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ममता साव9
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ममता साव9
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ममता साव9
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ममता साव9
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ममता साव9
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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६७९
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ममता साव9
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Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''गदह भू—गदाधर'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|गदहछू (हिं० पु०) एक प्रकारका खेल। इसमें एक लड़का दूसरे लड़केको चक्षु बांधकर शेष लड़कों को छूनेके लिये कहता है। जिन लड़कोंका पता वह कह दे उन्हें "गदडो" और जिन्हें न कर सके उन्हें "गदहा" कह कर पुकारते हैं। उसके बाद गदहे गर्दाक्षियों पर चढ़कर एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।}}
{{outdent|गदहा (हिं० पु०) १ रोग हरनेवाला, वैद्य, चिकित्सक। २ गर्दभ। गर्दभ देखे।}}
{{outdent|गदहिला (हिं० पु०) ईंट और सुरखीसे लदे हुवे गढ़। २ गोवरे लेक तरहका एक विषैला कीड़ा।}}
{{outdent|गदांवर (हिं० पु०) मेघ।}}
{{outdent|गदा (सं० स्त्री०) गद घटाञ् लोहमय शस्त्रविशेष। इसमें लोहेका डंडा होता है और डंडे सिर पर भारी बहू लगा रहता है। इसका ठंडा पकड़कर लड़का जोरसे शत्रु पर प्रहार करते हैं। प्रयुद्ध में गदायुद्ध ही अतिशय कठिन और योद्धाओंका बलसापेक्ष है। अग्निपुराणमें आहत, गोमूत्र, प्रभृत, कमलासन, ऊर्ध्वगात, नामित, दक्षिण, वृत्त, परावृत्त, पदोद्धृत, अवप्लुत, हंसमार्ग और विमार्ग इन कई प्रकारके गदायुद्धका उल्लेख है। महाभारतमें मण्डल, गतप्रत्यागत, अस्त्रयन्त्र, स्थान, परिमोक्ष, प्रहारवर्जन, परिधावन, अभिद्रवण, विक्षेप, अवस्थान, सविग्रह, परिवर्तन, संवर्त, अवनत, उपप्लुत, उपन्यस्त और अपन्यस्त इन कई प्रकारके गदायुद्धके कनक्री कथा वर्णित है। गदायुद्धमें निपुण महाबली भीम और दुर्योधनके गदायुद्ध से स्वर्गमर्त्य पातालवासियोंको विस्मयापन्न कर दिया था। टीकाकार नीलकण्ठके मतसे युद्धकालमें शत्रु के चारो ओर घूम कर युद्ध करनेका नाम मण्डल है। जो कौशलसे शत्रु के निकट पहुंच कर फिर हठात् दूर भाग जाता है, उसको गतप्रत्यागत कहते हैं। शत्रु के कठिन मर्मदेशका पातन कर ऊपरकी ओर उठाने या नीचे फेंकनेको अस्त्रयन्त्र कहते हैं। आघात के उपयुक्त मर्मदेश अर्थात् कर्मस्थानमें आघात करने को स्थान कह कर उल्लेख किया है।}}
वेगसे घूमने फिरनेको परिधावन, वेगसे शत्रु के सम्मुख उपस्थित होनेको अभिद्रवण, शस्त्र के यत्नसे ही उसीके नाश करके कामको प्राक्षेप, युद्धमें किसी तरह की चञ्चलता प्रकाश नहीं करनेको अवस्थान, शत्रु के पहुंचने पर अत्यन्त
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
फिर भी उसके साथ युद्ध करनेको सविग्रह, शत्रु के चारों ओर विचरण करनेकी परिवर्तन, उसको इधर उधर टलने न देनेको संवर्त, शत्रु के प्रहारसे अपनेको बचानेके लिये अवनत होकर भाग जानेको अवनत, विपक्ष के आघातसे रक्षा पानेके लिये पीछे हट जानेको उपप्लुत, शत्रु के पास पहुंचकर गदा प्रहारको उपन्यस्त और घूमकर हाथ से शत्रु को मारनेका नाम अपन्यस्त है।<Small>(भारत शल्य० ५६ अध्यायकी टीका देखों)</Small> देवताओंके बीच विष्णु भगवान् ही गदायुद्धमें अति निपुण हैं। वायुपुराण में लिखा है कि गद नामका एक भयङ्कर असुर था जिसकी अस्थि वज्रसे भी कठिन थी। गदासुर देवताओं के ऊपर बहुत अत्याचार किया करता था। अन्तमें ब्रह्माजीने उसके शरीर से अस्थि ले ली और उसीसे विष्णुकी गदा बनाई गई<Small>(वायुपुराण)।</Small> २ बुद्धितत्त्व, महत्तत्त्व, बड़प्पन।
{{C|<small>"समस्यात्मकं च बुद्धितत्त्वात्मिका गदाम्।" (विश्व)</Small>}}
३ पाटलवृक्ष। ४ योगविशेष।
{{outdent|गदाई (फा० स्त्री०) तुच्छ, नीच। २ रही।}}
{{outdent|गदाक्षेत्र—विरजाक्षेत्रका दूसरा नाम।<Small> बड़ा बाजार देखो</Small>।}}
{{outdent|गदाख्य (सं० क्ली०) गदा इत्याख्या यस्य, बहुव्री०। कोष्ठ, कोढ़।}}
{{outdent|गदागद (सं० पु०) अश्विनीकुमार।}}
{{outdent|गदाग्रज (सं० पु०) गदस्य अग्रजः, ६-तत्। १ बलराम। २ कृष्ण।}}
{{outdent|गदाग्रणी (सं० पु०) गदस्य अग्रणी, ६-तत्। क्षयरोग। सभी रोगों में बलके कारण क्षयरोगका नाम गदाग्रणी पड़ा।}}
{{outdent|गदाधर (सं० पु०) गदां धरति गदा-धृ-अच्। १ विष्णु। इन्होंने गदासुर नामक राक्षसकी हड्डियोंसे एक गदा बनाकर धारण की, इसीसे इनका नाम गदाधर पड़ा। यह गदा विष्णुभगवान्को जिस तरह मिली वह वायुपुराणमें लिखा है। एक समय ब्रह्मपुत्र पेतिरक्षने ब्रह्माकी आराधना की। ब्रह्मा उसकी कठिन तपस्यासे संतुष्ट हो कर उसको वर देनेके लिये उपस्थित हुए। तिरक्षने निवेदन किया "प्रभो! यदि इस अधम पर आपकी कृपा हुई तो मुझे यह वर दीजिये कि मैं त्रिलोकमें अजेय रहूं। देवास्त्र, असुरास्त्र या मनुष्यास्त्र से मुझे किसी प्रकारका अनिष्ट न हो।" ब्रह्माजीने इसे}}
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Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गदह भू—गदाधर'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|गदहछू (हिं० पु०) एक प्रकारका खेल। इसमें एक लड़का दूसरे लड़केको चक्षु बांधकर शेष लड़कों को छूनेके लिये कहता है। जिन लड़कोंका पता वह कह दे उन्हें "गदडो" और जिन्हें न कर सके उन्हें "गदहा" कह कर पुकारते हैं। उसके बाद गदहे गर्दाक्षियों पर चढ़कर एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।}}
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वेगसे घूमने फिरनेको परिधावन, वेगसे शत्रु के सम्मुख उपस्थित होनेको अभिद्रवण, शस्त्र के यत्नसे ही उसीके नाश करके कामको प्राक्षेप, युद्धमें किसी तरह की चञ्चलता प्रकाश नहीं करनेको अवस्थान, शत्रु के पहुंचने पर अत्यन्त
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फिर भी उसके साथ युद्ध करनेको सविग्रह, शत्रु के चारों ओर विचरण करनेकी परिवर्तन, उसको इधर उधर टलने न देनेको संवर्त, शत्रु के प्रहारसे अपनेको बचानेके लिये अवनत होकर भाग जानेको अवनत, विपक्ष के आघातसे रक्षा पानेके लिये पीछे हट जानेको उपप्लुत, शत्रु के पास पहुंचकर गदा प्रहारको उपन्यस्त और घूमकर हाथ से शत्रु को मारनेका नाम अपन्यस्त है।<Small>(भारत शल्य० ५६ अध्यायकी टीका देखों)</Small> देवताओंके बीच विष्णु भगवान् ही गदायुद्धमें अति निपुण हैं। वायुपुराण में लिखा है कि गद नामका एक भयङ्कर असुर था जिसकी अस्थि वज्रसे भी कठिन थी। गदासुर देवताओं के ऊपर बहुत अत्याचार किया करता था। अन्तमें ब्रह्माजीने उसके शरीर से अस्थि ले ली और उसीसे विष्णुकी गदा बनाई गई<Small>(वायुपुराण)।</Small> २ बुद्धितत्त्व, महत्तत्त्व, बड़प्पन।
{{C|<small>"समस्यात्मकं च बुद्धितत्त्वात्मिका गदाम्।" (विश्व)</Small>}}
३ पाटलवृक्ष। ४ योगविशेष।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८१
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2026-07-20T15:09:15Z
Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१९'''|'''गन्धकारौ—गन्धतन्मात्र'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|गन्धकारी(सं० स्त्री०) मोहन, मलई का पेड़।}}
{{outdent|गन्धकालिका(सं० स्त्री०) गन्धकाली कन्-टाप्। व्यासदेव की माता सत्यवती।}}
{{outdent|गन्धकाली(सं० स्त्री०) गन्धः प्रशस्तगन्धस्तत्र चमति पर्याप्नोति चम्-अच् गौरादित्वात् ङीष्। १ व्यासदेव की माता, उनका दूसरा नाम सत्यवती था। सत्यवती देखो।
२ कुन्ती की मूर्तिधारिणी शापभ्रष्टा एक अप्सरा। हनुमान् के हाथ से निहत होकर मुक्ति पाई थी। (रामायण)}}
{{outdent|गन्धकाष्ठ(सं० क्ली०) गन्धयुक्तं काष्ठमसौ, बहुव्री०। १ अगुरुचन्दन, अगर की लकड़ी। २ शम्बरचन्दन। (राजनि०)}}
{{outdent|गन्धकी(सं० स्त्री०) शल्लकी, शलई।}}
{{outdent|गन्धकी(देशज) गन्धक के रंग का हलका पीला।}}
{{outdent|गन्धकुटी(सं० स्त्री०) गन्धस्य कुटीव आधारः। १ मरा नामक गन्धद्रव्य। २ किसी मन्दिर के भीतर की वह कोठरी जिसमें बहुत-सी देवमूर्तियाँ रखी हों। ३ जैनियों के केवलियों की कुटी। तीर्थङ्करों के लिए इन्द्रादिदेव समवशरण की रचना करते हैं। परन्तु साधारण केवली भगवान् के लिये गन्धकुटी की रचना होती है। जैसे—रामचन्द्रकेवली और गौतमकेवली की गन्धकुटी।}}
{{outdent|गन्धकुसुमा(सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं कुसुमं यस्याः, बहुव्री०। गणिका पुष्पवृक्ष, गनियार का पेड़।}}
{{outdent|गन्धकूटी(सं० स्त्री०) बौद्धविहारस्थ आराम स्थान। "यावत् भगवता गन्धकूट्याम्..." (दिव्यावदान में पूर्णावदान)}}
{{outdent|गन्धकनिका(सं० स्त्री०) गन्धं लेशं धारयति, कस्तूरी, एक सुगन्धित द्रव्य, मृगनाभि।}}
{{outdent|गन्धकोकिला(सं० स्त्री०) गन्धप्रधाना कोकिला इव। गन्धद्रव्यविशेष, सुगन्धकोकिला। इसका गुण—तीक्ष्ण, उष्ण, कफनाशक, तिक्त और सुगन्धि है। (भावप्रकाश)}}
{{outdent|गन्धकोलिका(सं० स्त्री०) गन्धमालती के समान गन्धद्रव्यविशेष।}}
{{outdent|गन्धखेड़(सं० क्ली०) गन्धस्य खेला यत्र, बहुव्री०। सुगन्धित ग्राम, गन्धखेड़। इसका पर्याय भूषण, रोहिष, गोमयप्रिय और मखवास है।
"न यशस्विनम्।" (हरिवं० २०५।१०)}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
गंध, सुरस, सुरभि, सुगन्धि। यह तिक्त, रसायन, स्निग्ध, मधुर, शीतल, कफ, पित्त और श्रमनाशक एवं सुगन्धि होता है। (राजनि०)
{{outdent|गन्धगज(सं० पु०) हाथियों में श्रेष्ठ।}}
{{outdent|गन्धगर्भ(सं० पु०) का पेड़।}}
{{outdent|गन्धगृहा(सं० स्त्री०) गन्धद्रव्यविशेष।}}
{{outdent|गन्धघ्राण (सं० स्त्री०) नासिका, नाक।}}
{{outdent|गन्धत्राण(सं० क्ली०) गन्ध का बाण।}}
{{outdent|गन्धचेलिका(सं० स्त्री०) गन्धं चेलति गच्छति येन। कस्तूरी, मृगनाभि।}}
{{outdent|गन्धजटिला(सं० स्त्री०) जटिला, वच, हैमती का पेड़।}}
{{outdent|गन्धजल(सं० क्ली०) गन्धद्रव्यवासितं जलम्, मध्यपदलो०। सुगन्धि कुसुमादि वासित जल, सुगन्धित जल, "फल्गूनां" (भाग० ११४)।}}
{{outdent|गन्धजात(सं० क्ली०) गन्धो वासनादौ जातौ यस्मात्, बहु०। १ तेजपत्र, तेजपात। गन्धानां जातम्, ६-तत्। २ गन्धसमूह।}}
{{outdent|गन्धज्ञा(सं० स्त्री०) गन्धं जानाति ज्ञा-कर्तरि क-टाप्। नासिका, नाक।}}
{{outdent|गन्धतण्डुल(सं० क्ली०) गन्धः प्रधानं तण्डुलमस्य, बहुव्री०। सुगन्धि शालिविशेष, वासफुल चावल।}}
{{outdent|गन्धतन्मात्र(सं० क्ली०) गन्धस्य तन्मात्रम्, ६-तत्। सांख्यमतसिद्ध सूक्ष्म द्रव्य। इसको हम लोग देख नहीं सकते, इस लिये हमारा यह भोग्य नहीं है। योगी और देवतागण इसका भोग करते हैं। स्थूल पृथ्वी का गन्ध जिसका हम लोग अनुभव करते हैं, वह शान्त, घोर या मूढ़ अर्थात् सुखकर, दुःखकर या मोहजनक है। किन्तु गन्धतन्मात्र में जो गन्ध है वह शान्त और घोर या मूढ़ नहीं है। दान्तगण इस तन्मात्र को ही अपञ्चीकृतभूत नाम से कहा करते हैं। नैयायिक और वैशेषिकगण तन्मात्र स्वीकार नहीं करते हैं, उनके मत में परमाणु (पृथ्वी का अत्यन्त सूक्ष्म भाग, जिसको और भाग कर नहीं सकते) वही चरम अवयव है। सांख्यभाष्यकार विज्ञानभिक्षु ने इस}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८२
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2026-07-21T08:29:01Z
Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१८'''|'''गन्ध—गन्धद्विप'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
मतका खण्डन किया है।<Small> तन्मय शब्द के विस्तृत विवरण देखो।</Small>
{{outdent|गन्धतुलसी (सं० स्त्री०) सुगन्ध तुलसी, गोलाप तुलसी।}}
{{outdent|गन्ध (सं० क्ली०) गंधे हिंसास्थाने, युद्ध से आहन्यमानं तूर्य। रणवाद्यविशेष, लड़ाईकी तूरी, बाजा। इसका पर्याय तूर्य और महास्वन है।}}
{{outdent|गन्धतृण (सं० क्ली०) गन्धप्रधानं तृणं मध्यपदलो०। गन्धयुक्त तृणविशेष, रुसाघास। इसके पर्याय—सुगन्ध, भूतृण, सुरस, सुरभि और मुखवास हैं। इसके गुण—यह तिक्त, सुगन्धि, रसायन, स्निग्ध, मधुर, शीतल, कफ, पित्त और श्रान्तिनाशक है। <></Small>(राजनि०)</Small>}}
{{outdent|गन्धतेल (सं० क्ली०) गन्धयुक्तस्य चन्दनस्य अग्नियोगेन जनितं तैलं, मध्यपदलो०। १ गन्धयुक्त तेलविशेष। इसको चन्दनका अतर भी कहते हैं।
{{c|<Small>"प्रदीप का गंधतेनावचिते।" (भारत २।६०)</Small>}}
२ सुश्रुतोक्त औषध और तेलविशेष। इसकी पाक-प्रणाली इस तरह है—कृष्णातिलको रात्रिके समय जलमें भिगो देना चाहिये एवं दिनमें सूर्यकी गर्मीसे सुखा कर गोदुग्धमें भावना देनी चाहिये। तीन रात्रि वा सात रात्रि इसी तरह करनेके बाद मधुमिश्रित जलमें भावना देते रहें अनन्तर गोदुग्धकी भावनासे सुखा कर चूर्ण कर डालें और काकोल्यादिगण, यष्टिमधु, मञ्जिष्ठा, श्यामालता, कुड़धूमा, जटामांसी, देवदारु, रक्तचन्दन और शतपुष्प इन सबका चूर्ण पूर्वोक्त तिलक चूर्णमें मिला दें। गुड़त्वक्, इलाची, तेजपात, नागकेशर, कर्पूर, कक्कोल, अगुरु, कुङ्कुम और लवंगको दुग्धमें पाक करें और उस दुग्धमें वह समस्त पाक कर तेल बाहर निकाल लें। उस तेलको फिरसे दुग्धमें पाक करें। इसके बाद इलायची, शालपर्णी, तेजपात, जीरक, तगरपादुका, लोध, शैलज, सैरेयक, शुष्क भूमिकूष्माण्ड, अनन्तमूल, मधुलिका और शृङ्गाटकको एकत्र पेषण कर उष्ण तैलके साथ थोड़ी आगमें पाक करें। आक्षेप, पक्षाघात, तालुशोष, अर्दित, सामक, वायुरोग, शिरोरोग, कर्णशूल, हनुग्रह, बधिरता, तिमिररोग और क्षीणता इन समस्त रोगोंमें खाने, मर्दन करने, सूंघने और भोजनमें इस तेलका प्रयोग करनेसे उक्त रोग नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवनसे ग्रीवा, स्कंध और वक्षस्थलकी पुष्टि होती है और मुख पद्मसा प्रफुल्ल और निश्वास सुगंध
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
युक्त होता है। इसका नाम गंधतैल है।{{Right|</Small> (सुश्रुत चि० ४०)</Small>}}
{{outdent|गन्धत्वक् (सं० क्ली०) गंधप्रधाना त्वक् यस्य, बहुव्री०। गंधद्रव्यविशेष, सुगंध वृक्षका छिलका, एलवालुक, एलवा।}}
{{outdent|गन्धदला (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं दलं यस्याः, बहुव्री०। अजमोदा, अजवायनकी तरहका एक पेड़।}}
{{outdent|गन्धदारु (सं० क्ली०) गन्धप्रधानं दारु। चन्दन।}}
{{outdent|गन्धद्रवा (सं० क्ली०) गंधप्रधानं द्रवा। १ नागकेशर। २ तेल पाक होने पर जिन द्रव्योंको डाल कर औषधको सुगंधित करते हैं, वैद्यकशास्त्र में उन्हींको गंधद्रवा कहते हैं। इलायची, चन्दन, कुङ्कुम, अगुरु, मुरा, कक्कोल, जटामांसी, श्रीवासच्छद, चोरक, कर्पूर, शैलज, उशीर, कस्तूरी, नखी, रोहितृषा, मोथा एवं लवङ्गादि गंधद्रवा कहलाते हैं।}}
{{outdent|गन्धद्रावक (सं० क्ली०) गंधयुक्तं द्रावकं। प्लीहादि रोगनाशक औषधविशेष, एक प्रकारका अर्क। इसकी प्रस्तुत-प्रणाली यों है:—गंधक तथा सोराको यन्त्रयोग से जला कर उसका धूम मूसाके पात्रमें जलवाष्पके साथ मिश्रित किया जाता है। इसीको गन्धद्रावक कहते हैं। इसके गुण—अग्निवीर्य, अतिशय उग्र, प्लीहादि पीड़ानाशक, अग्निदीपक और सर्व प्रकारके उदररोगविनाशक हैं। रक्तस्राव, अतिशय धर्म, विसूची, तरुणज्वर और अग्निमान्द्यादि रोगों में यह विशेष उपकारी है। परिमित द्रावक चौदह गुना जल में मिला कर १ बिन्दु सेवन करना चाहिये। यह अत्यन्त दाहकर होता है। बिना जलके सेवन करना अहितकर है। गन्धद्रावकको अंगरेजी भाषामें Sulphuric Acid या Oil of Vitriol कहते हैं। यह कभी कभी आम्नेय पर्वतके निकट अल्प परिमाणमें मिलता है। यह गंधक और सोरासे प्रस्तुत किया जाता है। इसकी प्रस्तुत प्रणाली आत्रेयसंहितामें लिखी हुई प्रणालीसे बहुत कुछ मिलती जुलती है।}}
{{outdent|गन्धद्विप (सं० पु०) गंधप्रधानो मदगंधयुक्तो द्विपः।
मदगंधयुक्त हस्ती, उत्कृष्ट हस्ती, अच्छा हाथी।
{{c|<Small>"पिवन्मदञ्जीवः" (किरात १०।१०)</Small>}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१८'''|'''गन्ध—गन्धद्विप'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
मतका खण्डन किया है।<Small> तन्मय शब्द के विस्तृत विवरण देखो।</Small>
{{outdent|गन्धतुलसी (सं० स्त्री०) सुगन्ध तुलसी, गोलाप तुलसी।}}
{{outdent|गन्ध (सं० क्ली०) गंधे हिंसास्थाने, युद्ध से आहन्यमानं तूर्य। रणवाद्यविशेष, लड़ाईकी तूरी, बाजा। इसका पर्याय तूर्य और महास्वन है।}}
{{outdent|गन्धतृण (सं० क्ली०) गन्धप्रधानं तृणं मध्यपदलो०। गन्धयुक्त तृणविशेष, रुसाघास। इसके पर्याय—सुगन्ध, भूतृण, सुरस, सुरभि और मुखवास हैं। इसके गुण—यह तिक्त, सुगन्धि, रसायन, स्निग्ध, मधुर, शीतल, कफ, पित्त और श्रान्तिनाशक है। <></Small>(राजनि०)</Small>}}
{{outdent|गन्धतेल (सं० क्ली०) गन्धयुक्तस्य चन्दनस्य अग्नियोगेन जनितं तैलं, मध्यपदलो०। १ गन्धयुक्त तेलविशेष। इसको चन्दनका अतर भी कहते हैं।}}
{{c|<Small>"प्रदीप का गंधतेनावचिते।" (भारत २।६०)</Small>}}
२ सुश्रुतोक्त औषध और तेलविशेष। इसकी पाक-प्रणाली इस तरह है—कृष्णातिलको रात्रिके समय जलमें भिगो देना चाहिये एवं दिनमें सूर्यकी गर्मीसे सुखा कर गोदुग्धमें भावना देनी चाहिये। तीन रात्रि वा सात रात्रि इसी तरह करनेके बाद मधुमिश्रित जलमें भावना देते रहें अनन्तर गोदुग्धकी भावनासे सुखा कर चूर्ण कर डालें और काकोल्यादिगण, यष्टिमधु, मञ्जिष्ठा, श्यामालता, कुड़धूमा, जटामांसी, देवदारु, रक्तचन्दन और शतपुष्प इन सबका चूर्ण पूर्वोक्त तिलक चूर्णमें मिला दें। गुड़त्वक्, इलाची, तेजपात, नागकेशर, कर्पूर, कक्कोल, अगुरु, कुङ्कुम और लवंगको दुग्धमें पाक करें और उस दुग्धमें वह समस्त पाक कर तेल बाहर निकाल लें। उस तेलको फिरसे दुग्धमें पाक करें। इसके बाद इलायची, शालपर्णी, तेजपात, जीरक, तगरपादुका, लोध, शैलज, सैरेयक, शुष्क भूमिकूष्माण्ड, अनन्तमूल, मधुलिका और शृङ्गाटकको एकत्र पेषण कर उष्ण तैलके साथ थोड़ी आगमें पाक करें। आक्षेप, पक्षाघात, तालुशोष, अर्दित, सामक, वायुरोग, शिरोरोग, कर्णशूल, हनुग्रह, बधिरता, तिमिररोग और क्षीणता इन समस्त रोगोंमें खाने, मर्दन करने, सूंघने और भोजनमें इस तेलका प्रयोग करनेसे उक्त रोग नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवनसे ग्रीवा, स्कंध और वक्षस्थलकी पुष्टि होती है और मुख पद्मसा प्रफुल्ल और निश्वास सुगंध
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
युक्त होता है। इसका नाम गंधतैल है।{{Right|</Small> (सुश्रुत चि० ४०)</Small>}}
{{outdent|गन्धत्वक् (सं० क्ली०) गंधप्रधाना त्वक् यस्य, बहुव्री०। गंधद्रव्यविशेष, सुगंध वृक्षका छिलका, एलवालुक, एलवा।}}
{{outdent|गन्धदला (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं दलं यस्याः, बहुव्री०। अजमोदा, अजवायनकी तरहका एक पेड़।}}
{{outdent|गन्धदारु (सं० क्ली०) गन्धप्रधानं दारु। चन्दन।}}
{{outdent|गन्धद्रवा (सं० क्ली०) गंधप्रधानं द्रवा।}}
१ नागकेशर। २ तेल पाक होने पर जिन द्रव्योंको डाल कर औषधको सुगंधित करते हैं, वैद्यकशास्त्र में उन्हींको गंधद्रवा कहते हैं। इलायची, चन्दन, कुङ्कुम, अगुरु, मुरा, कक्कोल, जटामांसी, श्रीवासच्छद, चोरक, कर्पूर, शैलज, उशीर, कस्तूरी, नखी, रोहितृषा, मोथा एवं लवङ्गादि गंधद्रवा कहलाते हैं।}}
{{outdent|गन्धद्रावक (सं० क्ली०) गंधयुक्तं द्रावकं। प्लीहादि रोगनाशक औषधविशेष, एक प्रकारका अर्क। इसकी प्रस्तुत-प्रणाली यों है:—गंधक तथा सोराको यन्त्रयोग से जला कर उसका धूम मूसाके पात्रमें जलवाष्पके साथ मिश्रित किया जाता है। इसीको गन्धद्रावक कहते हैं। इसके गुण—अग्निवीर्य, अतिशय उग्र, प्लीहादि पीड़ानाशक, अग्निदीपक और सर्व प्रकारके उदररोगविनाशक हैं। रक्तस्राव, अतिशय धर्म, विसूची, तरुणज्वर और अग्निमान्द्यादि रोगों में यह विशेष उपकारी है। परिमित द्रावक चौदह गुना जल में मिला कर १ बिन्दु सेवन करना चाहिये। यह अत्यन्त दाहकर होता है। बिना जलके सेवन करना अहितकर है। गन्धद्रावकको अंगरेजी भाषामें Sulphuric Acid या Oil of Vitriol कहते हैं। यह कभी कभी आम्नेय पर्वतके निकट अल्प परिमाणमें मिलता है। यह गंधक और सोरासे प्रस्तुत किया जाता है। इसकी प्रस्तुत प्रणाली आत्रेयसंहितामें लिखी हुई प्रणालीसे बहुत कुछ मिलती जुलती है।}}
{{outdent|गन्धद्विप (सं० पु०) गंधप्रधानो मदगंधयुक्तो द्विपः।}}
मदगंधयुक्त हस्ती, उत्कृष्ट हस्ती, अच्छा हाथी।
{{c|<Small>"पिवन्मदञ्जीवः" (किरात १०।१०)</Small>}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१८'''|'''गन्धागवाय—गन्धपाषाण'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|गन्धधारी (सं० त्रि०) गन्धं गंधयुक्तं द्रवां धारयति धारि-णिनि। १ जो गंध द्रवाको धारण करता हो। (पु०) २ महादेव।}}
{{C|<small>"वरूप गंधधारी कप हर्शन" (भारत अनु० १७ पृ०)</small>}}
{{outdent|गन्धधूम (सं० पु०) गंधस्य गंधायाः धूमात् जायते 'धूम-जन्-क' स्वादु नामक गंधद्रवा।}}
{{outdent|गन्धभूति (सं० स्त्री०) गंधयुक्त भूतिः यस्याः, बहुव्री०। कस्तूरी।}}
{{outdent|गन्धन (सं० क्ली०) गंध-ल्युट्। १ उत्साह, हिम्मत। २ प्रकाश, ज्योति, चमक। ३ हिंसा, वध। ४ सूचन, भेद, गंध।}}
{{C|<small>"वा गतिगन्धनयोः" (कौमुदी, धातुपाठ)</small>}}
{{outdent|गन्धनकुल (सं० पु०) गंधेन गन्धेन नकुल इव। कुकुन्दर।}}
{{outdent|गन्धनाकुली (सं० स्त्री०) गंधयुक्ता नाकुली। रास्नाविशेष, एक प्रकारका नकुलीकंद। (Ophioxylon Serpentinum) इसका पर्याय—महासुगंधा, सुबहा, मीना, फणिहन्त्री, अहिभुक्, विषमर्दनिका, अहिमर्दनी, महाहिगन्धा, नकुलाह्या और अहिलता है। यह तिक्त, कटु, उष्ण, त्रिदोषनाशक और विषघ्न माना गया है। (प्रकाश) २ चविका, चवा नामकी दवा। ३ कन्दविशेष।}}
{{outdent|गन्धनाम (सं० पु०) गंधेति पदयुक्तं नाम यस्य, बहुव्री०। रमतुलसी, लाल तुलसी।}}
{{outdent|गन्धनामकर्म—जैनमतानुसार वह कर्म जिसके उदयसे शरीरमें सुगंध और दुर्गन्ध उत्पन्न हो। शुभगन्धनामकर्मसे सुगंधित और अशुभगन्धनामकर्मसे दुर्गन्धित शरीर हो जाता है।<small>(सर्वार्थसिद्धि)</small>}}
{{outdent|गन्धनाभ्या (सं० स्त्री०) क्षुद्ररोगविशेष, एक साधारण रोग।}}
{{outdent|गन्धनालिका (सं० स्त्री०) गंधस्य गंधज्ञानस्य नालिका इव। नासिका, नाक।}}
{{outdent|गन्धनाली (सं० स्त्री०) गंधस्य नालीव। नासिका।}}
{{outdent|गन्धनिलया (सं० स्त्री०) गंधस्य निलयो वासो यत्र, बहुव्री०। नवमल्लिका, चमेलीका फूल।}}
{{outdent|गन्धनिशा (सं० स्त्री०) गंधेन निशा हरिद्रा इव। गन्धपत्रा, शठीविशेष, कपूर कचूरी।}}
{{Left| Vol. VI. 46|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गन्धप (सं० त्रि०) गंधं पिवति, गंध-पा-क। देवताविशेष, एक देवताका नाम।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"यातुधानासुरा गन्धपा दृष्टिपाश्च।
बाधा गरुडाश्च ममाविरुद्धाः॥" (भारत अनु० १८५ पृ०)</poem>}}}}
{{outdent|गन्धपत्र (सं० क्ली०) गन्धयुक्तं पत्रम्। तेजपात। इसका गुण वातनाशक, शीतल और अग्निवर्धक है।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"गांथा सौरभयौ च गंध नपुंसकम्।
गंधपत्रं वातहरं शीतल वन्हि बर्द्धनम्॥" (वैद्यक)</poem>}}}}
(पु०) गन्धयुक्तं पत्रं यस्य, बहुव्री०। २ श्वेततुलसी। ३ मरुववृक्ष, मरुवा। ४ बब्जूर, बबूल। ५ नागरङ्ग, नारङ्गी। ६ बिल्व, बेल।
{{outdent|गन्धपत्रा (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं पत्रं यस्याः, बहुव्री० ततः टाप्। गँठीविशेष, कपूर कचूरी। इसका पर्याय—स्थला, तिक्तकंदिका, वनजा, शठिका, वन्या, तवचीरी, एकपत्रिका, गंधपीता, पलाशान्ता, गन्ध्याद्या, गंधपत्रिका, दीर्घपत्रा, निशा, वेदमुख्या और सुपाकिनी।}}
इसका गुण—कटु, स्वादु, तीक्ष्ण, उष्ण, वात, कास, व्रणनाशक तथा पित्तकोपहृचिकर है।
{{outdent|गन्धपत्रिका (सं० स्त्री०) गंधपत्रा संज्ञायां कन्-टाप्। १ गन्धपत्रा। २ अजमोदा। (निघण्टु)}}
{{outdent|गन्धपत्री (सं० स्त्री०) १ अम्बष्ठा, एक लता, पाढ़। २ गन्धा, एक झाड़ी, गंधा। ३ अजमोदा।}}
{{outdent|गन्धपर्ण (सं० क्ली०) गन्धयुक्तं पर्णमस्य, बहुव्री०। गन्धपत्र, काकपुष्प।}}
{{outdent|गन्धपर्णी (सं० स्त्री०) सप्तपर्णी।}}
{{outdent|गन्धपलाशिका (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं पलाशमस्याः, बहुव्री० कन्-टाप्। हरिद्रा, हल्दी।}}
{{outdent|गन्धप्लाशी (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं पलाशं यस्याः, बहुव्री०। शठी, गन्धपत्रा, कपूरकचूरी। शब्दार्थचिन्तामणिके मत से इसका गुण—कषाय, ग्राही, लघु, तिक्त, तीक्ष्ण, कटु, मलनाशक, कास, व्रण, श्वास, शूल और हिचकीनाशक है।}}
{{outdent|गन्धपाषाण (सं० पु०) गन्धयुक्तः पाषाण इव। उपधातुविशेष, गंधक।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "अभ्रद्वयावायवचूर्ण यवक्षारयवैषितम्।
उपसिनाम व्रजस्या, वटु तो ससुतेय च" (चक्रपाणि) एक एक</poem>}}}}
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{{C|<small>"वरूप गंधधारी कप हर्शन" (भारत अनु० १७ पृ०)</small>}}
{{outdent|गन्धधूम (सं० पु०) गंधस्य गंधायाः धूमात् जायते 'धूम-जन्-क' स्वादु नामक गंधद्रवा।}}
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{{outdent|गन्धनाम (सं० पु०) गंधेति पदयुक्तं नाम यस्य, बहुव्री०। रमतुलसी, लाल तुलसी।}}
{{outdent|गन्धनामकर्म—जैनमतानुसार वह कर्म जिसके उदयसे शरीरमें सुगंध और दुर्गन्ध उत्पन्न हो। शुभगन्धनामकर्मसे सुगंधित और अशुभगन्धनामकर्मसे दुर्गन्धित शरीर हो जाता है।<small>(सर्वार्थसिद्धि)</small>}}
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बाधा गरुडाश्च ममाविरुद्धाः॥" (भारत अनु० १८५ पृ०)</poem>}}}}
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गंधपत्रं वातहरं शीतल वन्हि बर्द्धनम्॥" (वैद्यक)</poem>}}}}
(पु०) गन्धयुक्तं पत्रं यस्य, बहुव्री०। २ श्वेततुलसी। ३ मरुववृक्ष, मरुवा। ४ बब्जूर, बबूल। ५ नागरङ्ग, नारङ्गी। ६ बिल्व, बेल।
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इसका गुण—कटु, स्वादु, तीक्ष्ण, उष्ण, वात, कास, व्रणनाशक तथा पित्तकोपहृचिकर है।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१८२'''|'''गन्धपिण्डीर—गन्धवणिक्'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|गन्धपिण्डीर (सं० पु०) कृष्णमदनवृक्ष।}}
{{outdent|गन्धपिशाचिका (सं० स्त्री०) गंधेन पिशाचान् किरति दूरीकरोति यद्वा गंधेन पिशाचान् कृष्णाति हन्ति पिशाच-डु। धूप। धूपगंध से पिशाचगण दुःखित होकर भाग जाते हैं। इस लिये धूपका नाम गंधपिशाचिका पड़ा है।}}
{{outdent|गन्धपीता (सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं पीतं पत्रं यस्याः, बहुव्री० टाप्। १ शठीविशेष, कपूर कचरी। २ गन्धपत्रा।}}
{{outdent|गन्धपुष्प (सं० पु०) गंधयुक्तं पुष्पं अस्य, बहुव्री०। १ वेतसवृक्ष, बेतका पेड़। २ अङ्कोटवृक्ष, अकोला। ३ बहवारवृक्ष, बहुआर-लसोड़ा। ४ अशोकवृक्ष। (को०) गंधश्च पुष्पञ्च, इतरेतरद्वन्द्व। ५ गंध और पुष्प।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"अभावे गंधपुष्पस्य केवलेन जलेन वा।" (आह्निकतत्त्व)</poem>}}}}
६ गन्धयुक्तपुष्प, वह फूल जिसमें गंध हो।
{{outdent|गन्धपुष्पक (सं० पु०) गंधपुष्प संज्ञायां कन्। वेतसवृक्ष, बेतका गाछ।
{{outdent|गन्धपुष्पा (सं० स्त्री०) गंधयुक्तं पुष्पं यस्याः, बहुव्री०। १ नीलीवृक्ष, नीलका पेड़। २ केतकीवृक्ष। ३ गणिकारीवृक्ष, गनियारीका पेड़।}}
{{outdent|गन्धप्रिय (सं० त्रि०) गंधः प्रियो यस्य, बहुव्री०। जिसकी गंध अत्यन्त प्रिय हो।}}
{{outdent|गन्धप्रियङ्गु (सं० स्त्री०) प्रियङ्गु लता, फूलफेन।}}
{{outdent|गन्धप्रियङ्गुका (सं० स्त्री०) गंधप्रधाना प्रियङ्गुका। प्रियङ्गुविशेष। प्रियङ्गु देखो।}}
{{outdent|गन्धफणिज्झक (सं० पु०) गंधप्रधानः फणिज्झकः। रक्ततुलसीवृक्ष, लाल तुलसीका पेड़।}}
{{outdent|गन्धफल (सं० पु०) गंधयुक्तं फलं यस्य, बहुव्री०। १ कपित्थवृक्ष, कैथका पेड़। २ बिल्ववृक्ष, बेलका पेड़। ३ तेजःफलवृक्ष।}}
{{outdent|गन्धफला (सं० स्त्री०) गंधयुक्तं फलं यस्याः, बहुव्री० टाप्। १ प्रियङ्गुवृक्ष। २ मेथिका, मेथी। ३ विदारी। ४ शल्लकीवृक्ष, शलईका पेड़।}}
{{outdent|गन्धफली (सं० स्त्री०) १ चम्पाकी कली। २ प्रियङ्गु।}}
{{outdent|गन्धवणिक् (सं० पु०) गंधस्य आमोदयुक्तद्रव्यस्य वणिक्, ६-तत्। वङ्गवासी जातिविशेष। इस जातिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें लोगोंका मतभेद है। ये अपनेको वैश्यजाति}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
के अन्तर्गत और चाँदसौदागर के वंशज बतलाते हैं। कोई कोई पद्मपुराणोक्त शाहराजको ही इन लोगों के वंशका आदिपुरुष मानते हैं। आज कल के वैश्यकी नाई ये यज्ञोपवीत धारण नहीं करते और शूद्रके जैसा एक मास मृत अशौच मानते हैं।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"अम्बष्ठाद् राजकन्यायां जायते गांधिको वणिक्।
गन्धचन्दनधूपादिक्रयविक्रयकारकः॥"</poem>}}}}
{{Right|<Small>(ब्रह्मवैवर्तपुराण पर रामपद्धति)</Small>}}
{{Gap}}अर्थात् अम्बष्ठके औरस और राजपूत महिलाके गर्भ से गंधवणिकका जन्म है। गंध, चन्दन और धूपादिका क्रय, और विक्रय इनकी उपजीविका है।
प्रवाद है कि कुब्जादासी कंसराजकी सभामें रहती तथा राजसदनमें फूल चन्दन प्रभृति विविध सुगंधि द्रव्य संग्रह करती थी। एक दिन जब श्रीकृष्णचन्द्रजी मथुरामें कंसपुर जा रहे थे, मार्ग में ही उन्हें कुब्जादासी से भेंट हुई। श्रीकृष्णने उस दासीको सुन्दर बना कर अपनी पटराणी बना ली। कुब्जाके गर्भप्रसूत बालक ही सबसे पहले गंधद्रव्य विक्रय करते रहे तथा वेही गंधवणिक के आदिपिता ठहराये गये। इसके अतिरिक्त एक दूसरा प्रवाद है कि देवादिदेव शिवजीको दुर्गाके साथ विवाहके समय गंधद्रव्यका प्रयोजन पड़ा। इस लिये उन्होंने गंधवणिक बनाया। पहिले अपने कपालसे "देश", बगल से "शङ्ख", नाभिसे "ऑउत" और पादसे "छत्रिश" इन चार मनुष्योंकी सृष्टि की।
गन्धवणिक् जातियोंमें उताश्रम, छत्रिशाश्रम, देशाश्रम और शङ्खाश्रम येही चार नामधेय श्रेणी वर्तमान हैं। इनके गोत्र अलम्यन, भरद्वाज, काश्यप, कृष्णात्रेय, मौद्गल्य, नृसिंह, राजऋषि, सावर्ण और शाण्डिल्य हैं। देशाश्रमी गंधवणिक शाह, साधु, लाहा और खाँ एवं उताश्रममें दत्त, दे, धर, धार, कर, नाग, प्रभृति पदवियाँ पायी जाती हैं। इस जातिमें बाल्यावस्था में ही लड़कियोंकी शादी होती है। वर तथा कन्या पक्षवालेको सांसारिक अवस्थानुसार कन्यापण दिया जाता है। विक्रमपुरके गंधवणिक् उच्चवंशके हैं। इस लिये नीच घरमें कन्याको देनेसे वे अधिक रुपये लेते तथा पुत्रादिके विवाह में अल्प पण देते हैं। जब लड़का विवाह करने आता है तो उसे
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|'''१८३'''|'''गन्धवलिक—गन्धमादन'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
एक चम्पाकाठ पर बैठना पड़ता है और लड़कीकी एक चौकी या पीढ़ी पर बैठा कर सात बार वरका प्रदक्षिण कराते हैं। जहां चम्पाकाठ नहीं रहता वहां उनकी डाली या उनकी तखता पर लड़केको बैठाते हैं। विवाह समय वर कन्या दोनोंको लाल पाड़ जरद रंगका वस्त्र पहनाया जाता है। लड़कीको दशदिन पर्यन्त वर वस्त्र धारण करना पड़ता है। इन लोगों में द्वि या बहुविवाहकी प्रथा प्रचलित नहीं है, किन्तु प्रथमा स्त्री से कोई सन्तान न होने पर द्वितीय बार विवाह करने में किसी प्रकारकी बाधा नहीं है। विवाह विच्छेद या विधवाविवाह पूर्णतः निषिद्ध है। किसी स्त्रीके व्यभिचारिणी वा परपुरुषगामिनी होने पर वह जाति और हिन्दू-समाजसे बहिष्कृत की जाती एवं उसका स्वामी उसकी मूर्ति बनाकर दाहकार्य करता है और इसके लिये एक मिथ्या श्राद्ध भी होता है।
इनके क्रियाकलापादि उच्चश्रेणीके हिन्दूके जैसे हैं। इन लोगोंमें अधिकांश वैष्णव, शाक्त और अल्पसंख्यक शैव हैं। वैशाख पूर्णिमाको ये एक पात्रमें सिन्दूर लगा कर उसके सम्मुखमें डण्डी, बटखरा और हिसाबकी बही रखकर षोडशोपचार अपने अपने इष्टदेवका पूजन करते हैं। गंधेश्वरी इनकी इष्टदेवी हैं। ब्राह्मणको बुलाकर गंधेश्वरी मूर्तिकी पूजा कराते हैं। अनेक प्रकारके मसाले, चन्दनादि द्रव्य और भिन्न भिन्न प्रकार के पौधे और औषध विक्रय करना इनका प्रधान व्यवसाय है। धन्वन्तरिविद्या नहीं होने पर भी ये कविराजी औषधकी व्यवस्था दे सकते हैं। अल्प स्वल्प रोग होने पर भी ये औषधका प्रयोग करते हैं। हिन्दुस्तानी भाषामें इन्हें "पनसारी" कहा करते हैं। हरएक पनसारीकी दूकानमें प्रायः चारसौ तरह के औषध रखे जाते हैं। ये लोग अपने ही हाथसे बहुत तरहके पाचनादि प्रस्तुत कर विक्रय करते हैं।}}
{{outdent|गन्धबन्धा (सं० स्त्री०) गंधस्य बंधो ग्रहणं यया, बहुव्री०, टाप्। नासिका, नाक।}}
{{outdent|गन्धबन्धु (सं० पु०) गंधं बध्नाति बंध-उण् या गंधस्य बंधुरिव। आम्रवृक्ष, आमका पेड़। (शब्दरत्ना०)}}
{{outdent|गन्धबहुल (सं० पु०) गंधो बहलो बहुलोऽस्य, बहुव्री०। सितानेक, श्वेततुलसी, बाजयसा।}}
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{{outdent|गन्धधवन (सं० पु०) गंधी बहुली, वही गंध—शालि, गंधयुक्त चावल।}}
{{outdent|गन्धबहुला (सं० स्त्री०) गंधी बहलो यस्याः, बहुव्री० ततः टाप्। गोरक्षीवृक्ष, एक प्रकारकी झाड़ी।}}
{{outdent|गन्धभद्रा (सं० स्त्री०) गंधो भद्रो रोगनाशको यस्याः, बहुव्री०। प्रसारणीलताविशेष, गंधाली लता।}}
{{outdent|गन्धभाण्ड (सं० पु०) गंधस्य भाण्ड इव। गर्दभाण्डवृक्ष, अमड़ाका पेड़। इसका पर्याय—नंदिवृक्ष, ताम्पाकी, फलपाकी, पीतक, गंधमुण्ड और क्षिप्रपाकी है।}}{{right|</small> (वैद्यकरत्नमाला)}}
{{outdent|गन्धभेदक (सं० पु०) १ कटक, एक प्रकार नमक। २ काचक, काला नमक। ३ लौह, लोहा। ४ तिलक, मीठातिल।}}
{{outdent|गन्धमांसी (सं० स्त्री०) गंधप्रधाना मांसी। जटामांसीविशेष। A kind of Indian spikenard। यह देखने में भ्रमरवर्ण और केशर जटाके सदृश है। इसका पर्याय—वंशी, भूतजटा, पिशाची, पूतना, भूतकेशी, लोमशा, जटना और लघुमांसी है। इसका गुण—तिक्त, शीतल, कफ, कण्ठरोग, रक्तपित्त, विष और ज्वरनाशक एवं कान्तिपर्द है।<small>आटामांसी देखो।</small>}}
{{outdent|गन्धमाता (सं० स्त्री०) गंधस्य माता जननी, ६-तत्। पृथ्वी।}}
{{outdent|गन्धमातङ्गा (सं० स्त्री०) गंधमतिति प्रतिबध्नाति, इयविशेष।}}
{{outdent|गन्धमाद (सं० पु०) १ श्रीरामचन्द्रजीकी सेनाका एक बन्दर।<small> (भागवत १०।६१)</small> राम और रावणकी लड़ाईमें इन्होंने अपना युद्धकौशलका अच्छा परिचय दिया था। २ कुरु और अक्रूरसे गांधिनीके गर्भमें उत्पन्न अक्रूरका भाई।<small> (भागवत ९।२४।१५)</small>३ भ्रमर, भौंरा।}}
{{outdent|गन्धमादन (सं० पु०-क्ली०) गंधेन मादयति मद-णिच्-ल्युट्। पर्वतविशेष, एक पहाड़का नाम। गंधमादन शब्दका प्रयोग प्रायः पुलिङ्गमें ही देखा जाता है।}}
{{C|<small>"तस्यापरे पूर्वपदे माल्यवद् गंधमादनौ। नीलमन्त्रिणौयायतौ।" (भागवत ५।१६।१०</small>किसी किसी स्थानमें क्लीवलिङ्गमें भी प्रयोग किया गया है।}}
<small>"यस्य चोपवनं स्वादु गंधमादनम्।" (कुमार०)</small>
गोलाध्यायके मतसे गंधमादन पर्वत रोमकपत्तनके
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इनके क्रियाकलापादि उच्चश्रेणीके हिन्दूके जैसे हैं। इन लोगोंमें अधिकांश वैष्णव, शाक्त और अल्पसंख्यक शैव हैं। वैशाख पूर्णिमाको ये एक पात्रमें सिन्दूर लगा कर उसके सम्मुखमें डण्डी, बटखरा और हिसाबकी बही रखकर षोडशोपचार अपने अपने इष्टदेवका पूजन करते हैं। गंधेश्वरी इनकी इष्टदेवी हैं। ब्राह्मणको बुलाकर गंधेश्वरी मूर्तिकी पूजा कराते हैं। अनेक प्रकारके मसाले, चन्दनादि द्रव्य और भिन्न भिन्न प्रकार के पौधे और औषध विक्रय करना इनका प्रधान व्यवसाय है। धन्वन्तरिविद्या नहीं होने पर भी ये कविराजी औषधकी व्यवस्था दे सकते हैं। अल्प स्वल्प रोग होने पर भी ये औषधका प्रयोग करते हैं। हिन्दुस्तानी भाषामें इन्हें "पनसारी" कहा करते हैं। हरएक पनसारीकी दूकानमें प्रायः चारसौ तरह के औषध रखे जाते हैं। ये लोग अपने ही हाथसे बहुत तरहके पाचनादि प्रस्तुत कर विक्रय करते हैं।}}
{{outdent|गन्धबन्धा (सं० स्त्री०) गंधस्य बंधो ग्रहणं यया, बहुव्री०, टाप्। नासिका, नाक।}}
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<small>"यस्य चोपवनं स्वादु गंधमादनम्।" (कुमार०)</small>
गोलाध्यायके मतसे गंधमादन पर्वत रोमकपत्तनके
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh|'''१८४'''|'''गन्धमादन—गन्धमूल'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>उत्तर केतुमाल और इलावृतवर्ष के मध्य में अवस्थित है। यह पर्वत नील और निषध तक विस्तृत है। विष्णुपुराणके मतमें यह सुमेरु पर्वतके दक्षिण भागमें अवस्थित है।
इस पर्वत के ऊपर जम्बू नामका एक वृक्ष है। इसके पूर्व में चैत्ररथ, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैब्राज और उत्तर में नन्दन नामक चार मनोहर उपवन हैं। देवगण इन्हीं उपवनोंमें आनंदसे विहार किया करते हैं। गन्धमादन किम्पुरुष, सिद्ध और चारणगणका आवासस्थान है। इस पर विद्याधर, विद्याधरी और किन्नरगण सर्वदा विचरण करते हैं।<small>(भारत वन १५८ पृ०)</small>
विष्णुपुराणका मत है कि इस पर्वत पर महाभद्र नामका एक ह्रद देवभोग्य सरोवर विद्यमान है।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"सरसराय त्रेतायुग महाभद्रं सितोदं मानसं।
सरस्यादीनि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥" (पुराण)</Poem>}}}}
किन्तु सिद्धान्तशिरोमणिके "मानस महाह्रदं" से स्पष्ट है कि गंधमादन पर्वत पर मानसरोवर है। एकही सरोवर के दो नाम रखे गये ऐसा स्वीकार कर विरोध भञ्जन करते हैं। मानसरोवर हिमालय पर्वतके उत्तर तिब्बतके मध्य में स्थित है।<small>भागवत देखो।</small>
२ गंधमादन पर्वत स्थित एक वन। ३ गंधमादन सत्रिवासी एक वानर, जिसने रामचन्द्रजीको लड़ाईमें सहायता दी थी।
{{C|<small>"गंधमादनवासी च मथितो गंधमादनः" (भारत वन २८० पृ०)</small>}}
४ उड़ीसाके केओंझर राज्यमें एक पहाड़। यह अक्षां० २१° ३८' १२" उ० और देशा० ८५° ३२' पू० पर स्थित है। इसकी ऊंचाई २४२८ फुट है। ५ भ्रमर, भौंरा। ६ गन्धक। ७ जैनमतानुसार सुमेरु पर्वतके पासपास के गजदन्तपर्वतोंमेंसे एक।}}
{{outdent|गन्धमादिनी (सं० स्त्री०) गन्धेन माद्यतेऽनया, मद-णिच्-इनि। १ मदिरा, शराब। २ वञ्जुल। ३ चौड़ा नामक गन्धद्रव्य। ४ लाक्षा, लाह, लाख।}}
{{outdent|गन्धमादिनी (सं० स्त्री०) गन्धेन मादयति, गन्ध-मद-णिच्-णिनि-ङीप्। १ लाक्षा, लाह। २ मुरा नामक गन्धद्रव्य।}}
{{outdent|गन्धमाद्रिका (सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष।}}
{{outdent|गन्धमाद्री (सं० स्त्री०) सुगन्धि विशेष।}}
{{outdent|गन्धमार्जार (सं० पु०) गन्धप्रधानः मार्जारः। खट्टाश, खटास, गंधबिलाव।}}
{{outdent|गन्धमार्जारवीर्य (सं० क्ली०) गन्धमार्जारस्याण्डवीर्यम्, कस्तूरिया। खटासी।}}
{{outdent|गन्धमालती (सं० स्त्री०) मालतीलताविशेष। इसका गुण गन्धकोकिला जैसा है।}}
{{C|<small>"गंधकोकिलया तुल्या विज्ञेया गंधमालती।" (भावप्रकाश)</small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गन्धमाला (सं० स्त्री०) क्षुद्ररोगभेद, एक तरह की साधारण बीमारी। गंधमाला देखो।}}
{{outdent|गन्धमालिनी (सं० स्त्री०) १ गन्धमाला अस्त्यस्याः, गन्धमाला-इनि-ङीप्। मुरा नामक गन्धद्रव्य। २ जैनमतानुसार विदेहकी नदियोंमेंसे एक नदी।}}
{{outdent|गन्धमाल्य (सं० क्ली०) गन्धश्च माल्यञ्च, इतरेतरद्वन्द्वः। गन्ध और माल्य।}}
{{C|<small>"अथ यदि गन्धमाल्यकामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतः।" (छान्दोग्य उपनिषद्)</small>}}
{{outdent|गन्धमांसी (सं० स्त्री०) जटामांसी।}}
{{outdent|गन्धमित्र—अयोध्या नगरके एक राजा। इनके पिताका नाम विजयसेन और माताका नाम विजयवती था। इनके पिता साधु होते समय इनके बड़े भाई जयसेनको राज्य दे गये थे और इनको युवराज बना गये थे। गंधमित्रने कर्मचारियों और प्रजावर्गको भड़का कर जयसेनको राज्यभ्रष्ट कर दिया था और खुद राजा बन गये थे। पीछे जयसेनने इन्हें फलोंके साथ विष सुंघाकर मार डाला था। (आराधनाकथाकोश)}}
{{outdent|गन्धमुखा (सं० स्त्री०) गन्धो मुखे यस्याः, बहुव्री०। १ कुकुन्दर। (त्रि०) २ जिसके मुंह में गंध हो।}}
{{outdent|गन्धमुण्ड (सं० पु०) गन्धं मुञ्चति निवारयति। लताविशेष, गंधिया, भाँट। इसका पर्याय—नन्दीश, ताम्रपाकी, फलपाकी, पीतक, गर्दभाण्ड और क्षिप्रपाकी है।}}
{{outdent|गन्धमूल (सं० पु०) गन्धप्रधानं मूलं यस्य, बहुव्री०। कुलञ्चन, अदरककी तरहका एक पौधा।}}
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इस पर्वत के ऊपर जम्बू नामका एक वृक्ष है। इसके पूर्व में चैत्ररथ, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैब्राज और उत्तर में नन्दन नामक चार मनोहर उपवन हैं। देवगण इन्हीं उपवनोंमें आनंदसे विहार किया करते हैं। गन्धमादन किम्पुरुष, सिद्ध और चारणगणका आवासस्थान है। इस पर विद्याधर, विद्याधरी और किन्नरगण सर्वदा विचरण करते हैं।<small>(भारत वन १५८ पृ०)</small>
विष्णुपुराणका मत है कि इस पर्वत पर महाभद्र नामका एक ह्रद देवभोग्य सरोवर विद्यमान है।
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सरस्यादीनि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥" (पुराण)</Poem>}}}}
किन्तु सिद्धान्तशिरोमणिके "मानस महाह्रदं" से स्पष्ट है कि गंधमादन पर्वत पर मानसरोवर है। एकही सरोवर के दो नाम रखे गये ऐसा स्वीकार कर विरोध भञ्जन करते हैं। मानसरोवर हिमालय पर्वतके उत्तर तिब्बतके मध्य में स्थित है।<small>भागवत देखो।</small>
२ गंधमादन पर्वत स्थित एक वन। ३ गंधमादन सत्रिवासी एक वानर, जिसने रामचन्द्रजीको लड़ाईमें सहायता दी थी।
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४ उड़ीसाके केओंझर राज्यमें एक पहाड़। यह अक्षां० २१° ३८' १२" उ० और देशा० ८५° ३२' पू० पर स्थित है। इसकी ऊंचाई २४२८ फुट है। ५ भ्रमर, भौंरा। ६ गन्धक। ७ जैनमतानुसार सुमेरु पर्वतके पासपास के गजदन्तपर्वतोंमेंसे एक।}}
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इस पर्वत के ऊपर जम्बू नामका एक वृक्ष है। इसके पूर्व में चैत्ररथ, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैब्राज और उत्तर में नन्दन नामक चार मनोहर उपवन हैं। देवगण इन्हीं उपवनोंमें आनंदसे विहार किया करते हैं। गन्धमादन किम्पुरुष, सिद्ध और चारणगणका आवासस्थान है। इस पर विद्याधर, विद्याधरी और किन्नरगण सर्वदा विचरण करते हैं।<small>(भारत वन १५८ पृ०)</small>
विष्णुपुराणका मत है कि इस पर्वत पर महाभद्र नामका एक ह्रद देवभोग्य सरोवर विद्यमान है।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"सरसराय त्रेतायुग महाभद्रं सितोदं मानसं।
सरस्यादीनि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥" (पुराण)</Poem>}}}}
किन्तु सिद्धान्तशिरोमणिके "मानस महाह्रदं" से स्पष्ट है कि गंधमादन पर्वत पर मानसरोवर है। एकही सरोवर के दो नाम रखे गये ऐसा स्वीकार कर विरोध भञ्जन करते हैं। मानसरोवर हिमालय पर्वतके उत्तर तिब्बतके मध्य में स्थित है।<small>भागवत देखो।</small>
२ गंधमादन पर्वत स्थित एक वन। ३ गंधमादन सत्रिवासी एक वानर, जिसने रामचन्द्रजीको लड़ाईमें सहायता दी थी।
{{C|<small>"गंधमादनवासी च मथितो गंधमादनः" (भारत वन २८० पृ०)</small>}}
४ उड़ीसाके केओंझर राज्यमें एक पहाड़। यह अक्षां० २१° ३८' १२" उ० और देशा० ८५° ३२' पू० पर स्थित है। इसकी ऊंचाई २४२८ फुट है। ५ भ्रमर, भौंरा। ६ गन्धक। ७ जैनमतानुसार सुमेरु पर्वतके पासपास के गजदन्तपर्वतोंमेंसे एक।}}
{{outdent|गन्धमादिनी (सं० स्त्री०) गन्धेन माद्यतेऽनया, मद-णिच्-इनि। १ मदिरा, शराब। २ वञ्जुल। ३ चौड़ा नामक गन्धद्रव्य। ४ लाक्षा, लाह, लाख।}}
{{outdent|गन्धमादिनी (सं० स्त्री०) गन्धेन मादयति, गन्ध-मद-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
णिच्-णिनि-ङीप्। १ लाक्षा, लाह। २ मुरा नामक गन्धद्रव्य।}}
{{outdent|गन्धमाद्रिका (सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष।}}
{{outdent|गन्धमाद्री (सं० स्त्री०) सुगन्धि विशेष।}}
{{outdent|गन्धमार्जार (सं० पु०) गन्धप्रधानः मार्जारः। खट्टाश, खटास, गंधबिलाव।}}
{{outdent|गन्धमार्जारवीर्य (सं० क्ली०) गन्धमार्जारस्याण्डवीर्यम्, कस्तूरिया। खटासी।}}
{{outdent|गन्धमालती (सं० स्त्री०) मालतीलताविशेष। इसका गुण गन्धकोकिला जैसा है।}}
{{C|<small>"गंधकोकिलया तुल्या विज्ञेया गंधमालती।" (भावप्रकाश)</small>}}
{{outdent|गन्धमाला (सं० स्त्री०) क्षुद्ररोगभेद, एक तरह की साधारण बीमारी। गंधमाला देखो।}}
{{outdent|गन्धमालिनी (सं० स्त्री०) १ गन्धमाला अस्त्यस्याः, गन्धमाला-इनि-ङीप्। मुरा नामक गन्धद्रव्य। २ जैनमतानुसार विदेहकी नदियोंमेंसे एक नदी।}}
{{outdent|गन्धमाल्य (सं० क्ली०) गन्धश्च माल्यञ्च, इतरेतरद्वन्द्वः। गन्ध और माल्य।}}
{{C|<small>"अथ यदि गन्धमाल्यकामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतः।" (छान्दोग्य उपनिषद्)</small>}}
{{outdent|गन्धमांसी (सं० स्त्री०) जटामांसी।}}
{{outdent|गन्धमित्र—अयोध्या नगरके एक राजा। इनके पिताका नाम विजयसेन और माताका नाम विजयवती था। इनके पिता साधु होते समय इनके बड़े भाई जयसेनको राज्य दे गये थे और इनको युवराज बना गये थे। गंधमित्रने कर्मचारियों और प्रजावर्गको भड़का कर जयसेनको राज्यभ्रष्ट कर दिया था और खुद राजा बन गये थे। पीछे जयसेनने इन्हें फलोंके साथ विष सुंघाकर मार डाला था। (आराधनाकथाकोश)}}
{{outdent|गन्धमुखा (सं० स्त्री०) गन्धो मुखे यस्याः, बहुव्री०। १ कुकुन्दर। (त्रि०) २ जिसके मुंह में गंध हो।}}
{{outdent|गन्धमुण्ड (सं० पु०) गन्धं मुञ्चति निवारयति। लताविशेष, गंधिया, भाँट। इसका पर्याय—नन्दीश, ताम्रपाकी, फलपाकी, पीतक, गर्दभाण्ड और क्षिप्रपाकी है।}}
{{outdent|गन्धमूल (सं० पु०) गन्धप्रधानं मूलं यस्य, बहुव्री०। कुलञ्चन, अदरककी तरहका एक पौधा।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८५'''|'''गन्धमूलक—गन्धयुक्ति'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|गन्धमूलक (सं० पु०) गन्धमूलमेव गन्धमूलं स्वार्थे कन्। १ शठी, कपूरकचरी। २ कच्छूर, कचर।}}
{{outdent|गन्धमूला (सं० स्त्री०) गन्धप्रधानं मूलं यस्याः, बहुव्री०। १ शल्लकी, शलई। २ शठी। (राजनि०)}}
{{outdent|गन्धमूलिका (सं० स्त्री०) गन्धमूला कन्-टाप्। १ माकन्दी, एक प्रकारका साग। २ शठी, कपूरकचरी।}}
{{outdent|गन्धमूषिक (सं० पु०) गन्धप्रधानी मूषिकः। कुकुन्दर।}}
{{outdent|गन्धमूषी (सं० स्त्री०) गन्धप्रधाना मूषी। कुकुन्दर।}}
{{outdent|गन्धमृग (सं० पु०) गन्धप्रधानो मृगः। १ कस्तूरीमृग, वह मृग जिसमें कस्तूरी पाई जाय। २ खट्टाश।}}
{{outdent|गन्धभृत्यपुष्प (सं० पु०) कदम्बवृक्ष।}}
{{outdent|गन्धमैथुन (सं० पु०) गन्धेन योनिगन्धग्रहणेन मैथुनं मैथुनारम्भो यस्य, बहुव्री०। वृषभ, बैल।}}
{{outdent|गन्धमोजवाह (सं० पु०) श्वफल्कके पुत्रका नाम।}}
{{outdent|गन्धमोदन (सं० पु०) गन्धेन मोदयति आह्नादयति। गन्धक।}}
{{outdent|गन्धमोदिनी (सं० स्त्री०) १ चम्पककली। २ चम्पकपुष्पकली, चम्पा फूलकी कली।}}
{{outdent|गन्धमोहिनी (सं० स्त्री०) गन्धेन मोहयति मुह-णिच्-णिनि। चम्पककलिका, चम्पाकी कली।}}
{{outdent|गन्धयुक्ति (सं० स्त्री०) गन्धानां गन्धद्रव्याणां युक्तिः योगः,
६-तत्। गन्धद्रव्योंका योगविशेष। इसके सेवन करने से शुक्रेतर बाल काले हो जाते हैं। उक्त ग्रन्थमें इसकी प्रस्तुत प्रणाली और गुण इस प्रकार वर्णित हैं—
जिसके बाल सफेद हो जाते हैं, उसे कुछ कपड़े और अलङ्कारादि भी शोभा नहीं देते हैं। बालोंकी शोभासे ही मनुष्य सुंदर देख पड़ते हैं। यहां तक कि बाल ही मनुष्योंके मनोहर और शोभाकर अलङ्कार हैं। किन्तु मनुष्योंके यह अनुपम अलङ्कार सर्वदाके लिये नहीं रहते, थोड़े ही दिन में कई एक कारणोंसे सफेद होकर मनुष्योंको मलीन बना देते हैं। इसलिये पवन और भूषणादिकी नाईं बालोंकी रक्षा करना एकान्त कर्तव्य है।}}
निर्मल लोहपात्रमें कोदों धानका चावल पाक करके लोहचूर्णके साथ पेषण करें। अच्छी तरह पीसनेके बाद उस परिमाणमें सिरके बालोंके ऊपर प्रलेप दें एवं भिगे हुए पत्रसे बांध रखें। दो प्रहरके पश्चात् उक्त प्रलेप
{{Left|Vol. VI.|47}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
को अलग करके मस्तकपर आँवलेका लेप देकर पहले जैसा भिगे हुए पत्र से फिर भी ढांक दें। दो प्रहरके बाद लेपको सिरसे अच्छी तरह धो डालें। ऐसा करनेसे उजले बाल काले हो जाते हैं। इसके पश्चात् सुगंध तैलादि लगाकर स्नान करें और मनोहर गन्ध तथा धूप द्वारा मस्तकको भली भाँति सुगन्धित कर लें जिससे इसमें किसी प्रकारकी दुर्गन्ध न रहे।
चम्पकाधि तेल—मञ्जिष्ठा, व्याघ्रनख, नखी, दालचीनी, कुड़, बोलनामक गन्धद्रव्य और एला इन सबकी तेलके साथ मिलाकर धूपमें गरम करना पड़ता है। इसीको चम्पकाधि कहते हैं।
गन्धद्रव्य प्रस्तुत करनेका नियम—शिलारस, वासिया, वाला और तगरका समान भाग मिश्रित करने पर जो गन्धद्रव्य प्रस्तुत होता है उसीको कामोद्दीपक गन्ध कहते हैं। इस गन्धमें वंशलोचन, बकुल और हींगका धूप मिलानेसे कटुक नामक द्रव्य बन जाता है। कटुक के साथ कुड़ मिलानेसे पद्म; पद्म गन्धके साथ चन्दन योग करनेसे चम्पक; चम्पक गन्धके साथ धनियाँ, जायफल और दालचीनी मिलानेसे अतिमुक्त नामक गन्धद्रव्य प्रस्तुत होता है।
सुगन्ध प्रस्तुत करनेकी प्रणाली—शतपुष्पा, कुन्दुरुको चार भागों का एक भाग, नखी और शिलारस आधा भाग एवं चन्दन और प्रियङ्गुके चौथाई भागको गुड़ और नखके साथ मिलाने पर एक प्रकारका सुगन्धि धूप तैयार होता है। इसके सिवा गुग्गुल, वाला, लाक्षा, मोथा, नखी और शर्करा इन सबको बराबर मिलानेसे एक प्रकारका धूप बन जाता है। जटामांसी, वाला, शिलारस, नखी और चन्दन द्वारा पिण्ड करने से भी धूप तैयार होता है। हरीतकी, शङ्ख, घनद्रव और वालाके बराबर बराबर भागों को मिलानेसे एक प्रकारका धूप बन जाता तथा उसमें गुड़ और उत्पल मिलानेसे दूसरे प्रकारका धूप तैयार होता है। दूसरे प्रकार धूपके साथ शैलज और मोथा मिश्रित करनेसे एक तीसरे प्रकारका धूप बन जाता है।
इन तीनों प्रकार के द्रव्योंमें क्रमशः अन्नद्रव्य चौथाई भाग देने से एक उत्कृष्ट धूप तैयार होता है। शर्करामें लेय और मोथाके चार भाग, यांवामक और सर्जरसके दो भाग, नखी और गुग्गुलके दो भागों को कर्पूर-
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>गन्धयुक्ति - गग्धव
[णं के साथ मिला कर मधु द्वारा पिण्ड प्रस्तुत करनेमे
कोपच्छद नामक धूप बनता है ।
परि
घन
चार
दालचीनी और उशीर के पत्तोंके साथ इसका
माण कोटो इलायची मिला कर चर्ण करें, इसके माथ
अल्पपरिमाण मृगनाभि और कर्पूर मिलाने से यह वामक
नामक अत्यन्त उत्कृष्ट गंधच र्ण तैयार होता है।
(अभ्र), वाला, शैलेय और कर्पूर; उशीर, नागपुष्प, व्याघ्र
नव और पिण्डिशाक, अगुरु, दमनक, नख और तगर:
धनियां, कपूर, चोर और चंदन इन चार
पदार्थों में एक एक गण होता है, इनके ममभागों से एक
प्रकार गंधच र्ण प्रस्तुत होगा। इनके प्रत्येक गणा
हो नाम गंधा है।
१४०२० भागों में
विभक्त हो सकता है। समस्त गंधद्री में नमी, नगर
नग्वी,
और गिन्नारम मिलाना पड़ता है। इमे जाति, कर
और मृगनाभि द्वारा सुगंधित तथा गुड़ और नवी द्वारा
पित करना होता है, इमोका नाम मव तोभद्र है।
इस मिश्रित पदार्थ की जातिफल, सुगनाभि धीर कर्पूर
धारा सुगंधित कर आस्त्रमधु द्वारा मिक्त तथा इच्छानुसार
चार भागों में बांटने बहुत तरह पारिजात मध
उत्पन्न होते हैं। इसमें मर्जरम और श्रीवामक मिला
कर जितना परिमाण दूध हो, उसमें उतना परिमाण
वाला और दालचीनी मिला दें, इसके बाद उन समस्त
द्रव्यों द्वारा स्नानजल प्रस्तुत कर लें ।
लोध, उशीर, नगरपादुका, गुरू, मोथा, मिथुन,
प्रियङ्ग,
मन और पथ्या इन समस्त द्रवको नवकोष्ठ कच्छपुट मे
तीन तीन द्रवों को मम्यरूपसे उद्धार कर चन्दन और
शिलारस दो भाग पत्र परिमाण शक्ति चतुच भाग शत
पुष्पा, कट, हिङ्गल और गुड़ दे कर धूपित करन
चौरामा प्रकार केशरगंध प्रस्तुत होते हैं । हरी-
युक्त गांव दन्तका ७ दन भिंगा रखनेके
बाद उसका गंधजनमें निप करें इन्नायची, दाल
चोनी, मधु मिर्च, नागपुष्प और कुछ इन
समस्त द्रतोंको मिलाकर निर्मल जन्नमें कुछ काल तक
रखनेके बाद गंधजन्न प्रस्तुत हो जाता है । इसके बाद
जातिफल, तेजपत्र, इलायची और कर्पूरको यथाक्रम
धार, दो, एक और तोन भागों द्वारा अवचूर्णित कर
सूर्य किरणमें सुखाना पड़ता है
सूर्य किरण में सुखाना पड़ता है । गंधयुक्त दन्तकाष्ठ
सेवन करने मुखको प्रसवता, कान्ति और सुगंधिको
वृद्धि होती तथा वाक्य भी अत्यन्त श्रतिसुखकर हो
जाता है। (हम हिता० ७०० )
गन्धयुति (मं० स्त्री) नानाप्रकार के गंधद्रका एव
मिश्रण, कई एक गन्धद्रवीको मिन्नावट ।
गन्धरस ( म ं० पु० ) गंधय, तो रमो यस्य, बहुत्रो० ।
उपधातुविशेष, सुगंधमार दमका पर्याय- योन, प्राण,
पिण्ड, गोप, रम, गोम, पिण्डगोम, शश, गोमशश, गांधार,
मites न, वोलज और गायक है गंध रमथ, इतर
तरन् । २ गंध और रम ।
"काय गोद
गंधपम् ||" ( भारत ५०२७/११ )
गन्धरमाङ्गक (सं० पु० ) गंधरमोऽ यस्य बहुव्रो०
ततः स्वार्थ
कन् । श्रीवेष्ट नामका गंध द्रवा ।
गन्धराज ( मं० पु० ) गंधानां गंधमाराणां राजा, ६ तत् ।
ततः टच् । गजाहतिमाष्टच १ १ मुहर वृक्ष,
मोगरा बेला । २ कण गुग्ग ुल । ३ पुष्पवृक्ष । इसके पुष्प में
इतनी सुगंधि है कि दशो दिशाएं श्रमोदित हो जाती है ।
इसमें लवण लिये १२ टन और शिविशिष्ट है ।
इसमें फल नहीं लगते हैं। इसको डाली रोपने से लगती
है। 8 श्रेष्ठगंध, अच्छी गध । ( क्लो० ) गंधन राजते
राज- अच । ५ चन्दन । ६ जवादि नामका गंधद्रवा ।
(०) धनराज राज-किप धूपक, धूमा।
८ नव नामक मुगंधद्रव्य ।
गन्धराजी (म० स्त्री० ) गंधराज यिां ङीप् । नखी
नामक गधद्रव्य
गन्धराजतेल ( मं० क्लो० ) वातव्याधितेल, वह तेल
जिसके सेवन से वातरोग जाता रहता है।
गन्धकहा (मं० [स्त्री० ) वनमल्लिका, काष्ठमल्लिका, एक
प्रकारको लता । इमका पर्याय-मदयन्ती, मोदयस्तो
और मरस्रवा है।
गन्धव ( मं० पु० ) गाः स्तुतिरूपा गीतिरूपा वा वाचः
रश्मि वा धारयति धृव । १ घोटक, घोड़ा ।
“पथ' सत्य-अयामासु समालिनि।" (भारत २०१६१०१३)
२ मृगविशेष, कम्त रोमृग । २ अन्तराभव ।
(११) अमर टीकाकार रायमुकुटका कथन है कि<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''गण—गणक'''|'''१४५'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इन नक्षत्रोंनें जन्म होने पर नरगण, चित्रा, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शतभिषा, मूला, धनिष्ठा, अश्लेषा और कृतिकामें राक्षसगण तथा रोहिणी, रेवती, पुष्य, स्वाती, हस्ता, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा और श्रवणामें जन्म लेने पर देवगण होते हैं।
वर और कन्याका एक गण होना अच्छा है। अगर एकने देवगणमें और दूसरेने नरगणमें जन्म लिया हो तो मध्यम फल है, देवगण और राक्षसगण में जन्म होनेसे अधम सोड़ा हो कर रहता है, किन्तु नरगण और राक्षसगणमें होनेसे नरगणवालेकी मृत्यु होती है।
७ स्वाति संज्ञक नक्षत्रसमूह।
"त्रयः पूर्वा मधान्तकाः।" (जोतिष)
८ वाणिज्यकारी वणिक् समूह।
"हरेद्यस्तु सम्विदं यश्च लङ्घयेत्।" (याज्ञवल्क्य)
९ व्याकरणप्रसिद्ध स्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि और चुरादि इन दशको गण कहते हैं। १० गणपाठग्रन्थ। ११ पाणिनिरचित खरादि स्वरूप प्रतिपादक पाठग्रन्थ।
१२ दैत्यविशेष, एक असुरका नाम। स्कन्दपुराणके गणेशखण्ड में इसका उपाख्यान इस तरह है—
किसी समय अभिजित् नामका एक ब्राह्मण अपनी स्त्री गुणवतीके साथ स्नान करनेके लिये समुद्र गये। गुणवतीने तृष्णासे कातर हो समुद्र जल पान किया। इस जलके साथ ब्रह्माका वीर्य उसके उदरमें प्रवेश किया। क्रमानुसार उस अमोघ वीर्य से ब्राह्मण पत्नी गुणवतीको गर्भ रहा। यथा समय गुणवतीने एक पुत्र प्रसव किया। यह पुत्र गण नामसे प्रसिद्ध दैत्य हुआ। युवावस्था पाने पर विधिकी आराधना की। शिवजीने तपस्या से सन्तुष्ट होकर उसे वर दिया तुम स्वर्ग, मर्त्य और पातालके ऊपर अपना आधिपत्य जमा सकते हो। इसका परिणाम यह हुआ कि वह गण दैत्य भयानक अत्याचारी हो गया। किसी दिन उसने महामुनि कपिलको अपमानित कर उनकी बहुमूल्य चिन्तामणिको ले लिया। महात्मा कपिलने दुःखित हो कर गणेशकी आराधना की। इस पर गणेश सन्तुष्ट हो कर गण दैत्यका विनाश करनेके लिये राजी हुए। थोड़े दिनके
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
बाद पार्वतीनन्दन गणराजने उसी दैत्य पर क्रुद्ध होकर उसका नाश किया। (स्कन्दपुराण गणेशखण्ड १० अ०)
{{c|{{x-smaller|<poem>
"सगणाय सपरिवाराय सायुधाय सशतिकाय इन्द्राय नमः।"
</poem>}}}
(विधानपारिजात)
१४ अनुचर, सेवक, पारिषद। १५ एक संस्कृत चिकित्सा-शास्त्र रचयिता। ये दुर्गके पुत्र थे। इन्होंने अश्वायुर्वेद या सिद्धयोगसंग्रह नामक ग्रन्थ की रचना की है।
१६ दि० जैन मतानुसार—आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शिक्षण, ग्लान, गण, कुल, और मनोज इन दश-प्रकार के मुनियोंमें से एक। जो बड़े मुनियोंकी परिपाटीके हों, उनका नाम 'गण' है।
"आचार्यों ध्यावत स्त्रियं ग्लानं गणकुलं सामनं।"
(तत्त्वार्थसू० २४ सूत्र)
१७ महावीर स्वामी के एक शिष्य।
{{outdent|गणक (सं० वि०) गणयति संख्यां करोति, गण-ण्वुल्। १ संख्याकारक, जो राशि स्थिर करता हो। (पु०) २ मातृकादेवोभक्त मुनिविशेष, एक मुनि जो मातृकादेवीके भक्त थे। ३ ज्योतिषी। इसका पर्याय—सांवत्सर, ज्योतिषिक, दैवज्ञ, ज्योतिर्विद्, मौहूर्तिक, मुहूर्तज्ञान और कालिक है।}}
बहुतका मत है कि जो ग्रहनक्षत्रादि विषय गणना करते, या ज्योतिषशास्त्र अध्ययन या व्यवसाय करते हैं वे पतित, निन्दनीय हैं और धर्मशास्त्रोंमें भी गणककी निन्दा पाई गई है।
{{c|{{x-smaller|<poem>
"वरं चाण्डालसंस्पर्शः कल्पिते साधकोत्तमः।
तथाप्यस्य मगधकं सदा तु परित्यजेत्।"
</poem>}}}
(ताराभक्तिरङ्गिणी १५ उल्लास)
धर्मशास्त्रकार सुमन्तका भी कथन है, "सांवत्सरिकोऽपाङ्क्तेयः।" सांवत्सरिक या दैवज्ञ अपांक्तेय है अर्थात् इनके साथ एक पंक्तिमें बैठकर आहारादि नहीं करना चाहिये। महाभारतमें लिखा है—
{{c|{{x-smaller|<poem>
"कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्च जीवति।
एतान्विनश्यतः सर्वान् प्राहुः पाङ्क्तेयदूषकान्॥"
</poem>}}}
नाटक खेलनेवाला, तनखाह पानेवाला, देवपूजक और जो नक्षत्रपद प्रभृति गणना कर जीविका निर्वाह करते हों, उन समस्त ब्राह्मणोंको पंक्तिदूषक अर्थात्...
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गण—गणक'''|'''१४५'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इन नक्षत्रोंनें जन्म होने पर नरगण, चित्रा, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शतभिषा, मूला, धनिष्ठा, अश्लेषा और कृतिकामें राक्षसगण तथा रोहिणी, रेवती, पुष्य, स्वाती, हस्ता, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा और श्रवणामें जन्म लेने पर देवगण होते हैं।
वर और कन्याका एक गण होना अच्छा है। अगर एकने देवगणमें और दूसरेने नरगणमें जन्म लिया हो तो मध्यम फल है, देवगण और राक्षसगण में जन्म होनेसे अधम सोड़ा हो कर रहता है, किन्तु नरगण और राक्षसगणमें होनेसे नरगणवालेकी मृत्यु होती है।
७ स्वाति संज्ञक नक्षत्रसमूह।
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८ वाणिज्यकारी वणिक् समूह।
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९ व्याकरणप्रसिद्ध स्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि और चुरादि इन दशको गण कहते हैं। १० गणपाठग्रन्थ। ११ पाणिनिरचित खरादि स्वरूप प्रतिपादक पाठग्रन्थ।
१२ दैत्यविशेष, एक असुरका नाम। स्कन्दपुराणके गणेशखण्ड में इसका उपाख्यान इस तरह है—
किसी समय अभिजित् नामका एक ब्राह्मण अपनी स्त्री गुणवतीके साथ स्नान करनेके लिये समुद्र गये। गुणवतीने तृष्णासे कातर हो समुद्र जल पान किया। इस जलके साथ ब्रह्माका वीर्य उसके उदरमें प्रवेश किया। क्रमानुसार उस अमोघ वीर्य से ब्राह्मण पत्नी गुणवतीको गर्भ रहा। यथा समय गुणवतीने एक पुत्र प्रसव किया। यह पुत्र गण नामसे प्रसिद्ध दैत्य हुआ। युवावस्था पाने पर विधिकी आराधना की। शिवजीने तपस्या से सन्तुष्ट होकर उसे वर दिया तुम स्वर्ग, मर्त्य और पातालके ऊपर अपना आधिपत्य जमा सकते हो। इसका परिणाम यह हुआ कि वह गण दैत्य भयानक अत्याचारी हो गया। किसी दिन उसने महामुनि कपिलको अपमानित कर उनकी बहुमूल्य चिन्तामणिको ले लिया। महात्मा कपिलने दुःखित हो कर गणेशकी आराधना की। इस पर गणेश सन्तुष्ट हो कर गण दैत्यका विनाश करनेके लिये राजी हुए। थोड़े दिनके
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बाद पार्वतीनन्दन गणराजने उसी दैत्य पर क्रुद्ध होकर उसका नाश किया।
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"सगणाय सपरिवाराय सायुधाय सशतिकाय इन्द्राय नमः।"
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{{Right|<small>(विधानपारिजात)</small>}}
१४ अनुचर, सेवक, पारिषद। १५ एक संस्कृत चिकित्सा-शास्त्र रचयिता। ये दुर्गके पुत्र थे। इन्होंने अश्वायुर्वेद या सिद्धयोगसंग्रह नामक ग्रन्थ की रचना की है।
१६ दि० जैन मतानुसार—आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शिक्षण, ग्लान, गण, कुल, और मनोज इन दश-प्रकार के मुनियोंमें से एक। जो बड़े मुनियोंकी परिपाटीके हों, उनका नाम 'गण' है।
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१७ महावीर स्वामी के एक शिष्य।
{{outdent|गणक (सं० वि०) गणयति संख्यां करोति, गण-ण्वुल्। १ संख्याकारक, जो राशि स्थिर करता हो। (पु०) २ मातृकादेवोभक्त मुनिविशेष, एक मुनि जो मातृकादेवीके भक्त थे। ३ ज्योतिषी। इसका पर्याय—सांवत्सर, ज्योतिषिक, दैवज्ञ, ज्योतिर्विद्, मौहूर्तिक, मुहूर्तज्ञान और कालिक है।}}
बहुतका मत है कि जो ग्रहनक्षत्रादि विषय गणना करते, या ज्योतिषशास्त्र अध्ययन या व्यवसाय करते हैं वे पतित, निन्दनीय हैं और धर्मशास्त्रोंमें भी गणककी निन्दा पाई गई है।
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"वरं चाण्डालसंस्पर्शः कल्पिते साधकोत्तमः।
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</poem>}}}}
{{Right|<small>(ताराभक्तिरङ्गिणी १५ उल्लास)</small>}}
धर्मशास्त्रकार सुमन्तका भी कथन है, <small>"सांवत्सरिकोऽपाङ्क्तेयः।"</small> सांवत्सरिक या दैवज्ञ अपांक्तेय है अर्थात् इनके साथ एक पंक्तिमें बैठकर आहारादि नहीं करना चाहिये। महाभारतमें लिखा है—
{{c|{{x-smaller|<poem>
"कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्च जीवति।
एतान्विनश्यतः सर्वान् प्राहुः पाङ्क्तेयदूषकान्॥"
</poem>}}}}
नाटक खेलनेवाला, तनखाह पानेवाला, देवपूजक और जो नक्षत्रपद प्रभृति गणना कर जीविका निर्वाह करते हों, उन समस्त ब्राह्मणोंको पंक्तिदूषक अर्थात्...
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८०'''|'''गन्धर्व'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्राणीकी मृत्यु होने पर जब तक दूसरा शरीर प्राप्त नहीं होता है, तब तक यह एक सूक्ष्म शरीर धारण कर यातना अनुभव करते हैं उनकी इस अवस्थाको अन्तराभवसत्त्व कहते हैं।
टीकाकार रमानाथके मत से अन्तराभवसत्त्व का अर्थ गुप्त प्राप्तने उदाहरण स्वरूप विराटपर्वका "गांधर्वा नव्यासन्न" यह वाक्य उद्धृत किया है।
४ ग्रहविशेष, एक प्रकारका ग्रह, जो समय पाकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर अनेक तरहकी अशन्ति उत्पादन करता है। वैद्यकचिकित्सक का कथन है कि वध और आतुर रोगियोंको निशाचरोंके हाथसे रक्षा करने के लिये सावधान रहना चाहिये। रोगी शौच या अशौच न हो किसी तरह अशुचि होते ही यह साक्षात् नाव पूर्ण करने अथवा पूजा पानेकी आशासे रोगीके शरीर में प्रवेश कर उसे अनेक तरह कष्ट देते हैं। यथा-नियम उनकी पूजा वा उपहार भोग नहीं देने से वे रोगी को मार डालते हैं।
इस प्रकार ग्रहों की संख्या बहुत है। किन्तु प्रधानतः ये आठ भागोंमें विभक्त किये जा सकते हैं। यथा देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, पितृ, राक्षस, भुजङ्ग और पिशाच। उनके आवेश होने पर रोगी भूत भविष्यत्का हाल मालूम कर सकता है। उस समय वह भूत और भविष्यत् घटना की जा...... है साफ़ साफ़ कह देता है उस समय रोगीकी महिला विलुप्त हो जाती है। जो सब कार्य मनुष्य बुद्धिसे अगम्य हैं, कभी भी उनसे वे कार्य सम्पन्न नहीं हो सकते उन्हें रोगी अनायास ही अनुष्ठान करके दर्शकों को विस्मयापन्न और आत्मीय स्वजनोंको भयविह्वल तथा शोककातर बना देता है। आधुनिक वैज्ञानिक जो कुछ कहें लेकिन प्राचीन विद्वान् इस अवस्थाको भूत वा ग्रहावेश कह एवं पूजादि करके रोगीको प्रकृतिस्थ कर देते थे।
गन्धर्व ग्रह के आवेश होने पर रोगीका मन सदा हृष्ट रहता और नदीतीर वा निर्जन वनमें भ्रमण करनेकी यथेष्ट अभिलाषा बनी रहती है। इस अवस्थामें रोगी गंध, माल्य और गीत बहुत पसन्द करता तथा कभी नाचता और कभी हँसता है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दर्पण छाया वा प्रतिबिम्ब प्राणीके देहमें शीतोष्ण और सूर्य किरण एवं देश जीव जिस प्रकार अलक्षित होकर प्रवेश हो जाते हैं, उसी प्रकार गंधर्व ग्रह भी अलक्षित होकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। इसकी शान्तिके लिये नियमित जप और होम प्रभृति देवक्रियायें करनी चाहिये। वर्ण गंधमाल्य मधु घृत अनेक प्रकारके खाद्य वस्त्र, मद्य, मांस, रुधिर और दुग्ध प्रभृति प्रदान करना उचित है।
इतने करने पर भी यदि रोगी की शान्ति न मिले तो औषध प्रयोग करना चाहिये। काकल, भालुक, शल्यक और इनके चमड़े और रोमकी ढी एवं काशमुच्च मिलाकर धूम प्रयोग करनेसे बलवान् ग्रहसे रोगी छुटकारा पा सकता है।
गोमपार्क, नकुल, बिडाल पर भालुकका पित्त एकत्र कर गजपिप्पली मूल, त्रिकटु आमलका क्षार सरसों देकर भावित करें। इसके नस्य लेने और सेवन करनेसे ग्रहकी शान्ति है।
नटकरञ्ज विकट, हीङ्गु, वेलमूल, हरिद्रा और दारुहरिद्राको एक साथ लेकर इसकी बत्ती बनावें। पित्तके सहयोग से इसका अञ्जन सेवन करने से ग्रहकी शान्ति होती है।
ये सब औषध या अन्य कोई चिकित्सा देवग्रहमें अयुक्तरूपमें प्रयोग नहीं करनी चाहिये। पिशाचके अतिरिक्त किसी दूसरे ग्रहमें कोई प्रतिकूल आचरण करना निषिद्ध है करनेसे वह क्रुद्ध होकर वैद्य और रोगी दोनोंको ही नाश कर डालता है।<small> (सुप्त उण ०६ अ०)</small>
गन्धर्वग्रहकी कथा वैदिक उपन्यास में भी वर्णित है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि किसी समय बहुत मुनिकुमार अध्ययनके लिये मद्रदेशको गये थे। विश्रामके लिये वे कपिगोत्रसम्भव पतञ्चलके गृहमें जा पहुँचे। वहाँ पतञ्चलकी कन्या गन्धर्वग्रहके आवेशमें शोच्यभूत देखा।
{{C|<small>"ऋधदण दतडह दतडढतथझल लधझ
तेज णतजझ झढढजथक्षश्रलदतत (बृह दधरमक)</small>}}
५ ऐरण्ड, अंडी।
{{C|<small>"ग लवधधमयलधधर हरिरधदत ध़़नमभभ ।(यदि प्रकाश)</small>
६ देवयोनिविशेष, स्वर्गके गायक। ये देवताकी
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८०'''|'''गन्धर्व'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्राणीकी मृत्यु होने पर जब तक दूसरा शरीर प्राप्त नहीं होता है, तब तक यह एक सूक्ष्म शरीर धारण कर यातना अनुभव करते हैं उनकी इस अवस्थाको अन्तराभवसत्त्व कहते हैं।
टीकाकार रमानाथके मत से अन्तराभवसत्त्व का अर्थ गुप्त प्राप्तने उदाहरण स्वरूप विराटपर्वका "गांधर्वा नव्यासन्न" यह वाक्य उद्धृत किया है।
४ ग्रहविशेष, एक प्रकारका ग्रह, जो समय पाकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर अनेक तरहकी अशन्ति उत्पादन करता है। वैद्यकचिकित्सक का कथन है कि वध और आतुर रोगियोंको निशाचरोंके हाथसे रक्षा करने के लिये सावधान रहना चाहिये। रोगी शौच या अशौच न हो किसी तरह अशुचि होते ही यह साक्षात् नाव पूर्ण करने अथवा पूजा पानेकी आशासे रोगीके शरीर में प्रवेश कर उसे अनेक तरह कष्ट देते हैं। यथा-नियम उनकी पूजा वा उपहार भोग नहीं देने से वे रोगी को मार डालते हैं।
इस प्रकार ग्रहों की संख्या बहुत है। किन्तु प्रधानतः ये आठ भागोंमें विभक्त किये जा सकते हैं। यथा देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, पितृ, राक्षस, भुजङ्ग और पिशाच। उनके आवेश होने पर रोगी भूत भविष्यत्का हाल मालूम कर सकता है। उस समय वह भूत और भविष्यत् घटना की जा...... है साफ़ साफ़ कह देता है उस समय रोगीकी महिला विलुप्त हो जाती है। जो सब कार्य मनुष्य बुद्धिसे अगम्य हैं, कभी भी उनसे वे कार्य सम्पन्न नहीं हो सकते उन्हें रोगी अनायास ही अनुष्ठान करके दर्शकों को विस्मयापन्न और आत्मीय स्वजनोंको भयविह्वल तथा शोककातर बना देता है। आधुनिक वैज्ञानिक जो कुछ कहें लेकिन प्राचीन विद्वान् इस अवस्थाको भूत वा ग्रहावेश कह एवं पूजादि करके रोगीको प्रकृतिस्थ कर देते थे।
गन्धर्व ग्रह के आवेश होने पर रोगीका मन सदा हृष्ट रहता और नदीतीर वा निर्जन वनमें भ्रमण करनेकी यथेष्ट अभिलाषा बनी रहती है। इस अवस्थामें रोगी गंध, माल्य और गीत बहुत पसन्द करता तथा कभी नाचता और कभी हँसता है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दर्पण छाया वा प्रतिबिम्ब प्राणीके देहमें शीतोष्ण और सूर्य किरण एवं देश जीव जिस प्रकार अलक्षित होकर प्रवेश हो जाते हैं, उसी प्रकार गंधर्व ग्रह भी अलक्षित होकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। इसकी शान्तिके लिये नियमित जप और होम प्रभृति देवक्रियायें करनी चाहिये। वर्ण गंधमाल्य मधु घृत अनेक प्रकारके खाद्य वस्त्र, मद्य, मांस, रुधिर और दुग्ध प्रभृति प्रदान करना उचित है।
इतने करने पर भी यदि रोगी की शान्ति न मिले तो औषध प्रयोग करना चाहिये। काकल, भालुक, शल्यक और इनके चमड़े और रोमकी ढी एवं काशमुच्च मिलाकर धूम प्रयोग करनेसे बलवान् ग्रहसे रोगी छुटकारा पा सकता है।
गोमपार्क, नकुल, बिडाल पर भालुकका पित्त एकत्र कर गजपिप्पली मूल, त्रिकटु आमलका क्षार सरसों देकर भावित करें। इसके नस्य लेने और सेवन करनेसे ग्रहकी शान्ति है।
नटकरञ्ज विकट, हीङ्गु, वेलमूल, हरिद्रा और दारुहरिद्राको एक साथ लेकर इसकी बत्ती बनावें। पित्तके सहयोग से इसका अञ्जन सेवन करने से ग्रहकी शान्ति होती है।
ये सब औषध या अन्य कोई चिकित्सा देवग्रहमें अयुक्तरूपमें प्रयोग नहीं करनी चाहिये। पिशाचके अतिरिक्त किसी दूसरे ग्रहमें कोई प्रतिकूल आचरण करना निषिद्ध है करनेसे वह क्रुद्ध होकर वैद्य और रोगी दोनोंको ही नाश कर डालता है।<small> (सुप्त उण ०६ अ०)</small>
गन्धर्वग्रहकी कथा वैदिक उपन्यास में भी वर्णित है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि किसी समय बहुत मुनिकुमार अध्ययनके लिये मद्रदेशको गये थे। विश्रामके लिये वे कपिगोत्रसम्भव पतञ्चलके गृहमें जा पहुँचे। वहाँ पतञ्चलकी कन्या गन्धर्वग्रहके आवेशमें शोच्यभूत देखा।
{{C|<small>"ऋधदण दतडह दतडढतथझल लधझ
तेज णतजझ झढढजथक्षश्रलदतत (बृह दधरमक)</small>}}
५ ऐरण्ड, अंडी।
{{C|<small>"ग लवधधमयलधधर हरिरधदत ध़़नमभभ ।(यदि प्रकाश)</small>}}
६ देवयोनिविशेष, स्वर्गके गायक। ये देवताकी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८०'''|'''गन्धर्व'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>सभामें गान, वाद्य और नाट्याभिनय किया करते हैं। ये देखने में बहुत सुन्दर होते हैं। स्वर्ग लोक में इनके ममान दूसरी कोई जाति रूपवती नहीं है। शब्दार्थ-चिन्तामणिके मत से गन्धर्ष दो भागों में विभक्त हैं—दिव्य और मर्त्य। जो मनुष्य इस कल्पके मध्य पुण्यवलसे गन्धर्वत्व प्राप्त होकर गन्धर्व समाजभुक्त हुए हैं उन्हींको सत्य और जो इस कल्पके पादिमे गन्धर्व हैं उनको दिव्य गन्धर्व कहते हैं। पग वेदमें भी दिव्यगंधर्वका उल्लेख पाया जाता है।
<Small>"गेबिग्स रमी तमी ग्रैनल गंध दिव्य गंधवा(अंक ५|८||)</small>
वही पुराणके मत से द य गंधर्व फिर ग्यारह भागों में विभक्त हैं—१ वा २ चहारिरारि ४ सूर्य-वर्ग, ५ धु, ६ स्त, सुहस्त, मूईवान्, महामना, १० विश्वावसु चोर ११ कमाण। जटाधरने पाठ प्रधान गंधर्व के नाम उसकर गंधर्व वंशका परिचय दिया है। यथा—हाहा, इह, चित्ररथ, हम, विखावस, गोमायु, तुम्बुरु चोर नन्दि ये ही गन्धर्वनगरमै हैं तथा इन्हीं के नाम पर एक एक वंश प्रतिष्ठित है। अथर्ववेद २२ गंधर्वोंका उन ख है।
मनुष्य के जैसे गन्धर्व भी दो ये णियोंमें विभक्त हैं—मौनेय और प्राधेय। मुनि और प्रधा नामके करव-ऋषिको दो पत्नी थीं। दक्षकन्या मुनिके गर्भ से १६ गन्धर्व उत्पन्न हुए। यथा—१ भीममेन २ उग्रसेन, ३ सुपर्ण, ४ वरुण ५ गोपति ६ टतराष्ट्र, ७ सूर्यवर्चा, ८ अर्कपर्ण, ९ पर्यन्य, १० कलि, ११ प्रयुत, १२ भीम, १३ चित्ररथ, १४ सर्वविद्दशी, १५ शालिशिरा और १६ नारद। इन्होंको मौनेय कहते हैं। प्रधाके गर्भ से १० गन्धर्व—१ अतिबाहु २ पूर्ण ३ बहु ४ पूर्णा, ५ ब्रह्मचारी, ६ रतिगुण, ७ सुपर्ण ८ विश्वावसु, ९ भानु और १० चन्द्र। ये ही प्रार्थय कलाये।
{{c|{{x-smaller|<poem>“यन्तो जो समुत्पन्ना गंधस्यात्। तत्
दिवस अभिवाच गंध” (रखियो)</poem>}}}}
ब्रह्मासे तत्क्षणात् गंधर्वकी उत्पत्ति हुई। (वाक्य वा गीत) धमन अर्थात् उच्चारण वा गान करते करते जन्म इस लिये यह गन्धर्व नामसे अभिहित हुए हैं। किसी किसीका मत है कि ब्रह्माकी कान्तिसे इम जातिकी उत्पत्ति हुई। ये रूप दान करते हैं।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
हरिवंश के मत से स्वारोचिष मन्वन्तरमें परिष्टाके गर्भ से गन्धर्वोंने जन्मग्रहण किया है। (हरिवंश अध्याय)
विष्णुपुराण में लिखा है कि गन्धर्वगण पाताल जा कर नागोंको परास्त करके उनके धनरत्नादि बलपूर्वक छीन ले आये। नागगणने विष्णुसे सहायता मांगी। विष्णु-भगवान् ने यह कह स्वीकार किया कि वे पुरुकुत्स रूपसे उन लोगोंकी सहायता कर सकते हैं। नागोंने अपनी बहन नर्मदाको विष्णुके निकट भेजा। नर्मदा पुरुकुत्सको साथ ले कर पाताल आई और पुरुकुत्स से पातालस्थ गंधर्वोंका विनाश हुआ।
(त्रि०) ७ गायक, जो गाम कर सकता हो। ८ रश्मिधारक, जो रश्मि या किरण धारण करता हो, चन्द्र, सूर्य प्रभृति। ९ द्वीपविशेष।
{{c|{{x-smaller|<poem>“भागोपसथा सौग्यं गंध तरुणः॥” (ब्रह्मा)
१० दिन, दिवस। "तस्यानीही गंध राज्याताः।" </poem>}}}}
{{right|<small>(भागवत ४।२८।२१)</small>}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“नमकत गंययध मूतमागधवन्दिनः।
मायन्ति चोसमशोक चरितान्य इ तानि च ॥” (भाग० १।११।१०)</poem>}}}}
११ शरीराधिष्ठात्री देवताविशेष, शरीरके अधिकारी एक देवताका नाम। इन्होंने अविवाहिता कामिनी के स्वामिसम्भोगके पहले उसका कुछ विकसितयौवन उपभोग किया था। ऋग्वेदमें लिखा है कि रमणियोंको पहले चन्द्र ने उसके बाद गंधर्व ने और तब अग्निने उपभोग किया। इन्हींके उपभोग शेष होने पर मनुष्य-पतिने उन्हें ग्रहण किया।
{{c|{{x-smaller|<poem>“सोमः प्रथमो विविदे गंधर्वो विविदे उत्तरः।
द्वतीयोऽनिष्ठति रोरसे मनुष्यना::” (१०।८५।४०)
१२ प्राणवायु। "वाच मनसा बिलसितं तदिदाहुरेकं ननन्तः" (ऋ० १०।१००।१२)</poem>}}}}
{{C|<small>"शब्दान् धावतो गंधर्वः प्राणवायुः" (सायण)</small>}}
१३ महाभारतवर्णित भारतके उत्तरवासी जातिविशेष। १४ श्वेतकरवीर, सफेद कनेर। १५ खस ऐरल, सफेद रेंड़ी।
१६ जैनमतानुसार व्यन्तर देवोंके आठ कुल होते हैं, किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच। ये गन्धर्वदेव तीर्थङ्करोंके जन्म-कल्याणमें नृत्य, वादित्रादि कर आनन्दित होते हैं।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" /></noinclude>गन्धवखण्ड-गन्धर्वलोक
यह
यह
गन्धर्व खण्ड (सं० को ० ) गंधर्व नामक खण्ड, मध्य-
पदलो० । भारतवर्षके अन्तर्गत एक प्रदेश गन्धार ।
गन्धर्व गढ़-बम्बई प्रदेशके वेलगाम जिलेके अन्तर्गत ए
उपविभाग । इस उपविभाग में वेलगाम्से प्रायः २१ मोल
पश्चिम सह्याद्रि पर्वतके पाश्व शाखाके समतन्न क्षेत्र से
४०० फुट ऊ ंचे पर गंधर्वगड़ गिरिदुर्ग है ।
दुर्ग १००० फुट चौरस भूमिके ऊपर निर्मित है ।
१७२४ ई०को साधन्तवाड़ी के राजा फोन्द सामन्तर्क
द्वितीय पुत्र नागसामन्तसे बनाया गया है । १७७८ ई० में
कोल्हापुरके राजाने गंधर्व गढ़को अपने अधिकार में कर
लिया, लेकिन १७८३ ई० में मिन्धियाराजकी सहायता से
गन्धर्वगड़ फिर भी सामन्तवाडीके दब्लमें श्रा गया ।
१७८७ ई० में नैसर्गी मर्दारने अपने स्वामी कोल्हापुर
राजा विरुद्ध युद्ध कर गंधर्व गढ़ और दूम दूसरे
स्थानों पर अपना दखल जमाया। किन्तु थोड़े समय के
बाद हो राजाने सर्दारको भगा कर गंधर्व गढ़ अपने
अधिकारमें लाया ।
मन्धर्वगृहीत (मंत्रि०) गंधर्वेण गृहीतः ६ - तत् ।
जिसको ने ग्रहण किया हो । गधवं खो ।
गन्धर्वग्रह (मं० पु० ) शरोरप्रवेशकारी उपदेवविशेष,
एक प्रकारका ग्रह जो भूत प्रेतको नाई मनुष्यकेश, रौर में
प्रवेश कर जाता है ।
गंधर्ष देखः ।
तीर्थ (सं० पु० ) तोर्थ विशेष, एक तोर्थं का नाम ।
( भारत ८५० )
तेल (सं० की ० ) एरण्डकतेल । रेंड़ोका तेल ।
गन्धर्व दत्त-पटना एक प्राचीन राजा, ये जैनमताव-
लम्बी था ।
गन्धर्व दत्ता -- जैनमतानुसार रत्नद्दीपके मनुजोदय नगर के
राजा गरुड़वे की पुत्री । यह दि०जैनधर्म में अचल श्रा
रखती थी। एक दिन वह जिनेन्द्रको पूजा करके
फलों का हार पिताके पास लाई । उसे यौवनवती देख
कर गरुड़वे गका बड़ो चिन्ता हुई । विपुलमति नामक
चारणमुनिसे मालूम हुआ कि यंत्र में हेमाङ्गद
देशके राजाके पुत्रसे इसका वीणा स्वयम्बर में विवाह
होगा। इस पर जिनदन्त नामके एक सेठने भरतक्षेत्र में
इस स्वयम्बरका आयोजन किया । स्वयम्बरम गन्धर्व
Vol. VI. 48
१८
दत्ताने बीणा बजाने में सब राजकुमारों को पराजित कर
दिया । आखिर सत्यधर के पुत्र जीवन्धरको वारी भाई ।
इन्होंने उसे पराजित कर दिया। इस पर काष्ठाङ्गारके
पुत्रों से गन्धर्वदत्ताको हरण करनेका उद्यम किया।
जीवन्धर कुमारको खबर लगते ही उन्होंने गन्धगज
(गन्धजातके हाथी पर सवार हो कर उन दुष्टों के उप-
मको नष्ट भ्रष्ट कर दिया। कुमारको वीरताको देख कर
गन्धव दत्ता तो फल न समाई । तुरत ही विवाह हो
गया, और दोनों सुख से रहने लगे । औवनधर देखी ।
(उत्तरपुर ११ )
२ जेनो के २२ वें तीर्थंकर नेमिनाथकं भाई बासुदे-
एक पक्ष ।
गन्धर्वनगर (सं० की ० ) गंधर्वाणां नगरं, ६ तत् । १ गगन
मण्डल में उदित श्रनिष्टसूचक पुरविशे ष । ७पुर देखा।
२ मानससरोवरका निकटवर्ती एक नगर । गंधव
मण इसकी देखभाल करते हैं,
इस लिये यह
गंधर्व नगर अभिहित है। महाभारतमें लिखा है कि-
महापराक्रमशाली अजु मने गंधर्व' रक्षित गंध नगरको
जय कर तिप्तिर, कल्माव और मण्डक नामके अश्वरन
प्राप्त किये थे । ( भारत २।१० अध्याय )
३ विजयपथ तको उत्तर श्रेणीका एक नगर ।
४ मिथ्या भ्रम, संसारकी उपमा गंधव नगरसे दो
जाती है ।
गन्धव भूषण ( मं० क्लो० ) सिन्दूर |
गन्धर्व राज-रागरत्नाकर नामक संस्कृत सङ्गीतग्रन्थप्रणेता ।
गन्धवं लोक (सं० पु० ) गन्धर्वाणां लोक भावासस्थानं,
६-तत् । गुचक लोकक ऊपर और विद्याधर लोकके
नीचे अवस्थित एक स्थान । इस स्थान पर देवगायक
गन्धर्वगण वास करते हैं। काशीखण्डका मत है कि ओ
गीतशास्त्राभित्र गान करके राजाओं को खुश कर मकते
एवं धन लोभसे मोहित हो कर धनशालो मानवगण-
को गान द्वारा स्तुति करके जो वस्त्र प्रभृति उनसे दान
पाते हैं उन्हें वे ब्राह्मणको देते हैं और गानमें
treat अतिशय प्रोति है एवं नाव्यशास्त्रमें भी विशेष
पारदर्शिता हैं, वे ही गन्धवं लोकको प्राप्त कर परम
सुखसे कालयापन करते हैं ।
()<noinclude></noinclude>
d7uxugwfvoc4n4djhkoje4kijdp4wyp
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2026-07-22T08:36:16Z
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८१'''|'''गन्धर्वखण्ड—गन्धर्वलोक'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|गन्धर्वखण्ड (सं० क्ली०) गंधर्व नामक खण्ड, मध्यपदलो०। भारतवर्षके अन्तर्गत एक प्रदेश गन्धार।}}
{{outdent|गन्धर्वगढ़—बम्बई प्रदेशके बेलगाम जिलेके अन्तर्गत एक उपविभाग। इस उपविभाग में बेलगाम्से प्रायः २१ मील पश्चिम सह्याद्रि पर्वतके पार्श्व शाखाके समतल क्षेत्र से ४०० फुट ऊंचे पर गंधर्वगढ़ गिरिदुर्ग है।
दुर्ग १००० फुट चौरस भूमिके ऊपर निर्मित है। १७२४ ई०को सामन्तवाड़ी के राजा फोन्द सामन्तके द्वितीय पुत्र नागसामन्तसे बनाया गया है। १७७८ ई० में कोल्हापुरके राजाने गंधर्वगढ़को अपने अधिकार में कर लिया, लेकिन १७८३ ई० में सिन्धियाराजकी सहायता से गन्धर्वगढ़ फिर भी सामन्तवाड़ीके दखलमें आ गया। १७८७ ई० में नैसर्गी सर्दारने अपने स्वामी कोल्हापुर राजा विरुद्ध युद्ध कर गन्धर्वगढ़ और दूसरे स्थानों पर अपना दखल जमाया। किन्तु थोड़े समय के बाद ही राजाने सर्दारको भगा कर गन्धर्वगढ़ अपने अधिकारमें लाया।}}
{{outdent|गन्धर्वगृहीत (सं० त्रि०) गन्धर्वेण गृहीतः, ६-तत्। जिसको गन्धर्वने ग्रहण किया हो। गंधर्वग्रस्त।}}
{{outdent|गन्धर्वग्रह (सं० पु०) शरीरप्रवेशकारी उपदेवविशेष, एक प्रकारका ग्रह जो भूत-प्रेतकी नाई मनुष्यके शरीर में प्रवेश कर जाता है। गंधर्व देखो।}}
{{outdent|गन्धर्वतीर्थ (सं० पु०) तीर्थविशेष, एक तीर्थका नाम।}}
{{Right|<Small>(भारत ८५०)</Small>}}
{{outdent|गन्धर्वतेल (सं० क्ली०) एरण्डकतेल। रेंड़ीका तेल।}}
{{outdent|गन्धर्वदत्त—पटनाके एक प्राचीन राजा, ये जैनमतावलम्बी थे।}}
{{outdent|गन्धर्वदत्ता—जैनमतानुसार रत्नद्वीपके मनुजोदय नगर के राजा गरुड़वेग की पुत्री। यह दि० जैनधर्म में अचल श्रद्धा रखती थी। एक दिन वह जिनेन्द्रकी पूजा करके फूलों का हार पिताके पास लाई। उसे यौवनवती देख कर गरुड़वेग को बड़ी चिन्ता हुई। विपुलमति नामक चारणमुनिसे मालूम हुआ कि क्षेत्र में हेमाङ्गद देशके राजाके पुत्रसे इसका वीणा स्वयम्बर में विवाह होगा। इस पर जिनदत्त नामके एक सेठने भरतक्षेत्र में इस स्वयम्बरका आयोजन किया। स्वयम्बरमे गन्धर्व-}}
{{Left|Vol. VI. 48|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दत्ताने वीणा बजाने में सब राजकुमारों को पराजित कर दिया। आखिर सत्यधर के पुत्र जीवन्धरकी वारी आई। इन्होंने उसे पराजित कर दिया। इस पर काष्ठाङ्गारके पुत्रों ने गन्धर्वदत्ताको हरण करनेका उद्यम किया। जीवन्धर कुमारको खबर लगते ही उन्होंने गन्धगज (गन्धजातके हाथी) पर सवार हो कर उन दुष्टों के उद्यमको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कुमारकी वीरताको देख कर गन्धर्वदत्ता तो फूली न समाई। तुरत ही विवाह हो गया, और दोनों सुख से रहने लगे।<Small> जीवन्धर देखो।</Small>
{{Right|<Small>(उत्तरपुराण ६१)</Small>}}
२ जैनों के २२ वें तीर्थंकर नेमिनाथके भाई वासुदेवका एक पक्ष।
{{outdent|गन्धर्वनगर (सं० क्ली०) गंधर्वाणां नगरं, ६-तत्। १ गगनमण्डल में उदित अनिष्टसूचक पुरविशेष।<Small> पुर देखो।</Small>}}
२ मानससरोवरका निकटवर्ती एक नगर। गंधर्वगण इसकी देखभाल करते हैं, इस लिये यह गंधर्वनगर अभिहित है। महाभारतमें लिखा है कि—महापराक्रमशाली अर्जुनने गंधर्व-रक्षित गंधर्वनगरको जय कर तित्तिर, कल्माष और मण्डूक नामके अश्वरत्न प्राप्त किये थे।<Small>(भारत २।१० अध्याय)</Small>
३ विजयपथ तककी उत्तर श्रेणीका एक नगर। ४ मिथ्या भ्रम, संसारकी उपमा गंधर्वनगरसे दी जाती है।
{{outdent|गन्धर्वभूषण (सं० क्ली०) सिन्दूर।}}
{{outdent|गन्धर्वराज—रागरत्नाकर नामक संस्कृत सङ्गीतग्रन्थप्रणेता।}}
{{outdent|गन्धर्वलोक (सं० पु०) गन्धर्वाणां लोकः आवासस्थानं, ६-तत्। गुह्यक लोकके ऊपर और विद्याधर लोकके नीचे अवस्थित एक स्थान। इस स्थान पर देवगायक गन्धर्वगण वास करते हैं। काशीखण्डका मत है कि जो गीतशास्त्राभिज्ञ गान करके राजाओं को खुश कर सकते एवं धन-लोभसे मोहित हो कर धनशाली मानवगणकी गान द्वारा स्तुति करके जो वस्त्र प्रभृति उनसे दान पाते हैं उन्हें वे ब्राह्मणको देते हैं और गानमें जिनकी अतिशय प्रीति है एवं नाट्यशास्त्रमें भी विशेष पारदर्शिता हैं, वे ही गन्धर्वलोकको प्राप्त कर परम सुखसे कालयापन करते हैं।<small>। K खाद्यान</small>}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१४२'''|'''गणकपति—गणनाममहामात्र'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>किन्तु उसमें भी किसी ग्रन्थका नाम नहीं है।
{{Right|<Small>पदार्थ देखो।</Small>}}
५ केतुविशेष। ये आठ होते और तारापुञ्ज जैसे दीखते हैं। बृहत्संहिताके अनुसार ये ब्रह्माके पुत्र माने गये हैं।
{{c|{{x-smaller|<poem>
'तारापुञ्जनिकाशा गणका नाम प्रजापतेः।'</poem>}}}}
{{Right|<small>(बृहत्संहिता ११।३५)</small>}}
{{outdent|गणकपति, गणधर देखों।}}
{{outdent|गणकर्णिका (सं० स्त्री०) गणस्य गणेशस्य कर्ण इव पत्रमस्याः बहुव्री०। इन्द्रवारुणी, इन्द्रायणलता।}}
{{outdent|गणकर्मन् (सं० क्ली०) गणयज्ञ।<Small> गणयज्ञ देखों।</Small>}}
{{outdent|गणकार (सं० पु०) गणं धात्वादिपाठं करोति, गण-क-अण्, उपपदस०। १ धातुसंग्रहकर्त्ता। २ भीमसेन। गणं गणनां करोति गण-क-अण्। ३ जो गणना करे, गणक।}}
{{outdent|गणकारि (सं० पु०) गणं धात्वादिपाठं करोति, गण-क बाहुलकात् इञ्। गणकार, वह जो गणना करता हो।}}
{{outdent|गणकी (सं० स्त्री०) गणकपत्नी, गणककी स्त्री।}}
{{outdent|गणकुण्ड—हिमालयस्य एक पवित्र कुण्ड।}}
{{Right|<Small>(हिमाद्रिखण्ड ६४८)</Small> }}
{{outdent|गणकूट (सं० पु०) गणरूपं कूटं। वर और कन्याका देव, मनुष्य या राक्षस-गण रूप कूट। <Small>विवाद देखो।</Small>}}
{{outdent|गणगति (सं० स्त्री०) गणनागति, कोई निर्दिष्ट उच्च संख्या।}}
{{outdent|गणचक्रक (सं० क्ली०) गणानां धार्मिकाणां चक्रमत, बहुव्री०। धार्मिकोंका एकत्र भोजन।}}
{{outdent|गणच्छन्दः (सं० क्ली०) पादपरिमित छन्द।}}
{{outdent|गणजीवविजय—सन्देहसमुच्चय नामक संस्कृत धर्मशास्त्रके संग्रहकार।}}
{{outdent|गणता (सं० स्त्री०) गणस्य भावः गण-तल्-टाप्। १ समूहत्व, समूहका भाव। २ समूह, ढेर।}}
{{outdent|गणतिथ (सं० त्रि०) गणानां पूरकं गण-तिथुग्। गणपूरक।}}
{{outdent|गणदास (सं० पु०) नृत्यकार।}}
{{outdent|गणदीक्षी (सं० पु०) गणांन् दीक्षयति दीक्ष-णिनि। बहुतोंको यज्ञ करानेवाला, बहुयाजक। (त्रि०) गणस्य गणेशस्य शिवस्य वा दीक्षा विद्यतेऽस्मिन् अस्य। २ गणेश या शिव-}}
{{Left|Vol. VI. |38|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मन्त्रमें दीक्षित, जो गणेश या शिवमन्त्रमें दीक्षित हो।
{{outdent|गणदेवता (सं० स्त्री०) समूहचारी देवता। आदित्य १२, विश्वदेवा १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, वायु ४९, महाराजिका २२०, साध्य १२, रुद्र ११ इन सबको गणदेवता कहते हैं।}}
{{outdent|गणद्रव्य (सं० क्ली०) गणानां द्रव्यं, ६-तत्। सर्व साधारणकी सम्पत्ति, वह धन जिस पर बहुतसे मनुष्योंके समान अधिकार हो।}}
{{outdent|गणद्वीप (सं० क्ली०) गणामां समानां राज्यात्वात् द्वीपः। द्वीपविशेष। इस द्वीपमें सात राज्य थे। इस लिये इसका नाम गणद्वीप पड़ा।}}
{{outdent|गणधर (सं० पु०) आचार्य, अध्यापक, जैनाचार्य।}}
जैनमतानुसार गणधर वे कहलाते हैं, जो तीर्थङ्करोंकी दिव्यध्वनि (उपदेश) को धारणा पूर्वक, आचाराङ्ग आदि ग्यारह अङ्गोंमें विभक्त कर मनुष्योंको भिन्न भिन्न भाषाओंमें उनके उपदेशको समझाते हैं। प्रत्येक तीर्थङ्करोंके गणधर हुआ करते हैं। ये भी नियमसे मुक्त हो जाते हैं।<Small> गौतम गणधर देखों।</Small>
{{outdent|गणन (सं० क्ली०) गण्यते गण-णिच्, भावे ल्युट्। १ गणना, गिनना। २ गिनती। ३ अवधारणा, निश्चय।}}
{{outdent|गणना (सं० स्त्री०) १ गिनती। २ हिसाब। ३ संख्या।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>
"यदि तिलोकी गणनापरा स्यात्।
तस्याः समाप्तिंनदि नाड्यः स्यात्॥" (नैषध १४।०)
</poem>}}}}
{{outdent|गणनागति (सं० स्त्री०) कोई निर्दिष्ट उच्चसंख्या।}}
{{outdent|गणनाथ (सं० पु०) गणानां प्रमथादीनां नाथः, ६-तत्। १ प्रमथाधिपति शिव, महादेव। २ गणेश। ३ गणोंका मालिक।}}
{{outdent|गणनायक (सं० पु०) गणानां नायकः, ६-तत्। १ गणेश।}}
{{c|<small>
"सिद्धका भारतस्यास्य भगवान् गणनायकः।" (भारत १।१।७७)
</Small>}}
२ शिव, महादेव।
{{outdent|गणनायिका (सं० स्त्री०) गणानां नायकः शिवः तस्य शक्तिः गणनायक-टाप्। दुर्गा, भगवती।}}
{{outdent|गणपति (सं० पु०) १ गणेश। २ गणोंका मालिक। ३ शिव, महादेव। ४ षडङ्गशास्त्रविद्।}}
{{outdent|गणनाममहामात्र (सं० पु०) आय और व्ययका मन्त्री, वह जो खर्च और आमदका हिसाब रखता हो।}}
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मन्त्रमें दीक्षित, जो गणेश या शिवमन्त्रमें दीक्षित हो।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|१५०|
गणनीय – गणपतिकल्प}}
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{{Outdent|गणनीय (सं० त्रि०) १. गिनने योग्य। २. नामी, प्रसिद्ध।}}
{{Outdent|गण (सं० पु०) गणेश।}}
{{Outdent|गणपति (सं० पु०) गणानां पतिः ६ तत्। १. गणेश। २. शिव। ३. स्वामी। ४. अथर्व उपनिषद विशेष। ५. मृच्छकटिक नाटक का एक ग्रंथकार। ६. गोपाल के पुत्र, 'रत्नप्रदीप' नामक ज्योतिष-शास्त्रकार। ७. वीरेश्वर के पुत्र, 'गंगाभक्तितरंगिणी' नामक संस्कृत ग्रंथ के प्रणेता। ८. राम उपाध्याय के पुत्र, 'चोरपंचाशिका' के टीकाकार। ९. एक विशिष्ट राजोपाधि; एक राजा की पदवी; दाक्षिणात्य (दक्षिण भारत के) वारंगल के राजा इस उपाधि को धारण करते थे।}}
{{Right|<small>(वारंगल देखो)।</small>}}
{{Outdent|गणपतिकल्प (सं० पु०) गणेश की एक पूजा-प्रक्रिया। यह विघ्न-शांति के लिए गणपति के उद्देश्य से किया जाता है।
विनायक नामक कोई अपदेवता या भूत होते हैं। वह समय-समय पर सुंदर नर-नारियों को आश्रय करते हैं (उन पर सवार होते हैं) या जिस पर उनकी दृष्टि रहती है, लोग उसे भूत-ग्रस्त समझने लगते हैं। विनायक का आश्रय या दृष्टि होने से प्रायः दुःख आता है। वह व्यक्ति स्वप्न में देखता है मानो अगाध जल में प्रवेश करके गोते खा रहा हो और कभी-कभी कटा हुआ मुंड भी देख पाता है; यही विनायक की दृष्टि का प्रधान लक्षण है। इसके व्यतीत (अलावा) स्वप्न में काषायवस्त्र (गेरुआ वस्त्र) आच्छादित हिंसक जंतुओं पर अधिरोहण भी किया जाता है। उस व्यक्ति को सर्वदा चांडाल प्रभृति (इत्यादि) निकट (नीच) जातियों, गर्दभों (गधों) या ऊंटों के साथ रहना अच्छा लगता है। जब वह एकाकी (अकेला) कहीं चलता है, तो उसे मालूम पड़ता है—मानो उसके साथ कितने ही दूसरे लोग लगे हैं। इससे वह डरकर चौंक पड़ता है। उसके मन की स्फूर्ति बिल्कुल विलुप्त हो जाती है। वह जो कोई भी कार्य करने लगता है, उसको विपरीत (उल्टा) फल मिलता है। राजकुमार के प्रति विनायक की दृष्टि होने पर वह राजत्व से वंचित रहता है। यदि किसी कुमारी पर उनकी दृष्टि पड़ जाती है, तो वह स्वामी-सुख से वंचित होकर घोर यातना में समय बिताती है। गर्भिणी के प्रति विनायक का आविर्भाव होने से संतान नष्ट होती है। यदि विद्यार्थी पर इनकी दृष्टि पड़ी, तो वह आचार्य या श्रोत्रिय नहीं हो सकता। इनकी दृष्टि से वणिक (व्यापारी) का वाणिज्य बिगड़ता है और पक्की कृषि में घाटा पड़ता है।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
विनायक की शांति के लिए याज्ञवल्क्य ने इस प्रकार विधान किया है—जिसके प्रति विनायक की दृष्टि हो, उस दिन के समय शिला (सिल्ट) पर पेषण (पीस) करके उबटन के साथ उसके शरीर में लगाना और मस्तक में सर्वौषधि तथा गंध-लेपन बढ़ाना चाहिए। फिर उक्त व्यक्ति को भद्रासन पर बैठा लेते हैं। अश्वशाला, हस्तिशाला, वन, दीमक के ढेर, संगम-स्थान तथा ह्रद (तलाब) की मृत्तिका (मिट्टी), रोचना, गंध और गुग्गुल जल में निक्षेप (डालना) किया जाता है। फिर एकवर्ण (एक ही रंग के) चार कलशों में जल लाकर भद्रासन के चारों ओर लगाते हैं। पीछे इसी जल से उक्त व्यक्ति को स्नान कराना पड़ता है। उसका मंत्र है—
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“
"सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।
तेन त्वामभिषिंचामि पावमान्यः पुनंतु ते॥
भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः।
भगमिंद्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमंते यच्च मूर्धनि।
ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद् घ्नंतु सर्वदा॥"</poem>}}}}
इसी प्रकार स्नान कराकर उसके मस्तक पर उड़द पर बने सार्षप तेल (सरसों का तेल) डालना चाहिए। वाम (बाएँ) हस्त से कुशा ग्रहण करके इस कार्य का अनुष्ठान करते हैं।
मित, सम्मित, शालकटंकट, कुष्माँड और राजपुत्र नामों के साथ 'स्वाहा' योग करके चतुष्पथ (चौराहे) पर कुश बिछाकर उस पर बलि दी जाती है। कृताकृत (कच्चे-पक्के) तंडुल (चावल), अम्लोदन (खट्टा भात), नानावर्ण के सुगंधित पुष्प, मूलक (मूली), पूरी, कचोरी, एरण्ड की माला, दहीयुक्त व पायस (खीर), पिटक (पुआ) आदि विनायक की पूजा का उपहार व बलि हैं। यह सकल पूजोपहार एकत्र करके मस्तक को भूमि पर रख विनायक-जननी (अंबिका) की आराधना करनी चाहिए। दूर्वा और सरसों के फल से उनको अर्घ्य देना और हाथ जोड़कर यह मंत्र पढ़ना पड़ता है—
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे॥"</poem>}}}}
इसके पीछे (बाद) स्वच्छ वस्त्र परिधान करके (पहनकर), सफेद चंदन और सफेद फूलों की माला पहन ब्राह्मण-भोजन कराना और गुरु को एक जोड़ा कपड़ा पहनाना चाहिए। इसी प्रकार विनायक की पूजा शेष (संपन्न) होने पर नवग्रह, लक्ष्मी तथा
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''२५५'''|'''गणेश'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पश्चिम-उत्तर अञ्चल वक्रतुण्ड धीर तुण्डराज ये दोनों गणेश अति प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराणके मतसे—
"ॐ ह्रीं ग्रीं ह्रीं" स्वाहा ब्रह्मरूपाय सर्वसिद्धि प्रदायिने विघ्नेशाय नमो नमः इस मन्त्रसे गणेशपूजा करनी उचित है। तुलसीपत्र द्वारा गणेशपूजा करना निषिद्ध मानी जाती है। इस मन्त्रको पचास लाख बार जपनेसे मन्त्रसिद्धि होती है। गणेशपूजा शेष होने पर स्तवपाठ करना चाहिये। गणेशका स्तव, यथा—
{{c|{{x-smaller|<poem>
श्रीविष्णुरुवाच
"ईश! त्वां स्तोतुमिच्छामि ब्रह्मज्योतिः सनातनम्।
निरुपितुमशक्तोऽहमनुरुपमनन्तसम्॥
प्रवरं सर्वदेवांनां सिद्धानां योगिनां गुरुम्।
ब्रह्मस्वरूपं सर्वेशं ज्ञानराशिस्वरूपिणम्॥
अव्ययमकक्षरं नित्यं सत्यमात्मस्वरूपिणम्।
धातारं सर्वजगतामीशितारं सर्वमुपरि॥
संसाराऽर्णवपारे च मायापोतं सुदुर्लभम्।
करणाधाररूपञ्च भक्तानुग्रहकारकम्॥
वरं वरेण्यं वरदं वरदानांमपीश्वरम्।
सिद्धिं सिद्धिस्वरूपञ्च सिद्धिदं सिद्धिसाधनम्॥
ध्यानातिरिक्तं ध्येयञ्च ध्यान असाध्यक्ष धार्मिकम्।
धर्मस्वरूपं धर्मेशं धर्माधर्मफलप्रदम्॥
बीजं प्राकृतिमहतां प्रकृतेः परमुच्यते।
स्त्रीपुंनपुंसकानाञ्च तमेतदतीन्द्रियम्॥
सर्वमग्रप्रकृत्या च प्रकृतेः परम्।
को स्तोतुमुद्यमोंऽनन्तः सहस्रवदनेन च॥
न च शशाक पुरहरश्चाननश्चतुराननः।
सरस्वती नशक्तश्च न च तव स्तुतौ॥
इत्येवमुक्त्वा स्तवनं कृत्वा सुरेशं सुरसंसदि।
सुरेशश्चासुरमारी विरराम रमापतिः॥
इति विष्णु स्तवं श्रुत्वा यः पठेत्॥
सायं प्रातः मध्याह्ने भक्तियुक्तः समाहितः॥
तस्य विघ्नं कुरुते न चापि सतत मुने।
येत्या यजनकः सदा॥
यात्राकाले च यः याति भक्तिपूर्वकम्।
तस्य सर्वाभीष्टसिद्धिर्भवत्येव न संशयः॥
तेन दुःस्वप्नं सुप्रजायते।
कदापि न भवेत् तस्य गृहपीडा च दारुणा॥
बन्धुविनाशं शत्रुभ्यो बन्धूनां विवर्द्धनम्।
सर्वत्र विजयं लभेत् सम्पत्तिवर्द्धनम्॥
</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{c|{{x-smaller|<poem>
स्थिरा भवेत् गृहे लक्ष्मीः पुत्रपौत्रविवर्द्धिनी।
सर्वसिद्धिंप्राप्य तं विणुपदं लभेत्॥
फलञ्चापि यतो यज्ञानां यत् ध्रुवम्।
महतो सर्वदानानां श्रीगणेशप्रसादतः॥"
</poem>}}}}
{{C|<small>इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे गणेशखण्डे विष्णु कृतं गणेशस्तोत्रम्॥</small>}}
गणेशपूजा सिर्फ भारतवर्षमें ही नहीं होती वरं और भी देशों में यथा नेपाल, चीन, जापान और मङ्गोलियामें होती है। नेपालके हिन्दू और बौद्धोंको पूरा विश्वास है कि गणेशकी पूजासे अभीष्ट सिद्ध होता है। नेपाल में पशुपतिनाथ मन्दिरके उत्तरमें एक प्राचीन तथा प्रसिद्ध गणेशमन्दिर है जिसे अशोककी कन्या चारुमतीने निर्माण कराया है। यवद्वीपमें भी गणेशके कई एक स्वरूपकी मूर्तियोंकी पूजा होती है। मन्त्रमहार्णवमें गणेशका ध्यान यूँ है—
{{c|{{x-smaller|<poem>
"विषाणांकुशपाशांश्च दधानं करे मोदकं पुष्करे।
स्वकीयायुधभूषांश्च मराठयं गणं समुद्यद्दिनेशाभमीडे॥"
</poem>}}}}
गणेशके हाथों में पाश, अंकुश, पद्म और परशु हैं और सूँड़के अग्रभाग पर मिठाइयाँ हैं। ये अपने साथ सहगामिनी लिये हुए हैं और अपने सुवर्ण अलङ्कारोंसे ये सूर्यके जैसे दीखते हैं।
२ एक विख्यात ज्योतिर्विद्। इन्होंने आयप्रश्न-जातक-कल्पलता, तिथिचिन्तामणि-पञ्चाङ्गसाधन, तिथिचिन्तामणि-सारणी, पाटीटीका, भावाध्याय, रत्नावलीपद्धति, ताजकजातक प्रभृति संस्कृत ज्योतिषकी रचना की है। ३ शङ्कारिकाके रचयिता। ४ पिष्टपशु-स्तरगी और महिषसर्गविधि नामक धर्मशास्त्रसंग्रहकार। ५ भागवतवादिभूपणके रचयिता। ६ रसतरङ्गिणी के रसोदधि नामका टीकाकार। ७ स्मृतिचन्द्रोदय-प्राणभट्टपुत्र, ऋग्वेदपाठानुक्रमणदीपिकाके रचयिता। ८ गोपालपुत्र, इन्होंने १६१४ ई० में जातकालङ्कार नामक संस्कृत ग्रन्थकी रचना की है। १० दुरागमनाशिनीचन्द्रिका, विनोद, ताजिकभूषण प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ प्रणयन किये हैं। ११ यज्ञालसेनके पुत्र, शिवतोषिणी नामक लिङ्गपुराणके टीकाकार। १२ रामदेवके पुत्र, नैषधोदयटीकारचयिता। १३ बनारसके एक हिन्दी कवि। यह
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सौरभ तिवारी 05
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प्रतियोगिता समाप्त।
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३१
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|३०|इदंकार्या-इध्म|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इदङ्घार्या (सं॰ स्त्री॰) दुरालभा लता, जवासा।}}
{{outdent|इदद्वसु (वै॰ त्रि॰) इसमें और उसमें समृद्ध, इसका और उसका अमीर।}}
{{outdent|इदन्तन (सं० त्रि॰) अस्मिन् काले भवः, निपातनात् व्युल् तुट् च। इदानीन्तन, आधुनिक, नया।}}
{{outdent|इदन्ता (सं॰ स्त्री॰) अस्य भावः, इदम्-तल्। अङ्गुल्यादि द्वारा बतानेका विषय, शिनाख्त, पहुंचाना।}}
{{outdent|इदम्प्रकार (सं॰ अव्य॰) इस रीतिसे, ऐसे तौरपर।}}
{{outdent|इदम्प्रथम (सं॰ त्रि॰) प्रथमतः कार्यकारी, पहले-पहल काम करनेवाला।}}
{{outdent|इदम्मय (सं॰ पु॰) इदम् मयट्। इसके द्वारा प्रस्तुत, जो इससे बना हो।}}
{{outdent|इदा (वै॰ अव्य॰) इदम्-दाच् वेदे निपातनात्। इस समय, अव्य॰।}}
{{outdent|इदानीं (सं॰ अव्य॰) इदम् दानीम्। {{smaller|दानींच। पा ५।३।१८। अधुना, सम्पुति, अब, इस समय।}}}}
{{outdent|इदानीन्तन (सं॰ त्रि॰) वर्तमान, मौजूद, नापायदार।}}
{{outdent|इदावत्सर (सं॰ पु॰) इदा इति वत्सरः, शाकतत्। पांच संवत्सरादिके मध्य एक। संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर और उदावत्सर पांच वर्ष होते हैं। संवत्सरमें तिल, परिवत्सरमें यव, इदावत्सरमें अन्न एवं वस्त्र, अनुवत्सरमें धान्य और उदावत्सरमें रौप्य दान करनेसे अधिकतर फल मिलता है। नभोमण्डल सूर्य और चन्द्रमण्डलके साथ जो समग्रकाल विताता, उसमें शुक्ल प्रतिपत्को सूर्यसंक्रान्ति पड़ने और सौर तथा चान्द्रमासका एक-कालीन उपक्रम लगनेसे संवत्सर आता है। फिर सौर मास पड़नेसे वत्सरमें छः दिन बढ़ते और चान्द्र मास आनेसे छः दिन घटते हैं। इसी प्रकार बारह दिनके व्यवधानसे दोनोका अग्र पश्चात् भाव कम हो जाता है। ऐसे ही पांच वत्सर बीतनेपर दो मलमास पड़ते हैं। फिर षष्ठ वत्सर संवत्सर होता है। समकालमें लगने और सौर तथा चान्द्रमासयुक्त रहने-वाले वत्सरकी संवत्सर कहते हैं। सौर तथा चान्द्र-मास आरम्भ होते जिस वत्सर विषम मास आता, वह परिवत्सर कहाता है।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इदावत्सरीय (सं॰ त्रि॰) इदा वत्सर-सम्बन्धीय, इदावत्सरवाला।}}
{{outdent|इदुवत्सर, {{smaller|इदावत्सर देखो।}}}}
{{outdent|इद्दत (अ॰ स्त्री॰) शास्त्रविहित परीक्षाका समय, कानुनी जांचका वक्त। पतिकी मृत्यु होनेपर स्त्रीको दूसरा विवाह करनेके लिये चालीस दिन राह देखना पड़ती है। इसीको इद्दत कहते हैं। इद्दतसे स्त्रीके गर्भ रहने या न रहनेका पता लगता है।}}
{{outdent|इद्दतमें बैठना (हिं॰ क्रि॰) एकान्तमें रहना, किसी पुरुषसे न मिलना।}}
{{outdent|इद्ध (सं॰ क्ली॰) इन्ध भावे क्त। १ रौद्र, धूप। २ दीप्ति, चमक। ३ आश्चर्य, ताज्जुब। (त्रि॰) ४ निर्मल, साफ ५ दग्ध, जला हुआ। ६ प्रदीप्त, रौशन। ७ आश्चर्यमय, अनोखा। ८ अप्रतिहत, आज़ाद, जो रुका न हो।}}
{{c|{{smaller|"तमिङ्धमाराधयितुं सकर्णकैः।”"(माघ)}}}}
{{outdent|इद्धमन्यु (सं॰ त्रि॰) क्रुड, गुस्से में आया हुआ, जिसके गुस्सा सुलग उठे।}}
{{outdent|इद्दा (सं॰ अव्य॰) प्रकाश्य, खुले तौरपर।}}
{{outdent|इद्धाग्नि (वै॰ त्रि॰) प्रदीप्त अग्नियुक्त, जिसके आग जले।}}
{{outdent|इद्वत्सर, {{smaller|इदावत्सर देखो।}}}}
{{outdent|इद्वत्सरीय, {{smaller|दावत्सरौव देखो।}}}}
{{outdent|इध् (सं॰ ति॰) प्रदीप्त, चमकता हुआ। यह शब्द समासके अन्तमें आता है, जैसे—अग्नीध।}}
{{outdent|इधर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ अत्र, यहाँ, इस तर्फ़, इस राह, इस जगह। २ इहलोकमें, इस दुनियापर।}}
{{outdent|इधर-उधर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ इतस्ततः, जहां-तहां। २ चारों ओर, सब तर्फ़, नीचे ऊपर। ३ दाहने-बाये', आगे-पीछे।}}
{{outdent|इधरसे उधर करना (हिं॰ क्रि॰) स्थानमें परिवर्तन डालना, सरकाना, बेजगह रख देना।}}
{{outdent|इधरसे उधर होना (हिं॰ क्रि॰) १ खो जाना, चल पड़ना, लम्बी लेना। २ स्थानच्युत किया जाना, बेतरतीबीमें पड़ना। ३ लुढ़कना, उलट जाना।}}
{{outdent|इध्म (सं॰ क्ली॰) इध्यतेऽग्निरनेनेति, इन्ध-मक्।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११८
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वरचन्द्र विद्यासागर|११७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:पूर्ववङ्गके अनेक प्राचीन स्थानोंका वृत्तान्त एवं वङ्गीय कवियोंका जीवनचरित लिखा और भारतचन्द्रकी लुप्तप्राय कविताको बड़े परिश्रमसे ढूंढ़कर छपा दिया। प्रबोधप्रभाकर, हितप्रभाकर और बोधेन्दु-विकाश नामक ग्रन्थ भी इन्होंने प्रभाकरमें प्रकाशित किये। पीछे श्रीमद्भागवतका पद्यानुवाद करना ईश्वरचन्द्रने हाथमें लिया था। किन्तु १७८९ शककी माघकृष्ण दशमी को आधीरातके समय इनका स्वर्गवास हो गया। ये बङ्गभाषाके एक असाधारण कवि थे।
{{outdent|ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बङ्गदेशके एक ख्यातनामा पण्डित। १७४२ शक (१८२० ई॰) को आश्विन कृष्ण मङ्गलवारके दिन मेदिनीपुर ज़िलेके वीरसिंह नामक ग्राममें इन्होंने जन्म लिया। इनके पिताका नाम ठाकुरदास बन्योपाध्याय था। १७२९ ई॰ की १ली जूनको विद्यासागरने विद्याशिक्षार्थ संस्कृत-कालेजमें प्रवेश किया। गंभीर गवेषणा और धीशक्तिके प्रभावसे अल्प दिवसके मध्य ही संस्कृत साहित्य-शास्त्रमें इन्होंने पारदर्शिता पायी थी। विद्यासागरने गङ्गाधर तर्कवागीशसे व्याकरण, जयगोपाल तर्कालङ्गारसे साहित्य, प्रेमचन्द्र तर्कवागीशसे अलङ्कार, शम्भुचन्द्र विद्यावाचस्पतिसे वेदान्त, रामचन्द्र विद्यावागीशसे स्मृति और पहले निमाईचन्द्र शिरोमणिसे तथा पीछे जयनारायण तर्कपञ्चाननसे न्याय पढ़ा। संस्कृत कालेजसे इन्हें 'विद्यासागर' उपाधि मिला था।<br>{{gap}}विद्यासागरके पिताकी आर्थिक अवस्था अच्छी न थी। अतएव बाल्यकालसे पाठावस्था पर्यन्त इन्हें दरिद्रतावंश अनेक कष्ठ उठाना पड़े।<br>{{gap}}१८४१ ई॰ के दिसम्बर मासमें विद्यासागर फोर्टविलियम कालेजमें प्रधान पण्डित रूपसे नियुक्त हुये। कार्यकारिता और विचक्षणतादर्शनसे संस्कृत कालेजके कल्ले पक्षने १८४६ ई॰ के अपरेल मास इन्हें संस्कृत-कालेजमें सहकारी कर्माध्यक्ष (Assistant secre-tary) का पद सौंप दिया, किन्तु उसके दूसरे वर्ष ही विद्यासागरने उक्त पदसे अवसर ग्रहणं कर लिया।<br>{{gap}}१८४८ ई॰ के फरवरी मास ये फिर फोर्ट विलियम, कालेजमें पहुंचे और 'हेड राइटर' (Head-writer) के
{{Multicol-break}}
कार्य में नियुक्त हुये। विद्यासागरकी सुख्याति क्रमशः बढ़ने लगी। १८५० ई॰ के दिसम्बर मासमें इन्हें संस्कृत कालेजके साहित्याध्यापकका पद मिला था। अनेक विषयोंमें पाण्डित्य देख तत्कालीन भारतस्थ संस्कृतन्न साहब विद्यासागरके पक्षपाती बने। उन्हींके यत्नसे दूसरे वर्ष ही विद्यासागर संस्कृत कालेजके अध्यक्ष (Principal) हुये। इसी समय इन्होंने संस्कृत कालेजके सम्बन्धमें अनेक सुनियम बनाये थे। १८५५ ई॰ में कालेजका अध्यक्षता रहते भी गवरनमेण्टने इनपर 'विशेष विद्यालय-परिदर्शक' (Special Inspector of Schools) का भार डाला! उभय कार्यमें इन्होंने सुख्याति पायी थी।
फोर्ट विलियम कालेजमें रहते समय कप्तान मार्शल साहबने विद्यासागरसे अंगरेज़ी पढ़नेको कहा। उसके बाद ही ये अंगरेज़ी सीखनेमें लग गये। उस समय सिविलियनोंको पढ़ानेके लिये हिन्दीभाषाका प्रयोजन पड़ता था। इसी लिये विद्यासागरने हिन्दी-भाषा भी पढ़ ली।
संस्कृत-कालेजकी अध्यापनाके समय तत्कालीन गवरनमेण्ट-सेक्रेटरी हालिडे साहबसे इनका आलाप परिचय हुआ। वे नाना विषयोंका परामर्श करनेके लिये सप्ताह पीछे एकदिन विद्यासागरको अपने घर ले जाते और अनेक समय विद्यासागरका सत्परामर्श ग्रहण करते। उन्होंके यत्नसे ये 'स्कूल-इन्सपेकर' हुये। उस समय बङ्गला विभागके चार जिलोंमें कुल २० मडेल स्कूल थे। उन्हीं बोस विद्यालयके परिदर्शनका भार विद्यासागरपर न्यस्त था। इसी समय बेथन साहबके मरनेपर तत्प्रतिष्ठित बालिका-विद्यालय गवरनमेण्टके हाथ आया। ये वेथून स्कूलके तत्त्वावधायक रहे और स्त्रीशिक्षाके सम्बन्धमें विशेष यत्न करते थे। हालिडे साहबके उत्साहवाक्यसे उत्साहित हो बङ्गालमें स्थान-स्थान पर विद्यासागरने ५०/६० बालिका-विद्यालय खोल दिये। किन्तु दुःखका विषय है, गवरनमेण्टने उस वृहत् कार्य में मन ने लगाया। कुछ दिन पीछे इन्होंने समस्त बालिका-विद्यालयोंके खरचाका बिल बनाकर
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 30|2em}}</noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वरचन्द्र विद्यासागर|११७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:पूर्ववङ्गके अनेक प्राचीन स्थानोंका वृत्तान्त एवं वङ्गीय कवियोंका जीवनचरित लिखा और भारतचन्द्रकी लुप्तप्राय कविताको बड़े परिश्रमसे ढूंढ़कर छपा दिया। प्रबोधप्रभाकर, हितप्रभाकर और बोधेन्दु-विकाश नामक ग्रन्थ भी इन्होंने प्रभाकरमें प्रकाशित किये। पीछे श्रीमद्भागवतका पद्यानुवाद करना ईश्वरचन्द्रने हाथमें लिया था। किन्तु १७८९ शककी माघकृष्ण दशमी को आधीरातके समय इनका स्वर्गवास हो गया। ये बङ्गभाषाके एक असाधारण कवि थे।
{{outdent|ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बङ्गदेशके एक ख्यातनामा पण्डित। १७४२ शक (१८२० ई॰) को आश्विन कृष्ण मङ्गलवारके दिन मेदिनीपुर ज़िलेके वीरसिंह नामक ग्राममें इन्होंने जन्म लिया। इनके पिताका नाम ठाकुरदास बन्योपाध्याय था। १७२९ ई॰ की १ली जूनको विद्यासागरने विद्याशिक्षार्थ संस्कृत-कालेजमें प्रवेश किया। गंभीर गवेषणा और धीशक्तिके प्रभावसे अल्प दिवसके मध्य ही संस्कृत साहित्य-शास्त्रमें इन्होंने पारदर्शिता पायी थी। विद्यासागरने गङ्गाधर तर्कवागीशसे व्याकरण, जयगोपाल तर्कालङ्गारसे साहित्य, प्रेमचन्द्र तर्कवागीशसे अलङ्कार, शम्भुचन्द्र विद्यावाचस्पतिसे वेदान्त, रामचन्द्र विद्यावागीशसे स्मृति और पहले निमाईचन्द्र शिरोमणिसे तथा पीछे जयनारायण तर्कपञ्चाननसे न्याय पढ़ा। संस्कृत कालेजसे इन्हें 'विद्यासागर' उपाधि मिला था।<br>{{gap}}विद्यासागरके पिताकी आर्थिक अवस्था अच्छी न थी। अतएव बाल्यकालसे पाठावस्था पर्यन्त इन्हें दरिद्रतावंश अनेक कष्ठ उठाना पड़े।<br>{{gap}}१८४१ ई॰ के दिसम्बर मासमें विद्यासागर फोर्टविलियम कालेजमें प्रधान पण्डित रूपसे नियुक्त हुये। कार्यकारिता और विचक्षणतादर्शनसे संस्कृत कालेजके कल्ले पक्षने १८४६ ई॰ के अपरेल मास इन्हें संस्कृत-कालेजमें सहकारी कर्माध्यक्ष (Assistant secre-tary) का पद सौंप दिया, किन्तु उसके दूसरे वर्ष ही विद्यासागरने उक्त पदसे अवसर ग्रहणं कर लिया।<br>{{gap}}१८४८ ई॰ के फरवरी मास ये फिर फोर्ट विलियम, कालेजमें पहुंचे और 'हेड राइटर' (Head-writer) के}}
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कार्य में नियुक्त हुये। विद्यासागरकी सुख्याति क्रमशः बढ़ने लगी। १८५० ई॰ के दिसम्बर मासमें इन्हें संस्कृत कालेजके साहित्याध्यापकका पद मिला था। अनेक विषयोंमें पाण्डित्य देख तत्कालीन भारतस्थ संस्कृतन्न साहब विद्यासागरके पक्षपाती बने। उन्हींके यत्नसे दूसरे वर्ष ही विद्यासागर संस्कृत कालेजके अध्यक्ष (Principal) हुये। इसी समय इन्होंने संस्कृत कालेजके सम्बन्धमें अनेक सुनियम बनाये थे। १८५५ ई॰ में कालेजका अध्यक्षता रहते भी गवरनमेण्टने इनपर 'विशेष विद्यालय-परिदर्शक' (Special Inspector of Schools) का भार डाला! उभय कार्यमें इन्होंने सुख्याति पायी थी।
फोर्ट विलियम कालेजमें रहते समय कप्तान मार्शल साहबने विद्यासागरसे अंगरेज़ी पढ़नेको कहा। उसके बाद ही ये अंगरेज़ी सीखनेमें लग गये। उस समय सिविलियनोंको पढ़ानेके लिये हिन्दीभाषाका प्रयोजन पड़ता था। इसी लिये विद्यासागरने हिन्दी-भाषा भी पढ़ ली।
संस्कृत-कालेजकी अध्यापनाके समय तत्कालीन गवरनमेण्ट-सेक्रेटरी हालिडे साहबसे इनका आलाप परिचय हुआ। वे नाना विषयोंका परामर्श करनेके लिये सप्ताह पीछे एकदिन विद्यासागरको अपने घर ले जाते और अनेक समय विद्यासागरका सत्परामर्श ग्रहण करते। उन्होंके यत्नसे ये 'स्कूल-इन्सपेकर' हुये। उस समय बङ्गला विभागके चार जिलोंमें कुल २० मडेल स्कूल थे। उन्हीं बोस विद्यालयके परिदर्शनका भार विद्यासागरपर न्यस्त था। इसी समय बेथन साहबके मरनेपर तत्प्रतिष्ठित बालिका-विद्यालय गवरनमेण्टके हाथ आया। ये वेथून स्कूलके तत्त्वावधायक रहे और स्त्रीशिक्षाके सम्बन्धमें विशेष यत्न करते थे। हालिडे साहबके उत्साहवाक्यसे उत्साहित हो बङ्गालमें स्थान-स्थान पर विद्यासागरने ५०/६० बालिका-विद्यालय खोल दिये। किन्तु दुःखका विषय है, गवरनमेण्टने उस वृहत् कार्य में मन ने लगाया। कुछ दिन पीछे इन्होंने समस्त बालिका-विद्यालयोंके खरचाका बिल बनाकर
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२०|इटली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
थे। ९७३ को द्वितीय और ९९६ ई॰ को तृतीय ओटो सिंहासन पर बैठे। १००२ ई॰ को तृतीय ओटोके मरनेपर इवरियाके अधिपति आरडोइन लोम्बार्डीके राजा हुये और १०१५ ई॰ को मर गये। बेनेरियाके हेनरीने अपने वैरी पेवियाको विनष्टकर रोममें सिंहासन पाया था, किन्तु १०२४ ई॰ को परलोक गमन किया। बाकी इटलीके राजाओंका शासन-समय नीचे लिखते हैं,—
{|Width=100%
|हेनरी||१०२४
|-
|४र्थ हेनरी||१०५६
|-
|७म ग्रेगोरी||१०७३
|-
|पोपाधिकार||१०७७
|-
|लोथर साक्सन||११२५-११३७
|-
|कोनण्ण रखावीय||११३८-११५२
|-
|फ्रेडरिक||११५४
|-
|६ष्ठ हेनरी||११९४
|-
|२य फेड्रिक||१२२०
|-
|कोमण्ड||१२५०
|-
|कोनराडिन||१२५४
|-
|पादरी मुह और जनप्रकोप||१२५९-१३०३
|-
|रबार्ट||१३०९
|-
|जोन||१३४३
|-
|चार्लस||१३८२
|-
|लाडिसलाउस||१३८७
|-
|२य जोन||१४१४
|-
|आलफोन्सो||१४३५
|-
|स्वतन्त्र शासन||१४५३-१४९२
|-
|३य चार्लस्||१४९२-१४९५
|-
|१२श लूइ||१४९९
|-
|१०म लिओ||१५१३
|-
|आलेस्मछेण्डी||१५३०
|-
|कोसिमो||१५३७
|-
|फरडीनण्ड||१५३७
|-
|विक्टर आमोडेउस||१७१३
|-
|३य एम्मानुएल||१७३०
|-
|परमाकोन कारलोसकीरानी||१७३७
|-
|२ जोसेफ़||१७८०
|-
|लिओपोल्ड||१७९०
|}
{{Multicol-break}}
{|Width=100%
|-
|प्रजातन्त्र||१७६९६
|-
|७म पाअस||१८००
|-
|नेपोलियान-शासन||१८०२
|-
|मूरट||१८०८
|-
|आष्ट्रीय अधिकार||१८१५-१८७०
|-
|इटलीय शासनतन्त्र||१८७१ ई॰ से आरम्भ
|}
ई॰ के १६वें शताब्द पहले इटली देश भीषण युद्ध और स्व-स्व जातीय उन्नतिके लिये स्पेन, फ्रान्स तथा जर्मनी के ग्रहसे प्रायः जनशून्य हो गया था। १५२५ ई॰ को पेवियाके युद्धने जर्मन-सम्राट्का प्रभुत्व प्रतिष्ठित किया, किन्तु ई॰ के १८वें शताब्दारम्भ अष्ट्रीयाका आतङ्क जम गया। १७९७-९८ ई॰ को नेपोलियानका विजय होनेसे शासन बदला और कयी वर्षतक इस प्रायद्वीपका अधिकांश फ्रान्सके अधीन रहा। १८१४ ई॰ को सन्धि होनेपर लोम्बार्डी-वेनिशीय प्रान्त अष्ट्रीया और सारदिनिया राज्य तथा गेनाइस प्रदेश सेवायके राजपरिवारने पाया था। लुक्का नव्वाबी बना और तासकनीकी नव्वाबीका पुनरुद्धार हुवा। बोरबोंनोको नेपल्स, पोपको अपने राज्य और इष्ट वंशको मोडेने तथा अन्य प्रान्तका पुनरधिकार मिला था। १८४८ ई॰ को मिलानीसों और वेनिशीयोंने अष्ट्रीयाके विरुद्ध व्यर्थ विप्लव बढ़ाया। १८५९ ई॰को पीडमोण्ट और अष्ट्रीयामें जो युद्ध हुवा, उसमें पीडमोण्ट हार गया। १८६१ ई॰ को पीडमोण्ट-नरेशके अधीन इटली एक राज्य बना था। १८६६ ई॰ को अष्ट्रीयाने नये राज्यके हाथ वेनशिया सौंपा। १८७० ई॰को ११ वीं सितम्बरको इटलीय सेनापति कादोरनाने ६०००० फौजके साथ पोपके अधिकृत रोमराज्यमें प्रवेश किया था। पोपने नाममात्र बाधा डाली। अवशेषको रोम इटलीय शासनतन्त्रके अधीन हुवा था। वाटिकान (Vatican) मात्र पोपके अधिकारमें रहा। १८७१ ई॰ की २२ वीं जुलायीको राजा विकृर एम्मानुएलने जयोल्लाससे सदलबल पहुंच रोम नगरको इटलीकी राजधानी बनाया था। अर्ध शताब्दकी चेष्टाके बाद इटली फिर स्वाधीन हुआ।
१८७८ ई॰ की ९वीं जनवरीको विक्टर एम्मानुएल
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली|१९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
रांतो, कालतानीसेत्ता, कातानिआ, गिरगेंती, मेस्सिना, पालेर्मौं, सिराकुसा, भपानी, जेनोबा, कागलिआरी, सस्सारी अलेस्सन्द्रिआ, बेनेवेन्ता, बेर्गामो, कोमो, क्रेमोना, कुनेओ, मानतुआ, मिलन, नोवारा, पेविआ, पिअसेनजा, पोर्तो भाउरिजिओ, रेग्गिओ, एमिलिआ, सोन्द्रियओ, तूरिन और उम्बिआ। नेपिल्स, मिलन, रोम, पालेर्नो, तूरिन, फ्रोरेन्स, जिनोआ, वेनिस, बोलोना, मेस्सिना, लेघोरन, और कातानिया, बड़ा नगर है।
इटलीमें श्रमजीवियोंका वेतन अधिक और खाद्य वस्तुवोंका मूल्य न्यून है। व्यापारके केन्द्र लोमबार्डी और पीडमीण्टमें हड़ताल बहुत पड़ती है। किन्तु कितनी ही सेविङ्गबद्ध, बीमा कम्पनी और परस्पर साहाय्य-समिति खुली हैं। कोआपरेशन वा सम्भूय व्यवसायका भी बड़ा वैभव है। उसमें छोटे-छोटे व्यवसायी और कृषक योग देते हैं। अब लोगोंको अधिक व्याज देनेका कष्ट उठाना नहीं पड़ता।
पाठशाला सरकारके हाथ है। विनामूल्य शिक्षा मिलती है। सरकार और व्यवसायी पर पाठशालाके व्ययका भार पड़ता है। पढ़े-लिखोंकी संख्या दिन दिन बढ़ती जाती है। पुस्तकालय बहुत हैं। हस्तलिखित और बहुमूल्य पुस्तकोंकी कोई कमी नहीं। थोड़े दिन हुये, कोई दो सहस्र पुस्तकालय गिने गये थे। स्थानीय इतिहासका अन्वेषण हुवा करता है। शिल्पसम्बन्धीय पुस्तक खरीदनेको करोड़ों रुपए जमा हैं।
दरिद्रोंको अन्न-वस्त्र देनेके लिये सार्वजनिक संस्थायें प्रतिष्ठित हैं। रोगियोंके लिये औषधालय, अनाथोंके लिये निवासस्थान और लूलों, लंगडों, बहरों तथा अन्धोंके लिये विद्यालय और विश्रामालय बनाये गये हैं।
इटली राज्य एक राजाके अधीन है। वही लोगोंको पदाधिकार देते और पारलियामेण्टको एकत्र कर लेते हैं। अदालतका काम फ्रान्सकी तरह चलता है। विचारपतिका वेतन कम है। मुक़दमा जल्द नहीं निबटता।
{{Multicol-break}}
{{gap}}सेनाविभागमें विभिन्न प्रान्तके लोग एकत्र भरती कर लिये जाते हैं। सिपाही बननेसे कोई इनकार कर नहीं सकता। शान्तिके समय सेनाकी संख्या ढायी या तीन और युद्धके समय साढ़े सात लाख रहती है। स्पोजिया, नेपल्स, वेनिस, तारान्तो और मड्डा लोनाद्वीपमें जङ्गी जहाजोंका अड्डा है। इटलीका आय-व्यय बढ़ते जाता है। सोने, चांदी रूपे और कांसेका सिक्क़ा चलता है। कर अधिक लगता है।
{{smaller|इतिहास}}—अतिशय रमणीय देश होने और जलवायु स्वास्थाप्रद रहनेसे पुराकाल उत्तरसे कितने ही लोगोंने इटलीपर आक्रमण किया था। इसीसे नाना प्रकारकी भाषाका प्रचार हुआ। रोमके ऐतिहासिकोंके कथनानुसार ई॰ से ३९० वर्ष पहले गालोंका दल रोमनगर मारते-काटते पहुंचा था। रोमकोंने इटली को जीत अच्छी-अच्छी सड़कें बनवाया। ४७६ ई॰ को हेरूदलीयोंके राजा ओडोआकर रोमुलस को सिंहासनच्युत कर सम्राट् बने थे। ४८८ ई॰ को ग्रीक-सम्राट् जेनोकी आज्ञासे पूर्व गालांके नरेश थिसोकोरिकने ओडोआकरको हराया और ४९३ ई॰ को जानसे मार डाला। फिर गालों और यूनानियोंमें ५३९ से ५५३ ई॰ तक ख़ूब युद्ध हुवा था। अन्तको गालीय नृपति टेइगा वेसूविअस् के पास यूनानियोंसे हार गये और यूनानी इटलीके अधिपति बने। ५६८ ई॰ को लोमबार्डीं ने गालोंको मार भगाया था। ५९० से ६०४ ई॰ तक ग्रिगोरीने लोमबार्डीं को मूर्तिपूजक बनाया और ७२६ ई॰ को द्वितीय ग्रिगोरीने रोममें स्वतन्त्र राज्य प्रतिष्ठित किया। ७५६ ई॰ को फ्रान्स-सरदारने इटलीका कितना ही उत्तरांश जीत पोपको सौंप दिया था। ७७४ ई॰ को चार्लस अपने श्वसुर देसीदेरिअस्को सिंहासनसे उतार इटलीके सम्राट् बने। चार्लस वंशके आठ नरेशोंने इटलीमें राज्य किया था। ८८८ ई॰ को चार्लस दी फत्राट (मोटे) सिंहासन-च्युत हुये। ९६१ ई॰ को इटलीय नृपति द्वितीय बेरेङ्गरने अपना राज्य ओटोको दिया था। चार्लस और ओटोके समय अराजकताकी धूम रही। चारों ओर लूट-मार होनेसे क़िले बहुत बने
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२|इडरहर—इण्डरी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इडरहर, {{smaller|इंडहर देखो।}}}}
{{outdent|इड़स्पति (सं॰ पु॰) विष्णु।}}
{{outdent|इड़हर, {{smaller|इंड़हर देखो।}}}}
{{outdent|इड़ा (सं॰ स्त्री॰) इल-क-टाप्, डस्य लत्वं वा। १ पृथिवी, ज़मीन्। २ धेनु, गाय। ३ त्वरा, शिताबी, जल्द। ४ सरस्वती। ५ हविः, अन्न। ६ देवी। ७ दुर्गा। ८ स्तुति, तारीफ़ ९ यज्ञपात्रविशेष। १० सन्तोष, तसल्ली। ११ भोजन, ख़ुराक़। १२ आहुति विशेष। यह आहुति प्रयाज अनुयाजके बीच होती है। इड़ायर चार प्रकारका दूध तैयारकर जलमय पात्रमें डालते और फिर होता और यजमान मिलकर पी जाते हैं। १३ अप्रिय देवता विशेष। यह असीमपा हैं। १४ आकाशदेवत। १५ मनुकी कन्या, बुधपत्नी। शतपथब्राह्मण (७।८।१११-१३) में मनुकन्या इड़ाके उत्पत्ति-सम्बन्धपर इस प्रकार गल्प कहा है,—मनुने प्रजासृष्टि करनेके लिये पाकयज्ञका अनुष्ठान किया था। घृत, नवनीत और आमिक्षा जलमें छोड़नेसे संवत्सरके मध्य एक कन्या उत्पन्न हुयी। बालिका सुस्निग्ध जलसे उठी थी। मित्रावरुण निकट आये। उन्होंने प्रश्न किया,—तुम कौन हो। जवाब मिला—मनुकी कन्या। उन्होंने फिर कहा,—तुम हमारी हो। इड़ाने उत्तर दिया—नहीं, हम अपने जन्म देनेवालेकी हो हैं। किन्तु मित्रावरुणने पुनः इनकी ओर प्यारसे देखा। यह कुछ उत्तर न दे मनुके समीप जा पहुंचीं। मनुने भी पूछा,—तुम कौन हो। इड़ाने कहा,—हम आपकी कन्या हुयी, आपके घृत, नवनीत तथा अमिक्षा प्रदानसे निकली हैं। हमें यज्ञमें अर्पण कीजिये। आपकी मनस्कामना पूर्ण होगी। मनुने इड़ाके साथ कठोर यज्ञका अनुष्ठान किया। अन्तको मनु प्रजापति बन गये। {{smaller|इला देखो।}} १६ वामपार्श्वस्थ रक्तवाही नाड़ी। मेरुदण्डके वहिर्भाग वाम तथा दक्षिण पार्श्वंपर चन्द्रसूर्यात्मक इड़ा पिङ्गला नामक दो नाड़ी होती, जो चन्द्र, सूर्य और अग्नि तीनोंका गुण रखती हैं। साधकके पक्ष में इड़ा नाड़ी गङ्गा और पिङ्गला यमुनाका स्वरूपं है। इन दोनों नाड़ीके मध्य सुषुम्णा सरस्वती-जैसी रहती}}
{{Multicol-break}}
:है। इड़ा पिङ्गला और सुषुम्णा तीनों नाड़ीके मिलन-को त्रिवेणी कहते हैं। योगी इस त्रिवेणीके सङ्गमपर स्नानकर सर्वपापसे छूट जाते हैं। प्राणायाममें पूरक करते समय इड़ा नाड़ोसे हो वायुको ऊपर चढ़ाते हैं। जब इड़ा नाड़ीसे स्वर चलता तब प्रत्येक शुभकार्य करनेमें साफल्य मिलता है। सुषुम्णा ब्रह्मनाड़ी है। उसीमें जगत् प्रतिष्ठित है। इड़ा, इरा और इला तीनों रूप सिद्ध हो सकते हैं।
{{outdent|इड़ाचिका (सं॰ स्त्री॰) इड़ेव आचति सूक्ष्म मध्य-भागम्, इड़ा-अच्-खुल्-टाप, अत इत्। १ वरटा, बर। २ गन्धोली, ककड़ी।}}
{{outdent|इड़ाजात (सं॰ पु॰) भूमिज गुग्गुल, जमीन्से पेदा गूगुर।}}
{{outdent|इड़ावत् (वै॰ त्रि॰) १ इड़ा मतुप्। इड़ानाड़ी विशिष्ट, जो इड़ाको रखता हो। २ आनन्दप्रद, फ़रहत बखुश। ३ आप्यायित, तरोताज़ा बना हुआ। ४ हविः-विशिष्ट।}}
{{outdent|इड़िक, {{smaller|इड़िक्क देखो।}}}}
{{outdent|इड़िका (सं॰ स्त्री॰) इड़ा स्वार्थे क, इत्वञ्चाकारस्य। पृथिवी, ज़मीन्।}}
{{outdent|इड़िक्क (सं॰ पु॰) इड़िक् इति कायति शब्दायते, इड़िक्-के-ड। १ वन्ध छागल, जङ्गली बकरा। २ वानर, बन्दर।}}
{{outdent|इड़ीय (सं॰ स्त्री॰) इड़ायां अन्नस्य अदूरदेशः, इड़ा-छ {{smaller|उत्करादिभ्थ्य। पा ४।३।९०।}} अन्न-सम्बन्धीय, अनाजसे भरा हुआ।}}
{{outdent|इड्देवता (सं॰ स्त्री॰) उदकदानकी देवी}}
{{outdent|इडुर (सं॰ पु॰) इच्छति वृषमिति, इष-क्विप्-इट् वृषस्यन्तीतया ब्रियते, इट् वृ कर्मणि अच्। वृष, छोड़देने लायक सांड़ ।}}
{{outdent|इण्ट्रेन्स (अं॰ स्त्री॰ = Entrance) १ प्रवेश, दखल, पैठ। २ प्रवेशाज्ञा, पैठका हुक्म। ३ द्वार, दरवाज़ा, पौली। ४ आरम्भ, शुरू। ५ अंगरेज़ी पाठशालाकी एक कक्षा, अंगरेज़ी मदरसेका एक दरज।}}
{{outdent|इण्डरी (सं॰ स्त्री॰) पक्कान्नविशेष, किसी क़िस्मके पके अनाजकी बनी चीज़।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली—इड़}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
(२य) कालग्रासमें पड़े और उनके पुत्र हामबर्ट राजसिंहासनपर बैठे। १८८१ ई॰ को राजा हामबर्ट अष्ट्रीया-सम्राट्के आमन्त्रणसे सस्त्रीक वियाना गये थे। २७वीं से ३१वीं अक्तोबरतक अष्ट्रीया-राजधानीमें वह ठहरे। उससे जर्मनी और अष्ट्रीयाके साथ इटलीका सङ्गाव स्थायी हुआ था। १८८२ ई॰ की २०वीं मईको तीनों राज्यके मध्य (Triple Alliance) सन्धिपत्र लिखा गया। इस सन्धिपत्रके अनुसार रूस, फ्रन्स या कोई दूसरा राज्य जर्मनी, अष्ट्रीया वा इटलीसे लड़नेपर उक्त तीनों राज्य उसके विरुद्ध अस्त्र धारण करनेपर सम्मत हुये थे। इस सन्धिसे इटलीको राज्यकी उन्नति करने और सेना तथा नौ विभागमें बल बढ़ानेका बहुत सुभीता पड़ा है।
१८९१ ई॰ के जून मास जर्मन और इटलीय मन्त्रीकी चेष्टासे वाणिज्यवृद्धिक अभिप्राय फिर उक्त सन्धिपत्र गृहीत हुआ। १८०० ई॰ को २९वीं जुलाई-को ब्रेस्की नामक किसी राजद्रोहीने इटलीराज हामबर्टको गोलीसे मार डाला। पीछे उनके एकमात्र पुत्र ३य विक्टर एम्मानुएल इटलीके राजा हुये। यह अति शान्तिप्रिय नृपति हैं। इन्हींके समय १९०८ ई॰की २८वीं दिसम्बरका सवेरे पांच बजे अतिहृदय-विदारक भूमिकम्पसे समग्र दक्षिण कलब्रिया और सिसिलीका पूर्वींश विध्वस्त हो गया था। उससे बहुतसे जनपद टूटे और अकेले मसीना नगरमें डेढ़ लाख मनुष्य मरे।
१९०३ ई॰ के अक्तोबर मास राजा एम्मानुएल सपत्नीक फ्रान्स-राजधानी पारिस गये थे। उससे दोनों राज्यके मध्य यथेष्ट, सद्भाव स्थापित हुआ। १९०८ ई॰ के अक्तोबर मास अष्ट्रीय-सम्राट् फ्रान्सिस् जोसेफने बोसनियाको अपने राज्यमें मिला लिया था। इस संवादसे राजा एम्मानुएल और अपरा पर नृपति विचलित हुये। उसी समयसे अष्ट्रीयाक साथ इटलीका मनोमालिन्य बढ़ा। जर्मनी एवं अष्ट्रीयाके साथ रूस, फान्स और इङ्गलेण्ड़के लड़ते भी कुछ दिन इटली-नरेश निरपेक्ष रहे। किन्तु अपनी स्वार्थहानि भयानक रूपसे होते देख १९१५
{{Multicol-break}}
ई॰ इटलीकी फौज आगे बढ़ी और अष्ट्रीयासे लड़ बैठी। इटली बड़े बलविक्रमसे आजकल अष्ट्रीयाके साथ युद्ध कर रहा है।
{{smaller|राम, पोप, नेपोलियान्, गारिवल्डी, माजिनि, अष्ट्रीया प्रभृति शब्द और विवरण देखो।}}
{{outdent|इटसून (वे॰ क्ली॰) इट-क-श्वि-क्त पृषोदरादित्वात् शस्य सः। शाखामय कट, बेंतकी चटाई। "वैतसे इटसूनेउत्तरतोश्वस्यावद्यन्ति।" (शतपयब्राह्मण १३।२।२।१९।) 'इटसून तस्मिन्नेव शाखामये कटे।' (हरिस्वामी)}}
{{outdent|इटालिक (अं॰ पु॰ = Italic) वङ्काक्षर, टेढ़े छापेके हर्फ़।}}
{{outdent|इटालियन (अं॰ पु॰) १ इलीवासी। २ वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। प्रथमतः इटलीमें बननेसे ही इस वस्त्रको इटालियन कहते हैं। वृक्षत्वक्से इटालियन बनता और खूब चमकदार निकलता है। रङ्ग काला होता है।}}
{{outdent|इट्चर (सं॰ पु॰) इष भावे कि्कप्-चर-अच्, दृषा कामेन चरतीति। षण्ड, स्वतन्त्र घूमनेबाला सांड़।}}
{{outdent|इठलाना (हिं॰ क्रि॰) १ साहङ्कार गमन करना, गुरूरके साथ चलना। २ अव्यक्त भाषण करना, तुतलाना, साफ-साफ न बोलना। ३ वक्रोत्तर प्रदान करना, टेढ़े जबाब देना। ४ तिर्यक् सम्भाषण करना, गुस्ताख़ीके साथ बोलना, उलटी बात बताना। ५ छद्म देखाना, मटियाना, नावाफिक़ होनेका बहाना करना। ६ विरोध करना, झगड़ा लगाना।}}
{{outdent|इठलायी (हिं॰ स्त्री॰) साहङ्कार गमन, ठसककी चाल, इठलाहट।}}
{{outdent|इठलाहट, {{smaller|इठलायी देखो।}}}}
{{outdent|इठायी (हिं॰ स्त्री॰) अभिलाष, खाहिश, चाह, प्यार।}}
{{outdent|इठिमिका (सं॰ स्त्री) काठक शाखाभेद, यजुर्वेदकी एक शाखा।}}
{{outdent|इड़ (सं॰ स्त्री॰) इल्-क्किप् वा लस्य ङः। १ भूमि, ज़मीन्। २ अन्न, अनाज। ३ वर्षाकाल, बरसात। ४ तृतीय प्रयाज। ५ यज्ञाङ्ग। ६ षष्ठ प्रयाज। (वै॰ त्रि॰) ७ स्तुतियोग्य, तारीफके क़ाबिल।}}
{{block center|<poem>{{smaller|"परिधिरस्यग्रिरिड़इडितम्।" (वाजसनेयसं॰ २।३)
'इव्द्यते स्तूयते इतौड़ः स्तुतियोग्यः।' (महीधर)}}</poem>}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. {{gap}}6}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२४|इतरेद्युस्—इतिहास|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इतरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) इतर-एद्युस्। {{smaller|सद्यपञ्चदित्यादिना। या ५।३।२२}} अन्य दिन वा समय, दूसरे रोज या वक्त।}}
{{outdent|इतरौहां (हिं॰ वि॰) सगर्व, मगरूर, इतरानेवाला।}}
{{outdent|इतलाक (अ॰ पु॰) प्रार्थना, अनुसन्धान, अर्ज़, हवाला।}}
{{outdent|इतलाक रखना (हिं॰ क्रि॰) लगना, मिलना।}}
{{outdent|इतली, {{smaller|इटली देखो।}}}}
{{outdent|इतवरी (हिं॰) {{smaller|इत्वरी देखो।}}}}
{{outdent|इतवार (हिं॰ पु॰) आदित्यवार, एकशब्दा, एतवार।}}
{{outdent|इतश्चेतश्च (सं॰ अव्य॰) इतश्च द्वित्वम्। इधर-उधर, इस तर्फ़ उस तर्फ़।
{{block center|<poem>{{smaller|"सन्तोषामृततृप्तानां यत् सुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तहनलुब्धानामितश्वे तय धावताम्॥" (हितोपदेश)}}</poem>}}}}
{{outdent|इतस् (सं॰ अव्य॰) इदम् तसिल्। १ इस स्थानसे यहां, इस जगह। २ इहलीकसे, इस दुनियासे।}}
{{outdent|इतस्ततः (सं॰ अव्य॰) इदम्-तटु-असिल्। नाना स्थानपर, इधर-उधर, यहां वहां।}}
{{outdent|इताति (हिं॰) {{smaller|इतायत देखो।}}}}
{{outdent|इताब (अ॰ पु॰) १ क्रोध, गुस्सा। २ निन्दा, मलामत, झिड़की।}}
{{outdent|इताब-खिताब (अ॰ पु॰) क्रोधयुक्त शब्द, गुस्सेकी बात।}}
{{outdent|इतायत (अ॰ स्त्री॰) अधीनता, मातहती।}}
{{outdent|इतायत करना (हिं॰ क्रि॰) १ आज्ञा मानना, हुक्म बजा लाना। २ आदर देना, झुकना।}}
{{outdent|इताली, {{smaller|इटली देखी।}}}}
{{outdent|इति (सं॰ अव्य॰) इ-क्तिन्। १ अतएव, इससे। २ इसी हेतु, इसी सबबसे। ३ प्रकाश्य रूपसे, खुले तौर पर। ४ निदर्शनपूर्वक, देख-सुनकर। ५ प्रकार, तरह। ६ अनुकर्षसे, पहली बातके मुवाफ़िक़। ७ समाप्तिमें, पूरा होनेपर। ८ स्वरूप, जैसे। ९ प्रकरणपूर्वक, हिकायतसे। १० सान्निध्यमें, नज़दीक। ११ नियमपूर्वक, क़ायदेसे। १२ मतमें, रायसे। १३ प्रत्यक्ष, सामने। १४ अवधारणपूर्वक, सोच-समझ-के। १५ व्यवस्थासे, तजवीज़ करके। १६ परामर्श द्वारा, नसीहतसे। १७ मानपूर्वक, इज्जतसे। १८ इसी}}
{{Multicol-break}}
:प्रकार, इस तरह। १९ प्रकर्षमें, ज़ोरस। २० उपक्रम-पूर्वक, सिलसिलेमें। प्रक्कत रूपसे इति शब्द कहे या विचारे हुये विषयको बताता और पूर्वगामी शब्दपर प्रभाव डालता है। ब्राह्मणमें यह श्रोताको समझी हुयी रीतिका स्मरण दिलाता है। उद्धत वाक्यमें इससे प्रमाणित होता, पूर्व विषय किसी अन्य लेखक या ग्रन्थकारका कहा है। कभी-कभी इति एक ही विषयके विभिन्न शब्द जोड़ता है। किसी ग्रन्थकारके नाममें लगनेसे यह क्रियाविशेषण हो जाता है।
(क्ली॰) भावे क्तिन्। २१ गमन, चाल। २२ ज्ञान, समझ। २३ मुनिविशेष।
{{outdent|इतिक (सं॰ त्रि॰) इतं गतिरस्त्यस्येति, ठन्। १ गमन विशिष्ट, चलनेवाला। (पु॰) २ जातिविशेष।}}
{{outdent|इतिकथ (सं॰ त्रि॰) इति इत्यं कथा यस्य, बहुव्री॰। १ अश्रद्धेय, न मानने लायक। २ नष्ट, बरबाद। अर्थशून्य वाक्यका वक्ता इतिकथ कहाता है।}}
{{outdent|इतिकथा (सं॰ स्त्री॰) इति इत्थं कथा। अर्थशून्य कथा, बेहूदी बात।}}
{{outdent|इतिकरण (सं॰ क्ली॰) {{smaller|इति शब्द।}}}}
{{outdent|इतिकर्तव्य (सं॰ त्रि॰) इति इत्यं कर्तव्यम्, सुप्सुपा समा॰। १ नियमानुसार करने योग्य, क़ायदेके सुवाफ़िक़ किया जानेवाला। (क्ली॰) २ धर्म, फ़र्ज़।}}
{{outdent|इतिकर्तव्यता (सं॰ स्त्री॰) इतिकर्तव्यस्य भावः, इति-कर्तव्य-तल्-टाप्। धर्म, फ़र्ज़, वाजिबात्।}}
{{outdent|इतिकर्तव्यतामूढ़ (सं॰ त्रि॰) आकुल, गूंगा बना हुआ, जिसे अपना काम विलकुल समझन न पड़े।}}
{{outdent|इतिकार्यता, {{smaller|इतिकर्तव्यता देखो।}}}}
{{outdent|इतिकृत्यता, {{smaller|इतिकर्तव्यता देखो।}}}}
{{outdent|इतिथ (बै॰ त्रि॰) ऐसा-वसा, एक न एक।}}
{{outdent|इतिमात्र (सं॰ त्रि॰) इति स्वार्थे मात्रच्। केवल इतना ही, इससे कम न ज़्यादा।}}
{{outdent|इतिवत् (सं॰ अव्य॰) एक ही प्रकार, एक ही तरह।}}
{{outdent|इतिवृत्त (सं॰ क्ली॰) इत्यं वृत्तम्, सुप्सुपा समा॰। १ पुराणशास्त्र। २ ऐसा ही चरित्र, इसी क़िस्मका हाल। ३ इतिहास, तवारीख। {{smaller|इतिहास देखो।}}}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इातश—इातहास|२५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इतिश (सं॰ पु॰) एक ऋषि। इनके गोत्रापत्यको ऐतिशायन कहते हैं।}}
{{outdent|इतिह (सं॰ अव्य॰) एवं ह किल, इन्ह-समा॰। पुराणानुसार, निःसन्देह इस प्रकार, हकीक़तमें इसी तरह।}}
{{Outdent|इतिहास (सं॰ पु॰) इतिह पुरावृत्तं आस्ते अस्मिन्; इतिह-आस-घञ, ६-तत्। पुरावृत्त, प्राचीन आख्यान, तवारीख। पुरावृत्त कथा ही इतिहास है। इसे अष्टादश शास्त्रके अन्तर्गत मानते हैं। {{smaller|"ऋग्वेदी यजुर्वेदः सामवेदोऽधर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्या नानि।" (यजुर्वेदीय शतपथब्राह्मण १४।५।४।१०)}}
:उपरोक्त ब्राह्मगा और अपगपर प्राचीन ग्रन्थमें इतिहास और पुराण वाक्यका उल्लेख देख अति प्राचीन कालसे इतिहास और पुराण नामके स्वतन्त्र ग्रन्थकी विद्यमानता समझ पड़ती है।
:अथव-संहिता (१५।६।४), और छान्दोग्योपनिषद् (७।१।१) मध्य इतिहासका उल्लेख पाते हैं। छान्दोग्योपनिषत् तथा कौटिल्यके अर्थशास्त्रमें इतिहास पञ्चमवेद कहकर निर्दिष्ट हुआ है। महाभारतकार कृष्णद्वे पायनने कहा है—
{{block center|<poem>{{smaller|"धर्मार्थकाममोक्षानामुपदेशसमन्वितम्।
पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥"}}</poem>}}
:जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका उपदेश एवं पुरावृत्त कथा रहता, वह इतिहास कहाता है।
:विष्णुपुराणकी टीकामें (३।४।१०) श्रीधरस्वामीने भी ऐसा और एक प्राचीन वचन उद्धत किया हैं—
{{block center|<poem>{{smaller|"आर्यादि बहुव्याख्यानं देवर्षिचरिताश्रयम्।
इतिहासमिति प्रोक्तं भविष्याङ्गु तधर्मयुक्॥"}}</poem>}}
:ऋषिप्रोक्त बहु व्याख्यान, देवर्षिचरित तथा अद्भुत धर्मकथादि जिसमें ही वह इतिहास है।
:महात्मा चाणक्यने निर्देश किया है—{{smaller|"पुराणमितिवृत्त-माख्यायिकीदाहरणं धर्मशास्त्रं अर्थशास्त्रं चेतिहासः।" (कौटिलीय अर्थशास्त्र)}}
:पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र यह सब ही इतिहास हैं।
:इतिहासमें चतुर्वर्ग फल-लाभकी कथा है; अतएव इतिहास पञ्चमवेद श्रुतिमें कीर्तित हुआ और इसी}}
{{Multicol-break}}
:लिये स्मरणातीत कालसे भारत में इतिहासका समादर भी होता आया। गृह्यसूत्र तथा सन्वादि धर्मशास्त्र में श्राद्धादि पितृकार्यमें इतिहास और पुराण सुनानेकी जो व्यवस्था लिखी, उसका कारण भी यही है। यथ—
:{{smaller|"आयुष्मतां कथाः कीर्तयन्ती माङ्गल्यानीतिहासपुराणानीव्याख्यापयमानाः।" (आश्वलायनग्गृह्यसूत्र ४।५)}}
{{block center|<poem>{{smaller|"स्वाध्याय' श्रावयेत् पिवे धर्मशास्त्राणि चैवहि।
आख्यानानीतिहासांञ्ज पुराणान्यस्विलानि च॥" (मनु २।७२)}}</poem>}}
:महाभारतमें लिखा है—
{{block center|<poem>{{smaller|"आरण्यकश्च वेदेभ्यो ओषधिभ्योऽमृत' यथा।
इदानासुदधि श्रैष्ठी गौर्वरिष्ठी चतुष्पदां॥
यथै तानीतिहासानां तथा भारतमुच्यते।
यश्चैनं यावयेच्छाद्ध ब्राह्मणान् पादद्मन्ततः॥
अक्षय्यमन्नपानं वैपितृं स्तस्योपतिष्ठते।
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं ससुपतृं हयेत्॥" (आदिपर्व, १अ॰)}}</poem>}}
:अर्थात् वेदोंमें जैसे आरण्यक, ओषधियोंमें अमृत, जलाशयोंमें समुद्र और चतुष्पदोंमें गौ श्रेष्ठ है, वैसा हो इतिहासोंमें भारत श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति श्राद्धके समय ब्राह्मणसे इस भारतका अन्ततः एक चरण भी सुन पाता उनका दिया अन्नपान पितृलोकमें अक्षय होता है। इतिहास और पुराणोंके द्वारा वेदका हो अर्थ प्रकाशित होता है।
:उद्धृत महाभारतीय श्लोकसे जान पड़ता, कि महाभारत हमारा इतिहास है, इसके पूर्व भी बहु इतिहास रहा उनमें भारत श्रेष्ठ इतिहास कह परिचित हुआ था। आस्वलायन-गृह्यसूत्रके (३।४।४) "भारत-महाभारत-धर्माचार्याः" इत्यादि वचनसे मालूम होता है, उस समय 'भारत' और 'महाभारत' नाममें विभिन्न इतिहास प्रचलित था। हम प्रचलित महाभारतसे भी जान सकते, कि पहले लक्ष श्लोकी महाभारत प्रचलित नहीं रहा, महाभारतमें ही है—
{{block center|<poem>{{smaller|"चतुर्विंशतिसाहस्री चक्रे भारतसंहितां।
उपाख्यानैर्विना तावहारतं प्रोच्यते बुधैः॥"}}</poem>}}
:व्यासदेवने प्रथम २४००० श्लोकमयी भारत-संहिता बनायी थी। वास्तविक वर्तमान प्रचलित संस्करण-समूहमें उस आदि संहिताकी अनेक कथा रहते भी
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२६|इतिहास|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उपाख्यान प्रभृतिके साथ बहुत अवान्तर विषय। प्रविष्ट हो जानेसे आज महाभारतको कितने ही लोग। इतिहास माननेसे हिचकते हैं। किन्तु जिन युरोपीय ऐतिहासिकोंके आदर्शपर हम वर्तमान कालके इतिहासका उपादान मानते, वह जानते हैं,—
"* * * *It is evident that Freeman's definition of history as 'past politics' is miserably inadequate. Political events are mere externals. History enters into every phase of activity, and the economic forces which urge society along are as much its subject as the political result. In short the historical spirit of the age has invaded every field." ''Encyclopædia Britannica,'' 11th. Ed. (1911), Vol. XIII, p. 527.
'फ्रीमेनकी यह परिभाषा अतिशय अपर्याप्त आती, कि इतिहासकी गणना 'गत राजनीति' में जाती है। राजनीतिक काण्ड केवल बहिरङ्ग होते हैं। इतिहास व्यापारके प्रत्येक अंशको छूता है। निर्वाहसम्बन्धी बल राजनीतिक फलकी भांति इतिहासका विषय बन जाता है। संक्षेपमें कहनेसे सामयिक इतिहासकी शक्तिने प्रत्येक क्षेत्रपर अपना प्रभाव डाला है।'
सुतरां पाश्चात्य वर्तमान ऐतिहासिकोंके मतसे महाभारतको भी इतिहास माननेमें कोई आपत्ति न पड़ेगी। हमारे आदि इतिहासके सार महाभारतमें ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे स्थावर जङ्गम सकल प्रकार सृष्टि तत्त्व, देव ऋषि पितृ प्रभृति जीवका संक्षिप्त परिचय, भारतके प्राचीन राजवंशका विवरण, दुर्ग नगर तीर्थक्षेत्र प्रभृति समुदाय जीवस्थान, धर्मरहस्य, कामरहस्य, वेदचतुष्टय, योगशास्त्र, विज्ञानशास्त्र, धर्मार्थकाम-विषयक नाना शास्त्र और लोकयात्राविषयक आयुर्वेद धनुर्वेद आलोचित है। कहनेसे क्या! वर्तमान पाश्चात्य इतिहासविद् इतिहासका जैसा व्यापकत्व और विषयनिर्धारण ठहराते, महाभारतरूप भारतके प्राचीन इतिहासमें, वैसा ही आयोजन पाते भी हैं।
जो विषय ध्रुव सत्य रहता और प्रत्यक्ष वा परोक्ष प्रमाण द्वारा प्रतिष्ठित होता, वही इतिहास बजता है। इसीसे भगवान् शङ्कराचार्यने इतिहासका प्रामाण्य मान बता दिया है,—{{smaller|"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरमूलतामाकाङ्गते।" (शारीरकभाष्य १।३।३२)}}
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{{gap}}अर्थात् इतिहास पुराणको भी पौरुषेय समझकर प्रमाणान्तरमूलता वा वेदके बाद गौणप्रमाण मानना पड़ेगा कैसे स्वीकार करेंगे। उत्तरमें शङ्कराचार्यने कहा है,—
{{smaller|"इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन् मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि प्रपञ्चयितुम्। प्रत्यक्ष मूलमपि सम्भवति। भवति हि अस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम्। तथा च व्यासादयो देवताभिः प्रत्यक्षं व्यवहारन्तीति अर्थते।"}}
अर्थात् इतिहास और पुराण जिस भावसे व्याख्यात हुआ, मन्त्र और अर्थवाद होनेसे वह देवता विग्रहादिके प्रपञ्चनिर्णयमें समर्थ है। इसका प्रत्यक्षमूलक होना भी सम्भवपर है। हमारे पक्षमें अप्रत्यक्ष रहते भी प्राचीनोंके लिये यह प्रत्यक्ष हुआ। इसीसे स्मृतिमें कहा, कि व्यासप्रभृतिने देवताओंके साथ प्रत्यक्षरूपसे व्यवहार किया था।
भारतका प्राचीन ऋषिगण समझते, जो प्रत्यक्षमूलक वा समसामयिक लोगोंके रचित रहता और जिसकी मौलिकताके सम्बन्धपर कुछ सन्देह उठने न पाता वही प्रकृत इतिहास कहाता था।
हमारे महाभारतीय इतिहासकी मौलिकता और प्रामाणिकता आजकलकी अवस्था देख विचारनेसे नहीं बनता। उसे भगवान् शङ्कराचार्य ही अच्छी तरह देखा गये हैं। समसामयिकी घटना सम सामयिक मनीषी द्वारा लिपिबद्ध हुयी थी। पुराकालकी सकल विक्षिप्त कथाको जिसने परवर्ती कालमें एकत्र सङ्कलन किया, उसीने व्यासदेव वा संग्रहकार नाम कमा लिया। हमारे प्राचीन इतिहासका अधिकांश विलुप्त वा विकृत पड़ जाना अत्यन्त दुःखका विषय है। अतिप्राचीन भारतका विशुद्ध इतिहास ढूंढ निकालना एकप्रकार दुःसाध्य व्यापार हो गया है। इसीसे वर्तमान ऐतिहासिक 'महाभारत' को इतिहास नहीं समझते। तथापि कितनी ही मिलावट रहते और प्रक्षिप्त उपकरण बढ़ते भी भारतवर्षीय पण्डित समाजमें महाभारत इतिहास ही कहाता है।
महाभारतीय युगके बाद भी लगातार इतिहास
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इातहास|२७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अपने-अपने राजवंशके चरिताख्यायक वा सूतमागधादि द्वारा लिपिबद्ध होता था। किन्तु राष्ट्रविप्लवसे वह समुदाय बिगड़ गया। हमारे पुराणोंमें राजवंशके प्रसङ्गपर राजगणका नाम और राज्यशासनकाल मात्र मिलता है। विस्तृत इतिहास विलुप्त होते भी हमारे श्राद्धादि कार्यमें इतिहासपुराण अवश्यपाठ करनेसे अवधारित रहनेपर एककाल वह मिट नहीं सका। इसी कारण पुराणसे प्रकृत ऐतिहासिक युगके क्षीण कङ्गालका सन्धान लगता है।
पाश्चात्य पुराविदु बताते, कि मकदुनिया बीर अलेक्सन्दरके समयसे ही प्रकृत प्रस्तावपर वैज्ञानिक प्रणालीमें भारतीय इतिहास-रचनाकी सूचना पाते हैं। तदनुसार अनेक ही मौर्याधिपत्यकालसे हमारे भारतके प्रकृत ऐतिहासिक युगका आरम्भ समझते हैं। सम-सामयिक लिपिसे इसका प्रमाण यथेष्ट मिला, कि उस समय वास्तविक पाश्चात्य और प्राच्य जगत्में धारावाहिक इतिहास रचनाका समादर बढ़ा था। बहुतसे लोग सोचते, कि भारत में यवन वा ग्रीक-प्रभावके फल और आदर्शसे ही नाना शिलालेखका उत्कीर्ण होना देखते हैं। प्रवादानुसार उपाख्यान वा कल्पनाके हाथसे निष्कृति ले उसी समय प्रकृत घटना खोदी जाने लगी और साथ ही साथ भारतमें विज्ञान सम्मत इतिहासकी भित्ति पड़ी। किन्तु पिपरावेमें एक खोदित शिलालेख निकला है। उसमें शाक्यबुद्धके भस्माधारपर निर्वाणके बाद जो लिखा गया, उससे भारतमें पारसिक वा यवन-प्रभाव-विस्तारके बहुत पहले समसामयिक घटना पत्थरपर खुदनेकी पद्धतिके प्रचारका निदर्शन स्पष्ट हाथ लगा है। अलेक्सन्दरसे बहुत पहले नाना भावमें विभिन्न देशका इतिहास लिखा जाता था। उक्त विषय महापुराण-वर्णित राजवंशके विवरणसे ही प्रमाणित होता। अलेक्सन्दरके समय जिन सकल महात्माओंने भारत आकर यहांकी कथा लिखी उनकी विवरणीसे भी कितनी ही बात चली है। अलेक्सन्दरके तिरोधान बाद ही मेगस्थेनिस दौत्यकार्यपर पाटलिपुत्रकी राजसभामें उपस्थित रहे। उन्हीं मेगस्थनिस
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पर निर्भर कर प्राचीन पुराविद् आरियानने लिखा है,—"डाइओनिसस्से चन्द्रगुप्त पर्यन्त भारतीय राजन्यवर्गने ६०४२ वर्ष राजत्व रखा था। राजाओंकी संख्या एक-सौ तिरपन रही। फिर भी उक्त समयके मध्य तीन बार साधारणतन्त्र चला।"<ref>Arrian's Indica.</ref> इस विवरणीसे अच्छीतरह समझते—जिस समयसे विज्ञानसम्मत ऐतिहासिक युगका सूत्रपात मानते, उससे छः हजार वर्ष पूर्वकाल होते भी धारावाहिक रूपमें भारतका इतिहास लिखा देखते हैं। आजकल उसका अधिकांश विलुप्त है। महाभारत और पुराणमें क्षीण स्मृतिमात्र मिलता है। इसी कारण, महाभारत और पुराण हमारे भारतके प्राचीन इतिहासका अङ्ग समझा जाता है। परदर्तों काल नाना स्थानसे विभिन्न सम्प्रदायके जो शत-शत शिलालेख, ताम्रपत्र वा सामयिक इतिवृत्त निकला, उससे भारत-पुराणका प्रभाव सुस्पष्ट झलका है।
प्रारम्भमें ही कहा इतिहासको व्यापकता अति विशाल और विस्तृत है। स्थावर जङ्गम, जीव-अजीव और मूर्त-अमूर्त क्या—ऐसा कौन पदार्थ होता, जिसका इतिहास नहीं रहता। साहित्य, विज्ञान, दर्शन, तथा शिल्पकलादि सभीका इतिहास विद्यमान है। इसीसे आधुनिक पाश्चात्य ऐतिहासिक डाक्टर जे॰ टि॰, सोटओयेलने कहा है,—
"History in the wider sense is all that has happened, not merely all the phenomena of human life, but those of the natural world as well. It includes everything that undergoes change; and as modern science has shown that there is nothing absolutely static, therefore the whole universe and every part of it, has its history. * * * Solids are solids no longer. The universe is in motion in every particle of every part, rock and metal merely a transition stage between crystallization and dissolution. This idea of universal activity has in a sense made physics itself a branch of history. It is the same with the other sciences-especially the biological division, where the doctrine of evolution has induced an attitude of mind which is distinctly historical."<ref>''Encyclopacdia Britannica,'' 11th ed Vol. XIII, p. 527.</ref>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२८|इतोक—इत्तिला करना|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पाश्चात्य पण्डितोंके मतमें जगत्की अतीत और वर्तमान घटनाकी वर्णन द्वारा साधारणको उपदेश देना ही इतिहास है। वेकन साहबने दर्शन और काव्यको नीचे डाल इतिहासका प्राधान्य माना है। उनके सतमें इतिहास ही भूतपूर्वं मानव जगत्की आन्तरिक और बाह्य वृत्ति समझनेकी मूल स्मृति है। आर्नल्ड साहब समाजकी जीवनीको ही इतिहास कहते हैं—
"The general idea of history seems to me to the that it is the biography of a scciety History is to the common life of many, what biography is to the life of an individual." (Arnold's Lectures on history,)
इतिहास जगत्के समग्र पदार्थों के परिवर्तनका वर्णन है। केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग—यहांतक, कि जड़ पदार्थ भी अपना-अपना इतिहास रखते हैं। भूतपूर्व राजनीतिको ही इतिहास मानना भूल है। 'इतिह' का 'पुरावृत्त' और 'आस'का अर्थ 'रहता' है। जिस पुस्तकमें किसी वस्तुका पुराना वृत्तान्त रहता, उसे ही मनुष्य इतिहास कहता है।
इतिहास लेखकको मित्रकी निन्दा और शत्रु की प्रशंसा करना पड़ती है। क्योंकि इतिहास सच्चा न होनेसे किसी अर्थका नहीं निकलता। चीनीयों, रोमकों, यूनानियों और इसलामीयोंने इतिहास लिखनेमें बड़ा श्रम उठाया है।
प्राचीन आर्यसमाज अच्छीतरह समझता—इतिहास क्या होता, उससे कौन लाभ मिलता और वह किस काम आता था। महर्षि कृष्णद्वैपायनने अपनी अमृर्तानस्यन्दिनी भाषामें कहा है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना।
लोकगर्भगृहं कृत्यं यथावत् संप्रकाशितम्।"
(महाभारत १।१।८३)}}</poem>}}
अर्थात् इतिहास ही हमारा मोहान्धकार दूर करता और ज्ञानचक्षु खोल देता है।
{{outdent|इतीक (सं॰ पु॰) जातिविशेष, एक क़ौम।}}
{{outdent|इतेक, {{smaller|इतना देखो।}}}}
{{outdent|इतो, {{smaller|इतना देखो।}}}}
{{outdent|इत्कट (सं॰ पु॰) इतं गन्तारं समीपस्थं वा कटति}}
{{Multicol-break}}
आष्टणीति स्वभिखास्थफलेनेति; इत्-कट्-अच्, ६-तत्। स्वनामख्यात क्षुपविशेष, किसी किस्मका सर।
{{outdent|इत्कटा (सं॰ स्त्री॰) सूक्ष्मपत्रिका एवं दीर्धलोहित यष्टिका काष्ठविशेष, किसी किस्मकी लकड़ी। इसका पत्र छोटा और डण्ठल बड़ा तथा लाल होता है। {{smaller|(वाग्भट)}}}}
{{outdent|इत्कर, {{smaller|इत्कट देखो।}}}}
{{outdent|इत्किला (सं॰ स्त्री॰) किल शौक्लेत्र किल-क किला, इत् गतः किलः शौल्लयं यश्याः। रोचना नामक सुगन्धि द्रव्य, एक क़िस्मकी खुशबूदार चीज़।}}
{{outdent|इत्ता, {{smaller|इतना देखो।}}}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़ (अ॰ पु॰) १ समय, वक्त। २ स्वरैक्य, एकदिली। ३ सङ्ग, साथ। {{smaller|"इत्तिफाक बड़ी चीज है।" (लोकोक्ति)}} ४ सम्मति, रज़ा। ५ समवाय, मेल। ६ पक्षपात, साज़िश। ७ मैत्री, दोस्ती। ८ दशा, हालत। ९ कार्य, काम। १० अवसर, मौक़ा। इसका बहुवचन इत्तिफ़ाकात् है।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़ करना (हिं॰ क्रि॰) १ सम्मत होना, मिल-जुलके चलना। २ मैत्री लगाना, दोस्ती जोड़ना।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़न् (अ॰ क्रि॰ वि॰) १ अवसरवश, मौकेसे। दैवयोगसे, एकायेक।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़ बनना (हिं॰ क्रि॰) आनन्द रहना, बखेड़ा न पड़ना।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़, रखना (हिं॰ क्रि॰) शान्तिपूर्वक रहना, दोस्ताना तौरपर चलना।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़राय (अ॰ पु॰) सम्मति, मेल-जोल।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़ होना (हिं॰ क्रि॰) १ सम्मति बैठना, राय पड़ना। २ मिलना, एक-जसा देख पड़ना। ३ मित्र बनना, दोस्ती जुड़ना।}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़िया, {{smaller|इत्तिफ़ाकी देखो।}}}}
{{outdent|इत्तिफ़ाक़ी (अ॰ वि॰) आकस्मिक, अप्रक्कत, नाग-हानौ, आसमानी।}}
{{outdent|इत्तिला (अ॰ त्रि॰) विज्ञापन, वृत्तान्त, मुखबिरी, खुबर, चितावनी।}}
{{outdent|इत्तिला करना (हिं॰ क्रि॰) १ निवेदन सुनाना, हवाला देना कहना। २ सूचना निकालना, इश्तेहार देना, जताना।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इत्तिलानामा—इदंविद्|२९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इत्तिलानामा (अ॰ पु॰) लिखित आख्यान, तलबीनामा, दस्तक।}}
{{outdent|इत्तिष्हाम (अ॰ पु॰) अपराध, कुसूर, खोट।}}
{{outdent|{{smaller|इतना देखो।}}}}
{{outdent|इत्थं (सं॰ अव्य॰) इदं प्रकारे थसुः, इदमः इदादेशः। इस प्रकार, इस तरह, ऐसे, यों।}}
{{outdent|इत्थंविध (सं॰ त्रि॰) ऐसा, ऐसे गुणवाला, जिसमें ऐसे औसाफ़ रहें।}}
{{outdent|इत्यङ्कार (सं॰ अव्य॰) इस रीतिसे, ऐसे तौरपर।}}
{{outdent|इत्थमेव (सं॰ त्रि॰) १ ऐसा ही, इसी हालत में रहनेवाला। (अव्य॰) २ इसीप्रकार, इसीतरह।}}
{{outdent|इत्थम्भाव (सं॰ पु॰) इत्थं भावः, ६-तत्; भू प्राप्तौ घञ्। ऐसी अवस्था, यह हालत।}}
{{outdent|इत्थम्भूत (सं॰ त्रि॰) इत्थं कमपि प्रकारं भूतः प्राप्तः, इत्यम्-भू प्राप्ती कर्तरिक्त। ऐसा बना हुआ, जो ऐसी हालतमें पड़ गया हो।}}
{{outdent|इत्यशाल (सं॰ पु॰) ज्योतिषीक्त तृतीय योग। जब शीघ्र चलनेवाला ग्रह अंशमें कम पड़ते भी मन्दगामी ग्रहकी देखता, तब इत्थसाल योग होता है। यह शब्द सम्भवतः अरबोके 'इत्तसाल'का अपभ्रंश है।}}
{{outdent|इत्था (वै॰ अव्य॰) इदम् थाल् इदादेशः। १ सत्य! बेशक। २ इस प्रकार, इसीतरह।}}
{{outdent|इत्थात् (वै॰ अव्य॰) ऐसे, इसप्रकार, यों।}}
{{outdent|इत्याधी (वै॰ अव्य॰) इत्या सत्या घीः यस्य, बहुव्री॰। सत्यपरायण, दृढ़बुद्धि, सुधी, सच्चा, खासी समझ रखनेवाला।}}
{{outdent|इत्य (सं॰ त्रि॰) इण् कर्मणि क्यप् तुगागमश्च। १ गमनके योग्य, जाने क़ाबिल, जहां जा सकें। (क्ली॰) भावे क्यप्। २ गमनकार्य, रवानगी।}}
{{outdent|इत्यक (सं॰ पु॰) इत्याय कायति, इत्य-कै-क। १ गमन, चाल। २ द्वारपाल, दरवान्।}}
{{outdent|इत्यर्थं (सं॰ अव्य॰) इस निमित्त, इसलिये।}}
{{outdent|इत्या (सं॰ स्त्री॰) इण्-क्यप् तुक्-टाप्। १ शिविका, पालकी। २ गमनकार्य, रवानगी। ३ बङ्गाल-प्रान्तके यशोर ज़िलेका एक ग्राम। यहां खजूरका गुड़, चीनी और तम्बाकू तैयार होता है।}}
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{{outdent|इत्यादि (सं॰ त्रि॰) इति आदिः यस्य, बहुत्री॰। यही सकल, यही सब, वग़ैरह।}}
{{outdent|इत्यादिक, {{smaller|इत्यादि देखो।}}}}
{{outdent|इत्युक्त (सं॰ स्त्री॰) इति अनेन उक्तम्। इसीप्रकार कथित, ऐसे हो कहा हुआ।}}
{{outdent|इत्र (अ॰ पु॰) १ गन्ध द्रव्य, अत्तर। {{smaller|अतर देखो।}} २ सौरभ, खुशबू।}}
{{outdent|इत्र खेंचना (हिं॰ क्रि॰) सौरभ निकालना, खुशबू उतारना।}}
{{outdent|इत्रदान {{smaller|अतरदान देखो।}}}}
{{outdent|इत्रफ़रोश (अ॰ पु॰ स्त्री॰) परिमल विक्रेता, अतर बेचनेवाला।}}
{{outdent|इत्र लगाना (हिं॰ क्रि॰) परिमल मलना, अतर डालना।}}
{{outdent|इत्त्रौफल, {{smaller|इतरीफल देखो।}}}}
{{outdent|इत्वन् (सं॰ त्रि॰) इ-क्वनिप्। गमनकारी, चलने-वाला।}}
{{outdent|इत्वर (सं॰ त्रि॰) इ-करप्। १ इच्छामत गमनकारी, मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ चलनेवाला। २ पथिक, राहगीर। ३ नीच, कमीना। ४ निष्ठुर, बेरहम। ५ षण्ड। ६ नपुंसक, नामर्द।}}
{{outdent|इत्वरी (सं॰ स्त्री॰) एति परपुरुषं प्राप्नोति, इ-करप्-ङीप। {{smaller|इण् नशजिसर्तिभ्यः करप। पा ४।१।७।}} असती स्त्री, छिनाल।}}
{{outdent|इदु (वै॰ अव्य॰) केवल, एवं, ठीक, भी। यह शब्द ऋग्वेदमें प्रायः, किन्तु ब्राह्मणमें कभी-कभी आता है!}}
{{outdent|इदं (सं॰ त्रि॰) इन्द कमिन्। १ सम्मुखस्थ, बुद्धिके विषययोग्य, सामने रहनेवाला, यह। (वे॰ अव्य॰) २ इस स्थानको, यहां। ३ इस समय, अब। ४ उस स्थानपर, वहां। ५ इन शब्दोंके साथ।}}
{{outdent|इदंयु (सं॰ त्रि॰) इसका अभिलाषी, यह चाहने-वाला।}}
{{outdent|इदं रूप (वै॰ त्रि॰) इदं च रूपं च। इस आकार-वाला, जो ऐसी शक्ल रखता हो।}}
{{outdent|इदं विदु (सं॰ त्रि॰) इद वेत्ति, इदम् विदु-क्विप। यह समझनेवाला, जो इसे जानता हो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११६|ईश्वरचन्द्र गुप्त|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:वर्षके वयसमें शारीरिक नियमके लङ्घनवश इनकी मृत्यु हुई। गिरीशचन्द्र नामक इनके एक पुत्र थे। ईश्वरचन्द्रकी सभामें एक प्रसिद्ध ज्योतिर्विदु रहते थे। उन्होंने सारदामङ्गल नामक एक सङ्गीत ग्रन्थ बंगलामें बनाया था।
{{outdent|ईश्वरचन्द्र गुप्त—विख्यात बङ्गाली कवि। ये कांचरापाड़ा निवासी हरिनारायण गुप्तके पुत्र थे। इनको माताका नाम श्रीमती देवी था। १७३२ शकमें फाल्गुन शुक्लपञ्चमी शुक्रवारके दिन ईश्वरचन्द्र गुप्तने जन्म लिया था। बाल्यकालमें ये बड़े ही दुरन्त थे। लिखने-पढ़नेमें इनका विशेष मन न लगता था। किन्तु बाल्यकालसे ही कविता लिखनेका औत्सुक्य था। ग्रामस्थ अपरापर बालक उस समय फ़ारसी पढ़ते थे। ईश्वरचन्द्र उनके मुखसे फ़ारसी कविताका अर्थ सुनते और स्वयं फिर बंगलामें कविता बनाते।<br>
{{gap}}ईश्वरचन्द्र जन्मकवि थे। पाठ्यावस्थामें ये केवल कविताकी चर्चा चलाते थे। मानो कविता ही इनका जीवन और कविता ही इनका प्रधान लक्ष्य था। कवित्वशक्तिकी भांति ईश्वरचन्द्रकी श्रुतिशक्ति भी बहुत चमत्कारिणी थी। १७।१८ वर्षके वयसमें डेढ़ मासके मध्य इन्होंने मुग्धबोध व्याकरण मुखस्थ किया। कलकत्तेकी ठाकुरगोष्ठीसे ईश्वरचन्द्र के मातामह वंशको कुछ मित्रता थी। इसी सूत्रसे ठाकुरबाड़ी ये सर्वदा आते-जाते थे। क्रम-क्रमसे पथरियाघ्घट्टा-निवासी गोपीमोहन ठाकुरके पौत्र योगेन्द्रमोहनसे ईश्वरचन्द्रका बन्धुत्व बढ़ा। उभय समवयस्क थे। इनके सहवाससे योगेन्द्रमोहनमें भी रचनाशक्ति उपजी थी।<br>
{{gap}}१५ वर्षके वयःक्रमकालमें गुप्तपाड़ा निवासी गौर-हरि मल्लिककी कन्यासे ईश्वरचन्द्रका विवाह हुआ। दुर्गामणि देखनेमें बहुत अच्छी न लगती थो, गूंगी—जैसी समझ पड़ती थीं। इसलिये उनसे इनका मन न भरा और विवाहके बाद ही बोलचाल बन्द हो गयी। दोनों चिरदिन सोच-सोचकर जलने लगे।<br>
{{gap}}१७५१ शकमें योगेन्द्रमोहन ठाकुरके साहाय्यसे ईश्वरचन्द्रने, 'संवादप्रभाकर' नामक एक साप्ताहिक}}
{{Multicol-break}}
पत्र निकाला था। १७५३ शकमें योगेन्द्रमोहन के मरनेसे संवादप्रभाकर बन्द हुआ। परन्तुः इसी वर्ष इनकी कवित्व एवं रचनाशक्ति देख अन्टूलके ज़मीन्दार बाबू जगन्नाथप्रसाद मल्लिकने 'संवाद-रत्नावली' निकाली थी। ईश्वरचन्द्र इस पत्रिका में विशेष साहाय्य करते थे।
कुछ दिन पीछे ये श्रीक्षेत्रादिके दर्शन करनेको कटक पहुँचे। यहां ये अपने मौसा श्याममोहन रायके घरपर रह एक दण्डीसे तन्त्रादि सोखते थे। १७५६ शकके वैशाखमासने ईश्वरचन्द्र कलकत्ते वापस आये। इसी वर्ष श्रावण मासके अन्तिम बुधवारको इन्होंम कन्हाईलाल ठाकुरके साहाय्यसे 'प्रभाकर' निकाला। १७५८ शकका आषाढ़ मास आरम्भ होते ही प्रभाकर प्रात्यहिक रूपसे प्रकाशित होने लगा। देशीय प्रात्यक्षिक संवाद पत्र में प्रभाकर ही प्रथम था। इसी समय पण्डित और नगर तथा ग्रामके सम्भ्रान्त जमीन्दार नानाप्रकारसे ईश्वरचन्द्रकी साहाय्य देने लगे।
१७६७ शकके आषाढ़ मास इन्होंने 'पाषण्डपीड़न' नामक दूसरा पत्र निकाला था। इसी समय 'भास्कर' सम्पादक गौरीशङ्कर तर्कवागीश 'रसराज' नामक एक पत्र प्रकाश कर ईश्वरचन्द्रसे कविता-युद्धमें प्रवृत्त हुये। इन्होंने भी 'पाषण्डपीड़न' पत्र में 'भास्कर'—सम्पादकको कविताका प्रतिवाद आरम्भ किया था। इसी तरह दोनों में अनेक दिन कुत्सापूर्ण कविताकी लड़ाई लगी रही। किन्तु कुछ समय बाद दोनों पत्र बन्द हो गये।
पाषण्डपीड़नके उठ जानेसे १७६८ शकके वैशाख मासमें इन्होंने 'साधुरष्जन' नामक दूसरा पत्र निकाला। इसमें ईश्वरचन्द्रके छात्रोंकी कविता और प्रबन्धावली छपती थी। १७७४ शकके वैशाख माससे यह एक वृहत् कलेवरका प्रभाकर निकालने लगे। यह प्रति मासको पहली तिथिको निकलता और इनको स्त्रीय कवितासे पूर्ण रहता था। उक्त स्वतन्त्र मासिक प्रभाकर निकालनेमें ईश्वरचन्द्रकी अतिरिक्त परिश्रम उठाना पड़ा, इसीसे इनका क्रमशः स्वास्थयभङ्ग होने लगी। इससमय ईश्वरचन्द्र कलकत्तेमें रह अधिकांश समय किसी बागमें बिताते थे। इन्होंने
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इध्मजिह्व—इनामदार|३१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{smaller|इषि युधीन्धिदंसिश्याव सूभ्यो मक्। उण् १।१४४।}} १ यज्ञीय समिध्, होमकी लकड़ी। (पु॰) २ अग्निदीपनकाष्ठ, आग की लकड़ी। ३ प्रियव्रतके पुत्र। {{smaller|(भागवत)}}
{{outdent|इध्मजिह्व (सं॰ पु॰) इध्मं काष्ठं जिह्वेव यस्य, बहुव्री॰। १ अग्न, लकड़ीकी जीभ रखनेवाली आग। २ प्रियव्रतके एक पुत्र।}}
{{outdent|इध्मप्रव्रश्चन (सं॰ पु॰) वृक्षादनी, लकड़ी काटनेका कुल्हाड़ा।}}
{{outdent|इध्मवाह (सं॰ पु॰) इध्मं समिधं वहति, इध्म-वह-बिण्। अगस्त्य के पुत्र दृढ़स्यु। महातेजा अगस्त्य के पुत्रने बाल्यकाल हीसे पितृभवनमें रहने और पिताके होमकाष्ठका भार उठानेसे इध्यवाह नाम पाया है।}}
{{outdent|इध्या (सं॰ स्त्री॰) प्रकाशन, सुलगाव।}}
{{outdent|इन् (सं॰ पु॰) इनीति गच्छतीति, इन्नक्। {{smaller|इम्षिञ्जि-दौङु ष्यविभ्यी नक्। उण् ३।२।}} १ राजा, बादशाह, नवाब। २ प्रभु, मालिक। ३ सूर्य। ४ हस्तानक्षत्र। ५ ईश्वर (वै॰ त्रि॰) ६ योग्य, लायक़ ७ शक्तिशाली, ताक़तवर ८ प्रथित, मशहूर।}}
{{c|{{smaller|"इनी राजानां पतिरिनः पुष्टीनां सखा।" (ऋक् १०।२६।७)}}<br>(हिं॰ सर्व॰) ९ 'इस'का बहुवचन ।}}
{{outdent|इनकम (अं॰ स्त्री॰ = Income) अर्थप्राप्ति, आमदनी, कमायी।}}
{{outdent|इनकम टैक्स (अं॰ स्त्री॰ = Incom-tax) अर्थप्राप्ति-का शुल्क, आमदनी पर लगनेवाला महसूल।}}
{{outdent|इनकार (अ॰ पु॰) १ निषेध, नहीं। २ प्रत्याख्यान, खिलाफ बयानी। ३ मतिभेद, नाराज़ी। ४ निवर्तन, दस्तबरदारी। ५ आक्षेप, एतराज़।}}
{{outdent|इनकार करना (हिं॰ क्रि॰) १ निषेध निकालना, न मानना! २ प्रत्याख्यान पहुंचाना, झुटलाना। ३ निवारण लगाना, इजाज़त न देना। ४ अपहव अड़ाना, दस्तबरदार होना। ५ विरोध बढ़ाना, बात काटना। ६ परित्याग देना, छोड़ना।}}
{{outdent|इनकार करनेवाला (हिं॰ पु॰) वाधक, अपवाधक, सुनकिर, सरकश।}}
{{outdent|इनकार दावा (अ॰ पु॰) स्वत्वप्रतिपादननिषेध, मुतालबेसे दस्तबरदारी।}}
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{{outdent|इन्फ्रिकाक (अ॰ पु॰) परिक्रय, उद्दार, खलासी, छुटकारा। क़ानून में यह शब्द बन्धक छोड़नेका अर्थ रखता है।}}
{{outdent|इनफ़िसाल (अ॰ पु॰) निर्णय, निष्पत्ति, फैसला, चुकौता।}}
{{outdent|इनफु येञ्जा (अ॰ पु॰ = Influenza) प्रबल श्लेष्मा, गहरा ज़ुकाम। यह एकाएक उत्पन्न हो जाता और साथ ही अशक्त बना देनेवाला ज्वर चढ़ आता है। इन्फुयेञ्जा प्रायः महामारीका रूप बनाता और समाजके अनेक व्यक्तियोंपर शीघ्र अपना प्रभाव जनाता है।}}
{{outdent|इनशा (अ॰ स्त्री॰) १ लिपि, लिखावट। २ भाषा-सरणि, इबारत।}}
{{outdent|इनष्टिट्यूट (अ॰ स्त्री॰ = Institute) १ विधि, नियम, कायदा। २ समाज, अञ्जु मन।}}
{{outdent|इनष्ट्रमेण्ट (अ॰ पु॰ = Instrument) १ यन्त्र, आला, हथियार। २ कारण, सबब। ३ कारक, शखूस-दरमियानी, बिचौलिया। ४ लेखपत्र, कवाला।}}
{{outdent|इनसाफ़ (अ॰ पु॰) धर्म, न्याय, अदल, दियानतदारी।}}
{{outdent|इनसाफ़ करना (हिं॰ क्रि॰) न्याय निकालना, दाद देना।}}
{{outdent|इनसाफ़ चाहना (हिं॰ क्रि॰) न्याय मांगना, दावेदार होना।}}
{{outdent|इनसाफ़ से (हिं॰ क्रि॰ वि॰) न्यायपूर्वक, ब-इनसाफ़, ठीक-ठीक।}}
{{outdent|इनस्पेकृर (अ॰ पु॰ = Inspector) निरीक्षक, निगहवान्, देखने-सुननेवाला अफ़सर।}}
{{outdent|इनानी (सं॰ स्त्री॰) वटपत्री वृक्ष।}}
{{outdent|इनाम (अ॰ पु॰) १ पारितोषिक, कामका फल। २ प्रीतिदान, शुकराना, भेंट।}}
{{outdent|इनाम-इकराम (अ॰ पु॰) दान-दाक्षिण्य, मान-पान।}}
{{outdent|इनामका पैसा (हिं॰ पु॰) पारितोषिक वृत्ति, पल-टेका भत्ता।}}
{{outdent|इनामदार (अ॰ पु॰) निष्कर भूमिका अधिपति, बेलगान जमीन्का मालिक}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११८|ईश्वरचन्द्र विद्यासागर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
भेजा, किन्तु गवरनमेण्टने रुपया देना न चाहा। जिनके उत्साहसे सकल विद्यालय खुले, वह हालिडे साहब भी उस समय कुछ उत्तर दे न सके। विद्यासागरने अपने पाससे रुपये दे थोड़े दिन विद्यालय चलाये थे।
उसी समय विद्यासागरके एक बन्धु 'तत्त्वबोधिनी पत्रिका' में ग्रन्थाध्यक्ष थे। जो विषय तत्त्वबोधिनीके लिये कोई लिखकर भेजता, वह इनके देखनेमें आता और पीछे उक्त पत्रिकामें छपता था। विद्यासागर अपने बन्धुके निकट अंगरेजी आलोचना करने पहुंचते और उन्हीं बन्धुवरके अनुरोधसे तत्वबोधिनीके लेखक इनका परिचय पाते। तत्त्वबोधिनी पत्रिकाके तत्कालीन सम्पादक अक्षयकुमार दत्त स्वयं निकट आ विद्यासागरसे प्रबन्धादि लिखनेका अनुरोध करते और जो ग्रन्थ लिखते, उन्हें संशोधन करा छपनेको भेजते थे। वस्तुतः इम्हींके साहाय्यसे अक्षयकुमारकी रचना-प्रणाली उतनी प्राञ्जल हुई। विद्यासागर कभी कभी तत्त्वबोधिनीमें प्रबन्धादि लिखते थे। इन्होंने सबसे आगे महाभारतका बङ्गला अनुवाद उक्त पत्रिकामें प्रकाशित किया। किन्तु विद्यासागर-विरचित महाभारतका बङ्गला अनुवाद सम्पूर्ण हुआ न था। स्वर्गीय कालीप्रसन्न सिंहने उसे देख इनके परामर्शानुसार कि पण्डितोंके साहाय्यसे उसे पूरा कराया। तत्त्वबोधिनी-संभावाले सभ्योंके अनुरोधसे विद्यासागर तत्त्वावधायक बने थे। किन्तु कुछ दिन पीछे ही किसी विशेष कारणसे इन्होंने तत्त्वबोधिनीका संस्स्रव त्याग किया।
१८५३ ई॰ को विद्यासागरने निज जन्मभूमि वीरसिंह ग्राममें निर्धन बालकबालिकायोंके उपकाराथै अवैतनिक विद्यालय खोला था। दरिद्र बालकोंको समस्त दिन अवकाश न मिलनेसे रात्रिकालमें भी शिक्षा देनेके लिये विद्यालय खुलता। विद्यालय खोलनेके बाद निज ग्राममें इन्होंने एक दातव्य-चिकित्सालयं भी स्थापन किया था।
इसी समय गवरनमेण्टने संस्कृत शिक्षा निकाल दैनेका प्रस्ताव किया। अनेक कृतविद्य साहबों और
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बङ्गालियों ने इस प्रस्तावका समर्थन किया था। किन्तु विद्यासागर उक्त प्रस्तावको रद्द करनेके लिये विशेष चेष्टित हुये। इन्होंने उस समय अनेकानेक कतवियोंका मत काटा और भारतवर्षमें संस्कृत शिक्षा अधिक फैलानेके लिये गवरनमेण्टके निकट आवेदन किया। विद्यासागरका जय और सरकारसे भारतवर्ष के यावतीय विद्यालयोंमें संस्कृत शिक्षाके प्रचारका आदेश हुआ। लोगोंको सहजमें संस्कृत सीखनेके लिये इन्होंने सरल संस्कृत पाठ्य पुस्तक सङ्कलन किये थे।
विद्यासागर केवल स्त्रियों और साधारण निर्धनोंकी शिक्षाके लिये ही यत्नवान् न हुये, किन्तु विधवाविवाह चलानेको भी आगे बढ़े। इनके द्वारा विधवाविवाह के विषयमें समस्त स्मृतिशास्त्रोंसे जो व्यवस्था जुड़ी, उससे इनकी शास्त्र पारदर्शिता विलक्षण मालूम पड़ी थी। इसी समय अपने समाजवाले अनेक मर्तावद्य, समान्य और मूर्ख प्रवृति सकल श्रेणियोंके लोग विद्यासागरपर खड्गहस्त हुये। ये देशीय लोगों को ग्लानि, कुत्सा घोर निन्दाका वाद अकातर सहते भी प्रतिवादियोंका मत काटस्वीय गन्तव्य पथमें आगे बढ़े थे। तत्काल तारानाथ तर्कवाचस्पति, भरतचन्द्र शिरोमणि, गिरिशचन्द्र विद्यारत्न, रामगति न्यायरत्न प्रभृति पण्डितोंने विद्यासागरको साहाय्य दिया। इन्हींके यत्न और उद्योगसे सरकारने विधवाविवाह चलानेकी १८५६ ई॰ का ५ वां आईन छपा था। विद्यासागरके यत्नसे कई विधवाविवाह भी शान्ति पूर्वक हो गये। इसी समय इन्होंने समाजके एक विशेष हितकर कार्यमें मन लगाया। इस देश में बहु विवाहरूप कुप्रथा बहुत दिनोंसे चल रही है। इसके प्रमाण देनेका प्रयोजन नहीं, कि उक्त तामसिक कार्यसे हमारे समाजका कितना अनिष्ट होता है। इस कुपथाको रोकनेके लिये विद्यासागरने प्राणपणसे यथासाध्य चेष्टा को। इसौ उपलच्चमें बहुविवाह पर विचार करनेके लिए दो ग्रन्थ इन्होंने छपवाये। उन ग्रन्थोंका नाम 'बहुविवाहके उचितरूपसे रोकने या न रोकनेका विचार था। इन्होंने प्रायः समस्त देशोय
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९२|उन्माद-उन्मादन}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
है। क्योंकि इन दोनोंमें दृष्य एवं दोषको तुल्यता विद्यमान है।
वमन एवं विरचनादिसे कोष्ठ, हृदय, इन्द्रिय तथा
मस्तक शुद्धः होनेपर रोगी प्रसन्नता, स्मृति और संज्ञा
सुश्रुत कहते हैं-सकलप्रकारके उन्मादमें चित्तको पाता है। किन्तु शुद्ध हो जाते भी यदि उसके आच-
आल्हादित रखना प्रधान कर्तव्य है। मद रोग रण अयोग्य देखाते है, तो नस्य सुंधाते और अञ्जन
अर्थात् सन्मादकी प्रथमावस्थापर मृदु क्रिया किया
लगाते हैं। ऐसे स्थलपर ताड़न और मनः बुद्धि तथा
करते हैं। विषजन्य रोग लगते भी विक्रियाक साथ | देहके प्रति उद्देग प्रापण अतिशय हितकर है।
साथ मृदु क्रिया कही है।*
फिर अतिशय शक्तिसम्पन्न होनेपर कड़े कपड़ेसे बांध
और अंधेरे घरमें डाल रोगी दबाया जाता है।
ब्राह्मणयष्टि, पुरातन कुमाण्ड, शाहपुष्यो एवं
तुलसी पृथक् पृथक् इन्द्रयव तथा मधु मिलाकर घरमें लक्कड़ पत्थर बिलकुल रहना न चाहिये ।
खिलानेसे उन्माद रोग मिट जाता है। .
उन्मादके रोगीको सुधारनेका उपाय-
हिङ्ग, सैन्धव लवण, मरिच, पिप्पली और शुण्ठी
"तर्जनं वासनं दानं सान्त्वनं हर्षण भयम्।
प्रत्येकका दो पल कल्क छ: सेर घत और चतुर्गण गो-
विस्मयो विस्म ते हेतुर्नयन्ति प्रकृति मनः ॥" (चरक)
मूत्रमें पकाकर देनेसे उन्माद निश्चय आरोग्य होता है।
तर्जन, नासन, दान, सान्त्वना, हर्ष, भय एवं विस्मय
सहद्य इस रोगमें बाषणाद्य-वटिका और कल्या-
मनको भटका कर प्रकृति पर पहुंचा देता है। "
णक, क्षौरकल्याण, चैतस, महापैशाशिक, हिङ्गाद्य
डाकरीवो मतसे रोगीका परिधेय वस्त्र सर्वदा
तथा लशुनाद्य प्रभृति घृत खिलाते हैं।
उष्ण रखा जाता, भौगने या शीतल पड़ने नहीं पाता।
समुदायके मध्य जिसमें रोगी क्रोध और आक्रो देहके मध्य भागपर फ्लाबेल लिपटा रहना अच्छा ।
शसे हस्त उठा निष्क्रिय भावसे अपने या अन्य के शरीर है। रोगी रोयको बनी या मुलायम चटाई पर
पर छोड़ देता है, वही उन्माद रोग असाध्य होता
नर्म तकियाके सहार लिटाया जाता है। शयन कालमें
है। फिर जिस उन्मादमें चक्षुसे अश्रु चलता, मेढ़से
देहके अपर अङ्ग प्रत्यङ्गको अपेक्षा मस्तक कुछ
रक्त बहता, जिवापर क्षत पड़ता और नासिकासे जल
उन्नत और अनावृत रहना चाहिये। मूर्छा पानेसे
गिरता, वह भी आसाध्य-जैसा ही होता है। अथवा
उसे भूमिपर लेटाते और आहारादि अवस्थालें देख
रोगोंके ताली बजाने, सर्वदा चिल्लाने, अपने ममस्थान-
भालकर खिलाते हैं।
पर चोट लगाने, दुर्ण देखाने, वृषणासे घबराने
- आलोपाथोक मतमें उन्मादके रोगीको प्रथमा-
और दुर्गन्ध एवं हिंस्रक बन जानसे उन्माद अच्छा
वस्थामें ठण्डा रखनेको सविशेष चेष्टा करना चाहिये।
नहीं होता।
इसपर नाइट्रेट अव पोटास, म्यरिएट अव अमोनिया,
प्रथम रोगीको शान्त रखना चाहिये। किन्तु
सिलुशन एसैटेट अव अमोनिया मिश्र, स्पिरिट अव
पित्तजनित उन्मादमें विशेषतः वमन करा देते हैं।
नाइट्रिक ईथर, टार्टाराइस अञ्जन और कपूरका जुलद
देनेसे विशेष उपकार पहुंचता है। कपूर, कालोमल
"उन्मादिषु च सषु कर्याचित्तप्रसादनम् ।
और बिनिगार प्रभृति भी विशेष लाभदायक हैं।
- मृटुयूर्व मदेऽप्ये व क्रियां विद्वान् प्रयोजयेत् ।
फिर रोगीको अवस्थाके अनुसार नानाप्रकार औषध
विषजे मृटुपूर्वाञ्च विषघ्नौं कारयेत् क्रियाम् ॥"
दिया जाया करता है।
(सुध त उत्तरतन्त्र ६२ १०)
"सब ष्वपि तु खल्वेष यो इस्तावुद्यम्य रोषस रम्भान्निःस'ज्ञोऽन्येष्वा-1
उन्मादक ( स० त्रि. ) उत-मद-णिच-गख ल ।
त्मनि वा पातयेत् सोह्यसाध्यो शेयस्तथा साधु नेवी मैदप्रवृत्तरतः क्षतजिनः |
उन्मादजनक, नशा लाने या पागल बनानेवाला। :
प्रस तमासिकश्चिद मानमर्मा प्रतिहन्धमानपाणिः सततं विकूजनं दुर्वर्णरूपातः | उन्मादन (सं० पु०) उत्-मद-णिच्-न्यु। १ काम-
पुतिगन्धय हिंसाौँ उन्मत्तो जयस्त' परिवर्जयेत् ।" (चरक) . | देवके पञ्चवाणान्तर्गत वाण विशेष। ..<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|३२|इनाम देना—इन्थिहा|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इनाम देना (हिं॰ क्रि॰) पारितोषिक बांटना, पलटा पहुंचाना।}}
{{outdent|इनाम पाना (हिं॰ क्रि॰) पारितोषिक मिलना, कामका नतीजा निकलना।}}
{{outdent|इनायत (अ॰ स्त्री॰) १ अनुग्रह, मेहरबानी। २ साहाय्य, मदद।}}
{{outdent|इनायत करना (हिं॰ क्रि॰) १ देना, बख़्शना। २ कृपा देखाना, मेहरबानी लाना।}}
{{outdent|इनायत रखना (हिं॰ क्रि॰) कृपा देखाना, मेहरबानीकी नज़र डालना।}}
{{outdent|इनायती (अ॰ वि॰) दिया हुआ, जो बख्शा गया हो।}}
{{outdent|इनारा, {{smaller|इंदारा देखो।}}}}
{{outdent|इनु (सं॰ पु॰) गन्धर्व विशेष।}}
{{outdent|इने-गिने (हिं॰ क्रि॰) अल्प, परिमित, चन्द, थोड़े, भूले-भटके।}}
{{outdent|इन्तिक़ाम (अ॰ पु॰) प्रत्य पकार, बदला।}}
{{outdent|इन्तिक़ाम लेना (हिं॰ क्रि॰) प्रत्युपकार पहुँचना, बदला चुकाना।}}
{{outdent|इन्तिक़ाल (अ॰ पु॰) १ स्थानान्तर प्रापण, तहवील। २ प्रवासन, जलावतनी, देशनिकाला। ३ उत्सारण, सरकाव। ४ समर्पण, पहुंचाव। ५ मृत्यु, मौत।}}
{{outdent|इन्तिज़ाम (अ॰ पु॰) १ रचना, आरास्तगी, सजावट। २ प्रणयन, काररवायी। ३ उपाय, तदबीर, ढङ्ग। ४ राजव्यवस्था, क़ानून्। ५ विधि, क़ायदा।}}
{{outdent|इन्तिज़ाम ख़ानगी (अ॰ पु॰) गृहरचना, घरावू सजावट।}}
{{outdent|इन्तिज़ार (अ॰ पु॰) अपेक्षा, भरोसा।}}
{{outdent|इन्तिज़ार करना (हिं॰ क्रि॰) अपेक्षा रखना, राह देखना।}}
{{outdent|इन्तिहा (अ॰ स्त्री॰) अत्यन्तता, परमावधि, अखीर, किनारा, छोर।}}
{{outdent|इन्थिहा-ताजकोक्ता मुथहा। इसका आनयन प्रकारादि नीलकण्ठ-ताजकमें लिखा है—मुथहा अपने-अपने जन्म लग्नसे प्रतिवत्सर क्रमशः एक-एक स्थान भोग करती है। सूर्य तष्टगत एवं शरद्युक्त ही स्व-स्व}}
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जन्म लग्नमें व्याप नक्षत्रगणसे प्रथम पड़ता है। इन्यिहा प्रत्यक्ष अनुपाद क्रमसे शरलिप्तके साथ बढ़ती है। किसी-किसीके मतानुसार यह मासमें डेढ़ अंशपर व्यामृत होती है। स्वामिसौम्यतामें सौम्यता रहती और क्षुत दृष्टिसे भय तथा रोगकी वृद्धि लगती है। इसके भावावलोकनका फल वर्षलग्नमें सुखप्रद और अन्त्यरिपुरन्धुमें अशुभ निकलता है। पुण्यकर्म एवं आयगामी होनेसे मुथहा स्वामित्व और अपुण्णाकमें पड़नेसे उद्यमवश धन देती है। यह शरीरस्थ होनेसे शत्रुक्षय, मनस्तुष्टि लाभ, प्रतापवृद्धि, राजप्रसाद, शरीर पुष्टि, विविध उद्यम और सुखप्रदान करती है। अर्थभावमें पड़नेसे मुथहा उत्साहके साथ अर्थ लाती, यशः फैलाती, बन्धु मिलाती, मान बढ़ाती, उत्तम खाद्य पहुंचाती और सुख प्रभृति उपजाती है। पराक्रम हेतु वित्त, यशः एवं सुखप्राप्ति और सौन्दर्यसुख, देवता-ब्राह्मणभक्ति तथा दूसरेके उपकारकी प्रवृत्ति होती है। इसके टतीय लग्नमें जानेसे शरीर पुष्ट पड़ता, कान्तिका प्रभाव बढ़ता और राजाश्रय हाथ पड़ता है। इन्थिहाके सुखभावमें पहुंचनेसे शत्रु भय, आत्मीय विरोध, मनस्ताप, निरुद्यम, लोकापवाद, पीड़ाभार और दुःखकी वृद्धि होती है। जब यह पञ्चम स्थानमें आती; तब सद्बुद्धि सौख्य, पुत्र, धन, प्रताप, विविध विलास, देवता-ब्राह्मण-भक्ति एवं राज-प्रसाद बढ़ाती है। मुथहाके अरिगत होनेसे अङ्गमें क्लम पैठता, शत्रु बढ़ता, भय लगता, रोग उपजता, और चढ़ता, राजा भड़कता, कार्य बिगड़ता, अर्थ घटता, दुर्बुद्धिका प्रभाव पड़ता और अनुताप उठता है। स्मरमें आनेसे यश स्त्रीपुत्रादि व्यसन लगाती, शत्रुभय देखाती, उत्साह घटाती, धन एवं धर्म बिगाड़ती, शारीरिक पीड़ा उपजाती और मोह तथा विरुद्ध चेष्टा लगाती है। मुथहाके मृत्युस्थ होनेसे शत्रु तथा चोरका भय लगता, धर्म एवं अर्थ घटता, अत्यन्त शोक उपजता, पीड़ाका प्रभाव बढ़ता, सैन्य विगड़ता और दूरदेश जाना पड़ता है। भाग्यगत होनेसे यह प्रभुत्व बढ़ाती, धनोपार्जन कराती, राजाके निकट आनन्द उठाती, स्त्रीपुत्त्र सुखलाभ देती,
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वरचन्द्र विद्यासागर|११९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कृतविद्य पण्डितों और सम्भान्त व्यक्तियों को बहु-विवाह रोकनेके लिये उभारा था। इस कार्य में कृष्ण-नगरके राजा श्रीशचन्द्रने विद्यासागरको यथेष्ट साहाय्य दिया। किन्तु सिपाही विद्रोह लग जानेसे सरकार बहुविवाह रोकनेका कानून् बना न सको थी।
१८५८ ई॰ में नाना कारणोंसे विरक्त हो इन्होंने कालेजकी अध्यक्षता और स्कूल-इन्सपेक्टरीको छोड़ दिया। कुछ दिन पीछे विद्यासागरने अपने तत्त्वाव-धानमें निज व्ययसे 'मेट्रोपलिटन' नामक अंगरेजी विद्यालय खोला था। किन्तु विद्यालयके कर्तृपक्ष साहब मिल-जुल कर कहने लगे, बङ्गाली अंगरेजी कालेज चलानेको क्षमता नहीं रखते। सिवा अंगरेजी के दूसरेसे कालेजका प्रबन्ध होना असम्भव है। इन्होंने उनको बात न मान निज विद्यालयमें बङ्गालियों के मध्य ही सर्वप्रथम कालेज क्लास खोला। इसी कालेजपर छोटेलाट ई॰ सी॰ बेलीसे अनेक कथावार्ता हुयी थी। ई॰ सी॰ बेलोने कहा, "विद्यासागर! किस प्रकार आप निज कालेज चलायेंगे? अंगरेजों के साहाय्य भिन्न अंगरेज़ी कालेज चल नहीं सकता।" विद्यासागरने उत्तर दिया,—"अपने छात्रोंको अंगरेज़ी पढ़ा न सकते भी उन्हें परीक्षा पास करा देना निश्चित है।" पीछे वही हो गया। आजकल इनके स्थापित एक कालेज और पांच विद्यालयोमें भली भांति पठन-पाठन होता है।
विद्यासागरसे पूर्व बङ्गलाभाषा सरल, सुगम और इस समय-जैसी परिशुद्ध न थी। ये पाठ्यपुस्तक इस उद्देश्यसे बनाने लगे, जिसमें सब कोई सहज हो बंगला भाषा सीख सके। विद्यासागरके बनाये ग्रन्थकी तालिका नीचे लिखी है,—
वैतालपञ्चविंशति, बङ्गालका इतिहास, जीवन-चरित, बीधोदय, उपक्रमणिका व्याकरण, ऋजुपाठ (तीन भाग), शकुन्तला, विधवाविवाह, वर्णपरिचय, कथामाला, संस्कृतप्रस्ताव, चरितावली, महाभारतकी उपक्रमणिका, सीताका वनवास, व्याकरणकौमुदी, आख्यानमञ्जरी, अभ्रान्तिविलास और ब्रहुविवाह रक्षित होना उचित है या नहीं।
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वर्तमान विशुद्ध बंगला भाषाने जो आकार बनाये, उनके आदि प्रवर्तक विद्यासागर हो हैं। उक्त विषयको विद्वान् मात्र मानते ओर उसी प्रणाली को पकड़कर अनेक वर्तमान बङ्गाला-लेखक नाना छन्दों और भावों में अपनी लेखनी चलाते हैं।
विद्यासागर केवल समाज-संस्कार और बंगला भाषाके उन्नतिकल्प में हो प्रसिद्ध नहीं। इनको परोपकारिता और दानशीलताको भी बङ्गदेशके महाधनवान्से लेकर दीन दरिद्र पर्यन्त सकल हो जानते थे। विद्यासागर देशीय विपन्न, दरिद्र और विधवानोंके लिये प्रति मास अनेक रुपये दे देते। किन्तु इन्होंने प्रकाश्य रूपसे नहीं, 'गुप्तभावसे' ही दानकार्य सम्पन किया था। धनाढ्य न होते भी १८६५ ई॰ के दारुण दुर्भिक्ष समय विद्यासागरने प्रायः छः मास पर्यन्त वीरसिंहमें प्रत्यह सहस्रां व्यक्तियोंको अन्न और वस्त्रहीन दरिद्रोंको प्रायः दो हज़ार रुपयेका वस्त्र दिया। इन्होंने यह दानशीलता और परदुःखकातरता अपनी मातासे सीखी थी। प्रवादानुसार विद्यासागरकी माता अतिशय दानशीला थीं। किसीका दुःख देख उनका हृदय फट जाता और उसके दूर करनेका प्रयास उठाना पड़ता। उन्हीं सदाशय जननीके नाना गुण इनमें भी आ गये थे। विद्यासागरके कथनानुसार-द्ररिद्रोंको पीड़ा कितनोंने देखी और उनके हृदयकी व्यथा कितनोंने सुनी है! वास्तविक दरिद्रका दैन्य और विधवाका दुःख देखनेपर नयन जलसे इनका वक्षस्थल डूब जाता था। दुःखीका दुःख किसीसे कहते समय भी अश्रु बहने लगते। इस चरित्रको कोई अतिरञ्जित न समझे। यह चाक्षुष-प्रत्यक्ष है। मुक्तकण्ठसे कहनेपर ऐसे हृदयवान् पुरुष बङ्गदेशमें अतिविरल हैं। विद्यासागर सामान्य मेषपालकसे लेकर बहुत बड़े राजातक सकलके हो बन्धु थे। अपनो विपद् बतानेपर ये अर्थ, परिश्रम, परामर्श, दूसरेके साहाय्य अथवा किसी न किसी उपायसे यथासाध्य लोगोंका उपकार कर देते श।
वैद्यनाथ के निकट कर्माटांड नामक एक स्थान
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्थिहा—इन्दीवरिणी|३३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
देवादि-भक्ति उपजाती, यशः फैलाती और धन दिलवाती है। अम्बरस्थ सुथहामें राजप्रसाद, लोकोपकार, सत्कर्मलाभ, देवादिअर्चन, यशः और धन होता है। इसके लाभगत होनेपर विलास, सौभाग्य, आरोग्य, सन्तोष, राजसेवामें धन, सद्बन्धु और पुत्रादि मिलता है। मुथहाके व्ययमें आनेसे अधिक व्यय, कुसंसर्ग, रोग, कार्यनाश, धर्म एवं अर्थक्षय और सद्व्यक्तिके साथ वैर बढ़ता है। इसी प्रकार क्रूर तथा क्षुत दृष्टिसे भी इन्थिहांका फल शुभाशुभ होता है। रविसे युक्त वा दृष्ट होनेपर यह राज्य, मङ्गल और अतिशय गुणप्राप्ति करती है। मङ्गलसे मुथहाके युक्त वा दृष्ट होनेपर पित्त एवं उष्ण बढ़ता, अस्त्राघात लगता और रक्तप्रकोप उठता है। शनिके विषयमें भी उक्त ही फल मिलता है। सोमसे युक्त वा दृष्ट होनेपर यह धर्म, यशः, आरोग्य, और सन्तोष बढ़ाती है। पापग्रहके साथ मुथहा रहते दुःख उपजता है। बुध वा शुक्र युक्त अथवा दृष्ट होनेपर यह स्त्री, सद्बुद्धि,
सुख, धर्म और अतुल यशोलाभ करती है। वृहस्पतिके साथ मुथहा आने वा तद्युक्त नक्षत्त्रसे देखे जानेपर स्री, सद्बुद्धि, पुत्र, सुख, स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, मणि और
मुक्तादि लाभ होता है। शनिके गृहमें पड़ने अथवा उसके द्वारा देखे जानेपर यह वातरोग, मानभङ्ग और अग्नि धनक्षयादि करती है। किन्तु गुणयोगसे धन मिलता है। राहुसे युक्त वा दृष्ट होनेपर सुथहा धन, मिलता है। राहुसे युक्त वा दृष्ट होनेपर सुथहा धन, यशः, सुख, धर्म और उन्नत भाव बढ़ाती है। चन्द्रयोगसे सत्पद और स्वर्ण रत्नादि प्राप्त होता है। राहुके भोग्य एवं पृष्ठगत लव और सप्तम नक्षत्रयुक्त पुच्छको देखकर शुभाशुभ फल कहना चाहिये। मुथहाके शुभपृष्ठ एवं राहुपुच्छ गत होनेसे आपदु आती और शत्रुभय तथा दुःखकी मात्रा बढ़ जाती है। पापयोगमें दर्शनसे अर्थ और सुख बिगड़ता है। जो जन्मकालमें बली और वत्सरान्तमें दुर्बल होता, उसके लिये एक ही अशुभ ठहरता है। जिसकी दोनों ओर समान पड़ती, उसके फलको मीमांसा भी नहीं घटती-बढ़ती। षष्ठ, अष्टम वा शेष अथवा इसी पृथिवीपर इन्थिहाधिपतिके जन्तुमत किंवा क्रूर होनेसे अदृष्ट अशुभ मिला करता
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है। यह क्रूरतावश चतुर्थ यदि अस्तगत मङ्गलजनक नहीं पड़ती, तो रोगष्ट्वृद्धि और धनहानि होती है। अष्टमाधिपके साथ मुथहा युक्त और अदृष्ट क्षुताख्य दृष्टिसे शुभ न होनेपर दोनोंमें मरण तथा एक योगमें मरणतुल्य क्लेश मिलता है। मुथहा वा उसका अधिप जन्ममें शुभलक्षणयुक्त पड़नेसे वर्षारम्भ पर शुभदायक और वर्षके पीछे अशुभ है।
{{outdent|इन्दम्बर (सं॰ क्ली॰) नीलपद्म, आस्मानी कमल।}}
{{outdent|इन्दर (हिं॰) {{smaller|इन्द्र देखो।}}}}
{{outdent|इन्दव (हिं॰) {{smaller|ऐन्दव देखो।}}}}
{{outdent|इन्दाम्बर (सं॰ क्ली॰) इन्द बहुमूल्यं अम्बरं नील-वस्त्रमिव, उप॰ कर्मधा॰। १ नीलपद्म, आस्मानी कमल। (पु॰) २ भ्रमर, भौंरा।}}
{{outdent|इन्दि (सं॰ स्त्री॰) इदि-इनि वा ङीप्। लक्ष्मी, दौलत।}}
{{outdent|इन्दिन्दिर (सं॰ पु॰) इन्दि-किरच् निपातनात्। मधुप, भौंरा।}}
{{outdent|इन्दिया (अ॰ पु॰) १ मत, राय। २ मनोयोग, मन्शा, इरादा। (अ॰ स्त्री॰ = India) ३ भारतवर्ष।}}
{{outdent|इन्दिरा (सं॰ स्त्री॰) इदि-किरच्-टाप्। लक्ष्मी, विष्णुप्रिया।}}
{{outdent|इन्दिरामन्दिर (सं॰ पु॰) १ इन्दिरायां मन्दिरं आश्रय-इव। विष्णु, लक्ष्मीपति, भगवान्। (क्ली॰) २ लक्ष्मीगृह।}}
{{outdent|इन्दिरालय (सं॰ क्ली॰) १ इन्दिरायाः आलयः, ६-तत्। नीलोत्पल, लक्ष्मीके रहनेका स्थान पद्म। २ लक्ष्मीगृह।}}
{{outdent|इन्दिरावर (सं॰ क्ली॰) इन्दिरायाः श्रीयाः वरं प्रियम्। नीलपद्म, आस्मानी कमल।}}
{{outdent|इन्दी, इन्दि देखो।}}
{{outdent|इन्दीवर (सं॰ क्ली॰) इन्दिङीप् इन्दीतस्याः वरं वरणीयं प्रियम्। १ नीलपद्म, आस्मानी कमल। २ साधारण उत्पल, मामूली कमल। ३ पद्मलता, गुलाबका झाड़।{{smaller|"इन्दीवरघनश्यामं रामं कमललोचनम्।"(रामायण)}}}}
{{outdent|इन्दीवरा, {{smaller|इन्दीवरी देखो।}}}}
{{outdent|इन्दीवरिणी (सं॰ स्त्री॰) इन्दीवराणां समूहः, इनिङीप्। पद्मलता, कमलकी बेल।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 9|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|३४|इन्दीवरी—इन्दुज}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्दीवरी (सं॰ स्त्री॰) इन्दीवरमस्त्यस्याः, अच्डीष्। १ शतमूली, सतावर। नीलपद्म सदृश पुष्प निकलनेसे शतमूलीका नाम यह पड़ा है। २ अजशृङ्गी, मेढ़ासींगी। ३ इन्द्रचिर्भटी, कुंदुरू। ४ कदली-वृक्ष, केला।}}
{{outdent|इन्दीवार (सं॰ पु॰) नीलपद्म, आसमानी कमल।}}
{{outdent|इन्दु (सं॰ पु॰) उनत्ति अमृतधारया भुवं क्लिन्नां करोति, {{smaller|उन्दे रिञ्जादेः। उण् १।१३। १}} चन्द्र, चांद। {{smaller|"ग्रसति तव मुस्वेन्दुं पूर्णचन्द्रं विहाय।" (शृंङ्गारतिलक)}} २ मृगशिरा नक्षत्र। इस नक्षत्रका देवता चन्द्र है। ३ एक संख्या, एकायी। ४ कर्पूर, काफूर।}}
{{outdent|इन्दुक (सं॰ पु॰) इन्दु स्वार्थे क। अश्मन्तक वृक्ष। इसके तन्तुसे ब्राह्मण अपनी मौञ्जी-मेखला बनाते हैं।}}
{{outdent|इन्दुकक्षा (सं॰ स्त्री॰) इन्दोश्चन्द्रस्य कक्षा। राशि-चक्रस्थ चन्द्रमण्डल। चन्द्रकक्षाका परिमाण ३२४००० योजन है। {{smaller|चन्द्र देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुकमल (सं॰ क्ली॰) इन्दुरिव शुक्लं कमलम्, उप॰ कर्मधा॰। शुक्लकमल, कुमुद, बघीला, कीकाबेली।}}
{{outdent|इन्दुकर (सं॰ पु॰) चन्द्रकिरण, चांदनी।}}
{{outdent|इन्दुकला (सं॰ स्त्री॰) इन्दोः कला अंशः। चन्द्ररेखा, चांदका सोलहवां हिस्सा। इन्दुकी सोलह कला यह हैं,—१ पूषा, २ यशा ३ सुमनसा, ४ रति, ५ प्राप्ति, ६ धृति, ७ ऋडि, ८ सौम्या, ८ मरीचि, १० अंशुमालिनी, ११ अङ्गिरा, १२ शशिनी, १३ छाया, १४ सम्पूर्णमण्डला, १५ तुष्टि और १६ अमृता।}}
:{{gap}}चन्द्रकी प्रथम कला अग्नि, द्वितीय सूर्य, तृतीय विश्वेदेवगण, चतुर्थ वरुण, पञ्चम वषट्कार, षष्ठ इन्द्र, सप्तम स्वर्गीय ऋषि, अष्टम विष्णु, नवम यम, दशम वायु, एकादश उषा, द्वादश अग्निष्वात्तादि पितृगण, त्रयोदश कुवेर, चतुदेश शिव और पञ्चदश ब्रह्मा पी जाते हैं। किन्तु षोड़स कला सर्वदा ही जलमें प्रविष्ट रहती है। ओषधिमें परिणत होनेसे अमावस्याको चन्द्र देख नहीं पड़ता। फिर उक्त ओषधि गोचर लेती हैं। इससे दुग्ध और ष्टत उपजता है। उसी दुग्धघृतादिसे ब्राह्मण यज्ञ करते हैं। यन्नके फलसे
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अमृत निकलता है। अमृतसे फिर चन्द्रकला पूर्ण हो जाती है। {{smaller|(कालमाधव)}}
{{outdent|इन्दुकलावटिका (सं॰ स्त्री॰) वैद्यकोक्ति औषध विशेष, दवाकी एक गोली। शिलाजतु, लौह एवं स्वर्ण समभाग डाल तुलसीके रसमें घोंटे और रत्ती-रत्तीकी गोली बना डाले। यह मसुरिका, विस्फोटक, लोहितज्वर, सर्वप्रकार व्रण और शीतला रोगके लिये विशेष उपकारी होती है।}}
{{outdent|इन्दुकलिका (सं॰ स्त्री॰) इन्दुरिव शुभ्रा कलिका यस्याः, बहुव्री॰। १ केतकी वृक्ष, केवड़ेका पेड़। २ स्वेत केतकी।}}
{{outdent|इन्दुकान्त (सं॰ पु॰) इन्दुः कान्तः मनोज्ञः यस्य, बहुब्री॰। चन्द्रकान्त मणि, हजर-उल्-क़मर, चन्दर-गांठ। २ चन्द्रकला।}}
{{outdent|इन्दुकान्ता (सं॰ स्त्री॰) इन्दुः कान्तः पतिः यस्याः, बहुव्री॓॰। १ रात्रि, रात। इन्दुः कान्तइव प्रकाशक-त्वात् यस्याः। २ केतकी, केवड़ा ३ चन्द्रप्रिया, रोहिणी।}}
{{outdent|इन्दुखण्डा (सं॰ स्त्री॰) कर्कटशृङ्गी, ककड़ासींगी।}}
{{outdent|इन्दुचन्दन (सं॰ क्ली॰) हरिचन्दन।}}
{{outdent|इन्दुज (सं॰ पु॰) इन्दोः जायते, इन्दुजन-ड। ताराके गर्भसे चन्द्र कर्तृक उत्पादित बुधग्रह, दवीर-फ़लक। चन्द्रने राजसूययज्ञ करनेपर विवेकशून्य बन वृहस्पति-की स्त्री ताराको हरण किया था। देवतावोंके यह बात बतानेपर ब्रह्माने स्वयं ताराको ले जाकर वृहस्पतिके हाथ सौंपा। वृहस्पतिने ताराको गर्भवती देख कहा था,—हमारे घरमें रहकर तुम इस गर्भको कभी रख न सकोगी। ताराने स्वामीके वाक्यानुसार तत्क्षण गर्भस्थ पुत्रको निकाल जलस्तम्भपर फेंक दिया। सद्यप्रसूत कुमार शरस्तम्भपर पड़ते ही ज्वलन्त अग्निके समान चमकने लगा था। उसका रूप देख देवतावोंने भी हार मानी। ब्रह्माने तारासे पूछा, कि वह पुत्र किसका था—चन्द्र या वृहस्पतिका। ताराने अतिकष्टसे शिरः झुकाकर कहा, कि पुत्र चन्द्रका रहा। उस समय चन्द्रने पुत्रको गोदमें ले बुध नाम रखा था। {{smaller|(हरिवंश २६ अ॰)}}}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दुजनक—इन्दु वटी|३५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्दुजनक (सं॰ पु॰) इन्दोश्चन्द्रस्य जनकः। १ अत्रिमुनि। {{smaller|अत्रिजात शब्द देखो।}} २ समुद्र। समुद्रमन्थनसे चन्द्र निकला है। {{smaller|(भारत आदि १८ अ॰)}}}}
{{outdent|इन्दुजा (सं॰ स्त्री॰) इन्दोर्जाता, इन्दु-जन-ड-टाप्। नर्मदा नदी।}}
{{outdent|इन्दुदल (सं॰ पु॰) चन्द्रकला, चांदका सोलहवां हिस्सा।}}
{{outdent|इन्दुपत्र (सं॰ पु॰) भूर्जवृक्ष, भोजपत्रका पेड़।}}
{{outdent|इन्दुपुत्र, {{smaller|इन्दुज देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुपुष्पिका (सं॰ स्त्री॰) इन्दोरिव शुक्लं पुष्पं यस्याः, बहुव्री॰। लाङ्गलीवृक्ष, नारियलका पेड़।}}
{{outdent|इन्दुपोदकी (सं॰ स्त्री॰) वेल्लिका, किसी किस्म़की बेल।}}
{{outdent|इन्टुफल (सं॰ पु॰-क्ली॰) आम्रातक, आमड़ा।}}
{{outdent|इन्दुभ (सं॰ क्ली॰) ६-तत्। १ मृगशिरा नक्षत्र। २ मृगशिरा नक्षत्रका स्वामी चन्द्र। ३ कर्कटराशि।}}
{{outdent|इन्दुभा (सं॰ स्त्री॰) इन्दुना भाति, इन्दुभा-ड-आप्। १ कुमुदिनी, कोकावेली। २ चन्द्रकिरण, चांदनी।}}
{{outdent|इन्दुभूषण (सं॰ पु॰) इन्दुना भूषति, ३-तत्। नीलपद्म, आसमानी कमल।}}
{{outdent|इन्दुभृत् (सं॰ पु॰) इन्दु विभर्ति, इन्दु-सृ-किप्। महादेव, चन्द्रको सर्वदा कपालपर धारण करनेवाले शङ्कर।}}
{{outdent|इन्दुमणि (सं॰ पु॰) इन्दुप्रियो मणिः, शाक-तत्। १ इन्द्रकान्त, हजर-उल्-कमर, चन्द्ररगांठ। इन्दुरिव शुभ्त्रा मणिर्वा। २ मुक्ता, मोती।}}
{{outdent|इन्दुमण्डल (सं॰ क्ली॰) इन्दोर्मण्डलम्, ६-तत्। चन्द्रविम्ब, चांदका घेरा। चन्द्रमण्डलका परिमाण ४८० योजन है। {{smaller|(सिद्धान्त शिरोमणि)}}}}
{{outdent|इन्दुमत् (सं॰ पु॰) इन्दुर्विद्यतेऽत्र, इन्दु-मतुप्। १ रात्रि, रात। २ शिव। ३ मयूर। ४ पूर्णिमा। (वै॰) ५ अग्नि।}}
{{outdent|इन्दुमती (सं॰ स्त्री॰) प्रशस्तः इन्दु विद्यतेऽस्याः। १ पूर्णिमा। २ अजराजकी पत्नी और विदर्भराजकी भगिनी।}}
{{outdent|इन्दुमुखी (सं॰ स्त्री॰), पद्मिनी, कमलकी बेल}}
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{{outdent|इन्दुमौलि (सं॰ पु॰) इन्दुः प्रीतिजनकतया मौली शिरसि यस्य, बहुव्री॰। महादेव। तपस्यासे तुष्ट हो शङ्कर सर्वदा ही इन्दुकलाको अपने मस्तकपर धारण किये रहते हैं। {{smaller|(काशीखण्ड)}}}}
{{outdent|इन्दुर (सं॰ पु॰) मूषिक, चूहा। इन्दुर बिलेशय अर्थात् बिलका रहनेवाला है। बिलमें रहनेसे इसका मांस बातघ्न्न, मधुर, वृंहण, बञ्जविण्मूत्र और वीर्योष्ण होता है। {{smaller|(भावप्रकाश)}} {{smaller|इन्दूर देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुरत्न (सं॰ क्ली॰) ६-तत् वा इन्दुरिव शुभ्वं रत्नम्, कर्मधा॰। मुक्ता, मोती। देवता चन्द्र होने और चन्द्र-जैसा शुभ्र रहनेसे मुक्ताका नाम इन्दुरत्न पड़ा है।}}
{{outdent|इन्दुरसा (सं॰ स्त्री॰) पिष्टकभेद, अंदरसा। चावल-को पीस दो हिस्से चीनी मिलाते और दहीका मोवन डाल दूसरे दिन घीमें उसके छोटे-छोटे पूवे सावधान से पकाते हैं। यह अति शीत, हृद्य और बलपुष्टिकर होती है। {{smaller|(वैद्यकनिघण्टु)}}}}
{{outdent|इन्दुरा (सं॰ स्त्री॰) सोमराजी, बाकची।}}
{{outdent|इन्दुराज (सं॰ पु॰) इन्दुना राजते, ३-तत्। १ चन्द्र-कान्तमणि, चन्द्रगांठ। २ कुमुद, कोकाबली।}}
{{outdent|इन्दुराजि, {{smaller|इन्दुरा देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुराजी, {{smaller|इन्दुरा देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुरेखा (सं॰ स्त्री॰) इन्दोलँखेव लेखा, रश्च लश्च ६.तत् चन्द्रकला, चांदका सोलहवां हिस्सा। २ सोमलता। ३ सोमराजी, बाकची। ४ गुडूची, गुर्च। ५ यमानी, अजवायन।}}
{{outdent|इन्दुलेखा, {{smaller|इन्दुरेखा देखो।}}}}
{{outdent|इन्टुलोक (सं॰ पु॰) इन्दोर्लोकः, ६-तत्। चन्द्रलोक।}}
{{outdent|इन्दुलोह, {{smaller|इन्दुलीहक देखो।}}}}
{{outdent|इन्दुलोहक (सं॰ क्ली॰) इन्दोर्लोहम्, स्वार्थे कन्। रौप्य, चांदी। चन्द्रदोषकी शान्तिके लिये इन्दुलोहक दान करना पड़ता है।}}
{{outdent|इन्दुलौह (सं॰ क्ली॰) लोहा। ६-तत्। लोह-धातु, आहन,}}
{{outdent|इन्दुवटी (सं॰ स्त्री॰) औषधविशेष, एक दवा। शिलाजतु, अभ्र एवं लौह एक-एक और स्वर्ण चौथायी भाग कूट-पीस बढ़न्ते, शतमूली, आमलकी}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|३६|इन्दुवदना—इन्दूर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:तथा पद्मरसकी भावनासे २ रत्ती प्रमाण वटिका बनाये। आमलकीके रस या क्वाथसे प्रत्यह प्रातःकाल एक वटिका खाना चाहिये। इस औषधके सेवनले कर्णनासादिका रोगसमूह, नानाप्रकार वातज व्याधि और बीस तरहका प्रमेह दूर हो जाता है।
{{outdent|इन्दुवदना (सं॰ स्त्री॰) छन्दः विशेष, चौदह अक्षर और चार चरणका एक छन्द। {{smaller|"इन्दुवदना भजसनैः सगुरु-युग्मैः।" (वृत्तरद्वाकर)}} जिस छन्दःमें एक भगण, एक जगण, एक सगण, एक नगण और शेषमें दो गुरु अक्षर रहता, उसे सब कोई इन्दुवदना कहता है।}}
{{outdent|इन्दुवल्लिका, {{smaller|इन्दुवल्ली देखो!}}}}
{{outdent|इन्दुवल्ली (सं॰ स्त्री॰) इन्दोर्व्ल्ली, ६-तत्। १ सोमलता। २ गुडुची, गुर्च। ३ सोमराजी, बाकची। ४ यवानी, अजवायन।}}
{{outdent|इन्दुवार (सं॰ पु॰) इन्दोः वारः, ६-तत्। नीलकण्ठ-ताजकोक्त वर्षलग्नसे तीसरे, छठें, नवें और बारहवेंको छोड़ अन्यस्थान, समस्त ग्रहगणका अवस्थानरूप योगविशेष।}}
{{outdent|इन्दुव्रत (सं॰ क्ली॰) इन्दुलोकार्थं व्रतम्, शाक-तत्। चान्द्रायण, चन्द्रलोक प्राप्त होनेके लिये किया जाने-वाला व्रत। इसमें एक पक्ष वो मास पर्यन्त प्रति दिन कुछ-कुछ भोजन घटाते चले जाते हैं। इन्दुव्रत करनेसे चन्द्रलोक मिलता और सर्वपाप मिटता है।}}
{{outdent|इन्दुशकला (सं॰ स्त्री॰) सोमराजी, बाकची।}}
{{outdent|इन्दुशफरी (सं॰ स्त्री॰) अश्मन्तक वृत्त।}}
{{outdent|इन्दुशेखर (सं॰ पु॰) इन्दुः शेखरें यस्य, बहुव्री॰। महादेव, इन्दुको मस्तकपर धारण करनेवाले शङ्कर।}}
{{outdent|इन्दुशेखररस (सं॰ क्ली॰) औषध विशेष, एक दवा। शिलाजतु, अभ्र, रससिन्दूर, प्रवाल, लौह, स्वर्णमाक्षिक एवं हरितालको समभागमें एकत्र मिला भृङ्गराज, अर्जुनत्वक्, निसिन्धु, वासक, स्थलपद्म, पद्म तथा कुरथीके रसकी भावना देते हुये मटर-जैसी वटिका बना ले। इसके सेवनसे गर्भिणीका ज्वर, स्वास, कास, शिरःदुःख, रक्तातिसार, ग्रहणीरोग, वमन, क्षुधामान्द्य, आलस्य और दीर्बल्य दूर होता है।}}
{{outdent|इन्दूर (सं॰ पु॰) मूषिक, चूहा। इन्दूर या चूहा}}
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नानाजातीय होता है। देशभेदसे भिन्न-भिन्न प्रकार-का इन्दूर देख पड़ता है। भारतवर्षमें प्रायः पचास प्रकारका इन्दूर होता है। उसमें जिस-जिस इन्दूरकी संख्या अधिक आती, उसकी बात नीचे लिखी जाती है।
'''१ जङ्गली चूहे या घूंस (Mus bandicota)'''—के गात्रका ऊपरी भाग कुछ-कुछ पिङ्गलवर्ण लगता, बीच-बीच दो-एक काला-काला बाल भी रहता और नीचेका अंश धूसर देख पड़ता है। लाङ्गुल व्यतीत देहका पन्द्रह और लाङ्गुलका आयतन तेरह इञ्च बैठता है। इस जातिकी स्त्रीके बारह स्तन होते हैं। सिंहल, भारतवर्ष, मलय और अष्ट्रेलियामें यह बहुत देख पड़ता है। जङ्गली चूहा दीवारमें गड्डा बना घरका अनिष्ट बहुत करता और उद्यानको भी विस्तर क्षति पहुंचाता है। इसका प्रधान खाद्य अन्न और शाक है।
'''२ काला चूहा (Mus rattus)'''—इसकी ऊपरी धूसर और निचली दिक् पांशुवर्णं होती है। देहका आयतन प्रायः सात इञ्च बैठता और लाङ्गुल तदपेक्षा भी बड़ा निकलता है। फिरङ्गियोंके कथनानुसार काला चूहा युरोपसे जहाज़ द्वारा इस देशमें आया है। क्योंकि जहां जहां जहाज़ आकर ठहरता, वहां-वहां यह बहुत देख पड़ता है। किन्तु हमें काला-चूहा एतद्देशीय ही मालूम देता है। महर्षि सुश्रुतने सम्भवतः काले चूहे को ही कृष्ण वा महाकृष्ण मूषिक कहा है।
'''३ दंशक इन्दूर (Mus decumanus)'''—ऊपरसे पांशुयुक्त कपिलवर्ण और बीच-बीच पीला होता है। छोटे-छोटे कानोंमें पीली धारियां पड़ी रहती हैं।
{{c|[[File:"पृष्ठ-हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu-३७".jpg|200px]]<br>दंशक इन्दूर}}
निम्नभाग पांशुवर्ण है। यह चूहा भारतवर्ष में प्रायः सर्वत्र ही रहता है। पारस्य वा ईरानमें भी शायद
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दूर|३७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
इसका उपद्रव बढ़ गया है। पहले यह इन्दूर विलायतमें न रहा। आजकल जहाज़ द्वारा वहां भी जा पहुंचा है। इस इन्दूरके प्रवेशसे विलायतका काला चूहा बिलकुल ध्वंस जैसा हो गया है। यह सब कुछ खाता है। कबूतर, छोटी छोटी मुर्गी और चिड़ियेके अण्डे खाना इसे बहुत अच्छा लगता है।
'''४ नेपाली चूहा'''—केवल नेपालमें ही होता है। ऊपरी भाग पिङ्गलवर्णं रहता और बीच-बीच लाल रङ्ग झलकता है। लोम बहुत कोमल होता है। देह और लाङ्गुलका आयतन प्रायः छः इञ्च बैठता है।
'''५ पेड़का चूहा'''—ऊपरसे देखनेमें पिङ्गलवर्ण रहता, निम्नभाग सादा होता और बीच-बीच काला धब्बा पड़ता है। भारतवर्षमें अनेक स्थानपर यह मिलता है। देहका आयतन प्रायः साढ़े सात इञ्च बैठता और लाङ्गुल कुछ उससे भी अधिक निकलता है। यह अधिकांश पेड़पर रहता और किसी-किसी स्थानपर कड़ी-बरंगेमें गड्डा खोद घुस जाता है।
'''६ सादे पेटका चूहा (Mus niviventer)'''—इसका देह प्रायः सात इञ्च पर्यन्त और लाङ्गुल उससे भी अधिक बड़ा होता है। नेपाल और पूर्ववङ्गके घर-घर यह देखनेमें आता है।
'''७ पहाड़ी चूहा (Mus homourus)'''—इसका ऊपरी भाग पिङ्गलवर्ण होता, बीच-बीच काला रङ्ग झलकता और निम्न अंश सादा रहता है। देह और लाङ्गुलका आयतन साढ़े तीन इच्च बैठता है। इस जातिकी स्त्रीके आठ स्तने निकलते हैं। यह पञ्जाब और पूर्ववङ्गके मध्य समुदय हिमालय प्रदेश में रहता है।
'''८ चिक्किर इन्दुर'''—वङ्गदेश और युक्तप्रदेशके स्थान-स्थानपर रहता है। इसके गात्रसे छछूंदरकी तरह दुर्गन्ध उठता है। {{smaller|छछूंदर दर देखो।}}
'''९ स्वेतका चूहा''' (Gerbillus Indicus)— इसका ऊपरी भाग देखनेमें मृगशावकके गात्र जैसा होता, दोनों पार्श्व काला रहता और निम्न अंश सादा लगता है। मस्तक तथा देह एकत्र सात और लाङ्गुल आठ इच्च बैठता है। यह चहा भारतवर्ष, अफ़ग़ानिस्तान
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और सिंहलमें देख पड़ता है। भारतवर्षमें हो इसकी संख्या अधिक रहती है। लम्बे-चौड़े मैदान या रेतीली जगह पर यह प्रायः गर्त खोदा करता है। गर्त ज़मीनसे दो-तीन फीट ही नीचे पड़ता और मध्यमें कोई एक फुट प्रशस्त शुष्क तृणयुक्त वासस्थान रहता है। यह चूहा शस्य, वीज, तृण और वृक्षमूल खाता है। इस जातिकी स्त्री एक काल आठसे बीस पर्यन्त बच्चे देती है।
महर्षि सुश्रुतने अट्ठारह प्रकारके इन्दुरका उल्लेख किया है,—
{{blockcenter|<poem>{{smaller|"लालनः पुत्रकः कृष्णो हंसिद्यिक्किरस्तथा।
छुछुन्दरोश्चैव कषायदशनोऽपि च॥
कुलिङ्गद्यजितय व चपलः कपिलस्तथा।
कोकिलोऽरुणसङ्गय महाक्कष्णस्तथेन्दुरः॥
श्वेतेन महता सार्धं कपिलेनाखुन। तथा।
मूषिकश्च कपोताभस्तथैवाष्टादश स्मृताः ॥"
{{right|(सुश्रुत कल्पस्थान हअ॰)}}}}</poem>}}
अर्थात् इन्दूर अष्टादश प्रकारका होता है—१ लालन, २ पुत्त्रक, २ कृष्ण, ४ हंसिर, ५ चिक्किर, ६ छुछुन्दर, ७ अलप्स, ८ कषायदर्शन, ९ कुलिङ्ग, १० अजित, ११ चपल, १२ कपिल, १३ कोकिङ्ग, १४ अरुणसङ्ग, १५ महाकृष्ण, १६ श्वेत, १७ महाकपिल और १८. कपोत। सुश्रुतने उपरोक्त अट्ठारहो प्रकार इन्दूर-के विषकी बात यों कही है,—
१ लालनके विषसे लालाश्राव, हिक्का और वमनका वेग बढ़ता है। इसमें नटशाकका कल्क मधुके साथ सेवन करना चाहिये।
२ पुत्रक के विषसे शरीर अवसन्न एवं पाण्डुवर्ण पड़ जाता है। पीछे चुहिये—जैसी ग्रन्थि भी निकलती है। इसमें शिरीष और इङ्गदीकी पत्थरपर पीसकर मधुयोगसे खिलाते हैं।
३ कृष्ण इन्दुरके विषसे सचराचर—विशेषतः मेधाच्छन्न दिन रक्तवमन होता है। इसमें शिरीषफल और कुष्ठरस किंशुक भस्मयोगसे पिलाना चाहिये।
४ हंसिके विषसे अन्नमें विराग, जृम्भण, शरीर-लोमाञ्च और दन्तहर्षण होता है। रोगीकी पहले वमन कराके आरग्वधादि पिलाते हैं।
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 10|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दूर—इन्दौर|३९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कुक्कुर और नकुलसे भी इन्दूर युद्ध करता है। किसी-किसी स्थल में यह उन्हें मार भी डालता है। विलायतमें एक प्रकारका इन्दूर होता, जो सोते शिशु का रक्त पीता है।
एक बार विलायतके न्वूगेट कारागारसे चार क़ैदियोंने गंभीर रात्रिको भागनेकी चेष्टा लगायी थी। भागते समय कितने ही इन्दूरोंने उनपर आक्रमण किया। किसीने किसीका पैर पकड़ा और कोई इन्दूर किसीके गात्रपर जा चढ़ा था। इसी प्रकार चूहोंने क़ैदियोंको पकड़ लिया। वह कहां चुपके-चुपके भागे जाते थे, कहां विषम विभ्राट्में पड़ गये और परित्राहि परित्राहि चिल्लाने लगे। प्रतिवासियोंने आकर उन्हें बचा लिया था। उस समय वह फिर कारागार जानेसे कुछ न हिचके।
{{smaller|इन्दूर मारनेका उपाय}}—थोड़ेसे सड़े आटेमें मधु मिला तथा अल्प परिमाण सांड़का गोबर छोड़ लेयी बनाते, फिर छोटी-छोटी टिकिया उतार इन्दूरके गर्तमें डालते हैं। इससे निश्चय इन्दूर मर जाते हैं। अथवा अच्छी संखियेका चूर्ण नवनीत, तथा मधु मिला लेयी बनाते और जहां इन्दूर सर्वदा आते-जाते, वहां उसे लगा देते हैं। इन्दूर लेयीको प्रेमसे खाते और साथ हो साथ पञ्चत्व भी पाते हैं। किन्तु लेयी बनाकर हाथ धो डालना चाहिये। क्योंकि इस विषाक्त वस्तुसे सहज ही अनिष्ट आ सकता है। नक्सवमिकाको आटेमें मिला खिलानेसे भी निश्चय इन्दूर मरता है। गन्धकका धूम यह सह नहीं सकता। इसीसे अनेक लोग गर्तमें गन्धक जला इन्दूर मारा करते हैं।
{{smaller|औषध}}—एक छटांक इन्दूरमांस और एक पाव सर्षप तलको साथ ही आगपर चढ़ाये। मांस तला—जैसा हो जानेपर उतार लेना चाहिये। इस तेलको मलनेसे गुदभ्रंश रोग सत्वर आरोग्य होता है।
{{smaller|वाणिज्य}}—इन्दूरके चमड़े और दांतका वाणिज्य चलता है। चमड़ेके दस्ताने स्त्रियां अपने लिये बनाती हैं। दांतके छोटे-छोटे बटन तैयार होते हैं। लोमकी बड़े-बड़े साहब टोपीमें लगाते हैं। एकबार पारिस
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नगरके किसी नाबदानमें एकपक्ष मध्य ही छः लाख इन्दूर मारे गये थे।
{{smaller|इन्दूरका घर}}—बबयी पक्षी जैसे अपना घोंसला लगाता, एक प्रकारका विलायती क्षुद्र इन्दूर भी वैसे ही वृक्षपर लतापत्रका गोलाकार घर बनाता है। घरका पथ कोई ढूंढ नहीं सकता। बालक किसी प्रकारका फल वा अन्य पदार्थ समझ उसे तोड़ लाते और भूमिमें
{{c|[[File:"पृष्ठ-हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu-४०".jpg|200px]]<br>घोंसले—जैसा घर।}}
गाड़कर खेल मचाते हैं। घर टूटनेसे देख पड़ता, कि उसमें पर-पर अनेक स्थान रहता है। प्रत्येक स्थानमें चक्षुहीन शिशु सोया करता है। घरके बीच एक पथ चलता है। बोध होता, कि उसी पथसे यातायात लगा रहता है।
नाना देशके लोग इन्दूर खाया करते हैं। हमारे देशके सन्ताल आर भील चूहेको चबा डालते हैं। चीन, नेपाल, कालिफारनिया, फ्रान्स, मालटा और इङ्गलेण्डमें भी कोई-कोई इन्दूर खाता है। फ्रान्स के पारिस नगरमें किसी-किसी श्वेताङ्गिनीको चूहेका शोरबा बहुत अच्छा लगता है।
{{outdent|इन्दौर—मध्यभारतके मालवा प्रान्तका एक विशाल राज्य। यह अक्षा° २१° २४ तथा २४° १४′ उ॰ और द्राधि° ७४° २८ एवं ७८° १०′ पू॰ के मध्य अवस्थित है। क्षेत्रफल ८४०० वर्गमील है। वार्षिक आय प्रायः एक करोड़ रुपयेसे अधिक है। राज्यका राजनैतिक सम्बन्ध बड़ेलाटके मध्यभारतस्थ एजण्टसे सीधा लगा है। इन्दौर राज्य चार भागमें विभक्ता है। प्रथम भागसे उत्तर ग्वालियर-राज्य; पूर्व देवास, धारराज्य तथा नीमाड़, दक्षिण बम्बई प्रान्तका खान्देश ज़िला और पश्चिम बरवानी तथा धार पड़ता।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रियवज्री—इन्द्रियसन्निकर्ष|६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्द्रियवज्री (हिं॰ स्त्री॰) वाजीकरण-भेद, नामर्दी दूर करनेकी एक तदबीर।}}
{{outdent|इन्द्रियवत् (सं॰ त्रि॰) प्रशस्तं वा वश्यं इन्द्रियं अस्त्यस्य, इन्द्रिय-मतुप, मस्य वः। १ इन्द्रियको वशमें रखने-वाला। २ प्रशस्त इन्द्रिययुक्त, अच्छे रुक्तवाला।}}
{{outdent|इन्द्रियवर्ग (सं॰ पु॰) एकादशेन्द्रिय, इन्द्रियसमूह, ग्यारहो रुक्न।}}
{{outdent|इन्द्रियविप्रतिपत्ति (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रियको विक्तति, रुक्तका बिगाड़।}}
{{outdent|इन्द्रियवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) शब्द, स्पर्श प्रभृति विषयमें बहिरेन्द्रियको आलोचना, रुक्तका काम। वचन, आदान, विहार, त्याग एवं आनन्द ये पांच कर्मेन्द्रियों की और सङ्कल्प, विकल्प तथा अध्यवसाय ये मनःको वृत्ति हैं।}}
{{outdent|इन्द्रियवैकल्प (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियदुर्बलता, रुक्तको कमज़ोरी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्ताप (सं॰ पु॰) इन्द्रियवैक्कृति, रुक्तकी बीमारी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्निकर्ष (सं॰ पु॰) स्व स्व विषयके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध, प्रत्यक्ष जनक व्यापार, अपने-अपने कासमें रुक्तका लगाव। इन्द्रियसन्निकर्ष कार्यमात्र दो प्रकारके कारणसे उपजता है। एक करण-विधायक अर्थात् परम्परासे सम्बन्ध रखनेवाला और दूसरा व्यापार विधायक अर्थात् साक्षात्कारण होता है। जैसे-काष्ठछेदन कार्यमें, कुठार करण विधायक और चोग्नेवालो संयोजना क्रिया व्यापार-विधायक कारण है।<br>{{gap}}हमें नासिका, कर्ण, चक्षुः, जिह्वा, त्वक् और मनः इन छः इन्द्रियों द्वारा प्रत्यच्च होता है। इस छहो तरहके प्रत्यक्षका सन्निकर्ष-व्यापार साक्षात् कारण है। तथा वह. संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्त समवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषणविशेष्यभावके भेदसे छः प्रकारका है। वस्तुके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध संयोग व्यापार कहाता है। क्योंकि प्रत्यक्षमें द्रव्यके साथ इन्द्रियका संयोग होते हो उसका ज्ञान हो जाता है। जैसे- त्वक्के संयोगसे स्पर्शयुक्त द्रव्य का वा स्मर्शका प्रत्यक्ष होता है।}}
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:{{gap}}द्रव्यमें रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवाय व्यापार कारण होता है। जैसे-किसी द्रव्यके दृष्टिगोचर होनेसे उसका गुण रूप प्रभृति भी देखनेमें आता है। वहां उस गुणके साथ इन्द्रियका संयोग हो नहीं सकता। क्योंकि गुणसे गुण कभी नही मिलता अर्थात् रूप और इन्द्रियसंयोग दोनों गुण हैं। और गुणमें इन्द्रियसंयोग कभी रह नहीं सकता। इसलिये इन्द्रिय-संयोगको गुणका प्रत्यक्ष कारण कह नहि सकते इसोसे संयुक्त-समवाय व्यापार माना है। संयुक्त वस्तु होतो है, क्योंकि उसमें इन्द्रियका संयोग रहता है। इन्द्रियसंयुक्त रहनेसे हो वस्तु नाम पड़ा है। उस संयुक्त वस्तु में रहनेवाले गुणादिमें समवाय है। अतः इन्द्रियसंयुक्त समवाय सम्बन्धसे द्रव्यमें रहनेवाले गुणक्रिया जाति प्रभृति पदार्थका प्रत्यक्ष होता है।<br>{{gap}}द्रव्यमें समवेत-समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवेत समवाय संबध कारण है। इसलिये द्रव्यमें समवेत रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें संयुक्त-समवेत-समवायको व्यापार माना है। द्रव्यमें समवेत गुणक्रिया और उसमें रहनेवाली जाति है। इसलिये उसका प्रत्यक्ष इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवायसे होता है। इन्द्रिय-संयुक्त द्रव्य होता है। उसमें समवेत गुणक्रिया इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत है। गुणक्रिया में गुणत्व-कर्मत्व जातिका समवाय है अत इन्द्रिय-संयुक्त समवेत समवाय-सम्बन्ध-से जातिके प्रत्यच्च होनेमें इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवाय कारण अवश्य स्वीकार करना चाहिये।<br>{{gap}}शब्दके प्रत्यक्षमें समवाय-व्यापार कारण है। शब्द गुण और कणे द्रव्य पदार्थ है। कर्णमें शब्द समवाय सम्बन्धसे रहता है। सुतरां कर्णके समवाय सम्बन्धसे शब्दका प्रत्यक्ष होता है। अतएव शब्दक प्रत्यक्षमें कारण समवाय सन्निकर्ष है।<br>{{gap}}शब्द-समवेत शब्दत्व जातिके प्रत्यक्षमें कारण सम वेत्त समवाय व्यापार है। शब्द कर्णमें समवेत है। उसमें शब्दत्व जातिका समवाय हैं। इसलिये शब्दत्व जातिके प्रत्यच्चमें समवेत समवाय कारण माना है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४०|इन्दौर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
है। यह उत्तरसे दक्षिण १२० मील लम्बा और ८२ मील चौड़ा है। बीचों बीच नर्मदा नदी बहती है। राज्यका दूसरा बड़ा भाग अक्षा॰ २४° ३ एवं २४° ४०′ उ॰ और द्राधि॰ ७५° ६ तथा ७६° १२ पू॰ के बीच पड़ता है। यह प्रदेश पूर्वसे पश्चिम ७० मील लम्बा ४० मील चौड़ा है। प्रधान नगर रामपुरा, भानपुरा और चंदवाड़ा है। तीसरा भाग अक्षा॰ २३° २९′ उ॰ तथा द्राधि॰ ८५° ४२′ पू॰ पँरै अवस्थित और महीदपुर नगरसे संयुक्त है। चौथे भागमें अक्षा॰ २२° १०′ उ॰ और द्राधि॰ ७४° ३९ पू॰ पर धीनगर विद्यमान है। कई छोटे-छोटे राज्य इन्दौरके अधीन हैं। सिवा इसके खासगी या सरकारी १५० से भी अधिक ग्राम लगते हैं। ग्राम समृद्ध हैं। प्रायः दश लाख रुपये वार्षिक ग्रामोंका आय है।
उत्तरमें चम्बल और दक्षिणमें नर्मदा नदी बहती है। दक्षिण दिक् विन्धयाचल पर्वत खड़ा है। राज्य के मध्यकी मन्दसोर उपत्यका समुद्रतलसे छः-सात हज़ार फीट ऊंची है। ढाक, बबूल और दूसरे झाड़का जङ्गल पड़ता है। भूमि उर्वरा है। प्रधानतः गेहूं, चावल, बाजरा, दाल, राई, सरसों, गन्ना और रुईकी फसल होती है। अहिफेनकी कृषिके लिये भूमि अतिशय उपयुक्त है। उम्दा तम्बाकू भी बहुत पैदा होती है। जङ्गलमें साखुकी बीड़ लगायी जाती है। वन्य पशुमें सिंह, चित्रव्याघ्न, विडाल, तरक्षु, शृगाल, नील-गाव, और जङ्गली भैंसा मिलता है। नक्र और विषाक्त सर्पकी कोई कमी नहीं।
इन्दौर में राजवंशीय महाराष्ट्र, हिन्दू, कुछ मुसलमान और बहुतसे गोंड तथा भील रहते हैं। सेनामें युक्तप्रदेश और पन्जाबके लोग अधिकांश हैं। भील वन्यद्रव्य खा, आखेट मार और सभ्य प्रतिवासीको लूट अपना निर्वाह करते हैं। किन्तु अब युद्धपाठशाला में शिक्षा पानेसे वह पुलिस और पलटनमें अच्छा काम देने लगे हैं। लोकसंख्या दश लाखसे अधिक है।
बम्बईसे ३५३ मील दूर खंडवा जङ्कशनसे होलकर-ष्टेट-रेलवे मवूकी राह इन्दौर नगरको जाती है। महाराजको अतिरिक्त लाभका अर्धांश मिलता है।
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१८७६ ई॰ को नर्मदापर पुल बंधा था। इन्दौर से नीमचको जानेवाली पक्की सड़कपर ही मवू नगर पड़ता है। इन्दौरसे खंडवेको भी पक्की सड़क निकली है।
इन्दौर नगरमें महाराज रूईका एक पुतलीघर चलाते हैं। अफीम धड़ाधड़ बाहर भेजी जाती है। अन्नका चालान अधिक नहीं होता।
{{smaller|इतिहास}}—होलकर वंश गड़रिये महाराष्ट्रोंसे सम्बन्ध रखता है। किसी गड़रियेके लड़के मल्हार रावने इस वंशकी प्रतिष्ठा की है। वह १६९३ ई॰ को दक्षिणमें नीरा नदीपर होल नामक ग्राममें उत्पन्न हुये थे। करका अर्थ अधिवासी है। इसीसे इस वंशका उपाधि होलकर अर्थात् होल ग्रामका अधिवासी पड़ गया है। युवावस्था पर मल्हार राव अपने घरका काम छोड़ किसी महाराष्ट्र पदाधिकारीकी अश्वारोही सेनामें भरती हुये थे। १७२४ ई॰ को वह पेशवाके अधीन पांच सौ सवारोंके नायक बनें। थोड़े हो दिनमें मल्हार रावकी कितनी ही भूमि पुरस्कार स्वरूप मिली थी। १७३२ ई॰ को उन्होंने पेशवा के प्रधान सेनापति बन मालवेके मुगल सूबेदारको युद्धमें नीचा देखाया, इस विजयके उपलक्ष में मल्हाररावको इन्दौर और जीते प्रान्तका अधिकांश सैनिक व्ययके लिये दिया गया था। १७३५ ई॰ को वह नर्मदासे उत्तर रहनेवाली महाराष्ट्र-सेनाके अध्यक्ष बने। फिर बारह वर्षतक मल्हारराव मुगलोंसे लड़ने और बसरेसे पोर्तगीजोंको निकालने तथा रुहेलोंसे लखनऊके नवाबी बचानेमें सहायता पहुंचाते रहे। इसी बीच अधिकार और प्रभाव बढ़नेसे वह भारतीय नरेशोंमें अग्रगण्य हो गये थे। १७६१ ई॰ को पाणिपथ युद्धसे मल्हारराव सकुशल पीछे हट आये। वह मध्य-भारत पहुंचते हो अपने विशाल राज्यको घटा सम्बद्ध और नियमित बनानेमें लगे। १७६५ ई॰ को मल्हारराव स्वर्गवासी हुये। मल्हाररावके पुत्र मालीरावको राज्यका उत्तराधिकार मिला था। किन्तु वह सिंहासनपर बैठनेके नौ मास बाद ही पागल होकर मर गये। मालीरावके बाद सुप्रसिद्धं अहल्याबाईने सेनापति तुकाराव जीके साथ
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दौर|४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
राज्यका प्रबन्ध अपने हाथ ले शान्तिपूर्वक ३० वर्षतक शासन चलाया था। १७९५ ई॰ को अहल्याबाईके मरनेपर गृहविवादसे होलकर वंशका बल घटा। किन्तु तुकारावजीके जारजपुत्र यशोवन्त रावने बिगड़ा काम बनाया था। एकबार भीषण रूपसे सेंधियाके साथ हारते ही उन्होंने अपनी सेना सुधारनेके लिये युरोपीय अफसर नौकर रखे। १८०२ ई॰ को यशोवन्त-रावने पेशवा और सेंधियाकी संयुक्त सेना हरा पूना नगर अधिकार किया था। किन्तु बसईमें जो सन्धि हुयी, उसके अनुसार यशोवन्त-रावकी सवारी इन्दौर वापस आयी और पेशवाको उनकी राजधानी मिल गयी। १८०३ ई॰ के महाराष्ट्र-युद्धसे यशोवन्त राव अलग रहे। अन्तको वह अंगरेज सरकारसे लड़ गये थे। पहले तो उन्होंने करनल मोनसनको पीछे हटाया और अंगरेज राज्यपर आक्रमण मारा, किन्तु अन्तकी लार्ड लेकसे हारनेपर १८०५ ई॰ के दिसम्बर मास बियास नदी किनारे आत्मसमर्पणकर सन्धिपत्र लिख दिया। सन्धिके अनुसार युद्धमें जीता प्रान्त अंगरेजोंको मिला था। किन्तु दूसरे वर्ष अंगरेजोंने उनका अधिकार वापस किया। १८११ ई॰ को यशोवन्तराव पागल होकर मर गये। उनके लड़के मल्हार-राव रहे, जो तुलसीबाई नामक रानीसे पैदा हुये थे। कुछ वर्षतक राज्यमें कितना ही झगड़ा चला और पिण्डारी डाकुवींका उपद्रव बढ़ा। सेनाके विप्लव मचाने पर रानीने अपनी और मल्हार रावकी रक्षाके लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच पेशवा और अंगरेज सरकारमें युद्ध लग गया। इन्दौरने भी पेशवाके साथ योग दिया था। रानीका वध हुआ और महीदपुरमें इन्दौरकी सेनाको पूर्ण रीतिसे नीचा देखना पड़ा। १८१८ ई॰ को मन्दसोर में जो सन्धि हुयी, उससे कितनी ही भूमि राज्यसे निकल गयी थी। १८३३ ई॰ को मल्हाररावके मरनेपर उनकी विधवा रानीने मार्तण्ड रावको गोद लिया। किन्तु कुछ सप्ताह बाद मार्तण्ड-रावको निकाल हरिरावने राज्यका भार अपने हाथ उठाया था। हरिरावके समय समस्त राज्यमें अराजकताकी धूम रही। १८४३ ई॰ को
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हरिराव मरे और उनके दत्तकपुत्र भी कुछ मास बाद चल बसे। १८५१ ई॰ को तुकारावजी सिंहासनारूढ़ हुये थे। १८५७ ई॰ को इन्दौरकी सेनाने अंगरेजी पोलिटिकल रेसिडेण्ट सर हेनरी ड्ररण्डको घेर लिया। मुश्किलसे वह अपने बालबच्चोंको ले भूपाल पहुंचे थे। किन्तु सेनाके कुछ सप्ताह बाद हथियार रख देनेसे फिर शान्ति हो गयी।
१८८८ ई॰ को इन्दौर में बृटिश रेसिडेण्ट नियुक्त हुआ। उस समय राज्य शासन संक्रान्त कितने नियम परिवर्तित और मन्त्रिसभा स्थापित हुई। १९०३ ई॰ महाराज शिवाजीराव होलकर अपने १२ वर्षके अवस्थावाले पुत्र तुकाजी रावको राज्यभार सौंपा। बाद १९०८ ई॰ को महाराज शिवाजीका परलोक हुआ। महाराज तुकारावजी इस समय वर्तमान महीप है। {{smaller|होलकर देखो।}}
इन्दौर राज्यकी लोकसंख्या नौ लाखसे ऊपर है। अंगरेज इन्दौरकी रक्षा करते और दूसरे राज्यसे विवाद बढ़नेपर मिटा देते हैं। इन्दौरके महाराज दूसरे राज्यसे सीधे पत्रव्यवहार न चलाने, अधिक सेना न रखने, किसी युरोपीय या अमेरिकनको अपने राज्यमें नौकरी न देनेपर वाध्य हैं। उन्हें गोद लेनेको सनद दी गयी है। अंगरेजीमें १९ और अपने राज्यमें २१ तोपोंकी सलामी वह पाते हैं। ३१०० मामूली तथा २१५० गैरपाबन्द पैदल और २१०० मामूली एवं १२०० गैरपाबन्द सवार रहते हैं। २४ तोपोंमें ३४० आदमी लगते हैं। महाराजको फांसी देनेका अधिकार प्राप्त है।
राज्यका आयः बढ़ते जाता है। इन्दौरकी रेसिडेन्सी में मध्यभारतीय राजावोंके लड़कोंको शिक्षा देनेके लिये राजकुमार कालेज बना है। किन्तु वह राज्यसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, समस्त व्यय अंगरेज-सरकारसे मिलता है। १२ से २० पर्यन्त राजकुमार शिक्षा पाते हैं। महाराजके स्कूलमें केवल दक्षिणी ब्राह्मण पढ़ते हैं। मन्दसोर और खारगांवमें भी अंगरेजो स्कूल हैं।
२. इन्दौर राज्यका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २२°
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 11|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४२|इन्द्र|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
४२′ उ॰ और द्राधि॰ ७५° ५४′ पू॰ पर अवस्थित है। इन्दौरमें महाराज और बड़ेलाटके पोलिटिकल एजण्ट रहते हैं। अहल्याबाईने मल्हार-रावके मरनेपर यह नगर बनवाया था। राजप्रासाद, लालबाग, टकसालघर, हायीस्कूल, बाज़ार, पुस्तकालय, अस्पताल और रूईका पुतलोधर देखने योग्य है। नगरसे मिली अंगरेज़ी रेसीडेन्सीका अस्पताल बहुत बढ़िया है। कृत्रिम नाक प्रस्तुत होती है।
{{outdent|इन्द्र (सं॰ पु॰) इदि परमैश्वर्ये रन्। {{smaller|ऋजेन्द्राय....... वने, रामात्राः। उण् २।२८।}} १ शक्र, देवराज। यह वेदोक्त प्राचीन देवता हैं। वैदिक ऋषि जिन देवताओंकी आराधना करते, उनमें इन्द्र ही प्रधान रहे। ऋक्संहिताके मत में इन्द्र निष्टिग्रीके पुत्र हैं। {{smaller|"निष्टियाः पुत्रमाच्यावयोतय इन्द्रं सवाध इह।" (ऋक् १०।२०१।१२)}} माताने इनको सहस्त्र मास और अनेक वर्ष गर्भमें रखा था। उसके बाद इन्द्रने वीर्यपूर्ण हो स्वयं जन्मग्रहण किया। उस समय इनकी माता प्रमत्त हो गयी थीं {{smaller|(ऋक् ४।१८१५-८)}} इन्द्रने अपने पिताका पादद्वय ग्रहणकर उनको मार डाला। {{smaller|(ऋक् ४।१९।१३, तै॰ सं॰ ६।१।३।६)}}}}
इन्द्रकी माताका नाम एकाष्टका रहा—
{{block center|<poem>{{smaller|"एकाष्टका तपसा तप्यमाना
जजान गर्भस्म्महिमानमिन्द्रम्।
तेन देवा अस्त्रहन्त शत् न्
हन्ता दू नामभवत् शचीपतिः॥" (अथर्व ३।१०।१२)}}</poem>}}
एकाष्टकाने घोरतर तपस्या करके महिमान् इन्द्रको उत्पन्न किया था। इन्हीके द्वारा देवताओंने शत्रुओंपर आक्रमण मारा। शचीपति दस्युवों के हन्ता हुये थे। सोम इन्द्रके जनक हैं। {{smaller|"सोम... जनिता इन्द्रस्य" (ऋक् ९।९९।५)}} इन्द्रने अग्नि सहित पुरुषके मुखसे जन्मग्रहण किया। {{smaller|"सुखादिन्द्रयाग्रिश्च प्राणादायुरजायत।" (पुरुषसूक्त)}} ऋक्संहिताके मतमें इन्द्र एक आदित्य होते भी द्वादश आदित्यसे भिन्न हैं। इन्द्र प्रजापतिसे भी उत्पन्न माने गये हैं। {{smaller|(शतपथ १।१।१।१५)}}कहते हैं,—{{smaller|"प्रजापतिदें वासुरानसृजत। स इन्द्रमणि न असृजेत। तं देवा अनुवन्निन्द्रं नो जनव इति। सो अब्रवीद यथा अहं युभांस्तपसा असृक्षि एवमिन्द्रं जनध्वनिति। ते तयो अतपान्त ते आत्मनीन्द्र मपश्यत्। तमव्रुबन् जायस्व}}
{{Multicol-break}}
{{smaller|इति। प्ब्रवीत् किम् मागधे यमभिजनिष्ये इति। ऋतून् संवत्सरान् प्रजाः पशून् लोकानित्यब्रुवन्।" (तैत्तिरीय ब्राह्मण)}}
प्रजापतिने देवों एवं असुरोंकी सृष्टि की, किन्तु इन्द्रकी उत्पत्ति न हुयी। देवगणने उनसे इन्द्रको भी उत्पादन करनेको कहा था। उन्होंने उत्तर दिया,—हमारी तरह तपोवलसे तुम भी इन्द्रको उत्पादन करो। इसके बाद देवता तपस्यामें प्रवृत्त हुये थे। देवताओंने इन्द्रको अपने आत्मामें देख जन्म लेनेकी प्रार्थना की इन्द्रने कहा—किस भाग्यमें जन्मग्रहण करें। देवताओंने ऋतु, वत्सर, प्रजा, पशु एवं इह लोकादिका नाम ले दिया था।
उक्त श्रुतिके अन्यस्थलमें, प्रजापति द्वारा इन्द्रका उत्पादन किया जाना भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}} इन्द्रकी पत्नी इन्द्राणी हैं {{smaller|(ऋक् १।१२।१२)।}} स्त्रीका नाम प्रसहा भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}}
वैदिक देवताओंमें इन्द्र प्रधान योद्धा एवं श्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न थे। ऋक्संहितामें इनके असीमगुणका परिचय पाया जाता है।
सामार्चिकमें भी लिखा है—
{{smaller|"इन्द्रस्व वाह स्थविरी युवान्वाष्पृष्यी सुप्रतिकावस ह्यौ। ती युञ्जीत प्रथमौ योगे आगते याभग्रां जितमसुराणां सही महत्॥"}}
समय आनेपर (युद्धकालमें) इन्द्रने स्थविर, युवा, अनाष्टष्य, सुप्रतीक और शत्रु के असह्य वाहुहयको पहले ही योजना कर डाली, जिसके प्रभावसे असुरोंकी शक्ति पराजित हो गयी। यह सुवर्णमय कोड़ाधारण करते और सूर्यके अश्व या कभी हिरण्यमय रथपर चढ़ते थे। वायु इनके सारथी रहे।
{{smaller|(ऋक् ८।३।३।११, १०।४९।७, ८।१।२४, ८।४८।३)}}
अस्त्रोंमें वज्र और अङ्गश ही इन्द्र सदा व्यवहार करते थे। उस समय वृत्र नामक एक असुर देवताओंकी सर्वदा अनिष्ट करता था। देवताओंने जाकर अपना दुःख इनसे कहा। इन्द्र देवताओंके साथ वृत्त्र-संहारमें अग्रसर हुये थे। इस युद्धमें सब देवता भागे, केवल मरुङ्गण और विष्णु साहाय्यार्थं रह गये। इन्द्रने वज्रके द्वारा वृत्रकी विनाश किया।
एतद्भिन्न अहि, शुष्ण, नमुचि, पिप्रु, शम्बर, उरण,
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्र|४३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पणि वत्स प्रभृति प्रधान प्रधान असुरांको भी इन्द्रने मारा था। {{smaller|(ऋक् १।१२।१९, १।१२।९-१०, ४।१८।१२ इत्यादि)}} नमुचि-वधके समय अश्विहय एवं सरस्वतीने इन्द्रको साहाय्य दिया।
इस सम्बन्धपर एक गल्प है—
{{smaller|"इन्द्रस्व इन्द्रियमन्नस्य रसं सोमस्यभक्षं सुरया आसुरी नसुचिरहरत्। सोश्विनी च सरखतीञ्ज उपधावत्। शेपानोश्मि नमुचये न त्वा दिवा न नक्तं हनानि न दण्डेन न धन्वना न पृथेन न सुष्टिना न शुष्केण न आर्द्रण अथ में इदमहार्षीत्। इदं में आाजिहीर्षय इति। तेऽब्रुवन्नस्तु नाऽत्राम्थ आइराम इति। सह न एतदथ आहरत इत्यव्रवीदिति। तावश्विनौ च सरस्वती च अपांफेनं वज्रमसिञ्चन् न शुष्को न आर्द्रः इति। तेन इन्द्रो नमुचिरासुरस्य व्युष्टायां रात्रौ अनुदिते आदित्ये न दिवा न नक्तमिति शिर उवासयत्। तस्व शीर्ष श्र्छिन्ने लोहितमिश्रः सोमौतिष्ठत्। (शतपथ-ब्राह्मण १२।७।३।१)}}
नमुचि नामक असुर इन्द्रका इन्द्रिय, अन्नरस और सुराके साथ सोमपात्र अपहरण कर ले गया। पीछे उन्होंने अश्विदय एवं सरस्वतीके निकट जाकर कहा, मैंने नमुचिकी दिवा अथवा रात्रिमें यष्टि, धनुः, चपेटिका सुष्टिसे शुष्क अथवा आर्द्र स्थानपर न मारनेका शपथ किया है। इस समय मेरी सर्वशक्ति हरण कर ली है। क्या आपलोग मेरा उद्धार कर सकते हैं?" उसके बाद अश्विद्वय एवं सरस्वतीने जलके फेनसे वज्रकी सिञ्चन कर उत्तर दिया, 'यह शुष्क वा आर्द्र नहीं है'। इन्द्रने उसी वज्रसे नमुचिका मस्तक खण्ड खण्ड कर डाला। उस समय रात्रि बीतनेपर भोर हो रहा था। सूर्योदय न होनेसे वह समय रात्रि दिन कैसे समझा जा सकता था। नमुचिके मस्तक-छेदन काल सोम रक्त मिश्रित होने पर अवज्ञा करने लगे, किन्तु पीछे सब कोई पी गये।
अथर्वसंहितामें लिखते,—इन्द्र असुरनारीके प्रेममें मुग्ध हुये थे। काठकके (१३५) मतसे यह विलिस्तेङ्गा नामक दानवीपर अनुरक्त रहे। ऋक्संहितामें इन्द्रके अतिशय सोमप्रिय होनेका विस्तर प्रमाण मिलता है।
इन्द्र वारिवर्षण करते और वज्र एवं विद्युत् चलाते हैं। इन्होंने असुरोंके लोहनिर्मित नगर तोड़ असंख्य दस्यु वा दास जातिका विनाश किया था।
{{Multicol-break}}
पौराणिकके मतमें इन्द्रके पिता कश्यप रहे। माताका नाम अदिति था। इन्होंने वृत्रादि असुरोंका वध करनेसे वृत्रहा नाम पाया। इन्द्र पूर्वेदिक्के पालक और सबको जलदान करनेवाले हैं।
तैत्तिरीय ब्राह्मणमें लिखा, इन्द्रको अपर किसी देवीके रूपपर मोह नहीं हुआ। इन्होंने केवल इन्द्राणीको ही रूपपर मोहित हो पत्नी बनाया था। किन्तु पौराणिक मतसे इन्द्रने पुलोमा दैत्यको मार उसकी कन्या ग्रहण की थी। वही कन्या इन्द्राणी हुई। इन्होंने दितिके गर्भस्थ पुत्र को नाश करनेके लिये खण्ड खण्ड किया, उसीसे मरुद्गणने जन्म लिया। {{smaller|दिति और मरुद देखो।}}
पारिजातके लिय इन्द्रके साथ कृष्णका विवाद हुआ था। {{smaller|कृष्ण और पारिजात देखो।}} व्रजके गोप इन्द्रकी पूजा करते रहे। किन्तु पीछे कृष्णने उस पूजाको उठा दिया था। इन्द्र क्रुद्ध हो अनवरत जल बरसाने और व्रज डुबाने लगे। कृष्णने गोवर्द्धन धारण कर व्रजवासियोंको रक्षा की। {{smaller|(हरिवंश)}} इन्द्रके पुत्र जयन्त, ऋषभ और मोद्र रहे। तृतीय पाण्डव अर्जुन भी इन्द्रपुत्र कहे जाते हैं। राज्यका अमरावती, उद्यानका नन्दन, अश्वका उच्चैःश्रवा, हस्तीका ऐरावत, रथका विमान, सारथिका मातलि, धनुःका इन्द्रधनुः और असिका नाम परञ्ज है। इन्द्र सब देवताओंके राजा हैं। गुरुपत्नी अहल्याको हरण करनेसे इनके सहस्र चक्षुः हुआ। {{smaller|अहल्या देखो।}} प्रधान अस्त्र वज्र है। एक एक मनु पर्यन्त इन्द्रका अधिकार रहता है। राजत्वके बाद यह १०० वर्ष पर्यन्त ब्रह्माके निकट ब्रह्मविद्या अध्ययन करते, उसके बाद कैवल्य पाते हैं। इन्द्र त्वष्ट्पुत्र विश्वरूपके वध पापसे राज्यच्युत हुये। अनन्तर इन्होंने पाप भोग करनेपर फिर अपना राज्य प्राप्त किया था। इन्होंने पर्वतोंका पक्ष छेदनेसे गोत्रहा और १०० शत अश्वमेध यज्ञ करनेसे शतक्रतु नाम पाया है। {{smaller|इन्द्रजित देखो।}} इन्द्रके नाम अनेक हैं—महेन्द्र, शक्रधनु, ऋभुक्षु, अर्ह, दत्तेय, वज्रपाणि, मेघवाहन, पाकशासन, देव-पति, दिवस्पति, स्वर्गपति, उलूक, जिष्णु, मरुत्वान्,
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४४|इन्द्रऋषभ—इन्द्रजनन|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उग्रधन्वा इत्यादि है। प्रति मन्वन्तरमें इन्द्रके नाम पृथक् पृथक् पड़ते हैं—१ यज्ञ, २ रोचन, ३ सत्यजित्, ४ त्रिशिख, ५. विभु, ६ मन्त्रद्रुम, ७ पुरन्दर, ८ वलि, ९ श्रुत, १० शम्भु, ११ वैष्टत, १२ ऋतधाम, १३ दिवस्पति और १४ शुचि।
२ परमात्मा। ३ योगविशेष। ४ श्रेष्ठ। ५ कुटजवृक्ष। ६ रात्रि। ७ प्रथम। ८ राजा। ९ ज्येष्ठानक्षत्र। १० धनवान्। ११ अन्तरात्मा। १२ धन। १३ इन्द्रिय। १४ छन्दोविशेष, चौदह संख्या। १५ बङ्गालमें दक्षिणराढ़ीय और बङ्गज कायस्थोंका एक उपाधि।
{{outdent|इन्द्रऋषभ (वै॰ त्रि॰) इन्द्रको वृषभकी भांति रखने वाली, जिसे इन्द्र हामला बनाये। यह शब्द पृथिवीका विशेषण है।}}
{{outdent|इन्द्रक (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्य धनिनः कं सुखं यत्र, बहुव्री॰। १ सभागृह, बैठकख़ाना। २ इन्द्रका सुख। ३ मन्दरगिरि।}}
{{outdent|इन्द्रकर्णक (सं॰ पु॰) रक्तैरण्ड, लाल रेड़का पेड़।}}
{{outdent|इन्द्रकर्मन् (सं॰ पु॰) इन्द्रस्येव ऐश्वर्यान्वितं कर्मास्य। विष्णु, इन्द्रका काम करनेवाले भगवान्।}}
{{outdent|इन्द्रकर्मा {{smaller|इन्द् कर्मन् देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रकील (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य कील इव। १ मन्दर-पर्वत। यह बड़ा पहाड़ है। नाना प्रकार मणिमुक्ता विद्यमान है। शिशुपाल-वधके समय श्रीकृष्णने पहले यहां क्रीड़ा की थी। २ पर्वत, पहाड़।
{{smaller|"न विषमेन्द्र कौलचतुष्पथश्वभाणामुपरिष्टात्।" (सुश्रुत)}}}}
{{outdent|इन्द्रकुञ्जर (सं॰ पु॰) ऐरावत, इन्द्रका हाथी। समुद्रमन्थनके समय इन्द्रने इसे पाया था।}}
{{outdent|इन्द्र-कूट (सं॰ पु॰) इन्द्रः ऐश्वर्यवान् कूटोयस्य, बहुव्री॰। एक पर्वत। यह कैलासके निकट विद्यमान है। {{smaller|"महामेरु सकैलास इन्द्र कूटय नामतः।" (हरिवंश १७०।१५)}}}}
{{outdent|इन्द्रकृष्ट (सं॰ त्रि॰) कृष भावे क्त तत् अस्ति अस्मिन्, अर्श आदित्वात् अच्; इन्द्रेण इन्द्रहेतुकं कृष्टम्। इन्-कर्षित, जङ्गलमें पैदा होनेवाला। वृष्टिपड़नेसे जो धान्यादि स्वभावतः उपजता, वह इन्द्रकृष्ट बजता है।
{{smaller|"इन्द्र कृष्टै वर्तयन्ति धान्ये ये च नदीमुखैः।" (महाभारत सभा॰ ५१।९) 'इन्द्र कृष्टैः इन्द्रै वाकृष्टैर्न तु कर्वणादि क्षेत्रयक यत्रापेक्षैः' (नीलकण्ठ)}}}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इन्द्रकेतु (सं॰ पु॰) इन्द्रका ध्वज, विमानकी पताका।}}
{{outdent|इन्द्रकोश, {{smaller|इन्द्र कोष देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रकोष (सं॰ पु॰) ६-तत्। १ मञ्च, मचान। २ खट्टा, खाट। ३ निर्यूह, फलीका काढ़ा। ४ निर्यास, पेड़का दूध। ५ तमङ्गक, छज्जा।}}
{{outdent|इन्द्रकौषक, {{smaller|इन्द कोष देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रगिरि (सं॰ पु॰) इन्द्रनामा गिरिः, शाक-तत्। महेन्द्रपर्वत।}}
{{outdent|इन्द्रगुप्त (सं॰ क्ली॰) १ उशीर, खस। (वै॰ त्रि॰) २ इन्द्रद्वारा रचित, जिसके इन्द्र हिफ़ाज़त रखे।}}
{{outdent|इन्द्रगुरु (सं॰ पु॰) १ वृहस्पति। २ कश्यप।}}
{{outdent|इन्द्रगोप (सं॰ पु॰) इन्द्रः गोपः रक्षकः यस्य, बहुव्री॰। १ शकगीप, वीरबहूटी। यह श्वेत और रक्तवर्ण दोनों प्रकारका होता है। (वे॰ त्रि॰) २ इन्द्रकर्तृक रक्षित। {{smaller|(ऋक् ८।६६।३२)}}}}
{{outdent|इन्द्रघोष (सं॰ पु॰) इन्द्र इति स्पष्टं घुष्यते, घुष्-घञ। इन्द्र।}}
{{outdent|इन्द्रचन्दन (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्य इन्द्रप्रियं वा चन्दनम्, ६-तत् वा शाक-तत्। १ हरिचन्दन, स्वेतचन्दन। २ रक्तचन्दन, लाल चन्दन।}}
{{outdent|इन्द्रचाप (सं॰ पु॰) इन्द्रे इन्द्रस्वामिके मेघे चाप इव, शाक-तत्। १. इन्द्रधनुः। ६-तत्। २ इन्द्राशरासन।}}
{{outdent|इन्द्रचिर्भिटा, {{smaller|इन्द्र, चिर्भिंटी देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रचिर्भिटी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रप्रिया चिर्भिटी, शाक-तत्। एक लता। वैद्यशास्त्र मतसे इसके पर्याय हैं,—इन्दीवरा, युग्मफला, दीर्घवृन्ता, उत्तमारणी, पुष्प मज्जरिका, द्रोणी, करम्भा और नलिका। इन्द्रचिमिटी तिक्त, शीतल ओर श्लेष्मनाशक होती है। यह पित्त, कास, व्रणदोष और कृमिको नष्ट करती है। चक्षुरोगमें इन्द्रचिर्भिटी विशेष उपकारी है। २ इन्द्रवारुणी।}}
{{outdent|इन्द्रच्छन्द (सं॰ क्ली॰) इन्द्र-इव सहस्रनेत्रेण सहस्त्रगुच्छेन छाद्यते, छद-असुन्-ल्युट् निपातनात्। सहस्र-गुच्छ हार, हज़ार लड़ीकी माला।}}
{{outdent|इन्द्रज (सं॰ पु॰) १ इन्द्रयव। २ कुटजवृत्त।}}
{{outdent|इन्द्रजतु (सं॰ क्ली॰) शिलाजतु।}}
{{outdent|इन्द्रजन्न (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्यात्मनः जननः देह-}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रजननीय-इन्द्रजाल|४५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
सम्बन्धः, छः। १ इन्द्रका जन्म। २ परमात्माका देह-सम्बन्ध विशेष।
{{outdent|इन्द्रजननीय (सं॰ वि॰) इन्द्रजन्म-सम्बन्धीय, इन्द्रकी पैदायशका हाल बतानेवाला।}}
{{outdent|इन्द्रजम्बूकवत्पत्रा (सं॰ स्त्री॰) कृष्णसारिवा, काली सतावर।}}
{{outdent|इन्द्रजव (हिं॰) {{smaller|इन्द्रयव देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रजा (वे॰ त्रि॰) इन्द्रसे उत्पन्न, जो इन्द्रसे पैदा हो।}}
{{outdent|इन्द्रजानु (सं॰ पु॰) वानरविशेष, किसी बन्दरका नाम।}}
{{outdent|इन्द्रजाल (सं॰ क्ली॰) इन्द्राणां इन्द्रियाणां जालं आवरकं यदा इन्द्रस्येश्वरस्य जालं मायेव। १ इन्द्रका पाश। २ युद्ध-कल्पना, जङ्गका फ़रेब। ३ छल, धोखा। ४ माया, हस्तलाघव, तिलस्म, बाजीगरी। ५ तन्त्रशास्त्र विशेष।<br>
{{gap}}मन्त्र एवं द्रव्य द्वारा किसी वस्तुको अन्य प्रकार बनाना इन्द्रजाल नामक स्वतन्त्र शास्त्र तन्त्रके अन्तर्गत है। गुरु उपदेश बिना इसकी शिक्षा नहीं मिलती। इन्द्रजालमें नाना विषय वर्णित हैं। उसे दृष्टान्त स्वरूप कुछ नीचे लिखते हैं,—<br>
{{gap}}१, एक प्रस्थ (२ सेर परिमाण) महाकाल या लाल इन्द्रायणके वीजमें धात्रीरसकी सात भावना दे और उसे गोली—जैसा बना मुख्तके भीतर रखें तो मनुष्य कपोत बन जाता है। २, छागलके मस्तकपर काली मट्टी रखनेसे और उसमें धतूरेका वीज बोनेसे जो फूल्छ आता है, उसको गात्रमें लगाते हो मनुष्य बकरा बन जाता है। ३, कृष्णचतुर्दशीको मयूरके मस्तक-पर काली मट्टी चढ़ा संनका वीज डालनेसे जब फल-फूल उतरे, तब उसको गलेमें बांधते ही मनुष्य मयूरका रूप धारण कर लेता है। ४, कृष्णचतुर्दशीको मयूरके मस्तकपर काली मट्टी लगा कपासका वीज बोनेसे जब फल-फूल लगे, तब उसे कूट-पीसकर गात्रपर मलनेसे मनुष्य पानीमें नहीं डूबता और भूमिकी तरह जलपर खड़ा रहता है। ५, काले कौवेके मस्तक पर मट्टी डाल वृहती या बढ़न्तेका वीज बोये। और उसके फलको मुखमें दबा लेनेपर मनुष्य कौवेको तरह उड़ता है, किन्तु उसे उगल देनेसे वह फिर}}
{{Multicol-break}}
मनुष्य हो जाता है। ६, कृष्णचतुर्दशीको कबूतरके मत्थेपर मट्टी डाल तिल बोये और दूधमें पानी मिला उसे सींचता रहे। फूल निकलनेपर उसे मुखमें रखनेसे कोई उस मनुष्यको देख नहीं सकता। और उस तिलके फलको कूटपीस गात्रमें लगा देनेसे मनुष्य किङ्कर बन जाता है। तथा समग्र धन-सम्पत्ति स्वेच्छाक्रमसे छोड़ बैठता है। ७, फिर उसी तिलको कपिलाके दूधमें पीस गोली बनावे और सात राततक पकाता रहे। पीछे गोली मुखमें दबा लेनेसे देवता भी किन्तु गोली उगल सकते हैं। वह सौ उस मनुष्यको देख नहीं सकते। किन्तु गोली उगल देनेसे उसको सब लोग फिर देख सकते हैं वह सौ वर्षतक जीता है और क्या स्त्री क्या पुरुष सब कोई उसके वश्य हो जाते हैं। ८, कृष्ण चतुर्दशीको शकुनिके मस्तक पर मट्टी डाल लहसुन लगायिये और फूल आनेपर पुष्यानक्षत्रमें तोड़ कपिलाके घुतसे काजल पारिये। उस फूलको उक्त काजलमें मिला आंखमें लगानेसे सौ योजन पर्यन्त दीख पड़ता है। दिनके समय नक्षत्र दृष्टिगोचर होते हैं। ऊंट, गर्दभ, महिष प्रभृति बड़े-बड़े जन्तुके मस्तकपर यदि लहसुन बोवे और फल-फूल तोड़ रखे तो फिर इस फल-फूलको मुंहमें डालनेसे उक्त जन्तुके जीवित हो जानेमें कोई सन्देह नहीं रहता।
उक्त सकल धारणाका मन्त्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं ऐ लं लं ॐ भौ स्वाहा' लक्षजप करनेसे पुरश्चरण और सहस्र जप करनेसे होम होता है। घृत द्वारा तर्पण और मार्जन करना चाहिये। ब्राह्मणभोजनादि करानेसे सिद्धि मिलती है।
उल्लूकी खोपड़ीमें घृतसे कज्जल पार उसे आंखमें आंजनेपर अन्धकारमें भी पुस्तक पढ़ सकते हैं। 'ॐ नमो नारायणाय विश्वम्भराय इन्द्रजाल-कौतुकानि दर्शय सिद्धिं कुरु स्वाहा' मन्त्र १०८ बार जपनेसे कार्यसिद्धि होती है। उक्त मन्त्र सिद्ध न होनेसे कार्य में सफलता नहीं मिलती।
'ॐ नमः परंब्रह्म परमात्मने मम शरीरं पाहि पाहि कुरु कुरु' रक्षामन्त्र है। इसी मन्त्रसे रक्षा बांध कार्य करना चाहिये।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४६|इन्द्रजाल|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
वृहस्पतिवारको हाथीकी खोपड़ी में अङ्गीलका बीज वो मन्त्रपाठपूर्वक जलसेचन करे और फल लगनेपर एक वीजको त्रिलौहसे लपेट सुखमें दवा ले। इस प्रक्रियासे मनुष्य हस्ती जैसा बलवान् और वायु-तुल्य पराक्रमी हो सकता है। त्रिलोह सकल कार्यमें प्रसिद्ध है। दश भाग सोना, बारह भाग तांबा और सोलह भाग रूपा मिलानेसे त्रिलोह बनता है। महादेवका वाक्य मिथ्या नहीं,—किसी वीजकी अङ्लीके वीजमें मिला मट्टीमें बोवे और फिर मन्त्र पढ़कर त्रि-लौहसे लपेट उसे मुखमें रखे तो साधक बिलकुल वैसा ही बन सकता है। कई वीज अङ्गीलमें मिलाकर बोनेसे उसी समय वृक्ष ऊगता है। अङ्गीलके फलका तैल एक विन्दु मुखमें डालनेसे मुर्दा प्रहरके मध्य ही जी उठता है।
शोभाञ्जनाका तेल, कपोतकी विष्ठा, शूकर तथा गर्दभकी चर्बी, हरिताल और मनःशिला एकमें मिला टीका लगानेसे मनुष्य वारण-जैसा बन सकता है।
पेचककी विष्ठा एरण्डतैलके साथ रगड़ गात्रमें लगाते ही लोग पागल हो जाते हैं।
सर्पका दन्त, काले बिच्छूका कण्टक और छिपकली (कृकलास) का रक्त एकमें पीस गात्रपर लगाते ही मनुष्य मरता है।
सिन्दूर, गन्धक, हरिताल तथा मनःशिलाकी एकत्र पीस वस्त्रपर डालने और पीछे उसी वस्त्रकी मस्तक पर बांधनेसे समस्त जगत् अग्निमय दीख पड़ता है।
विकीरण, वट और उडुम्बरका दुग्ध किसी पात्रके मध्य लगा कर जल डालनेसे दूध निकलता है।
अङ्गोलके फलका तेल अङ्गमें मलने से मनुष्य राक्षस-जैसा लगता है और उसे देखते ही सब कोई भय खाकर भागते हैं।
अङ्गोलके फलका तेल रात्रिको प्रदीपमें जलानेसे आकाशका भूत सकल भूमिपर दीख पड़ता है।
बुधवार शनिवारको कृक्लास मारकर शत्रुगणके मूत्रोत्सर्ग-स्थानमें गाड़ दे। पीछे उसे न उखाड़नेसे शत्रु, क्लीब हो जाते हैं।
गन्धक, हरिताल, गोमूत्र और विष एकत्र पीस
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अग्निमें छोड़नेसे समस्त विघ्न मिटता है। {{smaller|(दत्तात्रैयतन्त्र)}}
वशीकरण एवं आकर्षण वसन्त, विद्वेषण ग्रीष्म, स्तम्भन वर्षा, मारण शिशिर, शान्तिकर्म शरत् और उच्चाटनकार्य हेमन्तकी पूर्णिमाको करना चाहिये। {{smaller|वशीकरण देखो।}} दिनके पूर्वाह्न वसन्त, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्षा, सन्धया शिशिर, अर्धरात्र हेमन्त और फिर शरत् ऋतुका समय आता है।
पक्षादि निर्णय—मारणादि अभिचार कृष्णमें, और शान्ति प्रभृति मङ्गलकर्म शुक्लपक्षमें करना उचित है। द्वादशी तथा एकादशीको मारण; तृतीया एवं नवमी-को वशीकरण; चतुर्दशी, चतुर्थी तथा प्रतिपत्की स्तम्भन और द्वितीया, षष्ठी एवं अष्टमीको शान्तिकर्म होता है।
अश्विनी, मृगशिरा, मूला, पुष्या तथा पुनर्वसुमें वशीकरण और अनुराधा, जेष्ठा, उत्तराषाढ़ा एवं रोहिणी नक्षत्रमें मारण, विजय, शान्ति तथा स्तम्भन किया जाता है। इस सकल कार्यमें तिथि और नक्षत्रकी विवेचना आवश्यक होती है, नहीं तो मन्त्रादिकी सिद्धि बिगड़ जाती है।
जय—पुष्या नक्षत्रमें गोजिह्वा और अपामार्गका मूल उखाड़ मस्तकपर रखनेसे सकल विवाद में जय मिलता है।
सौभाग्य—पुष्यानचत्र में श्वेत विकीरणका मूल उखाड़ दक्षिण वाहुपर बांधनेसे सौभाग्य बढ़ता है।
क्रोधीपशम—{{smaller|'ॐ शान्त प्रशान्त सर्वक्रोधोपशमनो स्वाहा'}} मन्त्र इक्कीस बार जपकर जो मनुष्य मुख धोता है, उसके प्रति किसीको क्रोध नहीं होता।
स्वेत अपराजिताका मूल हस्तपर बांधने और शिवजटाका मूल मुखमें डालनेसे हस्ती निकट नहीं आ सकता।
वृहतीमूल हस्त और मुखमें धारण करनेसे व्याघ्रका भय छूट जाता है।
'ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं स्वाहा' मन्त्र पढ़कर पत्थर फेंकनेसे व्याघ्र न तो मुख झुका सकता है और न चल ही सकता है। नारिकेलमूल कृष्णचतुर्दशीको धारण करने से व्याघ्रका भय नहीं होता। {{smaller|(इन्द्रजालतन्त्र)}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रजाल|४७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
स्तम्भन—जिस व्यक्तिके मुखमें सफेद चिरभिटीकी जड़ रहती है उसके सामने किसीकी बात नहीं चलती।
'ॐ ह्रीं ह्रीं रक्ष रक्ष चामुण्डे कुरु कुरु अमुकं में वशमानय वशमानय स्वाहा' मन्त्रसे कार्यसिद्धि होती है। रविवारको पुष्यानक्षत्रमें यष्टिमधुका मूल उखाड़ सभामें फेंक देनेसे सत्रका मुंह बन्द हो जाता है।
मेघस्तम्भन—एक ईंटपर चार चतुष्कोण रेखा खींच दूसरी ईंटसे दबावे और 'ॐ मेघान् स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा' मन्त्र पढ़कर किसी बागमें गाड़ देवे तो मेघकी वृष्टि रुकती है।
भरणीनक्षत्रमें उदुम्बर प्रभृति क्षीरीवृक्षके मूलको और पांच अङ्गुल परिमाण एकखण्ड काष्ठको नौकामें डाल देनेसे उसकी चाल रुक जाती है।
निद्रास्तम्भन—यष्टिमधु और वृहतीका मूल बारीक पीसकर सूंघनेसे निद्रा नहीं आती।
अस्त्रस्तम्भन—कपित्यका मूल कृत्तिका-नक्षत्रमें उखाड़ धारण करनेसे देवगणका अस्त्र भी स्तम्भित होता है।
गुलञ्चका मूल उखाड़ हस्तपर धारण करनेसे शस्त्र भय छूट जाता है।
'ॐ अहो कुम्भकर्ण महाराक्षस निकषागर्भसम्भूत परसैन्यस्तम्भन महाभय रणरुद्र आज्ञापय स्वाहा' मन्त्र १०८ बार जप करने और अपामार्गमूल शुभ नक्षत्रमें उखाड़ शरीरपर मलनेसे समस्त शस्त्रका स्तम्भन होता है।
पेटकी हड्डी गोष्ठकी चारो ओर भूमिमें गाड़ देनेसे गो, मेष, महिष, अश्व प्रभृति स्तम्भित हो जाते हैं।
भृङ्गराज, अपामार्ग, स्वेत सर्षप, सहदेविका, अर्शघ्न, वच और खेत विकीरणका मूल उखाड़ लौह पात्रमें रखे और दो दिनके बाद निकाले। फिर उसका तिलक लगावे और 'ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमः सर्वसुखीभ्यां विश्वामित्र आगच्छ स्वाहा' मन्त्रका जप करे तो सब प्राणियोंको बुद्धि स्तम्भित होती है।
'ॐ ब्रह्मवेशिनि शिरे रक्ष रक्ष स्वाहा' मन्त्र पढ़कर
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सात पांसे उठायिये। उनमें से तीन कटिमें बांधने पर और बाक़ी हाथमें रखनेपर चौरगति रुक जाती है।
देहरञ्जन—कदम्बपत्र, लोधु और अर्जुनपुष्यी एकत्र पीस अङ्गमें लगानेसे दुर्गन्ध दूर होती है।
एला, शटी, तेजपत्र, रक्तचन्दन, हरीतकी, शोभाञ्जन, मुस्तक, कुष्ठ और अन्यान्य सुगन्ध द्रव्य पीस गात्रमें मलनेसे जो सोरभ उठता है, उससे सकल ही मोहित हो जाते हैं।
आम्र एवं जम्बुकी आठी तथा पद्ममूल पास मधुके साथ रात्रिको मुखमें रखनेस पुरुषके मुखका दुर्गन्ध दूर होता है और सुगन्ध आने लगती है। मुरा-मांसी, नागकेशर एवं कुष्ठको बांटकर पन्द्रह दिन तक प्रातः तथा सन्धयाकाल चाटनेसे स्त्रीके मुखमें कपूरको गन्ध भर जाती है
लोहका मल, जवापुष्य और आमलकी बांटकर शिरःपर लगानेसे तीन मासके मध्य सफेद बाल काले हो जाते हैं।
छागीके दुग्ध द्वारा सात दिन पर्यन्त भावना दे तिलका तेल निकाले और फिर उसे शिरःमें लगावे तो काले बाल सफ़ेद हो जाते हैं।
अश्विनी नक्षत्र में वटकी जीवन्तिका दुग्धके साथ खानेसे पुरुष बलवान् बनता है। पुष्यनक्षत्रमें विकीरणका मूल उखाड़ गोदुग्धसे बांटकर खानेपर सात दिनमें वृद्ध भी युवाके समान कूदने लगता है।
जन्मवन्धया-चिकित्सा—रविवारको मूलपत्र तथा शाखा सहित गन्धनाकुली उखाड़ एकवर्ण गौके दुग्ध में अविवाहित कन्यासे पिसा ऋतुकालमें चार तोले परिमाण सात दिन पर्यन्त खावे और दुग्ध एवं मूंगकी दाल प्रभृति लघु पथ्य खावे तो वन्ध्याके गर्भरह जाता है। इस औषधको खाकर उद्वैग, भय, शोक और दिवानिद्रा त्याग कर देना चाहिये। परिश्रमका कार्य करना भी मना है। केवल पतिका सहवास रखना कहा है। अन्यथा होनेसे गर्भ नहीं रहता।
कष्ण अपराजिताका मूल छागीके दुग्धमें बांटकर ऋतुकालपर पीनेसे वन्धया गर्भधारण करती है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४८|इन्द्रजाल|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
गोक्षुरका वीज निसिन्धुके रसमें बांटकर तीन या सात दिन सेवन करनेसे वन्धया गर्भवती होती है।
काकवन्धया-चिकित्सा—रविवारको पुष्यानक्षत्रमें अश्वगन्धांका मूल महिषीके दुग्धमें बांटकर ४ तोले परिमाण सात दिन खानेसे काकवन्द्याको गर्भ रह जाता है।
मृतवत्सा-चिकित्सा—कृत्तिकानक्षत्रमें पूर्वमुख ही पीतघीषालताका मूल जलके साथ पीस दो तोले परिमाण खानेसे मृतवत्सा दोष दूर होता है।
दाड़िमका मूल दुग्धके साथ बांट पीने और निज पतिसहवास करनेसे मृतवत्सा दीर्घायु पुत्र प्रसव करती है।
मच्चिष्ठा, यष्ठिमधु, कुष्ठ, त्रिफला, शर्करा, मेदा लता,
क्षीरयुक्त भूमिकुष्माण्ड, काकोली, अश्वगन्धा-मूल, यमानी, हरिद्रा, क्षीरकाकोली, स्वेतचन्दन, दारु-हरिद्रा, हिङ्गुल, कटुकी, नीलोत्पल, कुमुद एवं द्राक्षाको दो-दो तोले ले चार सेर घुतमें पकायिये और पाकके समय शतमूलीका रस तथा दुग्ध छः-छः सेर डान्त दीजिये। नियमपूर्वक पकाकर इस घृतको जो नारी पीती है, वह सुन्दर पुत्र प्रसव करती है। अल्पायु सन्तान और केवल कन्या प्रसव करनेका दोष इस घुतसे छूट जाता है। योनि एवं रजोदोष और गर्भस्रावमें यह विशेष उपकार पहुंचाता है। इसके पानसे प्रजा तथा आयुवृर्द्धि और ग्रहदोषकी शान्ति होती है। इसे फलष्टत कहते हैं। यह अति आयुष्कर है। वैद्य इस घृतमें खेत कण्टकारी भी डालनेको व्यवस्था देते हैं। जङ्गली वेरकी आगसे इसे पकाना पड़ता है।
गर्भस्राव-चिकित्सा—प्रथम मासके गर्भस्त्रावपर पद्मकेशर और रक्तचन्दन समभाग गोदुग्धके साथ बांट कर खानेसे दोष दूर हो जाता है। अथवा यष्टिमधु, देवदारु, शरवीज और क्षारकाकोली गोदुग्धमें पोस कर पीनेसे गर्भस्त्राव रुकता है।
द्वितीय मास नीलोत्पल, पद्ममृणाल, यष्टिमधु और कर्कटशृङ्गी गोदुग्धके साथ बांट कर पीनेसे वेदना मिटती है।
तृतीय मास रक्तचन्दन, तगर, कूट, मृणाल और
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पद्मकेशर शीतल जलमें पीसकर पीनेसे पीड़ा छूटती है। अथवा क्षीरकाकोली, बला और अनन्तमूलकी दुग्धमें रगड़कर पीना चाहिये।
चतुर्थ मास स्वेत उत्पल, मृणाल, गोक्षुर और केशरको दुग्धमें बांटकर सेवन करनेसे गर्भस्राव रुकता है। अथवा यष्टिमधु, रास्त्रा, श्यामालता, ब्राह्मण्यष्टिका और अनन्तमूल गोदुग्धमें पोसकर पीना चाहिये।
पञ्चम मास पुनर्णवा, काकोली, तगर तथा नीलोत्पल अथवा वृहती, कण्टकारी, उडुम्बर, कायफल, दारुचीनी और गव्यघृत दुग्धके साथ पीसकर खानसे उपकार होता है।
षष्ठ मास सिता, ह्रीवेरका मूल एवं आखुमज्जा शीतल जलमें बांट गोदुग्धके साथ अथवा गोक्षुर, शोभाच्जनवीज, यष्टिमधु, पृश्चिपर्णी तथा बला दुग्धमें पीसकर पीनेसे गर्भ नहीं गिरता।
सप्तम मास पद्मका काष्ठ एवं मूल, शृङ्गाटक और नीलोत्पल दुग्धमें बांटकर सेवन करना चाहिये। अथवा किशमिश, शृङ्गाटक और पद्मका केशर गोदुग्ध-के साथ सेवन करनेसे गर्भस्राव रुक जाता है।
अष्टम मास यष्टिमधु, पद्मकाष्ठ, विभीतक, विकीरणमूल, मुस्तक, नागकेशर, गजपिप्पली और न्नोलपद्म बांटकर दुग्धके साथ खिलानेसे गर्भ-स्राव नहीं होता। अथवा विल्व मूल, कपित्थ, बृहती और शमीकाष्ठ सहित दुग्ध पकाकर देना चाहिये।
नवम मास गोरक्षतण्डुलका वीज और कक्कील मधु सहित पीस लेप करनेसे वेदना दूर होती है। अथवा यष्टिमधु, श्यामालता, अनन्तमूल और धीर-काकोली सहित दुग्ध पकाकर खिलाते हैं।
दशम मास सिता, अङ्कर, किशमिश, मधु और नीलपद्म गोदुग्ध सहित खिलानेसे गर्भस्त्राव रुकता है। अथवा केवल दुग्ध पकाकर ही दे सकते हैं। यष्टिमधु और देवदारु दुग्ध सहित देनेसे भी उपकार होता है।
मधु, वासक, रक्तचन्दन, सैन्धव और महेन्द्रवीज गोदुग्धमें बाँटकर खिलानेसे सर्वप्रकार गर्भस्त्रावदोष नष्ट होता है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५०|इन्द्रतूलक—इन्द्रधनुस्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्द्रतूलक, {{smaller|इन्द्रतूल देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रतोया (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रं ऐश्वर्यान्वितं तोयं यस्याः वा इन्द्रेण पूरितं तोयं यस्याः, बहुब्री॰। गन्धमादन पर्वतके निकट बहनेवाली नदी।}}
{{outdent|इन्द्रत्व (सं॰ क्ली॰) १ इन्द्रका बल और वैभव, इन्द्रकी ताकत और हैसियत। २ राजत्व, बादशाही।।}}
{{outdent|इन्द्रत्वीत (वै॰ त्रि॰) हे इन्द्र! तेरे द्वारा रक्षित।}}
{{outdent|इन्द्रदत्त (सं॰ पु॰) एकजन ग्रन्थकार। इनकी उपाधि 'उपाध्याय' थी। इन्द्रदत्तने 'सिद्धान्तकौमुदी-गूढ़ फक्किका-प्रकाश' नामक ग्रन्थ बनाया था।}}
{{outdent|इन्द्रदमन (सं॰ पु॰) १ वाणासुरका पुत्र। {{smaller|(हरिवंश ३६०)}} ३ पवैविशेष। जलप्लावनके समय कुण्ड, तड़ाग, वट वा पिप्पल्लवृच्च पर्यन्त जल बढ़कर पहुंचने-से यह पर्व पड़ता है। ७ मेघनाद, इन्द्रजित्}}
{{outdent|इन्द्रदारु (सं॰ पु॰) १ देवदारु। २ तैल-देवदारु वृक्ष।}}
{{outdent|इन्द्रदेवी (स॰ स्त्री॰) काश्मीरराज मेघवाहनकी पत्नी। इन्होंने इन्द्रदेवीभवन नामक विहार बनवाया था। {{smaller|(राजतरङ्गिणी)}}}}
{{outdent|इन्द्रद्युति (सं॰ क्ली॰) चन्दन, सन्दल।}}
{{outdent|इन्द्रद्युम्न (सं॰ क्ली॰) १ हद विशेष, एक झील। (पृ॰) २ एक राजा। स्कन्दपुराणके उत्कलखण्डमें लिखा है, कि मालव देशमें इन्द्रद्युम्न नामक एक राजा उन्होंने ही उत्कलस्थ पुरुषोत्तम देवका मन्दिर बनवाया था। उसमें विश्वकर्मा स्वयं आ दारुमयी मूर्ति निर्माण कर गये थे। {{smaller|(कपिलसंहिता और पुरुषोत्तममाहात्मा)।}} मुकुन्द रामक्कत जगन्नाथमङ्गलमें लिखा है, कि इन्द्रद्युम्न एक मन्दिर बनवा ब्रह्माके निकट मूर्तिस्थापनके लिये उपदेश लेने पहुंचा था। ब्रह्मलोक पहुंचने और अनेक स्तवस्तुति सुनानेपर इन्द्रद्युम्नसे ब्रह्माने सन्तुष्ट हो एक मुहूर्तं ठहरने तथा सन्यावन्दनके बाद वर देनेको कहा। ब्रह्माके एक मुहूर्तमें मनुष्यके साठ हजार वर्ष बीतते हैं। किन्तु वहां यह कुछ समझ न सके थे। जब ब्रह्मा सन्धया करके आये, तब इन्द्रद्युम्नसे कहने लगे-अपने राज्य एकबार जाकर वापस आओ तब हम आपको मूर्ति देंगे। ये अपने राज्य वापस}}
{{Multicol-break}}
आये, किन्तु उसके चिह्न भी कहीं न पाये। समयके फेरसे समस्त ध्वंस हो गया था। इन्द्रद्युम्न अपने राज्यको पहुंचान भी न सके। जिसको देखते, उसीसे पूछते थे—इस राज्यका नाम क्या है। अवशेषमें एक पेचक और कूर्मने इनको पूर्वकथा बतायी थी। इन्द्रद्युम्न फिर राजा हुये और कौमाद्य राजाकी कन्या मालावतीके साथ व्याहे गये। उसके बाद इन्होंने प्रस्तरमय जगन्नाथका मन्दिर बनवाया था। किसी दिन एक दूतने आकर कहा, समुद्रके तौरपर एक काष्ठ तैर रहा है। इन्द्रद्युम्नने उससे पहले ब्रह्माके मुख सुनसे रक्खा था भगवान् कृष्ण निम्ब वृक्षपर प्राण छोड़ेंगे और बहकर समुद्रतीर पहुंचेगे। इसलिये दूतको बात कानमें पड़ते ही वे महासमारोहके साथ उस काष्ठकी समुद्रसे जाकर उठा लाये। विश्वकर्माने आकर उसो काष्ठसे जगन्नाथको मूर्ति बनायी थी। जगन्नाथ देखो। इन्द्रद्युम्नने जगन्नाथ देवसे अपनी कन्या सत्यवतीका विवाह कर दिया। २ अन्य एक गङ्गवंशीय नृपति। ११८८ ई॰ को इन्होंने जगन्नाथ देवके मन्दिरका पुनः संस्कार कराया था। ३ एक असुरका राजा। क्लष्णने इन्हें मार डाला था। {{smaller|(महाभारत वन॰ १२ १०)}} ४ ऋषि-विशेष। शतपथब्राह्मणमें इन्हें भाल्लवेय कहा है। ५ राजर्षि विशेष। {{smaller|(महाभारत वन॰ १९८ ५०)}} ६ मगधके पालवंशीय शेष राजा।
{{outdent|इन्द्रद्रु (सं॰ प्र॰) इन्द्रस्य द्रुः, ६-तत्। १ अर्जुनष्टच्च। २ कुटजवच। ३ देवदारु वृच।}}
{{outdent|इन्द्रद्दीप (सं॰ पु॰ क्ली॰) पौराणिक मतसे भारतके नौ विभागोंमेंसे एक विभाग। वर्त्तमान अष्ट्रेलिया।}}
{{outdent|इन्द्रधनुस् (सं॰ क्ली॰) इन्द्रे तत्स्वामिके मेघे धनुः इव, ७-तत्। इन्द्रायुध, कौस-कुजा। वर्षाकालके उद्य वा अस्त होनेके समय सूर्यको विपरीत दिशामें यह प्रायः देख पड़ता है। वृष्टिजल-कणाँकी आणविक शक्तिके प्रभावसे नाना वर्णं बन उक्त नैसर्गिक काण्ड उत्पन्न होता है। इसी प्रकार चन्द्रको आभासे कभी-कभी राम-धनुः निकलता है, किन्तु वह बहुत कम देख पड़ता है।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५२|इन्द्रपर्वत—इन्द्रब्रह्मवटी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:बहुव्री॰। १ इन्द्रवारुणी, कुंदरू। २ लाङ्गलिका, कलिहारी।
{{outdent|इन्द्रपर्वत (सं॰ पु॰) इन्द्रनामकः वा इन्द्रवर्णः पर्वतः, शाक-तत्। १ महेन्द्रपर्वत। २ नीलपर्वत।}}
{{outdent|इन्द्रपातम (वै॰ त्रि॰) दूसरेकी अपेक्षा अधिक प्रीतिसे इन्द्र द्वारा पान किया हुआ।}}
{{outdent|इन्द्रपान (वै॰ त्रि॰) इन्द्र द्वारा पान किया हुवा।}}
{{outdent|इन्द्रपीत, {{smaller|इन्दू पान देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रपुत्रा (सं॰ पु॰) इन्द्र पुत्रों यस्याः, बहुव्रीहि॰। अदिति।}}
{{outdent|इन्द्रपुरी (सं॰ स्त्री॰) अमरावती।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोगम (सं॰ त्रि॰) इन्द्रको आगे रखनेवाला, जिसके इन्द्र रहनुमा रहे।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोहित (सं॰ पु॰) बृहस्पति।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोहिता (सं॰ स्त्री॰) पुष्या नक्षत्र।}}
{{outdent| (सं॰ क्ली॰) लवङ्ग, लौंग।}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पा (सं॰ स्त्री॰) १ लाङ्गलीष्टच, कलिहारी। २ पूतीकरञ्च, वनकरेला।}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पिका, {{smaller|इन्द्र, पुष्पा देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पी, {{smaller|इन्द्रपुष्पा देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रप्रमति (सं॰ पु॰) इन्द्रः प्रमतिः प्रकृष्टा मतिः यस्याः, बहुव्री॰। १ ऋद्मन्वद्रष्टा एक पृथक् वसिष्ठ ऋषि।
{{smaller|(ऋक् ९।९७।४—६)। २ व्यासशिष्य पैल ऋषिके शिष्य।<br>(अग्निपुराण तथा भागवत)}}}}
{{outdent|इन्द्रप्रसूत (वै॰ त्रि॰) इन्द्र द्वारा उत्पादित वा प्रीत् साहित, जिसे इन्द्र निकाले या बढ़ाये।}}
{{outdent|इन्द्रप्रस्थ—एक प्राचीन नगर। इन्द्रप्रस्थ खाण्डवा-रण्यके मध्य था। महाराज युधिष्ठिरने इस नगर में राजधानी स्थापित को थी। उस समय इन्द्रप्रस्थ समुद्र-सदृश परिखा द्वारा अलङ्कृत और गरुड़की तरह द्विपक्ष द्वार तथा परम रमणीय सौधसमूहसे समाकीर्ण था। इसके परम रमणीय प्रदेशमें कुवेरागार-सदृश कौरव-गृह बना था। चारों ओर उद्यानमें नानाजातीय फलशाली वृक्ष थे। {{smaller|(महाभारत आदि)}}}}
इन्द्रप्रस्थ एक पवित्र तीर्थ माना गया है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थमिदं क्षेत्रंं स्थापितं दैवतैः पुरा।
पूर्वपश्चिमयोस्तात एकयोजनविस्तृतम्॥७५॥}}</poem>}}
{{Multicol-break}}
{{block center|<poem>{{smaller|कलिन्द्या दक्षिणे यावद्योजनानां चतुष्टयम्।
इन्द्र प्रस्थस्य मर्यादा कथितैषा महर्षिभिः॥७६॥"
{{right|(सौभरिसंहिता २य अ॰)}}</poem>}}}}
अर्थात् पूर्वकालमें देवगणने इस इन्द्रप्रस्थको स्थापन किया था। यह पूर्व-पश्चिम एक और यमुनाके दक्षिण तक चार योजन विस्तृत था। महर्षियोंने इन्द्रप्रस्थको मर्यादा इसीप्रकार बतायी है।
हमारी समझमें पूर्वसमयमें इन्द्रने विष्णुकी पूजाकी इससे इस स्थानका नाम इन्द्रप्रस्थ पड़ा है। इन्द्रप्रस्थ में देहत्याग करनेसे मनुष्य विष्णुतुल्य हो जाता है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थाख्यमेतद्वै क्षेत्रमिन्द्रस्य पावनम्।
तेनात्र पूजितो विष्णुः क्रतुभिर्ष हुदचिणैः॥२४॥
तुष्टे न विषणुना तस्प्रै वरी दत्तो निशम्यताम्।
भी शक्र तावते क्षेत्रे सर्वतीर्थमया जनाः॥२५॥
तनूं त्यक्षन्ति ये ते वै मत्तुला हिंसका अपि॥" (२ अ॰)
"इन्द्र स्य खाण्डवारण्ये इन्द्र प्रस्थाभिध' शुभम्।"
(सौभरिसंहिता ८ अ॰)}}</poem>}}
वर्तमान दिल्लामें ही यह प्राचीन नगर था। अब इसका सामान्य ध्वंसावशेष मात्र बचा है। 'इन्दरपत' नाम चला जाता है। सुना जाता है, कि दिल्लीपति पृथ्वीराजके समय यहां एक गढ़ बना हुआ था। चन्द कविने कहा है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"गढं इन्दपत्थं सहायं सुकज्जै
उभै दीन जुट्टै करै यग्ग धज्जै॥” (पृथ्वीराजरायसा २०।७५)}}</poem>}}
आज भी दिल्लीमें 'पुराना किला' नामक प्राचीन दुर्ग देख पड़ता है। उसे कोई-कोई 'इन्दरपत' कहते हैं। यद्यपि यह मुसलमानोंकां बनाया है तो भी वह किसी हिन्दू द्वारा निर्मित दुर्गपर रचित है।
(Archaeological Survey Reports of India, Vol. IV. p. 2.)
{{outdent|इन्द्रप्रहरण (सं॰ क्ली॰) वज्र। यह दधीचि मुनिकी हड्डीसे बना था।}}
{{outdent|इन्द्रफल, {{smaller|इन्दू यव देखो}}}}
{{outdent|इन्द्रभाष (हिं॰ स्त्री॰) तालविशेष। इसमें बादलके गर्जन-जैसा शब्द निकलता है।}}
{{outdent|इन्द्रब्रह्मवटी (सं॰ स्त्री॰) अपस्मारनाशक वटी विशेष, मृगी रोगकी गोली। रससिन्दूर, अभ्भ्र, लौह, रौप्य, स्वर्णमाक्षिक, विष एवं पद्मकेशर समभाग ले स्रहि,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५२|इन्द्रपर्वत—इन्द्रब्रह्मवटी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:बहुव्री॰। १ इन्द्रवारुणी, कुंदरू। २ लाङ्गलिका, कलिहारी।
{{outdent|इन्द्रपर्वत (सं॰ पु॰) इन्द्रनामकः वा इन्द्रवर्णः पर्वतः, शाक-तत्। १ महेन्द्रपर्वत। २ नीलपर्वत।}}
{{outdent|इन्द्रपातम (वै॰ त्रि॰) दूसरेकी अपेक्षा अधिक प्रीतिसे इन्द्र द्वारा पान किया हुआ।}}
{{outdent|इन्द्रपान (वै॰ त्रि॰) इन्द्र द्वारा पान किया हुवा।}}
{{outdent|इन्द्रपीत, {{smaller|इन्दू पान देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रपुत्रा (सं॰ पु॰) इन्द्र पुत्रों यस्याः, बहुव्रीहि॰। अदिति।}}
{{outdent|इन्द्रपुरी (सं॰ स्त्री॰) अमरावती।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोगम (सं॰ त्रि॰) इन्द्रको आगे रखनेवाला, जिसके इन्द्र रहनुमा रहे।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोहित (सं॰ पु॰) बृहस्पति।}}
{{outdent|इन्द्रपुरोहिता (सं॰ स्त्री॰) पुष्या नक्षत्र।}}
{{outdent| (सं॰ क्ली॰) लवङ्ग, लौंग।}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पा (सं॰ स्त्री॰) १ लाङ्गलीष्टच, कलिहारी। २ पूतीकरञ्च, वनकरेला।}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पिका, {{smaller|इन्द्र, पुष्पा देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रपुष्पी, {{smaller|इन्द्रपुष्पा देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रप्रमति (सं॰ पु॰) इन्द्रः प्रमतिः प्रकृष्टा मतिः यस्याः, बहुव्री॰। १ ऋद्मन्वद्रष्टा एक पृथक् वसिष्ठ ऋषि।
{{smaller|(ऋक् ९।९७।४—६)। २ व्यासशिष्य पैल ऋषिके शिष्य।<br>(अग्निपुराण तथा भागवत)}}}}
{{outdent|इन्द्रप्रसूत (वै॰ त्रि॰) इन्द्र द्वारा उत्पादित वा प्रीत् साहित, जिसे इन्द्र निकाले या बढ़ाये।}}
{{outdent|इन्द्रप्रस्थ—एक प्राचीन नगर। इन्द्रप्रस्थ खाण्डवा-रण्यके मध्य था। महाराज युधिष्ठिरने इस नगर में राजधानी स्थापित को थी। उस समय इन्द्रप्रस्थ समुद्र-सदृश परिखा द्वारा अलङ्कृत और गरुड़की तरह द्विपक्ष द्वार तथा परम रमणीय सौधसमूहसे समाकीर्ण था। इसके परम रमणीय प्रदेशमें कुवेरागार-सदृश कौरव-गृह बना था। चारों ओर उद्यानमें नानाजातीय फलशाली वृक्ष थे। {{smaller|(महाभारत आदि)}}}}
इन्द्रप्रस्थ एक पवित्र तीर्थ माना गया है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थमिदं क्षेत्रंं स्थापितं दैवतैः पुरा।
पूर्वपश्चिमयोस्तात एकयोजनविस्तृतम्॥७५॥}}</poem>}}
{{Multicol-break}}
{{block center|<poem>{{smaller|कलिन्द्या दक्षिणे यावद्योजनानां चतुष्टयम्।
इन्द्र प्रस्थस्य मर्यादा कथितैषा महर्षिभिः॥७६॥"(सौभरिसंहिता २य अ॰)}}</poem>}}
अर्थात् पूर्वकालमें देवगणने इस इन्द्रप्रस्थको स्थापन किया था। यह पूर्व-पश्चिम एक और यमुनाके दक्षिण तक चार योजन विस्तृत था। महर्षियोंने इन्द्रप्रस्थको मर्यादा इसीप्रकार बतायी है।
हमारी समझमें पूर्वसमयमें इन्द्रने विष्णुकी पूजाकी इससे इस स्थानका नाम इन्द्रप्रस्थ पड़ा है। इन्द्रप्रस्थ में देहत्याग करनेसे मनुष्य विष्णुतुल्य हो जाता है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थाख्यमेतद्वै क्षेत्रमिन्द्रस्य पावनम्।
तेनात्र पूजितो विष्णुः क्रतुभिर्ष हुदचिणैः॥२४॥
तुष्टे न विषणुना तस्प्रै वरी दत्तो निशम्यताम्।
भी शक्र तावते क्षेत्रे सर्वतीर्थमया जनाः॥२५॥
तनूं त्यक्षन्ति ये ते वै मत्तुला हिंसका अपि॥" (२ अ॰)
"इन्द्र स्य खाण्डवारण्ये इन्द्र प्रस्थाभिध' शुभम्।"
(सौभरिसंहिता ८ अ॰)}}</poem>}}
वर्तमान दिल्लामें ही यह प्राचीन नगर था। अब इसका सामान्य ध्वंसावशेष मात्र बचा है। 'इन्दरपत' नाम चला जाता है। सुना जाता है, कि दिल्लीपति पृथ्वीराजके समय यहां एक गढ़ बना हुआ था। चन्द कविने कहा है,—
{{block center|<poem>{{smaller|"गढं इन्दपत्थं सहायं सुकज्जै
उभै दीन जुट्टै करै यग्ग धज्जै॥” (पृथ्वीराजरायसा २०।७५)}}</poem>}}
आज भी दिल्लीमें 'पुराना किला' नामक प्राचीन दुर्ग देख पड़ता है। उसे कोई-कोई 'इन्दरपत' कहते हैं। यद्यपि यह मुसलमानोंकां बनाया है तो भी वह किसी हिन्दू द्वारा निर्मित दुर्गपर रचित है।
(Archaeological Survey Reports of India, Vol. IV. p. 2.)
{{outdent|इन्द्रप्रहरण (सं॰ क्ली॰) वज्र। यह दधीचि मुनिकी हड्डीसे बना था।}}
{{outdent|इन्द्रफल, {{smaller|इन्दू यव देखो}}}}
{{outdent|इन्द्रभाष (हिं॰ स्त्री॰) तालविशेष। इसमें बादलके गर्जन-जैसा शब्द निकलता है।}}
{{outdent|इन्द्रब्रह्मवटी (सं॰ स्त्री॰) अपस्मारनाशक वटी विशेष, मृगी रोगकी गोली। रससिन्दूर, अभ्भ्र, लौह, रौप्य, स्वर्णमाक्षिक, विष एवं पद्मकेशर समभाग ले स्रहि,}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दरभगिनी—इन्दरभूति|५३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:अग्नि, विजया, एरण्ड, वचा, निष्पाव, शूरण तथा निर्गुण्डीके द्रवमें घोंटे। फिर सबको कङ्गुनी सर्षपोंके तैलमें पकाते और चणमात्र वटी बनाते हैं। आर्द्रकके रसमें देनेसे इन्द्रप्रस्थवटी अपस्मार रोगको नाश करती है। {{smaller|(रसेन्द्रसारसंग्रह)}}
{{outdent|इन्द्रभगिनी (संष स्त्री॰) शिवपत्नी। यह इन्द्रकी बहन थी।}}
{{outdent|इन्द्रभूति (सं॰ पु॰) गणधरभेद। जैनियोंके चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामीके ११ गणधर थे। सर्वज्ञ तीर्थङ्करकी दिव्य ध्वनिका जो अर्थ समझकर लोगोंके लिये उपदेश देते हैं वे श्रावक, श्राविका, मुनि और आर्यका रूप चारप्रकारके गणके धारक-स्वामी गणधर वा गणेश कहलाते हैं। गणधर भिन्न भिन्न तीर्थङ्करोंके भिन्न भिन्न होते हैं। तदनुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर भगवान्के इन्द्रभूति प्रथम और मुख्य गणधर थे। इनके जीवनका वृत्तान्त जैनशास्त्रों में यों लिखा है,—<br>{{gap}}इन्द्रभूति जातिके गौतम ब्राह्मण थे। इनका जन्मस्थान गौतम नामक नगर था। ये अपने माँ बापके इन्द्रभूति, वायुभूति और अग्निभूति नामके तीन पुत्र थे। ये तीनों ही भाई वैदिक धर्मानुयायी महाविद्वान् थे। इनके पास देशदेशान्तरोंसे अनेक छात्र शास्त्राध्ययन करने आया करते थे। इन्द्रभूतिकी जिह्वापर समस्त वेद और शास्त्र नृत्य किया करते थे। इस कारण इनको अपनी विद्यावत्ताका बड़ाही घमण्ड था। ये उस समय अपने शास्त्रज्ञानके सामने संसारके विद्वानोंको तुच्छ समझते थे।<br>{{gap}}जब महावीर स्वामी चार घातिया (आत्माकी अनन्त-ज्ञानशक्ति, अनन्त-दर्शनशक्ति, अनन्त-सुखशक्ति और अनन्त वीर्यशक्तिको आच्छादन कर देनेवाले कर्म) कर्मों को नष्टकर वैशाख शुक्लदशमीके दिन सर्वज्ञ हो गये और इन्द्रकी आज्ञानुसार कुबेरने भगवान्का समवशरण (व्याख्यानसभा) रचकर तैयार कर दिया, तो उनके व्याख्यानको सुननेके लिये देशदेशान्तरोंसे मनुष्य, तिर्यश्च और स्वर्गों से देवता आने लगे। जब सभाके बारहो प्रकोष्ठ भर गये और सम्पूर्ण, आगन्तुक}}
{{Multicol-break}}
जीव व्याख्यान सुननेकी प्रतिक्षा करने लगे, तो भगवान्की दिव्यध्वनि ही न निकला (तीर्थङ्गरोंकी वाणी ओष्ठ, तालु और जिह्वाके संसर्गसे नहीं निकलती, बल्कि मेघक गर्जनके समान मूर्धासे स्वरव्यञ्ज-रहित निकलती है। उसमें तपके प्रभावसे ऐसा अतिशय होता है कि सब देशवासी सब जातिके मनवाले प्राणी अपनी अपनी भाषामें उसे समझने लगते हैं।) दिव्यध्वनिकी प्रतीक्षा करते करते एक दिन दो दिन यहांतक कि ब्यासठ दिनतक बीत गये, परन्तु भगवान्की उपदेश वृष्टि न हुई। जब यह सब वृत्तान्त इन्द्रने देखा, तो उसने अपने अवधिन्ज्ञानसे {{smaller|(अवधिज्ञान शब्द देखो)}} निश्चय किया कि "भगवान्का कोई गणधर तो है ही नहीं, जो उनके दिव्य उपदेशको धारणा रख लोगोंको समझा सके, इसलिये हो वाणी नहीं निस्सृत हुई है।" अब तो इन्द्रको गणधरके खोजनेको आवश्यकता हुई। उसने अपने अवधिज्ञानसे जब इन्द्रभूतिकी भावी गणधर जाना, तो वह सीधा एक विद्यार्थीका वेशधारण कर उनके पास गया। उस समय इन्द्रभूति अपने छात्रोंको पढ़ा रहे थे। इसलिये इन्द्र भी उन छात्रोंमें जा कर ही बैठ गया और उनका व्याख्यान सुनने लगा।
उस समय किसी विषयका प्रतिपादन करके इन्द्रभूतिने अपने विद्यार्थियोंसे पूछा—"क्यों! तुम सब लोगोंको समझमें आ गया न?" उत्तरमें अन्य विद्यार्थियोंने तो 'हां' कह दिया, परन्तु छात्रवेशधारी इन्द्र अपनी नाक भौं सिकोड़ अरुचि प्रकट करने लगा। उसके इस व्यापारसे असन्तुष्ट हो छात्रोंने इन्द्रभूतिसे कहा—"महाराज! यह नवीन छात्र आपको अवज्ञा करता है।" यह सुन इन्द्रभूतिने कहा—"क्यों! मैं समस्त शास्त्रोंका वेत्ता हूं। मेरे व्याख्यानको सब लोग पसन्द करते हैं फिर क्या कारण है कि वह तुम्हें नहीं रुचा?" उत्तरमें इन्द्रने कहा—"यदि आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, तो मेरे एक आर्याछन्दका हो अर्थ कह दीजिये वह आर्या यह है
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 14|2em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४५|इन्दरभूति—इन्द्रमेदिन्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{block center|<poem>{{smaller|"षड़ द्रव्य नवपदार्थ त्रिकाल-पञ्चास्तिकाय-षट्कायान्।
विदुषां वरः स एव हि यो जानाति प्रमाणनयैः॥"}}<ref>जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छः द्रव्य, जीव, अजीव, आश्चव, बन्ध, संवर, निर्जर, मोक्ष, पाप और पुण्य ये नौ पदार्थ, अतीत, अनागत, और वर्तमान ये तीनकाल, जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, और आकाश ये पांच अस्तिकाय, एवं पृथी, जल, तेज, वायु और वनस्पति जातिके शरीरवाले पांचप्रकारे जीव और शेषकाय (वसकाय) के धारी जीव ये षट्काय इनको जो प्रमाण और नयीसे जानता है वह ही विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं।</ref> (कथाकोष)</poem>}}
इस जैनधर्मके मर्मको कहनेवाले अश्रुतपूर्व विषम आर्याको देखकर इन्द्रभूति बड़े चकराये। उन्होंने क्रोधमें आकर इन्द्रसे कहा कि "तेरा कौन गुरु है? मैं उसीसे शास्त्रार्थ करूंगा। तुझे छात्रके साथ वाद विवाद करनेसे मेरी प्रतिष्ठामें क्षति पहुंचती है।" इसके उत्तरमें इन्द्रने कहा—"मेरे जगद्पूज्य महावीर भगवान् गुरु हैं।" इन्द्रभूति बोले—"क्या वही अपने इन्द्रजालसे आकाशमें देवींको दिखानेवाला सिद्धार्थ राजाका पुत्र महावीर? क्या तू उसोका शिष्य है! अच्छा चल! उसीके साथ शास्त्रार्थं करूंगा।" इन्द्र अपने प्रयोजनकै सिद्ध हुआ जान प्रसन्नतासे बोला—"आइये! मेरे साथ आइये। मैं आपको अपने गुरुके साथ मुलाकात करा दूंगा।" अपने वचनानुसार इन्द्रभूति इन्द्रके साथ चल दिये। यह देख उनके अन्य दो भाई अग्निभूति, वायुभूति और अनेक शिष्य भी साथ साथ हो लिये। चलकर वे लोग महावीर भगवान्के समवसरणके पास आये। समवसरणमें जो चारो दिशाओं में चार बहुत विशाल स्तम्भ (मानस्तम्भ) होते हैं, (जिन्हें देखकर मानियोंका मानभङ्ग हो जाता है।) उन्हें देखते ही उन सब लोगोंका मान गलित हो गया, वे लोग स्पर्धा छोड़ भगवान्की प्रदक्षिणा दे उनकी स्तुति करने लगे। उनमेंसे इन्द्रभूति तत्काल हो समस्त परिग्रह (धन धान्य वस्त्र आदि) छोड़ मुनि हो गये।
ये ही इन्द्रभूति बादको तपस्याके बलसे अवधिन्नान और मनःपर्ययज्ञानके (दूसरेके मनकी बातको जानने-वाला ज्ञान) स्वामी हो गये। सात ऋषि प्रकट हो गई और समस्त तपस्वियोंमें मुख्य ही ये भगवान्के प्रधान
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{{smallrefs}}
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गणधरहो गये। बस! इनके गणधर होते ही महावीर स्वामीका दिव्य उपदेश होने लगा। उसे इन्द्रभूति गणधरने धारण कर आचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग आदि बारह अङ्गोंमें रचा और उसका भव्योंको ज्ञान कराया।
जब तक महावीर स्वामी इस संसारमें रहे, तब तक तो ये उनके गणधर रहे, बादको जब वे मोक्षधाममें पधार गये, तब इन्हें भी सर्वज्ञता हुई। इन्होंने १२ वर्ष तक इस पृथीमण्डलपर जैनधर्मका प्रसार किया। अन्तमें अविनाशी पदप्राप्तकर सर्वदाके लिये अनन्त सुखका अनुभव करने लगे।
इन इन्द्रभूतिका गोत्र गौतम था, इसलिये इनको लोग गौतम नामसे भी कहते हैं। बहुतसे लोग बौद्धधर्मके नेता गौतमको और इन गौतमको नाम-साम्यसे एक ही समझते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं। ये दोनों भिन्न-भिन्न मतके प्रचारक भिन्न भिन्न व्यक्ति थे।
{{outdent|इन्द्रभेषज (सं॰ क्ली॰) इन्द्रं महत् भेषजमौषधम्, कर्मधा॰। शुण्ठी, सोंठ।}}
{{outdent|इन्द्रमख (सं॰ पु॰) इन्द्रकी प्रीतिके लिये होनेवाला यज्ञ।}}
{{outdent|इन्द्रमण्डल (सं॰ पु॰) नक्षत्रमण्डल विशेष। इसमें अभिजित्से अनुराधातक नक्षत्र रहते हैं।}}
{{outdent|इन्द्रमद (सं॰ पु॰) तरुगुल्म-ज्वर, पेड़पौधेको लगनेवाला बुखार। यह एक प्रकारका विष होता हैं और प्रथम वृष्टिके जलसे उपजता है। इन्द्रमसे तरु तथा गुल्म झुलस जाते हैं और मौन एवं जलीकादि मर जाते हैं।}}
{{outdent|इन्द्रमह (सं॰ क्ली) इन्द्र-प्रीतिजनक उत्सव-यज्ञादि। यह यज्ञ 'इन्द्रं अहं' प्रभृति शब्दसे आरम्भ होता है।}}
{{outdent|इन्द्रमष्टकामुक (सं॰ पु॰) इन्द्रमहं कामये, इन्द्रमह-कम-उक्छ। कुक्कुर, कुत्ता।}}
{{outdent|इन्द्रमादन (वे॰ वि॰) इन्द्रको प्रसन्न करनेवाला।}}
{{outdent|इन्द्रमार्ग (सं॰ पु॰) इन्द्रलोकमाप्तार्थी मार्गः, शाक तत्। बदरीपाचनका निकटवर्ती तीर्थ। इस स्थानमें वशिष्ठका आश्रम था। {{smaller|(भारत, वन २५ २०)}}}}
{{outdent|इन्द्रमेदिन्, (सं॰ वि॰) इन्द्रसे मित्रता रखनेवाला।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११५
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११४|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{smaller|बीपगतं व्याख्यानं सुखातया क्रियतेऽतोयं प्रधान विषयीस्तीत्यवधार्य्यम्। किं च नैव प्रधानस्यायेऽप्रधानस्य ग्रहणं भवितुमर्हति। प्रधानाप्रधानयीः प्रधाने कार्यसम्प्रत्यय इति व्याकरणमहाभाष्यवचनप्रामाण्यात्। एवमेव सर्वेषां वेदानामीश्वरे मुख्यचें मुखातात् पर्यंमस्ति। तत्प्राप्तिप्रयोजनाएव सर्व-उपदेशाः सन्ति। अतस्तदुपदेशपुरः। सरेणैव त्रयाणां कर्मोंपासनाज्ञान-काण्डानां पारमाथि कवावहारिकफलसिद्धये यथायोग्योपकाराय चानुष्ठानं सर्वे में नुष्धैर्यथावत्कर्तव्यमिति ।" (ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका)}}
पुनः इस विषयमें ऋग्वेदका प्रमाण है—विष्णु अर्थात् व्यापक परमेश्खरका जो अत्यन्त आनन्दस्वरूप प्राप्तिके योग्य होता और सुक्ति कहाता है, वह विद्वान्की सर्वदा या सकल काल देखाता है। (अर्थात् योगी पुरुष सदा उस परमात्माके आनन्दखरूपकी ज्ञाननेत्रसे देखते या केवल हृदयमें रखते हैं) वही समस्त पदार्थ में व्याप्त है। उसमें देश, काल और वस्तुका भेद नहीं पड़ता अर्थात् ऐसा नहीं—वह अमुक स्थानमें रहता है, इस स्थानमें नहीं; अमुक समय था, इस समय नहीं अथवा अमुक वस्तुमें है, इस वस्तुमें नहीं। सर्व पदार्थमें विराजनेसे वह ब्रह्म सर्वं समय सर्वत्र परिपूर्ण रूपसे अधिष्ठित रहता है। सूर्यके प्रकाशसे आवरणरहित आकाश और नेत्र भर जानेकी भांति, परब्रह्मका अवस्थान स्वयंप्रकाश और व्याप्तवान् भांति, परब्रह्मका अवस्थान स्वयंप्रकाश और व्याप्तवान् है। इस परब्रह्म के परमपदकी प्राप्तिसे श्रेष्ठ दूसरी प्राप्ति ब्रह्माण्डमें नहीं, इसीसे चारों वेदमें वह पद-प्राप्ति विशेष प्रतिपादित है। इस विषयमें व्यासदेव-लिखित वेदान्तशास्त्रका प्रमाण भी मिलता है,—'समस्त वेदवाक्यमें उसी ब्रह्मका हो विशेष प्रतिपादन विद्यमान है।' यही ब्रह्म वेदके किसी स्थानमें साचात् और किसी स्थानमें परम्पराभावसे प्रतिपादित है। इसीसे परब्रह्म वेदका परम अर्थ वा परम अतिपादक पदार्थ बना है। यजुर्वेदमें भी इसका ऐसा ही प्रमाण है—उस परब्रह्मकी अपेक्षा श्रेष्ठ वा उत्क्लष्ट द्वितीय पदार्थ अन्य कोई नहीं, वह सर्वत्र समस्त विश्वमें व्याप्त है, समस्त जगत्का पालनकर्ता तथा अध्यक्ष है और अग्नि सूर्य एवं विद्युत् तीन ज्योतिर्मयको अन्यान्य सृष्ट पदार्थसे मिलनेके कारण षोड़शी अर्थात् षोड़शकला कहाता है। यथा—१ ईक्षण वा यथार्थ विचार, २ समस्त विश्वको
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धारण करनेवाले प्राण, ३ श्रद्धा वा सत्य विषयके विश्वास, ४ आकाश, ५ वायु, ६ अग्नि, ७ जल, ८ पृथिवो, ९ वाह्यीन्द्रिय, १० मन अर्थात् ज्ञान, ११ अब, १२ वीर्य अर्थात् बल एवं पराक्रम, १३ तप अर्थात् धर्मानुष्ठानरुप सदाचार, १४ मन्त्र वा वेदविद्या, १५ कर्म वा चेष्टा और १६ नाम अर्थात् दृष्ट वा एवं अदृष्ट पदार्थकी संज्ञाको षोड़श कला कहते हैं। ईश्वर व्याप्तिमें रहनेसे ही कलाका षोड़शी नाम इन्होंने पाया है। इन षोड़श कलाका प्रतिपादन प्रश्नोपनिषत्के षष्ठ प्रश्नमें लिखा है। इस स्थानमें वेद शब्दका मुख्यार्थ परमेश्वरके स्वरूप का हो प्रतिपादन करना है। परमेश्वरसे पृथक रूप जगतादि वेद शब्दका गीणार्थ है। इसीसे मुख्य और गीणार्थमें मुख्य हो ग्रहणीय है। पुनः लिखा है,—उस अक्षर वा अविनश्वर परमात्माका नाम ॐ है। जो सर्वत्र व्याप्त और सर्व श्रेष्ठ है, वही ब्रह्म है। इससे हमने यह समझा है कि वेदका मुख्य तात्पर्य परब्रह्मका प्रतिपादन और उससे जीवको किसी प्रकार मिला देना है। परमेश्वरका उपदेशरूप वेद तीन प्रकारके अवयवसे युक्त है—कर्म, उपासना और ज्ञान, इन तीनी काण्डसे इसकाल तथा परकालका व्यवहारिक फल पाने और यथावत् उपकारार्थ सकल मनुष्यके उपरोक्त तीन प्रकार अनुष्ठान विषयमें पुरुषकार लानेको ही देहधारणका फल समझना चाहिये। {{smaller|आर्य समाज और दयानन्द सरखती शब्दमें विस्तत विवरण देखिये।}}
महात्मा केशवसेनके मतसे वेदका ईश्वर निश्चेष्ट और पुराणका ईश्वर कर्मशील है। निश्चेष्ट और कर्मशील दोनों प्रकारका इसतरह सिद्ध होता है कि—ईश्वर मनुष्यकी भांति इधर-उधर नहीं घूमता और न बारबार कोई काम हो करता है। वह हमारे और तुम्हारे मुंहमें प्रकाश्य रूपसे अन्न न डाल समस्त ब्रह्माण्डकी शक्तिके भीतर उसका प्रबन्ध बांधता है। ब्रह्म निष्कृिय रहते भी गूढ़ नियमसे हमारा समुदाय अभाव मोचन करता है। हम देश, नगर एवं ग्राममें सर्वत्र ब्रह्मको पूजें और उसीको अपने भवनकी लक्ष्मी समझें। विश्वमें निगूढ़ कल्याणके कौशलसे कार्यका स्रोत नियत
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११४|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{smaller|बीपगतं व्याख्यानं सुखातया क्रियतेऽतोयं प्रधान विषयीस्तीत्यवधार्य्यम्। किं च नैव प्रधानस्यायेऽप्रधानस्य ग्रहणं भवितुमर्हति। प्रधानाप्रधानयीः प्रधाने कार्यसम्प्रत्यय इति व्याकरणमहाभाष्यवचनप्रामाण्यात्। एवमेव सर्वेषां वेदानामीश्वरे मुख्यचें मुख्यातात् पर्यंमस्ति। तत्प्राप्तिप्रयोजनाएव सर्व-उपदेशाः सन्ति। अतस्तदुपदेशपुरः सरेणैव त्रयाणां कर्मोंपासनाज्ञान-काण्डानां पारमाथि कवावहारिकफलसिद्धये यथायोग्योपकाराय चानुष्ठानं सर्वे में नुष्धैर्यथावत्कर्तव्यमिति ।" (ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका)}}
पुनः इस विषयमें ऋग्वेदका प्रमाण है—विष्णु अर्थात् व्यापक परमेश्खरका जो अत्यन्त आनन्दस्वरूप प्राप्तिके योग्य होता और सुक्ति कहाता है, वह विद्वान्की सर्वदा या सकल काल देखाता है। (अर्थात् योगी पुरुष सदा उस परमात्माके आनन्दखरूपकी ज्ञाननेत्रसे देखते या केवल हृदयमें रखते हैं) वही समस्त पदार्थ में व्याप्त है। उसमें देश, काल और वस्तुका भेद नहीं पड़ता अर्थात् ऐसा नहीं—वह अमुक स्थानमें रहता है, इस स्थानमें नहीं; अमुक समय था, इस समय नहीं अथवा अमुक वस्तुमें है, इस वस्तुमें नहीं। सर्व पदार्थमें विराजनेसे वह ब्रह्म सर्वं समय सर्वत्र परिपूर्ण रूपसे अधिष्ठित रहता है। सूर्यके प्रकाशसे आवरणरहित आकाश और नेत्र भर जानेकी भांति, परब्रह्मका अवस्थान स्वयंप्रकाश और व्याप्तवान् भांति, परब्रह्मका अवस्थान स्वयंप्रकाश और व्याप्तवान् है। इस परब्रह्म के परमपदकी प्राप्तिसे श्रेष्ठ दूसरी प्राप्ति ब्रह्माण्डमें नहीं, इसीसे चारों वेदमें वह पद-प्राप्ति विशेष प्रतिपादित है। इस विषयमें व्यासदेव-लिखित वेदान्तशास्त्रका प्रमाण भी मिलता है,—'समस्त वेदवाक्यमें उसी ब्रह्मका हो विशेष प्रतिपादन विद्यमान है।' यही ब्रह्म वेदके किसी स्थानमें साचात् और किसी स्थानमें परम्पराभावसे प्रतिपादित है। इसीसे परब्रह्म वेदका परम अर्थ वा परम अतिपादक पदार्थ बना है। यजुर्वेदमें भी इसका ऐसा ही प्रमाण है—उस परब्रह्मकी अपेक्षा श्रेष्ठ वा उत्क्लष्ट द्वितीय पदार्थ अन्य कोई नहीं, वह सर्वत्र समस्त विश्वमें व्याप्त है, समस्त जगत्का पालनकर्ता तथा अध्यक्ष है और अग्नि सूर्य एवं विद्युत् तीन ज्योतिर्मयको अन्यान्य सृष्ट पदार्थसे मिलनेके कारण षोड़शी अर्थात् षोड़शकला कहाता है। यथा—१ ईक्षण वा यथार्थ विचार, २ समस्त विश्वको
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धारण करनेवाले प्राण, ३ श्रद्धा वा सत्य विषयके विश्वास, ४ आकाश, ५ वायु, ६ अग्नि, ७ जल, ८ पृथिवो, ९ वाह्यीन्द्रिय, १० मन अर्थात् ज्ञान, ११ अब, १२ वीर्य अर्थात् बल एवं पराक्रम, १३ तप अर्थात् धर्मानुष्ठानरुप सदाचार, १४ मन्त्र वा वेदविद्या, १५ कर्म वा चेष्टा और १६ नाम अर्थात् दृष्ट वा एवं अदृष्ट पदार्थकी संज्ञाको षोड़श कला कहते हैं। ईश्वर व्याप्तिमें रहनेसे ही कलाका षोड़शी नाम इन्होंने पाया है। इन षोड़श कलाका प्रतिपादन प्रश्नोपनिषत्के षष्ठ प्रश्नमें लिखा है। इस स्थानमें वेद शब्दका मुख्यार्थ परमेश्वरके स्वरूप का हो प्रतिपादन करना है। परमेश्वरसे पृथक रूप जगतादि वेद शब्दका गीणार्थ है। इसीसे मुख्य और गीणार्थमें मुख्य हो ग्रहणीय है। पुनः लिखा है,—उस अक्षर वा अविनश्वर परमात्माका नाम ॐ है। जो सर्वत्र व्याप्त और सर्व श्रेष्ठ है, वही ब्रह्म है। इससे हमने यह समझा है कि वेदका मुख्य तात्पर्य परब्रह्मका प्रतिपादन और उससे जीवको किसी प्रकार मिला देना है। परमेश्वरका उपदेशरूप वेद तीन प्रकारके अवयवसे युक्त है—कर्म, उपासना और ज्ञान, इन तीनी काण्डसे इसकाल तथा परकालका व्यवहारिक फल पाने और यथावत् उपकारार्थ सकल मनुष्यके उपरोक्त तीन प्रकार अनुष्ठान विषयमें पुरुषकार लानेको ही देहधारणका फल समझना चाहिये। {{smaller|आर्य समाज और दयानन्द सरखती शब्दमें विस्तत विवरण देखिये।}}
महात्मा केशवसेनके मतसे वेदका ईश्वर निश्चेष्ट और पुराणका ईश्वर कर्मशील है। निश्चेष्ट और कर्मशील दोनों प्रकारका इसतरह सिद्ध होता है कि—ईश्वर मनुष्यकी भांति इधर-उधर नहीं घूमता और न बारबार कोई काम हो करता है। वह हमारे और तुम्हारे मुंहमें प्रकाश्य रूपसे अन्न न डाल समस्त ब्रह्माण्डकी शक्तिके भीतर उसका प्रबन्ध बांधता है। ब्रह्म निष्कृिय रहते भी गूढ़ नियमसे हमारा समुदाय अभाव मोचन करता है। हम देश, नगर एवं ग्राममें सर्वत्र ब्रह्मको पूजें और उसीको अपने भवनकी लक्ष्मी समझें। विश्वमें निगूढ़ कल्याणके कौशलसे कार्यका स्रोत नियत
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर—ईश्वरचन्द्र|११५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
बहा करता है। ईश्वर उसी कल्याणके कौशलसे भक्तकी सुखी बनाता और सच्चेको जिताता है।
{{right|{{smaller|(सेवकका निवेदन १म और २य खण्ड, २०६ पृष्ठ)}}}}
केशवका कहना है—जो दुर्गा है, वही काली है। पूजा करनेवालेने दोनोंमें एकही शक्ति पायी। केवल मनके भावने देवीको दो वर्णमें प्रतिफलित किया था। जिस मूर्तिको देख पहले भक्तिभाव बढ़ा और मन मुग्ध पड़ा, उसीका परिवर्तन पा ऐसा भय उपस्थित हुआ! भक्तिपूर्वक एकबार हृदयके मध्य पहुंचने और वहां ही ढूंढ़नेसे यह मूर्ति देखनेको मिलती है। भीतर आलोक न आये और अन्धकार समा जायेगा। अनन्त आकाश काला है। उसी अनन्त आकाशमें यह शक्ति विलीन रहती है। इस स्थानपर अन्धकारमें अन्धकार सना और एक निराकारमें सकल एकाकार बना है। आकाश और अन्धकारमें कुछ भी प्रभेद पड़ नहीं सकता। उसी गहरे काले आकाशमें अन्धकारके भीतर ब्रह्मशक्ति ब्रह्मज्ञान है। बाहर उसीको कालीमूर्ति बनी है। बाहर देवी और भीतर ब्रह्मज्ञानरूप ब्रह्मशक्ति है।" {{smaller|(सेवकका निवेदन ४र्थ खण्ड १४७-८ पृष्ठ)}}
परमहंस रामकृष्णने कहा है,—सच्चिदानन्द हरि बहुरूपी है। वह एक है, वह अनन्त है, वह विश्वरूपी भगवान् है। जो उसको नहीं देखता, वह उसका मर्म नहीं समझता और साकार निराकार पर तर्क भी करता है। किन्तु प्रकृत भक्त उसे साकार और निराकार दोनों रूपमें पूजता है। ब्रह्मका अनन्त नाम और अनन्त भाव है। जिसे जो भाव और जो नाम अच्छा लगता है, उसे उसो नाम और उसी भावसे पुकारने पर ईश्वर मिलता है। अहम्भाव छूटनेसे ईश्वर देख पड़ता है। कलिकालमें ईश्वरका नाम हो एकमात्र साधन है। {{smaller|रामकृष्ण और विवेकानन्द देखो।}}
खुष्टानोंकी बाइबिलके मतसे ईश्वर स्सृष्टिकर्ता है। सृष्टिके पूर्व एकमात्र वही विद्यमान था। उसीसे यह चराचर जगत् निकला है। {{smaller|ईसाई देखो।}}
कुरान्के मतसे ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वंश्रेष्ठ और सकलका स्रष्टा है। उसने नूतन रक्तसे मनुष्य-
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को बनाया है। वह सर्वदर्शी, असीम, अमर इत्यादि विशेषणसे संयुक्त है। {{smaller|इस्लाम और मुसलमान् देखो।}}
वर्तमान समयमें खुष्टानोंका धर्मसम्प्रदाय नाना श्रेणियोंमें विभक्त हो गया है। कोई ईश्वरको सर्वस्रष्टा समझता और कोई ईश्वरसे नहीं—स्वभावसे ही जगत् की उत्पत्ति मानता है। कोई संयोग-वियोग द्वारा पृथिवीको उत्पत्ति ठहराता है और ईश्वरके अस्तित्वपर विश्वास नहीं लाता। {{smaller|पाश्चत्य दर्शन शब्दमें विस्तृत विवरण देखो।}}
{{outdent|ईश्वरकवि—एक प्रसिद्ध हिन्दुस्थानी कवि। ये औरंगज़ेबकी राजसभामें रहते और सरस कविता करते थे।}}
{{outdent|ईश्वरकृष्ण—एक प्रसिद्ध ग्रन्थकार। इनकी बनायी सांख्यकारिका हमारे दर्शनशास्त्रमें चिरप्रसिद्ध है। ५५७ से ५८९ ई॰ के मध्य चनती (परमार्थ) ने चीना भाषामें उक्त ग्रन्थका अनुवाद किया था। ईश्वर-कृष्णको कोई-कोई कालिदास समझते हैं। पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे ये ई॰ के ६ठें शताब्दमें विद्यमान थे। किन्तु उनका यह मत माना जा नहीं सकता। क्योंकि जो ग्रन्य ६ठें शताब्दमें चीन देशमें जा कर अनुवादित हुआ, वह उक्त समयसे अन्ततः बहु वर्षे पूर्व अवश्य बना था। बनते ही सांख्यकारिका कुछ चीनदेश पहुंच न गयी होगी। नाना स्थानोंमें विख्यात होनेपर चीन देशके लोग भारतवर्ष आ उसे ले गये होंगे। अनुवाद करनेमें भी कम समय लगा न होगा। अतएव ६ठे शताब्दसे बहुपूर्व ईश्वरकृष्ण का विद्यमान रहना समझ पड़ता है। इस देशके कोई पण्डित भगवान् श्रीकृष्णकी हो सांख्यकारिकाका रचयिता मानते हैं। कृष्णदपायन प्रभृति अपर कृष्णोंसे भिन्न रखनेके लिये ईश्वरक्कष्ण नाम पड़ा है।}}
{{outdent|नारायणने—'सांख्यचन्द्रिका' नाम्नी सांख्यकारिकाकी टीका एवं विज्ञानभिक्षुने 'आर्यभाष्य' नामक सांख्यकारिकाका भाष्य बनाया है।}}
{{outdent|ईश्वरगीता (सं॰ स्त्री॰) कूर्मपुराणका अंशविशेष।
{{outdent|ईश्वरचन्द्र—वङ्गदेशान्तर्गत ऊष्णनगरके एक राजा। ये शिवचन्द्रके पुत्र थे। १७१८ ई॰ में शिवचन्द्रके मरनेपर इन्हें राजपद मिला था। ईश्वरचन्द्र रूपवान्, बलवान् और सङ्गीतप्रिय थे । १८०२ ई॰ में ५५}}
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बहा करता है। ईश्वर उसी कल्याणके कौशलसे भक्तकी सुखी बनाता और सच्चेको जिताता है।
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केशवका कहना है—जो दुर्गा है, वही काली है। पूजा करनेवालेने दोनोंमें एकही शक्ति पायी। केवल मनके भावने देवीको दो वर्णमें प्रतिफलित किया था। जिस मूर्तिको देख पहले भक्तिभाव बढ़ा और मन मुग्ध पड़ा, उसीका परिवर्तन पा ऐसा भय उपस्थित हुआ! भक्तिपूर्वक एकबार हृदयके मध्य पहुंचने और वहां ही ढूंढ़नेसे यह मूर्ति देखनेको मिलती है। भीतर आलोक न आये और अन्धकार समा जायेगा। अनन्त आकाश काला है। उसी अनन्त आकाशमें यह शक्ति विलीन रहती है। इस स्थानपर अन्धकारमें अन्धकार सना और एक निराकारमें सकल एकाकार बना है। आकाश और अन्धकारमें कुछ भी प्रभेद पड़ नहीं सकता। उसी गहरे काले आकाशमें अन्धकारके भीतर ब्रह्मशक्ति ब्रह्मज्ञान है। बाहर उसीको कालीमूर्ति बनी है। बाहर देवी और भीतर ब्रह्मज्ञानरूप ब्रह्मशक्ति है।" {{smaller|(सेवकका निवेदन ४र्थ खण्ड १४७-८ पृष्ठ)}}
परमहंस रामकृष्णने कहा है,—सच्चिदानन्द हरि बहुरूपी है। वह एक है, वह अनन्त है, वह विश्वरूपी भगवान् है। जो उसको नहीं देखता, वह उसका मर्म नहीं समझता और साकार निराकार पर तर्क भी करता है। किन्तु प्रकृत भक्त उसे साकार और निराकार दोनों रूपमें पूजता है। ब्रह्मका अनन्त नाम और अनन्त भाव है। जिसे जो भाव और जो नाम अच्छा लगता है, उसे उसो नाम और उसी भावसे पुकारने पर ईश्वर मिलता है। अहम्भाव छूटनेसे ईश्वर देख पड़ता है। कलिकालमें ईश्वरका नाम हो एकमात्र साधन है। {{smaller|रामकृष्ण और विवेकानन्द देखो।}}
खुष्टानोंकी बाइबिलके मतसे ईश्वर स्सृष्टिकर्ता है। सृष्टिके पूर्व एकमात्र वही विद्यमान था। उसीसे यह चराचर जगत् निकला है। {{smaller|ईसाई देखो।}}
कुरान्के मतसे ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वंश्रेष्ठ और सकलका स्रष्टा है। उसने नूतन रक्तसे मनुष्य-
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को बनाया है। वह सर्वदर्शी, असीम, अमर इत्यादि विशेषणसे संयुक्त है। {{smaller|इस्लाम और मुसलमान् देखो।}}
वर्तमान समयमें खुष्टानोंका धर्मसम्प्रदाय नाना श्रेणियोंमें विभक्त हो गया है। कोई ईश्वरको सर्वस्रष्टा समझता और कोई ईश्वरसे नहीं—स्वभावसे ही जगत् की उत्पत्ति मानता है। कोई संयोग-वियोग द्वारा पृथिवीको उत्पत्ति ठहराता है और ईश्वरके अस्तित्वपर विश्वास नहीं लाता। {{smaller|पाश्चत्य दर्शन शब्दमें विस्तृत विवरण देखो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२०|ईश्वरता-ईश्वराधीनता|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर वहां जाकर रहते और सन्यालोंका बड़ा उपकार करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।<br>{{gap}}विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता-पिताको ईश्वर-जैसा मानते थे। माता-पिता ही इनके आराध्य देवता थे। जब मातापिताकी बात कोई उठाता, तब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा अदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रमायुसे भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र-विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। १८९१ ई॰ के जुलाई मासमें (१२९८ बंगला सन्के १६ श्रावण) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ।
{{outdent|ईश्वरता, {{smaller|ईशिता देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरदास—१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहर्तरत्न' नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमश्नरी-कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरकृष्ण-कालिदास रहा।}}
{{outdent|ईश्वरदीक्षित-रामायण-व्याख्याके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरनिषेध (सं॰ पु॰) १ नास्तिक्य, इलहाद, ईश्वरका न माननाः। २ अनिष्टजनक कार्य, जिस कामसे बुराई आये।}}
{{outdent|ईश्वरनिष्ठ (सं॰ ति॰) ईश्वरे निष्ठा दृढ़ता वा भक्तिर्यस्य, बहुव्री॰। ईश्वरपरायण, ईश्वरको माननेवाला।}}
{{outdent|ईश्वरपरायण (सं॰ ति॰) ईश्वर एव परंमुख्यं अयनं आश्रयी यस्य, बहुव्री॰। भक्त, सिर्फ ईश्वरका सहारा लेनेवाला।}}
{{outdent|ईश्वरपुरी-एक साधु। गया धाममें इनसि महाप्रभु चैतन्यदेवने दीक्षा ली थी। {{smaller|चैतन्यदेव देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरपूजक (सं॰ त्रि॰ ईश्वरको उपासना करने-वाला, जो ईश्वरको पूजता हो।}}
{{outdent|ईश्वरपूजा (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की आराधना, खुदा परस्ती।}}
{{outdent|ईश्वरप्रणिधान (सं॰ क्ली॰) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा मब्रहबी तवस्तत। ग्रह योगके पांच नियमोंमें अन्तिम}}
{{Multicol-break}}
:है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।
{{outdent|ईश्वरप्रसाद (सं॰ पु॰) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको मेहरबानी।}}
{{outdent|ईश्वरभाव (सं॰ पु॰) राजदशा, शाहाना हालत।}}
{{outdent|ईश्वरमल्लिका (सं॰ स्त्री॰) वकष्टक्ष, अगस्तका पेड़।}}
{{outdent|ईश्वरमिश्र—१ रुपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता। २. लघुजातकके टीकाकार।}}
{{outdent|ईश्वरमूलक (सं॰ पु॰-क्ली॰) तरुभेद, एक पेड़।}}
{{outdent|ईश्वर मीठे—स्मृतिकल्पद्रुम-रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरविभूति (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरका ऐश्वर्य, खुदाकी शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।}}
{{outdent|ईश्वरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्मृतिग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसख, {{smaller|ईशसख देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरसद्म (सं॰ क्ली॰) १ मन्दिर, मसजिद। २ विभुवन, जहान्।}}
{{outdent|ईश्वरसभ (सं॰ क्ली॰) राजपरिषत्, शाही मजलिस।}}
{{outdent|ईश्वरसाक्षिन् (सं॰ पु॰) ईश्वर एव साक्षी, र्मधा॰। वैदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष। माया द्वारा आच्छादित चैतन्यको ईश्वरसाती कहते हैं। क्योंकि ईश्वरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।}}
{{outdent|ईश्वरसाधन (सं॰ क्ली॰) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरसुमति-पार्वतीपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसेवा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरकी उपासना, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप्। ईश्वरकी स्त्री दुर्गा। {{smaller|"विन्यस्तमङ्गलमध्षधिरौश्वराया स्त्राती रण-प्रतिसरेण करेण पाणिः।" (भारवि)}}}}
{{outdent|ईश्वराधीन (सं॰ ति॰) भगवान् के वशीभूत, जो मालिकके मातहत हो।}}
{{outdent|ईश्वराधीनता (सं॰ स्त्री॰) खरतन्वता, मालिकको मातहतो।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव9" /></noinclude>ईश्वरता-ईश्वराधीनता
है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर | है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे
वहां जाकर रहते और सन्थालोंका बड़ा उपकार प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता
करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।
है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मक्त हो जाता है।
विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता- | ईश्वरप्रसाद (सं० पु०) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको
मेहरबानी।
पिताको ईखर-जैसा मानते थे। माता-पिता ही
इनके पाराध्य देवता थे। जब मातापिताको बात ईखरभाव (सं० पु०) राजदशा, शाहाना हालत ।
कोई उठाता, सब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा
ईश्वरमल्लिका (सं० स्त्री०) वकवृक्ष, अगस्तका पेड़।
प्रदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रेमायुसे
ईश्वरमिश्र-१ रूपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता।
भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र- २ लघुजातकके टीकाकार।
विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-| ईश्वरमूलक (सं० पु०-क्लो०) तरुभेद, एक पेड़।
हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान ईश्वरमोठे-स्मतिकल्पद्रुम रचयिता।
वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। ईवरविभूति (सं. स्त्री०) ईश्वरका ऐश्वर्य, रह
१८८१ ई के जुलाई मास में (१२९८ बंगला सनके शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें
श्रावण ) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ। ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।
ईखरता, ईशिता देखो।
ईखरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्म तिग्रन्थके रचयिता।
देखरदास-१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहर्तरत्न' | ईखरसख, ईशसख देखो।
नामक ज्योतिषग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमञ्जरी- | ईखरसझ ( स० क्लो०) १ मन्दिर, मसजिद । २ त्रिभु-
कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरक्षण-कालिदास | वन, जहान्।
रहा।
ईश्वरसभ (सं० लो०) राजपरिषत, शाही मजलिस।
ईखरदीचित-रामायण-व्याख्याके रचयिता। ईश्वरसाक्षिन् (सं० पु०) ईश्वर एव साक्षी, कर्मधा।
ईश्वरनिषेध ( स० पु० ) १ नास्तिक्य, इलहाद, ईश्वरका | वेदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष । माया
न मानना। २ अनिष्टजनक कार्य, जिस कामसे द्वारा पाच्छादित चैतन्यको देवरसाक्षी कहते हैं।
बुराई आये।
क्योंकि ईखरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया
ईश्वरनिष्ठ (सं० त्रि.) ईखरे निष्ठा दृढ़ता वा भक्ति और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।
यस्य, बहुव्री०। ईश्वरपरायण, ईश्वरको माननेवाला। | ईश्वरसाधन (सं० लो०) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश ।
ईखरपरायण (सं० त्रि.) ईश्वर एव परं मुख्यं अयन ईश्वरसुमति-पार्वतोपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थक
पाश्रयो यस्य, बहुव्री०। भक्त, सिर्फ ईश्वरका सहारा रचयिता।
लेनेवाला।
ईश्वरसेवा ( स० स्त्री० ) ईश्वरको उपासना, खुदाकी
ईश्वरपुरी-एक साधु। गया धाममें इनी महाप्रभु परस्तिश।
चैतन्यदेवने दीक्षा ली थी। चैतन्यदेव देखी। . ईश्वरा (सं० स्त्री० ) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप ।
ईश्वरपूजक (सं० त्रि.) ईश्खरकी उपासना करने- ईश्वरको स्त्री दुर्गा। “विन्धस्तमङ्गलमहोषधिरौश्वराया स्त्रातो रण-
वाला, जो ईश्वरको पूजता हो। .
प्रतिसरण करेण पाणिः।" (भारवि)
ईश्वरपूजा (सं० स्त्री०) भगवान्की आराधना, खुदा-ईवराधीन ( स० वि०) भगवान्के वशीभूत, जो
........... मालिकके मातहत हो।
ईश्वरप्रणिधान (सं० क्लो०) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा | ईश्वराधीनता (सं० स्त्री०) खरतन्त्रता, मालिकको.
मतहबी तवसमतयह योगके पांच नियमों में अन्तिमा मातहतो।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२०|ईश्वरता-ईश्वराधीनता|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर वहां जाकर रहते और सन्थालोंका बड़ा उपकार करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।<br>{{gap}}विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता-पिताको ईश्वर-जैसा मानते थे। माता-पिता ही इनके आराध्य देवता थे। जब मातापिताकी बात कोई उठाता, तब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा अदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रमायुसे भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। १८९१ ई॰ के जुलाई मासमें (१२९८ बंगला सन्के १६ श्रावण) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ।
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{{outdent|ईश्वरदास—१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहर्तरत्न' नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमश्नरी-कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरकृष्ण-कालिदास रहा।}}
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{{outdent|ईश्वरपूजक (सं॰ त्रि॰ ईश्वरको उपासना करने-वाला, जो ईश्वरको पूजता हो।}}
{{outdent|ईश्वरपूजा (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की आराधना, खुदा परस्ती।}}
{{outdent|ईश्वरप्रणिधान (सं॰ क्ली॰) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा मब्रहबी तवस्तत। ग्रह योगके पांच नियमोंमें अन्तिम}}
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:है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।
{{outdent|ईश्वरप्रसाद (सं॰ पु॰) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको मेहरबानी।}}
{{outdent|ईश्वरभाव (सं॰ पु॰) राजदशा, शाहाना हालत।}}
{{outdent|ईश्वरमल्लिका (सं॰ स्त्री॰) वकष्टक्ष, अगस्तका पेड़।}}
{{outdent|ईश्वरमिश्र—१ रुपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता। २. लघुजातकके टीकाकार।}}
{{outdent|ईश्वरमूलक (सं॰ पु॰-क्ली॰) तरुभेद, एक पेड़।}}
{{outdent|ईश्वर मीठे—स्मृतिकल्पद्रुम-रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरविभूति (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरका ऐश्वर्य, खुदाकी शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।}}
{{outdent|ईश्वरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्मृतिग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसख, {{smaller|ईशसख देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरसद्म (सं॰ क्ली॰) १ मन्दिर, मसजिद। २ विभुवन, जहान्।}}
{{outdent|ईश्वरसभ (सं॰ क्ली॰) राजपरिषत्, शाही मजलिस।}}
{{outdent|ईश्वरसाक्षिन् (सं॰ पु॰) ईश्वर एव साक्षी, र्मधा॰। वैदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष। माया द्वारा आच्छादित चैतन्यको ईश्वरसाती कहते हैं। क्योंकि ईश्वरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।}}
{{outdent|ईश्वरसाधन (सं॰ क्ली॰) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरसुमति-पार्वतीपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसेवा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरकी उपासना, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप्। ईश्वरकी स्त्री दुर्गा। {{smaller|"विन्यस्तमङ्गलमध्षधिरौश्वराया स्त्राती रण-प्रतिसरेण करेण पाणिः।" (भारवि)}}}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव9" /></noinclude>ईश्वरता-ईश्वराधीनता
है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर | है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे
वहां जाकर रहते और सन्थालोंका बड़ा उपकार प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता
करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।
है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मक्त हो जाता है।
विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता- | ईश्वरप्रसाद (सं० पु०) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको
मेहरबानी।
पिताको ईखर-जैसा मानते थे। माता-पिता ही
इनके पाराध्य देवता थे। जब मातापिताको बात ईखरभाव (सं० पु०) राजदशा, शाहाना हालत ।
कोई उठाता, सब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा
ईश्वरमल्लिका (सं० स्त्री०) वकवृक्ष, अगस्तका पेड़।
प्रदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रेमायुसे
ईश्वरमिश्र-१ रूपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता।
भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र- २ लघुजातकके टीकाकार।
विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-| ईश्वरमूलक (सं० पु०-क्लो०) तरुभेद, एक पेड़।
हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान ईश्वरमोठे-स्मतिकल्पद्रुम रचयिता।
वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। ईवरविभूति (सं. स्त्री०) ईश्वरका ऐश्वर्य, रह
१८८१ ई के जुलाई मास में (१२९८ बंगला सनके शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें
श्रावण ) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ। ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।
ईखरता, ईशिता देखो।
ईखरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्म तिग्रन्थके रचयिता।
देखरदास-१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहर्तरत्न' | ईखरसख, ईशसख देखो।
नामक ज्योतिषग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमञ्जरी- | ईखरसझ ( स० क्लो०) १ मन्दिर, मसजिद । २ त्रिभु-
कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरक्षण-कालिदास | वन, जहान्।
रहा।
ईश्वरसभ (सं० लो०) राजपरिषत, शाही मजलिस।
ईखरदीचित-रामायण-व्याख्याके रचयिता। ईश्वरसाक्षिन् (सं० पु०) ईश्वर एव साक्षी, कर्मधा।
ईश्वरनिषेध ( स० पु० ) १ नास्तिक्य, इलहाद, ईश्वरका | वेदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष । माया
न मानना। २ अनिष्टजनक कार्य, जिस कामसे द्वारा पाच्छादित चैतन्यको देवरसाक्षी कहते हैं।
बुराई आये।
क्योंकि ईखरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया
ईश्वरनिष्ठ (सं० त्रि.) ईखरे निष्ठा दृढ़ता वा भक्ति और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।
यस्य, बहुव्री०। ईश्वरपरायण, ईश्वरको माननेवाला। | ईश्वरसाधन (सं० लो०) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश ।
ईखरपरायण (सं० त्रि.) ईश्वर एव परं मुख्यं अयन ईश्वरसुमति-पार्वतोपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थक
पाश्रयो यस्य, बहुव्री०। भक्त, सिर्फ ईश्वरका सहारा रचयिता।
लेनेवाला।
ईश्वरसेवा ( स० स्त्री० ) ईश्वरको उपासना, खुदाकी
ईश्वरपुरी-एक साधु। गया धाममें इनी महाप्रभु परस्तिश।
चैतन्यदेवने दीक्षा ली थी। चैतन्यदेव देखी। . ईश्वरा (सं० स्त्री० ) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप ।
ईश्वरपूजक (सं० त्रि.) ईश्खरकी उपासना करने- ईश्वरको स्त्री दुर्गा। “विन्धस्तमङ्गलमहोषधिरौश्वराया स्त्रातो रण-
वाला, जो ईश्वरको पूजता हो। .
प्रतिसरण करेण पाणिः।" (भारवि)
ईश्वरपूजा (सं० स्त्री०) भगवान्की आराधना, खुदा-ईवराधीन ( स० वि०) भगवान्के वशीभूत, जो
........... मालिकके मातहत हो।
ईश्वरप्रणिधान (सं० क्लो०) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा | ईश्वराधीनता (सं० स्त्री०) खरतन्त्रता, मालिकको.
मतहबी तवसमतयह योगके पांच नियमों में अन्तिमा मातहतो।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२०|ईश्वरता-ईश्वराधीनता|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर वहां जाकर रहते और सन्थालोंका बड़ा उपकार करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।<br>{{gap}}विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता-पिताको ईश्वर जैसा मानते थे। माता-पिता ही इनके आराध्य देवता थे। जब मातापिताकी बात कोई उठाता, तब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा अदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रमायुसे भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। १८९१ ई॰ के जुलाई मासमें (१२९८ बंगला सन्के १६ श्रावण) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ।
{{outdent|ईश्वरता, {{smaller|ईशिता देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरदास—१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहूर्तरत्न' नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमश्नरी-कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरकृष्ण-कालिदास रहा।}}
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:है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।
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है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर | है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे
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है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मक्त हो जाता है।
विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता- | ईश्वरप्रसाद (सं० पु०) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको
मेहरबानी।
पिताको ईखर-जैसा मानते थे। माता-पिता ही
इनके पाराध्य देवता थे। जब मातापिताको बात ईखरभाव (सं० पु०) राजदशा, शाहाना हालत ।
कोई उठाता, सब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा
ईश्वरमल्लिका (सं० स्त्री०) वकवृक्ष, अगस्तका पेड़।
प्रदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रेमायुसे
ईश्वरमिश्र-१ रूपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता।
भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र- २ लघुजातकके टीकाकार।
विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-| ईश्वरमूलक (सं० पु०-क्लो०) तरुभेद, एक पेड़।
हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान ईश्वरमोठे-स्मतिकल्पद्रुम रचयिता।
वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। ईवरविभूति (सं. स्त्री०) ईश्वरका ऐश्वर्य, रह
१८८१ ई के जुलाई मास में (१२९८ बंगला सनके शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें
श्रावण ) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ। ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।
ईखरता, ईशिता देखो।
ईखरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्म तिग्रन्थके रचयिता।
देखरदास-१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहर्तरत्न' | ईखरसख, ईशसख देखो।
नामक ज्योतिषग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमञ्जरी- | ईखरसझ ( स० क्लो०) १ मन्दिर, मसजिद । २ त्रिभु-
कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरक्षण-कालिदास | वन, जहान्।
रहा।
ईश्वरसभ (सं० लो०) राजपरिषत, शाही मजलिस।
ईखरदीचित-रामायण-व्याख्याके रचयिता। ईश्वरसाक्षिन् (सं० पु०) ईश्वर एव साक्षी, कर्मधा।
ईश्वरनिषेध ( स० पु० ) १ नास्तिक्य, इलहाद, ईश्वरका | वेदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष । माया
न मानना। २ अनिष्टजनक कार्य, जिस कामसे द्वारा पाच्छादित चैतन्यको देवरसाक्षी कहते हैं।
बुराई आये।
क्योंकि ईखरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया
ईश्वरनिष्ठ (सं० त्रि.) ईखरे निष्ठा दृढ़ता वा भक्ति और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।
यस्य, बहुव्री०। ईश्वरपरायण, ईश्वरको माननेवाला। | ईश्वरसाधन (सं० लो०) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश ।
ईखरपरायण (सं० त्रि.) ईश्वर एव परं मुख्यं अयन ईश्वरसुमति-पार्वतोपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थक
पाश्रयो यस्य, बहुव्री०। भक्त, सिर्फ ईश्वरका सहारा रचयिता।
लेनेवाला।
ईश्वरसेवा ( स० स्त्री० ) ईश्वरको उपासना, खुदाकी
ईश्वरपुरी-एक साधु। गया धाममें इनी महाप्रभु परस्तिश।
चैतन्यदेवने दीक्षा ली थी। चैतन्यदेव देखी। . ईश्वरा (सं० स्त्री० ) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप ।
ईश्वरपूजक (सं० त्रि.) ईश्खरकी उपासना करने- ईश्वरको स्त्री दुर्गा। “विन्धस्तमङ्गलमहोषधिरौश्वराया स्त्रातो रण-
वाला, जो ईश्वरको पूजता हो। .
प्रतिसरण करेण पाणिः।" (भारवि)
ईश्वरपूजा (सं० स्त्री०) भगवान्की आराधना, खुदा-ईवराधीन ( स० वि०) भगवान्के वशीभूत, जो
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ईश्वरप्रणिधान (सं० क्लो०) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा | ईश्वराधीनता (सं० स्त्री०) खरतन्त्रता, मालिकको.
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२०|ईश्वरता-ईश्वराधीनता|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:है। विद्यासागर स्वास्थ्यरक्षाके लिये समय समय पर वहां जाकर रहते और सन्थालोंका बड़ा उपकार करते, वे भी इन्हें देवतातुल्य समझते थे।<br>{{gap}}विद्यासागरका हृदय भक्तिमय रहा। ये माता-पिताको ईश्वर जैसा मानते थे। माता-पिता ही इनके आराध्य देवता थे। जब मातापिताकी बात कोई उठाता, तब देखते-देखते पुलक, भक्ति अथवा अदर्शन-निबन्धनके दुःखसे महात्माका हृदय प्रमायुसे भर जाता। संक्षेपमें कहनेसे विद्यासागर एक शास्त्र विशारद, समाजसंस्कारक, राजनैतिक और देश-हितैषी महापुरुष थे। अधिक क्या, ये वर्तमान वङ्गसाहित्य-जगत्के पितास्वरूप माने जा सकते हैं। १८९१ ई॰ के जुलाई मासमें (१२९८ बंगला सन्के १६ श्रावण) महात्मा विद्यासागरका परलोक हुआ।
{{outdent|ईश्वरता, {{smaller|ईशिता देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरदास—१ ज्योतिषरायके पुत्र। इन्होंने 'मुहूर्तरत्न' नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा था। २ प्रत्युक्तपदमश्नरी-कोषके रचयिता। अपर नाम ईश्वरकृष्ण-कालिदास रहा।}}
{{outdent|ईश्वरदीक्षित-रामायण-व्याख्याके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरनिषेध (सं॰ पु॰) १ नास्तिक्य, इलहाद, ईश्वरका न मानना। २ अनिष्टजनक कार्य, जिस कामसे बुराई आये।}}
{{outdent|ईश्वरनिष्ठ (सं॰ ति॰) ईश्वरे निष्ठा दृढ़ता वा भक्तिर्यस्य, बहुव्री॰। ईश्वरपरायण, ईश्वरको माननेवाला।}}
{{outdent|ईश्वरपरायण (सं॰ ति॰) ईश्वर एव परंमुख्यं अयनं आश्रयी यस्य, बहुव्री॰। भक्त, सिर्फ ईश्वरका सहारा लेनेवाला।}}
{{outdent|ईश्वरपुरी-एक साधु। गया धाममें इनसि महाप्रभु चैतन्यदेवने दीक्षा ली थी। {{smaller|चैतन्यदेव देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरपूजक (सं॰ त्रि॰ ईश्वरकी उपासना करने वाला, जो ईश्वरको पूजता हो।}}
{{outdent|ईश्वरपूजा (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की आराधना, खुदा परस्ती।}}
{{outdent|ईश्वरप्रणिधान (सं॰ क्ली॰) प्रगाढ़ समाधियोग, गहरा मब्रहबी तवस्तत। ग्रह योगके पांच नियमोंमें अन्तिम}}
{{Multicol-break}}
:है। समस्त जगत्को ईश्वरमय देखना और उससे प्रत्येक वस्तुको अभिन्न मानना ईश्वरप्रणिधान कहाता है। इसके अवधारणसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।
{{outdent|ईश्वरप्रसाद (सं॰ पु॰) ईश्वरका अनुग्रह, खुदाको मेहरबानी।}}
{{outdent|ईश्वरभाव (सं॰ पु॰) राजदशा, शाहाना हालत।}}
{{outdent|ईश्वरमल्लिका (सं॰ स्त्री॰) वकष्टक्ष, अगस्तका पेड़।}}
{{outdent|ईश्वरमिश्र—१ रुपतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता। २. लघुजातकके टीकाकार।}}
{{outdent|ईश्वरमूलक (सं॰ पु॰-क्ली॰) तरुभेद, एक पेड़।}}
{{outdent|ईश्वर मीठे—स्मृतिकल्पद्रुम-रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरविभूति (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरका ऐश्वर्य, खुदाकी शान्। यह संसारमें सर्वत्र विराजती है। आत्मज्ञानमें ईश्वरको विभूतिका प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान है।}}
{{outdent|ईश्वरशर्मा-व्यवस्थासेतु नामक स्मृतिग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसख, {{smaller|ईशसख देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरसद्म (सं॰ क्ली॰) १ मन्दिर, मसजिद। २ विभुवन, जहान्।}}
{{outdent|ईश्वरसभ (सं॰ क्ली॰) राजपरिषत्, शाही मजलिस।}}
{{outdent|ईश्वरसाक्षिन् (सं॰ पु॰) ईश्वर एव साक्षी, र्मधा॰। वैदान्तिक मतसिद्ध मायावत चैतन्य विशेष। माया द्वारा आच्छादित चैतन्यको ईश्वरसाती कहते हैं। क्योंकि ईश्वरका उपाधि नामान्तर-स्वरूप है, माया और तादृश चैतन्यमें कोई भेद नहीं।}}
{{outdent|ईश्वरसाधन (सं॰ क्ली॰) भगवत्पूजा, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरसुमति-पार्वतीपरिणय नामक संस्कृत ग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरसेवा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरकी उपासना, खुदाको परस्तिश।}}
{{outdent|ईश्वरा (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरस्य स्त्री, ईश्वर-टाप्। ईश्वरकी स्त्री दुर्गा। {{smaller|"विन्यस्तमङ्गलमध्षधिरौश्वराया स्त्राती रण-प्रतिसरेण करेण पाणिः।" (भारवि)}}}}
{{outdent|ईश्वराधीन (सं॰ ति॰) भगवान् के वशीभूत, जो मालिकके मातहत हो।}}
{{outdent|ईश्वराधीनता (सं॰ स्त्री॰) खरतन्वता, मालिकको मातहतो।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१२२
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वराधीनत्व-ईषद्रक्त|१२१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|ईश्वराधीनत्व (सं॰ क्ली॰) {{smaller|ईश्वराधीनता देखो।}}}}
{{outdent|ईश्वरानन्द (सं० पु०) १ ईश्वरका आमोद, खुदाकी खुशी। २ महाभाष्यप्रदीप-विवरणके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरी (सं॰ स्त्री॰) अश्-वरट्, चकारात् उपधाया ईत्वं टित्वात् ङीप्। अत्रोतेरागुकर्मणि वरट् च। उण् ५।५७। १ दुर्गा। २ लक्ष्मी। ३ सरस्वती। ४ सकल प्रकार शक्ति। ५ लिङ्गिनीवृत्त। ६ वन्ध्याकर्कोटकी लता, कड़वी ककड़ी। ७ नागदमनी, नागदेवना। ८ नाकुलोकन्द, बांदा। ९ रुद्रजटा। १० ऐश्वर्यान्वित स्त्री, शान्दार औरत।}}
{{outdent|ईश्वरीदत्त—शब्दबोधतरङ्गिणी-व्याकरणके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरीनारायण सिंह (महाराज)—काशी के एक विद्योत्साही नृपति और महाराज उदितनारायण सिंहके भ्रातुष्णुत्र। उदितनारायणके मरने बाद १८३५ ई॰ में ये वाराणसीके राजपदपर अभिषिक्त हुए थे। ईश्वरी-नारायण सुकवि और शिल्पी रहे। इनका रचित सुन्दर गान और स्वहस्तनिर्मित विविध हस्तिदन्तका कारुकार्य रामनगरके राजभवनमें विद्यमान है। ईश्वरी नारायण बहुतसे कवियोंके आश्रयदाता थे। देव, हरिजन एवं उनके पुत्र सरदार, गणेश, वन्दन पाठक प्रभृति बहुतसे हिन्दुस्थानी कवि इनके आश्चय और साहाय्यसे कितनी ही कविता बना गये हैं। १८८९ ई॰ के ज्यैष्ठ मास महाराज ईश्वरीनारायणके परलोक पधारनेपर उनके पुत्र महाराज प्रभुनारायणको राजपद मिला।}}
{{outdent|ईश्वरीप्रसाद—शब्दकीस्तुभ-व्याकरणके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी—सीतापुर ज़िलेके पीरनगर ग्राममें रहनेवाले एक हिन्दुस्थानी कवि। १८८३ ई॰ में यह जीवित रहे। इन्होंने विभिन्न छन्दोंमें वाल्मीकि-रामायणका हिन्दी अनुवाद लिखा, जिसका नाम 'रामविलास' रखा है।}}
{{outdent|ईश्वरीय (सं॰ त्रि॰) दिव्य, दैव, रब्बानी।}}
{{outdent|ईश्वरेच्छा (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की आकाङ्गा, खुदाकी मर्ज़ी।}}
{{outdent|ईश्वरोपासना (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की पूजा, खुदाकी परस्तिश।}}
{{outdent|ईष्—तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट् धातु। १ उच्छवृत्ति। भ्वा॰ आत्म॰ सक॰ सेट् धातु। २ इससे दान, दर्शन, गमन और हिंसाका अर्थ निकलता है।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ईष (सं॰ पु॰) ईष्-क। १ तृतीय मनु उत्तमके पुत्र। २ आश्विनमास। ३ शिवके एक भृत्य।}}
{{outdent|ईषच्छास (सं॰ त्रि॰) अल्पमुखरित, थोड़ा गूंजनेवाला।}}
{{outdent|ईषज्जल (सं॰ क्ली॰) अल्प नीर, कुछ पानी।}}
{{outdent|ईषण (सं॰ ति॰) सत्वर, त्वरा करनेवाला, जल्दबाज़।}}
{{outdent|ईषणा (सं॰ स्त्री॰) त्वरा, शिताबी, जल्दी।}}
{{outdent|ईषणिन्, {{smaller|ईषण देखो।}}}}
{{outdent|ईषत् (सं॰ अव्य॰) ईष् बाहुलकात् अति। अल्प, किञ्चित्, खुफीफ, ज़रासा, थोड़ा, कुछ, कम।}}
{{outdent|ईषत्कर (सं॰ त्रि॰) ईषत्-कृ-खुल्। १ अत्यल्प बहुत कम। २ अल्पप्रयाससाध्य, आसानीसे होनेवाला। ३ अल्पकारी, घोड़ा काम करनेवाला।}}
{{outdent|ईषत्कार्य (सं॰ त्रि॰) अल्प चेष्टाविशिष्ट, खफीफ कोशिशसे ताल्लुक रखनेवाला।}}
{{outdent|ईषत्पाण्डु (सं॰ त्रि॰) ईषत् चासी पाण्डुश्। १ धूसर, हलका भूरा। (प॰) २ घूसरवणे, हलका-भूरा रङ्ग।}}
{{outdent|ईषत्पान (सं॰ त्रि॰) १ अल्पपीया हुआ, जो ज्यादा पीया न गया हो। (क्ली॰) २ सूक्ष्म पानीय, ज़रासा घूंट।}}
{{outdent|ईषत्प्रलम्भ (सं॰ त्रि॰) अल्पार्थ प्राप्तव्य, थोड़ेसे हासिल किया जानेवाला।}}
{{outdent|ईषत्स्पृष्ट (सं॰ त्रि॰) अल्प संस्पृष्ट, कुछ छूवा हुआ। यह शब्द अर्धस्वरका विशेषण है।}}
{{outdent|ईषदु, {{smller|ईषत् देखो।}}}}
{{outdent|ईषदुष्ण (सं॰ त्रि॰) ईषत् च तदुष्णञ्चेति, कर्मधा॰। अल्पतप्त, ख़फ़ीफ़ गर्म। इसके पर्यायमें कोष्ण, कवोष्ण, मन्दोष्ण और कदुष्ण शब्द भी आते हैं।}}
{{outdent|ईषदून (सं॰ त्रि॰) किञ्चित् न्यून, कुछ कम।}}
{{outdent|ईषदुगुण (सं॰ त्रि॰) अल्प उत्कर्ष-युक्त, कम-कदर, जो थोड़ा वस्फ रखता हो।}}
{{outdent|ईषद्दर्शन (सं॰ क्ली॰) कटाच, नज़र, चितवन।}}
{{outdent|ईषद्दीर्घ (सं॰ क्ली॰) वातामफल, बादाम।}}
{{outdent|ईषड्वास (सं॰ पु॰) स्मित, मुसकराहट, हलकी हंसी।}}
{{outdent|ईषद्रक्त (सं॰ पु॰) अत्यल्प रक्तवर्ण, निहायत हलका सुर्खरङ्ग।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 31}}</noinclude>
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{{outdent|ईश्वरीप्रसाद—शब्दकीस्तुभ-व्याकरणके रचयिता।}}
{{outdent|ईश्वरीप्रसाद त्रिपाठी—सीतापुर ज़िलेके पीरनगर ग्राममें रहनेवाले एक हिन्दुस्थानी कवि। १८८३ ई॰ में यह जीवित रहे। इन्होंने विभिन्न छन्दोंमें वाल्मीकि-रामायणका हिन्दी अनुवाद लिखा, जिसका नाम 'रामविलास' रखा है।}}
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{{outdent|ईश्वरेच्छा (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की आकाङ्गा, खुदाकी मर्ज़ी।}}
{{outdent|ईश्वरोपासना (सं॰ स्त्री॰) भगवान्की पूजा, खुदाकी परस्तिश।}}
{{outdent|ईष्—तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट् धातु। १ उच्छवृत्ति। भ्वा॰ आत्म॰ सक॰ सेट् धातु। २ इससे दान, दर्शन, गमन और हिंसाका अर्थ निकलता है।}}
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{{outdent|ईषद्दिवृत (सं॰ ति॰) अल्योद्घाटित, थोड़ा खुला।}}
{{outdent|ईवद्दोजा (सं॰ स्त्री॰) बिष्होदानेका पेड़।}}
{{outdent|ईषना (हिं॰) {{smaller|एषणा देखो।}}}}
{{outdent|ईषन्नाद (सं॰ ति॰) अल्प शब्दकर, ख़फ़ीफ़ अवाज़ निकालनेवाला। यह शब्द आकाङ्खारहित मृदु व्यष्जनवर्णका विशेषण है।}}
{{outdent|ईषनिमय (सं॰ वि॰) अल्पार्थ परिवर्तित, खुफीफके लिये बदला हुआ।}}
{{outdent|देषल्लाभ, {{smaller|ईषत्प्रलम्भ देखो।}}}}
{{outdent|ईषा (सं॰ स्त्री॰ ईष्-क-टाप्। १ लाङ्गलदण्ड, हल या गाड़ीका डण्ड़ा, हरीस।}}
{{outdent|ईषादण्ड (सं॰ पु॰) लाङ्गलमुष्टि, हलका हत्या।}}
{{outdent|ईषादन्त (सं॰ पु॰) ईषा इव दन्तोऽस्य, बहुव्री॰। दीर्घ-दन्त-गन, लम्बे दांतका हाथी।}}
{{outdent|ईषाधार (सं॰ पु॰) १ लाङ्गल रथ प्रभृति, हल गाड़ी वर्ग रह। २ एक नागका नाम।}}
{{outdent|ईषिका (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्-इकन्-आप्। १ गजाति-गोलक, हाथीकी आंखका ढेला। २ तुलिका, मुसव्वरको कूची। ३ एकप्रकार अस्त्र, किसी किस्मका हथियार। ४ काशटण, कांस। ५ अक्षिकूट, आंखकाढेला।}}
{{outdent|ईषिकास्त्र (सं॰ क्ली॰) अस्त्रविशेष, एक हथियार। "ईषिकास्त्र' समुत्सृज्य पञ्चच्छेद' वाधादयम्।" {{smaller|(नकुलक्कृत पश्चचिकित्सा)}}}}
{{outdent|ईषिर (सं॰ पु॰) ईष्-किरच्। अग्नि, आग।}}
{{outdent|ईषोका (सं॰ स्त्री॰) १ वीरणादि शलाका। २ अन्तर प्रविष्ट मूर्ति, अन्दर पहुँची हुयी सूरत। ३ निमज्जन-शलाका, डुबानेकी सीक। इसे तैजसावर्तिनी (कुठाली) में डालकर देखते हैं—धातु गला है या नहीं। ४ चित्रकारको आघर्षिणी, मुसब्बरकी कूंची।}}
{{outdent|ईष्म (सं॰ पु॰) ईष्मक्। {{smaller|इयुयुषीत्यादि। उण् १।१४४।}} १ कामदेव। २ वसन्त ऋतु, मौसम-बहार।}}
{{outdent|ईष्व (सं॰ पु॰) आचार्य, उपाध्याय, मज़हबी तालीम देनेवाला उस्ताद।}}
{{outdent|ईस (हिं॰ पु॰) ईश्वर, खुदा।}}
{{c|{{smaller|"नाम-रूप टुइ ईस उपाधी।" (तुलसी)}}}}
{{outdent|ईसबगोल, {{smaller|इसबगोल देखो ।}}}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|दूसरगोल, {{smaller|इसवगोल देखो।}})}}
{{outdent|ईसवी (अ॰ वि॰) खुष्ट-सम्बन्धीय, ईसाके मुताल्लिक। (पृ॰) २ बृष्टीय संवत्, ईसाका सन्। यह संवत् ईसा मसीहके जन्मसे आरम्भ हुआ है। पहली जनवरीसे इसकी गणना की जाती है। ईसवीमें ३६५ दिन होते हैं। जिस वर्ष यह सन् चार संख्यासे पूर्ण रीतिपर कटता, उस वर्ष मलमास पड़ता अर्थात् फ़रवरीमें एक दिन बढ़ता है।}}
{{outdent|ईसा (अ॰ पु॰) यीशूख्रष्ट, ईसा मसीह। (Jesus Christ) ईसाई धर्म-प्रवर्तक एक साधु। ईसाई धर्मावलम्बी इन्हें जगत्का त्राणकर्ता (Savior), ईश्वरका पुत्र (the Son of God) और वित्व (Trinity) का एकाङ्ग मानकर पूजते हैं। बाइबिल ग्रन्थके 'आदिभाग' में विश्वासकारी यहूदी बताते हैं, मसोहा वा 'विश्वत्त्राता' अवतीणे होंगे। किन्तु ईसाका अवतारत्व वे सर्वतीभावसे स्वीकार नहीं करते। इस विषयपर ईसायियों और यहूदियोंमें बड़ा वाद-प्रतिवाद हुआ था। ईसायियोंको मनोषिमण्डलोने ईसाका देवत्व एवं अवतारत्व अनेक तर्क तथा युक्ति द्वारा प्रमाणित किया। हम बाइबिल ग्रन्थकी इब्नोल या नव संहिता (New Testament) से ईसाई-जगत्में पूज्य इन अद्वितीय महापुरुषको एक क्षुद्र जीवनी-मात्र सङ्कलन करते हैं,<br>{{gap}}राजा हेरोदके राजत्वकालमें युदिया राज्यान्तर्गत बेथलेहेम (Bethlehem) नगर में ईसाने जन्म लिया था । सेण्ट मथो (Mathew) लिखित सुसमाचारके श्म अध्याय पर इब्राहीम और दाऊद (David) के वंशमें इनके पिता युसुफुके जन्म लेनेकी कथा लिखी है। किन्तु सेण्ट लकके श्य अध्यायमें आदमसे यूसुफको वंशलता कल्पित है। उक्त दोनों स्थलोंमें दाऊदसे यूसुफकी वंशावलीका गड़बड़ देखकर धर्मग्रन्थके टीकाकारोंने विभिन्न सिद्धान्त द्वारा उसके निराकरण पर प्रयास उठाया है ।<br>{{gap}}महात्मा मथो ईसाका जन्मवृत्तान्त अत्यन्त रहस्यपूर्ण बताते हैं। इनकी माता मेरीका विवाह जब यूसुफ़से हुआ, तब उनके गर्भ रहा। उभयका सहवास}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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{{outdent|ईष्व (सं॰ पु॰) आचार्य, उपाध्याय, मज़हबी तालीम देनेवाला उस्ताद।}}
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{{outdent|ईसवी (अ॰ वि॰) खुष्ट-सम्बन्धीय, ईसाके मुताल्लिक। (पृ॰) २ बृष्टीय संवत्, ईसाका सन्। यह संवत् ईसा मसीहके जन्मसे आरम्भ हुआ है। पहली जनवरीसे इसकी गणना की जाती है। ईसवीमें ३६५ दिन होते हैं। जिस वर्ष यह सन् चार संख्यासे पूर्ण रीतिपर कटता, उस वर्ष मलमास पड़ता अर्थात् फ़रवरीमें एक दिन बढ़ता है।}}
{{outdent|ईसा (अ॰ पु॰) यीशूख्रष्ट, ईसा मसीह। (Jesus Christ) ईसाई धर्म-प्रवर्तक एक साधु। ईसाई धर्मावलम्बी इन्हें जगत्का त्राणकर्ता (Savior), ईश्वरका पुत्र (the Son of God) और वित्व (Trinity) का एकाङ्ग मानकर पूजते हैं। बाइबिल ग्रन्थके 'आदिभाग' में विश्वासकारी यहूदी बताते हैं, मसोहा वा 'विश्वत्त्राता' अवतीणे होंगे। किन्तु ईसाका अवतारत्व वे सर्वतीभावसे स्वीकार नहीं करते। इस विषयपर ईसायियों और यहूदियोंमें बड़ा वाद-प्रतिवाद हुआ था। ईसायियोंको मनोषिमण्डलोने ईसाका देवत्व एवं अवतारत्व अनेक तर्क तथा युक्ति द्वारा प्रमाणित किया। हम बाइबिल ग्रन्थकी इब्नोल या नव संहिता (New Testament) से ईसाई-जगत्में पूज्य इन अद्वितीय महापुरुषको एक क्षुद्र जीवनी-मात्र सङ्कलन करते हैं, राजा हेरोदके राजत्वकालमें युदिया राज्यान्तर्गत बेथलेहेम (Bethlehem) नगर में ईसाने जन्म लिया था । सेण्ट मथो (Mathew) लिखित सुसमाचारके श्म अध्याय पर इब्राहीम और दाऊद (David) के वंशमें इनके पिता युसुफुके जन्म लेनेकी कथा लिखी है। किन्तु सेण्ट लकके श्य अध्यायमें आदमसे यूसुफको वंशलता कल्पित है। उक्त दोनों स्थलोंमें दाऊदसे यूसुफकी वंशावलीका गड़बड़ देखकर धर्मग्रन्थके टीकाकारोंने विभिन्न सिद्धान्त द्वारा उसके निराकरण पर प्रयास उठाया है।महात्मा मथो ईसाका जन्मवृत्तान्त अत्यन्त रहस्यपूर्ण बताते हैं। इनकी माता मेरीका विवाह जब यूसुफ़से हुआ, तब उनके गर्भ रहा। उभयका सहवास}}
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२२|ईषद्विवृत-ईसा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|ईषद्दिवृत (सं॰ ति॰) अल्योद्घाटित, थोड़ा खुला।}}
{{outdent|ईवद्दोजा (सं॰ स्त्री॰) बिष्होदानेका पेड़।}}
{{outdent|ईषना (हिं॰) {{smaller|एषणा देखो।}}}}
{{outdent|ईषन्नाद (सं॰ ति॰) अल्प शब्दकर, ख़फ़ीफ़ अवाज़ निकालनेवाला। यह शब्द आकाङ्खारहित मृदु व्यष्जनवर्णका विशेषण है।}}
{{outdent|ईषनिमय (सं॰ वि॰) अल्पार्थ परिवर्तित, खुफीफके लिये बदला हुआ।}}
{{outdent|देषल्लाभ, {{smaller|ईषत्प्रलम्भ देखो।}}}}
{{outdent|ईषा (सं॰ स्त्री॰ ईष्-क-टाप्। १ लाङ्गलदण्ड, हल या गाड़ीका डण्ड़ा, हरीस।}}
{{outdent|ईषादण्ड (सं॰ पु॰) लाङ्गलमुष्टि, हलका हत्या।}}
{{outdent|ईषादन्त (सं॰ पु॰) ईषा इव दन्तोऽस्य, बहुव्री॰। दीर्घ-दन्त-गन, लम्बे दांतका हाथी।}}
{{outdent|ईषाधार (सं॰ पु॰) १ लाङ्गल रथ प्रभृति, हल गाड़ी वर्ग रह। २ एक नागका नाम।}}
{{outdent|ईषिका (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्-इकन्-आप्। १ गजाति-गोलक, हाथीकी आंखका ढेला। २ तुलिका, मुसव्वरको कूची। ३ एकप्रकार अस्त्र, किसी किस्मका हथियार। ४ काशटण, कांस। ५ अक्षिकूट, आंखकाढेला।}}
{{outdent|ईषिकास्त्र (सं॰ क्ली॰) अस्त्रविशेष, एक हथियार। "ईषिकास्त्र' समुत्सृज्य पञ्चच्छेद' वाधादयम्।" {{smaller|(नकुलक्कृत पश्चचिकित्सा)}}}}
{{outdent|ईषिर (सं॰ पु॰) ईष्-किरच्। अग्नि, आग।}}
{{outdent|ईषोका (सं॰ स्त्री॰) १ वीरणादि शलाका। २ अन्तर प्रविष्ट मूर्ति, अन्दर पहुँची हुयी सूरत। ३ निमज्जन-शलाका, डुबानेकी सीक। इसे तैजसावर्तिनी (कुठाली) में डालकर देखते हैं—धातु गला है या नहीं। ४ चित्रकारको आघर्षिणी, मुसब्बरकी कूंची।}}
{{outdent|ईष्म (सं॰ पु॰) ईष्मक्। {{smaller|इयुयुषीत्यादि। उण् १।१४४।}} १ कामदेव। २ वसन्त ऋतु, मौसम-बहार।}}
{{outdent|ईष्व (सं॰ पु॰) आचार्य, उपाध्याय, मज़हबी तालीम देनेवाला उस्ताद।}}
{{outdent|ईस (हिं॰ पु॰) ईश्वर, खुदा।}}
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{{outdent|दूसरगोल, {{smaller|इसवगोल देखो।}})}}
{{outdent|ईसवी (अ॰ वि॰) खुष्ट-सम्बन्धीय, ईसाके मुताल्लिक। (पृ॰) २ बृष्टीय संवत्, ईसाका सन्। यह संवत् ईसा मसीहके जन्मसे आरम्भ हुआ है। पहली जनवरीसे इसकी गणना की जाती है। ईसवीमें ३६५ दिन होते हैं। जिस वर्ष यह सन् चार संख्यासे पूर्ण रीतिपर कटता, उस वर्ष मलमास पड़ता अर्थात् फ़रवरीमें एक दिन बढ़ता है।}}
{{outdent|ईसा (अ॰ पु॰) यीशूख्रष्ट, ईसा मसीह। (Jesus Christ) ईसाई धर्म-प्रवर्तक एक साधु। ईसाई धर्मावलम्बी इन्हें जगत्का त्राणकर्ता (Savior), ईश्वरका पुत्र (the Son of God) और वित्व (Trinity) का एकाङ्ग मानकर पूजते हैं। बाइबिल ग्रन्थके 'आदिभाग' में विश्वासकारी यहूदी बताते हैं, मसोहा वा 'विश्वत्त्राता' अवतीणे होंगे। किन्तु ईसाका अवतारत्व वे सर्वतीभावसे स्वीकार नहीं करते। इस विषयपर ईसायियों और यहूदियोंमें बड़ा वाद-प्रतिवाद हुआ था। ईसायियोंको मनोषिमण्डलोने ईसाका देवत्व एवं अवतारत्व अनेक तर्क तथा युक्ति द्वारा प्रमाणित किया। हम बाइबिल ग्रन्थकी इब्नोल या नव संहिता (New Testament) से ईसाई-जगत्में पूज्य इन अद्वितीय महापुरुषको एक क्षुद्र जीवनी-मात्र सङ्कलन करते हैं,<br>{{gap}}राजा हेरोदके राजत्वकालमें युदिया राज्यान्तर्गत बेथलेहेम (Bethlehem) नगर में ईसाने जन्म लिया था । सेण्ट मथो (Mathew) लिखित सुसमाचारके श्म अध्याय पर इब्राहीम और दाऊद (David) के वंशमें इनके पिता युसुफुके जन्म लेनेकी कथा लिखी है। किन्तु सेण्ट लकके श्य अध्यायमें आदमसे यूसुफको वंशलता कल्पित है। उक्त दोनों स्थलोंमें दाऊदसे यूसुफकी वंशावलीका गड़बड़ देखकर धर्मग्रन्थके टीकाकारोंने विभिन्न सिद्धान्त द्वारा उसके निराकरण पर प्रयास उठाया है ।<br>{{gap}}महात्मा मथो ईसाका जन्मवृत्तान्त अत्यन्त रहस्यपूर्ण बताते हैं। इनकी माता मेरीका विवाह जब यूसुफ़से हुआ, तब उनके गर्भ रहा। उभयका सहवास}}
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होनेपर यूसुफ़ समझ गये—मेरी पत्नी मेरी अनूढ़ावस्थासे ही गर्भवती है। सुतरां उन्होंने चुपके स्वीय पत्नीको छोड़ पृथक् रहनेकी ठहरायी। उनके चित्तका भाव परख परस पिताने देवदूत भेजा था। यूसुफने निद्रावस्थामें स्वप्न देखा, मानो देवदूतने उनको लक्ष्य कर कहा—मेरीके गर्भमें भ्रूणरूपसे विद्यमान शिशुको पवित्रात्मा (Holy Ghost) का बालक-जैसा समझो; जितने दिन वह प्रसूत न हो, उतने दिन मेरीसे यह संवाद छिपावी; उन्हें पत्नी-रूपसे ग्रहण करो और जातबालकका नाम ईसा (Jesus) रखो।
यथेच्छाचारी राजा हिरोद ईसाके जन्म-समय अलौकिक और अत्याश्चर्यकर घटना पड़ते देख विस्मयाविष्ट हुये। पूर्वप्रीक्त भविष्यद्वाणी-वर्णित जन्मका वृत्तान्त एवं स्थानादिका ऐक्य गंठ जानेसे वह मन हो मन अपनेको विपद्ग्रस्त समझने और इस भयसे बालकके ध्वंससाधन पर झपटने लगे, कहीं परिणाममें वह परम शत्रु न निकले। तदनुसार ईसाकी मृतुत्र अस्लङ्घनीय बनानेके लिये राजाने वेथलेहेम और तत् यार्श्ववर्ती स्थानवासी दो वर्षवयस्क यावतीय शिशु मार डालनेका आदेश दिया था। इसी दुर्घटना के समय एक देवदूतने पहुंच निशायोगसे निद्रित मेरी और यूसुफको स्वप्नमें चेताया,—तुम इस बालकको उठा शीघ्र ही मिशर राज्यमें भाग जायी
महात्मा मथी इतना ही लिखकर निश्चिन्त हो गये हैं। किन्तु लक (St Luke) के सुसमाचारमें प्रकाशित है—सूतिकाके शीचान्त मेरी आर यूसुफ पवित्र मन्दिरमें समर्पणार्थ बेथलेहेमसे जातबालक ईसाको उठा जेरूसलम नगर पहुंचे थे। वहां यथाविधि कंत्य सम्पादनके बाद वह पुत्रको क्रीड़में दवा जन्मभूमि (गालिलोके अन्तर्गत) नजरेथ नगरको ओर चले। इस स्थानपर बालोचित शिक्षाके साथ-साथ ईसाके ज्ञानका विकाश भी बढ़ने लगा। तीच्णबुद्धि और अतिभाने ही भविष्यत्में इन्हें जगत्का उच्च पद सौंपा था। कहना दुःसाध्य है—ईसाने विद्यालयमें शिक्षा पायो या नहीं।
इनके ग्रीक, अर्मीय, हिब्र और लातिन भाषा
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जाननेका आभाष मिलता है। बाइबिल देखनेसे मालूम पड़ता है—ईसाके ग्टहमें अध्ययन होता था (Deut, vi. 4, Psalms cxiv-cxvii)। धर्म-पुस्तकको आलोचना हो इनका मुख्य उद्देश्य रहो। ईश्वरप्रसिद्ध ग्रन्थावलीने प्रक्कतपक्ष में ईप्ताका आचार्य-पद पाया था। इनके चित्तमें सर्वदा ईश्वरका आदेय-वाक्य गूंजते रहता।
द्वादश वर्षके वयःक्रमकालशिक्षा समापन करनेपर यहदो-बालक ईसाको व्यत्पत्ति धर्मशास्त्र में विशेष बढ़ गयो थो। उस समय लोग इन्हें सर्वत्र 'कानून के बेटे' (Son of law) कहने लगे। मातापिता के प्रति ईसाको भक्ति और श्रद्दा यथेष्ट रही। यह कभो कभी पिताको सूत्रधारवृत्तिः उठा उनका परिश्रम घटा देते थे। तीस वर्षके वयःक्रम पर्यन्त ईसाने सांसारिक जोवन अतिदोन भावसे बिताया (Mark 6-3)। दादश वर्ष शिरोभूषा (Phylacteries) पहना धर्मतत्त्वोप-देशकके पदपर अभिषिक्त करनेके मानस मेरी और यूसुफ़के जेरूसलम नगर लानेसे ईसाको प्रतिभा प्रवोण यहूदी-पण्डित-समाज में समा गयो थो। एक दिन मन्दिरमें बैठ ईसाने मनीषियों- (Doctors) से इतना धर्मविषयक प्रश्नोत्तर किया, कि अतिकाल हो जानेका बिलकुल अवधारण न रहा। मातापिताने समझा, पुत्र कहीं खो गया था। वे इतस्ततः अन्वे-षणमें व्याप्त हुये। अवशेषमें अबोध बालकको पण्डितमण्डलीको मोमांसामें पड़ा देख उन्हें बहुत विस्मय लगा था।
द्वादशवर्ष जेरुसलम आने और त्रि ंशवर्ष यहूदी पुरोहित-पुन जोहन दो-बाप्तिस्तसे जर्दन नदोतोर दीक्षा लेनेतक अष्टादश वर्षकाल ये गार्हस्थ-जोवनमें व्यस्त रहे। दोच्चताके बाद ईसा धर्मप्रचार पर व्रती - हुये। इन्होंने स्वीय धर्म फैलाने, ईश्वरको प्रेरणासे देवकार्य (Divine mission) बनाने और अपना मत चलानेको प्रायः तीन वर्ष नानारूप अलौकिक कर्म देखाया था। ईसाने ईश्वरसे जो पवित्र धर्म पाया, साधारणमें उसी पवित्र वाक्यके प्रचारार्थ द्वादश सञ्चरित्र साधु पुरुषको मनोनीत कर अपना साथी
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बनाया। साथ रहते-रहते उन्हें इनके धर्मोपदेशमें अभिन्नता आ गयी थी। धर्मग्रन्थमें उन्हींको द्वादश 'अपोसल' (Apostle = देवानुगृहीत व्यक्ति) माना है। अपनी मृत्युके पीछे यह धर्माभिव्यक्ति धीरे धीरे फैलानेके उद्देश्यसे ईसाने उन द्वादश व्यक्तिको निज मतमें विशेषरुप दीक्षित किया था। उक्त 'अपोसल' अशिक्षित, अज्ञान, निर्धन और मर्यादाहीन रहे। इनकी अलोकसामान्य प्रतिभामें ऐसे ज्ञानहीन लोग भी साधारणके चित्तसे वहमूल चिरन्तन संस्कार, श्रेष्ठ मनीषियोंको प्रतिपादित धर्मप्रणाली और दृढ़भक्तिपर प्रतिष्ठित नैष्ठिक आचारादि समूल उत्पाटित कर सके थे। अतःपर ईसाने अपने मतावलम्बियोंमें ७० व्यक्तिको शिष्य (Disciple) बना वाच्छित पथपर दो-दो भेज दिये (Luke x. i.)। इन सप्तति शिष्यके नियोगकी कथा अन्यान्य ईसाचरितकार (Evangelist)-ने नहीं लिखी।
जब ईसा इस प्रकार शिष्यसह धीरे-धीरे अपना धर्म फैलानेको आगे बढ़े, तब पाश्चात्य सभ्य-जगत्में शक्तिशाली रोमक समृद्धिकी शीर्षसीमापर चढ़े थे! जूलियस सीजरके प्रभाव और अगस्तास्के कूट शासनसे साम्राज्य उन्नतिके चरम पदपर पहुंचते भी ऐश्वर्य-मदमत्त रोमकोंने दाग्भिकता वश क्रमशः अवनत होते गया। ताइबिरियास् के राजत्वकालसे यह अवनतिचित्र नानावर्णमें ढला। ईसायी युगारम्भसे प्राक्काल रोम-साम्राज्यपर अत्याचार और अनाचारकी घोर छाया पड़ी थी। रोमक नृपतिके गृहविवादपर आत्मीय खजनहत्यामें फंसते राज्यमध्य विषादकालिमा लगी और अधीनस्थ परराष्ट्रापहारी निर्देय एवं अत्याचारी इदुमीय वंशीय राजाके हस्त जाते युदियाराज्यकी उत्पीड़न व्यथा उससे भी अधिक जगी। युदियाके अत्याचारप्रिय राजाका अनुष्ठित वीभत्स्य दृश्यसमूह प्राचीन जगत्में दूसरी जगह कहीं देखनेमें नहीं आया।
साम्राज्यकी ऐसी दारुण उच्छृङ्गल अवस्थामें रोम-देशवासीके हृदयमें क्रमशः प्राचीन धर्मप्रभाव हट रहा था। अनेक ज्ञानवान् व्यक्तिने ष्टोयिकका निर्विकार-बाद (stoicism) माना और लोगोने प्रायः एक
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प्रकार नास्तिकता (athiesm) को अपना परम धर्म जाना। जब प्रतीच्य जगत्का पौत्तलिक सम्प्रदाय प्रक्कतपक्षसे नास्तिकता में डूबा और यहूदीय सम्प्रदायका धर्म शास्त्रीय आचारके प्रतिपालनमें कपटता रखने पर हृदयसे छूटा, तब ईसा तारेकी तरह मानो आकाशसे टूटा था।
धर्मनैतिक तथा राजनैतिक जगत्में ऐसा विपर्यय पड़ते हो क्या यहूदी क्या जेन्ताइल—सकल हो परित्राणप्रार्थी हो किसी परित्राताके आनेकी राह देखने लगे। पैग़म्बर-परम्परासे ईश्वर के अवतारका जो उल्लेख होते आया, सरलचित्त इसराइलींकि हृदय पर भी उसी विश्वासने अपना प्रभाव जमाया। भार्जिल, तासितास्, सुयेटोनियास्, जोसेफास् प्रभृतिने लिखा, कि तत्कालके पाश्चात्य सभ्य जगत्ने प्राच्य देशसे ही अपने पवित्रात्माको ढूंढ़ लिया था।
इसी उत्कण्ठा और अवतारागमकी आशाके दिन ईसायी-धर्मगुरु बाप्तिस्त जोहन (Jolin) सत्यधर्म फैलाने लगे। उन्होंने कहा था,—मूसाका विधि माननेवाली सत्यमार्गाश्रयी यहूदी जातिमें मसीहा अवतार लेंगे। उनके भाव, भङ्गी, भक्तिगुण और परिच्छदादिको देख लोगोंके मनमें एलिजा प्रभृति पैगम्बरको कथाका स्मरण आ जाता था। सकल हो उनके वाक्यपर विश्वास लाते। सन्यास और निर्जन प्रदेशका योगालय देख लोग उनसे बहुत मिलजुल गये थे। धर्मोपदेश सुनकर साधारणमें इतनी हलचल पड़ी, कि सहस्र-सहस्र लोगोंने जर्दन-नदीतीरपर जाकर जोहनसे दीक्षा ली।
महात्मा ईसाको वनमध्य इतने काल ईश्वरचिन्तामें निमग्न रहते भी ज्ञानलाभकी आशासे निर्जनगृह वास छोड़ देना और ईश्वर-चिन्ताका पथ परिष्कार करनेकी प्रत्याशासे ईश्वरवाक्यविघोषक अपने अग्रगामी उन्हीं महापुरुषके पास पहुंच जर्दनपर दीक्षाको लेना पड़ा। उसी समय इनको निष्कलङ्ग सौम्यमूर्ति देख निर्जनवासी निर्भीक प्रचारक जोहनका हृदय हार गया था। उन्होंने पवित्रताकी प्रतिमूर्ति निष्पापदेह ईसाको दीक्षा देना न चाहा। क्योकि उन्हें
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स्वयं अपने निष्पाप होंनेमें सन्देह था। किन्तु। निष्पाप ईसाको बारम्बार अनुरोधसे जोहन उसे दीक्षा देनेको वाध्य हुआ। दीक्षाकालमें उन्होंने इनके शरीरमें दिव्यज्योतिः देखा था। उसी समय जोहनके प्रति आकाशसे दैववाणी हुई, यही प्रतिश्रुत मसीहा और यही मसीहा ईश्वरके पुत्र हैं।
दीक्षाके बाद ईसाने ईश्वरलाभकी आशासे वन-गमनपूर्वक सन्यास लिया था। द्वादश अपोसल-कथित अभिव्यक्तिसे समझ पड़ता है—ये जेरिका मरुभूमिके कोयावान्तानिया प्रदेशमें योगसिद्ध हो ऐश्वरिक प्रत्यादेशसे वलीयन् बने। योगाभ्यासके समय पाप-सहचर (Powers of Evil) से इन्हें लड़ना पड़ा था।
पापपर जय पा ईसा जर्दन नदीतीर फिर आये। इसी स्थानसे इनका धर्मप्रचार कार्य आरम्भ हुआ था। ईसायी लोग इस धर्मप्रचार-कालको प्रधानतः आठ भागमें बांटते हैं,—
१ जोहन-विवृत प्राथमिक चित्र अर्थात् गालिलीके साधारण प्रचारारम्भ पर्यन्त।
२ गालिलीका प्रचार-जोहनकी हत्या पर्यन्त।
३ विरोधकाल अर्थात् गालिलीवासी फारासियों और स्काइबोंसे ईसाका मतद्वैध।
४ विपद्ग्रस्त हो गालिलीसे चिरप्रस्थान और इनके पलायनकालका वृत्तान्त।
५ उक्त सुदीर्घ प्रवासप्रव्रज्यास जेरुसलम आगमन और वहांसे गुप्तहत्याके भय इफ्राइम ग्राममें पलायन एवं लुक्कायित भावपर अवस्थान। टेवारन्कलके भोजोत्सव दिन ईसा सहसा जेरूसलमके पवित्र मन्दिर में आ पहुंचे थे। 'अन्धोंको चक्षुदान' (Healing of the blind) और Woman taken in adultery
नामक घटनाइयसे इन्होंने अलौकिक करुणा और ज्ञानशक्तिका जो परिचय दिया, उसने इन्हें उस पवित्र नगरके पदार्पणप्रसङ्गपर चिरस्मरणीय बना लिया है। उसी समय 'उत्सर्गभोजके दिन जेरूसलम मन्दिर में यहूदियोंसे ईसाका घोर मतद्वैध उपस्थित हुआ। विवाद इतना बढ़ा, कि उन्होंने एकबार उठकर इन्हें प्रस्तर-निक्षेप द्वारा मार डालनेका भय देखाया
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था। उसीके अनुसार अपना प्राण बचानेको ये नाना स्थानमें घूमे-फिरे। लाजारास्के मृत्यु उपलक्ष्यमें ईसाको बेथनी जाना पड़ा था। वहां स्वीय शक्तिबलसे मृत लाजारास्को पुनर्जीवित करनेपर सानहेद्रिन इतने उभरे, कि कायाफास (Caiaphas) के नेतृत्व में इनके ध्वंससाधनको खड़े हुये। ईसाने वनप्रान्तस्थित इफ्राइम पहुंच आत्मरक्षा की थी।
६ इफ्राइममें रहनेसे 'पासोवर' (The passover)-के भोजोत्सव पर्यन्त। इस समय कुष्ठरोगमुक्त साइमानके भोजदान उपलक्ष्यपर भक्तिमती मेरीकर्तृक उनके अभिषेकमें युदावासी प्रतिहिंसावद्भिसे ऐसे जले, कि यहूदी-पुरोहित एकत्र कर ईसाको मारने चले। सहसी, स्काइव, हिरोदोय, फारास और सानहेद्रो इनके उपदेशसे क्रमशः विरक्त बने जाते थे। एकदिन प्रकाश्य वक्तृतामें इन्होंने विद्वषी यहूदियोंसे अभि-सम्पातपूर्वक कह दिया, —'रे धूर्त्त स्क्राइबी और फारासियो तुम उत्सन्न हो' (Woe unto you, Scribes and Pharisees, hypocrites.) यहदी ईसाके इस घृषासूचक वाक्यसे इतने बिगड़े, कि अविलम्ब इन्हें मार डालनेको मन्त्रणा करने लगे। अवशेषमें पश्चात् पहुंच उन्होंने इसाको पकड़ बन्दी बना लिया।
७ इसके पोछे शेषभोज (Last supper), ईश्वरप्रेम, अपूर्व निग्रह, विचार (Trial) और क्रूशारोप (Crusi-fixion) पर्यन्त।
८ सर्वशेषमें इनके समाधिसे पुनरभ्युत्थान (Resurrection) और स्वर्गारोहण (Ascension) पर्यन्त।
पूर्व में लिखा जा चुका है कि इसाने वेथनी भागकर शरण लिया था। उद्धत यहूदी एकदिन सन्ध्याको शीतल समीर लेते-लेते इनके पदानुसरणपूर्वक चलकर बेथनी पहुंचे। ठीक उसी समय युदा-प्रमुख यहदी ईसाको भटका पकड़नेके लिये पुरोहितोंसे कुमन्त्रणा करते थे। सम्भवतः ३० ई॰ को ३१ वीं मार्च शुक्रवारको ये बेथनी आये थे। परवर्ती बुधवार पर्यन्त ईसा यहां सुखसे सोये, किन्तु वृहस्पतिको प्रातःकाल शय्या छोड़ जागने पीछे फिर
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१२७
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सुखसे आंख लगा न सके, दूसरे दिन अनन्त निद्रामें शायित हुये।
वृहस्पतिवारको सन्ध्याकाल ये यूखेरिष्टका पवित्रता-ज्ञापक केयासो-पासकाल-भोजोत्सव पर्व मनाने सशिष्य जेरूसलमनगर गये थे। वहां भोजनपर बैठ ईसाने जोहन और पीटरसे अपने हत्याकारियोंकी बात कही। अतःपर ये गेथसेमन (Gethsemane) के जैतून-बाग में जा भक्ति और प्रेमसे विह्वल हो गये थे। उसी समय मशाल लिये युदास और विश्वास-घातक पुरोहित वहां जा पहुंचे। उन्होंने छलनापूर्वक पीटरका निषेध न ईसाको फुसला पकड़ लिया था। मान इन्होंने उनके हाथ आत्मसमर्पण किया। शत्रुके हस्त बन्दी होनेवाद ईसाको छोड़ शिष्य भाग गये।
यहूदी ईसाको पकड़ उसी रात विचाराथ एन्नास नामक कूटनीतिन्न पुरोहितके पास लाये। मध्य-रात्रिको ही इनका विचार होने लगा। विचारक पुरोहितोंके समक्ष ईसाने आत्मरक्षार्थ कोई बात कही न थी। विचारक मारपीट कर भी जब इनके मुखसे कोई बात निकला न सके, तब हस्तपद बांध एन्नास-जामाता कायाफास (the de facto high-priest)-के पास ले चले। उस समय भी रात्रि बीती न थी। कायाफासने सानहेद्रिनोंसे विचारसमितिका सङ्गठन किया। यहां ही सदुदुसी पुरोहित आ पहुंचे थे। नानारूपं तकैके बाद उन्होंने ईसासे पूछा, —"तुम मसीहा या ईश्वरके पुत्र हो, या नहीं?" इन्होंने उत्तर में कहा था,—"हां, मैं ही मसीहा या ईश्वरका पुत्र हूं।" इन्होंने दूसरी बार भी बताया था,—"तुम मृत्यु के पीछे मेघमध्य मेरा पुनरागमन देख लोगे।" कायाफास यह बात सुन, क्रोधसे अधीर बन, अपने शरीरका वस्त्र फाड़ और ईसाको देवविद्दषी बता चिल्ला उठे-सानहेद्रिन-समिति इनके प्रति मृत्यु-दण्डका आदेश देती है।
द्वितीय विचारके बाद ईसा प्रातःकाल पर्यन्त प्रष्वरी-परिवेष्टित हो कच्तके मध्य अवरुद्ध रहे। दूसरे दिन सवेरे सानहेट्रिनोंने एकत्र हो फिर विचार प्रारम्भ किया। इस बार भी ये मृत्युदण्डसे ही दण्डित
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हुये। इस समय उक्त प्रदेशमें रोमराज्यका प्रभाव विस्तृत था। सुतरां यहूदियोंमें प्राणदण्ड देने को शक्ति न रही। उन्होंने अपना दोष कीड़ाने को ईसाके दण्डका भार रोमक शासनकर्ता (Procurator) के मत्थे डाला था। रोमक शासनकर्ता पिलेट (Pilate) विना विचार अपराधीको दण्ड दे न सके। डेरे (Præto-rium) में नाना तर्कवितर्कके बाद पिलेटन इन्हें छोड़ा था। उसपर यहूदियोंके तरह तरहका गड़बड़ लगानेसे पिलेटको गालिलीमें ईसाके रहनेकी बात मालूम पड़ी। इसीसे उन्होंने इनको राजा हेरोदके निकट विचारार्थ भेजा था। हेरोदने निर्दोष ईसाको छोड़ फिर पिलेटके पास पहुंचा दिया।
द्वितीय वार विचारमें इनकी निर्दोषिता प्रमाणित होते भी उद्दत यहूदियोंके मनोरञ्जनाथं पिलेट फिर तृतीय वार विचारमें प्रवृत्त हुए। यहूदियों, सामरियों तथा गालिलियोंके अपने विरुद्ध राजद्रोही बन पीछे राष्ट्रविप्लव उठानेके भय, अपनी स्त्रीको प्रार्थना और दण्डादेशपालनकारीको प्रशान्त-मूर्तिके सन्दर्शनसे करुणार्द्रचित्त ही उन्होंने ईसाका वेत्राघात लगा छोड़ देनेको ठहरायी थी। किन्तु पुरोहितों एवं सानहेद्रिनोंके ओर चीत्कार और उत्तेजित लोगोंके कल्लीलकोलाहलसे वह अपना अभिलाष पूर्ण कर न सके। पिलेट इस भयसे उनके विरुद्ध कोई प्रस्ताव कैसे करते-पीछे कहीं शासनकर्ताके विरुद्ध लोग अस्त्र न उठायें। तत्काल 'पासोवार' उत्सव के भेटकी तरह बन्दी छोड़नेको प्रथा रही। ईसाके विद्वेषियोंने इसो उपलक्ष्यमें उनसे इन्हें अपनेको सौंप देनेको प्रार्थना की थी। पिलेट इस बातको टाल न सके, किन्तु ईसाको छोड़नेके लिये बार बार उन्हें समझाने लगे। ऐसी चेष्टासे भो वे उत्तेजित यहूदियोंको शान्त कर न सके थे। उन्होंने राजद्रोहो तथा हत्याकारी बारह अब्बासोंको छोड़ दिया, किन्तु ईसाको फांसीपर चढ़ानेके लिये उन्मत्त भावसे चीतत्कार किया। उसी समय यहूदी ईसाको रक्त-वर्णका जीर्णवस्त्र पहना सब समक्ष लाये थे। इनके शिरपर कण्टकमय मुकुट और इस्तमें राजदण्ड-स्वरूप
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसा|१२७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
लठ रहा। लोग ईसाको 'यहूदियोंका राजा' कहकर चिढ़ाते और निर्दय सिपाही 'रोमके वेत्रदण्डकी भांति' दारुण रूपसे आघात लगाते थे। ऐसी अवस्थामें भी पिलेटने फिर एकबार यहूदियोंका चित्त खींचनेकी करुण कण्ठसे स्वीय आवेदन ज्ञापन किया। शेषको पुरोहितोंका तर्जन-गर्जन सुन उम्हें साधारणके समक्ष इनके क्रूशारोपका आदेश देना पड़ा।
अनन्तर यहूदी दो दस्यु और ईसाको क्रूशपर चढ़ाने के लिये गोलगोथेकी ओर ले चले। अपने हस्तमें कील ठुकते समय भी इन्होंने हत्याकारियों कौ मुक्तिके लिये प्रार्थना की थी। ईसाके मृत्युकालकी वाक्यावन्ली ईश्वर-विश्वासकी सुगभीर परिचायक है।
जो विद्वेषी और अत्याचारी यहूदी इनके क्रूशपर चढ़ते समय उपस्थित रहे, वे भी उदारता एवं गाम्भीर्य देख नयनजलमें डूब और 'हा हतोऽस्मि' कहते तथा करसे वक्ष कूटते जेरूसलम नगर लौट गये। सन्ध्याके प्राक्काल सिपाहियों ने क्रूशपर चढ़े दस्युदयके पदद्दय तोड़ कर भेज दिये थे। तत्काल उन्होंने मरने या न मरने को परीक्षा लेने को ईसाके मृत वक्षमें अस्त्र भोंका। अनन्तर सन्धयाके बाद समाधिकार्य-सम्पादनको अंसम्भव समझ उन्होंने झटपट इन्हें मट्टी दी थी। शासनकर्ताके आदेशक्रमसे निकोदिमास और आरमाथियावासी युसुफने ईसाके मृत-शवको यथारीति कब्र में रखा। शुक्रवारको संध्या समय महात्मा ईसा मसीहका समाधि लगा था। रविवारको अतिप्रत्यूष मेरी इनके समाधिस्थानपर पहुंचीं। रजनीको देवदूतसे ईसाके पुनरभ्युत्थानको बात सुन वहां गयी थीं।
बाइबिल ग्रन्थके John xx. 17, xxi. 1-24, Matt xxviii. 9-10, Luke xxiv. 13-32, 34, I Cor. xv. 3, 5, 8, प्रभृति स्थलमें ईसाके पुनराविर्भावका उल्लेख मिलता है। प्रथम ईष्टर दिवस (Easter day) से ४० दिन पर्यन्त इन्होंने खोय भक्त शिष्यों और अपोसलों के सम्मुख आविर्भूत हो उनके प्रति धर्मतत्त्व सम्बन्धमें उपदेश दिया था। शेष दिन ईसा भक्तप्राण शिष्यों को बेथनीके अभिमुख
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ले गये। वहां उनकी मङ्गलकामना कर इन्होंने अपना शेष आदेश मानने को समझाया था। इसी प्रकार आशीर्वाद देते देते ईसा उनके सामने मेघ मध्य समा गये। चालीस दिन पीछे इन्होंने स्वर्गारोहण किया।
स्वर्गारोहणके पचास दिन पीछे ईसाको शिष्यमण्डली पेण्टेकष्ट भोजीत्सव के समय जेरूसलम नगरमें समवेत हुई थी। इस दिन शिथों पर परमात्माका भर हुआ और उन्होंने सकल भाषाओं में उपदेश दे जनसाधारणको विमोहित किया। इसी दिन इसी मुद्धतेपर उनके भावसे मुग्ध हो प्रायः तीन सहस्त्र लोग ईसाई धर्म में दीक्षित हुए थे। अतः पर ईसा-नियोजित अपीसलों और शिष्योंने पृथिवीके नाना स्थानोंमें जा ईसाईधर्म प्रचार करना आरम्भ किया। सब पहिले मध्य-एसियामें धर्मप्रचार कार्यपर व्रती बने थे। विश्वासघातक युदासके बदले मथियास (Matthias) अपोसल मनोनीत हुये। (ये यहदोवंश सन्भूत थे पीछे पल नामसे प्रसिद्ध हुये।) दूसरे एक जोहन भी 'अपोसल' बने थे।
मथो, मार्क, लुक और जोहन प्रभृति महात्मावोंने जो लिखा, उससे ईसाको ऐसी एक पार्थिव जीवनीका चित्र उतारा गया। इनका आध्यात्मिक जीवन वा धर्मतत्त्व (Christianty) जिस सकल उपादानसे गंठा, वह यथास्थान लिखा है। {{smaller|ईसाई देखो।}}
पाश्चात्य ऐतिहासिकोंने इसका कोई प्रमाण नहीं दिया, पौत्तलिक-प्रधान पाश्चात्य जगत्में किस उहीपनासे कौन उपादान उठा ईसाने नूतन धर्मप्रचार में अग्रगमन किया था। ईसाई भी इसका कोई ठीक प्रमाण बता न सके, अपने अन्नातवासकाल ईसा किस देशमें रहे। सम्भवतः इनके पिता इन्हें मिशर ले आये थे। बाइबिलके नाना स्थलीमें जेरूसलमनगरके पूर्व-दिक्से मसोहाके आविर्भूत होनेका प्रसङ्गादि विवृत रहने पर स्पष्ट ही समझ पड़ता है, कि यहूदी-प्रधान पालेस्तिनके पूर्वाञ्चल हो ईसाईधर्मका झण्डा उड़ा था।
पूर्वाञ्चलवासियोंपर ईसा और उन्के भक्तों के एतादृश अनुराग रहनेका कारण क्या है? इस बातको प्राच्य वा प्रतीक्ष वुधमण्डलीका कोई व्यक्ति इतने दिनतक
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१२८|ईसा|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
जान न सका। जहां आसिरीय, बाबिलोनीय, कालदीय, रोमक प्रभृति प्राचीन राजवंशने बहु पूर्वाब्दसे प्राचीन धर्म पालन किया, उसी जनपद-समूहमें यह नव मत्त प्रचार क्यों ईसाकी इतनी आकाङ्गाका वस्तु बना था? ईसा मसीहके अज्ञात वासकालकी संक्षिप्त जीवनी (Unknown life of Christ) सम्प्रति भोटराज्यके अन्तर्गत एक प्राचीन मठमें मिली है। यह ग्रन्थ ईसाकी जीवनीका मूलक और पाली भाषामें लिखित है। भारत तथा भीट देश आकर अज्ञातवासमें अवस्थान और जैन एवं बौद्ध साधुवोंके साथ साक्षात् इस ग्रन्थमें आनुपूर्विक वर्णित है। रूस-पर्यटक नोटोविचने (Nicholus Notovitch) तिब्बतके हिमिन नामक स्थानीय मठसे इस ग्रन्थको लाकर फान्सीसी भाषामें अनुवाद किया था। पीछे वही अनुवाद क्रिस्पे कर्तृक अंगरेज़ी भाषामें अनूदित हुआ।<ref>The Unknown Life of Christ, by Nicholas Notovich, translated from the French by Violet Crispe, 1893.</ref>
उक्त ग्रन्थमें ईसाके अज्ञातवासकालकी शिक्षा और बौद्ध धर्मचर्चाकी कथा विवृत है। भारतमें ईसाजन्मके समकाल ईसाइयोंका अभ्युदय देखकर भी समझ पड़ता है, कि धर्मचर्चाके लिये इन्होंने और इनके सम्प्रदायवालोंने उसी प्राचीन समय भारतमें पैर रखा था। इसीसे प्राचीन ईसाई सम्प्रदाय और भारतीय धर्म-तश्वमें हमें सम्यक् अपने भक्तिभावका आभास मिलता है। बौद्ध धर्मानुसार पवित्रता, निरहङ्कार, अहिंसा, सन्यास, भिक्षुवृत्ति, चूड़ाकरण, जपमालाधारण प्रञ्चति कर्म रोमन काथलिक् ईसाई समाजमें स्पष्ट-रूपसे गृहीत हुये हैं। (Muller's Origin & Growth of Religion, p. 353.) गीतामें भगवान्ने अर्जुनको जो धर्म सिखाया, बाइबिल ग्रन्थमें भी उसका सारांश कुछ कुछ दिखाया है। तदानीन्तन समृद्ध एवं बौद्ध प्रतिभासे उद्भासित भारतराज्यमें ईसाके शुभागमनपर सन्देह करनेका कोई विषय नहीं। ईसा प्रतिपादित इञ्जील वा नव संहिता (New Testament) मतके अनुसार जिस प्रकार बौद्धधर्मकी
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छाया पड़ी, वह तद्ग्रन्थ देखनेसे सम्यक् उपन्लब्ध हो सकी है। सिवा इसके अगस्तिन (St. Augustine) का बुद्ध और टमास (St. Thomas) का बोधिसत्त्व नामसे ईसाई धर्मप्रचारकों में परिचय रहनसे स्पष्ट बोध होता है—प्राचीन कालमें बौद्धों और ईसाईयों में विशेष संस्स्रव रहा। अलबेरुनी और मसूदोका इति-वृत्त पढ़नेसे समझ सक्त हैं, कि बुद्धासफ (बुद्ध) साबियान मतके प्रवर्तक थे। जेरोम (St. Jerome) और अचेरी (L. D. Achery ) बौद्ध तथा ईसाई धर्मके सामञ्जस्य प्रतिपादनपर चेष्टा कर गये हैं।
जर्ज सिद्रनास्ने खीय इतिवृत्तमें लिखा है,—
"This mad man then, Manis (also called Seythianus) was by race a Brachman, and he had for his teacher Budas, formerly called Terebinthus, who having been brought up by Scythianus in the learning of the Greeks, became a follower of the sect of Empedocles (who said there were two first principles opposed to one another), and when he entered Persia, declared that he had been born of a virgin and had been brought up among the hills............and this Budas (also Terebinthus) did perish, crushed by an unclean spirit,"
प्रत्नतत्त्वविदु इ॰ बि॰ कोवेल महोदयन स्मिथ के अभिधानमें ईसा मसीहकी जीवनीक सङ्कलनकालमें कहा है,—"This wonderful jumble, mainly copiedas we see, from Socrates seems to bring Buddha and Manes together, many of the ide as of Manicheism were but frag ments of Buddhism,"
ईसाई धर्मशास्त्रके साथ प्राच्य दर्शनशास्त्रका सम्बन्ध ठहरा पारस्य देशवासी धर्ममतप्रवर्तक मनिकी को हुई धर्मतत्व अवतारणा और उक्त मतामत विचारनेपर अवान्तर भावसे ईसाके प्राच्य संस्स्रवका परिचय मिलता है। अध्यापक मीचमूलरने वुडके महात्मपद (Saint of Church) पानेको बात मानो है।<ref>Chips from German Workshops, IV, 184. Academy, Sept 1, 1883, p. 146.</ref>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसा-ईसाई|१२९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मुहम्मदके मतसे ईसा मसीह 'रुह-अल्ला' वा जगदीश्वरके आत्मा, कुमारी मेरीके सन्तान और एक पैग़म्बर समझे गये हैं। मुसलमान इनके आगमनसे पौत्तलिकताके स्रोतका कितना ही रुकना और सनातन धर्मका जमना मानते भी इन्हें जगत्का परित्राता (Redeemer and Saviour) नहीं समझते। स्वयं मुहम्मदने ईसा मसीहका जन्म, ईश्वर कर्टक मृद्विकारसे उत्पत्ति और मेरीके निकट देवदूतका समागम प्रभृति घटनायें कुरान्में लिखी हैं।
ईसाइयोंने इनकी जीवनी नाना प्रकारसे सङ्कलित की है। सकल ही ग्रन्थों में ईसाका मत विशदरूपसे मीमांसित और आलोचित है। अनेकों ने ईसा प्रवर्तित धर्ममतको विचार विशेष निन्दा भी की है, जिसकी आलोचनाका यहां कोई प्रयोजन नहीं। ईसाइयोंमें जिन सकल महात्मायों ने इनकी जीवनी देखकर हृदयमें उन्नत भाव प्राप्त किये, उनमें कई लोगों के मत यहां लिखे जाते हैं। काण्टने ईसाकी अभिव्यक्तिस पूर्णज्ञानकी पराकाष्ठा पायी थी। हेगेलने इनमें नर और नारायणका एकत्र समावेश (The union of the human and the divine) देखा था। बहुत बड़े नास्तिक (sceptics) भी ईसाकी सम्मानना कर गये हैं। स्पिनोजाने इन्हें स्वर्गीय ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बताया है। वोलतार (Voltaire) ईसा-चरित्र-चित्रके सौन्दर्य और गाम्भीर्यपर मुग्ध हुए थे। जगत्के विख्यात वीर नेपोलियनने सेण्टहेलेना द्वीपमें रहते समय कहा था—इनके साथ किसी अपर व्यक्तिका सामञ्जस्य ठहर नहीं सकता। रुसों ने ईसाका जन्म और मृत्यु देवताकी भांति माना है। एतद्भिन्न ट्रायास्, रैनान, जनष्टुयार्टमिल प्रभृतिने इन्हें मनुष्यजीवनका नेता और आदर्शपुरुष लिखा है।
एक ओर जैसे ईसाई ईसाके गुण गाते हैं, दूसरी ओर वैसे ही अनेक ईसाई पुराविदु धराधाममें उक्त अवतारके होनेपर बिलकुल विश्वास नहीं लाते। इनके अवतार होनेपर सन्देह कर नेपोलियनने पहले
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हार्डारसे पूछा था,—"ईसा नामक कोई व्यक्ति धरातल-पर रहा या नहीं।" पुराविदों ने उक्त अपने मतको पोषकतापर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। किन्तु ईसाई धर्मपर प्रकृत विश्वास रखनेवाले अयौक्तिक युक्तिकी मूख व्यक्तिका प्रलाप कहा करते हैं। उनके कथनानुसार कुइरिनियाम्, पिलेट वा टाइबिरियास्की राज-तालिकानें लिखा न रहते भी तासितास को लेखनसे उसका प्रमाण मिलता है। तासितास्ने लिखा है—ताइबिरियासके राजत्वकालमें शासनकर्ता पीन्तयास् पिलेटकी आज्ञासे ईसाईधर्म-प्रवर्तक (Founder of Christianity) मारा गया था। पिलेटने ईसाई मतके अनुचरथसे होनमति बालकोंको सतर्क करनेके लिये एक राजाज्ञा ( Act of Pilate) निकाली वो, और वह ई॰ के २रे शताब्दतक बलवती रही।
{{outdent|ईसाई (फा॰ वि॰) १ खुष्टीय, नसरानी, मसीही। (पु॰) २ खुष्टान, मसीहको माननेवाला।<br>{{gap}}यह ईसा मसीहका भक्त और तन्मतावलम्बी सम्प्रदाय है। ईसाके भक्त कहा करते हैं,—"उसी असीम अनन्त शक्तिमान् विश्वव्यापी जगदोखरने परम प्रीतिसे पवित्नात्मासमूह और इस जगत्को बनाया था। पवित्राव्मा ईश्वरका माहात्म्य, प्रेमसन्धोग और कियत् परिमाण उसकी पवित्रता पानेके अधिकारी हुये। पीछे ईश्वरने कामावसायिता (Free Will) उन्हें दे डाली। सुतरां वे इच्छानुसार चलने लगे। स्वेच्छावश क्रमशः उनका मन कलुषित हुआ। उसीसे पापकी उत्पत्ति, धीरे-धीरे पापकी वृद्धि और उसीके साथ दारुण मनस्ताप आया है! शैतानके साथ उसके दूतभी वैसी ही अवस्थामें पड़ गये। उन्होंने सारे पापका भार सरलप्रकृति मानवपर डालना चाहा था। उनको मनोवाच्छा पूर्ण हुई। इसीसे मानवजाति इतनी सन्तप्त, इतनी पीड़ित और इतनी पापग्रस्त है। मानवके पापमोचन, जगत्में न्याय एवं सुखराज्यस्थापन और मानवजातिकी फिर पवित्रता तथा पूर्वगौरव प्रदान कर नेके लिये भगवान्ने अपना प्रियपुत्र ईसाकी धरातल-पर प्रेरण किया था। जो ईसा मसीहका धर्मोपदेश प्रक्कतरूपसे समझते हैं, वे जो उनको इच्छाके अनुकूल}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसा-ईसाई|१२९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मुहम्मदके मतसे ईसा मसीह 'रुह-अल्ला' वा जगदीश्वरके आत्मा, कुमारी मेरीके सन्तान और एक पैग़म्बर समझे गये हैं। मुसलमान इनके आगमनसे पौत्तलिकताके स्रोतका कितना ही रुकना और सनातन धर्मका जमना मानते भी इन्हें जगत्का परित्राता (Redeemer and Saviour) नहीं समझते। स्वयं मुहम्मदने ईसा मसीहका जन्म, ईश्वर कर्टक मृद्विकारसे उत्पत्ति और मेरीके निकट देवदूतका समागम प्रभृति घटनायें कुरान्में लिखी हैं।
ईसाइयोंने इनकी जीवनी नाना प्रकारसे सङ्कलित की है। सकल ही ग्रन्थों में ईसाका मत विशदरूपसे मीमांसित और आलोचित है। अनेकों ने ईसा प्रवर्तित धर्ममतको विचार विशेष निन्दा भी की है, जिसकी आलोचनाका यहां कोई प्रयोजन नहीं। ईसाइयोंमें जिन सकल महात्मायों ने इनकी जीवनी देखकर हृदयमें उन्नत भाव प्राप्त किये, उनमें कई लोगों के मत यहां लिखे जाते हैं। काण्टने ईसाकी अभिव्यक्तिस पूर्णज्ञानकी पराकाष्ठा पायी थी। हेगेलने इनमें नर और नारायणका एकत्र समावेश (The union of the human and the divine) देखा था। बहुत बड़े नास्तिक (sceptics) भी ईसाकी सम्मानना कर गये हैं। स्पिनोजाने इन्हें स्वर्गीय ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बताया है। वोलतार (Voltaire) ईसा-चरित्र-चित्रके सौन्दर्य और गाम्भीर्यपर मुग्ध हुए थे। जगत्के विख्यात वीर नेपोलियनने सेण्टहेलेना द्वीपमें रहते समय कहा था—इनके साथ किसी अपर व्यक्तिका सामञ्जस्य ठहर नहीं सकता। रुसों ने ईसाका जन्म और मृत्यु देवताकी भांति माना है। एतद्भिन्न ट्रायास्, रैनान, जनष्टुयार्टमिल प्रभृतिने इन्हें मनुष्यजीवनका नेता और आदर्शपुरुष लिखा है।
एक ओर जैसे ईसाई ईसाके गुण गाते हैं, दूसरी ओर वैसे ही अनेक ईसाई पुराविदु धराधाममें उक्त अवतारके होनेपर बिलकुल विश्वास नहीं लाते। इनके अवतार होनेपर सन्देह कर नेपोलियनने पहले
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हार्डारसे पूछा था,—"ईसा नामक कोई व्यक्ति धरातल-पर रहा या नहीं।" पुराविदों ने उक्त अपने मतको पोषकतापर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। किन्तु ईसाई धर्मपर प्रकृत विश्वास रखनेवाले अयौक्तिक युक्तिकी मूख व्यक्तिका प्रलाप कहा करते हैं। उनके कथनानुसार कुइरिनियाम्, पिलेट वा टाइबिरियास्की राज-तालिकानें लिखा न रहते भी तासितास को लेखनसे उसका प्रमाण मिलता है। तासितास्ने लिखा है—ताइबिरियासके राजत्वकालमें शासनकर्ता पीन्तयास् पिलेटकी आज्ञासे ईसाईधर्म-प्रवर्तक (Founder of Christianity) मारा गया था। पिलेटने ईसाई मतके अनुचरथसे होनमति बालकोंको सतर्क करनेके लिये एक राजाज्ञा ( Act of Pilate) निकाली वो, और वह ई॰ के २रे शताब्दतक बलवती रही।
{{outdent|ईसाई (फा॰ वि॰) १ खुष्टीय, नसरानी, मसीही। (पु॰) २ खुष्टान, मसीहको माननेवाला।
यह ईसा मसीहका भक्त और तन्मतावलम्बी सम्प्रदाय है। ईसाके भक्त कहा करते हैं,—"उसी असीम अनन्त शक्तिमान् विश्वव्यापी जगदोखरने परम प्रीतिसे पवित्नात्मासमूह और इस जगत्को बनाया था। पवित्राव्मा ईश्वरका माहात्म्य, प्रेमसन्धोग और कियत् परिमाण उसकी पवित्रता पानेके अधिकारी हुये। पीछे ईश्वरने कामावसायिता (Free Will) उन्हें दे डाली। सुतरां वे इच्छानुसार चलने लगे। स्वेच्छावश क्रमशः उनका मन कलुषित हुआ। उसीसे पापकी उत्पत्ति, धीरे-धीरे पापकी वृद्धि और उसीके साथ दारुण मनस्ताप आया है! शैतानके साथ उसके दूतभी वैसी ही अवस्थामें पड़ गये। उन्होंने सारे पापका भार सरलप्रकृति मानवपर डालना चाहा था। उनको मनोवाच्छा पूर्ण हुई। इसीसे मानवजाति इतनी सन्तप्त, इतनी पीड़ित और इतनी पापग्रस्त है। मानवके पापमोचन, जगत्में न्याय एवं सुखराज्यस्थापन और मानवजातिकी फिर पवित्रता तथा पूर्वगौरव प्रदान कर नेके लिये भगवान्ने अपना प्रियपुत्र ईसाकी धरातल-पर प्रेरण किया था। जो ईसा मसीहका धर्मोपदेश प्रक्कतरूपसे समझते हैं, वे जो उनको इच्छाके अनुकूल}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसा-ईसाई|१२९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मुहम्मदके मतसे ईसा मसीह 'रुह-अल्ला' वा जगदीश्वरके आत्मा, कुमारी मेरीके सन्तान और एक पैग़म्बर समझे गये हैं। मुसलमान इनके आगमनसे पौत्तलिकताके स्रोतका कितना ही रुकना और सनातन धर्मका जमना मानते भी इन्हें जगत्का परित्राता (Redeemer and Saviour) नहीं समझते। स्वयं मुहम्मदने ईसा मसीहका जन्म, ईश्वर कर्टक मृद्विकारसे उत्पत्ति और मेरीके निकट देवदूतका समागम प्रभृति घटनायें कुरान्में लिखी हैं।
ईसाइयोंने इनकी जीवनी नाना प्रकारसे सङ्कलित की है। सकल ही ग्रन्थों में ईसाका मत विशदरूपसे मीमांसित और आलोचित है। अनेकों ने ईसा प्रवर्तित धर्ममतको विचार विशेष निन्दा भी की है, जिसकी आलोचनाका यहां कोई प्रयोजन नहीं। ईसाइयोंमें जिन सकल महात्मायों ने इनकी जीवनी देखकर हृदयमें उन्नत भाव प्राप्त किये, उनमें कई लोगों के मत यहां लिखे जाते हैं। काण्टने ईसाकी अभिव्यक्तिस पूर्णज्ञानकी पराकाष्ठा पायी थी। हेगेलने इनमें नर और नारायणका एकत्र समावेश (The union of the human and the divine) देखा था। बहुत बड़े नास्तिक (sceptics) भी ईसाकी सम्मानना कर गये हैं। स्पिनोजाने इन्हें स्वर्गीय ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बताया है। वोलतार (Voltaire) ईसा-चरित्र-चित्रके सौन्दर्य और गाम्भीर्यपर मुग्ध हुए थे। जगत्के विख्यात वीर नेपोलियनने सेण्टहेलेना द्वीपमें रहते समय कहा था—इनके साथ किसी अपर व्यक्तिका सामञ्जस्य ठहर नहीं सकता। रुसों ने ईसाका जन्म और मृत्यु देवताकी भांति माना है। एतद्भिन्न ट्रायास्, रैनान, जनष्टुयार्टमिल प्रभृतिने इन्हें मनुष्यजीवनका नेता और आदर्शपुरुष लिखा है।
एक ओर जैसे ईसाई ईसाके गुण गाते हैं, दूसरी ओर वैसे ही अनेक ईसाई पुराविदु धराधाममें उक्त अवतारके होनेपर बिलकुल विश्वास नहीं लाते। इनके अवतार होनेपर सन्देह कर नेपोलियनने पहले
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हार्डारसे पूछा था,—"ईसा नामक कोई व्यक्ति धरातल-पर रहा या नहीं।" पुराविदों ने उक्त अपने मतको पोषकतापर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। किन्तु ईसाई धर्मपर प्रकृत विश्वास रखनेवाले अयौक्तिक युक्तिकी मूख व्यक्तिका प्रलाप कहा करते हैं। उनके कथनानुसार कुइरिनियाम्, पिलेट वा टाइबिरियास्की राज-तालिकानें लिखा न रहते भी तासितास को लेखनसे उसका प्रमाण मिलता है। तासितास्ने लिखा है—ताइबिरियासके राजत्वकालमें शासनकर्ता पीन्तयास् पिलेटकी आज्ञासे ईसाईधर्म-प्रवर्तक (Founder of Christianity) मारा गया था। पिलेटने ईसाई मतके अनुचरथसे होनमति बालकोंको सतर्क करनेके लिये एक राजाज्ञा ( Act of Pilate) निकाली वो, और वह ई॰ के २रे शताब्दतक बलवती रही।
{{outdent|ईसाई (फा॰ वि॰) १ खुष्टीय, नसरानी, मसीही। (पु॰) २ खुष्टान, मसीहको माननेवाला।<br>{{gap}}यह ईसा मसीहका भक्त और तन्मतावलम्बी सम्प्रदाय है। ईसाके भक्त कहा करते हैं,—"उसी असीम अनन्त शक्तिमान् विश्वव्यापी जगदोखरने परम प्रीतिसे पवित्नात्मासमूह और इस जगत्को बनाया था। पवित्राव्मा ईश्वरका माहात्म्य, प्रेमसन्धोग और कियत् परिमाण उसकी पवित्रता पानेके अधिकारी हुये। पीछे ईश्वरने कामावसायिता (Free Will) उन्हें दे डाली। सुतरां वे इच्छानुसार चलने लगे। स्वेच्छावश क्रमशः उनका मन कलुषित हुआ। उसीसे पापकी उत्पत्ति, धीरे-धीरे पापकी वृद्धि और उसीके साथ दारुण मनस्ताप आया है! शैतानके साथ उसके दूतभी वैसी ही अवस्थामें पड़ गये। उन्होंने सारे पापका भार सरलप्रकृति मानवपर डालना चाहा था। उनको मनोवाच्छा पूर्ण हुई। इसीसे मानवजाति इतनी सन्तप्त, इतनी पीड़ित और इतनी पापग्रस्त है। मानवके पापमोचन, जगत्में न्याय एवं सुखराज्यस्थापन और मानवजातिकी फिर पवित्रता तथा पूर्वगौरव प्रदान कर नेके लिये भगवान्ने अपना प्रियपुत्र ईसाकी धरातल-पर प्रेरण किया था। जो ईसा मसीहका धर्मोपदेश प्रक्कतरूपसे समझते हैं, वे जो उनको इच्छाके अनुकूल}}
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मुहम्मदके मतसे ईसा मसीह 'रुह-अल्ला' वा जगदीश्वरके आत्मा, कुमारी मेरीके सन्तान और एक पैग़म्बर समझे गये हैं। मुसलमान इनके आगमनसे पौत्तलिकताके स्रोतका कितना ही रुकना और सनातन धर्मका जमना मानते भी इन्हें जगत्का परित्राता (Redeemer and Saviour) नहीं समझते। स्वयं मुहम्मदने ईसा मसीहका जन्म, ईश्वर कर्टक मृद्विकारसे उत्पत्ति और मेरीके निकट देवदूतका समागम प्रभृति घटनायें कुरान्में लिखी हैं।
ईसाइयोंने इनकी जीवनी नाना प्रकारसे सङ्कलित की है। सकल ही ग्रन्थों में ईसाका मत विशदरूपसे मीमांसित और आलोचित है। अनेकों ने ईसा प्रवर्तित धर्ममतको विचार विशेष निन्दा भी की है, जिसकी आलोचनाका यहां कोई प्रयोजन नहीं। ईसाइयोंमें जिन सकल महात्मायों ने इनकी जीवनी देखकर हृदयमें उन्नत भाव प्राप्त किये, उनमें कई लोगों के मत यहां लिखे जाते हैं। काण्टने ईसाकी अभिव्यक्तिस पूर्णज्ञानकी पराकाष्ठा पायी थी। हेगेलने इनमें नर और नारायणका एकत्र समावेश (The union of the human and the divine) देखा था। बहुत बड़े नास्तिक (sceptics) भी ईसाकी सम्मानना कर गये हैं। स्पिनोजाने इन्हें स्वर्गीय ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बताया है। वोलतार (Voltaire) ईसा-चरित्र-चित्रके सौन्दर्य और गाम्भीर्यपर मुग्ध हुए थे। जगत्के विख्यात वीर नेपोलियनने सेण्टहेलेना द्वीपमें रहते समय कहा था—इनके साथ किसी अपर व्यक्तिका सामञ्जस्य ठहर नहीं सकता। रुसों ने ईसाका जन्म और मृत्यु देवताकी भांति माना है। एतद्भिन्न ट्रायास्, रैनान, जनष्टुयार्टमिल प्रभृतिने इन्हें मनुष्यजीवनका नेता और आदर्शपुरुष लिखा है।
एक ओर जैसे ईसाई ईसाके गुण गाते हैं, दूसरी ओर वैसे ही अनेक ईसाई पुराविदु धराधाममें उक्त अवतारके होनेपर बिलकुल विश्वास नहीं लाते। इनके अवतार होनेपर सन्देह कर नेपोलियनने पहले
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हार्डारसे पूछा था,—"ईसा नामक कोई व्यक्ति धरातल-पर रहा या नहीं।" पुराविदों ने उक्त अपने मतको पोषकतापर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। किन्तु ईसाई धर्मपर प्रकृत विश्वास रखनेवाले अयौक्तिक युक्तिकी मूख व्यक्तिका प्रलाप कहा करते हैं। उनके कथनानुसार कुइरिनियाम्, पिलेट वा टाइबिरियास्की राज-तालिकानें लिखा न रहते भी तासितास को लेखनसे उसका प्रमाण मिलता है। तासितास्ने लिखा है—ताइबिरियासके राजत्वकालमें शासनकर्ता पीन्तयास् पिलेटकी आज्ञासे ईसाईधर्म-प्रवर्तक (Founder of Christianity) मारा गया था। पिलेटने ईसाई मतके अनुचरथसे होनमति बालकोंको सतर्क करनेके लिये एक राजाज्ञा ( Act of Pilate) निकाली वो, और वह ई॰ के २रे शताब्दतक बलवती रही।
{{outdent|ईसाई (फा॰ वि॰) १ खुष्टीय, नसरानी, मसीही। (पु॰) २ खुष्टान, मसीहको माननेवाला।
यह ईसा मसीहका भक्त और तन्मतावलम्बी सम्प्रदाय है। ईसाके भक्त कहा करते हैं,—"उसी असीम अनन्त शक्तिमान् विश्वव्यापी जगदोखरने परम प्रीतिसे पवित्नात्मासमूह और इस जगत्को बनाया था। पवित्राव्मा ईश्वरका माहात्म्य, प्रेमसन्धोग और कियत् परिमाण उसकी पवित्रता पानेके अधिकारी हुये। पीछे ईश्वरने कामावसायिता (Free Will) उन्हें दे डाली। सुतरां वे इच्छानुसार चलने लगे। स्वेच्छावश क्रमशः उनका मन कलुषित हुआ। उसीसे पापकी उत्पत्ति, धीरे-धीरे पापकी वृद्धि और उसीके साथ दारुण मनस्ताप आया है! शैतानके साथ उसके दूतभी वैसी ही अवस्थामें पड़ गये। उन्होंने सारे पापका भार सरलप्रकृति मानवपर डालना चाहा था। उनको मनोवाच्छा पूर्ण हुई। इसीसे मानवजाति इतनी सन्तप्त, इतनी पीड़ित और इतनी पापग्रस्त है। मानवके पापमोचन, जगत्में न्याय एवं सुखराज्यस्थापन और मानवजातिकी फिर पवित्रता तथा पूर्वगौरव प्रदान कर नेके लिये भगवान्ने अपना प्रियपुत्र ईसाकी धरातल-पर प्रेरण किया था। जो ईसा मसीहका धर्मोपदेश प्रक्कतरूपसे समझते हैं, वे जो उनको इच्छाके अनुकूल
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मुहम्मदके मतसे ईसा मसीह 'रुह-अल्ला' वा जगदीश्वरके आत्मा, कुमारी मेरीके सन्तान और एक पैग़म्बर समझे गये हैं। मुसलमान इनके आगमनसे पौत्तलिकताके स्रोतका कितना ही रुकना और सनातन धर्मका जमना मानते भी इन्हें जगत्का परित्राता (Redeemer and Saviour) नहीं समझते। स्वयं मुहम्मदने ईसा मसीहका जन्म, ईश्वर कर्टक मृद्विकारसे उत्पत्ति और मेरीके निकट देवदूतका समागम प्रभृति घटनायें कुरान्में लिखी हैं।
ईसाइयोंने इनकी जीवनी नाना प्रकारसे सङ्कलित की है। सकल ही ग्रन्थों में ईसाका मत विशदरूपसे मीमांसित और आलोचित है। अनेकों ने ईसा प्रवर्तित धर्ममतको विचार विशेष निन्दा भी की है, जिसकी आलोचनाका यहां कोई प्रयोजन नहीं। ईसाइयोंमें जिन सकल महात्मायों ने इनकी जीवनी देखकर हृदयमें उन्नत भाव प्राप्त किये, उनमें कई लोगों के मत यहां लिखे जाते हैं। काण्टने ईसाकी अभिव्यक्तिस पूर्णज्ञानकी पराकाष्ठा पायी थी। हेगेलने इनमें नर और नारायणका एकत्र समावेश (The union of the human and the divine) देखा था। बहुत बड़े नास्तिक (sceptics) भी ईसाकी सम्मानना कर गये हैं। स्पिनोजाने इन्हें स्वर्गीय ज्ञानकी प्रतिमूर्ति बताया है। वोलतार (Voltaire) ईसा-चरित्र-चित्रके सौन्दर्य और गाम्भीर्यपर मुग्ध हुए थे। जगत्के विख्यात वीर नेपोलियनने सेण्टहेलेना द्वीपमें रहते समय कहा था—इनके साथ किसी अपर व्यक्तिका सामञ्जस्य ठहर नहीं सकता। रुसों ने ईसाका जन्म और मृत्यु देवताकी भांति माना है। एतद्भिन्न ट्रायास्, रैनान, जनष्टुयार्टमिल प्रभृतिने इन्हें मनुष्यजीवनका नेता और आदर्शपुरुष लिखा है।
एक ओर जैसे ईसाई ईसाके गुण गाते हैं, दूसरी ओर वैसे ही अनेक ईसाई पुराविदु धराधाममें उक्त अवतारके होनेपर बिलकुल विश्वास नहीं लाते। इनके अवतार होनेपर सन्देह कर नेपोलियनने पहले
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हार्डारसे पूछा था,—"ईसा नामक कोई व्यक्ति धरातल-पर रहा या नहीं।" पुराविदों ने उक्त अपने मतको पोषकतापर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। किन्तु ईसाई धर्मपर प्रकृत विश्वास रखनेवाले अयौक्तिक युक्तिकी मूख व्यक्तिका प्रलाप कहा करते हैं। उनके कथनानुसार कुइरिनियाम्, पिलेट वा टाइबिरियास्की राज-तालिकानें लिखा न रहते भी तासितास को लेखनसे उसका प्रमाण मिलता है। तासितास्ने लिखा है—ताइबिरियासके राजत्वकालमें शासनकर्ता पीन्तयास् पिलेटकी आज्ञासे ईसाईधर्म-प्रवर्तक (Founder of Christianity) मारा गया था। पिलेटने ईसाई मतके अनुचरथसे होनमति बालकोंको सतर्क करनेके लिये एक राजाज्ञा ( Act of Pilate) निकाली वो, और वह ई॰ के २रे शताब्दतक बलवती रही।
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यह ईसा मसीहका भक्त और तन्मतावलम्बी सम्प्रदाय है। ईसाके भक्त कहा करते हैं,—"उसी असीम अनन्त शक्तिमान् विश्वव्यापी जगदोखरने परम प्रीतिसे पवित्नात्मासमूह और इस जगत्को बनाया था। पवित्राव्मा ईश्वरका माहात्म्य, प्रेमसन्धोग और कियत् परिमाण उसकी पवित्रता पानेके अधिकारी हुये। पीछे ईश्वरने कामावसायिता (Free Will) उन्हें दे डाली। सुतरां वे इच्छानुसार चलने लगे। स्वेच्छावश क्रमशः उनका मन कलुषित हुआ। उसीसे पापकी उत्पत्ति, धीरे-धीरे पापकी वृद्धि और उसीके साथ दारुण मनस्ताप आया है! शैतानके साथ उसके दूतभी वैसी ही अवस्थामें पड़ गये। उन्होंने सारे पापका भार सरलप्रकृति मानवपर डालना चाहा था। उनको मनोवाच्छा पूर्ण हुई। इसीसे मानवजाति इतनी सन्तप्त, इतनी पीड़ित और इतनी पापग्रस्त है। मानवके पापमोचन, जगत्में न्याय एवं सुखराज्यस्थापन और मानवजातिकी फिर पवित्रता तथा पूर्वगौरव प्रदान कर नेके लिये भगवान्ने अपना प्रियपुत्र ईसाकी धरातल-पर प्रेरण किया था। जो ईसा मसीहका धर्मोपदेश प्रक्कतरूपसे समझते हैं, वे जो उनको इच्छाके अनुकूल
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१३०|ईसाई|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
चलते हैं, वे ही उनकी कृपाका लाभ करनेवाले ईसाई कहलाते हैं।"<ref>Rev. Charles Buck's Theological Dictionary, p . 65, 69.</ref>
३०६ ई॰ में विख्यातपण्डित लाक्टेन्सियास्ने लिखा है,—"जो स्थलपथसे चोरी और जलपथसे डकैती करते हैं, वे ईसाई हो नहीं सकते। स्त्री, पति वा पुत्रघातियों, भ्रूणहत्याकारियों, कन्यागमनकारियों, इन्द्रियकी परिष्टप्तिके लिये दूसरेसे कामनाकारियों वा भिन्न पुरुषके हस्त देहविक्रयकारियोंमें किसीको ईसाई नहीं कहते। किसी प्रकारका पाप करने और मनसे भी अपरका अनिष्ट चाहनेवाले ईसाई कभी नहीं।"
ईसाई धर्मवेत्ता अरिगेन कहते हैं,—"जो धन स्पृहा नहीं रखते, जो निज अधिकृत सम्पत्ति अन्यके अन्यायपूर्वक लेते भी कुण्ठित नहीं होते और जो सरलता, पवित्रता एवं उदारताको अलङ्कार समझते हैं, वही प्रकृत ईसाईधर्मको मानते हैं ।"<ref>J, Eadie's Biblical Cyclopaedia.</ref>
ठीक तौर पर कह नहीं सकते—ईसा मसीहके भक्तोंने कब किसके द्वारा खुष्टान या ईसाई नाम पाया। किसीके मतसे अन्तियोक नगरमें यह नाम प्रथम निकला था। वहां अपरापर सम्प्रदाय यहूदियोंसे पृथक् करनेके लिये ईसाइयोंको विद्रूपभावसे 'खृष्टान' कहकर पुकारते थे। उसी समयसे यह नाम चला आता है।
प्रधानतः ईसाई सम्प्रदायको इन कई मतोंको मानकर चलना पड़ता है—१ बाइबिल वा ईसाई धर्मपुस्तक ईश्वरका वाक्य होनेसे समस्त ही प्रामाण्य और ग्राह्य है। २ बाइबिल सर्वतोभाव आलोच्य है।
३ ईश्वरके एकत्व, ईश्वर और ईसा तथा दिव्यात्मा (Holy Ghost) का त्रित्व (Trinity) स्वीकार्य है। ४ आदि मानवका पतन ही मानवजातिके पापका कारण है। ५ मानव-त्राणके लिये ईसाका आत्मोत्सर्ग, उनका ईश्वरके प्रियपुत्र तथा अवतार होना और उनका कार्य कलापादि विश्वास्य एवं स्वीकार्य है।
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६ भक्ति और एकमात्र विश्वाससे पापोंकी मुक्ति होती है। ७ पापोंकी परित्राण एवं पवित्रता दिव्यात्मा दे सकता है। ८ आत्मा अविनश्वर है। ईसाका देह नष्ट होकर भी उठा था। महात्मा ईसाके शेषविचारसे दुष्टों को अनन्त शास्ति और शिष्टों को अनन्त स्वर्गीय सुखोपलब्धि हुई। ९ ईसाई धर्ममण्डलीका मत ऐश्वरिक समझकर स्वीकार किया जाता है। ईसाई धर्म में दीक्षित होनेका कर्मकाण्ड चिरदिन प्रतिपाल्य और अवश्यकर्तव्य है। ईसाके क्रूशारोपपर मृत्य से पूर्वरात्र मशिष्य भोज (Lord's Supper) का होना सत्य-जैसे विश्वासका विषय है।
ईसा मसीहसे पूर्व जेरूसलम, अन्तियोक प्रभृति स्थानमें यहूदीयों कुसंस्कारावच्छिन्न और उनके याजकों अर्थलोभी तथा अत्याचारी हो गये थे। कुसंस्कार और अत्याचार हटानेके लिये ईसा नाना स्थानों में अपना मत फैलाने घूसे। उन्होंने जो सकल मत फैलाया, उसका अधिकांश यहूदी जातिके प्राचीन धर्मग्रन्थों में पाया जाता है। इससे बोध होता है—ईसा-प्रवर्तित ईसाईधर्म यहूदी धर्मका ही संस्कार ठहरहा और प्राचीन यहूदी धर्मसे ही उपजता है।
ईसाने अपने प्रधान बारह शिष्योंको साधारणका कुसंस्कार छुड़ानेके लिये नियुक्त किया। ये बारही लोग धन, मान वा शिक्षा कुछ भी न रखते थे। तथापि उनको बात सुन सेकड़ों व्यक्ति ईसाई धर्ममें दीक्षित हुये। सर्वप्रथम जेरूसलम नगरमें ईसाई-समिति स्थापित हुई थी। इसी समय यहूदियोंने ईसाइयोंपर घोरतर अत्याचार किया। अनेक कष्ट एवं अनेक दुःख सहकर ईसाके प्रधान शिष्योंने जेरुसलम, अन्तियोक, इफेसास, स्मिरना, आथेन्स, कोरिन्थ, रोम और अलेकजून्द्रिया नगरमें ईसाई धर्ममन्दिर बनवाया था। सर्वप्रथम जेरूसलम नगरमें ईसाई धर्ममन्दिर स्थापित हुआ। इसीसे ईसाई जेरुसलमको अपनी समाजको जननी और महापुण्यभूमि समझते हैं।
{{smaller|ईसा और बाइबिल शब्दमें विस्त त विवरण देखो।}}
ईसाके प्रधाम शिष्योंने जो सकल समाज स्थापन किये, परव्रर्तीकालमें वेही ईसाई धर्मावलम्बियोंके महा-
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसाई|१३१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पुण्यस्थान और भक्तिके पात्र बने। उसी समय पश्चिममें रोमनगर और पूर्वमें अन्तियोक ईसाई समाजका प्रधानस्थान माना गया।
ईसा मसीहका धर्ममत एक ही है। किन्तु उत्तर काल नाना जातिके नाना मत और विश्वास मिल जानेसे अकेले ईसाई धर्मने नाना आकार बना लिये। अब उसके कई समाज हो गये हैं, जैसे—रोमन-काथोलिक, सिरीयक, याक़ बी, नेष्टोरी, अर्मनी, ग्रीक, प्रोटेष्टाण्ट, जेसुट इत्यादि।
{{c|{{smaller|रोमक-समाज।}}}}
विपक्षवादियोंके अत्याचारसे आदि ईसाइयोंने "काथोलिक" अर्थात् सार्वजनिक वा साधारण मतावलम्बीके नामसे अपना परिचय दिया था। उसो समयसे यह नाम पड़ा। अव काथोलिक कहनेसे रोमनकाथोलिक (Roman Catholic) नामक ईसाई समाज समझा जाता है। काथोलिक रोमराज्यके अधिपति पोपकी उसे यावतीय ईसाइयोंका धर्मपिता मान अतिशय भक्तिश्रद्धा करते हैं। उनके कथनानुसार मानव मेषपाल थे! पीछे एकताका बन्धन टूटा; इसीसे ईसा मसीहने अपने प्रधान शिष्य सेण्टपोटरकी मेषपाल रूपसे नियुक्त किया। रोम नगरमें सेण्टपीटर रहते थे। वहां ठहरकर उन्होंने साम्य और मुक्तिमार्ग लोगोंको देखाया। ईसाका आदेश था-सेण्ट-पीटरके पीछे उनका उत्तराधिकारी भी 'मेषपालक' होगा। रोमके पोप सेण्टपीटरके स्थलाभिषिक्त और उत्तराधिकारी हैं। सुतरां जिस समय जो पोप होंगे, उस समय वेही 'मेषपालक' रहेंगे।
रोमन काथोलिकोंको धर्मरक्षार्थ सात शपथ मानना पड़ते हैं, ईसाईधर्मको दीक्षा, धर्मसम्बन्धीय उपासनादिका क्रियाकलाप, क्रूशारीपके पूर्वरात्र ईसाका सशिष्य भोजपर्व, निग्रहखोकार (Penance), मृत्यु काल-में तैलका अवलेपन (Extreme unction), धर्माधिकार (Orders) और पाणिग्रहण।
इस समाजके धर्माधिकारमें अनेक पद पड़ते हैं, प्रथम पोप (Pope) अर्थात् सकलके धर्मपिता, तत्पर कार्डिनाल (Cardinal) अर्थात् ईसाई समाजके राजा
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प्रभृति महाजन, (जो पोपत्रे निर्वाचनमें अधिकारी होते हैं) उसके पर पेट्यिार्क (Patriarch) अर्थात् प्रधान धर्मगुरु, उनके अधीन आर्क बिशप (Archbishop) अर्थात् धर्माचार्य, उनके नीचे विशय (Bishop) अर्थात् महापुरोहित, तत्पर पुरोहित (Priest) और सामान्य याजक (Deacon)।
रोमन काथोलिक साकार उपासक हैं। ईश्वर, ईसा और दिव्यात्मा (Holy Ghost) उनके उपास्य देव हैं। सिवा इसके वे मूसा प्रभृति सिद्धपुरुषों को भी विशेष भक्ति और पूजा करते हैं।
ई॰ द्वादशसे चतुदेश शताब्द मध्य रोमाधिपति पोपके प्रबल प्रतापसे समस्त युरोपमें कोथोलिक धर्म फैला था। उक्त महादेशमें प्रवल पराक्रान्त राजाधिराजसे कुटीरवासी दीन दरिद्र पर्यन्त सकल ही पोपके पदावनत हुए। पोप अथवा तन्नियुक्त धर्माधिकारियों के बिना आदेश कोई धर्मकर्म कर न सकता था। उस समय अनेकोंने समझा पोप ही सम्भवतः देवता और ईश्वरका अंश हैं! उनके भयसे कोई एक बात भी मुंह खोलकर कह न सकता था। उस समय पोपने ईसाई धर्मासन पर बैठ जा अत्याचार किया, उसे सुननेसे किसे हत्कम्प नहीं हुआ! जो ईसाई पोपका नियम लांघता, वह यथाकाल उनके उपचार प्रदानसे विमुख जाता अथवा जो घुणाक्षरसे भी किसी विधर्मीका संसर्ग करलेता किंवा जो विधर्मों पोपका आदेय न मानता, उसका निस्तार हो न होता था। इसी प्रकार सैकड़ों व्यक्तियों ने अकालमें कालका आतिथ्य स्वीकार किया और हजारों लोगों ने कारायन्त्रणांका दुःख अपने ऊपर लिया। आबालवृद्धवनिता हजारों व्यक्तियों ने असीम मनोकष्ट पाया था। युरोपमें ऐसा कोई प्रदेश नहीं, जो पोपके उस दारुण दण्डविधि (Inquisition) से अव्याहति पाता। सर्व जीवों पर प्रेम रखना जिस धर्मका मूलमन्त्र है, उसी धर्मके सर्वमय कर्ताका ऐसा कार्य। ईसाई इतिहासपर विषम कलङ्क लगाता है।
काथोलिकसे जेसुट (Jesuit) सम्प्रदायका जन्म हुआ है। जेसुट शब्दसे ईशाके समाजका अर्थ निकलता
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१३२|ईसाई}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
है। ई॰ षोड़श शताब्दमें स्पनदेशवासी इग्नेसिया लोयोला (Ignatius Loyola) नामक एक व्यक्तिने यह समाज बनाया था। उस समय भी स्पेन प्रभृति देश पोपकी धर्मनीतिके अधीन थे। पोपके आदेश बिना किसी नूतन धर्भसमाजको बनानेके लिये किसीको अधिकार न था। सुतरां लोयोलाने पोपको समाचार दिया,—"ईश्वरादेशसे हम यह समाज स्थापन करनेके लिये अग्रसर हुये हैं। अब आपकी अनुमति सापेक्ष है।" पोप और उनके सदस्योंने लोयोलाका आवेदन सुना न था। लोयोलाने सोचा—यह कार्य पोपके हाथमें रखना चाहिये, नहीं तो सिद्धि मिलना कठिन है। उन्होंने फिर इसतरह आवेदन दिया,—"यह समाज पोपके सम्पूर्ण अधीन है। इसके लोग विशुद्धचरित्र, धर्माश्रमभक्त, पोपकी आज्ञाके अधीन और अति दीन दरिद्र हैं। इसके सन्तानोंको जो कुछ मिलेगा, उसीपर धर्मपिताका अधिकार रहेगा। जो जाति इस समाजमें आयेगी, ईसाई धर्मकी प्रजा ठहरेगी और पोपको धर्मपिता-जैसा मानेगी।" इतना प्रलोभन देख महामति पोप किसी बातपर आपत्ति लगा न सके; आवेदन ग्राह्य होनेपर जेसुट अपने कार्यक्षेत्र में अग्रसर हुये।
पूर्वतन ईसाई याजकों और यतियोंने नियम रखा था—हम किसी सांसारिक कर्ममें लिप्त न होंगे, निर्जनमें निभृत स्थानपर बैठ केवल ईश्वरकी चिन्ता करेंगे और मानवको ज्ञानालोक देंगे। किन्तु जेसुट-समाजने इस सकल बन्धनको तोड़ डाला। नियम निकला था—अपर ईसाई याजक, यति और प्रधान धर्मोपदेष्टा जो सकल कार्य करेंगे, इस समाजके साथ हम उनका कोई संस्त्रव न रखेंगे। इस समाजके लोग देश, काल, अवस्था और पात्रके भेदसे कभी उन्मुक्त असिके इस्त, तथा कभी दीन दरिद्र वेशसे कभी राजाके प्रासाद एवं कभी कृषकके शस्य क्षेत्र में पहुंच भयके प्रदर्शन, उद्दीपन अथवा प्रलोभन द्वारा स्वः स्वः कार्य उद्धार करेंगे। जैसे बने, ईसाई धर्म चलाना ही इस समाजका मुख्य उद्देश्य है।
जेसुटको पोपने सनद दो थी। उसी सनदके
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बल वे पोपकी धर्मनीतिसे अधीन युरोपके सकल काथोलिक राज्यमें फैल पड़े और सर्वत्र बालक बालिका आदिको धर्मकी शिक्षा देने लगे। राह घाट जङ्गल पहाड़ नाना स्थानमें जेसुटोंकी गतिमतिये वक्त्ताका स्त्रोत फूट पड़ा था। सभ्य असभ्य उच्च नीच सैकड़ों व्यक्तियोंने जेसुटका मत मान लिया। जेसुट कितने ही राजावों और राजपरिवारोंके धर्मगुरु एवं दीक्षागुरु बन बैठे। वे केवल धर्मको ही चला शान्त न हुये, पोपकी सनदके बल भारत और अमेरिका आ बाणिज्यव्यवसायभी चलाने लगे। युरोपके नानास्थानोंमें उनके बाणिज्यालय खुला गये। वाणिज्यके ही लोभसे वे देश-विदेश पहुंच उपनिवेश करने लगे। इसी प्रकार बणिक्के वेश्शसे जेसुट दक्षिण अमेरिकामें शस्यशाली पारागुया राज्य के अधीश्वर बन बैठे। उन्होंने उक्त स्थानके आदिम अधिवासियोंको ईसाई धर्मकी दीक्षा दी। असभ्यों को जेसुटो ने सभ्य बनाया। देश रीतिके अनुसार उन्होंने यह प्रबन्ध भी किया,—स्थानीय आदिम अधिवासी युरोपकी किसी अपर जातिके साथ मिलने-जुलने न पाये। वैदेशिक आक्रमणसे राज्यकी रक्षा करना पड़ती है। इसीसे जेसुटोंने इन अधिवांसीयोंको तोप, बन्दूक और तलवार चलाना सिखाया था। अब जेसुट दीन हीन धर्म प्रचारक नहीं, पराक्रान्त बणिक् और अधिपति देख पड़ते हैं।
ई॰ के १३वें और १५ वें शताब्दमें रोमन काथोलिक भारतमें बहुत आने लगे। उनमें अधिकांश ही पोर्तुगीज़ रहे। किन्तु तत्काल पोर्तुगीज़ सिपाहियों और देशीय राजावोंके दारुण उत्पीड़नसे पोर्तुगीज़ ईसाई यति कुछ भी कर न सके। उस समय भारत-वासियोंने ईसाई यतियोंके साथ घोर अत्याचार एवं दुर्व्यवहार किया। ईसाई यतियोंके साथ सैकड़ों अपर व्यक्तियों का रक्त बहा था। उस समय केवल पोर्तुगीजों के अधिकृत गोया प्रभृति स्थानों में निर्विवाद ईसाई धर्म चला।
पोर्तुगालके राजा एमानुएल (१४९५-१५२१ ई॰) और उनके पुत्र जोह्न ने (१५२१-५७ ई॰) भारत
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसाई|१३३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
वासियों को ईसाई धर्मकी दीक्षा देनेके लिये बड़ा उद्योग किया था। उन्हींके यत्नसे दुधार्ति-नुनेज (Duarte Nunez a Dominican) नामक एक व्यक्ति (१५१४-१७ ई॰) सर्वप्रथम बिशप (Bishop) बन भारत आये। वे जन-डि-मालवुकार्क (John de Albuquerque) गोया-नगरके सर्वप्रथम बिशप हुये। किन्तु उस समय भी काथोलिक समाज भारतमें अपना अभीष्ट बना न सका था।
१५४२ ई॰ में सेण्ट ज़ेवियर नामक एक जेसुट भारत आये। मलबार, मदुरा तथा दक्षिण मनट्राजके अनेक असभ्यों और तेनिबल्ली ज़िलेके परवर नामक कैवर्तोंने सेण्टजे वियरसे दीक्षा ली थी। दाक्षिणात्यके वे लोग आज भी सेण्टजे वियर पर अतिशय भक्तिश्रद्धा रखते और अपनेको 'जेवियरके सन्तान' कहते हैं।—जेसुट समाजमें सेण्टजे, वियर अतिशय सम्मानित हैं। उन्होंने भारतवर्ष व्यतीत भारत-महासागरके द्वीपपुञ्ज और जापानमें भी ईसाई धर्म चलाया था। अन्तसमय चीन राज्यमें धर्म चलानेके लिये गये और वहा जा अनाहार अनिद्रासे १५५२ ई॰ की २२वीं दिसम्बरको नाङ्गकिन नगरमें कालके ग्रास पतित हुये। १५५४ ई॰ की १५ वीं मार्चको उनका अस्थि मंगाकर गोया नगरके रौप्याधारमें रखा गया।—१५४९ ई॰ को उक्त तेनिवल्ली ज़िले में एण्टानिओ-क्रिमिनल नामक एक विख्यात जेसुट किसी भारतवासीके हाथों निहत हुआ था। उसके पर वर्ष भी अनेक संभ्रान्त जेसुटोंने धर्म चलाने आ विषम शास्ति उठायी। १५५० ई॰ को बम्बई प्रदेशके अन्तर्गत थाने नगरमें जेसुटों का एक धर्मालय बना। इस स्थानमें विस्तर असभ्यों को ईसाई धर्मको दीक्षा मिली। {{smaller|थाना देखो।}}
१६०६ ई॰ में राबर्ट डि नोबिली नामक एक सम्भ्रान्त जेसुट इटलीसे मन्द्राजके उपकूल आये। उन्होंने जिस प्रकार यहां आकर ईसाई धर्म चलाया, वह बहुत ही बहुत और कौतूहलोद्दीपक था। उन्होंने सोचा,—'भारतवासी हिन्दू युरोपोयों से म्लेच्छ की तरह अतिशय घृणा करते हैं, सुतरां कोई उच्च
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हिन्दू सहजमें युरोपीयों के मुखसे धर्म की बात नहीं सुनते। विशेषतः बहुदिनसे वे जिस धर्म और विश्वासपर चलते हैं, उसे भी एककाल सामान्य मानव हटा नहीं सकते।' इसीसे उन्होंने प्रथम भारतका आचार-व्यवहार समझा। वे अपनेको नाम तथा जन्मस्थान छिपा 'रोमक ब्राह्मण' बताया करते थे। फिर उन्होंने अनेक कष्ट उठा सन्यासीके वेशमें ब्राह्मण पण्डितों से संस्कृत और तामिल भाषा सीखी। कुछ दिन बाद नोबिलीका नाम 'तत्त्वबोधस्वामी' पड़ गया। द्राविड़के ब्राह्मणों ने तत्त्वबोधकी 'रोमक ब्राह्मण' मान लिया था। जेसुट सन्यासी उन लोगों के आश्रयसे घूमफिर स्वकार्य बनाने लगे। प्रथम उन्होंने तामिल भाषामें 'आत्मनिर्णयविवेक' और 'पुनर्जन्म आक्षेप' नामक दो ग्रन्थ लिखे। उनमें उन्होंने वेदान्तके मतसे सिद्ध आत्मतत्त्व एवं परलोकका विषय और पुनर्जन्मके सम्बन्धमें पुराणका मत काट डाला। हिन्दू दाशनिकों में बहुतसे उनके ग्रन्थ पढ़कर चिढ़ गये और उनकी बात शास्त्रके विरुद्ध समझ उपहास करने लगे। इसपर उन्होंने निज मतको समर्थन करनेके लिये कल्पित वेद और उपवेद लिखना आरम्भ किया उनके रचित एक कल्पित उपवेदमें लिखा है,—
{{blockcenter|<poem>{{smaller|"ब्रह्मा न ईश्वरी नित्य नावतारश्च निषयः।
न सृष्टिः तस्य जगतः केवलं नररूपकः॥
यथा त्वञ्च तथा स हि विशेषी नास्ति किश्चन।
सृष्टिं नाशं पालनन्तु करीति स स्वयम्प्रभुः।
तस्यावतारी नास्त्येव गुणादि स्पर्शनं तथा॥"}}</poem>}}
ब्रह्मा न तो नित्य ईश्वर, न ईश्वरके अवतार और न जगत्के सृष्टा ही हैं। वे सामान्य मानवमात्र ठहरते है। स्वयम्भू ईश्वर हो सृष्टि, नाथ और पालन करता है। उसमें अवतार किंवा स्पर्शादि गुण नहीं होता।
इसीप्रकार गुरु भावसे जेसुट सन्यासीने हिन्दुओंके धर्मपर आक्रमण किया। अनेक अल्पबुद्धि ब्राह्मणों ने उनके कल्पित वेदपर विश्वासकर और उसे वैदिक धर्म समझ ईसाई धर्म मान लिया था। (ऐसे ही कल्पित वेदका एक पुस्तक श्रीरङ्गके प्रधान देवमन्दिरमें मिला है।)<ref>Asiatic Researches, Vol. XIV. p. 2.</ref>
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{{left|Vol. III. 34}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१३४|ईसाई|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अच्छ्न्नभावसे उनके मध्य हिन्दुओं के धर्ममें ईसाई धर्म मिल गया। इसीप्रकार नोबिलीने ४५वर्ष नङ्गेपैरों सन्यासीके वेशमें रह और मुखपर भस्म लगा सैकड़ों निर्बोध हिन्दुओंको ईसाई धर्मकी दीक्षा दी थी। आज भी 'मन्द्राजके निकटवर्ती अनेक देशी ईसाई नोबिलीको 'तत्त्वबोधस्वामी' और 'सिद्धपुरुष' समझते हैं। ईसाई धर्मप्रचारकोंने लिखा है,—ईसा के अन्यतम शिष्य सेण्ट टोमस और उनके बहुत पीछे सेण्ट जेवियर जो कर न सके, जेसुट सन्यासी रबर्ट-डि-नोबिली उससे शत गुण कार्य करके देखा गये। ईसाई पण्डित मसीमने अपने रचित ईसाई याजकोंके इतिहासमें कहा है,—"भारतमें जेसुट अपनेको ब्राह्मण बताते थे। मनमें आता है, कि जेसुट-याजकोंने असम्भव और भयङ्कर कार्य बनाया था। किन्तु वास्तविक वैसा नहीं हुआ। वे देखनेमें सन्यासी रहे, किन्तु इधर गुप्त भावसे मद्य पीते, मांस खाते और रमणीकी सेवा करते थे।"<ref>Mosheim's Ecclesiastical History</ref>
१६५६ ई॰ में जेसुट-सन्यासी रबर्ट के मरनेपर जेसुटोंने उनके अनुवर्ती बन कुछ दिन ईसाई धर्मको चलाया। उनके प्रलोभनसे मदुरा, त्रिशिरापल्ली, तञ्जोर, तेनिवली, सलेम प्रभृति स्थानोंके अनेक नीच लोग ईसाई धर्ममें दीक्षित हुये।
इधर गोया नगरमें ईसाई धर्माचार्य प्रतिष्ठित होनेपर पोर्तुगीज ईसाई एक ओर भारतमें राज्य और दूसरी ओर असिके बलसे ईसाई धर्म चलाने आगे बढ़े। पोपने युरोपमें जो दारुण दण्डविधि (Inquisition) चलाया, पोर्तुगीजोंके अधिकृत भारतमें भी उसीका नियम निकल पड़ा। पोर्तुगीजोंका अत्याचार भारतमय राष्ट्र बना और इसी दोषके कारण भारतसे पोर्तुगीज पराक्रम चिर दिनके लिये खर्व हुआ। {{smaller|पोर्तुगीज देखो।}}
ई॰ १६वें शताब्दके शेष भागमें युरोपके प्रधान-प्रधान ईसाई जेसुटोंकी धर्मप्रणालीका तीव्र प्रतिवाद करने लगे थे। सकलने हो कहना आरम्भ किया,—"जेसुटोंको प्रकृत धर्मप्रचारक समझ नहीं सकते। वे यहूदियोंसे यहूदियोंके मनोमत बात करते, मुसल-
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मानोमें मुहम्मदकी दोहाई देते बौर हिन्दुओंसे अपनेको ब्राह्मण बताते हैं। ऐसे प्रतारक और स्वार्थपर समाजसे ईसाई समाजका प्रकृत हितसाधन नहीं बन सकता।"
जेसुट अपने धर्मकी नीतिका निगूढ़ रहस्य अपरिचित किंवा स्वदलस्थ किसी व्यक्तिको कभी बताते न थे। प्रोटेष्टाण्टोंके अभ्युदयसे पोपकी असाधारण क्षमता घटी और युरोपके प्रधान प्रधान ईसाई पण्डितों से उनकी अधीनता हटी। उस विलुप्त गौरवके उद्धार करनेके लिये ही जेसुट निःस्वार्थ बन न सके। क्योंकि उनकी धर्मनीतिसे पोप और जेसुट समाजका स्वार्थ लगा था। जेसुटों में असाधारण पण्डित और अनेक महापुरुष उपजते भी केवल स्वार्थके कारण ही उनका अधःपतन हुआ। १६०४ ई॰ में इङ्गलेण्डसे जेसुट निकाले गये। पीछे वे अपर राज्यसे भी ताड़ित हुये। १७७३ ई॰ में क्लेमेण्ट नामक पोपने साधारणके प्रतिवादसे बहुत ही विरक्त ही जेसुट समाज बिलकुल तोड़ डाला था। अनन्तर जेसुट रोमन काथोलिक कहलाने लगे।
जातिभेदका अस्वीकार और सार्वजनिक भ्रातृभावका स्थापन ईसाई धर्मका प्रधान अङ्ग है। आदि ईसाई इसीसे साधारणकी भक्ति एवं श्रद्दाके पात्र बने और इसीसे समग्र युरोपके लोग उनका मत मानने लगे। किन्तु रोमक-समाजके प्रादुर्भाव कालमें यह नियम न रहा। दाक्षिणात्यके अनेक लोगों को ईसाई धर्ममें दीक्षित करते भी वे जातिभेदकी प्रथा रोक न सके। गिर्जामें भी उपासनाके समय उच्चजातिके आगे और नीच जातिके लोग पीछे बैठते, निम्न श्रेणी-वाले बैठनेको आसन पाते न थे। दाक्षिणात्यमें जो उच्च श्रेणीके लोग दीक्षित हुँये, वे नीच जातिवालों पर कर्तृत्व और याजकता रखते; किन्तु नीच जांति-वाले उच्च श्रेणीवालों का कोई कार्य कभी कर न सकते। वस्तुतः दाक्षिणात्य में जो ईसाई हुये, वे नाममात्रके ही ईसाई रहे। उस जातिका प्रधान अङ्ग वर्णभेदकी प्रथा चली जाती थी। आज भी दाक्षिणात्यमें उन्हीं सकल देशी ईसाइयों के वंशधरों ने
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसाई|१३५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
आयः कितना हो पूर्वभाव बनाया है। किन्तु अब ईसाईधर्मका प्रबल स्रोत वह निकला है इसलिये किसी बातका ठिकाना नहीं लगता। इसी भारतवर्ष में देशी और विदेशी मिलाकर चौदह लाखसे ऊपर काथोलिक ईसाई रहते हैं। अंगरेजों के राजत्वसे प्रायः सकल युरोपीय देशों के धर्मप्रचारक भारतमें आ टिके हैं। अधिकांश काथोलिक गिर्जा और ईसाई याजक गोया-वाले धर्माचार्यके अधीन हैं।
{{c|{{smaller|सिरीयक-समाज।}}}}
सिरीयक ईसाई समाज अतिप्राचीन और अन्तियोक तथा जेरूसलमवाले प्रधान धर्मगुरुके (Patriarch) अधीन है। पूर्वकालमें यह समाज अतिशय समृद्धिशाली हो गया था। ई॰ के ४थे शताब्दमें इस समाजके अधीन ११९ बिशप (Bishop) और प्रायः दश लाखसे अधिक ईसाई रहे। आजकल यह समाज मेरोनाइट, याक़ूबी, असली सिरीयक और मेलकाइट (ग्रीक) चार संप्रदायों में विभक्त हो गया है। ई॰ के पञ्चम शताब्दमें ईसा मसीहके अवतार सम्बन्धपर इस समाजमें एक झगड़ा पड़ा। ४४४ ई॰ को यूटिकेस (Eutyches) नामक एक पादरीने कन्स्ताव्तिनोपलमें प्रचार किया—'अवतार होनेसे पूर्व ईसा मसीहका आत्मा ईश्वरसे मिला था; अवतार होनेसे पीछे भी वह पूर्वभाव नहीं गया। ईसाके देव और मानव दोनों प्रकृति रहते भी मानवप्रकृति देवप्रकृतिसे जा मिलती थी।' इसी मतभेदपर सिरीयक-समाजमें विषम तर्क वितर्क खड़ा हुआ। कन्स्तान्तिनोपलके प्रधान धर्मगुरु (Patriarch) फ्लू्रियान्ने एक महासमिति आह्वान की। इस महासमितिने उक्त मत न माना। किन्तु ४४९ ई॰ को जोफेसास् की महासभामें मिशर्-वाले ईसाई उदासीनके प्रबल आन्दोलनसे यूटिकेस्का मत फिर सादर मान लिया गया। फ्लू्रियान् और उनके सहचरका पद घटा था। उस समय सिरीयकसमाजमें उपरोक्त मत ईसाई धर्मके मूलतत्त्वकी तरह चल पड़ा; किन्तु अधिक दिन न ठहरा। कालसिडनकी महासभामें ६५० विशप लोगोंके विचारसे माना गया था,—'पूर्वमत अत्यन्त असङ्गत और ईसाई धर्मके
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विरुद्ध रहनेसे अग्राह्य है। ईसा मसीहको देव और मानव प्रकृति एकत्र निबद्ध है। वस्तु गतिसे कोई प्रभेद नहीं।' यूटिकेस के मतको मानकर उस समय कई समाज बन गये थे। उनके मरनेपर भी उक्त मत सैकड़ोंवर्ष चला। इस समाजके लोगोंमें परवर्तीकाल कोई कोई फिर मोनोफिसाइट (Monophysites) अर्थात् ईसाके एक-प्रकृतिवादी नामसे विख्यात हुये। वही एकप्रकृतिवाद आज भो याक़ूबी (Jacobites) समाजमें चलता है।
यूफाइटों के मत-वैषम्यसे सिरीयक समाजका पूर्व गौरव घटने लगा। शेषमें इसलाम धर्मके अभ्युदयसे अत्यन्त अवनति हुई। ई॰ के ७म शताब्दमें इस समाज-पर अधिक विपद् पड़ी थी। ई॰ के ८म शताब्दों मेरोनाइटोंने मुसलमानोंके अत्याचारसे लेवेनन पर्वतपर रह स्व धर्म बचाया। ये मेरोनाइट ही आदि सिरीयक ईसाई वंशसे उत्पन्न हैं। किसीके मतानुसार ६३० ई॰ को सम्राट् हेराक्लियस् के समय सिरीयक समाजमें मोनोथेलाइट (Monothelite) अर्थात् ईसा के एकेच्छावादी नामसे निकलने और ६८० ई॰ की षष्ठ महासमितिमें ईसाई धर्मका विरुद्धवादी माना जानेसे उठनेवाले सम्प्रदाय के हो ये मेरोनाइट सन्तान हैं। ई॰ के ५म शताब्दको मेरोण-आश्रममें मेरी नामक एक धर्मगुरु रहते थे। उन्हींको इस सम्प्रदाय के अपना प्रधान-जैसा माननेसे 'मेरोनाइट' (Meronite) नाम निकला। मुसलमानोंके आधिपत्यकाल सिरीयक समाजमें केवल मेरोनाइट ही धर्म और स्वाधीनता बचा सके थे। ई॰ के १२श शताब्दको जेरूसलममें रोमक समाज जमनेसे इन्होंने एकेच्छाबाद छोड़ रोमक समाजकी अधीनता मान ली। १५८४ ई॰ को मेरोनाइट याजककी अध्यापनाके लिये रोममें एक विश्व-विद्यालय खुला था। रोमक समाजकी अधीनता मानते भी इस सम्प्रदाय के ईसाई जातीय क्रियाकलाप और आचार-व्यवहारमें सम्पूर्ण अधिकार रखते हैं। सिरीयक-भाषा में उपासनादि कर्म होता है। याजकता करनेसे पूर्व विवाहित होनेपर याजक पत्नीके साथ रह सकता है, किन्तु याजकता पाने पर विवाह
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१३६|ईसाई|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
करनेका अधिकार नहीं रखता। इस समाजको प्रति दशम वर्ष पोपसे धर्मराज्यकी आभ्यन्तरिक अवस्था बताना पड़ती है।
याक़ूबी या जाकोबाइट (Jacobite) सम्प्रदायके लोग पहले आदि-सिरीयक समाजका मत मानकर चलते थे। याकूब-बरदाई (Jacobus Baradaeus) नामक एक सिरीयक यति इस सम्प्रदायके थे। उन्होंके नामपर यह सम्प्रदायं याक़बी कहाया है। इसका पूर्वनाम मोनोफिसाइट (Monophysite) अर्थात् एक-प्रकृतिवादी है। मोनोफिसाइटोंके मतसे ईसाकी प्रकृति एक ही रही, मानवप्रकृति ही क्रमसे दैवी प्रकृति बन गयी। नेष्टोरियास्के मत विरुद्ध प्रथम यह मत निकला था। यूटिकेस्का मत उठनेपर कालसिडनकी सभासे ही मोनोफिसाइट नाम चल पड़ा। इस सभामें स्थिर हुआ था,—'ईसामें एकाधार दो प्रकृति विद्यमान हैं। उनका परिवर्तन वा विभाग कोई समझ नहीं सकता।' किन्तु साधारण सिरीयक ईसाइयोंका मन इस बातसे बिगड़ गया था। तर्क-वितर्क, वाद-प्रतिवाद, विरुद्धवादियोंमें परस्पर लड़ाई झगड़ा लातजता और शेषमें लाठी-सोटा चलने लगा। ई॰ के ६ठे शताब्दको मोनोफिसाइट सम्प्रदाय आदि सिरीयक समाजसे पृथक् हुआ। उसके पीछे सम्राट् जष्टिन् और जष्ठिनियान्के इस सम्प्रदायको छोड़ रोमक-समाजमें जा मिलनेसे इन लोगोंपर बड़ा गड़बड़ पड़ा था। इनमें परस्पर एकता न रही। फिर इस उनमें एक समाजसे कितने ही नूतन दल निकले थे। दलका नाम 'अकेफोलोई' (Akepholoi) पड़ा। ५१९ ई॰ को विषम तर्क उठा था—ईसाका शरीर भ्रष्ट है या नहीं। अन्तियोकके सेबेरास् नामक पदच्युत बिशपके शिष्योंने (Seberians) प्रचार किया, ईसाका शरीर भ्रष्ट है। उधर गजनास नामक बिशपके शिष्य (Gajanites) कहते फिरे,—ईसाका शरीर कभी भ्रष्ट नहीं। इसीप्रकार प्रथम दल 'फर्तीलोद्रिष्ट' (Phthartolotrist) अर्थात् भ्रष्टोपासक और द्वितीय दल 'अफर्तोदोसिटी' (Aphthartado-cete) अर्थात् पूतदेह-पूजक वा शिक्षक कहाया।
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द्वितीय दलने फिर तर्क उठाया था,—ईसाका देह सृष्ट है या नहीं? 'अकतिस्ते तोई' (Aktistetoi) अर्थात् असृष्टिवादीने कहा—सृष्ट नहीं। 'किष्टोलद्रिष्ट' (Kistolatrist) अर्थात् सृष्टिवादीने प्रमाण करके देखा दिया—हां सृष्ट है।
इन लोगोंमें फिर 'अग्नितोई' (Agnœtoi) नामक तीसरा दल निकला था। उसने प्रचार किया,—ईसा मानव नहीं, सर्वशक्तिमान् थे। ५६० ई॰ को एकप्रकृतिवादीमें अस्कुनगेश (Askunages) नामक एक व्यक्ति और उनके पीछे फिलोपोनस् (Philoponus) नामक किसी पण्डितने घोषणा की,—ईश्वर, ईसा और दिव्यात्मा तीनों अलग-अलग स्वतन्त्र हैं। किन्तु इस मतको एकप्रकृतिवादीने ईसाई धर्मके विरुद्ध समझ माना न था। मिशर, सिरीया और मेसोपोटेमिया प्रभृति स्थानों में उक्त मतावलम्बी बहुत दिनतक प्रबल रहे। ये अलेकज़न्द्रिया और अन्तियीकके धर्मगुरुका धर्मानुशासन स्वीकार करते थे। ई॰ के ६ शताब्दमें याकुब बर्दाइयोंके अभ्युदयसे उन्होंने स्वाधीन समाज बना लिया। उनमें कोई-कोई जर्मनी समाजसे जा मिला था ।
आदि-सिरीयक ईसाई पोपका प्राधान्य नहीं मानते। उनकी बाइबिल सिरीयक भाषामें लिखी है। उसीके द्वारा उपासनादि कर्म होता है। दूसरा धर्मकाण्ड ग्रीक-समाज-जैसा है। उनके पुरोहित याजक होनेसे पूर्व विवाह कर सकते हैं, किन्तु पीछे नहीं। उन्हें द्वितीय दारपरिग्रह करनेका भी अधिकार प्राप्त नहीं। बिशपों को एकबारगी हों विवाह करना मना है। वे सिद्धपुरुषका चित्र रखते और उसका स्तव करते हैं। रमणी बहुत धर्मशीला होती हैं। स्त्री-पुरुष उभय उपवासादि किया करते हैं, किन्तु उनकी संख्या अति अल्प है।
{{c|{{smaller|नेष्टोरियान (Nestorians)}}}}
ई॰ के ५वें शताब्द सिरीयक-समाजमें नेष्टोरियास नामक एक महामाने जन्म लिया था। उनके वाक्पटुता और सदुपदेशसे देशोय सकल लोग सुन्ध हुये। ४२८ ई॰ को वह कनस्तान्तिनोपस्तके धर्मगुरु
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(Patriarch) बने थे। उक्त उच्चासन मिलनेसे अल्पकाल पीछे ही ईसाके देव और मानव प्रकृति-सम्बन्धपर घोरतर तर्क चला। अनाष्टसिया नामक एक पुरोहित नेष्टोरियाके साथ कनस्तान्तिनोपल पहुंचे थे। एक दिन उन्होंने उपदेश देते समय कहा,—कुमारी मेरी ईश्वर वा देवपुरुषकी माता हो नहीं सकती, वह मानव ईसाकी माता हैं। इस बातको सुनकर अनेकोंने समझा, कि वह नेष्टोरियाका मत था। नेष्टोरियाने अपनी बात समर्थन करनेके लिये घोषणा की—'ईसाकी दोनों प्रक्ततिमें भेद है। उनका देह मानवप्रकृतिसे बना, किन्तु उनका उपदेश देवप्रकृतिसे छना है।' उस समय ईसाई जगत्में इस बातपर तुमुल आन्दोलन उठा था। अलेकज्रन्द्रियाके धर्माचार्य सेण्टसाइरिल उनसे बिगड़ पड़े। फिर रोमसे बिशप सिलेष्टाइनने नेष्टोरियासे कहला भेजा,—यदि तुम अपना मङ्गल चाहो, तो शीघ्र ही इस दुष्ट मतको छोड़ो। किन्तु नेष्टोरियाने किसी बातसे महासभामें पदच्युत होते भी अपना मत न छोड़ा। इसलिये कनस्तान्तिनोपलके एक धर्माश्रममें चार वर्षतक वह कैद रहे थे। किन्तु उससे भी उनका विश्वास किसो प्रकार न घटा। अतःपर वह मिशरकी महामरुभूमिमें निर्वासित किये गये।
नेष्टोरियाके मत मानने वाले व्यक्तिको ही नेष्टोरियान् (Nestorian) कहते हैं। आजकल नेष्टोरियान् एक पृथक् समाज समझा जाता है। इफेसास्की सभासे पदच्युत होने पर भी नेष्टोरियाका मत आसोरिया, पारस्य प्रभृति नाना स्थानोंमें बढ गया था। अल्प दिनमें रोमके शासनाधीन सकल स्थानोंसे उठ जाते भी ईरान, अरब, भारतवर्ष प्रभृति नम्ना स्थानमें नष्टोरियान् समाज स्थापित हुआ। सिरीय भाषामें लिखित एक शिल्पलिपि द्वारा मालूम पड़ा है,—ई॰ के ७वें शताब्दमें नेष्टोरियान् ईसाई चीन राज्यमें धर्मप्रचार करने गये थे। तुर्कस्थानमें खलीफ़ावों और मध्य एसियामें मुग़ल बादशाहोंने ने नेष्टीरियानोंको आश्रय दिया। प्रसिद्ध चङ्गज़ खान्की पत्नी एक नेष्टीरियान्-कन्या थीं। सुनते हैं- मध्य एसियासे
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नेष्टीरियान् धर्मग्रहण करने वाले मुगल बादशाहोंमें कराकोरमके अधिपति अवङ्गखान् प्रधान थे। चङ्गजखान्से हारने पर उन्होंने अपने को प्रष्टरजीभाओ (Prester John) अर्थात् जोहन (नामक) याजक बताया था।
ई॰ के १६वें शताब्द की नेष्टोरियान् समाजमें कुछ गड़बड़ पड़ा था। उस समय कितने ही लोगों ने वाध्य ही पोपकी अधीनता स्वीकार की। आजकल उन्हें कालदी ईसाई कहते हैं। वे सकल ही प्राचीन मत मानते हैं। कुर्दिस्थानके पार्वतीय राज्यमें इस समय प्रधानतः नेष्टोरियान् रहा करते हैं। किन्तु वे दरिद्र और मूर्ख हो गये हैं। उनके पुरोहित और निम्न श्रेणीके याजक विवाह कर सकते हैं। विवाहादिमें धर्माचार्यका मत लेना पड़ता है। वह मृतको मूर्तिके उद्देश्यसे स्तवपाठ करते और सिवा क्रशके ईसाको दूसरी मूर्ति नहीं पूजते।
भारतवर्षमें भी बहु दिनसे नेष्टोरियान् देखाते और वे दक्षिणापथके मलबारमें जिरोयक ईसाई कहाते हैं। त्रिवाङ्गड़में सिरीयक ईसाथियोंके सन्तान आज-कल 'नसरानी मापिल्ला' नामसे अभिहित हैं। इसके सम्बन्धमें कुछ मतभेद है—किस समय भारतमें सर्वप्रथम ईसाई आये। किसी-किसी मतसे ईसा मसीहके अन्यतम शिष्य सेण्ट टोमस अरब, ईरान् आदि स्थानोंमें धर्मप्रचार कर ६५ ई॰ को भारत पहुंचे थे। उन्हींसे यहां सिरीयक ईसायियोंकी उत्पत्ति है।
दाक्षिणात्यके 'नसरानी मापिल्लों' और नीच जातीय ईसायियों में अनेक सेण्ट टोमसकी धर्मपिता एवं बहुतसे लोगों को दिसम्बरी सेण्ट माइलापुर नामक खास ईसा मसीह समझते हैं। विश्वास है—६८ ई॰ को २१ वीं टोमस हो मन्द्राजके पार्श्ववर्ती स्थानमें ब्राह्मणों को उत्तेजनासे हिन्दू अधिवासोकर्तृ क निहत हुये थे। कोई कोई कहता है—पारस्यवासी मनिके शिष्य टोमस-मनिकोयने (Thomas the Manichœan) ई॰ के ३रे शताब्दमें भारत पहुंच अभिनव ईसाई धर्म चलाया था। दाक्षिणात्यवासी टोमस उन्हीके शिष्य हैं।
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एक दूसरा प्रवाद है—'ई॰ के ८वें शताब्दमें टोमस काना नामक एक जर्मनी बणिक् मलबार उपकूलपर बाणिज्य करने आये थे। उन्होंने दो सुन्दर केरल रमणीसे विवाह किया। देशी राजगणसे सद्भाव रहा। उन्होंने देखा—पूर्व मलबार उपकूलपर जो ईसाई थे, वे हिन्दुओं के अत्याचारसे एककाल ही विलुप्त हो गये है। अति अल्प संख्यक देशीय ईसाई वनमें पर्वत-पर गुप्त जीवन बिताते हैं। उनके मनमें ईसाई धर्म चलानेकी आयी। देशीय राजगणसे उन्होंने अनुमति ले ली—ईसाई स्व-स्व धर्मकी प्रथासे जो कार्य करेंगे, उसमें देशी लोग कोई बाधा डाल न सकेंगे। राजगणकी अनुमतिपर उन्होंने वन पर्वतसे ईसाइयोंकी फिर ला मलबारमें बैठा दिया। टोमस स्वयं उनके प्रधान धर्माचार्य बने थे। उसी समयसे यहांके ईसाई अपनेको टोमस के शिष्य बताने लगे।
उपरोक्त तीनों टोमसों पर ही झगड़ा है। इसमें कोई सन्देह नहीं, कि शेषीक्त टोमससे भी पूर्व-भारतमें ईसाई धर्म आ घुसा था। ई॰ के ३रे शताब्दमें हिपोलिटस्ने (Hippolytus, Bishop of Portus) लिखा है, ईसाके बारह प्रधान शिष्यों में सेण्ट बार्थलमेड (St. Bartholomew) ईसाई धर्म चलाने भारत गये थे। फिर सेण्ट, टोमस पारस्य और मध्य-एसियामें ईसाई धर्म चला शेषको भारतके 'कालमिना' नगर पहुंच मरे। ५४७ ई॰ को कोसमोस् इण्डिकोप्प्रुष्टेस्ने (CosmosIndico-pleustes) भी लिखा हऐ—मलबार के बिशप पारस्यसे नियुक्त हुये। किन्तु उन्होंने सेण्ट टोमसका नाम नहीं लिया। यदि ईसाके शिष्य सेण्ट टोमससे मलबारवासी ईसाइयों का कोई संस्त्रव रहता, तो अवश्य ही उन्होंने लिख दिया होता। इससे समझ पड़ता है—ईसाके शिष्य सेण्ट टोमस मलबार उपकूलमें अपना धर्म चलाने आये न थे। फिर भी उत्तर भारतके किसी स्थानमें वे मरे होंगे।
मन्द्राजके पार्श्वपर सेण्ट टोमस नामक एक पर्वत है। यहां प्राचीन पहलवी भाषानें क्रशपर खुदी एक
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लिपि निकली है। साधारणका विश्वास है—इसी पर्वतके पास सेण्ट टोमस मारे गये थे। किन्तु उक्त खुदी पह्लवी लिपि द्वारा अनायास ही मालूम पड़ता है—पारस्यवासी मनिके<ref>कारविकास् नामक एक साधारण मनुष्य थे। जब उनका वयस सात वत्सर हुआ, तब वाबिलनकी किसी विधवा रमणीने उन्हें मोल ले अपने घर रखा। विधवा मरने पर क्रीतदास कारविकास उसकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी बने। अतुल ऐश्वर्य पाकर उन्होंने अपना पहला नाम बदला और नये मनि नामसे परिचय दिया। फिर वे पारस्य-राज्यमें आकर रहने लगे। अपनी प्रतिपालिकाके साहाय्यसे मनिको विशेष शिक्षा मिली थी। पारस्यमें रह मनिने इञ्जील (New Testament) और अपरापर ईसाई धर्मके गन्थोंको पढ़ा, तथा ईश्साई धर्मके संमिश्रणसे पारसीक एवं बौद्ध धर्मका कितना ही मतामत जुटा एक अभिनव ईसाई सम्प्रदाय स्थापन करनेका उद्योग लगाया। ग्रह उद्देश्य साधन करनेके लिये उन्होंने अपनेको ईसाका प्ररित शिष्य वा दूत (Apostle) बताया था। इससे भी सन्तुष्ट न हो उन्होंने कहा,—'में वही पाराक्लिट हूँ, जिसे ईसा मसीहने भविष्यत्में भेजनेकी प्रतिज्ञा की थी। मेरे देहमें दिव्यात्मा स्वाधीन भावसे रहता है।'<br>{{gap}}क्षमता देखकर पारस्य-राजने उन्हें निज युवकी चिकित्सामें लगाया था। किन्तु राजपुत्रकी आरोग्य कर न सकनेसे पारस्यराजने उन्हें कारागार में डाल दिया। कारागारसे मनि कौशलपूर्वक भागे, किन्तु फिर पकड़ लिये गये। २७७ ई॰ को जोनदिशापुर में पारस्यराजके आदेशसे मनिक। वध हुआ। शरीरका चर्म घातकन खींच उधेड़ डाला था। अद्दास, टोमस, हरमूज प्रभृति कई शिष्य उनका निकाला मिश्रित ईसाई धर्म चलाते रहे। उनके प्रवर्तित ईसाई सम्प्रदायका नाम मनिकीय (Manichacan)है।<br>{{gap}}यह सम्प्रदाय वर्तमान ईसाई समाजसे अनेक विभिन्न है। मनिने प्रचार किया था,—इस दृश्यमान और अदृश्यमान जगत्के केवल दो मूल कारण हैं, एक सत् वा आलोक (सूक्ष्मप्रकृति Good or light) और दूसरा तमः (जप्रकृति Evil or Darkness)। मनिकीय उसी बातको मानते हैं। मनिकीयोंके मत में आत्मा सूक्ष्मप्रकृति भीर शरीर जड़प्रकृतिसे उपजा है। यह शक्तिद्वय अनन्तत्र्यापी सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरका भ्रंशमाव है। एकमाव ईश्वरसे ही सत्यक्तिका (Light) मूलकारण निरूपित होता है। तामसिक शक्ति (Darkness) का राज्य एकमाव प्रेत वा शैतान् (Demon) द्वारा परिचालित है। परस्पर विरोध बढ़नेपर ईश्वरने प्रतको स्वर्गराज्यसे निकाल दिया था। प्रेतने तमीराज्यसे आदि मानव (Adam and Eve) को बनाया। प्रेत द्वारा बनाये जानेसे ही मनुष्यके शरीरमें पाप और आत्मामें पुण्यम आश्रय लिया। आत्मा भी क्रमशः पापके संश्चवसे कलुषित हो गया। कलुषित मानवके लिये ईत्ररम् पहले पृथिवी और पीछे देहपिञ्जरसे आत्मा निकालने तथा</ref> शिष्य सेण्ट टोमसने ही
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसाई|१३९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
दाक्षिणात्य में सर्वप्रथम ईसाई धर्म चलाया था। दाक्षिणात्यवासी देशों ईसाई उन्हींको अपना धर्मपिता और ई॰ के १४वें शताब्दसे पूर्वावधि स्वयं ईसा मसीह जैसा समझते थे। वे पारस्यसे आये नेष्टोरियान बिशपकी आज्ञाके अधीन थे। ई॰ के ७वें शताब्दमें पारस्यके ईसाई समाजने अपनेको टोमस ईसाईके नामसे अभिहित किया, जिसके अनुसार मलवारस्य अन्त ईसाइयोंने भी अपना नाम 'टोमस ईसाई' रख लिया। मलवारस्य ईसाइयोंकी संख्या अधिक रहते भी देशी लोगोंके उत्पीड़नसे अवस्था अत्यन्त शोचनीय
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{{smaller|पापसे उक्त स्वर्गीय पदार्थ बचानेके लिये ईसा मसीह एवं दिव्यात्माको बनाया था। पवित्रात्मा (Intelligences) के मध्य ईसा मसीह भी एक जन हैं। वे सूर्यलोकमें रहते थे। फिर मानवका पाप छोड़ाने और आत्माकी मुक्ति बनानेको यहूदियोमें मनुष्यके शरीरपर ईसा अवतीर्ण हुये। यहूदियोंने तमोसे अन्धे बन उन्हें क्रूशपर चढ़ाया था। किन्तु उनका मरण न हुआ, उन्होंने मानवका पाप निज रक्तसे धो डाला। पृथिवीके सकल कार्य शेष कर पुनरुत्थानपूर्वक ईसा निज राजा सूर्यलोकको चले गये। उन्होंने जाते समय निज धर्म चलाने और निज शिष्यको सान्त्वना पहुंचाने के लिये दूतस्वरूपसे पाराक्लिट भेजने की बात कही थी। मनि ही ईसाके प्रेरित वे सान्त्वनाकारी दूतरूप पाराक्लिट रहे।<br>{{gap}}मनिके मतानुसार आत्मा चन्द्रलोक और सूर्यलोकसे पाप छोड़ाने पर परमपुरुषमें समाता है। मनिकीय ईसाके देहका पुनरुत्थान नहीं मानते। उनके मतसे पापी आत्मा स्वर्गलोककी जा नहीं सकता, किसी पशुदेहमें पहुंच जीवरूपसे जन्म लेता है। बाइविलका मूसा कृत धर्मशास्त्र ईश्वर-प्रयोदित नहीं, एकमाव प्रेत हो उसका प्रणयनकर्ता है। इसीसे कोई बाइबिलके भ
आदिशास्त्रको नही मानता। धर्मपरायण मनिकीयोंको मांस खाना मना है। उन्हें वानप्रस्थ ले चिरदिन ब्रह्मचारी को तरह रहना पड़ता है।<br>{{gap}}मनिकीयोंमें धर्मनिष्ठ और अल्पधी दो प्रकारके ईसाई होते हैं। धर्मनिष्ठ ईसाई मांस, डिम्ब, दुग्ध, मत्स्य, मद्य एवं अपरापर मादक द्रव्य नहीं खाते और रोटी, दाल, तरकारी तथा फलमूलादिसे अति कष्ठके साथ अपना काम चलाते हैं। कामक्रीधादि षड़रिपुको मारना ही उनका मुख्य उद्देश्य है। अस्पधी दुर्बल ईसाई स्त्री-पुत्रके साथ सकल-अकार सुख उठा सकते हैं। उनके धर्मसमाजका कार्य देखनेकी एक सभापति (ईसा मसीहके प्रतिनिधिस्वरूप), बारह प्रधान (ईसा के दूत-खरूप) और बारह बिशप रहते हैं। उनके नीचे अन्यान्य याजक हैं। वे ईसाई सम्प्रदायकी दीक्षा और शेषभीलपर्व (Eucharist) को मानते हैं। मनीकीय रविवार, ईसाके पुनरुत्थान (Easter) और यहूदियोंके पेष्टिकट (Pentecost) पर्वादिमें उपवास करते हैं।}}
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हो गयी थी। ६६० ई॰ को धर्माचार्य जेसजावुसने (Jesajabus) पारस्यके प्रधान ईसाई याजकको एक पत्र लिखा। उसके पढ़नेसे समझ पड़ता है—ऐसा कोई आदमी न था, जो मलबार उपकूलके देशों ईसायियोंको भलीभांति उपदेश देता। ई॰ के ८वें शताब्दमें अर्मनी टोमसने लिखा था,—मलबार के ईसाई वन्यपशुको तरह वन और गिरिगह्वरमें रहते हैं। ई॰ के १४वें शताब्दमें जोदेनास्ने (Friar Jordanus) देखा था—वे नाममात्रके ईसाई हैं, उनमें दीक्षा (Baptism) नहीं। आज भी कनाड़ा प्रदेश के अनेक असभ्य हिन्दुओंमें ईसाई धर्मके चिह्न मिलते हैं। इससे बोध होता है—'वे सकल असभ्य अनेक दिन ईसाई रहे होंगे। उन्होंने हिन्दुओं का भय अथवा अपनी शोचनीय अवस्था देख और हिन्दुयोंके समाजमें समानेका कोई उपाय न पा क्रम-क्रमसे हिन्दूधर्म पकड़ा होगा।' वास्को-डि-गामाके आनेसे पहले मलबारी ईसाई स्थानीय न्नृपतिके अधीन सैनिक विभागमें घुस सके। उस समय धर्मकर्म चलानेकी नेष्टोरियान् विशप, याजक, पुरोहित प्रभृति लगे थे। पोर्तुगीज़ नौसेनापति भारतमें जहां प्रथम उतरे, वहीं ईसाई उनसे जा मिले। पोर्तुगीजोंके साथ जो सकल याजक रहे, वह उक्त ईसाइयोंको काथोलिक समाज में मिलानेको चेष्टा करने लगे। उनको उत्तेजनासे १५६० ई॰ को भारतमें पोर्तुगीजोंके अधिकृत स्थानपर विधर्मियोंका विचारालय खुला था। अनेक तर्कवितर्क पर इतना विसम्बाद बढ़ा, कि बहुतोंको स्वामत रक्षार्थ रक्त बहाना पड़ा।
१५९९ ई॰ को कोचीनके निकटवर्ती उदयम्पूर नगरमें गोयाके प्रधान धर्माचार्यने (Arch-bishop) एक महासभा लगायी थी। वहां विस्तर आलोचनाके बाद सिरीयक ईसाई रोमक समाजमें मिल गये।<ref>उसी समय पोर्तुगीज राजप्रतिनिधियोंने भारतके सब बन्दरोंमें इसलिये प्रहरी बेठाये, जिसमें पारस्यसे किसीप्रकार नेष्टोरियान् विशप आने न पाये।</ref> इसी प्रकार भारतसे नेष्टोरियान् समाज उखड़ा था। सिरीयक ईसायियोंने रोमक-समाजकी अधीनता
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१४०|ईसाई|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मानते भी अपना कर्मकाण्ड न छोड़ा। वे आज भी। सिरीयक भाषामें ही उपासना किया करते हैं।
१६६५ई॰ को अन्तियोकके धर्माचार्यने अनाथ सिरीयक समाजकी रक्षा करनेके लिये भार-ग्रेगरी नामक एक विशपको भारत भेजा था। मलबारमें पहुंचने पर अनेक सिरीयक ईसाइयोंने मार-ग्रेगरीका मत पकड़ लिया। उस समय सिरीयक ईसाई दो भागमें बंट गये थे। उनमें एक दलका नाम 'पजहेइया कुत्तकार' अर्थात् प्राचीन समाज है। उदयम्पुरकी महासभासे ही 'पजहेइया कुत्तकार' की उत्पत्ति है। इस समाजके सिरीयक ईसाई पोपका प्राधान्य मानते हैं। फिर मार-ग्रेगरीसे 'पुत्तेन कुत्तकार' अर्थात् नूतन समाज निकला है। नूतन समाज याक़ूबी धर्ममतपर चलता है। इस दलके सिरीयक ईसाई रोमके बिशप और नेष्टोरियास् पर अनेक दोष लगाते हैं। उनके मतसे क्रूशारोपके पूर्वरात्र ईसाके सशिष्य भोजोपलक्ष्यपर ईसाई समाजमें होनेवाले पर्वके दिन जो रोटी और शराब बंटती है, वही ईसाका प्रकृत शरीर तथा रक्त ठहरती है। भारतके सिरीयक ईसाई अधिकांश धीवर और नौकाजीवी हैं।
{{c|{{smaller|ग्रीक-समाज।}}}}
ईसाई सम्प्रदायमें ग्रीक समाजका कर्मकाण्ड और मतामत स्वतन्त्र है। ईसाइयोंमें इस स्वतन्त्र समाजके जमनेका कारण यह है—ग्रीक ईसाइयोंने रोमके एक मात्र पोप और उनके बनाये नियमसे विरुद्ध नाना तर्कयुक्ति लगा अपनेको विभिन्न बना लिया है। आजकल ग्रीक, ग्रीसीय द्वीपपुञ्ज, वालेसिया, मोल-दाविया, मिशर, आबिसीनिया, न्यूबिया, लिबिया, अरब, मेसोपटेमिया, सिरीया, साइलिसिया, पालेस्तिन, रूस-साम्राज्य, अष्ट्राकान, कासान, जर्जिया प्रभृति स्थानवासी अधिकांश व्यक्ति इस समाजमें आ मिले हैं। यह समान तीन शाखामें बटा है। उनमें १म कनस्तान्तिनोपलके धर्मगुरु, २य ग्रीकराज और ३य शाखा रुसी जारके अधीन है।<ref>सम्पुति रुसियोंने जारको बन्दी बना अपने देशमें साधारणतन्त्र चलाया है।</ref>
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किन्तु पोपकी धर्मप्रणालीपर गड़बड़ पड़ा था। ई॰ ८वें शताब्दके मध्य भागमें (८६२ई॰) पोप निकोलास्ने जेरूसलमके धर्मगुरु फोटिउस्को (Photius) अपने समाजसे निकाल दिया। फोटिउम्रने उसी कारण एक साधारण धर्मसभा लगायी। इस सभा में रोमक-समाजके प्रवर्तित कई मतपर विचारकार्य आरम्भ हुआ था—
१म—रोमक-समाजके मतमें ईश्वर और तत्पुत्र ईसासे दिव्यात्माने अवतरण किया है। किन्तु ग्रीक-समाज इस बातको नहीं मानता। इसके मतानुसार दिव्यात्मा एकमात्र ईश्वरसे ही अवतीर्ण होता और तत्पुत्र कहाता है अथवा ईश्वरके पुत्र ईसामें हो दिव्यात्मा देखाता है।
२य—याजक विवाहादि सांसारिक धर्म चला न सकेंगे, केवलमात्र ब्रह्मचर्यको पकड़े रहेंगे।
३य—पुरोहित दीक्षाके बाद किसी व्यक्तिका धर्मसंस्कार कर न सकेंगे।
इसी प्रकार कई मतविरोधसे रोम और कनस्तान्तिनीपलका धर्मसमाज पृथक् हो गया। फिर ८६९ ई॰ में सम्राट् बेसिलने एक सभा लगा उभय सम्प्रदायके मध्य शान्ति और एकताकी स्थापन किया था। सर्व समाजका शीर्षस्थान रोम रहने और कनस्तान्तिनीपल अधीन बननेसे पोपके किये कार्यकलापपर हस्तक्षेप करनेकी विशेष असुविधा पड़ने लगी। पोपके गर्व और औद्धत्यसे धीरे धीरे ग्रीक ईसायियोंका मन श्रद्धाहीन हो गया था। शेषका १०५४ ई॰ में कनस्तास्तिनोपलके धर्मगुरु माइकेल केरुलेरियास् ने (Michael Cerularius) ईसाकी मृत्यु स्मरण रखनेके लिये शेष भोजपर्वको (Eucharist) ख़ालिस रोटीके (Unleavened bread) व्यवहार, रविवारको क्रियाकलापके अनुष्ठान, शनिवारको उपवासके शुभकार्य और यहूदियोंके साथ एकत्र वासकी बात उठा विवाद बढ़ाया। इसी समय पोप ९म लिओने केरुलेरियास को धर्मच्युत किया और समस्त ग्रीक धर्मप्रणालीको मिथ्या कह दिया। परिशेषपर उन्होंने निज दूत द्वारा साण्टा-साफियाके
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईसाई|१४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
धर्मगुरुको पदच्युत किया। इसमें ग्रीक विद्वेषानल से जलने लगे थे। बस! चिरकालके लिये रोमक-समाजसे ग्रीक समाज स्वतन्त्र हुआ
ग्रीक समाजके लिये ईसायियोंको निम्नलिखित व्यवस्थाके वशीभूत हो चलना पड़ता है,—
१, पोपका प्राधान्य कोई न मानेगा। ग्रीक ईसाई रोमकसमाजको यथार्थ काथोलिक समाज न समझेंगे।
२, तीन वत्सरसे न्यून वयस रहते पुत्रादिको दीक्षा देना नियमविरुद्ध है। फिर अट्ठारह वत्सर तक दीक्षा दे सकते हैं। तीन बार जर्दन नदीका जल मत्थे पर छिड़क देनेसे ही दीक्षा हो जाती है।
२, ईसाके सशिष्य भोजपर्वमें (Lord's Supper) रोटी और शराब रहना चाहिये । दीक्षाके पीछे ही पवित्र भोज-सम्बन्धीय द्रव्य पुत्रादिको देना पड़ता है।
४, रोमक समाजकी भांति पापका प्रायश्चित्त करनेकी कोई मुद्रा निर्धारित नहीं।
५, रोमन काथोलिकोंके मतसे देह छोड़नेपर पाप चालनके लिये जो स्थान होता, उसे ग्रीक समाज नहीं मानता; तथा मृतके शेष विचारसे कल्याण होनेकी भावनापर ईश्वरकी उपासना करता है।
६, ईश्वर और मनुष्यके मध्यस्थ समझ ग्रीक ईसाई पुण्यात्मा साधु (Saint) लोगोंको पूजते हैं।
७, रोमक समाजका धर्मसंस्कार (Confirmation), विपजनक रोगमें पवित्र तैलम्रक्षण (Extreme unc-tion) और विवाहबन्धन (Matrimony) छोड़ा गया है।
८, चुपके चुपके पाप मान लेनेको ईश्वर आदेश नहीं देता।
९, ईसाकी मृत्युसे पूर्वका भोजपर्व (Eucharist) धर्मकाण्डमें गिना नहीं जाता।
१०, रोगी एवं बलिष्ठ व्यक्ति उभय भोजके अंशका अधिकार रखते हैं। किन्तु जो पुरोहितके (Con-fessor) निकट पापको स्वीकार करता है, उसे उक्त अंश बांटकर देना नहीं पड़ता। क्योंकि धर्मविश्वासी व्यक्ति मात्र इस भोजका अंश पानेके उपयुक्त होते हैं।
११, केबल एकमात्र ईश्वरसे ही दिव्यात्मा आविर्भूत होते हैं।
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{{gap}}१२, अट्टष्टवाद पर विश्वास रखना चाहिये।
१३, गिर्जामें ताम्र एवं रौप्यके फलकपर मेरी और उनके पुत्र ईसाकी प्रतिमूर्ति खोदाकर रखना ग्रीक समाजका मुख्य कर्तव्य है।
१४, धर्मालयमें नियुक्त होनेसे पूर्व पुरोहित विवाह कर सकते हैं। किन्तु विधवा-विवाह करनेपर कोई याजक बन नहीं सकता।
१५, कितने ही पर्व के दिन उपवास करना चाहिये।
१६, मृत्युके पूर्वभोज (Lord's Supper) की-रोटी और शराब ईसाके मांस एवं रक्तका रूपान्तर समझी जाती है।
१७, गिर्जामें किसी प्रकारका वाद्ययन्त्र आवश्यक नहीं। केवल गानसे ही उपासना होती है।
१८, यहूदियोंके पेण्टे कोष्ट (Pentecost) पर्व पर घुटने टेक भजना और अपर सकल ही समय खड़े होकर उपासना करना पड़ती है।
१९, सभी को क्रूश पहनना चाहिये।
२०, स्त्री-पुरुष उभय ब्रह्मचर्य अवलम्बन कर सकते हैं।
तुर्कराज्यके अधीन ग्रीसराज्य जानेपर यह धर्म समाज अतिशय विशृङ्खल हो गया था। उस समय कनस्तान्तिनोपलके धर्माचार्य ही ग्रीक और रूसी समाजके दलपति बने थे। पीछे पोटर दी ग्रेटने (Peter the Great) यह प्रथा उठा डाली। फिर ज़ार द्वारा निर्वाचित धर्मसमितिने रूस राज्यके धर्मसमाजका कार्य चलाया। १८२९ ई॰ को स्वाधीन होनेपर ग्रीसके सभापत्ति कापोदिस्त्रियस्ने नूतन राज्य की भांति समाजको भी पृथक् कर लिया था। आजकल समग्र ग्रीस राज्यका धर्मकार्य सिर्फ दश बिशप चलाते हैं।
धर्मविषयमें पोपका एकाधिपत्य मान और अपने अपने समाजका कार्यकलापादि पालकर जो सम्प्रदाय रोमक समाजका प्राधान्य स्वीकार करता है, उसका नाम 'दी यूनाइटेड ग्रीक चर्च' (The United Greek Church) पड़ता है।
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 36}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५६'''|'''उद्ग्राह-उद्घाटिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
भः। १ ग्रहण, पकड़। २ तत्निबन्ध, पकड़की, उद्घर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-घृष-ल्युट्। १ उपरि
बन्दिश। ३ दान, बख शिश।
घर्षण, रगड। २ इष्टकादि द्वारा गानादि मार्जन,
“वाजस्य माप्रसव उदग्राभेगोग्रभीत्।” (वाजसनेयस॰ १३३८)ईट या पत्थरसे जिस्म की रगड़ाई। ३ लगुड़, लठ।
“उद्गार्भय अध्व' विग्रह्य दीयते उदगाभणं दानम्।’ (महौधर) “सिरामुखविविक्तत्व त्वस्थस्याग्नेच तेजनम् ।
उदग्राह (सं॰ पु॰) उत्-ग्रह-घञ् । १ दान, उघर्षणोत्सादनाभ्यां जायेयातामस'श्रयम्॥” (सुश्रु त)
बखुशिश। २ वामभेद, विद्या विचार। यह प्राति- उद्ध्वस (सं॰ क्ली॰) उत्-अद-अप घसादेशः।
शाख्यकी सन्धिका एक नियम है। इससे विसर्ग, १ मांस, गोश्त। २ भक्ष्यवस्तु, खाने लायक चीज़
इकार और ओकारके स्थानमें वर मागे रहनेपर उद्घाट (सं॰ पु॰) उत्-घट-घञ्। १ उद्घाटन,
प्रकार आदेश होता है। ३तर्क का उत्तर, बहसका खोलाई। २पण्यादि द्रव्य देखानेको खोलने का
जवाब। ४.आपत्ति, उज्ज। ५ उदगार, डकार। स्थान, बेचनेकी चीज़ खोलकर देखानेको जगह ।
उदग्राहणिका (सं॰ स्त्री॰) तर्कका उत्तर, बहसका ३ राजस्वके ग्रहणका स्थान, चुङ्गोघर। ४ हनन,
जवाब।
मारकाट । ५ क्षत, जख्म । ६ स्खलन, सरकाव।
उदग्राहिणी (सं॰ स्त्री॰) उत्-ग्रह-णिनि-डौ। ७ उन्नति, उठान। ८ आरम्भ, शुरू। ८ प्राणायाम ।
पाशरज्ज, जालको रस्सी।
१० गदा, सोंटा। ११ अध्याय, बाब। १२ प्रहरी
उग्राहित (सं॰ त्रि॰) उत्-ग्रह-णिच्-क्त। उपरि रहनेका स्थान, चौकी।
नौत, चढाया हुआ। २ बद्ध, बांधा हुआ। ३ उदोण, उद्घाटक (सं॰ पु॰ क्ली॰) उत्-घट-णिच्-खुल
निकाला हुआ। ४ अन्तःकरणसे अर्पित, सौंपा १ घटीयन्त्र, लोटाडोर। २ कुञ्चिका, चाबी।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
हुआ। ५ आक्रान्त, सताया हुआ। ६ उन्नमित, ३ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।
उचकाया हुआ। ७ ग्राहित, पकड़ा हुआ। ८ स्मरण उद्घाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट भावे ल्युट्!
किया हुआ, जो सोचा गया हो।
१ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।
उदग्रोव (सं॰ त्रि॰) ग्रीवाको उठानेवाला, जो उद्घाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट भावे ल्युट्। १ उन्मो-
गर्दन ऊंचौ करता हो।
चन, खोलाई। २ उल्लेख, लिखाई। ३ प्रकाशकरण,
उग्रीविन्, उदुगौव देखो।
जाहिर करनेका काम। .४ घटीयन्त्र, लोटाडोर।
उद्घ (सं॰ पु॰) उत्-इन-ड। १ अग्नि, आग। ५ कुच्चिका, चाबी। ६ उन्मोचनकारी, खोलने-
२ प्रशंसा, तारीफ़। ३ देहवायु, जिस्मको हवा। ४ कर- वाला।
पुट, अंजुरी। ५ उत्कर्ष, उम्दगी। ६ आदर्श, उद्घाटनीय (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनयोग्य, खोला
नमूना।
जानेवाला।
उबट (सं॰ क्ली॰) वार्ताकुपुष्प, भाटेका फल ।
उपटक (सं॰ पु॰) उद्दट्ट-कन्। ताल।
शित, जाहिर, खुला हुआ। २ कृतारम्भ, शुरू किया
उबट्टन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट्ट-ल्य ट्। १ आघात, हुआ। ३ उत्तोलित, उठाया हुआ। ४ कृतोद्योग,
रगड़। २ उन्मोचन, खोलाव।
कोशिशके साथ किया हुआ।
उदहित (सं॰ त्रि॰) उन्मुक्ता, खुला हुआ। उद्घाटितज्ञ (सं॰ त्रि॰) चतुर, होशियार।
उधन (सं॰ पु॰) अवस्थाप्य हन्यतेऽत्र, उत्-हन उद्घाटिताङ्ग (सं॰ त्रि॰) १ नग्न, नङ्गा। २ चतुर,
आधार अप् निपातनात्। काष्ठमय आधार, लक होशियार।
डोका तख ता। तक्षक इसी आधार पर काष्ठको उद्घाटिन् (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनकारी, खोलने या
रख परिष्कार करता है।
। शुरू करनेवाला।
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५६'''|'''उद्ग्राह-उद्घाटिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:भः। १ ग्रहण, पकड़। २ तत्निर्बन्ध, पकड़की, बन्दिश। ३ दान, बख़्शिश।
{{c|{{x-smaller|<poem>“वाजस्य माप्रसव उद्ग्राभेणोग्रभीत्।” (वाजसनेयस॰ १३।३८)
“उद्गार्भण ऊर्ध्व विगृह्य दीयते उद्गाभणं दानम्।’ (महीधर)</poem>}}}}
{{Outdent|उदग्राह (सं॰ पु॰) उत्-ग्रह-घञ्। १ दान, बख्शिश। २ वामभेद, विद्या विचार। यह प्रातिशाख्यकी सन्धिका एक नियम है। इससे विसर्ग, इकार और ओकारके स्थानमें स्वर आगे रहनेपर अकार आदेश होता है। ३ तर्क का उत्तर, बहसका जवाब। ४ आपत्ति, उज्र। ५ उद्गार, डकार।}}
{{Outdent|उदग्राहणिका (सं॰ स्त्री॰) तर्कका उत्तर, बहसका जवाब।}}
{{Outdent|उदग्राहिणी (सं॰ स्त्री॰) उत्-ग्रह-णिनि-ङीप्। पाशरज्जु, जालकी रस्सी।}}
{{Outdent|उग्राहित (सं॰ त्रि॰) उत्-ग्रह-णिच्-क्त। उपरि नीत, चढाया हुआ। २ बद्ध, बांधा हुआ। ३ उदीर्ण, निकाला हुआ। ४ अन्तःकरणसे अर्पित, सौंपा हुआ। ५ आक्रान्त, सताया हुआ। ६ उन्नमित, उचकाया हुआ। ७ ग्राहित, पकड़ा हुआ। ८ स्मरण किया हुआ, जो सोचा गया हो।}}
{{Outdent|उदग्रीव (सं॰ त्रि॰) ग्रीवाको उठानेवाला, जो गर्दन ऊंची करता हो।}}
{{Outdent|उग्रीविन्, <small>उद्वग्रीव देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्घट (सं॰ पु॰) उत्-इन-ड। १ अग्नि, आग। २ प्रशंसा, तारीफ़। ३ देहवायु, जिस्मकी हवा। ४ कर-पुट, अंजुरी। ५ उत्कर्ष, उम्दगी। ६ आदर्श, नमूना।}}
{{Outdent|उद्धट (सं॰ क्ली॰) वार्ताकुपुष्प, भांटेका फल।}}
{{Outdent|उद्घट्टक (सं॰ पु॰) उद्घट्ट-कन्। ताल।}}
{{Outdent|उद्घट्टन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट्ट-ल्युट्। १ आघात, रगड़। २ उन्मोचन, खोलाव।}}
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{{Outdent|उद्घन (सं॰ पु॰) ऊर्ध्व स्थाप्य हन्यतेऽत्र, उत्-हन आधार अप् निपातनात्। काष्ठमय आधार, लकड़ीका तख़्ता। तक्षक इसी आधार पर काष्ठको रख परिष्कार करता है।}}
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{{Outdent|उद्घर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-घृष-ल्युट्। १ उपरि घर्षण, रगड़। २ इष्टकादि द्वारा गात्रादि मार्जन, ईंट या पत्थरसे जिस्म की रगड़ाई। ३ लगुड़, लठ।}}
{{c|<poem>{{x-smaller|“सिरामुखविविक्तत्वं त्वक्स्थस्याग्रेश्च तेजनम्।
उद्घर्षणोत्सादनाभ्यां जायेयातामसं श्रयम्॥” (सुश्रुत)}}</poem>}}
{{Outdent|उद्घस (सं॰ क्ली॰) उत्-अद-अप घसादेशः। १ मांस, गोश्त। २ भक्ष्यवस्तु, खाने लायक़ चीज़।}}
{{Outdent|उद्घाट (सं॰ पु॰) उत्-घट-घञ्। १ उद्घाटन, खोलाई। २ पण्यादि द्रव्य देखानेको खोलने का स्थान, बेचनेकी चीज़ खो़लकर देखानेकी जगह। ३ राजस्वके ग्रहणका स्थान, चुङ्गीघर। ४ हनन, मारकाट। ५ क्षत, ज़ख्म। ६ स्खलन, सरकाव। ७ उन्नति, उठान। ८ आरम्भ, शुरू। ९ प्राणायाम। १० गदा, सोंटा। ११ अध्याय, बाब। १२ प्रहरी रहनेका स्थान, चौकी।}}
{{Outdent|उद्घाटक (सं॰ पु॰ क्ली॰) उत्-घट-णिच्-ण्वूल्। १ घटीयन्त्र, लोटाडोर। २ कुञ्चिका, चाबी। ३ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।}}
{{Outdent|उद्घाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट भावे ल्युट्! १ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।}}
{{Outdent|उद्घाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-घट भावे ल्युट्। १ उन्मो-चन, खोलाई। २ उल्लेख, लिखाई। ३ प्रकाशकरण, जाहिर करनेका काम। ४ घटीयन्त्र, लोटाडोर। ५ कुच्चिका, चाबी। ६ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।}}
{{Outdent|उद्घाटनीय (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनयोग्य, खोला जानेवाला।}}
{{Outdent|उद्घाटित (सं॰ त्रि॰) उत्-घट-णिच-क्त। १ प्रकाशित, जाहिर, खुला हुआ। २ कृतारम्भ, शुरू किया हुआ। ३ उत्तोलित, उठाया हुआ। ४ कृतोद्योग, कोशिशके साथ किया हुआ।}}
{{Outdent|उद्घाटितज्ञ (सं॰ त्रि॰) चतुर, होशियार।}}
{{Outdent|उद्घाटिताङ्ग (सं॰ त्रि॰) १ नग्न, नङ्गा। २ चतुर, होशियार।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५८
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्घात-उद्दिन'''|'''२५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उद्घात (सं॰ पु॰) उत्-इन-घ। १ प्रतिघात, उद्दानक (सं॰ पु॰) १ शिरीषच, कलसीसका पेड़।
ठोकर। २ वाधा, बाफत। ३ प्रारम्भ, शुरू। ४ पाद-
सूखलन, पैरको फिसलाइट। ५ कुम्भक। सूचना, उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-दम-क्त। अतिदमित, शान्त,
दोबाचा। ७ मुदगर। ८ अरघट्ट, कुवेंसे पानी ठण्डा, जो बहुत दवा हो।
निकालनेको कल। निदर्शन, देखाव।
उद्दाम (सं॰ त्रि॰) उदगतं दामः। १ उच्छकुल,
उदघातक (सं॰ त्रि॰) १ प्रतिघात लगानेवाला, जो खुला हुमा। २ खतन्त्र, आजाद। ३ उत्कट, गुस्ताख।
ठोकर मारता हो। (पु॰) २ नाटककी एक प्रस्ता ४ असीम, बेहद। ५ दीर्घ, बड़ा। (पु॰) ६ यम।
वना। इसमें कोई पात्र सूत्रधार वा नटीका कथन ७ वरुण। (अव्य॰)८ उच्छकल रूपसे, खुले मैदान ।
श्रवण कर अन्य पथ जोड़ता है।
उद्दामन् (सं॰ त्रि॰) उत्-दामन् बन्धनम्। १ बन्धन-
उदराती (सं॰ त्रि॰) १ प्रतिघात करनेवाला, जो रहित, खुला। २ उत्कट, झगड़ाल। ३ अतिशय,
ठोकर लगाता हो। २ उच्चनीच, चढ़ा-उतार। बहुत, ज्यादा।
उदघष्ट (सं॰ त्रि॰) १ शब्दायमान, पुरशोर। २ उद्दारदा (सं॰ स्त्री॰) शाकतरु, साखका पेड़।
विघोषित, कहा हुआ। (क्ली॰) ३ शब्द, भावाज। उद्दारा (सं॰ स्त्री॰)।
उद्घष्ट (सं॰ क्ली॰) उच्चारणका दोषविशेष, तलफ-उद्दारी, उद्दारा देखो।
फुजका एक ऐब।
उहाल (सं॰ पु॰) उत्-दल-णिच्-अच्। १ बहुवार-
उद्घोष (सं॰ पु॰) उत्-घुष-धज। १ उच्च शब्दकरण, वृक्ष, लसोड़ेका पेड़। २ वनकोद्रव, कोदो। ३ कुष्ठ,
बुलन्द आवाजमें कहनेकौ बात। २ साधारण कथन, केज। ४ धान्यविशेष, एक अनाज।
मामूली बात।
उद्दालक (सं॰ पु॰) १ षिविशेष। इनके पुत्रका
उहंश (सं॰ पु॰) उत्-दन्श-अच्। १ मशक, मच्छड़।। नाम खेतकेतु था। उद्दालक यान्नवल्काके गुरु रहे।
२ मत्कुण, खट्मल। ३ केशकीट, जं।
भारुषि देखो। २ बहुवार वृक्ष, लसोड़ेका पेड़।
उहण्ड (सं॰ त्रि॰) १ प्रचण्ड, बखेड़िया। २ उव्रत-! ३आरण्यकोद्रव, कोदो।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
टण्डयन, ऊंची डालवाला। ३ दण्डोपरि उत्तोलित, उद्दालकपुष्यभञ्चिका (सं॰ स्त्री॰) क्रीडाविशेष, एक
बांसपर चढ़ाया हुआ। (पु॰) ४ उन्नत दण्ड, खेल । यह आती मार छाती की तरह खेला जाता है।
जंचा सोटा।
उहालकव्रत (सं॰ क्ली॰) व्रतविशेष । षोड़श वत्सरके
उद्दण्डपाल (सं॰ पु॰) १ उन्नत दण्डाकार सर्पविशेष, वयस पर्यन्त गायत्रीकी दीक्षा न मिलनेसे द्विजातिको
ऊचे डण्डे-जैसा एक सांप। २ मत्स्यविशेष, एक यह व्रत करना पड़ता है। दो मास यव, एकमास
मछली। ३ दण्ड देनेवाला राजा वा शासनाधिकारी, दधि, टुग्ध तथा शर्कराका शर्बत, श्रष्ट रात्रि घृत,
जोहाकिम सजा देता हो।
षड राति अयाचित रूपसे प्राप्त द्रव्य, विरात्रि केवल
उहन्तर (सं॰ त्रि॰) अतिशयेन दन्तुरः। १ उत्तुङ्ग, जल और एक दिन उपवास पर निर्वाह करते हैं।
ऊंचा। २ कराल, खौफनाक। ३ उत्कटदन्त, बड़े उद्दालकायन (सं॰ पु॰) उद्दालकस्य गोत्रापत्यम्,
दांतोंवाला।
फक्। ऋषिभेद, खेतकेतु।
उहम (सं॰ पु॰) वशीकरण, दमन, मगलबी, दबाव। उहित (सं॰ त्रि॰) उत्-दो-त। बद्द, बंधा हुपा।
उहान (सं॰ क्ली॰) उत्-दो भाव ल्युट्। १ बन्धन, (हिं॰) उद्यत, उदित पौर उद्दत देखो।
बंधाई। २ उद्यम, कोशिश। ३ चुलो, चलहा। उद्दिधौर्षा (सं॰ स्त्री॰) खानान्तरित करने की इच्छा,
४ बड़वाग्नि, दरयाकै भौतरको आग। ५मध्य, दर- हटा देनेको खाहिश।
मियान्। ६ लग्न। ७पालन, पलाई।
उद्दिन (सं॰ क्ली॰) मध्याकाल, दोपहर ।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. |65}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्घात-उद्दिन'''|'''२५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उद्घात (सं॰ पु॰) उत्-हन-घञ्। १ प्रतिघात, ठोकर। २ वाधा, आफ़त। ३ आरम्भ, शुरू। ४ पाद-स्खलन, पैरकी फिसलाइट। ५ कुम्भक। ६ सूचना, दीबाचा। ७ मुद्गर। ८ अरघट्ट, कुवेंसे पानी निकालनेकी कल। ९ निदर्शन, देखाव।}}
{{Outdent|उद्घातक (सं॰ त्रि॰) १ प्रतिघात लगानेवाला, जो ठोकर मारता हो। (पु॰) २ नाटककी एक प्रस्तावना। इसमें कोई पात्र सूत्रधार वा नटीका कथन श्रवण कर अन्य अर्थ जोड़ता है।}}
{{Outdent|उद्घाती (सं॰ त्रि॰) १ प्रतिघात करनेवाला, जो ठोकर लगाता हो। २ उच्चनीच, चढ़ा-उतार।}}
{{Outdent|उद्घुष्ट (सं॰ त्रि॰) १ शब्दायमान, पुरशोर। २ विघोषित, कहा हुआ। (क्ली॰) ३ शब्द, आवाज़।}}
{{Outdent|उद्घृष्ट (सं॰ क्ली॰) उच्चारणका दोषविशेष, तलफ्-फुज़का एक ऐब।}}
{{Outdent|उद्घोष (सं॰ पु॰) उत्-घुष-घञ्। १ उच्च शब्दकरण, बुलन्द आवाज़में कहनेकी बात। २ साधारण कथन, मामूली बात।}}
{{Outdent|उद्दंश (सं॰ पु॰) उत्-दन्श-अच्। १ मशक, मच्छड़। २ मत्कुण, खट्मल। ३ केशकीट, जूं।}}
{{Outdent|उद्दण्ड (सं॰ त्रि॰) १ प्रचण्ड, बखेड़िया। २ उन्नत-दण्डयुक्त, ऊंची डालवाला। ३ दण्डोपरि उत्तोलित, बांसपर चढ़ाया हुआ।(पु॰) ४ उन्नत दण्ड, ऊंचा सोंटा।}}
{{Outdent|उद्दण्डपाल (सं॰ पु॰) १ उन्नत दण्डाकार सर्पविशेष, ऊंचे डण्डे-जैसा एक सांप। २ मत्स्यविशेष, एक मछली। ३ दण्ड देनेवाला राजा वा शासनाधिकारी, जो हाकिम सजा़ देता हो।}}
{{Outdent|उद्दन्तुर (सं॰ त्रि॰) अतिशयेन दन्तुरः। १ उत्तुङ्ग, ऊंचा। २ कराल, खौफ़नाक। ३ उत्कटदन्त, बड़े दांतोंवाला।}}
{{Outdent|उद्दम (सं॰ पु॰) वशीकरण, दमन, मग़लूबी, दबाव।}}
{{Outdent|उद्दान (सं॰ क्ली॰) उत्-दो भाव ल्युट्। १ बन्धन, बंधाई। २ उद्यम, कोशिश। ३ चुल्ली, चूल्हा। ४ बड़वाग्नि, दरयाक भीतरकी आग। ५ मध्य, दर-मियान्। ६ लग्न। ७ पालन, पलाई।}}
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{{Outdent|उद्दानक (सं॰ पु॰) १ शिरीषवृक्ष, कलसीसका पेड़। २ चुल्ली, चूल्हा।}}
{{Outdent|उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-दम-क्त। अतिदमित, शान्त, ठण्डा, जो बहुत दवा हो।}}
{{Outdent|उद्दाम (सं॰ त्रि॰) उदगतं दाम्त्रः। १ उच्छ्रंखल खुला हुआ। २ स्वतन्त्र, आजा़द। ३ उत्कट, गुस्ताख़। ४ असीम, बेहद। ५ दीर्घ, बड़ा। (पु॰) ६ यम। ७ वरुण। (अव्य॰) ८ उच्छङ्खल रूपसे, खुले मैदान।}}
{{Outdent|उद्दामन् (सं॰ त्रि॰) उत्-दामन् बन्धनम्। १ बन्धन-रहित, खुला। २ उत्कट, झगड़ालू। ३ अतिशय, बहुत, ज्यादा।}}
{{Outdent|उद्दारदा (सं॰ स्त्री॰) शाकतरु, साखूका पेड़।}}
{{Outdent|उद्दारा (सं॰ स्त्री॰) गुड़ूची, गर्च।}}
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{{Outdent|उद्दाल (सं॰ पु॰) उत्-दल-णिच्-अच्। १ बहुवार-वृक्ष, लसोड़ेका पेड़। २ वनकोद्रव, कोदो। ३ कुष्ठ, केऊ। ४ धान्यविशेष, एक अनाज।}}
{{Outdent|उद्दालक (सं॰ पु॰) १ ऋषिविशेष। इनके पुत्रका नाम श्वेतकेतु था। उद्दालक याज्ञवल्क्य के गुरु रहे। <small>आरुणि देखो।</small> २ बहुवार वृक्ष, लसोड़ेका पेड़। ३ आरण्यकोद्रव, कोदो।}}
{{Outdent|उद्दालकपुष्यभञ्चिका (सं॰ स्त्री॰) क्रीडाविशेष, एक खेल। यह ‘आती मार छाती’ की तरह खेला जाता है।}}
{{Outdent|उद्दालकव्रत (सं॰ क्ली॰) व्रतविशेष। षोड़श वत्सरके वयस पर्यन्त गायत्रीकी दीक्षा न मिलनेसे द्विजातिको यह व्रत करना पड़ता है। दो मास यत्र, एकमास दधि, टुग्ध तथा शर्कराका शर्बत, अष्ट रात्रि घृत, षड़्रात्रि अयाचित रूपसे प्राप्त द्रव्य, त्रिरात्रि केवल जल और एक दिन उपवास पर निर्वाह करते हैं।}}
{{Outdent|उद्दालकायन (सं॰ पु॰) उद्दालकस्य गोत्रापत्यम्, फक्। ऋषिभेद, श्वेतकेतु।}}
{{Outdent|उद्दित (सं॰ त्रि॰) उत्-दो-क्त। बद्ध, बंधा हुआ। (हिं॰) <small>उद्यत, उदित पौर उद्धत देखो।</small>}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४८२
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AMAN KUMAR
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एक्वानबे—एटा'''|'''४४१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एक्वानबे (हिं॰ वि॰) १ एकनवति, नब्बे और एक, ९१। (पु॰) २ एकनवति संख्या, एक्वानवे अदद।}}
{{outdent|एक्वावन (हिं॰ वि॰) १ एकपञ्चाशत्, पचास और एक, ५१। (पु॰) एकपञ्चाशत् संख्या, पचास और एक मिलकर बननेवाली अदद।}}
{{outdent|एक्वासी (हिं॰ वि॰) १ एकाशीति, अस्सी और एक, ८१। २ एकाशीति संख्या, अस्सी और एक मिलकर बननेवाली अदद।}}
{{outdent|एक्स्चेंज (अं॰ पु॰=Exchange) व्यापारस्थानविशेष, सौदागरीकी एक जगह। यहां व्यापारी और वणिक् आदान-प्रदान तथा क्रय-विक्रयके लिये जुटते हैं।}}
{{outdent|एक्स्पोज़ (अं॰ पु॰=Expose) १ सम्मुख वा निकट स्थापन, सामने या पास रखनेका काम। जब किसी वस्तुका प्रभाव अन्य द्रव्यपर पहुंचाना चाहते, तब उसे उसके पास एक्स्पोज़ करते हैं। फोटो उतारते समय लेंसका मुख उद्घाटित करना भी एक्स्पोज़ ही कहाता है।}}
{{outdent|एखनी (फ़ा॰ स्त्री॰) यूष, शोरबा। एखनी मांसमें ही होती है।}}
{{outdent|एगानगी (फ़ा॰ स्त्री॰) १ ऐक्य, हेलमेल। २ सुहृद्भाव, दोस्ती।}}
{{outdent|एगाना (फ़ा॰ वि॰) सुहृद्, मेली।}}
{{outdent|एज् (सं॰ धा॰) भ्वा॰ आत्म॰ अक॰ सेट्। "एजृ दीप्तौ।" (कविकल्पद्रुम) १ दीप्ति पाना, चमकना। भ्वा॰ पर॰ सक॰ सेट्। "एजृ कम्पे ।" (कविकल्पद्रुम) २ कम्पन देना, कंपाना।}}
{{outdent|एजक (सं॰ त्रि॰) कम्पित कर देनेवाला, जो कंपा देता हो।}}
{{outdent|एजत् (सं॰ क्ली॰) चैतन्य वा सजीव वस्तु, चलती-फिरती या जीती-जागती चीज़।}}
{{outdent|एजत्क (सं॰ वि॰) १ कम्पनशील, जो कंप रहा हो। (पु॰) २ कीटविशेष, एक कीड़ा।}}
{{outdent|एजथु (सं॰ पु॰) एज-अथु। कम्प, कंपाई।}}
{{outdent|एजन (सं॰ क्ली॰) एज् भावे ल्युट्। कम्पन, कंपाई।}}
<br><br>Vol. III. 121
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एजि (सं॰ त्रि॰) एज-इन्। वातरोगग्रस्त, जिसके गठियेकी बीमारी रहे।}}
{{outdent|एजित (सं॰ त्रि॰) कम्पित, हिलता हुआ, जो डोल गया हो।}}
{{outdent|एजितव्य (सं॰ त्रि॰) कम्पित किया जानेवाला, जो हिलाये जानेके काबिल हो !}}
{{outdent|एजिता (सं॰ त्रि॰) कम्पित करनेवाला, जो हिलाता हो।}}
{{outdent|एजेंट (अं॰ पु॰-स्त्री॰=Agent) प्रतिहस्त, प्रतिनिधि, गुमाश्ता, कारिन्दा—जैसे पोलिटिकल एजेंट, कामर्शल एजेंट।}}
{{outdent|एजेंसी (अं॰ स्त्री॰=Agency) १ प्रतिनिधित्त्व, मुनीबी, आढ़त, पेशकारी।}}
{{outdent|एज्य (सं॰ त्रि॰) आ-यज-क्यप्। सम्यक्रूप यजनीय, अच्छी तरह चढ़ाया जानेवाला।}}
एटा—१ युक्तप्रान्तका एक ज़िला। यह अक्षा॰ २७° १८' ४२" तथा २८° २' ४८" उ॰ और द्राघि॰ ७८° २७' ३६" एवं ७८° १८' २३" पू॰ पर अवस्थित है। दक्षिण सीमापर गङ्गा बहती हैं। क्षेत्रफल १७३८ वर्गमील है। कासगंज नगर व्यवसायका केन्द्र है। काली-नदी गङ्गामें गिरती है। इस ज़िलेमें वृक्ष बहुत कम हैं।
{{outdent|कहते—प्राचीन समयको कालीकी उपत्यकामें बड़े बड़े नगर बसते थे। ५वीं और ७वीं ई॰ शताब्दीके चीना परिव्राजक भी उक्त विषयका वर्णन लिख गये हैं। एटा ज़िलेमें उस समय अनेक मन्दिर और मठ बने थे, जिन्हें देखने स्वयं बुद्ध गये। अतरंजीके नष्टभ्रष्ट मृत्तिकाचयसे उनके जीवनका घनिष्ट सम्बन्ध रहा। सम्भवतः ६ष्ठ शताब्दीसे १०म शताब्दी पर्यन्त अहीरों और भारोंका राज्य चला, फिर राजपूतोंको अधिकार मिला। १०१७ ई॰को कन्नौज पर चढ़ते समय महमूद गज़नवीने एटेपर ज़रूर हाथ फेरा होगा। फिर दो शताब्दी बाद यमुनाकी द्रोणीमें राठौर जयचन्द्रसे लड़ने जाते मुहम्मद ग़ोरीकी फ़ौज इसे ज़िलसे निकली होगी। उसी समयसे एटा मुसलमानोंके अधीन चला आता है। पहले पटियाली प्रधान नगर और डाकुओंका घर था। १२७० ई॰को}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|६७८|कथाक्रम-कथासरित्सागर|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
है। इसमें वक्ता और श्रोता दोनों अपनी-अपनी राह लेते हैं। (अव्य०) ८ कथं, कैसे, कहांसे, क्यों।
कथाक्रम (सं० पु०) कथायाः क्रमः प्रसङ्गः, ६-तत्। कथाप्रसङ्ग, गुफ्तगूका आगाज।
कथाचल (सं० लो०) प्रबन्धकल्पनाका चातुर्य,किस्से की चाल।
कथादि (सं० पु०) ठक् प्रत्ययके लिये पाणिनिका कहा एक शब्दगण। इसमें कथा, विकथा, विश्व-कथा, सङ्कथा, वितण्डा, कुष्ठविद्, जनवाद, जनेवाद, वृत्तिसग्रह, गुण, गण और पायुर्वेद शब्द पड़ता है।
कथानक (सं० क्लो०) कथयति अन, कथ बाहुलकात् आनक्। १ गल्प, कहानी। २ कथाविशेष, कोई छोटा किस्मा। वेतालपचीसो और सिंहासनबत्तोसी आदिको छोटी छोटी कथावोंका नाम कथानक है।
कथानिका (सं० स्त्री०) उपन्यासभेद, किसी किस्माकी कहानी । यह कथासे बिलकुल मिलती-जुलती है। केवल प्रधान विषयको अनेक पात्र कहा करते हैं।
कथानुराग (सं० पु०) ध्यान, तवज्जो, बातचीतमें मन लगनेको हालत।
कथान्त (सं० पु०) बार्ताको समाप्ति, बातचौतका अखीर।
कथान्तर (सं० लो०) कथाया अन्तरं अवकाशः । १ कथावसर, बातचीतका मौका। २.अन्य कथा,दूसरी बात। ३ कलह, झगड़ा।
कथापीठ (सं० पु०) कथायाः पीठमिव, उपमि० । कथाका आधार, किस्मेको जड़। कथासरित्सागरके प्रथम लम्बकको 'कथापीठ' कहते हैं।
कथाप्रबन्ध (सं० पु०) कथायाः प्रबन्धः, ६-तत् । गल्पका उसख, कि स्मेको बन्दिश, बनी हुई कहानी।
कथाप्रसङ्ग (सं० पु० ) कथायाः प्रसङ्गः, ६-तत् । १ नानाविध कथनोपकथन, तरह-तरह की बातचीत । २ वार्ता, बात। ३ गोष्ठीवचन, गप।
<Small>{{center|<poem>"मिथः कथाप्रसनन विवाद किल चक्रतुः ।" (कथासरित्सागर)</Poem>}}</small>
३ विषवैद्य, जहरको दवा करनेवाला, जो जहर-मोहरा बेचता हो। (वि०) कथायां प्रसङ्गो यस्य, बहुव्रो०। ४ अविश्वास गल्पकारक, लगातार किस्सा कहनेवाला, बेवकू.फ। ५ वातुक, पामल, मतवाला ।
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कथाप्राण (सपु०) कथया प्राणिति जीवति, कथा-
प्र-अण-अच; कथायां प्राणः जीवनोपाया यस्य इति
वा। १ कथक, किस्सागो, कहानी कहकर काम
चलानेवाला। २ नाटकरचयिता, वांगको किताब
बनानेवाला।
कथाभास ( स० पु.) असत् तकैमूलक वाक्य विशेष,
झूठो बहसको एक बात। न्यायमतसे इसे वादी पौर
प्रतिवादो उठाते हैं।
| कथामय (सं० त्रि.) कथा-मयट । कथापूर्ण, किस्म से
भरा हुआ, जिसमें कहानियां रहें।
कथामुख (सं० लो०) कथाया भामुखम्, ६-तत् ।
कथाग्रन्थको प्रस्तावना, कस्म को दोबाचा। कथा-
सरित्सागरके दूसरे लम्बकका नाम 'कथामुख' है।
कथायोग (सं० पु०) कथायाः योगः, ६-तत् । कथा-
प्रसङ्ग, गुफ्तगू, बातचीत। .
“पटुत्व सत्यवादित्व कथायोगेन बुध्यते।" (हितोपदेश)
कथारम्भ सं. पु०) कथायाः प्रारम्भः, ६-तत्।
| कथाका प्रारम्भ, किस्म का पागाज, कहानोको कहाई।
कथारम्भकाल (सं० पु०) कथाके प्रारम्भ होनेका
समय, जिस वक्त में किस्सा कहना शुरू करें।
कथालाप (सं० पु.) कथायाः पालापः, ६-तत्।
.. कथनोपकथन, बातचीत ।
कथावशेष, कथाशेष देखो
कथावार्ता (सं० स्त्री०) कथा च वार्ता च, हन्द । विविध
| कथा, तरह तरहको बात-चीत, किस्सा कहानी।
कथाविरक्त (संवि०) वार्तालापसे अलग रहने-
वाला, जो बातचौत नापसन्द करता हो।
कथाशेष (सं० त्रि०) कथा मात्र शेषो यस्य, बहुव्री।
१ मृत, मुर्दा, जिसके सिर्फ बात बाकी रहे। (पु.)
कथासंग्रह (सं० पु.) आख्यानोंका समूह, कहा
नियोंकी लड़ी। .
कथासरित्सागर (स'. पु.) १ कथाको नदियों का
| समुद्र, कहानियोंके दरयावोंका बहर। २ संस्कृत
| कथाग्रन्थविशेष, कहानियों को किसी किताबका
नाम। सोमदेव भट्ट नामक जनैक कविने काश्मा-.<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६७८|कथाक्रम-कथासरित्सागर|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
है। इसमें वक्ता और श्रोता दोनों अपनी-अपनी राह लेते हैं। (अव्य०) ८ कथं, कैसे, कहांसे, क्यों।
कथाक्रम (सं० पु०) कथायाः क्रमः प्रसङ्गः, ६-तत्। कथाप्रसङ्ग, गुफ्तगूका आगाज।
कथाचल (सं० लो०) प्रबन्धकल्पनाका चातुर्य,किस्से की चाल।
कथादि (सं० पु०) ठक् प्रत्ययके लिये पाणिनिका कहा एक शब्दगण। इसमें कथा, विकथा, विश्व-कथा, सङ्कथा, वितण्डा, कुष्ठविद्, जनवाद, जनेवाद, वृत्तिसग्रह, गुण, गण और पायुर्वेद शब्द पड़ता है।
कथानक (सं० क्लो०) कथयति अन, कथ बाहुलकात् आनक्। १ गल्प, कहानी। २ कथाविशेष, कोई छोटा किस्मा। वेतालपचीसो और सिंहासनबत्तोसी आदिको छोटी छोटी कथावोंका नाम कथानक है।
कथानिका (सं० स्त्री०) उपन्यासभेद, किसी किस्माकी कहानी । यह कथासे बिलकुल मिलती-जुलती है। केवल प्रधान विषयको अनेक पात्र कहा करते हैं।
कथानुराग (सं० पु०) ध्यान, तवज्जो, बातचीतमें मन लगनेको हालत।
कथान्त (सं० पु०) बार्ताको समाप्ति, बातचौतका अखीर।
कथान्तर (सं० लो०) कथाया अन्तरं अवकाशः । १ कथावसर, बातचीतका मौका। २.अन्य कथा,दूसरी बात। ३ कलह, झगड़ा।
कथापीठ (सं० पु०) कथायाः पीठमिव, उपमि० । कथाका आधार, किस्मेको जड़। कथासरित्सागरके प्रथम लम्बकको 'कथापीठ' कहते हैं।
कथाप्रबन्ध (सं० पु०) कथायाः प्रबन्धः, ६-तत् । गल्पका उसख, कि स्मेको बन्दिश, बनी हुई कहानी।
कथाप्रसङ्ग (सं० पु० ) कथायाः प्रसङ्गः, ६-तत् । १ नानाविध कथनोपकथन, तरह-तरह की बातचीत । २ वार्ता, बात। ३ गोष्ठीवचन, गप।
<Small>{{center|<poem>"मिथः कथाप्रसनन विवाद किल चक्रतुः ।" (कथासरित्सागर)</Poem>}}</small>
३ विषवैद्य, जहरको दवा करनेवाला, जो जहर-मोहरा बेचता हो। (वि०) कथायां प्रसङ्गो यस्य, बहुव्रो०। ४ अविश्वास गल्पकारक, लगातार किस्सा कहनेवाला, बेवकू.फ। ५ वातुक, पामल, मतवाला ।
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कथाप्राण (सं० पु०) कथया प्राणिति जीवति, कथा-प्र-अण-अच; कथायां प्राणः जीवनोपाया यस्य इति वा। १ कथक, किस्सागो, कहानी कहकर काम चलानेवाला। २ नाटकरचयिता, वांगको किताब बनानेवाला।
कथाभास ( सं० पु०) असत् तकैमूलक वाक्य विशेष,झूठी बहसको एक बात। न्यायमतसे इसे वादी पौर प्रतिवादो उठाते हैं।
कथामय (सं० त्रि०) कथा-मयट । कथापूर्ण, किस्म से भरा हुआ, जिसमें कहानियां रहें।
कथामुख (सं० लो०) कथाया भामुखम्, ६-तत् । कथाग्रन्थकी प्रस्तावना, कस्म को दोबाचा। कथा-सरित्सागरके दूसरे लम्बकका नाम 'कथामुख' है।
कथायोग (सं० पु०) कथायाः योगः, ६-तत् । कथा-प्रसङ्ग, गुफ्तगू, बातचीत। .
<Small>{{center|<poem>“पटुत्व सत्यवादित्व कथायोगेन बुध्यते।" (हितोपदेश)</Poem>}}</small>
कथारम्भ सं० पु०) कथायाः प्रारम्भः, ६-तत्। कथाका प्रारम्भ, किस्म का पागाज, कहानोको कहाई।
कथारम्भकाल (सं० पु०) कथाके प्रारम्भ होनेका समय, जिस वक्त में किस्सा कहना शुरू करें।
कथालाप (सं० पु०) कथायाः पालापः, ६-तत्। कथनोपकथन, बातचीत ।
कथावशेष, <small>कथाशेष देखो</small>
कथावार्ता (सं० स्त्री०) कथा च वार्ता च, हन्द । विविध कथा, तरह तरहको बात-चीत, किस्सा कहानी।
कथाविरक्त (संवि०) वार्तालापसे अलग रहने-वाला, जो बातचीत नापसन्द करता हो।
कथाशेष (सं० त्रि०) कथा मात्र शेषो यस्य, बहुव्री०।
:१ मृत, मुर्दा, जिसके सिर्फ बात बाकी रहे। (पु०)
:२ कथा समाप्ति, किसके खामियां ।
कथासंग्रह (सं० पु०) आख्यानोंका समूह, कहा नियोंकी लड़ी।
कथासरित्सागर (सं० पु०) १ कथाको नदियों का समुद्र, कहानियोंके दरयावोंका बहर। २ संस्कृत कथाग्रन्थविशेष, कहानियों को किसी किताबका नाम। सोमदेव भट्ट नामक जनैक कविने काश्मा-.<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कथिक-कदग्नि|६७९}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
राधिपति श्रीहर्षदेवको महिषोके चित्तविनोदार्थ पैशाची भाषासे संस्कृतमें इसे अनुवाद किया था। इसमें कौशाम्बीराज वत्सराजके पुत्र नरवाहन दत्तका चरित्र वर्णित है। <Small>गुणाढ्य, सोमदेव और पेमेन्द्र देखो।</small>
कथिक (सं० त्रि० ) कथ-ठन् । १ कथक, पुराण-वक्ता, किस्म कहनेका पेशा करनेवाला। (हिं०)२ कत्थक, नाचने-गानेवाला।
कथिका (सं० स्त्री०) तक्रादि-साधित खाद्यद्रव्य-विशेष, कढ़ी, महेरी । <Small>कढ़ौ देखो।</small> यह पाचन, रुच्य, लघु, वह्निदीपन, कफानिलविबन्धन और किञ्चित पित्तप्रकोपन है। <Small>(वैद्यकनिघण्ट)</small>
कथित (सं० वि०) कथ-त। १ उक्त, कहा हुआ। २ वर्णित, बयान किया हुआ। ३ उच्चारित, मुंहसे निकाला हुआ। ४ व्याख्यात, समझाया हुआ। ५ प्रतिपादित, साबित किया हुआ। (को०) ६ कथन,बातचीत। ७ प्रबन्ध विशेष, मृदङ्गका कोई बोल। (पु०) ८ परमेश्वर, विष्णु।
कथितपद (सं० लो ०) कही हुई बात, दोहराव ।
कथितपदता (सं० स्त्री०) पुनरुक्ति, दोबारा कहाई। यह अलङ्कारशास्त्रोक्त एक दोष है। एकार्थवाचक दो शब्द किसी स्थानमें पड़नसे कथितपदता पाती है।
<Small>{{center|<poem>"रविलोलायम भिन्ते सलौलमनिलोवहन्।" (साहित्यदर्पण)</Poem>}}</small>
उक्त पदमें लोला शब्द निरर्थक है। क्योंकि रति-श्रम कहनेसे हो अर्थ निकल सकता था। फिर अनेक स्थलमें यह दोष गुणकी भांति काम देता है-
<Small>{{center|<poem>" कथितञ्च पदं पुनः ।
विहितस्यानुवाद्यत्वे विषाद विनये ऋधि ॥
दैन्य ऽथ लाटानुमासे ऽनुकम्पायां प्रसादने ।
पान्तरसंक्रमितवाची हर्ष ऽवधारणे ।" (साहित्यदर्पण)</Poem>}}</small>
विहितानुवाद, विषाद, विस्मय, क्रोध, दीनता,लाटानुप्रास, अनुकम्पा, प्रसादन, अर्थान्तरवाच्य, हर्ष और अवधारणमें कथितपदता-दोष नहीं-गुण है।
कथोक्वत (सं० त्रि०) अकथा कथा सम्पद्यमाना क्रियतेऽत्र, कथा-चि-व-ता। कथामात्रमें अवशिष्टकत,मृत, मुर्दा। <Small>"अवगम्य कथोकृतं वपुः।” (कुमार ४।१३)</small>
कथोर (हिं० पु०) कस्तोर, रांगा।
{{Multicol-break}}
कथील,<small> कथीर देखो।</small>
कथील, <small>कथीर देखो।</small>
कथोदय (सं० त्रि०) कथायां उदयः प्रकाशो यस्त्र, बहुव्री०।१ कथासे उत्पन, कहानीसे निकाला हुमा। (पु०)२ कथाका उत्थापन, किस्म का उठान ।
कथोदयात (सं० पु०) नाटकको एक प्रस्तावना,खांगका शुरू।
<Small>{{center|<poem>"स्वधारस्य वाक्य वा समादावार्थमख वा।
भवेत् पावप्रवेशश्वेत कचोदयातः स उचाते ।" (साहित्यदर्पण)</Poem>}}</small>
प्रथम अभिनेता जब सूत्रधारके वाक्य वा वायके किसी अर्थको पकड़ प्रवेश करता, तब कथोरात पड़ता है। रखावलोमें सूवधारके वाक्यको अवलम्बन और वेणीसंहारमें सूत्रधारके वाक्याथ को ग्रहणकर पात्रका प्रवेश देखाया है।
कथोपकथन (सं० ली०) कथायां उपकथनम, ७-तत् । कथापर कथा, विविध वार्ता, दो चार लोगोंका एकत्र हो किसी विषयपर परामर्श वा पान्दोलन, बातचीत ।
कथ्य (सं० वि०) कथय । कहने के उपयुक्ता, बता देने लायक। <Small>“भरतस्य समोपे तेनाई कथः कवचन" (रामायण २।२७)</small>
कथ्यमान (सं० वि०) कध कर्मणि शानच। कहा जानेवाला, जिसे कोई कह रहा हो।
कद् (सं० अव्य०) कहां, किस जगह।
कद (सं० पु०) कं जलं ददाति, क-दा-क। १ मेध, बादल। (वि०) २ जखदाता, पानी देनेवाला। ३ सुखदायक, पाराम बखू शनेवाला।
कद (हिं० स्त्रो०) १ ईर्ष्या, नाराजी, पनवन । २ हठ, जिद। (अव्य०) ३ कदा, कब, किस वक्त ।
कद (अ० पु०) डोलडौल, लम्बाई-चौड़ाई।
कदक (सं० पु०) कदः मेघइव कायति प्रकाशवे, कद-के-क। चन्द्रात्प, चंदोवा ।
कदवर (सं० को०) कु कुत्सितं अक्षरम, कोः कदा-देशः। १ कुत्सित पंचर, खराव हर्फ, बुरी लिखा-वट। (वि०)२ कुत्सित अक्षर लिखनेवाला, बदखत, जो बुरे हर्फ बनाता हो।
कदम्नि (सं० पु०) कुसितो अग्निः, कोः कदादेशः।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|६८०|कदधव-कदपा|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
१ मन्दाग्नि, थोड़ी पाग। (त्रि०) २ मन्दाग्नियुक्त, थोड़ी भाग रखनेवाला।
कदधव (हिं०) कदवा देखो।
कदवा (सं० पु०) कुत्सितो ऽध्वा, कोः कदादेशः । निन्दित पथ, बुरी राह । इसका संस्कृत पर्याय-व्यध्व, दुरध्व, विप और कापथ है।
कदन (सं० क्लो० ) कद्यते, दुःखं प्राप्यते ऽनेन, कद णिच-ल्य घटादित्वात् नहिः। १ पाप, गुनाह । २ मर्द, मलाई, रौंदाई, कुचलाई। ३ युद्ध, लड़ाई। ४ मारण, विनाश, बरबादी।
कटनप्रिय (सं० वि०) विनाशका अनुराग रखने-वाला, जिसे मारकाट अच्छी लगे।
कदत्तनाद-मद्राजके मलवार जिलेके मध्यका एक प्राचीन राज्य। यह प्रक्षा० ११ ३६ से ११° ४८ उ० और देशा० ७५° ३६ से ७५° ५२ पू० के मध्य अवस्थित है। कदत्तनाद राज्य समुद्रोपकूलसे
। २ अतिशय मन्द पुत्रवाला, जिसके बहुत खराब
बेटा रहे।
कदपा-मन्द्राज प्रान्तका एक ज़िला। इससे उत्तर
। करनल-जिला, पूर्व नल्लूर, दक्षिण उत्तर अरुकटू तथा
कोलार जिला और पश्चिम वेल्लारी जिला है।
भूमिपरिमाण ८७४५ वर्ग मील पडता है।
____ इस जिलेका पूर्व एवं दक्षिण अंश पार्वतीय है।
। दक्षिण-पश्चिम भाग समतल लगता है। दक्षिण-पूर्व-
भागमें हिन्दुवोंका पुण्य फेल त्रिपती विद्यमान है।
पालकोंडा और शेषाचल नामक पहाड़ इस जिलेको
दो भागोंमें विभक्त करते हैं-निम्न भाग और उच्च
भाग। उक्त दोनों पर्वत पवार (पिनाकिनी) नदी
पर्यन्त विस्तृत हैं। पालकोंडेका अर्थ 'दुग्धशैल' है।'
| बोध होता-यहां सुन्दर गोचारण क्षेत्र रहनसे उक्त
नाम पड़ा होगा। इस जिले में पेबार नदी ही प्रधान
है। इस नदीको दो शाखा है-कुण्डेर और सगलैर।
पश्चिमघाटके पश्चिमपाच पर्यन्त फैल रहा है। इसके सिवा इनके पापघ्नी, वैरैर और चित्रवती नाम्नी दूसरी ,
समुद्रतौरवर्ती स्थान बहुत उपजाऊ हैं। पूर्व ओर | भी कई नदी पड़ती हैं। यहां वनकी कोई कमी
पार्वत्यप्रदेश में वन यथेष्ट है। इसमें इलायची पधिक | नहीं। वनमें अच्छी अच्छी लकड़ी मिलती है।
होती है। १५६० ई०को किसी नायक सरदारने यह खनिज पदार्थों में लोहा, तांबा, चनेका कड़,
राज्य स्थापित किया। उक्त व्यक्ति कोलात्री राज्यक स्टेट और बिल्लौरी पत्थर निकलता है। कदपा
राजा तेक्कालङ्करके निकटसे आये थे । अन्त में टोपू नगरसे तीन-चार कोस उत्तर पिनाकिनी नदी किनारे
मुलतान्ने इस वंशको राज्यसे दूरीभूत किया। चेणर के पास हीरा मिला है। उडिज्नमें चना, कम्बू,
• फिर १७५२ ई में अंगरेज सरकारने प्राचीन वंश- धान, गेहूं, तम्बाकू, मिर्चा, नानाप्रकार तैलवीज, इक्षु,
धरको राज्यका अधिकार सौंपा। इसकी राजधानी। नील, केसर, कपास और पाट प्रभृति उपजता है।
कत्तिपुरम् है।
___इतिहास-पूर्वकालको यह ज़िला चोलराज्यके
कदन (सं० लो०) कुत्सितं अन्नम्, कोः कदादेशः।। अन्तर्गत था। यहां श्रीरामचन्द्र के प्रागमनको नाना-
१ कुत्सिताब, खराब खाना। २ कदर्यान्व, मोटा | प्रकार किंवदन्ती प्रचलित है।
अनाज। शास्त्रनिषिद्ध और अपथ्य पत्रको कदन - कदपामें बहुत दिन हिन्दुवोंका राज्य रहा । स्थानीय
कहते हैं। "हविविना हरिर्याति विना पौठेन माधवः । पहाड़ोंपर अनेक दुर्भेद्य दुर्ग रहनेसे मुसलमान सहज
कदन्न : पुरहरीकाच: प्रहारेण धनश्चयः ॥” (उट) ... ही इसे जीत न सके थे। अन्तको अनेक कष्ट उठा
कटनभोजी (सं.वि.) कृतसितं अन्न भडत. उन्होंने कदवा जय किया। १५४५ ई०को तालि-
कदव-भज-णिनि कोः कदादेशः। जघन्य अंन्त्र भोजन | कोटको दुर्घटनाके पीछे कर्णाटक जीत मसलमान
करनेवाला, जो ख़राब अनाज खाता हो।
कदपाके बीचसे आते जाते रहे। उसी समय गोल-
कदपत्य (सं. क्लो०) कुत्सितं अपत्यम, कोः कदा- 'कुण्ड के अधीनस्थ प्रधान प्रधान मुसलमान सामन्त,
देशः। १ कुपुत्र, खराब बेटा, बुरी चौलाद। (वि.)। नाना स्थान अपने भागयोग बनाने लगे। उनमें
पामा<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६८०|कदधव-कदपा|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
१ मन्दाग्नि, थोड़ी पाग। (त्रि०) २ मन्दाग्नियुक्त, थोड़ी भाग रखनेवाला।
कदधव (हिं०) <small>कदवा देखो।</small>
कदवा (सं० पु०) कुत्सितो ऽध्वा, कोः कदादेशः । निन्दित पथ, बुरी राह । इसका संस्कृत पर्याय-व्यध्व, दुरध्व, विप और कापथ है।
कदन (सं० क्लो० ) कद्यते, दुःखं प्राप्यते ऽनेन, कद णिच-ल्य घटादित्वात् नहिः। १ पाप, गुनाह । २ मर्द, मलाई, रौंदाई, कुचलाई। ३ युद्ध, लड़ाई। ४ मारण, विनाश, बरबादी।
कटनप्रिय (सं० वि०) विनाशका अनुराग रखने-वाला, जिसे मारकाट अच्छी लगे।
कदत्तनाद-मद्राजके मलवार जिलेके मध्यका एक प्राचीन राज्य। यह प्रक्षा० ११ ३६ से ११° ४८ उ० और देशा० ७५° ३६ से ७५° ५२ पू० के मध्य अवस्थित है। कदत्तनाद राज्य समुद्रोपकूलसे पश्चिमघाटके पश्चिमपाच पर्यन्त फैल रहा है। इसके समुद्रतौरवर्ती स्थान बहुत उपजाऊ हैं। पूर्व ओर पार्वत्यप्रदेश में वन यथेष्ट है। इसमें इलायची अधिक होती है। १५६० ई०को किसी नायक सरदारने यह राज्य स्थापित किया। उक्त व्यक्ति कोलात्री राज्यके राजा तेक्कालङ्करके निकटसे आये थे । अन्त में टोपू मुलतान्ने इस वंशको राज्यसे दूरीभूत किया। फिर १७५२ ई में अंगरेज सरकारने प्राचीन वंश-धरको राज्यका अधिकार सौंपा। इसकी राजधानी कत्तिपुरम् है।
कदन (सं० लो०) कुत्सितं अन्नम्, कोः कदादेशः।१ कुत्सिताब, खराब खाना। २ कदर्यान्व, मोटा अनाज। शास्त्रनिषिद्ध और अपथ्य पत्रको कदन
कहते हैं। <Small>{{center|<poem>"हविविना हरिर्याति विना पौठेन माधवः ।
कदन्न : पुरहरीकाच: प्रहारेण धनश्चयः ॥” (उड्भ्ट)</poem>}}</small>
कटनभोजी (सं० वि०) कृतसितं अन्न भडत कदव-भज-णिनि कोः कदादेशः। जघन्य अंन्त्र भोजन करनेवाला, जो ख़राब अनाज खाता हो।
कदपत्य (सं० क्लो०) कुत्सितं अपत्यम, कोः कदा-देशः। १ कुपुत्र, खराब बेटा, बुरी चौलाद। (वि०)
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२ अतिशय मन्द पुत्रवाला, जिसके बहुत खराब बेटा रहे।
कदपा-मन्द्राज प्रान्तका एक ज़िला। इससे उत्तर करनल-जिला, पूर्व नल्लूर, दक्षिण उत्तर अरुकटू तथा कोलार जिला और पश्चिम वेल्लारी जिला है। भूमिपरिमाण ८७४५ वर्ग मील पडता है।
इस जिलेका पूर्व एवं दक्षिण अंश पार्वतीय है। दक्षिण-पश्चिम भाग समतल लगता है। दक्षिण-पूर्व-भागमें हिन्दुवोंका पुण्य फेल त्रिपती विद्यमान है। पालकोंडा और शेषाचल नामक पहाड़ इस जिलेको दो भागोंमें विभक्त करते हैं-निम्न भाग और उच्च भाग। उक्त दोनों पर्वत पवार (पिनाकिनी) नदी पर्यन्त विस्तृत हैं। पालकोंडेका अर्थ 'दुग्धशैल' है। बोध होता-यहां सुन्दर गोचारण क्षेत्र रहनसे उक्त नाम पड़ा होगा। इस जिले में पेबार नदी ही प्रधान है। इस नदीको दो शाखा है-कुण्डेर और सगलैर। सिवा इनके पापघ्नी, वैरैर और चित्रवती नाम्नी दूसरी भी कई नदी पड़ती हैं। यहां वनकी कोई कमी नहीं। वनमें अच्छी अच्छी लकड़ी मिलती है।
खनिज पदार्थों में लोहा, तांबा, चनेका कड़, स्टेट और बिल्लौरी पत्थर निकलता है। कदपा नगरसे तीन-चार कोस उत्तर पिनाकिनी नदी किनारे चेणर के पास हीरा मिला है। उडिज्नमें चना, कम्बू, धान, गेहूं, तम्बाकू, मिर्चा, नानाप्रकार तैलवीज, इक्षु, नील, केसर, कपास और पाट प्रभृति उपजता है।
<Small>इतिहास</small>-पूर्वकालको यह ज़िला चोलराज्यके अन्तर्गत था। यहां श्रीरामचन्द्र के प्रागमनको नाना-प्रकार किंवदन्ती प्रचलित है।
कदपामें बहुत दिन हिन्दुवोंका राज्य रहा । स्थानीय पहाड़ोंपर अनेक दुर्भेद्य दुर्ग रहनेसे मुसलमान सहज ही इसे जीत न सके थे। अन्तको अनेक कष्ट उठा उन्होंने कदवा जय किया। १५४५ ई०को तालि-कोटको दुर्घटनाके पीछे कर्णाटक जीत मसलमान कदपाके बीचसे आते जाते रहे। उसी समय गोल-कुण्ड के अधीनस्थ प्रधान प्रधान मुसलमान सामन्त, नाना स्थान अपने भागयोग बनाने लगे। उनमें<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कदपा|६८१}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
गुरुम-कुण्ड के किसी नवाबने कदपा अधिकार किया। यह नवाब पत्यन्त पराक्रान्त हो गये थे। अन्तको इन्होंने अपने नामसे मुद्रादि भी चखा दिये।
चिरदिन कोई विषय समान नहीं रहता। यहांके मुसलमानोको क्षमता क्रमशः घटने लगी। १६४२ ई० को महाराष्ट्र-वीरोंने यह स्थान जीत लिया था। महावीर शिवजीने ब्राह्मणोंको यहांके दुर्गकी रक्षाका भार सौंपा। कुछ दिन बाद मुसलमानोंने इसे फिर जीता था। नबी खान् नामक एक पठान कदपाके स्वाधीन नवाब बने। इसके पीछे क्रमान्वयमे तीन नवाबोंने प्रबल प्रतापसे राज्य शासन किया था। १७३२ ई० को अन्तिम नवाबसे महाराष्ट्रोंका विवाद बढ़ा। उसी समयसे यहांके नवाबोंकी क्षमता घट चली। १७५० ई०को कदपाके नवाब कर्णाटिकके युद्धकाण्ड में लिप्त थे। दूसरे वर्ष उन्होंने निज़ाम मुजफफर जङ्गके विरुद्ध षड़यन्त्र किया। उसीसे लुकरद्दीपल्ली नामक गिरिपथ पर निज़ाम मारे गये। १७५७ ई०को महाराष्ट्रोंने कदपा नगर जीत लिया था। किन्तु उसी समय निजामको फौज कदपाभिमुख अग्रसर होनेसे महाराष्ट्र कुछ कर न सके।
महिसुरमें हैदर अली प्रबल पड़ गये थे। १७६९ई० को उन्होंने अंगरेजोंके साथ युद्ध रोक कदपा जीतनका प्रबन्ध बांधा। किन्तु हैदर अलीने समझा, कि कदपा जीतना बहुत सहज न था। इससे उन्होंने गुप्त भावमें निजामके साथ सन्धि को। उक्त के अनसार ठहर गया-दोनों मिलकर कर-मण्डल उपकूल जीतें और जयलब्ध जनपदादिके मध्य हैदर अली कदपा ले लें। अनेकवार युद्ध हुआ था। १७८२ ई०को हैदर अली मर गये। कदपा-वाले अन्तिम नवाबके किसी वंशधरने सिंहासन पानेका दावा किया था। कितनी ही अंगरेजी फौज उनको साहाय्य देने पर राजी हुई। किन्तु उभय दसके सामने आते ही मुसलमानोंने अंगरेजी सिपाहियों को अन्यायरूपसे मार डाला। इसके बाद कदपामें कुछ दिन तक कोई झगड़ा न उठा। १७९०
</Small>VoL III. 171{{gap}}{{gap}}
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ई०को निजामने यह स्थान उहार करनेको सविशेष चेष्टा लगायी थी। १७९२ ई०के सन्धिपत्रानुसार टीपू सुलतानने समस्त कदपा जिला निजामको सौंप दिया। फिर निजामने रेमण्ड साइबको जागिरि प्रदान किया। उसके बाद कई वर्ष तक पलिगागने कदपा दुर्ग अधिकार करने का अनक चेष्टा लगायी थी। १७९९ई० में निजामने अपना देय धन परिशा के लिये अमरेजोंको कदपा दे डाला। १८०० ईसे यह जिला अंगरेजोंक हाथ आया। इसी समय कदपाका पार्वतीय स्थान पलिगारकि अधिकारमें रहा। वह मध्य मध्य बड़ा उत्पात उठाते थे। दस्यत्ति हारा उनको एक प्रकार जीविका चलते रहो। प्रथम अंगरेज़ उन्ह दबा न सके थे। किन्तु क्रमशः नाना प्रकार उपाय अवलम्बन करने पर पलिगारोने वश्यता मानी। उनके वंशधर पाण भी कदपाके नाना स्थानों में मौरूसो जमीन पाये हैं। १८३२ ई०को किसी मसजिदपर यहांके पठानों और अगरेजोसे झगड़ा लग गया था। उससे यहांके समस्त मुसख-मानोंने विद्रोही हो सब-कलकर मैकडोनल्डको मार डाला। इस घटनाके चार वर्ष पोछे यहांके किसी पलिगारने गवरनमेण्टसे मनोमन वृत्ति न पाने पर कोई दो हजार लोग संग्रह कर अंगरेजोंके साथ युद्ध छेड़ा था। कईवार युद्ध होनेपर विद्रोहियोंमें कोई हत तथा कोई आहत हुवा और कोई भाग गया। उस समयसे कदपा शान्ति स्थापित हुई।
यहां हिन्दू और मुसलमान रहते हैं। हिन्दवों में ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। प्रायः सकल ब्राह्मण शैव पौर क्षत्रिय वैष्णव हैं। सिवा इसके चनदी, येरुकल, चेञ्च बर और सुगला प्रभृति कई प्रकारको दूसरी जातियां भी बसती हैं।
कदपा जिले के प्रधान नगर यह हैं-कदपा,बदतोल, प्रोहतुर, जन्म लमदगु, कदिरो, दमनपल्ली, पुलिबन्दल, रायचोट, बेम्पली. और बयलपद। ....
२ कदपा नगर। यह नगर पक्षा. १४° २८ ४९" उ० और देशा. ७८° ५१ ४७ “पू०पर अवस्थित है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६८२|कदब-कदम्ब|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कदपा शब्द संस्कृत कृपा शब्दका अपभ्रंश है। कोई कहता-गदप शब्दसे 'कादपा' बना है। तेलङ्ग गदप शब्दका अर्थ' हार' है। तिरुपती जानेका पथ रहनेसे ही गड़प (कड़पा) नाम पड़ा है।
विजयनगरवाले राजावोंके समय कदपाकी अच्छी सुखसमृद्धि रही। उस समयका प्राचीन नगर अब देखने में नहीं पाता। उसीके पार्श्व पर कदपा नगर स्थापित हुपा है। ई० १८वें शताब्दके प्रारम्भमें कुदपाके नवाबने यहां स्वतन्त्र राजधानी डाली थी ।
कदब-महिसुर-राज्यके तुमकुर जिलेको एक तहसील। इसकी भूमिका परिमाण ४९६ वर्गमील है। प्रधान नदी शिमशा उत्तरपूर्व से दक्षिणमुख बहती है। कदब और गन्धि नामक दोनों स्थलोंपर इसी नदीके गभ्में दो हद विद्यमान हैं। इस जिलेका सदर मुकाम गब्बी है। उसमें पदालत और थाना मौजूद है।
इस जिले में दबीघाटेके निकट एक प्रकारका खनिज पदार्थ मिलता है। अंगरेजीमें उसे हारन-बलेण्ड ( Horn-blend ) कहते हैं। यह धातु काचकी शलाका-जैसा लम्बा और ढालू रहता है। इसके तीन रङ्ग हैं-कृष्ण, हरित् और श्वेत। अंगरेजीमें कृष्णवर्णको हारनन्लेण्ड (Horn-blend),हरिद्वर्णको प्राकिनोलाइट (Actinolite) और श्वेतवर्णको ट्रिमोलाइट ( Tremolite ) कहते हैं। इस पदार्थ में मैगनेशिये, घने और लोहेका अंश,विद्यमान है।
इस जिलेके कदब ग्राममें श्रीवैष्णव ब्राह्मणोंका एक उपनिवेश है। इसे लोग अनेक दिनोंका प्राचीन ग्राम कहते हैं। ग्राममें एक वृहत् सरोवर विद्यमान है। शिमशा नदीमें बांध डालनेसे ही उक्त सरोवर निकला है। प्रवाद है-रामचन्द्र लङ्का जीतन पीछे प्रत्यावर्तनके समय यह बांध बना गये थे।
कदभ्यास (सं० पु०) कुत्सितोऽभ्यासः, कर्मधाः० । मन्द अभ्यास, बुरी आदत ।
कदम (हिं० पु०) १ कदम्बवृक्ष, एक पेड़ । <Small>कदम्ब देखो</small> । २ तृणविशेष, एक घास।
कदम (अ० पु०) १ पद, पैर। २ फलांग, डग,
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पैरका फासला। ३ धलि वा पङ्कपर अस्ति पदचिह्न, पेरका निशान्। ४ अश्वगतिविशेष, घोड़ेको एक चाल। इसमें घोड़ा ख ब जमकर पैर उठाता और सवार बड़ा पाराम पाता है। न तो उसका शरीर हिलता और न काई धक्का हो लगता है। पहले पहल घोड़े को कदम ही सिखाते हैं। लगाम कड़ी न रखनेसे यह चल बिगड़ जाती है।
कुदमचा (फा० पु०) १ पदार्पण करने का स्थान, पैर रखनेको जगह। २ खट्टी।
कदमबाज (अ० पु० ) कदम चलनेवाला घोड़ा।
कदमा (हिं० पु०) मिष्ट खाद्यद्रव्य विशेष, एक मिठाई। यह कदम्बके पुष्य-जैसा बनता है। वङ्ग- देशके राढ़ अञ्चलमेंएकदमाका प्रचुर व्यवहार है।
कदम्ब (सं० पु०) कदि-अम्बच्। <Small>छकदिकडिकटिभ्यो ऽम्वच्। उण् ४।८१।</small> १ वृक्षविशेष, कदमका पेड़ । (Anthocephalus Cadamba) इसका संसक्कत पर्याय-नीप, प्रियक, हरिप्रिय, कादम्ब, षट्पदेष्ट, प्रावषण्य, इलिप्रिय, वन्तपष्य, सरभि, ललनाप्रिय, कादम्बये, सीधुपुष्य, महाव्य और कर्णपूरक है। इसको हिन्दी एवं बंगलामें कदम, कर्णाटीमें कदबेदु, तामिलमें बेलकदम्ब, तैलङ्गमें कोदम्ब, रुद्रथा, कदिमोमा या कदपचेत कहते हैं।
यह सुन्दर वृक्ष भारतवर्ष, ब्रह्म और सिंहलमें उत्पन्न होता है। उंचाई ७०से ८० फौट तक रहती है। कदम्ब बहुत शोघ्र बढ़ता है। पहले दो-तीन वर्षतक सालमें यह काई १० फीट ऊंचा पड़ता है। किन्तु ११२ वर्षे बाद बाढ़ घटने लगती है। कदम्ब सदाबहार पेड़ है। पत्र महुवेके पत्रोंसे मिलते,किन्तु कुछ क्षुद्र और भासुर लगते हैं। कदम्ब वर्षा ऋतुमें फूलता है। पुष्प गाल और पीतवर्ण होते हैं। किन्तु पोत किरण झड़ जानेसे वही पुष्प गोल एवं हरित्वर्ण फल बन जाते हैं। फल पकनेपर लाल निकलते हैं। लोग उन्हें अचार या चटनी में व्यवहार करते हैं। फलोंका स्वाद खटमिट्ठा लगता है। कभी-कभी कदम्बको पत्तो मवेशियों को खिलायो जाती है। काष्ठ मृदु एवं खेतवर्ण रहता, किन्तु<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कदम्ब|६८२}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
उसमें कुछ कुछ पोतत्व झलकता है। उससे कछार और दारजिलिङ्गमें चायके सन्दूक बनते हैं। कदम्बसे कड़ियों और बरंगोंका भी काम निकलता है। कारण इसका काष्ठ सुलभ और लघु रहता है। फिर कदम्बके काष्ठसे नौका और नानाविध उप-योगी वस्तु बनाते हैं।
भावप्रकाशके मतसे यह मधुर, कषाय एवं लवण-रस, गुरु, विरेचक, विष्टम्भकारी, रुक्ष और कफ,स्तन्य तथा वायुवर्धक है।
नीप, महाकदम्ब, धारा कदम्ब, धलिकदम्ब, कद-म्बक प्रभृति कदम्बके विविध भेद हैं।
कदम्ब फल श्रीकृष्णको बहुत प्रिय है। इसीसे झलने में कदम्बके पुष्प व्यवहृत होते हैं। कदम्बके वृक्षसे एक प्रकारका मद्य निकलता, जिसका नाम कादम्बरी पड़ता है।
विष्णुपुराणमें लिखा है-- बलरामको गोपगोपियोंके साथ घूमते देख वरुणने वारुणी (शराब )से कहा था-हे मदिरे ! तुम जिनके अभिलाषका पात्र हो, उन्हों अनन्तदेवके उपभोगार्थ गमन करो। वरुणको बात सुन वारुणो वृन्दावनोत्पन्न कदम्ब वृक्षक कोटरमें आ पहुची। बलरामको घूमते-घूमते उत्तम मदिराका गन्ध मिला था। इससे उनका पूर्वानुराग जाग उठा। कदम्ब वृक्षसे विगलित मद्य देख वह परम पानन्दित हुये थे। फिर गोपगोपियोंने गान करना प्रारम्भ किया। बलरामने उनके साथ साथ मदिरा पी ।
कादम्बरी मद्यको उत्पत्तिके सम्बन्धपर हरिवंशमें इस प्रकार लिखा है-किसो दिन बलराम एकाकी शैलशिखरपर घूमते-घूमते एक प्रफुल्ल कदम्बतरकी छायामें बैठ गये। फिर अकस्मात् मदगन्धयुक्त वायु चलने लगा। वायुवश मदगन्ध उनके नासाविवरमें प्रविष्ट होते ही रातको मद्यपान करनेसे प्रभातके समय मुख सूखनेको भांति मदपिपासाका वेग बढा । वह कदम्ब वृक्षको ओर देखने लगे। वर्षाका जल उस प्रफुल्ल कदम्बके कोटरमें पड़ मद्य बन गया था। बलराम अत्यन्त तृष्णाकुल हो वह मदवारि
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पुनः पुनः पान करने लगे। उस वारिपानसे बलराम मत्त हो गये। शरीर विचलित पड़ा था। उनका शारदीय मुखशयो ईषत् चच्चस लोचन से घूमने लगा। उस अमृतवत् देवानन्द-विधायिनी वारुयोका नाम कदम्बके कोटरमें उत्पन्न होनेसे हो कादम्बरी पड़ा है।
<Small>{{center|<poem>"कदम्बकोटरे नाता नाचा कादम्बरोति सा। ।" (हरिवंश ६६ अ०)</Poem>}}</small>
२ सर्षपवृक्ष, सरसोंका पेड़। ३ देवताड़वच। ४ माक्षिक, शहद। ५ जगत्, दुनिया ।
<Small>{{center|<poem>“म एव सौम्य नित्य राजते मूले विश्वकदम्बम्य परमो वे पुरुष पात्मा"</poem>
(अति)}}</Small>
(क्लो०) ६ समूह, मुण्ड । कदम्ब (कादम्ब)-दाक्षिणात्य को एक प्राचीन पराकान्त जाति । किमो समय इस जातिके लोग दधिर- भारतमें अतिशय प्रबल हो गये थे। उस समय तापी नदीके दक्षिणसे गोपराष्ट्र (गोपा) पर्यन्त सकल देव कदम्ब राजावोंके अधिकारमें रहा।
दाक्षिणात्य का इतिहास और शिलालेख पढ़नेसे कदम्बोंका कितना हो वृत्तान्त ज्ञात होता है। किन्तु इस बातका प्राज भो कोई ठिकाना न हों-कदम्ब दक्षिण भारतके आदिम निवासी हैं या न हों, प्राय हैं अथवा अनार्य और किस सम्पदायका मानते हैं। किसी-किसी जातितत्वविद्के मतसे यह दाक्षिणात्यके पादिमनिवासी हैं। वर्तमान कुडम्बांके नामसे इनका बड़ा संस्रव लगा है। किन्तु विवेचना करनेसे कुड़म्ब खतन्त्र अनार्य जातिके लोग समझ पड़ते हैं। इसका कुछ भो निदशन वा प्रमाणादि नहीं मिलता-पराक्रान्त कदम्बोंके साथ उनका काई संघव लगता है। फिर कदम्बाको उत्तर भारतके प्राचीन पार्यो को शाखा भी कह नहीं सकते। किन्तु किसी समय सत्यताके बल इन लोगोंका आर्यों में समान प्रासन अधिकार करना सच है।
कदम्ब जातिके सकल पूर्वपुरुष शैव रहे, वह अपर देवताका प्राधान्य मानते न थे। इसीसे पुराणकारोंने कदम्बोंको असुर कहा है।
स्कन्दपुराणके तापोखहमें किसी कदम्ब राजाका असुर नामसे उल्लेख है। उन असुर-राजका विवरण<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकीभवत्—एकोत्तर'''|'''४३९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकीभवत् (सं॰ वि॰) मिश्रित, जो एक बन गया हो।}}
{{outdent|एकीभाव (सं॰ पु॰) एक-अभूततद्भावे च्वि-भू-घञ् । १ संयोग, मिलान। २ साधारण प्रकृति वा सम्पत्ति, मामूली कुदरत या जायदाद।}}
{{outdent|एकीभावी (सं॰ त्रि॰) स्वरोंके मेलसे सम्बन्ध रखनेवाला।}}
{{outdent|एकीभूत (सं॰ वि॰) एकत्र, इकट्ठा, जो मिल गया हो।}}
{{outdent|एकीय (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् तिष्ठतीति, एक-छ। १ एकपक्ष, एकतर्फा। २ एक सम्बन्धीय, एकके मुताल्लिक। ३ सहाय, साथी।}}
{{outdent|एकेक्षण (सं॰ पु॰) एकमीक्षणं यस्य, बहुव्री॰। १ काक, कौवा। २ काना। ३ शुक्राचार्य। पुराणमें शुक्राचार्यके एक-नेत्रपर लिखा, वलिराजने जब शुक्राचार्यका निषेध न मान वामनदेवको त्रिपाद भूमि देनेका उद्योग किया, तब उन्होंने जल व्यतिरेक दान असिद्ध ठहरानेके अभिप्रायसे सूक्ष्मरूपमें जलपात्रका मुख रोक लिया था। किन्तु वामनदेव यह चातुरी समझ गये। उन्होंने जलपात्रका छिद्र ढूढ़नेके छलमें कुशसे शुक्राचार्यका एक नेत्र फोड़ डाला।}}
{{outdent|एकेन्द्रिय (सं॰ पु॰) १ इन्द्रियका मनकी ओर निग्रह। इस अवस्थामें इन्द्रियको भली और बुरी दोनों बातोंसे अलग रखते हैं। २ एकमात्र इन्द्रिययुक्त जीव। जैन जलौकादि जीवोंको एकेन्द्रिय मानते हैं। कारण, उनके सिवा त्वक्के दूसरा इन्द्रिय नहीं रहता।}}
{{outdent|एकेश्वर (सं॰ त्रि॰) एकोऽद्वितीय ईश्वरः। १ प्रधान अधिपति, बड़ा मालिक। २ एकाकी, तनहा, अकेला।}}
{{outdent|एकैक (सं॰ त्रि॰) १ एकाकी, अकेला। (अव्य॰) २ अकेले, एक-एक।}}
{{outdent|एकैकतर (सं॰ त्रि॰) एकाकी, अकेला।}}
{{outdent|एकैकवृत्ति (सं॰ वि॰) प्रत्येक एकाकीमें अवस्थान करनेवाला, जो एक-एकमें रहता हो।}}
{{outdent|एकैकशः (सं॰ अव्य॰) एकैक-शस्। पृथक्-पृथक्, अलग-अलग, एक-एक।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकैकश्य (सं॰ क्ली॰) १ एकाकी स्थिति, तनहा हालत। (अव्य॰) २ पृथक्-पृथक्, एक-एक।}}
{{outdent|एकैषिकतैल (सं॰ क्ली॰) तन्नामक तैल, एकैषिक तेल। यह छिन्न, पित्तघ्न और वात एवं श्लेषावर्द्धानेवाला होता है। {{smaller|( मदनपाल )}}}}
{{outdent|एकैषिका (सं॰ स्त्री॰) १ वकपुष्पवृक्ष, मौलसिरीका पेड़। २ पाठा, हरज्यौरी। ३ त्रिवृता। इसका तैल मधुर, अति शीत, पित्तकर, वातकोपन और श्लेष्मवर्द्धन होता है। {{smaller|( सुश्रुत )}}}}
{{outdent|एकैषी (सं॰ स्त्री॰) पाठा, हरज्यौरी।}}
{{outdent|एकोक्ति (सं॰ स्त्री॰) एकमात्र कथन, अकेला लफ्ज़।}}
{{outdent|एकोजी—मन्द्राजस्थ तञ्जोरके प्रथम महाराष्ट्र राजा। यह शाहजीके पुत्र थे। तुका बाईके गर्भसे इनका जन्म हुआ। एकोजी प्रसिद्ध महाराष्ट्रवीर शिवजीके वैमात्रेय रहे। १६३८ ई॰को शाहजी विजयपुर सुलतानके द्वितीय सेनापति बन कर्णाटककी ओर गये थे। पथमें ज्येष्ठपुत्र शम्भुजी और द्वितीय पत्नी तुकाबाईका साथ रहा। १६५३ ई॰को चन्द्रगिरि दुर्ग जीतने जा शम्भुजी कालके ग्रासमें पड़े। कर्णाटक जीतने पर शाहजीको बंगलूरकी जागीर मिली थी। फिर वहीं उनकी स्वर्गवास होनेपर तुकाबाईके यत्नसे एकोजी पितृपदमें अभिषिक्त किये गये। १६७४ ई॰को तत्कालीन तञ्जारके राजाको भय देखा कौशलपूर्वक एवं विना रक्तपात इन्होंने तञ्जोरदुर्ग अपने हाथमें लिया और समस्त देशको अधिकार किया। {{smaller|तञ्जोर शब्दमें विस्तृत विवरण देखो।}} इनके १म शाहजी, २य शरभोजी और ३य पुत्र तुकाजी रहे। १६८७ ई॰को एकोजीका मृत्यु होनेसे ज्येष्ठ पुत्र शाहजी राजा बने थे।}}
{{outdent|एकोतरसौ (हिं॰ वि॰) एकोत्तरशत, एकसौ एक।}}
{{outdent|एकोतरा (हिं॰ पु॰) १ रुपये सैकड़ेका ब्याज। (वि॰) २ एक दिनके अन्तरसे आनेवाला, जो एक रोज़के फर्कसे आता हो।}}
{{outdent|एकोत्तर (सं॰ त्रि॰) एक संख्या अधिक रखनेवाला, जो एकसे बढ़ता हो।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४०'''|'''एकोत्तरिका—एक्की'''|}}
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<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकोत्तरिका (सं॰ स्त्री॰) बौद्धोंका चतुर्थ आगम।}}
{{outdent|एकोदक (सं॰ पु॰) एकं तुल्यमुदकं यस्य, बहुव्री॰। एकगोत्रज ऊर्द्ध्वतन सप्तम पुरुष।}}
{{outdent|एकोदर (सं॰ पु॰) एकं अभिन्नं उदरं जन्मसत्त्रं यस्य, बहुव्री॰। १ सहोदर, एक ही पेटसे पैदा होनेवाला। (क्ली॰) २ तुल्य उदर, बराबर पेट।}}
{{outdent|एकोदात्त (सं॰ त्रि॰) एकमात्र उदात्त स्वरयुक्त।}}
{{outdent|एकोद्दिष्ट (सं॰ क्ली॰) एकः प्रेत एव उद्दिष्टो यत्न, बहुव्री॰। प्रेतोद्देशसे किया जानेवाला एक श्राद्ध। यह श्राद्ध मृत व्यक्तिके उद्देशसे प्रति वर्ष किया जाता है। इसे मध्याह्नकालपर करना चाहिये। क्योंकि पूर्वाह्नको दैविक, अपराह्नको पार्वण और मध्याह्नको एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेकी व्यवस्था है। यथा—}}
{{block center|<poem>
"पूर्वाह्ने दैविकं श्राद्धमपराह्वेतु पार्वणम्।
एकोद्दिष्टं तु मध्याह्ने प्रातर्वृद्धिनिमित्तकम्॥" {{smaller|( मनु )}}
</poem>}}
कुतपके प्रथम भाग और आवर्त्तनके निकटवर्त्ती कालपर एकोद्दिष्ट आरम्भ करना चाहिये। पश्चिमदिगवस्थित छाया पूर्वदिक् जाते समय आवर्त्तनकाल होता है। एकोद्दिष्टके समय कोई विघ्न पड़नेसे अन्य मासमें कृष्ण एकादशी तिथिको श्राद्ध किया जा सकता है। पिता और माताके श्राद्धका पुत्रको ही अधिकार है। पुत्रके अभावमें पत्नी और पत्नीके अभावमें सहोदरपर पिण्डजलदान करनेका भार पड़ता है। पुत्र शब्दके द्वारा द्वादश प्रकार पुत्रोंके श्राद्धाधिकारी होनेकी सम्भावना रहते भी कलिमें अन्य पुत्रका निषेध लगनेसे औरस और दत्तक पुत्र ही समझा जायेगा। याज्ञवल्क्यके कथनानुसार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र, पत्नी, भ्राता, भ्रातुष्पुत्र, पिता, माता, पुत्रवधू, भगिनी, भागिनेय, सपिण्ड तथा नोदकमें पूर्वपूर्वका अभाव आनेसे उत्तरोत्तर व्यक्ति श्राद्धका अधिकारी होगा। किन्तु जहां पिताके बाद पितामह मरता, उस स्थलमें पितामहके दत्तकादि पुत्र न रहनेसे पौत्रको अधिकार मिलता है। दाक्षिणात्य ग्रन्थमें लिखा, कि पत्नी तथा दौहित्र उभय विद्यमान रहते पत्नी, दौहित्र एवं भ्रातुष्पुत्र उभय विद्यमान रहते विभक्तान्नमें दौहित्र तथा अविभक्तान्नमें भ्रातुष्पुत्र और भ्राता एवं भ्रातु-
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
ष्पुत्र उभय विद्यमान रहते कनिष्ठ होनेसे भ्राता तथा ज्येष्ठ होनेसे भ्रातुष्पुत्रको श्राद्ध करना चाहिये।
{{outdent|एकोद्देश (सं॰ पु॰) एकस्य उद्देशः, ६-तत्। एकका उद्देश्य, एक ही बातकी हिदायत।}}
{{outdent|एकोन (सं॰ त्रि॰) एककम, जिसमें एक कम पड़े। यह शब्द विंशति, त्रिंशत् प्रभृति दशकके आदिमें आता है, जैसे—एकोनविंशति, एकोनत्रिंशत् प्रभृति।}}
{{outdent|एकोशिका (सं॰ स्त्री॰) एका मुख्या उशिका कमनीया, कर्मधा॰। पाठा, हरज्योरी।}}
{{outdent|एकोष (सं॰ पु॰) अविच्छिन्नप्रवाह, बन्द न होनेवाला बहाव।}}
{{outdent|एकोषिका, {{smaller|एकोशिका देखो।}}}}
{{outdent|एकौघभूत (सं॰ त्रि॰) एकमात्र समूहमें इकट्ठा हुआ, जो मिलकर ढेर बन गया हो।}}
{{outdent|एकौभा (हिं॰ वि॰) एकाकी, तनहा, दूसरेको साथ न रखनेवाला।}}
{{outdent|एकौसना (हिं॰ क्रि॰) बालका फूटना, दाना पड़ना।}}
{{outdent|एक्का (हिं॰ पु॰) १ यानविशेष, एक गाड़ी। इसमें एक ही अश्व वा वृषभ जोता जाता है। २ अद्वितीय वीर, अनोखा बहादुर। ३ बड़ा मुद्गर। यह दोनों हाथसे उठता है। ४ आभूषणविशेष, एक जेवर। इसमें एक ही नग लगता है। एक्केको लोग बांहपर बांधते हैं। ५ किसी किस्मका शमादान। इसमें एक ही बत्ती जलती है। ६ एक ताश। इसमें एक ही बूटी रहती है। ७ पशुविशेष, अपने झुण्डको छोड़ अलग रहनेवाला जानवर। (त्रि॰) ८ एकसम्बन्धीय, जो दूसरेसे सरोकार रखता न हो। ९ एकाकी, अकेला।}}
{{outdent|एक्कावान (हिं॰ पु॰) एक्का हांकनेवाला पुरुष, जो शख्स एक्का चलाता हो।}}
{{outdent|एक्कावानी (हिं॰ स्त्री॰) १ एक्का चलानेका काम। २ एक्केकी मज़दूरी।}}
{{outdent|एक्की (हिं॰ स्त्री॰) १ ताशका एक पत्ता। यह अपने रंगमें सबसे बड़ी पड़ती और हरेकको काट सकती है। २ एकमात्र वृषभविशिष्ट शकट, एक बैलकी गाड़ी।}}
</div>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४८३
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AMAN KUMAR
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४२'''|'''एटा—एड़कघृत'''|}}
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<div style="text-align: justify;">
सुलतान बलबनने उनके अत्याचारकी बात सुनी। उन्होंने स्वयं पटियाली जा और जङ्गलमें बड़ी फौज जमा व्यवसायकी राह खोली थी। १५ वीं शताब्दीको बार बार मुसलमानोंका आक्रमण पड़ते समय एटेकी बड़ी दुर्दशा हुयी और दोनों ओरकी मार सहना पड़ी। अकबरने इसे अपने कन्नौज, कोयल और बदायू'के सरकारोंमें मिलाया तथा मैनपुरीके कट्टर हिन्दुओंसे लड़नेको अड्डा बनाया था। फिर अन्तको ऐटा पर लखनऊके नवाबका अधिकार रहा। १८०१-२ ई॰को उन्होंने अन्य देशके साथ इसे भी अंगरेजीके हाथ सौंपा। १८४५ ई॰को एटेके इधर उधर परगनोंकी अराजकता पर सरकारकी दृष्टि पड़ी थी। इसीसे पटियालीमें एक डिपुटी कलेक्टर और जायण्ट मजिष्ट्रेट रख गया। फिर १८५६ ई॰को हेड क्वाटेर एटा गांवमें उठ आया। इसी एटा गांवके नामपर ज़िला भी एटा कहाया है। १८५७ ई॰को अलीगढ़से बलवेका समाचार आते ही यहांकी सारी फौज चुपके चल हुई थी। कासगंजकी रक्षाके लिये बड़ी चेष्टा की गयी, किन्तु सफलता न मिली। उस समय एटाके राजा दामड़ सिंह ज़िलेके दक्षिणांशमें स्वतन्त्र शासक बन बैठे। किन्तु फरुखाबादके नवाबने उन्हें मार भगाया और कुछ मासके लिये अपना अधिकार जमाया था। १५वीं दिसम्बरको जनरल सीगेडकी फौजने विद्रोहियोंपर आक्रमण मार कासगंजका उद्धार किया। १८७८-७९ ई॰को रोग और दुर्भिक्षका प्राबल्य रहा। इस ज़िलेमें कितने ही कान्यकुब्ज ब्राह्मण जमीन्दार हैं। सैकड़े पीछे ७० आदमी खेतीके सहारे रहते हैं। मन्दिर और मसजिद बहुत कम हैं। टिड्डी अधिक निकलती है। वर्षांमें बाढ़से भी बड़ी हानि होती है। १८६०-६१ ई॰को दुर्भिक्षके समय लोगोंने घासपात खाकर प्राण बचाया था। उत्तरांशमें चीनी तैयार होती है। सनकी रस्सी और बोरी बनती है। सोरोंमें प्रतिवर्ष गङ्गा स्नानका मेला लगता है। एटासे शिकोहाबादको पक्की सड़क गई है। कासगंज और ढुंडवारगंजसे प्रति वर्ष नाव पर लाद कर माल बाहर भेजा जाता
</div>
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<div style="text-align: justify;">
है। जलवायु शुष्क और स्वास्थ्यकर है। किन्तु ग्रीष्म ऋतुमें प्रायः प्रत्यह बालू और धूलिका तूफ़ान आया करता है। ज्वर और शीतलाका प्रकोप रहता और कभी-कभी हैज़ा भी ज़ोर पकड़ता है।
२ युक्तप्रान्तके एटा ज़िलेकी तहसील। यह काली नदीसे पश्चिम पड़ती है। निम्नगङ्गा नहरकी तीन शाखा सींचका काम देती हैं। भूमिका परिमाण ४९१ वर्गमील है।
३ युक्तप्रान्तके एटा ज़िलेका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २७° ३३' ५०" उ॰ तथा द्राघि॰ ७८° ४२' २५" पू॰ पर काली नदीसे ८ मील पश्चिम अवस्थित है। पहले यह छोटासा गांव था, किन्तु १८५६ ई॰को पटियालीसे कचहरी वग़ैरह उठ आनेपर शहर बन गया। दिलसुख रायका मन्दिर बहुत ऊंचा है। तालाबकी शोभा देखकर जी प्रसन्न हो जाता है। नगरसे उत्तर संग्रामसिंह चौहानका किला है। इसे बने कोई ५०० वर्ष बीते। संग्रामसिंहके वंशज पहले राजा कहाते और किलेके आस-पास हुकूमत चलाते थे। किन्तु सिपाही विद्रोहके समय राजा दामड़सिंहके अस्त्र उठाने पर सरकारने उनका माल असबाब सब छीन लिया और उन्हें राज्यसे निकाल बाहर किया। नगरमें मट्टीके मकान् बहुत हैं।
{{outdent|एठ (सं॰ धा॰) भ्वा॰ आत्म॰ सक॰ सेट्। "एठृ वाधने।" ( कविकल्पद्रुम ) बाधा डालना, रोकना, छोड़ना।}}
{{outdent|एड (सं॰ पु॰) इल् स्वप्ने अच्, डलयोरैक्यम्, अथवा आ-इड़-घञ्। १ मेषविशेष, किसी किस्मका भेड़ा। (त्रि॰) २ बधिर, बहरा, जिसे सुन न पड़े। (हिं॰ स्त्री॰) ३ पाष्णिं, एड़ी।}}
{{outdent|एड़क (सं॰ पु॰) एड स्वार्थे कन्, इल् ख्वल् वा। १ पृथु-शृङ्ग मेष, भेड़ा। २ वनच्छागल, जंगली बकरा। ३ तृणविशेष, पतेर। ४ मञ्जिष्ठा, मजीठ।}}
{{outdent|एड़कघृत (सं॰ क्ली॰) एड़कके नवनीतसे उत्थित घृत, भेड़के मक्खनका घी। यह पुष्टिके पाटव और बलको बढ़ाता है। अति गुरु होनेसे सुकुमारोंको एड़कघृत खाना न चाहिये। {{smaller|( राजनिघण्टु )}}}}
</div>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३०
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
ओङ्गोल - १] मन्द्राजप्रान्त के मेलर जिलेको एक तहसील क्षेत्रफल ९८७ वर्ग मोल है। इसके लम्ब चौड़े मैदानको मूमि बहुत अच्छी है। फसल खब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब
बहुत कम हैं। जङ्गल भी कह देख नहीं पड़ता।
२ मन्द्राज - प्रान्त के नेल्लर जिलेका एक नगर। यह अक्षा० १५° ३०´ २० उ० तथा देशा० ८०० ५ ३० पू० में मूसी नदी किनारे स्थित है। १८०३-०० ई०को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह मगर मण्डपति वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा-भिड़ा करते थे। मपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः गिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
श्रइना, ऊंछना देखो।
चोखा (हिं.वि.) १ तुच्छ, डकोर, कोटा २ उथला, छिछला, हलका । ३ शक्तिहीन, कमज़ोर । 8 कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। “नहां बड़ी सेवा तहां भोका
फल्द।” (लोकोक्ति)
घोकाई (०) तुच्छता, हलकापन, कम पढ़नेको हालत।
ओछापन ( हिं० पु० ) ओछाई देखो।
घोल (पु) बीज-पच । १ मेषादि दादम
{{left|Vol. III. {{gap}} 133}}{{Multicol-break}}
राशि के मध्य अयुग्म राशि। २ अयुग्ममात्र, ताक, ऊना। ( हिं०) भोज: देखो ।
श्रजः (सं० क्लो० ) उन आर्जवे असुन्, वलोपश्च। उजे बँले बलोपश्च । उण् ४।१८१ । १ बल, ज़ोर । २ दोहि चमक । ३ अवलम्बन, सहारा । ४ प्रकाश रोशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, श्य, धूम, उम, स एवं ११श राशि । ६ समासबाहुल्य एवं पदा डम्बरताका काव्यगुण । इस गुणयुक्त रौतिका नाम गौड़ी है। ७ त्रादिका कोमल, हथियार वर्ग रचका इल्म ८ ज्ञानेन्द्रियगणको पटुता । रसादि सप्त- धातुके सारभागसे पैदा एक धातु वैद्यक मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल- पुष्पसे मधु संचय करनेको तरह नाना धातुसे चीज प्रभिचात् चय, कोप, शोक, चिन्ता, इकट्ठा होता है। परिश्रम और पापोन घट जाता है। घोनः व्यापच पड़ने सधगावल, गावका गुरुत्व, वर्षमेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है।
पोजल — काठियावाडको एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणको भोर यह चलती है। बनघालो में नगर के समीप भोजन उपेन नदोसे मिल गयी है।
योजना (हिं. क्रि.) अवरोध करना, रोकना। पीजसोन चोखत् देखो।
श्रजस्कर (सं० वि०) भोजोधातुवर्धक, हैवानो कृम्पत बढ़ानेवाला।
ओजस्वत (सं० त्रि०) अधिक मोनोधातुयुक्त, जिसके हैवानो 'कुव्वत ज्यादा रहे।
भोजस्य भोज देखो।
श्रीजखत् (स० वि० ) श्रजोऽस्यास्ति, पोन:- वलच्। १ तेस्रो मान्दार
शान्दार। २ बलवान्, जोरावर।
ओजस्विता (सं० स्त्री० ) प्रोजखिनो भाव:, चोजस्-तल्-टाप् । १ बलवत्ता, जोरावरी । २ तेजखिता शान्-शौकत।
ओजस्वी, {{smaller|ओजस्वत देखो।}}
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब
बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
ओछना, {{smaller|ऊंछना देखो।}}
ओछा (हिं॰ वि॰) १ तुच्छु, हक़ीर, छोटा। २ उथला, छिछला, हलका। ३ शक्तिहीन, कमज़ोर श। ४ कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। {{smaller|"जहां बड़ी सेवा तहां ओछा फल।" (लोकोक्ति)}}
ओझाई (हिं॰ स्त्री॰) तुच्छता, हलकापन, कम पड़नेकी हालत।
ओछापन (हिं॰ पु॰) {{smaller|ओछाई देखो।}}
ओज (सं॰ पु॰) ओज-अच्। १ मेषादि द्वादश
{{left|Vol. III. {{gap}} 133}}{{Multicol-break}}
राशि के मध्य अयुग्म राशि। २ अयुग्ममात्र, ताक, ऊना। ( हिं०) भोज: देखो ।
श्रजः (सं० क्लो० ) उन आर्जवे असुन्, वलोपश्च। उजे बँले बलोपश्च । उण् ४।१८१ । १ बल, ज़ोर । २ दोहि चमक । ३ अवलम्बन, सहारा । ४ प्रकाश रोशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, श्य, धूम, उम, स एवं ११श राशि । ६ समासबाहुल्य एवं पदा डम्बरताका काव्यगुण । इस गुणयुक्त रौतिका नाम गौड़ी है। ७ त्रादिका कोमल, हथियार वर्ग रचका इल्म ८ ज्ञानेन्द्रियगणको पटुता । रसादि सप्त- धातुके सारभागसे पैदा एक धातु वैद्यक मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल- पुष्पसे मधु संचय करनेको तरह नाना धातुसे चीज प्रभिचात् चय, कोप, शोक, चिन्ता, इकट्ठा होता है। परिश्रम और पापोन घट जाता है। घोनः व्यापच पड़ने सधगावल, गावका गुरुत्व, वर्षमेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है।
पोजल — काठियावाडको एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणको भोर यह चलती है। बनघालो में नगर के समीप भोजन उपेन नदोसे मिल गयी है।
योजना (हिं. क्रि.) अवरोध करना, रोकना। पीजसोन चोखत् देखो।
श्रजस्कर (सं० वि०) भोजोधातुवर्धक, हैवानो कृम्पत बढ़ानेवाला।
ओजस्वत (सं० त्रि०) अधिक मोनोधातुयुक्त, जिसके हैवानो 'कुव्वत ज्यादा रहे।
भोजस्य भोज देखो।
श्रीजखत् (स० वि० ) श्रजोऽस्यास्ति, पोन:- वलच्। १ तेस्रो मान्दार
शान्दार। २ बलवान्, जोरावर।
ओजस्विता (सं० स्त्री० ) प्रोजखिनो भाव:, चोजस्-तल्-टाप् । १ बलवत्ता, जोरावरी । २ तेजखिता शान्-शौकत।
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब
बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
ओछना, {{smaller|ऊंछना देखो।}}
ओछा (हिं॰ वि॰) १ तुच्छु, हक़ीर, छोटा। २ उथला, छिछला, हलका। ३ शक्तिहीन, कमज़ोर श। ४ कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। {{smaller|"जहां बड़ी सेवा तहां ओछा फल।" (लोकोक्ति)}}
ओझाई (हिं॰ स्त्री॰) तुच्छता, हलकापन, कम पड़नेकी हालत।
ओछापन (हिं॰ पु॰) {{smaller|ओछाई देखो।}}
ओज (सं॰ पु॰) ओज-अच्। १ मेषादि द्वादश
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राशि के मध्य अयुग्म राशि। २ अयुग्ममात्र, ताक़, ऊना। (हिं॰ ) {{smaller|ओज: देखो।}}
ओजः (सं॰ त्की॰) उञ आर्जवे असुन्, वलोपश्च। उल्लेर्बले वलोपश्च। उण् ४।१९१। १ बल, ज़ोर। २ दीप्ति, चमक। ३ अवलम्बन, सहारा। ४ प्रकाश, रौशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, ३य, ५म, ७म, ९म एवं ११श राशि। ६ समासबाहुल्य एवं पदाड़म्बरताका काव्यगुण। इस गुणयुक्त रीतिका नाम गौड़ी है। ७ शस्त्रादिका कौशल, हथियार वग़ैरहका इल्म। ८ ज्ञानेन्द्रियगणकी पटुता। रसादि सप्तधातुके सारभागसे पैदा एक धातु। वैद्यकके मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल–पुष्पसे मधु सञ्चय करनेकी तरह नाना धातुसे ओज: इकट्ठा होता है। अभिचात् क्षय, कोप, शोक, चिन्ता, परिश्रम और पापोन घट जाता है। घोनः व्यापच पड़ने सधगावल, गावका गुरुत्व, वर्षमेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है।
पोजल — काठियावाडको एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणको भोर यह चलती है। बनघालो में नगर के समीप भोजन उपेन नदोसे मिल गयी है।
योजना (हिं. क्रि.) अवरोध करना, रोकना। पीजसोन चोखत् देखो।
श्रजस्कर (सं० वि०) भोजोधातुवर्धक, हैवानो कृम्पत बढ़ानेवाला।
ओजस्वत (सं० त्रि०) अधिक मोनोधातुयुक्त, जिसके हैवानो 'कुव्वत ज्यादा रहे।
भोजस्य भोज देखो।
श्रीजखत् (स० वि० ) श्रजोऽस्यास्ति, पोन:- वलच्। १ तेस्रो मान्दार
शान्दार। २ बलवान्, जोरावर।
ओजस्विता (सं० स्त्री० ) प्रोजखिनो भाव:, चोजस्-तल्-टाप् । १ बलवत्ता, जोरावरी । २ तेजखिता शान्-शौकत।
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब
बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
ओछना, {{smaller|ऊंछना देखो।}}
ओछा (हिं॰ वि॰) १ तुच्छु, हक़ीर, छोटा। २ उथला, छिछला, हलका। ३ शक्तिहीन, कमज़ोर श। ४ कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। {{smaller|"जहां बड़ी सेवा तहां ओछा फल।" (लोकोक्ति)}}
ओझाई (हिं॰ स्त्री॰) तुच्छता, हलकापन, कम पड़नेकी हालत।
ओछापन (हिं॰ पु॰) {{smaller|ओछाई देखो।}}
ओज (सं॰ पु॰) ओज-अच्। १ मेषादि द्वादश
{{left|Vol. III. {{gap}} 133}}{{Multicol-break}}
राशि के मध्य अयुग्म राशि। २ अयुग्ममात्र, ताक़, ऊना। (हिं॰ ) {{smaller|ओज: देखो।}}
ओजः (सं॰ त्की॰) उञ आर्जवे असुन्, वलोपश्च। उल्लेर्बले वलोपश्च। उण् ४।१९१। १ बल, ज़ोर। २ दीप्ति, चमक। ३ अवलम्बन, सहारा। ४ प्रकाश, रौशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, ३य, ५म, ७म, ९म एवं ११श राशि। ६ समासबाहुल्य एवं पदाड़म्बरताका काव्यगुण। इस गुणयुक्त रीतिका नाम गौड़ी है। ७ शस्त्रादिका कौशल, हथियार वग़ैरहका इल्म। ८ ज्ञानेन्द्रियगणकी पटुता। रसादि सप्तधातुके सारभागसे पैदा एक धातु। वैद्यकके मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल–पुष्पसे मधु सञ्चय करनेकी तरह नाना धातुसे ओज: इकट्ठा होता है। अभिघात, क्षय, कोप, शोक, चिन्ता, परिश्रम और क्षुधासे ओज: घट जाता है। ओज: व्यापन्न पड़नेसे स्तब्धगात्रत्व, गात्रका गुरुत्व, वर्णभेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है।
पोजल — काठियावाडको एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणको भोर यह चलती है। बनघालो में नगर के समीप भोजन उपेन नदोसे मिल गयी है।
योजना (हिं. क्रि.) अवरोध करना, रोकना। पीजसोन चोखत् देखो।
श्रजस्कर (सं० वि०) भोजोधातुवर्धक, हैवानो कृम्पत बढ़ानेवाला।
ओजस्वत (सं० त्रि०) अधिक मोनोधातुयुक्त, जिसके हैवानो 'कुव्वत ज्यादा रहे।
भोजस्य भोज देखो।
श्रीजखत् (स० वि० ) श्रजोऽस्यास्ति, पोन:- वलच्। १ तेस्रो मान्दार
शान्दार। २ बलवान्, जोरावर।
ओजस्विता (सं० स्त्री० ) प्रोजखिनो भाव:, चोजस्-तल्-टाप् । १ बलवत्ता, जोरावरी । २ तेजखिता शान्-शौकत।
ओजस्वी, {{smaller|ओजस्वत देखो।}}
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब
बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
ओछना, {{smaller|ऊंछना देखो।}}
ओछा (हिं॰ वि॰) १ तुच्छु, हक़ीर, छोटा। २ उथला, छिछला, हलका। ३ शक्तिहीन, कमज़ोर श। ४ कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। {{smaller|"जहां बड़ी सेवा तहां ओछा फल।" (लोकोक्ति)}}
ओझाई (हिं॰ स्त्री॰) तुच्छता, हलकापन, कम पड़नेकी हालत।
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ओज (सं॰ पु॰) ओज-अच्। १ मेषादि द्वादश
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राशि के मध्य अयुग्म राशि। २ अयुग्ममात्र, ताक़, ऊना। (हिं॰ ) {{smaller|ओज: देखो।}}
ओजः (सं॰ त्की॰) उञ आर्जवे असुन्, वलोपश्च। उल्लेर्बले वलोपश्च। उण् ४।१९१। १ बल, ज़ोर। २ दीप्ति, चमक। ३ अवलम्बन, सहारा। ४ प्रकाश, रौशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, ३य, ५म, ७म, ९म एवं ११श राशि। ६ समासबाहुल्य एवं पदाड़म्बरताका काव्यगुण। इस गुणयुक्त रीतिका नाम गौड़ी है। ७ शस्त्रादिका कौशल, हथियार वग़ैरहका इल्म। ८ ज्ञानेन्द्रियगणकी पटुता। रसादि सप्तधातुके सारभागसे पैदा एक धातु। वैद्यकके मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल–पुष्पसे मधु सञ्चय करनेकी तरह नाना धातुसे ओज: इकट्ठा होता है। अभिघात, क्षय, कोप, शोक, चिन्ता, परिश्रम और क्षुधासे ओज: घट जाता है। ओज: व्यापन्न पड़नेसे स्तब्धगात्रत्व, गात्रका गुरुत्व, वर्णभेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है।
ओजत—काठियावाडकी एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणकी ओर बह चलती है। वनथालीमें नगरके समीप ओजत उवेन नदीसे मिल गयी है।
ओजना (हिं॰ क्रि॰) अवरोध करना, रोकना।
ओजसीन, {{smaller|ओजस्वत् देखो।}}
ओजस्कर (सं॰ त्रि॰) ओजोधातुवर्धक, हैवानी क़ुव्वत बढ़ानेवाला।
ओजस्तर (सं॰ त्रि॰) अधिक ओजोधातुयुक्त, जिसके हैवानी क़ुव्वत ज्य़ादा रहे।
ओजस्य {{smaller|ओजस्वत देखो।}}
ओजस्वत (सं॰ त्रि॰) ओजोऽस्यास्ति, ओज:-वलच्। १ तेजस्वी शान्दार। २ बलवान्, ज़ोरावर।
ओजस्विता (सं॰ स्त्री॰) ओजस्विनो भाव:, ओजस्–तल्–टाप्। १ बलवत्ता, ज़ोरावरी। २ तेजस्विता, शान्–शौकत।
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर यह मुथा नदी किनारे सोमवार–महल्लमें अवस्थित है। १७४० और १७६० ई॰के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहब या सदाशिवराव चिमनाजीने मन्दिर बनते समय छह वर्षतक एक हज़ार रुपया मासिक दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटककी दीवार बहुत मज़बूत बनी है। प्राङ्गणकी चारो ओर साधु–सन्तके विश्रामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड्डायां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरकार हज़ार रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दीकी मूर्ति अति विशाल है।
{{outdent|ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।}}
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
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{{outdent|ओजत—काठियावाडकी एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणकी ओर बह चलती है। वनथालीमें नगरके समीप ओजत उवेन नदीसे मिल गयी है।}}
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आदेश यादव
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{{outdent|ओङ्गोल—१ मन्द्राजप्रान्त के नेल्लूर जिल़ेकी एक तहसील। क्षेत्रफल ७९७ वर्ग मील है। इसके लम्बे–चौड़े मैदानकी भूमि बहुत अच्छी है। फ़सल ख़ूब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब बहुत कम हैं। जङ्गलभी कहीं देख नहीं पड़ता।}}
२ मन्द्राज–प्रान्त के नेल्लूर जिल़ेका एक नगर। यह अक्षा॰ १५° ३०’ २०’’ उ॰ तथा देशा॰ ८०° ५’ ३०’’ पू॰में मूसी नदी किनारे अवस्थित है। १८७६-७७ ई॰को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह नगर मण्डपति–वंशके राजावोंको राजधानी रहा। वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। मण्डपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः वेङ्कटगिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था।
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३६
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2026-07-21T13:52:00Z
आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५३५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अथवा प्रणव शब्दका उल्लेख है। इससे समझ पड़ता—वेदकी संहिता अर्थात् प्राचीनतम भागके साथ साथ ओम् का आविर्भाव हुआ है। उसी गणनातीत कालसे ऋषियोंने ओङ्कारतत्व प्रचार करनेको उद्योग लगाया। ऋग्वेद एतरेय–ब्राह्मण में लिखा है—{{smaller|"ओऽमित्युच प्रतिगर एवं तथेति गाथाया ओमिति वै देवं तथेति मानुषम्।" (७।१८)}}
सकल वेदोंकी प्राय: सकल ही उपनिषदोंमें ओम् पर कुछ न कुछ लिखा और उसके पाठसे कई प्रकार ओम् का गूढ़ार्थ प्रतिपादित हुआ है। यथा—
१म—सेतु। अथर्ववेदकी संहितामें ओम् 'सेतु' जैसा निर्दिष्ट है। (६।१०, ८।४) २य—मनं। (छान्दोग्य) ३य—काय। (छान्दोग्य) ४थ—रथ। (मैत्री उप॰ २।६०) ५म—उडुग। (श्वेताश्वतर २।८) ६ष्ठ—उद्गोथ। (छान्दोग्य १।१) ७म—श्वास। (छान्दोग्य ७।२) ८म—अग्नि ९म—तेजः। "तेजो प्रथममोङ्कारात्मकमासीत् । तत्तेजोऽनेनैवोमित्येव तप्व्युध़ति।" (मैत्री उप॰) १०—ज्योतिः। "दीपातीम् ज्योतिः प्रकाशनाज्योतिः। प्रणवाख्यप्रणेतारमरूपो वीतनिद्रो विजरो विमृत्युर्विशोकी भवतीत्येवं ह्याह।" (मैत्री उप॰ ६।२५) ११—वाक्य। १२—शब्द। (छान्दोग्य २।२३) १३—रस (तैत्तिरीय उप॰ २।७) १४—जल। "आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम्," (मैत्री उप॰ ६।१५)
१५ - मिथुन । ( छान्दोग्य ११६ ) १६ - ज्ञेय । ( योगशास्त्र )
१७ - यूप ।
।” (प्राणाग्रिोव उप० ) १८ – सर्व ।
। “बोङ्कारो यूपः
"ओमिति ब्रह्म । श्रमितोदं सर्वम्।” ( तैत्तिरीय उप० १८ )
ऊपरौ अर्थो से स्पष्ट समझ पड़ता, कि वही
विमा है।
२०- खोकारवाक्य । २१ - अनु-
१८ - आरम्भ |
मति २२ – अपाकृति। २२ – बखोकार ।
ब्रह्मको महिमा प्रकाश करनेको 'थोम्' मन्द
नाना अर्थों में व्यवहृत हुआ है। भिन्न भिन्न उप-
निषविषयका विस्तर प्रमाण मिलता है।
"मोमित्येतदचरमुद्दोथमुपास्रोत ।
श्रोमिति द्वायति तस्योपव्याख्यानम् । ” ( छान्दोग्य ३ १११ )
“श्रोमित्ये तदचरमुदृगौथः तहा एतन्मिथुन ं वागेवर्क प्राय: साम यहा
च प्रायश्चके च साम च ( छान्दोग्य २२१५ )
उपासना
करना
पचरवरूप उद्गीथ 'ॐ' को
चाहिये। क्योंकि 'ॐ' प्रचर से हो प्रारम्भ कर साम
{{Multicol-break}}
प्रवृति गाये जाते है इसलिये रोष
हैं।
है चोहारको व्याख्या करना कर्तव्य है।
:
उहोथ
वाक्य हो
डोनेसे प
ऋक्, प्राण हो साम और 'ॐ' अक्षर हो
वाक्य एवं प्राण ऋक् तथा सामका कारण
और साम शब्द राय मिथुन (१)
उगीय है।
" तथा एतन्मिय नमी मिये तस्मिन्नवरे जाते यदा में मिथुनी
समागच्छत आयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् " " कामानां
भवति य एतदेव विद्यानचरमुद्गीथमु गस्तं " ( छान्दोग्यउप० १६० )
और प्राण-
जैसे पुरुष परस्पर मिलने कामति क
वाक्यरूप स्त्री
हातो, वैसे हो जब
रूप पुरुषका मिथुन अर्थात् मिलन मंडला, तब
उनको परस्पर काम मिलता है। (१६) जो
विद्दान् व्यक्ति इस मतको देख उहोथ ओङ्कारको
उपासना करता, वह जब जो चाहता, वही फल पा
जाता है। (शश७ )
तंत्तिरीय उपनिषद
-
“श्रोमिति ब्रह्म । श्रमितोद सर्वम् श्रोमित्येतदनुति व्य वा
अप्यो श्रावयेव्या श्रावयन्ति । श्रमिति सामानि गायन्ति ओं शामिति
शस्त्राणि शंसन्ति । चामित्यध्वर्यु प्रतिगरं प्रतिग्टयति । श्रमिति ब्रह्मा
प्रसीति । श्रमित्यग्नि होव मनुजानाति । श्रमिति ब्राह्मणः प्रवचावाद |
ब्रह्ममा, वानोति ब्रह्म वो प्राप्नोति।” (१)
श्रोङ्कार हो ब्रह्म है। इस संसार सकल हो
श्रोङ्कार है । सकल कार्योंके पादिमें प्रोङ्कार प्रयोग
करना चाहिये। कोई वैदिक विषय सुनाने में प्रथम
हो प्रोङ्कार उच्चारण करना पड़ेगा । श्रोङ्कार प्रयोग
पूर्वक सामगान किया जाता है । शास्त्र पढ़ने में
प्रथम 'ॐ श' वाक्य बोलते हैं। अध्वर्युको मन्त्र
पढ़ते समय पहले ॐ उच्चारण कर लेना चाहिये ।
ब्रह्म कमर से पूर्व 'ॐ' शब्द बोलना पड़ता है।
ॐ शब्द उच्चारण कर अग्निहोत्र याग करते हैं।
पोद्दार उचारणपूर्वक वेदाध्ययन करनेमे वेदविद्या
और ब्रह्मविद्या दोनों मिलती हैं।
a
" परवापरच ब्रह्म यदोद्धारस्तस्मादिद्दाने तेदेवायतने नैकवरमन्वे ति | श
स यद्येकमावमभित्र्यायोत स तेन व संवेदितस्त यमेव जगन्यामभिसम्पद्यते ।
तसृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तव तरसा ब्रह्मचर्येण श्रइया सम्पन्नो महि-
मान मनुभवति । अथ यदि हिमावस्य मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिच यजुर्भि
रुन्नोयते । सोम लोकं स सोमचोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । ४ ।<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५३५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अथवा प्रणव शब्दका उल्लेख है। इससे समझ पड़ता—वेदकी संहिता अर्थात् प्राचीनतम भागके साथ साथ ओम् का आविर्भाव हुआ है। उसी गणनातीत कालसे ऋषियोंने ओङ्कारतत्व प्रचार करनेको उद्योग लगाया। ऋग्वेद एतरेय–ब्राह्मण में लिखा है—{{smaller|"ओऽमित्युच प्रतिगर एवं तथेति गाथाया ओमिति वै देवं तथेति मानुषम्।" (७।१८)}}
सकल वेदोंकी प्राय: सकल ही उपनिषदोंमें ओम् पर कुछ न कुछ लिखा और उसके पाठसे कई प्रकार ओम् का गूढ़ार्थ प्रतिपादित हुआ है। यथा—
१म—सेतु। अथर्ववेदकी संहितामें ओम् 'सेतु' जैसा निर्दिष्ट है। (६।१०, ८।४) २य—मनं। (छान्दोग्य) ३य—काय। (छान्दोग्य) ४थ—रथ। (मैत्री उप॰ २।६०) ५म—उडुग। (श्वेताश्वतर २।८) ६ष्ठ—उद्गोथ। (छान्दोग्य १।१) ७म—श्वास। (छान्दोग्य ७।२) ८म—अग्नि ९म—तेजः। "तेजो प्रथममोङ्कारात्मकमासीत् । तत्तेजोऽनेनैवोमित्येव तप्व्युध़ति।" (मैत्री उप॰) १०—ज्योतिः। "दीपातीम् ज्योतिः प्रकाशनाज्योतिः। प्रणवाख्यप्रणेतारमरूपो वीतनिद्रो विजरो विमृत्युर्विशोकी भवतीत्येवं ह्याह।" (मैत्री उप॰ ६।२५) ११—वाक्य। १२—शब्द। (छान्दोग्य २।२३) १३—रस (तैत्तिरीय उप॰ २।७) १४—जल। "आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम्," (मैत्री उप॰ ६।२५) १५—मिथुन। (छान्दोग्य १।६) १६—ज्ञेय। (योगशास्त्र) १७—यूप। "ओङ्कारो यूपः।" (प्राणाग्रिहोव उप॰) १८—सर्व। "ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्वम्।" (तैत्तिरीय उप॰ १।८)
ऊपरी अर्थोसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि वही विश्वात्मा है।
१९—आरम्भ। २०—स्वीकारवाक्य। २१—अनुमति। २२—अपाकृति। २३—अस्वीकार।
ब्रह्मकी महिमा प्रकाश करनेको 'ओम्' शब्द नाना अर्थों में व्यवहृत हुआ है। भिन्न भिन्न उपनिषद् में इस विषयका विस्तर प्रमाण मिलता है।
{{smaller|"ओमित्येतदक्षमुद्गीथमुपासोत।<br>
ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम्।" (छान्दोग्य ३।१।१)}}
"ओमित्येतदक्षरमुदृगौथः तहा एतन्मिथुनं वागेवर्कप्राण: साम यद्वाक् च प्रायश्चर्क च साम च।" (छान्दोग्य ३।१।५)
अक्षरवरूप उद्गीथ 'ॐ'की उपासना करना चाहिये। क्योंकि 'ॐ' अक्षरसे ही प्रारम्भ कर साम
{{Multicol-break}}
प्रभृति गाये जाते है इसलिये ओङ्कार ही उद्गीथ हैं। ओङ्कारकी व्याख्या करना कर्तव्य है। (३।१।१)
वाक्य ही ऋक्, प्राण ही साम और 'ॐ' अक्षर ही उद्गीथ हैं।
वाक्य एवं प्राण ऋक् तथा सामका कारण
और साम शब्द राय मिथुन (१)
उगीय है।
" तथा एतन्मिय नमी मिये तस्मिन्नवरे जाते यदा में मिथुनी
समागच्छत आयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् " " कामानां
भवति य एतदेव विद्यानचरमुद्गीथमु गस्तं " ( छान्दोग्यउप० १६० )
और प्राण-
जैसे पुरुष परस्पर मिलने कामति क
वाक्यरूप स्त्री
हातो, वैसे हो जब
रूप पुरुषका मिथुन अर्थात् मिलन मंडला, तब
उनको परस्पर काम मिलता है। (१६) जो
विद्दान् व्यक्ति इस मतको देख उहोथ ओङ्कारको
उपासना करता, वह जब जो चाहता, वही फल पा
जाता है। (शश७ )
तंत्तिरीय उपनिषद
-
“श्रोमिति ब्रह्म । श्रमितोद सर्वम् श्रोमित्येतदनुति व्य वा
अप्यो श्रावयेव्या श्रावयन्ति । श्रमिति सामानि गायन्ति ओं शामिति
शस्त्राणि शंसन्ति । चामित्यध्वर्यु प्रतिगरं प्रतिग्टयति । श्रमिति ब्रह्मा
प्रसीति । श्रमित्यग्नि होव मनुजानाति । श्रमिति ब्राह्मणः प्रवचावाद |
ब्रह्ममा, वानोति ब्रह्म वो प्राप्नोति।” (१)
श्रोङ्कार हो ब्रह्म है। इस संसार सकल हो
श्रोङ्कार है । सकल कार्योंके पादिमें प्रोङ्कार प्रयोग
करना चाहिये। कोई वैदिक विषय सुनाने में प्रथम
हो प्रोङ्कार उच्चारण करना पड़ेगा । श्रोङ्कार प्रयोग
पूर्वक सामगान किया जाता है । शास्त्र पढ़ने में
प्रथम 'ॐ श' वाक्य बोलते हैं। अध्वर्युको मन्त्र
पढ़ते समय पहले ॐ उच्चारण कर लेना चाहिये ।
ब्रह्म कमर से पूर्व 'ॐ' शब्द बोलना पड़ता है।
ॐ शब्द उच्चारण कर अग्निहोत्र याग करते हैं।
पोद्दार उचारणपूर्वक वेदाध्ययन करनेमे वेदविद्या
और ब्रह्मविद्या दोनों मिलती हैं।
a
" परवापरच ब्रह्म यदोद्धारस्तस्मादिद्दाने तेदेवायतने नैकवरमन्वे ति | श
स यद्येकमावमभित्र्यायोत स तेन व संवेदितस्त यमेव जगन्यामभिसम्पद्यते ।
तसृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तव तरसा ब्रह्मचर्येण श्रइया सम्पन्नो महि-
मान मनुभवति । अथ यदि हिमावस्य मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिच यजुर्भि
रुन्नोयते । सोम लोकं स सोमचोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । ४ ।<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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सकल वेदोंकी प्राय: सकल ही उपनिषदोंमें ओम् पर कुछ न कुछ लिखा और उसके पाठसे कई प्रकार ओम् का गूढ़ार्थ प्रतिपादित हुआ है। यथा—
१म—सेतु। अथर्ववेदकी संहितामें ओम् 'सेतु' जैसा निर्दिष्ट है। (६।१०, ८।४) २य—मनं। (छान्दोग्य) ३य—काय। (छान्दोग्य) ४थ—रथ। (मैत्री उप॰ २।६०) ५म—उडुग। (श्वेताश्वतर २।८) ६ष्ठ—उद्गोथ। (छान्दोग्य १।१) ७म—श्वास। (छान्दोग्य ७।२) ८म—अग्नि ९म—तेजः। "तेजो प्रथममोङ्कारात्मकमासीत् । तत्तेजोऽनेनैवोमित्येव तप्व्युध़ति।" (मैत्री उप॰) १०—ज्योतिः। "दीपातीम् ज्योतिः प्रकाशनाज्योतिः। प्रणवाख्यप्रणेतारमरूपो वीतनिद्रो विजरो विमृत्युर्विशोकी भवतीत्येवं ह्याह।" (मैत्री उप॰ ६।२५) ११—वाक्य। १२—शब्द। (छान्दोग्य २।२३) १३—रस (तैत्तिरीय उप॰ २।७) १४—जल। "आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम्," (मैत्री उप॰ ६।२५) १५—मिथुन। (छान्दोग्य १।६) १६—ज्ञेय। (योगशास्त्र) १७—यूप। "ओङ्कारो यूपः।" (प्राणाग्रिहोव उप॰) १८—सर्व। "ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्वम्।" (तैत्तिरीय उप॰ १।८)
ऊपरी अर्थोसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि वही विश्वात्मा है।
१९—आरम्भ। २०—स्वीकारवाक्य। २१—अनुमति। २२—अपाकृति। २३—अस्वीकार।
ब्रह्मकी महिमा प्रकाश करनेको 'ओम्' शब्द नाना अर्थों में व्यवहृत हुआ है। भिन्न भिन्न उपनिषद् में इस विषयका विस्तर प्रमाण मिलता है।
{{smaller|"ओमित्येतदक्षमुद्गीथमुपासोत।<br>
ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम्।" (छान्दोग्य ३।१।१)}}
"ओमित्येतदक्षरमुदृगौथः तहा एतन्मिथुनं वागेवर्कप्राण: साम यद्वाक् च प्रायश्चर्क च साम च।" (छान्दोग्य ३।१।५)
अक्षरवरूप उद्गीथ 'ॐ'की उपासना करना चाहिये। क्योंकि 'ॐ' अक्षरसे ही प्रारम्भ कर साम
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प्रभृति गाये जाते है इसलिये ओङ्कार ही उद्गीथ हैं। ओङ्कारकी व्याख्या करना कर्तव्य है। (३।१।१)
वाक्य ही ऋक्, प्राण ही साम और 'ॐ' अक्षर ही उद्गीथ हैं। वाक्य एवं प्राण ऋक् तथा सामका कारण और साम शब्द वाच्त मिथुन है। (३।१।५)
{{smaller|"तद्वा एतन्मियु नमोमियेतस्मिन्नक्षरे भ्रंमृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्षोन्यस्य कामम्"। "आपयेताऽवै कामानां भवति य एतदेव विद्वानचरमुदृगोथसु गल।" (छान्दोग्यउप॰ ३।१।६–७)}}
और प्राण-
जैसे पुरुष परस्पर मिलने कामति क
वाक्यरूप स्त्री
हातो, वैसे हो जब
रूप पुरुषका मिथुन अर्थात् मिलन मंडला, तब
उनको परस्पर काम मिलता है। (१६) जो
विद्दान् व्यक्ति इस मतको देख उहोथ ओङ्कारको
उपासना करता, वह जब जो चाहता, वही फल पा
जाता है। (शश७ )
तंत्तिरीय उपनिषद
-
“श्रोमिति ब्रह्म । श्रमितोद सर्वम् श्रोमित्येतदनुति व्य वा
अप्यो श्रावयेव्या श्रावयन्ति । श्रमिति सामानि गायन्ति ओं शामिति
शस्त्राणि शंसन्ति । चामित्यध्वर्यु प्रतिगरं प्रतिग्टयति । श्रमिति ब्रह्मा
प्रसीति । श्रमित्यग्नि होव मनुजानाति । श्रमिति ब्राह्मणः प्रवचावाद |
ब्रह्ममा, वानोति ब्रह्म वो प्राप्नोति।” (१)
श्रोङ्कार हो ब्रह्म है। इस संसार सकल हो
श्रोङ्कार है । सकल कार्योंके पादिमें प्रोङ्कार प्रयोग
करना चाहिये। कोई वैदिक विषय सुनाने में प्रथम
हो प्रोङ्कार उच्चारण करना पड़ेगा । श्रोङ्कार प्रयोग
पूर्वक सामगान किया जाता है । शास्त्र पढ़ने में
प्रथम 'ॐ श' वाक्य बोलते हैं। अध्वर्युको मन्त्र
पढ़ते समय पहले ॐ उच्चारण कर लेना चाहिये ।
ब्रह्म कमर से पूर्व 'ॐ' शब्द बोलना पड़ता है।
ॐ शब्द उच्चारण कर अग्निहोत्र याग करते हैं।
पोद्दार उचारणपूर्वक वेदाध्ययन करनेमे वेदविद्या
और ब्रह्मविद्या दोनों मिलती हैं।
a
" परवापरच ब्रह्म यदोद्धारस्तस्मादिद्दाने तेदेवायतने नैकवरमन्वे ति | श
स यद्येकमावमभित्र्यायोत स तेन व संवेदितस्त यमेव जगन्यामभिसम्पद्यते ।
तसृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तव तरसा ब्रह्मचर्येण श्रइया सम्पन्नो महि-
मान मनुभवति । अथ यदि हिमावस्य मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिच यजुर्भि
रुन्नोयते । सोम लोकं स सोमचोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । ४ ।<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५८०
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>औषध
५७
वैद्यकमतसे औषध तीन भागमें विभक्त है। कच्चा भोर सोनालका पक्का फल पाच है। ओषधके
कितने ही औषध कुपित दोष दृष्यके प्रशमक, कितने स्थान विशेषका उल्लेख न रहनेसे मूल हो लेना
ही उसके शोधक और कितने ही स्वस्थ अवस्था में पड़ता है। योगविशेषमें औषधका परिमाण बो
उपयोगी होते हैं। पिचकारीमें देय, विरेचक एवं लिखा जाता, कच्चा या गोला प्रोषध डालने में उससे
वमनकारक द्रव्य और दैहिक रोगमें साधारणतः। द्विगुण देना उचित पाता है।
तेल, घृत तथा मधु औषध उपयोगी है। मानस विषय समझ व्यवहार कर सकनेसे अमृत तुल्य
रोगमें बुद्धि, धर्य और आमज्ञान हो औषध है। । फल मिलता-किस प्रकार कौन अवस्थामें क्या औषध
जिस स्थानपर हल नहीं चलता एवं बृहत् चलता है। नहीं तो विष वच्च प्रभृतिको भांति औषध
वृक्षादि नहीं रहता और जो स्थान निग्ध, मृदु, अपकार साधन करता है। नाम, रूप और गुण-
समतल, कृष्णा, गौर अथवा लोहितवर्ण लगता, साधारणतः तीन ज्ञातव्य विषय समझ लेनेसे ही
उसी स्थानका औषध लेना पड़ता है। वल्मोक, औषधका पूरा ज्ञान नहीं होता। उक्त समस्त
श्मशान, देवमन्दिर और वालुकामय, गत वा प्रस्तर ज्ञातव्यकै साथ औषधके योगको प्रणाली समझना भी
विशिष्ट तथा निम्रोवत स्थानमें उत्पन्न होनेवाला विशेष आवश्यक है। क्योंकि योमविशेषले विष भी
औषध उपयोगी नहीं। पूर्वोक्त स्थानजात होते भी यदि अमृत बन जाता है।
पौषध कोटजुष्ट अथवा अस्त्र, प्रातप, वायु, अग्नि, उपवासके पीछे जलपान करने, चौथ रहने,
जल प्रभृतिके श्राघातसे मर जाये, तो उसको कभी अजौण मालूम पड़ने, पाहार ले चुकने और पिपासा
हाथ न लगाये। फिर सरस, परिपुष्ट और मृत्तिकाको लगने पर संशोधन प्रभृति कोई औषध सेवन करना
बहुदूर पर्यन्त भेद करनेवाला मूल ही ग्राह्य है। न चाहिये। साधारणतः अवहीन औषध सेवनको
___ कोई-कोई कहता-प्रावट, वर्षा, शरत, हेमन्त, हो व्यवस्था है। उससे पौषधका अधिक वीर्य प्रकाश
वसन्त एवं ग्रीष्मकालको यथाक्रम मूल, पत्र, वक्, पाता और निःसन्देह रोग नष्ट हो जाता है। किन्तु
चौर, सार तथा फल लेना पड़ता है। किन्तु सुश्रुतने बालक, वृद्ध, युवतो और मृदु व्यक्तिके लिये ऐसो
ससमें दोष लगा कहा-सौम्य ऋतुमें सौम्य और व्यवस्था करना न चाहिये। इससे उन्हें अत्यन्त
आम्नेय ऋतुमें पाम्नेय पोषध संग्रह करना उचित म्लानि लगती पोर बलको हानि पड़ता है।
है। वीर्यवान पोर एक वत्सर पतिक्रम न करनेवाला आहारसे कुछ पहले उन्हें प्रौषध सेवन करना
औषध हो रोगनाशक होता है। केवलमात्र मधु, चाहिये। उससे औषध अनाहत होनेपर वारम्बार
'घत, गुड, पिप्पलों और विडङ्ग द्रव्य पुरातन पड़नेसे मुखमें चढ़ नहीं सकता, परिपाक भो शीघ्र पड़ता
उपकारप्रद है। पृथिवी एवं जलगुणाधिक्य स्थानका ओर वलक्षय नहौं लगता। प्रोषध परिपाक होने पर
विरेचक, अग्नि, आकाश तथा वायुगुण-भूयिष्ठ : वायुका अनुलोम, स्वास्थ्य, क्षुधाकृष्णाका प्रकाश,
स्वानका वमनविरेचन कारक और आकाशगुणबहुल मनमें आनन्द, शरीरका हलकापन, सकल इन्द्रियका
स्थानका प्रशामक औषध अधिक गुणशाली होता है। शौच और शुद्ध उदगार होता है। औषध संपूर्ण
स्थल मूलका काष्ठ छोड़ बल्कल और सूक्ष्म मूलका जीणं न पड़ते पथवा पाहार सम्यक परिपाक न होते
काष्ठ और वल्कल समस्त हो ग्रहण करना चाहिये। औषध सेवन करनेसे पोडाको शान्ति न पाने पर
वटादिका वल्कल, वीजादिका सार, तालिशादिका अन्यान्य रोगको भी उत्पत्ति होती है। स
पत्र, त्रिफला प्रभृतिका फल, चित्रकका मूल, पोलका घोषध परिपाक न होते क्लान्ति, दाह, अवसवता,
कन्द, धातकीका पुष्य, खदिरादिका सार और भ्रम, मूर्छा, शिरःपीड़ा, पसखबोध और बलहानिका
कएकारीका समस्त अंश लेना पड़ता है। बेलका वेग बढ़ता है।
यो रुप<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औषध|५७९}}</noinclude>
वैद्यकमतसे औषध तीन भागमें विभक्त है। कच्चा भोर सोनालका पक्का फल पाच है। ओषधके
कितने ही औषध कुपित दोष दृष्यके प्रशमक, कितने स्थान विशेषका उल्लेख न रहनेसे मूल हो लेना
ही उसके शोधक और कितने ही स्वस्थ अवस्था में पड़ता है। योगविशेषमें औषधका परिमाण बो
उपयोगी होते हैं। पिचकारीमें देय, विरेचक एवं लिखा जाता, कच्चा या गोला प्रोषध डालने में उससे
वमनकारक द्रव्य और दैहिक रोगमें साधारणतः। द्विगुण देना उचित पाता है।
तेल, घृत तथा मधु औषध उपयोगी है। मानस विषय समझ व्यवहार कर सकनेसे अमृत तुल्य
रोगमें बुद्धि, धर्य और आमज्ञान हो औषध है। । फल मिलता-किस प्रकार कौन अवस्थामें क्या औषध
जिस स्थानपर हल नहीं चलता एवं बृहत् चलता है। नहीं तो विष वच्च प्रभृतिको भांति औषध
वृक्षादि नहीं रहता और जो स्थान निग्ध, मृदु, अपकार साधन करता है। नाम, रूप और गुण-
समतल, कृष्णा, गौर अथवा लोहितवर्ण लगता, साधारणतः तीन ज्ञातव्य विषय समझ लेनेसे ही
उसी स्थानका औषध लेना पड़ता है। वल्मोक, औषधका पूरा ज्ञान नहीं होता। उक्त समस्त
श्मशान, देवमन्दिर और वालुकामय, गत वा प्रस्तर ज्ञातव्यकै साथ औषधके योगको प्रणाली समझना भी
विशिष्ट तथा निम्रोवत स्थानमें उत्पन्न होनेवाला विशेष आवश्यक है। क्योंकि योमविशेषले विष भी
औषध उपयोगी नहीं। पूर्वोक्त स्थानजात होते भी यदि अमृत बन जाता है।
पौषध कोटजुष्ट अथवा अस्त्र, प्रातप, वायु, अग्नि, उपवासके पीछे जलपान करने, चौथ रहने,
जल प्रभृतिके श्राघातसे मर जाये, तो उसको कभी अजौण मालूम पड़ने, पाहार ले चुकने और पिपासा
हाथ न लगाये। फिर सरस, परिपुष्ट और मृत्तिकाको लगने पर संशोधन प्रभृति कोई औषध सेवन करना
बहुदूर पर्यन्त भेद करनेवाला मूल ही ग्राह्य है। न चाहिये। साधारणतः अवहीन औषध सेवनको
___ कोई-कोई कहता-प्रावट, वर्षा, शरत, हेमन्त, हो व्यवस्था है। उससे पौषधका अधिक वीर्य प्रकाश
वसन्त एवं ग्रीष्मकालको यथाक्रम मूल, पत्र, वक्, पाता और निःसन्देह रोग नष्ट हो जाता है। किन्तु
चौर, सार तथा फल लेना पड़ता है। किन्तु सुश्रुतने बालक, वृद्ध, युवतो और मृदु व्यक्तिके लिये ऐसो
ससमें दोष लगा कहा-सौम्य ऋतुमें सौम्य और व्यवस्था करना न चाहिये। इससे उन्हें अत्यन्त
आम्नेय ऋतुमें पाम्नेय पोषध संग्रह करना उचित म्लानि लगती पोर बलको हानि पड़ता है।
है। वीर्यवान पोर एक वत्सर पतिक्रम न करनेवाला आहारसे कुछ पहले उन्हें प्रौषध सेवन करना
औषध हो रोगनाशक होता है। केवलमात्र मधु, चाहिये। उससे औषध अनाहत होनेपर वारम्बार
'घत, गुड, पिप्पलों और विडङ्ग द्रव्य पुरातन पड़नेसे मुखमें चढ़ नहीं सकता, परिपाक भो शीघ्र पड़ता
उपकारप्रद है। पृथिवी एवं जलगुणाधिक्य स्थानका ओर वलक्षय नहौं लगता। प्रोषध परिपाक होने पर
विरेचक, अग्नि, आकाश तथा वायुगुण-भूयिष्ठ : वायुका अनुलोम, स्वास्थ्य, क्षुधाकृष्णाका प्रकाश,
स्वानका वमनविरेचन कारक और आकाशगुणबहुल मनमें आनन्द, शरीरका हलकापन, सकल इन्द्रियका
स्थानका प्रशामक औषध अधिक गुणशाली होता है। शौच और शुद्ध उदगार होता है। औषध संपूर्ण
स्थल मूलका काष्ठ छोड़ बल्कल और सूक्ष्म मूलका जीणं न पड़ते पथवा पाहार सम्यक परिपाक न होते
काष्ठ और वल्कल समस्त हो ग्रहण करना चाहिये। औषध सेवन करनेसे पोडाको शान्ति न पाने पर
वटादिका वल्कल, वीजादिका सार, तालिशादिका अन्यान्य रोगको भी उत्पत्ति होती है। स
पत्र, त्रिफला प्रभृतिका फल, चित्रकका मूल, पोलका घोषध परिपाक न होते क्लान्ति, दाह, अवसवता,
कन्द, धातकीका पुष्य, खदिरादिका सार और भ्रम, मूर्छा, शिरःपीड़ा, पसखबोध और बलहानिका
कएकारीका समस्त अंश लेना पड़ता है। बेलका वेग बढ़ता है।
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औषध|५७९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>वैद्यकमत से औषध तीन भागमें विभक्त है ।
कितने से कुपित दोष दुष्पके प्रथमक, कितने
हो उसके शोधक घोर किनने हो परखा
उपयोगी होते हैं। पिचकारी देय, विरेचक एवं
वमनकारक द्रव्य और दैहिक रोगमें साधारणतः
तेल, घृत तथा मधु श्रौषध उपयोगी है। मानस
रोग में बुद्धि, धर्य और श्रमज्ञान ही औषध है।
जिस स्थान पर हल नहीं चलता एवं बृहत्
वृक्षादि नहीं रहता और जो स्थान खिग्ध, मृदु,
स्थिर, समतल, कृष्ण, गौर अथवा लोहितवर्ण लगता,
उer स्थानका औषध लेना पड़ता है। वल्मीक,
• श्मशान, देवमन्दिर और वालुकामय, गतं वा प्रस्तर
विशिष्ट तथा निम्त्रोत स्थानमें उत्पन होनेवाला
औषध उपयोगी नहीं। पूर्वी स्थानजात होते भी यदि
पौषध कोटजुष्ट पथवा पत्र, घातप, वायु, अग्नि,
जल प्रभृतिके श्राघातसे मर जाये, तो उसको कभी
हाथ न लगाये। फिर सरस, परिपुष्ट और मृत्तिकाको
बहुदूर पर्यन्त भेद करनेवाला मूल हो बाह्य है।
कोई-कोई कहता- प्राहट, वर्षा, भरत, हेमन्त,
वसन्त एवं ग्रीष्मकाल को यथाक्रम मूल, पत्र, त्वक्,
चोर, सार तथा फल लेना पड़ता है। किन्तु सुश्रुतने
उसमें दोष लगा कहा— सौम्य ऋतु में सौम्य और
चाग्नेय ऋतु चान्नव पोषध संघ करना उचित
है । वीर्यवान् और एक वत्सर अतिक्रम न करनेवाला
-औषध हो रोगनाशक होता है । केवलमात्र मधु,
'घुल, गुड़, पिप्पल चोरवि द्वय पुरातन पड़नेले
उपकारप्रद है। पृथिवो एवं जलगुपाधिखानका
विरेचक, अग्नि, आकाश तथा
वायुमुच भूषिष्ठ
स्थानका वमनविरेचन - कारक और आकाशगुणबहुल
स्थानका प्रशासक पोषध अधिक बालो होता है।
स्थल मूलका काष्ठ छोड़ बल्कल मौर सूक्ष्म मूलका
काष्ठ और वल्कल समस्त हो ग्रहण करना चाहिये ।
वटादिका वल्कल, वीजादिका सार, तालिशादिका
पत्र, विफला प्रभृतिका फल, चित्रकका मूल, घोलका
कन्द घातकीका पुष्य, खदिरादिका सार चोर
कष्टकारीका समस्त अंग लेना पड़ता है। बेलका
{{Multicol-break}}
कच्चा और सोनालका पक्का फल ग्राह्य है। श्रोषधके
स्थान विशेषका उल्लेख न रहने से मूल हो लेना
पडता है। योगविशेषमें घोषधका परिमाण बो
लिखा जाता, कथा या गोला घोषध डालने में उससे
द्विगुण देना उचित पाता है।
विषय समझ व्यवहार कर सकनेसे अमृत तुल्य
फल मिलता - किस प्रकार कौन अवस्थामें क्या औषध
चलता है। नहीं तो विष वच्च प्रभृतिको भांति घौषध
अपकार साधन करता है। नाम, रूप और गुण—
साधारणतः तीन ज्ञातव्य विषय समझ लेनेसे हो
पोषका पूरा ज्ञान नहीं होता। उक्त समस्त
ज्ञानव्यके साथ घोषधके योग को प्रपातो समझना भी
विशेष आवश्यक है। क्योंकि योगविशेष ते विष भी
अमृत बन जाता है।
उपवासके पोछे
जलपान करने, घोष रहने,
बजी मालुम पड़ने, षाहार ले चुकने पर विवासा
लगने पर संशोधन प्रति कोई पौष सेवन करना
न चाहिये। साधारणतः अनहोन श्रौषध सेवनको
हो व्यवस्था है। उससे भौषधका अधिक वीर्य प्रकाश
पाता चोर निःसन्देह रोग नष्ट हो जाता है। किन्तु
बालक, द युवतो चोर मृदु व्यथिके लिये ऐसो
व्यवस्था करना न चाहिये। इससे उन्हें अत्यन्त
ग्लानि लगती और बत्तको हानि पड़ता है।
पाहारसे कुछ पहले उन्हें पोषध सेवन करना
चाहिये। उससे औषध अनाहत होनेपर वारम्बार
सुखमें चढ़ नहीं सकता, परिपाक भो शीघ्र पढ़ता
घर बलचय नहीं लगता। घोष परिपाक होनेपर
वायुकां अनुलोम, स्वास्थ्य, क्षुधातृष्णाका प्रकाश,
मनमें बानन्द, शरीरका हलकापन, सकल इन्द्रियका
शौच और छह उद्गार होता है। घोषव संपूर्ण
जीवं न पड़ते चवना चाहार सम्यक् परिपाक न होते
श्रौषध सेवन करनेसे पोड़ाको शान्ति न पाने पर
अन्यान्य रोगको भी उत्पत्ति होती है। सम्पूर्ण रूप
घोषच परिपाक न होते क्रान्ति, दाह, पदसवता
स्वम, सूर्च्छा, गिरःपोड़ा, मुखबोध और बलहानिका
वेग बढ़ता है ।<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१६७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१६०'''|'''अङ्गामी - नागा'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>तीन-चार अङ्गुल चौड़ा होता है । यह फल तीन-चार हाथ लम्बे बेंटमें लगता; जिसमें विचित्र रूप सजाया जाता और जिसके दूसरे छोर पर लोहेका एक पतला दूसरा फल भी रहता है । नागे भूलकर भी टेढ़ा बर्छा नहीं जड़ाते । का बछेर्बेंट सदा सुधा ही रहना चाहिये। इनको ढाल तख़्ते तथा बांस से बनतो, जिसपर हाथो या शेरका चमड़ा मढ़ा जाता है। ढालके ऊपरी दोनो कोनोंपर बेंतके सींग बने रहते, जिनका अग्रभाग बालके गुच्छेसे सजता है । ढालके नीचेका भाग पतला रहता, जिसके बीचमें सफेद, काले, नीले और लाल रंग-विरंगे रूएं तथा पर लगा दिये जाते हैं। नागाओंको खेतौके अस्त्र दांव, कुदाल और कुठार हैं; इन्हीं से यह सब काम चला सकते हैं । अङ्गामियोंको किसी द्रव्यसे वितृष्णा नहीं । जगत में जो अखाद्य है, यह वही आनन्द से खाते हैं। इनके लिये कुत्तेका मांस सुखाद्य और सत्पथ्य है ; पका और गलाकर खाने से शरीर में किसी प्रकारकी व्याधि नहीं रहती । परन्तु यह कह नहीं सकते, कि जो जाति ऐसी निर्विकार है, उसे दूध क्यों नहीं रुचता । दूधका कटोरा मुंहके पास ले जानेसे ही यह वमन कर देते हैं ।
अङ्गामो एक स्त्रीके रहते दूसरो से कभी विवाह नहीं कर सकते ; परन्तु स्त्री अपने इच्छानुसार पति को छोड़ सकती, पति भी इच्छा करनेसे स्त्रीको त्याग देता है। फिर किसीको भी पुनर्विवाह करनेमें रुकावट नहीं होती। इनका विवाह वरकन्याके इच्छानुसार ही होता है। दोनोका मन मिल जाने से घरका अभिभावक आपत्ति नहीं करता। हां, आवश्यकता पड़ने पर वह सत् परामर्श दे सकता है। विवाह तथा श्राद्ध आदिके अवसर पर पेट भर मद्य मांस खानेके सिवा और कुछ भी धूमधाम नहीं होती ।
पिताको मृत्यु के बाद जो कुछ सम्पत्ति रहती है, सब लड़के मिल कर उसे बांट लेते हैं; परन्तु मकान कनिष्ठ पुत्रको हो सम्पत्ति समझा जाता है, उस पर
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दूसरे लड़कोंका कोई अधिकार नहीं । घरकी विधवा स्त्रियां जीवन पर्यन्त भोजन-वस्त्र पाती हैं, परन्तु अपने वस्त्रालङ्कारके सिवा इन्हें किसी दूसरी वस्तुका अंश नहीं मिलता। स्त्री और पुरुष में विच्छेद होनेसे परित्यक्त स्त्री सारी सम्पत्तिका एक तिहाई अंश पाती है । यदि उस स्त्रीको गोद में कोई दुधमुंहा बच्चा हुआ, तो वह कुछ समयतक माके पास रहता, बड़ा होने. पर अपने पिता के पास वापस जाता है ।
गांव के पास हौ अङ्गामियांका कब्रस्थान रहता है। यह मृतदेहके साथ अस्त्र, वस्त्र, शराब, मुर्गी, और खाने-पीनेका सामान गाड़कर ऊपर समाधि बना देते हैं। समाधिको चागे और पत्थर से घेर बीच में एक पत्थरपर मृत व्यक्तिको मूर्ति बना दी जाती है । शव गड़- जानेपर बहुतसे पत्ते रखकर शराब ढाल देते हैं । यद्यपि अङ्गामी मांस- पिशाच हैं, तथापि इनमें जो कुछ धर्मज्ञान है, उससे जोवहिंसा और अखाद्य भोजन को महा पाप एव पहामोकी मूर्ति । समझतें हैं । इनको विश्वास है, कि अच्छे पुरुष मरने बाद आकाशके नक्षत्र होते हैं; परन्तु मांस खाने से सात बार प्रेतयोनि में जन्म
लेकर फिर
मधुमक्षिका होना पड़ता आका, सन्थाल आदि असभ्य जातियोंके समान पहाड़ोंमें इनके भी बहुतसे देवता हैं । नदी, जङ्गल, गिरिगुहा और पर्वत में सदा एक न एक देवता विराजा करते हैं। नागे प्राणके भयसे इनको पूजते हैं, क्योंकि इनके हृदयमं वास्तविक भक्ति नहीं होती। जब कभी कोई नया काम यह करते, तब पहले उसका शुभाशुभ फल विचार लेते हैं। बिना शकुनके कोई काम करनेसे इनका मूर्खता प्रकट होती है । यह हमारी तरह कागज़ और कलमसे गणना नहीं करते; फल-फलके नाम द्वारा भी नहीं विचारते। जिस समय किसी कार्यका परिणाम जाननेकी इच्छा इनके चितमें उत्पन्न होती है, उस समय एक पतली लकड़ीको दांव से ज़रा-ज़रा काटते हैं । ऊपरका कटा मुंह यदि उलट पड़े, तो बड़ा कुलक्षण
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१६८
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अङ्गामी-नागा-— अङ्गार'''|''' १६१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>समझा जाता है। भविष्यत् देखनेको और भी अच्छी प्रक्रिया है। एक मुर्गीका गला पकड़कर दबानेसे यदि वह बायें पैर पर दाहना पैर रख कर मरे, तो अधिक सुलक्षण है । यदि युद्धमें जाते समय सामनेसे हरिण दौड़कर चला जाय, तो युद्धमें हारना होता है; परन्तु पोछेसे यदि बाघ निकले, तो देवताओंके अस्त्र उठानेसे भी युद्ध में पराजय नहीं होती । कितने ही वनके पक्षियोंकी बोलियां शुभ, और कितनों ही को अशुभ समझी जाती हैं। बाईं ओर उनका बोलना शकुन और दाहनी ओर बोलना अशकुन होता है ।
अङ्गामियों का कोई राजा नहीं । यह सब स्वतन्त्र रहते हैं । फिर भी इतना है, कि इनके दलका एक सरदार होता, जो “प्यूमा" कहलाता है। जो सद्वक्ता हो, युद्धमें दो-चार बार वीरता दिखा चुका हो तथा जिसके पास भूमि और गाय-बैल बहुतसे हीं, वही पुरुष सरदार होने योग्य समझा जाता है । विरोध होने पर वही दोनो पक्ष के मनुष्योंको समझा- बुझा कर निबटारा करता है । परन्तु निबटारे के समय सरदारको निरपेक्ष रहकर दोनो पक्षके मनुष्योंका चित्त समाधान करना पड़ता है; नहीं तो उसकी बात कोई भी नहीं मानता। ऐसा न होनेसे अर्थो और प्रत्यर्थी अपने बाहुबल से झगड़ेका निबटारा कर लेते हैं । प्रसन्नताकौ बात यह है, कि एक सम्प्रदाय में विवाद होते समय दूसरे दल के लोग किसीके भी पक्षको अवलम्बन नहीं करते । युद्ध में वह प्रायः निरपेक्ष रहते हैं । यदि यह गुण न होता, तो आज तक नागा जाति निर्मूल हो जाती ।
नागाओंने अंगरेज़ोंसे कई बार युद्ध किया है । सन् १८३१ ई० में कप्तान जेङ्क्षिन्स, पेम्बर्टन और गर्डन आसाम और मणिपुर नागाओंके साथ व्यवसाय खोलने गये थे। परन्तु अङ्गामो अपनी स्वाधीनता चले जानेके भयसे लड़ पड़े । कितने ही नागाओं ने अंगरेज़ोंको पकड़कर मार डाला, कितने ही अंगरेज़ोंकौ गोलियोंसे मारे गये । इसके बाद सन् १८५० ई० में इनपर फिर काल आया । समगुतिङ्ग-
{{Left| ४१|2em}}
में अंगरेज़ोंका एक अड्डा था । नागे बार-बार वहां उत्पात मचाने लगे । अन्त में इन्होंने वहांके जमादार भोगचाँदको मार डाला । इस अपराधका उचित दण्ड देनेके लिये अंगरेज़ोंने फिर चढ़ाई को, इस बार गहरी लड़ाई हुई। नागे पराजित होकर भाग खड़े हुए। अब अङ्गामियोंका दौरामा बहुत कुछ कम हो गया है । <Small>नागा देखी। </Small>
(चित्र)
चोप्नु नामक स्थानमें शैवंभङ्गम् एक वलिष्ठ मनुष्य थे । यह सदा रणवेश में रहेते थे । यह चित्र फेमौका है, जो शैवंभङ्गम्की स्त्री थी। यह वास्तवमें एक बड़ी
ही सुन्दरी रहीं ।
फेमिकी
कमर में केवल एक मंगलना
पड़ा रहता था । शरीरमें और कहीं भो वस्त्र नहीं । मंगूलने पर साधारण कौड़ियोंका अलङ्कार और बेंतका कड़ा और
मिदिमन्दिभ्य
बाज़ बन्द, गलेमें पत्थरको माला विराजती थी । नागाओं में पुरुष ही अधिक गहने पहनते, स्त्रियां गहना उतना पसन्द नहीं करतीं । अङ्गार (सं० पु०-क्लो०) अङ्ग-आरन्। आरन्। उण् ३।१३४ । १ काठादि किञ्चित् दग्ध होने से अग्निनिर्वाणके बाद जो कृष्णवर्ण पदार्थ अवशिष्ट रहता है, वह चौज़ जो लकड़ो वगैरह, कुछ-कुछ जल जानेसे आग बुझने के बाद बाकी बचे । अँगार । २ कोयला । ३ मङ्गलग्रह | ४ रक्तवर्ण, लालरङ्ग । (त्रि०) ५ रक्तवर्णविशिष्ट, लाल, सुख । अग्यते चिह्न क्रियते अनेन इति अङ्गारम् । जिससे चिह्न लगाया
जाय, उसे अङ्गार कहते हैं
।
आज भी कितने हो
हैं ।
पहले अङ्गार
लोग अङ्गारसे चिह्न लगाते अधिक चिह्न करनेको व्यवहृत होता था । इसका प्रमाण कुमारसम्भवमें मिलता है-
{{block center|<poem><small> "थमोऽपि विलिखन् भूमि' दण्डेनास्तमितत्विषा ।
कुरुतेऽस्मिन्नमोघेऽपि निर्वाणालातलाघवम् ॥” कुमार २।२३। </small></poem>}}
<Small>अङ्गार वा कार्बोन् (Carbon ) </Small> - साङ्केतिक चिह्न " का " (C); सांयोगिक गुरुत्व ११८५ । पृथिवीमें हम जितने
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अङ्गामियों का कोई राजा नहीं । यह सब स्वतन्त्र रहते हैं । फिर भी इतना है, कि इनके दलका एक सरदार होता, जो “प्यूमा" कहलाता है। जो सद्वक्ता हो, युद्धमें दो-चार बार वीरता दिखा चुका हो तथा जिसके पास भूमि और गाय-बैल बहुतसे हीं, वही पुरुष सरदार होने योग्य समझा जाता है । विरोध होने पर वही दोनो पक्ष के मनुष्योंको समझा- बुझा कर निबटारा करता है । परन्तु निबटारे के समय सरदारको निरपेक्ष रहकर दोनो पक्षके मनुष्योंका चित्त समाधान करना पड़ता है; नहीं तो उसकी बात कोई भी नहीं मानता। ऐसा न होनेसे अर्थो और प्रत्यर्थी अपने बाहुबल से झगड़ेका निबटारा कर लेते हैं । प्रसन्नताकौ बात यह है, कि एक सम्प्रदाय में विवाद होते समय दूसरे दल के लोग किसीके भी पक्षको अवलम्बन नहीं करते । युद्ध में वह प्रायः निरपेक्ष रहते हैं । यदि यह गुण न होता, तो आज तक नागा जाति निर्मूल हो जाती ।
नागाओंने अंगरेज़ोंसे कई बार युद्ध किया है । सन् १८३१ ई० में कप्तान जेङ्क्षिन्स, पेम्बर्टन और गर्डन आसाम और मणिपुर नागाओंके साथ व्यवसाय खोलने गये थे। परन्तु अङ्गामो अपनी स्वाधीनता चले जानेके भयसे लड़ पड़े । कितने ही नागाओं ने अंगरेज़ोंको पकड़कर मार डाला, कितने ही अंगरेज़ोंकौ गोलियोंसे मारे गये । इसके बाद सन् १८५० ई० में इनपर फिर काल आया । समगुतिङ्ग-
{{Left| ४१|2em}}
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में अंगरेज़ोंका एक अड्डा था । नागे बार-बार वहां उत्पात मचाने लगे । अन्त में इन्होंने वहांके जमादार भोगचाँदको मार डाला । इस अपराधका उचित दण्ड देनेके लिये अंगरेज़ोंने फिर चढ़ाई को, इस बार गहरी लड़ाई हुई। नागे पराजित होकर भाग खड़े हुए। अब अङ्गामियोंका दौरामा बहुत कुछ कम हो गया है । <Small>नागा देखी। </Small>
(चित्र)
चोप्नु नामक स्थानमें शैवंभङ्गम् एक वलिष्ठ मनुष्य थे । यह सदा रणवेश में रहेते थे । यह चित्र फेमौका है, जो शैवंभङ्गम्की स्त्री थी। यह वास्तवमें एक बड़ी
ही सुन्दरी रहीं ।
फेमिकी
कमर में केवल एक मंगलना
पड़ा रहता था । शरीरमें और कहीं भो वस्त्र नहीं । मंगूलने पर साधारण कौड़ियोंका अलङ्कार और बेंतका कड़ा और
मिदिमन्दिभ्य
बाज़ बन्द, गलेमें पत्थरको माला विराजती थी । नागाओं में पुरुष ही अधिक गहने पहनते, स्त्रियां गहना उतना पसन्द नहीं करतीं । अङ्गार (सं० पु०-क्लो०) अङ्ग-आरन्। आरन्। उण् ३।१३४ । १ काठादि किञ्चित् दग्ध होने से अग्निनिर्वाणके बाद जो कृष्णवर्ण पदार्थ अवशिष्ट रहता है, वह चौज़ जो लकड़ो वगैरह, कुछ-कुछ जल जानेसे आग बुझने के बाद बाकी बचे । अँगार । २ कोयला । ३ मङ्गलग्रह | ४ रक्तवर्ण, लालरङ्ग । (त्रि०) ५ रक्तवर्णविशिष्ट, लाल, सुख । अग्यते चिह्न क्रियते अनेन इति अङ्गारम् । जिससे चिह्न लगाया
जाय, उसे अङ्गार कहते हैं
।
आज भी कितने हो
हैं ।
पहले अङ्गार
लोग अङ्गारसे चिह्न लगाते अधिक चिह्न करनेको व्यवहृत होता था । इसका प्रमाण कुमारसम्भवमें मिलता है-
{{block center|<poem><small> "थमोऽपि विलिखन् भूमि' दण्डेनास्तमितत्विषा ।
कुरुतेऽस्मिन्नमोघेऽपि निर्वाणालातलाघवम् ॥” कुमार २।२३। </small></poem>}}
<Small>अङ्गार वा कार्बोन् (Carbon ) </Small> - साङ्केतिक चिह्न " का " (C); सांयोगिक गुरुत्व ११८५ । पृथिवीमें हम जितने
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|१७२|
अङ्गुलि–अङ्गुलिवाण}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इससे उपकार न होनेपर वेदना स्थानमें पुनः पुनः जल डाले और घी मिला अलसीका पुलटिस बांधे । पूय सञ्चित न होनेसे भी अङ्गुलिका सिरा अधिक सूज जानेपर वेदना स्थलमें नश्तर लगाना कर्तव्य है । नश्तर लगाते समय विशेष सतर्क रहे । अङ्गलिके दोनो पार्श्व में नाड़ी हैं, अतएव यह सकल नाड़ी बचा पर्व के मध्यस्थलमें चोर और कदाच पर्व के जोड़पर अस्त्राघात न करे। नश्तर लग जानेसे प्रत्यह दो-तीन बार अलसीका पुलटिस बांधे और सेवनके लिये सिलिकाको व्यवस्था चलाये ।
एलोपेथी - अङ्गुलिमें प्रयोग करनेको ऊपर जिस प्रकार व्यवस्था लिखो गई, तदनुरूप कार्य करना चाहिये । अङ्गुलिमें सड़ा घाव हो जानेपर भीतरसे सड़ी हड्डी निकाल डाले । पोछे प्रतिदिन १ भाग कार्बोलिक एसिड और १६ भाग पानी एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थान धोये और बोरासिक मरहम लगाये। लौह (५ विन्दु टिङ्कचर ष्टोल, आध छटाक पानी ), काडलिवर आयल, कुनैन, बार्क और एमोनिया - इन सकल द्रव्यको सेवन करना चाहिये ।
सांसारिक कार्य करनेमें अङ्गुलि हो प्रधान इन्द्रिय है। इसीसे सचराचर अङ्गुलि कट जाती; चाकू, हंसिया, गडांस, कुल्हाड़ी और कलसे अङ्गुलिमें कई तरह चोट पहुंचती है। कटी अङ्गुलिसे अत्यन्त रक्त गिरनेपर तत्क्षणात् भोजा कपड़ा उसपर कसकर बांध दे और हाथ ऊपरको उठाये रहे। चतस्थान में आप हो फाइब्रिन (fibrin) जमकर रक्त बन्द कर देता है । अतएव पहले कटे हुए स्थानमें पानी न डाले ; पानी डालनेसे रक्त नहीं जमने पाता। पनियाले, और अकोड़ेका भी पत्ता रक्त बन्द करनेको उत्कृष्ट औषध है । कालकासुन्दे या पनियालेका पत्ता हुक्क के पानी में बांटकर कटे हुए स्थानपर लगाने से तत्क्षणात् रक्त बन्द हो जाता है । फिटकरी, लोहेका अर्क, बरफ प्रभृति द्रव्य कटे हुए स्थानमें लगा कसकर बांध देनेसे भी रक्त बन्द होता है। दूर्वा घासको प्रयोग करनेसे यही फल उत्पन्न हो सकता । अङ्गुलिको मोटी नाड़ी कट जानेपर
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कभी-कभी इन सकल उपायोंसे रक्त बन्द नहीं हों सकता। ऐसे स्थलमें लोहेका कोई द्रव्य आगमें कुछ गर्म कर, कटे हुए स्थानको दाग देना चाहिये। इससे अविलम्ब ही रक्त बन्द हो जाता है ।
किसी प्रकार अङ्गुलि कट जानेपर सुचिकित्सक द्वारा चिकित्सा कराना उचित है। कारण, भीतरी हड्डी चूर हो जानेसे अङ्गुलिका कियदंश काटकर फेंक देना पड़ता है । ऐसा न करनेसे क्रमशः वह स्थान सड़ा करता और अवशेषमें प्राण-संशय उत्पन्न हो जाता है।
अङ्गुलिका अग्रभाग स्नायु-मण्डलसे जड़ा, इसलिये आघात पहुंचने से कभी-कभी धनुष्टङ्कार रोग आ उपस्थित होता है। अङ्गुलिमें अधिक आघात न लगने से ऐसे भयका कोई विषय नहीं । शीतल जलमें कपड़ा भिजाकर अङ्ग ुलि बांध दे । नहीं तो, ३० रत्ती सोस् सर्करा ( Plumbic acid ), एक ड्राम अफीमका अरिष्ट और आधसेर शीतल जल एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थानपर प्रयोग करे । गेंदा फूलको पखुरोके रस किंवा होमिओपेथी मतके केलिण्डिउलाको जलके साथ आहत स्थानमें प्रयोग करने से कितना ही उपकार होता है ।
{{Outdent|अङ्गुलिग (सं० त्रि०)अङ्गुलिभिः गच्छतीति ।
अङ्गुलिपर भर देकर चलनेवाला, जो उंगलीपर बोझ डालकर चले ।}}
{{Outdent|अङ्गुलितोरण (सं० क्लो०) अङ्गुलेः तोरणमिव कृतम् । ललाटपर अर्द्धचन्द्राक्कृति चन्दनका तिलक । चन्दनको खौर जो माथेपर अर्द्धचन्द्राकार लगाई जाती है ।}}
{{Outdent|अङ्गुलित्र (सं० क्लो० ) अङ्गुलि-त्र-क, ६- तत् । अङ्गुलिका आवरण, उंगली की हिफाज़त करनेवाली चीज़ । १ लोहे या चमड़ेकी टोपी जिसे दरज़ी कपड़ा सीते समय पहनते हैं। दरज़ी लोहे या चमड़ेकी टोपी अनामिका के ऊपर पहन वस्त्रादि सोते हैं। यह टोपी न रहनेपर बार-बार सूई से अङ्गुलि छिद जाती है । २ दस्ताना ।}}
{{Outdent|अङ्ग लित्राण (सं० क्लो०) अङ्गुलि-त्र-क्त । <Small>संयोगादेरातो धातो- ६खतः । पा ८।२।४३। </Small>उंगली बचानेको टोपी, जिसे}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अङ्ग लिपञ्चक–अङ्गीय'''|
'''१७३'''|}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|दरजी कपड़ा सीते समय अनामिकामें इसलिये पहनते जिससे सूई उंगलियोंमें न चुभे। अङ्गुश्ताना।}}
{{outdent|अङ्गुलिपञ्चक (सं० पु०) हस्तकौ पञ्च अङ्गुलि, हाथकी पांचो उंगली।}}
{{outdent|अङ्गुलिपर्व (सं० पु०) उंगलीका पोर या जोड़।}}
{{outdent|अङ्गुलिमुद्रा, अङ्गुलिमुद्रिका (सं० स्त्री०) अङ्गुलि-मुद्रा-क, ६-तत्। नामाङ्कित अङ्गुरीय, नाम खोदी हुई अंगूठी (Seal-ring)। २ अङ्कित भूषण। खोदा हुआ जेवर।}}
{{outdent|अङ्गुलिमुख (सं० क्ली०) उंगलीका अग्रभाग।}}
{{outdent|अङ्गुलिमोटन (सं० क्ली०) अङ्गुल्याः मोटनं मर्दनं यत्र, बहुव्री०। उंगलीका फोड़ना या चिटकाना।}}
{{outdent|अङ्गुलिवेष्टन (सं० क्ली०) दस्ताना, उंगली लपेटनका वस्त्र।}}
{{outdent|अङ्गुलिसङ्ग (सं० पु०) उंगलीका साथ।}}
{{outdent|अङ्गुलिसङ्गा (सं० स्त्री०) अङ्गुली सङ्गः यस्याः, बहुव्री०।
<Small>समासैड्डुभिः सङ्गः। पा ८।३।८०।</small> अङ्गुलिमें लेपन करनेका यववाला मांड। उंगलीपर लेप किया जानेवाला यवका मांड।}}
{{outdent|अङ्गुलिसंज्ञा (सं० स्त्री०) अङ्गुल्या संज्ञा सङ्केतज्ञापनम्। अङ्गुलिद्वारा इङ्गित, अङ्गुलिसङ्केत, उंगलीका इशारा।}}
{{outdent|अङ्गुलिसन्देश (सं० पु०) अङ्गुलि-सम्-दिश-घञ् भावे। अङ्गुलि ध्वनि द्वारा भाव-प्रकाश, उंगली की आवाजसे मतलबका इजहार। २ अङ्गुलिके शब्दसे संह्लादान, उंगलीकी आवाज से बातचीत। ३ चुटकीसे संवाद-ज्ञापन, चुटकीसे खबर देना।}}
{{outdent|अङ्गुलिसम्भूत (सं० त्रि०) अङ्गुलि-सम्-भू-क्त, ७-तत्। अङ्गुल्यां सम्भूतः। अङ्गुलिसे जात, उंगलीसे पैदा हुआ। नख, नाखून।}}
{{outdent|अङ्गुलिस्फोटन (सं० क्ली०) अङ्गुल्योः स्फोटनं यत्र, बहुव्री०। उंगलीका चटकना या फोड़ना। आवश्यक न होते भी हाथकी स्वस्तिके लिये अनेक उंगली चटकाया करते हैं। हिन्दुस्तानमें स्त्रियां किसीको अभिसम्पात करते समय उंगली चिटकाकर गालियां देती हैं।}}
{{outdent|अङ्गुलि (सं० स्त्री०) अङ्गुलि-ङीप्। उंगली, अङ्गुश्त।}}
{{left|४४|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|अङ्गुलिपञ्चक (सं० क्ली०) अङ्गुलीनां पञ्चकं पञ्चसंख्या।
<small>संख्यायाः सं ज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु। पा ५।१।५८।</small> पांचो उंगली, जिन्हें अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठ कहते हैं।}}
{{outdent|अङ्गुलीय (सं० क्ली०) अङ्गुली-छ। अंगूठी, अङ्गुश्तरी। अङ्गुरीय देखो।}}{{outdent|अङ्गुलीसम्भूत (सं० त्रि०) अङ्गुलीजात, उंगलीसे पैदा; नख, नाखून।}}
{{outdent|अङ्गुल्यादि—अङ्गुलि प्रभृति कतिपय शब्द।}}
{{outdent|अङ्गुल्यादेश (सं० पु०) १ उंगली द्वारा बातचीत। २ सङ्केत, इशारा।}}
{{outdent|अङ्गुल्यानिर्देश (सं० पु०) १ उंगलियोंका उठाना। २ कलङ्क, बदनामी।}}
{{outdent|अङ्गुष्ठ (सं० पु०) अङ्गौ पाणौ तिष्ठतीति; अङ्गु-स्था-क, ६-तत् ७मी वा। <Small>अम्बा म्बोगोभूमि सव्यापविद्विसृकुच्छ कञ्ज मञ्जिष्ठि परमेवहिं दियाग्निभ्यः स्थः। पा ८।३।९७। १</small> वृद्धाङ्गुलि, अंगूठा। २ पैरका बुड्ढा अङ्गुल। ३ अङ्गल परिमाण। (कठ उ० ४।१२)}}
{{outdent|अङ्गुष्ठमात्र (सं० त्रि०) अङ्गुष्ठ-मात्रच् परिमाणार्थे। अङ्गुष्ठवाले बृहत् पर्वके परिमित, अंगूठेकी बड़ी गांठ के बराबर। अङ्गुष्ठपरिमाण।<small> (श्वेत० उ० ५।१३)</small>}}
{{outdent|अङ्गुष्ठ्य (सं० त्रि०) अङ्गुष्ठ सम्बन्धीय।<small>(कात्या० श्रौ० ७।२।८)</small>}}
{{outdent|अङ्गष (सं० पु०) अङ्गि गती—उषन्। १ नकुल, नेवला। २ बाण, तीर।}}
{{outdent|अङ्गष्ठा (वै० स्त्री०) अङ्गे स्थिता।<small>(अथर्व० ६।१११।१)</small>}}
{{outdent|अङ्ग्य (वै० त्रि०) अङ्गे भव।<small>(ऋक् १।११।१)</small> }}
{{outdent|अङ्गीय, आङ्ग्रे—(कनौज ) सन् ई० के १७वें शताब्दीके अनेक महाबल पराक्रान्त समुद्रके डाकू। सन् १६८० से १७४० ई० तक आङ्ग्रे डाकुओंका पश्चिम समुद्रमें बड़ा उपद्रव रहा। सन् १६८८ ई० में कनौजीने बम्बईके पास कुलाबामें अपना अड्डा स्थापित किया और सन् १७१३ ई० में जयनगरपर अपनी विजयवैजयन्ती फहराई सन् १७१३ ई० में इन्होंने अङ्गरेज के जहाज, लूटे, जिसके बदले अङ्गरेज, इनके विजयदुर्गपर टूट पड़े। किन्तु उन्हें हार मान पीछे लौटना हुआ। कोई दो बार इन्हें अङ्गरेजों और पुर्तगालियों की सम्मिलित सेनासे युद्ध करना पड़ा था।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''१७४'''|'''अङ्घ–अच्'''|}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इनकी मृत्यु सन् १७३१० में हुई । आङ्ग्रेने कोई एक शताब्दतक मलाबरके समुद्रतटकु लूटा-मारा और भीतरी शहरोंमें भी यह घुस जाते रहे । पीछे महाराष्ट्रदेशके सेना-नायक बन सुवर्णदुर्गके शासनकर्त्ता हुए। किन्तु अधिक दिन इन्हें दूसरेको नौकरी न करना पड़ी। इन्होंने शीघ्र हो स्वाधीन हो महाराष्ट्रोंको समस्त रणतरोको अधिकार और दाक्षिणात्य में अपने आधिपत्यको स्थापन किया । अंग्रेज़, फ्रान्सीसी और डेनमार्कवाले इनके प्रतापसे शशव्यस्त हो गये थे । यह इन सकल विदेशियों के जहाज लूट लेते रहे। इनके उत्तराधिकारीका नाम तुलजी आड्गेंन था । सन् १७५४ ई० में बम्बई- गवर्नमेण्ट इनसे भी परास्त हो गई थी । सन् १७५६ ई० में अंगरेजोंने इनका कोई पन्द्रह लाख रुपया लूटा । पीछे जैम्स साहबने सुवर्णदुर्गको अधिकार किया ।
{{Outdent|अङ्घ (वै० क्लो०) पाप । <Small>( वा० स० ४।२७ महौधर )</small>
{{Outdent|अङ्घस् (सं० क्लो०) अघि गतौ असुन् । पाप, इज़ाब ।}}
{{Outdent|अङ्घारि (सं० पु०) अङ्घस ऋ-इन् । पृषोदरादित्वात् साधु, ६-तत्। १ दीप्ति, वह चीज जो खूब चमके । २ पापनाशक । ३ दिव्य सोमजल ।<Small>(वाज० स० ४ १७)</small>}}
{{Outdent|अङ्घि, अंह्नि (सं० पु० ) अघि गतौ इन् करणे । <Small>वङ क्यादयश्च । उण् ८|६६| १६६-१</small> पादः पैर । २ वृक्षमूल, दरख्नुको जड़। ३ छन्दका चतुर्थ भाग, शेरका चौथा हिस्सा ।}}
{{Outdent|अङ्किप (सं० पु० ) अङ्किना पिवतीति, अङ्कि - पाक
१ वृक्ष, दरख्न । २ लता, बेल ।}}
{{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ चकोड़िया ।}}
{{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ वृक्ष, चकोड़िया ।}}
{{Outdent|अच्–अविस्पष्ट कथा, गति । भा० उ०, सेट् । }}
{{Outdent|अच्–भा०-प०, सक० सेट् ।}}
{{Outdent| अच्–१ समस्त स्वर-वर्ण को संज्ञा । २ पाणिनि गृहीत हृदन्त प्रभृतिको अच् प्रत्यय ।}}
अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ —यही कई एक वर्ण अच् हैं। बाकी क, ख प्रभृति समस्त वर्ण
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
हल् कहाते हैं । संस्कृत भाषामें अच् वर्ण और हल् वर्ण पृथक्-पृथक् गृहित हुए हैं । अन्य भाषा में ऐसा नहीं; सब वर्ण एक ही साथ
अब
लिखे हैं । सन्देह यही है, कि मनुष्यने पहले किस वर्ण की सृष्टि की थी – अच् या हल् वर्ण को। पहले सुनते हो यह प्रश्न कुछ कठिन मालूम होता ; किन्तु कुछ सोचने-विचारनेसे इस पुरातन बातका कितना हो मर्म समझा जा सकता है । प्रथम- प्रथम मनुष्य लिखना न जानता, बात कर सकता था; वह भी दो वर्ण एक साथ मिला
फिर दीर्घच्छन्द में नहीं । देना हो यथेष्ट होता था। दो अक्षर में एक-एक बात कही जाती थी और उसका भी शेष वर्ण हलन्त रहता था । असभ्य आन्दामानवासी इस बातका प्रमाण वह किसी तरह कुछ-कुछ मनका भाव व्यक्त कर सकते हैं; किन्तु अधिक बोलनेकी उन्हें सामर्थ्य नहीं ।
मनुष्यने पहले बात करना सीखा था । किन्तु दूरके लोगोंसे कथोपकथन नहीं चलता-पत्र लिखना पड़ता है । पत्र लिखनेको अक्षरादि आवश्यक हैं । जब अक्षरको सृष्टि हुई न थी, तब लोग कैसे पत्र लिखते थे ? फिनिशिया के लोग किसोको मनको बात लिखकर भेजनेके लिये पेड़ के पत्ते या बकलेपर कोई चित्र बना देते थे । गो बतानेको गोका चित्र बनाकर भेजा जाता, दर्शनशक्ति समझानेको चक्षु अङ्कित करते थे । प्राचीन फिनिशियावासियोंके पत्र लिखनेका ऐसा ही संकेत था । क्रमसे
अङ्घि, पर्णी, अङ्घि, पर्णिका (सं० स्त्री०) चकोड़, और भी संक्षेपमें पत्र लिखने के लिये समस्त गोन
अङ्कित कर केवल उसका शिर या शृङ्ग बना दिया जाता था। इसके बाद और भी सुविधा ढूंढते ढूंढते अक्षरको सृष्टि हुई। अनेक अनुमान करते हैं, कि वर्त्तमान एक-एक अक्षरका नाम एक-एक वस्तु के नामपर रखा गया है । हीब्रू भाषाके प्रथम अक्षरका नाम अलिफ् है, जिससे सांड समझा जाता है । दूसरे एक अक्षर गिमेलका अर्थ ऊंट है। मीम्से जलका बोध होता है। फिनिशियावासी और यहदी इस तरह ~~ लहर - जैसा चिह्न बना जलको
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१ वृक्ष, दरख्न । २ लता, बेल ।}}
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अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ —यही कई एक वर्ण अच् हैं। बाकी क, ख प्रभृति समस्त वर्ण
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हल् कहाते हैं । संस्कृत भाषामें अच् वर्ण और हल् वर्ण पृथक्-पृथक् गृहित हुए हैं । अन्य भाषा में ऐसा नहीं; सब वर्ण एक ही साथ
अब
लिखे हैं । सन्देह यही है, कि मनुष्यने पहले किस वर्ण की सृष्टि की थी – अच् या हल् वर्ण को। पहले सुनते हो यह प्रश्न कुछ कठिन मालूम होता ; किन्तु कुछ सोचने-विचारनेसे इस पुरातन बातका कितना हो मर्म समझा जा सकता है । प्रथम- प्रथम मनुष्य लिखना न जानता, बात कर सकता था; वह भी दो वर्ण एक साथ मिला
फिर दीर्घच्छन्द में नहीं । देना हो यथेष्ट होता था। दो अक्षर में एक-एक बात कही जाती थी और उसका भी शेष वर्ण हलन्त रहता था । असभ्य आन्दामानवासी इस बातका प्रमाण वह किसी तरह कुछ-कुछ मनका भाव व्यक्त कर सकते हैं; किन्तु अधिक बोलनेकी उन्हें सामर्थ्य नहीं ।
मनुष्यने पहले बात करना सीखा था । किन्तु दूरके लोगोंसे कथोपकथन नहीं चलता-पत्र लिखना पड़ता है । पत्र लिखनेको अक्षरादि आवश्यक हैं । जब अक्षरको सृष्टि हुई न थी, तब लोग कैसे पत्र लिखते थे ? फिनिशिया के लोग किसी को मनकी बात लिखकर भेजनेके लिये पेड़ के पत्ते या बकलेपर कोई चित्र बना देते थे । गो बतानेको गोका चित्र बनाकर भेजा जाता, दर्शनशक्ति समझानेको चक्षु अङ्कित करते थे । प्राचीन फिनिशियावासियोंके पत्र लिखनेका ऐसा ही संकेत था । क्रमसे
अङ्घि, पर्णी, अङ्घि, पर्णिका (सं० स्त्री०) चकोड़, और भी संक्षेपमें पत्र लिखने के लिये समस्त गोन
अङ्कित कर केवल उसका शिर या शृङ्ग बना दिया जाता था। इसके बाद और भी सुविधा ढूंढते ढूंढते अक्षरको सृष्टि हुई। अनेक अनुमान करते हैं, कि वर्त्तमान एक-एक अक्षरका नाम एक-एक वस्तु के नामपर रखा गया है । हीब्रू भाषाके प्रथम अक्षरका नाम अलिफ् है, जिससे सांड समझा जाता है । दूसरे एक अक्षर गिमेलका अर्थ ऊंट है। मीम्से जलका बोध होता है। फिनिशियावासी और यहदी इस तरह ~~ लहर - जैसा चिह्न बना जलको
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''१७६'''||'''अच्'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पशुके चरवाहे रहे। काल्डिया देशमें भी प्रथम गोपाल हौ ज्योतिषका मर्म समझे थे । यदि ऐसा हुआ है, तो इस बातको भी स्वीकार करना पड़ेगा, कि राशि प्रभृतिका नाम उन्हीं सकल पशुपालकोंने रखा था। उस समय पशुरक्षक सामान्य लोग थे ; राशि प्रभृतिका अच्छा नाम देख-भाल रख न सके । इसी लिये जो सकल द्रव्य वह अष्टप्रहर देखते, हाथमें लेकर घूमते और खाते थे, उन्हींके अनुसार उन्होंने बारह राशिके नाम मिथुन, कर्कट, सिंह,
राशि प्रभृतिका नाम रखा। उन्होंने यह रखे हैं,—मेष, वृष,
कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन । वास्तवमें कोई राशि न तो भेड़ और न सांड़ है और न सिंहको तरह केश ही फुलाये है । आकाशके स्थान-स्थानमें कितने ही तारा पास-पास मिल - जैसे गये हैं । कितनी ही देरतक देखने से वह एक वस्तुके रूपमें देख पड़ते हैं । कोई इसी सकल नक्षत्र-पुष्ञ्जकौ भालूसे तुलना करते, जो जीन वस्तु अच्छी तरह पहचानते, वह उसीके साथ तुलना करते हैं। उस कालके रखवाले जिन सकल वस्तुओंको भली भांति पहचानते थे, उन्हींको देख उन्होंने राशियोंका नाम रखा । किन्तु ज्योतिषको मेष प्रभृति राशिका ठीक चित्र अङ्कित नहीं । ठीक चित्र दिखाने के लिये यदि कोई राशियोंके नामानुसार अविकल छविको चित्रित कर दे, तो वह दूसरी बात है । किन्तु अविकल चित्र बनानेकी प्रथा ही नहीं। राशिको आकृतिका एक-एक प्रकार से सङ्केत है। राशि देखो । यहूदी जैसे जल बतानेकी लहर चित्रित कर दिखाते—और ज्योतिषको कुम्भराशिके स्थलमें भी लहर बना रखते थे, वैसे हो इस देशमें भी, राशिका सङ्केत सिवा मेषवृषादिवाले संक्षिप्त आकारके और कुछ भी नहीं। पहले उनके जो चित्र थे, अब उनमें अनेक परिवर्तन हो गये हैं, इसीसे हम उन्हें पहचान नहीं सकते । इन्हीं सकल विषयोंको आलोचना करनेसे कितना ही विश्वास उत्पन्न होता है, कि लिखनेका कौशल आविष्कृत होनेसे पहले इस देशके लोग भी चित्र भेज दूरके लोगोंसे मनके
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भावको प्रकाश करते थे । पौछे सुविधा के निमित्त एक-एक वस्तुके आद्यक्षरसे वर्णमालाके वर्ण की सृष्टि हुई।
इसमें कोई आगा-पीछा नहीं, कि अच् वर्ण और हल् वर्णको सृष्टि एककालमें ही हुई थी । किन्तु पहले इतने वर्ण न थे । मनुष्यके गलेका स्वर जितना हो परिष्कृत होने लगा, उतना ही विशुद्ध राग- रागिणीको तान, लय और खरसे सबने गान करना सीखा और नानावणकी सृष्टि होने लगी । अच्के मध्य में पहले आकार मात्र था ; क्योंकि इसका उच्चारण सहज और स्वाभाविक है । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोल शब्द करनेसे हो आकार उच्चारित होता है। पीछे क्रमशः मुखके अवकाशको घटाते जानेसे अकार, इकार, उकार प्रभृति अन्य स्वरवर्ण निकलते हैं । फिर, मुखके किसी स्थानको स्पर्श करनेसे हल्वर्ण उच्चारित होते हैं। वर्णका उच्चारण-स्थान और प्रयत्न इसका प्रमाण है ।
<small> उच्चारण-भ्थान- </small> अ, आ. आ३, क, ख, ग, घ, ङ, ह,
और विसर्गका उच्चारणस्थान कण्ठ है । <Small>( अकुहविसर्ज नौयानां कण्ठः । )</small>इ, ई, ई३, च, छ, ज, झ, ञ, और श तालुसे उच्चारित होते हैं ।<Small>( इचुयशानां तालु । )</small>ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ष मूर्द्धासे निकलते हैं ।<Small> (ऋटुरषाणां मूर्द्धा । )</small>। ऌ ॡ३, त, थ, द, ध, न, ल और स दांतसे सम्बन्ध रखते हैं ।<Small>( ऌतुलसानां दन्ताः । )</small> उ, ऊ, ऊ३, प, फ, ब, भ और उपध्मानीय अर्थात् प और फ ओष्ठके हैं ।
<Small>
(उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । )</small> ङ, ञ, ण, न और म ख ख वर्ग भिन्न नासिकासे भी उच्चारित हो जाते हैं ।<Small>(ञमङणनानां नासिका च । )</small>ए और ऐका उच्चारण कण्ठ और तालुसे होता है।<Small>(एदैतोः कण्ठतालु ! )</small> ओ और औ कण्ठौष्ठसे निकलते हैं ।<small> (ओदौतोः कण्ठौष्ठम् । )</small> वकार दन्त और ओष्ठसे उच्चारित होता है ।<Small>( वकारस्य दन्तौष्ठम् ।)</small> जिह्वामूलीय अर्थात् क और
खका
उच्चारणस्थान जिह्वामूल है ।<Small> जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । )</small>
अनुस्वार नासिकासे निकलता है ।<Small>(नासिकाऽनुखारस्य । )</small>
<Small>प्रयत्न—</small>इसके बाद प्रयत्नादि नाना प्रकार खरका भी - प्रमाण मिलता है । यथा, प्रयत्न दो प्रकारका
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कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन । वास्तवमें कोई राशि न तो भेड़ और न सांड़ है और न सिंहको तरह केश ही फुलाये है । आकाशके स्थान-स्थानमें कितने ही तारा पास-पास मिल - जैसे गये हैं । कितनी ही देरतक देखने से वह एक वस्तुके रूपमें देख पड़ते हैं । कोई इसी सकल नक्षत्र-पुष्ञ्जकौ भालूसे तुलना करते, जो जीन वस्तु अच्छी तरह पहचानते, वह उसीके साथ तुलना करते हैं। उस कालके रखवाले जिन सकल वस्तुओंको भली भांति पहचानते थे, उन्हींको देख उन्होंने राशियोंका नाम रखा । किन्तु ज्योतिषको मेष प्रभृति राशिका ठीक चित्र अङ्कित नहीं । ठीक चित्र दिखाने के लिये यदि कोई राशियोंके नामानुसार अविकल छविको चित्रित कर दे, तो वह दूसरी बात है । किन्तु अविकल चित्र बनानेकी प्रथा ही नहीं। राशिको आकृतिका एक-एक प्रकार से सङ्केत है। राशि देखो । यहूदी जैसे जल बतानेकी लहर चित्रित कर दिखाते—और ज्योतिषको कुम्भराशिके स्थलमें भी लहर बना रखते थे, वैसे हो इस देशमें भी, राशिका सङ्केत सिवा मेषवृषादिवाले संक्षिप्त आकारके और कुछ भी नहीं। पहले उनके जो चित्र थे, अब उनमें अनेक परिवर्तन हो गये हैं, इसीसे हम उन्हें पहचान नहीं सकते । इन्हीं सकल विषयोंको आलोचना करनेसे कितना ही विश्वास उत्पन्न होता है, कि लिखनेका कौशल आविष्कृत होनेसे पहले इस देशके लोग भी चित्र भेज दूरके लोगोंसे मनके
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भावको प्रकाश करते थे । पौछे सुविधा के निमित्त एक-एक वस्तुके आद्यक्षरसे वर्णमालाके वर्ण की सृष्टि हुई।
इसमें कोई आगा-पीछा नहीं, कि अच् वर्ण और हल् वर्णको सृष्टि एककालमें ही हुई थी । किन्तु पहले इतने वर्ण न थे । मनुष्यके गलेका स्वर जितना हो परिष्कृत होने लगा, उतना ही विशुद्ध राग- रागिणीको तान, लय और खरसे सबने गान करना सीखा और नानावणकी सृष्टि होने लगी । अच्के मध्य में पहले आकार मात्र था ; क्योंकि इसका उच्चारण सहज और स्वाभाविक है । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोल शब्द करनेसे हो आकार उच्चारित होता है। पीछे क्रमशः मुखके अवकाशको घटाते जानेसे अकार, इकार, उकार प्रभृति अन्य स्वरवर्ण निकलते हैं । फिर, मुखके किसी स्थानको स्पर्श करनेसे हल्वर्ण उच्चारित होते हैं। वर्णका उच्चारण-स्थान और प्रयत्न इसका प्रमाण है ।
<small> उच्चारण-भ्थान- </small> अ, आ. आ३, क, ख, ग, घ, ङ, ह,
और विसर्गका उच्चारणस्थान कण्ठ है । <Small>( अकुहविसर्ज नौयानां कण्ठः । )</small>इ, ई, ई३, च, छ, ज, झ, ञ, और श तालुसे उच्चारित होते हैं ।<Small>( इचुयशानां तालु । )</small>ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ष मूर्द्धासे निकलते हैं ।<Small> (ऋटुरषाणां मूर्द्धा । )</small>। ऌ ॡ३, त, थ, द, ध, न, ल और स दांतसे सम्बन्ध रखते हैं ।<Small>( ऌतुलसानां दन्ताः । )</small> उ, ऊ, ऊ३, प, फ, ब, भ और उपध्मानीय अर्थात् प और फ ओष्ठके हैं ।
<Small>
(उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । )</small> ङ, ञ, ण, न और म ख ख वर्ग भिन्न नासिकासे भी उच्चारित हो जाते हैं ।<Small>(ञमङणनानां नासिका च । )</small>ए और ऐका उच्चारण कण्ठ और तालुसे होता है।<Small>(एदैतोः कण्ठतालु ! )</small> ओ और औ कण्ठौष्ठसे निकलते हैं ।<small> (ओदौतोः कण्ठौष्ठम् । )</small> वकार दन्त और ओष्ठसे उच्चारित होता है ।<Small>( वकारस्य दन्तौष्ठम् ।)</small> जिह्वामूलीय अर्थात् क और
खका
उच्चारणस्थान जिह्वामूल है ।<Small> जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । )</small>
अनुस्वार नासिकासे निकलता है ।<Small>(नासिकाऽनुखारस्य । )</small>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१७८'''|'''अच्'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ प्रभृति स्वरवर्णो को उत्पत्ति
हुई है। जैसे नाना प्रकारके राग बजानेको वाद्य- यन्त्रोंमें कितने ही रोदे और तार लगा उनके नाना स्थान विवेचनापूर्वक दबाने पड़ते, फिर नाना प्रकार के स्वर निकलते ; वैसे ही खर और शब्दों को उच्चारण करनेके लिये अनेक प्रकारके वर्ण आवश्यक होते हैं । इसी कारण सङ्गीतविद्या और भाषाकी उन्नति के साथ नानाविध वर्णों को उत्पत्ति हुई है। स्वरवर्णसे ही स्वर निकलता है, हलवर्णमें कोई स्वर नहीं । संस्कृत और हिन्दीमें यद्यपि इतने अधिक स्वर्ण वर्ण विद्यमान हैं, तथापि हम इस समय दो खरवर्णों के अभावको अनुभव करते हैं । एक अकार, उकार और औकार और एक आकार और इकारका मध्यवर्ती है । जैसे, — भजाई और भया । इस जगह भजाई, या भौजाई – कुछ भी लिखनेसे ठीक उच्चारण नहीं मिलता। किन्तु यह समझा जा सकता है, कि स्वरवर्ण के अभाव में औ का उच्चारण नहीं होता, वह अउ एवं औकारका मध्यवर्ती कोई नये उच्चारण- का स्वरवर्ण है। पुनश्च भैया शब्द भिया, भैया इस प्रकारसे लिखनेपर ठीक उच्चारित नहीं होता ; अथच समझा जा सकता है, कि आकार और इकार का मध्यवर्ती कोई नूतन स्वरवर्ण होना चाहिये ; उसके होनेसे यह सकल शब्द ठोक लिखे जा सकते हैं। इसी तरह मुखका खरवैषम्य होनेसे एक-एक वर्ण का अभाव समझा जा सकता । अभाव मालूम कर सकनेसे हो उसे पूर्ण करनेके लिये नूतन वर्ण की सृष्टि करनी पड़ती है। फिनिशिया भाषा में अलिफ़ तालुसे उच्चारित होता, जो हल् वर्ण जैसा है। किन्तु यूनानी भाषा में अलिफ़ विशुद्ध स्वरवर्ण है। स्वरवर्ण में प्रथमतः आकारकी सृष्टि ही सकल देशोंके बीच हुई थी । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोलकर भीतरी तालुादि स्थानोंके स्पर्श भिन्न जो वर्ण उच्चारित होता, वही (आ) आकार है। जिह्वा अथवा ओष्ठ द्वारा वायुपथ जितना सङ्कुचित किया जायगा, उतने ही अन्यान्य
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
स्वरवर्ण उच्चारित होंगे । ओकारका उच्चारण करते
समय जिह्वाका निम्नस्थान उठा अलिजिह्वा और जिह्वाका मध्यवर्ती स्थान खाली कर देना पड़ता है । फिर इकार के उच्चारण करते समय जिह्वाका अग्रभाग उच्च कर जिह्वा और तालुका मध्यवर्ती स्थान खाली करना होता है । मोटो बात यह है, कि कण्ठसे ओड पर्यन्त समस्त वायुपथ उत्तम रूपमें खोल देनेपर आकार निकलता है । सुतरां स्पर्शादि प्रतिबन्ध भिन्न जिस वर्ण का उच्चारण किया जाता, वही अच् या स्वर वर्ण है। कोई शब्दन्द्रिय इधर-उधर घुमाने-फिराने और मुखके भीतर अल्प या अधिक प्रतिबन्ध होनेसे हल् वर्ण उच्चारित होता है । इसीसे आकार जैसा विशुद्ध स्वर कोई भी नहीं । क्योंकि इकारका उच्चारण करते समय जिह्वा खड़ी हो प्रायः तालुको स्पर्श करती है । उकार निकालनेमें ओष्ठ कितना हो बन्द रखना चाहिये । इसलिये आकार ही आदिस्वर है । दूसरे अच् वर्ण आकार के रूपान्तर मात्र होते हैं। किसी बिन्दुको दोनो ओर रेखायें खींचनेसे आकारका रूपान्तर स्पष्ट समझा जा सकता है। यथा-
आ
/ \
/ \
ए ओ
/ \
/ \
इ उ
एक ओर आकारसे क्रमश: मुख सङ्कुचित करते जानेपर प्रथमतः एकार और इसके बाद इकार उच्चारित होता है। इकारके बाद बिना ताल्वादिको स्पर्श किये अन्य स्वरवर्ण फिर नहीं निकलता। दूसरी ओर प्रथमतः आकार के बाद ओकार और इसके बाद उकार उच्चारित होता है । उकारके बाद अन्य स्वर वर्ण फिर नहीं निकलता । तज्जन्य शब्दशास्त्रके प्राचीन इतिहासकी आलोचना करनेसे स्पष्ट मालूम हो सकता है, कि पहले
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८६
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||अच्— अचपली|
१७९}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>आकार भिन्न अन्य स्वर न थे । आकार से इकारादि । दूसरे कई स्वरोंकी उत्पत्ति हुई है ।
अरबी और फार्सी भाषा इस बातका दूसरा स्थल आजतक इन दोनो प्राचीन भाषाओं में ह्रस्व इकार और हुव उकार एकमात्र अलिफ द्वारा लिखा जाता है, इन दोनोके लिये कोई विभिन्न स्वर नहीं। अलिफ़ में ज़र लगानेसे इकार और पेश लगानेसे उकार होता है। ज़र और पेश वह साङ्केतिक चिह्न हैं, जो अलिफ पर इकार और उकार लिखनेको लगाये जाते हैं अतएव अब स्पष्ट हो समझा जा सकता है, कि सकल भाषाओं में हो प्रथम अच् वर्ण आकार स्वभावसे ही गृहित हुआ था, इसके बाद अन्यान्य खरोंको उत्पत्ति हुई ।
{{outdent|अचक (हिं० वि० ) १ अधिक, ज्यादा । २ पूर्ण, पूरा । ( पु० ) ३ आश्चर्य, तज्जुब ।}}
{{outdent|अचकन ( हिं० पु० ) अँगरखा । चपकन ।}}
{{outdent|अचकां (हिं० क्रि० - वि०) १ अकस्मात्, एकाएक । २ बिना जाने-बूझे, बेबताये ।}}
{{outdent|अचकित (सं० त्रि० ) १ चक्षुनिमेषशून्य, इधर-उधर न ताकनेवाला । २ स्थिर, ठहरा हुआ । ३ अभीत, न डरा हुआ। ४ अतृप्त, आसूदा नहीं ।}}
{{outdent|अचक्का (हिं० पु० ) १ अपरिचित व्यक्ति, अजनबी । २ बेसमझो, लाइल्मी । `अचक्षु—अचक्षुस् देखी ।}}
{{outdent|अचतुदर्शन (सं० क्लौ० ) बिना आंखों देखा हुआ विषय । बुद्धि द्वारा प्राप्त ज्ञान ।}}
अचतुदर्शनका
{{outdent|क्षुदर्शनावरण (सं० क्लो० ) आवरण, वह परदा जिससे बिना आंखों देखनेका ज्ञान जाता रहे । अचतुदर्शनको रोकनेवाला काम ।}}
{{outdent|अचक्षुदर्शनावरणीय (सं० ति० ) अचतुदर्शनको छिपानेवाला । दिव्यदृष्टिका विरोधी ।}}
{{outdent|अचक्षुस् (सं० त्रि०) नास्ति चतुर्यस्य बहुव्री० । १ नेत्रहीन, अन्धा । नञ्- तत् । २ चक्षु दूसरा, आंख नहीं । भिन्न कुछ २ धैर्ययुक्त, ढाढसी ।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अचञ्चल
सं० त्रि०
१ चञ्चल नहीं, स्थिर ।
{{outdent|अचञ्चलता ( सं ० स्त्री० ) १ अचञ्चल होने की स्थिति, स्थिरता । २ धैर्य, सब्र ।}}
{{outdent|अचण्ड (सं० त्रि० ) १ सरल, सोधा । २ शान्त, मुसब्बर । ३ सुशील, शाइस्ता ।}}
{{outdent|अचण्डो (सं० स्त्रो० ) न चण्डी कोपना, नञ्-तत् । १ शान्त गो, सोधी गाय । २ सूकरी, मादा सूअर । ३ सुशीला स्त्री, भली औरत ।}}
{{outdent|अचतुर (सं० त्रि ० ) न सन्ति चत्वारि यस्य, बहुव्री० । जिसके चतुः संख्या न हो, विना चतु:- सख्यावाला। जिसके धर्म अर्थ काम मोक्ष, यह चतुर्वर्ग न हो; धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको न रखनेवाला । २ अपटु, भोंदू ।}}
{{outdent|अचणाचार्य - महिसूरके एक इन्होंने महिसूरपति कृष्णराजके उद्देशसे कृष्णराज सार्वभौम- त्रिशतो और कृष्णराजाष्टोत्तरशती नामक क्षुद्र संस्कृत varsaat रचना की थी । राजकवि ।}}
{{outdent|अचन – मन्द्राज - प्रान्तीय कोचिन राज्यके नव्यरोंकी उपाधिविशेष। पालघाटका राजवंश इस उपाधि से विभूषित है । कालोकटके मङ्गतअचन, कोचिनके पालीयत अचन और कालीकट द्वितीय राज्यके मन्त्री चेनलोचन कहाते हैं ।}}
{{outdent|अचना (हिं० क्रि० ) १ आचमन करना । २ मुंह धोना । ३ पीना ।}}
{{outdent|अचन्त- मन्द्राज - प्रान्तीय गोदावरी जिलेको नरसापुर तहसीलका कसबा । इसमें कोई छ:- सात हज़ार मनुष्य निवास करते, जो प्रधानतः कृषक हैं । पहले यह नगर-पिठापुरम् राजाके अधीन था ।}}
{{outdent|अचपल (सं० त्रि०) न चपलः, नञ्-तत् । १ स्थिर, ठहरा हुआ । नास्ति चपलो यस्मात्, बहुव्रो० । अत्यन्त चञ्चल, निहायत चुलबुला ।}}
{{outdent|अचपलता (सं० 'स्त्री० ) २ धैर्य, सब्र ।}}
{{outdent|अगशी ( हिं० स्त्री० ) उपद्रव, उत्पाद बदमाशी,}} {{outdent|अचपली (हिं० स्त्री० ) १ स्थिरता, ठहराव । १ खेल-कूद, क्रीड़ा छिछोरापन । २ चुलबुलापन ।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८७
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|१८०|
अचमन — अचलवसन्त}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अचमन ( हिं० पु० ) १ आचमन । २ मुंह धोना । ७३ पीना ।}}
{{Outdent|अचमौन ( हिं० पु० ) आश्चर्य, तअज्जुब ।}}
{{Outdent| अचम्भव (हिं० पु० ) आश्चर्य, तअज्जुब ।}}
{{Outdent|अचम्भा (हिं० पु० ) आश्चर्य, हैरत ।}}
{{Outdent|अचम्भित (हिं० वि० ) विस्मित, भौचका ।}}
{{Outdent|अचम्भो, अचम्भौ (हिं० पु० ) आश्चर्य, विस्मय; तअज्जुब, हैरत ।}}
{{Outdent|अचर (सं० त्रि०) न चर-अच्, नञ्-तत् । स्थिर, ठहरा हुआ; चलनशून्य, बिना चालका । ज्योतिष- के मत से मेष, कर्कट, तुला और मकर - यह चर और वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ – यह अचर लग्न हैं। मिथुन, कन्या, धनुः और मीनको चराचर अर्थात् द्विस्वभाव लग्न कहते हैं ।}}
{{Outdent|अचरज (हिं० पु० ) आश्चर्य, तअज्जुब ।}}
{{Outdent|अचरम (सं० त्रि०) न चरमः, नञ्- तत् । शेष नहीं,}}
{{Outdent|अचण्ड विलतान- मन्द्राज - प्रान्तीय तिनेवेल्ली जिलेकी श्रीविल्लीपुत्र तहसौलका कसबा । इसमें कोई दो- तीन हज़ार मनुष्य रहते और पांच-छ: सौके लगभग घर होंगे। काया-कूदी नदीके वाम तटपर यह अवस्थित है ।}}
{{Outdent| अचरित (सं० त्रि०) १ अप्रचलित । चालसे बाहर । २ न खाया गया । ३ जिसे किसीने स्पर्श न किया हो । नूतन, नवीन ।}}
{{Outdent| अचल (सं० पु० ) न चलः, नञ्- तत् । १ पर्वत, पहाड़ । २ वृक्ष, पेड़ । ३ खूंटा-खूंटी। (त्रि० ) ४ न चलनेवाला। ५ बना रहनेवाला ।}}
{{C|<small>अचला वसुधायां स्यादचल: शैलकौलयो: ।
( मेदिनी )</Small>}}
अचल – सूक्तिकर्णामृतमें लिखे गए एक प्राचीन कवि । २ आह्निकदीपक और निर्णयदीपक नामक स्मार्तग्रन्थ- रचयिता । ३ वत्सराजके पुत्र, जो शाङ्खायनाह्निकके रचयिता थे ।
अचलमिश्र – सिद्धान्तसंग्रह नामक संस्कृत ज्योतिर्ग्रन्थ- रचयिता ।}}
{{Outdent| अचलजा (सं० स्त्री० ) अचल-जन-ड, ५ तत् । अच- लात् जायते । १ पर्वतजाता, पार्वती । २ पर्वतजाता लतादि, पहाड़से पेदा बेलें वगैरह ।}}
{{Outdent|अचलत्विष् (सं० पु० ) अचला स्थिरा त्विट् कान्ति- र्यस्य, बहुव्री॰ । १ कोकिल, कोयल । २ स्थिर कान्ति - युक्त पदार्थ, वह चीज़ जिसकी चमक टिकाऊ हो । अचलदेव - महारुद्रपद्धति - रचयिता ।}}
अचलद्दिष् ( सं० पु० ) अचलेभ्यः अचल-द्दिष्- क्विप् ; ४-तत् । पक्षच्छेदन किया था ।}}
पर्वतेभ्यः द्वेष्टि,
इन्द्र । इन्होंने पर्वतोंका
{{Outdent|अचलष्टति (सं० स्त्री० ) छन्दोविशेष 'हिगुणित-वसु-
मध्य । अखोर नहीं, यानी दरमियान् ।
अचलउपाध्याय— वाक्यवाद नामक संस्कृत वैयाकरण ग्रन्थ रचयिता ।
लघुभिरचलष्टतिरिह ।' अर्थात् यह छन्द सोलह वर्णसे ग्रथित होता है, जिसके सकल ही वर्ण लघु रहते हैं । यथा, -
भज सकल सियपति जु चहहु मुख ।
अकथ कहहु जनि मुनर ! विमल मुख ।। सम्पा०
{{Outdent|अचलनारी (सं० स्त्री० ) अचलस्य हिमाचलस्य नारी, ६- तत् । मेनका, हिमालयको स्वी ।}}
{{Outdent|अचलपति (सं० पु० ) अचलानां पतिः, ६-तत् । पातेर्डति । उण् ४।५७। गिरिराज, हिमालय ।}}
{{Outdent|अचलभ्भ्राट (सं० पु०) जैनियोंके एकादश गणाधिप । ( हेम० ३२ )}}
{{Outdent|अचलराज ( सं० पु० ) अचलानां राजा, अच् समासे षष्ठौ ।}}
राजाहः सखिभ्यष्टच् । पा ५।४।११। हिमालय, जो सब पहाड़ोंका राजा है।
अचलवसन्त - उड़ीसा — कटक के अस्मिया पहाड़क चोटी। इसके नीचे माझीपुरका भग्नावशेष पड़ा है, जहां पुराकालके हिन्दू आधिपत्य करते थे । अब केवल स्वर्णद्दार, प्रस्तरप्राङ्गण और भङ्गभित्तिके ही चिह्न देख पड़ते हैं ।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Outdent|अचलकन्या (सं० स्त्री० ) अचलस्य हिमालयस्य: कन्या, ६-तत्। पार्वतौ, दक्षयज्ञमें देहको त्याग कर इन्होंने मेनकाके गर्भ और हिमालय के औरससे जन्मग्रहण किया था ।}}
{{Outdent| अचलकौला ( सं॰ स्त्री० ) अचला: कोला इव यस्याः । मुअज्जिब, पृथिवो, ज़मीन ।}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''१८०'''|'''
अचमन — अचलवसन्त'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
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{{Outdent|अचलकन्या (सं० स्त्री० ) अचलस्य हिमालयस्य: कन्या, ६-तत्। पार्वतौ, दक्षयज्ञमें देहको त्याग कर इन्होंने मेनकाके गर्भ और हिमालय के औरससे जन्मग्रहण किया था ।}}
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अर्थात् यह छन्द सोलह वर्णसे ग्रथित होता है, जिसके सकल ही वर्ण लघु रहते हैं । यथा, -}}
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अचलमिश्र – सिद्धान्तसंग्रह नामक संस्कृत ज्योतिर्ग्रन्थ- रचयिता ।}}
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{{Outdent|अचलभ्भ्राट (सं० पु०) जैनियोंके एकादश गणाधिप । ( हेम० ३२ )}}
अचलमिश्र – सिद्धान्तसंग्रह नामक संस्कृत ज्योतिर्ग्रन्थ- रचयिता ।}}
{{Outdent|अचलराज ( सं० पु० ) अचलानां राजा, अच् समासे षष्ठौ ।<Small>राजाहः सखिभ्यष्टच् । पा ५।४।११।</Small>हिमालय, जो सब पहाड़ोंका राजा है।}}
{{Outdent|अचलवसन्त - उड़ीसा — कटक के अस्मिया पहाड़क चोटी। इसके नीचे माझीपुरका भग्नावशेष पड़ा है, जहां पुराकालके हिन्दू आधिपत्य करते थे । अब केवल स्वर्णद्दार, प्रस्तरप्राङ्गण और भङ्गभित्तिके ही चिह्न देख पड़ते हैं ।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अचला — अचिर'''|'''१८१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>अचला (सं० स्त्री० ) १ पृथिवी, जमीन । २ मेनका, । अचालू ( हिं० पु० ) न चलने या कम चलनेवाला । हिमालयको स्त्री । ३ स्थिरा, गतिशक्तिविहीना । अचाह (हिं० स्त्री० ) चाहको अनुपस्थिति, प्रेमका
ठहरौ हुई, न हिलने-डुलनेवाली ।
अचलाचार्य — ज्योतिर्विशृङ्गार नामक संस्कृत ज्योति - र्ग्रन्थप्रणेता ।
अचला सप्तमौ (सं० स्त्री० ) माघ सुदी सप्तमौ । इस तिथिको दान-पुण्य करनेका विधान है । चवन ( हिं० पु० ) १ आचमन, पूजाके समय किञ्चित् जल मुखमें डाल शुद्धिको सम्पादन करना । २ भोजनके बाद हाथ मुंह धोना और कुल्ला करना । ३ पीना ।
अचवना (हिं० क्रि०) १ आचमन करना । करना ।
२ कुल्ला
अवाई (हिं० वि० ) आचमन कराई हुई, साफ़। धुलो-धुलाई ।
अचवाना (हिं० क्रि०) १ आचमन कराना । २ पिलाना ।
३ भोजनके बाद कुल्ला कराना ।
अचांचक (हिं० क्रि० - वि० ) एकाएक, विना जाने । अचाक, अचाका (हिं० क्रि० वि०) एकाएक, अकस्मात् । अचान, अचानक (हिं० क्रि० - वि०) एकाएक, अक- स्मात् । अचापल (सं० क्लो०) न चापलः । १ स्थिर, चपलता- शून्य पदार्थ । (त्रि०) नास्ति चापलं यस्य, बहुव्री० । २ ठहरा हुआ, स्थिर ।
अचापल्य (सं० क्लो० ) नञ्- तत् । १ स्थिरता, ठह राव । (त्रि०) नास्ति चापल्य यस्य, बहुव्री० । २ चापल्यशून्य, चुलबुला नहीं ।
अचार ( फा० पु० ) १ खटाई, जो फल या तरकारीसे मसाला मिला सिक में डाल खट्टो की जाती है । (हिं० पु० ) २ आचार, चाल-चलन । ३ चिरोंजीका पेड़।
अचारज ( हिं० पु० ) आचार्य, सदा घरमें कर्मकाण्ड करानेवाले पण्डित ।
अचारी (हिं० वि० ) १ आचारी, आचार करने- वाला । २ रामानुज सम्प्रदायके विशेष विधानोंको • माननेवाला । (स्त्री०) ३ एक प्रकार आमकी खटाई । ४६
अभाव। (वि० ) जिसे किसी चीज की चाह न
हो। इच्छाशून्य।
अचाहा (हिं० वि० ) जिसकी चाह अनिच्छित ।
न हो ।
आचाही (हिं० वि० ) किसी चोजकी चाह न करने- वाला । निष्काम, निरीह । अचिक्कण (सं० त्रि ० ) न चिक्कणः । चितेः कणः कश्च । उण् ४।१७५ । १ रूक्ष, रूखा । अपरिष्कार, मैला । अचिकित्स्य (सं० त्रि०) जिसको चिकित्सा हो न सके, असाध्य ; दवा देनेके नाकाबिल, लादवा । अचित् (सं० क्लौ० ) वह द्रव्य जो चेतन न हो । जड़ पदार्थ । बेजान चीज़ ।
अचित्त (सं० त्रि०) नास्ति चित्तं यस्य, बहुव्री० । चेतनाशून्य, बेहोश ।
अचिन्त ( हिं० वि० ) जिसे कोई चिन्ता न हो, बेखटके ।
अचिन्तनीय (सं० त्रि० ) न-चिन्त-अनीयर् शक्यार्थे । चिन्तासे अगम्य खयाल करनेके नाक़ाबिल ; जैसे,
ब्रह्म ।
अचिन्तित सं० ति० ) न चिन्तितः । अतर्कित, जिसको चिन्ता को न गई हो; विना विचारा । अचिन्त्य (सं० त्रि०) १ विचारसे बाहर, कल्पना- तत । ( पु० ) २ अलङ्कार - विशेष । इसमें अविलक्षण कारणसे विलक्षण कार्य और विलक्षण कारणसे अविलक्षण कार्यको उत्पत्ति होती है । जैसे—
{{block center|<poem><small>{{gap}}वर्षा ऋतु आगमनसों नाचत चहुँ दिशि मोर ।
परी विरहनौ सेजपै करे करहती भोर ॥ सम्पा०</small></poem>}}
यहां वर्षा ऋतु आगमनके अविलक्षण कारणसे विर- हिनीको दुःख मिलनेका विलक्षण कार्य उत्पन्न हुआ है।
अचिन्त्यात्मा (सं० पु० ) वह आत्मा जिसका ध्यान न हो सके । परमेश्वर ।
अचिर (सं० वि० ) न चिरम् । १ अल्पकालस्थायो, थोड़ी देर ठहरनेवाला ( क्रि० - वि०) २ शीघ्र, जल्द ।<noinclude></noinclude>
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{{outdent|अचला (सं० स्त्री० ) १ पृथिवी, जमीन । २ मेनका, । अचालू ( हिं० पु० ) न चलने या कम चलनेवाला । हिमालयको स्त्री । ३ स्थिरा, गतिशक्तिविहीना ।}}
{{outdent|अचाह (हिं० स्त्री० ) चाहको अनुपस्थिति, प्रेमका
ठहरी हुई, न हिलने-डुलनेवाली ।}}
{{outdent|अचलाचार्य — ज्योतिर्विशृङ्गार नामक संस्कृत ज्योति - र्ग्रन्थप्रणेता ।}}
{{outdent|अचला सप्तमौ (सं० स्त्री० ) माघ सुदी सप्तमौ । इस तिथिको दान-पुण्य करनेका विधान है ।}}
{{outdent|चवन ( हिं० पु० ) १ आचमन, पूजाके समय किञ्चित् जल मुखमें डाल शुद्धिको सम्पादन करना । २ भोजनके बाद हाथ मुंह धोना और कुल्ला करना । ३ पीना ।}}
{{outdent|अचवना (हिं० क्रि०) १ आचमन करना । करना ।
२ कुल्ला।}}
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हो। इच्छाशून्य।}}
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परी विरहनौ सेजपै करे करहती भोर ॥ सम्पा०</small></poem>}}
यहां वर्षा ऋतु आगमनके अविलक्षण कारणसे विर- हिनीको दुःख मिलनेका विलक्षण कार्य उत्पन्न हुआ है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अच्छोद-अछन'''|'''१८५'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{Outdent| अच्छोद्य (सं० अव्य० ) अच्छ वद- क्यप् । <Small>अच्छ गत्यर्थ- ।</small>
<Small>बदेषु । पा १।४।६९ !</small> अच्छ वदतीति । सम्मुखमें कहकर, सामने बोलकर ।}}
{{Outdent|अच्छोहिनी —<small> अक्षौहिणी देखो।</small>}}
{{Outdent|अच्युत (सं० पु० ) न च्युतः न च्यवते न यविष्यते वा । न-च्युक्त कालसामान्ये । नञ् - तत् । १ जिसका न कभी क्षय हुआ, न होता और न होगा ; सना- तन ब्रह्म, ईश्वर । २ कृष्ण । ३ विष्णु । ४ जैनियोंके देवताविशेष ५ द्वादश सर्गयुक्त काव्यविशेष । ६ प्रभुके कनिष्ठतम सन्तान । (त्रि०) ७ स्थिर, ठहरा हुआ । ८ अभ्रष्ट, लगा हुआ । ८ क्षरणशून्य, लाजवाल ; नाश न होनेवाला ।}}
{{Outdent|अच्युत - इस नामके अनेक संस्कृत ग्रन्थकार हो गए हैं । निम्नलिखित संस्कृत ग्रन्थ अच्युतनामधेय विभिन्न व्यक्तियोंके बनाए हैं, – १ कृष्णशतक । २ गुरुवर- । प्रार्थना-पञ्चरत्नस्तोत्र । ३ भागोरथोचम्पू । ४ रत्नमाला- नामक ज्योतिर्ग्रन्थ । ५ दायभागटीका । ६ वेदान्तामृत- चिद्रत्नच कटौका । ७ भास्वतौकरण्टीका ।}}
{{Outdent|अच्युतकुल (सं० क्लो० )वैष्णवोंका कुल या
गोत्र ।}}
{{Outdent|अच्युत कृष्णानन्द — छान्दोग्योपनिषद्विवरण और एका- दशमाहात्मा के रचयिता ।}}
{{Outdent|अच्युत कृष्णानन्द-तीर्थ – स्वयंप्रकाशानन्दतीर्थ सरस्वती- के शिष्य । इन्होंने कृष्णालङ्कार नामक शास्त्रसिद्धान्त- लेशस' ग्रहको टीका बनाई थी ।}}
{{Outdent| अच्च तगोत्र ( सं॰ क्लो० ) वैष्णवोंका गोत्र या कुल ।}}
{{Outdent|अच्युतचक्रवर्ती - हरिदास तर्काचार्य के पुत्र, हारलताके टीकाकार ।}}
{{Outdent|अच्युतपति- मधुसूदनाश्रमके शिष्य, जिन्होंने सीता- रामाष्टकस्तोत्र बनाया था ।}}
{{Outdent| अच्युत-षड्ज (सं० पु० ) विकृतस्वर - विशेष ।}}
{{Outdent|अच्युत वैद्य–रसस ंग्रह सिद्धान्तनामक वैद्यक-ग्रन्थके रचयिता । इनके पिताका धरणीगोणिग और पितामहका नाम महादेव था ।}}
{{Outdent| अच्युतषड्ज (सं० पु० ) विकृतस्वर - विशेष ।
{{Left|४७|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अच्युताग्रज (सं० पु० ) अच्युतस्य कृष्णस्य अग्रजः । ६-तत् । १ बलराम । वसुदेवके औरस और पथ गर्भसे श्रीकृष्ण के जन्म काल में बलदेव पहले प्रसूत हुए थे,
इससे इनका नाम अच्युताग्रज पड़ा। २ इन्द्र । कश्यपके औरस और अदिति के गर्भ से आगे इन्द्रने जन्मग्रहण किया था, पीछे भगवान् प्रसू हुए ; इससे इन्द्रको अच्युताग्रज और भगवान्को उपेन्द्र कहते हैं ।}}
{{Outdent|अच्युताङ्गज (सं० पु० ) अच्युतस्य अङ्गात् जायते, जन-ड । कृष्ण के पुत्र, कामदेव ।}}
{{Outdent|अच्चुतात्मज (सं० पु० ) अच्युतस्य आत्मनः जायते, जन-ड । कृष्णके पुत्र, कामदेव । यह कृष्णके औरस और रुक्मिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ।}}
{{Outdent|अच्युतानन्द (सं० क्लो० ) सनातन ब्रह्म । परमेश्वर ।}}अच्युतानुजा (सं० स्त्री० ) अच्युतस्य श्रीकृष्णस्य अनुजा । भगवती । श्रीकृष्ण के जन्म-दिन भगवतीने नन्दालय में जन्म लिया था, इसलिये यह अच्युतानुजा कहलाती हैं ।
{{Outdent|अच्युतावास ( सं० पु० ) अच्युतेन उष्यते अंत्र,आ- वस- घर अधिकरणे,बहुबरी० । आश्वासन पीपल का पेड़।}}
{{Outdent|अच्युताश्रम - चिदानन्दाश्रम या परमानन्दमाके
शिष्य । इन्होंने रामनाममाहात्मा, रामार्चनचन्द्रिका, विश्वेश्वरोपद्धति, संन्यासधर्मसंग्रह प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ बनाये थे ।}}
{{Outdent|अच्युति (सं० स्त्री० )न-च्य - क्तिन्, नञ-तत् । १ क्षरणाभाव, कायममुकामी । ( त्रि०) २ विच्युति - शून्य, लाजवाल ।}}
{{Outdent|अछक ( हिं० वि०) न कका हुआ, बुभुक्षित ।}}
{{Outdent|अक्कना ( हिं० क्रि०) भूखे रहना, डटकर न
खाना ।}}
{{Outdent| अछत (हिं० क्रि० वि० ) १ आगे, रूबरू । २ अलावा, सिवा; अतिरिक्त, भिन्न । ३ पीछे, बाद।}}
{{Outdent|अछताना पछताना (हिं० क्रि० ) पश्चात्ताप करना, अफ़सोस करना ।}}
{{Outdent|अछन (हिं० पु० ) १ अधिक समय लम्बा वक्त।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१८६'''|'''अछना-अज'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|( क्रि० वि०) २ क्रमशः, अहिस्ता-अहिस्ता ; शीघ्र नहीं, धीरे-धीरे ।}}
{{outdent|अकना (हिं० क्रि० ) होना, रहना ।}}
{{outdent|अछनेरा--युक्तप्रदेश के आगरा जि.लेका एक कसबा । यह रेलोंका जङ्गशन-ष्टेशन है।}}
{{outdent|अकप (हिं० वि०) न छिपनेवाला, ज़ाहिर ।}}
{{outdent|अम्मो (हिं० पु० ) आश्चर्य, अज्जुब ।}}
{{outdent|अछय - <small>अक्षय देखो।</small>}}
{{outdent|अछयकुमार—<small> अक्षकुमार देखो ।</small> }}
{{outdent|अकरा, अकरो -<small> अमरा देखो।</small> }}
{{outdent|अछरौटी (हिं० स्त्री० ) वर्णमाला, हरूफ तहज्जी ।}}
{{outdent|अछल ( हिं० वि० ) निश्चल, लाफरेब ; जो कपटी न हो ।}}
{{outdent|अवाना (हिं० क्रि०) सजाना, बनाना ।}}
{{outdent|अवानी (सं० स्त्री० ) प्रसूता स्त्रियों को दिया जाने - वाला पाकविशेष। यह घृत में परिपक्क किया जाता और इसमें मेवा, अजवाइन, सोंठ आदि कई दवायें पड़ती हैं।}}
{{outdent|अछाम (हिं० वि० १ स्थूल, मोटा ।}}
२ बलवान्, मज़बूत ।
{{outdent|अछियार (हिं० पु० ) सुख गोटवालौ गजक}}
{{outdent|अछी (हिं॰ स्त्री॰) आलवृक्ष, अलका दरखूत् या पेड़ ।}}
{{outdent|अछूत, अछूता ( हिं० वि० ) १ स्पर्श न किया हुआ, न कुना गया । २ काममें न लाया गया, नवीन ।}}
{{outdent|अछेद,अछेद्य -<small>अच्छेद्य देखो।</small> }}
{{outdent|अछेव -<small> अच्छिद्र देखो।</small> }}
{{outdent|अछेह -<small>अच्छेद्य देखो ।</small> }}
{{outdent|अकोप (हिं० वि० ) १ नग्न, नङ्गा । २ तुच्छ, छोटा ।}}
{{outdent|अछोभ, अछोह, अछोही—<small> श्रक्षोभ देखो।</small> }}
{{outdent|अज्— क्षेपण, गति । भ्रा० प०, सक० सेट् ।}}
{{outdent|अज् - दीप्ति (जि, इदित०) चु० उ० अक० धातु सेट् ।}}
{{outdent|अज (सं० पु० ) न जायते, न-जन-ड, नञ्-तत् ।
<small>अन्वेष्वपि दृश्यते । पा ३।२।१०१ ।</small> १ जिसका जन्म न हो, ईश्वर । २ जौव । ३ ब्रह्मा । ४ विष्णु । ५ शिव । ६ चन्द्र । ७ कामदेव । ८ अयोध्या के सूर्यवंशीय एक}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
राजा जो रघुके पुत्र और रामचन्द्र के पितामह थे ; . इनकी स्त्रीका नाम इन्दुमतो था, जिनके गर्भ से दशरथ ८ ऋषिषिशेष । उत्पन्न हुए थे । ११ मेंढ़ा । १२ सोनामाखी धातु ।
१० बकरा ।
१३ अजन्मा । १४ नेता । (स्त्री०) अजा ~ १ सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका प्रकृति । २ बकरी । ३ ओषधि-विशेष, काकड़ासींगो ।
अज यानो बकरा चतुष्पद जन्तु है । इसका सर्वाङ्ग लोमसे आवृत है । किसी-किसी जातिवाले बकरेको देहपर कोमल और रेशम जैसे चिक्कण और किसी- किसीके बाल जैसे मोटे लोम होते हैं । बकरे के दो शृङ्ग रहते, पूंछ छोटो होती; पागुर करते समय भुक्तद्रव्य जब मुखमें पेट से निकलता, तब 'हड़ात्' करके सामान्य एक शब्द उठता 1 बकरके बत्तोस दांत होते हैं। इनमें बीस नोचे और बारह ऊपर रहते हैं । नोचेके बौस दांतों में दोनो जबडों के बारह दांतोंसे खाद्यद्रव्यको बकरा चबाता और सामनेवाले आठ दांतोंसे तृणादि उखाड़ता है। ऊपरवाले दोनो जबडों में केवल खाद्यद्रव्य के चबानेके लिये बारह दांत लगे हैं। भूमिष्ठ होनेसे पौछे बकरेवाले शिशुके केवल छ : जबड़े के दांत रह जाते हैं। सामने के दांत इक्कीस दिनमें निकल आते हैं । एक वर्ष या पन्द्रह महीने बाद सामने के दो दांत टूट जाते ; फिर नये दांत निकलते हैं । दो अथवा ढ़ाई वर्षके वय:क्रममें सामनेके और दो दांत गिर पड़ते, साढ़े तीन वर्ष में फिर दो दांत गिरते ; बाक़ो दो साढ़े चार वर्ष में गिर जाते हैं । अतएव पांच वर्षतक दांत देखकर बकरेका वयःक्रम निश्चित किया जा सकता है । लोग कहते हैं, कि बकरा तेरह वर्ष जीता है ।
बकरे का वयःक्रम सात मास होनेसे सन्तानो- त्पादनको शक्ति उत्पन्न हो जाती है; बकरोका बस एक बर्ष होने से गर्भधारणका काल उपस्थित होता है । किन्तु दोनोका वयःक्रम कुछ और परिपक्क होनेसे शावक खूब हृष्टपुष्ट और बलिष्ट हुआ करते हैं । छ: महीने गर्भसे पोछे बकरीके सन्तान होती है और प्रायः दो, कहीं तीन-चार तक बच्चे हो जाते हैं। बकरीके दोसे अधिक सन्तान
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०४
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh||'''अजमेर-अजय'''|'''१९८'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इस दरगाहको पवित्र समझते हैं। शहाबुद्दोनके दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने
अजमेरको आक्रमण करने आनेसे पहले खाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती नामक एक फ़कोर इस जगह
आ पहुंचे थे। प्रायः वह खाजा नामसे प्रसिद्ध करती है। यह दरगाह उन्हींका कबरस्थान है। प्रति
वत्सर इसमें उर्स नामका एक मेला लगता है।
वह छः दिन रहता और उसमें कोई २०,००० लोग
समवेत होते हैं।
अजमेरमें एक दूसरी भी बड़ी मसजिद है, जो पहले जैनियोंका मन्दिर रही, पीछे मुसलमानोंने उसपर अपना अधिकार किया। अनासागर इदके
ऊपर जहांगीरने सफेद पत्थरका महल बनवाया था।
आजकल उसमें चीफ कमिशनर वास करते हैं।
{{outdent|अजमेर-मेरवाड़ा—राजपूतानेका एक अंगरेजी प्रान्त ।}}
गवरनर-जनरलके राजपूतानेमें रहनेवाले एजण्ट इस प्रान्तका प्रबन्ध चीफ़ कमिश्नरकी भांति करते हैं । इस प्रान्तमें दो छोटे-छोटे 'जिले हैं—अजमेर और मेरवाड़ा । यहां पर्वत खूब फैले हुए हैं । बहु-मूल्य अभरक और प्रधानतः तांबा और सीसा धातु जगह-जगह मिलती है । प्रधान फल अनार और अमरूद है । चीता और भेड़िया तो कम देख पड़ता ; किन्तु बघेरा नागपर्वतसे देबैरतक भरा है और जङ्गली सूअरोंकी भी देशी राज्योंमें कोई कमी नहीं, जिन्हें राजपूत बड़े शौकसे शिकार करते है । जलवायु अत्यन्त स्वास्थ्यकर है । ग्रीष्ममें गर्मी और शीतमें सर्दी रहती है । यहां पानी कम बरसता है ।<small> अजमेर शब्दमें इतिहास देखो ।</small>
{{outdent|अजमोद, अजमोदा ( सं० स्त्री० ) अज-मोदि-अण्, अजान् मोदयतीति । अजवायन । इस शब्दके कई एक यह पर्याय हैं—खराह्वा, वस्तुमोदा, वर्कटी, मोदा, गन्धदला, हस्तिकारवी, गन्धपत्रिका, मयूरी, शिखिमोदा, मोदाख्या, वह्निदीपिका, ब्रह्मकोशी, विशाली, हयगन्धा, उग्रगन्धिका, मोदिनी, फलमुख्या और विशल्या । वैद्यशास्त्रके मतसे अजमोदा—कटु, उष्ण, रूक्ष और रुचिकर होती है । इससे कफ, वायु, शूल, आध्मान, अरुचि और क्षुधामान्द्य प्रभृति}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने परीक्षा द्वारा देखा है, कि अजमोदा हिक्का, वमन और मूत्राशय प्रभृतिको वेदनामें विशेष उपकार करती है। वैद्यशास्त्रमें अजमोदा, अजवायन, जङ्गली अजवायन, ईशानी अजवायन और खुरासानी अजवायनके विषयमें कुछ गड़बड़ जान पड़ती है। अनेक स्थलमें अजमोदाको जगह अजवायन, जङ्गली अजवायन प्रभृति सकल प्रकारको अजवायने समझी जाती हैं। किन्तु यह बात ठीक नहीं। अजमोदा, अजवायन और जङ्गली अजवायन, —यह तीनो एक ही श्रेणीके उद्भिद् (Umbelliferæ) हैं। इनके मध्यमें फिर अजमोदा और अजवायन एक जातीय (Carum), और जङ्गली अजवायन अन्य जातीय (Seseli) है। युरोपीय उद्भिच्छाशास्त्रमें अजमोदाका Carum Roxburghianum, Benth ; अजवायनका Carum copticum, Benth ; इसी जातिका होनेके कारण जीरेका Carum Carui, Linn और जङ्गली अजवायनका नाम Seseli indicum है। ईशानी अजवायन कोई स्वतन्त्र द्रव्य नहीं, ईशन देशसे इसकी आमदनी होनेके कारण ही इसे ईशानी अजवायन कहते हैं। किन्तु खुरासानी अजवायन एकबारगी ही स्वतन्त्र पदार्थ है। यह वार्ताकु, व्याकुड़, कष्टकारीके श्रेणीभुक्त वृक्षका बीज (Solanaceæ) है। उद्भिच्छाशास्त्रमें इसका नाम Hyoscyamus niger, Linn है। डाक्टरी पुस्तकमें इसके पत्तेको हाइयोसियामस कहते हैं।
{{outdent|अजमोदाख्या (सं० स्त्री०) अजवायन।}}
{{outdent|अजमोदिका (सं० स्त्री०) अजवायन।}}
{{outdent|अजमोदाद्यवटका (सं० पु०) आमवातका एक औषध।}}
{{outdent|अजमांस (सं० क्ली०) छागमांस, बकरेका गोश्त।}}
{{outdent|अजम्भ (सं० पु०) न सन्ति जम्भा दन्ता अस्य, बहुव्री०। १ भेक, मेंढ़क। २ सूर्य, आफ़ताब। (वि०) ३ दन्तशून्य, जिसके दांत न हों।}}
{{outdent|अजय (सं० पु०) न जि-अच्, नञ्-तत्। १ जयाभाव, हार। असेन छागलेन यातीति, या-क। २ अग्नि, आग। ३ कुप्पय कुन्दका एक भेद।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अजमेर-अजय'''|'''१९८'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इस दरगाहको पवित्र समझते हैं। शहाबुद्दोनके दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने
अजमेरको आक्रमण करने आनेसे पहले खाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती नामक एक फ़कोर इस जगह
आ पहुंचे थे। प्रायः वह खाजा नामसे प्रसिद्ध करती है। यह दरगाह उन्हींका कबरस्थान है। प्रति
वत्सर इसमें उर्स नामका एक मेला लगता है।
वह छः दिन रहता और उसमें कोई २०,००० लोग
समवेत होते हैं।
अजमेरमें एक दूसरी भी बड़ी मसजिद है, जो पहले जैनियोंका मन्दिर रही, पीछे मुसलमानोंने उसपर अपना अधिकार किया। अनासागर इदके
ऊपर जहांगीरने सफेद पत्थरका महल बनवाया था।
आजकल उसमें चीफ कमिशनर वास करते हैं।
{{outdent|अजमेर-मेरवाड़ा—राजपूतानेका एक अंगरेजी प्रान्त ।}}
गवरनर-जनरलके राजपूतानेमें रहनेवाले एजण्ट इस प्रान्तका प्रबन्ध चीफ़ कमिश्नरकी भांति करते हैं । इस प्रान्तमें दो छोटे-छोटे 'जिले हैं—अजमेर और मेरवाड़ा । यहां पर्वत खूब फैले हुए हैं । बहु-मूल्य अभरक और प्रधानतः तांबा और सीसा धातु जगह-जगह मिलती है । प्रधान फल अनार और अमरूद है । चीता और भेड़िया तो कम देख पड़ता ; किन्तु बघेरा नागपर्वतसे देबैरतक भरा है और जङ्गली सूअरोंकी भी देशी राज्योंमें कोई कमी नहीं, जिन्हें राजपूत बड़े शौकसे शिकार करते है । जलवायु अत्यन्त स्वास्थ्यकर है । ग्रीष्ममें गर्मी और शीतमें सर्दी रहती है । यहां पानी कम बरसता है ।<small> अजमेर शब्दमें इतिहास देखो ।</small>
{{outdent|अजमोद, अजमोदा ( सं० स्त्री० ) अज-मोदि-अण्, अजान् मोदयतीति । अजवायन । इस शब्दके कई एक यह पर्याय हैं—खराह्वा, वस्तुमोदा, वर्कटी, मोदा, गन्धदला, हस्तिकारवी, गन्धपत्रिका, मयूरी, शिखिमोदा, मोदाख्या, वह्निदीपिका, ब्रह्मकोशी, विशाली, हयगन्धा, उग्रगन्धिका, मोदिनी, फलमुख्या और विशल्या । वैद्यशास्त्रके मतसे अजमोदा—कटु, उष्ण, रूक्ष और रुचिकर होती है । इससे कफ, वायु, शूल, आध्मान, अरुचि और क्षुधामान्द्य प्रभृति}}
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दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने परीक्षा द्वारा देखा है, कि अजमोदा हिक्का, वमन और मूत्राशय प्रभृतिको वेदनामें विशेष उपकार करती है। वैद्यशास्त्रमें अजमोदा, अजवायन, जङ्गली अजवायन, ईशानी अजवायन और खुरासानी अजवायनके विषयमें कुछ गड़बड़ जान पड़ती है। अनेक स्थलमें अजमोदाको जगह अजवायन, जङ्गली अजवायन प्रभृति सकल प्रकारको अजवायने समझी जाती हैं। किन्तु यह बात ठीक नहीं। अजमोदा, अजवायन और जङ्गली अजवायन, —यह तीनो एक ही श्रेणीके उद्भिद् (Umbelliferæ) हैं। इनके मध्यमें फिर अजमोदा और अजवायन एक जातीय (Carum), और जङ्गली अजवायन अन्य जातीय (Seseli) है। युरोपीय उद्भिच्छाशास्त्रमें अजमोदाका Carum Roxburghianum, Benth ; अजवायनका Carum copticum, Benth ; इसी जातिका होनेके कारण जीरेका Carum Carui, Linn और जङ्गली अजवायनका नाम Seseli indicum है। ईशानी अजवायन कोई स्वतन्त्र द्रव्य नहीं, ईशन देशसे इसकी आमदनी होनेके कारण ही इसे ईशानी अजवायन कहते हैं। किन्तु खुरासानी अजवायन एकबारगी ही स्वतन्त्र पदार्थ है। यह वार्ताकु, व्याकुड़, कष्टकारीके श्रेणीभुक्त वृक्षका बीज (Solanaceæ) है। उद्भिच्छाशास्त्रमें इसका नाम Hyoscyamus niger, Linn है। डाक्टरी पुस्तकमें इसके पत्तेको हाइयोसियामस कहते हैं।
{{outdent|अजमोदाख्या (सं० स्त्री०) अजवायन।}}
{{outdent|अजमोदिका (सं० स्त्री०) अजवायन।}}
{{outdent|अजमोदाद्यवटका (सं० पु०) आमवातका एक औषध।}}
{{outdent|अजमांस (सं० क्ली०) छागमांस, बकरेका गोश्त।}}
{{outdent|अजम्भ (सं० पु०) न सन्ति जम्भा दन्ता अस्य, बहुव्री०। १ भेक, मेंढ़क। २ सूर्य, आफ़ताब। (वि०) ३ दन्तशून्य, जिसके दांत न हों।}}
{{outdent|अजय (सं० पु०) न जि-अच्, नञ्-तत्। १ जयाभाव, हार। असेन छागलेन यातीति, या-क। २ अग्नि, आग। ३ कुप्पय कुन्दका एक भेद।}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||अजित — अजितात्मन्'''|'''२०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
बादसे पृथक् किया है। पूर्व की ओर बरारके बुल- 'डाना, अकोला और येवतमाल और दक्षिणकी ओर हैदराबाद के परभनी और निज़ामाबाद जिलोंमें भी इसका विस्तार देख पड़ता, जहां इसे सह्याद्रिपर्वत कहते हैं। सह्याद्रि पछत्तर और अजिण्ठा पर्वत पचास कोस लम्बा है। पुराने समय में व्यवसायी और योद्धा अजिण्ठा पर्वतको राह ही गुजरात और मालवेसे दक्षिण पहुंचते थे ।
अजित (सं० त्रि०) न-जि-क्त, नञ - तत् । १ परा- जितभिन्न, न हारा हुआ । (पुं०) २ विष्णु ।
३
शिव । ४ चतुर्दशमन्वन्तरका सप्तर्षिभेद । ५ द्वितीय तीर्थङ्कर । अजितनाथ देखो । ६ मैत्रेय बुद्ध । ७ तैलौषध-
अजिततैल (सं० क्लो० ) नेत्ररोगका
तैलविशेष, आंखकी बीमारीका एक तेल । इसके बनानेको यह विधि है, – तिलका तेल ३२ या ६४ तोले और आंवलेका रस और दूध दो सौ छप्पन छप्पन तोले डालकर खूब पकाये । कल्कके लिये एक पल यष्टि- मधु भी छोड़ देना चाहिये ।
अवस्थित है। इसकी उत्तर ओर
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
एक पुरातन
प्रसिद्ध : चीन
नगरका निदर्शन देख पड़ता है। परिव्राजक उअङ्ग चुअङ्ग इस स्थानको एक अद्भुत कहानी इसतरह लिख गये हैं- 'जनैक राजाने अजय- पुरमें एक गन्धहस्तौ पकड़ा था । बुद्धदेवने उसी हस्तीके औरससे जन्मग्रहण किया। पहले अजय- पुरमें मार्तण्डपुष्करिणी नामक एक सरोवर था । अनेकोंको विश्वास है, कि आजकल उसी पुष्करिणी- को लोग बुद्धकुण्ड कहा करते हैं। प्रति वत्सर बुद्ध- कुण्डपर अनेक लोगोंका समारोह होता है । यात्री स्नान के बाद पास-पास बैठ गयाके निकट- वर्ती समस्त तीर्थस्थानोंका नाम लेते हैं।
भेद । ८ एक प्रकारका ज.हर-मोहरा । एक | अजितबला (सं० स्त्री० ) जैनियोंको देवी विशेष, प्रकारका जहरीला चूहा । जो अर्हत अजितके आदेशानुसार कार्य करती हैं । अजितविक्रम (सं० पु० ) १ अपारशक्ति रखने- वाला | २ द्वितीय चन्द्रगुप्तको उपाधि | अजितसिंह – १ मारवाड़ — जोधपुर के जनैक राठौर महाराज । इनका जन्म सन् १६८१ ई० और मृत्यु सन् १७२४ ई० में हुई। इन्होंने राजरूपाख्यात नामक एक पुस्तक लिखाई, जिसमें सन् ४६८ ई० से पोछेका इतिहास सन्निवेशित किया गया । यह पुस्तक तीन भागों में बंटी है। पहले में नयन पालका अजयपालको मार जयचन्द्र के समय तक कन्नौज में
अजितनाथ - द्वितीय जैन तीर्थङ्कर, जैनियोंके दूसरे तीर्थङ्कर । इनके पिताका जितशत्रु और माताका नाम विजया था । चवणतिथि वैशाख शुक्ला त्रयोदशी, विमान- नाम विजय, तिथि माघशुक्ला अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में इन्होंने जन्मग्रहण किया । यह विनीता नगरी में रहते थे । इनको जन्मराशि धनु, चिह्न वृषभ, शरीरमान ५०० धनु, आयुमान ८४ लक्ष पूर्व, कुल इक्ष्वाकु, साध्वी ३०००, चतुर्दश पूर्वी ४७५०, केवलो २००००, श्रावक ३५००००, श्राविका ५५४०००, ज्ञानतिथि फाल्गुन कृष्णा एकादशी, दीक्षावृक्ष वटवृक्ष, मोक्षासन मोक्षतिथि माघ कृष्णा त्रयोदशी, मोक्षस्थान अष्टपद, प्रथम गणधर पुण्डरोक और १ली आर्या ब्राह्मी है । अजितपुर, अजयपुर– एक प्राचीन नगर, जिसका आधुनिक नाम बक्रूर है । यह फला नदीके कूलमें
गणधर संख्या ८४, साधु ८४०००,
पद्मासन,
१६८१ ई० के समय
शासन करना, दूसरे में सन् महाराज यशोवन्त सिंहका शरीर छोड़ना और तौसरमें सूर्यवंशीय क्षत्रियोंका सन् १७३४ ई० तक इतिहा दिखाया गया है । इनके पुत्रका नाम महाराज अभयसिंह था, जो सन् १७२४ ई० में उत्पन्न और सन् १७५० ई० में स्वर्गवासी हुए थे। चूड़ामणि कविने भी अपनी पुस्तकोंमें महाराज अजितसिंहको बड़ी प्रशंसा की है । २ युक्तप्रदेश - प्रतापगढ़ के जनैक स्वर्गीय महाराज । मातादोन शुक्ल इनके दरबार में जाते, जिन्होंने ज्ञान - दोहावली लिखी थी। अजिता (सं० स्वी० ) भाद्रकृष्ण - एकादशी अजितात्मन् (सं० त्रि०) जिसने आत्माको न जीता, इन्द्रियोंके वशीभूत ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२२२'''|'''अटेरन — अट्टालिका'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अटेरन (हिं० पु० ) १ यन्त्रविशेष, योजना । यह यन्त्र सूतको आँटी तैयार करनेको लकड़ीका बनाया जाता है। २ घोड़ा फेरनेका एक तरीक़ । २-३ कुश्तीका एक दांव ।}}
{{Outdent|अटेरना (हिं० क्रि० )१ सूतको पोनी या ऑटो तय्यार करना । २ नशे चकनाचूर होना ।}}
{{Outdent|अटोक ( हि० वि० )निषेधरहित, जिसकी रोक-टोक न हो।}}
{{Outdent|अटम्बर ( हि० पु० )ढेर, राशि, जखौरा ।
{{Outdent|अट्ट —}} अतिक्रम, हिंसा भ्वा॰, आ०, सक० सेट् । २ अनादर । चु०, पर० ; सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अट्ट (सं० पु० )अट्ट घञ् आधारे ; अयति न आद्रियते अन्यत् यत्र । १ पट्टवस्त्र, क्षौम । २ प्रासाद, हर्म्य ; महल । ३ प्रासादका उपरिस्थित गृह, महलके ऊपरका मकान । ४ प्राचौरका उपरिस्थित सैन्यगृह, चहारदीवारीके ऊपरका किला । ५ हाट, बाज़ार । ६ अन्न, अनाज । ७ भक्त, ईश्वरको सेवा करनेवाला । ( वि० ) ८ उच्च, ऊंचा। ९ अतिशय, बहुत ज्यादा । १० शुष्क, सूखा ।}}
{{c|{{smaller|अट्टं भक्तं चतुष्के ना क्षौमेऽत्यर्थे गृहान्तरे । ( मेदिनी )}}}}
{{Outdent|अट्टक (सं० पु० ) छतका कमरा ।}}
{{Outdent|अट्टट्ट (सं० अव्य० )अट्ट अनादरे, अट्ट-अट्ट । प्रकारे गुणवचनस्य । पा ८|१|१२| अत्युच्च होकर, निहायत बुलन्दीसे । बहुत ऊँचे स्वरमें ।}}
{{Outdent|अट्टट्टहास (सं० पु० )अत्युच्च हास्य, बड़े जोरको ऊंची हँसो । कहकहा ।}}
{{Outdent|अट्टन (सं० क्ली० )अट्ट-ल्युट करणे, अद्यते अनाद्रियते रिपुरनेन । १ चक्रफलकास्त्र, पहिये जैसे फलक (पृष्ठ) वाला हथियार, ढाल । -२ अनादर, बेइज्जती । भावे ल्युट् ।}}
{{Outdent|अट्टनगर -अयोध्या प्रदेशका एक शहर । यह लखनऊसे साढ़े बत्तीस कोस दक्षिणपूर्वमें एक नदी किनारे अवस्थित है। यहांके अधिवासी युद्धकुशल और परिश्रमी होते हैं ।}}
{{Outdent|अट्टपाडी — मन्द्राजके मलवर जिलेवाले वलवनाड तालुकुको एक उपत्यका । इसका विस्तार कोई सदा}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सौ वर्ग कोस है, और यह पश्चिमघाट पहाड़ से पीछे पड़ो, और कुण्डेसे दक्षिण-पश्चिम पालघाटको घाटीतक फैली है। इस उपत्यकामें भवानो नदीका स्रोत और चारो ओर घना जङ्गल है । सारे वर्ष यहां मलेरियाका प्रकोप बना रहता है ।
{{Outdent|अट्टस्थली (सं० स्त्री० )अट्ट प्रधाना स्थलो, शाकतत् । १ प्रासाद-विशेष, एक प्रकारका महल । २ देश-विशेष, एक मुल्क ।}}
{{Outdent|अट्टासित (सं० क्ली० )ऊंची हंसी ।}}
{{Outdent|अट्टहास ( सं० पु० )अट्ट- हस्- घञ् ; अट्टेन अतिशयेन हासः, ३-तत्। उच्च हास, ऊंची हंसी; खिलखिलाहट, कहकहा । २ बर्द्धमान जिलेके अन्तर्गत देवताका पीठस्थान-विशेष ।}}
{{Outdent|अट्टहासक (सं० पु० )अट्टहास इव कः प्रकाशो दीप्तिर्यस्य । १ जोर से हंसने वाला, कहकहा लगानेवाला । २ कुन्द वृक्ष । ३ मोगरा ।}}
यह झाड़ी बड़ी और पत्तीसे भरी होती है । ब्रह्म और चीनमें भी इसका विस्तार देख पड़ता है । प्रायः बागों में इसे बो देते हैं । इसकी सूखी पत्ती पानीमें भिगोते और उसका पुलटिस बनाकर नासूरपर बांधते हैं । इसकी जड़ सांपके काटने का पक्का ज़हर मोहरा है ।
{{Outdent|अट्टहासिन् (सं० पु० )अट्ट उच्च हसति, हस्- णिनि । शिव ।}}
{{Outdent|अट्टहास्य (सं० क्ली० )ऊंची हंसी ।}}
{{Outdent|अट्टा (हिं० पु० )१ मञ्च, मचान । २ अटारी ।}}
{{Outdent|अट्टा (सं० पु० )१ अत्युच्च निहायत ऊंचापन । २ सर्वोत्कर्ष, सबसे बड़प्पन । ३ अनादराधिक्य, अधिक अनादर करना ।}}
{{Outdent|अट्टाट्टहास्य (सं० क्ली० )ऊँची हंसी ।}}
{{Outdent|अट्टाल, अट्टालक (सं० पु० )अट्ट इव प्रासाद इव अलति पर्याप्तो भवति, अल-अच्-कन् स्वार्थे । प्रासादोपरिस्थ गृह, महलके ऊपरका मकान ।}}
{{Outdent|अट्टालिका (सं० स्त्री) : अट्टालिक टाप् । १ प्रासाद, महल । २ राजगृर्ह, शाही इमारत । ३ इष्टकादि निर्मित गृह, पक्का मकान ।}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अट्टालिकाकार — अठवास'''२२३'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{Outdent|अट्टालिकाकार (सं० पु० ) अट्टालिकां करोति रचयति, क- अण ;
उप स० ।
अट्टालिकादि निर्माण- कारक, महल वगैरह बनानेवाला । राज । स्थपति । शूद्राके गर्भ और चित्रकारके औरससे इस जातिका जन्म है। ब्रह्मवैवर्त-पुराणमें लिखा है, कि जारिणौ किंवा शूद्राके गर्भ एवं चित्रकारके औरसमें अट्टालिका- कारोंको उत्पत्ति हुई है, इसी जार दोषके कारण यह पतित होते हैं, -}}
{{c|{{x-smaller|<poem>"कुलटायाञ्च शूद्रायां चित्रकारस्य वीर्यतः ।
वभूवाट्टालिकाकारः पतितो जारदोषतः ॥" ( ब्रह्मवै० ब्रह्मख ० ) </poem>}}}}
आजकल हिन्दुस्थानमें मुसलमान, खटिक, कोरी, चमार, काछी, लोध प्रभृति अनेक जातियोंके लोग अट्टालिकाको निर्माण करते हैं ।
{{Outdent|अट्टालिकाबन्ध (सं० पु० ) आधारविशेष, एक तरहको नीव, डाट ।}}
{{Outdent|अहिलिका (सं० स्त्री० )एक नगरका नाम, एक शहरका इस्म । ( राजत० ८५८३ )}}
{{Outdent|अट्टी (हिं० स्वी० )लच्छी, अटेरनमें लगा धागा ।}}
{{Outdent|अटणार (सं० पु० )कोशलदेशके एक राजा ।}}
{{Outdent|अद्या (स० स्त्री० )अट्ट-ण्यत्-टाप्, स्त्रीत्वात् । परिभ्रमण, पर्यटन ; घूमना-फिरना, टहल-पहल ।}}
{{Outdent|अट्ठा (हिं० पु० ) ताशका आठवां पत्ता ।}}
{{Outdent|अट्ठाइस, अट्ठाईस (हिं० वि०)वह संख्या जो दो दहाई और आठ इकाई यानी बीस और आठ मिलकर बनती है, अष्टाविंशति । २८ ।}}
{{Outdent|अट्ठाइसवां, अट्ठाईसवां (हिं० वि०) अट्ठाईस संख्यावाला ।}}
{{Outdent|अट्ठानवे ( हिं० वि० ) नौ दहाई और आठ इकाई यानी नव्वे और आठ से मिलकर बनी संख्या, अष्टानवति । ९८ ।}}
{{Outdent|अट्ठानवेवां (हिं० वि० )अट्ठानवे संख्याका ।}}
{{Outdent|अट्ठावन ( हिं० वि० )पचास और आठ से बनी हुई संख्या, अष्टपञ्चाशत् । ५८ ।}}
{{Outdent|अट्ठावनवां (हिं० वि० )अट्ठावन संख्याका ।}}
{{Outdent|अट्ठासिवां (हिं० वि० )अट्ठासी संख्याका ।}}
{{Outdent|अट्ठासी (हिं०वि० )आठ दहाई और आठ इकाई यानी अस्सी और आठसे बनी संख्या । ८८ ।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अठ-}} गति । भ्वा०, पर, सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अठ ( ऋठि ) - गति । इदित् । भ्वा० आ०, सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अठ (हिं० वि०)}} आठ, अष्ट । ८ ।}}
{{Outdent|अठइसी (हिं० स्त्रो०)}} एक सौ चालीसकी संख्या, इसका व्यवहार फलोंके लेन-देन में होता, यह सैकड़े के समान समझी जाती है । १४० ।}}
{{Outdent|अठकौंसल (हिं० स्त्रो० ) १ सभा, पञ्चायत । २ मशविरा, मन्त्रणा ।}}
{{Outdent|अठखेलपन ( हिं० पु० )१ खेल-कूद, दौड़-धूप । २ नटखटी, शरारत ।}}
{{Outdent|अठखेलो — अटखेली देखो ।}}
{{Outdent|अठत्तर (हिं० वि०)सात दहाई और आठ इकाई यानी सत्तर और आठ, अष्टसप्तति । ७८ ।}}
{{Outdent|अठन्नी (हिं० स्त्री०)आठ आनेवाला चांदीका सिक्का । आधा रुपया ।}}
{{Outdent|अठपतिया (हिं० वि० )१ आठ पत्तोंकी, अष्टपत्रिका | ( स्त्री० ) २ एक प्रकारकी चित्रकारी ; एक तरहकी नक्काशी, जिसमें आठ फूल काढ़े जाते हैं ।}}
{{Outdent|अठपहला, अठपहलू (हिं० वि० )आठ पहलूवाला, अष्टपटल ; अष्टपार्श्वयुक्त, जिसमें आठ कोने हों।}}
{{Outdent|अठपाव (हिं० पु० )गड़बड़, उपद्रव, हलचल ।}}
{{Outdent|अठबन्ना ( हिं० पु० )तानेके सूतको लपेटनेका बांस ।}}
{{Outdent|अठमासा ( हिं० वि० )१ आठ मासका, आठ महीनेवाला । (पु० ) २ माघ से आषाढ़ तक जोता जानेवाला खेत, जिसमें ऊख लगाई जाये ।}}
{{Outdent|अठमासी (हिं० वि० )१ आठ मासेवाली, जिसका वज़न आठ मासे हो । (स्त्री०) २ मोहर, गिनी ।}}
{{Outdent|अठलाना (हिं० क्रि० )१ खेलना-कूदना, क्रीड़ा-कौतुक करना । २ अभिमानको प्रकाश करना, इतराना । ३ चोचले बघारना, नखरे दिखाना । ४ मतवाले बनना, नशे में चूर होना । ५ अनसुनी बरतना ।}}
{{Outdent|अठवना (हिं० क्रि०)१ इकट्ठा होना । २ ठनना ।}}
{{Outdent|अठवास (हिं० पु० )१ अष्टपार्श्व द्रव्य । २ अष्टकोण प्रस्तरखण्ड, अठकोने पत्थरका टुकड़ा । (वि०) ३ अष्टकोण, अठकोना ।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अट्टालिकाकार — अठवास'''२२३'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{Outdent|अट्टालिकाकार (सं० पु० ) अट्टालिकां करोति रचयति, क- अण ;
उप स० ।
अट्टालिकादि निर्माण- कारक, महल वगैरह बनानेवाला । राज । स्थपति । शूद्राके गर्भ और चित्रकारके औरससे इस जातिका जन्म है। ब्रह्मवैवर्त-पुराणमें लिखा है, कि जारिणौ किंवा शूद्राके गर्भ एवं चित्रकारके औरसमें अट्टालिका- कारोंको उत्पत्ति हुई है, इसी जार दोषके कारण यह पतित होते हैं, -}}
{{block center|<poem><small>{{gap}}"कुलटायाञ्च शूद्रायां चित्रकारस्य वीर्यतः ।
वभूवाट्टालिकाकारः पतितो जारदोषतः ॥" ( ब्रह्मवै० ब्रह्मख ० ) </small></poem>}}
आजकल हिन्दुस्थानमें मुसलमान, खटिक, कोरी, चमार, काछी, लोध प्रभृति अनेक जातियोंके लोग अट्टालिकाको निर्माण करते हैं ।
{{Outdent|अट्टालिकाबन्ध (सं० पु० ) आधारविशेष, एक तरहको नीव, डाट ।}}
{{Outdent|अहिलिका (सं० स्त्री० )एक नगरका नाम, एक शहरका इस्म । ( राजत० ८५८३ )}}
{{Outdent|अट्टी (हिं० स्वी० )लच्छी, अटेरनमें लगा धागा ।}}
{{Outdent|अटणार (सं० पु० )कोशलदेशके एक राजा ।}}
{{Outdent|अद्या (स० स्त्री० )अट्ट-ण्यत्-टाप्, स्त्रीत्वात् । परिभ्रमण, पर्यटन ; घूमना-फिरना, टहल-पहल ।}}
{{Outdent|अट्ठा (हिं० पु० ) ताशका आठवां पत्ता ।}}
{{Outdent|अट्ठाइस, अट्ठाईस (हिं० वि०)वह संख्या जो दो दहाई और आठ इकाई यानी बीस और आठ मिलकर बनती है, अष्टाविंशति । २८ ।}}
{{Outdent|अट्ठाइसवां, अट्ठाईसवां (हिं० वि०) अट्ठाईस संख्यावाला ।}}
{{Outdent|अट्ठानवे ( हिं० वि० ) नौ दहाई और आठ इकाई यानी नव्वे और आठ से मिलकर बनी संख्या, अष्टानवति । ९८ ।}}
{{Outdent|अट्ठानवेवां (हिं० वि० )अट्ठानवे संख्याका ।}}
{{Outdent|अट्ठावन ( हिं० वि० )पचास और आठ से बनी हुई संख्या, अष्टपञ्चाशत् । ५८ ।}}
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{{Outdent|अट्ठासी (हिं०वि० )आठ दहाई और आठ इकाई यानी अस्सी और आठसे बनी संख्या । ८८ ।}}
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{{Outdent|अठ-}} गति । भ्वा०, पर, सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अठ ( ऋठि ) - गति । इदित् । भ्वा० आ०, सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अठ (हिं० वि०)}} आठ, अष्ट । ८ ।}}
{{Outdent|अठइसी (हिं० स्त्रो०)}} एक सौ चालीसकी संख्या, इसका व्यवहार फलोंके लेन-देन में होता, यह सैकड़े के समान समझी जाती है । १४० ।}}
{{Outdent|अठकौंसल (हिं० स्त्रो० ) १ सभा, पञ्चायत । २ मशविरा, मन्त्रणा ।}}
{{Outdent|अठखेलपन ( हिं० पु० )१ खेल-कूद, दौड़-धूप । २ नटखटी, शरारत ।}}
{{Outdent|अठखेलो — अटखेली देखो ।}}
{{Outdent|अठत्तर (हिं० वि०)सात दहाई और आठ इकाई यानी सत्तर और आठ, अष्टसप्तति । ७८ ।}}
{{Outdent|अठन्नी (हिं० स्त्री०)आठ आनेवाला चांदीका सिक्का । आधा रुपया ।}}
{{Outdent|अठपतिया (हिं० वि० )१ आठ पत्तोंकी, अष्टपत्रिका | ( स्त्री० ) २ एक प्रकारकी चित्रकारी ; एक तरहकी नक्काशी, जिसमें आठ फूल काढ़े जाते हैं ।}}
{{Outdent|अठपहला, अठपहलू (हिं० वि० )आठ पहलूवाला, अष्टपटल ; अष्टपार्श्वयुक्त, जिसमें आठ कोने हों।}}
{{Outdent|अठपाव (हिं० पु० )गड़बड़, उपद्रव, हलचल ।}}
{{Outdent|अठबन्ना ( हिं० पु० )तानेके सूतको लपेटनेका बांस ।}}
{{Outdent|अठमासा ( हिं० वि० )१ आठ मासका, आठ महीनेवाला । (पु० ) २ माघ से आषाढ़ तक जोता जानेवाला खेत, जिसमें ऊख लगाई जाये ।}}
{{Outdent|अठमासी (हिं० वि० )१ आठ मासेवाली, जिसका वज़न आठ मासे हो । (स्त्री०) २ मोहर, गिनी ।}}
{{Outdent|अठलाना (हिं० क्रि० )१ खेलना-कूदना, क्रीड़ा-कौतुक करना । २ अभिमानको प्रकाश करना, इतराना । ३ चोचले बघारना, नखरे दिखाना । ४ मतवाले बनना, नशे में चूर होना । ५ अनसुनी बरतना ।}}
{{Outdent|अठवना (हिं० क्रि०)१ इकट्ठा होना । २ ठनना ।}}
{{Outdent|अठवास (हिं० पु० )१ अष्टपार्श्व द्रव्य । २ अष्टकोण प्रस्तरखण्ड, अठकोने पत्थरका टुकड़ा । (वि०) ३ अष्टकोण, अठकोना ।}}
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अट्टालिकादि निर्माण- कारक, महल वगैरह बनानेवाला । राज । स्थपति । शूद्राके गर्भ और चित्रकारके औरससे इस जातिका जन्म है। ब्रह्मवैवर्त-पुराणमें लिखा है, कि जारिणौ किंवा शूद्राके गर्भ एवं चित्रकारके औरसमें अट्टालिका- कारोंको उत्पत्ति हुई है, इसी जार दोषके कारण यह पतित होते हैं, -}}
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वभूवाट्टालिकाकारः पतितो जारदोषतः ॥" ( ब्रह्मवै० ब्रह्मख ० ) </poem>}}}}
आजकल हिन्दुस्थानमें मुसलमान, खटिक, कोरी, चमार, काछी, लोध प्रभृति अनेक जातियोंके लोग अट्टालिकाको निर्माण करते हैं ।
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वभूवाट्टालिकाकारः पतितो जारदोषतः ॥" ( ब्रह्मवै० ब्रह्मख ० ) </poem>}}}}
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{{Outdent|अठन्नी (हिं० स्त्री०)आठ आनेवाला चांदीका सिक्का । आधा रुपया ।}}
{{Outdent|अठपतिया (हिं० वि० )१ आठ पत्तोंकी, अष्टपत्रिका | ( स्त्री० ) २ एक प्रकारकी चित्रकारी ; एक तरहकी नक्काशी, जिसमें आठ फूल काढ़े जाते हैं ।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२३०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अठवांसा ( हिं० पु० ) १ सीमन्त संस्कार । २ माघसे आषाढ़तक जोता जानेवाला खेत, जिसमें ऊख लगाई जाती है । ( वि० ) आठ मासमें जन्म लेनेवाला ।}}
{{Outdent|अठवारा ( हिं० पु० ) अष्टदिवसकाल, आठ दिनमें समाप्त होनेवाला समय ।}}
{{Outdent|अठवारी ( हिं० स्त्री० ) प्रत्येक आठवें दिन किसान द्वारा ज़मीन्दारको खेत जोतनेके लिये हल और बैल दिये जानेकी प्रथा या चाल ।}}
{{Outdent|अठवाली ( हिं० स्त्री० ) १ किसी भारी चीज़को उठानेके लिये उसमें बांधा जानेवाला लकड़ीका टुकड़ा । २ आठ कहारों द्वारा उठाई जानेवाली पालकी ।}}
{{Outdent|अठसिल्या ( हिं० स्त्री० ) तख्त, सिंहासन, कुरसी, चौकी ।}}
{{Outdent|अठहत्तर—<small>अठत्तर देखो ।</small>}}
{{Outdent|अठहत्तरवां ( हिं० वि० ) अठहत्तर संख्यावाला ।}}
{{Outdent|अठान ( हिं० पु० ) ठाननेके अयोग्य काम, अनुचित कर्म । २ वैमनस्य, विद्रोह, दुश्मनी, झगड़ा ।}}
{{Outdent|अठाना ( हिं० क्रि० ) १ ठानना, खड़ा करना । २ दुःख देना, दिक पहुंचाना ।}}
{{Outdent|अठारह, अठारह ( हिं० वि० ) १ अष्टादश, दश और आठ, वह संख्या जो एक दहाई और आठ इकाईसे बनती है । १८ ।}}
{{Outdent|अठारहवां, अठारहवां ( हिं० वि० ) अठारह संख्याका ।}}
{{Outdent|अठासिवां—<small> अट्ठासिवां देखो ।</small>}}
{{Outdent|अठासी—<small>अट्ठासी देखो ।</small>}}
{{Outdent|अठिलाना—<small>अठलाना देखो ।</small>}}
{{Outdent|अठिल्ला ( सं० स्त्री० ) एक प्राकृत काव्यका नाम ।}}
{{Outdent|अठे ( हिं० क्रि०वि० ) यहां, इस जगह । अब, इस स्थलमें ।}}
{{Outdent|अठेल ( हिं० वि० ) ठेलनेके योग्य नहीं । बलवान्, सुदृढ़ ; ताकतवर, ज़ोरदार ।}}
{{Outdent|अठोठ ( हिं० पु० ) ठाट-बाट, बनाव-चुनाव, दिखाव-पहनाव ।}}
{{Outdent|अठोतरसौ ( हिं० वि० ) अष्टोत्तरशत, एक सौ आठ । १०८ ।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अठोत्तरी ( हिं० वि० ) १ एक सौ आठ की अष्टोत्तरी । ( स्त्री० ) २ एक सौ आठ ग्रन्थिकी जपमाला । ३ एक सौ आठ वर्षको दशा ।}}
{{Outdent|अठौरा ( हिं० वि० ) १ आठका । ( पु० ) आठ पानी का बना हुआ दोना ।}}
{{Outdent|अठङ्ग ( हिं० पु० ) अष्टाङ्ग-योग-साधक, पूरा योगी ।}}
{{Outdent|अड़—}}उद्यम । १ भ्वा०, पर०, सक० सेट् । २ व्याप्ति । स्वा०, पर०, अक० सेट् ।
{{Outdent|अड़ ( हिं० स्त्री० ) प्रतिज्ञा, हठ, टेक । ज़िद, तहक्कुक् ।}}
{{Outdent|अड़कवतो—}}१ मेरुका एक विशाल प्रासाद । २ एक नगर ।<small> ( ललितवि० )</small> वर्त्तमान नाम लासा ।
{{Outdent|अड़काना ( हिं० क्रि० ) रोक रखना, जाने न देना ।}}
{{Outdent|अडग ( हिं० वि० ) १ जो न डिगे । लाहरकत, अचल । २ सुदृढ़, मज़बूत ।}}
{{Outdent|अडिगरध ( हिं० वि० ) ठहरा हुआ, अटल ।}}
{{Outdent|अड़गोड़ा ( हिं० पु० ) वह वस्तु जो चलते समय पदपर अड़े । जो पशु नटखटी करते, उनके गलेमें अड़गोड़ा इसलिये बांध दिया जाता है, जिसमें वह जल्द-जल्द दौड़ न सकें ।}}
{{Outdent|अड़ङ्ग ( सं० पु० ) गोधूम, गेहूं ।}}
{{Outdent|अड़ङ्गा ( हिं० पु० ) रोक, अवरोध ।}}
{{Outdent|अड़चन ( हिं० स्त्री० ) विघ्नबाधा, मुशकिल ।}}
{{Outdent|अड़डण्डा ( हिं० पु० ) आड़का सोंटा । इस डण्डे की दोनो ओर लड्डू होते, जिनके सहारे मस्तूलपर पाल बांधा जाता है ।}}
{{Outdent|अड़ड़पोपो ( हिं० पु० ) १ सामुद्रिकवित्, हाथ देखकर शुभाशुभ कहनेवाला । २ छली, फरेबी । ३ बड़बड़िया, झूठ-सच कहनेवाला ।}}
{{Outdent|अड़गड़ ( हिं० वि० ) १ अदण्ड, जिसे दण्ड दिया जा न सके । २ बेखौफ़, निर्भय ।}}
{{Outdent|अड़तल ( हिं० स्त्री० ) १ आड़, अवरोध । २ छाया, छांह । ३ शरण, पनाह । ४ बहाना, मुगालता ।}}
{{Outdent|अड़तालिस, अड़तालीस ( हिं० वि० ) अष्टचत्वारिंशत्, चालीस और आठ । वह संख्या, जो चार दहाई और आठ मिलनेसे बनती है । ४८ ।}}
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{{Outdent|अठवांसा ( हिं० पु० ) १ सीमन्त संस्कार । २ माघसे आषाढ़तक जोता जानेवाला खेत, जिसमें ऊख लगाई जाती है । ( वि० ) आठ मासमें जन्म लेनेवाला ।}}
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{{Outdent|अठोत्तरी ( हिं० वि० ) १ एक सौ आठ की अष्टोत्तरी । ( स्त्री० ) २ एक सौ आठ ग्रन्थिकी जपमाला । ३ एक सौ आठ वर्षको दशा ।}}
{{Outdent|अठौरा ( हिं० वि० ) १ आठका । ( पु० ) आठ पानी का बना हुआ दोना ।}}
{{Outdent|अठङ्ग ( हिं० पु० ) अष्टाङ्ग-योग-साधक, पूरा योगी ।}}
{{Outdent|अड़—}}उद्यम । १ भ्वा०, पर०, सक० सेट् । २ व्याप्ति । स्वा०, पर०, अक० सेट् ।
{{Outdent|अड़ ( हिं० स्त्री० ) प्रतिज्ञा, हठ, टेक । ज़िद, तहक्कुक् ।}}
{{Outdent|अड़कवतो—}}१ मेरुका एक विशाल प्रासाद । २ एक नगर ।<small> ( ललितवि० )</small> वर्त्तमान नाम लासा ।
{{Outdent|अड़काना ( हिं० क्रि० ) रोक रखना, जाने न देना ।}}
{{Outdent|अडग ( हिं० वि० ) १ जो न डिगे । लाहरकत, अचल । २ सुदृढ़, मज़बूत ।}}
{{Outdent|अडिगरध ( हिं० वि० ) ठहरा हुआ, अटल ।}}
{{Outdent|अड़गोड़ा ( हिं० पु० ) वह वस्तु जो चलते समय पदपर अड़े । जो पशु नटखटी करते, उनके गलेमें अड़गोड़ा इसलिये बांध दिया जाता है, जिसमें वह जल्द-जल्द दौड़ न सकें ।}}
{{Outdent|अड़ङ्ग ( सं० पु० ) गोधूम, गेहूं ।}}
{{Outdent|अड़ङ्गा ( हिं० पु० ) रोक, अवरोध ।}}
{{Outdent|अड़चन ( हिं० स्त्री० ) विघ्नबाधा, मुशकिल ।}}
{{Outdent|अड़डण्डा ( हिं० पु० ) आड़का सोंटा । इस डण्डे की दोनो ओर लड्डू होते, जिनके सहारे मस्तूलपर पाल बांधा जाता है ।}}
{{Outdent|अड़ड़पोपो ( हिं० पु० ) १ सामुद्रिकवित्, हाथ देखकर शुभाशुभ कहनेवाला । २ छली, फरेबी । ३ बड़बड़िया, झूठ-सच कहनेवाला ।}}
{{Outdent|अड़गड़ ( हिं० वि० ) १ अदण्ड, जिसे दण्ड दिया जा न सके । २ बेखौफ़, निर्भय ।}}
{{Outdent|अड़तल ( हिं० स्त्री० ) १ आड़, अवरोध । २ छाया, छांह । ३ शरण, पनाह । ४ बहाना, मुगालता ।}}
{{Outdent|अड़तालिस, अड़तालीस ( हिं० वि० ) अष्टचत्वारिंशत्, चालीस और आठ । वह संख्या, जो चार दहाई और आठ मिलनेसे बनती है । ४८ ।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अड़तालिसवां- अडूसा'''|'''२२५'''}}</noinclude>
अड़तालिसवां, अड़तालीसवां (हिं० वि० ) तालीसवाला, अड़तालिसका । अड़तालीस—अड़तालिस देखो।
अड़ | अड़ाड़ (हिं० पु० ) १ पशुओंके रखनेका वह घेरा, जो ग्राम या नगरके बाहर बनाया जाता है । २ राशि, ज़ख़ीरा ।
अड़तिस, अड़तीस (हिं० वि० ) अष्टत्रिंशत्, तौस
और आठ । वह संख्या जो तीन दहाई और आठसे बनती है । ३८ | हिन्दुस्थानके ग्रामीण लोग अरतिस भी कहते हैं ।
अड़तिसवां, अड़तीसवां (हिं० वि० ) अड़तीसवाला, अतिसका ।
अड़दार (हिं० वि० ) १ अड़नेवाला, अड़ियल । जो चलनेमें रुके । २ मस्त, झूमता हुआ । अड़ना (हिं० क्रि० ) १ चलते-चलते रुक जाना, आगे न बढ़ना । २ जिद करना, टेक ठानना । अड़पापल (हिं० वि० ) ताकतवर, शक्तिशाली । अड़बङ्ग (हिं० वि० ) १ वक्र, टेढ़ा । २ निम्नोच्च, ऊंचा-नीचा । ३ दुर्धर्ष, मुश्किल । ४ निराला, पूर्व । ५ बेडौल, बेढब । अडबोल--आपस्तम्ब-सामान्य सूत्रवृत्तिरचयिता । अडम्बर — श्राडम्बर देखो ।
अडर (हिं० वि० ) भयरहित, बेखौफ । अड़व (हिं० पु० ) एक प्रकारका राग । इसमें षड्ज, गान्धार, मध्यम, धैवत और निषाद यही पांच खर लगते हैं ।
अडवोकेट (अ० Advocate) वकालतनामको जरूरत न रखनेवाला वकील या कौन्सिल ।
अड़सठ, अरसठ (हिं० वि०) अष्टषष्टि, साठ और आठ । वह संख्या जो छः दहाई और आठ मिलने से बनती है । ६८ ।
अड़सठवां, अरसठवां (हिं० वि० ) अड़सठ संख्या- वाला, अरसठका ।
अड़हु (सं० पु० ) वकुलवृक्ष, मौलसिरी । अड़हुल (हिं० पु० ) जपा या जवापुष्प, देवी- फल । यह दो सवा दो गज ऊंचा उगता और इसकी पत्ती हारसिंगारको पत्ती जैसी होती है । यद्यपि इसका पुष्प बड़ा और गहरे लाल रङ्गका रहता, परन्तु इसमें सौरभका कहीं नाम नहीं ।
५७
अड़ान ( हिं० स्त्री० ) विश्रामस्थान, ठहरनेको जगह ।
अड़ाना ( हिं० क्रि० ) १ रोक रखना, ठहरा लेना । २ टेक लगाना, आड़ देना । ( पु० ) ३ ठहराव, रोक । ४ टेक, डाट । ५ रागभेद |
“अड़ानी गुण्डक्री गौण्डा लौलरङ्गी सुधावती ।
पञ्चे ताः सुठुनयना अड़ाना वल्लभा इमाः ॥” ( संगीतद० )
आड़ करनेवाला, जो
अड़ानो (हिं॰ स्त्री॰ ) १ बड़ी पडी । २ लड़न्तका एक दांव, जो टांग टांग अड़ाकर किया जाता है। ३ अड़ानारागको स्त्री । अड़ायनो ( हिं० वि० ) ओट में छिपे । अड़ार (हिं० पु० ) १ जखीरा, ढेर । की राशि | ३ लकड़ीको दुकान ।
२ लकड़ी-
अड़ाल ( हिं पु० ) एक प्रकारका नृत्य, एक तरहका नाच । वह नाच जो मोरको तरह अड़-अड़ कर नाचा जाये ।
अडिग — डग देखो । अड़ियल (हिं० वि० ) १ अड़ जानेवाला, जो जाते- जाते रुके । २ सुस्त, काहिल । जो कार्य शीघ्र न करे । ३ हठ करनेवाला, जो ज़िद चलाये । अड़िया (हिं० पु० ) वह लकड़ी, जिसके सहारे साधु उपवेशन करते हैं, साधुओंको टेककर बैठने
४ अवसर,
अड़ी ( हि० स्त्री० ) १ ठहराव, रोक । २ हठ, जिद । ३ आवश्यक समय, जरूरी वक्त । मौका । ५ (वि०) रुकी हुई, ठहरी । अड़ीखम्भ (हि ं० वि० ) बलवान्, जोरावर । अडीठ (हिं० वि ) १ अदृष्ट नजरसे बाहर । २ गुप्त, पोशीदा । ३ पृष्ठभागमें उत्पन्न फोड़ा। अडूलना (हिं. क्रि० ) डालना, उड़ेलना, नाना । अटरूष, ओषधि-विशेष | अडूसा ( हिं० पु० ) इसका पौधा गज-सवा गजका और पत्ता हरा और<noinclude></noinclude>
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{{Outdent|अड़तालिसवां, अड़तालीसवां (हिं० वि० )अड़ तालीसवाला, अड़तालिसका ।}}
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यह दो सवा दो गज ऊंचा उगता और इसकी पत्ती हारसिंगारको पत्ती जैसी होती है । यद्यपि इसका पुष्प बड़ा और गहरे लाल रङ्गका रहता, परन्तु इसमें सौरभका कहीं नाम नहीं ।}}
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अड़ान ( हिं० स्त्री० ) विश्रामस्थान, ठहरनेको जगह ।
अड़ाना ( हिं० क्रि० ) १ रोक रखना, ठहरा लेना । २ टेक लगाना, आड़ देना । ( पु० ) ३ ठहराव, रोक । ४ टेक, डाट । ५ रागभेद |
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पञ्चे ताः सुठुनयना अड़ाना वल्लभा इमाः ॥” ( संगीतद० )</poem>}}}}
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इसका पौधा गज-सवा गजका और पत्ता हरा और
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh|'''२२६'''|'''अडोर - अण'''}}</noinclude>आमके पत्ते जैसा होता है। दो पत्ते एक हीमें जुड़े ।
और श्वेत पुष्प जटासे गुंथे रहते हैं। पुष्पोंका
मकरन्द खांसी, दमे आदि रोगोंमें सेवन करनेसे
बड़ा उपकार होता है।
अडोर (हिं पु०) घनघोर शब्द, बुलन्द आवाज ।
अढुक (हिं पु०) आघात, चोट ।
अडोल (हिं० वि०) न डोलनेवाला, स्थिर । अढुकना (हि क्रि०) १ चोट खाना, ठोकर लगना,
अड़ोस-पड़ोस (हिं. पु.) इधर-उधर, आस-पास । आघात बैठना। २ आधार ग्रहण करना, टेका लेना,
अड़ोसी-पड़ोसी (हिं० पु०) समीपका अधिवासी,
सहारा ढूंढना।
करीबका बाशिन्दा।
अद्वैया (हिं• पु०) १ ढाई सेरको तौल, पंसेरीका
अड्ड-अभियोग और निर्वाह । भा०, पर०, सक० सेट् ।
अद्धांश । २ ढाई गुणका पहाड़ा। (वि.) ३ काम
अड्डन (स' क्लो०) ढाल।
बता देनेवाला।
अड्डा (हिं. पु.) १ निवासस्थान, रहनेको अण्-१ पाणिनिग्रहीत प्रत्यय-विशेष । पाणिनिको
जगह। २ इकट्ठा होनेका मुकाम । ३ दुष्टोंके ग्रहण को हुई एक खास प्रत्यय । अणका ण इत् जाता,
उपवेशनका स्थान, बदमाशोंके इकट्ठा होनेकी अरहता है। २ पाणिनिग्टहीत चदुर्दश वर्ण प्रत्या-
जगह। ४ मजदूरों के बैठनेको जगह। ५ वेश्याओंके हारोंके एक प्रत्याहारको संज्ञा, पाणिनि द्वारा ग्रहण
एकत्र होनेका स्थान । ६ मुख्य भूमि, खास किये गये चौदह वर्ण प्रत्याहारोंके एक प्रत्याहारका
जगह। ७ पक्षियोंके उपवेशनका स्थान, जो पिंजड़ेमें
नाम । यथा,-इति माहेश्वराणि सूवाणि अणादि संज्ञार्थानि । कहते
लोहेका बनाकर लगाया जाता है। ८ बुलबुल आदि हैं, कि पाणिनि मुनि अतिशय स्थूलवुद्धि थे। उपवर्षसे
पक्षियों के बैठनेवाला अडडा । ८ कपड़ेका मोटा
विद्या पढ़ते समय वह शास्त्रार्थ भली भांति समझ
गद्दा। १० वस्त्र काढ़नेका ढांचा या चौकठा। न सकते थे। इसीसे मनमें खेदकर वह महादेवको
११ कबूतरोंके बैठनेका ठाट या छतरी। १२ दो बांसों आराधना करने लगे। महादेवने पाणिनिके प्रति
के सिरोंपर बंधा हुआ एक आड़ा बांस । १३ खरा तुष्ट हो ताण्डवको आरम्भ किया। नृत्य के बाद
दनेको लकड़ी। १४ खंडसालको टट्टी। १५ रहटको उन्होंने चौदह बार डमरु बजा चौदह सूत्रोंका
एक लकड़ी। १६ सूत बुननेका करघा। १७ नेवार उपदेश दिया,-
बुननेकी लकड़ी।
"नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारान् ।
अडडी (हिं. स्त्री०) १ काष्ठादि वस्तुओंके छेदनेका
उद्धत कामः सनकादिसिद्धानतहिमशें शिवसूवजालम् ॥"
बरमा। २ जूतेकी दीवार।
अणादि सूत्रसे इकतालीस संज्ञायें पाणिनिको
अड्रेस (अं० Address) १ अभिनन्दनपत्र, वह सम्मान-
अष्टाध्यायोमें प्रयुक्त हुई हैं,-
सूचक पत्र जो किसी बड़े आदमौको उसके कहीं "एकस्मान् ङजणवटा दाभ्या षस्त्रिभ्य एव कणमाः स्युः ।
पहुंचनेपर सुनाया और दिया जाये।
शेयौ बयी चतुर्यों रः पञ्चभ्यः शलो षड्भ्यः ॥” (काशिका)
२ पता।
अढ़तिया (हिं० पु.)
यथा,-अण, एञ्, षन, छव, अट् । ५। झष, भष, । २०
१ आढ़त या कमौशनपर
अक्, इक्. उक् । ३। अण. इण, यण् । ३ । अम्, यम्, डम् । ३ ।
माल मंगाने और बेचनेवाला दुकानदार, कमोशन-
अच, इच, एच, एच, । ४। यय, मय, झाय, खय्, । ४। यर, झर, खर,
एजण्ट। २ दलाल।
चर, शर्, । ५। अश, हश, बश, झण, जश्. वश् । ६ । अल्, हलवल,
अढ़न (हिं. स्त्री०) शिक्षा, बात, कही।
रल, झल, शल ।६।
अढ़ वना (हिं. क्रि०) १ हुकम देना, आज्ञा करना।
३ शब्द। भ्वा०, पर०, अक० सेट्। ४ जौवन ।
२ कार्यमें लगाना, काम बता देना।
दिव्य०, अक० सेट ।<noinclude>अढारटमी (हिं. स्त्री०) कमान, धनु ।
अढ़िया (हिं० पु.) १ काष्ठ या प्रस्तर निर्मित
लघु पात्र, लकड़ी या पत्थरका छोटा बरतन। २ गारा
ढोनेका छोटा कूड़ा।</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''२२६'''|'''अडोर - अण'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>आमके पत्ते जैसा होता है। दो पत्ते एक ही में जुड़े ।
और श्वेत पुष्प जटासे गुंथे रहते हैं। पुष्पोंका
मकरन्द खांसी, दमे आदि रोगोंमें सेवन करनेसे
बड़ा उपकार होता है ।
{{Outdent|अडोर (हिं० पु०) घनघोर शब्द, बुलन्द आवाज ।}}
{{Outdent|अडोल (हिं० वि०) न डोलनेवाला, स्थिर ।}}
{{Outdent|अड़ोस-पड़ोस (हिं० पु०) इधर-उधर, आस-पास ।}}
{{Outdent|अड़ोसी-पड़ोसी (हिं० पु०) समीपका अधिवासी, करीबका बाशिन्दा ।}}
{{Outdent|अड्ड—अभियोग और निर्वाह । भ्वा०, पर०, सक० सेट् ।}}
{{Outdent|अड्डन (सं० क्ली०) ढाल ।}}
{{Outdent|अड्डा (हिं० पु०) १ निवासस्थान, रहनेकी जगह । २ इकट्ठा होनेका मुकाम । ३ दुष्टोंके उपवेशनका स्थान, बदमाशोंके इकट्ठा होनेकी जगह । ४ मज़दूरोंके बैठनेकी जगह । ५ वेश्याओंके एकत्र होनेका स्थान । ६ मुख्य भूमि, खास जगह । ७ पक्षियोंके उपवेशनका स्थान, जो पिंजड़ेमें लोहेका बनाकर लगाया जाता है। ८ बुलबुल आदि पक्षियोंके बैठनेवाला अड्डा । ९ कपड़ेका मोटा गद्दा । १० वस्त्र काढ़नेका ढांचा या चौकठा । ११ कबूतरोंके बैठनेका ठाट या छतरी । १२ दो बांसोंके सिरीपर बंधा हुआ एक आड़ा बांस । १३ खरीदने की लकड़ी । १४ खंडसालकी टट्टी । १५ रहंटक एक लकड़ी । १६ सूत बुननेका करघा । १७ नेवार बुननेकी लकड़ी ।}}
{{Outdent|अड्डी (हिं० स्त्री०) १ काष्ठादि वस्तुओंके छेदनेका बरमा । २ जूतेकी दीवार ।}}
{{Outdent|अड्रेस (अं० Address) १ अभिनन्दनपत्र, वह सम्मानसूचक पत्र जो किसी बड़े आदमीको उसके कहीं पहुंचनेपर सुनाया और दिया जाये । २ पता ।}}
{{Outdent|अढ़तिया (हिं० पु०) १ आढ़त या कमीशनपर माल मंगाने और बेचनेवाला दुकानदार, कमीशन-एजण्ट । २ दलाल ।}}
{{Outdent|अढ़न (हिं० स्त्री०) शिच्छा, बात, कही ।}}
{{Outdent|अढ़वना (हिं० क्रि०) १ हुकम देना, आज्ञा करना । २ कार्यमें लगाना, काम बता देना ।}}
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{{Outdent|अढारटङ्की (हिं० स्त्री०) कमान, धनु ।}}
{{Outdent|अढ़िया (हिं० पु०) १ काष्ठ या प्रस्तर निर्मित लघु पात्र, लकड़ी या पत्थरका छोटा बर्तन । २ गारा ढोनेका छोटा कूंड़ा ।}}
{{Outdent|अढ़ुक (हिं० पु०) आघात, चोट ।}}
{{Outdent|अढ़ुकना (हिं० क्रि०) १ चोट खाना, ठोकर लगना, आघात बैठना । २ आधार ग्रहण करना, टेका लेना, सहारा ढूंढना ।}}
{{Outdent|अढ़ैया (हिं० पु०) १ ढाई सेरकी तौल, पंसेरीका अर्द्धांश । २ ढाईगुणाका पहाड़ा । (वि०) ३ काम बता देनेवाला ।}}
{{Outdent|अण्—१ पाणिनिगृहीत प्रत्यय-विशेष । पाणिनिकी ग्रहण की हुई एक खास प्रत्यय । अण्का ण इत् जाता, अ रहता है । २ पाणिनिगृहीत चतुर्दश वर्णप्रत्याहारोंके एक प्रत्याहारकी संज्ञा, पाणिनि द्वारा ग्रहण किये गये चौदह वर्ण प्रत्याहारोंके एक प्रत्याहारका नाम । यथा,—इति माहेश्वराणि सूत्राणि अणादि संज्ञाथानि । कहते हैं, कि पाणिनि मुनि अतिशय स्थूलबुद्धि थे । उपवर्षसे विद्या पढ़ते समय वह शास्त्रार्थ भली भांति समझ न सकते थे । इसीसे मनमें रखकर वह महादेवकी आराधना करने लगे । महादेवने पाणिनिके प्रति तुष्ट हो ताण्डवको आरम्भ किया । नृत्यके बाद उन्होंने चौदह बार डमरू बजा चौदह सूत्रोंका उपदेश दिया,—}}
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"नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥"
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{{Outdent|अणादि सूत्रसे इकतालीस संज्ञायें पाणिनिकी अष्टाध्यायीमें प्रयुक्त हुई हैं,—}}
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</poem>}}}}
यथा,—अण्, एक्, अञ्, कन्, घट् । ५ । अण्, अण् । २ । अक्, इक्, उक् । ३ । अण्, इण्, यण् । ३ । अम्, यम्, ङम् । ३ । अच्, इच्छ्, एच्, ऐच्, । ४ । यञ्, मञ्, झञ्, खञ्, । ४ । यर्, झर्, खर्, चर्, शर्, । ५ । अश्, हश्, वश्, जश्, बश्, । ६ । अल्, हल्, वल्, रल्, झल्, शल्, । ६ ।
३ शब्द । भ्वा०, पर०, अक० सेट् । ४ यौवन । दिव्य०, अक० सेट् ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" /></noinclude>________________
अण— अणौमाण्डव्य
२२७
अण, अणक (सं० त्रि० ) अण-अच्, अणति यथेच्छं
नदति ।<small> पापाणके कुत्सितैः । पा २१५४।</small>
१ अधम,
कुत्सित; जलौल, मकरूह | २ बक्की, बड़-बड़िया । अणकीय (सं० त्रि० ) छोटेसे सम्बन्ध रखनेवाला । अणद ( हिं० पु० ) आनन्द, खु.शौ | अणव्य (सं० क्लो० ) अणु-यत्, अणोः सूक्ष्मशस्योत्-
पादकं क्षेत्रम् | अणुधान्योत्पादक क्षेत्र, वह खेत जिसमें छोटी-छोटी चीजें पैदा हों ।
अणसङ्क (हिं० वि० ) निःशङ्क, बेखौफ । अणादीक्षित – चातुर्मास्यप्रयोग, हौत्रप्रयोग प्रभृति ग्रन्थप्रणेता ।
अण्डस, मुश्किल ।
अणायाचार्य - रामानुजविजय नामक ग्रन्थरचयिता । इनका दूसरा नाम सत्यधर्मतीर्थ था । सन् १८३१ ई० में इनको मृत्यु हुई। अणास (हिं० स्त्री० ) अणि (सं० पु० - स्त्री० ) अण्-इन्, अणति नदति । १ रथचक्राग्रस्थित कोलक, रथवाले पहिये के आगेकी कोल । २ अश्रि, आरा । ३ सूच्यादिका अग्रभाग, सूई वग़ैरहको नोक । ४ सीमा, सरहद ।
“अणिराणिवदक्षाग्रकौलाश्रि सोमसु दयोः ॥ " ( मेदिनो )
`अणिमन्, अणिमा ( सं० पु० ) अणोर्भावः, अणु- इमनिच् । १ अणुत्व, सूक्ष्म परिमाण, सूक्ष्मता । बारोको, जर्रा होनेको स्थिति । २ अष्ट प्रकार ऐश्वर्यो - के मध्य ऐश्वर्य - विशेष, आठ तरहको सिद्धियों में वह सिद्धि, जिसके प्रभावसे छोटेसे भी छोटा रूप रखा जा सकता है । अष्टविध ऐश्वयोंके यह नाम हैं,-
"अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्य महिमा तथा । ईशित्वञ्च वशित्वञ्च तथा कामावसायिता ॥"
अर्थात् १ अणिमा, २ लघिमा ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व, ८ कामवसायिता- यह अष्ट सिद्धि कहलाती हैं ।
अणिमादिक (सं० पु० ) अणिमा प्रभृति, अणिमा वगैरह आठ सिद्धियां ।
।
अणियाली (हिं० स्त्री० ) १ कटारी । २ अणिष्ठ (सं० त्रि० ) अतिशयेन, अणु - इष्ठन् । अति- निहायत बारीक ।
शय सूक्ष्म,
अणी (हिं० अव्य० ) ओजी, एजी, ऐजी; अरी, ओरी, एरी ।<Small>अणि देखो ।</small>
{{Outdent|अणीमाण्डव्य (सं० पु० )<small>'अणी शूलाग्र' तद्युक्तो माण्डव्य:' ( महाभारतटीकायां नीलकण्ठः)</small> एक मुनि ।}}
विदुर के जन्मवृत्तान्त में लिखा है, कि माण्डव्य नामके जनक मुनि किसी वृक्षतलमें तपस्या करते थे । एक दिन कई एक चोर अपहृत द्रव्य ले इनके आश्रम के भीतर आ छिपे । नगरके रक्षकोंने सन्धान लगाते-लगाते उसी स्थान में पहुंचकर देखा, कि चोर कुटीमें छिपे थे । रक्षकगण अपहृत धन, चोरों और मुनिको भी तस्कर समझ राजसभा में ले गये । उस समय न्यायपरायणता और धर्मभय अधिक था, चोर कहने से ही मनुष्य चोर समझा जाता था, - विचार करनेका कोई झगड़ा झञ्झट न था, चोरको पहुंचते ही शूलौ चढ़ानेकी आज्ञा दी जाती थी । राजाके सद्विचारसे माण्डव्य चोरोंके साथ चोर बन शूलो चढ़े। चोर तो मरे, किन्तु माण्डव्यका कठिन प्राण न निकला । अन्त में राजा अनेक अनुनय-विनय द्वारा मुनिको तुष्टकर शूलो छुड़ाने पहुंचे। किन्तु शूली न कूटी, मुनिके शरीरमें विद्ध हो गई थी। इससे इसके सिवा कोई दूसरा उपाय न था, कि शरीर के भीतर जो शूलीका अंश प्रविष्ट हुआ था, वह जहांका तहां रहता और बाहरका अंश काट डाला जाता। ऐसा ही किया भी गया । किन्तु मुनि तो तपस्याके सिवा और कुछ जानते न थे,
इनपर ऐसी विपद क्यों
पड़ी! उपरोक्त विषय जाननेके लिये माण्डव्य मुनिने धर्मराजसे सब बातें जाकर पूछीं । धर्मराजने कहा, – “ आप जब लड़के थे, तब आपने पतङ्गके शरीरमें तिनका घुसेड़ दिया था ; इससे आपकी इसतरह शास्ति की गई है ।" माण्डव्यने क्रुद्द होकर कहा, “ उस समय मैं अज्ञान शिशु था । आपने अल्प अपराध पर मुझे गुरुदण्ड दिया है ; इसलिये आप शूद्रयोनिमें जाकर जन्मको ग्रहण कीजिये । आजसे मैं यह नियम बनाता है, कि चतुर्दश वत्सर वयःक्रम न होनेसे बालकोंको कोई पाप न लगेगा ।"<noinclude></noinclude>
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सिद्धि, जिसके प्रभावसे छोटेसे भी छोटा रूप रखा जा सकता है । अष्टविध ऐश्वयोंके यह नाम हैं,-
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ईशित्वञ्च वशित्वञ्च तथा कामावसायिता ॥"</poem>}}}}
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यदि आप पूरे पाठ को एक साथ Outdent फ़ॉर्मूले में लगाना चाहते हैं, तो इस प्रकार लिखा जाएगा:
{{Outdent|सिद्धि, जिसके प्रभावसे छोटेसे भी छोटा रूप रखा जा सकता है । अष्टविध ऐश्वयोंके यह नाम हैं,-}}
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ईशित्वञ्च वशित्वञ्च तथा कामावसायिता ॥"</poem>}}}}
{{Outdent|अर्थात् १ अणिमा, २ लघिमा ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व, ८ कामवसायिता- यह अष्ट सिद्धि कहलाती हैं ।}}
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अणी (हिं० अव्य० ) ओजी, एजी, ऐजी; अरी, ओरी, एरी ।<Small>अणि देखो ।</small>
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विदुर के जन्मवृत्तान्त में लिखा है, कि माण्डव्य नामके जनक मुनि किसी वृक्षतलमें तपस्या करते थे । एक दिन कई एक चोर अपहृत द्रव्य ले इनके आश्रम के भीतर आ छिपे । नगरके रक्षकोंने सन्धान लगाते-लगाते उसी स्थान में पहुंचकर देखा, कि चोर कुटीमें छिपे थे । रक्षकगण अपहृत धन, चोरों और मुनिको भी तस्कर समझ राजसभा में ले गये । उस समय न्यायपरायणता और धर्मभय अधिक था, चोर कहने से ही मनुष्य चोर समझा जाता था, - विचार करनेका कोई झगड़ा झञ्झट न था, चोरको पहुंचते ही शूलौ चढ़ानेकी आज्ञा दी जाती थी । राजाके सद्विचारसे माण्डव्य चोरोंके साथ चोर बन शूलो चढ़े। चोर तो मरे, किन्तु माण्डव्यका कठिन प्राण न निकला । अन्त में राजा अनेक अनुनय-विनय द्वारा मुनिको तुष्टकर शूलो छुड़ाने पहुंचे। किन्तु शूली न कूटी, मुनिके शरीरमें विद्ध हो गई थी। इससे इसके सिवा कोई दूसरा उपाय न था, कि शरीर के भीतर जो शूलीका अंश प्रविष्ट हुआ था, वह जहांका तहां रहता और बाहरका अंश काट डाला जाता। ऐसा ही किया भी गया । किन्तु मुनि तो तपस्याके सिवा और कुछ जानते न थे,
इनपर ऐसी विपद क्यों
पड़ी! उपरोक्त विषय जाननेके लिये माण्डव्य मुनिने धर्मराजसे सब बातें जाकर पूछीं । धर्मराजने कहा, – “ आप जब लड़के थे, तब आपने पतङ्गके शरीरमें तिनका घुसेड़ दिया था ; इससे आपकी इसतरह शास्ति की गई है ।" माण्डव्यने क्रुद्द होकर कहा, “ उस समय मैं अज्ञान शिशु था । आपने अल्प अपराध पर मुझे गुरुदण्ड दिया है ; इसलिये आप शूद्रयोनिमें जाकर जन्मको ग्रहण कीजिये । आजसे मैं यह नियम बनाता है, कि चतुर्दश वत्सर वयःक्रम न होनेसे बालकोंको कोई पाप न लगेगा ।"<noinclude>शय सूक्ष्म,</noinclude>
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{{Outdent|अण, अणक (सं० वि०) अण-अच्, अणति यथेच्छं नदति । <small>पापाणके कुत्सितैः । पा २।१।५४</small> १ अधम, कुत्सित; जलौका, मकरन्द । २ बकी, बड़-बड़िया ।}}
{{Outdent|अणकीय (सं० वि०) छोटे से सम्बन्ध रखनेवाला ।}}
{{Outdent|अणद (हिं० पु०) आनन्द, खुशी ।}}
{{Outdent|अण्व्य (सं० क्ली०) अणु-यत्, अणोः सूक्ष्मशस्योत्पादकं क्षेत्रम् । अणुधान्योत्पादक क्षेत्र, वह खेत जिसमें छोटी-छोटी चीजें पैदा हों ।}}
{{Outdent|अणसङ्ग (हिं० वि०) निःशङ्क, बेखौफ ।}}
{{Outdent|अणादीक्षित—चातुर्मास्यप्रयोग, हौत्रप्रयोग प्रभृति ग्रन्थप्रणेता ।}}
{{Outdent|अणायाचार्य—रामानुजविजय नामक ग्रन्थरचयिता । इनका दूसरा नाम सत्यधर्मतीर्थ था । सन् १८३१ ई० में इनकी मृत्यु हुई ।}}
{{Outdent|अणास (हिं० स्त्री०) अड़स, मुश्किल ।}}
{{Outdent|अणि (सं० पु०-स्त्री०) अण-इन्, अणति नदति । १ रथचक्राग्रस्थित कीलक, रथवाले पहिये के आगे की कील । २ अश्रि, आरा । ३ सूच्यादिका अग्रभाग, सूई वगैरह की नोक । ४ सीमा, सरहद । “अणिराशिवदग्रचायकीलाग्रि सीमसु द्वयोः ॥” (मेदिनी)}}
{{Outdent|अणिमन्, अणिमा (सं० पु०) अणोर्भावः, अणु-इमनिच् । १ अणुत्व, सूक्ष्म परिमाण, सूक्ष्मता । बारीकी, जर्रा होने की स्थिति । २ अष्ट प्रकार ऐश्वर्यों के मध्य ऐश्वर्य-विशेष, आठ तरह की सिद्धियों में वह सिद्धि, जिसके प्रभाव से छोटे से भी छोटा रूप रखा जा सकता है। अष्टविध ऐश्वर्यों के यह नाम हैं,—}}
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ईशित्वञ्च वशित्वञ्च तथा कामावसायिता ॥"</poem>}}}}
{{Outdent|अर्थात् १ अणिमा, २ लघिमा, ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व, ८ कामावसायिता— यही अष्ट सिद्धि कहलाती हैं ।}}
{{Outdent|अणिमादिक (सं० पु०) अणिमा प्रभृति, अणिमा वगैरह आठ सिद्धियां ।}}
{{Outdent|अणियाली (हिं० स्त्री०) १ कटारी । २ बर्छी ।}}
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{{Outdent| अणी (हिं० अव्य० ) ओजी, एजी, ऐजी; अरी, ओरी, एरी ।<Small>अणि देखो ।</small>}}
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विदुर के जन्मवृत्तान्त में लिखा है, कि माण्डव्य नामके जनक मुनि किसी वृक्षतलमें तपस्या करते थे । एक दिन कई एक चोर अपहृत द्रव्य ले इनके आश्रम के भीतर आ छिपे । नगरके रक्षकोंने सन्धान लगाते-लगाते उसी स्थान में पहुंचकर देखा, कि चोर कुटीमें छिपे थे । रक्षकगण अपहृत धन, चोरों और मुनिको भी तस्कर समझ राजसभा में ले गये । उस समय न्यायपरायणता और धर्मभय अधिक था, चोर कहने से ही मनुष्य चोर समझा जाता था, - विचार करनेका कोई झगड़ा झञ्झट न था, चोरको पहुंचते ही शूली चढ़ानेकी आज्ञा दी जाती थी । राजाके सद्विचारसे माण्डव्य चोरोंके साथ चोर बन शूली चढ़े। चोर तो मरे, किन्तु माण्डव्यका कठिन प्राण न निकला । अन्त में राजा अनेक अनुनय-विनय द्वारा मुनिको तुष्टकर शूलो छुड़ाने पहुंचे। किन्तु शूली न कूटी, मुनिके शरीरमें विद्ध हो गई थी। इससे इसके सिवा कोई दूसरा उपाय न था, कि शरीर के भीतर जो शूलीका अंश प्रविष्ट हुआ था, वह जहांका तहां रहता और बाहरका अंश काट डाला जाता। ऐसा ही किया भी गया । किन्तु मुनि तो तपस्याके सिवा और कुछ जानते न थे,
इनपर ऐसी विपद क्यों
पड़ी! उपरोक्त विषय जाननेके लिये माण्डव्य मुनिने धर्मराजसे सब बातें जाकर पूछीं । धर्मराजने कहा, – “ आप जब लड़के थे, तब आपने पतङ्गके शरीरमें तिनका घुसेड़ दिया था ; इससे आपकी इसतरह शास्ति की गई है ।" माण्डव्यने क्रुद्द होकर कहा, “ उस समय मैं अज्ञान शिशु था । आपने अल्प अपराध पर मुझे गुरुदण्ड दिया है ; इसलिये आप शूद्रयोनिमें जाकर जन्मको ग्रहण कीजिये । आजसे मैं यह नियम बनाता है, कि चतुर्दश वत्सर वयःक्रम न होनेसे बालकोंको कोई पाप न लगेगा ।"
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सिद्धि, जिसके प्रभावसे छोटेसे भी छोटा रूप रखा जा सकता है । अष्टविध ऐश्वयोंके यह नाम हैं,-
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{{Outdent|अणसङ्ग (हिं० वि०) निःशङ्क, बेखौफ ।}}
{{Outdent|अणादीक्षित—चातुर्मास्यप्रयोग, हौत्रप्रयोग प्रभृति ग्रन्थप्रणेता ।}}
{{Outdent|अणायाचार्य—रामानुजविजय नामक ग्रन्थरचयिता । इनका दूसरा नाम सत्यधर्मतीर्थ था । सन् १८३१ ई० में इनकी मृत्यु हुई ।}}
{{Outdent|अणास (हिं० स्त्री०) अड़स, मुश्किल ।}}
{{Outdent|अणि (सं० पु०-स्त्री०) अण-इन्, अणति नदति । १ रथचक्राग्रस्थित कीलक, रथवाले पहिये के आगे की कील । २ अश्रि, आरा । ३ सूच्यादिका अग्रभाग, सूई वगैरह की नोक । ४ सीमा, सरहद । “अणिराशिवदग्रचायकीलाग्रि सीमसु द्वयोः ॥” (मेदिनी)}}
{{Outdent|अणिमन्, अणिमा (सं० पु०) अणोर्भावः, अणु-इमनिच् । १ अणुत्व, सूक्ष्म परिमाण, सूक्ष्मता । बारीकी, जर्रा होने की स्थिति । २ अष्ट प्रकार ऐश्वर्यों के मध्य ऐश्वर्य-विशेष, आठ तरह की सिद्धियों में वह सिद्धि, जिसके प्रभाव से छोटे से भी छोटा रूप रखा जा सकता है। अष्टविध ऐश्वर्यों के यह नाम हैं,—}}
{{c|{{x-smaller|<poem>"अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्य महिमा तथा ।
ईशित्वञ्च वशित्वञ्च तथा कामावसायिता ॥"</poem>}}}}
{{Outdent|अर्थात् १ अणिमा, २ लघिमा, ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व, ८ कामावसायिता— यही अष्ट सिद्धि कहलाती हैं ।}}
{{Outdent|अणिमादिक (सं० पु०) अणिमा प्रभृति, अणिमा वगैरह आठ सिद्धियां ।}}
{{Outdent|अणियाली (हिं० स्त्री०) १ कटारी । २ बर्छी ।}}
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विदुर के जन्मवृत्तान्त में लिखा है, कि माण्डव्य नामके जनक मुनि किसी वृक्षतलमें तपस्या करते थे । एक दिन कई एक चोर अपहृत द्रव्य ले इनके आश्रम के भीतर आ छिपे । नगरके रक्षकोंने सन्धान लगाते-लगाते उसी स्थान में पहुंचकर देखा, कि चोर कुटीमें छिपे थे । रक्षकगण अपहृत धन, चोरों और मुनिको भी तस्कर समझ राजसभा में ले गये । उस समय न्यायपरायणता और धर्मभय अधिक था, चोर कहने से ही मनुष्य चोर समझा जाता था, - विचार करनेका कोई झगड़ा झञ्झट न था, चोरको पहुंचते ही शूली चढ़ानेकी आज्ञा दी जाती थी । राजाके सद्विचारसे माण्डव्य चोरोंके साथ चोर बन शूली चढ़े। चोर तो मरे, किन्तु माण्डव्यका कठिन प्राण न निकला । अन्त में राजा अनेक अनुनय-विनय द्वारा मुनिको तुष्टकर शूलो छुड़ाने पहुंचे। किन्तु शूली न कूटी, मुनिके शरीरमें विद्ध हो गई थी। इससे इसके सिवा कोई दूसरा उपाय न था, कि शरीर के भीतर जो शूलीका अंश प्रविष्ट हुआ था, वह जहांका तहां रहता और बाहरका अंश काट डाला जाता। ऐसा ही किया भी गया । किन्तु मुनि तो तपस्याके सिवा और कुछ जानते न थे,
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२३४
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अणौय—– अणु'''}}
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जन्म ग्रहण किया था ।
{{Outdent|अणीय—<small>अणीयस् देखो ।</small>}}
{{Outdent|अणीयस् (सं० त्रि०) अणु-इयसुन् । अतिसूक्ष्म, अणुतर । निहायत बारोक, बहुत झीना ।}}
{{Outdent|अणु (सं० त्रि० ) अण्-उण् ।<small>अणश्च । उण् ११८ । 'लवलेश- कणाणवः' - इति उज्ज्वलदत्तः ।</small> १ सूक्ष्म, बारीक । २ क्षुद्र, छोटा । ३ लेश, घोड़ा । ४ अदृश्य । ( पु० ) ५ धान्य, धान । ६ कण, जरा। ७ सङ्गीतशास्त्रको मात्रा- विशेष, अणुमात्रा ।}}
सकल वस्तुओंको ही सूक्ष्म-सूक्ष्म अंशोंमें विभाग किया जाता है । इन्हीं सूक्ष्म अंशोंको अणु कहते हैं। जिस सूक्ष्म अंशका किसी प्रकार फिर विभाग नहीं होता, उसका नाम परमाणु है। हमारे देशके नैयायिक कहते हैं, कि परमाणु नित्य है, उसे ईश्वरने नहीं बनाया । कुम्भकार जैसे मृत्तिका घटको निर्माण करता, ईश्वरने वैसे हो परमाणुसे जगत्के अद्भुत व्यापारको सृष्टि की है। यह मत वेदान्तके विरुद्ध है । उपनिषत् में लिखा है,
{{C|<small>"इदम् वा अग्रे नैव किञ्चिदासीत् । आसोदेकमेवाद्दितीयम् ।”</small>}}
'इस जगत्को सृष्टिसे पहले एकमात्र अद्वितीय परब्रह्मके भिन्न और कुछ भी न था ।'
अतएव जो ईश्वरको सर्वस्रष्टा और सर्व नियन्ता बताना चाहते, उनके मतसे परमाणु नित्य हो नहीं सकता । चार्वाक और बौद्धमतावलम्बी भी पर- माणके अस्तित्वको स्वीकार करते हैं । किन्तु वैदान्तिक परमाणुको नित्य नहीं समझते। उन्हें यही विश्वास है, कि कोई ज्ञानरूप पदार्थ विद्यमान है। पाशुपत - दर्शन-शास्त्रवेत्ता भी कहते हैं, कि परमाणु नित्य नहीं । समस्त सृष्टि महेश्वरकी रची है । परमाणुको नित्य और अजन्य माननेसे ईश्वर के कर्तृत्वमें दोष लगता है।
अब बात यह है, कि क्या सचमुच परमाणु विद्य मान है। बहुकाल से इस विषयका कितना ही विचार हो रहा हैं, किन्तु सन्देह नहीं मिटता । समस्त हो वस्तु विभक्त को जा सकती हैं। विभाग
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
करते-करते जब एक-एक अंश इतना सूक्ष्म हो
जाता, कि किसी फिर तरह उसका विभाग नहीं होता, तब उस सूक्ष्म अंशको परमाणु कहा करते हैं । परमाणुतत्त्ववादी स्वीकार करते हैं, — सकल वस्तुओंके हो ऐसे सूक्ष्म कणा विद्यमान हैं, कि फिर किसी क्रमसे उनका विभाग नहीं होता । किन्तु यह मत अन्य सम्प्रदायसे विपरीत है । उन लोगोंका कहना है, कि देखनेके लिये उपयुक्त यन्त्र रहने और काटने या विभाग करनेके लिये सुतीक्ष्ण यन्त्र होने से जगत्में ऐसी सूक्ष्म कोई वस्तु नहीं, जो देखी या विभक्त को जान सके । अतिसूक्ष्म परमाणुको भी चिरकाल तक असंख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है । सुतरां परमाणु कोई नित्य वस्तु नहीं । एक लोटेमें थोड़ी सी शक्कर डाल दो, समस्त जल मीठा हो जायेगा । इस स्थल में शक्कर अत्यन्त सूक्ष्म- सूक्ष्म अंशोंमें विभक्त हुआ करती है । फिर उसी लोटेके जलको बड़े घड़े के
जलमें मिलाने से समस्त
जलमें शक्कर घुल जाती है । इसके बाद समुद्र- प्रमाणजलमें वह घड़े-भर जल डाल देनेसे अनुमान द्वारा यही सिद्ध होता, कि समस्त समुद्रके जलमें शक्करको मिठास मिश्रित हो सकती इसोसे कोई-कोई पण्डित कहते हैं,— सकल द्रव्य हो इच्छानुसार सूक्ष्म-सूक्ष्म अंशोंमें विभक्त किये जा सकते हैं, इस विभागका कोई अन्त नहीं। इसलिये पदार्थ के किसी अंशको परमाणु बताना विवेचनासङ्गत नहीं ।
किन्तु परमाणुवादी इस बातको स्वीकार नहीं करते । वह कहते हैं—किसी वस्तुको क्षुद्र अंशों में विभाग करनेसे अन्तमें ऐसा सूक्ष्मांश आ जाता, कि फिर उसका विभाग नहीं होता । आजकल के -वैज्ञानिक पण्डितोंमें भी अनेकोंका यही मत है । नाना भांतिको वैज्ञानिक और रासायनिक परीक्षाओं द्वारा इसके सम्बन्धमें उन्होंने अनेक प्रमाणोंको संग्रह किया है । इन समस्त प्रमाणोंसे जो सकल वैज्ञानिक सूत्र आविष्कृत हुए, उन्हें परमाणुतत्त्व ( Atomic theory ) कहते हैं। किन्तु इस नूतन शास्त्रका मूल परमाणु नहीं; अणु ( molecule ) ही इसका
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२३५
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अणु'''|'''२२९'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रधान साधन है । अणु और परमाणु में प्रभेद इतना ही है, कि अणु का सूक्ष्म-सूक्ष्म अंशों में विभाग किया जाता, परमाणु का विभाग नहीं होता। किसी वस्तु को अतिशय क्षुद्र-क्षुद्र अंशों में विभाग करने से अणु निकलता, किन्तु परमाणु नहीं बनता । वायु का प्रत्येक कण अणु है, परमाणु नहीं । जब दो वस्तुओं के संयोग से एक यौगिक वस्तु उत्पन्न होती, तब एक वस्तु का अणु दूसरी वस्तु के अणु से मिलता ; किन्तु एक परमाणु से दूसरे परमाणु का संयोग नहीं गँठता । किसी-किसी वस्तु का अणु ही परमाणु है। फिर किसी-किसी वस्तु का अणु दो अथवा अधिक संख्यक परमाणुओं की समष्टि है। पारा, जस्ता प्रभृति कई पदार्थों को विभाग करने से उनका सूक्ष्मतम अणु एक-एक परमाणु होता है। हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गन्धक प्रभृति का अणु दो परमाणुओं की समष्टि है । संख्या विष के एक-एक अणु में चार परमाणु होते हैं । जैसे गुलदस्ता कितने ही फूलों की समष्टि है, वैसे ही जगत् के समुदय पदार्थ कितने ही अणुओं की समष्टि हैं। जैसे एक-एक फूल में एक किंवा अधिक पंखुड़ी रह सकती हैं, वैसे ही प्रत्येक अणु में एक या अधिक परमाणु होते हैं। कितने ही फूल एक में मिलाने से गुलदस्ता बनता है । फिर गुलदस्ते के फूल निकाल डालने से प्रत्येक फूल अलग हो जाता है; किन्तु पंखुड़ियाँ अलग नहीं होतीं । इसी तरह रूढ़ किंवा यौगिक पदार्थ का वियोग करने से उसके सूक्ष्मतर अंश एक-एक अणु में विभक्त हो जायेंगे, किन्तु परमाणु बन न सकेंगे । अणु और परमाणु में यही भेद है ।
वैज्ञानिक पण्डितोंने रासायनिक योगायोग से यह स्थिर किया है, कि अनेक स्थलोंमें अणु, दो-तीन
परमाणु, श्रको समष्टि होता है । अक्षिजनके प्रत्येक अणु में दो परमाणु रहते हैं । अणु देख नहीं पड़ता ; किन्तु रासायनिकोंने ताड़ितयन्त्र द्वारा जलको वियोग करके देखा है, कि जल रूढ़ पदार्थ नहीं । अक्षि- जनका एक अणु हाइड्रोजनके दो अणुओं से मिलनेपर जल बन जाता है। जलके एक-एक अणु में अति-
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जनका आधा और हाइड्रोजनका एक अणु रहता है । मान लो कि दो पात्र ऐसे हैं, जिनमें एक दूसरेसे दूना, और बड़ा हाइड्रोजन और छोटा अजिनके अणुओंसे भर दिया गया है, और बड़े में हाइड्रोजन के सौ और छोटेमें अक्षिजनके पचास अणु हैं । ऐसी अवस्थामें हाइड्रोजन और अक्षिजनको एकत्र मिला ताड़ितवेग पहुंचानेसे बन्दूक कोसो आवाज निकल पड़ती है । यदि पात्र सुदृढ़ हुआ, तब तो न टूटेगा ; ऐसा न होनेसे चूरचूर हो जायेगा । इस तरह की आवाज होने और दो प्रकारके अणु मिलने से सौ जलकणाको उत्पत्ति होती है । परमाणुका भाग किया जा नहीं सकता । अतएव अणुके परमाणु होनेपर पचास अक्षिजन और सौ हाइड्रोजनके अणु मिलनेसे सौ जलकणाको उत्पत्ति किसीतरह सम्भव न थी। इससे यह सप्रमाण है, कि अक्षिजनके एक अणु में दो परमाणु रहते हैं, जिसका एक-एक परमाणु एक-एक हाइड्रोजनके अणुसे मिल जाता है । इस जगह उदाहरण-स्वरूप केवल डेढ़ सौ अणुओंकी बात लिखी गई है । वास्तवमें अणु इतने सूक्ष्म होते हैं, कि कोटि-कोटि एकत्र मिलने पर भी खाली आंखोंसे देख नहीं पड़ते । पण्डितोंने अनुमान किया है, कि ६००,०००,०००,०००,०००,०००,०००,००० हाइड्रोजनके अणु वज़नमें सिर्फ एक रत्ती रहते हैं । आजकलके अति उत्कृष्ट अणुवीक्षण (खुर्दबीन) से देखनेपर कोई वस्तु अपने सहज आकारसे आठ हज़ार गुण बड़ी मालूम पड़ती है । यदि कोई ऐसे यन्त्रको आविष्कार कर सके, जिसे आंख में लगानेसे कोई वस्तु अपने सहज आकारसे ६४००० चौंसठ हजार गुण बड़ी दिखाई दे, तो जलका एक-एक अणु देखे जानेकी सम्भावना की जा सकती है ।
अणु इतना सूक्ष्म है सही, किन्तु ठोक लोहे जैसा कड़ा होता है। एक शीशी आधी जलसे भर और खाली आधीसे वायुको चुम्बन कर काग लगा देनेसे शीशीके भीतर जलको छोड़ दूसरी कोई चीज, रहने नहीं पाती। इसके बाद बलपूर्वक शीशी
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अणु'''|'''२२९'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रधान साधन है । अणु और परमाणु में प्रभेद इतना ही है, कि अणु का सूक्ष्म-सूक्ष्म अंशों में विभाग किया जाता, परमाणु का विभाग नहीं होता। किसी वस्तु को अतिशय क्षुद्र-क्षुद्र अंशों में विभाग करने से अणु निकलता, किन्तु परमाणु नहीं बनता । वायु का प्रत्येक कण अणु है, परमाणु नहीं । जब दो वस्तुओं के संयोग से एक यौगिक वस्तु उत्पन्न होती, तब एक वस्तु का अणु दूसरी वस्तु के अणु से मिलता ; किन्तु एक परमाणु से दूसरे परमाणु का संयोग नहीं गँठता । किसी-किसी वस्तु का अणु ही परमाणु है। फिर किसी-किसी वस्तु का अणु दो अथवा अधिक संख्यक परमाणुओं की समष्टि है। पारा, जस्ता प्रभृति कई पदार्थों को विभाग करने से उनका सूक्ष्मतम अणु एक-एक परमाणु होता है। हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गन्धक प्रभृति का अणु दो परमाणुओं की समष्टि है । संख्या विष के एक-एक अणु में चार परमाणु होते हैं । जैसे गुलदस्ता कितने ही फूलों की समष्टि है, वैसे ही जगत् के समुदय पदार्थ कितने ही अणुओं की समष्टि हैं। जैसे एक-एक फूल में एक किंवा अधिक पंखुड़ी रह सकती हैं, वैसे ही प्रत्येक अणु में एक या अधिक परमाणु होते हैं। कितने ही फूल एक में मिलाने से गुलदस्ता बनता है । फिर गुलदस्ते के फूल निकाल डालने से प्रत्येक फूल अलग हो जाता है; किन्तु पंखुड़ियाँ अलग नहीं होतीं । इसी तरह रूढ़ किंवा यौगिक पदार्थ का वियोग करने से उसके सूक्ष्मतर अंश एक-एक अणु में विभक्त हो जायेंगे, किन्तु परमाणु बन न सकेंगे । अणु और परमाणु में यही भेद है ।
वैज्ञानिक पण्डितोंने रासायनिक योगायोग से यह स्थिर किया है, कि अनेक स्थलोंमें अणु, दो-तीन
परमाणु, श्रको समष्टि होता है । अक्षिजनके प्रत्येक अणु में दो परमाणु रहते हैं । अणु देख नहीं पड़ता ; किन्तु रासायनिकोंने ताड़ितयन्त्र द्वारा जलको वियोग करके देखा है, कि जल रूढ़ पदार्थ नहीं । अक्षि- जनका एक अणु हाइड्रोजनके दो अणुओं से मिलनेपर जल बन जाता है। जलके एक-एक अणु में अति-
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जनका आधा और हाइड्रोजनका एक अणु रहता है । मान लो कि दो पात्र ऐसे हैं, जिनमें एक दूसरेसे दूना, और बड़ा हाइड्रोजन और छोटा अजिनके अणुओंसे भर दिया गया है, और बड़े में हाइड्रोजन के सौ और छोटेमें अक्षिजनके पचास अणु हैं । ऐसी अवस्थामें हाइड्रोजन और अक्षिजनको एकत्र मिला ताड़ितवेग पहुंचानेसे बन्दूक कोसो आवाज निकल पड़ती है । यदि पात्र सुदृढ़ हुआ, तब तो न टूटेगा ; ऐसा न होनेसे चूरचूर हो जायेगा । इस तरह की आवाज होने और दो प्रकारके अणु मिलने से सौ जलकणाको उत्पत्ति होती है । परमाणुका भाग किया जा नहीं सकता । अतएव अणुके परमाणु होनेपर पचास अक्षिजन और सौ हाइड्रोजनके अणु मिलनेसे सौ जलकणाको उत्पत्ति किसीतरह सम्भव न थी। इससे यह सप्रमाण है, कि अक्षिजनके एक अणु में दो परमाणु रहते हैं, जिसका एक-एक परमाणु एक-एक हाइड्रोजनके अणुसे मिल जाता है । इस जगह उदाहरण-स्वरूप केवल डेढ़ सौ अणुओंकी बात लिखी गई है । वास्तवमें अणु इतने सूक्ष्म होते हैं, कि कोटि-कोटि एकत्र मिलने पर भी खाली आंखोंसे देख नहीं पड़ते । पण्डितोंने अनुमान किया है, कि ६००,०००,०००,०००,०००,०००,०००,००० हाइड्रोजनके अणु वज़नमें सिर्फ एक रत्ती रहते हैं । आजकलके अति उत्कृष्ट अणुवीक्षण (खुर्दबीन) से देखनेपर कोई वस्तु अपने सहज आकारसे आठ हज़ार गुण बड़ी मालूम पड़ती है । यदि कोई ऐसे यन्त्रको आविष्कार कर सके, जिसे आंख में लगानेसे कोई वस्तु अपने सहज आकारसे ६४००० चौंसठ हजार गुण बड़ी दिखाई दे, तो जलका एक-एक अणु देखे जानेकी सम्भावना की जा सकती है ।
अणु इतना सूक्ष्म है सही, किन्तु ठोक लोहे जैसा कड़ा होता है। एक शीशी आधी जलसे भर और खाली आधीसे वायुको चुम्बन कर काग लगा देनेसे शीशीके भीतर जलको छोड़ दूसरी कोई चीज, रहने नहीं पाती। इसके बाद बलपूर्वक शीशी
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२३६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२३०'''|'''अरु '''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>झुकाने से झम-झम शब्द निकलता है। वायु रहनेसे ऐसा शब्द नहीं होता ।
वाष्प, तरल द्रव्य किंवा कठिन पदार्थके अणु एकत्र मिले नहीं रहते। वह परस्पर पृथक् हो जाते हैं। फिर भी, कठिन पदार्थके अणु बहुत कुछ पास-पास रहते हैं । किन्तु एक-एक अणुका मध्यवर्त्ती स्थान खाली होता, वहां आकाश-भिन्न और कुछ भी नहीं। बाष्प और तरल पदार्थके अणु सर्वदा हो चला करते हैं । इसीसे घरमें कोई गन्ध द्रव्य ले जानेसे चारो ओर आमोदित हो जाती हैं। एक घड़े पानीमें थोड़ा कपूर डाल देनेसे सभी पानी सुवासित होता है । बाष्पके अणु पतले हैं, परस्पर में अधिक ठेल ठाल नहीं चलती; इससे यह सीधे राहपर जा सकते हैं । किन्तु, जब एक अणु दूसरे
को ठेलता, तब यह तत्क्षणात् अलग-अलग हो जाते हैं। पृथक् होनेपर यह फिर सीधे अपनी राहपर चला करते हैं । तरल पदार्थके अणु घन होते, सर्वदा ही टक्कर मारते रहते ; जिसके लगनेसे पृथक्-पृथक् हो जाते हैं । इसीतरह सर्वदा ठेल- ठालसे पृथक् हो जानेके कारण इनको गति वक्र हो जाती है। कठिन पदार्थके अणु एक प्रकार स्थिर होते हैं । यह परस्पर इतने पास-पास रहते, कि इन्हें चलने-फिरनेका स्थान नहीं मिलता ।
इस बातका खासा प्रमाण विद्यमान है, कि बाष्पीय अण परस्पर टकरानेसे एकत्र नहीं जुड़ते, संघर्ष होनेके बाद फिर अपने-अपने पथमें चलने लगते हैं। कार्बोनिक एसिड गेस भरी बोतलको ढट्ठी खोल देमेसे बाष्प बाहर निकल सारे घरमें व्याप्त हो जाती है । फिर बोतल के मुंहपर कृष्णसोसका पत्र ढका रहनेसे, जिसतरह कपड़े के छेदसे जल निर्गत होता. उसी तरह कृष्णसोसके पत्र से बाष्प निकलती है । बोतल में केवल कार्बोनिक एसिड न रख हाइड्रोजन और अजिन यह दोनो प्रकारकी बाष्पें भी रखी जाती हैं, किन्तु ऐसी अवस्था में जो बाष्प अधिक लघु होती, वही पहले बाहर निकल पड़ती है। हाइड्रोजन कार्बोनिक एसिड गेसको अपेक्षा लघु
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है, सुतरां हाइड्रोजन पहले निकलता, जिसके पीछे कार्बोनिक एसिड निर्गत होता है। कृष्ण-सीस के पत्र से एक आधार को दो भागों में विभक्त कर उसके निम्न भाग में केवल विशुद्ध हाइड्रोजन रखने पर यह वाष्प कृष्ण-सीस के भीतर से शीघ्र ही ऊपर आ पहुँचती है। हाइड्रोजन का कोई-कोई अणु परस्पर संघर्ष द्वारा संयुक्त हो जाने से अवश्य ही असंयुक्त अणु से भारी होता, जिसके कारण संयुक्त अणु कभी बोतल के ऊपर पहले आ न सकता। फिर बोतल वाले दोनों अंशों के अणुओं को यद्यपि कृष्ण-सीस के पत्र से छान लिया जाये, तथापि ऊपर का अणु लघु होने के कारण पहले बाहर निकलेगा । किन्तु कार्यतः ऐसा नहीं होता । विशेष परीक्षा द्वारा यह सप्रमाण हुआ है, कि ऊपर के अणु निकलने में जितना समय लगता है, नीचे के अणु भी ठीक उतने ही समय में बाहर हो जाते हैं। इससे यह निश्चित हुआ, कि अणु परस्पर में संयुक्त नहीं, – पृथक्-पृथक् ही रहते हैं। एक-एक द्रव्य के प्रत्येक अणु का आकार, अवयव और भाव ठीक एक ही प्रकार का है। किन्तु एक प्रकार के पदार्थ का अणु अन्य किसी प्रकार के पदार्थ वाले अणु-जैसा नहीं । इसका तात्पर्य यह है, - जल एक पदार्थ है । निर्मल होने से, किसी प्रकार का भी जल क्यों न हो, सबका एक ही जैसा होगा। तालाब का जल हो, या समुद्र का जल हो, जन्तु के रक्त का जलभाग किंवा पेड़ के रस का जलीयांश ही हो, परिष्कार करने से सकल जल के अणु समान होते हैं। किन्तु जल के अणु लवण वाले अणु के तुल्य नहीं । भिन्न-भिन्न वस्तु के अणु विभिन्न प्रकार होते भी, इनके आकार में कोई विशेष प्रभेद नहीं रहता । कारण, किसी आधार में जितने हाइड्रोजन के अणु समाते, उसी आधार में ठीक उतने ही ऑक्सीजन के अणु भी समा सकते हैं। ऐसे स्थल में अणुओं के भार का तारतम्य हो सकता है, किन्तु संख्या में न्यूनाधिक्य नहीं पड़ता। इसका प्रमाण यही है,—किसी आधार में वाष्प रखने से, अणु की स्वाभाविक गति द्वारा उस आधार पर सर्वदा ही आघात
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अणु'''|'''२३१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>लगा करता है । आधार से अणुके टकरानेपर वह संघर्ष द्वारा वापस जाता है । इसतरह के आघातको दबाव ( pressure ) कहते हैं । एक सेर बाष्प पूर्ण आधार में यदि फिर एक सेर अपर किसी बाष्पको भर दिया जाये, तो अणुओंका दबाव द्विगुण हो जाता है । अर्थात् स्वभावतः जितना स्थान बाष्प से व्याप्त होता, उसकी अपेक्षा स्थान घटा देनेसे अणुओं की गति बढ़ती है । इसलिये आधार में धड़-धड़ आघात लगता है । किसी आधार में भिन्न-भिन्न प्रकारके अणु भी ठसाठस भर देनेसे आघात और प्रतिघातका वेग बढ़ता है । आघात और प्रतिघातका वेग देख यह निश्चित किया, जाता, कि किस आधार में कितने अणु विद्यमान हैं ।
उत्तापके न्यूनाधिक्यसे अणुओंको गतिका तारतम्य बंधता है । उत्ताप कम लगने से अणुओंको गति घटती है । उत्ताप अधिक लगनेसे अणुओंका वेग बढ़ता है। वैज्ञानिकोंने परीक्षा कर देखा है, कि शीतकालके वायुमें जो ताप ( ६० डिगरी फारेन- होट) रहता, उससे वायुके अणु एक मिनटमें दश कोस घूमते हैं । अर्थात् सचराचर रेलगाड़ी जिस . वेगसे दौड़ती, अणुओंका वेग उसकी अपेक्षा साठ गुण अधिक होता है ।
एक-एक अणु अपने गुरुत्वानुसार अन्य अणु के साथ मिलता है । कहीं भी इस नियम में व्यतिक्रम नहीं पड़ता। आठ भाग अक्षिजन और एक भाग हाइड्रो- जन मिलनेसे जल बनता है । भागका हिसाब वज़नसे लगाना पड़ता है, किसी पात्रको मापसे ठीक नहीं होता। आठ बोतल अक्षिजन और एक बोतल हाइड्रोजन मिलानेसे जल नहीं बनेगा । कारण, यहां मापका हिसाब लगाया गया है । तथा आठ सेर अक्षिजन और एक सेर हाइड्रोजन मिलानेसे जल तय्यार हो जायेगा । कारण, इस जगह वज़नसे हिसाब किया गया है । ऐसा होनेका - तात्पर्य यह है, - पहले ही कह चुके हैं, कि किसी पात्रसें बाष्पादि नापनेपर उसके अणुओंकी संख्या न्यूनाधिक नहीं पड़ती। किसी बोतल में यदि दो- . सौ अम्लजानके अणु आ जायें, तो उसी बोतल में दो-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सौ हाइड्रोजनके अण भी समा जायेंगे, फिर यह भी पहले बता दिया गया है कि गणनाका हिसाब लगानेसे दो हाइड्रोजन के अणु एक अक्षिजनके अणु से मिलनेपर जल बनता है। किन्तु परमाणु तत्त्वमें यौगिक पदार्थ अण का योगायोग भारके हिसाब से भी लगाया जाता है । यह सकल वृत्तान्त रसायन- विद्याके अन्तर्गत हैं । <Small>अतएव रसायन और परमाणु शब्द में अणुके अन्यान्य विवरण देखो ।</small>
२ सङ्गीतशास्त्रको एक मात्रा । अणुमात्रा (x) इस तरहके डमरु चिह्न द्वारा निर्दिष्ट होतो है । वैयाकरण अकारादि एक-एक लघुवर्ण वाले उच्चारण के कालको एकमात्र काल कहते हैं । यथा, -
{{block center|<poem><small>“एकमावो भवेदृहस्वो हिमावो दीर्घ उच्यते ।
विमानवस्तु पुर्तज्ञेयी व्यञ्जनञ्चाई मात्रकम् ॥”</small></poem>}}
यहाँ आपके पाठ की केवल वर्तनी (Spelling) सुधार कर दी गई है (कोई भी नया शब्द नहीं जोड़ा गया है और न ही वाक्य बदले गए हैं):
एकमात्र ह्रस्व, द्विमात्र दीर्घ, त्रिमात्र प्लुत और अर्द्धमात्रक वर्ण व्यञ्जन होता है । वैद्योंने अन्य प्रकारसे मात्रा निर्दिष्ट की है । उनके मतसे, चक्षुका स्वाभाविक निमेष ही मात्रा निश्चित करनेका सहज उपाय है ।<small>“ तत्र स्वाचरोच्चारणमात्रोऽक्षिनिमेषः ।" (सुश्रुत)</small>ह्रस्व वर्णको उच्चारण करने में जो समय लगता, वही चक्षुका एक निमेष है। एक-एक निमेष एकमात्र काल होता है । सङ्गीत-शास्त्रकारोंके मतसे पांच लघु वर्णोंको उच्चारण करनेमें जो समय लगता, वही एकमात्र काल है । <small>“पञ्चलघ्वक्षरोच्चारणकालो मात्रा समीरिता ।"</small> मात्राके सम्बन्ध में भी इसीतरह के अनेक मतभेद देखे जाते हैं। जो हो, गायक और वाद्यकर अपने इच्छानुसार मात्रा के कालको घटा-बढ़ा सकते हैं । कहने का मतलब यही है, कि गीतादिके समय सर्वत्र कालका समान व्यवधान होनेसे कोई दोष नहीं लगता। सङ्गीत-शास्त्रमें अर्द्ध, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत एवं अणु–इन्हीं पांच प्रकारकी मात्राओंका व्यवहार होता है । एकमात्र कालसे द्विगुणको द्विमात्र या दीर्घमात्र, त्रिगुण या तदतिरिक्तको त्रिमात्र, अर्द्धको अर्द्ध मात्र, और चतुर्थांशको अणुमात्र काल कहते हैं । यह पांच प्रकारके काल बतानेके लिये पांच प्रकार के साङ्केतिक चिह्न वर्तमान हैं । यथा, - ( 1 ) एक या<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अणु'''|'''२३१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>लगा करता है । आधार से अणुके टकरानेपर वह संघर्ष द्वारा वापस जाता है । इसतरह के आघातको दबाव ( pressure ) कहते हैं । एक सेर बाष्प पूर्ण आधार में यदि फिर एक सेर अपर किसी बाष्पको भर दिया जाये, तो अणुओंका दबाव द्विगुण हो जाता है । अर्थात् स्वभावतः जितना स्थान बाष्प से व्याप्त होता, उसकी अपेक्षा स्थान घटा देनेसे अणुओं की गति बढ़ती है । इसलिये आधार में धड़-धड़ आघात लगता है । किसी आधार में भिन्न-भिन्न प्रकारके अणु भी ठसाठस भर देनेसे आघात और प्रतिघातका वेग बढ़ता है । आघात और प्रतिघातका वेग देख यह निश्चित किया, जाता, कि किस आधार में कितने अणु विद्यमान हैं ।
उत्तापके न्यूनाधिक्यसे अणुओंको गतिका तारतम्य बंधता है । उत्ताप कम लगने से अणुओंको गति घटती है । उत्ताप अधिक लगनेसे अणुओंका वेग बढ़ता है। वैज्ञानिकोंने परीक्षा कर देखा है, कि शीतकालके वायुमें जो ताप ( ६० डिगरी फारेन- होट) रहता, उससे वायुके अणु एक मिनटमें दश कोस घूमते हैं । अर्थात् सचराचर रेलगाड़ी जिस . वेगसे दौड़ती, अणुओंका वेग उसकी अपेक्षा साठ गुण अधिक होता है ।
एक-एक अणु अपने गुरुत्वानुसार अन्य अणु के साथ मिलता है । कहीं भी इस नियम में व्यतिक्रम नहीं पड़ता। आठ भाग अक्षिजन और एक भाग हाइड्रो- जन मिलनेसे जल बनता है । भागका हिसाब वज़नसे लगाना पड़ता है, किसी पात्रको मापसे ठीक नहीं होता। आठ बोतल अक्षिजन और एक बोतल हाइड्रोजन मिलानेसे जल नहीं बनेगा । कारण, यहां मापका हिसाब लगाया गया है । तथा आठ सेर अक्षिजन और एक सेर हाइड्रोजन मिलानेसे जल तय्यार हो जायेगा । कारण, इस जगह वज़नसे हिसाब किया गया है । ऐसा होनेका - तात्पर्य यह है, - पहले ही कह चुके हैं, कि किसी पात्रसें बाष्पादि नापनेपर उसके अणुओंकी संख्या न्यूनाधिक नहीं पड़ती। किसी बोतल में यदि दो- . सौ अम्लजानके अणु आ जायें, तो उसी बोतल में दो-
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सौ हाइड्रोजनके अण भी समा जायेंगे, फिर यह भी पहले बता दिया गया है कि गणनाका हिसाब लगानेसे दो हाइड्रोजन के अणु एक अक्षिजनके अणु से मिलनेपर जल बनता है। किन्तु परमाणु तत्त्वमें यौगिक पदार्थ अण का योगायोग भारके हिसाब से भी लगाया जाता है । यह सकल वृत्तान्त रसायन- विद्याके अन्तर्गत हैं । <Small>अतएव रसायन और परमाणु शब्द में अणुके अन्यान्य विवरण देखो ।</small>
२ सङ्गीतशास्त्रको एक मात्रा । अणुमात्रा (x) इस तरहके डमरु चिह्न द्वारा निर्दिष्ट होतो है । वैयाकरण अकारादि एक-एक लघुवर्ण वाले उच्चारण के कालको एकमात्र काल कहते हैं । यथा, -
{{block center|<poem><small>“एकमावो भवेदृहस्वो हिमावो दीर्घ उच्यते ।
विमानवस्तु पुर्तज्ञेयी व्यञ्जनञ्चाई मात्रकम् ॥”</small></poem>}}
एकमात्र ह्रस्व, द्विमात्र दीर्घ, त्रिमात्र प्लुत और अर्द्धमात्रक वर्ण व्यञ्जन होता है । वैद्योंने अन्य प्रकारसे मात्रा निर्दिष्ट की है । उनके मतसे, चक्षुका स्वाभाविक निमेष ही मात्रा निश्चित करनेका सहज उपाय है ।<small>“ तत्र स्वाचरोच्चारणमात्रोऽक्षिनिमेषः ।" (सुश्रुत)</small>ह्रस्व वर्णको उच्चारण करने में जो समय लगता, वही चक्षुका एक निमेष है। एक-एक निमेष एकमात्र काल होता है । सङ्गीत-शास्त्रकारोंके मतसे पांच लघु वर्णोंको उच्चारण करनेमें जो समय लगता, वही एकमात्र काल है । <small>“पञ्चलघ्वक्षरोच्चारणकालो मात्रा समीरिता ।"</small> मात्राके सम्बन्ध में भी इसीतरह के अनेक मतभेद देखे जाते हैं। जो हो, गायक और वाद्यकर अपने इच्छानुसार मात्रा के कालको घटा-बढ़ा सकते हैं । कहने का मतलब यही है, कि गीतादिके समय सर्वत्र कालका समान व्यवधान होनेसे कोई दोष नहीं लगता। सङ्गीत-शास्त्रमें अर्द्ध, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत एवं अणु–इन्हीं पांच प्रकारकी मात्राओंका व्यवहार होता है । एकमात्र कालसे द्विगुणको द्विमात्र या दीर्घमात्र, त्रिगुण या तदतिरिक्तको त्रिमात्र, अर्द्धको अर्द्ध मात्र, और चतुर्थांशको अणुमात्र काल कहते हैं । यह पांच प्रकारके काल बतानेके लिये पांच प्रकार के साङ्केतिक चिह्न वर्तमान हैं । यथा, - ( 1 ) एक या<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिवृष्टिहत—अतिशक्तिभाज्'''|'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलकी कटोरीके भीतर वही नाम और एक जवाका फूल रख, एक ही गोतेमें उसे तालाबके पानीके भीतर गाड़ आता था। अज्ञ लोगोंको विश्वास था, कि यह प्रक्रिया करनेसे तीन दिनमें अवश्य वृष्टि बन्द हो जाती है। <small>अनावृष्टि देखो।</small>
{{outdent|अतिवृष्टिहत (सं॰ त्रि॰) मूषलधार वृष्टिसे मारा गया, गहरी बारिशसे चोट खाया हुआ।}}
{{outdent|अतिवेगित (सं॰ त्रि॰) अतिवेगः जातोऽस्य। जातातिवेग, बड़े वेगका।}}
{{outdent|अतिवेध (सं॰ पु॰) अत्यन्तो वेधः सम्पर्कः। एकादशीके साथ दशमीका सम्पर्क-विशेष।}}
{{outdent|अतिवेपथु (सं॰ त्रि॰) १ बहुत कांपता हुआ। (स्त्री॰) २ बड़ी कँपकपी, अज़हद लरज़िश।}}
{{outdent|अतिवेल (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तं वेलां मर्यादां कुलं वा। १ अधिक, असीम, मर्यादातिक्रान्त। (अव्ययी॰) २ वेलातिक्रम।}}
{{outdent|अतिवेला (सं॰ स्त्री॰) देर, विलम्ब, कुसमय।}}
{{outdent|अतिवैचक्षण्य (सं॰ क्ली॰) अधिक बुद्धिमत्ता, बड़ी होशियारी, अज़हद कमाल।)}}
{{outdent|अतिवैसस् (सं॰ त्रि॰) अत्यन्त प्रतिकूल, निहायत बरखिलाफ़।}}
{{outdent|अतिवोढृ (सं॰ त्रि॰) अति वहनकर्ता, प्रापक।}}
{{outdent|अतिव्यथन (सं॰ क्ली॰) अत्यन्तपीड़न, बड़ी भारी व्यथा।}}
{{outdent|अतिव्यथा (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त पीड़ा, अज़हद दर्द।}}
{{outdent|अतिव्यय (सं॰ त्रि॰) अतिशयितो व्ययः। अपरिमित व्यय, फ़िज़ूल-ख़चं। शास्त्रकार कहते हैं कि उपार्जित धनका आधा भाग खाने-पीने और नित्य-नैमित्तिक कामोंमें खर्च और चौथाईसे पुण्य सञ्चय करे। बाकी चौथाईसे मूलधन या पूंजी बढ़ाये। इस नियमसे अधिक जो व्यय किया जाता है, उसीको अतिव्यय कहते हैं।}}
{{outdent|अतिव्याधिन् (सं॰ त्रि॰) तीखा, चुभनेवाला।}}
{{outdent|अतिव्याप्त (सं॰ त्रि॰) सर्वत्र वर्त्तमान, अपरिमित रूपसे संलग्न, निहायत आलूदा।}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{outdent|अतिव्याप्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन लक्ष्यमलक्ष्य-ञ्चाविशिष्य व्याप्तिः। अतिशय व्यापन, अधिक व्याप्ति, लक्ष्य तथा अलच्यमें लक्षणका गमन।}}
<small>'अलक्ष्ये लक्षणगमनमतिव्याप्तिः।'</small> लक्ष्य पदार्थमें पहुंचके अलक्ष्य पदार्थमें भी लक्षणके चले जानेको अतिव्याप्ति कहते हैं। इसका मतलब यह है—किसी एक वस्तुको लक्ष्यकर यदि उसके लक्षणादि निर्द्देश किये जायें, फिर वही लक्षण यदि उस वस्तुमें मिलें, जिसको पहले लक्ष्यकर वह लक्षण निर्द्दिष्ट नहीं हुए, तो ऐसी अवस्थामें अतिव्याप्ति कही जा सकती है। जैसे—<small>शाखापल्लवत्वं वृक्षत्वम्।</small> जिसमें डालियां और पत्तियां होती हैं, वही वृक्ष है। इस स्थानमें वृक्षको ही लक्ष्यकर यह लक्षण बताया गया, कि डालियों और पत्तियोंके होनसे ही वृक्ष कहाता; किन्तु यह लक्षण लताके प्रति भी पाया जाता है, जिसको पहले लक्षाकर लक्षण नहीं कहा गया था। इसलिये यह लक्षणकी अतिव्याप्ति कही जाती है।
{{outdent|अतिव्यायाम (सं॰ पु॰) अपरिमित परिश्रम, अज़हद कसरत। अतिव्यायाम यानी हदसे ज्य़ादा कसरत पथ्य नहीं। इससे कास, ज्वर, छर्दि, श्रम, क्लम, तृष्णा, क्षय, प्रतमक, रक्तपित्त प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं।}}
{{outdent|अतिशक्करी (सं॰ स्त्री॰) अतिक्रान्ता शक्करीं तन्नामक वृतम्। पन्द्रह अक्षरका छन्दोविशेष।}}
{{outdent|अतिशक्त (सं॰ त्रि॰) अत्यन्तशक्तिशाली, निहायत क़वी।}}
{{outdent|अतिशक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयितो शक्तिः, प्रादि-स॰। १ अत्यन्त सामर्थ्य, हदसे ज्य़ादा ताक़त। (त्रि॰) अतिशयिता शक्तिर्बलं यस्य, बहुव्री॰। अत्यन्त बलवान्। निहायत ताक़तवर। अतिक्रान्तः शक्तिम् अतिक्रा॰-तत्। सामर्थ्यका अतिक्रमकरनेवाला। सामर्थ्यातिक्रम (अव्ययी॰)।}}
{{outdent|अतिशक्तिता (सं॰ स्त्री॰) अतिशक्ति-तल्-टाप्। विक्रम-शीलका धर्म्म, महाबलत्व, ज़ोरावरी।}}
{{outdent|अतिशक्तिभाज् (सं॰ पु॰) अतिशक्ति-भज्-ण्वि। अतिशय शक्तिविशिष्ट, क्षमतावान्। <small>(अंशभाज् देखो।)</small>}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिवृष्टिहत—अतिशक्तिभाज्'''|'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलकी कटोरीके भीतर वही नाम और एक जवाका फूल रख, एक ही गोतेमें उसे तालाबके पानीके भीतर गाड़ आता था। अज्ञ लोगोंको विश्वास था, कि यह प्रक्रिया करनेसे तीन दिनमें अवश्य वृष्टि बन्द हो जाती है। <small>अनावृष्टि देखो।</small>
{{outdent|अतिवृष्टिहत (सं॰ त्रि॰) मूषलधार वृष्टिसे मारा गया, गहरी बारिशसे चोट खाया हुआ।}}
{{outdent|अतिवेगित (सं॰ त्रि॰) अतिवेगः जातोऽस्य। जातातिवेग, बड़े वेगका।}}
{{outdent|अतिवेध (सं॰ पु॰) अत्यन्तो वेधः सम्पर्कः। एकादशीके साथ दशमीका सम्पर्क-विशेष।}}
{{outdent|अतिवेपथु (सं॰ त्रि॰) १ बहुत कांपता हुआ। (स्त्री॰) २ बड़ी कँपकपी, अज़हद लरज़िश।}}
{{outdent|अतिवेल (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तं वेलां मर्यादां कुलं वा। १ अधिक, असीम, मर्यादातिक्रान्त। (अव्ययी॰) २ वेलातिक्रम।}}
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{{outdent|अतिवैचक्षण्य (सं॰ क्ली॰) अधिक बुद्धिमत्ता, बड़ी होशियारी, अज़हद कमाल।)}}
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{{outdent|अतिव्यथन (सं॰ क्ली॰) अत्यन्तपीड़न, बड़ी भारी व्यथा।}}
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{{outdent|अतिव्यय (सं॰ त्रि॰) अतिशयितो व्ययः। अपरिमित व्यय, फ़िज़ूल-ख़चं। शास्त्रकार कहते हैं कि उपार्जित धनका आधा भाग खाने-पीने और नित्य-नैमित्तिक कामोंमें खर्च और चौथाईसे पुण्य सञ्चय करे। बाकी चौथाईसे मूलधन या पूंजी बढ़ाये। इस नियमसे अधिक जो व्यय किया जाता है, उसीको अतिव्यय कहते हैं।}}
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<small>'अलक्ष्ये लक्षणगमनमतिव्याप्तिः।'</small> लक्ष्य पदार्थमें पहुंचके अलक्ष्य पदार्थमें भी लक्षणके चले जानेको अतिव्याप्ति कहते हैं। इसका मतलब यह है—किसी एक वस्तुको लक्ष्यकर यदि उसके लक्षणादि निर्द्देश किये जायें, फिर वही लक्षण यदि उस वस्तुमें मिलें, जिसको पहले लक्ष्यकर वह लक्षण निर्द्दिष्ट नहीं हुए, तो ऐसी अवस्थामें अतिव्याप्ति कही जा सकती है। जैसे—<small>शाखापल्लवत्वं वृक्षत्वम्।</small> जिसमें डालियां और पत्तियां होती हैं, वही वृक्ष है। इस स्थानमें वृक्षको ही लक्ष्यकर यह लक्षण बताया गया, कि डालियों और पत्तियोंके होनसे ही वृक्ष कहाता; किन्तु यह लक्षण लताके प्रति भी पाया जाता है, जिसको पहले लक्षाकर लक्षण नहीं कहा गया था। इसलिये यह लक्षणकी अतिव्याप्ति कही जाती है।
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{{outdent|अतिवैसस् (सं॰ त्रि॰) अत्यन्त प्रतिकूल, निहायत बरखिलाफ़।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६६'''|'''अतिशक्र—अतिशयोक्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{outdent|अतिशक्र(सं॰ त्रि॰) इन्द्रसे बड़ा।}}
{{outdent|अतिशङ्का (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त भय, अज़हद, खौफ़।}}
{{outdent|अतिशय (सं॰ पु॰) अति-शीङ्-अच्। १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादती। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसी वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि॰) ३ बहुत ज्य़ादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम्। ४ हस्ताति-क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्तिं (अव्य॰)। ५ शक्त्यतिक्रम। भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्ठु, किमुत, सु, अतीव, अति, द्वार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त—यह पर्याय हैं।}}
{{outdent|अतिशयन (सं॰ क्ली॰) अति शीङ्-भावे ल्युट्। १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत। (त्रि॰) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतीका।}}
{{outdent|अतिशयोक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन उक्तिः निर्द्दशोऽस्मिन् वर्णने। १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय। २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार।}}
साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है—
<small>"सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।"</small> प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है।
अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा—
{{Block center|<poem><small>
"विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः।
अधःकरणमावेण निगीर्णत्वं प्रचक्षते॥"</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>प्रकृत विषय निर्द्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है।
अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय।
{{Block center|<poem><small>"भेदेऽप्यभेदः सम्बन्धेऽसम्बन्धस्तद्विपर्य्ययौ।
पौर्व्वापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः॥" (साहित्यद॰)</small></poem>}}
१। भेदमें अभेद—
{{Block center|<poem><small>"कथमुपरि कलापिनः कलापी विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम्।
कुवलययुगलं ततो विलोलं तिलकुसुमं तदधः प्रवालस्मात्॥"</small></poem>}}
{{Block center|<poem><small>मोर पूंछ ऊपर लसत नीचे आठें चन्द।
तापर चञ्चल युग कमल फूले आनंद कन्द॥</small></poem>}}
क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं।
इस जगह केशादिके साथ मोरकी पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है।
२। अभेदमें भेद—
{{Block center|<poem><small>"अन्धदेवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद।
तस्याः पद्मपलाशाक्ष्राः सर सत्वमलौकिकम्।"</small></poem>}}
उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है।
जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है।
{{Block center|<poem><small>राधामें जो रूप है, वैसी कहुंन दिखात।
सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात॥</small></poem>}}
३। सम्बन्धमें असम्बन्ध—<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है—
<small>"सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।"</small> प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है।
अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा—
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अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय।
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पौर्व्वापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः॥" (साहित्यद॰)</small></poem>}}
१। भेदमें अभेद—
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कुवलययुगलं ततो विलोलं तिलकुसुमं तदधः प्रवालस्मात्॥"</small></poem>}}
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तापर चञ्चल युग कमल फूले आनंद कन्द॥</small></poem>}}
क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं।
इस जगह केशादिके साथ मोरकी पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है।
२। अभेदमें भेद—
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तस्याः पद्मपलाशाक्ष्राः सर सत्वमलौकिकम्।"</small></poem>}}
उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है।
जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है।
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सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात॥</small></poem>}}
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वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{Block center|<poem><small>"अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रदः?
शङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनी मासो नु पुष्याकरः?
वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्यावृत्तकोतूहलो
निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः?"</poem></small>}}
सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्त्ता हैं, अथवा श्रृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दर्पने क्या इसे निर्म्माण किया है? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसे निवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं।
इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्म्माण कर्त्ता होते भी दूसरेके निर्म्माण कर्त्तृत्वकी कल्पना की गई है।
{{Block center|<poem><small>रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप।
विधिना बूढ़े ह्वै परे, ज्ञानकाण्डके कूप॥</poem></small>}}
४। असम्बन्धमें सम्बन्ध—
{{Block center|<poem><small>"यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरद्वयम्।
तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं॥"</poem></small>}}
यदि चन्द्रमण्डलमें दो नीलपद्म लगा दिये जायं, तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-द्वय-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है।
{{Block center|<poem><small>होत निशाकरमें कहूं, जो युग नील-सरोज।
नयन सुशोभित वदनकी, भाषत उपमा खोज॥</poem></small>}}
५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव। स्वाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमान रहता, पीछे कार्यकी उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगे कार्य निर्द्दिष्ट होता और पीछे उसका कारण उल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इस प्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं।
{{Block center|<poem><small>(१) "प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं।
::पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः॥"</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>पहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पीछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे।
वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयोंका मन चञ्चल होनेकी सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनकी व्याकुलतावाली बात कह, पीछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है।
{{Block center|<poem><small>(२) "सममेव समाक्रान्तं द्वयं द्विरदगामिना।
तेन सिंहासनं पित्रां मण्डलञ्च महीक्षिताम्॥"</poem></small>}}
हस्तीके तुल्य मन्दगामा उन रघुने पैतृक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था।
पहले सिंहासनपर अधिरूढ़ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ।
अतिशयोक्तिकी जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे उत्प्रेक्षालङ्कार होता है।
{{outdent|अतिशयोपमा (सं॰ स्त्री॰) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुकी उपमा दूसरी वस्तुके साथ न दी जा सके।}}
{{Block center|<poem><small>"सब उपमा कवि रहे जुठारी।
केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसी॰</poem></small>}}
{{outdent|अतिशर्वर (वै॰ क्ली॰) आधीरात, मध्यनिशा।}}
{{outdent|अतिशष्कुली (सं॰ स्त्री॰) तिलकी रोटी।}}
{{outdent|अतिशस्त (सं॰ त्रि॰) बहुत बढ़िया, निहायत उम्दा।}}
{{outdent|अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) हथियारोंसे बढ़िया।}}
{{outdent|अतिशाक्कर (सं॰ त्रि॰) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका।}}
{{outdent|अतिशायन (सं॰ पु॰) अति-शोङ्-भावे ल्युट्, निपातनाद्दीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत।}}
{{outdent|अतिशायिन् (सं॰ त्रि॰) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्य़ादा।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार, वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६८'''|'''अतिशारिवा—अतिसान्तपन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{outdent|अतिशारिवा (सं॰ स्त्री॰) अनन्ता, अनन्तमूल।}}
{{outdent|अतिशीत (सं॰ अव्य॰) १ जाड़ेसे बाहर, जाड़े के बाद। (पु॰) २ अधिक जाड़ा।}}
{{outdent|अतिशीलन (सं॰ पु॰) अभ्यास, महावरा, मश्क़, किसी कामका बार-बार विचार।}}
{{outdent|अतिशुक्र, अतिशुक्ल (सं॰ त्रि॰) बहुत उज्ज्वल, निहायत सफ़ेद।}}
{{outdent|अतिशूक (सं॰ पु॰) यव, बेझरा।}}
{{outdent|अतिशूकज (सं॰ पु॰) गोधूम, गेहूं।}}
{{outdent|अतिशूद्र (सं॰ पु॰) जिस शूद्रके हाथका पानी ब्राह्मण आदि न पीयें, अन्त्यज—कोरी, चमार, धोबी, मेहतर आदि।}}
{{outdent|अतिश्रृतक्षीर (सं॰ क्ली॰) मावा, खोया।}}
{{outdent|अतिशेष (सं॰ पु॰) अति-शिष-कर्म्मणि घञ्, अतिशिष्यते। स्वल्पावशिष्ट, जो बहुत थोड़ा बचा हो।}}
{{outdent|अतिशोभन (सं॰ त्रि॰) अति-शुभ-ल्युट। अत्यन्त शोभायुक्त, श्रेष्ठ, निहायत ख़ूबसूरत।}}
{{outdent|अतिशोष (सं॰ पु॰) क्षयरोग।}}
{{outdent|अतिश्री (सं॰ त्रि॰) बहुत सम्पन्न, निहायत आसूदा।}}
{{outdent|अतिश्रेयसी (सं॰ स्त्री॰) उत्तम स्त्रीयोंसे भी उत्तम कल्याण करनेवाली।}}
{{outdent|अतिश्रेष्ठ (सं॰ त्रि॰) सबसे बड़ा, निहायत अफ़ज़ल।}}
{{outdent|अतिश्रेष्ठत्व (सं॰ क्ली॰) बड़ी बड़ाई, अज़हद सबक़त।}}
{{outdent|अतिश्व (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तं श्वानं टच्। <small>अते श्रुनः। पा ५।४।९६।</small> कुत्तेको हरा देनेवाला; जैसे सूअर, भेड़िया आदि, वेगवान्, कुत्तेसे तेज़ दौड़नेवाला।}}
{{outdent|अतिश्वन् (सं॰ पु॰) अतिशयितः सुन्दरः श्वा। उत्तम कुत्ता।}}
{{outdent|अतिष्कद्वरी (सं॰ स्त्री॰) लुच्ची स्त्री, आवारा औरत।}}
{{outdent|अतिष्ठत् (सं॰ त्रि॰) न टिकनेवाला, नापायदार।}}
{{outdent|अतिष्ठा (सं॰ स्त्री॰) अति-स्था-क्विप्, सर्व्वानतीत्य तिष्ठतीति। सबसे अतीत, वह स्त्री जो सबसे बढ़ी चढ़ी हो।}}
{{outdent|अतिष्ठावत्, अतिष्ठावन् (सं॰ त्रि॰) टिकाऊ, पायदार।}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{outdent|अतिसंस्कृत (सं॰ त्रि॰) बहुत संस्कार किया गया, निहायत दुरुस्त किया हुआ।}}
{{outdent|अतिसक्ति (सं॰ त्रि॰) बड़ा प्रेम, अज़हद मुहब्बत।}}
{{outdent|अतिसक्तिमत् (सं॰ त्रि॰) बहुत लगा हुआ, निहायत मुश्ताक़।}}
{{outdent|अतिसङ्क्य (सं॰ पु॰) बड़ा ढेर, भारी ज़खीरा।}}
{{outdent|अतिसन्तप्त (सं॰ त्रि॰) बहुत दुःखी, निहायत अफ़सुर्दा।}}
{{outdent|अतिसन्ध (सं॰ पु॰) वचन या आदेशका अमान्य, शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन।}}
{{outdent|अतिसन्धान (सं॰ पु॰) अतिक्रान्तं सन्धानम्। सन्धान-वर्जित, वञ्चना, धोखा, फ़रेब, जाल।}}
{{outdent|अतिसन्धित (सं॰ त्रि॰) १ जिसका खूब फ़ैसला हो गया हो। २ ठगा गया।}}
{{outdent|अतिसन्धेय (सं॰ त्रि॰) प्रसन्न करने योग्य, फ़ैसला होने क़ाबिल।}}
{{outdent|अतिसन्ध्या (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन सन्ध्या, प्रादि-स॰। अतिशय सन्ध्याकाल, ठीक सन्ध्याका समय।}}
{{outdent|अतिसमर्थ (सं॰ त्रि॰) बहुत समर्थ, निहायत कामिल।}}
{{outdent|अतिसमीप (सं॰ त्रि॰) बहुत निकट, निहायत नज़दीक।}}
{{outdent|अतिसम्पर्क (सं॰ पु॰) बड़ा सहवास।}}
{{outdent|अतिसर (सं॰ त्रि॰) अति-सृ-अच्। स्वस्य गतिमतीत्य सरति गच्छति। अतिचारी, अग्रसर, अपनी चालसे बाहर चलनेवाला।}}
{{outdent|अतिसर्ग (सं॰ पु॰) अति-सृज-घञ्। १ दान, उत्सर्ग। (त्रि॰) २ सृष्टि-अतिक्रमकारी।}}
{{outdent|अतिसर्ज्जन (सं॰ पु॰) अति-सृ-ल्युट्। १ विसर्ज्जन २ दान। ३ त्याग। ४ नियोग, वध। ५ विप्रलम्भ। ६ अतिशय दान।}}
{{outdent|अतिसर्व्व (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तः सर्व्वान। सबसे अतीत, सबसे आगे निकला हुआ।}}
{{outdent|अतिसाध्वस् (सं॰ क्ली॰) बड़ा डर, भारौ ख़ौफ।}}
{{outdent|अतिसान्तपन (सं॰ क्ली॰) १ अतिक्रान्तः सान्तपनम्। अधिकदिनसाध्यत्वात्, अत्यादि-तत्। २ एक व्रत।}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार, वर्तनी सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसान्द्र—अतिसार'''|'''२६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>मनुसंहितामें लिखा है, कि जान-बूझकर जातिभ्रंशकर पाप करनेपर सान्तपन व्रत करे, किन्तु यदि यह पाप बिना जाने हो जाय, तो प्राजापत्य व्रत करना चाहिये। यथा—
{{Block center|<poem><small>"जातिभ्रं शकरं कर्म्म कृत्वान्यतममिच्छया।
चरेत् सान्तपनं कच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया॥" ११।१२५।</poem></small>}}
विष्णुसंहिताके मतसे, पहले दिन गोमूत्र, गोमय यानी गोबर, दूध, दही, घी और कुशोदक सेवन करे; दूसरे दिन उपवास करे। इसीको सान्तपन कहते हैं। यह व्रत तीन बार अभ्यस्त होनेसे ही अति-सान्तपन कहाता है।
{{Outdent|अतिसान्द्र (सं पु॰) राजमाष, लोबिया, चौंला।}}
{{Outdent|अतिसांवत्सर (सं॰ त्रि॰) एक वर्षके ऊपर, संवत्सरसे अधिक।}}
{{Outdent|अतिसामान्य (सं० पु०) १ वह उक्ति जो कहनेवाले के मतलबसे बाहर निकल जाती है। (त्रि.)२ निहायत मामूली, बहुत सौधा।}}
{{Outdent|अतिसाम्या (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्तं साम्यं अधुना अस्याः बहुव्री॰। १ मधुयष्टिलता, मौरठीकी बेल। (क्ली॰) प्रादि-स॰। २ अत्यन्त सादृश्य।}}
{{Outdent|अतिसायं (सं॰ अव्य॰) अतिशयितं सायं। अत्यन्त सायंकाल।}}
{{Outdent|अतिसार, अतीसार (सं॰ पु॰) रुधिरादिकं अतिशयेन सारयतीति, अति-सृ-घञ्। <small>सरति अतीव इत्यतिसारः।</small> जो रुधिर आदिको बहुत गिराये, रोग-विशेष, उदरामयरोग, वह बीमारी, जिसमें आँव और ख़ून गिरता है। अतिसार रोग साधारणतः दो प्रकारका होता है। श्लेष्मातिसार (diarrhoea) और दूसरा रक्तातिसार (dysentery)। इसके भिन्न-भिन्न कारण, लक्षण और चिकित्सादि इस तरह हैं,—}}
कुपथ्य या गुरुपाक द्रव्य अधिक खाकर, कितने ही लोग पचा नहीं सकते। विशेषतः जिन्हें शारीरिक परिश्रम नहीं करना पड़ता, आठों पहर केवल एक ही स्थानमें बैठके लिखने-पढ़नेकी चर्चा करनी होती है, या जो स्वभावसे ही आलसी हैं, थोड़ी दूर चलने में जिन्हें कष्ट होता, उनके लिये भारी चीज़ खाना मना है।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>इस बातका ठीक-ठीक कोई उत्तर नहीं, कि कुपथ्य और गुरुपाक द्रव्य अर्थात् भारी चीज़ें कौन-कौन हैं। क्यों कि, एक मनुष्यके लिये जो वस्तु कुपथ्य और गुरुपाक है तथा जिसे थोड़ीसी ही खानेपर उसके पीड़ा उत्पन्न हो जाती है, दूसरा वही वस्तु दशगुण खाके अच्छी तरह पचा जाता है। फिर जाड़े में जो चीज़ अनायास ही जीर्ण (हज़म) होती, गर्मी और बरसातमें उसके खानेसे पीड़ा होने लगती है। इसीसे तो, दैहिक स्वभाव, अभ्यास और जाड़े-गर्मीकी कमी-वेशी देख सुपथ्य और कुपथ्य विचारना पड़ता है। प्राय: लडडू, पूड़ी, जलेबी प्रभृति मिठाइयों और पुलाव प्रभृति जिन चीज़ों में घी और मसाला ज्य़ादा रहता है, उन्हें गुरुपाक कहते हैं। सिवा इसके, जिन चीज़ोमें बकला, रेशा और वीज अधिक रहता है, वही कुपथ्य होती हैं। प्याज और लहसुन भी सुपथ्य नहीं। किन्तु युरोपीय पण्डित इन दोनो चीज़ोको आग्नेय समझते हैं। भारतवर्ष में गर्मी बहुत पड़ती है, यहां प्याज और लहसुन सुपथ्य नहीं हो सकता। मनुसंहितामें लिखा है,—ऋषियोंने मनुके सन्तान भृगुसे पूछा, कि सत्ययुगमें जब मनुष्यकी आयु चार सौ वर्षकी लिखी है तब वेदपारग ब्राह्मणोंकी अकाल-मृत्यु क्यों होती है। भृगुने इसके उत्तरमें खाद्यदोष ही मृत्युका प्रधान कारण बताया। <small>अभक्षा देखो।</small> और प्याज तथा लहसुनको दूषित कहा। ऊपर लिखे हुए कुपथ्यके सिवा और भी अनेक अनिष्टकर द्रव्य प्रायः सकल ही खाया करते हैं। इसमें बाज़ारकी मिठाई प्रधान है। प्रायः हलवाईकी दुकानमें जो खानेकी चीज़ें मिलती हैं, वह विषके बराबर हैं। हलवाई सस्ते घोको क्रय करते हैं, जो कभी स्वास्थ्य के लिये लाभदायक नहीं होता। नारियलका तेल, बकरे और बैलकी चर्बी और अण्डीका तेल इस घीमें अधिक परिमाणसे मिला रहता; अधिक क्या बताया जाये, घीमें जो चीज़ खानेकी नहीं, वही पड़ती है। ऐसे ही घीमें मिठाई तय्यार की जाती है। इसके बाद<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
वर्तनी सुधार
668645
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७०'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>न बिकनेसे हलवाई बासी चीज़ नई चीज़में मिला देते हैं। इसीसे हलवाईवाली दुकानकी मिठाई विषके लड्डू सिवा और कुछ भी नहीं। इन सकल द्रव्योंको भोजन करनेसे उदरामय प्रभृति नाना प्रकारके रोग आ उपस्थित होते हैं। सड़ा मत्स्य-मांस अत्यन्त कुपथ्य होता, कभी-कभी मत्स्यके भीतर एक प्रकारका क्षुद्र कीड़ा भी निकल पड़ता है। ऐसा रुग्ण मत्स्य खानेसे लोगोंको उत्कट पीड़ा उत्पन्न हो जाती है।
क्या सुस्थ और क्या पीड़ितावस्था, दोनों ही में कभी अधिक भोजन न करे और भोजनके बाद अधिकक्षण न जागे। आहारान्तमें विश्राम लेना कत्तव्य है। विश्राम न लेनेसे प्रायः क्षुधामान्द्य और अजीर्णरोग आ उपस्थित होता है। आंतमें छोटा किंवा बड़ा कीड़ा रहनेसे भी अतिसार हो सकता है।
इसके सिवा दूसरी भी कई एक बातें अतिसार-की कारण गिनी जा सकती हैं। गन्दा पानी पानसे उदरामय रोग उत्पन्न होता है। वर्षाकालमें गांवोंके तालाब पानीसे भर जाते हैं। मुंहानेसे पानी पहुंचते समय, मल-मूत्र और अन्यान्य नाना प्रकारके द्रव्य तालाबमें दाख़िल होते और पासके तृणादि भी डूबते हैं। पीछे यह सकल द्रव्य सड़ा करते; इसीसे वर्षाकालका जल अपरिष्कृतावस्थामें पीने से ज्वर, उदरामय प्रभृति नाना प्रकारकी पीड़ायें उत्पन्न होती हैं। <small>जल देखो।</small>
शीत ग्रीष्मादिके समय असावधान रहनेसे उदरामय हो जाता है। ग्रीष्म और शरत्कालमें दिनको रौद्र-धूप लगने और रातको ठण्डी हवामें सोनेसे भी उदरामय उत्पन्न हो सकता है। हठात् धर्म्म-पसीना रोकनेसे अतिसार उत्पन्न होता है। दांत निकलते समय शिशुओंको उदरामय रोग बहुत सताता है। <small>इसका विवरण दन्तोद्गम शब्दमें देखी।</small>
आहारके दोषसे उदरामय निकलनेपर प्रायः रात्रिकालमें ही पीड़ा उपस्थित हुआ करती है। पहले निद्रा नहीं आती, किंवा आनेसे भी शीघ्र टूट जाती है। इसके बाद सारा पेट कड़ा हो कुछ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुछ फूलता है। पेड़ू में मरोर उठती ओर ऊपरी पेट भारी मालूम पड़ता है। ऐसी अवस्थामें कुछ क्षण रह रोगी वमन करनेका आरम्भ करता है। वमनके साथ भुक्त-द्रव्य, लार, पित्त और अम्लजल निकल पड़ता है। फिर पुनःपुनः मलत्याग करनेकी इच्छा चलती है। अवशेषमें श्लेष्मायुक्त मल निर्गत होता है। रुग्ण शरीर या दुर्बल व्यक्ति होनेसे इस सामान्य उपसर्गसे ही कठिन अतिसार रोग उत्पन्न हो सकता है। साथ ही हैज़े का प्रादुर्भाव होनेसे इस अवस्थामें कितनों ही को उसके पञ्जे में पड़ जाना पड़ता है।
<small>पित्तातिसार (Bilious diarrhoea)</small>—यह अतिसार उष्ण-प्रधान देशमें अलस व्यक्तिको ही अधिक लगता है। जो अतिरिक्त मद्यपान करते, किंवा अधिक मांस खाते हैं, हमारे देशमें उन सब लोगोंके इस प्रकारके उदरामय हो जानेकी अधिक सम्भावना है। इसका कारण यही है, कि मांस खानेसे रक्त में अधिक हाइड्रोजन और अङ्गार उत्पन्न होता है। शीतप्रधान देशमें फेफड़ेसे यह सकल बाष्प निकल जाते हैं। किन्तु उष्णप्रधान स्थानमें अलस व्यक्तियोंके फेफड़ेका काम कितना ही कम रहता है, इसौसे हाइड्रोजन और अङ्गार प्रश्वासके साथ यथेष्ट परिमाणमें निकल नहीं सकते। सुतरां इन दोनो बाष्पों द्वारा पित्तवृद्धि होती है। पित्त बढ़ते ही यकृत्में पैत्तिक रक्ताधिक्य उत्पन्न होता और अन्त्रमें भी अधिक परिमाणसे पित्त आ पहुंचता है। इस अवस्थामें कभी-कभी यकृत्के मध्यमें फोड़ा हो जाता है। अतएव सामान्य उदरामय होनेसे भी कभी निश्चिन्त न बैठे।
पित्तातिसारमें पुनः पुनः अल्प-अल्प पतला हरिद्रा-वर्ण मल निर्गत होता, पेट शूलकी तरह वेदना किया करता है। मल निर्गत होनेसे पहले पेटमें मरोर आती है। मलेरिया प्रधान देशमें ऐसे उदरामयके साथ उत्कट स्वल्पविराम ज्वर (Remittent fever) रोगीको धर दबाता है। इस अवस्थामें यह जाननेके लिये विज्ञ चिकित्सकोंका भी शिर चकरा जाता<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>कि पीड़ा उदरामय, किंवा ज्वर है। ख्यातनामा डाकर गुडिव इस बातको अपने मुंहसे स्वीकार करते हैं, कि ज्वरसंयुक्त रक्तातिसार और उदरामय रोगको ठोक प्रकृति समझने में वह कईबार हार बैठे थे।
प्रदाहजनित अतिसार-दो प्रकारका है,-तरुण और पुरातन । तरुण प्रदाहजनित अतिसार (Acute inflamatory diarrhoea) अतिशय उत्कट पौड़ा अन्त्रकी भिक झिल्ली में प्रदाह होनेके कारण यह पौड़ा उत्पन्न होती है। प्रथम सञ्चित मल निर्गत हो जाता, इसके बाद कभी चर्बी जैसा श्लेष्मा एवं गलित मांस-जैसा पदार्थ निकलता है। कभी हरे रंग और कभी कुछ कुछ लाल खूनको छीटें उसमें मिश्रित रहती पेटको वेदना दुःसह हो जाती ; बोध होता, मानो कोई कुरीसे आंत फाड़ता है। रोगी उदरमें हाथ लगाने नहीं देता, वह पैर गोदकी ओर ला पेटको पेशी बचा लेता है। इसके साथ ज्वर, आहारसे अनिच्छा, जिह्वामें मलिनभाव, पिपासा प्रभृति नाना प्रकारके उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं।असाध्यस्थलमें क्रमशः मलसे बहुत ही सड़ी बदबू निकलती, मलहार फैल जाता, किसीके मुखमें क्षत भी होता , इसके बाद नितान्त दुर्बल हो रोगी प्राणत्याग करता है।
पुरातन प्रदाहजनित अतिसार रोगमें रोगी कभी कभी अल्प परिमाणसे पुनः पुनः मलत्याग किया करता है। फिर कभी-कभी अधिक परिमाणसे बड़ी देरमें मल निकलता पहले मल पित्त मिश्रित रहता, क्रमसे खेतवर्ण और जलवत् हो जाता है। कभी-कभी फेनदार और कभी-कभी मल कृष्णवर्ण देख पड़ता है। कोई द्रव्य उदरस्थ होनेसे उसी समय मलत्यागका वेग बढ़ जाता है। परिशेषमें तीसरे पहर अल्प-अल्प ज्वर चढ़ता ; शरीर रूक्ष पड़ जाता, उदरमें वेदना उठती, पेशाब स्वल्प उतरता, नाड़ी क्षीण और वेगवतो चलती, अरुचिका प्रादुर्भाव होता और हस्तपदका अन्तभाग शीतल मालूम होने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
लगता है। परिणाममें शोथ आ उपस्थित होता है। यह सकल कठिन लक्षण देख पड़नेसे प्रायः सभी रोगी प्राण छोड़ देते हैं।
मेदातिसार ( Fatty diarrhoea)-ऐसे उदरामय रोगके लक्षण प्रायः तरुण प्रदाहजनित उदरामयके ही जैसे होते हैं। प्रथम उदरमें वेदना उठती, इसके बाद सञ्चित मल निर्गत हो जाता है। फिर चर्बी और तैल-जैसा पदार्थ निर्गत हुआ करता है। रोगीको एकबारगी हो तैलाक्त द्रव्य न खिलानेसे भो मलको अवस्था परिवर्तित नहीं होती। अनेकोंको ऐसा विश्वास है, किलोम और पेङ्गक्रियास (Penereas) को विकृतिक कारण यह सकल लक्षण उपस्थित हो जाते हैं।
दूसरा भी एक प्रकारका अतिसार है, जिसे प्रायः हम सञ्चितग्रहणी कहते हैं। सञ्चितग्रहणी होनेसे अनेक लोग स्वभावसे हो दुर्बल और उद्यमहीन हो जाते हैं। जिस काम में अधिक परिश्रम और अध्यवसाय आवश्यक है, उस कामको
वह कर नहीं सकते। अनेकोंको अल्प हो कारणसे भय और मनःकष्ट उपस्थित होता, और स्वभाव चिड़चिड़ा पड़ जाता है। इस प्रकार लक्षणादि रहते भी वह विषयकर्मका निर्वाह करते हैं। सञ्चितग्रहणी रोगमें सकल उदरामय नहीं होता। रोगी विशेष विवेचना-पूर्वक आहारादि करते हैं, मध्य-मध्यमें उदरामय श्रा धमकता है। इसके बाद कोई-कोई रोगी १०। १५ दिन और कोई-कोई दो-तीन मास कष्ट उठाके पुनर्वार आरोग्यको लाभ करते हैं। सञ्चितग्रहणीका लक्षण सर्वत्र समान नहीं। पौड़ाके समय कोई. कोई व्यक्ति कुछ न खानेसे अच्छे रहते, किन्तु सामान्य खाद्य द्रव्य उदरस्थ होते हो पेट दुखता और मलत्यागका वेग बढ़ता है। फिर किसी-किसी रोगीका लक्षण इससे बिलकुल विपरीत होता है। पेट खाली रहनेसे पुन: पुन: अल्प-अल्प मल निर्गत हुआ करता, जो किञ्चित आहार लेते ही रुक जाता है। इस रोगमें मलको अवस्था भी सकल समय एक रूपसे नहीं रहती। कभी आम-मिश्रित, कभी
समय
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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2026-07-22T14:18:19Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>कि पीड़ा उदरामय, किंवा ज्वर है। ख्यातनामा डाक्टर गुडिव इस बातको अपने मुंहसे स्वीकार करते हैं, कि ज्वरसंयुक्त रक्तातिसार और उदरामय रोगकी ठीक प्रकृति समझने में वह कईबार हार बैठे थे।
<small>प्रदाहजनित अतिसार</small>—दो प्रकारका है,—तरुण और पुरातन। तरुण प्रदाहजनित अतिसार (Acute inflamatory diarrhoea) अतिशय उत्कट पीड़ा है। अन्त्रकी श्लैष्मिक झिल्लीमें प्रदाह होनेके कारण यह पीड़ा उत्पन्न होती है। प्रथम सञ्चित मल निर्गत हो जाता, इसके बाद कभी चर्बी जैसा श्लेष्मा एवं गलित मांस-जैसा पदार्थ निकलता है। कभी हरे रंग और कभी कुछ-कुछ लाल ख़ूनकी छींटें उसमें मिश्रित रहती हैं। पेटकी वेदना दुःसह हो जाती; बोध होता, मानो कोई कुरीसे आंत फाड़ता है। रोगी उदरमें हाथ लगाने नहीं देता, वह पैर गोदकी ओर ला पेटकी पेशी बचा लेता है। इसके साथ ज्वर, आहारसे अनिच्छा, जिह्वामें मलिनभाव, पिपासा प्रभृति नाना प्रकारके उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं। असाध्यस्थलमें क्रमशः मलसे बहुत ही सड़ी बदबू निकलती, मलहार फैल जाता, किसीके मुखमें क्षत भी होता, इसके बाद नितान्त दुर्बल हो रोगी प्राणत्याग करता है।
पुरातन प्रदाहजनित अतिसार रोगमें रोगी कभी-कभी अल्प परिमाणसे पुनः पुनः मलत्याग किया करता है। फिर कभी-कभी अधिक परिमाणसे बड़ी देरमें मल निकलता। पहले मल पित्त-मिश्रित रहता, क्रमसे श्वेतवर्ण और जलवत् हो जाता है। कभी-कभी फेनदार और कभी-कभी मल कृष्णवर्ण देख पड़ता है। कोई द्रव्य उदरस्थ होनेसे उसी समय मलत्यागका वेग बढ़ जाता है। परिशेषमें तीसरे पहर अल्प-अल्प ज्वर चढ़ता; शरीर रूक्ष पड़ जाता, उदरमें वेदना उठती, पेशाब स्वल्प उतरता, नाड़ी क्षीण और वेगवती चलती, अरुचिका प्रादुर्भाव होता और हस्तपदका अन्तभाग शीतल मालूम होने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
लगता है। परिणाममें शोथ आ उपस्थित होता है। यह सकल कठिन लक्षण देख पड़नेसे प्रायः सभी रोगी प्राण छोड़ देते हैं।
<small>मेदातिसार ( Fatty diarrhoea)</small>—ऐसे उदरामय रोगके लक्षण प्रायः तरुण प्रदाहजनित उदरामयके ही जैसे होते हैं। प्रथम उदरमें वेदना उठती, इसके बाद सञ्चित मल निर्गत हो जाता है। फिर चर्बी और तैल-जैसा पदार्थ निर्गत हुआ करता है। रोगीको एकबारगी ही तैलाक्त द्रव्य न खिलानेसे भी मलकी अवस्था परिवर्त्तित नहीं होती। अनेकोंको ऐसा विश्वास है, कि क्लीम और पेङ्गक्रियास (Pencreas) की विकृतिके कारण यह सकल लक्षण उपस्थित हो जाते हैं।
दूसरा भी एक प्रकारका अतिसार है, जिसे प्रायः हम सञ्चितग्रहणी कहते हैं। सञ्चितग्रहणी होनेसे अनेक लोग स्वभावसे ही दुर्बल और उद्यमहीन हो जाते हैं। जिस काम में अधिक परिश्रम और अध्यवसाय आवश्यक है, उस कामको
वह कर नहीं सकते। अनेकोंको अल्प हो कारणसे भय और मनःकष्ट उपस्थित होता, और स्वभाव चिड़चिड़ा पड़ जाता है। इस प्रकार लक्षणादि रहते भी वह विषयकर्म्मका निर्वाह करते हैं। सञ्चितग्रहणी रोगमें सकल उदरामय नहीं होता। रोगी विशेष विवेचना-पूर्वक आहारादि करते हैं, मध्य-मध्यमें उदरामय आ धमकता है। इसके बाद कोई-कोई रोगी १०। १५ दिन और कोई-कोई दो-तीन मास कष्ट उठाके पुनर्वार आरोग्यको लाभ करते हैं। सञ्चितग्रहणीका लक्षण सर्वत्र समान नहीं। पीड़ाके समय कोई-कोई व्यक्ति कुछ न खानेसे अच्छे रहते, किन्तु सामान्य खाद्य द्रव्य उदरस्थ होते ही पेट दुखता और मलत्यागका वेग बढ़ता है। फिर किसी-किसी रोगीका लक्षण इससे बिलकुल विपरीत होता है। पेट ख़ाली रहनेसे पुनः-पुनः अल्प-अल्प मल निर्गत हुआ करता, जो किञ्चित आहार लेते ही रुक जाता है। इस रोगमें मलकी अवस्था भी सकल समय एक रूपसे नहीं रहती। कभी आम-मिश्रित, कभी<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७२'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अल्प रक्त-मिश्रित और कभी पित्त-संयुक्त जल-जैसा पतला मल निकलता है।
वैद्यक ग्रन्थोंके मतसे अतिसार छः प्रकारका होता है। इन छः श्रेणियोंके मध्यमें भी फिर प्रकार भेद विद्यमान है। प्रधानतः आमातिसार, रक्ताति सार, पित्तातिसार, श्लेष्मातिसार, वातातिसार और प्रवाहिका—यह छः प्रबल गिने गये हैं। इनके सिवा कृमि और शोकादि द्वारा आगन्तुक अतिसार भी उत्पन्न हो जाता है। हमारे वैद्यकशास्त्रमें अतिसार रोगका जो लक्षण, निदान, उत्पत्ति-कारण, भाविफल और औषधादि सम्बन्धीय विषय लिखा गया, वह सकल प्रकारकी चिकित्सासे श्रेष्ठ है।
अतिसार रोगके यह असाध्य लक्षण हैं,—शरीरका वर्ण सीसक-धातु जैसा काला पड़ जाना; मलका वर्ण कभी पक्के जामुनके रस-जैसा, कभी रक्त और आम-संयुक्त, कभी हरा और कभी घी, तेल और चर्बी-जैसा रहना; तृष्णा, दाह, अरुचि, पार्श्वशूल, मलद्वारमें क्षत, मूर्च्छा, प्रलाप, अज्ञानावस्थामें मलत्याग, क्षीण और द्रुत नाड़ी, शीतल हस्तपद, शोथ, अग्निमान्द्य और मांसहीनता। अग्निमान्द्य और देहकी मांसहीनता इतने दुरूह लक्षण हैं, कि अन्यान्य उपसर्ग न होते भी यह दोनो सङ्केत मिलते ही, रोगका ठीक फलाफल मालूम किया जा सकता है। इस बातको वैद्य, डाक्टर, हकीम सभी स्पष्ट स्वीकार करते हैं। हमारे चिकित्सा-शास्त्र में लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"अतिसारी राजरोगी ग्रहणीरीगवानपि।
मांसाग्निबलहीनो यो दुर्लभं तस्य जीवनम्॥"</poem></small>}}
<small>होमिओपेथी</small>—कुपथ्यको भोजन करनेके कारण उदरामय होनेसे पलसेटिला, एण्टिमनी क्रुड, इपिकाक और कुचलेका अर्क़ उत्तम औषध है। अपरिष्कृत जल पीने किंवा अस्वास्थ्यकर स्थानमें रहनेसे जो उदरामय होता, उसपर आर्सेनिकको प्रयोग करना चाहिये। ग्रीष्मकालवाले रौद्रके कारणसे अतिसार होनेपर कर्पूर, एकोनाइट, डलकामारा, चायना, फ़सफ़ोरिक एसिड प्रभृति औषधोंसे उपकार होता है। वृद्धवयसके उदरामयमें फ़सफ़ोरिक एसिड, एण्टिमनी<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>क्रुड एवं नाइट्रिक एसिड विशेष उपयोगी हैं। सञ्चित उदरामयके लिये आर्सेनिक, सलफ़र, चायना, फ़स-फ़ोरस, फ़ेरम प्रभृति औषधोंकी व्यवस्था करे।
<small>वैद्यक</small>—अतिसार रोगमें होमिओपथी और वैद्यककी चिकित्सा ही अधिक प्रशस्त है। ऐलोपेथीकी चिकित्सा उतनी अच्छी नहीं। फिर होमिओपेथी और वैद्यककी चिकित्साका फलाफल विवेचना-पूर्वक देखनेसे वैद्यक चिकित्साको अपेक्षाकृत श्रेष्ठ कहना पड़ता है। किन्तु चिकित्साके लिये सद्वैद्य और प्रक्कत औषध होना चाहिये। कठिन अतिसारकी चिकित्सा-करनेके लिये प्रथम आम और पक्कका लक्षण स्थिर करना आवश्यक है। आम और पक्कका लक्षण निश्चित न कर औषध देनेसे अनिष्ट हो सकता है। क्योंकि आमातिसारमें लङ्घन कराना एवं पक्कातिसारमें धारक औषध देना उचित है। इसलिये आमातिसारमें धारक औषध देने और पक्कातिसारमें लङ्घन करानेसे पीड़ा बढ़ सकती है।
इन दोनो प्रकारके अतिसारोंका लक्षण स्थिर करना नितान्त सहज है। वैद्यलोग कहते हैं,—आमातिसारकी विष्ठा जलमें डालनेसे डूब जाती; फिर पक्कातिसारका पुरीष जलपर तैरज रहता है। किन्तु यह नियम सकल स्थानमें काम नहीं आता। पक्कातिसारका पुरीष भी अधिक तरल, अत्यन्त संघात एवं शीतल और कफदूषित होनेसे जलमें डूब सकता है। कफातिसारमें श्लेष्माके गुरुत्वसे विष्ठा डूबती है।आमातिसारमें पेटके भीतर गड़-गड़ शब्द होता, एक-एक बार अल्प-अल्प मल निकलता और विष्ठासे अत्यन्त दुर्गन्ध आने लगता है।
आमातिसारमें प्रथम धारक औषध न दे। रोगी सबल और उदर मलसे परिपूर्ण होनेपर लङ्घन कराये और आध तोला हरीतकी—हरड़ तथा पाव तोला छोटी पीपल, दोनोंको पीसके गर्म जलके साथ पिलाये। एतद्वारा बद्ध मल और आम मल निकल जाता है। इसके बाद धान्यपञ्चक अथवा धान्यचतुष्ककी व्यवस्था करे।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>धनिया, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रबाला, सुखाये हुए बेलकी गिरी—यह समस्त मिलित औषध दो तोले आधसेर जलमें पकाये और आधपाव रह जानेपर उतार ले। पीछे तीन मासे शहद डालकर इस काढ़ेको सेवन करे। इसका नाम धान्यपञ्चक है। पैत्तिकातिसारमें सोंठको छोड़ बाक़ी चार ही चीज़ोंसे काढ़ा तय्यार करे। इसका नाम धान्यचतुष्क है। यह काढ़े पेटकी मरोड़ और वद्ध आमको नष्ट करते हैं।
अजवायन, लवङ्ग, नागरमोथा और पित्तपापड़ा एक-एक तोले ले आध सेर पानीमें अल्प सिद्ध करे। इस औषधका जल बीच-बीचमें पिलानेसे उदरकी वेदना और आम नष्ट होता है।
चिकित्साकी प्रथमावस्था में ही यह निश्चित करना कर्त्तव्य है, कि पेटमें कृमि हैं या नहीं। क्योंकि कृमि रहनेसे, पहले उनका प्रतीकार होना चाहिये। कृमि निर्गत न होनेपर अमृत भक्षणसे भी आरोग्य प्राप्त करनेकी सम्भावना नहीं। सर्व्वत्र कृमिके लक्षण स्पष्ट रूपसे प्रकाशित नहीं होते। किन्तु अनेक स्थलोंमें ही यह कई एक उपसर्ग प्रायः विद्यमान रहते हैं,—मलहारका सुरसुराना, मुखसे खारा पानी निकलना और दुर्गन्ध आना, नाक बहना, रातको सुनिद्रा न पड़ना, और सो जानेसे दांत पीसना। यह सकल लक्षण वर्त्तमान होनेसे अन्त्र में कृमि रहनेकी सम्भावना है। विड़ङ्ग, पलाश-पापड़ा, अनरसके पत्तेका रस और इन्द्रयव कृमियोंके उत्कृष्ट औषध हैं। इनमें कोई भी एक औषध सेवन करानेसे पेटके कृमि निर्गत हो सकते हैं।
रोगीके उदरका वद्धमल और दुष्टरस निर्गत होने तथा शरीर शुष्क और दुर्बल हो जानेसे अल्प-अल्प लघुपथ्य और धारक औषधकी व्यवस्था करे। ऐसी अवस्थामें नीचे लिखे चूर्णों से कोई एक चूर्ण खिलाया जा सकता है,—
<small>नागरादिचूर्ण</small>—सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धाय-फल, इन्द्रयवका बकला, इन्द्रयव, पाठा, बेलगिरी,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुटकी—यह समस्त द्रव्य बराबर-बराबर ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्णका अनुपान चावल-धुला और मधु है। इससे ग्रहणी, मलमें रक्तके विन्दु निकलना और पित्तदोष प्रभृति रोग नष्ट होते हैं।
<small>वृहदृगङ्गाधरचूर्ण</small>—बेलसोंठ, सिंघाड़े और अनारके पत्ते, अतीस, नागरमोथा, शालवृक्षका सफ़ेद बुरादा, धायके फूल, कालीमिर्च, पीपल, सोंठ, दारुहलदी, चिरायता, नीम, जामनका बकला, रसाञ्जन, इन्द्रयव, आकनादि, वराक्रान्ता, बाला, मोचरस, सिड्विपत्र, भृङ्गराज—यह सब चीजें बराबर-बराबर और सबके बराबर इन्द्रयवके मूलका बकला अच्छी तरह पीस कर चूर्ण बनाये। इसकी मात्रा एक माशे है। इसे बकरीके दूध, शहद या चावलवाले मांडके साथ खाना चाहिये। ग्रहणीके साथ ज्वर, मलका नाना प्रकार वर्ण, पाण्डुरोग प्रभृति होनेसे यह औषध बड़ा उपकार करता है।
<small>जीरकादिचूर्ण</small>—जीरा, फुलाया हुआ सुहागा, नागर-मोथा, आकनादि, बेलसोंठ, धनिया, बाला, पित्त-पापड़ा, अनारके फलका और इन्द्रयवके मूलका बकला, वराक्रान्ता, धायके फूल, त्रिकटु—सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, मोचरस, इन्द्रयव, अभ्र, गन्धक, पारद,—इन सब चीजोंका चूर्ण बराबर-बराबर और सबके बराबर जायफल ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्ण का अनुपान मधु है। इसे सेवन करनेसे उत्कट ग्रहणी रोग छूट जाता है।
नीचे इस रोगके दूसरे औषध भी लिखे जाते हैं—
<small>ग्रहणी-मिहिर-तैल</small>—चार सेर तिलके तेलको पहले विधिपूर्वक मूर्च्छित कर ले। <small>तैल मूर्च्छित करनेकी प्रक्रिया मूर्च्छा शब्दमें देखो।</small> फिर कल्कद्रव्य—धनिया, धायके फूल, लोधकाष्ठ, वराक्रान्ता, अतीस, हर, खसकी जड़, नागरमोथा, नेत्रबाला, मोचरस, रसोत (दारुहलदीका सत), बेलगिरी, नीलोत्पल, तेजपात, नागेश्वर, पद्मकेशर, गुर्च, इन्द्रयव, श्यामालता, पद्मकाष्ठ, कुटकी, तगरपादुका, जटामांसी, दालचीनी, कसेरू, पुनर्नवा तथा आम, जामुन, कदम्ब और इन्द्रयवका बकला, अजवायन,<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>धनिया, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रबाला, सुखाये हुए बेलकी गिरी—यह समस्त मिलित औषध दो तोले आधसेर जलमें पकाये और आधपाव रह जानेपर उतार ले। पीछे तीन मासे शहद डालकर इस काढ़ेको सेवन करे। इसका नाम धान्यपञ्चक है। पैत्तिकातिसारमें सोंठको छोड़ बाक़ी चार ही चीज़ोंसे काढ़ा तय्यार करे। इसका नाम धान्यचतुष्क है। यह काढ़े पेटकी मरोड़ और वद्ध आमको नष्ट करते हैं।
अजवायन, लवङ्ग, नागरमोथा और पित्तपापड़ा एक-एक तोले ले आध सेर पानीमें अल्प सिद्ध करे। इस औषधका जल बीच-बीचमें पिलानेसे उदरकी वेदना और आम नष्ट होता है।
चिकित्साकी प्रथमावस्था में ही यह निश्चित करना कर्त्तव्य है, कि पेटमें कृमि हैं या नहीं। क्योंकि कृमि रहनेसे, पहले उनका प्रतीकार होना चाहिये। कृमि निर्गत न होनेपर अमृत भक्षणसे भी आरोग्य प्राप्त करनेकी सम्भावना नहीं। सर्व्वत्र कृमिके लक्षण स्पष्ट रूपसे प्रकाशित नहीं होते। किन्तु अनेक स्थलोंमें ही यह कई एक उपसर्ग प्रायः विद्यमान रहते हैं,—मलहारका सुरसुराना, मुखसे खारा पानी निकलना और दुर्गन्ध आना, नाक बहना, रातको सुनिद्रा न पड़ना, और सो जानेसे दांत पीसना। यह सकल लक्षण वर्त्तमान होनेसे अन्त्र में कृमि रहनेकी सम्भावना है। विड़ङ्ग, पलाश-पापड़ा, अनरसके पत्तेका रस और इन्द्रयव कृमियोंके उत्कृष्ट औषध हैं। इनमें कोई भी एक औषध सेवन करानेसे पेटके कृमि निर्गत हो सकते हैं।
रोगीके उदरका वद्धमल और दुष्टरस निर्गत होने तथा शरीर शुष्क और दुर्बल हो जानेसे अल्प-अल्प लघुपथ्य और धारक औषधकी व्यवस्था करे। ऐसी अवस्थामें नीचे लिखे चूर्णों से कोई एक चूर्ण खिलाया जा सकता है,—
<small>नागरादिचूर्ण</small>—सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धाय-फल, इन्द्रयवका बकला, इन्द्रयव, पाठा, बेलगिरी,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुटकी—यह समस्त द्रव्य बराबर-बराबर ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्णका अनुपान चावल-धुला और मधु है। इससे ग्रहणी, मलमें रक्तके विन्दु निकलना और पित्तदोष प्रभृति रोग नष्ट होते हैं।
<small>वृहदृगङ्गाधरचूर्ण</small>—बेलसोंठ, सिंघाड़े और अनारके पत्ते, अतीस, नागरमोथा, शालवृक्षका सफ़ेद बुरादा, धायके फूल, कालीमिर्च, पीपल, सोंठ, दारुहलदी, चिरायता, नीम, जामनका बकला, रसाञ्जन, इन्द्रयव, आकनादि, वराक्रान्ता, बाला, मोचरस, सिड्विपत्र, भृङ्गराज—यह सब चीजें बराबर-बराबर और सबके बराबर इन्द्रयवके मूलका बकला अच्छी तरह पीस कर चूर्ण बनाये। इसकी मात्रा एक माशे है। इसे बकरीके दूध, शहद या चावलवाले मांडके साथ खाना चाहिये। ग्रहणीके साथ ज्वर, मलका नाना प्रकार वर्ण, पाण्डुरोग प्रभृति होनेसे यह औषध बड़ा उपकार करता है।
<small>जीरकादिचूर्ण</small>—जीरा, फुलाया हुआ सुहागा, नागर-मोथा, आकनादि, बेलसोंठ, धनिया, बाला, पित्त-पापड़ा, अनारके फलका और इन्द्रयवके मूलका बकला, वराक्रान्ता, धायके फूल, त्रिकटु—सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, मोचरस, इन्द्रयव, अभ्र, गन्धक, पारद,—इन सब चीजोंका चूर्ण बराबर-बराबर और सबके बराबर जायफल ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्ण का अनुपान मधु है। इसे सेवन करनेसे उत्कट ग्रहणी रोग छूट जाता है।
नीचे इस रोगके दूसरे औषध भी लिखे जाते हैं—
<small>ग्रहणी-मिहिर-तैल</small>—चार सेर तिलके तेलको पहले विधिपूर्वक मूर्च्छित कर ले। <small>तैल मूर्च्छित करनेकी प्रक्रिया मूर्च्छा शब्दमें देखो।</small> फिर कल्कद्रव्य—धनिया, धायके फूल, लोधकाष्ठ, वराक्रान्ता, अतीस, हर, खसकी जड़, नागरमोथा, नेत्रबाला, मोचरस, रसोत (दारुहलदीका सत), बेलगिरी, नीलोत्पल, तेजपात, नागेश्वर, पद्मकेशर, गुर्च, इन्द्रयव, श्यामालता, पद्मकाष्ठ, कुटकी, तगरपादुका, जटामांसी, दालचीनी, कसेरू, पुनर्नवा तथा आम, जामुन, कदम्ब और इन्द्रयवका बकला, अजवायन,<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|६९|4em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७४'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>और जीरा, प्रत्येक दो-दो तोले ले। काढ़ेके लिये १२ सेर इन्द्रयवका बकला ६४ सेर पानी में उबाले और १६ सेर पानी बाक़ी रहनेसे नीचे उतार ले। पहले मूर्च्छित तैलमें इन्द्रयवका क्वाथ डाल दे। सात दिन बाद फिर उसमें दहीका मठा छोड़े। एक सप्ताह बाद आठ सेर पानीके साथ उपरि उक्त कल्कद्रव्य सिद्ध करे; निर्जल हो जानेसे नीचे उतार ले। यह सिद्ध किया हुआ तैल आठ दिन तक कल्क समेत किसी पात्रमें धरा रहने दे पीछे इसे कपड़ेसे छानके बोतल में भर रखे। यह तैल अनेक प्रकारसे प्रस्तुत करते हैं। इसे सर्व्वाङ्गमें मर्दन करनेसे कठिन ग्रहणीमें भी विलक्षण उपकार हो जाता है।
<small>प्राणेश्वररस</small>—गन्धक, अभ्र, और पारद प्रत्येक चार-चार माशे ले। सज्जीखार, फुलाया हुआ सुहागा, शोरा, पञ्चलवण, त्रिफला, त्रिकट, इन्द्रयव, जीरा, स्याहजीरा, चितामूल, यमानी, हींग, बायबिड़ङ्ग और पित्तपापड़ा प्रत्येक एक-एक माशे डाले। फिर इन सब चीज़ोंको एकमें पीस माशे-माशेकी वटी बनाये। इस रसका अनुपान मधु और पानका रस है। औषध सेवनके पीछे उष्ण जलको पान कर। अत्यन्त कठिन ज्वरातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी प्रभृति उपसर्गों में यह विलक्षण फलप्रद होता है।
<small>कामेश्वरमोदक</small>—अभ्र, कायफल, कूट, असगंध, गुर्च, मेथी, मोचरस, भूमिकुष्माण्ड, कालीमुसली, गोखरू, कुलखाड़े के वीज, केलेकी जड़, शतावर, यमानी, उड़द, तिल, धनिया, कचर, गन्धमात्रा, मैनफल, जायफल, सैन्धव, ब्राह्मणयष्टिका, काकड़ासींगी, त्रिकटु, जीरा, स्याहजीरा, चीतामूल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागेश्वर, पुनर्नवा, गजपीपल, दाख, सेमरका मुसला, नेत्रबाला, कोंचके वीज—यह सब द्रव्य प्रत्येक एक-एक तोले संग्रह करे और सूक्ष्म पीस तथा छानके रख ले। पीछे उक्त सब औषध-द्रव्योंसे द्विगुण चीनी की चाशनी बनाये। जब लडडू बनाने योग्य दो-तीन तारकी चाशनी बन जाये, तब पिसे हुए सब औषधोंका चूर्ण डालके मिला दे और चूल्हे से नीचे उतार ले।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>चाशनी अतीव शीतल होनेसे घी तथा शहद भी मिलाये और लड्डू बांधे। यह मोदक ग्रहणी रोगमें बड़ा उपकार करता है।
जीरकादि-मोदक, मेथीमोदक, अग्निकुमार-मोदक, अग्निकुमाररस, ग्रहणीकपाटरस, ग्रहणी-गजेन्द्रवटिका, वैद्यनाथवटिका, कनकप्रभावटी प्रभृति औषध अतिसारादि रोगों में विलक्षण फल दिखाते हैं।
<small>एलोपेथी-चिकित्सा</small>—गुरुतर आहारके बाद उदरामय उपस्थित होनेसे १५ किंवा २० ग्रेन इपिकाक चूर्ण ईषत् उष्ण जलके साथ सेवन करानेसे ही पीड़ा शान्त हो सकती है। किन्तु दुर्बल व्यक्तिको वमन कराना उचित नहीं। वमनके बाद पेटमें सञ्चितमल रहनेपर मृदु-विरेचक औषधका प्रयोग करनेसे अच्छा फल होता है। अण्डीका तेल सवा तोले और अफीमका अरिष्ट सात बूंद थोड़ेसे अदरकके रस में अच्छी तरह मिलाकर सेवन करानेसे उदरवेदना, आंतका भारीपन प्रभृति कष्ट दूर हो जाते हैं। किन्तु निकटमें हैजा फूटने किंवा रोगी दुर्बल होनेसे विरेचक औषधकी व्यवस्था करना ठीक नहीं।
अन्त्र-परिष्कार होनेसे निम्नलिखित औषधकी व्यवस्था करे—रेवाचीनीका अर्क़ १० बूंद, सोडा बाईकार्ब २० ग्रेन और पीपरमेण्टका जल आध छटांक एकमें मिला ३/४ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। उदरमें अत्यन्त वेदना होनेसे उक्त औषधकी प्रत्येक मात्राके साथ ४ बूंद अफीमका अरिष्ट मिला दे। शिशुओंके पक्षमें अफीम निषिद्ध है। पेटके अधिक दुखनेपर तारपीन-तेलके साथ गर्म पानीसे सेंके। पुनः-पुनः जलवत् अधिक मल निर्गत होनेसे धारक औषध देना योग्य है।
खदिरका अरिष्ट २० बूंद, काईनोका अरिष्ट ३० बूंद, सुगन्ध खड़ियेका चूर्ण १० रत्ती, गंदेका मांड़ सवा तोले और पीपरमेण्टका जल सवा तोले—इन सब द्रव्योंको एकत्र मिश्रितकर इसी तरह एक-एक मात्रा औषध ६ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। सन्धमाके बाद ७ बूंद अफीमका अरिष्ट खानेसे धारक होता और सुनिद्रा भी आ सकती है। रोगी दुर्बल होनेसे अल्प मात्रामें<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है।
हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है।
अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है।
<small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small>
रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है।
हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है।
हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है।
अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है।
<small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small>
रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है।
हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७६'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>उदरके भीतर मरोड़ उठा करती और मध्य-मध्यमें सारा पेट दुखने लगता है। मलहारमें अल्प ज्वाला और वेग मालूम पड़ता है। रोगी मलत्याग करने दौड़ता, किन्तु अधिक मल नहीं निकलता। पेटकी वेदना और उसका वेग विचारकर देखनेसे जाना जाता है, कि बहुत मल निकलेगा। किन्तु वास्तविक अनेक स्थलमें कुछ भी मल निःसरण नहीं होता। अनेकक्षण वेगके बाद किञ्चित आम और रक्त निकल आता है। उस समय रोगी अपनेको कुछ सुस्थ समझता है। किन्तु क्षणकालके मध्यमें ही फिर वेग बढ़ता और पेटमें वेदना होने लगती है। कहीं तो, विरेचनके साथ प्रथम-प्रथम मल मिश्रित रहता है। इसके बाद कभी अल्प मल निकलता; कभी मलका सम्पर्कमात्र भी नहीं रहता; केवल श्लेष्मा और रक्त निर्गत होता है। कहीं-कहीं मारी गई बकरीकासा ताज़ा खून निकल पड़ता है। प्रबल पीड़ामें सर्व्वाङ्ग उष्ण, नाड़ी वेगवती, मुखमण्डल मलिन और अत्यन्त ग्लानियुक्त हो जाता है। सरलान्त्रमें अत्यन्त प्रदाह होनेसे रोगी पेशाब नहीं कर सकता, कितने ही कष्टसे केवल दो-एक विन्दु मूत्र उतरता है। इस अवस्थामें रोग शान्त न होनेसे क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरकी वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फीत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धीरे-धीरे नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्व्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गोंके बाद रोगीकी मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका कुछ भी वैलक्षण्य देख नहीं पड़ता। ऐसा भी देखा गया है, कि समस्त इन्द्रियोंके अवश होने और शरीरमें केवल जीवात्माके रह जानेपर भी रोगी ज्ञानसे बात करता रहता, वाक्यमें कुछ भी जड़ता नहीं आती। इसीसे प्रवाद
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>है, कि इष्टदेवताका नाम लेते-लेते सज्ञानमें मृत्यु होनेके लिये पूर्व्वकालके ऋषियोंने अतिसार रोगको ईश्वरसे कामना कर लिया था।
इस समय एक विशेष सतर्कता आवश्यक है। रक्तामाशयको सामान्य व्याधि बता हमारे देशके कितने ही लोग पहले निश्चिन्त रहते हैं। पीड़ा उत्कट न हो जानेसे झाड़-फूंकपर ही प्रायः अनेक लोग भरोसा रखते हैं। कितनीं हीको विश्वास है, कि हिन्दुस्थानमें अनेक प्रकार अवधूत मतके टोटके तथा झाड़-फूँकवाले औषधोंसे नाना प्रकार कठिन रोगोंका निवारण होता है। किन्तु इसपर भी, अज्ञ लोगोंके हाथमें प्राणसमर्पण करना कर्त्तव्य नहीं। विशेषतः रक्तामाशय उपस्थित होनेसे यक्वत्की कोई न कोई पीड़ा उठ खड़े होनेकी सम्भावना रहती है। इसलिये पहलेसे ही सुचिकित्सकके हाथमें चिकित्साका भार अर्पण करना चाहिये।
<small>अवधूत और जड़ी-बूँटीकी चिकित्सा</small>—सामान्य प्रकारका रक्तातिसार कितने ही सहज उपायोंसे निवारण होता है। सूरतके पत्ते थूकके साथ दोनो हाथोंके नीचे मर्दन करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीज़ें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटको चपेटकर पकड़ सकता है; इसीसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जीरा ६॥, सोंठ ३।, जायफल १॥ और कनशरकी जड़ २॥ रत्ती कूट-पीसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२९४'''|'''अत्रिगुण—अत्रिसंहिता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>सप्तर्षि मघानक्षत्र में चार वत्सर अवस्थान करते हैं। ऐसा होनेसे सप्तर्षियोंका अवस्थान-काल कोई ५००० वत्सर पूर्व होता है। इसलिये उसी समयमें अत्रि-ऋषिका आविर्भाव काल सम्भव जान पड़ता है। <small>सप्तर्षि देखी।</small>
{{outdent|अत्रिगुण (सं॰ त्रि॰) १ जो त्रिगुणसे सम्बन्ध न रखे; सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंसे अलग। (क्ली॰) २ त्रिगुण-भिन्न अन्य वस्तु, तीन गुणोंको छोड़ कोई दूसरी चीज़।}}
{{outdent|अत्रिचतुरह (सं॰ पु॰) यज्ञविशेष, एक प्रकारका याग।}}
{{outdent|अत्रिज (सं॰ पु॰) अत्रिसे उत्पन्न, अत्रिके लड़के चन्द्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा।}}
{{outdent|अत्रिजात (सं॰ पु॰) अत्रेर्नेत्रात् जातः, जन-क्त, ५ तत्। चन्द्र, चांद। चन्द्र महर्षि अत्रिके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे।}}
{{outdent|अत्रिदृग्ज (सं॰ पु॰) अत्रेर्दृशो नेत्रात् जायते, जन-ड। चन्द्र, चांद।}}
{{outdent|अत्रिन् (सं॰ पु॰) १ भक्षक, खानेवाला। २ भूत, साया। ३ राक्षस, आदमखोर।}}
{{outdent|अत्रिनेत्रज}}
{{outdent|अत्रिनेत्रप्रभव}}
{{outdent|अत्रिनेत्रप्रसूत}}
{{outdent|अत्रिनेत्रभू}}
<small>अत्रिदृग्ज देखो।</small>
{{outdent|अत्रिप्रिया (सं॰ स्त्री॰) अत्रिकी स्त्री और कर्दम मुनिकी कन्या अनुसूया।}}
{{outdent|अत्रिभारद्वाजिका (सं॰ स्त्री॰) अत्रिभारद्वाज-वुन्; अत्रिभारद्वाजवंशयोः मैथुनम्। <small>द्वन्द्वाद्वुन वैरमेथुनिकयो। पा ४।३।१२५।</small> अत्रि और भरद्वाज वंशजात स्त्रीपुरुषोंका मिलन, अत्रिभारद्वाजी विवाह; अत्रि और भारद्वाज ख़ान्दानकी शादी।}}
{{outdent|अत्रिसंहिता (सं॰ स्त्री॰) अत्रिणा प्रणीता संहिता स्मृतिः। अत्रि ऋषि-प्रणीत संहिताविशेष, अत्रि ऋषिकी बनाई संहिता। इसमें प्रधान ज्ञातव्य विषय यह बताये गये हैं,—चार वर्णों की कर्मवृत्ति, राजधर्म, शोधन और स्नानविधि, शौचादि लक्षण, इष्टापूर्त्तवर्णन,}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>यमनियमादि, प्रायश्चित्तविधि, अशौचनिर्णय, चान्द्रायणादि विधि, वज्रव्रतविधि, षड्भिक्षुकनिर्णय, महापातकादिनिरूपण, नारीशुद्धि, आकरशुद्धि, प्राणायाम-लक्षण, दानविधि, श्राद्धीयब्राह्मण-निरूपण, श्राद्धफल इत्यादि।
इस संहितामें शङ्ख, आपस्तम्ब, शातातप, यम और मनुसंहिताका उल्लेख पाया जाता है। क्या यह समस्त धर्म्मशास्त्र रचित होनेके बाद अत्रिसंहिता बनी थी? इसको हम ठीक तौरसे कह नहीं सकते। कारण, मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ गृह्यसूत्रमें भी आत्रेय संहिताका नाम विद्यमान है। मनुने भी एक जगह कहा है,—'अत्रि और उतथ्यपुत्रके मतसे जो व्यक्ति शूद्रासे विवाह करता, वह अपने इस कार्य द्वारा पतित हो जाता है।' <small>मनु ३।१६।</small>
याज्ञवल्कासंहिता और अग्निपुराणमें भी अत्रि धर्मशास्त्रकर्ता बताये गये हैं,—
{{Block center|<poem><small>"मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽत्रिर्यमोऽङ्गिराः।" अग्निपु॰ १६२।१।</poem></small>}}
फिर आजकल जो अत्रिसंहिता मिलती, वह क्या उक्त मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन है? कभी नहीं। इसका कोई-कोई अंश उनकी अपेक्षा प्राचीन हो सकता है।
प्रथमतः मनुके वचनसे अत्रिका जो मत मिलता, वह उसमें प्रकाशित नहीं, जिसे हम अत्रिसंहिता कहते हैं।
द्वितीयतः इस अत्रिसंहितामें मन्वादिका मत उद्धृत हुआ है और कितनी ही अप्राचीन कथायें भी देख पड़ती हैं,—
{{Block center|<poem><small>"वेदैर्विहीनाश्च पठन्ति शास्त्रं शास्त्रेण हीनाश्च पुराणपाठाः।
पुराणहीनाः कृषिणोभवन्ति भष्टास्ततो भागवता भवन्ति॥"</poem></small>}}
इस श्लोकमें पुराणों के नाम रहनेसे यही प्रमाणित होता, कि अत्रिसंहिता पुराणों के बाद बनी थी। सिवा इसके इस संहितामें 'म्लेच्छोंके' नाम भी खूब लिखे हैं।
इस संहिताके कितने ही स्थलोंमें आया है,—<small>"भगवानत्रिरब्रवीत्" अर्थात् भगवान् अत्रिने कहा था। यदि महर्षि अत्रि इसके प्रणेता होते, तो कभी ऐसा न<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अत्रिस्थान—अथर्य'''|'''२९५'''}}</noinclude>
लिखते। अतएव इसमें कोई सन्देह नहीं, कि आज कलकी अत्रिसंहिता किसी दूसरे व्यक्तिकी बनाई है। इसमें अत्रिका मत अधिक परिमाणसे सन्निवेशित है। <small>स्मृति देखो।</small>
{{outdent|अत्रिस्थान—श्वेतगिरिस्थ जनपद-विशेष। यहां के लोग अत्रिदेवकी पूजा करते थे।}}
{{outdent|अत्रिस्मृति—<small>अविसंहिता देखो।</small>}}
{{outdent|अत्रेय—<small>आवेय देखो।</small>}}
{{outdent|अत्रै गुण्य (सं॰ ली॰) सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंका विनाश। सांख्यवादी इस स्थितिको मोक्ष कहते हैं।}}
{{outdent|अत्रैव (सं॰ अव्य॰) इसी स्थानमें, इसी जगह।}}
{{outdent|अत्वच् (सं॰ त्रि॰) चर्म्मरहित, जिसमें चमड़ा न हो।}}
{{outdent|अत्वरा (सं॰ स्त्री॰) शीघ्रताकी अनुपस्थिति, धैर्य; इस्तक़लाल।}}
{{outdent|अत्सरुक (सं॰ पु॰) नास्ति त्सरुरिव मुष्टिवन्धन स्थानं यस्य। खड्ग़ जैसा, जिसमें मुठिया न हो यज्ञीय पात्रविशेष,—चम्मच, हाथा आदि।}}
{{outdent|अथ, अथो (स॰ अव्य॰) अर्थ चु॰ अदन्त-ड पृषोदरादित्वात् रलोपः। १ इस समय, अब, उस समय। २ सिवा, अलावा; अतिरिक्त, भिन्न। ४ किञ्चित्-किञ्चित्, कुछ-कुछ। ५ निःसन्देह, बेशक। ६ किन्तु, परन्तु; लेकिन, मगर। ७ वरं, वरना; नहीं तो। ८ क्या। ९ किसतरह। १० या। ११ पूरे तौरसे। १२ फिर। इस शब्दसे अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कार्त्स्य, अधिकार, संशय, पक्षान्तर, विकल्प, समुच्चय और मङ्गलादि अर्थ निकलते हैं।}}
{{Block center|<poem><small>"मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कार्त्स्येष्वथो अथ।"</poem></small>}}
<small>अनन्तर—विवक्षुमाणेनाहृतः पार्थेनाथ हिषम्मु रम्।</small> अर्थात् इसके बाद (इन्ट्रका संवाद सुनकर) यज्ञाभिलाषी युधिष्ठिर कर्त्तृक निमन्त्रित मुरारि इत्यादि। <small>स्नानं कृत्वाऽथ भुञ्चोत।</small> अर्थात् स्नान करनेके अनन्तर भोजन करे।
<small>आरम्भ—अथ लिङ्गानुशासनं लिख्यते।</small> अर्थात् लिङ्गानुशासन लिखना अब आरम्भ किया जाता है।
<small>प्रश्न—अथ किमिदं तावत्</small>—यह सब फिर क्या है? <small>अथ वक्तं समर्थोऽसि?</small> क्या तुम बोल सकते हो?<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>कार्त्सा—अथ धातून् बूमः?</small> अर्थात् समस्त धातुओंका विषय कहते हैं?
<small>अधिकार</small>—किसी विषयके पहले <small>अथ सन्धिः, अथ समासः</small> इत्यादि लिखा रहनेसे उसका अधिकार अर्थात् उत्तरोत्तर सम्बन्ध समझा जायेगा। जैसे—<small>अथ सन्धिः</small> अर्थात् सन्धिका अधिकार करके यह प्रबन्ध लिखा जाता है।
<small>संशय—शब्दो नित्यः अथानित्यः?</small> अर्थात् शब्द नित्य है या अनित्य?
<small>पक्षान्तर—अय चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।</small> फिर यदि तुम यह धर्म्मयुद्ध न करोगे।
<small>समुच्चय—भौमोऽथार्जुनः।</small> भीम और अर्जुन।
<small>मङ्गल—अवातो ब्रह्मजिज्ञासा।</small> अर्थात् मङ्गलाचरणपूर्वक ब्रह्मके जाननकी इच्छा।
{{outdent|अथऊ (हिं॰ पु॰) सन्ध्यासे पहले होनेवाल भोजन, जो खाना शाम होनेसे पहले खाया जाये।}}
{{outdent|अथक (हिं॰ वि॰) न थकनेवाला, परिश्रमी।}}
{{outdent|अथकिं (सं॰ अव्य॰) १ हां, यही तो, ठीक है, ख़ूब समझे। २ फिर कैसे। ३ और क्या।}}
{{outdent|अथकिमु (सं॰ अव्य॰) १ कितनी अधिकतासे २ इतने परिमाणसे।}}
{{outdent|अथच (सं॰ अव्य॰) और भी, फिर, इसतरह।}}
{{outdent|अथतु (सं॰ अव्य॰) किन्तु, मगर; विपक्षमें।}}
{{outdent|अथमना (हिं॰ क्रि॰) न थमना, न ठहरना।}}
{{Right|<small>अस्तमन देखो।</small>}}
{{outdent|अथरा (हिं॰ पु॰) रंगरेज़ोंके कपड़ा रंगने, सुनारोके मानिक रेतने, जुलाहोंके सूत भिगोने और तानेमें लेई लगानका बरतन।}}
{{outdent|अथरि, अथरी (वै॰ स्त्री॰) १ नोकदार अङ्गार या अग्निशिखा। २ भालेकी नोक। ३ अङ्गुलि, उंगली। ४ हस्ती, हाथी। इस शब्दका प्रयोग केवल ऋग्वेदमें देख पड़ता और इसका अर्थ सन्दिग्ध है। (हिं॰ स्त्री॰) ५ हलका अथरा। ६ हांडी या घड़ा थापीसे पीटनेको कुंभारका बरतन। ७ दही जमानेका कूंडा।}}
{{outdent|अथर्य (वै॰ पु॰) १ लगातार चला जानेवाला}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अत्रिस्थान—अथर्य'''|'''२९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>लिखते। अतएव इसमें कोई सन्देह नहीं, कि आज कलकी अत्रिसंहिता किसी दूसरे व्यक्तिकी बनाई है। इसमें अत्रिका मत अधिक परिमाणसे सन्निवेशित है। <small>स्मृति देखो।</small>
{{outdent|अत्रिस्थान—श्वेतगिरिस्थ जनपद-विशेष। यहां के लोग अत्रिदेवकी पूजा करते थे।}}
{{outdent|अत्रिस्मृति—<small>अविसंहिता देखो।</small>}}
{{outdent|अत्रेय—<small>आवेय देखो।</small>}}
{{outdent|अत्रै गुण्य (सं॰ ली॰) सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंका विनाश। सांख्यवादी इस स्थितिको मोक्ष कहते हैं।}}
{{outdent|अत्रैव (सं॰ अव्य॰) इसी स्थानमें, इसी जगह।}}
{{outdent|अत्वच् (सं॰ त्रि॰) चर्म्मरहित, जिसमें चमड़ा न हो।}}
{{outdent|अत्वरा (सं॰ स्त्री॰) शीघ्रताकी अनुपस्थिति, धैर्य; इस्तक़लाल।}}
{{outdent|अत्सरुक (सं॰ पु॰) नास्ति त्सरुरिव मुष्टिवन्धन स्थानं यस्य। खड्ग़ जैसा, जिसमें मुठिया न हो यज्ञीय पात्रविशेष,—चम्मच, हाथा आदि।}}
{{outdent|अथ, अथो (स॰ अव्य॰) अर्थ चु॰ अदन्त-ड पृषोदरादित्वात् रलोपः। १ इस समय, अब, उस समय। २ सिवा, अलावा; अतिरिक्त, भिन्न। ४ किञ्चित्-किञ्चित्, कुछ-कुछ। ५ निःसन्देह, बेशक। ६ किन्तु, परन्तु; लेकिन, मगर। ७ वरं, वरना; नहीं तो। ८ क्या। ९ किसतरह। १० या। ११ पूरे तौरसे। १२ फिर। इस शब्दसे अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कार्त्स्य, अधिकार, संशय, पक्षान्तर, विकल्प, समुच्चय और मङ्गलादि अर्थ निकलते हैं।}}
{{Block center|<poem><small>"मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कार्त्स्येष्वथो अथ।"</poem></small>}}
<small>अनन्तर—विवक्षुमाणेनाहृतः पार्थेनाथ हिषम्मु रम्।</small> अर्थात् इसके बाद (इन्ट्रका संवाद सुनकर) यज्ञाभिलाषी युधिष्ठिर कर्त्तृक निमन्त्रित मुरारि इत्यादि। <small>स्नानं कृत्वाऽथ भुञ्चोत।</small> अर्थात् स्नान करनेके अनन्तर भोजन करे।
<small>आरम्भ—अथ लिङ्गानुशासनं लिख्यते।</small> अर्थात् लिङ्गानुशासन लिखना अब आरम्भ किया जाता है।
<small>प्रश्न—अथ किमिदं तावत्</small>—यह सब फिर क्या है? <small>अथ वक्तं समर्थोऽसि?</small> क्या तुम बोल सकते हो?<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>कार्त्सा—अथ धातून् बूमः?</small> अर्थात् समस्त धातुओंका विषय कहते हैं?
<small>अधिकार</small>—किसी विषयके पहले <small>अथ सन्धिः, अथ समासः</small> इत्यादि लिखा रहनेसे उसका अधिकार अर्थात् उत्तरोत्तर सम्बन्ध समझा जायेगा। जैसे—<small>अथ सन्धिः</small> अर्थात् सन्धिका अधिकार करके यह प्रबन्ध लिखा जाता है।
<small>संशय—शब्दो नित्यः अथानित्यः?</small> अर्थात् शब्द नित्य है या अनित्य?
<small>पक्षान्तर—अय चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।</small> फिर यदि तुम यह धर्म्मयुद्ध न करोगे।
<small>समुच्चय—भौमोऽथार्जुनः।</small> भीम और अर्जुन।
<small>मङ्गल—अवातो ब्रह्मजिज्ञासा।</small> अर्थात् मङ्गलाचरणपूर्वक ब्रह्मके जाननकी इच्छा।
{{outdent|अथऊ (हिं॰ पु॰) सन्ध्यासे पहले होनेवाल भोजन, जो खाना शाम होनेसे पहले खाया जाये।}}
{{outdent|अथक (हिं॰ वि॰) न थकनेवाला, परिश्रमी।}}
{{outdent|अथकिं (सं॰ अव्य॰) १ हां, यही तो, ठीक है, ख़ूब समझे। २ फिर कैसे। ३ और क्या।}}
{{outdent|अथकिमु (सं॰ अव्य॰) १ कितनी अधिकतासे २ इतने परिमाणसे।}}
{{outdent|अथच (सं॰ अव्य॰) और भी, फिर, इसतरह।}}
{{outdent|अथतु (सं॰ अव्य॰) किन्तु, मगर; विपक्षमें।}}
{{outdent|अथमना (हिं॰ क्रि॰) न थमना, न ठहरना।}}
{{Right|<small>अस्तमन देखो।</small>}}
{{outdent|अथरा (हिं॰ पु॰) रंगरेज़ोंके कपड़ा रंगने, सुनारोके मानिक रेतने, जुलाहोंके सूत भिगोने और तानेमें लेई लगानका बरतन।}}
{{outdent|अथरि, अथरी (वै॰ स्त्री॰) १ नोकदार अङ्गार या अग्निशिखा। २ भालेकी नोक। ३ अङ्गुलि, उंगली। ४ हस्ती, हाथी। इस शब्दका प्रयोग केवल ऋग्वेदमें देख पड़ता और इसका अर्थ सन्दिग्ध है। (हिं॰ स्त्री॰) ५ हलका अथरा। ६ हांडी या घड़ा थापीसे पीटनेको कुंभारका बरतन। ७ दही जमानेका कूंडा।}}
{{outdent|अथर्य (वै॰ पु॰) १ लगातार चला जानेवाला}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववत्—अथर्ववेद'''|'''२९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>{{outdent|अथर्ववत् (सं॰ अव्य॰) अथर्वन् या उनके वंशजोंकी भांति।}}
{{outdent|अथर्व विद् (सं॰ पु॰) अथर्व वेदको जाननेवाला ब्राह्मगा।}}
{{outdent|अथर्ववेद (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। चतुर्थ वेद। मार्कण्डेय-पुराणमें लिखा है, कि अथर्व वेद ब्रह्माके उत्तर-मुखसे उत्पन्न हुआ था। यह वेद भ्रमर और अञ्जन जैसा कृष्णवर्ण है, तथा घोराघोर स्वरूप और शान्ति एवं अभिचारिकादि प्रक्रियाओंसे परिपूर्ण है।}}
कहते हैं, कि ऋक्, यजुः और साम—इन तीन वेदोंका कोई-कोई अंश ले तथा कितने ही नये विषय संलग्न कर अथर्वा ऋषिने इस वेदका प्रचार किया।भागवतके मतानुसार ब्रह्माके दक्षिण और विष्णु-पुराणके मतानुसार ब्रह्माके उत्तर मुखसे अथर्ववेद निकला है। <small>(भागवत ३।१२।३७, विष्णु पुराण १।५।५५।)</small>
विष्णुपुराणमें एक जगह लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"एक आसीदृयजुर्वेदस्तं चतुर्द्धा व्यकल्पयत्।
चातुर्हीचमभूद्यम्मिंस्तेन यज्ञमथाकरीत्॥ ११
आव्वर्यवं यजुभिंस्तु ऋग् भिर्हीत्रं तथा मुनिः।
औट्गात्रं सामभिश्र्चके ब्रह्मत्वञ्चाप्यथर्व भिः॥ १२
ततः स ऋचमुहृत्य ऋग्वेदं कृतवान् मुनिः।
यजूंषि च यजुर्वदं सामवेदञ्च सामभिः॥ १३
राज्ञस्त्वथर्व वे देन सर्व्वकर्म्माणि स प्रभुः।
कारयामास मैत्रेय ब्रह्मत्वञ्च यथास्थिति॥" १४ (३ अंश, ४ अध्याय।)</small></poem>}}
'पहले यजुर्वेद अर्थात् आध्वर्यव-क्रियाप्रधान वेद एक प्रकारका था। वेदव्यासने इस यजुःप्रधान वेदके चार भाग बनाये, जिससे चातुर्होत्र स्थापित हुआ। उन्होंने उसके द्वारा यज्ञानुष्ठानकी विधि निर्ड्वारित की। इस चातुर्होत्रमें उन्होंने यजुर्वेद द्वारा आध्वर्यव, ऋग्वेद द्वारा होत्र, सामवेद द्वारा औद्गात्र और अथर्ववेद द्वारा यथाविधान ब्रह्मत्व स्थापन किया, और क्षत्रियोंके शान्तिपुष्टि प्रभृति समुदाय दैवकर्म इस अथर्ववेद हारा ही कराये।'
यह बड़े ही आक्षेपका विषय है, कि जिस वेदको विष्णुपुराण इतना माननीय समझता और जिस वेदमें ब्रह्मत्व प्रतिपादित हुआ है, उसी अथर्ववेदको
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>इस देशके वेदज्ञानविहीन पण्डित कुरानका अंशमात्र मानते हैं। वह इस वेदको जितना आधुनिक समझते, वास्तविक यह उतना आधुनिक नहीं। यह सत्य है, कि किसी-किसी पुराण और अमरकोष-जैसे ग्रन्थमें भी तीन वेदोंके सिवा चौथेका उल्लेख नहीं पाया जाता। <small>(अमरकोष—१।१।४।४ देखो।)</small> किन्तु प्राचीन उपनिषत्, स्मृति, रामायण, महा-भारत और कितने ही पुराणों में भी अथर्वाङ्गिरस या अथर्व वेद उल्लिखित हुआ है।<ref><small>छान्दोग्योपनिषत् ३।४।१-२, तैत्तिरीयोपनिषत् २।३, बृहदारण्यक २।४।१०, २।४।१२, शतपथब्राह्मण ११।५।३।७, १४।६।१०।६ प्रभृति।</small></ref>
{{Block center|<poem><small>"श्रुतीरथर्वाङ्गिरसी कुर्यादित्यविचारयन्।
वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्धादरीन् द्विजः॥" मनु ११।३३।
"अथर्ववेदमन्त्रैश्र्च देवेन्द्रं समपूजयेत् (अङ्गिराः)॥
ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यत॥
वरञ्च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा॥
अथर्वाङ्गिरसोनामवेदेऽस्मिन् वै भविष्यति।
उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागञ्च लप्स्वसे॥"</poem></small>}}
{{Right|<small>महाभारत उद्योगपर्व—१७ अ॰।</small>}}
(अङ्गिरा ऋषिने) अथर्व वेदोक्त मन्त्रपाठपूर्वक देवेन्द्रकी पूजा की। उस दर्शनसे भगवान् इन्द्रने सन्तुष्ट और हृष्ट हो वर दिया कि उनका अथर्वाङ्गि-रस नाम वेदमें प्रसिद्ध और उन्हें सर्वत्र यज्ञभाग प्राप्त होगा।
{{Block center|<poem><small>"मेदसा तर्पयेद्देवानथर्वाङ्गिरसः पठन्। पितृंश्र्च मधुसर्पिर्म्यामन्वहं शक्तितो द्विजः॥" याज्ञवल्का १।४४।</poem></small>}}
<small>"दैवबलप्रवत्ता ये देवद्रोहादभिशस्तका अथर्वकृता उपसर्गकृताश्र्चः (व्याधयः)।" सुश्रुत—सूच।</small>
इसके सिवा—<small>'आथर्वणिकस्येकलीपश्च' ४।३।१३३, 'कपि- बोधादाङ्गिरसे' ४।१।१०७, 'दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिक॰ ६।४।१७४</small> इत्यादि पाणिनिसूत्रों द्वारा क्या बोधनहीं हो सकता कि पाणिनिसे भी पहले अथर्ववेद विद्यमान था? इन्हीं सकल प्रमाणों द्वारा हम स्वीकार करते हैं, कि अथव वेद अति प्राचीन है।
ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है—
{{Block center|<poem><small>"अथर्वाणं द्विधा कृत्वा सुमन्तुरददद द्विजाः।
कवन्धाय पुनः कृत्स्रं स च विद्याद्यथाक्रमम्॥ ५१</poem></small>}}
{{Rule}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|७५|4em}}</noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२९८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>{{Block center|<poem><small>कबञ्चस्तु द्विधा कृत्वा पव्यायैकं पुनर्द दौ।
द्वितीयं वेदस्पशीय स चतुर्द्वाकरीत् पुनः॥ ५२
मोदो ब्रह्मवलश्चैव पिप्पलादस्तथैव च।
शौक्कायनिश्च धर्मज्ञयतुर्थस्तपनः स्मृतः।
बेदस्पर्शस्य चत्वारः शिष्वास्त्वे ते दृढवताः॥ ५३
पुनश्च विविधंं विद्धि पथ्यानां भेदमुत्तमम्।
जाजलिः कुसुदादिश्च तृतोय: शौनक: स्मृ तः॥ ५४
शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावे कन्तु वभ्रवे।
द्वितीयां संहितां धीमान् सैन्धवायनसंज्ञिते॥ ५५
सैन्धवो मुञ्चकेशाय भिन्ना सा च विधा पुनः।
नक्षत्रकल्पो वैतानस्तृतीयः संहिताविधिः॥ ५६
चतुर्थोऽङ्गिरसः कल्पो शान्तिकल्पश्च पञ्चमः।
श्रेष्ठस्वथर्व णेह्येते संहितानां विकल्पना:॥ ५७
षटशः कृत्वा मयाप्युक्तं पुराणमृषिसत्तमाः।
{{Gap}}×{{gap}}×{{gap}}×
ऋचामयर्वणां पञ्चसहस्राणि विनिश्चयः।
सहस्रमन्यद्विज्ञेयमृषिभिर्विशतिं विना॥ ७५
एतदङ्गिरसा प्रोक्तं तेषामारण्यकं पुनः।
इति संख्या प्रसंख्याता शाखाभेदास्तथैव च॥" ७३ (६५ अ॰)</poem></small>}}
अग्निपुराणमें इसतरह लिखा गया है,—
{{Block center|<poem><small>"सुमन्तुर्जाजलिश्चैव श्लोकायनिरथर्वके॥ ८
शीनकः पिप्पलादश्च मुञ्जकेशादवोऽपरे।
मन्त्राणामयुतं षष्टिण्तञ्चोपनिषच्छतम्॥" ९ (२७१ अ॰)</poem></small>}}
उक्त पुराणसकलका भावार्थ यह है,—महर्षि सुमन्तुने अथर्ववेद दो भागोंमें विभक्तकर कवन्ध नामक शिष्यको पढ़ाया। कवन्धने अथर्ववेद दो भागों में बांटके पथ्य और वेदस्पर्श या देवदर्श नामक दो शिष्योंको दिया। वेदस्पर्शने फिर चार भाग बना मोद, ब्रह्मबल या ब्रह्मबलि, पिप्पलाद और शौक्कायणि या शौक्तायणि या श्लोकायनिको यह दान किया। पथ्यने फिर तीन भाग कर जाजलि, कुमुदादि और शौनकको संहिता दे दी। शौनकने अधीत संहिता दो भागोंमें बांटी और उनमें एक शाखा वभ्रु को और एक शाखा सैन्धवायनको पढ़ायी। सैन्धव अर्थात् सैन्धवायनशिष्य और मुञ्जकेश अर्थात् वधु के शिष्यने अपनी-अपनी संहिता दो-दो शाखाओं में विभक्त की नक्षत्रकल्प, वैतान या वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरः या आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प—यह पांच अंश संहितासमुदायमें विकल्पक<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>और अथर्व वेदमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अथर्ववेदमें ५००० ऋक् और २० ऋषि हैं, जिन्हें अङ्गिरसने बनाया है। अग्निपुराणके मतसे इसके षष्टि-सहस्राधिक अयुत मन्त्र और एकशत उपनिषत् हैं।
अथर्व वेदका प्रकृत नाम 'अथर्वाङ्गिरस' है। इस अथर्वाङ्गिरस शब्दके संक्षेपमें उल्लेख करनेको लोग 'अथर्व वेद' कहते हैं। इस समय यही विवेचना करके देखना आवश्यक है, कि अथर्व शब्दका क्या अर्थ है? ऋग्वेदमें अथर्व शब्दके अनेक प्रयोग देख पड़ते हैं। इन सब स्थलोंके भाष्यमें सायणाचार्यन अथर्व शब्दका अर्थ प्रायः ऋषि लिखा है। हौग् साहब कहते हैं, कि अथर्व शब्दका अर्थ ज़िन्द आविश्ताके अनुसार—'अग्नि-पुरोहित' होता है। अथर्व वेदमें भी अनेक स्थलोंपर अथर्व शब्दका उल्लेख मिलता है—
<small>"अजीजनो हि वरुण स्वधावन् अथर्वाणं पितरं देववन्धु।"</small>
'हे स्वधावन् वरुण! देववन्धु पिता अथर्वाको, आपने उत्पन्न किया है।' इसके द्वारा स्पष्ट ही समझ पड़ता, कि अथर्वा किसी ऋषि विशेषका नाम है। अथर्वन् शब्दमें भी प्रमाण दे दिया गया है, कि अथर्वा नामक ऋषि आदिपुरुष ब्रह्मा ज्येष्ठ पुत्र थे। अङ्गिरा भी एक प्रधान ऋषि रहे। ऋगादि सकल ही वेदोंमें अङ्गिरस् नामका उल्लेख विद्यमान है। जान पड़ता है, कि अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिके वंशधरोंने ही अथर्वाङ्गिरस संहिता अर्थात् अथर्व-
वेदका सङ्कलन किया था। किसी-किसी विद्वान्के मतसे भृगुवंशीयोंने इस वेदके अनेक मन्त्रोंकी रचना की है।
नीचे अथर्ववेदके १९ वें काण्डसे २३ वां और २४ वां सूक्त उद्धृत किया गया है। उसकी पढ़नेसे मालूम हो सकता है, कि पहले अथर्वा और अङ्गिरा वशीयोंके अनेक मन्त्र थे, जिन सम्पूर्ण मन्त्रों के एकत्र सङ्कलनसे अथर्ववेदकी उत्पत्ति हुई। अथर्ववंशीयगण जिस प्रणालीसे मन्त्र रखते, वेदमें वही प्रणाली पाई जाती है। केवल अङ्गिरसोंके मन्त्र मिला देनेको स्थान-स्थानमें अन्य प्रणालीका अवलम्बन किया गया है।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''२९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude><small>अथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा।१। पञ्चर्चेभ्यः स्वाहा।२। षड्ऋचेभ्यः स्वाहा।३। सप्तर्चेभ्यः स्वाहा।४। अष्टर्चेभ्यः स्वाहा।५। नवर्चेभ्यः स्वाहा।६। दशर्चेभ्यः स्वाहा।७। एकादशर्चेभ्यः स्वाहा।८। हादशच भ्यः स्वाहा।९। त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा।१०। चतुर्द्दशर्चेभ्राः स्वाहा।११। पञ्चदशर्चेभ्राः स्वाहा।१२। षोडशर्चेभ्राः स्वाहा।१३। सप्तदशर्चेभ्राः स्वाहा।१४। अष्टादशर्चेभ्राः स्वाहा।१५। एकीन-विंशतिः स्वाहा।१६। विंशतिः स्वाहा।१७। महत्काण्डाय स्वाहा।१८। तृचेभ्रा स्वाहा।१९। एकर्चेभ्राः स्वाहा।२०। क्षुद्रभ्राः स्वाहा।२१। एकद्वृ चेभ्राः स्वाहा।२२। रोहितेभ्राः स्वाहा।२३। सूर्याभ्रां स्वाहा।२४। ब्रात्याभ्रां स्वाहा।२५। प्रजापत्याभ्रां स्वाहा।२६। विषासह्यै स्वाहा।२७। मङ्गलिकेभ्राः स्वाहा।२८। ब्रह्मणे स्वाहा।२९।</small>
अथर्व वेदमें भी देखा जाता है, कि प्रथम काण्डके प्रायः सकल सूक्त चार ऋक्से, और द्वितीय काण्डके भी प्रायः सकल सूक्त पांच ऋक्से ग्रथित हैं। इसलिये अथर्व बंशीयोंके मन्त्र लेकर ही अथर्ववेद बना है। <small>(२२ सूक्त)</small>
<small>आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा।१। षष्ठाय स्वाहा।२।
सप्तमाष्टमाभ्रां स्वाहा।३। नौलनखेभ्राः स्वाहा।४। हरितेभ्राः स्वाहा।५। क्षुद्रेभ्राः स्वाहा।६। पर्यायिकेभ्राः स्वाहा।७। प्रथमेभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।८। द्वितीवभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।९। तृतीयेभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।१०। उपोत्तमेभ्राः स्वाहा।११। उत्तमेभ्राः स्वाहा।१२। उत्तरेभ्राः स्वाहा।१३। ऋषिभ्राः स्वाहा।१४। शिखिभ्राः स्वाहा।१५। गणेभ्राः स्वाहा।१६। महागणेभ्राः स्वाहा।१७। अर्वेभ्राः अङ्गिरोभ्रो विदगणेभ्राः स्वाहा।१८। पृथक्सहस्राभ्रां स्वाहा।१९। ब्रह्मणे स्वाहा।२०।</small>
पूर्व कालसे ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेद ही भक्तिपूर्वक पढ़ते रहे और वेद तीन ही प्रसिद्ध थे। इसीसे वदका दूसरा नाम त्रयी पड़ा है। मनु प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका ही आदर अधिक जान पड़ता है,—
{{Block center|<poem><small>"अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं।
दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥" मनु १।२३।</poem></small>}}
'यागादिकी सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।'
<small>"त्रयी वै विद्या ऋचो यजुंषि सामानि।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७।१)</small>
'ऋक्, यजुः और साम—येही तीन विद्यायें हैं।'
<small>"प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रिं पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्यं दिवः।१। स एतास्तिस्रो देवता अभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रेर्ऋचोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्।२।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>स एतां त्रयीं विद्यामभ्रातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावृहद भूरित्य ग्भ्रो भुवरिति यजुर्भाः स्वरिति सामभ्राः।"३। (छान्दीग्योपनिषत् ४।१७)</small>
'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ही तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और द्यलोकसे आदित्य उद्धृत किये गये। इसके बाद उन्होंने इन तीन देवताओंमें फिर ताप पहुंचाया। इन तीनो देवताओंके उत्तप्त होनेसे इनका सारांश उद्धृत किया गया। अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और आदित्यसे सामवेद उपलब्ध हुआ। प्रजापतिने इन तीन विद्याओं में फिर ताप छोड़ा। इस वेदत्रयके उत्तप्त होनेपर ऋक्से भूर्, यजुसे भुवः और सामवेदसे खर् उत्पन्न हुआ।'
इस प्रकार अनुसन्धान करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि पहले ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेदको ही अध्ययन करते थे।
प्रस्थानभेद-प्रणेता मधुसूदन सरस्वतीने लिखा है,—
<small>"स च प्रयोगवर्यण यज्ञनिर्वाहार्थम् ऋग यजुःसामवेदन भिन्नः। ×××
अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिपौष्टिकाभिचारादि-कर्मप्रतिपादकत्वेन अत्यन्त विलक्षण एव।"</small>
'यज्ञादि सम्पन्न करनेके लिये वेदके, ऋक्, यजुः और साम—यह तीन प्रकारके विभाग किये गये हैं। *** अथर्ववेद यागादिकोंमें तो अनुपयुक्त है, परन्तु शान्ति, पौष्टिक और अभिचार आदिका इसमें अच्छा वर्णन किया गया है। इसलिये यह बड़ा ही अद्भुत है।'
अनेक लोग अनुमान करते हैं, कि अथर्ववेद तो म्लेच्छोंका वेद है; ब्राह्मण कभी इस वेदका आदर न करते थे। किन्तु यह भ्रान्त सिद्धान्त है। वास्तविक रूपसे यह म्लेच्छोंका वेद नहीं,—यह व्रात्यवेद है अब विचारना चाहिये, कि व्रात्य कहनेसे क्या समझा जाता है। मनुने व्रात्यके सम्बन्धमें इस प्रकार अपने मतको प्रकाश किया है,—
{{Block center|<poem><small>"आषोडशाद ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात् क्षत्रोबन्धोराचतुर्विशतेर्विशः॥
अत ऊर्द्धं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृ ताः।
सावित्रीपतिता व्राल्या भवत्यार्यविगर्हिताः॥" मनु २।२८-३९।</poem></small>}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३००'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>‘गर्भसे सोलह वर्ष वयःक्रम पर्यन्त ब्राह्मणोंके यज्ञोपवीतका काल नहीं बीतता; क्षत्रियों और वैश्योंके यज्ञोपवीतका समय यथाक्रम बाईस और चौबीस वर्ष तक रहता है। यह समय अतीत होनेसे वह सावित्रीपतित और असंस्कृत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य व्रात्य कहाते, जो आर्यों के निकट निन्दनीय हैं।'
सम्भवतः व्रात्य, —व्रात (अर्थात् समूह या सामान्य लोक) शब्द से निकला है।
भगवान् मनु गायत्रीहीन ब्राह्मणको व्रात्य बता गये हैं। किन्तु अथर्ववेद व्रात्यकी बड़ी ही प्रशंसा की गई है। समस्त १५ वां काण्ड व्रात्यकी प्रशंसासे परिपूर्ण है। इस काण्ड में लिखा गया है,—
{{Block center|<poem><small>"तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे। १
तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये अन्तरीक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे।" २ इत्यादि। (१५।१३।१-५)</small></poem>}}
'जो पृथिवीके सकल पुण्यलोकोंको प्राप्त होता, उसके घर व्रात्य अतिथि बन एक रात्रि वास करता है। जो अन्तरीक्षके सकल पुण्यलोकोंको जाता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन दो रात्रि रहता है। जो द्युलोकके सकल पुण्यलोकोंको पहुंचता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन तीन रात्रि ठहरता है। जो
पुण्य से पुणा (सर्वापेक्षा पुण्य ) लोक पाता,
उसके घर व्रात्यअतिथि बन चार रात्रि वसता है ।
जो अपरिमित सकल पुण्यलोक लाभ करता, उसके
घर व्रात्य अतिथि बन अपरिमित रात्रिसे रहता है ।'
अग्नि, आदित्य, पवमान, अप, पशु और प्रजा
व्रात्यके यहां सप्तप्राण हैं,
" तस्य व्रात्यस्य ॥ १ ॥ सप्तप्राणाः सप्तापानाः सप्तव्यानाः ॥ २ ॥ योऽस्य
प्रथमः प्राण ऊर्डी नामायं सो अग्निः ॥ ३ ॥ योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो
नामासौ स आदित्यः ॥ ४ ॥ योऽस्य तृतीयः प्राणो भ्यूढो नामांसौ
स चन्द्रमाः ॥ ५ ॥ योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभुर्नामायं स पवमानः ॥ ६॥
- योऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिर्नाम ता इमा आपः ॥ ७ ॥ योऽस्य षष्ठः प्रांण:
प्रियो नाम त इर्म पशवः ॥ ८ ॥ योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता
इमाः प्रजाः ॥ ८ ॥ १५।१५ ।
यह तो व्रात्यका परिचय हुआ। इसके बाद एक
दूसरी भी बात है। यह निश्चय करना कठिन है,
कि अथर्ववे दके मन्त्र कभी किसी यज्ञमें काम आते
थे या नहीं ? किन्तु इसका प्रमाण मिलता है, कि
शाखा-प्रशाखाओंके विधानानुसार
यागादि कर्म किये जाते थे । रामायण में यह कथा
लिखी है, कि दशरथका पुत्रेष्टि याग अथर्व वेदके
शीर्षक विधानानुसार अनुष्ठित हुआ था । अथर्व -
वेदी कहते हैं, कि यह ब्रह्मवेद है। यज्ञ करनेके लिये
चार ऋत्विक् और बारह सहकारी आवश्यक होते
हैं। प्रधान ऋत्विकोंमें जो सामवेदको उच्चारण
करतें, वह उद्गाता कहाते हैं । यजुर्वेद पढ़नेवालों का
नाम होता है। ऋमन्त्रको पढ़नेवाले अध्वर्यु है ।
और सबके ऊपर जो कर्तृत्व चलाते, वह ब्रह्मा बोले
जाते हैं । ब्रह्माका कोई स्वतन्त्र वेद नहीं, किन्तु
उन्हें सकल वेदका ज्ञान होना चाहिये । अथर्व -
वेदी कहते हैं, कि यज्ञस्थल में ब्रह्मनामक ऋत्विक्के
वेदका नाम अथर्ववेद है ।
पहले अथर्ववेदको बहुसंख्यक शाखायें थीं ।
अब उनमें केवल शौनक शाखा विद्यमान है । यह
वेद नौ भागों में विभक्त है । यथा - पैप्पलाद,
शौनकोय, दामोद, तोत्तायन, जायल, ब्रह्मपालाश,
कुनखा, देवदर्शी और चारणविद्या । चरणव्यूहमें
लिखा है,
"दादशानां सहस्राणि मन्त्राणां विशतानि च ।
गोपथ ब्राह्मणं वदेऽथर्व शतपाठकं ॥"
'अथर्व वेदमें बारह हजार तीन सौ मन्त्र, गोपथ
ब्राह्मण और शत प्रपाठक विद्यमान हैं ।'
हम समस्त वेदके मन्वादि सावधानतासे गिन,
नीचे उनकी तालिका देते हैं, -
१ काण्डमें
३५ सूक्त
"
३६. "
६ अनुवाक
६
२ प्रपाठ
१५३ ऋक्
४
२०७
"
३ "
३२
"
६
२३१
"
४०
८
25
13
र्ट
"
३२४
६
१२
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"
३७६
22
१४२
१०
22
१५
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११८
१०
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१७
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"
१०
५
"
२१
"
२५८
"
१०
५
२१
३०२ 23<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३००'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>‘गर्भसे सोलह वर्ष वयःक्रम पर्यन्त ब्राह्मणोंके यज्ञोपवीतका काल नहीं बीतता; क्षत्रियों और वैश्योंके यज्ञोपवीतका समय यथाक्रम बाईस और चौबीस वर्ष तक रहता है। यह समय अतीत होनेसे वह सावित्रीपतित और असंस्कृत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य व्रात्य कहाते, जो आर्यों के निकट निन्दनीय हैं।'
सम्भवतः व्रात्य, —व्रात (अर्थात् समूह या सामान्य लोक) शब्द से निकला है।
भगवान् मनु गायत्रीहीन ब्राह्मणको व्रात्य बता गये हैं। किन्तु अथर्ववेद व्रात्यकी बड़ी ही प्रशंसा की गई है। समस्त १५ वां काण्ड व्रात्यकी प्रशंसासे परिपूर्ण है। इस काण्ड में लिखा गया है,—
{{Block center|<poem><small>"तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे। १
तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये अन्तरीक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे।" २ इत्यादि। (१५।१३।१-५)</small></poem>}}
'जो पृथिवीके सकल पुण्यलोकोंको प्राप्त होता, उसके घर व्रात्य अतिथि बन एक रात्रि वास करता है। जो अन्तरीक्षके सकल पुण्यलोकोंको जाता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन दो रात्रि रहता है। जो द्युलोकके सकल पुण्यलोकोंको पहुंचता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन तीन रात्रि ठहरता है। जो पुण्यसे पुणा (सर्वापेक्षा पुण्य) लोक पाता, उसके घर व्रात्यअतिथि बन चार रात्रि वसता है। जो अपरिमित सकल पुण्यलोक लाभ करता, उसके घर व्रात्य अतिथि बन अपरिमित रात्रिसे रहता है।'
अग्नि, आदित्य, पवमान, अप, पशु और प्रजा व्रात्यके यहां सप्तप्राण हैं,—
<small>"तस्य व्रात्यस्य॥१॥ सप्तप्राणाः सप्तापानाः सप्तव्यानाः॥२॥ योऽस्व प्रथमः प्राण ऊर्द्धी नामायं सो अग्निः॥३॥ योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः॥४॥ योऽस्य तृतीयः प्राणो भ्यूढो नामासौ स चन्द्रमाः॥५॥ योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभुर्नामायं स पवमानः॥६॥ योऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिर्नाम ता इमा आपः॥७॥ योऽस्य षष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इर्म पशवः॥८॥ योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः॥"८॥ १५।१५ ।</small>
यह तो व्रात्यका परिचय हुआ। इसके बाद एक दूसरी भी बात है। यह निश्चय करना कठिन है,
कि अथर्ववे दके मन्त्र कभी किसी यज्ञमें काम आते थे या नहीं? किन्तु इसका प्रमाण मिलता है, कि शाखा-प्रशाखाओंके विधानानुसार यागादि कर्म किये जाते थे। रामायण में यह कथा लिखी है, कि दशरथका पुत्रेष्टि याग अथर्व वेदके शीर्षक विधानानुसार अनुष्ठित हुआ था। अथर्ववेदी कहते हैं, कि यह ब्रह्मवेद है। यज्ञ करनेके लिये चार ऋत्विक् और बारह सहकारी आवश्यक होते हैं। प्रधान ऋत्विकोंमें जो सामवेदको उच्चारण करतें, वह उद्गाता कहाते हैं। यजुर्वेद पढ़नेवालों का नाम होता है। ऋमन्त्रको पढ़नेवाले अध्वर्यु है। और सबके ऊपर जो कर्तृत्व चलाते, वह ब्रह्मा बोले जाते हैं। ब्रह्माका कोई स्वतन्त्र वेद नहीं, किन्तु उन्हें सकल वेदका ज्ञान होना चाहिये। अथर्ववेदी कहते हैं, कि यज्ञस्थल में ब्रह्मनामक ऋत्विक्के वेदका नाम अथर्ववेद है।
पहले अथर्ववेदकी बहुसंख्यक शाखायें थीं। अब उनमें केवल शौनक शाखा विद्यमान है। यह वेद नौ भागों में विभक्त है। यथा—पैप्पलाद, शौनकीय, दामोद, तोत्तायन, जायल, ब्रह्मपालाश, कुनखा, देवदर्शी और चारणविद्या। चरणव्यूहमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"द्वादशानां सहस्राणि मन्त्राणां त्रिशतानि च।
गोपथं ब्राह्मणं वदेऽथर्वणे शतपाठकं॥"</small></poem>}}
'अथर्ववेदमें बारह हज़ार तीन सौ मन्त्र, गोपथ ब्राह्मण और शत प्रपाठक विद्यमान हैं।'
हम समस्त वेदके मन्त्रादि सावधानतासे गिन, नीचे उनकी तालिका देते हैं,—<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३००'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>‘गर्भसे सोलह वर्ष वयःक्रम पर्यन्त ब्राह्मणोंके यज्ञोपवीतका काल नहीं बीतता; क्षत्रियों और वैश्योंके यज्ञोपवीतका समय यथाक्रम बाईस और चौबीस वर्ष तक रहता है। यह समय अतीत होनेसे वह सावित्रीपतित और असंस्कृत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य व्रात्य कहाते, जो आर्यों के निकट निन्दनीय हैं।'
सम्भवतः व्रात्य, —व्रात (अर्थात् समूह या सामान्य लोक) शब्द से निकला है।
भगवान् मनु गायत्रीहीन ब्राह्मणको व्रात्य बता गये हैं। किन्तु अथर्ववेद व्रात्यकी बड़ी ही प्रशंसा की गई है। समस्त १५ वां काण्ड व्रात्यकी प्रशंसासे परिपूर्ण है। इस काण्ड में लिखा गया है,—
{{Block center|<poem><small>"तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे। १
तद्व्रास्वैवं विद्वान व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृ हे वसति।
ये अन्तरीक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनावरुन्धे।" २ इत्यादि। (१५।१३।१-५)</small></poem>}}
'जो पृथिवीके सकल पुण्यलोकोंको प्राप्त होता, उसके घर व्रात्य अतिथि बन एक रात्रि वास करता है। जो अन्तरीक्षके सकल पुण्यलोकोंको जाता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन दो रात्रि रहता है। जो द्युलोकके सकल पुण्यलोकोंको पहुंचता है, उसके घर व्रात्य अतिथि बन तीन रात्रि ठहरता है। जो पुण्यसे पुणा (सर्वापेक्षा पुण्य) लोक पाता, उसके घर व्रात्यअतिथि बन चार रात्रि वसता है। जो अपरिमित सकल पुण्यलोक लाभ करता, उसके घर व्रात्य अतिथि बन अपरिमित रात्रिसे रहता है।'
अग्नि, आदित्य, पवमान, अप, पशु और प्रजा व्रात्यके यहां सप्तप्राण हैं,—
<small>"तस्य व्रात्यस्य॥१॥ सप्तप्राणाः सप्तापानाः सप्तव्यानाः॥२॥ योऽस्व प्रथमः प्राण ऊर्द्धी नामायं सो अग्निः॥३॥ योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः॥४॥ योऽस्य तृतीयः प्राणो भ्यूढो नामासौ स चन्द्रमाः॥५॥ योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभुर्नामायं स पवमानः॥६॥ योऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिर्नाम ता इमा आपः॥७॥ योऽस्य षष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इर्म पशवः॥८॥ योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः॥"८॥ १५।१५ ।</small>
यह तो व्रात्यका परिचय हुआ। इसके बाद एक दूसरी भी बात है। यह निश्चय करना कठिन है,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कि अथर्ववे दके मन्त्र कभी किसी यज्ञमें काम आते थे या नहीं? किन्तु इसका प्रमाण मिलता है, कि शाखा-प्रशाखाओंके विधानानुसार यागादि कर्म किये जाते थे। रामायण में यह कथा लिखी है, कि दशरथका पुत्रेष्टि याग अथर्व वेदके शीर्षक विधानानुसार अनुष्ठित हुआ था। अथर्ववेदी कहते हैं, कि यह ब्रह्मवेद है। यज्ञ करनेके लिये चार ऋत्विक् और बारह सहकारी आवश्यक होते हैं। प्रधान ऋत्विकोंमें जो सामवेदको उच्चारण करतें, वह उद्गाता कहाते हैं। यजुर्वेद पढ़नेवालों का नाम होता है। ऋमन्त्रको पढ़नेवाले अध्वर्यु है। और सबके ऊपर जो कर्तृत्व चलाते, वह ब्रह्मा बोले जाते हैं। ब्रह्माका कोई स्वतन्त्र वेद नहीं, किन्तु उन्हें सकल वेदका ज्ञान होना चाहिये। अथर्ववेदी कहते हैं, कि यज्ञस्थल में ब्रह्मनामक ऋत्विक्के वेदका नाम अथर्ववेद है।
पहले अथर्ववेदकी बहुसंख्यक शाखायें थीं। अब उनमें केवल शौनक शाखा विद्यमान है। यह वेद नौ भागों में विभक्त है। यथा—पैप्पलाद, शौनकीय, दामोद, तोत्तायन, जायल, ब्रह्मपालाश, कुनखा, देवदर्शी और चारणविद्या। चरणव्यूहमें लिखा है,—
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गोपथं ब्राह्मणं वदेऽथर्वणे शतपाठकं॥"</small></poem>}}
'अथर्ववेदमें बारह हज़ार तीन सौ मन्त्र, गोपथ ब्राह्मण और शत प्रपाठक विद्यमान हैं।'
हम समस्त वेदके मन्त्रादि सावधानतासे गिन, नीचे उनकी तालिका देते हैं,—<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>दो पूर्ण नक्षत्र और एक तीसरे नक्षत्रका एक पाद मिलानेसे एक राशि बनती है। अर्थात् प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश, २० कला है। अब ऊपरके हिसाबमें सन्देह उठता है, कि जो कृत्तिकाके पहलेसे गणनाको आरम्भ किया जाता है, तो साढ़े तीन नक्षत्र निकलते हैं। प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश २० कला रहनेसे पूरण द्वारा साढ़े तीन नक्षत्रोमें ४३ अंश ४० कला होती हैं। इसके बाद त्रैराशिक द्वारा गणना करनेसे मालूम होगा, कि ७२ वर्षमें यदि अयनगति एकअंश सरकती, तो ४३ अंश और ४० कला जानेसे कितने वर्ष हुए होंगे? इस प्रश्नके उत्तरमें ३३६० वर्ष आते हैं।
दूसरी बात यह है, कि जो कृत्तिका नक्षत्रके अन्तसे हिसाब लगाया जाये, तो अयनांश साढ़े चार नक्षत्र बढ़ता है। साढ़े चार नक्षत्रका परिमाण ६० अंश है। इसलिये ऊपरकी तरह त्रैराशिक लगानेसे ४३२० वर्ष निकलते हैं। अतएव अथर्ववेद संकलित हुए, कोई पांच हजार वर्ष बीते होंगे। ऊपरके ज्योतिष और त्रिकोणमितिकी गणनासे ३३९३ वर्ष हुए हैं। इस स्थल में सहज उपायकी गणनासे ३३६० वर्ष निकलते हैं। इसलिये ३३ वर्षका प्रभेद पड़ जाता है। फिर, कृत्तिकाके अन्तपर सहज उपाय द्वारा गिननेसे ४३२० वर्ष आये हैं। प्रथम उपाय द्वारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष निकलेंगे।
इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कृमि झाड़नेका मन्त्र विद्यमान है। अथर्ववेदमें भी एक वैसा ही मन्त्र लिखा है,—
<small>"अगस्तास्य ब्रह्मणा संपिनष्माहं कृमिम्।" (अथर्ववेद २ काण्ड, ६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक्।)</small>
'मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट करता हूँ।' इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>और सामवेदका नाम मिलता है। किन्तु इन तीनों वेदोंमें कहीं भी अथर्ववेदकी बात नहीं उठी है—
{{Block center|<poem><small>"ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्म्माणि कुर्व्वते।
एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः॥ १
ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोजी यजुर्वलं।
एष भा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते॥" २</small></poem>}}
{{Left|<small>अथर्ववेद ७ काण्ड ५४ सूक्त।</small>}}
'हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा लोग यज्ञकर्म्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि औ ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति! इन वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना।'
इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट ही बोध होता है, कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद संकलित हुआ था।
रोथ् और ह्विट्ने साहबकी मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,—
{{Block center|<poem><small>"ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥" १</small></poem>}}
किन्तु ब्राह्मणसर्वस्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें लिखा है,—
<small>"अथर्व वे दादिमन्त्रस्य दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायत्रीच्छन्दः शान्ति करणे विनियोगः। मन्त्री यथा—शन्नो देवीरभोष्टय आपी भवन्तु पीतये। शंयोरभित्रवन्तु नः॥"</small>
अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोथ् साहबकी मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसीमें 'शन्नो देवीरभीष्टये' इस मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें काण्डतक सूक्तकी ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्डके प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूक्त में<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३११
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०४'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>छः छः, चतुर्थ काण्डके प्रति सूक्त में सात-सात और पञ्चम काण्डके प्रति सूक्तमें आठसे लेकर अट्ठारह-तक ऋक् वर्त्तमान हैं। छठे काण्ड के प्रति सूक्त में तीन-तीन ऋक् हैं और सप्तम काण्डके प्रति सूक्तमें एक ही एक ऋक् मिलता है। अष्टम काण्डसे अष्टादश काण्ड पयन्त अनेक बड़-बड़े सूक्त हैं। त्रयोदश काण्डमें रोहित नामक देवताका विवरण दिया गया है। कदाचित् वही सबके सृष्टिकर्त्ता होंगे। उनकी पत्नीका नाम रोहिणी थाः चतुर्दश काण्डमें विवाहकी कथा है। पञ्चदश काण्डमें व्रात्यका बृत्तान्त कहा गया है। षोड़श और सप्तदश काण्डमें विविध विषय संकलित हुआ है। विंश काण्डके अधिकांश स्थलमें इन्द्रदेवकी स्तुति देख पड़ती है। यह स्तुति प्रायः समस्त ऋग्वेदके प्रथम मण्डलसे उद्धृत की गई है। अथर्व वेदका कमसेकम छठवां भाग ऋग्-वेदक मन्त्रोंसे बनाया गया है, जो प्रथम और दशम मण्डलके ही अधिक हैं। अथर्व वेदमें भी पुरुषसूक्त है, किन्तु ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे इसमें पाठका अनेक प्रभेद देख पड़ता है।
<small>युरोपीय पण्डितोंका मत,</small>—कोलब्रुक साहब कहते हैं, कि अथर्ववेद-संहितामें २० काण्ड विद्यमान हैं। यह काण्ड अनुवाक्, सूक्त और ऋक्—इन तीन भागोंमें विभक्त हैं। अनुवाक्की एक शतसे और सूक्तकी संख्या साढ़े सात शतसे अधिक है, मन्त्र केवल ६०१५ मिलते हैं। इसमें प्राय ४० प्रपाठक पाये जाते हैं।<ref>Asiatic Researches, Vol. VIII.</ref>
शास्त्रदर्शी विलसनके मतसे 'अथर्व' वेदमें गण्य नहीं, वरं यह वेदका क्रोड़पत्रस्वरूप है।<ref>Wilson's Rigveda, Introduction, p. viii.</ref> किन्तु उपनिषदोंको छोड़ अथर्ववेदमें ही लिखा हैं, कि यह चतुर्थ वेद है,—
{{Block center|<poem><small>"यस्माट्टको अपातक्षन्ययजुर्यस्मादपाकषन्।
सामानि यस्यो लोमान्यधर्वाङ्गिरसो मुखम्।
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः खिदेव सः॥ अथर्व १०।७।२०।</poem></poem>}}
'जिससे लोगोंने ऋक् मन्त्र पृथक् कर लिये हैं, तथा यजुः खींचा है, साम जिसका लोम और
{{Rule}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अथर्वाङ्गिरस जिसका मुख है वह स्कम्भ कौन है? यह बात आप हमसे कहिये।'
युरोपीय पण्डितोंके मतसे अथर्व वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन और कोई-कोई अंश आधुनिक है, जो ऋग्वेदके दशम मण्डल बनने के बाद रचा गया था।<ref>Mr. Whitney's Papers on the Journal of the
American Oriental Society, Vol. iii. p. 305ff; iv,
p. 155ff ; Max Müller's Anc. Sans. Lit. p. 38, 446ff.</ref>
अथर्ववेदका कोई-कोई अंश प्राचीन ऋग्वेदसे मिलता है सही, किन्तु दोनोंका प्राकृतिक भाव विचारकर देखनेसे सम्पूर्ण विभिन्न मालूम देता है। ऋग्वेदके ऋषि प्रकृतिके सौन्दर्यसे विमोहित हैं, किन्तु अथर्ववेदके ऋषि उपदेवोंके भय और उनके भौतिक प्रतापसे अतिशय चिन्तान्वित हैं। उक्त वैलक्षण्य रहते भी यह प्रमाणित हुआ, कि अथर्व-वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन है।<ref>Indische Studien, p. 295 : Zwei Vedische Texte iiber Omina und Portenta, p. 345—348.</ref>
सुप्रसिद्ध ह्वेटने साहबका कहना है,—'अथर्ववेद ऋग्वेदकी तरह ऐतिहासिक है, किन्तु याज्ञ नहीं। पहले यह वेद अष्टादश काण्डोंमें विभक्त था। इसका षष्ठांश भी छन्दमें न लिखा गया था। अवशिष्ट छन्द अर्थात् एकषष्ठांश ऋक्सूक्त, विशेषतः ऋग्वेदके दशम मण्डलमें देखा जाता है। बाकी सभी अथर्ववेदका अपना अंश है।' ह्वेटने साहबने ऐसे ही प्रमाणित किया है, कि ऋक्संग्रहकालमें अथर्ववेदका अपना अंश विद्यमान न था।
अध्यापक केरण (Kern) साहबने अपने भारतवर्षीय श्रेणीविभागप्रणाली नामक ग्रन्थमें लिखा है,—अथर्ववेदका प्रायः अर्द्धांंश ऋग्वेदसे मिलता है, इसलिये अथर्ववेद भी ऋग्वेदकी तरह प्राचीन हो सकता है। केवल अथर्ववेदका अवशिष्ट अंश भाषा, मन्त्र और वर्णनापद्धतिके अनुसार ऋग्वेदकी अपेक्षा अप्राचीन भी माना जा सकता है। ऋग्वदमें वह्लिक शब्दका कोई उल्लेख नहीं, किन्तु इस वेदके स्थान-स्थानमें यह शब्द उल्लिखित हुआ है। <small>अथर्ववेद ५।२२। ५, ७, ९ देखो।</small>
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<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>बल्ख आर्यजातिके प्राणियोंका वासस्थान था, सुतरां यह असम्भव नहीं, कि वह्लिकोंके साथ प्राचीन भारत-वासियोंका परिचय रहा हो।<ref>Indische Theorieïn over ed Standenverdeeling, p. 13.</ref>
अध्यापक रोथ् अपनी अथर्ववेदीय-आलोचना नामक पुस्तकमें कहा है,—'इसका कितना ही प्रमाण मिलता, कि यह वेद अन्य सकल वेदोंके अन्तमें प्रकाशित हुआ है। ऋग्वेदमें इन्द्र, अश्विनीकुमारद्वय और अन्यान्य देवता जिस-जिस स्थलपर पितृगणकौ मुक्ति के लिये विशेष रूपसे आराधित हुए, अथर्ववेदके चतुर्थ काण्डमें मित्रावरुण उसी-उसी स्थलपर विशिष्ट रूपसे पूजित हैं। जमदग्नि, वशिष्ठ, मेधातिथि, पुरुमोड़ प्रभृति ऋग्वेदके ऋषि इस वेदमें आराध्य हुए हैं। इसतरह स्वीकार किया जा सकता, कि यह ऋग्वेदके कितने ही समय बाद और आधुनिक कालमें प्रकाशित हुआ है। जो हो, लोग यह मानते, कि अथर्ववेद संस्कृत भाषाका अतिप्राचीन ग्रन्थ है।<ref>Abhandlung über den Atharwaveda, p. 12, 22.</ref>
किन्तु पण्डितवर रोथ् जो यह बात कहके इस वेदका अप्राचीनत्व प्रमाणित करते, कि ऋग्वेदके ऋषि अथर्व वेदमें पूजित हुए हैं, उसे हम यथार्थ बताके
स्वीकार नहीं कर सकते। इस विषयमें कितना ही सन्देह है, कि ऋग्वेदके ऋषियोंने ही ऋग्वेद प्रकाशित किया है। <small>(ऐतरेय आरणक—१ आ २ अ॰ देखो।)</small> फिर भी उन्होंने अथर्व वेदकी परीक्षाकर जो उसका ऋग्वेदके पीछे प्रकाशित होना माना, वह स्वीकार्य है।
महात्मा हीग इस वेदको कोई २००० वर्षका पुराना मानते हैं। किन्तु हम इसे इससे भी प्राचीन समझते हैं, क्योंकि पाणिनि मुनि और निरुक्तकार प्राचीन यास्क मुनिने <small>(निरुक्त नेघण्टु क काण्ड ५।५)</small> भी सङ्केतसे इस वेदका उल्लेख किया है। हौग साहब इस वेदके साथ अविस्ता-शास्त्रका सादृश्य दिखा गये हैं। अथर्ववेदकी तरह अविस्ता-शास्त्र में भी मारण, उच्चाटन, स्तम्भन और भैषज्यादि लिखित हैं। <small>(अविस्ता-होम यष्तु ९।१-३२ देखो।)</small> होम-यष्त्में (९।२४।) 'अपां
{{Rule}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>ऐविष्टिष' अर्थात् जलका आगमन उल्लिखित है। हौगका कहना है, कि यह कई एक साङ्केतिक शब्द अथर्ववेदसे उद्धृत किये गये, जो अथर्ववेदके प्रथम ही भिन्नाकारसे लिखे हैं।<ref>अथर्व वेद १।६।१, और Haug's Essays on the Parsis, 3rd ed. p. 182.</ref>सिवा इसके अविस्ताके कितने ही विषय अथर्ववेदसे मिलते हैं। <small>(अविस्ता शब्दमें समस्त विवरण देखो।)</small> अविस्ता प्राचीन पारसियोंका धर्म्मशास्त्र है। मालूम होता है, कि अविस्ताके साथ अथर्व वेदका ऐक्य रहनेसे कितने ही लोग इसे वेद नहीं मानते। किन्तु इसका कोई प्रकृत कारण नहीं।
अथर्व वेदका दूसरा नाम अथर्वाङ्गिरस वेद है, स्थान-स्थानमें केवल आङ्गिरस वेद अर्थात् अङ्गिरा और अङ्गिरा-वंशीय ऋषियोंका वेद बताकर यह लिखा गया है। जो अग्नियाजक अङ्गिरा और आङ्गिरस ऋषि हिन्दू और पारसीक दोनों जातियोंके परम श्रद्धेय और भक्तिभाजन बताये गये हैं, इस आङ्गिरस आख्या द्वारा यह वेद उन्हींसे प्रकाशित हुआ मालूम पड़ता है। पुराणमें इस वेदको अङ्गिराका अपत्य कहा गया है। <small>(भागवत ६।६।१६ देखो।)</small> इस वेदका फिर दूसरा नाम आथर्वणवेद अर्थात् अथर्वा-मतानुयायियोंका वेद है। आविस्तिक आयवन् और वैदिक आथर्वन् शब्द यथाक्रम याजक और वैदिक अग्नियाजकके प्रतिपादक हैं। यह समस्त पर्यालोचना करके देखनेसे प्रकरण विशेषमें आविस्तिक धर्मशास्त्रके साथ आथर्वन् धर्मका कुछ विशेष सम्बन्ध अवश्य ही लक्षित या सम्भावित हुआ करता है।
अथर्व वेदमें सब मिलाके तेंतीस देवता हैं। <small>(अथर्वसंहिता १०।७।१३,१०।७।२३,१०।७।२७।)</small> अविस्तामें भी तेंतीस रतु अर्थात् अध्यक्ष अहुरमज़द-स्थापित और जरथुस्त्र-प्रचारित सर्वोत्कृष्ट तत्त्वसमुदाय प्रचलित रखने के लिये नियोजित हैं। <small>(यश्न १।१०।)</small>
'वैदिक-गवेषणा' नामक पुस्तकमें पण्डित सत्यव्रतसामाश्रमिने लिखा
है,—'अथर्ववेदको कुरानके अंश बतानेका कारण भी मौजूद है। अथर्ववेदके जिस-जिस अंशमें चिकित्सासम्बन्धीय
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४७
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४०'''|अनिर्वेद—अनिलारिरस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनिर्वेद (सं॰ पु॰) न निर्वेदः, नञ्-तत्। १ असन्तोष, नाराज़ी। २ वैराग्यका न बढ़ना। ३ मोहका न मढ़ना, मुहब्बतका न मचलना।
अनिर्वेश (सं॰ त्रि॰) नियुक्तिविहीन, बेकार, दुर्दशाग्रस्त, कमबख्त।
अनिल (सं॰ पु॰) अन-इलच्। १ वायु, हवा। <small>इसका विस्तारित विवरण वायु शब्दमें देखो।</small> २ वसुविशेष। <small>अनिलो वसुवातयोः। (मेदिनी)</small> ३ चन्द्रवंशके नृपतिविशेष। यह तंसुके पुत्र रहे। दुष्मन्तादि इनके चार सन्तान हुए थे। यही दुष्मान्त भरत के पिता शकुन्तलानाटकके नायक हैं। <small>(विष्णुपुराण ४।१९।२)</small>
३ वातरोग, गठिया, लक़वा वग़ैरह वायुकी बीमारी। ४ शाकतरु, साखूका दरख्त़। (Capparis Trigoliata)
अनिलकपित्थक (सं॰ पु॰) स्थूलाम्रातक, बड़ा अमरा।
अनिलकारक (सं॰ पु॰) काञ्जिक विशेष, खौलते चावलका मांड।
अनिलकुमार (सं॰ पु॰) १ पवनतनय, हनूमान्। २ जैन देवविशेष, जैनियोंके ख़ास देवता।
अनिलघ्न, अनिलघ्नक (सं॰ पु॰) अनिलं वातरोगं हन्ति, हन-टक्। <small>संज्ञायां कन्। पा ४।३।१४७।</small> १ विभीतक-वृक्ष, बहेरेका पेड़। (Terminalia Belerica) (त्रि॰) २ वातरोगनाशन, वायुकी बीमारी मिटानेवाला।
अनिलज्वर (सं॰ पु॰) वातिकज्वर, वायुका बुख़ार। यह साम और निराम भेदसे दो तरहका होता है।
अनिलनिर्यास (सं॰ पु॰) प्रियालवृच, पीतसालक; एक तरहका दरख़्त।
अनिलपर्यय, अनिलपर्याय (सं॰ पु॰) वायुरोगविशेष, जिसमें पलकपर आंखका बाहरी भाग सूजता और दुखता है।
अनिलप्रकृति (सं॰ त्रि॰) वायुकी प्रकृति रखनेवाला।
अनिलभुक् (सं॰ पु॰) सर्प, सांप। सांप हवाको खाकर जीता-जागता, इसीसे अनिलभुक् कहाता है।
अनिलम्भसमाधि (सं॰ पु॰) जैनशास्त्रोक्त समाधिविशेष, जैनियोंके ध्यान लगानेका ख़ास तरीक़।
अनिलयन (सं॰ त्रि॰) गृहरहित, लामकां, जो कोई बंधा घर न रखता हो।
अनिलरस (सं॰ पु॰) रसविशेष जो पाण्डुरोग पर चलता है।
अनिलरिपु (सं॰ पु॰) एरण्ड वृक्ष, अण्डेका दरख़्त।
अनिलव्याधि (सं॰ पु॰) आन्तर वायुका विपर्यय, भीतरी वायुका बिगड़ जाना, वातरोगविशेष, वायुकी ख़ास बीमारी।
अनिलसख (सं॰ पु॰) अनिलस्य वायोः सखा, टजन्त ६-तत्। अग्नि, आग।
हवा लगनेसे आग ख़ूब धधकती, इसीसे अनिलसख या हवाका दोस्त कहलाती है।
अनिलहर (सं॰ क्ली॰) कृष्ण अगुरु, काला देवदारु।
अनिला (सं॰ स्त्री॰) १ नदी, दरया। २ खटिका, खड़िया मट्टी।
अनिलाजीर्ण (सं॰ क्ली॰) वाताजीर्ण, वायु बिगड़नेसे पैदा हुई बदहज़मी।
अनिलाटिका (सं॰ स्त्री॰) रक्तपुनर्नवा।
अनिलात्मज (सं॰ पु॰) वायुपुत्र। हनुमान् और भीमसेन दोनो ही पवनके पुत्र रहे।
अनिलान्तक (सं॰ पु॰) अन्तं करोतीति; अन्त-णिच्-खुल्—अन्तकः, अनिलस्य वायुरोगस्य अन्तको नाशकः। इङ्गुदीवृक्ष, अङ्गारपुष्प, अङ्गोट।
अनिलापहा (सं॰ पु॰) रक्तकुलत्थक, लाल कुरथी।
अनिलामय (सं॰ पु॰) अनिलेन दुष्टवायुना उद्भावित आमयः पीड़ा, शाक॰ तत्। वायुरोग, वातव्याधि, वायुकी बीमारी।
अनिलायन (सं॰ क्ली॰) वायुपथ, हवाकी राह, जिस डगरसे हवा निकले।
अनिलारिरस (सं॰ पु॰) वातव्याधिके अधिकारका रस, जो ख़ाक वायुकी बीमारीपर चले,—
{{Block center|<poem><small>"रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वाताऱिनिर्गु ण्डिरसैर्दिनैकं।
निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्टा च वालुकाख्ये॥
यन्त्रे पुटे गोमयू र्णवङ्गौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत्।
निर्गुण्डिकावातहराग्नितौयैः संचूर्ण्य यत्रेन विभावयेत्तत्॥"</poem></small>}}
{{Right|<small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अनिर्वेश (सं॰ त्रि॰) नियुक्तिविहीन, बेकार, दुर्दशाग्रस्त, कमबख्त।
अनिल (सं॰ पु॰) अन-इलच्। १ वायु, हवा। <small>इसका विस्तारित विवरण वायु शब्दमें देखो।</small> २ वसुविशेष। <small>अनिलो वसुवातयोः। (मेदिनी)</small> ३ चन्द्रवंशके नृपतिविशेष। यह तंसुके पुत्र रहे। दुष्मन्तादि इनके चार सन्तान हुए थे। यही दुष्मान्त भरत के पिता शकुन्तलानाटकके नायक हैं। <small>(विष्णुपुराण ४।१९।२)</small>
३ वातरोग, गठिया, लक़वा वग़ैरह वायुकी बीमारी। ४ शाकतरु, साखूका दरख्त़। (Capparis Trigoliata)
अनिलकपित्थक (सं॰ पु॰) स्थूलाम्रातक, बड़ा अमरा।
अनिलकारक (सं॰ पु॰) काञ्जिक विशेष, खौलते चावलका मांड।
अनिलकुमार (सं॰ पु॰) १ पवनतनय, हनूमान्। २ जैन देवविशेष, जैनियोंके ख़ास देवता।
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अनिलज्वर (सं॰ पु॰) वातिकज्वर, वायुका बुख़ार। यह साम और निराम भेदसे दो तरहका होता है।
अनिलनिर्यास (सं॰ पु॰) प्रियालवृच, पीतसालक; एक तरहका दरख़्त।
अनिलपर्यय, अनिलपर्याय (सं॰ पु॰) वायुरोगविशेष, जिसमें पलकपर आंखका बाहरी भाग सूजता और दुखता है।
अनिलप्रकृति (सं॰ त्रि॰) वायुकी प्रकृति रखनेवाला।
अनिलभुक् (सं॰ पु॰) सर्प, सांप। सांप हवाको खाकर जीता-जागता, इसीसे अनिलभुक् कहाता है।
अनिलम्भसमाधि (सं॰ पु॰) जैनशास्त्रोक्त समाधिविशेष, जैनियोंके ध्यान लगानेका ख़ास तरीक़।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिलयन (सं॰ त्रि॰) गृहरहित, लामकां, जो कोई बंधा घर न रखता हो।
अनिलरस (सं॰ पु॰) रसविशेष जो पाण्डुरोग पर चलता है।
अनिलरिपु (सं॰ पु॰) एरण्ड वृक्ष, अण्डेका दरख़्त।
अनिलव्याधि (सं॰ पु॰) आन्तर वायुका विपर्यय, भीतरी वायुका बिगड़ जाना, वातरोगविशेष, वायुकी ख़ास बीमारी।
अनिलसख (सं॰ पु॰) अनिलस्य वायोः सखा, टजन्त ६-तत्। अग्नि, आग।
हवा लगनेसे आग ख़ूब धधकती, इसीसे अनिलसख या हवाका दोस्त कहलाती है।
अनिलहर (सं॰ क्ली॰) कृष्ण अगुरु, काला देवदारु।
अनिला (सं॰ स्त्री॰) १ नदी, दरया। २ खटिका, खड़िया मट्टी।
अनिलाजीर्ण (सं॰ क्ली॰) वाताजीर्ण, वायु बिगड़नेसे पैदा हुई बदहज़मी।
अनिलाटिका (सं॰ स्त्री॰) रक्तपुनर्नवा।
अनिलात्मज (सं॰ पु॰) वायुपुत्र। हनुमान् और भीमसेन दोनो ही पवनके पुत्र रहे।
अनिलान्तक (सं॰ पु॰) अन्तं करोतीति; अन्त-णिच्-खुल्—अन्तकः, अनिलस्य वायुरोगस्य अन्तको नाशकः। इङ्गुदीवृक्ष, अङ्गारपुष्प, अङ्गोट।
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अनिलायन (सं॰ क्ली॰) वायुपथ, हवाकी राह, जिस डगरसे हवा निकले।
अनिलारिरस (सं॰ पु॰) वातव्याधिके अधिकारका रस, जो ख़ाक वायुकी बीमारीपर चले,—
{{Block center|<poem><small>"रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वाताऱिनिर्गु ण्डिरसैर्दिनैकं।
निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्टा च वालुकाख्ये॥
यन्त्रे पुटे गोमयू र्णवङ्गौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत्।
निर्गुण्डिकावातहराग्नितौयैः संचूर्ण्य यत्रेन विभावयेत्तत्॥"</poem></small>}}
{{Right|<small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अनिर्वेश (सं॰ त्रि॰) नियुक्तिविहीन, बेकार, दुर्दशाग्रस्त, कमबख्त।
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३ वातरोग, गठिया, लक़वा वग़ैरह वायुकी बीमारी। ४ शाकतरु, साखूका दरख्त़। (Capparis Trigoliata)
अनिलकपित्थक (सं॰ पु॰) स्थूलाम्रातक, बड़ा अमरा।
अनिलकारक (सं॰ पु॰) काञ्जिक विशेष, खौलते चावलका मांड।
अनिलकुमार (सं॰ पु॰) १ पवनतनय, हनूमान्। २ जैन देवविशेष, जैनियोंके ख़ास देवता।
अनिलघ्न, अनिलघ्नक (सं॰ पु॰) अनिलं वातरोगं हन्ति, हन-टक्। <small>संज्ञायां कन्। पा ४।३।१४७।</small> १ विभीतक-वृक्ष, बहेरेका पेड़। (Terminalia Belerica) (त्रि॰) २ वातरोगनाशन, वायुकी बीमारी मिटानेवाला।
अनिलज्वर (सं॰ पु॰) वातिकज्वर, वायुका बुख़ार। यह साम और निराम भेदसे दो तरहका होता है।
अनिलनिर्यास (सं॰ पु॰) प्रियालवृच, पीतसालक; एक तरहका दरख़्त।
अनिलपर्यय, अनिलपर्याय (सं॰ पु॰) वायुरोगविशेष, जिसमें पलकपर आंखका बाहरी भाग सूजता और दुखता है।
अनिलप्रकृति (सं॰ त्रि॰) वायुकी प्रकृति रखनेवाला।
अनिलभुक् (सं॰ पु॰) सर्प, सांप। सांप हवाको खाकर जीता-जागता, इसीसे अनिलभुक् कहाता है।
अनिलम्भसमाधि (सं॰ पु॰) जैनशास्त्रोक्त समाधिविशेष, जैनियोंके ध्यान लगानेका ख़ास तरीक़।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिलयन (सं॰ त्रि॰) गृहरहित, लामकां, जो कोई बंधा घर न रखता हो।
अनिलरस (सं॰ पु॰) रसविशेष जो पाण्डुरोग पर चलता है।
अनिलरिपु (सं॰ पु॰) एरण्ड वृक्ष, अण्डेका दरख़्त।
अनिलव्याधि (सं॰ पु॰) आन्तर वायुका विपर्यय, भीतरी वायुका बिगड़ जाना, वातरोगविशेष, वायुकी ख़ास बीमारी।
अनिलसख (सं॰ पु॰) अनिलस्य वायोः सखा, टजन्त ६-तत्। अग्नि, आग।
हवा लगनेसे आग ख़ूब धधकती, इसीसे अनिलसख या हवाका दोस्त कहलाती है।
अनिलहर (सं॰ क्ली॰) कृष्ण अगुरु, काला देवदारु।
अनिला (सं॰ स्त्री॰) १ नदी, दरया। २ खटिका, खड़िया मट्टी।
अनिलाजीर्ण (सं॰ क्ली॰) वाताजीर्ण, वायु बिगड़नेसे पैदा हुई बदहज़मी।
अनिलाटिका (सं॰ स्त्री॰) रक्तपुनर्नवा।
अनिलात्मज (सं॰ पु॰) वायुपुत्र। हनुमान् और भीमसेन दोनो ही पवनके पुत्र रहे।
अनिलान्तक (सं॰ पु॰) अन्तं करोतीति; अन्त-णिच्-खुल्—अन्तकः, अनिलस्य वायुरोगस्य अन्तको नाशकः। इङ्गुदीवृक्ष, अङ्गारपुष्प, अङ्गोट।
अनिलापहा (सं॰ पु॰) रक्तकुलत्थक, लाल कुरथी।
अनिलामय (सं॰ पु॰) अनिलेन दुष्टवायुना उद्भावित आमयः पीड़ा, शाक॰ तत्। वायुरोग, वातव्याधि, वायुकी बीमारी।
अनिलायन (सं॰ क्ली॰) वायुपथ, हवाकी राह, जिस डगरसे हवा निकले।
अनिलारिरस (सं॰ पु॰) वातव्याधिके अधिकारका रस, जो ख़ाक वायुकी बीमारीपर चले,—
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निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्टा च वालुकाख्ये॥
यन्त्रे पुटे गोमयू र्णवङ्गौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत्।
निर्गुण्डिकावातहराग्नितौयैः संचूर्ण्य यत्रेन विभावयेत्तत्॥"</poem></small>}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिलाशिन्—अनिषिद्ध'''|'''४४१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनिलाशिन् (सं॰ त्रि॰) वायुका भक्षण भोगते हुवा, हवाको खाकर जीनेवाला, भोजन न पाते हुवा, जो खानेको न चख रहा हो।
अनिलाशी, <small>अनिलाशिन् देखो</small>
अनिलोचित (सं॰ पु॰) नीलमाषक, काला उड़द।
अनिलोडित (सं॰ त्रि॰) अनुभवविहीन, नातजरबेकार, जिसे किसी बातका अच्छी तरह हाल मालूम न हो।
अनिवर्तन (सं॰ त्रि॰) १ निवर्तनरहित, न लौटते हुवा। २ स्थायी, स्थिर, जमा हुवा, पायंदार। ३ अत्याज्य, छोड़ा न जानेवाला, उपयुक्त, ठीक।
अनिवर्त्तित्व (सं॰ क्ली॰) पश्चादुपद न पड़नेका भाव, वापस न आनेकी हालत, वीरत्व, बहादुरी।
अनिवर्त्तिन् (सं॰ त्रि॰) न निवर्तते, नि-वृत-णिनि नञ्-तत्। १ कार्य अपूर्ण रहते शान्त न होनेवाला, अधूरा काम होते जो ठण्डा न पड़े। २ वीर, बहादुर, दुश्मन के सामनेसे न हटनेवाला। ३ लगा हुवा, जो कामसे मुंह न फेरे। (पु॰) ४ परमेश्वर। ५ विष्णु।
अनिवर्ती, <small>अनिवर्तिन् देखो।</small>
अनिवारित (सं॰ त्रि॰) निवारणशून्य, अबाध, न रोका गया, जिसे किसी ने हटका न हो।
अनिवार्य (सं॰ त्रि॰) निवारणके अयोग्य, रोकनेके नाक़ाबिल, जिसे हटक न सकें।
अनिविशमान (सं॰ त्रि॰) न निविशमानम्, नि-विश्-शानच्। १ निवेशरूप स्थितिशून्य, बैठा न रहनेवाला। २ सर्वदा गमनकारी, हमेशा चलने-वाला। ३ एक स्थानमें अस्थित, एक जगह न ठह रनेवाला। ४ परिव्राजक। ५ अवकाशशून्य, आराम
न अड़ानेवाला।
अनिवृत, अनिवृत्त (सं॰ त्रि॰) अबाध, रोका न गया।
अनिवृत्ति-वादर (सं॰ पु॰) परिणामको त्याग वासना बसानेवाला कर्म, जिस कामका नतीजा तो मिट जाये, लेकिन बू बनी हो रहे। यह कर्मवाद जैन-शास्त्रमें कहा गया है।
अनिवेदित (सं॰ त्रि॰) अकथित, अनुक्त, न कहा गया, जिसका जिक्ऱ न जमा हो।
अनिवेदितविज्ञात (सं॰ त्रि॰) विना कथन अनुभूत बेकहे समझा गया।
अनिवेद्य (सं॰ अव्य॰) विना निवेदन सुनाये, बेइत्तिला दिये।
अनिवेशन (सं॰ त्रि॰) उपवेशनस्थानशून्य, बैठनेकी जगह न रखनेवाला।
अनिश (सं॰ त्रि॰) निशायाः जनानां चेष्टाविनाश-हेतुतया लक्षणया निशा चेष्टाविनाशः सा नास्ति यस्य यस्मिन् वा, नञ्-बहुव्री॰। १ अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
२ रात्रिवर्जित, शबसे ख़ाली। ३ सर्वदा भयजनक, हमेशा खौक़ पैदा करनेवाला।
अनिशम् (सं॰ अव्य॰) नित्य, नित्यदा, सदा, अजस्र, सन्तत, रोज़, दिन-ब-दिन, हमेशा, आठपहर, बेरुके हुए।
अनिशित (सं॰ त्रि॰) अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
अनिशितसर्ग (सं॰ त्रि॰) अविरत प्रवाहशाली, लगातार बहनेवाला, जिसकी धारा कभी न रुके।
अनिश्चित (सं॰ त्रि॰) अनवधारित, अविवेचित, यक़ीन न किया गया, जो पक्का न पड़ा हो।
अनिश्चित्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचितासे, विना निश्चय निकाले, यक़ीन न करके, उटक्करपच्चू।
अनिश्चिन्त्य (सं॰ त्रि॰) विचारसे बुद्धिमें न बैठने-वाला, जो ख़्याल से समझ में न चढे, निश्चय निकालनेके अयोग्य, यक़ीन करनेके नाक़ाबिल, जो समझमें न समा सके।
अनिश्शस्त (सं॰ त्रि॰) निर्-शन्स-क्त, निशशस्तं अप्रशस्तम्, नि-निश्-शस्तम्, नञ्-तत्। १ प्रशस्त, अनिन्दित। २ सुखी, खुश, खुला। ३ जिसकी बुराई न सुन पड़े।
अनिषङ्ग (सं॰ त्रि॰) निषङ्गशून्य, तूणविहीन, बेतरकस, जो हथियार न हिलाये हो।
अनिषव्य (वै॰ त्रि॰) बधके अयोग्य, क़त्लके नाक़ाबिल; जिसे मार डालना ठीक न हो।
अनिषिद्ध (सं॰ त्रि॰) निषेधरहित, अनाज्ञाविहीन,<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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</noinclude>अनिलाशिन् (सं॰ त्रि॰) वायुका भक्षण भोगते हुवा, हवाको खाकर जीनेवाला, भोजन न पाते हुवा, जो खानेको न चख रहा हो।
अनिलाशी, <small>अनिलाशिन् देखो</small>
अनिलोचित (सं॰ पु॰) नीलमाषक, काला उड़द।
अनिलोडित (सं॰ त्रि॰) अनुभवविहीन, नातजरबेकार, जिसे किसी बातका अच्छी तरह हाल मालूम न हो।
अनिवर्तन (सं॰ त्रि॰) १ निवर्तनरहित, न लौटते हुवा। २ स्थायी, स्थिर, जमा हुवा, पायंदार। ३ अत्याज्य, छोड़ा न जानेवाला, उपयुक्त, ठीक।
अनिवर्त्तित्व (सं॰ क्ली॰) पश्चादुपद न पड़नेका भाव, वापस न आनेकी हालत, वीरत्व, बहादुरी।
अनिवर्त्तिन् (सं॰ त्रि॰) न निवर्तते, नि-वृत-णिनि नञ्-तत्। १ कार्य अपूर्ण रहते शान्त न होनेवाला, अधूरा काम होते जो ठण्डा न पड़े। २ वीर, बहादुर, दुश्मन के सामनेसे न हटनेवाला। ३ लगा हुवा, जो कामसे मुंह न फेरे। (पु॰) ४ परमेश्वर। ५ विष्णु।
अनिवर्ती, <small>अनिवर्तिन् देखो।</small>
अनिवारित (सं॰ त्रि॰) निवारणशून्य, अबाध, न रोका गया, जिसे किसी ने हटका न हो।
अनिवार्य (सं॰ त्रि॰) निवारणके अयोग्य, रोकनेके नाक़ाबिल, जिसे हटक न सकें।
अनिविशमान (सं॰ त्रि॰) न निविशमानम्, नि-विश्-शानच्। १ निवेशरूप स्थितिशून्य, बैठा न रहनेवाला। २ सर्वदा गमनकारी, हमेशा चलने-वाला। ३ एक स्थानमें अस्थित, एक जगह न ठह रनेवाला। ४ परिव्राजक। ५ अवकाशशून्य, आराम
न अड़ानेवाला।
अनिवृत, अनिवृत्त (सं॰ त्रि॰) अबाध, रोका न गया।
अनिवृत्ति-वादर (सं॰ पु॰) परिणामको त्याग वासना बसानेवाला कर्म, जिस कामका नतीजा तो मिट जाये, लेकिन बू बनी हो रहे। यह कर्मवाद जैन-शास्त्रमें कहा गया है।
अनिवेदित (सं॰ त्रि॰) अकथित, अनुक्त, न कहा गया, जिसका जिक्ऱ न जमा हो।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिवेदितविज्ञात (सं॰ त्रि॰) विना कथन अनुभूत बेकहे समझा गया।
अनिवेद्य (सं॰ अव्य॰) विना निवेदन सुनाये, बेइत्तिला दिये।
अनिवेशन (सं॰ त्रि॰) उपवेशनस्थानशून्य, बैठनेकी जगह न रखनेवाला।
अनिश (सं॰ त्रि॰) निशायाः जनानां चेष्टाविनाश-हेतुतया लक्षणया निशा चेष्टाविनाशः सा नास्ति यस्य यस्मिन् वा, नञ्-बहुव्री॰। १ अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
२ रात्रिवर्जित, शबसे ख़ाली। ३ सर्वदा भयजनक, हमेशा खौक़ पैदा करनेवाला।
अनिशम् (सं॰ अव्य॰) नित्य, नित्यदा, सदा, अजस्र, सन्तत, रोज़, दिन-ब-दिन, हमेशा, आठपहर, बेरुके हुए।
अनिशित (सं॰ त्रि॰) अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
अनिशितसर्ग (सं॰ त्रि॰) अविरत प्रवाहशाली, लगातार बहनेवाला, जिसकी धारा कभी न रुके।
अनिश्चित (सं॰ त्रि॰) अनवधारित, अविवेचित, यक़ीन न किया गया, जो पक्का न पड़ा हो।
अनिश्चित्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचितासे, विना निश्चय निकाले, यक़ीन न करके, उटक्करपच्चू।
अनिश्चिन्त्य (सं॰ त्रि॰) विचारसे बुद्धिमें न बैठने-वाला, जो ख़्याल से समझ में न चढे, निश्चय निकालनेके अयोग्य, यक़ीन करनेके नाक़ाबिल, जो समझमें न समा सके।
अनिश्शस्त (सं॰ त्रि॰) निर्-शन्स-क्त, निशशस्तं अप्रशस्तम्, नि-निश्-शस्तम्, नञ्-तत्। १ प्रशस्त, अनिन्दित। २ सुखी, खुश, खुला। ३ जिसकी बुराई न सुन पड़े।
अनिषङ्ग (सं॰ त्रि॰) निषङ्गशून्य, तूणविहीन, बेतरकस, जो हथियार न हिलाये हो।
अनिषव्य (वै॰ त्रि॰) बधके अयोग्य, क़त्लके नाक़ाबिल; जिसे मार डालना ठीक न हो।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अनिलाशी, <small>अनिलाशिन् देखो</small>
अनिलोचित (सं॰ पु॰) नीलमाषक, काला उड़द।
अनिलोडित (सं॰ त्रि॰) अनुभवविहीन, नातजरबेकार, जिसे किसी बातका अच्छी तरह हाल मालूम न हो।
अनिवर्तन (सं॰ त्रि॰) १ निवर्तनरहित, न लौटते हुवा। २ स्थायी, स्थिर, जमा हुवा, पायंदार। ३ अत्याज्य, छोड़ा न जानेवाला, उपयुक्त, ठीक।
अनिवर्त्तित्व (सं॰ क्ली॰) पश्चादुपद न पड़नेका भाव, वापस न आनेकी हालत, वीरत्व, बहादुरी।
अनिवर्त्तिन् (सं॰ त्रि॰) न निवर्तते, नि-वृत-णिनि नञ्-तत्। १ कार्य अपूर्ण रहते शान्त न होनेवाला, अधूरा काम होते जो ठण्डा न पड़े। २ वीर, बहादुर, दुश्मन के सामनेसे न हटनेवाला। ३ लगा हुवा, जो कामसे मुंह न फेरे। (पु॰) ४ परमेश्वर। ५ विष्णु।
अनिवर्ती, <small>अनिवर्तिन् देखो।</small>
अनिवारित (सं॰ त्रि॰) निवारणशून्य, अबाध, न रोका गया, जिसे किसी ने हटका न हो।
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अनिविशमान (सं॰ त्रि॰) न निविशमानम्, नि-विश्-शानच्। १ निवेशरूप स्थितिशून्य, बैठा न रहनेवाला। २ सर्वदा गमनकारी, हमेशा चलने-वाला। ३ एक स्थानमें अस्थित, एक जगह न ठह रनेवाला। ४ परिव्राजक। ५ अवकाशशून्य, आराम
न अड़ानेवाला।
अनिवृत, अनिवृत्त (सं॰ त्रि॰) अबाध, रोका न गया।
अनिवृत्ति-वादर (सं॰ पु॰) परिणामको त्याग वासना बसानेवाला कर्म, जिस कामका नतीजा तो मिट जाये, लेकिन बू बनी हो रहे। यह कर्मवाद जैन-शास्त्रमें कहा गया है।
अनिवेदित (सं॰ त्रि॰) अकथित, अनुक्त, न कहा गया, जिसका जिक्ऱ न जमा हो।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिवेदितविज्ञात (सं॰ त्रि॰) विना कथन अनुभूत बेकहे समझा गया।
अनिवेद्य (सं॰ अव्य॰) विना निवेदन सुनाये, बेइत्तिला दिये।
अनिवेशन (सं॰ त्रि॰) उपवेशनस्थानशून्य, बैठनेकी जगह न रखनेवाला।
अनिश (सं॰ त्रि॰) निशायाः जनानां चेष्टाविनाश-हेतुतया लक्षणया निशा चेष्टाविनाशः सा नास्ति यस्य यस्मिन् वा, नञ्-बहुव्री॰। १ अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
२ रात्रिवर्जित, शबसे ख़ाली। ३ सर्वदा भयजनक, हमेशा खौक़ पैदा करनेवाला।
अनिशम् (सं॰ अव्य॰) नित्य, नित्यदा, सदा, अजस्र, सन्तत, रोज़, दिन-ब-दिन, हमेशा, आठपहर, बेरुके हुए।
अनिशित (सं॰ त्रि॰) अविरत, निरन्तर, बराबर, लगातार।
अनिशितसर्ग (सं॰ त्रि॰) अविरत प्रवाहशाली, लगातार बहनेवाला, जिसकी धारा कभी न रुके।
अनिश्चित (सं॰ त्रि॰) अनवधारित, अविवेचित, यक़ीन न किया गया, जो पक्का न पड़ा हो।
अनिश्चित्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचितासे, विना निश्चय निकाले, यक़ीन न करके, उटक्करपच्चू।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४२'''|'''अनिषु—अनिसर्ग'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>मना न किया गया, जिसको कोई रोक-टोक न रहे।
अनिषु (सं॰ त्रि॰) वाणविहीन, तीर न रखनेवाला।
अनिष्कृत (सं॰ त्रि॰) १ पूर्ण न किया गया, पूरा न पड़ा। २ अविवेचित, फ़ैसल न हुवा।
अनिष्कृतैनस् (सं॰ त्रि॰) अविवेचित-अपराध, जिसके जुर्मका ठौर-ठीक न ठना हो; अपने अपराधके निमित्त प्रायश्चित्त न पहुंचानेवाला, जो अपने जुर्मपर तोबा न तौले।
अनिष्ट (सं॰ क्ली॰) इष-क्त, न इष्टम्, विरोधे नञ्-तत्। १ अपकार, बदकारी। २ दुःख, तकलीफ़। ३ विषाद, अफ़सोस। ४ पाप, इज़ाब। ५ अमङ्गल, बुराई। ६ हानि, नुक़सान। ७ विपद्, आफ़त।
{{Block center|<poem><small>"अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभा।
यत्रास्ते विषसं सर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे॥" (हितोपदेश)</small></poem>}}
अनिष्टकर वस्तुके साथ इष्टकर वस्तु मिलते भी कोई भलाई नहीं निकलती। क्योंकि अमृतमें ज़रा सा विष रहनेसे मृत्यु आ धमकती है।
(त्रि॰) ८ अनिच्छित, अनभिलषित, ख़्वाहिश न किया गया, चाहके नाक़ाबिल। ९ अधम, खराब। १० अशुद्ध, ग़लत। ११ कुत्सित, बद। १२ हतभाग्य, कमबख्त। १३ अशुभ, बदशिगून्। १४ वलि न चढ़ाया गया।
अनिष्टकर (सं॰ त्रि॰) अपकारकारक, बुराई बघारनेवाला।
अनिष्टकर्मन् (हालेय)—दाक्षिणात्यके नृपति-विशेष। भागवतमें इनका नाम लिखा गया है।
अनिष्टग्रह (सं॰ पु॰) अशुभग्रह, बुरा सितारा।
अनिष्टदुष्टधी (सं॰ त्रि॰) अधम एवं अशुभ बुद्धि-सम्पन्न, बुरे और बिगड़े दमाग़वाला।
अनिष्टप्रसङ्ग (सं॰ पु॰) अधम पदार्थ, तर्क अथवा नियमका सम्बन्ध, जो ताल्लुक़ ख़राब शै, बहस या कायदेसे पड़े।
अनिष्टफल (सं॰ क्ली॰) अशुभ फल, ख़राब नतीजा।
अनिष्टशङ्का (सं॰ स्त्री॰) पाप या अभाग्यका सन्देह, इज़ाब या बदक़िस्मतीका शक।
अनिष्टसूचक (सं॰ त्रि॰) अपकारकी सूचना देने-वाला, अशुभ, जो बुराईकी इत्तिला लाये, बदशिगून्। (स्त्री॰) अनिष्टसूचिका।
अनिष्टहेतु (सं॰ पु॰) अशुभ लक्षण, बद आसार।
अनिष्टा (सं॰ स्त्री॰) नागबला, बरियारी, खरेटी।
अनिष्टापादन (सं॰ क्ली॰) १ अभिलषित पदार्थकी अप्राप्ति, ख़्वाहिश की हुयी चीज़की नादस्तयाबी। २ अनभिलषित पदार्थकी प्राप्ति, बेचाही चीज़ की दस्तयाबी।
अनिष्टाप्ति (सं॰ स्त्री॰) <small>अनिष्टापादन देखो।</small>
अनिष्टाशंसिन्, <small>अनिष्टसूचक देखो।</small>
अनिष्टिन् (सं॰ त्रि॰) इष्टं अनेन यज-भावे क्त, ततोऽस्त्यर्थे इनि; न इष्टी, नञ्-तत्। यागयज्ञ-रहित, यज्ञ न करनेवाला।
अनिष्टृत (वै॰ त्रि॰) अबाध, निराघात, ग़ैरमग़लब, बेज़ख़्म, जिसके चोट न लगी हो या जो रोका न गया हो।
अनिष्ठा (सं॰ स्त्री॰) १ अनस्थिरता, चञ्चलता, नापायदारी, बेसबाती, टिके न रहनेकी हालत। २ अविश्वास, नायेतबारी। ३ नागबला, बरियारी।
अनिष्ठुर (सं॰ त्रि॰) निष्ठुरतारहित, बदमिज़ाज नहीं, जो कड़े दिलका न हो।
अनिष्णात (सं॰ त्रि॰) इष्टं अनेन; यज-भावे क्त, ततो नञ्-तत्। <small>निनदीभ्यां स्रातेः कौशले। पा ८।३।८९।</small> अकुशल, अनभिज्ञ, अकृती, बेहुनर, बेवक़ूफ, नारसीदा, जिसने कभी कुछ देखा-सुना न हो।
अनिष्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) अप्राप्ति, अपूर्णता, नाकमालियत, नाकामयाबी, पहुंच न सकनेकी हालत।
अनिष्पन्न (सं॰ त्रि॰) १ अपूर्ण, खाली। २ जो पहुंचा न हो।
अनिष्पत्र (सं॰ त्रि॰) न निःसृतं पत्रं पक्षोऽत्र, नञ्-बहुव्री॰। अखण्ड, समूचा, जो टूटा न हो। यह वाण शब्दका विशेषण है।
अनिष्पत्त्रम् (सं॰ अव्य॰) विना अधिक वेगके, जिसमें वाण फोड़कर बाहर न निकले।
अनिसर्ग (वै॰ त्रि॰) अप्राकृत, अप्राकृत रूपसे साधित,<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अनिषु (सं॰ त्रि॰) वाणविहीन, तीर न रखनेवाला।
अनिष्कृत (सं॰ त्रि॰) १ पूर्ण न किया गया, पूरा न पड़ा। २ अविवेचित, फ़ैसल न हुवा।
अनिष्कृतैनस् (सं॰ त्रि॰) अविवेचित-अपराध, जिसके जुर्मका ठौर-ठीक न ठना हो; अपने अपराधके निमित्त प्रायश्चित्त न पहुंचानेवाला, जो अपने जुर्मपर तोबा न तौले।
अनिष्ट (सं॰ क्ली॰) इष-क्त, न इष्टम्, विरोधे नञ्-तत्। १ अपकार, बदकारी। २ दुःख, तकलीफ़। ३ विषाद, अफ़सोस। ४ पाप, इज़ाब। ५ अमङ्गल, बुराई। ६ हानि, नुक़सान। ७ विपद्, आफ़त।
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यत्रास्ते विषसं सर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे॥" (हितोपदेश)</small></poem>}}
अनिष्टकर वस्तुके साथ इष्टकर वस्तु मिलते भी कोई भलाई नहीं निकलती। क्योंकि अमृतमें ज़रा सा विष रहनेसे मृत्यु आ धमकती है।
(त्रि॰) ८ अनिच्छित, अनभिलषित, ख़्वाहिश न किया गया, चाहके नाक़ाबिल। ९ अधम, खराब। १० अशुद्ध, ग़लत। ११ कुत्सित, बद। १२ हतभाग्य, कमबख्त। १३ अशुभ, बदशिगून्। १४ वलि न चढ़ाया गया।
अनिष्टकर (सं॰ त्रि॰) अपकारकारक, बुराई बघारनेवाला।
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अनिष्टा (सं॰ स्त्री॰) नागबला, बरियारी, खरेटी।
अनिष्टापादन (सं॰ क्ली॰) १ अभिलषित पदार्थकी अप्राप्ति, ख़्वाहिश की हुयी चीज़की नादस्तयाबी। २ अनभिलषित पदार्थकी प्राप्ति, बेचाही चीज़ की दस्तयाबी।
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अनिष्टाशंसिन्, <small>अनिष्टसूचक देखो।</small>
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अनिष्टृत (वै॰ त्रि॰) अबाध, निराघात, ग़ैरमग़लब, बेज़ख़्म, जिसके चोट न लगी हो या जो रोका न गया हो।
अनिष्ठा (सं॰ स्त्री॰) १ अनस्थिरता, चञ्चलता, नापायदारी, बेसबाती, टिके न रहनेकी हालत। २ अविश्वास, नायेतबारी। ३ नागबला, बरियारी।
अनिष्ठुर (सं॰ त्रि॰) निष्ठुरतारहित, बदमिज़ाज नहीं, जो कड़े दिलका न हो।
अनिष्णात (सं॰ त्रि॰) इष्टं अनेन; यज-भावे क्त, ततो नञ्-तत्। <small>निनदीभ्यां स्रातेः कौशले। पा ८।३।८९।</small> अकुशल, अनभिज्ञ, अकृती, बेहुनर, बेवक़ूफ, नारसीदा, जिसने कभी कुछ देखा-सुना न हो।
अनिष्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) अप्राप्ति, अपूर्णता, नाकमालियत, नाकामयाबी, पहुंच न सकनेकी हालत।
अनिष्पन्न (सं॰ त्रि॰) १ अपूर्ण, खाली। २ जो पहुंचा न हो।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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</noinclude>क़ुदरतके खिलाफ़, मसनूयी तौरसे असर डाला गया, जो असली न हो।
अनिःसारा (सं॰ स्त्री॰) कदली, केला।
अनिस्तब्ध (सं॰ त्रि॰) १ सञ्चालनशून्य अथवा कठोर न बनाया गया, जो बेहरकत या सख़्त न बना हो। २ बन्धनशून्य, न जकड़ा हुवा। ३ अस्थिर, बेमुक़रर जो बंधा न हो।
अनिस्तीर्ण (सं॰ त्रि॰) १ पार न किया गया। २ अलग न रखा हुवा। ३ रुका। ४ उत्तर या जबाब न पाया।
अनिस्तीर्णाभियोग (सं॰ पु॰) अभियोगमें काट-कूटसे छुटकारा न पाये हुवा प्रतिवादी, जिस मुद्दालहको तरदीदसे जुर्म में रिहायी न मिली हो।
अनी (हिं॰ स्त्री॰) १ नोक धार, हथियारका सिरा। २ नौकाका अग्रभाग, नावकी नोक, गल-ही। ३ जूतेका माथा। ४ जलके मध्य प्रसारित भूमिका अग्रभाग, पानीमें घुसी ज़मीनकी नोक। ५ सेना, फ़ौज। <small>"रणके अन्त फिरी दोउ अनी।" (तुलसीदास)</small> ६ ग्लानि, ग़म, खेद, खराश, लाग। (सम्बो॰) १ अरी, ओरी।
अनीक (सं॰ पु॰) अनिति अभिमुख्यं गच्छतीति, अन-ईकन्-किच्च। <small>अनिहषिभ्यां किच्च। उण् ४।१७ ।</small> १ सेना, कटक, दल, फ़ौज। <small>"ध्वजिनी वाहिनौ सेना पृतनाऽनीकिनी चमृः। वरूथिनी बलं सैन्यं चक्रं चानीकमस्त्रियाम्॥" (अमर)</small> अन्यते अभिमुख्यमभ्यागम्यते यत्र। २ युद्ध, कलह, जङ्ग, लड़ाई। <small>"रथराजिपत्तिकारिणीसमाकुलं तदनीकयोः समगत-द्वयम्मिथः।" (माघ १३।१७)</small> ३ मुख, मुंहाना। ४ चेष्टा, सूरत। ५ ज्योतिः, चमक। ६ अग्रभाग, नोक। ७ तट, किनारा। ८ क्षेत्र, मैदान। ९ श्रेणी, क़तार। १० गमन, कूच। (हिं॰ वि॰) ११ अनुत्तम, ख़राब।
अनीकवत् (वै॰ पु॰) अग्नि जो सर्वाग्रमें प्रतिष्ठित हैं।
अनीकविदारण (सं॰ पु॰) सैन्यको विचूर्ण बनाने-वाला व्यक्ति, जो शख्स फ़ौजको फार डाले।
अनीकशस् (सं॰ अव्य॰) सैन्यके शासनसे, फ़ौजके क़ायदेपर; गमनशील दलमें, कूच करते हुये ज़ख़ीरेमें, रेखा-रेखा, क़तार-क़तार।
अनीकस्थ (सं॰ पु॰) अनीके युद्धे तिष्ठति, स्था-क। १ युद्ध-गत सैन्य, ज़ङ्गमें पहुंची हुयी फ़ौज। २ योद्धा, सिपाही। ३ राजरक्षिवर्ग, बादशाहकी हिफ़ाजत रखनेवाली फ़ौज। ४ हस्तिशिक्षा-विचक्षण, हाथी सिखानेका उस्ताद, महावत। ५ चिह्न, सङ्केत, निशान, इशारा। ६ योद्धाका मर्दलक, सिपाहीवाला ढोल, जुझावू डङ्का।
{{Block center|<poem><small>'अनीकस्थो रणगते हस्तिशिचाविचचणे।
राजरक्षिणि चिह्ने च वीरमर्दलकेऽपि च॥'(मेदिनी)</small></poem>}}
अनीकिनी (सं॰ स्त्री॰) अनीकानां सेनानां समूहः, अनीक-इनि। १ सैन्य, फ़ौज। २ हस्ती-प्रभृति-संख्या-विशेष-युक्त सेना, निराली टोली। ३ दो हज़ार एक सौ सड़सठ हस्ती, दो हज़ार एक सौ सड़सठ रथ, छः हज़ार पांच सौ एकसठ घोड़े और दश हज़ार नौ सौ पैंतीस सिपाहीकी फौज। अमरकोषमें सेनाकी संख्या इसतरह लिखी गई है,—
{{Block center|<poem><small>"एकेभैकरथा अश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका।
प्रत्यङ्गैस्त्रिगुणेः सर्वैः क्रमादाख्वा यथोत्तरम्।
अनी किनी दशानीकिन्यक्षौहिण्यथ सम्पदि।"</small></poem>}}
एक हाथी होनेसे फ़ौजको एकेभा कहते हैं। एक रथसे एकरथा कहलाती है। तीन घोड़ेसे,—अश्वा होती है। पांच सिपाही पञ्चपदातिका बनाते हैं। इन सबको मिलाकर पत्ति पाते हैं। दूसरे,—<small>"एकरथो गजश्चैको नराः पञ्चपदातयः। त्रयश्च तुरगास्तजज्ञैः पत्तिरित्य-भिधीयते॥"</small> एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सिपाही और तीन घोड़े रहनेसे फौजको पत्ति कहते हैं। ऊपर पत्तिकी जो गिनती लिखी, उसे बार-बार तीनसे गुणित करनेपर क्रममें सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू, अनीकिनी, दशानीकिनी, और अक्षौहिणी बनती है। ४ कमलिनी, छोटा कमल।
अनीक्षण (सं॰ क्ली॰) अवलोकनका अभाव, किसी-चीज़का न देखना।
अनीच (सं॰ त्रि॰) उच्च, ऊंचा, इज्ज़तदार, माननीय, जो नीच या कमीना न हो। २ अनुदात्त स्वरसे न बोला जानेवाला, जिसका तलफ़फ़ुज़ हलका आवाज़ से न निकले।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिःसारा—अनीच'''|'''४४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>क़ुदरतके खिलाफ़, मसनूयी तौरसे असर डाला गया, जो असली न हो।
अनिःसारा (सं॰ स्त्री॰) कदली, केला।
अनिस्तब्ध (सं॰ त्रि॰) १ सञ्चालनशून्य अथवा कठोर न बनाया गया, जो बेहरकत या सख़्त न बना हो। २ बन्धनशून्य, न जकड़ा हुवा। ३ अस्थिर, बेमुक़रर जो बंधा न हो।
अनिस्तीर्ण (सं॰ त्रि॰) १ पार न किया गया। २ अलग न रखा हुवा। ३ रुका। ४ उत्तर या जबाब न पाया।
अनिस्तीर्णाभियोग (सं॰ पु॰) अभियोगमें काट-कूटसे छुटकारा न पाये हुवा प्रतिवादी, जिस मुद्दालहको तरदीदसे जुर्म में रिहायी न मिली हो।
अनी (हिं॰ स्त्री॰) १ नोक धार, हथियारका सिरा। २ नौकाका अग्रभाग, नावकी नोक, गल-ही। ३ जूतेका माथा। ४ जलके मध्य प्रसारित भूमिका अग्रभाग, पानीमें घुसी ज़मीनकी नोक। ५ सेना, फ़ौज। <small>"रणके अन्त फिरी दोउ अनी।" (तुलसीदास)</small> ६ ग्लानि, ग़म, खेद, खराश, लाग। (सम्बो॰) १ अरी, ओरी।
अनीक (सं॰ पु॰) अनिति अभिमुख्यं गच्छतीति, अन-ईकन्-किच्च। <small>अनिहषिभ्यां किच्च। उण् ४।१७ ।</small> १ सेना, कटक, दल, फ़ौज। <small>"ध्वजिनी वाहिनौ सेना पृतनाऽनीकिनी चमृः। वरूथिनी बलं सैन्यं चक्रं चानीकमस्त्रियाम्॥" (अमर)</small> अन्यते अभिमुख्यमभ्यागम्यते यत्र। २ युद्ध, कलह, जङ्ग, लड़ाई। <small>"रथराजिपत्तिकारिणीसमाकुलं तदनीकयोः समगत-द्वयम्मिथः।" (माघ १३।१७)</small> ३ मुख, मुंहाना। ४ चेष्टा, सूरत। ५ ज्योतिः, चमक। ६ अग्रभाग, नोक। ७ तट, किनारा। ८ क्षेत्र, मैदान। ९ श्रेणी, क़तार। १० गमन, कूच। (हिं॰ वि॰) ११ अनुत्तम, ख़राब।
अनीकवत् (वै॰ पु॰) अग्नि जो सर्वाग्रमें प्रतिष्ठित हैं।
अनीकविदारण (सं॰ पु॰) सैन्यको विचूर्ण बनाने-वाला व्यक्ति, जो शख्स फ़ौजको फार डाले।
अनीकशस् (सं॰ अव्य॰) सैन्यके शासनसे, फ़ौजके क़ायदेपर; गमनशील दलमें, कूच करते हुये ज़ख़ीरेमें, रेखा-रेखा, क़तार-क़तार।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनीकस्थ (सं॰ पु॰) अनीके युद्धे तिष्ठति, स्था-क। १ युद्ध-गत सैन्य, ज़ङ्गमें पहुंची हुयी फ़ौज। २ योद्धा, सिपाही। ३ राजरक्षिवर्ग, बादशाहकी हिफ़ाजत रखनेवाली फ़ौज। ४ हस्तिशिक्षा-विचक्षण, हाथी सिखानेका उस्ताद, महावत। ५ चिह्न, सङ्केत, निशान, इशारा। ६ योद्धाका मर्दलक, सिपाहीवाला ढोल, जुझावू डङ्का।
{{Block center|<poem><small>'अनीकस्थो रणगते हस्तिशिचाविचचणे।
राजरक्षिणि चिह्ने च वीरमर्दलकेऽपि च॥'(मेदिनी)</small></poem>}}
अनीकिनी (सं॰ स्त्री॰) अनीकानां सेनानां समूहः, अनीक-इनि। १ सैन्य, फ़ौज। २ हस्ती-प्रभृति-संख्या-विशेष-युक्त सेना, निराली टोली। ३ दो हज़ार एक सौ सड़सठ हस्ती, दो हज़ार एक सौ सड़सठ रथ, छः हज़ार पांच सौ एकसठ घोड़े और दश हज़ार नौ सौ पैंतीस सिपाहीकी फौज। अमरकोषमें सेनाकी संख्या इसतरह लिखी गई है,—
{{Block center|<poem><small>"एकेभैकरथा अश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका।
प्रत्यङ्गैस्त्रिगुणेः सर्वैः क्रमादाख्वा यथोत्तरम्।
अनी किनी दशानीकिन्यक्षौहिण्यथ सम्पदि।"</small></poem>}}
एक हाथी होनेसे फ़ौजको एकेभा कहते हैं। एक रथसे एकरथा कहलाती है। तीन घोड़ेसे,—अश्वा होती है। पांच सिपाही पञ्चपदातिका बनाते हैं। इन सबको मिलाकर पत्ति पाते हैं। दूसरे,—<small>"एकरथो गजश्चैको नराः पञ्चपदातयः। त्रयश्च तुरगास्तजज्ञैः पत्तिरित्य-भिधीयते॥"</small> एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सिपाही और तीन घोड़े रहनेसे फौजको पत्ति कहते हैं। ऊपर पत्तिकी जो गिनती लिखी, उसे बार-बार तीनसे गुणित करनेपर क्रममें सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू, अनीकिनी, दशानीकिनी, और अक्षौहिणी बनती है। ४ कमलिनी, छोटा कमल।
अनीक्षण (सं॰ क्ली॰) अवलोकनका अभाव, किसी-चीज़का न देखना।
अनीच (सं॰ त्रि॰) उच्च, ऊंचा, इज्ज़तदार, माननीय, जो नीच या कमीना न हो। २ अनुदात्त स्वरसे न बोला जानेवाला, जिसका तलफ़फ़ुज़ हलका आवाज़ से न निकले।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४४'''|'''अनीचानुवतिन्—अनीहा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीचानुवर्तिन् (सं॰ त्रि॰) १ नीच प्रसङ्ग न रखते हुवा, जो कमीनेकी सोहबत इख़्तियार न करता हो। (पु॰) ३ कृतज्ञतापूर्ण प्रेमी या स्वामी, वफ़ादार आशक या ख़्वाविन्द।
अनीचैस् (सं॰ त्रि॰) अनुदात्त स्वरसे नहीं, बुलन्द-आवाज़में, चिल्लाकर, गला फाड़-फाड़।
अनीठ (हिं॰ त्रि॰) १ अनिष्ट, अनीप्सित, बेचाहा, ख़्वाहिश न किया गया। २ अधम, ख़राब।
अनीड (सं॰ त्रि॰) १ वासस्थानविहीन, घोंसला या घर न रखनेवाला। २ निरवयव, वग़ैरजिस्म, जिस के शरीर या जिस्म न रहे। (पु॰) ३ अग्नि, आग।
अनीत (हिं॰) <small>अनीति देखो।</small>
अनीति (सं॰ स्त्री॰) विरोधार्थे नञ्-तत्। १ दुर्नीति, अन्याय, बेइन्साफ़ी, ज़ुल्म। २ असभ्यता, नाशायश्तगी। ३ अत्याचार, ज़बरदस्ती। ४ विपज्जनक ऋतुसे मुक्ति, ग़जबनाक मौसमसे छुटकारा।
अनीतिज्ञ (सं॰ त्रि॰) १ नीतिकुशल, क़ानून क़ायदे से वाक़िफ़। २ असभ्य, नाशायस्ता, जो क़ायदा-क़ानून से वाक़िफ़ न हो।
अनीतिमान् (सं॰ त्रि॰) अनीति अड़ानेवाला, जो ज़ुल्म जमाये। (स्त्री॰) अनीतिमती।
अनीतिविद्, <small>अनीतिज्ञ देखो।</small>
अनीदृश (सं॰ त्रि॰) असदृश, अतुल्य, असमान, नाहमवार, एक-जैसा नहीं, मुतफ़रिक़।
अनीप्सित (सं॰ त्रि॰) अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनीरसन (सं॰ त्रि॰) मेखला युक्त, जो कमरबन्दसे ख़ाली न रहे।
अनीलबाजी (सं॰ पु॰) अर्जुन, जो सफ़ेद घोड़ा रखते हैं।
अनीली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, काश नामकी घास।
अनीश (सं॰ पु॰) नास्ति ईशः प्रभुः, अधिकारी वा यस्य, नञ्-बहुव्री॰। १ विष्णु। विष्णुके अनीश कहानेका कारण यही है, कि उनका कोई नियन्ता नहीं होता, वही सब आज्ञा चलाते हैं। (त्रि॰) २ प्रभुशून्य, बेमालिक, जिसका कोई रखवारा न
रहे। ३ शक्तिशून्य, बिला-ताक़त। ४ अस्वतन्त्र, मातहत। ५ अधिकाररहित, बेमज़ाज।
भिन्न, जो परमेश्वर न हो।
{{Block center|<small><poem>"ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्र समेत्य भ्रातरः समम्।
भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतः॥" (मनु ९।१०४)</small></poem>}}
अनीशत्व (सं॰ क्ली॰) शक्तिशून्यता, नाताक़ती, बेबसी।
अनीशा (सं॰ स्त्री॰) १ दीनता, बेबसी। २ साहाय्य-राहित्य, बेमददी।
अनीश्वर (सं॰ क्ली॰) नास्ति ईश्वरस्य कर्तृत्वं यत्र। १ जगत्, जहान्। अनेकको विश्वास है, कि इस जगत्की सृष्टि सजानेमें ईश्वरका कुछ भी कर्तृत्व नहीं, यह आप ही आप बन गया है। नास्ति ईश्वरबु द्धिर्यस्य, नञ्-बहुव्री॰। २ नास्तिक, परमेश्वरको न माननेवाला व्यक्ति। (त्रि॰) ३ प्रभुविहीन, बेमालिक। ४ अबाध, जो रोका न रुके। ५ शक्ति-शून्य, नाताक़त। ६ ईश्वर-भिन्न, परमेश्वर से सम्बन्ध न रखनेवाला।
अनीश्वरता (सं॰ स्त्री॰) परमेश्वरकी अनुपस्थिति, ईश्वरका न रहना, ईश्वराभाव।
अनीश्वरत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनीश्वरता देखो।</small>
अनीश्वरवाद (सं॰ पु॰) १ ईश्वररहित वितर्क, बहस जिसमें इश्वरका रहना न माना जाये। २ नास्तिकता, ईश्वरका न मानना। ३ मीमांसा, जिसमें कर्म ही प्रधान रखा गया है।
अनीश्वरवादिन् (सं॰ पु॰) नास्तिक, ईश्वरको न माननेवाला।
अनीश्वरवादी, <small>अनीश्वरवादिन् देखो।<small>
अनीसून (हिं॰ पु॰) सौंफ जो भारतके उत्तरमें ख़ूब उपजती है।
अनीह (सं॰ त्रि॰) नास्ति ईहा चेष्टा यस्य, नञ्-बहुव्री। १ चेष्टाशून्य, बेपरवा। २ स्पृहारहित, बे ख़्वाहिश। (पु॰) ३ अयोध्याके नृपति-विशेष।
अनीहा (सं॰ स्त्री॰) चेष्टाशून्यता, स्पृहाराहित्य; बेपरवायी, बेख़्वाहिशी, किसी बात के न चाहनेकी हालत।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४४'''|'''अनीचानुवतिन्—अनीहा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीचानुवर्तिन् (सं॰ त्रि॰) १ नीच प्रसङ्ग न रखते हुवा, जो कमीनेकी सोहबत इख़्तियार न करता हो। (पु॰) ३ कृतज्ञतापूर्ण प्रेमी या स्वामी, वफ़ादार आशक या ख़्वाविन्द।
अनीचैस् (सं॰ त्रि॰) अनुदात्त स्वरसे नहीं, बुलन्द-आवाज़में, चिल्लाकर, गला फाड़-फाड़।
अनीठ (हिं॰ त्रि॰) १ अनिष्ट, अनीप्सित, बेचाहा, ख़्वाहिश न किया गया। २ अधम, ख़राब।
अनीड (सं॰ त्रि॰) १ वासस्थानविहीन, घोंसला या घर न रखनेवाला। २ निरवयव, वग़ैरजिस्म, जिस के शरीर या जिस्म न रहे। (पु॰) ३ अग्नि, आग।
अनीत (हिं॰) <small>अनीति देखो।</small>
अनीति (सं॰ स्त्री॰) विरोधार्थे नञ्-तत्। १ दुर्नीति, अन्याय, बेइन्साफ़ी, ज़ुल्म। २ असभ्यता, नाशायश्तगी। ३ अत्याचार, ज़बरदस्ती। ४ विपज्जनक ऋतुसे मुक्ति, ग़जबनाक मौसमसे छुटकारा।
अनीतिज्ञ (सं॰ त्रि॰) १ नीतिकुशल, क़ानून क़ायदे से वाक़िफ़। २ असभ्य, नाशायस्ता, जो क़ायदा-क़ानून से वाक़िफ़ न हो।
अनीतिमान् (सं॰ त्रि॰) अनीति अड़ानेवाला, जो ज़ुल्म जमाये। (स्त्री॰) अनीतिमती।
अनीतिविद्, <small>अनीतिज्ञ देखो।</small>
अनीदृश (सं॰ त्रि॰) असदृश, अतुल्य, असमान, नाहमवार, एक-जैसा नहीं, मुतफ़रिक़।
अनीप्सित (सं॰ त्रि॰) अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनीरसन (सं॰ त्रि॰) मेखला युक्त, जो कमरबन्दसे ख़ाली न रहे।
अनीलबाजी (सं॰ पु॰) अर्जुन, जो सफ़ेद घोड़ा रखते हैं।
अनीली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, काश नामकी घास।
अनीश (सं॰ पु॰) नास्ति ईशः प्रभुः, अधिकारी वा यस्य, नञ्-बहुव्री॰। १ विष्णु। विष्णुके अनीश कहानेका कारण यही है, कि उनका कोई नियन्ता नहीं होता, वही सब आज्ञा चलाते हैं। (त्रि॰) २ प्रभुशून्य, बेमालिक, जिसका कोई रखवारा न<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>रहे। ३ शक्तिशून्य, बिला-ताक़त। ४ अस्वतन्त्र, मातहत। ५ अधिकाररहित, बेमज़ाज।
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भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतः॥" (मनु ९।१०४)</small></poem>}}
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अनीश्वर (सं॰ क्ली॰) नास्ति ईश्वरस्य कर्तृत्वं यत्र। १ जगत्, जहान्। अनेकको विश्वास है, कि इस जगत्की सृष्टि सजानेमें ईश्वरका कुछ भी कर्तृत्व नहीं, यह आप ही आप बन गया है। नास्ति ईश्वरबु द्धिर्यस्य, नञ्-बहुव्री॰। २ नास्तिक, परमेश्वरको न माननेवाला व्यक्ति। (त्रि॰) ३ प्रभुविहीन, बेमालिक। ४ अबाध, जो रोका न रुके। ५ शक्ति-शून्य, नाताक़त। ६ ईश्वर-भिन्न, परमेश्वर से सम्बन्ध न रखनेवाला।
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अनीचैस् (सं॰ त्रि॰) अनुदात्त स्वरसे नहीं, बुलन्द-आवाज़में, चिल्लाकर, गला फाड़-फाड़।
अनीठ (हिं॰ त्रि॰) १ अनिष्ट, अनीप्सित, बेचाहा, ख़्वाहिश न किया गया। २ अधम, ख़राब।
अनीड (सं॰ त्रि॰) १ वासस्थानविहीन, घोंसला या घर न रखनेवाला। २ निरवयव, वग़ैरजिस्म, जिस के शरीर या जिस्म न रहे। (पु॰) ३ अग्नि, आग।
अनीत (हिं॰) <small>अनीति देखो।</small>
अनीति (सं॰ स्त्री॰) विरोधार्थे नञ्-तत्। १ दुर्नीति, अन्याय, बेइन्साफ़ी, ज़ुल्म। २ असभ्यता, नाशायश्तगी। ३ अत्याचार, ज़बरदस्ती। ४ विपज्जनक ऋतुसे मुक्ति, ग़जबनाक मौसमसे छुटकारा।
अनीतिज्ञ (सं॰ त्रि॰) १ नीतिकुशल, क़ानून क़ायदे से वाक़िफ़। २ असभ्य, नाशायस्ता, जो क़ायदा-क़ानून से वाक़िफ़ न हो।
अनीतिमान् (सं॰ त्रि॰) अनीति अड़ानेवाला, जो ज़ुल्म जमाये। (स्त्री॰) अनीतिमती।
अनीतिविद्, <small>अनीतिज्ञ देखो।</small>
अनीदृश (सं॰ त्रि॰) असदृश, अतुल्य, असमान, नाहमवार, एक-जैसा नहीं, मुतफ़रिक़।
अनीप्सित (सं॰ त्रि॰) अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनीरसन (सं॰ त्रि॰) मेखला युक्त, जो कमरबन्दसे ख़ाली न रहे।
अनीलबाजी (सं॰ पु॰) अर्जुन, जो सफ़ेद घोड़ा रखते हैं।
अनीली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, काश नामकी घास।
अनीश (सं॰ पु॰) नास्ति ईशः प्रभुः, अधिकारी वा यस्य, नञ्-बहुव्री॰। १ विष्णु। विष्णुके अनीश कहानेका कारण यही है, कि उनका कोई नियन्ता नहीं होता, वही सब आज्ञा चलाते हैं। (त्रि॰) २ प्रभुशून्य, बेमालिक, जिसका कोई रखवारा न<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>रहे। ३ शक्तिशून्य, बिला-ताक़त। ४ अस्वतन्त्र, मातहत। ५ अधिकाररहित, बेमज़ाज।
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अनीशत्व (सं॰ क्ली॰) शक्तिशून्यता, नाताक़ती, बेबसी।
अनीशा (सं॰ स्त्री॰) १ दीनता, बेबसी। २ साहाय्य-राहित्य, बेमददी।
अनीश्वर (सं॰ क्ली॰) नास्ति ईश्वरस्य कर्तृत्वं यत्र। १ जगत्, जहान्। अनेकको विश्वास है, कि इस जगत्की सृष्टि सजानेमें ईश्वरका कुछ भी कर्तृत्व नहीं, यह आप ही आप बन गया है। नास्ति ईश्वरबु द्धिर्यस्य, नञ्-बहुव्री॰। २ नास्तिक, परमेश्वरको न माननेवाला व्यक्ति। (त्रि॰) ३ प्रभुविहीन, बेमालिक। ४ अबाध, जो रोका न रुके। ५ शक्ति-शून्य, नाताक़त। ६ ईश्वर-भिन्न, परमेश्वर से सम्बन्ध न रखनेवाला।
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अनीश्वरत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनीश्वरता देखो।</small>
अनीश्वरवाद (सं॰ पु॰) १ ईश्वररहित वितर्क, बहस जिसमें इश्वरका रहना न माना जाये। २ नास्तिकता, ईश्वरका न मानना। ३ मीमांसा, जिसमें कर्म ही प्रधान रखा गया है।
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अनीसून (हिं॰ पु॰) सौंफ जो भारतके उत्तरमें ख़ूब उपजती है।
अनीह (सं॰ त्रि॰) नास्ति ईहा चेष्टा यस्य, नञ्-बहुव्री। १ चेष्टाशून्य, बेपरवा। २ स्पृहारहित, बे ख़्वाहिश। (पु॰) ३ अयोध्याके नृपति-विशेष।
अनीहा (सं॰ स्त्री॰) चेष्टाशून्यता, स्पृहाराहित्य; बेपरवायी, बेख़्वाहिशी, किसी बात के न चाहनेकी हालत।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अनीहित—अनुकनखलम्'''|'''४४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीहित (सं॰ त्रि॰) १ अहित, नागवार, असन्तोषप्रद, नाख़ुश बनानेवाला, अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनु (सं॰ अव्य॰) अनितीति, अन-उ बाहुलकात्। <small>अनुर्लक्षणे। पा १।४।८४ ।</small> प्रादि उपसर्गके अन्तर्गत एक उपसर्ग। यह किसी शब्द या धातुके पहले लगनेसे भिन्नार्थ निकालता है और नहीं भी निकालता। सचराचर अनु शब्द के यह कई एक अर्थ आते हैं,—लक्षण, इत्थम्भ ताख्यान (इसतरहका जात धर्म),
भाग (अंश), वीप्सा, सन्निधि (सामीप्य), सादृश्य अथवा योगाता, आयाम (व्याप्ति, दैर्ध्य), हीन, पश्चात्, सह।—
{{Block center|<poem><small>"अनु लक्षणवीप्सेत्यम्भूत भागेषु सन्निधौ।
सादृश्यायामहीनेषु पश्चादर्थसहार्थयोः॥" (हैम)</small></poem>}}
क्रिया और संज्ञासे पहले लगनेपर यह पीछे, साथ-साथ, बग़ल-बग़ल, इधर-उधर, पास-पास, और नीचे के अर्थ में आता है। संज्ञाके साथ प्रधानतः क्रिया-विशेषणवाले समासमें इसका अर्थ बार-बार, बसबब, कई-कई, एक-एक, क़ायदे और क़रीनेसे रहता है। कर्मकार के साथ पृथक् उपसर्गकी भांति योग पानेपर यह पीछे, साथ-साथ, ऊपर, पास-पास, से, को तर्फ़, पर, बसबब, क़ायदे में और मुवाफ़िक़ का मतलब रखता है। पृथक् क्रिया-विशेषणकी भांति इसका माने पीछे, पीछेसे, उसपर, फिर, आगे, तब और दूसरे निकलता है।
<small>लक्षण</small>—शाकल्यस्य संहितामनुप्रावर्षम्। <small>अनुलक्षणें।
पा १।४।८४ ।</small> शाकल्यमुनिके संहिता पाठसे पानी बरसा। इस जगह संहितापाठका हेतु वर्षण उपलक्षित है।
<small>इत्थम्भूताख्वान</small>—साधुर्देवदत्तो मातरमनु। देवदत्त माताके तयीं साधु है। मतलब यह कि देवदत्त माताके तयीं साधुत्वरूप धर्मविशिष्ट रहता, जिससे
इत्थम्भूताख्यान देखाता है।
<small>भाग</small>—यदत्र मामनुं स्यात्। <small>लक्षणेत्थम्भू ताखयानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः। पा १।४।९० ।</small> मेरे लिये ऐसा रहे। यहां अनु भागके भावसे भरा है।
<small>सन्निधि, समोप</small>–अनुमालिनोतोरम् । मालिनी नदी -
इस अवसर में अनु सन्निधिको
तटके पास |
संभालता है ।
<small>सदृश योग्य</small>अनु रूपम् । रूपके योग्य या सदृश ।
ऐसे वाक्यमें अनु सट्टशका अर्थ देता है ।
<small>आयाम</small> अनुयमुनं मथुरा । यस्य चायामः । पा २।१।१६।
यमुनाके साथ-साथ मथुरा चलौ है । इस स्थलमें
यमुनांके आयामसे मथुराका
पड़ता है ।
<small>होन</small>अन्वर्जुनं योद्धारः ।
सारे योद्धा अर्जुनसे नीचे हैं
होता है ।
आयाम समझ
7
हौने । पा १।४।८५। यहं
यहां अनुंका होन ग्रंथ
<small> पश्चात्</small>अनुपद। पैरके पीछे-पीछे ।
पति-
रन्वगच्छत् ।” ( रघु ) राजा छायाकी तरह उसके पीछे-
पौछे चले । इस उदाहरण में अनु पौछेके मतलब से
लगा है।
<small> सह</small>पर्वतमन्ववसिता सेना ।<small> तृतीयार्थे । पा १ ४ ८५ ।</small>
पहाड़ के साथ सारी फौज मिल गयौ । ऐसे स्थान में
"अनु सहका अर्थ देता है ।
( पु० ) २ ययातिके एक पुत्र जिनका नाम अनु
रहा। इन्हों अनुसे म्लेच्छ जाति उत्पन्न हुयी थी ।
ऋग्वेद में अनु वंशका उल्लेख उठा है,<small>"यदिन्द्राग्नी यदुषु
तुर्वशेषु यदुष्वनुषु पुरुष स्थ: । (११०८८)</small>
-
३ मनुष्य, आदमी । ४ म्लेच्छ ।
अनुक (सं० त्रि०) अनुकामयते, अनु-कन् । अनुकाभि-
कामुक, कमिता, कामी,
<small>काभीकः कमिता । पा ५|२|७४ |</small>
नफ सपरस्त, पुरशहबत, मस्त ।—
<small>कामुक कमिताऽनुकः । ' ( अमर )</small>
अनुकथन ( सं० क्लो० )
गुफ्तगू, वर्णन, बयान्,
कहावत ।
संयत वचन, कायदेको
वार्ता, बातचीत, खासी
अनुकथित (सं० त्रि०) नियमित रूपसे वर्णित,
कायदे से बताया गया ।
अनुकदली ( स ० स्त्री०) काशटण, कांसको घास ।
अनुकनखलम् (सं० अव्य० ) कनखलस्य अद्रेः समीपे ।<small>
अनुर्थत् समया । पा स१।१५॥</small>कनखल पहाड़के पास । यह<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनीहित—अनुकनखलम्'''|'''४४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीहित (सं॰ त्रि॰) १ अहित, नागवार, असन्तोषप्रद, नाख़ुश बनानेवाला, अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनु (सं॰ अव्य॰) अनितीति, अन-उ बाहुलकात्। <small>अनुर्लक्षणे। पा १।४।८४ ।</small> प्रादि उपसर्गके अन्तर्गत एक उपसर्ग। यह किसी शब्द या धातुके पहले लगनेसे भिन्नार्थ निकालता है और नहीं भी निकालता। सचराचर अनु शब्द के यह कई एक अर्थ आते हैं,—लक्षण, इत्थम्भ ताख्यान (इसतरहका जात धर्म),
भाग (अंश), वीप्सा, सन्निधि (सामीप्य), सादृश्य अथवा योगाता, आयाम (व्याप्ति, दैर्ध्य), हीन, पश्चात्, सह।—
{{Block center|<poem><small>"अनु लक्षणवीप्सेत्यम्भूत भागेषु सन्निधौ।
सादृश्यायामहीनेषु पश्चादर्थसहार्थयोः॥" (हैम)</small></poem>}}
क्रिया और संज्ञासे पहले लगनेपर यह पीछे, साथ-साथ, बग़ल-बग़ल, इधर-उधर, पास-पास, और नीचे के अर्थ में आता है। संज्ञाके साथ प्रधानतः क्रिया-विशेषणवाले समासमें इसका अर्थ बार-बार, बसबब, कई-कई, एक-एक, क़ायदे और क़रीनेसे रहता है। कर्मकार के साथ पृथक् उपसर्गकी भांति योग पानेपर यह पीछे, साथ-साथ, ऊपर, पास-पास, से, को तर्फ़, पर, बसबब, क़ायदे में और मुवाफ़िक़ का मतलब रखता है। पृथक् क्रिया-विशेषणकी भांति इसका माने पीछे, पीछेसे, उसपर, फिर, आगे, तब और दूसरे निकलता है।
<small>लक्षण</small>—शाकल्यस्य संहितामनुप्रावर्षम्। <small>अनुलक्षणें।
पा १।४।८४ ।</small> शाकल्यमुनिके संहिता पाठसे पानी बरसा। इस जगह संहितापाठका हेतु वर्षण उपलक्षित है।
<small>इत्थम्भूताख्वान</small>—साधुर्देवदत्तो मातरमनु। देवदत्त माताके तयीं साधु है। मतलब यह कि देवदत्त माताके तयीं साधुत्वरूप धर्मविशिष्ट रहता, जिससे
इत्थम्भूताख्यान देखाता है।
<small>भाग</small>—यदत्र मामनुं स्यात्। <small>लक्षणेत्थम्भू ताखयानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः। पा १।४।९० ।</small> मेरे लिये ऐसा रहे। यहां अनु भागके भावसे भरा है।
<small>सन्निधि, समीप</small>—अनुमालिनीतीरम्। मालिनी नदी-तटके पास। इस अवसर में अनु सन्निधिको संभालता है।
<small>सदृश योग्य</small>—अनु रूपम्। रूपके योग्य या सदृश। ऐसे वाक्यमें अनु सदृशका अर्थ देता है।
<small>आयाम</small>—अनुयमुनं मथुरा। <small>यस्य चायामः। पा २।१।१६ ।</small> यमुनाके साथ-साथ मथुरा चली है। इस स्थलमें यमुनाके आयामसे मथुराका आयाम समझ पड़ता है।
<small>हीन</small>अन्वर्जुनं योद्धारः। <small>हीने। पा १।४।८५।</small> यह सारे योद्धा अर्जुनसे नीचे हैं यहां अनुका हीन अर्थ होता है।
<small> पश्चात्</small>—अनुपद। पैरके पीछे-पीछे। <small>पति-रन्वगच्छत्।" (रघु)</small> राजा छायाकी तरह उसके पीछे-पीछे चले। इस उदाहरण में अनु पीछेके मतलबसे लगा है।
<small>सह</small>पर्वतमन्ववसिता सेना। <small>तृतीयार्थे। पा १।४।८५ ।</small>पहाड़के साथ सारी फ़ौज मिल गयी। ऐसे स्थानमें अनु सहका अर्थ देता है।
(पु॰) २ ययातिके एक पुत्र जिनका नाम अनु रहा। इन्हीं अनुसे म्लेच्छ जाति उत्पन्न हुयी थी। ऋग्वेद में अनु वंशका उल्लेख उठा है,—<small>"यदिन्द्राग्नी यदुषु
तुर्वशेषु यद्द्रुह्यष्वनुषु पुरुष स्थः।" (१।१०८।८)</small>
३ मनुष्य, आदमी। ४ म्लेच्छ।
अनुक (सं॰ त्रि॰) अनुकामयते, अनु-कन्। <small>अनुकाभि-काभीकः कमिता। पा ५।२।७४ ।</small> कामुक, कविता, कामी, नफ़् सपरस्त, पुरशहबत, मस्त।—
{{C|<small>'कामुक कमिताऽनुकः।' (अमर)</small>}}
अनुकथन (सं॰ क्ली॰) संयत वचन, क़ायदेकी गुफ़्तगू, वर्णन, बयान्, वार्ता, बातचीत, खासी कहावत।
अनुकथित (सं॰ त्रि॰) नियमित रूपसे वर्णित, क़ायदे से बताया गया।
अनुकदली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, कांसकी घास।
अनुकनखलम् (सं॰ अव्य॰) कनखलस्य अद्रेः समीपे।<small>अनुर्यत् समया। पा २।१।१५।</small>कनखल पहाड़के पास। यह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनीहित—अनुकनखलम्'''|'''४४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीहित (सं॰ त्रि॰) १ अहित, नागवार, असन्तोषप्रद, नाख़ुश बनानेवाला, अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनु (सं॰ अव्य॰) अनितीति, अन-उ बाहुलकात्। <small>अनुर्लक्षणे। पा १।४।८४ ।</small> प्रादि उपसर्गके अन्तर्गत एक उपसर्ग। यह किसी शब्द या धातुके पहले लगनेसे भिन्नार्थ निकालता है और नहीं भी निकालता। सचराचर अनु शब्द के यह कई एक अर्थ आते हैं,—लक्षण, इत्थम्भ ताख्यान (इसतरहका जात धर्म),
भाग (अंश), वीप्सा, सन्निधि (सामीप्य), सादृश्य अथवा योगाता, आयाम (व्याप्ति, दैर्ध्य), हीन, पश्चात्, सह।—
{{Block center|<poem><small>"अनु लक्षणवीप्सेत्यम्भूत भागेषु सन्निधौ।
सादृश्यायामहीनेषु पश्चादर्थसहार्थयोः॥" (हैम)</small></poem>}}
क्रिया और संज्ञासे पहले लगनेपर यह पीछे, साथ-साथ, बग़ल-बग़ल, इधर-उधर, पास-पास, और नीचे के अर्थ में आता है। संज्ञाके साथ प्रधानतः क्रिया-विशेषणवाले समासमें इसका अर्थ बार-बार, बसबब, कई-कई, एक-एक, क़ायदे और क़रीनेसे रहता है। कर्मकार के साथ पृथक् उपसर्गकी भांति योग पानेपर यह पीछे, साथ-साथ, ऊपर, पास-पास, से, को तर्फ़, पर, बसबब, क़ायदे में और मुवाफ़िक़ का मतलब रखता है। पृथक् क्रिया-विशेषणकी भांति इसका माने पीछे, पीछेसे, उसपर, फिर, आगे, तब और दूसरे निकलता है।
<small>लक्षण</small>—शाकल्यस्य संहितामनुप्रावर्षम्। <small>अनुलक्षणें।
पा १।४।८४ ।</small> शाकल्यमुनिके संहिता पाठसे पानी बरसा। इस जगह संहितापाठका हेतु वर्षण उपलक्षित है।
<small>इत्थम्भूताख्वान</small>—साधुर्देवदत्तो मातरमनु। देवदत्त माताके तयीं साधु है। मतलब यह कि देवदत्त माताके तयीं साधुत्वरूप धर्मविशिष्ट रहता, जिससे
इत्थम्भूताख्यान देखाता है।
<small>भाग</small>—यदत्र मामनुं स्यात्। <small>लक्षणेत्थम्भू ताखयानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः। पा १।४।९० ।</small> मेरे लिये ऐसा रहे। यहां अनु भागके भावसे भरा है।
<small>सन्निधि, समीप</small>—अनुमालिनीतीरम्। मालिनी नदी-तटके पास। इस अवसर में अनु सन्निधिको संभालता है।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude><small>सदृश योग्य</small>—अनु रूपम्। रूपके योग्य या सदृश। ऐसे वाक्यमें अनु सदृशका अर्थ देता है।
<small>आयाम</small>—अनुयमुनं मथुरा। <small>यस्य चायामः। पा २।१।१६ ।</small> यमुनाके साथ-साथ मथुरा चली है। इस स्थलमें यमुनाके आयामसे मथुराका आयाम समझ पड़ता है।
<small>हीन</small>अन्वर्जुनं योद्धारः। <small>हीने। पा १।४।८५।</small> यह सारे योद्धा अर्जुनसे नीचे हैं यहां अनुका हीन अर्थ होता है।
<small>पश्चात्</small>—अनुपद। पैरके पीछे-पीछे। <small>पति-रन्वगच्छत्।" (रघु)</small> राजा छायाकी तरह उसके पीछे-पीछे चले। इस उदाहरण में अनु पीछेके मतलबसे लगा है।
<small>सह</small>पर्वतमन्ववसिता सेना। <small>तृतीयार्थे। पा १।४।८५ ।</small>पहाड़के साथ सारी फ़ौज मिल गयी। ऐसे स्थानमें अनु सहका अर्थ देता है।
(पु॰) २ ययातिके एक पुत्र जिनका नाम अनु रहा। इन्हीं अनुसे म्लेच्छ जाति उत्पन्न हुयी थी। ऋग्वेद में अनु वंशका उल्लेख उठा है,—<small>"यदिन्द्राग्नी यदुषु
तुर्वशेषु यद्द्रुह्यष्वनुषु पुरुष स्थः।" (१।१०८।८)</small>
३ मनुष्य, आदमी। ४ म्लेच्छ।
अनुक (सं॰ त्रि॰) अनुकामयते, अनु-कन्। <small>अनुकाभि-काभीकः कमिता। पा ५।२।७४ ।</small> कामुक, कविता, कामी, नफ़् सपरस्त, पुरशहबत, मस्त।—
{{C|<small>'कामुक कमिताऽनुकः।' (अमर)</small>}}
अनुकथन (सं॰ क्ली॰) संयत वचन, क़ायदेकी गुफ़्तगू, वर्णन, बयान्, वार्ता, बातचीत, खासी कहावत।
अनुकथित (सं॰ त्रि॰) नियमित रूपसे वर्णित, क़ायदे से बताया गया।
अनुकदली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, कांसकी घास।
अनुकनखलम् (सं॰ अव्य॰) कनखलस्य अद्रेः समीपे।<small>अनुर्यत् समया। पा २।१।१५।</small>कनखल पहाड़के पास। यह<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनीहित—अनुकनखलम्'''|'''४४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनीहित (सं॰ त्रि॰) १ अहित, नागवार, असन्तोषप्रद, नाख़ुश बनानेवाला, अनिच्छित, ख़्वाहिश न किया गया।
अनु (सं॰ अव्य॰) अनितीति, अन-उ बाहुलकात्। <small>अनुर्लक्षणे। पा १।४।८४ ।</small> प्रादि उपसर्गके अन्तर्गत एक उपसर्ग। यह किसी शब्द या धातुके पहले लगनेसे भिन्नार्थ निकालता है और नहीं भी निकालता। सचराचर अनु शब्द के यह कई एक अर्थ आते हैं,—लक्षण, इत्थम्भ ताख्यान (इसतरहका जात धर्म),
भाग (अंश), वीप्सा, सन्निधि (सामीप्य), सादृश्य अथवा योगाता, आयाम (व्याप्ति, दैर्ध्य), हीन, पश्चात्, सह।—
{{Block center|<poem><small>"अनु लक्षणवीप्सेत्यम्भूत भागेषु सन्निधौ।
सादृश्यायामहीनेषु पश्चादर्थसहार्थयोः॥" (हैम)</small></poem>}}
क्रिया और संज्ञासे पहले लगनेपर यह पीछे, साथ-साथ, बग़ल-बग़ल, इधर-उधर, पास-पास, और नीचे के अर्थ में आता है। संज्ञाके साथ प्रधानतः क्रिया-विशेषणवाले समासमें इसका अर्थ बार-बार, बसबब, कई-कई, एक-एक, क़ायदे और क़रीनेसे रहता है। कर्मकार के साथ पृथक् उपसर्गकी भांति योग पानेपर यह पीछे, साथ-साथ, ऊपर, पास-पास, से, को तर्फ़, पर, बसबब, क़ायदे में और मुवाफ़िक़ का मतलब रखता है। पृथक् क्रिया-विशेषणकी भांति इसका माने पीछे, पीछेसे, उसपर, फिर, आगे, तब और दूसरे निकलता है।
<small>लक्षण</small>—शाकल्यस्य संहितामनुप्रावर्षम्। <small>अनुलक्षणें।
पा १।४।८४ ।</small> शाकल्यमुनिके संहिता पाठसे पानी बरसा। इस जगह संहितापाठका हेतु वर्षण उपलक्षित है।
<small>इत्थम्भूताख्वान</small>—साधुर्देवदत्तो मातरमनु। देवदत्त माताके तयीं साधु है। मतलब यह कि देवदत्त माताके तयीं साधुत्वरूप धर्मविशिष्ट रहता, जिससे
इत्थम्भूताख्यान देखाता है।
<small>भाग</small>—यदत्र मामनुं स्यात्। <small>लक्षणेत्थम्भू ताखयानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः। पा १।४।९० ।</small> मेरे लिये ऐसा रहे। यहां अनु भागके भावसे भरा है।
<small>सन्निधि, समीप</small>—अनुमालिनीतीरम्। मालिनी नदी-तटके पास। इस अवसर में अनु सन्निधिको संभालता है।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude><small>सदृश योग्य</small>—अनु रूपम्। रूपके योग्य या सदृश। ऐसे वाक्यमें अनु सदृशका अर्थ देता है।
<small>आयाम</small>—अनुयमुनं मथुरा। <small>यस्य चायामः। पा २।१।१६ ।</small> यमुनाके साथ-साथ मथुरा चली है। इस स्थलमें यमुनाके आयामसे मथुराका आयाम समझ पड़ता है।
<small>हीन</small>अन्वर्जुनं योद्धारः। <small>हीने। पा १।४।८५।</small> यह सारे योद्धा अर्जुनसे नीचे हैं यहां अनुका हीन अर्थ होता है।
<small>पश्चात्</small>—अनुपद। पैरके पीछे-पीछे। <small>पति-रन्वगच्छत्।" (रघु)</small> राजा छायाकी तरह उसके पीछे-पीछे चले। इस उदाहरण में अनु पीछेके मतलबसे लगा है।
<small>सह</small>पर्वतमन्ववसिता सेना। <small>तृतीयार्थे। पा १।४।८५ ।</small>पहाड़के साथ सारी फ़ौज मिल गयी। ऐसे स्थानमें अनु सहका अर्थ देता है।
(पु॰) २ ययातिके एक पुत्र जिनका नाम अनु रहा। इन्हीं अनुसे म्लेच्छ जाति उत्पन्न हुयी थी। ऋग्वेद में अनु वंशका उल्लेख उठा है,—<small>"यदिन्द्राग्नी यदुषु
तुर्वशेषु यद्द्रुह्यष्वनुषु पुरुष स्थः।" (१।१०८।८)</small>
३ मनुष्य, आदमी। ४ म्लेच्छ।
अनुक (सं॰ त्रि॰) अनुकामयते, अनु-कन्। <small>अनुकाभि-काभीकः कमिता। पा ५।२।७४ ।</small> कामुक, कविता, कामी, नफ़् सपरस्त, पुरशहबत, मस्त।—
{{C|<small>'कामुक कमिताऽनुकः।' (अमर)</small>}}
अनुकथन (सं॰ क्ली॰) संयत वचन, क़ायदेकी गुफ़्तगू, वर्णन, बयान्, वार्ता, बातचीत, खासी कहावत।
अनुकथित (सं॰ त्रि॰) नियमित रूपसे वर्णित, क़ायदे से बताया गया।
अनुकदली (सं॰ स्त्री॰) काशतृण, कांसकी घास।
अनुकनखलम् (सं॰ अव्य॰) कनखलस्य अद्रेः समीपे।<small>अनुर्यत् समया। पा २।१।१५।</small>कनखल पहाड़के पास। यह<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|112|5em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५३
250
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''४४६'''|'''अनुकनीयस—अनुकल्प'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>पर्वत हरिद्वारके निकट आज भी वर्तमान है, लोग कहते कि कनखल और हरिकी-पैड़ी—इन सकल स्थानोंमें दक्षराजकी राजधानी रही थी। देखते हैं,—
{{Block center|<poem><small>"तस्मादृगच्छे रनुकनखलं शैलराजावतीर्णाम्।
जङ्गो: कन्यां सगरतनयस्वर्ग सोपानपंक्तिम्॥" (मेघदूत, पूर्वमेघ ५१)</small></poem>}}
हरिवंशमें भी इस कनखलका नामोल्लेख निकलता है,—<small>"गङ्गाद्दारं कनखलं सोमो वै यत्र संस्थितः।"</small>
अनुकनीयस (सं॰ त्रि॰) छोटेसे छोटा, लड़केसे भी लड़का।
६ दूसरे ।
५ तब ।
१० पास ।
१३ साथ ।
-
अनु कम्प-युच् ।
१ दयाशील, मेहर-
अनुकम् (सं० अव्य० ) अनुकामयते, अनु-कम- क्विप् ।
१ पोछे । २ उसपर । ३ फिर । ४ आगे ।
७ पर । ८को । 2 से ।
११ तर्फ, ।
१२ नियम या कायदेसे ।
१४ बगलमें । १५ इधर-उधर । १६ नोचे ।
अनुकम्पक (सं० त्रि० ) अनुकम्पते दयते, अनु-कम्प-
खु ुल ्म । १ दयालु, रहोम । ( पु० ) २ नृपतिविशेष,
किसी राजाका नाम ।
अनुकम्पन (सं० त्रि० )
शब्दार्थादकर्मकात् युच । पा २१४८
बान्। (क्लो०) भावे ल्युट् ।
मेहरबानी ।
अनुकम्पा (सं० स्त्री० ) अनुकम्प । १ दया, कृपा,
रहम, मेहरबानौ। दुःखसे अन्यको कांपते देख
दयावान् व्यक्ति दयासे निजमें कांपने लगता है ।
इससे दयाका नाम अनुकम्पा पड़ा है । २ सहानु-
भूति, तरस । ३ किञ्चित् चलन, हलको हरकत ।
४ अल्प कम्पन, थोड़ो कंपकपी ।
२ दया, कृपा, रहम,
अनुकम्पायिन् (स ं० त्रि०) दया दिखाते हुवा, कृपा
करते गया, सहानुभूति सकारनेवाला, हमदर्द, जो
तरस खा रहा हो।
अनुकम्पितात्मन् (सं० त्रि०) दयाशील हृदयवाला,
जिसका दिल हमदर्दीसे भर जाये ।
अनुकम्पनीय, अनुकम्प देखो।
अनुकम्पा (सं० त्रि०) अनुकम्पमर्हति अनु-कम्प-
ण्यत् । १ त्वरायुक्त, वेगवान्, जल्दबाज़, दौड़ने-
वाला । २ दयाके योग्य, रहम खाने काबिल । (पु० )
श्रव्यक्तानुकरणस्यात् इतौ । पाहा
१ सट्टशीकरण, बरा-
२ अनुकरण निकालनेका
बरका बनाना, नकुल ।
द्रव्य, जिस चीज़ से नकल बनायी जाये ।
व्याकरणके मतमें अनुकरण दो प्रकार देखते
हैं, – शब्दानुकरण और अर्थानुकरण। जहां अर्थ-
रहित किसी शब्दका अनुकरण करते, वहां शब्दानु-
करण निकलता है । फिर, अर्थविशिष्ट अनुकरण
अर्थानुकरण कहलाता है ।
अनुकरणीय (सं० त्रि० ) अनुकरण निकालने योगा,
नकुल उतारने काबिल ।
अनुकर्ता (सं० पु० )
१ अनुकरण करनेवाला,
नक् काल । २ आदेशानुयायी, हुक्म माननेवाला ।
अनुकर्ण ( सं ० क्लो० ) कर्णके निकटका स्थान, कान
पासकी जगह ।
अनुकर्ष (सं० पु० ) अनुकृष्यते रथतलेन सम्बध्यते,
अनु - कृष- घ । १ रथका तल, गाड़ीका पेंदा । २ रथ-
चक्रके नीचे ब'धा रहनेवाला काष्ठ, जो लकड़ी गाड़ीके
पहिये में नीचे लगी रहती है । अनु-कृष- घञ् ।
३ आकर्षण, कशिश, खींच। ४ विलम्बका कार्य-
सम्पादन, देरसे फर्ज़का अदा होना ।
पुकार, मन्त्र से बुलाया जाना ।
आकर्षण, नहवकी कशिश । ७ पूर्व सूत्रमें परका
संमिलन, पहले कायदेमें पोछेका शामिल रहना ।
८ उत्सवके पश्चात्का घसिटना, जलसे के पीछेका
रह जाना ।
५ आवाहन,
६ व्याकरणका
अनुकर्षण ( सं० क्लो० ) अनु-क्वष-भावे ल्युट् ।
१ आकर्षण, कशिश, खैंचतान । २ पूर्व वाक्य में कुछ
उक्त रहते स्पष्ट अन्वयके निमित्त पर वाक्य में किसी
पदादिका आयोजन, पहले जुमलेमें कुछ कहा हुवा
रहते साफ, बयान्के लिये दूसरे जुमलेमें किसी
फिकरे वगैरहका जोड़। ३ रथका तल, गाडीवाला
पेंदा !
अनुकल्प (सं० पु० ) कल्पते विधीयते, कल्पो विधिः ।
३ साधु, फ. कौर । ४ दूत, संवादवाहक, कासिद,
हरकारा ।
अनु सादृश्ये क् ल्युट् ।अनुकरण (सं० क्ली ० )<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४६'''|'''अनुकनीयस—अनुकल्प'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>पर्वत हरिद्वारके निकट आज भी वर्तमान है, लोग कहते कि कनखल और हरिकी-पैड़ी—इन सकल स्थानोंमें दक्षराजकी राजधानी रही थी। देखते हैं,—
{{Block center|<poem><small>"तस्मादृगच्छे रनुकनखलं शैलराजावतीर्णाम्।
जङ्गो: कन्यां सगरतनयस्वर्ग सोपानपंक्तिम्॥" (मेघदूत, पूर्वमेघ ५१)</small></poem>}}
हरिवंशमें भी इस कनखलका नामोल्लेख निकलता है,—<small>"गङ्गाद्दारं कनखलं सोमो वै यत्र संस्थितः।"</small>
अनुकनीयस (सं॰ त्रि॰) छोटेसे छोटा, लड़केसे भी लड़का।
अनुकम् (सं॰ अव्य॰) अनुकामयते, अनु-कम-क्विप्। १ पीछे। २ उसपर। ३ फिर। ४ आगे। ५ तब। ६ दूसरे। ७ पर। ८ को। ९ से। १० पास। ११ तर्फ़। १२ नियम या क़ायदेसे। १३ साथ। १४ बग़लमें। १५ इधर-उधर। १६ नीचे।
अनुकम्पक (सं॰ त्रि॰) अनुकम्पते दयते, अनु-कम्प-खुल्। १ दयालु, रहीम। (पु॰) २ नृपतिविशेष, किसी राजाका नाम।
अनुकम्पन (सं॰ त्रि॰) अनु कम्प-युच्। <small>चलन-शब्दार्थादकर्मकात् युच्। पा ३।२।१४८।</small> १ दयाशील, मेहरबान्। (क्ली॰) भावे ल्युट्। २ दया, कृपा, रहम, मेहरबानी।
अनुकम्पा (सं॰ स्त्री॰) अनु-कम्प-अ। १ दया, कृपा, रहम, मेहरबानी। दुःखसे अन्यको कांपते देख दयावान् व्यक्ति दयासे निजमें कांपने लगता है। इसीसे दयाका नाम अनुकम्पा पड़ा है। २ सहानु-भूति, तरस। ३ किञ्चित् चलन, हलकी हरकत।
४ अल्प कम्पन, थोड़ी कंपकंपी।
अनुकम्पायिन् (सं॰ त्रि॰) दया दिखाते हुवा, कृपा करते गया, सहानुभूति सकारनेवाला, हमदर्द, जो तरस खा रहा हो।
अनुकम्पितात्मन् (सं॰ त्रि॰) दयाशील हृदयवाला, जिसका दिल हमदर्दीसे भर जाये।
अनुकम्पनीय, <small>अनुकम्प देखो।</small>
अनुकम्पा (सं॰ त्रि॰) अनुकम्पमर्हति अनु-कम्प-ण्यत्। १ त्वरायुक्त, वेगवान्, जल्दबाज़, दौड़ने-वाला। २ दयाके योग्य, रहम खाने क़ाबिल। (पु॰)<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>३ साधु, फ़क़ीर। ४ दूत, संवादवाहक, क़ासिद, हरकारा।
अनुकरण (सं॰ क्ली॰) अनु सादृश्ये कृ-ल्युट्। <small>अव्यक्तानुकरणस्यात् इतौ। पा ६।१।९८।</small> १ सट्टशीकरण, बरा-बरका बनाना, नक़ल। २ अनुकरण निकालनेका द्रव्य, जिस चीज़ से नक़ल बनायी जाये।
व्याकरणके मतमें अनुकरण दो प्रकार देखते हैं,—शब्दानुकरण और अर्थानुकरण। जहां अर्थ-रहित किसी शब्दका अनुकरण करते, वहां शब्दानु-करण निकलता है। फिर, अर्थविशिष्ट अनुकरण अर्थानुकरण कहलाता है।
अनुकरणीय (सं॰ त्रि॰) अनुकरण निकालने योगा, नक़ल उतारने क़ाबिल।
अनुकर्ता (सं॰ पु॰) १ अनुकरण करनेवाला, नक् क़ाल। २ आदेशानुयायी, हुक्म माननेवाला।
अनुकर्ण (सं॰ क्ली॰) कर्णके निकटका स्थान, कानके पासकी जगह।
अनुकर्ष (सं॰ पु॰) अनुकृष्यते रथतलेन सम्बध्यते, अनु-कृष-घ। १ रथका तल, गाड़ीका पेंदा। २ रथ-चक्रके नीचे बंधा रहनेवाला काष्ठ, जो लकड़ी गाड़ीके पहिये में नीचे लगी रहती है। अनु-कृष-घञ्। ३ आकर्षण, कशिश, खींच। ४ विलम्बका कार्य-सम्पादन, देरसे फर्ज़का अदा होना। ५ आवाहन, पुकार, मन्त्र से बुलाया जाना। ६ व्याकरणका आकर्षण, नहवकी कशिश। ७ पूर्व सूत्रमें परका संमिलन, पहले क़ायदेमें पीछेका शामिल रहना। ८ उत्सवके पश्चात्का घसिटना, जलसेके पीछेका रह जाना।
अनुकर्षण (सं॰ क्ली॰) अनु-कृष-भावे ल्युट्। १ आकर्षण, कशिश, खैंचतान। २ पूर्व वाक्यमें कुछ उक्त रहते स्पष्ट अन्वयके निमित्त पर वाक्यमें किसी पदादिका आयोजन, पहले जुमलेमें कुछ कहा हुवा रहते साफ़, बयान्के लिये दूसरे जुमलेमें किसी फ़िक़रे वग़ैरहका जोड़। ३ रथका तल, गाडीवाला पेंदा।
अनुकल्प (सं॰ पु॰) कल्पते विधीयते, कल्पो विधिः।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुकल्पित—अनुकूलिनी'''|'''४४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>यः प्रथमः कल्पः स मुख्यं स्यात्। ततो मुख्यादधमो। गौणः अनुकल्पः स्यात् प्रादि-स॰। <small>कृपो रोलः। पा ८।२।१८।</small>अप्रधान विधि, प्रधान विधि देखते अधम विधि, मामूली तरीक़्, खास तरीक़ की बनिस्बत ख़राब चाल। अनुगतं कल्पं वेदाङ्ग विशेषम्। २ कल्प-शास्त्र-प्रतिपादक ग्रन्थ। द्रव्यके अभावमें तद्गुणद्रव्यान्तर ग्रहण, किसी चीज़ के न रहते उसी सिफ़्, तकी दूसरीका लेना।
अनुकल्पित (सं॰ त्रि॰) पीछा किया या ध्यान दिया गया, जिसके पीछे पड़ गये या जिसपर ख़याल लड़ाये हों।
अनुकाङ्क्षा (सं॰ स्त्री॰) अभिलाष, इच्छा, ख़्वाहिश, मर्ज़ी।
अनुकाङ्क्षित (सं॰ त्रि॰) ईप्सित, अभिलषित, चाहा या ख़्वाहिश किया गया।
अनुकाङ्क्षिन् (सं॰ त्रि॰) इच्छुक, अभिलाष रखनेवाला, जो ख़्वाहिश दिखाये।
अनुकाम (सं॰ पु॰) अनु योग्यः सदृशो वा कामः, प्रादि सं॰। योग्य अभिलाष, मक़बूल ख़्वाहिश, जो ख़्वाहिश पूरी हो सके। (त्रि॰) कामस्य सदृशं योग्यं वा अनुकामम्। कामनाके सदृश अथवा योग्य, ख़्वाहिश के बराबर या क़ाबिल। ३ अतिकामुक, ख़्वाहिशमन्द, चाहनेवाला।
अनुकामीन (सं॰ त्रि॰) अनुकामं यथेच्छं गच्छतीति तच्छोलः ख। १ यथेष्ट गमनशील, ख़ूब रवां, ठीक-ठीक जानेवाला। २ यथेच्छाचारी, खुदरव, मनमानी मचानेवाला।—<small>'कामङ्गाम्यनुकामिनः।' (अमर)</small>
अनुकार (सं॰ पु॰) अनु-कृ-घञ्। अनुकरण, सट्टशीकरण, नक़ल।—<small>'अनुहारोऽनुकारः स्यात्।' (अमर)</small>
अनुकारिन् (सं॰ त्रि॰) अनुकरोति, अनु-कृ-णिनि। १ अनुकरणशील, नक़्काल, नक़ल निकालनेवाला।
२ सदृश, बराबर।—
{{C|<small>"अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू।" (शाकुन्तल)</small>}}
अनुकारी, <small>अनुकारिन् देखो।</small>
अनुकाल (सं॰ अव्य॰) कालस्य योग्यम्, यथार्यें अव्ययी॰ १ कालसे, समयपर, वक्त़न-फ़-वक्त़न,
मौक़ेमें। २ चिरकाल, सदा, हरवक्त़ हमेशा। (त्रि॰) ३ सामयिक, कालिक, वक्त़का, मौक़ेवाला।
अनुकीर्ण (सं॰ त्रि॰) भरा हुवा, भीड़-भड़क्केका।
अनुकीर्तन (सं॰ क्ली॰) अनु-कृत्-णिच्-ल्युट्। गुण-गान, सुयशवर्णन, तारीफ़का बयान्, भलाईका कहना।
अनुकुञ्चित (सं॰ त्रि॰) झुका झुकाया, टेढा, पेचदार, बल खाये हुवा, ख़मदार।
अनुकूल (सं॰ त्रि॰) मज्जमानस्य कूलमिव अनुगतः सहायतया समीपागतः, अतिक्रा॰-तत्। १ मज्जमानके समीप कूलकी भांति साहाय्यको पहुंचनेवाला, जो डूबेकी मददको किनारकी तरह पास जाये, सहाय, दक्षिण, मददगार, दाहना। २ दयालु, रहीम। ३ पक्षपाती, तर्फ़दार। ४ आश्रयदाता, पनाहपिज़ीर, सहारा देनेवाला। (पु॰) ५ अलङ्कार-शास्त्रके अनुसार नायक-विशेष, एक स्त्रीपर अनुरक्त रहनेवाला पति, जो ख़ाविन्द एक ही औरतको प्यार करे।
{{C|<small>"अनुकूल एकनिरतः।" (साहित्य-दर्पण ३।७३)</small>}}
६ अलङ्कारविशेष।
{{C|<small>"अनुकूलं प्रातिकूल्यमनुकूलानुबन्धिचेत्॥" (साहित्यदर्पण १०।७१३)</small>}}
अर्थात् जहां अनिष्टाचरण से लाभ निकलता, वहां अनुकूल अलङ्कार आता है।
{{Block center|<poem><small>"हों अपराधी राधिके मारिय नयनन वान।
कत बैठी हो कोपसों ताने भौंह कमान॥"</small>}}
७ सबका आत्मा परमेश्वर।
अनुकूलका (सं॰ स्त्री॰) लघुदन्ती, छोटो दन्ती।
अनुकूलता (सं॰ स्त्री॰) १ अनुकूल-तल्। सहायता, मदद। २ वैभव, होती।
अनुकूलनायक (सं॰ पु॰) कृपालु स्वामी या प्रेमी, जो ख़ाविन्द या आशक़ मेहरबान् रहे।
अनुकूलवायु (सं॰ पु॰) मुवाफ़िक़ हवा।
अनुकूला (सं॰ स्त्री॰) १ ह्रखदन्ती वृक्ष, छोटी दन्तीका दरख़्त। <small>दन्ती देखो।</small> २ छन्दोविशेष, बहर-ख़ास। इसके पद-पदमें भगण, नगण और दो गुरु रहते हैं। ३ मौक्तिक माला, मोतीका हार।
अनुकूलिनी, <small>अनुकूलका देखी।</small>
|<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुकल्पित—अनुकूलिनी'''|'''४४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>यः प्रथमः कल्पः स मुख्यं स्यात्। ततो मुख्यादधमो। गौणः अनुकल्पः स्यात् प्रादि-स॰। <small>कृपो रोलः। पा ८।२।१८।</small>अप्रधान विधि, प्रधान विधि देखते अधम विधि, मामूली तरीक़्, खास तरीक़ की बनिस्बत ख़राब चाल। अनुगतं कल्पं वेदाङ्ग विशेषम्। २ कल्प-शास्त्र-प्रतिपादक ग्रन्थ। द्रव्यके अभावमें तद्गुणद्रव्यान्तर ग्रहण, किसी चीज़ के न रहते उसी सिफ़्, तकी दूसरीका लेना।
अनुकल्पित (सं॰ त्रि॰) पीछा किया या ध्यान दिया गया, जिसके पीछे पड़ गये या जिसपर ख़याल लड़ाये हों।
अनुकाङ्क्षा (सं॰ स्त्री॰) अभिलाष, इच्छा, ख़्वाहिश, मर्ज़ी।
अनुकाङ्क्षित (सं॰ त्रि॰) ईप्सित, अभिलषित, चाहा या ख़्वाहिश किया गया।
अनुकाङ्क्षिन् (सं॰ त्रि॰) इच्छुक, अभिलाष रखनेवाला, जो ख़्वाहिश दिखाये।
अनुकाम (सं॰ पु॰) अनु योग्यः सदृशो वा कामः, प्रादि सं॰। योग्य अभिलाष, मक़बूल ख़्वाहिश, जो ख़्वाहिश पूरी हो सके। (त्रि॰) कामस्य सदृशं योग्यं वा अनुकामम्। कामनाके सदृश अथवा योग्य, ख़्वाहिश के बराबर या क़ाबिल। ३ अतिकामुक, ख़्वाहिशमन्द, चाहनेवाला।
अनुकामीन (सं॰ त्रि॰) अनुकामं यथेच्छं गच्छतीति तच्छोलः ख। १ यथेष्ट गमनशील, ख़ूब रवां, ठीक-ठीक जानेवाला। २ यथेच्छाचारी, खुदरव, मनमानी मचानेवाला।—<small>'कामङ्गाम्यनुकामिनः।' (अमर)</small>
अनुकार (सं॰ पु॰) अनु-कृ-घञ्। अनुकरण, सट्टशीकरण, नक़ल।—<small>'अनुहारोऽनुकारः स्यात्।' (अमर)</small>
अनुकारिन् (सं॰ त्रि॰) अनुकरोति, अनु-कृ-णिनि। १ अनुकरणशील, नक़्काल, नक़ल निकालनेवाला।
२ सदृश, बराबर।—
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अनुकारी, <small>अनुकारिन् देखो।</small>
अनुकाल (सं॰ अव्य॰) कालस्य योग्यम्, यथार्यें अव्ययी॰ १ कालसे, समयपर, वक्त़न-फ़-वक्त़न,
मौक़ेमें। २ चिरकाल, सदा, हरवक्त़ हमेशा। (त्रि॰) ३ सामयिक, कालिक, वक्त़का, मौक़ेवाला।
अनुकीर्ण (सं॰ त्रि॰) भरा हुवा, भीड़-भड़क्केका।
अनुकीर्तन (सं॰ क्ली॰) अनु-कृत्-णिच्-ल्युट्। गुण-गान, सुयशवर्णन, तारीफ़का बयान्, भलाईका कहना।
अनुकुञ्चित (सं॰ त्रि॰) झुका झुकाया, टेढा, पेचदार, बल खाये हुवा, ख़मदार।
अनुकूल (सं॰ त्रि॰) मज्जमानस्य कूलमिव अनुगतः सहायतया समीपागतः, अतिक्रा॰-तत्। १ मज्जमानके समीप कूलकी भांति साहाय्यको पहुंचनेवाला, जो डूबेकी मददको किनारकी तरह पास जाये, सहाय, दक्षिण, मददगार, दाहना। २ दयालु, रहीम। ३ पक्षपाती, तर्फ़दार। ४ आश्रयदाता, पनाहपिज़ीर, सहारा देनेवाला। (पु॰) ५ अलङ्कार-शास्त्रके अनुसार नायक-विशेष, एक स्त्रीपर अनुरक्त रहनेवाला पति, जो ख़ाविन्द एक ही औरतको प्यार करे।
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६ अलङ्कारविशेष।
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अर्थात् जहां अनिष्टाचरण से लाभ निकलता, वहां अनुकूल अलङ्कार आता है।
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कत बैठी हो कोपसों ताने भौंह कमान॥"</small>}}
७ सबका आत्मा परमेश्वर।
अनुकूलका (सं॰ स्त्री॰) लघुदन्ती, छोटो दन्ती।
अनुकूलता (सं॰ स्त्री॰) १ अनुकूल-तल्। सहायता, मदद। २ वैभव, होती।
अनुकूलनायक (सं॰ पु॰) कृपालु स्वामी या प्रेमी, जो ख़ाविन्द या आशक़ मेहरबान् रहे।
अनुकूलवायु (सं॰ पु॰) मुवाफ़िक़ हवा।
अनुकूला (सं॰ स्त्री॰) १ ह्रखदन्ती वृक्ष, छोटी दन्तीका दरख़्त। <small>दन्ती देखो।</small> २ छन्दोविशेष, बहर-ख़ास। इसके पद-पदमें भगण, नगण और दो गुरु रहते हैं। ३ मौक्तिक माला, मोतीका हार।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुकल्पित—अनुकूलिनी'''|'''४४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>यः प्रथमः कल्पः स मुख्यं स्यात्। ततो मुख्यादधमो। गौणः अनुकल्पः स्यात् प्रादि-स॰। <small>कृपो रोलः। पा ८।२।१८।</small>अप्रधान विधि, प्रधान विधि देखते अधम विधि, मामूली तरीक़्, खास तरीक़ की बनिस्बत ख़राब चाल। अनुगतं कल्पं वेदाङ्ग विशेषम्। २ कल्प-शास्त्र-प्रतिपादक ग्रन्थ। द्रव्यके अभावमें तद्गुणद्रव्यान्तर ग्रहण, किसी चीज़ के न रहते उसी सिफ़्, तकी दूसरीका लेना।
अनुकल्पित (सं॰ त्रि॰) पीछा किया या ध्यान दिया गया, जिसके पीछे पड़ गये या जिसपर ख़याल लड़ाये हों।
अनुकाङ्क्षा (सं॰ स्त्री॰) अभिलाष, इच्छा, ख़्वाहिश, मर्ज़ी।
अनुकाङ्क्षित (सं॰ त्रि॰) ईप्सित, अभिलषित, चाहा या ख़्वाहिश किया गया।
अनुकाङ्क्षिन् (सं॰ त्रि॰) इच्छुक, अभिलाष रखनेवाला, जो ख़्वाहिश दिखाये।
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अनुकामीन (सं॰ त्रि॰) अनुकामं यथेच्छं गच्छतीति तच्छोलः ख। १ यथेष्ट गमनशील, ख़ूब रवां, ठीक-ठीक जानेवाला। २ यथेच्छाचारी, खुदरव, मनमानी मचानेवाला।—<small>'कामङ्गाम्यनुकामिनः।' (अमर)</small>
अनुकार (सं॰ पु॰) अनु-कृ-घञ्। अनुकरण, सट्टशीकरण, नक़ल।—<small>'अनुहारोऽनुकारः स्यात्।' (अमर)</small>
अनुकारिन् (सं॰ त्रि॰) अनुकरोति, अनु-कृ-णिनि। १ अनुकरणशील, नक़्काल, नक़ल निकालनेवाला।
२ सदृश, बराबर।—
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अनुकारी, <small>अनुकारिन् देखो।</small>
अनुकाल (सं॰ अव्य॰) कालस्य योग्यम्, यथार्यें अव्ययी॰ १ कालसे, समयपर, वक्त़न-फ़-वक्त़न,<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>मौक़ेमें। २ चिरकाल, सदा, हरवक्त़ हमेशा। (त्रि॰) ३ सामयिक, कालिक, वक्त़का, मौक़ेवाला।
अनुकीर्ण (सं॰ त्रि॰) भरा हुवा, भीड़-भड़क्केका।
अनुकीर्तन (सं॰ क्ली॰) अनु-कृत्-णिच्-ल्युट्। गुण-गान, सुयशवर्णन, तारीफ़का बयान्, भलाईका कहना।
अनुकुञ्चित (सं॰ त्रि॰) झुका झुकाया, टेढा, पेचदार, बल खाये हुवा, ख़मदार।
अनुकूल (सं॰ त्रि॰) मज्जमानस्य कूलमिव अनुगतः सहायतया समीपागतः, अतिक्रा॰-तत्। १ मज्जमानके समीप कूलकी भांति साहाय्यको पहुंचनेवाला, जो डूबेकी मददको किनारकी तरह पास जाये, सहाय, दक्षिण, मददगार, दाहना। २ दयालु, रहीम। ३ पक्षपाती, तर्फ़दार। ४ आश्रयदाता, पनाहपिज़ीर, सहारा देनेवाला। (पु॰) ५ अलङ्कार-शास्त्रके अनुसार नायक-विशेष, एक स्त्रीपर अनुरक्त रहनेवाला पति, जो ख़ाविन्द एक ही औरतको प्यार करे।
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६ अलङ्कारविशेष।
{{C|<small>"अनुकूलं प्रातिकूल्यमनुकूलानुबन्धिचेत्॥" (साहित्यदर्पण १०।७१३)</small>}}
अर्थात् जहां अनिष्टाचरण से लाभ निकलता, वहां अनुकूल अलङ्कार आता है।
{{Block center|<poem><small>"हों अपराधी राधिके मारिय नयनन वान।
कत बैठी हो कोपसों ताने भौंह कमान॥"</small>}}
७ सबका आत्मा परमेश्वर।
अनुकूलका (सं॰ स्त्री॰) लघुदन्ती, छोटो दन्ती।
अनुकूलता (सं॰ स्त्री॰) १ अनुकूल-तल्। सहायता, मदद। २ वैभव, होती।
अनुकूलनायक (सं॰ पु॰) कृपालु स्वामी या प्रेमी, जो ख़ाविन्द या आशक़ मेहरबान् रहे।
अनुकूलवायु (सं॰ पु॰) मुवाफ़िक़ हवा।
अनुकूला (सं॰ स्त्री॰) १ ह्रखदन्ती वृक्ष, छोटी दन्तीका दरख़्त। <small>दन्ती देखो।</small> २ छन्दोविशेष, बहर-ख़ास। इसके पद-पदमें भगण, नगण और दो गुरु रहते हैं। ३ मौक्तिक माला, मोतीका हार।
अनुकूलिनी, <small>अनुकूलका देखी।</small><noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" /></noinclude>४४८
अनुकृत — अनुक्रमणौ
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनुकृत (सं० वि० ) अनुकार किया हुवा, नकुल
उतारा गया ।
अनुकृति (सं० स्त्री० ) अनु-क्व- क्तिन् । अनुकरण,
- सदृशीकरण, नकल, कापी ।
अनुकृत्य (सं० त्रि० ) अनुकरण करने योगा, नकुल
उतारने काबिल |
अनुकृष्ट (सं० त्रि०) अनु- कृष-त । १ आक्कष्ट, खिंचा
हुवा । २ अनुवृत्त, पूर्व नियम में सम्मिलित यां
संसाधित, जो पिछले कायदे में मशमूल हो ।
अनुक्त (सं० त्रि०) न उक्तम् । अनभिहित, अकथित,
बयान् न दिया गया, बेकहा । व्याकरणके मतमें सब
बात तिङ्, कृत्, तति और समाससे कही
जाती है ।
अनुक्ति (सं० स्त्री० ) अनुक्त वचन, बेकही बात,
अनसुनी।
अनुक्थ (वै० त्रि०)
नास्ति उकथं स्तोत्रं यस्य,
नत्र -बहुव्री० ।
पातृतुदिवचिरिचिसिचिभ्यस्थक्। उण् २७।
१ भजन होन, बेगोत, जिसका गुण न गाया जाये ।
२ भजन न गानेवाला, जो गोत न गाये ।
अनुकथ्य (वै० त्रि०) उक ध-यत्, न उक्तमर्हति
नञ्-तत् । छन्दांसि च । स्तुति के अयोगा, अप्रशस्य,
तारीफ़के नाकाबिल, जिसको प्रशंसा पड़ न सके ।
अनुक्रकच (स० त्रि०) दन्तविशिष्ट, दन्दांदार, दंतौला,
आरे-जैसे दांतवाला ।
अनुक्रम (सं० पु० ) अनुगतं क्रमम्, अतिक्रा० तत् ।
१. अनुगत क्रम, पिछला सिलसिला, पौछेको तरतीब ।
३२ संयत सूची, सिलसिलेवार फेहरिस्त । ( अव्य० )
क्रमपर, नियममें, आदेशसे, सिलसिलेवार, बकायदे,
तरतीबको देखकर ।
अनुक्रमण (सं० क्लौ ० ) नियमित प्रवाह, कायदेको
रविश, जो चाल ठोक निकले । २ पोछेका चलना ।
अनुक्रमणिका, अनुक्रमणी (सं० स्त्री० ) अनुक्रम्यते
- यथोत्तर परिपाठ्या आरभ्यतेऽनया, अनु क्रम - करणे
स्त्रीत्वात् ङीप् खार्थे कन् हखः । १ ग्रन्थ-
विशेषका आनुपूर्व पाठादि ज्ञापक परिच्छेद अथवा
प्रातिशाख्य, सूचीपत्र, फेहरिस्त । २ भूमिका,
'उपक्रमणिका, दीवाचा । अनुक्रमणिका एक तरह
का सूचीपत्र है । इसमें प्रत्येक सामका प्रथम शब्द,
सामकी संख्या, ऋषि, देवता और छन्दका नाम
उल्लिखित है। सामवेदको अनुक्रमणीको 'सर्वानु
क्रमणी' कहते हैं ।
ऋग्वेदको अनुक्रमणी कात्यायनने बनायी थीं ।
इसके टीकाकार षड्गुरुशिष्य ने वेदार्थदीपिका में लिखा
है, कि कात्यायन से भी पहले एक अनुक्रमणी रहीं ।
उसमें वेदमन्त्रवाले ऋषियोंके नाम, छन्द, देवतावों के
नाम, अनुवाक, ऋग्वेदके प्राचीन सूक्त और सामका
विवरण मिलता था । षड्गुरुशिष्यका कहना हैं,
कि आर्षानुक्रमणो, छान्दसी, दैवतो, अनुवाकानु
क्रमणी और सूत्रानुक्रमणीको शौनकने बनाया है ।
किन्तु अब शौनकको बनायो केवल अनुवाकानुक्रमणों
ही मिलती है ।
यह पद्यका ग्रन्थ है । कात्यायन की
अनुक्रमणो सूत्रको तरह संक्षेपसे गद्य में लिखी गयी
है । किन्तु षड्गुरुशिष्य और सायणाचार्य के समय
अर्थात् सात आठ शत वत्सर पूर्व लगभग सकल अनु
क्रमण विद्यमान थीं । कारण, देखनेमें आता कि,
षड्गुरुशिष्य शौनकरचित देवानुक्रमणीसे प्रमाणादि दे
गये हैं। सायणाचार्यने भी अपने वेदभाष्यके मध्य
शौनकको आर्षानुक्रमणी और बृहद्देवतानुक्रमणीसे
अनेक स्थान उद्धृत किया है ।
ऋग्वदको सर्वसमेत सात अनुक्रमणौका नामो-
ल्लेख मिलता है। इनमें पांच शौनक, एक कात्यायन
और एक निश्चित नहीं, किसकी बनायी है। अनु-
क्रमणो यद्यपि यथार्थ हो शौनकको बनायी और इस
ग्रन्थके परवर्ती लोगोंने चाहे नूतन विषय न भी मिलाया
हो, तथापि प्रमाण पाते हैं, कि शौनकने यास्क के
बाद जन्म लिया था। कारण, बृहद्देवतामें आश्व-
लायन, ऐतरेयक, कौषीतको, भालवि ब्राह्मण,
निदानग्रन्थ, शाकल, वास्कल, मयूक, श्वेतकेतु, गालव,
गार्गी रथीतर, राथन्तरी, शाकटायन, शाण्डिल्य,
रोमकायन, स्थावीर, शाकपूनि, और्णभाव, यास्क
प्रभृति अनेक नाम मिलते हैं । इसीसे बोध होता,
कि बृहद्देवता यास्क से पोछे लिखी गयी है॥<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४८'''|'''अनुकृत—अनुक्रमणी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनुकृत (सं॰ त्रि॰) अनुकार किया हुवा, नक़ल उतारा गया।
अनुकृति (सं॰ स्त्री॰) अनु-कृ-क्तिन्। अनुकरण, सदृशीकरण, नक़ल, कापी।
अनुकृत्य (सं॰ त्रि॰) अनुकरण करने योगा, नक़ल उतारने काब़िल।
अनुकृष्ट (सं॰ त्रि॰) अनु-कृष-क्त। १ आक्कष्ट, खिंचा हुवा। २ अनुवृत्त, पूर्व नियममें सम्मिलित या संसाधित, जो पिछले क़ायदेमें मशमूल हो।
अनुक्त (सं॰ त्रि॰) न उक्तम्। अनभिहित, अकथित, बयान् न दिया गया, बेकहा। व्याकरणके मतमें सब बात तिङ्, कृत्, तद्धित और समाससे कही जाती है।
अनुक्ति (सं॰ स्त्री॰) अनुक्त वचन, बेकही बात, अनसुनी।
अनुक्थ (वै॰ त्रि॰) नास्ति उकथं स्तोत्रं यस्य, नञ्-बहुव्री॰। <small>पातृतुदिवचिरिचिसिचिभ्यस्थक्। उण् २।७।</small> १ भजन हीन, बेगीत, जिसका गुण न गाया जाये। २ भजन न गानेवाला, जो गीत न गाये।
अनुक्थ्य (वै॰ त्रि॰) उक् थ-यत्, न उक्तमर्हति नञ्-तत्। छन्दांसि च। स्तुतिके अयोगा, अप्रशस्य, तारीफ़के नाक़ाबिल, जिसकी प्रशंसा पड़ न सके।
अनुक्रकच (सं॰ त्रि॰) दन्तविशिष्ट, दन्दांदार, दंतीला, आरे-जैसे दांतवाला।
अनुक्रम (सं॰ पु॰) अनुगतं क्रमम्, अतिक्रा॰ तत्। १ अनुगत क्रम, पिछला सिलसिला, पीछेकी तरतीब। २ संयत सूची, सिलसिलेवार फ़ेहरिस्त। (अव्य॰) क्रमपर, नियममें, आदेशसे, सिलसिलेवार, बक़ायदे, तरतीबको देखकर।
अनुक्रमण (सं॰ क्ली॰) नियमित प्रवाह, क़ायदेकी रविश, जो चाल ठीक निकले। २ पोछेका चलना।
अनुक्रमणिका, अनुक्रमणी (सं॰ स्त्री॰) अनुक्रम्यते यथोत्तरं परिपाठ्या आरभ्यतेऽनया, अनु-क्रम-करणे ल्युट्। स्त्रीत्वात् ङीप् स्वार्थे कन् ह्रस्वः। १ ग्रन्थ-विशेषका आनुपूर्व पाठादि ज्ञापक परिच्छेद अथवा प्रातिशाख्य, सूचीपत्र, फ़ेहरिस्त। २ भूमिका,
उपक्रमणिका, दीवाचा। अनुक्रमणिका एक तरहका सूचीपत्र है। इसमें प्रत्येक सामका प्रथम शब्द, सामकी संख्या, ऋषि, देवता और छन्दका नाम उल्लिखित है। सामवेदकी अनुक्रमणीको 'सर्वानु-क्रमणी' कहते हैं।
ऋग्वेदकी अनुक्रमणी कात्यायनने बनायी थीं। इसके टीकाकार षड्गुरुशिष्य ने वेदार्थदीपिका में लिखा है, कि कात्यायनसे भी पहले एक अनुक्रमणी रहीं। उसमें वेदमन्त्रवाले ऋषियोंके नाम, छन्द, देवतावों के नाम, अनुवाक, ऋग्वेदके प्राचीन सूक्त और सामका विवरण मिलता था। षड्गुरुशिष्यका कहना हैं, कि आर्षानुक्रमणी, छान्दसी, दैवती, अनुवाकानु-क्रमणी और सूत्रानुक्रमणीको शौनकने बनाया है। किन्तु अब शौनककी बनायी केवल अनुवाकानुक्रमणी ही मिलती है। यह पद्यका ग्रन्थ है। कात्यायन की अनुक्रमणो सूत्रकी तरह संक्षेपसे गद्यमें लिखी गयी है। किन्तु षड्गुरुशिष्य और सायणाचार्य के समय अर्थात् सात आठ शत वत्सर पूर्व लगभग सकल अनुक्रमण विद्यमान थीं। कारण, देखनेमें आता कि, षड्गुरुशिष्य शौनकरचित देवानुक्रमणीसे प्रमाणादि दे गये हैं। सायणाचार्यने भी अपने वेदभाष्यके मध्य शौनककी आर्षानुक्रमणी और बृहद्देवतानुक्रमणीसे अनेक स्थान उद्धृत किया है।
ऋग्वदकी सर्वसमेत सात अनुक्रमणीका नामोल्लेख मिलता है। इनमें पांच शौनक, एक कात्यायन और एक निश्चित नहीं, किसकी बनायी है। अनुक्रमणी यद्यपि यथार्थ ही शौनककी बनायी और इस ग्रन्थके परवर्ती लोगोंने चाहे नूतन विषय न भी मिलाया हो, तथापि प्रमाण पाते हैं, कि शौनकने यास्क के बाद जन्म लिया था। कारण, बृहद्देवतामें आश्वलायन, ऐतरेयक, कौषीतकी, भाल्लवि ब्राह्मण, निदानग्रन्थ, शाकल, वास्कल, मयूक, श्वेतकेतु, गालव, गार्गा रथीतर, राथन्तरी, शाकटायन, शाण्डिल्य, रोमकायन, स्थावीर, शाकपूनि, और्णभाव, यास्क प्रभृति अनेक नाम मिलते हैं। इसीसे बोध होता, कि बृहद्देवता यास्क से पीछे लिखी गयी है।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४४८'''|'''अनुकृत—अनुक्रमणी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>अनुकृत (सं॰ त्रि॰) अनुकार किया हुवा, नक़ल उतारा गया।
अनुकृति (सं॰ स्त्री॰) अनु-कृ-क्तिन्। अनुकरण, सदृशीकरण, नक़ल, कापी।
अनुकृत्य (सं॰ त्रि॰) अनुकरण करने योगा, नक़ल उतारने काब़िल।
अनुकृष्ट (सं॰ त्रि॰) अनु-कृष-क्त। १ आक्कष्ट, खिंचा हुवा। २ अनुवृत्त, पूर्व नियममें सम्मिलित या संसाधित, जो पिछले क़ायदेमें मशमूल हो।
अनुक्त (सं॰ त्रि॰) न उक्तम्। अनभिहित, अकथित, बयान् न दिया गया, बेकहा। व्याकरणके मतमें सब बात तिङ्, कृत्, तद्धित और समाससे कही जाती है।
अनुक्ति (सं॰ स्त्री॰) अनुक्त वचन, बेकही बात, अनसुनी।
अनुक्थ (वै॰ त्रि॰) नास्ति उकथं स्तोत्रं यस्य, नञ्-बहुव्री॰। <small>पातृतुदिवचिरिचिसिचिभ्यस्थक्। उण् २।७।</small> १ भजन हीन, बेगीत, जिसका गुण न गाया जाये। २ भजन न गानेवाला, जो गीत न गाये।
अनुक्थ्य (वै॰ त्रि॰) उक् थ-यत्, न उक्तमर्हति नञ्-तत्। छन्दांसि च। स्तुतिके अयोगा, अप्रशस्य, तारीफ़के नाक़ाबिल, जिसकी प्रशंसा पड़ न सके।
अनुक्रकच (सं॰ त्रि॰) दन्तविशिष्ट, दन्दांदार, दंतीला, आरे-जैसे दांतवाला।
अनुक्रम (सं॰ पु॰) अनुगतं क्रमम्, अतिक्रा॰ तत्। १ अनुगत क्रम, पिछला सिलसिला, पीछेकी तरतीब। २ संयत सूची, सिलसिलेवार फ़ेहरिस्त। (अव्य॰) क्रमपर, नियममें, आदेशसे, सिलसिलेवार, बक़ायदे, तरतीबको देखकर।
अनुक्रमण (सं॰ क्ली॰) नियमित प्रवाह, क़ायदेकी रविश, जो चाल ठीक निकले। २ पोछेका चलना।
अनुक्रमणिका, अनुक्रमणी (सं॰ स्त्री॰) अनुक्रम्यते यथोत्तरं परिपाठ्या आरभ्यतेऽनया, अनु-क्रम-करणे ल्युट्। स्त्रीत्वात् ङीप् स्वार्थे कन् ह्रस्वः। १ ग्रन्थ-विशेषका आनुपूर्व पाठादि ज्ञापक परिच्छेद अथवा प्रातिशाख्य, सूचीपत्र, फ़ेहरिस्त। २ भूमिका,<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>उपक्रमणिका, दीवाचा। अनुक्रमणिका एक तरहका सूचीपत्र है। इसमें प्रत्येक सामका प्रथम शब्द, सामकी संख्या, ऋषि, देवता और छन्दका नाम उल्लिखित है। सामवेदकी अनुक्रमणीको 'सर्वानु-क्रमणी' कहते हैं।
ऋग्वेदकी अनुक्रमणी कात्यायनने बनायी थीं। इसके टीकाकार षड्गुरुशिष्य ने वेदार्थदीपिका में लिखा है, कि कात्यायनसे भी पहले एक अनुक्रमणी रहीं। उसमें वेदमन्त्रवाले ऋषियोंके नाम, छन्द, देवतावों के नाम, अनुवाक, ऋग्वेदके प्राचीन सूक्त और सामका विवरण मिलता था। षड्गुरुशिष्यका कहना हैं, कि आर्षानुक्रमणी, छान्दसी, दैवती, अनुवाकानु-क्रमणी और सूत्रानुक्रमणीको शौनकने बनाया है। किन्तु अब शौनककी बनायी केवल अनुवाकानुक्रमणी ही मिलती है। यह पद्यका ग्रन्थ है। कात्यायन की अनुक्रमणो सूत्रकी तरह संक्षेपसे गद्यमें लिखी गयी है। किन्तु षड्गुरुशिष्य और सायणाचार्य के समय अर्थात् सात आठ शत वत्सर पूर्व लगभग सकल अनुक्रमण विद्यमान थीं। कारण, देखनेमें आता कि, षड्गुरुशिष्य शौनकरचित देवानुक्रमणीसे प्रमाणादि दे गये हैं। सायणाचार्यने भी अपने वेदभाष्यके मध्य शौनककी आर्षानुक्रमणी और बृहद्देवतानुक्रमणीसे अनेक स्थान उद्धृत किया है।
ऋग्वदकी सर्वसमेत सात अनुक्रमणीका नामोल्लेख मिलता है। इनमें पांच शौनक, एक कात्यायन और एक निश्चित नहीं, किसकी बनायी है। अनुक्रमणी यद्यपि यथार्थ ही शौनककी बनायी और इस ग्रन्थके परवर्ती लोगोंने चाहे नूतन विषय न भी मिलाया हो, तथापि प्रमाण पाते हैं, कि शौनकने यास्क के बाद जन्म लिया था। कारण, बृहद्देवतामें आश्वलायन, ऐतरेयक, कौषीतकी, भाल्लवि ब्राह्मण, निदानग्रन्थ, शाकल, वास्कल, मयूक, श्वेतकेतु, गालव, गार्गा रथीतर, राथन्तरी, शाकटायन, शाण्डिल्य, रोमकायन, स्थावीर, शाकपूनि, और्णभाव, यास्क प्रभृति अनेक नाम मिलते हैं। इसीसे बोध होता, कि बृहद्देवता यास्क से पीछे लिखी गयी है।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुक्रान्त—अनुगन्तव्य'''|'''४४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>यजुर्वेदकी तीन अनुक्रमणी हैं,—एक आत्रेयी, एक चारायणीय और एक माध्यन्दिन शाखाकी। आत्रेयी अनुक्रमणीमें लिखा, कि वैशम्पायनने वह अनुक्रमणी यास्कको दी थी। यास्कके हाथसे यह तित्तिरिको मिली। इसी तरह तित्तिरिसे उक्ष और उक्षसे आत्रेयने इसे पाकर पद-रचना फैलायी है।
सामवेदकी अनुक्रमणी दो प्रकारकी है। इसमें एकका 'नैगेयानामृक्ष्वार्षम्' और दूसरीका 'नैगेयाना-मृक्षुदैवतम्' नाम है। कोई-कोई अनुमान अड़ाते हैं, कि शेषोक्त अनुक्रमणी अधिक दिनकी नहीं बनी।
अथर्ववेदकी केवल एक अनुक्रमणी मिलती, जिसे बृहत्सर्वानुक्रमणी कहते हैं। यह झगड़ेकी बात है, कि सिवा उसके उस समय अथर्ववेदकी दूसरी अनुक्रमणी थी या नहीं। बृहत्सर्वानुक्रमणी दशपटल में समाप्त पड़ी है। अथर्ववेद-संहिताके यावतीय
विषयकी तालिका इसमें अतिस्पष्टरूपसे दी गई है।
अनुक्रान्त (सं॰ त्रि॰) संसाधित, पठित अथवा नियमितरूपसे कृत, पहुंचा, पढ़ा या क़ायदेसे अञ्जाम दिया हुवा।
अनुक्रिया (सं॰ स्त्री॰) १ अनुकरण, नक़ल। २ पिछली रस्म।
अनुक्री (सं॰ पु॰) अनुक्रियते, अनु-कृ-ई-किञ्च। १ सद्यस्क नामक यज्ञ। २ पिछली रस्म या चाल।
अनुक्रोश (सं॰ पु॰) अनुक्रोशति अनेन, अनुक्रुश-आह्वाने रोदने च घञ्। १ करुणा, कृपा, रहम, तरस।— <small>"कृप्रादयानुकम्पास्यादनुक्रोशः। (अमर)</small> त्रि॰ अनुगतं क्रोशम्, गति-स॰। २ एक कोस चला हुवा, जो दो मील राह निकल गया हो।
अनुक्षण (सं॰ अव्य॰) वीप्सायां अव्ययी॰। १ प्रतिक्षण, हरवक्त़ पल-पल। २ अनवरत, लगातार। (त्रि॰) अनुगतं क्षणम्, गति-स॰। चिरकाल रहने-वाला, जो हमेशा बना रहे।
अनुक्षत्तृ (सं॰ पु॰) द्वारपालक या सारथीका सहायक, दरबान या गड़ीबानका हाज़िरबाश।
अनुक्षत्तृ (सं॰ अव्य॰) रात-रात, कई रातों।
अनुक्षेत्र (सं॰ क्ली॰) उड़ीसेमें (मन्दिरके) भृत्यको
दिया जानेवाला पारिश्रमिक, जो उजरत उड़ोसेमें मन्दिरके नौकरको मिलती है।
अनुखञ्ज (सं॰ पु॰) प्रदेशविशेष, किसी मुल्कका नाम।
अनुख्याति (सं॰ स्त्री॰) आविष्कार करने अथवा संवाद देनेका कार्य, ईजाद निकालने या ख़बर लगानेकी बात।
अनुख्यातृ (सं॰ पु॰) आविष्कार करने अथवा समाचार सुनानेवाला व्यक्ति, जो शख़्श ईजाद निकाले या ख़बर लाये।
अनुग (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चाद् गच्छति, अनु-गम-ड। १ पश्चाद्गामी, पीछे-पीछे चलनेवाला। २ सहचर, सेवक, साथ रहने या ख़िदमत उठानेवाला।
अनुगङ्ग (सं॰ अव्य॰) गङ्गायाम् विभक्त्यर्थेऽव्ययी॰। गङ्गामें, गङ्गाके पास।
अनुगणित (सं॰ त्रि॰) गिना हुवा, जिसका शुमार लग गया हो।
अनुगणितिन् (सं॰ त्रि॰) गिने हुवा, जिसने शुमार बांध लिया हो।
अनुगत (सं॰ त्रि॰) अनु-गम-क्त। १ पश्चाद्गत, पीछे पहुंचा हुवा। २ आश्रित, मातहत। ३ यथाक्रमगत, सिलसिले से चला। ४ संगृहीत, पकड़ा गया। ५ अखिल, समूचा। ६ विशेष, ख़ास। ७ अधीन, ताबेदार। (क्ली॰) ८ संगीतका समान समय, जो वक्त़ गाने में कम-ज्य़ादा न मालूम हो।
अनुगतार्थ (सं॰ त्रि॰) आ गये हुये अर्थका, जिसका मानी मिलता हो।
अनुगति (सं॰ स्त्री॰) अनु-गम-क्तिन्। १ अनुगमन, पश्चाद्गमन, पीछे रहनेकी चाल। २ अनुकार नक़ल। ३ मृत्यु, मौत।
अनुगतिक (सं॰ पु॰) १ पश्चाद्गामी व्यक्ति, पीछे पड़नेवाला शख्श। २ अनुकरण निकालनेवाला, नक़्काल।
अनुगन्तव्य (सं॰ त्रि॰) पश्चाद्गमन लगाने योग्य, पीछे-पीछे जाने क़ाबिला। २ अनुकरण करने योग्य जो नक़ल उतारने लायक़ हो।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुक्रान्त—अनुगन्तव्य'''|'''४४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>यजुर्वेदकी तीन अनुक्रमणी हैं,—एक आत्रेयी, एक चारायणीय और एक माध्यन्दिन शाखाकी। आत्रेयी अनुक्रमणीमें लिखा, कि वैशम्पायनने वह अनुक्रमणी यास्कको दी थी। यास्कके हाथसे यह तित्तिरिको मिली। इसी तरह तित्तिरिसे उक्ष और उक्षसे आत्रेयने इसे पाकर पद-रचना फैलायी है।
सामवेदकी अनुक्रमणी दो प्रकारकी है। इसमें एकका 'नैगेयानामृक्ष्वार्षम्' और दूसरीका 'नैगेयाना-मृक्षुदैवतम्' नाम है। कोई-कोई अनुमान अड़ाते हैं, कि शेषोक्त अनुक्रमणी अधिक दिनकी नहीं बनी।
अथर्ववेदकी केवल एक अनुक्रमणी मिलती, जिसे बृहत्सर्वानुक्रमणी कहते हैं। यह झगड़ेकी बात है, कि सिवा उसके उस समय अथर्ववेदकी दूसरी अनुक्रमणी थी या नहीं। बृहत्सर्वानुक्रमणी दशपटल में समाप्त पड़ी है। अथर्ववेद-संहिताके यावतीय
विषयकी तालिका इसमें अतिस्पष्टरूपसे दी गई है।
{{Outdent|अनुक्रान्त (सं॰ त्रि॰) संसाधित, पठित अथवा नियमितरूपसे कृत, पहुंचा, पढ़ा या क़ायदेसे अञ्जाम दिया हुवा।}}
{{Outdent|अनुक्रिया (सं॰ स्त्री॰) १ अनुकरण, नक़ल। २ पिछली रस्म।}}
{{Outdent|अनुक्री (सं॰ पु॰) अनुक्रियते, अनु-कृ-ई-किञ्च। १ सद्यस्क नामक यज्ञ। २ पिछली रस्म या चाल।}}
{{Outdent|अनुक्रोश (सं॰ पु॰) अनुक्रोशति अनेन, अनुक्रुश-आह्वाने रोदने च घञ्। १ करुणा, कृपा, रहम, तरस।— <small>"कृप्रादयानुकम्पास्यादनुक्रोशः। (अमर)</small> त्रि॰ अनुगतं क्रोशम्, गति-स॰। २ एक कोस चला हुवा, जो दो मील राह निकल गया हो।}}
{{Outdent|अनुक्षण (सं॰ अव्य॰) वीप्सायां अव्ययी॰। १ प्रतिक्षण, हरवक्त़ पल-पल। २ अनवरत, लगातार। (त्रि॰) अनुगतं क्षणम्, गति-स॰। चिरकाल रहने-वाला, जो हमेशा बना रहे।}}
{{Outdent|अनुक्षत्तृ (सं॰ पु॰) द्वारपालक या सारथीका सहायक, दरबान या गड़ीबानका हाज़िरबाश।}}
{{Outdent|अनुक्षत्तृ (सं॰ अव्य॰) रात-रात, कई रातों।}}
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{{Outdent|अनुखञ्ज (सं॰ पु॰) प्रदेशविशेष, किसी मुल्कका नाम।}}
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{{Outdent|अनुग (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चाद् गच्छति, अनु-गम-ड। १ पश्चाद्गामी, पीछे-पीछे चलनेवाला। २ सहचर, सेवक, साथ रहने या ख़िदमत उठानेवाला।}}
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{{Outdent|अनुगत (सं॰ त्रि॰) अनु-गम-क्त। १ पश्चाद्गत, पीछे पहुंचा हुवा। २ आश्रित, मातहत। ३ यथाक्रमगत, सिलसिले से चला। ४ संगृहीत, पकड़ा गया। ५ अखिल, समूचा। ६ विशेष, ख़ास। ७ अधीन, ताबेदार। (क्ली॰) ८ संगीतका समान समय, जो वक्त़ गाने में कम-ज्य़ादा न मालूम हो।}}
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{{Outdent|अनुगति (सं॰ स्त्री॰) अनु-गम-क्तिन्। १ अनुगमन, पश्चाद्गमन, पीछे रहनेकी चाल। २ अनुकार नक़ल। ३ मृत्यु, मौत।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''४५०'''|'''अनुगम—अनुग्र'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{outdent|अनुगम (सं॰ पु॰) अनु-गम अप्। १ पश्चाद्गमन, जीवन या मरणका सङ्ग, पीछेका जाना, जीने या मरनेका साथ। २ विधवाका सती होना, बेवा औरतका अपने मरे ख़ाविन्दके साथ जल जाना। ३ अनुकरण, आप्ति, नक़ल, पहुंच। न्यायमें सामान्य धर्म द्वारा विशेषरूप सकलका संग्रह अनुगम कहाता
है। जैसे—<small>"सर्वेषां घटानामनुगमो घटत्वम्।"</small> अर्थात् सामान्य 'घटत्व' धर्म कहनेसे नील, पीत प्रभृति सकल घट समझे जाते हैं। इसीतरह नरत्वरूप धर्मको निर्दिष्ट बनानेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यवन प्रभृति सकल जातिके मनुष्यका मतलब निकलता है।}}
{{outdent|अनुगमन (सं॰ क्ली॰) अनु-गम-भावे ल्युट्। <small>अनुगम देखो।</small>}}
{{outdent|अनुगम्य, <small>अनुगन्तव्य देखो।</small>}}
{{outdent|अनुगर्जित (सं॰ क्ली॰) गर्जती गूंज, गड़गड़ाती हुयी बाज़गश्त।}}
{{outdent|अनुगव (सं॰ क्ली॰) गोः सदृश आयामः। अनुगु, ततो निपातने अच्। <small>अनुगवमायामे। पा ५।४।८३।</small> १ गोपरिमित शकट, गायके बराबर गाड़ी। (अव्य॰) २ गोके अनुकूल होनेपर गायके मुवाफ़िक़ रहनेसे।
{{outdent|अनुगवीन (सं॰ त्रि॰) गोः पश्चाद् अनुगु पर्याप्तं गच्छति-ख। <small>अनुग्वलं गामीति। पा ५ ।२।१५।</small> १ गोका पश्चाद्गामी, गायके पीछे जानेवाला। (पु॰) २ गो-समूह, गाय-बैलका झुण्ड।}}
{{outdent|अनुगा (सं॰ स्त्री॰) एक अप्सरस्का नाम, किसी परीका इस्म।}}
{{outdent|अनुगाङ्ग (सं० पु०) गङ्गातीरका प्रदेश, जो मुल्क गङ्गा के किनारे बसा हो।}}
{{outdent|अनुगाढ (सं॰ त्रि॰) मग्न, ग़र्क, डूबा हुवा, जो डुबकी लगाये हो।}}
{{outdent|अनुगादिन् (सं॰ त्रि॰), अनुगदति, अनु-गद-णिनि। <small>अनुगादिनष्ठक् च। पा ५।४।१३ ।</small> अनुवादक, तरजुमा बनानेवाला, वचनमें पश्चाद्गमनशील, जो पीछे-पीछे बात बताये।}}
{{outdent|अनुगामिन् (सं॰ त्रि॰), अनुगच्छति, अनु-गद-णिनि। १ पश्चाद्गामी, पीछे चलनेवाला। २ सहचर, जो साथ}}
रहे। ३ सहवास या सम्भोग सांटनेवाला, जो शहवत
लगाये । (स्त्री० ) अनुगामिनी ।
अनुगामी,
अनुगामिन् देखो ।
अनुगामुक (सं० त्रि०) खभावत: अथवा अनवरत
पश्चाद् गमन लगाने या सङ्गमें रहनेवाला, जो आदतन
या हमेशा पोछे चले या साथ रहे ।
अनुगिरम् (सं० अव्य० ) पर्वतपर, पहाड़ के ऊपर ।
अनुगीत ( सं० पु० ) छन्दोविशेष, एक किस्म का
बहर ।
अनुगीता (सं० स्त्री० ) महाभारतका भाग विशेष ।
अश्वमेधपर्वके १६वें से ८२ वें अध्यायतक अनुगीता
गयी है।
।
अनुगौति (सं० स्त्री० ) छन्दोविशेष, एक तरह की
बहर । इसमें दो पद रहते, प्रत्येक पदमें सत्ताईस
और बत्तीसके क्रमसे मात्रा मिलाते हैं ।
अनुगु ( सं ० अव्य० ) गोक पश्चात्, गायबैलके पीछे
अनुगुण (सं० त्रि०) अनुकूलो गुणो यस्य । १ सम-
गुणविशिष्ट, हमसिफ्त, हमवस्फ, जिसका गुण
बराबर रहे | २ सुयोग्य, काबिल | ( अव्य० )
३ स्वभावत:, प्रकृत रूपसे, कुदरतन्, अपने गुण
अनुसार। ( पु० ) ४ स्वाभाविक गुण, कुदरती
सिफत, जो गुण आप ही आप आया हो । ५ काव्या-
लङ्गार विशेष । इसमें किसी द्रव्यका पहला गुण
अपने जैसे दूसरेके मिलनेसे निखरता है,—
"नयन तिरीके हो चले कुटिल अलकके सङ्ग ।
अधरन छवि अवलोकिके वदन अरुण लहि रङ्ग ॥”
अनुगुप्त (सं० त्रि०) अनु-गुप रक्षणे क्त । १ आच्छा-
दित, ढंका हुवा । २ आवरणयुक्त, जिसपर परदा
पड़ा हो १३ अप्रकट, पोशीदा, छिपा हुवा । ४ रक्षित,
महफ ज़ ।
अनुगादिन् ( सं० त्रि० ) अनुगदति, अन्-गढ़ खिनि । अनुग्टहीत ( सं० त्रि० ) अनु-ग्रह-क्त | यहिज्यावयिव्यधिवष्ठि-
विचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च । पा ६ १ १ १ अनुग्रहयुक्त,
एहसान्मन्द । २ अनुग्रहपात्र, उपकृत, जिसपर
मेहरबानी दिखायो गयो हो । ३ पश्चाद् रचित,
पोछे हिफ़ाज़त किया गया
अनुग्र (सं० त्रि०) न उग्रम् । अनुद्धत, अनुद्गूर्ण,<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४५०'''|'''अनुगम—अनुग्र'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{outdent|अनुगम (सं॰ पु॰) अनु-गम अप्। १ पश्चाद्गमन, जीवन या मरणका सङ्ग, पीछेका जाना, जीने या मरनेका साथ। २ विधवाका सती होना, बेवा औरतका अपने मरे ख़ाविन्दके साथ जल जाना। ३ अनुकरण, आप्ति, नक़ल, पहुंच। न्यायमें सामान्य धर्म द्वारा विशेषरूप सकलका संग्रह अनुगम कहाता
है। जैसे—<small>"सर्वेषां घटानामनुगमो घटत्वम्।"</small> अर्थात् सामान्य 'घटत्व' धर्म कहनेसे नील, पीत प्रभृति सकल घट समझे जाते हैं। इसीतरह नरत्वरूप धर्मको निर्दिष्ट बनानेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यवन प्रभृति सकल जातिके मनुष्यका मतलब निकलता है।}}
{{outdent|अनुगमन (सं॰ क्ली॰) अनु-गम-भावे ल्युट्। <small>अनुगम देखो।</small>}}
{{outdent|अनुगम्य, <small>अनुगन्तव्य देखो।</small>}}
{{outdent|अनुगर्जित (सं॰ क्ली॰) गर्जती गूंज, गड़गड़ाती हुयी बाज़गश्त।}}
{{outdent|अनुगव (सं॰ क्ली॰) गोः सदृश आयामः। अनुगु, ततो निपातने अच्। <small>अनुगवमायामे। पा ५।४।८३।</small> १ गोपरिमित शकट, गायके बराबर गाड़ी। (अव्य॰) २ गोके अनुकूल होनेपर गायके मुवाफ़िक़ रहनेसे।}}
{{outdent|अनुगवीन (सं॰ त्रि॰) गोः पश्चाद् अनुगु पर्याप्तं गच्छति-ख। <small>अनुग्वलं गामीति। पा ५ ।२।१५।</small> १ गोका पश्चाद्गामी, गायके पीछे जानेवाला। (पु॰) २ गो-समूह, गाय-बैलका झुण्ड।}}
{{outdent|अनुगा (सं॰ स्त्री॰) एक अप्सरस्का नाम, किसी परीका इस्म।}}
{{outdent|अनुगाङ्ग (सं० पु०) गङ्गातीरका प्रदेश, जो मुल्क गङ्गा के किनारे बसा हो।}}
{{outdent|अनुगाढ (सं॰ त्रि॰) मग्न, ग़र्क, डूबा हुवा, जो डुबकी लगाये हो।}}
{{outdent|अनुगादिन् (सं॰ त्रि॰), अनुगदति, अनु-गद-णिनि। <small>अनुगादिनष्ठक् च। पा ५।४।१३ ।</small> अनुवादक, तरजुमा बनानेवाला, वचनमें पश्चाद्गमनशील, जो पीछे-पीछे बात बताये।}}
{{outdent|अनुगामिन् (सं॰ त्रि॰), अनुगच्छति, अनु-गद-णिनि। १ पश्चाद्गामी, पीछे चलनेवाला। २ सहचर, जो साथ}}
रहे। ३ सहवास या सम्भोग सांटनेवाला, जो शहवत लगाये। (स्त्री॰) अनुगामिनी।
{{outdent|अनुगामी, <small>अनुगामिन् देखो।</small>}}
{{outdent|अनुगामुक (सं॰ त्रि॰) स्वभावत: अथवा अनवरत पश्चाद् गमन लगाने या सङ्गमें रहनेवाला, जो आदतन या हमेशा पीछे चले या साथ रहे।}}
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{{outdent|अनुगीता (सं॰ स्त्री॰) महाभारतका भाग विशेष। अश्वमेधपर्वके १६वें से ९२ वें अध्यायतक अनुगीता गयी है।}}
{{outdent|अनुगीति (सं॰ स्त्री॰) छन्दोविशेष, एक तरह की बहर। इसमें दो पद रहते, प्रत्येक पदमें सत्ताईस और बत्तीसके क्रमसे मात्रा मिलाते हैं।}}
{{outdent|अनुगु (सं॰ अव्य॰) गोक पश्चात्, गायबैलके पीछे।}}
{{outdent|अनुगुण (सं॰ त्रि॰) अनुकूलो गुणो यस्य। १ सम-गुणविशिष्ट, हमसिफ़त, हमवस्फ़, जिसका गुण बराबर रहे। २ सुयोग्य, क़ाबिल। (अव्य॰) ३ स्वभावतः, प्रकृत रूपसे, क़ुदरतन्, अपने गुणके अनुसार। (पु॰) ४ स्वाभाविक गुण, क़ुदरती सिफ़त, जो गुण आप ही आप आया हो। ५ काव्या-लङ्गार विशेष। इसमें किसी द्रव्यका पहला गुण अपने-जैसे दूसरेके मिलनेसे निखरता है,—}}
{{Block center|<poem><small>"नयन तिरीछे ह्वे चले कुटिल अलकके सङ्ग।
अधरन छवि अवलोकिके वदन अरुण लहि रङ्ग॥"</small></poem>}}
{{outdent|अनुगुप्त (सं॰ त्रि॰) अनु-गुप रक्षणे क्त। १ आच्छा-दित, ढंका हुवा। २ आवरणयुक्त, जिसपर परदा पड़ा हो। ३ अप्रकट, पोशीदा, छिपा हुवा। ४ रक्षित, महफूज़।}}
{{outdent|अनुग्टहीत (सं॰ त्रि॰) अनु-ग्रह-क्त। <small>ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्ठि-विचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च। पा ६।१।१६।</small> १ अनुग्रहयुक्त,
एहसान्मन्द। २ अनुग्रहपात्र, उपकृत, जिसपर मेहरबानी दिखायो गयी हो। ३ पश्चाद् रक्षित, पीछे हिफ़ाज़त किया गया}}
{{outdent|अनुग्र (सं॰ त्रि॰) न उग्रम्। अनुद्धत, अनुद्गूर्ण,}}<noinclude></noinclude>
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{{outdent|अनुगमन (सं॰ क्ली॰) अनु-गम-भावे ल्युट्। <small>अनुगम देखो।</small>}}
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{{outdent|अनुगवीन (सं॰ त्रि॰) गोः पश्चाद् अनुगु पर्याप्तं गच्छति-ख। <small>अनुग्वलं गामीति। पा ५ ।२।१५।</small> १ गोका पश्चाद्गामी, गायके पीछे जानेवाला। (पु॰) २ गो-समूह, गाय-बैलका झुण्ड।}}
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{{outdent|अनुगीति (सं॰ स्त्री॰) छन्दोविशेष, एक तरह की बहर। इसमें दो पद रहते, प्रत्येक पदमें सत्ताईस और बत्तीसके क्रमसे मात्रा मिलाते हैं।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुग्रह—अनुच्चार'''|'''४५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>असमर्थ, शान्तस्वभाव, जो तबीयतका टेढ़ा न हो, सीधा-सादा, भोला-भाला।
{{Outdent|अनुग्रह (सं॰ पु॰) अनु-ग्रह-अप्। <small> ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च। पा ३।३।५८।</small> दुःख दूर करनेकी इच्छा, तकलीफ़ मिटानेकी ख़्वाहिश, प्रसन्नता, आनुकूल्य, मेहरबानी, नेवाज़िश। २ अनिष्टका निवारण निकाल इष्टका साधन, तकलीफ़ को मिटा ख़्वाहिश पूरा करना, प्रसाद। ३ पश्चादरक्षा, पीछे की हिफ़ाजत। ४ दरिद्रादिका प्रतिपालन, ग़रीब वग़ैरहकी परवरिश। रामतर्कवागीशने अनुग्रहका यह उदाहरण दिया है,}}
{{Block center|<poem><small>"विरूपोन्मत्तनिः स्वानामकुत्सापूर्वकं हि यत्।
पूरणं दानमानाभ्यामनुग्रह उदाहृतः॥"</small></poem>}}
अर्थात् कुरूप, उन्मत्त और निर्धन व्यक्तिकी निन्दा न निकाल जो प्रतिपालन पहुंचाना होता, वही अनुग्रह कहाता है। ५ पुराणानुसार—पञ्चम अथवा अष्टम कल्प, दुनियाका पांचवें या आठवें मरतबा फिर पैदा होना। (त्रि॰) ६ चन्द्र और सूर्य ग्रहणके अनुगत, जो चन्द्र और सूर्यके ग्रहण में शामिल हो। ७ सूर्यादि नवग्रहके अनुगत, सूर्य वग़ैरह नौ ग्रहमें शामिल रहनेवाला।
{{Outdent|अनुग्रहकातर (सं॰ त्रि॰) प्रसन्न बनानेका इच्छुक, ख़ुश करनेका ख़्वाहिश मन्द।}}
{{Outdent|अनुग्रहण (सं॰ क्ली॰) <small>अनुग्रह देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुग्रहसर्ग (सं॰ पु॰) सांख्यमतसे—भावकी उत्पत्ति, तबीयत का पैदा होना।}}
{{Outdent|अनुग्रहित <small>अनुग्राहित देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुग्रहिन् (वै॰ पु॰) इन्द्रजालमें निपुण व्यक्ति, ओझा, जादूगर, साहिर, जो शख़्स जादू जगानेमें ज़ाहिर हो।}}
{{Outdent|अनुग्राम (सं॰ अव्य॰) ग्राम-ग्राम, एक गांवसे दूसरे गांवतक।}}
{{Outdent|अनुग्रासक (सं॰ पु॰) ग्रासके तुल्य वस्तु, मुंहभर चीज़।}}
{{Outdent|अनुग्राहक (सं॰ त्रि॰) १ सरल बनानेवाला, जो किसी कामको सीधी राहपर लगा दे। २ कृपालु, दयालु, मेहरबान।}}
{{Outdent|अनुग्राहित (सं॰ त्रि॰) उपकृत, जिसपर नेवाज़िश देखायी गयी हो।}}
{{Outdent|अनुग्राहिन् (सं॰ त्रि॰) अनुकम्पा पहुंचानेवाला, जो नेवाज़िश रखे।}}
{{Outdent|अनुग्राही, <small>अनुग्राहिन् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुग्राह्य (सं॰ त्रि॰) अनु-ग्रह ण्यत्। अनुग्रहके योग्य, नेवाज़िशके क़ाबिल।}}
{{Outdent|अनुघात (सं॰ पु॰) विनाश, मारण, संहार, मार, चोट।}}
{{Outdent|अनुचर (सं॰ त्रि॰) अनुचरतीति, अनु-चरट्-अच्। <small>चरेष्टः। पा ३।२।१६ ।</small> १ सहचर, साथ चलनेवाला। २ पश्चादुगामी, जो पीछे रहे। (पु॰) ४ साथी, हमसोहबत। (स्त्री॰) अनुचरा।}}
{{Outdent|अनुचारक (सं॰ पु॰) अनु-चरति, अनु-चर-ण्वुल्। १ अनुगामी, पश्चादुगामी, पीछे चलनेवाला शख्स। २ सेवक, ख़िदमतगार। (क्ली॰) ३ आनुचारिक, सेवकका धर्म, सेवकका कार्य, ख़िदमतगारी, नौकरी। (स्त्री॰) अनुचारका।}}
{{Outdent|अनुचारिन् (सं॰ त्रि॰) पश्चाद् गमनशील, पीछे पड़ा हुवा, जो ख़िदमतमें हाज़िर रहे।}}
{{Outdent|अनुचित (सं॰ त्रि॰) न उचितम्, नञ्-तत्। <small>रुचिवचि-कुचिकुटिभ्यः किवच्। उण् ४ १८५।</small> अपरिचित, अयुक्त, अकर्तव्य, ग़ैरवाजिब, ग़लत, ग़ैरमामूली, अजनवी। २ समीप, दैर्ध्य अथवा श्रेणीमें स्थापित, जो इधर-उधर, लम्बानमें या क़तारसे रखा गया हो।}}
{{Outdent|अनुचिन्तन (सं॰ क्ली॰) अनु-चिन्ति-ल्युट्। अनुस्मरण, पंश्चात् स्मरण, फ़िक्रमन्दी। २ सर्वदा चिन्ता, फ़िक्रका लगा रहना।}}
{{Outdent|अनुचिन्ता (सं॰ स्त्री॰) अनु-चिन्ति-ल्युट्। <small>चिन्ति-पूजिकथिकुम्बिचर्चश्च। पा ३।३।१०५ ।</small> सतत चिन्ता, सर्वदा चिन्ता, फ़िक्र, ग़ौर।}}
{{Outdent|अनुचिन्तित (सं॰ त्रि॰) स्मरण सटाया हुवा, जिसकी याद लगी हो।}}
{{Outdent|अनुच्च (सं॰ त्रि॰) न उच्चम् नञ्-तत्। निम्न, नीच, नीचा, निचला, ज़ेर।}}
{{Outdent|अनुच्चार (सं॰ पु॰) उच्चारणका अभाव, तलफ़फ़ुजकान तड़कना।}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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</noinclude>असमर्थ, शान्तस्वभाव, जो तबीयतका टेढ़ा न हो, सीधा-सादा, भोला-भाला।
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{{Block center|<poem><small>"विरूपोन्मत्तनिः स्वानामकुत्सापूर्वकं हि यत्।
पूरणं दानमानाभ्यामनुग्रह उदाहृतः॥"</small></poem>}}
अर्थात् कुरूप, उन्मत्त और निर्धन व्यक्तिकी निन्दा न निकाल जो प्रतिपालन पहुंचाना होता, वही अनुग्रह कहाता है। ५ पुराणानुसार—पञ्चम अथवा अष्टम कल्प, दुनियाका पांचवें या आठवें मरतबा फिर पैदा होना। (त्रि॰) ६ चन्द्र और सूर्य ग्रहणके अनुगत, जो चन्द्र और सूर्यके ग्रहण में शामिल हो। ७ सूर्यादि नवग्रहके अनुगत, सूर्य वग़ैरह नौ ग्रहमें शामिल रहनेवाला।
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{{Outdent|अनुग्राही, <small>अनुग्राहिन् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुग्राह्य (सं॰ त्रि॰) अनु-ग्रह ण्यत्। अनुग्रहके योग्य, नेवाज़िशके क़ाबिल।}}
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{{Outdent|अनुचर (सं॰ त्रि॰) अनुचरतीति, अनु-चरट्-अच्। <small>चरेष्टः। पा ३।२।१६ ।</small> १ सहचर, साथ चलनेवाला। २ पश्चादुगामी, जो पीछे रहे। (पु॰) ४ साथी, हमसोहबत। (स्त्री॰) अनुचरा।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४५९
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2026-07-22T07:15:07Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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text/x-wiki
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</noinclude>{{outdent|अनुच्चैस् (सं॰ अव्य॰) उच्चखरमें नहीं, धीरेसे, बे
बुलन्द आवज़, न चिल्लाकर, धीमी बोलीमें।}}
{{outdent|अनुच्छाद (सं॰ पु॰) १ लटकनेवाला वस्त्र, जो पोशाक लटकती रहे। २ कटिसे चरण पर्यन्त सम्मुख लटकनेवाले वस्त्रका भाग विशेष, दामन।}}
{{outdent|अनुच्छित्ति (सं॰ स्त्री॰) अविनाश, भङ्गका न भोगना, नाबेख़कनी, बेग़ारती, टुकड़ेका न तड़कना।}}
{{outdent|अनुच्छित्तिधर्मन् (सं॰ त्रि॰) विनाश विहीन गुण-विशिष्ट, ग़ारत न जानेकी सिफ़त रखनेवाला।}}
{{outdent|अनुच्छिन्दत् (सं॰ त्रि॰) विनाश न बनाते हुवा, जो ग़ारत न कर रहा हो।}}
{{outdent|अनुच्छित्र (सं॰ त्रि॰) विनाशरहित, न कटा हुवा, जो ग़ारत न गया हो।}}
{{outdent|अनुच्छिष्ट (सं॰ त्रि॰) उद-शिष-क्त, नञ्-तत्। उच्छिष्ट नहीं, अनूठा, जो जूठा न हो। भोजनके बाद जो अवशिष्ट रहता, वह उच्छिष्ट या जूठा कहाता है।}}
{{outdent|अनुच्छेद्य (सं॰ त्रि॰) उच्छेद या विनाशके अयोग्य, जो उखाड़ा या तोड़ा न जा सके, ग़ारत न किया जा सकनेवाला।}}
{{outdent|अनुजं (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् जायते, जन-ड। १ पश्चात् जात, पीछ पैदा हुवा। २ लघु, छोटा। (पु॰) ३ कनिष्ठ भ्राता, छोटा भाई। (क्ली॰) ४ प्रपौण्डरीकनाम गन्धद्रव्य, पांडरी नामका एक ख़ुशबूदार मशाला।}}
{{outdent|अनुजन (सं॰ अव्य॰) जनके अनुसार, लोगोंके मुवाफ़िक, मेलसे, सबका सम्मत ग्रहणकर, जिसमें किसीको बुरा न लगे।}}
{{outdent|अनुजन्मन् (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् जन्म यस्य, बहुव्री॰। कनिष्ठ सहोदर, छोटा भाई।}}
{{outdent|अनुजन्मा (सं॰ स्त्री॰) १ कनिष्ठा भगिनी, छोटी बहन। (क्ली॰) २ पीछे पैदा हुवा।}}
{{outdent|अनुजा (सं॰ स्त्री॰) १ कनिष्ठा भगिनी, छोटी बहन। (क्ली॰) २ त्रायमाणा लता, पांडरी।}}
{{outdent|अनुजात (सं॰ त्रि॰) अनु-जन-क्त। १ पश्चात् जात, पीछे निकला। २ फिर उत्पन्न हुवा, यज्ञोपवीत दिया गया, जिसका जनेऊ हुवा हो। (पु॰) ३ कनिष्ठ}}
भ्राता, छोटा भाई। ४ पुत्र, बेटा। <small>"असौ कुमारस्तमजोऽनु-जातस्त्रिविष्टपस्येव पतिं जयन्तः।" (रघु ६।७८)</small>
(क्ली॰) ५ प्रपौण्डरीक, पांडरी।
{{outdent|अनुजाता (सं॰ स्त्री॰) त्रायमाणा लता, पांडरी। २ कनिष्ठा भगिनी, छोटी बहन। भ्रातृद्वितीयाके दिवस कनिष्ठा भगिनी यह मन्त्र पढ़ ज्येष्ठभ्राताको अन्न देती है,—}}
{{Block center|<poem><small>"भ्रातस्तवानुजाताऽहं भुक्ष्य भक्तमिदं शुभम्।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः॥"</small></poem>}}
{{outdent|अनुजावर (सं॰ त्रि॰) अनुजाद् अपि अवरः अश्रेष्ठः, ५-तत्। १ अत्यन्त निकृष्ट, निहायत नाकाम। २ अनुजकनिष्ठ, छोटे भाईसे भी कम। ३ अधमतर, बहुत ख़राब। (पु॰) अनुजाया वरः ओढ़ा, ६ तत्। कनिष्ठा भगिनीका वर, छोटे बहनका ख़ाविन्द, बहनोई।}}
{{outdent|अनुजिघृक्षा (सं॰ स्त्री॰) कृपा करनेकी इच्छा, मेहरबानी देखानेकी ख़्वाहिश, जो तबीयत रहम रखती हो।}}
{{outdent|अनुजीर्ण (सं॰ त्रि॰) बूढ़ा-बाढ़ा, गया, गुज़रा, बीता-बिताया, किसी कारणवश जो बुड्ढा पड़ या सड़ गल गया हो।}}
{{outdent|अनुजीविन् (सं॰ त्रि॰) अनु-जीवितमांश्रयतुं शीलं यस्य, अनु-जीव-णिनि। १ आश्रित, सहारा साधे हुवा। (पु॰) २ सेवक, ख़िदमतगार।}}
{{outdent|अनुजीविसात्कृत (सं॰ त्रि॰) अतिशय आश्रित बनाया हुवा, जो ज्य़ादातर सहारेपर डाला गया हो।}}
{{outdent|अनुजीव्य (सं॰ त्रि॰) अनुजीव्यते, अनु-जीव-ण्यत्। १ सेव्य, आश्रयणीय, ख़िदमंत- क़ाबिल, सहारा लेने लायक़, जिसके शरणापत्र बन सकें।}}
{{outdent|अनुञ्झत् (सं॰ त्रि॰) त्याग न तड़काते हुवा, जो छोड़ न रहा हो।}}
{{outdent|अनुञ्झित (सं॰ त्रि॰) अनभिभूत, अबाधित, अत्यक्त, निर्गत, घटाया न गया, जो रुका न हो, छूटा न हुवा।}}
{{outdent|अनुज्ञा (सं॰ स्त्री॰) अनु ज्ञा-अङ्। १ अनुमति, मर्ज़ी, सम्मति। २ गमनकी आज्ञा, जानेका हुक्म। ३ अपराध की क्षमा, क़ुसूरकी मुवाफ़ी। ४ आदेश, फ़रमान्।}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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बुलन्द आवज़, न चिल्लाकर, धीमी बोलीमें।}}
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{{outdent|अनुच्छित्ति (सं॰ स्त्री॰) अविनाश, भङ्गका न भोगना, नाबेख़कनी, बेग़ारती, टुकड़ेका न तड़कना।}}
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{{outdent|अनुजं (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् जायते, जन-ड। १ पश्चात् जात, पीछ पैदा हुवा। २ लघु, छोटा। (पु॰) ३ कनिष्ठ भ्राता, छोटा भाई। (क्ली॰) ४ प्रपौण्डरीकनाम गन्धद्रव्य, पांडरी नामका एक ख़ुशबूदार मशाला।}}
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(क्ली॰) ५ प्रपौण्डरीक, पांडरी।
{{outdent|अनुजाता (सं॰ स्त्री॰) त्रायमाणा लता, पांडरी। २ कनिष्ठा भगिनी, छोटी बहन। भ्रातृद्वितीयाके दिवस कनिष्ठा भगिनी यह मन्त्र पढ़ ज्येष्ठभ्राताको अन्न देती है,—}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४६०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुज्ञात—अनुत्तम'''|'''४५३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
</noinclude>{{outdent|अनुज्ञात (सं॰ त्रि॰) अनु-ज्ञा-क्त। १ कृतानुज्ञ,
मर्ज़ी पाये हुवा, जिसे अनुमति दे दी गयी हो। २ स्वीकृत, मञ्ज़ूर, फ़रमाया गया।
३ प्रतिष्ठित, अधिष्ठित सम्मानित, इख् तियारयाफ़ता, इज्ज़त पाये हुवा, जिसे बड़ाई मिल चुकी हो। ४ गमनार्थ आज्ञा-प्राप्त, जिसे छोड़नेको हुक्म मिला हो, ख़ारिज किया गया, निकाला हुवा।—
{{Block center|<small><poem>"ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठे दाधानं नैव कारयेत्।
अनुज्ञातस्तु कुर्वीत शङ्खस्य वचनं यथा॥" (उशना)</small></poem>}}
{{outdent|अनुज्ञापक (सं॰ पु॰) आदेश अथवा अनुमति देनेवाला व्यक्ति, जो शख्स हुक्म चलाये या ताकीद लगाये।}}
{{outdent|अनुज्ञापन (सं॰ क्ली॰) आदेश, आज्ञा, हुक्म, इख्तयारदिही।}}
{{outdent|अनुज्ञाप्ति (सं॰ स्त्री॰) <small>अनुज्ञापन देखो।</small>}}
{{outdent|अनुज्ञा-प्रार्थना (सं॰ स्त्री॰) आदेश प्राप्त करनेका विनय, हुक्म पानेकी अर्ज।}}
{{outdent|अनुज्ञैषणा (सं॰ स्त्री॰) <small>अनुज्ञा-प्रार्थना देखो।</small>}}
{{outdent|अनुज्येष्ठ (सं॰ त्रि॰) अनुगतं ज्येष्ठम्, प्रादि-स॰। १ ज्येष्ठके अनुगत, जो बड़ेके ही पीछेका हो। (अव्ययी॰) २ ज्येष्ठको उल्लङ्घनकर, बुजर्गोंसे आगे बढ़कर।}}
{{outdent|अनुतक्रं (सं॰ क्ली॰) तक्रानुपान, जो मठा दवाके साथ दिया जाये।}}
{{outdent|अनुतप्त (सं॰ त्रि॰) १ तपा हुवा, तपाया गया। २ दुःखसे भरा, अफ़सुर्दा, ग़मज़दा।}}
{{outdent|अनुतर (सं॰ क्ली॰) अनुतीर्यते अनेन, अनु-तृ-करणे अप्। नदीपारके निमित्त दातव्य शुल्क, दरया पार करनेको दी जानेवाली उतराई, किराया, महसूल।}}
{{outdent|अनुतर्ष (सं॰ क्ली॰) अनुसृष्यते अनेन इदं वा करणे कर्मणि वा घञ्। १ मद्यपानका पात्र, शराब पीनेका प्याला। २ मद्य, शराब। ३ मद्यपानका अभिलाष, शराब पीने का शौक़। ४ पानेच्छा, तृष्णा, पीनेकी ख़्वाहिश प्यास।}}
{{outdent|अनुतर्षण (क्ली॰) १ मद्यपानपात्र, शराब पीनेका प्याला। २ मद्यवितरण, शराबका दौर।}}
{{outdent|अनुताप (सं॰ पु॰) अनु-तप घञ्। १ पश्चात्ताप, अफ़सोस, पछतावा। २ उष्णता, गर्मी, तपिश।}}
{{outdent|अनुतापन (सं॰ त्रि॰) पश्चात्ताप पहुंचानेवाला, जो दुःख दे, पुरअफ़सोस, जिसे देखके पछतावा पड़े।}}
{{outdent|अनुतापिन् (सं॰ त्रि॰) पश्चात्ताप पालते हुवा, पछतावेमें जो पड़ा हो।}}
{{outdent|अनुतिल (सं॰ त्रि॰) अनुगतं तिलम्, गति-स॰। १ तिलानुगत, तिलका, तिलसे भरा हुवा। २ तिलसे उत्पन्न, जो तिलसे पैदा हुवा हो। (अव्य॰) ३ तिल-तिल, यव-यव, बाल-बाल, रत्ती-रत्ती, ख़ूब होशियारीसे, बड़ी बारीकीपर।}}
{{outdent|अनुतिष्ठमान (सं॰ त्रि॰) पीछा करते हुवा, जो पीछे पड़ा हो, अञ्जाम देनेवाला, जो पूरा उतारे, हाज़िरबाश, उपस्थित।}}
{{outdent|अनुतुन्न (वै॰ त्रि॰) दबा हुवा या दबाया गया, जिसकी आबाज़ बन्द कर दी गयी हो।}}
{{outdent|अनुतूलन (सं॰ क्ली॰) तूलेनानुकुष्णाति। तृणाद्यग्रं तूलेनानु-घट्टयति। (वाच॰) अनु-तूल-अनुकोषणे-णिच्-भावे ल्युट्। तूल द्वारा तृणादिके अग्रभागका निकालकर देखा जाना, बज़रिये पैमाने घास वग़ैरहके अगले हिस्सेकी आज़मायश।}}
{{outdent|अनुत्क (सं॰ त्रि॰) न उत्कम्, नञ्-तत्। <small>उत्क उन्मनाः। पा ५।२८।</small> अनुत्कण्ठित, स्वस्थ, अनुत्सुक, अनुन्मना, नाख़्वाहिशमन्द, आराम से बैठा हुवा, जो शौक़ न रखे, बेदिल।}}
{{outdent|अनुत्कर्ष (सं॰ पु॰) न उत्कर्षः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उत्कर्षाभाव, श्रेष्ठताभाव, खुर्दी, पश्ती, छोटाई।}}
{{outdent|अनुत्क्लेश (सं॰ पु॰) उत्क्लेशाभाव, बीमारीका न पड़ना।}}
{{outdent|अनुत्त (सं॰ त्रि॰) न-उन्दी-क्त। <small>नुदविदोन्दवात्राघ्राह्रीभ्योऽन्यतरस्याम्। पा ८।२।५६।</small> १ अक्लिन्न, क्लेदरहित, जो गिरा न हो, न जीतने क़ाबिल। नुद-क्त, नञ्-तत्। २ अनुन्न, अप्रेरित, न भेजा हुवा, जो पहुंचाया न गया हो।}}
{{outdent|अनुत्तम (सं॰ त्रि॰) नास्ति उत्तमं यस्मात्, ५-बहुव्री॰। १ अति उत्कृष्ट, निहायत उम्दा, जिससे}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनुज्ञात—अनुत्तम'''|'''४५३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
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मर्ज़ी पाये हुवा, जिसे अनुमति दे दी गयी हो। २ स्वीकृत, मञ्ज़ूर, फ़रमाया गया।
३ प्रतिष्ठित, अधिष्ठित सम्मानित, इख् तियारयाफ़ता, इज्ज़त पाये हुवा, जिसे बड़ाई मिल चुकी हो। ४ गमनार्थ आज्ञा-प्राप्त, जिसे छोड़नेको हुक्म मिला हो, ख़ारिज किया गया, निकाला हुवा।—}}
{{Block center|<small><poem>"ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठे दाधानं नैव कारयेत्।
अनुज्ञातस्तु कुर्वीत शङ्खस्य वचनं यथा॥" (उशना)</small></poem>}}
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{{outdent|अनुज्ञाप्ति (सं॰ स्त्री॰) <small>अनुज्ञापन देखो।</small>}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४८९
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Sanjana Chowdhury
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४८२'''|'''अनुमृता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
पहुंचना चाहिये। तुम्हारा पाणिग्रहण जो करे, उसी पुनर्बार विवाहेच्छु पतिकी सम्यक् रूपसे जाया बनो।२४।
ऋग्वेद और तैत्तिरीय-आरण्यकवाले दोनो मन्त्रके प्रत्येक शब्दका अर्थ मिलानेसे एक ही भाव निकलता, किन्तु दोनो ही मन्त्र में कालके सम्बन्धपर गड़बड़ पड़ जाता है।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“तामुत्थापयेद्दे वरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी।
जरहासो वोदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकमिति।”</poem>}}}}
{{right|<small>(आश्वलायन-सासूब ४।२।१८)</small>|1em}}
यह सकल प्रमाण देख स्पष्ट हो समझ पड़ा, कि वैदिक समयमें स्वामीकी मृत्यु बाद विधवा फिर घर वापस जाती, मृतपतिके साथ जलती न थी। किन्तु एक बड़ा सन्देह उठ खड़ा होता है। असली वस्तु न रहनेपर उससे नक़ली वस्तु कैसे बनेगी? असली मोती देखकर ही झूठे मोती तय्यार होते हैं। पहले यज्ञो पवीत होनेसे ब्रह्मचारी गुरुके आश्रम पहुंचता, जाकर वेद पढ़ता था। अब वह चाल उठ गयी; यज्ञोपवीत होनेसे कोई गुरुके घर वेद पढ़ने नहीं जाता। किन्तु पहलेके उस असली नियमकी कुछ नकल आज भी देख पड़ती; यज्ञोपवीत होनेपर ब्रह्मचारी घरसे निकल जानेके लिये कई कदम आगे बढ़ता, पीछे जननी समझा-बुझा उसे वापस लाती है। यह केवल
पुरातन नियमको रक्षामात्र है, वस्तुतः दूसरी कोई भी बात नहीं दिखाई देती।
वैदिक समयके सहमरणपर भी सन्देह है——स्वामीकी मृत्यु बाद विधवा नारी मृतपतिकी चितामें क्यों जाकर लेटती थी। मालूम होता है, कि वैदिक कालसे पूर्व आर्य-जातिके मध्य सहमरण चलित रहा। उत्साहपूर्वक भगिनी-हत्या, वा मातृ-हत्या करना धार्मिक लोगोंकी बुद्धिमें नही बैठता। वेदके समय आर्य सुशिक्षित और सभ्य बने, धर्मके
निर्मल ज्योतिःने उनके मनको आलोकित किया था। वैसी अवस्थापर मिथ्या आशामें आ वह कभी स्त्रीहत्या कर न सके होंगे। किन्तु कोई प्रथा देशमें अधिक दिन चलती रहनेसे उसे बिलकुल
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बन्द कर देना भी कठिन काम है। वैदिक समयसे पूर्व सहमरण चलित रहा, इसी कारण वैदिक समयमें ऋषि यह प्रथा बिलकुल बन्द कर न सके। इसलिये स्वामीकी मृत्यु बाद पुरातन नियमकी रक्षा रखनेके निमित्त विधवा नारी मृत पतिकी चिता-शय्यापर एक बार जा लेटती, अन्त में लोग उसे उठा लाते थे। अनुमानसे इस समय इतना ही कहा जा सकता है, कि वह सिवा असली नियमकी नक़लके दूसरा कुछ भी न था।
यही सहमरणका पूर्व इतिहास हुवा। फिर भी, मुसलमानी ज़माने में सहमरण-प्रथाके विशेष भावसे प्रचलित होनेका कारण हिन्दूनारीकी कुलधर्मरक्षा रही। मुसलमानों में बहु विवाह विशेष भावसे प्रचलित है। मुसलमानोंके आधिपत्य-कालमें किसी-किसी मुसलमान-राजपुरुषकी हिन्दू महिलापर तीव्र और लोलुप दृष्टि पड़ती थी। इस आशङ्कासे सकल ही पतिहीना नारीके सहमरणको अच्छा समझते, कि पीछे उनकी पतिहीना विधवापर किसी प्रकार अत्याचार न मचने लगता। इसीसे अंगरेजी अधिकारके प्रारम्भ पर्यन्त भारतमें सर्वत्र ही सहमरणके बाहुल्यका सन्धान लगा है। इसतरह बहुकाल भारतमें सहमरण प्रथा प्रचलित रहनेसे देशीय राज्यके मध्य भी यह प्रथा कुलगौरवजनक होनेके कारण सर्वत्र आद्रित हुयी थी। बस, जो नारी सहमरणमें आत्मोत्सर्ग रखती, वह दाक्षायणी सती-जैसी भारतमें सर्वत्र पूजी जाती रही। अनुमृता नारीकी स्मृतिरक्षाके लिये भारतके नानास्थानमें बहु सतीस्तम्भ बने हैं।<small> सती देखो।</small>
अब बताते हैं, पचास वत्सर पहले हिन्दुस्थानकी स्त्री कैसे जल जाती थी। ऋतुमती, गर्भवती रहने और गोदमें छोटा बच्चा होनेसे स्त्री पतिके साथ कभी जलने न पाती रही। फिर भी, ऋतुके तृतीय दिवस स्वामी की मृत्यु, पड़नेसे एक दिन शव रखनेकी व्यवस्था विद्यमान है। किन्तु सन् १८२२।२३ ई॰ में गवर्नमेण्ट चारो ओर तीव्र दृष्टि डालने लगी; पुलिसकी विशेष अनुमति न मिलनेसे कोई सतीदाह कर न सकता, इसलिये उस समय तीनचार दिनतक
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४८२'''|'''अनुमृता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
पहुंचना चाहिये। तुम्हारा पाणिग्रहण जो करे, उसी पुनर्बार विवाहेच्छु पतिकी सम्यक् रूपसे जाया बनो।२४।
ऋग्वेद और तैत्तिरीय-आरण्यकवाले दोनो मन्त्रके प्रत्येक शब्दका अर्थ मिलानेसे एक ही भाव निकलता, किन्तु दोनो ही मन्त्र में कालके सम्बन्धपर गड़बड़ पड़ जाता है।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“तामुत्थापयेद्दे वरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी।
जरहासो वोदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकमिति।”</poem>}}}}
{{right|{{x-smaller|(आश्वलायन-सासूब ४।२।१८)}}}}
यह सकल प्रमाण देख स्पष्ट हो समझ पड़ा, कि वैदिक समयमें स्वामीकी मृत्यु बाद विधवा फिर घर वापस जाती, मृतपतिके साथ जलती न थी। किन्तु एक बड़ा सन्देह उठ खड़ा होता है। असली वस्तु न रहनेपर उससे नक़ली वस्तु कैसे बनेगी? असली मोती देखकर ही झूठे मोती तय्यार होते हैं। पहले यज्ञो पवीत होनेसे ब्रह्मचारी गुरुके आश्रम पहुंचता, जाकर वेद पढ़ता था। अब वह चाल उठ गयी; यज्ञोपवीत होनेसे कोई गुरुके घर वेद पढ़ने नहीं जाता। किन्तु पहलेके उस असली नियमकी कुछ नकल आज भी देख पड़ती; यज्ञोपवीत होनेपर ब्रह्मचारी घरसे निकल जानेके लिये कई कदम आगे बढ़ता, पीछे जननी समझा-बुझा उसे वापस लाती है। यह केवल
पुरातन नियमको रक्षामात्र है, वस्तुतः दूसरी कोई भी बात नहीं दिखाई देती।
वैदिक समयके सहमरणपर भी सन्देह है——स्वामीकी मृत्यु बाद विधवा नारी मृतपतिकी चितामें क्यों जाकर लेटती थी। मालूम होता है, कि वैदिक कालसे पूर्व आर्य-जातिके मध्य सहमरण चलित रहा। उत्साहपूर्वक भगिनी-हत्या, वा मातृ-हत्या करना धार्मिक लोगोंकी बुद्धिमें नही बैठता। वेदके समय आर्य सुशिक्षित और सभ्य बने, धर्मके
निर्मल ज्योतिःने उनके मनको आलोकित किया था। वैसी अवस्थापर मिथ्या आशामें आ वह कभी स्त्रीहत्या कर न सके होंगे। किन्तु कोई प्रथा देशमें अधिक दिन चलती रहनेसे उसे बिलकुल
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बन्द कर देना भी कठिन काम है। वैदिक समयसे पूर्व सहमरण चलित रहा, इसी कारण वैदिक समयमें ऋषि यह प्रथा बिलकुल बन्द कर न सके। इसलिये स्वामीकी मृत्यु बाद पुरातन नियमकी रक्षा रखनेके निमित्त विधवा नारी मृत पतिकी चिता-शय्यापर एक बार जा लेटती, अन्त में लोग उसे उठा लाते थे। अनुमानसे इस समय इतना ही कहा जा सकता है, कि वह सिवा असली नियमकी नक़लके दूसरा कुछ भी न था।
यही सहमरणका पूर्व इतिहास हुवा। फिर भी, मुसलमानी ज़माने में सहमरण-प्रथाके विशेष भावसे प्रचलित होनेका कारण हिन्दूनारीकी कुलधर्मरक्षा रही। मुसलमानों में बहु विवाह विशेष भावसे प्रचलित है। मुसलमानोंके आधिपत्य-कालमें किसी-किसी मुसलमान-राजपुरुषकी हिन्दू महिलापर तीव्र और लोलुप दृष्टि पड़ती थी। इस आशङ्कासे सकल ही पतिहीना नारीके सहमरणको अच्छा समझते, कि पीछे उनकी पतिहीना विधवापर किसी प्रकार अत्याचार न मचने लगता। इसीसे अंगरेजी अधिकारके प्रारम्भ पर्यन्त भारतमें सर्वत्र ही सहमरणके बाहुल्यका सन्धान लगा है। इसतरह बहुकाल भारतमें सहमरण प्रथा प्रचलित रहनेसे देशीय राज्यके मध्य भी यह प्रथा कुलगौरवजनक होनेके कारण सर्वत्र आद्रित हुयी थी। बस, जो नारी सहमरणमें आत्मोत्सर्ग रखती, वह दाक्षायणी सती-जैसी भारतमें सर्वत्र पूजी जाती रही। अनुमृता नारीकी स्मृतिरक्षाके लिये भारतके नानास्थानमें बहु सतीस्तम्भ बने हैं।<small> सती देखो।</small>
अब बताते हैं, पचास वत्सर पहले हिन्दुस्थानकी स्त्री कैसे जल जाती थी। ऋतुमती, गर्भवती रहने और गोदमें छोटा बच्चा होनेसे स्त्री पतिके साथ कभी जलने न पाती रही। फिर भी, ऋतुके तृतीय दिवस स्वामी की मृत्यु, पड़नेसे एक दिन शव रखनेकी व्यवस्था विद्यमान है। किन्तु सन् १८२२।२३ ई॰ में गवर्नमेण्ट चारो ओर तीव्र दृष्टि डालने लगी; पुलिसकी विशेष अनुमति न मिलनेसे कोई सतीदाह कर न सकता, इसलिये उस समय तीनचार दिनतक
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमृता-अनुमोदक'''|'''४८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
लाश पड़े सड़ते रहती थी। जितने दिन लाश पड़े सड़ती, उतने दिन पर्यन्त हतभाग्य विधवा नारी कुछ भी न खाते रही।
अन्त्येष्टिक्रियाका आयोजन जुटा मृतदेहको चितापर रखते थे। प्रेत-पिण्डादि दिये जाने बाद नापित सतीका नख काटता, पीछे वह अलङ्कार निकाल, हाथकी चूड़ी फोड़ नहाती-धोती; स्नान हो जानेसे आत्मीय स्वजन उसे कफ़न पहनाते, रंगे डोरसे हाथमें महावर बांधते, बालों में कङ्घी लगाते और कपालपर सिन्दूर चढ़ा देते। ऐसी वेशभूषा बननेपर सती, आचमनकर तिल, जल और कुश हाथमें ले पूर्वमुख यों सङ्कल्प लगाते रही,——
<Small>“अद्यामुकै मासि अमुके पक्षे अमुके तिथौ अमुक गोवा श्रीमती अमुकी
देवी अरुन्धतीसमाचारत्वपूर्वक स्वर्गलोकमहीयमानत्व मानवाधिकरणक लोमसंख्याब्दावच्छिन्न स्वर्गवास भर्तृ सहित मोदमानत्व मातृपितृश्वशुरकुलवत्रय-पूतत्व चतुर्दशेन्द्रावच्छिन्न-कालाचिकरणकाप्सरोगणस्त यमानत्व पतिसहित क्रीड़मानत्व ब्रह्मघ्नकृतघ्नपतिपूतत्वकामा भर्तृ ज्ज्वलञ्चितारोहणमह’ करिष्ये।”</small>
इसतरह सङ्कल्प पढ़ लेनेसे, सती सूर्याध्य देकर दिक्पालको साक्षी बनाती थी,——
<small>“अष्टौ लोकपाला आदित्यचन्द्रानिलाषग्र्यकाशभूमिजलहदयावस्थितान्त-यमिपुरुषयमदिनरावि-सध्यया-धर्मा यूयं साक्षिणो भवत जलञ्चितारोहणेन भर्तृ शरीरानुगमनमहं करोमि।”</small>
इसी प्रकार लोकपालको साक्षी बना सती अञ्चलमें लावा, नारियल और बताशे भर सात बार (व्यवस्थामें तीन ही बार लिखा है) चिताका प्रदक्षिण फिरती, प्रदक्षिण फिरने बाद, ‘इमा नारीः' इत्यादि ऋङ-मन्त्रका पाठ पढ़ा जाता। शेषमें वह चितापर चढ़ स्वामीके पास सो जाती थी। आत्मीय स्वजन बान और दरख्तके कच्चे बकलेमें उसे और मृतदेह बड़े-बड़े लकड़ीके टुकडोंसे मजबूत तौरपर बांध देते; फिर अग्निसमर्पण ठहरता, चारो ओरसे लोग झड़ा-झड़ घास-फूस और रमशरका गट्ठा चितापर चलाने लगते। कोई-कोई चितापर बड़े-बड़े बांस रख दबाये रखता था। दूसरी ओर पांच सात ढोल बजते, कीर्तनीय झांझ-मंजीर झनकार आकाश-पाताल एक कर
डालते। चिताके भीतर घोर नाद निकलनेपर भी उसके सुननेका उपाय नहीं था। क्वचित् आगकी
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:ज्वालासे छटपटा कोई-कोई सती चितासे नीचे गिर जाती थी। चिताभ्रष्ट सतीको प्राजापत्य प्रायश्चित्त उठाना पड़ता है। प्रायश्चित्तके बाद गृहस्थ उसे फिर घरमें घुसने न देते। इसीसे मुर्देफरोश उसे ले जाते रहे। इस कारण कदाचित् चितासे किसी स्त्रीके नीचे गिर पड़नेपर आत्मीय स्वजन उसके शिरमें लठ फटकार उसका प्राण निकाल डालते थे। चिताका प्रदक्षिण लगाते समय अनेकके शरीरसे धर्मधारा बह चलती और अल्पक्षण बाद ही वह मूर्छा खा गिरती। कोई-कोई ऐसे समय मर भी गयी है। जिन्होंने यह सकल घटना प्रत्यक्ष देखी, अद्यावधि वह बृद्ध लोग जीवित हैं।
:उस कालमें सहमरण देखनेके निमित्त बालक, बालिका एवं अनेक सधवा स्त्री श्मशान पहुंचतीं और सतीके हाथकी फूटी चूड़ी, कपालका सिन्दूर और बिखरा हुवा लावा बटोर लाती थीं। कोई बालवधू पतिपरायणा न रहनेपर उसके कपालमें वही सिन्दूर चड़ाया जाता रहा । उस लावेको विस्तर पर रखनेसे खटमल भग जाते थे। किसीको पेतिनीमें पानेपर वही फूटी चूड़ी गले में बंधते रही।
:<Small>अनुमरणादिका ऐतिहासिक विवरण अनुमरण, सती और अशीचा-दिका हाल सहमरण शब्दमें देखी।</small>
{{Outdent|अनुमृग्यदाशु (सं॰ पु॰) मनोकामना पूर्ण करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स मुंह-मांगी चीज़ बख्शे।}}
{{Outdent|अनुमार्शम् (सं॰ अव्य॰) पुनः-पुनः विचार बांध, बार-बार ख़याल लड़ा, सोच-सोच, समझ-समझ।}}
{{Outdent|अनुमेय (सं॰ त्रि॰) अनुमीयते, अनु-मा कर्मणि यत्। १ अनुमान निकालने योग्य, अन्दाज़ लगाने काबिल। अनु-मि-कर्मणि यत्। २ पश्चात् क्षेपके योग्य, पोछे डालने लायक। अनु-मी कर्मणि यत्। ३ पश्चात् वध्य, जो पीछे कत्लके काबिल हो।}}
{{Outdent|अनुमोद (सं॰ पु॰) अनु-मुद-णिच्-घञ्। सम्मतिजनक व्यापार, सम्मतिप्रकाश, आह्वादप्रकाश, पीछेकी खुशी।}}
{{Outdent|अनुमोदक (सं॰ त्रि॰) स्वीकार करते हुवा, मानता, हामी भरनेवाला, मञ्जर फरमाता, जो रहमकी खुशी जाहिर कर रहा हो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुयाजप्रेष-अनुरक्त'''|'''४८५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुयाजप्रेष (सं॰ पु॰) अनुयाज यज्ञके नियम।}}
{{Outdent|अनुयाजवत् (सं॰ त्रि॰) निम्न श्रेणोके यज्ञवाला।}}
{{Outdent|अनुयाजानुमन्त्रण (सं॰ क्ली॰) अनुयाजके मन्त्रका पाठ।}}
{{Outdent|अनुयाजार्थ (सं॰ त्रि॰) अनुयाजसे सम्बन्ध रखनेवाला या जो अनुयाजमें काम आये}}
{{Outdent|अनुयात (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् सह वा या-क्त। १ पश्चादगामी, पीछे-पीछे चलनेवाला। कर्मणि क्त। २ अग्रगामी, आगे जानेवाला। ३ सहगामी, जो
साथ जाये।}}
{{Outdent|अनुयातव्य (सं॰ त्रि॰) पश्चाटुगमन लगाने योग्य, जिसके पीछे जा सकें।}}
{{Outdent|अनुयाल (सं॰ पु॰) पश्चाद्गामी व्यक्ति, पीछे पड़ने-वाला शख्स।}}
{{Outdent|अनुयात्र (सं॰ अव्य॰) यात्रायाः पश्चात्, अव्ययी॰। १ यात्राके पश्चात्, सफरसे पीछे। यात्रायां, अव्ययी॰। २ यात्रामें, सफरपर। अनुगता यात्रा, प्रा॰ स॰। ३ यात्राके अनुगत, सफ़रके मुवाफिक। (पु॰) अनुरूपी कृता यात्रा येन प्रादि॰-बहुव्री॰। ४ अनु-यायिवर्ग, साथ जानेवाले लोग।}}
{{Outdent|अनुयात्रिक (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चाद् यात्रा अस्त्यस्य, ठन्। अनुचर, पश्चादगामी, हाजिरबाश, नौकरकी तरह पीछे चलनेवाला।}}
{{Outdent|अनुयान (सं॰ क्ली॰) पश्चाद्गमन, पीछेका चलना।}}
{{Outdent|अनुयायिता (सं॰ स्त्री॰) पश्चाद्गमनकी स्थिति, पीछे पड़नकी हालत, पंक्ति, कतार।}}
{{Outdent|अनुयायित्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनुयायिता देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुयायिन् (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् याति गच्छतीति, अनु-या-णिनि। १ अनुचर, पश्चादगामी, पीछे-पीछे चलनेवाला। २ सेवक, नौकर। ३ सदृश, समान,
बराबर, अनुकरण करनेवाला, जो नकल उतार।}}
{{Outdent|अनुयायी, <small>अनुयायिन् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुयुक्त (सं॰ त्रि॰) अनुयुज्यते, अनु-युज्-कर्मणि क्त। १ जिज्ञासित, पूछा गया।क्ष२ तिरस्कृत, बेइज्जत, जिसकी तारीफ़ न रहे। ३ आदेशप्राप्त, हुक्म पाये हुवा।}}
{{Outdent|अनुयुक्तिन् (सं॰ पु॰) अनुज्ञा देनेवाला, जिसने हुक्म लगा दिया हो।}}
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{{Outdent|अनुयुग (सं॰ अव्य॰) युगके अनुरूप, युगको देखते हुये, जमाने के मुवाफिक।}}
{{Outdent|अनुयूप (सं॰ अव्य॰) यूपके अनुरूप, यूपकी तरह, यज्ञके स्थानानुसार।}}
{{Outdent|अनुयोक्तृ (सं॰ त्रि॰) अनु-युज-तृच्। अनुयोगकारी, प्रश्नकारक, वेतनग्राहो अध्यापक, इम्तहान लेनेवाला, जो सवाल पूछे, उस्ताद।}}
{{Outdent|अनुयोग (सं॰ पु॰) अनु-युज-घञ्। १ जिज्ञासा प्रश्न, सवाल, पूछताछ। २ आक्षेप, तानाज़नी। ३ तिरस्कार, हिकारत। ४ साधन, धर्मचिन्ता, मज़हबी तसव्वर, रूहानी ख्याल।}}
{{Outdent|अनुयोगकृत् (सं॰ पु॰) अनुयोगं प्रश्नविषयसंशयं कृन्तति छिनत्ति, अनुयोग-कृत् छेदने क्विप्। १ आचार्य, जिज्ञास्य विषयका सन्देह दूर करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स पूछी जानेवाली बातका शक रफा कर दे। (त्रि॰) अनुयोग-कृ-क्विप। २ जिज्ञासा करनेवाला, जो सवाल पूछे।}}
{{Outdent|अनुयोगिन् (सं॰ त्रि॰) अनु-युज-घिणुन् तच्छीला-दिषु। १ मिलानेवाला, जो जोड़ लगा दे। २ संयुक्त, मिला हुवा, नीचे या ऊपर प्रतिष्ठित, जो नीचे या ऊपर जमा हो। ३ प्रश्न पूछते हुवा, जो परीक्षा ले रहा हो, सवाल करनेवाला, मुम्तहिन।}}
{{Outdent|अनुयोजन (सं॰ क्ली॰) प्रश्न, सवाल, पूछताछ, परीक्षा, इम्तहान।}}
{{Outdent|अनुयोजित (सं॰ त्रि॰) पूछा गया, सवाल लगाया हुवा, जिसके बारे में पूछताछ हुयी हो।}}
{{Outdent|अनुयोज्य (सं॰ त्रि॰) अनुयोक्तं शक्यः, अनु-युज-ण्यत्। १ मन्द, निन्दाह, खराब, जो ताने मारने काबिल रहे। २ आज्ञाकारक, दास, नौकर, हुक्म माननेवाला। ३ परीक्षा लिये जाने योग्य, जो इम्तहान देने या सवाल बताने काबिल हो।}}
{{Outdent|अनुरक्त (सं॰ त्रि॰) अनु-रञ्ज-क्त। १ अनुरागविशिष्ट, आसक्त, अनुगत, मुश्ताक, फंसा हुवा। अनुगतं रक्तं रागम्, अत्या॰-तत्। २ रक्तवर्णप्राप्त, रञ्जित, रंगा हुवा, जिसपर रंगामेज़ौ लगायी गयी हो। ३ प्रिय, प्यारा।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४८६'''|'''अनुरक्तप्रज–अनुराजी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुरक्तप्रज (सं॰ त्रि॰) प्रजाका प्रिय, रैयतका प्यारा, जिसे लोग चाहते हों।}}
{{Outdent|अनुरक्तलोक (सं॰ पु॰) सबका प्रिय व्यक्ति, हरदिल अजी़ज़ शख्स, जिस आदमीसे सब कोई लगाव रखे।}}
{{Outdent|अनुरक्ति (सं॰ स्त्री॰) अनु-रन्ज-क्तिन्। आसक्ति, अनुराग, मुहब्बत, प्यार, लगाव।}}
{{Outdent|अनुरञ्जक (सं॰ त्रि॰) अनु-रन्ज-णिच्- ण्वुल्। १ अनुरागयुक्त बनानेवाला, जिसे देखकर प्यार आ जाये। २ रङ्ग चढ़ानेवाला, जो रंगामजी लगाये।}}
{{Outdent|अनुरञ्जन (सं॰ क्ली॰) अनु-रन्ज-णिच्-भावे ल्युट्। १ आसक्तकरण, लगाव, दिलबहलाव, प्यार, मुहब्बत पैदा करने का काम। (त्रि॰) कर्तरि नन्दादित्वात्
ल्यु। २ अनुरञ्जक, खुश करनेवाला, जो तबीयतपर रङ्ग चढ़ा दे।}}
{{Outdent|अनुरञ्जित (सं॰ त्रि॰) अनु-रञ्ज-णिच् कमणि क्त। १ प्रीतिसम्पादित, जिसे अनुराग लगा हो, मुहब्बतसे जोशमें आया हुवा, खुश। २ रङ्ग चढ़ाया गया, जिसपर रङ्ग फिरा हो।}}
{{Outdent|अनुरणन (सं॰ क्ली॰) अनु-रण-भावे ल्युट्। शब्दक पीछेंका शब्द, आवाज़के पीछेकी आवाज, प्रतिध्वनि, बाज गश्त, अनुगत स्वर, पीछे निकला बोल।}}
{{Outdent|अनुरत (सं॰ त्रि॰) अनु-रम्-कर्तरि क्त। अनुरक्त, आसक्त, मुश्ताक, फंसा हुवा, जो किसीको दिलसे चाहे।}}
{{Outdent|अनुरति (सं॰ स्त्री॰) अनु-रम-क्तिन्। १ आसक्ति, अनुराग, मुहब्बत, प्यार। २ प्रेम, इश्क, नेक खाहिश, भरी चाह।}}
{{Outdent|अनुरथ (सं॰ पु॰) कुरुवत्सके पुत्र और पुरुहोत्रके पिता।}}
{{Outdent|अनुरथ्या (सं॰ स्त्री॰) १ पथके पार्श्व का मार्ग, राहके किनारे की गली, फुट-पाथ। २ पार्श्वका मार्ग, बगलकी राह, पथका पार्श्व, राहका किनारा।}}
{{Outdent|अनुरस (सं॰ त्रि॰) अनुगतं रसम्, अत्या॰-तत्। १ माधुर्यादि रसके अनुगत, जिसमें मीठा वगैरह मजा़क्षमिले। (पु॰) २ काव्यमें-द्वितीय श्रेणीका भाव}}
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:अथवा उत्साह, दूसरे दरजेका मतलब या जोश। ३ वैद्यकमें-अनुगत खाद, भोतरी जा़यका़।
{{Outdent|अनुरहस (सं॰ त्रि॰) अनुगतं रहः निर्जन-स्थानं रतं वा, अत्या॰-अच-स॰। १ निर्जन देशके अनुगत, सुनसान, निराला, जहां कोई न रहे। २ सुरतप्राप्त। ३ तत्त्वप्राप्त। (अव्य॰) ४ एकान्तमें, पृथक् रूपसे, अलग, पोशीदगीपर। <Small>“इच्छानु रहसं पतिम्।” (भट्टि ४।२४)</small>}}
{{Outdent|अनुराग (सं॰ पु॰) अनु-रन्ज-घञ्। १ आसक्ति, स्नेह, प्रोति, मुहब्बत, प्यार, जोश, नेकखाहिश। (त्रि॰) अनुगतः रागं रक्त-वर्णम्, अत्या॰ तत्। २ रक्तवर्णप्राप्त, जो सुखं पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुरागवत् (सं॰ त्रि॰) प्रिय, प्यारा, आसक्त, मुश्ताक, फंसा हुवा, जो किसीसे प्रीतिका लगाव रखे।}}
{{Outdent|अनुरागिणी (सं॰ स्त्री॰) गीत-विशेष, किसी किस्मकी तान।}}
{{Outdent|अनुरागिता (सं॰ स्त्री॰) प्रेम रखनेको स्थिति, मुश्ताक होनेवाली हालत।}}
{{Outdent|अनुरागिन् (सं॰ त्रि॰) अनु-रन्ज-घिणुन्। अनुराग-युक्त, मुहब्बतसे मामूर, जो प्यार पैदा करे।}}
{{Outdent|अनुरागी, <small>अनुरागिन् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुरागेङ्गित (सं॰ क्ली॰) प्रेम दिखानेवाला भाव अथवा सङ्केत, जो बात अदा या मुहब्बत जाहिर करे।}}
{{Outdent|अनुराजी, अनुजारी-लेबानन प्रदेशको असभ्य जाति-विशेष। इन लोगोंकी संख्या कोई २०००० होगी। अनुराजियोंका एक सम्प्रदाय शम्सी कहलाता है। यह शम्स यानी सूर्यदेवको पूजा करते हैं। उसीसे बोध बंधता, कि इन्होंने ईरानके शिया धर्मसे सूर्यकी उपासना सीखी है। अनुजारीका वासस्थान बिलकुल समुद्रकूलमें है, जो उत्तरमें तरतोयातक फैल रहा; इससे पूर्व ओर अनुजारी गिरि खड़ा है। इसमें सन्देह नही हो सकता, कि अनुजारी पर्वतसे ही अनुजारी जातिका नामकरण निकला; ‘अनुराजी’ शब्द, मालूम पड़ता, अनुजारीका अपभ्रंश है। हमारे देशमें जैसे बताशेको बशाता बोलते, उसीतरह वर्ण उलट जानेसे अनुराजी शब्द बना होगा। अनेक इन लोगोंको खेलवायी, शम्सायी और मेखलाजायी भी कहते हैं।}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४८८'''|'''अनुराधपुर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
वहांका अनेक वृत्तान्त मिलता है। जिस वत्सर बुद्धदेवकी मृत्यु हुयी, उसी वर्ष विजय नामक जनक व्यक्तिने पूर्वभारतके राढ़ देशसे जा सिंहलको जीता था। वहीं बुद्ध चतुर्थ गौतम रहे। युरोपीयोंके हिसाबमें सन् ई॰ से ५४३ वत्सर पूर्व उनकी मृत्यु हुयी थी। इस हिसाबमें यदि कोई भूल न निकले, तो सहज ही निश्चयकर सकते, अनुराधपुर कितने दिनका शहर है।
विजय सिंहलके राजा बने थे। एक ओर राजा दूसरी ओर प्रजाके धर्मगुरु-सिंहलमें प्रथम बौद्ध धमका प्रचार उन्होंसे पहुंचा। किन्तु कोई-कोई कहता, कि देवप्रियतिष्यने सिंहलवासीको बौद्ध-धर्मकी दीक्षा दी थी। विजयके जनैक बन्धुका नाम अनुराध रहा। यह नगर उन्हींका बसाया हुवा था। प्रथम यहां सिवा साधारण गांवके दूसरा कुछ भी न रहा। सन् ई॰ से ४३७ वत्सर पूर्व पाण्डु काभय सिंहलके नरेश हुये थे। उन्होंने अनुराधपुरको सुरम्य अट्टालिकासे सजा अपनी राजधानी बनाया। अतएव इस नगरको बने कोई २३०० वत्सर वीते होंगे। पहले इस नगरकी चारो ओरके प्राचीरका घेरा बत्तीस कोस रहा। अब वह प्राचीर टूट गया, स्थान स्थानमें उसका चिह्नमात्र देख पड़ता है।
गौतम किसी बोधिद्रुमके नीचे बैठ कठोर तपस्या करते-करते सिद्ध बन गये थे। कहते हैं, कि सिंहलमें शायद दैववाणी हुयी, उसी वृक्षकी कोई शाखा बहां पहुंचकर गिर पड़ेगी। देववाणी मिथ्या जानेको नहीं निकलती। सन् ई॰ से ३०७ वत्सर पूर्व सत्य ही
सत्य एक शाखा जा पड़ी, उस समय सिंहलेतिष्य सिंहलके नरेश रहे; शाखा देख उनकी भक्तिका स्रोत उमड उठा। वह प्रजाको बौद्ध धर्म सिखाने लगे, क्रमसे अनुराधपुर बौद्धोंका तीर्थस्थान बन गया। वह बोधितरु आजतक नहीं सूखा। देवका कैसा माहात्म्य है!-दो हजार वत्सर बोते, फिर भी जैसा वृक्ष रहा, वैसा ही बना है। उसका ह्रास या वृद्धि कुछ भी नहीं होता। सन् ९९६ ई॰ में अनुराधसे राजधानी उठी थी। किन्तु इसका तीर्थ माहात्म्य अभी नष्ट नहीं हुवा।
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{{gap}}बोधितरुके पीठस्थानको महाविहार कहते, इस पीठमें दो महल बने हैं। प्रथम महल चतुष्कोण प्राचीरसे घिरा, प्राचीर २१० हाथ लम्बा, १६० हाथ चौड़ा और ६ हाथ ऊंचा खड़ा; उत्तर-दिक्के मध्यस्थलसे एक चबूतरा बाहर निकल पड़ा है। इसका परिसर कोई ४० हाथ होगा। इस चबूतरेकी दोनो ओर छोटे-छोटे मकान बने, उनके भातरसे पाठस्थानमें प्रवेश पहुंचाते हैं। इन मकानके सम्मुख पत्थरकी खुदी हुयी प्रतिमूर्ति पायी जाती है।
उससे आगे बोधिवृक्षका प्राचीर पड़ता है। वहां चढ़ा-उतार सिड्ढी बनी है, उसी सिड्ढी से वृक्षके पास पहुंचते; सिंहलके बौद्ध इस पड़पर बड़ी भक्ति रखते हैं। सन् ३९९ ई॰ में फाहिएन् नामक जनैक चीन-परिव्राजक सिंहलमें तीर्थयात्राके लिये पहुंच यह वटवृक्ष देख गये। उनके भ्रमण-वृत्तान्तमें लिखा है, कि उस समय इस वृक्षकी शाखासे चारो और बौ लटक रही थी। सन् १८२९ ई॰ में चापमेन साहबने यह पेड़ देखा। उनका कहना है, कि उस समय इसमें पांच बड़ी-बड़ी शाखा रहीं और तने के निम्नभागसे चार-पांच छोटे-छोटे पौधे जम उठे थे। वह छोटे छोटे पौधे शायद एक-जैसे नहीं रहते। सिंहलके बौद्ध बताते, कि पांच जन बुद्ध ही पृथक् पृथक् वृक्षमूलमें बैठ सिद्ध बने; इसीसे यह पांच वृक्ष एक-जैसे नहीं देखायी देते।
महाविहारकी उस ओर पाव कोस दूर पुरातन शैल चैत्य स्तूपाकार पड़ा है। इस स्थानमें बुद्धदेवके जबड़ेका अस्थि समाहित रहा और तृतीय बुद्ध यहीं तीर्थपर्यटन लगाने पहुंचे थे; उससे यहांका इतना माहात्म्य बढ़ गया। सन् ३०७ ई॰ से पहले देवप्रिय तिष्यराजने यह चैत्य बनवाया था। कहते हैं, कि तिष्यके राजा होनेसे बुद्धदेवने बड़ी कृपा देखायी, उनके दक्षिण जबड़ेका अस्थि जाकर राज-मुकुटपर पड़ा। नृपतिने भक्तिपूर्वक वह अस्थि उठा समाहित किया था। इस समाधिमन्दिरकी बनावट बिलकुल घण्टे-जैसी रही। पूर्व में इस चैत्यकी चारो ओर १६८ खम्भे थे। अब प्रायः सकल ही टूट
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४९६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुराधपुर-अनुराधा'''|'''४८९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
जिसकी ढालू
पड़ा; कहीं-कहीं किसी जगह छोटा छज्जा बना, महायान बौद्धगणने सन् ई०के ८वें शताब्दपर
ओर अजण्टे-जैसा मनुष्यका चित्र अनुराधपुरमें विजयाराम नामक जो बृहत् विहार
खिंचा है।
बनवाया, वह आज भी भग्नावस्थामें विद्यमान है।
महाविहारको पश्चिम ओर मरीचवती विद्यमान प्रत्नतत्त्ववित् बेल साहब ( Mr. Bell ) इस विहारका
है। सन् ई०से १६१ वर्ष पहले दुट्ठगामनि राजाने विस्तृत विवरण लिख गये हैं। विजयारामका
इसे बनवाया था। महाविहारके ठीक उत्तर रावण कारुकार्य एवं चित्रादि देख विमोहित बनना पड़ता
वल्ली है। इस पीठस्थानकी दुट्ठगामनि राजाने
है। इसको देखनेसे आभास आता, बौद्ध वहां कैसे
आरब्ध किया था, पौछे उनके भाई मध्यतिष्यने पूरे अपना जीवन बिताते थे। बहुतर बौद्ध देव-देवीको
उतारा। जलविम्बको देख कर यह विहार बना था मूर्ति, सभाग्रह, शयनागार, नानागार, भाण्डारगृह,
महावंशमें इसके सम्बन्धपर अनेक अलौकिक घटना पुष्करिणी प्रभृति इस विहारके मध्य विद्यमान है।
वर्णित है।
महावंश १७ से ३३ अध्यायतक देखी।
अनुराधपुरसे आविष्कृत एक ध्यानी-बौद्द-मूर्ति
अभयगिरि महाविहारके ईशान-कोणमें अवस्थित कोलम्बोके अजायबघरमें रखो, यह मूर्ति ५ फोट
है। सन् ई•से १०४ वर्ष पूर्व राजा पराक्रमवाहुने ८ इञ्च ऊंची है। पहले ही कह चुके, कि विभिन्न
इसे बनवाया था। इन राजाका दूसरा नाम बट्टगामनि विहारके प्राचीर-गावमें जो सकल नाना वर्ण के चित्र
अभय रहा। पहले इसी जगह एक देवमन्दिर अङ्कित हैं, वह अतिशय नयनाभिराम दख पड़ते ;
था; गिरि नामक जनेक व्यक्ति उन्हीं देवताको सेवा रूपनवेलिवाले विहारके चित्र सर्वापेक्षा मनोरम हैं।
साधते थे। गिरि सेवकवाले देवमन्दिरके स्थानमें यह सकल चित्र खींचने में खेत, हरिद्रा, लाल, नील,
अभय राजाके यह विहार बनवानेसे इसका नाम और हरित रङ्ग लगा था। यह रङ्गीन चित्र अजण्टेको
अभयगिरि रखा गया। इस विहारके गुम्बदका तरह नजर आते हैं। पद्मोपरि किबर और वामनका
व्यासार्ध १८०, परिधि ११०. और उचाई कोई चित्र विशेष उल्लेख-योग्य है।
२४४ फौट पड़ेगी। किन्तु महावंशमें लिखा है, अनुराधा (सं. स्त्री०) अनुगता राधां विशाखाम्,
कि यह १२० हाथ ऊंचा रहा। महाविहारके अत्या०-तत्। राशिचक्रके सत्ताईस नक्षत्रमें सप्तदश
वायुकोणमें लङ्कारामविहार बना है। सन् २३१ नक्षत्र । इसके देवता मित्र हैं। यह रूपमें सप्ततारामय
ई में अभयतिष्य राजाने इस विहारको बनवाया सर्पकी आकृति रखता है।
महाविहारसे उत्तर जतवनाराम खड़ा,
मृगशिरा, हस्ता, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, रेवती एवं
यह २५१ फौट ऊंचा और पचौस बीघे ज़मीनपर पुनर्वसु-यह नक्षत्र पार्खमुखगण
कहाते हैं।
अवस्थित हो रहा है। इस स्तूपको चारो ओर प्राचौर इन सकल नक्षत्र में यन्त्र, रथादिनिर्माण, नौका-
वेष्टित जो भूखण्ड लगा, उसका आयतन ४३ बौधे गठन, गृहप्रवेश और हस्तो, अश्व, गर्दभ, गो-
देखते हैं। महासेन राजाने सन् २७६ ई० में इस इन्हें प्रथम दमन देना किंवा गाड़ी में जोतना शुभ
विहारका सूत्रपात लगाया था, पौछे सन् ३३० होता है। अनुराधा नक्षत्र मृदुगणमें लिया गया है।
ई में उनके भाईने उसे पूरे उतारा।
मृदुगण नक्षत्रमें मित्र, अर्थ, सुरतविधि, वस्त्र, भूषण,
इल्लल नामक जनैक मालवने सिंहलमें पहुंच मङ्गलगीत प्रभृति कार्य हितकर रहते हैं। अनुराधा
दुट्ठगामनिको राज्यच्युत बनाया था। कुछ काल बाद नक्षत्रमें जन्म लेनेसे लोग कलान एवं कौति, कान्ति-
दुट्ठगामनिने उसे युद्धमें परास्त और निहत किया। “युक्त निकलते, सर्वदा उत्सवमें रत रहते और रिपुको
इस युद्ध-जयका चिह्नवरूप एक समाधिमन्दिर बना, जीतते हैं। यह नक्षत्र यात्रामें भी अच्छा ठहरता है।
अद्यापि उसका भग्नावशेष पड़ा है।
मन मशहर है,-'अनुराधा क्यो न साधा ?'
अनुराधा, ज्येष्ठा,
था।
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुराधपुर-अनुराधा'''|'''४८९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
पड़ा; कहीं-कहीं किसी जगह छोटा छज्जा बना, जिसकी ढालू ओर अजण्टे-जैसा मनुष्यका चित्र खिंचा है।
महाविहारकी पश्चिम ओर मरीचवती विद्यमान है। सन् ई॰ से १६१ वर्ष पहले दुट्ठगामनि राजाने इसे बनवाया था। महाविहारके ठीक उत्तर रावण वल्ली है। इस पीठस्थानकी दुट्ठगामनि राजाने आरब्ध किया था, पीछे उनके भाई मध्यतिष्यने पूरे
उतारा। जलविम्बको देख कर यह विहार बना था, महावंशमें इसके सम्बन्धपर अनेक अलौकिक घटना वर्णित है। <small>महावंश १७ से ३३ अध्यायतक देखो।</small>
अभयगिरि महाविहारके ईशान-कोणमें अवस्थित है। सन् ई॰ से १०४ वर्ष पूर्व राजा पराक्रमवाहुने इसे बनवाया था। इन राजाका दूसरा नाम बट्टगामनि अभय रहा। पहले इसी जगह एक देवमन्दिर था; गिरि नामक जनेक व्यक्ति उन्हीं देवताकी सेवा साधते थे। गिरि सेवकवाले देवमन्दिरके स्थानमें अभय राजाके यह विहार बनवानेसे इसका नाम अभयगिरि रखा गया। इस विहारके गुम्बदका व्यासार्ध १८०, परिधि ११०० और ऊंचाई कोई २४४ फ़ीट पड़ेगी। किन्तु महावंशमें लिखा है, कि यह १२० हाथ ऊंचा रहा। महाविहारके वायुकोणमें लङ्कारामविहार बना है। सन् २३१ ई॰ में अभयतिष्य राजाने इस विहारको बनवाया महाविहारसे उत्तर जेतवनाराम खड़ा, यह २५१ फ़ीट ऊंचा और पचीस बीघे ज़मीनपर अवस्थित हो रहा है। इस स्तूपकी चारो ओर प्राचीर
वेष्टित जो भूखण्ड लगा, उसका आयतन ४३ बीघे देखते हैं। महासेन राजाने सन् २७६ ई॰ में इस विहारका सूत्रपात लगाया था, पीछे सन् ३३० ई॰ में उनके भाईने उसे पूरे उतारा।
इल्लल नामक जनैक मालवने सिंहलमें पहुंच दुट्ठगामनिको राज्यच्युत बनाया था। कुछ काल बाद दुट्ठगामनिने उसे युद्धमें परास्त और निहत किया। इस युद्ध-जयका चिह्नवरूप एक समाधिमन्दिर बना, अद्यापि उसका भग्नावशेष पड़ा है।
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:{{gap}}महायान बौद्धगणने सन् ई॰ के ८वें शताब्दपर अनुराधपुरमें विजयाराम नामक जो बृहत् विहार बनवाया, वह आज भी भग्नावस्थामें विद्यमान है। प्रत्नतत्त्ववित् बेल साहब (Mr. Bell) इस विहारका विस्तृत विवरण लिख गये हैं। विजयारामका कारुकार्य एवं चित्रादि देख विमोहित बनना पड़ता है। इसको देखनेसे आभास आता, बौद्ध वहां कैसे अपना जीवन बिताते थे। बहुतर बौद्ध देव-देवीकी मूर्ति, सभाग्रह, शयनागार, स्नानागार, भाण्डारगृह, पुष्करिणी प्रभृति इस विहारके मध्य विद्यमान है।
:{{gap}}अनुराधपुरसे आविष्कृत एक ध्यानी-बौद्ध-मूर्ति कोलम्बोके अजायबघरमें रखो, यह मूर्ति ५ फी़ट ९ इञ्च ऊंची है। पहले ही कह चुके, कि विभिन्न विहारके प्राचीर-गात्रमें जो सकल नाना वर्ण के चित्र अङ्कित हैं, वह अतिशय नयनाभिराम दख पड़ते; रूपनवेलिवाले विहारके चित्र सर्वापेक्षा मनोरम हैं। यह सकल चित्र खींचने में श्वेत, हरिद्रा, लाल, नील, और हरित रङ्ग लगा था। यह रङ्गीन चित्र अजण्टेकी तरह नजर आते हैं। पद्मोपरि किन्नर और वामनका चित्र विशेष उल्लेख-योग्य है।
{{Outdent|अनुराधा (सं॰ स्त्री॰) अनुगता राधां विशाखाम्, अत्या॰-तत्। राशिचक्रके सत्ताईस नक्षत्रमें सप्तदश नक्षत्र। इसके देवता मित्र हैं। यह रूपमें सप्ततारामय सर्पकी आकृति रखता है। अनुराधा, ज्येष्ठा, मृगशिरा, हस्ता, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, रेवती एवं पुनर्वसु-यह नक्षत्र पार्श्वमुखगण कहाते हैं। इन सकल नक्षत्र में यन्त्र, रथादिनिर्माण, नौका-गठन, गृहप्रवेश और हस्ती, अश्व, गर्दभ, गो-इन्हें प्रथम दमन देना किंवा गाड़ी में जोतना शुभ होता है। अनुराधा नक्षत्र मृदुगणमें लिया गया है। मृदुगण नक्षत्रमें मित्र, अर्थ, सुरतविधि, वस्त्र, भूषण, मङ्गलगीत प्रभृति कार्य हितकर रहते हैं। अनुराधा नक्षत्रमें जन्म लेनेसे लोग कलान एवं कीर्ति, कान्ति-युक्त निकलते, सर्वदा उत्सवमें रत रहते और रिपुको जीतते हैं। यह नक्षत्र यात्रामें भी अच्छा ठहरता है। मस्ल मशहूर है,-<small>‘अनुराधा क्यों न साधा?’</small>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुराधपुर-अनुराधा'''|'''४८९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
पड़ा; कहीं-कहीं किसी जगह छोटा छज्जा बना, जिसकी ढालू ओर अजण्टे-जैसा मनुष्यका चित्र खिंचा है।
महाविहारकी पश्चिम ओर मरीचवती विद्यमान है। सन् ई॰ से १६१ वर्ष पहले दुट्ठगामनि राजाने इसे बनवाया था। महाविहारके ठीक उत्तर रावण वल्ली है। इस पीठस्थानकी दुट्ठगामनि राजाने आरब्ध किया था, पीछे उनके भाई मध्यतिष्यने पूरे
उतारा। जलविम्बको देख कर यह विहार बना था, महावंशमें इसके सम्बन्धपर अनेक अलौकिक घटना वर्णित है। <small>महावंश १७ से ३३ अध्यायतक देखो।</small>
अभयगिरि महाविहारके ईशान-कोणमें अवस्थित है। सन् ई॰ से १०४ वर्ष पूर्व राजा पराक्रमवाहुने इसे बनवाया था। इन राजाका दूसरा नाम बट्टगामनि अभय रहा। पहले इसी जगह एक देवमन्दिर था; गिरि नामक जनेक व्यक्ति उन्हीं देवताकी सेवा साधते थे। गिरि सेवकवाले देवमन्दिरके स्थानमें अभय राजाके यह विहार बनवानेसे इसका नाम अभयगिरि रखा गया। इस विहारके गुम्बदका व्यासार्ध १८०, परिधि ११०० और ऊंचाई कोई २४४ फ़ीट पड़ेगी। किन्तु महावंशमें लिखा है, कि यह १२० हाथ ऊंचा रहा। महाविहारके वायुकोणमें लङ्कारामविहार बना है। सन् २३१ ई॰ में अभयतिष्य राजाने इस विहारको बनवाया महाविहारसे उत्तर जेतवनाराम खड़ा, यह २५१ फ़ीट ऊंचा और पचीस बीघे ज़मीनपर अवस्थित हो रहा है। इस स्तूपकी चारो ओर प्राचीर
वेष्टित जो भूखण्ड लगा, उसका आयतन ४३ बीघे देखते हैं। महासेन राजाने सन् २७६ ई॰ में इस विहारका सूत्रपात लगाया था, पीछे सन् ३३० ई॰ में उनके भाईने उसे पूरे उतारा।
इल्लल नामक जनैक मालवने सिंहलमें पहुंच दुट्ठगामनिको राज्यच्युत बनाया था। कुछ काल बाद दुट्ठगामनिने उसे युद्धमें परास्त और निहत किया। इस युद्ध-जयका चिह्नवरूप एक समाधिमन्दिर बना, अद्यापि उसका भग्नावशेष पड़ा है।
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:{{gap}}महायान बौद्धगणने सन् ई॰ के ८वें शताब्दपर अनुराधपुरमें विजयाराम नामक जो बृहत् विहार बनवाया, वह आज भी भग्नावस्थामें विद्यमान है। प्रत्नतत्त्ववित् बेल साहब (Mr. Bell) इस विहारका विस्तृत विवरण लिख गये हैं। विजयारामका कारुकार्य एवं चित्रादि देख विमोहित बनना पड़ता है। इसको देखनेसे आभास आता, बौद्ध वहां कैसे अपना जीवन बिताते थे। बहुतर बौद्ध देव-देवीकी मूर्ति, सभाग्रह, शयनागार, स्नानागार, भाण्डारगृह, पुष्करिणी प्रभृति इस विहारके मध्य विद्यमान है।
:{{gap}}अनुराधपुरसे आविष्कृत एक ध्यानी-बौद्ध-मूर्ति कोलम्बोके अजायबघरमें रखो, यह मूर्ति ५ फी़ट ९ इञ्च ऊंची है। पहले ही कह चुके, कि विभिन्न विहारके प्राचीर-गात्रमें जो सकल नाना वर्ण के चित्र अङ्कित हैं, वह अतिशय नयनाभिराम दख पड़ते; रूपनवेलिवाले विहारके चित्र सर्वापेक्षा मनोरम हैं। यह सकल चित्र खींचने में श्वेत, हरिद्रा, लाल, नील, और हरित रङ्ग लगा था। यह रङ्गीन चित्र अजण्टेकी तरह नजर आते हैं। पद्मोपरि किन्नर और वामनका चित्र विशेष उल्लेख-योग्य है।
{{Outdent|अनुराधा (सं॰ स्त्री॰) अनुगता राधां विशाखाम्, अत्या॰-तत्। राशिचक्रके सत्ताईस नक्षत्रमें सप्तदश नक्षत्र। इसके देवता मित्र हैं। यह रूपमें सप्ततारामय सर्पकी आकृति रखता है। अनुराधा, ज्येष्ठा, मृगशिरा, हस्ता, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, रेवती एवं पुनर्वसु-यह नक्षत्र पार्श्वमुखगण कहाते हैं। इन सकल नक्षत्र में यन्त्र, रथादिनिर्माण, नौका-गठन, गृहप्रवेश और हस्ती, अश्व, गर्दभ, गो-इन्हें प्रथम दमन देना किंवा गाड़ी में जोतना शुभ होता है। अनुराधा नक्षत्र मृदुगणमें लिया गया है। मृदुगण नक्षत्रमें मित्र, अर्थ, सुरतविधि, वस्त्र, भूषण, मङ्गलगीत प्रभृति कार्य हितकर रहते हैं। अनुराधा नक्षत्रमें जन्म लेनेसे लोग कलान एवं कीर्ति, कान्ति-युक्त निकलते, सर्वदा उत्सवमें रत रहते और रिपुको जीतते हैं। यह नक्षत्र यात्रामें भी अच्छा ठहरता है। मस्ल मशहूर है,-<small>‘अनुराधा क्यों न साधा?’</small>}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४९७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४९०'''|'''अनुरु——अनुलेपन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुरु (सं॰ त्रि॰) लघु, अप्रशस्त, छोटा, जो बड़ा न हो।}}
{{Outdent|अनुरुद्ध (सं॰ त्रि॰) अनु-रुध्-क्त। १ अपेक्षित, अनुरोध लगाया गया, उपरुद्ध, अनुसृत, रुका हुवा, मुकाबिला किया गया। २ प्रसन्न किया गया, राजी़ रखा हुवा। (पु॰) ३ शाक्य मुनिके किसी भतीजका नाम।}}
{{Outdent|अनुरुध (सं॰ त्रि॰) अनु-रुध्-क्विप्। १ अनुरोध लगानेवाला, जो अपेक्षा पहुंचाये। कर्मणि क्विप्, वैदिके दीर्घः। २ अनुरोध किया गया, जिसपर अनुरोध पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुरुहा (सं॰ स्त्री॰) नागरमुस्ता, नागरमोथा। (Cyperus Pertenius)}}
{{Outdent|अनुरूप (सं॰ अव्य॰) रूपस्य योग्य सदृशं वा, अव्ययी॰। १ रूपके योग्य, रूपके सदृश, आराममें, खुशीसे, मर्जी़ के मुवाफिक। (त्रि॰) अनुगत रूपम्, अत्या॰-तत्। २ रूपानुगत, सदृश, शक्ल-जैसा, मिलता-जुलता, मानिन्द, मुशाबिह। ३ योग्य, काबिल, चस्यां। (पु॰) ४ स्तोत्रिय छन्दके परिमाणका पद, जिसे अनिस्त्रोकी कहते हैं। ५ एक साथ तीन गाये जानेवाले पदोंमें दूसरा। (क्ली॰) ६ सादृश्य, मुवाफिकत। ७ योग्यता, का़बिलि़यत।}}
{{Outdent|अनुरूपक (सं॰ पु॰) प्रतिमा, प्रतिमूर्ति, तस्वीर।}}
{{Outdent|अनुरूपचेष्ट (सं॰ त्रि॰) उचित रूपसे कार्य करने-की चेष्टा लगाते हुवा, जो मुवाफ़िक़ तौरपर काम चलाने की कोशिश कर रहा हो।}}
{{Outdent|अनुरूपतस् (सं॰ अव्य॰) रूपके अनुसार, शक्लके मुवाफ़िक, प्रसन्नतामें, खुशीसे।}}
{{Outdent|अनुरूपता (सं॰ त्रि॰) १ सादृश्य, बराबरी। २ योग्यता, का़बिलियत।}}
{{Outdent|अनुरूपेण, <small>अनुरूपतस् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुरेवती (सं॰ स्त्री॰) क्षुद्रदन्ती, एक प्रकारका पौधा।}}
{{Outdent|अनुरोध (सं॰ पु॰) अनु-रुध्-घञ्। १ उपरोध, रुकावट। २ अनुवर्तन, प्रेरणा, तरगीब। ४ अभीष्ट-साधनेच्छा, मतलब बर लानेकी ख़ाहिश।}}
{{Outdent|अनुरोधक </small>अनुरोचिन् देखो।</small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुरोधन (सं॰ क्ली॰) <small>अनुरोध देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुरोधिता (सं॰ स्त्री॰) अनुरोध लगानेकी स्थिति, रुकावट डालनेकी हालत।}}
{{Outdent|अनुरोधिन् (सं॰ त्रि॰) अनु-रुध-णिनि। अनुरोध लगानेवाला, जो अपेक्षा अड़ाये, रोकनेवाला, जो तरगीब दिलाये या दबाव डाले।}}
{{Outdent|अनुलग्न (सं॰ त्रि०) १ संयुक्त, लगा हुवा। २ अनु-वृत्त, पीछे पड़ा। ३ प्रवृत्त, मशगूल।}}
{{Outdent|अनुला (सं॰ स्त्री॰) १ बौद्ध अर्हत्-विशेष, किसी बौद्ध साध्वीका नाम। २ लङ्काकी कोई राणी, सिंहलकी किसी बेगमका इस्म।}}
{{Outdent|अनुलाप (सं॰ पु॰) अनु वीप्सायां पुनः पुनः लप्यते कथ्यते, लए भावे घञ्। पुनः पुनः कथन, पुनरुक्ति, मुहुर्भाष, कहे हुयेका दुहराव, तकरार-अलफाज़।}}
{{Outdent|अनुलास (सं॰ पु॰) मयूर, मोर।}}
{{Outdent|अनुलास्य, <small>अनुलास देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुलिप्त (सं॰ त्रि॰) अनु-लिप्-क्त। अनुरञ्जित, अङ्गमें गन्धादि लेपनयुक्त, दला-मला, जो तेल या इत्र लगाये हो।}}
{{Outdent|अनुलिप्ताङ्ग (सं॰ त्रि॰) अङ्गमें सुगन्धादि लिप्त, जिस्ममें तेल-फुलेल लगाये हुवा।}}
{{Outdent|अनुलेप (सं॰ पु॰) अनु-लिप्-भावे घञ्। १ सुगन्धादि मर्दन, तेल-फुलेलकी मालिश। अनुलिप्यते अनेन इति, करणे घञ्। २ चन्दनादि गन्धद्रव्य, तेल-फुलेल वगै़रह खु़शबूको चीज़।}}
{{Outdent|अनुलेपक (सं॰ त्रि॰) अनु-लिप्-ण्वुल्। सुगन्धादि लगानेवाला, जो तेल-फुलेल मले।}}
{{Outdent|अनुलेपन (सं॰ क्ली॰) अनु-लिप्-भावे ल्युट्। १ सुगन्धादि मर्दन, तेल-फुलेल वगैरहकी मालिश, उबटन । इसका गुण यों गिनाया है,——}}
{{c|{{x-smaller|<poem> “अनुलेपस्तृषामूर्छादौर्गन्ध्यश्रमवातजित्।
सौभाग्यतेजस्तग्वर्णप्रीत्योजो वलबर्धनः॥” (मदन ब॰ १३)</poem>}}}}
{{gap}}फिर देखिये,-
{{c|{{x-smaller|<poem>“अनुलेपनकं बल्यं तेजः सौभाग्यदायकम्।
त्वच्य मोतिप्रदंंप्रोक्तं तृण्मूर्छाश्रमनाशनम्
दौर्गन्ध्यवातहं प्रोक्तं पूर्वाचायैंरिद स्मृतम्॥” (वैद्यक निघ॰)</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुलेपित-अनुवचनीय'''|'''४९१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:{{gap}}अर्थात् अनुलेपनसे तृषा, मूर्छा, दौर्गन्ध्य, श्रम, वात मिटता और सौभाग्य, तेज, बल बढ़ता है।
:{{gap}}२ लेपनसाधन चन्दनादि, मलनेका तेल-फुलेल। ३ लेप, मरहम।
{{Outdent|अनुलेपित (सं॰ त्रि॰) अनु-लिप्-णिच् कर्मणि क्त। अनुलिप्तीकृत, मला हुवा, लगाया गया।}}
{{Outdent|अनुलेपिन् (सं॰ त्रि॰) अनुलेपक, मलनेवाला, जो तेल वगैरह मालिश करे।}}
{{Outdent|अनुलोम (सं॰ अव्य॰) यथाक्रमे अव्ययी॰-अच्-स॰।<small> अच् प्रत्यन्ववपूर्वात् सामलोम्रः। पा ५।४।७५।</small> १ अनुक्रम, क्रमानुसार, सिलसिलेमें, तरतीबसे। (त्रि॰) अनुगतं लोम आनुरूप्यम्। २ आनुरूप्यप्राप्त, लोमानुगत, कुदरती हिदायतका, बाकायदा, सिलसिलेवार। श्रेष्ठवर्णवाले पुरुषके तदपेक्षा अधम वर्णकी कन्यासे पाणिग्रहण करनेको अनुलोम विवाह कहते हैं। जैसे
ब्राह्मण यदि क्षत्रिय कन्याको व्याहे, तो वह अनुलोम विवाह कहलायेगा। अनुलोम शब्दका विरोधी शब्द प्रतिलोम है। नीच वर्णवाले पुरुषके श्रेष्ठ वर्णकी कन्यासे विवाह करनेपर प्रतिलोम विवाह होता है। यह विवाह अत्यन्त गर्हित है।}}
{{Outdent|अनुलोमकल्प (सं॰ पु॰) अथर्ववेदकी चौंतीसवीं प्रतिष्ठा।}}
{{Outdent|अनुलोमकृष्ट (सं॰ त्रि॰) नियमित ओर जोता गया, जो कायदेकी तर्फ जुता हो।}}
{{Outdent|अनुलोमज (सं॰ त्रि॰) अनुलोम-सम्बन्धात् जातः, जन-ड। उत्कृष्ट वर्णके औरस एवं निकृष्ट वर्णके गर्भसे जात, जो ऊंची जातिके बाप और नीची जातिको मासे पैदा हुवा हो, अम्बष्ठ, अप्रतिलोमज।}}
{{Outdent|अनलोमजन्म (सं॰ त्रि॰) अनुलोमं श्रेष्ठवर्णमनुक्रम्य जन्म यस्य। अनलोमजात, जो अनुलोमसे पैदा सुधा हो।}}
{{Outdent|अनुलोमन (सं॰ क्ली॰) १ सम्बद्ध नियम, विशुद्ध दिक्में प्रस्थान। २ मलादि धातुका यथामार्ग गमनोपाय, पाखाने, पेशाब वगैरहके राहसे निकालनेकी तरकीब। ३ अपक्व वात, पित्त और श्लेष्मा पचाकर बद्धवायुको भेद मल निकालनेवाला औषध, जो दवा}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:कच्चे धातुको हजम् कर रुके हुये गुदाज़को काट पाखाना-पेशाब साफ़ लाये। यथा——
{{c|{{x-smaller|<poem>“कृत्वा पाकं मलानाञ्च भित्त्वाबन्धमधी नयेत्।
तच्चानुलीमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी॥” (भावप्रकाश)</poem>}}}}
{{Outdent|अनुलोमपरिणिता (सं॰ स्त्री) नियमित श्रेणी में विवाहिता स्त्री, जिस औरतकी शादी कायदेके दरजेसे हुयी हो।}}
{{Outdent|अनुलोमाय (सं॰ त्रि॰) सौभाग्यशाली, खुशकिस्मत।}}
{{Outdent|अनुल्की (सं॰ स्त्री॰) १ हिक्का, हिचकी। २ तृष्णा, प्यास।}}
{{Outdent|अनुल्वण (सं॰ त्रि॰) अतिशय-भिन्न, जो ज्यादा न रहे, अप्रधान, छोटा, चिक्कण, चिकना, जिसपर हिदायतका असर न पड़े, असम्बद्ध स्थितिसे स्वतन्त्र, जो परेशानीसे आजाद रहे।}}
{{Outdent|अनुवंश (सं॰ अव्य॰) १ वंशसे, खान्दानके मुवाफिक। (पु॰) २ वंशावली, नस्वनामा।}}
{{Outdent|अनुवंश्य (सं॰ त्रि॰) वंशावली-सम्बन्धीय, नस्ब-नामेवाला।}}
{{Outdent|अनुवक्तृ (सं॰ त्रि॰) अनु सदृशं गुरुमुखोच्चारितानुरूपं वदतीति, अनु-वच्-तृच्। गुरूपदेशानुरूप पाठारम्भ-कारी, जो उस्तादके बताये तौरपर मुतालह लगाये, पीछे बोलते हुवा, दुहरानेवाला, जो जवाब देता हो।}}
{{Outdent|अनुवक्तव्य (सं॰ त्रि॰) पाठ किया जानेवाला, जो दुहराया जाये, जिसका मुतालह लगायें।}}
{{Outdent|अनुवक्र (सं॰ त्रि॰) अनुक्रमेण वक्रम्। १ किञ्चित् वक्र, कुछ-कुछ टेढ़ा। २ अत्यन्तवक्र, निहायत खमदार।}}
{{Outdent|अनुवक्रग (संं॰ त्रि॰) वक्रगतिविशिष्ट, टेढ़ी राह चलनेवाला, जो तिरछा-तिरछा जाये।}}
{{Outdent|अनुवचन (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं वचनं, प्रा॰ सं॰। १ अनुरूप कथन, जैसेका तैसा मुतालह, पीछेकी बात, दुहराव, पढ़ाई। २ व्याख्या, वाज़। अध्याय, बाब। ४ यज्ञका मन्त्रादिविशेष।}}
:{{gap}}<small>“जातुकण्य स्तमलोकयुं पुनः पप्रच्छ शस्त्र वानुवचनं वा निगद वा याज्यां वा यहान्यत् सर्व तत् पुनर्ब्रू यादिति।” (कौषीतकि-ब्राझय २६।५)</small>
{{Outdent|अनुवचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुवचनसम्बन्धीय, मुता-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४९२'''|'''अनुवत्सर-अनुवाचनप्रेष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:लहका हवाला रखनेवाला, जो दुहराये जानेसे हुवा, ताल्लुक रखे।
{{Outdent|अनुवत्सर (सं॰ पु॰) अनुकूलो वत्सरो दानादि विशेषाय। १ वर्ष, साल। २ ज्योतिष में—पांच वत्सरके युगका चतुर्थ वर्ष। विष्णुपुराणमें लिखा
है,—सावन, सौर, चान्द्र और नक्षत्र–इन्हीं चार प्रकारके माससे वत्सर-गणना गंठती; इन्हीं चार प्रकार मासके समन्वयसे पांच वत्सरका युग बंधता है। इस युगके प्रथम वत्सरको संवत्सर, द्वितीयको परिवत्सर, तृतीयको इद्वत्सर, चतुर्थको अनुवत्सर और पञ्चमको युगवत्सर कहते हैं। (२।६६-६७) अनुवत्सरमें धान्य देनेसे महाफल मिलता है।}}
{{Outdent|अनुवन (सं॰ अव्य॰) वनके मध्य, जङ्गलकी जगहमें, बीहड़के इधर-उधर।}}
{{Outdent|अनुवर्तन (सं॰ क्ली॰) अनु-वृत् ल्यट्। १ अनु-सरण, अनुगमन, आसपासका फेरा। २ व्याकरणमें_—अन्वय निमित्त पूर्वसूत्रके किसी विषयका परसूत्र में
आकर्षण, फ़िकरेमें मानी लगानेके लिये पहले कही हुयी बातका मिला लिया जाना। ३ अनुबन्ध, तफसील-जेल। ४ समादर, फरमाबरदारी। ५ फल, नतीजा। ६ सम्बन्ध, सिलसिला।}}
{{Outdent|अनुवर्तनीय (सं॰ त्रि॰) अनुवर्तन लगाने योग्य, जो पीछसे मिलाने काबिल हो, फेरा जानेवाला।}}
{{Outdent|अनुवर्तित्व (सं॰ क्ली॰) अनुवर्तन बैठानेकी स्थिति,पीछे फेरनेवाली हालत।}}
{{Outdent|अनुवर्तिन् (सं॰ त्रि॰) अनु-वत्-णिनि। पश्चादगामी, पीछे चलनेवाला, पिछलगा।}}
{{Outdent|अनुवर्ती, <small>अनुवर्तिन् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुवमन् (सं॰ त्रि॰) पश्चाद्गामी, पीछे फिरनेवाला।}}
{{Outdent|अनुवश (सं॰ पु॰) १ अपरेच्छासत्कार, दूसरेके दिलकी फरमाबरदारी। (त्रि॰) २ अपरेच्छासम्पादक, दूसरेको मर्जीका फरमाबरदार।}}
{{Outdent|अनुवषटकार (सं॰ पु॰) वलिप्रदानान्तर वषट्का लघु निनाद, वलिप्रदानके बाद जो वषट् धीरसे बोलते हैं।}}
{{Outdent|अनुवसित (सं॰ त्रि॰) १ वस्त्राच्छन्न, पोशाक पहने}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:हुवा, लपेटा हुवा। २ संलग्न, लगा हुवा, जो फंसा हो।
{{Outdent|अनुवह (सं॰ पु॰) अग्निको सात जिह्वामें एक।}}
{{Outdent|अनुवा (हिं॰ पु॰) १ पेंढी, जिस जगह खड़े हो कुयें से जल निकालते हैं। २ चोंडा, जो गड्डा पानी पीनेको खोदा जाता है। ३ चौना, जिस जगह तालाबसे बेंडीमें पानी भर खेत सींचते हैं।}}
{{Outdent|अनुवाक (सं॰ पु॰) अनुच्यते, अनु-वच्-घञ्। १ वेदका अंशविशेष, ऋविशेष। २ पश्चाद्वचन, पीछेका बोल, रट, दुहराव, पढ़ाई। ३ ऋग्वेद अथवा यजुर्वेदका संग्रह।}}
{{Outdent|अनुवाकसंख्या (सं॰ स्त्री॰) यजुर्वेद के अट्टारह परि-शिष्टका चौथा परिशिष्ट। चरणव्यूहमें अट्ठारहो परिशिष्टके यह नाम लिखे हैं,-१ यूपलक्षण-व्यास-देवके मतसे यह उपज्योतिष चरणव्यूह ठहरता है, २ छागललक्षण-व्यास इसे माङ्गललक्षण बताते थे, ३ प्रतिज्ञा-जिसे व्यास प्रतिज्ञानुवाक्य कहते रहे, ४ अनुवांकसंख्या-जो व्यासकी बातसे परिसंख्या होती है, ५ चरणव्यूह, ६ श्राद्धकल्प, ७ शुल्भिकानि, ८ पार्षद, ९ ऋग्यजप्रभृति, १० इष्टकापूरण, ११ प्रवरा-ध्याय, १२ उक्थशास्त्र, १३ ऋतुसंख्या, १४ निगम-व्यासके मतसे जो आगम है, १५ यज्ञपार्श्व, १६ हौत्रक, १७ प्रसवोत्थान, १८ कूर्मलक्षण।}}
{{Outdent|अनुवाक्यवत्, <small>अनुवाक्यावत् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुवाक्या (सं॰ स्त्री॰) अनु-वच्-ण्यत्। ऋविग्-विशेष, देवताह्वानी ऋक्, जो ऋक् होता देवताके वलिप्रदान लेनेको पढ़ता है।}}
{{Outdent|अनुवाक्यावत् (सं॰ त्रि॰) अनुवाक्या-विशिष्ट, जिसमें अनुवाक्या लगी हो।}}
{{Outdent|अनुवाच (सं॰ पु॰) अनु-वच्-णिच्-क्विप्। अध्यापक, अनुवाचक, मुअल्लिम, पढ़ानेवाला।}}
{{Outdent|अनुवाचन (सं॰ क्ली॰) अनु-वच्-ल्युट्। १ अध्यापन, पढ़ाना। २ अध्वर्यु के प्रेशार्थ होता द्वारा ऋग्-वेदका मन्त्रोच्चार।}}
{{Outdent|अनुवाचनप्रेष (सं॰ पु॰) अनुवाचनादेश, दुहरानेका हुका।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुवाचनीय-अनुवाद'''|'''४६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुवाचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुवाचन प्रयोजनमस्य; अनुप्रवचनादित्वात् छ। अध्यापक, पढ़ानेवाला।}}
{{Outdent|अनुवाचित (सं॰ त्रि॰) पूर्वोक्त, पूर्व कथित, पहले कहा हुवा, जिसे पेश्तर बता चुके हों।}}
{{Outdent|अनुवात (सं॰ पु॰) अनुकूलो वातः। गमन-कारीकी ओर को चलनेवाला वायु, जो हवा जाने वालेकी तर्फ चले। २ शिष्यकी ओरसे गुरुके तयीं बहनेवाला वायु, जो हवा शागिर्दको तर्फ से उस्ताद के पास पहुंचे।}}
{{Outdent|अनुवाते (सं॰ अव्य॰) वायुकी ओर, हवाकी तर्फ. जिस ओरको हवा चले।}}
{{Outdent|अनुवाद (सं॰ पु॰) १ कुत्सितार्थवाक्य, निन्दा, बदगोई।२ अनुकरण, नकल। ३ भाषान्तरकरण, तरजुमा, उलथा। ४ पश्चात् कथन, पुनः कथन, दोहराव। ५ पूर्व विधि द्वारा निर्दिष्ट विषयका कार्य-विशेषके निमित्त पुनरुल्लेख, आदमीसे बन सकनेवाले जिस कामकी बात शास्त्र में लिखी हो। जैसे—आकाशमें फूल नहीं खिलता-आगसे हिम हटता है। ऐसे स्थलमें सकल समझते, कि आकाशमें फूल
नहीं खिलता-आगसे हिम हटा करता है। अतएव इन सकल स्वतःसिद्ध विषयका उल्लेख उठनेसे इसे अनुवाद कहेंगे। ७ अर्थानुवाद। यह तीन तरहका होता है। जैसे-
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|विरोधी गुणवादः स्वादनुवादोऽवधारिते।
भूतार्थवादस्तद्धानावर्थवादस्त्रिधा मतः॥”}}</poem>}}
विरोधमें अर्थात् जहां विशेष्य विशेषणके अन्वयका विरोध बंधता, वहां गुणवाद रहता है। जैसे, 'यजमानः प्रस्तरः।' यहां प्रस्तर शब्दसे कुशमुष्टिका अर्थ आता है। जो यजमान वही प्रस्तर भी होगा। इस प्रकार अभेदरूप अन्वयका विरोध पड़नेसे यजमानका कुशमुष्टि धारणरूप अङ्ग बताया गया है। इसीसे यह गुणवाद कहाया।
निश्चित विषयका पुनर्वार कथन अवधारित होता जैसे-प्रातःकाल सूर्य निकलता है। यहां
सवेरे सूर्यका निकलना समझा रहनेस, उसका फिर कहा जाना अवधारित होगा।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{gap}}गुणवाद और अवधारितके वाधस्थलमें भूतार्थवाद (सिद्धार्थवाद) पड़ता है। यथा-‘इन्द्रो वृत्रहा।’ वृत्रासुरको इन्द्र ने मारा है।
भूतार्थवाद दो प्रकारका रहता है——स्तुत्यर्थवाद और निन्दार्थवाद। जैसे-
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“सन्धयामुपासते ये तु सतत शंसितव्रताः।
विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम्॥”}}</poem>}}
अर्थात् यो सम्यक् नियमानुसार तीन बार सध्या-उपासना करता, वह व्यक्ति निष्पाप बन अक्षय ब्रह्म-लोकको जाता है। इस जगह सन्ध्या-उपासनाकी प्रशंसा पड़नेसे स्तुत्यर्थवाद निकालते हैं।
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“स्त्रीतैलमांससम्भोगी पर्वस्व तेषु वै पुमान्।
विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥”}}</poem>}}
जो पुरुष इन समस्त पर्व में स्त्री, तैल और मांसको बरतता, वह मलमूत्रभोजन नामक नरकमें गिरता है। यहां विशेष पर्व दिनमें स्त्री, तेल और मांसके सम्भोगकी निन्दा निकलनेसे निन्दार्थवाद लगेगा।
{{c|)<small>“विध्यर्थवादार्थवादवचनविनियोगात्।” (गौतमसूत्र ६१))</small>}}
ब्राह्मणवाक्य तीन रूपसे विनियुक्त होता है। यथा-विधिवाक्य, अर्थवादवाक्य और अनुवादवाक्य।
{{c|<small>“विधिविधायकः।” (गौतमसूत्र ६२)</small>}}
जो वाक्य कार्यका विधायक हो, वह विधिवाक्य कहायेगा।
{{c|)<small>”स्तुतिनिन्दापरकृति: पुराकल्प इत्यर्थवादः।” (गौतमसूत्र (६३)</small>}}
श्रुति, निन्दा, परकृति और पुराकल्प-यही चार प्रकार अर्थवाद आता है।
{{c|)<small>"विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः।” (गौतमसूव ६४)</small>}}
विधिद्वारा विहित विषयके पश्चात् कथनका नाम ही अनुवाद है।
अनुक्षण कथन या प्रमाणान्तरसे अवगत अर्थका शब्द द्वारा संकीर्तन भी अनुवाद कहलाता है। यथा-अनुवाद चरणानाम्। पा २।४।३। पाणिनिके इस सूत्रमें काशिकाकारने अनुवाद शब्दका अर्थ यों लगाया है,
{{c|{{xx-smaller|“प्रमाणान्तरावगतस्वार्थस्य शब्दो न संकीर्तनमात्रमनुवादः।”}}}}
यानी प्रमाणके अनन्तर जो अर्थ अवगत होता, उसका शब्दसे संकीर्तनमात्र अनुवाद कहाता है।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|124|2em}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुवाचनीय-अनुवाद'''|'''४६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुवाचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुवाचन प्रयोजनमस्य; अनुप्रवचनादित्वात् छ। अध्यापक, पढ़ानेवाला।}}
{{Outdent|अनुवाचित (सं॰ त्रि॰) पूर्वोक्त, पूर्व कथित, पहले कहा हुवा, जिसे पेश्तर बता चुके हों।}}
{{Outdent|अनुवात (सं॰ पु॰) अनुकूलो वातः। गमन-कारीकी ओर को चलनेवाला वायु, जो हवा जाने वालेकी तर्फ चले। २ शिष्यकी ओरसे गुरुके तयीं बहनेवाला वायु, जो हवा शागिर्दको तर्फ से उस्ताद के पास पहुंचे।}}
{{Outdent|अनुवाते (सं॰ अव्य॰) वायुकी ओर, हवाकी तर्फ. जिस ओरको हवा चले।}}
{{Outdent|अनुवाद (सं॰ पु॰) १ कुत्सितार्थवाक्य, निन्दा, बदगोई।२ अनुकरण, नकल। ३ भाषान्तरकरण, तरजुमा, उलथा। ४ पश्चात् कथन, पुनः कथन, दोहराव। ५ पूर्व विधि द्वारा निर्दिष्ट विषयका कार्य-विशेषके निमित्त पुनरुल्लेख, आदमीसे बन सकनेवाले जिस कामकी बात शास्त्र में लिखी हो। जैसे—आकाशमें फूल नहीं खिलता-आगसे हिम हटता है। ऐसे स्थलमें सकल समझते, कि आकाशमें फूल
नहीं खिलता-आगसे हिम हटा करता है। अतएव इन सकल स्वतःसिद्ध विषयका उल्लेख उठनेसे इसे अनुवाद कहेंगे। ७ अर्थानुवाद। यह तीन तरहका होता है। जैसे-}}
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|विरोधी गुणवादः स्वादनुवादोऽवधारिते।
भूतार्थवादस्तद्धानावर्थवादस्त्रिधा मतः॥”}}</poem>}}
विरोधमें अर्थात् जहां विशेष्य विशेषणके अन्वयका विरोध बंधता, वहां गुणवाद रहता है। जैसे, 'यजमानः प्रस्तरः।' यहां प्रस्तर शब्दसे कुशमुष्टिका अर्थ आता है। जो यजमान वही प्रस्तर भी होगा। इस प्रकार अभेदरूप अन्वयका विरोध पड़नेसे यजमानका कुशमुष्टि धारणरूप अङ्ग बताया गया है। इसीसे यह गुणवाद कहाया।
निश्चित विषयका पुनर्वार कथन अवधारित होता जैसे-प्रातःकाल सूर्य निकलता है। यहां
सवेरे सूर्यका निकलना समझा रहनेस, उसका फिर कहा जाना अवधारित होगा।}}
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{{gap}}गुणवाद और अवधारितके वाधस्थलमें भूतार्थवाद (सिद्धार्थवाद) पड़ता है। यथा-‘इन्द्रो वृत्रहा।’ वृत्रासुरको इन्द्र ने मारा है।
भूतार्थवाद दो प्रकारका रहता है——स्तुत्यर्थवाद और निन्दार्थवाद। जैसे-
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अर्थात् यो सम्यक् नियमानुसार तीन बार सध्या-उपासना करता, वह व्यक्ति निष्पाप बन अक्षय ब्रह्म-लोकको जाता है। इस जगह सन्ध्या-उपासनाकी प्रशंसा पड़नेसे स्तुत्यर्थवाद निकालते हैं।
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विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥”}}</poem>}}
जो पुरुष इन समस्त पर्व में स्त्री, तैल और मांसको बरतता, वह मलमूत्रभोजन नामक नरकमें गिरता है। यहां विशेष पर्व दिनमें स्त्री, तेल और मांसके सम्भोगकी निन्दा निकलनेसे निन्दार्थवाद लगेगा।
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ब्राह्मणवाक्य तीन रूपसे विनियुक्त होता है। यथा-विधिवाक्य, अर्थवादवाक्य और अनुवादवाक्य।
{{c|<small>“विधिविधायकः।” (गौतमसूत्र ६२)</small>}}
जो वाक्य कार्यका विधायक हो, वह विधिवाक्य कहायेगा।
{{c|)<small>”स्तुतिनिन्दापरकृति: पुराकल्प इत्यर्थवादः।” (गौतमसूत्र (६३)</small>}}
श्रुति, निन्दा, परकृति और पुराकल्प-यही चार प्रकार अर्थवाद आता है।
{{c|)<small>"विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः।” (गौतमसूव ६४)</small>}}
विधिद्वारा विहित विषयके पश्चात् कथनका नाम ही अनुवाद है।
अनुक्षण कथन या प्रमाणान्तरसे अवगत अर्थका शब्द द्वारा संकीर्तन भी अनुवाद कहलाता है। यथा-अनुवाद चरणानाम्। पा २।४।३। पाणिनिके इस सूत्रमें काशिकाकारने अनुवाद शब्दका अर्थ यों लगाया है,
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यानी प्रमाणके अनन्तर जो अर्थ अवगत होता, उसका शब्दसे संकीर्तनमात्र अनुवाद कहाता है।
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुवाचनीय-अनुवाद'''|'''४६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुवाचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुवाचन प्रयोजनमस्य; अनुप्रवचनादित्वात् छ। अध्यापक, पढ़ानेवाला।}}
{{Outdent|अनुवाचित (सं॰ त्रि॰) पूर्वोक्त, पूर्व कथित, पहले कहा हुवा, जिसे पेश्तर बता चुके हों।}}
{{Outdent|अनुवात (सं॰ पु॰) अनुकूलो वातः। गमन-कारीकी ओर को चलनेवाला वायु, जो हवा जाने वालेकी तर्फ चले। २ शिष्यकी ओरसे गुरुके तयीं बहनेवाला वायु, जो हवा शागिर्दको तर्फ से उस्ताद के पास पहुंचे।}}
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{{Outdent|अनुवाद (सं॰ पु॰) १ कुत्सितार्थवाक्य, निन्दा, बदगोई।२ अनुकरण, नकल। ३ भाषान्तरकरण, तरजुमा, उलथा। ४ पश्चात् कथन, पुनः कथन, दोहराव। ५ पूर्व विधि द्वारा निर्दिष्ट विषयका कार्य-विशेषके निमित्त पुनरुल्लेख, आदमीसे बन सकनेवाले जिस कामकी बात शास्त्र में लिखी हो। जैसे—आकाशमें फूल नहीं खिलता-आगसे हिम हटता है। ऐसे स्थलमें सकल समझते, कि आकाशमें फूल
नहीं खिलता-आगसे हिम हटा करता है। अतएव इन सकल स्वतःसिद्ध विषयका उल्लेख उठनेसे इसे अनुवाद कहेंगे। ७ अर्थानुवाद। यह तीन तरहका होता है। जैसे-}}
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|विरोधी गुणवादः स्वादनुवादोऽवधारिते।
भूतार्थवादस्तद्धानावर्थवादस्त्रिधा मतः॥”}}</poem>}}
{{gap}}विरोधमें अर्थात् जहां विशेष्य विशेषणके अन्वयका विरोध बंधता, वहां गुणवाद रहता है। जैसे, 'यजमानः प्रस्तरः।' यहां प्रस्तर शब्दसे कुशमुष्टिका अर्थ आता है। जो यजमान वही प्रस्तर भी होगा। इस प्रकार अभेदरूप अन्वयका विरोध पड़नेसे यजमानका कुशमुष्टि धारणरूप अङ्ग बताया गया है। इसीसे यह गुणवाद कहाया।
निश्चित विषयका पुनर्वार कथन अवधारित होता जैसे-प्रातःकाल सूर्य निकलता है। यहां
सवेरे सूर्यका निकलना समझा रहनेस, उसका फिर कहा जाना अवधारित होगा।
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{{gap}}गुणवाद और अवधारितके वाधस्थलमें भूतार्थवाद (सिद्धार्थवाद) पड़ता है। यथा-‘इन्द्रो वृत्रहा।’ वृत्रासुरको इन्द्र ने मारा है।
भूतार्थवाद दो प्रकारका रहता है——स्तुत्यर्थवाद और निन्दार्थवाद। जैसे-
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विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम्॥”}}</poem>}}
अर्थात् यो सम्यक् नियमानुसार तीन बार सध्या-उपासना करता, वह व्यक्ति निष्पाप बन अक्षय ब्रह्म-लोकको जाता है। इस जगह सन्ध्या-उपासनाकी प्रशंसा पड़नेसे स्तुत्यर्थवाद निकालते हैं।
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“स्त्रीतैलमांससम्भोगी पर्वस्व तेषु वै पुमान्।
विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥”}}</poem>}}
जो पुरुष इन समस्त पर्व में स्त्री, तैल और मांसको बरतता, वह मलमूत्रभोजन नामक नरकमें गिरता है। यहां विशेष पर्व दिनमें स्त्री, तेल और मांसके सम्भोगकी निन्दा निकलनेसे निन्दार्थवाद लगेगा।
{{c|)<small>“विध्यर्थवादार्थवादवचनविनियोगात्।” (गौतमसूत्र ६१))</small>}}
ब्राह्मणवाक्य तीन रूपसे विनियुक्त होता है। यथा-विधिवाक्य, अर्थवादवाक्य और अनुवादवाक्य।
{{c|<small>“विधिविधायकः।” (गौतमसूत्र ६२)</small>}}
जो वाक्य कार्यका विधायक हो, वह विधिवाक्य कहायेगा।
{{c|)<small>”स्तुतिनिन्दापरकृति: पुराकल्प इत्यर्थवादः।” (गौतमसूत्र (६३)</small>}}
श्रुति, निन्दा, परकृति और पुराकल्प-यही चार प्रकार अर्थवाद आता है।
{{c|)<small>"विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः।” (गौतमसूव ६४)</small>}}
विधिद्वारा विहित विषयके पश्चात् कथनका नाम ही अनुवाद है।
अनुक्षण कथन या प्रमाणान्तरसे अवगत अर्थका शब्द द्वारा संकीर्तन भी अनुवाद कहलाता है। यथा-अनुवाद चरणानाम्। पा २।४।३। पाणिनिके इस सूत्रमें काशिकाकारने अनुवाद शब्दका अर्थ यों लगाया है,
{{c|{{xx-smaller|“प्रमाणान्तरावगतस्वार्थस्य शब्दो न संकीर्तनमात्रमनुवादः।”}}}}
यानी प्रमाणके अनन्तर जो अर्थ अवगत होता, उसका शब्दसे संकीर्तनमात्र अनुवाद कहाता है।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|124|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh|'''४९४'''||}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अनुवादक-अनुविधायिन्
भट्टोजिदीक्षितने इस सूत्रके अनुवाद शब्दका अर्थ ,
'सिद्धस्योपन्यास लिखा है।
अनुवादक (सं॰ त्रि॰) अनुवदते, अनु-वद्-खुल्। पिचकारी, नल।
:- १ अनुवाद करनेवाला, जो तरजुमा बनाये। २ अनु अनुवासनोपगवर्ग (सं॰ पु॰) षडूविंशदशकनाम
वाद करानेवाला, जो तरजुमा उतराये।
कषायवर्ग, एक प्रकारका काढ़ा। यथा-
अनुवादित (सं॰ त्रि॰) अनुवाद बनाया गया, "रामासुरदारुविलमदनशतपुष्पौरपुनन वायदंष्ट्रा नमन्यश्योणाका इति
जिसका तरजुमा उतरा हो।
दशेमानि।" (चरक सूत्रस्थान ४ ०)
अनुवादिन् (सं॰ त्रि॰) अनुवदते, अनु-वद-णिनि। अनुवासाख्य (सं॰ पु॰) अनुवासन देखो।
१ अनुवादकारक, तरजमा करनेवाला। अनु-वद- अनुवासित (सं॰ त्रि॰) अनु-चु वस-णिच्-क्त।
: णिच्-णिनि। २ अनुवाद करानेवाला, जो तरजुमा १ सुगन्धीकृत, बसाया हुवा, जिसमें खुशबू दी गयौ
उतराये।
हो। २ वस्तिकमद्वारा चिकित्सित, पिचकारी लगाया
अनुवादी (सं॰ पु॰) स-र-ग-मके तीन स्वरमें एक स्वर । गया, जिसको दवा पिचकारीके ज़रिये हुयो हो।
अनुवाद्य (सं० त्रि.) अनु-उद्यते अनु-वद्-ण्यत्। अनुवास्य (सं॰ त्रि॰) अनु॰ चु वस-णिच्-कर्मणि
१ अनुकथनीय, अनुकरणीय, तरजमा किया जाने ण्यत्। : १ सुगन्धि करने योग्य, खुशब देने काबिल ।
वाला, जिसकी नकल उतारी जाये। (क्ली॰) २ वस्तिकर्म हारा चिकित्साके योगा, जो पिचकारी
२ उद्देश्य, इरादा। अलङ्कारिकके मतसे प्रथम अनु लगाने काबिल हो।
वाद्य (उद्देश्य ) बता, पौछ विधेय बोलानेसे 'विधेयः अनुवित्त (सं॰ त्रि॰) प्राप्त, हस्तगत, मिला हुवा,
विमर्षदोष' आता है। यथा-
दस्तयाब।
"अनुवाद्यमनुक्के व न विधयमुदीरयेत्।"
अनुवित्ति (सं॰ स्त्री॰) प्राप्ति, आविष्कार, याफत,
अर्थात् अनुवाद्य ( उद्देश्य ) विना लगाये विधय
किसी चीज़का पाना।
न लाना चाहिये।
अनुविद्ध (सं॰ त्रि॰) अनु-विध्यते अनु-व्यध दि.
अनुवाद्यत्व (सं॰ क्ली॰) अनुवाद द्वारा वर्णन किये
१ संसृष्ट, संलग्न, लगा हुवा, जो चुभ
जानेको स्थिति, वह हालत जिसमें तरजुमेके जरिये
गया हो। २ पश्चाद् वेधित, पोछेसे मारा गया।
बयान करनेकी जरूरत पड़े।
३ पश्चात् क्षिप्त, पौछे फेका हुवा। ४ खचित,
अनुवास (सं॰ पु॰) अनुवासन देखो।
जड़ा गया।
अनुवासन (सं॰ क्ली॰) अनु-वस चुरादि णिच्-ल्युट । “सरसिजमनुविद्ध शैवलेनापि रम्यम् ।” ( शकुन्तला)
१ धूपादि द्वारा सुगन्धीकरण, लोबान वगैरहसे खुश- अनुविधातव्य. ( सं॰ त्रि॰) आज्ञानुसार करणीय,
बूका फैलाना। २ वस्त्रसुगन्धीकरण, पोशाकमें इत्रका हुक्मके मुताबिक तामोल किया जानेवाला।
३ वेद्यशास्त्रोक्त स्नेहादि द्वारा वस्तिकर्म, अनुविधान (सं॰ क्ली॰) सम्यग्रूप आज्ञाकारिता,
पिचकारीसे पतली दवाका लगाना। यह चिकित्सा फरमाबरदारी, कहनेके मुताबिक
वैद्यको वस्तिक्रियाके मध्य गण्य है। कषाय द्रव्यसे अञ्जाम देना।
लगायी जानेवाली पिचकारी निरूह और न हद्रव्य- अनुविधायिन् (सं॰ त्रि॰) अनु. पश्चात् विदधाति
वाली अनुवासन कहलाती है। प्राचीन समयके वैद्य जनयति, अनु-वि-धा-णिनि युगागमः ।
१ अनुविधान
चमड़े या मोटे कपड़ेसे पिचकारी तय्यार करते रहे। कर्ता, फरमाबरदार। .. २ पश्चादजनक, पौछे पैदा
उसके ही हारा मलद्धार, योनिमार्ग आदिमें औषध करनेवाला । ३ अनुगत, पिछ-लगा। (पु॰) ४ ब्रह्माको
पहुंचाया जाता था।
सृष्टिके अवशिष्ट सृष्टि-कर्ता अर्थात् मरीचि, अत्रि,
कर्मणि क्त।
इस्तेमाल।
कामका
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुवासनक, <small>अनुवासन देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुवासनवस्ति (सं॰ पु॰) स्नेहवस्ति, मात्रावस्ति,}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४९४'''|'''अनुवादक-अनुविधायिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:{{gap}}भट्टोजिदीक्षितने इस सूत्रके अनुवाद शब्दका अर्थ ‘सिद्धस्योपन्यास’ लिखा है।
{{Outdent|अनुवादक (सं॰ त्रि॰) अनुवदते, अनु-वद्-ण्वुल्। १ अनुवाद करनेवाला, जो तरजुमा बनाये। २ अनुवाद करानेवाला, जो तरजुमा उतराये।}}
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उतराये।}}
{{Outdent|अनुवादी (सं॰ पु॰) स-र-ग-मके तीन स्वरमें एक स्वर।}}
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२ उद्देश्य, इरादा। अलङ्कारिकके मतसे प्रथम अनुवाद्य (उद्देश्य) बता, पीछे विधेय बोलानेसे ‘विधेयः विमर्षदोष’ आता है। यथा-<br>
{{gap}}<small>अनुवाद्यमनुक्तै व न विधयमुदीरयेत्।”</small><br>
{{gap}}अर्थात् अनुवाद्य (उद्देश्य) विना लगाये विधयन लाना चाहिये।}}
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{{Outdent|अनुवासन (सं॰ क्ली॰) अनु-वस चुरादि णिच्-ल्युट्। १ धूपादि द्वारा सुगन्धीकरण, लोबान वगैरहसे खुश-बूका फैलाना। २ वस्त्रसुगन्धीकरण, पोशाकमें इत्रका इस्तेमाल। ३ वेद्यशास्त्रोक्त स्नेहादि द्वारा वस्तिकर्म, पिचकारीसे पतली दवाका लगाना। यह चिकित्सा वैद्यकी वस्तिक्रियाके मध्य गण्य है। कषाय द्रव्यसे लगायी जानेवाली पिचकारी निरूह और न हद्रव्य-वाली अनुवासन कहलाती है। प्राचीन समयके वैद्य चमड़े या मोटे कपड़ेसे पिचकारी तय्यार करते रहे। उसके ही द्वारा मलद्धार, योनिमार्ग आदिमें औषध पहुंचाया जाता था।}}
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{{Outdent|अनुवासित (सं॰ त्रि॰) अनु-चु॰ वस-णिच्-क्त। १ सुगन्धीकृत, बसाया हुवा, जिसमें खुशबू दी गयी हो। २ वस्तिकर्मद्वारा चिकित्सित, पिचकारी लगाया गया, जिसकी दवा पिचकारीके ज़रिये हुयो हो।}}
{{Outdent|अनुवास्य (सं॰ त्रि॰) अनु-चु॰ वस-णिच्-कर्मणि ण्यत्। १ सुगन्धि करने योग्य, खुशबू देने काबिल। २ वस्तिकर्म द्वारा चिकित्साके योग्य, जो पिचकारी लगाने काबिल हो।}}
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{{Outdent|अनुविधायिन् (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् विदधाति जनयति, अनु-वि-धा-णिनि युगागमः। १ अनुविधान कर्ता, फरमाबरदार। २ पश्चादजनक, पीछे पैदा करनेवाला। ३ अनुगत, पिछ-लगा। (पु॰) ४ ब्रह्माकी सृष्टिके अवशिष्ट सृष्टि-कर्ता अर्थात् मरीचि, अत्रि,}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh||'''अनुविनाश-अनुवृद्धि'''|'''४९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ-यह
सप्तऋषि। ५ विश्वामित्र । कहते हैं, कि विश्वामित्रने
भौ ब्रह्माकी सृष्टि के बाद कितनी ही वस्तुको सृष्टि
सजायी थी। ब्रह्माने जो मूंग बनायो, उसके परि
वर्तमें विश्वामित्रका बनाया उड़द मौजूद है। इसी
तरह गायके बदले भैंस और घोड़ेको जगह खच्चर
विश्वामित्रने बनाया था।
अनुविनाश (सं॰ पु॰) पश्चात्
मटियामेट।
अनुविन्द (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् विन्दतीति, विद ख्यात, पोछे मशहूर हुवा। ८पश्चात् मृत, जो
श संज्ञायाम्। गवादिषु विन्टेः सज्ञायाम्। (पा ३।११३८ सूत्र
वार्तिक।) राजविशेष, उजैनके कोई राजा। इन्होंने
कुरुक्षेत्र पहुंच भीष्मके पीछे-पीछे पाण्डवसे युद्ध
ठाना था।
"स'ज्ञा च परिभाषा च विधिनि यम एव च।
"शकुनिः सौवल शल्य आवन्तोष जयद्रथः ।
अतिदेशोऽधिकारश्च षड़ विधं सूवलक्षणम् ॥"
विन्दानुविन्दौ कैकैया: काम्बोजाश्च सुदक्षिणः ॥" (भीष्मपर्व १६।१५) अर्थात् संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश
अनुविधा (सं॰ अव्य॰) विध्य पर्वतं अतिक्रम्य, और अधिकार-यह छः प्रकार सूत्रका लक्षण होता
अव्ययी। १ विधापर्वतको अतिक्रम या उल्लङ्घनकर, है। पूर्वसूत्रके स्थित पदको परसूत्र में उपस्थिति
विन्धाचल पहाड़को लांघकर। (पु०) २ अवन्तिदेशके अधिकार कहाती है। यथा-
एक राजा।
"सिहावलोकिताख्यश्च मण्डूकप्त तिरेव च ।
अनुविष्टम्भ (सं॰ पु॰) कारणवश प्रतिबन्धक, जो गङ्गास्रोत इति ख्यातः अधिकारास्त्रयी मताः ।
रोकटोक किसी सबबसे लगायी जाये।
पाकाहायान्तु सर्वेषामनुत्तिपरे भवेत्।”
अनुविष्णु (सं॰ अव्य॰) विष्णुसे पीछे, विष्णु के बाद। अधिकार या अनुवृत्ति विविध रहती है।
अनुवृत (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् वर्तते, अनु वृत्॰ १ सिंहावलोकित। सिंह जैसे थोड़ी दूरतक लक्ष्य
१ पश्चाद्वर्ती, पश्चाभावी, अनुगत, जो लगाता, अनुवृत्तिका काम भी वैसे ही थोड़ी दूरतक
पश्चाद्भागमें खड़ा रहे, पीछे फिरनेवाला, बादको रहता है।
२ मण्डू कलुति-मण्डूक (मेंडक) जैसे
पैदा हुवा, लगा, सटा। अनु पश्चाद् वृणोति, वृणुते थोड़ी दूर कूद जाता, वैसे ही दो-चार सूत्र छोड़
स्वा०, वृणाति वृणोते क्रा०, वरति-ते भा० वा विप. अन्य सूत्रमें अधिकार भी जा पहुंचता है। ३ गङ्गा-
तुक्। २ पश्चावरणकारी, पश्चात् प्रार्थनाकारी, पीछे स्रोत-गङ्गास्रोत जैसे हिमालय पर्वतसे फट बहु दूर
वरण देनेवाला, जो पीछे अर्ज गुज़ार।
देशमें फैल बहता, वैसे ही अतिशय दूर पर्यन्त अनु-
अनुवृत्त (सं॰ त्रि॰)
अनु-वत-ती। १ अनुगत, वृत्ति चली जाती है। समन्वय और सेवाको भी
.पश्चाद्गत, पीछे पड़ा, तफसील-जेल, फ़रमांबरदार। अनुवृत्ति कहते हैं। देखो,-
२ व्याकरणके अनुसार-पूर्वसूत्रसे परसूत्रमें आकाङ्क्षा “ये ममानुगता नित्य प्रसादधनभोजन।
पूरणके निमित्त अन्वित पद, जो फि.करा नहवमें अनुत्तिं ध्रुवन्तेऽद्य कुर्वन्तान्यमहोभताम्॥” (मार्कछेय चण्डी)
पहले कायदेसे मतलब निकालनेके लिये पिछले अनुवृद्धि (सं॰ त्रि॰) समान अनुपातमें वर्धमान,
कायदेपर लगाया जाये। ३ क्रमशः गोल हुवा, जो बराबर मिकदारसे बढ़ते हुवा।
क्विप।
नाश, पीछेका
किया हुवा।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:{{gap}}धीरे-धीरे गोल पड़ गया हो। अनुगतं वृत्तं शीलम्, अतिक्रा॰-तत्। ४ शीलानुगत, सुशील, सच्चरित्र, लायक, तहज़ीबयाफ्ता, नर्मदिल। ५ पद्य श्लोक प्राप्त, जो शायरीमें चढ़ गया हो। ६ दृढ़ताप्राप्त, मज़बूत पड़ा हुवा। ७ अतीत, गया-गुजरा। ८ पश्चात् ख्यात, पीछे मशहूर हुवा। ९ पश्चात् मृत, जो पीछे मरा हो।
१० पश्चात् वृत, पीछे वरण हुवा।
{{Outdent|अनुवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) अनु-वृत-क्तिन्। १ पश्चात् गमन, पीछे की चाल, किसीकी मर्जीके मुवाफ़िक़ कामका करना। २ पूर्वसूत्रके पदादिका परसूत्रमें आकाङ्घापूरणके निमित्त आकर्षणं। ३ अधिकार, {{xx-larger|}}सूचके छः प्रकार लक्षण मध्य एक लक्षण । यथा-}}
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|}}</poem>}}
{{Outdent|}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुविनाश-अनुवृद्धि'''|'''४९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ-यह सप्तऋषि। ५ विश्वामित्र। कहते हैं, कि विश्वामित्रने भी ब्रह्माकी सृष्टि के बाद कितनी ही वस्तुकी सृष्टि सजायी थी। ब्रह्माने जो मूंग बनायी, उसके परि वर्तमें विश्वामित्रका बनाया उड़द मौजूद है। इसी
तरह गायके बदले भैंस और घोड़ेकी जगह खच्चर विश्वामित्रने बनाया था।}}
{{Outdent|अनुविनाश (सं॰ पु॰) पश्चात् नाश, पीछेका मटियामेट।}}
{{Outdent|अनुविन्द (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् विन्दतीति, विद न संज्ञायाम्। <Small> गवादिषु विन्टेः सज्ञायाम्। (पा ३।१।१३८ सूत्रे वार्तिक।)</Small> राजविशेष, उजैनके कोई राजा। इन्होंने कुरुक्षेत्र पहुंच भीष्मके पीछे-पीछे पाण्डवसे युद्ध ठाना था।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“शकुनिः सौवल शल्य आवन्त्योथ जयद्रथः।
विन्दानुविन्दौ कैकैया: काम्बोजाश्च सुदक्षिणः॥” (भीष्मपर्व १६।१५)</poem>}}}}
{{Outdent|अनुविधा (सं॰ अव्य॰) विध्य पर्वतं अतिक्रम्य, अव्ययी॰। १ विधापर्वतको अतिक्रम या उल्लङ्घनकर, विन्ध्याचल पहाड़को लांघकर। (पु॰) २ अवन्तिदेशके एक राजा।}}
{{Outdent|अनुविष्टम्भ (सं॰ पु॰) कारणवश प्रतिबन्धक, जो रोकटोक किसी सबबसे लगायी जाये।}}
{{Outdent|अनुविष्णु (सं॰ अव्य॰) विष्णुसे पीछे, विष्णु के बाद।}}
{{Outdent|अनुवृत (सं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् वर्तते, अनु-वृत्-क्विप १ पश्चाद्वर्ती, पश्चाद्भावी, अनुगत, जो पश्चाद्भागमें खड़ा रहे, पीछे फिरनेवाला, बादको पैदा हुवा, लगा, सटा। अनु पश्चाद् वृणोति, वृणुते स्वा॰, वृणाति वृणीते क्रा॰, वरति-ते भा॰ वा क्विप्-तुक्। २ पश्चाद्वरणकारी, पश्चात् प्रार्थनाकारी, पीछे वरण देनेवाला, जो पीछे अर्ज गुज़ार।}}
{{Outdent|अनुवृत्त (सं॰ त्रि॰) अनु-वृत-क्त। १ अनुगत, पश्चाद्गत, पीछे पड़ा, तफसील-जेल, फ़रमांबरदार। २ व्याकरणके अनुसार-पूर्वसूत्रसे परसूत्रमें आकाङ्क्षा
पूरणके निमित्त अन्वित पद, जो फिकरा नहवमें पहले कायदेसे मतलब निकालनेके लिये पिछले कायदेपर लगाया जाये। ३ क्रमशः गोल हुवा, जो}}
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:{{gap}}धीरे-धीरे गोल पड़ गया हो। अनुगतं वृत्तं शीलम्, अतिक्रा॰-तत्। ४ शीलानुगत, सुशील, सच्चरित्र, लायक, तहज़ीबयाफ्ता, नर्मदिल। ५ पद्य श्लोक प्राप्त, जो शायरीमें चढ़ गया हो। ६ दृढ़ताप्राप्त, मज़बूत पड़ा हुवा। ७ अतीत, गया-गुजरा। ८ पश्चात् ख्यात, पीछे मशहूर हुवा। ९ पश्चात् मृत, जो पीछे मरा हो।
१० पश्चात् वृत, पीछे वरण हुवा।
{{Outdent|अनुवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) अनु-वृत-क्तिन्। १ पश्चात् गमन, पीछे की चाल, किसीकी मर्जीके मुवाफ़िक़ कामका करना। २ पूर्वसूत्रके पदादिका परसूत्रमें आकाङ्घापूरणके निमित्त आकर्षणं। ३ अधिकार, {{xx-larger|}}सूचके छः प्रकार लक्षण मध्य एक लक्षण । यथा-}}
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“संज्ञा च परिभाषा च विधिनिर्यम एव च।
अतिदेशोऽधिकारश्च षड़ विधं सूवलक्षणम्॥”}}</poem>}}
:{{gap}}अर्थात् संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश और अधिकार-यह छः प्रकार सूत्रका लक्षण होता पूर्व सूत्रके स्थिति पदकी पर सूत्र में उपस्थिति अधिकार कहाती है। यथा——
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“सिहावलोकिताख्यश्च मण्डूकप्लू तिरेव च।
गङ्गास्रोत इति ख्यातः अधिकारास्त्रयी मताः।
आकाङ्क्षायान्तु सर्वेषामनुवृत्तिपरे भवेत्।”}}</poem>}}
:{{gap}}अधिकार या अनुवृत्ति विविध रहती है। १ सिंहावलोकित। सिंह जैसे थोड़ी दूरतक लक्ष्य लगाता, अनुवृत्तिका काम भी वैसे ही थोड़ी दूरतक रहता है।
२ मण्डू कप्लुति-मण्डूक (मेंडक) जैसे थोड़ी दूर कूद जाता, वैसे ही दो-चार सूत्र छोड़ अन्य सूत्रमें अधिकार भी जा पहुंचता है। ३ गङ्गा-स्रोत-गङ्गास्रोत जैसे हिमालय पर्वतसे फूट बहु दूर देशमें फैल बहता, वैसे ही अतिशय दूर पर्यन्त अनु-वृत्ति चली जाती है। समन्वय और सेवाको भी अनुवृत्ति कहते हैं। देखो,-
{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“ये ममानुगता नित्य प्रसादधनभोजनैः।।
अनुत्तिं ध्रुवन्तेऽद्य कुर्वन्तान्यमहोभताम्॥” (मार्कछेय चण्डी)}}</poem>}}
{{Outdent|अनुवृद्धि (सं॰ त्रि॰) समान अनुपातमें वर्धमान, बराबर मिकदारसे बढ़ते हुवा।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४९६'''|'''अनुवेद्यन्त-अनुव्याख्यान'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|अनुवेद्यन्त (सं॰ अव्य॰) यज्ञस्थलके किनारे, होम होनेको जमहके आगे।}}
{{Outdent|अनुवेध (सं॰ पु॰) १ छेदाई, छेद डालनेका काम। २ प्रतिबन्धक, रोक। ३ मुकाव, मुक पड़नेकी बात।}}
{{Outdent|अनुवेल (सं॰ अव्य॰) वेला वेलां अनु इति वीप्सार्थ अव्ययी॰। १ प्रतिक्षण, सर्वदा, हरघड़ी, हमेशा। वेला समुद्रतीरं तदनुसमीपे सामीप्यार्थे वीप्मार्थें वा अव्ययी॰। २ समुद्रतीरके निकट, जहां समुद्रका किनारा पास हो, समुद्रके तीर तीर, बहरके किनारे किनारे, उपकूलकी बगल।}}
{{Outdent|अनुवेल्लित (सं॰ क्ली॰) अनु-वेल्ल-क्त; वेलि्लत वक्र गोलाकारः इति यावत् तदनुगतम्, अतिक्रा॰-तत्। १ वैद्यसम्मत व्रणका लेपन-विशेष, फोड़ेका मरहम। २ व्रणबन्धनभेद, मरहमपट्टी। (अव्य॰) वेल्लितं कुटिलं तदनु समीपे, सामीप्यार्थे अव्ययी॰। २ कुटिलके निकट, टेढ़े के पास। (त्रि॰) ३ झुकते हुवा, जो
मुक पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुवेश (सं॰ पु॰) अनुविश्यते प्रविश्यते, अनु-विश् भावे घञ्। १ ज्ये ठके अतिक्रमपर कनिष्ठका विवाह, जो शादी बड़ेके बैठे रहते छोटे की हो। २ पश्चात् प्रवेश, पीछेका दाख़िला।}}
{{Outdent|अनुवेश्य (सं॰ त्रि॰) अनुक्रमेण पौर्वापर्यरूपेण विश्यते प्रविश्यते यत्, अनु-विश्-कर्मणि ण्यत्। प्रति-वासीसे एक गृहके अन्तरपर बसनेवाला, जो पड़ोसीसे
एक मकान्के फामिलेपर रहे। अनुक्रमेण वेश प्रवेश अर्हति, अनु-विश अर्हार्थे ण्यत्। प्रतिवेशीके अर्थ गृहवासी, पड़ोसीके लिये मकान्में रहनेवाला। यजमानसे एक घर छोड़ रहनेवाला ब्राह्मण भी अनुवेश्य कहाता है।}}
{{Outdent|अनुवैणेय-अयोध्याका एक पुरातन प्रदेश। इसके अन्तर्गत मनय नामक कोई नगर रहा। ललित-विस्तरके मतसे उसी जगह बुद्धदेवने अनोमा नदी पार उतर मत्था मुंडवा डाला, अनुचर उसी जगह सिद्धार्थसे रुखसत मांग कपिलनगर वापस गये थे।}}
:{{gap}}जो स्थान वैणय नदके साथ विस्तीर्ण पड़ा हुवा, किंवा वैणेय नदके समीप अथवा निम्न अवस्थित हो,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:वह अनुवैणेय कहा सकता है। अथवा पूर्वमें जो स्थान वेणु अर्थात् बांससे वेष्टित रहा, उसे लोग अनु-वैणय कहते थे। हमारी समझमें बांसबरलीको लोग अनुवैणेय नाममे पुकारते रहे।
:{{gap}}अनुवैणेयके समीपवाले दूसरे कुछ स्थान पहचान सकनेसे यह प्रदेश भी सहजमें मालूम पड़ जायेगा। अनोमा नदी पार उतर सिद्धार्थने छन्दक नामक अपने अनुचरसे कपिलनगर वापस जानेको कहा था। इसी कारण, वहां 'छन्दक-निवर्तन' नामक स्तूप खड़ा हुवा। मालूम पड़ता, कि अनोमा नदीके पूर्वपार, गोरखपुरसे पांच कोस दक्षिण 'छन्दकनिवर्तन' स्थान रहा था, वही आजकल 'चन्दवली' ग्राम बन गया।
:{{gap}}सिद्धार्थने छन्दकको रुखसत दे हाथकी तलवारसे चूड़ा काट डाला था। चूड़ेको काट वह बाल ऊपरकी ओर फेंकने लगे। देवताने चूड़ाके वही बाल संग्रह कर कोई पीठ बनवाया, जिसका नाम पड़ा 'चूड़ापति ग्रह'। आजकल चूड़ापति ग्रहको लोग 'चूड़ेय' कहते हैं। यह चन्दवलीसे डेढ़ कोस उत्तर बसा है।
:{{gap}}चड़ा काटने बाद सिद्धार्थने अपने वस्त्र उतार गेरुये वस्त्र पहने थे। लोगोंने उन्हीं काषाय वस्त्रको संग्रह कर कोई पीठ बनवाया, जिसका नाम 'काषायग्रहण' रखा गया। चन्दवलीसे डेढ़ कोस दूर 'काषेयर' नामक कोई ग्राम है। बोध बंधता, कि वही उस कालका 'काषाय-ग्रहण' होगा। चीन-परिव्राजक यूअं-चूअन् इन सकल तीर्थस्थानका जो निरूपण निकाल गये, उसके साथ तुलना लगानेसे
कुछ प्रभेद पड़ता है।
{{Outdent|अनुव्य (सं॰ त्रि॰) अनु-व्ययति-ते अनुगच्छति, अनु-व्ये संवृतौ क। १ अनुगत, पश्चाद्गामी, मातहत, पीछे रहनेवाला। अनुव्ययति-ते आच्छादयति। २ आच्छादनकारी, ढांकनेवाला। (अव्य॰) ३ पश्चात्, पीछे।}}
{{Outdent|अनुव्यञ्जन (सं॰ क्ली॰) द्वितीय श्रेणीका चिह्न अथवा सङ्केत, जो निशान् या इशारा दूसरे दरजेका हो।}}
{{Outdent|अनुव्याख्यान (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं सदृशं व्याख्यानम्,}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''४९७'''|'''अनुव्याहरण-अनुशयान'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:अनु-वि-आ-ख्या-भावे ल्युट, प्रादि॰ सं॰। १ मन्त्रादिका अविकल अर्थप्रकाश, मन्त्र वगैरहके ठीक मानेका इजहार। २ पश्चायाख्या, ब्राह्मणका वह भाग जो कठिन सूत्र, भाष्य अथवा गुह्यरहस्यकी व्याख्या बांधता है।
{{Outdent|अनुव्याहरणं (सं॰ क्ली॰) <small>अनुव्याहार देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुव्याहार (सं॰ पु॰) अनु-वि-आ-हृ भावे घञ्; अनु पश्चाद् व्याहारैः उक्तिः, कर्मधा॰। अनुरूपो व्याहारः, प्रादि॰ स॰ वा। १ अनुवाद, पश्चात् कथन, अनुरूप कथन, तरजुमा, पीछेका बोलना, नकल। २ शाप, कोसना, धिक्कार, बददुवा, लानत।}}
{{Outdent|अनुव्याहारिन् (सं॰ त्रि॰) शाप देनेवाला, जो बददुवा लगाये, धिक्कार देते हुवा, जो लानत भेज रहा हो।}}
{{Outdent|अनुव्रजन (सं॰ क्ली॰) अनु-व्रज-भावे ल्युट। १ पश्चाद् गमन, पीछेकी चाल। अनु-व्रज-युच् चलनार्थत्वात्। २ पथिक, राहगीर।}}
{{Outdent|अनुव्रज्या (सं॰ स्त्री॰) अनु पश्चाव्रजनं, अनु-व्रज-भावे क्यप। व्रजयजोभावे क्यम्। पा ३।३।९८ १ पश्चाद्गमन, पश्चादगमनरूप सेवा, पीछेकी दौड़, पोछे रहने-जैसी खिदमत। २ गोवधप्रायश्चित्तकी क्रियाविशेष। साक्षाद् गोवधके लिये कहा गया है,—}}
{{c|{{x-smaller|तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत्।”}}}}
:{{gap}}गायके खड़े होनेसे खड़ा रहे और चलनेसे उसके पीछे हो ले। अपालन-गोवधका प्रायश्चित्त यह है,—
{{c|{{x-smaller|“आर्द्र मेव हि तच्चर्म परिधाय स गां ब्रजेत्।”}}}}
:{{gap}}गोहत्याकारी गायका रक्तशुद्ध चर्म पहन पीछे
पीछे घूमा करे।
:{{gap}}स्त्रीके गोवधादि पाप करनेसे गोका अनुगमन प्रभृति कितना हो कार्य निषिद्ध है।
{{c|{{x-smaller|वपन नैव नारीणां नानुव्रज्या जपादिकम्।” (भट्ट भवदेवकृतवचन)}}}}
:{{gap}}अर्थात् स्त्रीके गोवधपाप करनेसे मुण्डन, गोका पश्चाद्गमन और गोमती-मन्त्रका जप मना है।
{{Outdent|अनुव्रत (सं॰ त्रि॰) अनु अनुकूलं सदृशं वा व्रतं नियमः कर्म-वा यस्य। १ अनुकूल नियमयुक्त, उत्तम-कर्मशाली, समान नियमकारी, मसरूफ, अ
आदी, मह्व,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:मफ़तून, लगा हुवा। कर्मधा॰। २. पश्चाद्वत, पीछे पड़ा हुवा। (पु॰) जैन साधुविशेष, खा़स किस्म का जैनौ फकीर।
{{Outdent|अनुव्राज्य (सं॰ त्रि॰) पश्चाद्गमन-योग्य, पीछे जाने काबिल, जिसके पीछे पहुंचना मुनासिब रहे।}}
{{Outdent|अनुशतिक (सं॰ त्रि॰) सौके साथ लगा या सौसे खरीदा गया।}}
{{Outdent|अनुशतिकादि (सं॰ क्ली॰) अनुशतिकं आदि यस्य, ६-बहुव्री॰। <small>अनुशतिकादीनाञ्च। पा ७।३।२०।</small> तद्धितके ज इत्,ण इत् और क इत् प्रत्यय बाद दो पदके आदि अच्की बद्धिका गुण। आकृतिगणमें निम्नलिखित शब्द रहते हैं,——अनुशतिक, अनुहोड़, अनुसंवरण, अनुसंवत्सर, अङ्गाररेणु, असिहत्य, अस्यहत्य, अस्यहेति, वध्योग, पुष्करसद, अणुहरत्, कुरुकत, कुरुपञ्चाल, उदकशुद्ध, इहलोक, परलोक, सर्वलोक, सर्व पुरुष, सर्व भूमि, प्रयोग, परस्त्री, राजपुरुष, सूत्रनड़, अभिगम, अधिभूत, अधिदेव, अध्यात्मवाद, चतुर्विद्या, शतकुम्भ और परदार।}}
{{Outdent|अनुशय (सं॰ पु॰), अनु-शीङ्-अच्; अनु पश्चात् शयः शयनं येन, ३-बहुव्री॰। १ अतिशयद्वेष, हद दरजकी दुश्मनी। २ अनुताप, पश्चात् सन्ताप, पछतावा}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्वेहानुशयी भवेत्।
सोऽन्तर्दशाहात्तद्रव्यं दद्याच्चैवाददीत वा॥” ( मनु ८।२२२)</poem>}}}}
:{{gap}}३ पूर्वविरोध, पहलेका झगड़ा, पुरानी अदावत। अनुगतं शयं हस्तम्। ४ हस्तप्राप्त वस्तु, जो वस्तु हस्तगत हो गयी हो, दस्तयाब शै, जो चीज़ हाथ लगी हो। ५ फलका निकटस्थ सम्बन्ध, नतीजे-का लगा हुवा रिश्ता। वैज्ञानिक कर्मके कुत्सित फलको अनुशय समझता, जो कर्मसे लगा रहता और आत्माको अन्य शरीरमें जम्म दिलाता; बह अपने शुभ कर्मके फलस्वरूप पुनर्जन्म न पानेकी स्वतन्त्रता थोड़े ही कालके लिये भोगता है।
{{Outdent|अनुशयक्त् (सं॰ त्रि॰) पश्चात्तापयुक्तं, पछतावेमें पड़ा हुवा।}}
{{Outdent|अनुशयान (सं॰ त्रि॰) पश्चात्ताप करते हुवा, जो पिछतावेमें पड़ा हो।}}
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:अनु-वि-आ-ख्या-भावे ल्युट, प्रादि॰ सं॰। १ मन्त्रादिका अविकल अर्थप्रकाश, मन्त्र वगैरहके ठीक मानेका इजहार। २ पश्चायाख्या, ब्राह्मणका वह भाग जो कठिन सूत्र, भाष्य अथवा गुह्यरहस्यकी व्याख्या बांधता है।
{{Outdent|अनुव्याहरणं (सं॰ क्ली॰) <small>अनुव्याहार देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुव्याहार (सं॰ पु॰) अनु-वि-आ-हृ भावे घञ्; अनु पश्चाद् व्याहारैः उक्तिः, कर्मधा॰। अनुरूपो व्याहारः, प्रादि॰ स॰ वा। १ अनुवाद, पश्चात् कथन, अनुरूप कथन, तरजुमा, पीछेका बोलना, नकल। २ शाप, कोसना, धिक्कार, बददुवा, लानत।}}
{{Outdent|अनुव्याहारिन् (सं॰ त्रि॰) शाप देनेवाला, जो बददुवा लगाये, धिक्कार देते हुवा, जो लानत भेज रहा हो।}}
{{Outdent|अनुव्रजन (सं॰ क्ली॰) अनु-व्रज-भावे ल्युट। १ पश्चाद् गमन, पीछेकी चाल। अनु-व्रज-युच् चलनार्थत्वात्। २ पथिक, राहगीर।}}
{{Outdent|अनुव्रज्या (सं॰ स्त्री॰) अनु पश्चाव्रजनं, अनु-व्रज-भावे क्यप। व्रजयजोभावे क्यम्। पा ३।३।९८ १ पश्चाद्गमन, पश्चादगमनरूप सेवा, पीछेकी दौड़, पोछे रहने-जैसी खिदमत। २ गोवधप्रायश्चित्तकी क्रियाविशेष। साक्षाद् गोवधके लिये कहा गया है,—}}
{{c|{{x-smaller|तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत्।”}}}}
:{{gap}}गायके खड़े होनेसे खड़ा रहे और चलनेसे उसके पीछे हो ले। अपालन-गोवधका प्रायश्चित्त यह है,—
{{c|{{x-smaller|“आर्द्र मेव हि तच्चर्म परिधाय स गां ब्रजेत्।”}}}}
:{{gap}}गोहत्याकारी गायका रक्तशुद्ध चर्म पहन पीछे
पीछे घूमा करे।
:{{gap}}स्त्रीके गोवधादि पाप करनेसे गोका अनुगमन प्रभृति कितना हो कार्य निषिद्ध है।
{{c|{{x-smaller|वपन नैव नारीणां नानुव्रज्या जपादिकम्।” (भट्ट भवदेवकृतवचन)}}}}
:{{gap}}अर्थात् स्त्रीके गोवधपाप करनेसे मुण्डन, गोका पश्चाद्गमन और गोमती-मन्त्रका जप मना है।
{{Outdent|अनुव्रत (सं॰ त्रि॰) अनु अनुकूलं सदृशं वा व्रतं नियमः कर्म-वा यस्य। १ अनुकूल नियमयुक्त, उत्तम-कर्मशाली, समान नियमकारी, मसरूफ, अ
आदी, मह्व,}}
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:मफ़तून, लगा हुवा। कर्मधा॰। २. पश्चाद्वत, पीछे पड़ा हुवा। (पु॰) जैन साधुविशेष, खा़स किस्म का जैनौ फकीर।
{{Outdent|अनुव्राज्य (सं॰ त्रि॰) पश्चाद्गमन-योग्य, पीछे जाने काबिल, जिसके पीछे पहुंचना मुनासिब रहे।}}
{{Outdent|अनुशतिक (सं॰ त्रि॰) सौके साथ लगा या सौसे खरीदा गया।}}
{{Outdent|अनुशतिकादि (सं॰ क्ली॰) अनुशतिकं आदि यस्य, ६-बहुव्री॰। <small>अनुशतिकादीनाञ्च। पा ७।३।२०।</small> तद्धितके ज इत्,ण इत् और क इत् प्रत्यय बाद दो पदके आदि अच्की बद्धिका गुण। आकृतिगणमें निम्नलिखित शब्द रहते हैं,——अनुशतिक, अनुहोड़, अनुसंवरण, अनुसंवत्सर, अङ्गाररेणु, असिहत्य, अस्यहत्य, अस्यहेति, वध्योग, पुष्करसद, अणुहरत्, कुरुकत, कुरुपञ्चाल, उदकशुद्ध, इहलोक, परलोक, सर्वलोक, सर्व पुरुष, सर्व भूमि, प्रयोग, परस्त्री, राजपुरुष, सूत्रनड़, अभिगम, अधिभूत, अधिदेव, अध्यात्मवाद, चतुर्विद्या, शतकुम्भ और परदार।}}
{{Outdent|अनुशय (सं॰ पु॰), अनु-शीङ्-अच्; अनु पश्चात् शयः शयनं येन, ३-बहुव्री॰। १ अतिशयद्वेष, हद दरजकी दुश्मनी। २ अनुताप, पश्चात् सन्ताप, पछतावा}}
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सोऽन्तर्दशाहात्तद्रव्यं दद्याच्चैवाददीत वा॥” ( मनु ८।२२२)</poem>}}}}
:{{gap}}३ पूर्वविरोध, पहलेका झगड़ा, पुरानी अदावत। अनुगतं शयं हस्तम्। ४ हस्तप्राप्त वस्तु, जो वस्तु हस्तगत हो गयी हो, दस्तयाब शै, जो चीज़ हाथ लगी हो। ५ फलका निकटस्थ सम्बन्ध, नतीजे-का लगा हुवा रिश्ता। वैज्ञानिक कर्मके कुत्सित फलको अनुशय समझता, जो कर्मसे लगा रहता और आत्माको अन्य शरीरमें जम्म दिलाता; बह अपने शुभ कर्मके फलस्वरूप पुनर्जन्म न पानेकी स्वतन्त्रता थोड़े ही कालके लिये भोगता है।
{{Outdent|अनुशयक्त् (सं॰ त्रि॰) पश्चात्तापयुक्तं, पछतावेमें पड़ा हुवा।}}
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{{Outdent|अनुशयाना (सं॰ स्त्री॰) अनुशेते परनायकवाक्येन क्रुध्यति, अनु-शीङ्-शानच्। परकोयनायिकाविशेष, जो नायिका इष्टहानिके निमित्त अनुताप उठाये। अनु-शयाना नायिका तीन तरहकी होती है——१-सङ्केत विघटना, यह वर्तमान सङ्केत-स्थानमें विघटन पड़नेसे अनुताप झेलती है। २-भाविसङ्केत विघटना, इसे भाविसङ्केत स्थानके अभावकी आशङ्कासे अनुताप पड़ जाता है। ३ सङ्केत-गमनविघटना, यह पतिके सङ्केत स्थानमें पहुंचनेपर अपने वहां न जा सकनेसे अनुतापमें चूर रहती है।}}
{{Outdent|अनुशयितव्य (सं॰ त्रि॰) पश्चात्ताप पहुंचाने योग्य, पछताने काबिल, जिसके लिये पछतायें।}}
{{Outdent|अनुशयिन् (सं॰ पु॰) अनुशेते अनुतप्यते, अनु-शीङ-इनि। १ निज पुण्यके अनुसार चन्द्रलोकमें ठहर पुण्य पूरा पड़नेसे अनुतापयुक्त बन भूलोकको आगमनेच्छु व्यक्ति, जो शख्स अपने सवाबके मुवाफिक चन्द्रलोकमें रह पुण्य खत्म होनेसे पछतावेके साथ इस दुनियाको पानेको खाहिश रखे। (त्रि॰) अनु शयोऽस्यास्ति इनि। २ पश्चात्तापयुक्त, जो पछतावेमें पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुशयी (सं॰ स्त्री॰) अनु शीङ भावे अच्; अनु पश्चात् शयस्तापो यया, बहुव्री॰। गौरादित्वात् ङीष्। क्षुद्ररोगान्तर्गत पादरोगविशेष, पैरकी मामूली बीमारी।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>”गम्भीरामल्पशोथाञ्च सवर्णमुपरिस्थिताम्।
पादस्यानुशयीं तान्तु विद्यादन्तः प्रपाकिनीम्॥”
“हरेदनुशयीं वैद्यः क्रियया श्ले भविद्रधः।” (भावप्रकाश पादरोगचि॰)</poem>}}}}
:(त्रि॰) अनु शयिन् देखो।
{{Outdent|अनुशर (सं॰ पु॰) अनु प्रतिक्षणं शृणाति हिनस्ति प्राणिनः, कर्तरि अच् अप् वा। राक्षस, आदमखोर।}}
{{Outdent|अनुशस्त्र (सं॰ क्ली॰) १ चीरफाड़के काम आनेवाले शस्त्रके स्थानमें कोई दूसरा छोटा शस्त्र, जो छोटा औज़ार जराहीके औजारकी जगह इस्तेमाल किया
जाये, जैसे-नख, बांस आदि। २ कोई दूसरा छोटा औजार।}}
{{Outdent|अनुशायिन् (सं॰ त्रि॰) चिपटा हुवा, जो पड़ा हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुशार (सं॰ पु॰) अनु-शृ करणे घञ्; शारं वायु वर्णं आवर्ण वा अनुगतः, अतिक्रा॰-तत्। वायुके अन्तर्गत वस्तु, जो चीज हवाके भीतर रहे, वायुप्राप्त, जिसे हवा लग रही हो।}}
{{Outdent|अनुशासक (सं॰ त्रि॰) प्रबन्ध बांधने या शिक्षा और दण्ड देनेवाला, जो इन्तजाम, तालीम या सज़ा करे।}}
{{Outdent|अनुशासत् (सं॰ त्रि॰) शिक्षा देते या प्रबन्ध बांधते हुवा, जो तालीम देता या इन्तज़ाम लगाता हो।}}
{{Outdent|अनुशासन (सं॰ कली॰) अनुशासनं याथार्थ्येन निरू-पणम्, अनु-शास-भावे ल्युट्। १ यथार्थ ज्ञापन, आदेश, निरूपण, कर्तव्यका विधान, तालीम, हिदायत, हुक्म, मस्ल। २ महाभारतका पर्वविशेष।}}
{{Outdent|अनुशासनीय (सं॰ त्रि॰) उपदेश देने योग्य, हिदायत लगाने काबिल, जो सिखाया-पढ़ाया जाये।}}
{{Outdent|अनुशासित (सं॰ त्रि॰) उपदेश दिया हुवा, प्रबन्ध }}
{{Outdent|बांधा हुवा, नियमसे निरूपित, जिसे हिदायत दी गयी हो, जिसका इन्तजाम लगा हो, जो कायदेसे बतलाया गया हो।}}
{{Outdent|अनुशासितृ (सं॰ त्रि॰) अनु-शास्ति याथार्थ्यन कार्य-मादिशति, अनु-शास्-तृच्। कर्तव्योपदेशकर्ता, फर्जको बतानेवाला। (स्त्री॰) अनुशासित्री।}}
{{Outdent|अनुशासिन् (सं॰ त्रि॰) अनु-शास्ति कार्यमुप-दिशति अनु-शास्-णिनि। १ कर्तव्यका उपदेशकर्ता, कर्तव्यका उपदेश देनेवाला। २ दण्डविधाता, जो सज़ा दे।}}
{{Outdent|अनुशिक्षिन् (सं॰ त्रि॰) निजमें शिक्षा पानेवाला, जो खुद महारत डाले।}}
{{Outdent|अनुशिख (सं॰ पु॰) सर्पविशेष, जिसने किसी यज्ञ में होताका काम किया था।}}
{{Outdent|अनुशिव (सं॰ अव्य॰) शिवके साथ, पार्वतीपतिके पीछे।}}
{{Outdent|अनुशिशु (सं॰ त्रि॰) शिशुसे पीछा की गयी, जिसके पीछे बच्चा पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुशिष्ट (सं॰ त्रि॰) अन्वशासि अनुशास कर्मणि क्त। १ शासित, हुक्म चलाया हुवा। २ हितोपदेश-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुशिष्टि-अनुषङ्ग'''|'''४९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:प्राप्त, जिसे भलाईकी बात बतायी गयी हो। २ दण्डित, सजायाफ्ता।
{{Outdent|अनुशिष्टि (सं॰ स्त्री॰) अनु-शास्-क्तिन्। अनुशासन, पश्चात् शासन, उपदेश, हिदायत, तालीम, इरशाद।}}
{{Outdent|अनुशीत (सं॰ अव्य॰) शीते विभक्त्यर्थे अव्ययी॰। शीतमें, मौसम-शर्मापर, जाड़ेसे।}}
{{Outdent|अनुशीलन (सं॰ क्ली॰) अनु-शौल भावे ल्युट; अनुक्षणं शीलनं आन्दोलनम्, प्रादि-स॰। सतत अभ्यास, सर्वदा आन्दोलन, प्रतिक्षण आचरण, सुदामी मुतालह, जो खिदमत बार-बार और दिलसे की जाये।}}
{{Outdent|अनुशीलनीय (सं॰ त्रि॰) सतत चिन्तनीय, पुनः पुन: आलोचनीय, जिसका बराबर अभ्यास रखा जाये, लगातार मुतालहके काबिल, जिसकी महारत हमेशा रहना ज़रूरी पड़े।}}
{{Outdent|अनुशीलित (सं॰ त्रि॰) सतत चिन्तित, पुनः पुनः आलोचित।}}
{{Outdent|अनुशुचित (सं॰ क्ली॰) अनु-शुच्-भावे क्त, अनु शोचितुमारब्ध इति आरम्भार्थे क्त विकल्पे किदिति वा गुणः। १ पश्चात् शोक, छपतावा। (त्रि॰)२ कृतानु
शोचनारम्भ, छपताते हुवा।}}
{{Outdent|अनुशोक (सं॰ पु॰) अनु पश्चाच्छोकः, अनु-शुच-भावे घञ्। पश्चात् शोक, पछतावा।}}
{{Outdent|अनुशोचक (सं॰ त्रि॰) पश्चात्तापयुक्त, पछतावेमें पड़ा हुवा।}}
{{Outdent|अनुशोचन (सं॰ क्ली॰) अनुशुच्यते, अनु-शुच-भावे ल्युट। पश्चात् शोक, पछतावा। (स्त्री॰) अनुशोचना।}}
{{Outdent|अनुशोचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुशुच्यते यत् अनु शुच कर्मणि अनीयर्।अनुशोकाई, पछतावे काबिल, जिसे याद करनेसे पछतावे में पड़ना हो।}}
{{Outdent|अनुशोचित (सं॰ क्ली॰) अनु-शुच् भावे क्त, शोचितु मारब्ध इति आरम्भार्थे वा क्त। १ पश्चात् शोक, पछतावा। (त्रि॰)२ जिसे सोच पछतावैमें पड़े।}}
{{Outdent|अनुशोचिन् (सं॰ त्रि॰) पश्चात् ताप उठाते हुवा, जो पछतावेमें पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुशोभिन् (सं॰ त्रि॰) उज्ज्वल, प्रकाशमान, खू़बसूरत, चमकते हुवा।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुश्राव (वै॰ पु॰) वैदिक कथा-वार्ता, जो बार-बार सुननेसे प्राप्त हो।}}
{{Outdent|अनुश्राविक (वै॰ त्रि॰) वैदिक वार्ता-सम्बन्धीय, जो लगातार वेद सुननेसे दिलपर जमा हो।}}
{{Outdent|अनुश्रुत (सं॰ त्रि॰) वैदिक वार्तासे प्राप्त, जो लगातार वेदकी बात सुननेसे मालम हो गया हो।}}
{{Outdent|अनुश्लोक (सं॰ पु॰) महाव्रतमें गानेका सामविशेष, वेदका गान भेद। <Small>‘अनश्रूयते इति अनुश्लोकः।’ (निरुक्त)</small>}}
{{Outdent|अनुषक्, अनुषट् (सं॰ अव्य॰) १ क्रमशः, बदनियमा-नुसार, लगातार, सिलसिलेसे । २ एकपर एक, एकके बाद दूसरा।}}
{{Outdent|अनुषक्त (सं॰ त्रि॰) अनु षज्यते स्म, अनु-सज्ज कर्मणि क्त। संलग्न, अनुवृत्त, पूर्व सूत्रका कार्यविशिष्ट, खूब सटा हुवा, पहलेको चीज़से जो मिला हो।}}
{{Outdent|अनुषङ्ग (सं॰ पु॰) अनुषञ्जनं, अनु-सञ्ज भावे घञ्। १ दया, मेहरबानी। २ सम्बन्ध, रिश्ता, लगाव। ३ अनुवृत्ति, पहले वाक्यसे दूसरे वाक्यमें कुछ शब्दका खींचा जाना। ४ प्रधान कार्यके अधिक उद्देश्य बीच किसी सामान्य कार्यका उद्देश्य। जैसे-भिक्षा मांगने जावो, यदि देख पड़े, तो गायको भी लेते आना। यहाँ भिक्षा मांगने जाना ही प्रधान उद्देश्य है। इसमें गायको लाना सामान्य उद्देश्य मिला, जिससे गायको लाना अनुषङ्ग कहयेगा।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“तीर्थ प्राप्यानुषङ्गन सान तीर्थ समाचरेत्।
स्रानजं फलमाप्नोति तीर्थयावाफल न तु॥”(शक)</poem>}}}}
:{{gap}}प्रधान उद्देश्यके अन्तर्गत सामान्य उद्देश्यसे तीर्थ पहुंच जो स्नान करता, उसे उसी नानका फल मिलता, तीर्थयात्राका नहीं। कारण, यथानियम वह तीर्थयात्रा नहीं निभाता। वाचस्पत्य और शब्दकल्पद्रुममें प्रसङ्ग और अनुषङ्ग दोनो एकार्थक शब्द समझ गये हैं। किन्तु उससे प्रायश्चित्ततत्त्वमें लिखित स्मार्तका एक पाठ सङ्गत नहीं ठहरता,——
{{c|{{x-smaller|"अतएव प्रासङ्गि कानुषङ्गिकफलसिद्धिरण्युपपन्ना।"}}}}
:{{gap}}‘अतएव प्रासङ्गिक और आनुषङ्गिक फलसिद्धि भी सङ्गत समझ पड़ी।’ प्रासङ्गिक शब्दसे एकजैसा अर्थ निकलनेपर यहां एक ही शब्द बोलने में काम चलता,}}
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुशिष्टि-अनुषङ्ग'''|'''४९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:प्राप्त, जिसे भलाईकी बात बतायी गयी हो। २ दण्डित, सजायाफ्ता।
{{Outdent|अनुशिष्टि (सं॰ स्त्री॰) अनु-शास्-क्तिन्। अनुशासन, पश्चात् शासन, उपदेश, हिदायत, तालीम, इरशाद।}}
{{Outdent|अनुशीत (सं॰ अव्य॰) शीते विभक्त्यर्थे अव्ययी॰। शीतमें, मौसम-शर्मापर, जाड़ेसे।}}
{{Outdent|अनुशीलन (सं॰ क्ली॰) अनु-शौल भावे ल्युट; अनुक्षणं शीलनं आन्दोलनम्, प्रादि-स॰। सतत अभ्यास, सर्वदा आन्दोलन, प्रतिक्षण आचरण, सुदामी मुतालह, जो खिदमत बार-बार और दिलसे की जाये।}}
{{Outdent|अनुशीलनीय (सं॰ त्रि॰) सतत चिन्तनीय, पुनः पुन: आलोचनीय, जिसका बराबर अभ्यास रखा जाये, लगातार मुतालहके काबिल, जिसकी महारत हमेशा रहना ज़रूरी पड़े।}}
{{Outdent|अनुशीलित (सं॰ त्रि॰) सतत चिन्तित, पुनः पुनः आलोचित।}}
{{Outdent|अनुशुचित (सं॰ क्ली॰) अनु-शुच्-भावे क्त, अनु शोचितुमारब्ध इति आरम्भार्थे क्त विकल्पे किदिति वा गुणः। १ पश्चात् शोक, छपतावा। (त्रि॰)२ कृतानु
शोचनारम्भ, छपताते हुवा।}}
{{Outdent|अनुशोक (सं॰ पु॰) अनु पश्चाच्छोकः, अनु-शुच-भावे घञ्। पश्चात् शोक, पछतावा।}}
{{Outdent|अनुशोचक (सं॰ त्रि॰) पश्चात्तापयुक्त, पछतावेमें पड़ा हुवा।}}
{{Outdent|अनुशोचन (सं॰ क्ली॰) अनुशुच्यते, अनु-शुच-भावे ल्युट। पश्चात् शोक, पछतावा। (स्त्री॰) अनुशोचना।}}
{{Outdent|अनुशोचनीय (सं॰ त्रि॰) अनुशुच्यते यत् अनु शुच कर्मणि अनीयर्।अनुशोकाई, पछतावे काबिल, जिसे याद करनेसे पछतावे में पड़ना हो।}}
{{Outdent|अनुशोचित (सं॰ क्ली॰) अनु-शुच् भावे क्त, शोचितु मारब्ध इति आरम्भार्थे वा क्त। १ पश्चात् शोक, पछतावा। (त्रि॰)२ जिसे सोच पछतावैमें पड़े।}}
{{Outdent|अनुशोचिन् (सं॰ त्रि॰) पश्चात् ताप उठाते हुवा, जो पछतावेमें पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुशोभिन् (सं॰ त्रि॰) उज्ज्वल, प्रकाशमान, खू़बसूरत, चमकते हुवा।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुश्राव (वै॰ पु॰) वैदिक कथा-वार्ता, जो बार-बार सुननेसे प्राप्त हो।}}
{{Outdent|अनुश्राविक (वै॰ त्रि॰) वैदिक वार्ता-सम्बन्धीय, जो लगातार वेद सुननेसे दिलपर जमा हो।}}
{{Outdent|अनुश्रुत (सं॰ त्रि॰) वैदिक वार्तासे प्राप्त, जो लगातार वेदकी बात सुननेसे मालम हो गया हो।}}
{{Outdent|अनुश्लोक (सं॰ पु॰) महाव्रतमें गानेका सामविशेष, वेदका गान भेद। <Small>‘अनश्रूयते इति अनुश्लोकः।’ (निरुक्त)</small>}}
{{Outdent|अनुषक्, अनुषट् (सं॰ अव्य॰) १ क्रमशः, बदनियमा-नुसार, लगातार, सिलसिलेसे । २ एकपर एक, एकके बाद दूसरा।}}
{{Outdent|अनुषक्त (सं॰ त्रि॰) अनु षज्यते स्म, अनु-सज्ज कर्मणि क्त। संलग्न, अनुवृत्त, पूर्व सूत्रका कार्यविशिष्ट, खूब सटा हुवा, पहलेको चीज़से जो मिला हो।}}
{{Outdent|अनुषङ्ग (सं॰ पु॰) अनुषञ्जनं, अनु-सञ्ज भावे घञ्। १ दया, मेहरबानी। २ सम्बन्ध, रिश्ता, लगाव। ३ अनुवृत्ति, पहले वाक्यसे दूसरे वाक्यमें कुछ शब्दका खींचा जाना। ४ प्रधान कार्यके अधिक उद्देश्य बीच किसी सामान्य कार्यका उद्देश्य। जैसे-भिक्षा मांगने जावो, यदि देख पड़े, तो गायको भी लेते आना। यहाँ भिक्षा मांगने जाना ही प्रधान उद्देश्य है। इसमें गायको लाना सामान्य उद्देश्य मिला, जिससे गायको लाना अनुषङ्ग कहयेगा।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“तीर्थ प्राप्यानुषङ्गन सान तीर्थ समाचरेत्।
स्रानजं फलमाप्नोति तीर्थयावाफल न तु॥”(शक)</poem>}}}}
:{{gap}}प्रधान उद्देश्यके अन्तर्गत सामान्य उद्देश्यसे तीर्थ पहुंच जो स्नान करता, उसे उसी नानका फल मिलता, तीर्थयात्राका नहीं। कारण, यथानियम वह तीर्थयात्रा नहीं निभाता। वाचस्पत्य और शब्दकल्पद्रुममें प्रसङ्ग और अनुषङ्ग दोनो एकार्थक शब्द समझ गये हैं। किन्तु उससे प्रायश्चित्ततत्त्वमें लिखित स्मार्तका एक पाठ सङ्गत नहीं ठहरता,——
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:{{gap}}‘अतएव प्रासङ्गिक और आनुषङ्गिक फलसिद्धि भी सङ्गत समझ पड़ी।’ प्रासङ्गिक शब्दसे एकजैसा अर्थ निकलनेपर यहां एक ही शब्द बोलने में काम चलता,
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३५
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{{rh|'''३५'''|'''कबीर-बड़—कब्ज'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उनके पुत्र चेतसिंह ने इनको संख्या निरूपण करने को काशी के निकट एक मेला लगाया। उसमें प्रायः ३५००० कबीरपन्थी संन्यासी पहुँचे थे।
{{outdent|कबीर-बड़ (हिं० पु०) विशाल वटवृक्ष, बरगद का बड़ा पेड़। यह भड़ौंच के निकट नर्मदा किनारे अवस्थित है। इसका परिणाह चतुर्दश सहस्र हस्त-परिमित आता है। कबीरबड़ की छाया में सप्त सहस्र व्यक्ति विश्राम कर सकते हैं।}}
{{outdent|कबोला(अ० स्त्री०) पट्टा, लोह।}}
{{outdent|कबीला(हिं० पु०) वृक्षविशेष, एक पेड़। यह बङ्गाल के बिंणभूम, उड़ीसे के पुरी, युक्तप्रदेश के गढ़वाल तथा कुमायूँ और पञ्जाब के काँगड़े जिले में उत्पन्न होता है। मध्यप्रदेश, दाक्षिणात्य, काश्मीर तथा नेपाल की तराई में भी इसका अभाव नहीं। कबीला एक क्षुद्र वृक्ष है। पत्र अमरूद से मिलते हैं। फलों का गुच्छ बनता है, जो रक्तवर्ण धूलि से आच्छादित रहता है। इस धूलि से रेशम को रँगते हैं। पहले एक सेर रेशम को आधसेर सोडा डाल जल में उबालते हैं। मुलायम पड़ने से रेशम निकाल लेते हैं। फिर १ पाव कबीला (रक्तवर्ण धूलि), आधछटांक तिलतेल, १ पाव फिटकरी और थोड़ा छोड़ वही जल पावघण्टे उबाला जाता है। पीछे रेशम डाल कोई १५ मिनट और उबालना पड़ता है। इससे रेशम नारङ्गी के रङ्ग की हो जाती है। कबीले से मरहम भी बनता, जो फोड़े-फुन्सी पर पड़ता है। कबीला उष्ण, रेचक और विशुद्ध रहता है। इसकी अधिक से अधिक मात्रा ६ रत्ती है। कगुलयाना, ककुलाना देखो।}}
{{outdent|ककुलाना(हिं० क्रि०) स्वीकार या क बूल कराना, सुंध्ये कहाना।}}
{{outdent|कबुत्ति(सं० स्त्री०) जन्तु के देह का पश्चात् भाग, जानवर के पिछाड़ा का पिछला हिस्सा।}}
{{outdent|कबूतर(फ़ा० पु०) कपोत, परेवा। कपोत देखो।}}
{{outdent|कबूतर का भात (हिं० पु०) एक पितपापड़ा। यह वृक्ष दक्षिण-पश्चिम भारत और विन्ध्याचल में उत्पन्न होता है। फिर दक्षिण कोणकण, मलय और बङ्गलिया में भी इसका अभाव नहीं। बम्बई प्रान्त में कभी-कभी
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
इसे लोग बाजार में व्यवहार करते हैं। यह वृक्ष सुखा कर पितपापड़े की भाँति औषध में डाला जाता है। किन्तु इसका आस्वाद उससे कुछ कटु और अप्रिय लगता है।}}
{{outdent|कबूतर का फूल(हिं० पु०) पुष्पविशेष, एक फूल।}}
{{outdent|कबूतर की जड़(हिं० स्त्री०) मूलविशेष, एक जड़।}}
{{outdent|कबूतरबाज(फ़ा० पु०) कपोतपालक, कबूतर पालने या उड़ानेवाला।}}
{{outdent|कबूतरबाजी(फ़ा० स्त्री०) कपोतपालक का कार्य, कबूतर पालने या उड़ाने का काम।}}
{{outdent|कबूतरी(फ़ा० स्त्री०) १ कपोतिका, मादा कबूतर। २ वेश्या, गाँव की नाचनेगानेवाली रण्डी।}}
{{outdent|कबूल(फ़ा० वि०) १ नीच, अधम, पासमानो, नोक्ता। (पु०) २ नोक्ता वंशोद्भव, नौसझण्डी।}}
{{outdent|कबूली(फ़ा० वि०) कय्य, अधम, पासमानो, नोक्ता।}}
{{outdent|कबूल(अ० पु०) १ स्वीकार, मञ्जूर। २ सम्मति, रजा, एकमत। ३ अनुकूल ग्रहण, स्वाwick स्वीकृत। ४ प्रतिश्रुति, इकरार। ५ ताजक ज्योतिषोक्त योगविशेष।}}
{{outdent|कबूलना(हिं० क्रि०) स्वीकार करना, मान लेना, मानना।}}
{{outdent|कबूलसूरत(अ० वि०) सुन्दर, खूबसूरत।}}
{{outdent|कबूलियत(अ० स्त्री०) १ प्रतिपत्ति, मञ्जूरी, स्वीकार। २ पट्टोचिका की प्रतिमूर्ति, पट्टे की मञ्जूर।}}
{{outdent|कबूली(फ़ा० स्त्री०) तण्डुल एवं चणक-विदल का एक सन्निश्रण, चावल और चने की दाल से बनी हुई खिचड़ी।}}
{{outdent|कब्ज(अ० पु०) १ मलावरोध, कुजियत, कब्ज, दस्त साफ न आने की हालत। २ अधिकार, दखल। ३ नियमविशेष, एक कायदा। यह मुसलमान वादशाहों के समय चलता रहा। इसके अधिकार पर सेनानी अथवा चेतन ज़मीन्दार से लेता और किफ़ायत हुआ धन भूमि के कर में मुजरे देता था। अकबर ने यह नियम रहित किया, किन्तु अवध के नवाबों ने फिर चला दिया। वह दो प्रकार का होता था—बाअबाजी और अमानी या वसूली। बाअबाजी में}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''३६'''|'''कबज़ा—कमङ्गर'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अनुसार सेनानी अपना वेतन पहले ही ज़मीन्दार से पाता, पीछे भूमिके कर से उतना धन आता या न आता। अमानी या वसूली के अनुसार सेनानी यथा-प्राप्त धन ग्रहण करता था। फिर वह सैकड़े पीछे ५ रु० कमीशन भी पाता रहा। ४ आज्ञापत्रविशेष, एक हुुकानामा। इसीके अधिकार पर मुसलमान बादशाहों के समय सेनानी अपना वेतन जमीन्दारों से ग्रहण करता था। बलपूर्वक अधिकार करने को 'कब्ज-बिल-जब्र' और पूर्ण अधिकार को 'कब्ज-ओ-दखल' कहते हैं।}}
{{outdent|कबज़ा (अ० पु०) १ मुष्टि, गिरफ़्त, जुग़ल, पञ्चा। २ दण्ड, दस्ता, बेंट। ३ द्वारसन्धि, नरमादगी, कड़ा। यह लोह-पित्तल प्रभृति धातु से बनता है। कब्ज़े में दो चतुष्कोण खण्ड संयुक्त रहते, जो सूचीपर चल सकते हैं। यह कपाट एवं पेटिकादि में सन्धिस्थान घुमाने को लगाया जाता है। ४ ग्रहण, दखल। ५ उपरिस्थ बाहु, उपरला बाजू, भुजदण्ड। ६ मल्ल युद्ध का कूचो-पायविशेष, गट्टा, पहुँचा, कुश्ती का एक पेंच। कुश्ती में एक पहलवान् को दूसरे का गट्टा पकड़ते, उसके शायपर चोट चलाने, झटका लगाने और अपने हाथ की कौड़ा लाने का नाम कब्ज़ा है।}}
{{outdent|कबज़ादार (फ़ा० वि०) १ अधिकारी। २ कब्ज़ा लगा हुआ, जो कब्ज़े से जुड़ा हो।}}
{{outdent|कब्ज़ियत (अ० स्त्री०) मलावरोध, कब्ज़, दस्त साफ न उतरने की हालत।}}
{{outdent|कबुलवसूल (फ़ा० पु०) पत्रविशेष, एक काग़ज। इस पर वेतन लेनेवाला अपने हस्ताक्षर करता है।}}
{{outdent|कब्बल—महिसूर राज्य का एक कोणाकार गिरि। यह माझवली तहसील में शिङ्गसा और अर्कवती नदी के मध्य अक्षा० १२° १०′ उ० तथा देशा० ७७° २२′ पू० पर अवस्थित है। पहले महिसूर के हिन्दू और मुसलमान् राजा दोषी व्यक्ति को इसी गिरि पर ले जा कर बन्दी बनाते थे। इस स्थान का वायु अस्वास्थ्यकर है। इसी से अपराधी का जीवन शीघ्र निःशेष हो जाता था।}}
{{outdent|क़ब्र (अ० स्त्री०) शवस्थान, समाधि, तुरबत, मज़ार।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|क़ब्रस्तान (फ़ा० पु०) प्रेतावास, गोरिस्तान, बहुत सी क़ब्रों की जगह।}}
{{outdent|कभी (हिं० क्रिया-वि०) १ पूर्व, एकदा, पेशतर, किसी समय। २ कचित्, कदाचित्, गाह-गाह, बाज औक़ात्। ३ कदापि, कर्हिचित्, किसी वक्त।}}
{{outdent|कभी-कभी (हिं० क्रिया-वि०) कदा कदा, गाहे, जबतब।}}
{{outdent|कभू, कभी देखो।}}
{{outdent|कमू (सं० अव्य०) १ जल, पानी। २ मस्तक, माथा। ३ सुख, आराम। ४ मङ्गल, भलाई। ५ पादपूरणार्थ निरर्थक शब्द।}}
{{outdent|कम (फ़ा० वि०) १ अल्प, थोड़ा। २ गन्दा, खराब। यह शब्द उपरोक्त दोनों अर्थों में क्रियाविशेषण की भाँति भी आता है।}}
{{outdent|कम-असल (फ़ा० वि०) अकलीन, वर्णसङ्कर, हरामी, कुमूर्त, घटियन्त।}}
{{outdent|कमक (सं० वि०) कम्-णिच्-भावे अच् स्वाथे कन्। १ कामुक, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला। (पु०) २ गोत्रप्रवर्तक एक ऋषि।}}
{{outdent|कम-कम (फ़ा० क्रि-वि०) अल्प-अल्प, थोड़ा-थोड़ा।}}
{{outdent|कमकस (हिं० वि०) अलस, सुस्त, जोर से काम न करनेवाला।}}
{{outdent|कमख़्वाब (फ़ा० पु०) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह गाढ़ एवं स्थूल रहता और कीटसूत्र से बनता है। फिर इस पर सुवर्ण एवं रजत के सूत्र से प्रसून बना देते हैं। किसी कमख़्वाब पर एक ओर और किसी पर दोनों ओर कलाबत्तू के बेलबूटे रहते हैं। यह बहुमूल्य वस्त्र है। इसका खण्ड (थान) चार या साढ़े चार गज पड़ता है। काशी में कमख़्वाब बहुत तैयार होता है।}}
{{outdent|कमखीरा (फ़ा० पु०) पशु्रोगविशेष, चौपायों की एक बीमारी। यह रोग पशु के खुर में होता है। इसके प्रभाव से पशु अपना खुर चला नहीं सकते और भूखे रहते हैं।}}
{{outdent|कमङ्गर (फ़ा० पु०) १ कारुककार, कमानगर, चाप बनानेवाला। २ अस्थियोजयिता, हड्डियाँ जोड़ने या}}
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अनुसार सेनानी अपना वेतन पहले ही ज़मीन्दार से पाता, पीछे भूमिके कर से उतना धन आता या न आता। अमानी या वसूली के अनुसार सेनानी यथा-प्राप्त धन ग्रहण करता था। फिर वह सैकड़े पीछे ५ रु० कमीशन भी पाता रहा। ४ आज्ञापत्रविशेष, एक हुुकानामा। इसीके अधिकार पर मुसलमान बादशाहों के समय सेनानी अपना वेतन जमीन्दारों से ग्रहण करता था। बलपूर्वक अधिकार करने को 'कब्ज-बिल-जब्र' और पूर्ण अधिकार को 'कब्ज-ओ-दखल' कहते हैं।
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बैठानेवाला। ३ चित्रकार, मुसौवर। (वि०) ४ कुशल, होशियार।
{{outdent|कमङ्गरी (हिं० स्त्री०) १ कार्मुककरण, कमानगरी, चाप बनानेका काम। २ अस्थियोजनविद्या, हड्डियोंके जोड़ने या बाँधनेका हुनर।}}
{{outdent|कमचा (हिं० पु०) १ क्षुद्र कार्मुक, कमानचा, छोटी कमान्। २ सारङ्गी, चीतारा, किंगरी। ३ स्थितिस्थापकत्वविशिष्ट चिरायस-पदार्थ, लोहेकी कमानी। इस यन्त्रको तञ्चक व्यवहार करते हैं। पहले कमचेमें एक रज्जु बाँध आस्फोटनीकी आहत कर लेते, पीछे घुमा देते हैं। ४ कुञ्चित पटल, मेहरावदार छत। ५ अन्तःशाला, ख़ास कमरा। ६ बाँश या झाबू प्रभृतिकी छाल एवं नमनशील शाखा, बाँस या झाबूकी पतली और लचीली डाल। इससे मछुआ बनती है। ७ बेणुका छाल तथा नमनशील खण्ड, बाँसकी तीली। ८ छाल एवं नमनशील यष्टि, पतली और लचीली छड़ी। ९ काष्ठादिका चामखण्ड, लकड़ी वगैरहका नाजुक टुकड़ा।}}
{{outdent|कमची (तु० स्त्री०) १ कञ्चिका, बाँसकी डाल।}}
२ यष्टिविशेष, नाजुक छड़ी। ३ काष्ठादिका चामखण्ड, लकड़ी वगैरहका नाजुक टुकड़ा।
{{outdent|कमच्चा (हिं०) <small>कमाख्या देखो।</small>}}
{{outdent|कमज़ोर (फ़ा० वि०) निर्वीर्य, नाताक़त, लाचार।}}
{{outdent|कमज़ोरी (फ़ा० स्त्री०) असामर्थ्य, नात्त्वानी, हिचर-मिचर।}}
{{outdent|कमच्छा (हिं० पु०) स्थितिस्थापकत्वविशिष्ट, चिरायस-पदार्थविशेष, लोहेकी कमानी।<small>कमचा देखो।</small>}}
{{outdent|कमटा (हिं० पु०) वृक्षविशेष, एक पेड़। यह कण्टकाकीर्ण एवं क्षुद्र होता है।}}
{{outdent|कमटी (हिं०) कमठी देखो।}}
{{outdent|कमठ (सं० पु०-स्त्री०) कम-अठ। उणाद० १।१०२। १ कच्छप, कछुआ। कच्छप देखो। २ विष्णुका द्वितीय अवतार। ३ बाँश, बांस। ४ दैत्यविशेष, एक राक्षस। ५ शल्यकी, खारपुश्त, सेह। ६ काम्बोजराजविशेष, एक राजा। <small>(भारत ३।५१२)</small> ७ भाण्डविशेष, एक बर्तन। प्रधानतः तुम्बी वा नारिकेलको छोलकर
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
जो पात्र मुनियोंके लिये बनाया जाता, वही कमठ कहलाता है। ८ मुनिविशेष, एक ऋषि। ९ वादित्रविशेष, एक बाजा। यह एक चर्माहत प्राचीन वाद्य है।}}
{{outdent|कमठपति (सं० पु०) कच्छपराज, कछुओंके राजा।}}
{{outdent|कमठा (हिं० पु०) १ चाप, कमान्। २ एक जैन महात्मा। इन्होंने उग्र तपस्या करके सकाम् निर्जरा पायी थी।}}
{{outdent|कमठासुरवध (सं० पु०) गणेशपुराणका एक अंग। इसमें कमठ दैत्यके वधकी कथा लिखी है।}}
{{outdent|कमठी (सं० स्त्री०) कमठ-डीप्। १ क्षुद्रकच्छप-जाति, छोटे-छोटे कछुओंका गिरोह। २ कच्छपी, कछुयी। ३ शल्यकी, खारपुश्त, सेह।}}
{{outdent|कमण्डल (हिं०) कमण्डलु देखो।}}
{{outdent|कमण्डली (हिं० वि०) १ कमण्डलुकयुक्त, जो कमण्डल रखता हो। २ पाखण्ड, पुर-फ़ितरत, बहुरूपिया। (पु०) ३ श्रद्धा।}}
{{outdent|कमण्डलु (सं० पु०-स्त्री०) कम्य जलस्य प्रजापतेर्वा, सारः तं लाति गृह्णाति, कम-मण्ड-ला-डु। डुक्रञ्श्चि मियाद्-दिभ्य उपसंख्यानम्। पा ३।२।२० वार्त्तिक। १ मृत्तिका, काष्ठ, तुम्बी वा नारिकेल द्वारा निर्मित संन्यासियोंका एक पात्र, कमण्डल, तोंबा। इसका संस्कृत पर्याय—कुण्डीय और करक है। २ लक्षवृक्ष, पाकरका पेड़। ३ अश्वत्थभेद, पारस-पीपल।}}
{{outdent|कमण्डलुतज (सं० पु०) लक्षवृक्ष, पाकरका पेड़।}}
{{outdent|कमण्डलुधर (सं० पु०) शिव, कमण्डलु धारण करनेवाले महादेव।}}
{{outdent|कमती (हिं० स्त्री०) १ अल्पत्व, कमी, घटी। (वि०) २ अल्प, कम, थोड़ा, जो बहुत न हो।}}
{{outdent|कमधू (वै० स्त्री०) स्त्रीविशेष, वेनपुत्री। 'कमधुवं मिमदाद्योध्यु 'गुवम्।' (ऋक् १०।९५।१२)}}
{{outdent|कमन (सं० वि०) कम-णिच्-भावे युच्। १ कमनीय, खूबसूरत। २ कामुक, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला। (पु०) ३ अशोकतुरु। ४ मदन, कामदेव। ५ ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमनचा (हिं० पु०) कमानचा, कमच्छा, बढ़ईका एक औज़ार। यह बरमा घुमानेमें काम देता है।}}
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{{Left| Vol. IV. 10|2em}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''३८'''|'''कमनच्छद—कमरख'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कमनच्छद (सं० पु०) कमनः कमनीयः छदः पत्रो यस्य, बहुव्री०। कङ्कपत्री, वगला, टूटीमार।}}
{{outdent|कमना (हिं० क्रि०) नून पड़ना, घट्ना, उतरना, ढलना, नीचेको चलना।}}
{{outdent|कमनीय (सं० वि०) कामयते यत्, कम् कर्मणि अनीयर्। १ स्पृहणीय, कामना करने योग्य, चाहने क़ाबिल। २ सुन्दर, खूबसूरत। इसका संस्कृत-पर्याय—चारु, चारि, रुचिर, मनोहर, वल्गु, कान्त, अभिराम, मञ्जुर, वाम, रुच, सुपम, शोभन, मञ्जु, मञ्जुल, मनोरम, साधु, रम्य, मनोज्ञ, पेशल, हृद्य, सुन्दर, काम्य, कम्र, सौम्य, मधुर और प्रिय है।}}
{{outdent|कमनीयता (सं० स्त्री०) कमनीयस्य भावः, कमनीय-तल्-टाप्। तस्य भावस्तल्तौ। पा ५।१।११६। १ सौन्दर्थ, खूबसूरती। २ कमनीयत्व, मरगूबी, दिलख़्वाही।}}
{{outdent|कमनैत (हिं० पु०) १ धनुर्धर, कमानवरदार, जो कमान रखता हो।}}
{{outdent|कमनैती (हिं० स्त्री०) धनुर्विद्या, कमानबरदारी, कमान इस्तेमाल करनेका इल्म।}}
{{outdent|कमन्द (फ़ा० स्त्री०) १ पाश, जाल। २ अस्थिर-ग्रन्थि, सरकफन्दा। ३ रज्जुकी तुलाधिरोहिणी, रस्सीकी तुली हुई सीढ़ी। इससे तस्कर उच्च भवनों पर चढ़ जाते हैं। ४ पाशबन्ध, जालका फन्दा।}}
{{outdent|कमन्द (हिं०) कमन्ध देखो।}}
{{outdent|कमन्ध (सं० स्त्री०) कं शिरः अन्धं शून्यं यस्य। १ कबन्ध, सरकटा धड़। कमं दीप्तिं जीवनं वा दधाति, कम-धा-ड पृषोदरादित्वात्। २ जल, पानी। हिन्दीमें लड़ाई-झगड़े और सरफन्द का भी कमन्ध कहते हैं।}}
{{outdent|कमवख़्त (फ़ा० वि०) देवोपहत, बदनसीब, अभागी।}}
{{outdent|कमबख़्ती (फ़ा० स्त्री०) मन्दभाग्य, बदनसीबी।}}
{{outdent|कमयाब (फ़ा० वि०) विरक्त, अजोव, मुश्क़िलसे मिलनेवाला।}}
{{outdent|कमर (सं० वि०) कम-अर-चित्। <Small>कर्त्तरि कमिमनिकमिदिन्विब-श्चिभ्यश्च। उण् ५।१५९।</small>कामुक, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला।}}
{{outdent|कमर (फ़ा० स्त्री०) १ श्रोणी, कटि, सुश्व, कूल्हा।}}
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कटि देखो। २ मध्य, दरमियान्, बीच। ३ मेखला, भिन्तका, पट्टा। ४ मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका कोयी पेंच। यह कटिप्रदेशसे चलता है। इसी प्रकार 'कमरकी टंगड़ी' भी होती है। एक पहलवान् जब दूसरेकी पीठपर आता और अपना बायां हाथ उसकी कमर पर पहुँचाता, तब नीचेवाला अपना बायां हाथ बगलसे निकाल उसकी कमर पर बढ़ाता और बायीं टांग अड़ा कमरके ज़ोरसे उसकी सामने घुमा लाता है।}}
{{outdent|कमरंग (हिं० पु०) कमेरुङ्ग, कमे रख। कमरख देखो।}}
{{outdent|कमरकाटा (हिं० पु०) प्राकार, वचोद्घ्न, मोनापनाह, कंगूरेदार ऊँची दीवार।}}
{{outdent|कमरकसा (हिं० पु०) पलाशनिर्यास, ढांकको गोंद। इसे चुनिया-गोंद भी कहते हैं। यह रक्तवर्ण एवं भासुर होता है। इसका आस्वाद कषाय है। कमरकस संग्रहणी और कासश्वासका महौषध है।}}
{{outdent|कमरकसायी (हिं०) कमरकुशायी देखो।}}
{{outdent|कमर-कुशायी (फ़ा० स्त्री०) अपराधियोंसे लिया जाने-वाला एक कर, असामीसे वसूल होनेवाला रुपया। यह प्रथा पूर्वकाल प्रचलित रही। जब कोयी असामी सिपाहीसे मूकपरीक्षके लिये परवाना लेता, तब उसे करस्वरूप कुछ धन देता था। इसीका नाम 'कमर-कुशायी' है। २ मेखलोद्घाटन, कमरबन्दको खोलना।}}
{{outdent|कमरकोट, कमरकाटा देखो।}}
{{outdent|कमरकोठा (हिं० पु०) गृहका एक भाग, शहतीर लट्ठे या कड़ीका एक हिस्सा। यह भित्तिसे वर्द्धिवर्ती रहता है।}}
{{outdent|कमरख (हिं० पु०) कर्मेरङ्ग, एक पेड़। (Averrhoa Carambola) इसे बँगलामें कामरांगा, आसामीमें करदयी, गुजरातीमें तमरक, मराठीमें करमर, तमिलमें त मर्तै,, तेलुगुमें करोमोंग, मलयमें तमरत्तक और ब्राह्मीमें ज़ीनसी कहते हैं। कमरखमें अम्ल, उष्णत्व, वातहरत्व एवं पित्तजनकत्व रहता, किन्तु पकनेसे मधुरसत्व तथा बल-पुष्टि-रुचिकरत्व बढ़ता है। (राजनिघण्टु) यह कटुपाक, अम्ल-पित्तकर और तीक्ष्ण गुणविशिष्ट है। (राजवल्लभ) कमरखका}}
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{{outdent|कमनच्छद (सं० पु०) कमनः कमनीयः छदः पत्रो यस्य, बहुव्री०। कङ्कपत्री, वगला, टूटीमार।}}
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{{outdent|कमनीयता (सं० स्त्री०) कमनीयस्य भावः, कमनीय-तल्-टाप्। <small>तस्य भावस्तल्तौ। पा ५।१।११६।</small>१ सौन्दर्थ, खूबसूरती। २ कमनीयत्व, मरगूबी, दिलख़्वाही।}}
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कटि देखो। २ मध्य, दरमियान्, बीच। ३ मेखला, भिन्तका, पट्टा। ४ मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका कोयी पेंच। यह कटिप्रदेशसे चलता है। इसी प्रकार 'कमरकी टंगड़ी' भी होती है। एक पहलवान् जब दूसरेकी पीठपर आता और अपना बायां हाथ उसकी कमर पर पहुँचाता, तब नीचेवाला अपना बायां हाथ बगलसे निकाल उसकी कमर पर बढ़ाता और बायीं टांग अड़ा कमरके ज़ोरसे उसकी सामने घुमा लाता है।}}
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आम-फल दही, अश्र, वातनाशन, उष्ण एवं पित्त-कर रहता, किन्तु पक जानेपे मधुर तथा अम्ल -लगता और बल, पुष्टि एवं रुचिकी वृद्धि करता है। (वैद्यकनिघण्टु) यह छर्दि, तृष्णा, घाम और कफ तथा -वातनाशन है। <Small>(भावप्रकाश)</small>
कमरख एक क्षुद्र वृक्ष है। इसके पत्र एक अङ्गुल प्रस्थ, दो अङ्गुल दीर्घ तथा ईषत् तीक्ष्णाग्र रहते और रुचिर दीखने लगते हैं। पञ्जाबमें यह १२/२० चौड़ाई अधिक नहीं बढ़ता। भारतमें कमरखको कवि बहुत होती है। जब उसकी झाड़ी अति स्वादु लगती है। यह उत्तरांशमें विशेषतया मिलता है।
कच्चे फलोंका रस रंगनेमें खटाईकी तरह छोड़ा जाता और सम्भवतः काटका काम दिखाता है। इसका वस्त्र, मूल और फल शीतल औषधकी भाँति व्यवहृत होता है। सूखा फल ज्वरमें शिफ़ा बख्शते हैं।
कमरख दो प्रकारका होता है—मीठा और खट्टा। मीठा कमरख खू़रके लिये उपयोगी है। किन्तु कच्चा खानेसे स्वर जाता और वक्षःस्थल दुःख पाता है। पक्का फल चटनी और तरकारीमें भी पड़ता है।
कमरख वर्षामें फूलता और शीतकालमें पकता है। उस प्राप्त १ इञ्च लम्बा होता है। समीप दूरी यथा भी जाते हैं। इसका मसल मृदु, सरस और पच्छेदन है। इसको अगरेज और गोड़ा दोनों ही लोग पसन्द बनाते हैं। यह मर्वत पीनेमें बहुत अच्छा लगता है। कमरखका मुरब्ब भी उमदा होता है।
इसका झाड़ हलका, लाल, कड़ा और दानेदार रहता है। सुन्दरतामें इसे अस्मानी और वाद्य सामान बनानेमें व्यवहार करते हैं।}}
{{outdent|कमरखी (हिं० वि०) १ कर्मेरङ्गाकार, कमरख-जैसा, फाँसदार। (स्त्री०) २ कर्मेरङ्गकार रचना, फाँसदार कटार।}}
{{outdent|कमरच्छेदे (हिं० अव्य०) पहुंरा, तलवार।}}
{{outdent|कमरटूटा (हिं० वि०) १ भग्नपृष्ठ, खम्मीदापुश्त, कुबड़ा। २ नपुंसक, नामर्द, कमरका ढीला।}}
{{outdent|कमरतोड़ा (हिं० पु०) मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका कोई पेंच।}}
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कमरतोड़,)<small>कमरतोड़ा देखो।)</small>
{{outdent|कमर-दियाल (हिं० पु०) चर्ममेखला, चमड़ेका पट्टा। इसमें पक्के हतियार पर्याप्त कसा जाता है।}}
{{outdent|कमरपट्टी (हिं० स्त्री०) कटिबन्ध, कमरकी पट्टी। इसे चपरास वगैरहमें कमरके ऊपर बाँधते हैं।}}
{{outdent|कमरपँेटा (हिं० पु०) १ व्यायामविशेष, एक कसरत। इसे नाम कमरपर लगाते हैं। यह कसरत बेंत लपेट और पालो छाप—दो प्रकार किया जाता है। 'कमरपेंटेकी कसौटी' भी एक कसरत है। २ मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका एक पेंच। एक पहलवान् नीचे भागिने कश्चित् अपनी दाहिनी टाँग नीचेवालेकी कमरमें डाल अपने बायें पैरकी काँध और पिण्डलीके बीच रखता तथा बायें हाथका पच्छा बनके बाँयें हाथके हुटमीपर भीतरसे धंसता है। फिर दाहिने हाथसे उसका दाहिना डालूं खींच उड़ा पकड़ता और उसको आसमान दिखाता है।}}
{{outdent|कमरबन्द (फ़ा० पु०) १ मेखला, फँटका, पटुका। २ कटिकी पारो और लपेटा हुआ वस्त्र, कमरकी चारो ओर कसा जानेवाला कपड़ा। (वि०) ३ कटिबद्ध, तैयार, कमर बाँधे हुए।}}
{{outdent|कमरबन्दी (फ़ा० स्त्री०) १ सुसज्जता, लड़ाईकी पोशाक। २ युद्धके लिये सल्लोन्नह, लड़नेकी तैयारी।}}
{{outdent|कमरबाज़ (फ़ा० पु०) मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका कोई पेंच। यह वक्षःस्थल और बहुपर बस होता है।}}
{{outdent|कमरभङ्गा (हिं० पु०) लाक्षणाद्विशेष, एक लकड़ी। यह खपड़ेके पटानमें दोरँबा वाले नीचे तहपर जड़ता है।}}
{{outdent|कमरमजबूत (फ़ा० वि०) १ चस्त, उद्यत, तैयार, कमर बाँधे हुए। (पु०) २ कमरकसा, लड़ाईमें बननेवाले एक लकड़ी।}}
{{outdent|कमरा (अं० पु०—Camera) १ कोठ, आगार, कोठरी, ओठा। २ पाली-सन्निवेश-यन्त्रविशेष, जिससे तस्वीर उतारनेके बनवा एक औज़ार। उस समय ट-कटक बनता और सुखकर प्रतिबिम्ब लेनेका गोलाकार स्फटिक लगता है। इसको प्रदीपन करनेमे घटा-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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आम-फल दही, अश्र, वातनाशन, उष्ण एवं पित्त-कर रहता, किन्तु पक जानेपे मधुर तथा अम्ल -लगता और बल, पुष्टि एवं रुचिकी वृद्धि करता है। (वैद्यकनिघण्टु) यह छर्दि, तृष्णा, घाम और कफ तथा -वातनाशन है। <Small>(भावप्रकाश)</small>
कमरख एक क्षुद्र वृक्ष है। इसके पत्र एक अङ्गुल प्रस्थ, दो अङ्गुल दीर्घ तथा ईषत् तीक्ष्णाग्र रहते और रुचिर दीखने लगते हैं। पञ्जाबमें यह १२/२० चौड़ाई अधिक नहीं बढ़ता। भारतमें कमरखको कवि बहुत होती है। जब उसकी झाड़ी अति स्वादु लगती है। यह उत्तरांशमें विशेषतया मिलता है।
कच्चे फलोंका रस रंगनेमें खटाईकी तरह छोड़ा जाता और सम्भवतः काटका काम दिखाता है। इसका वस्त्र, मूल और फल शीतल औषधकी भाँति व्यवहृत होता है। सूखा फल ज्वरमें शिफ़ा बख्शते हैं।
कमरख दो प्रकारका होता है—मीठा और खट्टा। मीठा कमरख खू़रके लिये उपयोगी है। किन्तु कच्चा खानेसे स्वर जाता और वक्षःस्थल दुःख पाता है। पक्का फल चटनी और तरकारीमें भी पड़ता है।
कमरख वर्षामें फूलता और शीतकालमें पकता है। उस प्राप्त १ इञ्च लम्बा होता है। समीप दूरी यथा भी जाते हैं। इसका मसल मृदु, सरस और पच्छेदन है। इसको अगरेज और गोड़ा दोनों ही लोग पसन्द बनाते हैं। यह मर्वत पीनेमें बहुत अच्छा लगता है। कमरखका मुरब्ब भी उमदा होता है।
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{{outdent|कमर-दियाल (हिं० पु०) चर्ममेखला, चमड़ेका पट्टा। इसमें पक्के हतियार पर्याप्त कसा जाता है।}}
{{outdent|कमरपट्टी (हिं० स्त्री०) कटिबन्ध, कमरकी पट्टी। इसे चपरास वगैरहमें कमरके ऊपर बाँधते हैं।}}
{{outdent|कमरपँेटा (हिं० पु०) १ व्यायामविशेष, एक कसरत। इसे नाम कमरपर लगाते हैं। यह कसरत बेंत लपेट और पालो छाप—दो प्रकार किया जाता है। 'कमरपेंटेकी कसौटी' भी एक कसरत है। २ मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका एक पेंच। एक पहलवान् नीचे भागिने कश्चित् अपनी दाहिनी टाँग नीचेवालेकी कमरमें डाल अपने बायें पैरकी काँध और पिण्डलीके बीच रखता तथा बायें हाथका पच्छा बनके बाँयें हाथके हुटमीपर भीतरसे धंसता है। फिर दाहिने हाथसे उसका दाहिना डालूं खींच उड़ा पकड़ता और उसको आसमान दिखाता है।}}
{{outdent|कमरबन्द (फ़ा० पु०) १ मेखला, फँटका, पटुका। २ कटिकी पारो और लपेटा हुआ वस्त्र, कमरकी चारो ओर कसा जानेवाला कपड़ा। (वि०) ३ कटिबद्ध, तैयार, कमर बाँधे हुए।}}
{{outdent|कमरबन्दी (फ़ा० स्त्री०) १ सुसज्जता, लड़ाईकी पोशाक। २ युद्धके लिये सल्लोन्नह, लड़नेकी तैयारी।}}
{{outdent|कमरबाज़ (फ़ा० पु०) मल्लयुद्धका एक हस्तलाघव, कुश्तीका कोई पेंच। यह वक्षःस्थल और बहुपर बस होता है।}}
{{outdent|कमरभङ्गा (हिं० पु०) लाक्षणाद्विशेष, एक लकड़ी। यह खपड़ेके पटानमें दोरँबा वाले नीचे तहपर जड़ता है।}}
{{outdent|कमरमजबूत (फ़ा० वि०) १ चस्त, उद्यत, तैयार, कमर बाँधे हुए। (पु०) २ कमरकसा, लड़ाईमें बननेवाले एक लकड़ी।}}
{{outdent|कमरा (अं० पु०—Camera) १ कोठ, आगार, कोठरी, ओठा। २ पाली-सन्निवेश-यन्त्रविशेष, जिससे तस्वीर उतारनेके बनवा एक औज़ार। उस समय ट-कटक बनता और सुखकर प्रतिबिम्ब लेनेका गोलाकार स्फटिक लगता है। इसको प्रदीपन करनेमे घटा-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४०'''|'''कमरिया—कमल'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
बढ़ा सकते हैं। उक्त स्फटिक (Lens) के सम्मुख एक निराधार काच (Ground glass) पड़ता है। उसीपर प्रथम केन्द्र (Focus) किया जाता है। पीछे निराधार काच हटा स्खलन (Slide) लगाते हैं। उसीके अन्तर्गत पट होता है। स्खलनका आच्छादन उठानेसे पट खुलता और स्फटिक निकलनेसे प्रतिविम्ब पड़ता है। यह दो प्रकारका होता है—लुसिडा (Lucida) अर्थात् सुप्रभ और अवस्कुरा (Obscura) अर्थात् निष्प्रभ। सुप्रभ यन्त्र असाधारण आकारके ऋक्चायत वा दर्पण-विन्यास द्वारा प्रतिविम्बपर चित्र प्रदान करता है। उस चित्रको यथासुख देखनेके लिये पत्र वा सूक्ष्म पटपर उतार सकते हैं। निष्प्रभ उपकरण द्विगुण कूर्म्मपृष्ठाकार स्फटिक द्वारा प्राप्त बाह्य द्रव्यकी प्रतिमा काच वा सम्पुट के केन्द्रमें रखे गृह्य पृष्ठपर उतारता है। (हिं०) २ कम्बल। ३ कीटविशेष, एक कीड़ा।}}
{{outdent|कमरिया (हिं० स्त्री०) १ छोटा कम्बल। "सूर शामक कारी कमरिया चढ़ै न दूजो रंग।" (सूर) २ कटि, कमर। (पु०) ३ हस्तिविशेष, एक हाथी। इसका देह क्षुद्र, शुण्ड दीर्घ और पद स्थूल रहता है। कमरिया अति प्रबल होती है।}}
{{outdent|कमरी (फ़ा० वि०) १ दुर्बलकटि, कमजोर कमरवाला। यह शब्द प्रायः अश्वके विशेषणमें आता है। (स्त्री०) २ क्षुद्रकञ्चुक, मिरज़यी। ३ कमली, छोटा कम्बल। ४ काष्ठखण्डविशेष, एक लकड़ी। यह सार्द्ध किष्कुपरिमित दीर्घ रहती और चक्रके ग्रीवापर लगती है। (पु०) ५ भग्ननौका, छकड़ा जहाज़। ६ अश्वरोगविशेष, घोड़ेकी एक बीमारी। इसके कारण अश्व अपने पृष्ठपर भार वा आरोहीको अधिक क्षण रख नहीं सकता।}}
{{outdent|कमरेंगा (हिं० पु०) मिष्टान्नविशेष, एक मिठाई। यह बङ्गालमें बहुत बनता है।}}
{{outdent|क़मरुद्दीन खान्—एतमाद्-उद्-दौला मुहम्मद आमिन् खान् वज़ीरके लड़के। इनका प्रधान नाम मीर मुहम्मद फ़ाजिल था। १७२४ ई० को निज़ाम-उल्-मुल्क आसफ़ जाहके पदत्याग करने पर बादशाह मुहम्मद
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
शाहने 'एतमाद्-उद्-दौला नवाब क़मरुद्दीन खान् बहादुर नसरतजङ्ग' उपाधि दे इन्हें स्वयं वज़ीर बनाया। अहमदशाह अब्दालीके प्रथम आक्रमण करते ही यह शाहज़ादे अहमदके साथ लड़नेको भेजे गये थे। किन्तु १७४८ ई० को ११ वीं मार्चको सरहिन्दके युद्धपर अपने डेरेमें नमाज़ पढ़ते समय तोपका गोला लगनेसे इनका देहान्त हुआ।}}
{{outdent|क़मरुद्दीन मीर—एक सुप्रसिद्ध मुसलमान् कवि। इनका उपनाम मिन्नत रहा। यह दिल्लीके अधिवासी थे। वारन हेस्टिङ्गसने मुरशिदाबादके नवाबकी सिफारिश पर 'मलिक-उश्-शुआरा' अर्थात् कविराजकी उपाधि इन्हें प्रदान किया। यह दक्षिण हैदराबाद निज़ामसे मिलने गये थे। वहाँ उन्होंने उनके प्रशंसा में एक 'कसीदा' लिखा, जिसके लिये ५०००) रु० नक़द पुरस्कार मिला। यह १७९३ ई० को कलकत्तेमें उर्दू और फ़ारसीके डेढ़ लाख शेर छोड़ मरे थे। इनका बनाया 'चमनिस्तान' और 'शकरिस्तान' ग्रन्थ छप गया है।}}
{{outdent|कमल (सं० पु०-स्त्री०) कम्-णिच्-भावे व्यादिलात् कन्धच्, कं जलं ललति अलङ्करोति, कम्-लल्-कच् वा। १ पद्म, कँवल। उत्पल और पद्म देखो। यह श्वेत, नील और रक्त-विविध होता है। कमल शीतल, वर्णकर एवं मधुर, और पित्त, कफ, तृष्णा, दाह, रक्त, विस्फोटक, विष तथा विसर्पहर है। श्वेत शीतल एवं मधुर और कफ तथा पित्तघ्न होता है। किन्तु रक्त एवं नीलमें श्वेत कमलसे अल्प गुण रहता है। (भावप्रकाश)}}
{{outdent|२ जल, पानी। ३ ताम्र, तांबा। ४ होम, जुहरा, सलखा। ५ औषध, दवा। ६ सारसपक्षी। ७ मृगविशेष, एक हिरन। ८ पाटलवर्ण, एक रंग। ९ आकाश, आसमान्। १० चातकपक्षी, एक चिड़िया। ११ ध्रुवक, एक ताल।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"लक्ष्मी मलयजातेन लङ्घयन्ते स्फुरद् गुणः।
अस्मदाधेषु ताः कमलीयं भयानकं॥" (सर्वोतदामोदर)</poem>}}}}
{{outdent|१२ पद्मकाष्ठ। १३ कुङ्कुम, रोरी। १४ मूत्राशय, मसाना। १५ ब्रह्मा। १६ कमलाका बसाया एक}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४१'''|'''कमल-अण्डा—कमलबन्ध'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
नगर। १७ छन्दविशेष। इसमें तीन तीन लक्षण-वर्णके चार पद होते हैं। एकमात्रिक छन्द और छप्पय भी कमल कहलाता है। १८ थलियोलुक, आंखका ढेला। १९ गर्भाशयका अग्रभाग, धरन, फल। २० दीपक रागका द्वितीय पुत्र और जय-जयन्तीका पति। २१ काचपात्रविशेष, शीशेका एक गिलास। इसकी आकृति कमलसे मिलती है। यह मोम-बत्ती जलानेके काम आता है। २२ रोगविशेष, एक बीमारी। इसमें अङ्ग पीले हो जाते हैं। बहुधा लोग इसे 'कांवर' कहते हैं। (वि०) २३ कामुक, चाहिशमन्द, चाहनेवाला। २४ पाटलवर्णयुक्त।}}
{{outdent|कमल-अण्डा (हिं० पु०) पद्मबीज, कँवल-गट्टा।}}
{{outdent|कमलक (सं० स्त्री०) कमल स्वार्थे कन्। १ कमल, कँवल। २ काश्मीरका नगरविशेष। (राजतं० ४।२१२)}}
{{outdent|कमलकन्द (सं० पु०) शालूक, कमलकी जड़। यह कटु, तुवर, मधुर, गुरु, मलस्तम्भकर, रुच, नेत्र्य, वृष्य, शीतल, दुर्ज्जर एवं ग्राहक और रक्तपित्त, दाह, तृष्णा, कफ, पित्त, वात, गुल्म, कास, कृमि, मुखरोग तथा रक्तदोषनाशक होता है। (वैद्यकनिघण्टु)}}
{{outdent|कमलकर्णिका (सं० स्त्री०) पद्मबीजकोष, कमल-गट्टेकी खोल। यह मधुर, तुवर, शीतल, लघु, तिक्त, मुखस्वच्छकर और रक्तदोष तथा तृणाहर होती है। (वैद्यकनिघण्टु)}}
{{outdent|कमलकीट (सं० पु०) कमलवर्णः कीटः। १ कीट-विशेष, कोई कीड़ा। २ ग्रामविशेष, कोई गाँव।}}
{{outdent|कमलकेसर (सं० पु०-स्त्री०) पद्मकिञ्जल्क, कमलका सूत। यह शीतल, ग्राही, मधुर, कटु, रुच, गर्भ-स्थैर्यकर और रुच्य होता है। (वैद्यकनिघण्टु)}}
{{outdent|कमलकोरक (सं० पु०) कमलस्य कोरकः, ६-तत्। पद्मकलिका, कमलकी कली।}}
{{outdent|कमलकोष (सं० पु०) 'कमलस्य कोषः, ६-तत्। पद्मकलिका, कमलकी कली।}}
{{outdent|कमलखण्ड (सं० क्ली०) कमल-खण्ड। कमलादिभ्यश्च। पा ४।२।५१। (वार्तिक)। पद्मसमूह, कमलोंका मजमा।}}
{{outdent|कमलगहा (हिं० पु०) पद्मबीज, कँवलका तुषम्।
{{Left|Vol. IV. 11|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यह लवणसे वेष्टित होता है। वल्कल कठोर पड़ता है। कमलगहा श्वेतवर्ण सारभूत द्रव्यके समान रहता है। कमलबीज देखो।}}
{{outdent|कमलगर्भ (सं० पु०) पद्मक्षक, कँवलका छाता।}}
{{outdent|कमलगर्भाभ (सं० त्रि०) कमलगर्भस्य आभा इव आभा यस्य, मध्यपदलो०। पद्मके मध्यस्थलकी भाँति कान्तिविशिष्ट, कँवलके छत्तेकी तरह चमकनेवाला।}}
{{outdent|कमलगुप्त—संस्कृतके एक प्राचीन कवि। (सूक्तिमुक्तावली)}}
{{outdent|कमलछद (सं० पु०) कमलः कमलवर्णः छदः पत्रं यस्य, बहुव्री०। १ कङ्कपक्षी, बगला, बूटीमार। २ पद्मदल, कँवलका पत्ता।}}
{{outdent|कमलज (सं० पु०) कमलात् विश्योर्नाभिकमलात् जायते, कमल-जन-ड। ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमलदेव—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। इनका निवासस्थान चन्द्रपुर रहा। कमलदेव निम्बदेवके पिता और गलितप्रदीप-रचयिता लक्ष्मीधर तथा पदन्याससिद्धि-रचयिता नागनाथके पितामह थे।}}
{{outdent|कमलदेवी (सं० स्त्री०) काश्मीरराज ललितादित्यकी पत्नी और राजा कुवलयापीड़की माता। (राजतरङ्गिणी ४।६०१)}}
{{outdent|कमलनयन (सं० त्रि०) कमलसदृश सुन्दर नेत्रयुक्त, जिसके कँवलकी तरह खूबसूरत आँख रहे। (पु०) २ विष्णु। ३ रामचन्द्र। ४ कृष्ण।}}
{{outdent|कमलनयन—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। देवराजने निघण्टुभाष्यमें इनका वचन उद्धृत किया है।}}
{{outdent|कमलनयनदीक्षित—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। कवीन्द्रने इनका उल्लेख किया है।}}
{{outdent|कमलनाभ (सं० पु०) नाभिमें कमल रखनेवाले विष्णु।}}
{{outdent|कमलनाल (सं० क्ली०) मृणाल, कँवलकी डण्डी।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"कमलनाल इन चाप चढ़ायू'।"
यह योजन प्रभाव से धायू ॥" (तुलसी)</poem>}}}}
{{outdent|कमलपत्राक्ष (सं० त्रि०) कमलपत्रवत् अक्षिणीयस्य। कमलपत्रकी भाँति चक्षुविशिष्ट, जिसके कँवलकी पंखुड़ी-जैसी आँख रहे।}}
{{outdent|कमलबन्ध (सं० पु०) चित्रकाव्यविशेष, किसी}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४२'''|'''कमलबन्धु—कमलबसु'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
दिखाको आक्षरे। इसके अक्षर नियमपूर्वक लिखनेसे कमलका चित्र उतर आता है।}}
{{outdent|कमलबन्धु (सं० पु०) कमलोंका बन्धु, सूर्य।}}
{{outdent|कमलबायो (हिं० स्त्री०) रोगविशेष, एक बीमारी। इससे शरीर पीला पड़ जाता है।}}
{{outdent|कमलभव (सं० पु०) कमलात् भवति, कमल-भू-अण्। १ कमलज, ब्रह्मा। २ एक जैन ग्रन्थकार। इन्होंने कर्णाटो भाषामें शान्तिनाथपुराण बनाया है।}}
{{outdent|कमलभू (सं० पु०) ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमलमूल (सं० क्ली०) कमलकन्द, कँवलकी जड़।}}
{{outdent|कमलयोनि (सं० पु०) कमलं विष्णुनाभिकमलं योनिरुत्पत्तिस्थानं यस्य, बहुव्री०। १ ब्रह्मा। (स्त्री०) पद्मकी उत्पत्तिस्थान, कँवल पैदा होनेकी जगह।}}
{{outdent|कमलयोनि—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। नृसिंहने सूर्यसिद्धान्तवासनाभाष्यमें इनका वचन उद्धृत किया है।}}
{{outdent|कमलरत्नाकर—संगीतचिन्तामणि और संगीतामृत नामक संस्कृत ग्रन्थरचयिता।}}
{{outdent|कमलवती, कमलदेवी देखो।}}
{{outdent|कमलबीज (सं० क्ली०) पद्मबीज, कँवलका तुषम्, कमलगहा। भावप्रकाशके मतमें यह स्वादु, कषाय एवं तिक्तरस, शीतल, गुरु, विष्टम्भी, शुक्रवर्धक, रुच, बलकारक, संस्थापक, गर्भसंस्थापक और कफ, वायु, पित्त, रक्त तथा दाहनाशक है।}}
{{outdent|कमलवदन (सं० त्रि०) कमलमीव वदनं यस्य, बहुव्री०। पद्मकी भांति मुखकान्तिविशिष्ट, जो कमलकी तरह खूबसूरत मुंह रखता हो।}}
{{outdent|कमलवर्द्धन—एक काश्मीरराज। यह काश्मीरराजके प्रसन्न असू रहे। बालक शूरवर्माके राजा होने पर इन्होंने सुयोग देख काश्मीरराज्य आक्रमण किया। एकाङ्ग और तन्त्रोगणने इनसे हार मानी थी। फिर इनके भयसे काश्मीरराज सिंहासनकी आशा छोड़ गुप्त भावमें भाग खड़े हुए। इन्हें काश्मीरके राजा बननेको बड़ी आशा थी। किन्तु मन्त्रिगणोने इन्हें किसी प्रकार सिंहासनपर बैठने न दिया और इनके बदले यस्कर नामक किसी सामान्य व्यक्तिको अभिषिक्त किया। कमलवर्द्धन ९१५ शकको विद्यमान थे।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|कमलबसु—बंगालके एक विख्यात व्यक्ति। साधारणतः लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमलबसु' कहते हैं। किन्तु इस विजातीय उपाधिके संयुक्त होनेका कारण बहुतसे लोग नहीं जानते।}}
कमलबसुका असली नाम रामकमल बसु था। १७६७ ई० को इन्होंने गोवर्धनगिरिके निकटवर्ती गोईपुर नामक ग्राममें जन्म लिया। इनके पिता माणिकचन्द्र बसु चन्दननगरवासी फ्रांसीसियोंके अधीन तहसीलदार थे। उसी समय गोईपुरमें कराल कालघ्नी शीतला रोगका प्रादुर्भाव हुआ। परिवारके प्रायः ही भयंकर रोगाक्रान्त हो भाग रहे थे। माणिकचन्द्र स्त्री और अपने चार पुत्र चन्दननगर ले आये। फिर वह जन्मभूमिको लौटे न थे। रामकमल गुरुकी पाठशालानि यत्सामान्या बंगला और फ़ारसी पढ़ने लगे।
यह अपने पिताके ज्येष्ठ पुत्र थे। पिताकी अवस्था अच्छी न रहनेसे इन्हें अर्थोपार्जनकी चेष्टा करना पड़ी। २० वर्षके वयःक्रमकाल यह पोर्तुगीज़ोंके सरकारी जहाज़ी कार्यमें नियुक्त हुए। जहाज़ी कप्तानोंके साथ संश्रव रहनेसे इन्होंने अल्प दिनमें सामान्यांशित पोर्तुगीज़ भाषा सीखी थी। किन्तु कोई उन्नति न हुई। इन्हें ६०।७०) रुपये कर्ज़ देना पड़ा था। उसी रुपयेके लिये यह थोड़े दिन कारागृहमें भी रहे। फिर गोपीमोहन ठाकुरके यत्न और साहाय्यसे इन्होंने छुटकारा पाया।
रामकमलने जिससे नोट छपना रुपया लगा व्यवसाय प्रारम्भ किया था। इस बार इनका भाग्य फिरा, छिं सुञ्जा प्रभृति प्रधान प्रधान वणिकोंके साथ कारबार चलने लगा। पोर्तुगीज़ वणिकोंके साथ कामकाज कर यह सम्यक् सम्पत्तिशाली बन गये। फिर रामकमल चन्दननगरके बुनाइयोंसे एक प्रकारकी छींट तैयार करा अमेरिका भेजने लगे। उससे इन्हें विलक्षण लाभ हुआ था। कप़ड़े—प्रत्येक जहाज़में ५००००) रु० मिले। इसोप्रकार इन्होंने दश बार लाभ उठाया था। पोर्तुगीज़ों (फिरङ्गियों)के संसर्गसे बड़े आदमी बननेपर लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमल बसु' कहने लगे। वास्तवमें यह एक कट्टर हिन्दू थे। रामकमल दोसू-दुर्गाउत्सवादि
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४२'''|'''कमलबन्धु—कमलबसु'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
दिखाको शायरी। इसके अक्षर नियमपूर्वक लिखनेसे कमलका चित्र उतर आता है।
{{outdent|कमलबन्धु (सं० पु०) कमलोंका बन्धु, सूर्य।}}
{{outdent|कमलबायो (हिं० स्त्री०) रोगविशेष, एक बीमारी। इससे शरीर पीला पड़ जाता है।}}
{{outdent|कमलभव (सं० पु०) कमलात् भवति, कमल-भू-अण्। १ कमलज, ब्रह्मा। २ एक जैन ग्रन्थकार। इन्होंने कर्णाटो भाषामें शान्तिनाथपुराण बनाया है।}}
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{{outdent|कमलयोनि—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। नृसिंहने सूर्यसिद्धान्तवासनाभाष्यमें इनका वचन उद्धृत किया है।}}
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{{outdent|कमलवती, कमलदेवी देखो।}}
{{outdent|कमलबीज (सं० क्ली०) पद्मबीज, कँवलका तुषम्, कमलगहा। भावप्रकाशके मतमें यह स्वादु, कषाय एवं तिक्तरस, शीतल, गुरु, विष्टम्भी, शुक्रवर्धक, रुच, बलकारक, संस्थापक, गर्भसंस्थापक और कफ, वायु, पित्त, रक्त तथा दाहनाशक है।}}
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{{outdent|कमलबसु—बंगालके एक विख्यात व्यक्ति। साधारणतः लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमलबसु' कहते हैं। किन्तु इस विजातीय उपाधिके संयुक्त होनेका कारण बहुतसे लोग नहीं जानते।}}
कमलबसुका असली नाम रामकमल बसु था। १७६७ ई० को इन्होंने गोवर्धनगिरिके निकटवर्ती गोईपुर नामक ग्राममें जन्म लिया। इनके पिता माणिकचन्द्र बसु चन्दननगरवासी फ्रांसीसियोंके अधीन तहसीलदार थे। उसी समय गोईपुरमें कराल कालघ्नी शीतला रोगका प्रादुर्भाव हुआ। परिवारके प्रायः ही भयंकर रोगाक्रान्त हो भाग रहे थे। माणिकचन्द्र स्त्री और अपने चार पुत्र चन्दननगर ले आये। फिर वह जन्मभूमिको लौटे न थे। रामकमल गुरुकी पाठशालानि यत्सामान्या बंगला और फ़ारसी पढ़ने लगे।
यह अपने पिताके ज्येष्ठ पुत्र थे। पिताकी अवस्था अच्छी न रहनेसे इन्हें अर्थोपार्जनकी चेष्टा करना पड़ी। २० वर्षके वयःक्रमकाल यह पोर्तुगीज़ोंके सरकारी जहाज़ी कार्यमें नियुक्त हुए। जहाज़ी कप्तानोंके साथ संश्रव रहनेसे इन्होंने अल्प दिनमें सामान्यांशित पोर्तुगीज़ भाषा सीखी थी। किन्तु कोई उन्नति न हुई। इन्हें ६०।७०) रुपये कर्ज़ देना पड़ा था। उसी रुपयेके लिये यह थोड़े दिन कारागृहमें भी रहे। फिर गोपीमोहन ठाकुरके यत्न और साहाय्यसे इन्होंने छुटकारा पाया।
रामकमलने जिससे नोट छपना रुपया लगा व्यवसाय प्रारम्भ किया था। इस बार इनका भाग्य फिरा, छिं सुञ्जा प्रभृति प्रधान प्रधान वणिकोंके साथ कारबार चलने लगा। पोर्तुगीज़ वणिकोंके साथ कामकाज कर यह सम्यक् सम्पत्तिशाली बन गये। फिर रामकमल चन्दननगरके बुनाइयोंसे एक प्रकारकी छींट तैयार करा अमेरिका भेजने लगे। उससे इन्हें विलक्षण लाभ हुआ था। कप़ड़े—प्रत्येक जहाज़में ५००००) रु० मिले। इसोप्रकार इन्होंने दश बार लाभ उठाया था। पोर्तुगीज़ों (फिरङ्गियों)के संसर्गसे बड़े आदमी बननेपर लोग इन्हें 'फिरङ्गी कमल बसु' कहने लगे। वास्तवमें यह एक कट्टर हिन्दू थे। रामकमल दोसू-दुर्गाउत्सवादि
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४३'''|'''कमलखण्ड—कमला'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
सकल पूजा महासमारोहसे सम्पन्न करते। विशेषतः ब्राह्मण पण्डितों पर इन्हें विलक्षण यथाभक्ति थी। दीनदरिद्रियों को यह यथेष्ट साहाय्य पहुँचाते। फिर ब्राह्मण पण्डितोंको भी यह कितनी ही ज़मीन माफ़ी दे गये हैं। कहते—रामकमलके घरसे कभी अतिथि विमुख फिरते न थे।
५३ वत्सरके वयसमें ५ पुत्र, कलकत्ते एवं चन्दननगरमें भूमिसम्पत्ति और बहुतसा नक़द रुपया छोड़ इससंसारसे रामकमल चल बसे।
मध्य मध्य कलकत्ते आ अपने भवनमें यह ठहरते थे। सर्वप्रथम उसी भवनमें डेविड हेयरने हिन्दू-कालेजकी स्थापना की। फिर राममोहन रायने भी उसी भवनमें प्रथम अपना मत चलाया और डफ साहबने आकर बङ्गालकी चारों ओर मिशनरी भेजनेका बीड़ा उठाया था। कलकत्तेमें आदि ब्राह्म-समाजके निकट दो-तीन मकान छोड़ कमल बसुका वही प्रसिद्ध भवन विद्यमान है। इनके वंशधरोंसे मल्लिकांने उक्त भवन खरीद लिया है। आज भी धनीलोग उसे 'फिरङ्गी कमल बसुका घर' कहते हैं।
{{outdent|कमलखण्ड (सं० पु०) कमलानां षण्डः समूहः, ६-तत्। पद्मसमूह, कँवलोंका मजमा।}}
{{outdent|कमलसम्भव (सं० पु०) कमलात् सम्भव उत्पत्तिर्यस्य, बहुव्री०। कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमलसिंह—कच्छपवंशीय एक प्राचीन विद्वान् नरेश। १३२५ ई० को यह राज्य करते थे। कमलसिंह देववर्मा (१३५० ई०) के पिता और वीरसिंहके पितामह रहे।}}
{{outdent|कमला (सं० स्त्री०) कमल-टाप्। १ लक्ष्मी। यह विष्णुकी पत्नी हैं। २ सुन्दरस्त्री, खूबसूरत औरत। ३ निम्बुकविशेष, नारङ्गी। इस वृक्षको संस्कृत भाषामें कमला, नारङ्ग, नागरङ्ग, सुरङ्ग, त्वग्गन्ध, त्वक्सुगन्ध, गन्धाढ्य, गन्धपत्र एवं मुखप्रिय; हिन्दीमें नारङ्गी, बङ्गलामें कमला नेंबू, नेपालीमें सुन्तला, पञ्जाबीमें सन्तरा, गुजरातीमें नारङ्गी, बम्बईमें नारिङ्गाल, मारवाड़ीमें सङ्गत्रिया, दक्षिणमें नारिङ्गी, तमिलमें किघिलि, तेलुगुमें गच्छनिम्म, कर्णाटीमें कित्तलीहण्णु, मलयमें माङ्कुरनारघा, महिषूरमें जेरुक, अरबीमें}}
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नारञ्ज, फ़ारसीमें नारङ्ग, ब्राह्मीमें थञ्जय और सिंहलीमें दोदन्म कहते हैं। (Citrus Aurantium)
इसको अङ्गरेजी आरञ्ज, फ़्रेंच आरञ्जर, पोर्तुगीज़ लरञ्जिरा (Laranjeira de fructo dolce), डचो नारञ्छ, डानीय नारञ्छ, जर्मैन योरङ्गेन बौम (Orangen baum), इटलीय अरनसिचो (Arancio) और लाटिन अरञ्छिया (Arangia) है। अङ्गरेजी 'आरञ्ज' शब्द अरबी 'नारञ्ज'का अपभ्रंश है। फिर अरबी 'नारञ्ज' संस्कृत 'नारङ्ग' शब्दका रूपान्तर मात्र लगता है।
इस बातपर भी गड़बड़ पड़ता—नारङ्गका नाम कमला क्यों चलता है। किसी किसीके कथनानुसार आसाममें कमला नदी है। उसके निकट बिस्तर उत्पन्न होनेसे इसको कमला कहते हैं। फिर कोई बताता—पहले त्रिपुराकी राजधानी कुमिल्लामें यह नीबू आता था। इसीसे कुमिल्लाके प्राचीन नाम कमलाङ्कके बदल कमला नाम पड़ गया। किन्तु हमारी विवेचनामें यह दोनों बातें ठीक नहीं। क्योंकि बहुत दिनसे तैलङ्ग देशमें इसे 'कमलापण्डु' कहते आये हैं। फिर कमला नाम भी अन्ततः २।३ शत वर्षका प्राचीन है। कल्याणन्दने तन्त्रसारमें इसका उल्लेख किया है—
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"रम्भाफलं तिन्तिड़ीकं कमलं नागरङ्गकम्।
फलान्येतानि भौम्यानि एण्योण्यानि विवर्जयेत्॥"</poem>}}}}
इसकी कृषि भारतके अनेक प्रान्तमें होती है। विशेषतः खाशिया पहाड़ोंके दक्षिण सुखको उपत्यका और मध्यप्रदेशके नागपुर जिलेमें इसे बहुत लगाते हैं। कुछ कुछ नारङ्गी नेपाल, सिक्किम और हिमालयके दो-एक स्थानमें भी लगायी जाती है। ब्रह्म-देशमें यह बहुत कम होती है। निम्नभूममें या तो फल ही नहीं आता या फ़ीका पड़ जाता है। भारतवर्षमें जलवायुके अनुसार दिसम्बर और मार्च मासके मध्य फल उतरता है। नागपुरकी नारङ्गी वर्षमें दो बार होती है।
उद्भिद्तत्त्वज्ञ डि कण्डोलने लिखा,—'दो सहस्र वर्ष पूर्व भारतवर्षमें कमला नीबू न था। यदि इसका अस्तित्व रहता, तो संस्कृत ग्रन्थमें अवश्य उल्लेख}}
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कमलखण्ड—कमला'''|'''४३'''}}
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सकल पूजा महासमारोहसे सम्पन्न करते। विशेषतः ब्राह्मण पण्डितों पर इन्हें विलक्षण यथाभक्ति थी। दीनदरिद्रियों को यह यथेष्ट साहाय्य पहुँचाते। फिर ब्राह्मण पण्डितोंको भी यह कितनी ही ज़मीन माफ़ी दे गये हैं। कहते—रामकमलके घरसे कभी अतिथि विमुख फिरते न थे।
५३ वत्सरके वयसमें ५ पुत्र, कलकत्ते एवं चन्दननगरमें भूमिसम्पत्ति और बहुतसा नक़द रुपया छोड़ इससंसारसे रामकमल चल बसे।
मध्य मध्य कलकत्ते आ अपने भवनमें यह ठहरते थे। सर्वप्रथम उसी भवनमें डेविड हेयरने हिन्दू-कालेजकी स्थापना की। फिर राममोहन रायने भी उसी भवनमें प्रथम अपना मत चलाया और डफ साहबने आकर बङ्गालकी चारों ओर मिशनरी भेजनेका बीड़ा उठाया था। कलकत्तेमें आदि ब्राह्म-समाजके निकट दो-तीन मकान छोड़ कमल बसुका वही प्रसिद्ध भवन विद्यमान है। इनके वंशधरोंसे मल्लिकांने उक्त भवन खरीद लिया है। आज भी धनीलोग उसे 'फिरङ्गी कमल बसुका घर' कहते हैं।
{{outdent|कमलखण्ड (सं० पु०) कमलानां षण्डः समूहः, ६-तत्। पद्मसमूह, कँवलोंका मजमा।}}
{{outdent|कमलसम्भव (सं० पु०) कमलात् सम्भव उत्पत्तिर्यस्य, बहुव्री०। कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमलसिंह—कच्छपवंशीय एक प्राचीन विद्वान् नरेश। १३२५ ई० को यह राज्य करते थे। कमलसिंह देववर्मा (१३५० ई०) के पिता और वीरसिंहके पितामह रहे।}}
{{outdent|कमला (सं० स्त्री०) कमल-टाप्। १ लक्ष्मी। यह विष्णुकी पत्नी हैं। २ सुन्दरस्त्री, खूबसूरत औरत। ३ निम्बुकविशेष, नारङ्गी। इस वृक्षको संस्कृत भाषामें कमला, नारङ्ग, नागरङ्ग, सुरङ्ग, त्वग्गन्ध, त्वक्सुगन्ध, गन्धाढ्य, गन्धपत्र एवं मुखप्रिय; हिन्दीमें नारङ्गी, बङ्गलामें कमला नेंबू, नेपालीमें सुन्तला, पञ्जाबीमें सन्तरा, गुजरातीमें नारङ्गी, बम्बईमें नारिङ्गाल, मारवाड़ीमें सङ्गत्रिया, दक्षिणमें नारिङ्गी, तमिलमें किघिलि, तेलुगुमें गच्छनिम्म, कर्णाटीमें कित्तलीहण्णु, मलयमें माङ्कुरनारघा, महिषूरमें जेरुक, अरबीमें}}
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नारञ्ज, फ़ारसीमें नारङ्ग, ब्राह्मीमें थञ्जय और सिंहलीमें दोदन्म कहते हैं। (Citrus Aurantium)
इसको अङ्गरेजी आरञ्ज, फ़्रेंच आरञ्जर, पोर्तुगीज़ लरञ्जिरा (Laranjeira de fructo dolce), डचो नारञ्छ, डानीय नारञ्छ, जर्मैन योरङ्गेन बौम (Orangen baum), इटलीय अरनसिचो (Arancio) और लाटिन अरञ्छिया (Arangia) है। अङ्गरेजी 'आरञ्ज' शब्द अरबी 'नारञ्ज'का अपभ्रंश है। फिर अरबी 'नारञ्ज' संस्कृत 'नारङ्ग' शब्दका रूपान्तर मात्र लगता है।
इस बातपर भी गड़बड़ पड़ता—नारङ्गका नाम कमला क्यों चलता है। किसी किसीके कथनानुसार आसाममें कमला नदी है। उसके निकट बिस्तर उत्पन्न होनेसे इसको कमला कहते हैं। फिर कोई बताता—पहले त्रिपुराकी राजधानी कुमिल्लामें यह नीबू आता था। इसीसे कुमिल्लाके प्राचीन नाम कमलाङ्कके बदल कमला नाम पड़ गया। किन्तु हमारी विवेचनामें यह दोनों बातें ठीक नहीं। क्योंकि बहुत दिनसे तैलङ्ग देशमें इसे 'कमलापण्डु' कहते आये हैं। फिर कमला नाम भी अन्ततः २।३ शत वर्षका प्राचीन है। कल्याणन्दने तन्त्रसारमें इसका उल्लेख किया है—
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फलान्येतानि भौम्यानि एण्योण्यानि विवर्जयेत्॥"</poem>}}}}
इसकी कृषि भारतके अनेक प्रान्तमें होती है। विशेषतः खाशिया पहाड़ोंके दक्षिण सुखको उपत्यका और मध्यप्रदेशके नागपुर जिलेमें इसे बहुत लगाते हैं। कुछ कुछ नारङ्गी नेपाल, सिक्किम और हिमालयके दो-एक स्थानमें भी लगायी जाती है। ब्रह्म-देशमें यह बहुत कम होती है। निम्नभूममें या तो फल ही नहीं आता या फ़ीका पड़ जाता है। भारतवर्षमें जलवायुके अनुसार दिसम्बर और मार्च मासके मध्य फल उतरता है। नागपुरकी नारङ्गी वर्षमें दो बार होती है।
उद्भिद्तत्त्वज्ञ डि कण्डोलने लिखा,—'दो सहस्र वर्ष पूर्व भारतवर्षमें कमला नीबू न था। यदि इसका अस्तित्व रहता, तो संस्कृत ग्रन्थमें अवश्य उल्लेख}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४४'''|'''कमला'''}}
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मिलता और ग्रीक वर्णनमें भी नाम निकलता। नारङ्गी चीनसे भारत आयी है।' किन्तु डाक्टर बोनेविया इसे भारतका ही द्रव्य बताते हैं।
यह चार प्रकारकी होती है—(१) सन्तरा, (२) नारङ्गी, (३) मलता और (४) मन्दारिन।
(१) सन्तरेका छिलका चिकना, पीला और नारङ्गी रहता है। त्वक् पृथक् पड़ती है। इस जातिकी कमला नागपुर, दिल्ली, अलवर, गुड़गाँव, लाहौर, मुलतान, पूने, मद्रास, कुर्ग, सिलहट, भोटान, नेपाल और सिंङ्घलमें लगायी जाती है। अग्रहायण वा पौष मास इसका फल पकता है।
(२) नारङ्गी सन्तरेसे अधिक उत्पन्न होती है। लगानेसे यह भारतमें सब जगह उपज सकती है। इसका छिलका सन्तरेसे कड़ा और पतला रहता है। फिर त्वक् भी पृथक् नहीं पड़ती। यह माघ मास फल देती और धूप सह लेती है। इसका रस सन्तरेसे फीका निकलता है।
(३) मलता या सुखं नारङ्गी कई प्रकारकी होती है। आजकल हिमालय और दार्जिलिङ्गमें जो हरी और बड़ी नारङ्गी उपजती, वह इसीकी अवनति मात्र समझ पड़ती है। ब्रह्मदेशमें बिल्कुल इसी प्रकारकी एक नारङ्गी मिलती है। पूनेकी छोटी लाल 'सुसेम्बी' जञ्जीबारसे इस देशमें आयी है। लखनऊमें सिपाही विद्रोहसे पहले सुखं नारङ्गी बहुत लगायी जाती थी। यह कंकरीली जमीनमें खूब होती है। इस अमृततुल्य स्वादु रहती है। गुजराँवालेकी सुखं नारङ्गी अङ्गरेजोंको बहुत अच्छी लगती और सबसे उम्दा समझ पड़ती है।
(४) मन्दारिन देखनेमें क्षुद्राकार और रक्तवर्ण होती है। यह खानेमें सुस्वादु लगती है। सकल प्रकार कमलाकी अपेक्षा इसके पत्र और फलमें सद्वंश अधिक रहता है। प्रधानतः यह पर्वतोंपर उपजती है। भारतवर्षमें असल मन्दारिन नहीं मिलती, सिंङ्घलमें देख पड़ती है।
पहले युरोपमें कमला उपजती न थी। इसे पोर्तुगीज़ भारतवर्षसे वहाँ ले गये हैं।
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नारङ्गियोंका व्यवसाय प्रधानतः दो स्थानोंमें होता है—सिलहट (श्रीहट्ट) और नागपुर। इसके लगानेमें मूलपर आर्द्राता रखना आवश्यक है। किन्तु जल नियत होना न चाहिये। श्रीहट्टमें इस बातकी सुविधा है। भूमि ढाल रहनेसे नदीकी लहर आती और वृक्षोंको सींचकर चली जाती है। वहाँ कमसे कम १००० एकड़में नारङ्गी लगाते हैं। पथिक घण्टों ही घण्टे इस बागमें घूम सकता है। दिसम्बर और जनवरी मास नारङ्गियोंसे लदे वृक्ष देख हृदय फूल उठता है। ऐसा बाग युरोपमें भी कहीं देख नहीं पड़ता।
<Small>कृषि—</small>बीज जनवरी और फ़रवरी मास प्रायः ६ इञ्च भूमिके सम्पुटमें सघनरूपसे बोया जाता है। उक्त सम्पुट इतने ऊँचे रहते, कि सूकर अपना दाँत लगा नहीं सकती। फिर वृक्षों और गिलहरियोंको दूर रखनेके लिये जाल भी डाल देते हैं। दृष्टि होनेसे बीजाङ्कुर भिन्न किये जाते हैं। किन्तु इस कार्यमें सम्पुट तोड़ मूलसे मृत्तिकाको इस प्रकार भटकते, जिसमें कोई हानि न पड़े। पीछे उन्हें उद्यानके पोषणस्थानमें लगाते हैं। बीजाङ्कुर पोषणस्थानमें तबतक रहते, जबतक उद्यानमें अपने ईप्सित थलपर फिर नहीं पहुँचते। किन्तु यह नियम सदोष प्रतीत होता है। कारण पोषणस्थान वर्षमें केवल एकवार पल्लववर मास निराया जाता है। कृन्तम लगाना किसीको मालूम नहीं। फिर बीज चुननेमें भी अंधा हो चेष्टा करते हैं।
<small>संग्रहण एवं निक्षेपण—</small>प्रत्येक संग्राहकके पास २० फ़ोट ऊँची बाँसकी सीढ़ी होती है। उसकी पीठपर एक मोटा जालीदार थैला लटकता, जिसका मुँह बेतके छल्लेसे खुला रहता है। इसी थैलेमें वह नारङ्गी तोड़ तोड़ डालता है। फिर वह उतरनेके पहले मुरझायी पत्तियाँ और सूखी डालियाँ भी गिरा देता है। सिवा इसके नारङ्गीके वृक्षमें दूसरा हाथ नहीं लगाते। लड़के गुलेल लिये कौवे उड़ाया करते हैं। आँधीसे गिरी नारङ्गियाँ सूअरों और कुत्तोंको खिलायी जाती हैं। इसको गणना सैकड़े हिसाबसे चलती है। ७५० वृक्षों (१०००)का एक मोल होता है। इसकी नारङ्गियाँ ५) रु० मोल बिकती हैं।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४५'''|'''कमला'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
नागपुर और कामठीमें भी नारङ्गीके बहुतसे बाग हैं। मध्यप्रदेशमें इसकी कृषि बढ़ रही है। नागपुरका सन्तरा बम्बई अधिक जाता है। मुक्तप्रदेशमें नेपाल, दिल्ली और कुछ नागपुरसे भी नारङ्गी आती हैं।
नारङ्ग—मधुराम्ल, अग्निप्रदीपक और वाटनाशक है। फिर दूसरी नारङ्गी अत्यन्त अम्लरस, दुष्पाच्य, दुष्पच, वायुनाशक और सारक होती है। (भावप्रकाश)
राजनिघण्टुके मतसे यह मधुर एवं अम्ल, गुरु, रोचन, बल्य, उष्ण और वात, आम, कृमि, शूल तथा वमिनाशक है।
हकीमोंमें नारङ्गीके छिलके और फूसको गर्म और शुष्क समझते हैं। इसका गूदा तर रहता है। ठण्डकसे खांसी आने या बुखार चढ़ जानेसे नारङ्गी खिलाते हैं। इसका अर्क सफ़ूफ़ और सफ़ूफ़के दस्तको दूर करता है। कीड़े या यूँ को रोकनेके लिये इसे बहुत काममें लाते हैं। नारङ्गीका अर्क भी निहायत ताक़तवर है। इसके छिलके और फूससे तेल बनता, जो मालिशमें दवाके तौर पर चलता है।
डाक्टर ऐम्सली लिखते,—'हिन्दू चिकित्सकोंके मतानुसार नारङ्ग रक्तशोधक, ज्वरमें पिपासानिवारक, पीनसरोगहर और क्षुधावर्धक है। बीछूके समय दंश थानमें नारङ्गीका अर्क अँगरेज़ोंके लिये बहुत उपादेय होता है। इसका छिलका वाटनाशक और अजीर्ण रोगके लिये हितकर है।'
भारतवर्षीय फ़ार्मकोवियाके मतसे नारङ्गी बलकर और अग्निद्वर्धक है। अजीर्ण रोग और साधारण दुर्बलता पर यह बड़ा उपकार करती है। इसके पत्तोंको चूआनेसे जो जल निकलता, वह आध्मान स्वादुयोग्य एवं मुखरोगपर प्रयोग करनेसे आक्षेप मिटाता है।
मुखपर उप्र होनेसे कोई कोई नारङ्गीका सूखा छिलका घिसकर लगाता है। फिर सूखे ही छिलकेको तेलमें रगड़ चर्मरोगपर व्यवहार करनेसे आशु फल मिलता है।
भारतवर्षमें प्रायः सर्वत्र ही नारङ्गी सुस्वादु फलकी भाँति समाहृत होती है। इसका वृक्ष बहुतदिन पर्यन्त
{{Left|Vol. IV. 12|2em}}
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जोता जागता है। सुननेमें आया—एक एक वृक्ष ५।६ शत वर्षसे नहीं मुरझाया। वृक्षका तना ५० फ़ोट पर्यन्त उच्च विस्तृत होता है। प्रत्येक वृक्षमें ५००से १००० पर्यन्त फल उतरते हैं।
नारङ्गका पत्र जलमें चूआनेपर एक प्रकार तेल निकलता है। उसका गन्ध अति तीव्र यद्यपि उत्कृष्ट होता है। अँगरेज़ उसे 'निरोली आ येल' कहते हैं। यह इतर बनानेमें काम आता है। विलायतवाले लिकेहुर, साबुन प्रभृति द्रव्योंमें उसे मिलाते हैं।
नारङ्गीके फूलसे जो तैलवत् निर्यास निकलता, उसका इतर अति उत्कृष्ट रहता है।
किसी-किसी वैज्ञानिकने देखभान नारङ्गीके तेलसे कपूर निकाला है। उस कपूरको 'निरोली काम्फ़र' कहते हैं।
४ गट्टा। "कमला कमलनिका धात्री वसुन्धरेति।" (वाग्भट० १२६४) ५ नर्तकी विशेष, एक नाचने-गानेवाली रण्डो। यह पोके राजा जयापीड़की पत्नी बनी थी। ६ काश्मीरस्थ पुरोविशेष, काश्मीरका एक शहर। (राजतरङ्गिणी ४।६०२) ७ छन्दोविशेष। इसमें दो नगण और एक सगण रहता अर्थात् ८ लघु वर्णके पीछे एक गुरुवर्ण लगता है।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"त्रिगुण गण सहितः सगण पद दि विदितः।
कविमति मति विमल विविध भवति कमला॥" (वृत्तरत्नाकर)</poem>}}}}
८ कामरूपमें प्रवाहित एक नदी। इस नदीके तीरकी भूमि अधिक उर्वरा है। (म० सभापर्व १४।५४)
९ उत्तर बिहारकी एक नदी। यह नदी नेपाल राज्यमें हिमालयसे निकलती है। इसके दक्षिण अंशको बूढ़ी कमला कहते हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें ६०वीं तेरहभुजी पुरुषोत्तमका कमला नदी बताया है। इसके तीरपर मिलानाथ ग्राम है। उसी ग्राममें मिलानाथ नामक महादेवकी लिङ्गमूर्ति प्रतिष्ठित है। (म० सभापर्व ४७।१९8)
१० विशालाराज्याका एक प्राचीन ग्राम। (म० सभापर्व १८।५०)
{{outdent|कमला (हिं० पु०) १ कम्बल, भाँग्रा, सूँड़ी। यह रूएँदार कीड़ा है। मनुष्यका देह इसके संसर्गसे खुजलाने लगता है। २ कृमिविशेष, टीडा, सट,}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४६'''|'''कमलाकर—कमलाकान्त भट्टाचार्य'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
एक लम्बा और सफ़ेद कीड़ा। यह अन्न और चैत्र-माष फ़साददिमें पड़ता है।
{{outdent|कमलाकर (सं० पु०) कमलानामाकरः उत्पत्तिस्थानम्, ६-तत्। सरोवरविशेष, एक तालाब। जिस सरोवर वा तड़ागमें अधिक कमल रहते, उसे ही कमलाकर कहते हैं। २ पद्मसमूह, कँवलोंका मजमा। ३ कमलाकरभट्टनिर्मित स्मृतिशास्त्रका एक ग्रन्थ। ४ गोदावरी-तीरवर्ती देवगिरिनिवासी नृसिंहके पुत्र। इन्होंने सिद्धान्ततत्त्वविवेक और जातकतिलक नामक संस्कृत ग्रन्थ बनाया था।
कमलाकर भट्ट—विख्यात स्मृतिग्रन्थकार। यह रामकृष्णभट्टके पुत्र, नारायणभट्टके पौत्र और दिनकर भट्टके सहोदर थे। इन महात्माने अनेक स्मृतिग्रन्थ बनाये। इनके निम्नलिखित ग्रन्थ प्रधान हैं—१ तत्त्वकमलाकर, २ पूतकमलाकर, ३ तीर्थकमलाकर, ४ संस्कारप्रयोग वा संस्कारपद्धति, ५ कात्तवीर्यार्जुनदीपदानप्रयोग, ६ शान्तिरत्न, ७ शूद्रधर्मतत्त्व, ८ सहस्रचण्डीदि विधि, ९ निर्णयसिन्धु, १० विवादताण्डव। इनके ग्रन्थ पढ़नेसे समझ सकते—कमलाकर भट्ट १५३८ शकको विद्यमान रहे।}}
{{outdent|कमलाकान्त (सं० पु०) १ लक्ष्मीपति विष्णु। २ राम। ३ कृष्ण।}}
{{outdent|कमलाकान्त भट्टाचार्य—१ बङ्गालके एक दिग्गजपण्डित। यह नवद्वीपाधिपति महाराज कृष्णचन्द्रके समसामयिक रहे। किसी किसी श्लोकमें इनका नाम आया है—"श्रीगणेशकमलाकान्त शङ्करराम गदाधरः।" किन्तु अन्य कोई परिचय नहीं मिलता। कहते—श्रीकान्त, कमलाकान्त, बलराम और शङ्कर चारों पण्डितोंके एकत्र एकपक्ष हो विचारपर बैठनेसे स्वयं सरस्वती भी अपर पक्ष अवलम्बन कर जीत सकती न थीं। महाराज कृष्णचन्द्रने इन्हें स्वीय सभामें रखनेके लिये बड़ी चेष्टा की। किन्तु किसी विशेष कारणसे यह विरक्त हो और राजसभा छोड़ अपने ग्राममें आकर रहने लगे। चौबीस-परगनेके अन्तर्गत 'पूँड़ा' ग्राममें इनका वास था। पण्डितमण्डलीका वास रहनेसे पूँड़ा छोटे नवद्वीपके नामसे विख्यात हुआ। आज भी वहाँ इनके वंशधर रहते हैं।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
२ एक प्रसिद्ध साधक और वर्द्धमानके राजसभाके पण्डित। १८०८ ई०को अम्बिकाकालनासे वर्द्धमान आ इन्होंने तत्कालीन वर्द्धमानाधिपति तेजश्चन्द्रको रिझाया और सभाके पण्डितका पद पाया था।
कमलाकान्त सात्त्विक, अभिमानशून्य और देवीके परम भक्त रहे। इनकी निष्ठासे मुग्ध हो तेजश्चन्द्रने इन्हें अपने गुरुपदपर वरण किया और निवासार्थ वर्द्धमानके निकट कोटालगहाट ग्राममें सुन्दर भवन बनवा दिया। उस भवनमें कमलाकान्त महासमारोहसे श्रीश्यामापूजा मनाते। इस पूजाके दिन सब मित्र एकत्र हो इन्हें कताये करते और इनकी भक्तिगाथा सुनते थे।
जैसे पदावलीसे रामप्रसादने देवीको रिझाया और जैसे पदावलीने भावुक बङ्गालियोंके हृदयमें अमृत बहाया, कमलाकान्तने वैसे ही पदावली गा कर किसी समय वर्द्धमानवासियोंको उन्मत्त बनाया। क्या बालक, क्या युवक, क्या वृद्ध—जो लोग अनुरोध लगाते, उन्हींको यह किसी न किसी ताल-स्वरमें एक श्यामाविषयक पद स्वयं बना, गा एवं सुनाकर रिझाते थे।
यह निर्भीक और सरलचित्त रहे। लोगोंसे सुन पाते,—एक दिन कमलाकान्त रात्रिकालको मोड़गाँवके मैदानसे चले जाते थे। हठात् कतिपय दस्युने भीमरवसे उनपर आक्रमण किया। उन्होंने देखा, कि इसबार उनका अन्तिमकाल उपस्थित था। फिर वह निर्भय परमानन्दसे रामप्रसादके स्वरमें श्यामा माताको पुकारने लगे। उक्त गान सुन दस्यु मोहित हुये थे। उन्होंने वैरभाव छोड़ और उनके पदपर लोट क्षमा माँगी। कमलाकान्त उन्हें सन्तुष्ट कर वर्द्धमान लौट गये।
यह विवेकके स्रोतमें डूब रहते, संसारकी कुछ भी ममता रखते न थे। सुननेमें आया—स्त्रीकी जलानेके लिये चिता प्रज्वलित होते कमलाकान्तने नाच नाच श्यामामाताका नाम गाया।
कुमार प्रतापचन्द्रभी इनके शिष्य हो गये थे।
कहते—मृत्युकाल महाराज तेजश्चन्द्र स्वयं कमला-
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४७
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''४७'''|'''कमलाकान्त विद्यालङ्कार'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
कान्तके भवन पहुँचे। उन्होंने गङ्गातीर जानेके लिये बहुत अनुनय विनय किया, जिसपर कमलाकान्तने एक पदावली गा कर मत फिरा दिया।
अनन्तर इन्होंने इससंसार छोड़ा था। प्रवादानुसार कमलाकान्तका शवदेह साधककी लयावस्था भेदकर भगवतीके स्रोतवेगर्भमें बह गया।
{{outdent|कमलाकान्त विद्यालङ्कार—बङ्गालके एक सुप्रसिद्ध पण्डित। बालकत्वमें अँगरेज़ प्राच्य विषयमें ज्ञान लाभ कर और चोदित-लिपि, प्राचीन हस्ताक्षर प्रभृति पढ़ जो तत्त्व ढूँढ़नेमें लगे, उसके मूल पण्डित कमलाकान्त विद्यालङ्कार ही रहे। १८०० ई०के मध्यभाग यह एशियाटिक सोसाइटीके पण्डितपदपर प्रतिष्ठित थे। फिर उसी समय प्रिन्सेप साहब उक्त सभाके सम्पादक रहे। प्राचीन शिलालेख, ताम्रफलक और हस्ताक्षर प्रभृतिका मर्मोद्धार करना ही पण्डित कमलाकान्तका कार्य था। दिल्ली और इलाहाबादमें दो लौहस्तम्भोंपर प्राचीन अप्रचलित भाषामें कोई विषय अङ्कित रहा। उसकी अनुलिपि पूर्व जो प्रचारित हो चुकी थी। किन्तु सर विलियम जोन्स, कोलब्रुक और होरेस-हैमेन विल्सन प्रभृति संस्कृतवित् साहब उसका अर्थ लगा या उस जातिके अक्षरोंका विन्दु विसर्ग भी बता न सके। शेषको कमलाकान्त उक्त लिपिका मर्मोद्धार करनेपर दृढ़प्रतिज्ञ हुए और अक्षर ठहरानेकी चेष्टा चलाने लगे। फिर देहलो, साँची और गिरनार प्रभृति स्थानोंकी चोदितशिलालेखका सादृश्य पा तथा ब्रह्माक्षरी एवं देवनागराक्षरोंसे मिला इन्होंने एक-एक अक्षर बता दिया। सर्वाग्र 'द' और 'न' स्थिर हुआ था। उक्त दोनों अक्षर पक्के पढ़नेसे काम कितना ही सीधा पड़ गया। तत्पर 'इ', 'ई' और 'उ' आदिको कमलाकान्तने स्थिर किया था। क्रमशः अन्यान्य वर्णों और शब्दोंको निकाल इन्होंने दोनों लिपिका प्राचीन पालो भाषामें चोदित होना ठहराया। प्राचीन पाली वर्णमालाके छद्मवेषका मूल वन्दनीय पण्डित कमलाकान्त विद्यालङ्कार ही थे।
पीछे इन्होंने उक्त दोनों लिपिका अर्थोद्धार और}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
भाष्य किया। १८३७ ई०को वही अर्थ और भाष्य साधारणमें प्रचारित हुआ था। विद्वज्जन-समाजमें बड़ी हलचल पड़ी। भारतेतिहासके तमसाच्छन्न अध्यायपर नूतन आलोक पड़ा था। किन्तु जिनके द्वारा इतना काण्ड हुआ, उनको कोई फल न मिला। फल सम्पादक प्रिन्सेप साहबने पाया था। अमेरिका और युरोपके विद्यानुरागी प्रिन्सेप साहबको धन्य धन्य कहने लगे। किन्तु प्रिन्सेप साहब कृतघ्न न थे। वह अपनी प्रबन्धवलीमें कमलाकान्तको दो मर्मच्छेदक और टोकाकार लिख गये हैं।
बरहीमें मिली एक कुटिल लिपिको समलोचनाके समय इन्होंने सुस्पष्ट बताया—ऐसा सुन्दर भाव और भाषण हमने अन्य किसी लिपिमें आजतक नहीं पाया। कमलाकान्तने ही प्रथम यह बात कही—इसी लिपिसे वङ्गीय वर्णमाला निकली या मिली है। यह दूसरा भी विशेष कार्य कर पुरातत्त्व की आलोचनामें समधिक उन्नति देखा गये हैं। दिल्ली और इलाहाबादकी पूर्वोक्त लिपिके अक्षरोंसे संख्यावाचकत्व प्रतिपादित होता था। नाना संस्कृत ग्रन्थ देख कमलाकान्तने ठहराया—कौन अक्षर किस संख्याके लिये आया है। इस स्थलपर उसके दो एक उदाहरण देते हैं—"सगणगुणाक्षरिततुरेको विसर्गः।" (का०व्या०)
४ (चार)का चिह्न स्त्रीके स्तनयुग और विसर्गकी आकृति रखता है। कातन्त्र व्याकरणमें कमलाकान्तने उक्त सूत्र देख निर्णय किया—विसर्ग (:) वर्ण (४) चारके अङ्कका बोधक माना गया है। इसी प्रकार पिङ्गलकृत प्राकृत व्याकरणका सूत्र ६ (छह) संख्याकी वतनिधाता ठहरा है।
इससे पूर्व और पर प्रिन्सेप साहब कमलाकान्त-पण्डितके साहाय्यपर नाना विषयमें कृतकार्य हुए। वह स्वयं 'विशेषरूपसे संस्कृत भाषाके अनभिज्ञ न रहे। पण्डित कमलाकान्त ही उनके चक्षु बन गये। इस अच्छी तरह समझते—कमलाकान्त यशोलिप्सु न थे। कारण विन्दु मात्र भी यशोलिप्सा रहते यह निज कृत अनेक कार्योंमें एक न एक अपने नामपर चलाते और लाभ एवं कीर्ति उठाते। फिर डाक्टर
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{{rh|'''४८'''|'''कमलाकार—कमलासन'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
राजेन्द्रलाल मित्रकी भाँति इनका नाम पृथिवीके सकल स्थानोंमें विघोषित हो जाता।
{{outdent|कमलाकार (सं० पु०) १ एक छप्पय। इसमें २७ गुरु एवं ३८ लघु अर्थात् १२५ वर्ण और १५२ मात्राका समावेश होता है। (छन्दो०) २ कमलका आकार रखनेवाला, जो कमल जैसा हो।}}
{{outdent|कमलादेवश्च (सं० पु०) पुण्यस्थानविशेष, एक परस्तिय-गाह। इसे कमलातीने बनवाया था। (राजत०)}}
{{outdent|कमलाक्ष (सं० त्रि०) कमलाक्षिव अक्षि यस्य, बहुव्री०। १ पद्मकी भाँति सुन्दर चक्षुविशिष्ट, जो कमलकी तरह आँखें रखता हो। (पु०) २ पद्मबीज, कमलगट्टा। यह स्वादु, रूक्ष, पाचन, कटुक, शीतल, तुवर, तिक्त, गुरु, विष्टम्भकारक, गर्भस्थितिकर, हृद्य, वातकर, वच्य, ग्राही, कफघ्न एवं लेखन और पित्त, रक्त, वमि तथा दाहनाशक है। (वैद्यकनिघण्टु) ३ स्थानविशेष, किसो जगहका नाम।}}
{{outdent|कमलायजा (सं० स्त्री०) दरिद्रा, दरिद्री।}}
{{outdent|कमलादेवी—१ कादम्बराज शिवचित्तऔरप्रभादिदेवकी पटरानी। दाक्षिणात्यकी शिलालेख पढ़नेसे समझात—कमलादेवीके पति गोपकपूरी (गोवा) में राजत्व करते थे। यह अपने पतिकी प्रियतमा महिषी रहीं। देवद्विजपर इन्हें बड़ी भक्ति श्रद्धा थी। अपनी दानशीलता और परोपकारिताके गुणसे यह श्रेष्ठ रमणीके मध्य परिगणित रहीं। इन्होंने वेद-वेदाङ्ग-पारदर्शी ब्राह्मणोंको अनेक ग्राम दे डाले। फिर इन्हींके अनुरोधसे ११७४ ई०को कादम्बराजने ब्राह्मणोंको देगम्ब ग्राम प्रदान किया। कमलादेवी उमाको पूजती थीं।
इतिहासमें दूसरी कमलादेवीका नाम भी मिलता है। नीचे उनका विवरण लिखा है,—
२ गुजरातके राजा करणरायकी परमासुन्दरी पत्नी। १२९७ ई०को सम्राट् अला-उद्-दीन खिलजीने गुजरात जय किया था। उस समय बन्दियोंके साथ कमलादेवी भी दिल्ली पहुँचायी गयीं। कुछ दिन पीछे अला-उद्-दीनकी कुशलता और रोचकतासे इन्होंने सम्राट्को गले लगाया था। फिर १३०६}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ई०को कमलादेवीके गर्भसे उत्पन्न गुजरातकी राजकन्या देवलदेवी भी दिल्ली पहुँच गयीं। अला-उद्-दीनके पुत्र शाहजादे खिज़्र खाँ उनके रूपसे मुग्ध हुए थे। अवश्यही देवलदेवी और शाहजादे खिज़्रखाँका भी विवाह हो गया। मुबारिक शाहने सम्राट् बन अपने भ्राता खिज़्र ख़ानको ग्वालियरके निकट बन्द कर मारा और देवलदेवीको घरमें डाला था। खिज़्र ख़ान और देवलदेवीका प्रणय कथापर तद्गानीन्तन राजकवि अमीर ख़ुसरो एक सुन्दर फ़ारसी काव्य लिख गये हैं। इतिहासलेखक मुसलमानोंने कमलादेवीको 'कंवला देवी' कहा है।
{{outdent|कमलानन्दन—कमलाके पुत्र दिनकर मिश्र।}}
{{outdent|कमलानिवास (सं० पु०) लक्ष्मीका वासस्थान, कमल।}}
{{outdent|कमलापति (सं० पु०) कमलायाः पतिः, ६-तत्। लक्ष्मीके स्वामी, विष्णु।}}
{{outdent|कमलायताक्ष (सं० त्रि०) कमलके समान दीर्घ चक्षु रखनेवाला, जिसके कमलकी तरह बड़ी आँख रहे।}}
{{outdent|कमलायुध (सं० पु०) १ संस्कृतके एक प्राचीन कवि। २ कान्यकुब्जके एक प्राचीन नृपति।}}
{{outdent|कमलालय (सं० स्त्री०) मन्द्रालप्रान्तीय तञ्जौर जिलेके तिवलूर नगरका एक पवित्र तीर्थ। यहाँ महादेवकी लिङ्गमूर्ति विद्यमान है।}}
{{outdent|कमलालया (सं० स्त्री०) कमलं आलयो यस्याः। कमलमें रहनेवाली लक्ष्मी।}}
{{outdent|कमलासख (सं० पु०) कमलायाः सखा, टच्, ।<small>राजा० सखिष्टच्, १। ५। ५४ । ९।</small>लक्ष्मीके सखा विष्णु।}}
{{outdent|कमलासन (सं० पु०) कमलं आसनं यस्य, बहुव्री०। १ कमलपर बैठनेवाले ब्रह्मा।<small>"आत्मानं पूर्ण' कमलासनेन।" (कुमार)</small> (स्त्री०) कमलाया लक्ष्म्या असनं क्षेपणं दानमित्यर्थः। २ लक्ष्मीका दान। ३ पद्मासन। यह दो प्रकार -होता है—बद्ध और मुक्त। मुक्तमें वामपद पहले दक्षिण पदकी जङ्घापर चढ़ाया जाता, फिर दक्षिणपद वामपदकी जङ्घापर आता है। अन्तको दोनों हाथकी हथेली जानुपर खुली रखते हैं।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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</small>
{{rh|'''४९'''|'''कमलासनस्थ—कमलेक्षण'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
इसी प्रकार मेरुदण्डको सीधा कर बैठनेका नाम मुक्त पद्मासन है। बद्ध पद्मासनमें पदोंके चढ़ानेका नियम तो ऐसा ही रहता है। किन्तु वाम हस्तको पीठके पीछे घुमा वाम पदका और दक्षिण हस्तको पीठके पीछे घुमा दक्षिण पदका अङ्गुष्ठ पकड़ते हैं। फिर चिबुक वक्षःस्थलपर जमा और नासाके अग्रभागपर दृष्टि लगा सीधे बैठा जाता है। यह पद्मासन अति उत्तम रहता और घण्टे आधा घण्टे अभ्यस्त होनेपर साधकके सब रोग हरता है।
{{outdent|कमलासनस्थ (सं० पु०) कमलं विष्णोर्नाभिकमलं तद्रूपे आसने तिष्ठति, कमल-आसन-स्था-क। विष्णुके नाभिकमलपर रहनेवाले ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमलाहट्ट (सं० पु०) काश्मीरका एक बाजार। काश्मीरकी रानी कमलायतीने इसे लगाया था।}}{{Right|<small>(राजतरङ्गिणी ४।२०८)</small>}}
{{outdent|कमलाल्लास (सं० पु०) पद्मका खुलना या मुँदना, कँवलके फूलने या बंद होनेकी हालत।}}
{{outdent|कमलाकर—संस्कृतके एक प्राचीन ग्रन्थकार। यह नृसिंहके पुत्र, कृष्णके पौत्र और दिवाकरके प्रपौत्र रहे। इन्होंने अपूर्वभावनोपत्ति, जातकतिलक, ज्योतिष्पतिविचार, त्रिंशती, मनोरमाभ्यासब्याख्याटीका, मेघाङ्गणगणना, सिद्धान्ततत्त्वविवेक (यह १५०९ ई०को बनारसमें लिखा गया) और सूर्यसिद्धान्तटीका सौरवासना ग्रन्थ लिखा है।}}
{{outdent|कमलाकर देव—आनन्दविलास नामक ग्रन्थके रचयिता।}}
{{outdent|कमलाकर भट्ट—एक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थकार। १६१६ ई०को इन्होंने 'निर्णयसिन्धु' बनाया था। इनके लिखे ग्रन्थ यह हैं—अग्निनिर्णय, आचारदीप वा आचारदीपिका, आश्वलायनशाखा-श्राद्धप्रयोग, आह्निकविधि, उत्तरपाद, ऐन्द्रीमहाशान्ति-सहित-राजाभिषेकप्रयोग, कर्मविपाकरत्न, कल्पलताहीन-प्रयोग, काव्यप्रकाश-व्याख्या, क्रियापाद, गयाकृत्य, गोतगोविन्दभाष्यरत्नमाला, गोलप्रवर-निर्णय वा गोत्र-प्रवरदर्पण, ग्रहयज्ञ, ग्रहोद्विधानपद्धति, जलाशयोत्सर्गविधि, -जोतिर्विदारविधि, तन्त्रवार्तिकटीका, तिल-गर्भदानप्रयोग, तीर्थयात्रा, तुलापद्धति, विप्रप्रदान-}}
{{Left|Vol.IV.13|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
विधि, त्रिस्थलीसेतु, दानकमलाकर, दायविभाग, धर्मतत्त्व, नारायणबलिप्रयोग, निर्णयसिन्धु, नीतिकमलाकर, पशुबन्ध, पशुलाङ्गुलदानविधि, पीठभक्तितरङ्गिणी, पूर्तकमलाकर, प्रतिष्ठाविधि, प्रवरदर्पण, प्रायश्चित्तरत्न, बहुचाह्निक, भक्तिरत्न, भाषाषाढ़, मन्त्रकमलाकर, रजतदानप्रयोग, रथदानविधि, रामकल्पद्रुम, राम-कौतुकमहाकाव्य, लक्षणोमविधि, लिङ्गार्चाप्रतिष्ठाविधि, विघ्नेशदानविधि, विवादताण्डव, विश्रवचक्रदानविधि, व्यवहार, व्रतकमलाकर, व्रतार्क, शतचण्डीसहस्रचण्डी-प्रयोग, शतमान-दानविधि, शान्तिरत्न वा शान्तिरत्नाकार, शास्त्रदीपिकालोक, शास्त्रमाला, शिवप्रतिष्ठा, शूद्रधर्मतत्त्व, श्राद्धनिर्णय, श्राद्धसार, श्रावणीप्रयोग, श्वेताश्वदानविधि, षोडशसंस्कार, संस्कारपद्धति, समय-कमलाकर, सरस्वतीदानविधि, सर्वशाखार्थनिर्णय, सहस्रचण्डीमण्डपप्रयोगपद्धति, सुवर्णपृथिवीदानविधि, स्थालीपाकप्रयोग, हिरण्यगर्भदानविधि और कमलाकरम्हात्म्य। नृसिंहने स्मृत्यर्थसागर, पुरुषोत्तमने द्रव्यशुद्धिदीपिका और बालकृष्णे ऋग्वेददेवताक्रम-नामफ़ ग्रन्थमें इनका वचन उद्धृत किया है।
{{outdent|कमलाकरभट्ट—संस्कृतके एक प्राचीन विद्वान्। वासवदत्तामें सुबन्धुने इनका उल्लेख किया है।}}
{{outdent|कमलिनी (सं० स्त्री०) कमलानि सन्ति अत्र, कमल-इनि।<small>पुष्करादिभ्यो देये। पा ५।२।११६। </small>१ पद्मिनी, कँवलका पेड़। यह शीतल, गुरु, मधुर, लवण, रुक्ष, पित्त, असृक् तथा कफघ्न और वात एवं विष्टम्भकर होती है। कमलिनीका कन्द शीत, तुवर, मधुर, तिक्त, पाकमें अति कटु, लघु, ग्राहक, वातकृत् और कफ एवं पित्तनाशक है।<small> (वैद्यकनिघण्टु)</small>२ पद्माकर, कँवलोंका खज़ाना। जिस सरोवर वा हदमें बहुतसे कमल रहते, उसे ही कमलिनी कहते हैं। ३ गङ्गा।}}
{{C|<small> "हसन्ती कमलिनी कान्तिः कश्चित्संशयिनी।।"(काव्यकल्प १२/१०)</small>}}
{{outdent|कमली (सं० पु०) ब्रह्मा।}}
{{outdent|कमली (हिं० स्त्री०) छोटा कम्बल, कमरी।}}
{{outdent|कमलेक्षण (सं० त्रि०) कमलुमिव ईक्षणं यस्य, बहुव्री०। पद्म चक्षु, कँवलकी तरह ख़ूबसूरत आँखें रखनेवाला।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५०'''|'''कमलेश—कमाना'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कमलेश (सं० पु०) कमलायाः ईशः विष्णु।}}
{{outdent|कमलेश्वर (सं० स्त्री०) एक तीर्थ। (ह०प्र० २६०) किसी किसी पुस्तकमें कमलेश्वरके स्थानपर 'कामके-श्वर' पाठ देख पड़ता है।}}
{{outdent|कमलो (हिं० पु०) उष्ट्र, ऊँट, साँड़िया।}}
{{outdent|कमलोत्तर (सं० क्ली०) कमलसिव उत्तरं श्रेष्ठं कमला-दुत्तरं उत्तममिव वा। कुसुमपुष्प, कुसुमका फल।}}
{{outdent|कमवाना (हिं० क्रि०) १ लाभ करवाना, दिलवाना। २ मलमूत्र उठवाना, साफ़ करवाना। ३ मुण्डन करवाना, बाल बनवाना। ४ संस्कार करवाना, सुधारवाना।}}
{{outdent|कमसमझो (हिं० स्त्री०) मन्दमतिता, नाफ़हमी, बेवकूफ़ी।}}
{{outdent|कमसरियट (अं० पु० = Commissariat) सेनाका एक विभाग, फ़ौजका कोई महकमा। यह सेनाको खाद्यादि सामग्री पहुँचाता है।}}
{{outdent|कमसिन (फ़ा० वि०) अल्पवयस्क, जो उम्रमें छोटा हो।}}
{{outdent|कमसिनी (फ़ा० स्त्री०) शैशव, लड़कपन।}}
{{outdent|कमह्रा (हिं० वि०) कार्यकारी, कामकाजी।}}
{{outdent|कमहिम्मत (फ़ा० वि०) भीरुहृदय, डरपोक।}}
{{outdent|कमहिम्मती (फ़ा० स्त्री०) भीरुता, बुज़दिली, डरपोक।}}
{{outdent|कमा (सं० स्त्री०) कम-क्विप्, भावे अ-टाप्। शोभा, खूबसूरती, चमक।}}
{{outdent|कमाई,<small> कमायी देखो।</small>}}
{{outdent|कमाऊ,<small>कमायू देखो।</small>}}
{{outdent|कमाची (हिं० स्त्री०) १ कमचिका, कमची। २ कमानचा, झुकी हुई तीली।}}
{{outdent|कमाण्डर (अं० पु० = Commander) सेनाध्यक्ष, सरदार, सरगिरोह। यह अफसर फ़ौजमें लफ़टनण्टके ऊपर और कपतानके नीचे काम करता है।}}
{{outdent|कमाण्डर-इन-चीफ़ (अं० पु० = Commander-in-chief) प्रधान सेनाध्यक्ष, सिपह-सालार, जङ्गी लाट।}}
{{outdent|कमान (फ़ा० स्त्री०) १ कामुक, धनुष, चाप, कमठा। २ खण्डमण्डल, तोरण, मेहराब। ३ इन्द्र-}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
धनुः, इन्द्रधनुष, क़ौस-क़ुज़ह। ४ सोढ़नाड़ी, धमन्यङ्ग, तोय, तूफ़क, बन्दूक। ५ व्यायामविशेष, एक कसरत। इसमें मालखम्बपर कसरत करनेवाला कमानकी तरह टेढ़ा पड़ जाता है। ६ यन्त्रविशेष, एक औज़ार। इससे आस्तरण बुना जाता है। ७ यन्त्रभेद, कोयो औज़ार। इसमें दो पदार्थोंके मध्यका अन्तर निर्धारित होता है। (वि०) ८ झुकनेयोग्य, नमनयोग्य, लचीला। ९ वक्र, टेढ़ा, झुका हुआ।
{{outdent|कमान (हिं० स्त्री०) १ आदेश, हुक्म। २ अधिकार, इख़्तियार। यह अँगरेज़ोके कमाण्ड (Command) शब्दका अपभ्रंश है।}}
{{outdent|कमान-अफ़सर (हिं० पु०) आज्ञापक पुरुष, हुक्म देनेवाला, सरदार। यह अँगरेज़ोके कमाण्डिङ्ग आफ़िसर (Commanding officer) शब्दका अपभ्रंश है।}}
{{outdent|कमानगर (फ़ा० पु०) १ कामुककार, कमान बनानेवाला। २ अस्थि-योजयिता, हड्डी जोड़नेवाला।}}
{{outdent|कमानगरी (फ़ा० स्त्री०) १ कामुकविधान, कमान-बनानेका काम। २ अस्थियोजना, हड्डीकी जुड़ायो।}}
{{outdent|कमानचा (फ़ा० पु०) १ क्षुद्र कामुक, छोटा कमान, कमठा। २ सारङ्गी, चीतारा, किँगरी। ३ सारङ्गीका क्षुरिकात्मकविशिष्ट पदार्थ, लीड़िको कमानी। ४ खण्डमण्डलाकार पटल, मेहराबदार छत। ५ विविक्तभवन, पोशीदा कमरा।}}
{{outdent|कमानदार (फ़ा० वि०) १ खण्डमण्डलाकार, मेहराबदार। (पु०) २ धनुर्धर, कमान लिये हुआ।}}
{{outdent|कमानदार (हिं० पु०) आज्ञापक, सेनापति, सरदार, सरगिरोह।}}
{{outdent|कमाना (हिं० क्रि०) १ उपार्जन करना, घर भरना। २ परिश्रम करना, मरना-मिटना। ३ अभ्यास बढ़ाना, मश्क़पर लाना। ४ परिष्कार करना, मसालेसे भरना। ५ मलमूत्र उठाना, झाड़ लगाना। ६ भूमि प्रस्तुत करना, जोतने-बोने भरना। ७ पौषणमें निर्वाह करना, किन्नाड़ेसे पेट भरना। ८ धनोपार्जन करना, रुपयेकी पैदावमें पड़ना। ९ क्षुर पछाना, बाल बनाना। १० न्यून बनाना, घटाना।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५१'''|'''कमानिया—कमौला'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कमानिया (हिं० पु०) धातुष्क, कमानदार।}}
{{outdent|कमानी (फ़ा० स्त्री०) १ स्थिति-स्थापकत्व-विशिष्ट पदार्थ, कोयी लचीली चीज़। जैसे—तीक्ष्णायस दण्ड पात्र वा व्यावर्त्तन, भारतीय घर्षक पिण्ड, संहत समीरकका समवाय। यह द्रव्य नाना प्रकार यन्त्र-विषयक कार्यमें लगता है। कमानीसे बल पाते या पहुँचाते, गतिको नियमपर लाते, गुरुत्व वा अन्य शक्ति नापते और सरुष्ट लगाते हैं। यन्त्र सामग्रीमें इसके जो प्रधान भेद चलते, उन्हें नीचे लिखते हैं—१ संश्लिष्ट (पेचदार), २ व्यावर्त्तित (लचीली या बालकपानी), ३ विलोम (मरगोल), ४ अण्डाकार (बैज़ावी), ५ अर्द्धाण्डाकृति (निस्फ़-बैज़ावी), ६ प्रधान (बड़ी), ७ साटोप (ऐंठादार)। यह लोह वा पीत्तलसे बनती है। भारतीय घर्षक (रावरकी) तथा वायव (हवायी) कमानी अर्द्धाण्डाकार रहती और चलनशील (चलते) द्रव्यपर लगती है। यह घड़ी या पङ्खा चलाती, झटका बचाती, तोल ठहराती और धक्का खगाती है। दबानेसे दब जाते भी कमानी अपने आप ऊपर उठ आती है।}}
२ वक्र एवं नमनशील लौहशलाका, लोहेकी झुकी हुयी लचकदार तीली। यह छाते और चश्मे वगै-रहमें लगती है। ३ मेखलाविशेष, एक पेटी। यह चर्ममय होती है। इस कमानीके भीतर कौधमय एवं नमनशील पट्ट रहता है। फिर उभय प्रान्तपर उपाधान लगा देते हैं। जिस रोगीका अन्त्र उतरता, वह कटिमें कमानी कसता है। इससे अन्त्र उतरने नहीं पाता। ४ धनुषाकार काष्ठविशेष, झुकी हुयी कोई लकड़ी। इसके दोनों प्रान्त रज्जु, लोहसूत्र वा कुम्मलसे बँधे रहते हैं। ५ वंशखण्डविशेष, बांसकी एक फट्टी। यह सूक्ष्म रहती और दरी बुननेके यन्त्रमें लगती है। ६ लोहनाड़ीके तालकका विशीर्ण स्थितिस्यापकत्व विशिष्ट पदार्थ, बन्दूकके तालेकी सूखी कमानी।
{{outdent|कमानीदार (फ़ा० वि०) स्थितिस्यापकत्वविशिष्ट पदार्थयुक्त, जो कमानी रखता हो।}}
{{outdent|कमायन (हिं० स्त्री०) कमानचा, सारङ्गीका गज़।}}
{{outdent|कमायी (हिं० स्त्री०) १ उपार्जित, लभ्यांश, उजरत, आमदनी। २ लाभ, फ़ायदा। ३ उद्यम, कामकाज।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|कमाल (अ० पु०) १ सिद्धि, तकमील, पूरापन। २ आश्चर्य, ताज्जुब, अच्म्भा। ३ कौशल, होशियारी। ४ नैपुण्य, कारीगरी। ५ कबीरके पुत्र। यह भी एक पहुँचे साधु थे। कबीरकी बात काट डालना इनका लक्ष्य रहा। (वि०) ६ सिद्ध, पूरा। ७ अत्यन्त, बहुत ज़्यादा।}}
{{outdent|कमाऊ (हिं० वि०) उपार्जन करनेवाला, जो पैदा करता हो।}}
{{outdent|कमासुत (हिं० वि०) धनोपार्जन करनेवाला, जो रुपया कमाता हो।}}
{{outdent|कमिता (सं० पु०) कम-णिच्-भावे क्वच्। कामुक, मस्त, चाहनेवाला।}}
{{outdent|कमिशनर (अं० पु० = Commissioner) १ नियोजी, मुख्य तारकार। २ अधिकारी, अमीन। माल और पुलिसके बड़े अफ़सरको भी कमिशनर कहते हैं।}}
{{outdent|कमी (फ़ा० स्त्री०) १ न्यूनता, कोताही, घाटा। २ अप्राप्ति, कमयाबी, तङ्गी। ३ हानि, नुक़सान्। ४ ह्रास, तकलील, उतार। ५ अपचय, गबन, ग़ावग़प। ६ उपशम, तख़फ़ीफ़, नरमी।}}
{{outdent|कमीज़ (हिं० स्त्री०) पुतक, अधोवसन, पहननेका एक कपड़ा। यह एक प्रकारका कुर्ता है। इसमें कली और चौबगला नहीं लगाते। पीठ पर चुन्नट पड़ती है। फिर हाथमें कफ़ और गलेमें कॉलर भी रहता है। भारतीयोंने अँगरेज़ोंसे कमीज़ पहनना सीखा है। अरबीमें इसे क़मीस कहते हैं।}}
{{outdent|कमीनगाह (अ० स्त्री०) निभृत स्थान, घातकी जगह।}}
{{outdent|कमीना (फ़ा० वि०) अधम, जघन्य, कम-बख़्त, रज़ील, पाजी, ओछा।}}
{{outdent|कमीनापन (हिं० पु०) जघन्यता, कम-बख़्ती, ओछापन।}}
{{outdent|कमीनी बाछ (हिं० स्त्री०) करविशेष, किसौकिसको उगाहो। यह कर गांवमें खेती न करनेवाले नीच लोग ज़मीन्दारको देते हैं।}}
{{outdent|कमौला, कमीना देखो।}}
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Sweta rani Gupta
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<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कमानिया (हिं० पु०) धातुष्क, कमानदार।}}
{{outdent|कमानी (फ़ा० स्त्री०) १ स्थिति-स्थापकत्व-विशिष्ट पदार्थ, कोयी लचीली चीज़। जैसे—तीक्ष्णायस दण्ड पात्र वा व्यावर्त्तन, भारतीय घर्षक पिण्ड, संहत समीरकका समवाय। यह द्रव्य नाना प्रकार यन्त्र-विषयक कार्यमें लगता है। कमानीसे बल पाते या पहुँचाते, गतिको नियमपर लाते, गुरुत्व वा अन्य शक्ति नापते और सरुष्ट लगाते हैं। यन्त्र सामग्रीमें इसके जो प्रधान भेद चलते, उन्हें नीचे लिखते हैं—१ संश्लिष्ट (पेचदार), २ व्यावर्त्तित (लचीली या बालकपानी), ३ विलोम (मरगोल), ४ अण्डाकार (बैज़ावी), ५ अर्द्धाण्डाकृति (निस्फ़-बैज़ावी), ६ प्रधान (बड़ी), ७ साटोप (ऐंठादार)। यह लोह वा पीत्तलसे बनती है। भारतीय घर्षक (रावरकी) तथा वायव (हवायी) कमानी अर्द्धाण्डाकार रहती और चलनशील (चलते) द्रव्यपर लगती है। यह घड़ी या पङ्खा चलाती, झटका बचाती, तोल ठहराती और धक्का खगाती है। दबानेसे दब जाते भी कमानी अपने आप ऊपर उठ आती है।}}
२ वक्र एवं नमनशील लौहशलाका, लोहेकी झुकी हुयी लचकदार तीली। यह छाते और चश्मे वगै-रहमें लगती है। ३ मेखलाविशेष, एक पेटी। यह चर्ममय होती है। इस कमानीके भीतर कौधमय एवं नमनशील पट्ट रहता है। फिर उभय प्रान्तपर उपाधान लगा देते हैं। जिस रोगीका अन्त्र उतरता, वह कटिमें कमानी कसता है। इससे अन्त्र उतरने नहीं पाता। ४ धनुषाकार काष्ठविशेष, झुकी हुयी कोई लकड़ी। इसके दोनों प्रान्त रज्जु, लोहसूत्र वा कुम्मलसे बँधे रहते हैं। ५ वंशखण्डविशेष, बांसकी एक फट्टी। यह सूक्ष्म रहती और दरी बुननेके यन्त्रमें लगती है। ६ लोहनाड़ीके तालकका विशीर्ण स्थितिस्यापकत्व विशिष्ट पदार्थ, बन्दूकके तालेकी सूखी कमानी।
{{outdent|कमानीदार (फ़ा० वि०) स्थितिस्यापकत्वविशिष्ट पदार्थयुक्त, जो कमानी रखता हो।}}
{{outdent|कमायन (हिं० स्त्री०) कमानचा, सारङ्गीका गज़।}}
{{outdent|कमायी (हिं० स्त्री०) १ उपार्जित, लभ्यांश, उजरत, आमदनी। २ लाभ, फ़ायदा। ३ उद्यम, कामकाज।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|कमाल (अ० पु०) १ सिद्धि, तकमील, पूरापन। २ आश्चर्य, ताज्जुब, अच्म्भा। ३ कौशल, होशियारी। ४ नैपुण्य, कारीगरी। ५ कबीरके पुत्र। यह भी एक पहुँचे साधु थे। कबीरकी बात काट डालना इनका लक्ष्य रहा। (वि०) ६ सिद्ध, पूरा। ७ अत्यन्त, बहुत ज़्यादा।}}
{{outdent|कमाऊ (हिं० वि०) उपार्जन करनेवाला, जो पैदा करता हो।}}
{{outdent|कमासुत (हिं० वि०) धनोपार्जन करनेवाला, जो रुपया कमाता हो।}}
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{{outdent|कमिशनर (अं० पु० = Commissioner) १ नियोजी, मुख्य तारकार। २ अधिकारी, अमीन। माल और पुलिसके बड़े अफ़सरको भी कमिशनर कहते हैं।}}
{{outdent|कमी (फ़ा० स्त्री०) १ न्यूनता, कोताही, घाटा। २ अप्राप्ति, कमयाबी, तङ्गी। ३ हानि, नुक़सान्। ४ ह्रास, तकलील, उतार। ५ अपचय, गबन, ग़ावग़प। ६ उपशम, तख़फ़ीफ़, नरमी।}}
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{{outdent|कमानिया (हिं० पु०) धातुष्क, कमानदार।}}
{{outdent|कमानी (फ़ा० स्त्री०) १ स्थिति-स्थापकत्व-विशिष्ट पदार्थ, कोयी लचीली चीज़। जैसे—तीक्ष्णायस दण्ड पात्र वा व्यावर्त्तन, भारतीय घर्षक पिण्ड, संहत समीरकका समवाय। यह द्रव्य नाना प्रकार यन्त्र-विषयक कार्यमें लगता है। कमानीसे बल पाते या पहुँचाते, गतिको नियमपर लाते, गुरुत्व वा अन्य शक्ति नापते और सरुष्ट लगाते हैं। यन्त्र सामग्रीमें इसके जो प्रधान भेद चलते, उन्हें नीचे लिखते हैं—१ संश्लिष्ट (पेचदार), २ व्यावर्त्तित (लचीली या बालकपानी), ३ विलोम (मरगोल), ४ अण्डाकार (बैज़ावी), ५ अर्द्धाण्डाकृति (निस्फ़-बैज़ावी), ६ प्रधान (बड़ी), ७ साटोप (ऐंठादार)। यह लोह वा पीत्तलसे बनती है। भारतीय घर्षक (रावरकी) तथा वायव (हवायी) कमानी अर्द्धाण्डाकार रहती और चलनशील (चलते) द्रव्यपर लगती है। यह घड़ी या पङ्खा चलाती, झटका बचाती, तोल ठहराती और धक्का खगाती है। दबानेसे दब जाते भी कमानी अपने आप ऊपर उठ आती है।}}
२ वक्र एवं नमनशील लौहशलाका, लोहेकी झुकी हुयी लचकदार तीली। यह छाते और चश्मे वगै-रहमें लगती है। ३ मेखलाविशेष, एक पेटी। यह चर्ममय होती है। इस कमानीके भीतर कौधमय एवं नमनशील पट्ट रहता है। फिर उभय प्रान्तपर उपाधान लगा देते हैं। जिस रोगीका अन्त्र उतरता, वह कटिमें कमानी कसता है। इससे अन्त्र उतरने नहीं पाता। ४ धनुषाकार काष्ठविशेष, झुकी हुयी कोई लकड़ी। इसके दोनों प्रान्त रज्जु, लोहसूत्र वा कुम्मलसे बँधे रहते हैं। ५ वंशखण्डविशेष, बांसकी एक फट्टी। यह सूक्ष्म रहती और दरी बुननेके यन्त्रमें लगती है। ६ लोहनाड़ीके तालकका विशीर्ण स्थितिस्यापकत्व विशिष्ट पदार्थ, बन्दूकके तालेकी सूखी कमानी।
{{outdent|कमानीदार (फ़ा० वि०) स्थितिस्यापकत्वविशिष्ट पदार्थयुक्त, जो कमानी रखता हो।}}
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{{outdent|कमाल (अ० पु०) १ सिद्धि, तकमील, पूरापन। २ आश्चर्य, ताज्जुब, अच्म्भा। ३ कौशल, होशियारी। ४ नैपुण्य, कारीगरी। ५ कबीरके पुत्र। यह भी एक पहुँचे साधु थे। कबीरकी बात काट डालना इनका लक्ष्य रहा। (वि०) ६ सिद्ध, पूरा। ७ अत्यन्त, बहुत ज़्यादा।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५२'''|'''कमीशन—कम्पन'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कमीशन (अं० स्त्री० = Commission) १ आचरण, इरतिकाब, करतव। २ समर्पण, सुपुर्दगी। ३ अधिकार, इख़्तियार। ४ आदेश, हुक्म। ५ परार्थ-विक्रय, दलाली। ६ नियुक्तजन, जमात, जथा।}}
{{outdent|कमीस (अ० स्त्री०) कमीज, किसी क़िस्मका कुरता।}}
{{outdent|कमुकन्दर (हिं० पु०) धनु भञ्जनकारी रामचन्द्र।}}
{{outdent|कमुवा (हिं० पु०) नौदण्डका मुष्टि, नाव चलानेके डाँडका कब्जा।}}
{{outdent|कमून (अ० पु०) जीरक, जीरा।}}
{{outdent|कमूनी (फ़ा० वि०) १ जीरक-सम्बन्धीय, जीरेसे ताल्लुक रखनेवाला। जीरकके अवलेहको 'जवारिश कमूनी' कहते हैं। (स्त्री०) २ औषधविशेष, एक दवा। इसमें जीरा बहुत पड़ता है।}}
{{outdent|कमूल, कमलाई देखों।}}
{{outdent|कमेटी (अं० स्त्री० = Committee) कार्यसम्पादिका सभा, पंचायत।}}
{{outdent|कमेढ़ी (हिं० स्त्री०) कुमरी, कपोतिका।}}
{{outdent|कमेरा (हिं० पु०) कर्मकार, मजदूर, नौकर। प्रधानतः खेतीके काम करनेवाले नौकरको 'कमेरा' कहते हैं।}}
{{outdent|कमैला (हिं० पु०) १ सुना, वध्यस्थान, क़त्लगाह। २ कमैला, एक पौधा।}}
{{outdent|कमेछरा (हिं० पु०) संस्थानविशेष, एक साँचा। यह मट्टीका होता है। इसमें कसकुटकी चूड़ियां ढाली जाती हैं।}}
{{outdent|क मोदन (हिं० स्त्री०) कुमुदिनी, कोकावेली।}}
{{outdent|कमोदपुष्प (सं० क्ली०) जलपुष्पविशेष, पानीमें होने-वाला एक फूल।}}
{{outdent|कमोदिक (हिं० पु०) १ कमोदराग गानेवाला। २ गायक, ग्वैया।}}
{{outdent|कमोदिन (हिं० स्त्री०) कुमुदिनी, कोकावेली।}}
{{outdent|कमोना—युक्तप्रदेशके बुलन्दशहर जिलेका एक ग्राम। यह काली नदीके दक्षिण तटसे थोड़ी दूर अवस्थित है। यहाँ एक प्रसिद्ध दुर्ग विद्यमान है।}}
{{outdent|कमोरा (हिं० पु०) १ मृत्पात्रविशेष, मट्टीका एक बरतन। इसका मुख प्रशस्त रहता है। इसमें दुग्ध}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
दुहते और रखते हैं। यह दही जमानेके काम भी आता है। २ घट, घड़ा।
{{outdent|कमोरी (हिं० स्त्री०) क्षुद्र मृत्पात्रविशेष, मट्टीका एक छोटा बरतन। इसका मुख प्रशस्त रहता है। यह दुग्ध दुहने तथा रखने और दही जमानेके काम आती है।}}
{{outdent|कम्प (सं० पु०) कपि भावे घञ् इदित्वात् नुम्। १ स्फुरण, थरथरि, थरथराहट, कपकपी। इसका संस्कृत पर्याय—वेपथु, वेपन, वेप और कम्पन है। २ उच्चारणविशेष, एक तन्त्रफ़ुज़ून। यह स्वरितका एक संस्कार है। स्वरितके आगे उदात्त स्वर आनेसे इस स्फुरणकी आवश्यकता पड़ती है। ३ वेपथु, बुखारकी कपकपी। ४ अनुभावविशेष। यह शृङ्गार-रसका सात्त्विक अनुभाव है। इसमें शीत, कोष, भय-प्रभृतिसे अकस्मात् शरीर कंपने लगता है। ५ कंगनी, उभरा हुआ दीवारका किनारा। यह मन्दिरों औत्-स्तम्भोंके नीचे रहती है।}}
{{outdent|कम्प (अं० पु० = Camp) १ शिविर, डेरा, खेमा। २ सैन्यनिवास, पड़ाव, छावनी। ३ सेना, फ़ौज, लश्कर।}}
{{outdent|कम्पज्वर (सं० पु०) कम्पयुक्तो ज्वरः, मध्यमपदलो०। शीतज्वर, विषम, तपज्वरज्, जुड़ो। यह ज्वर वायुसे उत्पन्न होता है। <Small>ज्वर देखो।</small>}}
{{outdent|कम्पति (सं० पु०) समुद्र, सागर।}}
{{outdent|कम्पन (सं० त्रि०) कपि-युच् इदित्वात् नुम्। १ कम्पयुक्त, कांपनेवाला, जिसको कपकपी लगी हो या जो कांपता हो। इसका संस्कृत पर्याय—चलन, क्रम्य, चल, लोल, चलाचल, चञ्चल, तरल, पारिप्लव, परिप्लव, चपल और चटुल है। २ कम्पकारक, कंपानवाला। (पु०-क्ली०) ३ कम्प, कपकपी। ४ शीतऋतु, जाड़ेका मौसम। ५ एक राजा।}}
{{c|{{x-smaller|<poem> "काम्पोश्राणः कनठः कम्पनम्त महाबलः।
सततः कम्पयामास यवनानेक एष यः॥" (महाभारत १२।४९)</poem>}}}}
६ अस्त्रविशेष, एक हथियार। ७ सन्निपातजन्य ज्वर-विशेष, एक बुखार। भावमिश्रने कफोल्बण सन्नि-पात ज्वरको ही कम्पन कहा है,—
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५३'''|'''कम्पना—कम्बन्'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{c|{{x-smaller|<poem>“लघुता गात्ररुग् वायो रात्रौ निद्रा मन्दतापि।
प्रसन्ने नयने यस्य सुखमाधुर्य्यमेव च॥
कफोल्बण लिङ्गानि सन्निपातस्य लक्षयेत्।
सुनिप्तिः सन्निपातो द्व्यङ्गकः कम्पनसञ्ज्ञकः॥” (भावप्रकाश)</poem>}}}}
कफोल्बण सन्निपातमें शरीरमें जड़ता आती, वाणी गद्गद् पड़ जाती, रात्रिको निद्रा अधिक सताती, आँख सुखाती और मुखमें मिठास दिखाती है। सुनि-योंने इसी ज्वरका नाम कम्पन रखा है। ८ कश्मीर-निकटवर्ती एक नगर। ९ उच्चारणविशेष, एक तन्फ़-फ़ुज़। १० कंपायी, हिलने डुलनेकी हालत।
{{outdent|कम्पना (सं० स्त्री०) कम्पन-टाप्। १ नदीविशेष, एक दरिया। २ सेना, फ़ौज।}}
{{outdent|कम्पनीय (सं० त्रि०) कम्पन-ढक। चलनशील, मुंतहर्रिक, जो हिल-डुल सकता हो।}}
{{outdent|कम्पमान (सं० त्रि०) कपि-शानच्, इदित्वात् नुम्। कम्पयुक्त, जो कांपता हो।}}
{{outdent|कम्पयत् (सं० त्रि०) कांपानेवाला, जो हिलाता डुलाता हो।}}
{{outdent|कम्पल्लक्षण (सं० पु०) कम्पः चलनं लक्षं लक्षणं यस्य, बहुव्री०। वायु, हवा।}}
{{outdent|कम्पवायु (सं० पु०) कम्पः कम्पकरः वायुः। वात-रोगविशेष, वायुकी एक बीमारी। इसमें सब शरीर कंपने लगता है। <Small>वायेव्याधि देखो। </Small>}}
{{outdent|कम्पा (सं० स्त्री०) कपि भावे अ-टाप्। कम्पन, कंपकंपी।}}
{{outdent|कम्पाक (सं० पु०) कम्पया चलनेन कायति प्रकाशते, कम्प कै-क। वायु, हवा।}}
{{outdent|कम्पान्वित (सं० त्रि०) कम्पयुक्त, कांपनेवाला, जो घबराया हो।}}
{{outdent|कम्पित (सं० क्ली०) कपि भावे क्त। १ कम्पन, कंपकंपी। (त्रि०) २ कम्पयुक्त, कांपनेवाला। ३ कंपाया, जो हिलाया डुलाया गया हो।}}
{{outdent|कम्पिल (सं० पु०) कम्प-इलच्। १ रोचनी, सफ़ेद नौसादर। इसका संस्कृत पर्याय—कम्पिल्ल, कम्पिल्लक, कम्बिल्ल, कम्पिल्लक, रक्ताङ्ग, रेची, रेचनक, रञ्जक, लोहिताङ्ग और रक्ताचूर्णक है। राजनिघण्टु के मतसे}}
{{Left| vol. Iv. 14|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यह विरेचक, कटु, उष्ण एवं लघु और व्रण, कफ, कास तथा तन्तु कृमिनाशक है। फिर सुश्रुत इसके तैलको तिक्त, कटु, कषायरस एवं व्रणशोधक और अधोगत दोष, कृमि, कफ, कुष्ठ तथा वायुनाशक बताते हैं। २ युक्तप्रदेशके फ़रुख़ाबाद जिलेकी कायमगञ्ज तहसीलका एक ग्राम। महाभारतमें इसका नाम काम्पिल्य लिखा है।<small> काम्पिल्य देखो।</small>
{{outdent|कम्पिल्ला (सं० स्त्री०) घृतकुमारी, घेोकुआर।}}
{{outdent|कम्पिल्ल (सं० पु०) कम्प-इलच्। श्वेतविद्वत्, सफ़ेद नौसादर।}}
{{outdent|कम्पिल्लक (सं० पु०) कम्पिल्ल स्वार्थे कन्। श्वेत-विद्वत्, सफ़ेद नौसादर।}}
{{outdent|कम्पिल्लस्मालक (सं० पु०) बकुलभेद, किसी किसमकी मौलसिरी।}}
{{outdent|कम्पिल्लत्र,<small>कम्पिल्ल देखो।</small>}}
{{outdent|कम्पी (सं० त्रि०) कम्पी अस्यास्ति, कम्प-इनि। १ कम्पयुक्त, कांपनेवाला। २ कांपानेवाला, जो कांपाता हो।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
अनर्थज्ञो अल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥” (शिक्षा ५२)</poem>}}}}}}
{{outdent|कम्प्य (सं० त्रि०) कपि-णिच् कर्मणि यत्। १ चलन-शील, मुंतहर्रिक, जो हिलाया डुलाया जा सकता हो। २ स्फुरणके साथ उच्चारित होनेवाला, जो आवाजको हिला डुला कर बोला जाता हो।}}
{{outdent|कम्भ (सं० त्रि०) कम्भि-र।<small> नमिकम्पि स्म्यस्जकमहिंस-दीपो रः। पा ३।१।१३८। </small>कम्पान्वित, कांपनेवाला।
{{c|<small>“विषम्य कम्प्रति सुखानि कम्प्रति।” (नैषध २।४६)</small>}}
{{outdent|कम्भ्रा (सं० स्त्री०) कम्भ्र स्त्रियां टाप्। शाखा, डाल।}}
{{outdent|कम्बन्—दाक्षिणात्यके प्रसिद्ध तमिल कवि। मद्राज प्रान्तीय तञ्जूर जिलेके तेरैइन्दूर नामक ग्राममें इन्होंने जन्म लिया था। यह वल्लाल शूद्रवंशीय रहे। इन्होंने बारह वर्षके वयससे वाल्मीकि-रामायणका तमिल भाषामें अनुवाद आरम्भ किया और पचास वर्षके वयःक्रमकाल पूरा उतार दिया। चोलाधिप करिकाल चोल कवित्वके गुणसे मुग्ध हो इनकी प्रशंसा करते थे। फिर राजेन्द्र-चोलने इन्हें अपनी}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५४'''|'''कम्बम्—कम्बालिका'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
सभामें बोला राजकविका उपाधि दिया। यह ८०७ शकको विद्यमान रहे। इनका बनाया 'तमिल रामायण 'कम्बन्पादन्', 'काञ्चीवरम् पिल्लत्तामॆ', 'चोल-कुरुबेङ्गे' (करिकाल चोलका इतिहास) और 'कम्बन् अगराधि' नामक तमिल अभिधान दाक्षिणात्यमें प्रसिद्ध है। इन्होंने मदुरा नगरमें ६० वर्षके वयःक्रमकाल इहलोक छोड़ा था। (Wilson's Mackenzie Collection.)
कोई कोई इनका नाम कम्बर और जन्मस्थान तञ्जोर जिलेका कम्ब नाडू नामक ग्राम बताता है। इन्होंने रामायणका अपना तमिल अनुवाद राजेन्द्र चोलके समयमे प्रारम्भ कर कुलोत्तुङ्ग चोलके राज्यकाल पूरे उतारा था। (Caldwell's Dravidian Grammar, p. 134.)
{{outdent|कम्बम्—मद्रासप्रान्तके कर्गाल जिलेका एक नगर।}}
{{outdent|कम्बर (सं० पु०) कम्बे-अरन्। विविधवर्ण, चित्रवर्ण, गुनावून रंग। (त्रि०) २ नानाविध वर्ण-विशिष्ट, रंग-ब-रंग।}}
{{outdent|कम्बर—सिन्धुप्रदेशकी एक तहसील। यह अक्षा० २७° २८' एवं २७° ५६' ३०" उ० और देशा० ६७° ३५' ४५" तथा ६८° १०' पू०के मध्य अवस्थित है। भूमिकार परिमाण ९७७ वर्गमील पड़ता है। यहाँ प्रायः एक लक्ष मनुष्य रहते हैं। इसका अपर नाम शहादतपुर है। शिकारपुर जिलेसे यहाँ तहसील उठ आयी है। इसके प्रधान नगरका नाम भी कम्बर ही है। वह अक्षा० २७° ३५' उ० और देशा० ६८° २' ४५" पू०पर अवस्थित है। १८४४ ई०को बलुचियोंने उक्त नगर लूटा था। फिर दूसरे ही वर्ष अग्निप्रयोगसे कम्बर एककाल ध्वंस हो गया।}}
{{outdent|कम्बल (सं० पु०-क्ली०) कम्ब् ह्रादादित्वात् कलच्। १ मेषादिके लोमसे निर्मित एक वस्त्र, भेड़ वगैरहके बालसे बना एक कपड़ा। इसका संस्कृत पर्याय—रक्षक, वेश्मक, रोमयोनि, रेणुका और प्रावार है। इस देशमें कितने ही कम्बल व्यवहार करते हैं। पूर्व कम्बल कवचका कार्य देता था। किसी किसीके कथनानुसार कम्बलोंक्यो भिगो भरा पहननेसे बन्दूककी गोली-}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
तक शरीरमें घुस नहीं सकती। २ सर्पविशेष, कोई सांप। ३ गौ प्रभृतिके गलेका रोम, मवेशियोंकी गर्दनका बाल। ४ उत्तरीय, ऊनी चादर। ५ मृगविशेष, एक हिरन। ६ नागद्वय, सांपका जोड़ा। इसमें एक पाताळ और एक वरुण देवकी सभास्थलमें रहता है। ७ कृमिविशेष, एक कीड़ा। ८ तीर्थविशेष।
{{c|{{x-smaller|<poem>“प्रयागे सुप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरौ तथा।
तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः॥” (भारत, वन ८४ पृ०)</poem>}}}}
९ जल, पानी। १० लोणिकाशाक, लोनिया। ११ साक्षा।
{{outdent|कम्बलक (सं० पु०) कम्बल स्वार्थे कन्। कम्बल, ऊनी कपड़ा, ऊनी पोशाक।}}
{{outdent|कम्बलकारक (सं० पु०) कम्बलं करोति, कम्बल्ल-कृ-ण्वुल्। कम्ब लनिर्माता, ऊनी कपड़ा-बनानेवाला।}}
{{outdent|कम्बलधारक (सं० पु०) कम्बल-धृ-ण्वुल्। कम्बलधारी, ऊनी कपड़ा ओढ़नेवाला।}}
{{outdent|कम्बलधावक (सं० पु०) कम्बल परिष्कार करनेवाला, जो ऊनी कपड़ा धोता हो।}}
{{outdent|कम्बलबर्हिष (सं० पु०) १ धन्धकराजाके एक पुत्र। (भागवत ९।२४।११)}}
{{outdent|कम्बलवान् (सं० त्रि०) कम्बलोऽस्यास्ति, कम्बल-मतुप्, मस्य वः। १ कम्बलविशिष्ट, ऊनी कपड़ा रखनेवाला। २ प्रशस्त गलगम्बलविशिष्ट, गर्दनपर खूब बाल रखनेवाला।}}
{{outdent|कम्बलवाह्य (सं० पु०) रथविशेष, एक गाड़ी। इस पर मोटा कम्बल ढका रहता है। इस गाड़ीमें बैल ही जुतते हैं।}}
{{outdent|कम्बलवाह्यक, कम्बलवाह्य देखो।}}
{{outdent|कम्बलहार (सं० पु०) कम्बलं हरति, कम्बल-हृ-अण्। १ कम्बलहारक, ऊनी कपड़ा चोरानवाला। २ ऋषिविशेष।}}
{{outdent|कम्बलाणं (सं० क्ली०) कम्बलरूपं ऋणम्, कम्बल-ऋण वृद्धिः। (प्रवत्सरतरकम्बलवसनाण्ण दशानमृणे। पा ६।१।८९। (वार्तिक)}}
{{outdent|कम्बलरूप ऋण, ऊनी कपड़ेका ऋण।}}
{{outdent|कम्बालिका (सं० स्त्री०) कम्बल-इ-स्वार्थे कन् ह्रसः टाप्, च। १ क्षुद्र कम्बल, कमली। २ कम्बळमृगकी स्त्री।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''५५'''|'''कम्बलिवाह्यक—कम्बोज'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|कम्बलिवाह्यक (सं० क्ली०) कम्बलः वाह्यः अस्यस्य, कम्बलि-इनि; कम्बलिभिर् वाह्यते, कम्बलिन्-वह कर्मणि ण्यत् स्वार्थे संज्ञायां वा कन्। गोशकट, बैलगाड़ी। इसका संस्कृत पर्याय—गन्त्री और गान्द्री है।}}
{{outdent|कम्बली (सं० पु०) कम्बलः गलकम्बलः प्रशस्तोऽस्त्यस्य, कम्बल-इनि। १ वृष, बैल। (त्रि०) २ कम्बलाच्छादित, ऊनी कपड़ेसे ढका हुआ।}}
{{outdent|कम्बलीय (सं० त्रि०) कम्बलाय हितम्, कम्बल-छ। मेषलोमयुक्त, ऊनी कपड़ेके लायक।}}
{{outdent|कम्बल्या (सं० स्त्री०) कम्बल-यत्। कम्बलाय संज्ञायाम्। पा ३।१।१११ शतदलपरिमित ऊर्णा, सौपल ऊन।}}
{{outdent|कम्बालायी (सं० पु०) शङ्खविशेष, किसी किस्मकी घोंघ।}}
{{outdent|कम्बि (सं० स्त्री०) कसु वाधुलकात् विन्। १ दर्वी, डग्घा, चम्मच। २ वंशांकुर, बांसकी खपाच। ३ वंशांकुर, बांसकी कोपल।}}
{{outdent|कम्बिका (सं० स्त्री०) वादित्रविशेष, एक बाजा।}}
{{outdent|कम्बु (सं० पु०) कम-उण्-मुक च। १ शङ्ख, घोंघा, कौड़ी। २ वलय, सीपकी चूड़ी। ३ शामुक, घोंघा। ४ हस्ती, हाथी। ५ चित्रवर्ण, कई-तरहका रंग। ६ ग्रीवादेश, गर्दन। ७ नलिका, नली, हड्डी। ८ मानभेद, एक माप।}}
{{outdent|कम्बुक (सं० पु०) कम्बु स्वार्थे कन्। १ कम्बु, शङ्ख। २ नीचपुरुष, कमीना शख्स।}}
{{outdent|कम्बुकण्ठी (सं० स्त्री०) कम्बुरिव कण्ठो यस्याः, कण्ठ ङीष्। शङ्खकी भांति कण्ठमें तीन चिह्न रखनेवाली स्त्री, जिस औरतके गलेमें शङ्खकी तरह तीन दाग रहें।}}
{{outdent|कम्बुकुसुमा (सं० स्त्री०) शङ्खपुष्पी, संखौली।}}
{{outdent|कम्बुका (सं० स्त्री०) असनगन्धाक्षुप, असनगंधका पेड़। असनगन्धा देखो।}}
{{outdent|कम्बुकाष्ठा (सं० स्त्री०) कम्बु चित्रवर्णं काष्ठं यस्याः, बहुव्री०। असनगन्धाक्षुप, असनगन्धका झाड़।}}
{{outdent|कम्बुग्रीव (सं० त्रि०) कम्बुरिव रेखात्रययुक्ता ग्रीवा यस्य। शङ्खकी भांति रेखात्रयविशिष्ट गलदेशयुक्त,}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
जिसके गलेमें शङ्खकी तरह तीन सतरें रहें। "कम्बुग्रीवः प्रमदाचो मतीमानुग्रो सवेन्द्रम।" (भारत १।६५१)
{{outdent|कम्बुग्रीवा (सं० त्रि०) कम्बुरिव रेखात्रययुक्ता ग्रीवा, उपमि०। शङ्खकी भांति रेखात्रययुक्ता ग्रीवा, शङ्खकी तरह तीन सतर रखनेवाली गर्दन।}}
{{outdent|कम्बुपुष्पी (सं० स्त्री०) कम्बुवद् शुभ्रं पुष्पं यस्याः, बहुव्री०। शङ्खपुष्पी, संखौली।}}
{{outdent|कम्बुमालिनी (सं० स्त्री०) कम्बुतुल्या पुष्पाणां माला-समूहः अस्याः। शङ्खपुष्पी, संखौली।}}
{{outdent|कम्बु (सं० त्रि०) कम्बन-यु निपातनात् साधुः। उणादिदृष्टौ कम्पु क म्पु कम्बु कुम्बु विधिपु । उणा० १।२५। १ अपहरणकारी, चोरानेवाला। (पु०) २ तस्कर, चोर। ३ वलय, चूड़ी। (स्त्री०) ४ शङ्ख।}}
{{outdent|कम्बूक (सं० पु०) कम्बू स्वार्थे कन्। १ कम्बु, शङ्ख। (वै०) २ अन्नवल्क, धानकी भूसी।}}
{{outdent|कम्बूपूत (सं० पु०) शङ्ख, खरमोहरा।}}
{{outdent|कम्बोज—जातिविशेष एक कौम। आजकल इस जातिके लोग पंजाब और उत्तरप्रदेशके बिजनौर जिलेमें रहते हैं। पूर्वकाल कम्बोज सिन्धुनद छोड़ काबुलकी उत्तर प्रदेशमें वास करते थे। संस्कृत शास्त्रमें इन्हींको 'काम्बोज' और इनके पूर्ववासस्थानको 'कम्बोज' कहते हैं। उस समय यह सकल भारतीय क्षत्रिय रहे। किन्तु सुहम्मद गज़नवीने इनमें कितनों ही को मुसलमान बना डाला। सुगल इनसे बड़ी घृणा रखते थे। फारसीमें कहते हैं,—}}
{{c|{{x-smaller|<poem>
"अव्वल कम्बो दोयम अफ़गान सोयम बदज़ात कश्मीरी।"
</poem>}}}
{{outdent|कम्बोज (सं० पु०) कम्ब-चोज। १ शङ्खविशेष, किसी किस्मका खरमोहरा या घोंघा। २ हस्तिविशेष, एक हाथी। ३ देशविशेष, एक मुल्क। यह अफगानिस्तानका एक भाग है। इसकी अवस्थिति गान्धारके निकट मानी जाती है। किन्तु शक्तिसङ्गम-तन्त्रमें लिखा है,—}}
{{c|{{x-smaller|<poem>
"पाञ्चालदेशमारभ्य म्लेच्छदेशात्पूर्वत्।
काम्बोजदेशी देवेशि वाजिराशिसुपरायणः॥"
</poem>}}}}
पञ्चाबसे लगा म्लेच्छ देशके दक्षिणपूर्व पर्यन्त कम्बोज गिना जाता है। यहाँ विस्तार घोटक उत्पन्न होते हैं।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६४
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कसार-कसैला|२६५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कसार (हिं॰ पु॰) खाद्यविशेष, पंजीरी। घीमें भुना और चीनी मिला आंटा कसार कहता है।}}
{{outdent|कसाला (हिं॰ पु॰) १ क्लेश, तकलीफ़। २ परिश्रम, मेहनत। ३ अनुभेद, एक खटायी। कसमें स्वर्णकार
अलङ्कारादि परिष्कार करते हैं।}}
{{outdent|कसाव (हिं॰ पु॰) १ कषायता, कसैलापन। २ आकर्षण, खिंचाव।}}
{{outdent|कसावट (हिं॰ स्त्री॰) आकर्षण, खींचतान।}}
{{outdent|कसावड़ा (हिं॰ पु॰) गावातक, कसाई।}}
{{outdent|कसिपु (सं॰ पु॰) कशति शास्ति दुःखम् निपातनात् सिबम्। अन्न, चावल, भात्।}}
{{outdent|कसिया (हिं॰ स्त्री॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया। यह धूसरवर्ण होती और राजपुताने तथा पञ्जाबको
छोड़ भारतवर्षमें सर्वत्र मिलती है। इसका कुलाय (घोंसला) वृक्षकी उच्च शाखा पर बनता है। अण्ड पीताभ होते हैं।}}
{{outdent|कसियाना (हिं॰ क्लि॰) कषायित्त हो जाना, कसाना। खट्टी चीज तांबे या पीतलके बरतनमें रखनेसे कसाने
लगती हैं।}}
{{outdent|कसी (हिं॰ स्त्री॰) १ रज्जु भेद, एक रस्सी। इससे भूमि नांपी जाती है। दैर्घ्य प्रायः दो पद (सवा ४९ इञ्च) पड़ता है। २ हलका अग्रभाग, फाल। ३ अवेधुक वृक्ष, एक पौधा।}}
{{outdent|प्राचीन कालको इसका चरू वैदिक यज्ञमें लगता था। कसी ऋषिका एक द्रव्य रही। वर्तमानमें इसकी ऋषि वन्द हो गयी है। फिर भी मध्यप्रदेश, सिक्किम, आसाम और ब्रह्मदेशके जङ्गली लोग कसी लगाते हैं। यह भारत, ब्रह्म, मलय, चीन, जापान प्रभृति देशोंमें वन्य अवस्था पर पायी जाती है। कसी कई प्रकार की होती है। दो भेद प्रधान हैं, खेतवर्ग और जङ्गलवर्ग। वर्षा ऋतु इसकी
उत्पत्तिका समय है। मूलसे कई बार शाखायें फूटती हैं। फल गोल, सुदीर्घ और एक घोर तीक्ष्णाग्र रहते हैं। त्वक् कठिन और चिक्कण होती है। खेत सारकी रोटी बनती है। फल भून कर सारको शङ्कुकी भाँति खाते भी हैं। फिर अप्पक सारके
{{c|Vol.IV.{{gap}}67}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|टुकड़े भातमें भी पड़ते हैं। यह स्वास्थ्यकर और सुस्वादु होती है। जापान आदि देशोंमें कसीसे मद्य प्रस्तुत किया जाता है। बीजको औषधमें डालते हैं। दानोंकी माला बनती है। नेपालके थारू लोग कसीके बीज टोकरींको झालचरोंमें टीकते हैं।}}
{{outdent|कसियाड़ी, बङ्गाल प्रान्तके मेदिनीपुर जिलेकी तमलुक तहसीलका एक ग्राम। यह अक्षा॰ २२° ७' २५'
उ॰ और देशा॰ ८७° १६' २०' पू॰ पर अवस्थित है। कसियाड़ी वाणिज्यप्रधान स्थान है। यहां तसरकी कृषि होती है। तसरके व्यवसायसे ही कथियाड़ी विख्यात है।}}
{{outdent|कसीदा (हिं॰) <small>कशीदा देखो।</small>}}
{{outdent|कसीदा (अ॰ पु॰) कविताविशेष, किसी किस्मकी शायरी। यह उर्दू या पारसीमें बनाया जाता है।
इसमें व्यक्तिविशेषकी स्तुति वा निन्दा रहती है। कसीदेमें कमसे कम १७ पंक्तियां पड़ती हैं।}}
{{outdent|कसोष (हिं॰) काशीश देखो।}}
{{outdent|कसून (हिं॰ पु॰) घखभेद, सुलेमानी घोड़ा। इसको आंखें कच्ची होती हैं।}}
{{outdent|कसूमर (हिं॰ पु॰) कुसुम्भ, कुसुम।}}
{{outdent|कसूर (अ॰ पु॰) अपराध, खता, चूक।}}
{{outdent|कसूरमन्द (का॰ वि॰) अपराधी, सतावार।}}
{{outdent|कसूरवार <small>कसूरमन्द देखो।</small>}}
{{outdent|कसरहट्टा (हिं॰ पु॰) कसेटोंका बाजार, कसरहट्टा।}}
{{outdent|कसेरा (हिं॰ पु॰) युक्तप्रदेश और बिहारके बनियोंकी एक जाति। यह कांसे और फूल वगैरहके बर्तन
बनाबना बेचते हैं।}}
{{outdent|कसेरु (पु॰ स्त्री॰) <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कसेरुका (सं॰ स्त्री॰) <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कसेरू (हिं॰) <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{Outdent|कसैया (हिं॰ पु॰) १ मज़बूत बांधनेवाला, जो कस देता है। २ परीक्षक, जांचनेवाला। ३ गोघातक,
कसाई।}}
{{outdent|कसैला (हिं॰ वि॰) कषायरस विशिष्ट, कसानेवाला, जो जीभको ऐंठता या सिकोड़ता है। कषाय द्रव्य जलमें पाक करनेसे कषा वर्ण बनता है।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६५
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६६|कसूर-कसैरा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कसूर, पञ्जाब प्रान्तके लाहौर जिलेकी अपनी तहसील और प्रधान नगर। यह अक्षा॰ ३१° ६' ४६' उ॰ और
देशा॰ ७४° २०' २१'' पू॰ पर अवस्थित है। लाहौर नगरसे कसूर ३४ मील दक्षिणपूर्व फीरोजपुरकी सड़क पर पड़ता है। पहले सिन्धु नदीके पूर्वसे पठान लोग आकर यहां बसे थे। १७६२ और १७७० ई॰ को सिखोंने आक्रमण मार कुछ दिनके लिये पठानोंको दबाया, किन्तु १७९४ ई॰ को उन्होंने फिर अपना पूर्वाधिकार पाया। अन्तपर १८०७ ई॰ में नवाब कुतव-उद-दीन खानको रणजितसिंहने हरा कसूर लादारसे मिला दिया। यहां घोड़े का साज़सामान बनता है। किसी डिप्टी कमिशनरकी प्रतिष्ठित शिल्पशालामें नमदे और कालीन तैयार होते हैं। सिन्धु, पञ्जाब, दिल्ली रेलवेको रायविन्द-फीरोजपुर शाखा इसे लाहोर और फीरोजपुरसे मिलाती है।
अतिरिक्त असिष्टणट कमिशनरकी कचहरौ, तहशीली,
पुलिसका थाना, पाठशाला, औषधालय और डाक बंगला
विद्यमान है। देशीय द्रव्यांके व्यवसायका कसूर केन्द्रस्थल है। बड़ी सड़कें पक्की बनी हैं। पानी निकलनेका बड़ा सुभीता है। लोगोंके कथनानुसार मर्यादा पुरुषोत्तमके पुत्र कुशने कसूर बसाया था।}}
{{outdent|कसैरा (हिं॰ पु॰) कांस्यकार, कांसेकी चीजें बनाने और बेचनेवाला। यह एक वणिक जाति है। संस्कृत
पर्याय कांसकार, कंसवणिक् और कांस्यकार है। इस जातिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें मतका भेद लक्षित होता है।ब्रह्मवैवर्तपुराणके ब्रह्मखण्डमें लिखा है,—}}
किसी समय विश्वकर्मा स्वर्गकी वेश्या घृताचीको देख कामके शरसे पीड़ित हुये। उस समय घृताची कामदेवके निकट जाती थीं। विश्वकर्माने अपना अभिलाष उनको बता कर कहा, 'हे सुन्दरी। मैंने कामदेवसे कामशास्त्र पढ़ा है। हमारी इच्छा पूर्ण कीजिये। हम आपको विविध अलङ्कार देंगे।' घृताची बोल उठीं, 'देखो! आप कामदेवसे कामशास्त्र सीखनेकी बात कहते हैं। इस समय हम उन्हीं कामदेवके चित्तरञ्जनको जा रही है। आज हम तुम्हारे गुरु कामदेवकी पत्नीके स्थानमें हैं। ऐसे स्थल पर
{{Multicol-break}}
हमारी कामना करनेसे आपको गुरुपत्नीके गमनका महापातक लगेगा। हम किसी प्रकार आज आपके प्रस्तावमें सम्मत हो नहीं सकतीं।' विश्वकर्माने घृताचीकी बातसे अत्यन्त घबरा आप दिया था, 'तूने मेरा मनोरथ पूर्ण न किया। अब मेरे अमोघ शापके प्रभावसे मर्त्यलोकमें शूद्रके गर्भसे तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।' फिर घृताचीने भी विश्वकर्माको शापित किया 'तू भी मेरे शापसे स्वर्ग छोड़ नरलोकमें जाकर उत्पन्न होगा।' घृताची नरलोकमें शूद्रके गर्भसे जन्म ले मदनगोपकी पत्नी बनीं। उधर विश्वकर्मा किसी ब्राह्मणके घर उत्पन्न हुए। घटनावश मदनगोपकी स्त्रीसे ब्राह्मणरूपी विश्वकर्माने सहवास किया था। उससे नौ पुत्रोंने जन्म लिया। उन्हीं नौ पुत्रोंसे मालाकार, कर्मकार, कंसकार (कसेरा) प्रभृति नौ जातियां
चली हैं। मालाकार, कर्मकार शङ्खकार, तन्तुवाय, कुम्भकार, और कंसकार (कसेरा) ये जातियां प्रधान हैं।<ref>{{block center|<poem><small>
"विश्वकर्मां च शूद्रायां वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवुः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः॥
मालाकार-कर्मकार-शङ्खकार-कुलिन्दकाः।
कुम्भकारः कंसकारः पञ्चैते शिल्पिनां वराः॥"</small></poem>}}
{{right|<small>(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, १०।१९-२०)</small>}}</ref> ब्रह्मवैहर्मपुराणके मतमें ब्राह्मणकी औरस और वैश्याके गर्भसे पद्मष्ट, गन्धर्वविक्, शङ्खकार और कांसकार (कसेरा) जाति निकली है।†<ref>{{block center|<poem><small>
"वैश्यायां ब्राह्मणात्स्यात: पद्मष्ठो गान्धिको वणिक्।
कंसकारशङ्खकारौ ब्राह्मणात् सम्भवतुः॥" (वृहद धर्मपुराण)
</small></poem>}}</ref>
{{block center|<poem>
भार्गवताम विरचित जातिमालामें लिखा है,
"गान्धिक: शाङ्गिकयैव कांशिको मणिकारक:।
सुवर्णवणिक्स्वैव पञ्चते वणिज: स्मृताः॥"</poem>}}
वणिक् यथात् बनिया जाति पांच प्रकारकी है—गन्धवणिक्, शङ्खवणिक्, कांसवणिक (कसेरा) मणिकार और सुवर्णवणिक।' गन्धवणिक्के औरस तथा शङ्खवणिक्की कन्याके गर्भसे ताम्र और कांस्य उपजीवी कांसवणिक (कसेरा) जाति उत्पन्न हुई है।
भागंवरामके मतानुसार वित्ताक्रम पर अपर
{{rule}}
{{smallrefs}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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2026-07-20T14:35:35Z
रेखा साव
5914
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६६|कसूर-कसैरा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कसूर, पञ्जाब प्रान्तके लाहौर जिलेकी अपनी तहसील और प्रधान नगर। यह अक्षा॰ ३१° ६' ४६' उ॰ और
देशा॰ ७४° २०' २१' पू॰ पर अवस्थित है। लाहौर नगरसे कसूर ३४ मील दक्षिणपूर्व फीरोजपुरकी सड़क पर पड़ता है। पहले सिन्धु नदीके पूर्वसे पठान लोग आकर यहां बसे थे। १७६२ और १७७० ई॰ को सिखोंने आक्रमण मार कुछ दिनके लिये पठानोंको दबाया, किन्तु १७९४ ई॰ को उन्होंने फिर अपना पूर्वाधिकार पाया। अन्तपर १८०७ ई॰ में नवाब कुतव-उद-दीन खानको रणजितसिंहने हरा कसूर लादारसे मिला दिया। यहां घोड़े का साज़सामान बनता है। किसी डिप्टी कमिशनरकी प्रतिष्ठित शिल्पशालामें नमदे और कालीन तैयार होते हैं। सिन्धु, पञ्जाब, दिल्ली रेलवेको रायविन्द-फीरोजपुर शाखा इसे लाहोर और फीरोजपुरसे मिलाती है।
अतिरिक्त असिष्टणट कमिशनरकी कचहरौ, तहशीली,
पुलिसका थाना, पाठशाला, औषधालय और डाक बंगला
विद्यमान है। देशीय द्रव्यांके व्यवसायका कसूर केन्द्रस्थल है। बड़ी सड़कें पक्की बनी हैं। पानी निकलनेका बड़ा सुभीता है। लोगोंके कथनानुसार मर्यादा पुरुषोत्तमके पुत्र कुशने कसूर बसाया था।}}
{{outdent|कसैरा (हिं॰ पु॰) कांस्यकार, कांसेकी चीजें बनाने और बेचनेवाला। यह एक वणिक जाति है। संस्कृत
पर्याय कांसकार, कंसवणिक् और कांस्यकार है। इस जातिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें मतका भेद लक्षित होता है।ब्रह्मवैवर्तपुराणके ब्रह्मखण्डमें लिखा है,—}}
किसी समय विश्वकर्मा स्वर्गकी वेश्या घृताचीको देख कामके शरसे पीड़ित हुये। उस समय घृताची कामदेवके निकट जाती थीं। विश्वकर्माने अपना अभिलाष उनको बता कर कहा, 'हे सुन्दरी। मैंने कामदेवसे कामशास्त्र पढ़ा है। हमारी इच्छा पूर्ण कीजिये। हम आपको विविध अलङ्कार देंगे।' घृताची बोल उठीं, 'देखो! आप कामदेवसे कामशास्त्र सीखनेकी बात कहते हैं। इस समय हम उन्हीं कामदेवके चित्तरञ्जनको जा रही है। आज हम तुम्हारे गुरु कामदेवकी पत्नीके स्थानमें हैं। ऐसे स्थल पर
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हमारी कामना करनेसे आपको गुरुपत्नीके गमनका महापातक लगेगा। हम किसी प्रकार आज आपके प्रस्तावमें सम्मत हो नहीं सकतीं।' विश्वकर्माने घृताचीकी बातसे अत्यन्त घबरा आप दिया था, 'तूने मेरा मनोरथ पूर्ण न किया। अब मेरे अमोघ शापके प्रभावसे मर्त्यलोकमें शूद्रके गर्भसे तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।' फिर घृताचीने भी विश्वकर्माको शापित किया 'तू भी मेरे शापसे स्वर्ग छोड़ नरलोकमें जाकर उत्पन्न होगा।' घृताची नरलोकमें शूद्रके गर्भसे जन्म ले मदनगोपकी पत्नी बनीं। उधर विश्वकर्मा किसी ब्राह्मणके घर उत्पन्न हुए। घटनावश मदनगोपकी स्त्रीसे ब्राह्मणरूपी विश्वकर्माने सहवास किया था। उससे नौ पुत्रोंने जन्म लिया। उन्हीं नौ पुत्रोंसे मालाकार, कर्मकार, कंसकार (कसेरा) प्रभृति नौ जातियां
चली हैं। मालाकार, कर्मकार शङ्खकार, तन्तुवाय, कुम्भकार, और कंसकार (कसेरा) ये जातियां प्रधान हैं।<ref>{{block center|<poem><small>
"विश्वकर्मां च शूद्रायां वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवुः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः॥
मालाकार-कर्मकार-शङ्खकार-कुलिन्दकाः।
कुम्भकारः कंसकारः पञ्चैते शिल्पिनां वराः॥"</small></poem>}}
{{right|<small>(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, १०।१९-२०)</small>}}</ref> ब्रह्मवैहर्मपुराणके मतमें ब्राह्मणकी औरस और वैश्याके गर्भसे पद्मष्ट, गन्धर्वविक्, शङ्खकार और कांसकार (कसेरा) जाति निकली है।†<ref>{{block center|<poem><small>
"वैश्यायां ब्राह्मणात्स्यात: पद्मष्ठो गान्धिको वणिक्।
कंसकारशङ्खकारौ ब्राह्मणात् सम्भवतुः॥" (वृहद धर्मपुराण)
</small></poem>}}</ref>
{{block center|<poem>
भार्गवताम विरचित जातिमालामें लिखा है,
"गान्धिक: शाङ्गिकयैव कांशिको मणिकारक:।
सुवर्णवणिक्स्वैव पञ्चते वणिज: स्मृताः॥"</poem>}}
वणिक् यथात् बनिया जाति पांच प्रकारकी है—गन्धवणिक्, शङ्खवणिक्, कांसवणिक (कसेरा) मणिकार और सुवर्णवणिक।' गन्धवणिक्के औरस तथा शङ्खवणिक्की कन्याके गर्भसे ताम्र और कांस्य उपजीवी कांसवणिक (कसेरा) जाति उत्पन्न हुई है।
भागंवरामके मतानुसार वित्ताक्रम पर अपर
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६६|कसूर-कसैरा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कसूर, पञ्जाब प्रान्तके लाहौर जिलेकी अपनी तहसील और प्रधान नगर। यह अक्षा॰ ३१° ६' ४६' उ॰ और देशा॰ ७४° २०' २१' पू॰ पर अवस्थित है। लाहौर नगरसे कसूर ३४ मील दक्षिणपूर्व फीरोजपुरकी सड़क पर पड़ता है। पहले सिन्धु नदीके पूर्वसे पठान लोग आकर यहां बसे थे। १७६२ और १७७० ई॰ को सिखोंने आक्रमण मार कुछ दिनके लिये पठानोंको दबाया, किन्तु १७९४ ई॰ को उन्होंने फिर अपना पूर्वाधिकार पाया। अन्तपर १८०७ ई॰ में नवाब कुतव-उद-दीन खानको रणजितसिंहने हरा कसूर लादारसे मिला दिया। यहां घोड़े का साज़सामान बनता है। किसी डिप्टी कमिशनरकी प्रतिष्ठित शिल्पशालामें नमदे और कालीन तैयार होते हैं। सिन्धु, पञ्जाब, दिल्ली रेलवेको रायविन्द-फीरोजपुर शाखा इसे लाहोर और फीरोजपुरसे मिलाती है। अतिरिक्त असिष्टणट कमिशनरकी कचहरौ, तहशीली, पुलिसका थाना, पाठशाला, औषधालय और डाक बंगला विद्यमान है। देशीय द्रव्यांके व्यवसायका कसूर केन्द्रस्थल है। बड़ी सड़कें पक्की बनी हैं। पानी निकलनेका बड़ा सुभीता है। लोगोंके कथनानुसार मर्यादा पुरुषोत्तमके पुत्र कुशने कसूर बसाया था।}}
{{outdent|कसैरा (हिं॰ पु॰) कांस्यकार, कांसेकी चीजें बनाने और बेचनेवाला। यह एक वणिक जाति है। संस्कृत पर्याय कांसकार, कंसवणिक् और कांस्यकार है। इस जातिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें मतका भेद लक्षित होता है।ब्रह्मवैवर्तपुराणके ब्रह्मखण्डमें लिखा है,—}}
किसी समय विश्वकर्मा स्वर्गकी वेश्या घृताचीको देख कामके शरसे पीड़ित हुये। उस समय घृताची कामदेवके निकट जाती थीं। विश्वकर्माने अपना अभिलाष उनको बता कर कहा, 'हे सुन्दरी। मैंने कामदेवसे कामशास्त्र पढ़ा है। हमारी इच्छा पूर्ण कीजिये। हम आपको विविध अलङ्कार देंगे।' घृताची बोल उठीं, 'देखो! आप कामदेवसे कामशास्त्र सीखनेकी बात कहते हैं। इस समय हम उन्हीं कामदेवके चित्तरञ्जनको जा रही है। आज हम तुम्हारे गुरु कामदेवकी पत्नीके स्थानमें हैं। ऐसे स्थल पर
{{Multicol-break}}
हमारी कामना करनेसे आपको गुरुपत्नीके गमनका महापातक लगेगा। हम किसी प्रकार आज आपके प्रस्तावमें सम्मत हो नहीं सकतीं।' विश्वकर्माने घृताचीकी बातसे अत्यन्त घबरा आप दिया था, 'तूने मेरा मनोरथ पूर्ण न किया। अब मेरे अमोघ शापके प्रभावसे मर्त्यलोकमें शूद्रके गर्भसे तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।' फिर घृताचीने भी विश्वकर्माको शापित किया 'तू भी मेरे शापसे स्वर्ग छोड़ नरलोकमें जाकर उत्पन्न होगा।' घृताची नरलोकमें शूद्रके गर्भसे जन्म ले मदनगोपकी पत्नी बनीं। उधर विश्वकर्मा किसी ब्राह्मणके घर उत्पन्न हुए। घटनावश मदनगोपकी स्त्रीसे ब्राह्मणरूपी विश्वकर्माने सहवास किया था। उससे नौ पुत्रोंने जन्म लिया। उन्हीं नौ पुत्रोंसे मालाकार, कर्मकार, कंसकार (कसेरा) प्रभृति नौ जातियां
चली हैं। मालाकार, कर्मकार शङ्खकार, तन्तुवाय, कुम्भकार, और कंसकार (कसेरा) ये जातियां प्रधान हैं।<ref>{{block center|<poem><small>
"विश्वकर्मां च शूद्रायां वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवुः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः॥
मालाकार-कर्मकार-शङ्खकार-कुलिन्दकाः।
कुम्भकारः कंसकारः पञ्चैते शिल्पिनां वराः॥"</small></poem>}}
{{right|<small>(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, १०।१९-२०)</small>}}</ref> ब्रह्मवैहर्मपुराणके मतमें ब्राह्मणकी औरस और वैश्याके गर्भसे पद्मष्ट, गन्धर्वविक्, शङ्खकार और कांसकार (कसेरा) जाति निकली है।†<ref>{{block center|<poem><small>
"वैश्यायां ब्राह्मणात्स्यात: पद्मष्ठो गान्धिको वणिक्।
कंसकारशङ्खकारौ ब्राह्मणात् सम्भवतुः॥" (वृहद धर्मपुराण)
</small></poem>}}</ref>
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भार्गवताम विरचित जातिमालामें लिखा है,
"गान्धिक: शाङ्गिकयैव कांशिको मणिकारक:।
सुवर्णवणिक्स्वैव पञ्चते वणिज: स्मृताः॥"</poem>}}
वणिक् यथात् बनिया जाति पांच प्रकारकी है—गन्धवणिक्, शङ्खवणिक्, कांसवणिक (कसेरा) मणिकार और सुवर्णवणिक।' गन्धवणिक्के औरस तथा शङ्खवणिक्की कन्याके गर्भसे ताम्र और कांस्य उपजीवी कांसवणिक (कसेरा) जाति उत्पन्न हुई है।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६६
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कसैरा—कसौंजा|२६७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
जातियोंके सम्रन्धमें कंसवणिक (कसेरे) से निम्न
लिखित जातियां निकली हैं,—
{{block center|<poem><small>
"शङ्गिकात् कांस्यकन्यायां मणिकारथ जायते।
कांस्यकाराञ्च माणिक्यां सुवर्णोजीविको भवेत्॥
मणिपुत्रां कांस्वकारात् गोपालस्य स सन्भव:।
गोपालात् कांस्यपुत्रां वै तैलिस्ताम्ब् लिपिस्तरः॥" (जातिमाला)</small></poem>}}
शङ्गवणिक्के औरस एवं कंसवणिककी कन्याके गर्भसे मणिकार, कंसवणिककी औरस तथा मणिकारकी कन्याके गर्भसे सुवर्णवणिक, सुवर्णवणिककी कन्याके गर्भ एवं कांस्यकारके औरससे गोपाल और गोपालके औरस तथा कंसवणिककी कन्याके गर्भसे तेली तंबोली हुये हैं।
किन्तु कसेरे अपनेको प्राकृत वैश्यजाति बतलाते हैं। वास्तविक शिल्पियों और वणिकोंमें इनका सम्मान कुछ कम नहीं। यह यज्ञोपवीत व्यवहार करते हैं। उपाधि के भेदसे कसेरोंमें सात शाखायें हैं,—१ पुरविहा, २ पछैहां, ३ गोरखपुरी, ४ तङ्ग, ५ तांचरा, ६ भरिहा और ७ गोलर।
उक्त शाखाओंमें परस्पर आदान प्रदान और आहार व्यवहार प्रचलित नहीं। मिर्जापुरमें कसेरे अधिक रहते पढ़ते हैं। वहां यह कांसेके पात्र प्रभृति प्रस्तुत कर दूर देशान्तरोंको विकनेके लिये भेजते हैं।
विहार अञ्चलके कसेरे हिन्दुस्तानी कसेरोंकी भांति पदमर्यादा पा न सकते भी ठठेरे ठगैरह दूसरे बनियोंसे कुल और शीलमें श्रेष्ठ हैं। ठठेरे उन्हींके बनाये द्रव्य पर खोदायी करते हैं। <small>ठठेरा देखो।</small>
विहारके कसेरोंमें अनेक गोत्र चलते हैं,—बनौधिया, बसैया, चौखर्गा, चौधरा, हरिहरना, लकड़महौलिया, मछुवा, महौलिया, मोहरिया, सुलरिया और सुघट। यह अपने गोत्रमें विवाह कर नहीं सकते। फिर कन्याका विवाह बाल्यकालमें ही करना पड़ता है। कभी कभी कन्याका वयस कुछ अधिक हो जाता और ऋतुमती बनने पीछे उसे पतिका सुख देखता है।
स्त्री रूग्णा, मृतवत्सा, मूढगर्भा अथवा बन्ध्या होने पर पुरुष स्वतन्त्र पत्नीको वरण कर सकता है। विधवा मनमें आनेसे 'सगाई' प्रथाके अनुसार अपना विवाह
{{Multicol-break}}
गभीर रात्रिको अन्धकार गृहमें होता है। उसमें केवल विधवायें ही जातीं, सधवायें अपवित्र समझ देखने नहीं पातीं। पुरुष सिन्दूर चढ़ा विधवाको अपने पत्नीमें ग्रहण करता है। भोज, आमोद प्रमोद और शास्त्रके धर्मकर्मका अभाव रहता है। समाजमें इन्हें सत्शूद्र कहते हैं। ब्राह्मण इनके हाथका पानी पी सकते हैं।
बङ्गदेशके कसेरोंमें पद, घर और गोत्र प्रचलित हैं,—
पद—कुण्ड, प्रमापिक, दास, दां, पाल, नन्दन, दे इत्यादि। घर—सप्तग्रामी, मुहन्मदावादी, मौता, मैती।
गोत्र—शङ्ग ऋषि, शाण्डील्य, सप्तवार्षि, ऋषिकेश, दधि ऋषि।
विवाहादि कार्यपर इन्हें विषम वायुमें गिरना पड़ता है। सब घरोंको निमन्त्रण देना आवश्यक है। भोजका बड़ा आयोजन होता है। इसीसे ग़रीब कसेरे एक ही साथ ८।९ कन्याओंका विवाह कर डालते हैं। बङ्गाली कसेरोंमें विधवाविवाह नहीं चलता। सौर भाद्रमासके ३० वें दिन विश्वकर्माकी पूजा होती है। उस दिवसको कोयी कसेरा यन्त्रादि नहीं छूता।
बम्बईके कसेरे अपनेको कार्तिवारी वंशीय क्षत्रिय सेनापतिके औरस और क्षत्रियाणीके गर्भसे उत्पन्न बताते हैं। शूद्रोंकी अपेक्षा यह कुल, शील और मानमें बहुत श्रेष्ठ हैं।
{{outdent|कसैलापन (हिं॰ पु॰) कषायरस, बाकपन।}}
{{outdent|कसैली (हिं॰ स्त्री॰) पूगफल, सुपारी।}}
{{outdent|कसोरा (हिं॰ पु॰) कटोरा, प्याला।}}
{{outdent|कसौंजा (हिं॰ पु॰) कासमर्द भेद, एक पौदा। यह वर्षा ऋतुमें उपजता और तीन चार हाथ ऊँचे उठता है। पत्रक एक सुषिर (सींके) में परस्पर सम्मुखीन
जाते और पृष्ठ तथा तीक्ष्णाग्र देखाते हैं। शीतकाल इसके फूलनेका समय है। फल छह-सात अङ्गुलि दीर्घ एवं समान होते हैं। बीज एक दिक् तीक्ष्णाग्र रहते हैं। रक्तवर्ण कसौंजा सतत हरित् वृक्ष है। पत्र और पुष्प रक्ताभ होते हैं। यह कटु, उष्ण और कफ, वात तथा कास नाशक है। लोग इसका शाक भी बनाते}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६८|कसौंजी—कस्तूरिकामृग}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
हैं। रक्तवर्ण कसौंजेके पत्र और बीज अर्शोरोगमें अर्शोरोगकी
औषधीकी भांति व्यवहृत होते हैं।
{{outdent|कसौंजी (हिं॰ स्त्री॰) <small>कसौंजा देखो।</small>}}
{{outdent|कसौंदा, <small>कसौंजा देखो।</small>}}
{{outdent|कसौंदी (हिं॰ स्त्री॰) <small>कसौंजा देखो।</small>}}
{{outdent|कसौटी (हिं॰ स्त्री॰) स्पर्शमणि, चांदीसोना कसनेका पत्थर। यह काली होती है। शालग्राम कसौटीके बनते हैं। लोग इसके खरल भी तैयार करते हैं। २ परीक्षा, जांच।}}
{{outdent|कसौली—पञ्जाबके शिमला ज़िलेका एक सैन्यावास (छावनी) और निरामय स्थान। यह एक पर्वतके शिखर (अक्षा॰ ३०° ५२' १२" उ॰ तथा देशा॰ ७६° ५२"
पू॰) पर अवस्थित है। कालिकाकी उपत्यका नीचे देख पड़ती है। कसाली अम्बालेसे ४५ मील उत्तर और शिमलेसे ३२ मील दक्षिण-पश्चिम लगती है। १८४४-४५ ई॰ को देशीय राज्य बीजासे भूमि ले यहां छावनी डाली गयी थी। उस समयसे बराबर कसौंलीमें अंगरेज सिपाही रहते हैं। पर्वत समुद्रतलसे ६३२२ फीट ऊँचा है। इसके दक्षिणपश्चिम समभूमि और उत्तर हिमालयका दृश्य अत्यन्त मनोहर लगता है। यहाँ कुक्कुट और श्रृगाल आदिके विषकी चिकित्सा होती है।}}
{{outdent|कस्कादि (सं॰ पु॰) पाणिनि व्याकरणोक्त गण विशेष। इसमें विसर्गस्थानपर नित्य 'स' होता है। यस्कादिके
शब्द यह हैं,—कस्क, कौतस्कुत, भ्रातुष्युत्र, शुनस्कर्ण, सद्दस्काल, सद्दस्री, सद्दस्त्र, कांस्कान्, सर्पिष्कुण्डिका, धनुष्कपाल, वर्हिष्पल, यजुष्पान, पयस्कान्त, तमस्काण्ड, अयस्काण्ड, मेदस्पिण्ड, भास्कर, अहस्कर और आकृतिगण। <small>(पा॰ ८ । ३ । ४८)</small>}}
{{outdent|कस्तभी (वै॰ स्त्री॰) कं शिरोऽग्रमागं स्तभाति, क-स्तन्भ-अण्-ङीष्। शकटका अध: पत्तन रोकनेको एक अवष्टम्भ, गाड़ीके बांसकी थूनी।}}
{{outdent|कस्तरी (हिं॰ स्त्री॰) दुग्धपात्रभेद, एक बरतन। इसमें दूध पकाकर रखा जाता है। मुख विस्तृत रहता है। फारसीमें इसे 'कसा' और साधारण हिन्दीमें 'दूधहंडी' कहते हैं।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|कस्तीर (सं॰ क्ली॰) पिच्चट, रांगा। इसका संस्कृत पर्याय—पुत्रपिच्चट, मृदङ्ग, वङ्ग, रङ्ग, वपुः, स्वर्णज, नागजीवन, गुरुपत्र, चक्र, तमर, नागज, आलीनक और सिंहल है। <small>रङ्ग देखो।</small>
{{outdent|कस्तीरी (सं॰ क्ली॰) रङ्ग, रांगा।}}
{{outdent|कस्तुरिका (सं॰ त्रि॰) कस्तूरी स्त्रार्थे कन्-टाप्-पृषो-दरादित्वात् साधुः। कस्तूरिका मृग, एक हिरन। इसकी तोंदीसे कस्तूरी निकलती है। <small>कस्तूरिकामृग देखो।</small> २ कस्तूरी, सुगन्ध।}}
{{outdent|कस्तूरमल्लिका, <small>कस्तूरीमृगिका देखो।</small>}}
{{outdent|कस्तूरा (हिं॰ पु॰) १ कस्तूरी, सुगन्ध। २ सन्धिभेद, एक जोड़। यह जहाजी तख्तोंमें पड़ता है। ३ शुक्ति भेद, एक सांप। इसमें मोती रहता है। ४ पक्षि-विशेष, एक चिड़िया। यह धूसरवर्ण छोटा है। पद तथा चक्षु का वर्ण पीत लगता और उदर श्वेताभ रहता है। कस्तूरा पार्वत्य प्रदेशमें काश्मीरसे आसाम तक मिलता है। इसकी बोली सुननेमें अच्छी लगती है। ५ द्रव्य विशेष, एक चीज़। इसे पोर्टव्लेयर्के पर्वतोंकी शिलाओंसे खुरच-खुरच निकालते हैं। कस्तूरा अत्यन्त मूल्यवान होता है। इसे दुग्धके साथ २ रत्ती सेवन करते हैं। लोग इसे अबाबील पक्षीके सुखका फेन समझते हैं।}}
{{outdent|कस्तूरिक (सं॰ पु॰) करवीर वृक्ष, कनैरका पेड़।}}
{{outdent|कस्तूरिका (सं॰ स्त्री॰) कस्तूरी स्वार्थ कन्-टाप् पुषोदरादित्वात् साधुः। कस्तूरी, मुश्क।}}
{{outdent|कस्तूरिकाण्डज, <small>कस्तूरीकाण्डज देखो।</small>}}
{{outdent|कस्तूरिकामृग (सं॰ पु॰) एक प्रकार हिरण, सुश्री हिरन। तलपेटके निकट नाभिमें कस्तूरी सहित रहने और शरीरसे कस्तूरिका गन्ध निकलनेसे ही इसको कस्तूरिकामृग कहते हैं। संस्कृत पर्याय—कस्तूरीमृग, गन्धवाह और गन्धमृग है। भारतवर्षमें अति पूर्वकालसे यह मृग परिचित और समादृत है। प्राचीन ग्रन्थकारोंने पांच प्रकारके मृग कहे हैं। कस्तूरिका मृग ‘पार्थिवमृग’के अन्तर्गत है।
{{block center|<small><poem>
"पृथिव्यप्सुयुगगनालक्षे जोऽधिकास्तु पञ्चधा।
निद्दन्तं नैतद्भेदास्त् समदा मृगजायव:॥</small></poem>}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२७०
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कस्तूरिया—कस्माब|२७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उपकारी है। बालकोंके आक्षेपरोगमें अधिक आक्षेप होनेसे १-५ ग्रेन कस्तूरी पिचकारीसे लगानेमें फल मिलता है।
आजकल तीन प्रकारकी कस्तूरी प्रचलित है—तिब्बती, रूसी और चीना। तिब्बती सर्वोत्कृष्ट, चीना मध्यम और रूसी अधम होती है। कुछ देशीय मृगको कस्तूरी उत्कृष्ट नहीं रहती। व्यवसायी कुछ देशीय मृगके नाभिमें लगा देते हैं। इससे कुछ देशीय कस्तूरीका गन्ध बहुत कुछ बदल जाता है।
मृगनाभि अधिक कूर्में बिकती है। प्रत्येक नाभिका मूल्य १५) या १७) रु॰ है। इसीसे व्यवसायी मांस और रक्त मिला और कृत्रिम चर्म लेप लगा इसे बेचते हैं। किन्तु मृगनाभिकी परीक्षा बहुत सीधी है। कृत्रिम मृगनाभि अग्निमें डालनेसे दुर्गन्ध उठता
है। किन्तु प्रकृत कस्तूरीमें यह बात नहीं होती है।
{{outdent|कस्तूरिया (हिं॰ पु॰) १ कस्तूरिकामृग। (वि॰) २ कस्तूरी मिश्रित, सुगन्धी। ३ कस्तूरी सदृश वर्ण विशिष्ट, जो मुस्क रंग रखता हो।}}
{{outdent|कस्तूरिक, <small>कस्तुरिक देखो।</small>}}
{{outdent|कस्तूरीकाञ्जन (सं॰ पु॰) मृगनाभि, मुश्क।}}
{{outdent|कस्तूरीतिलक (सं॰ क्ली॰) कस्तूर्यात्तिलकम्, ६-तत्। कस्तूरीका तिलक, सुश्काका टीका।}}
{{c|<small>"कस्तूरीतिलकं ललाटपटले" (विणुस्तव)</small>}}
{{outdent|कस्तूरीभैरवस (सं॰ पु॰) रसविशेष, एक कुश्ता ।
हिङ्गुछ, विष, टङ्क (सोहागा), जातीकोषफल (जायफल), मरिच़, पिप्प़ली और कस्तूरी बराबर बराबर जलमें घोटनेसे यह औषध प्रस्तुत होता है। मात्राका परिमाण २ रत्ती है। इसके सेवनसे शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। <small>(भैषव्यरत्नावली)</small> इदं कस्तूरीभैरवरस बनानेका विधि यह है—कस्तूरी, कपूर, ताम्र, धातकी, घूकाशिखी, रोप्य, स्वर्ण, सुक्ता, प्रवाल, लौह, पाठा, विडङ्ग, सुस्तक, शताड़ी, बाला, हरिताल, अभ्र और आमलकी समभाग अर्कपत्रके रसमें घोटनेसे यह रस प्रस्तुत होता है। इसे १ रत्ती आर्द्रकके रसमें सेवन करनेसे विषमज्वर छूटता है। <small>(रसरत्नाकर)</small>}}
कस्तूरीमञ्जिका (सं॰ क्ली॰) कस्तूरी गन्धयुता मञ्जिका
{{Multicol-break}}
मध्यपदली॰। १ मृगनाभि, हिरनका नाफा। २ मल्लिकापुष्पभेद, किसी किस्मकी चमेली। यह मृगमदबासा होती है। कस्तूरीमल्लिका दो प्रकारकी मिलती है—एक लता सदृश और दूसरी एरण्डवृक्षके समान। दोनोंमें फलफूल आते हैं। पुष्प और फलके बीजमें सद्गन्ध रहता है। केश मलनेके मसालोंमें इसका बीज डाला जाता है।
{{outdent|कस्तूरीमृग, <small>कस्तूरिकामृग देखो।</small>}}
{{outdent|कस्तूरीमोदक (सं॰ पु॰) मोदकभेद, किसी किस्मका लड्डू। कस्तूरी, पियङ्गु, कण्टकारी, दोनों जीरक, त्रिफला, पक्ककदालीफल, खर्जूर, कृष्णतिलक तथा कोकिलाक्षका बीज समभाग और सबके बराबर शर्करा डाल सद्वैध रस चूर्णको मन्द मन्द अग्निसे धात्रीरस, दुग्ध एवं कुष्माण्डरसमें पाक करे। मोदक अक्षपरिमित बनता है। इस मोदकको खानेसे प्रमेह रोग आरोग्य होता है। <small>(रसेन्द्रसारस ग्रह)</small>}}
{{outdent|कस्तूरीवल्लिका (सं॰ स्त्री॰) कस्तूरीगन्धयुक्ता वल्लिका, मध्यपदली॰। लताकस्त री, एक खुशबूदार बेल।
भावप्रकाशके मतसे यह मधुर एवं तिक्त रस, शीतल, लघु, चक्षुके लिये हितकर, भेदक और वृष्या, वस्तिरोग, मुखरोग तथा श्लेष्मनाशक होती है।}}
{{outdent|कस्तूरीहरिण, <small>कस्तूरिकामृग देखो।</small>}}
{{outdent|करद (सं॰ पु॰) प्रतिज्ञा, संकल्प, इरादा।}}
{{outdent|कस्मल (सं॰ क्ली॰) कच-कच-मुद, निपातनात् शस्य सत्वम्। १ सन्त्रास, घबराहट। २ मोह, गश।}}
{{outdent|कस्मात् (सं॰ अव्य॰) किस कारणसे, किसलिये, क्यों।}}
{{outdent|करय (हिं॰ क्ली॰) सुरा, शराब।}}
{{outdent|करवर (सं॰ त्रि॰) कस्-वरच्। १ गमनशील, चलता फिरता चालू। २ हिंसक, खूंखार।}}
{{outdent|कस्मरी (हिं॰ स्त्री॰) आकर्षण, खींचतान। यह शब्द लङ्गर खींचने या ताननेके अर्थमें आता है।}}
{{outdent|कस्सा (हिं॰ पु॰) बबूलत्वक्, बबूलकी छाल। इसमें रंगनेके लिये चमड़ा भिगोया जाता है। २ मदभेद-सुरा, एक शराब। यह बबूलकी त्वचासे प्रस्तुत होता है।}}
{{outdent|कस्प्राचना (हिं॰ स्त्री॰) दुबिया मटर, लोबिया।}}
{{outdent|कस्साब (अ॰ पु॰) गोघातक, कसाई।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२७२|कस्सी-कहवा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कस्सी (हिं॰ स्त्री॰) १ खनित्रभेद, एक फावड़ा। यह छोटी रहती और मालियोंके काममें लगती है।
२ मानविशेष, एक नाप। यह दो पद परिमित रहती और भूमि नापनेमें चलती है।}}
{{outdent|कहं (हिं॰ प्र॰) १ को। (क्रि॰ वि॰) २ कहां।}}
{{outdent|क़हक़हा (अ॰ पु॰) अट्टहास, ठट्ठा, खिलखिलाहट।}}
{{outdent|कहकहा दीवार (फ़ा॰ स्त्री॰) १ प्राचीर विशेष, एक ऊँची दीवार। चीनके राजा सीहवाङ्गतीने चीनके
उत्तर ई॰ से पूर्व ३य शताब्दीके अन्तमें फकिन, कुआङ्ग
तुङ्ग और कुआंची नामक मोङ्गलोंका आक्रमण निवारण करनेके लिये इसे बनाया था। यह १५०० मील दीर्घ, २० से २५ फीट तक उच्च और इतनी ही प्रशस्त है। सौ-सौ गजके अन्तर पर वप्र (बुर्ज) विद्यमान हैं। <small>चीन देखो।</small> २ कठिन अवरोध, कड़ी रोक।}}
{{outdent|कच्छगिल (हिं॰ स्त्री॰) गारा, फेनिया, घास मिली हुई गीली मट्टी। यह शब्द फ़ारसी भाषाके काह (घास) और गिल (मट्टी) का समाहार है।}}
{{outdent|कहत (अ॰ पु॰) दुर्भिक्ष, अकाल, अनाजकी कमी।}}
{{outdent|कहतरी (हिं॰ स्त्री॰) कस्सरी, लंङ्गर उठायी।}}
{{outdent|कहता (हिं॰ पु॰) कथनकार, कहनेवाला।}}
{{outdent|कहतूत (हिं॰ स्त्री॰) प्रसिद्ध वार्ता, मशहूर बात।}}
{{outdent|कहन (हिं॰ पु॰-स्त्री॰) १ कथन, बोलचाल। २ वचन, बात। ३ लोकोक्ति, मस्त्र, कहतूत। ४ कविता,
शायरी। ५ भाषण भाव, बोलनेका तौर।}}
{{outdent|कहना (हिं॰ क्रि॰) १ बोलना, बताना, समझना। २ उद्घाटित करना, खोलना। ३ संवाद सुनाना, ख़बर पहुंचाना। ४ बोलाना, नाम लेना। ५ सिखाना पढ़ाना, देखना-सुनाना। ६ लम्बी लेना, धोका देना। ७ अयोग्य बोलना, कह बैठना। ८ कविता बनाना, शायरी सजाना। (पु॰) ९ अनुरोध, तरग़ीब, समझाव।}}
{{outdent|कहनावत (हिं॰ स्त्री॰) १ किंवदन्ती, मसल, कहावत। २ कथन, काहासुनी।}}
{{outdent|कहर (अ॰ पु॰) १ आपद्, आफत, अनहोनी। (वि॰) २ भयङ्कर, खौफनाक।}}
{{outdent|कहरना, <small>कराहना देखो।</small>}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|कहय (सं॰ पु॰) कस्य सूर्यस्य हय: अश्वः। सूर्यका अश्व वा घोड़ा। सूर्यके सातों घोड़ोंका वर्ण हरित है।}}
{{outdent|कहरवा (हिं॰ पु॰) १ सङ्गीतातलविशेष, गानेबजनेका एक ठहराव। इसमें पांच मात्रायें लगती हैं,-चार पूरी और दो आधी। आघात चार पड़ते हैं। चाल है-धागें टेते नागधिन धा। २ गीतविशेष, दादरा। यह नाचगानिके पीछे होता है। ३ नृत्यभेद, एक नाच। यह सवेरे मिलजुलकर किया जाता है। ४ कहार, पानी भरनेवाला।}}
{{outdent|कहरवा (फा॰ पु॰) १ निर्यासभेद, एक गोंद। यह बद्दादेशकी खनियोंसे निकलता है। वर्ण पीत है।
इसे औषधोंमें व्यवहार करते हैं। चीनमें कहरूवा गला मालकी गुटिका और सुहनाल बनाते हैं। इस रंग भी चढ़ता है। वस्त्र प्रभृति पर रगड़ निकट रखनेसे यह तृषादिको यह सुभक्ष भांति आकर्षण करता है। २ सरेज, धूनेका पेड़। इसके गोंदको धूप या राल कहते हैं। यह सततहरित वृक्ष है।
पश्चिमघाटके पर्वतोंमें इसकी अधिक उत्पत्ति है। दूसरा नाम सफेद डामर है। तारपीनके तेलमें इसे घोल रंग चढ़ाते हैं। कहरूवे की माला भी उत्तम होती है। उत्तर-भारतमें स्त्रियां इसे तेलमें उबाल गोंद बना लेती और उसी गोंदसे चिपका मस्तक पर टिकली देती हैं। कषाय प्रस्तुत करनेमें भी यह कहीं कहीं व्यवहृत होता है।}}
{{outdent|कहरूवा, <small>कहरूवा देखो।</small>}}
{{outdent|कहल (हिं॰ पु॰-स्त्री॰) १ ऊष्मा, गरमी, उमस। २-ताप, बुखार, तकलीफ़।}}
{{outdent|कड़चना (हिं॰ क्रि॰) व्याकुल होना, घबराना।}}
{{outdent|कहलवाना (हिं॰ क्रि॰) १ कड़ाना, कढ़नेका काम दूसरेसे कराना। २ कड़लवाना, घबरवाना।}}
{{outdent|कहलाना (हिं॰ क्रि॰) १ कड़ाना, कढ़नेका काम दूसरेसे कराना। २ मार पाना, काठा जाना। ३ दहलाना। ४ संवाद पहुँचाना, संदेशा देना।}}
{{outdent|कहवा (अ॰ पु॰) एक पेड़का बीज, काफी (Coffee)। अंगरेजी वैज्ञानिक नाम काफिया अरेविका (Coffea arabica) है। इसे बंगालमें कापि, गुजरातीमें}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||क़हवा|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कप्पि, मराठीमें कफ्फी, मारवाड़ीमें कफि, तामिलमें कपिकोत्तई, तेलगुमें कपिवित्तुलु, मलयमें कोपि, कनाड़ीमें कापिबीज, फारस़ीमें बुन, ब्रह्मीमें काफिसि और सिंहलीमें कापिकोत्ता कहते हैं।
अधिकांश ग्रन्थकार क़हवेको अबिसीनिया, सोदान और गीनिया तथा भोजम्बिकके पूर्व समुद्रतटका वृक्ष मानते हैं। अरबमें किसीने इसे उत्पन्न होते नहीं देखा।
क़हवा एक क्षुद्र वृक्ष है। इसमें शाखायें बहुत होती हैं। यह १५ से २० फीट तक बढ़ता है। वल्कल श्वैताम और पुष्प श्वेतवर्ण रहता है। फल पकनेपर लाल पड़ जाता और छोटे शाहदाने की भांति दिखता है। फलमें दो बीज परस्पर चिपटे रहते हैं। यही बीज निकालनेसे बुन कहलाते और बाजारमें बेचे जाते हैं। बीजोंको भूनने और पीसनेसे दुकानका कहवा तैयार होता है।
दाक्षिणात्यकी इसकी कृषि अधिक है। कहवे और रूयीको एक ही प्रकारकी भूमिमें लगाते हैं। इसे पानी बराबर मिलना चाहिये। उष्ण प्रदेशमें यह बहुत पनपता है। निविड़ मेघ ठीक नहीं पड़ता और प्रबल वायु लगनेसे पुष्प अड़ता, जिसमें आघा क़हवा निकलता है। विशेष उष्णता और शोष रहनेसे छाया आवश्यक आती और प्रबल वायु चलनेसे वृक्षोंकी आड़
लगायी जाती है। निम्नप्रदेशकी भूमिमें उपयुक्त आर्द्रता न रहनेसे अच्छी फसल कम होती है।
ई॰ १५वें शताब्दको शेख शहाबुद्दीन इसी अदन ले गये थे। यमनसे यह मक्के, काहरो, दामासकस, अलेप्पा और कुस्तुनतुनिया पहुँचा। सबसे पहले १५५४ ई॰ को कुस्तुनतुनिया में ही कहवेको दुकान खुली थी। १५७३ ई॰ का अलेप्पोमें रानवोल्फ नामक यूरोपीयको इसका नाम सुन पड़ा।
मुसलमानोंमें क़हवा पीनेका बड़ा आदर बढ़ा। मसजिदोंसे भी अधिक लोग क़हवेकी दुकानोंमें देख पड़ते थे। इससे मोलवियोंने बिगड़ इसका पर कड़ा महसूल बांधा। ग्रेट वृटेनमें यह १६५२ ई॰को पहुंचा। किन्तु १६७५ ई॰का २य चार्लुसने इसकी
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दुकानें बन्द करा दीं। उनका कहना था—कहवेकी दुकानों पर बशमाश इकट्ठा होते हैं।
ई॰ १७वें शताब्दके अन्त कहवेकी कृषि बढ़ी। भारत, सिहंन, यवद्वीप, जमेका और ब्रेजिलमें यह लगाया जाने लगा। १६९० ई॰से पहले यह अरबमें ही होता था। आजकल कोष्टा, रिका, गाटेमाला, येनेजुएला, गिआना, पेरू, बोलिविया, कूबा, पोर्टोरिको और पश्चिम-भारतीय द्वीपपुज्जमें भी कहवा खूब उपजता है। कहते दो शताब्द पूर्व मक्केसे बाबा बूदन क़हवेकी ७ बीज महिसुर लाये थे।
इसकी भूमि उत्तम और आद्र रखना चाहिये। यह लालवर्ण एवं कृष्णवर्ण भूमिमें अधिक पनपता है। प्रबल वायु लगनेसे इसे बड़ो हानि पहुंचाती है। भूमि ढालू रखना चाहिये। सींचनेकी सुविधा पड़ना अच्छा है। भूमिको १८से २४ इंञ्च तक गहरी जोत घास फूस निकाल डालते है। एकर पीछे ५०से ८०मन तक खाद पड़ती है। पानी निकलनेकी राह क्यारियों रखी जाती है। बीजोंको ६ कतारोंमें बोना चाहिये।
प्रत्येक कतार ९ इंञ्च पृथक्, और २ इंञ्च गभीर रखती
है। बीज एक एक इंच दूर डाले जाते हैं। सवेरे और सन्ध्याकाल सिंचायी होती है। बीज उत्तम रहनेसे फसल भी अच्छी निकलती है। दो चार पत्तियां निकलनेसे वृक्षोंको खोद दूसरी जगह लगाते हैं। जल भरा रखनेसे जड़ें सड़ जाती हैं। एकर भूमिमें १०३७से अधिक वृक्ष न रखना चाहिये। गोबरकी खाद अच्छी होती है। डालियां बढ़नेसे थोड़ी थोड़ी काट देते हैं। ५ फीटसे अधिक इसका बढ़ना खराब है। इसके साथ दूसरी चीज लगा नहीं सकते। इसकी कृषि का समय मई या जून मास है। दूसरे वर्ष मार्च मासमें पुष्प आते और अक्तोबर मास फसल काटनेका प्रबन्ध लगाते हैं। फूल नवम्बरसे जनवरी तक पका करते हैं। पके फलको शीघ्र तोड़ लेना और रक्तवर्ण फल गिरा देना चाहिये।
साधारणत: देशीय लोग फलोंका धूपमें सुखा ओखलीमें कूट पछोड़ कर बीज निकालते हैं। किन्तु यह रीति अधिक लाभकर देख नहीं पड़ती। अंगरेजू
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२७४|कहवाना—कल्हाराद्यघृत}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
लोग कलमें डाल वीजोंका गूदा छोड़ाते है। कलका नाम डिस्क-पल्पर (disc pulper) है। इसमें गूदेसे बीज कूट अलग जा पड़ता है। फिर वीजको होज में डाल १२ घण्टे धोते हैं। धुलदुवा बीज धूपमें सुखाया जाता है। सूखनेकी भूमिपर मोटी चटायी बिछा देते हैं। सूखते समय लकड़िको लोटते रहना चाहिये।
भारतवर्षमें जितना अधिक और उत्तम कहवा उपजता, उतना किसी दूसरे अंगरेजी अधिकारमें देख नहीं पड़ता। किन्तु इसमें अनेक रोग लग जाते हैं। यथा,—पत्तियोंका पीला और काला पड़ना, पत्तियों, फूलों और फलोंका चिपचिपा हटना और कीड़ा लगना। टिड्डियां भी इसको बड़ी हानि पहुंचाती हैं। कहवेकी पत्तियां भी उबाल कर पीनेसे अच्छी लगती
हैं। गूदेमें चीनी रहती है। अरबमें लोग गूदेका अर्क़ तैयार करते हैं। कहवेमें तेल भी होता है।
यह उत्तेजक है। इसके सेवनसे थकावट दूर हो जाती है। शिर:पीड़ाका यह उत्तम औषध है। काशश्वास रोगमें भी इससे लाभ होता है। विशूचिका और ग्रहणीरोग इसके सेवनसे दब जाता है। कहवा ज्वर पर भी चलता है। पीनेसे मूत्रक्वच्छ और वातरक्त रोग नहीं लगता।
{{outdent|कहवाना (हिं॰ क्रि॰) कहलाना, कहाना।}}
{{outdent|कहवैया (हिं॰ वि॰) कथनकार, कहनेवाला।}}
{{outdent|कहा (हिं॰ पु॰) १ कथना, बातचीत। (क्रि॰ वि॰) २ कैसे, किस प्रकार। (सर्व॰) ३ क्या। (वि॰) ४ कौन। ५ कथित।}}
{{outdent|कहां (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ कुन, किस जगह। (पु॰) २ शब्दविशेष, एक आवाज़। सद्योजात शिशुके शब्द
करने या रोकनेको 'कहां कहां' कहते हैं।}}
{{outdent|कहाना (हिं॰ क्रि॰) कहलाना, कहा जाना।}}
{{outdent|कहानी (हिं॰ स्त्री॰) १ कथा, किस्सा। २ मिथ्या वचन, झूठी बात।}}
{{outdent|कहार (हिं॰ पु॰) जातिविशेष, एक क़ौम। यह लोग पानी भरते और डोली लेकर चलते समय अनेक
प्रकारके सांस्कृतिक शब्द व्यवहार करते हैं। बिहारमें कहार लोग जरासन्धका वंशीय कहलाता है।}}
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{{outdent|कहारा (हिं॰ पु॰) टोकरा, दौरी, झौवा।}}
{{outdent|कहाल (हिं॰ पु॰) वाद्यविशेष, एक बाजा।}}
{{outdent|कहावत (हिं॰ स्त्री॰) १ लोकोक्ति, मसल, चलती बात। २ कथित विषय, कहां हुयी बात।}}
{{outdent|कहासुना (हिं॰ पु॰) अनुचित वचन, गैरवाजिव बात, भूल चूक।}}
{{outdent|कहासुनी (हिं॰ स्त्री॰) वादविवाद, जगड़ा झगड़ा।}}
{{outdent|कहाह (सं॰ पु॰) १ महिष, भैंसा। २ कटाह, कड़ाह।}}
{{outdent|कहिक (सं॰ पु॰) कहोड़-ठक्। एक ऋषि।}}
{{outdent|कदिया (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ किस समय, कब। (पु॰) २ यन्त्रविशेष, एक औजार। कन्तईगर इससे रंग
रख जोड़ लगाते हैं। यह एक प्रकारका चौड़ दण्ड है। इसमें सुष्टि रहता है। एक किनारा काकचञ्चु की भांति कुटिल होता है।}}
{{outdent|कहीं (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ किसी स्थान पर, दूसरी जगह। २ नहीं। इस अर्थमें यह प्रश्न रूपसे आता है। ३ यदि, मगर। ४ अतिशय बहुत, बहुत।}}
{{outdent|कहुं, <small>कहीं देखो।</small>}}
{{outdent|कहें, <small>कहीं देखो।</small>}}
{{outdent|कइय (सं॰ पु॰) कः सूर्यः इयो यस्य, द्वे-कपू वहूव्री॰। सूर्यको आह्वान करनेवाले एक ऋषि।}}
{{outdent|कहोड़ (सं॰ पु॰) एक ऋषि। यह उद्दालकके
शिष्य और अष्टावक्रके पिता थे।}}
{{outdent|कह्वक, <small>कल्हार देखो।</small>}}
{{outdent|कह्वण (सं॰ पु॰) कछुआ, राजतरङ्गिणीके प्रणेता।}}
{{right|<small>कल्हण देखो।</small>}}
{{outdent|कहार (सं॰ स्त्री॰) कस्त जलस्व हार इव की जले इलादते वा, क-हलाद पचाद्दच्, षषोदरादित्वात् साधुः। १ श्वेत उत्पल, वचवक, कोकाबिची। (Nymphaea edulis) यह भारतके नाम खानोपर जलमें उत्पन्न होता है। कहार शीतल, गाढ़ी, विष्टम्भी, गुरू और कष है। <small>(भावप्रकाश)</small> २ श्वेत खेत रक्तकमल, कुछ सफेदी लिये लाल कंवल। ३ कम्बलसाधारण, कोई कंवल।}}
{{outdent|कल्हाराद्दष्टत (सं॰ क्ली॰) घृतविशेष, एक घी।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कह्व—कांगड़ा|२७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कल्हार, उत्पल, पद्म, कुमुद और मधुयष्टिकाको जलमें पकाने तथा घृतके साथ कल्क लगानेसे यह प्रसूत होता है। इसके खानेसे यावतीय हृद्रोग
आरोग्य होते हैं। <small>(रसरत्नाकर)</small>}}
{{outdent|कह्व (सं॰ पु॰) के जले ह्वयति क शब्दायते स्प्रर्धते वा, क-ह्वे-क। वक, बगला।}}
{{outdent|का (सं॰ अव्य॰) १ काकाका शब्द, कौवेकी आवाज़। (त्रि॰) <small>का पष्यवषो: । पा ६ । ३ । १०४ ।</small> २ मन्द, खराब।}}
{{outdent|का ( हि॰ प्रत्य॰) १ सम्बन्धीय, वाला । यह षष्ठीका चिन्ह है। इसे अधिकारी अधिकृत, आधार आधेय, कार्य कारण, कर्तृ कर्म प्रभृति अनेक भाव देखनेको दो शब्दोंके बीच लगाते हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'का' का रूप बदलकर 'की' हो जाता है। (सर्व) २ क्या।}}
{{block center|<small><poem>
"क्षा वर्षा लन कृपौ सुखाने।
समय चुकि पुनि कहु पछिताने॥" (तुलसी)</small></poem>}}
{{outdent|काई (हिं॰ स्त्री॰) तृण विशेष, एक घास। यह जल तथा शीतल स्थान पर उपजती और सूख लगती
है। इसका वर्ण और आकार विभिन्न होता है। शिला और भूमिपर पड़नेवाली काई सूक्ष्म सूत्रसदृश हरिहर्ण रहती है। किन्तु जलपर फैलनेवालोंमें गोलाकार सूक्ष्म पत्रक और पुष्प आते हैं। वस्तुतः यह एक प्रकारका मल है। काई उबच कर तरल पदार्थों पर आ जाती है। २ मख, फेन, मांड। ३ मल, मैल। ४ अयोमल, मोरचा।}}
{{outdent|काज (हिं॰ स्त्री॰) १ यष्टिविशेष, कानी, एक छोटी खूंटी। यह पाटेमें बरछीके सिरेपर लगायी जाती है। (सर्व॰) २ छोड़। ३ कुछ। (क्रि॰ वि॰) ४ कभी।
(पु॰) ५ काक, कौवा।}}
{{outdent|कांइयां (हिं॰ वि॰) धूर्त, चालाक, अपने मतलबका पक्का।}}
{{outdent|कांईं (हिं॰ अव्य॰) १ क्यों, किस लिये। (सर्व॰) २ किसे, किसको। ३ क्या।}}
{{outdent|कांक (हिं॰ पु॰) शस्यविशेष, एक अनाज। इसे कंगनी भी कहते हैं।}}
{{outdent|कांकड़ा (हिं॰ पु॰) कार्पासबीज, बिनौला।}}
{{outdent|कांकर (हिं॰ पु॰) कंकर, कंकड़।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|कांकरी (हिं॰ स्त्री॰) क्षुद्र कर्कट, छोटा कंकड़, बजरी।}}
{{outdent|कांकां (हिं॰ पु॰) काकका शब्द, कौवेकी बोली।}}
{{outdent|कांकुन, कांकुनी, <small>कंगनी देखो।</small>}}
{{outdent|कांख (हिं॰) <small>कच देखो। </small>}}
{{outdent|कांखनां (हिं॰ क्रि॰) १ पीड़ित अवस्थामें दुःखसूचक शब्द उच्चारण करना, कराहना। २ मूत्रपूरीषोत्सर्गार्थ उदरके वायुको पीड़न करना, आंतपर ज़ोर देना।}}
{{outdent|कांखासोती (हिं॰ स्त्री॰) वस्त्रपरिधानभेद, दुपट्टा रखनेका एक तरीका। इसमें दुपट्टा बायें कंधे और पीठ पर होता और दाहिनी बगलके नीचे पहुंचता, फिर बांयें कन्धे पर आ चढ़ता है।}}
{{outdent|कांखी (हिं॰) <small>कांचो देखो।</small>}}
{{outdent|कांगड़ा (हिं॰ पु॰) कद्रपक्षी, एक चिड़िया। यह धूसरवर्ण होता है। इसका वक्षःस्थल श्वेत, गण्डस्थल
रक्त और शिखाका वर्ण कृष्ण रहता है।}}
{{outdent|कांगड़ा—पञ्जाब प्रान्तका एक ज़िला। यह अक्षा॰ ३१° २०' से ३३° उ॰' और देशा॰ ७५° ५९' से ७८° ३५' पू॰ तक अवस्थित है। भूमिका परिमाण ९०६९ वर्गमील है। इसमें प्रायः साढ़ेसात लाख आदमी रहते हैं।}}
कांगड़ा सर्वत्र अत्युञ्च गिरिमालासे परिवेष्टित है। सकल गिरि समुद्रके समतलकी अपेक्षा ९३७से १५९५ फीट पर्यन्त उच्च हैं। धवलाधारगिरि कांगड़ेके उत्तर सीमारूपसे खड़ा है। उसीके आगे बड़ा बङ्गाहल मिलता; चढ़ता है। गिरिमालासे परिवेष्टित और समाकीर्ण रहते भी इसमें स्थान पर ग्राम तथा कृषिक्षेत्र विद्यमान हैं।
उत्तर सीमापर हिमालय पर्वत कांगड़ेक्षो तिब्बतके वक्षुजनपद और चीन साम्राज्यकी सीमासे पृथक् किया है। दक्षिण पूर्वको बसहर, मण्डी, बिलासपुर प्रभृति पार्वतीय राज्य हैं दक्षिणपश्चिम होशियारपुर ज़िला तथा उत्तरपश्चिम चाकी नदी गुरदासपुर और चम्बा राज्यको काटती है। कांगड़ा ज़िलेमें पांच तहसीलें हैं, कूलू, कांगड़ा, हमीरपुर, डेरा और नूपुर। कांगड़ा तहसील मध्यस्थलमें लगती है।
धवलाधार-गिरिने बङ्गाहल प्रान्तको दो भागोंमें
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२७६|कांगड़ा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
बांटा है। उत्तरार्धको बड़ा बङ्गाहल और दक्षिणार्धको छोटा बङ्गाहल कहते हैं। बड़े बङ्गाहलमें कूलूके मध्य स्थलपर बड़ा बङ्गाहल पहाड़ है। यह दैर्घ्य में पन्द्रह मील और उच्चतामें १७०० हज़ार फीट पड़ता है। इसमें एक सामान्य ग्राम है। उसमें कोई ८००० कुनैत रहते हैं। एक वर्ष दारुण तुषारपातसे लोगोंके बहुतसे घर नष्ट गये। इसी गिरिका अव्वुच्च श्रृङ्ग फोड़ इरावती नदी निकली है।
छोटे बङ्गाहलके बीचमें १००० फीट ऊंचा एक गिरिशृंग है। उसने इस स्थानको दो भागोंमें बांटा है। निम्नांशमें १९।२० ग्रामाविद्यमान हैं। सकल ग्रामोंमें केवल कुनैत और दाघी रहते हैं।
बङ्गाहल ताज्जुक़के कुछ अंशका नाम वीर बङ्गाहल है। इस स्थानका प्राकृतिक सौन्दर्य मनोहर है।
कांगड़ा ज़िलेके बीच तीन गिरि भेड़ियां समभावसे निकली हैं। इन्हीं गिरिश्रेणियोंसे विपाशा, चन्द्रभागा, स्थिति और इरावती नदी निकली है।
<small>पुरातत्त्व और इतिहास</small>—भारत और पुराणादिमें कुलिन्द और कुलूत नामक पावतीय जातिका नाम लिखा है। वही यहांकि प्राचीन अधिवासी थे। उस समय कांगड़ा कुछ कुलूत और कुछ कुलिन्द (कुनिन्द) जनपदमें रहा। आजकल कुलूत तथा कुलिन्द जातिको कुलू और कुनैत कहते हैं। <small>कुलूत और कुलिन्द देखो।</small>
कुलूत और कुलिन्द लोगोंको हरा राजपूतोंने यह स्थान अधिकार किया। उन्होंने यह पार्वतीय भूमाग विभागकर बहुकाल राजत्व चलाया। वह अपनेको कुरुपाण्डवके समकालीन जालन्धरका कतोच राजवंश बताते थे। मुसलमानोंके आक्रमणसे उधरता कतोचराजकुमारोंने कांगड़ेको गिरिदुर्गमें आश्रय लिया। उनका विपुल राज्य क्षुद्र क्षुद्र अंशोंमें बंट गया। उस समयभी यहांके नगरकोटवाले भारतीय देवमन्दिर विशेष प्रसिद्ध थे। ऐसा ऐश्वर्य पञ्जाबके किसी दूसरे देवमन्दिरमें न था। भारतीय लोगोंने देवमूर्तिकी बड़ी श्रद्धा भक्ति करते थे। १००९ ई॰को महमूद ग़जनवींने कांगड़ेके मन्दिरोंकी बड़ाई सुनीं। उनका लोभ और विद्वेष बढ़ गया। वह पेशावरके क्षेत्राभि-
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सुख ससैन्य आये थे। भारतीय राजावोंने बाधा देनेकी यथा साध्य चेष्टा लगायी, किन्तु कोई बात बन न पायी। महमूदने कांगड़ेका दुर्ग अधिकार कर देवमूर्तियोंके साथ स्वर्ण, रौप्य, मणिमाणिक्य प्रभृति बहुमूल्य धन लूटा था। कोई ३५ वर्ष पीछे राजपूतोंने कांगड़ेका दुर्ग छीन फिर राजपूतोंने बड़े समारोहके देवमूर्ति प्रतिष्ठा किया था।
कुछ दिन कोई गड़बड़ न पड़ा। १३६० ई॰को फीरोज़शाह तुग़लक कांगड़ेकी ओर बढ़ने आये। कांगड़ेकी राजाओंने उनकी वश्यता माननेके अपना राज्य तो पाया, किन्तु पवित्र देवमूर्तियोंको गंवाया था। मुसलमानोंने देवमूर्तियां लूट मक्के भेज दीं।
१५५६ ई॰को अकबर बादशाहने कांगड़ेका दुर्ग अधिकार किया। उसी समयसे यह पावर्तीय भूभाग दिल्लीके साम्राज्यमें मिल गया, केवल दुर्गमें मरुमय खान देशी सरदारोंके हाथ रहा। राजपूतोंने दो बार विद्रोही हो कांगड़ा दुर्गके उद्धारकी चेष्टा लगायी थी। जहांगीर दोनों बार (१६१५ और १६२८ ई॰) कतोच राजकुमारोंको शासन करने आये थे। उनको वैस-सर्दार कर देनेपर सम्मत हुये।
जहांगीरने प्राकृतिक सौन्दर्यसे मोहित हो यहां रहनेके लिये ग्रीष्मभवन बनानेको आदेश किया था। आज भी कांगड़ेकी गर्गरी ग्राममें उक्त ग्रीष्मभवनका चिह्न देख पड़ता है।
दिल्लीके मुसलमान बादशाह कांगड़के सरदारोंको उपेक्षा करते न थे। सब लोग विशेष सम्मानई रहे। पदके अनुसार मर्यादा मिलती थी। १६४६ ई॰को नूरपुरके राजा जगतचन्द्र शाहजहानके आदेशसे १४००० सैन्यका अधिनेतृपद पाया। उन्होंने उसी सैन्यके साहाय्यसे बलख और बदख्शानके ओजवेकोंको हराया था।
१६६१ ई॰को औरंगजेबके राजत्वकाल जगत्चन्द्रके पौत्र मान्यता कुछ दिनके लिये सुदूरवर्ती बामियान और गारबन्दके शासनकर्ता बने। २० वर्ष पीछे उन्होंने दो हज़ारों मनसबदारका पद पाया था।
१७५८ ई॰को कांगड़के राजा घमण्डचन्द जालन्धर
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२७६
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कांगड़ा|२७७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
और इरावती तथा शतद्रु नदीके मध्यवर्ती प्रदेशमें शासनकर्ता बनाये गये।
दिल्लीके बादशाहोंका पूर्व पराक्रम विलुप्त होनेसे राज्यमें एक प्रकारकी पराजंकता आई थी। उसी समय प्राय: १७५२ ई॰को राजपूत-सरदार स्वाधीन हो कांगड़ेका अधिकांश उपभोग करने लगे। केवल भग्न दुर्ग अहमद शाह दुरानीके आयत्तमें रहा। १७७४ ई॰को जयसिंह नामक किसी सिख सरदारने कौशलक्रमसे कांगड़ेका दुर्ग अधिकार किया, किन्तु १७८५ ई॰को कांगड़ेका राजपूत-सरदार संसारचन्दको सौंप दिया। इतने दिन पीछे कांगड़ेका दुर्ग फिर कतोचराजवंशके हस्तगत हुआ। कतोचराज संसारचन्द्र अपने पूर्वपुरुषोंकी भांति स्वाधीन भावसे राजत्व चलाने लगे। पावर्तीय प्रदेशस्थ नाना स्थानोंके सरदारोंने उन्हें कर दिया। दिग्विजयको निकलते समय सब सरदार सैन्य ले संसारचन्द्रके अनुवर्ती बनते थे।
वर्षमें एक बार प्रत्येक सरदार राजदर्शनको आने पर बाध्य रहा। संसारचन्द्रने २० वर्ष प्रबल प्रतापसे राजत्व चलाया। सम्भव और यशमें यह सब कतोच राजाओंसे श्रेष्ठ थे। १८०५ ई॰को संसारचन्द्र और विलासपुरके राजाने शतद्रु और घार्घरा नदी-मध्यवर्ती प्रदेशके गोरखा-सरदारोंसे साहाय्य मांगा था। गोरखा शतद्रु नदी पार आये। वह महलमोरी नामक स्थानमें
(१८०५ ई॰) कतोच-राजपूतों पर टूट पड़े। बाहुबलके प्रभावसे राजपूतोंने हार पीठ दिखायी। गोरखासरदार कांगड़े राज्यमें घुस दारुण अत्याचार मचाने लगे। कांगड़ा रक्के स्रोतमें डूबा था। नगर, ग्राम, उपवन, सुन्दर राजप्रासाद प्रभृति सब उजड़ गये। उस समय कांगड़ा राज्य अग्रान और मकभूमिके समान था। कतोच-राजकुमारोंने प्राण छोड़ गिरिकी
गुहामें आश्रय पाया। ऐसा लोमहर्षण-काण्ड क्या कोयी कभी भूल सकता है। कांगड़के प्रत्य क ग्राम एवं प्रत्येक नगरमें लोगोंके हृदय पर वह भोषण व्यापार खटकता है।
तीन वत्सर अत्याचार देखने पीछे संसारचन्द्रने महाराज रणजित सिंहसे साहाय्य मांगा। १८०९
{{c|Vol. IV.{{gap}}70}}
{{Multicol-break}}
ई॰को रणजितसिंहने गोरखाओंके विरुद्ध युद्धकी घोषणा लगायी थी। भीषण समर आरम्भ हुवा। बड़े कष्टमें रणजित्को जय मिला। गोरखा शतद्रु उत्तर गये। प्रथम उन्होंने समस्त कांगड़ा राज्य संसारचन्द्रको सौंप दिया, केवल कांगड़ेका दुर्ग और ६६ ग्रामों का कर सैन्यव्ययके निर्वाहको अपने हाथ रख
लिया। पीछे रणजित् धीरे धीरे पहाड़ी सरदारोंके अधीनस्थ स्थान अपने साम्राज्यमें मिलाने लगे। १८२४ ई॰को संसारचन्द्र मरे। उनके पुत्र अनिरुद्धचन्द्र राजा बने थे। अनिरुद्धचन्द्रने केवल चार वर्ष राजत्व किया। रणजित् सिंहने अपने मन्त्री ध्यानसिंहके पुत्रसे अनिरुद्धकी भगिनीका विवाह ठहराया। कतोच राजकुमारने इससे अपनेको अपमानित होते देख राज्य छोड़ा और हरिद्वारकी ओर मुंह मोड़ा। उसी समय समस्त कांगड़ा महाराज रणजित्सिंहके राज्यमें मिल गया। १८४५ ई॰को प्रथम सिख-युद्ध होने पर अंगरेजोंने कांगड़ा अधिकार किया। १८४८ ई॰को मूलतानो विद्रोहके पीछे यहींके पहाड़ी सरदारोंने विद्रोह बढ़ानेको चेष्टा चलायी थी, किन्तु कुछ सिद्धि न पायी। फिर सिपाही-विद्रोहके समय सूचना मिली कि कांगड़ेमें सामान्य विद्रोहकी आग भड़की है। उस समय छह विद्रोही सरदारोंको फांसी दी गयी। आज तक फिर कांगड़ेमें कोई अशान्ति न फैली।
इस ज़िल़ेके प्रधान नगरका भी नाम कांगड़ा है। यह अक्षा॰ ३२° ५४' १३" उ॰ और देशा॰ ७६° १७' ४६" पू॰ पर अवस्थित है। पहले यह नगरकोट नामसे विख्यात था। कांगड़ा-वाणगंङ्गा और विशाखा नदीसंङ्गमके निकट पर्वत बसा है। इस नगरमें एक बहुप्राचीन दुर्ग है। भवानी और भवानी-पतिका पूर्वनिर्मित मन्दिर सुन्दर है। कांगड़ेमें जड़ाव और मोनिका काम अच्छा बनता है।
कांगड़ेके लोग साहसा, बलशाली, सरल और स्वाधीनचेता हैं। राजपूत अधिक देख पड़ते हैं।
यहां चिकित्सकोंका एक दल रहता, जो नककटोंको अच्छा कर सकता है। अकबर, साहब-उद-दीन एक चिकित्सक थे। उन्होंने नाक बनानेकी
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४७४|
कामास श-कामारि}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
At
कामाखुश (सं० पु०) कामे कामाहोपने अद्भुश इव ।
१ नख, नाखून । २ शिश्न, उपस्थ । (वि०) ३ काम
शान्तिकारक, खाहिशको ठण्डा करनेवाला।
कामाङ्ग (सं० पु०) कामं कामाहोपर्क अङ्ग मुकुल
१महाराजचत, एक बड़ा प्राम। कामानल (सं० पु०) काम
२ आम्रवक्ष, आमका पड़ । ३ श्येनपच्ची, बाज
चिड़िया।
कामाङ्गनायकरस (सं० पु०) बाजीकरणौषध विशेष,
ताकतको एक दवा। शुद्ध पारिके बराबर गन्धक डाल
रक्त उत्पलके ट्रवसे एक प्रहर घोंटते हैं। फिर पहलेसे
आधा गन्धक मिलाने पर यह तैयार होता है। मात्रा
ढाई रती है। समूल इन्द्रयव, मुषली तथा शर्करा
बराबर कूट पीस चूर्ण बनाते और इस रसको प्राधे
पल गोदुग्ध एवं उक्ल पूर्ण के साथ खाते हैं। इसके
सेवनसे मदनादय होता है। (रसरवाकर )
कामाची (सं० स्त्री०) लघुकाकमाची, छोटी कौवाटोंटी।
कामासा (सं० स्त्रो.)१ बन्दा, बांदा ।
२काक
माची, कौवाटोंटी।
कामातुर (सं० वि०) कामेन पातुरः, ३ तत् ।
पीड़ित, चाइका मारा हुवा।
कामात्मज (सं० पु०) कामस्य भामजः पुत्रः, ६-तत् ।
कन्दपके प्रात्मज, अनिरुद्ध ।
कामामता ( सं० स्त्री० ) कामप्रधानः पात्मा यस्य
तस्य भावः, कामात्मन् सल्। १ अनुरागप्रधानचित्तता,
जोशदार तबीयत। २ कामाकुलचित्तता, चाहको
मारी हुयो तबीयत ।
कामामा (सं० पु०) कामप्रधान: पामा यस्य. बहुव्री।
१ अनुरागी, चाहनेवाला । कामवशीभूत, प्यारमें पड़ा.
हुवा। ३ काममय, चाहसे भरा हुआ। ४ फलाभिलाषी,
नतीजेका खाहिशमन्द ।
कामाधिकार (सं० पु.) कामस्य अधिकारः, ६-तत्।
१ कामरिपुका अधिकार, खाहिशका दौरदौरा।
२ मानवाभिलाष सम्बन्धीय शास्त्रका एक भाग ।
कामाधिष्ठान (सं• क्लो०) कामस्य अधिष्ठान स्थानम्,
इ-तत् । कामका स्थान अर्थात् मन, खाशके रहनेको
जगा यानी दिल।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कामाधिष्ठित (सं० त्रि.) कामेन भधिष्ठितम, ३-तत् ।
१ कन्दपं द्वारा अधिकृत, प्यारसे जीता दुवा । (को०)
भावे त। २ कामाधिष्ठान, खाहिश या प्यारको
यस्य, बहुत्री।
एव अनलः, काम पनल
इव वा। १ कामरूप अग्नि, खाथिको भाग।
२ कामकी तीव्र यातना, प्यारका गहरा दद।
कामानशन (सं० लो०) कामं अनशनं यत्र, बहुव्री० ।
१५च्छापूर्वक अनाहार तपस्या। २ रागद्देषादि-
रहित इन्द्रियगण द्वारा विषयका त्याग।
कामानुज (सं० पु.) कामका अनुज, क्रोध, गुस्मा,
खाशिका छोटा भाई।
कामान्ध (सं० पु०) कामन कामोद्दीपनेन अन्धयति
जानशून्यं करोति काम प्रध-णिच-मच्। १ कोकिल,
कोयल। (वि.) कामेन पन्धः। २ कामके वेगसे
हिताहितका ज्ञान न रखनेवाला, नो खाहिशके नोधमें
भलावुरा समझता न हो।
कामान्धा (सं० स्त्री.) कामं यथेष्ट अन्धयति, कामाच-
काम टाप् । १ कस्तूरी, मुश्क। (कामिन अन्धा) २ कामके
वैगसे हिताहितका मानन रखनेवाली स्त्री, जो औरत
खाहिशके नोशमें अन्धो पड़ गयी हो।
कामामी ( सं. वि. )१ इच्छाभागी, खाहियके
मुताबिक खानेवाला। २ पाहार लाभकर्ता, खाना
पानवाला।कामाभिकाम (सं० वि०) कामस्य अभि कामो यस्य,
बहुव्री। कामभोगेच्छु, शहवतपरस्त ।
कामायु (सं० पु.) कामं यथेष्ट पायुर्यस्य, बहुव्रो ।
१ रन, गोध। २ गरुड़।
कामायुध (संपु.) कामस्य भायुधमिव । १ महा.
राजचूत वच, बड़े प्रामका एक पेड़। (को०)
२शिन, उपस्थ ।
कामारण्य (सं० ली.) कामं शोभनं परण्यम्, कर्मधा।
मनोहर वन, खुबसूरत जङ्गल। २ कन्दर्पवन, काम-
देवका बाग़।
कामरथी (हि.) कामार्थो देखो।
कामारि (स.पु.) कामस परिः शनः तत् ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामुकौ-कामोद|४७७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कामुको (स.बी.) कामुक डोष्। नामपदकृष्णगोले ति।।
वृषस्यन्ती, हिमान। कामका देखो।
कामुहा (स. स्त्री०) मुहपर्णी, मोट ।
कामप्सु, (वि०) अभिलाषके पूरणार्थं उद्योग
करनेवाला, जी खाहिश पूरी करने में लगा हो।
कामेश्वर (स'• पु.) कामानां ईखरः, ६-सत् ।
१ परमेश्वर। २ कुवेर ।
कामेश्वरमोदक (सं. पु.) औषधविशेष, एक दवा।
पामलकी, सैन्धव, कुष्ठ, कट्फल, पिप्पली, शुण्ठी,
यमानी, बनयमानी, यष्टिमधु, जोरक, धान्य क, कृष्ण
जोरक, पठी, कर्कटशृङ्गी, वचा, नागैखर, तालीश,
एला, तालीशपत्र, गुड़त्वक, मरिच, हरीतकी तथा
विभौतकका पूर्ण समभाग पौर सवीन भूनी हुयी
भागका चूर्ण सबके बराबर डालते हैं। फिर उक्त
सर्वच के समान चीनी छोड़ पाकयोग्य जलमें चाशनी
बनाना चाहिये। पाक शेष होने पर किञ्चित् धृत
एवं मधु और सुगन्धके लिये भूना तिन तथा कपूर
मोदक आध तोलेका बांधते हैं। इस
औषध सेवनसे संग्रहणी रोग शीघ्र पारोग्य होता है।
{{Right|(रसरबाकर)}}
बाजीकरण ( ताकत बढ़ाने ) का कामखर मोदक
. इस प्रकार बनता है, कुष्ठ, गुडू चौ, मेथी, मोचरस,
विदारी, सुषली, गोक्षुरवीज, इक्षुर, शतावरी, कशेरुक,
यमानी, तासाहुर, धान्यक, यष्ठिमधु, नागबासा, तिला,
मधुरिका, जातीफल, सैन्धव, भार्गी, कर्कटशृङ्गी,
शुण्ठी, मरिच, पिप्पली, जौरक, कृष्णजीरक, चित्रक,
गुड़त्वक, तालीयपन, एमा, नागकेशर, पुनर्नवा,
गपिप्पली, द्राक्षा, कटूफल, शुण्ठी, शाल्मली, त्रिफला
और कपिभवका चूर्ण समभाग, सवैचूर्णका चतुर्थीग
.अन्न, और अमसे पाधा गन्धक पड़ता है। फिर इस
चर्णसमष्टिसे पाधी भांग और सबसे दूनी चीनी डाल
यह मोदक बनाया जाता है। मोदकको मात्रा १ तोला
है। इसके सेवनसे बलवीर्य बढ़ता है। (भेषनारवावलो)
कामेश्वररस (स. पु.) औषधविशेष, एक दवा ।
पारा १ पक्ष, गन्धक १ पल, हरीतकी तथा चित्रक
१पक्ष, सुस्तक डेढ़ पस, एला डेढ़ पर, पत्रक डेढ़
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पस, त्रिकट १ पल, पिप्पलीमूल १ पल, विष १ पन्न,
नागकेसर १कर्ष, एरण्ड १ पल और सबके बराबर
गुड़ डाल धुस्त ररस या घोसे एक प्रहर घाँटने पर
यह रस तैयार होता है। गोलो वेरको गुठलीके
बराबर बनती है। रातको इसे सेवन करनेसे पाण्डु
और शोथरोग पारोग्य होता है। (रसैन्द्रसारसया)
कामेश्वरी (सं० स्त्री.) कामानां भोग्यविषया
प्रदायित्वेन ईश्वरी,
६-तत्। १ कोई भैरवी।
२ कामाख्याको पांच मूर्तिमें एक मूर्ति ।
"कामाख्या विपुरा चैव सथा कामभरी पिया।
सारदाय महोबाहा कामरूपगुणयुवा" (कालिकापुराया.)
कालिकापुराणमें कामेश्वरी मूर्तिको वर्णना इस
प्रकार है, कृष्णवर्ण, मुस्निग्ध कृष्णकेश, षणमुख,
हादश इस्त, अष्टादश चक्षु, प्रत्येक मस्तकमें पध-
चन्द्र, वक्षोदेशपर मणिमुक्तादि-निर्मित माला और
दक्षिण-शस्त समूहमें पुस्तक, सिद्धसूत्र, पञ्चवाण, खडा
शक्ति नथा शूल है। वाम-हस्तसमूहमें पक्षमाला,पड़ता।
महापन, कोदण्ड, अभय, चर्म और पिनाक है।
ईशान, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और मध्य छहो
पोर षण्मुख अवस्थित हैं। सकल मुख यथाक्रम शक्त,
रक्त, पोत, हरित, कृष्ण और विचित्र वर्णविशिष्ट हैं।
यह मुख पृथक पृथक देवीके मुख कहे गये हैं। शक्ल
माहेश्वरीका, रख कामाख्याका, पोत त्रिपुराका; हरित
शारदाका, कृष्ण कामेश्वरोका और विचित्र मुख चण्डी
देवीका है। प्रति मस्तक पर केश संयत है। परिधान
विचित्रवस्त्र अथवा व्याघ्रचर्म है। सिंह पर खेत शव,
खेतशव पर रतपन और रक्तपद्म पर देवो बैठो हैं।
धर्म, अर्थ और कामसिक्षिके लिये इसी प्रकार काम-
खरी मूर्तिका ध्यान करना चाहिये।"
{{Right|(कालिकापुराण ६५०)}}
कामेष्ट (सं• पु०) रानाम्रवृक्ष, एक बड़े भामका पेड़ ।
कामोद (स.पु.) एक रागिणी। वैलावती पौर
गौड़के संयोगसे यह बनता है। ध नि स ऋ ग म प
स्वरग्राम है। धैवत इसका वादी और पञ्चम संघादी
है। करण और हास्य रसके समय यह गाया जाता है।
रात्रिका प्रथम पर्धप्रहर इसके गानका समय है। यह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कास्वविक-कांम्व|४७९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
"किस्मका करायल। दहीको चांछ और खटाईसे मूग
वगैरहका जो करायल बनाया जाता, बही 'कावलिक'
कहलाता है। यह विशेष रुचिकारक होता है।
"दधिमनिम्न सिइन्नुयूषः काम्बलिका मसः।" (सुयुत)
काम्बविक (सं• पु०) कम्वुः शङ्ख भूषणत्वेन शिल्पमस्य,
कम्बठक। शडकार, कौड़ीके बने जेवर बेचनेवाचा ।
काम्बुका (सं० स्त्री० ) कुत्सितं अम्बु यस्याः, कु-अम्ब
कप-टाप कोः कादेशः।
अश्वगन्धा, असगन्ध ।
काम्बे-१ गुजरातके पश्चिमभागका एक देशी राज्य ।
यह प्रक्षा• २२' एवं २२.४१७० और देथा.
७२.२० तथा ७३.५ पू के मध्य अवस्थित है। इसके
पूर्व बड़ोदा राज्यका बड़साद एवं पितन्नाद प्रदेश,
दक्षिण काबे उपसागर और पथिम साबरमती नदीके
'भागे ही अहमदाबादकी सीमा है। काम्बेकी सीमाके
मध्य अंगरेज और बड़ोदावाले गाइको वाडके अधिक्कत
कई ग्राम हैं। इस प्रदेशको पूर्वदिक् मही और पश्चिम
“दिक साबरमती नदी बहती है। दोनों नदीयामें
ज्वारभाटा पानसे पानी कुछ खारा रहता है।
काम्बे की जमीन भी लोनी है। नतन कूप खोदनेसे
बचाये थे। बेसिनको सन्धिके पीछे काम्ब अंगरेजोंके
अल्प दिन में ही पानी खारा हो जाता है। उसनलको
-सावधानसे व्यवहार करना पड़ता, नहीं सो नासूर
निकलता है। काम्बे की भूमि समतल है। बीच
बीच में भाम, इसनी, नीम, वट प्रमृति चोंको श्रेणी
है। देशमैं गुजराती और हिन्दी भाषा चलती है।
हिन्दोमें इसे खम्भात् कहते हैं। कारण स्तम्भतीर्थ
नामक महादेवका एक स्थान है। उसोसे खम्भात्
नाम बना हैं।
लोगोंके कथनानुसार ई० वें शताब्दके शेषमागमें
'पारस्य देशसे पारसिक लोग कुछ जहाजोंपर जाते
। तूफानसे उनमें कई जहाज डूब गये। कुछ
जहाल अति कष्टसे सानिम प्रदेश पहुंचे थे। साजिम
प्रदेश सूरतसे ३५ कोस दक्षिण है। पारसिकोंने वहां
उतरनेको राजासे अनुमति मांगी। राजाने कहा-यदि
वह गुजराती भाषामें बात करना सीख लेते और गोमांस
न खाते, तो उतरने की अनुमति.पा जाते। इस बात
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पर स्वीकृत हो पारसिक वहां बहुत दिन रहे थे।
फिर वह वहांसे उपकूलमें वाणिज्य करने नगे। क्रमसे
पारसिक चारो पोर फैल काम्बे पहुंच गये। काम्ब
स्थान उन्हें बहुत अच्छा लगा था। सुतरां वह दनके
दल वहां ना कर उपस्थित हुये। उनको संख्या क्रमसे
बढ़ने लगी। शेषको वहांके प्रधिवासियोंकी अपेक्षा
संख्या पधिक होने से उन्हीं का कत्व पारम्भ हुवा।
कुछ कात पोछे हिन्दुवोंने उन्हें युद्धमें परास्त कर देशसे
निकाल दिया। युद्धमें पनेक पारसी मरे थे।
ई० को काम्बे ब्राह्मणों के अधिकारमें पड़ा। उसी
समयसे क्रमिक उनति होने लगी। १२८७ ई.को
मुसलमानोंने काखे पधिकार किया। उस समय कावे
भारतका एक समृद्धिशाली नगर समझा जाता था।
मुसलमानोंके शासनमें काम्बे गुजरातके अन्तर्गत दुवा।
वें शताब्दमें काम्बेकी अधिक उबति देख
पड़ी। ई०१६ यताब्दसे उक्त प्रदेश वापिन्यका
प्रधान स्थान. माना जाने लगा। महाराष्ट्रोंके राज्य
बढ़ाते समय मुसलमानोंने प्राणपषसे अपने अधिकार
हाथ लगा।
आज कल अंगरेजोंके अधीन एक नवाद
शासन करते हैं। उनकी पंगरेजोंसे राज्य करनेके
सिये सनद मिली है। प्रबन्धानुसार राज्यका भार
उन्होंकी वंशावलीमें रहेगा। वा अंगरेज गवरन-
देख पड़ती है। भूमिका परिमाण ३५० वर्गमीन मेण्टको कर देते हैं।
काम्बेमें कोई ३० विद्यालय हैं। पफीम, गेहं,
चावल, रूई, तम्बाकू और नीच खूब उपजता है।
नीतगाय, जंगली सूवर और हिरन बहुत हैं।
काम्बे उपसागरमें वर्षा ऋतुके सिवा अन्य समय भलो
भांति मल नहीं रहता। कान्ये उपसागर देखी। बाणिज्यमें
अधिक सुविधा इसी कारण नहीं रहती। मही और
साबरमती उक्त उपसागरमें ही गिरती हैं। किन्तु
उनका प्रवाह बराबर एक राइसे नहीं चलता। उसीमे
नदोके मुख में बड़े बड़े जहाजोंके जानेमें भड़ान
पड़ती है। फिर भो बाणिज्य बुरा नहीं । सतरंजी,
गलोचा, नमक, नील और खोदनेका पत्थर तैयार
होता है। काम्बे में कोई पच्छो राज नहीं। बैलगाड़ी,<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काम्वे उपसागर-काम्य|४८०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
ऊंट, घोड़ा वगैरहके जरिये माल-असबाब भाता
जाता है।
{{Gap}}२ काम्बे राज्यका प्रधान नगर। वह मही।
नदीके सङ्गमस्थान पर पक्षा० २२° १८३०७० पौर
देशा० ७२' पू. में अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः
३६००० है। नगर प्रति प्राचीन है। पहले इस नगरके
विषम स्रोतका वेग बढ़ता है। काम्बे के निकट प्रायः.
चारो ओर प्राचौर वेष्टित था। फिर लो पर तोप
भी लगी रहती थी। किन्तु पान कल उसका भग्नाव
शेष मात्र लक्षित होता है। कथानुसार जारमनायने
वहां जन्म लिया था। वह प्राचीन द्राविड़के पाण्ड्यः
राजके दौत्यकार्यक्रो रोम-सम्राट् अगस्तसके निकट
भेजे गये। वहां प्राथम नगर में उन्होंने बाग लगायो
थी। फिर खच्छाक्रम जारमनाक्ष्य उसमें जल
मरे। प्रसिह राजा विक्रमादित्यके भी उक्त स्थानमें
जन्म लेनेका प्रवाद है। १२८३ ई. को मार्को पोलो
खदिर, सफेद कत्या। ३ पुवागवृक्ष, एक पेड़।
मामक वेनिसके परिव्राजक उस नगर देखने गये थे।
उन्होंने उसे भारतका एक बड़ा बन्दर और वाणिज्य
स्थान बसाया है। उनके विवरण काम्बेथ नामसे
काखे नगरका उल्लेख है। वास्तविक व भारतका
प्रधान बाणिजास्थान था। किन्तु उपसागरका जल
घट जानसे अब वह समृद्धि देख नहीं पड़ती।
{{Right|काव पसागर देखी। }}
काम्बेमें जैनोंके प्रकाण्ड मन्दिर थे। उन्हों;
मन्दिरकि स्तम्भ निकाल १२२५ ई० को मुहम्मद
शाने जामा मसजिद बनवायो। काम्ब की प्राचीन
कीर्तियोका भग्नावशेष भान भी पनिक स्थलीमें देख
एक मुसलमान नवाब वहां राजत्व करते
हैं। वह अंगरेजीके अधीन करद राजा हैं।
काम्बे उपसागर-खम्भातकी खाड़ी। उसके पश्चिम
गुजरात और पूर्व बम्बई-प्रान्त है। समुद्रके मुहानमें
उसका परिसर केवल डेढ़ कोस है। किन्तु सुखसे
उत्तर कवि प्रदेश तक प्रायः ४० कोस निकलेगा।
पूर्व दिकसे नर्मदा तथा ताप्ती, उत्तरसे साबरमती एवं
मही पौर पथिम काठियावाड़से दो नदी जा उसमें
गिरी हैं। उपसागरके मुखसे पश्चिम दिक् पोतं.
गीजोंका अधिक्षत दीड नामक हौंप और पूर्व दिक
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सूरत नगर अवस्थित है। सूरत, कास्बे वगैरह बन्दर
उमौके उपकूल पर हैं। फिर भी उसमें वाणिज्यका
विषम अन्तराय उपस्थित है। प्रायः दो सौ वर्षसे
जल क्रमशः घट रहा है। इसी कारण भाटेके समय
उसमें जल कम पड़ जाता है। फिर ज्वारके समय-
८ कोस तक भाटाके समय बिलकुल जल नहीं रहता।
उस समय पार जाते ज्वार उठनेसे जीवनको प्राथा
छोड़ना पड़ती है।
ज्वारके वैगसे जहाज तक टूट
जाता है। जो नौका या जहाज किसी ज्वारके
उठते आ लगता, वह फिर च्चार न चढ़नेसे कहां
जा सकता है।
काम्बोज ( स० पु. ) कम्बोजदेशे भवः, कम्बोज-अण् ।
१ कम्बोजदेशजात घोटक, एक घोड़ा। २ खेत
४ कट्फल, कायफल । ५ वरुण्यक्ष, एक पेड़। (को०).
६ पन काष्ठ, एक लकड़ी। (वि०) ७ कम्बोजदेश-
जास, कम्बोज मुल्कका पैदा। कम्बोज देखो।
काम्बोज-यवनतुल्य एक म्लेच्छनाति । सागर
राजाने इनें मस्तक मुण्डित करा देशसे निकाल दिया
था।(परिवंश)
काम्बोजक (म.ली.) कम्बोजे भवः, कम्बोज-बुन्।
मनुष्यतवस्त्रयो। पा १३९ । कम्बोजदेशवासीकाः
हास्यादि। (त्रि.)२ कम्बोजनात ।
काम्बोनि, काम्बोजी देखो।
काम्बोजिका (सं० स्त्री०) खेतगुना, सफेद घुघची।
काम्बोजी (सं. स्त्री०) काम्बोज-डीप । १ रसगुना-
लता, लाल धुधनी। २ वलक्ष खदिर, पापरी कत्था ।
काम्भोजी (सं० स्त्री०) १ खेतगुना, सफेद घुधची।
२ वाकुची । ३ विट्खदिर । ४ माषपर्णी । ५ गन्धमुखा।
काम्य ( ० वि० ) काम्यते, कम-णिच-यत्।
१ कामनीय, चाहने लायक। २ सुन्दर, खूबसूरत ।
३ कामनायुक्ता, खाधिशमन्द।
४ कर्तव्य, करने सायक।
“यत् किचित् फलमहिण्य यचदाननपादिकम् ।
क्रियते कायिकं यच्च तत्काम्य परिकौनितम् ।" (मुग्ध रा० टो)<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४८२|
कायदा-कायव्यह}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कायदा (अं० पु.) १ नियम, तरीका । २ रीति,
दस्तुर। ३ व्यवस्था, कानन ।
कायफर (हिं.) कायफल देखो।
कायफल (सं० ली. ) कट्फल, एक पेड़। इसकी छाल
पौषध पड़ती है। हिमालयकै उष्णप्रधान स्थानमें
यह उत्पन्न होता है। आसामके खासिया पर्वत
और ब्रह्मदेशमें भी इसकी उपज है।
कायबन्धन (सं० लो० ) कार्य बनाति, काय-बन्ध ल्यु
परिकर, कमरबन्द।
कायम (१० वि० ) १ स्थित, ठहरा हुवा। २ स्थापित,
रखा हुवा। ३ निवित, ठहराया हुवा । ४ समान,
बराबर।
कायम-कायम खान्का उपनाम ।
टोंकवाले नवाब
वजीर मुहम्मद ख़ानके अधीन यह सेनानीके पद पर
प्रतिष्ठित रहे। १६५३ ई० को इन्होंने उर्दू में एक
दोषान् बनाया था।
कायमज-फरुखाबादवाले नवाव
मुहम्मद खान
बहुपके पुत्र ।
जून मासमें इन्हें अपने
पिताका उत्तराधिकार मिला था। इन्होंने वजीर
नवाब सफदर जङ्गको प्रेरणा पर रुहेलोसे युद्ध ठाना।
किन्तु पराजय होनेपर १७४८ ई० के नवम्बर मासमे
उन्होंने इन्हें मार डाला था। फिर वनीर इनका राज्य
दवा बैठे। इनके प्रधान.कर्मचारी इलाहावादको बन्दी
बनाकर भेजे गये। किन्तु इनकी माताको १२ छोटे
जिनके साथ फरुखाबाद नगर वंशके भरणपोषणके
लिये मिला था।
विमित देश वनौरके प्रतिनिधि
राजा नवल रायके संरचण्में रहा। थोड़े दिन पछि
ही इनके माता अहमद खान्ने युरमें राजा नवल
रायको मार, देश पर अपना अधिकार जमा
लिया था।
कायमनोवाक्य (सं० वि०) काय: मनः वाक्यच्च यत्र,
बहुव्री०५ शरीर, मन और वाक्यसे होनेवाला, जो
दिलोजान से लगने पर बनता हो।
कायममुकाम. (अ.वि.) स्थानापन, एवजी, जगह
पर रहनेवाला।
कायमान (सं० को०) कायस्य मानमिव मानमस्त्र,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मध्यपदन्तो। १ टएकुटोर,
२ देहपरिमाण, जिस्मकी नाप ।
कायर (हिं.) कासर देखो।
कायरता (हिं०) कातरता देखो।
कायरूपसयम (सं० पु०) पातघ्नल कधित एक ध्यान।
इसमें अपने रूपका संयम कहा है।
कायल ( अ० वि० ) यथार्थताको स्वीकार करनेवाला,
जो
ठ निकलने पर अपनी बात पकड़सा.न हो।
कायली (हिं. स्त्री०) १ ग्लानि, शर्म। २ मघानी ।
कायवलन (सं० लो०) कायो धल्यते पाच्छाद्यते अनेन,
काय-बल-ल्युटा कवच, बखर।
कायव्य (संलो०) महाभारताच एक दमनराज । इनके
जन्मका विवरण इस प्रकार दिया है, किसी निषादीक
गर्भ और क्षत्रियके औरससे कायष्यका जन्म हुवा। यह
दस्युदशाधिप बनते भी सर्वदा धर्म-कर्ममें लगे रहते थे।
अनुचरोंके प्रति इनका आदेश रहा-तुम लोग वामए,
सपखौ, भीक, शिश, स्त्री और युद्धसे भागे व्यक्तिको
कभी मत मारो। या स्वयं वनवासी, तपखो तथा
ब्राह्मणको पूजते और मृगादि मार उन्हें पर्याप्त पाहार
देते थे। इसी प्रकार दस्युत्ति रखते भी कायष्यने
सिद्धि पायो। (महामारत, शान्ति, १२५ १०).
कायव्यूह (सं० पु.) काये धरौरे व्यूहः वातादीनां
बगादीनां सप्तधातूनाञ्च व्यूहनम्, तत् । शरीरक
वात, पित्त, नमा, त्वक् प्रभृति सप्तधातुका विन्यास,
वाह्यदिकसे पारम्भ करने पर यथाक्रम लक, रक्त,
मांस, सायु, अस्थि, मन्ना और शुक्र पाते हैं। वात,
पित्त और मा शरीरके अभ्यन्तरमें पृथक् पृथक
स्थामपर अवस्थित हैं।
इन तीनों दोषों की अविकृत अवस्थाका स्थान इस
प्रकार निर्टिष्ट है, नितम्ब एवं गुदेश वायुका,
और
पक्वाथय (तिनम्ब एवं गुपदेशके ऊपर
नाभिके नीचे पक्वाशय पड़ता है) तथा भामाशयके
मध्य पित्तका और भामाशय भाका स्थान है।
संक्षेपमें प्राधान्यके अनुसार उन्म तीनों स्थान सीमों
दायों के समझे गये हैं। (सयत )
प्रत्येक दोष पांच पांच भागों विभक्त है। सस<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ|
४८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
स्थानोंको छोड़ तीनों दोष दूसरी जगह भी रहते हैं।
{{Right|वायु, कफ, चौर पिच शब्द देखी।}}
२ कर्मभोगके लिये योगियों द्वारा कल्पित कायसमूह।
योगी कर्मत्यागके लिये कायव्य बनाते हैं।
{{C|"नामिचक्र कायशु इचानम् ।" ( पातलस्व )}}
नाभिचक्रम संयम रखनेसे योगी कायव्यूह समझ
सकते हैं। फिर 'सङ्कल्पादेव तच्छ्रुतेः' शाण्डिल्यसूत्रके
अनुसार योगी बहुविध फल भोगने के लिये जो शरीर
वनास, उससे चित्त, प्रत्येक इन्द्रिय और अङ्गकी
कल्पना लगाते हैं।
'कायसम्पद ( सं. स्त्री० ) कायस्य सम्पद तत् ।
शरीरको सम्पत्ति, जिस्मकी दौलत । रूप, लावण्य,
बल प्रौर सुगठन प्रभृतिको 'कायसम्पद' कहते हैं।
कायसौख्य (सं० ली.) शरीरसुख, जिस्मका पाराम।
कायस्थ (सं० पु० ) कायेषु सर्वभूतदेहेषु तिष्ठति,
काय-स्या का १ अन्तर्यामी परमेखर।
"कायस्थोऽपिन कायस्थः काययोऽपिन नायसे ।
कायस्थोऽपि म सुभानः कायम्योऽपि न षष्यते ।" (उत्तरगीता शरम)
२ जातिमेद । भारतवर्षके प्रधान प्रधान स्थानों में जो
कायस्थ वास करते हैं, उनमेंसे सामाजिक और विशुद्ध
कायस्थ मात्र पपनको चित्रगुप्तके वंशधर वसलाते हैं।
इनके सिवा और एक श्रेणोके सम्भान्त और अल्पसंख्यक
कायस्थ हैं, जो चान्द्रसेनीय प्रभु कहलाते हैं। जिन
क्षत्रिय वंशधरीने युत्ति त्याग कर उक्त प्रभु कायस्थ-
को हत्ति ग्रहण की वा उनके साथ सम्बन्ध जोड़ा,
वे भी 'प्रभु' कहलाते हैं। चित्रगुप्त देव ही कायस्थ
जातिके, प्रादिपुरुष है। ऐसी दशामें सबसे पहिले
चित्रगुप्तके विषयको ही पासोचना करनी चाहिये।
{{C|'''चित्रगुप्तका परिचय। '''}}
हस्तलिखित भविष्यपुराणमें लिखा है,
"दशवर्ष महसाहि दशवर्ष गतानि च।
स समाधि' समाधाय स्थिसोऽभूत कमलासने ।
..पानकलक पे हुए भविष्यपुराण, चिवगुप्तकै विषयमै ऐसी कोई
बात न देख कर कोई कोई इस विवरणकी प्रचित बतलासे परन्तु
भारदीय महापुराणकै उपविभागलपमें भविषापुराणको यो विस्त स विषय-
-सूची, उसमें कार्तिको ला दितीयाके व्रतकै प्रसंगमै चित्रगुप्तदेवको पूना
और विस्त त विवरणका पाभास मिलता है। इसके सिवा कई स्थानों से
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
स्थिते समाधी सकलं या तं वदामि ते ।
सच्चौरामाहामा: यामः कमललोचमः।
कन्नु नौवी गूढपिरा: पूर्णचन्द्रनिमामनः ।
स्खेखनीष दनौहती मसौभागमस युतः।
निहित्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उत्चमः सविचिवाबो ध्यानस्तिमितलोचमः।
स्यका समाधि गाय तं ददर्श पितामह
अधी, तनिरोधाध पुरुषश्चायत: स्थितम् ।
पप्रच्छ की भवानये सिष्ठले पुरुर्णत्तम ।
इति पृष्टोऽनवोत्रीण मार्य समक्षौरवम् ।
{{C|'''पुरुष उवाच । '''}}
उत्पनो विधिना नाथ त्वच्छरीरान संशयः ।
भामधैयं हि मे तात! वनुमईस्यतः परम् ।
यथोचितच यत्कार्य तत्व मामनुमामय ।
{{C|'''पुलक्षा उवाच । '''}}
प्रस्थाकथं तती बझा पुरुष स्वशरीरजम् ।
महष्य प्रस्य वाचदमानन्दितमतिः पुनः
स्थिरमामाय मेधावी ध्यानस्थस्थापि सुन्दर।
{{C|'''अमीषाच। '''}}
मच्छरोरात समुह सम्तमाल कायस्थ संतक ।
चित्रगुप्त ति नावा वै ख्यातो भुवि भविष्य मि ।
धर्माधर्मविवेकार्थ धर्मराजपुर सदा ।
स्थितिमवतु नै बत्म ! ममाला प्राप्य नियमाम् ।
शनवोचितो धम': पालगोय यथाविधि ।
प्रभा समस्त भी; पुव भुवि भारसमाहितः ।
सम दला वरं प्रातः वान्तरधीयत " (पापु० उत्तरखण्ड)
ब्रह्माने जगत्को सृष्टि करने के बाद स्थिरचित्तसे
इन्द्रियों को संयत कर ११०० वर्ष तपस्या की। उसी
अवस्थामें ब्रह्माके शरीरसे श्यामवर्ण, पनसोचन,
कम्बुग्रीव, गूढशिरा और परमसुन्दर एक पुरुष
उत्पन्न हुवा। वह दावात-कलम ले कर ब्रह्माके सामने
श्रा खड़ा हुआ।
तब ब्रह्माने समाधि भर कर उसे
नौसे ऊपर तक देख कर पूछा, तुम कौन हो ? और
मेरे सामने क्यों खड़े हो ? उत्तरमें उस पुरुषने कहा,
--" नाथ ! मैं आपके शरीरसे ही उत्पन्न हुई।
ऐसौ इसलिखित पुस्तकें भी मिली। जिनमें भविषापुराणीय चिवगुपके
प्रतका विवरया - पाया जाता है। सुप्रसिह "वाचस्पयामिधान" और
"भन्दकन्पद्रुम" महाकोषम मी भविषापुरापके कथनमै उक्त धिवगुप्तको
कथा उहतं है। पतएव जान पड़ता कि, पानकलकै कये हुए भविषा-
पुरापसे बातचा निकाल दी गयौ.।।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४८४|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पाप मेरा नामकरण कीजिये ; और मेरे लिए कार्य
दौजिये।
भगवान् ब्रह्माने उसके मधुर वाक्यों की सुन कर
बड़ी प्रसन्नतासे कहा-“हे वस! मैंने स्थिरचित्त
हो कर समाधि लगाई थी, उसी अवस्थामें तुम
मेरे कायसे पैदा हुए, इसलिए तुम संसार में कायस्थ
नामसे प्रसिद्ध होगे और तुम्हारा नाम चित्रगुप्त
हुपा। धर्माधर्मके विचार करनेके दिए यमराज
न्यायालय में तुम्हारा स्थान निर्दिष्ट हुआ।
क्षत्रिय धर्म पालन करना और पृथिवीमें बलिष्ठ प्रजा
उत्पन्न करो।" ऐसा वर दे कर बना वहांसे अन्तर्धान
हो गये। कमलाकर महोइत वृहत्वाखण्ड में भी
लिखा है-
"भवान् चवियवच समस्थान-समुद्भवात् ।
कायस्थ: पवियः खयाली भवान् भुषि विराजते ।
तमसम्भवा येतेऽपि त्वत् समतां गताः ।
तेषां लेखादितिय चनियाः रमतत्परः।
सकारादीनि कापि यानि वियनातिः ।
तानि सर्वाणि कार्यापि मदानावयतचिता:।
घका प्रजापतिरिदं व बान्तर्दधे विभुः।
एवमुक्तविश्वतः प्रसन्नध्दयोऽमवत् ।"
(Vyavastha Darpana by Syámácbaran Sarkar, Srd, Ed.
Part I, p. 664, )
ब्रह्माने कहा था कि, हे चित्रगुप्त ! समस्थान
अर्थात् कायसे पैदा हुए हो; इसलिए तुम भी
क्षत्रियवर्ण हो। तुम पृथिवीमें कायस्थ-क्षत्रिय नामसे
प्रसिद्ध होग। तुम्हारे वंशधर कायस्थ भी तुम्हारे
समानं कायस्थ-क्षत्रिय गिने नायगे। उनकी लेख्यादि
वृत्ति होगी और क्षत्रियकन्याके साथ उनका विवाद
होगा। क्षत्रियों में जो जो संस्कार होते हैं, हमारी
पानानुसार उनको भी वे ही संस्कार करने होंगे।"
इतना कह कर ब्रह्मा वहांसे अन्तर्धान हो गये; और
चित्रगुप्त उनके वचन सुन कर प्रसन्न हुए।
'''गरुडपुराणमें और एक जगह सिखा है-'''
"प्रयाति चिननगरं वौचिनो यब पार्थिवः ।
यमवैवाचनः मौरियंव राज्य प्रशान्ति दि" (उपरखए १०५०)
• फिर वह ऋषि · चित्रनगरमें पहुंचे जहां
घोचित, यमके छोटे भाई-सौरि अर्थात् पूर्वके पुत्र
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
राज्यशासन करते थे। उक्त गरुडपुराणमे यह भी
ज्ञात होता है कि, यही चित्रनगर पीछे 'चित्रगुप्तपुर'
नामसे विख्यात हुआ है।
"चिवगुतपुरं तन योजनानां तु विशक्तिः ।
कायस्थानव पश्वन्ति पापपुण्खानि मगा।" (अत्तरखण १२)
उस यमलोको (२० योजनमें विस्त त) चित्र-
गुप्तपुर है। वहांक कायस्थ सबके पाप-पुण्य का विचार
करते हैं।
{{Left|देवीभागवतमें लिखा है}}
"ग्राममायायां यमपुरी तव दाउघरो महान्।
स्वमटेव टिसी राजन् श्विगुतपुरोगनः ।
मिन शक्तियुती मानधनयोति यनो महान् ४ (१२०००).
हे राजन् । दक्षिण दिशामें यमपुरी है; जहां
चित्रगुप्त प्रादि अपने सुभटों सहित और अपनी समस्त.
शक्तियों सहित सूर्यके पुत्र यम विराजमान हैं।
गरुडपुराण में भी लिखा है,-
"वायुः सर्वगतः सृष्टः सूर्य जीविहहिमान ।
घरासतः सृष्टरिवाहन मयुवः ।
सष्ट्रवमादिकं सर्व वयसे पै तु पद्मना ।"
{{Right|(गरपुराए, मेदकटर, १०)}}
ब्रह्माने सबसे पहिले सर्वव्यापी वायुको ; फिर.
तेस्रोमय सूर्यको सृष्टि की थी। उसके बाद सूर्यसे
चित्रगुप्त सहित धर्मराज ( यमराज) को सृष्टि की।
इस तरह आदि जगत्को सृष्टि करके ब्रमा तपस्यामें
रत हुए।
स्कन्दपुराणके प्रभास-खण्डमें चित्रगुप्तको कायस्थ-
कहा गया है। और उनकी उत्पत्तिको कथा इस.
प्रकार है-
"मिमा जान पुरा देवि धर्मात्मामूदराती..२
कायवः सर्वभूतानां निव्य प्रियहितैरतः ।
तस्थापत्य' हाच या ऋतुकालामिगामिनः ।।
पुनः परमतेजसो चिनी भान वरानने।
तथा विवाभवत् मन्या व्यायामोदमनार
भाभ्यां तु जावमावा मिवः परत्वमा वान् ।
भय वस्त्र च मा माया मा तैनानिमाविश्न
पघं चौ बालकौ दौमापिमिः परियालिवी
हगिती महार बाहादेव स्थिती तर
-प्रमार नमामाच वयः परनमाथिवी।
प्रतिष्ठापा महादयं माखरं बारितस्करम् ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायय|
४८५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पूजयामास धर्मात्मा घपमात्यानुलेपनः ।
वशिष्ठकथितयच पटटिसमन्वितः।।
एदेश नपतमस्य थियस्व विमहामनः ।
तस्य तुष्टः साश: कादिम महसा विसः॥१
पनवौइनस मद्र' ते वरं वरय मुन्नता
सोऽवयौद्यदि मे सुटो मगांतोशोधितिः। र
प्रौढत्व सयकाय नायता मा रुचिस्तथा ।
सप्रौढत्वत्तति प्रतिज्ञात स्यप वरवर्षिमि ॥ २९
वतः सर्वधता प्राप्तयियो मिवकचौडवः।
संभात्वा धर्मराणम्त बुझाच परया युतः ॥ २४
चिन्तयामास मेधावी लतकोऽयं भवेत् यदि ।
तती मे समिहिस्त निश्चिय परा मवेत । १५
पव' चिन्तयतस्तस्य धर्मराजस्य मामिमि ।
अनिता गरिब खाना लवशाम्भसिम २६
"दनुमा सुरान् सर्वानयोध्यन्त तदाहये ।
स तब प्रविशन्ने व नीतम्त यमहिमः।
पथ मांसदा दृष्टा देवाम् दैवपतिर्महान् ।
सगरी महादवि यमादेशपरायः । २०
उदयाद्रिसम रद गमराक्ष सुभूषितम् ॥
स धिवगुप्यनामाभूविचारिखदेखकः।"
मिस्टरारुपरागाच घण्टाचामरमणितम् ।
{{Right|(प्रमाउखक, १२१ प.)}}
है देवि! पहिले इसी भूमण्डलमें, सर्वभूतोंके
प्रिय और उनके हितैषो 'मित्र' नामक एक कायस्थ
थे। ऋतुकालमें स्त्रीके साथ मम्भोग करके उन्होंने
चित्र नामका एक तेजस्वी पुत्र पैदा किया। मित्रके
रूपवती एक कन्या भी हुई थी। पुत्र-पुत्रीके होते
ही मित्र परोक सिधारे, साधमें उनकी स्त्री भी
चितामें जल कर मर गई। इनको मृत्यु के बाद
असहाय पुत्र-पुत्री दानोंका ऋषियोंके पाश्चममें
पालन-पोषण होने लगा और वै दिन टूर्ने रात चौगुने
बढ़ने लगे। इन दोनोंने बालकपन में ही व्रत
प्रारम्भ किये ; और प्रभासक्षेत्रमें गमन किया। वहां
इन लोगोंने महादेव तथा सूर्यको मूर्ति स्थापित को,
कर देवों पर पाक्रमण किया। उस समय दानव
और धूपमात्यसे उनकी पूजा कर तपस्या करनी
प्रारम्भ कर दी। इसको तपस्यासे संतुष्ट हो कर सूर्य-
देव वहां गये और चित्रसे कहने लगे,-
"३ मुव्रत । तुम्हारा मंगल हो; तुम हमसे वर पुरन्दरको ऐरावत पर
मांगी।"
चित्रने कहा, "हे भगवन् ।. भाप अगर मुझसे
सन्तुष्ट हुए हैं, तो मुझे यह वर दीजिये कि, मैं सब
काममें दचता प्राप्त करूं।'
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सूर्यदेवने "तथास्तु' कह कर उनको वर दिया पौर
चित्रने सर्वज्ञता प्राप्त करनी। चित्रको अपने समान
क्षमतापन देख कर धर्मराज मन ही मन विचारने
लगे,-"यदि यह बुद्धिमान् मेरा लेखक बन
जाता तो मेरे सब काम सिद्ध हो जाते। हे भामिनि !
एक दिन धर्मरानने, लवणसमुट्रमें नहाते हुए चित्रको
अनुचरों द्वारा अपनो पुरीमें बुला लिया और अपनी
इच्छाको पूर्ति को यह चित्र ही "संसार चरित्र के
लेखक हैं, और बादमें चित्रगुप्त नामसे प्रसिद्ध
देवीपुराण ( ३८ अध्याय ) से मालूम होता
हुए हैं।
चतुईन्न सुरुपाय' महावीर महावन्दम् ।
गनोदनुजन्यस्य कालसर्प स्वाभवत् ।
पय तब स्थितन्द्रं दृष्टा बादी महाबलः ।
कायरानं समारुड़ा दीप्ताकि दधावयत् ।
ख दृष्टा महिष धर्योदण्डपापिमहाबलः ।
पाक्दविवगुप्मथ कालकैतुसमन्वितः।
एवन्तु निमिंतिम पुरुष च तदानुनः ।महादतः ।
म्वत्रपाणिः सुराचा कृपाचनप्रमः ।
माम समादाय इन्द्रसन्य समागतः।
मेन समोरयः।"
कृतान्ती निष्ठर ख ववदणी वरुणो वारपाँधषगः पामधारक
कृपसारं समादाय पडा महावली वलासुर विष्णुके कौशलसे मारा गया
समान अंदे.ऐरावत हायो पर सवार हुए। इसके बाद
था। इसलिये उसके पुत्र सुवन्तासुरने क्रोधावही
गणके साथ देवाका तुमन्न युद्ध होने सगा। देव.
राज इन्द्र देवसों को हारते देख उदयाचल पर्वतके
सवार देख कर महाशक्तिमान्
अग्निदेवने छागरान पर सवार हो कर प्रदीप्त शक्ति
धारण की। उनको देखते ही महावन्नी यमरानने
पौर कृतातके समान कठोर ववदण्डधारी महावस-
पराक्रान्त चित्रगुप्तने कालकेतुके साथ महिष पर<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४८६|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
भारोहण किया। प्रकार यमराजने अपने
सुभटों और बहुतही सेनाको साथ ले कर इन्द्रको
युद्धमें सहायता की। पाथपाणि वरुणदेव भी मत्स्यपर
सवार हो अपनी सेनाभोंको साथ ले कर आ पहुंचे।
इत्यादि।
श्रीहर्षक "नेषधचरित में पाया जाता है,-
दमयन्तीको स्वयम्बर-सभामें इन्द्रादि देवों के साथ
चित्रगुप्तदेव क्षत्रिय रूपमें आये थे। नैषधकारने उनका
परिचय इस प्रकार दिया है,-
"गगोधरोऽभूदथ चित्रगुप्तः कायस्थ उचैर्ग व एतदीय ।
कन्तु पवस्य मसौद एको मसर्दधचोपरि पवमन्यः ।" (१४ मर्ग)
चित्रगुप्तके प्रार्थनामन्चमे यह भी मिलता है-
"थिया सह समुत्पन्न समुद्र-मथनीय ।
चित्रगुपत महापाही ममाय वरदो मघ ।"
उपयुक्त भिन्न भिन्न पुराणोंसे यह प्रमाणित होता
है कि, ब्रह्माके शरीरसे चित्रगुप्त की उत्पत्ति है; और
फिर कल्पभेदसे चन्द्र सूर्यादि देव जिस प्रकार नाना
भाव और नाना रूपसे अवतीर्ण हुये हैं, वैसे ही चित्र.
गुप्त भी विभिन्न कल्पों में कभी सूर्यदेवके पुत्ररूपसे
और कभी मित्रके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। इन्द्र,
चन्द्र, वायु और वरुण की भांति वह भी देवक्षत्रिय
रूपसे देव-सैन्यमें रहते थे।
{{Left|विरुद्धधादियों का मत।}}
उपयुक्त प्रमाणोंके रहते हुये भी विरुधवादा यह
कहा करते हैं कि, चित्रगुप्तदेव चार वर्णको सृष्ठिके
पोछे हुए हैं, इसलिये वे चार वर्णीमें नहीं गिने जा
सकते।
कमलाकरक- धर्य ध्यानस्थितस्यास्स सबकायादिमिर्गतः।"
इत्यादि वचनके अनुसार चित्रगुप्त प्रमाके समस्त
शरीरसे उत्पन्न हुए हैं और ब्रह्माकी "ववर्मोचित धर्म
पालनौया यथाविषि-"इस उक्तिसे चित्रगुप्तका क्षत्रिय
होना सिहनहीं होता। "ब्रहकायोडवो यम्मान कायस्थवर्ष
उच्यते” इस युनिसे कायस्थ एक स्वतन्त्र वर्ण हो
प्रतीत होते हैं।
इसके अतिरित. मन्वादि. धर्मशास्त्रमें चित्रगुप्त जाति-माजासे... चित्रगुप्त
अथवा कायस्थ जातिका.तत्व निर्मत नहीं हुवा है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
किसी किसी स्मृति शास्त्रमें चित्रगुप्त भोर कायस्थ
नाम पाया जाता है। परन्तु इससे यह नहीं समझा
जा सकता कायस्थ कौन जाति हैं।
पुराणको-"धर्मराजस्थाधिकारी चित्रगुप्तौ वभव का रस
उक्ति द्वारा यही सिद्ध होता है कि, चित्रगुप्त यमराजके
लेखक थे। विष्णु, याज्ञवल्क्य, वृहत्पराशर इत्यादि
स्पति-शास्त्रोंसे और कायस्थों धर्माधिकरण में भी उनके
लेखक रहनेका प्रमाण मिलता है। प्रौशनस
धर्मशास्त्र, ब्रह्मवैवर्तपुराण, अग्निपुराण, यान-
वल्क्यस्मृति और राजसरङ्गिणौमें जगह जगह
कायस्थों के प्रति कठोर उक्तियाँका प्रयोग पाया जाता
है। विशेषतः अइल्या-कामधेनु के नवम वत्सोइत
भविष्यपुराणान्तर्गत कार्तिक शुक्ल द्वितीया-व्रत-कथा-
सन्दर्भ में कहा है,
एतस्मिन्नेव काले तु धर्मशा हिनोधमः ।
अपत्यापाँच घावारमाराध्यममजचदा।
परमधिप्रसादन सम्ध्वा कन्धामिरावतीम् ।
चित्रगुप्तं च मां दत्वा विवाहमकरोचदा।"
उपर्युक्त प्रमाणसे यहो मालूम होता है कि, चिन-
गुप्तका विवाह ब्राह्मण धर्मधर्माशी पुत्री इरावतीसे
हुपा था। इसलिये प्रतिलोम विवाहसे उत्पन्न
हुये कायस्थ कदापि श्रेष्ठवर्ण हो नहीं सकते।
इसके अतिरिक्ष शब्दकल्पद्रुमोइत प्राचार-निर्णय-तन्त्रमें
कहा-
"चादी प्रजापतेर्मावा मुखाधिपाः सदारकाः।' इत्यादि उपक्रमसे
पादाळू दय सम्पतिस्विवर्णस्य च सेवकः ।
चौममामा सुतस्तस प्रदीपसस्य पुवकः ।
कायस्थमस पुर्वाऽभूत् बभूव लिपिकारकः ।
कायस्थस्य वयः पुवाः 'विखाता नगलौती।
विषप्तयिवसेनो विधिवय वर्थव च।
चित्रगुप्तो गतः खर्ग विचिदो नागसन्निधो ।
चिवसन: पबिया वसि शूद्रः प्रचावे।
वसुर्घोषो गुसो मिवी दत्त: करप एव च ।
मृत्यु अयय सप्ते चित्रसेनसुवा भुवि
इत्यादि.वचनोंसे और अग्निपुराणमें कही गई
और उनके वंशधरोंको
श्रेष्ठ वर्ण नहीं कह सकते। फिर कमलाकरके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ|४८७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
शुद्रधर्मतत्व में एक कायस्थकी उत्पत्ति इस प्रकार
बतलाई गई है-
"माडिव्यवनिसास्न्वेंदहादयः प्रसूयते ।
सकायस्थ प्रति प्रोजस्तस्य कर्म विधीयते।
चमाई यायो माहिया माहिमानो वैदे।
नीपानां देगाताना लेखनं स समाचरन ।
गणकत्व विचिवम बीजपाटी प्रभदनः ।
अघमः शूद्रशातिभ्यः पञ्चसकारवामसी।
चातुर्वस्य सेवाडि लिपिलखनसाधनम् ।
शिखां यज्ञोपवीतच कायस्थाद्यो विषघ्न येत्।"
'वैदेहके औरससे पौर माहिष्थपनीके गर्भसे जो
उत्पन्न हुये हैं, वे कायस्थ हैं। देशीय लिपिका लिखना,
गणना करना, शिल्प कार्य करना, वीज प्रादिका बोना,
चार वर्णकी सेवा करना इत्यादि उनका कार्य बतलाया
गया है। यह पांचो संस्कार प्रधम शूद्रजातिके करनेके
हैं, इसलिये इनको चोटी, यज्ञोपवीत, गैरिकवस्त्र और
देवताका स्पर्श न रखना चाहिये।'
इसके अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुमोइत देवीवरके "उपविष्टा
'दिनाः पञ्च तथैव शूद्रपञ्चकाः।" इस कथनसे यही प्रमाणित
होता है कि, आदिशूरको सभाम पञ्च ब्राह्मणों के साथ
आये हुये पञ्चकायस्ख प्रादि शूद्र ही ठहराये गये थे।
इसके सिवा बहरमपुराणमें भी लिखा है,-
"शुदायाँ वयानात: करणौ वर्णमहरा" (चर १३५०)
इत्यादि प्रमाणसे किसी लोगोंका मत है
'कि वैश्यसे उत्पन्न वर्णसहर करण भी कायस्थ थे।
{{C|विरुद्धमत-खण्डन।}}
विरुद्धवादी लोग चित्रगुप्तके वर्ण और धर्म सम्बन्धमें '
जिन युक्तियां को दिखलाते हैं, उनके उत्तरमें हम
पहिले ही कमलाकरत वृहप्रधाखण्ड का प्रमाण
उपत कर
चुके हैं कि, ब्रह्माने उत्पत्ति
कालमें ही चित्रगुप्तसे कहा था-"तुम कायस्ख' जिस
स्थलसे क्षत्रिय उत्पन्न हुए हैं उसी स्थानसे उत्पन्न
होनेके कारण क्षत्रिय नामसे प्रसिद्द होगे। तुम्हार वंशके
वोग मी तुम्हारे हो समान पर्थात् कायस्थ
नामसे पुकार जावेंगे। उन लोगोंका विवाह क्षत्रिय
कन्यावोंके साथ होगा: ::चत्रियवर्णके लिये नो
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
संस्कारादि कर्म बतलाये हैं, उन ससको वे मेरी
प्रतिाके अनुसार करेंगे।"
ब्रह्माके इस कथनसें चित्रगुप्त पोर उनके वंशधर
कायस्थ क्षत्रिय हैं, इसमें कुछ भी सन्देह उपस्थित
नहीं होता।
मिताक्षरामें कायस्थाँको राजवाझम, शूलपाणित
दीपकलिकामें राजसम्बन्धहत प्रभावशाली और पराक.
विरचित याज्ञवल्क्यनिधन्धमें कगधिकृत या करधि-
कारी कहा गया है। कायस्थ सदासे राजाक प्रिय
होते पाये हैं। यह राजकार्यमें निपुण होते हैं, और
कर वसूल करने में इनका मुख्यतः हाथ रहता है। इसे
लिये इन लोगों के द्वारा प्रजाका पधिक पौड़ा पंहुच
सकती है।
अतः याज्ञवलक्य और अग्निपुराण कार
राजाओंका इन (कायस्थ ) लोगोंके प्रति
विशेष नक्ष्य रखनेका पादेश दे गये हैं।
कायस्थोंके हाथसे किसी किसी जगह-प्रजा
अधिक पीड़ित होती रही, इसी लिये पौशनश-
धर्मशास्त्र में, ब्रह्मवैवर्तपुराणके. जन्मखण्डमें पौर
राजतरतिषी ग्रन्यमें कायस्थोंकी निन्दा की गई
लेकिन किसी भी शास्त्र में कायस्थोंको
होनवर्ण नहीं कहा गया है। कमलाकरने जिन
प्रतितोमजास कायस्योंका उल्लेख किया
चित्रगुप्तके वंशधर कायस्थ नहीं हैं पोर न उनमें उस
जगह लिखी गई बातें हो साटित होतो हैं। ऐसा
मालूम पड़ता है कि मेदनीपुरवासी प्राधुनिक 'कास्य-
जातिका नाम संस्कृत भाषामें उन्हों (कमलाकर)ने
कायस्थ रख दिया है। किन्तु चित्रगुप्तके वंशधर
कायस्थोंको उन्होंने भी कायस्थ-चत्रिय कह कर परिचय
दिया है। चित्रगुप्तने देवकन्या सुदक्षिणाके साथ
विवाह किया था। "प्रणाऽसीन्द्रियभानो देवाग्रायन-
मुक्स में। माननाच सदा तमादाति दयिते रिज" इत्यादि
पद्मपुराणके कथमानुसार ब्राह्मण नव चित्रगुप्त को देव
मान कर पूजते थे, तब धर्मधर्माने अपनी कन्याका
उनसे पाणिग्रहण कर दिया; तो इसमें दोष कौनसा
हो..गया। इसके सिवा उस समय यौनसृष्टि या
सहरोत्पत्तिको कोई चर्चा हौन थी; नहीं तो ब्राष्ट्राण<noinclude></noinclude>
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Lado Shaw
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कायस्थ|४८८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
ऋषिकन्या शर्मिष्ठाका विवाह क्षत्रिय राजा ययातिके
साथ कभी नहीं हो सकता था। शब्द कल्पगुममें
वरको उक्ति भी काल्पनिक है, क्योंकि देवीवरके मून
"प्राचारनिर्णयतन्त्र" और "प्रम्निपुराणीय जातिमाला" कुलग्रन्थमें कहीं भी ऐसे वचन नहीं हैं। उपरोक्छ
से जो प्रमाण लिये गये हैं, वह आधुनिक रचना प्रमाणों की भांति "ईमपुराण" के वचन मी कायस्योंकि
इसमें कुछ भी संदेह नहीं। तन्त्रसार, महासिद्धि
विषयमें ठीक नहीं जंचते । शब्दरत्नाकर अभिधान-
- सारस्वत, पागमतत्त्वविलास, वाराहीतन्त्र और रुद्रया-
"कर नापने गाने पुमान् गद्रावियोः सर्वे ।
मलतन्त्र में मित्र भिन्न ५०। ६. तन्त्रोंका उल्लेख है।
युद्दे कायस्यमेदेऽपि करमस्त्रियाम् ।"
. परन्तु उपर्युक्त किसी भी तन्त्रमें "प्राचारनिर्णयतन्त्र" का इत्यादि प्रमाणमे करण कायस्थ और शूटू-वैमासे
नाम तक नहीं पाया है। भारतके नाना स्थानों में उत्पन्न करण, सम्पूर्ण भिन्न प्रतीत होते हैं।
सैकड़ा तन्त्र-ग्रन्थों का पता लगा है, परन्तु दूसरी जगह
सान्धि-विग्रहिका
कहीं "प्राचारनिर्णयतन्त्र की एक भी पोधो नहीं
कायस्थ का अर्थ लेखक या राजाका लेखक है-
मिली। सिर्फ शब्दकल्पद्रुमके सग्लयिता राजा राधा-
इस बातको सब हो स्वीकार करते हैं।
विष्णुस्मृति
कान्त देवके पुस्तकालयमें ही एक प्रति मिलती है। और वृहत्परायरम तिमें रानसमाके लेखकको ही
इस पुस्तक में ७० लोक हैं। इसकी लिपि देखनसे ही कायस्थ कहा है। उक्त स्म ति पोर शुक्रनीतिसे यह
स्पष्ट मालूम हो जाता है कि, यह किसी प्राधुनिक स्पष्ट प्रतीत होता है कि, पहिले कायस्थ चोग हो
लेखकको लिखी हुई है। यह पुस्तक किसी उद्देश्य- . हिन्दूराजानों के समयमें सेना-विभागका हिसाव रखने के
.सिद्धिके लिये ही लिखी गई है -इस वातको केही निए, कर वसूल करनेके लिए और विचारालयके
हृदयङ्गम कर सकेंगे, जो इस पुस्तक को देख चुके हैं।
कागजात लिखनेके लिए राजलेखक रूपसे रखे
पग्निपुराणीय जातिमाताके विषयमें भी ऐसा ही है।
जाते थे। अर्थात् लिखनेका काम एक मात्र कायस्यों के
कलकन्नेको एशियाटिक सोसाइटी और वम्बई प्रादि ही हाथ था। पहिले हिन्दू-राजसमामें लिखने के
नाना-स्थानोंसे मूल अग्निपुराण प्रकाशित हुये हैं, पर
काममें कायस्थोंके सिवा दूसरे नहीं रखे जाते थे।
उनमेंसे किसी शब्दकल्पद्रुममें कही गई अग्निपुरा-
इसी निंए कायस्थ या राजसमाके लेखक राज्यका
गीय जातिमालाका एक भी लोक नहीं मिलता। साधनाङ्ग समझे जाते थे। मनुसंहिताके - लोकके.
और की तो क्या, भारतसे जिसने हस्तलिखित ग्रन्थ प्राप्त
भाष्यमें मेधातिथिने ऐसा लिखा है।
"राजाराहारणासनान्येवकायस्थ-इसनिखिताब प्रमारी मदन्ति ।"
इये हैं, उनको विवरण-पुस्तिकामें मो इस जाति.
अर्थात्-राजदत्त ब्रमोत्तर भूमि पादिका शासन,
मालाका उल्लेख नहीं। बङ्गालके बाहर जो चित्रगुप्तक
जो एक कायस्वके हाथका लिखा दुपा है, वही
वंश कायस्थ रहते हैं, उन्हें भी इस नातिमालाका
प्रमाणित है। मिताचरामें लिखा है,-
पता न था। बङ्गालमें सिर्फ वसु, घोष पादि उपाधि
"सन्धिवियहकारी तु भवेशन देखकः ।
धारियोंका वास है और इसके उल्लेखसे यह जातिमाला
स्वयं राज्ञा मनादिष्टः स लिखेट्राजशालनमा"
किसी बङ्गालीकी बनाई हुई और प्राधुनिक ही प्रतीत
(पाचाराध्याय, ३१९ शेक)
होती है। इसलिये 'भाचारनिर्णय तन्त्र' की तरह यह
नी बलि राजाका सन्धि-विग्रहकारी लेखकोगा,.
जातिमालाभी किसी विशेष उद्देश्यसिदिके लिये हाम्नमें
वरही रानाके पादेशानुसार राजयामन लिखेगा।
बनाई गई है इसमें सन्देह नहीं। इसी तरह शब्द अपराकके यानवल्का निवन्धमें मी व्यासके वचन:
कल्पद्रमोक्त कुलप्रदीप'के वचन भी प्राचीन-शास्त्र-सम्मत
ऐसे उहत है-
जहोनेके कारण आधुनिक है और वह किसी विशेष
"रामात सयमादिष्ट-सम्धिविनायकः।
इखसिषिके लिए सिखे गये हैं, इसलिए वह भी ताबपट्टे पट वापि प्रमिद्राममारम"
त्याग करने योग्य हैं। 'शब्दकल्पद्रुम में कही गई देवी-<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ|४८८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
ऋषिकन्या शर्मिष्ठाका विवाह क्षत्रिय राजा ययातिके
साथ कभी नहीं हो सकता था। शब्द कल्पगुममें
"प्राचारनिर्णयतन्त्र" और "प्रम्निपुराणीय जातिमाला"
से जो प्रमाण लिये गये हैं, वह आधुनिक रचना हैं।
इसमें कुछ भी संदेह नहीं। तन्त्रसार, महासिद्धि
- सारस्वत, पागमतत्त्वविलास, वाराहीतन्त्र और रुद्रया-
मलतन्त्र में मित्र भिन्न ५०। ६. तन्त्रोंका उल्लेख है।
. परन्तु उपर्युक्त किसी भी तन्त्रमें "प्राचारनिर्णयतन्त्र" का
नाम तक नहीं पाया है। भारतके नाना स्थानों में
सैकड़ा तन्त्र-ग्रन्थों का पता लगा है, परन्तु दूसरी जगह
सान्धि-विग्रहिका
कहीं "प्राचारनिर्णयतन्त्र की एक भी पोधो नहीं
मिली। सिर्फ शब्दकल्पद्रुमके सग्लयिता राजा राधा-
कान्त देवके पुस्तकालयमें ही एक प्रति मिलती है।
इस पुस्तक में ७० लोक हैं। इसकी लिपि देखनसे ही
स्पष्ट मालूम हो जाता है कि, यह किसी प्राधुनिक
लेखकको लिखी हुई है। यह पुस्तक किसी उद्देश्य- .
.सिद्धिके लिये ही लिखी गई है -इस वातको केही
हृदयङ्गम कर सकेंगे, जो इस पुस्तक को देख चुके हैं।
पग्निपुराणीय जातिमाताके विषयमें भी ऐसा ही है।
कलकन्नेको एशियाटिक सोसाइटी और वम्बई प्रादि
नाना-स्थानोंसे मूल अग्निपुराण प्रकाशित हुये हैं, पर
उनमेंसे किसी शब्दकल्पद्रुममें कही गई अग्निपुरा-
गीय जातिमालाका एक भी लोक नहीं मिलता।
और की तो क्या, भारतसे जिसने हस्तलिखित ग्रन्थ प्राप्त
इये हैं, उनको विवरण-पुस्तिकामें मो इस जाति.
मालाका उल्लेख नहीं। बङ्गालके बाहर जो चित्रगुप्तक
वंश कायस्थ रहते हैं, उन्हें भी इस नातिमालाका
पता न था। बङ्गालमें सिर्फ वसु, घोष पादि उपाधि
धारियोंका वास है और इसके उल्लेखसे यह जातिमाला
किसी बङ्गालीकी बनाई हुई और प्राधुनिक ही प्रतीत
होती है। इसलिये 'भाचारनिर्णय तन्त्र' की तरह यह
जातिमालाभी किसी विशेष उद्देश्यसिदिके लिये हाम्नमें
बनाई गई है इसमें सन्देह नहीं। इसी तरह शब्द
कल्पद्रमोक्त कुलप्रदीप'के वचन भी प्राचीन-शास्त्र-सम्मत
जहोनेके कारण आधुनिक है और वह किसी विशेष
इखसिषिके लिए सिखे गये हैं, इसलिए वह भी
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त्याग करने योग्य हैं। 'शब्दकल्पद्रुम में कही गई देवी-
वरको उक्ति भी काल्पनिक है, क्योंकि देवीवरके मून
कुलग्रन्थमें कहीं भी ऐसे वचन नहीं हैं। उपरोक्छ
प्रमाणों की भांति "ईमपुराण" के वचन मी कायस्योंकि
विषयमें ठीक नहीं जंचते । शब्दरत्नाकर अभिधान-
"कर नापने गाने पुमान् गद्रावियोः सर्वे ।
युद्दे कायस्यमेदेऽपि करमस्त्रियाम् ।"
इत्यादि प्रमाणमे करण कायस्थ और शूटू-वैमासे
उत्पन्न करण, सम्पूर्ण भिन्न प्रतीत होते हैं।
{{C|संधि विग्रह}}
कायस्थ का अर्थ लेखक या राजाका लेखक है-
इस बातको सब हो स्वीकार करते हैं।
विष्णुस्मृति
और वृहत्परायरम तिमें रानसमाके लेखकको ही
कायस्थ कहा है। उक्त स्म ति पोर शुक्रनीतिसे यह
स्पष्ट प्रतीत होता है कि, पहिले कायस्थ चोग हो
हिन्दूराजानों के समयमें सेना-विभागका हिसाव रखने के
निए, कर वसूल करनेके लिए और विचारालयके
जाते थे। अर्थात् लिखनेका काम एक मात्र कायस्यों के
ही हाथ था। पहिले हिन्दू-राजसमामें लिखने के
कागजात लिखनेके लिए राजलेखक रूपसे रखे
काममें कायस्थोंके सिवा दूसरे नहीं रखे जाते थे।
इसी निंए कायस्थ या राजसमाके लेखक राज्यका
साधनाङ्ग समझे जाते थे। मनुसंहिताके - लोकके.
भाष्यमें मेधातिथिने ऐसा लिखा है-
"राजाराहारणासनान्येवकायस्थ-इसनिखिताब प्रमारी मदन्ति ।"
अर्थात्-राजदत्त ब्रमोत्तर भूमि पादिका शासन,
जो एक कायस्वके हाथका लिखा दुपा है, वही
प्रमाणित है। मिताचरामें लिखा है,-
"सन्धिवियहकारी तु भवेशन देखकः ।
स्वयं राज्ञा मनादिष्टः स लिखेट्राजशालनमा"
{{Right|(पाचाराध्याय, ३१९ शेक)}}
{{Gap}}जो व्यक्ति राजाका सन्धि-विग्रहकारी लेखकोगा,.
वरही रानाके पादेशानुसार राजयामन लिखेगा।
अपराकके यानवल्का निवन्धमें मी व्यासके वचन:
ऐसे उहत है-
"रामात सयमादिष्ट-सम्धिविनायकः।
ताबपट्टे पट वापि प्रमिद्राममारम"<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ|
४८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
सन्धि-विग्रह-लेखक, स्वयं राजाकी पात्रासे तात्र
पट्ट या कपासके कागज पर. राजथासनं शिखेंगे।
भारतवर्षके नामा स्थानोंसे ताम्रखणों पर लिखे हुए
जितने शासन निकले हैं, उनके सन्धिविग्रहकारी
लेखक "सान्धिविग्रहिक" मामसे प्रसिह हुए
पहिले शान्धिविग्रहिकका
पद एकसान
कायस्थोंको ही मिलता था। प्राचीन संस्कृत ग्रन्थीमें
माधिविग्रहिक, "सन्धिविग्रह-लेखक" (अपराकं ।
पमावेचविया योज्याखदमावे सथोरना: ॥ ४१८।।
बोरमिबोदय पौर कैशववनयमी हा प.) "सन्धिविग्रहकायस्थ"
(जोमदेवका कथा-सरिक्षागर श) और "सन्धिविग्रहाधि.
करणाधिनत (Ind. Ant. VI p.10 ) मामले
प्रसिद्ध थे।
पग्निपुराणमें लिखा है:-
"साधिषियक्षिक कार्य: पार गुणादि विधारदः।" (२९०३)
सान्धिविग्रहिक छह गुणोंमें विशारद होना शूद्र गुणवान् होने
चाहिये। वे षट्गुण कौन कौनसे है ? 'मनुसंहिताके
मनसे-
"सन्विध विया व याममासममेव च ।
धीमा सवयच पड़ गुणाधिनयेळदा"
सन्धि, विग्रह यान, पासन इंधोभाव पौर संश्चय
इन छह गुणोंको चिन्ता, गम्भीरतापूर्वक करना
चाहिये। मनुसंहितामें और भी है-
"भोलान् भास्त्रविदः नरान् बन्धसचान कूलीङ्गतान् ।
सचिवान समचाटी वा प्रकृति परोधितान् ।
से साहचिन्तयविन्य सामान्य सन्धिविग्रहम्।" (७।५८। ५४१)
सुप्रतिष्ठित वेदादि धर्मशास्त्रों में पारदर्शी, और
युद्धविद्या में निपुण और कुसौन-ऐसे सात पाठ मन्त्री,
प्रत्येक रानाके पास रहने चाहिये। राजापोंको,
सन्धिविग्रह पादिकी सलाह उन्हीं बुधिमान् सचिाये
लेनी चाहिये।
मिताचरामें विज्ञानखरने लिखा है,-
"एव' मन्त्रिणः पूर्व कृत्वा नै साई राज्य सन्धिवियादिलपर्ण
कार्य चिन्तयेत् । समय व्यस्त र अनन्तर तेषामभिप्राय शाखा सकलशास्त्रार्थ-
विचारकुमलेन वावश्येन पुरोहितेन सा कार्य विचित्य सनः स्वयं बुरा
का चिन्तयेत् ।
मिताचराके उपर्युक्त वचनसे यह मालूम रोता है
कि, राजाके को संबी एसे है, वे सब प्राण ,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
नहीं थे। बों कि उसके बाद आपके साथ क्या क्या
परामर्श करेंगे यह भी लिखा है।
{{Right|(याभवत्का, एमपध्याय, १२वा योक)}}
शक्रनीतिमें स्पष्ट लिखा हुवा है,-
"पुरोधा च प्रतिनिधिः प्रधानसचिवस्तथा ॥ ९ ॥
मन्त्री च माविवाकर पणिक्य सुमन्त्रकः ।
पमाल्यो इतएज्ये ता रामः प्रकवयो दमः ॥ २०॥
दच प्रोका पुरोधाद्या प्राणा सः एष से।
'मैव शूद्रास्सु सयौक्या गुणयन्तोऽपि पार्थिवः।" (श्य पध्याय)
पुरोहित, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, . मन्त्री,
प्राविवाक, पण्डित, सुमन्च, पमात्य और दूत ये दध
व्यक्ति राजाको प्रकृति है। एक पुरोहित पादि दो
लोग ब्राह्मण होने चाहिये, ब्राह्मणके अभावमें क्षत्रिय
और वियके पभावमें वैश्य भो नियुक्त हो सकेंगे।
पर भी गजा · उक्त कार्योंके लिए
नियुक्त न कर सकेंगे।
उपरोक्ष.. सात-पाठ
सचिों में एक सान्धिविग्रहिक भी थे। शुक्रनीतिमें
इन्हीं साधिविग्रहिकका. "सचिव नामसे उख
किया गया है। यह सान्धिविग्रहिक सचिव शूद्र
नहीं हो सकते-इस बातका भी शुक्रनीतिमें प्रष्ट
प्रमाण मिलता है। हारीतस्मृतिसे यह साफ जाहिर
होता है कि, सन्धि विग्रह पादि क्षत्रियोंका हौ धर्म है।
"रान्यस्थः पविययापि मना.धर्मेष पालयन् ।
कर्यादध्ययन समाग यनेयमान् यथाविधि ।
नीतिशास्त्रार्थ कुपलः सन्विवियइतत्ववित् ।
देववाणमय पिवकायपरसपा
"य यबम कायमधर्मपरिवर्जनम् ।
उत्तम गतिभाषौति पवियोऽयमाचरन् ।।"
{{Right|(हारीतम ति श्य प.)}}
इन प्रमाणोंसे जब यह सिद्ध हो गया कि, सन्धि-
विग्रह आदि कार्य क्षत्रियोंका ही था, तब स्मृतिमें
कहे गये सन्धिविग्रहकारी कायस्थ वा सान्धिविग्रहिक,
क्षत्रियके सिवा दूसरी जाति नहीं हो मकते।
ब्राझोंक धर्मप्रतिष्ठापक गुप्तवंशीय सम्राटोसे
ले कर गोब्राह्मण-मा बङ्गाके सेनवंशीय राजावों के
समय सक जितने राना हुए है, उनकी सभामि<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४९०|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कायस्थ ही सान्धिविग्रहिकके पद पर नियुक्त रहे हैं। ...
इस विषयमें एक पुरातत्वविद ब्राह्मणने लिखा है,-
"It is a noticeable fact that the संधि
faust or minister of war and peace and the
secretary, were always Kayasthas or men
of the writer-caste. This not only occurs
in the Kataka plates, but in grants or ins-
criptions found in Ceylon and Central
India." ( Indian Antiquary, Vol. V. p. 57. )
संस्थतन अंग्रेज घिद्वानोंने सान्धिविग्रहिक शब्दका
अस प्रकार पर्थ किया है,-
"A great officer for making treaties and
declaring war. This officer or æ subor-
dinate, is deputed at the end of the grant
to give effect to it.” (Journal of the Asiatic
Society of Bengal, 1875. pt. I. p. 5)
* Secretary for foreign affairs."ma Taw-
ney's Kathasarit-Sagar. Vol. IV. p. 383.)
{{C|कायस्थ या लेखक।}}
यदि कोई कहे, जो कायस्थ साधिविहिक जैसे
ऊंचे पद पर नियुक्त थे, वे या उनके वंशधर क्षत्रिय
हो भी सकते हैं। परन्तु जो कायस्थ पटवारी
मुहरिर आदिका काम करते थे, वे तो कमलाकरद्वारा
कई गये माहिष्या और वैदेहसे उत्पन्न हुए अधम
ब्राह्मण करते थे, कायस्थ उनके सहकारी (लेखक,
मुहरिर वा पटवारी) रहते थे, वैश्य कर वसूत्र
शूद्र ही हैं। प्रकत शास्त्र में सामान्य पटवारी और
मुहरिराँके लिए कैसा स्थान था, हमें इस बातको
करते थे। शुक्रनीतिक उक्त वचनसे साफ जाहिर है
जांच करना जरूरी है।
शुक्रनीतिमें लिखा है-
"साखौटून पाचिठे दस्त्रपाताधिः सदा ।।
सशस्त्री दाहस' तु यथादिष्ट भूपमियाः ।
पक्षहस्त बसयुर्व मन्त्रिणो लेखका: सदा ।" (२२२६६-७)
राजाको पाग्ने य-अस्त्रसे और जहां स्त्र गिरते
हैं-ऐसे स्थानसे सदा दूर ही रहना चाहिये। राजासे
दश हाथको दूरी पर उनके प्रिय शस्त्रधारी, पांच
हाथको दूरी पर मन्त्री और उनके पास एक बगल
सेखक रहेंगे।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
शुक्रनीतिमें और एक नगह लिखा!
"भूयोऽधिकतमणाय म तिर्गयकलेखको।
हेमान अम्बु स्वपुरुषाः साधनाकानि ये दस ॥
एसयाकरण यस्त्रा मध्यस्य पार्थिवः।
न्यायान्याय्य कृतमतिः सा समाचरसनिमः" (५५७-)
राना, अध्यक्ष, सभ्य, स्मृति, गणक, लेखक, हेम,
अग्नि, जलं और
सत्पुरुष-ये दस साधनाङ्ग हैं।
उपयुक्त प्रमाणसे यह स्पष्ट विदित हो जाता है
कि, जो लेखक रानाकै नाघ्यण-मन्चौके पास बैठते थे,
और नो रानाके प्रङ्ग गिने जाते थे, वे कदापि शूद्र
नहीं हो सकते।
अङ्गिरः स्म तिमें कहा है-
"शान गद्रसम्पर्क' ट्रेण च सहासनम् ।
भद्रावधानागमं कथित व उत्तमपि पावयेत्" । ४६ ॥
- इस स्म तिवचनके अनुसार जब शूद्रके साथ
बैठना भी वाहपके लिये निषिध तब हिन्दू-रान-
सभामें ब्राह्मण-मन्दीके पास जो लेखक या कायस्थ
बैठी थे, वे अवश्य हो हिनाति होने चाहिये।
अमरकोषमें भी लेखक शब्दका वर्ग चविय
बतलाया गया है और शुक्रनीतिमें भी स्पष्ट सिखा
हुआ है,-
"ग्रामपो ब्राधणो योन्य ; कायस्थो लेख कम्नयाः।
गुस्कयाही तु वैग्यो हि प्रतिधारय पादनः ।।" (१।४२.)
अर्थात् हिन्दू राजाओं के समयमें ग्रामोंका भासन
करते थे और शूद्र नौकर (सेवक)का काम
कि, लेखक-कायस्थ ब्राह्मण नहीं, वैश्य नहीं और
न शूद्र हैं। नब.शास्त्र में चार वर्णके सिवा पांचवां
वर्ण हो नहीं माना गया, तब प्राध्याण, वैश्य और
शूद्र वर्ण के सिवा क्षत्रियवर्ण ही बच रहता है, इस
लिए कायस्थ क्षत्रियवर्ण ही प्रमाणित होते हैं। कोई
कोई कायस्थों के लिए पांचवें वर्षको कल्पना करता है।
परन्तु मनु हो अब पाचवा वर्ण नहीं है ऐसा कह
में गये हैं, तब पांचवें वर्णको कल्पना पगाध और
प्रशास्त्रीय है। दाक्षिणात्यमें नो जाति :अस्प श्य<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ
|४९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
और समाजसे वहिप्कत होती है, वह 'पक्षम' कहलाती
है। कायस्थोंको ऐमा मानना विल्कन पनुचित है।
कोई कोई रूपी दुई 'व्याससंहिता' के "यपिकिरातकायम्य
19151 Tota: 1" इस वचनसे कायस्थीको अन्त्यज
कहता है। परन्तु यह सोक वास्तविक नहीं बल्कि
"पिक विराट-कायस्तु मालाकार-कुटुम्मिनः।" इत्यादि लोकका
विकृत पाठ है, इस बातका अन्यत्र प्रमाण मिलेगा।
{{Right|(पायस्यका व मिर्षय पृष्ठमैं विये।)}}
अब पहिले कई हुए पुराण और भतिके
प्रमाणों द्वारा कायस्थ पवियवर्ण ही ठहरते हैं।
कोई कोई कहा करता है कि, स्कन्दपुराणमें रणकाके
माहारमासे दाल्भाश्रममें चान्द्रसेनी कायस्योंकी
उत्पत्तिको कथामें-
"कायस एप सपनो पविण्या पवियात वसः।
रामाभया स दालभ्यन चावधादहिष्कृत:।।४४।।
दत्तकायस्थधर्मोऽयं चित्रगुप्तस्य यः स्मृतः ।
'प्रानकायस्यमामत्वाने या पिय भूभताम् ॥४५॥
सस्त्र भार्याता चिवनम-कायस्यांगना।
सहगाय कायनां दालभ्यगोवाम्ततोऽभवन् ॥४६॥"
इन श्लोकों के पाधार पर कोई कोई कहता है कि,
विशद्ध नविय चन्द्रसेन राजाके पौरससे उत्पन्न होने
पर भी जब उनके पुत्रको "चानधर्मावहिष्क तः" कहा
है, तब कायस्थ और पविय एक नहीं हो सकते। इस
विषय पर महापण्डित गागाभट्टने अपने “कायस्थ-
धर्मप्रदीप"में ऐसा मत प्रकट किया है,-
"रामाभया स दाल म्येन चावधर्मादिक तः" इति पचनविरोधः सब
चावध गदरगीर्यादिधयियसाधारएधर्मपरः म तु यौतमायावहमपरः
था देवाभमादि वर्मायामपि निषेधापन: किन्तु सवायमे मामाग
इत्यायुपशम्य कायस्थोत्पत्तिरुया "दाम्म्योपदगतम् ३" इत्यादि यमदामतपः
गोलाप्रततीर्घ रन: मदा"
इत्यु पम'को
उपममोपसहारामामपि
चान्द्रसेनीयकायम्यानो अववियत्व' प्रतीयते।"
{{Right|(गागामात कायस्वधर्मदीप)}}
महामहोपाध्याय श्रीयुत वापुदेव शास्त्रीजी और
महामहोपाध्यायं कैलाशचन्द्र. शिरोमणिनी जैसे
प्रमुख विहान् भी गागाभट्टके उक्त वचनका समर्थन
कर गये है।
सद्याट्रिखरहके पमलकोपामके माहामा स.
मार्जुनबधक प्रसङ्ग ३६३ प्रध्याय लिखा है-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
"चन्द्र गम्म राममायां मा दुःपिता मगो ।।(४)।।
पमा नियन्या च राम दाभाच ययगः ।
सतोऽयं मम कायम्यो भविष्यति वयस्त ५
धोऽन को मवेदनादन् चावधांतिकृतः ।
मृत्वा सदमन रामः पुनरास महामतिः ।
{{C|'''राम उवाच '''}}
पवियाप मिस्वारोऽध्ययन' यशाम यत्।
तत्करिष्यति पुन मनापानमकमवितर
नियता चिवयमस्व वधमाऽम मविपाति।
सपनीम्य' मा लेखा राजस मुत्तम"!
अर्थात्-'उस समय राजर्षि चन्द्रसेनको भार्या
दुःखित हो कर राम और दाल्भा को नमस्कार करके
पूछने लगौं, 'पापके वचनानुसार मेरा यह शिशु
(पुत्र) कायस्थ नामसे प्रसिद्ध होगा यह ठीक है
परन्तु हे ब्रह्मन्। यह पुत्र जब क्षात्रधर्मसे वहिष्कृत
कर दिया गया है, तब इसका कोनसा धर्म होगा।
महामुनि परशुराम उनके इस प्रश्नको सुन कर
फिर कहने लगे,–'तुम्हारा पुत्र प्रजापालनमें रत
रहेगा। क्षत्रियों का जैसा संस्कार है, जैसा अध्ययन
है और जैसा यज्ञकर्म है, तुम्हारे पुत्र का भी यही
होगा। अर्थात् चित्रगुप्तके समान ही रहेगा।
भने। रानापोंके पास रह कर लेखनकार्यमें ही
इसकी उपजीविका होगी। इसके बाद उक्त पुराणमें
स्पष्ट ही लिखा है,-
"कायस्य एप उत्पन चविष्य पवियालया।
रामाचया स दाल्भेन चावधर्मादहिस्क तः ०२॥
ततः पवियस स्वारात वेदमध्यापयन् समिः ।
ससः स्वधर्मनिष्ठोऽयं गाम्यो मनियोजितः ०३॥
उपनीयतु सचिवगुमश्य यतृष्ण सम् ।
दामन समिमा तैन सुखिनो गोवशासव।।
मयिष्यन्ति म सन्देही यावचन्द्रदिवाकरी।"
कायस्थ ऐसे ही क्षत्रियों द्वारा क्षत्रियाणियोंके
गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। परशुराम पादेशानुसार
वही कायस्थ क्षात्रधर्मसे वहिष्कत होने पर मो दारभय
मुनिने उन्हें क्षत्रिय संस्कारों में संस्कृत करके वेद
अध्ययन कराया, फिर उन्हों स्वधर्मनिष्ठ कायस्थों-
को गाई स्य धर्म बताया। चित्रगुप्तको उपजीविका
हो उनकी उपजीविका दुई। दालमामुनिने पापोर्वाद<noinclude></noinclude>
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|४९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
और समाजसे वहिप्कत होती है, वह 'पक्षम' कहलाती
है। कायस्थोंको ऐमा मानना विल्कन पनुचित है।
कोई कोई रूपी दुई 'व्याससंहिता' के "यपिकिरातकायम्य
" इस वचनसे कायस्थीको अन्त्यज
कहता है। परन्तु यह सोक वास्तविक नहीं बल्कि
"पिक विराट-कायस्तु मालाकार-कुटुम्मिनः।" इत्यादि लोकका
विकृत पाठ है, इस बातका अन्यत्र प्रमाण मिलेगा।
{{Right|(पायस्यका व मिर्षय पृष्ठमैं विये।)}}
अब पहिले कई हुए पुराण और भतिके
प्रमाणों द्वारा कायस्थ पवियवर्ण ही ठहरते हैं।
कोई कोई कहा करता है कि, स्कन्दपुराणमें रणकाके
माहारमासे दाल्भाश्रममें चान्द्रसेनी कायस्योंकी
उत्पत्तिको कथामें-
"कायस एप सपनो पविण्या पवियात वसः।
रामाभया स दालभ्यन चावधादहिष्कृत:।।४४।।
दत्तकायस्थधर्मोऽयं चित्रगुप्तस्य यः स्मृतः ।
'प्रानकायस्यमामत्वाने या पिय भूभताम् ॥४५॥
सस्त्र भार्याता चिवनम-कायस्यांगना।
सहगाय कायनां दालभ्यगोवाम्ततोऽभवन् ॥४६॥"
इन श्लोकों के पाधार पर कोई कोई कहता है कि,
विशद्ध नविय चन्द्रसेन राजाके पौरससे उत्पन्न होने
पर भी जब उनके पुत्रको "चानधर्मावहिष्क तः" कहा
है, तब कायस्थ और पविय एक नहीं हो सकते। इस
विषय पर महापण्डित गागाभट्टने अपने “कायस्थ-
धर्मप्रदीप"में ऐसा मत प्रकट किया है,-
"रामाभया स दाल म्येन चावधर्मादिक तः" इति पचनविरोधः सब
चावध गदरगीर्यादिधयियसाधारएधर्मपरः म तु यौतमायावहमपरः
था देवाभमादि वर्मायामपि निषेधापन: किन्तु सवायमे मामाग
इत्यायुपशम्य कायस्थोत्पत्तिरुया "दाम्म्योपदगतम् ३" इत्यादि यमदामतपः
गोलाप्रततीर्घ रन: मदा"
इत्यु पम'को
उपममोपसहारामामपि
चान्द्रसेनीयकायम्यानो अववियत्व' प्रतीयते।"
{{Right|(गागामात कायस्वधर्मदीप)}}
महामहोपाध्याय श्रीयुत वापुदेव शास्त्रीजी और
महामहोपाध्यायं कैलाशचन्द्र. शिरोमणिनी जैसे
प्रमुख विहान् भी गागाभट्टके उक्त वचनका समर्थन
कर गये है।
सद्याट्रिखरहके पमलकोपामके माहामा स.
मार्जुनबधक प्रसङ्ग ३६३ प्रध्याय लिखा है-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
"चन्द्र गम्म राममायां मा दुःपिता मगो ।।(४)।।
पमा नियन्या च राम दाभाच ययगः ।
सतोऽयं मम कायम्यो भविष्यति वयस्त ५
धोऽन को मवेदनादन् चावधांतिकृतः ।
मृत्वा सदमन रामः पुनरास महामतिः ।
{{C|'''राम उवाच '''}}
पवियाप मिस्वारोऽध्ययन' यशाम यत्।
तत्करिष्यति पुन मनापानमकमवितर
नियता चिवयमस्व वधमाऽम मविपाति।
सपनीम्य' मा लेखा राजस मुत्तम"!
अर्थात्-'उस समय राजर्षि चन्द्रसेनको भार्या
दुःखित हो कर राम और दाल्भा को नमस्कार करके
पूछने लगौं, 'पापके वचनानुसार मेरा यह शिशु
(पुत्र) कायस्थ नामसे प्रसिद्ध होगा यह ठीक है
परन्तु हे ब्रह्मन्। यह पुत्र जब क्षात्रधर्मसे वहिष्कृत
कर दिया गया है, तब इसका कोनसा धर्म होगा।
महामुनि परशुराम उनके इस प्रश्नको सुन कर
फिर कहने लगे,–'तुम्हारा पुत्र प्रजापालनमें रत
रहेगा। क्षत्रियों का जैसा संस्कार है, जैसा अध्ययन
है और जैसा यज्ञकर्म है, तुम्हारे पुत्र का भी यही
होगा। अर्थात् चित्रगुप्तके समान ही रहेगा।
भने। रानापोंके पास रह कर लेखनकार्यमें ही
इसकी उपजीविका होगी। इसके बाद उक्त पुराणमें
स्पष्ट ही लिखा है,-
"कायस्य एप उत्पन चविष्य पवियालया।
रामाचया स दाल्भेन चावधर्मादहिस्क तः ०२॥
ततः पवियस स्वारात वेदमध्यापयन् समिः ।
ससः स्वधर्मनिष्ठोऽयं गाम्यो मनियोजितः ०३॥
उपनीयतु सचिवगुमश्य यतृष्ण सम् ।
दामन समिमा तैन सुखिनो गोवशासव।।
मयिष्यन्ति म सन्देही यावचन्द्रदिवाकरी।"
कायस्थ ऐसे ही क्षत्रियों द्वारा क्षत्रियाणियोंके
गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। परशुराम पादेशानुसार
वही कायस्थ क्षात्रधर्मसे वहिष्कत होने पर मो दारभय
मुनिने उन्हें क्षत्रिय संस्कारों में संस्कृत करके वेद
अध्ययन कराया, फिर उन्हों स्वधर्मनिष्ठ कायस्थों-
को गाई स्य धर्म बताया। चित्रगुप्तको उपजीविका
हो उनकी उपजीविका दुई। दालमामुनिने पापोर्वाद<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४९२|
कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
दिया कि, जब तक चन्द्र और सूर्य रहेंगे, तब तक
तुम्हार वंशीय और तुम सुख भोग करते रहोगे।
उपर्युक्त प्रमाणोंसे यह स्पष्ट विदित होता है कि,
चित्रगुप्तके बंधीय और चन्द्रसेनके वंशीय कायस्थ
क्षत्रिय हैं।
{{C|''' चंद्रगुप्त वंश।'''}}
चित्रगुतको सत्यत्तिकै विषयमें सबसे पहिले जो
पुराणके वचन उहत किये गये हैं, उन वचनोंके साथ
चित्रगुप्तके वंशका ऐसा परिचय मिलता है;-
"चिवगुवान्वये जाताः शृण मान् कथयामि थे।
गौडाख्या माधु राय व भटनागरसेनका: ।
पशिष्ठान श्रीवास्तव्या शकरीनास्तथ व च।
कुशलाः सशास्त्रेषु सम्बष्ठाद्या नराधिप ।
पुवान् वै स्थापयामास चित्रगुप्ती महीतले।
धर्माधर्मविषकशः पिवगुभो महामतिः।
भूयस्तान् दोषयामास सर्वसाधममुत्तमम् ।
पूजन देवतानाच पितृणां यशसाधनम् ॥
वर्णानां ब्रामणानां च सर्वदातिथिसेवनम् ।
प्रनाभ्य: करमादाय धर्माधर्मविलोचनम् ।
कर्तव्य हि प्रयवे न पुवाः खर्गस्य काम्यया ॥"
अहत्याकामधेनुसे उहत भविष्यपुराणमें भी
लिखा है:-
"चिवगुप्तेभ सा कन्या चाष्टी पुवामनीमनत् ।
पारुमचारथिवाखयी मतिमान् रिमस्तिथा।
चिनवारुयारुनच वष्टमोऽतौन्द्रियस्तथा ।
हितीया देवकोष दधिया या विवाहिता।
तस्याः पुवाश चत्वारस्ते या नामानि ।
मानवधा विभानुय विश्भानुश मौर्यवान् ।
पुवा हादश विख्यामा विचरती महोती।
मधु रायर्या गलथारु माथु रात्वमिती गवः।
सुचारु गौङदेशे तु तैन गौडीऽमवन्न ।
मानद गतथिवी मनागरिक अधः ।
श्रीवासमगर भानुमतमाच्छीवादासजकः ।।
अधामाराध्य हिमवान् तेमावष्ठ रवि च नः ।
समार्यों मविमान् गत्वा सखसेनवमागतः ।
शूरसेन विमान व तेन सूर्यध्वनः अतः।"
कायस्थोंके "कुलग्रन्व"में, वहांक
समाजमें प्रचसित "पातालखण्ड के कथनमें और
चित्रगुप्तको पूजापति, गौड़, माथुर, भटनागर,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सैनिक या शकसेन, अम्बष्ठ, श्रीवास्तव, अष्टान, करण,
सूर्यध्वज, वाल्मीक, कुलश्रेष्ठ और निगम-ऐसे बारह
भेद चित्रगुप्तन कायस्थों के पाये जाते हैं। पनों बारह
श्रेणियोंके कायस्थोंसे रक्कोस प्रकारके कायस्थ हुए -
ऐसा उस "पातालखण्ड में लिखा है। उनके भेद
इस प्रकार किये गये हैं:-
१ सूर्यध्वन, २ चन्द्रहास, ३ शूरिचन्द्राई, ४ चन्द्र-
देह, ५ रविदास, ६ रविरत्न, ७ रविधीर, ८ रविपूनक,
गम्भीर, १० प्रभु, ११ वल्लभ, १२ उदारहास रवि,
१३ मधुमान्. १४ भड, १५ सुभट्ट, १५ योगौड़,
१७ राजधाना, १८ अनिन्द, १८ सम्भ,म, २. विश्वास,
पौर २१ पञ्चतत्वज्ञ। इन इकोस ऋषियों में भी
हर एकके बीस बीस भेद हैं। पविमालके
कायस्थों के कुल ग्रन्यकी भांति बङ्गालके उत्तरसदीय
कायस्योंके कुलग्रन्थ भी लिखा है :-
"चिवगुप्तः क्रियोपेस: सर्व शास्त्रेषु पून्य ११५०
सैनीपुवाष्टका: पृष्या सर्व सम्पत्तिम' युवाः ।
गोदाखो माथ रश्चैव सक्सेन: भटनागर
अम्बष्ठय श्रीवास्तव्यः कपिक उच्चत।"
कुसाचार्य पचाननने अपनी "कुलकारिका मे
ऐसा लिखा है:-
"वेदोचराष्टशसान्दै भाकै कुम्भस्थमाकरे।
वाकाः मौकालीमयंष क्या मोहय एव च।
कामविश्वामिवीच पसगोवक्रमेय वे।
प्रमादिवरसिपश्च सोमघोषय सुधौरः
पुरुषोत्तमदासय देवदची महामतिः ।
सुधौरामगणश्च मिनकुल सुदर्भमः ।
अयोध्या निवासी सिको घोषश्चैव तथा पुनः ।
निवासी दासः कोलाधादाढमागवः ।
मायापुरीनिवासिनी दमिवों तथा गती।"
"नम्मदायातीर पुरी कर्यालोति मनोहरम् ।
मचर्यमय मौर' विश्वकर्मा निर्मितम् ।।
तथा श्रीवर्ष सनौकममवत् वत्पुरोवरः।
ततस्तेन पुरौं दवा मरात्रपुर' ययी।
समजो बसमवासिहासाश्च नरवार।
नई'मनाः क्रम व नामादिशामर' गताः।।
रायाभूपालपुवश्व रामागीपालनका युकप्रदेशक:|
वस्त्राभनोऽनादिवरसिंह खयानो महाबली ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कायस्थ|
४९३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
धार्मिकः सम्यवादी जितेन्द्रिय सदामयः ।
महाधनुरो-बीर: कुखवेष्ट: कुलाधिपः॥ -
रामकार्यपरित्राता सव'बार्यविभारदः।"
"चित्रगुप्मान्वये जावो विमान, उपकर्षकः ।
सस्याम्मनः सूर्यध्वजो घोष'शमीपतिः।
सूर्यदेवप्रसादन सूर्यायो नगर वसेत्।
वयनक्रमेव मानादिमान्तर गताः ।।
चन्द्रहासगिरी चित् चन्द्रहासगिरीश्वरः।
मध्यदेशे वयोध्यायां चन्द्रातस्र्यपदोहवः ।
नईपना बीसौमघोषः नौकर्षस्य कलानुगः ॥"
इस विषयमें कुलानन्दने अपने उत्तररादीय
'कायत्रकारिका' नामके बङ्गमा कुखग्रन्थमें जो कुछ
लिखा है, उसका अक्षरशः पनुवाद नीचे दिया
जाता है:-
"विधिने किया एक जन, कम्मे चिखने के लिए।
चित्रगुप्त नाम उसका, gपा फिर वह इस लिए।
कायस्थकी उत्पत्ति, दुई यमके समान ।
पापपुण्य लिखनेके, हेतु एपा फिर विधाम,
सादफिर हुए, उनके तीन जो लड़के।
चिलसेन चित्ररथ, नाम विचित्र उनके।
चित्रसेम स्वर्गम गया विचित्र पातासमें ।
चित्ररथ मत्य में पाया, सेनी जो कहाता।
यमुना विभा करमें हरिषके पम्सरमें।
सुखसे निवस मेनि-पनीके मन्दिरमें ।
यमुनाकै गर्भसे हुए पैदा बहुत जन ।
जो मौड़, माथुर, मह, सकसेन श्रीकरण ।
श्रीवास्तव, पहिष्ठान पम्बष्ट निगम ।
मुनिको पूजन सभामें गोत्रका सिखन ॥
तपोबससे श्रेष्ठ बसी श्रीकरण गल्थ ।
इसमें अनेक गोत्र मोमते बहुमान्य ।
{{Rh|#|#|#}}
गौड़ (देश) के महाराज श्रादित्यशूर नाम ।
गङ्गाके समीप वास सिंहेश्वर ग्राम,
पादरसे बुहासे उन्हें, विप्र पञ्चजन।
साथ उनके पक्षमोव पाये श्रीकरण
भ्रू वामन्दमित्रको “बाजकायस्थकारिका में भी
ऐसाोलिसा:-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
"चिवदेवसुताबाटो समासन वै मामयाः ।
बेमान्तु वल्पयामास वामपो जातवम च ।
एकव बाधा भावि गोवि गोवदेवता।
तेषां मध्ये प्रवरस एकाशितमः पतः।
सूर्यचनो चन्द्रहासचन्द्राई चन्द्रदेशकः।
रविदासी रविरवो रविधीरय बौड़कः।
इति चाष्टमका खास इलानां पतयोऽभवन् ।
घोषः स ध्वजावासचन्द्रहासाबसस्तथा ।
रविरवात् गुहद चन्द्रर्दशा, मिमयः ।
चन्द्रार्धात करणी जातः रविदासाच्च दत्तकः।
मृत्यु अयस्त गोडाच कथ्यते अन्यकारवः ।
दासकी नागनाथौ च करवाच समुनवाः ।
मव्युधय-सुतोनातः देवसेनस पालितः।
सिहजैव तथा खयाताः एते परतिकारकाः।
मम्य धय-कुलोरबी नित्यानन्दो पेश्वरः।
तस्थापि वंश स'बासाः सप्लायोतिः प्रकीर्तिताः ।
कुलाचारप्रमेदन दिसप्तत्यचलाभवन्॥"
इसके अतिरिक्त बंगालके दक्षिणरादीय कुलप्रन्यमें
भी वसु वंशको श्रीवास्तव और दत्त वंशको शकसेन
कुचोद्भव कहा है। अतएव उपरोक्ष कुलप्रन्योंके
पमाणोंसे यह निश्चय किया जाता है कि उत्तरराढ़ीय,
दक्षिणराढीय और पनज-क्या कुलीन पौर क्या
मौलिक सब ही-कायस्थ चिवगुप्तके वंशधर हैं;
भारतके भिन्न भिन्न देशोंको भिन्न भिन्न श्रेणाके
कायस्थों के "दायाद" हैं। अब यह देखना चाहिये
कि sत मिन मित्र श्रेचोके कायलोंका पूर्व परिचय
कैसा और क्या है।
प्राचीन शिलालेख और साम्रलिफियाम,
श्रीवास्तवोंको वास्तव्य-बंधका बताया है। मध्य-
प्रदेशके महतार नामक एक स्थानमें चेदिराज जानन-
देवकी एक प्रशस्ति मिली है। उसमें श्रीवास्तव
रवसिंहका ऐसा परिचय दिया है:-
"काश्यपीयाचयादीवनय सिद्धान्तवेदिना।
विपचवादिसिन रवसिहन धौमता ॥२३
श्रीराघवाधिकमला धराभिषेक।
लब्धोदयातसथाखमोरुन।
वास्तम्यवपकमलाकाभानुमेय
मामसुते रचिता बचिया प्रशस्ति।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४९३
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Lado Shaw
6039
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४९४|
घायस्य}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
चेदिराजके शिलालेखमें एक रत्नसिंहके पुत्रोंका
परिचय "निःशेषागमनबोधविमवः" ऐसा मिलता है।
मध्यप्रदेशके खलरि ग्रामसे मिले हुए, राजा हरिबह
देवके १४१० संवतके शिलालेखमें यों लिखा है-
"श्रीवास्तव्यान्वयनेपा प्रगतिरमलाचरा।
लिखिता रामदासन पडिसाधीवरेण चा"
अजयगड़ दुर्गमें राजा भोजवओके समयको
(६. बारावीं शताब्दीके नागगक्षरों में लिखी
हुई) दो बड़ी बड़ी शिला-लिपियां हैं, इन्हीं शिला
लिपियोंसे श्रीवास्तव वंशका विस्तृत परिचय मिला
है। इनमें सब ही 'ठक्कर' उपाधिधारी थे। कोई
सर्वाधिकारी था, कोई दुर्गाधिप था, कोई कोषाध्यक्ष
था, और कोई प्रधानमन्त्रीके पद पर नियुक्त था।
श्रावस्तीसे मिले हुए १२७६ मंवत्के शिलालेखसे
मालूम होता है कि, श्रीवास्तव वंश कर्कोटनागका
रक्षा किया दुपा वंश है ( Indian Antiquary, vol. मन्दयोरसे पाये
XVII. p. 62 )
काश्मीरके श्रीनगरमें श्रीवास्तवाँका प्रादिस्थान
है-ऐसा भी इतिहास पाया जाता है। राज.
तरङ्गियोसे यह मालूम होता है कि, वहांके सब
अधिकारी में कायस्सोंका हाथ था। इसके सिवा
कौटवंशीय कायस्थ रामापनि काश्मीरमें २५० वर्षसे
ज्यादा राज्य किया-इसका खासा प्रमाण मिलता
है। इसी के राजा जयादित्यके साथ गौड़के राजा
जयन्सने (कुलग्रन्यमें जिनका पादिशूर नामसे
सख) प्रपनो सड़की कल्याणदेवी व्याही थी।
तब ही से गौड़ोंका श्रीवास्तवाले वैवाहिक सम्बन्ध
चना जाता है। इन ही जयादित्यने पाणिनीय
व्याकरणको काशिकाहत्ति बनाई थी। इसमें उनके
वेदपाठ करनेका भी पता लगता है। उस समय वे
ही वेदपाठ करनेके अधिकारी होते थे, जिनके
संस्कारादि दिनोंके सदृश थे। ऐसी अवस्थामें
पिता सोदलका नाम प्रसिक है। ये देवगिरि-यादव-
जयादित्यके संस्कारादि हिनोंकी भांति थे-इसमें
सन्देश नीं। श्रीवास्तव कायस्थोंके सिवा माथुर,
भटनागर, शकमेन, निगम, गौड़ प्रादि विभित्र
श्रेणियोंके कायस्थ भी, ई.४ घी शताब्दीसे लेकर
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
१४यौं शताब्दी तक हिन्दू राजाओंके सबी, सेनापनि,
कराधिकारी, प्रतिनिधि, राजपखित पादि ऊँचे पदों
पर नियुक्त थे-इसका वर्णन शिक्षालिपि तथा ताम्र-
लिपियों में पाया जाता है। पहले शास्त्रीय प्रमाोंसे
यह बता चुके है कि, गौड़देशमें रहनेवाले कायस्थ
गौड़-कायस्थ कहलाते हैं। संवत् ११६१ के शिला-
लेखसे मिला दुवा माथुर कायखों के पञ्च राजकीय पद
और विहहत्ताका परिचय
(Indian Antiquary, vol.
XV.p. 201), १८१८ संवत्को मड़वाको शिलाविपिमें
मिला हुवा भड्यामके वैदिक धर्मनिष्ठ सकसेन
कायस्थ महीधर ( उक्त शिलालेखके अनुवादकने हों
महोघरका anointed sacrificer या पति-
याधिक कह कर परिचय दिया है),(Cunningham's
Arch. Sur. Reports, vol. III p. 59), The
चक्रवर्ती यशोधमाकं मालवीय संवत् ५८८ में सिमित
गये शिलालेखसे 'राजखानीय तथा
महापरिहत नैगम वा निगम कायस्थ वंश ( Fleet's
Corpus Inscriptionum Indicaram, vol. IL P.
152), ग्वालियरसे मिक्षा हुई ११५. संवत्को. गजा
महीपाल देवकी शिक्षामिदिमें महकायस या मट-
नागर बंधीय वायस्थ सूरि सोष पौर "शाब्दिक
भदन्त" सूर्यध्वज धौभद्रका नाम-ये सब विशेष
उल्लेखयोग्य है।
(Cordier-Catalogue du fonds Tibetan
deb Bibliotheque Nationale, p. 67.)
ई. पहिली शताब्दी सेकर चौथी शताब्ले
तक भारतके शासनका शवसेन वंशीय विय,
गुप्त वंशीय सम्राटोका पाधिपत्य नष्ट हो जानेके बाद
क्षत्रिय-कायस्थके नामसे प्रसिद्ध ए-बटुभटके
"देववंश" नामक संस्कृत-ग्रन्बी इस बातका पता
लगा है। श्रीकरण कायखोंमें, "माधर-पति'
और "महोतरनाकर" बनानेवाले मादेवक
राजके महासन्धिविपक्षिक थे। इनका सत्युकै बाद
इनके पद पर, प्रदितीय मानविशारद, "चतुर्वर्ग-
चिन्तामणि"के प्रणेता हिमाद्रि नियुक्त गए। गौड़<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४६५|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
देशमें कायमोंको उच्च पदाधिकार मिले थे।... ई० पूर्वी
यताब्दीमे से कर १३वौं शताब्दी तक गौड़देशके '
नामा स्थानों में ये ही कायस राज्य कर गये है।इसके
सिवा भारतके अत्यान्य देशों में भी.गौड कायम हिन्दू -
रानसभाषामजचे ऊंचे पदों पर नियुक्त थे; और
"मन्वाग्रणी" "असमयावसारसुमति" "विवाशिः
वन्दित" "साहित्याम्बुधिवन्धु" इत्यादि इत्यादि
पाण्डित्यसूचक विशेषणसे विभूषित किये जाते थे।
यहाँतक कि, बंगाल के घोष, दत्त, माग, भादित्य श्रादि
उपाधिधारी कायस्थ .. १. वौं और ११ वौं
शताब्दीमें, कलिङ्ग पौर- दक्षिण कोथतके सोमवंशीय
रानामांकी समाजांमें "शक","महासान्धिविहिक',
"महाचपटखिक" जैसे ऊंचे रचे पदोके अधिकारी
थे। यदि इनका संस्कार दिनांके सदृश न होता, तो
'धर्मनिष्ठ हिन्दू राजाओंको सभाओं में इनका स्थान
कदापि इतना ऊंचा नहीं जा सकता था। विकसिमके
अधिपति महाशिव ययातिरानकी ताम्रलिपिके
सहारकने उस ताम्रलिपिके लेखनेवाले सान्धिवियधिक
योरुद्रदत्सके विषयमें ऐसा लिखा है:-
" It is also to be noted that Rudra Datta
who was Bengali Kåyastha calls himself a
Rånaka, which indicates a Kshatriya origin."
(Journal of Behar & Orissa Research
Society, 1917, March, p. 2)
यह पहिले. ही कहा जा चुका है कि, गौड़
कायस्थोंके सिवा श्रीवास्तष, शकसेन, सूर्यध्वन, माथुर
इत्यादि विभिन्न श्रेणियोंके कायस्थ भित्र भित्र
समयमें युतप्रदेश प्रादि भारतके नाना स्थानोंसे जाकर
गौड़देशमें रहने लगे थे। उनमें घोषवंशक सूर्यध्धन,
बसुवंशके श्रीषास्तव, मित्रवंशके माथुर, पौर दत्तव शके
शकसेन, तथा सिंह, नाग, नाथ, दास पादि श्रीकरण
श्रेषीके कायल हैं। ये सब चित्रगुप्तके वश कायस्थ
पवियर और दिनोंकी भांति माने जाते है।
वसीय कायस्का साथिवीम्यागका कारण ।
{{Gap}}अपर,कदुए चित्रगुप्त वंश कायस्थ जब
दिनांकी भांति माने जाते थे; तब वहीय कायस्योंकि
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यत्रोप्नोतके नष्ट होने का कारण क्या है? वकीय-
कासवाचवमें सिखा हैं।-
"मडीयाध्यामिक शाम वापस्था विपमाना।
सव्यलय अन्नस व मायवीच तथा पुन:-
सतोकाले गते चापि भागवाहोचिसोऽमवम् ।
भागमोगाविधानिन पूताः कायस्थसम्भवाः ।
सम्मात विप्रमकाय विमावास्तवामपन् ।
साविकास समाजवास्तम्बाप्यामपि पारगा"
वास्तवमें बोड़ पासराज़के शासनकाल में यहांके
राजवलम कायस्थ वैदिकाचार,छोड़ कर बौह तान्त्रिक
हुए थे। वैदिकाचारके त्यागके साथ साथ उन्होंने
वैदिक यज्ञोपवीत संस्कार भी छोड़ दिया था। वे
कैसे सान्तिक थे या तन्त्रशास्त्र में कैसे व्यत्यत्र थे,
उसका यथेष्ठ प्रमाण मौजूद है। वङ्गीय साहित्य-
परिषदसे महामहोपाध्याय पं० एरप्रसाद शास्त्रो
महोदयने “इजार वर्ष पुराने वनभाषाके बौर गाम
और दोहे" प्रकाशित किये हैं। शास्त्री महाशयके
लिखे हुए उस अन्यके अन्त में जो "बीतान्त्रिक
अन्यकारसूची प्रकाशित हुई है, उससे जाना जाता है
कि, पालराजापोंके समयमें कायस्थोंने सैकड़ों तान्त्रिक
प्रन्योंकी रचना की थी। इन अन्यकारों में बहुतसे
उपाध्याय और महोपाध्याय
उपाधिके धारक
थे। उपर्युव सूचीसे यहभी जाना गया है कि,
उनमें पद्वारष्ठ
ग्रन्थकार महोपाध्याय .पाधिके
धारी थे। इनमेसे गयाधर, जिनवर घोष, तथागत-
रचित
पौर कमतरचित-ये चार
कायस्थ
महोपाध्याय उपाधिसे विभूषित थे। इनके पौर
पन्यान्य बहुतसे कायस्थपरिकतों के बनाये हुए सैकड़ों
ताधिक् ग्रन्यों का पता लगता है। केवल बौद्ध
तान्त्रिक कायस्थाचायौँको बात नहीं, बल्कि उस
समय गौड़के हिन्दू समाजमें भी बहुतसे प्रसिद्ध
प्रसिद्ध पण्डित मौजद थे। इनमें राढ़ाधिप गुण-
रबाभरण न्यायकन्दलीके कर्ता श्रीधरके पात्रयदाता
पाण्डुदास, गौड़के राजा रामपासके मन्त्री "तत्वबोध
मूर्ति बोधिदेव और उनके पुत्र “प्रधानवाचस्पति',
कामरूपक; राजा वैयदेव, गौड़ाधिप मदनपालके<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४६६|
कीयस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
सान्धिविग्रहिक वारन्ट्रं कायख प्रजापति नन्दी और
उनके पुत्र 'रामचरित' रचयिता 'कलिकासवाल्मीकि
सन्ध्याकर मन्दीका नाम विशेष उखयोग्य है।
पाल राजाओं के समयमें बहुतसे कायस्थ बौन-सड़के
विहार में प्रधानाचार्य भी होगये थे।
ग्राणोंके समान अधिकार होनेसे ही में बुलाये गये थे।
कायस्थ-ब्राहाणोंके पभ्युदयके समयमें मो-ऐसे ऐसे
ॐ पदों के अधिकारी बने और इसी लिए ही ये
वाङ्गीय ब्राह्मणसमानके विद्देषभाजन हुए थे। वैदिक
प्राधणों ने इन सधर्मियों पर कैसे कैसे अत्याचार
किये हैं, इसका पता 'शून्य पुराण के अन्तर्गत
"निरञ्जनको रुमासे खूब अच्छा लगता है।
इसके
फलस्वरूप बङ्गालमें बौडों का प्रभाव नष्ट हो गया और
ब्राह्मणों के प्रभाव कायस्यौको सच्छूट्रवत् बनना
पड़ा। इससे कायस्थांको समान-सम्बन्धी कोई हानि
नहीं उठानी पड़ी, यही कुशल है।
ब्राह्मणी नीचे
कायस्थोंका ही स्थान था। और तो क्या ; अकवर
बादशाहके समय में बङ्गालमें अधिकतर कायस्थ हो ।
राजा थे। साखों सैनिक, बजारों घुड़सवार और
सैकड़ों तो उनके प्राधिपत्यम रक्षाके लिए रहा
करती थीं। "प्राइन-ए-अकबरी"में इसका स्पष्ट
प्रमाण मिलता है। अकबर बादशाहके दरवारमें
कायस्थोके पवियत्वके विषयमें बड़ा भारी प्रान्दोलन
हुपा था। उस दरवारमें मधुचूदन सरस्वती जैसे
प्रमुख विहानों ने भी कायस्थोंके वत्रियत्वके अनुकूल
अपना मत प्रकट किया था। जहांगीर बादमारके
समय प्रकशित "वयान ए कायख" नामक पारसी
ग्रन्यमें उनके मतीका सल्लेख ही नहीं, वरन् इस
किया गया है। किसी किसी पहितका यह कहना
है कि, बङ्गास प्रातःस्मरणीय श्रीरघुनन्दन ही अब
वसु, घोष आदिको शूद्र निर्देध गये हैं, तब बङ्गालके
कायस्य शूद्र ही समझे जावेंगे। परन्तु निरपेक्ष
"वैलोक्यनारायणकी पचासी मामक पुस्तककागत
हो कर यदि रघुनन्दनके अन्य देखे जाय तो उनमें
कहीं भी "कायस्थ पद तक न मिलेगा। ऐसी दशा में
उनके मत कायख शूद्र है-यह बाना विसइस
पत्य था, तब वावि चांदनी ग्राम निवासी बनायो
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
लेकर बासको बहुतसी जातियों में पाया जाता है।
ऐसीदशामें केवल रघुनन्दनोश वसु, घोष प्रादि बन्दोंमे
बङ्गालके कोई कायख शूद्र बर्षे माने जा सकते।
ई. १४वौं शताब्दीमें गौड़से कुछ काय-पश्चित
राना दुनुभनारायचकी भोरसे कामना (कोचविहार)-
ये वहां "बारहमुंश्या" वाचाये
और पौन्होंने वहां अपना प्राधिपत्य जमा लिया।
इनके पाचार-व्यवहार ब्राधषों की भांति ही थे।
इन्ही (इयांगों के पनपी गिरोमणि मुंडयाँ कायम
चण्डीवरके वंश (महाप्रभु चैतन्यदेवके परिसे)
ई० १५ वीं शताब्दीको महापुरुष और पहितीय
पण्डित श्रीमहरदेव भाविभूत हुए। पासामके बोस
लाख हिन्दू इनको भगवान का अवतार मान कर
पूजते घे और पब भी ऐसा ही है। कायस्य-अवतार
शहरदेव प्रधान कायस्थ शिष्य माधवदेव भी उनकी
तरह प्रचार कार्यमें दक्ष थे और इन्होंने “महापुरुषीय"
सम्पदाय भी चलाया था। पासामके प्रधान प्रधान
स्थानों में महापुरुषीयों के मताधिक सन्न ( पुरवस्थान)
वर्तमान हैं। उनमें कायस्य सत्राधिकारी पद मी
ब्राह्मण आदि संवं वर्णी के दोचागुरु और प्रायों के
सदृश संस्कारवाने देखने में आते हैं। उनके पूर्वन
लोग गौड़वङ्गसे जा कर पासामवासी हुए थे। वङ्गीय
कायस्थ परिले हिन कहलात 2-इसका प्रमाण भी
यही है। कृष्णदास कविराज "श्रीचैतन्धचरिता-
में मृत में गौड़के रानाके प्रमात्व केशव वसुका (ई०
१५वीं शताब्दीमें) 'केशवकवी नामसे डल्लेख दिया गया
है। उत्तरराढ़ीय नन्दराम सिंह स्वयं (४० वर्ष
पहले) गोपीनाथकी पूजा करते थे।
ग्यारह पीढ़ियों तक चही पायी। इस वंयम
सर्वदा यन्त्रको प्रथा और प्रश्वोच्चारण की प्रथा
प्रचलित रही है। शिष्य रक्षाको प्रथा और पूनाको
प्रथा मी बराबर बनी सी है। परिवारकी तरफ
इस पुस्तक लिबाकि चार सौ.
ही प्रचार है।
वर्ष पहिले जब चन्द्रदीप रामाश परिमाधम प्राधि-
हास्यास्पद है। सुपौर घोष उपाधि ग्रामसे
या प्रका<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४९७|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कायस्य .हरिनारायण दास "विद्यासागर' उपाधिसे
विभूषित थे। दधिवरादीय कायस्ख-समान में सुगन्धाको
चिकित्साके व्यवहारी जहांगीर बादशाहक चिकि
सक वसुर्वधीय- चिन्तामणि राय 'वैद्यराम और
रत्नमणि राय 'धन्वन्तरि उपाधिसे पलकत थे। पीछे
इसी वंशम 'तपस्वी' 'सार्वभौम 'वाचस्पति' 'वैधशेखर'
'कण्हहार' 'वैद्यतिसक' 'वैद्यविशारद' 'वैद्यचूड़ा.
मणि 'तर्कतीर्थ 'वेधरन' इत्यादि इत्यादि उपाधियों के
अधिकारी हो गये हैं। इनके रचे हुए बहुतसे
वैद्यक अन्य मी मिले हैं।
दिनाजपुरके वर्तमान कायख महारानको समयसे
३०० वर्ष पहिले तक बोत्तरक दान-पतमें 'वर्मा
उपाधि देखने में पाता है। इस वंशमैं विजया
दशमोके दिन चित्रगुप्तका नमस्कार-मन्त्र पढ़ कर
पुरोहित जब इनके हाथ में तलवार देते हैं, तब ये
अपौच और क्षत्रिय धर्म दृष्ट होता है।' कहना
उसे ग्रहण करते हैं; और फिर उसी तसवारसे
केलेके पेड़की काटते हैं। यह प्रथा पहले के
चत्रियों की मृगयाका अनुकल्प है। बङ्गालके कायस्थ -
समानने तान्त्रिकताके प्रभावसे वैदिक गायत्री प्रादिक
त्यागने पर भी गर्भाधान, कर्णवेध और चड़ाकरण
पादि हिजोचित संस्कार पाले हैं, ऐसी हालत में
यहाँके कायस्थ कभी शूद्रोमें नहीं गिने जा सकते।
बङ्गालके अधिकांश सामाजिक कायस्थ चित्रगुप्तके
सन्तान हैं, उनमें बरावर संस्कार चले पाये हैं।
पौर उनमें बहुतों ने तान्त्रिक आचारको ग्रहण नहीं
किया है। वे बगवर वैदिक प्राचार पानन करते
आये हैं-इसका पाभास भी अन्यों में मिलता है।
इनके सन्तान बङ्गास और युक्षप्रदेशमें अब भी रहते
हैं और वे अब भी दिनों सदृश संस्कारवाले हैं।
बङ्गीय १२२४ संवत्के छपे हुए "कायस्थ-धर्म-
निर्णय' नामक प्राचीन बङ्गला-ग्रन्थमें ऐसा लिखा -
है. कि,-'गौड़ और बङ्गराज्यवाची दक्षिणरादी,
उत्तरराढ़ी और बङ्गाज कायस्थ-सन्तानों को प्राचारमें
हिन्दुखानो कायखों के पालापन :व्यवहारमै वृणित
होना पडता है। क्योंकि हिन्दुस्थानी कायस्थ
मात्रका चत्रिय भाचार, वेदवेदाङ्गपाठ, हादशाह
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
आशीष इत्यादि देख कर सन १२१३
बङ्गालो वर्षको महाराज गोपीमोहन देव बहादुरको
सम्मतिसे तारिणीचरण मित्रज' महामयने पत्र.
विवरणका आमूल सन्धान करके चित्रगुप्तवंशजात
कायम शूद्र नहीं, इस प्रकार प्रमाण पौराणिक पाने
पर समाचारपत्रमें प्रचार किया था। उस काल
नीमतलानिवासी दाज महाशय पौर वैकुण्ठवासी
तारिणीचरण वसुज महाशयने पत्र विवरणका भासून
सन्धान करते केवल पौराणिक प्रमाणसे अवधारण
किया, निश्चय न समझ चुपके रहे। पोछे डस
वैकुण्ठवासी दत्तन महाशयके पुत्र गुणाकर श्रीयुक्त
विशेखर दत्तज महाशय इलाहाबादसे फारसी
अक्षरों में लिखा एक पुस्तक ले आये। जिसमें पम-
पुराणोता चित्रगुप्त-सन्तान कायस्थ वंशका हादशाह
वधा है कि उक्त फारसी पधरै लिखित कायस्थवयान
नामक हस्तलिखित अन्य महाराज गोपीमोहन देवके
पुत्र राजा राधाकान्त देवके पुस्तकालयमें अयापि
विद्यमान है। राजा गोपीमोहन देव और राजा
राजवष्णदेव बहादुरके मध्य महाराज नवकृष्णको
विमुल सम्पत्तिके उत्तराधिकार पर कलकत्तेको सुपरीम
कोर्ट में जो मुकदमा चला, उसमें भी दोनों ने अपनेको
शूद्र और वैश्यसे भिन्न उच्च वर्णकी भांति घोषणा की
है। मेकण्टन.साहब कटक १८२४ ई० को प्रकाशित
उस मुकदमे की कैफियत पढ़नेसे सभी जान सकेंगे। *
पब बात. पाती है-राजा राधाकान्त देव बहाः
दुरके पिता और
पिळव्य अपनेको शूद्र वैश्यसे भिन्न
परिचित करते भी रामा राधाकान्त उच्च वर्णकी.भांति
देवने अपने शब्दकल्पद्रुममें कायस्थों के विषय पर
अशास्त्रीय कथा क्यों लिखी है ? जिस समय भब्द.
कल्पगुम प्रकाशित पीता था, उसी समय पान्दुनके
राजा राजनारायण प्रधान प्रधान पण्डितो का मत
ले कर कायस्व-समाजमें उपनयन संस्कार प्रवर्तन पर
अग्रसर हुये थे। राजा राधाकान्तके पिता राजा
l in Bengal, by Hon'ble Sir Francis WiMaghnaten, 1824
Consideration on the - Elinda Law as it is corrent<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४९८|कायस्थ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
गोपीमोहन. १२१३ सालको कायस्थों का क्षत्रियत्व
संवादपत्रमें घोषणा करते भी प्रक्षत कोई कार्य कर न
सके। उनके साथ पान्दुल-राजवंशको बराबर
सामाजिक प्रतिवन्दिता रही। कहना था है कि
उस काल कलकत्तेके दक्षिणरादीय कायस्थों के मध्य
१२ दत्त थे। दूसरे खानको भौर क्या बात कहेंगे।
राजा राधाकान्त देवके सुयोग्य दौहित्र स्वर्गीय '
भानन्दकृष्ण वसु महायसे सुना है कि उस
सामाजिक प्रतिवन्दिताके समय राजा राधाकान्त देवने
पान्दुलके राजा राजनारायणका विरुद्ध पक्ष अवन्तम्बन
किया था। उसी सुयोगमें उनके शब्दकल्पद्रुमके
संश्लिष्ट पण्डितने 'प्राचारनिर्णयतन्त्र' और 'पग्नि-
पुगणीय जातिमाला कोरचना कर कौशससे शब्दकल्प
गुमके मध्य प्रक्षिप्त किया, यह विचित्र नहीं। जो
हो, राजा राधाकान्त देव बहादुर र वयसमें अपना
बम समझ सके थे। शब्दकल्पद्रुमका वही भ्रम
संयोधन करनेके लिये वह अपने सुयोग्य और
सुपण्डित जामाता अमृतलास मित्र और प्रिय दौहित
पण्डितवर भानन्दकृष्ण वसु महोदय पर भार अर्पण
कर गये। वह केवल मुखसे ही कह कर वान्त
नये, अपने हा वयसवाले निल पौत्रके विवाहमें .
हिलोचित कुथण्डिका करके पिळपुरुषों का.मुखोज्ज्वल
कर गये हैं। यह बात उनके पामीय खनन
सब जानते हैं। इतिहास में भी यह बात लिखी हैं।
- राजा राधाकान्त देव थोड़े दिन अधिक जीनेस
चिनियापार प्रवर्तनमें उद्योगी...बनते, सन्द नहीं।
जो हो, पान्दुलके राजा रामनारायणको भांति स्वर्गीय
राय मोहनलाल मित्र महाशय पविय पाचारक
प्रचलनमें उद्योगी हुये थे। किन्तु उस समय संस्कृत
‘भाषामें प्रशिक्षित शास्त्रज्ञानहीन स्वजातीयोंके निकट :
रुपयुक्त सहानुभूति न मिलनेसे उनका. महत् उद्देश
: सुसिद्ध हो न सका। जो हो, पान्दुस्खके राजा
भारायण, जो वौन वो गये हैं, वर्तमान कायख
Ghose's Indian Obiefs,. Rajas, and Zamindars,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
समाजमें संस्कृत बिचा-प्रसारके माध क्रमसे वह
फसफर शुशोभित महीहमें परिणत होते माता
है। पालकत, वङ्गाके उत्तरराढ़ीय, दचिपरादोय,
वजन और वारेन्द्र इन चार श्रेणोके कायस्खोंके मध्य
प्रायः सचाधिक कायस्थ-सन्तान दिलोचित उपनयन-
सम्पत्र हैं। उस चारों समाजोंके बटुकुचीन और
मौशिक कायस्थ सन्तानोंने व्रात्य प्रायवित्त पन्त में
उपवीत ग्रहण किया है एवं उनके मध्य बयोदयाहमें
याबादि ववर्णाचित प्राचार प्रचलित पा है।
विशेषभावसे वनके प्रधान प्रधान पण्डित भी इस
स्थानके चित्रगुप्तवंशीय कायस्खों को वियवर्ण-
सम्भत समझते हैं। जब संस्कृत कावेनमें
कायस्थ छात्र चिये जायेंगे या नहीं-बात उठी, उस
समय संस्क त कालेजके - अधचप प्रातःस्मरणीय
स्वर्गीय ईश्वरचन्द्र विद्यासागर महाधयने शिक्षा-
विभागके हिरेकर महोदयको १८५१ ई. को २० वों
मार्चको लिखा था-"जब वैश कालेजमें पढ़ सकते
है, तव कायस्य क्यों न पढ़ सकेंगे? जब शूद्रजाति
वैद्य और अब शोभावानारके रामा राधाकान्त देवक
जामाता हिन्दू-स्कूल के छात्र प्रमतमात मिवने संस्क त
कालेज में पढ़नेका अधिकार पाया है, तब पन्याच
कायस्थ क्यों पढ़ न सकेंगे? कायस्थ पतिय पान्दूचके
राणा राजनारायण बहादुरने इसे प्रमाप करनेको
प्रयास उठाया। कि कायस्खोंको संस्कृत कालेज में
लेना उचित है। उसके पीछे संस्कत कालेनके
अध्यक्ष वर्मीय महामहोपाध्याय महेशचन्द्र न्यायरत्न
महाशय बङ्गता विश्वकोषमें कायस्व शब्द पढ़ तत्-
कालीन संस्कृतं कालेजके स्मृति-प्रध्यापक स्वर्गीय
मधुसूदन मतिरत्न महाशयको कहा था-'बायख-
जाति चत्रियवर्ण है, यह हम अच्छी तरह समझ ।
सके हैं। इनके परवर्ती पध्वच महामहोपाध्याय
मौसमदि न्यायासहर महाशयने बायस्थोंको
राम-चनियकी भांति स्त्रीकार किया है। (इनवा माडा
इतिहास द्रष्टम्य) पसापर महामहोपाध्याय प्रसाद पानी
महामय सिख गये हैं-बाय प्रमख वर्मप्रतिहार
वियेही बाधपोंकी भांति बायखके प्रधान इस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५१५
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{{Multicol|line=1px solid black}}
और प्राहियन्दके योगमें पञ्चमी सगती है। पक्षम्यपाल.
परिमिः । ॥ २२१. अप, पासपोर परि शब्दके
योगमें पञ्चमी पाती है। प्रतिनिधिप्रतिदाने च यथान् ।
तथा सप्तमी विभक्ति रखते हैं। गचने चलपि । पा
पा ११ । प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थ प्रति अष्टके
प्रयोगसे पञ्चमी पड़ती है। अक्षय'ये पद्यमी । पासार ।
कर्तृशून्य ऋण तुका खरूप होनेसे पक्षमी पाती
वाचक शब्द हेतुखरूप रहनेसे विकल्पमें पक्षमी एवं
पृथक्, विना और माना शब्दके योग, हतीया, सब सघमौ। पास। जो जिससे पधिक पथवा ईश्वर
द्वितीया एवं पञ्चमी विभखि लगाते हैं। बरणे व
कच्छ,कतिपयस्यासन्नवधनस्य। या १२२। प्रव्यवाची
भल्य, कच्छ, और कतिपय शब्दके उत्तर करणमें
ढतोया तथा पञ्चमी विभक्ति पड़ती है। दूरान्तिकार्थेभ्यो यथा-
द्वितीया छ। पा रा०१५। दूर एवं ममोपार्थ शब्दके
उत्तर द्वितीया और पञ्चमी विभक्ति रखते हैं।
पश्चमी विमले। पाराश। जिससे कुछ निकाल लिया
जाता, उसमें पञ्चमी विभक्तिका प्रयोग पाता है।
पधिकरणका लक्षण है,-पाधारोऽधिकरणम् ।
पा 118५ । क्रियाके पाधारस्वरूप क कर्मक पाधारको
पधिकरण संज्ञा है। उसमें सप्तमी विभकिशोती है।
सतम्यधिकरणे चा पा राशः अधिकरण और दूर तथा
निकटा शब्दके योगमें सप्तमी लगती है।
यस च
भावन मावक्षवषम्। पाय जिसकी क्रिया द्वारा
क्रियान्तर लक्षित होता, उसमें सप्तमी पाता है।
पशो चानादरे। पाराश। अनादर अर्थमें षष्ठी भौर व्यतिरिख स्वकीय स्वामिभावादि सम्बन्धका नाम शेष
सप्तमी विभक्ति होती है। खामोशाधिपतिदायादसाधि है।
मविभूमसूतैय। पा राक्षसा स्वामी, ईखर, अधिपति,
दायाद, साचो, प्रतिभू एवं प्रसूत शब्दके योगमै षष्ठी
पौर सप्तमी विमति लगती है। पायुतकुशलाभ्यां
पा 1३13.1 भायुद्ध और कुचल शब्दके योगमें तादर्य
अर्थ षष्ठी तथा सप्तमी विमति होती है। यतय
निर्धारणम् । पार| जाति, गुण, क्रिया और संक्षा
हारा एकदेश्य मात्र जिससे पथक् किया जाता, उसमें
सप्तमी विभक्ति का प्रयोग पाता है। साधुनिपुयाभ्यामर्चावाम
सक्षममतः। पाराशर साठ और निपुण शब्दकी योगमें ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पूजा
असे मतमी विभलिगती है। किन्तु उसमें
प्रति शब्दका प्रयोग नहीं होता। मसितोतसकाम्या वतीया
च। पाराश। प्रसित एवं सच क शब्दयोगमें बतीया
लुबन्त नक्षत्र शब्दमें पधिकरण पथ पर तीया पौर
सप्तमी विभक्ति लगायी जाती है। सक्षमीपञ्चम्यो बारक-
मध्ये। पास। विदयका मध्यवर्ती जो कालवाचक
है। विभाषा गुपेऽस्त्रियाम् । पाराशर५। अस्त्रीसित गुण-
पध्ववाचक शब्द रहता, उसमें पञ्चमी और
होती है। प्रथा विना मानामित तीयान्यतरस्याम्। पारा ।
सप्तमीका प्रयोग पड़ता है।
"धर्मणि होपिन इन्ति दन्तयोईन्नि घरम् ।
कैगेषु चमरौन्ति सोषि पुष्यक्षको इसः"
यवादधि यस वरवचने
स्तोकाम ठहरता, उसमें सप्तमीका प्रयोग लगता है। उसको
स्तोक, छोड़ साधु वा पसाधु शब्दके प्रयोग और कर्मपदयोगसे
निमित्तवाचक शब्दमें भी ससमी विधि होती है।
उन सकत कारकोंके मध्य उभयकी प्राप्ति-
सम्भावना रहनेसे परवर्ती कारक ही लगता है।
{{Left|यथा-}}
"अपादान सम्प्रदान करवाधारकर्नयाम् ।
कतुंगोमयसम्प्राप्तो परमेव प्रवर्तते।"
सम्बन्धको कारकता नहीं होती। उसोसे वा
कारकोम गिना भी नहीं जाता। सम्बन्ध अर्थ में और
कारक व्यतीत अन्य प्रथम षही विभक्ति होती है।
षष्ठी शेषे । पा राशन कारक पौर प्रातिपदिक अर्थ
सोम षष्ठी विभक्ति होती है। पख कारक विभति-
समूहकी भांति अर्थ विशेषमें भी षष्ठी विभलिका विधान
है। यथा-वडी हेतुप्रयोगे । पा रा३२२६ । हेतु शब्दके प्रयोगमें
चासेवायाम् । हेतुवाचक और हेतु शब्द उमय स्थल पर षष्ठी विभक्ति
होती है। सनाधक्ष तोया च । पाराशा हेतु शब्दक
प्रयोगसे सर्वनाम भब्द और हेतु शब्दमें षष्ठी विभति
लगती है। पहातमर्थ प्रव्ययेन : पा ३ । असमुच् पर्थ में
कप्रत्ययान्त शब्दके योगसे यष्ठौ विभक्ति होती है।
एनपा द्वितीया । पा ०३.२१ । एनए प्रत्ययान्त शब्दकके योगमें
हितीया और षष्ठी पाती है। दूरान्तिकाय: षड्यन्धनखाम्<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५१६|कारक}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
देख पड़ता,
पाती है।
पाराश। जिस विकृत अङ्ग हारा थरीरीका विकार
उसी अङ्गविशेषम कृतीयाका प्रयोग
चलता है। यम्भूतलक्षणे। पाराश! जिस चि हारा
कोई रूपान्तर लक्षित होता, उसमें तीया विभलिका
प्रयोग पड़ता है। स'गोऽन्यतरस्यां कमणि। पा राशर । पा २।३।१७।
संपूर्वक ज्ञा धातुके योगमें विकल्पसे हतीया होती है।
मन्वक्रमबारे
हेती। पाशशर.
फलसाधनयोग्य पदार्थ में , हतीया आती हैं।
सम्प्रदानका लक्षण है-कर्मशा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् ।
पा ११४३२। जिसके उद्देशसे दानकार्य सम्पादित होता,
उसोको सम्प्रदान संज्ञा है। रुधर्थानां प्रीयमाणः।
पा १॥४॥३ रुचि अर्थवोधक धातुके प्रयोगमें प्रीयमाण
अर्थात् प्रीतिवालेकी सम्प्रदान संशा होती है। शाधन,
चतों विभक्ति होती हैं। उसको छोड़ तादय अर्थ,
स्वाथां शीप स्यमानः। पा १४:३७ । साध, इ, स्था
धातुके प्रयोगमें उनके अर्थ अनुभवकारकको सम्प्रदान चापित विषय पौर हित शब्दके योगमें भी चतुर्थी
संज्ञा पड़ती है। धारकत्तमः । पा 8३५ । पिजन्सg
धातुके प्रयोगमें उत्तमणको सम्प्रदान संत्रा होती है।
प डेरोसितः। पा १६ । स्सह धातुके प्रयोगमे अभीष्ट
विशेष विषय में अवधीभूत कारकको अपादान संत्रा
पदार्थ की सम्प्रदान संज्ञा है। क्रुधामयार्थानां यं प्रति कोपः।
पा ४३७। क्रोध, अपकार, ईर्था पौर अस्या पथके
प्रयोगमै जिसके प्रति क्रोध पाता, वही सम्पदाम
कहाता है। किन्तु उपसर्गविशिष्ट होनेसे उसे कर्म
कहते हैं। राधीचोर्यस्य विपश्यः पा ११२राध और ईच
धातुके प्रयोगमें जिसके सम्बन्ध पर शभागभ प्रश्न
किया जाता, वही सम्पदान कहाता है। प्रत्याभ्यां व वः
पूर्वस्य कर्ता । पार1०। प्रति पौर पाङ, पूर्वक शु धातुके
प्रयोगमें पूर्ववर्ती प्रवर्तन व्यापारका जो कर्ता रहता,
उसका नाम सम्प्रदान पड़ता है। अनुप्रतिग्टयामा
पारा४/811 अनु और प्रति पूर्वक गृ धातुके प्रयोगमें
प्रवर्तन व्यापारके कर्ताको सम्पदान संत्रा होती है।
परिक्रय सम्पदाममन्यतरस्वाम् । पा१४181 जिसके द्वारा नियत है।
कालके लिये अधिकार, सधता, विकल्पसे उसका
सम्प्रदान नाम पड़ता है। चतुर्थों सम्दाने । पा३५॥
अन्यान्य स्यसमें भी चतुर्थी विभक्तिका विधान है,
यथा-क्रियार्पोपपदस्य पवमपि खानिनः । पाराश किया पा सार । पन्ध, पारात्, इतर ऋते, दिक,अत्तर, प
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
वाचक उपपदविशिष्ट प्रप्रयुक्त तुमन् अर्थके कर्मम
चतुर्थों चलती है। तुमघांच माववचनात् । पा रा३।१५1 तुमर्थ
प्रयोगमै और भाववचनामे विहित प्रत्ययक प्रयोगमे
चतुर्थी पाती है। नमः खत्ति वाहा सुधाळ वषट्योगा।
स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा; पलं और वषट्
शब्दके योगर्म चतुर्थों लगती है।
विभाषाऽप्रापिषु । पा २०१०। मन धातुके अनादर अर्य.
गम्यमानमें प्राणिवातीत अन्य कर्म पद पर विकल्समे
चतुथी विभक्ति लगाते है। फिर विकल पचमें
द्वितीया विमक्ति पाती है। गव्यर्थ कर्मपि रिवोया-चतुर्मा
चटायामनध्वनि। पा श३।१२। गत्यर्थ धातुर्क कायछत-
वापार प्रथम प्रध्व मित्र कर्मस्थच पर द्वितीया पौर
और शय् रूप धातुके अर्थ, सम्पदान अर्थ, उत्पातके द्वारा
विधि स्वगती है।
पपादनका लचय है,-ध्रुवमपायपादानम् । पाtain.
होती है। भौतार्थानां मबईतुः । पा १४२५ भया और
रक्षार्थ धातुके प्रयोगमें भयहेतुकी अपादान संत्रा
ठहरती है। परारमोदः । पा । परा पूर्वक नि:
धातुके प्रयोग, असा प्रर्यको अपादान संत्रा है।
बारपानामोमिमः। 41 101 वारणार्थ धातुके प्रयोगले
ईप्सित विषयकी अपादान संचाचगाते हैं। प्रधाना..
दर्भममिच्छति । पा २८ व्यवधान रहते जिसके द्वारा.
अपने प्रदर्शनको इच्छा को चासो, उसकी अपादाम-
संत्रा पाती है। पाख्यायोपयोगे । पा ReI यथारीति-
पड़ता है। अनिकतः प्रकृतिः। पा || जन धातुके.
अधयन में नो वक्ता रहता, उसका नाम प्रपादान
प्रयोगमें उत्पत्तिकारणको प्रपादान संत्रा होती
भुवः प्रभवः पा ११४३५६ प्रपूर्वक भू धातुके प्रयोगमें
उत्पत्ति कारणकी अपादान संत्रा है। अपादाने पक्षमा ।
पाराशर८६ अपादान कारकर्मे पक्षमी विभक्ति सगती
चतुर्थी विभक्ति होती है। है। उसको शेड अन्य स्खोंमें भी पश्चमी विधि
सौती है। यथा-वारादिवरत दिक मन्दाय परपदानादि यु ।<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५२३|कारगोपाधिः-कारन्धमो}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
'दिये। तत्यवन यथा,-'वादीने कहा-मैं पुरुषानुन
क्रमसे इस जमीनको दखल करते पाया इं, इस लिये
यह मेरी है।' प्रतिवादीने उत्तर दिया,-मैं भी
पुरुषानुक्रमसे इस जमीनको दखत करते पाया ई.
इस लिये यह मेरी है। दुबंच यथा,-वादौने कहा
मैं यह जमीन पुरुषानुक्रमसे दखल करते पाया ई, इस
लिये यह मैरी है। प्रतिवादीने उत्तर दिया. मैं दश
वर्षसे यह जमीन दखत करते पाया इस लिये
यह मेरी है।' (व्यवहारवच )
{{Left|कारणोपाधि (सं० पु०) ईश्वर।}}
कारणव (सं० पु.) कारण्डं वाति अथवा कारण्डस्य
इदं कारण्डं तदाकारं वाति, कारण्ड-वा-क। भावोऽनुप
सगै कः। पा शा३ । १ ईसविशेष, कोई बतक । २
चरण कृष्णवर्ण पक्षी, लम्बे पैरवाली काली
रूपवान् बामण युवकको तपस्या करते देखा। फिर
दरयायी चिड़िया।
कारण्डवपती (सं० स्त्री०) कारण्डवः सविशेषः पस्ति ।
पस्याम्, कारण्डव-मसुप्-डीप मस्य कः। नदीविशेष,
एक दरया। इसमें इंस बहुत रहते हैं।
'कारहव्यूह (सं० पु.) १ कोई बौद्ध । २ बौडौका
• कोई शास्त्र।
कारतूस (हिं० पु.) टोटा, एक सम्बी नली
(Cartridge)। इसमें गोली छरा और वारुद भरते
हैं। कारतूसको एक भोर टोपी लगती है।
कारन (हिं. पु०) १ कारण, सबब । (स्त्री०) २
रहमा।
कारनिस (० स्त्री० Cornice ) प्राकारगीर्ष, सौंका,
कंगनी, कगर।
कारनी (हिं. पु०) १ ईखर, प्रेरक। २ भेदक,
भेदिया।
- कारन्धम (सं० पु०) करन्धमस्य अपत्यम्, करन्धमा
पण। १ करन्धम रानाके पुत्र. प्रवीक्षित् (करन्धमस्य
गोवापत्यम्) २ करधमके पौत्र मरत। (मो.) .
नागेतीर्थ विशेष, औरतोंका कोई तीर्थ । महाभारत में
उक्त तीर्थको उत्पत्ति कथा लिखी पर्जुनको तीर्थ-
"भ्रमणके समय तपस्वियोनि पगस्य सौभद्र: पोमोम,
• कारन्धम और भारद्वाज पांच तीर्थ देखायो।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
तीर्थो को जनशून्य देख ऋविशेसे इसका कारण
पूछा। उन्होंने कहा कि उन पांचों तीर्थो में जल-
मन्सुका अत्यन्त डर था, उससे कोई उनमें उतरतान
रहा। पर्जुन यह वाक्य सुनके एक तीर्थ में उतर पड़े।
उसी समय जलजन्तुने उनका पाददेश पकड़ा था।
किन्तु वह उससे न डर। फिर उन्होंने बलप्रयोगसे
कुम्भीरको तीरमें उत्तोलन किया। वह कुम्भीर तोरमें
उस्थित होते ही सुन्दरी नारीको मूर्ति बन गया।
भनुनने वह देख नितान्त विस्ायसहकार उससे
पूछा
-वह कौन था, क्यों उस प्रकार कुम्भोरमूर्तिमें जलके.
•मध्य रहता था। नारी उन्हें उत्तर देने लगों कि
वह प्रसरा थी। किसी समय वह अपनी चार
दौर्घ सखियोंके साथ इन्द्रालय जाती थीं। राहमें उन्होंने एक
वह सनकी तपस्था भङ्ग करनेको नाचने-गाने खगों।
माअपने उससे क्रुद्ध हो पभिशाप दिया था,-
पांची जवजन्तु बन चिरकार जन्नमें विचरण करो।'
सन्होने उक्त पमियाप सुनके रोते रोते उनसे चमा
मांगी। उन्होंने कहा जब वह कुम्भीररूपसे किसी
पुरुषको पकड़ेंगी, तभी शापमुक्त हो अपने पूर्व रूपको
पहुंचेगी। फिर वह लिन जलाशयोंमें जलजन्तुरूपसे
रहेंगी, वह भारीतीर्थ नामसे पवित्र तीर्थको ख्याति-
लाभ करेंगे। ब्राह्मणके वाक्यसें कयश्चित्
करणा, श्रावस्त हो वह चिन्ता करतो घों-उन्हें कुम्भौरक्ष्य
धारण कर कहां अवखान करना पड़ेगा, जहां
मुक्तिकारक पुरुषका दर्शन मिलेगा। ... उसी समय
देवर्षि नारदने वहां पहुंच उस यांचो स्थान उनकी
बलाके कहा था कि भल्य दिनमें ही पर्जुन वहां पहुंच
उनको मुक्त कर देंगे। उसी भाशासे वह उ एक
एक जनाभयमें रहती थी। फिर मारौमे कहा,
जैसे प्रतुनके पनुपहसे उन्होंने मुक्ति पायो, वैसे-ती
वह उनको चारो. सखियों को भी अनुग्रहपूर्वक मुक्त
दूसरे चार तीर्थोसे सखियों को मुक्त किया।
{{Right|प्रजनने ! कारधी (पुबर एवं}}
करके उपकत करते। पर्नुनिने सदनुसार क्रम क्रम<noinclude></noinclude>
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सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw
3
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2026-07-22T03:50:10Z
Shivaniya shaw
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नमस्कार,
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::धन्यवाद सर 🙏🥰 [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १६:२५, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:१५, २२ मार्च २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:५१, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा उत्कृष्टता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:०७, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५५, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए २५ मार्च २०२६ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdAp7lxMY2nSh5wnsTi8SQOA4vu-0DGi2siReQtMcdictAemg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:०५, १८ मार्च २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] की पुरस्कार राशी अमेजन कूपन के रूप में भेजी जा चुकी है। कृपया अपना ईमेल जाँच लें। कोई समस्या हो तो मुझे सूचित करें -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:१९, ९ अप्रैल २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
@[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_भाग_1.djvu/६३&diff=prev&oldid=666381 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। इसके साथ ही संपादनोत्सव के दौरान शोधित किए जाने वाले पृष्ठों पर इन गलतियों से बचने का ध्यान रखें। संपादनोत्सव में भाग लेने के लिए धन्यवाद। आप निश्चिंत होकर अपना संपादन कार्य जारी रख सकती हैं। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०४:२३, ८ जुलाई २०२६ (UTC)
:धन्यवाद [[विशेष:योगदान/~2026-38725-16|~2026-38725-16]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-38725-16|वार्ता]]) ०५:२६, ८ जुलाई २०२६ (UTC)
::'''कृपया केवल वे पृष्ठ दिखाएं जिनमें सूत्र और चित्र दोनों स्पष्ट हों, क्योंकि अब जो भी पेज आ रहे हैं उसमें चित्र है।''' [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०३:५०, २२ जुलाई २०२६ (UTC)
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अजीत कुमार तिवारी
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