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राजपूत
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'''राजपूत''' [[उत्तर भारत]] यागु छगु [[क्षत्रीय]] कुल खः। थ्व नां ''राजपुत्र'' यु अपभ्रंश खः।
[[किपा:Rajputs.jpg|thumb|right|265px| "राजपूत" (anonymous, c.1860) <br /> ''From the collection of the British Library'']]
== जनसांख्यिकीय ==
[[किपा:Ravi Varma-Rajput soldier.jpg|right|thumb|200px|राजपूत sepoy, late 19th century. <br /> चित्रकार [[राजा रवि वर्मा]]]]
१९३१ यु जनगणना कथं भारतय् १२.८ मिलियन राजपूत दुगु जुल गुकिलि ५०,००० सिख, २.१ मिलियन मुसलमान व मेपिं हिन्दू ख।
हिन्दू राजपूत क्षत्रीय कुलयागु जुइ।
* '''[[सिख राजपूत]]'''
* '''[[मुसलमान राजपूत]]'''
== मूल ==
=== अनुश्रुति ===
=== ऐतिहासिक ===
== इतिहास ==
== Notes ==
<references/>
.
== External links ==
* The Historic Mandore of the Pratihara (Parihar) [http://www.justicekansingh.org/the_mandore.htm]
* [http://www.bartleby.com/65/ra/Rajputs.html Rajputs] [[Columbia Encyclopedia]], Sixth Edition; 2005
* [http://encyclopedia.jrank.org/PYR_RAY/RAJPUT.html Rajput] [[1911 Encyclopedia Britannica|Encyclopedia Britannica]]; 1911
* [https://web.archive.org/web/20071030070611/http://www.rajputs.org.uk/home.html British Association of Rajputs]
* [http://groups.yahoo.com/group/rajputworld Yahoo Group of Rajput World]
* [https://web.archive.org/web/20110907005801/http://www.rajputindia.com/ RajputIndia.com]
* [http://www.mewarindia.com/ency/raja.html The Mewar Encyclopedia]
* [http://heritagehotels.com/ektharaja/introduction.htm#intro Ek Tha Raja]
* [http://www.4dw.net/royalark/India/kotah.htm Kota Chauhan Clan]
* [https://web.archive.org/web/20110930024213/http://www.maharajajodhpur.com/hh/hh_main.htm Jodhpur Rathore Clan]
* [https://web.archive.org/web/20110822074051/http://www.rajputindia.com/rajputs Origin of Rajputs]
* [https://web.archive.org/web/20110822074051/http://www.rajputindia.com/rajputs Rajput Vansh and Clans]
* [https://web.archive.org/web/20031127213412/http://www.uq.net.au/~zzhsoszy/ips/r/rewah.html Rewa Baghel Clan]
* [http://www.smithsonianmagazine.com/issues/2004/june/raja.php?page=2 Marwari Horse]
* [http://mairrajputs.tripod.com/index.html The Mair Rajputs of Punjab]{{Dead link|date=May 2026 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}
* [http://www.sikhrajput.com "Sikh Rajputs" in Punjab and Haryana]
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हिमाचल प्रदेश
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'''हिमाचल प्रदेश''' उत्तर-पश्चिमी [[भारत]]य् स्थित छगू राज्य ख। थ्व राज्य 21,629 मील² (56019 किमी²) <ref name=area>{{cite web |url = http://www.indianmirror.com/geography/geo9.html| title = भारत के बारे में सांख्यकीय तथ्य |accessdate = 2006-10-26| publisher = www.indianmirror.com }}</ref> स्वया अधिक क्षेत्रय् दयाच्वंगु दु। थ्व राज्यया उत्तरय् [[जम्मू कश्मीर]], पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिमय् [[पंजाब]], दक्षिणय् [[हरियाणा]] व [[उत्तर प्रदेश]], दक्षिण-पूर्वय् [[उत्तराखण्ड]] तथा पूर्वय् [[सँदेय्]] ला। हिमाचल प्रदेशया शाब्दिक अर्थ ''च्वापुया प्रान्त'' ख। <ref name=hplm1>{{cite web |url = http://www.himachalpradesh.us/geography/himalayas_in_himachal.php |title = हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ |accessdate = 2007-05-20 |publisher = www.himachalpradesh.us}}</ref>
हिमाचल प्रदेशयात '''देव भूमि''' नं धाइ। थ्व क्षेत्रय् आर्यतयेगु प्रभाव [[वेद |ऋग्वेद]] स्वया पुलां। आंग्ल-गोरखा युद्ध धुंका थ्व ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकारया ल्हातय् लावन। सन 1857 तक्क थ्व [[महाराजा रणजीत सिंह]]या शासनया अधीन पंजाब राज्य (पंजाब हिल्सया सीबा राज्ययात त्वता)या भाग जुयाच्वन।<ref name=bsahis123>{{cite web
|url = http://www.webindia123.com/himachal/history/history.htm
|title = हिमाचल का इतिहास
|accessdate = 2007-04-28
|publisher = Suni system (P)
}}</ref>
सन 1950स थुकियात [[केन्द्र शासित प्रदेश]]दयेकल, सन् 1971स थ्व थाय्यात [[हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम-1971]]या अन्तर्गत 25 जून 1971स भारतया १८गु राज्य दयेकल।
हिमाचल प्रदेशया [[प्रतिव्यक्ति आय]] भारतया मेमेगु राज्य स्वया अप्व। बारहमासी खुसिया बहुतायत कारणं, हिमाचल अन्य राज्यतयेत [[बिजुली]] मी गुकिलि मू राज्य [[दिल्ली]], [[पंजाब]] व [[राजस्थान]] ला। राज्यया अर्थव्यवस्था ३ प्रमुख कारकय् निर्भर दु, बिजली, [[पर्यटन]] व [[कृषि]]। <ref>[http://www.yesbank.in/downloads/KnowledgeBank_17Jan06/YESBANK_Knowledge_ExecutiveSummary_Himachal.pdf हिमाचल प्रदेश में अर्थव्यवस्था विकास] yesbank.in अभिगमन तिथी- April 2008</ref>
थ्व राज्यया जनसंख्याया 90% हिन्दू व प्रमुख समुदायय् ब्राह्मण, राजपूत, कन्नेत, राठी व कोली ला। ट्रान्सपरेन्सी इंटरनैशनलया 2005या सर्वेक्षण अनुसार, हिमाचल प्रदेश भारतय् केरल धुंका दकलय् म्हो भ्रष्ट राज्य ख।<ref>{{cite web| url = http://www.transparency.org/regional_pages/asia_pacific/newsroom/news_archive__1/india_corruption_study_2005 | title= भारतीय भ्रष्टाचार अध्ययन - 2005 | publisher=Transparency International | accessdate=2007-05-29}}</ref>
==इतिहास==
हिमाचल प्रदेशयात पूर्ण [[राज्य]]या दर्जा २५ जनवरी, १९७१ खुनु दत। अप्रैल 1948स थ्व क्षेत्रया 27,000 वर्ग कि.मी.स दूगु लगभग 30 रियासततयेत स्वाना थ्व राज्यतयेत [[केंद्र शासित प्रदेश]] दयेकल। 1954स ‘ग’ श्रेणीया [[रियासत]] बिलासपुरयात थ्व राज्यय् स्वायेधुंका थ्व राज्यया क्षेत्रफल तधना 28,241 वर्ग कि.मी. जुल। सन 1966स थुकिलि [[पंजाब]]या पहाड़ी क्षेत्र स्वाना थुकियात पुनर्गठन यात। थ्व धुंका थ्व राज्यया क्षेत्रफल 55,673 वर्ग कि.मी. जुल।
==भूगोल==
थ्व जिल्लाया मू झ्वालाय् [[मछरियल झ्वाला]], [[राहला झ्वाला]], [[सिस्सु झ्वाला]], [[चैडविक झ्वाला]], [[बुंदला झ्वाला]] 328 फुट, [[पलानी झ्वाला]] 492 फुट आदि ला।
==सरकार==
थ्व राज्यया मुख्यमन्त्रीतेगु धलः थ्व कथं दु-
{| class="sortable wikitable"
|- bgcolor="#d3d3d3"
! ल्या
! नां
!
! कार्यकाल आरंभ
! कार्यकाल समाप्त
! राजनैतिक दल
! चुनाव क्षेत्र
|-
| 1
| [[यशवंत सिंह परमार]]
| <center>[[चित्र:YS%2BParmar.jpg|199x70px]]</center>
| 8 मार्च 1952
| 31 अक्तूबर 1956
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
|
|- bgcolor="#d3d3d3"
|
| [[राष्ट्रपति शासन]]
| -
| 31 अक्तूबर 1956
| 1 जुलाई 1963
| -
| -
|-
| 2
| [[यशवंत सिंह परमार]] (2)
| <center>[[किपा:YS%2BParmar.jpg|199x70px]]</center>
| 1 जुलाई 1963
| 28 जनवरी 1977
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
|
|-
| 3
| [[ठाकुर राम लाल]]
| <center>[[किपा:Thakur_Ram_Lal.jpg|199x70px]]</center>
| 28 जनवरी 1977
| 30 अप्रैल 1977
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
|
|- bgcolor="#d3d3d3"
|
| [[राष्ट्रपति शासन]]
| -
| 30 अप्रैल 1977
| 22 जून 1977
| -
| -
|-
| 4
| [[शांता कुमार]]
| <center></center>
| 22 जून 1977
| 14 फ़रवरी 1980
| [[जनता पार्टी]]
|
|-
| 5
| [[ठाकुर राम लाल]] (2)
| <center>[[किपा:Thakur_Ram_Lal.jpg|199x70px]]</center>
| 14 फ़रवरी 1980
| 7 अप्रैल 1983
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
|
|-
| 6
| [[वीरभद्र सिंह]]
| <center>[[किपा:Virbhadra_Singh_HP.jpg|199x70px]]</center>
| 8 अप्रैल 1983
| 8 मार्च 1985
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
| [[जुब्बल]] - [[कोटखाई]]
|-
| 7
| [[वीरभद्र सिंह]](2)
| <center>[[किपा:Virbhadra_Singh_HP.jpg|199x70px]]</center>
| 8 मार्च 1985
| 5 मार्च 1990
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
| [[जुब्बल]] - [[कोटखाई]]
|-
| 8
| [[शांता कुमार]] (2)
| <center></center>
| 5 मार्च 1990
| 15 दिसम्बर 1992
| [[भारतीय जनता पार्टी]]
|
|- bgcolor="#d3d3d3"
|
| [[राष्ट्रपति शासन]]
| -
| 15 दिसम्बर 1992
| 3 दिसम्बर 1993
| -
| -
|-
| 9
| [[वीरभद्र सिंह]] (3)
| <center>[[किपा:Virbhadra_Singh_HP.jpg|199x70px]]</center>
| 3 दिसम्बर 1993
| 24 मार्च 1998
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
| [[रोहड़ू]]
|-
| 10
| [[प्रेम कुमार धूमल]]
| <center></center>
| 24 मार्च 1998
| 6 मार्च 2003
| [[भारतीय जनता पार्टी]]
|
|-
| 11
| [[वीरभद्र सिंह]] (4)
| <center>[[किपा:Virbhadra_Singh_HP.jpg|199x70px]]</center>
| 6 मार्च 2003
| 30 दिसम्बर 2007
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
| [[रोहड़ू]]
|-
| 12
| [[प्रेम कुमार धूमल]]
| <center></center>
| 30 दिसम्बर 2007
| 20 दिसम्बर 2012
| [[भारतीय जनता पार्टी]]
| बमसन
|-
| 13
| [[वीरभद्र सिंह]]
| <center>[[किपा:Virbhadra_Singh_HP.jpg|199x70px]]</center>
| 25 दिसम्बर 2012
| वर्तमान
| [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]
| [[शिमला]] ग्रामीण
|}
==हिमाचल प्रदेशया जिल्ला==
{| class="wikitable" border="1" align="center" cellpadding="3" cellspacing="1" width="500" style="margin: 0 0 1em 1em; background: #F4F5F6; border: 1px #C6C7C8 solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%"
| colspan="3" bgcolor="#C2D6E5" align="center" | '''हिमाचल प्रदेशया जिल्ला
|-
| [[काँगड़ा जिल्ला]] || [[हमीरपुर जिल्ला]] || [[मंडी जिल्ला]]
|-
| [[बिलासपुर जिल्ला, हिमाचल प्रदेश|बिलासपुर जिल्ला]] || [[उना जिल्ला]] || [[चंबा जिल्ला]]
|-
| [[लाहौल व स्पीती जिल्ला]] || [[सिरमौर जिल्ला]] || [[किन्नौर जिल्ला]]
|-
| [[कुल्लू जिल्ला]] || [[सोलन जिल्ला]] || [[शिमला जिल्ला]]
|}
==जनसंख्या==
{| class="wikitable" border="1" align="center" cellpadding="3" cellspacing="1" width="500" style="margin-left:5px; background: #F4F5F6; border: 1px #C6C7C8 solid; border-collapse: collapse; font-size: 100%"
|-
! क्र.सं !! जिल्ला !! क्षेत्रफल किमी²य् !! जनसंख्या !! मुख्यालय
|-
! 1
| [[बिलासपुर जिल्ला]] || 1,167 || 2,95,387 || बिलासपुर
|-
! 2
| [[चम्बा जिल्ला]] || 6,528 || 3,93,386 || चंबा
|-
! 3
| [[हमीरपुर जिल्ला]] || 1,118 || 3,69,128 || हमीरपुर
|-
! 4
| [[कांगडा़ जिल्ला]] || 5,739 || 11,74,072 || धर्मशाला
|-
! 5
| [[किन्नौर जिल्ला]] || 6,401 || 71,270 || रिकाँग पिओ
|-
! 6
| [[कुल्लू जिल्ला]] || 5,503 || 3,02,432 || कुल्लु
|-
! 7
| [[लाहौल-स्पीति जिल्ला]] || 13,835 || 31,294 || केलोन्ग
|-
! 8
| [[मण्डी जिल्ला]]|| 3,950 || 7,76,372 || मंडी
|-
! 9
| [[शिमला जिल्ला]] || 5,131 || 6,17,404 || शिमला
|-
! 10
| [[सिरमौर जिल्ला]] || 2,825 || 3,79,695 || नाहन
|-
! 11
| [[सोलन जिल्ला]] || 1,936 || 3,82,268 || सोलन
|-
! 12
| [[ऊना जिल्ला]] || 1,540 || 3,78,269 || उना
|}
==संस्कृति==
राज्यया प्रमुख भाषाय् [[हिन्दी]], [[काँगड़ी]], [[पहाड़ी]], [[पंजाबी]], व [[मंडियाली]] ला। [[हिन्दू]], [[बौद्ध]] व [[सिख]] थनया प्रमुख धर्म ख। पश्चिमय् [[धर्मशाला]], [[दलाई लामा]]या शरण स्थली दु। थनया मू नसाय् इंदरा, सिद्दू, कुल्लू ट्राउट, चिकन अनारदाना, गुच्छी मटर, सेपु वड़ी, कद्दू का खट्टा, धाम, अंकलोस, अक्टोरी, पटंडे, चाय, मट्ठा, चना मद्रा, भटूरा, मिट्ठा, नसास्ता, पतीर, चो उक, भगजेरी आदि ला। थनया प्याखँय् जोरा, जूलि, दाँगि, महसु, जद्दा, जैंता, चर्हि, गिद्दा फर्हान्, लुड्डि, मुंज्रा, गूर्खालि आदि मू ख।
==अर्थतन्त्र==
हिमाचलप्रदेशया मू ज्या [[बुंज्या]] ख। थ्व राज्यया [[अर्थव्यवस्था]]य् बुंज्यां तःधंगु भूमिका म्हितु। थ्व राज्यया ६९% मनूतेसं थ्व ज्या या। बुंज्या व थ्व नाप स्वापू दूगु ख्यलं थ्व राज्यया कूल ग्राहस्थ उत्पादया २२.१ प्रतिशत दयेकु। कुल भौगोलिक क्षेत्र 55.673 लखः हेक्टेयरय् 9.79 लखः हेक्टेयर भूमि 9.14 लखः बुंज्यामितेगु अधीनय् ला। मध्यम व म्हो बुं दुपिं बुंज्यामित नाप करिब 86.4 प्रतिशत बुं दु। राज्यय् बुंज्याय् छ्यलातःगु भूमि 10.4 प्रतिशत जक्क दु। लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा-सिंचित दु।
प्रकृतिं हिमाचल प्रदेशयात व्यापक कृषि जलवायु परिस्थिति ब्युगु दु गुकिया कारणं बुंज्यामितेसं थीथी [[सि]] सयेकिगु या। थ्व राज्यय् [[स्याउ]], [[पासि]], [[आडू]], [[बेर]], [[खूमानी]], [[कागती]], [[अं]], [[लिचि]], [[अमरूद]], झरबेरी आदि सः। 1950य् 792 हेक्टेयर क्षेत्र बागवानीया अधीनय् लानाच्वंगु जुसां आःवया 2.23 लखः हेक्टेयरय् सि सयेकिगु या।
{{अनुवाद|हिन्दी}}
इसी तरह,1950 में फल उत्पादन 1200 मीट्रिक टन था, जो 2007 में बढकर 6.95 लाख टन हो गया है।
हिमाचल प्रदेश राज्य में यहां की सड़कें ही यहां की जीवन रेखा हैं और ये [[संचार]] के प्रमुख साधन हैं। इसके 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से 36,700 किलोमीटर में बसाहट है, जिसमें से 16,807 गांव अनेक पर्वतीय श्रृखलाओं और घाटियों के ढलानों पर फैले हुए हैं। जब यह राज्य 1948 में अस्तित्व में आया, तो यहां केवल 288 कि.मी. लंबी सड़कें थीं जो 15 अगस्त 2007 तक बढ़कर 30,264 हो गई हैं।
साल 2007 तक हिमाचल प्रदेश में कुल बुवाई क्षेत्र 5.83 लाख हेक्टेयर था। गांवों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई और अब तक राज्य में 14,611 हैंडपंप लगाए जा चुके हैं।
राज्य का कुल भौगोलिक [[क्षेत्रफल]] 55,673 वर्ग किलोमीटर है। वन रिकार्ड के अनुसार कुल वन क्षेत्र 37,033 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 16,376 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहां पहाड़ी [[चरागाह]] वाली वनस्पतियां नहीं उगाई जा सकतीं क्योंकि यह स्थायी रूप से [[बर्फ]] से ढका रहता है।
राज्य में 2 राष्ट्रीय पार्क और 32 वन्यजीवन [[अभयारण्य]] हैं। वन्यजीवन अभयारण्य के अंतर्गत कुल क्षेत्र 5,562 कि.मी., राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत 1,440 कि.मी. है। इस तरह कुल संरक्षित क्षेत्र 7,002 कि.मी. है।
[[पर्यटन]] उद्योग को हिमाचल प्रदेश में उच्च प्राथमिकता दी गई है और हिमाचल सरकार ने इसके विकास के लिए समुचित ढांचा विकसित किया है जिसमें जनोपयोगी सेवाएं, सड़कें, संचार तंत्र हवाई अड्डे यातायात सेवाएं, जलापूर्ति और जन स्वास्थ्य सेवाएं शामिल है। राज्य पर्यटन विकास निगम राज्य की आय में 10 प्रतिशत का योगदान करता है।
राज्य में तीर्थो और नृवैज्ञानिक महत्व के स्थलों का समृद्ध भंडार है। राज्य को व्यास, पाराशर, वसिष्ठ, मार्कण्डेय और लोमश आदि ऋषियों के निवास स्थल होने का गौरव प्राप्त है। गर्म पानी के स्रोत, ऐतिहासिक दुर्ग, प्राकृतिक और मानव निर्मित झीलें, उन्मुक्त विचरते चरवाहे पर्यटकों के लिए असीम सुख और आनंद का स्रोत हैं।
सड़क मार्ग इस राज्य की यातायात का मुख्य माध्यम है। परंतु [[मानसून]] और ठंड के मौसम में [[भू-स्खलन]] और अन्य वजहों से यह काफी बाधित होता है।
==लिधंसा==
{{reflist}}
==पिनेया स्वापू==
*[http://himachalpr.gov.in हिमाचल सरकार आधिकारिक जालस्थल]
*[http://himachal.nic.in/tour/census.htm 2001 जनगणनाय् हिमाचलया तथ्याङ्क]
*[https://web.archive.org/web/20100502052157/http://planningcommission.nic.in/plans/stateplan/stplsf.htm हिमाचल विकास रपट-भारतीय योजना आयोग]
*[https://web.archive.org/web/20100324124730/http://himachaltourism.gov.in/ हिमाचल सरकार पर्यटन जालस्थल]
*[https://web.archive.org/web/20190315050915/http://www.hptdc.gov.in/ हिमाचल पर्यटन विकास निगम जालस्थल]
*[https://web.archive.org/web/20070115021800/http://himachaltourism.nic.in/ हिमाचलय् पर्यटनया जानकारी]
*[https://web.archive.org/web/20190515023517/http://www.himtimes.com/ हिमाचल समाचार स्थल]
*[http://www.devbhoomihimachal.com देवभूमि हिमाचल]
*[https://web.archive.org/web/20100325225053/http://himachalmitra.com/ हिमाचल मित्र (हिन्दी वेब-पत्रिका)]
*[http://himdhara.blogspot.com/ हिमधारा - हिमाचल प्रदेश ब्लोगर्सतेगु कुतः]
*[https://web.archive.org/web/20190402162208/http://himachal.us/ हिमाचल आधारित ब्लाग]
{{भारत}}
[[Category:भारत]]
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सुबाल (उपनिषद्)
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{{नेपाललिपिपरिक्षण|छ्येलेमि:Eukesh/Auto/NepalScript/सुबाल (उपनिषद्)}}
'''{{PAGENAME}}''' छगू काव्य ख। थ्व काव्य [[मुक्तिक उपनिषद्|मुक्तिक उपनिषद्]]या अन्तर्गतय् [[उपनिषद्]] दुने ला <ref>http://sanskritdocuments.org/all_sa/upanishad_list_sa.html</ref>। थ्व [[श्रुति]] प्रचलनया छगू महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ ख।
==श्लोक==
थुकिया श्लोक थ्व कथं दु-<ref>[[sa:s:सुबालोपनिषत्|विकिस्रोत]]</ref>
॥ सुबालोपनिषत् ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
:ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
<poem><span style="font-size: 14pt; line-height: 200%">
॥ प्रथमः खण्डः ॥
ॐ तदाहुः किं तदासीत्तस्मै स होवाच न सन्नासन्न सदसदिति ॥ १ ॥
तस्मात्तमः सञ्जायते तमसो भूतादिर्भूतादेराकाशमाकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी ॥ २ ॥
तदण्डं समभवत्तत्संवत्सरमात्रमुषित्वा द्विधाकरोदधस्ताद्भूमिमुपरिष्टादाकाशं मध्ये पुरुषो दिव्यः सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । सहस्रबाहुरिति ॥ ३ ॥
सोऽग्रे भूतानां मृत्युमसृजन्त्र्यक्षरं त्रिशिरस्कं त्रिपादं खण्डपरशुम् ॥ ४ ॥
तस्य ब्रह्मा बिभेति स ब्रह्माणमेव विवेश स मानसान्सप्त पुत्रानसृजत्ते ह विराजः सप्त मानसानसृजन्ते ह प्रजापतयः ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत । चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च हृदयात्सर्वमिदं जायते ॥ ६ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
अपानान्निषादा यक्षराक्षसगन्धर्वाश्चास्थिभ्यः पर्वता लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो ललाटात्क्रोधजो रुद्रो जायते ॥ १ ॥
तस्यैतस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेवैतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषामयनं न्यायो मीमांसा धर्मशास्त्राणि व्याख्यानान्युपव्याख्यानानि च सर्वाणि च भूतानि ॥ २ ॥
हिरण्यज्योतिर्यस्मिन्नयमात्माधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा । आत्मानं द्विधाकरोदर्धेन स्त्री अर्धेन पुरुषो देवो भूत्वा देवानसृजदृषिर्भूत्वा ऋषीन्यक्षराक्षसगन्धर्वान्ग्राम्यानारण्यांश्च पशूनसृजदितरा गौरितरोऽनड्वानितरो वडवेतरोऽश्व इतरा गर्दभीतरो गर्दभ इतरा विश्वम्भरीतरो विश्वम्भरः ॥ ३ ॥
सोऽन्ते वैश्वानरो भूत्वा सन्दग्ध्वा सर्वाणि भूतानि पृथिव्यप्सु प्रलीयत आपस्तेजसि प्रलीयन्ते तेजो वायौ विलीयते वायुराकाशे विलीयत आकाशमिन्द्रियेष्विन्द्रियाणि तन्मात्रेषु तन्मात्राणि भूतादौ विलीयन्ते भूतादिर्महति विलीयते महानव्यक्ते विलीयतेऽव्यक्तमक्षरे विलीयते अक्षरं तमसि विलीयते तमः परे देव एकीभवति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ ४ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
असद्वा इदमग्र आसीदजातमभूतमप्रतिष्ठितमशब्दमस्पर्शमरूपमरसमगन्धमव्ययममहान्तमबृहन्तमजमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ १ ॥
अप्रमाणममुखमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम् अचक्षुष्कमनामगोत्रमशिरस्कम् अपाणिपादमस्निग्धमलोहितमप्रमेयम् अह्रस्वमदीर्घमस्थूलमनण्वनल्पमपारम् अनिर्देश्यमनपावृतमप्रतर्क्यम् अप्रकाश्यमसंवृतमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ २ ॥
एतद्वै सत्येन दानेन तपसाऽनाशकेन ब्रह्मचर्येण निर्वेदनेनानाशकेन षडङ्गेनैव साधयेदेतत्त्रयं वीक्षेत दमं दानं दयामिति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति य एवं वेद ॥ ३ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं हृदयस्य दश छिद्राणि भवन्ति येषु प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ १ ॥
स यदा प्राणेन सह संयुज्यते तदा पश्यति नद्यो नगराणि बहूनि विविधानि च यदा व्यानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवांश्च ऋषींश्च यदापानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति यक्षराक्षसगन्धर्वान्यदा उदानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्देवान्स्कन्दं जयन्तं चेति यदा समानेन सह संयुज्यते तदा पश्यति देवलोकान्धनानि च यदा वैरम्भेण सह संयुज्यते तदा पश्यति दृष्टं च श्रुतं च भुक्तं चाभुक्तं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति ॥ २ ॥
अथेमा दश दश नाड्यो भवन्ति । तासामेकैकस्या द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः शाखा नाडीसहस्राणि भवन्ति यस्मिन्नयमात्मा स्वपिति शब्दानां च करोत्यथ यद्द्वितीये सङ्कोशे स्वपिति तदेमं च लोकं परं च लोकं पश्यति सर्वाञ्छब्दान्विजानाति स सम्प्रसाद इत्याचक्षते प्राणः शरीरं परिरक्षति हरितस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य श्वेतस्य नाड्यो रुधिरस्य पूर्णाः ॥ ३ ॥
अथात्रैतद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तथा हिता नाम नाड्यो भवन्ति हृद्याकाशे परे कोशे दिव्योऽयमात्मा स्वपिति यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति न तत्र देवा न देवलोका यज्ञा न यज्ञा वा न माता न पिता न बन्धुर्न बान्धवो न स्तेनो न ब्रह्महा तेजस्कायममृतं सलिल एवेदं सलिलं वनं भूयस्तेनैव मार्गेण जाग्राय धावति सम्राडिति होवाच ॥ ४ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
स्थानानि स्थानिभ्यो यच्छति नाडी तेषां निबन्धनं चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूतमादित्यस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चक्षुषि यो द्रष्टव्ये य आदित्ये यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १ ॥
श्रोत्रमध्यात्मं श्रोतव्यमधिभूतं दिशस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः श्रोत्रे यः श्रोतव्ये यो दिक्षु यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ २ ॥
नासाध्यात्मं घ्रातव्यमधिभूतं पृथिवी तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो नासायां यो घ्रातव्ये यः पृथिव्यां यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ३ ॥
जिह्वाध्यात्मं रसयितव्यमधिभूतं वरुणस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यॊ जिह्वायां रसयितव्ये यो वरुणे यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरमममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ४ ॥
त्वगध्यात्मं स्पर्शयितव्यमधिभूतं वायुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यस्त्वचि यः स्पर्शयितव्ये यो वायौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ५ ॥
मनोऽध्यात्मं मन्तव्यमधिभूतं चन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो मनसि यो मन्तव्ये यश्चन्द्रे यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ६ ॥
बुद्धिरध्यात्मं बोद्धव्यमधिभूतं ब्रह्मा तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो बुद्धौ यो बोद्धव्ये यो ब्रह्मणि यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ७ ॥
अहङ्कारोऽध्यात्ममहङ्कर्तव्यमधिभूतं रुद्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं योऽहङ्कारे योऽहङ्कर्तव्ये यो रुद्रे यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ८ ॥
चित्तमध्यात्मं चेतयितव्यमधिभूतं क्षेत्रज्ञस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चित्ते यश्चेतयितव्ये यः क्षेत्रज्ञे यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ९ ॥
वागध्यात्मं वक्तव्यमधिभूतमग्निस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो वाचि यो वक्तव्ये योऽग्नौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १० ॥
हस्तावध्यात्ममादातव्यमधिभूतमिन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो हस्ते य आदातव्ये य इन्द्रे यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ ११ ॥
पादावध्यात्मं गन्तव्यमधिभूतं विष्णुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पादे यो गन्तव्ये यो विष्णौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १२ ॥
पायुरध्यात्मं विसर्जयितव्यमधिभूतं मृत्युस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः पायौ यो विसर्जयितव्ये यो मृत्यौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १३ ॥
उपस्थोऽध्यात्ममानन्दयितव्यमधिभूतं प्रजापतिस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं य उपस्थे य आनन्दयितव्ये यः प्रजापतौ यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपसीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १४ ॥
एष सर्वज्ञ एष सर्वेश्वर एष सर्वाधिपतिरेषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य सर्वसौख्येरुपास्यमानो न च सर्वसौख्यान्युपास्यति वेदशास्त्रैरुपास्यमानो न च वेदशास्त्राण्युपास्यति यस्यान्नमिदं सर्वे न च योऽन्नं भवत्यतः परं सर्वनयनः प्रशास्तान्नमयो भूतात्मा प्राणमय इन्द्रियात्मा मनोमयः सङ्कल्पात्मा विज्ञानमयः कालात्मानन्दमयो लयात्मैकत्वं नास्ति द्वैतं कुतो मर्त्यं नास्त्यमृतं कुतो नान्तःप्रज्ञो न बहिःप्रज्ञो नोभयतःप्रज्ञो न प्रज्ञानघनो न प्रज्ञो नाप्रज्ञोऽपि नो विदितं वेद्यं नास्तीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १५ ॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
नैवेह किञ्चनाग्र आसीदमूलमनाधारा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥ १ ॥
चक्षुश्च द्रष्टव्यं च नारायणः श्रोत्रं च श्रोतव्यं च नारायणो घ्राणं च घ्रातव्यं च नारायणो जिह्वा च रसयितव्यं च नारायणस्त्वक् च स्पर्शयितव्यं च नारायणो मनश्च मन्तव्यं च नरायणो बुद्धिश्च बोद्धव्यं च नारायणोऽहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च नारायणश्चित्तं च चेतयितव्यं च नारायणो वाक् च वक्तव्यं च नारायणो हस्तौ चादातव्यं च नारायणः पादौ च गन्तव्यं च नारायणः पायुश्च विसर्जयितव्यं च नारायण उपस्थश्चानन्दयितव्यं च नारायणो धाता विधाता कर्ता विकर्ता दिव्यो देव एको नारायणः ॥ २ ॥
आदित्या रुद्रा मरुतो वसवोऽश्विनावृचो यजूंषि सामानि मन्त्रोऽग्निराज्याहुतिर्नारायण उद्भवः सम्भवो दिव्यो देव एको नारायणः ॥ ३ ॥
माता पिता भ्राता निवासः शरणं सुहृद्गतिर्नारायणः ॥ ४ ॥
विराजा सुदर्शनाजितासोम्यामोघाकुमारामृतासत्यामध्यमानासीराशिशुतासूरासूर्याभास्वराविज्ञेयानि नाडीनामानि दिव्यानि ॥ ५ ॥
गर्जति गायति वाति वर्षति वरुणोऽर्यमा चन्द्रमाः कालः कलिर्धाता ब्रह्मा प्रजापतिर्मघवा दिवसाश्चार्धदिवसाश्च कलाः कल्पाश्चोर्ध्वं च दिशश्च सर्वं नारायणः ॥ ६ ॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति । तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् । तदेतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ ७ ॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥
अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यो यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन् यं पृथिवी न वेद । यस्यापः शरीरं योऽपोन्तरे संचरन्यमापो न विदुः । यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद । यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् य वायुर्न वेद । यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद । यस्य मनः शरीरं यो मनोन्तरे संचरन् यं मनो न वेद। यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे संचरन् यं बुद्धिर्न वेद । यस्याहङ्कारः शरीरं योऽहङ्कारमन्तरे संचरन् यमहङ्कारो न वेद । यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे संचरन् यं चित्तं न वेद । यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे संचरन् यमव्यक्तं न वेद । यस्याक्षरं शरीरं योऽक्षरमन्तरे संचरन् यमक्षरं न वेद । यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद । स एष सर्वभूतान्तरात्मापहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः ॥ १ ॥
एतां विद्यामपान्तरतमाय ददावपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ घोराङ्गिरा रैक्वाय ददौ रैक्वो रामाय ददौ रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येवं निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
अन्तःशरीरे निहितो गुहायां शुद्धः सोऽयमात्मा सर्वस्य मेदोमांसक्लेदावकीर्णे शरीरमध्येऽत्यन्तोपहते चित्रभित्तिप्रतीकाशे गान्धर्वनगरोपमे कदलीगर्भवन्निःसारे जलबुद्बुदवच्चञ्चले निःसृतमात्मानमचिन्त्यरूपं दिव्यं देवमसङ्गं शुद्धं तेजस्कायमरूपं सर्वेश्वरमचिन्त्यमशरीरं निहितं गुहायाममृतं विभ्राजमानमानन्दं तं पश्यन्ति विद्वांसस्तेन लये न पश्यन्ति ॥ १ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ हैनं <ref>[https://vedastudy.tripod.com/pur_index25/raikva.htm रैक्वोपरि टिप्पणी]{{Dead link|date=May 2026 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}</ref>रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वेऽस्तं गच्छन्तीति । तस्मै स होवाच चक्षुरेवाप्येति यच्चक्षुरेवास्तमेति द्रष्टव्यमेवप्येति यो द्रष्टव्यमेवास्तमेत्यादित्यमेवाप्येति य आदित्यमेवास्तमेति विराजमेवाप्येति यो विराजमेवास्तमेति प्राणमेवाप्येति यः प्राणमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १ ॥
श्रोत्रमेवाप्येति यः श्रोत्रमेवास्तमेति श्रोतव्यमेवाप्येति यः श्रोतव्यमेवास्तमेति दिशमेवाप्येति यो दिशमेवास्तमेति सुदर्शनामेवाप्येति यः सुदर्शनामेवास्तमेत्यपानमेवाप्येति योऽपानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ २ ॥
नासमेवाप्येति यो नासामेवास्तमेति घ्रातव्यमेवाप्येति यो घ्रातव्यमेवास्तमेति पृथिविमीवाप्येति यः पृथिवीमेवास्तमेति जितामेवाप्येति यो जितामेवास्तमेति व्यानमेवाप्येति यो व्यानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ३ ॥
जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौम्यामेवास्तमेत्युदानमेवाप्येति य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ४ ॥
त्वचमेवाप्येति यस्त्वचमेवास्तमेति स्पर्शयितव्यमेवाप्येति यः स्पर्शैतव्यमेवास्तमेति वायुमेवाप्येति यो वायुमेवास्तमेति मोधामेवाप्येति यो मोधामेवास्तमेति समानमेवाप्येति यः समानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ५ ॥
वाचमेवाप्येति यो वाचमेवास्तमेति वक्तव्यमेवाप्येति यो वक्तव्यमेवास्तमेत्यग्निमेवाप्येति योऽग्निमेवास्तमेति कुमारामेवाप्येति यः कुमारामेवास्तमेति वैरम्भमेवाप्येति यो वैरम्भमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ६ ॥
हस्तमेवाप्येति यो हस्तमेवास्तमेत्यादातव्यमेवाप्येति य आदातव्यमेवास्तमेतीन्द्रमेवाप्येति य इन्द्रमेवास्तमेत्यमृतामेवाप्येति योऽमृतामेवास्तमेति मुख्यमेवाप्येति यो मुख्यमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ७ ॥
पादमेवाप्येति यः पादमेवास्तमेति गन्तव्यमेवाप्येति यो गन्तव्यमेवास्तमेति विष्णुमेवाप्येति यो विष्णुमेवास्तमेति सत्यामेवाप्येति यः सत्यामेवास्तमेत्त्यन्तर्याममेवाप्येति योऽन्तर्याममेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ८ ॥
पायुमेवाप्येति यः पायुमेवास्तमेति विसर्जयितव्यमेवाप्येति यो विसर्जयितव्यमेवास्तमेति मृत्युमेवाप्येति यो मृत्युमेवास्तमेति मध्यमामेवाप्येति यो मध्यमामेवास्तमेति प्रभञ्जनमेवाप्येति यः प्रभञ्जनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ९ ॥
उपस्थमेवाप्येति य उपस्थमेवास्तमेत्यानन्दयितव्यमेवाप्येति य आनन्दयितव्यमेवास्तमेति प्रजापतिमेवाप्येति यः प्रजापतिमेवास्तमेति नासीरामेवाप्येति यो नासीरामेवास्तमेति कुमारमेवाप्येति यः कुमारमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १० ॥
मन एवाप्येति यो मन एवास्तमेति मन्तव्यमेवाप्येति यो मन्तव्यमेवास्तमेति चन्द्रमेवाप्येति यश्चन्द्रमेवास्तमेति शिशुमेवाप्येति यः शिशुमेवास्तमेति श्येनमेवाप्येति यः श्येनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ ११ ॥
बुद्धिमेवाप्येति यो बुद्धिमेवास्तमेति बोद्धव्यमेवाप्येति यो बोद्धव्यमेवास्तमेति ब्रह्माणमेवाप्येति यो ब्रह्माणमेवास्तमेति सूर्यामेवास्तमेति यः सूर्यामेवास्तमेति कृष्णमेवाप्येति यः कृष्णमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १२ ॥
अहङ्कारमेवाप्येति योऽहङ्कारमेवास्तमेत्यहङ्कर्तव्यमेवाप्येति योऽहङ्कर्तव्यमेवास्तमेति रुद्रमेवाप्येति यो रुद्रमेवास्तमेत्यसुरामेवाप्येति योऽसुरामेवास्तमेति श्वेतमेवाप्येति यः श्वेतमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १३ ॥
चित्तमेवाप्येति यश्चित्तमेवास्तमेति चेतयितव्यमेवाप्येति यश्चेतयितव्यमेवास्तमेति क्षेत्रज्ञमेवाप्येति यः क्षेत्रज्ञमेवास्तमेति भास्वतीमेवाप्येति यो भास्वतीमेवास्तमेति नागमेवाप्येति यो नागमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तं<ref>[https://puranastudy.page.tl/Ananta.htm अनन्तोपरि टिप्पणी]</ref> निर्बीजमेवाप्येति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १४ ॥
य एवं निर्बीजं वेद निर्बीज एव स भवति न जायते न म्रियते न मुह्यते न भिद्यते न दह्यते न छिद्यते न कम्पते न कुप्यते सर्वदहनोऽयमात्मेत्याचक्षते ॥ १५ ॥
नैवमात्मा प्रवचनशतेनापि लभ्यते न बहुश्रुतेन न बुद्धिज्ञानाश्रितेन न मेधया न वेदैर्न यज्ञैर्न तपोभिरुग्रैर्न सांख्यैर्न योगैर्नाश्रमैर्नान्यैरात्मानमुपुलभन्ते प्रवचनेन प्रशंसया व्युत्थानेन तमेतं ब्राह्मणा शुश्रुवांसोऽनूचाना उपलभन्ते शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वस्यात्मा भवति य एवं वेद ॥ १६ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति रसातललोकेष्विति होवाच कस्मिन्रसातललोका ओताश्च प्रोताश्चेति भूर्लोकेष्विति होवाच । कस्मिन्भूर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति भुवर्लोकेष्विति होवाच । कस्मिन्भुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति सुवर्लोकेष्विति होवाच । कस्मिन्सुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति महर्लोकेष्विति होवाच । कस्मिन्महर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति जनोलोकेष्विति होवाच । कस्मिन् जनोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति तपोलोकेष्विति होवाच । कस्मिंस्तपोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सत्यलोकेष्विति होवाच । कस्मिन्सत्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेष्विति होवाच । कस्मिन्प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेष्विति होवाच । कस्मिन्ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सर्वलोका आत्मनि ब्रह्मणि मणय इवौताश्च प्रोताश्चेति स होवाच ॥ १ ॥
एवमेतान् लोकानात्मनि प्रतिष्ठितान्वेदात्मैव स भवतीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानमुत्सृज्यापक्रामतीति तस्मै स होवाच । हृदयस्थ मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिऽन्स्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमिवानेकधा विकसितं तस्य मध्ये समुद्रः समुद्रस्य मध्ये कोशस्तस्मिन्न्नाड्यश्चतस्रो भवन्ति रमारमेच्छाऽपुनर्भवेति तत्र रमा पुण्येन पुण्यं लोकं नयत्यरमा पापेन पापमिच्छया यत्स्मरति तदभिसंपद्यते अपुनर्भवया कोशं भिनत्ति कोशं भित्त्वा शीर्षकपालं भिनत्ति शीर्षकपालं भित्त्वा पृथिवीं भिनत्ति पृथिवीं भित्त्वापो भिनत्त्यापो भित्त्वा तेजो भिनत्ति तेजो भित्त्वा वायुं भिनत्ति वायुं भित्त्वाकाशं भिनत्त्याकाशं भित्त्वा मनो भिनत्ति मनो भित्त्वा भूतादिं भिनत्ति भूतादिं भित्त्वा महान्तं भिनत्ति महान्तं भित्त्वाव्यक्तं भिनत्त्यव्यक्तं भित्त्वाक्षरं भिनत्त्यक्षरं भित्त्वा मृत्युं भिनत्ति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
ॐ नारायणाद्वा अन्नमागतं पक्वं ब्रह्मलोके महासंवर्तके पुनः पक्वमादित्ये पुनः पक्वं क्रव्यादि पुनः पक्वं जालकिलक्लिन्नं पर्युषितं पूतमन्नमयाचितमसंक्लृप्तमश्नीयान्न कञ्चन याचेत ॥ १ ॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
बाल्येन तिष्ठासेद्बालस्वभावोऽसङ्गो निरवद्यो मौनेन पाण्डित्येन निरवधिकारतयोपलभ्येत कैवल्यमुक्तं निगमनं प्रजापतिरुवाच महत्पदं ज्ञात्वा वृक्षमूले वसेत कुचेलोऽसहाय एकाकी समाधिस्थ आत्मकाम आप्तकामो निष्कामो जीर्णकामो हस्तिनि सिंहे दंशे मशके नकुले सर्पराक्षसगन्धर्वे मृत्यो रूपाणि विदित्वा न बिभेति कुतश्चनेति वृक्षमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेतोत्पलमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेताकाशमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेत सत्येन तिष्ठासेत्सत्योऽयमात्मा ॥ १ ॥
सर्वेषामेव गन्धानां पृथिवी हृदयं सर्वेषामेव रसानामापो हृदयं सर्वेषामेव रूपाणां तेजो हृदयं सर्वेषामेव स्पर्शानां वायुर्हृदयं सर्वेषामेव शब्दानामाकाशं हृदयं सर्वेषामेव गतीनामव्यक्तं हृदयं सर्वेषामेव सत्त्वानां मृत्युर्हृदयं मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
ॐ पृथिवी वान्नमापोऽन्नादा आपो वान्नं ज्योतिरन्नादं ज्योतिर्वान्नं वायुरन्नादो वायुर्वान्नमाकाशोऽन्नाद आकाशो वान्नमिन्द्रियाण्यन्नादानीन्द्रियाणि वान्नं मनोऽन्नादं मनो वान्नं बुद्धिरन्नादा बुद्धिर्वान्नमव्यक्तमन्नादमव्यक्तं वान्नमक्षरमन्नादमक्षरं वान्नं मृत्युरन्नादो मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः ॥
अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानं दहतीति तस्मै स होवाच योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्प्राणं दहत्यपानं व्यानमुदानं समानं वैरम्भं मुख्यमन्तर्यामं प्रभञ्जनं कुमारं श्येनं श्वेतं कृष्णं नागं दहति पृथिव्यापस्तेजोय्वाकाशं दहति जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयं च महतां च लोकं परं च लोकं दहति लोकालोकं दहति धर्माधर्मं दहत्यभास्करममर्यादं निरालोकमतः परं दहति महान्तं दहत्यव्यक्तं दहत्यक्षरं दहति मृत्युं दहति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
सौबालबीजब्रह्मोपनिषन्नाप्रशान्ताय दातव्या नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सररात्रोषिताय नापरिज्ञातकुलशीलाय दातव्या नैव च प्रवक्तव्या । यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मन इत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥
</span></poem>
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
:ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
॥ इति सुबालोपनिषत्समाप्ता ॥
== अधिकाध्ययनाय ==
* http://sanskritdocuments.org
[[वर्गः:उपनिषदः]]
==लिधंसा==
{{reflist|}}
==स्वयादिसँ==
*[[हिन्दू धर्म]]
*[[उपनिषद्]]
{{उपनिषदतेगु धलः}}
{{हिन्दू धर्म}}
[[पुचः:उपनिषद्]]
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शरभ (उपनिषद्)
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'''{{PAGENAME}}''' छगू काव्य ख। थ्व काव्य [[मुक्तिक उपनिषद्|मुक्तिक उपनिषद्]]या अन्तर्गतय् [[उपनिषद्]] दुने ला <ref>http://sanskritdocuments.org/all_sa/upanishad_list_sa.html</ref>। थ्व [[श्रुति]] प्रचलनया छगू महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ ख।
==श्लोक==
थुकिया श्लोक थ्व कथं दु-<ref>[[sa:s:शरभोपनिषत्|विकिस्रोत]]</ref>
{{Upanishad}}
॥ शरभोपनिषत् ॥
<poem>
सर्वं सन्त्यज्य मुनयो यद्भजन्त्यात्मरूपतः ।
तच्छारभं त्रिपाद्ब्रह्म स्वमात्रमवशिष्यते ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्वदेवाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अथ हैनं पैप्पलादो ब्रह्माणमुवाच भो भगवन्
ब्रह्मविष्णुरुद्राणां मध्ये को वा अधिकतरो ध्येयः
स्यात्तत्त्वमेव नो ब्रूहीति ।
तस्मै स होवाच पितामहश्च
हे पैप्पलाद शृणु वाक्यमेतत् ।
बहूनि पुण्यानि कृतानि येन
तेनैव लभ्यः परमेश्वरोऽसौ ।
यस्याङ्गजोऽहं हरिरिन्द्रमुख्या
मोहान्न जानन्ति सुरेन्द्रमुख्याः ॥ १ ॥
प्रभुं वरेण्यं पितरं महेशं
यो ब्रह्माणं विदधाति तस्मै ।
वेदांश्च सर्वान्प्रहिणोति चाग्र्यं
तं वै प्रभुं पितरं देवतानाम् ॥ २ ॥
ममापि विष्णोर्जनकं देवमीड्यं
योऽन्तकाले सर्वलोकान्संजहार ॥ ३ ॥
स एकः श्रेष्ठश्च सर्वशास्ता स एव वरिष्ठश्च ।
यो घोरं वेषमास्थाय [https://vipin110012.tripod.com/pur_index28/sharabh.htm शरभा]{{Dead link|date=May 2026 |bot=InternetArchiveBot |fix-attempted=yes }}ख्यं महेश्वरः ।
नृसिंहं लोकहन्तारं संजघान महाबलः ॥ ४ ॥
हरिं हरन्तं पादाभ्यामनुयान्ति सुरेश्वराः ।
मावधीः पुरुषं विष्णुं विक्रमस्व महानसि ॥ ५ ॥
कृपया भगवान्विष्णुं विददार नखैः खरैः ।
चर्माम्बरो महावीरो वीरभद्रो बभूव ह ॥ ६ ॥
स एको रुद्रो ध्येयः सर्वेषां सर्वसिद्धये ।
यो ब्रह्मणः पञ्चवक्रहन्ता
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ७ ॥
यो विस्फुलिङ्गेन ललाटजेन सर्वं जगद्भस्मसात्संकरोति ।
पुनश्च सृष्ट्वा पुनरप्यरक्षदेवं स्वतन्त्रं प्रकटीकरोति ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ८ ॥
यो वामपादेन जघान कालं घोरं पपेऽथो हालहलं दहन्तम् ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ९ ॥
यो वामपादार्चितविष्णुनेत्रस्तस्मै ददौ चक्रमतीव हृष्टः ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १० ॥
यो दक्षयज्ञे सुरसङ्घान्विजित्य
विष्णुं बबन्धोरगपाशेन वीरः ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ११ ॥
यो लीलयैव त्रिपुरं ददाह
विष्णुं कविं सोमसूर्याग्निनेत्रः ।
सर्वे देवाः पशुतामवापुः
स्वयं तस्मात्पशुपतिर्बभूव ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १२ ॥
यो मत्स्यकूर्मादिवराहसिंहा-
न्विष्णुं क्रमन्तं वामनमादिविष्णुम् ।
विविक्लवं पीड्यमानं सुरेशं
भस्मीचकार मन्मथं यमं च ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १३ ॥
एवं प्रकारेण बहुधा प्रतुष्ट्वा
क्षमापयामासुर्नीलकण्ठं महेश्वरम् ।
तापत्रयसमुद्भूतजन्ममृत्युजरादिभिः ।
नाविधानि दुःखानि जहार परमेश्वरः ॥१४ ॥
एवं मन्त्रैः प्रार्थ्यमान आत्मा वै सर्वदेहिनाम् ।
शङ्करो भगवानाद्यो ररक्ष सकलाः प्रजाः ॥ १५ ॥
यत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वं मृग्यते विष्णुना सह ।
स्तुत्वा स्तुत्यं महेशानमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥
भक्त्या नम्रतनोर्विष्णोः प्रसादमकरोद्विभुः ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचनेति ॥ १७ ॥
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्यजन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुःप्रसादान्महिमानमीशम् ॥ १८ ॥
वसिष्ठवैयासकिवामदेव-
विरिञ्चिमुख्यैर्हृदि भाव्यमानः ।
सनत्सुजातादिसनातनाद्यै-
रीड्यो महेशो भगवानादिदेवः ॥ १९ ॥
सत्यो नित्यः सर्वसाक्षी महेशो
नित्यानन्दो निर्विकल्पो निराख्यः ।
अचिन्त्यशक्तिर्भगवान्गिरीशः
स्वाविद्यया कल्पितमानभूमिः ॥ २० ॥
अतिमोहकरी माया मम विष्णोश्च सुव्रत ।
तस्य पादाम्बुजध्यानाद्दुस्तरा सुतरा भवेत् ॥ २१ ॥
विष्णुर्विश्वजगद्योनिः स्वांशभूतैः स्वकैः सह ।
ममांशसंभवो भूत्वा पालयत्यखिलं जगत् ॥ २२ ॥
विनाशं कालतो याति ततोऽन्यत्सकलं मृषा ।
ॐ तस्मै महाग्रासाय महादेवाय शूलिने ।
महेश्वराय मृडाय तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ २३ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतायनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २४ ॥
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चमिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ २५ ॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २६ ॥
शरा जीवास्तदङ्गेषु भाति नित्यं हरिः स्वयम् ।
ब्रह्मैव शरभः साक्षान्मोक्षदोऽयं महामुने ॥ २७ ॥
मायावशादेव देवा मोहिता ममतादिभिः ।
तस्य माहात्म्यलेशांशं वक्तुं केनाप्य शक्यते ॥ २८ ॥
परात्परतरं ब्रह्म यत्परात्परतो हरिः ।
परात्परतरो हीशस्तस्मात्तुल्योऽधिको न हि ॥ २९ ॥
एक एव शिवो नित्यस्ततोऽन्यत्सकलं मृषा ।
तस्मात्सर्वान्परित्यज्य ध्येयान्विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥ ३० ॥
शिव एव सदा ध्येयः सर्वसंसारमोचकः ।
तस्मै महाग्रासाय महेश्वराय नमः ॥ ३१ ॥
पैप्पलादं महाशास्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् ।
नास्तिकाय कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ३२ ॥
दांभिकाय नृशंसाय शठायानृतभाषिणे ।
सुव्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय सुशीलिने ॥ ३३ ॥
गुरुभक्ताय दान्ताय शान्ताय ऋजुचेतसे ।
शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकर्मोक्तधीमते ॥ ३४ ॥
स्वभक्तायैव दातव्यमकृतघ्नाय सुव्रतम् ।
न दातव्यं सदा गोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम ॥ ३५ ॥
एतत्पैप्पलादं महाशास्त्रं योऽधीते श्रावयेद्द्विजः
स जन्ममरणेभ्यो मुक्तो भवति ।
यो जानीते सोऽमृतत्वं
च गच्छति ।
गर्भवासाद्विमुक्तो भवति ।
सुरापानात्पूतो
भवति ।
स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति ।
ब्रह्महत्यात्पूतो
भवति ।
गुरुतल्पगमनात्पूतो भवति ।
स सर्वान्वेदानधीतो
भवति ।
स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति ।
स समस्तमहापातको-
पपातकात्पूतो भवति ।
तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति ।
स सततं शिवप्रियो भवति ।
स शिवसायुज्यमेति ।
न स
पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते ।
ब्रह्मैव भवति ।
इत्याह
भगवान्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इति शरभोपनिषत्समाप्ता ॥
</poem>
== अधिकाध्ययनाय ==
* http://sanskritdocuments.org
[[वर्गः:उपनिषदः]]
==लिधंसा==
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==स्वयादिसँ==
*[[हिन्दू धर्म]]
*[[उपनिषद्]]
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[[पुचः:उपनिषद्]]
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