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2026-07-19T13:56:25Z
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10600
माँ सरस्वती वंदना – गीत के बोल
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wikitext
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माँ सरस्वती वंदना – गीत के बोल
विद्या की दात्री हे मातु सरस्वती,
मेरे को बुद्धि सुबुद्धि बनाओ।
मेरे को बुद्धि सुबुद्धि बनाओ।
आपके पंथ पे पाव बढ़े नहीं,
ऐसा हमें सदमार्ग दिखाओ।
ऐसा हमें सदमार्ग दिखाओ।
हे अविनाशिनी विश्व विकासिनी,
पुत्र के अंतर आनंद समाओ।
व्याकुल है मन आज बड़ा,
एक बार कृपा कर वीणा बजाओ।
व्याकुल है मन आज बड़ा,
एक बार कृपा कर वीणा बजाओ।
व्यास की लेखनी में तुम छाई,
तो व्यास ने वेद पुराण रचाया।
व्यास ने वेद पुराण रचाया।
सत्य असत्य व धर्म अधर्म का,
अंतर है जग को समझाया।
अंतर है जग को समझाया।
जो भी तेरे दर आया है शारदे,
भेद बिना उसको अपनाया।
देव मुनि नर या फिर दैत्य हो,
ज्ञान का अमृत घोल पिलाया।
देव मुनि नर या फिर दैत्य हो,
ज्ञान का अमृत घोल पिलाया।
तेरी कृपा बिना मंत्र अधूरे हैं,
शब्द में भाव समाएगा कैसे?
शब्द में भाव समाएगा कैसे?
छंदों में ना लय ताल दिखेंगे,
तो श्रोता गुणी को सुहाएंगे कैसे?
श्रोता गुणी को सुहाएंगे कैसे?
वाणी में दिव्य मिठास ना आएगी,
गाके सभी को लुभाएंगे कैसे?
रूठना ना हमसे मां कभी,
हम तेरे बिना रह पाएंगे कैसे?
रूठना ना हमसे मां कभी,
हम तेरे बिना रह पाएंगे कैसे?
हंस के आसन साजी के शारदा,
बैठी के ध्यान लगाय रही हो।
बैठी के ध्यान लगाय रही हो।
श्वेत श्रृंगार में हे अविनाशिनी,
भक्त का चित्त लुभाय रही हो।
भक्त का चित्त लुभाय रही हो।
मूरख को महाज्ञानी बनाई के,
माया अपार दिखाय रही हो।
झूम रहे वन बाग सभी,
वीणा पाणि जो तू मुस्काय रही हो।
झूम रहे वन बाग सभी,
वीणा पाणि जो तू मुस्काय रही हो।
सृष्टि रचाया विधाता ने जो,
उसे देखने को है भूलोक सिधारा।
देखने को है भूलोक सिधारा।
छाई है व्याकुलता मन में,
जब देखा कि विश्व ही मौन है सारा।
देखा कि विश्व ही मौन है सारा।
कोई उपाय ना सूझा है तो,
कर जोड़ के मातु तुम्हें है पुकारा।
शब्द समाया है कण-कण भीतर,
वीणा का तार जो तुमने झंकारा।
शब्द समाया है कण-कण भीतर,
वीणा का तार जो तुमने झंकारा।
जानू नहीं जप योग व साधन,
कैसे रीझाऊँ तुम्हें महारानी?
कैसे रीझाऊँ तुम्हें महारानी?
पुण्य व कर्मों से अनजान मैं,
मंदमती ना हूँ ज्ञानी विज्ञानी।
मंदमती ना हूँ ज्ञानी विज्ञानी।
भाव भरे नहीं शब्द हैं पास में,
विनती सुनाऊँ तो कैसे भवानी?
शीश पे हाथ धरो हे सुरेश्वरी,
तेरे आधीन हैं सारे ही प्राणी।
शीश पे हाथ धरो हे सुरेश्वरी,
तेरे आधीन हैं सारे ही प्राणी।
सातों सुरों की हे देवी सरस्वती,
सेवक आज तेरा गुण गाए।
सेवक आज तेरा गुण गाए।
बीच सभा में पुकारे तुम्हें देखो,
लाज कहीं मैया जाने ना पाए।
लाज कहीं मैया जाने ना पाए।
भूलूं जो शब्द वो ध्यान कराना मां,
ना उपहास कहीं बन जाए।
तेरे भरोसे हूँ माँ वीणा पाणि,
कृपा रखना हर क्षण बनाए।
तेरे भरोसे हूँ माँ वीणा पाणि,
कृपा रखना हर क्षण बनाए।
दिव्य कलाओं की मूल हो शारदा,
हो तुम ही नित बुद्धि प्रकाशिनी।
हो तुम ही नित बुद्धि प्रकाशिनी।
जानती हो सबके मन की गति,
शक्तिस्वरूपा हे अविनाशिनी।
शक्तिस्वरूपा हे अविनाशिनी।
ब्रह्मा व विष्णु के संग सदाशिव,
गाते तेरा यश पाप विनाशिनी।
कंठ बसै रहना माँ सरस्वती,
कोटि प्रणाम है घट-घट वासिनी।
कंठ बसै रहना माँ सरस्वती,
कोटि प्रणाम है घट-घट वासिनी।
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सिद्धान्तसारपद्धतिः
0
165518
417870
2026-07-20T05:56:03Z
Shubha
190
{{header | title = सिद्धान्तसारपद्धतिः | author = | translator = | section = | previous = | next = | year = | notes = }} <poem> स्च्. ३) येन सप्तवारमति दीप्तास्त्राभिमन्त्रितेन सर्वाङ्गान्या लिप्येकाराभ्... नवीन पृष्ठं निर्मीत अस्ती
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{{header
| title = सिद्धान्तसारपद्धतिः
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<poem>
स्च्. ३)
येन सप्तवारमति दीप्तास्त्राभिमन्त्रितेन सर्वाङ्गान्या
लिप्येकाराभ्यां स्यानिधिप्येय प्राणायामपूर्ववत्तु * * * ?
मुक्त्वास्त्र? संनिभं ध्यायेन्यावच्छकिं स्थित्वान्नात्वा?त्तीर्यद्विज
नमभ्यां ब्राह्मीं प्रथममुपास्ये ततोऽस्त्र
सत्व्यामितरास्त्रसत्व्यामेवानुभिषेत् |?
* * *? भागस्यदाय? जलस्य मध्ये प्रविश्य वामहस्ते
विशुद्धमृद्भागत्रयं निधाय दक्षिणभागं शिवस्याद्यैः?
पूर्वमन्त्रेणोत्तरं स्वल ग * * * * * * * स्त? जप्तमृद्भाग
क्षेपाद्दिक्षु जलस्थित विघ्नान्युच्चाट्य मूलमन्त्रभि मन्त्रितेन
स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थं संकल्प्याङ्ग ग* * * * * ? भागेन
च शिरसः समारभ्य सर्वाङ्गमालभ्य निरुद्वाक्षः शिवमनुस्मरन्
स्नात्वा पश्चात्सुगत्वामलकादिना राजोप? * * * ? वामहस्ततल
जलमादाय मूलमन्त्रेणाभिमन्त्र्य सोमसूर्यौ शक्ति शिवौ च
वामदक्षिण हस्तयोः सञ्चिन्त्य मूलमन्त्रेण कुम्भमुद्रया * * *
* ?मभिच्य शुद्धेवाससी परिधाय प्रणवमुच्चरन् बुद्बुदरहितेना
फेनेनाम्भसाऽङ्गुष्ठ मूल ब्राह्म? प्रजापत्यतीर्थेन त्रिधा
चम्यौष्ठाङ्गुष्ठमूलेन द्विःपरि मृज्यानामिकाङ्गुष्ठाभ्यां
मुखनासालोचन कर्णविवराणि संस्पृश्य दक्षिणवाम
क्रमादंश द्वयं नाभिशिरस्संस्पृश्यः दर्भपवित्रक पाणिः |
सत्व्यामुपासीत् | तत्र कृत सकलीकरणः प्राणायामं मन्त्र संहित
पासं पाद्य वामपाणै जलं संस्थाप्यं
दक्षिणहस्तेन षडङ्गेनाभि मन्त्र्य मूलमन्त्रेण
कुम्भमुद्रयाऽत्मानमभिच्य पुनर्वामपाणौ तोयं गृहीत्वा गल
जलविन्दुना दक्षिणपाणिना प्रत्येक हृदयादि मन्त्रैः शिरसि
संयोजनेन मार्जन विधाय | शेषमुदकन्दक्षिणहस्तेन
गृहीत्वानामाग्रे पूरकेह्यत्यं कृष्णरूप पापमोक्ष? ओं नमः
शिवाय * * *? साद्यनिवर्तते विकल्पाः सुखदुःखयोः |
तस्यै विवर्त शून्याय नमश्चिन्मात्रमूर्तय * * * * * * *गुरु * * क्षा
विधि? तथा |
पवित्रारोहणश्चैव प्रतिष्ठाञ्च प्रवक्ष्महे |
सैषा क्रमेण नित्यादिकर्मस्मरणपद्धतिः |
भवाब्दि मूर्तितीर्पूणां नृणां * * ? वं निर्मिता |
अथ नित्यकर्मविधिस्तत्र प्रातरुत्थाय कृतावश्यक एकयामृदालिङ्गं
वामहस्तञ्च प्रक्षाल्यं तिसृभिर्गुदं * * *? स्तमुभौ च सप्तभिः
प्रक्षाल्य गन्धलेपापने | देवभाव शुद्ध्या वाशौ विधाय
सकृत्मृदा पादौ हस्तौ च प्रक्षाल्या च * * * *? काष्ठेन
द्वादशाङ्गलेन कनिष्ठाङ्गुली परीणाहेन दन्तशुद्धिं विधाय
स्नायात् |
नदी सङ्गमाद्यन्यत मंत्रात्वा कृतावश्यकः पा * * * * * * * *
चारिण्य |?
प्रक्षाल्य शिवमनुस्येन् शुचि भूप्रदेशमस्त्रेण संशोध्यते नैव
खात्वा हृदयेन मृदं समाहृत्यास्त्रे * * * * * * * * * * * * * * * * * * *?
भजेत् |
तत्र पूर्वमस्त्रेण दक्षिण ब्रह्मभिरुत्तरं शिवे नाभिमन्त्र्यस्त्र
जप्तं वश * * * ? च मुद्रया जलस्य मध्ये प्रक्षिप्याग्नेयया
धारणया तोयं शोषयित्वाऽमृतं धारणया पुनरा पूरा
शिवजप्त मृद्भागेना हु * * * * * * *? मावन्त्यं शिवतीर्थमेतदिति
कल्पयेत् |
ब्रह्मजप्तेन भागेन सर्वाङ्गान्यालभ्यमृत्मिश्रेण वारिणाहस्तौ
पादौ च प्रक्षाल्य शिवतीर्थे मध्ये स्नात्वा पुनश्च हव?
न्त्युपचारेण सुगन्धामेलकादिना च | ब्रह्माङ्गास्त्रे शिवं
शिवगायत्रीभिः फल समुद्रया स्वशिरस्यभिषेकं * * * * *?
सत्पासुपास्या मन्त्रां ह्रस्व प्रसादेनोपसंहृत्य समाकृष्ये
प्रवन्नाडीमागैण स्वहृदि विन्यस्य याग * * *?यात् |
गृहेपि * ष्ट?सु नवसु वा शिवतीर्थं प्रकल्प तथैव स्नायात् |
यद्वाऽष्टाङ्गुलां मृदं खात्वा भ्रांत्य * * * * * * * * * * * * *
*द्य?
स्च्. ४)
कृत्वा दक्षिणास्यन्दर्भा? नास्तीर्यतिलमिश्रेण वारिणा | ओं
सोमपितृमान्यमो अङ्गिरस्रीनग्निक व्यवाहनादयाय* * * * * *?यामि |
ओं पितृपत्नी गणान् स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं पितृगणान् स्वधानमस्तर्पयामि | ततो नामगोत्राभ्यां |
ओं स्व पितृन्स्वधेन मत्यु *? ओं स्वपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं स्व प्रपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि |
मातॄः स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं पितामहीस्वधानमस्तर्पयामि |
ओं प्रपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं माता महान् स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं मातुः पिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं मातुः * * ?तामन्तान् स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं माता महीः स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं मातुः पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं मातुः प्रपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि |
एवं जातीनाचार्या न पिंसंतर्प पवित्रकं त्यक्त्वा समाचम्य
पुनरन्य पवित्रकं गृहीत्वा | ओं ह्रां ह्रीं स इति सूर्यमन्त्र * *?
कृतदेहशुद्धिः कृत सकलीकरण अर्घपात्रं कृत्वा पुष्पादिकं
सम्प्रोक्ष्य रक्तचन्दनादिना सूर्यायमूलमन्त्रेणार्घन्दत्वा
सूर्यं पूजयेत् | तत्र गणपति गुरुपूजानन्तरं |
ओं अं प्रभूताय नमः | इति पीठमध्ये |
ओं अं विमलाय नमः | इत्याग्नेययां |
ओं अं साराय नम इति नैर्-ऋत्यां |
ओं अं आराध्याय नम इति वायव्यां |
ओं अं परमसुखाय नम इति ऐशान्यां
ओं अं पद्माय नम इति पुनर्मध्ये |
ओं गं दीप्तायै नमः पूर्वदले |
ओं रीं सूक्ष्मायै नमः अग्नौ |
ओं रुं जयायै नमः दक्षिण |
ओं रुं भद्रायै नमः नैर्-ऋते |
ओं रं विमलायै नमः वारणे |
ओं रैं विभूत्यै नमः वायव्ये |
ओं रां अमोघायै नमः सौम्ये |
ओं रौं विद्युदायै नमः इशाने |
ओं रं सर्वतो मुख्यै नमः कर्णिकायां सम्पूज्य विस्फुरां
मुद्रां प्रदर्श्यं रक्तवर्णवर्तुल तेजो विस्वमध्यस्थं
रक्तवाससं श्वेतपद्मोपरिस्थितं सर्वाभरणभूषितमेक वक्त्रं
द्विभुजं श्वेतपङ्कजपाणि सर्वलक्षण सम्पन्नं द्वालि?
रेचकेन सास्त्रैण तस्य भूक्षेपादघमर्ष कृत्वा समाचम्य
कुसुमाक्षतादि सन्मिश्रं शिव सूर्याय ओं हौ शिवसूर्य पि * * * * * *?
दत्वा यथा शक्ति जपमनेनैव कुर्यात् | !!!!४२ल्बेवं प्रातः
सत्व्यावत्मध्यं दिने सायञ्च सत्व्यामुपासीत् |
तत्र मध्यन्दिने पूर्ववतात्व्यामुपान्य मन्त्रादीन्तर्पयेत् ||
तत्र कृतोत्तरा सङ्गाऽङ्गुल्यग्रेण मूलमन्त्र प्रभृतीन्मन्त्रान् |
ब्रह्मविष्णुरुद्र इश्वर सदाशिवादीन्देवान् स्वाहान्तेन हृदा |
ओं वाग्वादिनि स्वाहेति सरस्वतीं | ओं इन्द्राण्यै नमः | ओं आग्नेययै
नमः | ओं याम्यायै नमः | ओं नर्-ऋत्यै नमः | ओं वारुण्यै नमः
| ओं वायव्यायै नमः | ओं सौम्यायै नमः | ओं ऐशान्यै नमः | ओं
अनन्तायै नमः | ओं नाक पृष्ठायै नमः | इति दिशः | ओं इन्द्राय
नमः | ओं अग्नये नमः | ओं यमाय नमः | ओं * * * ? नमः | ओं
वरुणाय नमः | ओं वायवे नमः | ओं सोमाय नमः | ओं ब्रह्मणे
नमः | ओं अनन्ताय नमः | इति दिवेती?
* * * * ** ? सन्धिभिः ओं अत्रि तर्पयामि नमः | ओं विश्वामित्रं
तर्पयामि नमः | ओं पुलभ्ये तर्पयामि नमः | ओं क्रतुन्तर्पयामि
नमः |? वशिष्ठन्तर्पयामि नमः | ओं मरीचिन्तर्पयामि नमः | ओं
प्रचेत संतर्पयामि नमः | इति ऋषी न | ओं सनकं तर्पयामि नमः
| ओं स नन्दनं तर्पयामि? नमः | ओं सनातनं तर्पयामि नमः | ओं
सनत्कुमारं तर्पयामि नमः | ओं रितुन्तर्पयामि नमः | इति
मनुष्यान् | ओं शिवाय नमः | ओं रुद्राय नमः | ओं उमापतये नमः
| ओं ब्रह्मणे नमः | ओं विष्णवे नमः | ओं अग्नये नमः | ओं वायवे
नमः | ओं धर्माय नमः | ओं सूर्याय नमः | ओं चन्द्रमसे नमः |
इति सिद्धान ||
ओं आदित्याय नमः | ओं सोमाय नमः | ओं अङ्गाराय नमः | ओं
वुधाय नमः | ओं वृहदातये? नमः ? | ओं चक्राय नमः | ओं
शनैश्चराय नमः | ओं राहवे नमः | ओं केतवे नमः | इति ग्रहान् | ओं
सर्वभूतेभ्यो वषट नमः | * * * * *?
स्च्. ५)
!!!वगुण्ठनाभ्यां गृह्नंयवक्ष्य? शिविकरणं कुर्यात् | तत्र
पादाङ्गुष्ठाभ्यामारभ्यात्मनि सूशिरं ध्यात्वा सुशिरस्य * * * *
* * * * * * ? सुशिरस्य मध्ये हूंकारं ज्वलन्तं सञ्चिन्त्य
प्राणमायम्ये हूंकार चिन्तं निवेश्य रेचकान्ते नैव हतन्तेन
हृङ्गलतावभ्रः? मध्य ब्रह्मचन्द्रेषु * * * * * *? प्रति निवर्त्य
पूरकेश चैतन्यमातृत्य सान्तवीजमयं जीवं हृदय संपुटितं
हूंकारं मूर्धनि विन्यस्य जीवविग्रहं पुरुषं हूंकारं
शिखान्त * * ?त्वा सूक्षं विन्दुभृतमेकाकिनं निचामयं
कुभकं कृत्वा ऊर्द्धं वायुं प्रवर्तयेदित्य घातेन एकैके नैव
शिवे संयोजदिति | ईजवृत्या शिवे ली *? नः प्राति लोम्येन स्वेषु स्वेषु
कारणेषु विन्दुपर्यन्तां | नितत्वानिलयं नीत्वा विशोधयेत् | ततो
भृतानि परस्परमीशानाद्यधिष्ठिता काशा भूतै * *? निलादीनि
विशोधयेत् | तत्र पार्थिव मण्डलं चतुरस्रं पीतं कठिनं
वज्रलाञ्छितं ह्लामिति पार्थिव वीजेन निवृत्ति कलारुपं पादादार प
* *? सुश्चिन्त्ययञ्च भिरुघातैर्वायुरूपं विशोध्यं आप्य
मण्डलमर्द्धचन्द्रं द्रवम्सौम्यं सुशुक्लं पद्मलाञ्कितं
ह्वीमित्याया वीजेन प्रतिष्ठकलारूपमुद्यतश्चतुभिर्वह्नि भृतं
पूर्ववद्विशोध्य आग्नेय मण्डलं त्र्यश्रं
स्वस्तिकलाञ्कितमारक्तं ह्रूमिति वह्निवीजेन विद्याकलारूपं
त्रिभिरुघातैर्जल भूतं पापं पूर्ववद्विशोध्यं | वायव्य
मण्डलं वृत्तं षड्विन्दुलाञ्कितं क्षष्तुं? ह्यैमिवायुवीजेन
शान्तिकलारूपमुघात द्वयेन पृथ्वीभूतं पूर्ववद्विशोध्य |
व्योमाकारं ढतन्तेन हूंकारेण शान्त्यतीत रूपमुघाते
नैकेन पूर्ववत्संशोध्य | ततोऽमृत वर्षिणामूलमन्त्रेण
सर्वमाप्याययेत् |इति भृतशुद्धिं निवर्त्य हृद्यासनं दत्वा
तद्व्यापिनी समन्तान्तच्छक्तिं विन्यस्य द्वादशान्ता द्विजरूपं
शिवमयमात्मानं पूरकेन समानीय ज्योतीरूपं कर्णिकाः यां
संस्थाप्यामृतेना प्लाव्य करशुद्धिं कुर्यात् | तत्र चन्दन
लोप्तौन्तस्तौ परस्पर | वर्षणेन तलक पृष्ठे व्यस्त्रेण सुशाध्य वा *
* * * * * * * * * न्त्य? पुष्पैरञ्जलिमा पून्न्य | उं हं खं
खसोल्काय ह्रां ह्रां सः | सूर्याय नम इत्यावाहन मुद्रया
समावाह्यस्थाप न्यासस्थाप्य * * * * * न्यास * * * * ? या निरोध्यार्घ
पाद्या चमनीयानि खसोल्किना दत्वा साङ्गेन मूलमन्त्रेण साङ्गं
सून्यं गन्धपुष्पादिभिः सम्पूज्य पद्ममुद्रां विम्वमुद्राञ्च
प्रदश्याग्नेयं ||
उं अं हृदयाय नमः |
ऐशान्यां उं अर्काद्य शिरसे स्वाहा | नैर्हत्यां उं भृर्भुवः
स्वरे ज्वालिनी शिखायै वौषट् | वायव्यां उं हूं कवचाय हूं
| ओं भां नेत्राय वषट्मध्ये | पूर्वादिचतुर्षुदि गूलेषु उं रः
अस्त्राय हतित्यङ्गानि संपूज्य हृदयादीनां धुएनुं | नेत्रस्यगो
वृषां | त्रासनी मन्त्रस्य भ प्रदश्यी ओं सं | सोमाय नमः
पूर्वदलाग्रे | ओं वुं वुधाय नमः दक्षिणे | ओं वृं वृं
वृहस्यतये नमः पश्चिमे | ओं भां भार्गवाय नमः उत्तरे | ओं अं
अङ्गाराय नमः आग्नेय | ओं शं शंन शुराय नमः | दत्यां | ओं
रां राहवे नमः वायव्ये | ओं कं कतव नमः इशान्यं | इति
ग्रहान् सम्पूज्य नम स्थार मुद्रया प्ररोच्य गन्धपुष्पदीपधुप
नैवेद्यादि खषोल्किना दत्वा पद्ममुद्रां विम्वमुद्रां च
प्रदर्श्य क्षमस्वेत्युच्चार्य मन्त्रसमूहमुपसंहृत्य
संहारमुद्रया द्वादशा तु स्थित सूर्याय हृत्स्थिता यवानि योजयेत् |
इत्यनेन विधिना विसर्ज्यनिर्माल्यमर्घपात्रोदकञ्च ऐशान्यां
तेजश्चण्डाय नमः | इति सूर्य पूजाविधिः || ० ||
अथा चम्य कृतसकली करणोऽसुकृत सामान्यार्घपात्रहस्तः |
द्वारि अस्त्रेण सम्प्रोक्ष्य ऊदशि उर्द्धादुम्बरे गणपति सरस्वत्यौ
स्वनाम्ना स्वर्य? नदिगङ्गे महाकालयमुने | आत्मना
दक्षिणवामयोः स्वनामा हृदाद्येन संपूज्य विघ्ननिर्द्वारणाय
ज्वलन्नाराचास्त्र प्रयोगेन यागगृहस्यान्तः पुष्पं प्रक्षिप्य
पार्ष्णिपायातत्र यं दत्वा किञ्चिदुत्तर शाखाश्रितो
देहलीमस्पृशन्दक्षिणपादनान्तः प्रविक्ष्य देहत्या | वय
निवारणाय पुष्पम * *?ण प्रक्षिप्ये ब्रह्मस्थाने ओं वास्तोष्येतपे
ब्रह्मणेनम इति पुष्पन्दत्वा ओं अनन्तासनाय नम इत्यासने * * * * *
शास्त्र * * * *?
स्च्. ६)
क्त | ओं प्रचोदया * * * * निवृत्तिं पश्चिमवक्त्रे | इति
तत्पुरुषकलाश्चतस्रः | ओं अघोरेभ्यो नम इति * * * * * * * * ?मोहां
ग्रीवायाः | ओं घोर नम इति क्षयां दक्षिणांशे | ओं घोरतरश्च
नम इति निष्ठां वामांशे | ओं सर्वतस्सर्व नम इति व्यापिना भा * *
* * ?भ्यो नम इति मृत्युञ्जठरे | ओं नमस्ते रुद्र नम इति क्षुधां
पृष्ठे | ओं रूपाभ्यो नम इति तृषामुरसि | अघोरस्य कलाष्ठकः || ओं
वाम दे * * * ?यं नमः रजोगुदे | ओं ज्येष्ठायै नम इति रक्षां
विङ्गे? | ओं रुद्राय नम इति रतिं दक्षिणोरुके | ओं कालाय नम इति
पाल्यां वामारुके | ओं कलाय नम इति | ओं विकरण्यै नम इति काम्यां
दक्षिण जानुनि | ओं वलविरण्यै नम इति संयमनी वामजानुनि | ओं वल
नम इति क्रियान्द * ण स्फिजि? | ओं प्रमथन्यै नम इति वृद्धिं
वामस्फिजि | ओं सर्वभृत समनाय नम इति भ्रामणीं कट्यां | ओं
मन नम इति त्रिमोहनीं दक्षिणापार्श्वे | ओं उन्मनाय नम इति
ज्वरां वामपार्श्वे | इति वामदेवकलास्त्रयोदश ||
ओं सद्योजातं प्रपद्यामि नम इति सिद्धिं दक्षिणपादे |
ओं सद्योजाताय वै नम इति दद्विंवामपाद |
ओं भवे नम इति द्युतिं दक्षिणपाणौ |
ओं अभव नम इति लक्ष्मीं वामपाणौ |
ओं अनादिभवे नम इति मेधानासायां |
ओं भजस्वमा नम इति कार्तिं शिरसि |
ओं भव नम इति स्वधां दक्षिण वाहो |
ओं उद्भव नम इति निधृतिम्वाम वाहौ |
इति सद्योजात कल्पेषु कमे तत् || स्वस्वमुद्राभिरीशानादिषु
अष्टत्रिंशत्कलान्यासं विधाय विंद्यादेहं
सम्पाद्यमूलमन्त्रमावाह्य हृदयं हृदिशिरः शिरसि
शिखाशिखायां कवचं सर्वगात्रेषु हस्ते अस्त्रं दत्वा
परमीकरणं कृत्वा महामुद्रया प्ररोच्यतालत्रय
च्छोटिकानिरीक्षण तर्ज्जनीभिरस्त्रेण तद्देशवर्त्ति विघ्नो जाटन
दिग्विरेचना वगु ञ्चमैः स्थान शुद्धिं विधाय
वाह्ययागवद्धृदय पूजानाभौ होमेन भ्रूमध्ये ध्याननान्त
यागं कृत्वा विशेषार्घ पात्रमस्त्रेण दग्वा प्रक्षा मृती कृत्य तत्र
विद्यादेहं शक्त्यन्त मम लद्युतिं विन्यस्य शिवं मूलेना
वाह्याङ्गुष्ठयादीशानं तर्ज्जन्यास्तत्पुरुषं मध्यमया *
घोरमनामि कथा वाम? कनिष्ठकयोः सद्योजातं ततः
कनिष्ठकयोर्हृदयमनामिकयोः शिरोमध्यमयोः शिखां
तर्जन्याः कवचमङ्गुष्ठयोरन्त्र विन्यस्य परेण रजसा स *? योज्य
कवचनावगुण्ठ्य सर्वकर्मसु नियोजयेत् | सर्वत्राप्या चमनादा
वनेनैवधिना करशुद्धिं विधाय क्षरकन्धपिकां
लिङ्गमुद्रास्वां वध्वा इशानः सर्वविद्यानामीश्वरः
सर्वभूतानां ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवामस्तु सदाशिव इति
इशानं मुष्टिम्बध्वाऽङ्गुष्ठाग्रेण भद्रमुद्रया मूर्ध्नि |
ओं तत्पुरुषाय विद्महे महादव्ययधीमहेतम्ना रुद्र प्रचोदयादिति
तथैव जर्जन्यङ्गुष्ठ योगात्तत्पुरुषं मुखे |
ओं अघोरेभ्यो थघोराभ्यो घोरघोरतरेभ्यः श सर्वतः
शर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्र रूपेभ्यो इति मध्यमाङ्गुष्ठ योगेन
हृद्यघोरं |
ओं वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः | *
* विकरणाय नमो वलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नामौ
मनोन्मनाय नमः | इत्यङ्गुष्ठानामिका योगेन नामदेवं गुह्ये
|
ओं सद्योजाप *? प्रपद्यामि सयोजाताय वै नमः |
भवे भवेनादि भवे भजस्वमोहवोद्भव इति कनिष्ठाङ्गुष्ठ
योगेन पादादारभ्य मस्तकात्तं यावत् सर्वशरीरः व्यापकत्वेन
मूर्तिभूतं सद्योजातमिति ब्रह्मङ्ग्या विन्यस्य ऊर्द्ध
पूर्वदक्षिणान्तर पश्चिमवक्त्रेषु वक्त्रभङ्ग्या च ततः
कल्पभङ्ग्या ओं इशान सर्वविद्यानां नमः इति शशिनी मूर्ध्नि |
ओं इश्वर सर्वभूतानां नम इत्यद्गदा पूर्व मूर्ध्नि |
ओं ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा नम इति इष्टां दक्षिण मूर्ध्नि
शिवामस्तु नम इति मरीचिमुत्तर मूर्ध्नि |
ओं सदाशिव नम इति ज्वालिनी पश्चिम मूर्ध्नि |
एवमीशान कला पञ्चक * * * * *? तु अव्यक्त कला |
ओं तत्पुरुषाय विद्महे नम इति शान्तिं पूर्ववत्रं |
ओं सप्ता देवायधीमहे नम इति विद्यां दक्षिणवक्त्र * * * * * * * *?
स्च्. ७)
पूर्वादीश पर्यदिग्दलके नरेषु सम्पूज्य |
ओं हां मनोत्मनन्यै नमः कर्णिकायाम् |
ओं हां सूर्यमण्डलाय नमः |
ओं हां सूर्यमण्डला * * * * * * * ? नम इति दलाग्रेषु |
ओं हां सोममण्डलाय नमः |
ओं हां सोममण्डलाधिपतये विष्णुवे नम इति केशराग्रेषु |
ओं हां अग्निमण्डलाय नमः इति अग्निमण्डलाधिपतये रुद्राय नम
इति कर्णिकायां | पृथिव्यादि शुद्धविद्या तत्वव्याप्तमासनं
सञ्चिन्त्य |
ओं हां शिवात्मनाय नम इति शिव सि * * ? पूजयत् | ततः
पुष्पैरञ्जलिमाधूर्य ओं हां हं हां शिवमूर्तये नमः | इति
मूर्तिं विन्यस्य तत्र ब्रह्मवक्त्र कल्पन्यासं यथा वद्विधाय
पुनः पुष्पैरञ्जलि * * * * * ? पद्मासनं
तन्दा?ं षोडशवर्षदेशीयं पञ्चवक्त्रमध्य प्रसाद
शक्तिशूलखट्वाङ्ग युक्तदक्षिणपाणिं |
भुजङ्गाक्षसूत्र डमरुक स्री लोत्पल बीजपुर सहित वामहस्तमेव
दशभुजं सुप्रसन्नं स्मितास्यं
* *? जटाजूटामित्था ज्ञानक्रियाशक्तित्रय नेत्रं
ज्ञानचन्द्रकलार्चितं सञ्चिन्त्यं ओं हां हौं हां विद्या देहाय
नम इति विद्यादेहं विन्यसेत् |
पुनः पुष्पैरञ्ज विमापूरा हृत्मन्त्र पूर्य सद्योजात पूर्वम्वा
मूलमन्त्रमूच्चार्य प्रस्फुरद्रस्मि मण्डं द्वादशान्तं नीत्वा
तन्मयी भृत विन्दुस्थानेऽभरुदितं ध्यात्वा तस्यादादाय स्थिर
वुद्धिरावाहन मुद्रया समावाह्य प्राण पथाङ्लिङ्गः मूर्तौ
स्थापन्यासंस्थाप्य वहुरूपेण संनिधानया
संनिधाप्यनिष्ठरया संनिरोध्य वस्वधास्वाहा? वौषडन्तेन
हृदा वा कवचेनाव गुण्व्य? देवाभिमुखं पादयोरर्घं
पाद्यञ्च मुखेत्वा चमनीयं हृदयेन तत्पुरुषेण वा शिवाय दत्वा
स्वागतञ्च कृत्वा निर्मंसनोद्वर्तन स्नानानि विधाय स्नपनार्थं
गडुकाना हृत्यनिचिन्दा?भ्युक्ष्य सन्ताड्य संप्रोक्ष चास्त्रेण
स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थ सङ्कल्प्य मन्त्रसंहितया पवित्रैर्वा
जलमावर्त्यास्त्रेण गडुकान्ताय वस्त्रञ्च प्रक्षाल्यगालिताम्भसा
गायत्र्या हृदयेनवाऽस्त्र वर्द्धनी सहिताना प * * * ल्प? विन्दु
ध्यानादमृत रूपे शाम्भसा पुष्पदूर्वा कुशाक्षतो पतेन
मन्त्रसहित या प्रपूर्य संपूज्य च धेनुमुद्रया पुराच्य
कर्मणावगुण्ठ्य तन्त्रा? परात्मान मूर्द्धन्यभिषिच्य स
कुकुशैश्च पुष्पादिवस्तुजामं शुद्ध्यर्थमस्त्रेण संप्रोक्ष्य
कवचेनाभ्युक्ष्य हृदयेन पिण्डमन्त्रैर्वाभि मन्त्रयत्
यद्वान्विलेपनं हृदयेन वस्त्रं शिरसा | आभरण व्रातं शिखया |
नैवेद्यं कवचेन | पुष्याणि मूलेन | क्षीरदध्यादिकं कवचेन |
घृतं शिखया | क्षौद्रं शिरसा | खण्ड हृदयेन |
गन्धोदकञ्चाभि मन्त्र्य चन्दनेन तिलकं कृत्वा स्वशिरसि
मूलमन्त्रेण पुष्पमारोपयेत् | ततो यथाभिमतमौनं कृत्वा
प्लूताता मन्त्रोच्चारणैर्न मन्त्रशुद्धिं विधाय पूर्वरचितां
पूजां गायत्र्या समभ्यर्चात्मामान्यार्पणार्घं दत्वा
सद्योजातादि ब्रह्मपञ्चकमावर्त्य पूजां लिङ्गादपनीय
हृत्मन्त्रेण इशान्यां पीठ कस्थ? चण्डेशाय निक्षिपेत् | ततः
पिण्डिकामस्त्रतोयेन प्रक्षाल्य लिङ्गं प्रक्षाल्यदिति लिङ्गशुद्धिं
विदध्यात् | सर्वत्राप्यात्माश्रयं मन्त्रलिङ्गाङ्ग पञ्चक शु * * * *?
शिव पूजयेत् | तत्र पीठ सात्म्य?व्यायां ओं गौंगणाधिपतये
नमः | ऐशान्यां ओं हां गुरुभ्यो नमः इति सामान्यार्घ
गन्धपुष्पधुपन्दत्वा | सा दे * हं? आकर शक्तये नमः | ओं हां
अनन्ताय नमः | मध्ये | ओं हां धर्माय नम आग्नेयां | ओं हां
ज्वालाय नमः नैर्हत्यां | ओं हां वैराग्याय नमः वायव्यायाः |
ओं हां ऐश्वर्याय नम ऐशान्यां | ओं हां अधर्माय नमः
पूर्वस्यां | ओं हां अज्ञानाय नमः दक्षिणस्यां | ओं हां
अवैराग्याय नमः पश्चिमस्यां ओं हां स ऐश्वर्याय नं
उत्तरस्यां संपूज्य ज्ञान संनिधौ ओं हां अधश्छदनाय
नमः | ऐश्वर्यसन्निधौ ओं हां ऊर्द्ध्वन्धदनाय नमः | मध्ये
तु ओं हां पद्माय नमः | * ? वल विकरण्यै नमः | ओं हां वल
प्रमथन्यै नमः | ओं हां सर्वभूतदमन्यै नमः | इति शक्तय * *
* * * ?
स्च्. ८)
अष्टो * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * तत्पात् | ततः कुसासीपे समु
* * * * * * * * * * * ? रीक्षण शिवमन्त्र * प्रोक्ता | मस्त्रेणाभ्युक्षण
कवचेन ताडनमस्त्रेणोल्लेखनावकीरण पूरण समीकरणन्मे च न
विकुटुनं अमार्जन्यपल? कुण्ड परिकल्पना प्लाययत् |
मुदगायत्रम्चारेखात्रयं तिर्यग्रेखया सहरेखा चतुष्टय व?
जीकरण चतुष्टयश्रमेकैकं दत्वा अर्घादविभुं द्विस्थातैर्देवं
सूपयेत् | ततो दुग्वदधिघृतमधु शक्कराटिभिर्जुल पूयात् रितः सत्व
* * * * * * * * *?ग्य विरूक्ष्य पुनर्यथा शक्ति केवलजलेन केवल जलेन
गन्धादकेन च मूलेन संस्नाप्य शुद्धवाससानिर्मृज्य
पाद्यमादौ दत्वा सिरसि शिववार्थ दद्यात् ततः पुनरासन? द्वारस्व
वस्त्रविलेपन | भरणाद्यलङ्कार शुद्धसुरभि नानापुष्पैः | ओं
ह्लौं? शिवाय नम इति देवमभ्यर्च्य यथान्यासं ब्रह्माणि च
सम्पूज्य | ओं हां हृदयाय नमः | ओं ह्रीं शिरसे नमः | ओं हूं
शिखायै नमः | ओं हैं कवचाय नमः | ओं हौं नेत्राय नमः | ओं
हः अस्त्राय फडितिलयाङ्गेषु सम्पूज्य | मध्ये इशानं |
पूर्वदक्षिणोत्तर पश्चिमेषु तत्पुरुषादीं सम्पूज्याग्नेयैशान
नैरृत वायव्येषु हृच्छिरः शिखाकवचानि सम्पूज्य पूर्वदक्षिण
पश्चिमोत्तरष्ठन्तं पूजयित्वा गन्धपुष्पादीन्न्दत्वा
धूपभाजनमस्त्रेण संप्रोक्ष्य हृदयेनाभ्यर्च्य धेनुमुद्रया
प्ररोच्यघना?मस्त्रेण संपूज्यतावयेत् | मूलेन
धूपदीपनैवंद्यभास्वलादिकं दत्वा दूर्वाक्षत यज्ञोपवीतानि
देवम्यशिरसि समारोध्या रात्रिकमुत्तार्य यथा शक्ति पं कुर्यात् |
* *?च त्रिविधोया न योधां? शुभाप्य भे * * *?र्भवात् | तत्र
मानसोमना मात्रवृत्ति निर्वर्त्यः स्वसंवेद्यः उपांशुः पुनः
परैरश्रूयमाण्येऽन्तस्तञ्जल्परूपः | यस्तु परैः श्रूयते
सभाष्यः | अयञ्च यथा क्रमणोत्तम मध्यमाधम सिद्धिषु
शान्तिषुभिचारादि रूपासुनियोज्यामानसस्यं | विर्यन्न
साध्यत्वाद्मष्यस्याधम्? सिद्धिफलत्वात् उपांशुः साधारण
फलन्तान्?प्रयोज्यस्त्रिविधो पिनद्रूतोर्न विलम्वितोनास्यष्टाक्षरोनान्य
मनसाकर्तव्या नित्यनैमित्तकेषु प्राङ्मुखे वा * ङ्मुखेन वाचक
वित्तनकाराः | काम्येषु कामानुसारेणाभिचारादावन्य मुखेनापि
विधेयस्तत्रान्यतमं यथा शक्ति जपकुर्यात् | ततो हृत्मन्त्र संपूजि *
* तं? कवचावगुण्ठितमन्तरक्षितं
कुशपुष्पचन्दनाक्षतोन्मिश्रगन्धोदक बु * कत्र सू * * * ?
पूर्वादीशपर्यदिग्दलकेशरेषु सम्पूज्या | ओं हां मनोत्मनन्यै
नमः कर्णिकायां | ओं हां सूर्यमण्डलाय नमः | ओं हां
सूर्यमण्डलाधिपतये बहु * * ? नम इति दलाग्रेषु | ओं हां
सोममण्डलाय नमः | ओं हां सोममण्डलाधिपतये विष्णवे नम
इति केशराग्रेषु | ओं हां अग्निमण्डलाय नमः | ओं हां
अग्निमण्डलाधिपतये रुद्राय नम इति कर्णिकायां | पृथिव्यादि
शुद्ध विद्यातत्व व्याप्तमासनं सञ्चिन्त्य | ओं हां शिवासनाय
नमः इति शिवासन पूजयेत् | ततः पुष्पैरञ्जलिमापूर्य ओं हां हं
हां शिवमूर्तये नमः | इति मूर्ति विन्यस्य तत्र ब्रह्मवक्त्र
कल्पन्यासं यथावद्विधाय पुनः पुष्पैरञ्जलि * * * ब्रह्म?
पद्मासनं मितच्छायं षोडशवर्षदेशीयं पञ्चवक्त्रमभ्य
प्रसादशक्तिशूलखट्वाङ्ग युक्तदक्षिणपाणिं | भुजङ्गाक्ष
सूत्रडमरुकनी * * ल? बीजपुरसहित वाहहस्तमेव दशभुजं
सुप्रसन्नं स्मितास्यं
नस्त्रमन्त्रेण कृत्वाकुण्डम * * सोमं सिवा प्रागुदगग्रैदभै |
परित आस्तिर्याष्टाङ्गुल परिणाह
वाहुमात्रात्परिधीन्त्रिंशद्दर्भदल निर्मिता * * * * ? वलितान्वा
विष्टराश्च पूज्यदारभ्य चतुर्द्दिक्षु प्रदक्षिणमस्त्रेण विन्यस्य ओं
कलाकुण्डाय नम इति कुण्डसंपूजयेत् | तत हतु मतीवागीश्वरीं *
*?गीश्वरं सकामञ्च ध्यात्वा समावाह्य ध्रूवेन
सम्पूज्यास्त्रेणाक्षपाटं दत्वा आरण्यतोरेणेः सूर्यकान्ताद्द्विज
गृहाद्वैश्या गृहात्सुगृहाद्वह्निमानीय क्रव्यादाशं
परित्यज्यार्घपात्रपाणी येन प्रोक्ष्यकवचेनावगुण्ठ्य ओं रौं
अग्निचैतन्याय नम इति वह्निबीजं विन्यस्य
वह्निं षडङ्गेनाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेण * * *त्तेन?
धेनुमुद्रयाऽमृती कृत्य संपूज्यं कुण्डस्या परिप्रदक्षिणं
त्रिःपरिभ्राम्यजानुभ्यामवनीङ्गतः | आत्मनः संमुखं
कृत्वावागीश्वरि * *? नाड्यां मूलमन्त्रेण निक्षिप्यतोय विन्दन्दत्वा
सदित्वनैरोत्थाद्य गर्भरक्षार्थमस्त्रे जप्तं कङ्कनं
देवीहस्तेवनो गर्भाधानाय
* * * * * *? हृदयेनाहुति त्रयं तिलैर्दत्वा पुंसवनार्थं
वामदेवेनाभ्यर्च्य शिरसा आहुतित्रयं दत्वा श्री * *? येन निमित्तये
धारणाभ्र्च्य शिखयाऽहुतित्रयं दत्वाजननार्थं
तत्पुरुषेणाभ्यर्च्य कवचेनाहुतित्रयं दत्वानामकरणनिमित्तेन
इशानेनाभ्यर्च्यास्त्रेनाहुतित्रयं दत्वामूलमन्त्रेण शिवाग्निस्वं
हुताशनेति नामकृत्वापितेर्विसर्जनं विदधात् | जाते च मृतक
निवृत्तये कुण्डमर्घाम्भसा ससिच्य वह्निरक्षार्थं
प्रागुदगग्रात्परितास्त्रेण दर्भणास्तीर्याहुतित्रयेन
वक्त्राण्युद्व्याद्य?लालापनादाय पुष्टये च
मूलाग्रयोर्घृताक्ताभिः षोडशाङ्भुव प्रमाणाभिरि *?न्तिः
पञ्चभिश्चतुर्विंशत्या वा इ *? होमं विधायं ततो
मेखलासुसास्त्रार?लोकपालान्सम्पूज्य परिधिविषुरेषु प्राच्यां
ब्रह्माणं दक्षिणस्या रुदं पश्चिमायां
विष्णुमुदीर्च्यमीश्वरं पूजयेत् | ततः
श्रीपर्णीदार्वादिना षट्त्रिंशदङ्गुलां
कलदुङ्गत षडङ्गुलपरिणाह दण्डामग्ररि * *? चतुरङ्गुल चतु * *
*?
शिवाय त्रिभिः श्लोकैर्ममास्तु फलसाधनमिति निवेदयेत् |
गुह्यातिगुह्यगोप्तात्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं |
सिद्ध्यैभवति मेयेनत्वन्प्रसादात्त्वयि स्थितः |
यत्किञ्चित्कुर्महे देव सदा सुकृतदुष्कृतं |
तन्मे शिवपदस्थस्ये हूं क्षः क्षपय शङ्कर ||
शिवो दाता शिवोभोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत् |
शिवो यजति सर्वत्रयः शिवः सोहमेव तु ||
इत्येवं जपं पूजामात्मानञ्च भक्ष्या देवाय विनिवेद्य शिवञ्च
पूर्वोदितं ध्यात्वास्तुत्वा च नमस्कार मुद्रया अष्टाङ्ग
नमस्कृतिं विदध्यात् | ततो होमार्थं यथोक्त लक्षण कुण्डं
समीपं यायात् तत्र कुण्डं चतुरस्रं वृत्तम्वा सार्वकामिकं
काम्यभेदेन त्र्यस्रयोनि खण्डेन्दु षडश्राष्टाश्र षोडशाश्र
शिवा कुर्यात् | अर्द्धशत होमे मुण्डहस्तांशतहोमे रत्नि मात्रं |
सहस्रहोमे हस्तं | अयुतहोमे द्विहस्तिकं | लक्षहोमे चतुष्करं |
दशलक्षण होमे षट्करं | कोटिहोमेऽष्टहस्तं |
खातायामविस्तारैः सममुपरि च मेखलाषु
मुण्डहस्ते प्रमाणस्याद्याद्व्यङ्गुलान्वितीयाऽङ्गुलेनार्द्वाङ्गुलेन
च तृतीया | रत्नि प्रमाणस्य त्र्यङ्गुलद्व्यङ्गुलाङ्गुलमानाः
क्रमेण | हस्त प्रमाणस्य चतुस्त्रि द्व्यङ्गुलाः |
द्विहस्तस्य षट्चतुस्त्र्यङ्गुलाः | चतुर्हस्तस्याषु षट्चतुरङ्गुलाः |
पतृस्तस्य दशाष्ट षडङ्गुलाः | अष्टहस्तस्य च
द्वादशदाशाष्टाङ्गुलाः | क्रमेण सर्वकुण्डेषु त्रिस्रोमेखलाः
कुण्डरूपेणैव विधातव्याः कुण्डस्य दक्षिणस्यां वारुण्यां वा
मेखला मध्ये कुण्डाकारा अश्वत्थ पत्राकारा वा
द्वादशाङ्गुलाय अष्टोङ्गुल विस्तीर्णाङ्गुलौष्ठाद्व्यङ्गुलोच्छिता
प्रथमकुण्डस्य | शेषाणां द्व्यङ्गुल वृद्ध्यायोनिर्विधातव्येति |
ततः कु समीपे समुपविश्य कुण्डस्य निरीक्षणं शिवमन्त्रेण
प्रोक्षणमस्त्रेणाभ्युक्षण कवचेन तात नमस्त्रेणोल्लेखनाव
कीरण पूरणसमीकरण सेचननिकुटन संमार्जनाय लेपनं
कुण्डपरिकल्पना प्रागायतमुदगा यतम्वा रेखात्रयं
तिर्यग्रेखया सहरेखा चतुष्टय वज्रीकरण चतुष्पथन्या *?
योज्य संपूज्यकवचेना वगुण्ठ्ये सन्निधानायाहुतित्रयं दद्यात् |
ततः शिष्यं हृत्प्रदेशे संप्रोक्ष्य पुष्पास्त्रेणा हृदि अन्यत्य रेचक
प्रयोगेन हुंकारमुच्चरन्नाती मार्गेण हृदि तस्य सम्प्रविश्य
शिशोश्चैतन्यं स्फुरत्तारकाकारं हृद्यस्त्रेण सण्थिद्य
मूलमन्त्रेण समोक्ष्यष्य द्वादशान्ते हृदय संपुठितं कृत्वा ओं
हां हं हां संहारमुद्रया संगृह्य सूत्रे संयोज्य व्यापकं
संभाव्य कवचेनावगुण्ठ्यनं निधानार्थं
मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं जुहुयात् | ताडनादीनि च पाशानां सूत्रे
कुर्यात् न शरीर इति | तदनु पाशान्मलकर्ममायया न भोक्तृत्वे
भोगशरीर विषयजनका न सूत्रे बन्धनापावलोक्य शान्त्यतीतादी
सूत्रस्थ चैतन्ये सयोजयेत् | ओं हौं शान्त्यतीतायै हुं फडिति
शिष्यं शिरसि संताड्य गृहित्वा संहारमुद्रया ओं हौं
शान्त्यतीतायै नमः | इति सूत्रे नियोजयेत् | तदनु ओं ह्यैं
शान्त्यै हुं फट् इति ल ह द्व्यङ्गलकान्तं सन्ताड्यास्त्रेण पूरक
वृत्त्यासंहारमुद्रया संगृह्य ओं ह्यैं शान्त्यै नम इति सूत्रे
नियोजयेत् | तदनु गलकान्नं स्वन्तं पुष्पास्त्रेण संताड्य ओं ह्रूं
विद्यायै हुं फडिति संहारमुद्रया संगृह्य ओं ह्रीं प्रतिष्ठायै
नम इति सूत्र नियोजयेत् | पुनर्गुहात्यादान्तं पुष्पास्त्रेण
सन्ताड्य ओं ह्लां निवृत्त्यै हुं फडिति संहारमुद्रया संगृह्य ओं
ह्लां निवृत्त्यै नम इति सूत्रे नियोजयेत् | एवं ताडनग्रहण
संयोगं कृत्वा व्याप्यव्यापक भावमनुसन्ध्यात् | तत्व
भुवनपद वर्णमन्त्रा व्याप्यामल कर्ममायया व्यापकाः
पुनर्मलादयो व्याप्याः शान्त्यातीतादिक कलाव्यापकाः | अतस्ताभिः
संगृहीताभिस्तत्वादयोमलादयश्च गृहीता |
उपस्थापिताभिरुपस्थापिताः शुद्धाभिरपि शुद्धाद्ध?वन्तीति | अत
आह अधे
चतुर्द्धा विभज्य भागमेकं पार्श्वयोर्दत्वा भागार्द्धश्च
मध्यस्थाद्बहिरङ्कत्रयान्त अर्द्धचन्द्रव सम्भ्राम्य चापा?कार ||
० ||
चतुरश्रं चतुर्द्वाविभज्य वर्व?भाये पार्श्वयोश्च भागैक वृद्व्या
ब्रह्मस्थानादधो भागैक ह्रासाद्विवृद्ध भागेष्टार्द्ध
चन्द्रवत्संभ्राम्य भागत्रयश्च दण्डार्थ मध्यो
दत्वादण्डस्यार्द्धमधूश्च वृत्तं टंकारे || ० ||
चतुरश्रं चतुर्द्वाविभज्य क्षेत्रार्द्धं पार्श्वेदन्तमूलार्थं
दत्वा त्रिभागादग्रे वक्रं विधाय दन्तमूलद्धारं कार्यं
गजदन्ते || ० ||
चतुरश्र तृतीयांशमाग्रे दत्वा पार्श्वयोश्च षड्भागं दत्वा
सूत्रद्वयङ्केषु संयोज्य समसूत्रयं त्र्यश्रे || ० ||
चतुरश्रे षत्भागं ब्रह्मसूत्र पार्श्वयोर्दत्वा
मध्यात्तत्समसूत्रेण मत्स्य चतुष्टये समसूत्रदानात् षडश्रम् ||
० ||
मत्स्य चतुष्टयेष्वपि त्र्यश्र क्रमेण सूत्रयातनात षट्कोणे || ० ||
चतुरश्रे कर्णार्द्ध सूत्रं वहिर्नीत्वा चतुरश्राच्छेषं
त्रिधाविभज्यभागेक त्यागाद्ब्रह्मस्थानाद्भ्रमेण वृत्तम् || ० ||
अनुद्दिष्ट पद्मद्वारेषु मण्डलेषु विशेषलक्षणा भाव पद्मद्वारे
सर्वतोभद्रवत् || ० ||
एतेषामन्यतममण्डलन्निष्पाद्य मण्डलप्रवेशादारस्य कुण्डल *
*कान्नामी पस्व दक्षिणदिग्भोगे शिष्योपवेशन
नाडीसन्धानमन्त्रतर्पणान्त कर्मकृत्वा पूर्णाञ्च दत्वा च
मूलमन्त्राद्यस्त्रान्तानां मन्त्राणान्दी * *?ण सपनं
विधात्मव्यं |
ओं हुं ह्लौं हुं फट् | ओं हुं हां हुं फट् | ओं हुं हीं हुं
फट् | ओं हुं ह्लुं ह् हुं फट् | ओं हुं हं हुं फट् | ओं हुं हः
फट् | वाचकाः क्रू * *?न्ताड्य रजात्यान्विता वाच्याः | भृकुटी
करालवदनाः पाशवन्धनादौ नियोज्याः सर्वमन्त्राणां
त्रिभिस्त्रिभिराहुतिभिर्दीपनं वि * *? क धातव्यः |
तदनुकन्यानिर्मितं सूत्रं त्रिगुणं त्रिगुणीकृत्यास्त्रि प्रोक्षितं
कवचावगुण्ठितं सम्पूज्य शिष्यार्द्धकायस्य शिखायां * *? काः
| * * * * * * * * * * * * * * * ?नाडीरूपं विचिन्त्य ओं सुषुम्नायै नम
इत्यनेन शिष्यदेहान्सुषुम्ना पद्गृह्यसूत्रे सं * * * ?
स्च्. १२)
शतालब्धे प्राचीन मस्तके बुभुक्षुम्मुमुक्षुमपि तथैव
शुद्धहस्मना दक्षिणमस्तकेऽस्त्रादि रक्षिते हृत्मन्त्रेण शिष्य * *?
मध्यशिखया * * * *?धाय वर्म जप्तवाससा प्रच्छाद्यस्वापयेत् |
शयनीयस्य बहिस्तिलसर्षपभस्मभिरन्त्राभि मन्त्रितैस्तिस्रोरेखाः
कृत्वा वाह्यलिं दत्वा सु * * ?पञ्चगव्यादिकं प्राश्यदीक्षितैः
सहशिष्यवत्भूपेत् || ततः प्रातरुत्थाय
समाप्तनित्यकर्मविधिर्भगवतः | प्राग्वदनुज्ञां
प्रार्ष्यशिष्यमाहूय * * *?प्न दर्शं सृष्ट्या अशुभे शान्तिहोमो
विधातव्यः शुभे तु पूर्ववच्छिष्य प्रवेशादि कर्मकृत्वा
कुण्डसमीपे समानीय पाशसूत्रमवलम्व्यपशोरनुग्रहं
करामीत्यनुसन्धाय प्रज्वलितशिखशिखिन्यादौ शक्तिमाधार
रूपिणीं विन्यसेत् | ओं हां आधार शक्तये नमः | तस्या उपरिनिवृत्तिः
पीडि वकी *? क्षकारो वर्णोमज्र *? पदान्यष्टाविंशतिः
पुराणामष्टाधिकं शतं | एतद्विन्यस्य तद्व्यापिकां निवृत्ति
कलां सम्भाव्य ओं ह्लां निवर्त्तकलायै नमः |
इत्यनेन * *? न्सगृह्यसन्निवेश्यग्नौ संपूज्य च गन्धपुष्पाद्यैः
सन्निधानाय ओं ह्लां निवृत्ति कलायै स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा
पाशत्रयं मलकर्ममाया रूपं भोक्तृत्व भोगशरीरादि जनकं
भावयेत् | तदनुशतं रुद्राद्यनन्तान्ते ध्वनियोनिरनन्ताः सङ्कल्प्य
तद्व्यापिकां वार्ग * *? हृत्मन्त्रेणावाह्य पूजयेत् | ओं ह्रां
वागीश्वरी नमः | तदनुप्रणवेन सन्निनायाहुतित्रयं हुत्वा ओं
वागीश्वर्यै स्वाहा भगवति पशोरनुग्रहाय नर्सि?धी भवैवं
प्रार्ष्य शिष्यमन्त्रेण संप्रोक्त्य ते नैव हृदि सन्ताड्य ओं हः अस्त्राय
हुं फट् | आत्मना रेचकेन तस्य देहं प्रविश्यास्त्रेण हृच्छेदं
कृत्वान्यद्वशमुद्रया चोत्कृष्ये मूलमन्त्रमनुस्मन् द्वादशान्ते
तृणाग्र विन्दुरूपं सञ्चिन्त्य प्रणवेन संपुटं कृत्वा ओं हं
पशुवैतन्यं संहारमुद्रया पूरक * य?क्त्या सुहृदिसन्निवेश्य
कुम्भकं कृत्वा मूलमन्त्रमनुस्मर एव केन द्वादशान्ते
नीत्वासङ्गृह्य भवमुद्रया सर्वयोनिष्ठनेक व्यक्तिरूपेण वि?
यानां कलानां ग्रहणादाधाराणान्तत्वादि मलानां ग्रहणं
कृतं भवतीति | एवं सूत्रस्थानां पाशानां स्वमन्त्रः पूजन
* *णं? विधायदीपनं विधातव्यं | ओं हुं हौ शान्त्यतीतायै
हुं फट् | ओं हुं ह्य शान्त्यै हुं फट् | ओं हुं ह्रूं विद्यायै
हुं फट् | ओं हुं ह्वीं प्रतिष्ठायै हुं फट् | ओं हुं ह्लानिवृत्त्यै
हुं हुं फट् | एवं दीपनं त्रिभिस्त्रिभिराहुतिभिः कृत्वा
पाशानां वन्धनं कुर्यात् | ततोस्त्रेण शिरसि संताड्य ओं हौं
हौं हौं भगवन् शान्त्यतीत पाशं मलकर्मयन्ति * ?
तत्वभुवनादि व्यापकं बन्धवं हूं फडिति सूत्रे ग्रन्थिं
कुर्यात् | तदनु ललाट प्रदेशेऽस्त्रेण सन्ताड्य ओं हौ ह्यं भगवन्
शान्तिकलापाशं मलादि तत्वादि व्यापकं वन्ध २ हुं फडिति
सूत्रे वन्ध ग्रन्थिं कुर्यात् | ततो गलके सूत्रमस्त्रेण संताड्य ओं
हौं ह्रूं भगवन् विद्यापाशं मलादि तत्वादि व्याप * वन्ध २
हुं फडिति सूत्रे ग्रन्थिं कुर्यात् | ततो नाभौ सूत्रमस्त्रेण
संताड्य ओं हौं ह्वीं हौं भगवन् प्रतिष्ठापाशं मलादि
तत्वादि व्यापकं वन्ध २ फडिति सूत्रग्रन्थिं कुर्यात् |
तदनु * *? सूत्रमस्त्रेण संताड्य ओं हौं ह्लां हौं
भगवन्निवृत्ति कलापाशं मलादि तत्वादि व्यापकं वन्ध २ हुं
फडिति सूत्रग्रन्थिं कुर्यात् | ततः पाशात्सराव सम्पुटे कृत्वा
संपाता हुतान् कुर्यात् | ततः स्थण्डिललमण्डल
लिङ्गवानिवेद्यरक्षार्थ शिवकुम्भे निवेदयेत् | मन्त्राणां दीपनं
कुर्यात्तथा सूत्रावलम्बनं | शुषुम्ना नाडि संयोगः शिष्य
चैतन्य योजनं || मलकर्मादिसंकल्पः शान्त्यतीतादितः क्रमात् |
ताडनं ग्रहणं योगः पूजातर्पणदीपनम् || बन्धनं
शान्त्यतीता देः शिवकुम्भसमर्पणं | इति कर्म क्रमः प्रोक्तः
पाशबन्ध शिवेन तु || ततः शिष्यं शिवशम्भु कुम्भाग्नीनां
प्रणामं कारयित्वा मण्डपाद्बहिर्मण्डलकत्रये समुपवेश्य
क्रमेण पञ्चगव्यं चरुंदत्तधावनं च दद्यात् |
दन्तधावनस्य च पातः प्रागुदगीशान पश्चिमेषु *?स्तः | अन्यत्र
पाते शान्त्यर्थं साष्टशतिकोहोमः | ततो मूलमन्त्रेणाहुती
शतमष्टाधिकं प्रायश्चित्त विशुद्धये हुता? शुद्धायां
भूमौदर्भशंयत्सऽस्त्र?
स्च् १३)
कल्प्य मध्या ज *?या भूतादिवाला तु संस्कार पूरणार्थं
वौषडन्तेन मूलमन्त्रेण पूर्णां विधाय चर्व्वर्थं
धूपदीपार्थं वह्निमुद्धृत्य कुण्डान्त * * *?
कुण्डसंस्कारदनन्तरं तमानीय प्रत्यहं यजेत् | तत्रैव
कुण्डेव्याहृतीर्हुत्वानिष्ठुर योनिरोधयेत् प्रत्यहं वा जनयेत् |
अनन्तरमग्नि हृत्पद्म * *?सनं भगवन्तमावाह्य साङ्गं
सम्पूज्य वह्निस्थ शिवस्य यागस्थ शिवेन सहनाडी सन्धानं कृत्वा
यथाभिमते वक्त्रे यथा शक्तिमूलमन्त्रेण दशांशेनाङ्गं *?
र्होमं विदध्यात् | तत्र होम द्रव्याणि समित्
क्षीरघृतमधुर्यधितिलयव तडुल भक्ष्यपायसव्यञ्तेनस्विन्न
भृष्टशाककन्दमूल फलादीनि | तत्राहुति प्रमाणां
मधुक्षीरसर्पिरादि द्रव्याणां श्रुवावधि | दधिपाय सयोः
प्रसृतिः | त्रिखण्डं मूलजातस्य | भक्षस्य यथा निष्पन्नं
हरीतकी तुल्यद्या *?क्ष्वादः पर्वसम्मितं | द्व्यङ्गुलं वर्णीनां |
फलपुष्प पत्त्राणामखण्डं | सत्ववां व्रणादि दोषरहितानां
कनीयसी स्थुलान्यं
समिधाम्प्रादेशिकं व्यञ्जन मिश्रो वनकासारपिण्याह
गोशकृतां ग्राममात्रं श्रुवान्नत शिखम्वा | व्रीहियवादीनां
पश्चाद्गलि समाहृतं तिलफण सक्त्वादिकस्य मृगीमात्रं |
गुग्गुलोर्वदरास्थिमात्रं कुङ्कुमचन्दन कल्कहस्तरिका
कर्पूरादीनां चणक प्रमाणं | अष्टाङ्गं कन्दं जातीना |
शाकानां सुहस्ततल सम्मितं | लाजानांमुष्टिमात्रं तर्जनीं
कनिष्ठिकां प्रसार्य मध्यमानामिकाङ्गुष्ठाग्रयोगान्मृती |
पश्चाङ्गुल्यग्र योगात्मुकुलाकारा सूकरी | एवं
वीजपदब्रह्मभिरपि होमनिवर्तयेत् | तत आज्येन श्रूचमापूर्य
पुष्करोपर्यधो मुखं श्रुवं कृत्वा तदग्रे पुष्पं दत्वा
वामदक्षिण हस्ताभ्यां शङ्खवत्संलग्नौ तावुभावुपादायः
समपादः समुच्छ्रयोर्द्वकार्यः नाड्यां तिर्पग्विधाय
श्रूगग्रदन्त दृष्टि वौषडन्तं मूलमन्त्रमुच्चरन्
वामस्तेनान्तं श्रुग्मूलमानीयान् द्विग्वयव प्रमाणधारया
समस्तमाज्यं वह्निं प्रापयेदिति पूर्णाम्विधाय उपविश्य
वह्नेर्भस्म वन्दयित्वा
उपरिकन्यसादितेनत्पद्सप्ताङ्गुलि कृतवेदिकामङ्गुल कण्ठां
पञ्चषट्सप्तोत्तर वेदिग्र त्र्यशविस्तृता कनिष्ठिका पृष्ठाज्य
निर्गमात्र्यङ्गुल खातावदुः पञ्च षट्गर्त्तमण्डलां श्रुचं
श्रुवमध्येङ्गुष्ठ परिणाहदण्डं कर्षाधारावटं
दण्डमूलाग्र चतुष्टिकं गोपदाकार पुष्करं तत्पृष्ठ?
कुम्भद्वय युक्तञ्चतुर्विंशत्यङ्गुलं द्वाविंशत्यङ्गुलम्वा
गृहीत्वास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवय नावगुण्ठ्याग्नौ प्रताप्या भ्राम्य
दर्भाग्रेणाग्रं संपृश्य पुनः परिभ्राम्ये मध्यम्मध्येन
सम्पृश्य पुनः परिभ्राम्ये मूलं मूलेन संस्पृश्य तत्वत्रयं
द्वयोः श्रुचि शक्तिं श्रुवे च शम्भुं विन्यस्यात्म ऋत्यदिग्भागे
दर्भाणासुपर्यधो मुखौसंस्थाप्य हृदा संपूजयेत् |
अथाज्यमानीयास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवचनावगुण्ठ्य शिवाग्नावस्त्रेण
प्रताप्येकवचनाद्वास्य कुण्डस्या परिप्रदक्षिणं त्रिः परिभ्राम्य *
*?संस्थाप्य प्रादेशमात्रं दर्भाग्रद्वयनिर्मितं मध्यग्रन्थि
पवित्रकं अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां गृहीत्वाऽग्नि संमुखं
त्रिराज्याभ्यवनं कवचेन
* * * *? संमुखं संप्लवन हृदा कृत्वाऽग्नौपविडकं
प्रक्षिप्याज्यमस्त्रेणावद्यात्यनिरीक्ष्य निराजनं कृत्वा शिवाग्नी * * * *
* * * * * *? नाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेणामृत मुद्रयाऽमृतां कृत्य
मूलेन संपूज्याज्य पात्र मध्ये प्रादेशमात्रं दर्भं विन्यस्य
इडा सुसुम्ना पिङ्गलाख्यं नाडीत्रयं संकल्प्य सव्यात् | ओं अग्नये
स्वाहा | वामतः | ओं सोमाय स्वाहा | मध्यात् ओं अग्नीषोमाभ्यां
स्वाहा | ओं अग्नये स्विष्टि कृते स्वाहा इत्याहुतिं च * * ? पशुवेण दत्वा
असंस्कृते सर्पिषि संस्कारार्थं विन्दुं क्षिपेत् | कृष्ण पक्षतु
सव्यात् ओं अग्नये स्वाहा | दक्षिणतः ओं सूर्याय स्वाहा | सध्यात् ओं
अग्निषोमाभ्यां स्वाहा | ओं अग्नयेस्विष्टि कृत स्वाहा इति ततो
वह्नेर्वक्त्राभि घोरमाज्याहुतित्रयेणम्वस्य मन्त्रैर्विधाय सदां
वामेन वाममघोरणांगारं? तत्पुरुषेण तत्पुरुषमीशेन
इशशिवेनति वक्त्रसन्धानैकीक्रणैस्वस्वमन्त्रैर्विधाय
कुण्डप्रमाण यथाभिलसितं वक्त्रं प *?
स्च् १४)
ओं वसुभ्या नमः | ओं आदित्ययो नमः | ओं रुद्रेभ्यो नमः | ओं सा
साधोभ्यो नमः | ओं नक्षत्रेभ्यो नमः | ओं पृथिव्यै नमः | ओं
पृथिवी चरभ्यौ नमः | ओं अन्तरि *? चरेभ्यो भूतेभ्यो नमः | ओं दिवे
नमः | ओं दिविचरभ्यो भूतभ्यो नमः | ओं दिग्भ्यो नमः | ओं
दिक्चरेभ्यो भूतेभ्यो नमः | इति प्रभृतभ्यो | दक्षिण
वृत्तवलिन्दत्वा | ओं विष्णवे सर्वभूतये सर्वात्मने ध्यानगम्याय
नम इति मण्डल मध्ये वलिन्दद्यात् | ततो
मण्डलाद्बहिर्दक्षिणतोऽपसर्वा न ओं बर्हि पितृभ्यः स्वधा नमः
| ओं अग्नि पितृभ्यः स्वधा नमः | ओं सोमपितृभ्यः स्वधा नमः | ओं
सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः इति वैश्वदेवं कृत्वा वहिर्निगत्य
दिग्देवताभ्यः | ओं इन्द्राय प्रतिगृह्ण नमः | ओं ऐन्द्र्यै प्रतिगृह्ण
नमः | ओं अग्नये प्रतिगृह्ण नमः | ओं आग्नेयौ प्रतिगृह्ण नमः | ओं
यथा? य प्रतिगृह्ण नमः | ओं याम्यायै प्रतिगृह्णनमः | ओं
नैर्-ऋतये प्रतिगृह्ण नमः | ओं नैर्-ऋत्यै प्रति गृह्ण नमः |
ओं वरुणाय प्रतिगृह्ण नमः | वारुणौ प्रतिगृह्ण नमः | ओं
वायव्यै प्रतिगृह्ण नमः | ओं कुवराय प्रतिगृह्ण नमः | ओं नागाय
प्रतिगृह्ण नमः | ओं नाग मात्रे प्रतिगृह्ण नमः | इति
गन्धपुष्पधूप सहितं बलिं दद्यात् | ततो वायसाः कृमयः
पतित्ताः श्वानः स्वपचाः समय भेदकाये चान्य इमं
प्रतिगृह्णन्तु नम इति गन्धपुष्पान्वितं शेषमन्नं भूमौ
निक्षिपेत् || ० ||
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
नित्यकर्मविधिस्समाप्तः || ० ||
अथ मुद्राणां लक्षणं | पद्माकारौ करौ कृत्वा मध्ये
अङ्गुष्ठौ कर्णिकाकारौ विन्यसेदिति पद्ममुद्रा |
पुनर्वह्निस्थं संपूज्य संहारमुद्रया पूरकेण
वह्नेर्मंत्रात्संहृत्य द्वादशान्तमानीय हृदि सन्निवेश्य
परिधिविष्टरानुद्वास्य कुण्डसमीपे वहिर्वा मण्डलके संप्रोक्ष्या
योगिन्यो भीषणारौद्रा वेतालाः क्षेत्ररक्षकाः | आगत्य
प्रतिगृह्णन्तु शिवेद्यनुविधायिनः || मयादन्तं वलिं क्षिप्रं
सिद्धिं यच्छन्तु मे सदा | हे हः हूं फडित्यनेन मन्त्रेण | ये
रुद्रारुद्रकर्माणो रौद्रस्थान निवासिनः | सौम्याश्चैव तु ये
केचित्सौम्यस्थान निवासिनः || मातरो रौद्ररूपाश्च गणानामपि
पाश्चये | सर्वसु प्रीतम नमः प्रतिगृह्णन्विमान्यलिं || सिद्धिं
जुषन्तुनः क्षिप्रं भयेभ्यः धान्तु नित्यशः | इत्यनेन मन्त्रेण च
वलिम्प्रक्षिप्य हस्तौ प्रक्षाल्य शिव संनिधिं गत्वा संपूज्य
प्रोतिलोम्येन विसर्जनार्थमर्घन्दत्वा भागाङ्गानि पूर्वोक्तन्यायेन
संहृत्ये लिङ्गे संयोज्य सापेक्षं क्षमस्वेति विसर्जयेत् | पर्वसुच
विशेष पूजा कुर्यात् || अथ भोक्तुमिच्छन्मध्याह्निकं निर्वृत्य
सिद्धस्य पा कस्य संस्कारार्थं चुल्ली होमगृहवलि वैश्वदेव
दिग्वसीन कुर्यात् |
तत्र सत्वमन्नं प्रोत्रे समाहृत्य संप्रोक्ष्याग्नि सोम सवितृवृहस्पति
प्रजापति विश्वदेव सर्वदेवानगिस्विष्टि कृत्यदेः प्रणवादि नमोऽन्तः
सम्पूज्य स्वाहान्तैराहुतीर्हुत्वा वास्तु देवताभ्यो वलिमुपहरेत् | तत्र
चूल्यां दक्षिणबाहौ ओं धर्माय नमः | वाम वाहौ ओं
अधर्माय नमः कञ्जिन्यां चक्रसन्धान भाण्डेषु ओं
स्वरसपरिवर्तनाय नमः | उदकभाण्डेषु ओं जलाश्रिताय वरुणाय
नमः | गृहप्रधान द्वार ओं महा विघ्नराजाय नमः |
पीषण्यां ओं सुभगे नमः | उदूखल ओं रौद्रेकोटरि गिरिके नमः |
मुषले ओं वलभद्र प्रियाय महाप्रहरणाय नमः |
सम्मार्जन्यां ओं मृत्यवे देवचोदिते नमः | शयनीय
शिरसि ओंकामाय कुसुमायुधाय नमः | मध्यस्तम्भस्याधस्तात् |ओं
स्कन्धाय ग्रहाधियतये नमः | इति वलिं निवर्त्यवास्तु मध्ये
वृत्तमण्डलकं कृत्वा गन्धपुष्पादिकं दत्वा विश्वदेव
वलिमुपहरेत् | तत्र ओं ब्रह्मणे नमः |
द्विहस्तात्पतिते देवाङ्ग लक्षजप्त्वा पुनः संस्कारेण शुध्यति ||
पुरुष मात्रात्पतिते प्रयत्न पूर्वं ससलाभे सर्वतो विसीर्णे
प्रायश्चित्तं नास्तीति तस्याप्ययर्थः | शलाक्यं भेदपातकस्यान्त
गुरुत्वान्न प्रमादिना भवितव्यम् | तृतीयमन्त्रादृतेऽत्यन्तगुरुतर
महापातकादि दोषापमर्द्दाय समर्थत्वादताय *?मवैवं
महापातकोच्छियेत्य | त्रिगुणप्रायश्चित्तार्थ जप्तव्यं |
स्थण्डिलेष्वध्या वाहनादिषु कृतेष्व समाप्ते पूजा कर्मण्य विसर्जित
एव देवेशे प्रमादाऽपद्या तेजातेऽर्च्चा पुष्पादिभ्यो मन्त्रां
संहृत्य अघोरस्य शतपञ्चकं जुहुयात् | सहस्र पञ्चकम्वाजपेत् |
देवोपकरणं पादेन स्पृष्ट्वा सहस्र पञ्चकं जपेत् | संध्यालापे
निरुजः सोपवायः शतं जपेत् | सरुजोजपेदेव | एकाहं दवस्यानर्चने
त्रिरात्रमुपाष्य प्रत्यहञ्च त्रिशं * आकामात्यञ्च शतिभः
उपवासः स्नानं पञ्चगव्य प्राशनं जपो होमश्च
सर्वसंकरदोषं नाशयति |
तत्र कामार्न्निर्माल्य संकरे ब्रह्मपञ्चकं शतसङ्ख्यं योजयेत्
| निर्माल्य भक्षणे त्वेकामाद्ब्रह्मपञ्चकं सार्द्ध
सहस्रमावर्तयेत् | कामतोऽनन्त योगेन पदाध्वदीक्षयाशुध्यति |
निर्माल्य भेदाः कथ्यन्ते देवस्वं देवद्रव्यं नैवेद्यं निवेदं
चण्डद्रव्यं निर्माल्यञ्चेति | देवसम्बन्धि ग्रामादि देवस्वं
वस्त्रालङ्कारादि देवद्रव्यं देवार्थमुपकल्पित नैवेद्यं
तदेवोत्सृष्टं निवेदं | चण्डाय दन्तं चण्डद्रव्यं
वहिर्निक्षिप्तं निर्माल्यं | विसर्जितेऽपि देवे पिण्डिकास्थं
पवित्रिकाद्यं निर्माल्यं न भवति | षड्विधमपि निर्माल्यं नः
जिघ्रेन्नलघयेत् न दद्यान्न विक्रीणीत | दत्वा क्रव्यादो भवति |
भुक्त्वा मातङ्गः लङ्घ्ने सिद्धिहानिः | आघ्राणाद्वृत्तः?
स्पर्शनात्स्त्रीत्वं | अयथा दहन चण्डालः विक्रये शवरः | गुरु
पुस्तकवह्नि यक्षनगेन्द्र योगि
स्च् १५)
धर्ममुद्रेव प्रसारिताङ्गुष्ठा संलग्न मध्यमाङ्गुल्यग्रा
विस्वमुद्रा संमुखहस्ता कुञ्चिताङ्गुल्याग्रौ पर्यङ्गुष्ठद्वय
बालाद्विस्फुरा | अन्योन्य ग्रथिताङ्गुल्यष्ट कनिष्ठा
नामिकयोर्मध्यमातर्जन्योश्च योजनेन गोप्तवाकाराधेनु मुद्रा |
बद्धमुष्टर्दक्षिणहस्तस्य मध्यमातर्जन्योर्विस्फुरित प्रसारणेन
गोवृषा * * र्दक्षिणहस्तास्य प्रसारित तर्जन्या वामहस्ततल
ताडनेन डामनी इति सूर्यमुद्रा | प्रसारित हस्ताभ्यामधो मुखा *
* * * * * * *सुक्रस्य?शात्महामुद्रा | धेनुमुद्रा पूर्वोक्तैव |
हस्ताभ्यामञ्जलीं कृत्वाऽनामिका मूलपर्वगाङ्गुष्ठ
संयोजमनाव्य द्विती * * * * * * * * * *? सलग्नमुष्ट्युच्छ्रिताङ्गुष्ठौ
करौ संनिधानी भावेवगर्भगाङ्गुष्ठौ निष्ठुरा संनिधा * * *
* * * * * * *दक्षिणाङ्गुष्ठा भ्रान्त वामाङ्गुष्ठौ
* * * * * * ?वरावद्य मुष्ट्याः करयाः संलग्न
संमुखाङ्गुष्ठयोः कालकर्णी | ग्राह्यया परिहस्तप्रसार्य
कनिष्ठादि * * * * *? मूलाग्रयनान् संहारमुद्रा | उत्तानसिथिल
मुष्टिर्वह्न्यादि प्रक्षपे भवमुद्रा | वामाङ्गुष्ठमध्ये
मुखदक्षिणहस्त * * * * ?तर्जन्यङ्गुष्ठ योगाधो दक्षिणाङ्गुष्ठ
मुच्छ्रितं कृत्वा वामहस्ताङ्गुलीभिर्दक्षिणहस्त
मुष्टिसंवेष्टनेन लिङ्गमुद्रा || ० ||
* * * * * * * नितायो? सिद्धान्तसारपद्धतौ मुद्रालक्षणं समाप्तम् ||
० ||
अथ प्रायश्चित्तविधिस्तत्र स्वष्टलिङ्गेनष्टे * * * * * *? जप्ता
लिङ्गान्तरं प्रतिष्ठाप्य विशुद्ध्यति || पिण्डिकाया मध्येवं
योज्यं | हस्तात्पतितेऽव्यङ्गेऽदीक्षितेन च * * * * * * *? धेनः
पञ्चगव्यादिनासं स्नाप्य विशेषपूजां कुर्यात् ||
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
प्द्f २
स्च् १)
त्राच्छिष्टः प्रसादादुच्छिष्ट समानजातीय स्पर्शै समुपस्पृश्य
स्वजातीश्वरं कीर्तयेत् || उच्छिष्टादीक्षित स्पर्शमुत्पती * * * *? तथा
ब्राह्मणो राजन्यं राजन्या वैश्य वैश्योशूद्रमुच्छिष्टं
संस्पृश्याहोरात्रमुपाष्यात्मीय जातीश्वर मन्त्रस्पृष्ट वर्णजातीय
मन्त्रादेकस्थौ जपेद्ब्राह्मण्ये वैश्यशूद्रौ स्पृष्ट्वाद्व्यहं
त्र्यमुपाष्यतदेव जपेत् | क्षत्रीयः शूद्रं स्पृष्ट्वा
द्व्यहमुपाष्यत देव | एता न दीक्षितान स्पृष्ट्वा
पूर्वोक्ताद्द्विगुणञ्चरेत् | क्षत्रियादयः समीपन्तर वर्णस्पर्श
पादहीनं वैश्यो विप्रस्पर्शेतदर्द्धं शूद्रः पादं | शूद्रः
क्षत्रीयस्पर्शे तदर्द्धमित्युपकल्पनया प्रायश्चित्तं कुर्युः | अत्यज
स्पर्शे त्रिरात्रमुपाष्य स्वजातीशस्यायुतं जपेत् | चाण्डालस्पर्श
उच्छिष्टस्य कृच्छ्रमघोरायुतञ्जपेत् | यद्वा वाह्य वर्णस्पर्शे
सर्वेषां दीक्षितानां गुरुश्चतुरस्र चतुर्हस्ते चतुर्द्वारे
वर्णकचतुष्टय निर्मिते चतुष्पत्त्र पद्मोपशोभिते
पूर्वदक्षिणोत्तर पश्चिमपत्त्रेषु तत्पुरुषाघोरवामदेव सद्योजाता
जातीश्वराः कर्णिकायामीशानं मण्डले शिवं संपूज्यकारं *?
विन्यस्त *? जातीशे तत्स्थापितेशाने स्वजातीश्वर मण्डले वा स्वजातीश
मन्त्रेण फडन्तेन शोध्यां जातिमुद्धृत्य स्वाहान्तेन तेनैव
मण्डलस्थस्वजातीशे निक्षिप्य तथैवोद्धृत्यशोध्यात्मनि तथैव
नियोजयेत् | इति जात्युद्वारकर्म निर्वर्त्य तं दीक्षयेत् | असन्निहित गुरुश्व
स्वयमेवात्मानं दीक्षयेत् | षडस्र | पोष्य स्वजातीश्वर
लक्षम्वाऽवन्यासना जपेत् | समानजातीय यस्या च्छिष्टं भुक्त्वा
उपास्य सहस्रञ्जपेत् | ब्राह्मणः शूद्रस्येच्छिष्टं भुक्त्वा
त्रिरात्रमुपाष्या युतद्वयञ्जपेत् | ब्राह्मणो वैश्यस्यौसिष्टं
भुक्त्वाद्व्यहमुपाष्याघोरायुतं जपेत् | अत्न्यजोच्छिष्टं
भुक्त्वाऽत्म विशुद्धये कृच्छ्रादिदशगुणं समाचरेत् |
प्रायश्चित्तं जपेद्दशकादारभ्य शतत्रयं यावत् स्नानमात्रं |
शतत्रयादूर्द्ध पञ्चशतपर्यन्तं स्नाननक्तेन | तस्या * * * * * * *
रात्र * * * ?
गणमातृगौरी प्रभृति प्रतिमासु शिवसूर्य निर्माल्यवन्न भवति |
अपरेष्ठपि दशसु स्थानेषु गुरुव्याख्या काले शिवकुम्भे
देवविप्रदक्षिण विसर्जितेऽपि लिङ्गस्था पूजा | चललिङ्गेऽघढिते चित्रे
रत्नजे हेमजे | अन्यस्मिन्नपि सद्यः प्रतिष्ठिते च चतुर्थां
कर्मावधिर्न निर्माल्यं भवति दोषतारि | पूजायां दीपका
लोकधूपान्नादि गन्धे च न दोषः | नदीप्रवाह निर्माल्येपि च |
सूत्रक शावाशौ वयोः परकीय योर्नभोक्तव्यं भुक्त्वा
चाकामतः समुपाष्य वामदेवसस्रञ्जपेत् | कामतस्तूपवासत्रयं
कृत्वा वामदेवमन्त्रं सहस्रं त्रयमावर्तयेत् | आत्म
सम्बन्धिनाः सूतकशावाशौचयोः सूतकि जनस्पर्शं विहाय
पृथक्या केन भोक्तव्यं | अन्यथा नित्यहानिहानिर्भवति | अतः
सूत्रके शाचाशौच च स्वधर्मस्थेन क्रियानुष्ठान परेण
ज्ञानवता वृत्तवता च न नित्य क्षतिः कार्या |
यदि च नित्यानुष्ठानं न भवति प्रमादात्सूतकि संस्पृष्ट
साधारण पाकभोजन वासमुपाष्य सहस्रबहुरूपन्भवत् |
कामत्र?स्त्रिगुणं तदेव ज्ञात्वा तु सूतकशावान्नभोजने
नित्यानुष्ठानं न कर्तव्यं | तस्याननुष्ठानात्सोपि सूतकि समः
स्यात् | तत्सूतकान्ते यावन्ति सूतकदिनानितावन्ति नक्तं यावकान्नेन
भुञ्जीत त्रिकाल स्नायी बहुरुपगतत्रयं जपेत् | तत्रैव भुक्तं
नित्यहानिश्चाकृता तत्र प्रतिनिमित्तं त्र्यहं वहुरूपस्य
सहस्रत्रयञ्जपेत् त्रिरात्रञ्चोपवसेदिति || अथवा आग्निक देवार्चनादिल्पे
सद्योजातस्या युतं जपेत् | समुपाष्य प्राणायामपूर्वकं शतम्वा
जपेत् | वामस्य शतं प्रतिषिद्धान्नमेवने |
प्रतिषिद्धहिंसायामघोरस्य रात्रौ रेतः स्पन्दन तत्पुरुषस्य |
दिवाद्विगुणं | ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य शूद्राणां
तत्पुरुषाघोरवामदेव सद्योजातां स्वजातीश्वरान्तं?
निर्वीजासाधिकारा निरधिकारा चेति |
तत्र समय समद्याचारवती सवीजा | सा च विदुषां क्रिया
समर्थानामेव भवति | समय समयाचार पाशशुद्धि
पूर्विकासमयाचारादिरहिता निर्वीजा | सा च वालवालिष
वृद्धव्याधितानां स्त्रीणां भोगभुजाञ्च | आचार्य
साधकयोर्नित्यनैमित्तिक काम्यकर्मस्वधिकरणात्साधिकारा | समयि
पुत्रयोर्निर्वीज दीक्षितानाञ्च
नित्यकर्ममात्राधिकारित्वान्निरधिकारैव | सा पुनरूपाधिद्विधा
क्रियावती ज्ञानवती च | तत्र रजः कुण्डमण्डलपूर्विका क्रियावती |
तद्विना केवलमनाव्यापारजनिता ज्ञानवती |
इच्छम्भूतादीक्षालब्धाधिकारेणाचार्येण क्रियते | सचावर्तादि
देशसम्भूतः श्रूतशीलगुणान्परसम्पन्नः शुद्धा शयः स्यात् |
शिष्यापि शीलादिगुणसम्पन्नः शिवान् ध्यानादि गुणयुक्तः | तत्र
शिवान् ध्यानाच्छक्तिपातस्तद्वशात्य लक्षयः |
ततो गुर्वस्वणन्ततो दीक्षा ततो बोध आन्तरो वाह्यश्च विहितेषु
प्रवृत्तिर्निषिद्धान्निवृत्तिरित्यय वर्जनं | श्रेयसिलयः सर्वज्ञतादि
गुणः * * *? प्रेषकभावनिवृत्तिः कार्यता परिक्षयरूप उत्पत्ति स्थिति
ध्वंसतिरोभावानुग्रहरूपः पञ्चधा प्रतिकृत्य परित्यागः |
विमल स्वात्मनि स्थितिरितिं | अथ दीक्षाविधिस्तत्राचार्यः कृतशौच
स्नानविधिः | निवर्तित सत्व्यापासनोयज्ञ गृहमनु प्रविश्य कृत
यज्ञमण्डपविधिः | शम्भुकुम्भ शिवास्तववर्द्धनिकानां कृत
पूजोनिवर्तित होमविधिर्भगवतादीयं
देहमाविश्यान्ग्राह्यगुणसम्पन्नस्यास्यानुग्रायाहं
कुर्वित्यनुज्ञां प्राथिवं करोमीति भगवतो लब्द्धानुज्ञो
मूलमन्त्रेण सप्तकृत्वोभिमन्त्रितं सितोष्णीषं शिरसि विन्यसेत् | ततो
मण्डल सर्वकर्मसाक्षीत्वेन शिवकुम्भेयस्तु रक्षकत्वेन वह्नो
होमाधिकरणत्वेन शिष्यदेहे तत्पाशशिथिलिकरणत्वेन
स्वात्मन्यनुग्राहकत्वेन इत्यपिकरण पञ्चकेप्यहयेवस? शिव इति
सदाशिवादय?
भूत ऊर्ध्व जपान् सारणापवासात्कल्पयेत् | मन्त्रीपरसिद्ध्यन्न
भोजने तल्लिङ्गेश्वर शतञ्जपेत् | त्रयीनष्टिक? लिङ्गिस्यात् ?
पाशुपतकापाल लिङ्गिनां सद्योजाताद्याः पतयः |
कपालान्नभोजने चान्द्रायणं कृत्वा ईशान लक्षं जपेत् |
जातीश्वरमण्डल वल्लिङ्गेश्वर मण्डलं विधाय
जात्युद्वारवन्निक्षेपाक्षेपयोगेन लिङ्गाद्वारपूर्वकं दीक्षाष्टा
कुर्यात् | तेनैव संस्पृष्टतदन्न भोजन लक्षत्रयं कृतचान्द्रायणो
जपेत् | लिङ्गे तु त्रान्सादि दिषदुष्टै महेशस्या युतञ्जपेत् | सूल्यं
तदर्द्धं ततोऽल्प तदर्द्धं लघीयसिसहस्रं | तत्र साधकोक्तं
प्रायश्चित्तं परायत्तस्य गृहस्थाचार्यस्य स्वायन्त साद्विगुणं | एत
देवव्रतं वरायत्तस्य व्रतिनः | स्वायन्तस्य पूर्वोक्त त्रिगुणं |
सर्वमध्येतत्तृतीयांशेन पुत्रकस्य पुत्रकार्द्धं समयिनः |
तदेतत् सर्वं प्रायश्चित जातमुक्तामुक्तानुक्त निकृतीना
कामाकामादिभेदेन पायाविरोधेन वलवयो विशेषेण
समद्विगुणार्द्ध तदर्द्धार्द्ध परिकल्पनया दातव्यं प्रायश्चित्त
भरणासमर्थस्य याव
पितृगुरुभ्रातृभगिनी पुत्रभार्यादिभिर्विभज्य
जपहोमौपवासातद्विशुद्धये कर्तव्यमिति ||
महाराजाधिराजश्रीभोजदेव विरवृत्ताया वृत्तसारपद्धतौ
प्रायश्चित्त विधिः समाप्तः ||
अथ दीक्षा स्वरूपं तत्र बन्ध हेतुमेल कर्ममायादिपास विश्लेषो
ज्ञानं चानुऋह्यस्य यया क्रियया किन्यते सा दीक्षा तत्रानुग्राह्यं
स्त्रिविधः | विज्ञाना कलः प्रलयाकलः सकलश्चेति | तत्र
मलमात्रयुक्तो विज्ञानाकलः मलकर्मयुक्तः प्रलयाकलः कलादि
पृथिव्यन्त तत्वयुक्तः सकलः | दीक्षापि द्विविधानि
चधिकरणामाधिकरणा च | तत्रा चार्यनिरपेक्षेण भगवता
स्वशक्त्यानुग्रह रूपयातीव्रतर शक्तिनिपातेन या क्रियते
सानिरधिकरणा | विज्ञानाकलप्रलया कलानां यात्वाचार्य
मूर्तिस्थेन भगवतामन्दमन्दतर तीव्रतीव्रतर वक्त्ररूपभक्ति
निपातेन या क्रियरसासाधिकरणासुकलात्मनां सो पुनः सवीजा वन
संपुट्य |
ओं हुं ओं संहारमुद्रया संगृह्य शिष्य हृदि संनिवेश्य
मूलमन्त्रेण यज्ञोपवीतमभिमन्त्र्य शिशोर्दद्यात् | शतं सहस्रं
वाहुत्वाहुतिं दद्यात् | एवं समय संस्कार संस्कृतः पूजा
होमश्रवणाध्ययनादिषु योग्योभवत्यैश्वरश्च पदं लभत इति |
नाडी सन्धान होमस्तु मन्त्राण?सहस्रकः | दीक्षैषा सामयी
प्रोक्तारुद्रेश पददायिनी || ० ||
इति राजाधिराज श्रीभोजदेवविरचिताया सिद्धान्तसारपद्धतौ
समयदीक्षाविधिः समाप्तः || ० ||
अथ मण्डलेषु मन्त्रान् सम्पूज्य निर्वाणदीक्षादिकं विधेयं |
तत्र मण्डलानि सर्वतो भद्रेभद्रं लतालिङ्गोद्भवं
अर्द्धचन्द्रं स्वस्तिकं योन्याकारं त्रिप्रकारं नवनाभं
चापाकारं टङ्काभं गजदन्तं काम्य कर्मणि च त्र्यश्रादि
भेदभिन्नं सर्वाण्यपि मण्डलानि
चतुरश्रानिष्पाद्यनेद्यतनञ्चतुरश्रं क्षेत्र साधयेत् | तत्र
शुद्धां दर्पणोदरां भुवं निष्पाद्य
पुष्पपौष्णमघावेधान् मण्डलस्थगङ्कुच्छाया प्रवेशनिगमः
* *वा? पूर्वापरे ससाध्य पूर्वापरायतं सूत्रसाम्यल्य
ब्रह्मस्थानं सङ्कल्प्य तस्मात्पूर्वापरायतं
समान्तरमङ्कद्वयं दत्वा तत्वामसूत्रं सकिञ्चिदधिकं
पूर्वापरयोरङ्कयोर्द्धृत्वा दक्षिण्येन्तरमत्स्य
संपाद्यमत्स्यादर दक्षिणोत्तरायतं सूत्रं संप्रसार्यमतः
क्षेत्रार्द्धमानेन मध्याद्दिक्ष्वङ्कं विधाय
तदङ्कसमसूत्रेण दिक्ष्वनुलोमविलोमतो मत्स्य चतुष्टयं दत्वा
तेषु सूत्र चतुष्टय दानाच्चतुरश्रं संसाध्य सर्वाणिमण्डलानि
कुर्यात् | तत्र चतुरश्रमष्टधा विभज्य चतुः षष्टि पदकृत्वा
मध्यकोष्ठ चतुष्टये पद्मं पीठञ्च संपाद्यतदनन्तर
पङ्क्तौ पद्मार्द्धेन वीथी तदनन्तर पङ्क्त्याञ्चतुर्द्दिक्षु
पद्मासमानि चत्वारिद्वाराणि द्वारार्द्धमानात् कण्ठोपकण्ठ
कपोलोप कपोलान्कुर्यात् | एवं विन्तज्य ब्रह्मस्थानात्सूत्रभ्रमणेन
त्र्यङ्गुलानि चत्वारि वृत्तानि कृत्वादिक्षु विदिक्षु
षम्भूतमात्नां तत्समानगुणं ममचेते हृदयादि मन्त्राः
करणभूता इति सञ्चिन्त्य स्वतन्त्र पतित्यमात्मनि
सम्भाव्यशिशोरनुग्रहात्मकर्म कुर्यात् | ततो द्वावे मण्डलकं
विधाय प्रणवेन दर्भमासनं दत्वा तत्र
शिष्यमूर्द्धकायमुदङ्मुखं कृताञ्जलिं सन्निवेश्य स्वयं
प्राग्वदनः शिवाम्भसास्त्रेण प्रोक्षयेत् | भस्मनामूर्ध्न्यस्त्रेण
सन्ताड्यास्त्रदर्भणनाभे मुर्द्धमधश्च त्रिधात्रिधासमुल्लिख्य
सकलीकृत्यास्त्र प्रोक्षित कवचावगुण्ठित मूलमन्त्र संस्कृत
वस्त्रेण नेत्र बन्धविधाय प्रवेश्य पुष्पक्षेपं कारयित्वा
भगवन्तं दर्शयेत् | तदनु दक्षिण दिग्भोगे मण्डल प्रणवासनं
विधायोपवेश्यधारणान्ति देहशुद्धिं सकलीकरणञ्च कृत्वा
शिवहस्ते मन्त्रात्सम्पूज्य तेजारूपं ध्यात्वा शिष्यमस्तके
सन्निवेश्य मूलमन्त्रं समुच्चरन् सर्वाङ्गालभनङ्कुर्यात् | ततः
कृतशिव नमस्कारं कुण्डं समीपगानीयात्मनः सव्यदिग्भागे
मण्डलं विधाय प्रणवासनन्दत्वा तदुपरि शिष्यं सन्निवेश्य
सम्पाताभिहुतं कृत्वा दर्भमूलं मूलमन्त्रेण शिष्यकरतल
दत्वा दर्भाग्रं स्वजघा सन्धौ नियोज्यैडा पिङ्गलामध्यनाडीः
शिष्य देहाद्विनिःसृत्य स्वनाड्याम्विलीनेति सम्भव्य
नाडीसन्धानार्थमाहुतीत्रयं मूलमन्त्रेण देयं | तयो
चैतन्यग्रहणाय प्रवेशनि विधातव्यौ | तदनु शिवहस्त
स्थिरीकरणामूलमन्त्र तर्पणायाहुति शतमङ्गानां दशांशेन
पूर्णाहुतिञ्च दत्वा प्रायश्चित्त निमित्तं मूलमन्त्रेण
शतमष्टोत्तरं दत्वाशूद्रादि जातिभ्य आहुतित्रयेण जातिमुद्धृत्य
द्विजत्वा पादनेध्याहुतित्रयं जुहुयात् | ओं ह्यौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मा योनि वीजाङ्कार भावदेश शुद्धो द्विजोभवतु |
रुद्रांशा पादनेध्याहुतित्रयं दत्वा भगवन्नस्यात्मारुद्रो
भवतु | ततश्चास्त्रेण प्रोक्षणताडने कृत्वा रेचकेन शिष्यदेह
प्रविष्य विश्लेषच्छेदावस्त्रेण विधायांकुश
मुद्रयातच्चैतन्यमाकृष्य द्वादशान्ते समानीय ध्रुवेन
सम्पाद्य ओं हं ओं संहारमुद्रया स्वहृदये पूरकेण प्रवेश्य
कुम्भकेन समरसी कृत्य रेचकेन ब्रह्मादि देवताः | सन्त्यज्य
द्वादश्यन्ते ध्रुवाश्चयोरष्टा लिङ्गानि विदध्यात् |
स्च्. ४)
वाहुवीष्यन्तर द्वारसम्बन्धकोष्ठकत्रयेण पीठं तदुपविततः
कोष्ठकत्रयेण दक्षिणोत्तरकोष्ठ द्वयस्य बाह्यैकैक
रेखालोपात्मध्यकोष्ठकैकेन कठं तदुपरि च कोष्ठकत्रयेण
जलपट्टं तदुपरिकण्ठवल्लिङ्गमव सर्वाण्यपि लिङ्गानिविधाय
कोणेषु कर्णकोष्ठकान् लतार्थं संरक्ष्यलता लिङ्गान्तराल
शेषरेखा विलाप्यतदुपरि ततोद्वरित कोष्ठकेषु वीथी पीठ पद्मानि
सर्वतोभद्रवकुर्याल्लता लिङ्गोद्भवे || ० ||
चतुरस्रे पञ्चमां शत्यागसूत्रन्तसूत्रेण पश्चिम वाहुमध्यस्थ
सूत्रभ्रमणेनार्द्ध चन्द्रं || ० ||
चतुरश्र क्षेत्रमष्टधा विभज्य चतुःषष्टि
कोष्ठकान्सम्पाद्यैककोण स्थित षोडश कोष्ठकेषु प्रतिदिशं
वाह्यकोष्ठकत्रयस्य वाह्यरेखाः संस्थाप्य
मध्यमध्यरेखात्रय लोप्यवन्मुष्टपि कोणकोष्ठकोषु वर्तितेषु
पञ्चमं स्वयमेवाभिव्यज्यते स्वस्तिके || ० ||
चतुरस्रं चतुर्द्वा विभज्यकोणभ्यष्टकेषु गर्भहस्तं संस्थाप्य
कर्णार्द्धास्थांशं
संत्यज्य गजकुम्भवद्द्वयं निष्पाद्यमध्यसूत्रे हस्तं दत्वा
दक्षिणोत्तर भ्रमसूत्रं पूर्वान्तं नीत्वा योन्याकारं कृत्वा
कुम्भद्वयान्तः पद्मसंमुखंद्वारं योन्याकारे || ० ||
चतुरश्रे त्रिधाविभक्ते संसक्तानि नवपद्मानि संसक्ते नवनाभे ||
० ||
पञ्चधा विभक्त पञ्चविंशति कोष्ठकान्संपाद्य दिक्षु विदिक्षु च
वाहुरेखा संलग्नकोष्ठकाष्टकं मध्यमञ्च नवमं
संस्थाप्ये शेषान्तकोष्ठ षोडशलोपेन संसक्त ससक्तानि
नवपद्मानि कुर्यात् संसक्ता ससक्तके | एतत्मण्डलद्वयमपि
द्वारादिरहितं || ० ||
सप्तधावा विभज्यैकोन पञ्चाशत्कोष्ठकान् सपाद्यवहिर्भागैकेन
चतुर्विंशति कोष्ठकैः समन्त्राद्वीथिं निष्पाद्योद्वरित
पञ्चविंशति कोष्ठकेषु पूर्वादिदिक्षु कोष्ठकं नवमञ्च
मध्ये संस्थाप्य षोडशकोष्ठकलोपेन वीथीका
चतुष्टयान्तर्नवपद्मान्य संसक्तानि कृत्वा वीथ्यनुगतान्यष्टौ
द्वाराणि चा संसक्ते | एवं त्रिप्रकारं नवनाभं || ० ||
चतुरश्रं क्षेत्रं तत्सत्विषु सत्व्यन्तरेषु च द्वात्रिंश सूत्राणि
दत्वा तृतीय वृत्ते सत्व्यन्तर सूत्राद्वहिः पार्श्व
भ्रमणेन षोडशार्द्ध चन्द्रात्कृत्वादिक्षु विदिक्षुर्द्व चन्द्रद्वयं
मध्ये चतुर्थ वृत्ते दलाग्राणि तृतीय वृत्ते दलसन्धी द्वितीय वृत्ते
केशराग्राणि प्रथमवृत्ते तद्वृत्त प्रमाणां पीतां कर्णिकां
तन्मध्ये नीलवर्णानि नवबीजानि मूलमध्याग्रेषु शुलरक्तपीतं
केशरजालं दलानि च प्रतिवारणया सहशुक्रवर्णानीति पद्मं
निष्पादयेत् | तच्चाभ्युन्नत दलाग्रं भुक्तिकामस्य प्राञ्जलं
मुक्तिकामस्यस्मारादि यागेतीक्ष्णाग्रं दिक्कालानां मन्दराग्रं
विद्येश्वराणां ग्रहाणाञ्च गोकर्णाग्रं गणानां
मण्डलाग्रमश्वत्थ यन्त्रकं गौरी सरस्वत्यादीनां विधेयं
कर्णिकार्द्ध समं वहिः पीठं नीलसन्धानकीलकोपेतं
श्वेतरक्तपीतकृष्णपादकं विचित्रगात्रकं विधाय बद्ध हि वीथी
वीथी मूत्राद्द्वारार्द्धेन द्वारकण्ठं ततो दक्षिणोत्तरे निःसृतं
तावदेवोपकण्ठं तदर्द्धं तावदेव कपालं तस्माद्दक्षिणोत्तर
मन्त्रः संमुखे
* ताव देवोप कपालं बहिः शुक्लरक्तकृष्णरेखात्रयं
सत्वरजस्तमोरूपं कृत्वैतारेखाः प्रथमाङ्गुल प्रमाणा
अन्ययवान यवान्तराश्च सर्वामुक्तिकामस्य भुक्तिकामस्य च सर्वाः
समाः कार्याः | द्वारकण्ठोपकण्ठकपालोपकपाल रेखाः
संरक्ष्य प्रतिकोण शेषरेखाः परिलोपयेत् | सर्वतो भद्रे
सर्वमण्डलेषु पद्मद्वाराण्यः | नैवमार्गेण कर्तव्यानीति || ० ||
इदमेव सर्वतोभद्रं कोणस्थ कोष्ठक षट्कमध्यात्मध्यस्थ
कोष्ठैकैक लोपेन भद्रम्भवति | शानिष्टेन श्वेतं तदैव
हरिद्रान्वितं पीतं सिन्दूरधात्विष्टकादिना रक्तं दग्वयवादिन
कृष्णंशुष्कसमीपत्त्रादिना नीलं तद्वर्णकार्थं रजः कार्यं |
विशेष सिद्धिकामः मुक्ता चिद्रुमादिना एतदेव कुर्यात् || ० ||
चतुरश्र क्षेत्रं चतुर्दिक्षु विंशति विभागैर्विभज्य कोष्ठक
शतचतुष्टन्निष्पाद्यसमन्ता द्वाह्यपङ्क्तौ वीथीं
विधायतदनन्तर पङ्क्तिं चतुष्टये प्रतिपङ्क्तिकोष्ठकद्वयपरिलोप्ये
चतुर्क्षु द्वाराणि कुर्यात् | वीथीद्वयान्तर्द्वारानुगतानि
स्च्. ५)
तपसम्थाव्य तत शुद्ध्यर्थमाहृतीर्दश दत्वामलादि श्लेषं
संकल्प्या पुनर्मूलेनाहुति त्रयं जुहुयात् | कर्मणो
विशुद्धस्याप्यत्यन्ता भाव * यं? विश्लेषं सञ्चिन्त्याहुतित्रय दत्वा
भगवन्तस्यात्मनोमायामलकर्मरूपस्य पाशत्रयस्य विश्लेषं कुरु
२ इति | एवं पाशत्रय विश्लेषो दीक्षा | पाशच्छेदो
निवृत्तिपाशस्यमलादि तत्वादिव्यापकस्यास्त्रेणाहुति त्रयं
दत्वाकाराः तदनु मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दद्यात् |
भगवन्तस्यात्मनो निवृत्तिपाशच्छेदं कुरु इति | अशेष शरीर विनाशे
चैतन्यस्यैकत्वं सङ्भाव्य वौषड्जाति युक्तेन मूलेन पूर्णाहुतिं
दद्यात् | तदनु ओं ब्रह्मणे नम इत्यावाह्य सम्पूज्याहुतित्रयं
दद्यात् | ओं ब्रह्म न शब्दस्पर्शौ गृहाण स्वाहात्याहुतित्रयं दत्वा
श्रावयेत् कारणे शत्वयानास्य यातु पदमनामयं | प्रतिव *
निधातव्यः प्राज्ञैषा पारमेश्वरी ब्रह्मादिकारणानाज्ञान्दत्वा
विसर्जयेत् | एवं शुद्ध तत्वाग्र सं
शुद्धस्फटिकमणि रू *? वृत्तिकलाजाल निर्मुक्तं
संचिन्त्यमूलेनाहुतित्रयं दत्वा समुद्वरेत् | ओं हौं शिवाय स्वाहा
| भगवन्तस्यात्मनो निवृत्तिकलापाशादुद्वारं कुरुर्वित्युद्वृत्य
संहारमुद्रया पूरकवृत्त्या आत्मस्थं कृत्वा रेचकेनोद्वरित शिष्य
सूत्रदेहे प्रवेशयेत् | स्थिरिकरणार्थमाहुतित्रयं दद्यात् |
तदनुवागीश्वरीं सम्पूज्य ओं वागीश्वर्यै स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा
विसर्जयेत् | कला सन्धानं शुद्धाशुद्धविभागेन द्विरूपं
कार्यं शुद्धं ह्रस्वमुच्चार्या शुद्धं दीर्घमुच्चरेत् | ओं ह्लं
ह्वीं निवृत्ति प्रतिष्ठाभ्यां नमः इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा
शुद्धमशुद्धे विलीनं सम्भाव्य द्वितीया कलामुपस्थापयेत् |
आदौशक्तिस्ततस्तत्वं वागीशीयनेकता | शिष्यस्य चेतनादानं
योजनं सर्वयोनिषु || गर्भजन्मदेश्वर्यं तद्भोगापादनं तथा |
लयोनिष्कृति विश्लेषौमल हस विनायुगपत्संयोगं कुर्यात् |
ततो मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय दत्वा | ओं हौ
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वासुयोनिषु युगपरं * * *? कुरु
कुर्विति | * * *?र्व गर्भनिष्पतय मूलैनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वासुयोनिषु गर्भनिष्पत्तिं
कुरुकुर्विति ततश्चन नार्थमूलेनाहुतित्रयं विधाय ओं हौं शिवाय
स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वगर्भाणाञ्जनन कुरु कुर्विति |
सर्वशरीराणां पुगपद्वृद्धिं सम्भाव्यभोग निष्पत्तये
प्राक्कर्मागमिकं चैकस्थं सर्वयोनिशरीरेषु भगदायकं
कर्मार्दुनश्च भावयित्वा मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय
स्वाहाभगवन्नस्यात्मनो नानाभोगदायकं कर्मार्जुनं कुरु २ इति
| लोकधर्मिकायां प्राक्कर्मागामिकं धर्मरूपं कर्मार्जुनं
सम्भाव्याहुतिदानं कर्तव्यं साधक दीक्षायां प्राक्कर्मैकं
सम्भाव्योदभिदानं विधेयं | तदनुदेशाकलसरीर विषयभेदेन
नानारूपं प्रागागामिककर्मवासनाजनितं भोक्तृत्वा
सितेह्यात्मनि
सुखदुःख * *? त्मकं भोगं सञ्चिन्त्य मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं
देयं | ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्तस्यात्मनः सर्वत्र
भोगनिष्पत्तिं कुरुकुर्विति लोकधर्मिकायां
प्रागागामिकधर्मजनितं देशकालशरीर विष भेदेन नानारूपं
भोगं सञ्चिन्त्याहुती दद्यात् | साधकदीक्षाया प्राक्कर्मणैव जनित
देशकालशरीर विषयभेदेन नानारूपं भोगं
सञ्चिन्त्याहुतिदानं कर्त्तव्यं | लयमत्रभागेषु परमप्रीति
रूपमनुसन्धाय मूलेनाहुतित्रयं दद्यात् | ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्तस्यात्मनौ भोगेषु परमपरमप्रीतिरूपं कुरु २ इति |
निष्कृतौ जात्यायुर्भोगसंस्कारादि शुद्ध्यर्थ हृदयेनाहुतिशतं
हुत्वा पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्रय दद्यात् | ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवत्तस्यत्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरुकुर्विति |
भोगाभावेमायापाशाद्बहिर्निष्ब्रुणमरूपं विश्लेषं
सम्भाव्य मूलनाहुतित्रयं दत्वाभोक्तृत्वं विषया सक्तिर्मलकारा
स्च्. ६)
मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यत्मानः
कर्मणो विश्लेषं कुरु २ इति पाशच्छेदः प्रतिष्ठापाशस्यमलादि
तत्वादि व्यापक * *?शास्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा कार्यः
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुति त्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः प्रतिष्ठापाशच्छेदं कुरुकुर्विति
विज्ञाप्याशेषं शरीरभङ्ग चैतन्यैकत्वं सम्भाव्य पूर्ववत्
पूर्वा दद्यात् || तदनु ओं विष्णुवे नम इत्यावाह्य संस्थाप्य
सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा ओं विष्णवै पूर्यष्टक सङ्गृहाण
स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्द्विसर्ज्जयेत् |
उद्धाराथमाहुतित्रयं दत्वा | ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः प्रतिष्ठा परिणादुद्धारं कुरु २ इति स्वदेहस्थ
शिष्यदेहस्थञ्च पूर्ववत्कुर्यात् | वागीशीम्पूजयित्वा आहुतित्रयं
दत्वा विसर्जयेत् | कलासन्धानं पूर्ववत् | ओं ह्रीं ह्रं प्रतिष्ठा
विद्याक्यान्नम इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा विद्यामुपस्थापयेत् || ओं
ह्रूं विद्यायै नम इति संपूज्याहुतित्रयं दत्वा तस्या व्याप्ति *?
लोकयेत् |
मायान्तानि तात्वानि एकोन सप्तवर्णाः सप्ताविंशतिर्भुवनानि
पदानां विंशतिकः मलकर्म मायारूपञ्च सर्वयाव्याप्तं
यश्चिन्त्य वागीशीं सर्वयोनि व्यापिकां समावाह्य संस्थाप्य
सम्पूज्याहुति त्रयेण सन्निधीकृत्य शिष्यस्यास्त्रेण प्रोक्षणताडन
प्रवेशच्छेदोत्कर्षग्रहणानि विधाय भवमुद्रया सर्वयोनिषु
संयोगं कृत्वा मूलेनाहुतित्रयं दद्यात् | ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः सर्वयोनिषु संयोग कुरुकुर्विति संयोजयेत् | एवं
गर्भाधानादि लयान्तं कर्मकृत्वानिष्कृतौ शिखयाशतहोमं
कुर्यात् | ओं हौं शिवाय स्वाहेति पुनर्मूलनाहुतित्रयं दत्वा
भगवन्नस्यात्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरुकुर्विति विश्लेष
पाशच्छदौ पूर्ववद्द्रष्टव्यौ पूर्णाहुतिरपि तथैव | तदनु ओं
रुद्राय नम इति संपूज्याहुतित्रयं दत्वा ओं रुद्ररूपगन्धौ
गृहाण स्वायेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् |
उद्धारमात्मसंस्थं तन्स्थञ्च पूर्ववत्कृत्वा वागीशीं
संपूज्याहुतित्रयं दत्वा विसर्जयेत् योजनः ||
पाशच्छेदौथ पूर्णाचकारणेश समर्प्यणं | उद्धारोग्रहणं
वैक्यं शिष्यदेहे नियोजनः || विसर्जनश्च वागीश्याः शुद्ध
तत्वावलोकनं | कलां संपूज्य पुनः शक्तिपूजनं || ० ||
ओं ह्वीं प्रतिष्ठायै नम इत्यावाह्य संस्थाप्य संपूज्याहुतित्रयं
दत्वा व्याप्तिमवलोकयेत् | षाढ्यत्रयं मल सन्धाय
कर्ममायारूपं भोक्तृत्व भोगशरीरादि जनकं प्रतिष्ठाकलया
व्याप्तं सम्भाव्य तदनु
प्रकृत्यन्तमध्वानं षट्पञ्चाशङ्भुवनानि पदानामेक विंशति
वर्णात्रयोविंशति मन्त्रत्रयं प्रतिष्ठया व्याप्तं सञ्चिन्त्य ओं
हौं शिवाय स्वाहेत्याहुतित्रयं दद्यात् | भगवन्मलादि तत्वादि
प्रतिष्ठाकलायां सन्निधी कुरु २ इति || ततः प्रकृत्याद्यप्तत्वान्ते
ध्वनियोनिर्नानारूपाः संस्थाप्येतद्व्यापिका वागीशीमावाह्य
संस्थाप्य संपूज्याहुति त्रयेण संनिधीकृत्य शिष्य
प्रोक्षणताडन प्रवेशच्छेदना कर्ष ग्रहणानि पूर्ववत्कृत्वा
पूरकेणात्मस्थं
* *? कुम्भित्वा संरेच्यद्वादशान्तान् संगृह्य भवमुद्रयो सर्वासु
योनिष्ठनेक व्यक्तिरूपेणात्मना योगं कुर्यात् | ततो
मूलेनाहुतित्रयं हुत्वा ओं हौं वायता *? भगवन्तस्यात्मनः
सर्वासु योनिषु यागं कुरु २ पाशगर्भाधानं कुरु २ एवं
जननादिष्वधि योज्य निष्कृतौ शिरसाहुतित्रयं हुत्वा
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरु २ इति
भोगाभावे मायापाशाद्वहिर्निष्क्रमणरूपं विश्लेष संभाव्य
हृदयेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हां हृदयाय स्वाहेति
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्र्यं पदत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्तस्यात्मनो मायापाशाद्विश्लेषं कुरु २ इति
पुनर्मलकार्याङ्गीन्कृत्वाद्वहिर्निः शरणं विश्लेषं संचिन्त्य
मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हां शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनोमलपाश विश्लेषं कुरु २ इति कर्मणो
विशुद्धस्याप्यन्तन्ताभावरूपं विश्लेषं सञ्चिन्त्य
स्च्. ७)
निधानाया हुतित्रय दत्वा शिष्यस्य प्रोक्षणताडनादिकं कृत्वा
तद्योनिषु योगं कुर्यात् | गर्भाजन्म तदैश्वर्य
तद्भोगापादनलयेषु पूर्वोक्तावधि * *?भिस्त्रिभिराहुतिभिः शुद्धि
कुर्यात् | निष्कृतौ मूलमन्त्रेण शतहोमं दत्वा शान्त्यतीतादि
पाशेभ्यो निःशरणरूपं विश्लेषं सञ्चिन्त्यमूलेनाहुतित्रयं
दत्वा तच्छान्त्यतीत पाशस्य मलादितत्वादि व्यापकस्य
प्रणवेनाहुतित्रयं दत्वा विच्छेदं विधाय मूलेनाहुतित्रयं
दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः शान्त्यतीत
पाशच्छेदं कुरु कुर्वित्युच्चार्य पूर्ववत्पूर्णां विधायतदनु
कलानां शुद्ध्यवसाने निविजदीक्षायां समय समयाचार
पाशमुपस्थाप्यशोधयेत् | ओं समयसमयाचार पाशाधिपेभ्यो
गणेभ्यो नम इत्यावाह्य संस्थाप्ये संपूज्याहुति त्रयेण
सन्निधीकृत्य ओं हौं शिवाय स्वाहेत्याहुति शतमष्टोत्तरं दत्वा
पूर्णाहुतिञ्च विधाय भगवन्नस्यात्मनः समयसमयाचार
पाशशुद्धि कुरु कुर्वित्युच्चरेत् | ततः ओं हौं सदाशिवाय नम
इत्यावाह्यस्था धा? संपूज्याहुतित्रयं दत्वा |
ओं हौं सदाशिवाय पूर्याष्टकांशं सनः संगृहाण
स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् | तदनु ओं ह ओं रेचकेन
शान्त्यतीत पाशात्संगृह्य शुद्धमत्यन्तनिर्मलमात्मस्थं
शिष्यस्थञ्च कृत्वा शिरास्युदक विन्दुं दद्यात् | वागीशीं संपूज्य
संतर्प्य विज्ञाप्य भगवति पश्वर्त्थां खदितासि गच्छेदिदानीं
स्वविषयं शान्त्यतीत कलां शक्तितत्वे विलीनां सम्भाव्य
मायातत्वान्तमात्म तत्वमुपस्थापयेत् | ओं हां आत्मतत्वाय नम इति
संनिधिकृत्य ओं हौं शिवाय स्वाहेति षशब्दोद्धारणाहुतिशतं
जुहुयात् | अविधि वैकल्य कर्मशुद्ध्यर्थं | एवं सदाशिवान्त
विद्यातत्वमुपस्थाप्य उपांशूच्चारेणाष्टोत्तरशतं हूत्वा
मन्त्रोच्चारवैकल्याच्छुध्यति | तदनुशक्त्यन्त शिवतत्वमुपस्थाप्य
मानसोच्चारयोगेन शतमष्टोत्तरं हुत्वामनो वैकल्याच्छुध्यति
तदनु आध्वान्तस्थां सर्वाध्व व्यापिकां कारण रूपां शक्तिं
तदग्रे शिष्य चैतन्यं च शुद्धमणि प्रख्यन्सञ्चिन्त्य शिखया
कर्तरीमभिमन्त्र्य शिखयाशिखांभि *?
कलासन्धानं ह्र * *घं? विभागेन | ओं ह्रूं ह्यैं
विद्याशान्तिभ्यां नम इति सन्निधानार्थमाहुतित्रयं दत्वा
शान्तिमुपस्थापयेत् || ० ||
ओं ह्यैं शान्ति कलायै नम इत्या वाह्यसंस्थाप्य संपूज्य
तत्सन्निधानायाहुतित्रयं दत्वा ततः प्रोक्षणताडनच्छेदना
कथैव? हणयोजनगर्भज व्यापिकारभोग लयान् पूर्ववत् कुर्वीत |
अधिकार शान्तिकलायां शुद्धकर्मार्जनरूप योजानादिषु
मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं सर्वत्र पृथक् २ देयं | निष्कृतौ
शतहोमं कवचेन विधाय तदनुमूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनो निष्कृतौ सर्वपाश शुद्धिं
कुरुर्वित्युचार्य मायायाभोगाद्वहिः निष्क्रमणरूपं विश्लेषं
सम्भाव्याहुतित्रयं देयं | ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मना भागाद्विश्लेषं कुरुकुर्वित्युच्चरेत् | एवं
मलकर्मणोरपि विश्लेषायाहुतित्रयं देयम् |
पाशच्छेदौऽस्त्रेणाहुतित्रयं हुत्वामूलेनाहुतित्रयं हुत्वा देयं
| ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्न सासने |
ममादि तत्वादि व्यापकस्य बुदं कुरुकुर्वित्युच्चरेत् | ततः
पूर्ववत्पूर्णां दत्वात्थं इश्वराय नम इत्यावाह्य संस्थाप्य
संपूज्याहुतित्रयं इश्वराय वुद्ध्यहङ्कारौ गृहाण स्वाहा
इत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् | ततः
शान्तिपाशादुद्वृत्यात्मस्थ तत्स्थञ्च कुर्यात् |
मूलेनाहुतिभिस्तिसृभिः | तदनु वागीशं सम्पूज्य सन्तर्प्य विसर्ज्य
ह्रस्वदीर्घ विभागेन कलासन्धानं कुर्यात् | ओं ह्यैं हौं
शान्तिशान्त्यतीताभ्यां नम इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा
शान्त्यतीतामुपस्थापयेत् || ० ||
ओं हौं शान्त्यतीतायै नम इत्यावाह्य यो वाह्यसंस्थाप्य संपूज्य
संनिधानायाहुतित्रयं दत्वा व्याप्तिमवलोकयेत् | तत्वानुरूपं
मलकर्मा स्थित्वं सम्भाव्य तस्यां शक्त्यन्तोऽध्वा षोडशः
वर्णास्त्रयोमन्त्राः पदमेकं भुवनानि पञ्चदशविन्दुनादशक्ति
कलारूपाणि शान्त्यतीतया व्याप्तानी | *?सन्निधानायाहुतित्रयं
मूलमन्त्रेण दत्वा विन्दुनादशक्तिकलायोनि व्यापिकां वागीशीं
समावाह्य संस्थाप्य संपूज्य *?
स्च्. ८)
समयाचारश्च तत्र मन्त्रतन्त्रकल्यान दीक्षितान्न श्रावयेत् | नापि
तत्पार्श्वलेखयेत् | अवतरित शक्ति कलादीक्षा * * * * * * * *?त्रिविरेक कालं
वा शिवं वह्निश्च पूजयेत् | शिवसहितानां जपेत् | देवाग्नि गुरुणाम
निवेद्यनाश्नीयात् | यथा शक्तिर तिथि दानात्व
कृपणेभ्योऽम्नादिकन्दद्यात् | श्वेकाकादीनाञ्च क्षिपेत् |
पानभोजनादिकं कांसभाजनेन कुर्यात् | पर्वसुविशेष पूजां
शिवे गुरौ च कुर्यात् | आचार्यादीन् सदा भजेत् | अष्टमी चतुर्द्वशी
पञ्चदशीषु मत्स्यमात्स स्त्री तैलक्षुरकर्मवर्जयेत् | नक्तमेक
भक्तम्वा कुर्यात् | भीतत्रस्त्राध्व खिन्न विह्वलरोगि
संमयज्ञाभवभक्ता प्रपालयेत् || ० ||
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तपद्धतौ
दीक्षाविधिः समाप्तः || ० ||
अथ साधक * *? यानि वृत्त्यादिकलात्रयं संशोध्य ततः
शान्त्यतीतां शोधयेत् | अनन्तरं पञ्चमन्त्रतनुं सदाशिव
ध्यात्वामूलन्त्रेण पूर्णाहुत्या शान्तिक * *? योज्य
ओं हौं आत्मन अनिमाते भवतु स्वाहा | ओं हौं आत्मन्महिमाते
भवतु स्वाहा | ओं हौं आत्मनलघिमाते भवतु स्वाहा * * * * * * *?
| ओं हौं आत्मन् प्राकाम्यन्ते भवतु स्वाहा | ओं हौं
आत्मन्नीशित्वं भवतु स्वाहा | ओं हौं आत्मन्वशित्वं भवतु
स्वाहा | ओं हौं आत्मन्यत्र कामावशायित्वंते भवतु स्वाहा
इत्याहुत्यष्टकेन गुणाना पाद्ययश्चभिः कलसैर्निवृत्त्यादि
कलान्यस्तैः साध्यमन्त्र पूजितैस्तनैवाष्टोत्तर शताभिमन्त्रिते
निवृत्ति प्रतिष्ठा विद्या कुम्भैरा * *? वदन्ति पिच्य ततः शान्त्यतीतया
पुनः शान्तिकलाकलसेनाभिषेचयेत् | अनन्तरं देवस्य दक्षिणे
श्रीपर्णादिनिर्मिते पीठे संस्थाप्य सकलीकृत्योष्णीष
सहितमधिकारं दत्वा साध्येमन्त्रमुच्चार्य पुष्पोदकान्वितन्तस्य
हस्त समर्पयेत् | ततः समन्त्रं हृदि निवेश्य कुण्डसमीपं गत्वा
साध्यमन्त्रसहितां सन्तर्प मण्डलकुम्भ वह्निदक्षिणपद्म पत्रे
साध्यमन्त्रं सम्पूज्य लब्धानुज्ञः स्वगुरोरष्टाङ्ग प्रणितिं
विधायमन्त्राराधनं कुर्यात् | तत्र पुण्यकाले स्वानुकूल मुहूर्ते
सूलभ
ततः शिष्यः स्नायादाचार्यश्चाचमनादिकं कुर्यात् | पुनरन्तः
प्रविश्य सकलीकृत्य * * गोमया यावष्ट्य पूर्ताहुत्या वह्ना निक्षिपेत् |
ततो वहिर्न्निःसृट्यश्रुक् श्रुवौ कर्तरीश्च प्रक्षाल्या चम्पसकलीकृत्य
शिवं संपूज्य तदनु भगवन्नस्यात्मनोऽध्व शुद्धिः
शिखाच्छेदान्तात्वत्प्रसादात्मया कृतायात्वयं परमं धामेति
विभुमनुश्राव्य प्रोथयेत् | इदानीं शिष्यं संयोजयामि
आज्ञामदीयतां प्रभो | इति प्राथ्य एव कुर्वित्यनुज्ञातः
प्रहृष्टाऽर्घपात्रमादाय शिष्यमाहूयाग्नि सदनयायात् | तत्र
पूर्ववच्छिष्य प्रोक्षणन्सकलीकरणान्त करणनाडी
सन्धानमन्त्रतर्पणानि सकलीकरण मन्त्राणां एकैकाहुति दानेन
सकलीकरणसाधनं कृत्वा शिवात्मनि शिष्यचैतन्यं योजयेत् |
तत्राचार्या विद्यातत्वमास्पन्दं सञ्चिन्त्य विन्दु तत्वासनासीनः |
इन्धिका दीपिकारो विक्रामोविका ऊर्द्धगामिनी सूक्ष्मसुसूक्ष्म
अमृतामृता शक्तिकल्पतनुर्व्यापिनी ध्यानरूपा
अनन्ता अनाथा अनाश्रितेति कलाबहिः करणः समनान्तः करणः
शुद्धात्म तत्वं उन्मन शिवेति तत्वत्रयेणा पूरित तनुः
पूरककुम्भको कृत्वे जिह्वान्तालुके संयोज्य इषद्व्यावृत
वक्त्रोदन्तैर्दन्ता न स्पशन् समुन्नत कायः शिष्यात्मानमात्मनि
संयोज्य सुषुम्नायां नाडी प्राणावायूनेकी भूतात्सञ्चिन्त्य तत्र
शिष्यचैतन्यं शुद्धस्फटिक प्रख्यं संभाव्य मन्त्रमुच्चार्य
हृदयादि स्थितब्रह्मादिकारण त्यागेन परमशिवे शिष्यचैतन्यं
पूर्णाहुत्या वहिः कुम्भकेन संयोज्य ओं हूं आत्मन् सर्वज्ञो
भव स्वाहा | ओं हूं आत्मन तृप्तिर्भव स्वाहा | ओं हूं आत्मन
नादि वुद्धो भव स्वाहा | ओं हूं आत्मन् स्वतन्त्रोभव स्वाहा | ऐं
हूं आत्मन लुप्त शक्तिर्भव स्वाहा | ओं हूं
आत्मननन्तशक्तिर्भव स्वाहा | इति षड्भिराहुतिभिर्गुणानापाद्यार्थ
पात्रोदकेनाभिषिच्याष्टौ समयानु श्रावयेत् | महेश्वरतच्छास्त्र
गुरुसाधकादि निन्दान कार्यालिङ्गच्छायां न लघयेत् निर्माल्यश्च
न तदश्नियात् | रजस्वला स्पृष्टान्नं न भक्षयेत् |
मन्त्रितैः पश्चिमोत्तर दक्षिण पूर्वेश्वान दिस्थैः
पृथिव्यादिघटैर्मूलमन्त्रेणाभि पिच्यसिते वाससी परिधाप्य पुनः
पूजित देवश्य दक्षि * * * * * * * ? पण्ड्यादि विन्यस्त्र पट्ट
अनन्ताद्यासनं दत्वा संस्थाप्य सकलीकृत्य संपूज्य उष्णी वाम
कुटं च्छत्र पादुका चामरहस्त्यश्वसि विकादिराजाङ्गानि करणा क
* *?खटिका श्रुक्श्रुवौदर्भ पुस्तकाक्ष सूत्रादिकञ्च दत्वाज्ञां
श्रावयेत् अद्य प्रभृति दीक्षाव्याख्यादिकं ज्ञात्वा परिक्ष्य चत्वया
विधेयं | ततो भगवती च निवेद्या चार्यौ यं मया
कृतस्त्वत्प्रसादादधिकारं निर्विघ्नेन करोत्वि विविज्ञापयेत् | ततः
कृताचार्यः कुण्डे गत्वानिवृत्त्यादिकला पञ्चकं
पञ्चपञ्चभिराहुतिभिः सन्तर्प्य पूर्णां दद्यात् | ततस्तस्य
दर्भाल्मुकेन पञ्चभिरङ्गैर्दक्षिणकरे
कनिष्ठाद्यङ्गुष्ठान्तं लाञ्छयेत् | पुनर्भगवते प्रणिपातं * *
* * * *? वृत्तं क्षमापयेत् | सच नध्वाधिकारो
गुरुपारम्पर्यायातमधिकारं कुर्यात् | अथवा महता
मण्डलस्यान्तरस्यां ब्राह्मणान्पूर्व
* *भित्रि * *? विद्श्यान्वारुण्यां शूद्रान्सर्वात्वा इशान्यां दीक्षा
संस्कृतां विशुद्धकाया दशाहं द्वादशाहं वाक्यत गोमूत्र
स्नानान् क्षीरयवान्नभोजनान् गायत्री जप
निरतान्सत्यव्रतानभिषेकनक्षत्रेस्वानु कूलसतारे
चन्द्रमस्यभिषेचयेत् | तत्र ब्राह्मणादीनां यथा क्रमं
पञ्चचतुस्त्रिं द्विहस्तरजोभिश्च पञ्चवर्ण चतुर्वर्ण
त्रिवर्णद्विवर्णैरूपशोभितं मध्यलिखित द्वात्रिंशदङ्गुल
शुक्लपद्मं द्वात्रिंशदङ्गुलायाम षोडशाङ्गुल विस्तृत वाहनीय
द्वाराभिमुखं सर्वरजो युक्त पादपीठसहितं वाह्यस्थ चित्र
पत्त्रवल्लीद्वार मोक्ष कोणस्थ कन्दुकाद्युपशोभितं
स्वस्वदिस्थवाहनीय द्वारं पूर्वदिग्वाहित द्वारं वा
मण्डलमालिखेत् | तत्र वीष्पन्तरगतान्पूर्वादि क्रमेण शुक्लरजसा
अष्टो शङ्खानं आनन्दसुनन्दा निन्दिवर्द्धन श्रीमुख
विजयतारसुतारमज्ञान | सुभद्रविभद्रसु दन्तपुष्पदन्त जयविजय
पूर्वोत्तर संज्ञाश्च तथा विधात्कुम्भानालिखेत् | मण्डलस्या
परिधवलं विचित्रं वा किङ्किणी घण्टायुक्तं मुक्ता जीव
गवाक्षकोपेत
समित्पुष्पे कुशोदके देशेदष गणमातृलोकेस कीलितमनेकलिङ्गं
साधकान्त सिचित दक्षिणोत्तर दिग्वाद देवकुलं विद्वं परिहृत्यन
नाज्ञ क्षेत्र * हि प्रेतमन्त्र सिद्धयस्यं कृत्य प्रागस्तयागं निवर्ता
सहस्रं हुत्वा पूर्णाहुतिन्दत्वा क्षेत्रञ्चात्र तेजो हि व्याप्तं
समन्तात्सञ्चिन्त्य तद्दिक्षुलोकपालाधिष्ठितान् सङ्कुन्विन्यस्य
वर्मजप्तसूत्रेणमवेष्टवाह वीजान्यस्त जप्तान्यव कार्य तस्यमयी
रेखां रेखां रक्षां दत्वाय वतिलैः कवच प्राकारं विधाय
वलिं दत्वा सुष्टे लिऽऽगे विधिवत्मन्त्रदाप्य सपानगुण
सखश्चतुष्कालं पूजादिकमाचनेन? | क्षेत्रमासिद्धे रुपरित्यजुन्
क्षेत्रात्सम्पन्न सहायोपनीतं भजमानः | अति क्रमे प्राश्चित्तं
कुर्वाणोऽभिमत मन्त्रमाराधयेत् | यदि वा वाण लिङ्गस्वयम्भूत
विकल्प वासना रहितमुनिसिद्धामरप्रतिष्ठितेषु सर्वावत्वेन
साधारणत्वात्षट्भ्र? सङ्करोनास्त्यतस्तेषु शट्सम्बिना स्वमन्त्रं
विन्यस्य समाराधयेत् | विज्ञातमन्त्र प्रतिष्ठित लिङ्गेषु
मन्त्रात्समुद्धृत्य प्रतिष्ठा विधिनामन्त्रमारोप्याराधयेत् |
* * * * * * * * * ? लिङ्गं प्र * कमात्रिकां वा विन्यस्य हृदिपूरकेन
समानीयरेचकेन द्वादशान्ते लयनीत्वा * * * * * *? विधिनासु
मन्त्रविन्यस्य षण्मा * * * ? च * ? लिङ्गं परिगृह्न मन्त्रमाराधयेत्
| साधकागारेऽपि क्षेत्रवल्लोकेशादि यासः | प्रत्यहं प्रदोष देवि
पूजाक्षेत्रशीमासुच पर्वसु || ० ||
इति महाराजाधिराजशीभोजदेव विरचितायं सिद्धान्त पद्धतौ
साधकाभिषेक विधिः समाप्तः || ० ||
अथ? चार्याभिषेक विधिः सवीज दीक्षयादीक्षतस्य
श्रुतशीलगुणाचारं सम्पन्नमाचार्याभिषेकं कुर्यात् | तत्र याग
गृहेशान्यां मण्डलक स्वस्तिकादिरर्चितेऽनन्तास नन्दत्वा
मूर्तिभूतं शिष्यविन्यस्य सकली कृत्यं संपूज्य
कर्णिकोवनमृङ्कस्मादूर्ध्वागोमय गोलकसिद्धार्थधितायै
निर्मत्स्य पञ्चभिः कलसः सितचन्दन चर्चितः पृथिव्या वाक्य
शान्तविन्यस्तु पञ्चतत्वेर्निवृत्य कलासहितेराधार
शक्त्यादिपरमीकरणान्त नित्यं यावपूजितेषु समन्त्राष्टान्तर
शतानि *?
स्च्. १०)
सुशुक्ल वाससी परिधाप्य मण्डलस्य दक्षिणदिग्भागे
प्रागुक्तमण्डलमालिख्य श्रीपर्णादिकं सुवर्णादिनिर्मितं पट्टं
वासदशाहतसित वस्त्रच्छन्न विन्यस्य शिष्यमुपवेश्य सकलीकृत्य
मन्त्रैरालभ्य शुक्लपुष्पैः सम्पूज्यवर्ण नियमेन यज्ञोपवीतं
दत्वा अलङ्कारैरलङ्कृत्य भगवते निवेदयेत् | आचार्यायमेतस्य
भवात्प्रसादाद्वाञ्कितं भवतु | ततस्तं पुनरप्यासने
समुपवेश्य छत्तादीनिराजचिह्नानि समर्पयेत् | एवममनैव
विधिनाराज्यकामस्य भ्रष्टराज्यस्य पूत्रकामायाः शौभाग्य
कामायाश्चाभिषेकं कुर्यात् | अत्र च शङ्खादीनां मन्त्राः | ओं
आं इं ऊं आनन्दात्मने नमः | ओं आं इं ऊं सुनन्दात्मने
नमः | ओं आं इं नन्द्यात्मने नमः | ओं आं इं
नन्दिवर्द्धनात्मने नमः | ओं आं ऊं श्रीमुखात्मने नमः | ओं
आं इं ऊं विजयात्मने नमः | ओं आं इं ऊं तारात्मने नमः
| ओं आं इं ऊं तस्यात्मने? नमः | शङ्खमन्त्राः || ० ||
ओं आं इं ऊं सुभद्रात्मने नमः | ओं आं इं ऊं विभद्रात्मने
नमः | ओं आं इं ऊं सुदन्तात्मने नमः | ओं आं इं ऊं
पुष्पदन्तात्मने नमः | ओं आं इं ऊं जयात्मने नमः |
ओं सोम्या ऊं विजयात्मने नमः | ओं आं इं ऊं पूर्वात्मने
नमः || ओं आं इं ऊं उत्तरात्मने नमः | कलसमन्त्राः || ० ||
ओं आं इं ऊं सर्वरत्नभ्यो नमः | रत्नमन्त्राः || ० ||
ये ओं इं ऊं सर्ववीजे स्व इन्द्रात्मकेभ्यो नमोनमः || वीजमन्त्रः ||
० ||
ओं आं इं ऊं सर्वौषधिभ्यः सोमात्मकेभ्यो नमोनमः || ओषधी
मन्त्रः
|| ० ||
ओं आं इं उं सर्वगन्धभ्यः पार्थिवात्मकेभ्यो नमोनमः ||
गन्धमन्त्रः || ० ||
ओं आं इं ऊं सर्वमृद्भ्यः पृथिव्यात्मभ्यो नमोनमः ||
मृत्तिकामन्त्रः
|| ० ||
ओं आं इं ऊं न्यग्रोधात्मनेसुराधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं
ऊं पलाशात्मने तेजोधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं
औदुम्वरात्मने धर्मराज तोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं
सिद्धकात्मने रक्षोधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं
अश्वत्थात्मने सलिलाधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं
मधुकात्मने पवनाधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं
पृक्षात्मने यक्षाधिपतोरणाय नमः | ओं आं इं ऊं विश्वात्मने
विद्याधिपतोरणाय नमः || इति तोरण मन्त्राः || ० ||
इति महाराजाधिराज
मणिदामोपशोभितं सचामर पट्टावस्त्रोपेतं लम्बमान
प्रतिसरकन्दुकाद्यलं कृतं वितानं विदधीत |
मण्डलस्याभ्यन्तरं क्वचित्पद्मनी यन्त्रसञ्छन्नमन्तरालेषु
बहिश्च गौर सर्वपलाजा खण्डतण्डुलयवकृष्णतिल
दूर्वाकाण्डैरजोभिश्च चित्रकं कुर्यात् | तारणञ्चास्य
ध्वजकुशचीरकुसुमं मण्डितं वन्दनमालायुक्तं |
पूर्वस्यान्यग्रोधं दक्षिणस्यामौदुम्वरं
पश्चिमायामश्वच्छमुत्तरस्या प्लक्षं विनिवेश्य विदिक्षु
प्रशस्तद्रुमजात्मनि च निवेशयेत् | सङ्खान्कलसाश्च मूर्तिमतः |
गोरोचनारचित स्वस्तिकांकित कण्ठान्सर्वरन्नैः सर्ववीजैः |
जयाविजया जयन्त्य पराजिता विष्णुकान्ता शङ्खपुष्पीवलाऽति
वालाहेमपुष्पी विषालाना कुलीगन्धनाकुली सहासहदेवावराही
शतावरीमेदा महामेदा ऋद्धिवृद्धिका कोलीक्षीरकाकोली
जीवक ऋषभक संज्ञाभिर्यथा लाभमौषधीभिर्गन्धैरङ्भिश्च
पूरितान्वस्त्रस्रग्दाम कण्ठान् चन्दनोपलेपितान्
शतकृत्वाऽभिमन्त्रितान्योगपीठस्य बहिर्दिक्षु विदिक्षुस्थापयेत् | तत्र
आ * त आनन्दो नात्यायतः सुनन्दौ महाकुक्षिर्नन्दीसु नाभिर्नन्दि
वर्द्धनै |
ह्रस्वनाभिः श्रीमुखौ नाभिमण्डली विजयः सुनिर्घोषस्तारं
उत्तरस्वनः सुतारश्चेति शङ्खः कलसाश्च मन्दरः सुभद्रः
किञ्चिदुन्नतो विभद्रः पृथुलौष्ठः सुदन्तो ह्रस्वोष्ठः
पुष्पदन्तौमन्धर ग्रीवो जयः शोभनग्रीवो विजयः पूर्व ऊतर इति
मण्डलस्यान्तरोदुम्वरं सदशाहतं सितवस्त्रेच्छन्नं
भद्रासनं विन्यस्य तस्मिन् शिष्यं शंखतूर्यवाणावेणु स्वस्ति
पुण्याहवेद ध्वनिभिः कृतमङ्गलं पूर्वाद्वाराति मुखं
समुपवेश्य जातवीजसरावै विचित्र
मुखैर्गणैरञ्जलिकारकैनां ठौरभिन्न पुठकोल्काभिर्मत्स्य
वल्मीकाग्र पर्वताग्र नदीतीर महानदी सङ्ग सकुश विल्वमूल
चतुष्पथ दन्तिदन्त गोशृङ्ग एकवृक्ष गृहीताभिर्मृद्भिः
प्रथमन्ततः पञ्चगव्येन ततो विल्व पद्मकेशर प्रियङ्गु चूर्णेन
पञ्चपल्लव काषायैः सर्वगन्धैश्च संस्नाप्य प्रदक्षिणापनीतैः
पूर्वविन्यस्त कुम्भैः शिवतत्वमनुस्येरनभिषिञ्चेत् | ततः
स्नानवस्त्र परित्य * ?
स्च्. ११)
एक शिव इति भुवनपञ्चकं | रागे? क्रोधश्चण्डौ विद्यायां ज्योतिः
संवर्तौ कलायां स्वरपञ्चान्तकौ नियतौ एकवीर शिखेदौका *?
महातेजवामदेव भव *? तद्भव एकपिङ्गक्षण इशानभुवनेश
अङ्गुष्ठामात्र इति मण्डलेश्वराष्टकं मायायां एवं
भुवनानि सप्ताविंशतिः | पदानिविंशतिः | व्यापिन २ व्यामिन् २
चेतन अचेतन २ परमेश्वर परापर ज्योतिरूपाय सर्वयोगाधि कृताय
अनिधनाय गोप्ते गुह्यातिगुह्याय ओं नमो नमः सद्योजातमूर्तयः
वामदेव गुह्याय अघोर हृदयाय तत्पुरुष वक्त्राय
इशानमूर्द्धाय शिवाय सर्वप्रभवे ओं नमः शिवाय ध्यानाहायेति
व्यापिन्नादि ध्याना हा * *? न्तानि विंशतिः | एवं
पञ्चविधमध्वानं षष्ठया विद्याकलया
व्याप्तमेव षड्विधाध्व व्याप्तिः || ३९ ||
शान्तिकलायां पुनः शुद्धविद्या इश्वर शिवा?न्तं तत्वत्रयं
वर्णास्त्रयः श ख क इति मन्त्रौ तत्पुरुष कवचौ
भुवनान्यष्टादश | वामाज्येष्ठा रौद्रीकाली कलविकरणी वलविकर
ओं सौम्यायै न * *? सर्वभूतदमनी मनोत्मनीन्तानि
शुद्धविद्यायां | अनन्तसूक्ष्म शिवोत्तम एक नेत्ररुद्र त्रिमूर्ति
श्रीकण्ठशिखण्डि इत्यष्टौ भुवनाय नमः | तत्वे सदाशिव
भुवनं सदाशिव तत्वे एवं भुवनान्यष्टादश पदान्येकादश
नित्यं योगिने योगपीठ संस्थिताय शाश्वताय ध्रुवाय अनाश्रिताय
विधिनन्ताय शिवाय सर्व व्यापिने व्योमरूपाय व्योमव्यापिनेति नित्यं
योगिने नित्यादिव्योमव्यापिनेति पदान्तानि पदान्येकादशेत्येवं
पञ्चविधमध्वानं शान्तिकलया व्याप्तमेवं षड्विधाध्व
व्याप्तः | शान्त्यतीतायां पुनशिवतत्वं वर्णाः षोडशस्वराः |
विसर्गाद्यकारान्ताः शिव इशान अस्त्र इति मन्त्रत्रयं भुवनानि
पञ्चदशनिवृत्ति प्रतिष्ठा विद्याशान्तिशान्त्यतीत इति
विन्दुकलाभुवनानि इन्दिकादीपिकारो विकामोविका ऊर्ध्वगा योगिनीति
नादकला भुवनानि | व्यापिनी व्योमरूपा अनन्ता अनाथो अनाश्रिता इति
शक्तिकलाभुवनानि व्योमव्यापि मन्त्राद्योकारः पदमित्येकं
मलग्रन्थीनि द्विजकन्याकर्णित कर्पासादिक्षानित सूत्रजनितानि
विस्तारतोऽपि * * * * * * * * * * * * * * * * * * *?नि लिङ्गविस्तार प्रमाणानि वा
पवित्रकानि समादायार्घा *? प्रोक्षितानि मन्त्र * * * * * * * * * * ?रीत्वा
मृगाजिनादिनासदाद्यसंयुत्सरात्मकं सर्वकृत्येसाक्षिणमव्ययं
*?ध्नारसंश्रयं कर्मफलप्राप्ति निवर्तनं? शिवमलस्समरन्
मन्त्रसहितया एकविंशति कृत्वे घातादिभिर्हुतानि कृत्वा सूर्याय
गन्धपवित्रक चत्वासमाचम्य कृतसकलीकरणः कृतार्घपात्रौ
पाशगेय? वृषस्थान प्रासादानल सश्रयो * *कवातञ्च? त्रिसूत्र्या
समावेष्टनन्द्यादिभ्यो गन्धपवित्रकं दत्वा पूर्ववत्
प्रविश्यवास्तोष्येतये ब्रह्मणेय विडन्दत्वा भगवन्संस्कृतानि * * *?
देतानि कुम्भस्थाय भगवते समर्पयामीति विज्ञाप्ये च क्षणाय
तस्मै समर्पवतेभ्यः समादाय शिवकुम्भेऽस्त्र वर्णन्यां
गन्धप * * य * *? श्वर स्थलेश्वर इति भुवनाष्टकं गन्ध
तन्मात्रादारभ्या फट्कारान्तेऽध्वनि स्थितं | पैशाचं
राक्षसं याक्षं गान्धर्व चैन्द्रं सौम्यं प्राजेशं
ब्राह्ममिति देवताष्टकं बुद्धौ | अकृतं कृतं भैरवं
ब्राह्मं वैष्णवं कौमारं औमंग्रै कण्ठमिति योगाष्टकं
गुणप्रकृतौ | एवमष्टकैः सप्तभिः षट्पञ्चाशद्भुवनानि |
एकविंशति पदानि महेश्वर परमात्मन् शर्वसर्वशिव
निधानौद्भवनिधन अनिधन ओं स्वः ओं भुवं ओं भूः धू धू २
नाना २ अनादि अभस्म अधूम अनग्नि अरूपिणति २ तेज २ प्रथम २
अरूपिण २ इति महेश्वर पदादारभ्य अरूपिणान्तानि पदान्येका
विंशतिः | एवं पञ्चविधमध्वानं षष्ठया प्रतिष्ठाकल * *?
व्याप्तं सञ्चिन्त्यैवं षड्विधाध्व व्याप्तिः || २ ||
विद्याकलायां पुनः पुरुषरागविद्याकलानियति कालमाया एतानि
तत्वानि सप्तसप्तवर्णा ऌ ऋजभ * *? मन्त्र एकः शिखा | भुवनानि
सप्ताविंशतिः | वामभीम उग्रभव इशान एकवीर इति पुरुषे षट् |
प्रचण्ड उमापति अज अनन्त
स्च्. १२)
सञ्चिन्तनीयमिति षड्विधाध्व व्याप्तिः || प्रतिष्ठाकलायां
पुनरापस्तेजोवायुराकाश इति चत्वारि भूतानि | गन्धरसरूप
स्पर्शशब्दा इति तन्मात्रपञ्चक *?ष्कार्णि पादपायूपस्था इ
कर्मेन्द्रिय पञ्चकं | श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वाघ्राण इति
बुद्धिन्द्रिय पञ्चकं | मनोऽहङ्कारो बुद्धिरित्यन्तः करणत्रयं
| गुणाः प्रकृतिमिति चतुर्विंशति तत्वानि ह स ष श व ल र य म भ व
फ प न ध द थ त ण ढ ड ठ ट | एवं वर्णास्त्रयो विंशतिः |
शिरो मन्त्र वामदेवा घोरा इति मन्त्रत्रयं | षट्पञ्चाशद्भुवनानि
| अमरेशप्रभासनैमिष पुष्कर आषाढिदिण्डिमुण्डिभारभृति
लकुलीशमित्यष्टकमप्तत्वे | हरिश्चन्द्र
श्रीशैलजल्पेश्वराम्रातिकेश्वरममैश्वर महाकालकेदारभैरव इति
भुवनाष्टकं तेजस्तत्वे | गया कुरुक्षेत्र न ख ल क न ख ल
विमलेश्वर अट्टहास महेन्द्र भीमेश्वर इति भुवनाष्टकं *
स्त्रापदरुद्रकोटि अविमुक्त महालयगोकर्ण
भद्रकर्णस्वर्णस्वर्णाक्षस्थाणु इति भुवनाष्टकमाकाशे || भू
गलण्ड द्विरण्डमाकोटमण्डलेश्वरकालिञ्जर ओं सौम्यायै * *?
भस्म पश्चिमाया सद्योजातेन मृदमुत्तर * *? देवेन धात्रीफलं
जलञ्च ऐशान्यां पञ्चगव्यमीशेन होमद्रव्यं कुशाश्च सद्योजा
* * येन यां? | दण्डाक्षमाला कौपीनभिक्षा पात्राण्य घोरेण
दक्षिणस्या गोरोचना कुङ्कुमतैलं शलाकाकेया
शाधनमपरमध्यादशादि वामेना * * ? ताम्बूलं सान्नकं
तत्पुरुषेण पूर्वस्यां | आसनं पादुकेच्छत्रं
यागपटुकमीशेनैशान्यां विन्यसेत् | यच्चा सम्पन्नमेतेषां
तत्मनसा प्रकल्पयेत् | ततश्चराः शिवभागमस्त्रे प्रोक्षितं
कवचावगुण्ठितं हृत्मन्त्र सम्पूजितं धेनुमुद्रयाऽसृती कृअं
ब्रह्मभिर्भगवते निवेदयेत् | ततो हस्तात्प्रभृतिनवहस्तपर्यन्त
लिङ्गेषु नवसूत्रिका विनिर्मिताष्टाविंशतितं तुभ्यः समारभ्य
दशवृद्ध्योऽषोत्तरशतं यावल्लिङ्गानुसारेण रत्नजे च न लिङ्गेषु
अन्यथा शक्त्याष्टोत्तर शतनिर्मितानि एकाशीति तन्तुनि वा
पञ्चाशदष्टत्रिंशत् षट्त्रिशन्तन्तु निर्मितानि वा
कुङ्कुमादिरञ्जितानि तन्तु सङ्ख्याया
श्रीभोजदेव विचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ आचार्याभिषेकविधिः
समाप्तः || ० ||
अथ दीक्षोपयागि षट्द्विधाध्वा व्याप्तिस्तत्र पृथिवी तत्व क्षकारां
वर्णो हृदय सद्योजातौ मन्त्रौ कालाग्नि कुष्माडहाटक
ब्रह्मविष्णुरुद्र इति ब्रह्माण्डमध्ये षड्भुवनानि वहिश्च
शतरुद्रादयोदश दिक्षुर्व्यवस्थिताः | कपालीश अजोवुद्धो वज्रदेहः
प्रमर्द्दनो विभृतिरव्ययः शान्तापिनाकी त्रिदशाधिप इति
पूर्वदिग्भागे दश || अग्निरुद्रो हुताशः पिङ्गलः खादकोहरा
ज्वलनोदहनोवभ्रूर्भस्मान्तकः कृपान्तकः | इत्याग्नेये दशं ||
पास्य मृत्यूहसे? धाताविधाता कर्ता संयोक्ता वियोक्ताधर्म
अधर्मयतिः | इति पास्येदश || निर्दतिर्मारणोहन्ता
क्रूरदृष्टिर्भयानकः | ऊर्द्धगेहो विरूपाक्षौ धूम्रोलोहितो
दंष्ट्रवानिति नैरृते दश || वल अतिवल पाशहस्त महावलश्चेत
जयभद्रदीर्घ भद्र ओं * ? क मेघनादसुनादा इति वारुणे दश ||
श्रीघ्रलघुवायुवेगसूक्ष्मतीक्ष्णाक्षयान्तक पञ्चान्तक
पञ्चशिखकपर्दिमेघनादा इति अव्येदश
ओं सौम्यायै रूपवीन् धन्यः सौम्य देहोजंटाधरालक्ष्मीधरा
रत्नधरः श्रीधरः प्रासादः प्रकाश इत्यूत्तरे दश || विद्याधिप
इश सर्वज्ञ ज्ञानदृक् वेदपादये * सुरेश? सर्वज्येष्ठभूत पालवलि
प्रिया इति ऐशाने दश || वृष वृष पर अनन्तक्रोधनमारुतासनग्रसन
उदुम्वरीशफणीन्द्र वज्रीदंष्ट्री इत्यधोदश *स्तु?
विभुगणाध्यक्ष त्रदशत्रिदशेश्वर सम्बाह विवाह
नभलिप्सुत्रिलोचना इत्यूर्द्ध्वेदश || तेषामुरिवीरभद्रभद्रकालीतु
भुवनद्वयं | एवमष्टोधिकं भुवनशतं नमोनमः | ओं
नमोनमः शिवाय | सव्वदशर्वशिव सूक्ष्म २ शब्द २ ज्ञान २ पिङ्ग
२ तुरु २ पतङ्ग २ साक्षि २ पूर्वस्थित अस्तुतास्तुत अर्चितानर्चित
ब्रह्मविष्णुरुद्र परसर्वसानैध्यकर
सर्वभूतसुखप्रदभवोद्भव भव २ सर्व २ प्रमथ २ मुञ्च २
योगाधियये महातेजः स्वाहा || सद्भावेश्वर महादेव इति
व्योमव्यापि मन्त्रस्यावसानिक यदादारभ्य महादेव
पदान्तान्यष्टाविंशति पदानीति | इत्येतदध्व पञ्चकं षष्ठयो
निवृत्तिकलया व्याप्तं
स्च्. १३)
माय नमः | ओं अङ्गाराय नमः | ओं बुधाय नमः | ओं वृहस्पतये
नमः | ओं शुक्राय नमः | ओं शनैश्चराय नमः | ओं राहवे नमः |
ओं केतवे नमः | इति स्वा?हान् || ओं सर्वभूभ्योवषट् नमः इति
भूतानि | ततोऽवसव्यं कृत्वा
दक्षिणाग्रान्दर्भानास्तीर्यतिलमिश्रेण वारिणा ओं सोमग्नि तु
मान्यमो अङ्गिरस्वानग्नि
कव्यवाहनादयोयेपितरस्तान्पितॄन्स्वाधानमस्तर्पयामि | ओं
पितृपत्नीस्वधानमस्तर्पयामि | ओं पितृगणान्स्वधानमस्तर्पयामि
| ओं पितृपत्नीगणान्स्वधानमस्तर्पयामि | ततो नामगोत्राभ्यां ओं
स्वप्तॄन् स्वपितॄन्स्वधान्मस्तर्पयामि | ओं पिता महान्
स्वधानमस्तर्पयामि | ओं धुपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि | ओं
मातॄः स्वधानमस्तर्पयामि | ओं पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि
| ओं धुपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि | ओं मातामहान्
स्वधानमस्तर्पयामि | ओं मातुः पिता महान्स्वधानमस्तर्पयामि
| ओं मातुः धुपितामहन्स्वधानमस्तर्पयामि | ओं मातामहीः
स्वधानमस्तर्पयामि |
ओं मातुः पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि | ओं मातुः धुपिता
महीः स्वधानमस्तर्पयामि | एवं ज्ञातीना वार्यानपि सन्तर्प्या
चम्य कृतसकली कवल्येऽस्त्रकृत सामान्यार्घपात्रहस्तोद्धारि
नन्द्यादीन्संपूज्यान्तः प्रविश्यनित्यविधिना शिवं
सम्पूज्यवह्नावपि मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वालिं
दत्वावह्नेर्मन्त्रान्संहृत्य योगस्थाय भगवते संयोज्यसापेक्षं
क्षमस्वेति विसर्जयेदिति नित्यपूजां विधायनैमित्तिकमुपक्रमेत् | तत्र
परीक्ष्य परिगृहीतायां भुविसूर्यं संपूज्या विसज्यै वा चम्य
कृतसकली करणोऽघपात्रं कृत्वा योगमण्डपं यायात् | तत्र
द्वाराण्यस्त्रेण संप्रोक्ष्य ओं शान्तिकलाद्वाराय नम इति पूर्वं ओं
विद्याकलाद्वाराय नम इति दक्षिणं | ओं निवृत्तिकलाद्वाराय नम इति
पश्चिमं | ओं प्रतिष्ठा कलाद्वाराय नमस्कृत्वास्तरं? संपूज्य
तच्छाखयोः पूर्वद्वारादारभ्य नन्दि महाकालौभृङ्गिविनायकौ
वृषस्कन्दौदेवी चण्डौ स्वनामभिः प्रणवादि नमोन्तैः
संपूज्यनादाचास्त्र मुद्रयायोगृह पुष्पेक्षेपं
पशुविधमध्वानं शान्त्यतीत कलया
व्याप्तमेवं षड्विधाध्वव्याप्तिः || एवमेतक्त्र षड्विधाध्व
संख्या | तत्र कलाः पञ्चताज्ञानि षट्त्रिंशत्वर्णाः पञ्चाशत्
मन्त्रा एकादशभुवनानि चतुर्विंशत्यधिकशतद्वय
पदान्येकाशीतिः षडध्व ज्ञानसम्पन्नामुच्यते भवबन्धनात्
मोचयति चेति || ० ||
इति महाराजाधिराजे श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ षड्विधाध्व निर्णयः समाप्तः || ० ||
अथ सर्वविच्छिद्र पूरणार्थं पवित्रविधिरभिधीयते |
तत्रा षोढश्रावण भाद्रपदानामन्यतमे मासिसितासित
पक्षयोरेकस्मिन्नष्टम्यां चतुर्द्दश्यां वा कृतशौच
स्नानविधिर्विहित सन्व्यौपासनो * * *?स्तर्पयेत् | तत्र कृतान्तरा
सङ्गोऽङ्गुल्यग्रेण सूलमन्त्र प्रभृतिमन्त्रान् ब्रह्मविष्णुरुद्र
इश्वर सदाशिवादीं देवान् स्वाहान्तेन हृदा | ओं वाग्वादिनि स्वाहा * *
* तीं? ओं ऐन्द्राण्यै नमः ओं आग्नेयै नमः ओं याम्यायै नमः ओं
नैर्-ऋत्यै नमः ओं वारुण्यै नमः ओं वायव्यायै नमः
ओं सौम्यायै नमः ओं इशानायै नमः ओं नागधृष्ठायै नमः ओं
नागभागायै नमः | इति दिशः | ओं इन्द्राय नमः | ओं अग्नये नमः
| ओं यमाय नमः | ओं निरये नमः | ओं वरुणाय नमः | ओं वायवे
नमः | ओं सोमाय नमः | ओं इशानाय नमः | ओं ब्रह्मणे नमः | ओं
अनन्ताय नमः | इति दिक्पतींश्चा ततः कण्ठोपवीतिः पर्वसन्धिभिः
| ओं अत्रिं तर्पयामि नमः | ओं विश्वामित्रन् तर्पयामि नमः | ओं
धुलम्त्यं तर्पयामि नमः | ओं क्रतुं तर्पयामि नमः | ओं
वशिष्टन् तर्पयामि नमः | ओं मरीचिं तर्पयामि नमः | इति ऋषी | ओं
मनकन्तर्पयामि नमः | ओं चन्द्रमने नमः | इति सिद्धान् || ओं
आदित्याय नमः ओं सोमभ्यर्च्य
स्च्. १४)
सितवस्त्र युगादिनोभयं विभृष्य ततः प्राच्यां ओं इन्द्राय नमः
| ओं वज्राय नमः | ओं अग्नये नमः | ओं शक्तये नमः | ओं यमाय
नमः? | ओं चण्डाय नमः | ओं निरितये नमः | ओं खड्गाय नमः
| ओं वरुणाय नमः | ओं पाशाय नमः | ओं वायवे नमः | ओं
ध्वजाय नमः | ओं कुवेराय नमः | ओं * *म नमः | ओं इशानाय
नमः | ओं त्रिश्वलाय नमः | अष्टदिशि || तत्रैव ओं ब्रह्मणे नमः | ओं
पद्माय नमः | ओं विष्णुवे नमः | ओं चक्राय नमः | नैर्-ऋत्ये | इति
मण्डपस्याभ्यन्तरभित्ति भागे सास्त्रा न लोकपालान् संपूज्य |
तदनुभोभो शक्रत्वयास्वस्यां दिशि विघ्न प्रशान्तये | सावधानेन
योगान्तं यावच्छिवाज्ञया स्थातव्यमित्यनेन क्रमेण
सर्वलोकपालान् शिवाज्ञां
श्रावयन्नस्त्रदुर्गमनुस्मरन्मण्डपस्याभ्यन्तर भित्तिं परितः
सन्तत धारयावर्द्धन्या सह कुम्भं परिभ्राम्य स्वस्थानं
नीत्वा पुनः स्थिरासनं संपूज्य तत्र वर्द्धनी कुम्भौ
संस्थाप्य संपूज्य कुम्भस्थाय
भगवते ज्ञान खड्गं समर्पयेत् | आयागात्तु मत्र भगवन्
त्वयाच्छातव्यमिति निरोधार्घपाठं विधाय
तदर्भसानिरोधनायार्घन्दत्वा तत्पात्रं तत्रैव निश्चलं
संस्थाप्य वर्द्धन्यानेन विकरोच्छास्त्र यागगृहमपसारिताशेष
विघ्नं समन्ताद्भावयेदिति भूपरिग्रहं विधाय देव
समीपमागत्यस्वासनेनमुपविश्यासन पूजा प्रभृत्यावनान्तं
कर्मकृत्वाऽर्घपाद्याचमनीयानि दत्वाघ्नपनमुप क्रमेत् | तत्र
पूर्वदन्त पुष्पाण्यस्त्रेणपनीय गड्डुकानाहृत्य निरीक्ष्याभ्युक्ष्य
संताड्य प्रोक्ष्यचास्त्रेण स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थं
संकल्प्यमन्त्रसंहितया पवित्रेर्वासकृज्जलमावर्त्यास्त्रेण
गडुकान्ताय वस्त्रञ्च प्रक्षाल्यगालिताम्भसा गायत्र्या हृदयेन
वाऽस्त्रवर्द्धनी सहिताना पूर्य प्रत्येकं पुष्पमेकैकं दत्वा
अर्घादक विन्दुं क्षिप्त्वातैर्देवं मूलमन्त्रेण स्नपयेत् | ततो
विशेषतो विभवान् सारेण दुग्वदधिघृ
विधायत्रिःपार्ष्णिघातैर्भौमान्
तालत्रयेणान्तरिक्षान् कोटित्रयेण च दिव्यान्
विघ्नान्निरस्यास्त्रेणादुम्बर पुष्पं प्रक्षिप्येद * *?
सस्पृशन्दक्षिणपादेन पाश्चात्यद्वारेणान्तः
प्रविश्यदेहल्यामस्त्रेण पुष्पं प्रक्षिप्यवास्तोष्पतये ब्रह्मणे नम
इति ब्रह्मस्थाने पुष्पं दत्वाऽस्त्र प्राकारक *
चावगुण्ठनाभ्यां यागगृहं संरक्ष्य
वेदिकाकायामुदङ्मुख उपविष्टोभूतशुद्धिं विध्याय
कृतसूलीकरणस्तुण्डन सर्षपय वतिलकुशकुसुमक्षीरजलैरर्पात्रं
कृत्वातदम्भसा अश्रिरसि संप्रोक्ष्य सकुशेन च यागोपकरण
पुष्पादि द्रव्यजातं शुद्ध्यषु मस्त्रेणसंप्रोक्ष्य
कवचेनाभ्युक्ष्य प्रत्येकं हृदयेनाभिमन्त्रयेत् | ततश्चन्दनेन
तिलकं कृत्वासु शिरस्यारोपित मन्त्रसंहितार्चता | विहितशिवहस्तो गृही
तद्वा त्रिशद्दर्भदल वैशिक्यनिर्मितास्त्राभि मन्त्रितज्ञान खड्गः
संपाद्यनवकोष्टकात्मध्ये शिवतत्वाकोष्टकेसु प्रतिष्ठापात्रे
क्षीरं मूलमन्त्रेण इशानेन वामकृत् |
पूर्वैसदाशिवत्वकोष्ठकेसु शान्तेदधिकचेन तत्पुरुषेणवाद्विः |
दक्षिणे विद्यातत्वकोष्टके
तेजारूपघृतं शिखयाऽघोरेण वात्रिः | उत्तरे पुरुषे तत्वकोष्ठके
रत्नादके गोमूत्रं शिरसावामदेवेन वा चतुः पश्चिमकाल
तत्वकोष्ठकेऽमृतात्मके गोमयं हृदयेन सद्योजातेन वा
पञ्चवारान् | कुशोदकं षट्कृत्वोभि मन्त्र्यमूलमन्त्रेण
दध्यादीनि च सुप्रतिष्ठितपात्र संयोजयेदिति विहित
पञ्चगव्योविकिरानभि मन्त्रयेत् | ततो नैर्-ऋत्यां स्थित्वा
इशानाभिमुखो निरीक्षण प्रोक्षणाभ्युक्षणखननावकिरण
पूरण समीकरण सेचनाकुटुन संमार्जनोपलेपन
वज्रीकरणान्तैः स्वस्वमन्त्रोपेतैः संस्कृत्य मण्डपं
पञ्चगव्येन संप्रोक्ष्य ज्वलच्छस्त्रभूतान्विचिन्तयन्विकिरान् प्रक्षिप्ये
पुनस्तात्दर्भ कूर्चिकया समाहृत्य वेदिकायामीशानकोणे
संस्थाप्य हेमाद्येकतमं कुम्भमानीयगालिताम्भसा प्रपूर्य
संहृतविकरेषु चलमासनं दत्वा तत्र मूर्तिरूपं मूर्तिमन्त्रेण
कुम्भं विन्यस्येतस्मिन्साङ्गं भगवन्तं संपूज्य तद्दक्षिणतो
वर्द्धनी तद्वदानेनंऽस्त्रभूतां विन्यस्य तस्यामस्त्र
स्च्. १५)
मूलाग्रयो घृताक्षाभिः षोडशाङ्गुल प्रमाणाभिरिध्यभिः
पञ्चभिश्चतुर्विंशत्या वा मूलेनध्य होमं विधाअ
नामकरणाय इशानेनाभ्य * *?हुतीर्दत्वा मूलमन्त्रेण शिवाग्निस्त्व
हुताशनैतिनामकृत्वा संपूज्य पित्रोर्विसर्ज्जनं कुर्यात् |
सचेत्प्रसादादुप शान्तोलौकाग्निना वासं सृष्टस्तवत्? कुण्डादि
संस्कारां कृत्वा प्रायश्चिन्ताव्वं तृतीय मन्त्रस्य सहस्रपञ्चकं
जुहुयात् | आहूत शिवश्चेत्तथैव संस्कृत्य त्रिरातोषितौऽघोरायुतं
जुहुयात् ततो मेखलासु सास्त्रान् लोकपालान् सम्पूज्य परिधिविष्टरेषु
प्राच्या ब्रह्माणं दक्षिणस्यां रुद्रं पश्चिमस्यां
विष्णुमुदीच्यामीश्वरं संपूज्य श्रूतश्रूतान् संस्पृश्य
तत्वत्रयं द्वयोः श्रुचि शक्तिं श्रूवे च शिवं विन्यस्यात्मनः
सव्यदिग्भागे दर्भाणामुपर्याधोमुखौ संस्थाप्य हृदा पूजयेत्
अथा भूतानीयास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवचेनावगुण्व्य शिवाग्नावस्त्रेण
प्रताप्ये कवचेनाद्वास्य कुण्डस्यापरि प्रदक्षिणं
त्रिःपरिभ्राम्यनाभ्यां संस्थाप्य प्रादेश मात्रं
दर्भाग्रद्वयनिर्मितं मध्यग्रन्थि
पवित्रकमङ्गुष्ठानामिकाभ्यां गृहीत्वाऽग्नि संमुखं
त्रिराज्योत्प्लवनेनात्प्लवं कवचेन तथैवात्मसंमुखं संप्लवं
हृदाकृत्वाऽग्नौ पवित्रकं प्रक्षिप्याज्यमस्त्रेणावद्योत्य निरीक्ष्य
नीराजनं शिवाग्नावुल्मुकं निक्षिपेत् | तत आज्यं
संप्रोक्ष्य षडङ्गेनाभिमन्त्र्य मूलमन्त्रेणामृत मुद्रयाऽमृती
कृत्यमूलेन संपूज्याज्य पात्रं मध्ये प्रादेशमात्रं दर्भं
विन्यस्य इडासुषुम्नापिङ्गलाख्यं नाडीत्रयं
संकल्प्यादक्षिणात् ओं अग्नये स्वाहा वामात् ओंसोमाय स्वाहा
मध्यात् ओं अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ओं अग्नये स्विष्टिक्षते स्वाहा
इत्याहुति नो |
त मधुशर्क्कराभिर्ज्जल धूपान्तरितैः सर्वत्रा शून्यमस्तकं
मूलमन्त्रेण स्नपयित्वा विरूक्ष्य ततो यथा शक्ति केवल जलेन
गन्धोदकेन च पुनः संस्नाप्य मण्डलेऽन्यत्र वा सासनं शिवं
साङ्गं पूजयेत् | ततो जपं कृत्वा कुण्डसमीपं यायात् | तत्र
कुण्डस्य निरीक्षणं शिवमन्त्रेण प्रोक्षणमस्त्रेणाभ्युक्षणं
कवचेन ताडनमस्त्रेण उल्लेखनावकिरण पूरणसेचना कुटून
संमार्जनोपलेपन कुण्डपरिकल्पना परिधिविष्टरन्यास कुण्डार्चन
प्रागायतमुदगायतम्वा रेखात्रयन् तिर्यग्रेखया सहरेखा
चतुष्टय यवजीकरण चतुष्पथन्यासान् खड्गमन्त्रेण
विधाय ऋतुमतीं वागीश्वरीं वागीश्वरञ्च सकामं ध्यात्वा
समावाह्य ध्रुवेण संपूज्यास्त्रेणाक्षपाटं दत्वा अरणेः
सूर्यकान्ताद्द्विजगृहाद्वैश्य गृहात्स्वगृहाद्वा वह्निमानीय
क्रव्यादांशं परित्यज्यार्घ पात्रपानीयेन प्रोक्ष्य
कवचेनावगुण्ठ्य ओं रौं इति वह्नीबीजं विन्यस्य वह्निषडङ्गेनाभि
मन्त्र्य प्रासादेन वौषडन्तेन धेनु मुद्रयाऽमृती कृत्य
संपूज्यकुण्डस्योपरि प्रदक्षिणं त्रिःपन्थरि?
भ्राम्यजानुभ्यामवनीं गत आत्मनः संमुखं वागीश्वरी
गर्भनाड्यां विनिक्षिप्येतोय विन्दुं दत्वा सदित्वं नैराच्छाद्य
गर्भरक्षार्थमस्त्र जप्तदर्भकङ्कनणं देवीहस्ते
बद्धागर्भाधानाय सद्योजातेनाभ्यर्च्य हृदयेनाहुतित्रयं दत्वा
पुंसवनार्थं वामदेवेनाभ्यर्च्य शिरसा तिस्र आहुतीर्दत्वा
सीमन्तोन्नयन निमित्तमघोरेणाभ्यर्च्य शिखयाहुतित्रयं दत्वा
शिखयैव दर्भेण वक्त्राङ्गकल्पना निष्कृतिश्च विधाय
तत्पुरुषेणाभ्यर्च्य कवचेन जातकर्मार्थ तिस्र आहुतीर्दत्वा जाते च
सूतक निवृत्तये कुण्डमर्घाम्भसा संसिच्य वह्निरक्षार्थं
प्रागुदगग्रान् कुण्डस्य परितोऽस्त्रेण दर्भानास्तीर्याहुतित्रयेण
वक्त्राण्यूर्घाट्पलालापनोदाय पुष्टयेच्य
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
प्द्f ३
स्च्. १)
हाट्टने? अस्त्रेण कुर्वन् ह्रस्व प्रासादेन चरु विपचेत् | ततः सिद्धे
मन्त्रसंहिताया स्वाहान्तयासुस्निस्ना भवेति तप्ताभिघोरविधाय * *
*? शादिके द्वितीय मण्डलके संपूजितेऽवतार्य वषडन्तया
मन्त्रमन्त्रहितयासु शीतो भवेति शीताभिघोरं कुर्यात् | अथ
मन्त्रसंहितयाव य * *?यातमालम्बसर्वतः संसृज्य
मृदम्भोभ्यां तलमुत्सृज्यामृत मुद्रयाचामृती कृत्यकुण्ड
समीपं नीत्वा पश्चिमायान्दिशि पूर्ववत्मण्डलके संपूजिते
विन्यस्य हृदयेन संपूजयेत् | ततोऽङ्गैरेकशो मूलमन्त्रेणाष्टोत्तर
शतं स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य श्रुवेणाग्नावाज्यं प्रक्षिप्य
संस्कारास्य | परिहेत्यूवन्यज्य शेषं श्रूवम्वुद्धभ्यातयेविति
संपात होमेन चरुं संपाताहुतिं कुर्यात् | ततस्तं त्रिधाविभज्य
शिवभागवह्निभागं घृतमधुभ्यां युक्तं कृत्वा * * *? वल
घृते नैव सं * *? कुर्यात् | ततः शिवभागं हृदासंपूज्यादाय
वह्ने च समीपं गत्वा देवं संपूज्यं प्रोच्या तत्पुरुषेण
दन्तकाष्ठं द * * *?
प गत्वास्वा समन्त्रमुपविश्य स्वमूर्तो गुरुदाङ्क्तौ च क्रमेण
गन्धपवित्रकं दत्वामैकं ग्रन्थिकमल्प तन्तुकं पूजितं
सपुष्पं * * *?दाययो मन्त्रेण पवित्रकममृता कृतं
रेचकेनमूकमन्त्रेण शिवाय समारोप्यामन्त्रेण यदात्मकं
मन्त्रं पापत्वन्त समस्तविधिच्छिद्र गूरुशेशम इति | ततो
जपङ्कृत्वा देवाय पूर्ववत्समावेद्यपा?णम्यस्तुत्वाक्षमापयित्वा
मण्डपाभ्यन्तरभित्ति स्थापितेभ्यो लोकपालेभ्यौऽस्त्रैभ्यश्च
पवित्रकं दत्वा वहिनि अस्याग्निस्थाय भगवते तृतीयां
शञ्चरोर्हुत्वाऽमन्त्रण पवित्रकं दद्यात् | तत ओं इत्वाद्य प्रतिगृह्न
नमः | ओं अग्नये धुरु?गृह्न नमः | ओं यमाय प्रतिगृह्न नमः | ओं
निरितये प्रतिगृह्न नमः | ओं वरुणाय प्रतिगृह्न नमः | ओं वायुवे
प्रतिगृह्न नमः | ओं कुवेराय
चतुष्टयं श्रूवेण दत्वाऽसंस्कृते सर्पिषि संस्मरार्थं विन्दुं
क्षिपेत् | कृष्णपक्षं तु वामात् ओं अग्नये स्वाहा | दक्षिण * *?
सूर्याय स्वाहा | मध्यात् सर्व? अग्नीसूर्याभ्यां स्वाहा ओं अग्नये
स्विष्टि कृते स्वाहा | इति ततो वह्निवक्त्राभिघोर माज्याहुति त्रयेणसु
स्वमन्त्रैर्विधाय सद्यं वामेन वाममघोरेण घोरं तत्पुरुषेण
तत्पुरुषमीशेन शेषं शिवेन इति वक्त्रसन्धानकीरणानि
स्वस्वमन्त्रैर्विधाय कुण्डप्रमाण यथाभिलषितं वक्त्रं
परिकल्प्य मध्यजिह्वाया चूतादिवालान्तं संस्कारपूरणार्थं
वौषडन्तेन मूलमन्त्रेण पूर्णाहुतिविधाय चर्वथं
धूपदीपार्थं वह्निवक्त्रयोः सन्धानं
कृत्वामूलमन्त्रमुच्चार्य वह्निस्थ शिवनासा विनिर्गत
ज्योतीरूपशिखायागस्थ शिवशिखालीनां रस्मिन्योज्ञात?
वियोगेनावच्छिस्नामुभयत्र कृतास्पदां ध्यायेदिति
* * * वह्निस्थ * * * ती? सधानं कृत्वा सासनं कृत्वा * * * * * *
संपूज्य * * * * * कुर्यात् | ततः स्थालींतामयीं मृत्मयी वा * * ?
दोषरहितामस्त्रेण वारिणा प्रक्षाल्य कवचेनावगुण्ठ्यनराक्ष्य
प्रोक्षणात्यु * * * * * * * * *भिरुपलिप्य? धूपयित्वा कुशदा *?
कवचरूपेण कण्ठेसंवेष्ट्य गोमयेनोपलिप्तमण्डलक
अस्त्रप्रोक्षिते कवचावगुण्ठिते अस्त्र विन्यस्तदर्भ षडुत्थमासनं
संपूज्य मूर्तिभूतास्थाली विन्यस्यङ्गं भगवन्तमभ्यर्च्य
पुष्पादिकमपनीयाज्येनास्यज्य वस्त्रपूतगोक्षीरेणा पूरयेत् |
ततश्चली दक्षिणस्यां पूर्वस्यां पश्चिमायास्वा
अस्त्रेणाल्लिख्यतेनैव प्रोक्षितां कवचावगुण्ठितां
संमार्जितामुपलिप्ता धर्माधर्मभुजां कल्पित शेषा तूर्यवां
पूर्वोद्धृत शिवाग्निना संयोज्य प्रणवासनं
दत्वास्थालीमारोपयेत् | ततो याज्ञीय धान्यतण्डुलान् चूर्णं
वयुश्च प्रसृत प्रमाणं तस्या
प्रक्षिप्याग्नेयदिगुपविष्टश्चालनाकी?
विशेष पूजां विधाय दन्तकाष्टादीनि चरुं विवर्जयन्यथा
स्थानं विन्यस्य ततो मन्त्रान्सन्तर्प्य प्रायश्चित्तं हुत्वा
पूर्णाहुतिं विधाय सूर्याय व * * ?दत्वा समाचम्य
कृतसकलीकरणा तत्व्यादिभ्यः पवित्रकं दत्वा पूर्ववत्
प्रविश्यवास्तोः पतये ब्रह्मणे च ततः शिवकुम्भास्त्रवर्द्धन्याश्च
पवित्रक * *? त्वा देव समीपं गत्वास्वासने समुपविश्य
विभवानुसारेण विशेषपूजां विधाय स्वमूर्तौ गुरु पङ्क्तौ च
पवित्रकं दत्वा शिवं कालात्मकंस्म *त्? | वर्षर्तु मासपक्षदि न
घटिप्राणादि विग्रहं सर्वेन्द्रिय शरीरार्थ व्यवहारैककारणं
कृताकृत समुत्सृष्टङ्विष्टकर्मैक साक्षिणं
क्षेत्रगोप्तारमीशानं शरण्यं शुचिमो नमः पवित्रकमादाय
किञ्चिच्छिवकलसाभिमुखे इश्वरं व्रूयात् | ओं कालात्मनात्वया
देवयदृष्टंमामके विधौ | कृतं सिष्टं समुत्सृष्ट धृतं
गुप्तश्च मत्कृतम् | तदस्तु सिष्टमक्लिष्टं कृतं प्रष्ने?म सत्कृतं
| सर्वात्मनामुनाशम्भा पवित्रेणत्वदिच्छया || ओं पूरय २ मख *
* यमेश्वराय स्वाहैत्युचार्य ओं हौं शिव तत्वाधिपतय शिवाय
नमः | ओं हौं विद्या तत्वाधिपतये शिवाय नमः | ओं हौं
आत्मतत्वाधिपतये शिवाय नमः | इति क्रमेण लिङ्गमूर्द्धनि
पवित्रकत्रयं दत्वा चतुर्थकं सर्वतत्वात्मकं पिण्डिकास्धृक् | ओं
हौ सर्वतत्वाधिपतये शिवाय नमः इति मूलमन्त्रेणैव दद्यात् |
भुक्तिकामा मुक्तिकामस्त्वात्म तत्वादि क्रमेण ततो जपं कृत्वानि
वेद्यस्तुत्वा चतुस्त्रीन् द्वावेकं वा मासं तदर्द्ध सप्तरात्रं
पञ्चरात्रं त्रिरात्रमेकरात्रं प्रारब्ध कर्मावसानं
वायावत्पवित्रकधारणा व्रह्मग्रहणे च मयेदं कर्तव्यमिति
नियमं गृहीत्वा प्रणम्य क्षमापयित्वा यागमण्डपाभ्यन्तरभि?
त्तिभाग पूजित लोकपालभ्यौऽस्त्रेभ्यश्च पवित्रकानिदत्वा
कुण्डान्तिकमागत्य वह्निस्थाय भगवते
मूलयागवत्पवित्रकचतुष्टयं दद्यात् | ततो व्याप्तीतिभिर्वह्निं
संरोध्यस्विष्टि कृताहुतीन्दद्यात् | ततोऽन्तः प्रविश्य देवेशं
सम्पूज्य गुरुवे सिद्धान्तपुस्तकेषु च पवित्रकं दत्वा
दिक्पालादिभ्योवलिमुप
प्रतिगृह्ण नमः | ओं इशानाय प्रतिगृह्णनमः | ओं ब्रह्माण
प्रतिगृह्ण नमः | ओं विष्णुवे प्रतिगृह्ण नमः | इति स्वस्वेदिक्षु यथा
क्रमं बहिर्वलिं प्रक्षिप्य वायव्याया ओं क्षेत्रपालाय नम इति
क्षेत्रपालवलिं दत्वा समाचम्य विधिच्छिद्रं पूरणार्थं
प्रायश्चित्तं हुत्वा पूर्णाश्च दत्वा ततो ओं भूः स्वाहा | गुरुवः
स्वाहा | ओं स्वः स्वाहा | ओं भूर्तवः स्वः स्वाहेति व्याहृतिर्भित्तां
मंकृत्वा तत्रैव च वह्निं संरोध्य ओं अग्नये स्वाहा ओं सोमाय
स्वाहा ओं अग्नीषोमाभ्याम् स्वाहा ओं अग्नये स्विष्टिकृते स्वाहा इत्याहुति
चतुष्टयं दत्वा वह्निस्थं शिवं नाडीसन्धानेन मण्डलस्थिते
शिवसंयोजयेत् | ततो देवं सम्पूज्य सिद्धान्तपुस्तके गुरो च
पवित्रकन्दत्वा वहिर्निः सृत्याचम्य शुचिगोमयमण्डलकं त्रयं
पञ्चगव्यञ्चरुं दन्तधावनञ्च क्रमाद्भजेत् | अथाचम्य शुचिः
शययोदर्भरास्तीर्य वुभुक्षुः प्राकारत्रयेण तिलादिना रक्षा कृत्वा
शिवमनुस्यरन् स्वपेत् | मुमुक्षुरपि भस्मनैव | अथ प्रातरूत्थाय
कृत शौचस्नानविधिर्विहित सन्ध्यापासनो निर्माल्यादिकमपनीय
गन्धपवित्रकम विसर्जितमवैशानकोणमण्डलके संस्थाप्य
समाचम्य कृतसकलीकरणः सामान्यार्घपात्रं कृत्वा यथा
वच्छिवं संस्नाप्य समाचम्यसकलीकरणं कृत्वा द्वाराणि
द्वारपालाश्च संपूज्य पूर्ववत् पश्चिमद्वारेण प्रविश्य
वास्तोष्पतये पुष्पं दत्वा शिवाकलसमन्त्र वर्द्धनीञ्च संपूज्य
ततो दिक्पालान्सास्त्रान्क्रमेणाभ्यर्च्य स्वासनं प्रणवेन सम्पूज्य
समुपविश्य भूतशुद्धि सकलीकरण विशेषार्घ पात्रद्रव्यशुद्धि
कर्महस्त पञ्चगव्यानि कृत्वानित्यविधिनादेवं
सम्पूज्यकुण्डान्तिकमागत्य कुण्डमस्त्रेण प्रोक्ष्य तन्मेखलासु
सास्त्रान् लोकपालाम्वरिधि विष्टरषु पूर्वब्रह्मादीन्संपूज्य
श्रूत्स्रूवा वाज्यश्च पूर्ववत्संस्कृत्य पूर्णाहुतिं
दत्वामन्त्रतर्पणाद्य कर्मकृत्वा अनुद्वास्यैव परिधिविष्टरान् वलिं
प्रक्षिप्य शिवात् | ग्नेर्विसर्जनमकृत्वेव शिवसमीपमागत्या विज्जित एव
देवशे नैमित्ति
स्च्. ४)
* त्र? हस्तान्तानि नवलिङ्गानि | एतान्यष्टाङ्गुल कन्यस लिङ्गपाद
वृद्ध्यात्रयस्त्रिंशद्भवन्ति | तथा षोडशाङ्गुलादारभ्य * * *?
दारुजान्यपि षडुस्तान्तानि नवलिङ्गानि भवन्ति | कन्यस
पादवृद्ध्यातान्य पित्रय स्त्रिंशदेव | अथवा प्रासाद चतुर्थ
पञ्चषडेशेन वा लिङ्गदैर्घ्यं प्रासादगर्भे वा पञ्चधा
विभक्ते भागत्रयेण नवधाविभक्ते भागपञ्चकेन भागार्द्धेन
त्र्यन्तरेण नवलिङ्गदैर्घ्य समन्तस्यापि लिङ्गव्रातस्य
त्वदैर्घ्यार्द्धमष्टधा विभज्य चतुर्भिः पञ्चभिः षड्भिः स
त्रिभागैः पञ्चभिः सुरणगार्चितं | अनाद्य आद्य
सर्वसमसंज्ञकं विस्तारोपलक्षितान्येतत् संज्ञकान्येवं लिङ्गानि
भवन्ति | एतेषां चतुरस्रोब्रह्मभागः कर्णार्द्ध सूत्रलाण्छित
कोणत्यागेन सप्तधा विभक्ते भाग?त्रयं मध्ये संस्थाप्य
भागद्वयद्वयत्यागाद्वाष्नाश्रीर्विष्णुभागः | ब्रह्मस्थान
भ्रमादश्रि लोपक्रमाद्वा वृत्तोरुद्रभागः | लिङ्गमूर्ध्नि
विस्तार चतुर्थांश विवर्त्तनात्कुक्कुटाण्ड संज्ञकं भवति |
तथैव त्रिभागवर्त्तनादं?र्द्धचन्द्रं
| षड्भागवर्त्तनान्त्रपुषमष्टकमष्टमांशाच्छत्रं तच्चाष्टा
* *?र्भक्ते भागभाग विवर्तनात् पुण्डरीक विशाल श्रीवत्स
शत्रुमर्द्दन संज्ञया चतुः प्रकारं भवति | उक्त मानात्कृषे
द्रव्यनाशः स्थूलमृत्युः * त्युच्चे गोत्रक्षयः | ह्रस्वे व्याधिः |
वक्रेराष्ट्र भ्रंसः * धो? हीने दुर्भिक्षं मध्य महीने
प्रकृतिक्षोभ मूर्द्धहीने सर्वनाशः रुद्रभागे दीर्घे पूजा
हीनिः | मध्ये दीर्घऽनावृष्टिरधो दीर्घराष्ट्रभङ्गः |
उक्तलक्षण लक्षितं | सन्धिरेखा
विन्दुजालककीलककलङ्कगाराच्छिद्रत्रास धूलिकाक पदमार्जार
पदरहितं भुक्तिमुक्ति प्रदम्भवति | मस्तकसमोरुद्रभागः |
दिक्षुपीठ प्रणालश्च ब्रह्मभाग प्रवेश ब्रह्मशिलाया ज्ञात्वा
विष्णुभागान्तं पीठमुच्छ्रितं कुर्यात् | ये गुणदोषा लिङ्गेपीठे
त एव | तत्र हस्तमानस्य लिङ्गस्य
हृत्यसमाचम्य प्रायश्चित्तं हुत्वा पूर्णां विधायमण्डलं
भगन्तं संपूज्य क्षमापयेत् | ततश्च भोजनाच्छादनादिना
दीक्षितां सम्पूज्य प्रीयतां मे सदाशिव इति व्रूयात् | ब्रतान्ते
अतीनन्तरदिनवच्छिवमभ्यर्च्य ततो भुक्तिकामो भगवन्ममास्तु
फलसाधकमिति व्रतं शिवाय समर्पयेत् | मुक्तिकाम *ः? पुनर्मामे
कर्मप्रतिवन्धकं भवत्विति निवेदयेत् | ततो मन्त्रतर्पणान्तं
कर्मकृत्वा प्रायश्चित्तं होमं विधाय पूर्णां
दत्वाभस्मवन्दयित्वा नाडीसन्धानेन वह्निस्थं भगवन्तं
शिवसंयोज्य वह्नेर्मन्त्रान्समाहृत्य द्वादशान्तं नीत्वा
हृदिसंनिवेश्य वर्ह्निविसर्ज्य परिधिविष्टरान् द्वास्यवलिन्दत्वा
समाचम्य कृतसकलीकरणोऽन्तः प्रविश्य शिवकुम्भास्त्रवर्द्धन्यो
मन्त्रान्संहृत्य शिवे संयोज्य सापेक्षं क्षमस्वेति विसर्जयेत् | ततो
दिक्वलाटीन्विसर्ज्य देवात्पवित्रकाश्यादाय स त्रिचण्डेश्वरे
चण्डेश्वराय पवित्रकं दत्वा पवित्रक निर्माल्यादि समर्पयेत् |
तच्चेत्प्रसादात्पवित्रे
प्रायश्चिन्तार्थं तृतीयमन्त्रस्य लक्षमावर्त्य दशांशेन होमं
कुर्यात् |
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेवविरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
पवित्रकविधिः समाप्तः || ० ||
अथ प्रतिष्ठाविधिः प्रतिष्ठा
चलिङ्गपिण्डिकादिस्तमाश्रयेत्यतस्तल्लक्षणमभिधीयते | तत्र
हस्तमात्रादारभ्यं पादवृद्ध्याहस्तत्रयान्तं
नवलिङ्गानिकनीयः कटच्छके भवन्ति तथा नयैव वृद्ध्या
चतुर्हस्ताद्वस्त षट्कं यावत्मध्यमकटच्छकेऽनयैव
वृद्ध्यात्सप्तहस्तान्नवहस्तान्तान्यपि नवलिङ्गान्यत्तमकटच्छके
भवन्ति | तथान्यदपि
त्रिचतुर्हस्तयोर्मध्ये षट्सप्तहस्तयोश्चलिङ्ग षट्कमेवं
त्रयत्रिंशलिङ्गानि शैलमयानि मृत्मयानि च | तथा
मुद्गप्रमाणादारभ्य नवाङ्गुल पर्यन्तं रत्नजः लोहजश्च
त्र्यङ्गुलावधि चललिङ्गं भवति | लोहाष्टकनिर्मितानि
अष्टाङ्गुलादारभ्याष्टाङ्गुल वृ
स्च्. ५)
कुम्भावशिष्ट जलेन खातञ्चाप्लाव्य कुदालादिकं संस्नाप्य
पूजयेत् | ततो परं पूर्ण कुम्भं वस्त्रयुगच्छन्नं
ब्राह्मणस्यकस्वनिधाय गीतवाद्यादि ब्रह्म *?षेण
वहुजनसाक्षिकं | यावदभि प्रेतं पुरपूर्वसीमान्तं नयेत् | तत्र
च मुहूर्तमात्रं स्थित्वा प्रदक्षिणमाग्नेयादि इशानादि गन्तं
भ्रामयेत् | ततः प्रासाद भूमौ शङ्कष्टकं प्रासादसीमा
विनिश्चयार्थं चतुर्षुकोणेषु विन्यस्य सूत्रेण संयोज्य सुवर्ण
रजतमुक्तादध्य क्षतादिभीरेखां प्रदं | स वालग्ने वा
ध्वजाद्यायैर्वा वं कं चं तं एं हं शं पं
यैर्नवभिर्वर्णेः प्रश्नगतेर्वाशल्पजानीयात् | तत्र शिरः कण्डूयते
शिरः शल्यं तत्प्रमाणेन अन्यदतं कण्डुयनादि
नाविकारोऽस्तितदङ्गेन तत्प्रमाणेन शल्यं द्विरूपे द्विरूपं
शल्यं सर्वाङ्गिके विकार सर्वत्र सशल्यं क्षेत्रं ज्ञात्वा खात्वा
शल्यमुद्धृत्य हस्तापूरयाषाणेरष्टाङ्गुलोच्छत मृदन्तरै
प्लावितै मुद्गराकोटितैः पादत्रयान्तमाप्ल * समप्लवां
सुघटितां सुघटितांसुश्लक्ष्णां भुवं विधायच्छ्याया
शङ्कादिना प्रान्नैरित्यन्तमूर्द्धवत् समाग्नेयाच्च वायव्यान्तं
तिर्यग्वशं दत्वाति पदषट्पदश्चरत्क?ष्टकं विन्यस्य मर्माणि
ज्ञात्वा इशानकोणार्द्ध इशं दत्वापर्जन्य जयमहेन्द्ररवि सत्य
वृषात्पदिकात्संपूज्य अग्निकोष्ठके व्योमपावको विन्यस्य
पूषावितूष गृहक्षतं यमं गन्धर्व
भृङ्गान्पदिकान्दत्वानैरितकोणकोष्ठके मृगपितरौ
संस्थाप्यद्वौवारिक पश्चिमसुग्रीव पुष्पदन्त चरुण
असुरशोषान्यादिकान्दत्वा वायुकोणकोष्ठके रोगताय
चतुर्हस्तः प्रासादो विस्तारेण भवति | अथवा
लिङ्गमानान्त्रिगुणश्चतुर्गुणः पञ्चगुणः षड्गुणो वा विस्तारेण
भवति | प्रासादादुच्छ्रयेण त्रिगुणो भूमिजः सार्द्ध द्विगुणो
नागरः | द्विगुणोः शिख | वलभिः | लोहदारुजानां कन्यस
लिङ्गादारभ्य चतुर्हस्तादिप | विस्ताराट्त्रिंशद्वस्तपर्यन्तः
प्रासादः कार्यः | रत्नजानां स्वसाध्यादिति || ० ||
अथ प्रासादं चिकीर्षुः प्रागेवसुपरीक्षिता भुवं परिगृह्णीयात् |
तत्र भूमिशुलाज्य गन्धामधुरा ब्राह्मणस्य रक्तासृग्गत्वा
कथायाक्षत्रियस्य पीतातिक्तान्न गत्वा वैश्यस्य विगत्वाकटुका
कृष्णामद्यगत्वा शूद्रस्य भौषाच तूरू पापिख्यत
वारिदीपगुणादिना परिक्षणीया | तत्र हस्तमात्र खातं तदुद्धृत
मृदायस्या पूर्यते स मध्यमा | यत्र उद्धरितमृत्तिकासा श्रेष्ठा
पत्राऽपरिपूर्ण मृत्तिकासाऽधमा | उदकेन खातमापूरितं
पदशत मम नागमनपर्यन्तं यत्र सम्पूर्णं दृश्यते
स्यज्यायसी? |
अङ्गुलौना मध्यमा | बहुभिरङ्गुलैरूनं सानिकृष्टेति | आमं
कुम्भस्य वा उपरिघृत पूर्णांममरावे चतुर्दिक्षु सितरक्तपीत * *?
वर्ति चतुष्टयं प्रज्वलितं कृत्वा तत्पुरुषादि
मन्त्रपूजितंमास्नेहान्तं प्रज्वलद्यदि पश्येत्तदा सर्ववर्णानां
भूःप्रशस्तेति जानीयात् | अवनिर्वाणा यावत् प्रशस्तावतात्मान
प्रशस्तेति भुवं परीक्ष्य तस्यां यथोक्त मण्डपं कुण्डसहितं
कारयित्वा द्वारपाल पूजादिमन्त्रसन्तर्पणान्तं
कर्मकृत्वात्मघोरास्त्रेन सहस्रं हुत्वा कुम्भ पञ्चकं
सप्तधान्यानामुपरिस्थितं पुण्योदक पूर्णं प्रशस्तोषधी रत्न
गर्भं चूताश्वत्थादि पल्लवबीजपूरादि फलशोभित मुखं
सितवस्त्र युगावृतं शुक्लश्रुक्सूत्रकण्ठं सासनेनमाङ्गेन
भगवता समधिष्ठितं संपूज्य लग्नकाले प्रासादगर्भस्य
मध्यस्थाने कुम्भजलं प्रक्षिप्य
पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरमीशासु च | ततो मध्यस्थाने खात्वा
तस्मात्मृदमादाय नैरित्यां दिशि प्रक्षिपेत् |
स्च्. ६)
क्रमेणैव द्वादशहस्तादि द्विहस्तं वृद्ध्यामण्डपं
प्रासादस्याग्रतः कारयित्वा तस्य प्रात्यामुदीच्यामीशान्याम्वा
स्नान मण्डपमधिवासनम * *?निवेश्य तत्रोपविश्य आचार्य
मूर्तिधराणामलङ्कारादिकं दत्वा गृहीतार्घं पात्रं कन्यस
लिङ्गेषु पञ्चषट्सप्तहस्तानि तोरणानि | इतरेषु वसुवेदाङ्गुल
वृद्धानि | न्यग्रौधौदुम्बराश्वत्थ प्लक्षद्रुमसमुद्भवानि
पूर्वादरभ्य शान्तिभूतिवलार्धेगसंज्ञकानि तोरणान्यस्त्र
शुद्धानि वर्मावगुण्ठितानि प्रणवेन विन्यस्य स्वहृत्मन्त्रैः
स्वनामभिरभ्यर्च्य तच्छाखयोर्नन्दि महाकालौ भृङ्गिविनायकौ
वृषस्कत्यै देवी चण्डौ च स्वनामभिः सम्पूज्य इश्वर इन्द्र
चापरक्त कृष्णनीलमेघ पीतपद्मवर्णासुपताकासु
शूलवज्रशक्तिदण्ड खड्गपाश ध्वजगदा संज्ञकानि
लोकेशायुधानि सम्पूज्य * * ? यां ब्रह्मायुधं पद्ममीशान्यां
| अतसीपुष्पवर्णायां विष्ण्वायुधं चक्रं नैरित्ये | मध्ये स्वेतचिते
वा ध्वजे पाशुपतास्त्रमघोरास्त्रं वा
* * *श्चात्यकारण? प्रविशेत् | ततो वेदिकायामुदद्युख उपविष्टः |
भूतशुद्धिं विधाय कृतसकली करणोऽर्घपात्र कृत्वा
स्वशिरस्यारा * *? कर्महस्ता गृहीतद्वात्रिंशद्दर्भदन
वणिकानिर्मिताभि मन्त्रित ज्ञानखड्गः सम्पाद्य
पञ्चकोष्ठकात्मण्य शिवतत्वकोष्टकेसु प्रतिष्ठा पात्रकं सक्षीर
पूर्वे सदाशिव तत्वकोष्ठकेसु शान्तसदधि दक्षिणे विद्यातत्व
कोष्ठके तेजोरूपं घृतं पश्चिमकालतत्वकोष्ठके अमृतात्मकं
सगोमयमुत्तरे पुरुषतत्व कोष्ठके रत्नादयं सगोमूतं
संस्थाप्ये यथा क्रममङ्गैरनाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेण
यथावत्सयोजित पञ्चगव्योविकिरानभि मन्त्रयेत् | ततो
नैर्-ऋत्यामीशानाभि मुखौमण्डपं निरीक्षण
प्रोक्षणाभ्युक्षण खननावकिरण समीकरसेचना कुटुन
संमार्जनोपलेपन वज्रीकरणान्तैः कर्मभिः स्वस्वमन्त्रोपेतैः
संस्कृत पञ्चगव्येन संप्रोक्ष्य ज्वलच्छस्त्रभूतान् विचिन्तयन्
विन्यस्य नाग मुख्य भल्वाठलोमगिरि अदित्यन्तात्पदिकान्दत्वा
इशकोणार्द्धेदितिं संपूजयेत् | मध्ये * * * * ? ब्रह्माण
तस्यश्यान्यान्यदिकै | आप आपवत्सौ प्राच्यां षट्पदमरीचिमाग्नेया
सवितासावित्र्यो दक्षिणस्या विवस्वन्त नैरित्या इन्द्र इन्द्रजयावारुण्या
मित्रं वायव्यां रुद्रारुद्रदासौ उत्तरस्यां परापरमित्या
पवत्सादि क्रमेण कुशतिल दध्यक्षतादिभिः संपूज्य इशानादि
दिक्षु चरकीं स्कन्दं विदारीं अन्य अन्य पूतना जम्भाया
पराक्षसी पिलिपिच्छान्तर्वहि देवताष्टकं पूजयेदिति || ० ||
एकाशीति पद वास्तो मध्ये ब्रह्मानवपदः | मरीचाद्याः षट्पदा
आपवत्साद्याद्विपदिका वहिर्देवताश्च पूर्ववद्वत्सरङ्कादिकश्चेति
वास्तु संपूज्य मर्मादि | गृह | परिहृत्य शिला प्रदिकं विदध्यात् ||
० ||
अथ प्रतिष्ठालक्षणं | तत्र पिण्डिकारन्ध्रमध्ये
भगाकारोद्धृतलक्षणे स्वगुप्तक्रियाशक्ति स्वरूपे
ज्ञानशक्तिस्वरूप * *?लक्षणस्याधः स्थाने योजनं प्रतिष्ठाय
द्वालिङ्ग पिण्डिकयोर्विधिनायोगः प्रतिष्ठति || ० ||
सा च विधा तत्र प्रतिष्ठास्थाप * * स्थापन
उत्थापनमास्थापनश्चैति | तत्र व्यक्तं लिङ्गब्रह्मशिलाया विन्यस्य
पीठबन्धं विधायापरिपिण्डिकाया यत्र योगः क्रियते सा प्रतिष्ठा
यत्र वरन्नजं धातुजम्वाण लिङ्गाम्वा पञ्चधा त्रिधा
विभज्यभागद्वयमेकं वापिण्डिकायामारोप्यते तत्स्थापनं
यत्पुनरभिन्नपिण्डिकमभेदेन संस्क्रियते तस्थित स्थापनं |
जीर्णोद्वार उत्थापनं | व्यक्तं रुद्ररूपं
जलपीठस्योपरिविन्यस्यवडमन्त्रैः संस्कारः हियते तदास्थापन
एवं पञ्चरूपाणि प्रतिष्ठा व्यक्ताव्यक्तत्वान् महेश्वरस्य
ब्रह्मविष्णादीनां व्यक्तत्वादास्थापनोत्थापन रूपाद्विधैव |
तत्र हस्तादारभ्य नवहस्तान्तानां लिङ्गानां मध्येषु
त्रिष्वष्टनव दशहस्तमितरेषु चतुर्हस्तादि विङ्गेषु हस्तद्वय
वृद्ध्यायद्वत् | हृदया * *?
स्च्. ६)
दक्षिणे सर्पिः पश्चिमगोमगोमयमत्तरे गोमूत्रं
वारिहैममुपस्करणमाभरणजातं धूपं मधुवासांसि
आग्नेये | नैराञ्जनानि नैरित्य? षाय संग्रहं वायव्ये |
कुङ्कुममीशानः इति कारकव्रातं कोष्ठकेषु विन्यस्य | क्षीर |
आमल | गन्ध | रत्न | फल | पुष्प | शस्य | औषधाम्भः
संज्ञकान् कुम्भान् विन्यस्यास्त्र प्रोक्षितान् कवचावगुण्ठितान्
स्वसंज्ञाभिरभ्यर्च्यक्षारादि समुद्रान्परिकल्प्य वहिरन्यानपि
कुम्भा संस्थाप्य लोकपालाय धाङ्कितं शिलाष्टकमपि
संपूज्याहुतिभिः संतर्प्यतिलघृतान् सारेण शिला समीपं गत्वा
होमसंख्यया जपं विधो | युक्तशमलेन शिलामूलं
संस्पृश्यशान्ति कुम्भाम्भसा संप्रोक्ष्य पुनः
कुण्डसमीपमागत्योपविश्यात्म तत्व विद्यातत्वाभ्यां नम इति
तत्वयोः सन्धानकृत्वाविद्या तत्वतत्वाधिपविष्णुमूर्तिमूर्तिपाश्च
संस्थाप्य संपूज्य तिलघृतान् सारेणा
ज्ञातभिः सन्तर्प्य होमसंख्यया शिलासमीपं गत्वा जपं कृत्वा
कुशमध्यभागेन शिलामध्यभागं संस्पृश्य शान्ति
कुम्भोदकेन संप्रोक्ष्य पुनः | कुण्डसमीपमागत्या पविश्य
विद्यातत्वशिवत्वाभ्यां नम इति अनुसत्वाय शिवतत्वा तत्वाधिप
रुद्रमूर्तिमूर्तिपांश्च संस्थाप्याहुतिभिः सन्तर्प्य शिलासमीपे
होमसङ्ख्यया जपं कृत्वाङ्कुशाग्रेण शिलाग्रं संस्पृश्य
शिवाज्ञां श्रावयेत् | हे तत्वेश्वरास्तत्व मूर्तिमूर्तिपैः
सहशिवाज्ञाया संनिहितैर्भवितव्यमित्यागत्य पूर्णादत्वाशतं
सहस्रमर्द्धवाकर्मसंपूर्णाच्च माचार्यो मूलमन्त्रेण
मूर्तिधराश्च स्वदिग्गतममन्त्र होमं कुर्यूः पूर्णाञ्च
दद्यूस्ततः प्रायश्चित्त होमश्च विधाय शिलां
कुम्भांश्चादायं द्रोमादं गत्वागर्त्ता स्वाधारशतिन्दत्वा ओं
अनन्तायं च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ
च्छ च्छ न इति कुम्भं विन्यस्य लग्नकाले वुद्ध्यन्ता ध्वपद
व्याप्तिं
विकिरान् प्रोक्षिप्य पुनस्तादर्भ कूर्चिकया समाहृत्यवेदिकेशान्यां
संस्थाप्य हेमाद्यैकतमं कुम्भमानीय गालिताम्भसा प्रपूर्य
संहृत विकिरेष्वासनन्दत्वा तत्र मूर्तिभूतं कुम्भविन्यस्य
साङ्गं भगवन्तं संपूज्य तद्दक्षिणतो वर्द्धन्यामस्त्रञ्च
सितववस्त्र युगादिनोभयं विभूष्य पूर्वद्वारि प्रशान्त शिशिरौ
दक्षिणे पर्जन्याशाकौ पश्चिमे भूत सञ्जीवानामृतो |
उत्तरेधनेशश्रीश कुम्भो सवस्त्रौ सुसूत्रक्षत कण्वौ स हिरर्ण्यो च
ताश्वच्छदल विभूतितवक्त्रौ वीजपूरादि फलसहितो
नन्द्यादिद्वारपालाधिष्ठितौ सम्पूज्य यथा क्रमं स्वस्वदिगिन्द्रादि
विष्ण्वन्तं लोकपालाधिष्ठितं कुम्भदशकञ्च ततोऽपिण्डित
द्वारयावर्धन्या सह कुम्भमाभ्राम्य भो २
शक्रत्वयान्वस्यांदिशि विघ्नप्राशान्त सावधानेन यागान्तं
शिवाज्ञया भवितव्यमित्यनेन क्रमेण लोकपालानामाज्ञां दत्वा
* *तरासन संपूज्य वर्द्धनी कुम्भौ च कुम्भे स्थाय भगवते
ज्ञानखड्गं समर्प्य निराधार्दो पात्रं संस्थाप्य
वर्द्धन्यासनविकिरोत्थास्त्रैर्याग गृहमुप सारिता शेष विघ्नं
समन्तात्सण्चिन्त्य कुण्डसमीपगत्वा निरीक्षणाद्यग्नि जननान्तं
कर्मकृत्वा नवधापञ्चधा वा अग्निविभज्ये दिक्स्थितानं शान्दिन्
कुण्डेषु निक्षिप्ये मध्यां शं स्वकुण्डे प्रज्वाल्य भगवन्तं
सम्पूज्ये मन्त्रेकाकादशिकां सन्तर्प्य पूर्णां विधाय
प्रतिकुण्डं शान्तिकुम्भानस्त्रग्रे मूलेन वाभिमन्त्र्य
संपाताभिहुता न कुर्यात् | तद्वारिणा च लिङ्गादिकं गत्वा
प्रतिभागं मन्त्रसनीधानार्थं प्रोक्षयेत् | ततः स्नानमण्डपे
कोष्ठक नवकं वि * *? मध्ये शिवत्वं पूर्वे सदाशित तत्वमाग्नेये
इश्वर तत्वं दक्षिणे विद्या तत्वं नैरिते मायातत्वं पश्चिमे
कालतत्वं वा यव्ये नियति तत्वं उत्तरे पुरुष तत्वं मीशाने प्रकृति
तत्वं मीशाने प्रकृति तत्वं विन्यस्य मध्ये दुग्धं पूर्वेदपि
स्च्. ८)
संयोज्य दशपञ्चलोकेश व्योम्नि विन्यस्य प्रयश्चित्त होमं कृत्वा
वाङ्मनः काय दोषापहं लोकपाल वलिश्च दत्वाक्षमस्वति यागं
विसर्जयेत्? |
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
पाद प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः || ० ||
अथ लिङ्गप्रतिष्ठाविधिः | तत्र पूर्ववत्मण्डपद्वयं कुण्डानि
नवपञ्चैकं वा विधाय कारकसमूहमाहरेत् | कुण्डसङ्ख्यया
श्रुक्श्रुवौ तिलपात्रार्घ पात्राज्य पात्राणि घण्टा धूप दहनकानि
पञ्चगव्यपात्र चरुस्थाली शिवकुम्भास्त्र वर्द्धनिकानिद्रा
कुम्भोव्यङ्गपात्रशान्ति कुम्भान्तं ताम्रमयं
द्वारपाललोकपाल विद्येश्वर कुम्भाश्च ताम्रमयात्मृत्मयान्धा
स्नानार्थं पर्वताग्रान्नदीतीरात् क्षेत्र
मध्याङ्गजदन्ताद्वृषशृङ्गात् शरमूलाद्वल्मीकतस्तीर्थादित्यष्टौ
मृदस्तीर्थोदकानि | उदुम्वर वटाश्वत्थ जन्त्वाम्रत्वचः | गोमूत्र
गोमय दुग्वदपि घृतमपि सर्वौषधी भद्रपीठानि | रौप्य पात्र
द्वयं हेमशलाकाद्वयं च सर्व
* * * वीज *? हादि भूतिकाद्वयं खड्ग क्षुरिके गृहोपस्करणं
तलिका अन्तिरिका नानावर्णपताकागृह तेजचन्द्रोवकं? तिलघृत
खण्ड गुग्गुलु विश्वपत्र श्रीखण्ड
कुङ्कुमयोपपट्टवस्त्रताम्बूलादि प्रचुरं मानीय उत्तर
वेदिकायां विन्यस्तत्वमष्टकेषु यथा क्रमं कारक पातं विन्यस्य
पूर्ववन्मण्डप प्रवेशं विधाय वेदिकायां समुपविश्य
देहशुद्धिं कृत्वा सितोष्णीषं मूलमन्त्राभिमन्त्रितं शिरसि
विन्यस्या धारशक्तेरारभ्य परसीकरणान्त मन्तर्यागं निर्वर्त्य
हृत्याकाशात्परं तेजः समाकृष्य स्वचक्षुषोर्विन्यस्य
द्रव्यगणमवलोक्यार्घपात्रं दहनोत्पपनादिना
संस्कृत्यामृतरूपेणाम्भसा प्रपूर्यसाङ्गं भगवन्तं
सम्पूज्य कर्महस्तादि मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वा
उत्तरवेदिकायां विद्वमानीय * *? शुद्धिं विधाया चार्यामृद्भिः
कथाय वर्गेण गोमूत्रेणोदकान्तरं गोमयेनाम्भसास्त्रेण
स्नानं निर्वर्त्य
सञ्चिन्त्य नवपञ्चकम्वा ताम्रकलं सांपेत समानीय
स्नानमुपक्रमेत् | मृद्भिः कथाय वर्गेण गोमूत्रेणोदकान्तरं |
गोमयेन ततोऽस्ताभिः पञ्चगव्यादिना च
संस्नाप्यरक्तवस्त्रैराच्छाद्यमण्डपं प्रदक्षिणी कृत्य
पाश्चात्पद्वारेण प्रवेश्य वेदिकायां शययोपरिसंस्थाप्य शिरः
समीप असिला निद्राकलसं संस्थाप्य वर्माभिजप्तं वा
समासंस्च्छाद्य नैवेद्यं दत्वा पृथिव्यादि वुद्ध्यन्तमध्वानं
विन्यस्य तन्त्रि खण्डं भावयेत् | तत्र तन्मात्रान्तमात्म तत्वं
सनोन्तं विद्याख्य महङ्कारवुद्ध्यन्तं शिवतत्व तत्वत्रयाधिपान्
ब्रह्मविष्णुहरांश्च | क्ष्मा | वह्नि | यजमान | अर्क | जल | वायु |
चन्द्र | आकाशाख्यं मूर्त्यष्टकं | शर्व | पशुपतिः | उग्र | रुद्र
| भव | इशान | महादेव | भीमसंज्ञकं मूर्तीश्वराष्टकञ्च
विन्यस्य निष्ठूरयासंनिरोध्य शिलायां पूजयेत् |
दिग्वादि? शिलासुतत्वानि सर्वाणि न्यस्यानि पृथक् पृथक् स्वदिशमूर्तियौ
च विन्यस्य निरोध्य पूजयेत् | ततः कुण्डसमीपं गत्वोपविश्य
कुण्डमध्ये ओं हां आधारशक्तये नम इति
संपूज्यशक्तेराहुतित्रयं दत्वा ओं हांन्मात्मतत्वाय नमः ओं
हां स्वात्म तत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः | ओं दां क्ष्मा मूर्तये
नमः ओं हां क्षा मूर्त्यधिपतय शर्वाय नमः | इत्यनेन
मार्गेण मूर्तीशा | ओं हौ शिवाय स्वाहेति मन्त्रमुच्चार्य
नमस्कारेण शिलां विन्यसेत् | ततः पूर्वादिगर्तासु | ओं लूं इन्द्राय
नमः | ओं रुन्मग्नये नमः | ओं द्रुं यमाय नमः | ओं षूं
नैरितये नमः | ओं वूं वरुणाय नमः | ओं यूं वायवे नमः | ओं
सूं सोमाय नमः | ओं हूं इशानाय नमः | इति लोकेश
मन्त्रैस्ताम्रमय कुम्भान् घृतमधु पूरितान् कृत सुसूत्र
कण्ठान् विन्यस्य तेषामुपरि शिलाः संस्थाप्य धर्मादि
चतुष्टयश्च शिलानामधिष्ठाय कत्वेन विन्यस्य ऊर्द्धाध्वानं
स्च्. ९)
क्षीरतिलसिद्धार्थ यवतण्डुलोपेतेनार्घणार्घमामाचनं
दत्वामूलमन्त्रेण सम्पूज्य हृदयेनोत्थाप्यरथे चारोप्य नगरं
पुरं प्रासादमण्डपं वा प्रदक्षिणीकृत्यं हिरण्यकंस्य
वासांसि रत्न करम्वकपरकांश्च प्रक्षिप्यमण्डपाग्रे
हृदयेनरथात्समुत्तार्य पश्चिमद्वारेण मण्डपं सप्रवेश्य
भद्रपीठे संप्राप्यशप्यायामासनं साधारणेन वा
दत्वाशिरसाशयने विन्यस्य शिखयापधानं दत्वा वर्मजप्तवाससा
संच्छाद्यनैवेद्यं दत्वास्थालीपिधान
ददत्वीमु?षलोलुखलशिलामार्जनीयन्त्रिका पात्रं
गृहोपकरणमन्यदपि दत्वामधुघृत पाअत्रं पाददेशे हृदा
मृत्युञ्जयेन वासं स्थाप्य शिरः समीपे शिवकुम्भवन्निद्रा
कुम्भमसिनासं पूज्य दिक्षुविद्येश्वरे कुम्भाष्टकं च
भागप्रदर्शकान् पुष्पप्रतिसरान्दत्वाभूतिदर्भतिलैः प्राकार
* * *? लोकपालात्संपूज्य तत्वतत्वाधिप मूर्तिमूर्तिपान् विन्यस्येत् |
तत्र मायान्तमात्म तत्व समूहं सञ्चिन्त्य ओं हां आत्मतत्वाय
नमः | ओं हां आत्मतत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः | सदाशिवान्त
विद्यातत्वमनुतान्वाय ओं हीं विद्यातत्वाय नमः | ओं हीं
विद्यातत्वाधिपतये विष्णुवे नमः | शिवतत्वान्त व्याप्त्या ओं हूं
विश्वा तत्वाय नमः | ओं हूं शिवतत्वाधिपतये रुद्राय नमः | इति
ब्रह्मभागे आत्मतत्वं विष्णुभागे विद्यातत्वं रुद्रभागे
शिवतत्व विन्यस्य प्रतितत्व तत्वत्रय व्यापकत्वेन वा
मूर्तिमूर्तियान्विन्यसेत् | ओं हां क्ष्मा मूर्तये नमः | ओं हां
क्ष्मा मूर्त्यधिपतये शर्वाय नमः | ओं हां अग्नि मूर्तये नमः
| ओं हां अग्निमूर्त्यधिपतये पशुपतये नमः | ओं हां
यजमानमूर्तये नमः | ओं हां यजमान मूर्त्यधिपतये उग्राय
नमः |
द्वितीय वेदिकायां हेमशलाकया गुरुर्लक्षणमालिखेत् | तत्र
पूजाभागं त्रिधाविभज्य भागमेकमुपरिष्ठात्मन्त्यज्य
भागद्वयेन लिङ्गाकारं लक्षणमवतारयेत् | चार्द्वात्यक्षरेखा
भ्रमः | लिङ्गदेव्य षोडशांश त्रिभक्ते भागमेकं संत्यज्य
भागद्वयेन रेखाद्वयमध्ये विस्तारः भार्यः रेखायाश्च खात
विस्तारयोर्मानं | नवहस्तलिङ्गस्य वाष्टकेन | अष्टहस्तादि
लिङ्गानां त्रैराशिकात् | अथवा यवस्य नवमाशोयवांशः
पूजाभागे या वन्त्यङ्गुलानि तावन्तोय वांशकाः |
लक्षणरेखायाः प्रमाणं | पक्षक्षेत्रं त्रिधाविभक्त
पक्षरेखा सूत्रात्सार्द्ध भागद्वयेनाधोभागार्द्धं परित्यज्य
राज्यसन्तान कामस्ये पक्षरेखावतारे | भ्रमेण कार्यः |
रेखाद्वयस्य च पृष्ठे युतिरयुतिर्वा नवधा वा विभक्ते
भागद्वयमधः सन्त्यज्य पक्षरेखावतारे भ्रमेण कार्यः
| षोडशधा वा भक्ते
भागद्वयं संत्यज्ययश्च भिर्नवभिर्द्वादशभिश्चतुर्द्दशभिर्वा
भ्रमेण पक्षरेखावतारः | अश्रिकोण क्रमेण वा प्रतिमासु च
दृगुन्मीलन कुर्यात् शिल्पी | तच्छस्त्रेणोत्कीर्य? घृतमधुभ्यां
मृत्यूजित्मन्त्रेण संपूर्य पात्रशलाकादिकं शिल्पिने दत्वा
पुनरासने संच्छाप्य अविधवा अष्टौ चतस्रो वा नार्पो रक्तसूत्रेण
स्पृशेयुः | दहेण वा | तैलेन हरिद्र या च नीराजनादिकश्च
कर्मकुर्यूः | अनन्तर मस्त्रेणाताड्य वर्मणाभूक्ष | वगुण्ठ्य
च साधारणेन स्वमन्त्रेण वा संपूज्य स्नपनमुपक्रमेत् गोमूत्र
गोमयं दुग्धदधिघृतमधुपश्च गव्येर्जलातुरैः
समुद्ररूपकल्पित क्षीरजलादि कुम्भैः
स्वस्वमूर्तिमन्त्राभिमन्त्रितैः संस्नाप्य चन्दनादिभिरालिप्येसु रक्ते
वाससी परिधाप्य नीराजनं कृत्वा कुशकुसुमजल
स्च्. १०)
* *? ततोमूलमन्त्रेण कुशमूले लिङ्गमूल सस्पृश्य शान्त
कुम्भाम्भ सा प्रोक्षयेत् | पुनरपि कुण्ड समीपगत्वा ओं हां
आत्मतत्व विद्यातत्वाभ्यां नमः | इति शुद्धाशुद्धरूपतया
तत्वसन्धान्धां कृत्वा विद्यातवमुस्थापयेत् | ओं हां विद्यातत्वाय
नमः | ओं हां विद्यातवाधिपतये विष्णुवेनमः इति सम्पूज्य
स्वाहान्तेनाहुति दानं विदध्यात् | ततो मूर्त्यष्टकं पृथक् पृथक्
विन्यस्य संपूज्याहुतिभिः सन्तर्प्य लिङ्गस
ओं हां अर्कमूर्तये नमः | ओं हां अर्कमूर्त्यधिपतये रुद्राय
नमः | ओं हां जलमूर्तये नमः | ओं हा जलमूर्त्यधिपतये भवाय
नमः | ओं हां वायुमूर्तये नमः | ओं हां वायुमूर्त्यधिपतये
ईशानाय नमः | ओं हां इन्द्रुमूर्तये नमः | ओं हां
इन्दुमूर्त्यधिपतये महादेवाय नमः | ओं हां ख मूर्तये नमः
| ओं हां खमूर्त्यधिपतये भीमाय नमः | इति
मूर्तिमूर्तिपान्विन्यस्य विष्णुरया संनिरुद्व्यानेन मार्गेण
लिङ्गस्योत्तरतः पिण्डिकायामपि तत्वविन्यासः कर्तव्यः |
लिङ्गमूलस्थित ब्रह्मशिलायाश्च | किंत्वे तस्यां
क्रियाज्ञानेच्छाख्यमात्म तत्वाधिष्ठाधिपत्येन शक्तित्रयं
विन्यसेत् | ओं हां आत्मतत्वाय नमः | ओं हां आत्मतत्वाधियायै *
*यै नमः | ओं हां विद्यातत्वाय नमः | ओं हां विद्यातत्वाधियायै
ज्ञानशक्तये
* * *? ओं हां शिवतवाय नमः | ओं हां शिवत्वाधिपाये इच्छायै
नमः | साधकप्रतिष्ठायाश्च शुद्धविद्यादिशक्त्युक्तेऽध्वनि
भोगमिच्छोरनन्तादि मूर्तिधान् | अनन्तासूक्ष्म शिवोत्तम | एक नेत्र
| एक रुद्र | त्रिमूर्ति | श्रीकण्ठ | शिखण्डिन इति | पुरुषादि मायान्ते
शुद्धाशुद्धाध्वनि पुनर्मण्डलिनोऽङ्गुष्ठमात्र
प्रभृतीन्रूद्रानङ्गुष्ठमात्र भुवनेश | इशान | एक पिङ्गक्षण |
उद्भव | भव | वावदेव | महातेज पर्यन्तान् | पृथिव्यादि
प्रधानान्ते अशुद्धेऽध्वनि पूर्वादिदिक्षु व्यवस्थितम् |
शतरुद्राणामध्ये प्रधानमेकैकं क्ष्मादिमूर्त्यधियत्वेन
विन्यसेत् | तेषां नामानि | कपालीश | अग्निरुद्रयाम्य | निरिति | वल |
शीघ्र | निधीश विद्याधिप इति | क्वचिच्चेन्द्रादयो मूर्तिपो
क्षुद्रकर्मणि भैरवाः | असिताङ्गौ रुरुश्चण्डः क्रोध उन्मत्त
भैरवः कपाली
क्षीरतिलसिद्धार्थ यवतण्डुलोपेतेनार्घणार्घमा *? चमनं
दत्वासूलमन्त्रेण सम्पूज्य हृदयेनोच्छाप्यरग्नेवारोप्य नगरं
पुरं प्रासादमण्डपं वा प्रदक्षिणी कृत्यं हिरण्यकास्य
वासांसि * * * * * *? द्वारेण मण्डपं स * * * * * *?
* * * * * * * * * * * * * ? सर्वगतस्मरन् सकल मध्य ध्वानत दारूढं
संचिन्त्यानन्तरं रत्नादिकं पञ्चकं विन्यसेत् तत्र पूर्वस्या
वज्रमाग्नेयया सूर्यभान्तं दक्षिणस्या नीलं नैरित्या महानीलं
पश्चिमायां मौक्तिकं वायव्यां पुष्परागं उत्तरस्यां
पद्मरागं ऐशान्यां वैदूर्यमिति विन्यस्य हेमताम्र कृष्टलोहत्र
पुरौप्यरीति काकान्स्य सीसकान्यपि देहशक्तिमनुस्मरन् | हरितालं
मनःशिलांगैरिक्यं सुवर्णमाक्षिकं पारदेहेमगैरिका
गन्धकं अभ्रकं
ऋएपत् उप् हेरे
भीषणश्चैव संहारश्चाष्टमः स्मृतः | पञ्चमूर्तिन्या स पक्षे
तु क्ष्मा वारिदहना निलाकाशाख्यं पूर्ववत्मन्त्रै मूर्ति
पञ्चकं विन्यस्य | ब्रह्मविष्णुरुद्र इश्वर सदाशिवाख्यं मूर्तीश
पञ्चकं | निवृत्त्यादि सहितं सद्योजातादि पञ्चकं वा
मुमुक्षोर्विन्यसेत् | गौर्यादि प्रतिष्ठायाश्च धारिका | दीप्तिमती |
उग्राज्योस्ना | चेता वलोत्कटा धात्री | विस्वीति मूर्त्यधिपत्वेन शक्तयः
| भोगेच्छाः साधकस्यानन्तादयः | स्त्री पाठवशमाधन्ना
विद्याराज्या भवन्ति | पञ्चमूर्ति पक्षे तु | वामा ज्येष्ठा क्रिया
ज्ञानी इच्छा चेति | उग्र्यर्वा सांतमा मोहाक्षया निष्ठामृत्यू
माया? भयोजरा | पञ्चमूर्ति पक्षे तु | तमा मोहा घोरारत्यप
ज्वराः | एताश्च प्रणवादिस्व संज्ञाभिः संपूज्यान्तरं
कुण्डसमीपं गत्वा * * * * ? आधार शक्तये नम इति शक्तिं विन्यस्य
संपूज्याहुति त्रयं दत्वाऽत्म तत्वमुपस्थापयेत् | आत्मतत्वाय
नमः |
* *? आत्मतत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः | इति संपूज्य मूर्तियान्
विन्यसेत् | ओं हां क्ष्मा मूर्तये नमः | ओं हां क्ष्मा
मूर्त्यधिपतये शर्वाय नमः | इति संपूज्य
स्वाहान्तेनाहुतिभिस्तर्पयेत् | एवमनेनैव मार्गेण
मूर्त्यष्टकमधिपं सपूज्याहुतिभिस्तर्पयेत् | ततो लिङ्गसमीपगत्वा
आहुति सङ्ख्यया जपं विधाय मूर्तियैः सह तत्वाधिपमाज्ञां
श्रावयेत् | ब्रह्मन् यावद्दोष निर्मुक्तं लिङ्गं तावत्त्वया सन्निहितेन
शिवाज्ञयास्थातव्यं ततो मूलमन्त्रेण कुशमूलैर्लिङ्गमूलं
संस्पृश्य शान्ति कुम्भाम्भ सा प्रोक्षयेत् | पुनरपि कुण्ड समीपं
गत्वा ओं हां आत्मतत्व विद्या तत्वाभ्यां नमः | इति शुद्धाशुद्ध
रूपतया तत्व सन्धानं कृत्वा विद्यातत्वमुपस्थापयेत् | ओं हां
विद्या तत्वाय नमः | ओं हां विद्या तत्वाधिपतये विष्णुवे नमः | इति
सम्पूज्य स्वाहान्तेनाहुति दानं विदद्यात् | ततो मूर्त्यष्टकं
पृथक् पृथक् विन्यस्य संपूज्याहुतिभिः सन्तर्प्य लिङ्गस
स्च् १२)
ओं हां अर्क मूर्तये नमः | ओं हां अर्कमूर्त्यधिपतये रुद्राय
नमः | ओं हां * * * * ?
स्थाप्यमान्यस्थत वा मध्याच्च | तत्वा प्राच्या देशमा * * * * * * * ?
सूलमन्त्रेण शतद्वयत्रय वा जुहुयात् | शान्ता वैन्द्र्या दक्षिणा
गजं तदभावेकाञ्चनं गजं | अग्नेयादि शान्तीनां काञ्चनं
महिषं छागं मौक्तिकं पित्तलं धेनुं च जतं
क्रमेणस्थापकाय दत्वा पूर्णा च जुहुयात् | द्रव्या
भावेन्सर्वदिगाश्रिते चलने सम्पूज्य विज्ञाप्य
मन्त्रतर्पणायाष्टोत्तरशतं हुत्वा पूर्णाहुतिं
मीपं गत्वा मूर्तिपैः सहमूअं मन्त्रमुच्चारयेत् | कुशमध्येन
विष्णु विभागं संस्पृश्याज्ञां श्रावयेत् | विष्णो शिवाज्ञ
निर्दोषं लिङ्गं यावत्तावत्त्व या सन्निहितेन भाव्यं | ततः
शान्तिकुम्भाम्भसा संप्रोक्ष्य कुण्डसमीपं गत्वा ओं हां
विद्यातत्वशिवतत्वाव्यां नम इति तत्वसन्धानानन्तरं
शिवतत्वमुपस्थापयेत् | ओं हां शिवतत्वाय नमः | ओं हां
शिवतत्वाधिपतये रुद्राय नमः | इति सम्पूज्य स्वाहान्तेनाहुतिं
दत्वामूर्ति मूर्तिपान् विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् | ततोलिङ्गसमीपं
गत्वामूलाणुना कुशाग्रेणाग्र भागं संस्पृश्य शान्ति
कुम्भोदकेन संप्रोक्ष्याज्ञां श्रावयेत् | भोभो
रुद्रत्वयाव्यङ्गादि दोषनिर्मुक्तं यावत्तावच्छिवाज्ञया संनिहितेन
भाव्यं | एवं पीठ शिलादिषु तत्वशुद्धिं विधाय शतं
सहस्रमर्द्धं वा सद्योजातादिभिर्मन्त्रैः स्वस्वदिक्षु होमं
विधाय व्याहृतिभिर्यथा शक्तिहोम कृत्वा उत्थाय
* *? वस्य दक्षिण श्रवणे ज्ञानशक्त्या कर्मसमर्प्ययेत् |
भगवताया भागत्रयेपि कर्मनिवर्तितं त्वत्प्रसादात्संपूर्णं
तां यात्विति संबोध्य भासुर मन्त्रमुच्चारयन् प्रासादं गत्वा
विघ्नानुच्छायं द्वारमध्य षट्विंशाधिकशतांशेन
ब्रह्मस्थानं परिहृत्य इशान दिगाग्रे तां ब्रह्मशिलां स्थापयेत् |
ओं नमो व्यापिनि स्थिरे अचल ध्रुवलं ह्रीं लं स्वाहेति ब्रह्मशिलां
विन्यस्यस्थैर्य सर्वगतं स्मरन् सकलमध्य ध्वानं तदा रूढं
संचिन्त्यानन्तरं रत्नादिकं पञ्चकं विन्यसेत् | तत्र पूर्वस्या
वज्रमाग्नेयया सूर्यकान्तं दक्षिणस्या नीलं नैरित्या महानीलं
पश्चिमायां मौक्तिकं वायव्यां पुष्परागं उत्तरस्यां
पद्मरागं ऐशान्या वैदूर्यमिति विन्यस्य हेमताम्र कृष्ण
लोहत्रपुरौप्यरीति काकात्स्य सीसकान्यपि देहशक्तिमनुस्मरन् |
हरितालं मनःशिलांगैरिकां सुवर्णमाक्षिकं पारदं
हेमगैरिका गन्धकं अभ्रकं
ऋएपत् उप् तो हेरे
स्च् १३ समे १४)
* * * * *त्र दत्वङ्गानि ततः | ओं सूविच्छक्तये नमः | इति
चिच्छक्तिव्यापकत्वे नैव विन्यस्य रुद्रभागाधस्तात् पीठे सर्वतः
क्रियाशक्तिं विन्यस्य निरोधयेत् | अथगोमय पिष्टोदि निर्मितैः |
वज्रशक्ति दण्डखड्गपाश ध्वजगदाशूलैः स्वस्वमन्त्रैः
पाशुअतास्त्रेण वा निर्मत्स्य पद्म उत्पलकमलशङ्खनन्द्यावर्त
श्रीवत्स स्वस्तिका * *? घोरास्त्रेण निर्मत्स्य विधिवत् स्नानं विदध्यात् |
ततश्चन्दनादिभिलिप्य नैवेद्यं दत्वा वाससा परिधाप्या
लङ्कारैरलं कृत्य धूपाट्यादिकन्दत्वा जपं
कृत्वायजमानद्यमीश्वरान्तं भगवते नामदत्वा प्रार्थयेत् |
भगवत्सर्वदा संनिहितेन भवितव्यमेवं करोमीत्यनुज्ञातः
कुण्डसमीपं गत्वा शान्त्यर्थधायमेन मूलमन्त्रोमाम
मन्त्राभ्यां होममाचरेत् | ततो द्वितीयेऽह्नि विधि
संपादनार्थमच्छिद्रीकरणाय च पूर्वदक्षिणोत्तर
पश्चिमकुण्डेषु शिवास्त्रा घोरास्त्र पाशुपतास्त्र
मूलमन्त्रैराग्नेयादि
इति धातृन् | उश्रीरं विष्णुक्रान्तं रक्तचन्दनं कृष्णागरुं
श्रीखण्डमुत्पलसारिवा कुष्ठ सङ्गा पुष्पिका इत्यौषधीः |
व्रीहिगोधूमतिलमाषमुङ्गय वनीवारश्यामाकान् पूर्वादि
क्रमेण विन्यसेत् | यद्वा समस्त रत्नानां वज्रं लोहानां सुवर्णं
धातूनां हरितालं औषधीनां सहदेवां वीजानां यवान् |
एकं वा पारदं सर्वगर्तासुलोकपाल मन्त्रैर्विन्यस्य मध्यगर्ताया
हेममद्य कूर्मं वृषं गौरी वाद्यनन्त मन्त्रण संस्थाप्य
पायसेन विलिप्येवर्म जप्तवासमच्छाद्य लोकपालवलिन्दत्वा शिला
सूत्रत्युतिच्छिद्र निवारणायासिना शिवैन वा होमः कार्यः | ततो
महेश्वरमुत्थाप्य शिरसाऽर्घं दत्वा भगवन्तं सस्तुभ्य
जयशब्दादि मङ्गलः सतूर्य निर्घोषे रत्नकरस्वकं प्रक्षिपेत् |
प्रासादं प्रदक्षणी कृत्यरीत्वा? द्वारस्व भ्रान्तरे रुद्रपीठे
समुत्तार्य स्थिरे भवेत्युक्त्वा ब्रह्मशिलास्व भ्रमस्त्रेणोद्घाट्य
यन्त्रेण प्रगुणं शक्तिशक्तिमतो ध्यात्वा ब्रह्मादिकारण त्यागेन
लयान्तं मन्त्रमुच्चार्य
सृष्टिमार्गेण विन्यस्य पीठबन्ध विधाय देवीमुद्बोधयेत् |
ताञ्चसमानीय * *?स्वनः प्रगुणीकृत्य लग्नकालमवलोकयेत् | ततो ओं
ह्रीं क्रियाशक्तये उमायै नमः इति देवीमन्त्रमुच्चार्यस्यषु
मार्गेण विन्यसेत् | यदि च प्रगुणालग्नकालेन भवति चलनेन
दिग्भ्रान्तिर्भवति तदादिग्देवता होमो मूलमन्त्रेणास्त्रेण
वाऽष्टोत्तरशतिकः कर्तव्यः | तथालिङ्गं स्थाप्यमान स्थितं वा
मध्याच्चलित्वा प्राच्यादिशमाश्रयति तदैन्द्र्यादि शान्तीः कुर्यात् |
तदनु च स्वस्वदिक्काल मन्त्रेण शतद्वयं त्रयं वा जुहुयात् |
शान्ता वैन्द्र्यां दक्षिणागजं तदभावेकाञ्चनं गजं |
आग्नेयादिशान्तीनां काञ्चनं महिषं भागं मौक्तिकं
पित्तलं धेनुं च जतं क्रमेण स्थापकाय दत्वा पूर्णा च
जुहुयात् | द्रव्या भावे सत्वदिगाश्रिते चलने सम्पूज्य विज्ञाप्य
मन्त्रतर्पणायाष्टोत्तरशतं हुत्वा पूर्णाहुतिं
स्च्. १४ सेम १५)
म २ ज्योति २ सुवोसुवः भुवोभुवः पाह्यमृतो हृद वगत्य त्रिभि ठं
पदय जुषां लक्ष्मीर्सोवः किरिकेयः करोति तमेवाघो विसतु महादेव
सुव्रते नमोनमः स्वाहा | प्रत्याङ्गरा || ० ||* * * * * * * * * * * *?
प्रतिमानान्तु स्वेन स्वेन मूलमन्त्रेण च तुर्थिका कर्मकुर्यात् | एवं
दिन चतुष्टयं यावन्निर्माल्य | वगाहतादि दोषो नास्ति | चतुर्थेह्नि च
भगवन्तं संस्नाप्ये लोकपालवलिं दत्वा नैवेद्योदेर पनयनं
कृत्वाण्डं साध्याण्डं स्वा विसज्य लिङ्गमूर्तौ चण्डनाथं
पूज्यध्यात्वा नवाम्वुदा हासं चतुर्वक्त्रञ्चतुर्भुजं त्र्यक्षं
चन्द्रकलाचूतं दीप्ताम्यं फणिकङ्कणं शूलटङ्कोद्यतकरं
कमण्डेल्वक्षमालिनं महोरगोपवीतं च प्रसन्नार्तिविनाशनं |
आत्मसु? प्राणपथा समानीय इशान्यामाधार शक्तिकमल
संस्थापयेत् | ततोलिङ्गं सस्नाप्ये साधारण विधिना यागं
विन्यस्याहुति समूलमन्त्रेण दत्यात् |
उक्तानुक्तेष्वपि दोषेषु मूलमन्त्रेणास्त्रेण वा होमः कार्यः |
ततोलिङ्गं पिण्डके प्राण्जले कृत्वा शिवेन साङ्गेन होम कृत्वा
विज्ञाप्य निर्दोषो भूत्वासर्जलोहमलादिना सन्विलपं विधाय
निरन्ध्र कृत्वा शान्तिकुम्भाम्भसार्द्धेन पञ्चमृतेन च
संस्नाप्य संपूज्यार्घं दद्यात् | ततो दक्षिण पाणिना
उत्सृताङ्गुष्ठां मुष्टिंवद्वापिण्डिकायां संस्थाप्य
लिङ्गमङ्गुष्ठेन संस्पृश्य लिङ्गस्य शिवरूपमभिधाय
पिण्डिकाया उमारूपतां संचिन्त्य ओं हौं शिवाय नमः | ओं ह्रीं
क्रियाशक्तये उमायै नमः | इति शिवोमामन्त्राभ्यां लिङ्गस्य
पिण्डिकाया सह वुभुक्षाः सन्धानं कुर्यात् |
मुमुक्षोरुमामन्त्रपूर्वेण शिवमन्त्रेण | ततो
ब्रह्मविष्णुरुद्रभागेष्वात्मादि तत्वत्रयं माया सदाशिवशिवप्रा *
*? स्वाधियैः सह विन्यस्य आसनं मन्त्रान् पीठे मूर्तिमन्त्रं विद्या
देह सहितं लिङ्गे विन्यस्य ततो मूलमन्त्रेण व्याप
स्च्. १५)
इति धातून् | उशीरं विष्णु * * * * * * * * * * ?
संपूज्य बध्वायश्चित्तनित्तं पूर्वद्धोमः कार्यः || ० ||
इति महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ द्वारं प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ||
अथ हृत् प्रतिष्ठाविधिः | तत्र पूर्ववद्योग गृहमनुप्रविश्यमन्त्र
तर्पणान्तं कर्म कृत्वोत्त
कुण्डेषु वा घोरास्त्र सावित्रीं गायत्री प्रत्यङ्गिरा मन्त्रै पृथक्
पृथक् सहस्रं जुहुयात् | ततस्तृतीयेऽह्नि | ऐन्द्री आग्नेयी याम्या
नैरितीवारुणी वायव्या कौवेरी ऐशानीति शान्त्यष्टकाय स्वस्वमन्त्रैः
सहस्रं २ जुहुयात् | ततश्चतुर्थे दिवसे यथा शक्तिभगवन्तं
सम्पूज्य वागीश्वरी मन्त्रेण स्वब्रह्माङ्ग सहितेन प्रतिकुण्डं
सहस्रं २ हुत्वा च रुं संसाध्य देवाय निवेद्य प्रतिकुण्डं यथा
शक्ति जुहुयात् | तत्र मन्त्राष्टकं | ओं हः अस्त्रा फट् शिवास्त्रं | ओं
प्रस्फुर २ घोरघोरतर तनु सपचट् २ प्रचट २ कह ए वम २ घातय २
हूं फट् | अघोरास्त्रं | ओं श्लीं पशु हूं फट् || पाशुपतास्त्रं
| ओं व्योम व्योमाय विद्महे सूक्ष्म सूक्ष्मायधीमहे तन्ना रुद्रः
प्रचोदयात् | शिवसावित्री | ओं तन्महेशाय विद्महे
वाग्विशुद्धायधीमहे तन्नः शिवः प्रचोदयात् | शिवगायत्री ओं आं
इं ऊं रुद्रास्थि शृङ्खल हूं सर्वतो भद्र भद्ररूटि रुद्रवचन
विधारि रक्ष २ मांप्रत्यङ्गिरे
स्च्. १६)
प्त कटातव्यं | ओं हां शिवस्थिरां भव स्वाहा | ओं हां
शिवाव्यापको भव स्वाहा | ओं हां शिव अप्रमेयो भव स्वाहा | ओं
हां शिव अनादि बुद्धो भव स्वाहा ओं हां शिव नित्यो भव स्वाहा
| ओं हां शिव अविनश्वरो भव स्वाहा | ओं हां शिवतृप्तो भव स्वाहा
| इति नित्यदिधर्मान्वितस्य भगवतः | विधौकर्मसम्पूर्णार्थमाहुति
सप्तकं दातव्यं | ततः कृताकृतकर्मपूर्णार्थं शतं
सहस्रमर्द्धस्वा अघोरास्त्रेण पाशुपतास्त्रेण वा होमः कर्तव्यः ||
० ||
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
लिङ्ग प्रतिष्ठाविधः समाप्तः ||
अथ द्वारप्रतिष्ठाविधिस्तत्र पूर्ववत् द्वारपालध्वजादि
मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वा द्वाराङ्गानि कथायादिभिः
संस्नाप्य रक्तवस्त्र युग्मेन संच्छाद्य शययायां सम्यरोप्य अधो
दुम्बरे मायान्तं तत्व व्रातमात्मत व्याप्तमूर्द्ध विग्रह
शक्त्यन्तं विद्यातत्व व्याप्तं सर्वञ्च शिवतत्व व्याप्तं भावयित्वा
मूर्ति
न्यास विधाय पूर्वद्कल्मकुशादिना प्राकारत्रयेणरक्षणादिकं
विधाय कुण्डसमीपं गत्वा | अथ शुद्धिं कृत्वा द्वार प्रदेशे
वास्तु संपूज्य रत्नादि पञ्चकं विन्यस्य प्रणवासनं दत्वा
प्रणवेन द्वारविन्यस्य यव सिद्धार्थक वृक्रान्ता वृद्ध्यद्व्यमृता
मोहना | गोशृङ्गमृद्वरदात्पल कुष्ठतिला रग्?बध
लक्ष्मणारोधनात्महदेवादधि पूर्वति द्रव्यसमूह चित्रकर्पटे
बद्धोर्द्धादुम्बरे बन्धयेत् | ततः स्थिरो भवेत् पाद्याहुति सप्तकं
दत्वा शाखासुनन्दि महाकालौ गङ्गायमुने ऊर्ध्वोदुम्बरे
गणेश श्रियञ्चेति देवता षट्कं विन्यस्य शिवाज्ञया संनिरोध्य
संपूज्य रध्वा पश्चित्तनित्तं पूर्ववद्धोमः कार्यः || ० ||
इति महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ द्वारप्रतिष्ठाविधिः समाप्तः || अथ
हृत्प्रतिष्ठाविधिः | तत्र पूर्ववद्याग गृहमनु प्रविश्यमन्त्र
तर्पणान्तं कर्म कृत्वान्त
कुण्डेषु चाघोरास्त्र सावित्रीं गायत्री प्रत्यङ्गिरामन्त्र पृथक्
पृथक् सहस्रं जुहुयात् | ततस्तृतीयऽग्नि | ऐन्द्री आग्नेयी याम्या नैरिती
वारुणी वायव्या कौवेरी ऐशानीति शान्त्यष्टकाय स्वस्वमन्त्रैः
सहस्रं २ जुहुयात् | ततश्चतुर्थि दिवसे यथा शक्ति भगवन्तं
सम्पूज्य वागीश्वरी मन्त्रेण स्वब्रह्माङ्ग सहितेन प्रतिकुण्डं
सहस्रं २ हुत्वा चरुं संसाध्य देवाय निवेद्य प्रतिकुण्डं यथा
शक्ति जुहुयात् | तत्र मन्त्राष्टकं |
स्च्. १७ सेम १८)
* * * * * * * * * * * * ? कालति यामि कस्य साध्यसाधकत्वेनाङ्गुष्ठ
मात्र * * * * * * * * * *? विन्यस्य सरुप्य च त्रिखण्डमध्वानां माया
सदाशिव शिवप्रान्तं भावयेत् | ततो रक्षां कृत्वा कुण्डसमीपं
गत्वा ओं हां आधार शक्तये नमः | इति शक्ति न्यासादनन्तरं
कल्पदि तत्वव्रातं विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् | ततो होम संख्यया
जपं विधायाज्ञां श्रावयेत् | कालाधिपश्च तत्वेन सहशिवाज्ञया
प्रासाद स्थिति पुरा? स्थातव्यमित्यनेन मार्गेण परान्तं निरोधयेत् |
ततः शुकन्य सार्द्ध गर्भ गृहके खट्वायां हेमाद्येकतमं * *
* ? विन्यस्य * * *?
* वेदिकायां यथा विभवं हेम मयं पुरुषं कृत्वा
पञ्चगव्यादिनासंस्नाप्य चन्दनादिना विलिप्य वस्त्रैराच्छाद्य
मण्डपमानीय शयया संस्थाप्य प्रलया कलमेकं शिवाज्ञा
पदवोधितं द्वादशान्तात् समानीय ओं हां हं हां आत्मन्
शिवाज्ञया त्वयात्रशरीरे स्थातव्यमिति रेचकेन विन्यस्याति वाहिकं
देहं न्यसेत् | ओं हां कलायै नमः | ओं हां कलाधिपतये नमः |
कलाधिपास्य कर्तृत्व व्यक्तिं कुरु २ | ओं हां विद्यायै नमः | ओं
हां विद्याधिपतये नमः | विद्याधियास्य ज्ञानाभिव्यक्तिं कुरु २
| ओं हां रागाय नमः | ओं हां रागाधिपतये नमः |
रागाधिपास्य विषयेषु राग कुरु २ | ओं हां प्रकृत्यै नमः | ओं हां
प्रकृत्यधिपतये नमः | प्रकृत्यधिपस्वाधिकार पूरकत्वमस्य कुरु
२ | ओं हां वुद्ध्यै नमः | ओं हां वुद्ध्यधिपतये नमः |
वुद्ध्यधिपास्य वोधं कुरु २ | ओं हां अहङ्काराय नमः | ओं हां
अहङ्काराधिपतये नमः | अहङ्कारास्याभि
२ | ओं हां मनसे नमः | ओं हां मनोधिपतये चक्षुय नमः |
मनोधिवास्य सङ्कल्पं कुरु २ | ओं हां श्रोताभ्या नमः | ओं हां
* * * * * *? नमः | शोत्राधिपास्य शब्दग्रहकत्वं कुरु २ | ओं हां
त्वच नमः | ओं हां त्वगङ्कल्पविकाधिपतये वायवे नमः |
त्वगधिपास्य शब्दमोहक? त्वं कुरु २ | ओं हां चक्षुषे नमः | ओं
हां चक्षुरधिपतये अर्काय नमः | चक्षुरधिपास्य रूपग्राकत्वं
कुरु २ | ओं हां जिह्वायै नमः | ओं हां जिह्वाधिपतये वरुणाय
नमः | जिह्वाधिपास्य रसग्राहकत्वं कुरु २ | ओं हां घ्राणाय
नमः | ओं हां घ्राणाधिपतिभ्याम * ?भ्यां नमः
घ्राणाधिपास्य गन्धग्राहकत्वं कुरु २ | ओं हां ः | ओं हां
वागधिपतये अग्नये नमः | वागधिपास्य वाच कुरु २ | ओं हां
पाणिभ्यां नमः | ओं हां पाण्यधिपतये इन्द्राय नमः |
पाण्यधियास्य पदार्थ ग्राहकत्वं कुरु २ | ओं हां पद्यां नमः
| ओं हां पदाधिपतये विष्णु
स्च्. १८)
नावगुण्ठ्य तत्वा * * * * * * * * * * * * * * * * *ज्य? अघोरास्त्रं ओं
प्रस्फुर २ घोरघोरतरतनु रू * * * * * ? अस्त्राय नमः | ओं प्रस्फुर २
* *? | फट् हृदयाय नमः | ओं घोरघोरतर हूं फट् शिरसे नमः
|ओं तनुरूप हूं फट् शिखायै नमः | ओं चत २ प्रचट २ हूं फट्
* * *?नमः | ओं कह २ वम २ घातय २ हूं फट् अस्त्राय नमः |
ध्वजञ्च जङ्घार्द्ध लम्बिजघान्तं
वे नमः | पादाधिपास्य गमनोत्साहं कुरु २ | ओं हां पायवे
नमः | ओं हां पाद्यधितये मित्राय नमः | पाद्यधिपास्या * * * * *
* * *? नमः | ओं हां उपस्थाधिपतये ब्रह्मणे नमः |
उपस्थाधिपास्या नन्दं कुरु २ | ओं हां शब्दाय नमः | ओं हां
स्पर्शाय नमः | ओं हां रूपाय नमः | ओं हां रसाय नमः | ओं
हां गत्वाय नमः | ओं हां आकाशाय नमः | ओं हां
आकाशाधिपतये सदाशिवाय नमः | ओं हां वायवे नमः | ओं हां
वाद्यधिपतये इश्वाराय नमः | ओं हां तेजसे नमः | ओं हां
तेजोधिपतये रुद्राय नमः | ओं हां अङ्ग्यो? नमः | ओं हां
अवधिपतये विष्णुवे नमः | ओं हां पृथिव्यै नमः | ओं हां
पृथिव्यधिपतये ब्रह्मणे नमः | एवं तत्व व्रातं विन्यस्य
नाडीदशकं वायुदशकञ्च विन्यसेत् | ओं हां इडायै नमः ओं
हां पि * *यै नमः | ओं हां शुष्टम्नायै नमः | ओं हां शावित्र्यै
नमः | ओं हां शङ्खिन्य नमः | ओं हां कुह्वै नमः | ओं हां
यशोवत्यै नमः | ओं हां हस्तिजिह्वायै नमः |
ओं हां पुष्णायै नमः | ओं हां लड्डुषायै नमः | ओं हां
अधानायै नमः | ओं हां समानाय नमः | ओं हां उदानाय
नमः | ओं हां व्यानाय नमः | ओं हां नागाय नमः | ओं हां
कूर्माय नमः | ओं हां कृकराय नमः | ओं हां देवदत्ताय
नमः | ओं हां धनञ्जयाय नमः | इति माया स्वाधिकारत्वेन
कालति यामिकेस्य साध्यसाधकत्वेनाङ्गुष्ठमात्र प्रभृति मन्त्रैः
सहस्र प्रेरकत्वेन व्यापकत्वेन च भगवन्तं विन्यस्य संरुध्य च
त्रिखण्डमध्वानां माया सदाशिवशिव प्रान्तं भावयेत् | ततो
रक्षां कृत्वा कुण्डसमीपं गत्वा ओं हां आधार शक्तये नमः |
इति शक्ति न्यासीदनन्तरं कल्पदितत्व व्रातं विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् |
ततो होमसंध्यया जपं विधायाज्ञां श्रावयेत् | कालाधिपश्च
तत्वेन सह शिवाज्ञया प्रासाद स्थिति पुर्यन्तं स्थातव्यं मित्यनेन
मार्गेण परान्तं निरोधयेत् | ततः शुकन्यसोर्द्ध गर्भगृहके
खट्वायां माद्येकतमं कुम्भ मूर्तिभतं विन्यस्य घृत
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
Pद्f ४
स्च्. १ सेम २, ३)
तयालितय * * * * * * ? णिकारहित वक्त्रविकराल भीषण दोष दु
धुभ्यामापूर्य रत्नादि पञ्चकं विनासा चन्दनादिना विलिप्य
सुशुक्ले वाससी परिधाप्य तत्र पुरुष न्यसेत् | पुनः कुण्ड * * * *?
गत्वा प्रायश्चित? मं विधाया चार्याणां यथा
शक्त्यदक्षिणादिकं दत्वा भगवन्तं क्षमापयेत् || ० ||
इति श्री महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसार
पद्धतौ हृत्प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ||
इदानीं चूलकादि प्रतिष्ठाविधिस्तत्र पूर्ववत् मण्डले द्वारपाल
पूजादिमन्त्रतर्पणान्तं कर्म कृत्वान्तर वेदिकायां चूलक
दण्डौ शूलञ्च संस्नाप्याधि वासनमण्डपै समानीय
शययायां विन्यस्य लिङ्गवत्तत्व न्यासं विदध्यात् | लक्षणोद्वारञ्च
तुर्थिको होमञ्चण्ड कल्पनान्विहाय यथा लिङ्गे विधिः कृतस्तथा
त्रापिकरणीयः | किन्तु मूर्ति वक्त्राङ्गन्यास विशेषाध्व क्रियाजि?तः |
ततः प्रासादे तत्व न्यासः | जङ्घायामात्म तत्वं कण्ठान्तं
विद्यातत्वं कण्ठादूर्द्धं शिवतत्वं विन्यस्यै तत्वाधिय
मूर्तिमूर्तिपान् विन्यस्य?
चूलक प्रासाद विन्यस्त तत्वादिषु तिलघृतानुमारणाहूतिर्दत्वा
प्रतिभागञ्च जप स्पर्शो विधायचूलका धाररत्नादि पञ्चकं
पूर्ववद्विन्यस्य चूलकं स्थापयेत् | ततः कालोपरित
फलैर्घटमापूर्य प्रासादस्य फलस्नानं विदध्यात् | ततो
दण्डध्वजा वस्त्रेण संप्रोक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य तत्वादिन्यासं
विधाय होमं कृत्वा जप स्पर्शो
निर्वर्त्यध्वजाधारे षडुत्थमासनं दत्वा मूर्ति भूतदण्डं
विन्यस्यास्त्रं साङ्गं सम्पूज्य | अघोरास्त्र ओं प्रस्फुर २
घोरघोरतर तनुरूप पचट २ प्रचट २ कह २ वम २ घातय २ हूं
फट् अस्त्राय नमः | ओं प्रस्फुर २ हूं फट् हृदयाय नमः | ओं
घोरघोरतरहूं फट् शिरसे नमः | ओं तनुरूप हूं
फट्शिखायै नमः | ओं चट् २ प्रचट हूं फट् कवचाय नमः | ओं
कह २ वम २ घातय २ हूं फट् अस्त्राय नमः | ध्वजञ्च
जङ्घार्द्ध लम्बिजङ्घान्तं
वे नमः | पादाधिपास्य गमनोत्साहं कुरु २ | ओं हां पायवे
नमः | ओं हां पाद्यधिपतये मित्राय नमः | पाद्यधिपास्यात्सर्ग
कुरु २ |? ओं हां उपस्थाय नमः | ओं हां उपस्थाधिपतये ब्रह्मणे
नमः | उपस्थाधिपास्यानन्दं कुरु २ | ओं हां शब्दाय नमः | ओं
हां स्पर्शाय नमः | ओं हां रूपाय नमः | ओं हां रसाय
नमः | ओं हां गन्धाय नमः | ओं हां आकाशाय नमः | ओं हां
आकाशाधिपतये सदाशिवाय नमः | ओं हां वायवे नमः | * * * * * *
* * * * * * ?यै नमः | ओं हां * * * * * * * * ?
दण्डप्रमाण वा दण्डे संयोज्या घोरं पाशुपतं शैवं वा
महास्त्रं विन्यस्य गन्धादि ब्रह्म शिरसा | ओं परमेश्वर पराय
ब्रह्माशरस? नमः | * * र्व योगाधिकृताय विद्याधिपाय नमः | इति
विद्याधिपे नैवा गन्धं | ओं ज्योतिरूपाय रुद्राण्यै नमः | पुरुष्.य?
तेन नैवेद्यं | ओं गोप्त्रे पुरुष्.य?ताय नमः | ओं प्रमथ प्रमथ
पाशुपताय नमः | विद्याङ्गानि वलि कर्म हृदाहृतन्तेन
मन्त्रसमूहेन निर्वर्त्य रूप ध्यायेत् | सूर्यसहस्राभं
प्रलयाम्वुद निस्वनं प्रदीप्त दशनप्रान्तं
प्रकाशमुखकन्दरं त्र्यक्षं ततिल्लता जिह्वं
दीप्तभ्रूमाणामूर्द्धजं | सर्पोपवीत शूलासि
शक्तिमुद्गरधारिणं | चतुर्भुजं चतुर्वक्त्रं स्फुरच्चन्द्रार्द्ध
शेखरं | देवदानवदैत्यानादर्पितानां विमर्दनं || तत इश * *?
मण्डलकं कृत्वा कुम्भं विन्यस्यतलिकायां महाध्वजं
प्रासायति प्रमाणेन
* * * * * *? प्रदक्षिणा विधाय सपिण्डिकं लिङ्गं वेष्टयेत् |
यावन्तस्तन्तवस्तेषु वरवर्णिनि | तावद्वर्ष सहस्रा * * * * *? मही * * * ?
त्यदानि कुरुते ध्वजपाणिः प्रदक्षिणां | तावद्वर्ष सहस्राणि
कर्तुर्भोग भुजं फलं | ततः कुण्डसमीपमागत्य प्रायश्चित्त? *
* *? विधाया व भृथ स्नानं कृत्वा आचार्याणां दक्षिणां दत्वा
क्षमापयित्वा विसर्जयेत् || इति महाराजिधिराजश्रीभोदेव विरचितायां
सिद्धान्त सार पद्धतौ ध्वज प्रतिष्ठा विधिः समाप्तः || अथ
जीर्णोद्धार विधिस्तत्र खण्डित स्फुटित भग्नवलित वालित पतित पातित
जीर्णदग्ध अनंशसर्भ? ब्रणदूषितान्यूनाधिक मानोत्मान
अभिचारार्थ प्रतिष्ठित पिण्डिकारहित वक्त्र विकराल
भीषणदोषदुष्टमन्त्रा सन्निधानात्
स्च्. ४ सेम ५)
* * *? मूर्ता च मूर्त्यादिमन्त्रान् ज्ञानशक्त्या सहन्यासक्रमेण
शिवसाङ्गञ्च विसर्जयेत् | सतिचण्डेश्वरे चण्डेश्वरञ्च * * * * * * * * ?
स्त्रान्ति मन्त्रिते संख्यात्वा हेम पाशयारज्जा शिखया लिङ्गं
बद्ध्वा वृषस्कन्धतां संयोज्य लोकैः सहशिवमस्थिति * * * * * * * * *
? लिङ्गमगाधाम्भसि शिखया क्षिपेत् | मृन्मय रत्नजञ्च
अग्निदग्धं परिरत्नजं स्वतेज सान विमुक्तश्चेत् * * * * * * * *?मपि
शिवाग्नाव घोरेण दर्ह्येत् | सुवर्णादि लोहमयुत देव समग्र कृत्वा
तथैव स्थापयेत् | अनेनैव * * * * * * * ? विसर्जयेत् | प्रासादेवाय विशेषः
| प्रासादमन्त्रान् खड्ग संयोज्य लिङ्गं सरक्ष प्रासान नि * * * * * *
* * *?देव खड्ग स्थान् मन्त्रान् सां हृत्य समुदायेन यथा स्थानं
मन्त्रन्यासः | * * * * * * * * ?
* * * * * * *? मस्त्रेणा विधाय पूर्णाञ्च हुत्वा | आचार्याणा दक्षिणा
दत्वा कुमस्वेति विसर्जयेत् | * * * * * * * * * * *? तदाकारं
मन्यलिङ्गादिकं यथोक्त विधिना प्रतिष्ठापयेत् || ० || येषा क्रमेण
नित्या जा * * * * * * * * * * * * *? मुत्तितिर्थणां नावानोरिव निर्मिता || ० ||
यद्वि प्रकीर्णमति विस्तृतमस्फुटार्थ नित्यादिकर्म विधि * * * * * * * *?
मश्वरेण | तत्सङ्गतञ्च लघुचापि परिस्फुटञ्च श्रीभोजदेव जगती
पतिना ताधायि ||
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
जीर्णोद्धारविधिः समाप्तः || सम्वत् आल ज्येष्ठ कृष्ण
* * *सद्यनामधिष्ठा नमतस्तथा भूतं लिङ्गमुद्धृत्य
लिङ्गान्तरं प्रतिष्ठापयेत् | पिण्डिकाञ्च लिङ्गोक्त दोषदुष्टां
समुद्धृत्या न्या निवेशयेत् | प्रतिमाञ्च पूर्वोक्त दोषदुष्टां
कर्णाद्यवयव हीनाञ्चोद्धृत्योन्या स्थापयेत् | तत्र वहिर्देव कुलस्य
दक्षिणादिशि स्थण्डिले प्रणवासनं दत्वा | ओं व्यापकेश्वर एह्येहि
नमः | ओं व्यापकेश्वर हृदयाय नमः | ओं व्यापकेश्वर शिरसे
स्वाहा | ओं व्यापकेश्वर शिखायै वौषट् व्यापकेश्वर कचाय हूं
| ओं व्यापकेश्वर नेत्राय वषट् | ओं व्यापकेश्वर अस्त्राय फट् |
एवमङ्ग सहितं भगवन्तं सम्पूज्य मन्त्रत * * * * *?
पूर्णाहुतिन्दत्वा पायसेन घृतेन च लिङ्गिनो द्विजाश्च भोजयित्वा
दिग्वलिञ्च दत्वा भगवन्तं विज्ञापयेत् | भगवन् लिङ्ग
* * * * *? य प्रवृत्तिमामवत्ष्ठन्त परमेश्वरः || एवं कुर्विति
लब्धानुज्ञः क्षीराज्यं मधु * * * * * ** *चरेत् | ततो लिङ्गस * * * *?
सहस्रं हुत्वा पुनरपि मया संस्थापनं कर्तव्यमिति शतं
पूर्वोक्त द्रव्यैः पायसेन वा जुहुयात् | सुवर्ण पुष्पसहस्रेण लिङ्ग
ध्व * * *? कुर्यात् | ततो लिङ्गसमीपं गत्वा लिङ्गं संस्नाप्य
संपूज्य लिङ्गस्थं सत्व श्रावयेत् | लिङ्गरूपमास्थाय येनेदं
लिङ्गमधिष्ठितं | सश्रीघ्रं लिङ्गत्यक्त्वा शिवाज्ञया समीहितं
स्थानं यायात् | अत्रावस्थाने विद्या विद्येश्वरै युतः
शिवाऽधिष्ठानं करोतु | एवमुक्त्वा शिवास्त्रेणार्घन्दत्वा
लिङ्गस्थितं पिशाचादि विसर्जयेत् | ततः पाशुपतास्त्रेण लिङ्गं
ब्रह्मादिभागत्रये सहस्रं हुत्वा शान्ति कुम्भाम्भ मासं
प्रोक्तप्राणैः संस्पृश्य होमसंख्यया जपं कृत्वा
विलोमार्घञ्च दत्वा मूर्तिमूर्त्याधिप तत्वतत्वाधिप क्रियाशक्ति
पीठमता न
स्च्. ६, सेमे ७)
* * * * * ? वत सज नाग साधकुम्भश्च | इडा चा * *? तथैव च ||
इन्द्रमूलं | उल्कं च | ऊस्मादौ | * * * * * * * *? पादान् एकदन्तिन |
ऐराव तत्व ओञ्वञ्च ऌ औ वीजननन्तथा || ऋन्नन्तं || मोहं वाहचे
षोडष क्षेत्रपालकाः * * * * *? अतः परं || कम्वल खरिसानञ्च
गोमुखं ण्डमेव च | उलनश्चन्द्र वा * चच्छ झटो ज झट् लक्ष * *?
स्तथा * * *? तासीति तस्य न ढ ट कर्ण णदीपे कृत सिता तथा ||
दन्तरावनदष्ठैव नाग * * * वा * * * * * * *?भेद्यतासन ||
युगान्तानी र * चंचलस्यष्ट कलसस्तै * * || शुष्कङ्त्रणय * * * * *?
* * * * * * * * * * * * * सयो नमः | रजा रक्षारभिः पाल्या * * * * *? च
भ्रामणीयोन्तनी ज्वरा वामदेवस्य कलात्रयोदश नाभिस्थाय नमो
नमः | सिद्धिरिद्धिद्युतिलं क्ष्माये पान्दान्दिः? स्व वायुभा |
सद्योजात कला अष्टजंघस्थाय नमोनम * * * *? सन्मुखं देवं
पतये भुमितं पठेत् |? * * * * * * * *? कथं
</poem>
== स्रोतः ==
*[https://muktalib7.com/DL_CATALOG_ROOT/digital_library.htm मुक्तबोधपुस्तकालयः]
[[वर्गः:तन्त्रग्रन्थाः]]
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2026-07-20T05:56:38Z
Shubha
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| title = सिद्धान्तसारपद्धतिः
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<poem>
स्च्. ३)
येन सप्तवारमति दीप्तास्त्राभिमन्त्रितेन सर्वाङ्गान्या
लिप्येकाराभ्यां स्यानिधिप्येय प्राणायामपूर्ववत्तु * * * ?
मुक्त्वास्त्र? संनिभं ध्यायेन्यावच्छकिं स्थित्वान्नात्वा?त्तीर्यद्विज
नमभ्यां ब्राह्मीं प्रथममुपास्ये ततोऽस्त्र
सत्व्यामितरास्त्रसत्व्यामेवानुभिषेत् ।?
* * *? भागस्यदाय? जलस्य मध्ये प्रविश्य वामहस्ते
विशुद्धमृद्भागत्रयं निधाय दक्षिणभागं शिवस्याद्यैः?
पूर्वमन्त्रेणोत्तरं स्वल ग * * * * * * * स्त? जप्तमृद्भाग
क्षेपाद्दिक्षु जलस्थित विघ्नान्युच्चाट्य मूलमन्त्रभि मन्त्रितेन
स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थं संकल्प्याङ्ग ग* * * * * ? भागेन
च शिरसः समारभ्य सर्वाङ्गमालभ्य निरुद्वाक्षः शिवमनुस्मरन्
स्नात्वा पश्चात्सुगत्वामलकादिना राजोप? * * * ? वामहस्ततल
जलमादाय मूलमन्त्रेणाभिमन्त्र्य सोमसूर्यौ शक्ति शिवौ च
वामदक्षिण हस्तयोः सञ्चिन्त्य मूलमन्त्रेण कुम्भमुद्रया * * *
* ?मभिच्य शुद्धेवाससी परिधाय प्रणवमुच्चरन् बुद्बुदरहितेना
फेनेनाम्भसाऽङ्गुष्ठ मूल ब्राह्म? प्रजापत्यतीर्थेन त्रिधा
चम्यौष्ठाङ्गुष्ठमूलेन द्विःपरि मृज्यानामिकाङ्गुष्ठाभ्यां
मुखनासालोचन कर्णविवराणि संस्पृश्य दक्षिणवाम
क्रमादंश द्वयं नाभिशिरस्संस्पृश्यः दर्भपवित्रक पाणिः ।
सत्व्यामुपासीत् । तत्र कृत सकलीकरणः प्राणायामं मन्त्र संहित
पासं पाद्य वामपाणै जलं संस्थाप्यं
दक्षिणहस्तेन षडङ्गेनाभि मन्त्र्य मूलमन्त्रेण
कुम्भमुद्रयाऽत्मानमभिच्य पुनर्वामपाणौ तोयं गृहीत्वा गल
जलविन्दुना दक्षिणपाणिना प्रत्येक हृदयादि मन्त्रैः शिरसि
संयोजनेन मार्जन विधाय । शेषमुदकन्दक्षिणहस्तेन
गृहीत्वानामाग्रे पूरकेह्यत्यं कृष्णरूप पापमोक्ष? ओं नमः
शिवाय * * *? साद्यनिवर्तते विकल्पाः सुखदुःखयोः ।
तस्यै विवर्त शून्याय नमश्चिन्मात्रमूर्तय * * * * * * *गुरु * * क्षा
विधि? तथा ।
पवित्रारोहणश्चैव प्रतिष्ठाञ्च प्रवक्ष्महे ।
सैषा क्रमेण नित्यादिकर्मस्मरणपद्धतिः ।
भवाब्दि मूर्तितीर्पूणां नृणां * * ? वं निर्मिता ।
अथ नित्यकर्मविधिस्तत्र प्रातरुत्थाय कृतावश्यक एकयामृदालिङ्गं
वामहस्तञ्च प्रक्षाल्यं तिसृभिर्गुदं * * *? स्तमुभौ च सप्तभिः
प्रक्षाल्य गन्धलेपापने । देवभाव शुद्ध्या वाशौ विधाय
सकृत्मृदा पादौ हस्तौ च प्रक्षाल्या च * * * *? काष्ठेन
द्वादशाङ्गलेन कनिष्ठाङ्गुली परीणाहेन दन्तशुद्धिं विधाय
स्नायात् ।
नदी सङ्गमाद्यन्यत मंत्रात्वा कृतावश्यकः पा * * * * * * * *
चारिण्य ।?
प्रक्षाल्य शिवमनुस्येन् शुचि भूप्रदेशमस्त्रेण संशोध्यते नैव
खात्वा हृदयेन मृदं समाहृत्यास्त्रे * * * * * * * * * * * * * * * * * * *?
भजेत् ।
तत्र पूर्वमस्त्रेण दक्षिण ब्रह्मभिरुत्तरं शिवे नाभिमन्त्र्यस्त्र
जप्तं वश * * * ? च मुद्रया जलस्य मध्ये प्रक्षिप्याग्नेयया
धारणया तोयं शोषयित्वाऽमृतं धारणया पुनरा पूरा
शिवजप्त मृद्भागेना हु * * * * * * *? मावन्त्यं शिवतीर्थमेतदिति
कल्पयेत् ।
ब्रह्मजप्तेन भागेन सर्वाङ्गान्यालभ्यमृत्मिश्रेण वारिणाहस्तौ
पादौ च प्रक्षाल्य शिवतीर्थे मध्ये स्नात्वा पुनश्च हव?
न्त्युपचारेण सुगन्धामेलकादिना च । ब्रह्माङ्गास्त्रे शिवं
शिवगायत्रीभिः फल समुद्रया स्वशिरस्यभिषेकं * * * * *?
सत्पासुपास्या मन्त्रां ह्रस्व प्रसादेनोपसंहृत्य समाकृष्ये
प्रवन्नाडीमागैण स्वहृदि विन्यस्य याग * * *?यात् ।
गृहेपि * ष्ट?सु नवसु वा शिवतीर्थं प्रकल्प तथैव स्नायात् ।
यद्वाऽष्टाङ्गुलां मृदं खात्वा भ्रांत्य * * * * * * * * * * * * *
*द्य?
स्च्. ४)
कृत्वा दक्षिणास्यन्दर्भा? नास्तीर्यतिलमिश्रेण वारिणा । ओं
सोमपितृमान्यमो अङ्गिरस्रीनग्निक व्यवाहनादयाय* * * * * *?यामि ।
ओं पितृपत्नी गणान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं पितृगणान् स्वधानमस्तर्पयामि । ततो नामगोत्राभ्यां ।
ओं स्व पितृन्स्वधेन मत्यु *? ओं स्वपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं स्व प्रपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
मातॄः स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं पितामहीस्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं प्रपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं माता महान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं मातुः पिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं मातुः * * ?तामन्तान् स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं माता महीः स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं मातुः पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं मातुः प्रपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि ।
एवं जातीनाचार्या न पिंसंतर्प पवित्रकं त्यक्त्वा समाचम्य
पुनरन्य पवित्रकं गृहीत्वा । ओं ह्रां ह्रीं स इति सूर्यमन्त्र * *?
कृतदेहशुद्धिः कृत सकलीकरण अर्घपात्रं कृत्वा पुष्पादिकं
सम्प्रोक्ष्य रक्तचन्दनादिना सूर्यायमूलमन्त्रेणार्घन्दत्वा
सूर्यं पूजयेत् । तत्र गणपति गुरुपूजानन्तरं ।
ओं अं प्रभूताय नमः । इति पीठमध्ये ।
ओं अं विमलाय नमः । इत्याग्नेययां ।
ओं अं साराय नम इति नैर्-ऋत्यां ।
ओं अं आराध्याय नम इति वायव्यां ।
ओं अं परमसुखाय नम इति ऐशान्यां
ओं अं पद्माय नम इति पुनर्मध्ये ।
ओं गं दीप्तायै नमः पूर्वदले ।
ओं रीं सूक्ष्मायै नमः अग्नौ ।
ओं रुं जयायै नमः दक्षिण ।
ओं रुं भद्रायै नमः नैर्-ऋते ।
ओं रं विमलायै नमः वारणे ।
ओं रैं विभूत्यै नमः वायव्ये ।
ओं रां अमोघायै नमः सौम्ये ।
ओं रौं विद्युदायै नमः इशाने ।
ओं रं सर्वतो मुख्यै नमः कर्णिकायां सम्पूज्य विस्फुरां
मुद्रां प्रदर्श्यं रक्तवर्णवर्तुल तेजो विस्वमध्यस्थं
रक्तवाससं श्वेतपद्मोपरिस्थितं सर्वाभरणभूषितमेक वक्त्रं
द्विभुजं श्वेतपङ्कजपाणि सर्वलक्षण सम्पन्नं द्वालि?
रेचकेन सास्त्रैण तस्य भूक्षेपादघमर्ष कृत्वा समाचम्य
कुसुमाक्षतादि सन्मिश्रं शिव सूर्याय ओं हौ शिवसूर्य पि * * * * * *?
दत्वा यथा शक्ति जपमनेनैव कुर्यात् । !!!!४२ल्बेवं प्रातः
सत्व्यावत्मध्यं दिने सायञ्च सत्व्यामुपासीत् ।
तत्र मध्यन्दिने पूर्ववतात्व्यामुपान्य मन्त्रादीन्तर्पयेत् ।।
तत्र कृतोत्तरा सङ्गाऽङ्गुल्यग्रेण मूलमन्त्र प्रभृतीन्मन्त्रान् ।
ब्रह्मविष्णुरुद्र इश्वर सदाशिवादीन्देवान् स्वाहान्तेन हृदा ।
ओं वाग्वादिनि स्वाहेति सरस्वतीं । ओं इन्द्राण्यै नमः । ओं आग्नेययै
नमः । ओं याम्यायै नमः । ओं नर्-ऋत्यै नमः । ओं वारुण्यै नमः
। ओं वायव्यायै नमः । ओं सौम्यायै नमः । ओं ऐशान्यै नमः । ओं
अनन्तायै नमः । ओं नाक पृष्ठायै नमः । इति दिशः । ओं इन्द्राय
नमः । ओं अग्नये नमः । ओं यमाय नमः । ओं * * * ? नमः । ओं
वरुणाय नमः । ओं वायवे नमः । ओं सोमाय नमः । ओं ब्रह्मणे
नमः । ओं अनन्ताय नमः । इति दिवेती?
* * * * ** ? सन्धिभिः ओं अत्रि तर्पयामि नमः । ओं विश्वामित्रं
तर्पयामि नमः । ओं पुलभ्ये तर्पयामि नमः । ओं क्रतुन्तर्पयामि
नमः ।? वशिष्ठन्तर्पयामि नमः । ओं मरीचिन्तर्पयामि नमः । ओं
प्रचेत संतर्पयामि नमः । इति ऋषी न । ओं सनकं तर्पयामि नमः
। ओं स नन्दनं तर्पयामि? नमः । ओं सनातनं तर्पयामि नमः । ओं
सनत्कुमारं तर्पयामि नमः । ओं रितुन्तर्पयामि नमः । इति
मनुष्यान् । ओं शिवाय नमः । ओं रुद्राय नमः । ओं उमापतये नमः
। ओं ब्रह्मणे नमः । ओं विष्णवे नमः । ओं अग्नये नमः । ओं वायवे
नमः । ओं धर्माय नमः । ओं सूर्याय नमः । ओं चन्द्रमसे नमः ।
इति सिद्धान ।।
ओं आदित्याय नमः । ओं सोमाय नमः । ओं अङ्गाराय नमः । ओं
वुधाय नमः । ओं वृहदातये? नमः ? । ओं चक्राय नमः । ओं
शनैश्चराय नमः । ओं राहवे नमः । ओं केतवे नमः । इति ग्रहान् । ओं
सर्वभूतेभ्यो वषट नमः । * * * * *?
स्च्. ५)
!!!वगुण्ठनाभ्यां गृह्नंयवक्ष्य? शिविकरणं कुर्यात् । तत्र
पादाङ्गुष्ठाभ्यामारभ्यात्मनि सूशिरं ध्यात्वा सुशिरस्य * * * *
* * * * * * ? सुशिरस्य मध्ये हूंकारं ज्वलन्तं सञ्चिन्त्य
प्राणमायम्ये हूंकार चिन्तं निवेश्य रेचकान्ते नैव हतन्तेन
हृङ्गलतावभ्रः? मध्य ब्रह्मचन्द्रेषु * * * * * *? प्रति निवर्त्य
पूरकेश चैतन्यमातृत्य सान्तवीजमयं जीवं हृदय संपुटितं
हूंकारं मूर्धनि विन्यस्य जीवविग्रहं पुरुषं हूंकारं
शिखान्त * * ?त्वा सूक्षं विन्दुभृतमेकाकिनं निचामयं
कुभकं कृत्वा ऊर्द्धं वायुं प्रवर्तयेदित्य घातेन एकैके नैव
शिवे संयोजदिति । ईजवृत्या शिवे ली *? नः प्राति लोम्येन स्वेषु स्वेषु
कारणेषु विन्दुपर्यन्तां । नितत्वानिलयं नीत्वा विशोधयेत् । ततो
भृतानि परस्परमीशानाद्यधिष्ठिता काशा भूतै * *? निलादीनि
विशोधयेत् । तत्र पार्थिव मण्डलं चतुरस्रं पीतं कठिनं
वज्रलाञ्छितं ह्लामिति पार्थिव वीजेन निवृत्ति कलारुपं पादादार प
* *? सुश्चिन्त्ययञ्च भिरुघातैर्वायुरूपं विशोध्यं आप्य
मण्डलमर्द्धचन्द्रं द्रवम्सौम्यं सुशुक्लं पद्मलाञ्कितं
ह्वीमित्याया वीजेन प्रतिष्ठकलारूपमुद्यतश्चतुभिर्वह्नि भृतं
पूर्ववद्विशोध्य आग्नेय मण्डलं त्र्यश्रं
स्वस्तिकलाञ्कितमारक्तं ह्रूमिति वह्निवीजेन विद्याकलारूपं
त्रिभिरुघातैर्जल भूतं पापं पूर्ववद्विशोध्यं । वायव्य
मण्डलं वृत्तं षड्विन्दुलाञ्कितं क्षष्तुं? ह्यैमिवायुवीजेन
शान्तिकलारूपमुघात द्वयेन पृथ्वीभूतं पूर्ववद्विशोध्य ।
व्योमाकारं ढतन्तेन हूंकारेण शान्त्यतीत रूपमुघाते
नैकेन पूर्ववत्संशोध्य । ततोऽमृत वर्षिणामूलमन्त्रेण
सर्वमाप्याययेत् ।इति भृतशुद्धिं निवर्त्य हृद्यासनं दत्वा
तद्व्यापिनी समन्तान्तच्छक्तिं विन्यस्य द्वादशान्ता द्विजरूपं
शिवमयमात्मानं पूरकेन समानीय ज्योतीरूपं कर्णिकाः यां
संस्थाप्यामृतेना प्लाव्य करशुद्धिं कुर्यात् । तत्र चन्दन
लोप्तौन्तस्तौ परस्पर । वर्षणेन तलक पृष्ठे व्यस्त्रेण सुशाध्य वा *
* * * * * * * * * न्त्य? पुष्पैरञ्जलिमा पून्न्य । उं हं खं
खसोल्काय ह्रां ह्रां सः । सूर्याय नम इत्यावाहन मुद्रया
समावाह्यस्थाप न्यासस्थाप्य * * * * * न्यास * * * * ? या निरोध्यार्घ
पाद्या चमनीयानि खसोल्किना दत्वा साङ्गेन मूलमन्त्रेण साङ्गं
सून्यं गन्धपुष्पादिभिः सम्पूज्य पद्ममुद्रां विम्वमुद्राञ्च
प्रदश्याग्नेयं ।।
उं अं हृदयाय नमः ।
ऐशान्यां उं अर्काद्य शिरसे स्वाहा । नैर्हत्यां उं भृर्भुवः
स्वरे ज्वालिनी शिखायै वौषट् । वायव्यां उं हूं कवचाय हूं
। ओं भां नेत्राय वषट्मध्ये । पूर्वादिचतुर्षुदि गूलेषु उं रः
अस्त्राय हतित्यङ्गानि संपूज्य हृदयादीनां धुएनुं । नेत्रस्यगो
वृषां । त्रासनी मन्त्रस्य भ प्रदश्यी ओं सं । सोमाय नमः
पूर्वदलाग्रे । ओं वुं वुधाय नमः दक्षिणे । ओं वृं वृं
वृहस्यतये नमः पश्चिमे । ओं भां भार्गवाय नमः उत्तरे । ओं अं
अङ्गाराय नमः आग्नेय । ओं शं शंन शुराय नमः । दत्यां । ओं
रां राहवे नमः वायव्ये । ओं कं कतव नमः इशान्यं । इति
ग्रहान् सम्पूज्य नम स्थार मुद्रया प्ररोच्य गन्धपुष्पदीपधुप
नैवेद्यादि खषोल्किना दत्वा पद्ममुद्रां विम्वमुद्रां च
प्रदर्श्य क्षमस्वेत्युच्चार्य मन्त्रसमूहमुपसंहृत्य
संहारमुद्रया द्वादशा तु स्थित सूर्याय हृत्स्थिता यवानि योजयेत् ।
इत्यनेन विधिना विसर्ज्यनिर्माल्यमर्घपात्रोदकञ्च ऐशान्यां
तेजश्चण्डाय नमः । इति सूर्य पूजाविधिः ।। ० ।।
अथा चम्य कृतसकली करणोऽसुकृत सामान्यार्घपात्रहस्तः ।
द्वारि अस्त्रेण सम्प्रोक्ष्य ऊदशि उर्द्धादुम्बरे गणपति सरस्वत्यौ
स्वनाम्ना स्वर्य? नदिगङ्गे महाकालयमुने । आत्मना
दक्षिणवामयोः स्वनामा हृदाद्येन संपूज्य विघ्ननिर्द्वारणाय
ज्वलन्नाराचास्त्र प्रयोगेन यागगृहस्यान्तः पुष्पं प्रक्षिप्य
पार्ष्णिपायातत्र यं दत्वा किञ्चिदुत्तर शाखाश्रितो
देहलीमस्पृशन्दक्षिणपादनान्तः प्रविक्ष्य देहत्या । वय
निवारणाय पुष्पम * *?ण प्रक्षिप्ये ब्रह्मस्थाने ओं वास्तोष्येतपे
ब्रह्मणेनम इति पुष्पन्दत्वा ओं अनन्तासनाय नम इत्यासने * * * * *
शास्त्र * * * *?
स्च्. ६)
क्त । ओं प्रचोदया * * * * निवृत्तिं पश्चिमवक्त्रे । इति
तत्पुरुषकलाश्चतस्रः । ओं अघोरेभ्यो नम इति * * * * * * * * ?मोहां
ग्रीवायाः । ओं घोर नम इति क्षयां दक्षिणांशे । ओं घोरतरश्च
नम इति निष्ठां वामांशे । ओं सर्वतस्सर्व नम इति व्यापिना भा * *
* * ?भ्यो नम इति मृत्युञ्जठरे । ओं नमस्ते रुद्र नम इति क्षुधां
पृष्ठे । ओं रूपाभ्यो नम इति तृषामुरसि । अघोरस्य कलाष्ठकः ।। ओं
वाम दे * * * ?यं नमः रजोगुदे । ओं ज्येष्ठायै नम इति रक्षां
विङ्गे? । ओं रुद्राय नम इति रतिं दक्षिणोरुके । ओं कालाय नम इति
पाल्यां वामारुके । ओं कलाय नम इति । ओं विकरण्यै नम इति काम्यां
दक्षिण जानुनि । ओं वलविरण्यै नम इति संयमनी वामजानुनि । ओं वल
नम इति क्रियान्द * ण स्फिजि? । ओं प्रमथन्यै नम इति वृद्धिं
वामस्फिजि । ओं सर्वभृत समनाय नम इति भ्रामणीं कट्यां । ओं
मन नम इति त्रिमोहनीं दक्षिणापार्श्वे । ओं उन्मनाय नम इति
ज्वरां वामपार्श्वे । इति वामदेवकलास्त्रयोदश ।।
ओं सद्योजातं प्रपद्यामि नम इति सिद्धिं दक्षिणपादे ।
ओं सद्योजाताय वै नम इति दद्विंवामपाद ।
ओं भवे नम इति द्युतिं दक्षिणपाणौ ।
ओं अभव नम इति लक्ष्मीं वामपाणौ ।
ओं अनादिभवे नम इति मेधानासायां ।
ओं भजस्वमा नम इति कार्तिं शिरसि ।
ओं भव नम इति स्वधां दक्षिण वाहो ।
ओं उद्भव नम इति निधृतिम्वाम वाहौ ।
इति सद्योजात कल्पेषु कमे तत् ।। स्वस्वमुद्राभिरीशानादिषु
अष्टत्रिंशत्कलान्यासं विधाय विंद्यादेहं
सम्पाद्यमूलमन्त्रमावाह्य हृदयं हृदिशिरः शिरसि
शिखाशिखायां कवचं सर्वगात्रेषु हस्ते अस्त्रं दत्वा
परमीकरणं कृत्वा महामुद्रया प्ररोच्यतालत्रय
च्छोटिकानिरीक्षण तर्ज्जनीभिरस्त्रेण तद्देशवर्त्ति विघ्नो जाटन
दिग्विरेचना वगु ञ्चमैः स्थान शुद्धिं विधाय
वाह्ययागवद्धृदय पूजानाभौ होमेन भ्रूमध्ये ध्याननान्त
यागं कृत्वा विशेषार्घ पात्रमस्त्रेण दग्वा प्रक्षा मृती कृत्य तत्र
विद्यादेहं शक्त्यन्त मम लद्युतिं विन्यस्य शिवं मूलेना
वाह्याङ्गुष्ठयादीशानं तर्ज्जन्यास्तत्पुरुषं मध्यमया *
घोरमनामि कथा वाम? कनिष्ठकयोः सद्योजातं ततः
कनिष्ठकयोर्हृदयमनामिकयोः शिरोमध्यमयोः शिखां
तर्जन्याः कवचमङ्गुष्ठयोरन्त्र विन्यस्य परेण रजसा स *? योज्य
कवचनावगुण्ठ्य सर्वकर्मसु नियोजयेत् । सर्वत्राप्या चमनादा
वनेनैवधिना करशुद्धिं विधाय क्षरकन्धपिकां
लिङ्गमुद्रास्वां वध्वा इशानः सर्वविद्यानामीश्वरः
सर्वभूतानां ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवामस्तु सदाशिव इति
इशानं मुष्टिम्बध्वाऽङ्गुष्ठाग्रेण भद्रमुद्रया मूर्ध्नि ।
ओं तत्पुरुषाय विद्महे महादव्ययधीमहेतम्ना रुद्र प्रचोदयादिति
तथैव जर्जन्यङ्गुष्ठ योगात्तत्पुरुषं मुखे ।
ओं अघोरेभ्यो थघोराभ्यो घोरघोरतरेभ्यः श सर्वतः
शर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्र रूपेभ्यो इति मध्यमाङ्गुष्ठ योगेन
हृद्यघोरं ।
ओं वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः । *
* विकरणाय नमो वलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नामौ
मनोन्मनाय नमः । इत्यङ्गुष्ठानामिका योगेन नामदेवं गुह्ये
।
ओं सद्योजाप *? प्रपद्यामि सयोजाताय वै नमः ।
भवे भवेनादि भवे भजस्वमोहवोद्भव इति कनिष्ठाङ्गुष्ठ
योगेन पादादारभ्य मस्तकात्तं यावत् सर्वशरीरः व्यापकत्वेन
मूर्तिभूतं सद्योजातमिति ब्रह्मङ्ग्या विन्यस्य ऊर्द्ध
पूर्वदक्षिणान्तर पश्चिमवक्त्रेषु वक्त्रभङ्ग्या च ततः
कल्पभङ्ग्या ओं इशान सर्वविद्यानां नमः इति शशिनी मूर्ध्नि ।
ओं इश्वर सर्वभूतानां नम इत्यद्गदा पूर्व मूर्ध्नि ।
ओं ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा नम इति इष्टां दक्षिण मूर्ध्नि
शिवामस्तु नम इति मरीचिमुत्तर मूर्ध्नि ।
ओं सदाशिव नम इति ज्वालिनी पश्चिम मूर्ध्नि ।
एवमीशान कला पञ्चक * * * * *? तु अव्यक्त कला ।
ओं तत्पुरुषाय विद्महे नम इति शान्तिं पूर्ववत्रं ।
ओं सप्ता देवायधीमहे नम इति विद्यां दक्षिणवक्त्र * * * * * * * *?
स्च्. ७)
पूर्वादीश पर्यदिग्दलके नरेषु सम्पूज्य ।
ओं हां मनोत्मनन्यै नमः कर्णिकायाम् ।
ओं हां सूर्यमण्डलाय नमः ।
ओं हां सूर्यमण्डला * * * * * * * ? नम इति दलाग्रेषु ।
ओं हां सोममण्डलाय नमः ।
ओं हां सोममण्डलाधिपतये विष्णुवे नम इति केशराग्रेषु ।
ओं हां अग्निमण्डलाय नमः इति अग्निमण्डलाधिपतये रुद्राय नम
इति कर्णिकायां । पृथिव्यादि शुद्धविद्या तत्वव्याप्तमासनं
सञ्चिन्त्य ।
ओं हां शिवात्मनाय नम इति शिव सि * * ? पूजयत् । ततः
पुष्पैरञ्जलिमाधूर्य ओं हां हं हां शिवमूर्तये नमः । इति
मूर्तिं विन्यस्य तत्र ब्रह्मवक्त्र कल्पन्यासं यथा वद्विधाय
पुनः पुष्पैरञ्जलि * * * * * ? पद्मासनं
तन्दा?ं षोडशवर्षदेशीयं पञ्चवक्त्रमध्य प्रसाद
शक्तिशूलखट्वाङ्ग युक्तदक्षिणपाणिं ।
भुजङ्गाक्षसूत्र डमरुक स्री लोत्पल बीजपुर सहित वामहस्तमेव
दशभुजं सुप्रसन्नं स्मितास्यं
* *? जटाजूटामित्था ज्ञानक्रियाशक्तित्रय नेत्रं
ज्ञानचन्द्रकलार्चितं सञ्चिन्त्यं ओं हां हौं हां विद्या देहाय
नम इति विद्यादेहं विन्यसेत् ।
पुनः पुष्पैरञ्ज विमापूरा हृत्मन्त्र पूर्य सद्योजात पूर्वम्वा
मूलमन्त्रमूच्चार्य प्रस्फुरद्रस्मि मण्डं द्वादशान्तं नीत्वा
तन्मयी भृत विन्दुस्थानेऽभरुदितं ध्यात्वा तस्यादादाय स्थिर
वुद्धिरावाहन मुद्रया समावाह्य प्राण पथाङ्लिङ्गः मूर्तौ
स्थापन्यासंस्थाप्य वहुरूपेण संनिधानया
संनिधाप्यनिष्ठरया संनिरोध्य वस्वधास्वाहा? वौषडन्तेन
हृदा वा कवचेनाव गुण्व्य? देवाभिमुखं पादयोरर्घं
पाद्यञ्च मुखेत्वा चमनीयं हृदयेन तत्पुरुषेण वा शिवाय दत्वा
स्वागतञ्च कृत्वा निर्मंसनोद्वर्तन स्नानानि विधाय स्नपनार्थं
गडुकाना हृत्यनिचिन्दा?भ्युक्ष्य सन्ताड्य संप्रोक्ष चास्त्रेण
स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थ सङ्कल्प्य मन्त्रसंहितया पवित्रैर्वा
जलमावर्त्यास्त्रेण गडुकान्ताय वस्त्रञ्च प्रक्षाल्यगालिताम्भसा
गायत्र्या हृदयेनवाऽस्त्र वर्द्धनी सहिताना प * * * ल्प? विन्दु
ध्यानादमृत रूपे शाम्भसा पुष्पदूर्वा कुशाक्षतो पतेन
मन्त्रसहित या प्रपूर्य संपूज्य च धेनुमुद्रया पुराच्य
कर्मणावगुण्ठ्य तन्त्रा? परात्मान मूर्द्धन्यभिषिच्य स
कुकुशैश्च पुष्पादिवस्तुजामं शुद्ध्यर्थमस्त्रेण संप्रोक्ष्य
कवचेनाभ्युक्ष्य हृदयेन पिण्डमन्त्रैर्वाभि मन्त्रयत्
यद्वान्विलेपनं हृदयेन वस्त्रं शिरसा । आभरण व्रातं शिखया ।
नैवेद्यं कवचेन । पुष्याणि मूलेन । क्षीरदध्यादिकं कवचेन ।
घृतं शिखया । क्षौद्रं शिरसा । खण्ड हृदयेन ।
गन्धोदकञ्चाभि मन्त्र्य चन्दनेन तिलकं कृत्वा स्वशिरसि
मूलमन्त्रेण पुष्पमारोपयेत् । ततो यथाभिमतमौनं कृत्वा
प्लूताता मन्त्रोच्चारणैर्न मन्त्रशुद्धिं विधाय पूर्वरचितां
पूजां गायत्र्या समभ्यर्चात्मामान्यार्पणार्घं दत्वा
सद्योजातादि ब्रह्मपञ्चकमावर्त्य पूजां लिङ्गादपनीय
हृत्मन्त्रेण इशान्यां पीठ कस्थ? चण्डेशाय निक्षिपेत् । ततः
पिण्डिकामस्त्रतोयेन प्रक्षाल्य लिङ्गं प्रक्षाल्यदिति लिङ्गशुद्धिं
विदध्यात् । सर्वत्राप्यात्माश्रयं मन्त्रलिङ्गाङ्ग पञ्चक शु * * * *?
शिव पूजयेत् । तत्र पीठ सात्म्य?व्यायां ओं गौंगणाधिपतये
नमः । ऐशान्यां ओं हां गुरुभ्यो नमः इति सामान्यार्घ
गन्धपुष्पधुपन्दत्वा । सा दे * हं? आकर शक्तये नमः । ओं हां
अनन्ताय नमः । मध्ये । ओं हां धर्माय नम आग्नेयां । ओं हां
ज्वालाय नमः नैर्हत्यां । ओं हां वैराग्याय नमः वायव्यायाः ।
ओं हां ऐश्वर्याय नम ऐशान्यां । ओं हां अधर्माय नमः
पूर्वस्यां । ओं हां अज्ञानाय नमः दक्षिणस्यां । ओं हां
अवैराग्याय नमः पश्चिमस्यां ओं हां स ऐश्वर्याय नं
उत्तरस्यां संपूज्य ज्ञान संनिधौ ओं हां अधश्छदनाय
नमः । ऐश्वर्यसन्निधौ ओं हां ऊर्द्ध्वन्धदनाय नमः । मध्ये
तु ओं हां पद्माय नमः । * ? वल विकरण्यै नमः । ओं हां वल
प्रमथन्यै नमः । ओं हां सर्वभूतदमन्यै नमः । इति शक्तय * *
* * * ?
स्च्. ८)
अष्टो * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * तत्पात् । ततः कुसासीपे समु
* * * * * * * * * * * ? रीक्षण शिवमन्त्र * प्रोक्ता । मस्त्रेणाभ्युक्षण
कवचेन ताडनमस्त्रेणोल्लेखनावकीरण पूरण समीकरणन्मे च न
विकुटुनं अमार्जन्यपल? कुण्ड परिकल्पना प्लाययत् ।
मुदगायत्रम्चारेखात्रयं तिर्यग्रेखया सहरेखा चतुष्टय व?
जीकरण चतुष्टयश्रमेकैकं दत्वा अर्घादविभुं द्विस्थातैर्देवं
सूपयेत् । ततो दुग्वदधिघृतमधु शक्कराटिभिर्जुल पूयात् रितः सत्व
* * * * * * * * *?ग्य विरूक्ष्य पुनर्यथा शक्ति केवलजलेन केवल जलेन
गन्धादकेन च मूलेन संस्नाप्य शुद्धवाससानिर्मृज्य
पाद्यमादौ दत्वा सिरसि शिववार्थ दद्यात् ततः पुनरासन? द्वारस्व
वस्त्रविलेपन । भरणाद्यलङ्कार शुद्धसुरभि नानापुष्पैः । ओं
ह्लौं? शिवाय नम इति देवमभ्यर्च्य यथान्यासं ब्रह्माणि च
सम्पूज्य । ओं हां हृदयाय नमः । ओं ह्रीं शिरसे नमः । ओं हूं
शिखायै नमः । ओं हैं कवचाय नमः । ओं हौं नेत्राय नमः । ओं
हः अस्त्राय फडितिलयाङ्गेषु सम्पूज्य । मध्ये इशानं ।
पूर्वदक्षिणोत्तर पश्चिमेषु तत्पुरुषादीं सम्पूज्याग्नेयैशान
नैरृत वायव्येषु हृच्छिरः शिखाकवचानि सम्पूज्य पूर्वदक्षिण
पश्चिमोत्तरष्ठन्तं पूजयित्वा गन्धपुष्पादीन्न्दत्वा
धूपभाजनमस्त्रेण संप्रोक्ष्य हृदयेनाभ्यर्च्य धेनुमुद्रया
प्ररोच्यघना?मस्त्रेण संपूज्यतावयेत् । मूलेन
धूपदीपनैवंद्यभास्वलादिकं दत्वा दूर्वाक्षत यज्ञोपवीतानि
देवम्यशिरसि समारोध्या रात्रिकमुत्तार्य यथा शक्ति पं कुर्यात् ।
* *?च त्रिविधोया न योधां? शुभाप्य भे * * *?र्भवात् । तत्र
मानसोमना मात्रवृत्ति निर्वर्त्यः स्वसंवेद्यः उपांशुः पुनः
परैरश्रूयमाण्येऽन्तस्तञ्जल्परूपः । यस्तु परैः श्रूयते
सभाष्यः । अयञ्च यथा क्रमणोत्तम मध्यमाधम सिद्धिषु
शान्तिषुभिचारादि रूपासुनियोज्यामानसस्यं । विर्यन्न
साध्यत्वाद्मष्यस्याधम्? सिद्धिफलत्वात् उपांशुः साधारण
फलन्तान्?प्रयोज्यस्त्रिविधो पिनद्रूतोर्न विलम्वितोनास्यष्टाक्षरोनान्य
मनसाकर्तव्या नित्यनैमित्तकेषु प्राङ्मुखे वा * ङ्मुखेन वाचक
वित्तनकाराः । काम्येषु कामानुसारेणाभिचारादावन्य मुखेनापि
विधेयस्तत्रान्यतमं यथा शक्ति जपकुर्यात् । ततो हृत्मन्त्र संपूजि *
* तं? कवचावगुण्ठितमन्तरक्षितं
कुशपुष्पचन्दनाक्षतोन्मिश्रगन्धोदक बु * कत्र सू * * * ?
पूर्वादीशपर्यदिग्दलकेशरेषु सम्पूज्या । ओं हां मनोत्मनन्यै
नमः कर्णिकायां । ओं हां सूर्यमण्डलाय नमः । ओं हां
सूर्यमण्डलाधिपतये बहु * * ? नम इति दलाग्रेषु । ओं हां
सोममण्डलाय नमः । ओं हां सोममण्डलाधिपतये विष्णवे नम
इति केशराग्रेषु । ओं हां अग्निमण्डलाय नमः । ओं हां
अग्निमण्डलाधिपतये रुद्राय नम इति कर्णिकायां । पृथिव्यादि
शुद्ध विद्यातत्व व्याप्तमासनं सञ्चिन्त्य । ओं हां शिवासनाय
नमः इति शिवासन पूजयेत् । ततः पुष्पैरञ्जलिमापूर्य ओं हां हं
हां शिवमूर्तये नमः । इति मूर्ति विन्यस्य तत्र ब्रह्मवक्त्र
कल्पन्यासं यथावद्विधाय पुनः पुष्पैरञ्जलि * * * ब्रह्म?
पद्मासनं मितच्छायं षोडशवर्षदेशीयं पञ्चवक्त्रमभ्य
प्रसादशक्तिशूलखट्वाङ्ग युक्तदक्षिणपाणिं । भुजङ्गाक्ष
सूत्रडमरुकनी * * ल? बीजपुरसहित वाहहस्तमेव दशभुजं
सुप्रसन्नं स्मितास्यं
नस्त्रमन्त्रेण कृत्वाकुण्डम * * सोमं सिवा प्रागुदगग्रैदभै ।
परित आस्तिर्याष्टाङ्गुल परिणाह
वाहुमात्रात्परिधीन्त्रिंशद्दर्भदल निर्मिता * * * * ? वलितान्वा
विष्टराश्च पूज्यदारभ्य चतुर्द्दिक्षु प्रदक्षिणमस्त्रेण विन्यस्य ओं
कलाकुण्डाय नम इति कुण्डसंपूजयेत् । तत हतु मतीवागीश्वरीं *
*?गीश्वरं सकामञ्च ध्यात्वा समावाह्य ध्रूवेन
सम्पूज्यास्त्रेणाक्षपाटं दत्वा आरण्यतोरेणेः सूर्यकान्ताद्द्विज
गृहाद्वैश्या गृहात्सुगृहाद्वह्निमानीय क्रव्यादाशं
परित्यज्यार्घपात्रपाणी येन प्रोक्ष्यकवचेनावगुण्ठ्य ओं रौं
अग्निचैतन्याय नम इति वह्निबीजं विन्यस्य
वह्निं षडङ्गेनाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेण * * *त्तेन?
धेनुमुद्रयाऽमृती कृत्य संपूज्यं कुण्डस्या परिप्रदक्षिणं
त्रिःपरिभ्राम्यजानुभ्यामवनीङ्गतः । आत्मनः संमुखं
कृत्वावागीश्वरि * *? नाड्यां मूलमन्त्रेण निक्षिप्यतोय विन्दन्दत्वा
सदित्वनैरोत्थाद्य गर्भरक्षार्थमस्त्रे जप्तं कङ्कनं
देवीहस्तेवनो गर्भाधानाय
* * * * * *? हृदयेनाहुति त्रयं तिलैर्दत्वा पुंसवनार्थं
वामदेवेनाभ्यर्च्य शिरसा आहुतित्रयं दत्वा श्री * *? येन निमित्तये
धारणाभ्र्च्य शिखयाऽहुतित्रयं दत्वाजननार्थं
तत्पुरुषेणाभ्यर्च्य कवचेनाहुतित्रयं दत्वानामकरणनिमित्तेन
इशानेनाभ्यर्च्यास्त्रेनाहुतित्रयं दत्वामूलमन्त्रेण शिवाग्निस्वं
हुताशनेति नामकृत्वापितेर्विसर्जनं विदधात् । जाते च मृतक
निवृत्तये कुण्डमर्घाम्भसा ससिच्य वह्निरक्षार्थं
प्रागुदगग्रात्परितास्त्रेण दर्भणास्तीर्याहुतित्रयेन
वक्त्राण्युद्व्याद्य?लालापनादाय पुष्टये च
मूलाग्रयोर्घृताक्ताभिः षोडशाङ्भुव प्रमाणाभिरि *?न्तिः
पञ्चभिश्चतुर्विंशत्या वा इ *? होमं विधायं ततो
मेखलासुसास्त्रार?लोकपालान्सम्पूज्य परिधिविषुरेषु प्राच्यां
ब्रह्माणं दक्षिणस्या रुदं पश्चिमायां
विष्णुमुदीर्च्यमीश्वरं पूजयेत् । ततः
श्रीपर्णीदार्वादिना षट्त्रिंशदङ्गुलां
कलदुङ्गत षडङ्गुलपरिणाह दण्डामग्ररि * *? चतुरङ्गुल चतु * *
*?
शिवाय त्रिभिः श्लोकैर्ममास्तु फलसाधनमिति निवेदयेत् ।
गुह्यातिगुह्यगोप्तात्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं ।
सिद्ध्यैभवति मेयेनत्वन्प्रसादात्त्वयि स्थितः ।
यत्किञ्चित्कुर्महे देव सदा सुकृतदुष्कृतं ।
तन्मे शिवपदस्थस्ये हूं क्षः क्षपय शङ्कर ।।
शिवो दाता शिवोभोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत् ।
शिवो यजति सर्वत्रयः शिवः सोहमेव तु ।।
इत्येवं जपं पूजामात्मानञ्च भक्ष्या देवाय विनिवेद्य शिवञ्च
पूर्वोदितं ध्यात्वास्तुत्वा च नमस्कार मुद्रया अष्टाङ्ग
नमस्कृतिं विदध्यात् । ततो होमार्थं यथोक्त लक्षण कुण्डं
समीपं यायात् तत्र कुण्डं चतुरस्रं वृत्तम्वा सार्वकामिकं
काम्यभेदेन त्र्यस्रयोनि खण्डेन्दु षडश्राष्टाश्र षोडशाश्र
शिवा कुर्यात् । अर्द्धशत होमे मुण्डहस्तांशतहोमे रत्नि मात्रं ।
सहस्रहोमे हस्तं । अयुतहोमे द्विहस्तिकं । लक्षहोमे चतुष्करं ।
दशलक्षण होमे षट्करं । कोटिहोमेऽष्टहस्तं ।
खातायामविस्तारैः सममुपरि च मेखलाषु
मुण्डहस्ते प्रमाणस्याद्याद्व्यङ्गुलान्वितीयाऽङ्गुलेनार्द्वाङ्गुलेन
च तृतीया । रत्नि प्रमाणस्य त्र्यङ्गुलद्व्यङ्गुलाङ्गुलमानाः
क्रमेण । हस्त प्रमाणस्य चतुस्त्रि द्व्यङ्गुलाः ।
द्विहस्तस्य षट्चतुस्त्र्यङ्गुलाः । चतुर्हस्तस्याषु षट्चतुरङ्गुलाः ।
पतृस्तस्य दशाष्ट षडङ्गुलाः । अष्टहस्तस्य च
द्वादशदाशाष्टाङ्गुलाः । क्रमेण सर्वकुण्डेषु त्रिस्रोमेखलाः
कुण्डरूपेणैव विधातव्याः कुण्डस्य दक्षिणस्यां वारुण्यां वा
मेखला मध्ये कुण्डाकारा अश्वत्थ पत्राकारा वा
द्वादशाङ्गुलाय अष्टोङ्गुल विस्तीर्णाङ्गुलौष्ठाद्व्यङ्गुलोच्छिता
प्रथमकुण्डस्य । शेषाणां द्व्यङ्गुल वृद्ध्यायोनिर्विधातव्येति ।
ततः कु समीपे समुपविश्य कुण्डस्य निरीक्षणं शिवमन्त्रेण
प्रोक्षणमस्त्रेणाभ्युक्षण कवचेन तात नमस्त्रेणोल्लेखनाव
कीरण पूरणसमीकरण सेचननिकुटन संमार्जनाय लेपनं
कुण्डपरिकल्पना प्रागायतमुदगा यतम्वा रेखात्रयं
तिर्यग्रेखया सहरेखा चतुष्टय वज्रीकरण चतुष्पथन्या *?
योज्य संपूज्यकवचेना वगुण्ठ्ये सन्निधानायाहुतित्रयं दद्यात् ।
ततः शिष्यं हृत्प्रदेशे संप्रोक्ष्य पुष्पास्त्रेणा हृदि अन्यत्य रेचक
प्रयोगेन हुंकारमुच्चरन्नाती मार्गेण हृदि तस्य सम्प्रविश्य
शिशोश्चैतन्यं स्फुरत्तारकाकारं हृद्यस्त्रेण सण्थिद्य
मूलमन्त्रेण समोक्ष्यष्य द्वादशान्ते हृदय संपुठितं कृत्वा ओं
हां हं हां संहारमुद्रया संगृह्य सूत्रे संयोज्य व्यापकं
संभाव्य कवचेनावगुण्ठ्यनं निधानार्थं
मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं जुहुयात् । ताडनादीनि च पाशानां सूत्रे
कुर्यात् न शरीर इति । तदनु पाशान्मलकर्ममायया न भोक्तृत्वे
भोगशरीर विषयजनका न सूत्रे बन्धनापावलोक्य शान्त्यतीतादी
सूत्रस्थ चैतन्ये सयोजयेत् । ओं हौं शान्त्यतीतायै हुं फडिति
शिष्यं शिरसि संताड्य गृहित्वा संहारमुद्रया ओं हौं
शान्त्यतीतायै नमः । इति सूत्रे नियोजयेत् । तदनु ओं ह्यैं
शान्त्यै हुं फट् इति ल ह द्व्यङ्गलकान्तं सन्ताड्यास्त्रेण पूरक
वृत्त्यासंहारमुद्रया संगृह्य ओं ह्यैं शान्त्यै नम इति सूत्रे
नियोजयेत् । तदनु गलकान्नं स्वन्तं पुष्पास्त्रेण संताड्य ओं ह्रूं
विद्यायै हुं फडिति संहारमुद्रया संगृह्य ओं ह्रीं प्रतिष्ठायै
नम इति सूत्र नियोजयेत् । पुनर्गुहात्यादान्तं पुष्पास्त्रेण
सन्ताड्य ओं ह्लां निवृत्त्यै हुं फडिति संहारमुद्रया संगृह्य ओं
ह्लां निवृत्त्यै नम इति सूत्रे नियोजयेत् । एवं ताडनग्रहण
संयोगं कृत्वा व्याप्यव्यापक भावमनुसन्ध्यात् । तत्व
भुवनपद वर्णमन्त्रा व्याप्यामल कर्ममायया व्यापकाः
पुनर्मलादयो व्याप्याः शान्त्यातीतादिक कलाव्यापकाः । अतस्ताभिः
संगृहीताभिस्तत्वादयोमलादयश्च गृहीता ।
उपस्थापिताभिरुपस्थापिताः शुद्धाभिरपि शुद्धाद्ध?वन्तीति । अत
आह अधे
चतुर्द्धा विभज्य भागमेकं पार्श्वयोर्दत्वा भागार्द्धश्च
मध्यस्थाद्बहिरङ्कत्रयान्त अर्द्धचन्द्रव सम्भ्राम्य चापा?कार ।।
० ।।
चतुरश्रं चतुर्द्वाविभज्य वर्व?भाये पार्श्वयोश्च भागैक वृद्व्या
ब्रह्मस्थानादधो भागैक ह्रासाद्विवृद्ध भागेष्टार्द्ध
चन्द्रवत्संभ्राम्य भागत्रयश्च दण्डार्थ मध्यो
दत्वादण्डस्यार्द्धमधूश्च वृत्तं टंकारे ।। ० ।।
चतुरश्रं चतुर्द्वाविभज्य क्षेत्रार्द्धं पार्श्वेदन्तमूलार्थं
दत्वा त्रिभागादग्रे वक्रं विधाय दन्तमूलद्धारं कार्यं
गजदन्ते ।। ० ।।
चतुरश्र तृतीयांशमाग्रे दत्वा पार्श्वयोश्च षड्भागं दत्वा
सूत्रद्वयङ्केषु संयोज्य समसूत्रयं त्र्यश्रे ।। ० ।।
चतुरश्रे षत्भागं ब्रह्मसूत्र पार्श्वयोर्दत्वा
मध्यात्तत्समसूत्रेण मत्स्य चतुष्टये समसूत्रदानात् षडश्रम् ।।
० ।।
मत्स्य चतुष्टयेष्वपि त्र्यश्र क्रमेण सूत्रयातनात षट्कोणे ।। ० ।।
चतुरश्रे कर्णार्द्ध सूत्रं वहिर्नीत्वा चतुरश्राच्छेषं
त्रिधाविभज्यभागेक त्यागाद्ब्रह्मस्थानाद्भ्रमेण वृत्तम् ।। ० ।।
अनुद्दिष्ट पद्मद्वारेषु मण्डलेषु विशेषलक्षणा भाव पद्मद्वारे
सर्वतोभद्रवत् ।। ० ।।
एतेषामन्यतममण्डलन्निष्पाद्य मण्डलप्रवेशादारस्य कुण्डल *
*कान्नामी पस्व दक्षिणदिग्भोगे शिष्योपवेशन
नाडीसन्धानमन्त्रतर्पणान्त कर्मकृत्वा पूर्णाञ्च दत्वा च
मूलमन्त्राद्यस्त्रान्तानां मन्त्राणान्दी * *?ण सपनं
विधात्मव्यं ।
ओं हुं ह्लौं हुं फट् । ओं हुं हां हुं फट् । ओं हुं हीं हुं
फट् । ओं हुं ह्लुं ह् हुं फट् । ओं हुं हं हुं फट् । ओं हुं हः
फट् । वाचकाः क्रू * *?न्ताड्य रजात्यान्विता वाच्याः । भृकुटी
करालवदनाः पाशवन्धनादौ नियोज्याः सर्वमन्त्राणां
त्रिभिस्त्रिभिराहुतिभिर्दीपनं वि * *? क धातव्यः ।
तदनुकन्यानिर्मितं सूत्रं त्रिगुणं त्रिगुणीकृत्यास्त्रि प्रोक्षितं
कवचावगुण्ठितं सम्पूज्य शिष्यार्द्धकायस्य शिखायां * *? काः
। * * * * * * * * * * * * * * * ?नाडीरूपं विचिन्त्य ओं सुषुम्नायै नम
इत्यनेन शिष्यदेहान्सुषुम्ना पद्गृह्यसूत्रे सं * * * ?
स्च्. १२)
शतालब्धे प्राचीन मस्तके बुभुक्षुम्मुमुक्षुमपि तथैव
शुद्धहस्मना दक्षिणमस्तकेऽस्त्रादि रक्षिते हृत्मन्त्रेण शिष्य * *?
मध्यशिखया * * * *?धाय वर्म जप्तवाससा प्रच्छाद्यस्वापयेत् ।
शयनीयस्य बहिस्तिलसर्षपभस्मभिरन्त्राभि मन्त्रितैस्तिस्रोरेखाः
कृत्वा वाह्यलिं दत्वा सु * * ?पञ्चगव्यादिकं प्राश्यदीक्षितैः
सहशिष्यवत्भूपेत् ।। ततः प्रातरुत्थाय
समाप्तनित्यकर्मविधिर्भगवतः । प्राग्वदनुज्ञां
प्रार्ष्यशिष्यमाहूय * * *?प्न दर्शं सृष्ट्या अशुभे शान्तिहोमो
विधातव्यः शुभे तु पूर्ववच्छिष्य प्रवेशादि कर्मकृत्वा
कुण्डसमीपे समानीय पाशसूत्रमवलम्व्यपशोरनुग्रहं
करामीत्यनुसन्धाय प्रज्वलितशिखशिखिन्यादौ शक्तिमाधार
रूपिणीं विन्यसेत् । ओं हां आधार शक्तये नमः । तस्या उपरिनिवृत्तिः
पीडि वकी *? क्षकारो वर्णोमज्र *? पदान्यष्टाविंशतिः
पुराणामष्टाधिकं शतं । एतद्विन्यस्य तद्व्यापिकां निवृत्ति
कलां सम्भाव्य ओं ह्लां निवर्त्तकलायै नमः ।
इत्यनेन * *? न्सगृह्यसन्निवेश्यग्नौ संपूज्य च गन्धपुष्पाद्यैः
सन्निधानाय ओं ह्लां निवृत्ति कलायै स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा
पाशत्रयं मलकर्ममाया रूपं भोक्तृत्व भोगशरीरादि जनकं
भावयेत् । तदनुशतं रुद्राद्यनन्तान्ते ध्वनियोनिरनन्ताः सङ्कल्प्य
तद्व्यापिकां वार्ग * *? हृत्मन्त्रेणावाह्य पूजयेत् । ओं ह्रां
वागीश्वरी नमः । तदनुप्रणवेन सन्निनायाहुतित्रयं हुत्वा ओं
वागीश्वर्यै स्वाहा भगवति पशोरनुग्रहाय नर्सि?धी भवैवं
प्रार्ष्य शिष्यमन्त्रेण संप्रोक्त्य ते नैव हृदि सन्ताड्य ओं हः अस्त्राय
हुं फट् । आत्मना रेचकेन तस्य देहं प्रविश्यास्त्रेण हृच्छेदं
कृत्वान्यद्वशमुद्रया चोत्कृष्ये मूलमन्त्रमनुस्मन् द्वादशान्ते
तृणाग्र विन्दुरूपं सञ्चिन्त्य प्रणवेन संपुटं कृत्वा ओं हं
पशुवैतन्यं संहारमुद्रया पूरक * य?क्त्या सुहृदिसन्निवेश्य
कुम्भकं कृत्वा मूलमन्त्रमनुस्मर एव केन द्वादशान्ते
नीत्वासङ्गृह्य भवमुद्रया सर्वयोनिष्ठनेक व्यक्तिरूपेण वि?
यानां कलानां ग्रहणादाधाराणान्तत्वादि मलानां ग्रहणं
कृतं भवतीति । एवं सूत्रस्थानां पाशानां स्वमन्त्रः पूजन
* *णं? विधायदीपनं विधातव्यं । ओं हुं हौ शान्त्यतीतायै
हुं फट् । ओं हुं ह्य शान्त्यै हुं फट् । ओं हुं ह्रूं विद्यायै
हुं फट् । ओं हुं ह्वीं प्रतिष्ठायै हुं फट् । ओं हुं ह्लानिवृत्त्यै
हुं हुं फट् । एवं दीपनं त्रिभिस्त्रिभिराहुतिभिः कृत्वा
पाशानां वन्धनं कुर्यात् । ततोस्त्रेण शिरसि संताड्य ओं हौं
हौं हौं भगवन् शान्त्यतीत पाशं मलकर्मयन्ति * ?
तत्वभुवनादि व्यापकं बन्धवं हूं फडिति सूत्रे ग्रन्थिं
कुर्यात् । तदनु ललाट प्रदेशेऽस्त्रेण सन्ताड्य ओं हौ ह्यं भगवन्
शान्तिकलापाशं मलादि तत्वादि व्यापकं वन्ध २ हुं फडिति
सूत्रे वन्ध ग्रन्थिं कुर्यात् । ततो गलके सूत्रमस्त्रेण संताड्य ओं
हौं ह्रूं भगवन् विद्यापाशं मलादि तत्वादि व्याप * वन्ध २
हुं फडिति सूत्रे ग्रन्थिं कुर्यात् । ततो नाभौ सूत्रमस्त्रेण
संताड्य ओं हौं ह्वीं हौं भगवन् प्रतिष्ठापाशं मलादि
तत्वादि व्यापकं वन्ध २ फडिति सूत्रग्रन्थिं कुर्यात् ।
तदनु * *? सूत्रमस्त्रेण संताड्य ओं हौं ह्लां हौं
भगवन्निवृत्ति कलापाशं मलादि तत्वादि व्यापकं वन्ध २ हुं
फडिति सूत्रग्रन्थिं कुर्यात् । ततः पाशात्सराव सम्पुटे कृत्वा
संपाता हुतान् कुर्यात् । ततः स्थण्डिललमण्डल
लिङ्गवानिवेद्यरक्षार्थ शिवकुम्भे निवेदयेत् । मन्त्राणां दीपनं
कुर्यात्तथा सूत्रावलम्बनं । शुषुम्ना नाडि संयोगः शिष्य
चैतन्य योजनं ।। मलकर्मादिसंकल्पः शान्त्यतीतादितः क्रमात् ।
ताडनं ग्रहणं योगः पूजातर्पणदीपनम् ।। बन्धनं
शान्त्यतीता देः शिवकुम्भसमर्पणं । इति कर्म क्रमः प्रोक्तः
पाशबन्ध शिवेन तु ।। ततः शिष्यं शिवशम्भु कुम्भाग्नीनां
प्रणामं कारयित्वा मण्डपाद्बहिर्मण्डलकत्रये समुपवेश्य
क्रमेण पञ्चगव्यं चरुंदत्तधावनं च दद्यात् ।
दन्तधावनस्य च पातः प्रागुदगीशान पश्चिमेषु *?स्तः । अन्यत्र
पाते शान्त्यर्थं साष्टशतिकोहोमः । ततो मूलमन्त्रेणाहुती
शतमष्टाधिकं प्रायश्चित्त विशुद्धये हुता? शुद्धायां
भूमौदर्भशंयत्सऽस्त्र?
स्च् १३)
कल्प्य मध्या ज *?या भूतादिवाला तु संस्कार पूरणार्थं
वौषडन्तेन मूलमन्त्रेण पूर्णां विधाय चर्व्वर्थं
धूपदीपार्थं वह्निमुद्धृत्य कुण्डान्त * * *?
कुण्डसंस्कारदनन्तरं तमानीय प्रत्यहं यजेत् । तत्रैव
कुण्डेव्याहृतीर्हुत्वानिष्ठुर योनिरोधयेत् प्रत्यहं वा जनयेत् ।
अनन्तरमग्नि हृत्पद्म * *?सनं भगवन्तमावाह्य साङ्गं
सम्पूज्य वह्निस्थ शिवस्य यागस्थ शिवेन सहनाडी सन्धानं कृत्वा
यथाभिमते वक्त्रे यथा शक्तिमूलमन्त्रेण दशांशेनाङ्गं *?
र्होमं विदध्यात् । तत्र होम द्रव्याणि समित्
क्षीरघृतमधुर्यधितिलयव तडुल भक्ष्यपायसव्यञ्तेनस्विन्न
भृष्टशाककन्दमूल फलादीनि । तत्राहुति प्रमाणां
मधुक्षीरसर्पिरादि द्रव्याणां श्रुवावधि । दधिपाय सयोः
प्रसृतिः । त्रिखण्डं मूलजातस्य । भक्षस्य यथा निष्पन्नं
हरीतकी तुल्यद्या *?क्ष्वादः पर्वसम्मितं । द्व्यङ्गुलं वर्णीनां ।
फलपुष्प पत्त्राणामखण्डं । सत्ववां व्रणादि दोषरहितानां
कनीयसी स्थुलान्यं
समिधाम्प्रादेशिकं व्यञ्जन मिश्रो वनकासारपिण्याह
गोशकृतां ग्राममात्रं श्रुवान्नत शिखम्वा । व्रीहियवादीनां
पश्चाद्गलि समाहृतं तिलफण सक्त्वादिकस्य मृगीमात्रं ।
गुग्गुलोर्वदरास्थिमात्रं कुङ्कुमचन्दन कल्कहस्तरिका
कर्पूरादीनां चणक प्रमाणं । अष्टाङ्गं कन्दं जातीना ।
शाकानां सुहस्ततल सम्मितं । लाजानांमुष्टिमात्रं तर्जनीं
कनिष्ठिकां प्रसार्य मध्यमानामिकाङ्गुष्ठाग्रयोगान्मृती ।
पश्चाङ्गुल्यग्र योगात्मुकुलाकारा सूकरी । एवं
वीजपदब्रह्मभिरपि होमनिवर्तयेत् । तत आज्येन श्रूचमापूर्य
पुष्करोपर्यधो मुखं श्रुवं कृत्वा तदग्रे पुष्पं दत्वा
वामदक्षिण हस्ताभ्यां शङ्खवत्संलग्नौ तावुभावुपादायः
समपादः समुच्छ्रयोर्द्वकार्यः नाड्यां तिर्पग्विधाय
श्रूगग्रदन्त दृष्टि वौषडन्तं मूलमन्त्रमुच्चरन्
वामस्तेनान्तं श्रुग्मूलमानीयान् द्विग्वयव प्रमाणधारया
समस्तमाज्यं वह्निं प्रापयेदिति पूर्णाम्विधाय उपविश्य
वह्नेर्भस्म वन्दयित्वा
उपरिकन्यसादितेनत्पद्सप्ताङ्गुलि कृतवेदिकामङ्गुल कण्ठां
पञ्चषट्सप्तोत्तर वेदिग्र त्र्यशविस्तृता कनिष्ठिका पृष्ठाज्य
निर्गमात्र्यङ्गुल खातावदुः पञ्च षट्गर्त्तमण्डलां श्रुचं
श्रुवमध्येङ्गुष्ठ परिणाहदण्डं कर्षाधारावटं
दण्डमूलाग्र चतुष्टिकं गोपदाकार पुष्करं तत्पृष्ठ?
कुम्भद्वय युक्तञ्चतुर्विंशत्यङ्गुलं द्वाविंशत्यङ्गुलम्वा
गृहीत्वास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवय नावगुण्ठ्याग्नौ प्रताप्या भ्राम्य
दर्भाग्रेणाग्रं संपृश्य पुनः परिभ्राम्ये मध्यम्मध्येन
सम्पृश्य पुनः परिभ्राम्ये मूलं मूलेन संस्पृश्य तत्वत्रयं
द्वयोः श्रुचि शक्तिं श्रुवे च शम्भुं विन्यस्यात्म ऋत्यदिग्भागे
दर्भाणासुपर्यधो मुखौसंस्थाप्य हृदा संपूजयेत् ।
अथाज्यमानीयास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवचनावगुण्ठ्य शिवाग्नावस्त्रेण
प्रताप्येकवचनाद्वास्य कुण्डस्या परिप्रदक्षिणं त्रिः परिभ्राम्य *
*?संस्थाप्य प्रादेशमात्रं दर्भाग्रद्वयनिर्मितं मध्यग्रन्थि
पवित्रकं अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां गृहीत्वाऽग्नि संमुखं
त्रिराज्याभ्यवनं कवचेन
* * * *? संमुखं संप्लवन हृदा कृत्वाऽग्नौपविडकं
प्रक्षिप्याज्यमस्त्रेणावद्यात्यनिरीक्ष्य निराजनं कृत्वा शिवाग्नी * * * *
* * * * * *? नाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेणामृत मुद्रयाऽमृतां कृत्य
मूलेन संपूज्याज्य पात्र मध्ये प्रादेशमात्रं दर्भं विन्यस्य
इडा सुसुम्ना पिङ्गलाख्यं नाडीत्रयं संकल्प्य सव्यात् । ओं अग्नये
स्वाहा । वामतः । ओं सोमाय स्वाहा । मध्यात् ओं अग्नीषोमाभ्यां
स्वाहा । ओं अग्नये स्विष्टि कृते स्वाहा इत्याहुतिं च * * ? पशुवेण दत्वा
असंस्कृते सर्पिषि संस्कारार्थं विन्दुं क्षिपेत् । कृष्ण पक्षतु
सव्यात् ओं अग्नये स्वाहा । दक्षिणतः ओं सूर्याय स्वाहा । सध्यात् ओं
अग्निषोमाभ्यां स्वाहा । ओं अग्नयेस्विष्टि कृत स्वाहा इति ततो
वह्नेर्वक्त्राभि घोरमाज्याहुतित्रयेणम्वस्य मन्त्रैर्विधाय सदां
वामेन वाममघोरणांगारं? तत्पुरुषेण तत्पुरुषमीशेन
इशशिवेनति वक्त्रसन्धानैकीक्रणैस्वस्वमन्त्रैर्विधाय
कुण्डप्रमाण यथाभिलसितं वक्त्रं प *?
स्च् १४)
ओं वसुभ्या नमः । ओं आदित्ययो नमः । ओं रुद्रेभ्यो नमः । ओं सा
साधोभ्यो नमः । ओं नक्षत्रेभ्यो नमः । ओं पृथिव्यै नमः । ओं
पृथिवी चरभ्यौ नमः । ओं अन्तरि *? चरेभ्यो भूतेभ्यो नमः । ओं दिवे
नमः । ओं दिविचरभ्यो भूतभ्यो नमः । ओं दिग्भ्यो नमः । ओं
दिक्चरेभ्यो भूतेभ्यो नमः । इति प्रभृतभ्यो । दक्षिण
वृत्तवलिन्दत्वा । ओं विष्णवे सर्वभूतये सर्वात्मने ध्यानगम्याय
नम इति मण्डल मध्ये वलिन्दद्यात् । ततो
मण्डलाद्बहिर्दक्षिणतोऽपसर्वा न ओं बर्हि पितृभ्यः स्वधा नमः
। ओं अग्नि पितृभ्यः स्वधा नमः । ओं सोमपितृभ्यः स्वधा नमः । ओं
सर्वपितृभ्यः स्वधा नमः इति वैश्वदेवं कृत्वा वहिर्निगत्य
दिग्देवताभ्यः । ओं इन्द्राय प्रतिगृह्ण नमः । ओं ऐन्द्र्यै प्रतिगृह्ण
नमः । ओं अग्नये प्रतिगृह्ण नमः । ओं आग्नेयौ प्रतिगृह्ण नमः । ओं
यथा? य प्रतिगृह्ण नमः । ओं याम्यायै प्रतिगृह्णनमः । ओं
नैर्-ऋतये प्रतिगृह्ण नमः । ओं नैर्-ऋत्यै प्रति गृह्ण नमः ।
ओं वरुणाय प्रतिगृह्ण नमः । वारुणौ प्रतिगृह्ण नमः । ओं
वायव्यै प्रतिगृह्ण नमः । ओं कुवराय प्रतिगृह्ण नमः । ओं नागाय
प्रतिगृह्ण नमः । ओं नाग मात्रे प्रतिगृह्ण नमः । इति
गन्धपुष्पधूप सहितं बलिं दद्यात् । ततो वायसाः कृमयः
पतित्ताः श्वानः स्वपचाः समय भेदकाये चान्य इमं
प्रतिगृह्णन्तु नम इति गन्धपुष्पान्वितं शेषमन्नं भूमौ
निक्षिपेत् ।। ० ।।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
नित्यकर्मविधिस्समाप्तः ।। ० ।।
अथ मुद्राणां लक्षणं । पद्माकारौ करौ कृत्वा मध्ये
अङ्गुष्ठौ कर्णिकाकारौ विन्यसेदिति पद्ममुद्रा ।
पुनर्वह्निस्थं संपूज्य संहारमुद्रया पूरकेण
वह्नेर्मंत्रात्संहृत्य द्वादशान्तमानीय हृदि सन्निवेश्य
परिधिविष्टरानुद्वास्य कुण्डसमीपे वहिर्वा मण्डलके संप्रोक्ष्या
योगिन्यो भीषणारौद्रा वेतालाः क्षेत्ररक्षकाः । आगत्य
प्रतिगृह्णन्तु शिवेद्यनुविधायिनः ।। मयादन्तं वलिं क्षिप्रं
सिद्धिं यच्छन्तु मे सदा । हे हः हूं फडित्यनेन मन्त्रेण । ये
रुद्रारुद्रकर्माणो रौद्रस्थान निवासिनः । सौम्याश्चैव तु ये
केचित्सौम्यस्थान निवासिनः ।। मातरो रौद्ररूपाश्च गणानामपि
पाश्चये । सर्वसु प्रीतम नमः प्रतिगृह्णन्विमान्यलिं ।। सिद्धिं
जुषन्तुनः क्षिप्रं भयेभ्यः धान्तु नित्यशः । इत्यनेन मन्त्रेण च
वलिम्प्रक्षिप्य हस्तौ प्रक्षाल्य शिव संनिधिं गत्वा संपूज्य
प्रोतिलोम्येन विसर्जनार्थमर्घन्दत्वा भागाङ्गानि पूर्वोक्तन्यायेन
संहृत्ये लिङ्गे संयोज्य सापेक्षं क्षमस्वेति विसर्जयेत् । पर्वसुच
विशेष पूजा कुर्यात् ।। अथ भोक्तुमिच्छन्मध्याह्निकं निर्वृत्य
सिद्धस्य पा कस्य संस्कारार्थं चुल्ली होमगृहवलि वैश्वदेव
दिग्वसीन कुर्यात् ।
तत्र सत्वमन्नं प्रोत्रे समाहृत्य संप्रोक्ष्याग्नि सोम सवितृवृहस्पति
प्रजापति विश्वदेव सर्वदेवानगिस्विष्टि कृत्यदेः प्रणवादि नमोऽन्तः
सम्पूज्य स्वाहान्तैराहुतीर्हुत्वा वास्तु देवताभ्यो वलिमुपहरेत् । तत्र
चूल्यां दक्षिणबाहौ ओं धर्माय नमः । वाम वाहौ ओं
अधर्माय नमः कञ्जिन्यां चक्रसन्धान भाण्डेषु ओं
स्वरसपरिवर्तनाय नमः । उदकभाण्डेषु ओं जलाश्रिताय वरुणाय
नमः । गृहप्रधान द्वार ओं महा विघ्नराजाय नमः ।
पीषण्यां ओं सुभगे नमः । उदूखल ओं रौद्रेकोटरि गिरिके नमः ।
मुषले ओं वलभद्र प्रियाय महाप्रहरणाय नमः ।
सम्मार्जन्यां ओं मृत्यवे देवचोदिते नमः । शयनीय
शिरसि ओंकामाय कुसुमायुधाय नमः । मध्यस्तम्भस्याधस्तात् ।ओं
स्कन्धाय ग्रहाधियतये नमः । इति वलिं निवर्त्यवास्तु मध्ये
वृत्तमण्डलकं कृत्वा गन्धपुष्पादिकं दत्वा विश्वदेव
वलिमुपहरेत् । तत्र ओं ब्रह्मणे नमः ।
द्विहस्तात्पतिते देवाङ्ग लक्षजप्त्वा पुनः संस्कारेण शुध्यति ।।
पुरुष मात्रात्पतिते प्रयत्न पूर्वं ससलाभे सर्वतो विसीर्णे
प्रायश्चित्तं नास्तीति तस्याप्ययर्थः । शलाक्यं भेदपातकस्यान्त
गुरुत्वान्न प्रमादिना भवितव्यम् । तृतीयमन्त्रादृतेऽत्यन्तगुरुतर
महापातकादि दोषापमर्द्दाय समर्थत्वादताय *?मवैवं
महापातकोच्छियेत्य । त्रिगुणप्रायश्चित्तार्थ जप्तव्यं ।
स्थण्डिलेष्वध्या वाहनादिषु कृतेष्व समाप्ते पूजा कर्मण्य विसर्जित
एव देवेशे प्रमादाऽपद्या तेजातेऽर्च्चा पुष्पादिभ्यो मन्त्रां
संहृत्य अघोरस्य शतपञ्चकं जुहुयात् । सहस्र पञ्चकम्वाजपेत् ।
देवोपकरणं पादेन स्पृष्ट्वा सहस्र पञ्चकं जपेत् । संध्यालापे
निरुजः सोपवायः शतं जपेत् । सरुजोजपेदेव । एकाहं दवस्यानर्चने
त्रिरात्रमुपाष्य प्रत्यहञ्च त्रिशं * आकामात्यञ्च शतिभः
उपवासः स्नानं पञ्चगव्य प्राशनं जपो होमश्च
सर्वसंकरदोषं नाशयति ।
तत्र कामार्न्निर्माल्य संकरे ब्रह्मपञ्चकं शतसङ्ख्यं योजयेत्
। निर्माल्य भक्षणे त्वेकामाद्ब्रह्मपञ्चकं सार्द्ध
सहस्रमावर्तयेत् । कामतोऽनन्त योगेन पदाध्वदीक्षयाशुध्यति ।
निर्माल्य भेदाः कथ्यन्ते देवस्वं देवद्रव्यं नैवेद्यं निवेदं
चण्डद्रव्यं निर्माल्यञ्चेति । देवसम्बन्धि ग्रामादि देवस्वं
वस्त्रालङ्कारादि देवद्रव्यं देवार्थमुपकल्पित नैवेद्यं
तदेवोत्सृष्टं निवेदं । चण्डाय दन्तं चण्डद्रव्यं
वहिर्निक्षिप्तं निर्माल्यं । विसर्जितेऽपि देवे पिण्डिकास्थं
पवित्रिकाद्यं निर्माल्यं न भवति । षड्विधमपि निर्माल्यं नः
जिघ्रेन्नलघयेत् न दद्यान्न विक्रीणीत । दत्वा क्रव्यादो भवति ।
भुक्त्वा मातङ्गः लङ्घ्ने सिद्धिहानिः । आघ्राणाद्वृत्तः?
स्पर्शनात्स्त्रीत्वं । अयथा दहन चण्डालः विक्रये शवरः । गुरु
पुस्तकवह्नि यक्षनगेन्द्र योगि
स्च् १५)
धर्ममुद्रेव प्रसारिताङ्गुष्ठा संलग्न मध्यमाङ्गुल्यग्रा
विस्वमुद्रा संमुखहस्ता कुञ्चिताङ्गुल्याग्रौ पर्यङ्गुष्ठद्वय
बालाद्विस्फुरा । अन्योन्य ग्रथिताङ्गुल्यष्ट कनिष्ठा
नामिकयोर्मध्यमातर्जन्योश्च योजनेन गोप्तवाकाराधेनु मुद्रा ।
बद्धमुष्टर्दक्षिणहस्तस्य मध्यमातर्जन्योर्विस्फुरित प्रसारणेन
गोवृषा * * र्दक्षिणहस्तास्य प्रसारित तर्जन्या वामहस्ततल
ताडनेन डामनी इति सूर्यमुद्रा । प्रसारित हस्ताभ्यामधो मुखा *
* * * * * * *सुक्रस्य?शात्महामुद्रा । धेनुमुद्रा पूर्वोक्तैव ।
हस्ताभ्यामञ्जलीं कृत्वाऽनामिका मूलपर्वगाङ्गुष्ठ
संयोजमनाव्य द्विती * * * * * * * * * *? सलग्नमुष्ट्युच्छ्रिताङ्गुष्ठौ
करौ संनिधानी भावेवगर्भगाङ्गुष्ठौ निष्ठुरा संनिधा * * *
* * * * * * *दक्षिणाङ्गुष्ठा भ्रान्त वामाङ्गुष्ठौ
* * * * * * ?वरावद्य मुष्ट्याः करयाः संलग्न
संमुखाङ्गुष्ठयोः कालकर्णी । ग्राह्यया परिहस्तप्रसार्य
कनिष्ठादि * * * * *? मूलाग्रयनान् संहारमुद्रा । उत्तानसिथिल
मुष्टिर्वह्न्यादि प्रक्षपे भवमुद्रा । वामाङ्गुष्ठमध्ये
मुखदक्षिणहस्त * * * * ?तर्जन्यङ्गुष्ठ योगाधो दक्षिणाङ्गुष्ठ
मुच्छ्रितं कृत्वा वामहस्ताङ्गुलीभिर्दक्षिणहस्त
मुष्टिसंवेष्टनेन लिङ्गमुद्रा ।। ० ।।
* * * * * * * नितायो? सिद्धान्तसारपद्धतौ मुद्रालक्षणं समाप्तम् ।।
० ।।
अथ प्रायश्चित्तविधिस्तत्र स्वष्टलिङ्गेनष्टे * * * * * *? जप्ता
लिङ्गान्तरं प्रतिष्ठाप्य विशुद्ध्यति ।। पिण्डिकाया मध्येवं
योज्यं । हस्तात्पतितेऽव्यङ्गेऽदीक्षितेन च * * * * * * *? धेनः
पञ्चगव्यादिनासं स्नाप्य विशेषपूजां कुर्यात् ।।
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
प्द्f २
स्च् १)
त्राच्छिष्टः प्रसादादुच्छिष्ट समानजातीय स्पर्शै समुपस्पृश्य
स्वजातीश्वरं कीर्तयेत् ।। उच्छिष्टादीक्षित स्पर्शमुत्पती * * * *? तथा
ब्राह्मणो राजन्यं राजन्या वैश्य वैश्योशूद्रमुच्छिष्टं
संस्पृश्याहोरात्रमुपाष्यात्मीय जातीश्वर मन्त्रस्पृष्ट वर्णजातीय
मन्त्रादेकस्थौ जपेद्ब्राह्मण्ये वैश्यशूद्रौ स्पृष्ट्वाद्व्यहं
त्र्यमुपाष्यतदेव जपेत् । क्षत्रीयः शूद्रं स्पृष्ट्वा
द्व्यहमुपाष्यत देव । एता न दीक्षितान स्पृष्ट्वा
पूर्वोक्ताद्द्विगुणञ्चरेत् । क्षत्रियादयः समीपन्तर वर्णस्पर्श
पादहीनं वैश्यो विप्रस्पर्शेतदर्द्धं शूद्रः पादं । शूद्रः
क्षत्रीयस्पर्शे तदर्द्धमित्युपकल्पनया प्रायश्चित्तं कुर्युः । अत्यज
स्पर्शे त्रिरात्रमुपाष्य स्वजातीशस्यायुतं जपेत् । चाण्डालस्पर्श
उच्छिष्टस्य कृच्छ्रमघोरायुतञ्जपेत् । यद्वा वाह्य वर्णस्पर्शे
सर्वेषां दीक्षितानां गुरुश्चतुरस्र चतुर्हस्ते चतुर्द्वारे
वर्णकचतुष्टय निर्मिते चतुष्पत्त्र पद्मोपशोभिते
पूर्वदक्षिणोत्तर पश्चिमपत्त्रेषु तत्पुरुषाघोरवामदेव सद्योजाता
जातीश्वराः कर्णिकायामीशानं मण्डले शिवं संपूज्यकारं *?
विन्यस्त *? जातीशे तत्स्थापितेशाने स्वजातीश्वर मण्डले वा स्वजातीश
मन्त्रेण फडन्तेन शोध्यां जातिमुद्धृत्य स्वाहान्तेन तेनैव
मण्डलस्थस्वजातीशे निक्षिप्य तथैवोद्धृत्यशोध्यात्मनि तथैव
नियोजयेत् । इति जात्युद्वारकर्म निर्वर्त्य तं दीक्षयेत् । असन्निहित गुरुश्व
स्वयमेवात्मानं दीक्षयेत् । षडस्र । पोष्य स्वजातीश्वर
लक्षम्वाऽवन्यासना जपेत् । समानजातीय यस्या च्छिष्टं भुक्त्वा
उपास्य सहस्रञ्जपेत् । ब्राह्मणः शूद्रस्येच्छिष्टं भुक्त्वा
त्रिरात्रमुपाष्या युतद्वयञ्जपेत् । ब्राह्मणो वैश्यस्यौसिष्टं
भुक्त्वाद्व्यहमुपाष्याघोरायुतं जपेत् । अत्न्यजोच्छिष्टं
भुक्त्वाऽत्म विशुद्धये कृच्छ्रादिदशगुणं समाचरेत् ।
प्रायश्चित्तं जपेद्दशकादारभ्य शतत्रयं यावत् स्नानमात्रं ।
शतत्रयादूर्द्ध पञ्चशतपर्यन्तं स्नाननक्तेन । तस्या * * * * * * *
रात्र * * * ?
गणमातृगौरी प्रभृति प्रतिमासु शिवसूर्य निर्माल्यवन्न भवति ।
अपरेष्ठपि दशसु स्थानेषु गुरुव्याख्या काले शिवकुम्भे
देवविप्रदक्षिण विसर्जितेऽपि लिङ्गस्था पूजा । चललिङ्गेऽघढिते चित्रे
रत्नजे हेमजे । अन्यस्मिन्नपि सद्यः प्रतिष्ठिते च चतुर्थां
कर्मावधिर्न निर्माल्यं भवति दोषतारि । पूजायां दीपका
लोकधूपान्नादि गन्धे च न दोषः । नदीप्रवाह निर्माल्येपि च ।
सूत्रक शावाशौ वयोः परकीय योर्नभोक्तव्यं भुक्त्वा
चाकामतः समुपाष्य वामदेवसस्रञ्जपेत् । कामतस्तूपवासत्रयं
कृत्वा वामदेवमन्त्रं सहस्रं त्रयमावर्तयेत् । आत्म
सम्बन्धिनाः सूतकशावाशौचयोः सूतकि जनस्पर्शं विहाय
पृथक्या केन भोक्तव्यं । अन्यथा नित्यहानिहानिर्भवति । अतः
सूत्रके शाचाशौच च स्वधर्मस्थेन क्रियानुष्ठान परेण
ज्ञानवता वृत्तवता च न नित्य क्षतिः कार्या ।
यदि च नित्यानुष्ठानं न भवति प्रमादात्सूतकि संस्पृष्ट
साधारण पाकभोजन वासमुपाष्य सहस्रबहुरूपन्भवत् ।
कामत्र?स्त्रिगुणं तदेव ज्ञात्वा तु सूतकशावान्नभोजने
नित्यानुष्ठानं न कर्तव्यं । तस्याननुष्ठानात्सोपि सूतकि समः
स्यात् । तत्सूतकान्ते यावन्ति सूतकदिनानितावन्ति नक्तं यावकान्नेन
भुञ्जीत त्रिकाल स्नायी बहुरुपगतत्रयं जपेत् । तत्रैव भुक्तं
नित्यहानिश्चाकृता तत्र प्रतिनिमित्तं त्र्यहं वहुरूपस्य
सहस्रत्रयञ्जपेत् त्रिरात्रञ्चोपवसेदिति ।। अथवा आग्निक देवार्चनादिल्पे
सद्योजातस्या युतं जपेत् । समुपाष्य प्राणायामपूर्वकं शतम्वा
जपेत् । वामस्य शतं प्रतिषिद्धान्नमेवने ।
प्रतिषिद्धहिंसायामघोरस्य रात्रौ रेतः स्पन्दन तत्पुरुषस्य ।
दिवाद्विगुणं । ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य शूद्राणां
तत्पुरुषाघोरवामदेव सद्योजातां स्वजातीश्वरान्तं?
निर्वीजासाधिकारा निरधिकारा चेति ।
तत्र समय समद्याचारवती सवीजा । सा च विदुषां क्रिया
समर्थानामेव भवति । समय समयाचार पाशशुद्धि
पूर्विकासमयाचारादिरहिता निर्वीजा । सा च वालवालिष
वृद्धव्याधितानां स्त्रीणां भोगभुजाञ्च । आचार्य
साधकयोर्नित्यनैमित्तिक काम्यकर्मस्वधिकरणात्साधिकारा । समयि
पुत्रयोर्निर्वीज दीक्षितानाञ्च
नित्यकर्ममात्राधिकारित्वान्निरधिकारैव । सा पुनरूपाधिद्विधा
क्रियावती ज्ञानवती च । तत्र रजः कुण्डमण्डलपूर्विका क्रियावती ।
तद्विना केवलमनाव्यापारजनिता ज्ञानवती ।
इच्छम्भूतादीक्षालब्धाधिकारेणाचार्येण क्रियते । सचावर्तादि
देशसम्भूतः श्रूतशीलगुणान्परसम्पन्नः शुद्धा शयः स्यात् ।
शिष्यापि शीलादिगुणसम्पन्नः शिवान् ध्यानादि गुणयुक्तः । तत्र
शिवान् ध्यानाच्छक्तिपातस्तद्वशात्य लक्षयः ।
ततो गुर्वस्वणन्ततो दीक्षा ततो बोध आन्तरो वाह्यश्च विहितेषु
प्रवृत्तिर्निषिद्धान्निवृत्तिरित्यय वर्जनं । श्रेयसिलयः सर्वज्ञतादि
गुणः * * *? प्रेषकभावनिवृत्तिः कार्यता परिक्षयरूप उत्पत्ति स्थिति
ध्वंसतिरोभावानुग्रहरूपः पञ्चधा प्रतिकृत्य परित्यागः ।
विमल स्वात्मनि स्थितिरितिं । अथ दीक्षाविधिस्तत्राचार्यः कृतशौच
स्नानविधिः । निवर्तित सत्व्यापासनोयज्ञ गृहमनु प्रविश्य कृत
यज्ञमण्डपविधिः । शम्भुकुम्भ शिवास्तववर्द्धनिकानां कृत
पूजोनिवर्तित होमविधिर्भगवतादीयं
देहमाविश्यान्ग्राह्यगुणसम्पन्नस्यास्यानुग्रायाहं
कुर्वित्यनुज्ञां प्राथिवं करोमीति भगवतो लब्द्धानुज्ञो
मूलमन्त्रेण सप्तकृत्वोभिमन्त्रितं सितोष्णीषं शिरसि विन्यसेत् । ततो
मण्डल सर्वकर्मसाक्षीत्वेन शिवकुम्भेयस्तु रक्षकत्वेन वह्नो
होमाधिकरणत्वेन शिष्यदेहे तत्पाशशिथिलिकरणत्वेन
स्वात्मन्यनुग्राहकत्वेन इत्यपिकरण पञ्चकेप्यहयेवस? शिव इति
सदाशिवादय?
भूत ऊर्ध्व जपान् सारणापवासात्कल्पयेत् । मन्त्रीपरसिद्ध्यन्न
भोजने तल्लिङ्गेश्वर शतञ्जपेत् । त्रयीनष्टिक? लिङ्गिस्यात् ?
पाशुपतकापाल लिङ्गिनां सद्योजाताद्याः पतयः ।
कपालान्नभोजने चान्द्रायणं कृत्वा ईशान लक्षं जपेत् ।
जातीश्वरमण्डल वल्लिङ्गेश्वर मण्डलं विधाय
जात्युद्वारवन्निक्षेपाक्षेपयोगेन लिङ्गाद्वारपूर्वकं दीक्षाष्टा
कुर्यात् । तेनैव संस्पृष्टतदन्न भोजन लक्षत्रयं कृतचान्द्रायणो
जपेत् । लिङ्गे तु त्रान्सादि दिषदुष्टै महेशस्या युतञ्जपेत् । सूल्यं
तदर्द्धं ततोऽल्प तदर्द्धं लघीयसिसहस्रं । तत्र साधकोक्तं
प्रायश्चित्तं परायत्तस्य गृहस्थाचार्यस्य स्वायन्त साद्विगुणं । एत
देवव्रतं वरायत्तस्य व्रतिनः । स्वायन्तस्य पूर्वोक्त त्रिगुणं ।
सर्वमध्येतत्तृतीयांशेन पुत्रकस्य पुत्रकार्द्धं समयिनः ।
तदेतत् सर्वं प्रायश्चित जातमुक्तामुक्तानुक्त निकृतीना
कामाकामादिभेदेन पायाविरोधेन वलवयो विशेषेण
समद्विगुणार्द्ध तदर्द्धार्द्ध परिकल्पनया दातव्यं प्रायश्चित्त
भरणासमर्थस्य याव
पितृगुरुभ्रातृभगिनी पुत्रभार्यादिभिर्विभज्य
जपहोमौपवासातद्विशुद्धये कर्तव्यमिति ।।
महाराजाधिराजश्रीभोजदेव विरवृत्ताया वृत्तसारपद्धतौ
प्रायश्चित्त विधिः समाप्तः ।।
अथ दीक्षा स्वरूपं तत्र बन्ध हेतुमेल कर्ममायादिपास विश्लेषो
ज्ञानं चानुऋह्यस्य यया क्रियया किन्यते सा दीक्षा तत्रानुग्राह्यं
स्त्रिविधः । विज्ञाना कलः प्रलयाकलः सकलश्चेति । तत्र
मलमात्रयुक्तो विज्ञानाकलः मलकर्मयुक्तः प्रलयाकलः कलादि
पृथिव्यन्त तत्वयुक्तः सकलः । दीक्षापि द्विविधानि
चधिकरणामाधिकरणा च । तत्रा चार्यनिरपेक्षेण भगवता
स्वशक्त्यानुग्रह रूपयातीव्रतर शक्तिनिपातेन या क्रियते
सानिरधिकरणा । विज्ञानाकलप्रलया कलानां यात्वाचार्य
मूर्तिस्थेन भगवतामन्दमन्दतर तीव्रतीव्रतर वक्त्ररूपभक्ति
निपातेन या क्रियरसासाधिकरणासुकलात्मनां सो पुनः सवीजा वन
संपुट्य ।
ओं हुं ओं संहारमुद्रया संगृह्य शिष्य हृदि संनिवेश्य
मूलमन्त्रेण यज्ञोपवीतमभिमन्त्र्य शिशोर्दद्यात् । शतं सहस्रं
वाहुत्वाहुतिं दद्यात् । एवं समय संस्कार संस्कृतः पूजा
होमश्रवणाध्ययनादिषु योग्योभवत्यैश्वरश्च पदं लभत इति ।
नाडी सन्धान होमस्तु मन्त्राण?सहस्रकः । दीक्षैषा सामयी
प्रोक्तारुद्रेश पददायिनी ।। ० ।।
इति राजाधिराज श्रीभोजदेवविरचिताया सिद्धान्तसारपद्धतौ
समयदीक्षाविधिः समाप्तः ।। ० ।।
अथ मण्डलेषु मन्त्रान् सम्पूज्य निर्वाणदीक्षादिकं विधेयं ।
तत्र मण्डलानि सर्वतो भद्रेभद्रं लतालिङ्गोद्भवं
अर्द्धचन्द्रं स्वस्तिकं योन्याकारं त्रिप्रकारं नवनाभं
चापाकारं टङ्काभं गजदन्तं काम्य कर्मणि च त्र्यश्रादि
भेदभिन्नं सर्वाण्यपि मण्डलानि
चतुरश्रानिष्पाद्यनेद्यतनञ्चतुरश्रं क्षेत्र साधयेत् । तत्र
शुद्धां दर्पणोदरां भुवं निष्पाद्य
पुष्पपौष्णमघावेधान् मण्डलस्थगङ्कुच्छाया प्रवेशनिगमः
* *वा? पूर्वापरे ससाध्य पूर्वापरायतं सूत्रसाम्यल्य
ब्रह्मस्थानं सङ्कल्प्य तस्मात्पूर्वापरायतं
समान्तरमङ्कद्वयं दत्वा तत्वामसूत्रं सकिञ्चिदधिकं
पूर्वापरयोरङ्कयोर्द्धृत्वा दक्षिण्येन्तरमत्स्य
संपाद्यमत्स्यादर दक्षिणोत्तरायतं सूत्रं संप्रसार्यमतः
क्षेत्रार्द्धमानेन मध्याद्दिक्ष्वङ्कं विधाय
तदङ्कसमसूत्रेण दिक्ष्वनुलोमविलोमतो मत्स्य चतुष्टयं दत्वा
तेषु सूत्र चतुष्टय दानाच्चतुरश्रं संसाध्य सर्वाणिमण्डलानि
कुर्यात् । तत्र चतुरश्रमष्टधा विभज्य चतुः षष्टि पदकृत्वा
मध्यकोष्ठ चतुष्टये पद्मं पीठञ्च संपाद्यतदनन्तर
पङ्क्तौ पद्मार्द्धेन वीथी तदनन्तर पङ्क्त्याञ्चतुर्द्दिक्षु
पद्मासमानि चत्वारिद्वाराणि द्वारार्द्धमानात् कण्ठोपकण्ठ
कपोलोप कपोलान्कुर्यात् । एवं विन्तज्य ब्रह्मस्थानात्सूत्रभ्रमणेन
त्र्यङ्गुलानि चत्वारि वृत्तानि कृत्वादिक्षु विदिक्षु
षम्भूतमात्नां तत्समानगुणं ममचेते हृदयादि मन्त्राः
करणभूता इति सञ्चिन्त्य स्वतन्त्र पतित्यमात्मनि
सम्भाव्यशिशोरनुग्रहात्मकर्म कुर्यात् । ततो द्वावे मण्डलकं
विधाय प्रणवेन दर्भमासनं दत्वा तत्र
शिष्यमूर्द्धकायमुदङ्मुखं कृताञ्जलिं सन्निवेश्य स्वयं
प्राग्वदनः शिवाम्भसास्त्रेण प्रोक्षयेत् । भस्मनामूर्ध्न्यस्त्रेण
सन्ताड्यास्त्रदर्भणनाभे मुर्द्धमधश्च त्रिधात्रिधासमुल्लिख्य
सकलीकृत्यास्त्र प्रोक्षित कवचावगुण्ठित मूलमन्त्र संस्कृत
वस्त्रेण नेत्र बन्धविधाय प्रवेश्य पुष्पक्षेपं कारयित्वा
भगवन्तं दर्शयेत् । तदनु दक्षिण दिग्भोगे मण्डल प्रणवासनं
विधायोपवेश्यधारणान्ति देहशुद्धिं सकलीकरणञ्च कृत्वा
शिवहस्ते मन्त्रात्सम्पूज्य तेजारूपं ध्यात्वा शिष्यमस्तके
सन्निवेश्य मूलमन्त्रं समुच्चरन् सर्वाङ्गालभनङ्कुर्यात् । ततः
कृतशिव नमस्कारं कुण्डं समीपगानीयात्मनः सव्यदिग्भागे
मण्डलं विधाय प्रणवासनन्दत्वा तदुपरि शिष्यं सन्निवेश्य
सम्पाताभिहुतं कृत्वा दर्भमूलं मूलमन्त्रेण शिष्यकरतल
दत्वा दर्भाग्रं स्वजघा सन्धौ नियोज्यैडा पिङ्गलामध्यनाडीः
शिष्य देहाद्विनिःसृत्य स्वनाड्याम्विलीनेति सम्भव्य
नाडीसन्धानार्थमाहुतीत्रयं मूलमन्त्रेण देयं । तयो
चैतन्यग्रहणाय प्रवेशनि विधातव्यौ । तदनु शिवहस्त
स्थिरीकरणामूलमन्त्र तर्पणायाहुति शतमङ्गानां दशांशेन
पूर्णाहुतिञ्च दत्वा प्रायश्चित्त निमित्तं मूलमन्त्रेण
शतमष्टोत्तरं दत्वाशूद्रादि जातिभ्य आहुतित्रयेण जातिमुद्धृत्य
द्विजत्वा पादनेध्याहुतित्रयं जुहुयात् । ओं ह्यौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मा योनि वीजाङ्कार भावदेश शुद्धो द्विजोभवतु ।
रुद्रांशा पादनेध्याहुतित्रयं दत्वा भगवन्नस्यात्मारुद्रो
भवतु । ततश्चास्त्रेण प्रोक्षणताडने कृत्वा रेचकेन शिष्यदेह
प्रविष्य विश्लेषच्छेदावस्त्रेण विधायांकुश
मुद्रयातच्चैतन्यमाकृष्य द्वादशान्ते समानीय ध्रुवेन
सम्पाद्य ओं हं ओं संहारमुद्रया स्वहृदये पूरकेण प्रवेश्य
कुम्भकेन समरसी कृत्य रेचकेन ब्रह्मादि देवताः । सन्त्यज्य
द्वादश्यन्ते ध्रुवाश्चयोरष्टा लिङ्गानि विदध्यात् ।
स्च्. ४)
वाहुवीष्यन्तर द्वारसम्बन्धकोष्ठकत्रयेण पीठं तदुपविततः
कोष्ठकत्रयेण दक्षिणोत्तरकोष्ठ द्वयस्य बाह्यैकैक
रेखालोपात्मध्यकोष्ठकैकेन कठं तदुपरि च कोष्ठकत्रयेण
जलपट्टं तदुपरिकण्ठवल्लिङ्गमव सर्वाण्यपि लिङ्गानिविधाय
कोणेषु कर्णकोष्ठकान् लतार्थं संरक्ष्यलता लिङ्गान्तराल
शेषरेखा विलाप्यतदुपरि ततोद्वरित कोष्ठकेषु वीथी पीठ पद्मानि
सर्वतोभद्रवकुर्याल्लता लिङ्गोद्भवे ।। ० ।।
चतुरस्रे पञ्चमां शत्यागसूत्रन्तसूत्रेण पश्चिम वाहुमध्यस्थ
सूत्रभ्रमणेनार्द्ध चन्द्रं ।। ० ।।
चतुरश्र क्षेत्रमष्टधा विभज्य चतुःषष्टि
कोष्ठकान्सम्पाद्यैककोण स्थित षोडश कोष्ठकेषु प्रतिदिशं
वाह्यकोष्ठकत्रयस्य वाह्यरेखाः संस्थाप्य
मध्यमध्यरेखात्रय लोप्यवन्मुष्टपि कोणकोष्ठकोषु वर्तितेषु
पञ्चमं स्वयमेवाभिव्यज्यते स्वस्तिके ।। ० ।।
चतुरस्रं चतुर्द्वा विभज्यकोणभ्यष्टकेषु गर्भहस्तं संस्थाप्य
कर्णार्द्धास्थांशं
संत्यज्य गजकुम्भवद्द्वयं निष्पाद्यमध्यसूत्रे हस्तं दत्वा
दक्षिणोत्तर भ्रमसूत्रं पूर्वान्तं नीत्वा योन्याकारं कृत्वा
कुम्भद्वयान्तः पद्मसंमुखंद्वारं योन्याकारे ।। ० ।।
चतुरश्रे त्रिधाविभक्ते संसक्तानि नवपद्मानि संसक्ते नवनाभे ।।
० ।।
पञ्चधा विभक्त पञ्चविंशति कोष्ठकान्संपाद्य दिक्षु विदिक्षु च
वाहुरेखा संलग्नकोष्ठकाष्टकं मध्यमञ्च नवमं
संस्थाप्ये शेषान्तकोष्ठ षोडशलोपेन संसक्त ससक्तानि
नवपद्मानि कुर्यात् संसक्ता ससक्तके । एतत्मण्डलद्वयमपि
द्वारादिरहितं ।। ० ।।
सप्तधावा विभज्यैकोन पञ्चाशत्कोष्ठकान् सपाद्यवहिर्भागैकेन
चतुर्विंशति कोष्ठकैः समन्त्राद्वीथिं निष्पाद्योद्वरित
पञ्चविंशति कोष्ठकेषु पूर्वादिदिक्षु कोष्ठकं नवमञ्च
मध्ये संस्थाप्य षोडशकोष्ठकलोपेन वीथीका
चतुष्टयान्तर्नवपद्मान्य संसक्तानि कृत्वा वीथ्यनुगतान्यष्टौ
द्वाराणि चा संसक्ते । एवं त्रिप्रकारं नवनाभं ।। ० ।।
चतुरश्रं क्षेत्रं तत्सत्विषु सत्व्यन्तरेषु च द्वात्रिंश सूत्राणि
दत्वा तृतीय वृत्ते सत्व्यन्तर सूत्राद्वहिः पार्श्व
भ्रमणेन षोडशार्द्ध चन्द्रात्कृत्वादिक्षु विदिक्षुर्द्व चन्द्रद्वयं
मध्ये चतुर्थ वृत्ते दलाग्राणि तृतीय वृत्ते दलसन्धी द्वितीय वृत्ते
केशराग्राणि प्रथमवृत्ते तद्वृत्त प्रमाणां पीतां कर्णिकां
तन्मध्ये नीलवर्णानि नवबीजानि मूलमध्याग्रेषु शुलरक्तपीतं
केशरजालं दलानि च प्रतिवारणया सहशुक्रवर्णानीति पद्मं
निष्पादयेत् । तच्चाभ्युन्नत दलाग्रं भुक्तिकामस्य प्राञ्जलं
मुक्तिकामस्यस्मारादि यागेतीक्ष्णाग्रं दिक्कालानां मन्दराग्रं
विद्येश्वराणां ग्रहाणाञ्च गोकर्णाग्रं गणानां
मण्डलाग्रमश्वत्थ यन्त्रकं गौरी सरस्वत्यादीनां विधेयं
कर्णिकार्द्ध समं वहिः पीठं नीलसन्धानकीलकोपेतं
श्वेतरक्तपीतकृष्णपादकं विचित्रगात्रकं विधाय बद्ध हि वीथी
वीथी मूत्राद्द्वारार्द्धेन द्वारकण्ठं ततो दक्षिणोत्तरे निःसृतं
तावदेवोपकण्ठं तदर्द्धं तावदेव कपालं तस्माद्दक्षिणोत्तर
मन्त्रः संमुखे
* ताव देवोप कपालं बहिः शुक्लरक्तकृष्णरेखात्रयं
सत्वरजस्तमोरूपं कृत्वैतारेखाः प्रथमाङ्गुल प्रमाणा
अन्ययवान यवान्तराश्च सर्वामुक्तिकामस्य भुक्तिकामस्य च सर्वाः
समाः कार्याः । द्वारकण्ठोपकण्ठकपालोपकपाल रेखाः
संरक्ष्य प्रतिकोण शेषरेखाः परिलोपयेत् । सर्वतो भद्रे
सर्वमण्डलेषु पद्मद्वाराण्यः । नैवमार्गेण कर्तव्यानीति ।। ० ।।
इदमेव सर्वतोभद्रं कोणस्थ कोष्ठक षट्कमध्यात्मध्यस्थ
कोष्ठैकैक लोपेन भद्रम्भवति । शानिष्टेन श्वेतं तदैव
हरिद्रान्वितं पीतं सिन्दूरधात्विष्टकादिना रक्तं दग्वयवादिन
कृष्णंशुष्कसमीपत्त्रादिना नीलं तद्वर्णकार्थं रजः कार्यं ।
विशेष सिद्धिकामः मुक्ता चिद्रुमादिना एतदेव कुर्यात् ।। ० ।।
चतुरश्र क्षेत्रं चतुर्दिक्षु विंशति विभागैर्विभज्य कोष्ठक
शतचतुष्टन्निष्पाद्यसमन्ता द्वाह्यपङ्क्तौ वीथीं
विधायतदनन्तर पङ्क्तिं चतुष्टये प्रतिपङ्क्तिकोष्ठकद्वयपरिलोप्ये
चतुर्क्षु द्वाराणि कुर्यात् । वीथीद्वयान्तर्द्वारानुगतानि
स्च्. ५)
तपसम्थाव्य तत शुद्ध्यर्थमाहृतीर्दश दत्वामलादि श्लेषं
संकल्प्या पुनर्मूलेनाहुति त्रयं जुहुयात् । कर्मणो
विशुद्धस्याप्यत्यन्ता भाव * यं? विश्लेषं सञ्चिन्त्याहुतित्रय दत्वा
भगवन्तस्यात्मनोमायामलकर्मरूपस्य पाशत्रयस्य विश्लेषं कुरु
२ इति । एवं पाशत्रय विश्लेषो दीक्षा । पाशच्छेदो
निवृत्तिपाशस्यमलादि तत्वादिव्यापकस्यास्त्रेणाहुति त्रयं
दत्वाकाराः तदनु मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दद्यात् ।
भगवन्तस्यात्मनो निवृत्तिपाशच्छेदं कुरु इति । अशेष शरीर विनाशे
चैतन्यस्यैकत्वं सङ्भाव्य वौषड्जाति युक्तेन मूलेन पूर्णाहुतिं
दद्यात् । तदनु ओं ब्रह्मणे नम इत्यावाह्य सम्पूज्याहुतित्रयं
दद्यात् । ओं ब्रह्म न शब्दस्पर्शौ गृहाण स्वाहात्याहुतित्रयं दत्वा
श्रावयेत् कारणे शत्वयानास्य यातु पदमनामयं । प्रतिव *
निधातव्यः प्राज्ञैषा पारमेश्वरी ब्रह्मादिकारणानाज्ञान्दत्वा
विसर्जयेत् । एवं शुद्ध तत्वाग्र सं
शुद्धस्फटिकमणि रू *? वृत्तिकलाजाल निर्मुक्तं
संचिन्त्यमूलेनाहुतित्रयं दत्वा समुद्वरेत् । ओं हौं शिवाय स्वाहा
। भगवन्तस्यात्मनो निवृत्तिकलापाशादुद्वारं कुरुर्वित्युद्वृत्य
संहारमुद्रया पूरकवृत्त्या आत्मस्थं कृत्वा रेचकेनोद्वरित शिष्य
सूत्रदेहे प्रवेशयेत् । स्थिरिकरणार्थमाहुतित्रयं दद्यात् ।
तदनुवागीश्वरीं सम्पूज्य ओं वागीश्वर्यै स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा
विसर्जयेत् । कला सन्धानं शुद्धाशुद्धविभागेन द्विरूपं
कार्यं शुद्धं ह्रस्वमुच्चार्या शुद्धं दीर्घमुच्चरेत् । ओं ह्लं
ह्वीं निवृत्ति प्रतिष्ठाभ्यां नमः इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा
शुद्धमशुद्धे विलीनं सम्भाव्य द्वितीया कलामुपस्थापयेत् ।
आदौशक्तिस्ततस्तत्वं वागीशीयनेकता । शिष्यस्य चेतनादानं
योजनं सर्वयोनिषु ।। गर्भजन्मदेश्वर्यं तद्भोगापादनं तथा ।
लयोनिष्कृति विश्लेषौमल हस विनायुगपत्संयोगं कुर्यात् ।
ततो मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय दत्वा । ओं हौ
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वासुयोनिषु युगपरं * * *? कुरु
कुर्विति । * * *?र्व गर्भनिष्पतय मूलैनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वासुयोनिषु गर्भनिष्पत्तिं
कुरुकुर्विति ततश्चन नार्थमूलेनाहुतित्रयं विधाय ओं हौं शिवाय
स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः सर्वगर्भाणाञ्जनन कुरु कुर्विति ।
सर्वशरीराणां पुगपद्वृद्धिं सम्भाव्यभोग निष्पत्तये
प्राक्कर्मागमिकं चैकस्थं सर्वयोनिशरीरेषु भगदायकं
कर्मार्दुनश्च भावयित्वा मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय
स्वाहाभगवन्नस्यात्मनो नानाभोगदायकं कर्मार्जुनं कुरु २ इति
। लोकधर्मिकायां प्राक्कर्मागामिकं धर्मरूपं कर्मार्जुनं
सम्भाव्याहुतिदानं कर्तव्यं साधक दीक्षायां प्राक्कर्मैकं
सम्भाव्योदभिदानं विधेयं । तदनुदेशाकलसरीर विषयभेदेन
नानारूपं प्रागागामिककर्मवासनाजनितं भोक्तृत्वा
सितेह्यात्मनि
सुखदुःख * *? त्मकं भोगं सञ्चिन्त्य मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं
देयं । ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्तस्यात्मनः सर्वत्र
भोगनिष्पत्तिं कुरुकुर्विति लोकधर्मिकायां
प्रागागामिकधर्मजनितं देशकालशरीर विष भेदेन नानारूपं
भोगं सञ्चिन्त्याहुती दद्यात् । साधकदीक्षाया प्राक्कर्मणैव जनित
देशकालशरीर विषयभेदेन नानारूपं भोगं
सञ्चिन्त्याहुतिदानं कर्त्तव्यं । लयमत्रभागेषु परमप्रीति
रूपमनुसन्धाय मूलेनाहुतित्रयं दद्यात् । ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्तस्यात्मनौ भोगेषु परमपरमप्रीतिरूपं कुरु २ इति ।
निष्कृतौ जात्यायुर्भोगसंस्कारादि शुद्ध्यर्थ हृदयेनाहुतिशतं
हुत्वा पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्रय दद्यात् । ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवत्तस्यत्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरुकुर्विति ।
भोगाभावेमायापाशाद्बहिर्निष्ब्रुणमरूपं विश्लेषं
सम्भाव्य मूलनाहुतित्रयं दत्वाभोक्तृत्वं विषया सक्तिर्मलकारा
स्च्. ६)
मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यत्मानः
कर्मणो विश्लेषं कुरु २ इति पाशच्छेदः प्रतिष्ठापाशस्यमलादि
तत्वादि व्यापक * *?शास्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा कार्यः
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुति त्रयं दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः प्रतिष्ठापाशच्छेदं कुरुकुर्विति
विज्ञाप्याशेषं शरीरभङ्ग चैतन्यैकत्वं सम्भाव्य पूर्ववत्
पूर्वा दद्यात् ।। तदनु ओं विष्णुवे नम इत्यावाह्य संस्थाप्य
सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा ओं विष्णवै पूर्यष्टक सङ्गृहाण
स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्द्विसर्ज्जयेत् ।
उद्धाराथमाहुतित्रयं दत्वा । ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः प्रतिष्ठा परिणादुद्धारं कुरु २ इति स्वदेहस्थ
शिष्यदेहस्थञ्च पूर्ववत्कुर्यात् । वागीशीम्पूजयित्वा आहुतित्रयं
दत्वा विसर्जयेत् । कलासन्धानं पूर्ववत् । ओं ह्रीं ह्रं प्रतिष्ठा
विद्याक्यान्नम इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा विद्यामुपस्थापयेत् ।। ओं
ह्रूं विद्यायै नम इति संपूज्याहुतित्रयं दत्वा तस्या व्याप्ति *?
लोकयेत् ।
मायान्तानि तात्वानि एकोन सप्तवर्णाः सप्ताविंशतिर्भुवनानि
पदानां विंशतिकः मलकर्म मायारूपञ्च सर्वयाव्याप्तं
यश्चिन्त्य वागीशीं सर्वयोनि व्यापिकां समावाह्य संस्थाप्य
सम्पूज्याहुति त्रयेण सन्निधीकृत्य शिष्यस्यास्त्रेण प्रोक्षणताडन
प्रवेशच्छेदोत्कर्षग्रहणानि विधाय भवमुद्रया सर्वयोनिषु
संयोगं कृत्वा मूलेनाहुतित्रयं दद्यात् । ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनः सर्वयोनिषु संयोग कुरुकुर्विति संयोजयेत् । एवं
गर्भाधानादि लयान्तं कर्मकृत्वानिष्कृतौ शिखयाशतहोमं
कुर्यात् । ओं हौं शिवाय स्वाहेति पुनर्मूलनाहुतित्रयं दत्वा
भगवन्नस्यात्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरुकुर्विति विश्लेष
पाशच्छदौ पूर्ववद्द्रष्टव्यौ पूर्णाहुतिरपि तथैव । तदनु ओं
रुद्राय नम इति संपूज्याहुतित्रयं दत्वा ओं रुद्ररूपगन्धौ
गृहाण स्वायेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् ।
उद्धारमात्मसंस्थं तन्स्थञ्च पूर्ववत्कृत्वा वागीशीं
संपूज्याहुतित्रयं दत्वा विसर्जयेत् योजनः ।।
पाशच्छेदौथ पूर्णाचकारणेश समर्प्यणं । उद्धारोग्रहणं
वैक्यं शिष्यदेहे नियोजनः ।। विसर्जनश्च वागीश्याः शुद्ध
तत्वावलोकनं । कलां संपूज्य पुनः शक्तिपूजनं ।। ० ।।
ओं ह्वीं प्रतिष्ठायै नम इत्यावाह्य संस्थाप्य संपूज्याहुतित्रयं
दत्वा व्याप्तिमवलोकयेत् । षाढ्यत्रयं मल सन्धाय
कर्ममायारूपं भोक्तृत्व भोगशरीरादि जनकं प्रतिष्ठाकलया
व्याप्तं सम्भाव्य तदनु
प्रकृत्यन्तमध्वानं षट्पञ्चाशङ्भुवनानि पदानामेक विंशति
वर्णात्रयोविंशति मन्त्रत्रयं प्रतिष्ठया व्याप्तं सञ्चिन्त्य ओं
हौं शिवाय स्वाहेत्याहुतित्रयं दद्यात् । भगवन्मलादि तत्वादि
प्रतिष्ठाकलायां सन्निधी कुरु २ इति ।। ततः प्रकृत्याद्यप्तत्वान्ते
ध्वनियोनिर्नानारूपाः संस्थाप्येतद्व्यापिका वागीशीमावाह्य
संस्थाप्य संपूज्याहुति त्रयेण संनिधीकृत्य शिष्य
प्रोक्षणताडन प्रवेशच्छेदना कर्ष ग्रहणानि पूर्ववत्कृत्वा
पूरकेणात्मस्थं
* *? कुम्भित्वा संरेच्यद्वादशान्तान् संगृह्य भवमुद्रयो सर्वासु
योनिष्ठनेक व्यक्तिरूपेणात्मना योगं कुर्यात् । ततो
मूलेनाहुतित्रयं हुत्वा ओं हौं वायता *? भगवन्तस्यात्मनः
सर्वासु योनिषु यागं कुरु २ पाशगर्भाधानं कुरु २ एवं
जननादिष्वधि योज्य निष्कृतौ शिरसाहुतित्रयं हुत्वा
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं दत्वा ओं हौ शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनो निष्कृत्या सर्वकर्मशुद्धिं कुरु २ इति
भोगाभावे मायापाशाद्वहिर्निष्क्रमणरूपं विश्लेष संभाव्य
हृदयेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हां हृदयाय स्वाहेति
पुनर्मूलमन्त्रेणाहुतित्र्यं पदत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्तस्यात्मनो मायापाशाद्विश्लेषं कुरु २ इति
पुनर्मलकार्याङ्गीन्कृत्वाद्वहिर्निः शरणं विश्लेषं संचिन्त्य
मूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हां शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मनोमलपाश विश्लेषं कुरु २ इति कर्मणो
विशुद्धस्याप्यन्तन्ताभावरूपं विश्लेषं सञ्चिन्त्य
स्च्. ७)
निधानाया हुतित्रय दत्वा शिष्यस्य प्रोक्षणताडनादिकं कृत्वा
तद्योनिषु योगं कुर्यात् । गर्भाजन्म तदैश्वर्य
तद्भोगापादनलयेषु पूर्वोक्तावधि * *?भिस्त्रिभिराहुतिभिः शुद्धि
कुर्यात् । निष्कृतौ मूलमन्त्रेण शतहोमं दत्वा शान्त्यतीतादि
पाशेभ्यो निःशरणरूपं विश्लेषं सञ्चिन्त्यमूलेनाहुतित्रयं
दत्वा तच्छान्त्यतीत पाशस्य मलादितत्वादि व्यापकस्य
प्रणवेनाहुतित्रयं दत्वा विच्छेदं विधाय मूलेनाहुतित्रयं
दत्वा ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनः शान्त्यतीत
पाशच्छेदं कुरु कुर्वित्युच्चार्य पूर्ववत्पूर्णां विधायतदनु
कलानां शुद्ध्यवसाने निविजदीक्षायां समय समयाचार
पाशमुपस्थाप्यशोधयेत् । ओं समयसमयाचार पाशाधिपेभ्यो
गणेभ्यो नम इत्यावाह्य संस्थाप्ये संपूज्याहुति त्रयेण
सन्निधीकृत्य ओं हौं शिवाय स्वाहेत्याहुति शतमष्टोत्तरं दत्वा
पूर्णाहुतिञ्च विधाय भगवन्नस्यात्मनः समयसमयाचार
पाशशुद्धि कुरु कुर्वित्युच्चरेत् । ततः ओं हौं सदाशिवाय नम
इत्यावाह्यस्था धा? संपूज्याहुतित्रयं दत्वा ।
ओं हौं सदाशिवाय पूर्याष्टकांशं सनः संगृहाण
स्वाहेत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् । तदनु ओं ह ओं रेचकेन
शान्त्यतीत पाशात्संगृह्य शुद्धमत्यन्तनिर्मलमात्मस्थं
शिष्यस्थञ्च कृत्वा शिरास्युदक विन्दुं दद्यात् । वागीशीं संपूज्य
संतर्प्य विज्ञाप्य भगवति पश्वर्त्थां खदितासि गच्छेदिदानीं
स्वविषयं शान्त्यतीत कलां शक्तितत्वे विलीनां सम्भाव्य
मायातत्वान्तमात्म तत्वमुपस्थापयेत् । ओं हां आत्मतत्वाय नम इति
संनिधिकृत्य ओं हौं शिवाय स्वाहेति षशब्दोद्धारणाहुतिशतं
जुहुयात् । अविधि वैकल्य कर्मशुद्ध्यर्थं । एवं सदाशिवान्त
विद्यातत्वमुपस्थाप्य उपांशूच्चारेणाष्टोत्तरशतं हूत्वा
मन्त्रोच्चारवैकल्याच्छुध्यति । तदनुशक्त्यन्त शिवतत्वमुपस्थाप्य
मानसोच्चारयोगेन शतमष्टोत्तरं हुत्वामनो वैकल्याच्छुध्यति
तदनु आध्वान्तस्थां सर्वाध्व व्यापिकां कारण रूपां शक्तिं
तदग्रे शिष्य चैतन्यं च शुद्धमणि प्रख्यन्सञ्चिन्त्य शिखया
कर्तरीमभिमन्त्र्य शिखयाशिखांभि *?
कलासन्धानं ह्र * *घं? विभागेन । ओं ह्रूं ह्यैं
विद्याशान्तिभ्यां नम इति सन्निधानार्थमाहुतित्रयं दत्वा
शान्तिमुपस्थापयेत् ।। ० ।।
ओं ह्यैं शान्ति कलायै नम इत्या वाह्यसंस्थाप्य संपूज्य
तत्सन्निधानायाहुतित्रयं दत्वा ततः प्रोक्षणताडनच्छेदना
कथैव? हणयोजनगर्भज व्यापिकारभोग लयान् पूर्ववत् कुर्वीत ।
अधिकार शान्तिकलायां शुद्धकर्मार्जनरूप योजानादिषु
मूलमन्त्रेणाहुतित्रयं सर्वत्र पृथक् २ देयं । निष्कृतौ
शतहोमं कवचेन विधाय तदनुमूलेनाहुतित्रयं दत्वा ओं हौं
शिवाय स्वाहा भगवन्नस्यात्मनो निष्कृतौ सर्वपाश शुद्धिं
कुरुर्वित्युचार्य मायायाभोगाद्वहिः निष्क्रमणरूपं विश्लेषं
सम्भाव्याहुतित्रयं देयं । ओं हौं शिवाय स्वाहा
भगवन्नस्यात्मना भागाद्विश्लेषं कुरुकुर्वित्युच्चरेत् । एवं
मलकर्मणोरपि विश्लेषायाहुतित्रयं देयम् ।
पाशच्छेदौऽस्त्रेणाहुतित्रयं हुत्वामूलेनाहुतित्रयं हुत्वा देयं
। ओं हौं शिवाय स्वाहा भगवन्न सासने ।
ममादि तत्वादि व्यापकस्य बुदं कुरुकुर्वित्युच्चरेत् । ततः
पूर्ववत्पूर्णां दत्वात्थं इश्वराय नम इत्यावाह्य संस्थाप्य
संपूज्याहुतित्रयं इश्वराय वुद्ध्यहङ्कारौ गृहाण स्वाहा
इत्याहुतित्रयं दत्वा पूर्ववद्विसर्जयेत् । ततः
शान्तिपाशादुद्वृत्यात्मस्थ तत्स्थञ्च कुर्यात् ।
मूलेनाहुतिभिस्तिसृभिः । तदनु वागीशं सम्पूज्य सन्तर्प्य विसर्ज्य
ह्रस्वदीर्घ विभागेन कलासन्धानं कुर्यात् । ओं ह्यैं हौं
शान्तिशान्त्यतीताभ्यां नम इति सम्पूज्याहुतित्रयं दत्वा
शान्त्यतीतामुपस्थापयेत् ।। ० ।।
ओं हौं शान्त्यतीतायै नम इत्यावाह्य यो वाह्यसंस्थाप्य संपूज्य
संनिधानायाहुतित्रयं दत्वा व्याप्तिमवलोकयेत् । तत्वानुरूपं
मलकर्मा स्थित्वं सम्भाव्य तस्यां शक्त्यन्तोऽध्वा षोडशः
वर्णास्त्रयोमन्त्राः पदमेकं भुवनानि पञ्चदशविन्दुनादशक्ति
कलारूपाणि शान्त्यतीतया व्याप्तानी । *?सन्निधानायाहुतित्रयं
मूलमन्त्रेण दत्वा विन्दुनादशक्तिकलायोनि व्यापिकां वागीशीं
समावाह्य संस्थाप्य संपूज्य *?
स्च्. ८)
समयाचारश्च तत्र मन्त्रतन्त्रकल्यान दीक्षितान्न श्रावयेत् । नापि
तत्पार्श्वलेखयेत् । अवतरित शक्ति कलादीक्षा * * * * * * * *?त्रिविरेक कालं
वा शिवं वह्निश्च पूजयेत् । शिवसहितानां जपेत् । देवाग्नि गुरुणाम
निवेद्यनाश्नीयात् । यथा शक्तिर तिथि दानात्व
कृपणेभ्योऽम्नादिकन्दद्यात् । श्वेकाकादीनाञ्च क्षिपेत् ।
पानभोजनादिकं कांसभाजनेन कुर्यात् । पर्वसुविशेष पूजां
शिवे गुरौ च कुर्यात् । आचार्यादीन् सदा भजेत् । अष्टमी चतुर्द्वशी
पञ्चदशीषु मत्स्यमात्स स्त्री तैलक्षुरकर्मवर्जयेत् । नक्तमेक
भक्तम्वा कुर्यात् । भीतत्रस्त्राध्व खिन्न विह्वलरोगि
संमयज्ञाभवभक्ता प्रपालयेत् ।। ० ।।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तपद्धतौ
दीक्षाविधिः समाप्तः ।। ० ।।
अथ साधक * *? यानि वृत्त्यादिकलात्रयं संशोध्य ततः
शान्त्यतीतां शोधयेत् । अनन्तरं पञ्चमन्त्रतनुं सदाशिव
ध्यात्वामूलन्त्रेण पूर्णाहुत्या शान्तिक * *? योज्य
ओं हौं आत्मन अनिमाते भवतु स्वाहा । ओं हौं आत्मन्महिमाते
भवतु स्वाहा । ओं हौं आत्मनलघिमाते भवतु स्वाहा * * * * * * *?
। ओं हौं आत्मन् प्राकाम्यन्ते भवतु स्वाहा । ओं हौं
आत्मन्नीशित्वं भवतु स्वाहा । ओं हौं आत्मन्वशित्वं भवतु
स्वाहा । ओं हौं आत्मन्यत्र कामावशायित्वंते भवतु स्वाहा
इत्याहुत्यष्टकेन गुणाना पाद्ययश्चभिः कलसैर्निवृत्त्यादि
कलान्यस्तैः साध्यमन्त्र पूजितैस्तनैवाष्टोत्तर शताभिमन्त्रिते
निवृत्ति प्रतिष्ठा विद्या कुम्भैरा * *? वदन्ति पिच्य ततः शान्त्यतीतया
पुनः शान्तिकलाकलसेनाभिषेचयेत् । अनन्तरं देवस्य दक्षिणे
श्रीपर्णादिनिर्मिते पीठे संस्थाप्य सकलीकृत्योष्णीष
सहितमधिकारं दत्वा साध्येमन्त्रमुच्चार्य पुष्पोदकान्वितन्तस्य
हस्त समर्पयेत् । ततः समन्त्रं हृदि निवेश्य कुण्डसमीपं गत्वा
साध्यमन्त्रसहितां सन्तर्प मण्डलकुम्भ वह्निदक्षिणपद्म पत्रे
साध्यमन्त्रं सम्पूज्य लब्धानुज्ञः स्वगुरोरष्टाङ्ग प्रणितिं
विधायमन्त्राराधनं कुर्यात् । तत्र पुण्यकाले स्वानुकूल मुहूर्ते
सूलभ
ततः शिष्यः स्नायादाचार्यश्चाचमनादिकं कुर्यात् । पुनरन्तः
प्रविश्य सकलीकृत्य * * गोमया यावष्ट्य पूर्ताहुत्या वह्ना निक्षिपेत् ।
ततो वहिर्न्निःसृट्यश्रुक् श्रुवौ कर्तरीश्च प्रक्षाल्या चम्पसकलीकृत्य
शिवं संपूज्य तदनु भगवन्नस्यात्मनोऽध्व शुद्धिः
शिखाच्छेदान्तात्वत्प्रसादात्मया कृतायात्वयं परमं धामेति
विभुमनुश्राव्य प्रोथयेत् । इदानीं शिष्यं संयोजयामि
आज्ञामदीयतां प्रभो । इति प्राथ्य एव कुर्वित्यनुज्ञातः
प्रहृष्टाऽर्घपात्रमादाय शिष्यमाहूयाग्नि सदनयायात् । तत्र
पूर्ववच्छिष्य प्रोक्षणन्सकलीकरणान्त करणनाडी
सन्धानमन्त्रतर्पणानि सकलीकरण मन्त्राणां एकैकाहुति दानेन
सकलीकरणसाधनं कृत्वा शिवात्मनि शिष्यचैतन्यं योजयेत् ।
तत्राचार्या विद्यातत्वमास्पन्दं सञ्चिन्त्य विन्दु तत्वासनासीनः ।
इन्धिका दीपिकारो विक्रामोविका ऊर्द्धगामिनी सूक्ष्मसुसूक्ष्म
अमृतामृता शक्तिकल्पतनुर्व्यापिनी ध्यानरूपा
अनन्ता अनाथा अनाश्रितेति कलाबहिः करणः समनान्तः करणः
शुद्धात्म तत्वं उन्मन शिवेति तत्वत्रयेणा पूरित तनुः
पूरककुम्भको कृत्वे जिह्वान्तालुके संयोज्य इषद्व्यावृत
वक्त्रोदन्तैर्दन्ता न स्पशन् समुन्नत कायः शिष्यात्मानमात्मनि
संयोज्य सुषुम्नायां नाडी प्राणावायूनेकी भूतात्सञ्चिन्त्य तत्र
शिष्यचैतन्यं शुद्धस्फटिक प्रख्यं संभाव्य मन्त्रमुच्चार्य
हृदयादि स्थितब्रह्मादिकारण त्यागेन परमशिवे शिष्यचैतन्यं
पूर्णाहुत्या वहिः कुम्भकेन संयोज्य ओं हूं आत्मन् सर्वज्ञो
भव स्वाहा । ओं हूं आत्मन तृप्तिर्भव स्वाहा । ओं हूं आत्मन
नादि वुद्धो भव स्वाहा । ओं हूं आत्मन् स्वतन्त्रोभव स्वाहा । ऐं
हूं आत्मन लुप्त शक्तिर्भव स्वाहा । ओं हूं
आत्मननन्तशक्तिर्भव स्वाहा । इति षड्भिराहुतिभिर्गुणानापाद्यार्थ
पात्रोदकेनाभिषिच्याष्टौ समयानु श्रावयेत् । महेश्वरतच्छास्त्र
गुरुसाधकादि निन्दान कार्यालिङ्गच्छायां न लघयेत् निर्माल्यश्च
न तदश्नियात् । रजस्वला स्पृष्टान्नं न भक्षयेत् ।
मन्त्रितैः पश्चिमोत्तर दक्षिण पूर्वेश्वान दिस्थैः
पृथिव्यादिघटैर्मूलमन्त्रेणाभि पिच्यसिते वाससी परिधाप्य पुनः
पूजित देवश्य दक्षि * * * * * * * ? पण्ड्यादि विन्यस्त्र पट्ट
अनन्ताद्यासनं दत्वा संस्थाप्य सकलीकृत्य संपूज्य उष्णी वाम
कुटं च्छत्र पादुका चामरहस्त्यश्वसि विकादिराजाङ्गानि करणा क
* *?खटिका श्रुक्श्रुवौदर्भ पुस्तकाक्ष सूत्रादिकञ्च दत्वाज्ञां
श्रावयेत् अद्य प्रभृति दीक्षाव्याख्यादिकं ज्ञात्वा परिक्ष्य चत्वया
विधेयं । ततो भगवती च निवेद्या चार्यौ यं मया
कृतस्त्वत्प्रसादादधिकारं निर्विघ्नेन करोत्वि विविज्ञापयेत् । ततः
कृताचार्यः कुण्डे गत्वानिवृत्त्यादिकला पञ्चकं
पञ्चपञ्चभिराहुतिभिः सन्तर्प्य पूर्णां दद्यात् । ततस्तस्य
दर्भाल्मुकेन पञ्चभिरङ्गैर्दक्षिणकरे
कनिष्ठाद्यङ्गुष्ठान्तं लाञ्छयेत् । पुनर्भगवते प्रणिपातं * *
* * * *? वृत्तं क्षमापयेत् । सच नध्वाधिकारो
गुरुपारम्पर्यायातमधिकारं कुर्यात् । अथवा महता
मण्डलस्यान्तरस्यां ब्राह्मणान्पूर्व
* *भित्रि * *? विद्श्यान्वारुण्यां शूद्रान्सर्वात्वा इशान्यां दीक्षा
संस्कृतां विशुद्धकाया दशाहं द्वादशाहं वाक्यत गोमूत्र
स्नानान् क्षीरयवान्नभोजनान् गायत्री जप
निरतान्सत्यव्रतानभिषेकनक्षत्रेस्वानु कूलसतारे
चन्द्रमस्यभिषेचयेत् । तत्र ब्राह्मणादीनां यथा क्रमं
पञ्चचतुस्त्रिं द्विहस्तरजोभिश्च पञ्चवर्ण चतुर्वर्ण
त्रिवर्णद्विवर्णैरूपशोभितं मध्यलिखित द्वात्रिंशदङ्गुल
शुक्लपद्मं द्वात्रिंशदङ्गुलायाम षोडशाङ्गुल विस्तृत वाहनीय
द्वाराभिमुखं सर्वरजो युक्त पादपीठसहितं वाह्यस्थ चित्र
पत्त्रवल्लीद्वार मोक्ष कोणस्थ कन्दुकाद्युपशोभितं
स्वस्वदिस्थवाहनीय द्वारं पूर्वदिग्वाहित द्वारं वा
मण्डलमालिखेत् । तत्र वीष्पन्तरगतान्पूर्वादि क्रमेण शुक्लरजसा
अष्टो शङ्खानं आनन्दसुनन्दा निन्दिवर्द्धन श्रीमुख
विजयतारसुतारमज्ञान । सुभद्रविभद्रसु दन्तपुष्पदन्त जयविजय
पूर्वोत्तर संज्ञाश्च तथा विधात्कुम्भानालिखेत् । मण्डलस्या
परिधवलं विचित्रं वा किङ्किणी घण्टायुक्तं मुक्ता जीव
गवाक्षकोपेत
समित्पुष्पे कुशोदके देशेदष गणमातृलोकेस कीलितमनेकलिङ्गं
साधकान्त सिचित दक्षिणोत्तर दिग्वाद देवकुलं विद्वं परिहृत्यन
नाज्ञ क्षेत्र * हि प्रेतमन्त्र सिद्धयस्यं कृत्य प्रागस्तयागं निवर्ता
सहस्रं हुत्वा पूर्णाहुतिन्दत्वा क्षेत्रञ्चात्र तेजो हि व्याप्तं
समन्तात्सञ्चिन्त्य तद्दिक्षुलोकपालाधिष्ठितान् सङ्कुन्विन्यस्य
वर्मजप्तसूत्रेणमवेष्टवाह वीजान्यस्त जप्तान्यव कार्य तस्यमयी
रेखां रेखां रक्षां दत्वाय वतिलैः कवच प्राकारं विधाय
वलिं दत्वा सुष्टे लिऽऽगे विधिवत्मन्त्रदाप्य सपानगुण
सखश्चतुष्कालं पूजादिकमाचनेन? । क्षेत्रमासिद्धे रुपरित्यजुन्
क्षेत्रात्सम्पन्न सहायोपनीतं भजमानः । अति क्रमे प्राश्चित्तं
कुर्वाणोऽभिमत मन्त्रमाराधयेत् । यदि वा वाण लिङ्गस्वयम्भूत
विकल्प वासना रहितमुनिसिद्धामरप्रतिष्ठितेषु सर्वावत्वेन
साधारणत्वात्षट्भ्र? सङ्करोनास्त्यतस्तेषु शट्सम्बिना स्वमन्त्रं
विन्यस्य समाराधयेत् । विज्ञातमन्त्र प्रतिष्ठित लिङ्गेषु
मन्त्रात्समुद्धृत्य प्रतिष्ठा विधिनामन्त्रमारोप्याराधयेत् ।
* * * * * * * * * ? लिङ्गं प्र * कमात्रिकां वा विन्यस्य हृदिपूरकेन
समानीयरेचकेन द्वादशान्ते लयनीत्वा * * * * * *? विधिनासु
मन्त्रविन्यस्य षण्मा * * * ? च * ? लिङ्गं परिगृह्न मन्त्रमाराधयेत्
। साधकागारेऽपि क्षेत्रवल्लोकेशादि यासः । प्रत्यहं प्रदोष देवि
पूजाक्षेत्रशीमासुच पर्वसु ।। ० ।।
इति महाराजाधिराजशीभोजदेव विरचितायं सिद्धान्त पद्धतौ
साधकाभिषेक विधिः समाप्तः ।। ० ।।
अथ? चार्याभिषेक विधिः सवीज दीक्षयादीक्षतस्य
श्रुतशीलगुणाचारं सम्पन्नमाचार्याभिषेकं कुर्यात् । तत्र याग
गृहेशान्यां मण्डलक स्वस्तिकादिरर्चितेऽनन्तास नन्दत्वा
मूर्तिभूतं शिष्यविन्यस्य सकली कृत्यं संपूज्य
कर्णिकोवनमृङ्कस्मादूर्ध्वागोमय गोलकसिद्धार्थधितायै
निर्मत्स्य पञ्चभिः कलसः सितचन्दन चर्चितः पृथिव्या वाक्य
शान्तविन्यस्तु पञ्चतत्वेर्निवृत्य कलासहितेराधार
शक्त्यादिपरमीकरणान्त नित्यं यावपूजितेषु समन्त्राष्टान्तर
शतानि *?
स्च्. १०)
सुशुक्ल वाससी परिधाप्य मण्डलस्य दक्षिणदिग्भागे
प्रागुक्तमण्डलमालिख्य श्रीपर्णादिकं सुवर्णादिनिर्मितं पट्टं
वासदशाहतसित वस्त्रच्छन्न विन्यस्य शिष्यमुपवेश्य सकलीकृत्य
मन्त्रैरालभ्य शुक्लपुष्पैः सम्पूज्यवर्ण नियमेन यज्ञोपवीतं
दत्वा अलङ्कारैरलङ्कृत्य भगवते निवेदयेत् । आचार्यायमेतस्य
भवात्प्रसादाद्वाञ्कितं भवतु । ततस्तं पुनरप्यासने
समुपवेश्य छत्तादीनिराजचिह्नानि समर्पयेत् । एवममनैव
विधिनाराज्यकामस्य भ्रष्टराज्यस्य पूत्रकामायाः शौभाग्य
कामायाश्चाभिषेकं कुर्यात् । अत्र च शङ्खादीनां मन्त्राः । ओं
आं इं ऊं आनन्दात्मने नमः । ओं आं इं ऊं सुनन्दात्मने
नमः । ओं आं इं नन्द्यात्मने नमः । ओं आं इं
नन्दिवर्द्धनात्मने नमः । ओं आं ऊं श्रीमुखात्मने नमः । ओं
आं इं ऊं विजयात्मने नमः । ओं आं इं ऊं तारात्मने नमः
। ओं आं इं ऊं तस्यात्मने? नमः । शङ्खमन्त्राः ।। ० ।।
ओं आं इं ऊं सुभद्रात्मने नमः । ओं आं इं ऊं विभद्रात्मने
नमः । ओं आं इं ऊं सुदन्तात्मने नमः । ओं आं इं ऊं
पुष्पदन्तात्मने नमः । ओं आं इं ऊं जयात्मने नमः ।
ओं सोम्या ऊं विजयात्मने नमः । ओं आं इं ऊं पूर्वात्मने
नमः ।। ओं आं इं ऊं उत्तरात्मने नमः । कलसमन्त्राः ।। ० ।।
ओं आं इं ऊं सर्वरत्नभ्यो नमः । रत्नमन्त्राः ।। ० ।।
ये ओं इं ऊं सर्ववीजे स्व इन्द्रात्मकेभ्यो नमोनमः ।। वीजमन्त्रः ।।
० ।।
ओं आं इं ऊं सर्वौषधिभ्यः सोमात्मकेभ्यो नमोनमः ।। ओषधी
मन्त्रः
।। ० ।।
ओं आं इं उं सर्वगन्धभ्यः पार्थिवात्मकेभ्यो नमोनमः ।।
गन्धमन्त्रः ।। ० ।।
ओं आं इं ऊं सर्वमृद्भ्यः पृथिव्यात्मभ्यो नमोनमः ।।
मृत्तिकामन्त्रः
।। ० ।।
ओं आं इं ऊं न्यग्रोधात्मनेसुराधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं
ऊं पलाशात्मने तेजोधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं
औदुम्वरात्मने धर्मराज तोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं
सिद्धकात्मने रक्षोधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं
अश्वत्थात्मने सलिलाधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं
मधुकात्मने पवनाधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं
पृक्षात्मने यक्षाधिपतोरणाय नमः । ओं आं इं ऊं विश्वात्मने
विद्याधिपतोरणाय नमः ।। इति तोरण मन्त्राः ।। ० ।।
इति महाराजाधिराज
मणिदामोपशोभितं सचामर पट्टावस्त्रोपेतं लम्बमान
प्रतिसरकन्दुकाद्यलं कृतं वितानं विदधीत ।
मण्डलस्याभ्यन्तरं क्वचित्पद्मनी यन्त्रसञ्छन्नमन्तरालेषु
बहिश्च गौर सर्वपलाजा खण्डतण्डुलयवकृष्णतिल
दूर्वाकाण्डैरजोभिश्च चित्रकं कुर्यात् । तारणञ्चास्य
ध्वजकुशचीरकुसुमं मण्डितं वन्दनमालायुक्तं ।
पूर्वस्यान्यग्रोधं दक्षिणस्यामौदुम्वरं
पश्चिमायामश्वच्छमुत्तरस्या प्लक्षं विनिवेश्य विदिक्षु
प्रशस्तद्रुमजात्मनि च निवेशयेत् । सङ्खान्कलसाश्च मूर्तिमतः ।
गोरोचनारचित स्वस्तिकांकित कण्ठान्सर्वरन्नैः सर्ववीजैः ।
जयाविजया जयन्त्य पराजिता विष्णुकान्ता शङ्खपुष्पीवलाऽति
वालाहेमपुष्पी विषालाना कुलीगन्धनाकुली सहासहदेवावराही
शतावरीमेदा महामेदा ऋद्धिवृद्धिका कोलीक्षीरकाकोली
जीवक ऋषभक संज्ञाभिर्यथा लाभमौषधीभिर्गन्धैरङ्भिश्च
पूरितान्वस्त्रस्रग्दाम कण्ठान् चन्दनोपलेपितान्
शतकृत्वाऽभिमन्त्रितान्योगपीठस्य बहिर्दिक्षु विदिक्षुस्थापयेत् । तत्र
आ * त आनन्दो नात्यायतः सुनन्दौ महाकुक्षिर्नन्दीसु नाभिर्नन्दि
वर्द्धनै ।
ह्रस्वनाभिः श्रीमुखौ नाभिमण्डली विजयः सुनिर्घोषस्तारं
उत्तरस्वनः सुतारश्चेति शङ्खः कलसाश्च मन्दरः सुभद्रः
किञ्चिदुन्नतो विभद्रः पृथुलौष्ठः सुदन्तो ह्रस्वोष्ठः
पुष्पदन्तौमन्धर ग्रीवो जयः शोभनग्रीवो विजयः पूर्व ऊतर इति
मण्डलस्यान्तरोदुम्वरं सदशाहतं सितवस्त्रेच्छन्नं
भद्रासनं विन्यस्य तस्मिन् शिष्यं शंखतूर्यवाणावेणु स्वस्ति
पुण्याहवेद ध्वनिभिः कृतमङ्गलं पूर्वाद्वाराति मुखं
समुपवेश्य जातवीजसरावै विचित्र
मुखैर्गणैरञ्जलिकारकैनां ठौरभिन्न पुठकोल्काभिर्मत्स्य
वल्मीकाग्र पर्वताग्र नदीतीर महानदी सङ्ग सकुश विल्वमूल
चतुष्पथ दन्तिदन्त गोशृङ्ग एकवृक्ष गृहीताभिर्मृद्भिः
प्रथमन्ततः पञ्चगव्येन ततो विल्व पद्मकेशर प्रियङ्गु चूर्णेन
पञ्चपल्लव काषायैः सर्वगन्धैश्च संस्नाप्य प्रदक्षिणापनीतैः
पूर्वविन्यस्त कुम्भैः शिवतत्वमनुस्येरनभिषिञ्चेत् । ततः
स्नानवस्त्र परित्य * ?
स्च्. ११)
एक शिव इति भुवनपञ्चकं । रागे? क्रोधश्चण्डौ विद्यायां ज्योतिः
संवर्तौ कलायां स्वरपञ्चान्तकौ नियतौ एकवीर शिखेदौका *?
महातेजवामदेव भव *? तद्भव एकपिङ्गक्षण इशानभुवनेश
अङ्गुष्ठामात्र इति मण्डलेश्वराष्टकं मायायां एवं
भुवनानि सप्ताविंशतिः । पदानिविंशतिः । व्यापिन २ व्यामिन् २
चेतन अचेतन २ परमेश्वर परापर ज्योतिरूपाय सर्वयोगाधि कृताय
अनिधनाय गोप्ते गुह्यातिगुह्याय ओं नमो नमः सद्योजातमूर्तयः
वामदेव गुह्याय अघोर हृदयाय तत्पुरुष वक्त्राय
इशानमूर्द्धाय शिवाय सर्वप्रभवे ओं नमः शिवाय ध्यानाहायेति
व्यापिन्नादि ध्याना हा * *? न्तानि विंशतिः । एवं
पञ्चविधमध्वानं षष्ठया विद्याकलया
व्याप्तमेव षड्विधाध्व व्याप्तिः ।। ३९ ।।
शान्तिकलायां पुनः शुद्धविद्या इश्वर शिवा?न्तं तत्वत्रयं
वर्णास्त्रयः श ख क इति मन्त्रौ तत्पुरुष कवचौ
भुवनान्यष्टादश । वामाज्येष्ठा रौद्रीकाली कलविकरणी वलविकर
ओं सौम्यायै न * *? सर्वभूतदमनी मनोत्मनीन्तानि
शुद्धविद्यायां । अनन्तसूक्ष्म शिवोत्तम एक नेत्ररुद्र त्रिमूर्ति
श्रीकण्ठशिखण्डि इत्यष्टौ भुवनाय नमः । तत्वे सदाशिव
भुवनं सदाशिव तत्वे एवं भुवनान्यष्टादश पदान्येकादश
नित्यं योगिने योगपीठ संस्थिताय शाश्वताय ध्रुवाय अनाश्रिताय
विधिनन्ताय शिवाय सर्व व्यापिने व्योमरूपाय व्योमव्यापिनेति नित्यं
योगिने नित्यादिव्योमव्यापिनेति पदान्तानि पदान्येकादशेत्येवं
पञ्चविधमध्वानं शान्तिकलया व्याप्तमेवं षड्विधाध्व
व्याप्तः । शान्त्यतीतायां पुनशिवतत्वं वर्णाः षोडशस्वराः ।
विसर्गाद्यकारान्ताः शिव इशान अस्त्र इति मन्त्रत्रयं भुवनानि
पञ्चदशनिवृत्ति प्रतिष्ठा विद्याशान्तिशान्त्यतीत इति
विन्दुकलाभुवनानि इन्दिकादीपिकारो विकामोविका ऊर्ध्वगा योगिनीति
नादकला भुवनानि । व्यापिनी व्योमरूपा अनन्ता अनाथो अनाश्रिता इति
शक्तिकलाभुवनानि व्योमव्यापि मन्त्राद्योकारः पदमित्येकं
मलग्रन्थीनि द्विजकन्याकर्णित कर्पासादिक्षानित सूत्रजनितानि
विस्तारतोऽपि * * * * * * * * * * * * * * * * * * *?नि लिङ्गविस्तार प्रमाणानि वा
पवित्रकानि समादायार्घा *? प्रोक्षितानि मन्त्र * * * * * * * * * * ?रीत्वा
मृगाजिनादिनासदाद्यसंयुत्सरात्मकं सर्वकृत्येसाक्षिणमव्ययं
*?ध्नारसंश्रयं कर्मफलप्राप्ति निवर्तनं? शिवमलस्समरन्
मन्त्रसहितया एकविंशति कृत्वे घातादिभिर्हुतानि कृत्वा सूर्याय
गन्धपवित्रक चत्वासमाचम्य कृतसकलीकरणः कृतार्घपात्रौ
पाशगेय? वृषस्थान प्रासादानल सश्रयो * *कवातञ्च? त्रिसूत्र्या
समावेष्टनन्द्यादिभ्यो गन्धपवित्रकं दत्वा पूर्ववत्
प्रविश्यवास्तोष्येतये ब्रह्मणेय विडन्दत्वा भगवन्संस्कृतानि * * *?
देतानि कुम्भस्थाय भगवते समर्पयामीति विज्ञाप्ये च क्षणाय
तस्मै समर्पवतेभ्यः समादाय शिवकुम्भेऽस्त्र वर्णन्यां
गन्धप * * य * *? श्वर स्थलेश्वर इति भुवनाष्टकं गन्ध
तन्मात्रादारभ्या फट्कारान्तेऽध्वनि स्थितं । पैशाचं
राक्षसं याक्षं गान्धर्व चैन्द्रं सौम्यं प्राजेशं
ब्राह्ममिति देवताष्टकं बुद्धौ । अकृतं कृतं भैरवं
ब्राह्मं वैष्णवं कौमारं औमंग्रै कण्ठमिति योगाष्टकं
गुणप्रकृतौ । एवमष्टकैः सप्तभिः षट्पञ्चाशद्भुवनानि ।
एकविंशति पदानि महेश्वर परमात्मन् शर्वसर्वशिव
निधानौद्भवनिधन अनिधन ओं स्वः ओं भुवं ओं भूः धू धू २
नाना २ अनादि अभस्म अधूम अनग्नि अरूपिणति २ तेज २ प्रथम २
अरूपिण २ इति महेश्वर पदादारभ्य अरूपिणान्तानि पदान्येका
विंशतिः । एवं पञ्चविधमध्वानं षष्ठया प्रतिष्ठाकल * *?
व्याप्तं सञ्चिन्त्यैवं षड्विधाध्व व्याप्तिः ।। २ ।।
विद्याकलायां पुनः पुरुषरागविद्याकलानियति कालमाया एतानि
तत्वानि सप्तसप्तवर्णा ऌ ऋजभ * *? मन्त्र एकः शिखा । भुवनानि
सप्ताविंशतिः । वामभीम उग्रभव इशान एकवीर इति पुरुषे षट् ।
प्रचण्ड उमापति अज अनन्त
स्च्. १२)
सञ्चिन्तनीयमिति षड्विधाध्व व्याप्तिः ।। प्रतिष्ठाकलायां
पुनरापस्तेजोवायुराकाश इति चत्वारि भूतानि । गन्धरसरूप
स्पर्शशब्दा इति तन्मात्रपञ्चक *?ष्कार्णि पादपायूपस्था इ
कर्मेन्द्रिय पञ्चकं । श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वाघ्राण इति
बुद्धिन्द्रिय पञ्चकं । मनोऽहङ्कारो बुद्धिरित्यन्तः करणत्रयं
। गुणाः प्रकृतिमिति चतुर्विंशति तत्वानि ह स ष श व ल र य म भ व
फ प न ध द थ त ण ढ ड ठ ट । एवं वर्णास्त्रयो विंशतिः ।
शिरो मन्त्र वामदेवा घोरा इति मन्त्रत्रयं । षट्पञ्चाशद्भुवनानि
। अमरेशप्रभासनैमिष पुष्कर आषाढिदिण्डिमुण्डिभारभृति
लकुलीशमित्यष्टकमप्तत्वे । हरिश्चन्द्र
श्रीशैलजल्पेश्वराम्रातिकेश्वरममैश्वर महाकालकेदारभैरव इति
भुवनाष्टकं तेजस्तत्वे । गया कुरुक्षेत्र न ख ल क न ख ल
विमलेश्वर अट्टहास महेन्द्र भीमेश्वर इति भुवनाष्टकं *
स्त्रापदरुद्रकोटि अविमुक्त महालयगोकर्ण
भद्रकर्णस्वर्णस्वर्णाक्षस्थाणु इति भुवनाष्टकमाकाशे ।। भू
गलण्ड द्विरण्डमाकोटमण्डलेश्वरकालिञ्जर ओं सौम्यायै * *?
भस्म पश्चिमाया सद्योजातेन मृदमुत्तर * *? देवेन धात्रीफलं
जलञ्च ऐशान्यां पञ्चगव्यमीशेन होमद्रव्यं कुशाश्च सद्योजा
* * येन यां? । दण्डाक्षमाला कौपीनभिक्षा पात्राण्य घोरेण
दक्षिणस्या गोरोचना कुङ्कुमतैलं शलाकाकेया
शाधनमपरमध्यादशादि वामेना * * ? ताम्बूलं सान्नकं
तत्पुरुषेण पूर्वस्यां । आसनं पादुकेच्छत्रं
यागपटुकमीशेनैशान्यां विन्यसेत् । यच्चा सम्पन्नमेतेषां
तत्मनसा प्रकल्पयेत् । ततश्चराः शिवभागमस्त्रे प्रोक्षितं
कवचावगुण्ठितं हृत्मन्त्र सम्पूजितं धेनुमुद्रयाऽसृती कृअं
ब्रह्मभिर्भगवते निवेदयेत् । ततो हस्तात्प्रभृतिनवहस्तपर्यन्त
लिङ्गेषु नवसूत्रिका विनिर्मिताष्टाविंशतितं तुभ्यः समारभ्य
दशवृद्ध्योऽषोत्तरशतं यावल्लिङ्गानुसारेण रत्नजे च न लिङ्गेषु
अन्यथा शक्त्याष्टोत्तर शतनिर्मितानि एकाशीति तन्तुनि वा
पञ्चाशदष्टत्रिंशत् षट्त्रिशन्तन्तु निर्मितानि वा
कुङ्कुमादिरञ्जितानि तन्तु सङ्ख्याया
श्रीभोजदेव विचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ आचार्याभिषेकविधिः
समाप्तः ।। ० ।।
अथ दीक्षोपयागि षट्द्विधाध्वा व्याप्तिस्तत्र पृथिवी तत्व क्षकारां
वर्णो हृदय सद्योजातौ मन्त्रौ कालाग्नि कुष्माडहाटक
ब्रह्मविष्णुरुद्र इति ब्रह्माण्डमध्ये षड्भुवनानि वहिश्च
शतरुद्रादयोदश दिक्षुर्व्यवस्थिताः । कपालीश अजोवुद्धो वज्रदेहः
प्रमर्द्दनो विभृतिरव्ययः शान्तापिनाकी त्रिदशाधिप इति
पूर्वदिग्भागे दश ।। अग्निरुद्रो हुताशः पिङ्गलः खादकोहरा
ज्वलनोदहनोवभ्रूर्भस्मान्तकः कृपान्तकः । इत्याग्नेये दशं ।।
पास्य मृत्यूहसे? धाताविधाता कर्ता संयोक्ता वियोक्ताधर्म
अधर्मयतिः । इति पास्येदश ।। निर्दतिर्मारणोहन्ता
क्रूरदृष्टिर्भयानकः । ऊर्द्धगेहो विरूपाक्षौ धूम्रोलोहितो
दंष्ट्रवानिति नैरृते दश ।। वल अतिवल पाशहस्त महावलश्चेत
जयभद्रदीर्घ भद्र ओं * ? क मेघनादसुनादा इति वारुणे दश ।।
श्रीघ्रलघुवायुवेगसूक्ष्मतीक्ष्णाक्षयान्तक पञ्चान्तक
पञ्चशिखकपर्दिमेघनादा इति अव्येदश
ओं सौम्यायै रूपवीन् धन्यः सौम्य देहोजंटाधरालक्ष्मीधरा
रत्नधरः श्रीधरः प्रासादः प्रकाश इत्यूत्तरे दश ।। विद्याधिप
इश सर्वज्ञ ज्ञानदृक् वेदपादये * सुरेश? सर्वज्येष्ठभूत पालवलि
प्रिया इति ऐशाने दश ।। वृष वृष पर अनन्तक्रोधनमारुतासनग्रसन
उदुम्वरीशफणीन्द्र वज्रीदंष्ट्री इत्यधोदश *स्तु?
विभुगणाध्यक्ष त्रदशत्रिदशेश्वर सम्बाह विवाह
नभलिप्सुत्रिलोचना इत्यूर्द्ध्वेदश ।। तेषामुरिवीरभद्रभद्रकालीतु
भुवनद्वयं । एवमष्टोधिकं भुवनशतं नमोनमः । ओं
नमोनमः शिवाय । सव्वदशर्वशिव सूक्ष्म २ शब्द २ ज्ञान २ पिङ्ग
२ तुरु २ पतङ्ग २ साक्षि २ पूर्वस्थित अस्तुतास्तुत अर्चितानर्चित
ब्रह्मविष्णुरुद्र परसर्वसानैध्यकर
सर्वभूतसुखप्रदभवोद्भव भव २ सर्व २ प्रमथ २ मुञ्च २
योगाधियये महातेजः स्वाहा ।। सद्भावेश्वर महादेव इति
व्योमव्यापि मन्त्रस्यावसानिक यदादारभ्य महादेव
पदान्तान्यष्टाविंशति पदानीति । इत्येतदध्व पञ्चकं षष्ठयो
निवृत्तिकलया व्याप्तं
स्च्. १३)
माय नमः । ओं अङ्गाराय नमः । ओं बुधाय नमः । ओं वृहस्पतये
नमः । ओं शुक्राय नमः । ओं शनैश्चराय नमः । ओं राहवे नमः ।
ओं केतवे नमः । इति स्वा?हान् ।। ओं सर्वभूभ्योवषट् नमः इति
भूतानि । ततोऽवसव्यं कृत्वा
दक्षिणाग्रान्दर्भानास्तीर्यतिलमिश्रेण वारिणा ओं सोमग्नि तु
मान्यमो अङ्गिरस्वानग्नि
कव्यवाहनादयोयेपितरस्तान्पितॄन्स्वाधानमस्तर्पयामि । ओं
पितृपत्नीस्वधानमस्तर्पयामि । ओं पितृगणान्स्वधानमस्तर्पयामि
। ओं पितृपत्नीगणान्स्वधानमस्तर्पयामि । ततो नामगोत्राभ्यां ओं
स्वप्तॄन् स्वपितॄन्स्वधान्मस्तर्पयामि । ओं पिता महान्
स्वधानमस्तर्पयामि । ओं धुपिता महान् स्वधानमस्तर्पयामि । ओं
मातॄः स्वधानमस्तर्पयामि । ओं पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि
। ओं धुपिता महीः स्वधानमस्तर्पयामि । ओं मातामहान्
स्वधानमस्तर्पयामि । ओं मातुः पिता महान्स्वधानमस्तर्पयामि
। ओं मातुः धुपितामहन्स्वधानमस्तर्पयामि । ओं मातामहीः
स्वधानमस्तर्पयामि ।
ओं मातुः पितामहीः स्वधानमस्तर्पयामि । ओं मातुः धुपिता
महीः स्वधानमस्तर्पयामि । एवं ज्ञातीना वार्यानपि सन्तर्प्या
चम्य कृतसकली कवल्येऽस्त्रकृत सामान्यार्घपात्रहस्तोद्धारि
नन्द्यादीन्संपूज्यान्तः प्रविश्यनित्यविधिना शिवं
सम्पूज्यवह्नावपि मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वालिं
दत्वावह्नेर्मन्त्रान्संहृत्य योगस्थाय भगवते संयोज्यसापेक्षं
क्षमस्वेति विसर्जयेदिति नित्यपूजां विधायनैमित्तिकमुपक्रमेत् । तत्र
परीक्ष्य परिगृहीतायां भुविसूर्यं संपूज्या विसज्यै वा चम्य
कृतसकली करणोऽघपात्रं कृत्वा योगमण्डपं यायात् । तत्र
द्वाराण्यस्त्रेण संप्रोक्ष्य ओं शान्तिकलाद्वाराय नम इति पूर्वं ओं
विद्याकलाद्वाराय नम इति दक्षिणं । ओं निवृत्तिकलाद्वाराय नम इति
पश्चिमं । ओं प्रतिष्ठा कलाद्वाराय नमस्कृत्वास्तरं? संपूज्य
तच्छाखयोः पूर्वद्वारादारभ्य नन्दि महाकालौभृङ्गिविनायकौ
वृषस्कन्दौदेवी चण्डौ स्वनामभिः प्रणवादि नमोन्तैः
संपूज्यनादाचास्त्र मुद्रयायोगृह पुष्पेक्षेपं
पशुविधमध्वानं शान्त्यतीत कलया
व्याप्तमेवं षड्विधाध्वव्याप्तिः ।। एवमेतक्त्र षड्विधाध्व
संख्या । तत्र कलाः पञ्चताज्ञानि षट्त्रिंशत्वर्णाः पञ्चाशत्
मन्त्रा एकादशभुवनानि चतुर्विंशत्यधिकशतद्वय
पदान्येकाशीतिः षडध्व ज्ञानसम्पन्नामुच्यते भवबन्धनात्
मोचयति चेति ।। ० ।।
इति महाराजाधिराजे श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ षड्विधाध्व निर्णयः समाप्तः ।। ० ।।
अथ सर्वविच्छिद्र पूरणार्थं पवित्रविधिरभिधीयते ।
तत्रा षोढश्रावण भाद्रपदानामन्यतमे मासिसितासित
पक्षयोरेकस्मिन्नष्टम्यां चतुर्द्दश्यां वा कृतशौच
स्नानविधिर्विहित सन्व्यौपासनो * * *?स्तर्पयेत् । तत्र कृतान्तरा
सङ्गोऽङ्गुल्यग्रेण सूलमन्त्र प्रभृतिमन्त्रान् ब्रह्मविष्णुरुद्र
इश्वर सदाशिवादीं देवान् स्वाहान्तेन हृदा । ओं वाग्वादिनि स्वाहा * *
* तीं? ओं ऐन्द्राण्यै नमः ओं आग्नेयै नमः ओं याम्यायै नमः ओं
नैर्-ऋत्यै नमः ओं वारुण्यै नमः ओं वायव्यायै नमः
ओं सौम्यायै नमः ओं इशानायै नमः ओं नागधृष्ठायै नमः ओं
नागभागायै नमः । इति दिशः । ओं इन्द्राय नमः । ओं अग्नये नमः
। ओं यमाय नमः । ओं निरये नमः । ओं वरुणाय नमः । ओं वायवे
नमः । ओं सोमाय नमः । ओं इशानाय नमः । ओं ब्रह्मणे नमः । ओं
अनन्ताय नमः । इति दिक्पतींश्चा ततः कण्ठोपवीतिः पर्वसन्धिभिः
। ओं अत्रिं तर्पयामि नमः । ओं विश्वामित्रन् तर्पयामि नमः । ओं
धुलम्त्यं तर्पयामि नमः । ओं क्रतुं तर्पयामि नमः । ओं
वशिष्टन् तर्पयामि नमः । ओं मरीचिं तर्पयामि नमः । इति ऋषी । ओं
मनकन्तर्पयामि नमः । ओं चन्द्रमने नमः । इति सिद्धान् ।। ओं
आदित्याय नमः ओं सोमभ्यर्च्य
स्च्. १४)
सितवस्त्र युगादिनोभयं विभृष्य ततः प्राच्यां ओं इन्द्राय नमः
। ओं वज्राय नमः । ओं अग्नये नमः । ओं शक्तये नमः । ओं यमाय
नमः? । ओं चण्डाय नमः । ओं निरितये नमः । ओं खड्गाय नमः
। ओं वरुणाय नमः । ओं पाशाय नमः । ओं वायवे नमः । ओं
ध्वजाय नमः । ओं कुवेराय नमः । ओं * *म नमः । ओं इशानाय
नमः । ओं त्रिश्वलाय नमः । अष्टदिशि ।। तत्रैव ओं ब्रह्मणे नमः । ओं
पद्माय नमः । ओं विष्णुवे नमः । ओं चक्राय नमः । नैर्-ऋत्ये । इति
मण्डपस्याभ्यन्तरभित्ति भागे सास्त्रा न लोकपालान् संपूज्य ।
तदनुभोभो शक्रत्वयास्वस्यां दिशि विघ्न प्रशान्तये । सावधानेन
योगान्तं यावच्छिवाज्ञया स्थातव्यमित्यनेन क्रमेण
सर्वलोकपालान् शिवाज्ञां
श्रावयन्नस्त्रदुर्गमनुस्मरन्मण्डपस्याभ्यन्तर भित्तिं परितः
सन्तत धारयावर्द्धन्या सह कुम्भं परिभ्राम्य स्वस्थानं
नीत्वा पुनः स्थिरासनं संपूज्य तत्र वर्द्धनी कुम्भौ
संस्थाप्य संपूज्य कुम्भस्थाय
भगवते ज्ञान खड्गं समर्पयेत् । आयागात्तु मत्र भगवन्
त्वयाच्छातव्यमिति निरोधार्घपाठं विधाय
तदर्भसानिरोधनायार्घन्दत्वा तत्पात्रं तत्रैव निश्चलं
संस्थाप्य वर्द्धन्यानेन विकरोच्छास्त्र यागगृहमपसारिताशेष
विघ्नं समन्ताद्भावयेदिति भूपरिग्रहं विधाय देव
समीपमागत्यस्वासनेनमुपविश्यासन पूजा प्रभृत्यावनान्तं
कर्मकृत्वाऽर्घपाद्याचमनीयानि दत्वाघ्नपनमुप क्रमेत् । तत्र
पूर्वदन्त पुष्पाण्यस्त्रेणपनीय गड्डुकानाहृत्य निरीक्ष्याभ्युक्ष्य
संताड्य प्रोक्ष्यचास्त्रेण स्नानोदक भाण्डेषु शिवतीर्थं
संकल्प्यमन्त्रसंहितया पवित्रेर्वासकृज्जलमावर्त्यास्त्रेण
गडुकान्ताय वस्त्रञ्च प्रक्षाल्यगालिताम्भसा गायत्र्या हृदयेन
वाऽस्त्रवर्द्धनी सहिताना पूर्य प्रत्येकं पुष्पमेकैकं दत्वा
अर्घादक विन्दुं क्षिप्त्वातैर्देवं मूलमन्त्रेण स्नपयेत् । ततो
विशेषतो विभवान् सारेण दुग्वदधिघृ
विधायत्रिःपार्ष्णिघातैर्भौमान्
तालत्रयेणान्तरिक्षान् कोटित्रयेण च दिव्यान्
विघ्नान्निरस्यास्त्रेणादुम्बर पुष्पं प्रक्षिप्येद * *?
सस्पृशन्दक्षिणपादेन पाश्चात्यद्वारेणान्तः
प्रविश्यदेहल्यामस्त्रेण पुष्पं प्रक्षिप्यवास्तोष्पतये ब्रह्मणे नम
इति ब्रह्मस्थाने पुष्पं दत्वाऽस्त्र प्राकारक *
चावगुण्ठनाभ्यां यागगृहं संरक्ष्य
वेदिकाकायामुदङ्मुख उपविष्टोभूतशुद्धिं विध्याय
कृतसूलीकरणस्तुण्डन सर्षपय वतिलकुशकुसुमक्षीरजलैरर्पात्रं
कृत्वातदम्भसा अश्रिरसि संप्रोक्ष्य सकुशेन च यागोपकरण
पुष्पादि द्रव्यजातं शुद्ध्यषु मस्त्रेणसंप्रोक्ष्य
कवचेनाभ्युक्ष्य प्रत्येकं हृदयेनाभिमन्त्रयेत् । ततश्चन्दनेन
तिलकं कृत्वासु शिरस्यारोपित मन्त्रसंहितार्चता । विहितशिवहस्तो गृही
तद्वा त्रिशद्दर्भदल वैशिक्यनिर्मितास्त्राभि मन्त्रितज्ञान खड्गः
संपाद्यनवकोष्टकात्मध्ये शिवतत्वाकोष्टकेसु प्रतिष्ठापात्रे
क्षीरं मूलमन्त्रेण इशानेन वामकृत् ।
पूर्वैसदाशिवत्वकोष्ठकेसु शान्तेदधिकचेन तत्पुरुषेणवाद्विः ।
दक्षिणे विद्यातत्वकोष्टके
तेजारूपघृतं शिखयाऽघोरेण वात्रिः । उत्तरे पुरुषे तत्वकोष्ठके
रत्नादके गोमूत्रं शिरसावामदेवेन वा चतुः पश्चिमकाल
तत्वकोष्ठकेऽमृतात्मके गोमयं हृदयेन सद्योजातेन वा
पञ्चवारान् । कुशोदकं षट्कृत्वोभि मन्त्र्यमूलमन्त्रेण
दध्यादीनि च सुप्रतिष्ठितपात्र संयोजयेदिति विहित
पञ्चगव्योविकिरानभि मन्त्रयेत् । ततो नैर्-ऋत्यां स्थित्वा
इशानाभिमुखो निरीक्षण प्रोक्षणाभ्युक्षणखननावकिरण
पूरण समीकरण सेचनाकुटुन संमार्जनोपलेपन
वज्रीकरणान्तैः स्वस्वमन्त्रोपेतैः संस्कृत्य मण्डपं
पञ्चगव्येन संप्रोक्ष्य ज्वलच्छस्त्रभूतान्विचिन्तयन्विकिरान् प्रक्षिप्ये
पुनस्तात्दर्भ कूर्चिकया समाहृत्य वेदिकायामीशानकोणे
संस्थाप्य हेमाद्येकतमं कुम्भमानीयगालिताम्भसा प्रपूर्य
संहृतविकरेषु चलमासनं दत्वा तत्र मूर्तिरूपं मूर्तिमन्त्रेण
कुम्भं विन्यस्येतस्मिन्साङ्गं भगवन्तं संपूज्य तद्दक्षिणतो
वर्द्धनी तद्वदानेनंऽस्त्रभूतां विन्यस्य तस्यामस्त्र
स्च्. १५)
मूलाग्रयो घृताक्षाभिः षोडशाङ्गुल प्रमाणाभिरिध्यभिः
पञ्चभिश्चतुर्विंशत्या वा मूलेनध्य होमं विधाअ
नामकरणाय इशानेनाभ्य * *?हुतीर्दत्वा मूलमन्त्रेण शिवाग्निस्त्व
हुताशनैतिनामकृत्वा संपूज्य पित्रोर्विसर्ज्जनं कुर्यात् ।
सचेत्प्रसादादुप शान्तोलौकाग्निना वासं सृष्टस्तवत्? कुण्डादि
संस्कारां कृत्वा प्रायश्चिन्ताव्वं तृतीय मन्त्रस्य सहस्रपञ्चकं
जुहुयात् । आहूत शिवश्चेत्तथैव संस्कृत्य त्रिरातोषितौऽघोरायुतं
जुहुयात् ततो मेखलासु सास्त्रान् लोकपालान् सम्पूज्य परिधिविष्टरेषु
प्राच्या ब्रह्माणं दक्षिणस्यां रुद्रं पश्चिमस्यां
विष्णुमुदीच्यामीश्वरं संपूज्य श्रूतश्रूतान् संस्पृश्य
तत्वत्रयं द्वयोः श्रुचि शक्तिं श्रूवे च शिवं विन्यस्यात्मनः
सव्यदिग्भागे दर्भाणामुपर्याधोमुखौ संस्थाप्य हृदा पूजयेत्
अथा भूतानीयास्त्रेणाभ्युक्ष्य कवचेनावगुण्व्य शिवाग्नावस्त्रेण
प्रताप्ये कवचेनाद्वास्य कुण्डस्यापरि प्रदक्षिणं
त्रिःपरिभ्राम्यनाभ्यां संस्थाप्य प्रादेश मात्रं
दर्भाग्रद्वयनिर्मितं मध्यग्रन्थि
पवित्रकमङ्गुष्ठानामिकाभ्यां गृहीत्वाऽग्नि संमुखं
त्रिराज्योत्प्लवनेनात्प्लवं कवचेन तथैवात्मसंमुखं संप्लवं
हृदाकृत्वाऽग्नौ पवित्रकं प्रक्षिप्याज्यमस्त्रेणावद्योत्य निरीक्ष्य
नीराजनं शिवाग्नावुल्मुकं निक्षिपेत् । तत आज्यं
संप्रोक्ष्य षडङ्गेनाभिमन्त्र्य मूलमन्त्रेणामृत मुद्रयाऽमृती
कृत्यमूलेन संपूज्याज्य पात्रं मध्ये प्रादेशमात्रं दर्भं
विन्यस्य इडासुषुम्नापिङ्गलाख्यं नाडीत्रयं
संकल्प्यादक्षिणात् ओं अग्नये स्वाहा वामात् ओंसोमाय स्वाहा
मध्यात् ओं अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ओं अग्नये स्विष्टिक्षते स्वाहा
इत्याहुति नो ।
त मधुशर्क्कराभिर्ज्जल धूपान्तरितैः सर्वत्रा शून्यमस्तकं
मूलमन्त्रेण स्नपयित्वा विरूक्ष्य ततो यथा शक्ति केवल जलेन
गन्धोदकेन च पुनः संस्नाप्य मण्डलेऽन्यत्र वा सासनं शिवं
साङ्गं पूजयेत् । ततो जपं कृत्वा कुण्डसमीपं यायात् । तत्र
कुण्डस्य निरीक्षणं शिवमन्त्रेण प्रोक्षणमस्त्रेणाभ्युक्षणं
कवचेन ताडनमस्त्रेण उल्लेखनावकिरण पूरणसेचना कुटून
संमार्जनोपलेपन कुण्डपरिकल्पना परिधिविष्टरन्यास कुण्डार्चन
प्रागायतमुदगायतम्वा रेखात्रयन् तिर्यग्रेखया सहरेखा
चतुष्टय यवजीकरण चतुष्पथन्यासान् खड्गमन्त्रेण
विधाय ऋतुमतीं वागीश्वरीं वागीश्वरञ्च सकामं ध्यात्वा
समावाह्य ध्रुवेण संपूज्यास्त्रेणाक्षपाटं दत्वा अरणेः
सूर्यकान्ताद्द्विजगृहाद्वैश्य गृहात्स्वगृहाद्वा वह्निमानीय
क्रव्यादांशं परित्यज्यार्घ पात्रपानीयेन प्रोक्ष्य
कवचेनावगुण्ठ्य ओं रौं इति वह्नीबीजं विन्यस्य वह्निषडङ्गेनाभि
मन्त्र्य प्रासादेन वौषडन्तेन धेनु मुद्रयाऽमृती कृत्य
संपूज्यकुण्डस्योपरि प्रदक्षिणं त्रिःपन्थरि?
भ्राम्यजानुभ्यामवनीं गत आत्मनः संमुखं वागीश्वरी
गर्भनाड्यां विनिक्षिप्येतोय विन्दुं दत्वा सदित्वं नैराच्छाद्य
गर्भरक्षार्थमस्त्र जप्तदर्भकङ्कनणं देवीहस्ते
बद्धागर्भाधानाय सद्योजातेनाभ्यर्च्य हृदयेनाहुतित्रयं दत्वा
पुंसवनार्थं वामदेवेनाभ्यर्च्य शिरसा तिस्र आहुतीर्दत्वा
सीमन्तोन्नयन निमित्तमघोरेणाभ्यर्च्य शिखयाहुतित्रयं दत्वा
शिखयैव दर्भेण वक्त्राङ्गकल्पना निष्कृतिश्च विधाय
तत्पुरुषेणाभ्यर्च्य कवचेन जातकर्मार्थ तिस्र आहुतीर्दत्वा जाते च
सूतक निवृत्तये कुण्डमर्घाम्भसा संसिच्य वह्निरक्षार्थं
प्रागुदगग्रान् कुण्डस्य परितोऽस्त्रेण दर्भानास्तीर्याहुतित्रयेण
वक्त्राण्यूर्घाट्पलालापनोदाय पुष्टयेच्य
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
प्द्f ३
स्च्. १)
हाट्टने? अस्त्रेण कुर्वन् ह्रस्व प्रासादेन चरु विपचेत् । ततः सिद्धे
मन्त्रसंहिताया स्वाहान्तयासुस्निस्ना भवेति तप्ताभिघोरविधाय * *
*? शादिके द्वितीय मण्डलके संपूजितेऽवतार्य वषडन्तया
मन्त्रमन्त्रहितयासु शीतो भवेति शीताभिघोरं कुर्यात् । अथ
मन्त्रसंहितयाव य * *?यातमालम्बसर्वतः संसृज्य
मृदम्भोभ्यां तलमुत्सृज्यामृत मुद्रयाचामृती कृत्यकुण्ड
समीपं नीत्वा पश्चिमायान्दिशि पूर्ववत्मण्डलके संपूजिते
विन्यस्य हृदयेन संपूजयेत् । ततोऽङ्गैरेकशो मूलमन्त्रेणाष्टोत्तर
शतं स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य श्रुवेणाग्नावाज्यं प्रक्षिप्य
संस्कारास्य । परिहेत्यूवन्यज्य शेषं श्रूवम्वुद्धभ्यातयेविति
संपात होमेन चरुं संपाताहुतिं कुर्यात् । ततस्तं त्रिधाविभज्य
शिवभागवह्निभागं घृतमधुभ्यां युक्तं कृत्वा * * *? वल
घृते नैव सं * *? कुर्यात् । ततः शिवभागं हृदासंपूज्यादाय
वह्ने च समीपं गत्वा देवं संपूज्यं प्रोच्या तत्पुरुषेण
दन्तकाष्ठं द * * *?
प गत्वास्वा समन्त्रमुपविश्य स्वमूर्तो गुरुदाङ्क्तौ च क्रमेण
गन्धपवित्रकं दत्वामैकं ग्रन्थिकमल्प तन्तुकं पूजितं
सपुष्पं * * *?दाययो मन्त्रेण पवित्रकममृता कृतं
रेचकेनमूकमन्त्रेण शिवाय समारोप्यामन्त्रेण यदात्मकं
मन्त्रं पापत्वन्त समस्तविधिच्छिद्र गूरुशेशम इति । ततो
जपङ्कृत्वा देवाय पूर्ववत्समावेद्यपा?णम्यस्तुत्वाक्षमापयित्वा
मण्डपाभ्यन्तरभित्ति स्थापितेभ्यो लोकपालेभ्यौऽस्त्रैभ्यश्च
पवित्रकं दत्वा वहिनि अस्याग्निस्थाय भगवते तृतीयां
शञ्चरोर्हुत्वाऽमन्त्रण पवित्रकं दद्यात् । तत ओं इत्वाद्य प्रतिगृह्न
नमः । ओं अग्नये धुरु?गृह्न नमः । ओं यमाय प्रतिगृह्न नमः । ओं
निरितये प्रतिगृह्न नमः । ओं वरुणाय प्रतिगृह्न नमः । ओं वायुवे
प्रतिगृह्न नमः । ओं कुवेराय
चतुष्टयं श्रूवेण दत्वाऽसंस्कृते सर्पिषि संस्मरार्थं विन्दुं
क्षिपेत् । कृष्णपक्षं तु वामात् ओं अग्नये स्वाहा । दक्षिण * *?
सूर्याय स्वाहा । मध्यात् सर्व? अग्नीसूर्याभ्यां स्वाहा ओं अग्नये
स्विष्टि कृते स्वाहा । इति ततो वह्निवक्त्राभिघोर माज्याहुति त्रयेणसु
स्वमन्त्रैर्विधाय सद्यं वामेन वाममघोरेण घोरं तत्पुरुषेण
तत्पुरुषमीशेन शेषं शिवेन इति वक्त्रसन्धानकीरणानि
स्वस्वमन्त्रैर्विधाय कुण्डप्रमाण यथाभिलषितं वक्त्रं
परिकल्प्य मध्यजिह्वाया चूतादिवालान्तं संस्कारपूरणार्थं
वौषडन्तेन मूलमन्त्रेण पूर्णाहुतिविधाय चर्वथं
धूपदीपार्थं वह्निवक्त्रयोः सन्धानं
कृत्वामूलमन्त्रमुच्चार्य वह्निस्थ शिवनासा विनिर्गत
ज्योतीरूपशिखायागस्थ शिवशिखालीनां रस्मिन्योज्ञात?
वियोगेनावच्छिस्नामुभयत्र कृतास्पदां ध्यायेदिति
* * * वह्निस्थ * * * ती? सधानं कृत्वा सासनं कृत्वा * * * * * *
संपूज्य * * * * * कुर्यात् । ततः स्थालींतामयीं मृत्मयी वा * * ?
दोषरहितामस्त्रेण वारिणा प्रक्षाल्य कवचेनावगुण्ठ्यनराक्ष्य
प्रोक्षणात्यु * * * * * * * * *भिरुपलिप्य? धूपयित्वा कुशदा *?
कवचरूपेण कण्ठेसंवेष्ट्य गोमयेनोपलिप्तमण्डलक
अस्त्रप्रोक्षिते कवचावगुण्ठिते अस्त्र विन्यस्तदर्भ षडुत्थमासनं
संपूज्य मूर्तिभूतास्थाली विन्यस्यङ्गं भगवन्तमभ्यर्च्य
पुष्पादिकमपनीयाज्येनास्यज्य वस्त्रपूतगोक्षीरेणा पूरयेत् ।
ततश्चली दक्षिणस्यां पूर्वस्यां पश्चिमायास्वा
अस्त्रेणाल्लिख्यतेनैव प्रोक्षितां कवचावगुण्ठितां
संमार्जितामुपलिप्ता धर्माधर्मभुजां कल्पित शेषा तूर्यवां
पूर्वोद्धृत शिवाग्निना संयोज्य प्रणवासनं
दत्वास्थालीमारोपयेत् । ततो याज्ञीय धान्यतण्डुलान् चूर्णं
वयुश्च प्रसृत प्रमाणं तस्या
प्रक्षिप्याग्नेयदिगुपविष्टश्चालनाकी?
विशेष पूजां विधाय दन्तकाष्टादीनि चरुं विवर्जयन्यथा
स्थानं विन्यस्य ततो मन्त्रान्सन्तर्प्य प्रायश्चित्तं हुत्वा
पूर्णाहुतिं विधाय सूर्याय व * * ?दत्वा समाचम्य
कृतसकलीकरणा तत्व्यादिभ्यः पवित्रकं दत्वा पूर्ववत्
प्रविश्यवास्तोः पतये ब्रह्मणे च ततः शिवकुम्भास्त्रवर्द्धन्याश्च
पवित्रक * *? त्वा देव समीपं गत्वास्वासने समुपविश्य
विभवानुसारेण विशेषपूजां विधाय स्वमूर्तौ गुरु पङ्क्तौ च
पवित्रकं दत्वा शिवं कालात्मकंस्म *त्? । वर्षर्तु मासपक्षदि न
घटिप्राणादि विग्रहं सर्वेन्द्रिय शरीरार्थ व्यवहारैककारणं
कृताकृत समुत्सृष्टङ्विष्टकर्मैक साक्षिणं
क्षेत्रगोप्तारमीशानं शरण्यं शुचिमो नमः पवित्रकमादाय
किञ्चिच्छिवकलसाभिमुखे इश्वरं व्रूयात् । ओं कालात्मनात्वया
देवयदृष्टंमामके विधौ । कृतं सिष्टं समुत्सृष्ट धृतं
गुप्तश्च मत्कृतम् । तदस्तु सिष्टमक्लिष्टं कृतं प्रष्ने?म सत्कृतं
। सर्वात्मनामुनाशम्भा पवित्रेणत्वदिच्छया ।। ओं पूरय २ मख *
* यमेश्वराय स्वाहैत्युचार्य ओं हौं शिव तत्वाधिपतय शिवाय
नमः । ओं हौं विद्या तत्वाधिपतये शिवाय नमः । ओं हौं
आत्मतत्वाधिपतये शिवाय नमः । इति क्रमेण लिङ्गमूर्द्धनि
पवित्रकत्रयं दत्वा चतुर्थकं सर्वतत्वात्मकं पिण्डिकास्धृक् । ओं
हौ सर्वतत्वाधिपतये शिवाय नमः इति मूलमन्त्रेणैव दद्यात् ।
भुक्तिकामा मुक्तिकामस्त्वात्म तत्वादि क्रमेण ततो जपं कृत्वानि
वेद्यस्तुत्वा चतुस्त्रीन् द्वावेकं वा मासं तदर्द्ध सप्तरात्रं
पञ्चरात्रं त्रिरात्रमेकरात्रं प्रारब्ध कर्मावसानं
वायावत्पवित्रकधारणा व्रह्मग्रहणे च मयेदं कर्तव्यमिति
नियमं गृहीत्वा प्रणम्य क्षमापयित्वा यागमण्डपाभ्यन्तरभि?
त्तिभाग पूजित लोकपालभ्यौऽस्त्रेभ्यश्च पवित्रकानिदत्वा
कुण्डान्तिकमागत्य वह्निस्थाय भगवते
मूलयागवत्पवित्रकचतुष्टयं दद्यात् । ततो व्याप्तीतिभिर्वह्निं
संरोध्यस्विष्टि कृताहुतीन्दद्यात् । ततोऽन्तः प्रविश्य देवेशं
सम्पूज्य गुरुवे सिद्धान्तपुस्तकेषु च पवित्रकं दत्वा
दिक्पालादिभ्योवलिमुप
प्रतिगृह्ण नमः । ओं इशानाय प्रतिगृह्णनमः । ओं ब्रह्माण
प्रतिगृह्ण नमः । ओं विष्णुवे प्रतिगृह्ण नमः । इति स्वस्वेदिक्षु यथा
क्रमं बहिर्वलिं प्रक्षिप्य वायव्याया ओं क्षेत्रपालाय नम इति
क्षेत्रपालवलिं दत्वा समाचम्य विधिच्छिद्रं पूरणार्थं
प्रायश्चित्तं हुत्वा पूर्णाश्च दत्वा ततो ओं भूः स्वाहा । गुरुवः
स्वाहा । ओं स्वः स्वाहा । ओं भूर्तवः स्वः स्वाहेति व्याहृतिर्भित्तां
मंकृत्वा तत्रैव च वह्निं संरोध्य ओं अग्नये स्वाहा ओं सोमाय
स्वाहा ओं अग्नीषोमाभ्याम् स्वाहा ओं अग्नये स्विष्टिकृते स्वाहा इत्याहुति
चतुष्टयं दत्वा वह्निस्थं शिवं नाडीसन्धानेन मण्डलस्थिते
शिवसंयोजयेत् । ततो देवं सम्पूज्य सिद्धान्तपुस्तके गुरो च
पवित्रकन्दत्वा वहिर्निः सृत्याचम्य शुचिगोमयमण्डलकं त्रयं
पञ्चगव्यञ्चरुं दन्तधावनञ्च क्रमाद्भजेत् । अथाचम्य शुचिः
शययोदर्भरास्तीर्य वुभुक्षुः प्राकारत्रयेण तिलादिना रक्षा कृत्वा
शिवमनुस्यरन् स्वपेत् । मुमुक्षुरपि भस्मनैव । अथ प्रातरूत्थाय
कृत शौचस्नानविधिर्विहित सन्ध्यापासनो निर्माल्यादिकमपनीय
गन्धपवित्रकम विसर्जितमवैशानकोणमण्डलके संस्थाप्य
समाचम्य कृतसकलीकरणः सामान्यार्घपात्रं कृत्वा यथा
वच्छिवं संस्नाप्य समाचम्यसकलीकरणं कृत्वा द्वाराणि
द्वारपालाश्च संपूज्य पूर्ववत् पश्चिमद्वारेण प्रविश्य
वास्तोष्पतये पुष्पं दत्वा शिवाकलसमन्त्र वर्द्धनीञ्च संपूज्य
ततो दिक्पालान्सास्त्रान्क्रमेणाभ्यर्च्य स्वासनं प्रणवेन सम्पूज्य
समुपविश्य भूतशुद्धि सकलीकरण विशेषार्घ पात्रद्रव्यशुद्धि
कर्महस्त पञ्चगव्यानि कृत्वानित्यविधिनादेवं
सम्पूज्यकुण्डान्तिकमागत्य कुण्डमस्त्रेण प्रोक्ष्य तन्मेखलासु
सास्त्रान् लोकपालाम्वरिधि विष्टरषु पूर्वब्रह्मादीन्संपूज्य
श्रूत्स्रूवा वाज्यश्च पूर्ववत्संस्कृत्य पूर्णाहुतिं
दत्वामन्त्रतर्पणाद्य कर्मकृत्वा अनुद्वास्यैव परिधिविष्टरान् वलिं
प्रक्षिप्य शिवात् । ग्नेर्विसर्जनमकृत्वेव शिवसमीपमागत्या विज्जित एव
देवशे नैमित्ति
स्च्. ४)
* त्र? हस्तान्तानि नवलिङ्गानि । एतान्यष्टाङ्गुल कन्यस लिङ्गपाद
वृद्ध्यात्रयस्त्रिंशद्भवन्ति । तथा षोडशाङ्गुलादारभ्य * * *?
दारुजान्यपि षडुस्तान्तानि नवलिङ्गानि भवन्ति । कन्यस
पादवृद्ध्यातान्य पित्रय स्त्रिंशदेव । अथवा प्रासाद चतुर्थ
पञ्चषडेशेन वा लिङ्गदैर्घ्यं प्रासादगर्भे वा पञ्चधा
विभक्ते भागत्रयेण नवधाविभक्ते भागपञ्चकेन भागार्द्धेन
त्र्यन्तरेण नवलिङ्गदैर्घ्य समन्तस्यापि लिङ्गव्रातस्य
त्वदैर्घ्यार्द्धमष्टधा विभज्य चतुर्भिः पञ्चभिः षड्भिः स
त्रिभागैः पञ्चभिः सुरणगार्चितं । अनाद्य आद्य
सर्वसमसंज्ञकं विस्तारोपलक्षितान्येतत् संज्ञकान्येवं लिङ्गानि
भवन्ति । एतेषां चतुरस्रोब्रह्मभागः कर्णार्द्ध सूत्रलाण्छित
कोणत्यागेन सप्तधा विभक्ते भाग?त्रयं मध्ये संस्थाप्य
भागद्वयद्वयत्यागाद्वाष्नाश्रीर्विष्णुभागः । ब्रह्मस्थान
भ्रमादश्रि लोपक्रमाद्वा वृत्तोरुद्रभागः । लिङ्गमूर्ध्नि
विस्तार चतुर्थांश विवर्त्तनात्कुक्कुटाण्ड संज्ञकं भवति ।
तथैव त्रिभागवर्त्तनादं?र्द्धचन्द्रं
। षड्भागवर्त्तनान्त्रपुषमष्टकमष्टमांशाच्छत्रं तच्चाष्टा
* *?र्भक्ते भागभाग विवर्तनात् पुण्डरीक विशाल श्रीवत्स
शत्रुमर्द्दन संज्ञया चतुः प्रकारं भवति । उक्त मानात्कृषे
द्रव्यनाशः स्थूलमृत्युः * त्युच्चे गोत्रक्षयः । ह्रस्वे व्याधिः ।
वक्रेराष्ट्र भ्रंसः * धो? हीने दुर्भिक्षं मध्य महीने
प्रकृतिक्षोभ मूर्द्धहीने सर्वनाशः रुद्रभागे दीर्घे पूजा
हीनिः । मध्ये दीर्घऽनावृष्टिरधो दीर्घराष्ट्रभङ्गः ।
उक्तलक्षण लक्षितं । सन्धिरेखा
विन्दुजालककीलककलङ्कगाराच्छिद्रत्रास धूलिकाक पदमार्जार
पदरहितं भुक्तिमुक्ति प्रदम्भवति । मस्तकसमोरुद्रभागः ।
दिक्षुपीठ प्रणालश्च ब्रह्मभाग प्रवेश ब्रह्मशिलाया ज्ञात्वा
विष्णुभागान्तं पीठमुच्छ्रितं कुर्यात् । ये गुणदोषा लिङ्गेपीठे
त एव । तत्र हस्तमानस्य लिङ्गस्य
हृत्यसमाचम्य प्रायश्चित्तं हुत्वा पूर्णां विधायमण्डलं
भगन्तं संपूज्य क्षमापयेत् । ततश्च भोजनाच्छादनादिना
दीक्षितां सम्पूज्य प्रीयतां मे सदाशिव इति व्रूयात् । ब्रतान्ते
अतीनन्तरदिनवच्छिवमभ्यर्च्य ततो भुक्तिकामो भगवन्ममास्तु
फलसाधकमिति व्रतं शिवाय समर्पयेत् । मुक्तिकाम *ः? पुनर्मामे
कर्मप्रतिवन्धकं भवत्विति निवेदयेत् । ततो मन्त्रतर्पणान्तं
कर्मकृत्वा प्रायश्चित्तं होमं विधाय पूर्णां
दत्वाभस्मवन्दयित्वा नाडीसन्धानेन वह्निस्थं भगवन्तं
शिवसंयोज्य वह्नेर्मन्त्रान्समाहृत्य द्वादशान्तं नीत्वा
हृदिसंनिवेश्य वर्ह्निविसर्ज्य परिधिविष्टरान् द्वास्यवलिन्दत्वा
समाचम्य कृतसकलीकरणोऽन्तः प्रविश्य शिवकुम्भास्त्रवर्द्धन्यो
मन्त्रान्संहृत्य शिवे संयोज्य सापेक्षं क्षमस्वेति विसर्जयेत् । ततो
दिक्वलाटीन्विसर्ज्य देवात्पवित्रकाश्यादाय स त्रिचण्डेश्वरे
चण्डेश्वराय पवित्रकं दत्वा पवित्रक निर्माल्यादि समर्पयेत् ।
तच्चेत्प्रसादात्पवित्रे
प्रायश्चिन्तार्थं तृतीयमन्त्रस्य लक्षमावर्त्य दशांशेन होमं
कुर्यात् ।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेवविरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
पवित्रकविधिः समाप्तः ।। ० ।।
अथ प्रतिष्ठाविधिः प्रतिष्ठा
चलिङ्गपिण्डिकादिस्तमाश्रयेत्यतस्तल्लक्षणमभिधीयते । तत्र
हस्तमात्रादारभ्यं पादवृद्ध्याहस्तत्रयान्तं
नवलिङ्गानिकनीयः कटच्छके भवन्ति तथा नयैव वृद्ध्या
चतुर्हस्ताद्वस्त षट्कं यावत्मध्यमकटच्छकेऽनयैव
वृद्ध्यात्सप्तहस्तान्नवहस्तान्तान्यपि नवलिङ्गान्यत्तमकटच्छके
भवन्ति । तथान्यदपि
त्रिचतुर्हस्तयोर्मध्ये षट्सप्तहस्तयोश्चलिङ्ग षट्कमेवं
त्रयत्रिंशलिङ्गानि शैलमयानि मृत्मयानि च । तथा
मुद्गप्रमाणादारभ्य नवाङ्गुल पर्यन्तं रत्नजः लोहजश्च
त्र्यङ्गुलावधि चललिङ्गं भवति । लोहाष्टकनिर्मितानि
अष्टाङ्गुलादारभ्याष्टाङ्गुल वृ
स्च्. ५)
कुम्भावशिष्ट जलेन खातञ्चाप्लाव्य कुदालादिकं संस्नाप्य
पूजयेत् । ततो परं पूर्ण कुम्भं वस्त्रयुगच्छन्नं
ब्राह्मणस्यकस्वनिधाय गीतवाद्यादि ब्रह्म *?षेण
वहुजनसाक्षिकं । यावदभि प्रेतं पुरपूर्वसीमान्तं नयेत् । तत्र
च मुहूर्तमात्रं स्थित्वा प्रदक्षिणमाग्नेयादि इशानादि गन्तं
भ्रामयेत् । ततः प्रासाद भूमौ शङ्कष्टकं प्रासादसीमा
विनिश्चयार्थं चतुर्षुकोणेषु विन्यस्य सूत्रेण संयोज्य सुवर्ण
रजतमुक्तादध्य क्षतादिभीरेखां प्रदं । स वालग्ने वा
ध्वजाद्यायैर्वा वं कं चं तं एं हं शं पं
यैर्नवभिर्वर्णेः प्रश्नगतेर्वाशल्पजानीयात् । तत्र शिरः कण्डूयते
शिरः शल्यं तत्प्रमाणेन अन्यदतं कण्डुयनादि
नाविकारोऽस्तितदङ्गेन तत्प्रमाणेन शल्यं द्विरूपे द्विरूपं
शल्यं सर्वाङ्गिके विकार सर्वत्र सशल्यं क्षेत्रं ज्ञात्वा खात्वा
शल्यमुद्धृत्य हस्तापूरयाषाणेरष्टाङ्गुलोच्छत मृदन्तरै
प्लावितै मुद्गराकोटितैः पादत्रयान्तमाप्ल * समप्लवां
सुघटितां सुघटितांसुश्लक्ष्णां भुवं विधायच्छ्याया
शङ्कादिना प्रान्नैरित्यन्तमूर्द्धवत् समाग्नेयाच्च वायव्यान्तं
तिर्यग्वशं दत्वाति पदषट्पदश्चरत्क?ष्टकं विन्यस्य मर्माणि
ज्ञात्वा इशानकोणार्द्ध इशं दत्वापर्जन्य जयमहेन्द्ररवि सत्य
वृषात्पदिकात्संपूज्य अग्निकोष्ठके व्योमपावको विन्यस्य
पूषावितूष गृहक्षतं यमं गन्धर्व
भृङ्गान्पदिकान्दत्वानैरितकोणकोष्ठके मृगपितरौ
संस्थाप्यद्वौवारिक पश्चिमसुग्रीव पुष्पदन्त चरुण
असुरशोषान्यादिकान्दत्वा वायुकोणकोष्ठके रोगताय
चतुर्हस्तः प्रासादो विस्तारेण भवति । अथवा
लिङ्गमानान्त्रिगुणश्चतुर्गुणः पञ्चगुणः षड्गुणो वा विस्तारेण
भवति । प्रासादादुच्छ्रयेण त्रिगुणो भूमिजः सार्द्ध द्विगुणो
नागरः । द्विगुणोः शिख । वलभिः । लोहदारुजानां कन्यस
लिङ्गादारभ्य चतुर्हस्तादिप । विस्ताराट्त्रिंशद्वस्तपर्यन्तः
प्रासादः कार्यः । रत्नजानां स्वसाध्यादिति ।। ० ।।
अथ प्रासादं चिकीर्षुः प्रागेवसुपरीक्षिता भुवं परिगृह्णीयात् ।
तत्र भूमिशुलाज्य गन्धामधुरा ब्राह्मणस्य रक्तासृग्गत्वा
कथायाक्षत्रियस्य पीतातिक्तान्न गत्वा वैश्यस्य विगत्वाकटुका
कृष्णामद्यगत्वा शूद्रस्य भौषाच तूरू पापिख्यत
वारिदीपगुणादिना परिक्षणीया । तत्र हस्तमात्र खातं तदुद्धृत
मृदायस्या पूर्यते स मध्यमा । यत्र उद्धरितमृत्तिकासा श्रेष्ठा
पत्राऽपरिपूर्ण मृत्तिकासाऽधमा । उदकेन खातमापूरितं
पदशत मम नागमनपर्यन्तं यत्र सम्पूर्णं दृश्यते
स्यज्यायसी? ।
अङ्गुलौना मध्यमा । बहुभिरङ्गुलैरूनं सानिकृष्टेति । आमं
कुम्भस्य वा उपरिघृत पूर्णांममरावे चतुर्दिक्षु सितरक्तपीत * *?
वर्ति चतुष्टयं प्रज्वलितं कृत्वा तत्पुरुषादि
मन्त्रपूजितंमास्नेहान्तं प्रज्वलद्यदि पश्येत्तदा सर्ववर्णानां
भूःप्रशस्तेति जानीयात् । अवनिर्वाणा यावत् प्रशस्तावतात्मान
प्रशस्तेति भुवं परीक्ष्य तस्यां यथोक्त मण्डपं कुण्डसहितं
कारयित्वा द्वारपाल पूजादिमन्त्रसन्तर्पणान्तं
कर्मकृत्वात्मघोरास्त्रेन सहस्रं हुत्वा कुम्भ पञ्चकं
सप्तधान्यानामुपरिस्थितं पुण्योदक पूर्णं प्रशस्तोषधी रत्न
गर्भं चूताश्वत्थादि पल्लवबीजपूरादि फलशोभित मुखं
सितवस्त्र युगावृतं शुक्लश्रुक्सूत्रकण्ठं सासनेनमाङ्गेन
भगवता समधिष्ठितं संपूज्य लग्नकाले प्रासादगर्भस्य
मध्यस्थाने कुम्भजलं प्रक्षिप्य
पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरमीशासु च । ततो मध्यस्थाने खात्वा
तस्मात्मृदमादाय नैरित्यां दिशि प्रक्षिपेत् ।
स्च्. ६)
क्रमेणैव द्वादशहस्तादि द्विहस्तं वृद्ध्यामण्डपं
प्रासादस्याग्रतः कारयित्वा तस्य प्रात्यामुदीच्यामीशान्याम्वा
स्नान मण्डपमधिवासनम * *?निवेश्य तत्रोपविश्य आचार्य
मूर्तिधराणामलङ्कारादिकं दत्वा गृहीतार्घं पात्रं कन्यस
लिङ्गेषु पञ्चषट्सप्तहस्तानि तोरणानि । इतरेषु वसुवेदाङ्गुल
वृद्धानि । न्यग्रौधौदुम्बराश्वत्थ प्लक्षद्रुमसमुद्भवानि
पूर्वादरभ्य शान्तिभूतिवलार्धेगसंज्ञकानि तोरणान्यस्त्र
शुद्धानि वर्मावगुण्ठितानि प्रणवेन विन्यस्य स्वहृत्मन्त्रैः
स्वनामभिरभ्यर्च्य तच्छाखयोर्नन्दि महाकालौ भृङ्गिविनायकौ
वृषस्कत्यै देवी चण्डौ च स्वनामभिः सम्पूज्य इश्वर इन्द्र
चापरक्त कृष्णनीलमेघ पीतपद्मवर्णासुपताकासु
शूलवज्रशक्तिदण्ड खड्गपाश ध्वजगदा संज्ञकानि
लोकेशायुधानि सम्पूज्य * * ? यां ब्रह्मायुधं पद्ममीशान्यां
। अतसीपुष्पवर्णायां विष्ण्वायुधं चक्रं नैरित्ये । मध्ये स्वेतचिते
वा ध्वजे पाशुपतास्त्रमघोरास्त्रं वा
* * *श्चात्यकारण? प्रविशेत् । ततो वेदिकायामुदद्युख उपविष्टः ।
भूतशुद्धिं विधाय कृतसकली करणोऽर्घपात्र कृत्वा
स्वशिरस्यारा * *? कर्महस्ता गृहीतद्वात्रिंशद्दर्भदन
वणिकानिर्मिताभि मन्त्रित ज्ञानखड्गः सम्पाद्य
पञ्चकोष्ठकात्मण्य शिवतत्वकोष्टकेसु प्रतिष्ठा पात्रकं सक्षीर
पूर्वे सदाशिव तत्वकोष्ठकेसु शान्तसदधि दक्षिणे विद्यातत्व
कोष्ठके तेजोरूपं घृतं पश्चिमकालतत्वकोष्ठके अमृतात्मकं
सगोमयमुत्तरे पुरुषतत्व कोष्ठके रत्नादयं सगोमूतं
संस्थाप्ये यथा क्रममङ्गैरनाभिमन्त्र्यमूलमन्त्रेण
यथावत्सयोजित पञ्चगव्योविकिरानभि मन्त्रयेत् । ततो
नैर्-ऋत्यामीशानाभि मुखौमण्डपं निरीक्षण
प्रोक्षणाभ्युक्षण खननावकिरण समीकरसेचना कुटुन
संमार्जनोपलेपन वज्रीकरणान्तैः कर्मभिः स्वस्वमन्त्रोपेतैः
संस्कृत पञ्चगव्येन संप्रोक्ष्य ज्वलच्छस्त्रभूतान् विचिन्तयन्
विन्यस्य नाग मुख्य भल्वाठलोमगिरि अदित्यन्तात्पदिकान्दत्वा
इशकोणार्द्धेदितिं संपूजयेत् । मध्ये * * * * ? ब्रह्माण
तस्यश्यान्यान्यदिकै । आप आपवत्सौ प्राच्यां षट्पदमरीचिमाग्नेया
सवितासावित्र्यो दक्षिणस्या विवस्वन्त नैरित्या इन्द्र इन्द्रजयावारुण्या
मित्रं वायव्यां रुद्रारुद्रदासौ उत्तरस्यां परापरमित्या
पवत्सादि क्रमेण कुशतिल दध्यक्षतादिभिः संपूज्य इशानादि
दिक्षु चरकीं स्कन्दं विदारीं अन्य अन्य पूतना जम्भाया
पराक्षसी पिलिपिच्छान्तर्वहि देवताष्टकं पूजयेदिति ।। ० ।।
एकाशीति पद वास्तो मध्ये ब्रह्मानवपदः । मरीचाद्याः षट्पदा
आपवत्साद्याद्विपदिका वहिर्देवताश्च पूर्ववद्वत्सरङ्कादिकश्चेति
वास्तु संपूज्य मर्मादि । गृह । परिहृत्य शिला प्रदिकं विदध्यात् ।।
० ।।
अथ प्रतिष्ठालक्षणं । तत्र पिण्डिकारन्ध्रमध्ये
भगाकारोद्धृतलक्षणे स्वगुप्तक्रियाशक्ति स्वरूपे
ज्ञानशक्तिस्वरूप * *?लक्षणस्याधः स्थाने योजनं प्रतिष्ठाय
द्वालिङ्ग पिण्डिकयोर्विधिनायोगः प्रतिष्ठति ।। ० ।।
सा च विधा तत्र प्रतिष्ठास्थाप * * स्थापन
उत्थापनमास्थापनश्चैति । तत्र व्यक्तं लिङ्गब्रह्मशिलाया विन्यस्य
पीठबन्धं विधायापरिपिण्डिकाया यत्र योगः क्रियते सा प्रतिष्ठा
यत्र वरन्नजं धातुजम्वाण लिङ्गाम्वा पञ्चधा त्रिधा
विभज्यभागद्वयमेकं वापिण्डिकायामारोप्यते तत्स्थापनं
यत्पुनरभिन्नपिण्डिकमभेदेन संस्क्रियते तस्थित स्थापनं ।
जीर्णोद्वार उत्थापनं । व्यक्तं रुद्ररूपं
जलपीठस्योपरिविन्यस्यवडमन्त्रैः संस्कारः हियते तदास्थापन
एवं पञ्चरूपाणि प्रतिष्ठा व्यक्ताव्यक्तत्वान् महेश्वरस्य
ब्रह्मविष्णादीनां व्यक्तत्वादास्थापनोत्थापन रूपाद्विधैव ।
तत्र हस्तादारभ्य नवहस्तान्तानां लिङ्गानां मध्येषु
त्रिष्वष्टनव दशहस्तमितरेषु चतुर्हस्तादि विङ्गेषु हस्तद्वय
वृद्ध्यायद्वत् । हृदया * *?
स्च्. ६)
दक्षिणे सर्पिः पश्चिमगोमगोमयमत्तरे गोमूत्रं
वारिहैममुपस्करणमाभरणजातं धूपं मधुवासांसि
आग्नेये । नैराञ्जनानि नैरित्य? षाय संग्रहं वायव्ये ।
कुङ्कुममीशानः इति कारकव्रातं कोष्ठकेषु विन्यस्य । क्षीर ।
आमल । गन्ध । रत्न । फल । पुष्प । शस्य । औषधाम्भः
संज्ञकान् कुम्भान् विन्यस्यास्त्र प्रोक्षितान् कवचावगुण्ठितान्
स्वसंज्ञाभिरभ्यर्च्यक्षारादि समुद्रान्परिकल्प्य वहिरन्यानपि
कुम्भा संस्थाप्य लोकपालाय धाङ्कितं शिलाष्टकमपि
संपूज्याहुतिभिः संतर्प्यतिलघृतान् सारेण शिला समीपं गत्वा
होमसंख्यया जपं विधो । युक्तशमलेन शिलामूलं
संस्पृश्यशान्ति कुम्भाम्भसा संप्रोक्ष्य पुनः
कुण्डसमीपमागत्योपविश्यात्म तत्व विद्यातत्वाभ्यां नम इति
तत्वयोः सन्धानकृत्वाविद्या तत्वतत्वाधिपविष्णुमूर्तिमूर्तिपाश्च
संस्थाप्य संपूज्य तिलघृतान् सारेणा
ज्ञातभिः सन्तर्प्य होमसंख्यया शिलासमीपं गत्वा जपं कृत्वा
कुशमध्यभागेन शिलामध्यभागं संस्पृश्य शान्ति
कुम्भोदकेन संप्रोक्ष्य पुनः । कुण्डसमीपमागत्या पविश्य
विद्यातत्वशिवत्वाभ्यां नम इति अनुसत्वाय शिवतत्वा तत्वाधिप
रुद्रमूर्तिमूर्तिपांश्च संस्थाप्याहुतिभिः सन्तर्प्य शिलासमीपे
होमसङ्ख्यया जपं कृत्वाङ्कुशाग्रेण शिलाग्रं संस्पृश्य
शिवाज्ञां श्रावयेत् । हे तत्वेश्वरास्तत्व मूर्तिमूर्तिपैः
सहशिवाज्ञाया संनिहितैर्भवितव्यमित्यागत्य पूर्णादत्वाशतं
सहस्रमर्द्धवाकर्मसंपूर्णाच्च माचार्यो मूलमन्त्रेण
मूर्तिधराश्च स्वदिग्गतममन्त्र होमं कुर्यूः पूर्णाञ्च
दद्यूस्ततः प्रायश्चित्त होमश्च विधाय शिलां
कुम्भांश्चादायं द्रोमादं गत्वागर्त्ता स्वाधारशतिन्दत्वा ओं
अनन्तायं च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ च्छ
च्छ च्छ न इति कुम्भं विन्यस्य लग्नकाले वुद्ध्यन्ता ध्वपद
व्याप्तिं
विकिरान् प्रोक्षिप्य पुनस्तादर्भ कूर्चिकया समाहृत्यवेदिकेशान्यां
संस्थाप्य हेमाद्यैकतमं कुम्भमानीय गालिताम्भसा प्रपूर्य
संहृत विकिरेष्वासनन्दत्वा तत्र मूर्तिभूतं कुम्भविन्यस्य
साङ्गं भगवन्तं संपूज्य तद्दक्षिणतो वर्द्धन्यामस्त्रञ्च
सितववस्त्र युगादिनोभयं विभूष्य पूर्वद्वारि प्रशान्त शिशिरौ
दक्षिणे पर्जन्याशाकौ पश्चिमे भूत सञ्जीवानामृतो ।
उत्तरेधनेशश्रीश कुम्भो सवस्त्रौ सुसूत्रक्षत कण्वौ स हिरर्ण्यो च
ताश्वच्छदल विभूतितवक्त्रौ वीजपूरादि फलसहितो
नन्द्यादिद्वारपालाधिष्ठितौ सम्पूज्य यथा क्रमं स्वस्वदिगिन्द्रादि
विष्ण्वन्तं लोकपालाधिष्ठितं कुम्भदशकञ्च ततोऽपिण्डित
द्वारयावर्धन्या सह कुम्भमाभ्राम्य भो २
शक्रत्वयान्वस्यांदिशि विघ्नप्राशान्त सावधानेन यागान्तं
शिवाज्ञया भवितव्यमित्यनेन क्रमेण लोकपालानामाज्ञां दत्वा
* *तरासन संपूज्य वर्द्धनी कुम्भौ च कुम्भे स्थाय भगवते
ज्ञानखड्गं समर्प्य निराधार्दो पात्रं संस्थाप्य
वर्द्धन्यासनविकिरोत्थास्त्रैर्याग गृहमुप सारिता शेष विघ्नं
समन्तात्सण्चिन्त्य कुण्डसमीपगत्वा निरीक्षणाद्यग्नि जननान्तं
कर्मकृत्वा नवधापञ्चधा वा अग्निविभज्ये दिक्स्थितानं शान्दिन्
कुण्डेषु निक्षिप्ये मध्यां शं स्वकुण्डे प्रज्वाल्य भगवन्तं
सम्पूज्ये मन्त्रेकाकादशिकां सन्तर्प्य पूर्णां विधाय
प्रतिकुण्डं शान्तिकुम्भानस्त्रग्रे मूलेन वाभिमन्त्र्य
संपाताभिहुता न कुर्यात् । तद्वारिणा च लिङ्गादिकं गत्वा
प्रतिभागं मन्त्रसनीधानार्थं प्रोक्षयेत् । ततः स्नानमण्डपे
कोष्ठक नवकं वि * *? मध्ये शिवत्वं पूर्वे सदाशित तत्वमाग्नेये
इश्वर तत्वं दक्षिणे विद्या तत्वं नैरिते मायातत्वं पश्चिमे
कालतत्वं वा यव्ये नियति तत्वं उत्तरे पुरुष तत्वं मीशाने प्रकृति
तत्वं मीशाने प्रकृति तत्वं विन्यस्य मध्ये दुग्धं पूर्वेदपि
स्च्. ८)
संयोज्य दशपञ्चलोकेश व्योम्नि विन्यस्य प्रयश्चित्त होमं कृत्वा
वाङ्मनः काय दोषापहं लोकपाल वलिश्च दत्वाक्षमस्वति यागं
विसर्जयेत्? ।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
पाद प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ।। ० ।।
अथ लिङ्गप्रतिष्ठाविधिः । तत्र पूर्ववत्मण्डपद्वयं कुण्डानि
नवपञ्चैकं वा विधाय कारकसमूहमाहरेत् । कुण्डसङ्ख्यया
श्रुक्श्रुवौ तिलपात्रार्घ पात्राज्य पात्राणि घण्टा धूप दहनकानि
पञ्चगव्यपात्र चरुस्थाली शिवकुम्भास्त्र वर्द्धनिकानिद्रा
कुम्भोव्यङ्गपात्रशान्ति कुम्भान्तं ताम्रमयं
द्वारपाललोकपाल विद्येश्वर कुम्भाश्च ताम्रमयात्मृत्मयान्धा
स्नानार्थं पर्वताग्रान्नदीतीरात् क्षेत्र
मध्याङ्गजदन्ताद्वृषशृङ्गात् शरमूलाद्वल्मीकतस्तीर्थादित्यष्टौ
मृदस्तीर्थोदकानि । उदुम्वर वटाश्वत्थ जन्त्वाम्रत्वचः । गोमूत्र
गोमय दुग्वदपि घृतमपि सर्वौषधी भद्रपीठानि । रौप्य पात्र
द्वयं हेमशलाकाद्वयं च सर्व
* * * वीज *? हादि भूतिकाद्वयं खड्ग क्षुरिके गृहोपस्करणं
तलिका अन्तिरिका नानावर्णपताकागृह तेजचन्द्रोवकं? तिलघृत
खण्ड गुग्गुलु विश्वपत्र श्रीखण्ड
कुङ्कुमयोपपट्टवस्त्रताम्बूलादि प्रचुरं मानीय उत्तर
वेदिकायां विन्यस्तत्वमष्टकेषु यथा क्रमं कारक पातं विन्यस्य
पूर्ववन्मण्डप प्रवेशं विधाय वेदिकायां समुपविश्य
देहशुद्धिं कृत्वा सितोष्णीषं मूलमन्त्राभिमन्त्रितं शिरसि
विन्यस्या धारशक्तेरारभ्य परसीकरणान्त मन्तर्यागं निर्वर्त्य
हृत्याकाशात्परं तेजः समाकृष्य स्वचक्षुषोर्विन्यस्य
द्रव्यगणमवलोक्यार्घपात्रं दहनोत्पपनादिना
संस्कृत्यामृतरूपेणाम्भसा प्रपूर्यसाङ्गं भगवन्तं
सम्पूज्य कर्महस्तादि मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वा
उत्तरवेदिकायां विद्वमानीय * *? शुद्धिं विधाया चार्यामृद्भिः
कथाय वर्गेण गोमूत्रेणोदकान्तरं गोमयेनाम्भसास्त्रेण
स्नानं निर्वर्त्य
सञ्चिन्त्य नवपञ्चकम्वा ताम्रकलं सांपेत समानीय
स्नानमुपक्रमेत् । मृद्भिः कथाय वर्गेण गोमूत्रेणोदकान्तरं ।
गोमयेन ततोऽस्ताभिः पञ्चगव्यादिना च
संस्नाप्यरक्तवस्त्रैराच्छाद्यमण्डपं प्रदक्षिणी कृत्य
पाश्चात्पद्वारेण प्रवेश्य वेदिकायां शययोपरिसंस्थाप्य शिरः
समीप असिला निद्राकलसं संस्थाप्य वर्माभिजप्तं वा
समासंस्च्छाद्य नैवेद्यं दत्वा पृथिव्यादि वुद्ध्यन्तमध्वानं
विन्यस्य तन्त्रि खण्डं भावयेत् । तत्र तन्मात्रान्तमात्म तत्वं
सनोन्तं विद्याख्य महङ्कारवुद्ध्यन्तं शिवतत्व तत्वत्रयाधिपान्
ब्रह्मविष्णुहरांश्च । क्ष्मा । वह्नि । यजमान । अर्क । जल । वायु ।
चन्द्र । आकाशाख्यं मूर्त्यष्टकं । शर्व । पशुपतिः । उग्र । रुद्र
। भव । इशान । महादेव । भीमसंज्ञकं मूर्तीश्वराष्टकञ्च
विन्यस्य निष्ठूरयासंनिरोध्य शिलायां पूजयेत् ।
दिग्वादि? शिलासुतत्वानि सर्वाणि न्यस्यानि पृथक् पृथक् स्वदिशमूर्तियौ
च विन्यस्य निरोध्य पूजयेत् । ततः कुण्डसमीपं गत्वोपविश्य
कुण्डमध्ये ओं हां आधारशक्तये नम इति
संपूज्यशक्तेराहुतित्रयं दत्वा ओं हांन्मात्मतत्वाय नमः ओं
हां स्वात्म तत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः । ओं दां क्ष्मा मूर्तये
नमः ओं हां क्षा मूर्त्यधिपतय शर्वाय नमः । इत्यनेन
मार्गेण मूर्तीशा । ओं हौ शिवाय स्वाहेति मन्त्रमुच्चार्य
नमस्कारेण शिलां विन्यसेत् । ततः पूर्वादिगर्तासु । ओं लूं इन्द्राय
नमः । ओं रुन्मग्नये नमः । ओं द्रुं यमाय नमः । ओं षूं
नैरितये नमः । ओं वूं वरुणाय नमः । ओं यूं वायवे नमः । ओं
सूं सोमाय नमः । ओं हूं इशानाय नमः । इति लोकेश
मन्त्रैस्ताम्रमय कुम्भान् घृतमधु पूरितान् कृत सुसूत्र
कण्ठान् विन्यस्य तेषामुपरि शिलाः संस्थाप्य धर्मादि
चतुष्टयश्च शिलानामधिष्ठाय कत्वेन विन्यस्य ऊर्द्धाध्वानं
स्च्. ९)
क्षीरतिलसिद्धार्थ यवतण्डुलोपेतेनार्घणार्घमामाचनं
दत्वामूलमन्त्रेण सम्पूज्य हृदयेनोत्थाप्यरथे चारोप्य नगरं
पुरं प्रासादमण्डपं वा प्रदक्षिणीकृत्यं हिरण्यकंस्य
वासांसि रत्न करम्वकपरकांश्च प्रक्षिप्यमण्डपाग्रे
हृदयेनरथात्समुत्तार्य पश्चिमद्वारेण मण्डपं सप्रवेश्य
भद्रपीठे संप्राप्यशप्यायामासनं साधारणेन वा
दत्वाशिरसाशयने विन्यस्य शिखयापधानं दत्वा वर्मजप्तवाससा
संच्छाद्यनैवेद्यं दत्वास्थालीपिधान
ददत्वीमु?षलोलुखलशिलामार्जनीयन्त्रिका पात्रं
गृहोपकरणमन्यदपि दत्वामधुघृत पाअत्रं पाददेशे हृदा
मृत्युञ्जयेन वासं स्थाप्य शिरः समीपे शिवकुम्भवन्निद्रा
कुम्भमसिनासं पूज्य दिक्षुविद्येश्वरे कुम्भाष्टकं च
भागप्रदर्शकान् पुष्पप्रतिसरान्दत्वाभूतिदर्भतिलैः प्राकार
* * *? लोकपालात्संपूज्य तत्वतत्वाधिप मूर्तिमूर्तिपान् विन्यस्येत् ।
तत्र मायान्तमात्म तत्व समूहं सञ्चिन्त्य ओं हां आत्मतत्वाय
नमः । ओं हां आत्मतत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः । सदाशिवान्त
विद्यातत्वमनुतान्वाय ओं हीं विद्यातत्वाय नमः । ओं हीं
विद्यातत्वाधिपतये विष्णुवे नमः । शिवतत्वान्त व्याप्त्या ओं हूं
विश्वा तत्वाय नमः । ओं हूं शिवतत्वाधिपतये रुद्राय नमः । इति
ब्रह्मभागे आत्मतत्वं विष्णुभागे विद्यातत्वं रुद्रभागे
शिवतत्व विन्यस्य प्रतितत्व तत्वत्रय व्यापकत्वेन वा
मूर्तिमूर्तियान्विन्यसेत् । ओं हां क्ष्मा मूर्तये नमः । ओं हां
क्ष्मा मूर्त्यधिपतये शर्वाय नमः । ओं हां अग्नि मूर्तये नमः
। ओं हां अग्निमूर्त्यधिपतये पशुपतये नमः । ओं हां
यजमानमूर्तये नमः । ओं हां यजमान मूर्त्यधिपतये उग्राय
नमः ।
द्वितीय वेदिकायां हेमशलाकया गुरुर्लक्षणमालिखेत् । तत्र
पूजाभागं त्रिधाविभज्य भागमेकमुपरिष्ठात्मन्त्यज्य
भागद्वयेन लिङ्गाकारं लक्षणमवतारयेत् । चार्द्वात्यक्षरेखा
भ्रमः । लिङ्गदेव्य षोडशांश त्रिभक्ते भागमेकं संत्यज्य
भागद्वयेन रेखाद्वयमध्ये विस्तारः भार्यः रेखायाश्च खात
विस्तारयोर्मानं । नवहस्तलिङ्गस्य वाष्टकेन । अष्टहस्तादि
लिङ्गानां त्रैराशिकात् । अथवा यवस्य नवमाशोयवांशः
पूजाभागे या वन्त्यङ्गुलानि तावन्तोय वांशकाः ।
लक्षणरेखायाः प्रमाणं । पक्षक्षेत्रं त्रिधाविभक्त
पक्षरेखा सूत्रात्सार्द्ध भागद्वयेनाधोभागार्द्धं परित्यज्य
राज्यसन्तान कामस्ये पक्षरेखावतारे । भ्रमेण कार्यः ।
रेखाद्वयस्य च पृष्ठे युतिरयुतिर्वा नवधा वा विभक्ते
भागद्वयमधः सन्त्यज्य पक्षरेखावतारे भ्रमेण कार्यः
। षोडशधा वा भक्ते
भागद्वयं संत्यज्ययश्च भिर्नवभिर्द्वादशभिश्चतुर्द्दशभिर्वा
भ्रमेण पक्षरेखावतारः । अश्रिकोण क्रमेण वा प्रतिमासु च
दृगुन्मीलन कुर्यात् शिल्पी । तच्छस्त्रेणोत्कीर्य? घृतमधुभ्यां
मृत्यूजित्मन्त्रेण संपूर्य पात्रशलाकादिकं शिल्पिने दत्वा
पुनरासने संच्छाप्य अविधवा अष्टौ चतस्रो वा नार्पो रक्तसूत्रेण
स्पृशेयुः । दहेण वा । तैलेन हरिद्र या च नीराजनादिकश्च
कर्मकुर्यूः । अनन्तर मस्त्रेणाताड्य वर्मणाभूक्ष । वगुण्ठ्य
च साधारणेन स्वमन्त्रेण वा संपूज्य स्नपनमुपक्रमेत् गोमूत्र
गोमयं दुग्धदधिघृतमधुपश्च गव्येर्जलातुरैः
समुद्ररूपकल्पित क्षीरजलादि कुम्भैः
स्वस्वमूर्तिमन्त्राभिमन्त्रितैः संस्नाप्य चन्दनादिभिरालिप्येसु रक्ते
वाससी परिधाप्य नीराजनं कृत्वा कुशकुसुमजल
स्च्. १०)
* *? ततोमूलमन्त्रेण कुशमूले लिङ्गमूल सस्पृश्य शान्त
कुम्भाम्भ सा प्रोक्षयेत् । पुनरपि कुण्ड समीपगत्वा ओं हां
आत्मतत्व विद्यातत्वाभ्यां नमः । इति शुद्धाशुद्धरूपतया
तत्वसन्धान्धां कृत्वा विद्यातवमुस्थापयेत् । ओं हां विद्यातत्वाय
नमः । ओं हां विद्यातवाधिपतये विष्णुवेनमः इति सम्पूज्य
स्वाहान्तेनाहुति दानं विदध्यात् । ततो मूर्त्यष्टकं पृथक् पृथक्
विन्यस्य संपूज्याहुतिभिः सन्तर्प्य लिङ्गस
ओं हां अर्कमूर्तये नमः । ओं हां अर्कमूर्त्यधिपतये रुद्राय
नमः । ओं हां जलमूर्तये नमः । ओं हा जलमूर्त्यधिपतये भवाय
नमः । ओं हां वायुमूर्तये नमः । ओं हां वायुमूर्त्यधिपतये
ईशानाय नमः । ओं हां इन्द्रुमूर्तये नमः । ओं हां
इन्दुमूर्त्यधिपतये महादेवाय नमः । ओं हां ख मूर्तये नमः
। ओं हां खमूर्त्यधिपतये भीमाय नमः । इति
मूर्तिमूर्तिपान्विन्यस्य विष्णुरया संनिरुद्व्यानेन मार्गेण
लिङ्गस्योत्तरतः पिण्डिकायामपि तत्वविन्यासः कर्तव्यः ।
लिङ्गमूलस्थित ब्रह्मशिलायाश्च । किंत्वे तस्यां
क्रियाज्ञानेच्छाख्यमात्म तत्वाधिष्ठाधिपत्येन शक्तित्रयं
विन्यसेत् । ओं हां आत्मतत्वाय नमः । ओं हां आत्मतत्वाधियायै *
*यै नमः । ओं हां विद्यातत्वाय नमः । ओं हां विद्यातत्वाधियायै
ज्ञानशक्तये
* * *? ओं हां शिवतवाय नमः । ओं हां शिवत्वाधिपाये इच्छायै
नमः । साधकप्रतिष्ठायाश्च शुद्धविद्यादिशक्त्युक्तेऽध्वनि
भोगमिच्छोरनन्तादि मूर्तिधान् । अनन्तासूक्ष्म शिवोत्तम । एक नेत्र
। एक रुद्र । त्रिमूर्ति । श्रीकण्ठ । शिखण्डिन इति । पुरुषादि मायान्ते
शुद्धाशुद्धाध्वनि पुनर्मण्डलिनोऽङ्गुष्ठमात्र
प्रभृतीन्रूद्रानङ्गुष्ठमात्र भुवनेश । इशान । एक पिङ्गक्षण ।
उद्भव । भव । वावदेव । महातेज पर्यन्तान् । पृथिव्यादि
प्रधानान्ते अशुद्धेऽध्वनि पूर्वादिदिक्षु व्यवस्थितम् ।
शतरुद्राणामध्ये प्रधानमेकैकं क्ष्मादिमूर्त्यधियत्वेन
विन्यसेत् । तेषां नामानि । कपालीश । अग्निरुद्रयाम्य । निरिति । वल ।
शीघ्र । निधीश विद्याधिप इति । क्वचिच्चेन्द्रादयो मूर्तिपो
क्षुद्रकर्मणि भैरवाः । असिताङ्गौ रुरुश्चण्डः क्रोध उन्मत्त
भैरवः कपाली
क्षीरतिलसिद्धार्थ यवतण्डुलोपेतेनार्घणार्घमा *? चमनं
दत्वासूलमन्त्रेण सम्पूज्य हृदयेनोच्छाप्यरग्नेवारोप्य नगरं
पुरं प्रासादमण्डपं वा प्रदक्षिणी कृत्यं हिरण्यकास्य
वासांसि * * * * * *? द्वारेण मण्डपं स * * * * * *?
* * * * * * * * * * * * * ? सर्वगतस्मरन् सकल मध्य ध्वानत दारूढं
संचिन्त्यानन्तरं रत्नादिकं पञ्चकं विन्यसेत् तत्र पूर्वस्या
वज्रमाग्नेयया सूर्यभान्तं दक्षिणस्या नीलं नैरित्या महानीलं
पश्चिमायां मौक्तिकं वायव्यां पुष्परागं उत्तरस्यां
पद्मरागं ऐशान्यां वैदूर्यमिति विन्यस्य हेमताम्र कृष्टलोहत्र
पुरौप्यरीति काकान्स्य सीसकान्यपि देहशक्तिमनुस्मरन् । हरितालं
मनःशिलांगैरिक्यं सुवर्णमाक्षिकं पारदेहेमगैरिका
गन्धकं अभ्रकं
ऋएपत् उप् हेरे
भीषणश्चैव संहारश्चाष्टमः स्मृतः । पञ्चमूर्तिन्या स पक्षे
तु क्ष्मा वारिदहना निलाकाशाख्यं पूर्ववत्मन्त्रै मूर्ति
पञ्चकं विन्यस्य । ब्रह्मविष्णुरुद्र इश्वर सदाशिवाख्यं मूर्तीश
पञ्चकं । निवृत्त्यादि सहितं सद्योजातादि पञ्चकं वा
मुमुक्षोर्विन्यसेत् । गौर्यादि प्रतिष्ठायाश्च धारिका । दीप्तिमती ।
उग्राज्योस्ना । चेता वलोत्कटा धात्री । विस्वीति मूर्त्यधिपत्वेन शक्तयः
। भोगेच्छाः साधकस्यानन्तादयः । स्त्री पाठवशमाधन्ना
विद्याराज्या भवन्ति । पञ्चमूर्ति पक्षे तु । वामा ज्येष्ठा क्रिया
ज्ञानी इच्छा चेति । उग्र्यर्वा सांतमा मोहाक्षया निष्ठामृत्यू
माया? भयोजरा । पञ्चमूर्ति पक्षे तु । तमा मोहा घोरारत्यप
ज्वराः । एताश्च प्रणवादिस्व संज्ञाभिः संपूज्यान्तरं
कुण्डसमीपं गत्वा * * * * ? आधार शक्तये नम इति शक्तिं विन्यस्य
संपूज्याहुति त्रयं दत्वाऽत्म तत्वमुपस्थापयेत् । आत्मतत्वाय
नमः ।
* *? आत्मतत्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः । इति संपूज्य मूर्तियान्
विन्यसेत् । ओं हां क्ष्मा मूर्तये नमः । ओं हां क्ष्मा
मूर्त्यधिपतये शर्वाय नमः । इति संपूज्य
स्वाहान्तेनाहुतिभिस्तर्पयेत् । एवमनेनैव मार्गेण
मूर्त्यष्टकमधिपं सपूज्याहुतिभिस्तर्पयेत् । ततो लिङ्गसमीपगत्वा
आहुति सङ्ख्यया जपं विधाय मूर्तियैः सह तत्वाधिपमाज्ञां
श्रावयेत् । ब्रह्मन् यावद्दोष निर्मुक्तं लिङ्गं तावत्त्वया सन्निहितेन
शिवाज्ञयास्थातव्यं ततो मूलमन्त्रेण कुशमूलैर्लिङ्गमूलं
संस्पृश्य शान्ति कुम्भाम्भ सा प्रोक्षयेत् । पुनरपि कुण्ड समीपं
गत्वा ओं हां आत्मतत्व विद्या तत्वाभ्यां नमः । इति शुद्धाशुद्ध
रूपतया तत्व सन्धानं कृत्वा विद्यातत्वमुपस्थापयेत् । ओं हां
विद्या तत्वाय नमः । ओं हां विद्या तत्वाधिपतये विष्णुवे नमः । इति
सम्पूज्य स्वाहान्तेनाहुति दानं विदद्यात् । ततो मूर्त्यष्टकं
पृथक् पृथक् विन्यस्य संपूज्याहुतिभिः सन्तर्प्य लिङ्गस
स्च् १२)
ओं हां अर्क मूर्तये नमः । ओं हां अर्कमूर्त्यधिपतये रुद्राय
नमः । ओं हां * * * * ?
स्थाप्यमान्यस्थत वा मध्याच्च । तत्वा प्राच्या देशमा * * * * * * * ?
सूलमन्त्रेण शतद्वयत्रय वा जुहुयात् । शान्ता वैन्द्र्या दक्षिणा
गजं तदभावेकाञ्चनं गजं । अग्नेयादि शान्तीनां काञ्चनं
महिषं छागं मौक्तिकं पित्तलं धेनुं च जतं
क्रमेणस्थापकाय दत्वा पूर्णा च जुहुयात् । द्रव्या
भावेन्सर्वदिगाश्रिते चलने सम्पूज्य विज्ञाप्य
मन्त्रतर्पणायाष्टोत्तरशतं हुत्वा पूर्णाहुतिं
मीपं गत्वा मूर्तिपैः सहमूअं मन्त्रमुच्चारयेत् । कुशमध्येन
विष्णु विभागं संस्पृश्याज्ञां श्रावयेत् । विष्णो शिवाज्ञ
निर्दोषं लिङ्गं यावत्तावत्त्व या सन्निहितेन भाव्यं । ततः
शान्तिकुम्भाम्भसा संप्रोक्ष्य कुण्डसमीपं गत्वा ओं हां
विद्यातत्वशिवतत्वाव्यां नम इति तत्वसन्धानानन्तरं
शिवतत्वमुपस्थापयेत् । ओं हां शिवतत्वाय नमः । ओं हां
शिवतत्वाधिपतये रुद्राय नमः । इति सम्पूज्य स्वाहान्तेनाहुतिं
दत्वामूर्ति मूर्तिपान् विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् । ततोलिङ्गसमीपं
गत्वामूलाणुना कुशाग्रेणाग्र भागं संस्पृश्य शान्ति
कुम्भोदकेन संप्रोक्ष्याज्ञां श्रावयेत् । भोभो
रुद्रत्वयाव्यङ्गादि दोषनिर्मुक्तं यावत्तावच्छिवाज्ञया संनिहितेन
भाव्यं । एवं पीठ शिलादिषु तत्वशुद्धिं विधाय शतं
सहस्रमर्द्धं वा सद्योजातादिभिर्मन्त्रैः स्वस्वदिक्षु होमं
विधाय व्याहृतिभिर्यथा शक्तिहोम कृत्वा उत्थाय
* *? वस्य दक्षिण श्रवणे ज्ञानशक्त्या कर्मसमर्प्ययेत् ।
भगवताया भागत्रयेपि कर्मनिवर्तितं त्वत्प्रसादात्संपूर्णं
तां यात्विति संबोध्य भासुर मन्त्रमुच्चारयन् प्रासादं गत्वा
विघ्नानुच्छायं द्वारमध्य षट्विंशाधिकशतांशेन
ब्रह्मस्थानं परिहृत्य इशान दिगाग्रे तां ब्रह्मशिलां स्थापयेत् ।
ओं नमो व्यापिनि स्थिरे अचल ध्रुवलं ह्रीं लं स्वाहेति ब्रह्मशिलां
विन्यस्यस्थैर्य सर्वगतं स्मरन् सकलमध्य ध्वानं तदा रूढं
संचिन्त्यानन्तरं रत्नादिकं पञ्चकं विन्यसेत् । तत्र पूर्वस्या
वज्रमाग्नेयया सूर्यकान्तं दक्षिणस्या नीलं नैरित्या महानीलं
पश्चिमायां मौक्तिकं वायव्यां पुष्परागं उत्तरस्यां
पद्मरागं ऐशान्या वैदूर्यमिति विन्यस्य हेमताम्र कृष्ण
लोहत्रपुरौप्यरीति काकात्स्य सीसकान्यपि देहशक्तिमनुस्मरन् ।
हरितालं मनःशिलांगैरिकां सुवर्णमाक्षिकं पारदं
हेमगैरिका गन्धकं अभ्रकं
ऋएपत् उप् तो हेरे
स्च् १३ समे १४)
* * * * *त्र दत्वङ्गानि ततः । ओं सूविच्छक्तये नमः । इति
चिच्छक्तिव्यापकत्वे नैव विन्यस्य रुद्रभागाधस्तात् पीठे सर्वतः
क्रियाशक्तिं विन्यस्य निरोधयेत् । अथगोमय पिष्टोदि निर्मितैः ।
वज्रशक्ति दण्डखड्गपाश ध्वजगदाशूलैः स्वस्वमन्त्रैः
पाशुअतास्त्रेण वा निर्मत्स्य पद्म उत्पलकमलशङ्खनन्द्यावर्त
श्रीवत्स स्वस्तिका * *? घोरास्त्रेण निर्मत्स्य विधिवत् स्नानं विदध्यात् ।
ततश्चन्दनादिभिलिप्य नैवेद्यं दत्वा वाससा परिधाप्या
लङ्कारैरलं कृत्य धूपाट्यादिकन्दत्वा जपं
कृत्वायजमानद्यमीश्वरान्तं भगवते नामदत्वा प्रार्थयेत् ।
भगवत्सर्वदा संनिहितेन भवितव्यमेवं करोमीत्यनुज्ञातः
कुण्डसमीपं गत्वा शान्त्यर्थधायमेन मूलमन्त्रोमाम
मन्त्राभ्यां होममाचरेत् । ततो द्वितीयेऽह्नि विधि
संपादनार्थमच्छिद्रीकरणाय च पूर्वदक्षिणोत्तर
पश्चिमकुण्डेषु शिवास्त्रा घोरास्त्र पाशुपतास्त्र
मूलमन्त्रैराग्नेयादि
इति धातृन् । उश्रीरं विष्णुक्रान्तं रक्तचन्दनं कृष्णागरुं
श्रीखण्डमुत्पलसारिवा कुष्ठ सङ्गा पुष्पिका इत्यौषधीः ।
व्रीहिगोधूमतिलमाषमुङ्गय वनीवारश्यामाकान् पूर्वादि
क्रमेण विन्यसेत् । यद्वा समस्त रत्नानां वज्रं लोहानां सुवर्णं
धातूनां हरितालं औषधीनां सहदेवां वीजानां यवान् ।
एकं वा पारदं सर्वगर्तासुलोकपाल मन्त्रैर्विन्यस्य मध्यगर्ताया
हेममद्य कूर्मं वृषं गौरी वाद्यनन्त मन्त्रण संस्थाप्य
पायसेन विलिप्येवर्म जप्तवासमच्छाद्य लोकपालवलिन्दत्वा शिला
सूत्रत्युतिच्छिद्र निवारणायासिना शिवैन वा होमः कार्यः । ततो
महेश्वरमुत्थाप्य शिरसाऽर्घं दत्वा भगवन्तं सस्तुभ्य
जयशब्दादि मङ्गलः सतूर्य निर्घोषे रत्नकरस्वकं प्रक्षिपेत् ।
प्रासादं प्रदक्षणी कृत्यरीत्वा? द्वारस्व भ्रान्तरे रुद्रपीठे
समुत्तार्य स्थिरे भवेत्युक्त्वा ब्रह्मशिलास्व भ्रमस्त्रेणोद्घाट्य
यन्त्रेण प्रगुणं शक्तिशक्तिमतो ध्यात्वा ब्रह्मादिकारण त्यागेन
लयान्तं मन्त्रमुच्चार्य
सृष्टिमार्गेण विन्यस्य पीठबन्ध विधाय देवीमुद्बोधयेत् ।
ताञ्चसमानीय * *?स्वनः प्रगुणीकृत्य लग्नकालमवलोकयेत् । ततो ओं
ह्रीं क्रियाशक्तये उमायै नमः इति देवीमन्त्रमुच्चार्यस्यषु
मार्गेण विन्यसेत् । यदि च प्रगुणालग्नकालेन भवति चलनेन
दिग्भ्रान्तिर्भवति तदादिग्देवता होमो मूलमन्त्रेणास्त्रेण
वाऽष्टोत्तरशतिकः कर्तव्यः । तथालिङ्गं स्थाप्यमान स्थितं वा
मध्याच्चलित्वा प्राच्यादिशमाश्रयति तदैन्द्र्यादि शान्तीः कुर्यात् ।
तदनु च स्वस्वदिक्काल मन्त्रेण शतद्वयं त्रयं वा जुहुयात् ।
शान्ता वैन्द्र्यां दक्षिणागजं तदभावेकाञ्चनं गजं ।
आग्नेयादिशान्तीनां काञ्चनं महिषं भागं मौक्तिकं
पित्तलं धेनुं च जतं क्रमेण स्थापकाय दत्वा पूर्णा च
जुहुयात् । द्रव्या भावे सत्वदिगाश्रिते चलने सम्पूज्य विज्ञाप्य
मन्त्रतर्पणायाष्टोत्तरशतं हुत्वा पूर्णाहुतिं
स्च्. १४ सेम १५)
म २ ज्योति २ सुवोसुवः भुवोभुवः पाह्यमृतो हृद वगत्य त्रिभि ठं
पदय जुषां लक्ष्मीर्सोवः किरिकेयः करोति तमेवाघो विसतु महादेव
सुव्रते नमोनमः स्वाहा । प्रत्याङ्गरा ।। ० ।।* * * * * * * * * * * *?
प्रतिमानान्तु स्वेन स्वेन मूलमन्त्रेण च तुर्थिका कर्मकुर्यात् । एवं
दिन चतुष्टयं यावन्निर्माल्य । वगाहतादि दोषो नास्ति । चतुर्थेह्नि च
भगवन्तं संस्नाप्ये लोकपालवलिं दत्वा नैवेद्योदेर पनयनं
कृत्वाण्डं साध्याण्डं स्वा विसज्य लिङ्गमूर्तौ चण्डनाथं
पूज्यध्यात्वा नवाम्वुदा हासं चतुर्वक्त्रञ्चतुर्भुजं त्र्यक्षं
चन्द्रकलाचूतं दीप्ताम्यं फणिकङ्कणं शूलटङ्कोद्यतकरं
कमण्डेल्वक्षमालिनं महोरगोपवीतं च प्रसन्नार्तिविनाशनं ।
आत्मसु? प्राणपथा समानीय इशान्यामाधार शक्तिकमल
संस्थापयेत् । ततोलिङ्गं सस्नाप्ये साधारण विधिना यागं
विन्यस्याहुति समूलमन्त्रेण दत्यात् ।
उक्तानुक्तेष्वपि दोषेषु मूलमन्त्रेणास्त्रेण वा होमः कार्यः ।
ततोलिङ्गं पिण्डके प्राण्जले कृत्वा शिवेन साङ्गेन होम कृत्वा
विज्ञाप्य निर्दोषो भूत्वासर्जलोहमलादिना सन्विलपं विधाय
निरन्ध्र कृत्वा शान्तिकुम्भाम्भसार्द्धेन पञ्चमृतेन च
संस्नाप्य संपूज्यार्घं दद्यात् । ततो दक्षिण पाणिना
उत्सृताङ्गुष्ठां मुष्टिंवद्वापिण्डिकायां संस्थाप्य
लिङ्गमङ्गुष्ठेन संस्पृश्य लिङ्गस्य शिवरूपमभिधाय
पिण्डिकाया उमारूपतां संचिन्त्य ओं हौं शिवाय नमः । ओं ह्रीं
क्रियाशक्तये उमायै नमः । इति शिवोमामन्त्राभ्यां लिङ्गस्य
पिण्डिकाया सह वुभुक्षाः सन्धानं कुर्यात् ।
मुमुक्षोरुमामन्त्रपूर्वेण शिवमन्त्रेण । ततो
ब्रह्मविष्णुरुद्रभागेष्वात्मादि तत्वत्रयं माया सदाशिवशिवप्रा *
*? स्वाधियैः सह विन्यस्य आसनं मन्त्रान् पीठे मूर्तिमन्त्रं विद्या
देह सहितं लिङ्गे विन्यस्य ततो मूलमन्त्रेण व्याप
स्च्. १५)
इति धातून् । उशीरं विष्णु * * * * * * * * * * ?
संपूज्य बध्वायश्चित्तनित्तं पूर्वद्धोमः कार्यः ।। ० ।।
इति महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ द्वारं प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ।।
अथ हृत् प्रतिष्ठाविधिः । तत्र पूर्ववद्योग गृहमनुप्रविश्यमन्त्र
तर्पणान्तं कर्म कृत्वोत्त
कुण्डेषु वा घोरास्त्र सावित्रीं गायत्री प्रत्यङ्गिरा मन्त्रै पृथक्
पृथक् सहस्रं जुहुयात् । ततस्तृतीयेऽह्नि । ऐन्द्री आग्नेयी याम्या
नैरितीवारुणी वायव्या कौवेरी ऐशानीति शान्त्यष्टकाय स्वस्वमन्त्रैः
सहस्रं २ जुहुयात् । ततश्चतुर्थे दिवसे यथा शक्तिभगवन्तं
सम्पूज्य वागीश्वरी मन्त्रेण स्वब्रह्माङ्ग सहितेन प्रतिकुण्डं
सहस्रं २ हुत्वा च रुं संसाध्य देवाय निवेद्य प्रतिकुण्डं यथा
शक्ति जुहुयात् । तत्र मन्त्राष्टकं । ओं हः अस्त्रा फट् शिवास्त्रं । ओं
प्रस्फुर २ घोरघोरतर तनु सपचट् २ प्रचट २ कह ए वम २ घातय २
हूं फट् । अघोरास्त्रं । ओं श्लीं पशु हूं फट् ।। पाशुपतास्त्रं
। ओं व्योम व्योमाय विद्महे सूक्ष्म सूक्ष्मायधीमहे तन्ना रुद्रः
प्रचोदयात् । शिवसावित्री । ओं तन्महेशाय विद्महे
वाग्विशुद्धायधीमहे तन्नः शिवः प्रचोदयात् । शिवगायत्री ओं आं
इं ऊं रुद्रास्थि शृङ्खल हूं सर्वतो भद्र भद्ररूटि रुद्रवचन
विधारि रक्ष २ मांप्रत्यङ्गिरे
स्च्. १६)
प्त कटातव्यं । ओं हां शिवस्थिरां भव स्वाहा । ओं हां
शिवाव्यापको भव स्वाहा । ओं हां शिव अप्रमेयो भव स्वाहा । ओं
हां शिव अनादि बुद्धो भव स्वाहा ओं हां शिव नित्यो भव स्वाहा
। ओं हां शिव अविनश्वरो भव स्वाहा । ओं हां शिवतृप्तो भव स्वाहा
। इति नित्यदिधर्मान्वितस्य भगवतः । विधौकर्मसम्पूर्णार्थमाहुति
सप्तकं दातव्यं । ततः कृताकृतकर्मपूर्णार्थं शतं
सहस्रमर्द्धस्वा अघोरास्त्रेण पाशुपतास्त्रेण वा होमः कर्तव्यः ।।
० ।।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
लिङ्ग प्रतिष्ठाविधः समाप्तः ।।
अथ द्वारप्रतिष्ठाविधिस्तत्र पूर्ववत् द्वारपालध्वजादि
मन्त्रतर्पणान्तं कर्मकृत्वा द्वाराङ्गानि कथायादिभिः
संस्नाप्य रक्तवस्त्र युग्मेन संच्छाद्य शययायां सम्यरोप्य अधो
दुम्बरे मायान्तं तत्व व्रातमात्मत व्याप्तमूर्द्ध विग्रह
शक्त्यन्तं विद्यातत्व व्याप्तं सर्वञ्च शिवतत्व व्याप्तं भावयित्वा
मूर्ति
न्यास विधाय पूर्वद्कल्मकुशादिना प्राकारत्रयेणरक्षणादिकं
विधाय कुण्डसमीपं गत्वा । अथ शुद्धिं कृत्वा द्वार प्रदेशे
वास्तु संपूज्य रत्नादि पञ्चकं विन्यस्य प्रणवासनं दत्वा
प्रणवेन द्वारविन्यस्य यव सिद्धार्थक वृक्रान्ता वृद्ध्यद्व्यमृता
मोहना । गोशृङ्गमृद्वरदात्पल कुष्ठतिला रग्?बध
लक्ष्मणारोधनात्महदेवादधि पूर्वति द्रव्यसमूह चित्रकर्पटे
बद्धोर्द्धादुम्बरे बन्धयेत् । ततः स्थिरो भवेत् पाद्याहुति सप्तकं
दत्वा शाखासुनन्दि महाकालौ गङ्गायमुने ऊर्ध्वोदुम्बरे
गणेश श्रियञ्चेति देवता षट्कं विन्यस्य शिवाज्ञया संनिरोध्य
संपूज्य रध्वा पश्चित्तनित्तं पूर्ववद्धोमः कार्यः ।। ० ।।
इति महाराजाधिराज परमेश्वर श्रीभोजदेव विरचितायां
सिद्धान्तसारपद्धतौ द्वारप्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ।। अथ
हृत्प्रतिष्ठाविधिः । तत्र पूर्ववद्याग गृहमनु प्रविश्यमन्त्र
तर्पणान्तं कर्म कृत्वान्त
कुण्डेषु चाघोरास्त्र सावित्रीं गायत्री प्रत्यङ्गिरामन्त्र पृथक्
पृथक् सहस्रं जुहुयात् । ततस्तृतीयऽग्नि । ऐन्द्री आग्नेयी याम्या नैरिती
वारुणी वायव्या कौवेरी ऐशानीति शान्त्यष्टकाय स्वस्वमन्त्रैः
सहस्रं २ जुहुयात् । ततश्चतुर्थि दिवसे यथा शक्ति भगवन्तं
सम्पूज्य वागीश्वरी मन्त्रेण स्वब्रह्माङ्ग सहितेन प्रतिकुण्डं
सहस्रं २ हुत्वा चरुं संसाध्य देवाय निवेद्य प्रतिकुण्डं यथा
शक्ति जुहुयात् । तत्र मन्त्राष्टकं ।
स्च्. १७ सेम १८)
* * * * * * * * * * * * ? कालति यामि कस्य साध्यसाधकत्वेनाङ्गुष्ठ
मात्र * * * * * * * * * *? विन्यस्य सरुप्य च त्रिखण्डमध्वानां माया
सदाशिव शिवप्रान्तं भावयेत् । ततो रक्षां कृत्वा कुण्डसमीपं
गत्वा ओं हां आधार शक्तये नमः । इति शक्ति न्यासादनन्तरं
कल्पदि तत्वव्रातं विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् । ततो होम संख्यया
जपं विधायाज्ञां श्रावयेत् । कालाधिपश्च तत्वेन सहशिवाज्ञया
प्रासाद स्थिति पुरा? स्थातव्यमित्यनेन मार्गेण परान्तं निरोधयेत् ।
ततः शुकन्य सार्द्ध गर्भ गृहके खट्वायां हेमाद्येकतमं * *
* ? विन्यस्य * * *?
* वेदिकायां यथा विभवं हेम मयं पुरुषं कृत्वा
पञ्चगव्यादिनासंस्नाप्य चन्दनादिना विलिप्य वस्त्रैराच्छाद्य
मण्डपमानीय शयया संस्थाप्य प्रलया कलमेकं शिवाज्ञा
पदवोधितं द्वादशान्तात् समानीय ओं हां हं हां आत्मन्
शिवाज्ञया त्वयात्रशरीरे स्थातव्यमिति रेचकेन विन्यस्याति वाहिकं
देहं न्यसेत् । ओं हां कलायै नमः । ओं हां कलाधिपतये नमः ।
कलाधिपास्य कर्तृत्व व्यक्तिं कुरु २ । ओं हां विद्यायै नमः । ओं
हां विद्याधिपतये नमः । विद्याधियास्य ज्ञानाभिव्यक्तिं कुरु २
। ओं हां रागाय नमः । ओं हां रागाधिपतये नमः ।
रागाधिपास्य विषयेषु राग कुरु २ । ओं हां प्रकृत्यै नमः । ओं हां
प्रकृत्यधिपतये नमः । प्रकृत्यधिपस्वाधिकार पूरकत्वमस्य कुरु
२ । ओं हां वुद्ध्यै नमः । ओं हां वुद्ध्यधिपतये नमः ।
वुद्ध्यधिपास्य वोधं कुरु २ । ओं हां अहङ्काराय नमः । ओं हां
अहङ्काराधिपतये नमः । अहङ्कारास्याभि
२ । ओं हां मनसे नमः । ओं हां मनोधिपतये चक्षुय नमः ।
मनोधिवास्य सङ्कल्पं कुरु २ । ओं हां श्रोताभ्या नमः । ओं हां
* * * * * *? नमः । शोत्राधिपास्य शब्दग्रहकत्वं कुरु २ । ओं हां
त्वच नमः । ओं हां त्वगङ्कल्पविकाधिपतये वायवे नमः ।
त्वगधिपास्य शब्दमोहक? त्वं कुरु २ । ओं हां चक्षुषे नमः । ओं
हां चक्षुरधिपतये अर्काय नमः । चक्षुरधिपास्य रूपग्राकत्वं
कुरु २ । ओं हां जिह्वायै नमः । ओं हां जिह्वाधिपतये वरुणाय
नमः । जिह्वाधिपास्य रसग्राहकत्वं कुरु २ । ओं हां घ्राणाय
नमः । ओं हां घ्राणाधिपतिभ्याम * ?भ्यां नमः
घ्राणाधिपास्य गन्धग्राहकत्वं कुरु २ । ओं हां ः । ओं हां
वागधिपतये अग्नये नमः । वागधिपास्य वाच कुरु २ । ओं हां
पाणिभ्यां नमः । ओं हां पाण्यधिपतये इन्द्राय नमः ।
पाण्यधियास्य पदार्थ ग्राहकत्वं कुरु २ । ओं हां पद्यां नमः
। ओं हां पदाधिपतये विष्णु
स्च्. १८)
नावगुण्ठ्य तत्वा * * * * * * * * * * * * * * * * *ज्य? अघोरास्त्रं ओं
प्रस्फुर २ घोरघोरतरतनु रू * * * * * ? अस्त्राय नमः । ओं प्रस्फुर २
* *? । फट् हृदयाय नमः । ओं घोरघोरतर हूं फट् शिरसे नमः
।ओं तनुरूप हूं फट् शिखायै नमः । ओं चत २ प्रचट २ हूं फट्
* * *?नमः । ओं कह २ वम २ घातय २ हूं फट् अस्त्राय नमः ।
ध्वजञ्च जङ्घार्द्ध लम्बिजघान्तं
वे नमः । पादाधिपास्य गमनोत्साहं कुरु २ । ओं हां पायवे
नमः । ओं हां पाद्यधितये मित्राय नमः । पाद्यधिपास्या * * * * *
* * *? नमः । ओं हां उपस्थाधिपतये ब्रह्मणे नमः ।
उपस्थाधिपास्या नन्दं कुरु २ । ओं हां शब्दाय नमः । ओं हां
स्पर्शाय नमः । ओं हां रूपाय नमः । ओं हां रसाय नमः । ओं
हां गत्वाय नमः । ओं हां आकाशाय नमः । ओं हां
आकाशाधिपतये सदाशिवाय नमः । ओं हां वायवे नमः । ओं हां
वाद्यधिपतये इश्वाराय नमः । ओं हां तेजसे नमः । ओं हां
तेजोधिपतये रुद्राय नमः । ओं हां अङ्ग्यो? नमः । ओं हां
अवधिपतये विष्णुवे नमः । ओं हां पृथिव्यै नमः । ओं हां
पृथिव्यधिपतये ब्रह्मणे नमः । एवं तत्व व्रातं विन्यस्य
नाडीदशकं वायुदशकञ्च विन्यसेत् । ओं हां इडायै नमः ओं
हां पि * *यै नमः । ओं हां शुष्टम्नायै नमः । ओं हां शावित्र्यै
नमः । ओं हां शङ्खिन्य नमः । ओं हां कुह्वै नमः । ओं हां
यशोवत्यै नमः । ओं हां हस्तिजिह्वायै नमः ।
ओं हां पुष्णायै नमः । ओं हां लड्डुषायै नमः । ओं हां
अधानायै नमः । ओं हां समानाय नमः । ओं हां उदानाय
नमः । ओं हां व्यानाय नमः । ओं हां नागाय नमः । ओं हां
कूर्माय नमः । ओं हां कृकराय नमः । ओं हां देवदत्ताय
नमः । ओं हां धनञ्जयाय नमः । इति माया स्वाधिकारत्वेन
कालति यामिकेस्य साध्यसाधकत्वेनाङ्गुष्ठमात्र प्रभृति मन्त्रैः
सहस्र प्रेरकत्वेन व्यापकत्वेन च भगवन्तं विन्यस्य संरुध्य च
त्रिखण्डमध्वानां माया सदाशिवशिव प्रान्तं भावयेत् । ततो
रक्षां कृत्वा कुण्डसमीपं गत्वा ओं हां आधार शक्तये नमः ।
इति शक्ति न्यासीदनन्तरं कल्पदितत्व व्रातं विन्यस्याहुतिभिस्तर्पयेत् ।
ततो होमसंध्यया जपं विधायाज्ञां श्रावयेत् । कालाधिपश्च
तत्वेन सह शिवाज्ञया प्रासाद स्थिति पुर्यन्तं स्थातव्यं मित्यनेन
मार्गेण परान्तं निरोधयेत् । ततः शुकन्यसोर्द्ध गर्भगृहके
खट्वायां माद्येकतमं कुम्भ मूर्तिभतं विन्यस्य घृत
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
Pद्f ४
स्च्. १ सेम २, ३)
तयालितय * * * * * * ? णिकारहित वक्त्रविकराल भीषण दोष दु
धुभ्यामापूर्य रत्नादि पञ्चकं विनासा चन्दनादिना विलिप्य
सुशुक्ले वाससी परिधाप्य तत्र पुरुष न्यसेत् । पुनः कुण्ड * * * *?
गत्वा प्रायश्चित? मं विधाया चार्याणां यथा
शक्त्यदक्षिणादिकं दत्वा भगवन्तं क्षमापयेत् ।। ० ।।
इति श्री महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसार
पद्धतौ हृत्प्रतिष्ठाविधिः समाप्तः ।।
इदानीं चूलकादि प्रतिष्ठाविधिस्तत्र पूर्ववत् मण्डले द्वारपाल
पूजादिमन्त्रतर्पणान्तं कर्म कृत्वान्तर वेदिकायां चूलक
दण्डौ शूलञ्च संस्नाप्याधि वासनमण्डपै समानीय
शययायां विन्यस्य लिङ्गवत्तत्व न्यासं विदध्यात् । लक्षणोद्वारञ्च
तुर्थिको होमञ्चण्ड कल्पनान्विहाय यथा लिङ्गे विधिः कृतस्तथा
त्रापिकरणीयः । किन्तु मूर्ति वक्त्राङ्गन्यास विशेषाध्व क्रियाजि?तः ।
ततः प्रासादे तत्व न्यासः । जङ्घायामात्म तत्वं कण्ठान्तं
विद्यातत्वं कण्ठादूर्द्धं शिवतत्वं विन्यस्यै तत्वाधिय
मूर्तिमूर्तिपान् विन्यस्य?
चूलक प्रासाद विन्यस्त तत्वादिषु तिलघृतानुमारणाहूतिर्दत्वा
प्रतिभागञ्च जप स्पर्शो विधायचूलका धाररत्नादि पञ्चकं
पूर्ववद्विन्यस्य चूलकं स्थापयेत् । ततः कालोपरित
फलैर्घटमापूर्य प्रासादस्य फलस्नानं विदध्यात् । ततो
दण्डध्वजा वस्त्रेण संप्रोक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य तत्वादिन्यासं
विधाय होमं कृत्वा जप स्पर्शो
निर्वर्त्यध्वजाधारे षडुत्थमासनं दत्वा मूर्ति भूतदण्डं
विन्यस्यास्त्रं साङ्गं सम्पूज्य । अघोरास्त्र ओं प्रस्फुर २
घोरघोरतर तनुरूप पचट २ प्रचट २ कह २ वम २ घातय २ हूं
फट् अस्त्राय नमः । ओं प्रस्फुर २ हूं फट् हृदयाय नमः । ओं
घोरघोरतरहूं फट् शिरसे नमः । ओं तनुरूप हूं
फट्शिखायै नमः । ओं चट् २ प्रचट हूं फट् कवचाय नमः । ओं
कह २ वम २ घातय २ हूं फट् अस्त्राय नमः । ध्वजञ्च
जङ्घार्द्ध लम्बिजङ्घान्तं
वे नमः । पादाधिपास्य गमनोत्साहं कुरु २ । ओं हां पायवे
नमः । ओं हां पाद्यधिपतये मित्राय नमः । पाद्यधिपास्यात्सर्ग
कुरु २ ।? ओं हां उपस्थाय नमः । ओं हां उपस्थाधिपतये ब्रह्मणे
नमः । उपस्थाधिपास्यानन्दं कुरु २ । ओं हां शब्दाय नमः । ओं
हां स्पर्शाय नमः । ओं हां रूपाय नमः । ओं हां रसाय
नमः । ओं हां गन्धाय नमः । ओं हां आकाशाय नमः । ओं हां
आकाशाधिपतये सदाशिवाय नमः । ओं हां वायवे नमः । * * * * * *
* * * * * * ?यै नमः । ओं हां * * * * * * * * ?
दण्डप्रमाण वा दण्डे संयोज्या घोरं पाशुपतं शैवं वा
महास्त्रं विन्यस्य गन्धादि ब्रह्म शिरसा । ओं परमेश्वर पराय
ब्रह्माशरस? नमः । * * र्व योगाधिकृताय विद्याधिपाय नमः । इति
विद्याधिपे नैवा गन्धं । ओं ज्योतिरूपाय रुद्राण्यै नमः । पुरुष्.य?
तेन नैवेद्यं । ओं गोप्त्रे पुरुष्.य?ताय नमः । ओं प्रमथ प्रमथ
पाशुपताय नमः । विद्याङ्गानि वलि कर्म हृदाहृतन्तेन
मन्त्रसमूहेन निर्वर्त्य रूप ध्यायेत् । सूर्यसहस्राभं
प्रलयाम्वुद निस्वनं प्रदीप्त दशनप्रान्तं
प्रकाशमुखकन्दरं त्र्यक्षं ततिल्लता जिह्वं
दीप्तभ्रूमाणामूर्द्धजं । सर्पोपवीत शूलासि
शक्तिमुद्गरधारिणं । चतुर्भुजं चतुर्वक्त्रं स्फुरच्चन्द्रार्द्ध
शेखरं । देवदानवदैत्यानादर्पितानां विमर्दनं ।। तत इश * *?
मण्डलकं कृत्वा कुम्भं विन्यस्यतलिकायां महाध्वजं
प्रासायति प्रमाणेन
* * * * * *? प्रदक्षिणा विधाय सपिण्डिकं लिङ्गं वेष्टयेत् ।
यावन्तस्तन्तवस्तेषु वरवर्णिनि । तावद्वर्ष सहस्रा * * * * *? मही * * * ?
त्यदानि कुरुते ध्वजपाणिः प्रदक्षिणां । तावद्वर्ष सहस्राणि
कर्तुर्भोग भुजं फलं । ततः कुण्डसमीपमागत्य प्रायश्चित्त? *
* *? विधाया व भृथ स्नानं कृत्वा आचार्याणां दक्षिणां दत्वा
क्षमापयित्वा विसर्जयेत् ।। इति महाराजिधिराजश्रीभोदेव विरचितायां
सिद्धान्त सार पद्धतौ ध्वज प्रतिष्ठा विधिः समाप्तः ।। अथ
जीर्णोद्धार विधिस्तत्र खण्डित स्फुटित भग्नवलित वालित पतित पातित
जीर्णदग्ध अनंशसर्भ? ब्रणदूषितान्यूनाधिक मानोत्मान
अभिचारार्थ प्रतिष्ठित पिण्डिकारहित वक्त्र विकराल
भीषणदोषदुष्टमन्त्रा सन्निधानात्
स्च्. ४ सेम ५)
* * *? मूर्ता च मूर्त्यादिमन्त्रान् ज्ञानशक्त्या सहन्यासक्रमेण
शिवसाङ्गञ्च विसर्जयेत् । सतिचण्डेश्वरे चण्डेश्वरञ्च * * * * * * * * ?
स्त्रान्ति मन्त्रिते संख्यात्वा हेम पाशयारज्जा शिखया लिङ्गं
बद्ध्वा वृषस्कन्धतां संयोज्य लोकैः सहशिवमस्थिति * * * * * * * * *
? लिङ्गमगाधाम्भसि शिखया क्षिपेत् । मृन्मय रत्नजञ्च
अग्निदग्धं परिरत्नजं स्वतेज सान विमुक्तश्चेत् * * * * * * * *?मपि
शिवाग्नाव घोरेण दर्ह्येत् । सुवर्णादि लोहमयुत देव समग्र कृत्वा
तथैव स्थापयेत् । अनेनैव * * * * * * * ? विसर्जयेत् । प्रासादेवाय विशेषः
। प्रासादमन्त्रान् खड्ग संयोज्य लिङ्गं सरक्ष प्रासान नि * * * * * *
* * *?देव खड्ग स्थान् मन्त्रान् सां हृत्य समुदायेन यथा स्थानं
मन्त्रन्यासः । * * * * * * * * ?
* * * * * * *? मस्त्रेणा विधाय पूर्णाञ्च हुत्वा । आचार्याणा दक्षिणा
दत्वा कुमस्वेति विसर्जयेत् । * * * * * * * * * * *? तदाकारं
मन्यलिङ्गादिकं यथोक्त विधिना प्रतिष्ठापयेत् ।। ० ।। येषा क्रमेण
नित्या जा * * * * * * * * * * * * *? मुत्तितिर्थणां नावानोरिव निर्मिता ।। ० ।।
यद्वि प्रकीर्णमति विस्तृतमस्फुटार्थ नित्यादिकर्म विधि * * * * * * * *?
मश्वरेण । तत्सङ्गतञ्च लघुचापि परिस्फुटञ्च श्रीभोजदेव जगती
पतिना ताधायि ।।
इति महाराजाधिराज श्रीभोजदेव विरचितायां सिद्धान्तसारपद्धतौ
जीर्णोद्धारविधिः समाप्तः ।। सम्वत् आल ज्येष्ठ कृष्ण
* * *सद्यनामधिष्ठा नमतस्तथा भूतं लिङ्गमुद्धृत्य
लिङ्गान्तरं प्रतिष्ठापयेत् । पिण्डिकाञ्च लिङ्गोक्त दोषदुष्टां
समुद्धृत्या न्या निवेशयेत् । प्रतिमाञ्च पूर्वोक्त दोषदुष्टां
कर्णाद्यवयव हीनाञ्चोद्धृत्योन्या स्थापयेत् । तत्र वहिर्देव कुलस्य
दक्षिणादिशि स्थण्डिले प्रणवासनं दत्वा । ओं व्यापकेश्वर एह्येहि
नमः । ओं व्यापकेश्वर हृदयाय नमः । ओं व्यापकेश्वर शिरसे
स्वाहा । ओं व्यापकेश्वर शिखायै वौषट् व्यापकेश्वर कचाय हूं
। ओं व्यापकेश्वर नेत्राय वषट् । ओं व्यापकेश्वर अस्त्राय फट् ।
एवमङ्ग सहितं भगवन्तं सम्पूज्य मन्त्रत * * * * *?
पूर्णाहुतिन्दत्वा पायसेन घृतेन च लिङ्गिनो द्विजाश्च भोजयित्वा
दिग्वलिञ्च दत्वा भगवन्तं विज्ञापयेत् । भगवन् लिङ्ग
* * * * *? य प्रवृत्तिमामवत्ष्ठन्त परमेश्वरः ।। एवं कुर्विति
लब्धानुज्ञः क्षीराज्यं मधु * * * * * ** *चरेत् । ततो लिङ्गस * * * *?
सहस्रं हुत्वा पुनरपि मया संस्थापनं कर्तव्यमिति शतं
पूर्वोक्त द्रव्यैः पायसेन वा जुहुयात् । सुवर्ण पुष्पसहस्रेण लिङ्ग
ध्व * * *? कुर्यात् । ततो लिङ्गसमीपं गत्वा लिङ्गं संस्नाप्य
संपूज्य लिङ्गस्थं सत्व श्रावयेत् । लिङ्गरूपमास्थाय येनेदं
लिङ्गमधिष्ठितं । सश्रीघ्रं लिङ्गत्यक्त्वा शिवाज्ञया समीहितं
स्थानं यायात् । अत्रावस्थाने विद्या विद्येश्वरै युतः
शिवाऽधिष्ठानं करोतु । एवमुक्त्वा शिवास्त्रेणार्घन्दत्वा
लिङ्गस्थितं पिशाचादि विसर्जयेत् । ततः पाशुपतास्त्रेण लिङ्गं
ब्रह्मादिभागत्रये सहस्रं हुत्वा शान्ति कुम्भाम्भ मासं
प्रोक्तप्राणैः संस्पृश्य होमसंख्यया जपं कृत्वा
विलोमार्घञ्च दत्वा मूर्तिमूर्त्याधिप तत्वतत्वाधिप क्रियाशक्ति
पीठमता न
स्च्. ६, सेमे ७)
* * * * * ? वत सज नाग साधकुम्भश्च । इडा चा * *? तथैव च ।।
इन्द्रमूलं । उल्कं च । ऊस्मादौ । * * * * * * * *? पादान् एकदन्तिन ।
ऐराव तत्व ओञ्वञ्च ऌ औ वीजननन्तथा ।। ऋन्नन्तं ।। मोहं वाहचे
षोडष क्षेत्रपालकाः * * * * *? अतः परं ।। कम्वल खरिसानञ्च
गोमुखं ण्डमेव च । उलनश्चन्द्र वा * चच्छ झटो ज झट् लक्ष * *?
स्तथा * * *? तासीति तस्य न ढ ट कर्ण णदीपे कृत सिता तथा ।।
दन्तरावनदष्ठैव नाग * * * वा * * * * * * *?भेद्यतासन ।।
युगान्तानी र * चंचलस्यष्ट कलसस्तै * * ।। शुष्कङ्त्रणय * * * * *?
* * * * * * * * * * * * * सयो नमः । रजा रक्षारभिः पाल्या * * * * *? च
भ्रामणीयोन्तनी ज्वरा वामदेवस्य कलात्रयोदश नाभिस्थाय नमो
नमः । सिद्धिरिद्धिद्युतिलं क्ष्माये पान्दान्दिः? स्व वायुभा ।
सद्योजात कला अष्टजंघस्थाय नमोनम * * * *? सन्मुखं देवं
पतये भुमितं पठेत् ।? * * * * * * * *? कथं
</poem>
== स्रोतः ==
*[https://muktalib7.com/DL_CATALOG_ROOT/digital_library.htm मुक्तबोधपुस्तकालयः]
[[वर्गः:तन्त्रग्रन्थाः]]
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