विकिपीडिया awawiki https://awa.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE MediaWiki 1.47.0-wmf.13 first-letter मीडिया खास बातचीत यूजर यूजर बातचीत विकिपीडिया विकिपीडिया बातचीत फाइल फाइल बातचीत मीडियाविकी मीडियाविकी बातचीत खाँचा खाँचा बातचीत मदद मदद बातचीत श्रेणी श्रेणी बातचीत TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk प्रिन्स एंड संजय ज्वेलर्स 0 10321 36420 36411 2026-08-04T15:00:41Z BlueSkyWalker 5484 36420 wikitext text/x-wiki प्रिन्स एंड संजय ज्वेलर्स उत्तराखंड के कुमाऊँ इलाका मा स्थित एक भारतीय गहना कारोबार अउर सुनार व्यवसाय हय। ई कारोबार सन् १९५६ मा शुरू भवा रहा। इहाँ परंपरागत कुमाऊँनी अउर गढ़वाली गहना बनावा अउर बेचा जात हैं, साथे-साथ ग्राहकन के पसंद के मुताबिक खास तौर पर बनवाए गहना भी उपलब्ध अहैं। एह कारोबार के भौवाली अउर हल्द्वानी मा खुदरा दुकानन अहैं। jvgw5hjla2m42ouzqq283u3muppr1wq 36421 36420 2026-08-04T15:23:17Z BlueSkyWalker 5484 ज्ञानकोश 36421 wikitext text/x-wiki उत्तराखंड मा आभूषण शिल्प कै इतिहास, सामाजिक संरचना अउर क्रमिक विकास, उत्तराखंड के कुमाऊँ अउर गढ़वाल क्षेत्र मा धातु अउर आभूषण शिल्प कै इतिहास कवनो साधारण कला नाहीं, बल्कि ई मध्यकालीन सभ्यता कै एक अमूल्य अंग हय। कत्यूरी राजवंश, चंद राजवंश अउर पंवार राजवंश के शासनकाल मा एह पहाड़ी भूभाग मा स्वर्ण कला अउर धातुकला क बड़ राजकीय आदर अउर संरक्षण मिला रहा। मध्यकाल के राजा-महाराजा लोगन के दरबार मा विशिष्ट जौहरियन अउर स्वर्णकारन (जिंका स्थानीय भाषा मा 'सुनार' कहा जात हय) कै बड़ पूछ-परख रही। ई कारीगर केवल राजपरिवार, राजदरबार के उच्चाधिकारियन अउर सेनानायकों बरे बहुमूल्य धातुओं से अत्यंत महीन, जटिल अउर अलौकिक आभूषण तैयार करत रहेन।प्रारंभिक दौर मा, आभूषण केवल देह क सुंदरता बढ़ावे कै साधन नाहीं रहा, बल्कि ई समाज मा किसी भी व्यक्ति के सामाजिक स्तर, ओकर कुल कै आर्थिक संपन्नता, ओकर धार्मिक निष्ठा अउर ओकर जनजातीय अस्मिता कै प्रमुख परिचायक रहा। उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी इलाका मा निवास करे वाली विभिन्न जनजातियन जइसे—भोटिया, राजी, जौनसारी, थारू अउर बुक्सा—के आभूषणन क बनावट, भार अउर ओकर मूल स्वरूप एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न रहा हय। ई भिन्नता उनकर अलहदा सांस्कृतिक पहचान क रेखांकित करत रही। प्रारंभिक दौर मा, आभूषण केवल देह क सुंदरता बढ़ावे कै साधन नाहीं रहा, बल्कि ई समाज मा किसी भी व्यक्ति के सामाजिक स्तर, ओकर कुल कै आर्थिक संपन्नता, ओकर धार्मिक निष्ठा अउर ओकर जनजातीय अस्मिता कै प्रमुख परिचायक रहा। उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी इलाका मा निवास करे वाली विभिन्न जनजातियन जइसे—भोटिया, राजी, जौनसारी, थारू अउर बुक्सा—के आभूषणन क बनावट, भार अउर ओकर मूल स्वरूप एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न रहा हय। ई भिन्नता उनकर अलहदा सांस्कृतिक पहचान क रेखांकित करत रही।इन आभूषणन पर उकेरी जाय वाली आकृतियाँ अउर नक्काशी पूरी तरह से स्थानीय वन्य जीवन अउर भौगोलिक परिवेश से प्रेरित होत रही। आभूषणन पर सूर्य, चंद्रमा, पीपल कै पत्ता, मयूर, गेहूं कै बाली, अउर विभिन्न पहाड़ी जंगली फूलन कै आकृतियाँ मुख्य रूप से बनाई जात रही। इन आकृतियन क केवल सिंगार नाहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से अत्यंत शुभ, मंगलकारी अउर अदृश्य बाधाओं से रक्षा करे वाला कवच माना जात रहा। पारंपरिक आभूषणन कै विस्तृत वर्गीकरण अउर बनावटउत्तराखंड के कठिन भौगोलिक परिवेश, वहाँ के पारंपरिक पहनाव अउर ऋतुओं के अनुसार मानव शरीर के अलग-अलग अंगन बरे विशिष्ट आभूषणन कै विकास भवा। इनकर अंग-वार विस्तृत वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से अहय: नासिका आभूषण (नाक के आभूषण)नथ (नथुली): ई उत्तराखंड के संपूर्ण सांस्कृतिक पहचान कै मुकुटमणि हय। ई शुद्ध स्वर्ण से बनी एक बहुत विशाल गोलाकार बाली होत हय, जेहपर हाथ से अत्यंत बारीक अउर सघन नक्काशी कीन जात हय। किसी भी वैवाहिक उत्सव, यज्ञोपवीत या अन्य मांगलिक अनुष्ठान मा विवाहित मेहरारू लोगन बरे एका पहिनब अनिवार्य अहय। गढ़वाल कै 'टिहरी नथ' अउर 'कुमाऊँनी नथ' अपने असाधारण बड़े अकार, अधिक भार, अउर कीमती मोतियन अउर मणियों के जड़ाव बरे पूरे देश मा विख्यात अहैं। ई कन्या के ननिहाल अउर ससुराल के गौरव कै प्रतीक मानी जात हय।बुलाक: ई सोने से निर्मित एक लटकनदार आभूषण होत हय, जेका नाक के मध्य भाग (नासापट्ट) क सुई से छेदिके पहिना जात हय। एह आभूषण पर अत्यंत सुंदर ज्यामितीय रेखाएँ अउर सूक्ष्म बिंदू उकेरे जात अहैं, जो मेहरारू के मुखमंडल क एक अत्यंत विशिष्ट अउर गंभीर पारंपरिक रूप प्रदान करत हय।फुल्ली अउर लौंग: ई दैनिक जीवन मा नाक के दाहिने या बाएं छिद्र मा पहिने जाय वाले छोटे सोने के आभूषण अहैं, जेहमा बीच मा कोई रंगीन पत्थर जड़ा होत हय।ख. कंठ आभूषण (गले के आभूषण) गुलबंद (गलबंध): ई एक अत्यंत सुंदर अउर विशिष्ट प्रकार कै कंठहार (गले से सटा हुआ हार) हय। एका बनावे कै तकनीक बहुत अनूठी अहय; सबसे पहले मखमल या मोटे सूती लाल कपड़ा कै एक मजबूत पट्टी तैयार कीन जात हय। ओकरे ऊपर सोने के चौकोर या आयताकार छोटे-छोटे टुकड़ों (दानों) क रेशमी धागा के मदद से बहुत घनी अउर मजबूत सिलाई कइके मढ़ा जात हय। ई सीधे गला क पूरी तरह से ढक के रखत हय।हंसुली (खगवली): ई आभूषण मुख्य रूप से शुद्ध चाँदी या भारी सोने से बनी एक ठोस, वजनी अउर अर्ध-चंद्राकार गोलाकार छड़ होत हय। एहके दोनों सिरा आपस मा जुड़े नाहीं होत, बल्कि आगे के ओर मुड़िके गोल घुंडी जइसन आकार बनावत अहैं। ग्रामीण अंचल मा एका नारी के शारीरिक सुरक्षा अउर ओकर सुहाग कै परम प्रतीक माना जात हय।चंद्रहार अउर सिक्कामाला: ई चाँदी के पुराने सिक्कों या सोने के गोल टुकड़ों क एक लंबी कतार मा पिरोकर बनावा जाय वाला एक भारी हार हय, जो कंठ से शुरू होइके छाती के निचले हिस्से तक लटकत हय।ग. हस्त अउर कर्ण आभूषण (हाथ अउर कान के आभूषण)पहुँची: ई कलाई मा पहिना जाय वाला एक परम पारंपरिक आभूषण हय। एहके निर्माण मा एक विशेष बुद्धिमत्ता कै प्रयोग कीन जात हय; सोने के छोटे-छोटे खोखले दानों के भीतर 'लाख' (एक प्रकार क प्राकृतिक गोंद या राल) भरी जात हय, जेहसे भारी दबाव पड़ने पर भी सोने क दाना पिचकब नाहीं। इन तैयार दानों क लाल रंग के मोटे रेशमी कपड़ा के पट्टी पर पंक्तियों मा सिला जात हय। एका सौभाग्य अउर वंश वृद्धि कै सूचक माना जात हय।धगुला (खंडवे): ई चाँदी से निर्मित एक अत्यंत सादा, भारी अउर मोटा कड़ा होत हय। एका केवल मेहरारू ही नाहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों मा पुरुष भी अपनी कलाई मा आत्मरक्षा अउर शारीरिक दृढ़ता बरे पहिनत अहैं।मुर्खली, तुग्याल अउर कानफूल: कान के ऊपरी हिस्से क छेदिके पहिने जाय वाली मुर्खली अउर कान के लौ मा पहिना जाय वाला कानफूल, दोनों ही आभूषण विभिन्न फूलन के स्वरूप से प्रेरित होत अहैं। इनके निचले हिस्से मा छोटी-छोटी सोने या चाँदी कै घंटियाँ लटकत अहैं, जो हिलने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करत अहैं। पाद आभूषण (पैर के आभूषण)पैजी, झांवर अउर बिछुआ: पैर मा पहिने जाय वाले समस्त आभूषण अनिवार्य रूप से केवल अउर केवल चाँदी से ही बनाए जात अहैं, काहे से सनातन भारतीय सांस्कृतिक परंपरा मा नाभि से निचले अंगन मा स्वर्ण धारण करब सर्वथा वर्जित माना गा हय। झांवर मा लगी सैकड़ों छोटी-छोटी घुँघरू मेहरारू के चलने पर एक अत्यंत लयबद्ध अउर मधुर ध्वनि उत्पन्न करत अहैं, जेहका गृहलक्ष्मी के आगमन कै संकेत माना जात हय। आभूषण निर्माण कै प्राचीन अउर पारंपरिक तकनीकेंउत्तराखंड के स्थानीय जौहरी आभूषण बनावे बरे जिन प्राचीन विधियों कै प्रयोग प्राचीन काल से करत आवत अहैं, वे पूर्णतः हस्तशिल्प पर आधारित अहैं:तारकशी अउर जाली कर्म: एह विधि मा सोने या चाँदी के बड़े टुकड़ों क पीट-पीटकर अत्यंत महीन तारों मा बदला जात हय। फिर उन तारों क आपस मा गूँथिके अत्यंत सुंदर अउर पारदर्शी जालीदार आकृतियाँ बनाई जात अहैं।ठप्पा कला (मुद्रांकन): एहमा लोहे, कांसे या ताँबे के साँचों पर पहले से आकृतियाँ खुदी होत अहैं। धातु कै पतली अउर चिकनी चादर क एह साँचे के ऊपर रखिके हथौड़ा से बड़ सावधानी से पीटा जात हय, जेहसे साँचे कै पूरी कलात्मक आकृति धातु पर उभर आवत हय।लाख भराव कला: खोखले आभूषणन क मजबूती देवे बरे उनके भीतर पिघली हुई लाख भरने कै कला मा यहाँ के सुनार अत्यंत निपुण होत अहैं। आधुनिक काल, मशीनीकरण कै संकट अउर संरक्षण के प्रयासबीसवीं सदी के उत्तरार्ध मा, जैसे-जैसे संसार मा तेज औद्योगिकीकरण भवा, यातायात के साधन बढ़े अउर आधुनिक कारखाना मा बनी मशीनी वस्तुओं कै चलन बढ़ा, वैसे-वैसे हाथ से आभूषण बनावे कै ई प्राचीन पहाड़ी कला बड़ भारी संकट मा पड़ गे लागी। कारखाना मा बने आभूषणन कै कृत्रिम चमक अउर कम लागत मा बहुत जल्दी बन जावे के कारण, हाथ से काम करे वाले स्थानीय सुनारन कै जीविका पूरी तरह प्रभावित होवे लागी। परिणाम ई भवा कि कई अत्यंत दुर्लभ अउर प्राचीन पहाड़ी डिज़ाइन पूरी तरह विलुप्त होवे के कगार पर पहुँच गएन।एह अत्यंत कठिन अउर चिंताजनक संक्रमण काल मा, इन पारंपरिक डिज़ाइनों क उनके मूल, शुद्ध अउर ऐतिहासिक स्वरूप मा जीवित रक्खे बरे अउर स्थानीय कारीगरी कै निरंतरता क बनाए रक्खे बरे बीसवीं सदी के मध्य मा कुछ दूरदर्शी स्थानीय संस्थानन कै उदय भवा। इसी ऐतिहासिक क्रम के अंतर्गत, वर्ष १९५६ मा स्थापित प्रिन्स एंड संजय ज्वेलर्स जइसन पुरान संस्थानन ने कुमाऊँ क्षेत्र के भवाली अउर हल्द्वानी जइसन मुख्य नगरन मा इन पारंपरिक डिज़ाइनों क उनके मूल, शुद्ध अउर ऐतिहासिक स्वरूप मा जीवित रक्खे बरे अउर स्थानीय कारीगरी कै निरंतरता क बनाए रक्खे बरे बीसवीं सदी के मध्य मा कुछ दूरदर्शी स्थानीय संस्थानन कै उदय भवा। इसी ऐतिहासिक क्रम के अंतर्गत, वर्ष १९५६ मा स्थापित प्रिन्स एंड संजय ज्वेलर्स जइसन पुरान संस्थानन ने कुमाऊँ क्षेत्र के भवाली अउर हल्द्वानी जइसन मुख्य नगरन मा इन पारंपरिक कुमाऊँनी अउर गढ़वाली आभूषणन के निर्माण कै शुद्ध हस्तशिल्प परंपरा क पूरी निष्ठा से जीवित रक्खेन।अइसन ऐतिहासिक संस्थान आज के अत्यंत आधुनिक अउर तीव्र व्यावसायिक बाज़ार मा भी प्राचीन पहाड़ी आभूषण शिल्प के महत्व क बनाए रक्खे मा सहायक सिद्ध भये अहैं। ई संस्थान आजहुँ सैकड़ों स्थानीय हस्तशिल्पियों अउर कारीगरन क रोज़गार देइके उत्तराखंड के ई अनमोल अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर क आने वाली भावी पीढ़ियों बरे सुरक्षित रक्खे मा एक अत्यंत सुदृढ़ अउर ऐतिहासिक कड़ी साबित भये अहैं। ki4aep9tt37ourbajhl436f2g70aviq