विकिपुस्तक hiwikibooks https://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिपुस्तक विकिपुस्तक वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता रसोई रसोई वार्ता विषय विषय चर्चा TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पाश्चात्य काव्यशास्त्र/संरचनावाद 0 5985 83206 18798 2026-10-21T08:51:45Z Jcb 16661 83206 wikitext text/x-wiki '''फ्रांस''' में ६० के दशक में '''फर्दिनांद द सस्यूर''' (Ferdinand de Saussure) की भाषिकी अवधारणा को आधार बनाकर संरचनावाद उभरा। यह कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं अपितु एक 'प्रविधि' (Methodology) है। फ्रांसीसी नृतत्वशास्त्री या मानवविज्ञानी (Anthropologist) '''क्लॉद लेवी स्त्रास''' (Claude Lévi-Strauss) ने सर्वप्रथम रक्तसंबंध (kinship) के माध्यम से संरचना को समझने का प्रयास किया। वे संरचना को 'संबंधों का समुच्चय' (set of relations) मानते हैं। सस्यूर की संकेत प्रणाली (sign system) इसका आधार थी। सस्यूर की मान्यता थी कि संकेतक (signifier), संकेतित (signified) तथा वास्तव (referent) में एक यादृच्छिक संबंध (arbitrary relation) होता है, जो रुढ़ि पर आधारित है। संरचनावाद का संघर्ष 'वाक्' (langue) व 'वाच्य' (parole) तथा 'ऐतिहासिक' (diachronic) व 'एककालिक' (synchronic) को लेकर भी बना रहता है। इस प्रविधि में ऐतिहासिक व्याख्या की बजाय एककालिक विश्लेषण पर जोर दिया गया। वाक् या लैंग एक अमूर्त नियम है, वाच्य या पैरोल उससे नियंत्रित अवश्य होता है, किंतु लैंग की संकल्पना पैरोल में ही मूर्त होती है। अतः पैरोल का विश्लेषण महत्वपूर्ण माना गया। ध्यातव्य है कि संरचनावाद विश्लेषण की ऐसी प्रविधि या पद्धति है जिसको जीवविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र आदि किसी भी अनुशासन पर लागू किया जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में संरचनावाद को '''रोलाँ बार्थ''' (Roland Barthes) ने प्रचलित किया। साहित्यिक समीक्षा में '''मिशेल फूको''' (Michel Foucault) तथा '''ज्याक लकाँ''' (Jacques Lacan) का भी उल्लेखनीय योगदान है। संरचनावाद का मूल भाषिकी मॉडेल (linguistic model) है। '''ज्याँ पेजे''' (Jean Piaget) ने संरचना की तीन अन्योन्याश्रित विशेषताएँ बताई हैं जो साहित्यिक कृति पर भी लागू होती हैं। वे हैं - पूर्णता (wholeness), सजीवता (transformation) तथा स्वनिष्ठता (self-regulations)<ref>डॉ. सुरेश कुमार, शैली विज्ञान, मैकमिलन, १९७७, पृष्ठ - १००</ref> इस रूप में देखें तो संरचना अपने आप में पूर्ण होती है, स्वतंत्र घटकों का संग्रह मात्र नहीं। वह जीवंत और गतिशील रहती है। उसके अपने अनुशासन होते हैं, अर्थात आप तंत्र में तत्वों को जोड़ तो सकते हैं किंतु उसकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते है। संरचनावाद कृतियों के एककालिक अध्ययन पर बल देता है तथा उसी आधार पर उनका ऐतिहासिक पुनर्निर्माण भी करता है। जॉक लकाँ मनोवैज्ञानिक चिंतन को संरचना में ढालने की उल्लेखनीय कोशिश करता है। उनके अनुसार भाषा चूंकि चेतना में निहित होती है, तथा चेतन (conscious), अवचेतन (subconscious) तथा अचेतन (unconscious) में भी एक यादृच्छिक संबंध (arbitrary relation) होता है। इसी को ध्यान में रखकर भाषा के 'विन्यासक्रमी' (syntagmatic) अविन्यासक्रमी (paradigmatic) संबंधों को समझा जा सकता है। सारे तत्वों का महत्व वस्तुतः इसी में है कि ये संरचना में कार्य कैसे करते हैं (how it function)। एक महत्वपूर्ण सवाल अक्सर उठा करता है कि क्या बिना भाषा के विचार संभव हैं? सस्यूर का मानना है कि विचार बिना भाषा के कोई अस्तित्व नहीं रखते। यह भाषा ही है जो विचारों को आकार प्रदान करती है तथा उन्हें अभिव्यक्ति योग्य बनाती है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात संकेतकों के बारे में यह कि तंत्र में उनके बीच सबसे महत्वपूर्ण संबंध, जो उनका मूल्य निर्धारित करता है, वह है अंतर का बोध। जैसे - बिल्ली। 'बिल्ली' - बिल्ली है क्योंकि वह दूसरा कुछ (कुत्ता, बकरी, भेंड़ आदि) नहीं है। सस्यूर इसे 'नकारात्मक मूल्य' (negative value) कहते हैं, जिसमें किसी वस्तु का मूल्य अथवा अर्थ इसी कारण से है क्योंकि वह अन्य कुछ नहीं है। संरचनावाद संकेतक (signifier) और संकेतित (signified) को समान महत्व देने की बात करता है। मार्क्स भी कथ्य और शिल्प के द्वंद्वात्मक संबंध की बात करता है। जैसा कथ्य है उसी के अनुरूप उसके शिल्प की निर्मिति भी आवश्यक है। संरचनावाद एक पाठ केंद्रित प्रविधि है। 'रचना-कर्म' पूर्ण होने पर लेखक की भूमिका समाप्त हो जाती है तथा पाठक उसमें अर्थ की खोज स्वयं करता है। बार्थ ने तो कह दिया कि 'लेखक की मृत्यु हो चुकी है, क्योंकि उसी में पाठक का जन्म निहित है।' इसी कारण संरचनावाद का पूरा ध्यान पाठ (text) पर है। पाठ के साथ पाठक का भी महत्व बढ़ा। संरचनावाद किसी भी लेखन (written text) को अपने अध्ययन का विषय बनाता है। संरचनावाद में सिद्धांततः साहित्यिकता जैसा कोई आग्रह नहीं है। वह हर तरह के लेखन को अपने विश्लेषण का आधार बनाता है। महान साहित्य और बाजारू साहित्य जैसा मानक संरचनावाद निर्मित नहीं करता। इसी कारण संरचनावाद मूल्य निर्णय (value judgement) नहीं देता। == संदर्भ और सहायक सामग्री== * Deleuze, Gilles. 2002. "How Do We Recognise Structuralism?" In Desert Islands and Other Texts 1953-1974. Trans. David Lapoujade. Ed. Michael Taormina. Semiotext(e) Foreign Agents ser. Los Angeles and New York: Semiotext(e), 2004. 170–192. {{ISBN|1-58435-018-0}}: p. 170. * Mambrol, Nasrullah (2016-03-20). "Structuralism". Literary Theory and Criticism Notes. Retrieved 2017-06-29. * John Sturrock (1979), Structuralism and since: from Lévi Strauss to Derrida, Introduction. * F. de Saussure, Cours de linguistique generale, published by C. Bally and A. Sechehaye (Paris: Payot, 1916); English translation by Wade Baskin, Course in General Linguistics (New York: Philosophical Library, 1959), p. 120. oidoe110633zj6qu35nfwa5wh44q5ny पर्यावरणीय भूगोल/अवधारणा एवं क्षेत्र 0 6408 83211 61436 2026-10-21T08:56:45Z Jcb 16661 /* पर्यावरण भूगोल की अवधारणाएं */ 83211 wikitext text/x-wiki {{संचरण|अगला=मानव पर्यावरण संबंध}} == पर्यावरण भूगोल की अवधारणाएं == '''पर्यावरण भूगोल''' (अंग्रेजी: Environmental geography) पर्यावरणीय दशाओं, उनकी कार्यशीलता और तकनीकी रूप से सबल ''आर्थिक मानव'' और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्यययन स्थानिक तथा कालिक (spatio-temporal) सन्दर्भों में करता है।<ref> William M. Marsh, [http://books.google.co.in/books?id=OEMknwEACAAJ&dq=environmental+geography&hl=en&sa=X&ei=-n_gU6b9Ccfn8AWW8ILIDw&ved=0CD8Q6AEwBQ Environmental Geography: Science, Land Use, and Earth Systems], John Wiley, 1996 </ref> पर्यावरण भूगोल भूगोल की शाखाओं में से एक है, यह मानव और प्राकृतिक प्रणालियों के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। भूगोल कि यह शाखा एक प्रकार से भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के विभाजन और बढ़ती दूरियों को कम करने का कार्य करती है। भूगोल सदैव ही मानव और उसके पर्यावरण का अध्ययन स्थान के सन्दर्भों में करता रहा है ।भूगोल सदैव ही मानव और उसके पर्यावरण का अध्ययन स्थान के सन्दर्भों में करता रहा है लेकिन 1950-1970 के बीच भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के बीच बढती दूरियों ने इसे पर्यावरण के अध्ययन से विमुख कर दिया था। बाद में तंत्र विश्लेषण और पारिस्थितिकीय उपागम के बढ़ते महत्व को भूगोल में तेजी से स्वीकृति मिली और पर्यावरण भूगोल, भौतिक और मानव भूगोल के बीच एक बहुआयामी संश्लेषण के रूप में उभरा।<ref>Noel Castree, David Demeritt, Diana Liverman, Bruce Rhoads; [http://books.google.co.in/books/about/A_Companion_to_Environmental_Geography.html?id=tvOGJd5BfcsC A Companion to Environmental Geography], John Wiley & Sons, (Google eBook)</ref> [[File:Sustainable development-mr.svg|right|300px]] पर्यावरण शब्द परि+आवरण के संयोग से बना है। ''''परि' का आशय चारों ओर तथा 'आवरण' का आशय परिवेश है।''' के. हेविट और एफ. के. हरे ने सबसे पहले 'पर्यावरण भूगोल' शब्द का प्रयोग किया था, उन्होंने टिप्पणी की कि आज पर्यावरण भूगोल की मुख्य ज़रूरतें विचारों और जीवन विज्ञान के परिणामों का गहरा संलयन हैं। वनस्पतियों, जीवों,और मानव जाति सहित सभी सजीवों और उनके साथ संबंधित भौतिक परिसर को '''पर्यावरण''' कहतें हैं । वास्तव में, पर्यावरण में वायु,जल,भूमि,पेड़-पौधे, जीव-जन्तु,मानव और उसकी विविध गतिविधियों के परिणाम आदि सभी का समावेश होता हैं। पारिस्थितिकी और भूगोल में यह शब्द अंग्रेजी के ''environment'' के पर्याय के रूप में इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी शब्द ''environment'' स्वयं उपरोक्त पारिस्थितिकी के अर्थ में काफ़ी बाद में प्रयुक्त हुआ और यह शुरूआती दौर में आसपास की सामान्य दशाओं के लिये प्रयुक्त होता था। यह फ़्रांसीसी भाषा से उद्भूत है जहाँ यह "state of being environed" (see environ + ment) के अर्थ में प्रयुक्त होता था और इसका पहला ज्ञात प्रयोग कार्लाइल द्वारा जर्मन शब्द ''Umgebung'' के अर्थ को फ्रांसीसी में व्यक्त करने के लिये हुआ।<br>कुछ महत्वपूर्ण परिभाषा:-<br> '''प्रो. जे. स्मिथ (J. smith)''' के अनुसार, भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं का योग, जो एक जीव द्वारा अनुभव किया जाता है। इसमें जलवायु, मृदा, जल, प्रकाश, निकटवर्ती वनस्पति, व्यक्तिगत तथा अन्य प्रजातियां सम्मिलित हैं। <br> '''डी. एच. डेविड (D. H. David)''' के अनुसार''पर्यावरण का अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर से घेरे हुए उन सभी भौतिक स्वरूपों से है, जिनमें न केवल वह रहता है। अपितु जिनका प्रभाव उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।'' <br> '''ए. गाउडी (A. Goudie)''' ने अपनी पुस्तक The '''Nature of Environment''' में पृथ्वी के भौतिक घटकों को ही पर्यावरण का प्रतिनिधि माना है तथा उनके अनुसार पर्यावरण को प्रभावित करने में मानव एक महत्वपूर्ण कारक है। <br> पर्यावरणीय भूगोल को जीवित एवं गैर-जीवित जीवों एवं प्राकृतिक पर्यावरण के बीच तकनीकी रूप से उन्नत आर्थिक व्यक्ति और विशेष रूप से अस्थाई और स्थाई ढांचे में उनके प्राकृतिक वातावरण के बीच अंतर्संबंधों के स्थानिक गुणों के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो प्रखण्डों में विभाजित किया जाता है - प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। हालाँकि पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर्यावरण (जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल न हुआ हो) या पूर्ण रूपेण मानव निर्मित पर्यावरण (जिसमें सब कुछ मनुष्य निर्मित हो), कहीं नहीं पाए जाते। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। पारिस्थितिकी और पर्यावरण भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण <ref name="Saxena2017">{{cite book|author=H. M. Saxena|title=Environmental Geography|url=https://books.google.com/books?id=7shaMQAACAAJ|year=2017|publisher=Rawat Publications|isbn=978-81-316-0848-7}}</ref>शब्द का प्रयोग पर्यावास (habitat) के लिये भी होता है।अतः प्राकृतिक या भौतिक भूगोल और मानव भूगोल के मध्य समन्वय स्थापित करने और इनके बहु आयामी संश्लेषण के कारण पर्यावरण भूगोल को एक तीसरी नई शाखा के रूप में भी कुछ विद्वानों द्वारा देखा गया है। पर्यावरण भारतीय संस्कृति, दर्शन एवं चिन्तन का अभिन्न अंग रहा है। हमारे वेदों, पुराणों, पंचतंत्र व जातक कथाओं, उत्सवों, त्योहारों व संस्कारों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश गुंथा हुआ है, जिसे हमने पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति केेेेेे प्रभाव में बिसरा दिया है। मनुष्य प्रकृति विजय का स्वप्न साकार करने की चेष्टा में भुला बैठा है कि वह भी प्रकृति पुत्र है। <ref>डॉ रतन जोशी,पर्यावरण भूगोल, साहित्य भवन पब्लिकेशन्स आगरा, {{ISBN|978-93-8979-715-2}}</ref>आधुनिक युग में प्रकृति की अवमानना व पर्यावरण अवनयन का प्रतिफल वैश्विक तापन, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, ओजोन परत क्षरण, अम्लीय वर्षा, मरुस्थलीकरण इत्यादि रूपों में प्रकट हो रहा है। बढ़ते प्रदूषण के कारण हमारी आस्था व श्रद्धा की प्रतीक जीवनदायिनी नदियां मलवाही नालों में बदल रही हैं। प्राणवायु देने वाला वायुमण्डल दमघोटु हो गया है। इसके लिए शासन तंत्र की उदासीनता एवं आम नागरिक का पर्यावरण के प्रति कत्र्तव्यच्युत होना, समान रूप से उत्तरदायी है। हमारी नदियों, झीलों, पहाड़ियों, वन सम्पदा तथा वायुमण्डल का नैसर्गिक स्वरूप बचाने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार को आदेश व निर्देश देने पड़े हैं। आज प्रत्येक स्तर पर औपचारिक व अनौपचारिक रूप में पर्यावरण शिक्षा की महती आवश्यकता है। ==पर्यावरण भूगोल का विषयक्षेत्र== पृथ्वी के सतह, वायुमंडल और जलमंडल (या अन्य ग्रहों के अनुरूप भागों) में रहने वाले जीवों के कब्जे वाले क्षेत्र को '''जीवमंडल '''के रूप में जानते हैं। जीवमंडल व्यापक भू-तंत्र (पारिस्थितिकी तंत्र) है जो पर्यावरण भूगोल के अध्ययन के लिए स्थानिक इकाई के रूप में इसे शामिल किया जाता है।<ref name="Singh1991">{{cite book|author=Savindra Singh|title=Environmental Geography|url=https://books.google.com/books?id=m9pKAAAAYAAJ|year=1991|publisher=Prayag Pustak Bhawan}}</ref> पर्यावरण भूगोल का मुख्य विषय यह है कि जैविक प्रक्रियाओं और मानव जिम्मेदारियों, मानव-पर्यावरण संबंधों के माध्यम से विभिन्न स्तरों पर प्राकृतिक पर्यावरण के घटकों एवं उनके संबंध का अलग-अलग और साथ-साथ अध्ययन किया जाए। पर्यावरणीय भूगोल को 5 प्रमुख उपक्षेत्रों में बांटा जा सकता है:- # पर्यावरण का एक पारितंत्र के रूप में संगठन और उसकी कार्यशीलता, # मानव-पारितंत्रीय संबंध विश्लेषण और पर्यावरणीय अवनयन # पर्यावरणीय दशाओं और मानव-पर्यावरण संबंधों का स्थानिक संदर्भ में अध्ययन # पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबन्धन से जुड़े स्थानिक पहलू # भौगोलिक सूचना तंत्र और सुदूर संवेदन तकनीक का पर्यावरणीय अध्ययन में अनुप्रयोग कि दशा और दिशा निर्धारित करना है। ==संबंधित प्रश्न== # पर्यावरण भूगोल के मुख्य उपागो को वर्णन किजीए। # पर्यावरण भूगोल की अवधारणा पर चर्चा करें। # पर्यावरणीय भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा इसके विषय-क्षेत्र की व्याख्या करें। # पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। पर्यावरण भूगोल का वर्णन करते हुए उसके महत्व पर प्रकाश डालिए। ==सन्दर्भ== {{BookCat}} n8d95el6s6ol5zfdkndw9vc9hm93i8e मध्यकालीन भारत/मुग़ल वंश 0 7736 83209 81740 2026-10-21T08:54:53Z Jcb 16661 83209 wikitext text/x-wiki {{BookCat}} भारत में मुगल राजवंश महानतम शासनकाल में से एक था। मुगल शासकों ने हज़ारों लाखों लोगों पर शासन किया। भारत एक नियम के तहत एकत्र हो गया और यहां विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक और राजनैतिक समय अवधि मुगल शासन के दौरान देखी गई। पूरे भारत में अनेक मुस्लिम और हिन्दु राजवंश टूटे, और उसके बाद मुगल राजवंश के संस्थापक यहाँ आए। बाबर, जो महान एशियाई विजेता तैमूर लंग का पोता था। १५०४ ई.काबुल तथा १५०७ ई. में कंधार को जीता था तथा बादशाह (शाहों का शाह) की उपाधि धारण की १५१९ से १५२६ ई. तक भारत पर उसने ५ बार आक्रमण किया तथा सफल हुआ १५२६ में जब उसने पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान "इब्राहिम लोदी"(लोदी वंश) को हराकर "मुगल वंश" की नींव रखी।<ref>Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part - II</ref> == मुग़ल सम्राटों का कालक्रम == <timeline> ImageSize = width:1000 height:160 PlotArea = left:20 right:50 bottom:50 top:10 AlignBars = early Colors = id:canvas value:white id:MUG value:orange legend: मुग़ल_साम्राज्य id:SUR value:purple legend: सूरी_साम्राज्य id:ACTIVE value:rgb(1,0,0.07) DateFormat = yyyy Period = from:1526 till:1857 TimeAxis = orientation:horizontal Legend = columns:2 left:280 top:20 columnwidth:150 PlotData= bar:PRMs width:50 mark:(line,white) align:left fontsize:s from:1526 till:1530 shift:(-5,35) color:MUG text:"[[बाबर]] 1526–1530" from:1530 till:1540 shift:(-10,-40) textcolor:ACTIVE color:MUG text:"हुमायूँ 1530–1540" from:1540 till:1545 shift:(-5,50) color:SUR text:"[[शेर शाह सूरी]] 1540–1545" from:1545 till:1554 shift:(-10,-55) color:SUR text:"[[इस्लाम शाह सूरी]] 1545–1554" from:1555 till:1556 shift:(0,35) textcolor:ACTIVE color:MUG text:"हुमायूँ 1555–1556" from:1556 till:1605 shift:(-35,-40) color:MUG text:"[[अकबर]] 1556–1605" from:1605 till:1627 shift:(-30,35) color:MUG text:"[[जहांगीर]] 1605–1627" from:1627 till:1658 shift:(-45,-40) color:MUG text:"[[शाह जहाँ|शाहजहाँ]] 1627–1658" from:1658 till:1707 shift:(-40,35) color:MUG text:"[[औरंगज़ेब]] 1658–1707" from:1707 till:1712 shift:(-5,-40) color:MUG text:"[[बहादुर शाह प्रथम]] 1707–1712" from:1712 till:1713 shift:(0,35) color:MUG text:"[[जहांदार शाह]] 1712–1713" from:1713 till:1719 shift:(-10,-55) color:MUG text:"[[फर्रुख्शियार]] 1713 –1719" from:1719 till:1719 shift:(0,50) color:MUG text:"[[रफी उल-दर्जत]] 1719" from:1719 till:1719 shift:(0,65) color:MUG text:"[[रफी उद-दौलत]] 1719" from:1719 till:1748 shift:(-40,-70) color:MUG text:"[[रोशन अख्तर बहादुर]] 1719–1748" from:1748 till:1754 shift:(-2,35) color:MUG text:"[[अहमद शाह बहादुर]] 1748–1754" from:1754 till:1759 shift:(-5,-40) color:MUG text:"[[अज़ीज़ुद्दीन]] 1754–1759" from:1759 till:1760 shift:(-5,50) color:MUG text:"[[मुही-उल-मिल्लत]] 1759–1760" from:1759 till:1806 shift:(-45,-55) color:MUG text:"[[अली गौहर]] 1759–1806" from:1806 till:1837 shift:(-45,35) color:MUG text:"[[अकबर शाह द्वितीय|अकबर शाह II]] 1806–1837" from:1837 till:1857 shift:(-30,-40) color:MUG text:"[[बहादुर शाह द्वितीय|बहादुर शाह II]] 1837–1857" </timeline><br /><br /> == बाबर (१५२६-१५३०) == [[File:Emperor babur.jpg|thumb|बाबर]] === परिचय और पानीपत का युद्ध === [[File:1526-First Battle of Panipat-Ibrahim Lodhi and Babur.jpg|thumb|left|पानीपत का युद्ध (१५२६)]] बाबर तैमूर लंग का पौत्र था और विश्वास रखता था कि चंगेज़ ख़ान उनके वंश का पूर्वज था। बाबर भारत में प्रथम मुगल शासक थे। उसने दिल्ली पर फिर से तैमूरवंशियों की स्थापना के लिए १५२६ में पानीपत के प्रथम युद्ध के दौरान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष कर उसे पराजित किया और इस प्रकार मुगल राजवंश की स्थापना हुई।<ref>Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part - II</ref> === खानवा का युद्ध === [[File:Maharana Sangram Singh Riding a Prize Stallion.jpg|thumb|left|राणा सांगा]] राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत काफी शक्तिशाली बन चुके थे। राजपूतों ने एक बड़ा-सा क्षेत्र स्वतंत्र कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ होने की चाहत दिखाई। बाबर की सेना राजपूतों की आधी भी नहीं थी। १७ मार्च १५२७ में खानवा की लड़ाई राजपूतों तथा बाबर की सेना के बीच लड़ी गई। इस युद्ध में राणा सांगा के साथ मुस्लिम यदुवंशी राजपूत उस वक़्त के मेवात के शासक खानजादा राजा हसन खान मेवाती और इब्राहिम लोदी के भाई मेहमूद लोदी थे। इस युद्ध में मारवाड़, अम्बर, ग्वालियर, अजमेर, बसीन चंदेरी भी मेवाड़ का साथ दे रहे थे। राजपूतों का जीतना निश्चित था पर राणा सांगा के घायल होने पर घायल अवस्था मे उनके साथियो ने उन्हें युद्ध से बाहर कर दिया और एक आसान-सी लग रही जीत उसके हाथों से निकल गई। बाबर ने युद्ध के दौरान अपने सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा कर शराब न पीने की कसम ली। उसने मुस्लिमों से "तमगा कर" न लेने की भी घोषणा की। तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था, जो राज्य द्वारा लिया जाता था।[[File:Babur’s army in battle against the army of Rana Sanga at.jpg|thumb|right|खानवा का युद्ध]] बाबर २०,०००० मुग़ल सैनिकों को लेकर साँगा से युद्ध करने उतरा था। उसने साँगा की सेना के लोदी सेनापति को प्रलोभन दिया, जिससे वह साँगा को धोखा देकर सेना सहित बाबर से जा मिला। बाबर और साँगा की पहली मुठभेड़ बयाना में और दूसरी खानवा नामक स्थान पर हुई। इस तरह 'खानवा के युद्ध' में भी पानीपत युद्ध की रणनीति का उपयोग करके बाबर ने राणा साँगा के विरुद्ध एक सफल युद्ध की रणनीति तय की। इसके एक साल के बाद राणा सांगा की ३० जनवरी १५२८ में मृत्यु हो गई। इसके बाद बाबर दिल्ली की गद्दी का अविवादित अधिकारी बना। उसके इस‌ विजय ने मुगल वंश को भारत की सत्ता पर ३३१ सालों तक राज करवाया। इस‌ युद्ध के बाद बाबर ने गाजी(दानी) की उपाधि ली थी और जेहाद का नारा भी दिया था।<ref name="Rao">{{cite book|first=K. V. Krishna |last=Rao|title=Prepare Or Perish: A Study of National Security|isbn=978-81-7212-001-6|publisher=Lancer Publishers|page=453|year=1991}}</ref><ref>Gwalior Fort: Rock Sculptures, A Cunningham, Archaeological Survey of India, pages 364–370</ref> === चंदेरी का युद्ध === [[चित्र:Chanderi Fort.jpg|अंगूठाकार|चन्देरी दुर्ग]] [[File:1528 Chanderi fort-large.jpg|thumb|left|१५२८ चंदेरी का युद्ध]] मेवाड़ विजय के बाद बाबर ने अपनी सैना को विद्रोहियों का दमन करने पूर्व में भेजा क्योंकि अफ़गानों का स्वागत और समर्थन बंगाल के शासक नुसरत ने किया था। इस लाभ के कारण अफ़ग़ानों ने अनेक स्थानों से मुगलों को निकाल दिया था। बाबर अफ़ग़ान विद्रोहियों के दमन के लिए चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चिय कर लिया। चंदेरी के राजपूत शासक मेदनी राय ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा का साथ दिया था और अब चंदेरी मैं राजपूत सत्ता का पुनर्गठन भी होने लगा था। चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चय बताता है कि बाबर की दृष्टि में राजपूत संगठन अफ़गानों की अपेक्षा अधिक गंभीर था अतः वह मुगल शासन के लिए राजपूत शक्ति को नष्ट करना अधिक आवश्यक समझता था। चंदेरी का अपना एक अलग ही व्यापारिक तथा सैनिक महत्व था वह मालवा तथा राजपूताने में प्रवेश करने के लिए सबसे उचित स्थान था। बाबर की चंदेरी पर आक्रमण करने गयी सेना राजपूतों द्वारा पराजित हो गयी थी। इस कारण बाबर स्वयं युद्ध के लिए गया क्योंकि यह संभव है कि चंदेरी राजपूत शक्ति का केंद्र बन जाए। उसने चंदेरी के विरुद्ध लड़ने के लिए २१ जनवरी १५२८ की तारीख चुनी क्योंकि उसे चंदेरी की मुस्लिम जनता का बड़ी संख्या में समर्थन प्राप्त होने की आशा थी और जिहाद के द्वारा राजपूतों तथा इन मुस्लिमों का सहयोग रोका जा सकता था। उसने मेदनी राय के पास शांति पूर्ण रूप से चंदेरी को समर्पण कर देने का संदेश भेजा और शमशाबाद की जागीर दी जाने की शर्त रखी। मेदनी राय ने प्रस्ताव टुकड़ा दिया। राजपूतों ने भयंकर संग्राम लड़ा और राजपूती वीरांगनाओं ने जौहर किया। विजय के बाद बाबर ने चंदेरी का राज्य मालवा सुल्तान के वंशज अहमद शाह को दे दिया और उसे आदेश दिया कि वह २० लाख दाम प्रति वर्ष शाही कोष में जमा करते रहे।<ref name="Lane-Poole">{{cite book |last=Lane-Poole |first=Stanley |author-link=Stanley Lane-Poole |year=1899 |title=Babar |url=https://archive.org/details/babar035008mbp |pages=182–183 |publisher=The Clarendon Press |ref=harv}}</ref><ref name="Chandra">{{cite book |first=Satish |last=Chandra |title=Medieval India: From Sultanat to the Mughals (1206–1526) |volume=2 |publisher=Har-Anand Publications |year=2006}}</ref> === घाघरा का युद्ध === [[Image:River Ganges and tributaries.png|thumb|left|घाघरा नदी का क्षेत्र]] भारत पर राज करने का सपना मुगलों से पहले अफगानियों ने देखा था। सुल्तान महमूद गजनवी पहला अफ़ग़ान सुल्तान था। बाबर ने ध्यान दिया कि महमूद लोदी बिहार लगातार गया और उसने एक लाख सैनिक एकत्रित कर लिया। बाबर जानता था कि यदि आगरा पर अफ़गानियों का राज हो गया, तो दिल्ली का तख्त पलट करने में उन्हें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। चंदेरी के युद्ध के बाद बाबर ने अवध की तरफ रूख किया। इस ख़बर ने अफगानियों मुश्किल में डाल दी। विद्रोहियों के मुखिया अफ़ग़ान नेता बिब्बन ने अवध से भागकर बंगाल में शरण ली। उसके भागते ही बाबर ने लखनऊ को जीत लिया। वहीं दूसरी ओर अफ़गानियों ने बिहार के बाद बनारस और फिर चुनार तक अपनी पहुँच बना ली। इसके बाद बाबर ने लखनऊ से निकलकर बिहार का रूख किया। बाबर यह जान गया था कि बंगाल शासक नुसरत शाह महमूद लोदी की मदद कर रहा है, इसलिए बाबर ने उसे संदेश भिजवाया कि अफगानियों की मदद न करे पर उसने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया फिर बाबर ने बिहार के घाघरा नदी के किनारे अफ़ग़ानों को युद्ध के लिए ललकारा। जंग में महमूद लोदी ने भी हिस्सा लिया था क्योंकि उसे लगा था कि पानीपत और खनवा के बाद चंदेरी युद्ध करते हुए बाबर की हिम्मत जवाब दे गई होगी, वह थक गया होगा और उसे हराना मुश्किल नहीं होगा इसलिए वह बिना किसी बड़ी तैयारी के ही इस जंग में कूद गया। वहीं अफगानियों की आंखों में बदले की आग भरी थी, लेकिन उनकी सेना कमजोर पर गयी। इस कारण अफगानियों ने अपनी जान बचाने के लिए घाघरा नदी में उतर जाना बेहतर समझा, लेकिन बाबर सेना ने वहाँ भी उनका पीछा नही छोड़ा। सैनिकों ने नाव पर युद्ध लड़ा और देखते ही देखते ‘घाघरा की जमीन और पानी’ दोनों सैनिकों के रक्त से लहू लूहान हो गयी। बाबर ने गंगा नदी पार करके घाघरा नदी के पास अफ़गानों से घमासान युद्ध किया। साथ ही बाबर ने नुसरत शाह को फिर से प्रस्ताव भेजा कि अफ़ग़ानों की मदद ना करे। इस‌ बार बाबर की शक्ति के आगे वह डर गया और उसने संधि की जिसके अनुसार बंगाल बाबर के किसी भी दुश्मन को राज्य में पनाह नहीं देने देगा इसके बदले बाबर बंगाल पर हमला नहीं करेगा और महमूद बंगाल में ही रहेगा और उसे बंगाल में ही जागीर दे दी जाएगी। बाबर ने अफ़ग़ान जलाल खान(बिहार का शासक) को अपने अधीन किया और उसे आदेश दिया कि वह शेर खाँ को अपना मंत्री रखें। इसके बाद अफगानियों ने बाबर की अधीनता को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया हम कह सकते हैं कि बाबर ने १५२९ में महमूद लोदी(अफ़ग़ानी) के साथ घाघरा के युद्ध में आगरा जीतकर अपने राज्य को सफल बना दिया। घाघरा का यह‌ युद्ध ज़मीन और पानी पर लड़ा जाने वाला ऐतिहासिक युद्ध के रूप में याद किया जाता है।<ref>Medieval India: From Sultanat to the Mughals Part - II</ref> === जीवनी और मृत्यु === [[File:Humayun (left) with his father Babur (right), painted circa 1640 (Late Shah Jahan Album).jpg|thumb|left|बाबर और हुमायूँ]] [[File:1842 tomb of Babur by Charles Masson.png|thumb|काबुल में बाबर का मक़बरा]] बाबर की मृत्यु १५३० ई० में हो गई। मान्यता है कि हुमायूँ के बिमार होने पर बाबर ने अल्लाह से दुआ मांगी कि हुमायूँ स्वस्थ हो जायें और हुमायूँ के कष्ट उसे मिल जाए। इसके बाद हुमायूँ तो स्वस्थ हो गया किन्तु बाबर‌ मारा गया। उसने चगताई में बाबरनामा के नाम से अपनी जीवनी लिखी।<ref name="ref63laxoy">[http://books.google.com/books?id=nMUJAQAAIAAJ Babar: life and times], Muni Lal, Vikas Publishing House, 1977, {{ISBN|978-0-7069-0484-0}}, ''... After Humayun had been driven away from Hindustan by Sher Shah Suri, one of Babar's wives, Bibi Mubarika, came to Agra to claim her husband's body and carry it through the passes to Kabul ...''</ref><ref name="ref72medij">[http://books.google.com/books?id=-0huAAAAMAAJ Two studies in early Mughal history], Yusuf Husain Khan, Indian Institute of Advanced Study, 1976, ''... wish in his lifetime that his body should be buried in his favourite garden at Kabul, known as Bagh-i-Babur ... Most probably his remains were removed to Kabul in the reign of Sher Shah Suri ...''</ref> == हुमायूँ (१५३०-१५४० और १५५५-१५५६) == [[File:Emperor Humayun (cropped).JPG|thumb|left|हुमायूँ]] [[File:Hamida Banu Begum, wife of Mughal Emperor Humayun.jpg|thumb|हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानो बेगम]] हुमायूँ बाबर का सबसे बड़ा बेटा था और मुगल राजवंश का द्वितीय शासक था। बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने १५३० में भारत की राजगद्दी संभाली और उनके सौतेले भाई कामरान मिर्ज़ा ने काबुल और लाहौर का शासन ले लिया। बाबर ने मरने से पहले ही इस तरह से राज्य को बाँटा ताकि आगे चल कर दोनों भाइयों में लड़ाई न हो। कामरान आगे जाकर हुमायूँ के कड़े प्रतिद्वंदी बने। हुमायूँ का शासन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के हिस्सों पर १५३०-१५४० और फिर १५५५-१५५६ तक रहा।<ref>{{cite book |last=Soucek |first=Svat |date=2000 |title=A History of Inner Asia |publisher=Cambridge University Press |isbn=978-0-521-65704-4 |url-access=registration |url=https://archive.org/details/historyofinneras00souc }}</ref>उसने लगभग १ दशक तक भारत पर शासन किया किन्तु फिर उसे अफगानी शासक शेर शाह सूरी ने पराजित किया। सन् १५३९ में, हुमायूँ को चौसा की लड़ाई में शेर शाह का सामना करना पड़ा जिसे शेरशाह ने जीत लिया। १५४० ई. में बिलग्राम युद्ध में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और शेर खान की उपाधि लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना साम्रज्य स्थापित कर दिया। हुमायूँ अपनी पराजय के बाद लगभग १५ वर्ष तक भटकता रहा।[[File:Humayun&#039;s Tomb from the Charbagh - 1.jpg|thumb|left|दिल्ली में हुमायूँ का मक़बरा]]इस बीच शेर शाह की मौत हो गई और हुमायूं उसके उत्तरवर्ती सिकंदर सूरी को पराजित करने में सक्षम रहा तथा दोबारा हिन्दुस्तान का राज्य प्राप्त कर सका। जबकि इसके कुछ ही समय बाद केवल ४८ वर्ष की उम्र में पुस्तकालय की सीढ़ी से गिर कर १५५६ में उसकी मौत हो गई। हुमायूँ की जीवनी का नाम हुमायूँनामा है जो उनकी बहन गुलबदन बेग़म ने लिखी है।<ref>''The Life and Times of Humāyūn'' by Ishwari Prasad, Published by Orient Longmans, 1956, p. 36</ref><ref>{{cite book |last=Rehman |first=Abdur |year=1989 |chapter=Salt Range: History and Culture |editor1=Kamil Khan Mumtaz |editor2=Siddiq-a-Akbar |title=Temples of Koh-e-Jud & Thar: Proceedings of the Seminar on Hindu Shahiya Temples of the Salt Range, Held in Lahore, Pakistan, June 1989 |publisher=Anjuman Mimaran |page=8 |oclc=622473045 |quote=Babar established good relations with them [the Ghakhars] and hereafter they always sided with the Mughals. Sher Shah Suri therefore determined to crush the Ghakhars and built a fort at Rohtas;}}</ref> "जयशंकर प्रसाद जी" ने अपनी कहानी [https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%86%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6_-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AA_-%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_.pdf/%E0%A5%A8%E0%A5%A9 ममता] में चित्रित किया है कि शरणार्थी हुमायूँ ने रोहतास-दुर्गपति के मंत्री चूड़ा-मणि की अकेली दुहिता ममता के यहाँ शरण ली थी।<ref>[https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0:%E0%A4%86%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6_-%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AA_-%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_.pdf/%E0%A5%A8%E0%A5%A9 ममता]</ref> == शेर शाह सूरी (१५४०-१५४५) == शेर शाह सूरी का बचपन का नाम "फ़रीद खाँ" था। बचपन में एक शेर को मारने के कारण उसका नाम शेर शाह पड़ा। शेर शाह सूरी एक अफ़ग़ानी नेता था, जिसने १५४० में हुमायूँ को पराजित कर मुगल शासन पर विजय पाई। शेर शाह ने अधिक से अधिक ५ वर्ष तक दिल्ली के तख्त पर राज किया और वह इस उप-महाद्वीप में अपने अधिकार क्षेत्र को स्थापित नहीं कर सका। एक राजा के तौर पर उसके खाते में अनेक उपलब्धियों का श्रेय जाता है। उसने एक दक्ष लोक प्रशासन की स्थापना की। उसने भूमि के माप के आधार पर राजस्व संग्रह की एक प्रणाली स्थापित की। उसके राज्य में आम आदमी को न्याय मिला। अनेक लोक कार्य उसके अल्प अवधि के शासन कार्य में कराए गए जैसे कि पेड़ लगाना, यात्रियों के लिए कुंए और सरायों का निर्माण कराया गया, सड़कें बनाई गई, मुद्रा को बदल कर छोटी रकम के चांदी के सिक्के बनवाए गए, जिन्हें दाम कहते थे। यद्यपि शेर शाह तख्त पर बैठने के बाद अधिक समय जीवित नहीं रहा और २२ मई १५४५ में चंदेल राजपूतों के खिलाफ लड़ते हुए शेरशाह सूरी की कालिंजर किले की घेराबंदी की, जहां उक्का नामक आग्नेयास्त्र से निकले गोले के फटने से उसकी मौत हो गयी।[[चित्र:Sasaram.jpg|right|thumb||200px|सासाराम में शेर शाह का मक़बरा]]१५४०-१५४५ के अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नयी नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की, पहला रुपया जारी किया है, भारत की डाक व्यवस्था को पुनः संगठित किया और अफ़गानिस्तान में काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगांव तक ग्रांड ट्रंक रोड को बढ़ाया। साम्राज्य के उसके पुनर्गठन ने बाद में मुगल सम्राटों के लिए एक मजबूत नीव रखी विशेषकर हुमायूँ के बेटे अकबर के लिये।<ref name="Columbia">{{cite web |url=http://www.infoplease.com/encyclopedia/people/sher-khan.html |title=Sher Khan |trans-title=शेर शाह |work=इन्फोप्लीज़ |publisher=कोलम्बिया इनसाइक्लोपीडिया |accessdate=१६ मई २०१४ |language=अंग्रेज़ी |archive-url=https://web.archive.org/web/20140311083814/http://www.infoplease.com/encyclopedia/people/sher-khan.html |archive-date=11 मार्च 2014 |url-status=live }}</ref><ref name="Race Against Time">{{cite web|url=http://www.upscandssc.com/2013/12/blog-post_17.html|title=शेरशाह सूरी: एक महान राष्ट्र निर्माता|accessdate=१६ मई २०१४|date=१७ दिसम्बर २०१३|publisher=रेस अगेंस्ट टाइम|archive-url=https://web.archive.org/web/20140512215146/http://www.upscandssc.com/2013/12/blog-post_17.html|archive-date=12 मई 2014|url-status=dead}}</ref> === रोहितास किला === [[File:Rohtas Fort Gate.jpg|thumb|left|रोहितास किला]] रोहितास किले का निर्माण शेरशाह ने मुगल सम्राट हुमायूँ के अग्रिमों को अवरुद्ध करने के लिए किया था, जिन्हें कन्नौज के युद्ध में अपनी हार के बाद फारस में निर्वासित कर दिया गया था। यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम शहर के पास स्थित है। १९९७ में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया है।<ref>{{cite book |last=Rehman |first=Abdur |year=1989 |chapter=Salt Range: History and Culture |editor1=Kamil Khan Mumtaz |editor2=Siddiq-a-Akbar |title=Temples of Koh-e-Jud & Thar: Proceedings of the Seminar on Hindu Shahiya Temples of the Salt Range, Held in Lahore, Pakistan, June 1989 |publisher=Anjuman Mimaran |page=8 |oclc=622473045 |quote=Babar established good relations with them [the Ghakhars] and hereafter they always sided with the Mughals. Sher Shah Suri therefore determined to crush the Ghakhars and built a fort at Rohtas;}}</ref> == अकबर (१५५६-१६०५) == === प्रारंभिक जीवन === [[File:Emperor Akbar, Los Angeles County Museum of Art.jpg|thumb|अकबर]] हुमायूँ के उत्तराधिकारी, अकबर का जन्म निर्वासन के दौरान राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल अमरकोट, सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) में २३ नवंबर, १५४२ (हिजरी अनुसार रज्जब, ९४९ के चौथे दिन) हुआ था। यहां बादशाह हुमायुं अपनी हाल की विवाहिता बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ शरण लिये हुए थे। हुमायूँ को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण फारस में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था किन्तु अकबर को वह अपने संग नहीं ले गया वरन रीवां (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राज्य के एक ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था। अकबर की वहां के राजकुमार राम सिंह प्रथम से, जो आगे चलकर रीवां का राजा बना, के संग गहरी मित्रता हो गयी थी। ये एक साथ ही पले और बढ़े और आजीवन मित्र रहे। कालांतर में अकबर सफ़ावी साम्राज्य (वर्तमान अफ़गानिस्तान का भाग) में अपने एक चाचा मिर्ज़ा अस्कारी के यहां रहने लगा। पहले वह कुछ दिनों कंधार में और फिर १५४५ से काबुल में रहा। हुमायूँ की अपने छोटे भाइयों से बराबर ठनी ही रही इसलिये चाचा लोगों के यहाँ अकबर की स्थिति बंदी से कुछ ही अच्छी थी। खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिये अकबर के पिता हुमायूँ के अनवरत प्रयत्न अंततः सफल हुए और वह सन्‌ १५५५ में हिंदुस्तान पहुँच सका किंतु अगले ही वर्ष सन्‌ १५५६ में राजधानी दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई और गुरदासपुर के कलनौर नामक स्थान पर १४ वर्ष की आयु में अकबर का राजतिलक हुआ। अकबर का संरक्षक बैराम खान को नियुक्त किया गया जिसका प्रभाव उस पर १५६० तक रहा। जब अकबर केवल १३ वर्ष का था तब उसके पिता की मौत हो गई।<ref>[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/gulbadan/part10.html घाग १०: बर्थ ऑफ अकबर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100629053135/http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/gulbadan/part10.html |date=29 जून 2010 }} ''हुमायुंनामा'', [[कोलंबिया विश्वविद्यालय]]</ref><ref>{{cite web |url=http://www.newworldencyclopedia.org/entry/Timurid_Dynasty |title=तिमुरिड डायनेस्टी |publisher=न्यू वर्ल्ड एन्साइक्लोपीडिया |date= |access-date=१८ जुलाई २००९ |archive-url=https://web.archive.org/web/20110923005307/http://www.newworldencyclopedia.org/entry/Timurid_Dynasty |archive-date=23 सितंबर 2011 |url-status=live }}</ref> === पानीपत का द्वितीय युद्ध === [[चित्र:Maharaja Hemu Bhargava - Victor of Twenty Two Pitched Battles, 1910s.jpg|thumb|हेमू]] ५ नवम्बर १५५६ को 'राजा विक्रमादित्य' अथवा विक्रमाजीत (हेमू) के साथ अकबर तथा बैरम खाँ का पानीपत के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र में युद्ध प्रारम्भ हुआ। इतिहास में यह युद्ध 'पानीपत के दूसरे युद्ध' के नाम से प्रसिद्ध है। हेमू की सेना संख्या में अधिक थी तथा उसका तोपखाना भी अच्छा था किन्तु एक तीर उसकी आँख में लग जाने से वह बेहोश हो गया। इसपर उसकी सेना तितर-बितर हो गई। हेमू को पकड़कर अकबर के सम्मुख लाया गया और बैरम खाँ के आदेश से मार डाला गया।<ref name="General2006">{{cite book|author=Singh, Jagjit (Maj. General.)|title=Artillery: The Battle-winning Arm|url=http://books.google.com/books?id=hjQGmn4ghOMC&pg=PA19|accessdate=11 जुलाई 2012|year=2006|publisher=Lancer Publishers|isbn=978-81-7602-180-7|pages=19–}}</ref><ref>{{cite book|title=History of Medieval India|author=S. Chand|isbn=81-219-0364-5}}</ref> === हल्दीघाटी का युद्ध === [[File:RajaRaviVarma MaharanaPratap.jpg|thumb|महाराणा प्रताप]] १५६८ में चित्तौड़गढ़ की विकट घेराबंदी के कारण मेवाड़ की उपजाऊ पूर्वी बेल्ट को मुगलों ने आक्रमण कर जीत लिया था किन्तु बाकी जंगल और पहाड़ी राज्य अभी भी राणा के नियंत्रण में थे। मेवाड़ के जरिए अकबर गुजरात के लिए एक स्थिर मार्ग हासिल करना चाहता था। १५७२ में प्रताप सिंह राजा (राणा) बनें। इसके बाद अकबर ने उन्हें जागीरदार बनाने के लिए अपने दूतों(जलाल खान कुरची, अम्बर, राजा भगवंत दास) को वहाँ भेजा। राणा ने अकबर को व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत होने से इनकार कर दिया, अकबर ने फिर राजा मान सिंह को राणा प्रताप के पास भेजा परन्तु राणा प्रताप ने मान सिंह के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। इसके बाद अकबर ने युद्ध से ही मेवाड़ जीतना जरूरी समझा। राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी (एक संकरा पहाड़ी दर्रा) को युद्धक्षेत्र चुना गया था। महाराणा प्रताप लगभग ३,००० घुड़सवारों और ४०० भील धनुर्धारियों के साथ मैदान में उतरे। युद्ध में भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील बने थे। युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे:-हकीम खाँ सूरी। मुगलों का नेतृत्व आमेर के राजा मान सिंह ने किया था, जिन्होंने लगभग ५,०००-१०,००० लोगों की सेना की कमान संभाली थी।{{sfn|Chandra|2005|pp=121–122}}{{sfn|Sarkar|1960|p=75}}{{sfn|Chandra|2005|pp=119–120}}[[File:Raja Man Singh.jpg|thumb|left|राजा मान सिंह]][[File:Chokha, Battle of Haldighati, painted 1822.jpg|thumb|हल्दीघाटी युद्ध का चित्र]]तीन घंटे के भीषण युद्ध के बाद मेवाड़ी सेना के लगभग १,६०० सैनिको की म्रत्यु हो गई, जबकि मुगल सेना के करीब १५० सिपाही मारे गए और ३५० घायल हुए फिर भी राजपूतों ने गज़ब का शौर्य दिखाया और डटकर मुगलों का सामना करते रहें। युद्ध में राणा के घोड़े चेतक ने भी कमाल का शौर्य दिखाया। युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल होकर वह वीरगति को प्राप्त हुआ। हिंदी कवि "श्याम नारायण पाण्डेय" द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य "हल्दी घाटी" में चेतक के पराक्रम एवं उसकी स्वामिभक्ति की मार्मिक कथा वर्णित है:- ==== चेतक कविता ==== [[File:Statue of Maharana Pratap of Mewar, commemorating the Battle of Haldighati, City Palace, Udaipur.jpg|thumb|महाराणा प्रताप और चेतक का स्मारक]] {| class="wikitable" |- | :रणबीच चौकड़ी भर-भर कर :चेतक बन गया निराला था :राणाप्रताप के घोड़े से :पड़ गया हवा का पाला था :जो तनिक हवा से बाग हिली :लेकर सवार उड़ जाता था :राणा की पुतली फिरी नहीं :तब तक चेतक मुड़ जाता था | :गिरता न कभी चेतक तन पर :राणाप्रताप का कोड़ा था :वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर :वह आसमान का घोड़ा था :था यहीं रहा अब यहाँ नहीं :वह वहीं रहा था यहाँ नहीं :थी जगह न कोई जहाँ नहीं :किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं | :निर्भीक गया वह ढालों में :सरपट दौडा करबालों में :फँस गया शत्रु की चालों में :बढ़ते नद सा वह लहर गया :फिर गया गया फिर ठहर गया :विकराल वज्रमय बादल सा :अरि की सेना पर घहर गया। | :भाला गिर गया गिरा निशंग :हय टापों से खन गया अंग :बैरी समाज रह गया दंग :घोड़े का ऐसा देख रंग |} <Ref>[http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_/_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%AF चेतक कविता]</ref> === राज्य विस्तार === [[चित्र:Fictional flag of the Mughal Empire.svg|thumb|120px|left|मुगल ध्वज]] दिल्ली पर पुनः अधिकार जमाने के बाद अकबर ने अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया और मालवा को १५६२ में, गुजरात को १५७२ में, बंगाल को १५७४ में, काबुल को १५८१ में, कश्मीर को १५८६ में और खानदेश को १६०१ में मुग़ल साम्राज्य के अधीन कर लिया।<ref name="श्रीवास्तव">[http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/30/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%95/ कौन कहता है – अकबर महान था ! अकबर – एक परिचय] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20101125132915/http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/30/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%95/ |date=25 नवंबर 2010 }}। जागरण जंक्शन। ३० जून २०१०। श्रीवास्तव, डी.के</ref> === उपलब्धियाँ और रणनीति === अकबर को इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। अकबर को अकबर-ऐ-आज़म (अर्थात अकबर महान), शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है। वह एक मात्र ऐसा शासक था जिसने मुगल साम्राज्य की नींव को संपुष्ट बनाया। लगातार विजय पाने के बाद उसने भारत के अधिकांश भाग को अपने अधीन कर लिया। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया। जो हिस्से उसके शासन में शामिल नहीं थे, उन्हें सहायक भाग घोषित किया गया। उसने राजपूतों के प्रति भी उदारवादी नीति अपनाई, राजपूत कन्याओं से विवाह किया और इस प्रकार उनसे खतरे को कम किया।[[चित्र:Jodhbai.jpg|250px|thumb|left|मरियम उज़-ज़मानी जोधा बेगम साहिबा(जोधा बाई)]]अकबर ने अपने दरबार में कई हिन्दूओं को राजसी पदों पर नियुक्त किया और की हिन्दू स्त्री से उसने विवाह भी रचाया अकबर न केवल एक महान विजेता था बल्कि वह एक सक्षम संगठनकर्ता एवं एक महान प्रशासक भी था। उसने ऐसे संस्थानों की स्थापना की जो एक प्रशासनिक प्रणाली की नींव सिद्ध हुए, जिन्हें ब्रिटिश कालीन भारत में भी प्रचालित किया गया था। अकबर के शासन काल में गैर मुस्लिमों के प्रति उसकी उदारवादी नीतियों, उसके धार्मिक नवाचार, भूमि राजस्व प्रणाली और उसकी प्रसिद्ध मनसबदारी प्रथा के कारण उसकी स्थिति मुगल बादशाहों में श्रेष्ठ है। अकबर की मनसबदारी प्रथा मुगल सैन्य संगठन और नागरिक प्रशासन का आधार बनी।<ref>{{Harvnb|सरकार|१९८४|p=३६}}</ref><ref>{{Harvnb|चंद्रा|२००७|pp=२४२-२४३}}</ref> === दीन-ए-इलाही === [[File:Jesuits at Akbar's court.jpg|thumb|इबादत खाना में दीन-ए-इलाही पर चर्चा]] उसने हिन्दू-मुस्लिम संप्रदायों के बीच की दूरियां कम करने के लिए दीन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की। इस धर्म में उसने हिंदू या मुस्लिम जाति को श्रेष्ठ ना बता कर इश्वर धर्म को श्रेष्ठ माना इसी कारण अकबर ने हिन्दुओं पर लगने वाला जज़िया कर समाप्त किया। सभी धर्मो के मूल तत्वों को उसने दीन-ए-इलाही में डाला, इसमे प्रमुखतः हिंदू एवं इस्लाम धर्म के साथ पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के मूल विचारों भी सम्मिलित थें। अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इसके अनुयायी बने रहे थे।[[चित्र:Silver Rupee Akbar.jpg|thumb|अकबर के समकालीन चाँदी की मुद्रा|left]]अकबर ने सिक्कों के पीछे "अल्लाह-ओ-अकबर" लिखवाया जो केवल मुस्लिम से संबंधित ना होकर अनेकार्थी शब्द था।<ref>{{Cite web |url=http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi |title=दीन-ऐ-इलाही ब्रितानिका ज्ञानकोश |access-date=16 फ़रवरी 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080514090902/http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi |archive-date=14 मई 2008 |url-status=live }}</ref><ref>{{Cite web |url=http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html |title=महान इस्लामिक साम्राज्यों का उदय (मुग़ल साम्राज्य : अकबर) |access-date=16 फ़रवरी 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090407041624/http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html |archive-date=7 अप्रैल 2009 |url-status=dead }}</ref><ref>https://web.archive.org/web/20090407041624/http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html</ref> === सुलह-ए-कुल === र्वधर्म मैत्री सुलह-ए-कुल सूफियों का मूल सिद्धांत रहा है। प्रसिद्ध सूफी शायर रूमी के पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा- एक मुसलमान एक ईसाई से सहमत नहीं होता और ईसाई यहूदी से। फिर आप सभी धर्मो से कैसे सहमत हैं? रूमी ने हंसकर जवाब दिया- मैं आपसे भी सहमत हूं। सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने सुलह-ए-कुल का सिद्धांत दिया, जिसे अकबर ने प्रतिपादित किया।<ref>{{Cite web |url=http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi |title=दीन-ए-इलाही ब्रितानिका ज्ञानकोश |access-date=31 जनवरी 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20080514090902/http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi |archive-date=14 मई 2008 |url-status=live }}</ref><ref>[http://www.srijangatha.com/Alekh3_2k10 भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100531005936/http://www.srijangatha.com/Alekh3_2k10 |date=31 मई 2010 }}। कृ्ष्ण कुमार यादव। ३ मार्च २०१०। पोर्ट ब्लेयर</ref> === इबादत खाना === [[File:Audienzhalle.jpg|thumb|इबादत खाना]] विभिन्न धर्मगुरुओं एवं प्रचारकों से धार्मिक चर्चाएँ करने के लिए अकबर ने दरबार में एक विशेष जगह बनवाई थी, जिसे इबादत-खाना (प्रार्थना-स्थल) कहा जाता था। अकबर को अपने धर्म के अलावा हिन्दू, शिया मुस्लिम, तुर्की, पुर्तगाली आदि से भी लगाव था।<ref name="sen2">{{Cite book |last=Sen |first=Sailendra |title=A Textbook of Medieval Indian History |publisher=Primus Books |year=2013 |isbn=978-9-38060-734-4 |pages=171}}</ref> === कला रुचि === [[File:Fatehpur Sikri near Agra 2016-03 img09.jpg|thumb|left|बुलन्द दरवाजा<ref>{{Cite web|title=prateek to Visit in India: Buland Darwaza|publisher=India Travel|url=http://www.indiaplaces.com/india-monuments/fatehpur-sikri-buland-darwaza.html |archiveurl=https://web.archive.org/web/20141105154120/http://www.indiatravelfaq.com/india-monuments/fatehpur-sikri-buland-darwaza.html |archivedate=5 November 2014|url-status=dead}}</ref><ref>There is another memorial gate called the "Buland Darwaza" at the [[Dargah Sharif]] in [[Ajmer]], Rajasthan, {{Cite web |title=Historical Monuments |publisher=Mission Sarkar Gharib Nawaz |url=http://www.missiongharibnawaz.com/historical-monuments.html |archiveurl=https://web.archive.org/web/20150129040942/http://www.missiongharibnawaz.com/historical-monuments.html |archivedate=29 January 2015 |url-status=dead |access-date=29 January 2015 }}, and another in Hyderabad near the [[Golconda Fort]].{{Citation needed|reason=not found|date=January 2015}}</ref><ref>{{cite web | url=https://www.britannica.com/place/Fatehpur-Sikri | website=[[Encyclopaedia Britannica]] |title=Fatehpur Sikri}}</ref>]] उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफ़ी रुचि दिखाई और उसके प्रासाद की भित्तियाँ सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थीं। मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया। उसे साहित्य में भी रुचि थी और उसने अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद भी करवाया था। अनेक फारसी संस्कृति से जुड़े चित्रों को अपने दरबार की दीवारों पर भी बनवाया। === कामुकता का आरोप === कई इतिहासकारों ने अकबर को स्त्रियों का शोषण करने वाला एक कामुक व्यक्ति बताया है तत्कालीन समाज में वेश्यावृति को सम्राट का संरक्षण प्रदान था। उसकी एक बहुत बड़ी हरम थी जिसमे बहुत सी स्त्रियाँ थीं। इनमें अधिकांश स्त्रियों को बलपूर्वक अपहृत करवा कर वहां रखा हुआ था। उस समय में सती प्रथा भी जोरों पर थी। तब कहा जाता है कि अकबर के कुछ लोग जिस सुन्दर स्त्री को सती होते देखते थे, बलपूर्वक जाकर सती होने से रोक देते व उसे सम्राट की आज्ञा बताते तथा उस स्त्री को हरम में डाल दिया जाता था। उसके दरबार के इतिहासकारों ने इस बारे में लिखा है कि अकबर इस तरह से सती होने वाली स्त्रियों की रक्षा करता था। अपने जीवनी में अकबर ने कहा है:-"यदि मुझे पहले ही यह बुधिमत्ता जागृत हो जाती तो मैं अपनी सल्तनत की किसी भी स्त्री का अपहरण कर अपने हरम में नहीं लाता।"<ref>[[आईने अकबरी]], भाग ३, पृष्ठ ३७८</ref> [[चित्र:Rani Durgavati.jpg|right|thumb|300px|रानी दुर्गावती]]अकबर अपनी प्रजा को बाध्य किया करता था की वह अपने घर की स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन सामूहिक रूप से आयोजित करे जिसे अकबर ने खुदारोज (प्रमोद दिवस) नाम दिया हुआ था। इस उत्सव के पीछे अकबर का एकमात्र उदेश्य सुन्दरियों को अपने हरम के लिए चुनना था। 'गोंडवाना' की रानी 'दुर्गावती' पर भी अकबर की कुदृष्टि थी। जब उसने उसे पाने के लिए उसके राज्य को पराजित किया तो 'दुर्गावती' ने आत्महत्या कर ली।<ref>[[आइने अकबरी]], पृ-१५</ref><ref name="श्रीवास्तव-२"/><ref name="श्रीवास्तव-२">[http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/25/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a5%a7%e0%a5%a6/ कौन कहता है – अकबर महान था ! १०. क्या ऐसा कामुक एवं पतित बादशाह अकबर महान है !] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20101108225232/http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/25/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A5%A7%E0%A5%A6/ |date=8 नवंबर 2010 }}। जागरण जंक्शन। श्रीवास्तव, डी.के।</ref>सम्पूर्ण कहानी पढ़ने के लिए आप देख सकते हैं:- ([https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80 रानी दुर्गावती]) === ज्वालामुखी मंदिर की घटना === [[File:Jawala Ji Temple.jpg|thumb|ज्वालामुखी मंदिर]] ज्वालामुखी मंदिर के संबंध में एक कथा काफी प्रचलित है। यह १५४२ से १६०५ के मध्य की ही कहानी है जब अकबर दिल्ली का राजा था। "ध्यानुभक्त" माता जोतावाली का परम भक्त था। एक बार जब वह देवी के दर्शन के लिए अपने गांववासियों के साथ ज्वालाजी के दर्शन लिए निकला। उसका काफिला दिल्ली से गुजरा तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उसे रोक लिया और राजा अकबर के दरबार में पेश किया। अकबर ने जब ध्यानु से पूछा कि वह अपने गांववासियों के साथ कहाँ जा रहा है तो उत्तर में ध्यानु ने कहा वह जोतावाली के दर्शन के लिए जा रहा है। अकबर ने माँ की शक्ति पर प्रश्न किया? तब ध्यानु ने कहा वह तो पूरे संसार की रक्षक। ऐसा कोई भी कार्य नही है जो वह नहीं कर सकती है। अकबर ने ध्यानु के घोड़े का सर यह कह कर कटवा दिया कि अगर तेरी माँ में शक्ति है तो घोड़े के सर को जोड़कर उसे जीवित कर के दिखायें। यह सुनते ही ध्यानु देवी की स्तुति करने लगा और अपना सिर काट कर माता को भेट के रूप में प्रदान किया। माता की शक्ति से घोड़े का सर जुड़ गया और अकबर को देवी की शक्ति का एहसास हुआ। बादशाह अकबर देवी के मंदिर में सोने का छत्र भी चढ़ाने गया। किन्तु उसके मन मे अभिमान हो गया कि वो सोने का छत्र चढाने लाया है, तो माता ने उसके हाथ से छत्र को गिरवा दिया और उसे एक अजीब (नई) धातु में बदल दिया, जो आज तक एक रहस्य है। यह छत्र आज भी मंदिर में मौजूद है। ज्वालामुखी मंदिर में आज तक एक लौ जल रही है, जिसे बुझाने का प्रयास भी अकबर ने किया पर वह असफल रहा।<ref>{{cite book|author=पालीवाल, डॉ॰डी एल (शिक्षा)|title=महाराणा प्रताप स्मृति ग्रंथ|publisher=साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ|page=१८२}}</ref> === इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार === इतिहासकार "दशरथ शर्मा" बताते हैं, कि हम "अकबर" को उसके दरबार के इतिहास और वर्णनों जैसे "अकबरनामा", आदि के अनुसार महान कहते हैं यदि कोई अन्य उल्लेखनीय कार्यों की ओर देखे, जैसे दलपत विलास, तब स्पष्ट हो जाएगा कि अकबर अपने हिन्दू सामंतों से कितना अभद्र व्यवहार किया करता था। तुलसी ने भी अकबर के शासनकाल का चित्रण कोई बहुत अच्छे रूप में नहीं किया है। अकबर के हिन्दू सामंत उसकी अनुमति के बगैर मंदिर निर्माण तक नहीं करा सकते थे। बंगाल में राजा मानसिंह ने एक मंदिर का निर्माण बिना अनुमति के आरंभ किया, तो अकबर ने पता चलने पर उसे रुकवा दिया और १५९५ में उसे मस्जिद में बदलने के आदेश दिया गया। अकबर के नवरत्न राजा मानसिंह द्वारा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण किए जाने के कारण हिन्दुओं ने उस मंदिर में जाने का बहिष्कार कर दिया। कारण साफ था, कि राजा मानसिंह के परिवार के अकबर से वैवाहिक संबंध थे। साथ ही अकबर के सिक्कों के पिछे अल्लाह-ओ-अकबर लिखवाने के पिछे तर्क था कि "अल्लाह महान हैं " या "अकबर ही अल्लाह हैं।"<ref>{{cite book|author=पालीवाल, डॉ॰डी एल (शिक्षा)|title=महाराणा प्रताप स्मृति ग्रंथ|publisher=साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ|page=१८२}}</ref>।<ref>{{cite book|author=पालीवाल, डॉ॰डी एल (शिक्षा)|title=महाराणा प्रताप स्मृति ग्रंथ|publisher=साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ|page=१८३}}</ref> === अकबर के नव रत्न === [[चित्र:Akbar, Todarmal, Tansen and Abul Fazal, Faizi and Abdur Rahim Khan-i-Khana in a court scene (16th Century A.D.).jpg|thumb|अकबर के नवरत्न :अबुल फजल, फैजी, मिंया तानसेन, राजा बीरबल, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह, अब्दुल रहीम खान-ऐ-खाना, फकीर अजिओं-दिन, मुल्लाह दो पिअज़ा]] * '''अबुल फजल''' (१५५१ - १६०२):- अकबर के दरबार में रचनाकार व इतिहासकार थें। इन्होंने ही अकबरनामा और आइन-ए-अकबरी की रचना की थी।<ref>{{Citation|last=Lee|first=Newton|title=To Google or Not to Google|date=2016|url=http://dx.doi.org/10.1007/978-1-4939-6415-4_1|work=Google It|pages=3–52|publisher=Springer New York|isbn=978-1-4939-6413-0|access-date=2020-04-13}}</ref><ref>[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/abulfazl/000_intro_fwp.html Introduction to Akbaranama and Ain-e-Akbari] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100627112939/http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/abulfazl/000_intro_fwp.html |date=27 जून 2010 }} [[Columbia University]]</ref> * '''फैजी''' (१५४७ - १५९५) अबुल फजल का भाई था। वे फारसी में कविता करते थें। राजा अकबर ने उसे अपने बेटे के गणित शिक्षक के पद पर नियुक्त किया था।<ref name=ain1>ब्लॉक्मैन, एच. (ट्र.) (१९२७, पुनर्मुद्रण १९९३)। ''द आइन-ए-अकबरी बाय अबुल-फ़ज़्ल अल्लामी'', खण्ड-१, कलकत्ता:द एशियाटिक सोसायटी, पृ. ५४८-५०</ref> * '''मिंया तानसेन''' अकबर के दरबार में गायक थे। वें कवि भी थे और कविता भी करते थें। मशहूर है कि यह जब गातें थे तो बादल भी रो पड़ते थे।<ref>{{cite book|author1=Stuart Cary Welch|author2=Metropolitan Museum of Art|title=India: Art and culture, 1300-1900|url=https://books.google.com/books?id=MEvZaVmBQtgC&pg=PA171|year=1985|publisher=Metropolitan Museum of Art|isbn=978-0-03-006114-1|pages=171–172}}</ref> [[File:Birbal.jpg|thumb|बीरबल]] * '''राजा बीरबल''' (१५२८ - १५८३) दरबार के विदूषक और अकबर के सलाहकार थे। ये परम बुद्धिमान भी थे। इनके अकबर के संग किस्से आज भी मशहूर है।<ref name="Sharma1999 Mughal in India">{{Cite book |last=S.R. Sharma |url=https://books.google.com/books?id=4j_VLlGqVSoC&pg=PA787 |title=Mughal Empire in India: A Systematic Study Including Source Material |date=1 January 1999 |publisher=Atlantic Publishers & Dist |isbn=978-81-7156-819-2 |page=787 |access-date=29 June 2013}}</ref><ref name="Malleson2001 Rise of Mughals">{{Cite book |last=G. George Bruce Malleson |url=https://books.google.com/books?id=GwSF6l59x88C&pg=PA131 |title=Akbar and the Rise of the Mughal Empire |publisher=Cosmo Publications |year=2001 |isbn=978-81-7755-178-5 |pages=131, 160, 161 |access-date=29 June 2013}}</ref> * '''राजा टोडरमल''' अकबर के वित्त मंत्री थे। विश्व की प्रथम भूमि लेखा जोखा एवं मापन प्रणाली तैयार करने वाले टोडरमल ही थें।<ref name=tod1>[Indian History, VK Agnihotri, pp.B249 ]</ref><ref name=tod2>[The Challenges of Indian Management, B R Virmani pp.57]</ref> * '''राजा मान सिंह''' आम्बेर जयपुर के कच्छवाहा राजपूत राजा थे। वह अकबर की सेना के प्रधान सेनापति थे। इनकी बुआ जोधाबाई अकबर की पटरानी थी।<ref>[http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00702051%26ct%3D237%26rqs%3D302%26rqs%3D309%26rqs%3D310 30. Ra´jah Ma´n Singh, son of Bhagwán Dás - Biography] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161007092053/http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile%3D00702051%26ct%3D237%26rqs%3D302%26rqs%3D309%26rqs%3D310 |date=7 अक्तूबर 2016 }} [[Ain-i-Akbari]], Vol. I.</ref><ref>[http://www.mapsofindia.com/who-is-who/history/raja-man-singh.html Raja Man Singh Biography] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190409172211/https://www.mapsofindia.com/who-is-who/history/raja-man-singh.html |date=9 अप्रैल 2019 }} India's who's who, www.mapsofindia.com.</ref><ref>1.राजस्थान का इतिहास : कर्नल जेम्स टॉड, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर</ref> * '''अब्दुल रहीम खान-ऐ-खाना''' अकबर के दरबार के कवि थें और अकबर के संरक्षक बैरम खान के बेटे थें।<ref>{{cite web|url=http://oldpoetry.com/oauthor/show/Abdur_Rahim_Khankhana |title=Abdur Rahim KhanKhana at Old poetry |publisher=Oldpoetry.com |date= |accessdate=30 September 2010}}</ref> * '''फकीर अजिओं-दिन''' अकबर के सलाहकार थें। * '''मुल्लाह दो पिअज़ा''' अकबर के सलाहकार थें।<ref name="C M Naim">{{cite book |url=https://books.google.com/books?id=ZbKv3zyIFD8C|title=Cultural History of Medieval India |last=Naim |first=C. M. |publisher=Social Science Press |year=2007 |isbn=978-81-87358-30-5 |editor-last=Khanna |editor-first=Meenakshi |location=New Delhi |pages=27–28,31–32 |chapter=Popular Jokes and Political History: The Case of Akbar, Birbal and Mulla Do-Piyaza |author-link=C. M. Naim}}</ref> === जीवनी === [[File:AbulFazlPresentingAkbarnama.jpg|thumb|left|अबुल फ़ज़ल अकबर को आइन-ए-एकबरी देते हुए]] अकबर की जीवनी का नाम "आइन-ए-एकबरी" था, जिसके रचनाकार 'अबुल फज़ल' थें।।<ref>[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/abulfazl/000_intro_fwp.html Introduction to Akbaranama and Ain-e-Akbari] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100627112939/http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/abulfazl/000_intro_fwp.html |date=27 जून 2010 }} [[Columbia University]]</ref> === मृत्यु === [[File:Gate of the Tomb of Akbar at Sikandra, Agra, India, 1795.jpg|thumb|अकबर का मक़बरा (सिकंदरा, आगरा)]] अकबर की मृत्यु उसके तख्त पर आरोहण के लगभग ५० साल बाद १६०५ में हुई और उसे सिकंदरा में आगरा के बाहर दफनाया गया। तब उसके बेटे जहाँगीर ने तख्त सम्भाला।<ref>Majumdar 1984, pp. 168–169</ref> === फिल्म एवं साहित्य === अकबर का व्यक्तित्व बहुचर्चित रहा है, इसलिए भारतीय साहित्य एवं सिनेमा ने अकबर से प्रेरित कई फिल्में और रचनाएँ हुए हैं। * २००८ में आशुतोष गोवरिकर निर्देशित फिल्म "जोधा अकबर" में अकबर एवं उनकी पत्नी की कहानी को दर्शाया गया है। अकबर एवं जोधा बाई का पात्र क्रमशः ऋतिक रोशन एवं ऐश्वर्या राय ने निभाया है। * १९६० में भारतीय सिनेमा की एक लोकप्रिय फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म" बनी थी। इसमें अकबर का पात्र पृथ्वीराज कपूर ने निभाया था। इस फिल्म में अकबर के पुत्र जहाँगीर(सलीम) की प्रेम कथा और उस कारण से पिता पुत्र में पैदा हुए द्वंद को दर्शाया गया है। सलीम की भूमिका दिलीप कुमार एवं अनारकली की भूमिका मधुबाला ने निभायी थी। * १९९० में जी टीवी चैनल में "अकबर-बीरबल" नाम से एक धारावाहिक प्रसारित किया गया था जिसमे अकबर का पात्र हिंदी अभिनेता विक्रम गोखले ने निभाया था। यह बहुत ही लोकप्रिय धारावाहिक थी। * नब्बे के दशक में संजय खान द्वारा निर्देशित धारावाहिक "अकबर दी ग्रेट" दूरदर्शन पर प्रदर्शित किया गया था। * प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार "सलमान रुशदी" द्वारा लिखित उपन्यास "दी एन्चैन्ट्रेस ऑफ़ फ्लोरेंस" में अकबर एक मुख्य पात्र है।<ref>{{Cite web |url=http://www.guardian.co.uk/books/2008/mar/29/fiction.salmanrushdie |title=एन्चैन्ट्रेस ऑफ़ फ्लोरेंस की समीक्षा |access-date=10 जून 2009 |archive-url=https://web.archive.org/web/20090322033309/http://www.guardian.co.uk/books/2008/mar/29/fiction.salmanrushdie |archive-date=22 मार्च 2009 |url-status=live }}</ref> == जहाँगीर (१६०५-१६२७) == [[File:Prince Salim, the future Jahangir.jpg|thumb|जहांगीर]] अकबर के स्थान पर उसके बेटे सलीम ने तख्तोताज़ को संभाला, जिसने जहांगीर(नूरुद्दीन मोहम्मद जहांगीर) की उपाधि पाई, जिसका अर्थ होता है (दुनिया का विजेता)। जहांगीर के दो भाई भी थें जिनके मुराद और दानियाल थें, यें दोनों अधिक शराब पीने के कारण मर गये थें। जँहागिर का प्रथम विवाह १५८५ ई. में मानबाई से हुआ जो आमेर के राजा भगवानदास की पुत्री व मान सिंह की बहन थी। उनका दूसरा विवाह मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई से हुआ। इसके बाद उसने मेहर-उन-निसा से निकाह किया, जिसे उसने नूरजहां (दुनिया की रोशनी) का खिताब दिया। वह उसे बेताहाशा प्रेम करता था और उसने प्रशासन की पूरी बागडोर नूरजहां को सौंप दी।[[File:Noorjahan &amp; Jahangir.jpg|thumb|left|जहांगीर और नूरजहां]] जहांगीर के अंदर अपने पिता अकबर जैसी राजनैतिक उद्यमशीलता की कमी थी किन्तु वह एक ईमानदार और सहनशील शासक था। १६१४ ई. में राजकुमार खुर्रम शाहजहां ने मेवाड़ के राणा अमर सिंह को हराया। १६२० ई. में कानगड़ह स्वयं जहांगीर ने जीत लिया। १६२२ ई. में कंधार क्षेत्र हाथ से निकल गया। जहांगीर ही के समय में अंग्रेज सर 'टामस रोई' राजदूत द्वारा, पहली बार भारतीय व्यापारिक अधिकार करने के इरादे से आया और ''ईस्ट इंडिया कंपनी'' की स्थापना की मंजूरी उसने जहाँगीर से पाई। १६२३ ई. में खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि नूरजहाँ अपने दामाद शहरयार को वली अहद बनाने की कोशिश कर रही थी। अंत १६२५ ई. में बाप और बेटे में सुलह हो गई। उसने कांगड़ा और किश्वर के अतिरिक्त अपने राज्य का विस्तार किया तथा मुगल साम्राज्य में बंगाल को भी शामिल कर दिया। उसने समाज में सुधार करने का प्रयास किया और वह हिन्दुओं, ईसाइयों तथा ज्यूस के प्रति उदार था जबकि सिक्खों के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण थे और दस सिक्ख गुरूओं में से पांचवें गुरू "जुजुुन देव" को जहांगीर के आदेश पर मौत के घाट उतार दिया गया था, जिन पर जहांगीर के बगावती बेटे खुसरू की सहायता करने का अरोप था।[[File:Tomb of Jahangir and gardens 3.jpg|thumb|जहांगीर का मक़बरा]]जहांगीर के शासन काल में कला, साहित्य और वास्तुकला फली फूली और श्री नगर में बनाया गया मुगल गार्डन उसकी कलात्मक अभिरुचि का एक स्थायी प्रमाण है। सम्राट जहांगीर अपनी आत्मकथा 'तुजुक ए-जहाँगीरी'में लिखते हैं कि नूरजहां बेगम की मां (अस्मत बेगम) ने गुलाब से इत्र निकलने की विधि का आविष्कार किया था। जहांगीर को चिल्ला से अत्यंत प्रेम था इसी कारण उसके समय को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है। कश्मीर से लौटते वक्त भीमवार में जहांगीर का निधन हो गया और लाहौर के पास शहादरा में रावी नदी के किनारे उसे दफनाया गया।<ref>{{cite book |last1=Hindustan) |first1=Jahangir (Emperor of |title=Jahān̐gīranāmā |date=1990 |publisher=Nāgarīpracāriṇī Sabhā |url=https://books.google.co.in/books?id=e4AcAAAAIAAJ&q=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwihy6zqpsPcAhWGpo8KHYdnD5MQ6AEIVDAH |accessdate=29 जुलाई 2018 |language=hi |archive-url=https://web.archive.org/web/20180729081559/https://books.google.co.in/books?id=e4AcAAAAIAAJ&q=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwihy6zqpsPcAhWGpo8KHYdnD5MQ6AEIVDAH |archive-date=29 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref><ref>{{cite book |last1=Reviews |first1=C. T. I. |title=Connections, A World History, Volume 1: World history, World history |date=2016 |publisher=Cram101 Textbook Reviews |isbn=9781490257839 |url=https://books.google.co.in/books?id=UJAlAgAAQBAJ&pg=PT249&dq=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwihy6zqpsPcAhWGpo8KHYdnD5MQ6AEITzAG#v=onepage&q=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8%20%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE%20%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&f=false |accessdate=29 जुलाई 2018 |language=en |archive-url=https://web.archive.org/web/20180729081419/https://books.google.co.in/books?id=UJAlAgAAQBAJ&pg=PT249&dq=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE+%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwihy6zqpsPcAhWGpo8KHYdnD5MQ6AEITzAG#v=onepage&q=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%A8%20%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%AE%20%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0&f=false |archive-date=29 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> == शाह जहाँ (१६२७-१६५८) == [[File:Shah Jahan and Mumtaz Mahal.jpg|thumb|मुमताज और शाहज़हां]]जहांगीर के बाद उसके द्वितीय पुत्र 'अल् आजाद अबुल मुजफ्फर शाहब उद-दीन मोहम्मद खुर्रम' ने १६२८ में तख्त संभाला। खुर्रम ने अपना नाम शाहज़हां रखा, जिसका अर्थ होता है 'दुनिया का राजा'। उसने उत्तर दिशा में कंधार तक अपना राज्य विस्तारित किया और दक्षिण भारत का अधिकांश हिस्सा जीत लिया। मुगल शासन शाहजहां के कार्यकाल में अपने सर्वोच्च बिन्दु पर था। शाहज़हां के अवधि में दुनिया को मुगल शासन की कलाओं और संस्कृति के अनोखे विकास को देखने का अवसर मिला। शाहज़हां को वास्तुकार राजा कहा जाता है। शाह जहाँ ने १६१२ में नूरजहाँ के भाई असफ खान की बेटी ''अरजूमन बानू'' से विवाह किया, अपनी इसी पत्नी का नाम उसने ''मुमताज महल'' रखा जिसका अर्थ है ''प्रकाश पूंज''।[[File:TajMahalbyAmalMongia.jpg|thumb|{{विकिपीडिया|ताजमहल}}]] [[File:Tombs-in-crypt.jpg|thumb|left|ताजमहल के निचले स्तर में मुमताज़ महल और शाहजहाँ की वास्तविक कब्रें]] शाहज़हां ने लाल किला, मोती मस्जिद और जामा मस्जिद जैसी कई वास्तुकला के सुंदर उदाहरण संसार को दिया। इन सब के अलावा शाहज़हां को आज ताज महल के लिए याद किया जाता है, जो उसने आगरा में यमुना नदी के किनारे अपनी प्रिय पत्नी मुमताज के लिए सफेद संगमरमर से बनवाया था। शाहज़हां के वास्तुकला के प्रति प्रेम के कारण ही उसके काल को वास्तुकला की दृष्टि से "स्वर्ण काल" कहा जाता है।<ref>{{cite book |year=2011 |title=Illustrated dictionary of the Muslim world |url=https://archive.org/details/illustrateddicti0000unse |url-access=registration |location=Tarrytown, NY|publisher=Marshall Cavendish Reference |page=[https://archive.org/details/illustrateddicti0000unse/page/136 136] |isbn=978-0-7614-7929-1}}</ref> शाहज़हां को उसके पहली पत्नी 'कंधारी बेगम' से 'परेज बानू बेगम' नामक पुत्री प्राप्त हुई थी और 'मुमताज बेगम' से 'जहाँआरा बेगम', 'दारा शिकोह', 'शाह शुजा', 'रोशनारा बेगम', 'औरंगज़ेब', 'मुराद बख्श', 'गौहरारा बेगम' नाम के पुत्र-पुत्री प्राप्त हुए थे।<ref>{{cite journal |last=Kumar |first=Anant |date=January–June 2014 |title=Monument of Love or Symbol of Maternal Death: The Story Behind the Taj Mahal |url=http://www.casereportswomenshealth.com/article/S2214-9112(14)00003-4/pdf |journal=Case Reports in Women's Health |volume=1 |pages=4–7 |doi=10.1016/j.crwh.2014.07.001 |access-date=21 December 2015|doi-access=free }}</ref><ref>{{harvnb|Nicoll|2009|p=177}}</ref> <center> <gallery> File:Ghulam Ali Khan 003b.jpg|लाल किला File:New Delhi Jama Masjid.jpg|जामा मस्जिद File:Jahanara 1635.jpg|जहाँआरा बेगम File:Unknown Indian - Miniature Portrait of Dara Shikoh - Google Art Project (cropped).jpg|दारा शिकोह File:Sháh Shujáʿ.jpg|शाह शुजा File:Raushanara.jpg|रोशनारा बेगम File:Aurangzeb-portrait.jpg|औरंगजेब File:Murád Baxsh.jpg|मुराद बख्श </gallery> </center> == औरंगज़ेब (१६५८-१७०७) == [[File:The Emperor Aurangzeb on Horseback ca. 1690–1710 The Cleveland Museum of Art.jpg|thumb|औरंगज़ेब]] औरंगज़ेब ने १६५८ में अपने भाईयों को मारकर और पिता को गिरफ्तार कर तख्त संभाला और १७०७ तक राज्य किया। इस प्रकार औरंगज़ेब ने ५० वर्ष तक राज्य किया। जो अकबर के बराबर लम्बा कार्यकाल था परन्तु दुर्भाग्य से उसने अपने पांचों बेटों को शाही दरबार से दूर रखा और इसका नतीजा यह हुआ कि उनमें से किसी को भी सरकार चलाने की कला का प्रशिक्षण नहीं मिला। इससे मुगलों को आगे चल कर हानि उठानी पड़ी साथ-साथ औरंगजेब के कट्टर हिन्दू विरोधी नीतियों ने भी मुगल साम्राज्य को विनाश की ओर ढकेल दिया। [[File:Mughal-empire-map.jpg|thumb|औरंगज़ेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य]] शाहजहाँ द्वारा १६३४ में शहज़ादा औरंगज़ेब को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया गया, मुग़ल प्रथाओं के अनुसार, औरंगज़ेब किरकी (महाराष्ट्र) को गया और उसका नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया। १६३७ में उसने रबिया दुर्रानी से शादी की। इधर आगर में शाहज़हां दरबार का सारा कामकाज उसके बड़े भाई दारा शिकोह को सौंप रहा था। १६४४ में औरंगजेब की बहन एक दुर्घटना में जलकर मर गयी किन्तु औरंगजेब इस घटना के तीन हफ्ते बाद लौटा, इससे क्रोधित हो कर शाहज़हां ने उसे दक्कन के सूबेदार के पद से बर्ख़ास्त कर दिया। कुछ दिनों बाद वह गुजरात का सूबेदार बना और उसके सुचारू रूप से शासन को देख उसे बदख़्शान (उत्तरी अफ़गानिस्तान) और बाल्ख़ (अफ़गान-उज़्बेक) क्षेत्र का सूबेदार बना दिया गया। बाद में उसे मुल्तान और सिंध का भी गवर्नर बनाया गया। इस दौरान वो फ़ारस के सफ़वियों से कंधार पर नियंत्रण के लिए लड़ता रहा पर उसे सिर्फ हार और अपने पिता की उपेक्षा मिली। १६५२ में वह पुनः दक्कन का सुबेदार बना। उसने गोलकोंडा और बीजापुर के खिलाफ़ लड़ाइयाँ की पर निर्णायक क्षण पर शाहजहाँ ने दारा शिकोह के कहने पर सेना वापस बुला ली जिससे उसे बहुत ठेस पहुंची। औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह का खून कर स्वयं को मुगल शासक बना लिया। औरंगजेब ने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के जरिये मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और १५ करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का १/४ था। अपने शासनकाल में उसने गैर मुस्लिमों पर जजिया कर पुनः लगा दिया जिसे अक़बर ने हटा दिया था। उसने कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम क़बूल करने पर मजबूर किया जब सिखों के नौवें गुरु तेग़ बहादुर ने इसका विरोध किया तो औरंगजेब ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। [[File:Shivaji British Museum.jpg|thumb|left|छत्रपती शिवाजी महाराज]][[File:Raja Shivaji at Aurangzeb&#039;s Darbar- M V Dhurandhar.jpg|thumb|औरंगजेब के दरबार में छत्रपती शिवाजी महाराज]] अपने शासनकाल में उसने दक्षिण के बीजापुर और गोलकुंडा पर विजय प्राप्त की। शिवाजी महाराज से उसका भीषण युद्ध हुआ यूं तो एक बार औरंगजेब ने अपने सेनापति जयसिंह के सहारे शिवाजी महाराज को अपने पास मित्रता के निवेदन से बुलाकर उन्हें कैद कर‌ लिया था पर शिवाजी उसके कैद से भागने में सफल रहे और फिर शिवाजी महाराजा ने औरंगजेब को हराया और भारत में मराठो ने पूरे देश में अपनी ताकत बढ़ाई शिवाजी की मृत्यु के बाद भी मराठों ने औरंग़जेब को परेशान किया। औरंगजेब को अपनी हिन्दू विरोधी नज़रिया के कारण कई राजपूत के विरोध का सामना करना पड़ा।<ref>Gordon, Stewart (1993), The Marathas 1600–1818, Cambridge University Press, {{ISBN|978-0-521-26883-7}}</ref> [[File:Tomb Aurangzeb.jpg|thumb|औरंगाबाद, महाराष्ट्र में औरंगज़ेब की कब्र]] औरंगज़ेब की मौत के साथ विघटनकारी ताकतें उठ खड़ी हुईं और शक्तिशाली मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। मुगल शासन काल का पतन या मुगल शासन काल का विघटन १७०७ में औरंगजेब की मृत्यु के बाद आरंभ हो गया था। उनके पुत्र और उत्तराधिकारी, बहादुर शाह जफर पहले ही बूढ़े हो गए थे, जब वे सिहांसन पर बैठे तो उन्हें एक के बाद एक बगावतों का सामना करना पड़ा। उस समय साम्राज्य के सामने मराठों और ब्रिटिश की ओर से चुनौतियां मिल रही थी। करो में स्फीति और धार्मिक असहनशीलता के कारण मुगल शासन की पकड़ कमजोर हो गई थी। मुगल साम्राज्य अनेक स्वतंत्र या अर्ध स्वतंत्र राज्यों में टूट गया। इरान के नादिरशाह ने १७३९ में दिल्ली पर आक्रमण किया और मुगलों की शक्ति की टूटन को जाहिर कर दिया। यह साम्राज्य तेजी से इस सीमा तक टूट गया कि अब यह केवल दिल्ली के आस पास का एक छोटा सा जिला रह गया। फिर भी उन्होंने १८५० तक भारत के कम से कम कुछ हिस्सों में अपना राज्य बनाए रखा, जबकि उन्हें पहले के दिनों के समान प्रतिष्ठा और प्राधिकार फिर कभी नहीं मिला। राजशाही साम्राज्य बहादुर शाह द्वितीय के बाद समाप्त हो गया, जो सिपाहियों की बगावत में सहायता देने के संदेह पर ब्रिटिश राज द्वारा रंगून निर्वासित कर दिए गए थे। वहां १८६२ में उनकी मृत्यु हो गई। इससे भारतीय इतिहास का मध्य कालीन युग समाप्त हुआ और धीरे धीरे ब्रिटिश राज ने राष्ट्र पर अपनी पकड़ बढ़ाई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जन्म हुआ।<ref>{{cite web|url=https://scroll.in/article/856178/aurangzeb-was-a-bigot-not-just-by-our-standards-but-by-those-of-his-predecessors-and-peers|title=Aurangzeb was a bigot not just by our standards but also by those of his predecessors and peers|access-date=1 नवंबर 2017|archive-url=https://web.archive.org/web/20171101095918/https://scroll.in/article/856178/aurangzeb-was-a-bigot-not-just-by-our-standards-but-by-those-of-his-predecessors-and-peers|archive-date=1 नवंबर 2017|url-status=live}}</ref><ref name="Satyagraha">{{Cite news|url=https://satyagrah.scroll.in/article/16718/was-the-aurangzeb-most-evil-ruler-in-indian-history|title=पांच तथ्य जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि औरंगजेब हिंदुओं के लिए सबसे बुरा शासक था|last=दानियाल|first=शोएब|work=सत्याग्रह|access-date=2018-05-21|language=hi-IN|archive-url=https://web.archive.org/web/20180517195552/http://satyagrah.scroll.in/article/16718/was-the-aurangzeb-most-evil-ruler-in-indian-history|archive-date=17 मई 2018|url-status=live}}</ref> ==एक दृष्टि में== {| style="width:100%;" class="wikitable" ! style="background:#b0dc58; width:8%;"| चित्र ! style="background:#b0dc58; width:12%;"| नाम ! style="background:#f0dc88; width:18%;"| जन्म नाम ! style="background:#b0dc88; width:9%;"| जन्म ! style="background:#b0dc88; width:20%;"| राज्यकाल ! style="background:#b0dc88; width:13%;"| मृत्यु ! style="background:#b0dc28; width:20%;"| अन्य जानकारी |- | style="text-align:center;"|[[File:Babur of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|बाबर'''(بابر)''' | style="text-align:center;"|ज़हीरुद्दीन मुहम्मद'''(ظہیر الدین محمد)''' | style="text-align:center;"|२३ फ़रवरी १४८३ | style="text-align:center;"|३० अप्रैल १५२६ – २६ दिसम्बर १५३० | style="text-align:center;"|५ जनवरी १५३१ (आयु ४७) | style="text-align:center;"|[[File:1842 tomb of Babur by Charles Masson.png|thumb|काबुल में बाबर का मक़बरा]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Humayun of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|हुमायूँ'''(ہمایوں)''' | style="text-align:center;"|नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ'''(نصیر الدین محمد ہمایوں)'''<small>(पहला राज्यकाल)</small> | style="text-align:center;"|१७ मार्च १५०८ | style="text-align:center;"|२६ दिसम्बर १५३० – १७ मई १५४० | style="text-align:center;"|२७ जनवरी १५५६ (आयु ४७) | style="text-align:center;"|[[चित्र:Humayu tomb DELHI.jpg|अंगूठाकार|दिल्ली में हुमायूं का मकबरा]] |- style="background:#EDE4EB" | style="text-align:center;"|[[File:Shershah.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|शेर शाह सूरी'''(شیر شاہ سوری)''' | style="text-align:center;"|फ़ारिद खान'''(فرید خان)''' | style="text-align:center;"|१४८६ | style="text-align:center;"|१७ मई १५४० – २२ मई १५४५<ref name="p.83">Majumdar, R.C. (ed.) (2007). ''The Mughul Empire'', Mumbai: Bharatiya Vidya Bhavan, p.83</ref> | style="text-align:center;"|२२ मई १५४५ | style="text-align:center;"|[[File:Rohtas Fort Gate.jpg|thumb|रोहितास किला]][[चित्र:Sasaram.jpg|right|thumb|सासाराम में शेर शाह का मक़बरा]] |- style="background:#EDE4EB" | style="text-align:center;"|[[File:Sin foto.svg|80px]] | style="text-align:center;"|इस्लाम शाह सूरी'''(اسلام شاہ سوری)''' | style="text-align:center;"|जलाल खान'''(جلال خان)''' <small>शेर शाह सूरी का पुत्र</small> | style="text-align:center;"|? | style="text-align:center;"|२६ मई १५४५ – २२ नवम्बर १५५४<ref name="p.90-33">Majumdar, R.C. (ed.) (2007). ''The Mughul Empire'', Mumbai: Bharatiya Vidya Bhavan, pp.90–93</ref> | style="text-align:center;"|२२ नवम्बर १५५४ | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|इस्लाम शाह सूरी}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Humayun of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|हुमायूँ'''(ہمایوں)''' | style="text-align:center;"|नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ'''(نصیر الدین محمد ہمایوں)'''<small>(1540 में सुरी वंश के शेर शाह सूरी द्वारा हुमायूं को उखाड़ फेंक दिया गया था, लेकिन इस्लाम शाह सूरी (शेर शाह सूरी के पुत्र और उत्तराधिकारी) की मृत्यु के बाद 1555 में उसे गद्दी पुनः मिल गई।)</small> | style="text-align:center;"|१७ मार्च १५०८ | style="text-align:center;"|२२ फ़रवरी १५५५ – २७ जनवरी १५५६ | style="text-align:center;"|२७ जनवरी १५५६ (आयु ४७) | style="text-align:center;"|[[File:Humayun&#039;s Tomb from the Charbagh - 1.jpg|thumb|दिल्ली में हुमायूँ का मक़बरा]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Akbar Shah I of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|अकबर-ए-आज़म'''(اکبر اعظم)''' | style="text-align:center;"|जलालुद्दीन मुहम्मद'''(جلال الدین محمد اکبر)''' | style="text-align:center;"|१४ अक्टूबर १५४२ | style="text-align:center;"|२७ जनवरी १५५६ – २७ अक्टूबर १६०५ | style="text-align:center;"|२७ अक्टूबर १६०५ (आयु ६३) | style="text-align:center;"|[[File:Fatehpur Sikri near Agra 2016-03 img09.jpg|thumb|बुलन्द दरवाजा<ref>{{Cite web|title=prateek to Visit in India: Buland Darwaza|publisher=India Travel|url=http://www.indiaplaces.com/india-monuments/fatehpur-sikri-buland-darwaza.html |archiveurl=https://web.archive.org/web/20141105154120/http://www.indiatravelfaq.com/india-monuments/fatehpur-sikri-buland-darwaza.html |archivedate=5 November 2014|url-status=dead}}</ref><ref>There is another memorial gate called the "Buland Darwaza" at the [[Dargah Sharif]] in [[Ajmer]], Rajasthan, {{Cite web |title=Historical Monuments |publisher=Mission Sarkar Gharib Nawaz |url=http://www.missiongharibnawaz.com/historical-monuments.html |archiveurl=https://web.archive.org/web/20150129040942/http://www.missiongharibnawaz.com/historical-monuments.html |archivedate=29 January 2015 |url-status=dead |access-date=29 January 2015 }}, and another in Hyderabad near the [[Golconda Fort]].{{Citation needed|reason=not found|date=January 2015}}</ref><ref>{{cite web | url=https://www.britannica.com/place/Fatehpur-Sikri | website=[[Encyclopaedia Britannica]] |title=Fatehpur Sikri}}</ref>]][[File:Gate of the Tomb of Akbar at Sikandra, Agra, India, 1795.jpg|thumb|अकबर का मक़बरा (सिकंदरा, आगरा)]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Jahangir of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|जहांगीर'''(جہانگیر)''' | style="text-align:center;"|नूरुद्दीन मुहम्मद सलीम'''(نور الدین محمد سلیم)''' | style="text-align:center;"|20 सितम्बर 1569 | style="text-align:center;"|27 अक्टूबर 1605 – 8 नवम्बर 1627 | style="text-align:center;"|8 नवम्बर 1627 (आयु 58) | style="text-align:center;"|[[File:Tomb of Jahangir and gardens 3.jpg|thumb|जहांगीर का मक़बरा]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Shah Jahan I of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|शाह-जहाँ-ए-आज़म'''(شاہ جہان اعظم)''' | style="text-align:center;"|शहाबुद्दीन मुहम्मद ख़ुर्रम'''(شہاب الدین محمد خرم)''' | style="text-align:center;"|5 जनवरी 1592 | style="text-align:center;"|8 नवम्बर 1627 – 31 जुलाई 1658 | style="text-align:center;"|22 जनवरी 1666 (आयु 74) | style="text-align:center;"|[[File:TajMahalbyAmalMongia.jpg|thumb|{{विकिपीडिया|ताजमहल}}]][[File:Tombs-in-crypt.jpg|thumb|left|ताजमहल के निचले स्तर में मुमताज़ महल और शाहजहाँ की वास्तविक कब्रें]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Alamgir I of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|अलामगीर(औरंगज़ेब)'''(عالمگیر)''' | style="text-align:center;"|मुइनुद्दीन मुहम्मद'''(محی الدین محمداورنگزیب)''' | style="text-align:center;"|4 नवम्बर 1618 | style="text-align:center;"|31 जुलाई 1658 – 3 मार्च 1707 | style="text-align:center;"|3 मार्च 1707 (आयु 88) | style="text-align:center;"|[[File:Tomb Aurangzeb.jpg|thumb|औरंगाबाद, महाराष्ट्र में औरंगज़ेब की कब्र]] |- | style="text-align:center;"|[[File:Bahadur Shah I of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|बहादुर शाह | style="text-align:center;"|क़ुतुबुद्दीन मुहम्मद मुआज्ज़म<small>उन्होंने मराठाओं के साथ बस्तियों बनाई, राजपूतों को शांत किया और पंजाब में सिखों के साथ मित्रता बनाई।</small> | style="text-align:center;"|14 अक्टूबर 1643 | style="text-align:center;"|19 जून 1707 – 27 फ़रवरी 1712 (4 साल और 253 दिन) | style="text-align:center;"|27 फ़रवरी 1712 (आयु 68) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|बहादुर शाह प्रथम}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Jahandar Shah of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|जहांदार शाह | style="text-align:center;"|माज़ुद्दीन जहंदर शाह बहादुर<small>अपने विज़ीर ज़ुल्फ़िकार खान द्वारा अत्यधिक प्रभावित।</small> | style="text-align:center;"|9 मई 1661 | style="text-align:center;"|27 फ़रवरी 1712 – 11 फ़रवरी 1713 (0 साल और 350 दिन) | style="text-align:center;"|11 फ़रवरी 1713 (आयु 51) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|जहांदार शाह}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Farrukhsiyar of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|फर्रुख्शियार | style="text-align:center;"|फर्रुख्शियार<small>1717 में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक फ़रमान जारी कर बंगाल में शुल्क मुक्त व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया, जिसके कारण पूर्वी तट में उनकी ताक़त बढ़ी।</small> | style="text-align:center;"|20 अगस्त 1685 | style="text-align:center;"|11 जनवरी 1713 – 28 फ़रवरी 1719 (6 साल और 48 दिन) | style="text-align:center;"|28 फ़रवरी 1719 (आयु 33) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|फ़र्रुख़ सियर}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Emperor Rafi Uddar Jat.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|रफी उल-दर्जत | style="text-align:center;"|रफी उल-दर्जत | style="text-align:center;"|30 नवम्बर 1699 | style="text-align:center;"|28 फ़रवरी – 6 जून 1719 (0 साल और 98 दिन) | style="text-align:center;"|6 जून 1719 (आयु 19) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|रफी उद-दर्जत}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Shah Jahan II of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|शाहजहां द्वितीय | style="text-align:center;"|रफी उद-दौलत | style="text-align:center;"|जून 1696 | style="text-align:center;"|6 जून 1719 – 19 सितम्बर 1719 (0 साल और 105 दिन) | style="text-align:center;"|19 सितम्बर 1719 (आयु 23) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|रफी उद-दौलत}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Muhammad Shah of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|मुहम्मद शाह | style="text-align:center;"|रोशन अख्तर बहादुर | style="text-align:center;"|17 अगस्त 1702 | style="text-align:center;"|27 सितम्बर 1719 – 26 अप्रैल 1748 (28 साल और 212 दिन) | style="text-align:center;"|26 अप्रैल 1748 (आयु 45) | style="text-align:center;"|<!--Got rid of the [[Syed Brothers]]. Fought a long war with the Marathas, losing [[Deccan]] and [[Malwa]] in the process. Suffered the invasion of [[Nadir Shah]] of Persia in 1739. He was the last Mughal Emperor to possess effective control over the empire-->{{विकिपीडिया|मुहम्मद शाह (मुग़ल)}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Ahmad Shah Bahadur of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|अहमद शाह बहादुर | style="text-align:center;"|अहमद शाह बहादुर<small>सिकंदराबाद की लड़ाई में मराठाओं द्वारा मुगल सेना की हार</small> | style="text-align:center;"|23 दिसम्बर 1725 | style="text-align:center;"|26 अप्रैल 1748 – 2 जून 1754 (6 साल और 37 दिन) | style="text-align:center;"|1 जनवरी 1775 (आयु 49) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|अहमद शाह बहादुर}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Alamgir II of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|आलमगीर द्वितीय | style="text-align:center;"|अज़ीज़ुद्दीन | style="text-align:center;"|6 जून 1699 | style="text-align:center;"|2 जून 1754 – 29 नवम्बर 1759 (5 साल और 180 दिन) | style="text-align:center;"|29 नवम्बर 1759 (आयु 60) | style="text-align:center;"|<!--Domination of [[Vizier]] [[Ghazi ud-Din Khan Feroze Jung III|Imad-ul-Mulk]]-->{{विकिपीडिया|आलमगीर द्वितीय}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Sin foto.svg|80px]] | style="text-align:center;"|शाहजहां तृतीय | style="text-align:center;"|मुही-उल-मिल्लत<small>बक्सर के युद्ध के दौरान बंगाल, बिहार और ओडिशा के निजाम का समेकन। 1761 में हैदर अली मैसूर के सुल्तान बने।</small> | style="text-align:center;"| | style="text-align:center;"|10 दिसम्बर 1759 – 10 अक्टूबर 1760 | style="text-align:center;"|1772 | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|शाहजहां तृतीय}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Ali Gauhar of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|शाह आलम द्वितीय | style="text-align:center;"|अली गौहर<small>1799 में मैसूर के टीपू सुल्तान का निष्पादन</small> | style="text-align:center;"|25 जून 1728 | style="text-align:center;"|24 दिसम्बर 1760 – 19 नवम्बर 1806 (46 साल और 330 दिन) | style="text-align:center;"|19 नवम्बर 1806 (आयु 78) | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|शाह आलम द्वितीय}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Akbar Shah II of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|अकबर शाह द्वितीय | style="text-align:center;"|मिर्ज़ा अकबर या अकबर शाह सानी | style="text-align:center;"|22 अप्रैल 1760 | style="text-align:center;"|19 नवम्बर 1806 – 28 सितम्बर 1837 | style="text-align:center;"|28 सितम्बर 1837 (आयु 77) | style="text-align:center;"|<!--Titular figurehead under British protection.-->{{विकिपीडिया|अकबर शाह द्वितीय}} |- | style="text-align:center;"|[[File:Bahadur Shah II of India.jpg|80px]] | style="text-align:center;"|बहादुर शाह द्वितीय | style="text-align:center;"|अबू ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर या बहादुर शाह ज़फर<small>अंतिम मुगल सम्राट। 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश द्वारा अपदस्थ और बर्मा में निर्वासित किया गया। | style="text-align:center;"|24 अक्टूबर 1775 | style="text-align:center;"|28 सितम्बर 1837 – 14 सितम्बर 1857 (19 साल और 351 दिन) | style="text-align:center;"|7 नवम्बर 1862 | style="text-align:center;"|{{विकिपीडिया|बहादुर शाह ज़फ़र}} |} ==सन्दर्भ== d57k92vy6th1gd1smps42nabu948pzc भारतीय अर्थव्यवस्था/ब्रिटिश शासन के समय भारतीय अर्थव्यवस्था 0 8868 83207 76339 2026-10-21T08:52:13Z Jcb 16661 83207 wikitext text/x-wiki {{संचरण|पिछला= विकास|अगला=1950 से 1990 तक की भारतीय अर्थव्यवस्था}} भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना के सूत्र इतिहास में बहुत गहरे है।भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रा प्राप्ति के पूर्व दो सौ वर्षोो तक ब्रिटिश शासन के अधीन था।भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का मुख्य उद्येश्य इंग्लैंड में तेजी से विससित हो रहे औद्योगिक आधार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को केवल एक कच्चा प्रदायक तक ही सीमित रखना था.ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की स्थापना से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था स्वतंत्र थी। कृषि जनसामान्य की आजीविका और सरकार की आय का मुख्य स्रोत था,फिर भी विनिर्माण गतिविधियाँ भी जारी थी।सूती व रेशमी वस्त्रों,धातु आधारित तथा बहुमूल्य मणि-रत्न आदि से जुड़ी शिल्पकलाओं के उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में भारत विश्व भर में सुविख्यात हो चुका था।भारत में निर्मित इन वस्तुओं का विश्व के बाजोरों में अच्छी सामग्री के प्रयोग तथा उच्च स्तर की कलात्मकता के आधार पर काफी प्रतिष्ठा प्राप्त था। <ref>http://www.ncert.nic.in/ncerts/l/khec101.pdf,पेज-4</ref> ढाका के मलमल ने उत्कृष्ट कोटि के सूती वस्त्र के रूप में विश्व भर में ख्याति अर्जित की थी। शाही मलमल 17 वीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नीयर के अनुसार उस समय का बंगाल मिश्र से अधिक समृद्ध था ।यहां से सूती रेशमी वस्त्र,चावल ,शक्कर और मक्खन का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता था। == औपनिवेशिक शासन के दौरान निम्न-स्तरीय आर्थिक विकास == ब्रिटिश अर्थशास्त्री '''एंगस मैडिसन''' के अनुसार, विश्व अर्थव्यवस्था अर्थात् वैश्विक सकल घरेलू उत्पादन(GDPमें भारत की हिस्सेदारी '''1700 में 24.4% से घटकर 1950 में 4.2%''' हो गई। भारत की जीडीपी (पीपीपी) प्रति व्यक्ति मुगल साम्राज्य के दौरान स्थिर रही और ब्रिटिश शासन की शुरुआत से पहले ही गिरावट शुरू हो गई। <ref> Maddison, Angus (2003): Development Centre Studies The World Economy Historical Statistics: Historical Statistics, OECD Publishing, {{ISBN|9264104143}}, page 261</ref> [[File:Share of Global GDP.gif|thumb|300px|एंगस मैडिसन के आकलन के अनुसार,1000 ईस्वी से 2008 ईस्वी तक भारत सहित कई देशों का सकल घरेलू उत्पादन(GDP) में वैश्विक योगदान]] चित्र:वैश्विक सकल घरेलू उत्पादन(GDP) में भारत तथा अन्य देशों का योगदान।<ref>Data table in Maddison A (2007), Contours of the World Economy I-2030AD, Oxford University Press, {{ISBN|978-0199227204}}</ref> वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी '''1750 में 25% से घटकर 1900 में 2%''' हो गई।<ref>Jeffrey G. Williamson, David Clingingsmith (August 2005). "India's Deindustrialization in the 18th and 19th Centuries" (PDF). Harvard University. Retrieved 18 May 2017.</ref>इसी समय, विश्व अर्थव्यवस्था में यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा '''1700 में 2.9% से बढ़कर 1870 में 9%''' हो गया, <ref>Maddison, Angus (2003): Development Centre Studies The World Economy Historical Statistics: Historical Statistics, OECD Publishing, {{ISBN|9264104143}}, page 261</ref>और ब्रिटेन ने भारत को 19 वीं शताब्दी में दुनिया के सबसे बड़े कपड़ा निर्माता के रूप में प्रतिस्थापित किया। भारतीय अर्थव्यवस्था जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप 1890 से 1910 तक प्रति वर्ष लगभग 1% बढ़ी,<ref>B. R. Tomlinson, ''The Economy of Modern India, 1860–1970'' (1996) p. 5</ref> औपनिवेशिक शासकों ने कभी भी भारत की राष्ट्रीय तथा प्रतिव्यक्ति आय का आकलन करने का ईमानदारी से प्रयास नहीं किया।फिर भी देश की राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय का आकलन निजी स्तर पर दादा भाई नौरोजी,विलियम डिग्बी,फिंडले शिराज,डॉ वी.के. आर .वी.राव तथा आर.सी. देसाई ने किया।इनमें डॉ राव द्वारा लगाए गए अनुमान बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनके अनुसार बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत की राष्ट्रीय आय की '''वार्षिक वृद्धि दर 2% से कम तथा प्रति व्यक्ति उत्पाद वृद्धि दर मात्र आधा प्रतिशत''' ही रही है।<ref>http://www.ncert.nic.in/ncerts/l/khec101.pdf,पेज-5</ref> देश की राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय का आकलन निजी स्तर पर दादा भाई नौरोजी विलियम डिग्री हिंदले सिराज डॉक्टर वीके आरवी राव तथा आरसी देसाई 1820 में भारत की जीडीपी विश्व का कुल 16% थी, 1870 तक यह गिरकर 12% हो गई और 1947 तक 4% तक गिर गई थी। भारत की प्रति व्यक्ति आय ब्रिटिश राज के दौरान अधिकांशतः स्थिर रही, इसकी अधिकांश जीडीपी वृद्धि का विस्तार आबादी से हुआ। 1850 से 1947 तक भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 16% से थोड़ी ही बढ़ी,जो 533$(डॉलर) से बढ़कर 618$ हुई।(1990 के अंतर्राष्ट्रीय डॉलर में।)<ref>Maddison, Angus. "PerCapita GDP". Historical Statistics of the World Economy:1–2008 AD (Report). University of Groningen. Retrieved 15 January 2020.</ref> == कृषि क्षेत्रक == औपनिवेशिक शासन से पूर्व भारत मूलत: कृषि अर्थव्यवस्था हीं बना रहा। उस समय भारत की 80% जनसंख्या गाँवों में बसी थी जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि के माध्यम से अपनी रोजी-रोटी कमा रही थी।अंग्रेजों के भू-राजस्व निर्धारण और संग्रहण के नये तरीके ने यहां के परंपरागत कृषि ढांचे को नष्ट कर दिया।[[File:Indian farmers.jpg|thumb|भारतीय कृषक]] कृषि क्षेत्र की गतिहीनता का मुख्य कारण औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू की गई भूव्यवस्था प्रणाली थी।1757 के प्लासी के युद्ध के पश्चात् बंगाल की दीवानी प्राप्त करने के बाद कंपनी के गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 में बंगाल में द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर '''फार्मिंग सिस्टम (इजारेदारी प्रथा)''' की शुरुआत भू-राजस्व की वसूली के लिए की।फार्मिंग सिस्टम के अंतर्गत कंपनी किसी क्षेत्र या जिले के भू-क्षेत्र से राजस्व वसूली की जिम्मेदारी उसे सौंपती थी, जो सबसे अधिक बोली लगाता था।<ref>https://www.indiaolddays.com/british-rule-influence-on-indian-agriculture/</ref> प्रौद्योगिकी का निम्न स्तर,सिंचाई सुविधाओं का अभाव और उर्वरकों का नगण्य प्रयोग भी कृषि उत्पादकता के स्तर को बहुत निम्न रखने के लिए उत्तरदीयी था। कृषि के व्यवसायीकरण के कारण नकदी फसलों की उत्पादकता के प्रमाण भी मिले हैं मिलते हैं। परंतु उसका लाभांश किसानों को नहीं मिलता था।उन्हें तो खाद्दान्न की खेती के स्थान पर नकदी फसलों का उत्पादन करना पड़ता था,जिनका प्रयोग अंतत:इंग्लैंड में लगे कारखानों में किया जाता था। सिंचाई व्यवस्था में कुछ सुधार के बावजूद भारत बाढ़ नियंत्रण एवं भूमि की उपजाऊ शक्ति के मामले में पिछड़ा हुआ था।काश्तकारों के एक बड़े वर्ग तथा छोटे किसानों के पास कृषि क्षेत्र में निवेश करने के लिए न ही संसाधन थे न तकनीक और न हीं कोई प्रेरणा। == औद्योगिक क्षेत्रक == औपनिवेशिक शासन के दौरान देश की विश्व प्रतिष्ठित शिल्प कलाओं का पतन हो रहा था और उसका स्थान इंग्लैंड के तैयार वस्त्र ले रहे थे। वास्तव में भारत के औद्योगिकरण के पीछे विदेशी शासकों का दौरा उद्देश्य था। औपनिवेशिक शासकों द्वारा अपने देश इंग्लैंड के हितों के संरक्षण और संवर्धन के लिए निर्मित नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप को मूल रूप से बदल डाला।भारत इंग्लैंड को कच्चे माल की पूर्ति करने तथा वहांके बने तैयार माल का आयात करने वाला देश बनकर रह गया। एक तो वह भारत को इंग्लैंड में विकसित हो रहे लोगों के लिए कच्चे माल का निर्यात निर्यातक बनाना चाहते थे दूसरा उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाजार भी बनाना चाहते थे। उद्यमी जमशेदजी टाटा (1839-1904) ने 1877 में बॉम्बे में सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग, वीविंग और मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के साथ अपना औद्योगिक करियर शुरू किया। जबकि अन्य भारतीय मिलों ने ब्रिटेन से आयातित स्थानीय लघु-स्टेपल कपास और सरल मशीनरी का उपयोग करके सस्ते मोटे यार्न (और बाद में कपड़े) का उत्पादन किया, टाटा ने मिस्र से महंगे लंबे स्टेपल कपास आयात करके और संयुक्त राज्य से अधिक जटिल रिंग-स्पिंडल मशीनरी खरीदकर बेहतर प्रदर्शन किया। ब्रिटेन से आयात के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं कि बेहतर यार्न स्पिन करने के लिए राज्यों 1860 में अहमदाबाद में पहला सूती वस्त्र मिल स्थापित पटसन उद्योग की स्थापना का श्रेय विदेशियों को दिया जा सकता है यह उद्योग केवल बंगाल प्रांत तक ही सीमित रहा टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना 1960 में हुई दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात(1939-45) चीनी सीमेंट कागज आदि के कारखाने स्थापित हुए। पूंजीगत उद्योगों यह तत्कालिक उपभोग में काम आने वाली वस्तुओं के उत्पादन के लिए मशीनों और कल पुर्जों का निर्माण करते हैं इसके अभाव के कारण औद्योगिकरण के विकास में समय लगा । जीडीपी में भी इसका योगदान काफी कम रहा इसने उत्पादन की एक और महत्वपूर्ण कमी यह थी कि इसमें रेल विद्युत उत्पादन संचार बंदरगाहों जैसे सीमित सार्वजनिक क्षेत्र की आप आए जिनका कार्यक्षेत्र बहुत कम था। विदेशी व्यापार और निवेश की सरकार की वस्तु उत्पादन व्यापार और सीमा शुल्क की प्रतिबंध कारी नीतियों के कारण भारत कच्चे उत्पादों का निर्यात अब होकर रह गया। निर्यात- रेशम कपास चीनी मील और पटसन आयात सूती रेशमी ऊनी वस्त्रों और इंग्लैंड के कारखानों में बनी हल्की मशीनों का आयातक आदि व्यापार लैंड तक सीमित रह से श्रीलंका और ईरान तक। निर्यात का आकार बड़ा होने के कारण आंतरिक बाजारों में अनाज कपड़ा और मिट्टी का तेल जैसी अनेक आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध हो पाती थी इस निर्यात का देश में सोने और चांदी के प्रवाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 1869 स्वेज नहर के खुलने से भारत के व्यापार पर अंग्रेजी नियंत्रण और सख्त हो गया । ==सन्दर्भ== jznwfasaf0yt6sviuitljrj1wjd9z8g पर्यावरणीय भूगोल/बायोम 0 9241 83205 61753 2026-10-21T08:50:11Z Jcb 16661 83205 wikitext text/x-wiki {{संचरण|पिछला=मानव पर्यावरण संबंध|अगला=पारिस्थितिकी तंत्र}} {{BookCat}} धरती या समुद्र के किसी बड़े क्षेत्र को जैवक्षेत्र बोलते हैं जिसके सभी भागों में मौसम, भूगोल और निवासी जीवों (विशेषकर पौधों और प्राणी) की समानता हो।<ref name="ref22zuper">[http://books.google.com/books?id=ANT8VB14oBUC Life: The Science of Biology], David Sadava, H. Craig Heller, David M. Hillis, May Berenbaum, Macmillan, 2009, {{ISBN|978-1-4292-1962-4}}, ''... A biome is an environment that is defined by its climatic and geographic attributes and characterized by ecologically similar organisms, particularly its dominant plants ...''</ref> किसी बायोम में एक ही तरह का पारितंत्र होता है, जिसके पौधे एक ही प्रकार की परिस्थितियों में पनपने के लिए एक जैसे तरीके अपनाते हैं।<ref name="ref46xugof">[http://books.google.com/books?id=Aw43QliZrr8C Toward a Unified Ecology], Timothy F. H. Allen, Thomas W. Hoekstra, Columbia University Press, 1992, {{ISBN|978-0-231-06919-9}}, ''... What makes a biotic collection a biome is the manner in which all members are pressed against certain constraints that dictate plant architecture of the dominant. The same vegetation can be seen as either an exemplar of a community or a biome ...''</ref>जैवक्षेत्र के अन्तर्गत प्रायः स्थलीय भाग के समग्र वनस्पति और जन्तु समुदायों को ही सम्मिलित किया जाता हैं क्योंकि सागरीय जैवक्षेत्र का निर्धारण कठिन होता है।[[File:Vegetation.png|thumb|right|250px|One विश्व में अलग प्रकार के बायोम]] हालांकि इस दिशा में शोधकर्ताओं द्वारा प्रयास किया गया हैं। यद्यपि जैवक्षेत्र में वनस्पति तथा जन्तु दोनों को सम्मिलित करते हैं, तथापि हरे पौधों का ही प्रभुत्व होता है क्योंकि इनका कुल जीवभार जन्तुओं की तुलना में बहुत अधिक होता है।<ref>भौतिक भूगोल का स्वरूप, सविन्द्र सिंह, प्रयाग पुस्तक भवन, prayagraj, २०१२, पृष्ठ ६६४, ८१-८६५३९-७४-३</ref> == बायोम के प्रकार == ट्रिवार्था ने मृदाजल और ताप की उपलब्धता के आधार पर विश्व के बायोमों को 5 भागों में बांटा है:- ===वन बायोम=== इसे दो वृहत् और छह उपविभागों में बांटा है:- # सदाहरित वन # पर्णपाती वन ===सदाहरित वन=== ====उष्णकटिबंधीय सदाहरित वन==== विषुवतीय प्रदेशों और उष्णकटिबंधीय तटीय प्रदेशों के भारी वर्षा और उच्च तापमान की दशाओं में सघन, ऊँचे एवं विश्व के सर्वाधिक विविधतापूर्ण जैव-सम्पदा एवं कठोर लकड़ियों वाले पेड़ जैसे-महोगनी, आबनूस, रोजवुड और डेल्टाई भागों में मैंग्रोव के वन पाये जाते हैं । पृथ्वी के 12% भाग इन्हीं वनों से ढँके हुए हैं।वृक्षों की सघनता के कारण यहाँ प्रकाश नहीं पहुँच पाता है जिससे अंधेरा छाया रहता है। लताएं (लियाना) व अधिपादप (एपीफाइट) इस बायोम की प्रमुख प्रजाति है । ये वन अत्यधिक जैव-विविधतापूर्ण हैं। पृथ्वी के आधे से अधिक जन्तुओं व वनस्पतियों की प्रजातियाँ यहां पायी जाती है । [[File:tropical_forests.tif|thumb|350px|right|]] इन वनों में मिलने वाले जीवों में हाथी, गैंडा, जंगली सुअर, शेर, घड़ियाल तथा बंदर व सांपों की अनेक प्रजातियां होती हैं । आमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, अफ्रीका का गिनी तट, जावा-सुमात्रा आदि इन वनों के प्रमुख क्षेत्र हैं । ब्राजील में इन वनों को सेलवास कहा जाता है । वर्तमान समय में झूम खेती एवं अवैज्ञानिक व अत्यधिक दोहन के कारण पृथ्वी के इस सबसे जटिल पारिस्थितिक तंत्र तथा इसके विशाल आनुवांशिकी संसाधन पर खतरा उत्पन्न हो गया है‌। अतः इसका संरक्षण जरूरी है । ====मध्य अक्षांशीय सदाहरित वन==== उपोष्ण प्रदेशों में महाद्वीपों के पूर्वी [[File:Manu_National_Park-71.jpg|link=https://en.wikivoyage.org/wiki/File:Manu_National_Park-71.jpg|right|300px|]]तटीय भागों के ये वर्षा वन होते हैं। यहाँ प्रायः एक ही जाति वाले वृक्षों की प्रधानता पायी जाती है। चौड़ी पत्तीवाले कठोर लकड़ी ओक, लॉरेल, मैग्नेलिया, यूकेलिप्टस आदि के वन यहाँ प्रमुख होती हैं। दक्षिणी चीन, जापान, दक्षिणी पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी ब्राजील आदि इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। ====भूमध्यसागरीय वन==== मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी सीमांतों पर शीतकालीन वर्षा प्रदेशों में ये वन पाए जाते हैं। यहाँ के प्रमुख वृक्ष कार्क, ओक, जैतून, चेस्टनट, पाइन इत्यादि हैं। इस बायोम में अग्नि से नष्ट न होने वाले पौधे और सूखे में रहने योग्य जंतु पाए जाते हैं। यहाँ रंग-बिरंगी चिड़ियों की अधिकता है । [[File:Vineyards_in_Chianti_Country.jpg|right|300px|Vineyards in Italy]] ग्रीष्मकाल की शुष्क जलवायु से बचाव के लिए वृक्षों ने स्वयं को अनुकूलित किया है। भूमध्य सागरीय प्रदेश ‘सिट्रस फलों’ के लिए प्रसिद्ध इनमें अंगूर, नींबू, नारंगी, शहतूत, नाशपाती व अनार प्रमुख है । चैपेरल, लैवेन्डर, लॉरेल तथा अन्य सुगन्धित जड़ी-बूटियाँ (मैक्वीस) का भी यहां उत्पादन होता है। ====शंकुधारी वन==== उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र के चारों ओर यूरोप,एशिया व उत्तरी अमेरिका महाद्वीपों में एंव अन्य भागों में ऊँचे पर्वतों पर जाए जाने वाले मुलायम लकड़ी के वन शकुंधारी वन होते हैं । इन वनों में प्रमुख वृक्ष चीड़, देवदार, फर, हेमलॉक, स्प्रूस हैं जिसका वर्धन काल ग्रीष्मकाल तक सीमित रहता है । इन वृक्षों की पत्तियाँ मोटी व सुइयों के आकार की होती हैं जो कम वाष्पोत्सर्जन करती है एवं शीत ऋतु में ठंड से बचाव में सहायक होती है । शंकुधारी वन विश्व के वन क्षेत्रों के अंतर्गत सर्वाधिक विस्तार रखते हैं । टैगा वनों के प्रदेश में लोमड़ी, मिंक, समूर व साइबेरियन क्रेन मिलते है । ===पर्णपाती वन=== ====मध्य अक्षांशीय पर्णपाती वन==== ये शीतल जलवायु के तटीय प्रदेशों में पाए जाने वाले वन होते हैं। उत्तर पूर्वी अमेरिका, दक्षिणी चिली आदि क्षेत्रों में इन वनों की व्याप्ति है। इन वनों में प्रमुख वृक्ष ओक, बीच, वालनट, मैपल, ऐश, चेस्टनट आदि हैं । शीत ऋतु में ठंड से बचाव के लिए इनकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं । ====उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन या मानसूनी वन==== एशिया के मानसूनी प्रदेशों, ब्राजील, मध्य अमेरिका, उत्तरी आस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले इन वन क्षेत्रों में शुष्क ऋतु होती है एवं उसके बाद वर्षा होती है। यहाँ सागवान, शीशम, साल, बाँस आदि प्रमुख वृक्ष पाए जाते हैं। उष्ण कटिबंधीय सदाहरित वनों के बाद सर्वाधिक विविधता इन्हीं वन क्षेत्रों में पाई जाती है । ===सवाना बायोम === इस बायोम में आर्द्र-शुष्क उष्णकटिबंधीय जलवायु पायी जाती है। यह पार्कलैंड भूमि है जहाँ घासभूमियों के क्षेत्र में यत्र-तत्र कुछ वृक्ष होते हैं। 5 मीटर लंबी और सघन हाथी घास ,सवाना प्रदेश की प्रमुख घास है। अफ्रीका, भारत, ब्राजील, पूर्वी आस्ट्रेलिया आदि इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। वेनेजुएला में इस बायोम को लानोस कहा जाता है । सवाना बायोम में पेड़-पौधे और जन्तुओं में सूखे को सहन करने की क्षमता होती है तथा वृक्षों में अधिक विविधता नहीं होती। इस बायोम में हाथी, दरियाई घोड़ा, जंगली भैंस, हिरण, जेब्रा, सिंह, चीता, तेंदुआ, गीदड़, घड़ियाल, हिप्पोपोटैमस, सांप, ऐमू व शुतुरमुर्ग जैसे जानवर मिलते है। यह प्रदेश बड़े-बड़े शिकारों की भूमि के नाम से प्रसिद्ध है तथा विश्व प्रसिद्ध ‘जू’ है। मानवीय हस्तक्षेप के कारण इस क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। ===घास भूमि बायोम === ====अर्द्धशुष्क महाद्वीपीय घास भूमि==== यहाँ की प्रमुख वनस्पतियाँ लैन्टेना और बुफैलो घास, सूर्यमुखी लोको घास आदि हैं। इन छोटे घास के मैंदानों को यूक्रेन व दक्षिणी पश्चिमी रूस में स्टेपी, दक्षिण अफ्रीका में वेल्ड कहा जाता है। ====मध्य अक्षांशीय आर्द्र घास भूमि==== उपोष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेशों में ये लंबी एवं सघन घास के मैदान हैं। उत्तरी अमेरिका में इन्हें प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका में पम्पास, आस्ट्रेलिया में डाउन्स, न्यूजीलैंड में कैंटरबरी और हंगरी में पुस्टाज कहते हैं। ===मरुस्थलीय बायोम=== यहाँ वनस्पतियों का अभाव पाया जाता है। [[File:BW climate.png|right|300px|मरुस्थलीय क्षेत्र]]यहां केवल छोटी झाड़ियाँ, नागफनी, बबूल, खजूर, खेजड़ी आदि वनस्पतियाँ ही मिलती हैं।यह सभी लक्षण रेगिस्तानी [[File:Sangar_western_sahara.jpg|right|300px|Sahara Desert]]पौधे में एक-समान होने से जीव-वैज्ञानिक इस परितंत्र को एक 'बायोम' का ख़िताब देते हैं।<ref name="ref98difeh">[http://books.google.com/books?id=ALKCupwW_RoC Environmental Science], Daniel D. Chiras, pp. 83, Jones & Bartlett Publishers, 2012, {{ISBN|978-1-4496-1486-7}}, ''... The Desert Biome ... often widely spaced on the desert floor, which reduces competition for water and ensures an adequate supply. How do plants space themselves? Some plants release growth-inhibiting chemicals into the soil that deter competitors from taking root in a region around them ...''</ref> === टुण्ड्रा बायोम === टुण्ड्रा वे मैदान हैं, जो हिम तथा बर्फ़ से ढँके रहते हैं तथा जहाँ मिट्टी वर्ष भर हिमशीतित रहती है। अत्यधिक कम तापमान और प्रकाश, इस बायोम में जीवन को सीमित करने वाले कारक हैं। वनस्पति इतनी बिखरी हुईं होती हैं कि इसे आर्कटिक मरूस्थल भी कहते हैं। यह बायोम वास्तव में वृक्षविहीन है। इसमें मुख्यतः लाइकेन,काई, हीथ,घास तथा बौने विलो-वृक्ष शामिल होते हैं। हिमशीतित मृदा का मौसमी पिघलाव भूमि की कुछ सेंटीमीटर गहराई तक कारगर रहता है, जिससे यहाँ केवल उथली जड़ों वाले पौधे ही उग सकते हैं। इस क्षेत्र में कैरीबू,आर्कटिक खरगोश,आर्कटिक लोमड़ी, रेंडियर, हिम उल्लू तथा प्रवासी पक्षी सामान्य रूप से पाए जाते हैं।<ref>भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत, (कक्षा ११ के लिए पाठ्यपुस्तक- सत्र १), [[राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद]], २00२, पृष्ठ- १३७, {{ISBN|81-7450-075-8}}</ref> == संबंधित प्रश्न == # बायोम किसे कहते हैं। # बायोम कितने प्रकार के होते हैं व्याख्या करें। # वन के कितने प्रकार होते हैं। ==सन्दर्भ== 2wupjaxmk8wc3kswdevig429ln7vjgt मध्यकालीन भारत/मुस्लिम आक्रमण 0 9440 83210 81392 2026-10-21T08:55:13Z Jcb 16661 83210 wikitext text/x-wiki पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद प्रथम शताब्दी में दक्षिण एशिया के अंदर इस्लाम का आरंभिक प्रवेश हुआ। उमायद खलीफा ने डमस्कस में बलूचिस्तान और सिंध पर ७११ में मुहम्मद बिन कासिन के नेतृत्व में चढ़ाई की। उन्होंने सिंध और मुलतान पर कब्जा कर लिया। उनकी मौत के ३०० साल बाद सुल्तान महमूद ग़ज़नवी, जो एक खूख्वार नेता थे, उन्होंने राजपूत राजशाहियों के विरुद्ध तथा धनवान हिन्दू मंदिरों पर छापामारी की एक श्रृंखला आरंभ की तथा भावी चढ़ाइयों के लिए पंजाब में अपना एक आधार स्थापित किया। वर्ष १०२४ में सुल्तान ने अरब सागर के साथ काठियावाड़ के दक्षिणी तट पर अपना अंतिम प्रसिद्ध खोज का दौर शुरु किया, जहां उसने सोमनाथ शहर पर हमला किया और साथ ही अनेक प्रतिष्ठित हिंदू मंदिरों पर आक्रमण किया।<ref name="pj03">Peter Jackson (2003), The Delhi Sultanate: A Political and Military History, Cambridge University Press, {{ISBN|978-0521543293}}, pp 3-30</ref><ref>T. A. Heathcote, The Military in British India: The Development of British Forces in South Asia:1600-1947, (Manchester University Press, 1995), pp 5-7</ref><ref>Barnett, Lionel (1999), {{Google books|LnoREHdzxt8C|Antiquities of India: An Account of the History and Culture of Ancient Hindustan|page=1}}, Atlantic pp. 73–79</ref> [[File:Prithvi Raj Chauhan (Edited).jpg|thumb|अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान]] मुख्य रूप से फ़ारस पर अरबी तथा तुर्कों के विजय के बाद ११वीं सदी में इन शासकों का ध्यान भारत की ओर गया। मोहम्मद गोरी ने मुल्तान और पंजाब पर विजय पाने के बाद ११७५ में भारत पर आक्रमण किया, वह दिल्ली की ओर आगे बढ़ा। उत्तरी भारत के बहादुर राजपूत राजाओं ने पृथ्वी राज चौहान के नेतृत्व में ११९१ में तराइन के प्रथम युद्ध में उसे पराजित किया। एक साल चले युद्ध के पश्चात मोहम्मद गोरी अपनी पराजय का बदला लेने दोबारा आया। वर्ष ११९२ के दौरान तराइन में एक अत्यंत भयानक युद्ध लड़ा गया, जिसमें राजपूत पराजित हुए और पृथ्वी राज चौहान को पकड़ कर मौत के घाट उतार दिया गया। तराइन का दूसरा युद्ध एक निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ और इसमें उत्तरी भारत में मुस्लिम शासन की आधारशिला रखी। मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर लौट आए गया था किन्तु उसके एक गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत को स्थापित कर राज किया।<ref>MUHAMMAD B. SAM Mu'izz AL-DIN, T.W. Haig, Encyclopaedia of Islam, Vol. VII, ed. C.E.Bosworth, E.van Donzel, W.P. Heinrichs and C. Pellat, (Brill, 1993)</ref> ==सन्दर्भ== {{BookCat}} f3b1fw1vxalzn1qz9w5nmq3yxypu1jp भाषाविज्ञान/भाषा और बोली का अंतरसंबंध, भाषा की परिवर्तनशीलता 0 9458 83208 73757 2026-10-21T08:52:27Z Jcb 16661 83208 wikitext text/x-wiki '''भाषा और बोली''' में कोई तात्विक अंतर नहीं है। सूक्ष्म दृष्टि से हम कह सकते हैं कि भाषाओं के अंतर्गत बोलियां अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाती है। बोलिए जब किन्ही कारणों से प्रमुखता प्राप्त कर लेती है तब वह भाषा का रूप धारण कर लेती है।<ref>[https://en.m.wikipedia.org/wiki/Dialect/ विकिपीडिया पर पढ़ें] </ref> बोली से भाषा बनने में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि कारण होतें हैं। राजनीतिक केंद्र दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली खड़ीबोली बोली से ऊपर उठकर भाषा बन गई। इसलिए प्रमुख भाषाविद् एल. एच. ग्रे के अनुसार 'बोलियों और भाषाओं में विभाजक रेखा खींचना असंभव है।'<ref>foundations of language by L.H. grey, p.26</ref> लेकिन फिर भी बोली और भाषा में अंतर किया गया है- १)भाषा का क्षेत्र '''व्यापक''' होता है और बोली का '''सीमित''' अर्थात भाषा का व्यवहार अधिक दूर तक होता है और बोली का उसकी अपेक्षा कम दूर तक। एक भाषा के अंदर अनेक बोलियां हो सकती है लेकिन एक बोली के अंदर अनेक भाषा नहीं हो सकते। २)एक भाषा के विभिन्न बोलियां बोलने वाले परस्पर एक दूसरे को समझ लेते हैं किंतु विभिन्न भाषाएं बोलने वाले दूसरे को समझ नहीं सकते अर्थात भाषाओं की विभिन्न बोलियों में '''बोधगम्यता''' होती है। जैसे खड़ी बोली में 'जाता हूं' बोलने वाला ब्रजभाषा का 'जात हौ' आसानी से समझ लेगा। लेकिन अंग्रेजी का 'आई गो' नहीं समझ सकेगा। इसलिए खड़ी बोली और ब्रज भाषा हिंदी की बोलियां है और हिंदी और अंग्रेजी दो अलग-अलग भाषाएं हैं। ३) भाषा का प्रयोग '''शिक्षा, शासन, साहित्य रचना''' आदि के लिए होते हैं किंतु बोली का दैनिक व्यवहार के लिए। लेकिन इसका अपवाद भी मिलता है, प्रतिभाशाली लोग कभी-कभी बोलियों मैं भी उत्कृष्ट रचनाएं उपस्थित कर देते हैं। उदाहरण के लिए, मैथिली में रचे विद्यापति के पद या अवधी भाषा में रचित तुलसीदास का 'रामचरितमानस'। दोनों रचनाएं बोलियों की होकर भी किसी साहित्यिक या परिनिष्ठित भाषा के रचनाओं के समकक्ष रखी जा सकती है।<ref>भाषा विज्ञान की भूमिका, भोलानाथ तिवारी, p.57, {{ISBN|978-81-7119-743-9}}</ref> बोली का भाषा बनने का सबसे प्रमुख साधन है लोगों के पारस्परिक संपर्क। जब संपर्क की दूरी बढ़ती है तो मूल्यों का भेद भी बढ़ता है और संपर्क बढ़ने पर बोलियों की दक्षता में कमी आती है और भाषा का विस्तार होता है। निम्नलिखित तत्व संपर्क में सहायक है- १) '''प्राकृतिक कारण'''- पहले जंगल, नदी, वन आदि के द्वारा और आवागमन की सुविधा न रहने के कारण संपर्क में बाधा पहुंचती थी। जिसके कारण बोलियों का विस्तार नहीं होता था। आधुनिक काल में पहले की अपेक्षा प्राय: प्राकृतिक अवरोधों को हटाया जा रहा है जिससे बोलियों का विस्तार होकर वह भाषा का रूप ग्रहण कर रही है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आज की तुलना में पहले बोलियों का भेद अधिक था। ==सन्दर्भ== {{BookCat}} c1of799l70tiqmee3xw3rzi7f7ii1s5