विकिसूक्ति
hiwikiquote
https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.2
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिसूक्ति
विकिसूक्ति वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
विकिसूक्ति:सूक्ति सुझाएँ
4
1877
32864
30892
2026-05-17T17:50:07Z
Manoj nath Jakhar
5481
/* */
32864
wikitext
text/x-wiki
सूक्ति:23/06/2025
अनुभव जीवन को उन्नत बनाते हैं। परन्तु जरूरी नही वे अनुभव स्वयं के ही हों।
लेखक शिव शिल्पी
सूक्ति:17/06/2026
सभी इंसान हमेशा से बुरे नहीं होते है, कुछ लोग वक्त के साथ बुरे इसलिए भी बन जाते है क्योंकि लोगों द्वारा उनकी अच्छाई का नाजायज फायदा उठाया गया...!!
लेखक मनोज नाथ जाखड़
= सुझाव =
* [[महात्मा गांधी के विचार]]
:{{Not done}} कृप्या पृष्ठ से जो सूक्ति डलवाना चाहते हैं, वो यहां स्रोत के साथ लिखें। [[सदस्य:सूरजमुखी|सूरजमुखी]] ([[सदस्य वार्ता:सूरजमुखी|वार्ता]]) १३:११, २४ अगस्त २०२२ (IST)
==चाणक्य का संदेश==
# "वह जो अपने प्रियजनों से अत्याधिक जुड़ा हुआ है,उसे चिंता और भय का सामना करना पड़ता है,क्योंकि सभी दुखों का जड़ लगाव है.इसलिए खुश रहने के लिए लगाव छोड़ दीजिए।"
# "काम को निष्पादन करो, परिणाम से मत डरो।"
# "व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं।"
# "किसी को बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं।"
# "भय को समीप न आने दो। यदि यह समीप आए, इस पर आक्रमण करो, यानी भय से भागो मत इसका सामना करो।"
# "सुगंध का प्रसार वायु की दिशा पर आधारित होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है।"
# "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है। शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है। शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही दुर्बल हैं।"
# "अज्ञानी के लिए पुस्तकें और अंधे के लिए दर्पण एक समान उपयोगी है।"
# "बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं। असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं।"
# "अपनी कमाई में से धन का कुछ प्रतिशत हिस्सा संकट काल के लिए हमेशा बचाकर रखें।"
:{{Nd}} किसी का भी स्रोत नहीं दिया गया। [[सदस्य:सूरजमुखी|सूरजमुखी]] ([[सदस्य वार्ता:सूरजमुखी|वार्ता]]) १३:१८, २४ अगस्त २०२२ (IST)
==स्वामी विवेकानंद के विचार==
* जब तक तुम स्वंय पर विश्वास नहीं करते,परमात्मा में विश्वास कर ही नहीं सकते.
* वचन देकर तिल भर भी उससे न डिगो| यही मानवता है नहीं तो तुम मानव वेश में पाखंडी हो|
* '' हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो आप किसी की मदद नहीं कर सकते. बस उसकी सेवा कर सकते हैं|''
* '' उठो जागो और तबतक आगे बढते रहो जबतक तुम्हारा लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता,,
* स्वामी विवेकानंद कहते है कि जब पड़ोसी भूखा मरता हो,तब मंदिर में भोग चढना पुण्य नहीं,बल्कि पाप है|
* '' जब तक जीना,तब तक सीखना'-अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है''|
* '' हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है.इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते है.शब्द गौण है.विचार रहते है,वे दूर तक यात्रा करते हैं.
* " मेहनत जितना संर्घषमय होगा जीत इतनी ही शानदार होगी।"
:{{Nd}} किसी का भी स्रोत नहीं दिया गया। [[सदस्य:सूरजमुखी|सूरजमुखी]] ([[सदस्य वार्ता:सूरजमुखी|वार्ता]]) १३:१९, २४ अगस्त २०२२ (IST)
== 27 अप्रैल 2024 ==
* ''मैं जीवन को आशावाद और उम्मीद के साथ देखने और एक बेहतर दिन की प्रतीक्षा करने की पूरी कोशिश करती हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पूर्ण खुशी जैसी कोई चीज़ है। यह मुझे पीड़ा देता है कि अभी भी बहुत सी क्लान गतिविधि और नस्लवाद है। मुझे लगता है कि जब आप कहते हैं कि आप खुश हैं, तो आपके पास वह सब कुछ है जिसकी आपको ज़रूरत है और वह सब कुछ जो आप चाहते हैं, और इसके अलावा किसी और चीज़ के लिए इच्छा नहीं होती। मैं अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंची हूं।'' — [[रोज़ा पार्क्स]], "स्टैंडिंग अप फॉर फ़्रीडम" ("स्वतंत्रता के लिए खड़ा होना"), Academy of Achievement.org (2005-10-31) में उद्धृत
[[सदस्य:सूरजमुखी|सूरजमुखी]] ([[सदस्य वार्ता:सूरजमुखी|वार्ता]]) १८:३६, २७ अप्रैल २०२४ (IST)
:{{done}}, एक दिन तक कोई विरोध न आने पर स्वीकृत। [[सदस्य:सूरजमुखी|सूरजमुखी]] ([[सदस्य वार्ता:सूरजमुखी|वार्ता]]) १६:३३, २९ अप्रैल २०२४ (IST)
hl97nd1fpo7xnxydsvmzn1jox53xex3
योग
0
6051
32863
32692
2026-05-17T17:46:16Z
अनुनाद सिंह
658
32863
wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Sarvangasana.jpg|200px|thumb|right|'''आसन''', योग के आठ अंगों में से एक है। '''सर्वाङ्गासन''' = सभी अंगों का आसन]]
'''[[:w:योग|योग]]''', प्राचीन भारत में उद्भूत शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्रिया है जिसका उद्देश्य मन को स्थायी [[शान्ति]] प्रदान करना है ताकि आत्मसाक्ष्त्कार किया जा सके। [[पतंजलि]] द्वारा रचित 'योगसूत्र' योग का प्रधान ग्रन्थ है। योगदर्शन, भारत के छः आस्तिक [[दर्शन|दर्शनों]] में से एक है। १९वीं और २०वीं शताब्दी में भारत से निकलकर अनेक योग-गुरु पश्चिमी देशों में जाकर योग का प्रचार-प्रसार किये।
== उक्तियाँ ==
* ''योगः चित्तवृत्तिनिरोधः'' -- पतञ्जलि योगसूत्र
: अर्थ : चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
* ''योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम्।
: ''मोक्षे निर्वृत्तिर्निशेषाः योगो मोक्षप्रवर्तकः ॥'' -- चक्रपाणिदत्त, चरकतात्पर्यटीका
:योग और मोक्ष की स्थिति में सभी वेदनाओं का पुनः आना रुक जाता है। मोक्ष प्राप्त होने पर वेदनाओं से पूर्ण निवृत्ति हो जाती है। योग मोक्ष दिलाने वाला (मोक्षप्रवर्तक) है।
* ''योगः समाधिः'' -- वेद व्यास
: योग नाम समाधि का है।
* ''साङ्ख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते ।
: ''हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥'' -- [[महाभारत]]
: सांख्य के वक्ता कपिलाचार्य परमर्षि कहलाते हैं और योग के वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, इनसे पुराना और कोई वक्ता नहीं है।
* ''इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
: ''विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।
: ''एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
: ''स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तपः ॥
: ''स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
: ''भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥'' (गीता 4/1-3)
: अर्थात- इस अविनाशी योग को मैंने विवस्वान (सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान ने अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु के अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा । हे परन्तप अर्जुन इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों द्वारा जाना गया किन्तु इसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्त हो गया । तू मेरा प्रिय भक्त एवं सखा है इसलिए वही पुरातन योग आज मैंने तुझे बताया है, क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है। अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है।
* ''हिरण्यगर्भो द्युतिमान य एषच्छन्दशि स्तुतः।
: ''योगैः सम्पुज्यते नित्यं स च लोके विभु: स्मृतः॥'' -- [[महाभारत]]
: यह द्युतिमान हिरण्यगर्भ वही है जिसकी वेदों में स्तुति की गयी है, जिनकी योगी लोग नित्य पूजा किया करते हैं और संसार में जिन्हें " विभु " कहते हैं।
* ''ध्यान योगेन सम्यश्यदगतिस्यान्तरामनः।'' -- [[मनुस्मृति]] 16/731
: अर्थ : ध्यान योग से भी योग आत्मा को जाना जा सकता है। अतः योगपरायण ध्यान होना चाहिए।
* ''यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।
: ''बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमा गति॥
: ''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।
: ''अप्रमत्तस्दा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥'' -- कठोपनिषद-2/3/10-11
: अर्थात् जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं, और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है, इस अवस्था को परमगति कहते है। इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं, उसमें शुभ संस्कारों की उत्पत्ति और अशुभ संस्कारों का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग की है।
* ''पुरूष प्रकृत्योतियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते।'' -- सांख्यशास्त्र
: अर्थात् प्रकृति-पुरुष का पृथकत्व स्थापित कर, अर्थात् दोनो का वियोग करके पुरुष के स्वरुप में स्थिर हो जाना योग है।
* ''श्रद्धाभक्तियोगावदेहि।'' -- कैवल्योपनिषद्
: अर्थात् श्रद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना ही योग है।
* ''संयोगो योग इत्यक्तो जीवात्मापरमात्मनोः।'' -- याज्ञवल्क्य स्मृति
: अर्थात् जीवात्मा परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।
* ''अयं तु परमोधर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।'' -- याज्ञवल्क्य स्मृति
: ‘योग’ के द्वारा आत्म दर्शन करना ही परमधर्म है।
* ''ब्रह्म प्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैकचित्तता।
: ''चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनो परः॥'' -- अग्नि पुराण 183/1-2
: अर्थात् ज्ञान का प्रकाश पड़ने पर चित्त ब्रह्म में एकाग्र हो जाता है। जिससे जीव का ब्रह्म में मिलन हो जाता है। ब्रह्म में चित्त की यह एकाग्रता ही योग है।
* ''जीवात्मा परमार्थोऽयमविभागः परमतपः
: ''सः एव परोयोगः समासा कथितस्तव॥ -- स्कन्धपुराण
: अर्थात् जीवात्मा व परमात्मा का अलग-अलग होना ही दुःख का कारण है। और इस का अपृथक भाव ही योग है। एकत्व की स्थिति ही योग है।
* ''योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा।'' -- लिङ्गपुराण
: अर्थात् चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना, उसे पूर्ण समाप्त कर देना ही योग है। उसी से परमगति अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
* ''तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः।'' -- वैशेषिक सूत्र 6/2/16
: अर्थात् मन आत्मा में स्थिर होने पर उसके (मन के काय का) अनारम्भ है, वह योग है।
* ''योगस्थः कुरु कर्माणि संगत्यक्त्वा धनञ्जय।
: ''सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥'' -- गीता 2/48
: अर्थात् योग में स्थिर हो कर कर्म फल का त्याग करे और सिद्ध-असिद्ध में सम होकर कर्मों को करे, यही समता ही योग है।
* ''बुद्धि युक्तो जहातीह उभय सुकृत दुष्कृते।
: ''तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ -- गीता 2/50
: अर्थात् कर्मो में कुशलता का नाम ही योग है। कर्मों की कुशलता का तात्पर्य यह है कि हमे कर्म इस प्रकार से करने चहिए कि वे बन्धन का कारण ना बनें। अनासक्त भाव से अपने कर्तव्य कर्मों का निर्वहन करना ही कर्म योग है।
* ''तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
: ''स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥'' -- गीता 6.23
: अर्थात् उस योग को उत्साह, श्रद्धा, धैर्य, से समाहित चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए। इस दुख रुप संसार के संयोग से रहित है, वह योग है।
* ''एकत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च।
: ''सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते॥'' -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25
: अर्थात् प्राण, मन व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्रावस्था को प्राप्त कर लेना, बाह्म विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन आत्मा में लग जाना, प्राण का निष्चल हो जाना योग है।
* ''योऽपानप्राणयोरैक्यं स्वरजोरेतसोस्तथा।
: ''सूर्याचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनो:।
: ''एवंतु़द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते॥ -- योगशिखोपनिषद् 1/68-69
: अर्थात् अपान और प्राण की एकता कर लेना, स्वरज रूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेत रूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्त करना, सूर्य अर्थात् पिंगला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करना तथा परमात्मा से जीवात्मा का मिलन योग है।
* ''योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्धते।
: ''योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगी रमते चिरम्॥'' -- सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत
: योग (शास्त्र जो मन को संतुलित करता है) केवल योग द्वारा (उसके अनुशासन का अभ्यास करके) ज्ञात होता है। इसके प्रायोगिक अभ्यास से ही योग का विकास होता है। योग के लम्बे अभ्यास से जो साधक सदैव सतर्क बन जाता है, वह निःसंशय सदैव आनन्दी रहता है।
* ''सलिबे सैन्धवं यद्वत साम्यं भजति योगत:।
: ''तयात्ममनसोरैक्यं समाधिरभी घीयते॥'' -- हठयोग प्रदीपिका (4/5)
: अर्थात् जिस प्रकार नमक जल में मिलकर जल की समानता को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार जब मन वृत्तिशून्य होकर आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त कर लेता है तो मन की उस अवस्था का नाम समाधि है।
* ''बुद्धया भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
: ''गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति॥
: इस जगत् में मनुष्य बुद्धि से डर को दूर कर सकता है , तपस्या के द्वारा महत्त्व को प्राप्त कर सकता है , गुरुजनों की सेवा से ज्ञान तथा योग के द्वारा शक्त्ति प्राप्त कर सकता है।
* ''योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् ।
: ''मोक्षे निवृत्तिः निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ॥'' -- चरकसंहिता 1.137
: मोक्ष होने पर वेदनाओं से पूर्ण निवृत्ति हो जाती है, योग मोक्ष का प्रवर्तक है।
* ''मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।'' -- योगसूत्र 33
: सुख, दुख, पुण्य, अपुण्य विषयों में क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा का भाव रखने से चित्त प्रसन्न होत है।
: अर्थात सुखी व्यक्तियों के प्रति मित्रता की, दुःखी व्यक्तियों के प्रति करुणा अर्थात कृपा की, पुण्य आत्माओं या सज्जन व्यक्तियों के प्रति प्रसन्नता की व पापी या दुष्ट व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा अर्थात उदासीनता की भावना अथवा व्यवहार रखने से चित्त प्रसन्न व एकाग्र होता है। <ref>[https://drsomveeryoga.com/yoga-sutra-33/ योगसूत्र-३३] (व्याख्या : डॉ सोमवीर आर्य)</ref>
* ''अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः।'' -- योगसूत्र, साधनापाद
: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश - ये पाँच क्लेश हैं।
: अस्मिता = देखने की शक्ति (दृक शक्ति) और दर्शन शक्ति का एक हो जाना, अर्थात् मिथ्या/भ्रम समझने की शक्ति क लुप्त हो जाना
: अभिनिवेश = मृत्य का भय
* ''मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- महोपनिषद, ५-४२
: मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है।
* ''इन्द्रियार्थाश्रया बुद्धिज्ञनिं स्वागमपूर्वकम् ।
: ''सदनुष्ठानव चचैतदसम्मोहोऽभिधीयते ॥
: '' रत्नोपलम्भतज्ज्ञानतत्प्राप्त्यादि यथाक्रमम् ।
: '' दूदोदाहरणं साधु ज्ञेयं बुद्ध्यादिसिद्धये ॥'' -- हरिभद्रसूरि कृत योगदृष्टिसमुच्चय ११९-१२०
: (गीता में 'बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः' पद आता है।) हरिभद्र इस पद को लेकर बुद्धि की अपेक्षा ज्ञान की कक्षा और ज्ञान की अपेक्षा असम्मोह की कक्षा कैसी ऊँची है - यह रत्न की उपमा देकर समझाते हैं और अन्त में कहते हैं कि सदनुष्ठान में परिणत होने वाला आगम ज्ञान ही असम्मोह है।
* ''यमदिषु कृताभ्यासो निःसंगो निर्ममो मुनिः।
: ''रागादिक्लेशनिर्मुक्तं करोति स्ववशं मनः॥
: ''एक एवं मनोरोधः सर्वाभ्युदयसाधकः।
: ''यमेवालम्ब्य संप्राप्ता योगिनस्तत्त्वनिश्चयम्॥
: ''मनःशुद्धयेव शुद्धिः स्वाद् देहिनां नात्र संशयः।
: ''वृथा तद्व्यतिरेकेण कायस्यैव कदर्थनम्॥'' -- शुभचन्द्राचार्य विरचित ज्ञानार्णव प्रत्र 22 श्लोत्र 3, 12, 14
: जिसने यमादिक का अभ्यास किया है, परिग्रह और ममता से रहित है ऐसा मुनि ही अपने मनको रागादि से निर्मुक्त तथा वश करने में समर्थ होता है। निस्सन्देह मन की शुद्धि से ही जीवों की शुद्धि होती है, मन की शुद्धि के बिना शरीर को क्षीण करना व्यर्थ है। मन की शुद्धि से इस प्रकार का ध्यान होता है, जिससे कर्मजाल कट जाता हैं एक मन का निरोध ही समस्त अभ्युदयों को प्राप्त कराने वाला है; मन के स्थिर हुए बिना आत्मस्वरूप में लीन होना कठिन है। अतएव योगांगों का प्रयोग मन को स्थिर करने के लिए अवश्य करना चाहिए। यह एक ऐसा साधन है, जिससे मन स्थिर करने से सबसे अधिक सहायता मिलती है।
* ''मोक्षेण योजनाद् योगः, सर्वोप्याचार इष्यते।
: ''विशिष्य स्थानवर्णार्थालम्बनैकाग्रयगोचरः॥'' -- ज्ञानसारचयनिका-८४
: मोक्ष के साथ योजित करने के कारण समस्त आचार ‘योग’ कहलाता है। उस योग के पांच प्रकार हैं -स्थान (आसन) वर्ण, अर्थज्ञान, आलम्बन तथा एकाग्रता।
* ''स्थिरसुखमासनम् '' -- पतंजलि (योगसूत्र)
: सुखपूर्वक स्थिरता से बैठने का नाम आसन है। या, जो स्थिर भी हो और सुखदायक अर्थात् आरामदायक भी हो, वह आसन है।
* ''तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥'' -- पतंजलि (योगसूत्र)
:श्वास प्रश्वास के गति को अलग करना प्राणायाम है।
* ''चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्
: ''योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥'' -- हठयोगप्रदीपिका
: अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। अतः योगी को श्वांसों का नियंत्रण करना चाहिये।
* पवन ही जोग पवन ही भोग, पवन ही हरै छतीसौं रोग।
: या पवन कोई जाणे भेव, सो आपे करता आपे देव ॥ -- [[गुरु गोरखनाथ]]
: पवन ही योग है, पवन ही भोग है, और पवन ही छत्तीसों (सभी) रोगों को नष्ट करता है। जो कोई पवन की प्रकृति को जानता है वह स्वयं कर्ता (विधाता) है और स्वयं ही देवता है।
* जीवन जीने की कला ही योग है। -- [[श्रीराम शर्मा]] आचार्य
* जीवन को बिना खोए भगवान की प्राप्ति योग है। -- महर्षि अरविन्द
* प्राचीन आर्ष ग्रन्थो का अध्ययन ही योग है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* महर्षि पतंजलि प्रणीत अष्टांग योग के आसन समेत सभी अंगों को [[स्वामी विवेकानन्द|स्वामी विवेकानंद]] बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि योग के उच्चतर अंगों में जाने से पहले आसन का अभ्यास बहुत महत्वपूर्ण है। स्वामी जी कहते हैं, "[[यम]] और [[नियम]] के बाद आसन आता है। जब तक बहुत उच्च अवस्था की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक रोज़ नियमानुसार कुछ शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। अतएव जिससे दीर्घकाल तक एक भाव से बैठा जा सके, ऐसे एक आसन का अभ्यास आवश्यक है। जिनको जिस आसन से सुभीता मालूम होता हो, उनको उसी आसन पर बैठना चाहिए। एक व्यक्ति के लिए एक प्रकार से बैठकर सोचना सहज हो सकता है, परन्तु दूसरे के लिए, सम्भव है, वह बहुत कठिन जान पड़े।"<ref name=":0">{{Cite web|url=https://hindipath.com/swami-vivekananda-sadhana-ke-prathamik-sopan/|title=राजयोग द्वितीय अध्याय – साधना के प्राथमिक सोपान|last=विवेकानंद|first=स्वामी|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20190819095735/https://hindipath.com/swami-vivekananda-sadhana-ke-prathamik-sopan/|archive-date=19 अगस्त 2019|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref><br><br>
:स्वामी विवेकानन्द का मत है कि ध्यान-धारणा आदि के लिए सीधे बैठना अत्यन्त आवश्यक है। उनके अनुसार "आसन के सम्बन्ध में इतना समझ लेना होगा कि मेरुदण्ड को सहज भाव से रखना आवश्यक है–ठीक सीधा बैठना होगा–वक्ष, ग्रीवा और मस्तक सीधे और समुन्नत रहें, जिससे देह का सारा भार पसलियों पर पड़े। यह तुम सहज ही समझ सकोगे कि वक्ष यदि नीचे की ओर झुका रहे, तो किसी प्रकार का उच्च चिंतन करना संभव नहीं।"<ref name=":0" /> वे अन्यत्र आसन के इसी रूप पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, "आसन के बारे में इतना ही समझ लेना चाहिए कि वक्षस्थल, ग्रीवा और सिर को सीधे रखकर शरीर को स्वच्छंद भाव से रखना होगा।"<ref>{{Cite web|url=https://hindipath.com/swami-vivekananda-sankshep-me-raja-yoga-hindi/|title=अष्टम अध्याय – संक्षेप में राजयोग|last=विवेकानंद|first=स्वामी|date=|website=|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022105134/https://hindipath.com/swami-vivekananda-sankshep-me-raja-yoga-hindi/|archive-date=22 अक्तूबर 2019|dead-url=|access-date=|url-status=dead}}</ref> -- स्वामी विवेकानन्द
* निःस्वार्थ भावना से कर्म करना ही सच्चे धर्म का पालन है, और यही वास्तविक योग है। -- गुरु ग्रन्थ साहिब
* शिव व शक्ति का मिलन को योग कहते हैं। -- रागेय राधव, ‘गोरखनाथ और उनका युग’ में
* संसार सागर से पार होने की युक्ति का नाम ही योग है। -- योग वाशिष्ठ
* योग के द्वारा मनुष्य अपने वास्तविक स्वरुप सद्-चित्-आनन्द का अनुभव कर लेता है। -- महर्षि वशिष्ठ
* अपना अभ्यास करो और सब कुछ आ रहा है। -- श्री के पट्ठाबी जॉइस
* आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में हम सब अपने आप से ही अलग हो गये है इसलिए योग हमें अपने आप से पुन: जोड़ने में में मदद करता है।
* आप कौन हैं इस बारे में उत्सुक होने के लिए योग एक सही अवसर है। -- जेसन क्रैंडल
* आप योग नहीं कर सकते। योग आपकी प्राकृतिक अवस्था है। आप जो कर सकते हैं वो है योग व्यायाम , जो ये उजागर कर सकता है कि आप कहाँ अपनी प्राकृतिक अवस्था का विरोध कर रहे हैं। -- शेरोन गैनन
* आपका मन आपका औज़ार है। इसका मालिक बनना सीखें गुलाम नहीं। -- अज्ञात
* एक फोटोग्राफर लोगों से उसके लिए पोज दिलवाता है। एक योग प्रशिक्षक लोगों से खुद के लिए पोज दिलवाता है। -- टी गिलेमेट्स
* एक सर्जन हमेसा गर्भवती महिलाओं को योग का अभ्यास करने के लिए सलाह देता हैं क्योंकि योग के द्वारा उन्हें स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।
* एलर्जी को रोकने के लिए ऊर्जा उत्पन्न करें। -- बाबा रामदेव
* कर्म योग में कभी कोई प्रयत्न बेकार नहीं जाता, और इससे कोई हानि नहीं होती। इसका थोड़ा सा भी अभ्यास जन्म और मृत्यु के सबसे बड़े भय से बचाता है। -- भगवद गीता
* कर्म योग वास्तव में एक बड़ा रहस्य है। योग मन की दुखो की समाप्ति है। -- भगवद गीता
* कहा जाता है कि एक व्यक्ति को योग के द्वारा स्वयं के साथ मिलना है जब पूरी तरह अनुशासित होकर अपने मन से सभी इच्छाओं से नियन्त्रण प्राप्त कर लेते हैं तब हम अपने आप को जान पाते है।
* जब आप सांस लेते हैं , आप भगवान से शक्ति ले रहे होते हैं। जब आप सांस छोड़ते हैं तो ये उस सेवा को दर्शाता है जो आप दुनिया को दे रहे हैं। -- बी के एस आयंगर
* जब तक आपने अभ्यास नहीं किया है , सिद्धांत बेकार है। अभ्यास करने के बाद, सिद्धांत ज़ाहिर है। -- डेविड विलियम्स
* जब पुछा गया उसे अपने जन्मदिन पर क्या उपहार चाहिए , योगी बोला : मुझे किसी उपहार की नहीं बस आपके उपस्थिति की कामना है। -- अज्ञात
* जब सांसें विचलित होती हैं तो मन भी अस्थिर हो जाता है। लेकिन जब सांसें शांत हो जाती हैं , तो मन भी स्थिर हो जाता है, और योगी दीर्घायु हो जाता है। इसलिए , हमें श्वास पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। -- हठयोग प्रदीपिका
* जो कोई भी अभ्यास करता है वह योग में सफलता पा सकता है लेकिन वो नहीं जो आलसी है। केवल निरंतर अभ्यास ही सफलता का रहस्य है। -- स्वात्मरामा
* जो कोई व्यक्ति भी अभ्यास करता है वह योग के द्वारा सफलता प्राप्त कर सकता है लेकिन आलसी व्यक्ति के लिए योग का कोई महत्व नहीं है और निरंतर अभ्यास अकेले सफलता का रहस्य है।
* धन्य हैं वे लचीले लोग, क्योंकि उनके आकार को नहीं बिगड़ना पड़ेगा। -- अज्ञात
* ध्यान का बीज बोएं और मन की शांति का फल पाएं। -- अज्ञात
* ध्यान से ज्ञान आता है; ध्यान की कमी अज्ञानता लाती है। अच्छी तरह जानो कि क्या तुम्हे आगे ले जाता है और क्या तुम्हे रोके रखता है, और उस पथ को चुनो जो ज्ञान की ओर ले जाता है। -- बुद्ध
* ध्यान से परे ‘अब’ का अनुभव है। -- रयान पैरेंटी
* नियमित योग अभ्यास करने से मनुष्य को तनाव से दूर रहने में तो मद्द मिलती ही है साथ ही बुरे दौर से उभरने में भी मद्द मिलती है। योग मनुष्य को एक खुशहाल और समृद्ध जीवन प्रदान करने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है।
* प्राणायाम बुनियादी सांस लेने का व्यायाम है जो ऑक्सीजन को तुम्हारे शरीर के सभी भागों तक पहुँचाने में मदद करता है जिससे न सिर्फ कोशिकाओं को फिर से जीवंत कर देता है बल्कि तुम्हारे अंदर बहुत सारी ऊर्जा भी भर देता है। मेरे अनुसार , एक इंसान को छः घंटे सोना, एक घंटा योग , एक घंटा दैनिक दिनचर्या , दो घंटा परिवार और १४ घंटा कड़ी मेहनत करना चाहिए। -- बाबा रामदेव
* बाहर क्या जाता है उसे आप हमेशा कंट्रोल नहीं कर सकते हैं। लेकिन अंदर क्या जाता है उसे आप हमेशा कंट्रोल कर सकते हैं। -- श्री योग
* मन की शांति के लिए सबसे अच्छा साधन योग हैं।
* मेरे लिए, योग सिर्फ एक कसरत नहीं है – यह अपने आप पर काम करने के बारे में है। -- मैरी ग्लोवर
* मैं योग को प्यार करता हूँ क्योंकि यह न केवल यह हमारे शरीर के लिए कसरत है बल्कि हमारी श्वास भी है जो अत्यधिक तनाव को मुक्त करने में मदद करता है योग सचमुच हमे दिन की दिनचर्या के लिए तैयार करता है।
* यदि शरीर व मन स्वस्थ नही हैं।
* यह योग उसके लिए संभव नहीं है जो बहुत अधिक खाता है , या जो बिलकुल भी नहीं खाता ; जो बहुत अधिक सोता है , या जो हमेशा जगा रहता है। -- भगवद गीता
* योग 99% अभ्यास और 1% सिद्धांत है। -- श्री कृष्ण पट्टाभि जॉइस
* योग आपके मन को शांत करने का एक प्राचीन तरीका है।
* योग आपको स्वीकार करता है और प्रदान करता है।
* योग एक तरह से लगभग संगीत जैसा है; इसका कोई अंत नहीं है। -- स्टिंग
* योग एक धर्म नहीं है। यह एक विज्ञान है, सलामती का विज्ञान, यौवन का विज्ञान, शरीर, मन और आत्मा को एकीकृत करने का विज्ञान है। -- अमित राय
* योग एक लाभदायक प्रक्रिया है, जो न सिर्फ मनुष्य को चुनौतीपूर्ण बीमारियों से छुटकारा दिलवाने में मदद करती है बल्कि उन्हें आजीवन स्वास्थ्य रखने में भी उपयोगी साबित होती है।
* योग करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण जो आपको चाहिए होंगे वो हैं आपका शरीर और आपका मन। -- रॉडने यी
* योग का आसन, जाने के लिए एक अच्छी जगह है जब टॉक थेरेपी और एंटीडेप्रेसेन्ट्स पर्याप्त न हों। -- एमी वेंट्रौब
* योग के पास उन मेन्टल पैटर्न्स को शार्ट सर्किट करने के बड़े शातिर और चालाक तरीके हैं जो चिंता पैदा करते हैं। -- बैक्सटर बेल
* योग के बारे में यह कभी भी मत सोचिये की योग से क्या मिल सकता है बल्कि यह सोचिये की योग के द्वारा हम क्या नही प्राप्त कर सकते है।
* योग को दृढ संकल्प और अटलता के साथ बिना किसी मानसिक संदेह या संशय के साथ किया जाना चाहिए। -- भगवद गीता
* योग न सिर्फ मनुष्य के मस्तिष्क और शरीर की एकता को संगठित करता है बल्कि यह मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का काम करता है। योग से मनुष्य का मन शांत रहता है और उसे अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है।
* योग बहुत ही आश्चर्यजनक है इससे हमारे स्वास्थ्य की समस्याएं दूर तो होती हैं तथा साथ में खुद का अवलोकन होता भी होता है।
* योग भी अब व्यवसाय के रूप में बदल रहा है और कई लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रहा है।
* योग मन के उतार-चढ़ाव को स्थिर करने की प्रक्रिया है।
* योग मन को शांत करने का अभ्यास है।
* योग मन को शांति में स्थिर करना है। जब मन स्थिर हो जाता है , हम अपनी आवश्यक प्रकृति में स्थापित हो जाते हैं , जोकि असीम चेतना है। हमारी आवश्यक प्रकृति आम तौर पर मस्तिष्क की गतिविधियों द्वारा ढक दी जाती है। -- पतंजलि
* योग मन को स्थिर करने की क्रिया है। -- पतंजलि
* योग मनुष्य को सफल बनाने में भी उसकी मदद करता है। वहीं नियमित रुप से किया गया योग अभ्यास मनुष्य को एक बेहतर शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक स्वास्थ्य की तरफ ले जाता है।
* योग यौवन का फव्वारा है। आप उतने ही नौजवान हैं जितनी आपके रीढ़ की हड्डी लचीली है। -- बॉब हार्पर
* योग वह प्रकश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे , लौ उतनी ही उज्जवल होगी। -- बी के एस आयंगर
* योग विश्राम में उत्साह है। दिनचर्या में स्वतंत्रता। आत्म नियंत्रण के माध्यम से विश्वास। भीतर ऊर्जा और बाहर ऊर्जा । -- यम्बर डेलेक्टो
* योग सिर्फ आत्म सुधार के बारे में नहीं बतलाता है, बल्कि यह आत्म स्वीकृति के बारे में सिखाता है।
* योग सिर्फ कसरत ही नहीं है बल्कि यह खुद अपने आप पर काम करता है।
* योग से सिर्फ रोगों, बीमारियों से छुटकारा ही नही मिलता है बल्कि यह सबके कल्याण की गारंटी भी देता है।
* योग स्वीकार करता है। योग प्रदान करता है। -- एप्रिल वैली
* योग हम सभी को नकारात्मकता से दूर रखता है और हमारे मस्तिस्क में अच्छे विचारों का निर्माण करता है। वहीं मनुष्य योग के द्धारा अपनी जीवनशैली में बदलाव कर सकता है और एक सुखी और स्वस्थ जीवन जी सकता है।
* योग हमारी कमियों पर प्रकाश डालता हैं।
* योग हमारे जीवन की शक्ति, ध्यान करने की क्षमता और उत्पादकता को बढ़ाता है योग मनुष्य के शरीर, मन और भावना को स्थिर और नियंत्रित भी करता है।
* योग हमें उन चीजों को ठीक करना सिखाता है जिसे सहा नहीं जा सकता और उन चीजों को सहना सिखाता है जिन्हे ठीक नहीं किया जा सकता। -- बी के एस आयंगर
* योग हमे खुशी, शांति और पूर्ति की एक स्थायी भावना प्रदान करता है।
* योग हर उस व्यक्ति के लिए संभव है जो वास्तव में इसे चाहता है। योग सार्वभौमिक है ….लेकिन योग को सांसारिक लाभ हेतु एक व्यवसायिक दृष्टिकोण से ना अपनाएं। -- श्री कृष्ण पट्टाभि जॉइस
* योग हर वह व्यक्ति के कर सकता है जो वास्तव में इसे चाहता है क्योंकि योग सार्वभौमिक है।
* योगा हमे वो ऊर्जा प्रदान करता है जो हम हज़ारो घंटे भी अपना काम करके अर्जित नहीं कर सकते। ।
* रोना उच्चतम भक्ति गीतों में से एक है। जो रोना जानता है, वह साधना जानता है। यदि आप सच्चे दिल से रो सकें, तो इस प्रार्थना के तुल्य कुछ भी नहीं है। रोने में योग के सभी सिद्धांत शामिल हैं। -- कृपालवानंदजी
* व्यायाम गद्य की तरह है , जबकि योग गति की कविता है। एक बार जब आप योग का व्याकरण समझ जाते हैं ; आप अपने गति की कविता लिख सकते हैं। -- अमित राय
* शरीर आपका मंदिर है। आत्मा के निवास के लिए इसे पवित्र और स्वच्छ रखिये। -- बी० के० एस० आयंगर
* शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए योग और ध्यान अपनायें।
* सभी बीमारियों का उपचार योग और स्वस्थ जीवन शैली में निहित है। -- बाबा रामदेव
* सभ्यता द्वारा घायल हुए लोगों के लिए, योग सबसे बड़ा मरहम है। -- टी गिलेमेट्स
* सांसें अंदर लो , और ईश्वर तुम तक पहुँचता है। सांसें रोके रहो , और ईश्वर तुम्हारे साथ रहता है। सांसें बाहर निकालो, और तुम ईश्वर तक पहुँचते हो। सांसें छोड़े रहो , और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाओ। -- कृष्णामचार्य
* स्वस्थ जीवन जीना जिंदगी की जमा पूंजी, योग करना रोगमुक्त जीवन की कुंजी…।
* स्वास्थ सबसे बड़ा उपहार हैं, संतोष सबसे बड़ा धन हैं, यह दोनों योग से ही मिलते हैं।
* हमारा स्वास्थ्य ही असली धन है न कि सोने और चांदी के टुकड़े, इसलिए योग के द्वारा इसे बनाये रखें।
* हमारे पास प्राचीनकाल में स्वास्थ्य बीमा नहीं था लेकिन हम सभी के के पास योग एक ऐसा अभ्यास है जो बिना एक पैसे खर्च किये हमारे स्वास्थ्य की रक्षा का आश्वासन देता है।
== विभिन्न ग्रन्थों में योग ==
=== वेद===
अन्य विद्याओं की तरह योग का उद्भव भी [[वेद|वेदों]] से हुआ है।
* विज्ञलोग, पुरोहित, यजमान अपने मनों को केन्द्रित करते हैं और प्रार्थनाओं को महान (सविता) में लगाते हैं जो सभी प्रार्थनाओं को जानने वाला है। -- ऋग्वेद
* ''यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन।
: ''स धीनां योगमिन्वति॥'' -- ऋक्संहिता, मण्डल-1, सूक्त-18, मंत्र-7
: योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। वह योग क्या है?
* ''स घा नो योग आभुवत् स राये स पुरं ध्याम।
: गमद् वाजेभिरा स नः ॥'' -- ऋग्वेद 1-5-3
: वही परमात्मा हमारी समाधि के निमित्त अभिमुख हो, उसकी दया से समाधि, विवेक, ख्याति तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा का हमें लाभ हो, अपितु वही परमात्मा अणिमा आदि सिद्धियों के सहित हमारी ओर आगमन करे।
* ''योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे।
: ''सखायऽइन्द्रमूतये॥'' -- यजुर्वेद 11/14
: बार-बार योगाभ्यास करते और बार-बार मानसिक और शारीरिक बल बढ़ाते हुये हम सब परस्पर मित्रभाव से युक्त होकर अपनी रक्षा के लिये अनन्त बलवान्, ऐश्वर्यशाली ईश्वर का ध्यान करते हैं। उसी से सब प्रकार की सहायता मांगते हैं।
* यु॒ञ्जा॒नः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
: ''अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्याऽध्याभरत्॥'' -- यजुर्वेद 11/1
: जो पुरुष योगाभ्यास और भूगर्भविद्या सीखना चाहे, वह यम आदि योग के अङ्ग और क्रिया-कौशलों से अपने हृदय को शुद्ध करके तत्त्वों को जान, बुद्धि को प्राप्त और इन को गुण, कर्म तथा स्वभाव से जान के उपयोग लेवे।
* ''युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे।
: ''सुवर्गेर्याय शक्त्या॥'' -- यजुर्वेद 11/2
: मनुष्य परमेश्वर की इस सृष्टि में समाहित हुए योगाभ्यास ओर तत्त्वविद्या को यथाशक्ति सेवन करें तथा उनमें सुन्दर आत्मज्ञान के प्रकाश से युक्त हुए योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करें, तो अवश्य सिद्धियों को प्राप्त हो जावें।
* ''युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम् ।
: ''बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्॥'' -- यजुर्वेद 11/3
: जो पुरुष योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करते हैं, वे अविद्या आदि क्लेशों को हटानेवाले शुद्ध गुणों को प्रकट कर सकते हैं। जो उपदेशक पुरुष से योग और तत्त्वज्ञान को प्राप्त होकर ऐसा अभ्यास करे, वह भी इन गुणों को प्राप्त होवे।
* ''युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
: ''शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः।
: आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥'' -- यजुर्वेद 11/5
: अर्थात् योगाभ्यास के ज्ञान को चाहने वाले मनुष्यों को चाहिये कि योग में कुशल विद्वानों का सङ्ग करें। उनके सङ्ग से योग की विधि को जान के ब्रह्मज्ञान का अभ्यास करें।
=== उपनिषद ===
यद्यपि योग विद्या का स्तम्भ पतञ्जलि के योगसूत्र को माना जाता है परन्तु योग विद्या का आधार वेदों में है। वेदों से निकली योग विद्या का वटवृक्ष स्वरूप उपनिषदों में देखने को मिलता है।
*''तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।'' -- कठोपनिषद् २/३/११
: जिसमें इन्द्रियाँ (मन व बुद्धि) स्थिर और संयमित हो जातीं हैं, वही योग है।
* ''यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
: ''बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥
: ''तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
: ''अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥'' -- कठोपनिषद 6 / 10-11, नचिकेता और यम के बीच सम्वाद
: जब मन के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती है तथा बुद्धि की भी कोई चेष्टा नहीं रहती, तब इस अवस्था को परमागति कहते हैं । उसी स्थिर इन्द्रिय-धारणा को योग कहते हैं। उस अवस्था में साधक प्रमाद रहित होता है। क्योंकि 'योग' ही पदार्थों का उद्भव तथा लय (प्रभवाव्ययौ) दोनों ही है।<ref>[https://upanishads.org.in/upanishads/3/2/3/11 कठोपनिषद २/३/१०-११]</ref>
: (जब मन के सहित पांचों ज्ञानेन्द्रियां भली प्रकार स्थित हो जाती हैं और बुद्धि चेष्टा नहीं करती उसे परमगति कहते हैं। उस स्थिर इन्द्रियधारणा को ‘योग’ मानते हैं। क्योंकि तब (वह) प्रमाद रहित हो जाता है (निश्व्चय ही) योग (शुभ के) उदय और (अशुभ के) अस्त वाला है।)
* ''ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।'' -- श्वेताश्वतरोपनिषत <ref>[https://thinkindiaquarterly.org/index.php/think-india/article/download/10857/6566/ संस्कृत वाङ्मय में योग]</ref>
: वे योगी ध्यान में गए और उन्होंने ईश्वर की शक्ति को अपने अन्दर देखा।
* ''प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।
: ''तर्कश्चैत्र समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥'' -- अमृतनादोपनिषद्
: योग इन छः अंगों वाला है - प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क तथा समाधि।
* ''आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा।
: ''ध्यानं समाधितरेतानि योगङ्गानि भवन्ति षड्॥'' -- योगचूडामण्युपनिषद्
: आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि - योग के ये छः अंग होते हैं।
* ''कर्म कर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु ।
: ''बन्धनं मनसो नित्यं कर्मयोगः स उच्यते॥''
: ''यत्तुचित्तस्य सततमर्थे श्रेयसि बन्धनम्।
: ''ज्ञानयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकरः शिवः॥'' -- त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्
: विहित कर्मों में इस बुद्धि का बने रहना, यह कर्तव्य कर्म है। शास्त्रानुकूल कर्मों में निरन्तर मन लगाये रखना कर्मयोग कहलाता है।
: श्रेय के अर्थ में चित्त का सदैव बद्ध रहना ज्ञान योग कहलाता है। यह ज्ञान योग सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला और कल्याणकारी है।
: ( ध्यातव्य है कि त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् में अष्टांग योग के साथ-साथ कर्मयोग व ज्ञानयोग का भी वर्णन मिलता है।)
* ''मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥'' -- महोपनिषद, ५-४२
: मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है।
* ''प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायामोथ धारणा ।
: ''तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्चते ॥ '' -- अमृतनादोपनिषद् तथा मैत्रायणी उपनिषद
: प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क और समाधि के रूप में योग छः अंगों वाला (षडङ्ग) है।
* आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा ।
: ''ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥'' -- ध्यानविन्दूपनिषद्
: आसन, प्राणसंरोध, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - ये योग के छः अंग हैं।
* ''हेतुद्वयं हि चित्तस्य वासना च समीरणः ।
: ''तयोर्विनष्टे एकस्मिंस्तद्वावपि विनश्यतः ॥'' -- योग कुण्डल्युपनिषद्
: चित्त के दो हेतु है- वासना और प्राण। इनसे से किसी एक पर नियंत्रण होने से दोनो नियंत्रित हो जाते हैं ।
* ''योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम्।
: ''योगोऽपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि ॥'' -- योगतत्त्वोपनिषद्
: योग के बिना ज्ञान कैसे निश्चित रूप से मोक्षदायी हो सकता है ? उसी प्रकार ज्ञानहीन योग भी मोक्षकर्म में असमर्थ है।
* ''मंत्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः ।'' --योगतत्त्वोपनिषद्
: मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग - ये योग के चार विभाग हैं।
* ''न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः।
: ''प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥'' -- श्वेताश्वतर उपनिषद्
: योगाग्निमय शरीर जिसको प्राप्त होता है, उसे कोई रोग नहीं होता, बुढ़ापा नहीं आता और मृत्यु भी नहीं होती ।
=== रामायण ===
* ''संसारोत्तरेण युक्तिर्योग शब्देन कथ्यते ।'' -- योगवशिष्ठ महारामायण
: इस संसार सागर से पार होने की युक्ति ही योग है।
* ''मार्गस्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधनाः ।
: ''कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥'' -- अध्यात्म रामायण
: पहले मैंने मोक्षप्राप्ति के तीन साधन बतलाये हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।
=== महाभारत ===
* सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ भीष्म. २६/४८, गीता.२/४८॥
* योगः कर्मसु कौशलम्॥ भीष्म. २६/५०, गीता.२/५०॥
* एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥ भीष्म. २९/५, गीता.५/५॥
* इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः॥ भीष्म. २९/१९, गीता.५/१९॥
* तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ भीष्म. ३३/२२, गीता.९/२२॥
* तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः।
: लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यामानमात्मनि॥ शान्ति. १८७/२९॥
* तस्मात् समाहितं बुद्ध्या मनो भूतेषु धारयेत्।
: नापध्यायेन्न स्पृहयेन्नाबद्धं चिन्तयेदसत्॥ शान्ति. २१५/८॥
* अथामोघप्रयत्नेन मनो ज्ञाने निवेशयेत्।
: वाचामोघप्रयासेन मनोज्ञं तत् प्रवर्तते॥ शान्ति. २१५/९॥
* धृतिमानात्मवान् बुद्धिं निगृह्णीयादसंशयम्।
: मनो बुद्ध्या निगृह्नीयाद् विषयान्मनसाऽऽत्मनः॥ शान्ति. २१५/१८॥
* आहारनियमं चैव देशे काले च सात्त्विकम्।
: तत् परीक्ष्यानुवर्तेत तत्प्रवृत्त्यनुपूर्वकम्॥ शान्ति. २१५/२३॥
* प्रवृत्तं नोपरुन्धेत शनैरग्निमिवेन्धयेत्।
: ज्ञानान्वितं तथा ज्ञानमर्कवत् सम्प्रकाशते॥ शान्ति. २१५/२४॥
* हेतुमच्छक्यमाख्यातुमेतावज्ज्ञान चक्षुषा।
: प्रत्याहारेण वा शक्यमक्षरं ब्रह्म वेदितुम्॥ शान्ति. २१६/२०॥
* यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्ध्या य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम्॥ शान्ति. २३६/४॥
* ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः॥ शान्ति. २३६/५॥
* निर्मुच्यमानः सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यतः।
: शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रयते नभः॥ शान्ति. २३६/१७॥
* एकत्वं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वशः॥ शान्ति. २४०/२॥
* आत्मनो व्यापिनस्तात ज्ञानमेतद्नुत्तमम्।
: तदेतदुपशान्तेन दान्तेनाध्ययनशीलिना॥ शान्ति. २४०/३॥
* आत्मारामेण बुद्धेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा।
: योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः॥ शान्ति. २४०/४॥
* कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्पप्नं च पञ्चमम्।
: क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात्॥ शान्ति. २४०/५॥
* सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रामुच्छेतुमर्हति।
: धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा॥ शान्ति. २४०/६॥
* चक्षुः श्रोत्रे च मनसा मनोवाचं च कर्मणा।
: अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात्॥ शान्ति. २४०/७॥
* वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसायुक्तां मनोनुदाम्॥ शान्ति. २४०/९॥
* ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा॥ शान्ति. २४०/१०॥
* शौचमाचारसंशुद्धिरिन्द्रियाणां च निग्रहः।
: एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति॥ शान्ति. २४०/११॥
* धूतपाम्पा तु तेजस्वी लघ्वाहरो जितेन्द्रियः।
: कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम्॥ शान्ति. २४०/१३॥
* मनसश्चेन्द्रियाणां च कृत्वैकाग्य्रं समाहितः।
: पूर्वरात्रापरार्धं च धारयेन्मन आत्मनि॥ शान्ति. २४०/१४॥
* जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रियम्।
: ततोऽस्य स्रवते प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम्॥ शान्ति. २४०/१५॥
* मनस्तु पूर्वमादद्यात् कुमीनमिव मत्स्यहा।
: ततः श्रोत्रं ततश्चक्षुर्जिह्वां घ्राणं च योगवित्॥ शान्ति. २४०/१६॥
* तत एतानि संयम्य मनसि स्थापयेद् यतिः।
: तथैवापोह्य संकल्पान्मनो ह्यात्मनि धारयेत्॥ शान्ति. २४०/१७॥
* विधूम इव दीप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान्॥ शान्ति. २४०/१९॥
* वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे दृश्यतेऽऽत्मा तथाऽऽत्मनि।
: प्रमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणं श्रवणदर्शने।
: अद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः॥ शान्ति. २४०/२३॥
* प्रतिभामुपसर्गांश्चाप्युपसंगृह्य योगतः।
: तांस्तत्वविदनादृत्य आत्मन्येव निवर्तयेत्॥ शान्ति. २४०/२४॥
* येनोपायेन शक्येत संनियन्तुं चलं मनः।
: तं च युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत् ततः॥ शान्ति. २४०/२७॥
* नाभिष्वजेत् परं वाचा कर्मणा मनसापि वा।
: उपेक्षको यताहारो लब्धालब्धे समो भवेत्॥ शान्ति. २४०/२९॥
* अपि वर्णावकृष्टस्तु नारी वा धर्मकाङ्क्षिणि।
: तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम्॥ शान्ति. २४०/३४॥
* निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः॥ शान्ति. २६९/३६॥
* प्रत्यक्षमिह पश्यन्ति भवन्तः सत्पथे स्थिताः॥ शान्ति. २६९/४०॥
* यथा समुद्रमभितः संश्रिताः सरितोऽपराः।
: तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंश्रियते सदा॥ शान्ति. २९८/३४॥
* रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम्।
: योगाच्छित्त्वा ततो दोषान् पञ्चैतान् प्राप्नुवन्ति तत्॥ शान्ति. ३००/११॥
* अप्रमत्तो यथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः।
: युक्तः सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम्॥ शान्ति. ३००/३१॥
* सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते।
: धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभिः॥ शान्ति. ३००/५४॥
* कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते।
: एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम्॥ शान्ति. ३०१/५५॥
* छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात्।
: सत्त्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद् भयं तथा॥ शान्ति. ३०१/५६॥
* छिन्दति पञ्चमं श्वासमल्पहारतया नृप॥ शान्ति. ३०१/५७॥
* इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन।
: सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः॥ शान्ति. ३०१/८८॥
* ज्योतिरात्मनि नान्यत्र सर्वजन्तुषु तत् समम्।
: स्वयं च शक्यते द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा॥ शान्ति. ३२६/३२॥
* संयोज्य मनसा ऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहनीम्।
: त्यक्त्वा कामं च मोहं च तदा ब्रह्मत्वमश्नुते॥ शान्ति. ३२६/३५॥
* यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाप्ययम्।
: समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ शान्ति. ३२६/३६॥
* प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः।
: तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥ शान्ति. ३२६/३९॥
* तमः परिगतं वेश्च यथा दीपेन दृश्यते।
: तथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम्॥ शान्ति. ३२६/४०॥
* न चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः।
: युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि॥ अनु. ९६ दा. पा.॥
* इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत्।
: तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत्॥ आश्व. १९/१७॥
* यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति।
: तथा रूपमिवात्मानं साधु युक्तः प्रपश्यति॥ आश्व. १९/२१॥
* इषीकां च यथा मुञ्जात् कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत्।
: योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः॥ आश्व. १९/२२॥
* अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते।
: विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति॥ आश्व. १९/२५॥
* दुःखशोकमयैर्घोरैः सङ्गस्नेह समुद्भवैः।
: न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः॥ आश्व. १९/२८॥
* सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते।
: विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः॥ आश्व. १९/३०॥
* सम्युग्युक्तो यदाऽऽत्मानमात्मन्येव प्रपश्यति।
: तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः॥ आश्व. १९/३२॥
* समानव्यानयो र्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः॥ आश्व. २०/१५॥
* तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च।
: अपान प्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति।
: तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ च मुञ्चतः॥ आश्व. २०/१६॥
* तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम्।
: अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेऽन्तरा॥ आश्व. २०/१७॥
* घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम्।
: मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः॥ आश्व. २०/१९॥
* घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च।
: मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम॥ आश्व. २०/२०॥
* योगान्नास्ति परं सुखम्॥ आश्व. ३०/३१॥
* यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा।
: सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः॥ आश्व. ५१/२३॥
* चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः।
: यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम्॥ आश्व. ५१/२७॥
=== पुराण ===
पुराणों में अनेक लोकोपयोगी विद्याओं का वर्णन उपलब्ध होता है, जैसे- अश्वशास्त्र का ज्ञान, रत्नपरीक्षा का ज्ञान, वास्तुविद्या का ज्ञान, धनुर्विद्या का ज्ञान आदि। इसी प्रकार पुराणों में योगविद्या का भी वर्णन विस्तार से मिलता है। पुराणों में भी पातञ्जल योगसूत्र के अनुसार योग का लक्षण दिया गया है, परन्तु पुराणकारों ने चित्त का अर्थ इन्द्रियाँ लिया है।
* ''आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः।।
: ''तस्या ब्रह्मर्षि संयोगो योग इत्याभिधीयते॥'' -- विष्णुपुराण, 6.7.31
: आत्माज्ञन के प्रयत्नभूत यम, नियमादि की अपेक्षा रखनेवाली मन की विशिष्ट गति है, उसका ब्रह्म के साथ संयोग होना ही योग है।
* ''आहुः शरीरं रथामिन्द्रियाणि हयानभीषून् मनइन्द्रियेशम्।
: ''वर्मनि मत्राधिष्णां च सूतं सत्वं वृहद् | बन्धुरमीशसृष्टम्॥'' -- भागवतपुराण, 7.15.41
: बहिर्गामी उच्छृखल इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटाकर इनकी प्रवृत्ति को अन्तर्मुखी करना योग है।
* '' ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रेकचित्तता।
: ''चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनोः परः॥ '' -- अग्निपुराण, 372.1-2
: चित्त की एकाग्रता ही योग है और चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है जो जीवात्मा और परमात्मा से परे रहा करता है।
* ज्ञान के द्वारा वैराग्य की उत्पत्ति होती है तथा वैराग्य के द्वारा दुःखों का नाश। -- मार्कण्डेयपुराण
=== रामचरितमानस ===
* जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
: बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥117 क॥
: तब योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्म रूपी ईंधन लगा दें (सब कर्मों को योग रूपी अग्नि में भस्म कर दें)। जब (वैराग्य रूपी मक्खन का) ममता रूपी मल, जल जाए, तब (बचे हुए) ज्ञान रूपी घी को (निश्चयात्मिका) बुद्धि से ठंडा करें।
=== विविध ===
* ''यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यायी योगविचक्षणः ।
: ''सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पनस्तस्य बान्धवाः ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति
* ''इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् ।
: ''अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति १.८
: यज्ञाचार, दम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय, प्रभृति कर्मों में योग के द्वारा आत्मदर्शन ही परम धर्म है ।
* '' मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात् ।
: ''एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते ॥'' -- गोरक्षशतकम्
: महायोग एक ही है (किन्तु) यह चार प्रकार का होता है- मंत्रयोग , हठयोग लययोग व राजयोग।
* ''श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि ।'' -- कैवल्य उपनिषद्
: अर्थात् श्रद्धा भक्ति, ध्यान के द्वारा आत्मा का ज्ञान ही योग हैं।
* ''मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते।'' -- महोपनिषद ५-४२
: मन के प्रशमन के उपाय को योग कहते हैं।
* ''पुंप्रकृत्योर्वियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते ।'' -- सांख्य दर्शन
: अथाषि् पुरुष-प्रकृति का वियोग ही योग है।
* चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना या उसका पूर्णतया समाप्त हो जाना ही योग है। -- लिंग पुराण
* ''केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिश्यते।'' -- हठयोगप्रदीपिका
: मैं इस हठविद्या का उपदेश केवल राजयोग की प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ।
: (हठयोग प्रदीपिका में योग को समाधि कहा गया है यह समाधि जीवात्मा एवं परमात्मा की एकता से व सभी संकल्पों के नष्ट होने पर प्राप्त होती है अर्थात् जीवात्मा परमात्मा के मिलन से साधक के सभी संकल्प नष्ट हो जाते हैं और यही अवस्था समाधि या योग की अवस्था है।)
* ''शोधनं दृढ़ता चैव स्थैर्यं धैर्यं च लाघवम् ।
: ''प्रत्यक्षं च निर्लिप्तं च घटस्थं सप्तसाधनम्।'' -- घेरण्डसंहिता
: शरीर की शुद्धि के लिए सात साधन है- शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, धैर्य, लाघव, प्रत्यक्ष, और निर्लिप्तता । (जिन्हें सामान्यतः 'सप्तसाधन' की संज्ञा दी जाती है।)
* ''षट्कर्मणा शोधनं च आसनेन भवेद् दृढम् ।
: ''मुद्रया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता ॥
: ''प्राणायामाल्लाघवं च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मनि ।
: ''समाधिना च निर्लिप्तं मुक्तिरेव न संशयः ॥'' -- घेरण्डसंहिता
: अर्थात् शरीर के शोधन के लिए षट्कर्म, दृढ़ता के लिये आसनों का अभ्यास, स्थैर्य के लिये मुद्रायें, धैर्य के लिये प्रत्याहार, लाघव के लिये प्राणायाम, ध्येय के प्रत्यक्ष दर्शनार्थ ध्यान और निर्लिप्तता (आसक्तिहीनता) के लिये समाधि आवश्यक है। इस क्रम से अभ्यास करने पर अवश्य ही मुक्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।
* ''धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिनलिकंत्राटकस्तथा ।
: ''कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ॥'' -- घेरण्डसंहिता, 1/12
: अर्थात् योग के लिये धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति इन षट्कर्मों का अभ्यास करना चाहिए ।
* ''आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् ।'' -- गोरक्ष संहिता, द्वितीयशतक
: अर्थात् आसनों से शारीरिक और मानसिक रोग तथा प्राणायाम से पाप नष्ट होते हैं।
* ''महामुद्रां नभोमुद्रां उड्डियानं जालन्धरम् ।
: ''मूलबन्धं चयो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनः ॥'' -- गोरक्ष संहिता
: महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियानबन्ध, जालन्धरबन्ध और मूलबन्ध के अभ्यास में जो योगी कुशल होता है, वह मुक्ति का पात्र होता है।
* ''प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता।'' -- सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति
: अर्थात् प्राणायाम से प्राण स्थिर होता है।
* परमात्मा की शाश्वत और अखण्ड ज्योति के साथ अपनी ज्योति को मिला देना ही योग है। -- श्री राम कृष्ण परमहंस
* जीवन के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है, वही योग है। -- महर्षि अरविन्द
* योग का तात्पर्य एक भाव का अनुभव अथवा अन्तर्निहित आत्म से तादात्म्य स्थापित करना है, यही एकता वास्तविकता से मन तथा पदार्थ के द्वैवादिता को समाहित करके प्राप्त होती है। -- स्वामी सत्यानन्द सरस्वती
==इन्हें भी देखें==
* [[प्राणायाम]]
* [[व्यायाम]]
* [[ध्यान]]
* [[आयुर्वेद]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
85ms2vqx6k6syb9r7jzp7qsr8vzkxx9
विदुर नीति
0
6112
32873
27622
2026-05-18T05:29:35Z
अनुनाद सिंह
658
32873
wikitext
text/x-wiki
'''[[विदुर]]''' धृतराष्ट्र के महामंत्री और नीतिशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान् थे। महाभारत में बहुत ही महान बता कर उनकी प्रशंसा की गई है। उन्होंने महाभारत के युद्ध को टालने का हरसम्भव प्रयास किया था परन्तु असफल रहे। युद्ध के अनन्तर विदुर पांडवों के भी मंत्री हुए। पांडवों ने उनकी ही आज्ञा तथा सलाह लेकर शासन आरम्भ किया और आदर्श राज्य की स्थापना की।
महाभारत में महात्मा विदुर सदैव अपनी नीतियों से सही समय पर सही सुझाव देते नजर आते हैं। ये दूरदर्शी थे जो समय से पहले ही परेशानियों को भांप लेते थे। महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले विदुर ने [[धृतराष्ट्र]] को चेताया था कि इस युद्ध का अन्त अत्यन्त ही बुरा होगा। महात्मा विदुर को अपने समय के बुद्धिजीवियों में से एक माना जाता है।
'''विदुर-नीति''' वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है। युद्ध के पूर्व महाराजा धृतराष्ट्र अपने सलाहकार विदुर को बुलाकर अच्छे और बुरे के बारे में चर्चा करते हैं। ‘महाभारत’ के [[उद्योग पर्व]] में इस चर्चा का वर्णन मिलता है।
==उपदेश==
*'' अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्।
:'' हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागरः॥
: विदुरजीने बोले-राजन्! जिसका बलवान् के साथ विरोधवहो गया है, उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको , जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामीको तथा चोरको रातमें नींद नहीं आती।
*'' कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि कदाचन।
:'' कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन् न परितप्यसे॥
: नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं?
*'' श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः।
:'' अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः॥
*'' राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत्।
:'' प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः॥
: विदुरजी बोले-महाराज धृतराष्ट्र! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंकी स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उनहें वनमें भेज दिया।
*'' विपरीततरश्च त्वं भागधेये न सम्मतः।
:'' अर्चिषां प्रक्षयाश्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः॥
: आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखों की ज्योतिसे हीन होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसी से उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें सम्मती नहीं हुई।
*'' आनृशंश्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात्।
:'' गुरुत्वात् त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते॥
: युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य , तथा पराक्रम है, वे आपमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इनहीं सद्गुणोंके कारण वे सेच विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सहते हैं।
*'' दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा।
:'' एतेष्वैश्वर्यमादाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि॥
: आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्यका भार रखकर केसे कल्याण चाहते हैं?
*'' आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
*'' निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
:'' अनास्तिकःश्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥
: जो अच्छे कर्मोंका सेवन कर्ता और बूरे कर्मोंसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होनेके लक्षण है।
*'' क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते।१७
: क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपनेको पूज्य समझाना-ये भाव जिसको पुरुषार्थको भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
:'' कृतमेवास्यजानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहलेसे किये हुए विचारको नहीं जानते , बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते है, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः।
:'' समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
: सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति-दरिद्रता-ये जिस्के कार्यमें विघ्न नहीं डालते , वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते।
:'' कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते॥
: जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करते है और जो भोगको छोडकर पुरुषार्थका ही वरण करता है, वहीं पण्डित कहलाता है।
*'' यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
:'' न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
*'' क्षिप्रं विजानन्ति चिरं श्रुणोति
: विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।
:'' नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
: तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥
*'' नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।
:'' आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥
: पण्डितोंकी-सी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभवस्तुकी कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तुके विषयमें शोक करना नहीं चाहते और विपत्तिमें बड़कर घबराते नहीं हैं।
*'' निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
:'' अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥
: जो पहले निश्शय करके फिर कार्यका आरम्भ करता है, कार्यके बीचमें नहीं रुकता, समयको व्यर्थ नहीं जाने देता, और मनको वशमें रखता है।
*'' आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते।
:'' हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिताः भरतर्षभ॥
: भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठकर्मों में रुचि रखते है, उन्नतिके कार्य करते है, तथा भलाई करनेवलों में दोष पहीं निकालते।
*'' न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
:'' गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो अपना आदर होनेपर हर्षके मारे फूल नहीं उठता, अनादरसे संतप्त नहीं होता तथा गंगाजीके ह्रद(गहरे गर्त) – के सम्मान जिसके चित्तको क्षुभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है।
*'' तत्त्वज्ञःसर्वभूतानां योगज्ञःसर्वकर्मणाम्।
:'' उपायज्ञो मनुष्याणां नरःपण्डित उच्यते॥
: जो संपूर्ण भौतिक पदार्थोंकी असलीयतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढकरउपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है।
*'' प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।
:'' आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पणडित उच्यते॥
: जिसकी वाणी कहीं रुकती नही , जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थकेतात्पर्यको शीघ्र बता सक्ताहै, वह पण्डित कहलाता है।
*'' श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगाः।
:'' असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥
: जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है, और बुद्धि विद्याका तथा जो शिष्ट पुरुषोंकी मर्यादाका उल्लंघन नही करता, वही पण्डितकी संज्ञा पासकता है।
*'' अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः
: अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥
: विना पढ़े ही कर्व करनेवाले, दरिद्र होकर भी बड़े -बड़े मनोरथ करनेवाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको पण्डितलोग मूर्ख कहते है।
*'' स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमुनुतिष्ठति।
:'' मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते॥
: जो अपने कर्तव्य छोडकर दूसरेके कर्तव्यका पालन करता है, तथा मित्रके साथ असत् आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है।
*'' अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
:'' बलवन्तंच यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम्॥
: जो नचाहनेवालोंको चाहता है, और चाहनेवालोंको त्याग देता है जो अपनेसे बलवान्के साथ वैर बाँधता है, उसे मूढ विचारका मनुष्य कहते है।
*'' अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
:'' कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्॥
: जो शत्रुको मितूर बानाता और मित्र से द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहूँचता है तथा सदा बूरे कर्मोंका आरम्भ किया करता है, उसे मूढ चित्तवाला कहते है।
*'' संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
:'' चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ॥
*'' श्राद्धं पित्रुभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति।
:'' सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम्॥
: जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् नहीं मिलता, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
*'' श्राद्धं पित्रुभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति।
:'' सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम्॥
: जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् नहीं मिलता, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
*'' अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते।*
: अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥
: मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मुनुष्यपर भी विश्वास करता है।
*'' परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा
: यश्च कृध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः॥
: दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरेपर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी क्रोध सकता है, वह मुष्य महामूर्ख है।
*'' आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवरिजितम्।
:'' अलभ्यमिच्छन् नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरहोच्यते॥
: जो अपने बलको न समझकर विना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है , वह पुरुष इस संसारमें मूढबुद्धि कहलाता है।
*'' अशिष्यं शास्ति यो राज यश्च शून्यमुपासते।
:'' कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम्॥
: जो अनधिकारीको उपदेश देता है और शून्यकी उपासना करता है, तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
*'' अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव च।
:'' विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो बहुत धन, विद्या तथावैश्वर्यको पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नही चलता, वह पण्डितवकहलाता है।
*'' एकःसम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम्।
:'' योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः॥
: जो अपनेद्वारा भरण-पोषणके योग्यव्यक्तियोंको बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन भोजन करता है, और अच्छा वस्त्र पहलाता है, उससे बढ़कर क्रर कौन होगा?
*'' एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः।
:'' भोक्तरो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते॥
: मनुष्य अकेला पाप कर(-के धन कमा)-ता है और (उस धन) उपभोग बहुत-लोग करते है।उपभोग करनेवाले तो दोषसे छूट जाते है, पर उसका करता दोषका भागी होता है।
*'' एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
:'' बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्यद्राष्ट्रं सराजकम्॥
: किसी धुनुर्धर वीरके द्वारा छोडा हुआ बाण सम्भव है, एकको भी मारे या न मारे। परन्तु बुद्धिमान् द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्रका विनाश कर सकती है।
*'' एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु।
:'' पञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव॥
: एक (बुद्धि)से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके चार ( साम,दान,भेद,दण्ड)-से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन)-को वशमें कीजिये। पाँच( इन्द्रियों)को जीतकर छः ( सन्धि,विग्रह, यान ,आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप) गुणोंको जानकर तथा सात (स्त्री, जुआ, मृगया, मद्य, कठोरवचन, दण्डकी कठोरता, और अन्यायसे धनोपार्जन) को छोडकर सुखी हो जाइये।
*'' एकं विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते।
:'' सराष्ट्रं सप्रजं हन्न्ति राजानं मन्त्रविप्लवः॥
: विषका रस एक (पीनेवाले ) की मारता है,शस्त्रसे एकका ही वध होता है, किन्तु (गुप्त) मन्त्रणा प्रकाशित होना राष्ट्र और प्रजाके साथ ही राजाका भी विनाश कर डालता है।
*'' एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान् न चिन्तयेत्।
: एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात्॥
: अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेला किसी विषयका निश्च न करे, अकेला रास्ता न चले और बहुत-से लोग सोये हों तो उनमें अकेला न जागता रहे।
*'' एकमेवाद्वितीयं तद् यद् राजन् नावबुद्ध्यसे।
:'' सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावास्य नौरिव॥
: राजन्! जैसे समुद्रके पार जानेके लिये नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्लर्गके लिये सत्य ही एकमात्र सोपान है, दूसरा नहीं, किंतु अप इसे नहीं समझ रहे है।
*'' एकःक्षमवतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
:'' यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
: क्षमाशील पुरुषोंमें एक ही दोषका आरोप होता है, दूसरेकी तो संभावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्यको लोग असमर्थ समझ लेते है।
*'' सोऽस्य दोषो न मन्तव्यःक्षमा हि परमंबलम्।
:'' क्षमागुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा॥
: किन्तु क्षमाशील पुरुषका वह दोष नहीं मानना चाहिये, क्योंकी क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्योंका गुण तथा समर्थोंका भूषण है।
*'' क्षमा वशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते।
:'' शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः॥
: इस जगत् मे क्षमा वशीकरणरूप है, भला, क्षमासे क्या नहीं सिद्ध होता है? जिसके हाथमें शान्तिरूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लगें?
*'' अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति।
:'' अक्षमावान् परं दोषैरात्मानंचैव योजयेत्॥
: तृणरहितस्थानमें गिरी हुई आग अपने-आप बुझ जाती है। क्षमाहीन पुरुष अपनेको तथा दूसरेको भी दोषका भागी बन लेता है।
*'' एको धर्मः परं श्रेयःक्षमैका शान्तिरुत्तमा।
:'' विद्यैका परमातृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
: केवल धर्म ही परमकल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शान्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देनेवाले है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देनेवाले है।
*'' पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ।
:'' गृहस्थश्च निरारम्भः सारम्भश्चैव भिक्षुकः॥
: समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवीमें दो प्रकारके अथम पुरुष है-अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मों में लगा हुआ संन्यासी
*'' द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलाशयानिव।
:'' राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥
: बिलमें रहनेवाले जीवोंको जैसेवसाँप खा जाता है, उसी प्रकार यह पृथिवी शत्रुसे विरोध न करनेवाले राजा और परदेश सेवन करनेवाले ब्राह्मण-इन दोनोंको खा जाती है।
*'' द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणौ।
:'' यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः॥
: जो निर्धन होकर भी बहुमूल्य वस्तुकी इच्छा रखता उर असमर्थ होकर भी कर्रोध करता है-ये दोनों ही अपने लिये तीक्ष्ण काँटोंके समान हैं एवं अपने शरीरको सुखानेवाले हैं।
*'' द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
:'' गृहस्थस्य निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः॥
: दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते-अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपञ्चमें लगा हुआ संन्यासी।
*'' द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्।
:'' धनवन्तमदातारं दरिद्रं चाऽतपस्विनम्॥
: जो धनी होनेपर भी दान नदे और दरिद्र होने पर भी सहन नकर सके-इन दो प्रकारके मनुष्योंको गलेमें मजबूत पत्थर बाँधकर पानीमें डुबा देना चाहिये।
*'' द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ।
:'' परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखे हतः॥
: पुरुषश्रेष्ठ! ये दो प्रकारके पुरुष सूर्यमण्डलको भेदकर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होते है-योगयुक्त संन्यासी, और संग्राममें शत्रुओंके सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा।
*'' त्रयो न्याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ।
:'' कनीयान् मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः॥
: मनुष्योंके कार्यसिद्धिके लिए उत्तम, मध्यम और अधम – ये तीन प्रकारके न्यायानुकूल उपाय सुने जाते है, ऐसा वेदवेत्ता विद्वान् जानते हैं।
*'' त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः।
:'' नियोजयेद् यथावत्तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु॥
: राजन्! उत्तम,मध्यमऔर अधम-ये तीन प्रकारके पुरुष होते हैं, इनको यथायोग्य तीन ही प्रकारके कर्मोंमें लगाना चाहिये॥
*'' त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।
:'' यत् ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद् धनम्॥
: राजन्! तीन ही धनके अधिकारी नहीं माने जाते-स्त्री,पुत्र, तथा दास। ये जो कुछ कमाते है, वह धन उसीका होता है, जिसके अधीन ये रहते हैं।
*'' हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम्।
:'' सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः॥
: दूसरेके धनका हरण, दूसरेकी स्त्रीका संसर्ग,सुहृद् मित्रका परित्याग-ये तीनों ही दोष (मनुष्यके आयु, धर्म तथा कीर्तिका) क्षय करनेवाले होते है।
*'' त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
:'' कामक्रोधस्तथालोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्॥
*'' वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत।
:'' शत्रोश्च मोक्षणं कृच्छात् त्रीणि चैकं च तत्समम्॥
: भारत! वरदान पाना, राज्यकी प्राप्ति और पुत्रका जन्म-ये तीन एक ओर और शत्रुके कष्टसे छूटना-यह एक ओर, वे तीन और एक बराबर ही ह।
*'' भक्तं च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम्।
:'' त्रीनेतांश्छरणं प्राप्तान् विषमेऽपि न संत्यजेत्।६८
: भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसावकरनेवाले-इन तीन प्रकारके शरणागत मनुष्योंको संकट पड़नेपर भी नहीं छोडनि चाहिये।
*'' चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन
: वर्ज्यान्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात्।
:'' अल्पप्रज्ञैः सहमन्त्रं च नकुर्या-
: न्न दीर्घसूत्रै रभसैश्चारणैश्च॥
: थोडी बुद्धिवाले, दीर्घसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करनेवाले लोगोंके साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। ये चारोंवमहाबली राजाके लिये त्यागनेयोग्य बताये गये हैं। विद्वान् पुरुष ऐसे लोगोंको पहचान ले।
*'' देवतानां च संकल्पमनुभावं च धीमताम्।
:'' विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम्॥
: देवताओंका संकल्प, बुद्धिमानोंका प्रभाव, विद्वानोंकी नम्रता और पापियोंका विनाश।
*'' चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि
: भयं प्रयच्छन्त्यथाकृतानि।
:'' मानाग्निहोत्रमुतमानमौनम्
: मानेनाधीतमुतमानयज्ञः॥
: चार कर्म भयको दूर करनेवाले है, किन्तु वे ही ठीक तरहसे सम्पादित न हो, तो भयप्रदान करते हैं। वे कर्म हैं-आदरके साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान।
*'' पञ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि।
:'' मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः॥
: राजन्! आप जहाँ जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँ मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रय देनेवाले तथा आश्रय पानेवाले-ये पाँच आपके पीछे लगे रहेंगे।
*'' पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्यच्छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम्।
:'' ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम्॥
: पाँच ज्ञानेन्द्रियोंवाले पुरुषकी यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र(दोष) युक्त हो जाय तो उससे उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशकके छेदसे पानी।
*'' षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
:'' निद्रा तंद्रा भयं क्रोधं आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
*'' षडिमान् पुरुषो जह्याद् भिन्नं नावमिवार्णवे।
:'' अप्रवक्तारमचार्यमनधीयानमृत्विजम्॥
: अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम्।
:'' ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम्॥
*'' षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन।
:'' सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः॥
*'' अर्थागमो नित्यमरोगता च
: प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
:'' वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या
: षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥
: राजन्! धनकी प्राप्ति, नित्य नीरोग रहना, स्त्रीका अनुकूल तथा प्रियवादिनी होना, पुत्रके आज्ञाके अन्दर रहना, तथा धन पैदा करनेवाली विद्याका ज्ञान-ये छः बातें इस मनुष्य लोकमें सुखदायिनी होती हैं।
*'' षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति।
:'' न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः॥
: मनमें नित्य रहनेवाले छः शत्रु( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) – को जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंसे ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थोंसे युक्त होनेकी तो बात ही क्या है?
*'' षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते।
:'' चौराः प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सकाः॥
*'' प्रमदाः कामयानेषु यजमानेषु याचकाः।
:'' राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डितः॥
*'' षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात्।
:'' गावः सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसङ्गतिः॥
*'' षडेते ह्यवमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्।
:'' आचार्यं शिक्षिताः शिष्याः कृतदाराश्च मातरम्॥
*'' नारीं विगतकामास्तु कृतार्थश्च प्रयोजकम्।
:'' नावं विस्तीर्णकान्तारा आतुराश्च चिकित्सकम्॥
*'' आरोग्यमनृण्यमविप्रवासः
: सद्भिर्मनुष्यैः सह सम्प्रयोगः।
:'' स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः
: षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥
*'' ईष्यी घृणी नसंतुष्टः क्रोधिनो नित्यशङ्कितः।
:'' परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुःखिताः॥
*'' सप्तदोषाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः।
:'' प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वराः॥
*'' स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञ्चमम्।
:'' महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च॥
: स्त्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना-ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देना चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।
*'' अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यतः।
:'' ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥
*'' ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति।
:'' रमते निंदया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति॥
*'' नैनान् स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूयति।
:'' एतान् दोषान् नरः प्राज्ञो बुध्येत् बुद्ध्वा विसर्जयेत्॥
: विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूरवचिह्न हैं-प्रथम तो वह ब्रह्मणोंसे द्वेष करता है, ब्रह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणेंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ-यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता। तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है, इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे।
*'' अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत।
:'' वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखन्यपि॥
*'' समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः।
:'' पुत्रेण च परिष्वङ्गः सन्निपातश्च मैथुने॥
*'' समये च प्रियालापः स्वयूथेषु समुन्नतिः।
:'' अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि॥
: भारत! मित्रोंसे समागम, अधिकधनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिङ्गन, मैथुनमें संलग्न होना, समपर प्रियवचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति, और जनसमाजमें सन्मान-ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं।
*'' अष्टौगुणाः पुरुषं दीपयन्ति
: प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
:'' पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
: दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
*'' नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्।
:'' क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स परःकविः॥
*'' दशधर्मं नजानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान्
: मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः कृद्धो बुभुक्षितः॥
*'' त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश।
:'' तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः॥
*'' यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं
: न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यात्।
:'' न मूर्च्छितः कटुकान्याह किंचित्
: प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि॥
: जो कभी उद्दण्डका-वेष नहीं बनता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघ भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यार बना लेते है।
*'' न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं
: न दर्पमरोहति नास्तमेति।
:'' न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं
: तमार्यशीलं परमाहुरार्याः॥
: जो शान्त हुई वैरके आग फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा ‘ विपत्तिमें पड़ा हूँ’ ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है।
*'' अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
:'' पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैव सुधन्वता॥
: इसी विषयमें असुरोंके राजा प्रह्लादने सुधन्वाके साथ अपने पुत्रके प्रति कूछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञलोग उस पुरातन इतहास उदाहरण देते हैं।
*'' यः काममन्यू प्रजहाति राजा
: पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च।
:'' विशेषविच्छृतवान् क्षिप्रकारी
: तं सर्वलेकः कुरुते प्रमाणम्॥
: जो राजा काम और क्रोधका त्यग करता है और सुपात्रको धन देता है, विशेषज्ञ है , शास्त्रोंका ज्ञाता और कर्तव्यको शीघ्र पूरा करनेवाला है, – के व्यवहार और वचनों) उस को सब लोग प्रमण मानते है।
*'' जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान्
: विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम्।
:'' जानाति मात्रां च तथा क्षमां च
: तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा॥
*'' सुदुर्बलं नावजानाति कंचिद्
: युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्।
:'' न विग्रहं रोचयते बलस्थैः
: काले च यो विक्रमते स धीरः॥
*'' न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग-
: माकारितः शंसति तत्त्वमेव।
:'' न मित्रार्थे रोचयते विवादं
: नापूजयति कुप्यति चाप्यमूढः॥
*'' न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च
: न दुर्बलः प्रतिभाव्यं करोति।
:'' नात्याह किंचित् क्षमते विवादं
: सर्वत्र तादृग् लभते प्रशंसाम्॥
: जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ,तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता , आदर न पाने पर क्रुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
*'' यो नोद्धतं कुरुते जातु वेष
: न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्
: न मूर्च्छितः कटुकान्याह किंचित्
: प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि॥
: जो कभी उद्दण्डका-वेष नहीं बनता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघ भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यार बना लेते है।
*'' न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं
: न दर्पमरोहति नास्तमेति।
:'' न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं
: तमार्यशीलं परमाहुरार्याः॥
: जो शान्त हुई वैरके आग फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा ‘ विपत्तिमें पड़ा हूँ’ ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है।
*'' न स्वेसुखे वै कुरुते प्रहर्षं
: नान्यस्य दुःखे भवति प्रहृष्टः।
:'' दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेऽनुतापं
: स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः॥
: जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरेके दुःखके समय हर्ष नहीं मानता, और दान देकर पश्चात्ताप नहीं करता, वह सज्जनोंमें सदाचारी कहलाता है।
*'' देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान्
: बुभूषते यः स परावरज्ञः।
:'' स यत्र तत्राभिगतः सदैव
: महाजनस्याधिपत्यं करोति॥
: जो मनुष्य देशके व्यवहार , अवसर तथा जातियोंके धर्मोंको तत्तवसे जानना चाहता है, उसे उत्तम-अथमका विवेक हो जाता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, सदा महान जनसमूह पर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है।
*'' दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं
: राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम्।
:'' मत्तोन्त्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं
: यः प्रज्ञावान् वर्जयेत् स प्रधानः॥
*'' दानं होमं दैवतं मङ्गलानि
: प्रायश्चित्तान् विधिवल्लोकवादान्।
:'' एतानि यः कुरुते नैत्यकानि
: तस्योत्थानं देवता राधयन्ती॥
*'' समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः
: समैः सख्यं व्यवहारं कथां च।
:'' गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति
: विपश्चितस्यस्य नयाः सुनीताः॥
: जो अपने बराबरवालोंके साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत करता है, हीन पुरुषोंके साथ नहीं और गुणोंमे बड़े-चड़े पुरुषोंको सदा आगे रहता है, उस विद्वानकी नीति श्रेष्ठ नीति है।
*'' मितं भुङ्क्ते संविभाज्याश्रितेभ्यो
: मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा।
:'' ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं-
: स्तमात्मवन्तं प्रजहन्त्यनर्थाः॥
*'' चिकीर्षितं विप्रकृत्यं च यस्य
: नान्ये जनाः कर्मजानन्ति किंचित्।
:'' मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च
: नाल्पोप्यस्य च्यवते कश्चिदर्थः॥
*'' यः सर्वभूत प्रशमे निविष्टः
: सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्धभावः।
:'' अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये
: महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः॥
: जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारसे ठीक ठीक जानता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञनमें दत्तचित्त रहता है, वह राज्यको प्रप्त करता है।
*'' य आत्मानाऽपत्रपते भृशं नरः
: स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत।
:'' अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः
: सतेजसा सूर्य इवावभासते॥
: सुमनसा, समाहितमनसा च सूर्य इव विराजते।: जो स्वयं ही अधिक लज्जा शील है, वह सब लोगोंमे श्रेष्ठ समझा जाता है । वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रतासे युक्त होनेके कारण कान्तिमें सूर्यके समान शोभा पाता है।
*'' वनेजाताः शापदग्धस्य राज्ञः।
:'' पाण्डोः पुत्राः पञ्चपञ्चेन्द्रकल्पाः।
:'' त्वयैव बाला वर्धिताः शिक्षिताश्च
: तवादेशं पालयन्त्याम्बिकेय॥
: अम्बिकानन्दन! (मृगरूपधारी किंदमऋषि के) शापसे दग्ध राजा पाण्डुके जो पाञ्च पुत्र वनमें उत्पन्न हुए, वे पाञ्च इन्द्रके समान शक्तिशाली है, उनहें आपने ही बचपनसे पाला और शिक्षा दी है, वे भी आपकी आज्ञाका पालन करते रहते है।
*'' प्रदायैषामुचितं तात राज्यं
: सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः।
:'' न देवानां नापि च मानुषाणां
: भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र॥
*'' तात! उन्हें उनका न्ययोचित राज्यभाग देकर आप अपने पुत्रेंके साथ आनन्दित होते हुए सुख भोगियें। नरेन्द्र! ऐसा करनेपर आप देवतओं तथा मनुष्येंकी आलोचनाके विषय नहीं रह जायँगे।
*'' जाग्रतो दह्यमानस्य यत् कार्यमनुपश्यति।
:'' तद् ब्रूहि त्वं नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि॥
: धृतराष्ट्र बोलें-तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जाग रहा हूँ। तुम मेरे करनेयोग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ, क्योंकी हमलोगोंमें तुमहीं धर्म और अर्थकी ज्ञनमें निपण हो।
*'' त्वं मां यथावद् विदुर प्रशाधि
: प्रज्ञापूर्वं सर्वमजातशत्रोः।
:'' यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व
: श्रेयस्करं ब्रहि तद् वै कुरूणाम्॥
: उदारचित्त विदौर! तुम अपनी बुद्धीसे विचारकरमुझे ठीक ठीक उपदेश करो। जो बात युधिष्ठिरके लिये हितकर और कौरवोंके लियेवकल्याणकारो समझो, वह सब अवश्य बताओ।
*'' पापशङ्की पापमेवानुपश्यन्
: पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम्।
:'' कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथाव-
: न्मनीषितं सर्वमजातशत्रोः॥
: विद्वन्! मेरे मनमें अनिष्टकी अंशका बनी रहती सै, इसलिए मैं सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ। अतः व्याकुलहृदयसे तुमसे पूछ रहा हूँ-अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, सो सब ठीक-ठीक बताओ।
*'' शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम्।
:'' अपृष्टस्तस्य तद् ब्रूयाद् यस्य नेच्छेत् पराभवम्॥
*'' विदुरजीने कहाँ-राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसके बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करनेवाली या अनिष्ट करनेवाली-जी भी बात हो, बात दे।
*'' तस्माद् वक्ष्यामि ते राजन् हितं यत्स्यात् कुरून् प्रति।
:'' वचः श्रेयस्करं धर्म्यं ब्रुवत स्तन्निबोध मे॥
*'' इसलिए राजन्! जिससे समस्त कौरवोंका हित हो, मैं वही बात आपसे कहूँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें।
*'' मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत।
:'' अनुपायप्रयुक्तानि मा स्म तेषु मनः कृथाः॥
: भारत! असत् उपायों( अन्यायपूर्वक युद्ध एवं द्यूत) आदिका प्रयोग करके जो कपटपूर्ण कार्य सिद्धि होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइए।
*'' तथैव योगविहितं यत् तु कर्म न सिद्ध्यति।
:'' उपाययुक्तं मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मनः॥
*'' अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु।
:'' सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्॥
: किसी प्रयोजनसे किये गये कर्मों में पहले प्रयोजनको समझ लेना चाहिये। खूब सोच विचारकर काम करना चाहिये, जलादबाजीसे किसी कामका आरम्भ नहीं करना चाहिये।
*'' अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम्।
:'' उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा॥
: धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंका प्रयोजन, परिणाम तथाव्पनी उन्नतीका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे।
*'' यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये।
:'' कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते॥
*'' यस्त्येतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति।
:'' युक्तो धर्मार्थयोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति॥
: जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारे ठीक – ठीक जामाता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञानमेव दत्तचित्त रस्ता है , वह राज्यको प्राप्तः करता है।
*'' न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम्।
:'' श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्॥
: ‘अब तो राज्य प्राप्त ही हो गया’–ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये।उद्दण्डता सम्पत्तिको उसी प्रकार नष्ट कर देती है , जैसे सुन्दर रूपको बुढापा।
*'' भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायशम्।
:'' लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते॥
: जैसे मछली बढ़िया खाद्य वस्तुसे ढकी हुई लोहेकी काँटीको लोभमें पड़कर निगल जाती है , उससे होनेवाले परिणाम परं विचारः नहीं करती(अतएव मर जाती है)
*'' यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
:'' हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता॥
: यद् भोक्तुं समर्थोऽस्ति तदेव तथा यत् परिणमते तदेव परिणामानन्तरं यद् हितं यच्छति तदेव भोक्तव्यम्।: अतः अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषो वहीं वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये,(जो परिणाममें अनिष्टकर न हो अर्थात्) जो खाने योग्य हो तथा खानी जा सकते , खाने (या ग्रहण करणे)-पर चक सके और पर जानेपर हितकारी हो।
*'' वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः।
:'' स नाप्नोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनस्यति॥
: जो पेड़से कच्चे फलोंको तोड़ता है, वह उन फलोंसेरस तो पाता नहीं, परंतु उस वृक्षके बीजका नाश हो जाता है।
*'' यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम्।
:'' फलाद्रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुनः॥
: परंतु जो समयपर पके हुए फलको ग्रहण करता है , वह उन फलोंसे रस पाता है और उस बीजसे पुनः फल प्राप्त करता है।
*'' यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः।
:'' तद्वदर्थान् मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया॥
: जैसे भैंरा फूलोंकी रक्षा करता हुआ ही उनके मधुका ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनोंको कष्ट दिये बिना ही उनसे धन ले।
*'' पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत्।
:'' मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः॥
*'' किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः।
:'' इति कर्माणि संचिन्त्य कुर्याद् वा पुरुषो न वा॥
: इसे करने मेरा क्या लाभ होगा और न करनेसे क्या हानि होगा-इस प्रकार कर्मोंके विषयमें भलीभाँति विचार करके फिर मनुष्य( कर्म ) करे या न करे।
*'' अनारभ्या भवन्त्यर्थाः केचिन्नित्यं तथागताः।
:'' कृतः पुरुषकारो हि भवेद्*येषु निरर्थकः॥
: जिस ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो नित्य अप्राप्त होनेके कारण आरम्भ करने योग्य नहीं होते, क्योंकी उनके लिए किया हुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है।
*'' प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः।
:'' न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्डं पतिमिव स्त्रियः॥
: जिसकी प्रसन्नताका कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है,हउसको प्रजा स्वमीबनना नहीं चाहती-जैसे स्त्री नपुंसकको पति नहीं बनाना चाहती।
*'' कांश्चिदर्थान् नरः प्राज्ञो लघुमूलान् महाफलान्।
:'' क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान्॥
: जिनका मूल (साधना)छोटा और फल महान् हो , बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्भ कर देताहै, वैसे काममें वह विघ्न नहीं आने देता।
*'' ऋजु पश्यति यःसर्वं चाक्षुषानुपिबन्निव।
:'' आसीनमपितूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः॥
: जो राजा इसी प्रकार प्रेमके साथ कोमल दृष्टिसे देखता है, वह चुपचाप बैठा भी रहे, तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है।
*'' सुपुष्पितः स्यादफलः फलितः स्याद् दुरारुहः।
:'' अपक्वःपक्वसंकाशो न तु शीर्येत कर्हिचित्॥
*'' चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।
:'' प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति ॥
: जो राजा नेत्र, मन, वाणी और कर्म-इन चारोंसे प्रजाको प्रसन्न करता है, उससी प्रजा प्रसन्न रहती है।
*'' यस्मात् त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगाइव।
:'' सागरान्तमपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते॥
: जैसे व्याधसे हरिण भयभीत होते हैं, उसी प्रकार जैसे समस्त प्राणी डरते है, वह समुद्रपर्यन्त पृथवीका राज्य पाकर भी प्रजाजनोंके द्वारा त्याग दिया जाता है।
*'' पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान् स्वेन कर्मणा।
:'' वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः॥
: अन्यायमें स्थित हुआ राजा बाप-दादोंका राज्य पाकर भी अपने कर्मोंसे उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसा हवा बादलको भिन्न भिन्न कर देती है।
*'' धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः।
:'' वसुधा वसुसंपूर्णा वर्धते भूतिवर्धिनी॥
: परम्परासे सज्जनपुरुषों द्वारा किये हुए धर्मका आचरण करनेवाले राज्यकी पृथ्वी धन-धान्यसे पूर्ण होकर उन्नतीकी प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्यको बढ़ाती है।
*'' अथ संत्यजतो धर्ममधर्मं चानुतिष्ठतः।
:'' प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा॥
*'' जो राजा धर्मको छोड़ता और अधर्मका अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आगपर रखे हुए चमड़ेकी भाँती संकुचित हो जाती है।
*'' य एव यत्नः क्रियते परराष्ट्रविमर्दने।
:'' स एव यत्नः कर्तव्यः स्वराष्ट्रपरिपालने॥
: दूसरेराष्ट्रोंका नाश करनेके लिये जिस प्रकारका प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकारकी तत्परता अपने राज्यकी रक्षाके लिये करना चाहिये।
*'' भूयासं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा।
:'' अथ या सुदुहा राजन् नैव तां वितुदन्त्यपि॥
: राजन्! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुहने देती है, वह बहुत क्लेश उठाति है। किन्तु जो आसानीसे दूध देते है, उसे लोग कष्ट नहीं देते।
*'' यदतप्तं प्रणमति न तत् संतापयन्त्यपि।
:'' यच्च स्वयं नतं दारु न तत् संनमयन्त्यपि॥
: जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उनहें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका हचता है, उसे कोई झुकानेका प्रयत्न नहीं करता।
* जो लोग अच्छे कार्य करते हैं उनके पास स्थाई लक्ष्मी आती है, यानी सही तरीके से कमाया गया धन ही हमारे पास टिकता है।
* जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन करना पड़े, शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
* ''आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।
: ''यमार्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: अर्थ : आत्मज्ञान, उद्योग, कष्ट सहने की सामर्थ्य और धर्म में स्थिरता, ये बातें जिसको 'अर्थ' (पुरुषार्थ) से नहीं भटका पातीं हैं वही पंडित कहलाता है। दूसरे शब्दों में, महात्मा विदुर का कहना है कि तमाम सदगुणों के बाद भी जो व्यक्ति अर्थ से विचलित नहीं होता है, उसे ही बुद्धिमान माना जा सकता है।
* परस्त्री का स्पर्श, पर धन का हरण, मित्रों का त्याग रूप यह तीनों दोष क्रमशः काम, लोभ, और क्रोध से उत्पन्न होते हैं।
* जो विश्वास का पात्र नहीं है, उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिए। पर जो विश्वास के योग्य है, उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
* संसार के छह सुख प्रमुख है- धन प्राप्ति, हमेशा स्वस्थ रहना, वश में रहने वाले पुत्र, प्रिय भार्या, प्रिय बोलने वाली भार्या और मनोरथ पूर्ण कराने वाली विद्या- अर्थात् इन छह से संसार में सुख उपलब्ध होता है।
* बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाए तो चैन से न बैठे, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
* क्षमा को दोष नहीं मानना चाहिए, निश्चय ही क्षमा परम बल है। क्षमा निर्बल मनुष्यों का गुण है और बलवानों का क्षमा भूषण है।
* ईर्ष्या, दूसरों से घृणा करने वाला, असंतुष्ट, क्रोध करने वाला, शंकालु और पराश्रित (दूसरों पर आश्रित रहने वाले) इन छह प्रकार के व्यक्ति सदा दुखी रहते हैं।
*जो पुरुष अच्छे कर्मों और पुरुषों में विश्वास नहीं रखता, गुरुजनों में भी स्वभाव से ही शंकित रहता है। किसी का विश्वास नहीं करता, मित्रों का परित्याग करता है... वह पुरुष निश्चय ही अधर्मी होता है।
* जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
* जो अपना आदर-सम्मान होने पर खुशी से फूल नहीं उठता और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगा जी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।
* मूढ़ चित वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाए ही अंदर चला आता है, बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वास करने योग्य नहीं हैं उन पर भी विश्वास कर लेता है।
* जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी इठलाता नहीं, वह पंडित कहलाता है।
* मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
* किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है किसी एक को भी मारे या न मारे, मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।
* विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं: राजन! जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, कुछ और नहीं, किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
* केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
* विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं : राजन! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं- शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देने वाला।
* ''त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
: (अर्थ : काम, क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, यानी दुखों की ओर जाने के मार्ग हैं। यह तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं, इसलिए इनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।
* भरतश्रेष्ठ! पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु-मनुष्य को इन पांच की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
* अच्छे कर्मो को अपनाना और बुरे कर्मों से दूर रहना साथ ही परमात्मा में विश्वास रखना और श्रद्धालु भी होना - ऐसे सद्गुण बुद्धिमान और पंडित होने का लक्षण है।
* क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दंडता, तथा स्वयं को पूज्य समझना - ये भाव जिस व्यक्ति को पुरुषार्थ के मार्ग (सन्मार्ग) से नहीं भटकाते वही बुद्धिमान या पंडित कहलाता है।
* जिस व्यक्ति के कर्त्तव्य, सलाह और पहले से लिए गए निर्णय को दूसरे लोग केवल काम संपन्न होने पर ही जान पाते हैं, वही पंडित कहलाता है।
* जिस व्यकित के कर्मों में न ही सर्दी और न ही गर्मी, न ही भय और न ही अनुराग, न ही संपत्ति और न ही दरिद्रता विघ्न डाल पाते हैं वही पण्डित कहलाता है।
* जिस व्यक्ति का निर्णय और बुद्धि धर्मं का अनुशरण करती है और जो भोग विलास ओ त्याग कर पुरुषार्थ को चुनता है वही पण्डित कहलाता है।
* ज्ञानी और बुद्धिमान पुरुष शक्ति के अनुसार काम करने के इच्छा रखते हैं और उसे पूरा भी करते हैं तथा किसी वस्तु को तुक्ष्य समझ कर उसकी अवहेलना नहीं करते हैं।
* जो व्यक्ति किसी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, उस विषय के बारे में धैर्य पूर्वक सुनते हैं, और अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से संपन्न करते हैं, तथा किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करते हैं वही पण्डित कहलाते हैं।
* बुद्धिमान तथा ज्ञानी लोग दुर्लभ वस्तुओं की कामना नहीं रखते, न ही खोयी हुए वस्तु के विषय में शोक करना चाहते हैं तथा विपत्ति की घडी में भी घबराते नहीं हैं।
* जो व्यक्ति पहले निश्चय करके रूप रेखा बनाकर काम को शुरू करता है तथा काम के बीच में कभी नहीं रुकता और समय को नहीं गँवाता और अपने मन को वश में किये रखता है वही पण्डित कहलाता है।
* हे भारत कुलभूषण (धृतराष्ट्र), ज्ञानी पुरुष हमेशा श्रेष्ठ कर्मों में रूचि रखते हैं, और उन्न्नति के लिए कार्य करते व प्रयासरत रहते हैं तथा भलाई करनेवालों में अवगुण नहीं निकालते हैं।
* जो अपना आदर-सम्मान होने पर भी फूला नहीं समाता, और अपमान होने पर भी दुखी व विचलित नहीं होता तथा गंगाजी के कुण्ड के समान जिसके मन को कोई दुख नहीं होता वह पण्डित कहलाता है।
* जो व्यक्ति प्रकृति के सभी पदार्थों का वास्तविक ज्ञान रखता है, सब कार्यों के करने का उचित ढंग जाननेवाला है तथा मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ उपायों का जानकार है वही मनुष्य पण्डित कहलाता है।
* जो निर्भीक होकर बात करता है , कई विषयों पर अच्छे से बात कर सकता है, तर्क-वितर्क में कुशल है, प्रतिभाशाली है और शाश्त्रों में लिखे गए बातों को शीघ्रता से समझ सकता है वही पण्डित कहलाता है।
* जिस व्यक्ति की विद्या या ज्ञान उसके बुद्धि का अनुशरण करती है और बुद्धि उसके ज्ञान का तथा जो भद्र पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता वही पण्डित की पदवी पा सकता है।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
* [https://dn721600.ca.archive.org/0/items/HindiBookVidurNeetiCompleteByGitaPress/Hindi%20Book-Vidur-Neeti%20%28Complete%29%20by%20Gita%20Press.pdf विदुर नीति]
hnuhiblm2ib0ye8myvy9c07ou3r0kd7
पण्डित
0
6373
32870
29875
2026-05-18T05:06:43Z
अनुनाद सिंह
658
32870
wikitext
text/x-wiki
* ''परिच्छेदो हि पाण्डित्यं यदापन्ना विपत्तयः।
: ''अपरिच्छेदकर्तॄणां विपदः स्युः पदे पदे॥'' -- हितोपदेश
: जब संकट आ जाते हैं तब परिच्छेद (अच्छी तरह से विश्लेषण करके तथा सोच समझकर काम करने) में ही पाण्डित्य है। बिना सोचे समझे काम करने वालों पर हर कदम पर संकट आते रहते हैं।
* ''को धर्मो भूतदया किं सौख्यं नित्यमरोगिता जगति ।
: ''कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥'' -- हितोपदेश १.१६१
: धर्म क्या है ? प्राणियों पर दया । संसार में सुख क्या है ? निरोग रहना । स्नेह क्या है ? सद्भाव अनुराग, प्रेम । पाण्डित्य क्या है? सत् असत् का विवेक । अर्थात्- उचित अनुचित का ठीक ठीक समझना ।
* ''शत दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम् ।
: ''विना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम् ॥'' -- हितोपदेश
: अपनी सैकड़ों की हानि करके भी विवाद न करे, यह ज्ञानी का लक्षण है। बिना करण के क्लह कर बैठना मूर्ख का लक्षण है।
* ''उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
:'' हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
: ''अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
: ''परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥'' -- हितोपदेश, सुहृद्भेद
: (यदि बात को) स्पष्ट रूप से कहा जाय तो उसे पशु भी समझ लेते हैं। घोड़े एवं हाथी जैसे पशु भी (स्पष्ट रूप से दिये गये आदेश को ) ग्रहण कर उसका पालन करते हैं। लेकिन पण्डित तो अनकही बात को भी समझ लेता है। दूसरे के संकेत मात्र को समझ लेना ही बुद्धि का फल है। अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति थोड़ा सा संकेत मिलने पर भी सारी बात समझ लेता है।
* ''शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरूषः स विद्वान् ।
: शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख बने रहते है। परन्तु जो क्रियाशील है वही सही अर्थ से विद्वान है ।
* ''झटिति पराशयवेदिनो हि विज्ञाः।'' (नैषधचरित ४.११८)
: अर्थ - विज्ञ जन झट दूसरे का मतलब समझ जाते हैं।
* ''देशाटनं पण्डितमित्रता च वाराङ्गना राजसभाप्रवेशः ।
: ''अनेकशास्त्रार्थविलोकनं च चातुर्यमूलानि भवन्ति पञ्च ॥
: देशाटन, बुद्धिमान से मैत्री, वारांगना (गणिका), राजसभा में प्रवेश, और शास्त्रों का परिशीलन – ये पाँच चतुराई के मूल है ।
* ''बालः पश्यति लिङ्गं मध्यम बुद्धि र्विचारयति वृत्तम् ।
: ''आगम तत्त्वं तु बुधः परीक्षते सर्वयत्नेन ॥'' -- षोडषप्रकरण
: जो बाह्य चिह्नों को देखता है, वह बालबुद्धि का है; जो वृत्ति का विचार करता है, वह मध्यम बुद्धि का है; और जो सर्वयत्न से आगम तत्त्व की परीक्षा करता है, वह बुध/ज्ञानी है ।
* ''आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः'' ।
: अर्थ - जो सारे प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पण्डित है।
* ''यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
: ''न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
: जो मनुष्य शक्ति के अनुसार इच्छा करते हैं, शक्ति के अनुकूल काम करते हैं और किसी का निरादर नहीं करते- वे मनुष्य पण्डित बुद्धि वाले होते हैं।
* काम, क्रोध, मद, लोभकी, जौ लौं मन में खान।
: तौं लौ पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान ॥ -- [[तुलसीदास]]
: काम, क्रोध, मद और लोभ की खान जब तक मन में है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों एक समान हैं।
* सुख दुख या संसार में , सब काहू को होय ।
: ज्ञानी काटै ज्ञान से , मूरख काटै रोय ॥
* अर्थ सत्य और असत्य का निर्णय करने वाला बुद्धि का जो स्वामी हो उसका नाम पण्डित है । -- अष्टाध्यायी 5/2/36
* ''विद्वान विपशचिद् दोषज्ञः सनसुधी कोविदो बुधः
: ''धीरो मनीषी ज्ञः प्राज्ञः संख्यावानपंडित कवि: ॥'' -- अमरकोष 2/7/5
: अर्थ - विद्वान, विपशचिद् दोषज्ञ (दोषों को जानने वाला) सन् साधु सुधी कोविद वेदों को जानने वाला बुध धीर मनीषी संख्यावान विचारशिल और कवि पंडित कहाते हैं।
* ''विद्याविनयसमपन्ने ब्राहाणे गवि हस्तिनि
:'' शुनि चैव शवपाके च पण्डिता समदर्शिनः॥'' -- गीता 5/18
: अर्थ जो लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राहमण में गौ और हाथी में कुत्ते और चंडाल में समान दृष्टि रखते हैं, वे ही पंडित हैं ।
== विदुरनीति के अनुसार पण्डित ==
*'' आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डितुच्यते॥
: अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग (समार्म्भ), दुःख सहने की शक्ति और धर्म में नित्यता - ये गुण जिस मनुष्य को [[पुरुषार्थ]] से दूर नहीं कर पाते हैं, वही पण्डित कहलाता है।
*'' निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
:'' अनास्तिकः श्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥
: जो अच्छे कर्मों का सेवन करता और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होने के लक्षण हैं।
*'' क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपने को पूज्य समझाना - ये भाव जिस को पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
:'' कृतमेवास्यजानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहले से किये हुए विचार को नहीं जानते , बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः।
:'' समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
: सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति-दरिद्रता- ये जिसके कार्य में विघ्न नहीं डालते , वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते।
:'' कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते॥
: जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थ का ही अनुसरण करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है, वहीं पण्डित कहलाता है।
*'' यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
:'' न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
: विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथाकिसी वस्तुको तुच्छ समझकरउसकी अवहेलना नहीं करते।
*'' क्षिप्रं विजानन्ति चिरं श्रुणोति
:'' विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।
:'' नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
:'' तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥
: विद्वान् पुरुष विषय को देर तक सुनाता है, किन्तु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धि से पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है- कामना से नहीं । विना पूछे दूसरे के विषय में व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका वह स्वभाव पण्डित की मुख्य पहचान है।
*'' नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।
:'' आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥
: पण्डितों जैसी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तु के विषय में शोक करना नहीं चाहते और विपत्ति में पड़कर घबराते नहीं हैं।
*'' निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
:'' अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डितउच्यते॥
: जो पहले निश्चय करके फिर कार्य का आरम्भ करता है, कार्य के बीच में नहीं रुकता, समय को व्यर्थ नहीं जाने देता, और चित्त को वश में रखता है।
*'' आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते।
:'' हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिताः भरतर्षभ॥
: भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठकर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं, तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते।
*'' न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
:'' गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो अपना आदर होने पर हर्ष के मारे फूल नहीं जाता, अनादर से संतप्त नहीं होता तथा गंगाजी के ह्रद (गहरे गर्त) – के सम्मान जिसके चित्त को क्षोषुभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है।
*'' तत्त्वज्ञः सर्वभूतानांयोगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
:'' उपायज्ञोमनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते॥
: जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों की वास्तविकता का ज्ञान रखनेवाला, सब कार्यों के करने का ढंग जानने वाला तथा मनुष्यों में सबसे बढ़कर उपाय का जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है।
*'' प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।
:'' आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पणडित उच्यते॥
: जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं , जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थ के तात्पर्य को शीघ्र बता सक्ता है, वह पण्डित कहलाता है।
*'' श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगाः।
:'' असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥
: जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है, और बुद्धि विद्या का, तथा जो शिष्ट पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नही करता, वही पण्डित की संज्ञा पा सकता है।
*'' अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।
:'' अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्यच्यते बुधैः॥
: विना पढ़े ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े -बड़े मनोरथ करने वाले और बिना काम किये ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पण्डित लोग मूर्ख कहते हैं।
*'' अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव च।
:'' विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नही चलता, वह पण्डित कहलाता है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[मूर्ख]] या मूढ़
74e2g7pfpaucy3shegrvzatuhh5ftjs
32871
32870
2026-05-18T05:13:30Z
अनुनाद सिंह
658
32871
wikitext
text/x-wiki
* ''परिच्छेदो हि पाण्डित्यं यदापन्ना विपत्तयः।
: ''अपरिच्छेदकर्तॄणां विपदः स्युः पदे पदे॥'' -- हितोपदेश
: जब संकट आ जाते हैं तब परिच्छेद (अच्छी तरह से विश्लेषण करके तथा सोच समझकर काम करने) में ही पाण्डित्य है। बिना सोचे समझे काम करने वालों पर हर कदम पर संकट आते रहते हैं।
* ''को धर्मो भूतदया किं सौख्यं नित्यमरोगिता जगति ।
: ''कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥'' -- हितोपदेश १.१६१
: धर्म क्या है ? प्राणियों पर दया । संसार में सुख क्या है ? निरोग रहना । स्नेह क्या है ? सद्भाव अनुराग, प्रेम । पाण्डित्य क्या है? सत् असत् का विवेक । अर्थात्- उचित अनुचित का ठीक ठीक समझना ।
* ''शत दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम् ।
: ''विना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम् ॥'' -- हितोपदेश
: अपनी सैकड़ों की हानि करके भी विवाद न करे, यह ज्ञानी का लक्षण है। बिना करण के क्लह कर बैठना मूर्ख का लक्षण है।
* ''उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
:'' हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
: ''अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
: ''परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥'' -- हितोपदेश, सुहृद्भेद
: (यदि बात को) स्पष्ट रूप से कहा जाय तो उसे पशु भी समझ लेते हैं। घोड़े एवं हाथी जैसे पशु भी (स्पष्ट रूप से दिये गये आदेश को ) ग्रहण कर उसका पालन करते हैं। लेकिन पण्डित तो अनकही बात को भी समझ लेता है। दूसरे के संकेत मात्र को समझ लेना ही बुद्धि का फल है। अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति थोड़ा सा संकेत मिलने पर भी सारी बात समझ लेता है।
* ''शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरूषः स विद्वान् ।
: शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख बने रहते है। परन्तु जो क्रियाशील है वही सही अर्थ से विद्वान है ।
* ''झटिति पराशयवेदिनो हि विज्ञाः।'' (नैषधचरित ४.११८)
: अर्थ - विज्ञ जन झट दूसरे का मतलब समझ जाते हैं।
* ''देशाटनं पण्डितमित्रता च वाराङ्गना राजसभाप्रवेशः ।
: ''अनेकशास्त्रार्थविलोकनं च चातुर्यमूलानि भवन्ति पञ्च ॥
: देशाटन, बुद्धिमान से मैत्री, वारांगना (गणिका), राजसभा में प्रवेश, और शास्त्रों का परिशीलन – ये पाँच चतुराई के मूल है ।
* ''बालः पश्यति लिङ्गं मध्यम बुद्धि र्विचारयति वृत्तम् ।
: ''आगम तत्त्वं तु बुधः परीक्षते सर्वयत्नेन ॥'' -- षोडषप्रकरण
: जो बाह्य चिह्नों को देखता है, वह बालबुद्धि का है; जो वृत्ति का विचार करता है, वह मध्यम बुद्धि का है; और जो सर्वयत्न से आगम तत्त्व की परीक्षा करता है, वह बुध/ज्ञानी है ।
* ''आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः'' ।
: अर्थ - जो सारे प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पण्डित है।
* ''यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
: ''न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥'' -- महाभारत (उद्योगपर्व) ; विष्णुधर्मोत्तरपुराण
: जो मनुष्य शक्ति के अनुसार इच्छा करते हैं, शक्ति के अनुकूल काम करते हैं और किसी का निरादर नहीं करते- वे मनुष्य पण्डित बुद्धि वाले होते हैं।
* काम, क्रोध, मद, लोभकी, जौ लौं मन में खान।
: तौं लौ पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान ॥ -- [[तुलसीदास]]
: काम, क्रोध, मद और लोभ की खान जब तक मन में है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों एक समान हैं।
* सुख दुख या संसार में , सब काहू को होय ।
: ज्ञानी काटै ज्ञान से , मूरख काटै रोय ॥
* अर्थ सत्य और असत्य का निर्णय करने वाला बुद्धि का जो स्वामी हो उसका नाम पण्डित है । -- अष्टाध्यायी 5/2/36
* ''विद्वान विपशचिद् दोषज्ञः सनसुधी कोविदो बुधः
: ''धीरो मनीषी ज्ञः प्राज्ञः संख्यावानपंडित कवि: ॥'' -- अमरकोष 2/7/5
: अर्थ - विद्वान, विपशचिद् दोषज्ञ (दोषों को जानने वाला) सन् साधु सुधी कोविद वेदों को जानने वाला बुध धीर मनीषी संख्यावान विचारशिल और कवि पंडित कहाते हैं।
* ''विद्याविनयसमपन्ने ब्राहाणे गवि हस्तिनि
:'' शुनि चैव शवपाके च पण्डिता समदर्शिनः॥'' -- गीता 5/18
: अर्थ जो लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राहमण में गौ और हाथी में कुत्ते और चंडाल में समान दृष्टि रखते हैं, वे ही पंडित हैं ।
== विदुरनीति के अनुसार पण्डित ==
*'' आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डितुच्यते॥
: अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग (समार्म्भ), दुःख सहने की शक्ति और धर्म में नित्यता - ये गुण जिस मनुष्य को [[पुरुषार्थ]] से दूर नहीं कर पाते हैं, वही पण्डित कहलाता है।
*'' निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
:'' अनास्तिकः श्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥
: जो अच्छे कर्मों का सेवन करता और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होने के लक्षण हैं।
*'' क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
:'' यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपने को पूज्य समझाना - ये भाव जिस को पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
:'' कृतमेवास्यजानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
: दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहले से किये हुए विचार को नहीं जानते , बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः।
:'' समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
: सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति-दरिद्रता- ये जिसके कार्य में विघ्न नहीं डालते , वही पण्डित कहलाता है।
*'' यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते।
:'' कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते॥
: जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थ का ही अनुसरण करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है, वहीं पण्डित कहलाता है।
*'' यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
:'' न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
: विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथाकिसी वस्तुको तुच्छ समझकरउसकी अवहेलना नहीं करते।
*'' क्षिप्रं विजानन्ति चिरं श्रुणोति
:'' विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।
:'' नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
:'' तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥
: विद्वान् पुरुष विषय को देर तक सुनाता है, किन्तु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धि से पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है- कामना से नहीं । विना पूछे दूसरे के विषय में व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका वह स्वभाव पण्डित की मुख्य पहचान है।
*'' नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।
:'' आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥
: पण्डितों जैसी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तु के विषय में शोक करना नहीं चाहते और विपत्ति में पड़कर घबराते नहीं हैं।
*'' निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
:'' अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डितउच्यते॥
: जो पहले निश्चय करके फिर कार्य का आरम्भ करता है, कार्य के बीच में नहीं रुकता, समय को व्यर्थ नहीं जाने देता, और चित्त को वश में रखता है।
*'' आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते।
:'' हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिताः भरतर्षभ॥
: भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठकर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं, तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते।
*'' न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
:'' गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो अपना आदर होने पर हर्ष के मारे फूल नहीं जाता, अनादर से संतप्त नहीं होता तथा गंगाजी के ह्रद (गहरे गर्त) – के सम्मान जिसके चित्त को क्षोषुभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है।
*'' तत्त्वज्ञः सर्वभूतानांयोगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
:'' उपायज्ञोमनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते॥
: जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों की वास्तविकता का ज्ञान रखनेवाला, सब कार्यों के करने का ढंग जानने वाला तथा मनुष्यों में सबसे बढ़कर उपाय का जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है।
*'' प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।
:'' आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पणडित उच्यते॥
: जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं , जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थ के तात्पर्य को शीघ्र बता सक्ता है, वह पण्डित कहलाता है।
*'' श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगाः।
:'' असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥
: जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है, और बुद्धि विद्या का, तथा जो शिष्ट पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नही करता, वही पण्डित की संज्ञा पा सकता है।
*'' अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।
:'' अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्यच्यते बुधैः॥
: विना पढ़े ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े -बड़े मनोरथ करने वाले और बिना काम किये ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पण्डित लोग मूर्ख कहते हैं।
*'' अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव च।
:'' विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते॥
: जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नही चलता, वह पण्डित कहलाता है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[मूर्ख]] या मूढ़
scuojtkladz7vqwb4w7nq5dloqpdltj
राजा भोज
0
9145
32866
32409
2026-05-18T03:02:24Z
अनुनाद सिंह
658
32866
wikitext
text/x-wiki
'''राजा भोज''' (राज्यकाल 1010 ई० – 1055 ई०) परमार राजवंश के राजा थे । उनका साम्राज्य मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में केन्द्रित था। उनकी राजधानी धारा-नगरी थी जो वर्तमान समय में 'धार' नाम से प्रसिद्ध है।
== उद्धरण ==
* मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।
: ''सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यांतकः।।
: ''अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते ।
: नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥'' -- भोज प्रबन्ध
: सतयुग के भूषण स्वरूप राजा मान्धाता चले गये, समुद्र पर पुल बाँध कर रावण को मारने वाले रामचन्द्रजी भी आज कहाँ है ? और युधिष्ठिर आदि जैसे राजा भी स्वर्ग को सिधार गए परन्तु यह पृथ्वी किसी के भी साथ नहीं गयी । हे राजन! लेकिन आपको देख के ये जान पड़ता है कि ये पृथ्वी आपके साथ जायेगी।
* ''प्रियो मेयो भवेन्मुर्खःसपुराहहिरस्तुमे ।।
: ''कुम्भकारोपि यो विद्धवान सतिष्ठतु पुरेमम ।।
: (राजा भोज का कहना था कि) अगर कोई मेरा प्यारा भी हो, लेकिन मूर्ख हो, तो वह मेरे राज्य में ना रहें, किंतु अगर कुम्हार भी हो, ओर वह विद्धवान हो, तो निःसंदेह मेरे राज्य में रहें।
== राजा भोज के बारे में उद्धरण ==
*'' अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
:'' पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
: आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।
जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -
* ''अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
: ''पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
: आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।
* ''काव्यं करोमि न हि चारुतरं करोमि
: ''यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
: ''भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
: ''हे साहसांक कवयामि वयामि यामि।
: हे राजन !! में काव्य करती हूं, लेकिन अत्युत्तम काव्य नही करती, में यत्न से कपड़े बुनकर अपनी जिविका चलाती हूँ, हे साहशांक महाराज, लेकिन में काव्य ओर जुलाहापन दोनो तरह की विद्या जानती हूं, क्या में आपके नगर में रहने लायक हूँ ??
: (महाराज भोज में उस कोलिन को 5 लाख रुपये दिए, ओर कहा ,की तुम ब्राह्मण से पांच गुणा ज़्यादा श्रेष्ठ हो !! )
* कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली !
12kabvfs75kl0721q1nvj8pawjnn1hm
32867
32866
2026-05-18T03:05:26Z
अनुनाद सिंह
658
32867
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:परमार भोज|राजा भोज]]''' (राज्यकाल 1010 ई० – 1055 ई०) परमार राजवंश के राजा थे । उनका साम्राज्य मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में केन्द्रित था। उनकी राजधानी धारा-नगरी थी जो वर्तमान समय में 'धार' नाम से प्रसिद्ध है।
== उद्धरण ==
* मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।
: ''सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यांतकः।।
: ''अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते ।
: नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥'' -- भोज प्रबन्ध
: सतयुग के भूषण स्वरूप राजा मान्धाता चले गये, समुद्र पर पुल बाँध कर रावण को मारने वाले रामचन्द्रजी भी आज कहाँ है ? और युधिष्ठिर आदि जैसे राजा भी स्वर्ग को सिधार गए परन्तु यह पृथ्वी किसी के भी साथ नहीं गयी । हे राजन! लेकिन आपको देख के ये जान पड़ता है कि ये पृथ्वी आपके साथ जायेगी।
* ''प्रियो मेयो भवेन्मुर्खःसपुराहहिरस्तुमे ।।
: ''कुम्भकारोपि यो विद्धवान सतिष्ठतु पुरेमम ।।
: (राजा भोज का कहना था कि) अगर कोई मेरा प्यारा भी हो, लेकिन मूर्ख हो, तो वह मेरे राज्य में ना रहें, किंतु अगर कुम्हार भी हो, ओर वह विद्धवान हो, तो निःसंदेह मेरे राज्य में रहें।
== राजा भोज के बारे में उद्धरण ==
*'' अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
:'' पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
: आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।
जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -
* ''अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
: ''पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
: आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।
* ''काव्यं करोमि न हि चारुतरं करोमि
: ''यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
: ''भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
: ''हे साहसांक कवयामि वयामि यामि।
: हे राजन !! में काव्य करती हूं, लेकिन अत्युत्तम काव्य नही करती, में यत्न से कपड़े बुनकर अपनी जिविका चलाती हूँ, हे साहशांक महाराज, लेकिन में काव्य ओर जुलाहापन दोनो तरह की विद्या जानती हूं, क्या में आपके नगर में रहने लायक हूँ ??
: (महाराज भोज में उस कोलिन को 5 लाख रुपये दिए, ओर कहा ,की तुम ब्राह्मण से पांच गुणा ज़्यादा श्रेष्ठ हो !! )
* कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली !
kvbg1ko52vyepmcwuo77pzn5tmpsdgs
32868
32867
2026-05-18T03:12:33Z
अनुनाद सिंह
658
/* उद्धरण */
32868
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:परमार भोज|राजा भोज]]''' (राज्यकाल 1010 ई० – 1055 ई०) परमार राजवंश के राजा थे । उनका साम्राज्य मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में केन्द्रित था। उनकी राजधानी धारा-नगरी थी जो वर्तमान समय में 'धार' नाम से प्रसिद्ध है।
== उद्धरण ==
* मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।
: ''सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यांतकः।।
: ''अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते ।
: नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥'' -- भोज प्रबन्ध (भोज द्वारा मुंज को लिखे पत्र में)
: सतयुग के भूषण स्वरूप राजा मान्धाता चले गये, समुद्र पर पुल बाँध कर रावण को मारने वाले रामचन्द्रजी भी आज कहाँ है ? और युधिष्ठिर आदि जैसे राजा भी स्वर्ग को सिधार गए परन्तु यह पृथ्वी किसी के भी साथ नहीं गयी । हे राजन! लेकिन आपको देख के ये जान पड़ता है कि ये पृथ्वी आपके साथ जायेगी।
* ''प्रियो मेयो भवेन्मुर्खःसपुराहहिरस्तुमे ।।
: ''कुम्भकारोपि यो विद्धवान सतिष्ठतु पुरेमम ।।
: (राजा भोज का कहना था कि) अगर कोई मेरा प्यारा भी हो, लेकिन मूर्ख हो, तो वह मेरे राज्य में ना रहें, किंतु अगर कुम्हार भी हो, ओर वह विद्धवान हो, तो निःसंदेह मेरे राज्य में रहें।
== राजा भोज के बारे में उद्धरण ==
*'' अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
:'' पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
: आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।
जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -
* ''अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
: ''पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
: आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।
* ''काव्यं करोमि न हि चारुतरं करोमि
: ''यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
: ''भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
: ''हे साहसांक कवयामि वयामि यामि।
: हे राजन !! में काव्य करती हूं, लेकिन अत्युत्तम काव्य नही करती, में यत्न से कपड़े बुनकर अपनी जिविका चलाती हूँ, हे साहशांक महाराज, लेकिन में काव्य ओर जुलाहापन दोनो तरह की विद्या जानती हूं, क्या में आपके नगर में रहने लायक हूँ ??
: (महाराज भोज में उस कोलिन को 5 लाख रुपये दिए, ओर कहा ,की तुम ब्राह्मण से पांच गुणा ज़्यादा श्रेष्ठ हो !! )
* कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली !
sl1xri8sgr2ue8ib9ursi51yy0jth86
32869
32868
2026-05-18T03:25:18Z
अनुनाद सिंह
658
/* राजा भोज के बारे में उद्धरण */
32869
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:परमार भोज|राजा भोज]]''' (राज्यकाल 1010 ई० – 1055 ई०) परमार राजवंश के राजा थे । उनका साम्राज्य मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में केन्द्रित था। उनकी राजधानी धारा-नगरी थी जो वर्तमान समय में 'धार' नाम से प्रसिद्ध है।
== उद्धरण ==
* मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।
: ''सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यांतकः।।
: ''अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते ।
: नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥'' -- भोज प्रबन्ध (भोज द्वारा मुंज को लिखे पत्र में)
: सतयुग के भूषण स्वरूप राजा मान्धाता चले गये, समुद्र पर पुल बाँध कर रावण को मारने वाले रामचन्द्रजी भी आज कहाँ है ? और युधिष्ठिर आदि जैसे राजा भी स्वर्ग को सिधार गए परन्तु यह पृथ्वी किसी के भी साथ नहीं गयी । हे राजन! लेकिन आपको देख के ये जान पड़ता है कि ये पृथ्वी आपके साथ जायेगी।
* ''प्रियो मेयो भवेन्मुर्खःसपुराहहिरस्तुमे ।।
: ''कुम्भकारोपि यो विद्धवान सतिष्ठतु पुरेमम ।।
: (राजा भोज का कहना था कि) अगर कोई मेरा प्यारा भी हो, लेकिन मूर्ख हो, तो वह मेरे राज्य में ना रहें, किंतु अगर कुम्हार भी हो, ओर वह विद्धवान हो, तो निःसंदेह मेरे राज्य में रहें।
== राजा भोज के बारे में उद्धरण ==
*'' अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
:'' पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
: आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।
जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -
* ''अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
: ''पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
: आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।
* ''काव्यं करोमि न हि चारुतरं करोमि
: ''यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
: ''भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
: ''हे साहसांक कवयामि वयामि यामि।
: हे राजन !! में काव्य करती हूं, लेकिन अत्युत्तम काव्य नही करती, में यत्न से कपड़े बुनकर अपनी जिविका चलाती हूँ, हे साहशांक महाराज, लेकिन में काव्य ओर जुलाहापन दोनो तरह की विद्या जानती हूं, क्या में आपके नगर में रहने लायक हूँ ??
: (महाराज भोज में उस कोलिन को 5 लाख रुपये दिए, ओर कहा ,की तुम ब्राह्मण से पांच गुणा ज़्यादा श्रेष्ठ हो !! )
* कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली !
* भारतीय राजाओं में परमार राजा भोज अद्धितीय है। उनकी राजधानी धारानगरी (धार) होने से घारेश्वर और राज्य का केन्द्र मालवा होने से मालवाधीश भी कहलाते थे। वे परम विद्धान, परम शक्तिशाली और सुयोग्य तथा लोकप्रिय राजा के रूप में अपने समय ही विख्यात हो गये थे। उनके ताम्रपत्र, शिलालेख तथा मुर्तिलेख प्राप्त होते है। अपने असामान्य कर्मो के कारण राजा भोज अपने युग में ही कथा कहानियां के नायक के रूप में प्रसिद्ध होने लगे थे। बाद में तो महाराज विक्रमादित्य के समान महाराज भोज भी भारत के ऐसे लोकनायक के रूप में मान्य हो गये कि उनकी कहानियाँ न केवल भारतीय जनता में, लोक में प्रसिद्ध हो गयी थी अपितु लंका, नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया सहित कई देशो में भी फैल गयी थी। मंगोली भाषा मे ‘अराजि बुजि’ पुस्तक राजा भोज सम्बन्धी है। राजा भोज की ‘चाणक्यमाणिक्य’ पुस्तक का एक तिब्बती रूप भी प्राप्त होता है। राजा भोज इतिहास पुरुष होते हुए भी मिथक पुरुष हो गये। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। वे अपने अपने युग के मित्र राजाओं के समान शत्रु राजाओं के भी अपने विविध वर्णी उदात्त गुणों के कारण आदर्श बन गये थे। यही नहीं सदियों तक परवर्ती अनेक राजा भी स्वयं को लघु भोजराज, अपर भोजराज, नव भोजराज आदि कहने में गौरव का अनुभव करते रहे है। राजा भोज के अभिलेख 1010 से 1034 ई. तक प्राप्त होते है। -- "राजा भोज" पुस्तक के लेखक एवं राजा भोज पर गहन शोध और अध्ययन कर चुके डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित
pwd18abfucgf376j9crodn536tfv6gy
सदस्य वार्ता:Manoj nath Jakhar
3
9254
32862
2026-05-17T17:41:57Z
Manoj nath Jakhar
5481
/* */
32862
wikitext
text/x-wiki
सभी इंसान हमेशा से बुरे नहीं होते है, कुछ लोग वक्त के साथ बुरे इसलिए भी बन जाते है क्योंकि लोगों द्वारा उनकी अच्छाई का नाजायज फायदा उठाया गया...!!
hpclz9cw2jueah1uczb4uf3gs84ceeb
सदस्य:Manoj nath Jakhar
2
9255
32865
2026-05-17T17:51:39Z
Manoj nath Jakhar
5481
"सभी इंसान हमेशा से बुरे नहीं होते है, कुछ लोग वक्त के साथ बुरे इसलिए भी बन जाते है क्योंकि लोगों द्वारा उनकी अच्छाई का नाजायज फायदा उठाया गया...!! लेखक मनोज नाथ जाखड़" के साथ नया पृष्ठ बनाया
32865
wikitext
text/x-wiki
सभी इंसान हमेशा से बुरे नहीं होते है, कुछ लोग वक्त के साथ बुरे इसलिए भी बन जाते है क्योंकि लोगों द्वारा उनकी अच्छाई का नाजायज फायदा उठाया गया...!!
लेखक मनोज नाथ जाखड़
447n32whrg3j2ahst862n75qde8k1n1
विदुरनीति
0
9256
32872
2026-05-18T05:25:20Z
अनुनाद सिंह
658
[[विदुर नीति]] को अनुप्रेषित
32872
wikitext
text/x-wiki
#पुनर्प्रेषित [[विदुर नीति]]
g95hc9s6l4beg2rbugb8l57bag7z8vc
गोवा इनक्विजीशन
0
9257
32874
2026-05-18T07:21:18Z
अनुनाद सिंह
658
"'''[[:w:गोवा इंक्विज़िशन|गोवा इनक्विजीशन]]''' भारत के गोवा में पुर्तगाल के शासन के समय अत्याचार करके मुख्यतः [[हिन्दू|हिन्दुओं]] को रोमन कैथोलिक बनाने का उपक्रम था। इस संस्थ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
32874
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:गोवा इंक्विज़िशन|गोवा इनक्विजीशन]]''' भारत के गोवा में पुर्तगाल के शासन के समय अत्याचार करके मुख्यतः [[हिन्दू|हिन्दुओं]] को रोमन कैथोलिक बनाने का उपक्रम था। इस संस्था के तहत औपनिवेशिक युग की पुर्तगाली सरकार और ईसाई पादरियों ने हिंदुओं, मुस्लिमों, बेने इजरायल, परिवर्तित ईसाइयों और नसरानियों को सताया और उनका दमन किया। इसे 1560 में स्थापित किया गया था, 1774-78 अवधि में इसपर कुछ हद तक अंकुश लगाया गया और अंत में 1820 में समाप्त कर दिया गया।
== उक्तियाँ ==
t028sqbp5h20hozs4igygug67u7vsv5