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मोहनदास करमचंद गांधी
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2026-07-18T01:20:16Z
अनुनाद सिंह
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[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== भाषा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रन्ता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==इन्हें भी देखें==
*[[महात्मा गांधी के विचार]]
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार (के बाद तक का भी
के शब्दों में)]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
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2026-07-18T01:43:29Z
अनुनाद सिंह
658
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wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== अंग्रेजी शिक्षा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
== हिन्दी ==
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रन्ता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==इन्हें भी देखें==
*[[महात्मा गांधी के विचार]]
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार (के बाद तक का भी
के शब्दों में)]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
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33051
2026-07-18T01:51:25Z
अनुनाद सिंह
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33052
wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== अंग्रेजी शिक्षा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
=== हिन्दी ===
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है।
* हिंदुस्तान के लिए [[देवनागरी लिपि]] का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
* हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
* अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
* राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रन्ता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==इन्हें भी देखें==
*[[महात्मा गांधी के विचार]]
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार (के बाद तक का भी
के शब्दों में)]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
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33056
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2026-07-18T02:13:10Z
अनुनाद सिंह
658
/* ज्ञान */
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wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== अंग्रेजी शिक्षा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
=== हिन्दी ===
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है।
* हिंदुस्तान के लिए [[देवनागरी लिपि]] का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
* हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
* अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
* राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==इन्हें भी देखें==
*[[महात्मा गांधी के विचार]]
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार (के बाद तक का भी
के शब्दों में)]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
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33057
33056
2026-07-18T02:19:14Z
अनुनाद सिंह
658
/* बाह्य सूत्र */
33057
wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== अंग्रेजी शिक्षा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
=== हिन्दी ===
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है।
* हिंदुस्तान के लिए [[देवनागरी लिपि]] का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
* हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
* अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
* राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==इन्हें भी देखें==
*[[महात्मा गांधी के विचार]]
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
ak2tbcqj442wjyspq03wqp7z00abco0
33058
33057
2026-07-18T02:19:49Z
अनुनाद सिंह
658
/* इन्हें भी देखें */
33058
wikitext
text/x-wiki
[[चित्र:Portrait Gandhi.jpg|अंगूठाकार|मोहनदास करमचंद गांधी]]
'''मोहनदास करमचन्द गांधी''' (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे। उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया।
==महात्मा गांधी की सूक्तियाँ==
=== अनुशासन ===
* अनुशासन केवल सैनिक के लिए नहीं होता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र के लिए होता है।
* अनुशासन के बिना न तो राष्ट्र, न ही कोई संस्था और न ही कोई परिवार चल सकता है। अनुशासन इन सबको बांधे रखता है और इनके प्रगति की सीढ़ी है।
* बाहरी दुनिया की तरह अपने मन और शरीर को भी अनुशासन में रखना चाहिए।
* किसी भी राष्ट्र का परिचय वहां के अनुशासित लोगो से पता चलता है।
* अनुशासन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के होते है। ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति के प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी होता है।
===अस्पृश्यता ===
* अगर आत्मा और इस्वर एक है तो फिर अछूत और अस्पृश्य कोई हो ही नहीं सकता है।
* अस्पृश्य वह है जो झूठ बोलता है और पाखंड करता हो।
* मै पूवर्जन्म की इच्छा नहीं रखता पर मुझे अगर फिर से जन्म लेना हो तो मै एक अछूत के घर जन्म लेना चाहूंगा, जिससे मै उनके कष्ट को बाँट सकूँ।
===खादी ===
* हिन्दुस्तान सबसे पहले अपनी पोशाक और भाषा को अपनाये।
* गांव की जरुरत की हर चीज़ गांव में ही बननी चाहिए। खादी इसकी पहली सीढ़ी है।
* खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक समानता और स्वतन्त्रा का आरंभ है।
=== डर और अभय ===
* जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है तो भय किसका और किसलिए।
* अभय रहने से मनुष्य का कोई भी, कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।
* बल तो निडरता में है, आपके शरीर से इसका कोई मतलब नहीं है।
* अगर इस शरीर से ममता छूट जाय तो आसानी से हम अभय को उपलब्ध हो जायेगे।
* जो भगवान पर विश्वास रखते है वे अभय हो जाते है।
* संसार में आधे से अधिक लोग इस लिए सफल नहीं हो पाते है। क्योकि उनमें साहस का संचार नहीं हो पता है और वे भयभीत हो जाते है।
===गलती ===
* हमें यह सोचने की ग़लती नहीं करनी चाहिए कि हम कभी भूल नहीं कर सकते है।
* ग़लती मान लेना, झाड़ू लगाने के समान है। यह गंदगी को बहारकर, सतह को साफ़ कर देता है।
* भूल करके आदमी सीखता तो है पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल ही करता जाय और कहे कि हम सीख रहे है।
* अपनी गलती से इन्सान बहुत कुछ सीख सकता है, बशर्ते वह इसके लिए तैयार हो।
* सच्चा मनुष्य वही है, जो अपनी ग़लती को मान ले और फिर उसे त्याग कर अपने में सुधार करे।
===गो-सेवा ===
* गाय जैसे निरीह और उपयोगी पशु का वध करना राष्ट्र के लिए आत्मधात के समान है।
* गो-सेवा करना अपने आप की सेवा करने के समान है।
* गाय हिन्दू-जीवन की अहिंसकता और सादगी का प्रतीक है।
=== असहयोग ===
* असहयोग एक बड़ा अस्त्र है। असहयोग का पालन तलवार की धार पर चलने के समान है।
* असहयोग कोई निष्क्रिय (आलसी) की स्थिति नहीं है बल्कि एक सक्रिय स्थिति है। यह हिंसा से कही अधिक क्रियाशील है।
* मैं काम करने के तरीकों, पद्धतियों और प्रणालियो से असहयोग करता हु, न की मनुष्य से।
* असहयोग में तो इतनी शक्ति है की छोटी से छोटी इकाइयो (परिवार) को भी भंग कर सकता है।
===चिन्ता ===
* चिंता एक डायन है जो शरीर को खा जाती है।
* चिंता मुक्ति पूर्ण समपर्ण से संभव है।
* चिंता मनुष्य की शक्तियो को शून्य कर देती है, इसलिए इसे त्याग देना चाहिए।
===तपस्या ===
* तप से संसार बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
* तप के बिना त्याग अधूरा ही रहता है।
* तप से मनुष्य मन के उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
=== अहिंसा ===
* उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है जिसके बनाने की शक्ति हम में न हो।
* अहिंसा का नियम है कि मर्यादा पर कायम रहना चाहिए। कभी भी अभिमान नहीं करनी चाहिए और हमेशा नर्म रहना चाहिए।
* अहिंसा प्रेम की पराकाष्ठा है।
* जहां अहिंसा है, वहां धीरज, भीतरी शांति, भले बुरे का ज्ञान और जानकारी भी है।
* अहिंसा निर्बल और डरपोक का नहीं, वीर का धर्म है।
* किसी को कभी भी नहीं मारना और किसी को कभी नहीं सताना ही अहिंसा है।
* अहिंसा में इतनी ताकत है कि यह आपके विरोधियों को भी मित्र बना लेती है।
* अहिंसा और कायरता परस्पर विरोधी शब्द है।
* जहां दया नहीं वहां अहिंसा नहीं हो सकती है। जितना ज्यादा दया होगी उतनी ज्यादा अहिंसा होगा।
* बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव है।
* जो अहिंसा पर अंत तक डटा रहेगा, उसकी विजय निश्चित है।
* हिंसा का परिणाम जल्दी आता है जबकि अहिंसा का परिणाम देर से आता है।
* कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकता; क्षमा करना ताकतवर की पहचान है।
===उपवास ===
* उपवास का धमकी के रूप में उपयोग करना बुरा है।
* उपवास तो आखरी हथियार है वह अपनी या दूसरों की तलवार की जगह लेता है।
* उपवास शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक सहयोग है।
===किसान ===
* अगर भारत को शांतिपूर्ण सच्ची प्रगति करनी है तो पैसे वाले यह समझ ले कि किसानों में ही भारत की आत्मा बसती है।
* किसानों का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह न तो घर का रहेगा न घाट का।
* किसान देश की रीढ़ की हड्डी है; उसकी उन्नति ही भारत की उन्नति है।
* कृषि केवल आजीविका नहीं, एक साधना है, यह धरती माँ से हमारा सीधा संबंध है।
=== आहार ===
* आहार संतुलित और विवेकपूर्ण हो तो शरीर में कोई रोग हो ही नहीं सकता है।
* आहार शरीर के लिए है न कि शरीर आहार के लिए।
* पशु-पक्षी स्वाद के लिए भोजन नहीं करते है, न ही वे इतना खाते कि पेट फटने लगे। वे भोजन को स्वयं नहीं पकाते है । प्रकृति जैसा देती है वैसे ग्रहण कर लेते है।
* संसार में जितने लोग भूख से नहीं मरते उससे ज्यादा लोग अधिक भोजन करने से मरते है।
* इंसान की शारीरिक बनावट देखने से यह पता चलता है प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया है।
* अगर हम आहार विवेकपूर्ण नहीं करेंगे तो हममें और पशु में कोई अंतर नहीं है।
* जब तक आहार में स्वाद की प्रधानता रहेगी तब तक उसमे सात्विकता आ ही नहीं सकता है।
* "आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाएं।"
* जहाँ प्रेम है, वहाँ जीवन है।
* स्वयं को पाने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो देना।
* हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं, हमारे शब्द कर्म बनते हैं, और कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं।
* जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वह दुनिया को जीत सकता है।
===शिक्षा ===
* मै उच्च शिक्षा उसी को कहूंगा जिसे पाकर इन्सान विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्यतत्पर बन जाय।
===क्रांति ===
* क्रन्तिकारी की प्रशंसा मै तभी करूँगा, यदि वह अहिंसक है।
* क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने और सुधारने के लिए आती है।
=== ईश्वर ===
* मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।
* जिसको ईश्वर बचाना चाहता है, उसे कौन मिटा सकता है।
* जिस ईश्वर ने अपने लाखों लोगों की सहायता की है, वह क्या तुम्हें छोड़ देगा।
* ईश्वर की इस दुनियाँ में कहीं भी सदा रात नहीं रहती है।
* जब तक ईश्वर हमारी रक्षा करता है, मारनेवाला कितना भी बलवान हो, हमें मार नहीं सकता।
* हम सोते है तब भी ईश्वर हमारी चौकीदारी करता है। फिर हम क्यों डरे?
* जो ईश्वर में विश्वास रखता है, वह बीमारी का भी सद्पयोग कर लेता है। वह बीमारी से कभी नहीं हारता है।
* जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
* मै मानवता की सेवा के माध्यम से ही ईश्वर का साक्षात्कार का प्रयास कर रहा हु। क्योकि मै जानता हुं कि ईश्वर न तो स्वर्ग में है और न ही पाताल में है, वह हर किसी के दिल में मौजूद है।
===गीता ===
* गीता तो रत्नों की खान है।
* मन पर निंयत्रण करना सबसे कठिन काम है। इसके लिए उत्तम उपाय गीता का अध्ययन करना है।
* अगर मुझे संसार की एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक चुनना हो तो मै गीता को चुनुँगा।
===देशभक्ति ===
* देशभक्ति मनुष्य का पहला गुण है। इसके बिना वह दुनियाँ में सिर उठाकर नहीं चल सकता।
* दुनिया में देशभक्तो ने आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया है।
=== क्रोध ===
* क्रोध से बदले की भावना बढ़ती है और उसके भयंकर परिणाम होते है।
* क्रोध पाप का मूल कारण है।
* हम जन्तुओ को तो मार डालते है पर अपने सीने में छिपे क्रोध को नहीं मारते, जो सचमुच मारने की चीज़ है।
* क्रोध को जीतने में ही सच्ची मर्दानगी है।
* क्रोध ख़ुद को तो जलाता ही है आसपास के संबद्ध लोगो भी पीड़ित कर देता है।
* क्रोध एक प्रकार का रोग है जिसे क्षणिक पागलपन भी कह सकते है।
* क्रोध के बिना मनुष्य देवता के सामान है।
===नवयुवकों ===
* देश के युवक अगर चाहें तो वे बड़े से बड़े सत्कार्य आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
* युवकों को अपने जोश का उपयोग होश के साथ करना चाहिए।
===नियमितता ===
* अगर कोई मनुष्य अपना काम नियमित रूप से नहीं करता है, तो उसे सफ़लता नहीं मिल सकती।
* नियमितता सफलता की जननी है।
* नियमितता जीवन की एक कसौटी है।
* बूंद-बूंद से तालाब इसलिए भरता है क्योकि यह काम नियमित रूप से होता है।
* नियमितता के द्वारा मनुष्य बड़े से बड़ा सम्पन्न कर सकता है।
=== चरखा ===
* चरखा भारत की आर्थिक आज़ादी का प्रतीक है।
* चरखे के बिना दूसरे उद्योग नहीं चल सकते है, वैसे ही जैसे यदि सूरज डूब जाए तो दूसरे ग्रह भी डूब जायेगे।
* चरखा तो लंगड़े की लाठी है।
* चरखा अहिंसा का प्रतीक है।
* खेती किसान का धड़ है और चरखा हाथ-पैर।
* मेरे लिए चरखे से अधिक प्रिय वस्तु कोई नहीं है।
===चरित्र-निर्माण ===
* चरित्र की संपत्ति दुनिया की सारी दौलत से बढ़कर है।
* चरित्र की रक्षा किसी भी मूल्य पर होनी चाहिए।
* चरित्र की सीढ़ी है सदाचरण।
* चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है।
* वयक्ति के चरित्र से ही राष्ट्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।
* शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में वृद्धि हो और ऊंचे उदेश्यों के प्रति लगन जागे।
===धर्म ===
* धर्म की परीक्षा दुःख में ही होती है।
* जो धर्म सत्य और अहिंसा का विरोधी है, वह धर्म नहीं है।
* धर्म तो उत्कृठ श्रद्धा का नाम है।
* संकट के समय धर्म ही मनुष्य को उबार सकता है।
* धर्म भगवान तक पहुँचने का सेतु है।
* धर्महीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
=== प्रार्थना ===
* प्रार्थना जीभ से नहीं होता है, ह्रदय से होता है। जो गूंगे और मूढ़ है, वे भी प्रार्थना कर सकते है।
* प्रार्थना धर्म का प्राण और सार है।
* प्रार्थना के बिना भीतरी शांति नहीं मिल सकती है।
* प्रार्थना अपनी योग्यता और दुर्बलता को स्वीकार करना है।
* प्रार्थना आत्मा की खुराक है।
* प्रार्थना में असीम शक्ति है।
* प्रार्थना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।
* प्रार्थना तभी प्रार्थना है, जब वह अपने आप से निकलती है।
* प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है।
* मै अपना कोई काम, बिना प्रार्थना किये नहीं करता हु।
* प्रार्थना आत्मशुद्धि का सहज और सरल साधन है।
* मुझे शांति और सफलता प्रार्थना के द्वारा ही मिली है।
* प्रार्थना में तल्लीन हो जाना ही असली उपासना है।
===नम्रता ===
* नम्रता से मनुष्य के ऐसे बहुत से काम बन सकते है, जो कठोरता से नहीं होते है।
* नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
* नम्रता अहिंसा का ही हिस्सा है।
* नम्रता के पीछे स्वार्थ हो तो वह एक ढोंग है।
===पुस्तकें ===
* पुस्तकों का मूल्य रत्नो से भी अधिक है। क्योकि बाहरी चमक-दमक दिखाते है जबकि पुस्तकें अंतकरण को प्रकाशित है।
* कुछ पुस्तकें मेरे जीवन के लिए मार्गदर्शिका बन गई, उनमे से एक एमर्सन की “अंटू डी लॉस्ट” है।
* गीता का मेर ऊपर काफी प्रभाव रहा है।
* मेरे लिए तुलसी दास की रामायण भक्तिरस का बेस्ट ग्रन्थ है।
=== प्रेम ===
* जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।
* जहां प्रेम है, वहां डर का स्थान कहां ?
* प्रेम की गंथि से ही जगत बंधा हुआ है।
* प्रेम जैसी पवित्र चीज संसार में कोई और नहीं है।
* प्रेम बारे में मेरा मानना यह है कि प्रेम फूल से भी कोमल और व्रज से ज्यादा कठोर होता है।
===ब्रह्मचर्य ===
* ब्रह्मचर्य का ठीक मतलब ब्रह्म की खोज है और यह खोज इंद्रियों के सम्पूर्ण संयम के बिना असंभव है।
* ब्रह्मचर्य भी अन्य व्रतों के समान ही सत्य से निकलता है।
* अहिंसा का पूरा पालन ब्रह्मचर्य के बिना नामुमकिन है।
* ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।
* ब्रह्मचारी को जीने के लिए ही खाना चाहिए।
* ब्रह्मचर्य जीवन की पहली सीढ़ी है। इसके बिना आदमी शिखर तक नहीं पहुंच सकता है।
===माता-पिता ===
* माता-पिता कभी संतान का बुरा नहीं चाहते है इसलिए उनके बातो की कद्र करना चाहिए।
* माता-पिता की सेवा पुत्र का प्रथम कर्तव्य है।
* माता-पिता का ऋण संतान जिंदगी भर चूका नहीं सकता है।
* संतान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और पूजनीय है।
=== बुद्धि ===
* बुद्धि के बिना मनुष्य अपंग के समान है।
* पहला ह्रदय है उसके बाद बुद्धि है।
* जिसमे शुद्ध श्रद्धा है उसकी बुद्धि तेजस्वी होगी।
* जो बुद्धि के परे है वहां श्रद्धा काम आती है।
* बुद्धि तो ह्रदय की दासी है।
* जिसमे बुद्धि नहीं है, उसमे बल नहीं है।
* बुद्धि का दुरुपयोग हुआ तो दुनियाँ में बहुत सारे अनर्थ हो सकते हैं।
* आप जो बदलाव दुनिया में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लाइए।
===मौन ===
* मौन से कलह का नाश होता है।
* जहां तक हो सके वहां तक मौन ही रहना चाहिए। कभी भी एक भी शब्द बेकार नहीं बोलना चाहिए।
* बोलना एक सुन्दर कला है लेकिन मौन उससे भी ऊंची कला है।
* मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
===लड़ाई ===
* लड़ाई विनाश की जड़ है।
* लड़ाई चाहें दो व्यक्तियो के बीच हो या दो राष्ट्रों के बीच में हो, उसकी तह में बर्बादी ही छिपा रहता है।
* लड़ाई ने बड़े-बड़े राष्ट्रों के नामोनिशान मिटा देता है।
* लड़ाई सभी उपद्रवों की जननी है।
* लड़ाई मनुष्य की सबसे बरी शत्रु है।
=== मृत्यु ===
* जिंदगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलु है। बिना उथल-पुथल के जीवन किस काम का।
* मनुष्य के विकास के लिए जीवन जितनी ही मृत्यु का होना आवश्यक है।
* मौत ईश्वर की अमर देंन है।
* मौत कभी टाली नहीं जा सकती है, वह तो हमारा मित्र है।
* मृत्यु जीवन की जननी है।
* मृत्यु केवल निद्रा और विस्मृति है।
* मृत्यु जीवन की माँ है।
* मृत्यु हमारी जीवन संगिनी है, वह हमें नवजीवन का उपहार भी दे जाती है।
===विद्यार्थी ===
* विद्यार्थी को आलस्य से दूर रहना चाहिए।
* विद्यार्थी भविष्य की आशा है।
* विद्यार्थी अपने अंदर सेवा भाव विकसित करे।
* विद्यार्थी-जीवन में पान, सिगरेट या शराब की आदत डालना आत्मघात के सामान है।
* विद्यार्थी खादी पहने और स्वदेशी वस्तु का ही उपयोग करे।
* विद्यार्थी को किसी न किसी महान व्यक्ति को अपने जीवन का आदर्श बनाए।
===विश्वास ===
* विश्वास से पहाड़ भी हिल सकता है।
* अपना विश्वास कभी मत खोइए। उसे हमेशा बनाये रखे।
* विश्वास के बिना मनुष्य उस बूंद के समान है जो समुद्र से अलग हो चुका है, जिसका नष्ट होना निश्चित है।
* विश्वास के बिना कोई भी भी व्यवहार और व्यापार नही चल सकता है।
===शिक्षा ===
* जिस शिक्षा से आर्थिक, समाजिक और आध्यत्मिक मुक्ति मिलती है, वही वास्तविक शिक्षा है।
* शिक्षा एक योग है।
* शिक्षा का उदेश्य आत्मोन्नती होनी चाहिए।
* संगीत के बिना शिक्षा अधूरी है।
* शिक्षा का विषय चरित्र का निर्माण करना है।
* शिक्षा के बिना मानव मस्तिष्क का विकास नहीं सकता है।
* शिक्षा ऊंचा गुण है, लेकिन चरित्र उससे ऊपर है।
* हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमें सेवा, चरित्र और आत्म-नियंत्रण सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
===व्रत और संयम ===
* कोई भी प्रतिज्ञा करना या व्रत करना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं।
* संयम के बिना व्रत असंभव है। संयम से व्रत पूरा करने बल मिलता है।
* जो मनुष्य मन से दुर्बल होता है वह संयम का पालन नहीं कर पाता है लेकिन जिसके मन में लगन हो, वह अभ्यास से संयम-पालन सीख लेता है।
===विवाह ===
* विवाह दो वयक्तियों का आधात्मिक और शारीरिक मिलन है।
* विवाह की उपेछा नहीं करनी चाहिए, उसे जीवन में उचित स्थान देना चाहिए।
* विवाह की जिम्मेदारियों से भागना कायर का काम है।
===सत्य ===
* सत्य ही ईश्वर है।
* पृथ्वी सत्य पर टिकी हुई है।
* अगर सम्पूर्ण सत्य का पालन किया जाय, तो क्या नहीं हो सकता है।
* अगर हमारे जीवन में सच्चाई है, तो यह लोगों को प्रभावित करेगा।
* सत्य एक विशाल वृक्ष है। जिसकी जैसे-जैसे सेवा की जाती है वैसे-वैसे उसमें अनेक फल आते हुए दिखाई देते है।
* सत्य के पालन में ही शांति है।
* सत्य ही धर्म की सच्ची प्रतिष्ठा है।
* सत्य न होता तो यह जगत भी न होता।
* अपने आप को जान लेना सत्य को पहचानना है।
===व्यायाम ===
* व्यायाम, शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है जितना हवा, पानी और भोजन।
* व्यायाम शारीरिक स्वास्थ की कुंजी है।
* व्यायाम के बिना दिमाग वैसे ही कमजोर पड़ जाता हैं, शरीर।
* तंदुरुस्त दिमाग का तंदुरुस्त शरीर में होना ही निरोगता है।
* शारीरिक और मानसिक व्यायाम एक सीमा के अंदर करना चाहिए।
===शाकाहार ===
* शाकाहार से हमारे अंदर हिंसात्मक विचार नहीं आते।
* शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्धजीवी बनाता है।
* शाकाहार एक स्वाभाविक वृति है।
===सत्याग्रह ===
* सत्याग्रह बल-प्रयोग के बिलकुल विपरीत है। हिंसा के पूर्ण त्याग से ही सत्याग्रह की कल्पना की जा सकती है।
* सत्याग्रह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
* सत्याग्रह करने से पहले मनुष्य को बहुत-सी तैयारियां करनी पडती है जिन्हे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
* मेरा विश्वास है कि सत्याग्रह एक दिन विश्व शक्ति बन जायेगा।
* मैंने बहुत सारे प्रयोग के बाद जिन दो अस्त्रों को पाया है, वह है सत्याग्रह और असहयोग।
===शांति ===
* शांति बाहर की किसी चीज़ से नहीं मिलती। वह आंतरिक है।
* शांति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य का वृतियों पर नियंत्रण हो।
* अपनी आवश्यकताए कम करके आप वास्तविक शांति प्राप्त कर सकते है।
* संसार की उथल-पुथल में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति को क़ायम रख सके, वही सच्चा पुरुष है।
===श्रद्धा ===
* जिसके पास श्रद्धा है उनके कंधों से सारी चिंताएं मिट जाती है।
* जहां श्रद्धा नहीं, वहां धर्म नहीं। धर्म के मूल में श्रद्धा ही है।
* श्रद्धा का अर्थ है आत्म्विश्वास, और आत्म्विश्वास का अर्थ है ईश्वर पर विश्वास।
* श्रद्धा की कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करने के बाद जो भी भला या बुरा होता है, उसे इन्सान स्वीकार कर ले।
* श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है।
* श्रद्धावान वही है जो कठिन परिस्तितियों में भी डिगे नहीं।
===स्वदेशी ===
* किसी भी भारतीय को स्वदेशी वस्तु के उपयोग के लिए उपदेश देना पड़े तो यह उसके लिए शर्म की बात है।
* स्वदेशी वही है जो शुद्ध स्वदेशी हो।
* स्वदेशी-व्रत निर्वाह तभी हो सकता है। जब विदेशी चीज़ का इस्तमाल न किया जाय।
* स्वदेशी की भावना संसार के सभी स्वतंत्र देशों में है।
* खादी केवल वस्त्र नहीं, यह आत्मनिर्भरता का प्रतीक है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1935)
=== अंग्रेजी शिक्षा ===
* अंग्रेजी शिक्षा ‘बेहद गंभीर बुराई’ है। -- 1921 में उड़ीसा में एक भाषण में
* बाल गंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, यदि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी ना लगी होती।
* शंकर जो काम अकेले कर गये, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी फौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरू गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे। क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरूनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की।…अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
* मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढ़ंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है, इससे भारतीय विद्यार्थियों की मानसिक सामर्थ्य पर बहुत जबर्दस्त दबाव पड़ा है। भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर देना ब्रिटिश संबंधों का सबसे दुखद अध्याय रहा है। -- गांधी जी के एक मित्र द्वारा उड़ीसा की उक्त बातचीत को स्पष्ट करने के आग्रह पर गांधीजी का स्पष्टीकरण
* राम मोहन राय और भी बड़े सुधारक हो सकते थे और लोकमान्य तिलक और बड़े विद्वान हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी में चिंतन करने और अपने विचारों को मुख्य रूप से अंग्रेजी में व्यक्त करने की मजबूरी नहीं होती। वो तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्रता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा पद्धति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है।
=== हिन्दी ===
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है।
* हिंदुस्तान के लिए [[देवनागरी लिपि]] का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
* हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
* अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
* राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।
===सफाई ===
* अपना शरीर, भोजन और पानी के साथ-साथ अपने आसपास के स्थानों को भी साफ़ रखें।
* भगवान के बाद सफाई ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
* जिसमे सफाई नहीं, उसके साथ कोई नहीं रहना चाहता।
* स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक ज़रूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1947)
===सेवा ===
* सेवा तो मूक होना चाहिए, उसका ढ़िढोरा पीटना चाहिए।
* दृश्य ईश्वर क्या है? – ग़रीब की सेवा।
* जो सेवा करेंगे उनका पतन नहीं हो सकता है।
* मुझे सेवा धर्म प्रिय है।
* सेवा का भी मोह हो सकता है। मोह भाव छोड़कर ही सच्ची सेवा की जा सकती है।
* संसार में सेवा से बढ़कर मनुष्य को द्रवित करने वाली कोई और चीज़ नहीं है।
===स्त्री ===
* स्त्री को अबला कहना उसका अपमान है।
* स्त्री अहिंसा मूर्ति है।
* स्त्री अगर निर्भय हुई तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
* स्त्री साक्षात् त्याग है।
* स्त्री पुरुष की ग़ुलाम नहीं बल्कि सहधर्मणि, अर्धनगिनी और मित्र है।
* स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक है।
* किसी भी पुरुष का पर स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
* भारत के धर्म और संस्कृति को स्त्रीयों ने टिका रखा है।
* स्त्री चाहें तो संसार को आनंदमय बना सकती है।
* जब तक स्त्री और पुरुष समान अधिकारों में नहीं होते, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है (स्रोत: हरिजन, महात्मा गांधी, 1940)
===स्वास्थ्य ===
* अगर स्वास्थ्य ठीक रखना है तो नियमित और सादा आहार ले और नशीली चीजों से दूर रहे।
* शरीर संसार का एक छोटा सा नमूना है।
* शरीर का निरोग और दीर्घायु होना विषय-रहित परिणाम है।
* स्वस्थ वही है जो बिना थकान के दिन-भर शारीरिक और मानसिक मेहनत कर सके।
* शरीर के स्वस्थ होने का मतलब यह है कि मनुष्य की इंद्रिया और मन भी स्वस्थ हो।
* अच्छे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हचर्य का पालन बहुत जरुरी है।
* हमें यह शरीर इसलिए मिला है कि हम इसे भगवान की सेवा में लगाएं। हमारा यह फर्ज़ है कि हम इसे शुद्ध और स्वस्थ रखें। जब समय आये इसे उसी भांति शुद्ध रूप में लौटा सके।
===हरिजन ===
* इसे मै अच्छा संकेत मानता हु कि हरिजन खुद जाग गये है।
* केवल जन्म के कारण किसी मनुष्य अछूत नहीं माना जा सकता है।
* अछूतो को अल्पमत नहीं माना जा सकता।
* हरिजनों को खूब जोश के साथ अपने अंदर सुधार करना चाहिए जिससे किसी को यह कहने का हक़ न रहे कि उसके अंदर यह बुराई है।
===ज्ञान ===
* ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
* बिना ज्ञान के सही स्वन्त्रता नहीं मिलती।
* ज्ञान ही प्रकाश है। उसके बिना हम एक कदम भी नहीं चल सकते है।
* जो ज्ञान केवल दिमाग में ही रह जाता है और हृदय में प्रवेश नहीं नहीं कर पाता है। वह जीवन के अनुभव में व्यर्थ सिद्ध होता है।
* सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा को शुद्ध करे और सेवा के योग्य बनाए।
* ज्ञान बिना चरित्र के, समाज के लिए एक खतरा बन सकता है।
=== विविध ===
* वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रह और परदेशी बन गये ?
* कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।
* उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ ८१)
* सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५६)
* एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १५९)
* मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १८०)
* चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २५७)
* अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३६७)
* सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं- -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २४३)
* अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २५१)
* नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ २५२)
* आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३०२)
* क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३९९)
* एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ १५८)
* आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७६)
* वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, १९५८ पृष्ठ १८)
* स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३५६)
* निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ५७)
* जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ४३)
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १९२)
* अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १७९)
* उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २८६)
* रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३४९)
* गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ७२)
* जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ , पृष्ठ १)
* मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है। -- (द मैसेज ऑफ द गीता, १९५९, पृष्ठ ४)
* गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २७८)
* मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३११)
* हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २५२)
* साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ६१)
* संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३)
* हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३०)
* मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ १६८)
* सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २४८)
* शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १५३)
* हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६१)
* यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ ३७)
* आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १२१)
* किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३१३)
* ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २३४)
* नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३३)
* गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अथों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईष्र्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ४१७)
* प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ११)
* प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २६४)
* यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २०६)
* मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९९९ पृष्ठ ४५)
* यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ २)
* जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ३७१)
* विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३३)
* बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २९५)
* हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किन्तु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं। महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९४)
* स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)
* जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)
* समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)
* पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)
* किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)
* विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)
* मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)
* सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)
* हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)
* सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)
* अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)
* हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)
* किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)
* यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)
* स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)
* धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)
* महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)
* स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)
* भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)
* स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)
* आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)
* मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)
* अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)
* सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)
* अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)
* मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)
* अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)
* थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।
* पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।
* पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।
* मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।
* जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।
* उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।
* सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।
* जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
* हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।
* युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941 )
* अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: ''युद्ध और अहिंसा'', महात्मा गांधी, 1941)
* आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'' , 1909)
* पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: ''हिन्द स्वराज'', 1909)
* मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* जब तक हम स्वयं को नहीं बदलते, तब तक दुनिया में कोई सच्चा परिवर्तन नहीं आ सकता। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927))
* अहिंसा केवल हथियार न उठाना नहीं है, बल्कि प्रेम और सहनशीलता की पराकाष्ठा है। (स्रोत: ''सत्य के प्रयोग'', महात्मा गांधी (1927) )
* सत्य के लिए जिया जाए तो जीवन कठिन नहीं, तपस्वी बन जाता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई मित्र नहीं (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अकेला हो सकता है, पर वह कभी कमजोर नहीं होता (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* कोई भी सुधार दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं पर लागू होना चाहिए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* संयम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपने भीतर के राक्षस को वश में कर सकता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से सिद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सबसे कठिन प्रयोग अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध होता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* सेवा करने का भाव यदि स्वार्थ से रहित हो तो वह पूजा बन जाती है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* असत्य से प्राप्त कोई भी लाभ अंततः हानि में बदलता है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* धर्म वह है जो सबके हित में हो और किसी को क्षति न पहुँचाए (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* नीयत की पवित्रता ही कार्य की सफलता का आधार है (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))
* समाज की सच्ची समृद्धि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति देखकर मापी जानी चाहिए (स्रोत : सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* न्याय वह है जो सबको समान अवसर और सम्मान दे (स्रोत: सर्वोदय, महात्मा गांधी (1908))
* सच्चा धर्म वह है जो करुणा और सेवा सिखाए, न कि भेदभाव (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1939)
* अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो हमें हर जीव में ईश्वर को देखना चाहिए (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1937)
* समाज में बदलाव लाने के लिए खुद बदलना सबसे पहला कदम है (स्रोत : हरिजन, महात्मा गांधी, 1942)
==महात्मा गांधी पर महापुरुषों के विचार==
* महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं। -- [[अरविन्द घोष]], १९३६ में
* उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है। -- सन १९२६
* महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं। -- [[चित्तरंजन दास]], असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए (उस समय वे जेल में थे)
* भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था। --अल्बर्ट आइंस्टीन
* गांधी हमेशा मुझे एक प्रेरणा-पुंज की तरह रास्ता दिखाते रहे। -- नेल्सन मान्डेला
* ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए और महात्मा गांधी ने हमें उन्हें प्राप्त करने के तरीके बताए। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
* दशकों के अभियान में गांधी ने जो हासिल नहीं किया था, बोस की आजाद हिन्द फौज ने दो साल से भी कम समय में हासिल कर लिया और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला करना पड़ा। और उसकी यह उपलब्धि वास्तव में बहुत अधिक गोलियां चलाए बिना मिल गयी। यदि आप शक्ति विकीर्ण करते हैं, तो आपको अक्सर इसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है। दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा आजाद हिन्द फौज की भूमिका को कमतर आंका है और स्वतंत्रता की उपलब्धि का श्रेय महात्मा गांधी को दिया है। -- के एल्स्ट (Elst, K.), 'सुभाष बोस विन्डिकेटेद' में (हिन्दू ह्यूमन राइट्स, प्रयाग तथा स्वराज्य, अप्रैल 2019)<ref>[https://web.archive.org/web/https://koenraadelst.blogspot.com/2019/05/subhas-bose-vindicated.html Subhas Bose vindicated (Hindu Human Rights, Pragyata and Swarajya, April 2019)]</ref>
* मेरा अपना विचार है कि महापुरुष अपने देश के लिए महान सेवा के होते हैं, लेकिन वे निश्चित समय के बाद कभी कभी देश की प्रगति में बाधा भी बनते हैं। मि० गांधी इस देश के लिए एक निश्चित खतरा बन गए थे। उन्होंने सभी के विचारों को घुट कर रख दिया था। वह कांग्रेस के साथ खड़े हुए थे, वो काँग्रेस, जो समाज के सभी बुरे और स्वार्थसेवी तत्वों का एक संयोजन है, जो सिवाय प्रशंसा और चापलूसी के, समाज-जीवन को नियंत्रित करने वाले किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं। इस तरह की संस्था किसी भी देश पर शासन करने के लिए अयोग्य है।
: जैसा कि बाइबल कहती है, कि कभी-कभी अच्छाई, बुराई से ही बाहर आती है, इसलिए मुझे भी लगता है कि मि० गांधी की मौत से अच्छा ही निकलेगा। यह लोगों को बंधन से निकाल कर, उन्हें खुद के लिए सोचने के लिए और उनकी योग्यता के आधार पर खड़े होने के लिए मजबूर करेगा। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], गांधी की हत्या के लगभग एक सप्ताह बाद लिखे एक पत्र में, स्रोत - 'लेटर्स ऑफ अंबेडकर', पेज़ नं० 205 , लेखक - सुरेन्द्र अजनात
* गांधी कभी भी महात्मा नहीं थे, मैं उन्हें महात्मा नहीं मानता। -- [[भीमराव अम्बेडकर]], सन 1955 में BBC से साक्षात्कार में
* मेरी तरह किसी को भी गांधीजी के प्रति एक प्रकार की सौन्दर्यपरक अरुचि महसूस हो सकती है, कोई उनकी ओर से किए गए संतत्व के दावों को अस्वीकार कर सकता है, कोई आदर्श के रूप में संतत्व को भी अस्वीकार कर सकता है और इसलिए महसूस कर सकता है कि गांधी के मूल उद्देश्य मानव-विरोधी और प्रतिक्रियावादी थे। लेकिन यदि उन्हें उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखा जाय, और हमारे समय के अन्य प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की तुलना में, वह कितनी साफ गंध छोड़ने में कामयाब रहे! -- [[जॉर्ज ओरवेल]], गांधी के बारे में लिखते हुए, १९४९
==बाह्य सूत्र==
{{कॉमन्स श्रेणी|Mohandas K. Gandhi|{{PAGENAME}}}}
{{wikipedia}}
* [http://www.hindi.mkgandhi.org/efg.htm सुविचार]
*[https://www.gyanipandit.com/mahatma-gandhi-quotes-in-hindi-with-image/ महात्मा गांधी के सर्वश्रेष्ठ अनमोल विचार]
*[https://www.activehindi.com/2020/06/mahatma-gandhi-biography-in-hindi.html महात्मा गांधी की जीवनी]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:राजनेता]]
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हिन्दी
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अनुनाद सिंह
658
33054
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:हिन्दी|हिन्दी भाषा]]''' विश्व की तीसरी और [[भारत]] में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली [[भाषा]] है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। भारतीय संविधान में इसे संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया है।
== उद्धरण ==
'''आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद
'''यह मानसिक दशा का भी प्रश्न है जिसका हमारे समस्त जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। हम केन्द्र में जिस भाषा का प्रयोग करेंगे उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएँगे। आख़िर अंग्रेज़ी से हम निकटतर आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा थी। अब उस अंग्रेज़ी के स्थान पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है। इससे अवश्यमेव हमारे संबंध घनिष्ठतर होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परम्पराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। हमने यथासम्भव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद के वक्तव्य के उपसंहार में
'''राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।''' - अवनीन्द्रकुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।''' - बाबूराम सक्सेना <br/> <br/>
'''समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है।''' - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है।''' - शंकरराव कप्पीकेरी <br/> <br/>
'''अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू।''' -रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।''' - के.सी. सारंगमठ <br/> <br/>
'''हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।''' - वी. कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।''' - बालकृष्ण शर्मा '''नवीन''' <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।''' - बेरिस कल्यएव <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सिर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।''' - सम्पूर्णानंद <br/> <br/>
'''एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।''' -सर जार्ज ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है।''' - नलिनविलोचन शर्मा <br/> <br/>
'''जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।''' - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।''' - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।''' - टी. माधवराव <br/> <br/>
'''हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।''' - [[राजेन्द्र प्रसाद]] <br/> <br/>
'''उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।''' - मुहम्मद हुसैन '''आजाद''' <br/> <br/>
'''समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।''' - जनार्दनप्रसाद झा '''द्विज''' <br/> <br/>
'''मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।''' - शिवप्रसाद सितारेहिंद <br/> <br/>
'''हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।''' - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।''' - पीर मुहम्मद मूनिस <br/> <br/>
'''भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहुँचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।''' - बेनी कवि <br/> <br/>
'''यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा।''' - ब्रजनंदन दास <br/> <br/>
'''देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।''' - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी नागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है।''' - [[राहुल सांकृत्यायन]] <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।''' - [[गणेशशंकर विद्यार्थी]] <br/> <br/>
'''अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।''' - पं. कृ. पिल्लयार <br/> <br/>
'''उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।''' - देवव्रत शास्त्री <br/> <br/>
'''हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'''। - गोविन्दवल्लभ पंत <br/> <br/>
'''भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।''' - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह <br/> <br/>
'''भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।''' - डॉ. फादर कामिल बुल्के <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जानसन <br/> <br/>
'''रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।''' - यशोदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।''' - श्रीनारायण चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।''' - राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है?''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।''' - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद <br/> <br/>
'''कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।''' - राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।''' - मनोरंजन प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है।''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है।''' - (प्रो.) तान युन् शान <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।''' - श्रीधर पाठक <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।''' - लक्ष्मीनारायण '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।''' - सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।''' - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल <br/> <br/>
'''परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें।''' - हरगोविंद सिंह <br/> <br/>
'''अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - [[मैथिलीशरण गुप्त]] <br/> <br/>
'''दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।''' - भूदेव मुखर्जी <br/> <br/>
'''हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। ''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।''' - नन्ददुलारे वाजपेयी <br/> <br/>
अकबर की सभा में सूर के '''जसुदा बार-बार यह भाखै''' पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।'''- राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है।''' - सुधाकर द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।''' - (डॉ.) भगवानदास <br/> <br/>
'''हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।''' - दरियाये लताफत <br/> <br/>
'''भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।''' - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।''' - [[संपूर्णानंद]] <br/> <br/>
'''भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।''' - बदरीनाथ शर्मा <br/> <br/>
'''तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।'''- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।''' - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।'''- मथुरा प्रसाद दीक्षित <br/> <br/>
'''भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।'''- रवींद्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।''' - गोविंदबल्लभ पंत <br/> <br/>
'''हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।''' - (डॉ.) रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।''' - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दूदाँ तक तंग आ गए हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।''' - ब्रजभूषण पांडेय <br/> <br/>
'''लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है।''' - कंक <br/> <br/>
'''मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।''' - अंबाप्रसाद सुमन <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।''' - पं. गिरिधर शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।''' - [[वासुदेवशरण अग्रवाल]] <br/> <br/>
'''भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।''' - विष्णुदेव पौद्दार <br/> <br/>
'''सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।''' - जहूरबख्श <br/> <br/>
'''किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।''' - सैयद इंशा अल्ला खाँ <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है''' - संपूर्णानंद <br/> <br/>
'''हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।''' - पार्वती देवी <br/> <br/>
'''विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता''' - वासुदेवशरण अग्रवाल <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।''' - पं. सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।''' - नाथूराम '''शंकर''' शर्मा <br/> <br/>
'''राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।''' - राजकुमार वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।''' - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।''' - निराला <br/> <br/>
'''कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।''' - सुमित्रानंदन पंत <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविंद शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।''' - रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है।''' - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव <br/> <br/>
'''बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।''' - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।''' - [[माखनलाल चतुर्वेदी]] <br/> <br/>
'''विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।''' - सूर्यनारायण व्यास <br/> <br/>
'''कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।''' - सू. च. धर <br/> <br/>
'''मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''आज का आविष्कार कल का साहित्य है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती।''' - माधव राव सप्रे <br/> <br/>
'''हिंदी विश्व की महान भाषा है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला लेकिन हिन्दी के संबंध में मैंने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।''' - संत रामदास <br/> <br/>
'''पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।''' - लीलावती मुंशी <br/> <br/>
'''हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।''' - डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्य कांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है।''' - [[सुभाषचन्द्र बोस|सुभाषचंद्र बसु]] <br/> <br/>
'''पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।''' - बी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।''' - बृजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।''' - म. म. रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।''' - रघुवरप्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें।''' - एक फ्रांसीसी बालिका <br/> <br/>
'''निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।''' - सैयद अमीर अली मीर <br/> <br/>
'''इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।''' - [[जयचंद्र विद्यालंकार]] <br/> <br/>
'''सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।''' - अमरनाथ झा <br/> <br/>
'''हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।''' - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।''' - अयोध्याप्रसाद वर्मा <br/> <br/>
'''किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।''' - सकलनारायण पांडेय <br/> <br/>
'''संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।''' - मौलवी महमूद अली <br/> <br/>
'''संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।''' - ताराचंद्र दूबे <br/> <br/>
'''सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।''' - राजा कृत्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।''' - नरोत्तम व्यास <br/> <br/>
'''भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।''' - बिहारीलाल चौबे <br/> <br/>
'''देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।''' - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।''' - गिरजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।''' - डॉ. श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है।''' - रमेशचंद्र दत्त <br/> <br/>
'''वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।''' - गिरींद्रमोहन मित्र <br/> <br/>
'''समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।''' - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।''' - बाबू राव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।''' - अनादिधन वंद्योपाध्याय <br/> <br/>
'''व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।''' - अनंतराम त्रिपाठी <br/> <br/>
'''स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।''' - रामजी लाल शर्मा <br/> <br/>
'''गुणवान '''खानखाना''' सदृश प्रेमी हो गए '''रसखान''' और '''रसलीन''' से हिंदी प्रेमी हो गए।''' - राय देवीप्रसाद <br/> <br/>
'''वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।''' - गणपति जानकीराम दूबे <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कवि का हृदय कोमल होता है।''' - गिरिजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।''' - शैलजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।''' - चंद्रबली पाण्डेय <br/> <br/>
'''भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।''' - सत्यदेव परिव्राजक <br/> <br/>
'''खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।''' - विनयकुमार सरकार <br/> <br/>
'''हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।''' - बदरीनारायण चौधरी '''प्रेमधन''' <br/> <br/>
'''हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।''' - भारतेन्द्न्दु हरिश्चंद्र <br/> <br/>
'''आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।''' - वीम्स साहब <br/> <br/>
'''क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।''' - विष्णु दिगंबर <br/> <br/>
'''जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।''' - [[महात्मा गांधी]] <br/> <br/>
'''जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।''' - डॉ. भगवानादास <br/> <br/>
'''विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।''' - भीमसेन शर्मा <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।''' - छोटूलाल मिश्र <br/> <br/>
'''नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।''' - गोपालदास गहमरी <br/> <br/>
'''किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।''' - '''निराला''' <br/> <br/>
'''देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।''' - '''चकोर''' <br/> <br/>
'''शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।''' - पं. रामनारायण मिश्र <br/> <br/>
'''भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।''' - श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।''' - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।''' - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।''' - पांडेय रामवतार शर्मा <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।''' - नाथूराम शंकर शर्मा <br/> <br/>
'''जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।''' - घनश्याम सिंह <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।''' - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।''' - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।''' - मोहनलाल महतो वियोगी <br/> <br/>
'''युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।''' - सु. च. धर <br/> <br/>
'''हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।''' - नूर मुहम्मद <br/> <br/>
'''आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।''' - गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - गोविन्ददास <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।''' - शरच्चंद <br/> <br/>
'''सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।''' - संतराम शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।''' - मौलाना हसरत मोहानी <br/> <br/>
'''भारतीय भाषाएं नदियां हैं जबकि हिन्दी महानदी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।''' - वी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' - [[स्वामी दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानंद]] <br/> <br/>
'''इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।''' - [[जयशंकर प्रसाद]] <br/> <br/>
'''विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।''' - अरस्तु <br/> <br/>
'''अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।''' - डिजरायली <br/> <br/>
'''जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।''' - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् <br/> <br/>
'''शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।''' - कबीर <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।''' - सुभाषचन्द्र बसु <br/> <br/>
'''प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।''' - एक जपानी सूक्ति <br/> <br/>
'''संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं।''' - यशेदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -'''स्वत्व''' का रक्षण हो।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।''' - जयशंकर प्रसाद <br/> <br/>
'''जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।''' - बाबूराव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।''' - मैक्सिम गोर्की <br/> <br/>
'''कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।''' - महादेवी वर्मा <br/> <br/>
'''क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।''' - माघ <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।''' - बागीश्वरजी <br/> <br/>
'''श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।''' - प्रेमचंद <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।''' - पंडितराज जगन्नाथ <br/> <br/>
'''प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।''' - भास्कर गोविन्द धाणेकर <br/> <br/>
'''यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।''' - पं. नेहरू <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जोनसन <br/> <br/>
'''हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।''' - सेठ गोविन्ददास <br/> <br/>
'''अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।''' - लक्ष्मीनारायण सिंह '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।''' - चन्द्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।''' - ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन <br/> <br/>
'''संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।''' - डॉ. सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।''' - रणवीर सिंह जी <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।''' - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''साहित्य ही हमारा जीवन है।''' - डॉ. भगवानदास <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।''' - मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।''' - अंबिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।''' - शारदाचरण मित्र (जस्टिस) <br/> <br/>
'''समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिदीभाषी जाति की एकता आवश्यक है।''' - रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''राजा बलवंत सिंह कालेज के हिन्दी अध्यापक डॉ. श्री मोहन द्विवेदी की देखरेख में महेश चन्द्र गुप्त ´राजस्थान के प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग’ विषय पर शोध कार्य कर रहे हैं। उन्होंने सन् 1857 के पहले के और उसके बाद के भी काफी दस्तावेज़ इकट्ठे किए हैं। इन दस्तावेज़ों में वे पत्र हैं जो अंग्रेजों ने राजाओं को लिखे, राजाओं ने अंग्रेजों को लिखे; साथ ही ऐसे पत्र हैं जोराजाओं ने एक दूसरे को लिखे। यदि राजस्थान में 19 वीं सदी में हिन्दी राजभाषा के रूप में काम आती थी और उसका व्यवहार हिन्दुस्तान के लोग हीं नहीं अंग्रेज भी करते थे तो कोई कारण नहीं कि 20 वीं सदी के अन्तिम चरण में अंग्रेजी प्रेमी भारतवासी अपना अंग्रेजी मोह त्यागकर हिन्दी का उपयोग न कर सकें।''' - रामविलास शर्मा, भारत की भाषा समस्या, पृष्ठ 13, तीसरा संस्करण, राजकामल प्रकाशन (2003)<ref>[https://www.pravakta.com/official-language-hindi-condition-and-direction/ राजभाषा हिन्दी : दशा एवं दिशा]</ref><br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।''' - आचार्य क्षितिमोहन सेन <br/> <br/>
'''हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।''' - सैयद अली बिलग्रामी <br/> <br/>
'''हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।''' - शचींद्रनाथ बख्शी <br/> <br/>
'''अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है।''' - विनयमोहन शर्मा <br/> <br/>
'''अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।''' - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।''' - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन <br/> <br/>
'''(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।''' - अमृतलाल नागर <br/> <br/>
* और तो और, जिन लोगों ने उसे राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था, वही आज यह प्रयत्न कर रहे हैं कि 'हिंदी', 'हिंदुस्तानी' हो जाए और हिंदी वाले 'राम' को 'रहीम' और 'धर्म' को 'मजहब' लिखा करें। इस तरह वे हिंदी को 'वर्णसंकरी' भाषा बना डालना चाहते हैं।.... राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने भी ऐसा ही प्रयत्न एक बार पहले किया था, परंत् बाबू हरिश्चंद्र ने उनके सारे प्रयत्नों को बेकार कर दिया, यहां तक कि उसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया ।.. ..परंतु हिंदी आत्महत्या करने को तैयार न होगी। उसकी भी अपनी संस्कृति है । .... संसार में एक हिंदी ही ऐसी भाषा है, जो एकमात्र सर्वसाधारण के सहारे पर जीवित रही है। -- पं० देवीदत्त शुक्ल, 'हिंदी पर संकट' नामक लेख में, नवम्बर १९३६ में 'मदारी' नामक पत्रिका में [[महात्मा गांधी]] की ओर संकेत करते हुए<ref>[https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/1990/April/Ajkal_1990_April_pdf.pdf विदग्ध-वाक् पंओ देवीदत्त शुक्त की हिन्दीधारिता] (सरस्वती पत्रिका, जनवरी १९४१ अंक)</ref>
* हिंदी की प्रतिस्पर्धा स्थानीय भाषाओं से नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही देश सशक्त होगा। ... प्रधानमंत्री मोदी ने 10 भाषाओं में इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रम शुरू करने की पहल की है और जल्द ही ये पाठ्यक्रम सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे। वह क्षण स्थानीय भाषाओं और आधिकारिक भाषाओं के उत्थान की शुरुआत का प्रतीक होगा। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], राजभाषा पर संसद की समिति की 38वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए (4 अगस्त 2023)
* भारत वर्षों से ही विविध भाषाओं का देश रहा है और हिंदी को एक जनतांत्रिक भाषा के रूप में माना जाता है। इसने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ कई वैश्विक भाषाओं को सम्मान देने का भी काम किया है।... हिंदी भाषा ने देश की स्वतंत्रता के दौरान देशवासियों को एकसूत्र में बांधने और अनेक भाषाओं में बंटे देश में एकता की भावना को स्थापित करने का भी काम किया था।... हमारी सभी भारतीय भाषाएं और बोलियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और हमें इसे लेकर चलना है। हिंदी की किसी भी भाषा न कभी स्पर्धा थी और न कभी होगी। हमारी सभी भाषाओं को सशक्त करने से एक ही सशक्त राष्ट्र बनेगा और मुझे यकीन है कि हिंदी सभी भाषाओं को सशक्त बनाने का काम करेगी। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बोधन में
* मेरी कामना है कि हिंदी भाषा राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की डोर को निरंतर मजबूत करती रहे।''' भारतीय प्रधानमन्त्री [[नरेन्द्र मोदी]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बन्धी एक सोसल मिडिया पोस्ट में
* तमिलनाडु में हमारे लिए हिन्दी न जानना बहुत ही बड़ी बाधा हो जाती है। हमारे लिए हिन्दी सीखना 'स्मार्ट' है। -- [[श्रीधर वम्पू]], तमिलनाडु में जन्मे जोहो के संस्थापक एवं प्रसिद्ध उद्योगपति<ref>[https://panchjanya.com/2025/02/27/393047/bharat/tamil-nadu/hindi-v-controversy-zoho-founder-urges-hindi-learning/ तमिलनाडु के उद्योगपतियों ने सरकार से कहा “हिन्दी को पढ़ाने दें!”]</ref>
* कड़वी सच्चाई है कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, लेकिन सरकारी विभागों में हिंदी में काम करने का दिखावा हो रहा है। अधिकतर अफसरशाही अंग्रेजी में काम कर रहे हैं। हिंदी का पत्रकार परिचय-पत्र अंग्रेजी में बनाकर पेश करता है। जबकि लोगों को समझना चाहिए कि जब चुनाव होता है तो नेता हिंदी में जनता से संवाद करते हैं। क्योंकि उन्हें पता है भारत में अंग्रेजी में बात करके लोगों से जुड़ा नहीं जा सकता। हमें तो हिंदी में काम करने पर गर्व होता है। देहरादून कॉलेज में था, तभी संकल्प लिया था कि अपना हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे। राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण की 10 साल बाद हिंदी में वेबसाइट बनवाया। हिंदी दिवस मनाना शुरू किया। अब हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित किए जाने से कर्मचारी भी खुश हैं। अब प्राधिकरण का विधि उपनियम हिंदी में बनाकर वेब साइट पर डाला जा रहा है। -- तरुण विजय, अध्यक्ष, राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण
* साहित्य अकादमी के साथ काम करते हुए यह अनुभव किया है कि हिंदी देश की 24 क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पुल है। गुजराती भाषा की पुस्तक का मणिपुरी में सीधा अनुवाद कराना आसान नहीं है। लेकिन गुजराती से हिंदी में अनुवाद कराने के बाद हिंदी से मणिपुरी में अनुवाद आसानी से हो जाता है। करीब सभी क्षेत्रीय साहित्यकारों के लिए हिंदी समझना आसान है। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बनकर उभरी है। विदेशी शक्तियां भारत में व्यापार करने के लिए अपने लोगों को हिंदी सिखा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी में भाषण देकर वैश्विक पटल पर हिंदी का दबदबा और बढ़ा दिया है। देश में करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। दुनिया में कई देशों की इतनी आबादी है। अब बिना देर किए संयुक्त राष्ट्र को हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता देनी चाहिए। -- के. श्रीनिवासराव, सचिव, साहित्य अकादमी
* भारत बहुभाषायी देश है, लंबे समय से हिंदी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता ने अहम भूमिका अदा की है। यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है, इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद 14 सितम्बर सन् 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज लगभग प्रत्येक कार्यालय में एक राजभाषा विभाग है, जो राजभाषा हिंदी में काम करने के लिए नीतियों, नियमों और पुरस्कार प्रोत्साहन आदि की न केवल जानकारी प्रदान करता है, बल्कि कार्यालयों के सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए तत्पर है। दिल्ली हिंदी भाषी क्षेत्र है। हिंदी में काम करना हमारा संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है। हिंदी बहुआयामी भाषा है इसकी खूबी है कि ये सभी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। हिंदी में काम करना बहुत सरल है क्योंकि जो बोलना है वही लिखना है। आप अपनी बात आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी दूसरे स्थान पर है। हमारी रेलवे में भी हिंदी में बहुत कार्य किया जा रहा है, विशेष रूप से स्टेशनों पर। हिंदी का प्रचार प्रसार बढ़ाने में राजभाषा विभाग भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। -- डिंपी गर्ग, दिल्ली रेल मंडल प्रबंधक
=== महात्मा गांधी ===
===अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ===
* जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला।
: जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला।
: उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी।
: उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी।
: क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।
: दो सूबों के भिन्न भिन्न बोली वाले जन।
: जब करते हैं खिन्न बने, मुख भर अवलोकन।
: जो भाषा उस समय काम उनके है आती।
: जो समस्त भारत भू में है समझी जाती।
: उस अति सरला उपयोगिनी हिन्दी भाषा के लिए।
: हम में कितने हैं जिन्होंने तन मन धान अर्पण किए।
: गुरु गोरख ने योग साधाकर जिसे जगाया।
: औ कबीर ने जिसमें अनहद नाद सुनाया।
: प्रेम रंग में रँगी भक्ति के रस में सानी।
: जिस में है श्रीगुरु नानक की पावन बानी।
: हैं जिस भाषा से ज्ञान मय आदि ग्रंथसाहब भरे।
: क्या उचित नहीं है जो उसे निज सर आँखों पर धारे।
: करामात जिसमें है चंद-कला दिखलाती।
: जिसमें है मैथिल-कोकिल-काकली सुनाती।
: सूरदास ने जिसे सुधामय कर सरसाया।
: तुलसी ने जिसमें सुर-पादप फलद लगाया।
: जिसमें जग पावन पूत तम रामचरित मानस बना।
: क्या परम प्रेम से चाहिए उसे न प्रति दिन पूजना।
: बहुत बड़ा, अति दिव्य, अलौकिक, परम मनोहर।
: दशम ग्रंथ साहब समान बर ग्रंथ बिरच कर।
: श्रीकलँगीधार ने जिसमें निज कला दिखाई।
: जिसमें अपनी जगत चकित कर ज्योति जगाई।
: वह हिन्दी भाषा दिव्यता-खनि अमूल्य मणियों भरी।
: क्या हो नहिं सकती है सकल भाषाओं की सिर-धारी।
: यह कविता हिन्दी को माँ के समान बताते हुए, उसे पूरे भारत की समझी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित करती है और गोरख, कबीर, नानक, सूर, और तुलसी जैसे महान संतों व कवियों की साहित्यिक विरासत से जोड़कर उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव को व्यक्त करती है।
=== हिन्दी की विकासयात्रा पर उद्धरण ===
* कोई कहानी ऐसी कहिये कि जिसमें हिंदो को छुट और किसी बोली की पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली रूप खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उनके बीच में न हो। हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। जितने भले लोग आपस में बोलते-चलाते हैं, ज्यों का त्यों डोल रहे और छाँह किसी की न दे। -- इंशाअल्ला खाँ, 'रानी केतकी की कहानी' की भाषा के सम्बन्ध में
* हमारे मत में हिंदी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिंदी इस देश के हिंदू वालते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिंदुओं की बोलचाल है। हिंदी में संस्कृत के शब्द बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी फारसी के। परन्तु कुछ आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के शब्दों के बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हों। -- राजा लक्ष्मण सिंह, संस्कृत महाकाव्य "रघुवश" के अनुवाद के प्राक्कथन में
* हिन्दी नई चाल से ढली सन् १८७३ ई०। -- [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]
* समय के साथ, [[संस्कृत]] से प्राकृत भाषाए विकसित हुईं, जो आम जनता की बोलचाल की भाषाएं थीं। -- डॉ भोलानाथ तिवारी की पुस्तक “भारतीय भाषाओं का इतिहास”
* प्राकृत से आगे चलकर अपभ्रंश (लगभग 6ठी से 12वीं शताब्दी) का विकास हुआ, जो हिंदी और अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार बनी। अपभ्रंश में शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी जैसी बोलियां शामिल थीं। -- ग्रियर्सन के अध्ययन और केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* उत्तरी भारत में, विशेष रूप से दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के क्षेत्र में, शौरसेनी अपभ्रंश से हिंदी की प्रारंभिक बोलियाँ जैसे खड़ी बोली, ब्रज, अवधी और भोजपुरी उभरीं। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास”
* 10वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान मुस्लिम शासकों (दिल्ली सल्तनत और मुगल काल) के प्रभाव से हिंदी में फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों का समावेश हुआ. इससे हिंदुस्तानी भाषा का विकास हुआ, जो हिंदी और उर्दू का साझा रूप थी। -- सतीश चंद्रा की पुस्तक “मध्यकालीन भारत का इतिहास”
* भक्ति और सूफी आंदोलनों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया। कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे कवियों ने अवधी, ब्रज और अन्य बोलियों में साहित्य रचकर हिंदी को समृद्ध किया। -- हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक “हिंदी साहित्य का आदिकालीन इतिहास”
* 18वीं शताब्दी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया गया। इसे दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बोला जाता था। -- नंददुलारे वाजपेयी की पुस्तक “आधुनिक हिंदी साहित्य”
* मुगल दरबारों और बाजारों में हिंदुस्तानी के रूप में इसका प्रयोग बढ़ा। -- “द कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया”
* ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं शताब्दी में हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ मानकीकृत करने का प्रयास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र को “आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक” माना जाता है, जिन्होंने खड़ी बोली में नाटक, कविता और निबंध लिखे। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
* 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया। महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने की वकालत की। -- “द नेशनल मूवमेंट इन इंडिया”
* प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और अन्य लेखकों ने खड़ी बोली में उपन्यास, कहानी और कविता लिखकर हिंदी को आधुनिक साहित्यिक भाषा बनाया। -- साहित्य अकादमी और नंददुलारे वाजपेयी
* 20वीं शताब्दी में हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो और बाद में टेलीविजन ने हिंदी के प्रसार को बढ़ाया। -- “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स
* हिंदी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली प्रमुख भाषा बनी। -- केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* 21वीं शताब्दी में इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे मंचों ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। -- “स्टैटिस्टिता” और “गूगल ट्रेंड्स” के आंकड़ों के अनुसार
* हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स और बॉलीवुड ने भी हिंदी के प्रसार में योगदान दिया। -- “द टाइम्स ऑफ इंडिया” और “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स के अनुसार
* वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य संगठनों ने हिंदी के शब्दकोश, व्याकरण और शब्दावली को मानकीकृत करने में मदद की।
* हिंदी का विकास जनता के बीच संचार की जरूरत से हुआ। -- डॉ भोलानाथ तिवारी के अध्ययनों के अनुसार
* २०१४ के बाद भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व काल में सभी मंचों पर हिन्दी में विचारविमर्श को अत्यधिक बढ़ावा मिला।
==इन्हें भी देखें==
* [[हिन्दी साहित्य]]
* [[देवनागरी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भाषा]]
==बाह्य सूत्र==
{{wikipedia}}
*[http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2009/hindi.htm हिंदी के विषय में विदेशियों के विचार] - बदरीनारायण तिवारी
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:हिन्दी]]
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33055
33054
2026-07-18T02:10:16Z
अनुनाद सिंह
658
/* महात्मा गांधी */
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wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:हिन्दी|हिन्दी भाषा]]''' विश्व की तीसरी और [[भारत]] में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली [[भाषा]] है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। भारतीय संविधान में इसे संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया है।
== उद्धरण ==
'''आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद
'''यह मानसिक दशा का भी प्रश्न है जिसका हमारे समस्त जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। हम केन्द्र में जिस भाषा का प्रयोग करेंगे उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएँगे। आख़िर अंग्रेज़ी से हम निकटतर आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा थी। अब उस अंग्रेज़ी के स्थान पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है। इससे अवश्यमेव हमारे संबंध घनिष्ठतर होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परम्पराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। हमने यथासम्भव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद के वक्तव्य के उपसंहार में
'''राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।''' - अवनीन्द्रकुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।''' - बाबूराम सक्सेना <br/> <br/>
'''समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है।''' - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है।''' - शंकरराव कप्पीकेरी <br/> <br/>
'''अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू।''' -रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।''' - के.सी. सारंगमठ <br/> <br/>
'''हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।''' - वी. कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।''' - बालकृष्ण शर्मा '''नवीन''' <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।''' - बेरिस कल्यएव <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सिर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।''' - सम्पूर्णानंद <br/> <br/>
'''एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।''' -सर जार्ज ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है।''' - नलिनविलोचन शर्मा <br/> <br/>
'''जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।''' - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।''' - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।''' - टी. माधवराव <br/> <br/>
'''हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।''' - [[राजेन्द्र प्रसाद]] <br/> <br/>
'''उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।''' - मुहम्मद हुसैन '''आजाद''' <br/> <br/>
'''समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।''' - जनार्दनप्रसाद झा '''द्विज''' <br/> <br/>
'''मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।''' - शिवप्रसाद सितारेहिंद <br/> <br/>
'''हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।''' - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।''' - पीर मुहम्मद मूनिस <br/> <br/>
'''भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहुँचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।''' - बेनी कवि <br/> <br/>
'''यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा।''' - ब्रजनंदन दास <br/> <br/>
'''देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।''' - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी नागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है।''' - [[राहुल सांकृत्यायन]] <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।''' - [[गणेशशंकर विद्यार्थी]] <br/> <br/>
'''अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।''' - पं. कृ. पिल्लयार <br/> <br/>
'''उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।''' - देवव्रत शास्त्री <br/> <br/>
'''हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'''। - गोविन्दवल्लभ पंत <br/> <br/>
'''भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।''' - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह <br/> <br/>
'''भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।''' - डॉ. फादर कामिल बुल्के <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जानसन <br/> <br/>
'''रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।''' - यशोदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।''' - श्रीनारायण चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।''' - राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है?''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।''' - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद <br/> <br/>
'''कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।''' - राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।''' - मनोरंजन प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है।''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है।''' - (प्रो.) तान युन् शान <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।''' - श्रीधर पाठक <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।''' - लक्ष्मीनारायण '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।''' - सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।''' - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल <br/> <br/>
'''परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें।''' - हरगोविंद सिंह <br/> <br/>
'''अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - [[मैथिलीशरण गुप्त]] <br/> <br/>
'''दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।''' - भूदेव मुखर्जी <br/> <br/>
'''हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। ''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।''' - नन्ददुलारे वाजपेयी <br/> <br/>
अकबर की सभा में सूर के '''जसुदा बार-बार यह भाखै''' पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।'''- राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है।''' - सुधाकर द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।''' - (डॉ.) भगवानदास <br/> <br/>
'''हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।''' - दरियाये लताफत <br/> <br/>
'''भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।''' - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।''' - [[संपूर्णानंद]] <br/> <br/>
'''भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।''' - बदरीनाथ शर्मा <br/> <br/>
'''तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।'''- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।''' - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।'''- मथुरा प्रसाद दीक्षित <br/> <br/>
'''भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।'''- रवींद्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।''' - गोविंदबल्लभ पंत <br/> <br/>
'''हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।''' - (डॉ.) रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।''' - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दूदाँ तक तंग आ गए हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।''' - ब्रजभूषण पांडेय <br/> <br/>
'''लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है।''' - कंक <br/> <br/>
'''मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।''' - अंबाप्रसाद सुमन <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।''' - पं. गिरिधर शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।''' - [[वासुदेवशरण अग्रवाल]] <br/> <br/>
'''भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।''' - विष्णुदेव पौद्दार <br/> <br/>
'''सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।''' - जहूरबख्श <br/> <br/>
'''किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।''' - सैयद इंशा अल्ला खाँ <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है''' - संपूर्णानंद <br/> <br/>
'''हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।''' - पार्वती देवी <br/> <br/>
'''विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता''' - वासुदेवशरण अग्रवाल <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।''' - पं. सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।''' - नाथूराम '''शंकर''' शर्मा <br/> <br/>
'''राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।''' - राजकुमार वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।''' - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।''' - निराला <br/> <br/>
'''कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।''' - सुमित्रानंदन पंत <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविंद शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।''' - रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है।''' - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव <br/> <br/>
'''बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।''' - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।''' - [[माखनलाल चतुर्वेदी]] <br/> <br/>
'''विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।''' - सूर्यनारायण व्यास <br/> <br/>
'''कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।''' - सू. च. धर <br/> <br/>
'''मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''आज का आविष्कार कल का साहित्य है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती।''' - माधव राव सप्रे <br/> <br/>
'''हिंदी विश्व की महान भाषा है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला लेकिन हिन्दी के संबंध में मैंने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।''' - संत रामदास <br/> <br/>
'''पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।''' - लीलावती मुंशी <br/> <br/>
'''हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।''' - डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्य कांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है।''' - [[सुभाषचन्द्र बोस|सुभाषचंद्र बसु]] <br/> <br/>
'''पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।''' - बी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।''' - बृजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।''' - म. म. रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।''' - रघुवरप्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें।''' - एक फ्रांसीसी बालिका <br/> <br/>
'''निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।''' - सैयद अमीर अली मीर <br/> <br/>
'''इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।''' - [[जयचंद्र विद्यालंकार]] <br/> <br/>
'''सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।''' - अमरनाथ झा <br/> <br/>
'''हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।''' - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।''' - अयोध्याप्रसाद वर्मा <br/> <br/>
'''किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।''' - सकलनारायण पांडेय <br/> <br/>
'''संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।''' - मौलवी महमूद अली <br/> <br/>
'''संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।''' - ताराचंद्र दूबे <br/> <br/>
'''सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।''' - राजा कृत्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।''' - नरोत्तम व्यास <br/> <br/>
'''भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।''' - बिहारीलाल चौबे <br/> <br/>
'''देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।''' - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।''' - गिरजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।''' - डॉ. श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है।''' - रमेशचंद्र दत्त <br/> <br/>
'''वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।''' - गिरींद्रमोहन मित्र <br/> <br/>
'''समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।''' - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।''' - बाबू राव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।''' - अनादिधन वंद्योपाध्याय <br/> <br/>
'''व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।''' - अनंतराम त्रिपाठी <br/> <br/>
'''स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।''' - रामजी लाल शर्मा <br/> <br/>
'''गुणवान '''खानखाना''' सदृश प्रेमी हो गए '''रसखान''' और '''रसलीन''' से हिंदी प्रेमी हो गए।''' - राय देवीप्रसाद <br/> <br/>
'''वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।''' - गणपति जानकीराम दूबे <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कवि का हृदय कोमल होता है।''' - गिरिजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।''' - शैलजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।''' - चंद्रबली पाण्डेय <br/> <br/>
'''भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।''' - सत्यदेव परिव्राजक <br/> <br/>
'''खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।''' - विनयकुमार सरकार <br/> <br/>
'''हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।''' - बदरीनारायण चौधरी '''प्रेमधन''' <br/> <br/>
'''हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।''' - भारतेन्द्न्दु हरिश्चंद्र <br/> <br/>
'''आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।''' - वीम्स साहब <br/> <br/>
'''क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।''' - विष्णु दिगंबर <br/> <br/>
'''जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।''' - [[महात्मा गांधी]] <br/> <br/>
'''जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।''' - डॉ. भगवानादास <br/> <br/>
'''विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।''' - भीमसेन शर्मा <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।''' - छोटूलाल मिश्र <br/> <br/>
'''नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।''' - गोपालदास गहमरी <br/> <br/>
'''किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।''' - '''निराला''' <br/> <br/>
'''देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।''' - '''चकोर''' <br/> <br/>
'''शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।''' - पं. रामनारायण मिश्र <br/> <br/>
'''भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।''' - श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।''' - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।''' - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।''' - पांडेय रामवतार शर्मा <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।''' - नाथूराम शंकर शर्मा <br/> <br/>
'''जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।''' - घनश्याम सिंह <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।''' - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।''' - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।''' - मोहनलाल महतो वियोगी <br/> <br/>
'''युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।''' - सु. च. धर <br/> <br/>
'''हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।''' - नूर मुहम्मद <br/> <br/>
'''आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।''' - गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - गोविन्ददास <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।''' - शरच्चंद <br/> <br/>
'''सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।''' - संतराम शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।''' - मौलाना हसरत मोहानी <br/> <br/>
'''भारतीय भाषाएं नदियां हैं जबकि हिन्दी महानदी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।''' - वी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' - [[स्वामी दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानंद]] <br/> <br/>
'''इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।''' - [[जयशंकर प्रसाद]] <br/> <br/>
'''विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।''' - अरस्तु <br/> <br/>
'''अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।''' - डिजरायली <br/> <br/>
'''जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।''' - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् <br/> <br/>
'''शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।''' - कबीर <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।''' - सुभाषचन्द्र बसु <br/> <br/>
'''प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।''' - एक जपानी सूक्ति <br/> <br/>
'''संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं।''' - यशेदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -'''स्वत्व''' का रक्षण हो।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।''' - जयशंकर प्रसाद <br/> <br/>
'''जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।''' - बाबूराव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।''' - मैक्सिम गोर्की <br/> <br/>
'''कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।''' - महादेवी वर्मा <br/> <br/>
'''क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।''' - माघ <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।''' - बागीश्वरजी <br/> <br/>
'''श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।''' - प्रेमचंद <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।''' - पंडितराज जगन्नाथ <br/> <br/>
'''प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।''' - भास्कर गोविन्द धाणेकर <br/> <br/>
'''यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।''' - पं. नेहरू <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जोनसन <br/> <br/>
'''हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।''' - सेठ गोविन्ददास <br/> <br/>
'''अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।''' - लक्ष्मीनारायण सिंह '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।''' - चन्द्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।''' - ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन <br/> <br/>
'''संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।''' - डॉ. सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।''' - रणवीर सिंह जी <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।''' - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''साहित्य ही हमारा जीवन है।''' - डॉ. भगवानदास <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।''' - मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।''' - अंबिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।''' - शारदाचरण मित्र (जस्टिस) <br/> <br/>
'''समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिदीभाषी जाति की एकता आवश्यक है।''' - रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''राजा बलवंत सिंह कालेज के हिन्दी अध्यापक डॉ. श्री मोहन द्विवेदी की देखरेख में महेश चन्द्र गुप्त ´राजस्थान के प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग’ विषय पर शोध कार्य कर रहे हैं। उन्होंने सन् 1857 के पहले के और उसके बाद के भी काफी दस्तावेज़ इकट्ठे किए हैं। इन दस्तावेज़ों में वे पत्र हैं जो अंग्रेजों ने राजाओं को लिखे, राजाओं ने अंग्रेजों को लिखे; साथ ही ऐसे पत्र हैं जोराजाओं ने एक दूसरे को लिखे। यदि राजस्थान में 19 वीं सदी में हिन्दी राजभाषा के रूप में काम आती थी और उसका व्यवहार हिन्दुस्तान के लोग हीं नहीं अंग्रेज भी करते थे तो कोई कारण नहीं कि 20 वीं सदी के अन्तिम चरण में अंग्रेजी प्रेमी भारतवासी अपना अंग्रेजी मोह त्यागकर हिन्दी का उपयोग न कर सकें।''' - रामविलास शर्मा, भारत की भाषा समस्या, पृष्ठ 13, तीसरा संस्करण, राजकामल प्रकाशन (2003)<ref>[https://www.pravakta.com/official-language-hindi-condition-and-direction/ राजभाषा हिन्दी : दशा एवं दिशा]</ref><br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।''' - आचार्य क्षितिमोहन सेन <br/> <br/>
'''हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।''' - सैयद अली बिलग्रामी <br/> <br/>
'''हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।''' - शचींद्रनाथ बख्शी <br/> <br/>
'''अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है।''' - विनयमोहन शर्मा <br/> <br/>
'''अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।''' - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।''' - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन <br/> <br/>
'''(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।''' - अमृतलाल नागर <br/> <br/>
* और तो और, जिन लोगों ने उसे राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था, वही आज यह प्रयत्न कर रहे हैं कि 'हिंदी', 'हिंदुस्तानी' हो जाए और हिंदी वाले 'राम' को 'रहीम' और 'धर्म' को 'मजहब' लिखा करें। इस तरह वे हिंदी को 'वर्णसंकरी' भाषा बना डालना चाहते हैं।.... राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने भी ऐसा ही प्रयत्न एक बार पहले किया था, परंत् बाबू हरिश्चंद्र ने उनके सारे प्रयत्नों को बेकार कर दिया, यहां तक कि उसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया ।.. ..परंतु हिंदी आत्महत्या करने को तैयार न होगी। उसकी भी अपनी संस्कृति है । .... संसार में एक हिंदी ही ऐसी भाषा है, जो एकमात्र सर्वसाधारण के सहारे पर जीवित रही है। -- पं० देवीदत्त शुक्ल, 'हिंदी पर संकट' नामक लेख में, नवम्बर १९३६ में 'मदारी' नामक पत्रिका में [[महात्मा गांधी]] की ओर संकेत करते हुए<ref>[https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/1990/April/Ajkal_1990_April_pdf.pdf विदग्ध-वाक् पंओ देवीदत्त शुक्त की हिन्दीधारिता] (सरस्वती पत्रिका, जनवरी १९४१ अंक)</ref>
* हिंदी की प्रतिस्पर्धा स्थानीय भाषाओं से नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही देश सशक्त होगा। ... प्रधानमंत्री मोदी ने 10 भाषाओं में इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रम शुरू करने की पहल की है और जल्द ही ये पाठ्यक्रम सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे। वह क्षण स्थानीय भाषाओं और आधिकारिक भाषाओं के उत्थान की शुरुआत का प्रतीक होगा। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], राजभाषा पर संसद की समिति की 38वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए (4 अगस्त 2023)
* भारत वर्षों से ही विविध भाषाओं का देश रहा है और हिंदी को एक जनतांत्रिक भाषा के रूप में माना जाता है। इसने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ कई वैश्विक भाषाओं को सम्मान देने का भी काम किया है।... हिंदी भाषा ने देश की स्वतंत्रता के दौरान देशवासियों को एकसूत्र में बांधने और अनेक भाषाओं में बंटे देश में एकता की भावना को स्थापित करने का भी काम किया था।... हमारी सभी भारतीय भाषाएं और बोलियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और हमें इसे लेकर चलना है। हिंदी की किसी भी भाषा न कभी स्पर्धा थी और न कभी होगी। हमारी सभी भाषाओं को सशक्त करने से एक ही सशक्त राष्ट्र बनेगा और मुझे यकीन है कि हिंदी सभी भाषाओं को सशक्त बनाने का काम करेगी। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बोधन में
* मेरी कामना है कि हिंदी भाषा राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की डोर को निरंतर मजबूत करती रहे।''' भारतीय प्रधानमन्त्री [[नरेन्द्र मोदी]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बन्धी एक सोसल मिडिया पोस्ट में
* तमिलनाडु में हमारे लिए हिन्दी न जानना बहुत ही बड़ी बाधा हो जाती है। हमारे लिए हिन्दी सीखना 'स्मार्ट' है। -- [[श्रीधर वम्पू]], तमिलनाडु में जन्मे जोहो के संस्थापक एवं प्रसिद्ध उद्योगपति<ref>[https://panchjanya.com/2025/02/27/393047/bharat/tamil-nadu/hindi-v-controversy-zoho-founder-urges-hindi-learning/ तमिलनाडु के उद्योगपतियों ने सरकार से कहा “हिन्दी को पढ़ाने दें!”]</ref>
* कड़वी सच्चाई है कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, लेकिन सरकारी विभागों में हिंदी में काम करने का दिखावा हो रहा है। अधिकतर अफसरशाही अंग्रेजी में काम कर रहे हैं। हिंदी का पत्रकार परिचय-पत्र अंग्रेजी में बनाकर पेश करता है। जबकि लोगों को समझना चाहिए कि जब चुनाव होता है तो नेता हिंदी में जनता से संवाद करते हैं। क्योंकि उन्हें पता है भारत में अंग्रेजी में बात करके लोगों से जुड़ा नहीं जा सकता। हमें तो हिंदी में काम करने पर गर्व होता है। देहरादून कॉलेज में था, तभी संकल्प लिया था कि अपना हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे। राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण की 10 साल बाद हिंदी में वेबसाइट बनवाया। हिंदी दिवस मनाना शुरू किया। अब हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित किए जाने से कर्मचारी भी खुश हैं। अब प्राधिकरण का विधि उपनियम हिंदी में बनाकर वेब साइट पर डाला जा रहा है। -- तरुण विजय, अध्यक्ष, राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण
* साहित्य अकादमी के साथ काम करते हुए यह अनुभव किया है कि हिंदी देश की 24 क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पुल है। गुजराती भाषा की पुस्तक का मणिपुरी में सीधा अनुवाद कराना आसान नहीं है। लेकिन गुजराती से हिंदी में अनुवाद कराने के बाद हिंदी से मणिपुरी में अनुवाद आसानी से हो जाता है। करीब सभी क्षेत्रीय साहित्यकारों के लिए हिंदी समझना आसान है। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बनकर उभरी है। विदेशी शक्तियां भारत में व्यापार करने के लिए अपने लोगों को हिंदी सिखा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी में भाषण देकर वैश्विक पटल पर हिंदी का दबदबा और बढ़ा दिया है। देश में करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। दुनिया में कई देशों की इतनी आबादी है। अब बिना देर किए संयुक्त राष्ट्र को हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता देनी चाहिए। -- के. श्रीनिवासराव, सचिव, साहित्य अकादमी
* भारत बहुभाषायी देश है, लंबे समय से हिंदी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता ने अहम भूमिका अदा की है। यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है, इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद 14 सितम्बर सन् 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज लगभग प्रत्येक कार्यालय में एक राजभाषा विभाग है, जो राजभाषा हिंदी में काम करने के लिए नीतियों, नियमों और पुरस्कार प्रोत्साहन आदि की न केवल जानकारी प्रदान करता है, बल्कि कार्यालयों के सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए तत्पर है। दिल्ली हिंदी भाषी क्षेत्र है। हिंदी में काम करना हमारा संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है। हिंदी बहुआयामी भाषा है इसकी खूबी है कि ये सभी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। हिंदी में काम करना बहुत सरल है क्योंकि जो बोलना है वही लिखना है। आप अपनी बात आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी दूसरे स्थान पर है। हमारी रेलवे में भी हिंदी में बहुत कार्य किया जा रहा है, विशेष रूप से स्टेशनों पर। हिंदी का प्रचार प्रसार बढ़ाने में राजभाषा विभाग भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। -- डिंपी गर्ग, दिल्ली रेल मंडल प्रबंधक
=== महात्मा गांधी ===
* राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।
* अगर हिन्दुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ, दलितों के लिए होना है तो जन-सामान्य की भाषा हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा।
* हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है।
* हिंदुस्तान के लिए [[देवनागरी लिपि]] का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।
* जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। ... यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। वस्तुतः गुजराती या बंगला या मराठी की तर्ज पर हिंदी को किसी प्रदेश विशेष की भाषा कहना, उसके कद को छोटा करना होगा। -- मार्च 1918 में इंदौर में सम्पन्न हुए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अधिवेशन के सभापति के रूप में
* सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होना चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होना चाहिये। हिन्दू-मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए हिन्दुस्तानियों को इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।
* भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाय या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊंचे से ऊंचा चिन्तन नहीं कर सकता।
* राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ।
* हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
* अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।
* राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।
===अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ===
* जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला।
: जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला।
: उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी।
: उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी।
: क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।
: दो सूबों के भिन्न भिन्न बोली वाले जन।
: जब करते हैं खिन्न बने, मुख भर अवलोकन।
: जो भाषा उस समय काम उनके है आती।
: जो समस्त भारत भू में है समझी जाती।
: उस अति सरला उपयोगिनी हिन्दी भाषा के लिए।
: हम में कितने हैं जिन्होंने तन मन धान अर्पण किए।
: गुरु गोरख ने योग साधाकर जिसे जगाया।
: औ कबीर ने जिसमें अनहद नाद सुनाया।
: प्रेम रंग में रँगी भक्ति के रस में सानी।
: जिस में है श्रीगुरु नानक की पावन बानी।
: हैं जिस भाषा से ज्ञान मय आदि ग्रंथसाहब भरे।
: क्या उचित नहीं है जो उसे निज सर आँखों पर धारे।
: करामात जिसमें है चंद-कला दिखलाती।
: जिसमें है मैथिल-कोकिल-काकली सुनाती।
: सूरदास ने जिसे सुधामय कर सरसाया।
: तुलसी ने जिसमें सुर-पादप फलद लगाया।
: जिसमें जग पावन पूत तम रामचरित मानस बना।
: क्या परम प्रेम से चाहिए उसे न प्रति दिन पूजना।
: बहुत बड़ा, अति दिव्य, अलौकिक, परम मनोहर।
: दशम ग्रंथ साहब समान बर ग्रंथ बिरच कर।
: श्रीकलँगीधार ने जिसमें निज कला दिखाई।
: जिसमें अपनी जगत चकित कर ज्योति जगाई।
: वह हिन्दी भाषा दिव्यता-खनि अमूल्य मणियों भरी।
: क्या हो नहिं सकती है सकल भाषाओं की सिर-धारी।
: यह कविता हिन्दी को माँ के समान बताते हुए, उसे पूरे भारत की समझी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित करती है और गोरख, कबीर, नानक, सूर, और तुलसी जैसे महान संतों व कवियों की साहित्यिक विरासत से जोड़कर उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव को व्यक्त करती है।
=== हिन्दी की विकासयात्रा पर उद्धरण ===
* कोई कहानी ऐसी कहिये कि जिसमें हिंदो को छुट और किसी बोली की पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली रूप खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उनके बीच में न हो। हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। जितने भले लोग आपस में बोलते-चलाते हैं, ज्यों का त्यों डोल रहे और छाँह किसी की न दे। -- इंशाअल्ला खाँ, 'रानी केतकी की कहानी' की भाषा के सम्बन्ध में
* हमारे मत में हिंदी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिंदी इस देश के हिंदू वालते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिंदुओं की बोलचाल है। हिंदी में संस्कृत के शब्द बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी फारसी के। परन्तु कुछ आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के शब्दों के बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हों। -- राजा लक्ष्मण सिंह, संस्कृत महाकाव्य "रघुवश" के अनुवाद के प्राक्कथन में
* हिन्दी नई चाल से ढली सन् १८७३ ई०। -- [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]
* समय के साथ, [[संस्कृत]] से प्राकृत भाषाए विकसित हुईं, जो आम जनता की बोलचाल की भाषाएं थीं। -- डॉ भोलानाथ तिवारी की पुस्तक “भारतीय भाषाओं का इतिहास”
* प्राकृत से आगे चलकर अपभ्रंश (लगभग 6ठी से 12वीं शताब्दी) का विकास हुआ, जो हिंदी और अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार बनी। अपभ्रंश में शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी जैसी बोलियां शामिल थीं। -- ग्रियर्सन के अध्ययन और केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* उत्तरी भारत में, विशेष रूप से दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के क्षेत्र में, शौरसेनी अपभ्रंश से हिंदी की प्रारंभिक बोलियाँ जैसे खड़ी बोली, ब्रज, अवधी और भोजपुरी उभरीं। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास”
* 10वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान मुस्लिम शासकों (दिल्ली सल्तनत और मुगल काल) के प्रभाव से हिंदी में फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों का समावेश हुआ. इससे हिंदुस्तानी भाषा का विकास हुआ, जो हिंदी और उर्दू का साझा रूप थी। -- सतीश चंद्रा की पुस्तक “मध्यकालीन भारत का इतिहास”
* भक्ति और सूफी आंदोलनों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया। कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे कवियों ने अवधी, ब्रज और अन्य बोलियों में साहित्य रचकर हिंदी को समृद्ध किया। -- हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक “हिंदी साहित्य का आदिकालीन इतिहास”
* 18वीं शताब्दी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया गया। इसे दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बोला जाता था। -- नंददुलारे वाजपेयी की पुस्तक “आधुनिक हिंदी साहित्य”
* मुगल दरबारों और बाजारों में हिंदुस्तानी के रूप में इसका प्रयोग बढ़ा। -- “द कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया”
* ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं शताब्दी में हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ मानकीकृत करने का प्रयास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र को “आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक” माना जाता है, जिन्होंने खड़ी बोली में नाटक, कविता और निबंध लिखे। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
* 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया। महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने की वकालत की। -- “द नेशनल मूवमेंट इन इंडिया”
* प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और अन्य लेखकों ने खड़ी बोली में उपन्यास, कहानी और कविता लिखकर हिंदी को आधुनिक साहित्यिक भाषा बनाया। -- साहित्य अकादमी और नंददुलारे वाजपेयी
* 20वीं शताब्दी में हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो और बाद में टेलीविजन ने हिंदी के प्रसार को बढ़ाया। -- “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स
* हिंदी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली प्रमुख भाषा बनी। -- केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* 21वीं शताब्दी में इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे मंचों ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। -- “स्टैटिस्टिता” और “गूगल ट्रेंड्स” के आंकड़ों के अनुसार
* हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स और बॉलीवुड ने भी हिंदी के प्रसार में योगदान दिया। -- “द टाइम्स ऑफ इंडिया” और “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स के अनुसार
* वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य संगठनों ने हिंदी के शब्दकोश, व्याकरण और शब्दावली को मानकीकृत करने में मदद की।
* हिंदी का विकास जनता के बीच संचार की जरूरत से हुआ। -- डॉ भोलानाथ तिवारी के अध्ययनों के अनुसार
* २०१४ के बाद भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व काल में सभी मंचों पर हिन्दी में विचारविमर्श को अत्यधिक बढ़ावा मिला।
==इन्हें भी देखें==
* [[हिन्दी साहित्य]]
* [[देवनागरी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भाषा]]
==बाह्य सूत्र==
{{wikipedia}}
*[http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2009/hindi.htm हिंदी के विषय में विदेशियों के विचार] - बदरीनारायण तिवारी
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:हिन्दी]]
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'''[[:w:अनुवाद|अनुवाद]]''' शब्द [[संस्कृत]] का यौगिक शब्द है जो ‘अनु’ [[उपसर्ग]] तथा ‘वाद’ के संयोग से बना है। संस्कृत के ‘वद्’ धातु में ‘घञ’ [[प्रत्यय]] जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है ‘वाद’। ‘वद्’ धातु का अर्थ है ‘बोलना या कहना’ और ‘वाद’ का अर्थ हुआ ‘कहने की क्रिया’ या ‘कही हुई बात’।
‘अनु’ उपसर्ग अनुवर्तिता के अर्थ में व्यवहृत होता है। ‘वाद’ में यह ‘अनु’ उपसर्ग जुड़कर बनने वाला शब्द ‘अनुवाद’ का अर्थ हुआ-’प्राप्त कथन को पुनः कहना’। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि ‘पुनः कथन’ में अर्थ की पुनरावृत्ति होती है, शब्दों की नहीं।
हिन्दी में अनुवाद के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले अन्य शब्द ये हैं : छाया, टीका, उल्था, भाषान्तर आदि। अन्य भारतीय भाषाओं में ‘अनुवाद’ के समानान्तर प्रयोग होने वाले शब्द हैं : '''भाषान्तर''' (संस्कृत, कन्नड़, मराठी), '''तर्जुमा''' (कश्मीरी, सिन्धी, उर्दू), '''विवर्तन''' (मलयालम), '''मोषिये चर्ण्यु''' (तमिल), '''अनुवादम् '''(तेलुगु), अनुवाद (संस्कृत, हिन्दी, असमिया, बांग्ला, कन्नड़, ओड़िआ, गुजराती, पंजाबी, सिंधी)।
== कथन ==
* ''ज्ञातस्य कथनमनुवादः'' -- जैमिनिन्यायमाला
: ज्ञात का (पुनः) कथन अनुवाद है।
* ''विधिविहितस्यानुवचमनुवादः'' -- न्यायसूत्र
: विधि तथा विहित का पुनः कथन अनुवाद है।
* '''सामगान ऋग्यजुनव्या उत्तस्तस्यायमनुवादः'' -- [[मनुस्मृति]] के प्रसिद्ध टीकाकार [[कुमार भट्ट]] (४-४२४ पर)
* ''प्राप्तस्य पुनः कथनमनुवादः'' -- शब्दार्थ चिन्तामणि
: पहले कहे गये अर्थ ग्रहण कर उसको पुनः कहना अनुवाद है।
*''ज्ञातार्थस्य प्रतिपादनमनुवादः'' -- शब्दार्थ चिन्तामणि
: किसी के द्वारा कहे गये को भलीभाँति समझ कर उसका विन्यास करना अनुवाद है।
* ''आवृत्तिरनुवादो वा''' -- भर्तृहरि, वाक्यपदीयम्
: पुनरावर्तन ही अनुवाद है।
* ''अवगतार्थस्य प्रतिपादनमनुवादः'' -- भट्टोजि दीक्षित, सिद्धान्तकौमुदी में
: 'ज्ञात तथ्य की प्रस्तुति' अनुवाद है।
* ''प्रयोजनवान् पुनःकथनमनुवादः'' -- वात्स्यायन भाष्य
: पहले कही गई बात को उद्देश्यपूर्ण ढंग से पुनः कहना ही अनुवाद माना गया है।
* लेखक होना सरल है, किन्तु अनुवादक होना अत्यन्त कठिन है। -- मामा वरेरकर
* समस्त अभिव्यक्ति अनुवाद है क्योंकि वह अव्यक्त (या अदृश्य आदि) को भाषा (या रेखा या रंग) में प्रस्तुत करती है। -- सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन
* अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्थक अनुभव को एक भाषा समुदाय में संप्रेषित किया जाता है। -- पटनायक
* भाषा भेद के विशिष्ट पाठ को दूसरी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत करना अनुवाद है जिसमें वह मूल के भाषिक अर्थ, प्रयोग के वैशिष्ट्य को यथासंभव संरक्षित करते हुए दूसरी भाषा के पाठक को स्वाभाविक रूप से ग्राह्य प्रतीत हो। -- डॉ. सुरेश कुमार
* अनुवाद को दो संदर्भों में देखा जा सकता है- एक व्यापक और दूसरी, सीमित। व्यापक संदर्भ में अनुवाद को प्रतीक सिद्धांत के परिप्रेश्य में देखा जाता है। इस दृष्टि से मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि कथ्य का प्रतीकान्तरण अनुवाद है। अपने सीमित अर्थ में अनुवाद भाषा सिद्धांत का संदर्भ लेकर चलता है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि कथ्य का भाषांतरण अनुवाद है। -- प्रो० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव
* अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश के लिए लक्ष्य-भाषा में निकटतम सहज समतुल्य सन्देश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर । -- ई. ए. नाइडा (E. A. Naida)
* अनुवादक का कार्य निश्चित रूप से एक कठिन कार्य है और इसके लिये कोई धन्यवाद या प्रशंसा नहीं मिलता। अनुवादक यदि गलती करे तो उसकी बुरी तरह आलोचना होती है किन्तु वह सफल होता है तो उसकी प्रशंसा सादे शब्दों में कर दी जाती है। -- यूजीन अल्बर्ट नाइडा
* लेखक ने जो कुछ कहा है, अनुवादक को उसके अनुवाद का प्रयत्न तो करना ही है, जिस ढंग से कहा, उसके निर्वाह का भी प्रयत्न करना चाहिए। -- जॉन कनिंगटन
* एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापना ही अनुवाद है। -- कैटफोर्ड (Catford)
* मूल भाषा की पाठ्य सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना अनुवाद है। -- समुएल जानसन
* एक भाषा की पाठ्य सामग्री के तत्त्वों को दूसरी भाषा में स्थानान्तरित कर देना अनुवाद कहलाता है। यह ध्यातव्य है कि हम तत्त्व या कथ्य को संरचना (रूप) से हमेशा अलग नहीं कर सकते हैं। -- फॉरेस्टन
* अनुवाद एक सम्बन्ध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं। -- हैलिडे
* अनुवाद एक शिल्प है, जिसमें एक भाषा में व्यक्त सन्देश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। -- न्यूमार्क
* अनुवाद अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की वह शाखा है जिसका संबधं विशेष रूप से अर्थांतरण की समस्या से है. यह अर्थांतरण एक भाषा के सुसंबद्ध प्रतीकों में होता है। -- डार्ट (Dostert)
* अनुवाद एक श्रम-साध्य कला है जो किसी भी भाषा में मौलिक लेखन की अपेक्षा अधिक कठिन है... बेहतरीन अनुवाद वह है जो शाब्दिक न होकर प्रत्येक मूल भावना को, मूल लेख के प्रत्येक कथ्य पर समुचित ज़ोर देते हुए व्यक्त करे। -- डॉ [[राजेन्द्र प्रसाद]], डॉ. ज्ञानवती दरबार को 1960 में लिखे अपने पत्र में
* मेरा मानना है कि अनुवाद की वास्तविक कसौटी शब्दशः या वाक्यशः अनुवाद करना नहीं है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि यह कार्य कितना कठिन है और रोचक भी।... कठिनाई अनुवाद की नहीं, बल्कि एक भाषा के विचारों को दूसरी भाषा में अनूदित करने की है। क्या हमने अभिभाषणों का अनुवाद करते समय इन जटिलताओं का अनुभव नहीं किया है? -- डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. ज्ञानवती दरबार को 1960 में लिखे अपने पत्र में
* 'स्वराज्य' का कोई सम्यक अंग्रेजी अनुवाद नहीं है। -- [[महात्मा गांधी]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[भाषा]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://archive.org/details/fPaA_aioc-series-no.-60-anuvad-shastram-kavikulguru-kalidas-sanskrit-university-ramtek-collection/page/n1/mode/1up अनुवादशास्त्रम्] (कविकुलगुरु कालिदास विश्वविद्यालय, रामटेक)
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बहुभाषिकता
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"'''[[:w:बहुभाषिकता|बहुभाषिकता]] (Multilingualism) का अर्थ है एक व्यक्ति या लोगों के समूह द्वारा एक से अधिक भाषाओं का उपयोग करना। बहुभाषी का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो दो या अधिक भाषाओं..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''[[:w:बहुभाषिकता|बहुभाषिकता]] (Multilingualism) का अर्थ है एक व्यक्ति या लोगों के समूह द्वारा एक से अधिक भाषाओं का उपयोग करना। बहुभाषी का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो दो या अधिक भाषाओं का प्रयोग करता है। विश्व में बहुभाषी लोगों की संख्या एकभाषियों की तुलना में बहुत अधिक है। विद्वानों का मत है कि द्विभाषिकता किसी भी व्यक्ति के ज्ञान एवं व्यक्तित्व के विकास के लिये बहुत उपयोगी है।
जब भाषाएँ केवल दो होती हैं, तो इसे सामान्यतः '''द्विभाषिकता''' (Bilingualism) कहा जाता है।
== उद्धरण ==
* ''कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी।'' -- भारत में प्रसिद्ध कहावत
* मनुष्यों में एक विशेष तंत्र होता है जिसे वे भाषा अर्जन उपकरण (Language Acquisition Device) कहते हैं। यह एक ऐसी प्रणाली है जो सीखने वाले को अपने आसपास के वक्ताओं द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा के नियमों और अन्य विशेषताओं को सही ढंग से पुनः निर्मित करने में सक्षम बनाती है। चॉम्स्की के अनुसार यह तंत्र समय के साथ कमजोर हो जाता है और सामान्यतः किशोरावस्था (puberty) तक सक्रिय नहीं रहता। इसी कारण वे यह समझाते हैं कि कई किशोरों और वयस्कों को दूसरी भाषा (L2) के कुछ पहलुओं को सीखने में अपेक्षाकृत कम सफलता मिलती है। -- भाषाविद् [[नोआम चाम्सकी|नोम चॉम्स्की]] (Noam Chomsky)
* गर्भ में ही बच्चा आवाज के अंतर को उतने ही ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझता है, जितने ज्यादा तरीके के शब्द वह सुनता रहता है। अगर मां गर्भ में पल रहे अपने बच्चे से ज्यादा से ज्यादा बातचीत करे और अलग-अलग भाषाओं का इस्तेमाल करें, तो इसका भी बेहतर असर बच्चे के विकास पर पड़ता है। -- डॉक्टर कार्ल्स एस्केरा, बार्सिलोना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर
* परिवार में बोली जाने वाली भाषा बच्चे की न्यूरल कोडिंग को मॉड्यूलेट करती है। बच्चे से बात करने वाले लोग जितना ज्यादा भाषाओं में बात करेंगे, बच्चे का दिमाग उतना ही ज्यादा विकसित होगा । -- डॉक्टर कार्ल्स एस्केरा, बार्सिलोना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर
==इन्हें भी देखें==
*[[भाषा]]
*[[मातृभाषा]]
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'''[[:w:बहुभाषिकता|बहुभाषिकता]]''' (Multilingualism) का अर्थ है एक व्यक्ति या लोगों के समूह द्वारा एक से अधिक [[भाषा]]ओं का उपयोग करना। बहुभाषी का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो दो या अधिक भाषाओं का प्रयोग करता है। विश्व में बहुभाषी लोगों की संख्या एकभाषियों की तुलना में बहुत अधिक है। विद्वानों का मत है कि द्विभाषिकता किसी भी व्यक्ति के ज्ञान एवं व्यक्तित्व के विकास के लिये बहुत उपयोगी है।
जब भाषाएँ केवल दो होती हैं, तो इसे सामान्यतः '''द्विभाषिकता''' (Bilingualism) कहा जाता है।
== उद्धरण ==
* ''कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी।'' -- भारत में प्रसिद्ध कहावत
* मनुष्यों में एक विशेष तंत्र होता है जिसे वे भाषा अर्जन उपकरण (Language Acquisition Device) कहते हैं। यह एक ऐसी प्रणाली है जो सीखने वाले को अपने आसपास के वक्ताओं द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा के नियमों और अन्य विशेषताओं को सही ढंग से पुनः निर्मित करने में सक्षम बनाती है। चॉम्स्की के अनुसार यह तंत्र समय के साथ कमजोर हो जाता है और सामान्यतः किशोरावस्था (puberty) तक सक्रिय नहीं रहता। इसी कारण वे यह समझाते हैं कि कई किशोरों और वयस्कों को दूसरी भाषा (L2) के कुछ पहलुओं को सीखने में अपेक्षाकृत कम सफलता मिलती है। -- भाषाविद् [[नोआम चाम्सकी|नोम चॉम्स्की]] (Noam Chomsky)
* गर्भ में ही बच्चा आवाज के अंतर को उतने ही ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझता है, जितने ज्यादा तरीके के शब्द वह सुनता रहता है। अगर मां गर्भ में पल रहे अपने बच्चे से ज्यादा से ज्यादा बातचीत करे और अलग-अलग भाषाओं का इस्तेमाल करें, तो इसका भी बेहतर असर बच्चे के विकास पर पड़ता है। -- डॉक्टर कार्ल्स एस्केरा, बार्सिलोना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर
* परिवार में बोली जाने वाली भाषा बच्चे की न्यूरल कोडिंग को मॉड्यूलेट करती है। बच्चे से बात करने वाले लोग जितना ज्यादा भाषाओं में बात करेंगे, बच्चे का दिमाग उतना ही ज्यादा विकसित होगा । -- डॉक्टर कार्ल्स एस्केरा, बार्सिलोना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर
==इन्हें भी देखें==
*[[भाषा]]
*[[मातृभाषा]]
pb9gj43olkxo86i5zbzcj5wfe2mle7o
देवनागरी लिपि
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9285
33053
2026-07-18T01:52:24Z
अनुनाद सिंह
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[[देवनागरी]] को अनुप्रेषित
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wikitext
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#पुनर्प्रेषित [[देवनागरी]]
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