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विधि
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अनुनाद सिंह
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कोई कार्य पूरा करने के लिये जो प्रक्रिया अपनायी जाती है, उसे उस कार्य की '''विधि''' कहते हैं।
* वेद के ५ विभाग है - विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध, अर्थवाद ।
'''विधि''' - अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः (अग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकामः)
मीमांसादर्शन में याज्ञिक विचार की दृष्टि से विधि के चार भेद माने गये हैं - (१) उत्पत्तिविधि,. (२) गुणविधि या विनियोगविधि, (३) अधिकारविधि. और ( ४ ) प्रयोगविधि ।
'''उत्पत्तिविधि''' - कर्मस्वरुपमात्रबोधकोविधिः ( अग्निहोत्रं जुहोति )
'''विनियोगविधि''' - अङ्गप्रधानसम्बन्धबोधको विधिः (दध्ना जुहोति)
'''अधिकार विधि''' - कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधको विधिः (यजेत् स्वर्गकामः)
'''प्रयोगविधि''' - प्रयोगप्राशुभावबोधको विधिः
== उक्तियाँ ==
* ''अज्ञातस्याऽनुष्ठेयत्वकथनं विधिः'' -- जैमिनीयन्यायमालाविस्तरः, प्रथमाध्याय
: विधि का अर्थ है किसी अज्ञात या अनिश्चित कार्य को करने के लिए निर्देश देना या विधान करना।
* ''उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
: ''शूरं कृतज्ञं दृढसौह्रदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः ॥
: जो व्यक्ति उत्साही है, शीघ्र कार्य सम्पन्न करने वाला है, व्यापार मे कुशल है, व्यसनों से दूर रहने वाला है, शूर, कृतज्ञ तथा मित्रता निभाने वाला होता है, धन संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी स्वयं ऐसे गुणसम्पन्न व्यक्ति के यहां निवास करने की इच्छा रखती हैं।
* ''प्रागेव विग्रहो न विधिः ।'' -- [[पंचतन्त्र]]
: पहले ही ( बिना साम, दान , दण्ड का सहारा लिये ही ) युद्ध करना कोई (अच्छा) तरीका नहीं है ।
* अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः
==इन्हें भी देखें==
*[[उपाय]]
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लक्ष्मी
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अनुनाद सिंह
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* ''उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
: ''शूरं कृतज्ञं दृढ़सौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः॥'' -- [[हितोपदेश]]
: जो हमेशा उत्साह से भरे रहते हैं, किसी कार्य में देर नहीं करते, क्रियाविधि के ज्ञाता होते हैं, व्यसनों से दूर रहते हैं, साहसी होते हैं, कृतज्ञ होते हैं, दृढ़ निश्चयी होते हैं और सुन्दर हृदय ( सबको चाहने वाले ) होते हैं उनके पास लक्ष्मी स्वयं चल कर रहने के लिए आती हैं ।
* ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी
: ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: ''यत्नेकृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्रदोषः॥'' -- [[भर्तृहरि]]
: लक्ष्मी कर्म करने वाले पुरुषरूपी सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ऐसा तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो देखो क्या समस्या है (कोई और समस्या तो नहीं?)।
* ''यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्य विहीनता ।
: ''नयविक्रम संयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम् ॥'' -- [[पञ्चतन्त्र]]
: जहाँ उत्साह है, आरम्भ (पहल) है, और आलस्य नहीं है, नय (नीति) और पराक्रम का समुचित समन्वय है, वहाँ से लक्ष्मी कहीं और नहीं जाती, यह निश्चित है।
* ''शूरं त्यजामि वैधव्यादुदारं लज्जया पुनः ।
: ''सापत्न्यात्पण्डितमपि तस्मात्कृपणमाश्रये ॥'' -- सुभाषितरत्नाकर (स्फुट)
: भावार्थ : (लक्ष्मी कहतीं हैं कि) मैं विधवा होने के डर से शूरवीर व्यक्तियों का वरण नहीं करती हूँ, उदारहृदय व्यक्तियों के साथ रहने मे मुझे लज्जा आती है (कि वे कहीं मुझे किसे अन्य व्यक्ति को न दे दें ) तथा किसी विवाहित विद्वान के साथ भी रहना नहीं चाहती हूँ। इसीलिये मैं एक कृपण व्यक्ति के आश्रय में ही रहती हूँ।
* ''सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।
: ''अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
: लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती है। कीर्ति त्याग के पीछे जाती है। विद्या अभ्यास से ही प्राप्त होती है और बुद्धि पर कर्म का ही अंकुश रहता है।
* ''अव्यवसायिनमलसं दैवपरं साहसाच्च परिहीनम् ।
: ''प्रमदेव हि वृद्धपतिं नेच्छत्युपगूहितुं लक्ष्मीः ॥'' -- हितोपदेश, सुहृद्भेद, ४
: जिस प्रकार नवयुवती वृद्ध पति को नहीं चाहती, वैसे ही उद्योग रहित, आलसी, "भाग्य में जो लिखा है, सो होगा”–ऐसा कहने वाले मनुष्य के निकट लक्ष्मी निवास नहीं करना चाहती ।
* जहां मूर्ख पूजे नहीं जाते, अन्न संचित रहता है और जहां पत्नी-पति में कलह नहीं होता वहाँ लक्ष्मी आप ही आकर आसन जमाती है। -- [[कालिदास]]
* ''व्यापारे वसते लक्ष्मी ।
: व्यापार में लक्ष्मी वसती हैं।
* ''साहसे खलु श्री वसति।
: साहस में ही लक्ष्मी का वास होता है।
* ''यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्य विहीनता ।
: ''नयविक्रम संयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम् ॥'' -- पञ्चतन्त्र
: जहाँ उत्साह है, आरम्भ (पहल) है, और आलस्य नहीं है, नय (नीति) और पराक्रम का समुचित समन्वय है, वहाँ से लक्ष्मी कहीं और नहीं जाती, यह निश्चित है।
* ''सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।
: ''सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥'' -- वाल्मीकि रामायण
: संसार में सत्य ही ईश्वर है। सत्य ही लक्ष्मी (= धन-धान्य) का निवास है। सत्य ही सभी (अच्छाइयों) का मूल है। संसार में सत्य से बढ़कर और कोई परम पद नहीं है।
* आलस्य में दरिद्रता का वास हैं और परिश्रम में लक्ष्मी बसती हैं। -- संत तिरूवल्लुवर
* लक्ष्मी थिर न रहीम कह, यह जानत सब कोय।
: पुरष पुरातन की वधू, क्यों न चंचला होय॥ -- [[रहीम]]
: लक्ष्मी स्थिर नहीं है, यह सभी लोग जानते हैं। पुरुष पुरातन (विष्णु ; बूढ़े व्यक्ति) की पत्नी क्यों चंचला न होगी?
== लक्ष्मी स्तुति ==
: ''या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
: ''या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
: ''या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
: ''सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥
=== लक्ष्मी सूक्त ===
<poem>
पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
हे लक्ष्मी देवी! आप कमलमुखी, कमल पुष्प पर विराजमान, कमल-दल के समान नेत्रों वाली, कमल पुष्पों को पसंद करने वाली हैं। सृष्टि के सभी जीव आपकी कृपा की कामना करते हैं। आप सबको मनोनुकूल फल देने वाली हैं। हे देवी! आपके चरण-कमल सदैव मेरे हृदय में स्थित हों।
पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्॥
हे लक्ष्मी देवी! आपका श्रीमुख, ऊरु भाग, नेत्र आदि कमल के समान हैं। आपकी उत्पत्ति कमल से हुई है। हे कमलनयनी! मैं आपका स्मरण करता हूं, आप मुझ पर कृपा करें।
अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने।
धनं मे जुष तां देवि सर्वांकामांश्च देहि ॥
हे देवी! अश्व, गौ, धन आदि देने में आप समर्थ हैं। आप मुझे धन प्रदान करें। हे माता! मेरी सभी कामनाओं को आप पूर्ण करें
पुत्र पौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम्।
प्रजानां भवसी माता आयुष्मंतं करोतु मे॥
हे देवी! आप सृष्टि के समस्त जीवों की माता हैं। आप मुझे पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, हाथी-घोड़े, गौ, बैल, रथ आदि प्रदान करें। आप मुझे दीर्घ-आयुष्य बनाएँ।
धनमाग्नि धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसु।
धन मिंद्रो बृहस्पतिर्वरुणां धनमस्तु मे॥
हे लक्ष्मी! आप मुझे अग्नि, धन, वायु, सूर्य, जल, बृहस्पति, वरुण आदि की कृपा द्वारा धन की प्राप्ति कराएं।
वैनतेय सोमं पिव सोमं पिवतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥
हे वैनतेय पुत्र गरुड़! वृत्रासुर के वधकर्ता, इंद्र, आदि समस्त देव जो अमृत पीने वाले हैं, मुझे अमृतयुक्त धन प्रदान करें।
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्॥
इस सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती, वे सत्कर्म की ओर प्रेरित होते हैं।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गंधमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरी प्रसीद मह्यम्॥
हे त्रिभुवनेश्वरी! हे कमलनिवासिनी! आप हाथ में कमल धारण किए रहती हैं। श्वेत, स्वच्छ वस्त्र, चंदन व माला से युक्त हे विष्णुप्रिया देवी! आप सबके मन की जानने वाली हैं। आप मुझ दीन पर कृपा करें।
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम॥
भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी, माधवप्रिया, भगवान अच्युत की प्रेयसी, क्षमा की मूर्ति, लक्ष्मी देवी मैं आपको बारंबार नमन करता हूं।
महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
हम महादेवी लक्ष्मी का स्मरण करते हैं। विष्णुपत्नी लक्ष्मी हम पर कृपा करें, वे देवी हमें सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त करें।
चंद्रप्रभां लक्ष्मीमेशानीं सूर्याभांलक्ष्मीमेश्वरीम्।
चंद्र सूर्याग्निसंकाशां श्रिय देवीमुपास्महे॥
जो चंद्रमा की आभा के समान शीतल और सूर्य के समान परम तेजोमय हैं उन परमेश्वरी लक्ष्मीजी की हम आराधना करते हैं।
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाभिधाच्छ्रोभमानं महीयते।
धान्य धनं पशु बहु पुत्रलाभम् सत्संवत्सरं दीर्घमायुः॥
इस लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने से व्यक्ति श्री, तेज, आयु, स्वास्थ्य से युक्त होकर शोभायमान रहता है। वह धन-धान्य व पशु धन सम्पन्न, पुत्रवान होकर दीर्घायु होता है।
</poem>
=== शुकनासोपदेश में लक्ष्मी के चरित्र के बारे में उपदेश ===
: ''...हे प्रजा का कल्याण चाहने वाले (राजकुमार), पहले लक्ष्मी (की प्रकृति) को ही देखें। यह लक्ष्मी योद्धाओं एवं शस्त्रों के समूह रूपी कमल पर भ्रमण करने वाली मधुमखी है। वह क्षीरसागर से निकली है (और अपने साथ निकलने वाले अन्य वस्तुओं के गुण उसने धर लिये हैं।) उसने पारिजात वृक्ष के पल्लवों से लाल रंग (आनन्द के लिये आकर्षण का गुण) ले लिया, चन्द्रमा की कला उसकी एकान्तवक्रता ले ली, उच्चैःश्रवा से उसकी चंचलता ग्रहण कर लिया, कालकूट से मोहने की शक्ति और मदिरा (वारुणी) से उसका मद ले लिया, कौस्तुभ मणि से उसकी कठोरता (निठुरता) ले ली। इस प्रकार की दूसरी अपरिचित वस्तु संसार में और कोई नहीं है जैसी यह अनार्या है। यह पाकर भी दुःख से बचाई जाती है। सन्धिविग्रहादि दृढ़ बन्धनों से बाँधकर निश्चल की गई भी यह पलायन कर जाती है। उत्कट अभिमानी योद्धाओं की उठाई गई हजारों तलवारों के समूहरूपी पिंजड़े में बन्दी करके रखी गई भी (यह अनार्या लक्ष्मी) गायब होती जाती है। मदजल की निरन्तर होने वाली वर्षा के कारण दुर्दिन जैसा अन्धकार बना देने वाली हाथियों की घनी घटाओं से घिरी हुई भी भाग जाती है। (यह दुष्टा लक्ष्मी) जान पहिचान की रक्षा नहीं करती, उत्तम कुल का भी ध्यान नहीं रखती, सुन्दरता को नहीं देखती, कुलक्रम का अनुगमन नहीं करती, शील को नहीं देखती, पाण्डित्य को नहीं गिनती, शास्त्रों के (ज्ञान) को नहीं सुनती, धर्म का अनुरोध नहीं करती, त्याग का आदर नहीं करती, विशेषज्ञता को नहीं विचारती, आचरण का पालन नहीं करती, सत्य को नहीं जानती, सामुद्रिक शास्त्रानुसार छत्रचामरादि चिह्नों को भी प्रमाणित नहीं करती है। गन्धर्व नगरलेखा की भाँति देखते-देखते यह नष्ट हो जाती है।'' -- [[बाणभट्ट]] कृत कादम्बरी (के 'शुकनासोपदेश' में)
==इन्हें भी देखें==
* [[धन]]
2o2i5hu5q2qd5admr3wnn6u8ndrkvj2
पञ्चतन्त्र
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2026-07-27T05:35:36Z
अनुनाद सिंह
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[[पंचतंत्र]] को अनुप्रेषित
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wikitext
text/x-wiki
#पुनर्प्रेषित [[पंचतंत्र]]
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