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भाग्य
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अनुनाद सिंह
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'''भाग्य''' अर्थात दैवयोग से बिना कुछ किये ही फल मिल जाना।
'''भाग्य''' (दैव, प्रारब्ध, नसीब) का अर्थ है बिना प्रयास के प्राप्त होने वाला फल। यह एक दार्शनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणा है, जिसमें यह विश्वास किया जाता है कि जीवन की कुछ घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती हैं या दिव्य योजना के अनुसार घटित होती हैं। किंतु भारत के कई दर्शन, ग्रंथ और विचारक यह मानते हैं कि भाग्य से अधिक महत्वपूर्ण '''[[पुरुषार्थ]]''' (कर्म और प्रयास) है।
; परिभाषा
* '''संस्कृत में''' – "दैवयोग" अर्थात ईश्वर की इच्छा या पूर्व जन्म का फल।
* '''हिन्दू दृष्टिकोण''' – प्रारब्ध के अनुसार भाग्य की बात होती है, किंतु कर्म को ही प्रमुख माना गया है।
* '''आधुनिक सोच''' – भाग्य से अधिक स्वयं का प्रयास, निर्णय और विवेक ही भविष्य निर्धारित करता है।
== उक्तियाँ ==
* '' उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी
:'' दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: '' दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: '' यत्नेकृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्रदोषः॥ -- [[भर्तृहरि]], नीतिशतक
: लक्ष्मी कर्म करने वाले पुरुषरूपी सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ऐसा तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो देखो क्या समस्या है (कोई और समस्या तो नहीं?)।
* ''विक्लवो वीर्यहीनो य: स दैवमनुवर्तते।
: ''वीराः संभावितात्मानो न दैवं पर्युपासते॥'' -- वाल्मीकिरामायणम् , अयोध्याकाण्ड
: बलहीन या कापुरुष ही भाग्य के भरोसे बैठा रहता है। स्वावलम्बी पुरुष कर्म के माध्यम से सब कुछ प्राप्त कर लेता है, वह केवल भाग्य के भरोसे नहीं बैठा रहता है।
* कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥ -- रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड
: (लक्ष्मणजी ने कहा-) यह दैव (भाग्य) तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं।
* वर्षों तक वन में घूम-घूम,
: बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
: सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
: पांडव आये कुछ और निखर।
: सौभाग्य न सब दिन सोता है,
: देखें, आगे क्या होता है। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']] , रश्मिरथी में
* "मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है।" — '''स्वामी रामतीर्थ'''
* "भाग्य पर वह भरोसा करता है, जिसमें पौरुष नहीं होता।" — '''प्रेमचंद'''
* "मृत अतीत को दफना दो, अनंत भविष्य तुम्हारे सामने है और स्मरण रखो कि प्रत्येक शब्द, विचार और कर्म तुम्हारे भाग्य का निर्माण करता है।" — '''स्वामी विवेकानन्द'''
* "ईश्वर या प्रारब्ध या भाग्य को कोसने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि अपमानजनक स्थिति में हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।" — '''सुभाषित'''
* "अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है।" — '''रामधारी सिंह 'दिनकर'''
* "अपने पुरुषार्थ से अर्जित ऐश्वर्य का ही दूसरा नाम सौभाग्य है।" — '''अज्ञात'''
* विचार सारे भाग्य का प्रारंभिक बिंदु है। -- नेपोलियन हिल
* भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर भाग्य सोया रहता है, और साहसपूर्वक खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है।
* ईश्वर या प्रारब्ध या भाग्य को कोसने से कोई लाभ नहीं क्योंकि अपने को अपमान और लांछना की स्थिति में ला पटकने की सारी जिम्मेदारी हमारी है। -- सुभाषित
* मृत अतीत को दफना दो, अनंत भविष्य तुम्हारे सामने है और स्मरण रखो कि प्रत्येक शब्द, विचार और कर्म तुम्हारे भाग्य का निर्माण करता है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* जो कुछ भी होता है, वह अच्छे के लिए होता है। ईश्वर के पास हमेशा एक बेहतर योजना होती है। -- अज्ञात
* अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है॥ -- रामधारी सिंह 'दिनकर'
* अपने पुरुषार्थ से अर्जित ऐश्वर्य का ही दूसरा नाम सौभाग्य है। -- अज्ञात
* भाग्य साहसी मनुष्य की सहायता करता है। -- वर्जिल
* प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य एक बार अवश्य उदय होता है। यह बात अलग है कि वह उसका कितना लाभ उठाता है। -- भृगु
* भाग्यचक्र लगातार घूमा करता है, कौन कह सकता है कि आज मैं उच्च शिखर पर पहुँच जाऊंगा। -- कन्फ्यूशस
* सौभाग्य दरवाजा खटखटाता है और पूछता है - "क्या समझदारी घर में मौजूद है ?"
* आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य है। -- पाल शिरट
* "विचार सारे भाग्य का प्रारंभिक बिंदु है।" — '''नेपोलियन हिल'''
* "भाग्य साहसी मनुष्य की सहायता करता है।" — '''वर्जिल'''
* "प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य एक बार अवश्य उदय होता है, यह बात अलग है कि वह उसका कितना लाभ उठाता है।" — '''भृगु'''
* "भाग्यचक्र लगातार घूमता है। कौन जानता है कि आज कौन शिखर पर पहुँच जाए।" — '''कन्फ्यूशियस'''
* "सौभाग्य दरवाजा खटखटाता है और पूछता है — क्या समझदारी घर में मौजूद है?" — '''अज्ञात'''
* "आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य है।" — '''पाल शिरट'''
* "जो कुछ भी होता है, वह अच्छे के लिए होता है। ईश्वर के पास हमेशा एक बेहतर योजना होती है।" — '''अज्ञात'''
== सन्दर्भ ==
* [[रामचरितमानस]]
* [[वाल्मीकि रामायण]]
* नीति शतक – भर्तृहरि
* स्वामी विवेकानन्द – 'कार्य और विचार'
* प्रेमचंद – निबंध संग्रह
* दिनकर – 'रश्मिरथी'
== इन्हें भी देखें ==
* [[कर्म]]
* [[पुरुषार्थ]]
* [[प्रेरणा]]
* [[धैर्य]]
* [[साहस]]
* [[धर्म]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://www.mlsu.ac.in/naac2023/3.4.4%20Offline%20Research%20Publications/Journals/J-189%20%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%20%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4%20%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE.pdf संस्कृत सुभाषित साहित्य में भाग्य की अवधारणा]
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पाणिनि
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'''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।
== उक्तियाँ ==
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]]
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
== पाणिनि पर उद्धरण ==
* ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ।
: ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है।
* ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ।
: ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है।
* ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
: ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥''
: अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है।
: भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।)
* ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ।
: ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥
: वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ।
* ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने-
: ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्।
: ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल-
: ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref>
: व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है?
* ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ।
: ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निबध्नन्ति किमत्र चित्रम् ॥
: विचारवान पाणिनि ने अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। इसमें आश्चर्य कैसा? जैसे भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, वैसे ही पाणिनि ने भी किया है।
* "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३)
* "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)*
== देखें भी ==
* [[अष्टाध्यायी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भारतीय दर्शन]]
* [[व्याकरण]]
* [[शब्द]]
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ]
* [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[Category:संस्कृत विद्वान]]
[[Category:भारतीय दर्शन]]
[[Category:वैयाकरण]]
[[Category:प्राचीन भारत]]
[[Category:शिक्षा]]
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