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राजा
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अनुनाद सिंह
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'''राजा''' (king) जिसे नरेश, नरेन्द्र, भूपति आदि कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः ।
: ''विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत् ॥'' -- ऋग्वेद 10.173.1-2
: ऋग्वेद के इस मन्त्र में राजा के चुनाव की ओर संकेत किया गया है। यहां पर राजा से कहा गया है कि तुम राष्ट्र के अधिपति बनाए गए हो। तुम राष्ट्र के स्वामी और स्थिर मति , अटल विचर और दृढ़ कार्यों को करने वाले बनो। तुम्हारी प्रजा तुम्हारे प्रति अनुरक्त रहे और तुम्हारे राष्ट्र का अमंगल न हो। तुम पर्वत के समान अटल होकर यहां निवास करो। जैसे इन्द्र अविचलित रूप से रहते हैं उसी प्रकार तुम भी निश्चल होकर रहो तथा अपने राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने वाले बनो।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥'' -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व
: (भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि) काल राजा को बनाता है या राजा काल को? इसमें तुम कभी संशय मत करना। राजा ही काल को बनाता है। (जैसा राजा होगा, वैसा समय।)
* ''अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत्।
: ''धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः।
: ''न धर्मो विद्यते तत्र यत्र राजा क्षमान्वितः॥
: ''अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम्।
: ''वध्यांश्च घातयेद्यस्तु अवध्यानपरिरक्षति॥'' -- [[महाभारत]], अनुशासन पर्व
* ''पित्राअपरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः।
: ''अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत॥'' -- विष्णुपुराण, १-१३-४८
: जिस प्रजा को पिता वेन ने अप्रसन्न किया उसी को पृथु ने अनुरञ्जित (प्रसन्न) किया। इस कारण अनुरञ्जन करने से उनका नाम 'राजा' हुआ। (यह श्लोक 'राजा' शब्द को इस प्रकार परिभाषित करता है कि जो प्रजा को प्रसन्नता प्रदान करे वह राजा होता है।)
* ''राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः।
: ''राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ -- चाणक्यनीति
: यदि किसी देश का राजा (शासक) धार्मिक आचरण करने (राजधर्म का पालन करने वाला) वाला हो तो उस देश की प्रजा भी धार्मिक होती है। यदि राजा पापी (दुष्ट) हो तो प्रजा भी पापी होती है। प्रजा, राजा के आचरण का अनुसरण करती है। जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती है।
*''प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
:'' नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥ -- कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण (विनयाधिकारिक), प्रकरण १५
: प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है। वैयक्तिक स्तर पर राजा को जो अच्छा लगे उसमें उसे अपना हित न देखना चाहिए, बल्कि प्रजा को जो ठीक लगे, उसे ही राजा अपना हित समझे।
*'' तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम् ।
:'' अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥ -- कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण (विनयाधिकारिक), प्रकरण १५
: अतः उक्त बातों को ध्यान में रखते हुए राजा को चाहिए कि वह प्रतिदिन उन्नतिशील-उद्यमशील होकर शासन-प्रशासन एवं व्यवहार के दैनिक कार्यव्यापार सम्पन्न करे। अर्थ के मूल में उद्योग में संलग्नता ही है, इसके विपरीत लापरवाही, आलस्य, श्रम का अभाव आदि अनर्थ (संपन्नता के अभाव या हानि) के कारण बनते हैं।
*'' अश्विनी सूयते वत्सं कामधेनुस्तुरंगमम् ।
:'' नद्यां संजायते वह्निर्यथा राजा तथा प्रजाः ॥ -- महासुभाषितसंग्रह
: जैसा राजा होता हैं, वैसी ही उसकी प्रजा होती हैं। यदि राजा का व्यवहार सामान्य नहीं है, तो उसकी प्रजा विकृत रूप से व्यवहार करती हैं। (उस विकृत राज्य में) घोड़ी बछड़े को जन्म देती है, कामधेनु तुरंग को जन्म देती है, नदी में आग पैदा होती है। (यह सुभाषित अतिशयोक्ति अलंकार का एक उदाहरण हैं। इसका उपयोग भावनाओं को तीव्रता से व्यक्त करने या अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जाता हैं, लेकिन इसका अर्थ शाब्दिक रूप से नहीं लेते हैं।)
* ''नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः ।
: ''शेरते विवृतद्वाराः कृषिगोरक्षजीविनः ॥ -- वाल्मीकि रामायण
: बिना राजा के राज्य में धनी जन सुरक्षित नहीं रह पाते हैं और न ही कृषिकार्य एवं गोरक्षा (गोपालन) से आजीविका कमाने वाले लोग ही दरवाजे खुले छोड़कर सो सकते हैं। अर्थात् राजा न होने पर सर्वत्र असुरक्षा फैल जाती है और चोरी-छीनाझपटी जैसी घटनाओं का उन्हें सामना करना पड़ता है।
* ''अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
: ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनुस्मृति ७।३ ॥
: अर्थ : बिना राजा के इस लोक में सब ओर अराजकता फैल जायेगी, जिसके कारण सब लोग सब ओर से भय को प्राप्त होंगे। इन सबकी रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा को बनाया।
*'' राजन् दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेतां
:'' तेनाद्य वत्समिव लोकममुं पुषाण ।
:'' तस्मिंश्च सम्यगनिशं परिपोष्यमाणे
:'' नानाफलैः फलति कल्पलतेव भूमिः ॥ -- भर्तृहरि, नीतिशतक, श्लोक ४६
: हे राजा ! अगर आप पृथ्वी रुपी गाय को दुहना चाहते हैं, तो प्रजा रुपी बछड़े का पालन-पोषण कीजिये। यदि आप प्रजा रुपी बछड़े का अच्छी तरह पालन-पोषण करेंगे तो पृथ्वी कल्पलता की तरह आपको नाना प्रकार के फल देगी।
*'' वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
:'' तथाभिवर्षेत् स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ मनुस्मृति ९।३०४ ॥
: जिस प्रकार इन्द्र वर्ष में चार माह वर्षा करके सबको तृप्त कर देता है, वैसे ही राजा को अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि-शान्ति-उन्नति की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहिए। उसको अपनी प्रजा को ऐश्वर्य-युक्त करना चाहिए। यह उसका '''इन्द्र-व्रत''' कहलाता है।
*'' अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
:'' तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ मनु० ९।३०५ ॥
: जिस प्रकार शेष आठ मास सूर्य, अपनी किरणों के द्वारा, सब वस्तुओं में से जल हरता रहता है, उसी प्रकार राजा भी, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, नित्य कर की वसूली करे । यह उसका '''अर्कव्रत''' होता है।
:'' प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
:'' तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ मनु० ९।३०६ ॥
: जिस प्रकार वायु सब वस्तुओं में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा अपनी राष्ट्र के हर भाग में प्रवेश करके, वहां की सूचना रखनी चाहिए। यह उसका '''मारुत-व्रत''' कहलाता है।
*'' यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति ।
:'' तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम् ॥ मनु० ९।३०७ ॥
: जिस प्रकार यम, समय आने पर कर्मानुसार सब को प्रिय या अप्रिय कर्मफल देकर नियन्त्रित करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा को दण्ड और लाभ देकर नियन्त्रण में रखना चाहिए। यह उसका यम-व्रत होता है।
*'' परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
:'' तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ मनु० ९।३०९ ॥
: जिस प्रकार पूर्ण चन्द्र को देखकर मानव हर्ष करते हैं, वैसी ही प्रकृति राजा की होनी चाहिए। अर्थात् राजा की आर्थिक व नैयायिक व्यवस्था से सन्तुष्ट जन उसको देखकर आह्लादित होने चाहिए । वही राजा चान्द्रव्रतिक कहलाता है।
*'' प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु ।
:'' दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ मनु० ९।३१० ॥
: जिस प्रकार अग्नि शाक, धातु, आदि के दोषों को जला देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह पापकर्मों में प्रतापी और तेजस्वी हो, अर्थात् स्वयं भयभीत न हो, अपितु पापी को भय दिलाए, और दुष्ट मन्त्री, अधिकारी तक को भी कठोर दण्ड दे। राजा के प्रतिनिधि ही यदि अत्याचार करेंगे, तो प्रजा में न्यायव्यवस्था स्थापित ही नहीं हो सकती । यह राजा का आग्नेय-व्रत होता है ।
*'' यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
:'' तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ मनु० ९।३११ ॥
: जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार राजा को सारी प्रजा का पक्षपात-रहित होकर पालन-पोषण करना चाहिए । यह उसका '''पार्थिव व्रत''' कहलाता है।
*''महोत्साहः स्थूललक्षः कृतज्ञो वृद्धसेवकः ।
: ''विनीतः सत्त्वसंपन्नः कुलीनः सत्यवाक्शुचिः ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३०९
: ''अदीर्घसूत्रः स्मृतिमानक्षुद्रोऽपरुषस्तथा ।
: ''धार्मिकोऽव्यसनश्चैव प्राज्ञः शूरो रहस्यवित् ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३१०
: ''स्वरन्ध्रगोप्तान्वीक्षिक्यां दण्डनीत्यां तथैव च ।
: ''विनीतस्त्वथ वार्तायां त्रय्यां चैव नराधिपः ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३११
: राजा महान उत्साही , अत्यन्त धन देने वाला , विनित , सत्त सम्पन्न , सम्पत्ति एवं विपत्ति में एक - सा आचरण करने वाला हो। वह कुलीन, सत्य वचन बोलने वाला' पवित्र' आलस्य रहित , जानते हुए कार्यों का स्मरण रखने वाला' सद्गुणी , दूसरे को दुःख न देने वाला, आर्थिक व्यसन न करने वाला, बुद्धिमान , वीर , रहस्य को छिपाने में चतुर तथा अपने राज्य के प्रवेश द्वारों को गुप्त रखने वाला हो। आन्वीक्षिकी , दण्डनीती और वार्ता इन विद्याओं में राजा प्रवीण होना चाहिए।
*'' स्वाम्यमात्या जनो दुर्गं कोशो दण्डस्तथैव च ।
:'' मित्राण्येताः प्रकृतयो राज्यं सप्ताङ्गमुच्यते ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण
: स्वामी (राजा), मन्त्रीवृन्द, प्रजा, दुर्ग, राजकोश, दण्ड, एवं राज्य के मित्रगण, ये सभी राज्य के सात अंग होते हैं। इसलिए राज्य को सप्तांग (सात अंगों वाला) कहा गया है।
*'' अपि भ्राता सुतोऽर्घ्यो वा श्वसुरो मातुलोऽपि वा ।
:'' नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति धर्माद्विचलितः स्वकात् ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण
: भाई, पुत्र, पूज्य जन, श्वसुर, एवं मामा, कोई भी अपने धर्म से विचलित होने पर राजा के लिए अदण्डनीय नहीं होता है।
*''ब्राह्मणेषु क्षमी स्निग्धेष्वजिह्मः क्रोधनोऽरिषु ।
: ''स्याद्राजा भृत्यवर्गेषु प्रजासु च यथा पिता ॥ '' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३३४
: राजा को ब्राह्मणों के प्रति क्षमाशील, अनुराग रखने वालों के प्रति सरल , शत्रुओं के प्रति क्रोधी तथा सेवकों एवं प्रजा के प्रति पिता के समान दयावान एवं हितकारी होना चाहिए।
* ''मन्त्रमूलं यतो राज्यं तस्मान्मन्त्रं सुरक्षितम् ।
: ''कुर्याद्यथास्य न विदुः कर्मणां आफलोदयात् ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३४४
: राज्य कार्य का मुख्य आधार मन्त्र है। इसलिए मन्त्र को इस प्रकार राजा गुप्त रखे कि राजा के कर्मों के फलीभूत होने के पूर्व उसकी जानकारी किसी को न मिल सके।
* ''स्वाम्यमात्या जनो दुर्गं कोशो दण्डस्तथैव च ।
: ''मित्राण्येताः प्रकृतयो राज्यं सप्ताङ्गं उच्यते ॥'' -- याज्ञवल्क्यस्मृति, राजधर्मप्रकरण १.३५३
: राजा , अमात्य, प्रजा , दुर्ग , कोष , दण्ड (सेना) और मित्र ये राज्य के मूल कारण हैं। इसलिए राज्य को सप्तांग कहा जाता है।
* ''अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः।
: ''राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव॥'' -- महाभारत, शान्तिपर्व
: जिसमें क्रोध का अभाव होता है, जो दुर्व्यसनों से दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया है वह राजा हिमालय के समान सम्पूर्ण प्राणियों का विश्वासपात्र बन जाता है।
* ''राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वाय कल्पते।
: ''स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति॥'' -- [[महाभारत]]
: राजा यदि धर्म के अनुसार आचरण करता है तो देवता बन जाता है और यदि वह अधर्म का आचरण करता है तो नरकगामी हो जाता है।
* ''नैव राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः।
: ''धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व, सत्ययुग के हालात बताते हुए युधिष्ठिर को भीष्म का उपदेश
: (उस समय) न राज्य था और ना राजा था , न दण्ड था और न दण्ड देने वाला । सारी प्रजा ही नैतिक आचरण से एक-दूसरे की रक्षा करती थी।
* ''तस्य संवरणं योगं सचिवेषु निवेश्य च।
: ''विजिगीषुः परान भूमिं तस्यौषधं स्मृतम्॥'' -- [[कालिदास]] द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंशम्' में
: राजा को अपनी गुप्त योजनाओं को मंत्रियों के अधीन सुरक्षित रखना चाहिए, और शत्रुओं को जीतने की इच्छा रखने वाले राजा के लिए 'भूमि' (राज्य का विस्तार या विजय) ही औषध (दवा) मानी गई है।
* मैं वास्तव में एक राजा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि खुद पर शासन कैसे करना है। -- Pietro Aretino
* अँधेरी नगरी चौपट राजा, सवा सेर भाजी सवा सेर खाजा। -- [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]
* आपको राजा बनने के लिए राजा को हराना होगा। कोई आपको स्वर्ण पदक देने वाला नहीं है। -- Donovan Bailey
* मैं मूर्खों के राजकुमार के बजाय बच्चों का राजा बनना पसंद करूँगा। -- जैक ब्लैक
* अगर मैं राजा नहीं होता, तो मैं एक विश्वविद्यालय का आदमी होता। -- राजा जेम्स प्रथम
* मैं हमेशा मानता हूं कि राजा या आधिकारिक नेता का शासन पुराना है। अब हमें आधुनिक दुनिया के साथ चलना होगा। -- [[दलाई लामा]]
* राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण में, हमने अभी भी राजा का सिर नहीं काटा है। -- माइकेल फौकल्ट
* मैं वहां रहना और प्यार करना पसंद करूंगा जहां मौत राजा है बजाय अनंत जीवन पाने के जहां प्यार नहीं है। -- Robert Green Ingersoll
* राजा मर गया और फिर रानी मर गई यह एक कहानी है। राजा मर गया, और फिर रानी शोक से मर गई यह एक साजिश है। -- E. M. Forster
* राजा कोई गलती नहीं कर सकता यह अंग्रेजी संविधान का एक आवश्यक और मौलिक सिद्धांत है। -- William Blackstone
* राजा को मरना चाहिए ताकि देश जीवित रह सके। -- Maximilien Robespierre
* मैं पढ़ने की इच्छा के बिना एक राजा की तुलना में किताबों से भरी झोपड़ी में गरीब होना पसंद करूंगा। -- Thomas Babington Macaulay
* मैंने हमेशा कहा है, अगर आप अपने आप को एक रानी की तरह मानते हैं, तो आप एक राजा को आकर्षित करेंगे। -- Pepa
* हमारी व्यवस्था के अधीन लोग, राजशाही में राजा की तरह, कभी नहीं मरते। -- Martin Van Buren
* सत्ता एक मरते हुए राजा को भूल जाती है। -- अल्फ्रेड लॉर्ड टेन्नीसन
* जो दयालु है वह स्वतंत्र है, यद्यपि वह दास है; जो दुष्ट है वह दास है, चाहे वह राजा ही क्यों न हो। -- सन्त अगस्ताइन
* ऐसा कोई राजा नहीं है जिसके पूर्वजों में कोई दास न रहा हो, और न ऐसा कोई दास हुआ हो जिसका कोई राजा न हुआ हो। -- हेलेन केलर
* ऐसा कोई राजा नहीं है जिसका झारखंड में कोई दास नहीं हो रहा है, और न ऐसा कोई दास हुआ है जिसका कोई राजा न हुआ हो। -- रॉबर्ट केनेडी
* पृथ्वी पर आंसू की एक बूंद स्वर्ग के राजा को बुलाती है। -- Charles R. Swindoll
* वह जो अपने भीतर राज करता है और जुनून, इच्छाओं और भय पर शासन करता है, वह राजा से बढ़कर है। -- जॉन मिल्टन
* राजा की कृपा और सच्चाई उसकी रक्षा करते हैं, करूणा से उसकी गद्दी स्थिर रहती है। -- King Solomon
* बदमाशों के देश में जिसकी नाक आधी होती है वही राजा होता है। -- Chris Farley
* वह सबसे सुखी है, चाहे वह राजा हो या किसान, जिसे अपने घर में शांति मिलती है। -- Johann Wolfgang von Goethe
==इन्हें भी देखें==
* [[क्षत्रिय]]
* [[नेता]]
* [[प्रबन्धक]]
* [[सेनापति]]
* [[युद्ध]]
* [[राज्य]]
* [[राजधर्म]]
* [[राजनीति]]
* [[राजतंत्र]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://medium.com/@Shashankpoddar/राजधर्म-राजा-की-योग्यता-कर्तव्य-और-दण्ड-का-महत्व-392b9ed17e99 राजा की योग्यता कर्तव्य और दण्ड का महत्व]
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औषधि
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अनुनाद सिंह
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'''औषधि''' , औषध, भेषज या दवा ।
== उक्तियाँ ==
* ''प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्
: ''युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम्
: ''दोषध्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये
: ''समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥'' -- सुश्रुतसंहिता
: उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में उखाड़ी गई, युक्तप्रमाण (युक्त मात्रा में), मन को प्रिय, गन्ध वर्ण रस से युक्त, दोषों को नष्त करने वाली, ग्लानि न उत्पन्न करने वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वल्प विकार उत्पन्न करने वाली या विकार न करने वाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् -- वाग्भट्ट
: जो प्राणी जिस देश, स्थान या वातावरण में पैदा होता है, उसके शरीर और स्वास्थ्य के लिए उसी स्थान की भूमि, जल और प्रकृति से उत्पन्न जड़ी-बूटियाँ, औषधियाँ और आहार (खान-पान) सबसे अधिक हितकारी और लाभकारी होते हैं।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्
: ''देशादन्यत्र वसतस्तत्तुल्यगुणमौषधम् ॥१०॥
: ''स्वे देशेनिचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपमागताः
: ''बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ॥११॥ -- भावमिश्र, भावप्रकाशसंहिता में
: जिस देश (प्रदेश या जलवायु) में जो जीव पैदा होता है, उसी देश में उत्पन्न होने वाली औषधियाँ और अन्न उसके लिए सर्वाधिक हितकारी (अनुकूल) होते हैं। जब कोई मनुष्य अपने मूल देश को छोड़कर किसी दूसरे देश या क्षेत्र में रहने लगता है, तब उसे उस नए देश की ऐसी औषधियों का प्रयोग करना चाहिए जिनके गुण उसके मूल देश की औषधियों के समान हों।
: अपने मूल देश में संचित हुए दोष (वात, पित्त, कफ) जब किसी दूसरे देश में जाने पर कुपित (दूषित) होते हैं, तो वे उतने अधिक बलवान (हानिकारक) नहीं होते; ठीक उसी प्रकार जैसे जल में रहने वाले जीव थल पर और थल के जीव जल में जाने पर अपना स्वाभाविक बल खो देते हैं।
*''अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
:''भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
: [[व्याकरण]] छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नौका से नदी पार करना, और अयोग्य आहार के साथ लिया हुआ औषध – ये ऐसे करने के बजाय तो न करने हि बेहतर हैं।
* ''मनीषिणः सन्ति न ते हितैषिणः
: ''हितैषिणः सन्ति न ते मनीषिणः।
: ''सुहृच्च विद्वानपि दुर्लभो नृणां
: ''यथौषधं स्वादु हितं च दुर्लभम्॥'' -- सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
: विश्व में जो ज्ञानी लोग तो हैं, वे हितैषी नहीं होते। जो हितैषी हैं, वे ज्ञानी नहीं हैं। अच्छे हृदय वाला और साथ में ज्ञानी मनुष्यों में उसी तरह दुर्लभ हैं जैसे स्वादिष्ट औ हितकर औषधि।
* ''परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं
: ''स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहित: ।
: ''छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं
: ''शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात् ॥'' -- भागवत् पुराण, सप्तम स्कन्ध
: यद्यपि औषधि (जड़ी-बूटी) जंगल में उत्पन्न होने के कारण मनुष्य की श्रेणी में परिगणित नहीं होती किन्तु लाभप्रद होने पर अत्यन्त सावधानी से रखी जाती है। इसी प्रकार यदि अपने परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति अनुकूल हो तो उसे पुत्र के समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, यदि किसी के शरीर का कोई अंग रोग से विषाक्त हो जाये तो उसे काट कर अलग कर देना चाहिए जिससे शेष शरीर सुखपूर्वक जीवित रहे। इसी प्रकार भले ही अपना आत्मज पुत्र ही क्यों न हो, यदि वह प्रतिकूल है, तो उसका परित्याग कर देना चाहिए।
* ''शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
: ''सुचिन्तितं चौषधामातुराणाम् न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥
: शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रह जाते हैं, लेकिन जो शास्त्रों को पढ़ कर अपने जीवन में उनका अनुकरण करते हैं वही विद्वान हैं । जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक होता है।
* '' जगत्येवमनौषधम् । न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशान्नानार्थयोगयोः'' ॥ १० ॥
: इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों (प्रयोजनों) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥ १० ॥
* ''नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते ।'' (भगवान पनर्वसु का उपदेश, चरकसूत्र २६।१२ )
: संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है जो औषधि नहीं है।
* प्रसन्नता परमात्मा की दी हुई औषधि है, इसे व्यर्थ ना जाने दें।
* हित चाहने वाला पराया भी अपना है, और अहित करने वाला अपना भी पराया है। रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है और औषधि वन में पैदा होकर भी हमें लाभ पहुँचाती है।
* मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर।
: श्रवन मार्ग ह्वै संचरे, शाले सकल शरीर॥ -- [[कबीरदास]]
* मौन हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ औषधि है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[रोग]]
* [[चिकित्सा]]
* [[निदान]]
* [[वैद्य]]
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अनुनाद सिंह
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'''औषधि''' , औषध, भेषज या दवा ।
== उक्तियाँ ==
* ''प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्
: ''युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम्
: ''दोषध्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये
: ''समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥'' -- सुश्रुतसंहिता
: उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में उखाड़ी गई, युक्तप्रमाण (युक्त मात्रा में), मन को प्रिय, गन्ध वर्ण रस से युक्त, दोषों को नष्त करने वाली, ग्लानि न उत्पन्न करने वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वल्प विकार उत्पन्न करने वाली या विकार न करने वाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् -- वाग्भट्ट (??)
: जो प्राणी जिस देश, स्थान या वातावरण में पैदा होता है, उसके शरीर और स्वास्थ्य के लिए उसी स्थान की भूमि, जल और प्रकृति से उत्पन्न जड़ी-बूटियाँ, औषधियाँ और आहार (खान-पान) सबसे अधिक हितकारी और लाभकारी होते हैं।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्
: ''देशादन्यत्र वसतस्तत्तुल्यगुणमौषधम् ॥१०॥
: ''स्वे देशेनिचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपमागताः
: ''बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ॥११॥ -- भावमिश्र, भावप्रकाशसंहिता में
: जिस देश (प्रदेश या जलवायु) में जो जीव पैदा होता है, उसी देश में उत्पन्न होने वाली औषधियाँ और अन्न उसके लिए सर्वाधिक हितकारी (अनुकूल) होते हैं। जब कोई मनुष्य अपने मूल देश को छोड़कर किसी दूसरे देश या क्षेत्र में रहने लगता है, तब उसे उस नए देश की ऐसी औषधियों का प्रयोग करना चाहिए जिनके गुण उसके मूल देश की औषधियों के समान हों।
: अपने मूल देश में संचित हुए दोष (वात, पित्त, कफ) जब किसी दूसरे देश में जाने पर कुपित (दूषित) होते हैं, तो वे उतने अधिक बलवान (हानिकारक) नहीं होते; ठीक उसी प्रकार जैसे जल में रहने वाले जीव थल पर और थल के जीव जल में जाने पर अपना स्वाभाविक बल खो देते हैं।
*''अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
:''भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
: [[व्याकरण]] छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नौका से नदी पार करना, और अयोग्य आहार के साथ लिया हुआ औषध – ये ऐसे करने के बजाय तो न करने हि बेहतर हैं।
* ''मनीषिणः सन्ति न ते हितैषिणः
: ''हितैषिणः सन्ति न ते मनीषिणः।
: ''सुहृच्च विद्वानपि दुर्लभो नृणां
: ''यथौषधं स्वादु हितं च दुर्लभम्॥'' -- सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
: विश्व में जो ज्ञानी लोग तो हैं, वे हितैषी नहीं होते। जो हितैषी हैं, वे ज्ञानी नहीं हैं। अच्छे हृदय वाला और साथ में ज्ञानी मनुष्यों में उसी तरह दुर्लभ हैं जैसे स्वादिष्ट औ हितकर औषधि।
* ''परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं
: ''स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहित: ।
: ''छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं
: ''शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात् ॥'' -- भागवत् पुराण, सप्तम स्कन्ध
: यद्यपि औषधि (जड़ी-बूटी) जंगल में उत्पन्न होने के कारण मनुष्य की श्रेणी में परिगणित नहीं होती किन्तु लाभप्रद होने पर अत्यन्त सावधानी से रखी जाती है। इसी प्रकार यदि अपने परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति अनुकूल हो तो उसे पुत्र के समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, यदि किसी के शरीर का कोई अंग रोग से विषाक्त हो जाये तो उसे काट कर अलग कर देना चाहिए जिससे शेष शरीर सुखपूर्वक जीवित रहे। इसी प्रकार भले ही अपना आत्मज पुत्र ही क्यों न हो, यदि वह प्रतिकूल है, तो उसका परित्याग कर देना चाहिए।
* ''शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
: ''सुचिन्तितं चौषधामातुराणाम् न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥
: शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रह जाते हैं, लेकिन जो शास्त्रों को पढ़ कर अपने जीवन में उनका अनुकरण करते हैं वही विद्वान हैं । जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक होता है।
* '' जगत्येवमनौषधम् । न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशान्नानार्थयोगयोः'' ॥ १० ॥
: इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों (प्रयोजनों) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥ १० ॥
* ''नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते ।'' (भगवान पनर्वसु का उपदेश, चरकसूत्र २६।१२ )
: संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है जो औषधि नहीं है।
* प्रसन्नता परमात्मा की दी हुई औषधि है, इसे व्यर्थ ना जाने दें।
* हित चाहने वाला पराया भी अपना है, और अहित करने वाला अपना भी पराया है। रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है और औषधि वन में पैदा होकर भी हमें लाभ पहुँचाती है।
* मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर।
: श्रवन मार्ग ह्वै संचरे, शाले सकल शरीर॥ -- [[कबीरदास]]
* मौन हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ औषधि है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[रोग]]
* [[चिकित्सा]]
* [[निदान]]
* [[वैद्य]]
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2026-09-12T02:52:36Z
अनुनाद सिंह
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'''औषधि''' , औषध, भेषज या दवा ।
== उक्तियाँ ==
* ''धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
: ''रोगस्तस्यापहर्ता च यः स तस्यौषधं स्मृतम्॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 1.15
: आरोग्य ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल है। उस आरोग्य का नाश करने वाले रोग को औषध कहते हैं।
* ''प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्
: ''युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम्
: ''दोषध्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये
: ''समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥'' -- सुश्रुतसंहिता
: उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में उखाड़ी गई, युक्तप्रमाण (युक्त मात्रा में), मन को प्रिय, गन्ध वर्ण रस से युक्त, दोषों को नष्त करने वाली, ग्लानि न उत्पन्न करने वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वल्प विकार उत्पन्न करने वाली या विकार न करने वाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं स्मृतम् -- वाग्भट्ट (??)
: जो प्राणी जिस देश, स्थान या वातावरण में पैदा होता है, उसके शरीर और स्वास्थ्य के लिए उसी स्थान की भूमि, जल और प्रकृति से उत्पन्न जड़ी-बूटियाँ, औषधियाँ और आहार (खान-पान) सबसे अधिक हितकारी और लाभकारी होते हैं।
* ''यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्
: ''देशादन्यत्र वसतस्तत्तुल्यगुणमौषधम् ॥१०॥
: ''स्वे देशेनिचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपमागताः
: ''बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ॥११॥ -- भावमिश्र, भावप्रकाशसंहिता में
: जिस देश (प्रदेश या जलवायु) में जो जीव पैदा होता है, उसी देश में उत्पन्न होने वाली औषधियाँ और अन्न उसके लिए सर्वाधिक हितकारी (अनुकूल) होते हैं। जब कोई मनुष्य अपने मूल देश को छोड़कर किसी दूसरे देश या क्षेत्र में रहने लगता है, तब उसे उस नए देश की ऐसी औषधियों का प्रयोग करना चाहिए जिनके गुण उसके मूल देश की औषधियों के समान हों।
: अपने मूल देश में संचित हुए दोष (वात, पित्त, कफ) जब किसी दूसरे देश में जाने पर कुपित (दूषित) होते हैं, तो वे उतने अधिक बलवान (हानिकारक) नहीं होते; ठीक उसी प्रकार जैसे जल में रहने वाले जीव थल पर और थल के जीव जल में जाने पर अपना स्वाभाविक बल खो देते हैं।
*''अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
:''भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
: [[व्याकरण]] छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नौका से नदी पार करना, और अयोग्य आहार के साथ लिया हुआ औषध – ये ऐसे करने के बजाय तो न करने हि बेहतर हैं।
* ''मनीषिणः सन्ति न ते हितैषिणः
: ''हितैषिणः सन्ति न ते मनीषिणः।
: ''सुहृच्च विद्वानपि दुर्लभो नृणां
: ''यथौषधं स्वादु हितं च दुर्लभम्॥'' -- सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
: विश्व में जो ज्ञानी लोग तो हैं, वे हितैषी नहीं होते। जो हितैषी हैं, वे ज्ञानी नहीं हैं। अच्छे हृदय वाला और साथ में ज्ञानी मनुष्यों में उसी तरह दुर्लभ हैं जैसे स्वादिष्ट औ हितकर औषधि।
* ''परोऽप्यपत्यं हितकृद्यथौषधं
: ''स्वदेहजोऽप्यामयवत्सुतोऽहित: ।
: ''छिन्द्यात्तदङ्गं यदुतात्मनोऽहितं
: ''शेषं सुखं जीवति यद्विवर्जनात् ॥'' -- भागवत् पुराण, सप्तम स्कन्ध
: यद्यपि औषधि (जड़ी-बूटी) जंगल में उत्पन्न होने के कारण मनुष्य की श्रेणी में परिगणित नहीं होती किन्तु लाभप्रद होने पर अत्यन्त सावधानी से रखी जाती है। इसी प्रकार यदि अपने परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति अनुकूल हो तो उसे पुत्र के समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, यदि किसी के शरीर का कोई अंग रोग से विषाक्त हो जाये तो उसे काट कर अलग कर देना चाहिए जिससे शेष शरीर सुखपूर्वक जीवित रहे। इसी प्रकार भले ही अपना आत्मज पुत्र ही क्यों न हो, यदि वह प्रतिकूल है, तो उसका परित्याग कर देना चाहिए।
* ''शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
: ''सुचिन्तितं चौषधामातुराणाम् न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥
: शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रह जाते हैं, लेकिन जो शास्त्रों को पढ़ कर अपने जीवन में उनका अनुकरण करते हैं वही विद्वान हैं । जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक होता है।
* '' जगत्येवमनौषधम् । न किञ्चिद्विद्यते द्रव्यं वशान्नानार्थयोगयोः'' ॥ १० ॥
: इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में कोई भी द्रव्य ऐसा नहीं है जो औषध न हो, क्योंकि सभी द्रव्य अनेक अर्थों (प्रयोजनों) में एवं विविध प्रकार के योगों में प्रयुक्त होते हैं ॥ १० ॥
* ''नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते ।'' (भगवान पनर्वसु का उपदेश, चरकसूत्र २६।१२ )
: संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है जो औषधि नहीं है।
* प्रसन्नता परमात्मा की दी हुई औषधि है, इसे व्यर्थ ना जाने दें।
* हित चाहने वाला पराया भी अपना है, और अहित करने वाला अपना भी पराया है। रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है और औषधि वन में पैदा होकर भी हमें लाभ पहुँचाती है।
* मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर।
: श्रवन मार्ग ह्वै संचरे, शाले सकल शरीर॥ -- [[कबीरदास]]
* मौन हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ औषधि है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[रोग]]
* [[चिकित्सा]]
* [[निदान]]
* [[वैद्य]]
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सदस्य वार्ता:LM.CR
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Vincent Vega
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-- [[सदस्य:New user message|New user message]] ([[सदस्य वार्ता:New user message|वार्ता]]) ०५:१२, १७ जून २०२४ (IST)
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ॐ
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:ॐ|ॐ]]''' या '''ओ३म्''' एक पवित्र आध्यात्मिक प्रतीक है। यह एक रहस्यमय ध्वनि है जो सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि में प्रयुक्त होती है। यह परम सत्ता, चेतना या आत्म को अभिव्यक्त करता है। ब्रह्मप्राप्ति के लिए निर्दिष्ट विभिन्न साधनों में प्रणवोपासना मुख्य है।
सनातन ग्रन्थों में ओ३म की बहुत महिमा कही गई है। मारकण्डेय पुराण में , योग ऋषि दत्तात्र्य जी ने बताया है कि मानव को ओम रूपी धनुष पर अपनी आत्मा रूपी बाण को अपने लक्ष्य, उस एक ईश्वर की ओर साध देना चाहिए।
== उक्तियाँ ==
* ''प्रकर्षेणनूयते स्तूयते अनेन इति, नौति स्तौति इति वा प्रणवः।
: वह ध्वनि या शब्द जिसके द्वारा परमात्मा की विशेष रूप से स्तुति की जाती है, या जो स्वयं परमात्मा की स्तुति करती है, उसे 'प्रणव' (ॐ) कहते हैं।
* ''ओमिति ब्रह्म । ओमितीदँसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति ।
: ''ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
:''ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ '' -- [[तैत्तिरीयोपनिषद]], शिक्षावल्ली, अष्टमोऽनुवाकः
: अर्थात् ॐ ही [[ब्रह्म]] है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
* ''सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
:''यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ --([[कठ उपनिषद्|कठोपनिषद]], अध्याय १, वल्ली २),
: अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।
* ''ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते।
:''तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ७॥ -- ( [[प्रश्नोपनिषद]] प्रश्न ५, श्लोक ७),
: अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।
*''प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
:''अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ -- ( [[मुण्डकोपनिषद्]], मुण्डक २, खण्ड २, श्लोक-४)
: अर्थात प्रणव धनुष है, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।। ४।।
: ''ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,
:''भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव।
:''यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १॥'' -- ([[माण्डूक्योपनिषद]], गौ० का० श्लोक १)
: अर्थात ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।
* ''सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।। ८।।'' -- (माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८)
: वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।
* ''तस्य वाचकः प्रणवः'' -- [[पतञ्जलि]], समाधिपाद के 27वें सूत्र में
: उस ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है।
* ''ॐ इत्येतत् अक्षरः '' -- छान्दोग्योपनिषद्
: अर्थात् ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
* ''सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च'' -- गोपथ ब्राह्मण
: जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर [[मुँह|मुख]] कर एक हजार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
* ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
: ''ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥'' -- श्रीमद्भगवद्गीता
: भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्" (वह), "सत्" (शाश्वत) है। और इन तीन अक्षरों ( अ +उ +म् ) के ब्रह्म को ब्राह्मण यज्ञ में मन्त्रों में स्मरण करते हैं ,और इसी का उच्चारण करते हैं।
* ''ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
: ''कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः॥'' -- परमात्मप्रकाश
* जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है। -- [[श्रीमद्भगवद्गीता]]
* ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता। -- ध्यानबिन्दु उपनिषद्
* 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, इसकी ही उपासना करनी चाहिए । 'ॐ' ऐसा ही उद्गान करता है । उस की ही व्याख्या की जाती है। -- छान्दोग्य उपनिषद
* वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और समरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन हैं।
* आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है। -- कठोपनिषद्
* ''एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त '' -- [[गुरु नानक]]
: अर्थ - ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष" के सदृश हो जाता है।
* ''ओ ओंकार आदि मैं जाना।
: ''लिखि औ मेटें ताहि ना माना ॥
: ''ओ ओंकार लिखे जो कोई।
: ''सोई लिखि मेटणा न होई ॥ -- [[कबीरदास]]
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:ॐ|ॐ]]''' या '''ओ३म्''' एक पवित्र आध्यात्मिक प्रतीक है। यह एक रहस्यमय ध्वनि है जो सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि में प्रयुक्त होती है। यह परम सत्ता, चेतना या आत्म को अभिव्यक्त करता है। ब्रह्मप्राप्ति के लिए निर्दिष्ट विभिन्न साधनों में प्रणवोपासना मुख्य है।
सनातन ग्रन्थों में ओ३म की बहुत महिमा कही गई है। मारकण्डेय पुराण में , योग ऋषि दत्तात्र्य जी ने बताया है कि मानव को ओम रूपी धनुष पर अपनी आत्मा रूपी बाण को अपने लक्ष्य, उस एक ईश्वर की ओर साध देना चाहिए।
== उक्तियाँ ==
* ''प्रकर्षेणनूयते स्तूयते अनेन इति, नौति स्तौति इति वा प्रणवः।
: वह ध्वनि या शब्द जिसके द्वारा परमात्मा की विशेष रूप से स्तुति की जाती है, या जो स्वयं परमात्मा की स्तुति करती है, उसे 'प्रणव' (ॐ) कहते हैं।
* ''ओमिति ब्रह्म । ओमितीदँसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति ।
: ''ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
:''ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ '' -- [[तैत्तिरीयोपनिषद]], शिक्षावल्ली, अष्टमोऽनुवाकः
: अर्थात् ॐ ही [[ब्रह्म]] है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
* ''सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
:''यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ --([[कठ उपनिषद्|कठोपनिषद]], अध्याय १, वल्ली २),
: अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।
* ''ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते।
:''तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ७॥ -- ( [[प्रश्नोपनिषद]] प्रश्न ५, श्लोक ७),
: अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।
*''प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
:''अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ -- ( [[मुण्डकोपनिषद्]], मुण्डक २, खण्ड २, श्लोक-४)
: अर्थात प्रणव धनुष है, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।। ४।।
: ''ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,
:''भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव।
:''यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १॥'' -- ([[माण्डूक्योपनिषद]], गौ० का० श्लोक १)
: अर्थात ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।
* ''सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।। ८।।'' -- (माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८)
: वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।
* ''तस्य वाचकः प्रणवः'' -- [[पतञ्जलि]], समाधिपाद के 27वें सूत्र में
: उस ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है।
* ''ॐ इत्येतत् अक्षरः '' -- छान्दोग्योपनिषद्
: अर्थात् ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
* ''सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च'' -- गोपथ ब्राह्मण
: जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर [[मुँह|मुख]] कर एक हजार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
* ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
: ''ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥'' -- श्रीमद्भगवद्गीता
: भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्" (वह), "सत्" (शाश्वत) है। और इन तीन अक्षरों ( अ +उ +म् ) के ब्रह्म को ब्राह्मण यज्ञ में मन्त्रों में स्मरण करते हैं ,और इसी का उच्चारण करते हैं।
* ''ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
: ''कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः॥'' -- परमात्मप्रकाश
: बिन्दु से संयुक्त ओंकार, जिनका योगी निरन्तर ध्यान करते हैं, जो काम और मोक्ष को देने वाला है, उस ओंकार का नमन करता हूँ ।
* जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है। -- [[श्रीमद्भगवद्गीता]]
* ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता। -- ध्यानबिन्दु उपनिषद्
* 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, इसकी ही उपासना करनी चाहिए । 'ॐ' ऐसा ही उद्गान करता है । उस की ही व्याख्या की जाती है। -- छान्दोग्य उपनिषद
* वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और समरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन हैं।
* आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है। -- कठोपनिषद्
* ''एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त '' -- [[गुरु नानक]]
: अर्थ - ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष" के सदृश हो जाता है।
* ''ओ ओंकार आदि मैं जाना।
: ''लिखि औ मेटें ताहि ना माना ॥
: ''ओ ओंकार लिखे जो कोई।
: ''सोई लिखि मेटणा न होई ॥ -- [[कबीरदास]]
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