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* ''सङ्घे शक्तिः कलौ युगे।'' -- [[महाभारत]]
: कलियुग में संघ में ही शक्ति है।
* ''त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च, ज्ञानशक्तिः कृते युगे।
: ''द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघशक्तिः कलौ युगे॥''
: सत्ययुग में ‘ज्ञान-शक्ति’, त्रेता में ‘मंत्र शक्ति’ तथा द्वापर में ‘युद्ध-शक्ति’ प्रबल थी, किन्तु कलियुग में ‘संगठन की शक्ति’ (संघशक्ति) ही प्रधान है।
* ''बुद्धिर्यस्य बलं तस्य। -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]
: जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास बल है।
* ''कोऽतिभारः समर्थानां, किं दूरं व्यवसायिनाम्।
: ''को विदेशः सुविद्यानां, कः परः प्रियवादिनाम्॥'' -- (हितोपदेश, सुहृदभेद्,१३)
: जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है? व्यवसायी के लिये दूर क्या है? विद्वानों के लिये विदेश क्या है?प्रिय बोलने वालों के लिये 'पराया' क्या है?
* '' इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिश्चेतीमास्तिस्रः शक्तयो।'' -- स्वातन्त्र्यसूत्रवृत्तिः, प्रथमोऽध्यायः, परमार्थप्रदीपकः
: इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति - ये तीन प्रकार की शक्तियाँ हैं।
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः ।
: ''विक्रमार्जित सत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥'' -- [[हितोपदेश]]
: सिंह को जंगल का राजा नियुक्त करने के लिए न तो कोई अभिषेक किया जाता है, न कोई संस्कार । अपने गुण और पराक्रम से वह खुद ही मृगेंद्रपद प्राप्त करता है ।
* ''विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
: ''खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥
: दुर्जन की विद्या विवाद के लिये, धन उन्माद के लिये, और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिये होती है। इसके विपरीत सज्जन इनको क्रमशः ज्ञान, दान और दूसरों के रक्षण के लिये उपयोग करते हैं।
* ''क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ।
: महापुरुषों की क्रिया-सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से।
* ''सामर्थ्यमूलं स्वात्रन्त्र्यं श्रममूलं च वैभवम् ।
: ''न्यायमूलं स्वराज्यं स्यात् संघमूलं महाबलम्॥
: स्वतन्त्रता का मूल सामर्थ्य है, वैभव का मूल श्रम है, स्वराज्य का मूल न्याय है, और महाबलशाली होने का मूल है - संगठन।
* ''शिवः शक्त्य युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभावितुम
: ''न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पंदितुमपि।
: ''अतः त्वं आराध्यं हरि-हर-विरिंचादिभिर अपि
: ''प्रणन्तुम स्तोत्म् वा कथम् अकृत-पुण्यः प्रभावति।।'' -- सौन्दर्यलहरी
: शक्ति (स्वयं) के साथ मिलकर भगवान शिव ही ब्रह्माण्ड की रचना करने में समर्थ हैं। अन्यथा भगवान हिलने-डुलने में भी समर्थ नहीं हैं। आप भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा द्वारा भी वंदनीय हैं। इसलिए हे देवी! महान पुण्यों के बिना कोई व्यक्ति आपको कैसे नमस्कार कर सकता है?
* ''न्यायमते शक्तिस्त्रिविधा योगः रूढिः योगरूढिश्चेति।'' -- न्यायकोश
: न्यायमत से शक्ति तीन प्रकार की होती है- योग, रूढि और योगरूढि।
* राज्य तीन शक्तियों से मिलकर बनत है, ये शक्तियाँ हैं- मन्त्र, प्रभाव और उत्साह जो परस्पर अनुगृहीत होकर कार्यों में आतीं हैं। - दण्डी, दशकुमारचरितम्
* विद्वान् का बल विद्या और बुद्धि है। राष्ट्र का बल सेना और एकता है। व्यापारी का बल धन और चतुराई है। सेवक का बल सेवा और कर्तव्यपरायणता है। शासन का बल दंड-विधान और राजस्व है। सुन्दरता का बल युवावस्था है। नारी का बल शील है। पुरूष का बल पुरुषार्थ है। वीरों का बल साहस है, निर्बल का बल शासन व्यवस्था है। बच्चों का बल रोना है। दुष्टों का बल हिंसा है। मूर्खों का बल चुप रहना है और भक्त का बल प्रभु की कृपा है।
* शक्ति भ्रष्टाचार की ओर उन्मुख होती है, और पूरी तरह से निरपेक्ष शक्ति पूरी तरह से भ्रष्ट करती है। -- लॉर्ड ऐक्टन
* अपनी शक्ति में विश्वास रखना ही शक्तिवान होना हैं। -- [[दयानन्द सरस्वती]]
* शक्ति स्वयं एक स्वतंत्र सत्ता हैं जो किसी भी प्रकार के प्रतिबन्ध को नहीं स्वीकार करती। -- भगवतीचरण वर्मा
* शक्ति का सर्वोत्तम उपयोग दूसरों की भलाई करना है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* क्षमा से बढ़कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है। -- [[जयशंकर प्रसाद]]
* ज्ञान को सभी शक्तियों में सर्वोच्च शक्ति माना जाता हैं क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ ज्ञान बढ़ता ही जाता हैं। -- [[अरविन्द घोष]]
* आत्म-सम्मान, आत्म-ज्ञान एवं आत्म-नियन्त्रण ये तीन जीवन को प्रमुख सम्पन्न शक्ति की ओर ले जाते हैं। -- टेनीसन
* अपनी शक्ति को प्रकट न करने से शक्तिशाली पुरूष भी अपमान सहन करता हैं। -- [[पंचतंत्र]]
*नियम बनाने की शक्ति ही वास्तविक शक्ति है। यही कारण है कि जब कांग्रेस कानून बनाती है तो लॉबिस्ट इकट्ठा होते हैं, और यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के पास कांग्रेस से भी अधिक शक्ति है क्योंकि वह संविधान की व्याख्या और सीमांकन करता है अर्थात नियम लिखने के नियमों की व्याख्या करता है। यदि आप सिस्टम की सबसे बड़ी खराबी को समझना चाहते हैं तो इस पर ध्यान दें कि नियमों पर किसकी शक्ति है। -- डोनेला मीडोज, 'थिंकिंग इन : अ प्राइमर', चेल्सी ग्रीन पब्लिशिंग, 2008, पृष्ठ 158 (ISBN 9781603580557)।
=== मृदु शक्ति ===
* मृदु शक्ति (सॉफ्ट पावर) क्या है? यह वह क्षमता है जिससे आप अपनी मनचाही वस्तु को बल से या पैसे देकर नहीं बल्कि आकर्षण के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। यह किसी देश की संस्कृति, राजनीतिक आदर्शों और नीतियों के आकर्षण से पैदा होती है। -- जोसेफ एस. नाई जूनियर, सॉफ्ट पावर: द मीन्स टू सक्सेस इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स
* असली कुंजी यह नहीं है कि मैं कितने दुश्मनों को मारता हूँ। असली कुंजी यह है कि मैं कितने सहयोगी बनाता हूँ। -- जोसेफ एस. नाई जूनियर, सॉफ्ट पावर: द मीन्स टू सक्सेस इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स
* स्मार्ट पॉवर न तो कठोर शक्ति है, न ही मृदु शक्ति। यह दोनों है। -- Joseph S. Nye Jr., Soft Power: The Means To Success In World Politics
=== सूचना की शक्ति ===
=== शिक्षा की शक्ति ===
* भविष्य का अनपढ़ (निरक्षर) वह व्यक्ति नहीं होगा जो पढ़ नहीं सकता। बल्कि वह व्यक्ति होगा जो सीखना नहीं जानता। -- एल्विन टॉफ़लर
* शिक्षा वह सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं। -- [[नेल्सन मंडेला]]
==इन्हें भी देखें==
* [[संगठन]]
* [[एकता]]
* [[राज्य]]
* [[बुद्धि]]
* [[ज्ञान]]
* [[विद्या]]
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'''[[:w:ग्रहण|ग्रहण]]''' एक खगोलीय घटना है जो तब घटित होती है जब कोई खगोलीय पिण्ड अस्थायी रूप से द्रष्टा की दृष्टि से 'छिप' जाता है। यह 'छिपना' किसी पिण्ड के दूसरे किसी पिण्ड की छाया में आने से हो सकता है (जैसे चन्द्र ग्रहण में) या द्रष्टा और पिण्ड के बीच में किसी तीसरे पिण्ड के आने से हो सकता है (सूर्यग्रहण)।
== उद्धरण ==
* ''छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूछाया ॥'' -- [[आर्यभट]], आर्यभटीय में
: चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है (सूर्य ग्रहण के समय), और पृथ्वी की विशाल छाया चन्द्रमा को ढक लेती है (चन्द्र ग्रहण के समय)।
* ''भूग्रहभानां गोलार्धानि स्वच्छायया विवर्णानि ।
: ''अर्धानि यथासारं सूर्याभिमुखानि दीप्यन्ते ॥'' -- [[आर्यभट]]
: पृथ्वी, ग्रहों और चन्द्रमा का आधा हिस्सा अपनी ही छाया के कारण अंधेरे में रहता है, जबकि दूसरा आधा हिस्सा जो सूर्य के सामने होता है, वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है।
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।'' -- [[वराहमिहिर]]
: चन्द्र ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
=== आचार्य वटेश्वर के ग्रहण सम्बन्धी उद्धरण ===
* ''पर्वप्रतिक्रिधरणधिमाससकृतन्मेन्द्वानमानात् । ... ज्योतिर्विदा बहुमत्वमस्मात् ॥
:पर्व (ग्रहण), तिथि, और अधिमास आदि का निर्णय 'चान्द्रमान' (Lunar measure) के आधार पर किया जाना चाहिए।
; ग्रहण का भौतिक कारण
* ''छादकः शशिनो भासां भूच्छाया विबुधैः स्मृता ।
: ''भास्करं छादयेदिन्दुः सव्यतः सव्यमेव च ॥
: विद्वानों के अनुसार, चंद्रमा का आच्छादक (ढकने वाला) पृथ्वी की छाया है। जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, तो चंद्र ग्रहण होता है। इसी प्रकार, जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है, तो वह सूर्य को ढक लेता है, जिससे सूर्य ग्रहण होता है।
; ग्रहण किस दशा में होता है?
* ''विक्षेपश्च यदा स्वल्पः शशिनः पर्वसंक्षये ।
: ''तदैव जायते नूनं ग्रहणं नान्यथा भवेत् ॥
: जब पर्व के अंत में (पूर्णिमा या अमावस्या पर) चंद्रमा का विक्षेप (Latitude) बहुत कम होता है, तभी निश्चित रूप से ग्रहण घटित होता है। यदि चंद्रमा अपनी कक्षा में राहु या केतु (पात) के बहुत निकट नहीं है, तो ग्रहण नहीं हो सकता।
; तमोविष्काम्भ (छाया का व्यास) की गणना
* ''भूबिम्बं रविणा विद्धं शशिनः पथि संस्थितम् ।
: ''छाया तमोमयी तत्र तद्विष्कम्भोऽत्र साध्यते ॥
: सूर्य की किरणों द्वारा पृथ्वी का जो बिम्ब चंद्रमा के मार्ग (कक्षा) पर पड़ता है, वह अंधकारमय छाया (तम) कहलाता है। उस छाया के व्यास को गणितीय विधि से सिद्ध किया जाता है ताकि ग्रहण की अवधि जानी जा सके।
; ग्रहण में 'वलन' (Deflection) की गणना
* ''अक्षजं वलनं तद्वदायनं चापि कल्पयेत् ।
: ''द्वयोः संयोगवियोगौ स्फुटीकरणहेतवे ॥
: अक्ष-वलन और अयन-वलन की कल्पना (गणना) करनी चाहिए। इन दोनों का योग (Addition) या वियोग (Subtraction) करने पर स्पष्ट वलन प्राप्त होता है, जो ग्रहण के ग्रास (Eclipsed portion) की सही दिशा निर्धारित करने के लिए आवश्यक है।
; लम्बन (Parallax in Solar Eclipses)
* ''लम्बनं दृश्यते सूर्ये न विधौ भूवियोगतः ।
: ''तस्मात् तत्साधनं कार्यं सूर्यपर्वणि धीमता ॥
: पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी के कारण सूर्य ग्रहण में लम्बन (Parallax) दिखाई देता है, लेकिन चंद्र ग्रहण में नहीं। इसलिए, बुद्धिमान गणितज्ञ को सूर्य ग्रहण की गणना करते समय लम्बन का संस्कार (Correction) अवश्य करना चाहिए।
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"वराहमिहिर (सम्भावित जीवकाल : ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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वराहमिहिर (सम्भावित जीवकाल : ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।''
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल जल एकत्र हो।
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वराहमिहिर (सम्भावित जीवकाल : ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।''
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल ( (प्राचीन भारतीय तौल की इकाई)) जल एकत्र हो गया हो।
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'''[[:w:वराहमिहिर|वराहमिहिर]]''' (सम्भावित जीवकाल : ईसा की ५वीं-६ठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।''
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल ( (प्राचीन भारतीय तौल की इकाई)) जल एकत्र हो गया हो।
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'''[[:w:वराहमिहिर|वराहमिहिर]]''' (सम्भावित जीवकाल : ईसा की ५वीं-६ठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।'' ([[ग्रहण]] पर)
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
* ''धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलौपलब्धिः ।
:'' पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥
:'' एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभस्तो वसुधाविशेषात् ।
:'' नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥'' -- बृहत्संहिता ५४.१-२ (भूजल के शोधन के सम्बन्ध में)
: अर्थ - धर्म व यश को देने वाला दकार्गल को बताता हूँ जिससे भूमि में स्थित जल का ज्ञान होता है तथा उसके प्राप्ति के उपायों को करते हुए भूमि में स्थित जल को प्राप्त किया जा सके जो मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो। जिस प्रकार मानव जीवन में नाड़ियाँ हाती हैं जिनसे रक्तप्रवाह होता है उसी प्रकार भूमि में भी ऊँची-नीची अनेक जल शिराएं होती हैं जिनके द्वारा जलप्रवाह होता रहता है।
: वर्षा का जल सर्वत्र एक ही स्वाद वर्ण का होता है परन्तु भूमि के सन्सर्ग से उसका वर्ण व स्वाद अलग-अलग हो जाता है, अतः जल की परीक्षा भूमि के समान ही करनी चाहिए अर्थात् जिस प्रकार की भूमि होगी उसी प्रकार का जल उस स्थान पर प्राप्त होगा।
* जो भूमि सशर्करा व ताम्रवर्ण की हो वहाँ जल का स्वाद कसैला होता है। कपिल वर्ण की भूमि हो तो उस स्थान का जल क्षारीय होता है। पाण्डु वर्णी भूमि का जल नमकीन होता है व नीलवर्ण की भूमि का जल मीठा होता है।
* ''अतृणे सतृणा यस्मिन् सतृणे तृणवर्जिता मही यत्र ।
: ''तस्मिच्छिरा प्रदिष्टा वक्तव्यं वा धनं चास्मिन्
: तृणहीन स्थान पर कोई तृणयुक्त स्थान हो, या वहाँ सब दूर घास हो पर एक स्थान पर हरी घास न हो तो वहाँ साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा होती है, या गड़ा धन होता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल ( (प्राचीन भारतीय तौल की इकाई)) जल एकत्र हो गया हो।
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:वराहमिहिर|वराहमिहिर]]''' (सम्भावित जीवकाल : ईसा की ५वीं-६ठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे। उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।'' ([[ग्रहण]] पर)
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
* ''धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलौपलब्धिः ।
:'' पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥
:'' एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभस्तो वसुधाविशेषात् ।
:'' नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥'' -- बृहत्संहिता ५४.१-२ (भूजल के शोधन के सम्बन्ध में)
: अर्थ - धर्म व यश को देने वाला दकार्गल को बताता हूँ जिससे भूमि में स्थित जल का ज्ञान होता है तथा उसके प्राप्ति के उपायों को करते हुए भूमि में स्थित जल को प्राप्त किया जा सके जो मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो। जिस प्रकार मानव जीवन में नाड़ियाँ हाती हैं जिनसे रक्तप्रवाह होता है उसी प्रकार भूमि में भी ऊँची-नीची अनेक जल शिराएं होती हैं जिनके द्वारा जलप्रवाह होता रहता है।
: वर्षा का जल सर्वत्र एक ही स्वाद वर्ण का होता है परन्तु भूमि के सन्सर्ग से उसका वर्ण व स्वाद अलग-अलग हो जाता है, अतः जल की परीक्षा भूमि के समान ही करनी चाहिए अर्थात् जिस प्रकार की भूमि होगी उसी प्रकार का जल उस स्थान पर प्राप्त होगा।
* जो भूमि सशर्करा व ताम्रवर्ण की हो वहाँ जल का स्वाद कसैला होता है। कपिल वर्ण की भूमि हो तो उस स्थान का जल क्षारीय होता है। पाण्डु वर्णी भूमि का जल नमकीन होता है व नीलवर्ण की भूमि का जल मीठा होता है।
* ''अतृणे सतृणा यस्मिन् सतृणे तृणवर्जिता मही यत्र ।
: ''तस्मिच्छिरा प्रदिष्टा वक्तव्यं वा धनं चास्मिन्
: तृणहीन स्थान पर कोई तृणयुक्त स्थान हो, या वहाँ सब दूर घास हो पर एक स्थान पर हरी घास न हो तो वहाँ साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा होती है, या गड़ा धन होता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल ( (प्राचीन भारतीय तौल की इकाई)) जल एकत्र हो गया हो।
=== त्रिकोणमितीय सूत्र ===
; sin x = cos(pi/2 - x)
* ''प्रथमो बाहुजीवः स्यात्तत्कोणस्य तथा कोटिजीवा।
: ''कोटिजीवैव बाहुजीवा नवतेः शोधितात् तु या ॥'' -- सूर्यसिद्धान्त , ग्रहगणिताध्याय
: किसी चाप का sine बाहुज्या कहलाता है और इस कोण के complement का sine कोटिज्या कहलाता है। किसी चाप (कोण) का कोटिज्या = ( 90 - वह कोण ) का ज्या।
; sin<sup>2</sup>x + cos<sup>2</sup>x = 1
* ''दोःकोटिवर्गयोर्योगान्मूलं कर्णः प्रकीर्तितः ।
: ''तस्मात् दोर्ज्या-कोटिज्योर्वर्गयोगः त्रिंशत्-त्रिज्योत्पत्तिः ॥
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अनुनाद सिंह
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/* उद्धरण */
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'''[[:w:वराहमिहिर|वराहमिहिर]]''' (सम्भावित जीवकाल : ईसा की ५वीं-६ठी शताब्दी) भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। उन्होंने अपने पिता से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान में वेधशाला की स्थापना उनके प्रमुख कार्यों की झलक देते हैं। वे सूर्य के उपासक थे। उन्होंने लघुजातक, बृहत्संहिता, बृहत्जातक, योगयात्रा और पंचसिद्धन्तिका नामक ग्रन्थों की रचना की। बृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृति, इतिहास, भौतिक व भूगोल जैसे विषयों का उल्लेख है।
== उद्धरण ==
* '' जयति जगतः प्रसूतिर्विश्वात्मा सहजभूषणं नभसः ।
: ''द्रुतकनकसदृशदशशतमयूखमालार्चितः सविता ॥'' -- बृहत्संहिता के प्रथम अध्याय के मंगलाचरण में [[सूर्य]] की स्तुति
: सूर्य जो ब्रह्मांड का निर्माता है, जो सर्वोच्च प्राणी (ब्रह्मांड की आत्मा) है, जो आकाश का प्राकृतिक आभूषण है और जो पिघले हुए सोने के समान हजारों किरणों की पंक्तियों से सुशोभित है, वह सर्वोच्च रूप से फल-फूल रहा है।
* ''भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः ।'' ([[ग्रहण]] पर)
: चन्द्र ग्रहण में [[चन्द्रमा]] [[पृथ्वी]] की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा [[सूर्य]] (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
* ''धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलौपलब्धिः ।
:'' पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥
:'' एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभस्तो वसुधाविशेषात् ।
:'' नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥'' -- बृहत्संहिता ५४.१-२ (भूजल के शोधन के सम्बन्ध में)
: अर्थ - धर्म व यश को देने वाला दकार्गल को बताता हूँ जिससे भूमि में स्थित जल का ज्ञान होता है तथा उसके प्राप्ति के उपायों को करते हुए भूमि में स्थित जल को प्राप्त किया जा सके जो मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो। जिस प्रकार मानव जीवन में नाड़ियाँ हाती हैं जिनसे रक्तप्रवाह होता है उसी प्रकार भूमि में भी ऊँची-नीची अनेक जल शिराएं होती हैं जिनके द्वारा जलप्रवाह होता रहता है।
: वर्षा का जल सर्वत्र एक ही स्वाद वर्ण का होता है परन्तु भूमि के सन्सर्ग से उसका वर्ण व स्वाद अलग-अलग हो जाता है, अतः जल की परीक्षा भूमि के समान ही करनी चाहिए अर्थात् जिस प्रकार की भूमि होगी उसी प्रकार का जल उस स्थान पर प्राप्त होगा।
* जो भूमि सशर्करा व ताम्रवर्ण की हो वहाँ जल का स्वाद कसैला होता है। कपिल वर्ण की भूमि हो तो उस स्थान का जल क्षारीय होता है। पाण्डु वर्णी भूमि का जल नमकीन होता है व नीलवर्ण की भूमि का जल मीठा होता है।
* ''अतृणे सतृणा यस्मिन् सतृणे तृणवर्जिता मही यत्र ।
: ''तस्मिच्छिरा प्रदिष्टा वक्तव्यं वा धनं चास्मिन्
: तृणहीन स्थान पर कोई तृणयुक्त स्थान हो, या वहाँ सब दूर घास हो पर एक स्थान पर हरी घास न हो तो वहाँ साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा होती है, या गड़ा धन होता है।
=== वर्षा पर ===
* ''अस्वत्थाः पिपीलिकाण्डसंचारे सर्पाणां च वृक्षाधिरोहणे ।
: ''अकारणमुद्विग्ना गावो यदा भवन्ति तदा सद्यो वृष्टिः ॥'' -- बृहत्संहिता २८.७
: जब चीटियाँ बिना किसी दूसरे कारण के ही अपने अण्डे उठाकर स्थानान्तरित होने लगें , जब सर्प वृक्ष पर चढ़ना आरम्भ कर दें, जब गायें बिना किसी कारण के उद्विग्न (परेशान) हो जाँय, कुछ ही समय में वर्षा होगी।
* ''मार्जारो भूमितलमुल्लिखति नखैः कांस्यमपि विगन्धं स्यात् ।
: ''रथ्यासु च सिकताभिः सेतुं कुर्वन्ति बालाश्च ॥'' -- बृहत्संहिता २८.५
: जब बिल्ली अपने नख (नाखून) से भूमि को खरोंचने लगे, जब कांसे के बर्तनों से गन्ध आने लगे, जब बच्चे रेत के पुल बनाने लगें, वर्षा अवश्य होगी।
* ''हस्तविशालं कुण्डं प्रवृत्तमेवं प्रकीर्तितं मानम् ।
: ''पञ्चाशत्पलमाढकमनेन मिनीयाज्जलस्यात्र ॥'' -- बृहत्संहिता २३.२
: वर्षा को मापने के लिये प्रयुक्त पात्र का मुँह वृत्ताकार होना चाहिये जिसका व्यास एक हाथ होना चाहिये। एक आढक वर्षा तब मानी जाती है जब इस पात्र में ५० पल ( (प्राचीन भारतीय तौल की इकाई)) जल एकत्र हो गया हो।
=== त्रिकोणमितीय सूत्र ===
; sin x = cos(pi/2 - x)
* ''प्रथमो बाहुजीवः स्यात्तत्कोणस्य तथा कोटिजीवा।
: ''कोटिजीवैव बाहुजीवा नवतेः शोधितात् तु या ॥'' -- सूर्यसिद्धान्त , ग्रहगणिताध्याय
: किसी चाप का sine बाहुज्या कहलाता है और इस कोण के complement का sine कोटिज्या कहलाता है। किसी चाप (कोण) का कोटिज्या = ( 90 - वह कोण ) का ज्या।
; sin<sup>2</sup>x + cos<sup>2</sup>x = 1
* ''दोःकोटिवर्गयोर्योगान्मूलं कर्णः प्रकीर्तितः ।
: ''तस्मात् दोर्ज्या-कोटिज्योर्वर्गयोगः त्रिंशत्-त्रिज्योत्पत्तिः ॥
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