विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.21 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk दीपक चोपड़ा 0 3084 33238 23544 2026-09-27T16:15:02Z Mulkh Singh 3596 33238 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Deepak Chopra.jpg|right|thumb|{{PAGENAME}}]] ==उक्तियाँ== * आप और मैं अनंत विकल्पों का चुनाव कर सकते हैं। हमारे अस्तित्व के हर एक क्षण में हम उन सभी संभावनाओं के मध्य में होते हैं जहाँ हमारे पास अनंत विकल्प मौजूद होते हैं। * अपने आनंद से पुनः जुड़ने से महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। कुछ भी इतना समृद्ध नहीं है।कुछ भी इतना वास्तविक नहीं है। * सोचना ब्रेन केमिस्ट्री का अभ्यास है। * अपने शरीर को जानकार कर एवं विश्वास और जीव विज्ञान के बीच कि कड़ी समझ कर आप उम्र बढ़ने से मुक्ति पा सकते हैं। * उथल -पुथल और अराजकता के बीच अपने भीतर शांति बनाये रखें। * प्रसन्नता ऐसी घटनाओ की निरंतरता है जिनका हम विरोध नहीं करते। * हम उम्र बढ़ने, बीमारी और मृत्यु के शिकार नहीं हैं। ये सीनरी का हिस्सा हैं, सिद्ध पुरुष नहीं हैं जिनमे कोई बदलाव नहीं आता। यह सिद्ध पुरुष आत्मा है, सनातन अस्तित्व की अभिव्यक्ति। * हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की आशा में होते हैं। इसलिए ये डर पर आधारित हैं। * <sub>जितना कम आप अपना ह्रदय दूसरों के समक्ष खोलेंगे , उतनी अधिक आपके ह्रदय को पीड़ा होगी</sub>। * ब्रह्माण्ड में कोई भी टुकड़ा अतिरिक्त नहीं है। हर कोई यहाँ इसलिए है क्योंकि उसे कोई जगह भरनी है, हर एक टुकड़े को बड़ी पहेली में फिट होना है। * यदि आप और मैं इस क्षण किसी के भी विरुद्ध हिंसा या नफरत का विचार ला रहे हैं तो हम दुनिया को घायल करने में योगदान दे रेहे हैं। * ''<u>प्रेम को कारण की ज़रुरत नहीं होती। वो दिल के तर्कहीन ज्ञान से बोलता है।</u>'' * स्वभाव रखना है तो एक छोटे से दीपक की तरह रखो यो गरीव की झोंपड़ी में भी उतनी रौशनी देता है जितनी के एक राजा के महल में देता है। * ख़ुशी एसी घटनायों की निरंतरता है जिसका आप कभी विरोध नहीं कर पाते। * अंहकार, दरअसल वास्‍तविकता में आप नहीं है। अंहकार की आपकी अपनी छवि है। ये आपका सामाजिक मुखौटा है। ये वो पात्र है जो आप खेल रहे हैं। आपका सामाजिक मुखौटा प्रशंशा पर जीता है। वो नियंत्रण चाहता है, सत्ता के दम पर पनपता है क्‍योंकि वो भय में जीता है। ==बाहरी कडियाँ== {{कॉमन्स श्रेणी|Deepak Chopra|{{PAGENAME}}}} {{Wikipedia}} [[श्रेणी:लेखक]] [[en:Deepak Chopra]] i93ffqejnpyws565dbtxwog31adfh5r धर्म 0 6052 33248 31705 2026-09-28T07:57:51Z अनुनाद सिंह 658 33248 wikitext text/x-wiki '''धर्म''' का शाब्दिक अर्थ है 'धारण करने योग्य'। इसका सामान्य अर्थ 'कर्तव्य' है। == सूक्तियाँ == * ''धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । : ''धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥'' -- [[मनुस्मृति]] : धारणा शक्ति, क्षमा, दम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध – ये दस धर्म के लक्षण हैं । * ''विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः। : ''हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत॥'' -- [[मनुस्मृति]] (द्वितीय अध्याय, श्लोक 1) : वह धर्म (या कर्तव्य) जिसे मनुष्य का शुद्ध हृदय और उसकी अंतरात्मा पूरी तरह स्वीकार करती है, उसे तुम ध्यान से सुनो और समझो। मनुस्मृति के इस श्लोक में धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाया गया है। इसमें कहा गया है कि सच्चा धर्म केवल बाहरी नियमों या किताबों में नहीं है। धर्म वह सदाचार है जिसका पालन राग-द्वेष (अहंकार, नफरत और आसक्ति) से मुक्त विद्वान और सज्जन लोग करते हैं, और जिसे करने के लिए हमारा मन और अंतरात्मा अंदर से गवाही देती है (जिस काम को करते समय मन में कोई संकोच, भय या ग्लानि न हो)। *'' श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् । :'' आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ :'' यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् । :'' आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥'' --[[महाभारत]], शान्तिपर्व : धर्म का सार क्या है, यह सुनो और सुनकर उसे धारण भी करो! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये। : और अपने लिए जिन-जिन बातों की इच्छा हो वे दूसरों को भी मिलें, ऐसा सोचना चाहिये। अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये। * '' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।'' -- मीमांसासूत्र-१,१.२ : प्रेरणा, धर्म का लक्षण और अर्थ है। (लोक-परलोक के सुखों की सिद्धि के लिये गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण है।) * ''धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्'' -- कुमारिल भट्ट, तन्त्रवार्तिकम् : 'धर्म' नामक विषय के बारे में बोलना मीमांसा का उद्देश्य है। * ''यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।'' -- वैशेषिक सूत्र : जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है। * ''सुखस्य मूलं धर्मः।''-- चाणक्य <ref>[https://www.divyayug.com/index.php/सुख-का-मूल-धर्म-है सुखस्य मूलं धर्मः]</ref> : धर्म, सुख का मूल (जड़) है। * ''धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। : ''यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥ -- महाभारत : 'धर्म' शब्द 'धृ' अर्थात 'धारण करना' धातु से बना है। धर्म से ही सब प्रजा बँधी हुई है। यह निश्चय किया गया है कि जिससे (सब प्रजा का) धारण होता है वही धर्म है। * ''ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शृणोति माम् ॥ : ''धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते ॥ -- वेदव्यास, महाभारत में : मैं बाँहें उठाकर लोगों को समझा रहा हूँ कि धर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, इसलिए क्यों नहीं धर्म के मार्ग पर चलते? पर कोई मेरी सुनता ही नहीं। * ''न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । : ''नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥'' -- महाभारत, भारतसावित्री का चतुर्थ श्लोक : कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिये भी धर्म का त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धन का हेतु अनित्य। * ''नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। : ''स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥'' -- [[भगवद्गीता]] : मनुष्यलोक में इस समबुद्धिरूप धर्म के आरम्भ का नाश नहीं होता। इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान महान् भय से रक्षा कर लेता है। * ''धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। : ''तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ : मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले। * ''यतो धर्मः ततो जयः'' -- महाभारत : जहाँ धर्म है वहाँ जीत है। * ''पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रांगमिश्रिताः। : ''वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥'' -- याज्ञवल्क्य स्मृति : पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, ६ वेदांग एवं ४ वेद - ये विद्या और धर्म के चौदह स्थान हैं। * ''सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । : ''सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥ : सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहीं। इसलिए तू धर्मपरायण बन । * ''तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके । : ''भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥ : तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म – ये अवश्य ही जगत में हंसी के पात्र बनते हैं । * ''अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने । : ''अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥ : इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है । केवल धर्म, और कीर्ति ये दो ही बातें स्थिर हैं। * ''स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य जीवति । : ''गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् ॥ : जो गुणवान है, धार्मिक है वही जीते हैं। जो गुण और धर्म से रहित है उसका जीवन निष्फल है । * ''प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु साधनानामनेकता । : ''उपास्यानामनियमः एतद् धर्मस्य लक्षणम् ॥ : वेदों में प्रामाण्यबुद्धि, साधना के स्वरुप में विविधता, और उपास्यरुप संबंध में नियमन नहीं – ये हि धर्म के लक्षण हैं । * ''अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः । : ''दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥ : अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान – ये दस धर्म के साधन है । * ''धर्मः कल्पतरुः मणिः विषहरः रत्नं च चिन्तामणिः : ''धर्मः कामदुधा सदा सुखकरी संजीवनी चौषधीः । : ''धर्मः कामघटः च कल्पलतिका विद्याकलानां खनिः : ''प्रेम्णैनं परमेण पालय ह्रदा नो चेत् वृथा जीवनम् ॥ : धर्म कल्पतरु, विषहर मणि, चिंतामणि रत्न है । धर्म सदा सुख देनेवाली कामधेनु है, और संजीवनी औषधि है । धर्म कामघट, कल्पलता, विद्या और कला का खजाना है । इस लिए, तूं उस धर्म का प्रेम और आनंद से पालन कर, वर्ना तेरा जीवन व्यर्थ है । * ''अध्रुवेण शरीरेण प्रतिक्षण विनाशिना । : ''ध्रुवं यो नार्जयेत् धर्मं स शोच्यः मूढचेतनः ॥ : प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले, अनिश्चित शरीर के मुकाबले, निश्चित ऐसे धर्म को जो प्राप्त नहि करता, वह मूर्ख शोक करने योग्य है । * ''पूर्वे वयसि तत्कुर्याधेन वृद्धः सुखं वसेत् । : ''यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येनामुत्रसुखं वसेत् ॥ : यौवन में ऐसा करना चाहिए जिससे बुढ़ापा सुख से कटे। यह जीवन ऐसे जीना जिससे परलोक (या दूसरे जन्म) में चैन मिले । * ''अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने । : ''अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥ : इस जगत में धन, जीवन, यौवन अस्थिर हैं; पुत्र और स्त्री भी अस्थिर हैं । केवल धर्म और कीर्ति (ये दो ही) स्थिर है । * ''उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृतम् । : ''आयुषः खण्डमादाय रविरस्तं गमिष्यति ॥ : रोज उठकर “आज क्या सुकृत्य किया” यह जान लेना चाहिए, क्यों कि सूर्य (हररोज) आयुष्य का छोटा तुकडा लेकर अस्त होता है । * ''अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् । : ''गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ : बूढापा और मृत्यु नहीं आयेंगे ऐसा समजकर विद्या और धन का चिंतन करना चाहिए । पर मृत्यु ने हमें बाल से जकड रखा है, ऐसा समजकर धर्म का आचरण करना चाहिए । * ''जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । : ''मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ : धर्महीन मनुष्य को जिंदा होने के बावजुद मैं मृत समजता हूँ । धर्मयुक्त इन्सान मर कर भी दीर्घायु रहेता है उस में संदेह नहीं । * ''अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः । : ''नित्य संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसङ्ग्रहः ॥ : शरीर अनित्य है; धन भी कायमी नहि है; और मृत्यु निश्चित है, इस लिए धर्मसंग्रह करना चाहिए । * ''सकलापि कला कलावतां विकला धर्मकलां विना खलु । : ''सकले नयने वृथा यथा तनुभाजां कनीनिकां विना ॥ : जैसे इन्सान की आँखें कीकी के बिना निस्तेज है, वैसे हि धर्म की कला के बिना सभी कला व्यर्थ है । * ''मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । : ''विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥ : मृत शरीर को छोड़कर जैसे लकड़ी के टुकड़े चले जाते हैं, वैसे संबंधी भी मुँह फेरकर चले जाते हैं । केवल धर्म ही मनुष्य के पीछे जाता है । * ''आहार निद्रा भय मैथुनं च :''सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । : ''धर्मो हि तेषामधिको विशेष: :''धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ : आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये तो इन्सान और पशु में समान है । इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है । * ''धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः । : ''फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥ : लोगों को धर्म का फल चाहिए, पर धर्म का आचरण नहीं, और पाप का फल नहि चाहिए, पर गर्व से पापाचरण करना है ! * ''धर्मो मातेव पुष्णानि धर्मः पाति पितेव च । : ''धर्मः सखेव प्रीणाति धर्मः स्निह्यति बन्धुवत् ॥ : धर्म माता की तरह हमें पुष्ट करता है, पिता की तरह हमारा रक्षण करता है, मित्र की तरह खुशी देता है, और सम्बन्धियों की भाँति स्नेह देता है। * ''अन्यस्थाने कृतं पापं धर्मस्थाने विमुच्यते । : ''धर्मस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥ : अन्य जगहों पे किये हुए पापों से धर्मस्थान में मुक्ति मिलती है, पर धर्मस्थान में किया हुआ पाप वज्रलेप बनता है । * ''न क्लेशेन विना द्रव्यं विना द्रव्येण न क्रिया । : ''क्रियाहीने न धर्मः स्यात् धर्महीने कुतः सुखम् ॥ : क्लेश बिना द्रव्य नहीं, द्रव्य बिना क्रिया नहीं, क्रिया बिना धर्म संभव नहीं; और धर्म के बिना सुख कैसे हो सकता है? * ''वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति। : ''ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति॥'' -- महाभारत, आरण्यक पर्व : अधर्म का आचरण करने से मनुष्य पहले बढ़ता है। इसके बाद धनादि ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है। उसके बाद शत्रुओं को भी जीतता है। अन्त में वह समूल नष्ट हो जाता है। * ''कथमुत्पद्यते धर्मः कथं धर्मो विवर्धते । : ''कथं च स्थाप्यते धर्मः कथं धर्मो विनश्यति ॥'' -- [[महाभारत]] : धर्म किससे उत्पन्न होता है? धर्म किससे बढ़ता है? और किससे धर्म स्थापित हो जाता है, तथा किससे धर्म विनष्ट हो जाता है? * ''सत्येनोत्पद्यते धर्मो दयादानेन वर्धते । : ''क्षमाया स्थाप्यते धर्मो क्रोधलोभाद्विनश्यति ॥'' -- [[महाभारत ]] : धर्म सत्य से उत्पन्न होता है, दया और दान से बढता है, क्षमा से स्थिर होता है, और क्रोध एवं लोभ से नष्ट होता है । * ''अभावो वा प्रभावो वा यत्र नास्त्यर्थकामयोः। : ''समाजेष्वात्मरूपत्वं धर्मचक्र प्रवर्त्तनम्॥ : जहां समाज में अर्थ का और कर्म का अभाव भी नहीं रहता और प्रभाव भी नहीं रहता तथा समाज में ही व्यक्ति का आत्मभाव रहता है, वहीं धर्मचक्र का प्रवर्तन होता है। * '' जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः । : ''जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्तिः ॥'' -- [[महाभारत]] : दुर्योधन कहते है कि ऐसा नहीं की [[धर्म]] तथा अधर्म क्या है यह मैं नहीं जानता था। परन्तु ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना यह मेरी प्रवृत्ति नहीं थी और अधर्म के मार्ग से मैं निवृत्त भी नहीं हो सका । * ''यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। : ''अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥4.7॥ : ''परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। : ''धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥4.8॥'' -- गीता में श्रीकृष्ण : हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। : साधु पुरुषों के रक्षण के लिये, दुष्कृत्य करने वालों के नाश के लिये, तथा धर्म की स्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ। * ''नैव राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः। : ''धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥'' : ''पाल्यमानास्तथाऽन्योन्यं नरा धर्मेण भारत। : ''दैन्यं परमुपाजग्मुस्ततस्तान्मोह आविशत्॥ : ''ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ। : ''प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत्॥''-- [[महाभारत]], शान्तिपर्व, सत्ययुग के हालात बताते हुए युधिष्ठिर को भीष्म का उपदेश : (उस समय) न राज्य था और ना राजा था , न दण्ड था और न दण्ड देने वाला । सारी प्रजा ही नैतिक आचरण से एक-दूसरे की रक्षा करती थी। : भारत ! सब मनुष्य धर्म के द्वारा परस्पर पालित और पोषित होते थे। कुछ दिनों के बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षण के कार्य में महान्‌ कष्ट का अनुभव करने लगे; फिर उन सब पर मोह छा गया। : हे नरश्रेष्ठ ! जब सारे मनुष्य मोह के वशीभूत हो गये, तब कर्तव्य और अकर्त्तव्य के ज्ञान से शून्य होने के कारण उनके धर्म का नाश हो गया। * ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । : ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥'' -- ईशावास्योपनिषद् : हे सूर्य ! सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका हुआ है । मुझे सत्यधर्म की प्राप्ति के लिये उस आवरण को हटा दें। * जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़इ असुर अधम अभिमानी। : तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा। हरहिं दयानिधि सज्जन पीरा॥ -- [[तुलसीदास]] : जब-जब धर्म की हानि होति है और असुर, अधम और अभिमानी बढ़ जाते हैं तब-तब दयानिधि प्रभु विविध शरीर धारण करके सज्जनों के दुख दूर करते हैं। * हम इह काज जगत मो आए। : धरम हेतु गुरुदेव पठाए॥ : जहां-जहां तुम धरम बिथारो। : दुसट दोखियनि पकरि पछारो॥ : याही काज धरा हम जनमे। : समझ लेहु साधू सब मनमे॥ : धरम चलावन संत उबारन। : दुसट सभन को मूल उपारन॥'' -- [[गुरु गोविन्द सिंह]], 'विचितर नाटक' में === सनातन धर्म === * ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । : ''प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥'' -- [[मनुस्मृति]], अध्याय 4, श्लोक 138 : सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये। सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये। प्रिय किन्तु असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यह सनातन धर्म है। * ''अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। : ''अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व : मन, वाणी और कर्म से प्राणियों के प्रति सद्भावना, सब पर कृपा और दान यही सज्जनों का सनातन-धर्म है। * ''न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन । : ''क्षान्त्या वैराणि शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः ॥ -- उदानवर्ग, द्रोहवर्ग १४.११ : इस संसार में वैर (वैमनस्य) का प्रतिकार वैर से करने से वैर का अन्त कभी भी नहीं होता है। उसका अन्त तो केवल वैर न कर सद्भाव पूर्ण व्यवहार से ही संभव है, यही सनातन धर्म है। * ''न हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनम् । : ''अवेरेण च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥'' -- धम्मपद, यमकवग्ग : इस संसार में वैर (वैमनस्य) का प्रतिकार वैर से करने से वैर का अन्त कभी भी नहीं होता है। उसका अन्त तो केवल वैर न कर सद्भाव पूर्ण व्यवहार से ही संभव है, यही सनातन धर्म है। * ''आतुरे नियमो नास्ति बाले वृद्धे तथैव च । : ''पराचाररते चैव एष धर्मः सनातनः ॥'' -- महासुभाषितसंग्रह : रोगी के लिये, बालक के लिये, वृद्ध के लिये, और दूसरों का उपकार करने वालों के लिये (अपरिवर्तनशील) नियम नहीं है। (अर्थात इन सबके लिये नियम बहुत लोचपूर्ण हैं)। * ''अकॄत्यं नैव कर्तव्यं प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते। : ''न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्मः सनातनः॥ : प्राण संकट में होने पर भी अकरणीय कर्म नहीं करना चाहिए और करणीय कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, यह सनातन धर्म है। * हिन्दू धर्म है क्या? यह धर्म क्या है जिसे हम सनातन कहते हैं। यह हिन्दू धर्म मात्र इसलिये कहलाया क्योंकि यह हिन्दू राष्ट्र में बढा, क्योंकि इस प्रायद्वीप में यह समुद्र और हिमालय से घिरे होने के कारण एकान्त में विकसित हुआ क्योंकि इस पावन और प्राचीन भूमि में इसे युगों तक सुरक्षित रखने का कार्यभार आर्यजाति को सौंपा गया था। लेकिन यह किसी एक देश के सीमान्तों में सीमाबद्ध नहीं है। यह विश्व के किसी भी देश की सदा के लिये निजी बपौती नहीं है। जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं , वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यह सार्वभौमिक धर्म ही है जो अन्य सबको गले लगाता है। यदि कोई धर्म सार्वभौमिक नहीं है, तो वह सनातन नहीं हो सकता। एक संकीर्ण धर्म, साम्प्रदायिक धर्म , ऐकान्तिक धर्म का उद्देश्य और अवधि सीमित ही होती है। यही एकमात्र ऐसा धर्म है जो विज्ञान के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिन्तन को सम्मिलित करते हुए और उनका पूर्वानुमान करते हुए भौतिकवाद पर विजय पा सकता है। यही एक मात्र वह धर्म है जो बराबर मानव जाति को यह कहता है कि भगवान् हमारे समीप हैं और उन तक पहुँचने के सभी सम्भव उपायों को अपनाता है। -- [[महर्षि अरविन्द]] == परम धर्म == * ''अहिंसा परमो धर्मः : अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। * ''आचारः परमो धर्मः : आचरण ही परम धर्म है। ==इन्हें भी देखें== * [[कर्म]] * [[अर्थ]] * [[मोक्ष]] * [[नीति]] * [[पंथनिरपेक्षता]] ==बाहरी कड़ियाँ== [https://janamejayans.home.blog/धर्म-जिज्ञासा-1/ धर्म जिज्ञासा] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} 6472cpb8hm1ntfrha7tvikixjt41ka3 सांख्यिकी 0 6785 33239 24123 2026-09-27T18:16:50Z अनुनाद सिंह 658 33239 wikitext text/x-wiki '''[[:w:सांख्यिकी|सांख्यिकी]]''' एक गणितीय विज्ञान है जो आंकड़ों के एकत्रीकरण, विश्लेषण, उनसे निष्कर्ष निकालने तथा आंकड़ों को प्रस्तुत करने से सम्बन्धित है। == उक्तियाँ == * सांख्यिकी, आँकड़ों से सीखने तथा अनिश्चितता को मापने, नियंत्रित करने और उसके बारे में बताने का विज्ञान है। -- मैरी डेविडियन और थॉमस ए लुई (2012). "Why Statistics?". Science. DOI:10.1126/science.1218685. * सभी मॉडल त्रुटिपूर्ण होते हैं, लेकिन कुछ उपयोगी होते हैं। -- जॉर्ज ई पी बॉक्स, 1979 * सांख्यिकी सबसे सफल सूचना का विज्ञान रहा है। जो लोग इसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें इसका पुनः आविष्कार करने का कष्ट उठाना पड़ेगा। -- Jerome H. Friedman (April 2001) के अनुसार Bradley Efron द्वारा कहा गया। "The Role of Statistics in the Data Revolution?" International Statistical Review 69: 5-10. * संक्षेप में, और अपने सबसे स्पष्ट रूप में, सांख्यिकीय विधियों का उद्देश्य आंकड़ों को कम करना है। आँकड़े प्रायः इतने अधिक होते हैं कि वे मस्तिष्क में समा नहीं सकते। इसलिये इन्हें अपेक्षाकृत कम राशियों द्वारा निरूपित किया जाता है जो सम्पूर्ण आंकड़ों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व करते हैं। -- आर ए फिशर (1922). "On the mathematical foundations of theoretical statistics": 311. DOI:10.1098/rsta.1922.0009. * सांख्यिकी, अनिश्चितता का विज्ञान भी है और आंकड़ों से सूचना निकालने की प्रौद्योगिकी भी। -- डेविड जे हैण्ड (2009). "Modern statistics: the myth and the magic". Journal of the Royal Statistical Society. DOI:https://doi.org/10.1111/j.1467-985X.2009.00583.x. * सांख्यिकी उसको भी ठीक-ठीक बताने की कला है जिसे वे स्वयं नहीं जानते। -- William Kruskal (1965). "STATISTICS, MOLIERE AND HENRY ADAMS": 80. * हममें से हर कोई अपने पूरे जीवन सांख्यिकी करता रहा है। मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि हममें से हरेक व्यक्ति प्रायोगिक प्रेक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने में व्यस्त रहा है। -- William Kruskal (1965). "STATISTICS, MOLIERE AND HENRY ADAMS": 81. * सांख्यिकी की मदद के बिना वास्तविक औषधि जैसी चीज सम्भव नहीं है। -- Pierre Charles Alexandre Louis * भगवान के विचारों को समझने के लिये हमें सांख्यिकी का अध्ययन करना चाहिये क्योंकि ये ही उसके उद्देश्यों के मापक हैं। -- फ्लोरेंस नाइतैंगेल , quoted in Karl Pearson, Life of Francis Galton, vol.II, ch.xiii, sect.i * एक आदमी की मृत्यु एक त्रासदी है, करोड़ों की मृत्यु सांख्यिकी है। * सांख्यिकी, अनिश्चितता की स्थिति में बुद्धिपूर्ण निर्णय लेने की विधि है। -- W. Allen Willis and Harry V. Roberts (1956). Statistics: A New Approach. The Free Press. pp. 3. * एक व्यक्ति के जीवनकाल से बढ़कर कोई अनिश्चितता नहीं है लेकिन एक हजार जीवनों के औसत से अधिक निश्चित कुछ भी नहीं है।-- Attributed to Elizur Wright ==इन्हें भी देखें== *[[गणित]] *[[गणित]] *[[विश्लेषण]] dpdgu6fym3zwo2xlmqexfznaydlgqy4 जलयान 0 6937 33240 24797 2026-09-28T04:18:20Z अनुनाद सिंह 658 33240 wikitext text/x-wiki '''जलयान''' (जहाज / शिप) एक पानी में चलने वाला एक विशाल यान है जिसमें यात्री होते हैं या वस्तुएं लदी होती हैं। पहले के जलयान हवा में लगे हुए पालों से चलते थे, उसके बाद भाप से चलने वाले जलयान आये । वर्तमान समय में अधिकांश जलयान पेट्रोलियम से चलते हैं। == उक्तियाँ == * जलयान में होना, जेल में होने के समान है, जिसमें डूबने की सम्भावना भी है। -- सैमुएल जॉन्सन, James Boswell द्वारा 'Life of Samuel Johnson' (1759) मे उद्धृत। * आप जो कोई भी हों, गति और पुनरावलोकन (रिफ्लेक्शन) आपके लिये ही हैं। दैवी जलयान, आपके लिये दैवी सागर पर चल रहा है। -- वाल्ट व्हिटमैन, Song of the Rolling Earth, 2. * एक छोटा भी छेद एक बड़े जहाज को डुबा सकता है। -- [[बेंजामिन फ्रैंकलिन]], Poor Richard's Almanac (1732-1758) में * विशाल जहाज को चलने के लिये गहरा समुद्र चाहिये। -- जॉर्ज हर्बर्ट, Jacula Prudentum (1651) * जहाज बन्दरगाह पर सुरक्षित होती है, किन्तु जहाज बन्दरगाह पर खड़े होने के लिये नहीं बनी है। -- William Greenough Thayer Shedd, attributed without citation in Gary Ninneman, C.I.A.: Church in Atrophy (Xulon Press, 2006), p. 167. ==इन्हें भी देखें== *[[जलसेना]] *[[नौका]] mxtuhd75lq84lq5ouk7v0toeh2xmw0i 33241 33240 2026-09-28T04:18:34Z अनुनाद सिंह 658 /* उक्तियाँ */ 33241 wikitext text/x-wiki '''जलयान''' (जहाज / शिप) एक पानी में चलने वाला एक विशाल यान है जिसमें यात्री होते हैं या वस्तुएं लदी होती हैं। पहले के जलयान हवा में लगे हुए पालों से चलते थे, उसके बाद भाप से चलने वाले जलयान आये । वर्तमान समय में अधिकांश जलयान पेट्रोलियम से चलते हैं। == उक्तियाँ == * जलयान में होना, जेल में होने के समान है, जिसमें डूबने की सम्भावना भी है। -- सैमुएल जॉन्सन, James Boswell द्वारा 'Life of Samuel Johnson' (1759) मे उद्धृत। * आप जो कोई भी हों, गति और पुनरावलोकन (रिफ्लेक्शन) आपके लिये ही हैं। दैवी जलयान, आपके लिये दैवी सागर पर चल रहा है। -- वाल्ट व्हिटमैन, Song of the Rolling Earth, 2. * एक छोटा भी छेद एक बड़े जहाज को डुबा सकता है। -- [[बेंजामिन फ्रैंकलिन]], Poor Richard's Almanac (1732-1758) में * विशाल जहाज को चलने के लिये गहरा समुद्र चाहिये। -- जॉर्ज हर्बर्ट, Jacula Prudentum (1651) * जहाज बन्दरगाह पर सुरक्षित होती है, किन्तु जहाज बन्दरगाह पर खड़े होने के लिये नहीं बनी है। -- William Greenough Thayer Shedd, attributed without citation in Gary Ninneman, C.I.A.: Church in Atrophy (Xulon Press, 2006), p. 167. ==इन्हें भी देखें== *[[जलसेना]] *[[नौका]] 4jj8bv69bx9zvpl38gbwa9h0tgxcgh0 पाणिनि 0 7128 33253 33175 2026-09-28T10:22:43Z अनुनाद सिंह 658 /* देखें भी */ 33253 wikitext text/x-wiki '''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। == उक्तियाँ == * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]] : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। == पाणिनि पर उद्धरण == * ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । : ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है। * ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । : ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है। * ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । : ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥'' : अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है। : भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।) * ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् । : ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ : वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ। * ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने- : ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्। : ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल- : ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref> : व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है? * ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह । : ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निबध्नन्ति किमत्र चित्रम् ॥ : विचारवान पाणिनि ने अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। इसमें आश्चर्य कैसा? जैसे भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, वैसे ही पाणिनि ने भी किया है। * "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३) * "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)* == देखें भी == * [[संस्कृत]] * [[भारतीय दर्शन]] * [[व्याकरण]] * [[शब्द]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ] * [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:संस्कृत विद्वान]] [[Category:भारतीय दर्शन]] [[Category:वैयाकरण]] [[Category:प्राचीन भारत]] [[Category:शिक्षा]] 9pc3joj8wwp989hzvlpzn11dw6m1w0s 33254 33253 2026-09-28T10:40:17Z अनुनाद सिंह 658 /* पाणिनि पर उद्धरण */ 33254 wikitext text/x-wiki '''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। == उक्तियाँ == * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]] : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। == पाणिनि पर उद्धरण == * ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । : ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है। * ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । : ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है। * ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । : ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥'' : अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है। : भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।) * ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् । : ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ : वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ। * ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने- : ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्। : ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल- : ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref> : व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है? * ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निब्ध्नन्ति किमत्र चित्रम् । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, इसमें आश्चर्य कैसा?विचारवान पाणिनि ने तो अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। * ''शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्शिता गौत्मधर्मपत्नी । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : गौतम की धर्मपत्नी से इन्द्र ने कुत्ते की भांति मैथुन किया। महान चिन्तक पाणिनि ने श्वान (कुत्ता), युवान (युवा) और मघवा (इन्द्र) को एक ही दोरी में बांध दिया। * "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३) * "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)* == देखें भी == * [[संस्कृत]] * [[भारतीय दर्शन]] * [[व्याकरण]] * [[शब्द]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ] * [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:संस्कृत विद्वान]] [[Category:भारतीय दर्शन]] [[Category:वैयाकरण]] [[Category:प्राचीन भारत]] [[Category:शिक्षा]] ha4y4am5cndt72off9dy9e7jawl8ly8 33255 33254 2026-09-28T10:57:54Z अनुनाद सिंह 658 33255 wikitext text/x-wiki '''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। == उक्तियाँ == * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]] : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। == पाणिनि पर उद्धरण == * ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । : ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है। * ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । : ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है। * ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । : ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥'' : अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है। : भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।) * ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् । : ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ : वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ। * ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने- : ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्। : ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल- : ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref> : व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है? * ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निब्ध्नन्ति किमत्र चित्रम् । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, इसमें आश्चर्य कैसा?विचारवान पाणिनि ने तो अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। * ''शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्शिता गौत्मधर्मपत्नी । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : गौतम की धर्मपत्नी से इन्द्र ने कुत्ते की भांति मैथुन किया। महान चिन्तक पाणिनि ने श्वान (कुत्ता), युवान (युवा) और मघवा (इन्द्र) को एक ही दोरी में बांध दिया। * "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३) * "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)* * पाणिनि की रचना (अष्टाध्यायी) वास्तव में संस्कृत भाषा का प्राकृतिक व्याकरण है। उनका यह व्याकरण (ग्रन्थ) विशाल एवं प्राचीन साहित्य की महत्वपूर्ण शाखा के केन्द्र में है। किसी अन्य रचना की जडें भारतीय वैज्ञानिक विकास रूपी भूमि में इतनी गहरी नहीं गयीं हैं जितनी यह (अष्टाध्यायी)। -- गोल्डस्टकर (Goldstucker)<ref>[https://tamilandvedas.com/2020/03/12/quotes-on-panini-post-no-7684/ QUOTES ON FAMOUS PANINI]</ref> == देखें भी == * [[संस्कृत]] * [[भारतीय दर्शन]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} * [[व्याकरण]] * [[शब्द]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ] * [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:संस्कृत विद्वान]] [[Category:भारतीय दर्शन]] [[Category:वैयाकरण]] [[Category:प्राचीन भारत]] [[Category:शिक्षा]] pzcrggivg5032pkp8m9afyyby9hs9ut 33256 33255 2026-09-28T10:58:38Z अनुनाद सिंह 658 33256 wikitext text/x-wiki '''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। == उक्तियाँ == * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]] : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। == पाणिनि पर उद्धरण == * ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । : ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है। * ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । : ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है। * ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । : ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥'' : अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है। : भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।) * ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् । : ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ : वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ। * ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने- : ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्। : ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल- : ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref> : व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है? * ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निब्ध्नन्ति किमत्र चित्रम् । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, इसमें आश्चर्य कैसा?विचारवान पाणिनि ने तो अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। * ''शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्शिता गौत्मधर्मपत्नी । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : गौतम की धर्मपत्नी से इन्द्र ने कुत्ते की भांति मैथुन किया। महान चिन्तक पाणिनि ने श्वान (कुत्ता), युवान (युवा) और मघवा (इन्द्र) को एक ही दोरी में बांध दिया। * "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३) * "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)* * पाणिनि की रचना (अष्टाध्यायी) वास्तव में संस्कृत भाषा का प्राकृतिक व्याकरण है। उनका यह व्याकरण (ग्रन्थ) विशाल एवं प्राचीन साहित्य की महत्वपूर्ण शाखा के केन्द्र में है। किसी अन्य रचना की जडें भारतीय वैज्ञानिक विकास रूपी भूमि में इतनी गहरी नहीं गयीं हैं जितनी यह (अष्टाध्यायी)। -- गोल्डस्टकर (Goldstucker)<ref>[https://tamilandvedas.com/2020/03/12/quotes-on-panini-post-no-7684/ QUOTES ON FAMOUS PANINI]</ref> == देखें भी == * [[संस्कृत]] * [[भारतीय दर्शन]] * [[व्याकरण]] * [[शब्द]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ] * [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:संस्कृत विद्वान]] [[Category:भारतीय दर्शन]] [[Category:वैयाकरण]] [[Category:प्राचीन भारत]] [[Category:शिक्षा]] tuxu02ks4tpv949m7nbh8rw5upe45e7 33257 33256 2026-09-28T11:13:48Z अनुनाद सिंह 658 /* पाणिनि पर उद्धरण */ 33257 wikitext text/x-wiki '''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। == उक्तियाँ == * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। * ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]] : अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं। == पाणिनि पर उद्धरण == * ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् । : ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है। * ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । : ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ : जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है। * ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । : ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥'' : अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है। : भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।) * ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् । : ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ : वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ। * ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने- : ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्। : ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल- : ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref> : व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है? * ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निब्ध्नन्ति किमत्र चित्रम् । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, इसमें आश्चर्य कैसा?विचारवान पाणिनि ने तो अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। * ''शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्शिता गौत्मधर्मपत्नी । : ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ : गौतम की धर्मपत्नी से इन्द्र ने कुत्ते की भांति मैथुन किया। महान चिन्तक पाणिनि ने श्वान (कुत्ता), युवान (युवा) और मघवा (इन्द्र) को एक ही दोरी में बांध दिया। * "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३) * "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)* * पाणिनि की रचना (अष्टाध्यायी) वास्तव में संस्कृत भाषा का प्राकृतिक व्याकरण है। उनका यह व्याकरण (ग्रन्थ) विशाल एवं प्राचीन साहित्य की महत्वपूर्ण शाखा के केन्द्र में है। किसी अन्य रचना की जडें भारतीय वैज्ञानिक विकास रूपी भूमि में इतनी गहरी नहीं गयीं हैं जितनी यह (अष्टाध्यायी)। -- गोल्डस्टकर (Goldstucker)<ref>[https://tamilandvedas.com/2020/03/12/quotes-on-panini-post-no-7684/ QUOTES ON FAMOUS PANINI]</ref> * बहुत अधिक विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पाणिनि के व्याकरण में '''बहुत कम''' घाल-मेल किया गया है। किसी अन्य ग्रन्थ की तुलना में अष्टाध्यायी की एकता अधिक सम्भावित है। -- Burnell * पाणिनि का व्याकरण क्वार्टो आकार के ३५ पन्नों में छापा जा सकता है। इसके बावजूद यह संस्कृत का सम्पूर्ण व्याकरण है। इसकी संरचना बहुत विस्तृत है, और इतनी सम्पूर्णता और कहीं नहीं है। '''एक ही साथ यह विश्व का सबसे छोटा और सबसे पूर्ण व्याकरण है।''' -- Professor A Macdonnell, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ए० मैक्डोनेल == देखें भी == * [[संस्कृत]] * [[भारतीय दर्शन]] * [[व्याकरण]] * [[शब्द]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी] * [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ] * [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[Category:संस्कृत विद्वान]] [[Category:भारतीय दर्शन]] [[Category:वैयाकरण]] [[Category:प्राचीन भारत]] [[Category:शिक्षा]] gstiwmp51u25wk1vc9fvi1bpwzpo3fs योगेन्द्र नाथ मंडल 0 8570 33251 32629 2026-09-28T09:55:15Z अनुनाद सिंह 658 33251 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Jogendra Nath Mandal.jpg|right|thumb|200px|योगेन्द्र नाथ मण्डल]] '''[[:w:योगेन्द्र नाथ मंडल|योगेन्द्र नाथ मंडल]]''' (१९०४ -- 5 अक्टूबर, 1968) [[भारत]] के एक दलित राजनेता थे जो [[भारत का विभाजन|भारत के विभाजन]] पर पाकिस्तान चले गये थे। वहाँ उन्हें पाकिस्तान का कानूनमंत्री बनाया गया था। किन्तु पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार से उनके विचार बिलकुल बदल गये और उन्होंने कानूनमन्त्री के पद से त्यागपत्र दे दिया तथा भारत आकर रहे। भारत आकर उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान से भारत आये शरणार्थियों के बीच में काम किया एवं भारतीय राजनीति में भी प्रवेश करने का प्रयत्न किया। किन्तु वे सफल नहीं हुए। == उक्तियाँ == * लंबे चिंतन और संघर्ष के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि पाकिस्तान में हिंदुओं के रहने की कोई जगह नहीं है। उनका भविष्य धर्मान्तरण या विघटन की भयावह छाया से ग्रस्त है। -- अपने त्यागपत्र में * भाग्य ने ऐसे समय पर क़ायद-ए-आज़म को हमसे निर्दयतापूर्वक छीना है जब उनकी हमें बहुत आवश्यकता थी। -- योगेन्द्र नाथ मंडल, जिन्ना की मृत्यु पर * कांग्रेस के नेताओं ने सत्ता के लोभ में विभाजन करवाया। -- बीरभूम के उत्तर तिलपारा शिविर में * इतने ऊँचे पद पर पहुँचने के बाद भी मैं गरीब रह गया हूँ और गरीबों के दुख-दर्द को समझ पाया हूँ। अगर मैंने गलत तरीके से पैसा कमाकर धन-संपत्ति हासिल की होती, तो मेरे मन में इतनी शांति नहीं होती। अगर कोई मुझे मरने के बाद याद करे, तो मैं चाहता हूँ कि वे मुझे उस गरीब के तौर पर याद रखें जो इतने ऊँचे पदों पर रहने के बाद भी अमीर नहीं बना। मैं चाहता हूँ कि लोग यह महसूस करें कि मैं एक दबे-कुचले गरीब समुदाय में पैदा होने और कई बार ऊँचे पदों पर रहने के बाद भी गलत तरीकों से अमीर नहीं बना। -- महाप्राण योगेंद्रनाथ-खंड 7, लेखक- जगदीश चंद्र मंडल, पृष्ट संख्या 14 * मैं, योगेन मंडल, ने बंगाल के बंटवारे के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया है। इसके लिए मुझे कई आलोचनाएँ सुननी पड़ी हैं। उदाहरण के लिए, “बंगाल के बंटवारे के खिलाफ योगेन मंडल की वकालत।” -- अपनी मृत्यु से पहले योगेन्द्र मंडल ने अपने आखिरी भाषण में यह कहा था। * अगर आज कोई यकीन के साथ कह सके कि मेरे जीवन के बदले में आठ करोड़ अनुसूचित जातियों की संप्रभु मुक्ति मिलेगी तो मैं उस मृत्यु को थोड़ा-थोड़ा करके स्वीकार करूंगा। अगर मुझे समुद्र में कूदना पड़े या जलती हुई आग में फेंक दिया जाए, तो मैं उसमें प्रबल इच्छा के साथ कूदूंगा। * 1941 की जनगणना में… लाखों अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में दर्ज नहीं किया गया था, बल्कि उन्हें हिंदू के रूप में दर्ज किया गया था। इस उद्देश्य के लिए, हिंदू महासभा ने बहुत पैसा खर्च किया और लाखों लोगों को रोजगार दिया… अनुसूचित जातियों के लिए इस अन्याय को रोकना संभव नहीं था। परिणामस्वरूप, यद्यपि 1941 में मुसलमानों और हिंदुओं की जनसंख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई, लेकिन अनुसूचित जातियों की जनसंख्या बिल्कुल नहीं बढ़ी। हम 1941 की जनगणना को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकते। -- यह घोषणा 1945 में अनुसूचित जाति महासंघ के पहले आम सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में योगेन्द्र मण्डल ने की थी। === योगेन्द्रनाथ मंडल का त्यागपत्र === : [https://wikilivres.org/wiki/Resignation_letter_of_Jogendra_Nath_Mandal योगेन्द्रनाथ मंडल का त्यागपत्र] (अंग्रेजी में) :[https://archive.org/details/joginder-nath-mandal-resignation-letter योगेन्द्रनाथ मंडल का त्यागपत्र] (अंग्रेजी में) * मुस्लिम लीग के साथ सहयोग करने की मेरी वजह ये थी कि बंगाल में मुसलमानों और अनुसूचित जातियों के हित एक-समान थे। अधिकतर मुसलमान या तो किसान थे या मज़दूर। अनुसूचित जाति के लोगों की भी यही स्थिति थी। दूसरे अनुसूचित जाति के लोग और मुसलमान दोनों शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़े हुए थे। * 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग ने जिस डायरेक्ट एक्शन डे का आयोजन किया था, उसमें हज़ारों लोग मारे गए थे। हिंदुओं ने लीग के मंत्रिमंडल से मेरे इस्तीफ़े की माँग की थी लेकिन मैंने उनकी बात नहीं सुनी थी। * कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया । हिंदू महिलाओं का बलात्कार और अपहरण किया गया । लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग जारी रखा। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने बाद दलितों पर अत्याचार काफी बढ़ गए हैं। कई बार इस ओर ध्यान दिलाया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हत्या और अत्याचार आम हो गया है। मैंने अपने आप से पूछा, 'क्या मै इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था। * विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल के 5 लाख हिन्दुओ को देश छोड़ना पड़ा है। पूर्वी पाकिस्तान के साथ पश्चिमी पाकिस्तान में भी ऐसे ही हालात हैं। बटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब में 1 लाख पिछड़ी जाति के लोग रह रहे थे, उनमे से ज्यादातर को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया है। मुझे जानकारी मिली है 363 मंदिरों और गुरूद्वारे मुस्लिमों के कब्जे में हैं । इनमे से कुछ को मोची की दुकान, कसाईखाना और होटलों में बदल दिया है। इसलिए मैं झूठे दिखाबे और असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता हूं और अपना इस्तीफा आपको सौंप रहा हूँ। * मैं यहाँ अपने दृढ़ विश्वास को दोहराना चाहता हूँ कि पूर्वी पाकिस्तान की सरकार अभी तक हिंदुओं को प्रांत से खदेड़ने की नीति पर चल रही है। मुझे ये कहना पड़ रहा है कि पश्चिम पाकिस्तान से हिंदुओं को भगाने की नीति पूरी तरह से कामयाब रही है और पूर्वी पाकिस्तान में भी ये कामयाबी की तरफ़ बढ़ रही है। == योगेन्द्र नाथ मण्डल के बारे में विचार == * हमारे लिए तो जोगेंद्र नाथ सबसे बड़े खलनायक थे। बांग्लादेश में इस व्यक्ति की वजह से हिंदुओं को तकलीफ़ों में रहना पड़ रहा है। उन्होंने हमें दलित हिंदू और मुस्लिम एकता की बात करके सब्ज़बाग़ दिखाए। विभाजन के दौरान बहुत से ऊँची जाति के हिंदू भारत चले गए। दलित यहीं रह गए क्योंकि मंडल बड़े नेता थे और वो लोग उनकी तरफ़ बड़ी उम्मीदों से देख रहे थे। -- जयन्त कर्माकर, बांग्लादेश में हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाले एक कार्यकर्ता * उन्होंने हमारे लिए क्या किया? उन्होंने इस्तीफ़ा दिया और भारत भाग गए। हम अत्याचार झेलने के लिए वहीं पड़े रह गए. वो खलनायक नहीं तो और क्या हैं? -- जयन्त कर्माकर, बांग्लादेश में हिंदू अधिकारों के लिए काम करने वाले एक कार्यकर्ता * जोगेंद्र नाथ पश्चिम बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाना चाहते थे लेकिन उनके अधिकतर दलित हिंदू समर्थकों का उन पर से विश्वास उठ चुका था और उन्होंने मंडल को मसीहा के तौर पर देखना बंद कर दिया था। मंडल अपने पुराने समर्थन और प्रताप को पाने के लिए बीरभूम और 24 परगना ज़िले के शरणार्थी शिविरों में भटकते रहे लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। -- दीप हलधर और अभिषेक बिस्वास, योगेन्द्र मंडल के वापस भारत आकर दलितों का नेतृत्व करने के प्रश्न पर * मंडल ने पाकिस्तान के निर्माण में दलित स्वतंत्रता के सपने को साकार होते हुए देखा था, लेकिन नए राज्य में हिंदू अल्पसंख्यक के आंतरिक अंतर को समझे बिना मंडल का विजन टिक नहीं सका। -- गजल आसिफ, अपने शोधपत्र 'जोगेन्द्र नाथ मंडल एंड पॉलिटिक्स ऑफ दलित रिकग्निशन इन पाकिस्तान' में * जब मेरे पिता कराची में रहते थे, तब भी उनके मंत्री रहते ही उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया था। ...उन्होंने पाकिस्तान में जिन्ना पर भरोसा किया और दलितों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में भारत में अपना सब कुछ त्याग दिया, लेकिन जिन्ना के बाद उसी पाकिस्तान में उन्हें राजनीतिक रूप से अछूत बना दिया गया। -- योगेन्द्र मण्डल के बेटे जगदीश चंद्र मंडल ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[भीमराव आम्बेडकर]] ==बाहरी कड़ियाँ== *[https://hindi.opindia.com/opinion/political-issues/story-of-jogendra-nath-mandal-and-jai-bhim-jai-mim/ जय भीम-जय मीम की विश्वासघात और पश्चाताप की कहानी: पाक का छला, हिंदुस्तान में गुमनाम मौत मरा] s23chx7jd4d38ajdk45vwhz77mii9cm जसवीर राणा 0 9331 33236 2026-09-27T15:50:46Z Mulkh Singh 3596 "'''जसवीर राणा''' (जन्म 18 सितंबर 1968) पंजाबी कथाकार और साहित्यिक संपादक है। आधा दर्जन से अधिक कहानी-संग्रहों के अलावा उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित हो चुका है। == कथन == * फ़ौज में..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33236 wikitext text/x-wiki '''जसवीर राणा''' (जन्म 18 सितंबर 1968) पंजाबी कथाकार और साहित्यिक संपादक है। आधा दर्जन से अधिक कहानी-संग्रहों के अलावा उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित हो चुका है। == कथन == * फ़ौज में बारूद था। युद्ध था। पर माँ को प्यार और शांति की तलाश थी। ** नसराली जाने वाली टुकड़ा सड़क पर खड़ी माँ— कहानी पंजाब, अंक 107, पृष्ठ 64, जनवरी-दिसंबर 2027 89smuz1mnnkvr0xhblcp97hm8upjl0j 33237 33236 2026-09-27T15:51:36Z Mulkh Singh 3596 33237 wikitext text/x-wiki '''जसवीर राणा''' (जन्म 18 सितंबर 1968) पंजाबी कथाकार और साहित्यिक संपादक है। आधा दर्जन से अधिक कहानी-संग्रहों के अलावा उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित हो चुका है। == कथन == * फ़ौज में बारूद था। युद्ध था। पर माँ को प्यार और शांति की तलाश थी। ** नसराली जाने वाली टुकड़ा सड़क पर खड़ी माँ— कहानी पंजाब, अंक 107, पृष्ठ 64, जनवरी-दिसंबर 2027 [[श्रेणी:पंजाबी कथाकार]] 087kg1snwwqavtadd0j31eml0xtb2f9 मिशनरी 0 9332 33242 2026-09-28T04:40:10Z अनुनाद सिंह 658 "'''मिशनरी''' उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनम..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33242 wikitext text/x-wiki '''मिशनरी''' उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. g5ctbpca807ike8rl2tzmrragrqqnyw 33243 33242 2026-09-28T04:43:22Z अनुनाद सिंह 658 [[धर्मप्रचारक]] को अनुप्रेषित 33243 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[धर्मप्रचारक]] 338t5oz9aq4lecvw4hi64tprr78p5rr 33244 33243 2026-09-28T04:45:21Z अनुनाद सिंह 658 [[धर्मप्रचारक]] तक का अनुप्रेषण हटाया 33244 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. kihoqdpx31ta3a950n4j4r3ykpt1wai 33245 33244 2026-09-28T04:53:15Z अनुनाद सिंह 658 33245 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. * कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने "द बेस्ट मीन्स ऑफ सिविलाइजिंग द सब्जेक्ट्स ऑफ द ब्रिटिश इम्पाय्र इन इन्डिया, ऐन्ड डिफ्यूजिंग द लाइट ऑफ क्रिश्चियन रेलिजन थ्रूऑउट द ईस्टर्न वर्ड" नाम से एक निबन्ध प्रतियोगिता शुरू की और उस पर पुरस्कार देना आरम्भ किया। -- [[राजीव मल्होत्रा]], 'इन्द्राज नेट' में [[en:Missionaries]] qggorfyhee2bb1gdfzv8cg4autfcqna 33246 33245 2026-09-28T04:57:11Z अनुनाद सिंह 658 33246 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. * जब यहाँ मिशनरियाँ पहुँची उस समय अफ्रीकावासियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाइबल। उन्होंने हमे आँख मूँदकर प्रार्थना करना सिखाया। जब हमने अपनी आँखें खोली, हमने देखा कि उनके पास जमीन थी और हमारे पास बाइबल। -- Jomo Kenyatta, reported in John Frederick Walker, A Certain Curve of Horn: The Hundred-Year Quest for the Giant Sable Antelope of Angola (2004), p. 144; also attributed to Archbishop Desmond Tutu. * कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने "द बेस्ट मीन्स ऑफ सिविलाइजिंग द सब्जेक्ट्स ऑफ द ब्रिटिश इम्पाय्र इन इन्डिया, ऐन्ड डिफ्यूजिंग द लाइट ऑफ क्रिश्चियन रेलिजन थ्रूऑउट द ईस्टर्न वर्ड" नाम से एक निबन्ध प्रतियोगिता शुरू की और उस पर पुरस्कार देना आरम्भ किया। -- [[राजीव मल्होत्रा]], 'इन्द्राज नेट' में [[en:Missionaries]] 7vo0xdp5vz3bc6b0term0vpmnp5al0h 33247 33246 2026-09-28T05:18:42Z अनुनाद सिंह 658 33247 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. * जब यहाँ मिशनरियाँ पहुँची उस समय अफ्रीकावासियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाइबल। उन्होंने हमे आँख मूँदकर प्रार्थना करना सिखाया। जब हमने अपनी आँखें खोली, हमने देखा कि उनके पास जमीन थी और हमारे पास बाइबल। -- Jomo Kenyatta, reported in John Frederick Walker, A Certain Curve of Horn: The Hundred-Year Quest for the Giant Sable Antelope of Angola (2004), p. 144; also attributed to Archbishop Desmond Tutu. * (ईसाई मशीनरियों द्वारा) अरोपी के हाथ-पैर काटना, मोमबत्ती से शरीर जलाना, रीढ़ तोड़ना, जैसे तमाम अमानवीय अत्याचार किये गये। -- ए०आर० पिरोलकर द्वारा लिखित ‘द गोवा इंक्वज़िशन’ में * आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं। -- [[महात्मा गांधी]] , ईसाई मिशनरियों के कार्यों पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए , 18 जुलाई, 1936 के हरिजन में * कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने "द बेस्ट मीन्स ऑफ सिविलाइजिंग द सब्जेक्ट्स ऑफ द ब्रिटिश इम्पायर इन इन्डिया, ऐन्ड डिफ्यूजिंग द लाइट ऑफ क्रिश्चियन रेलिजन थ्रूऑउट द ईस्टर्न वर्ड" नाम से एक निबन्ध प्रतियोगिता शुरू की और उस पर पुरस्कार देना आरम्भ किया। -- [[राजीव मल्होत्रा]], 'इन्द्राज नेट' में * अब समय आ गया है कि हम ‘ईसाई मिशनरी भारत छोड़ो’ अभियान शुरू करें। -- राकेश सिन्हा, आरएसएस चिंतक और राज्यसभा सदस्य ; ‘दैनिक जागरण’ को दिए एक साक्षात्कार (जुलाई 2021) में * धर्म प्रचार, गुलामी का प्रस्ताव है। -- लोकनाथ मिश्र, संविधान सभा में धर्म प्रचार के अधिकार (अनुच्छेद 25) पर बहस में [[en:Missionaries]] rgcfgeuw89pnc00ccex31ipyemobgzv 33249 33247 2026-09-28T08:06:39Z अनुनाद सिंह 658 33249 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. * जब यहाँ मिशनरियाँ पहुँची उस समय अफ्रीकावासियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाइबल। उन्होंने हमे आँख मूँदकर प्रार्थना करना सिखाया। जब हमने अपनी आँखें खोली, हमने देखा कि उनके पास जमीन थी और हमारे पास बाइबल। -- Jomo Kenyatta, reported in John Frederick Walker, A Certain Curve of Horn: The Hundred-Year Quest for the Giant Sable Antelope of Angola (2004), p. 144; also attributed to Archbishop Desmond Tutu. * (ईसाई मशीनरियों द्वारा) अरोपी के हाथ-पैर काटना, मोमबत्ती से शरीर जलाना, रीढ़ तोड़ना, जैसे तमाम अमानवीय अत्याचार किये गये। -- ए०आर० पिरोलकर द्वारा लिखित ‘द गोवा इंक्वज़िशन’ में * आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं। -- [[महात्मा गांधी]] , ईसाई मिशनरियों के कार्यों पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए , 18 जुलाई, 1936 के हरिजन में * यदि ईसाई मिशनरियों को यह विश्वास है कि केवल ईसाई धर्म अपनाने से ही आध्यात्मिक उद्धार संभव है, तो वे इस प्रक्रिया की शुरुआत उनसे या उनके निजी सचिव महादेव देसाई से क्यों नहीं करते? -- महात्मा गांधी * गरीब, अशिक्षित, भोले-भाले अनुसूचित जातियों और वनवासियों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है, जो न तो विभिन्न धर्मों के बीच का अंतर समझ सकते हैं और न ही जटिल धार्मिक उपदेशों को। ऐसे धर्मांतरण आस्था से नहीं, बल्कि पेट की मजबूरी से होते हैं। -- महात्मा गांधी * धर्मान्तरण राष्ट्रान्तरण है। -- [[महात्मा गांधी]], 1916 में 'क्रिश्चियन एसोसिएशन ऑफ मद्रास' को संबोधित करते हुए * कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने "द बेस्ट मीन्स ऑफ सिविलाइजिंग द सब्जेक्ट्स ऑफ द ब्रिटिश इम्पायर इन इन्डिया, ऐन्ड डिफ्यूजिंग द लाइट ऑफ क्रिश्चियन रेलिजन थ्रूऑउट द ईस्टर्न वर्ड" नाम से एक निबन्ध प्रतियोगिता शुरू की और उस पर पुरस्कार देना आरम्भ किया। -- [[राजीव मल्होत्रा]], 'इन्द्राज नेट' में * अब समय आ गया है कि हम ‘ईसाई मिशनरी भारत छोड़ो’ अभियान शुरू करें। -- राकेश सिन्हा, आरएसएस चिंतक और राज्यसभा सदस्य ; ‘दैनिक जागरण’ को दिए एक साक्षात्कार (जुलाई 2021) में * धर्म प्रचार, गुलामी का प्रस्ताव है। -- लोकनाथ मिश्र, संविधान सभा में धर्म प्रचार के अधिकार (अनुच्छेद 25) पर बहस में [[en:Missionaries]] oojtnr88klu2chdcxm8g5tb93pc7anz 33250 33249 2026-09-28T08:28:00Z अनुनाद सिंह 658 33250 wikitext text/x-wiki '''[[:w:dharmapracaaraka|मिशनरी]]''' (धर्मप्रचारक) उन लोगों को कहते हैं जो ऐसे समूह के सदस्य होते हैं जिसे किसी मजहबी काम (लोगों को इसाई बनाने , शिक्षित करने आदि) के लिये किसी क्षेत्र विशेष में भेजा जाता है। इनमें ईसाई मिशनरियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। == उक्तियाँ == * श्वेत लोग बहुत चालाक हैं। वे अपना मजहब लेकर बिना शोरगुल के हमारे पास आये। हम उसके मूर्खता पर आचम्भित हो गये और उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी। अब उसने हमारे कुछ भाइयों पर अधिकार कर लिया है और हम लोग अब 'एक' नहीं रहे। उसने हमें एक रखने वाली चीजों को काट दिया और हम अलग-थलग होकर गिर पड़े। -- Chinua Achebe, Things Fall Apart (1958), Ch. 20. * जब यहाँ मिशनरियाँ पहुँची उस समय अफ्रीकावासियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाइबल। उन्होंने हमे आँख मूँदकर प्रार्थना करना सिखाया। जब हमने अपनी आँखें खोली, हमने देखा कि उनके पास जमीन थी और हमारे पास बाइबल। -- Jomo Kenyatta, reported in John Frederick Walker, A Certain Curve of Horn: The Hundred-Year Quest for the Giant Sable Antelope of Angola (2004), p. 144; also attributed to Archbishop Desmond Tutu. * (ईसाई मशीनरियों द्वारा) अरोपी के हाथ-पैर काटना, मोमबत्ती से शरीर जलाना, रीढ़ तोड़ना, जैसे तमाम अमानवीय अत्याचार किये गये। -- ए०आर० पिरोलकर द्वारा लिखित ‘द गोवा इंक्वज़िशन’ में * आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं। -- [[महात्मा गांधी]] , ईसाई मिशनरियों के कार्यों पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए , 18 जुलाई, 1936 के हरिजन में * यदि ईसाई मिशनरियों को यह विश्वास है कि केवल ईसाई धर्म अपनाने से ही आध्यात्मिक उद्धार संभव है, तो वे इस प्रक्रिया की शुरुआत उनसे या उनके निजी सचिव महादेव देसाई से क्यों नहीं करते? -- महात्मा गांधी * गरीब, अशिक्षित, भोले-भाले अनुसूचित जातियों और वनवासियों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है, जो न तो विभिन्न धर्मों के बीच का अंतर समझ सकते हैं और न ही जटिल धार्मिक उपदेशों को। ऐसे धर्मांतरण आस्था से नहीं, बल्कि पेट की मजबूरी से होते हैं। -- महात्मा गांधी * धर्मान्तरण राष्ट्रान्तरण है। -- [[महात्मा गांधी]], 1916 में 'क्रिश्चियन एसोसिएशन ऑफ मद्रास' को संबोधित करते हुए * धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, जिसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। ...एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति का धर्म बदलने का प्रयास न केवल अनुचित है, बल्कि यह विभिन्न धर्मों के प्रति असम्मान भी दर्शाता है। -- [[महात्मा गांधी]], 22 मार्च 1935 को प्रकाशित एक लेख में * जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है कि "हकीमजी पहले अपना इलाज कीजिये न ?" -- महात्मा गांधी, ʹयंग इंडियाःʹ 23 अप्रैल, 1931 * भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना, कुछ ग्रहण करना होगा। -- [[महात्मा गांधी]], ʹयंग इंडियाʹ 11 अगस्त, 1927 * अभी कुछ दिन हुए, एक मिशनरी एक दुर्भिक्षपीड़ित अंचल में पैसा लेकर पहुँच गया। अकाल पीड़ितों को उसने पैसा बाँटा, उन्हें ईसाई बनाया, फिर उनका मंदिर हथिया लिया और उसे तुड़वा डाला। यह अत्याचार नहीं तो क्या है ? जिन हिन्दुओं ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था, उनका अधिकार तो उस मंदिर पर नहीं रहा था और ईसाई मिशनरी का भी उस पर कोई हक नहीं था, पर वह मिशनरी वहाँ पहुँचता है और जो कुछ ही समय पहले यह मानते थे कि उस मंदिर में ईश्वर का वास है, उन्हीं के हाथ से उसे तुड़वा डालता है। -- [[महात्मा गांधी]], गाँधी वाङ्मय : खंड 61, पृष्ठ 49 * ईसाइयों द्वारा किया जाने वाला धर्मान्तरण को ʹअशोभनʹ, ʹदूषितʹ, ʹहानिकारकʹ, ʹसंदेह एवं संघर्षपूर्णʹ, ʹअध्यात्मविहीनʹ, ʹभ्रष्ट करने वालाʹ, ʹसामाजिक ढाँचे को तोड़ने वालाʹ तथा ʹप्रलोभनों से पूर्णʹ है। -- गांधी सम्पूर्ण वाङ्मय * जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्मपरिवर्तन के पहलू को हटा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है ? मिशन स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को ʹबाइबिलʹ की कक्षाओं में भाग लेने को बाध्य क्यों किया जाता है या उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाती है ? यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुद्ध और मुहम्मद के संदेश को समझना जरूरी क्यों नहीं है ? धर्म की शिक्षा के लिए शिक्षा का प्रलोभन क्यों देना चाहिए ?-- हरिजन : 17 अप्रैल, 1937 * मेरा निश्चित मत है कि अमेरिका और इंगलैण्ड मिशनरी संस्थाओं के निमित्त जितना पैसा देता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई है। ईश्वर और धनासुर (मेमन) को एक साथ नहीं साधा जा सकता। मुझे तो ऐसी आशंका है कि भारत की सेवा करने के लिए धनासुर को ही भेजा गया है, ईश्वर पीछे रह गया है। परिणामतः वह एक-न-एक दिन उसका प्रतिशोध अवश्य करेगा। -- महात्मा गांधी, हरिजन : 26 दिसम्बर, 1936 * मिशनरियों को अपना रवैया बदलना होगा। आज वे लोगों से कहते हैं कि उनके लिए ʹबाइबिलʹ और ईसाई धर्म को छोड़कर मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है। अन्य धर्मों को तुच्छ बताना तथा अपने धर्म को मोक्ष का एकमात्र मार्ग बताना उनकी आम रीति हो गयी है। इस दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन होना चाहिए। -- महात्मा गाँधी, 14 जुलाई 1927 को ʹयंग इंडियाʹ में * अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो मैं धर्मांतरण का यह सारा कारोबार ही बन्द करा दूँ। इससे वर्ग-वर्ग के बीच निश्चय ही निरर्थक कलह और मिशनरियों के बीच बेकार का द्वेष बढ़ता है। यों किसी भी राष्ट के लोग सेवाभाव से आयें तो मैं स्वागत करूँगा। हिन्दू कुटुम्बों में मिशनरी के प्रवेश से वेशभूषा, रीति-रिवाज, भाषा और खान-पान तक में परिवर्तन हो गया है और इन सबका नतीजा यह हुआ है कि सुन्दर हरे-भरे कुटुम्ब छिन्न-भिन्न हो गये हैं। -- महात्मा गांधी, एक ईसाई मिशनरी से बातचीत में, हरिजन : 11 मई, 1935 में प्रकाशित * कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने "द बेस्ट मीन्स ऑफ सिविलाइजिंग द सब्जेक्ट्स ऑफ द ब्रिटिश इम्पायर इन इन्डिया, ऐन्ड डिफ्यूजिंग द लाइट ऑफ क्रिश्चियन रेलिजन थ्रूऑउट द ईस्टर्न वर्ड" नाम से एक निबन्ध प्रतियोगिता शुरू की और उस पर पुरस्कार देना आरम्भ किया। -- [[राजीव मल्होत्रा]], 'इन्द्राज नेट' में * अब समय आ गया है कि हम ‘ईसाई मिशनरी भारत छोड़ो’ अभियान शुरू करें। -- राकेश सिन्हा, आरएसएस चिंतक और राज्यसभा सदस्य ; ‘दैनिक जागरण’ को दिए एक साक्षात्कार (जुलाई 2021) में * धर्म प्रचार, गुलामी का प्रस्ताव है। -- लोकनाथ मिश्र, संविधान सभा में धर्म प्रचार के अधिकार (अनुच्छेद 25) पर बहस में [[en:Missionaries]] pnrd3qirn6r59sxxpy1llo2frde1j9e अष्टाध्यायी 0 9333 33252 2026-09-28T10:21:18Z अनुनाद सिंह 658 [[पाणिनि]] को अनुप्रेषित 33252 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[पाणिनि]] 6fgp7d7x5yj6590oqpqg180kc5r0dy7