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अनुनाद सिंह
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* ''प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र में
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष/कल्याण) की प्राप्ति होती है।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कः '' -- न्यायसूत्र 1.1.42
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त्त इति तर्काः द्रव्यादिसप्तपदार्थाः।'' -- तर्कसंग्रह
: यहाँ 'तर्क' शब्द का अर्थ है 'द्रव्यादि सप्त पदार्थ'
* ''द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः॥'' -- तर्कसंग्रह
: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, तथा अभाव - ये सात पदार्थ हैं।
* ''तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाकालदिगात्मनांसि नवैव ॥ २॥'' -- तर्कसंग्रह
: पदार्थों के अन्तर्गत द्रब्य नव ही होते हैं, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
* ''बोधरोधः शमापायः श्रद्धाभंगोऽभिमानकृत्।
: ''कुतर्को मानसो व्याधिर्ध्यानशत्रुरनेकधा।।
: ''कुतकैऽभिनिवेशोऽतो न युक्तो मुक्तिकांक्षिणाम्।
: ''आत्मतत्त्वे पुनर्युक्त: सिद्धिसौधप्रवेशके।।'' -- आचार्य अमितगति
: कुतर्क ज्ञान को रोकने वाला, शान्ति का विनाशक, श्रद्धा को भंग करने वाला और अभिमान को बढ़ाने वाला मानसिक रोग है, जो कि अनेक प्रकार से ध्यान का शत्रु सिद्ध होता है, अतः मोक्षाभिलाषियों को कुतर्क में अपना मन नहीं लगाना चाहिए।
* तर्क एक उत्पादक चिन्तन है जिसमें पहले के अनुभव किसी समस्या को हल करने के लिए नए ढंगों से संगठित या संयोजित किये जाते हैं। -- प्रो० गेट्स और अन्य
* तर्क की क्रिया एक सम्बद्ध किया है जिसमें एक या दूसरे प्रकार के प्रतीकों का हस्तवन शामिल होता है। -- प्रो० क्रूज़
* तर्क तथ्यों या घटनाओं में सम्बन्धों के अनुमान, साक्ष्यों के तोलन और मूल्यांकन और तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने की मानसिक प्रक्रिया है। -- प्रो० गुड
* तर्क विचारात्मक चिन्तन है। -- प्रो० डीवी
* तर्क चिन्तन की एक प्रक्रिया जिसमें अनुमान शामिल हो; या सामान्य सिद्धान्तों का प्रयोग करते हुए समस्या हल करने की प्रक्रिया। -- प्रो० ड्रेवर
==इन्हें भी देखें==
*[[परीक्षा]]
*[[ज्ञान]]
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* ''प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र में
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष/कल्याण) की प्राप्ति होती है।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कः '' -- न्यायसूत्र 1.1.42
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त्त इति तर्काः द्रव्यादिसप्तपदार्थाः।'' -- तर्कसंग्रह
: यहाँ 'तर्क' शब्द का अर्थ है 'द्रव्यादि सप्त पदार्थ'
* ''द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः॥'' -- तर्कसंग्रह
: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, तथा अभाव - ये सात पदार्थ हैं।
* ''तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाकालदिगात्मनांसि नवैव ॥ २॥'' -- तर्कसंग्रह
: पदार्थों के अन्तर्गत द्रब्य नव ही होते हैं, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
* ''रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथकत्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराश्चतुविंशतिगुणाः ।'' -- तर्कसंग्रह
: रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथकत्व -संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म और संस्कार - ये २४ गुण हैं।
* ''बोधरोधः शमापायः श्रद्धाभंगोऽभिमानकृत्।
: ''कुतर्को मानसो व्याधिर्ध्यानशत्रुरनेकधा।।
: ''कुतकैऽभिनिवेशोऽतो न युक्तो मुक्तिकांक्षिणाम्।
: ''आत्मतत्त्वे पुनर्युक्त: सिद्धिसौधप्रवेशके।।'' -- आचार्य अमितगति
: कुतर्क ज्ञान को रोकने वाला, शान्ति का विनाशक, श्रद्धा को भंग करने वाला और अभिमान को बढ़ाने वाला मानसिक रोग है, जो कि अनेक प्रकार से ध्यान का शत्रु सिद्ध होता है, अतः मोक्षाभिलाषियों को कुतर्क में अपना मन नहीं लगाना चाहिए।
* तर्क एक उत्पादक चिन्तन है जिसमें पहले के अनुभव किसी समस्या को हल करने के लिए नए ढंगों से संगठित या संयोजित किये जाते हैं। -- प्रो० गेट्स और अन्य
* तर्क की क्रिया एक सम्बद्ध किया है जिसमें एक या दूसरे प्रकार के प्रतीकों का हस्तवन शामिल होता है। -- प्रो० क्रूज़
* तर्क तथ्यों या घटनाओं में सम्बन्धों के अनुमान, साक्ष्यों के तोलन और मूल्यांकन और तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने की मानसिक प्रक्रिया है। -- प्रो० गुड
* तर्क विचारात्मक चिन्तन है। -- प्रो० डीवी
* तर्क चिन्तन की एक प्रक्रिया जिसमें अनुमान शामिल हो; या सामान्य सिद्धान्तों का प्रयोग करते हुए समस्या हल करने की प्रक्रिया। -- प्रो० ड्रेवर
==इन्हें भी देखें==
*[[परीक्षा]]
*[[ज्ञान]]
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* ''प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र में
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष/कल्याण) की प्राप्ति होती है।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कः '' -- न्यायसूत्र 1.1.42
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त्त इति तर्काः द्रव्यादिसप्तपदार्थाः।'' -- तर्कसंग्रह
: यहाँ 'तर्क' शब्द का अर्थ है 'द्रव्यादि सप्त पदार्थ'
* ''द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः॥'' -- तर्कसंग्रह
: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, तथा अभाव - ये सात पदार्थ हैं।
* ''तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाकालदिगात्मनांसि नवैव ॥ २॥'' -- तर्कसंग्रह
: पदार्थों के अन्तर्गत द्रब्य नव ही होते हैं, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
* ''रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथकत्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराश्चतुविंशतिगुणाः ।'' -- तर्कसंग्रह
: रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथकत्व -संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म और संस्कार - ये २४ गुण हैं।
* ''उत्क्षेपणाक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्च कर्माणि।'' -- तर्कसंग्रह
: उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), आक्षेपण (नीचे फेंकना), आकुञ्चन (सिकोड़ना/बटोरना), प्रसारण (फैलाना) और गमन (चलना) - ये पाँच कर्म हैं।
* ''बोधरोधः शमापायः श्रद्धाभंगोऽभिमानकृत्।
: ''कुतर्को मानसो व्याधिर्ध्यानशत्रुरनेकधा।।
: ''कुतकैऽभिनिवेशोऽतो न युक्तो मुक्तिकांक्षिणाम्।
: ''आत्मतत्त्वे पुनर्युक्त: सिद्धिसौधप्रवेशके।।'' -- आचार्य अमितगति
: कुतर्क ज्ञान को रोकने वाला, शान्ति का विनाशक, श्रद्धा को भंग करने वाला और अभिमान को बढ़ाने वाला मानसिक रोग है, जो कि अनेक प्रकार से ध्यान का शत्रु सिद्ध होता है, अतः मोक्षाभिलाषियों को कुतर्क में अपना मन नहीं लगाना चाहिए।
* तर्क एक उत्पादक चिन्तन है जिसमें पहले के अनुभव किसी समस्या को हल करने के लिए नए ढंगों से संगठित या संयोजित किये जाते हैं। -- प्रो० गेट्स और अन्य
* तर्क की क्रिया एक सम्बद्ध किया है जिसमें एक या दूसरे प्रकार के प्रतीकों का हस्तवन शामिल होता है। -- प्रो० क्रूज़
* तर्क तथ्यों या घटनाओं में सम्बन्धों के अनुमान, साक्ष्यों के तोलन और मूल्यांकन और तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने की मानसिक प्रक्रिया है। -- प्रो० गुड
* तर्क विचारात्मक चिन्तन है। -- प्रो० डीवी
* तर्क चिन्तन की एक प्रक्रिया जिसमें अनुमान शामिल हो; या सामान्य सिद्धान्तों का प्रयोग करते हुए समस्या हल करने की प्रक्रिया। -- प्रो० ड्रेवर
==इन्हें भी देखें==
*[[परीक्षा]]
*[[ज्ञान]]
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* ''प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र में
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष/कल्याण) की प्राप्ति होती है।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कः '' -- न्यायसूत्र 1.1.42
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्त इति तर्काः द्रव्यादिसप्तपदार्थाः।'' -- तर्कसंग्रह
: यहाँ 'तर्क' शब्द का अर्थ है 'द्रव्य आदि सात पदार्थ' ।
* ''द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः॥'' -- तर्कसंग्रह
: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, तथा अभाव - ये सात पदार्थ हैं।
* ''तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाकालदिगात्मनांसि नवैव ॥ २॥'' -- तर्कसंग्रह
: पदार्थों के अन्तर्गत द्रब्य नव ही होते हैं, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
* ''रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथकत्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराश्चतुविंशतिगुणाः ।'' -- तर्कसंग्रह
: रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथकत्व -संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म और संस्कार - ये २४ गुण हैं।
* ''उत्क्षेपणाक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्च कर्माणि।'' -- तर्कसंग्रह
: उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), आक्षेपण (नीचे फेंकना), आकुञ्चन (सिकोड़ना/बटोरना), प्रसारण (फैलाना) और गमन (चलना) - ये पाँच कर्म हैं।
* ''बोधरोधः शमापायः श्रद्धाभंगोऽभिमानकृत्।
: ''कुतर्को मानसो व्याधिर्ध्यानशत्रुरनेकधा।।
: ''कुतकैऽभिनिवेशोऽतो न युक्तो मुक्तिकांक्षिणाम्।
: ''आत्मतत्त्वे पुनर्युक्त: सिद्धिसौधप्रवेशके।।'' -- आचार्य अमितगति
: कुतर्क ज्ञान को रोकने वाला, शान्ति का विनाशक, श्रद्धा को भंग करने वाला और अभिमान को बढ़ाने वाला मानसिक रोग है, जो कि अनेक प्रकार से ध्यान का शत्रु सिद्ध होता है, अतः मोक्षाभिलाषियों को कुतर्क में अपना मन नहीं लगाना चाहिए।
* तर्क एक उत्पादक चिन्तन है जिसमें पहले के अनुभव किसी समस्या को हल करने के लिए नए ढंगों से संगठित या संयोजित किये जाते हैं। -- प्रो० गेट्स और अन्य
* तर्क की क्रिया एक सम्बद्ध किया है जिसमें एक या दूसरे प्रकार के प्रतीकों का हस्तवन शामिल होता है। -- प्रो० क्रूज़
* तर्क तथ्यों या घटनाओं में सम्बन्धों के अनुमान, साक्ष्यों के तोलन और मूल्यांकन और तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने की मानसिक प्रक्रिया है। -- प्रो० गुड
* तर्क विचारात्मक चिन्तन है। -- प्रो० डीवी
* तर्क चिन्तन की एक प्रक्रिया जिसमें अनुमान शामिल हो; या सामान्य सिद्धान्तों का प्रयोग करते हुए समस्या हल करने की प्रक्रिया। -- प्रो० ड्रेवर
==इन्हें भी देखें==
*[[परीक्षा]]
*[[ज्ञान]]
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पाणिनि
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/* पाणिनि पर उद्धरण */
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'''[[:w:पाणिनि|पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान् [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।
== उक्तियाँ ==
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'' — [[अष्टाध्यायी]]
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
== पाणिनि पर उद्धरण ==
* ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ।
: ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है।
* ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ।
: ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है।
* ''अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
: ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः ॥''
: अज्ञान के कारण अन्धे संसार को ज्ञान की शलाका (सलाई) से जिस पाणिनि ने आँख दिलायी, उस पाणिनि को नमस्स्कार है।
: भावार्थ : जिस प्रकार आँखों में अंधापन या मोतियाबिंद होने पर वैद्य शलाका (सलाई) से अंजन (काजल/औषधि) लगाकर आँखों की रोशनी लौटा देता है, ठीक उसी प्रकार पाणिनि ने अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए इस संसार की आँखें ज्ञान रूपी अंजन की सलाई से खोल दीं। उन्हें मेरा नमस्कार है।)
* ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ।
: ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥
: वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ।
* ''काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्
: महर्षि कणाद का '''तर्कशास्त्र''' (वैशेषिक/न्याय) और महर्षि पाणिनि का '''व्याकरण शास्त्र''' सभी शास्त्रों के लिए उपकारक (सहायक) हैं।
* ''सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान्प्रियान्पाणिने-
: ''र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्।
: ''छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गल-
: ''मज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]<ref>[https://mysanskritsubhashit.wordpress.com/2024/09/23/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ विजय भाटे]</ref>
: व्याकरण की रचना करनेवाले पाणिनि के प्रिय प्राणों का सिंह ने हरण किया। मीमांसा शास्त्र के रचयिता जैमिनि ऋषि को उन्मत्त हाथी ने कुचल दिया और छंदशास्त्र के ज्ञाननिधि पिंगल ऋषि को सागर किनारे पे घड़ियाल ने मार डाला। स्वाभाविक है, अज्ञानी व क्रूर पशुओं का और पाशवी मनुष्यों को गुणवन्त लोगों से क्या लाभ मिलने वाला है?
* ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निब्ध्नन्ति किमत्र चित्रम् ।
: ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥
: भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, इसमें आश्चर्य कैसा?विचारवान पाणिनि ने तो अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)।
* ''शुनेव यूना प्रसभं मघोना प्रधर्शिता गौत्मधर्मपत्नी ।
: ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥
: गौतम की धर्मपत्नी से इन्द्र ने कुत्ते की भांति मैथुन किया। महान चिन्तक पाणिनि ने श्वान (कुत्ता), युवान (युवा) और मघवा (इन्द्र) को एक ही दोरी में बांध दिया।
* "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३)
* "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)*
* पाणिनि की रचना (अष्टाध्यायी) वास्तव में संस्कृत भाषा का प्राकृतिक व्याकरण है। उनका यह व्याकरण (ग्रन्थ) विशाल एवं प्राचीन साहित्य की महत्वपूर्ण शाखा के केन्द्र में है। किसी अन्य रचना की जडें भारतीय वैज्ञानिक विकास रूपी भूमि में इतनी गहरी नहीं गयीं हैं जितनी यह (अष्टाध्यायी)। -- गोल्डस्टकर (Goldstucker)<ref>[https://tamilandvedas.com/2020/03/12/quotes-on-panini-post-no-7684/ QUOTES ON FAMOUS PANINI]</ref>
* बहुत अधिक विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पाणिनि के व्याकरण में '''बहुत कम''' घाल-मेल किया गया है। किसी अन्य ग्रन्थ की तुलना में अष्टाध्यायी की एकता अधिक सम्भावित है। -- Burnell
* पाणिनि का व्याकरण क्वार्टो आकार के ३५ पन्नों में छापा जा सकता है। इसके बावजूद यह संस्कृत का सम्पूर्ण व्याकरण है। इसकी संरचना बहुत विस्तृत है, और इतनी सम्पूर्णता और कहीं नहीं है। '''एक ही साथ यह विश्व का सबसे छोटा और सबसे पूर्ण व्याकरण है।''' -- Professor A Macdonnell, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ए० मैक्डोनेल
== देखें भी ==
* [[संस्कृत]]
* [[भारतीय दर्शन]]
* [[व्याकरण]]
* [[शब्द]]
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ]
* [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[Category:संस्कृत विद्वान]]
[[Category:भारतीय दर्शन]]
[[Category:वैयाकरण]]
[[Category:प्राचीन भारत]]
[[Category:शिक्षा]]
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काशी
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अनुनाद सिंह
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'''काशी''' भारत की प्राचीन नगरी एवं [[विद्या]] का केन्द्र। वाराणसी या बनारस। वाराणसी, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध नगर है। यह संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक और भारत का प्राचीनतम नगर है। [[हिन्दू धर्म]] में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक है और इसे 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा जाता है। बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। वाराणसी की संस्कृति का [[गंगा|गंगा नदी]], श्री कशी विश्वनाथ मन्दिर एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट सम्बन्ध है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है।
वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।
[[संगीत|हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत]] का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें [[कबीर]], वल्लभाचार्य, [[रविदास]], स्वामी रामानन्द, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, [[मुंशी प्रेमचंद]], [[जयशंकर प्रसाद]], [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचंद्र शुक्ल]], पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी [[तुलसीदास]] ने परम-पूज्य ग्रंथ [[रामचरितमानस]] यहीं लिखा था और [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।
वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, केन्द्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो [[हिन्दी]] की ही एक बोली है।
== उक्तियाँ ==
* ''काश्यां हि काशते काशी सर्वप्रकाशिका।
: ''सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता ही काशिका॥
: आत्मज्ञान के प्रकाश से काशी जगमगाती है, काशी सब वस्तुओं को आलोकित करती है। जो इस सत्य को जान गया वह काशी में एकरूप हो जाता है।
* ''मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम् ।
: ''कौपीन यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥
: जहां मृत्यु मंगलमय होती है, विभूति आभूषण के समान होती है, और लंगोटी रेशम के समान होती है। ऐसी काशी की महिमा को कोई माप नहीं सकता।
* ''अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
: ''पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
: अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांचीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), जगन्नाथ पुरी और द्वारिका -- ये सात मोक्षदायी नगरियाँ हैं।
* ''काशीगमनमात्रेण नान्नम्भट्टायते द्विजः''
: काशी जाने मात्र से कोई द्विज अन्नम् भट्ट नहीं बन जाता।
* जो कबिरा काशी बसै तो रामै कौन निहोरा। -- कबीरदास
* मुक्ति जन्म महि जानि,ग्यान खानि अघ हानिकर।
: जहँ बस संभु भवानि,सो कासी सेयिअ कस न॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]], [[रामचरितमानस]] में
: जहाँ शिव और पार्वती बसते हैं,उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि,ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर,उसका सेवन क्यों न किया जाय?
* जो गति अगम महामुनि दुरलभ,कहत संत श्रुति सकल पुरान।
: सो गति मरनकाल अपने पुर,देत सदा सिव सबहिं समान॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]], विनयपत्रिका में
* सेइअ सहित सनेह देह भरि,कामधेनु कलि कासी।
: समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल रासी॥
: मरजादा चहुँ ओर चरन बर, सेवत सुरपुर बासी।
: तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग,अमित अविनासी॥
: अंतर ऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ बेद-बिस्वासी।
: गलकंबल बरुना बिभाति जनु, लूम लसित सरिता सी॥
: दंडपानि भैरव बिषान, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।
: लोल दिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा सी॥
: स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोस महिमा-सी।
: बिस्वनाथ पालक कृपालुचित लालति नित गिरिजा-सी॥
: सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मग जोवति रहति रमा-सी।
: पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गब्य सुपंचनदा-सी॥
: ब्रह्म जीव-सम राम नाम जुग आखर बिस्व-बिकासी।
: चारितु चरति करम कुकरम करि मरत जीवगन घासी॥
: लहत परमपद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच उदासी।
: कहत पुरान रची केसव नित कर-करतूति कला-सी॥
: तुलसी बस हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी॥ -- गोस्वामी तुलसीदास, विनयपत्रिका में
: इस कलियुग में काशी-रूपी का प्रेम सहित जीवन-भर सेवन करना चाहिए। यह शोक,सन्ताप,पाप और रोग का नाश करने वाली तथा सभी प्रकार के कल्याणों की खानि है। काशी के चारों ओर की सीमा इस कामधेनु के सुन्दर चरण हैं। स्वर्गवासी देवता इसके चरणों की सेवा करते हैं। यहाँ के सब तीर्थस्थान इसके शुभ अंग हैं और नाशरहित शिवलिंग इसके रोम हैं। अन्तर्गृही (काशी का मध्य भाग) इस कामधेनु का ऐन है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - ये चारों फल इसके चार थन हैं। वेद-शास्त्रों पर विश्वास रखने वाले आस्तिक लोग इसके बछड़े हैं। विश्वासी पुरुषों को ही इसमें निवास करने से मुक्ति रूपी अमृतमय दूध मिलता है। सुन्दर वरुण नदी गल-कम्बल के समान इसकी शोभा बढ़ा रही है और असी नामक नदी पूँछ के रूप में शोभित हो रही है। दण्डधारी भैरव इसके सींग है। पाप में मन रखने वाले दुष्टों को उन सींगों से सदा डराया करती है। लोलार्क (कुण्ड) और त्रिलोचन (तीर्थ) इसके नेत्र हैं और कर्णघंटा नामक तीर्थ इसके गले का घण्टा है। मणिकर्णिका इसका चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख है,गंगाजी से मिलने वाला पाप-ताप-नाश रूपी सुख इसकी शोभा है। भोग और मोक्ष रूपी सुखों से परिपूर्ण पंचकोशी की परिक्रमा ही इसकी महिमा है। दयालु हृदय विश्वनाथ जी इस कामधेनु का पालन-पोषण करते हैं और पार्वती सरीखी स्नेहमयी जगज्जननी इस पर सदा प्यार-दुलार लुटाती रहती हैं। आठों सिद्धियाँ, सरस्वती और इन्द्राणी शची इसका पूजन करती हैं। जगत का पालन करने वाली लक्ष्मी सरीखी इसका रुख देखती रहती हैं। 'नमः शिवाय' यह पंचाक्षरी मंत्र ही इसके पाँच प्राण हैं। भगवान बिन्दुमाधव ही आनंद हैं। पंच नदी (पंचगंगा) तीर्थ ही इसके पंचगब्य हैं। यहाँ संसार को प्रकट करने वाले राम-नाम के दो अक्षर 'रकार' और 'मकार' - इसके अधिष्ठाता ब्रह्म और जीव हैं। यहाँ मरने वाले जीवों का सब सुकर्म और कुकर्म रूपी घास यह चर जाती है,जिससे उनको वही परमपद रूपी पवित्र दूध मिलता है,जिसको संसार के विरक्त महात्मागण चाहा करते हैं।पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु ने सम्पूर्ण कला लगाकर अपने हाथों से इसकी रचना की है। हे तुलसी! यदि तू सुखी होना चाहता है तो काशी में रहकर श्रीराम-नाम जपा कर !!
* मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
: यह तीन लोकों से न्यारी काशी।
: सुज्ञान धर्म और सत्यराशी॥
: बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: नये नहीं हैं ये ईंट पत्थर।
: है विश्वकर्मा का कार्य सुन्दर॥
: रचे हैं विद्या के भव्य मन्दिर, यह सर्वसृष्टि की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: यहाँ की है यह पवित्र शिक्षा।
: कि सत्य पहले फिर आत्म-रक्षा॥
: बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: वह वेद ईश्वर की सत्यवाणी।
: बनें जिन्हें पढ़ के ब्रह्मज्ञानी॥
: थे व्यास जी ने रचे यहीं पर, यह ब्रह्म-विद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: वह मुक्तिपद को दिलाने वाले।
: सुधर्म पथ पर चलाने वाले॥
: यहीं फले-फूले बुद्ध, शंकर, यह राज-ऋषियों की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: सुरम्य धाराएँ वरूणा अस्सी।
: नहाये जिनमें कबीर तुलसी॥
: भला हो कविता का क्यों न आकर, यह वाग्विद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: विविध कला अर्थशास्त्र गायन।
: गणित खनिज औषधि रसायन॥
: प्रतीचि-प्राची का मेल सुन्दर, यह विश्वविद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: यह मालवीय जी की देशभक्ति।
: यह उनका साहस यह उनकी शक्ति॥
: प्रगट हुई है नवीन होकर, यह कर्मवीरों की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥ -- '''काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत'''
* देखी तुमरी कासी, लोगों, देखी तुमरी कासी।
: जहाँ विराजैं विश्वनाथ विश्वेश्वरजी अविनासी॥
: आधी कासी भाट भंडेरिया बाम्हन औ संन्यासी।
: आधी कासी रंडी मुंडी राँड खानगी खासी॥
: लोग निकम्मे भंगी गंजड़ लुच्चे बे-बिसवासी।
: महा आलसी झूठे शुहदे बे-फिकरे बदमासी॥
: आप काम कुछ कभी करैं नहिं कोरे रहैं उपासी।
: और करे तो हँसैं बनावैं उसको सत्यानासी॥
: अमीर सब झूठे और निंदक करें घात विश्वासी।
: सिपारसी डरपुकने सिट्टू बोलैं बात अकासी॥
: मैली गली भारी कतवारन सड़ी चमारिन पासी।
: नीचे नल से बदबू उबलै मनो नरक चौरासी॥
: कुत्ते भूँकत काटन दौड़ें सड़क साँड़ सों नासी।
: दौड़ें बंदर बने मुछंदर कूदैं चढ़े अगासी॥
: घाट जाओ ते गंगापुत्तर नोचैं दै गल फाँसी।
: करैं घाटिया बस्तर-मोचन दे देके सब झाँसी॥
: राह चलत भिखमंगे नोचैं बात करैं दाता सी।
: मंदिर बीच भँडेरिया नोचैं करैं धरम की गाँसी॥
: सौदा लेत दलालो नोचैं देकर लासालासी
: माल लिये पर दुकानदार नोचैं कपड़ा दे रासी॥
: चोरी भए पर पुलिस नोचें हाथ गले बिच ढाँसी।
: गए कचहरी अमला नोचैं मेचि बनावैं घासी।।
: फिरैं उचक्का दे दे धक्का लूटैं माल मवासी।
: कैद भए की लाज तनिक नहिं बे-सरमी नंगा सी॥
: देखी तुमरी कासी भैया देखी तुमरी कासी॥ -- '''[[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]'''
* बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है। -- प्रसिद्ध अमरीकी लेखक [[मार्क ट्वेन]]
==इन्हें भी देखें==
* [[प्रयागराज]]
*[[अयोध्या]]
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अनुनाद सिंह
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'''काशी''' भारत की प्राचीन नगरी एवं [[विद्या]] का केन्द्र। वाराणसी या बनारस। वाराणसी, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध नगर है। यह संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक और भारत का प्राचीनतम नगर है। [[हिन्दू धर्म]] में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक है और इसे 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा जाता है। बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। वाराणसी की संस्कृति का [[गंगा|गंगा नदी]], श्री कशी विश्वनाथ मन्दिर एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट सम्बन्ध है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है।
वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।
[[संगीत|हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत]] का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें [[कबीर]], वल्लभाचार्य, [[रविदास]], स्वामी रामानन्द, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, [[मुंशी प्रेमचंद]], [[जयशंकर प्रसाद]], [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचंद्र शुक्ल]], पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी [[तुलसीदास]] ने परम-पूज्य ग्रंथ [[रामचरितमानस]] यहीं लिखा था और [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।
वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, केन्द्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो [[हिन्दी]] की ही एक बोली है।
== उक्तियाँ ==
* ''काश्यां हि काशते काशी सर्वप्रकाशिका।
: ''सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता ही काशिका॥
: आत्मज्ञान के प्रकाश से काशी जगमगाती है, काशी सब वस्तुओं को आलोकित करती है। जो इस सत्य को जान गया वह काशी में एकरूप हो जाता है।
* ''मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम् ।
: ''कौपीन यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥
: जहां मृत्यु मंगलमय होती है, विभूति आभूषण के समान होती है, और लंगोटी रेशम के समान होती है। ऐसी काशी की महिमा को कोई माप नहीं सकता।
* ''अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
: ''पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
: अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांचीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), जगन्नाथ पुरी और द्वारिका -- ये सात मोक्षदायी नगरियाँ हैं।
* ''काशीगमनमात्रेण नान्नम्भट्टायते द्विजः'' -- दक्षिण भारत में प्रचलित एक कहावत
: काशी जाने मात्र से कोई द्विज अन्नम् भट्ट नहीं बन जाता।
* जो कबिरा काशी बसै तो रामै कौन निहोरा। -- कबीरदास
* मुक्ति जन्म महि जानि,ग्यान खानि अघ हानिकर।
: जहँ बस संभु भवानि,सो कासी सेयिअ कस न॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]], [[रामचरितमानस]] में
: जहाँ शिव और पार्वती बसते हैं,उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि,ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर,उसका सेवन क्यों न किया जाय?
* जो गति अगम महामुनि दुरलभ,कहत संत श्रुति सकल पुरान।
: सो गति मरनकाल अपने पुर,देत सदा सिव सबहिं समान॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]], विनयपत्रिका में
* सेइअ सहित सनेह देह भरि,कामधेनु कलि कासी।
: समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल रासी॥
: मरजादा चहुँ ओर चरन बर, सेवत सुरपुर बासी।
: तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग,अमित अविनासी॥
: अंतर ऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ बेद-बिस्वासी।
: गलकंबल बरुना बिभाति जनु, लूम लसित सरिता सी॥
: दंडपानि भैरव बिषान, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।
: लोल दिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा सी॥
: स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोस महिमा-सी।
: बिस्वनाथ पालक कृपालुचित लालति नित गिरिजा-सी॥
: सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मग जोवति रहति रमा-सी।
: पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गब्य सुपंचनदा-सी॥
: ब्रह्म जीव-सम राम नाम जुग आखर बिस्व-बिकासी।
: चारितु चरति करम कुकरम करि मरत जीवगन घासी॥
: लहत परमपद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच उदासी।
: कहत पुरान रची केसव नित कर-करतूति कला-सी॥
: तुलसी बस हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी॥ -- गोस्वामी तुलसीदास, विनयपत्रिका में
: इस कलियुग में काशी-रूपी का प्रेम सहित जीवन-भर सेवन करना चाहिए। यह शोक,सन्ताप,पाप और रोग का नाश करने वाली तथा सभी प्रकार के कल्याणों की खानि है। काशी के चारों ओर की सीमा इस कामधेनु के सुन्दर चरण हैं। स्वर्गवासी देवता इसके चरणों की सेवा करते हैं। यहाँ के सब तीर्थस्थान इसके शुभ अंग हैं और नाशरहित शिवलिंग इसके रोम हैं। अन्तर्गृही (काशी का मध्य भाग) इस कामधेनु का ऐन है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - ये चारों फल इसके चार थन हैं। वेद-शास्त्रों पर विश्वास रखने वाले आस्तिक लोग इसके बछड़े हैं। विश्वासी पुरुषों को ही इसमें निवास करने से मुक्ति रूपी अमृतमय दूध मिलता है। सुन्दर वरुण नदी गल-कम्बल के समान इसकी शोभा बढ़ा रही है और असी नामक नदी पूँछ के रूप में शोभित हो रही है। दण्डधारी भैरव इसके सींग है। पाप में मन रखने वाले दुष्टों को उन सींगों से सदा डराया करती है। लोलार्क (कुण्ड) और त्रिलोचन (तीर्थ) इसके नेत्र हैं और कर्णघंटा नामक तीर्थ इसके गले का घण्टा है। मणिकर्णिका इसका चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख है,गंगाजी से मिलने वाला पाप-ताप-नाश रूपी सुख इसकी शोभा है। भोग और मोक्ष रूपी सुखों से परिपूर्ण पंचकोशी की परिक्रमा ही इसकी महिमा है। दयालु हृदय विश्वनाथ जी इस कामधेनु का पालन-पोषण करते हैं और पार्वती सरीखी स्नेहमयी जगज्जननी इस पर सदा प्यार-दुलार लुटाती रहती हैं। आठों सिद्धियाँ, सरस्वती और इन्द्राणी शची इसका पूजन करती हैं। जगत का पालन करने वाली लक्ष्मी सरीखी इसका रुख देखती रहती हैं। 'नमः शिवाय' यह पंचाक्षरी मंत्र ही इसके पाँच प्राण हैं। भगवान बिन्दुमाधव ही आनंद हैं। पंच नदी (पंचगंगा) तीर्थ ही इसके पंचगब्य हैं। यहाँ संसार को प्रकट करने वाले राम-नाम के दो अक्षर 'रकार' और 'मकार' - इसके अधिष्ठाता ब्रह्म और जीव हैं। यहाँ मरने वाले जीवों का सब सुकर्म और कुकर्म रूपी घास यह चर जाती है,जिससे उनको वही परमपद रूपी पवित्र दूध मिलता है,जिसको संसार के विरक्त महात्मागण चाहा करते हैं।पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु ने सम्पूर्ण कला लगाकर अपने हाथों से इसकी रचना की है। हे तुलसी! यदि तू सुखी होना चाहता है तो काशी में रहकर श्रीराम-नाम जपा कर !!
* मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
: यह तीन लोकों से न्यारी काशी।
: सुज्ञान धर्म और सत्यराशी॥
: बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: नये नहीं हैं ये ईंट पत्थर।
: है विश्वकर्मा का कार्य सुन्दर॥
: रचे हैं विद्या के भव्य मन्दिर, यह सर्वसृष्टि की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: यहाँ की है यह पवित्र शिक्षा।
: कि सत्य पहले फिर आत्म-रक्षा॥
: बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: वह वेद ईश्वर की सत्यवाणी।
: बनें जिन्हें पढ़ के ब्रह्मज्ञानी॥
: थे व्यास जी ने रचे यहीं पर, यह ब्रह्म-विद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: वह मुक्तिपद को दिलाने वाले।
: सुधर्म पथ पर चलाने वाले॥
: यहीं फले-फूले बुद्ध, शंकर, यह राज-ऋषियों की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: सुरम्य धाराएँ वरूणा अस्सी।
: नहाये जिनमें कबीर तुलसी॥
: भला हो कविता का क्यों न आकर, यह वाग्विद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: विविध कला अर्थशास्त्र गायन।
: गणित खनिज औषधि रसायन॥
: प्रतीचि-प्राची का मेल सुन्दर, यह विश्वविद्या की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥
: यह मालवीय जी की देशभक्ति।
: यह उनका साहस यह उनकी शक्ति॥
: प्रगट हुई है नवीन होकर, यह कर्मवीरों की राजधानी।
: मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी॥ -- '''काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत'''
* देखी तुमरी कासी, लोगों, देखी तुमरी कासी।
: जहाँ विराजैं विश्वनाथ विश्वेश्वरजी अविनासी॥
: आधी कासी भाट भंडेरिया बाम्हन औ संन्यासी।
: आधी कासी रंडी मुंडी राँड खानगी खासी॥
: लोग निकम्मे भंगी गंजड़ लुच्चे बे-बिसवासी।
: महा आलसी झूठे शुहदे बे-फिकरे बदमासी॥
: आप काम कुछ कभी करैं नहिं कोरे रहैं उपासी।
: और करे तो हँसैं बनावैं उसको सत्यानासी॥
: अमीर सब झूठे और निंदक करें घात विश्वासी।
: सिपारसी डरपुकने सिट्टू बोलैं बात अकासी॥
: मैली गली भारी कतवारन सड़ी चमारिन पासी।
: नीचे नल से बदबू उबलै मनो नरक चौरासी॥
: कुत्ते भूँकत काटन दौड़ें सड़क साँड़ सों नासी।
: दौड़ें बंदर बने मुछंदर कूदैं चढ़े अगासी॥
: घाट जाओ ते गंगापुत्तर नोचैं दै गल फाँसी।
: करैं घाटिया बस्तर-मोचन दे देके सब झाँसी॥
: राह चलत भिखमंगे नोचैं बात करैं दाता सी।
: मंदिर बीच भँडेरिया नोचैं करैं धरम की गाँसी॥
: सौदा लेत दलालो नोचैं देकर लासालासी
: माल लिये पर दुकानदार नोचैं कपड़ा दे रासी॥
: चोरी भए पर पुलिस नोचें हाथ गले बिच ढाँसी।
: गए कचहरी अमला नोचैं मेचि बनावैं घासी।।
: फिरैं उचक्का दे दे धक्का लूटैं माल मवासी।
: कैद भए की लाज तनिक नहिं बे-सरमी नंगा सी॥
: देखी तुमरी कासी भैया देखी तुमरी कासी॥ -- '''[[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]'''
* बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है। -- प्रसिद्ध अमरीकी लेखक [[मार्क ट्वेन]]
==इन्हें भी देखें==
* [[प्रयागराज]]
*[[अयोध्या]]
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लियोन त्रोत्स्की
0
9101
33264
32226
2026-09-29T23:25:38Z
Raippa-Valli
5574
File
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[[File:Bundesarchiv Bild 183-R15068, Leo Dawidowitsch Trotzki.jpg|thumb|लियोन त्रोत्स्की (1918)]]
'''लियोन त्रोत्स्की''' (Лев Давидович Троцкий; मूल नाम : Лев Давидович Бронштейн]; 7 नवम्बर या 26 अक्टूबर 1879 – 21 अगस्त 1940) रूस का एक मार्क्सवादी विचारक तथा क्रांतिकारी था। सोवियत संघ के आरम्भिक दिनों में उसने पोलितब्यूरो की स्थापना की, लाल सेना की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया। लेनिन की मृत्यु के बाद उसे देशनिकाला दे दिया गया क्योंकि वह स्टालिन के विचारों का विरोधी था। १९४० में एक सोवियत एजेन्ट ने मेक्सिको में बर्फ की कुल्हाड़ी से उसकी हत्या कर दी।
एक सिद्धांतकार के रूप में स्थायी क्रांति के सिद्धान्त के जरिये उन्होने मार्क्सवादी विमर्श में योगदान किया। इसके साथ ही ट्रॉट्स्की ने एक नियम का प्रतिपादन भी किया कि पूँजीवाद के विकास का स्तर सभी जगह एक सा नहीं होता, जिसका परिणाम पिछड़े देशों में सामाजिक और ऐतिहासिक विकास के दो चरणों के एक साथ घटित हो जाने में निकलता है।
बीसवीं सदी के पहले दशक में मार्क्सवादियों के बीच चल रहे बहस-मुबाहिसे के बीच ट्रॉट्स्की की इस सैद्धांतिक उपलब्धि ने रूस जैसे औद्योगिक रूप से पिछड़े देश में क्रांति करने के तर्क को मजबूती प्रदान की। लेनिन के देहांत के बाद ट्रॉट्स्की ने स्तालिन द्वारा प्रवर्तित किसी देश में समाजवाद की स्थापना के सिद्धांत का विरोध किया, लेकिन वे पार्टी के भीतर होने वाले संघर्ष में अकेले पड़ते चले गये। पहले उन्हें पार्टी से निकाला गया, और फिर सोवियत राज्य के विरुद्ध षडयन्त्र करने के आरोप में देश-निकाला दे दिया गया। निष्कासन के दौरान ट्रॉट्स्की ने स्तालिन के नेतृत्व में बन रहे सोवियत संघ की कड़ी आलोचना करते हुए उसे नौकरशाह, निरंकुश और राजकीय पूँजीवादी राज्य की संज्ञा दी।
== उद्धरण ==
* जब तक साँएं चल रहीं है, मुझे आशा है।
* सीखने में कुछ खतरे भी निहित होते हैं क्योंकि मजबूरीवश व्यक्ति को अपने शत्रुओं से भी सीखना पड़ता है।
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