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अन्न
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अनुनाद सिंह
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[[चित्र:Foods.jpg|दाएँ|200px|अंगूठाकार|]]
यहाँ '''अन्न''', आहार, भोजन आदि से सम्बन्धित सूक्तियाँ दी गयीं हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यम् करवावहै।
: ''तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥'' -- (भोजन मन्त्र) कृष्ण यजुर्वेद
: हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों को साथ-साथ वीर्यवान (पराक्रमी) बनाएं। हम जो कुछ पढ़ते हैं, वह तेजस्वी हो। हम गुरु और शिष्य एक दूसरे से द्वेष न करें।
* '' ॐ यन्तु नद्यो वर्षन्तु पर्जन्या सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु ।
: ''अन्नवतां ओदनवतां मामिक्षवतां एषां राजा भूयासम् ॥
: ''ओदनमुत्ब्रुवते परमेष्ठीवा एष यदोदनः ।
: ''परमामेवैनं श्रियं गमयति ॥'' -- बौधायन श्रौत सूत्र १८-१८-१९ (भोजन मन्त्र)
: नदियाँ बहें और बादल बरसें। औषधीय पौधे फलें-फूलें और सभी पेड़ फल दें। मैं चावल और दुग्ध आदि पैदा करने वाले लोगों का हितैषी बनूं। थाली में परोसा गया पका हुआ भोजन ईश्वर की ओर से एक उपहार है जिसके सेवन से उच्चतम स्तर की समृद्धि और कल्याण होगा।
* ''मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा ।
: ''सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥३॥'' -- अथर्ववेद/काण्ड ३/सूक्त ३० (भोजन मन्त्र)
: भाई, भाई से द्वेष न करे। बहन, बहन से द्वेष न करे। समान गति से एक-दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर (अथवा एकमत से प्रत्येक कार्य करने वाले होकर) भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें।
* ''पृथिव्यां त्रिणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।''
: पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- [[जल]], अन्न और [[सुभाषित]] ।
* ''युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
: ''युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥'' -- [[गीता]]
: मनुष्य के शरीर-मन आदि के जितने रोग हैं; अगर मनुष्य युक्त आहार, युक्त विहार व युक्त चेष्टाएं करे, तो उसे कोई दुःख व रोग नहीं होगा । परन्तु हम भगवान के बताए गए रास्ते पर चल नहीं पाते हैं । हम अयुक्त आहार करते हैं, अयुक्त विहार करते हैं और अयुक्त चेष्टाएं करते हैं; इसलिए दु:ख पाते हैं।
*''आयुः सत्त्ववला रोग्यसुखप्रीतिविवर्धनः।
: ''रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः॥'' -- गीता, अध्याय 17, श्लोक 8
: जो भोजन सात्विक व्यक्तियों को प्रिय होता है, वह आयु बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला तथा बल, स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति करने वाला होता है। ऐसा भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा ह्रदय को भाने वाला होता है।
* ''कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णंरूक्षविदाहि
: ''आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥ -- गीता, अध्याय 17, श्लोक 9
: अत्यधिक तिक्त (कड़वे), खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क, तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले हैं।
* ''सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा।
: ''क्षुत् स्वादुतां जनयति सा चैवाढ्येषु दुर्लभा॥'' (विदुरनीतित- २.५१)
: कठोर श्रम से जीविकोपार्जन करने वाले दरिद्र लोग सदा स्वादिष्ठ भोजन करते हैं, क्योंकि भूख स्वाद पैदा कर देती है और वह धनी लोगों में प्रयः दुर्लभ होती है।
* ''अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।
: ''अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ -- प्राच्य-शिक्षा-रहस्य
: अति भोजन आरोग्यता और आयु को नाश करनेवाला है, और स्वर्ग के कारणभूत यज्ञादिकों का विरोधी होने से स्वर्ग का भी नाश करनेवाला है, पापरूप है और लोक में निन्दित है। इससे अति भोजन का त्याग करे (अर्थात् बहुत कभी न खावे)।
* ''आरोग्यं भोजनाधीनम्।'' -- काश्यपसंहिता, खि० 5.9
: आरोग्य भोजन के अधीन होता है।
* ''जीर्णे हितं मितं चाद्यात् '' -- चरकसंहिता <ref>[http://literature.awgp.org/book/svasth_rahane_ke_saral_upay/v1.5 चरकसंहिता से उद्धृत भोजन करने के दस सूत्र] </ref>
: पूर्वभोजन के जीर्ण होने (पचने) पर ही हितकर व मित (अल्प) भोजन करना चाहिए।
* कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् ? हितभुक् मितभुक् ऋतभुक् ।
: कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है? (जो) हितकर भोजन करता है, जो कम भोजन करता है, जो सच्चाई का अन्न खाता है।
* '''जीर्णे भोजनमात्रेयः लङ्घनं परमौषधम् ।
: भावार्थ : पूर्वभोजन के जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिए। यदि कभी प्रमाद से अजीर्ण हो जाए तो लंघन (उपवास) उसकी परम औषधि है।
* ''हिताहारा मिताहारा अल्पाहाराश्च ये जनाः।
: ''न तान् वैद्याश्चिकत्सन्ति आत्मनस्ते चिकित्सकाः॥'' -- [[महर्षि चरक]]
: अर्थात् जो व्यक्ति हिताहारी (हितकर आहार करने वाले), मिताहारी (परिमित, नपा तुला, न अधिक न कम आहार करने वाले) तथा कभी- कभी अल्पाहारी (कम भोजन या उपवास करने वाले) होते हैं, उनकी चिकित्सा वैद्य लोग नहीं करते, प्रत्युत वे अपने चिकित्सक स्वयं होते हैं।
* ''आहारमग्निः पचति दोषानाहारवर्जितः।
: ''धातून् क्षीणेषु दोषेषु जीवितं धातुसंक्षये॥'' (अष्टाङ्गहृदय, चिकित्सास्थान-१०.९१)
: जठराग्नि आहार को पचाती है, यदि उसे आहार नहीं मिले तो बढ़े हुए दोषों को पचाती है, नष्ट करती है। दोषों के क्षीण होने पर भी उपवास किया जाएगा तो जठराग्नि रस-रक्त आदि धातुओं को जलाने लगती है व शरीर कृश होने लगता है तथा अन्त में जीवन को नष्ट कर देती है। (अतः उतना उपवास या अल्पाहार करना चाहिए जिससे दोष तो नष्ट हो जाएं, परन्तु शरीर की क्षीणता का अवसर न आए।)
* ''नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो''' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: बिना हाथ, पाँव व मुंह धोए (भोजन नहीं करना चाहिये)।
* ''नाशुद्धमुखो'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: अशुद्ध मुंह से (भोजन नहीं लेना चाहिये)।
* ''न कुत्सयन्न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: दूषित अन्न या भोजन या दुश्मन या विरोधियों द्वारा दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।
* ''आदौ फलानि भुञ्जीत'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: भोजन के प्रारम्भ में फल खाना चाहिये।
* ''हिताहितोपसंयुक्तमन्नं समशनं स्मृतम्। बहु स्तोकमकाले वा तज्ज्ञेयं विषमाशनम्।। अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते। त्रयमेतन्निहन्त्याशु बहून्व्याधीन्करोति वा॥ -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.494
: हितकर और अहितकर भोजन को मिलकर खाना (समशन), कभी अधिक कभी कम या कभी समय पर कभी असमय खाना (विषमाशन) या पहले खाये हुये भोजन के बिना पचे ही पुनः खाना (अध्यशन) शीघ्र ही अनेक बीमारियों को जन्म दे देते हैं।
* ''प्राग्भुक्ते त्वविविक्तेऽग्नौ द्विरन्नं न समाचरेत्। पूर्वभुक्ते विदग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम्।'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.492-493
: सुबह खाने के बाद जब तक तेज भूख न लगे तब तक दुबारा अन्न नहीं खाना चाहिये। पहले का खाया हुआ अन्न विदग्ध हो जाता है और ऐसी दशा में फिर खाने वाला इंसान अपनी पाचकाग्नि को नष्ट कर लेता है।
* ''भुक्त्वा राजवदासीत यावदन्नक्लमो गतः। ततः पादशतं गत्वा वामपार्श्वेन संविशेत्॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.487
: भोजन के बाद राजा की तरह सीधा तन कर बैठना चाहिये ताकि भोजन का क्लम हो जाये। फिर सौ कदम चल कर बायें करवट लेट जाना चाहिये।
* ''उष्णमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.1
: उष्ण आहार करना चाहिये। (गरम खाना खाना चाहिये)
* ''स्निग्धमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.2
: स्निग्ध भोजन करना चाहिये।
* ''मात्रावदश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.3
: मात्रापूर्वक भोजन करना चाहिये। (भोजन आवश्यकता से कम या अधिक नहीं करना चाहिये।)
* ''जीर्णेऽश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.4
: पूर्व में ग्रहण किये भोजन के जीर्ण होने या पच जाने के बाद ही भोजन करना चाहिये।
* ''वीर्याविरुद्धमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.5
: वीर्य के अनुकूल भोजन करना चाहिये। अर्थात् विरुद्ध वीर्य वाले खाद्य-पदार्थों, जैसे दूध और खट्टा अचार आदि को मिलाकर नहीं खाना चाहिये।
* ''इष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.6
: मन के अनुकूल स्थान और सामग्री के साथ भोजन करना चाहिये। अभीष्ट सामग्री के साथ भोजन करने से मन अच्छा रहता है।
*'' नातिद्रुतमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.7
: बहुत तेज गति से या जल्दबाज़ी में भोजन नहीं करना चाहिये।
* ''नातिविलम्बितमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.8
: अत्यन्त विलम्बपूर्वक भोजन नहीं करना चाहिये।
*'' अजल्पन्नहसन् तन्मना भुञ्जीत '' -- च.वि.1.24.9
: बिना बोले बिना हँसे तन्मयतापूर्वक भोजन करना चाहिये।
*'' आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.25
: पूर्ण रूप से स्वयं की समीक्षा कर भोजन करना चाहिये। (इसका तात्पर्य यह है कि शरीर के लिये हितकारी और अहितकारी, सुखकर और दुःखकर द्रव्यों का शरीर के परिप्रेक्ष्य में गुण-धर्म का ध्यान रखते हुये यहाँ दिये गये महावाक्यों के अनुरूप ही भोजन करने का लाभ है।)
* ''अशितश्चोदकं युक्त्या भुञ्जानश्चान्तरा पिबेत् '' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.482
: भोजन के पश्चात युक्तिपूर्वक पानी की मात्रा लेना चाहिये। तात्पर्य यह है कि खाने के बाद गटागट लोटा भर जल नहीं चढ़ा लेना चाहिये।
* जैसा अन्न, वैसा मन ।
* मुझे बता दो कि तुम क्या खाते हो और मैं बता दूँगा कि तुम क्या हो। -- Jean Anthelme Brillat-Savarin, Physiologie du Gout (1825)
* आदमी जैसा खाता है, वैसा बन जाता है।
* अन्न का दान परम दान है।
* रूखा सूखा काय के ठण्डा पानी पीव। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव ॥ ([[कबीर]])
* ''अहं अन्नं भवान भोक्ता प्रीतिर्कथं भविष्यति?''
: मैं अन्न हूँ और आप भोक्ता हैं, दोनों में प्रीति कैसे हो सकती है?
* ''यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी।
: ''कदाचिद् कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी ॥'' -- राजबल्लभ निघण्टु
: जिसके घर मे माता नहीं हो उसकी माता हरड़े (आयुर्वेदिक ओषधी ) होती है। माता तो कदाचित कुपित हो सकती है पर हरड़े कभी कुपित नहीं होती।
* ''यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः ।'' -- भावप्रकाश
: जिस प्रकार स्वर्ग में देवों को सुख देनेवाला अमृत है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को सुख देनेवाला तक्र है ।
* ''दिनान्ते च पिबेत् दुग्धं, निशान्ते च पिबेत् पयः।
: ''भोजनान्ते पिबेत् तक्रं, किं वैद्यस्य प्रयोजनम्॥
: दिन के अन्त में (शाम को) दूध पीना चाहिये, रात के अन्त में (सुबह) पानी पीना चाहिये, भोजन के उपरान्त छाछ पीना चाहिये, (ऐसा करने पर) वैद्य की क्या आवश्यकता है?
== इन्हें भी देखें ==
* [[उपवास]]
* [[शाकाहार]]
==सन्दर्भ==
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[[चित्र:Foods.jpg|दाएँ|200px|अंगूठाकार|]]
यहाँ '''अन्न''', आहार, भोजन आदि से सम्बन्धित सूक्तियाँ दी गयीं हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यम् करवावहै।
: ''तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥'' -- (भोजन मन्त्र) कृष्ण यजुर्वेद
: हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों को साथ-साथ वीर्यवान (पराक्रमी) बनाएं। हम जो कुछ पढ़ते हैं, वह तेजस्वी हो। हम गुरु और शिष्य एक दूसरे से द्वेष न करें।
* '' ॐ यन्तु नद्यो वर्षन्तु पर्जन्या सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु ।
: ''अन्नवतां ओदनवतां मामिक्षवतां एषां राजा भूयासम् ॥
: ''ओदनमुत्ब्रुवते परमेष्ठीवा एष यदोदनः ।
: ''परमामेवैनं श्रियं गमयति ॥'' -- बौधायन श्रौत सूत्र १८-१८-१९ (भोजन मन्त्र)
: नदियाँ बहें और बादल बरसें। औषधीय पौधे फलें-फूलें और सभी पेड़ फल दें। मैं चावल और दुग्ध आदि पैदा करने वाले लोगों का हितैषी बनूं। थाली में परोसा गया पका हुआ भोजन ईश्वर की ओर से एक उपहार है जिसके सेवन से उच्चतम स्तर की समृद्धि और कल्याण होगा।
* ''मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा ।
: ''सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥३॥'' -- अथर्ववेद/काण्ड ३/सूक्त ३० (भोजन मन्त्र)
: भाई, भाई से द्वेष न करे। बहन, बहन से द्वेष न करे। समान गति से एक-दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर (अथवा एकमत से प्रत्येक कार्य करने वाले होकर) भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें।
* ''पृथिव्यां त्रिणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।''
: पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- [[जल]], अन्न और [[सुभाषित]] ।
* ''युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
: ''युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥'' -- [[गीता]]
: मनुष्य के शरीर-मन आदि के जितने रोग हैं; अगर मनुष्य युक्त आहार, युक्त विहार व युक्त चेष्टाएं करे, तो उसे कोई दुःख व रोग नहीं होगा । परन्तु हम भगवान के बताए गए रास्ते पर चल नहीं पाते हैं । हम अयुक्त आहार करते हैं, अयुक्त विहार करते हैं और अयुक्त चेष्टाएं करते हैं; इसलिए दु:ख पाते हैं।
*''आयुः सत्त्ववला रोग्यसुखप्रीतिविवर्धनः।
: ''रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः॥'' -- गीता, अध्याय 17, श्लोक 8
: जो भोजन सात्विक व्यक्तियों को प्रिय होता है, वह आयु बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला तथा बल, स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति करने वाला होता है। ऐसा भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा ह्रदय को भाने वाला होता है।
* ''कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णंरूक्षविदाहि
: ''आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥ -- गीता, अध्याय 17, श्लोक 9
: अत्यधिक तिक्त (कड़वे), खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क, तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले हैं।
* ''सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा।
: ''क्षुत् स्वादुतां जनयति सा चैवाढ्येषु दुर्लभा॥'' (विदुरनीतित- २.५१)
: कठोर श्रम से जीविकोपार्जन करने वाले दरिद्र लोग सदा स्वादिष्ठ भोजन करते हैं, क्योंकि भूख स्वाद पैदा कर देती है और वह धनी लोगों में प्रयः दुर्लभ होती है।
* ''अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।
: ''अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ -- प्राच्य-शिक्षा-रहस्य
: अति भोजन आरोग्यता और आयु को नाश करनेवाला है, और स्वर्ग के कारणभूत यज्ञादिकों का विरोधी होने से स्वर्ग का भी नाश करनेवाला है, पापरूप है और लोक में निन्दित है। इससे अति भोजन का त्याग करे (अर्थात् बहुत कभी न खावे)।
* ''आरोग्यं भोजनाधीनम्।'' -- काश्यपसंहिता, खि० 5.9
: आरोग्य भोजन के अधीन होता है।
* ''जीर्णे हितं मितं चाद्यात् '' -- चरकसंहिता <ref>[http://literature.awgp.org/book/svasth_rahane_ke_saral_upay/v1.5 चरकसंहिता से उद्धृत भोजन करने के दस सूत्र] </ref>
: पूर्वभोजन के जीर्ण होने (पचने) पर ही हितकर व मित (अल्प) भोजन करना चाहिए।
* कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् ? हितभुक् मितभुक् ऋतभुक् ।
: कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है? (जो) हितकर भोजन करता है, जो कम भोजन करता है, जो सच्चाई का अन्न खाता है।
* '''जीर्णे भोजनमात्रेयः लङ्घनं परमौषधम् ।
: भावार्थ : पूर्वभोजन के जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिए। यदि कभी प्रमाद से अजीर्ण हो जाए तो लंघन (उपवास) उसकी परम औषधि है।
* ''हिताहारा मिताहारा अल्पाहाराश्च ये जनाः।
: ''न तान् वैद्याश्चिकत्सन्ति आत्मनस्ते चिकित्सकाः॥'' -- [[महर्षि चरक]]
: अर्थात् जो व्यक्ति हिताहारी (हितकर आहार करने वाले), मिताहारी (परिमित, नपा तुला, न अधिक न कम आहार करने वाले) तथा कभी- कभी अल्पाहारी (कम भोजन या उपवास करने वाले) होते हैं, उनकी चिकित्सा वैद्य लोग नहीं करते, प्रत्युत वे अपने चिकित्सक स्वयं होते हैं।
* ''आहारमग्निः पचति दोषानाहारवर्जितः।
: ''धातून् क्षीणेषु दोषेषु जीवितं धातुसंक्षये॥'' (अष्टाङ्गहृदय, चिकित्सास्थान-१०.९१)
: जठराग्नि आहार को पचाती है, यदि उसे आहार नहीं मिले तो बढ़े हुए दोषों को पचाती है, नष्ट करती है। दोषों के क्षीण होने पर भी उपवास किया जाएगा तो जठराग्नि रस-रक्त आदि धातुओं को जलाने लगती है व शरीर कृश होने लगता है तथा अन्त में जीवन को नष्ट कर देती है। (अतः उतना उपवास या अल्पाहार करना चाहिए जिससे दोष तो नष्ट हो जाएं, परन्तु शरीर की क्षीणता का अवसर न आए।)
* ''नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो''' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: बिना हाथ, पाँव व मुंह धोए (भोजन नहीं करना चाहिये)।
* ''नाशुद्धमुखो'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: अशुद्ध मुंह से (भोजन नहीं लेना चाहिये)।
* ''न कुत्सयन्न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 8.20
: दूषित अन्न या भोजन या दुश्मन या विरोधियों द्वारा दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।
* ''आदौ फलानि भुञ्जीत'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: भोजन के प्रारम्भ में फल खाना चाहिये।
* ''हिताहितोपसंयुक्तमन्नं समशनं स्मृतम्। बहु स्तोकमकाले वा तज्ज्ञेयं विषमाशनम्।। अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते। त्रयमेतन्निहन्त्याशु बहून्व्याधीन्करोति वा॥ -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.494
: हितकर और अहितकर भोजन को मिलकर खाना (समशन), कभी अधिक कभी कम या कभी समय पर कभी असमय खाना (विषमाशन) या पहले खाये हुये भोजन के बिना पचे ही पुनः खाना (अध्यशन) शीघ्र ही अनेक बीमारियों को जन्म दे देते हैं।
* ''प्राग्भुक्ते त्वविविक्तेऽग्नौ द्विरन्नं न समाचरेत्। पूर्वभुक्ते विदग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम्।'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.492-493
: सुबह खाने के बाद जब तक तेज भूख न लगे तब तक दुबारा अन्न नहीं खाना चाहिये। पहले का खाया हुआ अन्न विदग्ध हो जाता है और ऐसी दशा में फिर खाने वाला इंसान अपनी पाचकाग्नि को नष्ट कर लेता है।
* ''भुक्त्वा राजवदासीत यावदन्नक्लमो गतः। ततः पादशतं गत्वा वामपार्श्वेन संविशेत्॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.487
: भोजन के बाद राजा की तरह सीधा तन कर बैठना चाहिये ताकि भोजन का क्लम हो जाये। फिर सौ कदम चल कर बायें करवट लेट जाना चाहिये।
* ''उष्णमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.1
: उष्ण आहार करना चाहिये। (गरम खाना खाना चाहिये)
* ''स्निग्धमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.2
: स्निग्ध भोजन करना चाहिये।
* ''मात्रावदश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.3
: मात्रापूर्वक भोजन करना चाहिये। (भोजन आवश्यकता से कम या अधिक नहीं करना चाहिये।)
* ''जीर्णेऽश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.4
: पूर्व में ग्रहण किये भोजन के जीर्ण होने या पच जाने के बाद ही भोजन करना चाहिये।
* ''वीर्याविरुद्धमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.5
: वीर्य के अनुकूल भोजन करना चाहिये। अर्थात् विरुद्ध वीर्य वाले खाद्य-पदार्थों, जैसे दूध और खट्टा अचार आदि को मिलाकर नहीं खाना चाहिये।
* ''इष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.6
: मन के अनुकूल स्थान और सामग्री के साथ भोजन करना चाहिये। अभीष्ट सामग्री के साथ भोजन करने से मन अच्छा रहता है।
*'' नातिद्रुतमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.7
: बहुत तेज गति से या जल्दबाज़ी में भोजन नहीं करना चाहिये।
* ''नातिविलम्बितमश्नीयात् '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.24.8
: अत्यन्त विलम्बपूर्वक भोजन नहीं करना चाहिये।
*'' अजल्पन्नहसन् तन्मना भुञ्जीत '' -- च.वि.1.24.9
: बिना बोले बिना हँसे तन्मयतापूर्वक भोजन करना चाहिये।
*'' आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत '' -- चरकसंहिता, विमानस्थान 1.25
: पूर्ण रूप से स्वयं की समीक्षा कर भोजन करना चाहिये। (इसका तात्पर्य यह है कि शरीर के लिये हितकारी और अहितकारी, सुखकर और दुःखकर द्रव्यों का शरीर के परिप्रेक्ष्य में गुण-धर्म का ध्यान रखते हुये यहाँ दिये गये महावाक्यों के अनुरूप ही भोजन करने का लाभ है।)
* ''अशितश्चोदकं युक्त्या भुञ्जानश्चान्तरा पिबेत् '' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान 46.482
: भोजन के पश्चात युक्तिपूर्वक पानी की मात्रा लेना चाहिये। तात्पर्य यह है कि खाने के बाद गटागट लोटा भर जल नहीं चढ़ा लेना चाहिये।
* जैसा अन्न, वैसा मन ।
* मुझे बता दो कि तुम क्या खाते हो और मैं बता दूँगा कि तुम क्या हो। -- Jean Anthelme Brillat-Savarin, Physiologie du Gout (1825)
* आदमी जैसा खाता है, वैसा बन जाता है।
* अन्न का दान परम दान है।
* रूखा सूखा काय के ठण्डा पानी पीव। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव ॥ ([[कबीर]])
* ''अहं अन्नं भवान भोक्ता प्रीतिर्कथं भविष्यति?''
: मैं अन्न हूँ और आप भोक्ता हैं, दोनों में प्रीति कैसे हो सकती है?
* ''यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी।
: ''कदाचिद् कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी ॥'' -- राजबल्लभ निघण्टु
: जिसके घर मे माता नहीं हो उसकी माता हरड़े (आयुर्वेदिक ओषधी ) होती है। माता तो कदाचित कुपित हो सकती है पर हरड़े कभी कुपित नहीं होती।
* ''यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः ।'' -- भावप्रकाश
: जिस प्रकार स्वर्ग में देवों को सुख देनेवाला अमृत है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को सुख देनेवाला तक्र है ।
* ''दिनान्ते च पिबेत् दुग्धं, निशान्ते च पिबेत् पयः।
: ''भोजनान्ते पिबेत् तक्रं, किं वैद्यस्य प्रयोजनम्॥
: दिन के अन्त में (शाम को) दूध पीना चाहिये, रात के अन्त में (सुबह) पानी पीना चाहिये, भोजन के उपरान्त छाछ पीना चाहिये, (ऐसा करने पर) वैद्य की क्या आवश्यकता है?
* ''श्लेष्मामवातमेदोघ्नं बस्तिशोधन दीपनम्।
: ''कासश्वासज्वरहरं पीतमुष्णोदकं निशि॥'' -- शार्ङ्गधर संहिता, मध्यम खंडः 2.181
: रात में उष्णोदक (अग्नि पर उबाल कर औटाये हुए जल को सिद्ध उष्णोदक कहते हैं) पीने से कफ, आमवात (गठिया) व मेदारोग (मोटापा) नष्ट होता है। इससे खाँसी, श्वास (दमा) व बुखार में भी राहत मिलती है। सिद्ध उष्णोदक पान से मूत्राशय की शुद्धि होती है व जठराग्नि प्रदीप्त रहती है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[उपवास]]
* [[शाकाहार]]
* [[जल]]
* [[विटामिन]]
* [[आरोग्य]]
* [[औषधि]]
==सन्दर्भ==
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विद्या
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अनुनाद सिंह
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'''विद्या''' अर्थात ज्ञान, जानकारी, अनुभव, कुछ करने की विधि आदि।
== उद्धरण ==
* ''प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम्।
: ''आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वद् आन्वीक्षिकी मता॥'' -- चाणक्य
: अर्थ - आन्वीक्षिकी सभी विद्याओं की शाश्वत प्रदीप है, सभी कर्मों का शाश्वत साधन है, और सभी धर्मों का शाश्वत आश्रय है।
*''तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
:''आयासायापरं कर्म विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम् ॥'' -- विष्णुपुराण १-१९-४१
:कर्म वह है जो बन्धन में न डाले ; विद्या वह है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म करना मात्र श्रम करना है तथा अन्य विद्याएँ शिल्प में निपुणता मात्र हैं।
* ''विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
: ''अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥'' -- ईशोपनिषद्
: जो विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) और अविद्या (भौतिक ज्ञान) दोनों को जानता है, वह अविद्या के द्वारा मृत्यु को पार करके विद्या से अमृतत्त्व (देवतात्मभाव = देवत्व) प्राप्त कर लेता है।
*''विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
:''कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥
:विद्यावान और विनयी मनुष्य सभी का चित्त हरण (आकर्षित) कर लेता है। जैसे सुवर्ण और मणि का संयोग सबकी आँखों को सुख देता है।
*''यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं।
:''लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पणः किं करिष्यति॥
:जिस मनुष्य के पास स्वयं का(प्रज्ञा) विवेक नहीं है, उसके शास्त्र किस काम के, जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।
*''दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन ।
:''मणिना भूषितो सर्पः किमसौ न भयंकरः ॥
:दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी हो अर्थात वह विद्यावान भी हो तो भी उसका परित्याग कर देना चाहिए। मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता?
*''अजरामरवत् प्राज्ञः विद्यामर्थं च साधयेत् ।
:''गृहीत एव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
:बुढापा और मृत्यु नहीं आनेवाले है, ऐसा समझकर मनुष्य को विद्या और धन प्राप्त करना चाहिए। पर मृत्यु ने हमारे बाल पकड़े हैं, यह समझकर धर्माचरण करना चाहिए।
*''अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः ।
:''स्वावलम्बः दृढाभ्यासः षडेते छात्र सद्गुणाः ॥
:आलसी नहीं होना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, शीलवान होना, गुरुजनों का आदर करना, आत्मनिर्भर होना, और कठिन अभ्यास करना – ये छः छात्र के सद्गुण हैं।
*''अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ॥
:''सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
:अनेक संशयों को दूर करनेवाला, परोक्ष वस्तु को दिखानेवाला, और सबका नेत्ररुप शास्त्र जिसने पढ़ा नहीं, वह व्यक्ति (आँख होने के बावजुद) अंधा है।
*''अपूर्वः कोऽपि कोषोऽयं विद्यते तव भारति ।
:''व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात् ॥
:हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अद्भुत है; जो खर्च करने से बढ़ता है, और जमा करने से कम होता है।
*''अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
:''चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं॥
:बड़ों का अभिवादन करने वाले मनुष्य की और नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल -ये चार चीजें बढ़ती हैं।
*''अर्थातुराणां न सुखं न निद्रा कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
:''विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न रुचि न बेला ॥
:धन कमाने को आतुर व्यक्ति को सुख और नींद नहीं मिलते, जो व्यक्ति कामातुर होता है उसे न डर होता है और न किसी से शर्म। विद्या के लिए आतुर व्यक्ति को सुख और नींद कहाँ, और भूखे व्यक्ति को रुचि या समय का ध्यान नहीं रहता है।
*''अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
:''अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥
:आलसी इन्सान को विद्या कहाँ ? विद्याविहीन को धन कहाँ ? धनविहीन को मित्र कहाँ ? और मित्रविहीन को सुख कहाँ ?
*''अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
:''भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
:व्याकरण छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नव से नदी पार करना, और नहीं खाने लायक भोजन के साथ दवाई खाना – ये सब चीजें करने से बेहतर है इन्हें न करना।
*''आचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो ।
:''बाह्या इमे पठन पञ्चगुणा नराणाम् ॥
:आचार्य, पुस्तक, निवास, मित्र, और वस्त्र – ये पाँच पठन के लिए आवश्यक बाह्य गुण हैं ।
*''आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च ।
:''पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥
:आयु, कर्म, विद्या, वित्त, और मृत्यु, ये पाँच चीजें व्यक्ति के गर्भ में हीं निश्चित हो जाती है।
*''आरोग्य बुद्धि विनयोद्यम शास्त्ररागाः ।
:''आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ॥
:आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति राग (आत्यंतिक प्रेम) – ये पाँच पठन के लिए आवश्यक आंतरिक गुण हैं ।
*''कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने ।
:''अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु ॥
:यत्न कहाँ करना ? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में । अनादर कहाँ करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में ।
*''कुलं छलं धनं चैव रुपं यौवनमेव च ।
:''विद्या राज्यं तपश्च एते चाष्टमदाः स्मृताः ॥
:कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं ।
*''क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
:''क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
:एक-एक क्षण गँवाए बिना विद्या पानी चाहिए; और एक-एक कण बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए। क्षण गँवाने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती, और कण नष्ट करने वाले को धन नहीं मिलता।
*''गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः ।
:''अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥
:गाकर पढ़ना, जल्दी-जल्दी पढ़ना, पढ़ते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ जाना, अर्थ जाने बिना पढ़ना, और धीमा आवाज होना ये छः पाठक के दोष हैं।
*''गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा ।
:''अथवा विद्यया विद्या चतुर्थी नोपलभ्यते ॥
:गुरु की सेवा करके, अधिक धन देकर, या विद्या के बदले में विद्या, इन तीन तरीकों से हीं विद्या पायी जा सकती है; विद्या पाने का कोई चौथा उपाय नहीं होता है।
*''ज्ञातिभिर्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते ।
:''दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥
:यह विद्यारुपी रत्न महान धन है, जिसका वितरण ज्ञातिजनों द्वारा हो नहीं सकता, जिसे चोर ले जा नहीं सकते, और जिसका दान करने से क्षय नहीं होता ।
*''ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेव जीवति ।
:''ज्ञानवानेव बलवान् तस्मात् ज्ञानमयो भव ॥
:ज्ञानी इन्सान हि सुखी है, और ज्ञानी हि सही अर्थ में जीता है । जो ज्ञानी है वही बलवान है, इस लिए तूं ज्ञानी बन । (वसिष्ठ की राम को उक्ति)
*''तैलाद्रक्षेत् जलाद्रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात् ।
:''मूर्खहस्ते न दातव्यमेवं वदति पुस्तकम् ॥
:पुस्तक कहता है कि, तेल से मेरी रक्षा करो, जल से मेरी रक्षा करो, मेरा बंधन शिथिल न होने दो, और मूर्ख के हाथ में मुझे मत दो।
*''दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् ।
:''वित्तं दानसमेतं दुर्लभमेतत् चतुष्टयम् ॥
:प्रिय वचन के साथ दिया हुआ दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, और दान की इच्छावाला धन – ये चारों दुर्लभ हैं।
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
*''दुयतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ॥
:''स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
:जुआ, वाद्य, नाट्य (फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छः विद्या पाने में विघ्न होते हैं।
*''द्यूतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।
:''स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
:जुआ, वाद्य, नाट्य (फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छः विद्या पाने में विघ्न होते हैं।
*''न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
:''व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
:विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने से बढता है । सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है ।
*''नास्ति विद्या समं चक्षु नास्ति सत्य समं तपः ।
:''नास्ति राग समं दुखं नास्ति त्याग समं सुखं॥
:विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तपस्या नहीं है, आसक्ति के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है ।
*''नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ॥
:''नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥
:विद्या जैसा बंधु नहीं है, विद्या जैसा कोई मित्र नहीं है, (और) विद्या के जैसा कोई धन नहीं है और विद्या के जैसा कोई सुख नहीं है।
*''पठतो नास्ति मूर्खत्वं अपनो नास्ति पातकम् ।
:''मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ॥
:पढनेवाले को मूर्खत्व नहीं आता; जपनेवाले को पातक नहीं लगता; मौन रहनेवाले का झघडा नहीं होता; और जागृत रहनेवाले को भय नहीं होता ।
*''पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् ।
:''कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥
:जो विद्या पुस्तक में है और जो धन किसी को दिया हुआ है। जरूरत पड़ने पर न तो वह विद्या काम आती है और न वह धन।
*''माता शत्रुः पिता वैरी येन बालों ने पाठितः ॥
:''न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥
:जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं, वह माता शत्रु के समान है और पिता बैरी है, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता जैसे हँसों के बीच बगुला।
*''मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते
:''कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम् ।
:''लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम्
:''किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ॥
:विद्या माता की तरह रक्षण करती है, पिता की तरह हित करती है, पत्नी की तरह थकान दूर करके मन को रीझाती है, शोभा प्राप्त कराती है, और चारों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है । सचमुच, कल्पवृक्ष की तरह यह विद्या क्या क्या सिद्ध नहि करती ?
*''माधुर्यं अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
:''धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठके गुणाः ॥
:मधुरता, स्पष्ट उच्चारण, पदच्छेद, मधुर स्वर, धैर्य, और तन्मयता – ये पढ़ने वाले व्यक्ति के छः गुण हैं।
*''यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
:''तथा वेदं विना विप्रः त्रयस्ते नामधारकाः ॥
:काठा का हाथी, और चमड़े से बनाया हुआ मृग तथा वेदाध्ययन न किया हुआ ब्राह्मण भी केवल नामधारी ही हैं।
*''रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
:''विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥
:रुपसंपन्न, यौवनसंपन्न, और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों, पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंधरहित केसुडे के फूल की भाँति शोभा नहीं देते ।
*''विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
:''पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
:विद्या यानि ज्ञान हमें विनम्रता प्रादान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है जिससे हम धर्म के कार्य करते हैं और हमे सुख सुख मिलता है।
*''विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
:''धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।
:''सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
:''तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥
:विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन ।
*''विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
:''विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
:''विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
:''विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥
:विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, विद्या गुप्त धन है। वह भोग देनेवाली, यशदेने वाली, और सुखकारी है। विद्या गुरुओं की गुरु है, विदेश में विद्या बंधु है। विद्या बड़ी देवता है; राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्याविहीन व्यक्ति पशु ही है।
*''विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च ।
:''व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥
:ज्ञान प्रवास में, पत्नी घर में, औषध रोगी का तथा धर्म मृतक का ( सबसे बड़ा ) मित्र होता है ।
*''विद्या राज्यं तपश्च एते चाष्टमदाः स्मृताः ॥
:कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं।
*''विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।
:''कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ॥
:कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोयल का रुप स्वर, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है।
*''विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
:''यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥
:विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छः जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
* ''विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
: ''आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितियाद्रियते सदा ॥'' -- (हितोपदेश, श्लोक ७)
:शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या – ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं । इन में से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है, और दूसरी सदा आदर दिलाती है ।
*''विद्याभ्यास स्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
:''अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ॥
:विद्या का अभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रिय-संयम, अहिंसा और गुरुसेवा – ये सब बहुत कल्याण करने वाले हैं।
*''विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
:''कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥
:विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य का चित्त हरण नहि करता ? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहि देता ?
*''श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि ।
:''संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ॥
:शुद्ध बुद्धि सचमुच कामधेनु है, क्यों कि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति को रुकाती है, यश दिलाती है, मलिनता धो देती है, और संस्काररुप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है ।
*''सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदर पूरणे ।
:''शुकोऽप्यशनमाप्नोति रामरामेति च ब्रुवन् ॥
:सद्विद्या हो तो पेट भरने की चिंता करने का कारण नहीं। तोता भी “राम राम” बोलने से खुराक पा ही लेता है।
*''सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
:''अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
:सब धनों में विद्यारुपी धन सर्वोत्तम है, क्योंकि इसे न तो छीना जा सकता है और न यह चोरी की जा सकती है। इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसका न इसका कभी नाश होता है।
*''सालस्यो गर्वितो निद्रः परहस्तेन लेखकः ।
:''अल्पविद्यो विवादी च षडेते आत्मघातकाः ॥
:आलसी होना, झूठा घमंड होना, बहुत ज्यादा सोना, पराये के पास लिखाना, अल्प विद्या, और वाद-विवाद - ये छः आत्मघाती हैं।
*''सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
:''सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥
:सुख चाहने वाले को विद्या प्राप्त नहीं हो सकती, और विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता। सुख चाहने वाले को विद्या पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए, और विद्या चाहने वाले को सुख छोड़ देना चाहिए।
*''स्वच्छन्दत्वं धनार्थित्वं प्रेमभावोऽथ भोगिता ।
:''अविनीतत्वमालस्यं विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
:स्वंच्छंदता, पैसे का मोह, प्रेमवश होना, भोगाधीन होना, उद्धत होना – ये छः विद्या पाने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
*''हर्तृर्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
:''कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना॥
:जो चोरों को नजर नहीं आती, देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, वह विद्या के अलावा कौन सा धन हो सकता है ?
*''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कंठस्य भूषणम्।
:''श्रोतस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम्॥
:हाथ का आभूषण (गहना) दान है, गले का आभूषण सत्य है, कान की शोभा शास्त्र सुनने से है, अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है?
* ''संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् ।
: ''समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥'' -- (हितोपदेश, श्लोक ५)
: जैसे नीचे प्रवाह में बहेनेवाली नदी, नाव में बैठे हुए मनुष्य को न पहुँच पानेवाले समुद्र तक पहुँचाती है, वैसे हि निम्न जाति में गयी हुई विद्या भी, उस मनुष्य को राजा का समागम करा देती है; और राजा का समागम होने के बाद उसका भाग्य खिल उठता है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[विद्यार्थी]]
* [[शिक्षा]]
* [[कर्म]]
* [[गुण]]
* [[कला]]
* [[कौशल]]
* [[धन]]
* [[ज्ञान]]
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प्रबन्धन
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अनुनाद सिंह
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== उक्तियाँ==
* ''अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ।
: ''अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥'' -- शुक्राचार्य / समयोचितपद्यमालिका
: कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो, कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है, जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी व्यक्ति अयोग्य नही होता, उसको काम मे लेने वाले ही दुर्लभ हैं।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम्॥'' -- महाभारत, शान्तिपर्व
: राजा का कारण काल है, या काल का कारण राजा है, ऐसा सन्देह तुम्हारे मन में नहीं उठना चाहिए; क्योंकि राजा ही काल का कारण होता है। ( राजा का कारण तत्कालीन परिस्थिति है, या राजा तत्कालीन परिस्थिति का कारण है, इस सम्बन्ध में सन्देह ना रहे; राजा (ही) तत्कालीन परिस्थिति का कारण है। )
* ''कोऽतिभारः समर्थानामं किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
: ''को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥'' -- [[पंचतंत्र]]
: जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है? विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?
* ''राजा तुष्टोऽपि भृत्यानाम् अर्थमात्रं प्रयच्छति ।
: ''ते तु सम्मानितास् तस्य प्राणैर्प्युपकुर्वते ॥'' -- पञ्चतन्त्र
: राजा तुष्ट होकर भी अपने भृत्यों को केवल अर्थ (धन) देता है। (लेकिन) यदि वे सम्मानित होते हैं तो उसका (राजा का) अपने प्राण देकर भी उपकार करते हैं।
* ''कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत् ।
: ''फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत् ॥'' -- हितोपदेश
: भृत्य (सेवक) द्वारा किये गये कार्य को मारना नहीं चाहिये (उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिये)। बल्कि उनको वाणी, मन और दृष्टि से उसका फल (पुरस्कार) देकर उनको हर्षित करना चाहिये (उत्साहित करना चाहिये)।
* ''न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् ।
: ''यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ॥'' -- विदुरनीति ३-४०
: देवता पशुपालक की भाँति दण्ड लेकर रक्षा नहीं करते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि प्रदान कर देते हैं।
* ''व्याघ्रीव कुट्टनी यत्र रक्तपानामिषैषिणी ।
: ''नास्ते तत्र प्रगल्भन्ते जम्बुका इव कामुकाः ॥'' -- समयमातृका ४१, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: जिस वेश्या के घर में रक्त-पान एवं मांस भोजन की इच्छावाली व्याघ्री की भाँति कुट्टिनी नहीं रहती वहाँ जम्बुकों (सियारों ) की भाँति कामुकजन धृष्टता करते ही हैं।
* ''तस्मान्मानिनि कापि हेमकुसुमारामोच्चयाय त्वया
: ''माता तावदनेककूटकुटिला काचित्समन्विष्यताम् ।
: ''एताः सुभु भवन्ति यौवनभरारम्भे विजृम्भाभुवो
: ''वेश्यानां हि नियोगिनामिव शरत्काले घनाः संपदः ॥'' -- समयमातृका ४९, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: इसलिये हे मानिनि ! अत्यधिक धन की अभिवृद्धि के लिये अनेक प्रपञ्च एवं षड्यन्त्र में प्रवीण ( प्रपञ्च एवं षड्यन्त्र में प्रवीण होना ही उसकी कुटिलता है) किसी माता (रक्षाकर्त्री) का अन्वेषण तुम्हें करना चाहिए। हे सुन्दर भृकुटि वाली स्त्री ! जिस प्रकार शरत्काल में कृषकों को प्रचुर सम्पत्ति का लाभ होता है, उसी प्रकार पूर्ण यौवनावस्था के समय में वेश्याओं के लिये ये मातायें पर्याप्त सम्पत्ति का कारण होती हैं।
* ''अस्त्येव सा बहुतराङ्कवती तुलेव
: ''कालस्य सर्वजनपण्यपरिग्रहेषु ॥
: ''क्षिप्रकृष्टपल कल्पनया ययासौ
: ''भागीकृतः परिमितत्वमुपैति मेरुः ॥'' -- समयमातृका ५०, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: जिसे तुम माता बनाओगी वह, सम्पूर्ण प्राणिरूप पण्य ( खरीदने की वस्तु ) के ग्रहण करने में विस्तीर्ण मध्यभागवाली काल की उस तुला (तराजू) की भाँति होगी (होनी चाहिये), जिस तुला ( पक्षान्तर में स्त्री) के द्वारा अतिशीघ्र पलकल्पना से (एक एक पल के रूप में करने से अर्थात् ग्रहण करने से ) भागीकृत ( बाँटा या काटा गया ) यह मेरु ( पक्षान्तर मेरुसदृश धनी व्यक्ति ) भी परिमितता को प्राप्त हो जाता है अर्थात् सामान्य बन जाता है।
* ''भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला ।
: ''शल्यग्राहवती कॄपेण महता कर्णेन वेलाकुला ॥
: ''अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी ।
: ''सोत्तीर्णा खलु पाण्डवैः रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥'' -- भागवद्गीता , गीताध्यानम्
: भीष्म और द्रोण जिसके दो तट हैं, जयद्रथ जिसका जल है, शकुनि ही जिसमें नीलकमल है, शल्य जलचर ग्राह है, कर्ण तथा कृपाचार्य ने जिसकी मर्यादा को आकुल कर डाला है, अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर हैं, ऐसी भयंकर और दुर्योधन रूपी भंवर से युक्त रणनदी को केवल श्रीकृष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये।
* वैज्ञानिक प्रबंध यह जानने की कला है कि आप श्रमिकों से क्या काम कराना चाहते हैं और फिर यह देखना कि वे उसको सर्वोत्तम ढंग से एवं कम से कम लागत पर करें। -- फ्रेडरिक टेलर, वैज्ञानिक प्रबन्धन के जनक
* २०वीं शताब्दी के प्रबन्धन का सबसे महत्वपूर्ण और वस्तुतः अनन्य योगदान यह था कि उसने विनिर्माण के श्रमिकों की उत्पादकता को ५० गुना बढ़ा दिया।-- [[पीटर ड्रकर]]
* उस व्यक्ति को प्रबन्धक के पद पर नहीं नियुक्त किया जाना चाहिये जिसकी दृष्टि मनुष्य की शक्ति के बजाय पर केन्द्रित होने के उसकी कमजोरियों पर केन्द्रित रहती हो।-- [[पीटर ड्रकर]]
* प्रबन्धक लक्ष्य निर्धारित करता है, प्रबन्धक संगठित करता है, प्रबन्धक मोटिवेट करता है और अपनी बात सामने रखता है, प्रबन्धक एक मापदण्ड स्थापित करते हुए (कार्य का) मापन करता है, - प्रबन्धक लोगों का विकास करता है।-- [[पीटर ड्रकर]]
==इन्हें भी देखें==
* [[राजा]]
* [[नेता]]
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व्यवसाय एवं संगठन के सन्दर्भ में '''[[:w:प्रबन्धन|प्रबन्धन]]''' (management) का अर्थ है - उपलब्ध संसाधनों का दक्षतापूर्वक तथा प्रभावपूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए लोगों के कार्यों में समन्वय करना ताकि लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके। प्रबन्धन के अन्तर्गत आयोजन (planning), संगठन-निर्माण (organizing), स्टाफिंग (staffing), नेतृत्व करना (leading या directing), तथा संगठन अथवा पहल का नियंत्रण करना आदि आते हैं।
== उक्तियाँ==
* ''अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ।
: ''अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥'' -- शुक्राचार्य / समयोचितपद्यमालिका
: कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो, कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है, जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी व्यक्ति अयोग्य नही होता, उसको काम मे लेने वाले ही दुर्लभ हैं।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम्॥'' -- महाभारत, शान्तिपर्व
: राजा का कारण काल है, या काल का कारण राजा है, ऐसा सन्देह तुम्हारे मन में नहीं उठना चाहिए; क्योंकि राजा ही काल का कारण होता है। ( राजा का कारण तत्कालीन परिस्थिति है, या राजा तत्कालीन परिस्थिति का कारण है, इस सम्बन्ध में सन्देह ना रहे; राजा (ही) तत्कालीन परिस्थिति का कारण है। )
* ''कोऽतिभारः समर्थानामं किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
: ''को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥'' -- [[पंचतंत्र]]
: जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है? विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?
* ''राजा तुष्टोऽपि भृत्यानाम् अर्थमात्रं प्रयच्छति ।
: ''ते तु सम्मानितास् तस्य प्राणैर्प्युपकुर्वते ॥'' -- पञ्चतन्त्र
: राजा तुष्ट होकर भी अपने भृत्यों को केवल अर्थ (धन) देता है। (लेकिन) यदि वे सम्मानित होते हैं तो उसका (राजा का) अपने प्राण देकर भी उपकार करते हैं।
* ''कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत् ।
: ''फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत् ॥'' -- हितोपदेश
: भृत्य (सेवक) द्वारा किये गये कार्य को मारना नहीं चाहिये (उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिये)। बल्कि उनको वाणी, मन और दृष्टि से उसका फल (पुरस्कार) देकर उनको हर्षित करना चाहिये (उत्साहित करना चाहिये)।
* ''न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् ।
: ''यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ॥'' -- विदुरनीति ३-४०
: देवता पशुपालक की भाँति दण्ड लेकर रक्षा नहीं करते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि प्रदान कर देते हैं।
* ''व्याघ्रीव कुट्टनी यत्र रक्तपानामिषैषिणी ।
: ''नास्ते तत्र प्रगल्भन्ते जम्बुका इव कामुकाः ॥'' -- समयमातृका ४१, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: जिस वेश्या के घर में रक्त-पान एवं मांस भोजन की इच्छावाली व्याघ्री की भाँति कुट्टिनी नहीं रहती वहाँ जम्बुकों (सियारों ) की भाँति कामुकजन धृष्टता करते ही हैं।
* ''तस्मान्मानिनि कापि हेमकुसुमारामोच्चयाय त्वया
: ''माता तावदनेककूटकुटिला काचित्समन्विष्यताम् ।
: ''एताः सुभु भवन्ति यौवनभरारम्भे विजृम्भाभुवो
: ''वेश्यानां हि नियोगिनामिव शरत्काले घनाः संपदः ॥'' -- समयमातृका ४९, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: इसलिये हे मानिनि ! अत्यधिक धन की अभिवृद्धि के लिये अनेक प्रपञ्च एवं षड्यन्त्र में प्रवीण ( प्रपञ्च एवं षड्यन्त्र में प्रवीण होना ही उसकी कुटिलता है) किसी माता (रक्षाकर्त्री) का अन्वेषण तुम्हें करना चाहिए। हे सुन्दर भृकुटि वाली स्त्री ! जिस प्रकार शरत्काल में कृषकों को प्रचुर सम्पत्ति का लाभ होता है, उसी प्रकार पूर्ण यौवनावस्था के समय में वेश्याओं के लिये ये मातायें पर्याप्त सम्पत्ति का कारण होती हैं।
* ''अस्त्येव सा बहुतराङ्कवती तुलेव
: ''कालस्य सर्वजनपण्यपरिग्रहेषु ॥
: ''क्षिप्रकृष्टपल कल्पनया ययासौ
: ''भागीकृतः परिमितत्वमुपैति मेरुः ॥'' -- समयमातृका ५०, कङ्क नामक नाई कलावती नामक वेश्या से
: जिसे तुम माता बनाओगी वह, सम्पूर्ण प्राणिरूप पण्य ( खरीदने की वस्तु ) के ग्रहण करने में विस्तीर्ण मध्यभागवाली काल की उस तुला (तराजू) की भाँति होगी (होनी चाहिये), जिस तुला ( पक्षान्तर में स्त्री) के द्वारा अतिशीघ्र पलकल्पना से (एक एक पल के रूप में करने से अर्थात् ग्रहण करने से ) भागीकृत ( बाँटा या काटा गया ) यह मेरु ( पक्षान्तर मेरुसदृश धनी व्यक्ति ) भी परिमितता को प्राप्त हो जाता है अर्थात् सामान्य बन जाता है।
* ''भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला ।
: ''शल्यग्राहवती कॄपेण महता कर्णेन वेलाकुला ॥
: ''अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी ।
: ''सोत्तीर्णा खलु पाण्डवैः रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥'' -- भागवद्गीता , गीताध्यानम्
: भीष्म और द्रोण जिसके दो तट हैं, जयद्रथ जिसका जल है, शकुनि ही जिसमें नीलकमल है, शल्य जलचर ग्राह है, कर्ण तथा कृपाचार्य ने जिसकी मर्यादा को आकुल कर डाला है, अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर हैं, ऐसी भयंकर और दुर्योधन रूपी भंवर से युक्त रणनदी को केवल श्रीकृष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये।
* प्रबंध से आशय पूर्वानुमान लगाना एवं योजना बनाना, आदेश देना, समन्वय करना तथा नियंत्रण करना है। -- हेनरी फेयोल
* प्रबंध परिवर्तनशील पर्यावरण में सीमित संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करते हुए संगठन के उद्देश्यों को, प्रभावी ढंग से प्राप्त करने, के लिए दूसरों से मिलकर एवं उनके माध्यम से कार्य करने की प्रक्रिया है। -- क्रीटनर
* प्रबंध यह ज्ञात करने की कला है कि आप क्या करना चाहते है तत्पश्चात यह देखना की सर्वश्रेष्ठ एवं मितव्ययिता पूर्ण ढंग से कैसे किया जाता है। -- फ्रेडरिक टेलर, वैज्ञानिक प्रबन्धन के जनक
* २०वीं शताब्दी के प्रबन्धन का सबसे महत्वपूर्ण और वस्तुतः अनन्य योगदान यह था कि उसने विनिर्माण के श्रमिकों की उत्पादकता को ५० गुना बढ़ा दिया।-- [[पीटर ड्रकर]]
* उस व्यक्ति को प्रबन्धक के पद पर नहीं नियुक्त किया जाना चाहिये जिसकी दृष्टि मनुष्य की शक्ति के बजाय पर केन्द्रित होने के उसकी कमजोरियों पर केन्द्रित रहती हो।-- [[पीटर ड्रकर]]
* प्रबन्धक लक्ष्य निर्धारित करता है, प्रबन्धक संगठित करता है, प्रबन्धक मोटिवेट करता है और अपनी बात सामने रखता है, प्रबन्धक एक मापदण्ड स्थापित करते हुए (कार्य का) मापन करता है, - प्रबन्धक लोगों का विकास करता है।-- [[पीटर ड्रकर]]
==इन्हें भी देखें==
* [[राजा]]
* [[नेता]]
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वैद्य
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'''[[:w:वैद्य|वैद्य]]''' (परम्परागत भारतीय आयुर्वैदिक चिकित्सक) या डॉक्टर (आधुनिक नाम)। इनका कार्य रोगी के रोग का निदान करना तथा उसकी चिकित्सा करके रोगी को स्वस्थ बनाना है। 'वैद्य' का शाब्दिक अर्थ है, '[[विद्या]] से युक्त'। भिषक, चिकित्सक आदि इसके पर्याय हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयंकृती।
: ''लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः॥
: ''प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः।
: '' सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते॥ -- सुश्रुतसंहिता
: अर्थ - वैद्य उसे कहते हैं जो ठीक प्रकार से शास्त्र पढ़ा हुआ, ठीक प्रकार से शास्त्र का अर्थ समझा हुआ, छेदन स्नेहन आदि कर्मों को देखा एवं स्वयं किया हुआ, छेदन आदि शस्त्र-कर्मों में दक्ष हाथ वाला, बाहर एवं अन्दर से पवित्र (रज-तम रहित), शूर (विषाद रहित) , अग्रोपहरणीय अध्याय में वर्णित साज-सामान सहित, प्रत्युत्पन्नमति (उत्तम प्रतिभा-सूझ वाला), बुद्धिमान, व्यवसायी (उत्साहसम्पन्न), विशारद (पण्डित), सत्यनिष्ट, धर्मपरायण हो।
*'' संचयंच प्रकोपंच प्रसरं स्थानसंश्रयम्।
:'' व्यक्ति भेदंच यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्धिषक् ॥ -- सुश्रुत संहिता २१/३६
: अर्थात दोषों का संचय, प्रकोप, प्रसर, स्थानसंश्रय, व्यक्ति और भेद को जो जानता है, वही यथार्थ वैद्य है। (इन्हें 'षट् क्रियाकाल' कहते हैं।)
* ''गुरोरधीताऽखिलवैद्यविद्यः पीयूषपाणिः कुशलः क्रियासु ।
: ''गतस्प्रहो धैर्यधरः कृपालुः शुद्धोऽधिकारी भिषगीदृशः स्यात् ॥'' -- वैद्यप्रशंसा
: जिसने अपने गुरुओं से सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान सीखा हो, शल्यक्रिया करने में इतना कुशल हो कि मानो उसके हाथों में मृतक को भी जीवित करने वाला अमृत हो, ईर्ष्या से रहित, धैर्यवान, दयालु और सरल स्वभाव वाला हो , वही वैद्य वास्तव में एक आदर्श वैद्य होता है।
* ''सुश्रुतो न श्रुतो येन वाग्भटो येन वाग्भटः।
: ''नाधितश्च चरक येन स वैद्यो यम किङ्करः॥
: सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसे वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।
* ''तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके ।
: ''भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥
: तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म – ये अवश्य ही जगत में हंसी के पात्र बनते हैं।
*'' वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराज सहोदर:।
:'' यमस्तु हरति प्राणान् वैद्य: प्राणान् धनानि च।
:हे यमराज के भाई वैद्यराज! तुम्हें प्रणाम। यमराज तो सिर्फ प्राणों का हरण करता है परन्तु आप प्राण और धन दोनों का हरण कर लेते हो।
* ''सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्वं शलाकधूर्तं च चिकित्सकं च ।
: ''अरिं च मित्रं च कुशीलवं च नैतान्साक्ष्येष्वधिकुर्वीत सप्त ॥
: हस्तरेखा व शरीर के लक्षणों के जानकार को, चोर व चोरी से व्यापारी बने व्यक्ति को, जुआरी को, चिकित्सक को, मित्र को तथा सेवक को - इन सातों को कभी अपना गवाह न बनाएँ, ये कभी भी पलट सकते हैं।
* ''शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्
: '''तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते॥ '' -- चरकसंहिता, शारीरस्थान 7/19
: जो वैद्य सारे अव्यवों के साथ शरीर संख्या (?) को जानता है वह वैद्य अज्ञान के कारण से उत्पन्न मोह से प्रभावित नही होता।
*''वैद्यो गुरुश्च मन्त्री च यस्य राज्ञः प्रियंवदाः ।
: ''शरीर-धर्म-कोशेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते॥'' -- हितोपदेश
: जिस राजा के वैद्य, गुरु और मन्त्री प्रिय बोल्ने वाले होते हैं, उस राजा का शरीर, धर्म और राजकोश शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
* सचिव बैद गुर तीनि जौं, प्रिय बोलाहि भय आस।
: राज धरम तन तीनि कर, होइ बेगिहें नास॥ -- [[तुलसीदास]]
: तुलसीदास जी कहते है कि यदि [[गुरु]], वैद्य और [[मंत्री]] से डर या लाभ की आशा से अच्छा बोलते है तो [[धर्म]], [[शरीर]] और [[राज्य]] इन तीनों का विनाश शीघ्र ही तय है।
== डॉक्टर पर उक्तियाँ ==
* इस धरती पर सिर्फ दो भगवान् हैं, एक माँ और दूसरा डॉक्टर।
* हर वैद्य में हनुमान का वास है और वैद्य के लिए हर मरीज़ की जान भगवान् लक्ष्मण के सामान है।
* कोई दुआ काम नहीं करती, अगर अस्पतालों में डॉक्टर और उनकी लिखीं दवाएं काम नहीं करती।
* अभिभावकों के बाद जीवन की सुरक्षा का बीड़ा चिकित्सक ही उठाते हैं।
* डॉक्टर बिमारी का ईलाज करने से पूर्व मन का इलाज करते हैं।
* दवा से रोग ठीक हो जाते हैं, लेकिन रोगी को चिकित्सक ही ठीक कर सकते हैं। Carl Jung.
* माता पिता के बाद हमारे जीवन की देखभाल डॉक्टर ही करते है।
* जब हम ज़िंदगी और मौत की लड़ाई हारने लगते है, तो हमे जिताने की कोशिश मे सिर्फ डॉक्टर लग जाते है।
* ईश्वर सबके जीवन की रक्षा खुद से नही कर पाते इसलिए उन्होंने इस धरती पर अपने रूप में डॉक्टर को भेज दिया।
* डॉक्टर न केवल दवाइयां खाने की सलाह देते है बल्कि इससे दूरी बनाने को भी कहते हैं।
* डॉक्टर की लिखी दवा आँखों को भले समझ न आए, पर शरीर को ज़रूर समझ आती है।
* यदि आप अपने शरीर व सेहत को लेकर फिक्रमंद है तो आप स्वयं एक अच्छे डॉक्टर हैं।
* बीमारी से लड़ने की ताकत एक डॉक्टर ही हमे देता है।
* डॉक्टर की एक स्माइल ही मरीज के लिए दवा से कई असरदार होती है।
* बीमारी वह डॉक्टर है जिस पर हम सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं; दया के लिए, ज्ञान के लिए, हम केवल वादा करते हैं; दर्द हम मानते हैं। Marcel Proust
* डॉक्टर इस वास्तविक संसार के वास्तविक हीरो होते है, जो जीवन की रक्षा करते है।
* एक अच्छा चिकित्सक दवाई कम और स्वास्थ्य सलाह अधिक देता हैं।
* हर मरीज अपने अंदर अपना डॉक्टर लेकर चलता है।
* सम्मान करिए हर चिकित्सक का क्यूंकि वह किरदार निभाता है एक रक्षक का।
* ज़िन्दगी जीना सिखाती होगी इंसान को, पर एक डॉक्टर ज़िंदा रखता है इंसान को।
* माँ हमारे जीवन की वो सबसे पहली डॉक्टर है, जो जीवन भर हमारी देखभाल करती है।
* जीवन को अच्छे तरीके से जीने के लिए अभिभावकों के बाद चिकित्सक की सलाह लेनी पडती हैं।
* उत्कृष्ट चिकित्सक ने चिकित्सा देखभाल के मानवीय पहलू पर लगातार जोर दिया।
* अधिकांश डॉक्टर अपनी शिक्षा के कैदी हैं और अपने पेशे से बेड़ियों में जकड़े हुए है. Richard Diaz.।
* मरीज़ों का ख्याल रखते-रखते एक डॉक्टर को न अपनी ज़िन्दगी का ख्याल रहता है और ना ही वक़्त का ख़याल रहता है
* मैं एक डॉक्टर हूँ - यह एक ऐसा पेशा है जिसे एक विशेष मिशन, एक भक्ति माना जा सकता है. Ewa Kopacz.।
* जिस तरह मंदिर मे भगवान होते है, उसी तरह हॉस्पिटल मे डॉक्टर ही हमारे भगवान होते है।
* मैंने सुना है डॉटर की पढाई बहुत मुश्किल होती है, और हो भी क्यों न भगवान् का रूप लेना कोई आसान काम नहीं।
* एक डॉक्टर हमे दवा का आदी नही बनाता, बल्कि दवा से कैसे दूर रहे उसकी सलाह ज्यादा देता है।
* हर मरीज़ का इलाज हो सके इसलिए खुदा को डॉक्टर का रूप लेना पड़ा।
* एक डॉक्टर भगवान् तक बात पहुंचने से पहले, इंसान को बचाने पहुँच जाता है
* मेरा यह दायित्व है कि मैं जो कुछ भी जानता हूं उसका उपयोग करके हर डॉक्टर और बेडसाइड और रोगी के लिए वास्तविक, प्रयोग करने योग्य चिकित्सा विज्ञान लाने की कोशिश करूं।
* एक डॉक्टर ही होता है जो रोते हुए आये हुए को हँसाते हुए भेजता है।
* 50 फीसदी बीमारी का इलाज चिकित्सक की सांत्वना से हो जाता हैं।
* हर मरीज़ से दर्द पूछने वाले डॉक्टर से कभी मिलो तो उसका हाल और दर्द तुम भी ज़रूर पूछ लेना।
* जन्म माता-पिता देते हैं, पर एक बच्चे का जन्म नहीं होता अगर एक डॉक्टर नहीं होता।
* एक डॉक्टर के दवा से कही ज्यादा उसके सुझाव कार्य करते है।
* हर मरीज़ का इलाज हो सके इसलिए खुदा को डॉक्टर का रूप लेना पड़ा।
* चिकित्सक को उसके उन उपयोगों के प्रति उपर्युक्त आदर दो, जो तुमने प्राप्त किये हैं, क्योंकि उसका स्रजन परमपिता ने किया हैं।
* बीमारी अपने आप दूर होने लगती है, जब डॉक्टर और अस्पताल पास में होते हैं।
* एक अच्छा डॉक्टर दवा कम ख्याल ज्यादा रखने की सलाह देता है।
* वो सोते नहीं ताकि मरीज़ की आँखे बंद न हों वो कोई और नहीं वो डॉक्टर ही हैं।
* ऐसा एक पल व्यतीत नहीं होता, जब एक डॉक्टर अपने मरीज़ के लिए चिंतित नहीं होता।
* डॉक्टर ही रियल हीरोज होते है जो हमारी जीवन रक्षा करते हैं।
* अब तो लोग भी डॉक्टर को भगवान् मानते हैं, तभी तो मंदिर जाने से पहले वो अस्पताल जाते हैं।
* भंयकर बीमारी को भी चिकित्सक अपनी सूझबूझ से जड़ से मिटा देते हैं।
* उसकी लिखाई भले ही गन्दी लगती हो पर मन उसका साफ़ होता है ,वो डॉक्टर है साहब हर मरीज़ को बचाना ही उसका ख़्वाब होता है।
* मरीज़ सोया है बिस्तर पर और डॉक्टर बिना पलके झपकाए बीमारी से लड़ता है।
* जीवन से प्यार करना एक डॉक्टर ही सीखा देते है।
* एक भगवान् राम ने इंसान के वेश में जन्म लिया था और एक डॉक्टर है जो भगवान् के रूर्प में धरती पर जन्मे हैं।
* अगर बीमारी है तो उसका इलाज जरूर है और अगर भगवान है, तो धरती पर उसका अस्तित्व जरूर है, जो की एक डॉक्टर के रूप मे है।
* कितना महान है हर डॉक्टर खुद को बुखार है, पर आराम करने की सलाह वो मरीज़ को देता है।
* एक चिकित्सक अपने मरीज के स्वास्थ्य को लेकर निरंतर व्यतीत रहता हैं।
* हर जख्म भर जाता है उसके दर पर आ कर वो अस्पताल भी भगवान् के घर से कुछ कम नहीं है।
* इस दुनिया मे नही पता चलता है किसी का करैक्टर आज भी लोगो के लिए दुसरे खुदा है डॉक्टर।
* एक डॉक्टर को कभी भी आपकी जाति या धर्म से मतलब नही होता उसके लिए सभी एक समान होते है।
* एक डॉक्टर जिसकी खुद की जान जोखिम में है, पर वह जोखिम में फंसे मरीज़ को जोखिम से निकालना ज्यादा ज़रूरी समझता है।
* परेशान लोगों की दुनिया में परेशानी से निकालने वाला शख्स केवल एक है डॉक्टर।
* एक शिक्षक जीने का तरीक़ा सिखाता है और एक चिकित्सक जीवित रखने में मदद करता है दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
* सेहत के सुधार के लिए जितनी दवाएं आवश्यक होती है उतना ही डॉ पर विश्वास की भी आवश्यक होती है ।
* एक डॉक्टर की मुस्कराहट उसके दवाओ से कही ज्यादा असर दिखाती है।
* वो दर्द भी देते है, वो दवा भी बेचते है,सुना है हमने वो तो डॉक्टरी के पेशे में है।
* डॉक्टर की पढाई पैसे कमाने के लिए बल्कि मानवता की सेवा के लिए होता हैं ।
* एक सफल डॉक्टर वही होता हैं, जिसके ह्रदय में करुणा के भाव होते हैं।
* मानवता की रक्षा सिर्फ ईश्वर ही नहीं, एक चिकित्सक भी करता हैं।
==इन्हें भी देखें==
* [[औषधि]]
* [[आयुर्वेद]]
* [[भोजन]]
== बाह्य कड़ियाँ ==
*[https://archive.org/details/ClZO_vaidyakiya-subhashita-sahityam-by-bhaskar-govind-ghadekar-series-no.-184-kashi-sanskrit-series/mode/2up वैद्यकीय सुभाषित साहित्यम्] (लेखक - भास्कर गोविन्द घाणेकर)
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'''[[:w:वैद्य|वैद्य]]''' (परम्परागत भारतीय आयुर्वैदिक चिकित्सक) या डॉक्टर (आधुनिक नाम)। इनका कार्य रोगी के रोग का निदान करना तथा उसकी चिकित्सा करके रोगी को स्वस्थ बनाना है। 'वैद्य' का शाब्दिक अर्थ है, '[[विद्या]] से युक्त'। भिषक, चिकित्सक आदि इसके पर्याय हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयंकृती।
: ''लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः॥
: ''प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः।
: '' सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते॥ -- सुश्रुतसंहिता
: अर्थ - वैद्य उसे कहते हैं जो ठीक प्रकार से शास्त्र पढ़ा हुआ, ठीक प्रकार से शास्त्र का अर्थ समझा हुआ, छेदन स्नेहन आदि कर्मों को देखा एवं स्वयं किया हुआ, छेदन आदि शस्त्र-कर्मों में दक्ष हाथ वाला, बाहर एवं अन्दर से पवित्र (रज-तम रहित), शूर (विषाद रहित) , अग्रोपहरणीय अध्याय में वर्णित साज-सामान सहित, प्रत्युत्पन्नमति (उत्तम प्रतिभा-सूझ वाला), बुद्धिमान, व्यवसायी (उत्साहसम्पन्न), विशारद (पण्डित), सत्यनिष्ट, धर्मपरायण हो।
*'' संचयंच प्रकोपंच प्रसरं स्थानसंश्रयम्।
:'' व्यक्ति भेदंच यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्धिषक् ॥ -- सुश्रुत संहिता २१/३६
: अर्थात दोषों का संचय, प्रकोप, प्रसर, स्थानसंश्रय, व्यक्ति और भेद को जो जानता है, वही यथार्थ वैद्य है। (इन्हें 'षट् क्रियाकाल' कहते हैं।)
* ''गुरोरधीताऽखिलवैद्यविद्यः पीयूषपाणिः कुशलः क्रियासु ।
: ''गतस्प्रहो धैर्यधरः कृपालुः शुद्धोऽधिकारी भिषगीदृशः स्यात् ॥'' -- वैद्यप्रशंसा
: जिसने अपने गुरुओं से सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान सीखा हो, शल्यक्रिया करने में इतना कुशल हो कि मानो उसके हाथों में मृतक को भी जीवित करने वाला अमृत हो, ईर्ष्या से रहित, धैर्यवान, दयालु और सरल स्वभाव वाला हो , वही वैद्य वास्तव में एक आदर्श वैद्य होता है।
* ''सुश्रुतो न श्रुतो येन वाग्भटो येन वाग्भटः।
: ''नाधितश्च चरक येन स वैद्यो यम किङ्करः॥
: सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसे वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।
* ''तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके ।
: ''भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥
: तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म – ये अवश्य ही जगत में हंसी के पात्र बनते हैं।
*'' वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराज सहोदर:।
:'' यमस्तु हरति प्राणान् वैद्य: प्राणान् धनानि च।
:हे यमराज के भाई वैद्यराज! तुम्हें प्रणाम। यमराज तो सिर्फ प्राणों का हरण करता है परन्तु आप प्राण और धन दोनों का हरण कर लेते हो।
* ''सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्वं शलाकधूर्तं च चिकित्सकं च ।
: ''अरिं च मित्रं च कुशीलवं च नैतान्साक्ष्येष्वधिकुर्वीत सप्त ॥
: हस्तरेखा व शरीर के लक्षणों के जानकार को, चोर व चोरी से व्यापारी बने व्यक्ति को, जुआरी को, चिकित्सक को, मित्र को तथा सेवक को - इन सातों को कभी अपना गवाह न बनाएँ, ये कभी भी पलट सकते हैं।
* ''शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्
: ''तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते॥ '' -- चरकसंहिता, शारीरस्थान 7/19
: जो वैद्य सारे अव्यवों के साथ शरीरसंख्या (शरीर के अंग, प्रत्यंग, तंत्र, और उसके अवयव एवं उनकी मात्रा) को जानता है वह वैद्य अज्ञान के कारण से उत्पन्न मोह से प्रभावित नही होता।
*''वैद्यो गुरुश्च मन्त्री च यस्य राज्ञः प्रियंवदाः ।
: ''शरीर-धर्म-कोशेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते॥'' -- हितोपदेश
: जिस राजा के वैद्य, गुरु और मन्त्री प्रिय बोल्ने वाले होते हैं, उस राजा का शरीर, धर्म और राजकोश शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
* सचिव बैद गुर तीनि जौं, प्रिय बोलाहि भय आस।
: राज धरम तन तीनि कर, होइ बेगिहें नास॥ -- [[तुलसीदास]]
: तुलसीदास जी कहते है कि यदि [[गुरु]], वैद्य और [[मंत्री]] से डर या लाभ की आशा से अच्छा बोलते है तो [[धर्म]], [[शरीर]] और [[राज्य]] इन तीनों का विनाश शीघ्र ही तय है।
== डॉक्टर पर उक्तियाँ ==
* इस धरती पर सिर्फ दो भगवान् हैं, एक माँ और दूसरा डॉक्टर।
* हर वैद्य में हनुमान का वास है और वैद्य के लिए हर मरीज़ की जान भगवान् लक्ष्मण के सामान है।
* कोई दुआ काम नहीं करती, अगर अस्पतालों में डॉक्टर और उनकी लिखीं दवाएं काम नहीं करती।
* अभिभावकों के बाद जीवन की सुरक्षा का बीड़ा चिकित्सक ही उठाते हैं।
* डॉक्टर बिमारी का ईलाज करने से पूर्व मन का इलाज करते हैं।
* दवा से रोग ठीक हो जाते हैं, लेकिन रोगी को चिकित्सक ही ठीक कर सकते हैं। Carl Jung.
* माता पिता के बाद हमारे जीवन की देखभाल डॉक्टर ही करते है।
* जब हम ज़िंदगी और मौत की लड़ाई हारने लगते है, तो हमे जिताने की कोशिश मे सिर्फ डॉक्टर लग जाते है।
* ईश्वर सबके जीवन की रक्षा खुद से नही कर पाते इसलिए उन्होंने इस धरती पर अपने रूप में डॉक्टर को भेज दिया।
* डॉक्टर न केवल दवाइयां खाने की सलाह देते है बल्कि इससे दूरी बनाने को भी कहते हैं।
* डॉक्टर की लिखी दवा आँखों को भले समझ न आए, पर शरीर को ज़रूर समझ आती है।
* यदि आप अपने शरीर व सेहत को लेकर फिक्रमंद है तो आप स्वयं एक अच्छे डॉक्टर हैं।
* बीमारी से लड़ने की ताकत एक डॉक्टर ही हमे देता है।
* डॉक्टर की एक स्माइल ही मरीज के लिए दवा से कई असरदार होती है।
* बीमारी वह डॉक्टर है जिस पर हम सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं; दया के लिए, ज्ञान के लिए, हम केवल वादा करते हैं; दर्द हम मानते हैं। Marcel Proust
* डॉक्टर इस वास्तविक संसार के वास्तविक हीरो होते है, जो जीवन की रक्षा करते है।
* एक अच्छा चिकित्सक दवाई कम और स्वास्थ्य सलाह अधिक देता हैं।
* हर मरीज अपने अंदर अपना डॉक्टर लेकर चलता है।
* सम्मान करिए हर चिकित्सक का क्यूंकि वह किरदार निभाता है एक रक्षक का।
* ज़िन्दगी जीना सिखाती होगी इंसान को, पर एक डॉक्टर ज़िंदा रखता है इंसान को।
* माँ हमारे जीवन की वो सबसे पहली डॉक्टर है, जो जीवन भर हमारी देखभाल करती है।
* जीवन को अच्छे तरीके से जीने के लिए अभिभावकों के बाद चिकित्सक की सलाह लेनी पडती हैं।
* उत्कृष्ट चिकित्सक ने चिकित्सा देखभाल के मानवीय पहलू पर लगातार जोर दिया।
* अधिकांश डॉक्टर अपनी शिक्षा के कैदी हैं और अपने पेशे से बेड़ियों में जकड़े हुए है. Richard Diaz.।
* मरीज़ों का ख्याल रखते-रखते एक डॉक्टर को न अपनी ज़िन्दगी का ख्याल रहता है और ना ही वक़्त का ख़याल रहता है
* मैं एक डॉक्टर हूँ - यह एक ऐसा पेशा है जिसे एक विशेष मिशन, एक भक्ति माना जा सकता है. Ewa Kopacz.।
* जिस तरह मंदिर मे भगवान होते है, उसी तरह हॉस्पिटल मे डॉक्टर ही हमारे भगवान होते है।
* मैंने सुना है डॉटर की पढाई बहुत मुश्किल होती है, और हो भी क्यों न भगवान् का रूप लेना कोई आसान काम नहीं।
* एक डॉक्टर हमे दवा का आदी नही बनाता, बल्कि दवा से कैसे दूर रहे उसकी सलाह ज्यादा देता है।
* हर मरीज़ का इलाज हो सके इसलिए खुदा को डॉक्टर का रूप लेना पड़ा।
* एक डॉक्टर भगवान् तक बात पहुंचने से पहले, इंसान को बचाने पहुँच जाता है
* मेरा यह दायित्व है कि मैं जो कुछ भी जानता हूं उसका उपयोग करके हर डॉक्टर और बेडसाइड और रोगी के लिए वास्तविक, प्रयोग करने योग्य चिकित्सा विज्ञान लाने की कोशिश करूं।
* एक डॉक्टर ही होता है जो रोते हुए आये हुए को हँसाते हुए भेजता है।
* 50 फीसदी बीमारी का इलाज चिकित्सक की सांत्वना से हो जाता हैं।
* हर मरीज़ से दर्द पूछने वाले डॉक्टर से कभी मिलो तो उसका हाल और दर्द तुम भी ज़रूर पूछ लेना।
* जन्म माता-पिता देते हैं, पर एक बच्चे का जन्म नहीं होता अगर एक डॉक्टर नहीं होता।
* एक डॉक्टर के दवा से कही ज्यादा उसके सुझाव कार्य करते है।
* हर मरीज़ का इलाज हो सके इसलिए खुदा को डॉक्टर का रूप लेना पड़ा।
* चिकित्सक को उसके उन उपयोगों के प्रति उपर्युक्त आदर दो, जो तुमने प्राप्त किये हैं, क्योंकि उसका स्रजन परमपिता ने किया हैं।
* बीमारी अपने आप दूर होने लगती है, जब डॉक्टर और अस्पताल पास में होते हैं।
* एक अच्छा डॉक्टर दवा कम ख्याल ज्यादा रखने की सलाह देता है।
* वो सोते नहीं ताकि मरीज़ की आँखे बंद न हों वो कोई और नहीं वो डॉक्टर ही हैं।
* ऐसा एक पल व्यतीत नहीं होता, जब एक डॉक्टर अपने मरीज़ के लिए चिंतित नहीं होता।
* डॉक्टर ही रियल हीरोज होते है जो हमारी जीवन रक्षा करते हैं।
* अब तो लोग भी डॉक्टर को भगवान् मानते हैं, तभी तो मंदिर जाने से पहले वो अस्पताल जाते हैं।
* भंयकर बीमारी को भी चिकित्सक अपनी सूझबूझ से जड़ से मिटा देते हैं।
* उसकी लिखाई भले ही गन्दी लगती हो पर मन उसका साफ़ होता है ,वो डॉक्टर है साहब हर मरीज़ को बचाना ही उसका ख़्वाब होता है।
* मरीज़ सोया है बिस्तर पर और डॉक्टर बिना पलके झपकाए बीमारी से लड़ता है।
* जीवन से प्यार करना एक डॉक्टर ही सीखा देते है।
* एक भगवान् राम ने इंसान के वेश में जन्म लिया था और एक डॉक्टर है जो भगवान् के रूर्प में धरती पर जन्मे हैं।
* अगर बीमारी है तो उसका इलाज जरूर है और अगर भगवान है, तो धरती पर उसका अस्तित्व जरूर है, जो की एक डॉक्टर के रूप मे है।
* कितना महान है हर डॉक्टर खुद को बुखार है, पर आराम करने की सलाह वो मरीज़ को देता है।
* एक चिकित्सक अपने मरीज के स्वास्थ्य को लेकर निरंतर व्यतीत रहता हैं।
* हर जख्म भर जाता है उसके दर पर आ कर वो अस्पताल भी भगवान् के घर से कुछ कम नहीं है।
* इस दुनिया मे नही पता चलता है किसी का करैक्टर आज भी लोगो के लिए दुसरे खुदा है डॉक्टर।
* एक डॉक्टर को कभी भी आपकी जाति या धर्म से मतलब नही होता उसके लिए सभी एक समान होते है।
* एक डॉक्टर जिसकी खुद की जान जोखिम में है, पर वह जोखिम में फंसे मरीज़ को जोखिम से निकालना ज्यादा ज़रूरी समझता है।
* परेशान लोगों की दुनिया में परेशानी से निकालने वाला शख्स केवल एक है डॉक्टर।
* एक शिक्षक जीने का तरीक़ा सिखाता है और एक चिकित्सक जीवित रखने में मदद करता है दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
* सेहत के सुधार के लिए जितनी दवाएं आवश्यक होती है उतना ही डॉ पर विश्वास की भी आवश्यक होती है ।
* एक डॉक्टर की मुस्कराहट उसके दवाओ से कही ज्यादा असर दिखाती है।
* वो दर्द भी देते है, वो दवा भी बेचते है,सुना है हमने वो तो डॉक्टरी के पेशे में है।
* डॉक्टर की पढाई पैसे कमाने के लिए बल्कि मानवता की सेवा के लिए होता हैं ।
* एक सफल डॉक्टर वही होता हैं, जिसके ह्रदय में करुणा के भाव होते हैं।
* मानवता की रक्षा सिर्फ ईश्वर ही नहीं, एक चिकित्सक भी करता हैं।
==इन्हें भी देखें==
* [[औषधि]]
* [[आयुर्वेद]]
* [[भोजन]]
== बाह्य कड़ियाँ ==
*[https://archive.org/details/ClZO_vaidyakiya-subhashita-sahityam-by-bhaskar-govind-ghadekar-series-no.-184-kashi-sanskrit-series/mode/2up वैद्यकीय सुभाषित साहित्यम्] (लेखक - भास्कर गोविन्द घाणेकर)
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दान
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अनुनाद सिंह
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'''दान''' का शाब्दिक अर्थ है- 'देने की क्रिया'। सभी धर्मों में दान का बहुत महत्व है। दान देने में सुपात्र का ध्यान रखना चाहिये। हिन्दू धर्म में दान की बहुत गरिमा और महत्व बताया गया है। अन्नदान,विद्यादान, अभयदान आदि की प्रशंशा की गयी है। [[विनोबा भावे]] जी के शब्दों में "दान का अर्थ फेंकना नहीं बोना है"।
== उक्तियाँ ==
* ''उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
: ''तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
: जिस तरह तालाब का पानी बहता रहे तभी वह शुद्ध रह सकता है अन्यथा खराब हो जाता है , उसी तरह धन भी यदि दान या भोग न किया जाय तो वह नष्ट हो जाता है। (धन के त्याग में ही उसका रक्षण है संग्रह में नही ।)
* ''सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
: ''सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
: अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, सुपात्र को धन देना चाहिए । अच्छे खेत में बोया हुआ और सुपात्र को दिया हुआ, कभी नष्ट नहीं होता।
* ''न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।
: ''न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥
: अन्न एवम् जल के दान के समान कोई दान नहीं है , द्वादशी के समान तिथि नहीं है , [[गायत्री मंत्र]] के समान कोई [[मंत्र]] नही है, और माता के समान कोई देवता नही है।
* अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
: जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥
: जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल के योग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है।
* ''मूर्खो न हि ददाति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ।
: ''प्राज्ञाम्पस्तु वितरति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ॥'' -- भोजप्रबन्धम्
: मूर्ख मनुुुष्य इस डर से दान नहीं करता है कि कहीं दरिद्र न हो जांए। दूसरी ओर बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचकर अभी ही देता रहता है कि भविष्य में दरिद्रता आने पर दान नहीं दे पाउँगा।
* ''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
: ''श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
: हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?
* ''न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
: ''दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ॥
: न्यायपूर्ण मिले हुए धन से, पारलौकिक कर्तव्य करना चाहिए । दान विधिपूर्वक, गुणवान मनुष्य को, सही समयपर देना चाहिए ।
* ''न रणे विजयात् शूरोऽध्ययनात् न च पण्डितः
: ''न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थ दानतः ।
: ''इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः
: ''हित प्रायोक्तिभिः वक्ता दाता सन्मान दानतः ॥
: रणमैदान में विजय प्राप्त करने से नहीं, बल्कि इंद्रियविजय से इन्सान शूर कहलाता है; अध्ययन से नहीं बल्कि धर्माचरण से इन्सान पण्डित कहलाता है; वाक्चातुर्य से नहीं पर हितकारक वाणी से व्यक्ति वक्ता कहलाता है; और (केवल) धन देने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से (सम्मानपूर्वक देने से) इन्साना दाता बनता है ।
* ''गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
: ''दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥
: दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान (न देने) से ये सब नष्ट होते हैं।
* ''अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
: ''अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
* खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
*''अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
: ''वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥
: हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।
* ''यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
: ''अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥
: धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरने के बाद तो उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।
* ''यद्दददाति पुरुषः तत्तप्राप्नोति केवलम्।
: ''नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफल़ं विदु॥
: ''रूपं द्रव्यं बलं चायु: भोगैश्वर्य कुलं श्रुतम्।
: ''इत्येततत्सर्वसादुण्यं दानादभ्वति नान्यथा॥'' (महाभारत, आदिपर्व १२६-६३)
* ''अभिगभ्य दत्तं सन्तुष्टया यत्तदाहुरभिष्टुतम्।
: ''याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥
: ''अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रयद्धयाअपि च।
: ''तदाहुरधमं दानं मुनयस्सत्यवादिन:॥ ( महाभारत, शन्तिपर्व २७७)
* ''न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्दते।
: ''दानं यज्ञस्तप: कर्म लोके वृतिमत्तो यत:॥
: ''धर्माय यशसेअर्थाय कामाय स्वजनाय च।
: ''पंचधा विभजान्तित्तमिहामुत्र च मोदते॥
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
* सबसे बड़ा दान तो अभयदान है जो सत्य, अहिंसा का पालन करने से दिया जा सकता हैं। -- वेदव्यास
* तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर।
: दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर॥ -- [[तुलसीदास]]
* अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है। -- [[मनु]]
* दानी कभी दु:ख नहीं पाता, उसे कभी पाप नहीं घेरता। -- ऋग्वेद
* देना उचित है ऐसा समझकर, बदला मिलने की आशा के बिना देश, काल और पात्र को देखकर जो दान होता हैं, उसे सात्विक दान कहा जाता हैं। -- गीता
* जो दान अपनी कीर्ति-गाथा गाने की उतावला हो उठता है, वह दान नहीं रह जाता; अपितु अहंकार एवं आडम्बरमात्र रह जाता है। -- हुट्टन
* प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है, उपवास हमको उसके महल के द्वार तक पहुँचा देता है और दान से हम उसके अंदर प्रवेश करते हैं। -- कुरान
* प्रसन्न चित्त से दिया गया थोड़ा दान भी थोड़ा नहीं होता है। -- विमानवत्थु
* ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली होती है, दिल भरता जाता है। -- विक्टर ह्युगो
* जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही सज्जन भी जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसका दान भी करते हैं। -- कालिदास
* अल्प में से भी जो दान दिया जाता है, वह सहस्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है। -- महात्मा बुद्ध
* जो जल बाहै नाव में, घर में बाहै दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । -- कबीर
* कोई भी व्यक्ति दान देकर कभी गरीब नहीं बना है। -- ओपरा विनफ्रे
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* हम आपनी जीविका जो हमें मिलता है उससे चलाते हैं लेकिन हम दान देकर किसी की जिंदगी बनाते हैं। -- माया एंजेलो
* इस सनातन नियम को याद रखो यदि तुम प्राप्त करना चाहते हो तो अर्पित करना सीखो। -- सुभाषचन्द्र बोस
* दान को कर्त्तव्य के रूप में नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार के रूप में देखें। -- बारबरा बुश
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। -- स्वामी रामतीर्थ
* दान पुण्य के भाव बेहद श्रेष्ठ है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज में दान पात्रों का कोई जत्था खड़ा कर लिया जाए। -- डॉ. सम्पूर्णानन्द
* दान ही धर्म का पूर्णत्व और उसका आभूषण है। -- एडिसन
* तगड़े और स्वस्थ व्यक्ति को भिक्षा देना, दान का अन्याय है। कर्महीन मनुष्य भिक्षा के दान का अधिकारी नही है। -- [[विनोबा भावे]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[धन]]
* [[यश]]
* [[परोपकार]]
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'''दान''' का शाब्दिक अर्थ है- 'देने की क्रिया'। सभी धर्मों में दान का बहुत महत्व है। दान देने में सुपात्र का ध्यान रखना चाहिये। हिन्दू धर्म में दान की बहुत गरिमा और महत्व बताया गया है। अन्नदान,विद्यादान, अभयदान आदि की प्रशंशा की गयी है। [[विनोबा भावे]] जी के शब्दों में "दान का अर्थ फेंकना नहीं बोना है"।
== उक्तियाँ ==
* ''उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
: ''तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
: जिस तरह तालाब का पानी बहता रहे तभी वह शुद्ध रह सकता है अन्यथा खराब हो जाता है , उसी तरह धन भी यदि दान या भोग न किया जाय तो वह नष्ट हो जाता है। (धन के त्याग में ही उसका रक्षण है संग्रह में नही ।)
* ''सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
: ''सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
: अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, सुपात्र को धन देना चाहिए । अच्छे खेत में बोया हुआ और सुपात्र को दिया हुआ, कभी नष्ट नहीं होता।
* ''न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।
: ''न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥
: अन्न एवम् जल के दान के समान कोई दान नहीं है , द्वादशी के समान तिथि नहीं है , [[गायत्री मंत्र]] के समान कोई [[मंत्र]] नही है, और माता के समान कोई देवता नही है।
* अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
: जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥
: जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल के योग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है।
* ''मूर्खो न हि ददाति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ।
: ''प्राज्ञाम्पस्तु वितरति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ॥'' -- भोजप्रबन्धम्
: मूर्ख मनुुुष्य इस डर से दान नहीं करता है कि कहीं दरिद्र न हो जांए। दूसरी ओर बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचकर अभी ही देता रहता है कि भविष्य में दरिद्रता आने पर दान नहीं दे पाउँगा।
* ''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
: ''श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
: हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?
* ''न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
: ''दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ॥
: न्यायपूर्ण मिले हुए धन से, पारलौकिक कर्तव्य करना चाहिए । दान विधिपूर्वक, गुणवान मनुष्य को, सही समयपर देना चाहिए ।
* ''न रणे विजयात् शूरोऽध्ययनात् न च पण्डितः
: ''न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थ दानतः ।
: ''इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः
: ''हित प्रायोक्तिभिः वक्ता दाता सन्मान दानतः ॥
: रणमैदान में विजय प्राप्त करने से नहीं, बल्कि इंद्रियविजय से इन्सान शूर कहलाता है; अध्ययन से नहीं बल्कि धर्माचरण से इन्सान पण्डित कहलाता है; वाक्चातुर्य से नहीं पर हितकारक वाणी से व्यक्ति वक्ता कहलाता है; और (केवल) धन देने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से (सम्मानपूर्वक देने से) इन्साना दाता बनता है ।
* ''गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
: ''दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥
: दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान (न देने) से ये सब नष्ट होते हैं।
* ''अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
: ''अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
* खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
*''अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
: ''वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥
: हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।
* ''यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
: ''अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥
: धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरने के बाद तो उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।
* ''यद्दददाति पुरुषः तत्तप्राप्नोति केवलम्।
: ''नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफल़ं विदु॥
: ''रूपं द्रव्यं बलं चायु: भोगैश्वर्य कुलं श्रुतम्।
: ''इत्येततत्सर्वसादुण्यं दानादभ्वति नान्यथा॥'' (महाभारत, आदिपर्व १२६-६३)
* ''अभिगभ्य दत्तं सन्तुष्टया यत्तदाहुरभिष्टुतम्।
: ''याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥
: ''अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रयद्धयाअपि च।
: ''तदाहुरधमं दानं मुनयस्सत्यवादिन:॥ ( महाभारत, शन्तिपर्व २७७)
* ''न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्दते।
: ''दानं यज्ञस्तप: कर्म लोके वृतिमत्तो यत:॥
: ''धर्माय यशसेअर्थाय कामाय स्वजनाय च।
: ''पंचधा विभजान्तित्तमिहामुत्र च मोदते॥
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
* ''भोजनदानेन सौख्यं औषधदानेन शास्त्रदानेन च ।
: ''जीवानां अभयदानं सुदुर्ल्लभं सर्वदानानाम् ॥
: भोजन के दान से सुख मिलता है। इसी तरह औषध देने और विद्यादान से भी सुख मिलता है। किन्तु जीवों को भयरहित करना सभी दानों से दुर्लभ है।
* सबसे बड़ा दान तो अभयदान है जो सत्य, अहिंसा का पालन करने से दिया जा सकता हैं। -- वेदव्यास
* तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर।
: दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर॥ -- [[तुलसीदास]]
* अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है। -- [[मनु]]
* दानी कभी दु:ख नहीं पाता, उसे कभी पाप नहीं घेरता। -- ऋग्वेद
* देना उचित है ऐसा समझकर, बदला मिलने की आशा के बिना देश, काल और पात्र को देखकर जो दान होता हैं, उसे सात्विक दान कहा जाता हैं। -- गीता
* जो दान अपनी कीर्ति-गाथा गाने की उतावला हो उठता है, वह दान नहीं रह जाता; अपितु अहंकार एवं आडम्बरमात्र रह जाता है। -- हुट्टन
* प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है, उपवास हमको उसके महल के द्वार तक पहुँचा देता है और दान से हम उसके अंदर प्रवेश करते हैं। -- कुरान
* प्रसन्न चित्त से दिया गया थोड़ा दान भी थोड़ा नहीं होता है। -- विमानवत्थु
* ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली होती है, दिल भरता जाता है। -- विक्टर ह्युगो
* जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही सज्जन भी जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसका दान भी करते हैं। -- कालिदास
* अल्प में से भी जो दान दिया जाता है, वह सहस्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है। -- महात्मा बुद्ध
* जो जल बाहै नाव में, घर में बाहै दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । -- कबीर
* कोई भी व्यक्ति दान देकर कभी गरीब नहीं बना है। -- ओपरा विनफ्रे
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* हम आपनी जीविका जो हमें मिलता है उससे चलाते हैं लेकिन हम दान देकर किसी की जिंदगी बनाते हैं। -- माया एंजेलो
* इस सनातन नियम को याद रखो यदि तुम प्राप्त करना चाहते हो तो अर्पित करना सीखो। -- सुभाषचन्द्र बोस
* दान को कर्त्तव्य के रूप में नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार के रूप में देखें। -- बारबरा बुश
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। -- स्वामी रामतीर्थ
* दान पुण्य के भाव बेहद श्रेष्ठ है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज में दान पात्रों का कोई जत्था खड़ा कर लिया जाए। -- डॉ. सम्पूर्णानन्द
* दान ही धर्म का पूर्णत्व और उसका आभूषण है। -- एडिसन
* तगड़े और स्वस्थ व्यक्ति को भिक्षा देना, दान का अन्याय है। कर्महीन मनुष्य भिक्षा के दान का अधिकारी नही है। -- [[विनोबा भावे]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[धन]]
* [[यश]]
* [[परोपकार]]
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'''दान''' का शाब्दिक अर्थ है- 'देने की क्रिया'। सभी धर्मों में दान का बहुत महत्व है। दान देने में सुपात्र का ध्यान रखना चाहिये। हिन्दू धर्म में दान की बहुत गरिमा और महत्व बताया गया है। अन्नदान,विद्यादान, अभयदान आदि की प्रशंशा की गयी है। [[विनोबा भावे]] जी के शब्दों में "दान का अर्थ फेंकना नहीं बोना है"।
== उक्तियाँ ==
* ''उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
: ''तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
: जिस तरह तालाब का पानी बहता रहे तभी वह शुद्ध रह सकता है अन्यथा खराब हो जाता है , उसी तरह धन भी यदि दान या भोग न किया जाय तो वह नष्ट हो जाता है। (धन के त्याग में ही उसका रक्षण है संग्रह में नही ।)
* ''सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
: ''सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
: अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, सुपात्र को धन देना चाहिए । अच्छे खेत में बोया हुआ और सुपात्र को दिया हुआ, कभी नष्ट नहीं होता।
* ''न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।
: ''न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥
: अन्न एवम् जल के दान के समान कोई दान नहीं है , द्वादशी के समान तिथि नहीं है , [[गायत्री मंत्र]] के समान कोई [[मंत्र]] नही है, और माता के समान कोई देवता नही है।
* अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
: जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥
: जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल के योग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है।
* ''मूर्खो न हि ददाति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ।
: ''प्राज्ञाम्पस्तु वितरति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ॥'' -- भोजप्रबन्धम्
: मूर्ख मनुुुष्य इस डर से दान नहीं करता है कि कहीं दरिद्र न हो जांए। दूसरी ओर बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचकर अभी ही देता रहता है कि भविष्य में दरिद्रता आने पर दान नहीं दे पाउँगा।
* ''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
: ''श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
: हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?
* ''न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
: ''दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ॥
: न्यायपूर्ण मिले हुए धन से, पारलौकिक कर्तव्य करना चाहिए । दान विधिपूर्वक, गुणवान मनुष्य को, सही समयपर देना चाहिए ।
* ''न रणे विजयात् शूरोऽध्ययनात् न च पण्डितः
: ''न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थ दानतः ।
: ''इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः
: ''हित प्रायोक्तिभिः वक्ता दाता सन्मान दानतः ॥
: रणमैदान में विजय प्राप्त करने से नहीं, बल्कि इंद्रियविजय से इन्सान शूर कहलाता है; अध्ययन से नहीं बल्कि धर्माचरण से इन्सान पण्डित कहलाता है; वाक्चातुर्य से नहीं पर हितकारक वाणी से व्यक्ति वक्ता कहलाता है; और (केवल) धन देने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से (सम्मानपूर्वक देने से) इन्साना दाता बनता है ।
* ''गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
: ''दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥
: दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान (न देने) से ये सब नष्ट होते हैं।
* ''अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
: ''अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
* खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
*''अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
: ''वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥
: हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।
* ''यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
: ''अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥
: धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरने के बाद तो उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।
* ''यद्दददाति पुरुषः तत्तप्राप्नोति केवलम्।
: ''नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफल़ं विदु॥
: ''रूपं द्रव्यं बलं चायु: भोगैश्वर्य कुलं श्रुतम्।
: ''इत्येततत्सर्वसादुण्यं दानादभ्वति नान्यथा॥'' (महाभारत, आदिपर्व १२६-६३)
* ''अभिगभ्य दत्तं सन्तुष्टया यत्तदाहुरभिष्टुतम्।
: ''याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥
: ''अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रयद्धयाअपि च।
: ''तदाहुरधमं दानं मुनयस्सत्यवादिन:॥ ( महाभारत, शन्तिपर्व २७७)
* ''न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्दते।
: ''दानं यज्ञस्तप: कर्म लोके वृतिमत्तो यत:॥
: ''धर्माय यशसेअर्थाय कामाय स्वजनाय च।
: ''पंचधा विभजान्तित्तमिहामुत्र च मोदते॥
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अयाचिता निदेशानि सर्वदानानि भारत ।
: ''अन्नं विद्या तथा कन्या अनर्थीभ्यो न दीयते ॥'' -- महाभारत, उद्योग पर्व
: हे भारत (अर्जुन/युधिष्ठिर)! सभी सलाह या निर्देश और सभी दान बिना मांगे ही देना श्रेष्ठ है। (लेकिन) अन्न , विद्या और कन्या बिना मांगे नहीं देना चाहिये।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
* ''भोजनदानेन सौख्यं औषधदानेन शास्त्रदानेन च ।
: ''जीवानां अभयदानं सुदुर्ल्लभं सर्वदानानाम् ॥
: भोजन के दान से सुख मिलता है। इसी तरह औषध देने और विद्यादान से भी सुख मिलता है। किन्तु जीवों को भयरहित करना सभी दानों से दुर्लभ है।
* सबसे बड़ा दान तो अभयदान है जो सत्य, अहिंसा का पालन करने से दिया जा सकता हैं। -- वेदव्यास
* तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर।
: दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर॥ -- [[तुलसीदास]]
* अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है। -- [[मनु]]
* दानी कभी दु:ख नहीं पाता, उसे कभी पाप नहीं घेरता। -- ऋग्वेद
* देना उचित है ऐसा समझकर, बदला मिलने की आशा के बिना देश, काल और पात्र को देखकर जो दान होता हैं, उसे सात्विक दान कहा जाता हैं। -- गीता
* जो दान अपनी कीर्ति-गाथा गाने की उतावला हो उठता है, वह दान नहीं रह जाता; अपितु अहंकार एवं आडम्बरमात्र रह जाता है। -- हुट्टन
* प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है, उपवास हमको उसके महल के द्वार तक पहुँचा देता है और दान से हम उसके अंदर प्रवेश करते हैं। -- कुरान
* प्रसन्न चित्त से दिया गया थोड़ा दान भी थोड़ा नहीं होता है। -- विमानवत्थु
* ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली होती है, दिल भरता जाता है। -- विक्टर ह्युगो
* जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही सज्जन भी जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसका दान भी करते हैं। -- कालिदास
* अल्प में से भी जो दान दिया जाता है, वह सहस्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है। -- महात्मा बुद्ध
* जो जल बाहै नाव में, घर में बाहै दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । -- कबीर
* कोई भी व्यक्ति दान देकर कभी गरीब नहीं बना है। -- ओपरा विनफ्रे
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* हम आपनी जीविका जो हमें मिलता है उससे चलाते हैं लेकिन हम दान देकर किसी की जिंदगी बनाते हैं। -- माया एंजेलो
* इस सनातन नियम को याद रखो यदि तुम प्राप्त करना चाहते हो तो अर्पित करना सीखो। -- सुभाषचन्द्र बोस
* दान को कर्त्तव्य के रूप में नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार के रूप में देखें। -- बारबरा बुश
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। -- स्वामी रामतीर्थ
* दान पुण्य के भाव बेहद श्रेष्ठ है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज में दान पात्रों का कोई जत्था खड़ा कर लिया जाए। -- डॉ. सम्पूर्णानन्द
* दान ही धर्म का पूर्णत्व और उसका आभूषण है। -- एडिसन
* तगड़े और स्वस्थ व्यक्ति को भिक्षा देना, दान का अन्याय है। कर्महीन मनुष्य भिक्षा के दान का अधिकारी नही है। -- [[विनोबा भावे]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[धन]]
* [[यश]]
* [[परोपकार]]
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'''दान''' का शाब्दिक अर्थ है- 'देने की क्रिया'। सभी [[धर्म|धर्मों]] में दान का बहुत महत्व है। दान देने में सुपात्र का ध्यान रखना चाहिये। [[हिन्दू धर्म]] में दान की बहुत गरिमा और महत्व बताया गया है। अन्नदान, विद्यादान, गोदान, भूदान, कन्यादान, अभयदान आदि की प्रशंशा की गयी है। [[विनोबा भावे]] जी के शब्दों में "दान का अर्थ फेंकना नहीं बोना है"।
== उक्तियाँ ==
* ''श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ॥'' -- तैत्तिरीयोपनिषत् १-११
: श्रद्धा से देना चाहिये। बिना श्रद्धा के नहीं देना चाहिये। अपनी सामर्थ्य और ऐश्वर्य के अनुसार देना चाहिये। संकोच या विनम्रता से देना चाहिये। मर्यादा के भय से देना चाहिये। सहृदयता और संवाद के साथ देना चाहिये।
* ''उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
: ''तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
: जिस तरह तालाब का पानी बहता रहे तभी वह शुद्ध रह सकता है अन्यथा खराब हो जाता है , उसी तरह धन भी यदि दान या भोग न किया जाय तो वह नष्ट हो जाता है। (धन के त्याग में ही उसका रक्षण है संग्रह में नही ।)
* ''दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
: ''यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिः ॥'' -- भर्तृहरि, नीतिशतक
: धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग और नाश। जो न दान करता है न भोग — उसके धन की तीसरी गति (नाश) निश्चित है।
* ''सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
: ''सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
: अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, सुपात्र को धन देना चाहिए । अच्छे खेत में बोया हुआ और सुपात्र को दिया हुआ, कभी नष्ट नहीं होता।
* ''न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।
: ''न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥
: अन्न एवम् जल के दान के समान कोई दान नहीं है , द्वादशी के समान तिथि नहीं है , [[गायत्री मंत्र]] के समान कोई [[मंत्र]] नही है, और माता के समान कोई देवता नही है।
* अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
: जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥
: जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल के योग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है।
* ''मूर्खो न हि ददाति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ।
: ''प्राज्ञाम्पस्तु वितरति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ॥'' -- भोजप्रबन्धम्
: मूर्ख मनुुुष्य इस डर से दान नहीं करता है कि कहीं दरिद्र न हो जांए। दूसरी ओर बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचकर अभी ही देता रहता है कि भविष्य में दरिद्रता आने पर दान नहीं दे पाउँगा।
* ''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
: ''श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
: हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?
* ''न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
: ''दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ॥
: न्यायपूर्ण मिले हुए धन से, पारलौकिक कर्तव्य करना चाहिए । दान विधिपूर्वक, गुणवान मनुष्य को, सही समयपर देना चाहिए ।
* ''न रणे विजयात् शूरोऽध्ययनात् न च पण्डितः
: ''न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थ दानतः ।
: ''इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः
: ''हित प्रायोक्तिभिः वक्ता दाता सन्मान दानतः ॥
: रणमैदान में विजय प्राप्त करने से नहीं, बल्कि इंद्रियविजय से इन्सान शूर कहलाता है; अध्ययन से नहीं बल्कि धर्माचरण से इन्सान पण्डित कहलाता है; वाक्चातुर्य से नहीं पर हितकारक वाणी से व्यक्ति वक्ता कहलाता है; और (केवल) धन देने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से (सम्मानपूर्वक देने से) इन्साना दाता बनता है ।
* ''गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
: ''दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥
: दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान (न देने) से ये सब नष्ट होते हैं।
* ''अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
: ''अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
* खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
*''अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
: ''वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥
: हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।
* ''यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
: ''अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥
: धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरने के बाद तो उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।
* ''यद्दददाति पुरुषः तत्तप्राप्नोति केवलम्।
: ''नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफल़ं विदु॥
: ''रूपं द्रव्यं बलं चायु: भोगैश्वर्य कुलं श्रुतम्।
: ''इत्येततत्सर्वसादुण्यं दानादभ्वति नान्यथा॥'' (महाभारत, आदिपर्व १२६-६३)
* ''अभिगभ्य दत्तं सन्तुष्टया यत्तदाहुरभिष्टुतम्।
: ''याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥
: ''अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रयद्धयाअपि च।
: ''तदाहुरधमं दानं मुनयस्सत्यवादिन:॥ ( महाभारत, शन्तिपर्व २७७)
* ''न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्दते।
: ''दानं यज्ञस्तप: कर्म लोके वृतिमत्तो यत:॥
: ''धर्माय यशसेअर्थाय कामाय स्वजनाय च।
: ''पंचधा विभजान्तित्तमिहामुत्र च मोदते॥
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अयाचिता निदेशानि सर्वदानानि भारत ।
: ''अन्नं विद्या तथा कन्या अनर्थीभ्यो न दीयते ॥'' -- महाभारत, उद्योग पर्व
: हे भारत (अर्जुन/युधिष्ठिर)! सभी सलाह या निर्देश और सभी दान बिना मांगे ही देना श्रेष्ठ है। (लेकिन) अन्न , विद्या और कन्या बिना मांगे नहीं देना चाहिये।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥'' -- स्कन्द पुराण
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
* ''भोजनदानेन सौख्यं औषधदानेन शास्त्रदानेन च ।
: ''जीवानां अभयदानं सुदुर्ल्लभं सर्वदानानाम् ॥
: भोजन के दान से सुख मिलता है। इसी तरह औषध देने और विद्यादान से भी सुख मिलता है। किन्तु जीवों को भयरहित करना सभी दानों से दुर्लभ है।
* सबसे बड़ा दान तो अभयदान है जो सत्य, अहिंसा का पालन करने से दिया जा सकता हैं। -- वेदव्यास
* तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर।
: दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर॥ -- [[तुलसीदास]]
* अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है। -- [[मनु]]
* दानी कभी दु:ख नहीं पाता, उसे कभी पाप नहीं घेरता। -- ऋग्वेद
* देना उचित है ऐसा समझकर, बदला मिलने की आशा के बिना देश, काल और पात्र को देखकर जो दान होता हैं, उसे सात्विक दान कहा जाता हैं। -- गीता
* जो दान अपनी कीर्ति-गाथा गाने की उतावला हो उठता है, वह दान नहीं रह जाता; अपितु अहंकार एवं आडम्बरमात्र रह जाता है। -- हुट्टन
* प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है, उपवास हमको उसके महल के द्वार तक पहुँचा देता है और दान से हम उसके अंदर प्रवेश करते हैं। -- कुरान
* प्रसन्न चित्त से दिया गया थोड़ा दान भी थोड़ा नहीं होता है। -- विमानवत्थु
* ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली होती है, दिल भरता जाता है। -- विक्टर ह्युगो
* जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही सज्जन भी जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसका दान भी करते हैं। -- कालिदास
* अल्प में से भी जो दान दिया जाता है, वह सहस्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है। -- महात्मा बुद्ध
* जो जल बाहै नाव में, घर में बाहै दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । -- कबीर
* कोई भी व्यक्ति दान देकर कभी गरीब नहीं बना है। -- ओपरा विनफ्रे
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* हम आपनी जीविका जो हमें मिलता है उससे चलाते हैं लेकिन हम दान देकर किसी की जिंदगी बनाते हैं। -- माया एंजेलो
* इस सनातन नियम को याद रखो यदि तुम प्राप्त करना चाहते हो तो अर्पित करना सीखो। -- सुभाषचन्द्र बोस
* दान को कर्त्तव्य के रूप में नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार के रूप में देखें। -- बारबरा बुश
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। -- स्वामी रामतीर्थ
* दान पुण्य के भाव बेहद श्रेष्ठ है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज में दान पात्रों का कोई जत्था खड़ा कर लिया जाए। -- डॉ. सम्पूर्णानन्द
* दान ही धर्म का पूर्णत्व और उसका आभूषण है। -- एडिसन
* तगड़े और स्वस्थ व्यक्ति को भिक्षा देना, दान का अन्याय है। कर्महीन मनुष्य भिक्षा के दान का अधिकारी नही है। -- [[विनोबा भावे]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[धन]]
* [[यश]]
* [[परोपकार]]
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अनुनाद सिंह
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'''दान''' का शाब्दिक अर्थ है- 'देने की क्रिया'। सभी [[धर्म|धर्मों]] में दान का बहुत महत्व है। दान देने में सुपात्र का ध्यान रखना चाहिये। [[हिन्दू धर्म]] में दान की बहुत गरिमा और महत्व बताया गया है। अन्नदान, विद्यादान, गोदान, भूदान, कन्यादान, अभयदान आदि की प्रशंशा की गयी है। [[विनोबा भावे]] जी के शब्दों में "दान का अर्थ फेंकना नहीं बोना है"।
== उक्तियाँ ==
* ''श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ॥'' -- तैत्तिरीयोपनिषत् १-११
: श्रद्धा से देना चाहिये। बिना श्रद्धा के नहीं देना चाहिये। अपनी सामर्थ्य और ऐश्वर्य के अनुसार देना चाहिये। संकोच या विनम्रता से देना चाहिये। मर्यादा के भय से देना चाहिये। सहृदयता और संवाद के साथ देना चाहिये।
* ''उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
: ''तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
: जिस तरह तालाब का पानी बहता रहे तभी वह शुद्ध रह सकता है अन्यथा खराब हो जाता है , उसी तरह धन भी यदि दान या भोग न किया जाय तो वह नष्ट हो जाता है। (धन के त्याग में ही उसका रक्षण है संग्रह में नही ।)
* ''दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
: ''यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिः ॥'' -- भर्तृहरि, नीतिशतक
: धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग और नाश। जो न दान करता है न भोग — उसके धन की तीसरी गति (नाश) निश्चित है।
* ''सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
: ''सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
: अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए, सुपात्र को धन देना चाहिए । अच्छे खेत में बोया हुआ और सुपात्र को दिया हुआ, कभी नष्ट नहीं होता।
* ''न अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।
: ''न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥
: अन्न एवम् जल के दान के समान कोई दान नहीं है , द्वादशी के समान तिथि नहीं है , [[गायत्री मंत्र]] के समान कोई [[मंत्र]] नही है, और माता के समान कोई देवता नही है।
* ''अल्पमपि क्षितौ क्षिप्तं वटबीजं प्रवर्धते ।
: ''जलयोगात् यथा दानात् पुण्यवृक्षोऽपि वर्धते ॥
: जमीन पर डाला हुआ छोटा सा वटवृक्ष का बीज, जैसे जल के योग से बढता है, वैसे पुण्यवृक्ष भी दान से बढता है।
* ''मूर्खो न हि ददाति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ।
: ''प्राज्ञाम्पस्तु वितरति अर्थं नरो दारिद्रयशङ्कया ॥'' -- भोजप्रबन्धम्
: मूर्ख मनुुुष्य इस डर से दान नहीं करता है कि कहीं दरिद्र न हो जांए। दूसरी ओर बुद्धिमान व्यक्ति यह सोचकर अभी ही देता रहता है कि भविष्य में दरिद्रता आने पर दान नहीं दे पाउँगा।
* ''हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
: ''श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
: हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?
* ''न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
: ''दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ॥
: न्यायपूर्ण मिले हुए धन से, पारलौकिक कर्तव्य करना चाहिए । दान विधिपूर्वक, गुणवान मनुष्य को, सही समयपर देना चाहिए ।
* ''न रणे विजयात् शूरोऽध्ययनात् न च पण्डितः
: ''न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थ दानतः ।
: ''इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः
: ''हित प्रायोक्तिभिः वक्ता दाता सन्मान दानतः ॥
: रणमैदान में विजय प्राप्त करने से नहीं, बल्कि इंद्रियविजय से इन्सान शूर कहलाता है; अध्ययन से नहीं बल्कि धर्माचरण से इन्सान पण्डित कहलाता है; वाक्चातुर्य से नहीं पर हितकारक वाणी से व्यक्ति वक्ता कहलाता है; और (केवल) धन देने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से (सम्मानपूर्वक देने से) इन्साना दाता बनता है ।
* ''गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
: ''दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥
: दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान (न देने) से ये सब नष्ट होते हैं।
* ''अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
: ''अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
* खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
*''अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
: ''वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥
: हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।
* ''यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
: ''अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥
: धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरने के बाद तो उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।
* ''यद्दददाति पुरुषः तत्तप्राप्नोति केवलम्।
: ''नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफल़ं विदु॥
: ''रूपं द्रव्यं बलं चायु: भोगैश्वर्य कुलं श्रुतम्।
: ''इत्येततत्सर्वसादुण्यं दानादभ्वति नान्यथा॥'' (महाभारत, आदिपर्व १२६-६३)
* ''अभिगभ्य दत्तं सन्तुष्टया यत्तदाहुरभिष्टुतम्।
: ''याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥
: ''अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रयद्धयाअपि च।
: ''तदाहुरधमं दानं मुनयस्सत्यवादिन:॥ ( महाभारत, शन्तिपर्व २७७)
* ''न तद्दानं प्रशंसन्ति येन वृत्तिर्विपद्दते।
: ''दानं यज्ञस्तप: कर्म लोके वृतिमत्तो यत:॥
: ''धर्माय यशसेअर्थाय कामाय स्वजनाय च।
: ''पंचधा विभजान्तित्तमिहामुत्र च मोदते॥
*''दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
:''श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
:सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है ।
* ''अयाचिता निदेशानि सर्वदानानि भारत ।
: ''अन्नं विद्या तथा कन्या अनर्थीभ्यो न दीयते ॥'' -- महाभारत, उद्योग पर्व
: हे भारत (अर्जुन/युधिष्ठिर)! सभी सलाह या निर्देश और सभी दान बिना मांगे ही देना श्रेष्ठ है। (लेकिन) अन्न , विद्या और कन्या बिना मांगे नहीं देना चाहिये।
* ''अन्नदानं परं दानं विद्या दानम् अतः परम्।
: ''अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवञ्च विद्यया॥'' -- स्कन्द पुराण
: अन्न का दान परम् दान है। लेकिन विद्या का दान उससे भी अधिक है। क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है किन्तु विद्या से आजीवन तृप्ति मिलती रहती है।
* ''भोजनदानेन सौख्यं औषधदानेन शास्त्रदानेन च ।
: ''जीवानां अभयदानं सुदुर्ल्लभं सर्वदानानाम् ॥
: भोजन के दान से सुख मिलता है। इसी तरह औषध देने और विद्यादान से भी सुख मिलता है। किन्तु जीवों को भयरहित करना सभी दानों से दुर्लभ है।
* सबसे बड़ा दान तो अभयदान है जो सत्य, अहिंसा का पालन करने से दिया जा सकता हैं। -- वेदव्यास
* तुलसी पंछिन के पिये, घटै न सरिता-नीर।
: दान दिये धन ना घटै, जो सहाय रघुबीर॥ -- [[तुलसीदास]]
* अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है। -- [[मनु]]
* दानी कभी दु:ख नहीं पाता, उसे कभी पाप नहीं घेरता। -- ऋग्वेद
* देना उचित है ऐसा समझकर, बदला मिलने की आशा के बिना देश, काल और पात्र को देखकर जो दान होता हैं, उसे सात्विक दान कहा जाता हैं। -- गीता
* जो दान अपनी कीर्ति-गाथा गाने की उतावला हो उठता है, वह दान नहीं रह जाता; अपितु अहंकार एवं आडम्बरमात्र रह जाता है। -- हुट्टन
* प्रार्थना ईश्वर की तरफ आधे रास्ते तक ले जाती है, उपवास हमको उसके महल के द्वार तक पहुँचा देता है और दान से हम उसके अंदर प्रवेश करते हैं। -- कुरान
* प्रसन्न चित्त से दिया गया थोड़ा दान भी थोड़ा नहीं होता है। -- विमानवत्थु
* ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली होती है, दिल भरता जाता है। -- विक्टर ह्युगो
* जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही सज्जन भी जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उसका दान भी करते हैं। -- कालिदास
* अल्प में से भी जो दान दिया जाता है, वह सहस्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है। -- महात्मा बुद्ध
* जो जल बाहै नाव में, घर में बाहै दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम । -- कबीर
* कोई भी व्यक्ति दान देकर कभी गरीब नहीं बना है। -- ओपरा विनफ्रे
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* हम आपनी जीविका जो हमें मिलता है उससे चलाते हैं लेकिन हम दान देकर किसी की जिंदगी बनाते हैं। -- माया एंजेलो
* इस सनातन नियम को याद रखो यदि तुम प्राप्त करना चाहते हो तो अर्पित करना सीखो। -- सुभाषचन्द्र बोस
* दान को कर्त्तव्य के रूप में नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार के रूप में देखें। -- बारबरा बुश
* जीवन की माप उसके अवधि से नहीं बल्कि उसके दान से है। -- पीटर मार्शल
* दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। -- स्वामी रामतीर्थ
* दान पुण्य के भाव बेहद श्रेष्ठ है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि समाज में दान पात्रों का कोई जत्था खड़ा कर लिया जाए। -- डॉ. सम्पूर्णानन्द
* दान ही धर्म का पूर्णत्व और उसका आभूषण है। -- एडिसन
* तगड़े और स्वस्थ व्यक्ति को भिक्षा देना, दान का अन्याय है। कर्महीन मनुष्य भिक्षा के दान का अधिकारी नही है। -- [[विनोबा भावे]]
== इन्हें भी देखें ==
* [[धन]]
* [[यश]]
* [[परोपकार]]
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न्यायावतार
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अनुनाद सिंह
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"<poem> ''' सिद्धसेनमहामति : न्यायावतार न्यायावतारविवृति (Siddharṣigaṇin) # Header This file is a plain text transformation of http://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/sa_siddhasenamahAmati-nyAyAvatAra-comm.xml with a rudimentary header. For a more extensive header please refer to the source file. ## Data entry: Piotr Balcerowi..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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''' सिद्धसेनमहामति : न्यायावतार न्यायावतारविवृति (Siddharṣigaṇin)
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## Data entry: Piotr Balcerowicz
## Contribution: Piotr Balcerowicz
## Date of this version: 2020-07-31
## Source:
- Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes. 2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
## Publisher: Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages (GRETIL), SUB Göttingen
## Licence:
This e-text was provided to GRETIL in good faith that no copyright rights have been infringed. If anyone wishes to assert copyright over this file, please contact the GRETIL management at gretil(at)sub(dot)uni-goettingen(dot)de. The file will be immediately removed pending resolution of the claim.
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## Structure of references:
A reference is assembled consisting of
- a pragmatic abbreviation of the title: Nyāyāvatāra+comm = ,
- the number of the in arabic numerals,
- the number of the verse in arabic numerals.
## Notes:
This file has been created by mass conversion of GRETIL's Sanskrit corpus from snyayvau.htm. Due to the heterogeneity of the sources the header markup might be suboptimal. For the sake of transparency the header of the legacy file is documented in the note element below:
Siddhasena Mahamati: Nyayavatara,
with the Nyayavataravivrti commentary by Siddharsi-ganin
Based on the ed. by Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes.
2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
Input by Piotr Balcerowicz
p.balcerowicz@uw.edu.pl
[GRETIL-Version vom 27.3.2015]
ANALYTIC TEXT VERSION
(compounds indicated by hyphen and circumflex)
STRUCTURE OF REFERENCES (added):
NA_nn = Nyāyāvatāra_verse
NAV_nn.nn:nn = Nyāyāvatāra-Vivṛti_NA-verse.NAV-section:verse quoted in NAV
## Revisions:
- 2020-07-31: TEI encoding by mass conversion of GRETIL's Sanskrit corpus
# Text
''' तर्क-पञ्चानन-श्री-सिद्धसेन-महामति-विरचितः न्यायावतारः
''' श्री-देवभद्र-सूरि-कृत-टिप्पन-संवलित-श्री-सिद्धर्षि-गणि-कृत-टीका-सहितः
अवियुत-सामान्य-विशेष-देशिनं वर्धमानम् आनम्य । न्यायावतार-विवृतिः स्मृति-बीज-विवृद्धये क्रियते ॥ न्यायावतार ०० ॥
[न्या०अ००।०] अस्य चेदम् आदि-वाक्यम्॒
[न्या०अ००] प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इदम् आरभ्यते।
[न्या०अ००।१] प्रमाणेत्य्-आदि अनेन च तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-संबन्ध-विकलतया ध्वनेर् बहिर्-अर्थं प्रति प्रामाण्यायोगाद् अभिधेयादि-सूचन-द्वरोत्पन्नार्थ-संशय-मुखेनश्रोतारः श्रवणं प्रति प्रोत्साह्यन्त इति धर्मोत्तरो मन्यते। तद् अयुक्तम्। यदि हि शब्दस्यार्थ-प्रकाशनं प्रति सामर्थ्यं न समस्ति, तत् कथम् असाव् अभिधेयादि-सूचनेऽपि पटिष्ठः स्यात्? न च तस्याप्रामाण्य एतच्-छ्रवणाद् अर्थ-संशयं कुर्वन्ति प्रेक्षावन्तः, तद्-वत्ता-हानेर् मिथ्या-ज्ञानाद् अपि प्रवृत्त्य्-अविराम-प्रसङ्गाच् च। अर्चटस् त्व् आह॒ "न श्रावकोत्साहकम् एतत्, प्रामाण्याभावात्, तेषां चाप्रमाणाद् अप्रवृत्तेर्, अन्यथा प्रेक्षावत्ता-क्षतेः, किं तर्हि प्रकरणार्थ-कथनावसरोपस्थित-परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतोद्भावनार्थम्। तथा हि॒ सम्भवत्य् एवं-वादी -- नारब्धव्यम् इदम् अभिधेयादि-शून्यत्वात्, काक-दन्त-परीक्षादिवद् इति॑ तद् अनेनास्य तद्वत्ता-प्रकाशकेन वचसा तद्-धेतूनाम् असिद्धतोद्भाव्यत" इति। तद् अयुक्ततरम्॒ यतो यद्îदम् अप्रमाणम् इति नाभिधेयादीनि साक्षाल् लक्षयत् प्रवर्तयति, ततः परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतां कथयत्îति युक्ति-रिक्तं पश्यामः, अप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वाद्, अन्यथा प्रमाण-विचारणम् आनर्थक्यम् अश्नुवीत। तस्माद् इदं प्रमाण-भूतं सद्-अभिधेयादीनि प्रतिपादयत् प्रेक्षावतः प्रवर्तयत्îति प्रकरणादाव् उपन्यस्तम्।
[न्या०अ००।२] सम्बन्ध-शून्यत्वाद् अस्य कथम् अर्थे प्रमाणतेति चेत्, प्रत्यक्षेऽपि कथं तर्हि सेति वाच्यम्। ग्राह्य-ग्राहक-भाव-सम्बन्ध-बलाद् इति चेद्, अत्रापि वाच्य-वाचक-भावाद् इति ब्रूमः। स एव कथम् इति चेद्, अध्यक्षेऽपि वेद्य-वेदक-भावः कथम् इति वाच्यम्। तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारताभ्याम् इति चेत्, केयं तद्-उत्पत्तिर् नाम? तज्-जन्यतेति चेत्, प्रतिक्षण-भङ्गुरत्वे सैव दुरुपपादेत्य् आचक्ष्महे। तथा हि॒ क्षण-नश्वरोऽर्थः स्व-क्षणे पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इति त्रयी गतिः। तत्र न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-करणीयः, सम-काल-भाविनि व्यापाराभावात्, इतरथैक-क्षण-वर्तिनां समस्तार्थ-क्षणानाम् इतरेतरं कार्य-कारण-भावः प्रसज्येत, तथा च तत्-प्रयुक्तो ग्राह्य-ग्राहक-भावश् चेत्य् असमञ्जसम् आपनीपद्येत। अथ स्व-क्षणात् पूर्वम् -- अचार्व् एतद् अपि, स्वयम् असतो भविष्यच्-छङ्ख-चक्रवर्त्य्-आदेर् इव पूर्व-काल-वर्तिनि कार्ये व्यापाराभावात्। अथ स्व-क्षणाद् ऊर्ध्वं कार्यं विधत्त इति मन्येथाः, एतद् अप्य् असाधीयो, विनष्टस्य कार्य-करणाक्षमत्वाद्, अन्यथा मृतस्य शिखिनः केकायितं स्यात्। तद्-आकारतापि किम् अर्थाकार-सङ्क्रान्त्या? अथ तत्-सदृशतयोत्पत्तेर् ज्ञानस्येति? यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, ज्ञाने स्वाकारार्पणाद् अर्थस्य निराकारतानुषङ्गात्, स्व-देह-पृथुतरार्थादर्शन-प्रसङ्गात्, शिरः-स्फोटन-प्लावनाद्य्-अनर्थ-प्रसक्तेश् च। उत द्वितीयस्॒ तथा सति सादृश्य-वशाद् अर्थ-व्यवस्थेत्य् आयातम्। न च सादृश्यं भवतां दर्शने तात्त्विकम् अस्ति, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षणानां पारमार्थिकत्वाभ्युपगमात्। अनादि-कालालीन-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताक-निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनोत्तर-काल-भावि-विकल्प-व्यवस्थापित-सादृश्य-वशाद् अर्थ-ग्रहण-नियमे सत्य् एक-नील-स्वलक्षणे क्षणे सकल-काल-कलाप-व्यापि-काक-कुवलयादि-गत-नीलताया व्यवस्थितिर् अविशेषेणानुषजेत, तथा च प्रतिनियतो ग्राह्य-ग्राहक-भावो न घटाम्-अटाट्येत। अङ्गुल्य्-अग्र-निर्दिश्यमान-पुरो-वर्ति-नील-स्वलक्षण-दर्शन-बलायातत्वान् नैल्य-विकल्पस्य तद् एवाध्यवस्यति, न भूतं भावि काक-कुवलयादि-गतं वेति चेत्, तर्हि विकल्पः स्वलक्षण-निष्ठः प्राप्तो, नियत-देश-दशावच्छिन्नार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्रहणात्। तथा हि॒ तद्-अध्यवसायः किं तद्-विकल्पनं उत तद्-ग्रहणं? न तावत् तद्-विकल्पनम्, विकल्पानां भवद्-अभिप्रायेण स्वलक्षणान्तः-प्रवेशाभावात्। तद् उक्तम्॒
"तेनान्यापोह-विषयाः प्रोक्ताः सामान्य-गोचराः ।
शब्दाश् च बुद्धयश् चैव वस्तुन्य् एषाम् असम्भवात्" ॥ न्यायावतार ०१ ॥
इति।नव्०।
[न्या०अ००।३] अथ ब्रूयाद्॒ यद्य् अपि विकल्पाः सामान्यं गोचरयन्ति तत्त्वतस्, तथापि प्रत्यक्ष-विकल्पयोर् यौगपद्येन प्रवृत्तेर् विमूढः प्रतिपत्ता विकल्पस्य स्वलक्षण-निष्ठतां व्यवस्यति, तथा चोक्तम्॒
"मनसोर् युगपद्-वृत्तेः सविकल्पाविकल्पयोः ।
विमूढो लघु-वृत्तेर् वा तयोर् ऐक्यं व्यवस्यति" ॥ न्यायावतार ०२ ॥
तत् किम् इदं शपथैः प्रत्येयं, यद् उत मोहाद् विकल्पेन स्वलक्षणम् अध्यवस्यति, न पुनर् विशद-निर्भासेन साक्षात्-करोति? एवं चाध्यक्षम् अपि सकलार्थ-व्यक्तीर् गोचरयति, विकल्प-मोहात् तु सन्निहित-विषयं लक्ष्यत इति परोऽनुषञ्जयन् दुर्निवारः स्यात्। उत तद्-ग्रहणम् अध्यवसायः, तदा स्वलक्षण-निष्ठता विकल्पस्य स्व-वाचा भवद्भिः प्रतिपन्ना स्यात्। एवं च विकल्प-युगलकेऽप्य् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-पर्यवसित-सत्ताकता विकल्पस्याढौकते। यदा च विकल्पः स्वलक्षण-सौध-मध्यम् अध्यास्त इत्य् अभिदध्यास्, तथा सति ध्वनेर् अपि तद्-अन्तः-प्रवेशो दुर्निवारः स्यात्, तत्-सह-चरत्वात्। यद् आह भवद्-आचार्यः॒ "स एव शब्दानां विषयो यो विकल्पानाम्" इति। न च विकल्पं व्यतिरिच्य सादृश्य-व्यवस्थापकम् अन्यद् अस्ति, प्रत्यक्षस्य सकल-जगद्-विलक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणत्वात्। तद् यदि तत्-सदृशतयोत्पत्तिस् तद्-आकारता, तदा प्रतिपादित-न्यायाद् विकल्पस्य सन्निहितार्थ-गोचरतोररी-कर्तव्या, तथा च ध्वनिर् अपि तद्-विषयः सिध्यत्îति सिद्धं नः समीहितम्। अन्यथा तद्-आकारता न समस्ति, गत्य्-अन्तराभावात्। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते ग्राह्य-ग्राहक-भाव-हेतू संस्तः।
[न्या०अ००।४] संस्तां वा, तथापि विकल्पतः पर्यनुयोज्यो भवान्॒ किम् एते ग्रहण-कारणं पार्थक्येन उत सामस्त्येन? तद् यद्य् आद्यः पक्षः, कपाल-क्षणो घटान्त्य-क्षणस्य ग्राहकः प्राप्नोति, तज्-जन्यत्वात्, जल-चन्द्रो वा नभश्-चन्द्रस्य ग्राहकः स्यात्, तद्-आकारत्वात्। अथ द्वितीयस्, तथा सति घटोत्तर-क्षणः पूर्व-क्षणस्य ग्राहकः प्रसजति, तद्-उत्पत्तेस् तद्-आकारत्वाच् च। जडत्वाद् अर्थस्य न ग्राहकत्वम्, अपि तु ज्ञानस्य तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोः सत्योर् इति चेद्, इदम् इदानीं विदितम् अस्माभिर्, एतद् अपि समानार्थ-ग्राहि-प्राचीन-संवेदन-क्षण-लक्षण-मनस्कारोत्पाद्य-ज्ञाने ग्राहक-लक्षणं व्यभिचरत्य्, उत्पादक-प्राक्तन-क्षण-वर्ति-मनस्काराग्राहकत्वात्। तद्-अध्यवसाय-साहित्येन तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोर् ग्रहण-कारणत्वं सम्पूर्णं, मनस्कारे तन् नास्त्îति चेत्, किम् इदं भिन्न-गोचरेण सह साहित्यम्? तथा ह्य्॒ "अध्यवसायो वासना-प्रबोध-वशाद् उत्पन्नः सामान्यम् अनर्थ-रूपं विकल्पयति, प्रत्यक्षं बहिर्-अर्थाल् लब्धात्म-लाभं तद्-आकारं तम् एव साक्षात्-करोत्îति" भवतां दर्शनम्। तन् न विकल्प-साहित्यं प्रत्यक्षस्य कञ्चन विशेषं पुष्णाति। तद् इदम् ग्राह्य-ग्राहक-भाव-कारणं प्रत्यक्षेऽपि यद् भवद्भिर् अभ्यधायि, तद् यथा यथा विचार्यते तथा तथा विशीर्यत इत्य् अनपेक्षणीयम्। तद् -- यथा कथञ्चित् प्रत्यक्षस्य प्रतिपादित-ग्राह्य-ग्राहक-भाव-लक्षण-वैकल्येऽपि ग्राहकत्वम् अर्थस्य ग्राह्यत्वं, तथा दृष्टत्वात्, अन्यथा निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् भवद्भिर् अपि प्रत्यपादि, तथा शब्दस्य वाचकत्वम् अर्थस्य वाच्यत्वं प्रतिपद्यध्वं यूयम्॑ अत्रापि दृष्ट-हानेर् व्यवहारोच्छेदस्य समानत्वात्। अथेत्थम् आचक्षीथाः॒ यथा "नद्यास् तीरे गुड-शकटं पर्यस्तं, धावत धावतडिम्भका" इत्य्-आदि-विप्रतारक-पुरुष-वचन-श्रवणात् प्रवर्तमाना विप्रलम्भ-भाजो जायन्ते,ऽतः सकल-वचनेष्व् अनाश्वास इति -- एवं तर्हि चिकिचिकायमान-मरु-मरीचिका-चक्र-चुम्बि यज् जलोल्लेखि विशद-दर्शनम् उदय-पदवीं समासादयति तद् अलीकम् अवलोकितम् इति॑ सकलाध्यक्षेष्व् अनाश्वास इत्य् अभिदध्महे। पाश्चात्य-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-बाधितत्वाद् मरु-मरीचिकासु जल-ज्ञानम् अप्रमाणं, न शेष-सत्य-स्तम्भादि-ज्ञानानि, बाधा-रहितत्वाद् इति चेत्, तर्हि ध्वनाव् अप्य् अयं न्यायः किं काकैर् भक्षितः? न हि वयं सर्व-शब्दानां प्रामाण्यं प्रतिपद्येमहि॑ किं तर्हि सुनिश्चिताप्त-प्रणेतृकाणाम् एव। तन् न प्रामाण्यं प्रति प्रत्यक्ष-शब्दयोर् विशेषम् उपलभामहे। एष तु विशेषः स्यात्, प्रत्यक्षं चक्षुर्-आदि-सामग्री-विशेष-जन्यत्वात् सन्निहित-नियतार्थ-ग्राहि स्पष्ट-प्रतिभासं, शाब्दं तु तथा-विध-कारण-विकलत्वान् नियतानियतार्थ-ग्राह्य् अस्पष्ट-प्रतिभासम्। न चैष विशेषः प्रामाण्य-क्षति-कारी, इतरथानुमानस्याप्य् अप्रामाण्यम् आसज्येत, तस्याप्य् अविशदानियतार्थ-ग्राहित्वात्। परमार्थतस् तु त्रि-काल-व्यापिनः सर्वार्थ-ग्रहण-स्वभावत्वेऽप्य् आवरण-तिरस्-कृतस्य जीव-द्रव्यस्य चक्षुर्-आदि-सामग्री-सापेक्षावरण-क्षयोपशम-वशात् सन्निहित-स्पष्टार्थ-ग्रहण-परिणामः प्रत्यक्षम् इत्य् उच्यते। शब्द-सापेक्ष-क्षयोपशमान् नियतानियताविशदार्थ-ग्रहण-परिणामस् तु शाब्दम् इति। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते प्रत्यक्षे शाब्देऽन्यस्मिन् वा ज्ञाने वास्तव्यौ स्तः। तस्मात् पारमार्थिकाभिधेय-प्रयोजन-सम्बन्ध-प्रतिपादकम् एतद् आदि-वाक्यम् इति स्थितम्।
[न्या०अ००।५] तत्राभिधेयं वाच्यं, तच् चेह प्रमाणम्, तस्यैव प्रकरणेन प्रतिपाद्यत्वात्॑ तत् प्रमाणेत्य् अवयवेन लक्षयति। प्रयोजनं द्वेधा॒ श्रोतुः कर्तुश् च। पुनर् अपि द्विविधम्॒ अनन्तरं व्यवहितं च। तत्र श्रोतुर् अनन्तर-प्रयोजनं प्रमाण-विषया व्युत्पत्तिः, कर्तुर् व्युत्पद्यमानस्य प्राज्ञत्वाच् छिष्यस्य व्युत्पादनम्। तत्रात्म-प्रयोजनं दर्शयन्न् आ[हा]रभ्यत इति अस्य मयेति-पद-सव्यपेक्षत्वात्। शिष्य-प्रयोजनं तु व्युत्-पद्-इत्य् अनेनोपसर्ग-धातु-समुदायेनैव तद्-अन्तर्-अगतं लप्स्यत इत्य् अभिप्रायवान् कर्तात्म-व्यापारं णिज्-अन्तेन निर्दिशति॒ प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इति। व्यवहित-प्रयोजनं द्वेधा॒ व्यावहारिकं पारमार्थिकं च। व्यावहारिकं हेयोपादेयोपेक्षणीयेष्व् अर्थेषु हानोपादानोपेक्षा-लक्षणम्। पारमार्थिकं अभ्युदय-निःश्रेयसावाप्तिर् इति। एतत् तु साक्षाद् अनुक्तम् अप्य् अनन्तर-प्रयोजन-फलत्वात् तद्-वचनेनैवाक्षिप्तम् अवगन्तव्यम्। सम्बन्धस् त्ûपायोपेय-लक्षणः॑ तत्रोपेयं प्रकरणार्थ-परिज्ञानम्, प्रकरणम् उपायस्, ततस् तद्-अभिलषता प्रकरणम् इदम् आरम्भणीयम् इत्य् अनुक्तोऽपि वचनेन सम्बन्धोऽर्थाद् गम्यत इति तात्पर्यार्थः।
[न्या०अ००।६] अधुनाक्षरार्थो विव्रियते॒ तत्र यद्य् अपि प्रमाण-शब्दस्य सर्व-कारकैर् भावेन च व्युत्पत्तेः सुकरत्वात् "कृत्य-ल्युटो बहुलम्" अन्यत्राप्îति-वचनाद् यथा-क्रमम् अमी कर्त्र्-अर्थादि-कारक-भाव-व्युत्पत्त्या प्रमाण-शब्द-वाच्याः, तद् यथा आत्मार्थ-ज्ञानार्थ-क्रिया-कारण-कलाप-क्षयोपशम-क्रिया-रूपाः तथाप्îह ज्ञानम् एवाधिक्रियते, तस्यैव परीक्षा-क्षमत्वाद्॑ इतरेषां परीक्षायास् तत्-पुरःसरत्वाद् वैयर्थाच् च। तथा हि॒ नार्थस् तावद् आत्मनः परीक्षया, तस्य भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञानेषु समानत्वात्। नाप्य् अर्थस्य, तस्योपेयत्वाद्, उपाय-भूत-ज्ञान-परीक्षणेनैव गतत्वात्। नार्थ-क्रियायास्, तद्-अवगतौ परीक्षा-वैयर्थ्यात्। नापि कारण-कलापस्य, ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् स्वरूपानवगतेः, पश्चात् तत्-स्वरूप-निर्णयाद् एव तत्-साद्गुण्य-वैगुण्यावगतेर् नैरर्थक्यात्। नापि क्षयोपशमस्य, तस्य ज्ञानोत्पादोन्नीयमान-रूपत्वात्। नापि प्रमिति-मात्रस्य, तस्य प्रमाण-साध्यतया तच्-चारुता-द्वारेणैव समीचीनता-सिद्धेर् इति। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यद्य् अप्य् अनन्त-धर्माध्यासिते वस्तुनि सर्व एव शब्दार्था निरुपचरिता घटन्ते, तथापि येनार्थं परिच्छिद्यार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एवेह ज्ञानम् आत्मना सह धर्मि-रूपतया तादात्म्येऽपि धर्म-रूपतया व्यतिरिक्तं प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तस्य व्युत्पादनं पर-परिकल्पित-लक्षणादि-व्युदासेन स्वाभिप्रेत-लक्षणादि-स्वरूप-प्रकाशनम्। तद्-अर्थम्॒ अर्थ-शब्दः प्रयोजन-पर्यायः। इदम् इत्य् अर्थ-रूपतया स्व-चेतसि विवर्तमानं प्रकरण-शरीरं परामृशति॑ द्विविधं हि प्रकरण-शरीरं॒ शब्दोऽर्थश् चेति, बहिः शब्द-रूपतया प्रकाशयिष्यमाणत्वेऽप्य् अन्तस् तत्त्वार्थाकारेण प्रत्यक्षत्वात्। आरभ्यत इति पद-वाक्य-श्लोकादि-रचनया प्रक्रियत इति यावत्।
[न्या०अ००।७] इह च लक्षण-संख्या-गोचर-फलेषु प्रमाणं प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे। तथा हि॒ लक्षणे तावत् प्रमाणम् अविसंवादि ज्ञानम् इति सौगताः। अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम् इति मीमांसकाः। अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम् इति नैयायिकादयः। तथा संख्यायां॒ प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति सौगताः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानार्थापत्त्य्-अभावाः प्रमाणान्îति मीमांसकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानानि प्रमाणान्îति नैयायिकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दानि प्रमाणान्îति वैशेषिकाः। एतान्य् एव सांख्याः। प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इति चार्वाकाः। तथा गोचरे॒ परस्पर-विनिर्लुठित-क्षण-क्षयि-परमानु-लक्षणानि स्वलक्षणानि प्रमाण-गोचरस् तात्त्विक इति बौद्धाः। सामान्य-विशेषात्मकं वस्त्व् इति मीमांसकाः। परस्पर-विभक्तौ सामान्य-विशेषाव् इति नैयायिक-वैशेषिकाः। त्रैगुण्य-रूपं सामान्यम् इति सांख्याः। भूत-चटुष्टयं प्रमाण-भूम्îति चार्वाकाः। तथा फलेऽपि विप्रतिपद्यन्ते॒ अर्थाधिगतिः प्रमाण-फलम् इति सौगताः। पूर्वं पूर्वं प्रमाणम् उत्तरम् उत्तरं तु फलम् इति मीमांसकादयः।
[न्या०अ०१।०] तत्र तावल् लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराचिकीर्षुर् आह॒
प्रमाणं स्व-पराभासि ज्ञानं, बाध-विवर्जितम् ।
प्रत्यक्षं च परोक्षं च द्विधा, मेय-विनिश्चयात् ॥ न्यायावतार १ ॥
[न्या०अ०१।१] तत्रापि पूर्वार्धेन लक्षण-विप्रतिपत्तिम् उत्तरार्धेन तु संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे। लक्षणं च पर-रूपेभ्यो व्यावर्तन-क्षमोऽसाधारण-धर्मः। लक्ष्यते परिच्छिद्यते विजातीयेभ्यो व्यावृत्तं लक्ष्यं येन तल् लक्षणम् इत्य् उच्यते। तच् चेह द्वये प्रत्याय्याः, स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणास् तीर्थान्तरीया विप्रतिपन्नास्, तथा मुग्ध-बुद्धयो लौकिका अव्युत्पन्नाश् चेति। ततश् च यदादौ विप्रतिपन्नान् प्रति लक्षणं तदैवं लक्ष्य-लक्षण-भावो द्रष्टव्यो॒ यद् इदं भवताम् अस्माकं च प्रमाणम् इति प्रसिद्धम्, तत् स्व-पराभासि ज्ञानं बाध-विवर्जितं मन्तव्यम्॑ प्रसिद्धं प्रमाणम् अनूद्याप्रसिद्धं स्व-पराभासित्वादि विधीयते। यदा त्व् अव्युत्पन्न-मतीन् प्रत्îदं लक्षणम्, तदा प्रतिप्राणि स्व-पर-प्रकाशिनो ज्ञानस्य बाध-रहितस्य कस्यचित् सिद्धत्वाद्, अन्यथा प्रतिनियत-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद्, एवं ते बोध्यन्ते॒ यद् अदो भवतां क्वचिन् नियतार्थ-ग्राहि स्व-पर-प्रकाशकं बाध-रहितं ज्ञानं प्रसिद्धं तत् प्रमाणम् इति बुध्यन्ताम्। अत्रापि सिद्धस्यानुवादोऽसिद्धस्य विधानं योज्यम्।
[न्या०अ०१।२] अधुनाक्षरार्थस्॒ तत्र प्रमाणम् इति पूर्ववत्। स्व आत्मा स्वरूपं, परोऽर्थस्, ताव् आभासयितुं प्रकाशयितुं शीलम् यस्य तत्-तथा। ज्ञायते निर्णीयते तत्त्वं येन तज् ज्ञानम्। बाध्यतेऽनेनेति बाधः॑ विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-प्रवृत्तिर् इति यावत्। तेन विशेषेण वर्जितं रहितं यज् ज्ञानं तत् प्रमाणम् इति सण्टङ्कः।
[न्या०अ०१।३] इह च व्यवच्छेद्यापेक्षया लक्षणे विशेषण-प्रवृत्तेः स्व-पराभास्îत्य् अनेन ये स्वाभास्य् एव ज्ञानं मन्यन्ते ज्ञान-वादिनो बौद्ध-विशेषाः, ये च पराभास्य् एव मीमांसक-नैयायिकादयस् ते निरस्ताः। ते हि बहिर्-अर्थाभावाज् ज्ञानं स्व्âंश-पर्यवसित-सत्ताकम् इत्य् आचक्षीरन्, तद् अयुक्तम्, ज्ञेयार्थाभावे ज्ञानाभाव-प्रसङ्गात्। अथार्थाभावेऽपि स्वप्न-दशायां वन-देव-कुलादि-नाना-प्रतिभासं ज्ञानम् अवलोकितम् इति तथा-भूतं सकलं ब्रूषे, तन् न, तस्यापि जाग्रद्-अवस्था-भावि-सद्भूतार्थ-दर्शन-सम्पादितात्म-संस्कार-मिद्धादि-कारण-कलाप-सन्निधान-प्रबोध-सव्यपेक्षत्वाद्॑ इतरथात्यन्ताननुभूत-भूत-पञ्चकातिरिक्त-षष्ठ-भूत-प्रतिभासः स्यात्। किं च, कथम् एकं ज्ञानं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-विवर्तम् इति प्रष्टव्यो भवान्। अनाद्य्-अविद्या-वासनाद् इति चेद्, अत्रापि विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ ततो ज्ञानात् सा वासना व्यभैत्सीद् वा न वा? व्यत्यरैक्षीच् चेद्, एवं सति तद्-ग्राहक-प्रमाणम् अभिधानीयम्, ज्ञान-व्यतिरिक्तायाः संवेदनाभावात्, तत्-संवेदने चार्थस्यापि व्यतिरिक्तस्य संवेदनम् इति स दुष्प्रतिषेधः स्यात्। वेद्य-वेदकाकार-कलुषिताज् ज्ञानाद् एव व्यतिरिक्ता तत्-कारण-भूता ज्ञान-रूपैव सानुमीयत इति चेन्, न, तया सह सम्बन्ध-ग्रहणाभावाद्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाच् च। किं च, यथा व्यतिरिक्त-वासना-वशाद् एकम् अपि ज्ञानं नानाकारम्, तथा जडम् अपि तद्-वशाद् एव बोध-रूपं प्रकाशत इति विपरीतापत्तेर् अर्थ एव सिद्धिम् आस्कन्देन्, न ज्ञानम्। अथाव्यतिरिक्ता, हन्त ज्ञानम् एव तन्, न वासना तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवद् इत्य् आस्तां तावत्। पराभास्य् अपि स्व-प्रकाशाभावाद् अभिदधीरंस्, तद् अप्य् असम्बद्धम्, स्व-प्रकाशाभावे पर-प्रकाशायोगात्। न हि प्रदीपः स्वरूपम् अनुद्द्योतयन् घटाद्य्-उद्द्योतने व्याप्रियते। स्वयं चाप्रतीतम् अपि यद्य् अर्थं ग्राहयति ज्ञानं, देवदत्तस्योत्पन्नं यज्ञदत्तं ग्राहयेद्, विशेषाभावात्। अन्यच् च, पर-प्रकाशन-मात्रे दूरासन्नादि-भेदः प्रथमानानाम् अर्थानां किम्-अपेक्षश् चकास्ति? शरीरापेक्ष इति चेन्, न, तस्यापि प्रकाश्यताविशेषात्, तस्माद् अन्तर्-मुखाकारस्य बहिर्-अर्थ-ग्रहणे सत्य् अयं घटाम् आटीकते नान्यथा। अथार्थापत्त्य्-आदिना प्रमाणान्तरेण तद् अन्तर्-निविष्टं गृह्यते, ततस् तद्-अपेक्षया योक्ष्यते दूरासन्नादि-भेद इति चेन्, न, तत्रापि विकल्प-युगलकानतिवृत्तेः॑ तथा हि॒ तत् प्रमाणान्तरं स्व-प्रकाशम् अन्य-प्रकाशं वा? स्व-प्रकाशं चेत्, प्रथमस्य किं क्षूणम्?! अन्य-प्रकाशं चेत्, तत्राप्îयम् एव वार्तेत्य् अनवस्था। तस्मात् स्वरूपम् अवभासयद् एव ज्ञानम् अर्थ-ग्रहणाय व्याप्रियत इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।४] ज्ञानम् इत्य् अनेन तु यन् नैयायिकादिभिः पर्यकल्पि सन्निकर्षः प्रमाणम् इति तस्य प्रामाण्यं निरस्यति। यतः स्नान-पानावगाहनाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमम् अर्थं निश्चित्याव्यवधानेन प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एव ज्ञानं प्रमाणम्, न सन्निकर्षो जडतयास्ति, अव्यवहित-निर्णयाभावाद् इत्य् आकूतम्। अर्थोपलब्धि-हेतुत्वात् तस्य प्रामाण्यम् इति चेद्, विशीर्णेदानीं प्रमाणेयत्ता, देहादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्यापत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०१।५] बाध-विवर्जितम् इत्य् अमुना तु यत् तिमिरादि-तिरस्-कृत-नयन-दीधिति-प्रसरादीनां नभस्-तलावलम्बि-निशीथिनी-नाथ-द्वयादि-प्रतिभासं, यच् च कुतर्क-भ्रान्त-चेतसां निज-निज-दर्शनाकर्णन-प्रभवं क्षण-क्षयि-सामान्य-विशेषैकान्तेश्वरादिकृत-भुवन-प्रतिभासं ज्ञानं तत्-प्रत्यनीकार्थ-प्रत्यायक-प्रमाणान्तरोपनिपात-प्लावितत्वात् प्रतिक्षिपति। विशेषार्थ-वि-शब्दोपादानात् तु यः खलु बहुल-कामलावलेप-लुप्त-लोचन-बलानां धवले जलजे पीतिमानम् आदधानो बोधः समुल्लसति, स यद्य् अपि सकल-कालं तद्-दोषाव्युपरमे प्रमातुर् निज-दर्शनेन न बाध्यते, तथापि तज्-जलज-धवलता-ग्राहिना जनान्तर-दर्शनेन बाधितत्वान् न प्रमाणम् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०अ०१।६] समस्त-लक्षणेन तु यत् परे प्रत्यपीपदन्न् "अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम्", "अविसंवादकं प्रमाणम्", "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य्-आदि तन् निरास्थत्। तथा ह्य्॒ अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वं किम् अभिधीयते? ज्ञानान्तरेणानधिगतम् अर्थं यद् अधिगच्छति तत् प्रमाणम् इति चेत्, तर्हि तज् ज्ञानान्तरं परकीयं स्वकीयं वा? तद् यदि परकीयं, तद् अयुक्तं, सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सकलार्थ-गोचरतया सर्व-प्राकृत-लोक-ज्ञानानाम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्, तद्-अर्थ-ग्राहि-जनान्तर-दर्शन-सम्भवाच् च। अथ स्वकीयं, तत्रापि सोऽधिगम्योऽर्थः किं द्रव्यम् उत पर्यायो यद् वा, द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः पर्याय-विशिष्टं वा द्रव्यम् इति, तथा किं सामान्यम् उत विशेष, आहोस्वित् सामान्य-विशिष्टो विशेषः, विशेष-विशिष्टं वा सामान्यम् इत्य् अष्टौ पक्षाः। तत्र यद्य् आद्यम् उररी-कुरुषे, तद् अयुक्तं, द्रव्यस्य नित्यत्वैकत्वाभ्याम् अनधिगत्âंशाभावात्। अथ द्वितीयं, तद् अप्य् अचारु, पर्यायस्य प्राचीन-संवेदनोदय-समय-ध्वस्तस्य संवेदनान्तर-प्रभव-कालं यावत् प्रतीक्षणासम्भवेन विशेषणानर्थक्यात्। उत तृतीयं, तद् अप्य् असाधीयो, विकल्प-द्वयानतिक्रमात्। स हि द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः सम-काल-भाविना ज्ञानेनानधिगतोऽधिगम्यते, यद् वा कालान्तर-भाविनेति। न तावत् सम-काल-भाविना, तत्-सम्भवाभावेन विशेषण-वैफल्यात्। न हि सम्भवोऽस्त्य् एकस्य प्रमातुर् एक-कालं द्रव्य-क्रोडी-कृतैक-पर्याय-विषय-संवेदन-द्वय-वृत्तेः, तथानुभवाभवात्, परस्परम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गाच् च। नापि कालान्तर-भाविना, गृह्यमाण-पर्यायस्य कालान्तरानास्कन्दनात्, पूर्वोत्तर-क्षण-त्रुटित-वर्तमान-क्षण-मात्र-सम्बद्धत्वात् तस्य। एतेन पर्याय-विशिष्ट-द्रव्य-पक्षोऽपि प्रतिव्यूढः, समान-योग-क्षेमत्वात्। अथ सामान्यं, तद् अप्य् असम्बद्धं, तद्-एकतया प्रथम-ज्ञानेन साकल्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां सामान्य-ज्ञानानाम् अधिगतार्थ-गोचरतयाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अथ विशेषः, स नित्योऽनित्यो वेति वक्तव्यम्। नित्यश् चेद्, एवं सत्य् आद्य-संवेदनेनैव तस्य सामस्त्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां तद्-विषयाणाम् अधिगत-गोचरत्वेनाप्रामाण्य-प्रसक्तिः। अनित्यश् चेत्, पर्याय-दूषणेन प्रतिक्षिप्तिः। अथ सामान्य-विशिष्टो विशेषः, कास्य विशिष्टता॒ किं तादात्म्यम् उत तत्-सन्निधि-मात्रम्? तादात्म्यं चेत्, प्रथम-ज्ञानेन सामान्यवत् तस्यापि ग्रहःात्, अन्यथा तादात्म्य-क्षतेस्, तद्-विषयान्य-ज्ञानानाम् अप्रामाण्यं प्रसज्येत। तत्-सान्निध्य-पक्षे तु द्वयोर् अपि परस्परं विशकलित-रूपत्वात् पक्ष-द्वयोदितं दूषणं पश्चाल्-लग्नं धावति। विशेष-विशिष्ट-सामान्य-पक्षे पुनर् एतद् एव विपरीतं योज्यम्। तन् नानधिगतार्थाधिगन्तृत्वं ज्ञानस्य कथञ्चिद् विचार-भार-गौरवं सहत इत्य् अलक्षणम् इति स्थितम्। अविसंवादकत्वम् अधुना विचार्यते॒ तत् किं प्रदर्शितार्थ-प्राप्त्याहोस्विद् प्राप्ति-योग्यार्थोपदर्शकत्वेन उताविचलितार्थ-विषयत्वेन भवान् ज्ञानस्य प्रामाण्यं कथयति? यदि प्रथमः कल्पस्, तद् अयुक्तं, जल-बुद्बुद्-आदि-मुमूर्षु-पदार्थोत्पादित-संवेदनस्याप्रमाणतोत्पत्तेः, प्राप्ति-काले तस्य ध्वस्तत्वात्। अथ द्वितीयस्, तद् अप्य् अचारु, प्राप्त्य्-अयोग्य-देश-स्थित-ग्रह-नक्षत्रादि-गोचर-ज्ञानस्याप्रामाण्य-प्रसक्तेर्, अनुचित-देशावस्थानेनैव प्राप्त्य्-अनर्हत्वात् तेषाम्। अथ तृतीयः पक्षस्, तत्राप्य् अविचलित-विषयतां कथम् अवैषि? ज्ञानान्तरेण तद्-विषय-निराकरणाभावाद् इति चेद्, एतद् एवास्माभिर् उदितं॑ किं भवतः परुषम् आभाति? न हि स्व-पर-प्रकाशि ज्ञानं बाधा-रहितं विमुच्यान्यस्य विषयानिराकरणं ज्ञानान्तरेण प्रेक्षामहे। तत् तद् एव न्यायात् प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगतम् इति। "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य् एतद् अपि न परीक्षां क्षमते, शरीरादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अव्यवहितम् अर्थोपलम्भ-कारणं प्रमाणं, न देहादिकम् इति चेद्, एवं तर्हि ज्ञानम् एव स्व-पराविर्-भावकं निर्बाधकं च प्रमाणं, न सन्निकर्षादि, तद्-सद्भावेऽप्य् अर्थ-परिच्छेदाभावात्। तस्माद् एतद् एव चारु प्रमाण-लक्षणम् इति।
[न्या०अ०१।७] अधुना तत्-संख्याम् आह॒ प्रत्यक्षं चेत्य्-आदि॑ तत्र सिद्धान्त-प्रसिद्ध-पारमार्थिक-प्रत्यक्षापेक्षयाक्ष-शब्दो जीव-पर्यायतया प्रसिद्धः। इह तु व्यावहारिक-प्रत्यक्ष-प्रस्तावाद् अक्ष-ध्वनिर् इन्द्रिय-वचनो गृह्यते। ततश् चाक्षं प्रतिगतं प्रत्यक्षं। यद् इन्द्रियम् आश्रित्योज्जिहीतेऽर्थ-साक्षात्-कारि ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् इत्य् अर्थः। एतच् च प्रत्यक्ष-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्तं, न तु प्रवृत्ति-निमित्तम्। स ह्य् एवं व्युत्पादितः साक्षाद् ग्राह्य-ग्राहकं ज्ञान-विशेषं लक्षयति, तत्रैव रूढत्वात्, यथा गमन-क्रियायां व्युत्पादितोऽपि गो-शब्दः ककुद्-आदिमन्तं पिण्ड-विशेषं गच्छन्तम् अगच्छन्तं वा गोचरयति, तत्रैव तस्य प्रसिद्धत्वात्, न गमन-क्रिया-युक्तम् अपि पुरुषादिकं, विपर्ययाद् इति। ततश् च सर्व-ज्ञानानां यत् स्वरूप-संवेदनं तद् अपि प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तं भवति, तत्रापि स्वरूपस्य ग्राह्यस्य साक्षात्-करण-सद्भावाद् इति। अक्षेभ्यः परतो वर्तत इति परोक्षम्। अक्ष-व्यापार-निरपेक्षं मनो-व्यापारेणासाक्षाद्-अर्थ-परिच्छेदकं यज् ज्ञानं तत् परोक्षम् इति-भावः।
[न्या०अ०१।८] च-शब्दौ प्रत्यक्ष-परोक्षयोस् तुल्य-कक्षतां लक्षयतः। तेन यत् परे प्राहुः॒ "प्रत्यक्षं सकल-प्रमाण-ज्येष्ठम्" इत्यादि तद् अपास्तम् भवति, द्वयोर् अपि प्रामाण्यं प्रत्य् अविशेषात्, विशदाविशद-प्रतिभास-विशेषस्य सतोऽपि ज्येष्ठतां प्रत्य् अनङ्गत्वात्। प्रत्यक्षस्य पुरःसरत्वात् परोक्षस्य कनिष्ठतेति चेन्, नायम् एकान्तः, सर्वत्रान्यथानुपपन्नतावधारितोच्छ्वास-निःश्वासादि-जीव-लिङ्ग-सद्भावासद्भावाभ्यां जीव-साक्षात्-कारि-प्रत्यक्ष-क्षूणेऽपि जीवन्-मृत-प्रतीति-दर्शनाद्, अन्यथा लोक-व्यवहाराभाव-प्रसङ्गात्। क्वचित् प्रत्यक्ष-परिगृहीत-सम्बन्ध-बलात् परोक्षं प्रवर्तत इति प्रत्यक्षस्य ज्येष्ठत्व-कल्पने "पश्य मृगो धावत्îत्य्"-आदि-शब्द-बलात् कृकाटिका-मोटन-द्वारेण मृग-विषयम्, तथा स्मरणात् सङ्केत-ग्रहणाद् वापूर्वापूर्वार्थ-दर्शन-कुतूहलादिना वन-देव-कुलादि-गोचरं परोक्ष-पूर्वं प्रत्यक्षं दृष्टम् इति परोक्षस्य ज्येष्ठतासज्येत।
[न्या०अ०१।९] द्विधेति। "सर्वं वाक्यं सावधारणं प्रवर्तत" इति न्यायाद्, अन्यथा नियतार्थाप्रदर्शकत्वेन तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गाद्, विपरीताकार-निराकरण-चातुर्यायोगेन निराकाङ्क्ष-प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् द्विधैवेत्य् अवधारणेन पर-परिकल्पित-विपरीत-संख्यान्तरं तिरस्-कुरुते, तस्य युक्ति-बाधितत्वात्।
[न्या०अ०१।१०] तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इत्य् असत्, परोक्षाभावे तस्यैव प्रामाण्यायोगात्। स हि काश्चित् प्रत्यक्ष-व्यक्तीर् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रापकत्वेनाव्यभिचारिणीर् उपलभ्यान्यास् तद्-विपरीततया व्यभिचारिणीश् च, ततः कालान्तरे पुनर् अपि तादृशेतराणां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रमाणतेतरते समाचक्षीत। न च पूर्वापर-परामर्श-शून्यं पुरो-वर्त्य्-अर्थ-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकं प्रत्यक्षं पूर्वापर-काल-भाविनीनां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां सादृश्यं प्रामाण्य-निबन्धनम् उपलक्षयितुं क्षमते। न चायं स्व-प्रतीति-गोचराणाम् अपि प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्यं परं प्रतिपादयितुम् ईशः। तस्माद् अवश्यन्तया यथादृष्ट-प्रत्यक्ष-व्यक्ति-साधर्म्य-द्वारेणाधुनातन-प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्य-प्रत्यायकं पर-परिपादकं च परोक्षान्तर्-गतम् अनुमान-रूपं प्रमाणान्तरम् उररी-कर्तव्यम्। परावबोधार्थं च प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणं नान्यद् अस्त्îत्य् उल्लपन्न् उन्मत्तताम् आत्मनो लक्षयति, प्रत्यक्षेण पर-चेतो-वृत्ति-साक्षात्-करणाभावाद् व्यापार-व्याहार-चेष्टा-विशेष-दर्शनाद् बोध-विशेषावगतौ परोक्षस्य प्रामाण्यं बलाद् आपतत्îति न्यायात्। स्वर्गादृष्ट-देवतादि-प्रतिषेधं न प्रत्यक्षेण कर्तुम् अर्हति, तस्य सन्निहित-मात्र-विषयत्वात्। न चायं तद्-प्रतिषेधेन खर-खरक-चार्वाकताम् आप्नोति, प्रमाणान्तरं च तत्-प्रतिषेधार्थं नेच्छत्îति विषमम् एतत् कथं कुर्याद् इति सविस्मयं नश् चेतः। किं च, प्रत्यक्षम् अपि कथं प्रमाणतां स्वी-करोत्îति वक्तव्यम्, गृह्यमाण-पदार्थान्वय-व्यतिरेकानुकरणात्। तथा हि॒ तत् समग्र-सामग्रीक-पदार्थ-बलेनोन्मज्जति, तत्-अभावे विस्फारितेक्षण-युगलस्यापि प्रमातुर् नोदीयत इति यदि ब्रूषे, परोक्षेऽपि तर्हि समानम् एवैतत्, तद् अपि बहिर्-अर्थ-सामर्थ्याद् एवोल्लसति, तत्-सम्बद्ध-लिङ्ग-शब्द-द्वारेण तस्योत्पत्तेर्, अन्यथा परोक्षाभासता-प्रसङ्गात्, तस्य चालीकत्वे पारमार्थिक-परोक्ष-प्रामाण्य-क्षतेर् अयोगाद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् अपि गगन-तलावलम्बि-शश-धर-युगलावलोकन-चतुरम् अलीकम् अवलोकितम् इति सकल-विशद-दर्शनानि सत्यताभिमतान्य् अप्य् अलीकताम् अश्नुवीरन्। तन् न प्रमाण-भूतं परोक्षं कदाचन गृह्यमाण-पदार्थ-सत्तां विहायोत्पत्तुम् उत्सहत इति प्रत्यक्षवत् प्रमाण-कोटिम् आरोहति बलाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।११] तथा यद् अपि परैर् उक्त-द्वयातिरिक्तं प्रमाण-संख्यान्तरं प्रत्यज्ञायि, तत्रापि यत् पर्यालोच्यमानम् उपमानार्थापत्तिवत् प्रमाणताम् आत्मसात्-करोति, तद् अनयोर् एव प्रत्यक्ष-परोक्षयोर् अन्तर्-भावनीयम्। यत् पुनर् विचार्यमाणं मीमांसक-परिकल्पिताभाववत् प्रामाण्यम् एव नास्कन्दति, न तेन बहिर्-भूतेनान्तर्-भूतेन वा किञ्चिन् नः प्रयोजनम् अवस्तुत्वाद् इत्य् अपकर्णनीयम्।
[न्या०अ०१।१२] अथ कथम् उपमानस्य प्रामाण्यम् इति ब्रूषे, तद् उच्यते॒ प्रथमं हि विशद-दर्शनाधिगत-गो-पिण्ड-विशेषस्य "यथा गौस् तथा गवय" इति वाक्याकर्णनाहितात्म-संस्कारस्य पुंसोऽटव्यां पर्यटतो गवय-पिण्ड-विशेष-विषय-विविक्त-दर्शन-पुरःसरं यत् पूर्वापर-गो-गवय-पिण्ड-गोचर-दर्शन-व्यापार-सम्पादित-जन्मकम् अयं तेन सदृशोऽनयोर् वा सादृश्यम् इति सादृश्य-विशिष्टं पिण्डं पिण्ड-विशिष्टं सादृश्यं वा गोचरयत् संवेदनम् उदीयते तद् उपमानम् इति। यथाहुस् तद्-वादिनः॒
"तस्माद् यद् दृश्यते तत् स्यात् सादृश्येन विशेषितं ।
प्रमेयम् उपमानस्य सादृश्यं वा तद्-अन्वितम्" ॥ नव्१।१२॒१ ॥
इति।
[न्या०अ०१।१३] ततश् च पूर्वापर-दर्शनयोः पुरो-वर्ति-गो-गवय-पिण्ड-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात् पूर्वापर-परामर्श-शून्यत्वाद् विशद-निर्भासितया शब्दोल्लेख-रहितत्वात् तद्-अधिकम् अव्यभिचरितं व्यवहार-कारि सादृश्यम् अवस्यद् उपमानं स्व-पर-प्रकाशितया निर्बाधकत्वाच् च प्रमाणम्। पूर्वापर-पिण्डातिरिक्तम् अपरं सादृश्यं नोपलभ्यत इति चेत्, कोऽयम् उपलम्भो येन नोपलभ्यते सादृश्यं यदि प्रत्यक्षं तत्? यदि प्रत्यक्षे सादृश्यम् उपमान-गोचरत्वान् न प्रतिभाति, कोऽस्यापराधः? न हि ज्ञानान्तरे तद्-गोचरो न प्रतिभात्îति निर्गोचरं तद् इति वक्तुं शक्यम्, इतरथोपमानेऽपि प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्या व्यक्तिर् न भात्îति निर्गोचरम् अध्यक्षम् अनुषज्येत। तद् यथा स्व-विषयेऽध्यक्षं प्रमाणं तथोपमानम् अपि। न हि द्वयोः प्रथमानयोर् एकं प्रति विशेषाभावे पक्ष-पातः कर्तुं युक्तः। एतेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञान-स्मृत्य्-ऊहादीनाम् अविसंवादकानां परोक्ष-विशेषाणां प्रामाण्यं व्याख्यातम् अवगन्तव्यं, समान-न्यायानुपातित्वात्। तथा हि॒ प्रथमम् अर्थ-दर्शनम् आत्मनि संस्कारम् आधत्ते, तादृश-दर्शनाद् असौ संस्कारः प्रबुध्यते, प्रबुद्धः पूर्वार्थ-विषयं स एवायं तज्-जातीयो वेत्य् उल्लेखेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञानम् उत्थापयति, तस्योर्ध्व-तिरश्चीन-भेद-सामान्य-द्वयावस्थापकत्वाद्, असञ्जात-पूर्वार्थ-गोचर-दर्शनस्य तद्-उदयाभावात्। तथा स एव संस्कारस् तादृशार्थ-दर्शनेनाभोगादिना वा प्रबुद्धोऽनुभूत-विषयासम्प्रमोष-लक्षणं स्मरणम् उपजनयत्य्, अदृष्टार्थस्य पुंसः स्मरणानुपपत्तेर् इति। ऊहोऽपि प्रत्यक्षानुमानासंवेद्य-साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणः प्रमाणान्तरम् इति कथयिष्यते।
[न्या०अ०१।१४] अर्थापत्तिस् तु प्रत्यक्षादि-गोचरी-कृत-स्फोटादि-पदार्थान्यथानुपपत्त्या दहन-शक्त्य्-आदिकं पावकादेर् अर्थान्तरं पूर्व-दर्शन-गोचरात् समधिकम् अव्यभिचरितं परिकल्पयन्त्îति प्रमाणतां स्वी-करोत्य् एव, तल्-लक्षण-योगात्। एवम् अन्यद् अपि प्रत्यक्ष-गोचराधिक्य-सम्पादकं निराकाङ्क्षतया व्यवहार-कारि यद् यत् संवेदनं तत् तत् प्रमाणम् इति समर्थनीयं, स्व-पर-प्रकाशि-निर्बाधत्वात्, पूर्वापर-सोपान-पद्धति-दर्शनोत्तर-काल-भावि-तत्-संख्या-संवेदनवत्। सर्वेषां चैतेषां परोक्षेऽन्तर्-भावो,ऽन्यथानुपपन्नार्थान्तर-दर्शन-द्वारेण प्रस्तुतार्थ-संवेदन-चतुरत्वाद् इति। किञ्चिद्-विशेषात् तु प्रमाणान्तर-परिकल्पने प्रमाणेयत्ता विशीर्येतानन्त्य-प्राप्तेर्,आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतया ज्ञान-प्रवृत्तेर् विचित्रत्वाद् इति। ननु चैवं सति यत् परोक्षस्य द्वैविध्यं वक्ष्यमाणम् अनुमान-शाब्द-भेदेन तद् अपि कथम् उपपत्स्यते, तत्रापि ह्य् आप्त-प्रणीत-वचन-प्रभव-ज्ञानस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वेनानुमानान्तर्-भावो न दुरुपपादः? ततश् चानुमानम् एवैकम् अवशिष्यते, तद् एव परोक्ष-शब्देन, यद्य् उच्यते युक्तम् आस्ते, विदुषाम् अभिधानं प्रत्य् अनादरात्॑ सत्यम् एतद्, एवं तु मन्यते॒ यद्य् अपि कयाचित् प्रक्रिययानुमाने शाब्दम् अन्तर्-भावयितुं शक्यं, तथापि तत् प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे॑ऽतस् तस्याहत्य प्रामाण्यं समर्थनीयम्। न चापृथग्-भूतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम् इति, अतः पार्थक्येनोपन्यासः। अनेन चैतद् उपलक्षयत्य् अन्येषाम् अपि परोक्ष-विशेषाणाम् अनुमानान्तर्-भाव-सम्भवेऽपि यं यं प्रति परेषां विप्रतिपत्तिस् तं तं परोक्षान् निष्कृष्य विविक्त-युक्त्य्-उपन्यासेन तस्य तस्य प्रामाण्यम् आवेदनीयम्। तथा च शास्त्रान्तरे यद् ऊहादीनां लक्षणम् अकार्य् आचार्यैस् तद् युक्तम् एवेत्य् उक्तम् भवति।
[न्या०अ०१।१५] कथं तर्हि मीमांसक-परिकल्पितोऽभावो न प्रमाणम्? निर्गोचरत्वाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवान्वय-व्यतिरेक-द्वारेन "भू-तलम् एवेदं, घटादिर् नास्त्îति" वस्तु-परिच्छेद-प्रावीण्यम् आबिभ्राणं तद्-अधिक-ग्राह्यार्थाभावात् प्रमाणान्तरं परिकल्प्यमानं निरस्यत्îति किं नश् चिन्तया, तस्य सद्-असद्-रूप-वस्तु-ग्राहिणः प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। अथ कदाचिद् अभिदध्याद्॒ अध्यक्षं भाव्âंशम् एवाकलयत्îन्द्रिय-द्वारेणोत्पत्तेस्, तस्य च भाव्âंश एव व्यापारान्॑ नास्तिता-ज्ञानं तु वस्तु-ग्रहणोत्तर-कालं प्रतियोगि-स्मरण-सद्भावे मानसम् अक्ष-व्यापार-निरपेक्षम् उन्मज्जति। तद् उक्तम्॒
"न तावद् इन्द्रियेणैषा नास्त्îत्य् उत्पाद्यते मतिः ।
भाव्âंशेनैव संयोगो योग्यत्वाद् इन्द्रियस्य हि" ॥ नव्१।१५॒१ ॥
"गृःीत्वावस्तु-सद्भावं स्मृत्वा च प्रतियोगिनं ।
मानसं नास्तिता-ज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षया" ॥ नव्१।१५॒२ ॥
[न्या०अ०१।१६] अत्रोच्यते भाव्âंशाद् अभाव्âंशस् तर्ह्य् अभिन्नो भिन्नो वा? अभिन्नश् चेत्, कथम् अग्रहणम्, भाव्âंशाद् अव्यतिरिक्तत्वाद् एव, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेद्, घटाद्य्-अभाव-विनिर्लुठितं भू-तलम् आद्य-दर्शनेन गृह्यत इति घटादयो गृह्यन्त इति प्राप्तं, तद्-अभावाग्रहणस्य तद्-भाव-ग्रहणनान्तरीयकत्वात्। तथा चाभावोऽपि पश्चात् प्रवर्तमानस् तान् उत्सारयितुम् अपटिष्ठः स्याद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् असङ्कीर्णस्य सङ्कीर्णता-ग्रहणाद् भ्रान्तम् आपनीपद्येत। किं च, प्रमाणाभावाद् अर्थाभावोऽभाव-प्रमाणेन साध्यत इति भवतोऽभिप्रायः॒
"प्रमाण-पञ्चकं यत्र वस्तु-रूपे न जायते ।
वस्तु-सत्तावबोधार्थं तत्राभाव-प्रमाणता" ॥ नव्१।१६॒१ ॥
[न्या०अ०१।१७] इति-वचनात्, तद् अयुक्तम्, यतः प्रमाणाभावः कथं ग्राह्यः? तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावाद् इति चेत्, तस्याप्य् अभाव-ग्रहणे तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावो ग्राह्य इत्य् अनवस्था। अथ अर्थाभावात् प्रमाणस्य प्रमाणाभावाच् चार्थस्याभावः प्रतिपद्येत इति मन्येथास्, तद् एतद् इतरेतराश्रयं दुर्घटम् आपद्येत॒ न यावद् अर्थाभावोऽगृहीतस् तावत् प्रमाणाभावः सिध्यत्य्, अर्थाभावश् च प्रमाणाभावात् सेत्स्यत्îत्य् आवर्तनात्। अथेन्द्रियवत् स्वयम् अविज्ञातोऽपि प्रमाणाभावोऽर्थाभावं ज्ञापयिष्यत्îत्य् अभिदधीथास्, तद् अयुक्तम्, तस्य तुच्छतया सकल-शक्ति-विरह-लक्षणत्वाद्, इन्द्रियस्य तु तद्-विपर्यस्ततया ज्ञानोत्पादन-दक्षत्वात्। तस्मात् प्रत्यक्षम् एवम् भू-तलादि-प्रतिनियत-वस्तु-ग्राहितां बिभर्ति, यदि तद्-विपरीत-घटादि-प्रतियोगि-वस्त्व्-अन्तर-वैविक्त्यं तस्याकलयति नान्यथा, विजातीय-व्यवच्छेदाभावे तस्यैव प्रतिनियतत्वासिद्धेः, सकल-सङ्कीर्णतया ग्रहण-प्रसङ्गात्। अतोऽधिक-ग्राह्याभावान् निर्विषयतयाभावाख्यं प्रमाणं यत् परैः पर्यकल्पि तद् अप्रमाणम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।१८] द्विधेत्य् अस्मिन् सत्य् अपि प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति नियत-द्वैविध्य-प्रदर्शनेन सौगत-परिकल्पितं ‘प्रत्यक्षम् अनुमानं चेतिऽ॑ द्वैविध्यम् अपक्षिपति, तद्-आकूतेन तस्यायोगात्। प्रत्यक्षातिरिक्तं हि तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धोपलक्षित-कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-सम्पादित-जन्मकम् अनुमानम् एव प्रमाणं, न शाब्दोहादिकं, सम्बन्ध-विकलत्वाद् इति तद्-आकूतम्। अयुक्तं चैतत्, प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-प्रमाणान्तराभाव-ग्रहणोपायाभावात्। न तावत् प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तराभावावगतिस्, तस्य स्वलक्षण-विषयत्वेनाभाव-ग्राहिता-विरोधात्। नापि स्वभाव-कार्यानुमानाभ्यां, तयोर् वस्तु-साधकत्वात्। नाप्य् अनुपलब्धेस्, तस्या अप्य् अत्यन्ताभाव-साधन-विरोधात्। सा हि चतुर्-विधा वर्ण्यते मूल-भेदापेक्षया, तद् यथा -- विरुद्धोपलब्धिर् विरुद्ध-कार्योपलब्धिः कारणानुपलब्धिः स्वभावानुपलब्धिश् चेति। न तावद् विरुद्धोपलब्धेः प्रमाणान्तरस्यात्यन्ताभावो, दृश्यात्मनो विरुद्धस्य विधानेनेतराभाव-साधनात्, सन्निहित-देश एव प्रतियोग्य्-अभाव-सिद्धेः। एतेन विरुद्ध-कार्योपलब्धिर् अपि व्याख्याता, तस्या अपि प्रतिषेध्य-विरोधि-सन्निधापन-द्वारेणाभाव-साधकत्वात्। कारणानुपलब्धिर् अपि तद्-देशाशङ्कित-कार्यस्यैवाभावं साधयति न सर्वत्र, स्वयम् असिद्धत्वात्। स्वभावानुपलब्धिर् अप्य् एक-ज्ञान-संसर्गि-पदार्थोपलम्भ-रूपा तद्-देश एव प्रतिद्वन्द्व्य्-अभावं गमयति। अतः प्रमाणान्तरस्यापि क्वचिन् निषेधः स्यान्, न सर्वत्र। तन् न प्रमाणान्तर-बाधकं समस्ति।
[न्या०अ०१।१९] प्रत्यक्षानुमानयोश् च प्रामाण्यं कुत इति चिन्त्यम्। न तावत् प्रत्यक्षात्, तस्य निर्विकल्पकतया सतोऽप्य् असत्-कल्पत्वात्। तत्-पृष्ठ-भावी विकल्पस् तु न स्वलक्षणाम्भोधि-मध्यम् अवगाहते॑ तत् कथं तत्राप्रविष्टस् तत्-स्वरूपं निश्चिनुयात्। अप्रमाण-भूताच् च तस्मात् प्रामाण्य-निर्णय इति निबिड-जडिमाविष्करणं भवताम्। अनुमानात् प्रामाण्य-निर्णय इति चेन्, न, तस्यापि स्वलक्षणाद् बहिः प्लवनात्। अप्रामाण्य-व्यवच्छेदस् तेन साध्यत इति चेन्, न, व्यवच्छेदस्य व्यवच्छिन्नाव्यतिरेकाद्, इतरथान्धकार-नर्तन-कल्पम् अनुमानम् आसज्येत, निर्विषयत्वात्। किं च, तत्-प्रामाण्य-निर्णायकम् अनुमानं प्रमाणम् अप्रमाणं वा? न तावद् अप्रमाणम्, ततः प्रामाण्यासिद्धेः। नापि प्रमाणं, तत्-प्रामाण्य-साधकाभावात्। न हि प्रत्यक्षात् तत्-सिद्धिर्, विकल्प-शून्यतयाकिञ्चित्-करत्वाद् इत्य् उक्तम्। अनुमानात् तु तत्-साधने विकल्प-युगलं तद्-अवस्थम् एवावतिष्ठेत, तत्-प्रामाण्य-साधनेऽप्य् अनुमान-कल्पनेत्य् अनवस्था। किं च, गृहीत-सम्बन्धस्यानुमानं प्रवर्तेत, सम्बन्धस् त्रि-काल-गोचरो ग्राह्यो, न च प्रत्यक्षं तं लक्षयितुं क्षमते, पूर्वापर-क्षण-त्रुटित-रूप-वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविनो विकल्पस्यापि व्यावहारिकाभिप्रायेण तन्-निष्ठताभ्युपगमात्। अनुमानाद् ग्रहीष्यत्îति चेन् ननु तद् अपि सम्बन्ध-पूर्वकं प्रवर्तेत, तद्-ग्रहणेऽप्îयं वार्तेत्य् अनवस्था। तस्माद् अनुमानम् अभिलषता गत्य्-अन्तराभावात् तत्-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणस् त्रि-काल-गोचरोऽव्यभिचारी वितर्कोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा च प्रस्तुत-तद्-द्वैविध्यस्य विघटितत्वाद्, अन्यद् अपि यद् एवं-विधम् अविसंवादि ज्ञानं तत् प्रमाणम् अस्त्व् इत्य् अलं शुष्काभिमानेनेति। यदि पुनः साध्यार्थान्यथानुपपन्न-हेतु-सम्पादितम् अनुमानम् इष्येत, तदा प्रत्यक्षम् अनुमानं चेत्य् अपि द्वैविध्यं घटाम् अटेद् एव॑ प्रत्यक्ष-व्यतिरिक्त-ज्ञानस्य सामस्त्येनानुमानेऽन्तर्-भाव-सम्भवात्, अन्यथानुपपन्नार्थान्तरम् अन्तरेण परोक्षार्थ-विषय-प्रतीतेर् अभावाद् इति।
[न्या०अ०१।२०] साम्प्रतम् अन्यथा सूत्रावयवेनैव प्रकृत-नियम-कारणम् आह॒ मेय-विनिश्चयाद् इति द्विधैवेति च काकाक्षि-गोलक-न्यायेनात्रापि सम्बन्धनीयम्। ततश् चायम् अर्थो॒ द्वाभ्याम् एव प्रकाराभ्यां मेयस्य ग्राह्यार्थस्य विनिश्चयात् स्वरूप-निर्णयाद्॑ द्वे एव यथोक्ते प्रमाणे न न्यूनम् अधिकं चेति। अयम् अत्राभिप्रायः॒ स्व-संवेदनं प्रति निखिल-ज्ञानानाम् एक-रूपतया साक्षात्-करण-चतुरत्वान् नास्त्य् एव भेदः॑ बहिर्-अर्थं पुनर् अपेक्ष्य कश्चिच् चक्षुरादि-सामग्री-बल-लब्ध-सत्ताकः स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं सन्निहितं विशद-निर्भासं सामान्यम् आकारं साक्षात्-कुर्वाणः प्रकाशः प्रथते, तत्र प्रत्यक्ष-व्यवहारः प्रवर्तते। यः पुनर् लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण नियतानियत-सामान्याकारावलोकी परिस्फुटता-रहितः खल्व् आत्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणामः समुल्लसति स परोक्षतां स्वी-करोति। न चैतौ प्रकारौ विहाय प्रकारान्तरेण ज्ञान-प्रवृत्तिं पश्यामो, न चापश्यन्तः प्रमाणान्तर-परिकल्पनं क्षमामहे, न च द्वयोः प्रथमानयोर् एकं निह्नुवानम् अपेक्षामहे, विशेषाभावात्। तस्माद् एतद् एव द्वैविध्यम् उररी-कर्तव्यम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२।०] साम्प्रतं यद् अस्माभिः प्राग् विवृण्वद्भिर् व्युदपादि, यद् उत विप्रतिपन्नाव्युत्पन्न-व्यामोहापोह-सहम् इहेदं प्रमाण-लक्षणम् इति तत्-सूत्र-मात्र-दर्शनाद् एव विमल-बुद्धयोऽवगच्छेयुः। मन्द-मतयस् तु तावता न भोत्स्यन्त इति -- तद्धित-विधित्सया व्यक्तं प्रमाण-लक्षणाभिधान-फलं प्रतिपिपादयिषुर् अपि सपूर्व-पक्षं निराकाङ्क्षं लक्षयेयुस् त इति तावत् पूर्व-पक्षम् उत्थापयन्न् आह॒
प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश् च तत्-कृतः ।
प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ न्यायावतार २ ॥
[न्या०अ०२।१] इह वचनम् उच्चारयता विमृश्य-भाषिणा प्रत्यवमृश्यं, किम् इदं मामकं वचनं श्रोतृ-संस्काराधायकम् उत नेति। इतरथा पर्यालोचित-कारितास्य हीयते। श्रोतृ-संस्काराधायकं चेद् उच्चारयत्य्, अन्यथा विपर्यय इति। एतत् तु प्रमाण-लक्षण-वाक्यं सकल-जनानादि-प्ररूढार्थ-प्रत्यायकत्वाद् अश्रोतृ-संस्काराधायकम्, यत आह॒ प्रसिद्धानि प्ररुढानि, नाधुना साध्यान्îत्य् अर्थः। प्रमाणानि प्रत्यक्षादीनि, परोक्ष-गत-भेदापेक्षया बहु-वचनं व्यक्ति-भेदे सामान्यम् अपि कथञ्चिद् भिद्यत इति-दर्शनार्थम्। तथा हि॒ तद् अविवक्षित-व्यक्तिकम् एक-रूपतां बिभर्ति प्रमाणम् इति॑ व्यक्त्य्-अवच्छेदेन पुनर् अवच्छिद्यमानं नानातामादत्ते प्रत्यक्षानुमान-शाब्दानि प्रमाणान्îति, व्यक्ति-व्यतिरिक्ताव्यतिरिक्त-रूपत्वात् तस्य। तथा हि॒ शब्दाच् चक्षुरादेर् वा दूराद् वृक्ष इति प्रत्यये धव-खदिर-पलाशादि-विशेषानपेक्षया साधारणं वृक्षत्वम् एव चकास्ति, तस्मात् तत् तेभ्यो भिन्नं, तद्-व्यतिरेकिणाकारेण ज्ञाने प्रतिभासनाद्, घटादिवत्। परिस्फुट-धव-खदिर-पलाशादि-विशेषावलोकन-वेलायां तु न तद्, अतिरेकिणा रूपेण प्रकाशत इत्य् अभिन्नं, तद्-अव्यतिरिक्तस्य संवेदनात्, तत्-स्वरूपवत्। विशेषाभिन्नम् एव रूपं तात्त्विकं सामान्यस्य, तस्यैव दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रिया-क्षमत्वाद्, भिन्नं पुनः कल्पना-बुद्धि-विठपितत्वाद् अवस्तु-रूपम् इति चेन्, न, द्वयोः प्रकाशमानयोर् एकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। अन्यथा भिन्नम् एव रूपं स्वाभाविकम् इतरत् तु कल्पना-बुद्धि-दर्शितम् इत्य् अपि वदतां न वदन-भङ्गः स्यात्। अर्थ-क्रिया-कारिताविशेषस् तु भिन्नेऽपि रूपे न दुरुपपादस्, तस्यापि ज्ञान-साधारण-व्यवहार-करण-दक्षत्वात्। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम् इति निवेदयिष्यामस्, तस्मात् सर्वत्र भिन्नाभिन्नौ सामान्य-विशेषाव् इति दर्शनार्थो बहु-वचन-निर्देशः। आसतां तावत् प्रमाणानि।
[न्या०अ०२।२] व्यवहारश् च तत्-कृतः प्रसिद्ध इति सम्बन्धः। च-शब्दोऽपि-शब्दार्थः। तेनायम् अर्थो॒ यद्-अर्थं प्रमाण-परीक्षणम् असाव् अपि जल-पान-शीत-त्राणादिर् व्यवहारोऽनादि-प्ररूढः, तन् निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम् इत्य् अभिप्रायवान् अपि परः परुषता-परिजिहीर्षयात्मनोऽन्यथा प्राह॒ प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमासाधारण-प्रमाण-धर्म-कथन-रूपायां ज्ञायते निर्णीयतेऽस्माभिर् न प्रयोजनं तत्-फलम्, अतिसूक्ष्मत्वात् तावकाभिसन्धेर् इति काक्वा प्रश्नयत्य् उल्लुण्ठयति चेति। किं च, प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं वाभिधीयते, निश्चितं वा स्वरूपेणेति पक्ष-द्वयम्। न तावद् अनिश्चितम्, अनिश्चितस्य लक्षणत्वायोगाद्, उन्मत्तक-विरुतवत्। अथ निश्चितं, तत् किम् अप्रमाणात् प्रमाणाद् वा। न तावद् अप्रमाणाद्, अप्रमाणस्य निश्चायकत्वायोगात्। यदि पुनर् अप्रमाणम् अपि निश्चायकम् इति सङ्गीर्येत, तदा प्रमाण-पर्येषणं विशीर्येत, नैरर्थक्यापत्तेर्, अप्रमाणाद् अपि निश्चायाभ्युपगमात्। अथ प्रमाणात्, तत् किम् अलक्षणं लक्षणोपेतं वा। अलक्षणं चेन् निश्चायकं प्रमाणम्, तर्हि सर्व-प्रमाणानां लक्षणाभिधानम् अनर्थकं, तद्-व्यतिरेकेणाप्य् अर्थ-निश्चय-सिद्धेर्, भवद्-अभिप्रेत-लक्षण-निश्चायक-प्रमाणवत्। अथ लक्षणोपेतं, तत्रापि विकल्प-युगलम् अनुवारित-प्रसरम् अनुधावति॒ तल्-लक्षणं निश्चितम् अनिश्चितं वा। न तावद् अनिश्चितं लक्षणं लक्ष्यं लक्षयति। निश्चयोऽपि प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा। अप्रमाणान् निश्चयासिद्धेः प्रमाणाद् इति वक्तव्यम्। तद् अप्य् अलक्षणं सलक्षणं वा। अलक्षणत्वे पूर्वस्यार्थ-ग्रहणे किं क्षूणम्। सलक्षणत्वे तल्-लक्षणं निर्णीतम् अनिर्णीतं वेति तद् एवावर्तते। तन् न प्रमाण-लक्षणाभिधानोपायोऽस्ति, तस्मात् प्रसिद्धानि प्रमाणान्îत्य् अङ्गी-कर्तव्यम् इति।
[न्या०अ०३।०] अधुनाचार्यो गृहीतस् तावकीनोऽभिप्रायोऽस्माभिर् इति परं प्रत्याययंस् तन्-मतम् अनुद्राव्य तद् एवानुमन्यमानस् तथापि लक्षणोक्तेः साफल्यमावेदयन्न् आह॒
प्रसिद्धानां प्रमाणानां लक्षणोक्तौ प्रयोजनम् ।
तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् व्यामूढ-मनसाम् इह ॥ न्यायावतार ३ ॥
[न्या०अ०३।१] एतद् अभ्यधायि भवता, यथा प्रसिद्धानि प्रमाणानि, ततस् तेषां लक्षणोक्ताव् असाधारण-धर्म-कथन-विषये प्रयोजनं फलं, किम् इति शेषस्, तद् एतद् अयुक्तम्। यतो यद्य् अपि प्रतिप्राणि-प्रसिद्धानि प्रमाणान्य्, अन्यथा तत्-कृत-निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च दृष्ट-हान्य्-आद्य्-आपत्तेः, तथापि केचिद् वितत-मोहावष्टब्धान्तः-करणास् तत्-स्वरूपम् अनुभवन्तोऽपि न लक्षयन्ति, ततस् तान् अवलोकयताम् अस्माकं तद्-विषय-कृपा-परीत-चेतसां यथावस्थित-प्रमाण-लक्षणाविर्-भावन-द्वारेण व्यामोहम् एतेषाम् अपसारयाम इति प्रमाण-लक्षणाभिधानं प्रति प्रवर्तते चेतः। तद् इदं प्रयोजनं॒ तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् इति॑ तस्मिन् प्रमाण-लक्षणे व्यामोहो विपरीताभ्युपगमवतां विपर्यास-लक्षणस् तीर्थ्यानां प्रमाणाप्रमाण-विवेक-विकलानाम्, अनध्यवसायात्मकस् तु मुग्ध-बुद्धीनां लौकिकानाम्, तस्य निवृत्तिर् अविपरीत-लक्षणावगमाद् अपगम इत्य् अर्थः, सा स्याद् भवेत्। केषाम् इत्य् आह॒ व्यामूढं विपरीत-ग्रह-ग्रस्तं विचित्ततां गतं मनोऽन्तः-करणं येषां ते तथा तेषाम्॑ इहेति लोके -- तद् अयं तात्पर्यार्थः। यद्य् अनादि प्रसिद्धं प्रमाण-लक्षणं प्रति न केचिद् अपि व्यामुह्येयुस् तदा यद् भवद्भिः प्राग् उदग्राहि॒ ‘निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम्ऽ॑ इति तद् युक्तम् एव स्यात्। न चैतद् एवं॑ तत्र व्यामूढानां दर्शनात्। एतेन यद् अदायि दूषणं ‘प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं निश्चितं वाभिधीयतऽ॑ इत्य्-आदि तद् अपि सिद्ध-साध्यता-मध्य-प्रतिबद्धत्वान् न बाधाविधाय्य् अस्माकम् इति मन्तव्यम्। व्यामूढ-मनसोऽपि प्रति प्रमाण-लक्षण-प्रकाशने तल् लगत्îति चेन्, न, स्व-संवेदन-सिद्धस्य वचनेन प्रकाशनात्, तस्य व्यामोहापोह एव व्यापारात्। यथा विविक्त-भू-तलावलोकनेऽप्य् अध्यक्षात् यो घटादि-वैविक्त्यं न प्रतिपद्यते, कुदर्शन-व्यामोहात्, तं प्रत्युच्येत॒ ‘नास्त्य् अत्र घट, उपलम्भ-कारण-समग्रतायाम् अप्य् अनुपलम्भाद्ऽ, वैविक्त्यं हि तत्राध्यक्ष-सिद्धं, वचनाद् व्यामोहो निवर्त्येत॑ तथेहापि विद्वद्भिर् द्रष्टव्यम्। निर्णीतं तल्-लक्षणम् अध्यक्षेण, तस्य व्यवसाय-रूपत्वाद्, वचनं पुनर् विपरीतारोप-निराकरणे व्याप्रियत इति स्थितम्। तद् एवं प्रमाण-लक्षणं सामान्येन प्रतिपाद्य तद्-गतं कुचोद्यं पर्यहार्य् आचार्येण।
[न्या०अ०४।०] अधुना तद्-विषयाम् एव संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षता ये प्रत्यक्ष-परोक्ष-लक्षणे प्रमाण-व्यक्ती प्राक् प्रक्रान्ते, तयोर् अपि लक्षणं प्रति विप्रतिपद्यन्तेऽपरे। अतस् तल्-लक्षणम् अपि वक्तव्यम् इति तावत् प्रत्यक्ष-लक्षणम् अभिधातुकाम आह॒
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् ईदृशम् ।
प्रत्यक्षम्, इतरज् ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥ न्यायावतार ४ ॥
[न्या०अ०४।१] तत्र प्रत्यक्षम् इति लक्ष्य-निर्देशः, अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् इति लक्षण-निर्देशः। परोक्षोऽक्ष-गोचरातीतस्, ततोऽन्योऽपरोक्षस्, तद्-भावस् तत्ता तया, साक्षात्-कृततयेति यावत्। अर्यत इत्य् अर्थोऽवगम्यत इति हृदयम्॑ अर्थ्यत इति वार्थो दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रियार्थिभिर् अभिलष्यत इति यावत्। तस्य ग्राहकं व्यवसायात्मकतया साक्षात् परिच्छेदकं यज् ज्ञानं, तद् ईदृशम् इत्îदृग् एव प्रत्यक्षम् इति सण्टङ्कः। तत्र ज्ञान-ग्रहणेन यत् सांख्याः प्राहुः॒ ‘श्रोत्र्-आदि-वृत्तिः प्रत्यक्षम्ऽ॑ इति तत् तिरस्-करोति, श्रोत्र्-आदीनां प्रकृति-विकारतया तद्-वृत्तेर् व्यापार-लक्षणाया जडतया प्रत्यक्षत्वायोगाद्॑ अर्थ-परिच्छित्ति-हेतुतया प्रत्यक्षत्वे आलोकादि-जड-कारण-कलाप-व्यापारस्यापि प्रत्यक्षतापद्येत, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०४।२] अर्थस्य ग्राहकम् इत्य् अस्य ग्रहणेक्षयेति वक्ष्यमाण-पद-सापेक्षत्वाद्, अमुना बहिर् अपि येऽर्थ-कलाकलन-विकलं सकलम् अपि ज्ञानं प्रलपन्ति तान् निरस्यति॑ स्व्âंश-ग्रहणे ह्य् अन्तः-संवेदनं व्याप्रियते यथा -- तथा बहिर् अप्îतरथार्थवज् ज्ञान-सन्तानान्तराण्य् अपि विशीर्येरन्, स्वप्न-दृष्टान्तेन तद्-अनुमानस्योपप्लव-मात्रतापत्तेः, स्व-विज्ञानस्यैव तथा तथा विजृम्भणात्। तथा च प्रमाण-प्रमेय-प्रतिपाद्य-प्रतिपादक-कार्य-कारण-भावादयः प्रलीयेरन्न्, आत्म-व्यतिरेकेणात्मीय-पूर्वोत्तर-क्षणयोर् अपि ज्ञानस्य प्रवृत्ति-निरोधापत्तेः। अद्वय-विज्ञान-तत्त्व-साधनेनानुकूलम् आचरस्îति चेत्, स्याद् एतत्, यदि भवतः प्रमाण-परिदृष्ट-सकल-व्यवहारोच्छेदेन कुदर्शन-वासनाहितादृष्टाद्वय-तत्त्व-परिकल्पनात् प्रतिकूलं न स्यात्। तन् नार्थ-विरहेण बहिः-प्रमाण-भूत-ज्ञानोल्लासोऽस्ति, निर्हेतुकत्व-प्रसङ्गाद् इति।
[न्या०अ०४।३] ग्राहकम् इति च निर्णायकं द्रष्टव्यम्, निर्णयाभावेऽर्थ-ग्रहणायोगात्। तेन यत् ताथागतैः प्रत्यपादि॒ ‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् अभ्रान्तम्ऽ॑ इति तद् अपास्तं भवति, तस्य युक्ति-रिक्तत्वात्। तथा हि॒ ते निर्विकल्पकत्वेऽध्यक्षस्यायुक्तीः खेटयन्ति -- किलेदम् अर्थ-सामर्थ्येनोदीयते, सन्निहितार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्राहकत्वात्। न चार्थे ध्वनयः सन्ति, तद्-धेतु-विलक्षण-कारणान्तर-जन्यत्वात्, ततश् चासाव् उपनिपत्य स्व-गोचरं संवेदनम् उत्थापयन् स्वाकारम् अनुकारयति। तन् न तद्-ग्राहिणि विज्ञाने शब्द-संश्लेषो युक्तः। किं च, यद्य् उत्पादकार्थोपयोगेऽपि तं तावन् न गृह्णीयात्, संवेदनम् अपि तु स्मरण-सम्पादितं तद्-अभिधायक-ध्वनि-संयोजनं प्रतीक्षमाणं तावद् आसीत, तर्हि दत्तो जलाञ्जलिर् अर्थ-ग्रहणस्य। तथा हि॒ तम् अर्थम् अपश्यंस् तस्मिन् गृहीत-सङ्केतं तद्-अभिधायक-ध्वनिं नानुस्मरत्य्, उपायाभावाद्, अननुस्मरंश् च पुरो-वर्तिन्य् अर्थे न योजयति, स्मृत्य्-उपस्थापन-व्यतिरेकेण तद्-योजनाशक्तेर्, अयोजयंश् च भवद्-अभिप्रायेण न पश्यत्îति धान्ध्याद् आन्ध्यमापद्येत। यदि चेन्द्रियजम् अपि ज्ञानं विकल्प-कलुषितम् इष्येत, तदा तद् अपि मनो-राज्यादि-विकल्पवद् विकल्पान्तराविर्-भावे सति निवर्तेत॑ न चैतद् अस्ति, सन्निहित-गो-पिण्ड-गोचरस्य चक्षुर्ज-संवेदनस्याश्वादि-विषय-विकल्पोदयेऽप्य् अनिवर्तनात्, संहृत-सकल-विकल्पस्यापि च परिस्फुट-सन्निहितार्थ-विषय-दर्शन-सिद्धेः। तन् नाक्षजं ज्ञानं शब्द-सम्पर्कम् अनुभवत्îति।
[न्या०अ०४।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यत् तावद् उक्तम्॒ अशब्दकार्थ-सामर्थ्योद्भवत्वाद् ध्वनि-रहितम् अध्यक्षम् इति, तद् अयुक्तं, न हि शब्दासम्पृक्तार्थजम् इत्य् एतावतैवाभिलाप-विना-कृतम् इति वक्तुं शक्यम्, अन्यथा जडार्थ-जनितम् इति जडम् अपि तत् स्यात्। अथ बोध-रूप-मनस्कार-साहित्यान् न जडम् इति ब्रूषे, तथा सत्य् अभिलाप-संसृष्ट-मनस्कार-सन्नियोगात् साभिलापम् अपि स्यात्। किं च, विविक्ताः परमाणवः स्वाकारार्पण-द्वारेण स्व-गोचरं ज्ञानम् उत्पादयन्तः कथम् असन्तम् आत्मनि स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं तत्र प्रथयन्ति। विभ्रमाद् इति चेन्, न, नेदानीम् अर्थे यद् अस्ति तद् एव प्रतिभाति, तत्रासतोऽपि स्थूराकारस्य प्रतिभासनात्। तथा शब्दोऽपि। यद्य् अविद्यमानोऽर्थे तद्-ग्राहिणि ज्ञाने प्रतिभासेत किं क्षूयेत? यच् चोक्तम्॒ ‘स्मरण-जनित-शब्द-संयोजनं प्रतीक्षमानम् अर्थोपयोगेऽपि यद्य् आसीतेत्य्ऽ-आदि यावद् ‘आन्ध्यम् आपद्येतऽ, तत् तावक-पक्षेऽपि समानम्। तथा हि॒ स्वलक्षण-विषयेन्द्रियज-निर्विकल्पक-ज्ञान-सद्भावेऽपि न तावद् इदं-तयानिदं-तया वार्थ-व्यवस्थितिर्, यावद् विधि-प्रतिषेध-द्वारेण विकल्प-युगलकं पाश्चात्यं नोदयते, यत्रैव्âंशे विकल्पं जनयति, तत्रैवास्य प्रमाणतेति-वचनान्, निर्विकल्पकस्य सतोऽपि व्यवहारं प्रत्य् असत्-कल्पत्वात्। स च विकल्पः सङ्केत-काल-भावितम् अभिलाप-सामान्यम् अनुस्मरत एवोत्पत्तुम् अर्हति, अभिलाप-सामान्य-स्मरण-बीजं च कुतः प्रबुध्येत? तादृश-दर्शनाद् इति चेन्, ननु तद् अपि दर्शनं निर्विकल्पकत्वाद् अर्थं नातिशेते, तत् कथं सामान्य-विषय-विकल्प-बीजं प्रबोधयेत्? अर्थः पुनः सामान्य-व्यवसायात्मिकां बुद्धिं न जनयेद् इति भवतां कदाग्रहः। तद् अर्थवत् तद्-विषयं दर्शनं व्यवसाय-शून्यत्वान् नाभिलाप-सामान्य-गोचर-स्मरण-बीजं प्रबोधयति॑ तद् अप्रबुद्धं न स्मरणं जनयत्य्॑ अजातं स्मरणं न शब्दं योजयत्य्॑ अयोजितः शब्दो नार्थं निश्चाययत्य्॑ अनिश्चितोऽर्थो न व्यवहारम् अवतरत्य्॑ अनवतीर्णो नादृष्टाद् विशिष्यते॑ अविशिष्टः प्रमातुर् आन्ध्यं लक्षयत्îति। तस्माद् यथा कथञ्चिन्-निर्णयाभावात् स्वयम् अप्रतीतम् अपि निर्विकल्पक-दर्शनं वासना-प्रबोध-द्वारेण विकल्पम् उत्थाप्यात्म-व्यापारम् अभिलापयति कतिचिद्-अंश-विषयं, तथार्थोऽपि यदि चक्षुर्-आदि-सामग्र्य्-अन्तः-पातित्वेनाप्रतीत एव स्वयं, तथा-स्वभावत्वात्, सङ्केत-काल-भाविताभिलाप-सामान्य-विषयात्म-संस्कार-प्रबोध-द्वारेणात्म-विषयम् अभिलाप-संसृष्टं संवेदनम् उल्लासयेन् नात्यन्तम् अयुक्तं पश्यामः। न चायं सविकल्पको बोधो मनो-राज्यादि-विकल्प-कल्पश्, चक्षुरादि-सामग्री-सम्पाद्यत्वाद्, इतरस्य तु मनो-मात्र-प्रभवत्वात्। अतः कथं तद्-विकल्पान्तराविर्-भावे निवर्तेत? मानस-विकल्पस्यैव विकल्पान्तरेण निवर्तनाद्, अस्य तु कारण-सामर्थ्येन बलात् प्रवृत्तेः। एतेन संहृत-सकल-विकल्पावस्थायां नैष प्रादुःष्याद् इत्य् एतद् अपि प्रतिक्षिप्तम्, अस्य प्रमातुर् इच्छया संहर्तुम् अशक्यत्वान्, मानस-विकल्प-संहरण एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेर् इति। एतच् च शब्द-सम्पृक्त-प्रत्यक्ष-पक्षाद् अप्य् एकान्त-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-पक्षस्य पापीयस्तां दर्शयद्भिर् अस्माभिर् उदग्राहि।
[न्या०अ०४।५] परमार्थतः पुनः प्रत्यक्षे साक्षाच् छब्दोल्लेखो नेष्यते, विशद-व्यवसायेनार्थ-साक्षात्-करण-चतुरत्वात् तस्य। केवलं तद् अपि सन्निहितं परिस्फुटं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं पदार्थान्तरैः सह समानासमानाकारं स्व-परमाणूनां सामान्याकारं स्तम्भाधिकं पदार्थं गोचरयत्îति सविकल्पकम् इत्य् उच्यते, पर-परिकल्पित-क्षण-क्षयि-विविक्त-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवण-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-प्रतिषेधार्थं कथञ्चिद्-अभिलाप-संसर्ग-योग्य-गोचरता-दर्शनार्थं वा। एवं च प्रत्यक्ष-गोचरी-कृतेऽर्थे संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध-ग्रहणादयस् तद्-विषयाः शाब्द-व्यवहाराः सर्व एव निरुपचरिता घटन्त इत्य् उक्तं भवति। यदि पुनः शब्द-संसर्ग-योग्य-प्रतिभासम् अध्यक्षं न स्यात्, ततः को दोष इति चेद्, विकल्पानुत्थानेन सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गः। तथा हि॒ निर्व्यवसायं दर्शनम् अत्यन्त-पाटवोपेतम् अपि स्मृति-बीजाधानं तद्-उत्तर-काल-भावि वा तादृशार्थ-दर्शनं तत्-प्रबोधनम् अभ्यास-वासना-पाटवेऽपि न विधातुम् अलं, यतः सामान्य-विकल्पोत्पत्त्या व्यवहारः प्रवर्तेत, क्षणिकत्वादिषु सकल-कालं निर्विकल्पकाध्यक्ष-दृष्टतयाभ्युपगतेष्व् अपि तद्-अदर्शनात्। तस्माद् यत्र कुत्रचिद् अर्थ्âंशे पाश्चात्य-व्यवहार-प्रवृत्तिस् तत्र प्राचीनं संवेदनं निर्णायकम् अभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा क्षणिकत्वाद्य्-अंशवत् सर्व्âंशेषु व्यवहारः प्रलीयेत। तन् न कदाचन कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षस्य प्रमातुर् अपि प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति। अप्रतीतं चास्त्îति श्रद्धातुं दुःशकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् अलक्षणम्।
[न्या०अ०४।६] अभ्रान्तत्वम् अपि न जाघटीति, भवद्-अभिप्रायेण स्थिर-स्थूरार्थ-ग्राहिणः संवेदनस्य विपर्यस्त-रूपत्वात्, तद्-विपरीतस्य तु स्वप्न-कालेऽप्य् अप्रकाशमानत्वात्। तद् यदि यथावस्थितार्थ-ग्राहित्वम् अभ्रान्तत्वं, तन् न सम्भवत्य् एव, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणूनां कदाचिद् अप्य् अप्रतिभासात्, तेषां च पारमार्थिकत्वात्। अथ व्यावहारिकाभिप्रायेण यद् इदं घटादिकं स्वलक्षणम् अर्थ-क्रिया-क्षमं, तत्र यन् न भ्राम्यति तद् अभ्रान्तम् इत्य् अभिप्रेतं, तर्हि कल्पनापोढ-पदम् उत्सारणीयम्, इदानीम् अनेन सहावस्थानाभावाद्, व्यवहारावतारिणो घटादि-स्वलक्षणस्य निर्णयेनैव ग्रहणाद्, अन्यथा व्यवहाराप्रवृत्तेर्, दृष्टस्याप्य् अदृष्टानतिशयनात्। तस्माद् व्यवसायात्मकम् अध्यक्षम् इत्य् एतद् एव चार्व् इति स्थितम्।
[न्या०अ०४।७] अपरोक्षतयेत्य् अनेन तु परोक्ष-लक्षण-सङ्कीर्णताम् अध्यक्षस्य परिहरति, तस्य साक्षात्-कारितया अर्थ-ग्रहण-रूपत्वाद् इति। ईदृशम् इत्य् अमुना तु पूर्वोक्त-न्यायात् सावधारणेन विशेषण-कदम्बक-सचिव-ज्ञानोपप्रदर्शनात् पर-परिकल्पित-लक्षण-युक्तस्य प्रत्यक्षतां प्रतिक्षिपति। एवं च यद् आहुर्॒ "इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" तथा "सत्-सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धि-जन्म तत् प्रत्यक्षम्" इत्य्-आदि तद् अयुक्तम् इत्य् उक्तं भवत्य्, अपूर्व-प्रादुर्-भावस्य प्रमाण-बाधितत्वाद्, अत्यन्तासतां शश-विषाणादीनाम् अप्य् उत्पत्ति-प्रसङ्गात्। तस्माद् इदम् आत्म-रूपतया विद्यमानम् एव विशेष-कृद्-धेतु-कलाप-सन्निधानात् साक्षाद् अर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपतया विवर्तेत॑ तथा चोत्पन्न-जन्मादि-विशेषणं न सम्भवेत्। अथैवं-विधार्थ-सूचकम् एवैतद् इत्य् आचक्षीथास्, तथा सत्य् अविगानम् एवेत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०४।८] अधुना परोक्ष-लक्षणं दर्शयति॒ इतरद् इत्य्-आदि। अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तम्, तस्माद् इतरद् असाक्षाद् अर्थ-ग्राहकं ज्ञानं परोक्षम् इति ज्ञेयम् अवगन्तव्यम्। एतद् अपि स्व-संवेदनापेक्षया प्रत्यक्षम् एव, बहिर्-अर्थापेक्षया तु परोक्ष-व्यपदेशम् अश्नुत इति दर्शयन्न् आह॒ ग्रहणेक्षयेति॑ इह ग्रहणं प्रक्रमाद् बहिः प्रवर्तनम् उच्यते,ऽन्यथा विशेषण-वैयर्थ्यात्॑ तस्येक्षापेक्षा तया॑ बहिः-प्रवृत्ति-पर्यालोचनयेति यावत्। तद् अयम् अर्थो॒ यद्य् अपि स्वयं प्रत्यक्षं, तथापि लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण बहिर्-विषय-ग्रहणेऽसाक्षात्-कारितया व्याप्रियत इति परोक्षम् इत्य् उच्यते। एतच् च बुभुत्सितार्थान्यथानुपपन्नार्थान्तर-प्रतीति-वशाद् उदय-धर्मकं इति। सामान्य-लक्षण-सद्भावाद् एकाकारम् अपि विप्रतिपत्ति-निराकरणार्थं द्विधा भिद्यते, तद् यथा॒ अनुमानं शाब्दं चेति। यतोऽद्यापि शब्दस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वम् एव परे न प्रतिपद्यन्ते, न चापृथक्-कृतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम्, अतो भेदेनोपन्यासः।
[न्या०अ०५।०] तत्र तावद् अनुमान-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकं स्मृतम् ।
अनुमानं, तद् अभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवत् ॥ न्यायावतार ५ ॥
[न्या०अ०५।१] इहाप्य् अनुमानम् इति लक्ष्य-निर्देशः, तस्य प्रसिद्धतया अनूद्यत्वात्। साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इति लक्षण-निर्देशः, तस्याप्रसिद्धतया विधेयत्वाद् इति। अत्राप्य् अनुमान-शब्दस्य कर्त्र्-आदि-कारक-व्युत्पत्ति-क्रमेणार्थ-कथनं प्रमाण-शब्दवद् द्रष्टव्यम्। ततश् चेहापि लिङ्ग-ग्रहण-साध्याविनाभावित्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-स्मरण-कालात् [अनु] पश्चान् मीयते परिच्छिद्यतेऽर्थोऽनुमेयः पावकादिर् येन ज्ञानेन तद् अनुमानम् इति। तत् किं-भूतम् इत्य् आह॒ साध्य-निश्चायकम् इति -- साधनम् अर्हति, साधयितुं वा शक्य इति साध्योऽनुमेय इत्य् अर्थः॑ तस्य निश्चायकं तत्-स्वरूप-निर्णायकम् इति यावत्। तत् कुत इत्य् आह॒ लिङ्गाल् -- लिङ्ग्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति लिङ्गं हेतुस् तस्मात्। किं-भूताद् इत्य् आह॒ साध्याविनाभुन इति -- विना भवत्îति विनाभु, ततोऽन्यद् अविनाभु, साध्येनाविनाभु साध्याविनाभु, साध्यं विमुच्य यन् न भवत्îत्य् अर्थः, तस्मात् साध्य-निश्चायकं ज्ञानं तद् अनुमानम्। स्मृतम् अभिप्रेतं नीतिविद्भिर् इति सम्बन्धः। तत्र लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इत्य् अनेनानुमानस्य प्रत्यक्ष-शाब्द-लक्षण-सङ्कीर्णतां वारयति। साध्याविनाभुन इत्य् अनेन पर-प्रणीत-लिङ्ग-लक्षण-व्युदासम् आचष्टे।
[न्या०अ०५।२] ततश् च यत् परे प्रोचुः -- पक्ष-धर्मत्वान्वय-व्यतिरेक-लक्षण-रूप-त्रयोपलक्षितानि त्रीण्य् एव लिङ्गानि॒ अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति॑ तद् उक्तम्॒
"अनुमेयेऽथ तत्-तुल्ये सद्भावो, नास्तितासति ।
निश्चितानुपलम्भात्म-कार्याख्या हेतवस् त्रय" ॥ इति॑
[न्या०अ०२] तथान्ये॒ "ऽस्येदं कार्यं कारणं संयोगि समवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्" इति, तथा॒ "पूर्ववच् छेषवत् सामान्यतो-दृष्टम्" इत्य्-आदि -- तद् बाल-प्रलपित-प्रायम् इत्य् अवगन्तव्यं, सर्वत्र साध्याविनाभावित्वस्यैव गमकत्वात्, तद्-रहितस्य तु त्रैलक्षण्य-लक्षितस्याप्य् अगमकत्वाद्, इतरथा तत्-पुत्रत्वादीनाम् अपि गमकत्व-प्रसङ्गान्, नियमवत्। त्रैलक्षण्यं लक्षणं, न यत्-किञ्चित्, तेनायम् अप्रसङ्ग इति चेन्, न, नियमेन साध्याविनाभावित्वस्यैवोद्दीपनात्॑ तच् चेद् अस्ति किं त्रैलक्षण्यापेक्षया, तस्यैव गमकत्वात्। तथा हि॒ जल-चन्द्रान् नभश्-चन्द्रं, कृत्तिकोदयाच् छकटोदयं, पुष्पितैक-चूतात् पुष्पिताशेष-चूतान्, चन्द्रोदयात् कुमुदाकर-प्रबोधं, वृक्षाच् छायाम् इत्य्-आदि पक्ष-धर्मत्व-विरहेऽप्य् अनुमिमीमहे। कालादिकस् तत्र धर्मी समस्त्य् एव, तत्र पक्ष-धर्मता लिङ्गस्य गृह्यत इति चेन्, नातिप्रसङ्गाद्, एवं हि शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये काक-कार्ष्ण्यादेर् अपि गमकत्व-प्रसक्तेस्, तत्रापि लोकादेर् धर्मिणः कल्पयितुं शक्यत्वात्। तथान्वय-विकलोऽप्य् अनित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद् इत्य् अयं सम्यग्-घेतुतया समर्थयितुं शक्य इति, नान्वयोऽपि हेतोर् लक्षणम्। तथा हि॒ तावकाकूतेनैव सकलं सत्त्वम् अनित्यतया क्रोडी-कृतम् इति भाव-धर्मः श्रावणत्वं कथम् अनित्यतां विहाय विपक्षे वर्तितुम् उत्सहेत, तद्-विकलस्य निःस्वभावतापत्तेर्, अनित्यता-विनिर्मुक्तस्य सत्त्वस्यासम्भवावत्। एतेन सात्मकं जीवच्-छरीरं, प्राणादिमत्त्वान्, निरात्मकत्वे तद्-वैकल्य-प्रसङ्गाद्, घटादिवद् इत्य् अयम् अपि गमको व्याख्यातः, साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्वस्यात्रापि सद्भावात्, पक्ष-धर्मत्वान्वययोस् त्व् अलक्षणतया प्रतिपादनात्।
[न्या०अ०५।३] तथा कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-नियमोऽपि किल तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धास्तित्वम् एतेष्व् एवेति यः क्रियते, सोऽप्य् अयुक्तः, प्रकृत-सम्बन्ध-द्वय-विकलस्यापि रूपादे रसादि-गमकत्व-दर्शनात्। मा भूत् तस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्तिभ्यां गमकत्वं, समवायाद् भविष्यति, तथापि नान्यथानुपपन्नत्वम् एव हेतोर् लक्षणम् इति यदि वैशेषिको मन्येत, सोऽन्यथा निर्लोठनीयः। स हि विकल्पतः पर्यनुयोज्यः॒ समवायिभ्यः समवायोऽभिन्नो भिन्नो वा। यद्य् अभिन्नः, समवायिन एव तर्हि, न समवायः, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेत्, स कथं तेषु वर्तेत॒ सामस्त्येनाहोस्विद् एक-देशेन? तद् यदि सामस्त्येन, तद् अयुक्तं, समवाय-बहुत्व-प्रसङ्गात्, प्रतिसमवायि तस्य परिसमाप्ततावाप्तेः। अथैक-देशेन, तद् अप्य् अचारु, स्âंशता-प्रसङ्गेन निरवयवत्व-क्षतेः, स्व्âंश-वर्तनेऽपि सामस्त्यैक-देश-चोद्यावताराच् च। तत्रापि सामस्त्य-पक्षे बहुत्वं तद्-अवस्थम् एव। एक-देश-पक्षे त्व् अंशान्तर-प्रसङ्गेनानवस्था। तन् न समवाय-बलात् गमकतां प्रत्य् आशाविधेया, तस्यैव तत्र दुःस्थितत्वात्। एतेन संयोगिनोऽपि गमकता प्रत्युक्ता, समान-दूषणत्वात्। विरोधिनोऽपि विरुद्धाभाव-गमकत्वम् अन्यथानुपपन्नत्वम् एव सूचयति, तद्-अभावे गमकत्वायोगात्।
[न्या०अ०५।४] एवं पर-परिकल्पितम् अन्यद् अपि लिङ्ग-लक्षणं यद् गमकताङ्गं तद् अन्यथानुपपन्नत्वं न व्यभिचरति, साध्यं विनाप्य् उपपद्यमानस्य गमकता-वैकल्याद् इति॑ अत्रैव व्यापके लिङ्ग-लक्षणेऽन्तर्-भावनीयं, विपरीतं तु निरसनीयम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०५।५] तद् एवम् अनुमान-लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यच् छौद्धोदनि-शिष्यकैर् न्यगादि, यद् उत -- भ्रान्तम् अनुमानम्, सामान्य-प्रतिभासित्वात्, तस्य च बहिः-स्वलक्षणे व्यतिरेकाव्यतिरेक-विकल्पाभ्याम् अपाक्रियमाणतयायोगात्, तद्-रूपतया च तेन तस्याध्यवसायाद्, अतस्मिंस् तद्-ग्रहणस्य च भ्रान्ति-लक्षणत्वात्। प्रामाण्यं पुनः प्रणालिकया बहिः स्वलक्षण-बलायातत्वाद् अनुमानस्य। तथा हि॒ नार्थं विना तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-रूप-सम्बन्ध-प्रतिबद्ध-लिङ्ग-सद्भावो, न तद् विना तद्-विषयं ज्ञानं, न तज्-ज्ञानम् अन्तरेण प्राग्-अवधारित-सम्बन्ध-स्मरणं, तद्-अस्मरणे नानुमानम् इत्य्, अर्थाव्यभिचारित्वाद् भ्रान्तम् अपि प्रमाणम् इति सङ्गीर्यते॑ तद् उक्तम्॒ "अतस्मिंस् तद्-ग्रहो भ्रान्तिर् अपि सम्बन्धतः प्रमेति" -- तद् अपाकर्तुम् आह॒ तद् अभ्रान्तम् इत्य्-आदि। तद् अनुमानं, भ्राम्यति स्व-गोचरे विपर्यस्यत्îति भ्रान्तं, ततोऽन्यद् अभ्रान्तम्, अविपरीतार्थ-ग्राह्îति यावत्। इयं च प्रतिज्ञा। प्रमीयते यथावस्थितोऽर्थः परिच्छिद्यतेऽनेनेति प्रमाणं, तद्-भावस् तत्-त्वं तस्मात्। अयं तु हेतुः। सङ्गतम् अक्षाणाम् इति समक्षं, तद् इव समक्षवद् इति दृष्टान्तः। तद् इदम् अनुमानस्य भ्रान्तता-निराकारकं सम्पूर्णावयवम्, उपनय-निगमनयोर् अवयव-त्रय-प्रतिपादनेनैवाक्षिप्तत्वात्। प्रमाणं सूचितम्, प्रयोगस् त्व् एवं द्रष्टव्यो॒ऽभ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वाद्, इह यद् यत् प्रमाणं तत् तद् अभ्रान्तं यथा समक्षं, तथा च प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगम्यतेऽनुमानं, तस्मात् प्रमाणत्वाद् अभ्रान्तम् इति प्रतिपद्यन्ताम् इति। तत्रार्थ-वादी तावत् समक्ष-लक्षणे दृष्टान्ते साध्य-विकलताम् आविर्-भावयितुं न पारयति, स्वयम् एव समक्षस्याभ्रान्ततयाऽभ्युपगमात्। शून्य-वादिनः पुनः समस्तापलापित्वात् प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारं प्रत्य् अयोग्यतैवेति न तम् अधिकृत्य स्व-साधन-दोषाः परिहर्तव्याः, स्व-वचन-बाधित-प्रतिज्ञत्वेन तद्-वादोत्थानाभावात्। तथा हि॒ सर्वाभाव-प्रतिपादकं वचोऽस्ति, नास्ति वा? यद्य् अस्ति तर्हि प्रतिज्ञा-हानिः। अथ नास्ति, सकल-भाव-सिद्धिः, प्रतिषेधकाभावात्।
[न्या०अ०६।०] ज्ञान-वादी पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विकलं सकल-विकल्प-गोचरातीतं निर्विकल्पकं विविक्त-पारमार्थिक-स्व-संवेदन-वेद्यं संवेदनम् आगूर्यानादि-कालालीन-वासना-बल-प्रभावितं ग्राह्य-ग्राहकाकार-कलुषितं बहिष्-प्रथमानं निखिलम् अपि ज्ञानं विपर्यस्ततया प्रतिजानानः समक्ष-लक्षणस्य प्रकृत-दृष्टान्तस्य साध्य-शून्यताम् अभिदध्याद्, अतस् तन्-मत-विकुट्टनार्थम् आह॒
न प्रत्यक्षम् अपि भ्रान्तं प्रमाणत्व-विनिश्चयात् ।
भ्रान्तं प्रमाणम् इत्य् एतद् विरुद्धं वचनं यतः ॥ न्यायावतार ६ ॥
[न्या०अ०६।१] यद् भवतश् चेतसि विवर्तते, यद् उत न केवलम् अनुमानं भ्रान्तं, किं तर्हि यद् भवद्भिर् दृष्टान्ततयोपात्तं प्रत्यक्षं तद् अपि भ्रान्तम् एव, "सर्वम् आलम्बने भ्रान्तम्" इत्य् वचनात्, तद् एतन् न। कुत इत्य् आह॒ प्रमाणत्व-विनिश्चयाद् इति, प्रमाण-भाव-निर्णयाद् इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०६।२] ननु च प्रमाणताम् अभ्रान्ततान्यथानुपपन्नां यदि परः प्रतिपद्यते, ततस् ताम् अभ्युपगच्छन् कथं भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं विदध्याद् इति पार्श्व-स्थित-वचनावकाशम् आशङ्क्य, भ्रान्तता-प्रमाणतयोर् विरोध-साधनेन ततः प्रमाणतां व्यावर्त्यानन्य-शरणतया प्रतिज्ञाताभ्रान्तताक्रान्तां तां दर्शयन्न् आह॒ भ्रान्तम् इत्य्-आदि। भ्रान्तं विपर्यस्तम् अथ च प्रमाणं ग्राह्य-परिच्छेद-हेतुर् इत्य् एतद् वचनम् एवं-विद्धार्थ-प्रत्यायको ध्वनिर् विरुद्धं, पूर्वापर-व्याहतार्थ-गर्भत्वात्।
[न्या०अ०६।३] ननु च नैवास्य विरुद्धता, तथा ह्य्॒ अविदित-परमार्थ-व्यावहारिकाभिप्रायेण लोक-संवृतिं घटयन्तो वयं दृढतर-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताकयोः प्रत्यक्षानुमानयोः प्रमाणताम् आचक्ष्महे, तद्-अभिप्रायेण दर्शितार्थ-प्रापकत्वेन तयोर् अविसंवादकत्वात्। शिथिल-वासनाउन्मुख्य-निर्मित-जन्मकयोः पुनर् अप्रमाणतां, तद्-आकूतेनैव दर्शितेऽर्थे विप्रलम्भनाद् इति, भ्रान्ततां पुनस् तत्त्व-चिन्तकाभिप्रायेण सकलस्य बहिर् उपप्लवमानस्य ग्राह्य-ग्राहकाकार-कालुष्य-दूषितस्य प्रतिभासस्य पारमार्थिकाद्वय-संवेदन-विपर्यस्त-रूपत्वाद् अभिदध्महे, बहिः प्रतिभासस्य तद्-ग्राह्यार्थ-विचाराक्षमतयोपप्लुत-रूपत्वात्। तथा ह्य्॒ अर्थोऽवयवि-रूपोऽवयव-रूपो वा स्याद्, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् अवयवि-रूपो विचारं क्षमते,ऽवयव-विरहेऽवयवित्वायोगात्, तेषु च तद्-वृत्ति-विकल्पानुपपत्तेः। तथा हि॒ तेष्व् असाव् एकदेशेन वर्तते सामस्त्येन वा। न तावद् एकदेशेन, तस्य स्वयं निरवयवत्वात्। अवयव-वृत्ति-निमित्तम् अंशान्तर-कल्पने तद्-वृत्ताव् अप्य् अंशान्तर-कल्पन-प्रसङ्गस्, तथा चानवस्था। नापि सामस्त्येन, प्रत्य्-अवयवं परिसमाप्त-रूपतयावयवि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। भेद-पक्षे दोषोऽयम्, अभेद-पक्षे नास्त्îति चेन्, न॒ तत्राप्य् अवयव-मात्रम् अवयवि-मात्रं वा स्याद्, इतरेतराव्यतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्। किं च, समस्तावयव-व्यापिनोऽवयविनोऽभ्युपगमे पटादेर् एक-देश-राग-कम्प-दर्शनादिषु सकल-राग-कम्प-दर्शनादीनि दुर्निवाराणि स्युर्, एकस्य रागारागादि-विरुद्ध-धर्माध्यासायोगाद् इति। नाप्य् अवयव-रूपोऽर्थो विचार-गोचर-चारी कर-चरण-शिरो-ग्रीवादीनाम् अवयवानां स्वावयवापेक्षयावयवि-रूपतया तद्-दूषणेनैवापास्तत्वात्। परमाणूनां निरंशतयावयवत्वम् उपपद्यत इति चेन्, न, तेषाम् अपि दिक्-षट्क-सम्बन्धेन षट्-अंशतापत्तेर्, अन्यथावस्थानाभावात्। ततश् चार्थ-विरहात् तद्-उन्मुखो ग्राह्याकारोऽलीकस्, तद्-अलीकतायां ग्राहकाकारोऽपि नावस्थानम् आबध्नाति, ग्राह्याभावे ग्राहकायोगात्। तद्-अपेक्षयैव तत्-स्वरूप-स्थितिः, ग्राह्य-ग्राहकाकार-विलये च बोधाकारोऽवशिष्यते, तस्य सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात्, तस्मात् स एव पारमार्थिक इति।
[न्या०अ०६।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यद् अवादि संवेदनम् अद्वयं पारमार्थिकं, ग्राह्य-ग्राहकाकार-प्रवृत्तं पुनर् अतात्त्विकम् इति, तद् अयुक्तं, प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ बहिर् अन्तश् चानेकाकारतया हर्ष-विषादादिभिः स्थिर-स्थूरताद्य्-अनेक-धर्म-परिकरितार्थ-ग्रहण-परिणामैश् च विवर्तमानं संवेदनम् उपलभ्यते, न पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विविक्तं यादृग् भवद्भिर् उपवर्ण्यते ज्ञानं तादृशं कस्यचित् कदाचन प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अद्वय-प्रतिभासस्य स्वप्न-दशायाम् अप्य् अननुभूतेः। न च तत्त्व-चिन्तका अपि प्रमाणम् अन्तरेण स्वाकूतं प्रतिष्ठापयन्तः प्रेक्षावताम् अवधेय-वचना भवन्त्य्, अन्यथैकम् अचेतनम् अव्ययम् अपि ब्रह्मानेकं चेतनं क्षण-भङ्गुरताक्रान्तम् अविद्यातः प्रथत इति ब्रुवाणोऽनिराकार्यः स्यात्। यद् अपि बहिर्-अर्थ-निराकरण-धिया अवयव्य्-अवयव-द्वारेण दूषणम् अदायि, तद् अपि बहिर् अन्तः प्रथमान-सकलासुमत्-प्रतीत-प्रतिभास-मुद्गर-निर्दलित-शरीरतया भक्त-मध्य-निष्ठ्यूत-दर्शिनः पुरतो विप्रतारण-प्रवण-कुट्टिनी-शपथ-प्रायम् इति न विद्वज्-जन-मनांसि रञ्जयति, प्रत्यक्ष-प्रतिभासापह्नवे तन्-मूलकत्वात् कुयुक्ति-विकल्पानाम् उत्थानाभावात्। किं च, संवेदनस्यापि सितासिताद्य्-अनेकाकारेष्व् एकस्य वर्तने भेदाभेद-सामस्त्यैक-देशादि-चोद्यं समानम् एवेति न दूषणम्। अनेकाकार-विवर्तस्यालीकत्वान् न तेन सह संवेदनस्य पारमार्थिकस्य भेदाभेदादि-चिन्तेति चेन्, नन्व् एवम् इतरेतराश्रयं दुरुत्तरम् आढौकते। तथा हि॒ तद्-अलीकत्व-सिद्धाव् अद्वय-संवेदन-सिद्धिस्, तत्-सिद्धौ च तद्-अलीकत्वम् इति न्यायात्। अन्यच् चाद्वयम् अप्य् एक-क्षण-वर्ति संवेदनं यथा पूर्वोत्तर-क्षणाभ्यां सम्बन्धम् अनुभवति, तथा निरंशा अपि यदि परमाणवो दिग्-अंशैः परमाण्व्-अन्तरैर् वा संश्लेषमागच्छेयुः किम् अयुक्तं स्यात्। न चावयव्य्-अवयवयोर् एकान्त-व्यतिरेकाव्यतिरेक-पक्षे यद् दूषणं तद् अस्मत्-पक्ष-बाधा-करं, परस्पराविनिर्लुठित-रूपयोर् विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदयोस् तयोर् अभ्युपगमाद्, बहिर् अन्तश् च तथैव प्रकाशमानतया तयोर् निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। एतेन रागाराग-कम्पाकम्पादि-विरोधोद्भावनम् अपि प्रतिव्यूढं, प्रमाण-प्रसिद्धेऽर्थे विरोधाभावात्, प्रमाण-बाधितस्यैव विरुद्धत्वात्, कुयुक्ति-विकल्पानां च प्रत्यक्षापह्नवे निर्मूलतया बाधकत्वायोगात्, तद्-उद्दलितत्वेनोत्थानाभावाद्, भिन्न-प्रवृत्ति-निमित्तत्वाच् च सर्व-धर्मानां तद्-विपर्यय-सम्पाद्यो विरोधो दूरापास्त एव। किं च, स्वयम् एव संवेदनं परमार्थ-संव्यवहारापेक्षया प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-सविकल्पकाविकल्पक-भ्रान्ताभ्रान्तादि-रूपम् अभ्युपयतो बहिर्-अर्थे विरुद्ध-धर्माध्यास-प्रतिषेध-बुद्धिः केवलं जाड्यं सूचयति। तन् न प्रमाणं कथञ्चिद् भ्रान्तं समस्ति, स्वरूप-प्रच्यव-प्रसङ्गाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०६।५] ननु च तद्-दर्शितार्थालीकतया ज्ञानस्य भ्रान्तता, न स्वरूपेण, न च तद्-उदय-समये कस्यचिद् इदम् अलीकार्थम् इदं त्व् अनलीकार्थम् इति विवेकेनावधारणं समस्ति, भ्रान्ताभ्रान्ताभिमतयोस् तद्-एक-रूपतया प्रकाशनात्। यदा च विशद-दर्शन-पथ-चारिणोऽपि शश-धर-युगलादयोऽलीकताम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तदा सकल-सत्यार्थताभिमत-प्रतिभासेष्व् अप्य् अलीकार्थताशङ्कानिवृत्तेर् अनाश्वास एव। न च तद्-अर्थ-प्राप्त्य्-आदिकम् आरेका-निराकरण-कारणं कल्पनीयं, स्वप्नावस्थायां तत्-सद्भावेऽप्य् अलीकार्थता-सिद्धेः। बाधक-प्रत्ययोपनिपातात् तस्यासत्यार्थतेति चेन्, न, तस्य स्व-गोचर-पर्यवसितत्वेन बाधकत्वायोगात्। अन्यथा नीलम् आददाना देवदत्त-बुद्धिः प्राक्-प्रवृत्त-पीत-बुद्धेर् बाधिकापद्येत। सर्व-प्रतिभासस्य बाधकाभाव-सिद्धेश् च समानता। तस्माद् भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञान-भ्रान्तिर् इयं भवतां, विवेकाभावेन सर्वस्यालीकार्थत्वाद् इति।
[न्या०अ०७।०] अत्राह॒
सकल-प्रतिभासस्य भ्रान्तत्वासिद्धितः स्फुटं ।
प्रमाणं स्वान्य-निश्चायि द्वय-सिद्धौ प्रसिध्यति ॥ न्यायावतार ७ ॥
[न्या०अ०७।१] एवं मन्यते॒ योऽपि समस्त-संवेदनस्य भ्रान्ततां प्रतिजानीते, तेनापि तत्-साधकस्याभ्रान्तताभ्युपगन्तव्या, तद्-भ्रान्तत्वे तत्-प्रतिपादितार्थालीकत्वेन सकल-ज्ञानाभ्रान्तता-प्रसङ्गाद्, अन्यथा तद्-भ्रान्ततायोगात्। एवं च तज्-जातीयम् अन्यद् अप्य् अभ्रान्तं स्यात्, ततश् च सकल-प्रतिभासस्य समस्त-संवेदनस्य भ्रान्तत्वासिद्धितो विपर्यस्तत्वानिष्पत्तेर् यत् स्फुटं स्वान्य-निश्चायि सुनिश्चिततया स्व-पर-प्रकाशकं तत् प्रमाणम् इति सम्बन्धः। तच् च द्वय-सिद्धौ स्वरूपार्थ-लक्षण-युग्म-निष्पत्तौ प्रसिद्ध्यति निष्पद्यते, अन्यथा प्रमेयाभावे प्रमाणाभावात्। तस्मात् प्रमाणम् उररी-कुर्वाणेनार्थोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अभिप्राय इति।
[न्या०अ०८।०] तद् एवं स्वार्थानुमान-लक्षणं प्रतिपाद्य तद्-वतां भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं च निराकृत्याधुनाप्रतिपादित-परार्थानुमान-लक्षण एवाल्प-वक्तव्यत्वात् तावच् छाब्द-लक्षणम् आह॒
दृष्टेष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः ।
तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ॥ न्यायावतार ८ ॥
[न्या०अ०८।१] अत्रापि शाब्दम् इति लक्ष्यम्, अनूद्यत्वात्। दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य्-आदि लक्षणं, विधेयत्वात्। दृष्टेन प्रमाणावलोकितेनेष्टः प्रतिपादयिषितोऽव्याहतोऽनिराकृतः सामर्थ्याद् अर्थो यस्मिन् वाक्ये तत्-तथा, प्रमाण-निश्चितार्थाबाधितम् इति यावत्, तस्मात्। परमोऽकृत्रिमः पुरुषोपयोगी शक्यानुष्ठानो वार्थो वाच्यस्, तम् अभिधातुं शीलं यस्य तत् परमार्थाभिधायि, विशिष्टार्थ-दर्शकम् इत्य् अर्थः। ततस् तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं प्रकृत-वाक्य-प्रतिपाद्यार्थादान-शीलतया लब्धात्म-सत्ताकं यन् मानं तच् शाब्दम् इति प्रकीर्तितम् उपवर्णितं पूर्वाचार्यैर् इति सम्बन्धः। तत्र दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य् अनेन कुतीर्थिक-वचसां लौकिक-विप्रतारकोक्तीनां च शाब्दतां निरस्यति, प्रमाण-बाधितत्वात्। वाक्याद् इत्य् अमुना तु वाक्यस्यैव नियतार्थ-दर्शकत्वात् परमार्थाभिधायितेति दर्शयन् पदाच् छाब्दाभावम् आह। परमार्थाभिधायिन इत्य् अनेन ज्वर-हर-तक्षक-चूडा-रत्नालङ्कारोपदेशादि-वचन-प्रभव-ज्ञानस्य निष्फलतया प्रामाण्यं निराचष्टे। तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नम् इत्य् अमुना त्व् एवं-भूताद् अपि वाक्याच् छ्रोतृ-दोषाद् विपरीताद्य्-अर्थ-ग्रहण-चतुरतया प्रादुर्-भूतस्य शाब्दत्वं वारयति। मानम् इत्य् अनेनान्तर्-भावित-प्रोपसर्गार्थेन शाब्दे परस्याप्रामाण्य-बुद्धिं तिरस्-कुरुते, तद्-अप्रामाण्ये परार्थानुमान-प्रलय-प्रसङ्गात्, तस्य वचन-रूपत्वात्। त्र्य्-अवयव-हेतु-सूचकत्वेनोपचारतस् तस्य प्रामाण्यं, न तत्त्वत इति चेन्, नाप्रमाणस्य सूचकत्वायोगात्। ननु च हेतु-प्रतिपादने यदि तत् प्रमाणं, ततो हेतु-समर्थक-प्रमाणान्तर-प्रतीक्षणं विशीर्येत, तेनैव निर्णीत-स्वरूपत्वात् तस्य, प्रमाण-प्रसिद्धे पुनः प्रमाणान्तर-वैयर्थ्यात्। नैतद् अस्ति, भवत्-परिकल्पिताध्यक्षस्याप्य् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्॒ तद्-दर्शितेऽर्थे विकल्प-प्रतीक्षणात् तस्यैव प्रामाण्यम् आसज्येत। तद्-गृहीतम् एवार्थम् असाव् अभिलापयत्îति चेच् छब्द-प्रतिपादितं हेतुं प्रमाणान्तरं समर्थयत इति समानो न्यायः।
[न्या०अ०९।०] शाब्दं च द्विधा भवति॒ लौकिकं शास्त्र-जं चेति। तत्रेदम् द्वयोर् अपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितं। समर्थनं पुनर् अविप्रतारक-वचन-प्रभवस्येहादि-वाक्य-प्रस्ताव एव लौकिकस्य विहितं, शास्त्र-जस्य तु विधातव्यम् इति यादृशः शास्त्रात् तज्-जातं प्रमाणताम् अनुभवति तद् दर्शयति॒
आप्तोपज्ञम् अनुल्लङ्घ्यम् अदृष्टेष्ट-विरोधकम् ।
तत्त्वोपदेश-कृत् सार्वं शास्त्रं कापथ-घट्टनम् ॥ न्यायावतार ९ ॥
[न्या०अ०९।१] शास्ति शिक्षयति जीवाजीवादि-तत्त्वं ग्राहयति, शिष्यतेऽनेनेति वा शास्त्रम्। तत् किं-भूतम् इति तद्-विशेषणान्य् आह। आप्तः प्रक्षीणाशेष-रागादि-दोष-गणस्, तेनोपज्ञम् आदाव् उपलब्धम्। अनेनापौरुषेयापोहम् आह, तस्य प्रमाण-बाधितत्वात्, पुरुष-व्यापाराभावे वचनानुपलब्धेर्, उपलम्भेऽपि तद्-अर्थानवगमात्, तद्-अर्थ-निश्चयार्थं पुरुषाश्रयणे गज-स्नान-न्याय-प्रसङ्गात्, तस्य रागादि-कलुषितत्वेन वितथार्थ-कथन-प्रवृत्तेः। तद्-अनुष्ठानाद् अपि स्व-कार्य-सिद्धौ प्रणयनार्थम् अपि पुरुषः किं नेष्यते, विशेषाभावात्। तन् न क्षीण-दोष-वचनं व्यतिरिच्यान्यतः प्रेक्षावतां पर-लोकादाव् अदृष्टेऽर्थे प्रवृत्तिर् युक्ता॑ तत् तद् एव शास्त्रं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०९।२] अत एवोल्लङ्घ्यते प्राबल्येन गम्यतेऽभिभूयते अन्यैर् इत्य् उल्लङ्घ्यं, ततोऽन्यद् अनुल्लङ्घ्यं, सर्व-वचनातिशाय्îति यावत्। अत एव दृष्टेन प्रमाण-निर्णीतेनेष्टस्य तद्-वाच्यस्य विरोधो यस्मिंस् तत्-तथा तद् एव, यदि वा दृष्टः प्रमाणेन, इष्टो वचनान्तरेण, तयोर् विरोधकं, तद्-विरुद्धार्थाभिधानात्, ततोऽन्यद् अदृष्टेष्ट-विरोधकम्, अबाधार्थाभिधाय्îत्य् अर्थः।
[न्या०अ०९।३] तद्-इयता शास्त्रस्य स्वार्थ-सम्पद् उक्ता। अधुना तत्त्वोपदेशादीनां परार्थत्वात् परार्थ-सम्पदम् आह॒ तत्त्वं जीवादयः पदार्थाः, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्, तेषां उपदेशः स्वरूप-प्रकाशनं तद्-रक्षणादि-विधानं वा। तं करोति तत्त्वोपदेश-कृत्। अत एव सार्वं सर्वस्मै हितं, प्राणि-रक्षणोपायोपदेश-परम-पद-दायितया विश्व-जनीनत्वात्। एतेन परार्थ-सम्पादकत्वम् उक्तम्।
[न्या०अ०९।४] अधुना परेषाम् एवानर्थ-विघातित्वम् आह॒ कुत्सिताः पन्थाः कापथास् तीर्थान्तराणि, तेषां घट्टनं विचालकं निराकारकं, सर्व-जनापकारि-कुमत-विध्वंसकम् इत्य् अर्थः। ईदृशाद् एव शास्त्राज् जातं शाब्दं प्रमाणं, नान्येभ्यो, विप्रलम्भकत्वात् तेषाम् इति।
[न्या०अ०१०।०] अधुना परार्थानुमान-लक्षणं वक्तव्यम्, तच् च प्रत्यक्षेऽपि पश्यन्न् एक-योग-क्षेमत्वात् सामान्येनाह॒
स्व-निश्चयवद् अन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः ।
परार्थं मानम् आख्यातं वाक्यं तद्-उपचारतः ॥ न्यायावतार १० ॥
[न्या०अ०१०।१] अत्र परार्थं मानम् इति लक्ष्यं, स्व-निश्चयवद् इत्य्-आदि लक्षणम्। स्व आत्मा तस्य निश्चयः प्रमेयाधिगमस्, तद्वद् अन्येशां प्रतिपाद्यानां निश्चयोत्पादनं प्रमेय-परिच्छेदक-ज्ञान-प्रादुर्-भावनं॒ यथात्मनोऽर्थ-निर्णयस् तथा परेषां निर्णय-जननम् इत्य् अर्थः। बुधैर् विद्वद्भिः, परस्मै अर्थः प्रयोजनं येन तत् परार्थं, मीयतेऽनेनेति मानम्, आख्यातं कथितम्।
[न्या०अ०१०।२] ननु च यदि निश्चयोत्पादनं परार्थ-मानं, तथा ज्ञानम् अपि पर-प्रत्यायनाय व्याप्रियमानं परार्थं प्राप्नोत्îत्य् आह॒ वाक्यं परार्थं, न ज्ञानं, तस्यैवानन्तर्येण व्यापारात्, पर-प्रयोजन-मात्रत्वाच् च, इतरस्य तु व्यवहितत्वात्, स्व-परोपकारित्वाच् च। कथं वचनम् अज्ञान-रूपं प्रमाणम् इत्य् आह॒ तद्-उपचारतस्, तस्य ज्ञानस्योपचारोऽतद्-रूपस्यापि तद्-अङ्गतया तद्-रूपत्वेन ग्रहणम्, ततः। इदम् उक्तं भवति॒ प्रतिपाद्य-गतम् उत्पत्स्यमानं यज् ज्ञानं तद् अव्यवहित-कारणत्वाद् वचनम् अप्य् उपचारेण प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तत्रानुमानस्य पारार्थ्यं परैर् अभ्युपगतम् एव, प्रत्यक्षस्य न प्रतिपद्यन्ते, किलेदं शब्द-प्रवेश-शून्य-स्वलक्षण-ग्राह्îति नैतद्-गोचरः परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यते। न च शब्दात् परस्य स्वलक्षण-ग्रहण-दक्षं प्रत्यक्षम् उन्मङ्क्ष्यति, शब्दस्य विकल्पोत्पादितत्वेन परस्यापि विकल्पोत्पादकत्वात्। तद् उक्तं॒
"विकल्प-योनयः शब्दा विकल्पाः शब्द-योनयः ।
कार्य-कारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्य् अपि" ॥
[न्या०अ०११।०] निर्विकल्पकं च प्रत्यक्षम्, अतो न शब्द-जन्यम् इत्य् अतोऽनुमानं दृष्टान्ती-कृत्य प्रत्यक्षस्यापि परार्थतां साधयितुम् आह॒
प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् ।
परस्य तद्-उपायत्वात् परार्थत्वं द्वयोर् अपि ॥ न्यायावतार ११ ॥
[न्या०अ०११।१] प्रत्यक्षेणाप्य् अनुमानेनेव प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् स्व-प्रतीत-प्रमेय-प्रत्यायकत्वात् परार्थत्वं प्रतिपाद्य-प्रयोजनत्वं द्वयोर् अपि प्रत्यक्षानुमानयोस्, तुल्य-कारणत्वान्, नानुमानस्यैवैकस्येत्य् अभिप्रायः। इह चाश्रूयमाणत्वात् तद्-अर्थ-गमनाच् चाप्îव-शब्दौ लुप्त-निर्दिष्टौ द्रष्टव्यौ। प्रत्यक्ष-प्रतीतार्थ-प्रत्यायनं च प्रतिजानानस्यायम् अभिप्रायो॒ यत् परो मन्यते -- नैतद्-गोचरं परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यत इति -- तद् अयुक्तं, निर्विकल्पकाध्यक्षापोहेन व्यवसाय-रूपस्य प्रत्यक्षस्य प्राग् एव साधितत्वात्, तद्-गोचरस्य कथञ्चिद् विकल्प-गम्यत्वेन शब्द-प्रतिपाद्यत्वात्। तद् यथानुमान-प्रतीतोऽर्थः परस्मै प्रतिपाद्यमानो वचन-रूपापन्नः परार्थम् अनुमानं, तथा प्रत्यक्ष-प्रतीतोऽपि परार्थं प्रत्यक्षं, पर-प्रत्यायनस्य तुल्यत्वाद्, वचन-व्यापारस्यैव भेदात्। तथा ह्य्॒ अनुमान-प्रतीतं प्रत्याययन्न् एवं वचनयत्य् -- अग्निर् अत्र धूमाद्, यत्र यत्र धूमस् तत्र तत्राग्निर्, यथा महानसादौ॑ वैधर्म्येण वाग्न्य्-अभावे न क्वचिद् धूमो, यथा जलाशयादौ, तथा च धूमोऽयं, तस्माद् धूमाद् अग्निर् अत्रेति, अव्युत्पन्न-विस्मृत-सम्बन्धयोस् तथैव प्रतिपादयितुं शक्यत्वात्। स्मर्यमाणे सम्बन्धे पुनर् एवम्॒ अग्निर् अत्र धूमोपपत्तेर्॑ वैधर्म्येण॒ अग्निर् अत्र, अन्यथा धूमानुपपत्तेः। प्रत्यक्ष-प्रतीतं पुनर् दर्शयन्न् एतावद् वक्ति॒ ‘पश्य राज गच्छतिऽ। ततश् च वचनाद् द्विविधाद् अपि समग्र-सामग्रीकस्य प्रतिपाद्यस्यानुमेय-प्रत्यक्षार्थ-विषया यतः प्रतीतिर् उल्लसत्य्, अतो द्वयोर् अपि परार्थतेत्य् आह॒ परस्य तद्-उपायत्वात् प्रतिपाद्यस्य प्रतीतिं प्रति प्रतिपादक-स्थ-प्रत्यक्षानुमान-निर्णीतार्थ-प्रकाशन-कारणत्वाद् इत्य् अर्थः। एतेन पूर्व-कारिकोक्तोपचार-कारणं च लक्षयति।
[न्या०अ०११।२] यच् चोक्तं॒ ‘न शब्दात् परस्य प्रत्यक्षोत्पत्तिस्, तस्य विकल्प-जनकत्वात्, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षण-विषयत्वेन निर्विकल्पकत्वात्ऽ॑ -- तद् अयुक्तं, सामान्य-विशेषात्मकार्थ-विषयस्य निर्णय-रूपस्य तस्य कथञ्चिद् एक-विषयतया शब्दोत्पाद्यत्वाविरोधाद्, एवं-विधस्य च प्राग् एव समर्थनात्। चक्षुर्-आदि-सामग्रीतस् तद् उत्पद्यते, न शब्दाद् इति चेद्, अनुमानम् अपि प्रत्यक्षादि-निश्चिताद् धेतोर् अविस्मृत-सम्बन्धस्य प्रमातुर् उल्लसति, न शब्दाद्, अतस् तस्यापि परार्थता विशीर्येत। समर्थ-हेतु-कथनात् तत्र वचनस्य परार्थतेति चेद्, अत्रापि दर्शन-योग्यार्थ-प्रतिपादनाद् इति ब्रूमः। तन् न प्रत्यक्ष-परोक्षयोः पारार्थ्यं प्रति विशेषोपलब्धिर् इति मुच्यतां पक्ष-पातः।
[न्या०अ०१२।०] तद् एवं द्वयोर् अपि परार्थतां प्रतिपाद्य तत्-स्वरूपम् आह॒
प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि च यद् वचः ।
प्रत्यक्षं प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् तद् उच्यते ॥ न्यायावतार १२ ॥
[न्या०अ०१२।१] यद् वचः प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि साक्षात्-कारि-ज्ञान-गोचर-कथन-चतुरं तत् प्रत्यक्षम् उच्यत इति सम्बन्धः। तच् च प्रत्यक्ष-रूपम् एवोच्यमानं प्रत्यक्षं, विप्रतिपन्नं प्रति पुनर् अनुमान-द्वारेणोच्यमानम् अनुमानम् एवेति च-शब्देनानेकार्थत्वाद् दर्शयति। वचनं कुतः प्रत्यक्षम् इत्य् आह॒ प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् प्रतिपाद्य-प्रत्यक्ष-प्रकाश-हेतुत्वाद् उपचारेणोच्यत इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०१३।०] अनुमानम् आह॒
साध्याविनाभुवो हेतोर् वचो यत् प्रतिपादकम् ।
परार्थम् अनुमानं तत् पक्षादि-वचनात्मकम् ॥ न्यायावतार १३ ॥
[न्या०अ०१३।१] हिनोति गमयत्य् अर्थम् इति हेतुस्, तस्य साध्याविनाभुवः प्राङ् निरूपितस्य यद् वचः प्रतिपादकं सन्दर्शकं तद् अनुमान-प्रकाश-हेतुत्वात् परार्थम् अनुमानम्। तत् की-दृशं? इत्य् आह॒ पक्षो वक्ष्यमाण-लक्षणः स आदिर् येषां हेतु-दृष्टान्तोपनय-निगमनादीनां तानि तथा, तेषां वचनानि प्रतिपादका ध्वनयः॑ तान्य् एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् पक्षादि-वचनात्मकम्।
[न्या०अ०१३।२] ननु च हेतु-प्रतिपादकं वचः परार्थम् अनुमानम् इत्य् अभिधाय तत् पक्षादि-वचनात्मकम् इति वदतः पूर्वापर-व्याहता वाचो युक्तिः। नैतद् अस्त्य्॑ एवं मन्यते नैकः प्रकारः परार्थानुमानस्य, किं तर्हि यथा परस्य सुखेन प्रमेय-प्रतीतिर् भवति तथा यत्नतः प्रत्यायनीयः। तत्र दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः। तद् यथा -- पक्षादयः पञ्च, तच्-छुद्धयश् च। तत्र यदा प्रतिपाद्यः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षोऽविस्मृत-दृष्टान्त-स्मार्य-प्रतिबन्ध-ग्राहक-प्रमाणो व्युत्पन्न-मतित्वाच् छेषावयवाभ्यूहन-समर्थश् च भवति, यद् वात्यन्ताभ्यासेन परिकर्मित-मतित्वात् तावतैव प्रस्तुत-प्रमेयम् अवबुध्यते, तदा हेतु-प्रतिपादनम् एव क्रियते, शेषाभिधानस्य श्रोतृ-संस्काराकारितया नैरर्थक्याद् इत्य्-आदौ हेतु-प्रतिपादनं सूत्र-कृता परार्थम् अनुमानम् उक्तम्। यदा तु प्रतिपाद्यस्य नाद्यापि पक्ष-निर्णयस्, तदाकाण्ड एव हेत्ûपन्यासोऽदृष्ट-मुद्गर-पातायमानः स्याद् इति पक्षोऽपि निर्दिश्यते। तथास्मर्यमाणे प्रतिबन्ध-ग्राहिणि प्रमाणे दृष्टान्तोऽपि वर्ण्येतान्यथा हेतोः सामर्थ्यानवगतेः। स्मृतेऽपि प्रमाणे दार्ष्टान्तिके योजयितुम् अजानानस्योपनयो दर्श्यते। तथापि साकाङ्क्षस्य निगमनम् उच्यते,ऽन्यथा निराकुल-प्रस्तुतार्थासिद्धेः। तथा यत्र पक्षादौ स्वरूप-विप्रतिपत्तिस् तत्र तच्-छुद्धिः प्रमाणेन कर्तव्येतरथा तेषां स्व-साध्यासाधनात्। सर्वेषां चामीषां साधनावयवत्वं, प्रतिपाद्य-प्रतीत्य्-उपायत्वात्।
[न्या०अ०१३।३] ननु च स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तं, न च स्वार्थानुमान-काले क्रमोऽयम् अनुभूयते, सम्बन्ध-वेदिनो हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीति-सिद्धेर्, न हि प्रतिपत्ता पक्षं कृत्वा ततो हेतुं निभालयति, नापि दृष्टान्तादिकं विरचयति, तथा प्रतीतेर् अभावात्। किं चान्वय-व्यतिरेकाभ्यां हेतोर् एव सामर्थ्यम् उन्नीयते, न पक्षादीनां, तद्-व्यतिरेकेणापि साध्य-सिद्धेः, तथापि तेषां साधन्âंशत्व-कल्पनेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। यदि च तत्-सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्षोपन्यास-मात्राद् एव साध्यावगतेर् हेतुर् आनर्थक्यम् अश्नुवीत, उत्तरावयवाश् च, एवं हि तत्-सामर्थ्यं सिद्ध्येन् नान्यथा। तस्माद् य एव पर-निरपेक्षं साध्यं बोधयति स एव हेतुः साधनं, न पक्षादय इति।
[न्या०अ०१३।४] अत्रोच्यते -- ‘स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तम्ऽ॑ इत्य्-आदि यद् उक्तं तद् युक्तम् उक्तं, केवलं तद्-अर्थं न जानीषे, निश्चयापेक्षयैव ‘वत्ऽ-इना तुल्यताभिधानान्॑ न पुनः सर्व-सामान्यम् अभिप्रेतम्, अन्यथा ध्वनिम् अनुच्चारयन् स्वार्थानुमाने साध्यम् अवबुध्यत इति, तद्-अनुच्चारणेन पर-निश्चयोत्पादनं प्रसज्येत। न चैतद् अस्ति, शब्दानुच्चारणे पर-प्रतिपादनासम्भवात्, तद्-अर्थं शब्दाङ्गी-करणे येन येन विना पर-प्रतिपादनासम्भवस् तत् तद् उररी-कर्तव्यं, समान-न्यायात्। न च पक्षादि-विरहे प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं शक्यो, हेतु-गोचरादि-तत्-साध्यार्थ-प्रतीति-विकलतया तस्य साकाङ्क्षत्वात्। तथा च बुभुत्सितार्थ-बोधाभावाद् अप्रत्यायित एव तिष्ठेद्॑ अतस् तद्-बोधनार्थं पक्षादयो दर्शनीया इति तेऽपि साधन्âंशाः स्युः। यच् चोक्तम्॒ अन्वय-व्यतिरेकानुकरणाभावान् न साधनं, हेतु-मात्राद् अपि साध्य-सिद्धेस्, तद् अयुक्तम्, अविप्रतारकता-निश्चित-पुरुष-वचन-मात्राद् अप्य् अग्निर् अत्रेत्य्-आदि-रूपात् क्वचित् प्रमेयोऽर्थः सिध्यत्îति हेतोर् अप्य् असाधनता-प्रसङ्गात्। तद्-विरहेणापि साध्य-सिद्धेः। युक्तं चैतद्, अविप्रतारक-वचनस्य प्राग् एव प्रामाण्य-प्रसाधनात्। यच् चोक्तम्॒ यद्य् अमीषां सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्ष-मात्राद् एव साध्य-प्रतीतेर् हेतोर् वैयर्थ्यं स्याद् इति, तद् अयुक्ततरं, भवत्-पक्षेऽपि समानत्वात्, तत्रापि समर्थ-हेत्ûपन्यासाद् एव साध्यावगतेर्, अन्यथा समर्थतायोगात्। पश्चात् तस्यैव प्रमाणेन समर्थनं सर्वत्र गृहीत-व्याप्तिकस्य च पुनः पक्ष-धर्मिण्य् उपसंहरणम् अनर्थकतां प्राप्नुवत् केन निवार्येत? तद्-अभावे हेतोः सामर्थ्यं नावगम्यते, तेन सार्थकम् इति चेत्, पक्षादीन् अपि विरहय्य प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं न पार्यत इति तेषाम् अपि सार्थकता न दुरुपपादेति मुच्यताम् आग्रहः। तस्माद् धेतुवत् पक्षादयोऽपि साधनं, हेतोर् अपि क्वचित् प्रतिपाद्ये तद्-अपेक्षतया निरपेक्षतासिद्धेर् इति। तद् इदं सकलम् आकलय्योक्तं तत् पक्षादि-वचनात्मकं इति।
[न्या०अ०१४।०] तद् एवम् अर्थतः पक्षादीन् प्रस्तुत्य तावत् पक्ष-लक्षणम् आह॒
साध्याभ्युपगमः पक्षः प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृतः ।
तत्-प्रयोगोऽत्र कर्तव्यो हेतोर् गोचर-दीपकः ॥ न्यायावतार १४ ॥
[न्या०अ०१४।१] पच्यत इति पक्षो, व्यक्ती-क्रियत इति-भावः। किं-भूत इत्य् आह॒ साध्यस्यानुमेयस्याभ्युपगमोऽङ्गी-करणं, प्राश्निकादीनां पुरतः प्रतिज्ञा-स्वी-कार इत्य् अर्थः। किम् अभ्युपगम-मात्रम्? नेत्य् आह॒ प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृत इति। प्रत्यक्षं साक्षात्-कारि संवेदनम्, आदि-शब्दाद् अनुमान-स्व-वचन-लोका गृह्यन्ते, तैर् अनिराकृतोऽबाधितः पक्ष इति सम्बन्धः। तद् यथा -- ‘सर्वम् अनेकान्तात्मकम्ऽ, ‘अस्ति सर्व-ज्ञऽ॑ इत्य्-आदि वा। अयं च केवलम् एष्टव्यो, न पुनः परार्थानुमान-काले वचनेनाभिधातव्य इति यो मन्येत तं प्रत्याह॒ तस्य पक्षस्य प्रयोगोऽभिधानम् अत्र परार्थानुमान-प्रस्तावे कर्तव्यो विधेयः। कुत इत्य् आह॒ हेतोः प्राङ्-निरूपितस्य गोचर-दीपक इति, ‘निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां प्रायो दर्शनम्ऽ॑ इति-वचनाद्, भाव-प्रधानत्वाच् च निर्देशस्य, विषय-सन्दर्शकत्वाद् इत्य् अर्थः। अयम् अत्राभिप्रायो॒ न हि सर्वत्र प्रतिवादिनः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षस्य कूर्च-शोभा-पुरः-सरं हेतुर् उपन्यस्यते,ऽपि तु क्वचित् कथञ्चित्।
[न्या०अ०१५।०] ततो यदाद्यापि प्रतिपाद्यः पक्षार्थं न जानीते, तदाकाण्ड एव हेताव् उच्यमाने विषय-व्यामोहाद् भ्रान्ति-लक्षणो दोषः स्याद् इत्य् आह॒
अन्यथा वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचर-मोहिनः ।
प्रत्याय्यस्य भवेद् धेतुर् विरुद्धारेकितो यथा ॥ न्यायावतार १५ ॥
[न्या०अ०१५।१] अन्यथेत्य् उक्त-विपरीताश्रयणे पक्ष-प्रयोगाकरण इत्य् अर्थः। वादिनो हेत्ûपन्यास-कर्तुर् अभिप्रेतोऽभिमतः स चासौ हेतु-गोचरश् च वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचरस्॑ तत्र मुह्यति दोलायते तच् छीलश् च यस्, तस्य प्रत्याय्यस्य प्रतिवादिनो हेतुर् विरुद्धारेकितो भवेद् विरोध-शङ्का-कलङ्कितः स्याद् इत्य् अर्थः। ततश् च सम्यग्-घेताव् अपि ‘विपक्ष एवायं वर्ततऽ॑ इति व्यामोहाद् विरुद्ध-दूषणम् अभिदधीत, पक्षोपन्यासात् तु निर्णीत-हेतु-गोचरस्य नैष दोषः स्याद् इत्य् अभिप्रायः। अमुम् एवार्थं स्पष्ट-दृष्टान्तेनाह यथेति। तद्-उपन्यासार्थः।
धानुष्क-गुण-सम्प्रेक्षि-जनस्य परिविध्यतः ।
धानुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन गुणेतरौ ॥ न्यायावतार १६ ॥
[न्या०अ०१६।१] यथा लक्ष्य-निर्देशं विना धानुष्कस्येषुं प्रक्षिपतो यौ गुण-दोषौ तौ तद्-दर्शि-जनस्य विपर्यस्ताव् अपि प्रतिभातः -- गुणोऽपि दोषतया, दोषोऽपि वा गुणतया -- तथा पक्ष-निर्देशं विना हेतुम् उपन्यस्यतो वादिनो यौ स्वाभिप्रेत-साध्य-साधन-समर्थत्वासमर्थत्व-लक्षणौ गुण-दोषौ तौ प्राश्निक-प्रतिवाद्यादीनां विपरीताव् अपि प्रतिभात इति भावार्थः। अक्षरार्थस् तु धनुषा चरति धानुष्कस् तस्य गुणो लक्ष्य-वेध-प्रावीण्य-लक्षणस् तत्र प्रेक्षकाणां कुतूहलम् इति तस्यैवोपादानम्, अन्यथा दोषोऽपि द्रष्टव्यः। तत्-सम्प्रेक्षि-जनस्य तत्-सम्प्रेक्षण-शील-लोकस्य परिविध्यतो यथा -- कथञ्चिद् बाणं मुञ्चत इत्य् अर्थः॑ धनुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन चाप-धरस्य वेध्य-निष्टङ्कनम् ऋते यौ गुणेतरौ गुण-दोषौ तौ यथा विरुद्धारेकितौ भवतस्, तथा वादिनोऽप्îत्य् अर्थः। तस्माद् अविज्ञात-तद्-अर्थे प्रतिवादिनि वादि-धानुष्केण पक्ष-लक्ष्यं निर्दिश्यैव हेतु-शरः प्रोक्तव्य इति स्थितम्।
[न्या०अ०१७।०] साम्प्रतं हेतोर् लक्षणावसरस्, तच् च स्वार्थानुमानवन् निर्विशेषं द्रष्टव्यं॑ प्रयोगस् तु तत्र न दर्शितः, स्वार्थानुमानस्य बोध-रूपत्वाद्॑ इह तु दर्शनीयः, परार्थानुमानस्य वचन-रूपत्वाद्॑ अतस् तं दर्शयति॒
हेतोस् तथोपपत्त्या वा स्यात् प्रयोगोऽन्यथापि वा ।
द्वि-विधोऽन्यतरेणापि साध्य-सिद्धिर् भवेद् इति ॥ न्यायावतार १७ ॥
[न्या०अ०१७।१] स्वार्थानुमान-प्रस्तावे हि पर-प्रणीत-लक्षणान्तर-व्यपोहेन साध्य-व्यतिरेकात् सामस्त्येन हेतोर् व्यावृत्तिर् एवैकं लक्षणम् इति निर्णीतम्। परार्थानुमानेऽपि तद् एव प्रकाशनीयं, वचन-रचना तु क्वचित् कथञ्चित् प्रवर्तत इत्य् अभिप्रायवांस् तद्-द्वैविध्यम् आह॒ हेतोर् द्विविधः प्रयोगः स्याद् इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ तथैव साध्य-सद्भाव एवोपपत्तिर् विद्यमानता, तया तथोपपत्त्या, यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर् इति। अन्यथापि वेत्य् अनेनावयवे समुदायोपचाराद् अन्यथानुपपत्तिं लक्षयति। अन्यथा साध्य-व्यतिरेकेऽनुपपत्तिर् अविद्यमानतैव तया वान्यथानुपपत्त्या हेतोः प्रयोगः स्याद्, यथाग्निर् अत्र, धूमस्यान्यथानुपपत्तेर् इति। ‘एते च द्वे अप्य् एकस्मिन् साध्ये प्रयोक्तव्येऽ॑ इति यो मन्येत,तच्-छिष्यणार्थं आहान्यतरेणापि तथोपपत्ति-प्रयोगेणान्यथानुपपत्ति-प्रयोगेण वा साध्यस्य प्रतिपिपादयिषितार्थस्य सिद्धिर् निष्पत्तिः प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोहणं भवेद्, इति यस्मात्, तस्मान् न द्वे अपि प्रयोक्तव्ये, प्रयोग-द्वयेऽपि यस्माद् वचन-रचना भिद्यते, नार्थः॑ प्रयोगस्य च साध्य-साधनं फलं॑ तच् चेद् एकेनैव सिध्यति, द्वितीय-प्रयोगः केवलं वक्तुर् अकौशलमाचक्षीत, नैरर्थक्याद् इत्य् अभिप्रायः।
[न्या०अ०१८।०] अधुना दृष्टान्त-लक्षणावसरः। स च द्वेधा॒ साधर्म्येण वैधर्म्येण च। तत्र साधर्म्य-दृष्टान्तम् अधिकृत्याह॒
साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर् यत्र निश्चीयते-तराम् ।
साधर्म्येण स दृष्टान्तः सम्बन्ध-स्मरणान् मतः ॥ न्यायावतार १८ ॥
[न्या०अ०१८।१] दृष्टयोर् अवलोकितयोः सामर्थ्यात् साध्य-साधनयोर् अन्तः परिनिष्ठितिः अन्वयाद् व्यतिरेकाद् वा साध्य-साधन-भाव-व्यवस्थिति-निबन्धनास्मिन्न् इति दृष्टान्तः॑ समानो धर्मोऽस्येति सधर्मा तद्-भावः साधर्म्यं तेन साधर्म्येण। स किं-विधो भवत्îत्य् आह॒ साध्यं जिज्ञासितार्थात्मकं, साधनं तद्-गमको हेतुः, तयोः साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर्, इदम् अनेन विना न भवत्îत्य्-एवं-रूपा, यत्र क्वचिन् निश्चीयते-तरां अतिशयेन निर्णीयते स साधर्म्य-दृष्टान्तः। यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर्, महानसादिवद् इति। अयं चाविस्मृत-प्रतिबन्धे प्रतिवादिनि न प्रयोक्तव्य इत्य् आह॒ सम्बन्ध-स्मरणाद् इति, ल्यब्-लोपे पञ्चमी, प्राग्-गृहीत-विस्मृत-सम्बन्ध-स्मरणम् अधिकृत्य मतोऽभिप्रेतोऽयं नीतिविदाम्, नान्यदा। यदा हि प्रतिपाद्योऽद्यापि सम्बन्धं साध्याविनाभावित्व-लक्षणं नावबुध्यते, तदा प्रमाणेन सम्बन्धं ग्राहणीयो, न दृष्टान्त-मात्रेण, न हि सह-दर्शनाद् एव क्वचित् सर्वत्रेदम् अमुना विना न भवत्îति सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। गृहीते च प्रतिबन्धे स्मर्यमाणे केवलं हेतुर् दर्शनीयः, तावतैव बुभुत्सितार्थ-सिद्धेर् दृष्टान्तो न वाच्यो, वैयर्थ्यात्। यदा तु गृहीतोऽपि विस्मृतः कथञ्चित् सम्बन्धस्, तदा तत्-स्मरणार्थं दृष्टान्तः कथ्यते।
[न्या०अ०१८।२] ननु च कथं त्रि-काल-समस्त-देश-व्यापि-सम्बन्धावगतिः? न तावन् निर्णयात्मकम् अपि प्रत्यक्षं देश-कालान्तर-संचरिष्णुनोः साध्य-साधनयोः सम्बन्धं निरीक्षितुं क्षमते, सन्निहितेऽर्थे विशदाध्यवसायेन प्रवृत्तेः। नापि शब्दात् तन्-निर्णयस्, तस्य परोपदेश-रूपतया स्वार्थानुमानाभाव-प्रसङ्गात्, तत्र परोपदेशाभावात्, तद्-अभावे सम्बन्धासिद्देस्, तद्-असिद्धाव् अनुमानानुत्थानाद् इति। अनुमानात् सम्बन्ध-ग्रहणे निरवधिर् अनवस्थानुषज्येत, सम्बन्ध-ग्राहिणोऽप्य् अनुमानस्य पुनः सम्बन्धान्तर-ग्रहण-सव्यपेक्षत्वाद् इति। अत्रोच्यते -- प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति येषां मिथ्याभिनिवेशस्, तेषां एष दोषो नास्माकम्, अन्वय-व्यतिरेक-ग्राहि-प्रत्यक्षानुपलम्भोत्तर-काल-भाविनोऽव्यभिचरित-त्रि-काल-व्यापि-गोचरस्य मति-निबन्धनस्योह-संज्ञितस्य प्रमाणान्तरस्य सम्बन्ध-ग्राहितयेष्टत्वात्, तद्-अनिष्टौ दृष्ट-व्यवहार-विलोप-प्रसङ्गात्, तद्-विलोपे च विचारानर्थक्य-प्राप्तेर् इति। अत्र प्रकरणे पुनर् अनुमानात् पार्थक्येनोहो न दर्शितः, सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-प्रवृत्तत्वाद् अस्य, शाब्दं तु पृथक् समर्थितं, तस्यात्रैव परार्थानुमानोपयोगित्वाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०१९।०] इदानीं वैधर्म्य-दृष्टान्तम् उपदर्शयन्न् आह॒
साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य् असम्भवः ।
ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधर्म्येणेति स स्मृतः ॥ न्यायावतार १९ ॥
[न्या०अ०१९।१] विसदृशो धर्मोऽस्येति विधर्मा, तद्-भावो वैधर्म्यं, तेन वैधर्म्येण दृष्टान्तः। की-दृश इत्य् आह॒ साध्ये गम्ये निवर्तमानेऽसम्भवति तु-शब्दोऽवधारणार्थो भिन्न-क्रमः, स च साधनस्यापि गमकस्याप्य् असम्भव एवेत्य् अत्र द्रष्टव्यः, ख्याप्यते प्रतिपाद्यते यत्र क्वचिद् दृष्टान्ते स वैधर्म्येण भवत्îति-शब्देन सम्बन्ध-स्मरणाद् इति।
[न्या०अ०२०।०] इदम् अत्रापि सम्बध्नाति॒ अस्यापि स्मर्यमाणे सम्बन्धे प्रयोगायोगाद् इति किम् अर्थं विस्मृत-सम्बन्ध एव प्रतिवादिनि दृष्टान्तः प्रयुज्यते, नान्यदेति पर-वचनावकाशम् आशङ्क्याह॒
अन्तर्-व्याप्त्यैव साध्यस्य सिद्धेर् बहिर्-उदाहृतिः ।
व्यर्था स्यात् तद्-असद्भावेऽप्य् एवं न्याय-विदो विदुः ॥ न्यायावतार २० ॥
[न्या०अ०२०।१] अन्यदाहि स्मर्यमाणे वा सम्बन्धे प्रयुज्येतागृहीते वा। यद्य् आद्यः पक्षः, सोऽयुक्तः। यदा सर्वत्र साध्याविनाभाविनं हेतुं स्मरति प्रतिपाद्यस्, तदा पक्षेऽपि तम् अवबुध्य कथं साध्यं न प्रतिपद्येत? ततश् चान्तः पक्ष-मध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वम् अन्तर्-व्याप्तिस्, तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेर् बहिर् विवक्षित-धर्मिणोऽन्यत्र दृष्टान्त-धर्मिण्य् उदाहृतिर् व्याप्ति-दर्शन-रूपा व्यर्था निष्प्रयोजना, तत्-प्रत्याय्यार्थाभावाद् इति। द्वितीय-पक्षस्यापि निर्दोषतां निरस्यन्न् आह॒ तद्-असद्भावेऽप्य् एवं सम्बन्धाग्रहणाद् अन्तर्-व्याप्त्य्-अभावेऽप्य् एवम् इति व्यर्थैव बहिर्-उदाहृतिः। न हि सह-दर्शनात् क्वचित् सर्वत्र तद्-रूपता सिध्यति, व्यभिचार-दर्शनात्। तस्माद् अगृहीत-सम्बन्धे प्रतिपाद्ये प्रमाणेन प्रतिबन्धः साध्यः। तत्-सिद्धौ तत एव साध्य-सिद्धेर् अकिञ्चित्-करी दृष्टान्तोदाहृतिर् इति न्याय-विदो न्याय-विद्वांसो विदुर् अवबुध्यन्त इति। इह च प्रकरणे शेषावयवानाम् उपनय-निगमन-शुद्धि-पञ्चक-लक्षणानां सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-परत्वाद् अस्य, यद्य् अपि साक्षाल् लक्षणं नोक्तं, तथाप्य् अत एव प्रतिपादितावयव-त्रयाद् बुद्धिमद्भिर् उन्नेयं॑ यतोऽवयवापेक्षया जघन्य-मध्यमोत्कृष्टास् तिस्रः कथा भवन्ति। तत्र हेतु-प्रतिपादन-मात्रं जघन्या। द्व्य्-आद्य्-अवयव-निवेदनं मध्यमा। सम्पूर्ण-दशावयव-कथनम् उत्कृष्टा। तत्रेह मध्यमायाः साक्षात् कथनेन जघन्योत्कृष्टे अर्थतः सूचयति, तद्-सद्भावस्य प्रमाण-सिद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२१।०] एवं पक्षादि-लक्षणं प्रतिपाद्येदानीं हेय-ज्ञाने सत्य् उपादेयं विविक्ततरं वेद्यत इति तद्-व्युदस्ताः पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताभासा वक्तव्याः। तत्र तावत् पक्ष-लक्षण-व्युदस्तान् पक्षाभासान् आह॒
प्रतिपाद्यस्य यः सिद्धः पक्षाभासोऽक्ष-लिङ्गतः ।
लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितोऽनेकधा मतः ॥ न्यायावतार २१ ॥
[न्या०अ०२१।१] पक्ष-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणत्वाच् च पक्षवद् आभासत इति पक्षाभासः। असाव् अनेकधानेक-प्रकारो मत इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ प्रतिपाद्यस्य प्रतिवादिनो यः कश्चित् सिद्धः प्रतीताव् आरूढ एव स पक्षाभासः, साध्यस्यैव पक्षत्वात्, सिद्धस्य साधनानर्हत्वाद्, अतिप्रसक्तेः। तथाक्ष-लिङ्गतोऽध्यक्ष-हेतुभ्यां लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितस् तिरस्-कृतो यः स पक्षाभासः। तत्र प्रतिपाद्य-सिद्धो यथा॒ पौद्गलिको घटः, सौगतं वा प्रति॒ सर्वं क्षणिकम् इत्य्-आदि। प्रत्यक्ष-बाधितो यथा॒ निरंशानि स्वलक्षणानि, परस्पर-विविक्तौ वा सामान्य-विशेषाव् इति। अनुमान-बाधितो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञ इति। लोक-बाधितो यथा॒ गम्या माता इति। स्व-वचन-बाधितो यथा॒ न सन्ति सर्वे भावा इति।
[न्या०अ०२२।०] साम्प्रतं हेतु-लक्षणं स्मारयंस् तद्-अपास्तान् हेत्व्-आभासान् आह॒
अन्यथानुपपन्नत्वं हेतोर् लक्षणम् ईरितम् ।
तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस् तद्-आभता ॥ न्यायावतार २२ ॥
[न्या०अ०२२।१] हेतोर् लक्षणम् असाधारण-धर्म-रूपं यद् ईरितं गमितम् अनेकार्थत्वाद् वा प्रतिपादितं स्वार्थानुमान-प्रस्तावे यद् उतान्यथानुपपन्नत्वम् इति तस्याप्रतीतिर् अनध्यवसायः, सन्देहो दोलायमानता, विपर्यासो वैपरीत्य-निर्णयो॑ऽप्रतीतिश् च सन्देहश् च विपर्यासश् चेति द्वन्द्वः॑ पश्चात् तदा सह तत्-पुरुषस्॒ तैस् तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस्॑ तद्-आभताआभानम् आभा तस्येव सम्यग्-घेतोर् इवाभास्येति तद्-आभस्, तद्-भावस् तत्ता, हेत्व्-आभासता भवत्îत्य् अर्थः।
[न्या०अ०२३।०] अधुना येन लक्षणेन यन्-नामा हेत्व्-आभासो भवति तद् दर्शयति॒
असिद्धस् त्व् अप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते ।
विरुद्धो योऽन्यथाप्य् अत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु ॥ न्यायावतार २३ ॥
[न्या०अ०२३।१] यः कश्चिद् अप्रतीतः प्रतीत्या अगोचरी-कृतोऽनिश्चितः सोऽसिद्ध-नामा हेत्व्-आभासः। तु-शब्दस् त्रयस्यापि भेदोद्द्योतकः। यस् त्व् अन्यथैव साध्यं विनैव विपक्ष एवेति यावद्, उपपद्यते सम्भवति स विरुद्धाभिधानः। यः पुनर् अन्यथापि साध्य-विपर्ययेणापि युक्तो घटमानको,ऽपि-शब्दात् साध्येनापि, सोऽत्र व्यतिकरेऽनैकान्तिक-संज्ञो ज्ञातव्य इति। तत्र प्रतिप्राणि-प्रसिद्ध-प्रमाण-प्रतिष्ठितानेकान्त-विरुद्ध-बुद्धिभिः कणभक्षाक्षपाद-बुद्धादि-शिष्यकैर् उपन्यस्यमानाः सर्व एव हेतवः, तद् यथैकान्तेनानित्यः शब्दो नित्यो वा, सत्त्वाद्, उत्पत्तिमत्त्वात्, कृतकत्वात्, प्रत्यभिज्ञायमानत्वाद् इत्य्-आदयो विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकतां स्वी-कुर्वन्त्îत्य् अवगन्तव्यम्।
[न्या०अ०२३।२] तथा ह्य्॒ अनित्यैकान्ते तावद् असिद्धाः सर्व एव हेतवश्, चाक्षुषत्ववत् तेषां ध्वनाव् अविद्यमानत्वाद्, असद्-आदि-व्यवच्छेदेनालीक-संवृति-विकल्पितत्वात्, पारमार्थिकत्वे त्व् एकस्यानेक-रूपापत्त्यानेकान्त-वादापत्तेः, कल्पना-रचित-सत्ताकानां च सर्व-शक्ति-विरह-रूपतया निःस्वभावत्वात्, तथापि तेषां साधनत्वे साध्यम् अपि निःस्वभावम् इति खर-विषाणं शश-विषाणस्य साधनम् आपद्यत इति शोभनः साध्य-सधन-व्यवहारः। सर्व एवायम् अनुमानानुमेय-व्यवहारो बुद्ध्य्-आरूढेन धर्म-धर्मि-न्यायेन न बहिः-सद्-असत्त्वम् अपेक्षते, तेनायम् अदोष इति चेद्, एवं तर्हि चाक्षुषत्वम् अपि शब्दे बुद्ध्याध्यारोप्य हेतुतयोच्यमानं नासिद्धतयोद्भावनीयं, विशेषाभावात्। अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदेन चाक्षुषत्वं बुद्ध्याध्यारोपयितुंपार्यते, न यथा कथञ्चिन्, न चासौ शब्देऽस्त्य्, अचक्षुर्-ग्राह्यत्वात् तस्य, तेनायम् अदोष इति चेत्, कोऽयम् अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदो नाम॒ व्यवच्छेद-मात्रं नीरूपं, व्यवच्छिन्नं वा स्वलक्षणं, व्यवच्छेदिका वा बुद्धिः स्व्âंश-मग्नापि बहिर्-वस्तु-ग्रहण-रूपतया प्लवमाना? नापरो वस्तु-धर्मो यत्र भेदाभेद-विकल्प-द्वारेणा दूषणं दित्सुर् भवान् इति चेत्, तर्हि स शब्दे नास्त्îति कैषा भाषा? एवं हि नभः-पुण्डरीकं तत्र नास्त्îति सत्त्वादिकम् अपि कल्पयितुं न शक्यम् इति प्रसज्येत। किं च, ते साधन-धर्मा धर्मिणि भवन्तोऽपि न भवद्-दर्शने प्रतीतिम् आरोहन्ति, प्रत्यक्षस्य विकल्प-विकलतया धर्म-निर्णय-शून्यत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविन्या वासना-प्रबोध-जन्याया विकल्प-बुद्धेः स्व्âंश-ग्रहण-पर्यवसित-शरीरत्वेन बहिः-स्वलक्षणे प्रवेशाभावात्, ततश् चाप्रतीतत्वात् सर्वस्यासिद्धत्वम्।
[न्या०अ०२३।३] नित्यैकान्तेऽपि धर्मिणोऽत्यन्त-व्यतिरिक्तानाम् अपारमार्थिकानां वा स्व-साधन-धर्माणां प्रमाणेनाप्रतीतत्वाद् असिद्धता द्रष्टव्या, धर्मिणोऽविनिर्लुठित-रूपाणां पारमार्थिकानां सकल-धर्माणां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धत्वेन निह्नोतुम् अशक्यत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।४] तथा विरुद्धतापि पक्ष-द्वयेऽपि सर्व-साधन-धर्माणाम् उन्नेयानेकान्त-प्रतिबद्ध-स्वभावत्वेन तत्-साधन-प्रवणत्वात्। एतच् चोत्तरत्र वक्ष्यामः।
[न्या०अ०२३।५] एवं पक्ष-द्वयेऽपि निर्दिश्यमानाः सर्व एव हेतवोऽनैकान्तिकताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति, परस्पर-विरुद्धाव्यभिचारित्वात्, समान-युक्त्य्-उपन्यासेन विपक्षेऽपि दर्शयितुं शक्यत्वात्।
[न्या०अ०२३।६] तथा हि॒ अनित्य-वादी नित्य-वादिनं प्रति प्रमाणयति। सर्वं क्षणिकं, सत्त्वाद्, अक्षणिके क्रम-यौगपद्याभ्याम् अर्थ-क्रिया-विरोधाद्, अर्थ-क्रिया-कारित्वस्य च भाव-लक्षणत्वात्, ततोऽर्थ-क्रिया व्यावर्तमाना स्व-क्रोडी-कृतां सत्तां व्यावर्तयेद् इति क्षणिकत्व-सिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियायां क्रमेण प्रवर्तितुम् उत्सहते, पूर्वार्थ-क्रिया-करण-स्वभावोपमर्द-द्वारेणोत्तर-क्रियायां प्रवृत्तेर्, अन्यथा पूर्वार्थ-क्रिया-करणाविराम-प्रसङ्गात्॑ तत्-स्वभाव-प्रच्यवे च नित्यतापयात्य्, अतादवस्थ्यस्यानित्य-लक्षणत्वात्। नित्योऽपि क्रम-वर्तिनं सह-कारि-कारणम् अर्थम् उदीक्षमाणस् तावद् असीत्, पश्चात् तम् आसाद्य क्रमेण कार्यं कुर्याद् इति चेन्, न, सह-कारि-कारणस्य नित्येऽकिञ्चित्-करत्वाद्, अकिञ्चित्-करस्यापि प्रतीक्षणेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियां कुरुते,ऽध्यक्ष-विरोधात्। न ह्य् एक-कालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिद् उपलभते॑ करोतु वा, तथाप्य् आद्य-क्षण एव सकल-क्रिया-परिसमाप्तेर् द्वितीयादि-क्षणेष्व् अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोर् एकस्मिन् विरुद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।७] नित्य-वादी पुनर् एवं प्रमाणयति॒ सर्वं नित्यं सत्त्वात्। क्षणिके सद्-असत्-कालयोर् अर्थ-क्रिया-विरोधात्, तल्-लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नात्îति, ततो निवर्तमानम् अनन्य-शरणतया नित्यत्वं साधयति। तथा हि॒ क्षणिकोऽर्थः सद् वा कार्यं कुर्यात्, असद् वा, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् आद्यः पक्षः, सम-समय-वर्तिनि व्यापारायोगात्, सकल-भावानां परस्परं कार्य-कारण-भाव-प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच् च। नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्य-करण-शक्ति-विकलत्वात्। अन्यथा शश-विषाणादयोऽपि कार्य-करणायोत्सहेरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२३।८] तद् एवम् एकान्त-द्वयेऽपि ये ये हेतवस् ते ते युक्तेः समानतया विरुद्धं न व्यभिचरन्त्य्॑ अविचारित-रमणीयतया मुग्ध-जन-ध्य्-आन्ध्यं चोत्पादयन्त्îति विरुधाव्यभिचारिणोऽनैकान्तिकाः, सर्व-वस्तु-धर्माणां वस्तुतोऽनेकान्त-प्रतिबद्धत्वाद् इति। तस्माद् अमी सर्व एव हेतवः सन्तोऽनेकान्तम् अन्तरेण नोपपद्यन्त इति तम् एव प्रतिपादयितुम् ईशते॑ विमूढ-बुद्धिभिः पुनः विपक्ष-साधनार्थम् उपन्यस्यमाना विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकताम् आबिभ्रत्îति स्थितम्।
[न्या०अ०२४।०] तद् एवं हेत्व्-आभासान् प्रतिपाद्य दृष्तान्त-लक्षण-व्युदस्तान् दृष्टान्ताभासान् आह॒
साधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
अपलक्षण-हेत्ûत्थाः साध्यादि-विकलादयः ॥ न्यायावतार २४ ॥
[न्या०अ०२४।१] साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शयितुम् अभिप्रेतं यस्मिंस् तत् साधर्म्यं, तेन। अत्र व्यतिकरे॑ दूष्यन्त इति दोषाः। दृष्टान्ता एव दोषा दृष्टान्त-दोषाः दृष्टान्ताभासा इत्य् अर्थः। न्याय-विद्-ईरिता विद्वद्भिर् गदिताः॑ साध्यं गम्यम्॑ आदि-शब्दात् साधनोभय-परिग्रहस्॑ तद्-विकलास् तच्-छून्याः। आदि-शब्दात् सन्दिग्ध-साध्य-साधनोभय-धर्मा गृह्यन्ते। किं-भूता एते इत्य् आह॒ अपगतं लक्षणं येभ्यस् ते तथा, ते च ते हेतवः, तेभ्य उत्था उत्थानं येषां तेऽपलक्षण-हेत्ûत्थाः॑ इदं च प्रायिकं विशेषणं, सम्यग्-घेताव् अपि वक्तृ-दोष-वशात् दृष्टान्ताभासतोपपत्तेर्, यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद्, घटवद् इत्य्-आदि।
[न्या०अ०२४।२] तत्र साध्य-विकलो यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वात्, प्रत्यक्षवत्॑ प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता-विकलत्वात्॑ तद्-भ्रान्तत्वे सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च प्रमाण-प्रमेयाभावान् न किञ्चित् केनचित् साध्यत इति भ्रान्त-वादिनो मूकतापनिपद्येत। साधन-विकलो यथा॒ जाग्रत्-संवेदनं भ्रान्तं, प्रमाणत्वात्, स्वप्न-संवेदनवत्॑ स्वप्न-संवेदनस्य प्रमाणता-वैकल्यात् तत्-प्रत्यनीक-जाग्रत्-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वाद् इति। उभय-विकलो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञः, प्रत्यक्षाद्य्-अनुपलब्धत्वात्, घटवद्॑ घटस्य सत्त्वात् प्रत्यक्षादिभिर् उपलब्धत्वाच् च। सन्दिग्ध-साध्य-धर्मो यथा॒ वीत-रागोऽयं, मरण-धर्मत्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे वीत-रागत्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, विशिष्ट-चेतो-धर्माणां विशिष्ट-व्याहारादि-लिङ्ग-गम्यत्वाद् रथ्या-पुरुषे तन्-निर्णयस्याप्य् अभावाद् इति। सन्दिग्ध-साधन-धर्मो यथा॒ मरण-धर्मायं पुरुषो, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे रागादिमत्त्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, वीत-रागस्यापि तथा सम्भवाद् इति। सन्दिग्धोभय-धर्मो यथासर्व-ज्ञोऽयं, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे प्रदर्शित-न्यायेनोभयस्यापि सन्दिग्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२४।३] ननु च परैर् अन्यद् अपि दृष्टान्ताभास-त्रयम् उक्तम्, तद् यथानन्वयोऽप्रदर्शितान्वयो विपरीतान्वयश् चेति। तत्रानन्वयो यथा॒ रागादिमान् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद्, इष्ट-पुरुषवद् इति। यद्य् अपि किलेष्ट-पुरुषे रागादिमत्त्वं वक्तृत्वं च साध्य-साधन-धर्मौ दृष्टौ, तथापि यो यो वक्ता स स रागादिमान् इति व्याप्त्य्-असिद्धेर् अनन्वयोऽयं दृष्टान्तः। तथाप्रदर्शितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवद् इति। अत्र यद्य् अपि वास्तवोऽन्वयोऽस्ति, तथापि वादिना वचनेन न प्रकाशित इत्य् अप्रदर्शितान्वयो दृष्टान्तः। विपरितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति हेतुम् अभिधाय यद् अनित्यं तद् कृतकं घटवद् इति, विपरीत-व्याप्ति-दर्शनाद् विपरीतान्वयः, साधर्म्य-प्रयोगे हि साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शनीयम्, इह तु विपर्यास-दर्शनाद् विपरीतता। तद् एतद् भवद्भिः कस्मान् नोक्तम् इति।
[न्या०अ०२४।४] अत्रोच्यते -- परेषां न सुपर्यालोचितम् एतद् दृष्टान्ताभास-त्रयाभिधानम् इति ज्ञापनार्थम्। तथा हि॒ न तावद् अनन्वयो दृष्टान्ताभासो भवितुम् अर्हति। यदि हि दृष्टान्त-बलेन व्याप्तिः साध्य-साधनयोः प्रतिपाद्येत, ततः स्याद् अनवयो दृष्टान्ताभासः, स्व-कार्याकरणाद्, यदा तु पूर्व-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्राहि-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोदाहृतिर् इति स्थितं, तदानन्वयत्व-लक्षणो न दृष्टान्तस्य दोषः, किं तर्हि हेतोर् एव, प्रतिबन्धस्याद्यापि प्रमाणेनाप्रतिष्ठितत्वात्, प्रतिबन्धाभावे चान्वयासिद्धेः। न च हेतु-दोषोऽपि दृष्टान्ते वाच्यो,ऽतिप्रसङ्गाद् इति। तथाप्रदर्शितान्वय-विपरीतान्वयाव् अपि न दृष्टान्ताभासतां स्वी-कुरुतो,ऽन्वयाप्रदर्शनस्य विपर्यस्तान्वय-प्रदर्शनस्य च वक्तृ-दोषत्वात्, तद्-दोष-द्वरेणापि दृष्टान्ताभास-प्रतिपादने तद्-इयत्ता विशीर्येत, वक्तृ-दोषाणामानन्त्यात्। वक्तृ-दोषत्वेऽपि परार्थानुमाने तत्-कौशलम् अपेक्षत इति। एवं चोपन्यासे न बुभुत्सितार्थ-साधकाव् अतो दृष्टान्ताभासाव् एताव् इति चेद्, एवं तर्हि करणापाटवादयोऽपि दृष्टान्ताभासा वाच्याः। तथा हि॒ करण-पाटव-व्यतिरेकेणापि न पर-प्रत्यायनं समस्ति, विस्पष्ट-वर्णाग्रहणे व्यक्ततया तद्-अर्थावगमाभावाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२५।०] तद् एवं साधर्म्येण दृष्टान्ताभासान् प्रतिपाद्य वैधर्म्येणाह॒
वैधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
साध्य-साधन-युग्मानाम् अनिवृत्तेश् च संशयात् ॥ न्यायावतार २५ ॥
[न्या०अ०२५।१] साध्याभावः साधनाभाव-व्याप्तौ दर्शयितुम् अभिप्रेतो यस्मिंस् तद् वैधर्म्यम्, तेनात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिता इति दत्तार्थम्। साध्य-साधन-युग्मानां गम्य-गमकोभयानाम् अनिवृत्तेर् अनिवर्तनाच्, च-शब्दस्य व्यवहित-प्रयोगत्वात् संशयाच् च निवृत्ति-सन्देहाच् चेत्य् अर्थः। तद् अनेन षड् दृष्टान्ताभासाः सूचितास्, तद् यथा -- साध्याव्यतिरेकी, साधनाव्यतिरेकी, साध्य-साधनाव्यतिरेकी, तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकश् चेति।
[न्या०अ०२५।२] तत्र साध्याव्यतिरेकी यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानम्, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनर् भ्रान्तं न भवति न तत् प्रमाणं, तद् यथा स्वप्न-ज्ञानम् इति॑ स्वप्न-ज्ञानाद् भ्रान्ततानिवृत्तेः साध्याव्यतिरेकित्वम् इति। साधनाव्यतिरेकी यथा॒ निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनः सविकल्पकं न तत् प्रमाणं, तद् यथानुमानम्॑ अनुमानात् प्रमाणतानिवृत्तेः साधनाव्यतिरेकित्वम् इति। उभयाव्यतिरेकी यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, सत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् न नित्यानित्यः स न सन्, तद् यथा -- घटो॑ घटाद् उभयस्याप्य् अव्यावृत्तेर् उभयाव्यतिरेकित्वम् इति। तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेको यथासर्व-ज्ञा अनाप्ता वा कपिलादयो,आर्य-सत्य-चतुष्टयाप्रतिपादकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनः सर्व-ज्ञ आप्तो वाऽसाव् आर्य-सत्य-चतुष्टयं प्रत्यपीपदत्, तद् यथा -- शौद्धोदनिर् इति। अयं च साध्याव्यतिरेकी वार्य-सत्य-चतुष्टयस्य दुःख-समुदय-मार्ग-निरोध-लक्षणस्य प्रमाण-बाधितत्वेन तद्-भाषकस्यासर्वज्ञतानाप्ततोपपत्तेः। केवलं तन्-निराकारक-प्रमाण-सामर्थ्य-पर्यालोचन-विकलानां सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकतया प्रतिभात्îति तथोपन्यस्तः। तथा हि॒ यद्य् अप्य् आर्य-सत्य-चतुष्टयं शौद्धोदनिः प्रतिपादितवांस्, तथापि सर्वज्ञताप्तते तस्य न सिद्ध्यतः, ताभ्यां सहार्य-सत्य-चतुष्टय-प्रतिपादनस्यान्यथानुपपत्त्य्-असिद्धेर्, असर्व-ज्ञानाप्तेनापि पर-प्रतारणाभिप्राय-प्रवृत्त-निपुण-बुद्धि-शठ-पुरुषेण तथा-विध-प्रतिपादनस्य कर्तुं शक्यत्वात्। तस्माच् छौद्धोदनेः सकाशाद् असर्व-ज्ञतानाप्तता-लक्षणस्य साध्यस्य व्यावृत्तिः सन्दिग्धेति सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेको यथा॒ऽनादेय-वाक्यः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो रागादिमत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् आदेय-वाक्यो, न स रागादिमांस्, तद् यथा -- सुगत इति। यद्य् अपि तद्-दर्शनानुरक्तान्तः-करणाणां सुगतस्यादेय-वचनता सिद्धि-सौध-मध्यारूढा, तथापि रागादिमत्त्वाभावस् तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैधुर्यात् सन्देह-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अतः सुगताद् रागादिमत्ता-व्यावृत्ति-संशयात् सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेको यथा॒ न वीत-रागाः कपिलादयः, करुणास्पदेष्व् अप्य् अकरुणापरीत-चित्ततयादत्त-निजक-मांस-शकलत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ ये पुनर् वीत-रागास् ते करुणास्पदेषु करुणा-परीत-चित्ततया दत्त-निज-मांस-शकलास्, तद् यथा -- बोधिसत्त्वा इति। अत्र साध्य-साधन-धर्मयोर् बोधिसत्त्वेभ्यो व्यावृत्तिः सन्दिग्धा॑ तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैकल्यान् न ज्ञायते किं ते रागादिमन्त उत वीत-रागाः॑ तथानुकम्प्येषु किं स्व-पिशित-खण्डानि दत्तवन्तो नेति वा। अतः सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति।
[न्या०अ०२५।३] परैर् अपरेऽपि दृष्टान्ताभासास् त्रयोऽविमृश्य-भाषितया दर्शिताः। तद् यथा -- अव्यतिरेको,ऽप्रदर्शित-व्यतिरेको, विपरीत-व्यतिरेकश् चेति। तेऽस्माभिर् अयुक्तत्वान् न दर्शयितव्याः। तथा ह्य्॒ अव्यतिरेकस् तैर् दर्शितो, यथावीत-रागः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-डृष्टान्तो॒ यः पुनर् वीत-रागो, न स वक्ता, यथोपल-खण्ड इति। यद्य् अपि किलोपल-खण्डाद् उभयं व्यावृत्तं, तथापि व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेर् अव्यतिरेकित्वम् इति। अयुक्तश् चायं वक्तुम्, अव्यतिरेकिताया हेतु-दोषत्वात्। यदि हि दृष्टान्त-बलेनैव व्यतिरेकः प्रतिपाद्येत, तदा तथा-विध-सामर्थ्य-विकलस्य तद्-आभासता युज्येत, न चैतद् अस्ति, प्राक्-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवण-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोपादानात्। न ह्य् एकत्र यो यद्-अभावे न दृष्टः, स तद्-अभावे न भवत्îति प्रतिबन्ध-ग्राहि-प्रमाण-व्यतिरेकेण सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। तस्माद् असिद्ध-प्रतिबन्धस्य हेतोर् एवायं दोषो, न दृष्टान्तस्येति। तथाप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकाव् अपि वक्तुम् अयुक्तौ, तयोर् वक्तृ-दोषत्वात्। तथा ह्य्॒ अप्रदर्शित-व्यतिरेकस् तैर् उक्तो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, आकाशवद् इति। अत्र विद्यमानोऽपि व्यतिरेको वादिना वचनेन नोद्भावित इति दुष्टता। विपरीत-व्यतिरेकः पुनर् अभिहितो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यद् अकृतकं तन् नित्यं भवति, यथाकाशम् इति। अत्र विपर्यस्त-व्यतिरेक-प्रदर्शनाद् विपरीत-व्यतिरेकित्वम्। वैधर्म्य-प्रयोगे हि साध्याभावः साधनाभावाक्रान्तो दर्शनीयो, न चैएवम् अत्र, साधनाभावस्य साध्याभाव-व्याप्ततयाभिधानाद् इति।
[न्या०अ०२५।४] व्यतिरेकाप्रदर्शनं विपरीत-व्यतिरेक-प्रदर्शनं च न वस्तुनो दोषः, किं तर्हि वचन-कुशलता-विकलस्याभिधायकस्य। किं च, येषां भवताम् अदो दर्शनं॒ यद् उत स्वार्थानुमान-काले स्वयं हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीतेः परार्थानुमानावसरेऽपि हेतु-प्रतिपादनम् एव कर्तव्यं "विदुषां वाच्यो हेतुर् एव हि केवल" इति-वचनात् तेषां ‘कृतकत्वाद्ऽ॑ इत्îयता हेत्ûपन्यासेनैव सिसाधयिषित-साध्य-सिद्धेः समस्त-दृष्टान्ताभास-वर्णनम् अपि पूर्वापर-व्याहत-वचन-रचना-चातुर्यम् आविर्-भावयति।आसातां तावद् एतौ, दृष्टान्तस्य साधनावयवत्वेनानभ्युपगमात्। अथेत्थम् आचक्षीथा॒ अन्वय-व्यतिरेकापरिज्ञाने प्रतिपाद्यस्य न दृष्टान्तम् अन्तरेणैतौ दर्शयितुं शक्याव्, अतोऽन्वय-व्यतिरेक-दर्शनार्थं दृष्टान्तोऽभिधातव्यस्, ततश् च तत्-कार्याकारिणां तद्-आभासतेति चेद्, गले गृहीतस्यायम् उल्लापस्, तथाप्य् अप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकौ दृष्टान्ताभासौ न वास्तवौ, किं तर्हि वक्तृ-दोष-समुत्थाव्॑ अतो नाभिधातुं युक्तौ, तथा-विधस्य विद्यमान-वस्तु-प्रकाशन-सामर्थ्य-रहितस्य निबिड-जडिमावष्टब्धस्य पुंसो वादानधिकारित्वान्, मातृका-पाठ-शाला-योग्यतया विदुषां वादयितुम् अयुक्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२६।०] तद् एवं परार्थानुमानं व्याचक्षाणेन यद् उक्तं -- यद् उत "तत् पक्षादि-वचनात्मकम्" इति -- तत् पक्ष-हेतु-दृष्टान्तानां साभासानां प्रतिपादनात् प्रायः पर्यन्तितं॑ केवलं तत् परोक्त-दूषणोद्धाराद् एव समीचीनताम् आबिभर्त्îत्य् अमुना प्रस्तावेन दूषणं साभासम् अभिधातुकाम आह॒
वाद्य्-उक्ते साधने प्रोक्त-दोषाणाम् उद्भावनम् । दूषणं निरवद्ये तु दूषणाभास-नामकम् ॥ न्यायावतार २६ ॥
[न्या०अ०२६।१] वदन-शीलो वादी प्रत्यायकस्, तेनोक्त उपन्यस्ते॑ कस्मिन्? साधने॑ साध्यते प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोप्यतेऽनुमेयं येन तत् साधनम्। तच् चानेक-रूपं प्राक् प्रत्यपादि, तद् यथा -- क्वचिद् धेतुर् एवैकः, क्वचित् पक्ष-हेतू, क्वचित् पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताः, क्वचित् त एव सोपनयाः, क्वचित् सनिगमनाः, क्वचिद् एकैक-तच्-छुद्धि-वृद्ध्येति, प्रतिपाद्यस्य क्वचित् कथञ्चित् प्रत्याययितुं शक्यत्वात्, तत्-प्रत्यायनोपायस्य च साधनत्वाद् इति। तत्रेह सम्यक्-साधनस्य दूषयितुम् अशक्यत्वात्, साधनाभास एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेः, साधनाभासम् एव दूषनोपनिपातात् प्राग् अवस्थायाम् अनिर्ज्ञातं सामान्येन साधन-ध्वनिनोक्तं, तत्र प्रोक्त-दोषाणां प्रत्यक्षादि-निराकृत-पक्षासिद्धादि-हेतु-साध्यादि-विकल-दृष्टान्ताद्य्-उपन्यास-लक्षणानाम् उद्भावनं प्राश्निकानां पुरतः प्रकाशनं यत् तद् दूष्यते स्वाभिप्रेत-साध्य-प्रत्यायन-वैकल्य-लक्षणां विकृतिं नीयते साधनम् अनेनेति दूषणम् इति ज्ञेयम्।
[न्या०अ०२६।२] अधुना तद्-आभासम् आह॒ निर्गतं सम्यक्-प्रयुक्तत्वाद् अवद्यं पापं पक्षादि-दोष-लक्षणं दौष्ट्यम् अस्माद् इति निरवद्यं, तस्मिन् साधने वादिनोक्त इति वर्तते। तथापि मत्सरितया प्रमृद्योदरं यद् अविद्यमानानां दोषाणाम् उद्भावनं तद् दूषण-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणात् सम्यक्-साधने दोषोद्भावनस्य प्रलापायमानत्वाद् दूषणवदाभासत इति दूषणाभासम् इति॑ तद् एव नाम संज्ञा यस्य तत्-तथा। समर्थ-साधनोपन्यासत्वात् साधिते साध्ये सताम् अप्य् अपशब्दालङ्कारादि-दोषाणां यद् उद्भावनं तद् अपि दूषणाभास-नामकम् इति। तु-शब्देन विशेषणार्थेन दर्शयति वस्तु-सिद्ध्य्-अर्थं वाद-प्रवृत्तेस्, तस्य सिद्धत्वाद्, अपशब्दादीनाम् अप्रस्तुततया तद्-द्वरेण दोष-प्रकाशनस्यासम्बद्ध-प्रलाप-रूपत्वाद्, इतरथा तावन्-मात्रेणैव परापाकरण-सिद्धेः समर्थ-साधनान्वेषण-प्रयत्नो विशीर्येत, प्रयोजनाभावाद् इति।
[न्या०अ०२७।०] तद् एवं व्यावहारिक-प्रमाणस्य प्रत्यक्ष-परोक्ष-स्वार्थ-परार्हादि-भेद-भिन्नस्य लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यैः पारमार्थिकं समस्तावरण-विच्छेद-लभ्यम् अशेषार्थ-गोचरं केवल-ज्ञानं नाभ्युपगम्यते, तन्-मतोद्दलनार्थं तल्-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
सकलावरण-मुक्तात्म केवलं यत् प्रकाशते ।
प्रत्यक्षं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् ॥ न्यायावतार २७ ॥
[न्या०अ०२७।१] सकलं समस्तम्, आवृणोत्याव्रियते वानेनेत्य् आवरणं, तत्-स्वरूप-प्रच्छादनं कर्मेत्य् अर्थः, सकलं च तद् अवारणं च सकलावरणं, तेन मुक्तो रहित, आत्मा स्वरूपं यस्य तत्-तथा। अत एव केवलम् असहायम्, आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतयैव बोधस्य नानाकारतया प्रवृत्तेः, सामस्त्येन पुनर् आवरण-निर्दलने विबन्धक-कारण-वैकल्याद् एकाकारतयैव तस्य विवर्तनात्। अतो ज्ञानान्तर-निरपेक्षं यत् प्रकाशते प्रथते निरुपाधिकं द्योतत इत्य् अर्थः, तत् परमार्थतः प्रत्यक्षम्। तद् इदं सकलावरण-मुक्तात्मेति-हेतु-द्वारेण तथा केवलं यत् प्रकाशत इति-स्वरूपतो निरूप्याधुना कार्य-द्वारेण निरूपयन्न् आह॒ सकलार्थात्मनां समस्त-वस्तु-स्वरूपाणां सतत-प्रतिभासनम् अनवरत-प्रकाशनं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् इति, प्रतिभास्यतेऽनेनेति प्रतिभासनम्, आत्मनो धर्म-रूपतया भेदवद्-विवक्षितं ज्ञानम् इति यावत्। अस्य च पारमार्थिकत्वं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेः। तथा ह्य्॒ अक्ष-शब्दो जीव-पर्यायस्, ततश् चाक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं, यत्रात्मनः साक्षाद् व्यापारः। व्यावहारिकं पुनर् इन्द्रिय-व्यवहितात्म-व्यापार-सम्पाद्यत्वात् परमार्थतः परोक्षम् एव॒ धूमाद् अग्नि-ज्ञानवत्, तिरो-धानाविशेषात्।
[न्या०अ०२७।२] ननु च प्रसिद्धं लक्ष्यम् अनूद्याप्रसिद्धं लक्षणं विधीयते -- सर्वत्रायं न्यायः। अप्रसिद्धे पुनर् लक्ष्ये लक्षणम् अभिधीयमानम् अम्बरारविन्दिनी-कुसुम-लक्षणवन् निर्गोचरतां यायात्। तद् इदं स्वरूपतोऽप्रसाध्य लक्षणम् अभिदधानस्य कोऽभिप्राय इत्य्॑ अत्रोच्यते -- ये ये मिथ्यावलेपाध्मातान्तः-करणाः प्रमाण-प्रसिद्धम् अप्य् अदः प्रति विप्रतिपद्यन्ते, तेषां ध्य्-आन्धी-कृत-बुद्धित्वाद् अवधारणीयताम् अनेन दर्शयति। किम् अस्य प्रतिपादकं प्रमाणम् इति चेद्, एते ब्रूमः॒
[न्या०अ०२७।३] समस्ति समस्त-वस्तु-विस्तार-गोचरं विशद-दर्शनं, तद्-गोचरानुमान-प्रवृत्तेः॑ इह यद्-यद्-गोचरम् अनुमानं प्रवर्तते, तस्य तस्य ग्राहकं किञ्चित् प्रत्यक्षम् उदय-पदवीं समासादयति, यथा चित्र-भानोः॑ प्रवर्तते च सकलार्थ-विषयम् अनुमानम्॑ अतस् तद्-अवलोकिना विशद-दर्शनेनापि भाव्यम् इति। सर्वार्थ-विषयं किम् अनुमानं प्रवर्तत इति चेद्, इदम् अपि ब्रूम॒ इह यद् यद् अस्ति तत् तत् सर्वं स्थित्य्-उदयापवर्ग-संसर्गम् अनुभवति, वस्तुत्वात्॑ यद् यद् वस्तु तत् तत् स्थेम-जन्म-प्रलयैः क्रोडी-कृतं॑ तद् यथाङ्गुलिर् अङ्गुलित्व-वक्रत्व-र्जुत्वापेक्षयेति॑ वस्तु च यद् अस्त्य्, अतः प्रस्तुत-त्रयाक्रान्तं तद् अवगन्तव्यम्। इदम् एव निखिलार्थ-गोचरम् अनेकान्तानुमानं ज्ञान-क्रियाभ्यासातिशयान् निखिलावरण-विच्छेदे विबन्धक-कारणाभावाद् विशद-दर्शनी-भवति। न चानुमान-प्रवृत्ताव् अप्य् अनर्थित्वादिना प्रमातुर् अप्रवृत्ताव् अनुमेय-गोचर-प्रत्यक्षासम्भवेन व्यभिचारश् चोदनीयः, सम्भवस्य साध्यतयाभिप्रेतत्वात्। न च सम्भव-मात्रेऽस्ति व्यभिचारः, सर्वानुमेयानां सम्भवत्-प्रत्यक्षतया व्याप्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२७।४] अथवान्यथानुमानयामः॒ सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक आत्मा, विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायत्वाद्॑ इह यो यो विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायः स स सम्भवत्-समस्त-शुद्धिको॑ यथा विद्यमान-क्षार-मृत्-पुट-पाकादि-शुद्ध्य्-उपायो रत्न-विशेषस्, तथा च विद्यमान-ज्ञानाद्य्-अभ्यास-शुद्ध्य्-उपाय आत्मातः सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक इति। सामस्त्य-शुद्धश् चात्मा ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदात् केवलम् अभिधीयत इति। ज्ञानाद्य्-अभ्यासः कथं विशुद्धि-कारणम् इति चेद्, आवरण-मल-प्रतिपक्ष-रूपत्वाद् इति ब्रूमः। प्रतिपक्ष-रूपता कथम् अवधारितेइति चेत्, तवैव दर्शनात्। तथा हि॒ दृश्यते ज्ञानाद्य्-अभ्यासतः प्रतिक्षणम् आवरण-विलयो, विशिष्ट-विशिष्टतर-तत्-कार्य-बोधाद्य्-अनुभवात्, तद्-अतिशये पुनः सामस्त्योच्छेदः स्याद् इत्य् अभिदध्महे। एतेन यत् परे प्रोचुर् -- यथा॒ प्रत्यक्षादि-प्रमाण-पञ्चक-गोचरातिक्रान्तत्वात् सर्वार्थ-संवेदनम् अभावाख्य-षष्ठ-प्रमाण-गोचरतां प्रतिपद्यते -- तद् अयुक्तं, तत्-सम्भवस्यानुमानेन प्रतिपादनात्, प्रमाण-पञ्चक-प्रवर्तनाभावासिद्धेः। किं च, प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं न प्रवर्तत इति कथं भवतो निर्णयः? किं नियत-देश-काल-व्याप्त्या यद् वा समस्त-देश-कालास्कन्दनेनेति? यद्य् आद्यः पक्षस्, ततो यथा घटादेः क्वचित् प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं निर्वर्तमानम् अभावं साधयत्य्, एवं समस्त-वस्तु-संवेदन-गोचरम् अपि तन् निवर्तमानं नियत-देश-दशावच्छिन्नम् अभावं साधयेन्, न सर्वत्र॑ ततश् च घटादिवत् तद् दुर्निवारं स्यात्। अथ द्वितीयः पक्षो,ऽसाव् असम्भव्य् एव॑ समस्त-देश-काल-वर्ति-पुरुष-परिषत्-संवेदन-साक्षात्-कारिणो ह्य् एवं वक्तुं युक्तं, यद् उत न क्वचित् समस्तार्थ-संवेदनं अस्त्îति -- न भवतस्, तथा-विध-पुरुष-सम्भवानभ्युपगमात्। इतरथा य एव कश्चिन् निश्चित्यैवम् अभिदध्यात्, स एव समस्त-वस्तु-विस्तार-व्यापि-ज्ञानालोक इति समस्तार्थ-गोचर-संवेदन-सिद्धिर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२८।०] तद् एवं प्रमाण-विषये लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराकृत्याधुना क्रम-प्राप्तां गोचर-विप्रतिपत्तिं बहु-वक्तव्यत्वाद् अनिराकृत्य तावत् फल-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षुर् आह॒
प्रमाणस्य फलं साक्षाद् अज्ञान-विनिवर्तनम् ।
केवलस्य सुखोपेक्षे शेषस्यादान-हान-धीः ॥ न्यायावतार २८ ॥
[न्या०अ०२८।१] द्वि-विधं हि प्रमाणस्य फलं॒ साक्षाद् असाक्षाच् चानन्तरं व्यवहितं चेत्य् अर्थः। तत्र साक्षाद् अज्ञानम् अनध्यवसायः प्रमेयापरिच्छित्तिस् तस्य विनिवर्तनं विशेषेण प्रलयापादनं प्रमाणस्य फलम्, अज्ञानोद्दलन-द्वारेण तस्य प्रवृत्तेस्, तस्य च सर्वानर्थ-मूलतया प्रमात्र्-अपकारित्वात्। तन्-निवर्तनस्य प्रयोजनता युक्तैव। एतच् चानन्तर-प्रयोजनं सर्व-ज्ञानानाम् एक-रूपत्वात् सामान्येनोक्तम्। व्यवहित-प्रयोजनं पुनर् विभागेनाह॒ केवलस्य सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सुखं वैषयिक-सुखातीत-परमाह्लादानुभव, उपेक्षा साक्षात् समस्तार्थानुभवेऽपि हानोपादानेच्छाभावान् मध्य-स्थ-वृत्तिता, ते सुखोपेक्षे फलम् इत्य् अर्थः। शेषस्य तद्-व्यतिरिक्त-प्राकृत-लोक-प्रमाणस्यादानं ग्रहणं हानं परित्यागस्, तयोर् आदान-हानयोर् धीर् बुद्धिर् आदान-हान-धीः, सा फलम् इति यावत्। ततश् चादेयानां सम्यग्-दर्शनादि-स्रक्-चन्दनादीनां यादित्सा, तथा हेयानां मिथ्या-दर्शनादि-विष-कण्टकादीनां या जिहासा सा प्रमाण-साध्याप्रमाणात् तद्-असिद्धेः, प्रेक्षा-पूर्व-कारिणां ततः प्रवृत्त्य्-अयोगाद् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०अ०२९।०] अधुना गोचर-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे॒
अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचरः सर्व-संविदाम् ।
एक-देश-विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः ॥ न्यायावतार २९ ॥
[न्या०अ०२९।१] अनेके बहवोऽन्ता अंशा धर्मा वात्मानः स्वरूपाणि यस्य तद् अनेकान्तात्मकम्। किं तत्? वस्तु बहिर् अन्तश् च, गोचरो विषयः, सर्व-संविदां समस्त-संवित्तीनाम्। अनेनानेकान्तम् अन्तरेण संवेदन-प्रसर-व्यवच्छेदं दर्शयति, भ्रान्त-संवेदनानाम् अप्य् अनेकान्तोद्द्योतन-पटिष्ठतया प्रवृत्तेः, केवलं केषुचिद् अंशेषु विसंवादकत्वाद् अप्रमाणानि तानि सङ्गीर्यन्ते। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यदा संवेदन-सामान्यम् अप्य् अनेकान्त-विरहेण न प्रवर्तितुम् उत्सहते, तदा तद्-विशेष-भूतं प्रमाणम् एकान्ते प्रवर्तिष्यत इति दूरापास्तावकाशैवैषा वार्ता, तथाप्य् अनादि-मिथ्याभिनिवेश-वासितान्तः-करणाः कुदर्शन-विप्रलब्ध-बुद्धयो बहवोऽत्र विप्रतिपद्यन्त इति सर्व-प्रमाणानाम् अनेकान्त-गोचरत्व-साधकं प्रमाणम् अभिधीयते॒ इह यत् प्रमाणं तत् परस्पराविनिर्लुठितानेक-धर्म-परिकरित-वस्तुनो ग्राहकं, तस्यैव तत्र प्रतिभासमानत्वाद्॑ इह यद् यत्र प्रतिभाति, तद् एव तद्-गोचरतयाभ्युपगन्तव्यं॑ तद् -- यथा निरादीनव-नयन-प्रभव-दर्शने प्रतिभासमानं पाटलतया जपा-कुसुमं तथैव तद्-गोचरतयाभ्युपगम्यते॑ परस्पराविभक्तानेक-स्वभावाक्रान्त-मूर्तिकं च बहिर् अन्तश् च वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रथत इत्य्॑ अतस् तद् एव तेषां गोचरः।
[न्या०अ०२९।२] न चेतरेतर-विशकलित-धर्मि-धर्म-भाव-वादिभिः कणभक्षाक्षपाद-शिष्यकैस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धतादि-दोषः प्रतिपादयितुं शक्यस्, तद्-अभ्युपगमम् अन्तरेण स्वाभिप्रेत-वस्तुनोऽवस्थानाभावात्। तथा ह्य्॒ एकस्मिन् धर्मिणि बहवो धर्मास् ततो भिन्न-तनवः कथं वर्तेरन्? भेदाविशेषेण सर्वत्र तद्-वृत्ति-प्रसङ्गात्। तत्रैव तेषां समवायान् नान्यत्र वर्तन्त इति चेन्, ननु सोऽपि समवायो यद्य् उपकार्योपकारक-भाव-व्यतिरेकेणापि भवति, ततः सर्वत्राविशेषेण प्रसज्येत, तद्-अभावाविशेषात्। अस्त्य् एवोपकार्योपकारक-भाव इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, अनेकोपकारकस्यानेक-स्वभावता-प्राप्तेस्, तद्-विरहेऽनेकोपकारकत्वाभावात्। न हि येन स्वभावेनैकस्योपकरोति तेनैव द्वितीयस्य, तस्य तत्रैवोपयुक्तत्वाद्, द्वितीयोपकारक-स्वभावस्य तद्-उपमर्दन-द्वारेणोत्पत्तेर्, इतरथैकम् एवोपकुर्वंस् तिष्ठेत्, तद्-एक-स्वभावात्। भिन्नाभिः शक्तिभिर् उपकरोति, न भिन्नैः स्वभावैस्, तेन नानेकान्त इति चेत्, तास् तर्हि तत्र कथं वर्तन्त इति वाच्यम्। समवायाद् इत्य्-उत्तरेऽसाव् अप्य् उपकार्योपकारक-भावम् अन्तरेण कथं न सर्वत्रेति प्राचीनं चोद्यं पश्चाल्-लग्नम् अनुधावति। उपकार्योपकारक-भावाभ्युपगमे पुनर् अप्य् अनेक-स्वभावता-प्रदर्शित-युक्तेः पुनः शक्त्य्-उपकारक-भिन्न-शक्ति-परिकल्पने तद् एवावर्तते, तन् न भिन्न-धर्म-परिकल्पनेऽप्य् अनेकान्तान् मोक्ष इति वरम् आदाव् एव मत्सरितां विहायानेक-धर्माध्यासितं वस्त्व् अभ्युपगतम्। किं भेद-कल्पनयास्थान एवात्मना परिक्लेशितेनेति। किं चानेकान्ताभ्युपगमे सत्य् एष गुणः॒ परस्पर-विभक्तेषु संयोगि-संयोग-समवायि-समवाय-गुण-गुण्य्-अवयवावयवि-व्यक्ति-सामान्यादिषु संयोग-समवाय-गुण्य्-अवयवि-सामान्यादीनां संयोगि-समवायि-गुणावयव-विशेषादिषु वर्तन-चिन्तायां यद् दूषण-जालम् उपनिपतति, तद् अपि परिहृतं भवत्य्, एकान्त-भेद एव तद्-उपपत्तेर्, अनेकान्ते तद्-उत्थानाभावात्। तथा हि॒ भिन्नाः खलु संयोगादयः संयोग्य्-आदिभ्यो विकल्पयितुं पार्यन्ते -- यद् उत कथम् एत एतेषु वर्तन्त इति? किम् एक-देशेन यद् वा सामस्त्येन? यद्य् एक-देशेन, तद् अयुक्तं, तेषां निरवयवत्वाभ्युपगमात्। सावयवत्वेऽपि तेभ्योऽवयवेभ्यो यद्य् अभिन्नास्, ततोऽनेकान्तापत्तिर्, एकस्यानेकावयवत्व-प्राप्तेः। अथ भिन्नास् तेष्व् अपि ते कथं वर्तन्त इत्य् वाच्यम्॒ एक-देशेन सामस्त्येन वा। एक-देश-पक्षे तद् एवावर्तत इत्य् अनवस्था। अथ सामस्त्येन, तद् अप्य् असाधीयः, प्रत्येकं परिसमाप्ततया संयोगादि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। तद्-अभिन्नाः पुनः संयोगादयो न विकल्प-भाजो भवन्ति। अभेद-पक्षेऽपि संयोगादि-मात्रं संयोग्य्-आदि-मात्रं वा स्याद् इति चेन्, न, तस्याप्य् एकान्तेनानभ्युपगमात्, किं तर्ह्य् अन्योन्याविश्लिष्ट-स्वरूपा विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदाः सर्व एवैतेऽभ्युपगम्यन्ते, तथा-विधानां कुयुक्ति-विकल्पोत्थापित-दूषण-समूह-निराकरण-क्षमत्वाद्, अबाधित-प्रतिभासेषु सर्वत्र तेषां तथैव प्रतिभासनाद्, अन्यथा प्रतिभासमानानाम् अन्यथा परिकल्पने दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-द्वारेणासमञ्जस-प्राप्तेस्॑ तथा च ब्रह्माद्वैत-शून्य-वादादयः सिद्धिम् अश्नुवीरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२९।३] एतेनास्य हेतोः कापिला अप्य् असिद्धतादि-दोषम् अभिधित्सवो मौक्यम् आनीताः। तथा ह्य्॒ अन्तर् एकं संवेदनम् अपरापर-हर्ष-विषादाद्य्-अनन्त-धर्म-विवर्ताक्रान्त-रूपं बहिश् च घटादिकम् अर्थं नव-पुराणादि-वर्तुल-पार्थिवत्वाद्य्-अनेक-स्वभावावष्टब्ध-शरीरं साक्षाल् लक्षयन्तः कथं तद्-विपरीत-कथने प्रवर्तेरन्? प्रकृति-पुरुषात्मकं द्रव्यम् एवैकं तात्त्विकं, पर्याय-भ्रान्ति-जनकः पुनर् विवर्तोऽपारमार्थिक इति चेन्, न, द्वयोर् अपि सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशमानयोर् अबाधितयोः सर्व-व्यवहार-निबन्धनयोः पक्ष-पातम् अन्तरेणैकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। तथा सति विवर्त एव तात्त्विको, द्रव्यं पुनर् अलीकम् इति पर्याय-पक्ष-पाती प्रसञ्जयन् दुर्निषेधः स्याद् इति। अथेत्थम् अभिदधीथा॒ द्रव्यं सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात् सत्यं, पर्यायाः पुनर् व्यभिचारिण इत्य् असत्याः, तद् अयुक्तम्। यदि नाम द्रव्यम् अभेद-रूपत्वात् सर्वत्रानुवर्तते, पर्यायास् तु भेद-रूपत्वाद् व्यवच्छिद्यन्ते, तथापि तत् सत्यम्, इतरेऽलीका इति वक्तुं न पार्यते, न हि नीलं पीत-रूपतां न बिभर्त्îत्य्-एतावता तद् असत्यम्, अतिप्रसङ्गात्, सर्वस्य पर-रूप-परिहारावस्थायितयालीकत्व-प्राप्तेः। अथ द्रव्यम् एव पर्यायास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवन्, न सन्ति वा द्रव्य-व्यतिरेकिणः पर्याया, निःस्वभावत्वात्, ख-पुष्पवद् इति प्रमाणयसि, तथा सति पर्याया एव द्रव्यं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवन्, नास्ति वा पर्याय-व्यतिरिक्तं द्रव्यं, निष्पर्यायत्वाद्, आकाश-कुसुमवद् इत्îतरोऽपि प्रमाणयन् केन वार्येत। तन् न पक्ष-द्वयेऽपि काचिद् विशेषोपलब्धिर् इति। यथैवानन्त-सह-क्रम-वर्ति-पर्यायाध्यासितं वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशते तथैवाभ्युपगन्तव्यं, तथा चान्यस्याभावात् तद् एव तद्-गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।४] तथा सुगत-मतानुसारिणाम् अपि मध्ये सौत्रान्तिकस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धताम् आविर्-भावयितुं नोत्सहते, तद्-अभ्युपगति-व्यतिरेकेण निज-दर्शन-व्यवस्थानुपपत्तेः। तथा हि॒ बहिस् तावद् एकं कारणम् अपरापर-सामग्र्य्-अन्तः-पातितयानेक-कार्य-कार्यावेद्यते, यथा रूपं स्वोत्तर-क्षणं स्वावगाहि-ज्ञानादिकं च युगपज् जनयति। यदि चैक-क्षण-वर्तिनः सामग्री-भेदेन भेदम् अनुभवत एव भिन्न-देश-नाना-कार्य-कारिता, तथा सति नित्य-पक्षोदितं दूषणं स्व-मस्तकोपनिपाति स्यात्, तस्यापि तथैव भिन्न-काल-कार्य-निर्वर्तनेऽपि भेदाभाव-प्रसङ्गात्। तथा प्रतिभास-भेदेन क्षण-क्षयि-रूपादि-स्वलक्षण-विलक्षणत्वाभ्युपगमश् चैवं निर्निबन्धनः स्यात्, कौटस्थ्यम् आबिभ्रतोऽपि द्रव्यस्यापरापर-कारण-कलापान्तर्-गततया नव-पुराणादि-पर्याय-रूप-रस-गन्ध-स्पर्शावभास-लक्षण-कार्य-सम्पादनाविरोध-प्रसक्तेः। किं चायम् एकं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणानि स्वलक्षणान्य् आचक्षीत नान्यथा, यथाकूतं तद्-अवभासस्य स्वप्नान्तरेऽप्य् अनुपलक्षणाल्॑ लक्षितस्य चालक्षित-व्यतिरेक-निराकरणतस् तादात्म्यं कथयन् स्व-गिरानेकान्तावभासं समर्थयते। तथा ह्य्॒ अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्य-प्रतिक्षण-विवर्तम् अपि स्वलक्षणं स्थिर-स्थूराद्य्-आत्मना दर्शयति स्वरूपम्, अन्यथा सुषुप्तं जगद् आसज्येत, तद्-अप्रकाशने प्रमाणान्तरस्याप्य् अत्यन्त-विलक्षण-स्वलक्षणावेदकस्याप्रवृत्ति-प्रसङ्गात्। तथान्तः-संवेदनम् अर्थ-स्वरूपापेक्षया बहिर्-मुखान्तर्-मुख-सविकल्पाविकल्प-भ्रान्ताभ्रान्तादि-प्रतिभासम् एकम् अभ्युपयतः कथम् अनेकान्तावभासोऽसिद्धः स्यात्? तथा नाना-देश-स्थितार्थ-सार्थ-समर्पिताकारोपरक्तम् एकम् आकार-भेदेऽप्य् अन्यथा युगपत्-प्रकाशमान-सितासिताद्य्-अर्थ-व्यवस्थित्य्-अनुपपत्तेः संवेदनम् अनुमन्यमानः कथं भिन्न-समय-भावि-हर्ष-विषादाद्य्-अनेक-विवर्त-वशात् तद्-भेदम् आत्यन्तिकम् अभिदधीत, अभिन्न-योग-क्षेमत्वाद्। युगपद्-भाविनां संविद्-अन्तर्-निविष्टाकाराणाम् एकत्वं न हर्षादीनां, तद्-विपर्ययाद् इति चेन्, न, तत्-सामर्थ्य-व्यवस्थाप्यार्थाभेद-प्रसङ्गात्, तद्-एकतया सित-पीतादिषु ज्ञानस्य बोध-रूपेणैवाविशिष्टत्वात्। तद् एवं बहिर् अन्तश् चैकानेक-रूपत्वे प्रमाणतः स्थितेः स्वलक्षणस्यान्यथा स्वाभ्युपेत-दर्शन-व्यवस्थायोगान् नार्थ-वाद्य् अनेकान्त-प्रकाशं प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति।
[न्या०अ०२९।५] तथोररी-कृत-योगाचार-मतम् अपि बलाद् अनेकान्त-प्रकाश-रज्जुर् आवेष्टयत्य्, एकस्यापि ज्ञानस्यानेक-वेद्य-वेदकाकारतया प्रथनोपगतेः। एक-योग-क्षेमत्वात् तद्-ऐक्यम् इति चेन्, न, युगपद्-उदय-प्रलयवतां सह-वेदिनां सकल-सन्तानानाम् एकत्व-प्रसङ्गात्। संवृति-दर्शितत्वाद् अनेकत्वस्य, न तेन स्व-संवेदन-साक्षात्-कृत-पारमार्थिकैकत्व-क्षतिर् इति चेन्, न, ब्रह्म-वादि-मताप्रतिषेध-प्रसक्तेर्, यतोऽनाद्य्-अविद्या-बलाद् एकम् अक्रमं सचेतनं स्व-संवेदन-साक्षात्-कृतम् अपि ब्रह्मानेकं क्रमवच् चेतनाचेतनं परोक्षापरोक्षं लक्ष्यते, भवत्-परिकल्पित-ग्राह्य-ग्राहकाकार-विविक्त-संवेदनवद् इति तेनापि न दुरुपपादम्। अस्तु वायम् अनेकान्तावभासो भ्रान्तस्, तथापि संवेदनस्याद्वयता न लक्ष्यते, तल्-लक्षणे सकलासुमताम् अधुनैव मुक्ततावाप्तेः। लक्ष्यते च तत् कथञ्चिद्, इतरथा सुषुप्त-दशावत् सर्व-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् इत्य् एकस्यापि संवेदनस्य लक्षितालक्षितत्वेनानेकान्त-प्रतिभासो दुःशकोऽपह्नोतुम् इति ज्ञान-वाद्य् अप्य् अस्य हेतोर् असिद्धताविर्-भावनं प्रति तूष्णीम् आसीत।
[न्या०अ०२९।६] शून्य-वादिनः समस्ताभावाद् असिद्धोऽनेकान्त-प्रकाश इति चेन्, न, तस्यापि प्रमाण-प्रमेयाभावे न सर्वाभावावेदनं समस्त्य्, अन्यथाप्रमाणकं सर्वं सर्वत्र विद्यत इति परस्यापि वदतो न वदन-भङ्गः स्यात्, तद्-अभ्युपगमेऽभ्युपगम-क्षतिः। तयोश् च दर्शितवद् अनेकान्त-प्रकाश इति नासिद्धो हेतुः। मरु-मरीचिका-निचय-चुम्बिनि संवेदने जलोल्लेखेऽपि तद्-गोचरत्वाभ्युपगमाभावाद् अनैकान्तिकोऽयम् इति मा शङ्किष्ठास्, तस्य भ्रान्तत्वाद्, अभ्रान्त-प्रकाशो हि तद्-अभ्युपगति-हेतुः। अथायम् अप्îतरेतर-विनिर्लुठित-परमाणु-क्षण-क्षयि-बोधेन बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् आचक्षीथास्, तद् अयुक्तं, यतस् तद्-बोधः किम् उपलब्धि-मात्रम् यद् वा निर्णयः? यद्य् आद्यः कल्पस् तदानुमानं विशीर्येत, निर्गोचरत्वात्, प्राथमकल्पिकेनैव निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनेन विरोध-भीरुतया सर्वथा वस्तु-ग्रहणाभ्युपगमात्, प्रमाण-कलिते च मानान्तर-वैयर्थ्याद्, अनवस्था-प्राप्तेः। अथ द्वितीयस्, तथा सति सर्वं निर्विकल्पकम् अप्रमाणताम् अश्नुवीत। न च निर्णयोऽनेकान्त-प्रकाशं बाधते,ऽपि तु समर्थयते, बहिर् अन्तश् च तथैव तद्-विजृम्भणात्। अथ सर्वथा वस्तु-ग्रहणेऽपि निर्विकल्पकं यत्र्âंशे पाश्चात्यं व्यवहार-कारि-व्यवसायम् उपजनयति, तत्रैव प्रमाणताम् आस्कन्दति नान्यत्रेति मन्येथास्, तथा सति यद्-अनन्तरम् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया पुरुषः प्रवर्तते स एव निर्णयः प्रामाण्यं स्वी-कुर्यान्, न निर्विकल्पकं, तज्-जनकत्वेऽपि सन्निकर्षादिवद् इत्य् आसज्येत। निर्विकल्पकम् अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वात् प्रमाणं, न व्यवसितिस्, तद्-विकल्पत्वाद् इति चेन्, नानुमितेर् अपि तद्वद् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। न च विपरीताकार-निराकरण-चतुरतयानुमितिर् विशेषवती, निर्णीतेर् अपि तद्-अपनोद-दक्षत्वाद्, असमारोप-विषयेऽप्रवृत्तेः। त्रि-रूप-लिङ्ग-जतया विशेषोऽनुमितेर् मानता-साधक इति चेत्, साक्षाद् अनुभवाद् उत्पादस् तर्हि निर्णीतेर् महापराध इति भवतो बालताम् ईक्षामहे। किं च, यथा निर्विकल्पकम् अलक्षितं सकल-व्यावृत्त-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणम् अपि कतिचिद्-अंश-विषयं विकल्पम् उत्थापयति, तथार्थ एवेन्द्रियालोकादि-सन्निकृष्टतया कतिचिन्-निज्âंश-विषयं साक्षाद्-विशद-विकल्पं जनयेद् इति किम् अजा-गल-स्तन-कल्प-निर्विकल्पक-कल्पनया? तावन्तो ऽंशा बहिर्-अर्थे विरुध्यन्त इति चेत्, पाटवापाटवादयो दर्शनेऽप्य् एकस्मिन् न विरुध्यन्त इति किं राज्ञाम् आज्ञा? तस्मान् न क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-लक्षकं क्वचित् कदाचिद् दर्शनं लक्षयन्ति भवन्तोऽपि, केवलं स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणतया न तद्-असत्तां प्रतिपद्यन्ते। स्व्âंश-व्यापिनं कालान्तरानुयायिनम् एकं बहिर् अन्तश् चार्थं बोधं च प्रकाशयन् प्रथमानो निर्णयः, न पुनर् निर्मूलकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाध्यत इति न भ्रान्तः। किं चास्य भ्रान्ततां कथयन् सर्व-प्रमाण-प्रमेय-व्यवस्थाम् उन्मूल्यति। तथा हि॒ यत् सत्त्व-बोध-रूपत्व-सुखत्वादिषु प्रमाणं तद् एव क्षण-क्षयित्व-स्वर्ग-प्रापण-शक्ति-युक्तत्वादिष्व् अप्रमाणम्॑ तथा यद् वस्तु नील-चतुरस्रोर्ध्वतादि-रूपतया प्रमेयं तद् एव मध्य-भाग-क्षण-विवर्तादिनाप्रमेयं॑ तथा यद् बहिर्-अर्थापेक्षया सविकल्पकं स्वप्नादि-दर्शनं वा भ्रान्तं तद् एव स्वरूपापेक्षयाभ्रान्तम्॑ तथा यन् निशीथिनी-नाथ-द्वयादिकं द्वित्वेऽलीकं तद् अपि धवलता-नियत-देश-चारितादाव् अनलीकम् इति निर्णयः। यदि तु विरोधाद् बिभ्यद्भिर् भवद्भिर् अयम् अपह्नूयते, किम् अपरम् ऐकान्तिकं प्रमाणं प्रमेयं चोररी-कृत्य स्वाकूतं प्रतिष्ठापयेयुर् इति सकौतुकं नश् चेतः।
[न्या०अ०२९।७] अथ ज्ञान-वाद्य् अद्वैत-प्रकाशम् अलक्षितम् अभ्युपेत्य तेन बाहुविध्यं दधानो बोधो बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् अभिदध्यात्, तद् अयुक्तम्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाद्, अलक्षित-निर्विकल्प-दर्शनस्य च प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्। अथ युक्तिर् बोधस्य वैविध्यं बाधेत, तथा हि॒ भ्रान्ताभ्रान्त-संवेदन-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, संविन्-मात्रस्य तु सर्वत्राव्यभिचारित्वाद्, अद्वयं संवेदनं विविक्त-युक्त्या प्रकाशमानम् अनादि-कालालीन-वासना-समुपजनित-संवृति-दर्शित-सत्ताकं सितासितादि-विविध-प्रतिभासं निराकुरुते। अत्र प्रतिविदध्महे॒ किम् अयम् अनेकाकारो बोधोऽद्वय-संवेदनाद् व्यत्यरैक्षीद् वा न वा। किं चातो, यदि व्यभैत्सीत्, कथम् अदृष्ट-तत्-कार्यत्वे व्यतिरिक्तोऽयं तद् अद्वयं संवेदनम् अनुमापयेत्? अव्यतिरेक-पक्षे पुनर् अनेकः सन्न् एक-संवेदन-तादात्म्येन प्रथमानः कथम् अद्वैतं नोद्दलयेत्? अथ संवृति-दर्शितत्वाद् अलीकतयास्य सितासिताद्य्-आकार-बहिर्-मुख-कालुष्यस्य बोधेन तात्त्विकेन सह भेदाभेद-विकल्पानुपपत्तिर् इति ब्रूषे, तथा सति परो बोधस्यापारमार्थिकत्वं अविद्या-दर्शितत्वाद्, अर्थ-सत्तायाः पुनस् तत्त्व-रूपता, सर्वत्राव्यभिचाराद् इति ब्रुवाणो दुर्निवारः स्यात्। जडस्य प्रकाशायोगात् संवित्तिः सत्या, नार्थ इति चेद्, एकस्यानेकतावभासाभावाद् अनेकान्तः सत्यो, नाद्वैतम् इति प्रतिजानीमहे। संवृत्याद्वयस्यापि नाना-प्रतिभासोऽविरुद्ध इति चेद्, अनाद्य्-अविद्या-बलाज् जडस्यापि चेतनतया प्रकाशो न विरुद्ध इति परस्यापि शठोत्तरं नातिदुर्लभं भवेत्। किं च, नानाकार-कलुषित-चैतन्य-सामान्यस्यान्यथानुपपत्ति-सामर्थ्यतस् तस्य सिद्धत्वाद् अद्वयं संवेदनम् असिद्धं साधयेद् अयम्, अन्यथा निर्निबन्धनतया साधनस्याप्रवृत्तेस्, तथा च स्थिर-स्थूराद्य्-उपलक्षितार्थ्âंश-वशाद् विशकलित-परमाणु-क्षण-क्षयि-पर्याय-तादात्म्यं साधयन् तम् अनेकान्त-वादिनं न प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति, युक्तेर् उभयत्रापि तुल्यत्वात्। किं च, योऽयं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-निर्णयोऽसाव् अपि स्व-संवेदनापेक्षयाद्वय-रूप इति भवद्-अभिप्रायो॑ यथा चानवस्था-भीरुतया सर्वं ज्ञानं स्व-प्रकाशम् अभ्युपेतं, तथा सर्वो निश्चयः स्व-निश्चायकोऽभ्युपगन्तव्यो,ऽन्यथा तत्राप्य् अनवस्था-दोषोऽनुषज्येत, निश्चयाश् च सर्वथा स्वरूपं निश्चिनुयुर्, नैक-देशेन, यतो "निश्चयैर् यन् न निश्चीयते रूपं तत् तेषां विषयः कथम्" इति स्वयम् एव स्व-वधाय प्रलपितम्। तथा चाद्वयस्य क्षण-क्षयिणः स्वरूपस्य तैर् ग्रहणे विपरीतारोपाभावाद् आदित एव अनुत्थानं संसारस्येति युक्ति-रिक्त एवामुक्तताभिमानः स्यात्, न चैवम्, भव-भावस्य प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। तन् नायम् इतरेतराविनिर्लुठित-द्रव्य-पर्याय-प्रकाशो भ्रान्तस्, तद्-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाणान्तराभावाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।८] यदा तु शून्य-वादी ‘निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्न-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति पराभिप्राय-प्रवृत्तानुमान-बलाद् भ्रान्तताम् अस्य कथयेत्, तदा तं प्रति ‘सालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वाज्, जाग्रद्-दशा-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति विपरीतानुमानम् उपढौकनीयम्। स यदि दृष्टान्तस्य साध्य-विकलताम् उद्भावयेत्, तदा तद्-दृष्टान्तेऽपि सा दर्शनीया। यदि पुनर् असौ स्वप्न-प्रत्ययस्य निरालम्बनत्वं भवद्भिर् अभिप्रेतम् इति विलपन्न् आसितुं न दद्यात्, तदा स विकल्पतः पर्यनुयोज्यो॒ऽस्मद्-अभ्युपगमः प्रमाणं भवतोऽप्रमाणं वा? प्रमाणं चेद्, यथा तद्-बलाद् दृष्टान्त-समर्थनं तथा जाग्रत्-प्रत्यय-गोचरार्थ-समर्थनम् अपि किं न कुरुषे, कोऽयम् अर्ध-जरतीय-न्यायः? अथाप्रमाणम्, एवं सति स्वप्न-प्रत्यय-निरालम्बनता-साधकं प्रमाणान्तरं मृगणीयं, किम् अनेन कुश-काशावलम्बनेन। तत्रापि प्रमाणान्तरे विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ तत् किं निरालम्बनं सालम्बनं वा? निरालम्बनं चेन्, नान्य-प्रत्ययस्य निरालम्बनतां गदितुं पटिष्ठं, निर्गोचरत्वात्। अथ सालम्बनं, हन्त हतोऽसि, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्यया इति प्रतिज्ञात-क्षतेर्, अनेनैव व्यभिचाराद् इति शठः प्रतिशठाचरणेन निर्लोठनीयः। तन् नास्यानैकान्तिकत्वम्।
[न्या०अ०२९।९] विरुद्धता-शङ्का पुनर् दूरापास्त-प्रसरैव, प्रमाण-प्रकाशितेऽर्थे सर्व-वादिनां तथाभ्युपगमाविगानाद् इति। अनेन संशय-विरोधानवस्था-वैयधिकरण्यासम्भवादि-दूषणानि निर्मूलक-मिथ्या-विकल्पोत्थापितानि प्रतिभास-मुद्गर-निपात-निर्दलित-मस्तकत्वान् न जीवितुम् उत्सहन्त इति। तस्माद् असिद्धतादि-दोष-विना-कृतोऽयं तथा-प्रतिभास-लक्षणो हेतुर् अनेकान्त-गोचरतां प्रमाणस्य परान् अभ्युपगमयत्îत्य् अलम् विस्तरेण। तस्मात् ‘तस्यैव तत्र प्रतिभासनात्ऽ॑ सर्व-संविदाम् अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१०] अयं च यथावस्थित-प्रमाण-व्यापार-पर्यालोचक-प्रमात्र्-अभिप्रायेण प्रमाण-गोचरो दर्शितः। नयस् तर्हि किं-भूतम् तं मन्यत इति वचनावकाशे सत्य् आह॒ एकेत्य्-आदि। अनन्त-धर्माध्यासितं वस्तु स्वाभिप्रेतैक-धर्म-विशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनम् आरोहयत्îति नयः, प्रमाण-प्रवृत्तेर् उत्तर-काल-भावी परामर्श इत्य् अर्थस्॑ तस्य विषयो गोचरो मतोऽभिप्रेत एक-देशेनानित्यत्वादि-धर्म-लक्षणेन विशिष्टः पर-रूपेभ्यो विभिन्नोऽर्थः प्रमेय-रूपं, प्रमाणम् एवं-विधम् एवार्थं गृह्णात्îति स्वाकुतेन तेन व्यवस्थापनाद् इति।
[न्या०अ०२९।११] अथवा प्रमाण-विषयां लक्षण-संख्या-गोचर-फल-रूपां चतुर्-विधां विप्रतिपत्तिं निराकृत्यात्रैव नय-गोचरं निरूपयन्न् आह॒ एकेत्य्-आदि। ननु चादि-वाक्येन प्रमाण-व्युत्पादन-मात्रं प्रतिज्ञानं, तत् किं अयम् अप्रस्तुतोऽत्र नय-गोचरः प्रतिपाद्यत इति। सत्यं, एवं मन्यते॒ न नयः प्रमाणाद् अत्यन्तं दूर-यायी, किं तर्हि तद्-अंश-भूत एव, नय-समुदाय-सम्पाद्यत्वात् प्रमाणस्यातस् तद्-व्युत्पादन-प्रतिज्ञानेऽसाव् अपि ‘तन्-मध्य-पतितस् तद्-ग्रहणेन गृह्यतऽ॑ इति-न्यायाद् गृहीत एव, तन् नायम् अप्रस्तुत इति।
[न्या०अ०२९।१२] अत्रापि पदार्थः स एव, केवलं वाक्यार्थ-भेदः। तथा ह्îहैवं घटना॒ नयस्य विषय एक-देश-विशिष्टोऽर्थो मतो नीतिविदाम् इति। ननु च यदि नयस्य प्रमाणान्तः-पातित्वेऽपि पृथग् गोचरः प्रतिपाद्यते, ततः प्रमाणवद् एतद्-विषया लक्षणादि-विप्रतिपत्तिर् अपि निराकर्तव्या। सत्यं, किं तु न परेषां नय-व्यवहारः प्रसिद्धो,ऽतो धर्मिणोऽभावात् तद्-गोचरा विप्रतिपत्तिर् नास्त्य् एव। न च ते तेन तत्त्वं प्रतिपादनीयास्, तत्त्व-प्रतिपादने प्रमाणस्यैव व्यापारान्, नयस्य पुनर् एक-देश-निष्ठत्वेन तत्-प्रतिपादन-सामर्थ्य-विकलत्वाद्, अत एवाचार्यस्य न तल्-लक्षणादि-स्वरूप-कथनेऽपि महानादरः। गोचरं पुनर् हेय-पक्षे काक्वा प्रक्षिपन् साक्षात् प्रतिपादयति॒ मा भूत् स्व-दर्शनान्तः-पातिनां मन्द-बुद्धीनां प्रमाण-प्रतिपन्नेऽप्य् अनेकान्तात्मके वस्तुन्य् एक-देश-समर्थनाभिनिवेश-लक्षणः कदाग्रह इति। अथवा स्व-दर्शनान्तः-पातिनः प्रत्य् अनेनैव गोचर-कथनेनोपलक्षणत्वाल् लक्षणादीन्य् अपि लक्षयति। तत्र प्रमाण-प्रतिपन्नार्थैक-देश-परामर्शो नय इति लक्षणं, सर्व-नय-विशेषानुयायित्वात् पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमत्वाच् चास्य। संख्यया पुनर् अनन्ता इति, अनन्त-धर्मत्वाद् वस्तुनस्, तद्-एक-धर्म-पर्यवसिताभिप्रायाणां च नयत्वात्, तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्व-सङ्ग्राहि-सप्ताभिप्राय-परिकल्पना-द्वारेण सप्त नयाः प्रतिपादिताः। तद् यथा -- ‘नैगम-सङ्ग्रह-व्यवहार-र्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवम्भूता नयाऽ॑ इति। अतोऽस्माभिर् अपि त एव वर्ण्यन्ते।
[न्या०अ०२९।१३] कथम् एते सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका इति चेद्, उच्यते॒ऽभिप्रायस् तावद् अर्थ-द्वारेण शब्द-द्वारेण वा प्रवर्तेत, गत्य्-अन्तराभावाद्॑ अर्थश् च सामान्य-रूपो विशेष-रूपो वा, शब्दोऽपि रूढितो व्युत्पत्तितश् च, व्युत्पत्तिर् अपि सामान्य-निमित्त-प्रयुक्ता तत्-काल-भावि-निमित्त-प्रयुक्ता वा स्यात्। तत्र ये केचनार्थ-निरूपण-प्रवणाः प्रमात्र्-अभिप्रायास् ते सर्वेऽप्य् आद्ये नय-चतुष्टयेऽन्तर्-भवन्ति। तत्रापि ये परस्पर-विशकलितौ सामान्य-विशेषाव् इच्छन्ति तत्-समुदाय-रूपो नैगमः। ये पुनः केवलं सामान्यं वाञ्छन्ति तत्-समूह-सम्पाद्यः सङ्ग्रहः। ये पुनर् अनपेक्षित-शास्त्रीय-सामान्य-विशेषं लोक-व्यवहारम् अवतरन्तं घटादिकं पदार्थम् अभिप्रयन्ति तन्-निचय-जन्यो व्यवहारः। ये तु क्षण-क्षयिणः परमाणु-लक्षणा विशेषाः सत्या इति मन्यन्ते तत्-सङ्घात-घटित ऋजुसूत्र इति। तथा ये रूढितः शब्दानां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति तन्-निवह-साध्यः शब्द इति। ये तु व्युत्पत्तितो ध्वनीनां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति नान्यथा तद्-वार-जन्यः समभिरूढ इति। ये तु वर्तमान-काल-भावि-व्युत्पत्ति-निमित्तम् अधिकृत्य शब्दाः प्रवर्तन्ते नान्यथेति मन्यन्ते तत्-सङ्घ-घटितः खल्व् एवम्भूत इति। तद् एवं न कश्चिद् विकल्पोऽस्ति वस्तु-गोचरो योऽत्र नय-सप्तके नान्तर्-यात्îति सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका एते इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१४] साम्प्रतम् एषाम् एव प्रत्येकं मतम् उपवर्णयामः। तत्र गमनं गमः परिच्छेद इत्य् अर्थः। निश्चितो गमो निगमो विविक्त-वस्तु-ग्रहणं, स एव, प्रज्ञादेर् आकृति-गणतया स्वार्थिकाण्-प्रत्यय-विधानान् नैगमः। यदि वा निगम्यन्ते नियतं परिच्छिद्यन्त इति निगमा अर्थास् तेषु भवो योऽभिप्रायो नियत-परिच्छेद-रूपः स नैगम इति। अयं हि सत्ता-लक्षणं महा-सामान्यम् अवान्तर-सामान्यानि च द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्वादीनि तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारण-रूप-लक्षणान् अवान्तर-विशेषांश् चापेक्षया पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमान् सामान्याद् अत्यन्त-विनिर्लुठित-स्वरूपान् अभिप्रैति। तथा हि॒ किल संविन्-निष्ठाः पदार्थ-व्यवस्थितयो, न च सामान्य-ग्राहिणि विज्ञाने विशेषावभासोऽस्त्य्,ऽनुवर्तमानैकाकार-परामर्शेन तद्-ग्रहणाद्, अन्यथा सामान्य-ग्राहकत्वायोगात्। नापि विशेष-ग्रहण-दक्षे संवेदने सामान्यं चकास्ति, विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-पदार्थ-ग्राहितया तत्-प्रवृत्तेर्, अन्यथा विशेष-संवेदनत्वायोगात्। न चैतौ परस्पर-विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुम् युक्ताव्, अतिप्रसङ्गाद्, विभिन्न-प्रतिभासिनाम् अपि निखिलार्थात्मनाम् ऐक्य-प्राप्तेः। एवं च प्रमाणयति॒ परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ, पार्थक्येनोपलब्धेर्, इह यद् यत् पार्थक्येनोपलभ्यते तत् तत् परस्पर-विश्लिष्टं द्रव्यं, तद् यथा -- देवदत्त-यज्ञदत्ताव् इति, पार्थक्येन चोपलभ्येते सामान्य-विशेषाव्, अतः परस्पर-विभिन्नाव् इति। न सामान्यात् पृथग् विशेषोपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम्। सामान्य-व्याप्तस्येति चेन्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः, सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात्॑ ततश् च तेन बोधेन विविक्त-विशेष-ग्रहणाभावात् तद्-वाचकं ध्वनिं तत्-साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता॑ न चैतद् अस्ति, विशेषाभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्ति-दर्शनात्। तस्माद् विशेषम् अभिलषता तत्र च व्यवहारं प्रवर्तयता तद्-ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा सामान्यम् अपि विविक्ताकारतया स्व-ग्राहिणि ज्ञाने यदि न प्रकाशेत, तदा तद्-गोचराभिमत-संवेदनेन विशेषस्याप्य् आकलनात् सामान्याभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्तेर् उच्छेदस् तथैव वक्तव्यो, विविक्त-सामान्य-ग्राहि-बोध-मूलकत्वात् तयोस्, तद्-अनिष्टौ तयोर् अप्य् अभावापत्तेः। न च सामान्यं विशेषं वा तिरस्-कृत्य केवलस्य विशेषस्य सामान्यस्य वाभ्युपगमः कर्तुं युक्तो, द्वयोर् अपि स्व-ग्राहि-ज्ञाने प्रतिभासमानतया विशेषाभावात्। तस्माद् एतौ द्वाव् अप्îतरेतर-विशकलिताव् अङ्गी-करणार्हाव् इति नैगमः।
[न्या०अ०२९।१५] अधुना सङ्ग्रहाभिप्रायो वर्ण्यते। तत्र सङ्गृह्णात्य् अशेष-विशेष-तिरो-धान-द्वारेण सामान्य-रूपतया जगद् आदत्त इति सङ्ग्रहः। अयं हि मन्यते॒ भाव-लक्षण-सामान्याद् व्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा विशेषाः परिकल्प्येरन्न्, अव्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा, गत्य्-अन्तराभावात्। तत्र यद्य् आद्यः पक्षस्, तदा निःस्वभावतां ते स्वी-कुर्युर्, भाव-व्यतिरेकित्वाद्, गगन-कुसुमादिवत्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तर्हि भाव-मात्रम् आपद्यन्ते। तथा हि॒ भाव-मात्रं विशेषास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वाद्, इह यद् यतोऽव्यतिरिक्तं तत् तद् एव भवति, तद् यथा -- भावस्यैव स्वरूपम्, अव्यतिरेकिणश् च विशेषा, अतस् तद्-रूपा एव। ननु च यदि भाव-मात्रम् एव तत्त्वं तदा तस्य सर्वत्राविशेषाद् य एते प्रतिप्राणि-प्रसिद्धाः स्तम्भेभ-कुम्भाम्भो-रूहादि-विशिष्ट-वस्तु-साध्या व्यवहारास् ते सर्वेऽपि प्रलयम् आपद्येरन्न्, अतो विशेषा अपि विविक्त-व्यवहार-हेतवोऽभ्युपगन्तव्याः। नैतद् अस्ति, व्यवहारस्यानाद्य्-अविद्या-बल-प्रवर्तितत्वात्, तेन पारामर्थिक-प्रमाण-प्रतिष्ठित-तत्त्व-प्रतिबन्धाभावात्। किं च, विशेषाग्रहो विशेषेण त्याज्यो, विशेष-व्यवस्थापक-प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ भेद-रूपा विशेषाः, न च किञ्चित् प्रमाणं भेदम् अवगाहते, प्रत्यक्षं हि तावद् भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षत्-कर्तुं युक्तम्, नाभावं, तस्य सकल-शक्ति-विरह-रूपतया तद्-उत्पादने व्यापाराभावाद्, अनुत्पादकस्य च साक्षात्-करणे सर्व-साक्षात्-करण-प्रसङ्गात्, तथा च विशेषाभावात् सर्वो द्रष्टासर्व-दर्शीस्यात्। अनिष्टम् चैतद् भवतां, तस्माद् भाव-ग्राहकम् एव तद् एष्टव्यम्। स च भावः सर्वत्राविशिष्ट इति तथैव तेन ग्राह्यस्, तद्-उत्तर-काल-भावी पुनर् विकल्पो घटोऽयं पटादिर् न भवत्îत्य् एवम्-आकारो व्यवहारं रचयन्न् अविद्या-मूलत्वान् न प्रमाणं, तन् न प्रत्यक्षाद् विशेषावगतिः। नाप्य् अनुमानादेः, प्रत्यक्ष-मूलकत्वाच् छेष-प्रमाण-वर्गस्य, तस्मात् सामान्यम् एव परमार्थो, न विशेषा इति सङ्ग्रहः।
[न्या०अ०२९।१६] साम्प्रतं व्यवहार-मतम् उच्यते। तत्र व्यवहरणं व्यवह्रियते वानेन लौकिकैर् अभिप्रायेणेति व्यवहारः। अयं तु मन्यते॒ यथा लोक-ग्राहम् एव वस्त्व् अस्तु, किम् अनयादृष्टाव्यवह्रियमान-वस्तु-परिकल्पन-कष्ट-पिष्टिकया? यद् एव च लोक-व्यवहार-पथम् अवतरति तस्यानुग्राहकं प्रमाणम् उपलभ्यते, नेतरस्य, न हि सामान्यम् अनादि-निधनम् एकं सङ्ग्राहाभिमतं प्रमाण-भूमिस्, तथानुभवाभावात्, सर्वस्य सर्व-दर्शित्व-प्रसङ्गाच् च। नापि विशेषाः परमाणु-लक्षणाः क्षण-क्षयिणः प्रमाण-गोचरस्, तथा प्रवृत्तेर् अभावात्। तस्माद् इदम् एव निखिल-लोकाबाधितं प्रमाण-प्रसिद्धं कियत्-काल-भावि-स्थूरताम् आबिभ्राणम् उदकाहरणाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमं घटादिकं वस्तु-रूपं पारमार्थिकम् अस्तु, पूर्वोत्तर-काल-भावि-तत्-पर्याय-पर्यालोचना पुनर् अज्यायसी, तत्र प्रमाण-प्रसराभावात्, प्रमाणम् अन्तरेण च विचारस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्। अवस्तुत्वाच् च तेषां, किं तद्-गोचर-पर्यालोचनेन? तथा हि॒ पूर्वोत्तर-काल-भाविनो द्रव्य-विवर्ताः क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणा वा विशेषा न कञ्चन लोक-व्यवहारम् उपरचयन्ति, तन् न ते वस्तु-रूपा, लोक-व्यवहारोपयोगिनां एव वस्तुत्वाद् इति व्यवहारः।
[न्या०अ०२९।१७] साम्प्रतं ऋजुसूत्राभिप्रायः कथ्यते। तत्र र्जु प्रगुणम् अकुटिलम् अतीतानगत-वक्र-परित्यागाद् वर्तमान-क्षण-विवर्ति-वस्तुनो रूपं सूत्रयति निष्टङ्कितं दर्शयत्îत्य् ऋजुसूत्रः। तथा ह्य्॒ अस्याभिप्रायो --ऽतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्म-लाभत्वात् खर-विषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया सकल-शक्ति-विरह-रूपत्वान् नार्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमत्वम्, अर्थ-क्रिया-क्षमं च वस्तु॑ तद्-अभावान् न तयोर् वस्तुत्वम् इति। वर्तमान-क्षणालिङ्गितं च पुनर् वस्तु-रूपं समस्तार्थ-क्रियासु व्याप्रियत इति तद् एव पारमार्थिकम्। तद् अपि च निरंशम् अभ्युपगन्तव्यम्, अंश-व्याप्तेर् युक्ति-रिक्तत्वाद्, एकस्यानेक-स्वभावताम् अन्तरेणानेक-स्वावयव-व्यापनायोगात्। अनेक-स्वभावतैवास्त्व् इति चेन्, न, विरोध-व्याघ्राघ्रातत्वात्। तथा हि॒ यद्य् एकः स्वभावः कथम् अनेकः? अनेकश् चेत् कथम् एकः? एकानेकयोः परस्पर-परिहारेणावस्थानात्॑ तस्मात् स्वरूप-निमग्नाः परमाणव एव परस्परोपसर्पण-द्वारेण कथञ्चिन् निचय-रूपताम् आपन्ना निखिल-कार्येषु व्यापार-भाज इति त एव स्वलक्षणं, न स्थूरतां धारयत् पारमार्थिकं इति। किं च, प्रमाणतोऽर्थ-व्यवस्था, न च प्रमाणं देश-काल-व्याप्ति-ग्रहणे किञ्चन प्रवर्तते, सर्व-प्रमाणानां वर्तमान-प्रकाश-रूपत्वात्। तथा हि॒ प्रत्यक्षं तावद् रूपालोक-मनस्कार-चक्षुर्-लक्षण-कारण-चतुष्टयाल् लब्ध-सत्ताकं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशते, अतीत-वर्त्स्यत्-क्षणयोर् असन्निहितत्वात्, ततश् च तत् तत्-काल-सम्बद्धम् एव वस्तुनो रूपं साक्षात्-कर्तुं क्षमते न पूर्वम् अपरं वासन्निधानाद् एव। यदि पुनर् विनष्टम् अपि पूर्व-क्षण-वर्ति-रूपमाकलयेत्, तदा विनष्टत्वाविशेषान् निरवधिः क्षण-परम्परा तत्र प्रतीयेत, तथा च सति सङ्कलिकयानादि-जन्म-परम्परा-ग्राहि प्रत्यक्षम् अनुषज्येत। एवम् अनागत-क्षण-ग्रहणेऽपि योज्यम्॑ अनिष्टं चैतत्, तस्मात् तद् वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-दक्षम् एवेत्य् अभ्युपगन्तव्यम्। ननु च यदि क्षण-भङ्गुरताम् अर्थात्मनाम् अध्यक्षम् अवलोकयति, तदा नीलतेव प्रतिभासमाना सा विप्रतिपत्ति-गोचरं न यायाद् इति तद्-विषयो लौकिकानां व्यवहारः प्रवर्तेत, न चैतद् अस्ति, स्थिरता-द्वारेण व्यवहार-प्रवृत्तेर् इति। अत्र प्रतिविधीयते -- साक्षात्-कुर्वाणा अपि क्षण-विनश्वरतां सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्ध-बुद्धयो मन्दा नाध्यवस्यन्त्य्, अनादि-काल-प्ररूढ-वासना-प्रबोध-समुपजनित-मिथ्या-विकल्प-सामर्थ्याच् च विपर्यस्त-स्थिरता-व्यवहारं प्रवर्तयन्ति, तन् नायम् अध्यक्षस्यापराधो,ऽपि तु प्रमात्ःणाम् एव। तथा घनाकारोऽपि प्रत्यक्ष-पृष्ठ-भावि-मिथ्या-विकल्प-सन्दर्शित एव, विविक्त-दर्शने तत्-प्रतिभासायोगात्, कर-चरण-शिरो-ग्रीवादयो ह्य् अवयवाः परस्पर-विभक्ता एव तत्र प्रतिभान्ति, न व्याप्य्-आकारो, न च तेऽपि स्व्âंश-व्यापिनः प्रतिभान्ति, तद्-अवयवानाम् अप्îतरेतर-विशकलित-रूपाणां प्रतिभासात् तावद् यावत् परमाणव एव प्रथन्ते, व्यापि-रूपस्य विचाराक्षमत्वाद् इत्य् उक्त-प्रायम्। नाप्य् अनुमानात् स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिः, प्रत्यक्ष-परिगृहीतं हि सम्बन्धम् आसाद्यानुमानं प्रवर्तेत, यदा च तत् क्षण-भङ्गुर-विविक्त्âंश-ग्रहण-चातुर्यम् आबिभ्रद् दर्शितं तदानुमानम् अपि तत्-प्रतिबन्ध-मूलकं तद्-गोचरम् एव पारम्पर्येण प्रतिष्ठापयति, स्व-प्रतिभासिनो रूपस्यालीकतया तत्-प्रतिष्ठापन-द्वारेणैव तस्य प्रामाण्यात्। ननु च स्मरण-प्रत्यभिज्ञानादीनि स्थिर-स्थूर-वस्तु-व्यतिरेकेण नोपपद्यन्ते, पूर्वम् अदृष्टे तद्-अभावात्, पुरुषाद्य्-अवयविनां स्मरणात् प्रत्यभिज्ञानाच् च। नैतद् अस्ति, तेषाम् अलीक-वासना-प्रबोधोत्थापितत्वेन प्रामाण्यायोगात्। किं च, तान्य् अपि स्वयं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशन्ते, विप्लव-वशात् तु स्वरूपम् एव वासना-सम्पादितातीतार्थ-रूपतया व्यवस्यन्ति, घनाकारं च तस्यासन्तम् अध्यारोपयन्ति॑ तन् न तेभ्योऽपि व्यापि-वस्तु-सिद्धिः। तस्माद् व्यापिनि रूपे प्रमाणानवतारात् परस्पर-विश्लिष्टाः परमाणव एव परमार्थत इति र्जुसूत्रः।
[न्या०अ०२९।१८] तद् इदम् अर्थ-स्वरूप-निरूपण-निपुणानां नयानां मतम् उपवर्णितम्॑ अधुना शब्द-विचार-चतुराणाम् उपवर्ण्यते। तत्र त्रयाणाम् अपि शब्दादीनाम् इदं साधारणमाकूतं, यद् उत शब्द एव परमार्थो नार्थस्, तस्य तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्। पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धेः कथम् अव्यतिरेक इति चेत्, प्रमाणाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ न व्यतिरिक्तोऽर्थः शब्दात्, तत्-प्रतीतौ तस्य प्रतीयमानत्वाद्, इह यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तं भवति, तद् यथा -- शब्दे प्रतीयमाने तस्यैव स्वरूपं, प्रतीयते च शब्दे प्रतीयमानेऽर्थो,ऽतोऽसौ ततोऽव्यतिरिक्त इति। अगृहीत-सङ्केतस्य घट-शब्द-श्रवणेऽपि घट-प्रतीतेर् अभावाद् व्यतिरिक्त इति चेद्, एवं तर्हि विषस्य मारणात्मकत्वं तद्-अज्ञस्य न प्रतिभात्îति तत् ततो व्यतिरिक्तम् आपद्येत, न चैतद् अस्ति, तद्-व्यतिरेकाविशेषेण गुड-खण्डवद् विषस्याप्य् अमारकत्वापत्तेः, सम्बन्धस्य च व्यतिरिक्तेन सह प्राग् एवापास्तत्वात्॑ तन् नाबुद्ध-प्रमातृ-दोषेण वस्तुनोऽन्यथात्वम्, अन्यथान्धो रूपं नेक्षत इति तद्-अभावोऽपि प्रतिपत्तव्य इति। ये निरभिधाना वर्तन्तेऽर्थास् तेषां शब्दात् पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धिर् इति चेन्, न, निरभिधानार्थाभावात्, केवलं केचिद् विशेष-शब्दैः सङ्कीर्त्यन्ते, केचित् सामान्य-ध्वनिभिर् इत्य् एतावान् विशेषः स्यात्। यदि वा सकलार्थ-वाचका विशेष-धवनयो न सन्त्îति नास्त्य् अत्र प्रमाणम्। ततश् च सर्वेऽर्था विद्यमान-स्व-वाचका,ऽर्थत्वाद्, घटार्थवद् इति प्रमाणात् सर्वेषां स्व-वाचकत्वेन पूर्वोक्त-युक्तेः शब्दाद् अपार्थक्य-सिद्धिः। तस्मान् न परमार्थतोऽर्थः शब्दातिरिक्तोऽस्त्य्, उपचारतः पुनर् लौकिकैर् अपर्यालोचित-परमार्थैर् व्यवह्रियते। असाव् अप्य् औपचारिकः शब्दात्मको वार्थः प्रतिक्षण-भङ्गुरः स्वी-कर्तव्यो, वर्णानां क्षण-ध्वंसिता-प्रतीतेर्, ऋजुसूत्र-प्रतिपादित-युक्ति-कलापाच् च।
[न्या०अ०२९।१९] साम्प्रतम् एतेषाम् एव प्रत्येकम् अभिप्रायः कथ्यते। तत्र शब्दो॒ रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिद् अर्थे प्रवर्तन्ते॑ यथेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः, तेषां सर्वेषाम् अप्य् एकम् अर्थम् अभिप्रैति किल प्रतीति-वशाद्, यथा शब्दाव्यतिरेकोऽर्थस्य प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वं वानेकत्वं वा प्रतिपादनीयं॑ न चेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थ-वाचितया कदाचन प्रतीयन्ते, तेभ्यः सर्वदैवैकाकार-परामर्शोत्पत्तेर्, अस्खलद्-वृत्तितया तथैव व्यवहार-दर्शनात्। तस्माद् एक एव पर्याय-शब्दानाम् अर्थ इति शब्दः, शब्द्यत आहूयतेऽनेनाभिप्रायेणार्थ इति निरुक्ताद् एकार्थ-प्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्याय-ध्वनीनां प्रयोगाद् इति।
[न्या०अ०२९।२०] साम्प्रतं समभिरूढ-मतम् उपवर्ण्यते। तत्र सम् एकी-भावेनाभिरोहति व्युत्पत्ति-निमित्तम् आस्कन्दति शब्द-प्रवृत्तौ योऽभिप्रायः स समभिरूढः। अयं हि पर्याय-शब्दानां प्रतिविभक्तम् एवार्थम् अभिमन्यते, तद् यथेन्दनाद् इन्द्रः, परमैश्वर्यम् इन्द्र-शब्द-वाच्यं परमार्थतस्, तद्वत्य् अर्थे पुनर् उपचारतः प्रवर्तते, न वा कश्चित् तद्वान्, सर्व-शब्दानां परस्पर-विभक्तार्थ-प्रतिपादकतयाश्रयाश्रयि-भावेन प्रवृत्त्य्-असिद्धेः। एवं शकनाच् छक्रः, पूर्-दारणात् पुरन्दर इत्य्-आदि भिन्नार्थत्वं सर्व-शब्दानां दर्शयति॑ प्रमाणयति च॒ पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थाः, प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकत्वाद्, इह ये ये प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकास् ते ते भिन्नार्थाः, यथेन्द्र-घट-पुरुष-शब्दा विभिन्नार्था, विभिन्न-व्युत्पत्ति-निमित्तकाश् च पर्याय-शब्दा अप्य्, अतोऽभिन्नार्था इति। यत् पुनर् अविचारित-प्रतीति-बलाद् एकार्थाभिधायकत्वं प्रतिपाद्यते तद् अयुक्तम्, अतिप्रसङ्गात्। तथा हि॒ यदि युक्ति-रिक्ता प्रतीतिर् एव शरणी-क्रियते तदा मन्द-मन्द-प्रकाशे दवीयसि देशे सन्निविष्ट-शरीरा विभिन्ना अपि निम्ब-कदम्बाश्वत्थ-कपित्थादय एक-तर्व्-आकारताम् आबिभ्राणाः प्रतीयन्त इत्य् एकतयैवाभ्युपगन्तव्याः। न चैतद् अस्ति, विविक्त-तत्-स्वरूप-ग्राहि-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वेन पूर्व-प्रतीतेर् विविक्तानाम् एव तेषाम् अभ्युपगमात्, तन् नैकार्थ-वाचिनो ध्वनयः सन्ति, रूढिः पुनर् अविचारित-तद्-अर्थानाम् इति समभिरूढः।
[न्या०अ०२९।२१] साम्प्रतम् एवम्भूताभिप्रायः प्रतिपाद्यते। तत्रैवं-शब्दः प्रकार-वचनस्, ततश् चैवं यथा व्युत्पादितस् तं प्रकारं भूतः प्राप्तो यः शब्दः स एवम्भूतः॑ तत्-समर्थन-प्रधानोऽभिप्रायोऽप्य् एवम्भूतस्, तद्-विषयत्वात्, विषय-शब्देन च विषयिणोऽभिधानात्। अयं हि यस्मिन्न् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्ति-निमित्तम् अर्थो यदैव विवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानम् अभिप्रैति, न सामान्येन। यथोदकाद्य्-आहरण-वेलायां योषिद्-आदि-मस्तकारूढो विशिष्ट-चेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते, न शेषो, घट-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्त-शून्यत्वात्, पटादिवद् इति। अतीतां भाविनीं वा चेष्टाम् अधिकृत्य सामान्येनैवोच्यत इति चेन्, न, तयोर् विनष्टानुत्पन्नतया शश-विषाण-कल्पत्वात्॑ तथापि तद्-द्वारेण शब्द-प्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्तयितव्यो, विशेषाभावात्। किं च, यद्य् अतीत-वर्त्स्यच्-चेष्टापेक्षया घट-शब्दोऽचेष्टावत्य् अपि प्रयुज्येत, कपाल-मृत्-पिण्डादाव् अपि तत्-प्रवर्तनं दुर्निवारं स्यात्, विशेषाभावात्, तस्माद् यत्र क्षणे व्युत्पत्ति-निमित्तम् अविकलम् अस्ति तस्मिन्न् एव सोऽर्थस् तच्-छब्देन वाच्य इत्य् एवम्भूतः।
[न्या०अ०२९।२२] तद् एवम् अनेक-धर्म-परीतार्थ-ग्राहिका बुद्धिः प्रमाणं, तद्-द्वारायातः पुनर् एक-धर्म-निष्ठार्थ-समर्थन-प्रवणः परामर्शः शेष-धर्म-स्वी-कार-तिरस्-कार-परिहार-द्वारेण वर्तमानो नयः, स च धर्माणाम् आनन्त्याद् अनन्त-भेदस्, तथापि सर्व-सङ्ग्राहकाभिप्राय-परिकल्पन-मुखेनैवं सप्त-भेदो दर्शितः। अयम् एव च स्वाभिप्रेत-धर्मावधारणात्मकतयाशेष-धर्म-तिरस्-कार-द्वारेण प्रवर्तमाणः परामर्शो दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते॑ तद्-बल-प्रभावित-सत्ताका हि खल्व् एते पर-प्रवादाः। तथा हि॒ नैगम-नय-दर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। सङ्ग्रहाभिप्राय-प्रवृत्ताः सर्वेऽप्य् अद्वैत-वादाः सांख्य-दर्शनं च। व्यवहार-नयानुपाति प्रायश् चार्वाक-दर्शनम्। ऋजुसूत्राकूत-प्रवृत्त-बुद्धयस् ताथागताः। शब्दादि-नय-मतावलम्बिनो वैयाकरणादय इति। अथेत्थम् अभिदधीथा, यथा॒ कथम् एतेऽवधारण-द्वारेण स्वकम् अर्थं समर्थयन्तस् तद्-विपरीतं निराकुर्वाणा दुर्नयतां प्रतिपद्यन्त इत्य्, अत्रोच्यते -- एवं प्रवृत्तौ निर्गोचरत्वान्, निर्गोचरस्य नयत्वायोगात्। तथा हि॒ नयति केनचिद् अंशेन विशिष्टम् अर्थं प्रापयति योऽभिप्रायः स नयः, स्वाभिप्रेत-धर्माच् छेष-धर्म-प्रतिक्षेप-द्वारेण तु प्रवृत्तो न किञ्चिन् नयत्य्, एक-धर्मालिङ्गितस्य वस्तुनोऽसम्भवाद्, बहिर् अन्तश् चानेक-धर्म-परिकरित-स्वभावस्य तस्य प्रतिभासात्, तद्-अपह्नव-कारिणां कदभिप्रायाणां प्रतिभास-बाधितत्वेनालीकत्वात्।
[न्या०अ०२९।२३] तथा हि॒ यः तावन् नैगम-नयः परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ प्रत्यपीपदत्, तद् अयुक्तम्। तयोस् तथा कदाचन प्रतिभासाभावात्। यच् चोक्तम्॒ अनुवर्तमानैकाकार-परामर्श-ग्राह्यं सामान्यं यत्र न तत्र विशेष-प्रतिभासो, यत्र च विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-बोध-निर्ग्राह्यो विशेषो न तत्र सामान्यावगतिस्, तद्-वचन-मात्रम् एव, धव-खदिर-पलाशादि-समस्त-विशेषापसारणे वृक्षत्वादि-सामान्य-प्रतिभासाभावात्। दूराद् विशेषाग्रहणेऽपि केवलं तच् चकास्त्îति चेन्, न, तत्राप्य् अभ्यन्तरी-भूत-विशेष-प्रतिभासात्, तद्-विरहे शश-विषाण-रूपत्वात्। एवं विशेषा अपि न सामान्याद् अत्यन्त-व्यतिरेकिणः प्रतिभान्ति, तन्-निमग्नानाम् एव तेषां ग्रहणाद्, इतरथा सत्तातोऽतिरिच्यमाना भावा निःस्वभावताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। तथा वृक्षत्वादि-सामान्येभ्योऽपि भेदिनो वृक्षादयो न स्युस्, तद्-अभेद-निबन्धनत्वात् तत्-स्वरूप-स्थितेः। तस्मात् तद् एव संवेदनम् उपसर्जनी-कृत-वैषम्यं प्रधानी-कृतैकाकारं सामान्यं गृह्णात्îत्य् उच्यते, न्यक्-कृत-समत्वम् उत्कलित-नानात्वं पुनर् विशेष-ग्रह्îति, समत्व-नानात्वयोः कथञ्चिद् भेदाभेदिनोः परस्परं सर्वार्थेषु भावात्, तद्-अभावे तथा-विध-प्रतिभासानुपपत्तेः। एतेन यद् अवादि "न चैतौ विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुं युक्ताव्" इत्य्-आदि, तद् अपास्तम् अवगन्तव्यं, विभिन्नयोः प्रतिभासाभावात्। व्यवहारोऽपि सर्वः प्रधानोपसर्जन-द्वारेण कथञ्चिद् इतरेतराविनिर्लुठित-सामान्य-विशेष-साध्य एव॑ न हि सामान्यं दोह-वाहादि-क्रियायाम् उपयुज्यते, विशेषाणाम् एव तत्रोपयोगान्, नापि विशेषा एव तत्-कारिणः, गोत्व-शून्यानां तेषां वृक्षाद्य्-अविशिष्टतया तत्-करण-सामर्थ्याभावात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेके सामान्य-विशेषयोर् वृक्षं छिन्ध्îति चोदितः किम् इति तद्-विशेषे पलाशादौछेदं विधत्ते? तत्र तस्य समवायाद् इति चेन्, न, समवाय-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, भावेऽपि विश्लिष्टयोर् अभेद-बुद्ध्य्-उत्पादनाक्षमत्वात्, तस्यापि व्यतिरिक्ततया पदार्थान्तराविशेषान् नित्यत्वैकत्व-सर्व-गतत्वादिभिश् च सर्वत्र तत्-करण-प्रसङ्गाच् च। यत् पुनर् अवादीर्, यद् उत॒ यदि सामान्यं विशेष-निष्ठं, विशेषो वा सामान्य-व्याप्तः समुपलभ्येत, ततो विविक्तयोस् तयोः क्वचिद् अनुपलम्भाद् योऽयं विविक्तेषु सामान्येषु विशेषेषु चाभिधानार्थ-क्रिया-लक्षणो व्यवहारः स समस्तः प्रलयं यायाल्, लोली-भावेन तद्-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, तद् अप्य् असमीचीनं, यतो यद्य् अपि परस्पराविविक्तयोः सामान्य-विशेषयोः सर्वत्रोपलम्भस्, तथापि यत्रैव प्रमातुर् अर्थित्वं तद् एव सामान्यं, विशेषान् वा प्रधानी-कृत्य तद्-गोचरं ध्वनिम् अर्थ-क्रियां वा प्रवर्तयत्îतरस्याप्य् उपसर्जन-भावेन तत्र व्यापारात्, तद्-विकलस्येतरस्यापि शश-विशाणायमानतया क्वचिद् अनुपयोगात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेकिणि विशेषेभ्यः सामान्ये वृत्ति-विकल्पोपलम्भ-नूतन-विशेष-सम्बन्धादि-द्वारेण दूषण-मुद्गर-कदम्बकं मूर्धनि पतद् दुर्विषहं स्यात्। तथा हि॒ तत् तेषु कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वा? सामस्त्य-पक्षे प्रतिविशेषं परिसमाप्ततया सामान्य-बहुत्व-प्रसङ्गो,ऽनिष्टं चैतद्, एकत्वाभुपगम-क्षतेः। एकदेशेन वर्तने पुनर् यावन्तो विशेषास् तावन्तस् तद्-अंशाः प्रसजन्ति, न चैतद् अस्ति, सामान्यस्य निरवयवत्वात्॑ सावयवत्वेऽपि पुनस् तेऽभिन्ना भिन्ना वा। यद्य् अभिन्ना विशेषास्, तर्ह्य् अभेदिनः किं नेष्यन्ते, विशेषाभावात्। भेद-पक्षे पुनस् तेष्व् अपि तत् कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वेति? तद् एव चोद्यम् अलब्ध-परिनिष्ठम् अवतरति, तन् नात्यन्त-भेदिनो वृत्तिः सम्भवति। किं च, यद्य् एकं सामान्यं भेदवत् समस्त-विशेषेषु वर्तेत, तदैक-विशेषोपलम्भ-काले तद् उपलम्भ्यते न वा? यद्य् आद्यः पक्षस्, तस्यैकतया सर्वत्रोपलम्भात्, व्याप्य-ग्रहणाभावे व्यापक-ग्रहणासिद्धेर्, निखिल-तद्-व्याप्य-विशेष-ग्रहणम् आसज्येत, न चैतद् अस्ति, पुरो-वर्ति-विशेषस्यैव साक्षात्-करणाच्, छेष-विशेषाणाम् असन्निधानात्॑ सन्निहित-विशेष-निष्ठम् एव तद् उपलभ्यते। तस्यैव तद्-व्यञ्जकत्वाद्, इतरेषां तद्-अभावाद् इति चेन् नैक-स्वभावस्य खण्डशो व्यञ्जनायोगात् सन्निहित-विशेष-व्यञ्जितम् एव तत् सर्वत्र स्वभावान्तराभावात् सर्व-विशेष-गतं च तद्-रूपम्, अतस् तद्-दर्शनं केन वार्येत। अथ द्वितीयः कल्पस्, तथा सति यथैक-विशेषोपलम्भ-समये नोपलभ्यते, तथा शेष-विशेषोपलम्भ-कालेऽपि नोपलभ्येत, विशेषाभावात्। अतस् तद्-अभाव एवोक्तः स्यात्, केवलस्योपलम्भाभावात्। उपलम्भेऽपि स्व-स्वभाव-स्थितेर् विशेष-रूपतापत्तिः। तथा चिरन्तन-विशेष-व्यवस्थित-सत्ताकं तन् नूतन-विशेषोत्पादे सति कथं तेन सह सम्बन्धम् अनुभवेत्? न तावद् विशेषान्तरेभ्यस् तद् उत्पित्सु-विशेष-देशं गन्तुम् अर्हति, निष्क्रियत्वात्। नापि तत्रैवाभवद्, विशेषोत्पादात् प्राक् तद्-देशे तद्-उपलम्भाभावात्। नापि विशेषेणैव सहोत्पद्यते, नित्यत्वान्, नित्यस्य चोत्पत्ति-विरोधात्। अथैतद्-दोष-परिजिहीर्षया तत् सक्रियाकम् अभिधीयेत, तथापि पूर्व-व्यक्ति-त्यागेन वा नूतन-विशेष-देशम् आक्रामेत्, तद्-अभावेन वा? न तावद् अद्यः पक्षश्, चिरन्तन-व्यक्तीनां सामान्य-विकलतया तत्-सम्बन्ध-साध्य-बुद्धि-ध्वनि-विरह-प्रसङ्गात्। न चैतद् अस्त्य्, अपरापर-विशेषोत्पादेऽपि प्राचीन-व्यक्तिषु तद्-दर्शनात्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तद् अप्य् असम्बद्धं, निरवयवस्य पूर्व-व्यक्ति-त्याग-वैकल्ये सत्य् उत्पित्सु-व्यक्तिं प्रतिगमनाभावात्। सावयव-पक्षस्य पुनः प्राग् एवापास्तत्वान्, नैतद्-अभ्युपगम-द्वारेण परिहारः श्रेयान्। अन्यच् च॒ व्यतिरिक्त-सामान्य-सम्बन्धाद् यदि भावाः समाना, न स्वरूपेण, तदा सत्त्व-सम्बन्धात् प्राग् भावाः सन्तोऽसन्तो वा। सन्तश् चेद् अपार्थकः सत्ता-सम्बन्धो,ऽन्यथानवस्था प्रसज्येत, पुनः-सत्तान्तर-सम्बन्धानिवारणात्। असन्तश् चेद् अत्यन्तासताम् अपि गगनारविन्दादीनां सत्ता-सम्बन्धाद् भाव-रूपतापद्येत। एवं द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्व-गोत्वादि-सामान्येष्व् अपि समस्तम् एतद् वाच्यम्, एक-योग-क्षेमत्वात्, तन् न परस्परम् अत्यन्त-व्यतिरेकिणौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चन घटाम् आटीकेते। अत एव तत्-समर्थन-प्रवणस् तत्-तादात्म्य-प्रतिक्षेपकोऽभिप्रायो निरालम्बनत्वान् नैगम-दुर्नय-व्यपदेशम् आस्कन्दति, तादात्म्योपेक्षयैव सामान्य-विशेष-व्यतिरेक-समर्थकस्य नैगम-नयत्वाद्, व्यतिरेकिणोर् अपि तयोर् वस्तुनि कथञ्चिद् भावाद्, इतरथा विवक्षयापि तथा दर्शयितुम् अशक्यत्वात्, प्रधानोपसर्जन-भावस्य द्वय-निष्ठत्वात्, अत्यन्त-तादात्म्ये तत्-कारिण्या विवक्षाया अपि निर्गोचरता-प्रसङ्गात्। तस्मात् कथञ्चिद् भेदाभेदिनाव् एवैतौ, तद्-अन्यतर-समर्थकः पुनर् निरालम्बनत्वाद् दुर्नयतां स्वी-करोत्îति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।२४] तथा सङ्ग्रहोऽप्य् अशेष-विशेष-प्रतिक्षेप-मुखेन सामान्यम् एकं समर्थयमानो दुर्नयः, तद्-उपेक्षा-द्वारेणैव तस्य नयत्वात्, विशेष-विकलस्य सामान्यस्यासम्भवात्। तथा हि॒ यत् तावद् उक्तं -- यद् उत "विशेषाः सामान्याद् व्यतिरेकिणोऽव्यतिरेकिणो वा। व्यतिरेक-पक्षे निःस्वभावत्वं, निःसत्ताकत्वात्। अव्यतिरेक-पक्षे भाव-मात्रं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवद्" इति -- तद् अयुक्तं, विशेष-वादिनोऽप्य् एवं-विध-विकल्प-सम्भवात्। तथा हि॒ विशेषेभ्यः सामान्यं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा। व्यतिरिक्तं चेन्, न तर्हि सामान्यं, स्व-स्वरूप-व्यवस्थिततया विशेष-रूपत्वात्। अव्यतिरिक्तं चेत्, तथापि न सामान्यं, विशेषाव्यतिरिक्तत्वाद् एव तत्-स्वरूपवत्। यद् अप्य् अवाद्य् -- "अनाद्य्-अविद्या-बल-प्रवृत्तो विशेष-व्यवहारस्, तात्त्विकं सामान्यं" -- तद् अपि वचन-मात्रम् एव, युक्ति-रिक्तत्वात्, सामान्यम् एवानाद्य्-अविद्या-दर्शितं, विशेषाः पुनः पारमार्थिका इति विशेष-वादिनोऽपि वदतो वक्त्र-भङ्गाभावात्। यत् पुनर् विशेष-ग्राहक-प्रमाणाभावं प्रतिपादयताभ्यधायि, यद् उत "प्रत्यक्षं भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षात्-करोति नाभावं, तस्यानुत्पादकत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्ततरं, यतः केनेदं भवतोऽत्यन्त-सुहृदा निवेदितं॒ "भाव एव केवलः प्रत्यक्षम् उत्थापयति, न पुनर् अभावोऽपि" [इति]? अभाव-व्यापाराभाव-प्रतिपादक-युक्ति-कलापेनेति चेद् मुग्ध-विप्रतारितोऽसि, तद्-व्यापाराभावासिद्धेः, सद्-असद्-रूप-वस्तुनः समस्त-क्रियासु व्यापाराद्, भाव-तादात्म्येन व्यवस्थितस्याभावस्य व्यापारे विरोधाभावात्। कथं भावाभावयोस् तादात्म्यं, विरोधाद्? इति चेन्, न, प्रमाण-प्रसिद्धे विरोधाभावात्। तथा हि॒ घटादिकः पदार्थात्मा स्वरूपेण सन्, न पटादि-रूपेणाप्îति भावाभावात्मकः। यदि पुनः कथञ्चिन् नाभावात्मकः स्यात्, तदा पटादि-रूपेणापि भावात् सर्वात्मकः प्राप्नोति। युक्तम् एतद्, अत एव भेद-प्रपञ्च-विलय-सिद्धिर् इति चेत्, स्याद् एवैतद्, यदि पटाद्य्-अभावैकान्ताच् छून्य-वादिनोऽपि मनो-रथ-पूरणं न स्यात्॑ तथा हि॒ पटादि-विविक्तो घटोऽनुभूयते, न च पटाद्य्-अभावो भावेन सह तादात्म्यम् अनुभवति, तस्माद् अभावात्मक एवायम्, एवं पटादयोऽप्îतरेतरापेक्षयेति शून्यत्वापत्तिः। तस्मात् स्वरूपम् आबिभ्राणं पर-रूपेभ्यो व्यावृत्तम् एव वस्तु सर्व-क्रियासु व्याप्रियत इति भावाभावात्मकस्यैव व्यापारः, स्वरूप-धारणस्य भावत्वात्, पर-रूप-व्यावर्तनस्याभावत्वाद् इति। एवं स्व-गोचर-प्रत्यक्षोत्पादनेऽपि व्याप्रियते, ततश् च तद्-रूपम् एव तत् साक्षात्-कुर्याद् इति स्वरूप-नियते पर-रूपेभ्यो व्यावृत्त एव वस्तुनि प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तज्-जन्यत्वान्, न भाव-मात्रे, तस्य केवलस्य स्वरूपाव्यवस्थितेर् उत्पादकत्वायोगात्। न च जनकत्वाद् अर्थो ग्राह्यो जन्यत्वाद् वा ज्ञानं ग्राहकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् उक्तं, किं तर्ह्य् आवरण-विच्छेदादेर् लब्ध-सत्ताकं ग्रहण-परिणामाज् ज्ञानं गृह्णात्य्, अर्थस् तु सन्निधानादेर् गृह्यते, स चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूप एव प्रतीयत इति तथा-भूतोऽभ्युपगन्तव्यो, न केवल-सामान्य-रूप इति। सद्-असद्-अंशयोः कथम् एकत्रावस्थानम् इति चेत्, तादात्म्येनेति ब्रूमः। ननु तादात्म्ये भाव-मात्रम् अभाव-मात्रं वापद्येतेतरेतराव्यवतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्, तन् नोभय-रूप-वस्तु-सिद्धिः। नैतद् अस्ति, तादात्म्यस्य सम्बन्धत्वात्, सम्बन्धस्य च द्वय-निष्ठत्वात्, तद्-अभावे कस्य केन सम्बन्धो, निर्गोचरत्वात्? तस्माद् एतौ सद्-असद्-अंशौ धर्मि-रूपतयाभेदिनौ, वस्तुनः सद्-असद्-रूपस्यैकत्वाद्, धर्म-रूपतया पुनर् विवक्षितौ भेदम् अनुभवतः, स्वरूपेण भावात्, पर-रूपेण त्व् अभावाद् इति। तद् एवं प्रत्यक्षे विविक्त-वस्तु-ग्राहिणि सकल-प्रमाण-प्रष्ठे प्रसाधिते शेष-प्रमाणान्य् अपि तद्-अनुसारितया विविक्तम् एव स्व-गोचरं स्थापयन्त्îति। तद्-अपलापी केवल-सामान्य-प्रतिष्ठापकः कद्-अभिप्रायः सङ्ग्रह-दुर्नय-व्यपदेशं स्वी-कुरुते, विशेषापेक्षयैव सामान्य-स्थापकस्य सङ्ग्रह-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२५] तथा व्यवहारोऽपि प्रमाण-प्रसिद्धं वस्तु-स्वरूपं निह्नुवानो युक्ति-रिक्तम् अविचारित-रमणीयं लोक-व्यवहार-मार्गानुसारि समर्थयमानो दुर्नयताम् आत्मनि निधत्ते, लोक-व्यवहार-प्रसाधकस्याप्îतरानिष्टौ व्यवस्थानाभावात्। तथा हि॒ यद् इदं कियत्-काल-भावि स्थूरताम् आबिभ्राणं लोक-व्यवहार-कारि घटादिकं भवतस् तात्त्विकम् अभिप्रेतं तन् नाकस्मिकं, किं तर्हि नित्य-परमाणु-घटितम्, इतरथा निष्कारणत्वेन सर्वदा भावाभाव-प्रसङ्गात्। न ते परमाणवस् तथा प्रतिभान्त्îति चेन्, नात एव तेषाम् अनुमानतः सिद्धिः। यदि पुनर् यद् एव साक्षान् न विशद-दर्शने चकास्ति तत् सकलम् अपलप्येत, हन्त बह्व् इदानीम् अपलपनीयं, घटादि-वस्तुनोऽप्य् अर्वाग्-भाग-वर्ति-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासान् मध्य-पर-भागादीनाम् अपलाप-प्रसङ्गात्, तथा च लोक-व्यवहार-कारितापि विशीर्येत, तावता तद्-असिद्धेः। अथात्रानुमान-बलेन व्यवहार-क्षम-सम्पूर्ण-वस्तुनः साधनम्, एवं तर्हि भूत-भावि-पर्याय-परमाणु-साधनम् अपि क्रियतां, विशेषाभावात्। तथा हि॒ यथा बाह्य-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासेऽपि सर्व-वस्तूनां तावता व्यवहाराभावान् मध्य-भागादि-साधनेन सम्पूर्णानि तत्-समर्थानि तानि साध्यन्ते, तथैव कियत्-काल-भावि-घनाकार-दर्शनेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-परमाणु-तादाद्म्य-व्यवस्थित-शरीराणि तानि साध्यन्तां, तद्-अभावेऽपि तेषाम् अनुपपत्तेः। तथा हि॒ व्यवहारावतारिणो दर्शन-योग्यस्याद्य-पर्यायस्य तावद् अतीत-पर्यायानभ्युपगमे निर्हेतुकत्वं, तत्र चोक्तो दोषः। तद्-उत्पादकानन्तर-पर्यायेष्टौ पुनस् तज्-जनक-पर्यायोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अनादि-पर्याय-परम्परा सिद्धिम् अध्यासीत। तथा व्यवहारावतारि-वस्तु-पर्यन्त-पर्यायस्य पर्यायान्तरानुत्पादकत्वे बलाद् अवस्तुत्वम् आढौकते, भवन्-नीतेर् एवार्थ-क्रिया-करण-वैकल्यात्। तद्-उत्पादकत्वे पुनर् असाव् अप्य् अपर-पर्यायोत्पादक इत्य् अनन्त-पर्याय-मालोपपद्यते। तथा घनाकारोऽपि विशद-दर्शनेन साक्षात्-क्रियमाणो निष्प्रदेश-पर्यन्तावयव-व्यतिरेकेण नोपपद्यते, कर-चरणाद्य्-अवयवानां खण्डशो भिद्यमानतयावयवि-रूपत्वात्, तद्-अवयवानाम् अप्य् अवयवान्तर-घटितत्वात्। परमाणव एव पर्यन्तावयवाः परमार्थतो घनाकार-हेतवस्॑ तद्-अभावे पुनर् आकस्मिकोऽसौ सर्वत्रोपलभ्येत, न वा क्वचिद्, विशेषाभावात्। एतेन यद् अवादि॒ लोक-व्यवहारावतारिणः प्रमाणम् अनुग्राहकम् अस्ति वस्तुनो नेतरस्येत्य्-आदि, तद् अपि प्रतिक्षिप्तम् अवगन्तव्यं, दृश्यमानार्थान्यथानुपपत्त्यैव तत्-साधनात्। यत् पुनर् उक्तं॒ "किं तेषाम् अतीतानागत-पर्याय-परमाण्व्-आदीनां पर्यालोचनेन लोक-व्यवहारानुपयोगितयावस्तुत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्तम्, उपेक्षया वार्तमानिक-वस्तुनोऽनुपयोगित्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेः, सर्वस्य सर्व-लोकानुपयोगित्वात्। कस्यचिद् उपयोगितया वस्तुत्वे तेषाम् अपि सा समस्त्य् एव, सर्व-ज्ञ-ज्ञानादि-गोचरत्वाद् इत्य् आस्तां तावत्। तद् एवं प्रमाण-प्रसिद्धार्थापलापित्वाद् व्यवहारो दुर्नयः, तद्-उपेक्षया व्यवहारानुपाति-वस्तु-समर्थकस्य व्यवहार-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२६] अथ ऋजुसूत्रोऽपि दृष्टापलापेनादृष्टम् एव क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणं वस्तु-स्वरूपं परमार्थतया मन्यमानो दुर्नयताम् आस्कन्दति, दृश्यमान-स्थिर-स्थूरार्थापह्नवे निर्मूलतया स्वाभिप्रेत-वस्तु-समर्थक-परामर्शस्योत्थानाभावात्। तथा हि॒ स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् पश्चात् कुयुक्ति-विकल्पेन विवेचयेद्, यद् उतैष स्थिर-स्थूरो दृश्यमानः खल्व् आकारो न घटाम् इयर्ति। विचाराक्षमत्वाद् इत्य्-आदिना न च दृष्टम् अदृष्ट-सन्दर्शकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाधितुं शक्यं, सर्वत्रानाश्वास-प्रसङ्गात्। अथाभिदधीथा॒ "मन्द-मन्द-प्रकाशे प्रदेशे रज्जौ विष-धर-भ्रान्तिः प्राक्तनी यथोदीचीनेन तन्-निर्णय-कारिणा विकल्पेन बाध्यते, तथेदम् अपि स्थिर-स्थूर-दर्शनं क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रसाधक-परामर्शेन, किम् अत्रायुक्तम्?" नैतद् अस्ति, रज्जु-प्रतिभासस्यैव प्राक्-प्रवृत्त-विष-धर-भ्रान्त्य्-अपनोद-दक्षत्वात्, तद्-अभावे च विकल्प-शतैर् अपि निवर्तयितुम् अशक्यत्वात्। अत्राप्य् अतीत-वर्त्स्यतोर् विनष्टानुत्पन्नतयासन्निहितत्वात्, स्थूरावयवानां च स्वावयवेषु भेदाभेद-द्वारेण पर्यालोच्यमानानाम् अवस्थानाभावात् क्षण-क्षयि-परमाणव एव प्रतिभान्ति, ततश् च प्रतिभास एव स्थिर-स्थूर-दर्शनस्य बाधक इति चेद्, एवं तर्हि प्रतिभासस्योपदेश-गम्यतानुपपत्तेस्, तथैव व्यवहारः प्रवर्तेत। पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवान् न प्रवर्तत इति चेन्, नान्यत्राप्य् अस्योत्तरस्य विप्लव-हेतुत्वात्। तथा हि॒ धवले जलजादौ प्रतिभातेऽपि नीलोऽयम् अध्यक्षेणावलोकितः॑ पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवात् तु धवलः प्रतिभात्îति भवन्-न्यायेन शठः प्रतिजानानः केन वार्येत। तन् न दृष्टापलापः कर्तुं शक्य इति स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिस्, तस्यैव दर्शनाद्, इतरस्य तद्-दर्शन-द्वारेण साध्यमानस्यानुमेयत्वात्, तद्-अनिष्टौ तस्याप्य् असिद्धेः। एतेन स्थिर-स्थूर-वस्तुनोऽर्थ-क्रिया-विरह-प्रतिपादनम् अपि प्रतिव्यूढं, तथा-विधस्यैव सर्व-क्रियासु व्यापार-दर्शनात् क्षण-क्षयिणोऽर्थ-क्रिया-निषेधाच् च, यथोक्तं प्राक्॒ "क्षण-भङ्गुरो ह्य् अर्थात्मा स्वक्षने पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इत्य्-आदि। किं च, सत्त्व-पुरुषत्व-चैतन्यादिभिर् बाल-कुमार-युव-स्थविरत्व-हर्ष-विषादादिभिश् चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूपस्य सर्वस्य वस्तुनः प्रतीतेर् द्रव्य-पर्यायात्मकत्वम्, अभेदस्य द्रव्यत्वाद्, भेदस्य पर्याय-रूपत्वाद् इति। ततश् च भूत-भावि-क्षणयोर् असन्निधान-द्वारेण वार्तमानिक-क्षणस्यैवार्थ-क्रिया-कारित्व-प्रतिपादनं नास्माद्-बाधा-करं, पर्यायाणां क्रम-भावितया वर्तमान-पर्यायालिङ्गितस्यैव द्रव्यस्यार्थ-क्रिया-करण-चतुरत्वात्। [न] केवलं तत् त्रि-काल-व्यापि, द्रष्टापि द्रव्य-रूपतया तथा-भूत एव। ततश् च क्षणिक-पर्याय-तिरो-धान-द्वारेण तद्-रूप-सङ्कलनात् स्थिरम् एवेदं समस्त-क्रियासु व्याप्रियत इति प्रतीति-वीथिम् अवतरति, स्थैर्यस्यापि तात्त्विकत्वात्, क्षणिक-पर्यायाणां विद्यमानानाम् अप्य् अग्रहणात्, प्राकृत-लोक-ज्ञानस्यावरण-क्षयोपशमापेक्षितया कतिचिद्-अंश-विषयत्वात्। यदि पुनर् द्रव्य-बुद्धिः पर्याय-परम्परा-दर्शन-बलायातत्वाद् अतात्त्विकी कल्प्येत, तदा पूर्व-पर्यायस्योत्तर-पर्यायोत्पादने सान्वयत्वं निरन्वयत्वं वा वक्तव्यं, गत्य्-अन्तराभावात्। सान्वयत्वे द्रव्यं पर्यायान्तरेणाभिहितं स्यान्॑ निरन्वयत्वे पुनर् निर्हेतुतयोत्तर-पर्यायानुत्पाद-प्रसङ्गः। तन् नोभय-रूप-वस्तु-व्यतिरेकेणार्थ-क्रिया-सिद्धिः। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणं, शब्द-विद्युत्-प्रदीपादि-चरम-क्षणानां क्षनान्तरानारम्भकत्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेस्, तद्-अवस्तुत्वे पुनर् उपान्त्य-क्षणस्यापि वस्तुनि व्यापाराभावाद्॑ एवं यावत् सर्व-क्षणानां सङ्कलिकया वस्तुत्वम्। अथ क्षणान्तरानारम्भेऽपि स्व-गोचर-ज्ञान-जनकत्वम् अर्थ-क्रिया परिकल्प्येत, तथा सत्य् अतीत-भावि-पर्याय-परम्परापि योगि-ज्ञान-गोचरतां यात्îति वस्तुत्वं स्वी-कुर्यात्। तन् नार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम्, अपि त्ûत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तता, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्। उत्पाद-व्ययौ ध्रौव्येन सह विरुद्धाव् इति चेत्, कुतोऽयं विरोधः॒ प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा? न तावद् आद्यः पक्षः, सर्व-प्रमाणानां बहिर् अन्तश् च तथा-विधा-वस्तु-द्योतन-पटिष्ठतया प्रसाधितत्वात्। नापि द्वितीयो,ऽप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वात्। एतेन स्थूरता-दूषणम् अपि प्रतिक्षिप्तं, प्रतिभास-हतत्वात्, तद्-अपह्नवेन विरोधोद्भावनस्य निर्मूलतया प्रलाप-मात्रत्वात्। यत् पुनर् वर्तमान-प्रकाश-रूपतया तत्-सम्बद्ध-वस्तु-ग्राहित्वं सर्व-प्रमाणानाम् उदग्राहि, तद् अयुक्तं, तेषाम् एकान्तेन वार्तमानिकत्वासिद्धेः, कथञ्चिद् आत्मा-व्यतिरेकित्वात्, तस्य च काल-त्रय-व्यापकत्वात्, तद्-रूपतया तेषाम् अप्य् अवस्थानात्। ततश् चात्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपत्वात्, सर्व-प्रमाणानां परिणामिन्य् एव वस्तुनि व्यापारो, न क्षणिके। न चातीतानागत-क्षण-वर्ति-वस्तु-ग्रहणेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-जन्म-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्ग, आवरण-विच्छेद-सापेक्षत्वात्, तस्यैव परमार्थतः संवेदनाविर्-भावान्तर-कारणत्वाद्, ग्राह्यादेर् बहिर्-अङ्गत्वात्। सामस्त्येन पुनर् आवरण-विलये सति समस्त-वस्तु-विस्तारानाद्य्-अनन्त-क्षण-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्गो न नो बाधा-कार्îष्टत्वात्। तद् एक-देश-क्षयोपशमे पुनस् तद्-अनुसारिणी बोध-प्रवृत्तिर् इति कियत्-काल-भाविनि स्थूरे वस्तुनि प्राकृत-लोक-ज्ञानानि प्रवर्तन्ते, न सम्पूर्णे। न च तान्य् अलीकानि, तद्-ग्राह्य्âंशस्यापि वस्तुनि भावात्, तावतैव व्यवहार-सिद्धेर् इति। यच् चोक्तं॒ क्षणिकतां गृह्णन्तोऽपि सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्धत्वान् मन्दा नाध्यवस्यन्ति, मिथ्या-विकल्प-वशात् स्थिरता-व्यवहारं च प्रवर्तयन्ति, तद् अयुक्तं, भवद्-आकूटेन सादृश्याभावात्, तद्-अभावे तद्-उत्पाद्याभिमत-भ्रान्तेर् निर्बीजतयोत्पत्तेर् असम्भवात्। तथा स्थिरतारोपोऽपि क्वचिद् गृहीत-स्थिरत्वस्यैव युक्तो नान्यथा, यथा दृष्ट-विष-धरस्य मन्द-प्रकाशे रज्जु-दर्शने विष-धरारोपः। न च भवतां कदाचन स्थिरता प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति, तत् कथं प्रतिक्षणम् उदयापवर्ग-संसर्गिणि सकले वस्तुनि प्रत्यक्षेणावलोकितेऽपि तद्-आरोप इति। तस्मात् तिरो-हित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-वैविक्त्यं वस्तु सर्व-सांव्यवहारिक-प्रमाणैर् गोचरी-क्रियत इति तत्-तिरस्-कार-द्वारेणादृष्ट-क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रतिष्ठापकोऽभिप्राय ऋजुसूत्र-दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते, तद्-उपेक्षयैव तद्-दर्शकस्य नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२७] तथा शब्दादयोऽपि सर्वथा शब्दाव्यतिरेकम् अर्थस्य समर्थयन्तो दुर्नयास्, तत्-समर्थनार्थम् उपन्यस्तस्य तत्-प्रतीतौ प्रतीयमानत्व-लक्षणस्य हेतोर् अनैकान्तिकत्वात्। तथा हि॒ नायम् एकान्तो यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तम् एव, व्यतिरिक्तस्यापि पावकादेर् अन्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-सम्बन्ध-बलाद् धूमादि-प्रतीतौ प्रतीयमानत्वात्। एवं शब्दोऽपि व्यतिरिक्तम् अप्य् अर्थं वाचकत्वात् प्रत्याययिष्यत्य्, अव्यतिरेकस्य प्रत्यक्षादि-बाधितत्वाच्, छब्दाद् विवेकेनैवानुभूयमानत्वात्। अस्मिंश् च हेताव् अनैकान्तिके स्थिते सर्वार्थानां सस्व-वाचकत्व-साधन-द्वारेण शब्दाव्यतिरेक-साधनम् अपि दूरापास्तम् एव। न चात्रापि प्रतिबन्ध-ग्राहि प्रमाणं -- यो योऽर्थस् तेन तेन सस्व-वाचकेन भवितव्यं -- घटादि-दृष्टान्त-मात्रात् तद्-असिद्धेः, क्षणिकालक्ष्य-द्रव्य-विवर्तानां सङ्केत-ग्रहणोपायाभावेनाभिलपितुम् अशक्यतयानभिलाप्यत्व-सिद्धेश् च। क्षण-भङ्गुरता-प्रतिज्ञानं पुनर् अमीषां अप्य् ऋजुसूत्रवन् निरसितव्यम्। तथा प्रत्येक-मतापेक्षयापि स्वाभिप्रेतं प्रतिष्ठापयन्तस् तद्-विपरीतं शब्दार्थं तिरस्-कुर्वाणा दुर्नयताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। एतावद् धि प्रमाण-प्रतिष्ठितं, यद् उत विधि-मुखेन शब्दोऽर्थस्य वाचक इति॑ न पुनर् अयं नियमो यथायम् अस्यैव वाचको नान्यस्य, देश-काल-पुरुष-सङ्केतादि-विचित्रतया सर्व-शब्दानाम् अपरापरार्थ-प्रतिपादकत्वेनोपलब्धेर् अनन्त-धर्मतयापरापर-योग्यता-द्वरेणापरापरार्थाभिधायकत्वोपपत्तेर्, अर्थानाम् अप्य् अनन्त-धर्मत्वाद् एवापरापर-शब्द-वाच्यत्वाविरोधात्, तथैवाविगानेन व्यवहार-दर्शनात्, तद्-अनिष्टौ तल्-लोप-प्रसङ्गात्। तस्मात् सर्व-ध्वनयो योग्यतया सर्वार्थ-वाचका, देश-क्षयोपशमाद्य्-अपेक्षया तु क्वचित् कथञ्चित् प्रतीतिं जनयन्ति। ततश् च क्वचिद् अनपेक्षित-व्युत्पत्ति-निमित्ता रूढितः प्रवर्तन्ते, क्वचित् सामान्य-व्युत्पत्ति-सापेक्षाः, क्वचित् तत्-काल-वर्ति-व्युत्पत्ति-निमित्तापेक्षयेति न तत्र प्रामाणिकेन नियतार्थाग्रहो विधेयः। अतोऽमी शब्दादयो यदेतरेतराभिमत-शब्दार्थोपेक्षया स्वाभिमतं शब्दार्थं दर्शयन्ति, तदा नयास्, तस्यापि तत्र भावात्। परस्पर-बाधया प्रवर्तमानाः पुनर् दुर्नय-रूपतां भजन्ति, निरालम्बनत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२८] ननु च यद्य् एकैक-धर्म-समर्थन-परायणाःशेष-धर्म-तिरस्-कार-कारिणोऽभिप्राया दुर्नयतां प्रतिपद्यन्ते, तदा वचनम् अप्य् एक-धर्म-कथन-द्वारेण प्रवर्तमानं सावधारणत्वाच् च शेष-धर्म-प्रतिक्षेप-कार्य् अलीकमापद्यते। ततश् चानन्त-धर्माध्यासित-वस्तु-सन्दर्शकम् एव वचनं यथावस्थितार्थ-प्रतिपादकत्वात् सत्यं॑ न चैवं वचन-प्रवृत्तिर्, घटोऽयं शुक्लो मूर्त इत्य्-आद्य् एकैक-धर्म-प्रतिपादन-निष्ठतया व्यवहारे शब्द-प्रयोग-दर्शनात्, सर्व-धर्माणां यौगपद्येन वक्तुम् अशक्यत्वात्, तद्-अभिधायकानाम् अप्यानन्त्यात्। न चैकैक-धर्म-सन्दर्शकत्वेऽप्य् अमूनि वचनान्य् अलीकानि वक्तुं पार्यन्ते, समस्त-शाब्द-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-अलीकत्वे ततः प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् इति। अत्रोच्यत -- इह तावद् द्वये वस्तु-प्रतिपादका, लौकिकास् तत्त्व-चिन्तकाश् च। तत्र प्रत्यक्षादि-प्रसिद्धम् अर्थम् अर्थित्व-वशाल् लौकिकास् तावन् मध्यस्थ-भावेन व्यवहार-काले व्यपदिश्यन्ति, यद् उत नीलम् उत्पलं सुगन्धि कोमलम् इति, न तु तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-ग्रहण-निराकरणयोराद्रियन्ते,ऽनर्थित्वात्, तावतैव विवक्षित-व्यवहार-परिसमाप्तेः। न च तद्-वचनानाम् अलीकता, शेष-धर्मान्तर-प्रतिक्षेपाभावात्, तत्-प्रतिक्षेप-कारिणाम् एवालीकत्वात्। "सर्वं वचनं सावधारणम्" इति-न्यायात् तेषाम् अपि शेष-धर्म-तिरस्-कार-कारित्व-सिद्धेर् भवन्-नीत्यालीकतापद्यत इति चेन्, न, अवधारणस्य तद्-असम्भव-मात्र-व्यवच्छेदे व्यापाराद्॑ यथानेक-पुरुष-सम्पूर्णे सदसि द्वारादौ स्थितस्य किम् अत्र देवदत्तः समस्ति नास्त्îति वा दोलायमान-बुद्धेः केनचिद् अभिधीयते -- यथा देवदत्तोऽस्त्îति। अत्र यद्य् अप्य् उपन्यस्त-पद-द्वयस्य सावधारणता गम्यते,ऽन्यथा तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात्, तथाप्य् अवधारणं तद्-असम्भव-मात्रं व्यवच्छिनत्ति, न शेष-पुरुषान्तराणि॑ नापि पर-रूपेण नास्तित्वं, तद्-व्यवच्छेदाभिप्रायेण प्रस्तुत-वाक्य-प्रयोगात्, प्रयोक्त्र्-अभिप्रायादि-सापेक्षतयैव ध्वनेः स्वार्थ-प्रतिपादन-सामर्थ्यात्। न च वाच्य-वाचक-भाव-लक्षण-सम्बन्धानर्थक्यं, तद्-अभावे प्रयोक्त्र्-अभिप्राय-मात्रेण रूपस्यैव नियोक्तुम् अशक्यत्वात्। न च समस्त-धर्म-युक्तम् एव वस्तु प्रतिपादयद् वचनं सत्यम् इत्य् अभिदध्महे, येनैकैक-धर्मालिङ्गित-वस्तु-सन्दर्शकानाम् अलीकता स्यात्, किं तर्हि सम्भवद्-अर्थ-प्रतिपादकं सत्यम् इति, सम्भवन्ति च शेष-धर्माप्रतिक्षेपे वचन-गोचरापन्ना धर्मास्॑ तस्मात् तत्-प्रतिपादकं सत्यम् एव। यदा तु दुर्नय-मताभिनिविष्ट-बुद्धिभिस् तीर्थान्तरीयैस् तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-निराकरणाभिप्रायेणैव सावधारणं तत् प्रयुज्यते, यथानित्यम् एव वस्तु नित्यम् एव वेत्य्-आदि, तदा निरालम्बनत्वाद् अलीकतां प्राप्नुवत् केन वार्येत? तत्त्व-चिन्तकाः पुनः प्रत्यक्षादि-प्रमाण-सिद्धम् अनेकान्तात्मकं वस्तु दर्शयन्तो द्वेधा दर्शयेयुस्, तद् यथा -- विकलादेशेन सकलादेशेन वा। तत्र विकालादेशो नयाधीनः, सकलादेशः प्रमाणायत्तः। तथा हि॒ यदा मध्यस्थ-भावेनार्थित्व-वशात् किञ्चिद् धर्मं प्रतिपिपादयिषवः शेष-धर्म-स्वी-करण-निराकरण-विमुखया धिया वाचं प्रयुञ्जते, तदा तत्त्व-चिन्तका अपि लौकिकवत् सम्मुग्धाकारतयाचक्षते, यद् उत "जीवोऽस्ति कर्ता प्रमाता भोक्तेत्य्-आदि"। अतः सम्पूर्ण-वस्तु-प्रतिपादनाभावाद् विकलादेशोऽभिधीयते, नय-मतेन सम्भवद्-धर्माणां दर्शन-मात्रम् इत्य् अर्थः। यदा तु प्रमाण-व्यापारम् अविकलं परामृश्य प्रतिपादयितुम् अभिप्रयन्ति, तदाङ्गी-कृत-गुण-प्रधान-भावाशेष-धर्म-सूचक-कथञ्चित्-पर्याय-स्याच्-छब्द-भूषितया सावधारणया च वाचा दर्शयन्ति ‘स्याद् अस्त्य् एव जीवऽ॑ इत्य्-आदिकया। अतोऽयं स्याच्-छब्द-संसूचिताभ्यन्तरी-भूतानन्त-धर्मकस्य साक्षाद्-उपन्यस्त-जीव-शब्द-क्रियाभ्यां प्रधनी-कृतात्म-भावस्यावधारण-व्यवच्छिन्न-तद्-असम्भवस्य वस्तुनः सन्दर्शकत्वात् सकलादेश इत्य् उच्यते, प्रमाण-प्रतिपन्न-सम्पूर्णार्थ-कथनम् इति यावत्। तद् उक्तं॒
सा ज्ञेय-विशेष-गतिर् नय-प्रमाणात्मिका भवेत् तत्र ।
सकल-ग्राहि तु मानं विकल-ग्राही नयो ज्ञेयः ॥
[न्या०अ०२९।२९] तद् इदम् उक्तं भवति॒ नय-प्रमाणाभिज्ञः स्याद्-वादी सकल-विकलादेशाव् अधिकृत्य वस्तु-स्वरूप-प्रतिपिपादयिषया यद् यद् ब्रूते तत् तत् सत्यं, सम्भवद्-अर्थ-गोचरत्वात्। दुर्नय-मतावलम्बिनः पुनर् एकान्त-वादिनो यद् यद् आचक्षते तत् तद् अलीकम्, असम्भवद्-अर्थ-विषयत्वाद् इति।
[न्या०अ०३०।०] साम्प्रतम् अमुम् एवार्थं द्रढयन् सिद्धान्तेऽप्य् एकैक-नय-मत-प्रवृत्तानि सूत्राणि न सम्पूर्णार्थाभिधायकान्îत्य्, अपि तु तत्-समुदायाभिप्राय-प्रवृत्तम् अविकल-वस्तु-निवेदकम् इति दर्शयन्न् आह॒
नयानाम् एक-निष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुत-वर्त्मनि ।
सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि स्याद्-वाद-श्रुतम् उच्यते ॥ न्यायावतार ३० ॥
[न्या०अ०३०।१] इह त्रिविधं श्रुतं, तद् यथा -- मिथ्या-श्रुतं नय-श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतं च। तत्र श्रूयत इति श्रुतम् आगमः। मिथ्यालीकं श्रुतं मिथ्या-श्रुतं, तच् च दुर्नयाभिप्राय-प्रवृत्तं तीर्थिक-सम्बन्धि, निर्गोचरत्वात्। तथा नयैर् हेतु-भूतैः श्रुतं नय-श्रुतम्, एतच् चार्हद्-आगमान्तर्-गतम् एवैक-नयाभिप्राय-प्रतिबद्धं, यथा "पडुप्पण्णे नेरïë विणस्सï" इत्य्-आद्य्, ऋजुसूत्र-नयाभिप्रायेण क्षणिकत्वस्यापि तत्र सम्भवात्। तथा निर्दिश्यमान-धर्म-व्यतिरिक्ताशेष-धर्मान्तर-संसूचकेन स्याता युक्तो वादोऽभिप्रेत-धर्म-वचनं स्याद्-वादः, तद्-आत्मकं श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतम्। तत् किं-भूतम् उच्यत इत्य् आह॒ सम्पूर्णोऽविकलः स चासाव् अर्थश् च तद्-विनिश्चायि तन्-निर्णय-हेतुत्वाद् एवम् अभिधीयते॑ परमार्थतः पुनः समस्त-वस्तु-स्वरूप-प्रतिपाद्îत्य् अर्थः, शब्दात्मकत्वान्, निश्चयस्य बोध-रूपत्वाद् इति। नय-श्रुतं तर्हि सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि कस्मान् न भवत्îत्य् आह॒ नयानां नैगमादीनाम् एक-निष्ट्ःानाम् एक-धर्म-ग्रहण-पर्यवसितानां श्रुत-वर्त्मन्य् आगम-मार्गे प्रवृत्तेः प्रवर्तनान् न तद् एकैकाभिप्राय-प्रतिबद्धं सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि, तत्-समुदायस्यैव सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायकत्वाद् इत्य्-आकूटम्।
[न्या०अ०३१।०] तद् एवं नय-प्रमाण-स्वरूपं प्रतिपाद्याधुनाशेष-नय-प्रमाण-व्यापकं तेषां तत्र तादात्म्येनावस्थानात् प्रमातारम् अभिधातुकाम आह॒
प्रमाता स्वान्य-निर्भासी कर्ता भोक्ता विवृत्तिमान् ।
स्व-संवेदन-संसिद्धो जीवः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः ॥ न्यायावतार ३१ ॥
[न्या०अ०३१।१] तत्र त्रि-काल-जीवनाज् जीवः, प्राण-धारक आत्मेत्य् अर्थः, स प्रमिणोत्îति प्रमाता प्रमेय-परिच्छेदकः। किं-भूतः सन्न् इत्य् आह॒ स्वान्याव् आत्म-परौ निर्भासितुम् उद्द्योतयितुं शीलम् अस्येति स्वान्य-निर्भासी, स्व-स्वरूपार्थयोः प्रकाशक इति यावत्। तथा करोत्îति कर्ता, भुङ्क्त इति भोक्ता, विवर्तनम् अपरापर-पर्यायेषु गमनं विवृत्तिः परिणामः, सा विद्यते यस्येति विवृत्तिमान्। स्व आत्मा संवेद्यतेऽनेनेति स्व-संवेदनं तेन सम्यक् सिद्धः प्रतिष्ठितः प्रतीतो वा स्व-संवेदन-संसिद्धः। क्षितिः पृथिव्य् आदिर् येषां तानि क्षित्य्-आदीन्य्, आदि-शब्दाद् अम्बु-तेजो-वाय्व्-आकाशानि गृह्यन्ते॑ न विद्यत आत्मा स्वरूपम् अस्येत्य् अनात्मकः, किं स्व-स्वरूपापेक्षया? न, क्षित्य्-आदीनाम् अनात्मकः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः, क्षित्य्-आदि-स्वरूपो न भवत्îत्य् अर्थः।
[न्या०अ०३१।२] तत्र जीवः प्रमातेत्य्-अनेन ये पारमार्थिकं प्रमातारं नाभ्युपगच्छन्त्य्, अपि तु विज्ञान-क्षण-परम्परानुभव-बल-प्रबोधितानादि-प्ररूढ-वासना-सम्पादित-सत्ताकं मिथ्या-विकल्प-परिकल्पितम् अपारमार्थिकं तं मन्यन्ते प्रतिक्षण-विलय-वादिनः तान् निराचष्टे, क्षण-विलयस्य प्राग् एव प्रतिषिद्धत्वाद्, बहिर् अन्तश् च परिणामि-वस्तुनः प्रसाधनात्।
[न्या०अ०३१।३] ननु च घटादयस् तावद् विनाशम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तेषां च विनाशो लकुटादि-कारण-कलापेनाविनश्वर-स्वभावानां वा क्रियेत, विनश्वर-स्वभावानां वा। यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, स्वभावस्य प्रच्यावयितुम् अशक्यत्वात्, तस्य नियत-रूपत्वाद्, अन्यथा स्वभावत्वायोगात्। अथैवं-भूत एव तस्य स्वभावः स्व-कारण-बलायातो यद् उत विनाश-कारणम् आसाद्य विनङ्क्ष्यत्îति ब्रूषे, तथापि तद्-विनाश-कारण-सन्निधानं किं यादृच्छिकम् उत तत्-स्वभाव-सम्पाद्यम् एव। यदाद्यः कल्पस्, तदा सन्निहितस्यापि तत्-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपातेन निवर्तनात्, तत्-सन्निधापक-हेतूनां अपि स्व-सन्निधापक-कारण-कलाप-सापेक्षत्वात्, सन्निहितानाम् अपि प्रतिद्वन्द्विना निवर्तनाद्, यादृच्छिकत्वाच् च नावश्यं-भावि तत्-सन्निधानं॑ ततश् चासन्निहित-स्व-विनाश-कारण-कदम्बकः कश्चिद् घटादिर् न विनश्येद् अप्य्, अनिष्टं चैतत्, सर्व-कृतकानां विनाशाविगानात्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तथा सति पश्चाद् अपि तद्-बलाद् विनाश-हेतवः सन्निधास्यन्त्îति प्रथम-क्षण एव सन्निदधतु, तथापि क्षणिकतैवार्थस्य। स्व-हेतोर् एव नियत-कालात् परतोऽयं स्व-विनाश-हेतुं सन्निधापयिष्यत्îत्य् एवं-रूपो जात इति चेन्, नैवम् अपि क्षण-भङ्गुरतायाता। तथा हि॒ स्व-हेतुना किलासौ वर्षात् परतः स्व-विनाश-हेतु-सन्निधापन-क्षम-स्वभावो व्यधायि॑ स च तस्योत्पाद-क्षणाद् द्वितीय-क्षणे स्वभावोऽस्ति वा न वा? अस्ति चेत्, तथा सति पुनर् वर्षं तेन स्थातव्यम्, एवं यावद् वर्षोपान्त्य-क्षणेऽपि यदि तत्-स्वभाव एवासौ तदापरम् अपि वर्षान्तरं स्थितिर् आपद्येत, तदा चानन्त-कल्प-स्थायी-भावः स्याद्, अप्रच्युत-वर्ष-स्थायि-स्वभावत्वाद् इति। अथ द्वितीय-क्षणे नास्ति स स्वभाव इति ब्रूषे, हन्त क्षणिकत्वम् एवाढौकते,ऽतादवस्थ्यस्य तल्-लक्षणत्वात्। किं च, विनाश-हेतुर् भावस्य विनाशं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा कुर्यात्? व्यतिरिक्त-करणे न किञ्चित् कृतं स्यात्, ततश् च भावस् तादवस्थ्यम् अनुभवेत्। तत्-सम्बन्धः क्रियत इति चेन्, न सम्बन्धस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-व्यतिरिक्तस्य प्रतिषेधात्। न चानयोर् अन्यतरः सम्बन्धोऽत्र समस्ति, व्यतिरेकिणा सार्द्धं तादात्म्यायोगाद्, अन्य-हेतुकस्य पश्चाद् उत्पन्नस्य तद्-उत्पत्ति-वैकल्यात्। तन् न व्यतिरिक्तो विनाशः कर्तुं युक्तः। अव्यतिरिक्त-करणे पुनस् तम् एव भावं विनाश-हेतुः करोत्îति प्राप्तम्, अव्यतिरेकस्य तद्-रूपता-लक्षणत्वात्। न चासौ कर्तव्यः, स्व-हेतोर् एव निष्पन्नत्वात्, तत्-करणे च तस्यावस्थानम् एव स्यान्, न प्रलयः। तन् नाविनश्वर-स्वभावानां पश्चात् कथञ्चिद् अपि विनाशः कर्तुं शक्यो, विनश्वर-स्वभावानां पुनः स्व-हेतु-बलायातत्वात् प्राग् अपि प्रतिक्षण-भावी, न कारणान्तरापेक्षः, स्वभावस्य नियत-रूपत्वात्॑ तस्मात् प्राणित्य् अद्यापि प्रतिक्षण-विलय इति।
[न्या०अ०३१।४] अत्रोच्यते -- सत्यम् एतत्, किं तु यथा विनाश-कारणायोगात् प्रतिक्षण-भावी विनाशो भवद्भिः प्रतिपद्यते, तथैव स्थित्य्-उत्पत्ती प्रतिक्षण-भाविन्यौ किं न प्रतिपद्येते, तद्-धेतूनाम् अपि विचार्यमाणानाम् अयोगात्। तथा हि॒ स्थिति-हेतुना तावत् स्वयम् अस्थिर-स्वभावा भावाः स्थाप्येरन् स्थिर-स्वभावा वा? न तावत् प्रथमः पक्षः क्षोदं क्षमते, स्वभावस्यान्यथा कर्तुम् अशक्यत्वात्, तस्य प्रतिनियत-रूपत्वाच्, चेतनाचेतन-स्वभाववद्, अन्यथा स्वभावता-हानेः। द्वितीय-पक्षे पुनः स्वयं स्थिर-स्वभावानां किं स्थिति-हेतुना? स्थितिर् नेष्यत एव, तेनानभ्युपगतोपालम्भ एवायम् इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, एवं हि भावाः क्षण-मात्रम् अपि न तिष्ठेयुः। क्षण-भाविन्îष्यत एवेति चेत्, सा तर्ह्य् अस्थिति-स्वभावानां हेतु-शतैर् अपि कर्तुं न पार्यत इति ब्रूमः, तत्-स्वभावत्वे पुनर् हेतु-व्यापार-नैरर्थक्यात्। अहेतुका सती सकल-कालं भवत्îति दत्तो जलाञ्जलिः प्रतिक्षण-विलयस्य। तथोत्पाद-हेतुर् अपि तत्-स्वभावस्योत्पत्तिं विदध्याद् अतत्-स्वभावस्य वा? न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-कर्तुं युक्तः, स्वयम् उत्पादकस्योत्पादने व्याप्रियमाणो हि हेतुः पिष्टं पिनष्टि, शङ्खं धवलयति, तद्-अभावेऽपि स्व-योग्यतयोत्पत्तेः। नापि द्वितीयः कल्पोऽङ्गी-करणार्हः, स्वयम् अनुत्पत्ति-धर्मकस्योत्पादयितुम् अशक्यत्वाद्, अन्यथा शश-विषाणादयोऽप्य् उत्पाद्य-कोटिम् अध्यासीरन्, विशेषाभावात्॑ ततश् च न कश्चिद् अत्यन्ताभावः स्यात्। तद् यथा निर्हेतुकत्वान् नाशः प्रतिक्षण-भावी, तथैव दर्शित-युक्तेः स्थित्य्-उत्पत्ती अप्îति त्रयाक्रान्तं सकलं वस्तु जातम् अभ्युपगन्तव्यं॑ तथा सति जीवोऽपि जीवत्व-चैतन्य-द्रव्यत्वादिभिः स्थेमानं आबिभ्राण एव हर्ष-विषादादिभिर् अपरापरार्थ-ग्रहण-परिणामैश् चोत्पाद-व्यय-धर्मकः पारमार्थिकः प्रमातेति बलात् सिद्धिम् अध्यास्ते।
[न्या०अ०३१।५] ननु च यद्य् उत्पाद-व्यय-स्थितीनां निर्हेतुकत्वात् सकल-काल-भाविता भवद्भिः साध्यते, तदान्वय-व्यतिरेकाभ्यां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धः खल्व् अयं तत्-कारण-कलाप-व्यापारः कथं नेयः? न चायम् अपह्नोतुं शक्यः! तथा हि॒ कुलालादि-कारण-व्रात-व्यापारे घटादयः समुपलभ्यन्ते, तद्-अभावे च नोपलम्भ्यन्त इति तज्-जन्या इत्य् उच्यन्ते। स्थितिर् अपि विनाश-कारण-सन्निधानात् प्राक् तद्-बलाद् एव, तथा नाशोऽपि मुद्गरादि-सन्निधानासन्निधानाभ्यां सद्-असत्ताम् अनुभवंस् तत्-कृतः प्रतीयते, नाहेतुकः। तत् कथम् एतद् इति?
[न्या०अ०३१।६] अत्रोच्यते -- न वयं सर्वथा हेतूनां व्यापारं वारयामः, किं तर्हि स्वयम् उत्पाद-व्यय-स्थित्य्-आत्मना विवर्तमानस्य द्रव्यस्य हेतवस् तद्-विशेष-करणे व्यापारम् अनुभवन्ति, तेनैव सार्द्धं तेषाम् अन्वय-व्यतिरेकानुकरण-दर्शनाद्, दृष्टस्य चापह्नवेऽस्माकम् अप्रवृत्तत्वात्, प्रतीति-युक्ति-लक्षण-द्वय-पक्ष-पातित्वात्॑ केवलं प्रतीति-विकलां युक्तिं युक्ति-विनाकृतां वा प्रतीतिं नाङ्गी-कुर्महे,ऽसम्भवद्-अर्थ-गोचरतया निरालम्बनत्वात् तस्या इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।७] स्वान्य-निर्भास्îत्य्-अनेन प्राग्-उक्त-स्व-पराभासि-प्रमाण-विशेषणवन् मीमांसकान् परोक्ष-बुद्धि-वादिनो योगाचारांश् च ज्ञान-मात्र-वादिनः प्रतिक्षिपति, ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदेन तद्-उक्त-न्यायाविशेषाद् इति।
[न्या०अ०३१।८] कर्ता भोक्तेइति विशेषण-द्वयेन सांख्य-मतं विकुट्टयति, कर्ता सन् भोक्ताप्îति काक्वोपन्यासाद्, अकर्तुर् भोगानुपपत्तेर्, भुजि-क्रिया-निर्वर्तन-समर्थस्यैव भोक्तृत्वात्। जपा-कुसुमादि-सन्निधान-वशात् स्फटिके रक्ततादि-व्यपदेशवद् अकर्तुर् अपि प्रकृत्य्-उपधान-वशात् सुख-दुःखादि-भोग-व्यपदेशो युक्तस्॑ तथा हि॒ प्रकृति-विकार-दर्पणाकार-बुद्धि-सङ्क्रान्तानां सुख-दुःखाद्य्-आत्मकानाम् अर्थानां पुरुषः सन्निधान-मात्रेण भोजको व्यपदिश्यते, "बुद्ध्य्-अध्यवसितम् अर्थं पुरुषश् चेतयत" इति-वचनाद् इति चेन्, न, कथञ्चित् सक्रियाकता-व्यतिरेकेण प्रकृत्य्-उपधानेऽप्य् अन्यथात्वानुपपत्तेर्, अप्रच्युत-प्राचीन-रूपस्य व्यपदेशानर्हत्वात्, तत्-प्रच्यवे च प्राक्तन-रूप-त्यागेनोत्तर-रूपाध्यासितया सक्रियत्वम् आपतत्îति-न्यायात्॑ स्फटिक-दृष्टान्तेऽपि जपा-कुसुमादि-सन्निधानाद् अन्धोपलादौ रक्ततानाविर्-भवन्ती तत्र पुनर् आविर्-भवन्ती तस्य तथा-विधं परिणामं लक्षयत्य्, अन्यथान्धोपलवत् तत्रापि न प्रादुःष्यात्। तन् नाक्रियस्य भोक्तृतोपपद्यत इति।
[न्या०अ०३१।९] विवृत्तिमान् इत्य्-अमुना त्व् एकान्त-नित्यम् अपरिणामिनं नैयायिक-वैशेषिकादि-प्रकल्पितं प्रमातारं निरस्यति, सर्वथाविचलित-रूपस्यार्थ-ग्रहण-परिणामानुपपत्तेः। व्यतिरिक्त-ज्ञान-समवायाद् एकान्त-नित्योऽपि प्रमिणोत्îति चेन्, न, समवायस्य प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्, सम्बन्धान्तरस्य च व्यतिरेकिणा साकम् अनुपपत्तेर्, अन्यत्रान्यथानुपपन्नत्वात्। न च व्यतिरेकिणि ज्ञाने तत् समस्ति, तद्-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, अव्यतिरेकानुभवस्य च तद्-बाधकत्वात्। किं च, यदि समवाय-बलाद् आत्मनि ज्ञानं समवैति, तदात्मनां समवायस्य च विभुत्वाद् एक-रूपत्वाच् च सर्वात्मसु किं न समवैति, विशेषाभावात्? तथा च देवदत्त-ज्टानेन यज्टदत्तादयोऽप्य् अर्थ-तत्त्वं बुद्ध्येरन्। अन्यच् च विज्टानोदय-समयेऽपि यादृशः प्राग्-अवस्थायां तादृश एव सन्तिष्ठमानः प्राग् अप्रमाता पश्चात् प्रमातेति ब्रुवाणः खल्ûन्मत्तताम् आत्मन्य् आविर्-भावयति, नापरम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।१०] पश्चार्द्धेन पुनर् भूत-व्यतिरेकिणं स्व-संवेदन-प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्यं जीवं दर्शयंश् चार्वाक-दर्शनं तिरस्-कुरुते, जडात्मक-भूताव्यतिरेके हि तद्-विलक्षण-बोध-रूप-हर्ष-विषादादि-विवर्तानुभवाभाव-प्रसङ्गात्। ननु च कायाकार-परिणतानि भूतान्य् एवात्म-व्यतिरेकिणीं चेतनाम् उत्कालयन्ति॑ सा च तथा-विध-परिणाम-परिणतेषु तेषु सन्तिष्ठते, तद्-अभावे पुनस् तेष्व् एव निलीयत इति॑ तद्-व्यतिरेकानुभवेऽपि न पर-लोक-यायि-जीव-सिद्धिर्, इयतैव दृष्ट-व्यवहारोपपत्तेः। नैतद् अस्ति, द्वयं हि तावद् एतत् संयोगम् अनुभवद् उपलबभ्यते -- पट्च-भूतात्मकं शरीरं चेतना च। तत्रापि शरीरं बहिर्-मुखाकारेण बोधेनार्थ-रूपतया जडम् अनुभूयते, चेतना पुनर् अन्तर्-मुखाकारेण स्व-संवेदन-प्रत्यक्षेण साक्षात्-क्रियते॑ऽत एवाव्यतिरेक-पक्षः प्रतिभास-निराकृतत्वान् नाशङ्कितः। व्यतिरेकिणोः पुनः प्रकाशमानयोर् यदि भूतान्य् एव चेतनाम् उत्कालयन्त्îति भवद्भिः परिकल्प्यते, तदा चेतनैव भवान्तराद् उत्पत्ति-स्थानमायाता पट्च-भूत-भ्रान्ति-जनकं शरीरं निर्वर्तयेत्, पुनर् भवान्तरं यातुकामा मुट्चेत्, तत् तयाधिष्ठितं गमनादि-चेष्टां कुर्यात्, तद्-वियुक्तं पुनः काष्ठवत् तिष्ठेद् इति जीव-सम्पाद्यम् एव शरीरं, न पुनर् असौ तत्-सम्पाद्य इत्य्, एतत् परिकल्पनं युक्ततरं पश्यामः, जीवस्य चेतनावतः सकर्मकतयापरापर-भव-भ्रमणापरापर-शरीर-निर्वर्तनयोर् उपपद्यमानत्वात्। भवान्तराद् आगच्छन् उत्पत्ति-स्थानं जीवोऽध्यक्षेण नोपलभ्यत इति चेद्, भूतान्य् अपि तर्हि कायाकार-धारण-द्वारेण चेतनाम् उत्कालयन्त्îति प्रत्यक्षेण नोपलक्ष्यन्त इति समानो न्याहः। अथ कायाकार-परिणतेष्व् एव भूतेषु चेतनोपलभ्यते, नान्यदेत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशात् तज्-जन्येति परिकल्प्यत, एवं तर्हि मृतावस्थायां कायाकारम् आबिभ्राणेष्व् अपि नोपलब्धा, कायाकार-परिणामो वा कादाचित्कतया हेत्व्-अन्तरापेक्ष्îत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशाद् एव तन्-निर्वर्तन-क्षमा चेतना भवान्तरागत-जीव-सम्बन्धिन्îति प्रतिपद्यामहे। किं च, जीवस् तावत् कर्म-चैतन्य-सम्बन्धाच् छरीर-निर्वर्तनार्थं प्रवरत इति युक्तम् एवैतद्, भूतानि पुनः किं-भूतानि चेतना-करणे प्रवर्तेरन्॒ सचेतनानि निश्चेतनानि वा? यद्य् आद्यः कल्पस्, ततो विकल्प-युगलम् अवतरति॒ तच् चैतन्यं तेभ्यो भिन्नम् अभिन्नम् वा? यदि भिन्नं, तदा पुरुष-शरीरवत् तत्रापि भूतैः सह वर्तमानम् अपि भूत-विलक्षणम् आत्म-कारणम् अनुमापयत्îति तद्-अवस्थैव जीव-सिद्धिः। अथाभिन्नं, तथा सति समस्त-भूतानाम् ऐक्यं प्रसजत्य्, एक-चैतन्याव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। निज-निज-चैतन्याव्यतिरेकीणि भूतानि तेनायम् अदोष इति चेन्, न, तत्-सम्पाद्य-पुरुष-शरीरेऽपि तज्-जन्य-पञ्च-चैतन्य-प्रसङ्गात्। पञ्चापि सम्भूय बृहत्-पुरुष-चैतन्यं बहवस् तिला इव तैल-घटं जनयन्त्îति चेत्, तत् तर्हि पुरुष-चैतन्यं किं तेषाम् एव संयोगो यद् वा तद्-उत्पाद्यम्, अन्यद् एव? यद्य् आध्यः कल्पस्, तद् अयुक्तं, चैतन्यानां परस्परं मिश्रणाभावेन संयोग-विरोधाद्, इतरथा बहु-पुरुष-चैतन्यानि सम्भूय बृहत्तम-चैतन्यान्तरम् आरभेरन्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तत्रापि तेषां किम् अन्वयोऽस्ति नास्ति वा? यद्य् अस्ति, तद् अयुक्तं, प्राग्वत् तज्-जन्य-चैतन्य-पञ्च-रूपतापत्तेः। अथ नास्ति, तद् अप्य् अचारु, निरन्वयोत्पादस्य प्रमाण-बाधितत्वात्। तन् न सचेतनानि भूतानि चेतना-करणे व्यापार-भाञ्जि भवितुम् अर्हन्ति। नापि निश्चेतनानि, तेषाम् अत्यन्त-विलक्षणतया चैतन्योत्पाद-विरोधाद्, इतरथा सिकतादयस् तैलादि-करणे व्याप्रियेरन्। किं च, तत्-समुदाय-मात्र-साध्यं वा चैतन्यं स्याद् विशिष्ट-तत्-परिणाम-साध्यं वा। न तावद् आद्या कॢप्तिर्, इला-जलानलानिल-नभस्-तल-मीलनेऽपि चेतनानुपलब्धेः। द्वितीय-विकॢप्तौ पुनः किं तद् वैशिष्ट्यम् इति वाच्यम्। कायाकार-परिणाम इति चेत्, स तर्हि सर्वदा कस्मान् न भवति? कुतश्चिद् धेत्व्-अन्तरापेक्षणाद् इति चेत्, तत् तर्हि हेत्व्-अन्तरं भवान्तरायात-जीव-चैतन्यम् इत्य् अनुमिमीमहे, तस्यैव कायाकार-परिणाम-साध्य-चैतन्यानुरूपोपादान-कारणत्वात्, तद्-विरहे कायाकार-परिणाम-सद्भावेऽपि मृतावस्थायां तद्-अभावाद् गमनादि-चेष्टानुपलब्धेः॑ तन् न कायाकार-परिणाम-जन्यं चैतन्यम्, अपि तु स एव तज्-जन्य इति युक्तं पश्यामः। न प्रत्यक्षाद् अन्यत् प्रमाणम् अस्ति, न च तेन पर-लोक-गमनागमनादिकं चैतन्यस्योपलक्ष्यते, तेन दृष्टान्य् एव भूतानि तत्-कारणतया कल्पनीयान्îति चेन्, न, केवल-प्रत्यक्ष-प्रतिक्षेपेण प्रमाणान्तराणां प्राग् एव प्रसाधितत्वात्, तथा च भूयांस्य् अनुमानानि पर-लोकानुयायि-जीव-साधकानि प्रवर्तेरन्। तद् यथा -- तद्-अहर्-जात-बालकस्याद्य-स्तनाभिलाषः पूर्वाभिलाष-पूर्वको,ऽभिलाषत्वाद्, द्वितीय-दिवसादि-स्तनाभिलाषवत्। तद् इदम् अनुमानम् आद्य-स्तनाभिलाषस्याभिलाषान्तर-पूर्वकत्वम् अनुमापयद् अर्थापत्त्या पर-लोक-यायि-जीवमाक्षिपति, तज्-जन्मन्य् अभिलाषान्तराभावात्। एवम् अन्यद् अप्य् उदाहार्यम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।११] तद् अयं स्व-पर-प्रकाशकः कर्ता भोक्ता नित्यानित्यात्मको भूत-विलक्षणः साक्षात्-कृत-कतिचिन्-निज-पर्यायानुमितानाद्य्-अनन्त-काल-भावि-निजानन्त-पर्याय-विवर्तः प्रमाण-प्रतिष्ठितः पारमार्थिको जीवः सकल-नय-प्रमाण-व्यापकः प्रमातेति स्थितम्।
[न्या०अ०३२।०] साम्प्रतं पर्यन्त-श्लोकेन प्रकरणार्थम् उपसंहरन्न् आह॒
प्रमाणादि-व्यवस्थेयम् अनादि-निधनात्मिका ।
सर्व-संव्यवहर्त्ःणां प्रसिद्धापि प्रकीर्तिता ॥ न्यायावतार ३२ ॥
[न्या०अ०३२।१] प्रमाणानि प्रत्यक्षादीन्य्॑ आदि-शब्दान् नय-परिग्रहस्, तेषां व्यवस्था प्रतिनियत-लक्षणादि-रूपा मर्यादा, सेयम् अनन्तरोक्त-स्थित्या प्रकीर्तितेति संसर्गः। किं-भूतेत्य् आह॒ आदिः प्रभवो, निधनं पर्यन्तो, न विद्येते आदि-निधने यस्यासौ तथा-विध आत्मा स्वरूपं यस्याः सानादि-निधनात्मिका॑ सर्व-संव्यवर्त्ःणां लौकिक-तीर्थिकादि-भेद-भिन्न-समस्त-व्यवहारवतां प्रसिद्धापि रूढापि, तद्-अप्रसिद्धौ निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च विचारानुत्थाने न कस्यचित् तत्त्वस्य प्रतिष्ठितिः। प्रकीर्तिता संशब्दिताव्युत्पन्न-विप्रतिपन्न-व्यामोहापोहायेति गम्यते॑ प्रमाण-प्रसिद्धेऽप्य् अर्थे प्रबलावरण-कुदर्शन-वासनादितः केषाञ्चिद् अनध्यवसाय-विपर्यास-रूप-व्यामोह-सद्भावात्, तद्-अपनोदार्थं च सति सामर्थ्ये करुणावतां प्रवृत्तेर् इति।
स्याद्-वाद-केसरि-सुभीषण-नाद-भीतेर् उत्त्रस्त-लोल-नयनान् प्रपलायमानान् ।
हेतुर् नयाश्रित-कुतीर्थि-मृगान् अनन्यत्राणान् विहाय जिनम् एति तम् आश्रयध्वं ॥ नव्३२।१॒१ ॥
भक्तिर् मया भगवति प्रकटी-कृतेयं तच्-छासन्âंश-कथनान् न मतिः स्वकीया ।
मोहाद् अतो यद् इह किञ्चिद् अभूद् असाधु तत् साधवः कृत-कृपा मयि शोधयन्तु ॥ नव्३२।१॒२ ॥
न्यायावतार-विवृतिं विविधां विधित्सोः सिद्धः शुभो य इह पुण्य-चयस् ततो मे । नित्यं परार्थ-करणोद्यतम् आ भवान्ताद् भूयाज् जिनेन्द्र-मत-लम्पटम् एव चेतः ॥ नव्३२।१॒३ ॥
इति न्यायावतार-विवृतिः समाप्ता ॥
कृतिर् इयम् आचार्य-सिद्ध-व्याख्यानिकस्य तर्क-प्रकरण-वृत्तेर् इति।
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==स्रोतः ==
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2026-10-02T13:29:48Z
अनुनाद सिंह
658
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wikitext
text/x-wiki
<poem>
''' सिद्धसेनमहामति : न्यायावतार न्यायावतारविवृति (Siddharṣigaṇin)
# Header
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## Data entry: Piotr Balcerowicz
## Contribution: Piotr Balcerowicz
## Date of this version: 2020-07-31
## Source:
- Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes. 2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
## Publisher: Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages (GRETIL), SUB Göttingen
## Licence:
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## Structure of references:
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- a pragmatic abbreviation of the title: Nyāyāvatāra+comm = ,
- the number of the in arabic numerals,
- the number of the verse in arabic numerals.
## Notes:
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Siddhasena Mahamati: Nyayavatara,
with the Nyayavataravivrti commentary by Siddharsi-ganin
Based on the ed. by Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes.
2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
Input by Piotr Balcerowicz
p.balcerowicz@uw.edu.pl
[GRETIL-Version vom 27.3.2015]
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# Text
''' तर्क-पञ्चानन-श्री-सिद्धसेन-महामति-विरचितः न्यायावतारः
''' श्री-देवभद्र-सूरि-कृत-टिप्पन-संवलित-श्री-सिद्धर्षि-गणि-कृत-टीका-सहितः
अवियुत-सामान्य-विशेष-देशिनं वर्धमानम् आनम्य । न्यायावतार-विवृतिः स्मृति-बीज-विवृद्धये क्रियते ॥ न्यायावतार ०० ॥
[न्या०अ००।०] अस्य चेदम् आदि-वाक्यम्॒
[न्या०अ००] प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इदम् आरभ्यते।
[न्या०अ००।१] प्रमाणेत्य्-आदि अनेन च तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-संबन्ध-विकलतया ध्वनेर् बहिर्-अर्थं प्रति प्रामाण्यायोगाद् अभिधेयादि-सूचन-द्वरोत्पन्नार्थ-संशय-मुखेनश्रोतारः श्रवणं प्रति प्रोत्साह्यन्त इति धर्मोत्तरो मन्यते। तद् अयुक्तम्। यदि हि शब्दस्यार्थ-प्रकाशनं प्रति सामर्थ्यं न समस्ति, तत् कथम् असाव् अभिधेयादि-सूचनेऽपि पटिष्ठः स्यात्? न च तस्याप्रामाण्य एतच्-छ्रवणाद् अर्थ-संशयं कुर्वन्ति प्रेक्षावन्तः, तद्-वत्ता-हानेर् मिथ्या-ज्ञानाद् अपि प्रवृत्त्य्-अविराम-प्रसङ्गाच् च। अर्चटस् त्व् आह॒ "न श्रावकोत्साहकम् एतत्, प्रामाण्याभावात्, तेषां चाप्रमाणाद् अप्रवृत्तेर्, अन्यथा प्रेक्षावत्ता-क्षतेः, किं तर्हि प्रकरणार्थ-कथनावसरोपस्थित-परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतोद्भावनार्थम्। तथा हि॒ सम्भवत्य् एवं-वादी -- नारब्धव्यम् इदम् अभिधेयादि-शून्यत्वात्, काक-दन्त-परीक्षादिवद् इति॑ तद् अनेनास्य तद्वत्ता-प्रकाशकेन वचसा तद्-धेतूनाम् असिद्धतोद्भाव्यत" इति। तद् अयुक्ततरम्॒ यतो यदीदम् अप्रमाणम् इति नाभिधेयादीनि साक्षाल् लक्षयत् प्रवर्तयति, ततः परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतां कथयतीति युक्ति-रिक्तं पश्यामः, अप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वाद्, अन्यथा प्रमाण-विचारणम् आनर्थक्यम् अश्नुवीत। तस्माद् इदं प्रमाण-भूतं सद्-अभिधेयादीनि प्रतिपादयत् प्रेक्षावतः प्रवर्तयतीति प्रकरणादाव् उपन्यस्तम्।
[न्या०अ००।२] सम्बन्ध-शून्यत्वाद् अस्य कथम् अर्थे प्रमाणतेति चेत्, प्रत्यक्षेऽपि कथं तर्हि सेति वाच्यम्। ग्राह्य-ग्राहक-भाव-सम्बन्ध-बलाद् इति चेद्, अत्रापि वाच्य-वाचक-भावाद् इति ब्रूमः। स एव कथम् इति चेद्, अध्यक्षेऽपि वेद्य-वेदक-भावः कथम् इति वाच्यम्। तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारताभ्याम् इति चेत्, केयं तद्-उत्पत्तिर् नाम? तज्-जन्यतेति चेत्, प्रतिक्षण-भङ्गुरत्वे सैव दुरुपपादेत्य् आचक्ष्महे। तथा हि॒ क्षण-नश्वरोऽर्थः स्व-क्षणे पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इति त्रयी गतिः। तत्र न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-करणीयः, सम-काल-भाविनि व्यापाराभावात्, इतरथैक-क्षण-वर्तिनां समस्तार्थ-क्षणानाम् इतरेतरं कार्य-कारण-भावः प्रसज्येत, तथा च तत्-प्रयुक्तो ग्राह्य-ग्राहक-भावश् चेत्य् असमञ्जसम् आपनीपद्येत। अथ स्व-क्षणात् पूर्वम् -- अचार्व् एतद् अपि, स्वयम् असतो भविष्यच्-छङ्ख-चक्रवर्त्य्-आदेर् इव पूर्व-काल-वर्तिनि कार्ये व्यापाराभावात्। अथ स्व-क्षणाद् ऊर्ध्वं कार्यं विधत्त इति मन्येथाः, एतद् अप्य् असाधीयो, विनष्टस्य कार्य-करणाक्षमत्वाद्, अन्यथा मृतस्य शिखिनः केकायितं स्यात्। तद्-आकारतापि किम् अर्थाकार-सङ्क्रान्त्या? अथ तत्-सदृशतयोत्पत्तेर् ज्ञानस्येति? यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, ज्ञाने स्वाकारार्पणाद् अर्थस्य निराकारतानुषङ्गात्, स्व-देह-पृथुतरार्थादर्शन-प्रसङ्गात्, शिरः-स्फोटन-प्लावनाद्य्-अनर्थ-प्रसक्तेश् च। उत द्वितीयस्॒ तथा सति सादृश्य-वशाद् अर्थ-व्यवस्थेत्य् आयातम्। न च सादृश्यं भवतां दर्शने तात्त्विकम् अस्ति, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षणानां पारमार्थिकत्वाभ्युपगमात्। अनादि-कालालीन-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताक-निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनोत्तर-काल-भावि-विकल्प-व्यवस्थापित-सादृश्य-वशाद् अर्थ-ग्रहण-नियमे सत्य् एक-नील-स्वलक्षणे क्षणे सकल-काल-कलाप-व्यापि-काक-कुवलयादि-गत-नीलताया व्यवस्थितिर् अविशेषेणानुषजेत, तथा च प्रतिनियतो ग्राह्य-ग्राहक-भावो न घटाम्-अटाट्येत। अङ्गुल्य्-अग्र-निर्दिश्यमान-पुरो-वर्ति-नील-स्वलक्षण-दर्शन-बलायातत्वान् नैल्य-विकल्पस्य तद् एवाध्यवस्यति, न भूतं भावि काक-कुवलयादि-गतं वेति चेत्, तर्हि विकल्पः स्वलक्षण-निष्ठः प्राप्तो, नियत-देश-दशावच्छिन्नार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्रहणात्। तथा हि॒ तद्-अध्यवसायः किं तद्-विकल्पनं उत तद्-ग्रहणं? न तावत् तद्-विकल्पनम्, विकल्पानां भवद्-अभिप्रायेण स्वलक्षणान्तः-प्रवेशाभावात्। तद् उक्तम्॒
"तेनान्यापोह-विषयाः प्रोक्ताः सामान्य-गोचराः ।
शब्दाश् च बुद्धयश् चैव वस्तुन्य् एषाम् असम्भवात्" ॥ न्यायावतार ०१ ॥
इति । न्यायावतारः ।
[न्या०अ००।३] अथ ब्रूयाद्॒ यद्य् अपि विकल्पाः सामान्यं गोचरयन्ति तत्त्वतस्, तथापि प्रत्यक्ष-विकल्पयोर् यौगपद्येन प्रवृत्तेर् विमूढः प्रतिपत्ता विकल्पस्य स्वलक्षण-निष्ठतां व्यवस्यति, तथा चोक्तम्॒
"मनसोर् युगपद्-वृत्तेः सविकल्पाविकल्पयोः ।
विमूढो लघु-वृत्तेर् वा तयोर् ऐक्यं व्यवस्यति" ॥ न्यायावतार ०२ ॥
तत् किम् इदं शपथैः प्रत्येयं, यद् उत मोहाद् विकल्पेन स्वलक्षणम् अध्यवस्यति, न पुनर् विशद-निर्भासेन साक्षात्-करोति? एवं चाध्यक्षम् अपि सकलार्थ-व्यक्तीर् गोचरयति, विकल्प-मोहात् तु सन्निहित-विषयं लक्ष्यत इति परोऽनुषञ्जयन् दुर्निवारः स्यात्। उत तद्-ग्रहणम् अध्यवसायः, तदा स्वलक्षण-निष्ठता विकल्पस्य स्व-वाचा भवद्भिः प्रतिपन्ना स्यात्। एवं च विकल्प-युगलकेऽप्य् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-पर्यवसित-सत्ताकता विकल्पस्याढौकते। यदा च विकल्पः स्वलक्षण-सौध-मध्यम् अध्यास्त इत्य् अभिदध्यास्, तथा सति ध्वनेर् अपि तद्-अन्तः-प्रवेशो दुर्निवारः स्यात्, तत्-सह-चरत्वात्। यद् आह भवद्-आचार्यः॒ "स एव शब्दानां विषयो यो विकल्पानाम्" इति। न च विकल्पं व्यतिरिच्य सादृश्य-व्यवस्थापकम् अन्यद् अस्ति, प्रत्यक्षस्य सकल-जगद्-विलक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणत्वात्। तद् यदि तत्-सदृशतयोत्पत्तिस् तद्-आकारता, तदा प्रतिपादित-न्यायाद् विकल्पस्य सन्निहितार्थ-गोचरतोररी-कर्तव्या, तथा च ध्वनिर् अपि तद्-विषयः सिध्यतीति सिद्धं नः समीहितम्। अन्यथा तद्-आकारता न समस्ति, गत्य्-अन्तराभावात्। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते ग्राह्य-ग्राहक-भाव-हेतू संस्तः।
[न्या०अ००।४] संस्तां वा, तथापि विकल्पतः पर्यनुयोज्यो भवान्॒ किम् एते ग्रहण-कारणं पार्थक्येन उत सामस्त्येन? तद् यद्य् आद्यः पक्षः, कपाल-क्षणो घटान्त्य-क्षणस्य ग्राहकः प्राप्नोति, तज्-जन्यत्वात्, जल-चन्द्रो वा नभश्-चन्द्रस्य ग्राहकः स्यात्, तद्-आकारत्वात्। अथ द्वितीयस्, तथा सति घटोत्तर-क्षणः पूर्व-क्षणस्य ग्राहकः प्रसजति, तद्-उत्पत्तेस् तद्-आकारत्वाच् च। जडत्वाद् अर्थस्य न ग्राहकत्वम्, अपि तु ज्ञानस्य तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोः सत्योर् इति चेद्, इदम् इदानीं विदितम् अस्माभिर्, एतद् अपि समानार्थ-ग्राहि-प्राचीन-संवेदन-क्षण-लक्षण-मनस्कारोत्पाद्य-ज्ञाने ग्राहक-लक्षणं व्यभिचरत्य्, उत्पादक-प्राक्तन-क्षण-वर्ति-मनस्काराग्राहकत्वात्। तद्-अध्यवसाय-साहित्येन तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोर् ग्रहण-कारणत्वं सम्पूर्णं, मनस्कारे तन् नास्तीति चेत्, किम् इदं भिन्न-गोचरेण सह साहित्यम्? तथा ह्य्॒ "अध्यवसायो वासना-प्रबोध-वशाद् उत्पन्नः सामान्यम् अनर्थ-रूपं विकल्पयति, प्रत्यक्षं बहिर्-अर्थाल् लब्धात्म-लाभं तद्-आकारं तम् एव साक्षात्-करोतीति" भवतां दर्शनम्। तन् न विकल्प-साहित्यं प्रत्यक्षस्य कञ्चन विशेषं पुष्णाति। तद् इदम् ग्राह्य-ग्राहक-भाव-कारणं प्रत्यक्षेऽपि यद् भवद्भिर् अभ्यधायि, तद् यथा यथा विचार्यते तथा तथा विशीर्यत इत्य् अनपेक्षणीयम्। तद् -- यथा कथञ्चित् प्रत्यक्षस्य प्रतिपादित-ग्राह्य-ग्राहक-भाव-लक्षण-वैकल्येऽपि ग्राहकत्वम् अर्थस्य ग्राह्यत्वं, तथा दृष्टत्वात्, अन्यथा निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् भवद्भिर् अपि प्रत्यपादि, तथा शब्दस्य वाचकत्वम् अर्थस्य वाच्यत्वं प्रतिपद्यध्वं यूयम्॑ अत्रापि दृष्ट-हानेर् व्यवहारोच्छेदस्य समानत्वात्। अथेत्थम् आचक्षीथाः॒ यथा "नद्यास् तीरे गुड-शकटं पर्यस्तं, धावत धावतडिम्भका" इत्य्-आदि-विप्रतारक-पुरुष-वचन-श्रवणात् प्रवर्तमाना विप्रलम्भ-भाजो जायन्ते,ऽतः सकल-वचनेष्व् अनाश्वास इति -- एवं तर्हि चिकिचिकायमान-मरु-मरीचिका-चक्र-चुम्बि यज् जलोल्लेखि विशद-दर्शनम् उदय-पदवीं समासादयति तद् अलीकम् अवलोकितम् इति॑ सकलाध्यक्षेष्व् अनाश्वास इत्य् अभिदध्महे। पाश्चात्य-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-बाधितत्वाद् मरु-मरीचिकासु जल-ज्ञानम् अप्रमाणं, न शेष-सत्य-स्तम्भादि-ज्ञानानि, बाधा-रहितत्वाद् इति चेत्, तर्हि ध्वनाव् अप्य् अयं न्यायः किं काकैर् भक्षितः? न हि वयं सर्व-शब्दानां प्रामाण्यं प्रतिपद्येमहि॑ किं तर्हि सुनिश्चिताप्त-प्रणेतृकाणाम् एव। तन् न प्रामाण्यं प्रति प्रत्यक्ष-शब्दयोर् विशेषम् उपलभामहे। एष तु विशेषः स्यात्, प्रत्यक्षं चक्षुर्-आदि-सामग्री-विशेष-जन्यत्वात् सन्निहित-नियतार्थ-ग्राहि स्पष्ट-प्रतिभासं, शाब्दं तु तथा-विध-कारण-विकलत्वान् नियतानियतार्थ-ग्राह्य् अस्पष्ट-प्रतिभासम्। न चैष विशेषः प्रामाण्य-क्षति-कारी, इतरथानुमानस्याप्य् अप्रामाण्यम् आसज्येत, तस्याप्य् अविशदानियतार्थ-ग्राहित्वात्। परमार्थतस् तु त्रि-काल-व्यापिनः सर्वार्थ-ग्रहण-स्वभावत्वेऽप्य् आवरण-तिरस्-कृतस्य जीव-द्रव्यस्य चक्षुर्-आदि-सामग्री-सापेक्षावरण-क्षयोपशम-वशात् सन्निहित-स्पष्टार्थ-ग्रहण-परिणामः प्रत्यक्षम् इत्य् उच्यते। शब्द-सापेक्ष-क्षयोपशमान् नियतानियताविशदार्थ-ग्रहण-परिणामस् तु शाब्दम् इति। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते प्रत्यक्षे शाब्देऽन्यस्मिन् वा ज्ञाने वास्तव्यौ स्तः। तस्मात् पारमार्थिकाभिधेय-प्रयोजन-सम्बन्ध-प्रतिपादकम् एतद् आदि-वाक्यम् इति स्थितम्।
[न्या०अ००।५] तत्राभिधेयं वाच्यं, तच् चेह प्रमाणम्, तस्यैव प्रकरणेन प्रतिपाद्यत्वात्॑ तत् प्रमाणेत्य् अवयवेन लक्षयति। प्रयोजनं द्वेधा॒ श्रोतुः कर्तुश् च। पुनर् अपि द्विविधम्॒ अनन्तरं व्यवहितं च। तत्र श्रोतुर् अनन्तर-प्रयोजनं प्रमाण-विषया व्युत्पत्तिः, कर्तुर् व्युत्पद्यमानस्य प्राज्ञत्वाच् छिष्यस्य व्युत्पादनम्। तत्रात्म-प्रयोजनं दर्शयन्न् आ[हा]रभ्यत इति अस्य मयेति-पद-सव्यपेक्षत्वात्। शिष्य-प्रयोजनं तु व्युत्-पद्-इत्य् अनेनोपसर्ग-धातु-समुदायेनैव तद्-अन्तर्-अगतं लप्स्यत इत्य् अभिप्रायवान् कर्तात्म-व्यापारं णिज्-अन्तेन निर्दिशति॒ प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इति। व्यवहित-प्रयोजनं द्वेधा॒ व्यावहारिकं पारमार्थिकं च। व्यावहारिकं हेयोपादेयोपेक्षणीयेष्व् अर्थेषु हानोपादानोपेक्षा-लक्षणम्। पारमार्थिकं अभ्युदय-निःश्रेयसावाप्तिर् इति। एतत् तु साक्षाद् अनुक्तम् अप्य् अनन्तर-प्रयोजन-फलत्वात् तद्-वचनेनैवाक्षिप्तम् अवगन्तव्यम्। सम्बन्धस् त्ûपायोपेय-लक्षणः॑ तत्रोपेयं प्रकरणार्थ-परिज्ञानम्, प्रकरणम् उपायस्, ततस् तद्-अभिलषता प्रकरणम् इदम् आरम्भणीयम् इत्य् अनुक्तोऽपि वचनेन सम्बन्धोऽर्थाद् गम्यत इति तात्पर्यार्थः।
[न्या०अ००।६] अधुनाक्षरार्थो विव्रियते॒ तत्र यद्य् अपि प्रमाण-शब्दस्य सर्व-कारकैर् भावेन च व्युत्पत्तेः सुकरत्वात् "कृत्य-ल्युटो बहुलम्" अन्यत्रापीति-वचनाद् यथा-क्रमम् अमी कर्त्र्-अर्थादि-कारक-भाव-व्युत्पत्त्या प्रमाण-शब्द-वाच्याः, तद् यथा आत्मार्थ-ज्ञानार्थ-क्रिया-कारण-कलाप-क्षयोपशम-क्रिया-रूपाः तथापीह ज्ञानम् एवाधिक्रियते, तस्यैव परीक्षा-क्षमत्वाद्॑ इतरेषां परीक्षायास् तत्-पुरःसरत्वाद् वैयर्थाच् च। तथा हि॒ नार्थस् तावद् आत्मनः परीक्षया, तस्य भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञानेषु समानत्वात्। नाप्य् अर्थस्य, तस्योपेयत्वाद्, उपाय-भूत-ज्ञान-परीक्षणेनैव गतत्वात्। नार्थ-क्रियायास्, तद्-अवगतौ परीक्षा-वैयर्थ्यात्। नापि कारण-कलापस्य, ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् स्वरूपानवगतेः, पश्चात् तत्-स्वरूप-निर्णयाद् एव तत्-साद्गुण्य-वैगुण्यावगतेर् नैरर्थक्यात्। नापि क्षयोपशमस्य, तस्य ज्ञानोत्पादोन्नीयमान-रूपत्वात्। नापि प्रमिति-मात्रस्य, तस्य प्रमाण-साध्यतया तच्-चारुता-द्वारेणैव समीचीनता-सिद्धेर् इति। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यद्य् अप्य् अनन्त-धर्माध्यासिते वस्तुनि सर्व एव शब्दार्था निरुपचरिता घटन्ते, तथापि येनार्थं परिच्छिद्यार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एवेह ज्ञानम् आत्मना सह धर्मि-रूपतया तादात्म्येऽपि धर्म-रूपतया व्यतिरिक्तं प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तस्य व्युत्पादनं पर-परिकल्पित-लक्षणादि-व्युदासेन स्वाभिप्रेत-लक्षणादि-स्वरूप-प्रकाशनम्। तद्-अर्थम्॒ अर्थ-शब्दः प्रयोजन-पर्यायः। इदम् इत्य् अर्थ-रूपतया स्व-चेतसि विवर्तमानं प्रकरण-शरीरं परामृशति॑ द्विविधं हि प्रकरण-शरीरं॒ शब्दोऽर्थश् चेति, बहिः शब्द-रूपतया प्रकाशयिष्यमाणत्वेऽप्य् अन्तस् तत्त्वार्थाकारेण प्रत्यक्षत्वात्। आरभ्यत इति पद-वाक्य-श्लोकादि-रचनया प्रक्रियत इति यावत्।
[न्या०अ००।७] इह च लक्षण-संख्या-गोचर-फलेषु प्रमाणं प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे। तथा हि॒ लक्षणे तावत् प्रमाणम् अविसंवादि ज्ञानम् इति सौगताः। अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम् इति मीमांसकाः। अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम् इति नैयायिकादयः। तथा संख्यायां॒ प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति सौगताः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानार्थापत्त्य्-अभावाः प्रमाणानीति मीमांसकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानानि प्रमाणानीति नैयायिकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दानि प्रमाणानीति वैशेषिकाः। एतान्य् एव सांख्याः। प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इति चार्वाकाः। तथा गोचरे॒ परस्पर-विनिर्लुठित-क्षण-क्षयि-परमानु-लक्षणानि स्वलक्षणानि प्रमाण-गोचरस् तात्त्विक इति बौद्धाः। सामान्य-विशेषात्मकं वस्त्व् इति मीमांसकाः। परस्पर-विभक्तौ सामान्य-विशेषाव् इति नैयायिक-वैशेषिकाः। त्रैगुण्य-रूपं सामान्यम् इति सांख्याः। भूत-चटुष्टयं प्रमाण-भूमीति चार्वाकाः। तथा फलेऽपि विप्रतिपद्यन्ते॒ अर्थाधिगतिः प्रमाण-फलम् इति सौगताः। पूर्वं पूर्वं प्रमाणम् उत्तरम् उत्तरं तु फलम् इति मीमांसकादयः।
[न्या०अ०१।०] तत्र तावल् लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराचिकीर्षुर् आह॒
प्रमाणं स्व-पराभासि ज्ञानं, बाध-विवर्जितम् ।
प्रत्यक्षं च परोक्षं च द्विधा, मेय-विनिश्चयात् ॥ न्यायावतार १ ॥
[न्या०अ०१।१] तत्रापि पूर्वार्धेन लक्षण-विप्रतिपत्तिम् उत्तरार्धेन तु संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे। लक्षणं च पर-रूपेभ्यो व्यावर्तन-क्षमोऽसाधारण-धर्मः। लक्ष्यते परिच्छिद्यते विजातीयेभ्यो व्यावृत्तं लक्ष्यं येन तल् लक्षणम् इत्य् उच्यते। तच् चेह द्वये प्रत्याय्याः, स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणास् तीर्थान्तरीया विप्रतिपन्नास्, तथा मुग्ध-बुद्धयो लौकिका अव्युत्पन्नाश् चेति। ततश् च यदादौ विप्रतिपन्नान् प्रति लक्षणं तदैवं लक्ष्य-लक्षण-भावो द्रष्टव्यो॒ यद् इदं भवताम् अस्माकं च प्रमाणम् इति प्रसिद्धम्, तत् स्व-पराभासि ज्ञानं बाध-विवर्जितं मन्तव्यम्॑ प्रसिद्धं प्रमाणम् अनूद्याप्रसिद्धं स्व-पराभासित्वादि विधीयते। यदा त्व् अव्युत्पन्न-मतीन् प्रतीदं लक्षणम्, तदा प्रतिप्राणि स्व-पर-प्रकाशिनो ज्ञानस्य बाध-रहितस्य कस्यचित् सिद्धत्वाद्, अन्यथा प्रतिनियत-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद्, एवं ते बोध्यन्ते॒ यद् अदो भवतां क्वचिन् नियतार्थ-ग्राहि स्व-पर-प्रकाशकं बाध-रहितं ज्ञानं प्रसिद्धं तत् प्रमाणम् इति बुध्यन्ताम्। अत्रापि सिद्धस्यानुवादोऽसिद्धस्य विधानं योज्यम्।
[न्या०अ०१।२] अधुनाक्षरार्थस्॒ तत्र प्रमाणम् इति पूर्ववत्। स्व आत्मा स्वरूपं, परोऽर्थस्, ताव् आभासयितुं प्रकाशयितुं शीलम् यस्य तत्-तथा। ज्ञायते निर्णीयते तत्त्वं येन तज् ज्ञानम्। बाध्यतेऽनेनेति बाधः॑ विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-प्रवृत्तिर् इति यावत्। तेन विशेषेण वर्जितं रहितं यज् ज्ञानं तत् प्रमाणम् इति सण्टङ्कः।
[न्या०अ०१।३] इह च व्यवच्छेद्यापेक्षया लक्षणे विशेषण-प्रवृत्तेः स्व-पराभासीत्य् अनेन ये स्वाभास्य् एव ज्ञानं मन्यन्ते ज्ञान-वादिनो बौद्ध-विशेषाः, ये च पराभास्य् एव मीमांसक-नैयायिकादयस् ते निरस्ताः। ते हि बहिर्-अर्थाभावाज् ज्ञानं स्वांश-पर्यवसित-सत्ताकम् इत्य् आचक्षीरन्, तद् अयुक्तम्, ज्ञेयार्थाभावे ज्ञानाभाव-प्रसङ्गात्। अथार्थाभावेऽपि स्वप्न-दशायां वन-देव-कुलादि-नाना-प्रतिभासं ज्ञानम् अवलोकितम् इति तथा-भूतं सकलं ब्रूषे, तन् न, तस्यापि जाग्रद्-अवस्था-भावि-सद्भूतार्थ-दर्शन-सम्पादितात्म-संस्कार-मिद्धादि-कारण-कलाप-सन्निधान-प्रबोध-सव्यपेक्षत्वाद्॑ इतरथात्यन्ताननुभूत-भूत-पञ्चकातिरिक्त-षष्ठ-भूत-प्रतिभासः स्यात्। किं च, कथम् एकं ज्ञानं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-विवर्तम् इति प्रष्टव्यो भवान्। अनाद्य्-अविद्या-वासनाद् इति चेद्, अत्रापि विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ ततो ज्ञानात् सा वासना व्यभैत्सीद् वा न वा? व्यत्यरैक्षीच् चेद्, एवं सति तद्-ग्राहक-प्रमाणम् अभिधानीयम्, ज्ञान-व्यतिरिक्तायाः संवेदनाभावात्, तत्-संवेदने चार्थस्यापि व्यतिरिक्तस्य संवेदनम् इति स दुष्प्रतिषेधः स्यात्। वेद्य-वेदकाकार-कलुषिताज् ज्ञानाद् एव व्यतिरिक्ता तत्-कारण-भूता ज्ञान-रूपैव सानुमीयत इति चेन्, न, तया सह सम्बन्ध-ग्रहणाभावाद्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाच् च। किं च, यथा व्यतिरिक्त-वासना-वशाद् एकम् अपि ज्ञानं नानाकारम्, तथा जडम् अपि तद्-वशाद् एव बोध-रूपं प्रकाशत इति विपरीतापत्तेर् अर्थ एव सिद्धिम् आस्कन्देन्, न ज्ञानम्। अथाव्यतिरिक्ता, हन्त ज्ञानम् एव तन्, न वासना तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवद् इत्य् आस्तां तावत्। पराभास्य् अपि स्व-प्रकाशाभावाद् अभिदधीरंस्, तद् अप्य् असम्बद्धम्, स्व-प्रकाशाभावे पर-प्रकाशायोगात्। न हि प्रदीपः स्वरूपम् अनुद्द्योतयन् घटाद्य्-उद्द्योतने व्याप्रियते। स्वयं चाप्रतीतम् अपि यद्य् अर्थं ग्राहयति ज्ञानं, देवदत्तस्योत्पन्नं यज्ञदत्तं ग्राहयेद्, विशेषाभावात्। अन्यच् च, पर-प्रकाशन-मात्रे दूरासन्नादि-भेदः प्रथमानानाम् अर्थानां किम्-अपेक्षश् चकास्ति? शरीरापेक्ष इति चेन्, न, तस्यापि प्रकाश्यताविशेषात्, तस्माद् अन्तर्-मुखाकारस्य बहिर्-अर्थ-ग्रहणे सत्य् अयं घटाम् आटीकते नान्यथा। अथार्थापत्त्य्-आदिना प्रमाणान्तरेण तद् अन्तर्-निविष्टं गृह्यते, ततस् तद्-अपेक्षया योक्ष्यते दूरासन्नादि-भेद इति चेन्, न, तत्रापि विकल्प-युगलकानतिवृत्तेः॑ तथा हि॒ तत् प्रमाणान्तरं स्व-प्रकाशम् अन्य-प्रकाशं वा? स्व-प्रकाशं चेत्, प्रथमस्य किं क्षूणम्?! अन्य-प्रकाशं चेत्, तत्रापीयम् एव वार्तेत्य् अनवस्था। तस्मात् स्वरूपम् अवभासयद् एव ज्ञानम् अर्थ-ग्रहणाय व्याप्रियत इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।४] ज्ञानम् इत्य् अनेन तु यन् नैयायिकादिभिः पर्यकल्पि सन्निकर्षः प्रमाणम् इति तस्य प्रामाण्यं निरस्यति। यतः स्नान-पानावगाहनाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमम् अर्थं निश्चित्याव्यवधानेन प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एव ज्ञानं प्रमाणम्, न सन्निकर्षो जडतयास्ति, अव्यवहित-निर्णयाभावाद् इत्य् आकूतम्। अर्थोपलब्धि-हेतुत्वात् तस्य प्रामाण्यम् इति चेद्, विशीर्णेदानीं प्रमाणेयत्ता, देहादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्यापत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०१।५] बाध-विवर्जितम् इत्य् अमुना तु यत् तिमिरादि-तिरस्-कृत-नयन-दीधिति-प्रसरादीनां नभस्-तलावलम्बि-निशीथिनी-नाथ-द्वयादि-प्रतिभासं, यच् च कुतर्क-भ्रान्त-चेतसां निज-निज-दर्शनाकर्णन-प्रभवं क्षण-क्षयि-सामान्य-विशेषैकान्तेश्वरादिकृत-भुवन-प्रतिभासं ज्ञानं तत्-प्रत्यनीकार्थ-प्रत्यायक-प्रमाणान्तरोपनिपात-प्लावितत्वात् प्रतिक्षिपति। विशेषार्थ-वि-शब्दोपादानात् तु यः खलु बहुल-कामलावलेप-लुप्त-लोचन-बलानां धवले जलजे पीतिमानम् आदधानो बोधः समुल्लसति, स यद्य् अपि सकल-कालं तद्-दोषाव्युपरमे प्रमातुर् निज-दर्शनेन न बाध्यते, तथापि तज्-जलज-धवलता-ग्राहिना जनान्तर-दर्शनेन बाधितत्वान् न प्रमाणम् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०अ०१।६] समस्त-लक्षणेन तु यत् परे प्रत्यपीपदन्न् "अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम्", "अविसंवादकं प्रमाणम्", "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य्-आदि तन् निरास्थत्। तथा ह्य्॒ अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वं किम् अभिधीयते? ज्ञानान्तरेणानधिगतम् अर्थं यद् अधिगच्छति तत् प्रमाणम् इति चेत्, तर्हि तज् ज्ञानान्तरं परकीयं स्वकीयं वा? तद् यदि परकीयं, तद् अयुक्तं, सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सकलार्थ-गोचरतया सर्व-प्राकृत-लोक-ज्ञानानाम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्, तद्-अर्थ-ग्राहि-जनान्तर-दर्शन-सम्भवाच् च। अथ स्वकीयं, तत्रापि सोऽधिगम्योऽर्थः किं द्रव्यम् उत पर्यायो यद् वा, द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः पर्याय-विशिष्टं वा द्रव्यम् इति, तथा किं सामान्यम् उत विशेष, आहोस्वित् सामान्य-विशिष्टो विशेषः, विशेष-विशिष्टं वा सामान्यम् इत्य् अष्टौ पक्षाः। तत्र यद्य् आद्यम् उररी-कुरुषे, तद् अयुक्तं, द्रव्यस्य नित्यत्वैकत्वाभ्याम् अनधिगतांशाभावात्। अथ द्वितीयं, तद् अप्य् अचारु, पर्यायस्य प्राचीन-संवेदनोदय-समय-ध्वस्तस्य संवेदनान्तर-प्रभव-कालं यावत् प्रतीक्षणासम्भवेन विशेषणानर्थक्यात्। उत तृतीयं, तद् अप्य् असाधीयो, विकल्प-द्वयानतिक्रमात्। स हि द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः सम-काल-भाविना ज्ञानेनानधिगतोऽधिगम्यते, यद् वा कालान्तर-भाविनेति। न तावत् सम-काल-भाविना, तत्-सम्भवाभावेन विशेषण-वैफल्यात्। न हि सम्भवोऽस्त्य् एकस्य प्रमातुर् एक-कालं द्रव्य-क्रोडी-कृतैक-पर्याय-विषय-संवेदन-द्वय-वृत्तेः, तथानुभवाभवात्, परस्परम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गाच् च। नापि कालान्तर-भाविना, गृह्यमाण-पर्यायस्य कालान्तरानास्कन्दनात्, पूर्वोत्तर-क्षण-त्रुटित-वर्तमान-क्षण-मात्र-सम्बद्धत्वात् तस्य। एतेन पर्याय-विशिष्ट-द्रव्य-पक्षोऽपि प्रतिव्यूढः, समान-योग-क्षेमत्वात्। अथ सामान्यं, तद् अप्य् असम्बद्धं, तद्-एकतया प्रथम-ज्ञानेन साकल्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां सामान्य-ज्ञानानाम् अधिगतार्थ-गोचरतयाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अथ विशेषः, स नित्योऽनित्यो वेति वक्तव्यम्। नित्यश् चेद्, एवं सत्य् आद्य-संवेदनेनैव तस्य सामस्त्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां तद्-विषयाणाम् अधिगत-गोचरत्वेनाप्रामाण्य-प्रसक्तिः। अनित्यश् चेत्, पर्याय-दूषणेन प्रतिक्षिप्तिः। अथ सामान्य-विशिष्टो विशेषः, कास्य विशिष्टता॒ किं तादात्म्यम् उत तत्-सन्निधि-मात्रम्? तादात्म्यं चेत्, प्रथम-ज्ञानेन सामान्यवत् तस्यापि ग्रहःात्, अन्यथा तादात्म्य-क्षतेस्, तद्-विषयान्य-ज्ञानानाम् अप्रामाण्यं प्रसज्येत। तत्-सान्निध्य-पक्षे तु द्वयोर् अपि परस्परं विशकलित-रूपत्वात् पक्ष-द्वयोदितं दूषणं पश्चाल्-लग्नं धावति। विशेष-विशिष्ट-सामान्य-पक्षे पुनर् एतद् एव विपरीतं योज्यम्। तन् नानधिगतार्थाधिगन्तृत्वं ज्ञानस्य कथञ्चिद् विचार-भार-गौरवं सहत इत्य् अलक्षणम् इति स्थितम्। अविसंवादकत्वम् अधुना विचार्यते॒ तत् किं प्रदर्शितार्थ-प्राप्त्याहोस्विद् प्राप्ति-योग्यार्थोपदर्शकत्वेन उताविचलितार्थ-विषयत्वेन भवान् ज्ञानस्य प्रामाण्यं कथयति? यदि प्रथमः कल्पस्, तद् अयुक्तं, जल-बुद्बुद्-आदि-मुमूर्षु-पदार्थोत्पादित-संवेदनस्याप्रमाणतोत्पत्तेः, प्राप्ति-काले तस्य ध्वस्तत्वात्। अथ द्वितीयस्, तद् अप्य् अचारु, प्राप्त्य्-अयोग्य-देश-स्थित-ग्रह-नक्षत्रादि-गोचर-ज्ञानस्याप्रामाण्य-प्रसक्तेर्, अनुचित-देशावस्थानेनैव प्राप्त्य्-अनर्हत्वात् तेषाम्। अथ तृतीयः पक्षस्, तत्राप्य् अविचलित-विषयतां कथम् अवैषि? ज्ञानान्तरेण तद्-विषय-निराकरणाभावाद् इति चेद्, एतद् एवास्माभिर् उदितं॑ किं भवतः परुषम् आभाति? न हि स्व-पर-प्रकाशि ज्ञानं बाधा-रहितं विमुच्यान्यस्य विषयानिराकरणं ज्ञानान्तरेण प्रेक्षामहे। तत् तद् एव न्यायात् प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगतम् इति। "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य् एतद् अपि न परीक्षां क्षमते, शरीरादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अव्यवहितम् अर्थोपलम्भ-कारणं प्रमाणं, न देहादिकम् इति चेद्, एवं तर्हि ज्ञानम् एव स्व-पराविर्-भावकं निर्बाधकं च प्रमाणं, न सन्निकर्षादि, तद्-सद्भावेऽप्य् अर्थ-परिच्छेदाभावात्। तस्माद् एतद् एव चारु प्रमाण-लक्षणम् इति।
[न्या०अ०१।७] अधुना तत्-संख्याम् आह॒ प्रत्यक्षं चेत्य्-आदि॑ तत्र सिद्धान्त-प्रसिद्ध-पारमार्थिक-प्रत्यक्षापेक्षयाक्ष-शब्दो जीव-पर्यायतया प्रसिद्धः। इह तु व्यावहारिक-प्रत्यक्ष-प्रस्तावाद् अक्ष-ध्वनिर् इन्द्रिय-वचनो गृह्यते। ततश् चाक्षं प्रतिगतं प्रत्यक्षं। यद् इन्द्रियम् आश्रित्योज्जिहीतेऽर्थ-साक्षात्-कारि ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् इत्य् अर्थः। एतच् च प्रत्यक्ष-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्तं, न तु प्रवृत्ति-निमित्तम्। स ह्य् एवं व्युत्पादितः साक्षाद् ग्राह्य-ग्राहकं ज्ञान-विशेषं लक्षयति, तत्रैव रूढत्वात्, यथा गमन-क्रियायां व्युत्पादितोऽपि गो-शब्दः ककुद्-आदिमन्तं पिण्ड-विशेषं गच्छन्तम् अगच्छन्तं वा गोचरयति, तत्रैव तस्य प्रसिद्धत्वात्, न गमन-क्रिया-युक्तम् अपि पुरुषादिकं, विपर्ययाद् इति। ततश् च सर्व-ज्ञानानां यत् स्वरूप-संवेदनं तद् अपि प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तं भवति, तत्रापि स्वरूपस्य ग्राह्यस्य साक्षात्-करण-सद्भावाद् इति। अक्षेभ्यः परतो वर्तत इति परोक्षम्। अक्ष-व्यापार-निरपेक्षं मनो-व्यापारेणासाक्षाद्-अर्थ-परिच्छेदकं यज् ज्ञानं तत् परोक्षम् इति-भावः।
[न्या०अ०१।८] च-शब्दौ प्रत्यक्ष-परोक्षयोस् तुल्य-कक्षतां लक्षयतः। तेन यत् परे प्राहुः॒ "प्रत्यक्षं सकल-प्रमाण-ज्येष्ठम्" इत्यादि तद् अपास्तम् भवति, द्वयोर् अपि प्रामाण्यं प्रत्य् अविशेषात्, विशदाविशद-प्रतिभास-विशेषस्य सतोऽपि ज्येष्ठतां प्रत्य् अनङ्गत्वात्। प्रत्यक्षस्य पुरःसरत्वात् परोक्षस्य कनिष्ठतेति चेन्, नायम् एकान्तः, सर्वत्रान्यथानुपपन्नतावधारितोच्छ्वास-निःश्वासादि-जीव-लिङ्ग-सद्भावासद्भावाभ्यां जीव-साक्षात्-कारि-प्रत्यक्ष-क्षूणेऽपि जीवन्-मृत-प्रतीति-दर्शनाद्, अन्यथा लोक-व्यवहाराभाव-प्रसङ्गात्। क्वचित् प्रत्यक्ष-परिगृहीत-सम्बन्ध-बलात् परोक्षं प्रवर्तत इति प्रत्यक्षस्य ज्येष्ठत्व-कल्पने "पश्य मृगो धावतीत्य्"-आदि-शब्द-बलात् कृकाटिका-मोटन-द्वारेण मृग-विषयम्, तथा स्मरणात् सङ्केत-ग्रहणाद् वापूर्वापूर्वार्थ-दर्शन-कुतूहलादिना वन-देव-कुलादि-गोचरं परोक्ष-पूर्वं प्रत्यक्षं दृष्टम् इति परोक्षस्य ज्येष्ठतासज्येत।
[न्या०अ०१।९] द्विधेति। "सर्वं वाक्यं सावधारणं प्रवर्तत" इति न्यायाद्, अन्यथा नियतार्थाप्रदर्शकत्वेन तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गाद्, विपरीताकार-निराकरण-चातुर्यायोगेन निराकाङ्क्ष-प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् द्विधैवेत्य् अवधारणेन पर-परिकल्पित-विपरीत-संख्यान्तरं तिरस्-कुरुते, तस्य युक्ति-बाधितत्वात्।
[न्या०अ०१।१०] तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इत्य् असत्, परोक्षाभावे तस्यैव प्रामाण्यायोगात्। स हि काश्चित् प्रत्यक्ष-व्यक्तीर् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रापकत्वेनाव्यभिचारिणीर् उपलभ्यान्यास् तद्-विपरीततया व्यभिचारिणीश् च, ततः कालान्तरे पुनर् अपि तादृशेतराणां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रमाणतेतरते समाचक्षीत। न च पूर्वापर-परामर्श-शून्यं पुरो-वर्त्य्-अर्थ-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकं प्रत्यक्षं पूर्वापर-काल-भाविनीनां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां सादृश्यं प्रामाण्य-निबन्धनम् उपलक्षयितुं क्षमते। न चायं स्व-प्रतीति-गोचराणाम् अपि प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्यं परं प्रतिपादयितुम् ईशः। तस्माद् अवश्यन्तया यथादृष्ट-प्रत्यक्ष-व्यक्ति-साधर्म्य-द्वारेणाधुनातन-प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्य-प्रत्यायकं पर-परिपादकं च परोक्षान्तर्-गतम् अनुमान-रूपं प्रमाणान्तरम् उररी-कर्तव्यम्। परावबोधार्थं च प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणं नान्यद् अस्तीत्य् उल्लपन्न् उन्मत्तताम् आत्मनो लक्षयति, प्रत्यक्षेण पर-चेतो-वृत्ति-साक्षात्-करणाभावाद् व्यापार-व्याहार-चेष्टा-विशेष-दर्शनाद् बोध-विशेषावगतौ परोक्षस्य प्रामाण्यं बलाद् आपततीति न्यायात्। स्वर्गादृष्ट-देवतादि-प्रतिषेधं न प्रत्यक्षेण कर्तुम् अर्हति, तस्य सन्निहित-मात्र-विषयत्वात्। न चायं तद्-प्रतिषेधेन खर-खरक-चार्वाकताम् आप्नोति, प्रमाणान्तरं च तत्-प्रतिषेधार्थं नेच्छतीति विषमम् एतत् कथं कुर्याद् इति सविस्मयं नश् चेतः। किं च, प्रत्यक्षम् अपि कथं प्रमाणतां स्वी-करोतीति वक्तव्यम्, गृह्यमाण-पदार्थान्वय-व्यतिरेकानुकरणात्। तथा हि॒ तत् समग्र-सामग्रीक-पदार्थ-बलेनोन्मज्जति, तत्-अभावे विस्फारितेक्षण-युगलस्यापि प्रमातुर् नोदीयत इति यदि ब्रूषे, परोक्षेऽपि तर्हि समानम् एवैतत्, तद् अपि बहिर्-अर्थ-सामर्थ्याद् एवोल्लसति, तत्-सम्बद्ध-लिङ्ग-शब्द-द्वारेण तस्योत्पत्तेर्, अन्यथा परोक्षाभासता-प्रसङ्गात्, तस्य चालीकत्वे पारमार्थिक-परोक्ष-प्रामाण्य-क्षतेर् अयोगाद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् अपि गगन-तलावलम्बि-शश-धर-युगलावलोकन-चतुरम् अलीकम् अवलोकितम् इति सकल-विशद-दर्शनानि सत्यताभिमतान्य् अप्य् अलीकताम् अश्नुवीरन्। तन् न प्रमाण-भूतं परोक्षं कदाचन गृह्यमाण-पदार्थ-सत्तां विहायोत्पत्तुम् उत्सहत इति प्रत्यक्षवत् प्रमाण-कोटिम् आरोहति बलाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।११] तथा यद् अपि परैर् उक्त-द्वयातिरिक्तं प्रमाण-संख्यान्तरं प्रत्यज्ञायि, तत्रापि यत् पर्यालोच्यमानम् उपमानार्थापत्तिवत् प्रमाणताम् आत्मसात्-करोति, तद् अनयोर् एव प्रत्यक्ष-परोक्षयोर् अन्तर्-भावनीयम्। यत् पुनर् विचार्यमाणं मीमांसक-परिकल्पिताभाववत् प्रामाण्यम् एव नास्कन्दति, न तेन बहिर्-भूतेनान्तर्-भूतेन वा किञ्चिन् नः प्रयोजनम् अवस्तुत्वाद् इत्य् अपकर्णनीयम्।
[न्या०अ०१।१२] अथ कथम् उपमानस्य प्रामाण्यम् इति ब्रूषे, तद् उच्यते॒ प्रथमं हि विशद-दर्शनाधिगत-गो-पिण्ड-विशेषस्य "यथा गौस् तथा गवय" इति वाक्याकर्णनाहितात्म-संस्कारस्य पुंसोऽटव्यां पर्यटतो गवय-पिण्ड-विशेष-विषय-विविक्त-दर्शन-पुरःसरं यत् पूर्वापर-गो-गवय-पिण्ड-गोचर-दर्शन-व्यापार-सम्पादित-जन्मकम् अयं तेन सदृशोऽनयोर् वा सादृश्यम् इति सादृश्य-विशिष्टं पिण्डं पिण्ड-विशिष्टं सादृश्यं वा गोचरयत् संवेदनम् उदीयते तद् उपमानम् इति। यथाहुस् तद्-वादिनः॒
"तस्माद् यद् दृश्यते तत् स्यात् सादृश्येन विशेषितं ।
प्रमेयम् उपमानस्य सादृश्यं वा तद्-अन्वितम्" ॥ नव्१।१२॒१ ॥
इति।
[न्या०अ०१।१३] ततश् च पूर्वापर-दर्शनयोः पुरो-वर्ति-गो-गवय-पिण्ड-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात् पूर्वापर-परामर्श-शून्यत्वाद् विशद-निर्भासितया शब्दोल्लेख-रहितत्वात् तद्-अधिकम् अव्यभिचरितं व्यवहार-कारि सादृश्यम् अवस्यद् उपमानं स्व-पर-प्रकाशितया निर्बाधकत्वाच् च प्रमाणम्। पूर्वापर-पिण्डातिरिक्तम् अपरं सादृश्यं नोपलभ्यत इति चेत्, कोऽयम् उपलम्भो येन नोपलभ्यते सादृश्यं यदि प्रत्यक्षं तत्? यदि प्रत्यक्षे सादृश्यम् उपमान-गोचरत्वान् न प्रतिभाति, कोऽस्यापराधः? न हि ज्ञानान्तरे तद्-गोचरो न प्रतिभातीति निर्गोचरं तद् इति वक्तुं शक्यम्, इतरथोपमानेऽपि प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्या व्यक्तिर् न भातीति निर्गोचरम् अध्यक्षम् अनुषज्येत। तद् यथा स्व-विषयेऽध्यक्षं प्रमाणं तथोपमानम् अपि। न हि द्वयोः प्रथमानयोर् एकं प्रति विशेषाभावे पक्ष-पातः कर्तुं युक्तः। एतेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञान-स्मृत्य्-ऊहादीनाम् अविसंवादकानां परोक्ष-विशेषाणां प्रामाण्यं व्याख्यातम् अवगन्तव्यं, समान-न्यायानुपातित्वात्। तथा हि॒ प्रथमम् अर्थ-दर्शनम् आत्मनि संस्कारम् आधत्ते, तादृश-दर्शनाद् असौ संस्कारः प्रबुध्यते, प्रबुद्धः पूर्वार्थ-विषयं स एवायं तज्-जातीयो वेत्य् उल्लेखेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञानम् उत्थापयति, तस्योर्ध्व-तिरश्चीन-भेद-सामान्य-द्वयावस्थापकत्वाद्, असञ्जात-पूर्वार्थ-गोचर-दर्शनस्य तद्-उदयाभावात्। तथा स एव संस्कारस् तादृशार्थ-दर्शनेनाभोगादिना वा प्रबुद्धोऽनुभूत-विषयासम्प्रमोष-लक्षणं स्मरणम् उपजनयत्य्, अदृष्टार्थस्य पुंसः स्मरणानुपपत्तेर् इति। ऊहोऽपि प्रत्यक्षानुमानासंवेद्य-साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणः प्रमाणान्तरम् इति कथयिष्यते।
[न्या०अ०१।१४] अर्थापत्तिस् तु प्रत्यक्षादि-गोचरी-कृत-स्फोटादि-पदार्थान्यथानुपपत्त्या दहन-शक्त्य्-आदिकं पावकादेर् अर्थान्तरं पूर्व-दर्शन-गोचरात् समधिकम् अव्यभिचरितं परिकल्पयन्तीति प्रमाणतां स्वी-करोत्य् एव, तल्-लक्षण-योगात्। एवम् अन्यद् अपि प्रत्यक्ष-गोचराधिक्य-सम्पादकं निराकाङ्क्षतया व्यवहार-कारि यद् यत् संवेदनं तत् तत् प्रमाणम् इति समर्थनीयं, स्व-पर-प्रकाशि-निर्बाधत्वात्, पूर्वापर-सोपान-पद्धति-दर्शनोत्तर-काल-भावि-तत्-संख्या-संवेदनवत्। सर्वेषां चैतेषां परोक्षेऽन्तर्-भावो,ऽन्यथानुपपन्नार्थान्तर-दर्शन-द्वारेण प्रस्तुतार्थ-संवेदन-चतुरत्वाद् इति। किञ्चिद्-विशेषात् तु प्रमाणान्तर-परिकल्पने प्रमाणेयत्ता विशीर्येतानन्त्य-प्राप्तेर्,आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतया ज्ञान-प्रवृत्तेर् विचित्रत्वाद् इति। ननु चैवं सति यत् परोक्षस्य द्वैविध्यं वक्ष्यमाणम् अनुमान-शाब्द-भेदेन तद् अपि कथम् उपपत्स्यते, तत्रापि ह्य् आप्त-प्रणीत-वचन-प्रभव-ज्ञानस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वेनानुमानान्तर्-भावो न दुरुपपादः? ततश् चानुमानम् एवैकम् अवशिष्यते, तद् एव परोक्ष-शब्देन, यद्य् उच्यते युक्तम् आस्ते, विदुषाम् अभिधानं प्रत्य् अनादरात्॑ सत्यम् एतद्, एवं तु मन्यते॒ यद्य् अपि कयाचित् प्रक्रिययानुमाने शाब्दम् अन्तर्-भावयितुं शक्यं, तथापि तत् प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे॑ऽतस् तस्याहत्य प्रामाण्यं समर्थनीयम्। न चापृथग्-भूतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम् इति, अतः पार्थक्येनोपन्यासः। अनेन चैतद् उपलक्षयत्य् अन्येषाम् अपि परोक्ष-विशेषाणाम् अनुमानान्तर्-भाव-सम्भवेऽपि यं यं प्रति परेषां विप्रतिपत्तिस् तं तं परोक्षान् निष्कृष्य विविक्त-युक्त्य्-उपन्यासेन तस्य तस्य प्रामाण्यम् आवेदनीयम्। तथा च शास्त्रान्तरे यद् ऊहादीनां लक्षणम् अकार्य् आचार्यैस् तद् युक्तम् एवेत्य् उक्तम् भवति।
[न्या०अ०१।१५] कथं तर्हि मीमांसक-परिकल्पितोऽभावो न प्रमाणम्? निर्गोचरत्वाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवान्वय-व्यतिरेक-द्वारेन "भू-तलम् एवेदं, घटादिर् नास्तीति" वस्तु-परिच्छेद-प्रावीण्यम् आबिभ्राणं तद्-अधिक-ग्राह्यार्थाभावात् प्रमाणान्तरं परिकल्प्यमानं निरस्यतीति किं नश् चिन्तया, तस्य सद्-असद्-रूप-वस्तु-ग्राहिणः प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। अथ कदाचिद् अभिदध्याद्॒ अध्यक्षं भावांशम् एवाकलयतीन्द्रिय-द्वारेणोत्पत्तेस्, तस्य च भावांश एव व्यापारान्॑ नास्तिता-ज्ञानं तु वस्तु-ग्रहणोत्तर-कालं प्रतियोगि-स्मरण-सद्भावे मानसम् अक्ष-व्यापार-निरपेक्षम् उन्मज्जति। तद् उक्तम्॒
"न तावद् इन्द्रियेणैषा नास्तीत्य् उत्पाद्यते मतिः ।
भावांशेनैव संयोगो योग्यत्वाद् इन्द्रियस्य हि" ॥ नव्१।१५॒१ ॥
"गृःीत्वावस्तु-सद्भावं स्मृत्वा च प्रतियोगिनं ।
मानसं नास्तिता-ज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षया" ॥ नव्१।१५॒२ ॥
[न्या०अ०१।१६] अत्रोच्यते भावांशाद् अभावांशस् तर्ह्य् अभिन्नो भिन्नो वा? अभिन्नश् चेत्, कथम् अग्रहणम्, भावांशाद् अव्यतिरिक्तत्वाद् एव, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेद्, घटाद्य्-अभाव-विनिर्लुठितं भू-तलम् आद्य-दर्शनेन गृह्यत इति घटादयो गृह्यन्त इति प्राप्तं, तद्-अभावाग्रहणस्य तद्-भाव-ग्रहणनान्तरीयकत्वात्। तथा चाभावोऽपि पश्चात् प्रवर्तमानस् तान् उत्सारयितुम् अपटिष्ठः स्याद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् असङ्कीर्णस्य सङ्कीर्णता-ग्रहणाद् भ्रान्तम् आपनीपद्येत। किं च, प्रमाणाभावाद् अर्थाभावोऽभाव-प्रमाणेन साध्यत इति भवतोऽभिप्रायः॒
"प्रमाण-पञ्चकं यत्र वस्तु-रूपे न जायते ।
वस्तु-सत्तावबोधार्थं तत्राभाव-प्रमाणता" ॥ नव्१।१६॒१ ॥
[न्या०अ०१।१७] इति-वचनात्, तद् अयुक्तम्, यतः प्रमाणाभावः कथं ग्राह्यः? तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावाद् इति चेत्, तस्याप्य् अभाव-ग्रहणे तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावो ग्राह्य इत्य् अनवस्था। अथ अर्थाभावात् प्रमाणस्य प्रमाणाभावाच् चार्थस्याभावः प्रतिपद्येत इति मन्येथास्, तद् एतद् इतरेतराश्रयं दुर्घटम् आपद्येत॒ न यावद् अर्थाभावोऽगृहीतस् तावत् प्रमाणाभावः सिध्यत्य्, अर्थाभावश् च प्रमाणाभावात् सेत्स्यतीत्य् आवर्तनात्। अथेन्द्रियवत् स्वयम् अविज्ञातोऽपि प्रमाणाभावोऽर्थाभावं ज्ञापयिष्यतीत्य् अभिदधीथास्, तद् अयुक्तम्, तस्य तुच्छतया सकल-शक्ति-विरह-लक्षणत्वाद्, इन्द्रियस्य तु तद्-विपर्यस्ततया ज्ञानोत्पादन-दक्षत्वात्। तस्मात् प्रत्यक्षम् एवम् भू-तलादि-प्रतिनियत-वस्तु-ग्राहितां बिभर्ति, यदि तद्-विपरीत-घटादि-प्रतियोगि-वस्त्व्-अन्तर-वैविक्त्यं तस्याकलयति नान्यथा, विजातीय-व्यवच्छेदाभावे तस्यैव प्रतिनियतत्वासिद्धेः, सकल-सङ्कीर्णतया ग्रहण-प्रसङ्गात्। अतोऽधिक-ग्राह्याभावान् निर्विषयतयाभावाख्यं प्रमाणं यत् परैः पर्यकल्पि तद् अप्रमाणम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।१८] द्विधेत्य् अस्मिन् सत्य् अपि प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति नियत-द्वैविध्य-प्रदर्शनेन सौगत-परिकल्पितं ‘प्रत्यक्षम् अनुमानं चेतिऽ॑ द्वैविध्यम् अपक्षिपति, तद्-आकूतेन तस्यायोगात्। प्रत्यक्षातिरिक्तं हि तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धोपलक्षित-कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-सम्पादित-जन्मकम् अनुमानम् एव प्रमाणं, न शाब्दोहादिकं, सम्बन्ध-विकलत्वाद् इति तद्-आकूतम्। अयुक्तं चैतत्, प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-प्रमाणान्तराभाव-ग्रहणोपायाभावात्। न तावत् प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तराभावावगतिस्, तस्य स्वलक्षण-विषयत्वेनाभाव-ग्राहिता-विरोधात्। नापि स्वभाव-कार्यानुमानाभ्यां, तयोर् वस्तु-साधकत्वात्। नाप्य् अनुपलब्धेस्, तस्या अप्य् अत्यन्ताभाव-साधन-विरोधात्। सा हि चतुर्-विधा वर्ण्यते मूल-भेदापेक्षया, तद् यथा -- विरुद्धोपलब्धिर् विरुद्ध-कार्योपलब्धिः कारणानुपलब्धिः स्वभावानुपलब्धिश् चेति। न तावद् विरुद्धोपलब्धेः प्रमाणान्तरस्यात्यन्ताभावो, दृश्यात्मनो विरुद्धस्य विधानेनेतराभाव-साधनात्, सन्निहित-देश एव प्रतियोग्य्-अभाव-सिद्धेः। एतेन विरुद्ध-कार्योपलब्धिर् अपि व्याख्याता, तस्या अपि प्रतिषेध्य-विरोधि-सन्निधापन-द्वारेणाभाव-साधकत्वात्। कारणानुपलब्धिर् अपि तद्-देशाशङ्कित-कार्यस्यैवाभावं साधयति न सर्वत्र, स्वयम् असिद्धत्वात्। स्वभावानुपलब्धिर् अप्य् एक-ज्ञान-संसर्गि-पदार्थोपलम्भ-रूपा तद्-देश एव प्रतिद्वन्द्व्य्-अभावं गमयति। अतः प्रमाणान्तरस्यापि क्वचिन् निषेधः स्यान्, न सर्वत्र। तन् न प्रमाणान्तर-बाधकं समस्ति।
[न्या०अ०१।१९] प्रत्यक्षानुमानयोश् च प्रामाण्यं कुत इति चिन्त्यम्। न तावत् प्रत्यक्षात्, तस्य निर्विकल्पकतया सतोऽप्य् असत्-कल्पत्वात्। तत्-पृष्ठ-भावी विकल्पस् तु न स्वलक्षणाम्भोधि-मध्यम् अवगाहते॑ तत् कथं तत्राप्रविष्टस् तत्-स्वरूपं निश्चिनुयात्। अप्रमाण-भूताच् च तस्मात् प्रामाण्य-निर्णय इति निबिड-जडिमाविष्करणं भवताम्। अनुमानात् प्रामाण्य-निर्णय इति चेन्, न, तस्यापि स्वलक्षणाद् बहिः प्लवनात्। अप्रामाण्य-व्यवच्छेदस् तेन साध्यत इति चेन्, न, व्यवच्छेदस्य व्यवच्छिन्नाव्यतिरेकाद्, इतरथान्धकार-नर्तन-कल्पम् अनुमानम् आसज्येत, निर्विषयत्वात्। किं च, तत्-प्रामाण्य-निर्णायकम् अनुमानं प्रमाणम् अप्रमाणं वा? न तावद् अप्रमाणम्, ततः प्रामाण्यासिद्धेः। नापि प्रमाणं, तत्-प्रामाण्य-साधकाभावात्। न हि प्रत्यक्षात् तत्-सिद्धिर्, विकल्प-शून्यतयाकिञ्चित्-करत्वाद् इत्य् उक्तम्। अनुमानात् तु तत्-साधने विकल्प-युगलं तद्-अवस्थम् एवावतिष्ठेत, तत्-प्रामाण्य-साधनेऽप्य् अनुमान-कल्पनेत्य् अनवस्था। किं च, गृहीत-सम्बन्धस्यानुमानं प्रवर्तेत, सम्बन्धस् त्रि-काल-गोचरो ग्राह्यो, न च प्रत्यक्षं तं लक्षयितुं क्षमते, पूर्वापर-क्षण-त्रुटित-रूप-वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविनो विकल्पस्यापि व्यावहारिकाभिप्रायेण तन्-निष्ठताभ्युपगमात्। अनुमानाद् ग्रहीष्यतीति चेन् ननु तद् अपि सम्बन्ध-पूर्वकं प्रवर्तेत, तद्-ग्रहणेऽपीयं वार्तेत्य् अनवस्था। तस्माद् अनुमानम् अभिलषता गत्य्-अन्तराभावात् तत्-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणस् त्रि-काल-गोचरोऽव्यभिचारी वितर्कोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा च प्रस्तुत-तद्-द्वैविध्यस्य विघटितत्वाद्, अन्यद् अपि यद् एवं-विधम् अविसंवादि ज्ञानं तत् प्रमाणम् अस्त्व् इत्य् अलं शुष्काभिमानेनेति। यदि पुनः साध्यार्थान्यथानुपपन्न-हेतु-सम्पादितम् अनुमानम् इष्येत, तदा प्रत्यक्षम् अनुमानं चेत्य् अपि द्वैविध्यं घटाम् अटेद् एव॑ प्रत्यक्ष-व्यतिरिक्त-ज्ञानस्य सामस्त्येनानुमानेऽन्तर्-भाव-सम्भवात्, अन्यथानुपपन्नार्थान्तरम् अन्तरेण परोक्षार्थ-विषय-प्रतीतेर् अभावाद् इति।
[न्या०अ०१।२०] साम्प्रतम् अन्यथा सूत्रावयवेनैव प्रकृत-नियम-कारणम् आह॒ मेय-विनिश्चयाद् इति द्विधैवेति च काकाक्षि-गोलक-न्यायेनात्रापि सम्बन्धनीयम्। ततश् चायम् अर्थो॒ द्वाभ्याम् एव प्रकाराभ्यां मेयस्य ग्राह्यार्थस्य विनिश्चयात् स्वरूप-निर्णयाद्॑ द्वे एव यथोक्ते प्रमाणे न न्यूनम् अधिकं चेति। अयम् अत्राभिप्रायः॒ स्व-संवेदनं प्रति निखिल-ज्ञानानाम् एक-रूपतया साक्षात्-करण-चतुरत्वान् नास्त्य् एव भेदः॑ बहिर्-अर्थं पुनर् अपेक्ष्य कश्चिच् चक्षुरादि-सामग्री-बल-लब्ध-सत्ताकः स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं सन्निहितं विशद-निर्भासं सामान्यम् आकारं साक्षात्-कुर्वाणः प्रकाशः प्रथते, तत्र प्रत्यक्ष-व्यवहारः प्रवर्तते। यः पुनर् लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण नियतानियत-सामान्याकारावलोकी परिस्फुटता-रहितः खल्व् आत्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणामः समुल्लसति स परोक्षतां स्वी-करोति। न चैतौ प्रकारौ विहाय प्रकारान्तरेण ज्ञान-प्रवृत्तिं पश्यामो, न चापश्यन्तः प्रमाणान्तर-परिकल्पनं क्षमामहे, न च द्वयोः प्रथमानयोर् एकं निह्नुवानम् अपेक्षामहे, विशेषाभावात्। तस्माद् एतद् एव द्वैविध्यम् उररी-कर्तव्यम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२।०] साम्प्रतं यद् अस्माभिः प्राग् विवृण्वद्भिर् व्युदपादि, यद् उत विप्रतिपन्नाव्युत्पन्न-व्यामोहापोह-सहम् इहेदं प्रमाण-लक्षणम् इति तत्-सूत्र-मात्र-दर्शनाद् एव विमल-बुद्धयोऽवगच्छेयुः। मन्द-मतयस् तु तावता न भोत्स्यन्त इति -- तद्धित-विधित्सया व्यक्तं प्रमाण-लक्षणाभिधान-फलं प्रतिपिपादयिषुर् अपि सपूर्व-पक्षं निराकाङ्क्षं लक्षयेयुस् त इति तावत् पूर्व-पक्षम् उत्थापयन्न् आह॒
प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश् च तत्-कृतः ।
प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ न्यायावतार २ ॥
[न्या०अ०२।१] इह वचनम् उच्चारयता विमृश्य-भाषिणा प्रत्यवमृश्यं, किम् इदं मामकं वचनं श्रोतृ-संस्काराधायकम् उत नेति। इतरथा पर्यालोचित-कारितास्य हीयते। श्रोतृ-संस्काराधायकं चेद् उच्चारयत्य्, अन्यथा विपर्यय इति। एतत् तु प्रमाण-लक्षण-वाक्यं सकल-जनानादि-प्ररूढार्थ-प्रत्यायकत्वाद् अश्रोतृ-संस्काराधायकम्, यत आह॒ प्रसिद्धानि प्ररुढानि, नाधुना साध्यानीत्य् अर्थः। प्रमाणानि प्रत्यक्षादीनि, परोक्ष-गत-भेदापेक्षया बहु-वचनं व्यक्ति-भेदे सामान्यम् अपि कथञ्चिद् भिद्यत इति-दर्शनार्थम्। तथा हि॒ तद् अविवक्षित-व्यक्तिकम् एक-रूपतां बिभर्ति प्रमाणम् इति॑ व्यक्त्य्-अवच्छेदेन पुनर् अवच्छिद्यमानं नानातामादत्ते प्रत्यक्षानुमान-शाब्दानि प्रमाणानीति, व्यक्ति-व्यतिरिक्ताव्यतिरिक्त-रूपत्वात् तस्य। तथा हि॒ शब्दाच् चक्षुरादेर् वा दूराद् वृक्ष इति प्रत्यये धव-खदिर-पलाशादि-विशेषानपेक्षया साधारणं वृक्षत्वम् एव चकास्ति, तस्मात् तत् तेभ्यो भिन्नं, तद्-व्यतिरेकिणाकारेण ज्ञाने प्रतिभासनाद्, घटादिवत्। परिस्फुट-धव-खदिर-पलाशादि-विशेषावलोकन-वेलायां तु न तद्, अतिरेकिणा रूपेण प्रकाशत इत्य् अभिन्नं, तद्-अव्यतिरिक्तस्य संवेदनात्, तत्-स्वरूपवत्। विशेषाभिन्नम् एव रूपं तात्त्विकं सामान्यस्य, तस्यैव दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रिया-क्षमत्वाद्, भिन्नं पुनः कल्पना-बुद्धि-विठपितत्वाद् अवस्तु-रूपम् इति चेन्, न, द्वयोः प्रकाशमानयोर् एकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। अन्यथा भिन्नम् एव रूपं स्वाभाविकम् इतरत् तु कल्पना-बुद्धि-दर्शितम् इत्य् अपि वदतां न वदन-भङ्गः स्यात्। अर्थ-क्रिया-कारिताविशेषस् तु भिन्नेऽपि रूपे न दुरुपपादस्, तस्यापि ज्ञान-साधारण-व्यवहार-करण-दक्षत्वात्। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम् इति निवेदयिष्यामस्, तस्मात् सर्वत्र भिन्नाभिन्नौ सामान्य-विशेषाव् इति दर्शनार्थो बहु-वचन-निर्देशः। आसतां तावत् प्रमाणानि।
[न्या०अ०२।२] व्यवहारश् च तत्-कृतः प्रसिद्ध इति सम्बन्धः। च-शब्दोऽपि-शब्दार्थः। तेनायम् अर्थो॒ यद्-अर्थं प्रमाण-परीक्षणम् असाव् अपि जल-पान-शीत-त्राणादिर् व्यवहारोऽनादि-प्ररूढः, तन् निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम् इत्य् अभिप्रायवान् अपि परः परुषता-परिजिहीर्षयात्मनोऽन्यथा प्राह॒ प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमासाधारण-प्रमाण-धर्म-कथन-रूपायां ज्ञायते निर्णीयतेऽस्माभिर् न प्रयोजनं तत्-फलम्, अतिसूक्ष्मत्वात् तावकाभिसन्धेर् इति काक्वा प्रश्नयत्य् उल्लुण्ठयति चेति। किं च, प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं वाभिधीयते, निश्चितं वा स्वरूपेणेति पक्ष-द्वयम्। न तावद् अनिश्चितम्, अनिश्चितस्य लक्षणत्वायोगाद्, उन्मत्तक-विरुतवत्। अथ निश्चितं, तत् किम् अप्रमाणात् प्रमाणाद् वा। न तावद् अप्रमाणाद्, अप्रमाणस्य निश्चायकत्वायोगात्। यदि पुनर् अप्रमाणम् अपि निश्चायकम् इति सङ्गीर्येत, तदा प्रमाण-पर्येषणं विशीर्येत, नैरर्थक्यापत्तेर्, अप्रमाणाद् अपि निश्चायाभ्युपगमात्। अथ प्रमाणात्, तत् किम् अलक्षणं लक्षणोपेतं वा। अलक्षणं चेन् निश्चायकं प्रमाणम्, तर्हि सर्व-प्रमाणानां लक्षणाभिधानम् अनर्थकं, तद्-व्यतिरेकेणाप्य् अर्थ-निश्चय-सिद्धेर्, भवद्-अभिप्रेत-लक्षण-निश्चायक-प्रमाणवत्। अथ लक्षणोपेतं, तत्रापि विकल्प-युगलम् अनुवारित-प्रसरम् अनुधावति॒ तल्-लक्षणं निश्चितम् अनिश्चितं वा। न तावद् अनिश्चितं लक्षणं लक्ष्यं लक्षयति। निश्चयोऽपि प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा। अप्रमाणान् निश्चयासिद्धेः प्रमाणाद् इति वक्तव्यम्। तद् अप्य् अलक्षणं सलक्षणं वा। अलक्षणत्वे पूर्वस्यार्थ-ग्रहणे किं क्षूणम्। सलक्षणत्वे तल्-लक्षणं निर्णीतम् अनिर्णीतं वेति तद् एवावर्तते। तन् न प्रमाण-लक्षणाभिधानोपायोऽस्ति, तस्मात् प्रसिद्धानि प्रमाणानीत्य् अङ्गी-कर्तव्यम् इति।
[न्या०अ०३।०] अधुनाचार्यो गृहीतस् तावकीनोऽभिप्रायोऽस्माभिर् इति परं प्रत्याययंस् तन्-मतम् अनुद्राव्य तद् एवानुमन्यमानस् तथापि लक्षणोक्तेः साफल्यमावेदयन्न् आह॒
प्रसिद्धानां प्रमाणानां लक्षणोक्तौ प्रयोजनम् ।
तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् व्यामूढ-मनसाम् इह ॥ न्यायावतार ३ ॥
[न्या०अ०३।१] एतद् अभ्यधायि भवता, यथा प्रसिद्धानि प्रमाणानि, ततस् तेषां लक्षणोक्ताव् असाधारण-धर्म-कथन-विषये प्रयोजनं फलं, किम् इति शेषस्, तद् एतद् अयुक्तम्। यतो यद्य् अपि प्रतिप्राणि-प्रसिद्धानि प्रमाणान्य्, अन्यथा तत्-कृत-निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च दृष्ट-हान्य्-आद्य्-आपत्तेः, तथापि केचिद् वितत-मोहावष्टब्धान्तः-करणास् तत्-स्वरूपम् अनुभवन्तोऽपि न लक्षयन्ति, ततस् तान् अवलोकयताम् अस्माकं तद्-विषय-कृपा-परीत-चेतसां यथावस्थित-प्रमाण-लक्षणाविर्-भावन-द्वारेण व्यामोहम् एतेषाम् अपसारयाम इति प्रमाण-लक्षणाभिधानं प्रति प्रवर्तते चेतः। तद् इदं प्रयोजनं॒ तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् इति॑ तस्मिन् प्रमाण-लक्षणे व्यामोहो विपरीताभ्युपगमवतां विपर्यास-लक्षणस् तीर्थ्यानां प्रमाणाप्रमाण-विवेक-विकलानाम्, अनध्यवसायात्मकस् तु मुग्ध-बुद्धीनां लौकिकानाम्, तस्य निवृत्तिर् अविपरीत-लक्षणावगमाद् अपगम इत्य् अर्थः, सा स्याद् भवेत्। केषाम् इत्य् आह॒ व्यामूढं विपरीत-ग्रह-ग्रस्तं विचित्ततां गतं मनोऽन्तः-करणं येषां ते तथा तेषाम्॑ इहेति लोके -- तद् अयं तात्पर्यार्थः। यद्य् अनादि प्रसिद्धं प्रमाण-लक्षणं प्रति न केचिद् अपि व्यामुह्येयुस् तदा यद् भवद्भिः प्राग् उदग्राहि॒ ‘निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम्ऽ॑ इति तद् युक्तम् एव स्यात्। न चैतद् एवं॑ तत्र व्यामूढानां दर्शनात्। एतेन यद् अदायि दूषणं ‘प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं निश्चितं वाभिधीयतऽ॑ इत्य्-आदि तद् अपि सिद्ध-साध्यता-मध्य-प्रतिबद्धत्वान् न बाधाविधाय्य् अस्माकम् इति मन्तव्यम्। व्यामूढ-मनसोऽपि प्रति प्रमाण-लक्षण-प्रकाशने तल् लगतीति चेन्, न, स्व-संवेदन-सिद्धस्य वचनेन प्रकाशनात्, तस्य व्यामोहापोह एव व्यापारात्। यथा विविक्त-भू-तलावलोकनेऽप्य् अध्यक्षात् यो घटादि-वैविक्त्यं न प्रतिपद्यते, कुदर्शन-व्यामोहात्, तं प्रत्युच्येत॒ ‘नास्त्य् अत्र घट, उपलम्भ-कारण-समग्रतायाम् अप्य् अनुपलम्भाद्ऽ, वैविक्त्यं हि तत्राध्यक्ष-सिद्धं, वचनाद् व्यामोहो निवर्त्येत॑ तथेहापि विद्वद्भिर् द्रष्टव्यम्। निर्णीतं तल्-लक्षणम् अध्यक्षेण, तस्य व्यवसाय-रूपत्वाद्, वचनं पुनर् विपरीतारोप-निराकरणे व्याप्रियत इति स्थितम्। तद् एवं प्रमाण-लक्षणं सामान्येन प्रतिपाद्य तद्-गतं कुचोद्यं पर्यहार्य् आचार्येण।
[न्या०अ०४।०] अधुना तद्-विषयाम् एव संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षता ये प्रत्यक्ष-परोक्ष-लक्षणे प्रमाण-व्यक्ती प्राक् प्रक्रान्ते, तयोर् अपि लक्षणं प्रति विप्रतिपद्यन्तेऽपरे। अतस् तल्-लक्षणम् अपि वक्तव्यम् इति तावत् प्रत्यक्ष-लक्षणम् अभिधातुकाम आह॒
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् ईदृशम् ।
प्रत्यक्षम्, इतरज् ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥ न्यायावतार ४ ॥
[न्या०अ०४।१] तत्र प्रत्यक्षम् इति लक्ष्य-निर्देशः, अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् इति लक्षण-निर्देशः। परोक्षोऽक्ष-गोचरातीतस्, ततोऽन्योऽपरोक्षस्, तद्-भावस् तत्ता तया, साक्षात्-कृततयेति यावत्। अर्यत इत्य् अर्थोऽवगम्यत इति हृदयम्॑ अर्थ्यत इति वार्थो दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रियार्थिभिर् अभिलष्यत इति यावत्। तस्य ग्राहकं व्यवसायात्मकतया साक्षात् परिच्छेदकं यज् ज्ञानं, तद् ईदृशम् इतीदृग् एव प्रत्यक्षम् इति सण्टङ्कः। तत्र ज्ञान-ग्रहणेन यत् सांख्याः प्राहुः॒ ‘श्रोत्र्-आदि-वृत्तिः प्रत्यक्षम्ऽ॑ इति तत् तिरस्-करोति, श्रोत्र्-आदीनां प्रकृति-विकारतया तद्-वृत्तेर् व्यापार-लक्षणाया जडतया प्रत्यक्षत्वायोगाद्॑ अर्थ-परिच्छित्ति-हेतुतया प्रत्यक्षत्वे आलोकादि-जड-कारण-कलाप-व्यापारस्यापि प्रत्यक्षतापद्येत, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०४।२] अर्थस्य ग्राहकम् इत्य् अस्य ग्रहणेक्षयेति वक्ष्यमाण-पद-सापेक्षत्वाद्, अमुना बहिर् अपि येऽर्थ-कलाकलन-विकलं सकलम् अपि ज्ञानं प्रलपन्ति तान् निरस्यति॑ स्वांश-ग्रहणे ह्य् अन्तः-संवेदनं व्याप्रियते यथा -- तथा बहिर् अपीतरथार्थवज् ज्ञान-सन्तानान्तराण्य् अपि विशीर्येरन्, स्वप्न-दृष्टान्तेन तद्-अनुमानस्योपप्लव-मात्रतापत्तेः, स्व-विज्ञानस्यैव तथा तथा विजृम्भणात्। तथा च प्रमाण-प्रमेय-प्रतिपाद्य-प्रतिपादक-कार्य-कारण-भावादयः प्रलीयेरन्न्, आत्म-व्यतिरेकेणात्मीय-पूर्वोत्तर-क्षणयोर् अपि ज्ञानस्य प्रवृत्ति-निरोधापत्तेः। अद्वय-विज्ञान-तत्त्व-साधनेनानुकूलम् आचरसीति चेत्, स्याद् एतत्, यदि भवतः प्रमाण-परिदृष्ट-सकल-व्यवहारोच्छेदेन कुदर्शन-वासनाहितादृष्टाद्वय-तत्त्व-परिकल्पनात् प्रतिकूलं न स्यात्। तन् नार्थ-विरहेण बहिः-प्रमाण-भूत-ज्ञानोल्लासोऽस्ति, निर्हेतुकत्व-प्रसङ्गाद् इति।
[न्या०अ०४।३] ग्राहकम् इति च निर्णायकं द्रष्टव्यम्, निर्णयाभावेऽर्थ-ग्रहणायोगात्। तेन यत् ताथागतैः प्रत्यपादि॒ ‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् अभ्रान्तम्ऽ॑ इति तद् अपास्तं भवति, तस्य युक्ति-रिक्तत्वात्। तथा हि॒ ते निर्विकल्पकत्वेऽध्यक्षस्यायुक्तीः खेटयन्ति -- किलेदम् अर्थ-सामर्थ्येनोदीयते, सन्निहितार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्राहकत्वात्। न चार्थे ध्वनयः सन्ति, तद्-धेतु-विलक्षण-कारणान्तर-जन्यत्वात्, ततश् चासाव् उपनिपत्य स्व-गोचरं संवेदनम् उत्थापयन् स्वाकारम् अनुकारयति। तन् न तद्-ग्राहिणि विज्ञाने शब्द-संश्लेषो युक्तः। किं च, यद्य् उत्पादकार्थोपयोगेऽपि तं तावन् न गृह्णीयात्, संवेदनम् अपि तु स्मरण-सम्पादितं तद्-अभिधायक-ध्वनि-संयोजनं प्रतीक्षमाणं तावद् आसीत, तर्हि दत्तो जलाञ्जलिर् अर्थ-ग्रहणस्य। तथा हि॒ तम् अर्थम् अपश्यंस् तस्मिन् गृहीत-सङ्केतं तद्-अभिधायक-ध्वनिं नानुस्मरत्य्, उपायाभावाद्, अननुस्मरंश् च पुरो-वर्तिन्य् अर्थे न योजयति, स्मृत्य्-उपस्थापन-व्यतिरेकेण तद्-योजनाशक्तेर्, अयोजयंश् च भवद्-अभिप्रायेण न पश्यतीति धान्ध्याद् आन्ध्यमापद्येत। यदि चेन्द्रियजम् अपि ज्ञानं विकल्प-कलुषितम् इष्येत, तदा तद् अपि मनो-राज्यादि-विकल्पवद् विकल्पान्तराविर्-भावे सति निवर्तेत॑ न चैतद् अस्ति, सन्निहित-गो-पिण्ड-गोचरस्य चक्षुर्ज-संवेदनस्याश्वादि-विषय-विकल्पोदयेऽप्य् अनिवर्तनात्, संहृत-सकल-विकल्पस्यापि च परिस्फुट-सन्निहितार्थ-विषय-दर्शन-सिद्धेः। तन् नाक्षजं ज्ञानं शब्द-सम्पर्कम् अनुभवतीति।
[न्या०अ०४।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यत् तावद् उक्तम्॒ अशब्दकार्थ-सामर्थ्योद्भवत्वाद् ध्वनि-रहितम् अध्यक्षम् इति, तद् अयुक्तं, न हि शब्दासम्पृक्तार्थजम् इत्य् एतावतैवाभिलाप-विना-कृतम् इति वक्तुं शक्यम्, अन्यथा जडार्थ-जनितम् इति जडम् अपि तत् स्यात्। अथ बोध-रूप-मनस्कार-साहित्यान् न जडम् इति ब्रूषे, तथा सत्य् अभिलाप-संसृष्ट-मनस्कार-सन्नियोगात् साभिलापम् अपि स्यात्। किं च, विविक्ताः परमाणवः स्वाकारार्पण-द्वारेण स्व-गोचरं ज्ञानम् उत्पादयन्तः कथम् असन्तम् आत्मनि स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं तत्र प्रथयन्ति। विभ्रमाद् इति चेन्, न, नेदानीम् अर्थे यद् अस्ति तद् एव प्रतिभाति, तत्रासतोऽपि स्थूराकारस्य प्रतिभासनात्। तथा शब्दोऽपि। यद्य् अविद्यमानोऽर्थे तद्-ग्राहिणि ज्ञाने प्रतिभासेत किं क्षूयेत? यच् चोक्तम्॒ ‘स्मरण-जनित-शब्द-संयोजनं प्रतीक्षमानम् अर्थोपयोगेऽपि यद्य् आसीतेत्य्ऽ-आदि यावद् ‘आन्ध्यम् आपद्येतऽ, तत् तावक-पक्षेऽपि समानम्। तथा हि॒ स्वलक्षण-विषयेन्द्रियज-निर्विकल्पक-ज्ञान-सद्भावेऽपि न तावद् इदं-तयानिदं-तया वार्थ-व्यवस्थितिर्, यावद् विधि-प्रतिषेध-द्वारेण विकल्प-युगलकं पाश्चात्यं नोदयते, यत्रैवांशे विकल्पं जनयति, तत्रैवास्य प्रमाणतेति-वचनान्, निर्विकल्पकस्य सतोऽपि व्यवहारं प्रत्य् असत्-कल्पत्वात्। स च विकल्पः सङ्केत-काल-भावितम् अभिलाप-सामान्यम् अनुस्मरत एवोत्पत्तुम् अर्हति, अभिलाप-सामान्य-स्मरण-बीजं च कुतः प्रबुध्येत? तादृश-दर्शनाद् इति चेन्, ननु तद् अपि दर्शनं निर्विकल्पकत्वाद् अर्थं नातिशेते, तत् कथं सामान्य-विषय-विकल्प-बीजं प्रबोधयेत्? अर्थः पुनः सामान्य-व्यवसायात्मिकां बुद्धिं न जनयेद् इति भवतां कदाग्रहः। तद् अर्थवत् तद्-विषयं दर्शनं व्यवसाय-शून्यत्वान् नाभिलाप-सामान्य-गोचर-स्मरण-बीजं प्रबोधयति॑ तद् अप्रबुद्धं न स्मरणं जनयत्य्॑ अजातं स्मरणं न शब्दं योजयत्य्॑ अयोजितः शब्दो नार्थं निश्चाययत्य्॑ अनिश्चितोऽर्थो न व्यवहारम् अवतरत्य्॑ अनवतीर्णो नादृष्टाद् विशिष्यते॑ अविशिष्टः प्रमातुर् आन्ध्यं लक्षयतीति। तस्माद् यथा कथञ्चिन्-निर्णयाभावात् स्वयम् अप्रतीतम् अपि निर्विकल्पक-दर्शनं वासना-प्रबोध-द्वारेण विकल्पम् उत्थाप्यात्म-व्यापारम् अभिलापयति कतिचिद्-अंश-विषयं, तथार्थोऽपि यदि चक्षुर्-आदि-सामग्र्य्-अन्तः-पातित्वेनाप्रतीत एव स्वयं, तथा-स्वभावत्वात्, सङ्केत-काल-भाविताभिलाप-सामान्य-विषयात्म-संस्कार-प्रबोध-द्वारेणात्म-विषयम् अभिलाप-संसृष्टं संवेदनम् उल्लासयेन् नात्यन्तम् अयुक्तं पश्यामः। न चायं सविकल्पको बोधो मनो-राज्यादि-विकल्प-कल्पश्, चक्षुरादि-सामग्री-सम्पाद्यत्वाद्, इतरस्य तु मनो-मात्र-प्रभवत्वात्। अतः कथं तद्-विकल्पान्तराविर्-भावे निवर्तेत? मानस-विकल्पस्यैव विकल्पान्तरेण निवर्तनाद्, अस्य तु कारण-सामर्थ्येन बलात् प्रवृत्तेः। एतेन संहृत-सकल-विकल्पावस्थायां नैष प्रादुःष्याद् इत्य् एतद् अपि प्रतिक्षिप्तम्, अस्य प्रमातुर् इच्छया संहर्तुम् अशक्यत्वान्, मानस-विकल्प-संहरण एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेर् इति। एतच् च शब्द-सम्पृक्त-प्रत्यक्ष-पक्षाद् अप्य् एकान्त-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-पक्षस्य पापीयस्तां दर्शयद्भिर् अस्माभिर् उदग्राहि।
[न्या०अ०४।५] परमार्थतः पुनः प्रत्यक्षे साक्षाच् छब्दोल्लेखो नेष्यते, विशद-व्यवसायेनार्थ-साक्षात्-करण-चतुरत्वात् तस्य। केवलं तद् अपि सन्निहितं परिस्फुटं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं पदार्थान्तरैः सह समानासमानाकारं स्व-परमाणूनां सामान्याकारं स्तम्भाधिकं पदार्थं गोचरयतीति सविकल्पकम् इत्य् उच्यते, पर-परिकल्पित-क्षण-क्षयि-विविक्त-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवण-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-प्रतिषेधार्थं कथञ्चिद्-अभिलाप-संसर्ग-योग्य-गोचरता-दर्शनार्थं वा। एवं च प्रत्यक्ष-गोचरी-कृतेऽर्थे संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध-ग्रहणादयस् तद्-विषयाः शाब्द-व्यवहाराः सर्व एव निरुपचरिता घटन्त इत्य् उक्तं भवति। यदि पुनः शब्द-संसर्ग-योग्य-प्रतिभासम् अध्यक्षं न स्यात्, ततः को दोष इति चेद्, विकल्पानुत्थानेन सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गः। तथा हि॒ निर्व्यवसायं दर्शनम् अत्यन्त-पाटवोपेतम् अपि स्मृति-बीजाधानं तद्-उत्तर-काल-भावि वा तादृशार्थ-दर्शनं तत्-प्रबोधनम् अभ्यास-वासना-पाटवेऽपि न विधातुम् अलं, यतः सामान्य-विकल्पोत्पत्त्या व्यवहारः प्रवर्तेत, क्षणिकत्वादिषु सकल-कालं निर्विकल्पकाध्यक्ष-दृष्टतयाभ्युपगतेष्व् अपि तद्-अदर्शनात्। तस्माद् यत्र कुत्रचिद् अर्थांशे पाश्चात्य-व्यवहार-प्रवृत्तिस् तत्र प्राचीनं संवेदनं निर्णायकम् अभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा क्षणिकत्वाद्य्-अंशवत् सर्वांशेषु व्यवहारः प्रलीयेत। तन् न कदाचन कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षस्य प्रमातुर् अपि प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति। अप्रतीतं चास्तीति श्रद्धातुं दुःशकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् अलक्षणम्।
[न्या०अ०४।६] अभ्रान्तत्वम् अपि न जाघटीति, भवद्-अभिप्रायेण स्थिर-स्थूरार्थ-ग्राहिणः संवेदनस्य विपर्यस्त-रूपत्वात्, तद्-विपरीतस्य तु स्वप्न-कालेऽप्य् अप्रकाशमानत्वात्। तद् यदि यथावस्थितार्थ-ग्राहित्वम् अभ्रान्तत्वं, तन् न सम्भवत्य् एव, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणूनां कदाचिद् अप्य् अप्रतिभासात्, तेषां च पारमार्थिकत्वात्। अथ व्यावहारिकाभिप्रायेण यद् इदं घटादिकं स्वलक्षणम् अर्थ-क्रिया-क्षमं, तत्र यन् न भ्राम्यति तद् अभ्रान्तम् इत्य् अभिप्रेतं, तर्हि कल्पनापोढ-पदम् उत्सारणीयम्, इदानीम् अनेन सहावस्थानाभावाद्, व्यवहारावतारिणो घटादि-स्वलक्षणस्य निर्णयेनैव ग्रहणाद्, अन्यथा व्यवहाराप्रवृत्तेर्, दृष्टस्याप्य् अदृष्टानतिशयनात्। तस्माद् व्यवसायात्मकम् अध्यक्षम् इत्य् एतद् एव चार्व् इति स्थितम्।
[न्या०अ०४।७] अपरोक्षतयेत्य् अनेन तु परोक्ष-लक्षण-सङ्कीर्णताम् अध्यक्षस्य परिहरति, तस्य साक्षात्-कारितया अर्थ-ग्रहण-रूपत्वाद् इति। ईदृशम् इत्य् अमुना तु पूर्वोक्त-न्यायात् सावधारणेन विशेषण-कदम्बक-सचिव-ज्ञानोपप्रदर्शनात् पर-परिकल्पित-लक्षण-युक्तस्य प्रत्यक्षतां प्रतिक्षिपति। एवं च यद् आहुर्॒ "इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" तथा "सत्-सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धि-जन्म तत् प्रत्यक्षम्" इत्य्-आदि तद् अयुक्तम् इत्य् उक्तं भवत्य्, अपूर्व-प्रादुर्-भावस्य प्रमाण-बाधितत्वाद्, अत्यन्तासतां शश-विषाणादीनाम् अप्य् उत्पत्ति-प्रसङ्गात्। तस्माद् इदम् आत्म-रूपतया विद्यमानम् एव विशेष-कृद्-धेतु-कलाप-सन्निधानात् साक्षाद् अर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपतया विवर्तेत॑ तथा चोत्पन्न-जन्मादि-विशेषणं न सम्भवेत्। अथैवं-विधार्थ-सूचकम् एवैतद् इत्य् आचक्षीथास्, तथा सत्य् अविगानम् एवेत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०४।८] अधुना परोक्ष-लक्षणं दर्शयति॒ इतरद् इत्य्-आदि। अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तम्, तस्माद् इतरद् असाक्षाद् अर्थ-ग्राहकं ज्ञानं परोक्षम् इति ज्ञेयम् अवगन्तव्यम्। एतद् अपि स्व-संवेदनापेक्षया प्रत्यक्षम् एव, बहिर्-अर्थापेक्षया तु परोक्ष-व्यपदेशम् अश्नुत इति दर्शयन्न् आह॒ ग्रहणेक्षयेति॑ इह ग्रहणं प्रक्रमाद् बहिः प्रवर्तनम् उच्यते,ऽन्यथा विशेषण-वैयर्थ्यात्॑ तस्येक्षापेक्षा तया॑ बहिः-प्रवृत्ति-पर्यालोचनयेति यावत्। तद् अयम् अर्थो॒ यद्य् अपि स्वयं प्रत्यक्षं, तथापि लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण बहिर्-विषय-ग्रहणेऽसाक्षात्-कारितया व्याप्रियत इति परोक्षम् इत्य् उच्यते। एतच् च बुभुत्सितार्थान्यथानुपपन्नार्थान्तर-प्रतीति-वशाद् उदय-धर्मकं इति। सामान्य-लक्षण-सद्भावाद् एकाकारम् अपि विप्रतिपत्ति-निराकरणार्थं द्विधा भिद्यते, तद् यथा॒ अनुमानं शाब्दं चेति। यतोऽद्यापि शब्दस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वम् एव परे न प्रतिपद्यन्ते, न चापृथक्-कृतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम्, अतो भेदेनोपन्यासः।
[न्या०अ०५।०] तत्र तावद् अनुमान-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकं स्मृतम् ।
अनुमानं, तद् अभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवत् ॥ न्यायावतार ५ ॥
[न्या०अ०५।१] इहाप्य् अनुमानम् इति लक्ष्य-निर्देशः, तस्य प्रसिद्धतया अनूद्यत्वात्। साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इति लक्षण-निर्देशः, तस्याप्रसिद्धतया विधेयत्वाद् इति। अत्राप्य् अनुमान-शब्दस्य कर्त्र्-आदि-कारक-व्युत्पत्ति-क्रमेणार्थ-कथनं प्रमाण-शब्दवद् द्रष्टव्यम्। ततश् चेहापि लिङ्ग-ग्रहण-साध्याविनाभावित्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-स्मरण-कालात् [अनु] पश्चान् मीयते परिच्छिद्यतेऽर्थोऽनुमेयः पावकादिर् येन ज्ञानेन तद् अनुमानम् इति। तत् किं-भूतम् इत्य् आह॒ साध्य-निश्चायकम् इति -- साधनम् अर्हति, साधयितुं वा शक्य इति साध्योऽनुमेय इत्य् अर्थः॑ तस्य निश्चायकं तत्-स्वरूप-निर्णायकम् इति यावत्। तत् कुत इत्य् आह॒ लिङ्गाल् -- लिङ्ग्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति लिङ्गं हेतुस् तस्मात्। किं-भूताद् इत्य् आह॒ साध्याविनाभुन इति -- विना भवतीति विनाभु, ततोऽन्यद् अविनाभु, साध्येनाविनाभु साध्याविनाभु, साध्यं विमुच्य यन् न भवतीत्य् अर्थः, तस्मात् साध्य-निश्चायकं ज्ञानं तद् अनुमानम्। स्मृतम् अभिप्रेतं नीतिविद्भिर् इति सम्बन्धः। तत्र लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इत्य् अनेनानुमानस्य प्रत्यक्ष-शाब्द-लक्षण-सङ्कीर्णतां वारयति। साध्याविनाभुन इत्य् अनेन पर-प्रणीत-लिङ्ग-लक्षण-व्युदासम् आचष्टे।
[न्या०अ०५।२] ततश् च यत् परे प्रोचुः -- पक्ष-धर्मत्वान्वय-व्यतिरेक-लक्षण-रूप-त्रयोपलक्षितानि त्रीण्य् एव लिङ्गानि॒ अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति॑ तद् उक्तम्॒
"अनुमेयेऽथ तत्-तुल्ये सद्भावो, नास्तितासति ।
निश्चितानुपलम्भात्म-कार्याख्या हेतवस् त्रय" ॥ इति॑
[न्या०अ०२] तथान्ये॒ "ऽस्येदं कार्यं कारणं संयोगि समवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्" इति, तथा॒ "पूर्ववच् छेषवत् सामान्यतो-दृष्टम्" इत्य्-आदि -- तद् बाल-प्रलपित-प्रायम् इत्य् अवगन्तव्यं, सर्वत्र साध्याविनाभावित्वस्यैव गमकत्वात्, तद्-रहितस्य तु त्रैलक्षण्य-लक्षितस्याप्य् अगमकत्वाद्, इतरथा तत्-पुत्रत्वादीनाम् अपि गमकत्व-प्रसङ्गान्, नियमवत्। त्रैलक्षण्यं लक्षणं, न यत्-किञ्चित्, तेनायम् अप्रसङ्ग इति चेन्, न, नियमेन साध्याविनाभावित्वस्यैवोद्दीपनात्॑ तच् चेद् अस्ति किं त्रैलक्षण्यापेक्षया, तस्यैव गमकत्वात्। तथा हि॒ जल-चन्द्रान् नभश्-चन्द्रं, कृत्तिकोदयाच् छकटोदयं, पुष्पितैक-चूतात् पुष्पिताशेष-चूतान्, चन्द्रोदयात् कुमुदाकर-प्रबोधं, वृक्षाच् छायाम् इत्य्-आदि पक्ष-धर्मत्व-विरहेऽप्य् अनुमिमीमहे। कालादिकस् तत्र धर्मी समस्त्य् एव, तत्र पक्ष-धर्मता लिङ्गस्य गृह्यत इति चेन्, नातिप्रसङ्गाद्, एवं हि शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये काक-कार्ष्ण्यादेर् अपि गमकत्व-प्रसक्तेस्, तत्रापि लोकादेर् धर्मिणः कल्पयितुं शक्यत्वात्। तथान्वय-विकलोऽप्य् अनित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद् इत्य् अयं सम्यग्-घेतुतया समर्थयितुं शक्य इति, नान्वयोऽपि हेतोर् लक्षणम्। तथा हि॒ तावकाकूतेनैव सकलं सत्त्वम् अनित्यतया क्रोडी-कृतम् इति भाव-धर्मः श्रावणत्वं कथम् अनित्यतां विहाय विपक्षे वर्तितुम् उत्सहेत, तद्-विकलस्य निःस्वभावतापत्तेर्, अनित्यता-विनिर्मुक्तस्य सत्त्वस्यासम्भवावत्। एतेन सात्मकं जीवच्-छरीरं, प्राणादिमत्त्वान्, निरात्मकत्वे तद्-वैकल्य-प्रसङ्गाद्, घटादिवद् इत्य् अयम् अपि गमको व्याख्यातः, साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्वस्यात्रापि सद्भावात्, पक्ष-धर्मत्वान्वययोस् त्व् अलक्षणतया प्रतिपादनात्।
[न्या०अ०५।३] तथा कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-नियमोऽपि किल तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धास्तित्वम् एतेष्व् एवेति यः क्रियते, सोऽप्य् अयुक्तः, प्रकृत-सम्बन्ध-द्वय-विकलस्यापि रूपादे रसादि-गमकत्व-दर्शनात्। मा भूत् तस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्तिभ्यां गमकत्वं, समवायाद् भविष्यति, तथापि नान्यथानुपपन्नत्वम् एव हेतोर् लक्षणम् इति यदि वैशेषिको मन्येत, सोऽन्यथा निर्लोठनीयः। स हि विकल्पतः पर्यनुयोज्यः॒ समवायिभ्यः समवायोऽभिन्नो भिन्नो वा। यद्य् अभिन्नः, समवायिन एव तर्हि, न समवायः, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेत्, स कथं तेषु वर्तेत॒ सामस्त्येनाहोस्विद् एक-देशेन? तद् यदि सामस्त्येन, तद् अयुक्तं, समवाय-बहुत्व-प्रसङ्गात्, प्रतिसमवायि तस्य परिसमाप्ततावाप्तेः। अथैक-देशेन, तद् अप्य् अचारु, सांशता-प्रसङ्गेन निरवयवत्व-क्षतेः, स्वांश-वर्तनेऽपि सामस्त्यैक-देश-चोद्यावताराच् च। तत्रापि सामस्त्य-पक्षे बहुत्वं तद्-अवस्थम् एव। एक-देश-पक्षे त्व् अंशान्तर-प्रसङ्गेनानवस्था। तन् न समवाय-बलात् गमकतां प्रत्य् आशाविधेया, तस्यैव तत्र दुःस्थितत्वात्। एतेन संयोगिनोऽपि गमकता प्रत्युक्ता, समान-दूषणत्वात्। विरोधिनोऽपि विरुद्धाभाव-गमकत्वम् अन्यथानुपपन्नत्वम् एव सूचयति, तद्-अभावे गमकत्वायोगात्।
[न्या०अ०५।४] एवं पर-परिकल्पितम् अन्यद् अपि लिङ्ग-लक्षणं यद् गमकताङ्गं तद् अन्यथानुपपन्नत्वं न व्यभिचरति, साध्यं विनाप्य् उपपद्यमानस्य गमकता-वैकल्याद् इति॑ अत्रैव व्यापके लिङ्ग-लक्षणेऽन्तर्-भावनीयं, विपरीतं तु निरसनीयम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०५।५] तद् एवम् अनुमान-लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यच् छौद्धोदनि-शिष्यकैर् न्यगादि, यद् उत -- भ्रान्तम् अनुमानम्, सामान्य-प्रतिभासित्वात्, तस्य च बहिः-स्वलक्षणे व्यतिरेकाव्यतिरेक-विकल्पाभ्याम् अपाक्रियमाणतयायोगात्, तद्-रूपतया च तेन तस्याध्यवसायाद्, अतस्मिंस् तद्-ग्रहणस्य च भ्रान्ति-लक्षणत्वात्। प्रामाण्यं पुनः प्रणालिकया बहिः स्वलक्षण-बलायातत्वाद् अनुमानस्य। तथा हि॒ नार्थं विना तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-रूप-सम्बन्ध-प्रतिबद्ध-लिङ्ग-सद्भावो, न तद् विना तद्-विषयं ज्ञानं, न तज्-ज्ञानम् अन्तरेण प्राग्-अवधारित-सम्बन्ध-स्मरणं, तद्-अस्मरणे नानुमानम् इत्य्, अर्थाव्यभिचारित्वाद् भ्रान्तम् अपि प्रमाणम् इति सङ्गीर्यते॑ तद् उक्तम्॒ "अतस्मिंस् तद्-ग्रहो भ्रान्तिर् अपि सम्बन्धतः प्रमेति" -- तद् अपाकर्तुम् आह॒ तद् अभ्रान्तम् इत्य्-आदि। तद् अनुमानं, भ्राम्यति स्व-गोचरे विपर्यस्यतीति भ्रान्तं, ततोऽन्यद् अभ्रान्तम्, अविपरीतार्थ-ग्राहीति यावत्। इयं च प्रतिज्ञा। प्रमीयते यथावस्थितोऽर्थः परिच्छिद्यतेऽनेनेति प्रमाणं, तद्-भावस् तत्-त्वं तस्मात्। अयं तु हेतुः। सङ्गतम् अक्षाणाम् इति समक्षं, तद् इव समक्षवद् इति दृष्टान्तः। तद् इदम् अनुमानस्य भ्रान्तता-निराकारकं सम्पूर्णावयवम्, उपनय-निगमनयोर् अवयव-त्रय-प्रतिपादनेनैवाक्षिप्तत्वात्। प्रमाणं सूचितम्, प्रयोगस् त्व् एवं द्रष्टव्यो॒ऽभ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वाद्, इह यद् यत् प्रमाणं तत् तद् अभ्रान्तं यथा समक्षं, तथा च प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगम्यतेऽनुमानं, तस्मात् प्रमाणत्वाद् अभ्रान्तम् इति प्रतिपद्यन्ताम् इति। तत्रार्थ-वादी तावत् समक्ष-लक्षणे दृष्टान्ते साध्य-विकलताम् आविर्-भावयितुं न पारयति, स्वयम् एव समक्षस्याभ्रान्ततयाऽभ्युपगमात्। शून्य-वादिनः पुनः समस्तापलापित्वात् प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारं प्रत्य् अयोग्यतैवेति न तम् अधिकृत्य स्व-साधन-दोषाः परिहर्तव्याः, स्व-वचन-बाधित-प्रतिज्ञत्वेन तद्-वादोत्थानाभावात्। तथा हि॒ सर्वाभाव-प्रतिपादकं वचोऽस्ति, नास्ति वा? यद्य् अस्ति तर्हि प्रतिज्ञा-हानिः। अथ नास्ति, सकल-भाव-सिद्धिः, प्रतिषेधकाभावात्।
[न्या०अ०६।०] ज्ञान-वादी पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विकलं सकल-विकल्प-गोचरातीतं निर्विकल्पकं विविक्त-पारमार्थिक-स्व-संवेदन-वेद्यं संवेदनम् आगूर्यानादि-कालालीन-वासना-बल-प्रभावितं ग्राह्य-ग्राहकाकार-कलुषितं बहिष्-प्रथमानं निखिलम् अपि ज्ञानं विपर्यस्ततया प्रतिजानानः समक्ष-लक्षणस्य प्रकृत-दृष्टान्तस्य साध्य-शून्यताम् अभिदध्याद्, अतस् तन्-मत-विकुट्टनार्थम् आह॒
न प्रत्यक्षम् अपि भ्रान्तं प्रमाणत्व-विनिश्चयात् ।
भ्रान्तं प्रमाणम् इत्य् एतद् विरुद्धं वचनं यतः ॥ न्यायावतार ६ ॥
[न्या०अ०६।१] यद् भवतश् चेतसि विवर्तते, यद् उत न केवलम् अनुमानं भ्रान्तं, किं तर्हि यद् भवद्भिर् दृष्टान्ततयोपात्तं प्रत्यक्षं तद् अपि भ्रान्तम् एव, "सर्वम् आलम्बने भ्रान्तम्" इत्य् वचनात्, तद् एतन् न। कुत इत्य् आह॒ प्रमाणत्व-विनिश्चयाद् इति, प्रमाण-भाव-निर्णयाद् इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०६।२] ननु च प्रमाणताम् अभ्रान्ततान्यथानुपपन्नां यदि परः प्रतिपद्यते, ततस् ताम् अभ्युपगच्छन् कथं भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं विदध्याद् इति पार्श्व-स्थित-वचनावकाशम् आशङ्क्य, भ्रान्तता-प्रमाणतयोर् विरोध-साधनेन ततः प्रमाणतां व्यावर्त्यानन्य-शरणतया प्रतिज्ञाताभ्रान्तताक्रान्तां तां दर्शयन्न् आह॒ भ्रान्तम् इत्य्-आदि। भ्रान्तं विपर्यस्तम् अथ च प्रमाणं ग्राह्य-परिच्छेद-हेतुर् इत्य् एतद् वचनम् एवं-विद्धार्थ-प्रत्यायको ध्वनिर् विरुद्धं, पूर्वापर-व्याहतार्थ-गर्भत्वात्।
[न्या०अ०६।३] ननु च नैवास्य विरुद्धता, तथा ह्य्॒ अविदित-परमार्थ-व्यावहारिकाभिप्रायेण लोक-संवृतिं घटयन्तो वयं दृढतर-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताकयोः प्रत्यक्षानुमानयोः प्रमाणताम् आचक्ष्महे, तद्-अभिप्रायेण दर्शितार्थ-प्रापकत्वेन तयोर् अविसंवादकत्वात्। शिथिल-वासनाउन्मुख्य-निर्मित-जन्मकयोः पुनर् अप्रमाणतां, तद्-आकूतेनैव दर्शितेऽर्थे विप्रलम्भनाद् इति, भ्रान्ततां पुनस् तत्त्व-चिन्तकाभिप्रायेण सकलस्य बहिर् उपप्लवमानस्य ग्राह्य-ग्राहकाकार-कालुष्य-दूषितस्य प्रतिभासस्य पारमार्थिकाद्वय-संवेदन-विपर्यस्त-रूपत्वाद् अभिदध्महे, बहिः प्रतिभासस्य तद्-ग्राह्यार्थ-विचाराक्षमतयोपप्लुत-रूपत्वात्। तथा ह्य्॒ अर्थोऽवयवि-रूपोऽवयव-रूपो वा स्याद्, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् अवयवि-रूपो विचारं क्षमते,ऽवयव-विरहेऽवयवित्वायोगात्, तेषु च तद्-वृत्ति-विकल्पानुपपत्तेः। तथा हि॒ तेष्व् असाव् एकदेशेन वर्तते सामस्त्येन वा। न तावद् एकदेशेन, तस्य स्वयं निरवयवत्वात्। अवयव-वृत्ति-निमित्तम् अंशान्तर-कल्पने तद्-वृत्ताव् अप्य् अंशान्तर-कल्पन-प्रसङ्गस्, तथा चानवस्था। नापि सामस्त्येन, प्रत्य्-अवयवं परिसमाप्त-रूपतयावयवि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। भेद-पक्षे दोषोऽयम्, अभेद-पक्षे नास्तीति चेन्, न॒ तत्राप्य् अवयव-मात्रम् अवयवि-मात्रं वा स्याद्, इतरेतराव्यतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्। किं च, समस्तावयव-व्यापिनोऽवयविनोऽभ्युपगमे पटादेर् एक-देश-राग-कम्प-दर्शनादिषु सकल-राग-कम्प-दर्शनादीनि दुर्निवाराणि स्युर्, एकस्य रागारागादि-विरुद्ध-धर्माध्यासायोगाद् इति। नाप्य् अवयव-रूपोऽर्थो विचार-गोचर-चारी कर-चरण-शिरो-ग्रीवादीनाम् अवयवानां स्वावयवापेक्षयावयवि-रूपतया तद्-दूषणेनैवापास्तत्वात्। परमाणूनां निरंशतयावयवत्वम् उपपद्यत इति चेन्, न, तेषाम् अपि दिक्-षट्क-सम्बन्धेन षट्-अंशतापत्तेर्, अन्यथावस्थानाभावात्। ततश् चार्थ-विरहात् तद्-उन्मुखो ग्राह्याकारोऽलीकस्, तद्-अलीकतायां ग्राहकाकारोऽपि नावस्थानम् आबध्नाति, ग्राह्याभावे ग्राहकायोगात्। तद्-अपेक्षयैव तत्-स्वरूप-स्थितिः, ग्राह्य-ग्राहकाकार-विलये च बोधाकारोऽवशिष्यते, तस्य सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात्, तस्मात् स एव पारमार्थिक इति।
[न्या०अ०६।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यद् अवादि संवेदनम् अद्वयं पारमार्थिकं, ग्राह्य-ग्राहकाकार-प्रवृत्तं पुनर् अतात्त्विकम् इति, तद् अयुक्तं, प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ बहिर् अन्तश् चानेकाकारतया हर्ष-विषादादिभिः स्थिर-स्थूरताद्य्-अनेक-धर्म-परिकरितार्थ-ग्रहण-परिणामैश् च विवर्तमानं संवेदनम् उपलभ्यते, न पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विविक्तं यादृग् भवद्भिर् उपवर्ण्यते ज्ञानं तादृशं कस्यचित् कदाचन प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अद्वय-प्रतिभासस्य स्वप्न-दशायाम् अप्य् अननुभूतेः। न च तत्त्व-चिन्तका अपि प्रमाणम् अन्तरेण स्वाकूतं प्रतिष्ठापयन्तः प्रेक्षावताम् अवधेय-वचना भवन्त्य्, अन्यथैकम् अचेतनम् अव्ययम् अपि ब्रह्मानेकं चेतनं क्षण-भङ्गुरताक्रान्तम् अविद्यातः प्रथत इति ब्रुवाणोऽनिराकार्यः स्यात्। यद् अपि बहिर्-अर्थ-निराकरण-धिया अवयव्य्-अवयव-द्वारेण दूषणम् अदायि, तद् अपि बहिर् अन्तः प्रथमान-सकलासुमत्-प्रतीत-प्रतिभास-मुद्गर-निर्दलित-शरीरतया भक्त-मध्य-निष्ठ्यूत-दर्शिनः पुरतो विप्रतारण-प्रवण-कुट्टिनी-शपथ-प्रायम् इति न विद्वज्-जन-मनांसि रञ्जयति, प्रत्यक्ष-प्रतिभासापह्नवे तन्-मूलकत्वात् कुयुक्ति-विकल्पानाम् उत्थानाभावात्। किं च, संवेदनस्यापि सितासिताद्य्-अनेकाकारेष्व् एकस्य वर्तने भेदाभेद-सामस्त्यैक-देशादि-चोद्यं समानम् एवेति न दूषणम्। अनेकाकार-विवर्तस्यालीकत्वान् न तेन सह संवेदनस्य पारमार्थिकस्य भेदाभेदादि-चिन्तेति चेन्, नन्व् एवम् इतरेतराश्रयं दुरुत्तरम् आढौकते। तथा हि॒ तद्-अलीकत्व-सिद्धाव् अद्वय-संवेदन-सिद्धिस्, तत्-सिद्धौ च तद्-अलीकत्वम् इति न्यायात्। अन्यच् चाद्वयम् अप्य् एक-क्षण-वर्ति संवेदनं यथा पूर्वोत्तर-क्षणाभ्यां सम्बन्धम् अनुभवति, तथा निरंशा अपि यदि परमाणवो दिग्-अंशैः परमाण्व्-अन्तरैर् वा संश्लेषमागच्छेयुः किम् अयुक्तं स्यात्। न चावयव्य्-अवयवयोर् एकान्त-व्यतिरेकाव्यतिरेक-पक्षे यद् दूषणं तद् अस्मत्-पक्ष-बाधा-करं, परस्पराविनिर्लुठित-रूपयोर् विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदयोस् तयोर् अभ्युपगमाद्, बहिर् अन्तश् च तथैव प्रकाशमानतया तयोर् निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। एतेन रागाराग-कम्पाकम्पादि-विरोधोद्भावनम् अपि प्रतिव्यूढं, प्रमाण-प्रसिद्धेऽर्थे विरोधाभावात्, प्रमाण-बाधितस्यैव विरुद्धत्वात्, कुयुक्ति-विकल्पानां च प्रत्यक्षापह्नवे निर्मूलतया बाधकत्वायोगात्, तद्-उद्दलितत्वेनोत्थानाभावाद्, भिन्न-प्रवृत्ति-निमित्तत्वाच् च सर्व-धर्मानां तद्-विपर्यय-सम्पाद्यो विरोधो दूरापास्त एव। किं च, स्वयम् एव संवेदनं परमार्थ-संव्यवहारापेक्षया प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-सविकल्पकाविकल्पक-भ्रान्ताभ्रान्तादि-रूपम् अभ्युपयतो बहिर्-अर्थे विरुद्ध-धर्माध्यास-प्रतिषेध-बुद्धिः केवलं जाड्यं सूचयति। तन् न प्रमाणं कथञ्चिद् भ्रान्तं समस्ति, स्वरूप-प्रच्यव-प्रसङ्गाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०६।५] ननु च तद्-दर्शितार्थालीकतया ज्ञानस्य भ्रान्तता, न स्वरूपेण, न च तद्-उदय-समये कस्यचिद् इदम् अलीकार्थम् इदं त्व् अनलीकार्थम् इति विवेकेनावधारणं समस्ति, भ्रान्ताभ्रान्ताभिमतयोस् तद्-एक-रूपतया प्रकाशनात्। यदा च विशद-दर्शन-पथ-चारिणोऽपि शश-धर-युगलादयोऽलीकताम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तदा सकल-सत्यार्थताभिमत-प्रतिभासेष्व् अप्य् अलीकार्थताशङ्कानिवृत्तेर् अनाश्वास एव। न च तद्-अर्थ-प्राप्त्य्-आदिकम् आरेका-निराकरण-कारणं कल्पनीयं, स्वप्नावस्थायां तत्-सद्भावेऽप्य् अलीकार्थता-सिद्धेः। बाधक-प्रत्ययोपनिपातात् तस्यासत्यार्थतेति चेन्, न, तस्य स्व-गोचर-पर्यवसितत्वेन बाधकत्वायोगात्। अन्यथा नीलम् आददाना देवदत्त-बुद्धिः प्राक्-प्रवृत्त-पीत-बुद्धेर् बाधिकापद्येत। सर्व-प्रतिभासस्य बाधकाभाव-सिद्धेश् च समानता। तस्माद् भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञान-भ्रान्तिर् इयं भवतां, विवेकाभावेन सर्वस्यालीकार्थत्वाद् इति।
[न्या०अ०७।०] अत्राह॒
सकल-प्रतिभासस्य भ्रान्तत्वासिद्धितः स्फुटं ।
प्रमाणं स्वान्य-निश्चायि द्वय-सिद्धौ प्रसिध्यति ॥ न्यायावतार ७ ॥
[न्या०अ०७।१] एवं मन्यते॒ योऽपि समस्त-संवेदनस्य भ्रान्ततां प्रतिजानीते, तेनापि तत्-साधकस्याभ्रान्तताभ्युपगन्तव्या, तद्-भ्रान्तत्वे तत्-प्रतिपादितार्थालीकत्वेन सकल-ज्ञानाभ्रान्तता-प्रसङ्गाद्, अन्यथा तद्-भ्रान्ततायोगात्। एवं च तज्-जातीयम् अन्यद् अप्य् अभ्रान्तं स्यात्, ततश् च सकल-प्रतिभासस्य समस्त-संवेदनस्य भ्रान्तत्वासिद्धितो विपर्यस्तत्वानिष्पत्तेर् यत् स्फुटं स्वान्य-निश्चायि सुनिश्चिततया स्व-पर-प्रकाशकं तत् प्रमाणम् इति सम्बन्धः। तच् च द्वय-सिद्धौ स्वरूपार्थ-लक्षण-युग्म-निष्पत्तौ प्रसिद्ध्यति निष्पद्यते, अन्यथा प्रमेयाभावे प्रमाणाभावात्। तस्मात् प्रमाणम् उररी-कुर्वाणेनार्थोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अभिप्राय इति।
[न्या०अ०८।०] तद् एवं स्वार्थानुमान-लक्षणं प्रतिपाद्य तद्-वतां भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं च निराकृत्याधुनाप्रतिपादित-परार्थानुमान-लक्षण एवाल्प-वक्तव्यत्वात् तावच् छाब्द-लक्षणम् आह॒
दृष्टेष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः ।
तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ॥ न्यायावतार ८ ॥
[न्या०अ०८।१] अत्रापि शाब्दम् इति लक्ष्यम्, अनूद्यत्वात्। दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य्-आदि लक्षणं, विधेयत्वात्। दृष्टेन प्रमाणावलोकितेनेष्टः प्रतिपादयिषितोऽव्याहतोऽनिराकृतः सामर्थ्याद् अर्थो यस्मिन् वाक्ये तत्-तथा, प्रमाण-निश्चितार्थाबाधितम् इति यावत्, तस्मात्। परमोऽकृत्रिमः पुरुषोपयोगी शक्यानुष्ठानो वार्थो वाच्यस्, तम् अभिधातुं शीलं यस्य तत् परमार्थाभिधायि, विशिष्टार्थ-दर्शकम् इत्य् अर्थः। ततस् तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं प्रकृत-वाक्य-प्रतिपाद्यार्थादान-शीलतया लब्धात्म-सत्ताकं यन् मानं तच् शाब्दम् इति प्रकीर्तितम् उपवर्णितं पूर्वाचार्यैर् इति सम्बन्धः। तत्र दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य् अनेन कुतीर्थिक-वचसां लौकिक-विप्रतारकोक्तीनां च शाब्दतां निरस्यति, प्रमाण-बाधितत्वात्। वाक्याद् इत्य् अमुना तु वाक्यस्यैव नियतार्थ-दर्शकत्वात् परमार्थाभिधायितेति दर्शयन् पदाच् छाब्दाभावम् आह। परमार्थाभिधायिन इत्य् अनेन ज्वर-हर-तक्षक-चूडा-रत्नालङ्कारोपदेशादि-वचन-प्रभव-ज्ञानस्य निष्फलतया प्रामाण्यं निराचष्टे। तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नम् इत्य् अमुना त्व् एवं-भूताद् अपि वाक्याच् छ्रोतृ-दोषाद् विपरीताद्य्-अर्थ-ग्रहण-चतुरतया प्रादुर्-भूतस्य शाब्दत्वं वारयति। मानम् इत्य् अनेनान्तर्-भावित-प्रोपसर्गार्थेन शाब्दे परस्याप्रामाण्य-बुद्धिं तिरस्-कुरुते, तद्-अप्रामाण्ये परार्थानुमान-प्रलय-प्रसङ्गात्, तस्य वचन-रूपत्वात्। त्र्य्-अवयव-हेतु-सूचकत्वेनोपचारतस् तस्य प्रामाण्यं, न तत्त्वत इति चेन्, नाप्रमाणस्य सूचकत्वायोगात्। ननु च हेतु-प्रतिपादने यदि तत् प्रमाणं, ततो हेतु-समर्थक-प्रमाणान्तर-प्रतीक्षणं विशीर्येत, तेनैव निर्णीत-स्वरूपत्वात् तस्य, प्रमाण-प्रसिद्धे पुनः प्रमाणान्तर-वैयर्थ्यात्। नैतद् अस्ति, भवत्-परिकल्पिताध्यक्षस्याप्य् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्॒ तद्-दर्शितेऽर्थे विकल्प-प्रतीक्षणात् तस्यैव प्रामाण्यम् आसज्येत। तद्-गृहीतम् एवार्थम् असाव् अभिलापयतीति चेच् छब्द-प्रतिपादितं हेतुं प्रमाणान्तरं समर्थयत इति समानो न्यायः।
[न्या०अ०९।०] शाब्दं च द्विधा भवति॒ लौकिकं शास्त्र-जं चेति। तत्रेदम् द्वयोर् अपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितं। समर्थनं पुनर् अविप्रतारक-वचन-प्रभवस्येहादि-वाक्य-प्रस्ताव एव लौकिकस्य विहितं, शास्त्र-जस्य तु विधातव्यम् इति यादृशः शास्त्रात् तज्-जातं प्रमाणताम् अनुभवति तद् दर्शयति॒
आप्तोपज्ञम् अनुल्लङ्घ्यम् अदृष्टेष्ट-विरोधकम् ।
तत्त्वोपदेश-कृत् सार्वं शास्त्रं कापथ-घट्टनम् ॥ न्यायावतार ९ ॥
[न्या०अ०९।१] शास्ति शिक्षयति जीवाजीवादि-तत्त्वं ग्राहयति, शिष्यतेऽनेनेति वा शास्त्रम्। तत् किं-भूतम् इति तद्-विशेषणान्य् आह। आप्तः प्रक्षीणाशेष-रागादि-दोष-गणस्, तेनोपज्ञम् आदाव् उपलब्धम्। अनेनापौरुषेयापोहम् आह, तस्य प्रमाण-बाधितत्वात्, पुरुष-व्यापाराभावे वचनानुपलब्धेर्, उपलम्भेऽपि तद्-अर्थानवगमात्, तद्-अर्थ-निश्चयार्थं पुरुषाश्रयणे गज-स्नान-न्याय-प्रसङ्गात्, तस्य रागादि-कलुषितत्वेन वितथार्थ-कथन-प्रवृत्तेः। तद्-अनुष्ठानाद् अपि स्व-कार्य-सिद्धौ प्रणयनार्थम् अपि पुरुषः किं नेष्यते, विशेषाभावात्। तन् न क्षीण-दोष-वचनं व्यतिरिच्यान्यतः प्रेक्षावतां पर-लोकादाव् अदृष्टेऽर्थे प्रवृत्तिर् युक्ता॑ तत् तद् एव शास्त्रं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०९।२] अत एवोल्लङ्घ्यते प्राबल्येन गम्यतेऽभिभूयते अन्यैर् इत्य् उल्लङ्घ्यं, ततोऽन्यद् अनुल्लङ्घ्यं, सर्व-वचनातिशायीति यावत्। अत एव दृष्टेन प्रमाण-निर्णीतेनेष्टस्य तद्-वाच्यस्य विरोधो यस्मिंस् तत्-तथा तद् एव, यदि वा दृष्टः प्रमाणेन, इष्टो वचनान्तरेण, तयोर् विरोधकं, तद्-विरुद्धार्थाभिधानात्, ततोऽन्यद् अदृष्टेष्ट-विरोधकम्, अबाधार्थाभिधायीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०९।३] तद्-इयता शास्त्रस्य स्वार्थ-सम्पद् उक्ता। अधुना तत्त्वोपदेशादीनां परार्थत्वात् परार्थ-सम्पदम् आह॒ तत्त्वं जीवादयः पदार्थाः, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्, तेषां उपदेशः स्वरूप-प्रकाशनं तद्-रक्षणादि-विधानं वा। तं करोति तत्त्वोपदेश-कृत्। अत एव सार्वं सर्वस्मै हितं, प्राणि-रक्षणोपायोपदेश-परम-पद-दायितया विश्व-जनीनत्वात्। एतेन परार्थ-सम्पादकत्वम् उक्तम्।
[न्या०अ०९।४] अधुना परेषाम् एवानर्थ-विघातित्वम् आह॒ कुत्सिताः पन्थाः कापथास् तीर्थान्तराणि, तेषां घट्टनं विचालकं निराकारकं, सर्व-जनापकारि-कुमत-विध्वंसकम् इत्य् अर्थः। ईदृशाद् एव शास्त्राज् जातं शाब्दं प्रमाणं, नान्येभ्यो, विप्रलम्भकत्वात् तेषाम् इति।
[न्या०अ०१०।०] अधुना परार्थानुमान-लक्षणं वक्तव्यम्, तच् च प्रत्यक्षेऽपि पश्यन्न् एक-योग-क्षेमत्वात् सामान्येनाह॒
स्व-निश्चयवद् अन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः ।
परार्थं मानम् आख्यातं वाक्यं तद्-उपचारतः ॥ न्यायावतार १० ॥
[न्या०अ०१०।१] अत्र परार्थं मानम् इति लक्ष्यं, स्व-निश्चयवद् इत्य्-आदि लक्षणम्। स्व आत्मा तस्य निश्चयः प्रमेयाधिगमस्, तद्वद् अन्येशां प्रतिपाद्यानां निश्चयोत्पादनं प्रमेय-परिच्छेदक-ज्ञान-प्रादुर्-भावनं॒ यथात्मनोऽर्थ-निर्णयस् तथा परेषां निर्णय-जननम् इत्य् अर्थः। बुधैर् विद्वद्भिः, परस्मै अर्थः प्रयोजनं येन तत् परार्थं, मीयतेऽनेनेति मानम्, आख्यातं कथितम्।
[न्या०अ०१०।२] ननु च यदि निश्चयोत्पादनं परार्थ-मानं, तथा ज्ञानम् अपि पर-प्रत्यायनाय व्याप्रियमानं परार्थं प्राप्नोतीत्य् आह॒ वाक्यं परार्थं, न ज्ञानं, तस्यैवानन्तर्येण व्यापारात्, पर-प्रयोजन-मात्रत्वाच् च, इतरस्य तु व्यवहितत्वात्, स्व-परोपकारित्वाच् च। कथं वचनम् अज्ञान-रूपं प्रमाणम् इत्य् आह॒ तद्-उपचारतस्, तस्य ज्ञानस्योपचारोऽतद्-रूपस्यापि तद्-अङ्गतया तद्-रूपत्वेन ग्रहणम्, ततः। इदम् उक्तं भवति॒ प्रतिपाद्य-गतम् उत्पत्स्यमानं यज् ज्ञानं तद् अव्यवहित-कारणत्वाद् वचनम् अप्य् उपचारेण प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तत्रानुमानस्य पारार्थ्यं परैर् अभ्युपगतम् एव, प्रत्यक्षस्य न प्रतिपद्यन्ते, किलेदं शब्द-प्रवेश-शून्य-स्वलक्षण-ग्राहीति नैतद्-गोचरः परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यते। न च शब्दात् परस्य स्वलक्षण-ग्रहण-दक्षं प्रत्यक्षम् उन्मङ्क्ष्यति, शब्दस्य विकल्पोत्पादितत्वेन परस्यापि विकल्पोत्पादकत्वात्। तद् उक्तं॒
"विकल्प-योनयः शब्दा विकल्पाः शब्द-योनयः ।
कार्य-कारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्य् अपि" ॥
[न्या०अ०११।०] निर्विकल्पकं च प्रत्यक्षम्, अतो न शब्द-जन्यम् इत्य् अतोऽनुमानं दृष्टान्ती-कृत्य प्रत्यक्षस्यापि परार्थतां साधयितुम् आह॒
प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् ।
परस्य तद्-उपायत्वात् परार्थत्वं द्वयोर् अपि ॥ न्यायावतार ११ ॥
[न्या०अ०११।१] प्रत्यक्षेणाप्य् अनुमानेनेव प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् स्व-प्रतीत-प्रमेय-प्रत्यायकत्वात् परार्थत्वं प्रतिपाद्य-प्रयोजनत्वं द्वयोर् अपि प्रत्यक्षानुमानयोस्, तुल्य-कारणत्वान्, नानुमानस्यैवैकस्येत्य् अभिप्रायः। इह चाश्रूयमाणत्वात् तद्-अर्थ-गमनाच् चापीव-शब्दौ लुप्त-निर्दिष्टौ द्रष्टव्यौ। प्रत्यक्ष-प्रतीतार्थ-प्रत्यायनं च प्रतिजानानस्यायम् अभिप्रायो॒ यत् परो मन्यते -- नैतद्-गोचरं परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यत इति -- तद् अयुक्तं, निर्विकल्पकाध्यक्षापोहेन व्यवसाय-रूपस्य प्रत्यक्षस्य प्राग् एव साधितत्वात्, तद्-गोचरस्य कथञ्चिद् विकल्प-गम्यत्वेन शब्द-प्रतिपाद्यत्वात्। तद् यथानुमान-प्रतीतोऽर्थः परस्मै प्रतिपाद्यमानो वचन-रूपापन्नः परार्थम् अनुमानं, तथा प्रत्यक्ष-प्रतीतोऽपि परार्थं प्रत्यक्षं, पर-प्रत्यायनस्य तुल्यत्वाद्, वचन-व्यापारस्यैव भेदात्। तथा ह्य्॒ अनुमान-प्रतीतं प्रत्याययन्न् एवं वचनयत्य् -- अग्निर् अत्र धूमाद्, यत्र यत्र धूमस् तत्र तत्राग्निर्, यथा महानसादौ॑ वैधर्म्येण वाग्न्य्-अभावे न क्वचिद् धूमो, यथा जलाशयादौ, तथा च धूमोऽयं, तस्माद् धूमाद् अग्निर् अत्रेति, अव्युत्पन्न-विस्मृत-सम्बन्धयोस् तथैव प्रतिपादयितुं शक्यत्वात्। स्मर्यमाणे सम्बन्धे पुनर् एवम्॒ अग्निर् अत्र धूमोपपत्तेर्॑ वैधर्म्येण॒ अग्निर् अत्र, अन्यथा धूमानुपपत्तेः। प्रत्यक्ष-प्रतीतं पुनर् दर्शयन्न् एतावद् वक्ति॒ ‘पश्य राज गच्छतिऽ। ततश् च वचनाद् द्विविधाद् अपि समग्र-सामग्रीकस्य प्रतिपाद्यस्यानुमेय-प्रत्यक्षार्थ-विषया यतः प्रतीतिर् उल्लसत्य्, अतो द्वयोर् अपि परार्थतेत्य् आह॒ परस्य तद्-उपायत्वात् प्रतिपाद्यस्य प्रतीतिं प्रति प्रतिपादक-स्थ-प्रत्यक्षानुमान-निर्णीतार्थ-प्रकाशन-कारणत्वाद् इत्य् अर्थः। एतेन पूर्व-कारिकोक्तोपचार-कारणं च लक्षयति।
[न्या०अ०११।२] यच् चोक्तं॒ ‘न शब्दात् परस्य प्रत्यक्षोत्पत्तिस्, तस्य विकल्प-जनकत्वात्, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षण-विषयत्वेन निर्विकल्पकत्वात्ऽ॑ -- तद् अयुक्तं, सामान्य-विशेषात्मकार्थ-विषयस्य निर्णय-रूपस्य तस्य कथञ्चिद् एक-विषयतया शब्दोत्पाद्यत्वाविरोधाद्, एवं-विधस्य च प्राग् एव समर्थनात्। चक्षुर्-आदि-सामग्रीतस् तद् उत्पद्यते, न शब्दाद् इति चेद्, अनुमानम् अपि प्रत्यक्षादि-निश्चिताद् धेतोर् अविस्मृत-सम्बन्धस्य प्रमातुर् उल्लसति, न शब्दाद्, अतस् तस्यापि परार्थता विशीर्येत। समर्थ-हेतु-कथनात् तत्र वचनस्य परार्थतेति चेद्, अत्रापि दर्शन-योग्यार्थ-प्रतिपादनाद् इति ब्रूमः। तन् न प्रत्यक्ष-परोक्षयोः पारार्थ्यं प्रति विशेषोपलब्धिर् इति मुच्यतां पक्ष-पातः।
[न्या०अ०१२।०] तद् एवं द्वयोर् अपि परार्थतां प्रतिपाद्य तत्-स्वरूपम् आह॒
प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि च यद् वचः ।
प्रत्यक्षं प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् तद् उच्यते ॥ न्यायावतार १२ ॥
[न्या०अ०१२।१] यद् वचः प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि साक्षात्-कारि-ज्ञान-गोचर-कथन-चतुरं तत् प्रत्यक्षम् उच्यत इति सम्बन्धः। तच् च प्रत्यक्ष-रूपम् एवोच्यमानं प्रत्यक्षं, विप्रतिपन्नं प्रति पुनर् अनुमान-द्वारेणोच्यमानम् अनुमानम् एवेति च-शब्देनानेकार्थत्वाद् दर्शयति। वचनं कुतः प्रत्यक्षम् इत्य् आह॒ प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् प्रतिपाद्य-प्रत्यक्ष-प्रकाश-हेतुत्वाद् उपचारेणोच्यत इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०१३।०] अनुमानम् आह॒
साध्याविनाभुवो हेतोर् वचो यत् प्रतिपादकम् ।
परार्थम् अनुमानं तत् पक्षादि-वचनात्मकम् ॥ न्यायावतार १३ ॥
[न्या०अ०१३।१] हिनोति गमयत्य् अर्थम् इति हेतुस्, तस्य साध्याविनाभुवः प्राङ् निरूपितस्य यद् वचः प्रतिपादकं सन्दर्शकं तद् अनुमान-प्रकाश-हेतुत्वात् परार्थम् अनुमानम्। तत् की-दृशं? इत्य् आह॒ पक्षो वक्ष्यमाण-लक्षणः स आदिर् येषां हेतु-दृष्टान्तोपनय-निगमनादीनां तानि तथा, तेषां वचनानि प्रतिपादका ध्वनयः॑ तान्य् एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् पक्षादि-वचनात्मकम्।
[न्या०अ०१३।२] ननु च हेतु-प्रतिपादकं वचः परार्थम् अनुमानम् इत्य् अभिधाय तत् पक्षादि-वचनात्मकम् इति वदतः पूर्वापर-व्याहता वाचो युक्तिः। नैतद् अस्त्य्॑ एवं मन्यते नैकः प्रकारः परार्थानुमानस्य, किं तर्हि यथा परस्य सुखेन प्रमेय-प्रतीतिर् भवति तथा यत्नतः प्रत्यायनीयः। तत्र दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः। तद् यथा -- पक्षादयः पञ्च, तच्-छुद्धयश् च। तत्र यदा प्रतिपाद्यः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षोऽविस्मृत-दृष्टान्त-स्मार्य-प्रतिबन्ध-ग्राहक-प्रमाणो व्युत्पन्न-मतित्वाच् छेषावयवाभ्यूहन-समर्थश् च भवति, यद् वात्यन्ताभ्यासेन परिकर्मित-मतित्वात् तावतैव प्रस्तुत-प्रमेयम् अवबुध्यते, तदा हेतु-प्रतिपादनम् एव क्रियते, शेषाभिधानस्य श्रोतृ-संस्काराकारितया नैरर्थक्याद् इत्य्-आदौ हेतु-प्रतिपादनं सूत्र-कृता परार्थम् अनुमानम् उक्तम्। यदा तु प्रतिपाद्यस्य नाद्यापि पक्ष-निर्णयस्, तदाकाण्ड एव हेत्ûपन्यासोऽदृष्ट-मुद्गर-पातायमानः स्याद् इति पक्षोऽपि निर्दिश्यते। तथास्मर्यमाणे प्रतिबन्ध-ग्राहिणि प्रमाणे दृष्टान्तोऽपि वर्ण्येतान्यथा हेतोः सामर्थ्यानवगतेः। स्मृतेऽपि प्रमाणे दार्ष्टान्तिके योजयितुम् अजानानस्योपनयो दर्श्यते। तथापि साकाङ्क्षस्य निगमनम् उच्यते,ऽन्यथा निराकुल-प्रस्तुतार्थासिद्धेः। तथा यत्र पक्षादौ स्वरूप-विप्रतिपत्तिस् तत्र तच्-छुद्धिः प्रमाणेन कर्तव्येतरथा तेषां स्व-साध्यासाधनात्। सर्वेषां चामीषां साधनावयवत्वं, प्रतिपाद्य-प्रतीत्य्-उपायत्वात्।
[न्या०अ०१३।३] ननु च स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तं, न च स्वार्थानुमान-काले क्रमोऽयम् अनुभूयते, सम्बन्ध-वेदिनो हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीति-सिद्धेर्, न हि प्रतिपत्ता पक्षं कृत्वा ततो हेतुं निभालयति, नापि दृष्टान्तादिकं विरचयति, तथा प्रतीतेर् अभावात्। किं चान्वय-व्यतिरेकाभ्यां हेतोर् एव सामर्थ्यम् उन्नीयते, न पक्षादीनां, तद्-व्यतिरेकेणापि साध्य-सिद्धेः, तथापि तेषां साधनांशत्व-कल्पनेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। यदि च तत्-सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्षोपन्यास-मात्राद् एव साध्यावगतेर् हेतुर् आनर्थक्यम् अश्नुवीत, उत्तरावयवाश् च, एवं हि तत्-सामर्थ्यं सिद्ध्येन् नान्यथा। तस्माद् य एव पर-निरपेक्षं साध्यं बोधयति स एव हेतुः साधनं, न पक्षादय इति।
[न्या०अ०१३।४] अत्रोच्यते -- ‘स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तम्ऽ॑ इत्य्-आदि यद् उक्तं तद् युक्तम् उक्तं, केवलं तद्-अर्थं न जानीषे, निश्चयापेक्षयैव ‘वत्ऽ-इना तुल्यताभिधानान्॑ न पुनः सर्व-सामान्यम् अभिप्रेतम्, अन्यथा ध्वनिम् अनुच्चारयन् स्वार्थानुमाने साध्यम् अवबुध्यत इति, तद्-अनुच्चारणेन पर-निश्चयोत्पादनं प्रसज्येत। न चैतद् अस्ति, शब्दानुच्चारणे पर-प्रतिपादनासम्भवात्, तद्-अर्थं शब्दाङ्गी-करणे येन येन विना पर-प्रतिपादनासम्भवस् तत् तद् उररी-कर्तव्यं, समान-न्यायात्। न च पक्षादि-विरहे प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं शक्यो, हेतु-गोचरादि-तत्-साध्यार्थ-प्रतीति-विकलतया तस्य साकाङ्क्षत्वात्। तथा च बुभुत्सितार्थ-बोधाभावाद् अप्रत्यायित एव तिष्ठेद्॑ अतस् तद्-बोधनार्थं पक्षादयो दर्शनीया इति तेऽपि साधनांशाः स्युः। यच् चोक्तम्॒ अन्वय-व्यतिरेकानुकरणाभावान् न साधनं, हेतु-मात्राद् अपि साध्य-सिद्धेस्, तद् अयुक्तम्, अविप्रतारकता-निश्चित-पुरुष-वचन-मात्राद् अप्य् अग्निर् अत्रेत्य्-आदि-रूपात् क्वचित् प्रमेयोऽर्थः सिध्यतीति हेतोर् अप्य् असाधनता-प्रसङ्गात्। तद्-विरहेणापि साध्य-सिद्धेः। युक्तं चैतद्, अविप्रतारक-वचनस्य प्राग् एव प्रामाण्य-प्रसाधनात्। यच् चोक्तम्॒ यद्य् अमीषां सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्ष-मात्राद् एव साध्य-प्रतीतेर् हेतोर् वैयर्थ्यं स्याद् इति, तद् अयुक्ततरं, भवत्-पक्षेऽपि समानत्वात्, तत्रापि समर्थ-हेत्ûपन्यासाद् एव साध्यावगतेर्, अन्यथा समर्थतायोगात्। पश्चात् तस्यैव प्रमाणेन समर्थनं सर्वत्र गृहीत-व्याप्तिकस्य च पुनः पक्ष-धर्मिण्य् उपसंहरणम् अनर्थकतां प्राप्नुवत् केन निवार्येत? तद्-अभावे हेतोः सामर्थ्यं नावगम्यते, तेन सार्थकम् इति चेत्, पक्षादीन् अपि विरहय्य प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं न पार्यत इति तेषाम् अपि सार्थकता न दुरुपपादेति मुच्यताम् आग्रहः। तस्माद् धेतुवत् पक्षादयोऽपि साधनं, हेतोर् अपि क्वचित् प्रतिपाद्ये तद्-अपेक्षतया निरपेक्षतासिद्धेर् इति। तद् इदं सकलम् आकलय्योक्तं तत् पक्षादि-वचनात्मकं इति।
[न्या०अ०१४।०] तद् एवम् अर्थतः पक्षादीन् प्रस्तुत्य तावत् पक्ष-लक्षणम् आह॒
साध्याभ्युपगमः पक्षः प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृतः ।
तत्-प्रयोगोऽत्र कर्तव्यो हेतोर् गोचर-दीपकः ॥ न्यायावतार १४ ॥
[न्या०अ०१४।१] पच्यत इति पक्षो, व्यक्ती-क्रियत इति-भावः। किं-भूत इत्य् आह॒ साध्यस्यानुमेयस्याभ्युपगमोऽङ्गी-करणं, प्राश्निकादीनां पुरतः प्रतिज्ञा-स्वी-कार इत्य् अर्थः। किम् अभ्युपगम-मात्रम्? नेत्य् आह॒ प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृत इति। प्रत्यक्षं साक्षात्-कारि संवेदनम्, आदि-शब्दाद् अनुमान-स्व-वचन-लोका गृह्यन्ते, तैर् अनिराकृतोऽबाधितः पक्ष इति सम्बन्धः। तद् यथा -- ‘सर्वम् अनेकान्तात्मकम्ऽ, ‘अस्ति सर्व-ज्ञऽ॑ इत्य्-आदि वा। अयं च केवलम् एष्टव्यो, न पुनः परार्थानुमान-काले वचनेनाभिधातव्य इति यो मन्येत तं प्रत्याह॒ तस्य पक्षस्य प्रयोगोऽभिधानम् अत्र परार्थानुमान-प्रस्तावे कर्तव्यो विधेयः। कुत इत्य् आह॒ हेतोः प्राङ्-निरूपितस्य गोचर-दीपक इति, ‘निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां प्रायो दर्शनम्ऽ॑ इति-वचनाद्, भाव-प्रधानत्वाच् च निर्देशस्य, विषय-सन्दर्शकत्वाद् इत्य् अर्थः। अयम् अत्राभिप्रायो॒ न हि सर्वत्र प्रतिवादिनः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षस्य कूर्च-शोभा-पुरः-सरं हेतुर् उपन्यस्यते,ऽपि तु क्वचित् कथञ्चित्।
[न्या०अ०१५।०] ततो यदाद्यापि प्रतिपाद्यः पक्षार्थं न जानीते, तदाकाण्ड एव हेताव् उच्यमाने विषय-व्यामोहाद् भ्रान्ति-लक्षणो दोषः स्याद् इत्य् आह॒
अन्यथा वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचर-मोहिनः ।
प्रत्याय्यस्य भवेद् धेतुर् विरुद्धारेकितो यथा ॥ न्यायावतार १५ ॥
[न्या०अ०१५।१] अन्यथेत्य् उक्त-विपरीताश्रयणे पक्ष-प्रयोगाकरण इत्य् अर्थः। वादिनो हेत्ûपन्यास-कर्तुर् अभिप्रेतोऽभिमतः स चासौ हेतु-गोचरश् च वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचरस्॑ तत्र मुह्यति दोलायते तच् छीलश् च यस्, तस्य प्रत्याय्यस्य प्रतिवादिनो हेतुर् विरुद्धारेकितो भवेद् विरोध-शङ्का-कलङ्कितः स्याद् इत्य् अर्थः। ततश् च सम्यग्-घेताव् अपि ‘विपक्ष एवायं वर्ततऽ॑ इति व्यामोहाद् विरुद्ध-दूषणम् अभिदधीत, पक्षोपन्यासात् तु निर्णीत-हेतु-गोचरस्य नैष दोषः स्याद् इत्य् अभिप्रायः। अमुम् एवार्थं स्पष्ट-दृष्टान्तेनाह यथेति। तद्-उपन्यासार्थः।
धानुष्क-गुण-सम्प्रेक्षि-जनस्य परिविध्यतः ।
धानुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन गुणेतरौ ॥ न्यायावतार १६ ॥
[न्या०अ०१६।१] यथा लक्ष्य-निर्देशं विना धानुष्कस्येषुं प्रक्षिपतो यौ गुण-दोषौ तौ तद्-दर्शि-जनस्य विपर्यस्ताव् अपि प्रतिभातः -- गुणोऽपि दोषतया, दोषोऽपि वा गुणतया -- तथा पक्ष-निर्देशं विना हेतुम् उपन्यस्यतो वादिनो यौ स्वाभिप्रेत-साध्य-साधन-समर्थत्वासमर्थत्व-लक्षणौ गुण-दोषौ तौ प्राश्निक-प्रतिवाद्यादीनां विपरीताव् अपि प्रतिभात इति भावार्थः। अक्षरार्थस् तु धनुषा चरति धानुष्कस् तस्य गुणो लक्ष्य-वेध-प्रावीण्य-लक्षणस् तत्र प्रेक्षकाणां कुतूहलम् इति तस्यैवोपादानम्, अन्यथा दोषोऽपि द्रष्टव्यः। तत्-सम्प्रेक्षि-जनस्य तत्-सम्प्रेक्षण-शील-लोकस्य परिविध्यतो यथा -- कथञ्चिद् बाणं मुञ्चत इत्य् अर्थः॑ धनुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन चाप-धरस्य वेध्य-निष्टङ्कनम् ऋते यौ गुणेतरौ गुण-दोषौ तौ यथा विरुद्धारेकितौ भवतस्, तथा वादिनोऽपीत्य् अर्थः। तस्माद् अविज्ञात-तद्-अर्थे प्रतिवादिनि वादि-धानुष्केण पक्ष-लक्ष्यं निर्दिश्यैव हेतु-शरः प्रोक्तव्य इति स्थितम्।
[न्या०अ०१७।०] साम्प्रतं हेतोर् लक्षणावसरस्, तच् च स्वार्थानुमानवन् निर्विशेषं द्रष्टव्यं॑ प्रयोगस् तु तत्र न दर्शितः, स्वार्थानुमानस्य बोध-रूपत्वाद्॑ इह तु दर्शनीयः, परार्थानुमानस्य वचन-रूपत्वाद्॑ अतस् तं दर्शयति॒
हेतोस् तथोपपत्त्या वा स्यात् प्रयोगोऽन्यथापि वा ।
द्वि-विधोऽन्यतरेणापि साध्य-सिद्धिर् भवेद् इति ॥ न्यायावतार १७ ॥
[न्या०अ०१७।१] स्वार्थानुमान-प्रस्तावे हि पर-प्रणीत-लक्षणान्तर-व्यपोहेन साध्य-व्यतिरेकात् सामस्त्येन हेतोर् व्यावृत्तिर् एवैकं लक्षणम् इति निर्णीतम्। परार्थानुमानेऽपि तद् एव प्रकाशनीयं, वचन-रचना तु क्वचित् कथञ्चित् प्रवर्तत इत्य् अभिप्रायवांस् तद्-द्वैविध्यम् आह॒ हेतोर् द्विविधः प्रयोगः स्याद् इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ तथैव साध्य-सद्भाव एवोपपत्तिर् विद्यमानता, तया तथोपपत्त्या, यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर् इति। अन्यथापि वेत्य् अनेनावयवे समुदायोपचाराद् अन्यथानुपपत्तिं लक्षयति। अन्यथा साध्य-व्यतिरेकेऽनुपपत्तिर् अविद्यमानतैव तया वान्यथानुपपत्त्या हेतोः प्रयोगः स्याद्, यथाग्निर् अत्र, धूमस्यान्यथानुपपत्तेर् इति। ‘एते च द्वे अप्य् एकस्मिन् साध्ये प्रयोक्तव्येऽ॑ इति यो मन्येत,तच्-छिष्यणार्थं आहान्यतरेणापि तथोपपत्ति-प्रयोगेणान्यथानुपपत्ति-प्रयोगेण वा साध्यस्य प्रतिपिपादयिषितार्थस्य सिद्धिर् निष्पत्तिः प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोहणं भवेद्, इति यस्मात्, तस्मान् न द्वे अपि प्रयोक्तव्ये, प्रयोग-द्वयेऽपि यस्माद् वचन-रचना भिद्यते, नार्थः॑ प्रयोगस्य च साध्य-साधनं फलं॑ तच् चेद् एकेनैव सिध्यति, द्वितीय-प्रयोगः केवलं वक्तुर् अकौशलमाचक्षीत, नैरर्थक्याद् इत्य् अभिप्रायः।
[न्या०अ०१८।०] अधुना दृष्टान्त-लक्षणावसरः। स च द्वेधा॒ साधर्म्येण वैधर्म्येण च। तत्र साधर्म्य-दृष्टान्तम् अधिकृत्याह॒
साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर् यत्र निश्चीयते-तराम् ।
साधर्म्येण स दृष्टान्तः सम्बन्ध-स्मरणान् मतः ॥ न्यायावतार १८ ॥
[न्या०अ०१८।१] दृष्टयोर् अवलोकितयोः सामर्थ्यात् साध्य-साधनयोर् अन्तः परिनिष्ठितिः अन्वयाद् व्यतिरेकाद् वा साध्य-साधन-भाव-व्यवस्थिति-निबन्धनास्मिन्न् इति दृष्टान्तः॑ समानो धर्मोऽस्येति सधर्मा तद्-भावः साधर्म्यं तेन साधर्म्येण। स किं-विधो भवतीत्य् आह॒ साध्यं जिज्ञासितार्थात्मकं, साधनं तद्-गमको हेतुः, तयोः साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर्, इदम् अनेन विना न भवतीत्य्-एवं-रूपा, यत्र क्वचिन् निश्चीयते-तरां अतिशयेन निर्णीयते स साधर्म्य-दृष्टान्तः। यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर्, महानसादिवद् इति। अयं चाविस्मृत-प्रतिबन्धे प्रतिवादिनि न प्रयोक्तव्य इत्य् आह॒ सम्बन्ध-स्मरणाद् इति, ल्यब्-लोपे पञ्चमी, प्राग्-गृहीत-विस्मृत-सम्बन्ध-स्मरणम् अधिकृत्य मतोऽभिप्रेतोऽयं नीतिविदाम्, नान्यदा। यदा हि प्रतिपाद्योऽद्यापि सम्बन्धं साध्याविनाभावित्व-लक्षणं नावबुध्यते, तदा प्रमाणेन सम्बन्धं ग्राहणीयो, न दृष्टान्त-मात्रेण, न हि सह-दर्शनाद् एव क्वचित् सर्वत्रेदम् अमुना विना न भवतीति सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। गृहीते च प्रतिबन्धे स्मर्यमाणे केवलं हेतुर् दर्शनीयः, तावतैव बुभुत्सितार्थ-सिद्धेर् दृष्टान्तो न वाच्यो, वैयर्थ्यात्। यदा तु गृहीतोऽपि विस्मृतः कथञ्चित् सम्बन्धस्, तदा तत्-स्मरणार्थं दृष्टान्तः कथ्यते।
[न्या०अ०१८।२] ननु च कथं त्रि-काल-समस्त-देश-व्यापि-सम्बन्धावगतिः? न तावन् निर्णयात्मकम् अपि प्रत्यक्षं देश-कालान्तर-संचरिष्णुनोः साध्य-साधनयोः सम्बन्धं निरीक्षितुं क्षमते, सन्निहितेऽर्थे विशदाध्यवसायेन प्रवृत्तेः। नापि शब्दात् तन्-निर्णयस्, तस्य परोपदेश-रूपतया स्वार्थानुमानाभाव-प्रसङ्गात्, तत्र परोपदेशाभावात्, तद्-अभावे सम्बन्धासिद्देस्, तद्-असिद्धाव् अनुमानानुत्थानाद् इति। अनुमानात् सम्बन्ध-ग्रहणे निरवधिर् अनवस्थानुषज्येत, सम्बन्ध-ग्राहिणोऽप्य् अनुमानस्य पुनः सम्बन्धान्तर-ग्रहण-सव्यपेक्षत्वाद् इति। अत्रोच्यते -- प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति येषां मिथ्याभिनिवेशस्, तेषां एष दोषो नास्माकम्, अन्वय-व्यतिरेक-ग्राहि-प्रत्यक्षानुपलम्भोत्तर-काल-भाविनोऽव्यभिचरित-त्रि-काल-व्यापि-गोचरस्य मति-निबन्धनस्योह-संज्ञितस्य प्रमाणान्तरस्य सम्बन्ध-ग्राहितयेष्टत्वात्, तद्-अनिष्टौ दृष्ट-व्यवहार-विलोप-प्रसङ्गात्, तद्-विलोपे च विचारानर्थक्य-प्राप्तेर् इति। अत्र प्रकरणे पुनर् अनुमानात् पार्थक्येनोहो न दर्शितः, सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-प्रवृत्तत्वाद् अस्य, शाब्दं तु पृथक् समर्थितं, तस्यात्रैव परार्थानुमानोपयोगित्वाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०१९।०] इदानीं वैधर्म्य-दृष्टान्तम् उपदर्शयन्न् आह॒
साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य् असम्भवः ।
ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधर्म्येणेति स स्मृतः ॥ न्यायावतार १९ ॥
[न्या०अ०१९।१] विसदृशो धर्मोऽस्येति विधर्मा, तद्-भावो वैधर्म्यं, तेन वैधर्म्येण दृष्टान्तः। की-दृश इत्य् आह॒ साध्ये गम्ये निवर्तमानेऽसम्भवति तु-शब्दोऽवधारणार्थो भिन्न-क्रमः, स च साधनस्यापि गमकस्याप्य् असम्भव एवेत्य् अत्र द्रष्टव्यः, ख्याप्यते प्रतिपाद्यते यत्र क्वचिद् दृष्टान्ते स वैधर्म्येण भवतीति-शब्देन सम्बन्ध-स्मरणाद् इति।
[न्या०अ०२०।०] इदम् अत्रापि सम्बध्नाति॒ अस्यापि स्मर्यमाणे सम्बन्धे प्रयोगायोगाद् इति किम् अर्थं विस्मृत-सम्बन्ध एव प्रतिवादिनि दृष्टान्तः प्रयुज्यते, नान्यदेति पर-वचनावकाशम् आशङ्क्याह॒
अन्तर्-व्याप्त्यैव साध्यस्य सिद्धेर् बहिर्-उदाहृतिः ।
व्यर्था स्यात् तद्-असद्भावेऽप्य् एवं न्याय-विदो विदुः ॥ न्यायावतार २० ॥
[न्या०अ०२०।१] अन्यदाहि स्मर्यमाणे वा सम्बन्धे प्रयुज्येतागृहीते वा। यद्य् आद्यः पक्षः, सोऽयुक्तः। यदा सर्वत्र साध्याविनाभाविनं हेतुं स्मरति प्रतिपाद्यस्, तदा पक्षेऽपि तम् अवबुध्य कथं साध्यं न प्रतिपद्येत? ततश् चान्तः पक्ष-मध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वम् अन्तर्-व्याप्तिस्, तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेर् बहिर् विवक्षित-धर्मिणोऽन्यत्र दृष्टान्त-धर्मिण्य् उदाहृतिर् व्याप्ति-दर्शन-रूपा व्यर्था निष्प्रयोजना, तत्-प्रत्याय्यार्थाभावाद् इति। द्वितीय-पक्षस्यापि निर्दोषतां निरस्यन्न् आह॒ तद्-असद्भावेऽप्य् एवं सम्बन्धाग्रहणाद् अन्तर्-व्याप्त्य्-अभावेऽप्य् एवम् इति व्यर्थैव बहिर्-उदाहृतिः। न हि सह-दर्शनात् क्वचित् सर्वत्र तद्-रूपता सिध्यति, व्यभिचार-दर्शनात्। तस्माद् अगृहीत-सम्बन्धे प्रतिपाद्ये प्रमाणेन प्रतिबन्धः साध्यः। तत्-सिद्धौ तत एव साध्य-सिद्धेर् अकिञ्चित्-करी दृष्टान्तोदाहृतिर् इति न्याय-विदो न्याय-विद्वांसो विदुर् अवबुध्यन्त इति। इह च प्रकरणे शेषावयवानाम् उपनय-निगमन-शुद्धि-पञ्चक-लक्षणानां सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-परत्वाद् अस्य, यद्य् अपि साक्षाल् लक्षणं नोक्तं, तथाप्य् अत एव प्रतिपादितावयव-त्रयाद् बुद्धिमद्भिर् उन्नेयं॑ यतोऽवयवापेक्षया जघन्य-मध्यमोत्कृष्टास् तिस्रः कथा भवन्ति। तत्र हेतु-प्रतिपादन-मात्रं जघन्या। द्व्य्-आद्य्-अवयव-निवेदनं मध्यमा। सम्पूर्ण-दशावयव-कथनम् उत्कृष्टा। तत्रेह मध्यमायाः साक्षात् कथनेन जघन्योत्कृष्टे अर्थतः सूचयति, तद्-सद्भावस्य प्रमाण-सिद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२१।०] एवं पक्षादि-लक्षणं प्रतिपाद्येदानीं हेय-ज्ञाने सत्य् उपादेयं विविक्ततरं वेद्यत इति तद्-व्युदस्ताः पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताभासा वक्तव्याः। तत्र तावत् पक्ष-लक्षण-व्युदस्तान् पक्षाभासान् आह॒
प्रतिपाद्यस्य यः सिद्धः पक्षाभासोऽक्ष-लिङ्गतः ।
लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितोऽनेकधा मतः ॥ न्यायावतार २१ ॥
[न्या०अ०२१।१] पक्ष-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणत्वाच् च पक्षवद् आभासत इति पक्षाभासः। असाव् अनेकधानेक-प्रकारो मत इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ प्रतिपाद्यस्य प्रतिवादिनो यः कश्चित् सिद्धः प्रतीताव् आरूढ एव स पक्षाभासः, साध्यस्यैव पक्षत्वात्, सिद्धस्य साधनानर्हत्वाद्, अतिप्रसक्तेः। तथाक्ष-लिङ्गतोऽध्यक्ष-हेतुभ्यां लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितस् तिरस्-कृतो यः स पक्षाभासः। तत्र प्रतिपाद्य-सिद्धो यथा॒ पौद्गलिको घटः, सौगतं वा प्रति॒ सर्वं क्षणिकम् इत्य्-आदि। प्रत्यक्ष-बाधितो यथा॒ निरंशानि स्वलक्षणानि, परस्पर-विविक्तौ वा सामान्य-विशेषाव् इति। अनुमान-बाधितो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञ इति। लोक-बाधितो यथा॒ गम्या माता इति। स्व-वचन-बाधितो यथा॒ न सन्ति सर्वे भावा इति।
[न्या०अ०२२।०] साम्प्रतं हेतु-लक्षणं स्मारयंस् तद्-अपास्तान् हेत्व्-आभासान् आह॒
अन्यथानुपपन्नत्वं हेतोर् लक्षणम् ईरितम् ।
तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस् तद्-आभता ॥ न्यायावतार २२ ॥
[न्या०अ०२२।१] हेतोर् लक्षणम् असाधारण-धर्म-रूपं यद् ईरितं गमितम् अनेकार्थत्वाद् वा प्रतिपादितं स्वार्थानुमान-प्रस्तावे यद् उतान्यथानुपपन्नत्वम् इति तस्याप्रतीतिर् अनध्यवसायः, सन्देहो दोलायमानता, विपर्यासो वैपरीत्य-निर्णयो॑ऽप्रतीतिश् च सन्देहश् च विपर्यासश् चेति द्वन्द्वः॑ पश्चात् तदा सह तत्-पुरुषस्॒ तैस् तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस्॑ तद्-आभताआभानम् आभा तस्येव सम्यग्-घेतोर् इवाभास्येति तद्-आभस्, तद्-भावस् तत्ता, हेत्व्-आभासता भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०२३।०] अधुना येन लक्षणेन यन्-नामा हेत्व्-आभासो भवति तद् दर्शयति॒
असिद्धस् त्व् अप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते ।
विरुद्धो योऽन्यथाप्य् अत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु ॥ न्यायावतार २३ ॥
[न्या०अ०२३।१] यः कश्चिद् अप्रतीतः प्रतीत्या अगोचरी-कृतोऽनिश्चितः सोऽसिद्ध-नामा हेत्व्-आभासः। तु-शब्दस् त्रयस्यापि भेदोद्द्योतकः। यस् त्व् अन्यथैव साध्यं विनैव विपक्ष एवेति यावद्, उपपद्यते सम्भवति स विरुद्धाभिधानः। यः पुनर् अन्यथापि साध्य-विपर्ययेणापि युक्तो घटमानको,ऽपि-शब्दात् साध्येनापि, सोऽत्र व्यतिकरेऽनैकान्तिक-संज्ञो ज्ञातव्य इति। तत्र प्रतिप्राणि-प्रसिद्ध-प्रमाण-प्रतिष्ठितानेकान्त-विरुद्ध-बुद्धिभिः कणभक्षाक्षपाद-बुद्धादि-शिष्यकैर् उपन्यस्यमानाः सर्व एव हेतवः, तद् यथैकान्तेनानित्यः शब्दो नित्यो वा, सत्त्वाद्, उत्पत्तिमत्त्वात्, कृतकत्वात्, प्रत्यभिज्ञायमानत्वाद् इत्य्-आदयो विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकतां स्वी-कुर्वन्तीत्य् अवगन्तव्यम्।
[न्या०अ०२३।२] तथा ह्य्॒ अनित्यैकान्ते तावद् असिद्धाः सर्व एव हेतवश्, चाक्षुषत्ववत् तेषां ध्वनाव् अविद्यमानत्वाद्, असद्-आदि-व्यवच्छेदेनालीक-संवृति-विकल्पितत्वात्, पारमार्थिकत्वे त्व् एकस्यानेक-रूपापत्त्यानेकान्त-वादापत्तेः, कल्पना-रचित-सत्ताकानां च सर्व-शक्ति-विरह-रूपतया निःस्वभावत्वात्, तथापि तेषां साधनत्वे साध्यम् अपि निःस्वभावम् इति खर-विषाणं शश-विषाणस्य साधनम् आपद्यत इति शोभनः साध्य-सधन-व्यवहारः। सर्व एवायम् अनुमानानुमेय-व्यवहारो बुद्ध्य्-आरूढेन धर्म-धर्मि-न्यायेन न बहिः-सद्-असत्त्वम् अपेक्षते, तेनायम् अदोष इति चेद्, एवं तर्हि चाक्षुषत्वम् अपि शब्दे बुद्ध्याध्यारोप्य हेतुतयोच्यमानं नासिद्धतयोद्भावनीयं, विशेषाभावात्। अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदेन चाक्षुषत्वं बुद्ध्याध्यारोपयितुंपार्यते, न यथा कथञ्चिन्, न चासौ शब्देऽस्त्य्, अचक्षुर्-ग्राह्यत्वात् तस्य, तेनायम् अदोष इति चेत्, कोऽयम् अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदो नाम॒ व्यवच्छेद-मात्रं नीरूपं, व्यवच्छिन्नं वा स्वलक्षणं, व्यवच्छेदिका वा बुद्धिः स्वांश-मग्नापि बहिर्-वस्तु-ग्रहण-रूपतया प्लवमाना? नापरो वस्तु-धर्मो यत्र भेदाभेद-विकल्प-द्वारेणा दूषणं दित्सुर् भवान् इति चेत्, तर्हि स शब्दे नास्तीति कैषा भाषा? एवं हि नभः-पुण्डरीकं तत्र नास्तीति सत्त्वादिकम् अपि कल्पयितुं न शक्यम् इति प्रसज्येत। किं च, ते साधन-धर्मा धर्मिणि भवन्तोऽपि न भवद्-दर्शने प्रतीतिम् आरोहन्ति, प्रत्यक्षस्य विकल्प-विकलतया धर्म-निर्णय-शून्यत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविन्या वासना-प्रबोध-जन्याया विकल्प-बुद्धेः स्वांश-ग्रहण-पर्यवसित-शरीरत्वेन बहिः-स्वलक्षणे प्रवेशाभावात्, ततश् चाप्रतीतत्वात् सर्वस्यासिद्धत्वम्।
[न्या०अ०२३।३] नित्यैकान्तेऽपि धर्मिणोऽत्यन्त-व्यतिरिक्तानाम् अपारमार्थिकानां वा स्व-साधन-धर्माणां प्रमाणेनाप्रतीतत्वाद् असिद्धता द्रष्टव्या, धर्मिणोऽविनिर्लुठित-रूपाणां पारमार्थिकानां सकल-धर्माणां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धत्वेन निह्नोतुम् अशक्यत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।४] तथा विरुद्धतापि पक्ष-द्वयेऽपि सर्व-साधन-धर्माणाम् उन्नेयानेकान्त-प्रतिबद्ध-स्वभावत्वेन तत्-साधन-प्रवणत्वात्। एतच् चोत्तरत्र वक्ष्यामः।
[न्या०अ०२३।५] एवं पक्ष-द्वयेऽपि निर्दिश्यमानाः सर्व एव हेतवोऽनैकान्तिकताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति, परस्पर-विरुद्धाव्यभिचारित्वात्, समान-युक्त्य्-उपन्यासेन विपक्षेऽपि दर्शयितुं शक्यत्वात्।
[न्या०अ०२३।६] तथा हि॒ अनित्य-वादी नित्य-वादिनं प्रति प्रमाणयति। सर्वं क्षणिकं, सत्त्वाद्, अक्षणिके क्रम-यौगपद्याभ्याम् अर्थ-क्रिया-विरोधाद्, अर्थ-क्रिया-कारित्वस्य च भाव-लक्षणत्वात्, ततोऽर्थ-क्रिया व्यावर्तमाना स्व-क्रोडी-कृतां सत्तां व्यावर्तयेद् इति क्षणिकत्व-सिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियायां क्रमेण प्रवर्तितुम् उत्सहते, पूर्वार्थ-क्रिया-करण-स्वभावोपमर्द-द्वारेणोत्तर-क्रियायां प्रवृत्तेर्, अन्यथा पूर्वार्थ-क्रिया-करणाविराम-प्रसङ्गात्॑ तत्-स्वभाव-प्रच्यवे च नित्यतापयात्य्, अतादवस्थ्यस्यानित्य-लक्षणत्वात्। नित्योऽपि क्रम-वर्तिनं सह-कारि-कारणम् अर्थम् उदीक्षमाणस् तावद् असीत्, पश्चात् तम् आसाद्य क्रमेण कार्यं कुर्याद् इति चेन्, न, सह-कारि-कारणस्य नित्येऽकिञ्चित्-करत्वाद्, अकिञ्चित्-करस्यापि प्रतीक्षणेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियां कुरुते,ऽध्यक्ष-विरोधात्। न ह्य् एक-कालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिद् उपलभते॑ करोतु वा, तथाप्य् आद्य-क्षण एव सकल-क्रिया-परिसमाप्तेर् द्वितीयादि-क्षणेष्व् अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोर् एकस्मिन् विरुद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।७] नित्य-वादी पुनर् एवं प्रमाणयति॒ सर्वं नित्यं सत्त्वात्। क्षणिके सद्-असत्-कालयोर् अर्थ-क्रिया-विरोधात्, तल्-लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातीति, ततो निवर्तमानम् अनन्य-शरणतया नित्यत्वं साधयति। तथा हि॒ क्षणिकोऽर्थः सद् वा कार्यं कुर्यात्, असद् वा, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् आद्यः पक्षः, सम-समय-वर्तिनि व्यापारायोगात्, सकल-भावानां परस्परं कार्य-कारण-भाव-प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच् च। नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्य-करण-शक्ति-विकलत्वात्। अन्यथा शश-विषाणादयोऽपि कार्य-करणायोत्सहेरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२३।८] तद् एवम् एकान्त-द्वयेऽपि ये ये हेतवस् ते ते युक्तेः समानतया विरुद्धं न व्यभिचरन्त्य्॑ अविचारित-रमणीयतया मुग्ध-जन-ध्य्-आन्ध्यं चोत्पादयन्तीति विरुधाव्यभिचारिणोऽनैकान्तिकाः, सर्व-वस्तु-धर्माणां वस्तुतोऽनेकान्त-प्रतिबद्धत्वाद् इति। तस्माद् अमी सर्व एव हेतवः सन्तोऽनेकान्तम् अन्तरेण नोपपद्यन्त इति तम् एव प्रतिपादयितुम् ईशते॑ विमूढ-बुद्धिभिः पुनः विपक्ष-साधनार्थम् उपन्यस्यमाना विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकताम् आबिभ्रतीति स्थितम्।
[न्या०अ०२४।०] तद् एवं हेत्व्-आभासान् प्रतिपाद्य दृष्तान्त-लक्षण-व्युदस्तान् दृष्टान्ताभासान् आह॒
साधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
अपलक्षण-हेत्ûत्थाः साध्यादि-विकलादयः ॥ न्यायावतार २४ ॥
[न्या०अ०२४।१] साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शयितुम् अभिप्रेतं यस्मिंस् तत् साधर्म्यं, तेन। अत्र व्यतिकरे॑ दूष्यन्त इति दोषाः। दृष्टान्ता एव दोषा दृष्टान्त-दोषाः दृष्टान्ताभासा इत्य् अर्थः। न्याय-विद्-ईरिता विद्वद्भिर् गदिताः॑ साध्यं गम्यम्॑ आदि-शब्दात् साधनोभय-परिग्रहस्॑ तद्-विकलास् तच्-छून्याः। आदि-शब्दात् सन्दिग्ध-साध्य-साधनोभय-धर्मा गृह्यन्ते। किं-भूता एते इत्य् आह॒ अपगतं लक्षणं येभ्यस् ते तथा, ते च ते हेतवः, तेभ्य उत्था उत्थानं येषां तेऽपलक्षण-हेत्ûत्थाः॑ इदं च प्रायिकं विशेषणं, सम्यग्-घेताव् अपि वक्तृ-दोष-वशात् दृष्टान्ताभासतोपपत्तेर्, यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद्, घटवद् इत्य्-आदि।
[न्या०अ०२४।२] तत्र साध्य-विकलो यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वात्, प्रत्यक्षवत्॑ प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता-विकलत्वात्॑ तद्-भ्रान्तत्वे सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च प्रमाण-प्रमेयाभावान् न किञ्चित् केनचित् साध्यत इति भ्रान्त-वादिनो मूकतापनिपद्येत। साधन-विकलो यथा॒ जाग्रत्-संवेदनं भ्रान्तं, प्रमाणत्वात्, स्वप्न-संवेदनवत्॑ स्वप्न-संवेदनस्य प्रमाणता-वैकल्यात् तत्-प्रत्यनीक-जाग्रत्-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वाद् इति। उभय-विकलो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञः, प्रत्यक्षाद्य्-अनुपलब्धत्वात्, घटवद्॑ घटस्य सत्त्वात् प्रत्यक्षादिभिर् उपलब्धत्वाच् च। सन्दिग्ध-साध्य-धर्मो यथा॒ वीत-रागोऽयं, मरण-धर्मत्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे वीत-रागत्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, विशिष्ट-चेतो-धर्माणां विशिष्ट-व्याहारादि-लिङ्ग-गम्यत्वाद् रथ्या-पुरुषे तन्-निर्णयस्याप्य् अभावाद् इति। सन्दिग्ध-साधन-धर्मो यथा॒ मरण-धर्मायं पुरुषो, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे रागादिमत्त्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, वीत-रागस्यापि तथा सम्भवाद् इति। सन्दिग्धोभय-धर्मो यथासर्व-ज्ञोऽयं, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे प्रदर्शित-न्यायेनोभयस्यापि सन्दिग्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२४।३] ननु च परैर् अन्यद् अपि दृष्टान्ताभास-त्रयम् उक्तम्, तद् यथानन्वयोऽप्रदर्शितान्वयो विपरीतान्वयश् चेति। तत्रानन्वयो यथा॒ रागादिमान् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद्, इष्ट-पुरुषवद् इति। यद्य् अपि किलेष्ट-पुरुषे रागादिमत्त्वं वक्तृत्वं च साध्य-साधन-धर्मौ दृष्टौ, तथापि यो यो वक्ता स स रागादिमान् इति व्याप्त्य्-असिद्धेर् अनन्वयोऽयं दृष्टान्तः। तथाप्रदर्शितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवद् इति। अत्र यद्य् अपि वास्तवोऽन्वयोऽस्ति, तथापि वादिना वचनेन न प्रकाशित इत्य् अप्रदर्शितान्वयो दृष्टान्तः। विपरितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति हेतुम् अभिधाय यद् अनित्यं तद् कृतकं घटवद् इति, विपरीत-व्याप्ति-दर्शनाद् विपरीतान्वयः, साधर्म्य-प्रयोगे हि साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शनीयम्, इह तु विपर्यास-दर्शनाद् विपरीतता। तद् एतद् भवद्भिः कस्मान् नोक्तम् इति।
[न्या०अ०२४।४] अत्रोच्यते -- परेषां न सुपर्यालोचितम् एतद् दृष्टान्ताभास-त्रयाभिधानम् इति ज्ञापनार्थम्। तथा हि॒ न तावद् अनन्वयो दृष्टान्ताभासो भवितुम् अर्हति। यदि हि दृष्टान्त-बलेन व्याप्तिः साध्य-साधनयोः प्रतिपाद्येत, ततः स्याद् अनवयो दृष्टान्ताभासः, स्व-कार्याकरणाद्, यदा तु पूर्व-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्राहि-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोदाहृतिर् इति स्थितं, तदानन्वयत्व-लक्षणो न दृष्टान्तस्य दोषः, किं तर्हि हेतोर् एव, प्रतिबन्धस्याद्यापि प्रमाणेनाप्रतिष्ठितत्वात्, प्रतिबन्धाभावे चान्वयासिद्धेः। न च हेतु-दोषोऽपि दृष्टान्ते वाच्यो,ऽतिप्रसङ्गाद् इति। तथाप्रदर्शितान्वय-विपरीतान्वयाव् अपि न दृष्टान्ताभासतां स्वी-कुरुतो,ऽन्वयाप्रदर्शनस्य विपर्यस्तान्वय-प्रदर्शनस्य च वक्तृ-दोषत्वात्, तद्-दोष-द्वरेणापि दृष्टान्ताभास-प्रतिपादने तद्-इयत्ता विशीर्येत, वक्तृ-दोषाणामानन्त्यात्। वक्तृ-दोषत्वेऽपि परार्थानुमाने तत्-कौशलम् अपेक्षत इति। एवं चोपन्यासे न बुभुत्सितार्थ-साधकाव् अतो दृष्टान्ताभासाव् एताव् इति चेद्, एवं तर्हि करणापाटवादयोऽपि दृष्टान्ताभासा वाच्याः। तथा हि॒ करण-पाटव-व्यतिरेकेणापि न पर-प्रत्यायनं समस्ति, विस्पष्ट-वर्णाग्रहणे व्यक्ततया तद्-अर्थावगमाभावाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२५।०] तद् एवं साधर्म्येण दृष्टान्ताभासान् प्रतिपाद्य वैधर्म्येणाह॒
वैधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
साध्य-साधन-युग्मानाम् अनिवृत्तेश् च संशयात् ॥ न्यायावतार २५ ॥
[न्या०अ०२५।१] साध्याभावः साधनाभाव-व्याप्तौ दर्शयितुम् अभिप्रेतो यस्मिंस् तद् वैधर्म्यम्, तेनात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिता इति दत्तार्थम्। साध्य-साधन-युग्मानां गम्य-गमकोभयानाम् अनिवृत्तेर् अनिवर्तनाच्, च-शब्दस्य व्यवहित-प्रयोगत्वात् संशयाच् च निवृत्ति-सन्देहाच् चेत्य् अर्थः। तद् अनेन षड् दृष्टान्ताभासाः सूचितास्, तद् यथा -- साध्याव्यतिरेकी, साधनाव्यतिरेकी, साध्य-साधनाव्यतिरेकी, तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकश् चेति।
[न्या०अ०२५।२] तत्र साध्याव्यतिरेकी यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानम्, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनर् भ्रान्तं न भवति न तत् प्रमाणं, तद् यथा स्वप्न-ज्ञानम् इति॑ स्वप्न-ज्ञानाद् भ्रान्ततानिवृत्तेः साध्याव्यतिरेकित्वम् इति। साधनाव्यतिरेकी यथा॒ निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनः सविकल्पकं न तत् प्रमाणं, तद् यथानुमानम्॑ अनुमानात् प्रमाणतानिवृत्तेः साधनाव्यतिरेकित्वम् इति। उभयाव्यतिरेकी यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, सत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् न नित्यानित्यः स न सन्, तद् यथा -- घटो॑ घटाद् उभयस्याप्य् अव्यावृत्तेर् उभयाव्यतिरेकित्वम् इति। तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेको यथासर्व-ज्ञा अनाप्ता वा कपिलादयो,आर्य-सत्य-चतुष्टयाप्रतिपादकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनः सर्व-ज्ञ आप्तो वाऽसाव् आर्य-सत्य-चतुष्टयं प्रत्यपीपदत्, तद् यथा -- शौद्धोदनिर् इति। अयं च साध्याव्यतिरेकी वार्य-सत्य-चतुष्टयस्य दुःख-समुदय-मार्ग-निरोध-लक्षणस्य प्रमाण-बाधितत्वेन तद्-भाषकस्यासर्वज्ञतानाप्ततोपपत्तेः। केवलं तन्-निराकारक-प्रमाण-सामर्थ्य-पर्यालोचन-विकलानां सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकतया प्रतिभातीति तथोपन्यस्तः। तथा हि॒ यद्य् अप्य् आर्य-सत्य-चतुष्टयं शौद्धोदनिः प्रतिपादितवांस्, तथापि सर्वज्ञताप्तते तस्य न सिद्ध्यतः, ताभ्यां सहार्य-सत्य-चतुष्टय-प्रतिपादनस्यान्यथानुपपत्त्य्-असिद्धेर्, असर्व-ज्ञानाप्तेनापि पर-प्रतारणाभिप्राय-प्रवृत्त-निपुण-बुद्धि-शठ-पुरुषेण तथा-विध-प्रतिपादनस्य कर्तुं शक्यत्वात्। तस्माच् छौद्धोदनेः सकाशाद् असर्व-ज्ञतानाप्तता-लक्षणस्य साध्यस्य व्यावृत्तिः सन्दिग्धेति सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेको यथा॒ऽनादेय-वाक्यः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो रागादिमत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् आदेय-वाक्यो, न स रागादिमांस्, तद् यथा -- सुगत इति। यद्य् अपि तद्-दर्शनानुरक्तान्तः-करणाणां सुगतस्यादेय-वचनता सिद्धि-सौध-मध्यारूढा, तथापि रागादिमत्त्वाभावस् तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैधुर्यात् सन्देह-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अतः सुगताद् रागादिमत्ता-व्यावृत्ति-संशयात् सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेको यथा॒ न वीत-रागाः कपिलादयः, करुणास्पदेष्व् अप्य् अकरुणापरीत-चित्ततयादत्त-निजक-मांस-शकलत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ ये पुनर् वीत-रागास् ते करुणास्पदेषु करुणा-परीत-चित्ततया दत्त-निज-मांस-शकलास्, तद् यथा -- बोधिसत्त्वा इति। अत्र साध्य-साधन-धर्मयोर् बोधिसत्त्वेभ्यो व्यावृत्तिः सन्दिग्धा॑ तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैकल्यान् न ज्ञायते किं ते रागादिमन्त उत वीत-रागाः॑ तथानुकम्प्येषु किं स्व-पिशित-खण्डानि दत्तवन्तो नेति वा। अतः सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति।
[न्या०अ०२५।३] परैर् अपरेऽपि दृष्टान्ताभासास् त्रयोऽविमृश्य-भाषितया दर्शिताः। तद् यथा -- अव्यतिरेको,ऽप्रदर्शित-व्यतिरेको, विपरीत-व्यतिरेकश् चेति। तेऽस्माभिर् अयुक्तत्वान् न दर्शयितव्याः। तथा ह्य्॒ अव्यतिरेकस् तैर् दर्शितो, यथावीत-रागः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-डृष्टान्तो॒ यः पुनर् वीत-रागो, न स वक्ता, यथोपल-खण्ड इति। यद्य् अपि किलोपल-खण्डाद् उभयं व्यावृत्तं, तथापि व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेर् अव्यतिरेकित्वम् इति। अयुक्तश् चायं वक्तुम्, अव्यतिरेकिताया हेतु-दोषत्वात्। यदि हि दृष्टान्त-बलेनैव व्यतिरेकः प्रतिपाद्येत, तदा तथा-विध-सामर्थ्य-विकलस्य तद्-आभासता युज्येत, न चैतद् अस्ति, प्राक्-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवण-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोपादानात्। न ह्य् एकत्र यो यद्-अभावे न दृष्टः, स तद्-अभावे न भवतीति प्रतिबन्ध-ग्राहि-प्रमाण-व्यतिरेकेण सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। तस्माद् असिद्ध-प्रतिबन्धस्य हेतोर् एवायं दोषो, न दृष्टान्तस्येति। तथाप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकाव् अपि वक्तुम् अयुक्तौ, तयोर् वक्तृ-दोषत्वात्। तथा ह्य्॒ अप्रदर्शित-व्यतिरेकस् तैर् उक्तो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, आकाशवद् इति। अत्र विद्यमानोऽपि व्यतिरेको वादिना वचनेन नोद्भावित इति दुष्टता। विपरीत-व्यतिरेकः पुनर् अभिहितो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यद् अकृतकं तन् नित्यं भवति, यथाकाशम् इति। अत्र विपर्यस्त-व्यतिरेक-प्रदर्शनाद् विपरीत-व्यतिरेकित्वम्। वैधर्म्य-प्रयोगे हि साध्याभावः साधनाभावाक्रान्तो दर्शनीयो, न चैएवम् अत्र, साधनाभावस्य साध्याभाव-व्याप्ततयाभिधानाद् इति।
[न्या०अ०२५।४] व्यतिरेकाप्रदर्शनं विपरीत-व्यतिरेक-प्रदर्शनं च न वस्तुनो दोषः, किं तर्हि वचन-कुशलता-विकलस्याभिधायकस्य। किं च, येषां भवताम् अदो दर्शनं॒ यद् उत स्वार्थानुमान-काले स्वयं हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीतेः परार्थानुमानावसरेऽपि हेतु-प्रतिपादनम् एव कर्तव्यं "विदुषां वाच्यो हेतुर् एव हि केवल" इति-वचनात् तेषां ‘कृतकत्वाद्ऽ॑ इतीयता हेत्ûपन्यासेनैव सिसाधयिषित-साध्य-सिद्धेः समस्त-दृष्टान्ताभास-वर्णनम् अपि पूर्वापर-व्याहत-वचन-रचना-चातुर्यम् आविर्-भावयति।आसातां तावद् एतौ, दृष्टान्तस्य साधनावयवत्वेनानभ्युपगमात्। अथेत्थम् आचक्षीथा॒ अन्वय-व्यतिरेकापरिज्ञाने प्रतिपाद्यस्य न दृष्टान्तम् अन्तरेणैतौ दर्शयितुं शक्याव्, अतोऽन्वय-व्यतिरेक-दर्शनार्थं दृष्टान्तोऽभिधातव्यस्, ततश् च तत्-कार्याकारिणां तद्-आभासतेति चेद्, गले गृहीतस्यायम् उल्लापस्, तथाप्य् अप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकौ दृष्टान्ताभासौ न वास्तवौ, किं तर्हि वक्तृ-दोष-समुत्थाव्॑ अतो नाभिधातुं युक्तौ, तथा-विधस्य विद्यमान-वस्तु-प्रकाशन-सामर्थ्य-रहितस्य निबिड-जडिमावष्टब्धस्य पुंसो वादानधिकारित्वान्, मातृका-पाठ-शाला-योग्यतया विदुषां वादयितुम् अयुक्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२६।०] तद् एवं परार्थानुमानं व्याचक्षाणेन यद् उक्तं -- यद् उत "तत् पक्षादि-वचनात्मकम्" इति -- तत् पक्ष-हेतु-दृष्टान्तानां साभासानां प्रतिपादनात् प्रायः पर्यन्तितं॑ केवलं तत् परोक्त-दूषणोद्धाराद् एव समीचीनताम् आबिभर्तीत्य् अमुना प्रस्तावेन दूषणं साभासम् अभिधातुकाम आह॒
वाद्य्-उक्ते साधने प्रोक्त-दोषाणाम् उद्भावनम् । दूषणं निरवद्ये तु दूषणाभास-नामकम् ॥ न्यायावतार २६ ॥
[न्या०अ०२६।१] वदन-शीलो वादी प्रत्यायकस्, तेनोक्त उपन्यस्ते॑ कस्मिन्? साधने॑ साध्यते प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोप्यतेऽनुमेयं येन तत् साधनम्। तच् चानेक-रूपं प्राक् प्रत्यपादि, तद् यथा -- क्वचिद् धेतुर् एवैकः, क्वचित् पक्ष-हेतू, क्वचित् पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताः, क्वचित् त एव सोपनयाः, क्वचित् सनिगमनाः, क्वचिद् एकैक-तच्-छुद्धि-वृद्ध्येति, प्रतिपाद्यस्य क्वचित् कथञ्चित् प्रत्याययितुं शक्यत्वात्, तत्-प्रत्यायनोपायस्य च साधनत्वाद् इति। तत्रेह सम्यक्-साधनस्य दूषयितुम् अशक्यत्वात्, साधनाभास एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेः, साधनाभासम् एव दूषनोपनिपातात् प्राग् अवस्थायाम् अनिर्ज्ञातं सामान्येन साधन-ध्वनिनोक्तं, तत्र प्रोक्त-दोषाणां प्रत्यक्षादि-निराकृत-पक्षासिद्धादि-हेतु-साध्यादि-विकल-दृष्टान्ताद्य्-उपन्यास-लक्षणानाम् उद्भावनं प्राश्निकानां पुरतः प्रकाशनं यत् तद् दूष्यते स्वाभिप्रेत-साध्य-प्रत्यायन-वैकल्य-लक्षणां विकृतिं नीयते साधनम् अनेनेति दूषणम् इति ज्ञेयम्।
[न्या०अ०२६।२] अधुना तद्-आभासम् आह॒ निर्गतं सम्यक्-प्रयुक्तत्वाद् अवद्यं पापं पक्षादि-दोष-लक्षणं दौष्ट्यम् अस्माद् इति निरवद्यं, तस्मिन् साधने वादिनोक्त इति वर्तते। तथापि मत्सरितया प्रमृद्योदरं यद् अविद्यमानानां दोषाणाम् उद्भावनं तद् दूषण-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणात् सम्यक्-साधने दोषोद्भावनस्य प्रलापायमानत्वाद् दूषणवदाभासत इति दूषणाभासम् इति॑ तद् एव नाम संज्ञा यस्य तत्-तथा। समर्थ-साधनोपन्यासत्वात् साधिते साध्ये सताम् अप्य् अपशब्दालङ्कारादि-दोषाणां यद् उद्भावनं तद् अपि दूषणाभास-नामकम् इति। तु-शब्देन विशेषणार्थेन दर्शयति वस्तु-सिद्ध्य्-अर्थं वाद-प्रवृत्तेस्, तस्य सिद्धत्वाद्, अपशब्दादीनाम् अप्रस्तुततया तद्-द्वरेण दोष-प्रकाशनस्यासम्बद्ध-प्रलाप-रूपत्वाद्, इतरथा तावन्-मात्रेणैव परापाकरण-सिद्धेः समर्थ-साधनान्वेषण-प्रयत्नो विशीर्येत, प्रयोजनाभावाद् इति।
[न्या०अ०२७।०] तद् एवं व्यावहारिक-प्रमाणस्य प्रत्यक्ष-परोक्ष-स्वार्थ-परार्हादि-भेद-भिन्नस्य लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यैः पारमार्थिकं समस्तावरण-विच्छेद-लभ्यम् अशेषार्थ-गोचरं केवल-ज्ञानं नाभ्युपगम्यते, तन्-मतोद्दलनार्थं तल्-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
सकलावरण-मुक्तात्म केवलं यत् प्रकाशते ।
प्रत्यक्षं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् ॥ न्यायावतार २७ ॥
[न्या०अ०२७।१] सकलं समस्तम्, आवृणोत्याव्रियते वानेनेत्य् आवरणं, तत्-स्वरूप-प्रच्छादनं कर्मेत्य् अर्थः, सकलं च तद् अवारणं च सकलावरणं, तेन मुक्तो रहित, आत्मा स्वरूपं यस्य तत्-तथा। अत एव केवलम् असहायम्, आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतयैव बोधस्य नानाकारतया प्रवृत्तेः, सामस्त्येन पुनर् आवरण-निर्दलने विबन्धक-कारण-वैकल्याद् एकाकारतयैव तस्य विवर्तनात्। अतो ज्ञानान्तर-निरपेक्षं यत् प्रकाशते प्रथते निरुपाधिकं द्योतत इत्य् अर्थः, तत् परमार्थतः प्रत्यक्षम्। तद् इदं सकलावरण-मुक्तात्मेति-हेतु-द्वारेण तथा केवलं यत् प्रकाशत इति-स्वरूपतो निरूप्याधुना कार्य-द्वारेण निरूपयन्न् आह॒ सकलार्थात्मनां समस्त-वस्तु-स्वरूपाणां सतत-प्रतिभासनम् अनवरत-प्रकाशनं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् इति, प्रतिभास्यतेऽनेनेति प्रतिभासनम्, आत्मनो धर्म-रूपतया भेदवद्-विवक्षितं ज्ञानम् इति यावत्। अस्य च पारमार्थिकत्वं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेः। तथा ह्य्॒ अक्ष-शब्दो जीव-पर्यायस्, ततश् चाक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं, यत्रात्मनः साक्षाद् व्यापारः। व्यावहारिकं पुनर् इन्द्रिय-व्यवहितात्म-व्यापार-सम्पाद्यत्वात् परमार्थतः परोक्षम् एव॒ धूमाद् अग्नि-ज्ञानवत्, तिरो-धानाविशेषात्।
[न्या०अ०२७।२] ननु च प्रसिद्धं लक्ष्यम् अनूद्याप्रसिद्धं लक्षणं विधीयते -- सर्वत्रायं न्यायः। अप्रसिद्धे पुनर् लक्ष्ये लक्षणम् अभिधीयमानम् अम्बरारविन्दिनी-कुसुम-लक्षणवन् निर्गोचरतां यायात्। तद् इदं स्वरूपतोऽप्रसाध्य लक्षणम् अभिदधानस्य कोऽभिप्राय इत्य्॑ अत्रोच्यते -- ये ये मिथ्यावलेपाध्मातान्तः-करणाः प्रमाण-प्रसिद्धम् अप्य् अदः प्रति विप्रतिपद्यन्ते, तेषां ध्य्-आन्धी-कृत-बुद्धित्वाद् अवधारणीयताम् अनेन दर्शयति। किम् अस्य प्रतिपादकं प्रमाणम् इति चेद्, एते ब्रूमः॒
[न्या०अ०२७।३] समस्ति समस्त-वस्तु-विस्तार-गोचरं विशद-दर्शनं, तद्-गोचरानुमान-प्रवृत्तेः॑ इह यद्-यद्-गोचरम् अनुमानं प्रवर्तते, तस्य तस्य ग्राहकं किञ्चित् प्रत्यक्षम् उदय-पदवीं समासादयति, यथा चित्र-भानोः॑ प्रवर्तते च सकलार्थ-विषयम् अनुमानम्॑ अतस् तद्-अवलोकिना विशद-दर्शनेनापि भाव्यम् इति। सर्वार्थ-विषयं किम् अनुमानं प्रवर्तत इति चेद्, इदम् अपि ब्रूम॒ इह यद् यद् अस्ति तत् तत् सर्वं स्थित्य्-उदयापवर्ग-संसर्गम् अनुभवति, वस्तुत्वात्॑ यद् यद् वस्तु तत् तत् स्थेम-जन्म-प्रलयैः क्रोडी-कृतं॑ तद् यथाङ्गुलिर् अङ्गुलित्व-वक्रत्व-र्जुत्वापेक्षयेति॑ वस्तु च यद् अस्त्य्, अतः प्रस्तुत-त्रयाक्रान्तं तद् अवगन्तव्यम्। इदम् एव निखिलार्थ-गोचरम् अनेकान्तानुमानं ज्ञान-क्रियाभ्यासातिशयान् निखिलावरण-विच्छेदे विबन्धक-कारणाभावाद् विशद-दर्शनी-भवति। न चानुमान-प्रवृत्ताव् अप्य् अनर्थित्वादिना प्रमातुर् अप्रवृत्ताव् अनुमेय-गोचर-प्रत्यक्षासम्भवेन व्यभिचारश् चोदनीयः, सम्भवस्य साध्यतयाभिप्रेतत्वात्। न च सम्भव-मात्रेऽस्ति व्यभिचारः, सर्वानुमेयानां सम्भवत्-प्रत्यक्षतया व्याप्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२७।४] अथवान्यथानुमानयामः॒ सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक आत्मा, विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायत्वाद्॑ इह यो यो विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायः स स सम्भवत्-समस्त-शुद्धिको॑ यथा विद्यमान-क्षार-मृत्-पुट-पाकादि-शुद्ध्य्-उपायो रत्न-विशेषस्, तथा च विद्यमान-ज्ञानाद्य्-अभ्यास-शुद्ध्य्-उपाय आत्मातः सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक इति। सामस्त्य-शुद्धश् चात्मा ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदात् केवलम् अभिधीयत इति। ज्ञानाद्य्-अभ्यासः कथं विशुद्धि-कारणम् इति चेद्, आवरण-मल-प्रतिपक्ष-रूपत्वाद् इति ब्रूमः। प्रतिपक्ष-रूपता कथम् अवधारितेइति चेत्, तवैव दर्शनात्। तथा हि॒ दृश्यते ज्ञानाद्य्-अभ्यासतः प्रतिक्षणम् आवरण-विलयो, विशिष्ट-विशिष्टतर-तत्-कार्य-बोधाद्य्-अनुभवात्, तद्-अतिशये पुनः सामस्त्योच्छेदः स्याद् इत्य् अभिदध्महे। एतेन यत् परे प्रोचुर् -- यथा॒ प्रत्यक्षादि-प्रमाण-पञ्चक-गोचरातिक्रान्तत्वात् सर्वार्थ-संवेदनम् अभावाख्य-षष्ठ-प्रमाण-गोचरतां प्रतिपद्यते -- तद् अयुक्तं, तत्-सम्भवस्यानुमानेन प्रतिपादनात्, प्रमाण-पञ्चक-प्रवर्तनाभावासिद्धेः। किं च, प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं न प्रवर्तत इति कथं भवतो निर्णयः? किं नियत-देश-काल-व्याप्त्या यद् वा समस्त-देश-कालास्कन्दनेनेति? यद्य् आद्यः पक्षस्, ततो यथा घटादेः क्वचित् प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं निर्वर्तमानम् अभावं साधयत्य्, एवं समस्त-वस्तु-संवेदन-गोचरम् अपि तन् निवर्तमानं नियत-देश-दशावच्छिन्नम् अभावं साधयेन्, न सर्वत्र॑ ततश् च घटादिवत् तद् दुर्निवारं स्यात्। अथ द्वितीयः पक्षो,ऽसाव् असम्भव्य् एव॑ समस्त-देश-काल-वर्ति-पुरुष-परिषत्-संवेदन-साक्षात्-कारिणो ह्य् एवं वक्तुं युक्तं, यद् उत न क्वचित् समस्तार्थ-संवेदनं अस्तीति -- न भवतस्, तथा-विध-पुरुष-सम्भवानभ्युपगमात्। इतरथा य एव कश्चिन् निश्चित्यैवम् अभिदध्यात्, स एव समस्त-वस्तु-विस्तार-व्यापि-ज्ञानालोक इति समस्तार्थ-गोचर-संवेदन-सिद्धिर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२८।०] तद् एवं प्रमाण-विषये लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराकृत्याधुना क्रम-प्राप्तां गोचर-विप्रतिपत्तिं बहु-वक्तव्यत्वाद् अनिराकृत्य तावत् फल-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षुर् आह॒
प्रमाणस्य फलं साक्षाद् अज्ञान-विनिवर्तनम् ।
केवलस्य सुखोपेक्षे शेषस्यादान-हान-धीः ॥ न्यायावतार २८ ॥
[न्या०अ०२८।१] द्वि-विधं हि प्रमाणस्य फलं॒ साक्षाद् असाक्षाच् चानन्तरं व्यवहितं चेत्य् अर्थः। तत्र साक्षाद् अज्ञानम् अनध्यवसायः प्रमेयापरिच्छित्तिस् तस्य विनिवर्तनं विशेषेण प्रलयापादनं प्रमाणस्य फलम्, अज्ञानोद्दलन-द्वारेण तस्य प्रवृत्तेस्, तस्य च सर्वानर्थ-मूलतया प्रमात्र्-अपकारित्वात्। तन्-निवर्तनस्य प्रयोजनता युक्तैव। एतच् चानन्तर-प्रयोजनं सर्व-ज्ञानानाम् एक-रूपत्वात् सामान्येनोक्तम्। व्यवहित-प्रयोजनं पुनर् विभागेनाह॒ केवलस्य सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सुखं वैषयिक-सुखातीत-परमाह्लादानुभव, उपेक्षा साक्षात् समस्तार्थानुभवेऽपि हानोपादानेच्छाभावान् मध्य-स्थ-वृत्तिता, ते सुखोपेक्षे फलम् इत्य् अर्थः। शेषस्य तद्-व्यतिरिक्त-प्राकृत-लोक-प्रमाणस्यादानं ग्रहणं हानं परित्यागस्, तयोर् आदान-हानयोर् धीर् बुद्धिर् आदान-हान-धीः, सा फलम् इति यावत्। ततश् चादेयानां सम्यग्-दर्शनादि-स्रक्-चन्दनादीनां यादित्सा, तथा हेयानां मिथ्या-दर्शनादि-विष-कण्टकादीनां या जिहासा सा प्रमाण-साध्याप्रमाणात् तद्-असिद्धेः, प्रेक्षा-पूर्व-कारिणां ततः प्रवृत्त्य्-अयोगाद् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०अ०२९।०] अधुना गोचर-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे॒
अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचरः सर्व-संविदाम् ।
एक-देश-विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः ॥ न्यायावतार २९ ॥
[न्या०अ०२९।१] अनेके बहवोऽन्ता अंशा धर्मा वात्मानः स्वरूपाणि यस्य तद् अनेकान्तात्मकम्। किं तत्? वस्तु बहिर् अन्तश् च, गोचरो विषयः, सर्व-संविदां समस्त-संवित्तीनाम्। अनेनानेकान्तम् अन्तरेण संवेदन-प्रसर-व्यवच्छेदं दर्शयति, भ्रान्त-संवेदनानाम् अप्य् अनेकान्तोद्द्योतन-पटिष्ठतया प्रवृत्तेः, केवलं केषुचिद् अंशेषु विसंवादकत्वाद् अप्रमाणानि तानि सङ्गीर्यन्ते। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यदा संवेदन-सामान्यम् अप्य् अनेकान्त-विरहेण न प्रवर्तितुम् उत्सहते, तदा तद्-विशेष-भूतं प्रमाणम् एकान्ते प्रवर्तिष्यत इति दूरापास्तावकाशैवैषा वार्ता, तथाप्य् अनादि-मिथ्याभिनिवेश-वासितान्तः-करणाः कुदर्शन-विप्रलब्ध-बुद्धयो बहवोऽत्र विप्रतिपद्यन्त इति सर्व-प्रमाणानाम् अनेकान्त-गोचरत्व-साधकं प्रमाणम् अभिधीयते॒ इह यत् प्रमाणं तत् परस्पराविनिर्लुठितानेक-धर्म-परिकरित-वस्तुनो ग्राहकं, तस्यैव तत्र प्रतिभासमानत्वाद्॑ इह यद् यत्र प्रतिभाति, तद् एव तद्-गोचरतयाभ्युपगन्तव्यं॑ तद् -- यथा निरादीनव-नयन-प्रभव-दर्शने प्रतिभासमानं पाटलतया जपा-कुसुमं तथैव तद्-गोचरतयाभ्युपगम्यते॑ परस्पराविभक्तानेक-स्वभावाक्रान्त-मूर्तिकं च बहिर् अन्तश् च वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रथत इत्य्॑ अतस् तद् एव तेषां गोचरः।
[न्या०अ०२९।२] न चेतरेतर-विशकलित-धर्मि-धर्म-भाव-वादिभिः कणभक्षाक्षपाद-शिष्यकैस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धतादि-दोषः प्रतिपादयितुं शक्यस्, तद्-अभ्युपगमम् अन्तरेण स्वाभिप्रेत-वस्तुनोऽवस्थानाभावात्। तथा ह्य्॒ एकस्मिन् धर्मिणि बहवो धर्मास् ततो भिन्न-तनवः कथं वर्तेरन्? भेदाविशेषेण सर्वत्र तद्-वृत्ति-प्रसङ्गात्। तत्रैव तेषां समवायान् नान्यत्र वर्तन्त इति चेन्, ननु सोऽपि समवायो यद्य् उपकार्योपकारक-भाव-व्यतिरेकेणापि भवति, ततः सर्वत्राविशेषेण प्रसज्येत, तद्-अभावाविशेषात्। अस्त्य् एवोपकार्योपकारक-भाव इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, अनेकोपकारकस्यानेक-स्वभावता-प्राप्तेस्, तद्-विरहेऽनेकोपकारकत्वाभावात्। न हि येन स्वभावेनैकस्योपकरोति तेनैव द्वितीयस्य, तस्य तत्रैवोपयुक्तत्वाद्, द्वितीयोपकारक-स्वभावस्य तद्-उपमर्दन-द्वारेणोत्पत्तेर्, इतरथैकम् एवोपकुर्वंस् तिष्ठेत्, तद्-एक-स्वभावात्। भिन्नाभिः शक्तिभिर् उपकरोति, न भिन्नैः स्वभावैस्, तेन नानेकान्त इति चेत्, तास् तर्हि तत्र कथं वर्तन्त इति वाच्यम्। समवायाद् इत्य्-उत्तरेऽसाव् अप्य् उपकार्योपकारक-भावम् अन्तरेण कथं न सर्वत्रेति प्राचीनं चोद्यं पश्चाल्-लग्नम् अनुधावति। उपकार्योपकारक-भावाभ्युपगमे पुनर् अप्य् अनेक-स्वभावता-प्रदर्शित-युक्तेः पुनः शक्त्य्-उपकारक-भिन्न-शक्ति-परिकल्पने तद् एवावर्तते, तन् न भिन्न-धर्म-परिकल्पनेऽप्य् अनेकान्तान् मोक्ष इति वरम् आदाव् एव मत्सरितां विहायानेक-धर्माध्यासितं वस्त्व् अभ्युपगतम्। किं भेद-कल्पनयास्थान एवात्मना परिक्लेशितेनेति। किं चानेकान्ताभ्युपगमे सत्य् एष गुणः॒ परस्पर-विभक्तेषु संयोगि-संयोग-समवायि-समवाय-गुण-गुण्य्-अवयवावयवि-व्यक्ति-सामान्यादिषु संयोग-समवाय-गुण्य्-अवयवि-सामान्यादीनां संयोगि-समवायि-गुणावयव-विशेषादिषु वर्तन-चिन्तायां यद् दूषण-जालम् उपनिपतति, तद् अपि परिहृतं भवत्य्, एकान्त-भेद एव तद्-उपपत्तेर्, अनेकान्ते तद्-उत्थानाभावात्। तथा हि॒ भिन्नाः खलु संयोगादयः संयोग्य्-आदिभ्यो विकल्पयितुं पार्यन्ते -- यद् उत कथम् एत एतेषु वर्तन्त इति? किम् एक-देशेन यद् वा सामस्त्येन? यद्य् एक-देशेन, तद् अयुक्तं, तेषां निरवयवत्वाभ्युपगमात्। सावयवत्वेऽपि तेभ्योऽवयवेभ्यो यद्य् अभिन्नास्, ततोऽनेकान्तापत्तिर्, एकस्यानेकावयवत्व-प्राप्तेः। अथ भिन्नास् तेष्व् अपि ते कथं वर्तन्त इत्य् वाच्यम्॒ एक-देशेन सामस्त्येन वा। एक-देश-पक्षे तद् एवावर्तत इत्य् अनवस्था। अथ सामस्त्येन, तद् अप्य् असाधीयः, प्रत्येकं परिसमाप्ततया संयोगादि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। तद्-अभिन्नाः पुनः संयोगादयो न विकल्प-भाजो भवन्ति। अभेद-पक्षेऽपि संयोगादि-मात्रं संयोग्य्-आदि-मात्रं वा स्याद् इति चेन्, न, तस्याप्य् एकान्तेनानभ्युपगमात्, किं तर्ह्य् अन्योन्याविश्लिष्ट-स्वरूपा विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदाः सर्व एवैतेऽभ्युपगम्यन्ते, तथा-विधानां कुयुक्ति-विकल्पोत्थापित-दूषण-समूह-निराकरण-क्षमत्वाद्, अबाधित-प्रतिभासेषु सर्वत्र तेषां तथैव प्रतिभासनाद्, अन्यथा प्रतिभासमानानाम् अन्यथा परिकल्पने दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-द्वारेणासमञ्जस-प्राप्तेस्॑ तथा च ब्रह्माद्वैत-शून्य-वादादयः सिद्धिम् अश्नुवीरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२९।३] एतेनास्य हेतोः कापिला अप्य् असिद्धतादि-दोषम् अभिधित्सवो मौक्यम् आनीताः। तथा ह्य्॒ अन्तर् एकं संवेदनम् अपरापर-हर्ष-विषादाद्य्-अनन्त-धर्म-विवर्ताक्रान्त-रूपं बहिश् च घटादिकम् अर्थं नव-पुराणादि-वर्तुल-पार्थिवत्वाद्य्-अनेक-स्वभावावष्टब्ध-शरीरं साक्षाल् लक्षयन्तः कथं तद्-विपरीत-कथने प्रवर्तेरन्? प्रकृति-पुरुषात्मकं द्रव्यम् एवैकं तात्त्विकं, पर्याय-भ्रान्ति-जनकः पुनर् विवर्तोऽपारमार्थिक इति चेन्, न, द्वयोर् अपि सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशमानयोर् अबाधितयोः सर्व-व्यवहार-निबन्धनयोः पक्ष-पातम् अन्तरेणैकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। तथा सति विवर्त एव तात्त्विको, द्रव्यं पुनर् अलीकम् इति पर्याय-पक्ष-पाती प्रसञ्जयन् दुर्निषेधः स्याद् इति। अथेत्थम् अभिदधीथा॒ द्रव्यं सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात् सत्यं, पर्यायाः पुनर् व्यभिचारिण इत्य् असत्याः, तद् अयुक्तम्। यदि नाम द्रव्यम् अभेद-रूपत्वात् सर्वत्रानुवर्तते, पर्यायास् तु भेद-रूपत्वाद् व्यवच्छिद्यन्ते, तथापि तत् सत्यम्, इतरेऽलीका इति वक्तुं न पार्यते, न हि नीलं पीत-रूपतां न बिभर्तीत्य्-एतावता तद् असत्यम्, अतिप्रसङ्गात्, सर्वस्य पर-रूप-परिहारावस्थायितयालीकत्व-प्राप्तेः। अथ द्रव्यम् एव पर्यायास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवन्, न सन्ति वा द्रव्य-व्यतिरेकिणः पर्याया, निःस्वभावत्वात्, ख-पुष्पवद् इति प्रमाणयसि, तथा सति पर्याया एव द्रव्यं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवन्, नास्ति वा पर्याय-व्यतिरिक्तं द्रव्यं, निष्पर्यायत्वाद्, आकाश-कुसुमवद् इतीतरोऽपि प्रमाणयन् केन वार्येत। तन् न पक्ष-द्वयेऽपि काचिद् विशेषोपलब्धिर् इति। यथैवानन्त-सह-क्रम-वर्ति-पर्यायाध्यासितं वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशते तथैवाभ्युपगन्तव्यं, तथा चान्यस्याभावात् तद् एव तद्-गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।४] तथा सुगत-मतानुसारिणाम् अपि मध्ये सौत्रान्तिकस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धताम् आविर्-भावयितुं नोत्सहते, तद्-अभ्युपगति-व्यतिरेकेण निज-दर्शन-व्यवस्थानुपपत्तेः। तथा हि॒ बहिस् तावद् एकं कारणम् अपरापर-सामग्र्य्-अन्तः-पातितयानेक-कार्य-कार्यावेद्यते, यथा रूपं स्वोत्तर-क्षणं स्वावगाहि-ज्ञानादिकं च युगपज् जनयति। यदि चैक-क्षण-वर्तिनः सामग्री-भेदेन भेदम् अनुभवत एव भिन्न-देश-नाना-कार्य-कारिता, तथा सति नित्य-पक्षोदितं दूषणं स्व-मस्तकोपनिपाति स्यात्, तस्यापि तथैव भिन्न-काल-कार्य-निर्वर्तनेऽपि भेदाभाव-प्रसङ्गात्। तथा प्रतिभास-भेदेन क्षण-क्षयि-रूपादि-स्वलक्षण-विलक्षणत्वाभ्युपगमश् चैवं निर्निबन्धनः स्यात्, कौटस्थ्यम् आबिभ्रतोऽपि द्रव्यस्यापरापर-कारण-कलापान्तर्-गततया नव-पुराणादि-पर्याय-रूप-रस-गन्ध-स्पर्शावभास-लक्षण-कार्य-सम्पादनाविरोध-प्रसक्तेः। किं चायम् एकं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणानि स्वलक्षणान्य् आचक्षीत नान्यथा, यथाकूतं तद्-अवभासस्य स्वप्नान्तरेऽप्य् अनुपलक्षणाल्॑ लक्षितस्य चालक्षित-व्यतिरेक-निराकरणतस् तादात्म्यं कथयन् स्व-गिरानेकान्तावभासं समर्थयते। तथा ह्य्॒ अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्य-प्रतिक्षण-विवर्तम् अपि स्वलक्षणं स्थिर-स्थूराद्य्-आत्मना दर्शयति स्वरूपम्, अन्यथा सुषुप्तं जगद् आसज्येत, तद्-अप्रकाशने प्रमाणान्तरस्याप्य् अत्यन्त-विलक्षण-स्वलक्षणावेदकस्याप्रवृत्ति-प्रसङ्गात्। तथान्तः-संवेदनम् अर्थ-स्वरूपापेक्षया बहिर्-मुखान्तर्-मुख-सविकल्पाविकल्प-भ्रान्ताभ्रान्तादि-प्रतिभासम् एकम् अभ्युपयतः कथम् अनेकान्तावभासोऽसिद्धः स्यात्? तथा नाना-देश-स्थितार्थ-सार्थ-समर्पिताकारोपरक्तम् एकम् आकार-भेदेऽप्य् अन्यथा युगपत्-प्रकाशमान-सितासिताद्य्-अर्थ-व्यवस्थित्य्-अनुपपत्तेः संवेदनम् अनुमन्यमानः कथं भिन्न-समय-भावि-हर्ष-विषादाद्य्-अनेक-विवर्त-वशात् तद्-भेदम् आत्यन्तिकम् अभिदधीत, अभिन्न-योग-क्षेमत्वाद्। युगपद्-भाविनां संविद्-अन्तर्-निविष्टाकाराणाम् एकत्वं न हर्षादीनां, तद्-विपर्ययाद् इति चेन्, न, तत्-सामर्थ्य-व्यवस्थाप्यार्थाभेद-प्रसङ्गात्, तद्-एकतया सित-पीतादिषु ज्ञानस्य बोध-रूपेणैवाविशिष्टत्वात्। तद् एवं बहिर् अन्तश् चैकानेक-रूपत्वे प्रमाणतः स्थितेः स्वलक्षणस्यान्यथा स्वाभ्युपेत-दर्शन-व्यवस्थायोगान् नार्थ-वाद्य् अनेकान्त-प्रकाशं प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति।
[न्या०अ०२९।५] तथोररी-कृत-योगाचार-मतम् अपि बलाद् अनेकान्त-प्रकाश-रज्जुर् आवेष्टयत्य्, एकस्यापि ज्ञानस्यानेक-वेद्य-वेदकाकारतया प्रथनोपगतेः। एक-योग-क्षेमत्वात् तद्-ऐक्यम् इति चेन्, न, युगपद्-उदय-प्रलयवतां सह-वेदिनां सकल-सन्तानानाम् एकत्व-प्रसङ्गात्। संवृति-दर्शितत्वाद् अनेकत्वस्य, न तेन स्व-संवेदन-साक्षात्-कृत-पारमार्थिकैकत्व-क्षतिर् इति चेन्, न, ब्रह्म-वादि-मताप्रतिषेध-प्रसक्तेर्, यतोऽनाद्य्-अविद्या-बलाद् एकम् अक्रमं सचेतनं स्व-संवेदन-साक्षात्-कृतम् अपि ब्रह्मानेकं क्रमवच् चेतनाचेतनं परोक्षापरोक्षं लक्ष्यते, भवत्-परिकल्पित-ग्राह्य-ग्राहकाकार-विविक्त-संवेदनवद् इति तेनापि न दुरुपपादम्। अस्तु वायम् अनेकान्तावभासो भ्रान्तस्, तथापि संवेदनस्याद्वयता न लक्ष्यते, तल्-लक्षणे सकलासुमताम् अधुनैव मुक्ततावाप्तेः। लक्ष्यते च तत् कथञ्चिद्, इतरथा सुषुप्त-दशावत् सर्व-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् इत्य् एकस्यापि संवेदनस्य लक्षितालक्षितत्वेनानेकान्त-प्रतिभासो दुःशकोऽपह्नोतुम् इति ज्ञान-वाद्य् अप्य् अस्य हेतोर् असिद्धताविर्-भावनं प्रति तूष्णीम् आसीत।
[न्या०अ०२९।६] शून्य-वादिनः समस्ताभावाद् असिद्धोऽनेकान्त-प्रकाश इति चेन्, न, तस्यापि प्रमाण-प्रमेयाभावे न सर्वाभावावेदनं समस्त्य्, अन्यथाप्रमाणकं सर्वं सर्वत्र विद्यत इति परस्यापि वदतो न वदन-भङ्गः स्यात्, तद्-अभ्युपगमेऽभ्युपगम-क्षतिः। तयोश् च दर्शितवद् अनेकान्त-प्रकाश इति नासिद्धो हेतुः। मरु-मरीचिका-निचय-चुम्बिनि संवेदने जलोल्लेखेऽपि तद्-गोचरत्वाभ्युपगमाभावाद् अनैकान्तिकोऽयम् इति मा शङ्किष्ठास्, तस्य भ्रान्तत्वाद्, अभ्रान्त-प्रकाशो हि तद्-अभ्युपगति-हेतुः। अथायम् अपीतरेतर-विनिर्लुठित-परमाणु-क्षण-क्षयि-बोधेन बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् आचक्षीथास्, तद् अयुक्तं, यतस् तद्-बोधः किम् उपलब्धि-मात्रम् यद् वा निर्णयः? यद्य् आद्यः कल्पस् तदानुमानं विशीर्येत, निर्गोचरत्वात्, प्राथमकल्पिकेनैव निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनेन विरोध-भीरुतया सर्वथा वस्तु-ग्रहणाभ्युपगमात्, प्रमाण-कलिते च मानान्तर-वैयर्थ्याद्, अनवस्था-प्राप्तेः। अथ द्वितीयस्, तथा सति सर्वं निर्विकल्पकम् अप्रमाणताम् अश्नुवीत। न च निर्णयोऽनेकान्त-प्रकाशं बाधते,ऽपि तु समर्थयते, बहिर् अन्तश् च तथैव तद्-विजृम्भणात्। अथ सर्वथा वस्तु-ग्रहणेऽपि निर्विकल्पकं यत्रांशे पाश्चात्यं व्यवहार-कारि-व्यवसायम् उपजनयति, तत्रैव प्रमाणताम् आस्कन्दति नान्यत्रेति मन्येथास्, तथा सति यद्-अनन्तरम् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया पुरुषः प्रवर्तते स एव निर्णयः प्रामाण्यं स्वी-कुर्यान्, न निर्विकल्पकं, तज्-जनकत्वेऽपि सन्निकर्षादिवद् इत्य् आसज्येत। निर्विकल्पकम् अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वात् प्रमाणं, न व्यवसितिस्, तद्-विकल्पत्वाद् इति चेन्, नानुमितेर् अपि तद्वद् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। न च विपरीताकार-निराकरण-चतुरतयानुमितिर् विशेषवती, निर्णीतेर् अपि तद्-अपनोद-दक्षत्वाद्, असमारोप-विषयेऽप्रवृत्तेः। त्रि-रूप-लिङ्ग-जतया विशेषोऽनुमितेर् मानता-साधक इति चेत्, साक्षाद् अनुभवाद् उत्पादस् तर्हि निर्णीतेर् महापराध इति भवतो बालताम् ईक्षामहे। किं च, यथा निर्विकल्पकम् अलक्षितं सकल-व्यावृत्त-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणम् अपि कतिचिद्-अंश-विषयं विकल्पम् उत्थापयति, तथार्थ एवेन्द्रियालोकादि-सन्निकृष्टतया कतिचिन्-निजांश-विषयं साक्षाद्-विशद-विकल्पं जनयेद् इति किम् अजा-गल-स्तन-कल्प-निर्विकल्पक-कल्पनया? तावन्तो ऽंशा बहिर्-अर्थे विरुध्यन्त इति चेत्, पाटवापाटवादयो दर्शनेऽप्य् एकस्मिन् न विरुध्यन्त इति किं राज्ञाम् आज्ञा? तस्मान् न क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-लक्षकं क्वचित् कदाचिद् दर्शनं लक्षयन्ति भवन्तोऽपि, केवलं स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणतया न तद्-असत्तां प्रतिपद्यन्ते। स्वांश-व्यापिनं कालान्तरानुयायिनम् एकं बहिर् अन्तश् चार्थं बोधं च प्रकाशयन् प्रथमानो निर्णयः, न पुनर् निर्मूलकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाध्यत इति न भ्रान्तः। किं चास्य भ्रान्ततां कथयन् सर्व-प्रमाण-प्रमेय-व्यवस्थाम् उन्मूल्यति। तथा हि॒ यत् सत्त्व-बोध-रूपत्व-सुखत्वादिषु प्रमाणं तद् एव क्षण-क्षयित्व-स्वर्ग-प्रापण-शक्ति-युक्तत्वादिष्व् अप्रमाणम्॑ तथा यद् वस्तु नील-चतुरस्रोर्ध्वतादि-रूपतया प्रमेयं तद् एव मध्य-भाग-क्षण-विवर्तादिनाप्रमेयं॑ तथा यद् बहिर्-अर्थापेक्षया सविकल्पकं स्वप्नादि-दर्शनं वा भ्रान्तं तद् एव स्वरूपापेक्षयाभ्रान्तम्॑ तथा यन् निशीथिनी-नाथ-द्वयादिकं द्वित्वेऽलीकं तद् अपि धवलता-नियत-देश-चारितादाव् अनलीकम् इति निर्णयः। यदि तु विरोधाद् बिभ्यद्भिर् भवद्भिर् अयम् अपह्नूयते, किम् अपरम् ऐकान्तिकं प्रमाणं प्रमेयं चोररी-कृत्य स्वाकूतं प्रतिष्ठापयेयुर् इति सकौतुकं नश् चेतः।
[न्या०अ०२९।७] अथ ज्ञान-वाद्य् अद्वैत-प्रकाशम् अलक्षितम् अभ्युपेत्य तेन बाहुविध्यं दधानो बोधो बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् अभिदध्यात्, तद् अयुक्तम्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाद्, अलक्षित-निर्विकल्प-दर्शनस्य च प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्। अथ युक्तिर् बोधस्य वैविध्यं बाधेत, तथा हि॒ भ्रान्ताभ्रान्त-संवेदन-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, संविन्-मात्रस्य तु सर्वत्राव्यभिचारित्वाद्, अद्वयं संवेदनं विविक्त-युक्त्या प्रकाशमानम् अनादि-कालालीन-वासना-समुपजनित-संवृति-दर्शित-सत्ताकं सितासितादि-विविध-प्रतिभासं निराकुरुते। अत्र प्रतिविदध्महे॒ किम् अयम् अनेकाकारो बोधोऽद्वय-संवेदनाद् व्यत्यरैक्षीद् वा न वा। किं चातो, यदि व्यभैत्सीत्, कथम् अदृष्ट-तत्-कार्यत्वे व्यतिरिक्तोऽयं तद् अद्वयं संवेदनम् अनुमापयेत्? अव्यतिरेक-पक्षे पुनर् अनेकः सन्न् एक-संवेदन-तादात्म्येन प्रथमानः कथम् अद्वैतं नोद्दलयेत्? अथ संवृति-दर्शितत्वाद् अलीकतयास्य सितासिताद्य्-आकार-बहिर्-मुख-कालुष्यस्य बोधेन तात्त्विकेन सह भेदाभेद-विकल्पानुपपत्तिर् इति ब्रूषे, तथा सति परो बोधस्यापारमार्थिकत्वं अविद्या-दर्शितत्वाद्, अर्थ-सत्तायाः पुनस् तत्त्व-रूपता, सर्वत्राव्यभिचाराद् इति ब्रुवाणो दुर्निवारः स्यात्। जडस्य प्रकाशायोगात् संवित्तिः सत्या, नार्थ इति चेद्, एकस्यानेकतावभासाभावाद् अनेकान्तः सत्यो, नाद्वैतम् इति प्रतिजानीमहे। संवृत्याद्वयस्यापि नाना-प्रतिभासोऽविरुद्ध इति चेद्, अनाद्य्-अविद्या-बलाज् जडस्यापि चेतनतया प्रकाशो न विरुद्ध इति परस्यापि शठोत्तरं नातिदुर्लभं भवेत्। किं च, नानाकार-कलुषित-चैतन्य-सामान्यस्यान्यथानुपपत्ति-सामर्थ्यतस् तस्य सिद्धत्वाद् अद्वयं संवेदनम् असिद्धं साधयेद् अयम्, अन्यथा निर्निबन्धनतया साधनस्याप्रवृत्तेस्, तथा च स्थिर-स्थूराद्य्-उपलक्षितार्थांश-वशाद् विशकलित-परमाणु-क्षण-क्षयि-पर्याय-तादात्म्यं साधयन् तम् अनेकान्त-वादिनं न प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति, युक्तेर् उभयत्रापि तुल्यत्वात्। किं च, योऽयं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-निर्णयोऽसाव् अपि स्व-संवेदनापेक्षयाद्वय-रूप इति भवद्-अभिप्रायो॑ यथा चानवस्था-भीरुतया सर्वं ज्ञानं स्व-प्रकाशम् अभ्युपेतं, तथा सर्वो निश्चयः स्व-निश्चायकोऽभ्युपगन्तव्यो,ऽन्यथा तत्राप्य् अनवस्था-दोषोऽनुषज्येत, निश्चयाश् च सर्वथा स्वरूपं निश्चिनुयुर्, नैक-देशेन, यतो "निश्चयैर् यन् न निश्चीयते रूपं तत् तेषां विषयः कथम्" इति स्वयम् एव स्व-वधाय प्रलपितम्। तथा चाद्वयस्य क्षण-क्षयिणः स्वरूपस्य तैर् ग्रहणे विपरीतारोपाभावाद् आदित एव अनुत्थानं संसारस्येति युक्ति-रिक्त एवामुक्तताभिमानः स्यात्, न चैवम्, भव-भावस्य प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। तन् नायम् इतरेतराविनिर्लुठित-द्रव्य-पर्याय-प्रकाशो भ्रान्तस्, तद्-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाणान्तराभावाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।८] यदा तु शून्य-वादी ‘निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्न-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति पराभिप्राय-प्रवृत्तानुमान-बलाद् भ्रान्तताम् अस्य कथयेत्, तदा तं प्रति ‘सालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वाज्, जाग्रद्-दशा-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति विपरीतानुमानम् उपढौकनीयम्। स यदि दृष्टान्तस्य साध्य-विकलताम् उद्भावयेत्, तदा तद्-दृष्टान्तेऽपि सा दर्शनीया। यदि पुनर् असौ स्वप्न-प्रत्ययस्य निरालम्बनत्वं भवद्भिर् अभिप्रेतम् इति विलपन्न् आसितुं न दद्यात्, तदा स विकल्पतः पर्यनुयोज्यो॒ऽस्मद्-अभ्युपगमः प्रमाणं भवतोऽप्रमाणं वा? प्रमाणं चेद्, यथा तद्-बलाद् दृष्टान्त-समर्थनं तथा जाग्रत्-प्रत्यय-गोचरार्थ-समर्थनम् अपि किं न कुरुषे, कोऽयम् अर्ध-जरतीय-न्यायः? अथाप्रमाणम्, एवं सति स्वप्न-प्रत्यय-निरालम्बनता-साधकं प्रमाणान्तरं मृगणीयं, किम् अनेन कुश-काशावलम्बनेन। तत्रापि प्रमाणान्तरे विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ तत् किं निरालम्बनं सालम्बनं वा? निरालम्बनं चेन्, नान्य-प्रत्ययस्य निरालम्बनतां गदितुं पटिष्ठं, निर्गोचरत्वात्। अथ सालम्बनं, हन्त हतोऽसि, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्यया इति प्रतिज्ञात-क्षतेर्, अनेनैव व्यभिचाराद् इति शठः प्रतिशठाचरणेन निर्लोठनीयः। तन् नास्यानैकान्तिकत्वम्।
[न्या०अ०२९।९] विरुद्धता-शङ्का पुनर् दूरापास्त-प्रसरैव, प्रमाण-प्रकाशितेऽर्थे सर्व-वादिनां तथाभ्युपगमाविगानाद् इति। अनेन संशय-विरोधानवस्था-वैयधिकरण्यासम्भवादि-दूषणानि निर्मूलक-मिथ्या-विकल्पोत्थापितानि प्रतिभास-मुद्गर-निपात-निर्दलित-मस्तकत्वान् न जीवितुम् उत्सहन्त इति। तस्माद् असिद्धतादि-दोष-विना-कृतोऽयं तथा-प्रतिभास-लक्षणो हेतुर् अनेकान्त-गोचरतां प्रमाणस्य परान् अभ्युपगमयतीत्य् अलम् विस्तरेण। तस्मात् ‘तस्यैव तत्र प्रतिभासनात्ऽ॑ सर्व-संविदाम् अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१०] अयं च यथावस्थित-प्रमाण-व्यापार-पर्यालोचक-प्रमात्र्-अभिप्रायेण प्रमाण-गोचरो दर्शितः। नयस् तर्हि किं-भूतम् तं मन्यत इति वचनावकाशे सत्य् आह॒ एकेत्य्-आदि। अनन्त-धर्माध्यासितं वस्तु स्वाभिप्रेतैक-धर्म-विशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनम् आरोहयतीति नयः, प्रमाण-प्रवृत्तेर् उत्तर-काल-भावी परामर्श इत्य् अर्थस्॑ तस्य विषयो गोचरो मतोऽभिप्रेत एक-देशेनानित्यत्वादि-धर्म-लक्षणेन विशिष्टः पर-रूपेभ्यो विभिन्नोऽर्थः प्रमेय-रूपं, प्रमाणम् एवं-विधम् एवार्थं गृह्णातीति स्वाकुतेन तेन व्यवस्थापनाद् इति।
[न्या०अ०२९।११] अथवा प्रमाण-विषयां लक्षण-संख्या-गोचर-फल-रूपां चतुर्-विधां विप्रतिपत्तिं निराकृत्यात्रैव नय-गोचरं निरूपयन्न् आह॒ एकेत्य्-आदि। ननु चादि-वाक्येन प्रमाण-व्युत्पादन-मात्रं प्रतिज्ञानं, तत् किं अयम् अप्रस्तुतोऽत्र नय-गोचरः प्रतिपाद्यत इति। सत्यं, एवं मन्यते॒ न नयः प्रमाणाद् अत्यन्तं दूर-यायी, किं तर्हि तद्-अंश-भूत एव, नय-समुदाय-सम्पाद्यत्वात् प्रमाणस्यातस् तद्-व्युत्पादन-प्रतिज्ञानेऽसाव् अपि ‘तन्-मध्य-पतितस् तद्-ग्रहणेन गृह्यतऽ॑ इति-न्यायाद् गृहीत एव, तन् नायम् अप्रस्तुत इति।
[न्या०अ०२९।१२] अत्रापि पदार्थः स एव, केवलं वाक्यार्थ-भेदः। तथा हीहैवं घटना॒ नयस्य विषय एक-देश-विशिष्टोऽर्थो मतो नीतिविदाम् इति। ननु च यदि नयस्य प्रमाणान्तः-पातित्वेऽपि पृथग् गोचरः प्रतिपाद्यते, ततः प्रमाणवद् एतद्-विषया लक्षणादि-विप्रतिपत्तिर् अपि निराकर्तव्या। सत्यं, किं तु न परेषां नय-व्यवहारः प्रसिद्धो,ऽतो धर्मिणोऽभावात् तद्-गोचरा विप्रतिपत्तिर् नास्त्य् एव। न च ते तेन तत्त्वं प्रतिपादनीयास्, तत्त्व-प्रतिपादने प्रमाणस्यैव व्यापारान्, नयस्य पुनर् एक-देश-निष्ठत्वेन तत्-प्रतिपादन-सामर्थ्य-विकलत्वाद्, अत एवाचार्यस्य न तल्-लक्षणादि-स्वरूप-कथनेऽपि महानादरः। गोचरं पुनर् हेय-पक्षे काक्वा प्रक्षिपन् साक्षात् प्रतिपादयति॒ मा भूत् स्व-दर्शनान्तः-पातिनां मन्द-बुद्धीनां प्रमाण-प्रतिपन्नेऽप्य् अनेकान्तात्मके वस्तुन्य् एक-देश-समर्थनाभिनिवेश-लक्षणः कदाग्रह इति। अथवा स्व-दर्शनान्तः-पातिनः प्रत्य् अनेनैव गोचर-कथनेनोपलक्षणत्वाल् लक्षणादीन्य् अपि लक्षयति। तत्र प्रमाण-प्रतिपन्नार्थैक-देश-परामर्शो नय इति लक्षणं, सर्व-नय-विशेषानुयायित्वात् पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमत्वाच् चास्य। संख्यया पुनर् अनन्ता इति, अनन्त-धर्मत्वाद् वस्तुनस्, तद्-एक-धर्म-पर्यवसिताभिप्रायाणां च नयत्वात्, तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्व-सङ्ग्राहि-सप्ताभिप्राय-परिकल्पना-द्वारेण सप्त नयाः प्रतिपादिताः। तद् यथा -- ‘नैगम-सङ्ग्रह-व्यवहार-र्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवम्भूता नयाऽ॑ इति। अतोऽस्माभिर् अपि त एव वर्ण्यन्ते।
[न्या०अ०२९।१३] कथम् एते सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका इति चेद्, उच्यते॒ऽभिप्रायस् तावद् अर्थ-द्वारेण शब्द-द्वारेण वा प्रवर्तेत, गत्य्-अन्तराभावाद्॑ अर्थश् च सामान्य-रूपो विशेष-रूपो वा, शब्दोऽपि रूढितो व्युत्पत्तितश् च, व्युत्पत्तिर् अपि सामान्य-निमित्त-प्रयुक्ता तत्-काल-भावि-निमित्त-प्रयुक्ता वा स्यात्। तत्र ये केचनार्थ-निरूपण-प्रवणाः प्रमात्र्-अभिप्रायास् ते सर्वेऽप्य् आद्ये नय-चतुष्टयेऽन्तर्-भवन्ति। तत्रापि ये परस्पर-विशकलितौ सामान्य-विशेषाव् इच्छन्ति तत्-समुदाय-रूपो नैगमः। ये पुनः केवलं सामान्यं वाञ्छन्ति तत्-समूह-सम्पाद्यः सङ्ग्रहः। ये पुनर् अनपेक्षित-शास्त्रीय-सामान्य-विशेषं लोक-व्यवहारम् अवतरन्तं घटादिकं पदार्थम् अभिप्रयन्ति तन्-निचय-जन्यो व्यवहारः। ये तु क्षण-क्षयिणः परमाणु-लक्षणा विशेषाः सत्या इति मन्यन्ते तत्-सङ्घात-घटित ऋजुसूत्र इति। तथा ये रूढितः शब्दानां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति तन्-निवह-साध्यः शब्द इति। ये तु व्युत्पत्तितो ध्वनीनां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति नान्यथा तद्-वार-जन्यः समभिरूढ इति। ये तु वर्तमान-काल-भावि-व्युत्पत्ति-निमित्तम् अधिकृत्य शब्दाः प्रवर्तन्ते नान्यथेति मन्यन्ते तत्-सङ्घ-घटितः खल्व् एवम्भूत इति। तद् एवं न कश्चिद् विकल्पोऽस्ति वस्तु-गोचरो योऽत्र नय-सप्तके नान्तर्-यातीति सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका एते इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१४] साम्प्रतम् एषाम् एव प्रत्येकं मतम् उपवर्णयामः। तत्र गमनं गमः परिच्छेद इत्य् अर्थः। निश्चितो गमो निगमो विविक्त-वस्तु-ग्रहणं, स एव, प्रज्ञादेर् आकृति-गणतया स्वार्थिकाण्-प्रत्यय-विधानान् नैगमः। यदि वा निगम्यन्ते नियतं परिच्छिद्यन्त इति निगमा अर्थास् तेषु भवो योऽभिप्रायो नियत-परिच्छेद-रूपः स नैगम इति। अयं हि सत्ता-लक्षणं महा-सामान्यम् अवान्तर-सामान्यानि च द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्वादीनि तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारण-रूप-लक्षणान् अवान्तर-विशेषांश् चापेक्षया पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमान् सामान्याद् अत्यन्त-विनिर्लुठित-स्वरूपान् अभिप्रैति। तथा हि॒ किल संविन्-निष्ठाः पदार्थ-व्यवस्थितयो, न च सामान्य-ग्राहिणि विज्ञाने विशेषावभासोऽस्त्य्,ऽनुवर्तमानैकाकार-परामर्शेन तद्-ग्रहणाद्, अन्यथा सामान्य-ग्राहकत्वायोगात्। नापि विशेष-ग्रहण-दक्षे संवेदने सामान्यं चकास्ति, विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-पदार्थ-ग्राहितया तत्-प्रवृत्तेर्, अन्यथा विशेष-संवेदनत्वायोगात्। न चैतौ परस्पर-विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुम् युक्ताव्, अतिप्रसङ्गाद्, विभिन्न-प्रतिभासिनाम् अपि निखिलार्थात्मनाम् ऐक्य-प्राप्तेः। एवं च प्रमाणयति॒ परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ, पार्थक्येनोपलब्धेर्, इह यद् यत् पार्थक्येनोपलभ्यते तत् तत् परस्पर-विश्लिष्टं द्रव्यं, तद् यथा -- देवदत्त-यज्ञदत्ताव् इति, पार्थक्येन चोपलभ्येते सामान्य-विशेषाव्, अतः परस्पर-विभिन्नाव् इति। न सामान्यात् पृथग् विशेषोपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम्। सामान्य-व्याप्तस्येति चेन्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः, सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात्॑ ततश् च तेन बोधेन विविक्त-विशेष-ग्रहणाभावात् तद्-वाचकं ध्वनिं तत्-साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता॑ न चैतद् अस्ति, विशेषाभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्ति-दर्शनात्। तस्माद् विशेषम् अभिलषता तत्र च व्यवहारं प्रवर्तयता तद्-ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा सामान्यम् अपि विविक्ताकारतया स्व-ग्राहिणि ज्ञाने यदि न प्रकाशेत, तदा तद्-गोचराभिमत-संवेदनेन विशेषस्याप्य् आकलनात् सामान्याभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्तेर् उच्छेदस् तथैव वक्तव्यो, विविक्त-सामान्य-ग्राहि-बोध-मूलकत्वात् तयोस्, तद्-अनिष्टौ तयोर् अप्य् अभावापत्तेः। न च सामान्यं विशेषं वा तिरस्-कृत्य केवलस्य विशेषस्य सामान्यस्य वाभ्युपगमः कर्तुं युक्तो, द्वयोर् अपि स्व-ग्राहि-ज्ञाने प्रतिभासमानतया विशेषाभावात्। तस्माद् एतौ द्वाव् अपीतरेतर-विशकलिताव् अङ्गी-करणार्हाव् इति नैगमः।
[न्या०अ०२९।१५] अधुना सङ्ग्रहाभिप्रायो वर्ण्यते। तत्र सङ्गृह्णात्य् अशेष-विशेष-तिरो-धान-द्वारेण सामान्य-रूपतया जगद् आदत्त इति सङ्ग्रहः। अयं हि मन्यते॒ भाव-लक्षण-सामान्याद् व्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा विशेषाः परिकल्प्येरन्न्, अव्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा, गत्य्-अन्तराभावात्। तत्र यद्य् आद्यः पक्षस्, तदा निःस्वभावतां ते स्वी-कुर्युर्, भाव-व्यतिरेकित्वाद्, गगन-कुसुमादिवत्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तर्हि भाव-मात्रम् आपद्यन्ते। तथा हि॒ भाव-मात्रं विशेषास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वाद्, इह यद् यतोऽव्यतिरिक्तं तत् तद् एव भवति, तद् यथा -- भावस्यैव स्वरूपम्, अव्यतिरेकिणश् च विशेषा, अतस् तद्-रूपा एव। ननु च यदि भाव-मात्रम् एव तत्त्वं तदा तस्य सर्वत्राविशेषाद् य एते प्रतिप्राणि-प्रसिद्धाः स्तम्भेभ-कुम्भाम्भो-रूहादि-विशिष्ट-वस्तु-साध्या व्यवहारास् ते सर्वेऽपि प्रलयम् आपद्येरन्न्, अतो विशेषा अपि विविक्त-व्यवहार-हेतवोऽभ्युपगन्तव्याः। नैतद् अस्ति, व्यवहारस्यानाद्य्-अविद्या-बल-प्रवर्तितत्वात्, तेन पारामर्थिक-प्रमाण-प्रतिष्ठित-तत्त्व-प्रतिबन्धाभावात्। किं च, विशेषाग्रहो विशेषेण त्याज्यो, विशेष-व्यवस्थापक-प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ भेद-रूपा विशेषाः, न च किञ्चित् प्रमाणं भेदम् अवगाहते, प्रत्यक्षं हि तावद् भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षत्-कर्तुं युक्तम्, नाभावं, तस्य सकल-शक्ति-विरह-रूपतया तद्-उत्पादने व्यापाराभावाद्, अनुत्पादकस्य च साक्षात्-करणे सर्व-साक्षात्-करण-प्रसङ्गात्, तथा च विशेषाभावात् सर्वो द्रष्टासर्व-दर्शीस्यात्। अनिष्टम् चैतद् भवतां, तस्माद् भाव-ग्राहकम् एव तद् एष्टव्यम्। स च भावः सर्वत्राविशिष्ट इति तथैव तेन ग्राह्यस्, तद्-उत्तर-काल-भावी पुनर् विकल्पो घटोऽयं पटादिर् न भवतीत्य् एवम्-आकारो व्यवहारं रचयन्न् अविद्या-मूलत्वान् न प्रमाणं, तन् न प्रत्यक्षाद् विशेषावगतिः। नाप्य् अनुमानादेः, प्रत्यक्ष-मूलकत्वाच् छेष-प्रमाण-वर्गस्य, तस्मात् सामान्यम् एव परमार्थो, न विशेषा इति सङ्ग्रहः।
[न्या०अ०२९।१६] साम्प्रतं व्यवहार-मतम् उच्यते। तत्र व्यवहरणं व्यवह्रियते वानेन लौकिकैर् अभिप्रायेणेति व्यवहारः। अयं तु मन्यते॒ यथा लोक-ग्राहम् एव वस्त्व् अस्तु, किम् अनयादृष्टाव्यवह्रियमान-वस्तु-परिकल्पन-कष्ट-पिष्टिकया? यद् एव च लोक-व्यवहार-पथम् अवतरति तस्यानुग्राहकं प्रमाणम् उपलभ्यते, नेतरस्य, न हि सामान्यम् अनादि-निधनम् एकं सङ्ग्राहाभिमतं प्रमाण-भूमिस्, तथानुभवाभावात्, सर्वस्य सर्व-दर्शित्व-प्रसङ्गाच् च। नापि विशेषाः परमाणु-लक्षणाः क्षण-क्षयिणः प्रमाण-गोचरस्, तथा प्रवृत्तेर् अभावात्। तस्माद् इदम् एव निखिल-लोकाबाधितं प्रमाण-प्रसिद्धं कियत्-काल-भावि-स्थूरताम् आबिभ्राणम् उदकाहरणाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमं घटादिकं वस्तु-रूपं पारमार्थिकम् अस्तु, पूर्वोत्तर-काल-भावि-तत्-पर्याय-पर्यालोचना पुनर् अज्यायसी, तत्र प्रमाण-प्रसराभावात्, प्रमाणम् अन्तरेण च विचारस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्। अवस्तुत्वाच् च तेषां, किं तद्-गोचर-पर्यालोचनेन? तथा हि॒ पूर्वोत्तर-काल-भाविनो द्रव्य-विवर्ताः क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणा वा विशेषा न कञ्चन लोक-व्यवहारम् उपरचयन्ति, तन् न ते वस्तु-रूपा, लोक-व्यवहारोपयोगिनां एव वस्तुत्वाद् इति व्यवहारः।
[न्या०अ०२९।१७] साम्प्रतं ऋजुसूत्राभिप्रायः कथ्यते। तत्र र्जु प्रगुणम् अकुटिलम् अतीतानगत-वक्र-परित्यागाद् वर्तमान-क्षण-विवर्ति-वस्तुनो रूपं सूत्रयति निष्टङ्कितं दर्शयतीत्य् ऋजुसूत्रः। तथा ह्य्॒ अस्याभिप्रायो --ऽतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्म-लाभत्वात् खर-विषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया सकल-शक्ति-विरह-रूपत्वान् नार्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमत्वम्, अर्थ-क्रिया-क्षमं च वस्तु॑ तद्-अभावान् न तयोर् वस्तुत्वम् इति। वर्तमान-क्षणालिङ्गितं च पुनर् वस्तु-रूपं समस्तार्थ-क्रियासु व्याप्रियत इति तद् एव पारमार्थिकम्। तद् अपि च निरंशम् अभ्युपगन्तव्यम्, अंश-व्याप्तेर् युक्ति-रिक्तत्वाद्, एकस्यानेक-स्वभावताम् अन्तरेणानेक-स्वावयव-व्यापनायोगात्। अनेक-स्वभावतैवास्त्व् इति चेन्, न, विरोध-व्याघ्राघ्रातत्वात्। तथा हि॒ यद्य् एकः स्वभावः कथम् अनेकः? अनेकश् चेत् कथम् एकः? एकानेकयोः परस्पर-परिहारेणावस्थानात्॑ तस्मात् स्वरूप-निमग्नाः परमाणव एव परस्परोपसर्पण-द्वारेण कथञ्चिन् निचय-रूपताम् आपन्ना निखिल-कार्येषु व्यापार-भाज इति त एव स्वलक्षणं, न स्थूरतां धारयत् पारमार्थिकं इति। किं च, प्रमाणतोऽर्थ-व्यवस्था, न च प्रमाणं देश-काल-व्याप्ति-ग्रहणे किञ्चन प्रवर्तते, सर्व-प्रमाणानां वर्तमान-प्रकाश-रूपत्वात्। तथा हि॒ प्रत्यक्षं तावद् रूपालोक-मनस्कार-चक्षुर्-लक्षण-कारण-चतुष्टयाल् लब्ध-सत्ताकं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशते, अतीत-वर्त्स्यत्-क्षणयोर् असन्निहितत्वात्, ततश् च तत् तत्-काल-सम्बद्धम् एव वस्तुनो रूपं साक्षात्-कर्तुं क्षमते न पूर्वम् अपरं वासन्निधानाद् एव। यदि पुनर् विनष्टम् अपि पूर्व-क्षण-वर्ति-रूपमाकलयेत्, तदा विनष्टत्वाविशेषान् निरवधिः क्षण-परम्परा तत्र प्रतीयेत, तथा च सति सङ्कलिकयानादि-जन्म-परम्परा-ग्राहि प्रत्यक्षम् अनुषज्येत। एवम् अनागत-क्षण-ग्रहणेऽपि योज्यम्॑ अनिष्टं चैतत्, तस्मात् तद् वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-दक्षम् एवेत्य् अभ्युपगन्तव्यम्। ननु च यदि क्षण-भङ्गुरताम् अर्थात्मनाम् अध्यक्षम् अवलोकयति, तदा नीलतेव प्रतिभासमाना सा विप्रतिपत्ति-गोचरं न यायाद् इति तद्-विषयो लौकिकानां व्यवहारः प्रवर्तेत, न चैतद् अस्ति, स्थिरता-द्वारेण व्यवहार-प्रवृत्तेर् इति। अत्र प्रतिविधीयते -- साक्षात्-कुर्वाणा अपि क्षण-विनश्वरतां सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्ध-बुद्धयो मन्दा नाध्यवस्यन्त्य्, अनादि-काल-प्ररूढ-वासना-प्रबोध-समुपजनित-मिथ्या-विकल्प-सामर्थ्याच् च विपर्यस्त-स्थिरता-व्यवहारं प्रवर्तयन्ति, तन् नायम् अध्यक्षस्यापराधो,ऽपि तु प्रमात्ःणाम् एव। तथा घनाकारोऽपि प्रत्यक्ष-पृष्ठ-भावि-मिथ्या-विकल्प-सन्दर्शित एव, विविक्त-दर्शने तत्-प्रतिभासायोगात्, कर-चरण-शिरो-ग्रीवादयो ह्य् अवयवाः परस्पर-विभक्ता एव तत्र प्रतिभान्ति, न व्याप्य्-आकारो, न च तेऽपि स्वांश-व्यापिनः प्रतिभान्ति, तद्-अवयवानाम् अपीतरेतर-विशकलित-रूपाणां प्रतिभासात् तावद् यावत् परमाणव एव प्रथन्ते, व्यापि-रूपस्य विचाराक्षमत्वाद् इत्य् उक्त-प्रायम्। नाप्य् अनुमानात् स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिः, प्रत्यक्ष-परिगृहीतं हि सम्बन्धम् आसाद्यानुमानं प्रवर्तेत, यदा च तत् क्षण-भङ्गुर-विविक्तांश-ग्रहण-चातुर्यम् आबिभ्रद् दर्शितं तदानुमानम् अपि तत्-प्रतिबन्ध-मूलकं तद्-गोचरम् एव पारम्पर्येण प्रतिष्ठापयति, स्व-प्रतिभासिनो रूपस्यालीकतया तत्-प्रतिष्ठापन-द्वारेणैव तस्य प्रामाण्यात्। ननु च स्मरण-प्रत्यभिज्ञानादीनि स्थिर-स्थूर-वस्तु-व्यतिरेकेण नोपपद्यन्ते, पूर्वम् अदृष्टे तद्-अभावात्, पुरुषाद्य्-अवयविनां स्मरणात् प्रत्यभिज्ञानाच् च। नैतद् अस्ति, तेषाम् अलीक-वासना-प्रबोधोत्थापितत्वेन प्रामाण्यायोगात्। किं च, तान्य् अपि स्वयं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशन्ते, विप्लव-वशात् तु स्वरूपम् एव वासना-सम्पादितातीतार्थ-रूपतया व्यवस्यन्ति, घनाकारं च तस्यासन्तम् अध्यारोपयन्ति॑ तन् न तेभ्योऽपि व्यापि-वस्तु-सिद्धिः। तस्माद् व्यापिनि रूपे प्रमाणानवतारात् परस्पर-विश्लिष्टाः परमाणव एव परमार्थत इति र्जुसूत्रः।
[न्या०अ०२९।१८] तद् इदम् अर्थ-स्वरूप-निरूपण-निपुणानां नयानां मतम् उपवर्णितम्॑ अधुना शब्द-विचार-चतुराणाम् उपवर्ण्यते। तत्र त्रयाणाम् अपि शब्दादीनाम् इदं साधारणमाकूतं, यद् उत शब्द एव परमार्थो नार्थस्, तस्य तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्। पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धेः कथम् अव्यतिरेक इति चेत्, प्रमाणाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ न व्यतिरिक्तोऽर्थः शब्दात्, तत्-प्रतीतौ तस्य प्रतीयमानत्वाद्, इह यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तं भवति, तद् यथा -- शब्दे प्रतीयमाने तस्यैव स्वरूपं, प्रतीयते च शब्दे प्रतीयमानेऽर्थो,ऽतोऽसौ ततोऽव्यतिरिक्त इति। अगृहीत-सङ्केतस्य घट-शब्द-श्रवणेऽपि घट-प्रतीतेर् अभावाद् व्यतिरिक्त इति चेद्, एवं तर्हि विषस्य मारणात्मकत्वं तद्-अज्ञस्य न प्रतिभातीति तत् ततो व्यतिरिक्तम् आपद्येत, न चैतद् अस्ति, तद्-व्यतिरेकाविशेषेण गुड-खण्डवद् विषस्याप्य् अमारकत्वापत्तेः, सम्बन्धस्य च व्यतिरिक्तेन सह प्राग् एवापास्तत्वात्॑ तन् नाबुद्ध-प्रमातृ-दोषेण वस्तुनोऽन्यथात्वम्, अन्यथान्धो रूपं नेक्षत इति तद्-अभावोऽपि प्रतिपत्तव्य इति। ये निरभिधाना वर्तन्तेऽर्थास् तेषां शब्दात् पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धिर् इति चेन्, न, निरभिधानार्थाभावात्, केवलं केचिद् विशेष-शब्दैः सङ्कीर्त्यन्ते, केचित् सामान्य-ध्वनिभिर् इत्य् एतावान् विशेषः स्यात्। यदि वा सकलार्थ-वाचका विशेष-धवनयो न सन्तीति नास्त्य् अत्र प्रमाणम्। ततश् च सर्वेऽर्था विद्यमान-स्व-वाचका,ऽर्थत्वाद्, घटार्थवद् इति प्रमाणात् सर्वेषां स्व-वाचकत्वेन पूर्वोक्त-युक्तेः शब्दाद् अपार्थक्य-सिद्धिः। तस्मान् न परमार्थतोऽर्थः शब्दातिरिक्तोऽस्त्य्, उपचारतः पुनर् लौकिकैर् अपर्यालोचित-परमार्थैर् व्यवह्रियते। असाव् अप्य् औपचारिकः शब्दात्मको वार्थः प्रतिक्षण-भङ्गुरः स्वी-कर्तव्यो, वर्णानां क्षण-ध्वंसिता-प्रतीतेर्, ऋजुसूत्र-प्रतिपादित-युक्ति-कलापाच् च।
[न्या०अ०२९।१९] साम्प्रतम् एतेषाम् एव प्रत्येकम् अभिप्रायः कथ्यते। तत्र शब्दो॒ रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिद् अर्थे प्रवर्तन्ते॑ यथेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः, तेषां सर्वेषाम् अप्य् एकम् अर्थम् अभिप्रैति किल प्रतीति-वशाद्, यथा शब्दाव्यतिरेकोऽर्थस्य प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वं वानेकत्वं वा प्रतिपादनीयं॑ न चेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थ-वाचितया कदाचन प्रतीयन्ते, तेभ्यः सर्वदैवैकाकार-परामर्शोत्पत्तेर्, अस्खलद्-वृत्तितया तथैव व्यवहार-दर्शनात्। तस्माद् एक एव पर्याय-शब्दानाम् अर्थ इति शब्दः, शब्द्यत आहूयतेऽनेनाभिप्रायेणार्थ इति निरुक्ताद् एकार्थ-प्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्याय-ध्वनीनां प्रयोगाद् इति।
[न्या०अ०२९।२०] साम्प्रतं समभिरूढ-मतम् उपवर्ण्यते। तत्र सम् एकी-भावेनाभिरोहति व्युत्पत्ति-निमित्तम् आस्कन्दति शब्द-प्रवृत्तौ योऽभिप्रायः स समभिरूढः। अयं हि पर्याय-शब्दानां प्रतिविभक्तम् एवार्थम् अभिमन्यते, तद् यथेन्दनाद् इन्द्रः, परमैश्वर्यम् इन्द्र-शब्द-वाच्यं परमार्थतस्, तद्वत्य् अर्थे पुनर् उपचारतः प्रवर्तते, न वा कश्चित् तद्वान्, सर्व-शब्दानां परस्पर-विभक्तार्थ-प्रतिपादकतयाश्रयाश्रयि-भावेन प्रवृत्त्य्-असिद्धेः। एवं शकनाच् छक्रः, पूर्-दारणात् पुरन्दर इत्य्-आदि भिन्नार्थत्वं सर्व-शब्दानां दर्शयति॑ प्रमाणयति च॒ पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थाः, प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकत्वाद्, इह ये ये प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकास् ते ते भिन्नार्थाः, यथेन्द्र-घट-पुरुष-शब्दा विभिन्नार्था, विभिन्न-व्युत्पत्ति-निमित्तकाश् च पर्याय-शब्दा अप्य्, अतोऽभिन्नार्था इति। यत् पुनर् अविचारित-प्रतीति-बलाद् एकार्थाभिधायकत्वं प्रतिपाद्यते तद् अयुक्तम्, अतिप्रसङ्गात्। तथा हि॒ यदि युक्ति-रिक्ता प्रतीतिर् एव शरणी-क्रियते तदा मन्द-मन्द-प्रकाशे दवीयसि देशे सन्निविष्ट-शरीरा विभिन्ना अपि निम्ब-कदम्बाश्वत्थ-कपित्थादय एक-तर्व्-आकारताम् आबिभ्राणाः प्रतीयन्त इत्य् एकतयैवाभ्युपगन्तव्याः। न चैतद् अस्ति, विविक्त-तत्-स्वरूप-ग्राहि-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वेन पूर्व-प्रतीतेर् विविक्तानाम् एव तेषाम् अभ्युपगमात्, तन् नैकार्थ-वाचिनो ध्वनयः सन्ति, रूढिः पुनर् अविचारित-तद्-अर्थानाम् इति समभिरूढः।
[न्या०अ०२९।२१] साम्प्रतम् एवम्भूताभिप्रायः प्रतिपाद्यते। तत्रैवं-शब्दः प्रकार-वचनस्, ततश् चैवं यथा व्युत्पादितस् तं प्रकारं भूतः प्राप्तो यः शब्दः स एवम्भूतः॑ तत्-समर्थन-प्रधानोऽभिप्रायोऽप्य् एवम्भूतस्, तद्-विषयत्वात्, विषय-शब्देन च विषयिणोऽभिधानात्। अयं हि यस्मिन्न् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्ति-निमित्तम् अर्थो यदैव विवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानम् अभिप्रैति, न सामान्येन। यथोदकाद्य्-आहरण-वेलायां योषिद्-आदि-मस्तकारूढो विशिष्ट-चेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते, न शेषो, घट-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्त-शून्यत्वात्, पटादिवद् इति। अतीतां भाविनीं वा चेष्टाम् अधिकृत्य सामान्येनैवोच्यत इति चेन्, न, तयोर् विनष्टानुत्पन्नतया शश-विषाण-कल्पत्वात्॑ तथापि तद्-द्वारेण शब्द-प्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्तयितव्यो, विशेषाभावात्। किं च, यद्य् अतीत-वर्त्स्यच्-चेष्टापेक्षया घट-शब्दोऽचेष्टावत्य् अपि प्रयुज्येत, कपाल-मृत्-पिण्डादाव् अपि तत्-प्रवर्तनं दुर्निवारं स्यात्, विशेषाभावात्, तस्माद् यत्र क्षणे व्युत्पत्ति-निमित्तम् अविकलम् अस्ति तस्मिन्न् एव सोऽर्थस् तच्-छब्देन वाच्य इत्य् एवम्भूतः।
[न्या०अ०२९।२२] तद् एवम् अनेक-धर्म-परीतार्थ-ग्राहिका बुद्धिः प्रमाणं, तद्-द्वारायातः पुनर् एक-धर्म-निष्ठार्थ-समर्थन-प्रवणः परामर्शः शेष-धर्म-स्वी-कार-तिरस्-कार-परिहार-द्वारेण वर्तमानो नयः, स च धर्माणाम् आनन्त्याद् अनन्त-भेदस्, तथापि सर्व-सङ्ग्राहकाभिप्राय-परिकल्पन-मुखेनैवं सप्त-भेदो दर्शितः। अयम् एव च स्वाभिप्रेत-धर्मावधारणात्मकतयाशेष-धर्म-तिरस्-कार-द्वारेण प्रवर्तमाणः परामर्शो दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते॑ तद्-बल-प्रभावित-सत्ताका हि खल्व् एते पर-प्रवादाः। तथा हि॒ नैगम-नय-दर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। सङ्ग्रहाभिप्राय-प्रवृत्ताः सर्वेऽप्य् अद्वैत-वादाः सांख्य-दर्शनं च। व्यवहार-नयानुपाति प्रायश् चार्वाक-दर्शनम्। ऋजुसूत्राकूत-प्रवृत्त-बुद्धयस् ताथागताः। शब्दादि-नय-मतावलम्बिनो वैयाकरणादय इति। अथेत्थम् अभिदधीथा, यथा॒ कथम् एतेऽवधारण-द्वारेण स्वकम् अर्थं समर्थयन्तस् तद्-विपरीतं निराकुर्वाणा दुर्नयतां प्रतिपद्यन्त इत्य्, अत्रोच्यते -- एवं प्रवृत्तौ निर्गोचरत्वान्, निर्गोचरस्य नयत्वायोगात्। तथा हि॒ नयति केनचिद् अंशेन विशिष्टम् अर्थं प्रापयति योऽभिप्रायः स नयः, स्वाभिप्रेत-धर्माच् छेष-धर्म-प्रतिक्षेप-द्वारेण तु प्रवृत्तो न किञ्चिन् नयत्य्, एक-धर्मालिङ्गितस्य वस्तुनोऽसम्भवाद्, बहिर् अन्तश् चानेक-धर्म-परिकरित-स्वभावस्य तस्य प्रतिभासात्, तद्-अपह्नव-कारिणां कदभिप्रायाणां प्रतिभास-बाधितत्वेनालीकत्वात्।
[न्या०अ०२९।२३] तथा हि॒ यः तावन् नैगम-नयः परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ प्रत्यपीपदत्, तद् अयुक्तम्। तयोस् तथा कदाचन प्रतिभासाभावात्। यच् चोक्तम्॒ अनुवर्तमानैकाकार-परामर्श-ग्राह्यं सामान्यं यत्र न तत्र विशेष-प्रतिभासो, यत्र च विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-बोध-निर्ग्राह्यो विशेषो न तत्र सामान्यावगतिस्, तद्-वचन-मात्रम् एव, धव-खदिर-पलाशादि-समस्त-विशेषापसारणे वृक्षत्वादि-सामान्य-प्रतिभासाभावात्। दूराद् विशेषाग्रहणेऽपि केवलं तच् चकास्तीति चेन्, न, तत्राप्य् अभ्यन्तरी-भूत-विशेष-प्रतिभासात्, तद्-विरहे शश-विषाण-रूपत्वात्। एवं विशेषा अपि न सामान्याद् अत्यन्त-व्यतिरेकिणः प्रतिभान्ति, तन्-निमग्नानाम् एव तेषां ग्रहणाद्, इतरथा सत्तातोऽतिरिच्यमाना भावा निःस्वभावताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। तथा वृक्षत्वादि-सामान्येभ्योऽपि भेदिनो वृक्षादयो न स्युस्, तद्-अभेद-निबन्धनत्वात् तत्-स्वरूप-स्थितेः। तस्मात् तद् एव संवेदनम् उपसर्जनी-कृत-वैषम्यं प्रधानी-कृतैकाकारं सामान्यं गृह्णातीत्य् उच्यते, न्यक्-कृत-समत्वम् उत्कलित-नानात्वं पुनर् विशेष-ग्रहीति, समत्व-नानात्वयोः कथञ्चिद् भेदाभेदिनोः परस्परं सर्वार्थेषु भावात्, तद्-अभावे तथा-विध-प्रतिभासानुपपत्तेः। एतेन यद् अवादि "न चैतौ विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुं युक्ताव्" इत्य्-आदि, तद् अपास्तम् अवगन्तव्यं, विभिन्नयोः प्रतिभासाभावात्। व्यवहारोऽपि सर्वः प्रधानोपसर्जन-द्वारेण कथञ्चिद् इतरेतराविनिर्लुठित-सामान्य-विशेष-साध्य एव॑ न हि सामान्यं दोह-वाहादि-क्रियायाम् उपयुज्यते, विशेषाणाम् एव तत्रोपयोगान्, नापि विशेषा एव तत्-कारिणः, गोत्व-शून्यानां तेषां वृक्षाद्य्-अविशिष्टतया तत्-करण-सामर्थ्याभावात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेके सामान्य-विशेषयोर् वृक्षं छिन्धीति चोदितः किम् इति तद्-विशेषे पलाशादौछेदं विधत्ते? तत्र तस्य समवायाद् इति चेन्, न, समवाय-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, भावेऽपि विश्लिष्टयोर् अभेद-बुद्ध्य्-उत्पादनाक्षमत्वात्, तस्यापि व्यतिरिक्ततया पदार्थान्तराविशेषान् नित्यत्वैकत्व-सर्व-गतत्वादिभिश् च सर्वत्र तत्-करण-प्रसङ्गाच् च। यत् पुनर् अवादीर्, यद् उत॒ यदि सामान्यं विशेष-निष्ठं, विशेषो वा सामान्य-व्याप्तः समुपलभ्येत, ततो विविक्तयोस् तयोः क्वचिद् अनुपलम्भाद् योऽयं विविक्तेषु सामान्येषु विशेषेषु चाभिधानार्थ-क्रिया-लक्षणो व्यवहारः स समस्तः प्रलयं यायाल्, लोली-भावेन तद्-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, तद् अप्य् असमीचीनं, यतो यद्य् अपि परस्पराविविक्तयोः सामान्य-विशेषयोः सर्वत्रोपलम्भस्, तथापि यत्रैव प्रमातुर् अर्थित्वं तद् एव सामान्यं, विशेषान् वा प्रधानी-कृत्य तद्-गोचरं ध्वनिम् अर्थ-क्रियां वा प्रवर्तयतीतरस्याप्य् उपसर्जन-भावेन तत्र व्यापारात्, तद्-विकलस्येतरस्यापि शश-विशाणायमानतया क्वचिद् अनुपयोगात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेकिणि विशेषेभ्यः सामान्ये वृत्ति-विकल्पोपलम्भ-नूतन-विशेष-सम्बन्धादि-द्वारेण दूषण-मुद्गर-कदम्बकं मूर्धनि पतद् दुर्विषहं स्यात्। तथा हि॒ तत् तेषु कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वा? सामस्त्य-पक्षे प्रतिविशेषं परिसमाप्ततया सामान्य-बहुत्व-प्रसङ्गो,ऽनिष्टं चैतद्, एकत्वाभुपगम-क्षतेः। एकदेशेन वर्तने पुनर् यावन्तो विशेषास् तावन्तस् तद्-अंशाः प्रसजन्ति, न चैतद् अस्ति, सामान्यस्य निरवयवत्वात्॑ सावयवत्वेऽपि पुनस् तेऽभिन्ना भिन्ना वा। यद्य् अभिन्ना विशेषास्, तर्ह्य् अभेदिनः किं नेष्यन्ते, विशेषाभावात्। भेद-पक्षे पुनस् तेष्व् अपि तत् कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वेति? तद् एव चोद्यम् अलब्ध-परिनिष्ठम् अवतरति, तन् नात्यन्त-भेदिनो वृत्तिः सम्भवति। किं च, यद्य् एकं सामान्यं भेदवत् समस्त-विशेषेषु वर्तेत, तदैक-विशेषोपलम्भ-काले तद् उपलम्भ्यते न वा? यद्य् आद्यः पक्षस्, तस्यैकतया सर्वत्रोपलम्भात्, व्याप्य-ग्रहणाभावे व्यापक-ग्रहणासिद्धेर्, निखिल-तद्-व्याप्य-विशेष-ग्रहणम् आसज्येत, न चैतद् अस्ति, पुरो-वर्ति-विशेषस्यैव साक्षात्-करणाच्, छेष-विशेषाणाम् असन्निधानात्॑ सन्निहित-विशेष-निष्ठम् एव तद् उपलभ्यते। तस्यैव तद्-व्यञ्जकत्वाद्, इतरेषां तद्-अभावाद् इति चेन् नैक-स्वभावस्य खण्डशो व्यञ्जनायोगात् सन्निहित-विशेष-व्यञ्जितम् एव तत् सर्वत्र स्वभावान्तराभावात् सर्व-विशेष-गतं च तद्-रूपम्, अतस् तद्-दर्शनं केन वार्येत। अथ द्वितीयः कल्पस्, तथा सति यथैक-विशेषोपलम्भ-समये नोपलभ्यते, तथा शेष-विशेषोपलम्भ-कालेऽपि नोपलभ्येत, विशेषाभावात्। अतस् तद्-अभाव एवोक्तः स्यात्, केवलस्योपलम्भाभावात्। उपलम्भेऽपि स्व-स्वभाव-स्थितेर् विशेष-रूपतापत्तिः। तथा चिरन्तन-विशेष-व्यवस्थित-सत्ताकं तन् नूतन-विशेषोत्पादे सति कथं तेन सह सम्बन्धम् अनुभवेत्? न तावद् विशेषान्तरेभ्यस् तद् उत्पित्सु-विशेष-देशं गन्तुम् अर्हति, निष्क्रियत्वात्। नापि तत्रैवाभवद्, विशेषोत्पादात् प्राक् तद्-देशे तद्-उपलम्भाभावात्। नापि विशेषेणैव सहोत्पद्यते, नित्यत्वान्, नित्यस्य चोत्पत्ति-विरोधात्। अथैतद्-दोष-परिजिहीर्षया तत् सक्रियाकम् अभिधीयेत, तथापि पूर्व-व्यक्ति-त्यागेन वा नूतन-विशेष-देशम् आक्रामेत्, तद्-अभावेन वा? न तावद् अद्यः पक्षश्, चिरन्तन-व्यक्तीनां सामान्य-विकलतया तत्-सम्बन्ध-साध्य-बुद्धि-ध्वनि-विरह-प्रसङ्गात्। न चैतद् अस्त्य्, अपरापर-विशेषोत्पादेऽपि प्राचीन-व्यक्तिषु तद्-दर्शनात्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तद् अप्य् असम्बद्धं, निरवयवस्य पूर्व-व्यक्ति-त्याग-वैकल्ये सत्य् उत्पित्सु-व्यक्तिं प्रतिगमनाभावात्। सावयव-पक्षस्य पुनः प्राग् एवापास्तत्वान्, नैतद्-अभ्युपगम-द्वारेण परिहारः श्रेयान्। अन्यच् च॒ व्यतिरिक्त-सामान्य-सम्बन्धाद् यदि भावाः समाना, न स्वरूपेण, तदा सत्त्व-सम्बन्धात् प्राग् भावाः सन्तोऽसन्तो वा। सन्तश् चेद् अपार्थकः सत्ता-सम्बन्धो,ऽन्यथानवस्था प्रसज्येत, पुनः-सत्तान्तर-सम्बन्धानिवारणात्। असन्तश् चेद् अत्यन्तासताम् अपि गगनारविन्दादीनां सत्ता-सम्बन्धाद् भाव-रूपतापद्येत। एवं द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्व-गोत्वादि-सामान्येष्व् अपि समस्तम् एतद् वाच्यम्, एक-योग-क्षेमत्वात्, तन् न परस्परम् अत्यन्त-व्यतिरेकिणौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चन घटाम् आटीकेते। अत एव तत्-समर्थन-प्रवणस् तत्-तादात्म्य-प्रतिक्षेपकोऽभिप्रायो निरालम्बनत्वान् नैगम-दुर्नय-व्यपदेशम् आस्कन्दति, तादात्म्योपेक्षयैव सामान्य-विशेष-व्यतिरेक-समर्थकस्य नैगम-नयत्वाद्, व्यतिरेकिणोर् अपि तयोर् वस्तुनि कथञ्चिद् भावाद्, इतरथा विवक्षयापि तथा दर्शयितुम् अशक्यत्वात्, प्रधानोपसर्जन-भावस्य द्वय-निष्ठत्वात्, अत्यन्त-तादात्म्ये तत्-कारिण्या विवक्षाया अपि निर्गोचरता-प्रसङ्गात्। तस्मात् कथञ्चिद् भेदाभेदिनाव् एवैतौ, तद्-अन्यतर-समर्थकः पुनर् निरालम्बनत्वाद् दुर्नयतां स्वी-करोतीति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।२४] तथा सङ्ग्रहोऽप्य् अशेष-विशेष-प्रतिक्षेप-मुखेन सामान्यम् एकं समर्थयमानो दुर्नयः, तद्-उपेक्षा-द्वारेणैव तस्य नयत्वात्, विशेष-विकलस्य सामान्यस्यासम्भवात्। तथा हि॒ यत् तावद् उक्तं -- यद् उत "विशेषाः सामान्याद् व्यतिरेकिणोऽव्यतिरेकिणो वा। व्यतिरेक-पक्षे निःस्वभावत्वं, निःसत्ताकत्वात्। अव्यतिरेक-पक्षे भाव-मात्रं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवद्" इति -- तद् अयुक्तं, विशेष-वादिनोऽप्य् एवं-विध-विकल्प-सम्भवात्। तथा हि॒ विशेषेभ्यः सामान्यं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा। व्यतिरिक्तं चेन्, न तर्हि सामान्यं, स्व-स्वरूप-व्यवस्थिततया विशेष-रूपत्वात्। अव्यतिरिक्तं चेत्, तथापि न सामान्यं, विशेषाव्यतिरिक्तत्वाद् एव तत्-स्वरूपवत्। यद् अप्य् अवाद्य् -- "अनाद्य्-अविद्या-बल-प्रवृत्तो विशेष-व्यवहारस्, तात्त्विकं सामान्यं" -- तद् अपि वचन-मात्रम् एव, युक्ति-रिक्तत्वात्, सामान्यम् एवानाद्य्-अविद्या-दर्शितं, विशेषाः पुनः पारमार्थिका इति विशेष-वादिनोऽपि वदतो वक्त्र-भङ्गाभावात्। यत् पुनर् विशेष-ग्राहक-प्रमाणाभावं प्रतिपादयताभ्यधायि, यद् उत "प्रत्यक्षं भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षात्-करोति नाभावं, तस्यानुत्पादकत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्ततरं, यतः केनेदं भवतोऽत्यन्त-सुहृदा निवेदितं॒ "भाव एव केवलः प्रत्यक्षम् उत्थापयति, न पुनर् अभावोऽपि" [इति]? अभाव-व्यापाराभाव-प्रतिपादक-युक्ति-कलापेनेति चेद् मुग्ध-विप्रतारितोऽसि, तद्-व्यापाराभावासिद्धेः, सद्-असद्-रूप-वस्तुनः समस्त-क्रियासु व्यापाराद्, भाव-तादात्म्येन व्यवस्थितस्याभावस्य व्यापारे विरोधाभावात्। कथं भावाभावयोस् तादात्म्यं, विरोधाद्? इति चेन्, न, प्रमाण-प्रसिद्धे विरोधाभावात्। तथा हि॒ घटादिकः पदार्थात्मा स्वरूपेण सन्, न पटादि-रूपेणापीति भावाभावात्मकः। यदि पुनः कथञ्चिन् नाभावात्मकः स्यात्, तदा पटादि-रूपेणापि भावात् सर्वात्मकः प्राप्नोति। युक्तम् एतद्, अत एव भेद-प्रपञ्च-विलय-सिद्धिर् इति चेत्, स्याद् एवैतद्, यदि पटाद्य्-अभावैकान्ताच् छून्य-वादिनोऽपि मनो-रथ-पूरणं न स्यात्॑ तथा हि॒ पटादि-विविक्तो घटोऽनुभूयते, न च पटाद्य्-अभावो भावेन सह तादात्म्यम् अनुभवति, तस्माद् अभावात्मक एवायम्, एवं पटादयोऽपीतरेतरापेक्षयेति शून्यत्वापत्तिः। तस्मात् स्वरूपम् आबिभ्राणं पर-रूपेभ्यो व्यावृत्तम् एव वस्तु सर्व-क्रियासु व्याप्रियत इति भावाभावात्मकस्यैव व्यापारः, स्वरूप-धारणस्य भावत्वात्, पर-रूप-व्यावर्तनस्याभावत्वाद् इति। एवं स्व-गोचर-प्रत्यक्षोत्पादनेऽपि व्याप्रियते, ततश् च तद्-रूपम् एव तत् साक्षात्-कुर्याद् इति स्वरूप-नियते पर-रूपेभ्यो व्यावृत्त एव वस्तुनि प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तज्-जन्यत्वान्, न भाव-मात्रे, तस्य केवलस्य स्वरूपाव्यवस्थितेर् उत्पादकत्वायोगात्। न च जनकत्वाद् अर्थो ग्राह्यो जन्यत्वाद् वा ज्ञानं ग्राहकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् उक्तं, किं तर्ह्य् आवरण-विच्छेदादेर् लब्ध-सत्ताकं ग्रहण-परिणामाज् ज्ञानं गृह्णात्य्, अर्थस् तु सन्निधानादेर् गृह्यते, स चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूप एव प्रतीयत इति तथा-भूतोऽभ्युपगन्तव्यो, न केवल-सामान्य-रूप इति। सद्-असद्-अंशयोः कथम् एकत्रावस्थानम् इति चेत्, तादात्म्येनेति ब्रूमः। ननु तादात्म्ये भाव-मात्रम् अभाव-मात्रं वापद्येतेतरेतराव्यवतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्, तन् नोभय-रूप-वस्तु-सिद्धिः। नैतद् अस्ति, तादात्म्यस्य सम्बन्धत्वात्, सम्बन्धस्य च द्वय-निष्ठत्वात्, तद्-अभावे कस्य केन सम्बन्धो, निर्गोचरत्वात्? तस्माद् एतौ सद्-असद्-अंशौ धर्मि-रूपतयाभेदिनौ, वस्तुनः सद्-असद्-रूपस्यैकत्वाद्, धर्म-रूपतया पुनर् विवक्षितौ भेदम् अनुभवतः, स्वरूपेण भावात्, पर-रूपेण त्व् अभावाद् इति। तद् एवं प्रत्यक्षे विविक्त-वस्तु-ग्राहिणि सकल-प्रमाण-प्रष्ठे प्रसाधिते शेष-प्रमाणान्य् अपि तद्-अनुसारितया विविक्तम् एव स्व-गोचरं स्थापयन्तीति। तद्-अपलापी केवल-सामान्य-प्रतिष्ठापकः कद्-अभिप्रायः सङ्ग्रह-दुर्नय-व्यपदेशं स्वी-कुरुते, विशेषापेक्षयैव सामान्य-स्थापकस्य सङ्ग्रह-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२५] तथा व्यवहारोऽपि प्रमाण-प्रसिद्धं वस्तु-स्वरूपं निह्नुवानो युक्ति-रिक्तम् अविचारित-रमणीयं लोक-व्यवहार-मार्गानुसारि समर्थयमानो दुर्नयताम् आत्मनि निधत्ते, लोक-व्यवहार-प्रसाधकस्यापीतरानिष्टौ व्यवस्थानाभावात्। तथा हि॒ यद् इदं कियत्-काल-भावि स्थूरताम् आबिभ्राणं लोक-व्यवहार-कारि घटादिकं भवतस् तात्त्विकम् अभिप्रेतं तन् नाकस्मिकं, किं तर्हि नित्य-परमाणु-घटितम्, इतरथा निष्कारणत्वेन सर्वदा भावाभाव-प्रसङ्गात्। न ते परमाणवस् तथा प्रतिभान्तीति चेन्, नात एव तेषाम् अनुमानतः सिद्धिः। यदि पुनर् यद् एव साक्षान् न विशद-दर्शने चकास्ति तत् सकलम् अपलप्येत, हन्त बह्व् इदानीम् अपलपनीयं, घटादि-वस्तुनोऽप्य् अर्वाग्-भाग-वर्ति-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासान् मध्य-पर-भागादीनाम् अपलाप-प्रसङ्गात्, तथा च लोक-व्यवहार-कारितापि विशीर्येत, तावता तद्-असिद्धेः। अथात्रानुमान-बलेन व्यवहार-क्षम-सम्पूर्ण-वस्तुनः साधनम्, एवं तर्हि भूत-भावि-पर्याय-परमाणु-साधनम् अपि क्रियतां, विशेषाभावात्। तथा हि॒ यथा बाह्य-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासेऽपि सर्व-वस्तूनां तावता व्यवहाराभावान् मध्य-भागादि-साधनेन सम्पूर्णानि तत्-समर्थानि तानि साध्यन्ते, तथैव कियत्-काल-भावि-घनाकार-दर्शनेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-परमाणु-तादाद्म्य-व्यवस्थित-शरीराणि तानि साध्यन्तां, तद्-अभावेऽपि तेषाम् अनुपपत्तेः। तथा हि॒ व्यवहारावतारिणो दर्शन-योग्यस्याद्य-पर्यायस्य तावद् अतीत-पर्यायानभ्युपगमे निर्हेतुकत्वं, तत्र चोक्तो दोषः। तद्-उत्पादकानन्तर-पर्यायेष्टौ पुनस् तज्-जनक-पर्यायोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अनादि-पर्याय-परम्परा सिद्धिम् अध्यासीत। तथा व्यवहारावतारि-वस्तु-पर्यन्त-पर्यायस्य पर्यायान्तरानुत्पादकत्वे बलाद् अवस्तुत्वम् आढौकते, भवन्-नीतेर् एवार्थ-क्रिया-करण-वैकल्यात्। तद्-उत्पादकत्वे पुनर् असाव् अप्य् अपर-पर्यायोत्पादक इत्य् अनन्त-पर्याय-मालोपपद्यते। तथा घनाकारोऽपि विशद-दर्शनेन साक्षात्-क्रियमाणो निष्प्रदेश-पर्यन्तावयव-व्यतिरेकेण नोपपद्यते, कर-चरणाद्य्-अवयवानां खण्डशो भिद्यमानतयावयवि-रूपत्वात्, तद्-अवयवानाम् अप्य् अवयवान्तर-घटितत्वात्। परमाणव एव पर्यन्तावयवाः परमार्थतो घनाकार-हेतवस्॑ तद्-अभावे पुनर् आकस्मिकोऽसौ सर्वत्रोपलभ्येत, न वा क्वचिद्, विशेषाभावात्। एतेन यद् अवादि॒ लोक-व्यवहारावतारिणः प्रमाणम् अनुग्राहकम् अस्ति वस्तुनो नेतरस्येत्य्-आदि, तद् अपि प्रतिक्षिप्तम् अवगन्तव्यं, दृश्यमानार्थान्यथानुपपत्त्यैव तत्-साधनात्। यत् पुनर् उक्तं॒ "किं तेषाम् अतीतानागत-पर्याय-परमाण्व्-आदीनां पर्यालोचनेन लोक-व्यवहारानुपयोगितयावस्तुत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्तम्, उपेक्षया वार्तमानिक-वस्तुनोऽनुपयोगित्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेः, सर्वस्य सर्व-लोकानुपयोगित्वात्। कस्यचिद् उपयोगितया वस्तुत्वे तेषाम् अपि सा समस्त्य् एव, सर्व-ज्ञ-ज्ञानादि-गोचरत्वाद् इत्य् आस्तां तावत्। तद् एवं प्रमाण-प्रसिद्धार्थापलापित्वाद् व्यवहारो दुर्नयः, तद्-उपेक्षया व्यवहारानुपाति-वस्तु-समर्थकस्य व्यवहार-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२६] अथ ऋजुसूत्रोऽपि दृष्टापलापेनादृष्टम् एव क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणं वस्तु-स्वरूपं परमार्थतया मन्यमानो दुर्नयताम् आस्कन्दति, दृश्यमान-स्थिर-स्थूरार्थापह्नवे निर्मूलतया स्वाभिप्रेत-वस्तु-समर्थक-परामर्शस्योत्थानाभावात्। तथा हि॒ स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् पश्चात् कुयुक्ति-विकल्पेन विवेचयेद्, यद् उतैष स्थिर-स्थूरो दृश्यमानः खल्व् आकारो न घटाम् इयर्ति। विचाराक्षमत्वाद् इत्य्-आदिना न च दृष्टम् अदृष्ट-सन्दर्शकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाधितुं शक्यं, सर्वत्रानाश्वास-प्रसङ्गात्। अथाभिदधीथा॒ "मन्द-मन्द-प्रकाशे प्रदेशे रज्जौ विष-धर-भ्रान्तिः प्राक्तनी यथोदीचीनेन तन्-निर्णय-कारिणा विकल्पेन बाध्यते, तथेदम् अपि स्थिर-स्थूर-दर्शनं क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रसाधक-परामर्शेन, किम् अत्रायुक्तम्?" नैतद् अस्ति, रज्जु-प्रतिभासस्यैव प्राक्-प्रवृत्त-विष-धर-भ्रान्त्य्-अपनोद-दक्षत्वात्, तद्-अभावे च विकल्प-शतैर् अपि निवर्तयितुम् अशक्यत्वात्। अत्राप्य् अतीत-वर्त्स्यतोर् विनष्टानुत्पन्नतयासन्निहितत्वात्, स्थूरावयवानां च स्वावयवेषु भेदाभेद-द्वारेण पर्यालोच्यमानानाम् अवस्थानाभावात् क्षण-क्षयि-परमाणव एव प्रतिभान्ति, ततश् च प्रतिभास एव स्थिर-स्थूर-दर्शनस्य बाधक इति चेद्, एवं तर्हि प्रतिभासस्योपदेश-गम्यतानुपपत्तेस्, तथैव व्यवहारः प्रवर्तेत। पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवान् न प्रवर्तत इति चेन्, नान्यत्राप्य् अस्योत्तरस्य विप्लव-हेतुत्वात्। तथा हि॒ धवले जलजादौ प्रतिभातेऽपि नीलोऽयम् अध्यक्षेणावलोकितः॑ पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवात् तु धवलः प्रतिभातीति भवन्-न्यायेन शठः प्रतिजानानः केन वार्येत। तन् न दृष्टापलापः कर्तुं शक्य इति स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिस्, तस्यैव दर्शनाद्, इतरस्य तद्-दर्शन-द्वारेण साध्यमानस्यानुमेयत्वात्, तद्-अनिष्टौ तस्याप्य् असिद्धेः। एतेन स्थिर-स्थूर-वस्तुनोऽर्थ-क्रिया-विरह-प्रतिपादनम् अपि प्रतिव्यूढं, तथा-विधस्यैव सर्व-क्रियासु व्यापार-दर्शनात् क्षण-क्षयिणोऽर्थ-क्रिया-निषेधाच् च, यथोक्तं प्राक्॒ "क्षण-भङ्गुरो ह्य् अर्थात्मा स्वक्षने पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इत्य्-आदि। किं च, सत्त्व-पुरुषत्व-चैतन्यादिभिर् बाल-कुमार-युव-स्थविरत्व-हर्ष-विषादादिभिश् चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूपस्य सर्वस्य वस्तुनः प्रतीतेर् द्रव्य-पर्यायात्मकत्वम्, अभेदस्य द्रव्यत्वाद्, भेदस्य पर्याय-रूपत्वाद् इति। ततश् च भूत-भावि-क्षणयोर् असन्निधान-द्वारेण वार्तमानिक-क्षणस्यैवार्थ-क्रिया-कारित्व-प्रतिपादनं नास्माद्-बाधा-करं, पर्यायाणां क्रम-भावितया वर्तमान-पर्यायालिङ्गितस्यैव द्रव्यस्यार्थ-क्रिया-करण-चतुरत्वात्। [न] केवलं तत् त्रि-काल-व्यापि, द्रष्टापि द्रव्य-रूपतया तथा-भूत एव। ततश् च क्षणिक-पर्याय-तिरो-धान-द्वारेण तद्-रूप-सङ्कलनात् स्थिरम् एवेदं समस्त-क्रियासु व्याप्रियत इति प्रतीति-वीथिम् अवतरति, स्थैर्यस्यापि तात्त्विकत्वात्, क्षणिक-पर्यायाणां विद्यमानानाम् अप्य् अग्रहणात्, प्राकृत-लोक-ज्ञानस्यावरण-क्षयोपशमापेक्षितया कतिचिद्-अंश-विषयत्वात्। यदि पुनर् द्रव्य-बुद्धिः पर्याय-परम्परा-दर्शन-बलायातत्वाद् अतात्त्विकी कल्प्येत, तदा पूर्व-पर्यायस्योत्तर-पर्यायोत्पादने सान्वयत्वं निरन्वयत्वं वा वक्तव्यं, गत्य्-अन्तराभावात्। सान्वयत्वे द्रव्यं पर्यायान्तरेणाभिहितं स्यान्॑ निरन्वयत्वे पुनर् निर्हेतुतयोत्तर-पर्यायानुत्पाद-प्रसङ्गः। तन् नोभय-रूप-वस्तु-व्यतिरेकेणार्थ-क्रिया-सिद्धिः। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणं, शब्द-विद्युत्-प्रदीपादि-चरम-क्षणानां क्षनान्तरानारम्भकत्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेस्, तद्-अवस्तुत्वे पुनर् उपान्त्य-क्षणस्यापि वस्तुनि व्यापाराभावाद्॑ एवं यावत् सर्व-क्षणानां सङ्कलिकया वस्तुत्वम्। अथ क्षणान्तरानारम्भेऽपि स्व-गोचर-ज्ञान-जनकत्वम् अर्थ-क्रिया परिकल्प्येत, तथा सत्य् अतीत-भावि-पर्याय-परम्परापि योगि-ज्ञान-गोचरतां यातीति वस्तुत्वं स्वी-कुर्यात्। तन् नार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम्, अपि त्ûत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तता, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्। उत्पाद-व्ययौ ध्रौव्येन सह विरुद्धाव् इति चेत्, कुतोऽयं विरोधः॒ प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा? न तावद् आद्यः पक्षः, सर्व-प्रमाणानां बहिर् अन्तश् च तथा-विधा-वस्तु-द्योतन-पटिष्ठतया प्रसाधितत्वात्। नापि द्वितीयो,ऽप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वात्। एतेन स्थूरता-दूषणम् अपि प्रतिक्षिप्तं, प्रतिभास-हतत्वात्, तद्-अपह्नवेन विरोधोद्भावनस्य निर्मूलतया प्रलाप-मात्रत्वात्। यत् पुनर् वर्तमान-प्रकाश-रूपतया तत्-सम्बद्ध-वस्तु-ग्राहित्वं सर्व-प्रमाणानाम् उदग्राहि, तद् अयुक्तं, तेषाम् एकान्तेन वार्तमानिकत्वासिद्धेः, कथञ्चिद् आत्मा-व्यतिरेकित्वात्, तस्य च काल-त्रय-व्यापकत्वात्, तद्-रूपतया तेषाम् अप्य् अवस्थानात्। ततश् चात्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपत्वात्, सर्व-प्रमाणानां परिणामिन्य् एव वस्तुनि व्यापारो, न क्षणिके। न चातीतानागत-क्षण-वर्ति-वस्तु-ग्रहणेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-जन्म-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्ग, आवरण-विच्छेद-सापेक्षत्वात्, तस्यैव परमार्थतः संवेदनाविर्-भावान्तर-कारणत्वाद्, ग्राह्यादेर् बहिर्-अङ्गत्वात्। सामस्त्येन पुनर् आवरण-विलये सति समस्त-वस्तु-विस्तारानाद्य्-अनन्त-क्षण-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्गो न नो बाधा-कारीष्टत्वात्। तद् एक-देश-क्षयोपशमे पुनस् तद्-अनुसारिणी बोध-प्रवृत्तिर् इति कियत्-काल-भाविनि स्थूरे वस्तुनि प्राकृत-लोक-ज्ञानानि प्रवर्तन्ते, न सम्पूर्णे। न च तान्य् अलीकानि, तद्-ग्राह्यांशस्यापि वस्तुनि भावात्, तावतैव व्यवहार-सिद्धेर् इति। यच् चोक्तं॒ क्षणिकतां गृह्णन्तोऽपि सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्धत्वान् मन्दा नाध्यवस्यन्ति, मिथ्या-विकल्प-वशात् स्थिरता-व्यवहारं च प्रवर्तयन्ति, तद् अयुक्तं, भवद्-आकूटेन सादृश्याभावात्, तद्-अभावे तद्-उत्पाद्याभिमत-भ्रान्तेर् निर्बीजतयोत्पत्तेर् असम्भवात्। तथा स्थिरतारोपोऽपि क्वचिद् गृहीत-स्थिरत्वस्यैव युक्तो नान्यथा, यथा दृष्ट-विष-धरस्य मन्द-प्रकाशे रज्जु-दर्शने विष-धरारोपः। न च भवतां कदाचन स्थिरता प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति, तत् कथं प्रतिक्षणम् उदयापवर्ग-संसर्गिणि सकले वस्तुनि प्रत्यक्षेणावलोकितेऽपि तद्-आरोप इति। तस्मात् तिरो-हित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-वैविक्त्यं वस्तु सर्व-सांव्यवहारिक-प्रमाणैर् गोचरी-क्रियत इति तत्-तिरस्-कार-द्वारेणादृष्ट-क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रतिष्ठापकोऽभिप्राय ऋजुसूत्र-दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते, तद्-उपेक्षयैव तद्-दर्शकस्य नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२७] तथा शब्दादयोऽपि सर्वथा शब्दाव्यतिरेकम् अर्थस्य समर्थयन्तो दुर्नयास्, तत्-समर्थनार्थम् उपन्यस्तस्य तत्-प्रतीतौ प्रतीयमानत्व-लक्षणस्य हेतोर् अनैकान्तिकत्वात्। तथा हि॒ नायम् एकान्तो यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तम् एव, व्यतिरिक्तस्यापि पावकादेर् अन्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-सम्बन्ध-बलाद् धूमादि-प्रतीतौ प्रतीयमानत्वात्। एवं शब्दोऽपि व्यतिरिक्तम् अप्य् अर्थं वाचकत्वात् प्रत्याययिष्यत्य्, अव्यतिरेकस्य प्रत्यक्षादि-बाधितत्वाच्, छब्दाद् विवेकेनैवानुभूयमानत्वात्। अस्मिंश् च हेताव् अनैकान्तिके स्थिते सर्वार्थानां सस्व-वाचकत्व-साधन-द्वारेण शब्दाव्यतिरेक-साधनम् अपि दूरापास्तम् एव। न चात्रापि प्रतिबन्ध-ग्राहि प्रमाणं -- यो योऽर्थस् तेन तेन सस्व-वाचकेन भवितव्यं -- घटादि-दृष्टान्त-मात्रात् तद्-असिद्धेः, क्षणिकालक्ष्य-द्रव्य-विवर्तानां सङ्केत-ग्रहणोपायाभावेनाभिलपितुम् अशक्यतयानभिलाप्यत्व-सिद्धेश् च। क्षण-भङ्गुरता-प्रतिज्ञानं पुनर् अमीषां अप्य् ऋजुसूत्रवन् निरसितव्यम्। तथा प्रत्येक-मतापेक्षयापि स्वाभिप्रेतं प्रतिष्ठापयन्तस् तद्-विपरीतं शब्दार्थं तिरस्-कुर्वाणा दुर्नयताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। एतावद् धि प्रमाण-प्रतिष्ठितं, यद् उत विधि-मुखेन शब्दोऽर्थस्य वाचक इति॑ न पुनर् अयं नियमो यथायम् अस्यैव वाचको नान्यस्य, देश-काल-पुरुष-सङ्केतादि-विचित्रतया सर्व-शब्दानाम् अपरापरार्थ-प्रतिपादकत्वेनोपलब्धेर् अनन्त-धर्मतयापरापर-योग्यता-द्वरेणापरापरार्थाभिधायकत्वोपपत्तेर्, अर्थानाम् अप्य् अनन्त-धर्मत्वाद् एवापरापर-शब्द-वाच्यत्वाविरोधात्, तथैवाविगानेन व्यवहार-दर्शनात्, तद्-अनिष्टौ तल्-लोप-प्रसङ्गात्। तस्मात् सर्व-ध्वनयो योग्यतया सर्वार्थ-वाचका, देश-क्षयोपशमाद्य्-अपेक्षया तु क्वचित् कथञ्चित् प्रतीतिं जनयन्ति। ततश् च क्वचिद् अनपेक्षित-व्युत्पत्ति-निमित्ता रूढितः प्रवर्तन्ते, क्वचित् सामान्य-व्युत्पत्ति-सापेक्षाः, क्वचित् तत्-काल-वर्ति-व्युत्पत्ति-निमित्तापेक्षयेति न तत्र प्रामाणिकेन नियतार्थाग्रहो विधेयः। अतोऽमी शब्दादयो यदेतरेतराभिमत-शब्दार्थोपेक्षया स्वाभिमतं शब्दार्थं दर्शयन्ति, तदा नयास्, तस्यापि तत्र भावात्। परस्पर-बाधया प्रवर्तमानाः पुनर् दुर्नय-रूपतां भजन्ति, निरालम्बनत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२८] ननु च यद्य् एकैक-धर्म-समर्थन-परायणाःशेष-धर्म-तिरस्-कार-कारिणोऽभिप्राया दुर्नयतां प्रतिपद्यन्ते, तदा वचनम् अप्य् एक-धर्म-कथन-द्वारेण प्रवर्तमानं सावधारणत्वाच् च शेष-धर्म-प्रतिक्षेप-कार्य् अलीकमापद्यते। ततश् चानन्त-धर्माध्यासित-वस्तु-सन्दर्शकम् एव वचनं यथावस्थितार्थ-प्रतिपादकत्वात् सत्यं॑ न चैवं वचन-प्रवृत्तिर्, घटोऽयं शुक्लो मूर्त इत्य्-आद्य् एकैक-धर्म-प्रतिपादन-निष्ठतया व्यवहारे शब्द-प्रयोग-दर्शनात्, सर्व-धर्माणां यौगपद्येन वक्तुम् अशक्यत्वात्, तद्-अभिधायकानाम् अप्यानन्त्यात्। न चैकैक-धर्म-सन्दर्शकत्वेऽप्य् अमूनि वचनान्य् अलीकानि वक्तुं पार्यन्ते, समस्त-शाब्द-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-अलीकत्वे ततः प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् इति। अत्रोच्यत -- इह तावद् द्वये वस्तु-प्रतिपादका, लौकिकास् तत्त्व-चिन्तकाश् च। तत्र प्रत्यक्षादि-प्रसिद्धम् अर्थम् अर्थित्व-वशाल् लौकिकास् तावन् मध्यस्थ-भावेन व्यवहार-काले व्यपदिश्यन्ति, यद् उत नीलम् उत्पलं सुगन्धि कोमलम् इति, न तु तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-ग्रहण-निराकरणयोराद्रियन्ते,ऽनर्थित्वात्, तावतैव विवक्षित-व्यवहार-परिसमाप्तेः। न च तद्-वचनानाम् अलीकता, शेष-धर्मान्तर-प्रतिक्षेपाभावात्, तत्-प्रतिक्षेप-कारिणाम् एवालीकत्वात्। "सर्वं वचनं सावधारणम्" इति-न्यायात् तेषाम् अपि शेष-धर्म-तिरस्-कार-कारित्व-सिद्धेर् भवन्-नीत्यालीकतापद्यत इति चेन्, न, अवधारणस्य तद्-असम्भव-मात्र-व्यवच्छेदे व्यापाराद्॑ यथानेक-पुरुष-सम्पूर्णे सदसि द्वारादौ स्थितस्य किम् अत्र देवदत्तः समस्ति नास्तीति वा दोलायमान-बुद्धेः केनचिद् अभिधीयते -- यथा देवदत्तोऽस्तीति। अत्र यद्य् अप्य् उपन्यस्त-पद-द्वयस्य सावधारणता गम्यते,ऽन्यथा तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात्, तथाप्य् अवधारणं तद्-असम्भव-मात्रं व्यवच्छिनत्ति, न शेष-पुरुषान्तराणि॑ नापि पर-रूपेण नास्तित्वं, तद्-व्यवच्छेदाभिप्रायेण प्रस्तुत-वाक्य-प्रयोगात्, प्रयोक्त्र्-अभिप्रायादि-सापेक्षतयैव ध्वनेः स्वार्थ-प्रतिपादन-सामर्थ्यात्। न च वाच्य-वाचक-भाव-लक्षण-सम्बन्धानर्थक्यं, तद्-अभावे प्रयोक्त्र्-अभिप्राय-मात्रेण रूपस्यैव नियोक्तुम् अशक्यत्वात्। न च समस्त-धर्म-युक्तम् एव वस्तु प्रतिपादयद् वचनं सत्यम् इत्य् अभिदध्महे, येनैकैक-धर्मालिङ्गित-वस्तु-सन्दर्शकानाम् अलीकता स्यात्, किं तर्हि सम्भवद्-अर्थ-प्रतिपादकं सत्यम् इति, सम्भवन्ति च शेष-धर्माप्रतिक्षेपे वचन-गोचरापन्ना धर्मास्॑ तस्मात् तत्-प्रतिपादकं सत्यम् एव। यदा तु दुर्नय-मताभिनिविष्ट-बुद्धिभिस् तीर्थान्तरीयैस् तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-निराकरणाभिप्रायेणैव सावधारणं तत् प्रयुज्यते, यथानित्यम् एव वस्तु नित्यम् एव वेत्य्-आदि, तदा निरालम्बनत्वाद् अलीकतां प्राप्नुवत् केन वार्येत? तत्त्व-चिन्तकाः पुनः प्रत्यक्षादि-प्रमाण-सिद्धम् अनेकान्तात्मकं वस्तु दर्शयन्तो द्वेधा दर्शयेयुस्, तद् यथा -- विकलादेशेन सकलादेशेन वा। तत्र विकालादेशो नयाधीनः, सकलादेशः प्रमाणायत्तः। तथा हि॒ यदा मध्यस्थ-भावेनार्थित्व-वशात् किञ्चिद् धर्मं प्रतिपिपादयिषवः शेष-धर्म-स्वी-करण-निराकरण-विमुखया धिया वाचं प्रयुञ्जते, तदा तत्त्व-चिन्तका अपि लौकिकवत् सम्मुग्धाकारतयाचक्षते, यद् उत "जीवोऽस्ति कर्ता प्रमाता भोक्तेत्य्-आदि"। अतः सम्पूर्ण-वस्तु-प्रतिपादनाभावाद् विकलादेशोऽभिधीयते, नय-मतेन सम्भवद्-धर्माणां दर्शन-मात्रम् इत्य् अर्थः। यदा तु प्रमाण-व्यापारम् अविकलं परामृश्य प्रतिपादयितुम् अभिप्रयन्ति, तदाङ्गी-कृत-गुण-प्रधान-भावाशेष-धर्म-सूचक-कथञ्चित्-पर्याय-स्याच्-छब्द-भूषितया सावधारणया च वाचा दर्शयन्ति ‘स्याद् अस्त्य् एव जीवऽ॑ इत्य्-आदिकया। अतोऽयं स्याच्-छब्द-संसूचिताभ्यन्तरी-भूतानन्त-धर्मकस्य साक्षाद्-उपन्यस्त-जीव-शब्द-क्रियाभ्यां प्रधनी-कृतात्म-भावस्यावधारण-व्यवच्छिन्न-तद्-असम्भवस्य वस्तुनः सन्दर्शकत्वात् सकलादेश इत्य् उच्यते, प्रमाण-प्रतिपन्न-सम्पूर्णार्थ-कथनम् इति यावत्। तद् उक्तं॒
सा ज्ञेय-विशेष-गतिर् नय-प्रमाणात्मिका भवेत् तत्र ।
सकल-ग्राहि तु मानं विकल-ग्राही नयो ज्ञेयः ॥
[न्या०अ०२९।२९] तद् इदम् उक्तं भवति॒ नय-प्रमाणाभिज्ञः स्याद्-वादी सकल-विकलादेशाव् अधिकृत्य वस्तु-स्वरूप-प्रतिपिपादयिषया यद् यद् ब्रूते तत् तत् सत्यं, सम्भवद्-अर्थ-गोचरत्वात्। दुर्नय-मतावलम्बिनः पुनर् एकान्त-वादिनो यद् यद् आचक्षते तत् तद् अलीकम्, असम्भवद्-अर्थ-विषयत्वाद् इति।
[न्या०अ०३०।०] साम्प्रतम् अमुम् एवार्थं द्रढयन् सिद्धान्तेऽप्य् एकैक-नय-मत-प्रवृत्तानि सूत्राणि न सम्पूर्णार्थाभिधायकानीत्य्, अपि तु तत्-समुदायाभिप्राय-प्रवृत्तम् अविकल-वस्तु-निवेदकम् इति दर्शयन्न् आह॒
नयानाम् एक-निष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुत-वर्त्मनि ।
सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि स्याद्-वाद-श्रुतम् उच्यते ॥ न्यायावतार ३० ॥
[न्या०अ०३०।१] इह त्रिविधं श्रुतं, तद् यथा -- मिथ्या-श्रुतं नय-श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतं च। तत्र श्रूयत इति श्रुतम् आगमः। मिथ्यालीकं श्रुतं मिथ्या-श्रुतं, तच् च दुर्नयाभिप्राय-प्रवृत्तं तीर्थिक-सम्बन्धि, निर्गोचरत्वात्। तथा नयैर् हेतु-भूतैः श्रुतं नय-श्रुतम्, एतच् चार्हद्-आगमान्तर्-गतम् एवैक-नयाभिप्राय-प्रतिबद्धं, यथा "पडुप्पण्णे नेरïë विणस्सï" इत्य्-आद्य्, ऋजुसूत्र-नयाभिप्रायेण क्षणिकत्वस्यापि तत्र सम्भवात्। तथा निर्दिश्यमान-धर्म-व्यतिरिक्ताशेष-धर्मान्तर-संसूचकेन स्याता युक्तो वादोऽभिप्रेत-धर्म-वचनं स्याद्-वादः, तद्-आत्मकं श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतम्। तत् किं-भूतम् उच्यत इत्य् आह॒ सम्पूर्णोऽविकलः स चासाव् अर्थश् च तद्-विनिश्चायि तन्-निर्णय-हेतुत्वाद् एवम् अभिधीयते॑ परमार्थतः पुनः समस्त-वस्तु-स्वरूप-प्रतिपादीत्य् अर्थः, शब्दात्मकत्वान्, निश्चयस्य बोध-रूपत्वाद् इति। नय-श्रुतं तर्हि सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि कस्मान् न भवतीत्य् आह॒ नयानां नैगमादीनाम् एक-निष्ट्ःानाम् एक-धर्म-ग्रहण-पर्यवसितानां श्रुत-वर्त्मन्य् आगम-मार्गे प्रवृत्तेः प्रवर्तनान् न तद् एकैकाभिप्राय-प्रतिबद्धं सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि, तत्-समुदायस्यैव सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायकत्वाद् इत्य्-आकूटम्।
[न्या०अ०३१।०] तद् एवं नय-प्रमाण-स्वरूपं प्रतिपाद्याधुनाशेष-नय-प्रमाण-व्यापकं तेषां तत्र तादात्म्येनावस्थानात् प्रमातारम् अभिधातुकाम आह॒
प्रमाता स्वान्य-निर्भासी कर्ता भोक्ता विवृत्तिमान् ।
स्व-संवेदन-संसिद्धो जीवः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः ॥ न्यायावतार ३१ ॥
[न्या०अ०३१।१] तत्र त्रि-काल-जीवनाज् जीवः, प्राण-धारक आत्मेत्य् अर्थः, स प्रमिणोतीति प्रमाता प्रमेय-परिच्छेदकः। किं-भूतः सन्न् इत्य् आह॒ स्वान्याव् आत्म-परौ निर्भासितुम् उद्द्योतयितुं शीलम् अस्येति स्वान्य-निर्भासी, स्व-स्वरूपार्थयोः प्रकाशक इति यावत्। तथा करोतीति कर्ता, भुङ्क्त इति भोक्ता, विवर्तनम् अपरापर-पर्यायेषु गमनं विवृत्तिः परिणामः, सा विद्यते यस्येति विवृत्तिमान्। स्व आत्मा संवेद्यतेऽनेनेति स्व-संवेदनं तेन सम्यक् सिद्धः प्रतिष्ठितः प्रतीतो वा स्व-संवेदन-संसिद्धः। क्षितिः पृथिव्य् आदिर् येषां तानि क्षित्य्-आदीन्य्, आदि-शब्दाद् अम्बु-तेजो-वाय्व्-आकाशानि गृह्यन्ते॑ न विद्यत आत्मा स्वरूपम् अस्येत्य् अनात्मकः, किं स्व-स्वरूपापेक्षया? न, क्षित्य्-आदीनाम् अनात्मकः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः, क्षित्य्-आदि-स्वरूपो न भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०३१।२] तत्र जीवः प्रमातेत्य्-अनेन ये पारमार्थिकं प्रमातारं नाभ्युपगच्छन्त्य्, अपि तु विज्ञान-क्षण-परम्परानुभव-बल-प्रबोधितानादि-प्ररूढ-वासना-सम्पादित-सत्ताकं मिथ्या-विकल्प-परिकल्पितम् अपारमार्थिकं तं मन्यन्ते प्रतिक्षण-विलय-वादिनः तान् निराचष्टे, क्षण-विलयस्य प्राग् एव प्रतिषिद्धत्वाद्, बहिर् अन्तश् च परिणामि-वस्तुनः प्रसाधनात्।
[न्या०अ०३१।३] ननु च घटादयस् तावद् विनाशम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तेषां च विनाशो लकुटादि-कारण-कलापेनाविनश्वर-स्वभावानां वा क्रियेत, विनश्वर-स्वभावानां वा। यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, स्वभावस्य प्रच्यावयितुम् अशक्यत्वात्, तस्य नियत-रूपत्वाद्, अन्यथा स्वभावत्वायोगात्। अथैवं-भूत एव तस्य स्वभावः स्व-कारण-बलायातो यद् उत विनाश-कारणम् आसाद्य विनङ्क्ष्यतीति ब्रूषे, तथापि तद्-विनाश-कारण-सन्निधानं किं यादृच्छिकम् उत तत्-स्वभाव-सम्पाद्यम् एव। यदाद्यः कल्पस्, तदा सन्निहितस्यापि तत्-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपातेन निवर्तनात्, तत्-सन्निधापक-हेतूनां अपि स्व-सन्निधापक-कारण-कलाप-सापेक्षत्वात्, सन्निहितानाम् अपि प्रतिद्वन्द्विना निवर्तनाद्, यादृच्छिकत्वाच् च नावश्यं-भावि तत्-सन्निधानं॑ ततश् चासन्निहित-स्व-विनाश-कारण-कदम्बकः कश्चिद् घटादिर् न विनश्येद् अप्य्, अनिष्टं चैतत्, सर्व-कृतकानां विनाशाविगानात्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तथा सति पश्चाद् अपि तद्-बलाद् विनाश-हेतवः सन्निधास्यन्तीति प्रथम-क्षण एव सन्निदधतु, तथापि क्षणिकतैवार्थस्य। स्व-हेतोर् एव नियत-कालात् परतोऽयं स्व-विनाश-हेतुं सन्निधापयिष्यतीत्य् एवं-रूपो जात इति चेन्, नैवम् अपि क्षण-भङ्गुरतायाता। तथा हि॒ स्व-हेतुना किलासौ वर्षात् परतः स्व-विनाश-हेतु-सन्निधापन-क्षम-स्वभावो व्यधायि॑ स च तस्योत्पाद-क्षणाद् द्वितीय-क्षणे स्वभावोऽस्ति वा न वा? अस्ति चेत्, तथा सति पुनर् वर्षं तेन स्थातव्यम्, एवं यावद् वर्षोपान्त्य-क्षणेऽपि यदि तत्-स्वभाव एवासौ तदापरम् अपि वर्षान्तरं स्थितिर् आपद्येत, तदा चानन्त-कल्प-स्थायी-भावः स्याद्, अप्रच्युत-वर्ष-स्थायि-स्वभावत्वाद् इति। अथ द्वितीय-क्षणे नास्ति स स्वभाव इति ब्रूषे, हन्त क्षणिकत्वम् एवाढौकते,ऽतादवस्थ्यस्य तल्-लक्षणत्वात्। किं च, विनाश-हेतुर् भावस्य विनाशं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा कुर्यात्? व्यतिरिक्त-करणे न किञ्चित् कृतं स्यात्, ततश् च भावस् तादवस्थ्यम् अनुभवेत्। तत्-सम्बन्धः क्रियत इति चेन्, न सम्बन्धस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-व्यतिरिक्तस्य प्रतिषेधात्। न चानयोर् अन्यतरः सम्बन्धोऽत्र समस्ति, व्यतिरेकिणा सार्द्धं तादात्म्यायोगाद्, अन्य-हेतुकस्य पश्चाद् उत्पन्नस्य तद्-उत्पत्ति-वैकल्यात्। तन् न व्यतिरिक्तो विनाशः कर्तुं युक्तः। अव्यतिरिक्त-करणे पुनस् तम् एव भावं विनाश-हेतुः करोतीति प्राप्तम्, अव्यतिरेकस्य तद्-रूपता-लक्षणत्वात्। न चासौ कर्तव्यः, स्व-हेतोर् एव निष्पन्नत्वात्, तत्-करणे च तस्यावस्थानम् एव स्यान्, न प्रलयः। तन् नाविनश्वर-स्वभावानां पश्चात् कथञ्चिद् अपि विनाशः कर्तुं शक्यो, विनश्वर-स्वभावानां पुनः स्व-हेतु-बलायातत्वात् प्राग् अपि प्रतिक्षण-भावी, न कारणान्तरापेक्षः, स्वभावस्य नियत-रूपत्वात्॑ तस्मात् प्राणित्य् अद्यापि प्रतिक्षण-विलय इति।
[न्या०अ०३१।४] अत्रोच्यते -- सत्यम् एतत्, किं तु यथा विनाश-कारणायोगात् प्रतिक्षण-भावी विनाशो भवद्भिः प्रतिपद्यते, तथैव स्थित्य्-उत्पत्ती प्रतिक्षण-भाविन्यौ किं न प्रतिपद्येते, तद्-धेतूनाम् अपि विचार्यमाणानाम् अयोगात्। तथा हि॒ स्थिति-हेतुना तावत् स्वयम् अस्थिर-स्वभावा भावाः स्थाप्येरन् स्थिर-स्वभावा वा? न तावत् प्रथमः पक्षः क्षोदं क्षमते, स्वभावस्यान्यथा कर्तुम् अशक्यत्वात्, तस्य प्रतिनियत-रूपत्वाच्, चेतनाचेतन-स्वभाववद्, अन्यथा स्वभावता-हानेः। द्वितीय-पक्षे पुनः स्वयं स्थिर-स्वभावानां किं स्थिति-हेतुना? स्थितिर् नेष्यत एव, तेनानभ्युपगतोपालम्भ एवायम् इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, एवं हि भावाः क्षण-मात्रम् अपि न तिष्ठेयुः। क्षण-भाविनीष्यत एवेति चेत्, सा तर्ह्य् अस्थिति-स्वभावानां हेतु-शतैर् अपि कर्तुं न पार्यत इति ब्रूमः, तत्-स्वभावत्वे पुनर् हेतु-व्यापार-नैरर्थक्यात्। अहेतुका सती सकल-कालं भवतीति दत्तो जलाञ्जलिः प्रतिक्षण-विलयस्य। तथोत्पाद-हेतुर् अपि तत्-स्वभावस्योत्पत्तिं विदध्याद् अतत्-स्वभावस्य वा? न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-कर्तुं युक्तः, स्वयम् उत्पादकस्योत्पादने व्याप्रियमाणो हि हेतुः पिष्टं पिनष्टि, शङ्खं धवलयति, तद्-अभावेऽपि स्व-योग्यतयोत्पत्तेः। नापि द्वितीयः कल्पोऽङ्गी-करणार्हः, स्वयम् अनुत्पत्ति-धर्मकस्योत्पादयितुम् अशक्यत्वाद्, अन्यथा शश-विषाणादयोऽप्य् उत्पाद्य-कोटिम् अध्यासीरन्, विशेषाभावात्॑ ततश् च न कश्चिद् अत्यन्ताभावः स्यात्। तद् यथा निर्हेतुकत्वान् नाशः प्रतिक्षण-भावी, तथैव दर्शित-युक्तेः स्थित्य्-उत्पत्ती अपीति त्रयाक्रान्तं सकलं वस्तु जातम् अभ्युपगन्तव्यं॑ तथा सति जीवोऽपि जीवत्व-चैतन्य-द्रव्यत्वादिभिः स्थेमानं आबिभ्राण एव हर्ष-विषादादिभिर् अपरापरार्थ-ग्रहण-परिणामैश् चोत्पाद-व्यय-धर्मकः पारमार्थिकः प्रमातेति बलात् सिद्धिम् अध्यास्ते।
[न्या०अ०३१।५] ननु च यद्य् उत्पाद-व्यय-स्थितीनां निर्हेतुकत्वात् सकल-काल-भाविता भवद्भिः साध्यते, तदान्वय-व्यतिरेकाभ्यां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धः खल्व् अयं तत्-कारण-कलाप-व्यापारः कथं नेयः? न चायम् अपह्नोतुं शक्यः! तथा हि॒ कुलालादि-कारण-व्रात-व्यापारे घटादयः समुपलभ्यन्ते, तद्-अभावे च नोपलम्भ्यन्त इति तज्-जन्या इत्य् उच्यन्ते। स्थितिर् अपि विनाश-कारण-सन्निधानात् प्राक् तद्-बलाद् एव, तथा नाशोऽपि मुद्गरादि-सन्निधानासन्निधानाभ्यां सद्-असत्ताम् अनुभवंस् तत्-कृतः प्रतीयते, नाहेतुकः। तत् कथम् एतद् इति?
[न्या०अ०३१।६] अत्रोच्यते -- न वयं सर्वथा हेतूनां व्यापारं वारयामः, किं तर्हि स्वयम् उत्पाद-व्यय-स्थित्य्-आत्मना विवर्तमानस्य द्रव्यस्य हेतवस् तद्-विशेष-करणे व्यापारम् अनुभवन्ति, तेनैव सार्द्धं तेषाम् अन्वय-व्यतिरेकानुकरण-दर्शनाद्, दृष्टस्य चापह्नवेऽस्माकम् अप्रवृत्तत्वात्, प्रतीति-युक्ति-लक्षण-द्वय-पक्ष-पातित्वात्॑ केवलं प्रतीति-विकलां युक्तिं युक्ति-विनाकृतां वा प्रतीतिं नाङ्गी-कुर्महे,ऽसम्भवद्-अर्थ-गोचरतया निरालम्बनत्वात् तस्या इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।७] स्वान्य-निर्भासीत्य्-अनेन प्राग्-उक्त-स्व-पराभासि-प्रमाण-विशेषणवन् मीमांसकान् परोक्ष-बुद्धि-वादिनो योगाचारांश् च ज्ञान-मात्र-वादिनः प्रतिक्षिपति, ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदेन तद्-उक्त-न्यायाविशेषाद् इति।
[न्या०अ०३१।८] कर्ता भोक्तेइति विशेषण-द्वयेन सांख्य-मतं विकुट्टयति, कर्ता सन् भोक्तापीति काक्वोपन्यासाद्, अकर्तुर् भोगानुपपत्तेर्, भुजि-क्रिया-निर्वर्तन-समर्थस्यैव भोक्तृत्वात्। जपा-कुसुमादि-सन्निधान-वशात् स्फटिके रक्ततादि-व्यपदेशवद् अकर्तुर् अपि प्रकृत्य्-उपधान-वशात् सुख-दुःखादि-भोग-व्यपदेशो युक्तस्॑ तथा हि॒ प्रकृति-विकार-दर्पणाकार-बुद्धि-सङ्क्रान्तानां सुख-दुःखाद्य्-आत्मकानाम् अर्थानां पुरुषः सन्निधान-मात्रेण भोजको व्यपदिश्यते, "बुद्ध्य्-अध्यवसितम् अर्थं पुरुषश् चेतयत" इति-वचनाद् इति चेन्, न, कथञ्चित् सक्रियाकता-व्यतिरेकेण प्रकृत्य्-उपधानेऽप्य् अन्यथात्वानुपपत्तेर्, अप्रच्युत-प्राचीन-रूपस्य व्यपदेशानर्हत्वात्, तत्-प्रच्यवे च प्राक्तन-रूप-त्यागेनोत्तर-रूपाध्यासितया सक्रियत्वम् आपततीति-न्यायात्॑ स्फटिक-दृष्टान्तेऽपि जपा-कुसुमादि-सन्निधानाद् अन्धोपलादौ रक्ततानाविर्-भवन्ती तत्र पुनर् आविर्-भवन्ती तस्य तथा-विधं परिणामं लक्षयत्य्, अन्यथान्धोपलवत् तत्रापि न प्रादुःष्यात्। तन् नाक्रियस्य भोक्तृतोपपद्यत इति।
[न्या०अ०३१।९] विवृत्तिमान् इत्य्-अमुना त्व् एकान्त-नित्यम् अपरिणामिनं नैयायिक-वैशेषिकादि-प्रकल्पितं प्रमातारं निरस्यति, सर्वथाविचलित-रूपस्यार्थ-ग्रहण-परिणामानुपपत्तेः। व्यतिरिक्त-ज्ञान-समवायाद् एकान्त-नित्योऽपि प्रमिणोतीति चेन्, न, समवायस्य प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्, सम्बन्धान्तरस्य च व्यतिरेकिणा साकम् अनुपपत्तेर्, अन्यत्रान्यथानुपपन्नत्वात्। न च व्यतिरेकिणि ज्ञाने तत् समस्ति, तद्-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, अव्यतिरेकानुभवस्य च तद्-बाधकत्वात्। किं च, यदि समवाय-बलाद् आत्मनि ज्ञानं समवैति, तदात्मनां समवायस्य च विभुत्वाद् एक-रूपत्वाच् च सर्वात्मसु किं न समवैति, विशेषाभावात्? तथा च देवदत्त-ज्टानेन यज्टदत्तादयोऽप्य् अर्थ-तत्त्वं बुद्ध्येरन्। अन्यच् च विज्टानोदय-समयेऽपि यादृशः प्राग्-अवस्थायां तादृश एव सन्तिष्ठमानः प्राग् अप्रमाता पश्चात् प्रमातेति ब्रुवाणः खल्ûन्मत्तताम् आत्मन्य् आविर्-भावयति, नापरम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।१०] पश्चार्द्धेन पुनर् भूत-व्यतिरेकिणं स्व-संवेदन-प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्यं जीवं दर्शयंश् चार्वाक-दर्शनं तिरस्-कुरुते, जडात्मक-भूताव्यतिरेके हि तद्-विलक्षण-बोध-रूप-हर्ष-विषादादि-विवर्तानुभवाभाव-प्रसङ्गात्। ननु च कायाकार-परिणतानि भूतान्य् एवात्म-व्यतिरेकिणीं चेतनाम् उत्कालयन्ति॑ सा च तथा-विध-परिणाम-परिणतेषु तेषु सन्तिष्ठते, तद्-अभावे पुनस् तेष्व् एव निलीयत इति॑ तद्-व्यतिरेकानुभवेऽपि न पर-लोक-यायि-जीव-सिद्धिर्, इयतैव दृष्ट-व्यवहारोपपत्तेः। नैतद् अस्ति, द्वयं हि तावद् एतत् संयोगम् अनुभवद् उपलबभ्यते -- पट्च-भूतात्मकं शरीरं चेतना च। तत्रापि शरीरं बहिर्-मुखाकारेण बोधेनार्थ-रूपतया जडम् अनुभूयते, चेतना पुनर् अन्तर्-मुखाकारेण स्व-संवेदन-प्रत्यक्षेण साक्षात्-क्रियते॑ऽत एवाव्यतिरेक-पक्षः प्रतिभास-निराकृतत्वान् नाशङ्कितः। व्यतिरेकिणोः पुनः प्रकाशमानयोर् यदि भूतान्य् एव चेतनाम् उत्कालयन्तीति भवद्भिः परिकल्प्यते, तदा चेतनैव भवान्तराद् उत्पत्ति-स्थानमायाता पट्च-भूत-भ्रान्ति-जनकं शरीरं निर्वर्तयेत्, पुनर् भवान्तरं यातुकामा मुट्चेत्, तत् तयाधिष्ठितं गमनादि-चेष्टां कुर्यात्, तद्-वियुक्तं पुनः काष्ठवत् तिष्ठेद् इति जीव-सम्पाद्यम् एव शरीरं, न पुनर् असौ तत्-सम्पाद्य इत्य्, एतत् परिकल्पनं युक्ततरं पश्यामः, जीवस्य चेतनावतः सकर्मकतयापरापर-भव-भ्रमणापरापर-शरीर-निर्वर्तनयोर् उपपद्यमानत्वात्। भवान्तराद् आगच्छन् उत्पत्ति-स्थानं जीवोऽध्यक्षेण नोपलभ्यत इति चेद्, भूतान्य् अपि तर्हि कायाकार-धारण-द्वारेण चेतनाम् उत्कालयन्तीति प्रत्यक्षेण नोपलक्ष्यन्त इति समानो न्याहः। अथ कायाकार-परिणतेष्व् एव भूतेषु चेतनोपलभ्यते, नान्यदेत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशात् तज्-जन्येति परिकल्प्यत, एवं तर्हि मृतावस्थायां कायाकारम् आबिभ्राणेष्व् अपि नोपलब्धा, कायाकार-परिणामो वा कादाचित्कतया हेत्व्-अन्तरापेक्षीत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशाद् एव तन्-निर्वर्तन-क्षमा चेतना भवान्तरागत-जीव-सम्बन्धिनीति प्रतिपद्यामहे। किं च, जीवस् तावत् कर्म-चैतन्य-सम्बन्धाच् छरीर-निर्वर्तनार्थं प्रवरत इति युक्तम् एवैतद्, भूतानि पुनः किं-भूतानि चेतना-करणे प्रवर्तेरन्॒ सचेतनानि निश्चेतनानि वा? यद्य् आद्यः कल्पस्, ततो विकल्प-युगलम् अवतरति॒ तच् चैतन्यं तेभ्यो भिन्नम् अभिन्नम् वा? यदि भिन्नं, तदा पुरुष-शरीरवत् तत्रापि भूतैः सह वर्तमानम् अपि भूत-विलक्षणम् आत्म-कारणम् अनुमापयतीति तद्-अवस्थैव जीव-सिद्धिः। अथाभिन्नं, तथा सति समस्त-भूतानाम् ऐक्यं प्रसजत्य्, एक-चैतन्याव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। निज-निज-चैतन्याव्यतिरेकीणि भूतानि तेनायम् अदोष इति चेन्, न, तत्-सम्पाद्य-पुरुष-शरीरेऽपि तज्-जन्य-पञ्च-चैतन्य-प्रसङ्गात्। पञ्चापि सम्भूय बृहत्-पुरुष-चैतन्यं बहवस् तिला इव तैल-घटं जनयन्तीति चेत्, तत् तर्हि पुरुष-चैतन्यं किं तेषाम् एव संयोगो यद् वा तद्-उत्पाद्यम्, अन्यद् एव? यद्य् आध्यः कल्पस्, तद् अयुक्तं, चैतन्यानां परस्परं मिश्रणाभावेन संयोग-विरोधाद्, इतरथा बहु-पुरुष-चैतन्यानि सम्भूय बृहत्तम-चैतन्यान्तरम् आरभेरन्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तत्रापि तेषां किम् अन्वयोऽस्ति नास्ति वा? यद्य् अस्ति, तद् अयुक्तं, प्राग्वत् तज्-जन्य-चैतन्य-पञ्च-रूपतापत्तेः। अथ नास्ति, तद् अप्य् अचारु, निरन्वयोत्पादस्य प्रमाण-बाधितत्वात्। तन् न सचेतनानि भूतानि चेतना-करणे व्यापार-भाञ्जि भवितुम् अर्हन्ति। नापि निश्चेतनानि, तेषाम् अत्यन्त-विलक्षणतया चैतन्योत्पाद-विरोधाद्, इतरथा सिकतादयस् तैलादि-करणे व्याप्रियेरन्। किं च, तत्-समुदाय-मात्र-साध्यं वा चैतन्यं स्याद् विशिष्ट-तत्-परिणाम-साध्यं वा। न तावद् आद्या कॢप्तिर्, इला-जलानलानिल-नभस्-तल-मीलनेऽपि चेतनानुपलब्धेः। द्वितीय-विकॢप्तौ पुनः किं तद् वैशिष्ट्यम् इति वाच्यम्। कायाकार-परिणाम इति चेत्, स तर्हि सर्वदा कस्मान् न भवति? कुतश्चिद् धेत्व्-अन्तरापेक्षणाद् इति चेत्, तत् तर्हि हेत्व्-अन्तरं भवान्तरायात-जीव-चैतन्यम् इत्य् अनुमिमीमहे, तस्यैव कायाकार-परिणाम-साध्य-चैतन्यानुरूपोपादान-कारणत्वात्, तद्-विरहे कायाकार-परिणाम-सद्भावेऽपि मृतावस्थायां तद्-अभावाद् गमनादि-चेष्टानुपलब्धेः॑ तन् न कायाकार-परिणाम-जन्यं चैतन्यम्, अपि तु स एव तज्-जन्य इति युक्तं पश्यामः। न प्रत्यक्षाद् अन्यत् प्रमाणम् अस्ति, न च तेन पर-लोक-गमनागमनादिकं चैतन्यस्योपलक्ष्यते, तेन दृष्टान्य् एव भूतानि तत्-कारणतया कल्पनीयानीति चेन्, न, केवल-प्रत्यक्ष-प्रतिक्षेपेण प्रमाणान्तराणां प्राग् एव प्रसाधितत्वात्, तथा च भूयांस्य् अनुमानानि पर-लोकानुयायि-जीव-साधकानि प्रवर्तेरन्। तद् यथा -- तद्-अहर्-जात-बालकस्याद्य-स्तनाभिलाषः पूर्वाभिलाष-पूर्वको,ऽभिलाषत्वाद्, द्वितीय-दिवसादि-स्तनाभिलाषवत्। तद् इदम् अनुमानम् आद्य-स्तनाभिलाषस्याभिलाषान्तर-पूर्वकत्वम् अनुमापयद् अर्थापत्त्या पर-लोक-यायि-जीवमाक्षिपति, तज्-जन्मन्य् अभिलाषान्तराभावात्। एवम् अन्यद् अप्य् उदाहार्यम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।११] तद् अयं स्व-पर-प्रकाशकः कर्ता भोक्ता नित्यानित्यात्मको भूत-विलक्षणः साक्षात्-कृत-कतिचिन्-निज-पर्यायानुमितानाद्य्-अनन्त-काल-भावि-निजानन्त-पर्याय-विवर्तः प्रमाण-प्रतिष्ठितः पारमार्थिको जीवः सकल-नय-प्रमाण-व्यापकः प्रमातेति स्थितम्।
[न्या०अ०३२।०] साम्प्रतं पर्यन्त-श्लोकेन प्रकरणार्थम् उपसंहरन्न् आह॒
प्रमाणादि-व्यवस्थेयम् अनादि-निधनात्मिका ।
सर्व-संव्यवहर्त्ःणां प्रसिद्धापि प्रकीर्तिता ॥ न्यायावतार ३२ ॥
[न्या०अ०३२।१] प्रमाणानि प्रत्यक्षादीन्य्॑ आदि-शब्दान् नय-परिग्रहस्, तेषां व्यवस्था प्रतिनियत-लक्षणादि-रूपा मर्यादा, सेयम् अनन्तरोक्त-स्थित्या प्रकीर्तितेति संसर्गः। किं-भूतेत्य् आह॒ आदिः प्रभवो, निधनं पर्यन्तो, न विद्येते आदि-निधने यस्यासौ तथा-विध आत्मा स्वरूपं यस्याः सानादि-निधनात्मिका॑ सर्व-संव्यवर्त्ःणां लौकिक-तीर्थिकादि-भेद-भिन्न-समस्त-व्यवहारवतां प्रसिद्धापि रूढापि, तद्-अप्रसिद्धौ निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च विचारानुत्थाने न कस्यचित् तत्त्वस्य प्रतिष्ठितिः। प्रकीर्तिता संशब्दिताव्युत्पन्न-विप्रतिपन्न-व्यामोहापोहायेति गम्यते॑ प्रमाण-प्रसिद्धेऽप्य् अर्थे प्रबलावरण-कुदर्शन-वासनादितः केषाञ्चिद् अनध्यवसाय-विपर्यास-रूप-व्यामोह-सद्भावात्, तद्-अपनोदार्थं च सति सामर्थ्ये करुणावतां प्रवृत्तेर् इति।
स्याद्-वाद-केसरि-सुभीषण-नाद-भीतेर् उत्त्रस्त-लोल-नयनान् प्रपलायमानान् ।
हेतुर् नयाश्रित-कुतीर्थि-मृगान् अनन्यत्राणान् विहाय जिनम् एति तम् आश्रयध्वं ॥ नव्३२।१॒१ ॥
भक्तिर् मया भगवति प्रकटी-कृतेयं तच्-छासनांश-कथनान् न मतिः स्वकीया ।
मोहाद् अतो यद् इह किञ्चिद् अभूद् असाधु तत् साधवः कृत-कृपा मयि शोधयन्तु ॥ नव्३२।१॒२ ॥
न्यायावतार-विवृतिं विविधां विधित्सोः सिद्धः शुभो य इह पुण्य-चयस् ततो मे । नित्यं परार्थ-करणोद्यतम् आ भवान्ताद् भूयाज् जिनेन्द्र-मत-लम्पटम् एव चेतः ॥ नव्३२।१॒३ ॥
इति न्यायावतार-विवृतिः समाप्ता ॥
कृतिर् इयम् आचार्य-सिद्ध-व्याख्यानिकस्य तर्क-प्रकरण-वृत्तेर् इति।
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==स्रोतः ==
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[न्या०अ०१।१७] इति-वचनात्, तद् अयुक्तम्, यतः प्रमाणाभावः कथं ग्राह्यः? तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावाद् इति चेत्, तस्याप्य् अभाव-ग्रहणे तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावो ग्राह्य इत्य् अनवस्था। अथ अर्थाभावात् प्रमाणस्य प्रमाणाभावाच् चार्थस्याभावः प्रतिपद्येत इति मन्येथास्, तद् एतद् इतरेतराश्रयं दुर्घटम् आपद्येत॒ न यावद् अर्थाभावोऽगृहीतस् तावत् प्रमाणाभावः सिध्यत्य्, अर्थाभावश् च प्रमाणाभावात् सेत्स्यतीत्य् आवर्तनात्। अथेन्द्रियवत् स्वयम् अविज्ञातोऽपि प्रमाणाभावोऽर्थाभावं ज्ञापयिष्यतीत्य् अभिदधीथास्, तद् अयुक्तम्, तस्य तुच्छतया सकल-शक्ति-विरह-लक्षणत्वाद्, इन्द्रियस्य तु तद्-विपर्यस्ततया ज्ञानोत्पादन-दक्षत्वात्। तस्मात् प्रत्यक्षम् एवम् भू-तलादि-प्रतिनियत-वस्तु-ग्राहितां बिभर्ति, यदि तद्-विपरीत-घटादि-प्रतियोगि-वस्त्व्-अन्तर-वैविक्त्यं तस्याकलयति नान्यथा, विजातीय-व्यवच्छेदाभावे तस्यैव प्रतिनियतत्वासिद्धेः, सकल-सङ्कीर्णतया ग्रहण-प्रसङ्गात्। अतोऽधिक-ग्राह्याभावान् निर्विषयतयाभावाख्यं प्रमाणं यत् परैः पर्यकल्पि तद् अप्रमाणम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०१।१८] द्विधेत्य् अस्मिन् सत्य् अपि प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति नियत-द्वैविध्य-प्रदर्शनेन सौगत-परिकल्पितं ‘प्रत्यक्षम् अनुमानं चेतिऽ॑ द्वैविध्यम् अपक्षिपति, तद्-आकूतेन तस्यायोगात्। प्रत्यक्षातिरिक्तं हि तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धोपलक्षित-कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-सम्पादित-जन्मकम् अनुमानम् एव प्रमाणं, न शाब्दोहादिकं, सम्बन्ध-विकलत्वाद् इति तद्-आकूतम्। अयुक्तं चैतत्, प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-प्रमाणान्तराभाव-ग्रहणोपायाभावात्। न तावत् प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तराभावावगतिस्, तस्य स्वलक्षण-विषयत्वेनाभाव-ग्राहिता-विरोधात्। नापि स्वभाव-कार्यानुमानाभ्यां, तयोर् वस्तु-साधकत्वात्। नाप्य् अनुपलब्धेस्, तस्या अप्य् अत्यन्ताभाव-साधन-विरोधात्। सा हि चतुर्-विधा वर्ण्यते मूल-भेदापेक्षया, तद् यथा -- विरुद्धोपलब्धिर् विरुद्ध-कार्योपलब्धिः कारणानुपलब्धिः स्वभावानुपलब्धिश् चेति। न तावद् विरुद्धोपलब्धेः प्रमाणान्तरस्यात्यन्ताभावो, दृश्यात्मनो विरुद्धस्य विधानेनेतराभाव-साधनात्, सन्निहित-देश एव प्रतियोग्य्-अभाव-सिद्धेः। एतेन विरुद्ध-कार्योपलब्धिर् अपि व्याख्याता, तस्या अपि प्रतिषेध्य-विरोधि-सन्निधापन-द्वारेणाभाव-साधकत्वात्। कारणानुपलब्धिर् अपि तद्-देशाशङ्कित-कार्यस्यैवाभावं साधयति न सर्वत्र, स्वयम् असिद्धत्वात्। स्वभावानुपलब्धिर् अप्य् एक-ज्ञान-संसर्गि-पदार्थोपलम्भ-रूपा तद्-देश एव प्रतिद्वन्द्व्य्-अभावं गमयति। अतः प्रमाणान्तरस्यापि क्वचिन् निषेधः स्यान्, न सर्वत्र। तन् न प्रमाणान्तर-बाधकं समस्ति।
[न्या०अ०१।१९] प्रत्यक्षानुमानयोश् च प्रामाण्यं कुत इति चिन्त्यम्। न तावत् प्रत्यक्षात्, तस्य निर्विकल्पकतया सतोऽप्य् असत्-कल्पत्वात्। तत्-पृष्ठ-भावी विकल्पस् तु न स्वलक्षणाम्भोधि-मध्यम् अवगाहते॑ तत् कथं तत्राप्रविष्टस् तत्-स्वरूपं निश्चिनुयात्। अप्रमाण-भूताच् च तस्मात् प्रामाण्य-निर्णय इति निबिड-जडिमाविष्करणं भवताम्। अनुमानात् प्रामाण्य-निर्णय इति चेन्, न, तस्यापि स्वलक्षणाद् बहिः प्लवनात्। अप्रामाण्य-व्यवच्छेदस् तेन साध्यत इति चेन्, न, व्यवच्छेदस्य व्यवच्छिन्नाव्यतिरेकाद्, इतरथान्धकार-नर्तन-कल्पम् अनुमानम् आसज्येत, निर्विषयत्वात्। किं च, तत्-प्रामाण्य-निर्णायकम् अनुमानं प्रमाणम् अप्रमाणं वा? न तावद् अप्रमाणम्, ततः प्रामाण्यासिद्धेः। नापि प्रमाणं, तत्-प्रामाण्य-साधकाभावात्। न हि प्रत्यक्षात् तत्-सिद्धिर्, विकल्प-शून्यतयाकिञ्चित्-करत्वाद् इत्य् उक्तम्। अनुमानात् तु तत्-साधने विकल्प-युगलं तद्-अवस्थम् एवावतिष्ठेत, तत्-प्रामाण्य-साधनेऽप्य् अनुमान-कल्पनेत्य् अनवस्था। किं च, गृहीत-सम्बन्धस्यानुमानं प्रवर्तेत, सम्बन्धस् त्रि-काल-गोचरो ग्राह्यो, न च प्रत्यक्षं तं लक्षयितुं क्षमते, पूर्वापर-क्षण-त्रुटित-रूप-वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविनो विकल्पस्यापि व्यावहारिकाभिप्रायेण तन्-निष्ठताभ्युपगमात्। अनुमानाद् ग्रहीष्यतीति चेन् ननु तद् अपि सम्बन्ध-पूर्वकं प्रवर्तेत, तद्-ग्रहणेऽपीयं वार्तेत्य् अनवस्था। तस्माद् अनुमानम् अभिलषता गत्य्-अन्तराभावात् तत्-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणस् त्रि-काल-गोचरोऽव्यभिचारी वितर्कोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा च प्रस्तुत-तद्-द्वैविध्यस्य विघटितत्वाद्, अन्यद् अपि यद् एवं-विधम् अविसंवादि ज्ञानं तत् प्रमाणम् अस्त्व् इत्य् अलं शुष्काभिमानेनेति। यदि पुनः साध्यार्थान्यथानुपपन्न-हेतु-सम्पादितम् अनुमानम् इष्येत, तदा प्रत्यक्षम् अनुमानं चेत्य् अपि द्वैविध्यं घटाम् अटेद् एव॑ प्रत्यक्ष-व्यतिरिक्त-ज्ञानस्य सामस्त्येनानुमानेऽन्तर्-भाव-सम्भवात्, अन्यथानुपपन्नार्थान्तरम् अन्तरेण परोक्षार्थ-विषय-प्रतीतेर् अभावाद् इति।
[न्या०अ०१।२०] साम्प्रतम् अन्यथा सूत्रावयवेनैव प्रकृत-नियम-कारणम् आह॒ मेय-विनिश्चयाद् इति द्विधैवेति च काकाक्षि-गोलक-न्यायेनात्रापि सम्बन्धनीयम्। ततश् चायम् अर्थो॒ द्वाभ्याम् एव प्रकाराभ्यां मेयस्य ग्राह्यार्थस्य विनिश्चयात् स्वरूप-निर्णयाद्॑ द्वे एव यथोक्ते प्रमाणे न न्यूनम् अधिकं चेति। अयम् अत्राभिप्रायः॒ स्व-संवेदनं प्रति निखिल-ज्ञानानाम् एक-रूपतया साक्षात्-करण-चतुरत्वान् नास्त्य् एव भेदः॑ बहिर्-अर्थं पुनर् अपेक्ष्य कश्चिच् चक्षुरादि-सामग्री-बल-लब्ध-सत्ताकः स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं सन्निहितं विशद-निर्भासं सामान्यम् आकारं साक्षात्-कुर्वाणः प्रकाशः प्रथते, तत्र प्रत्यक्ष-व्यवहारः प्रवर्तते। यः पुनर् लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण नियतानियत-सामान्याकारावलोकी परिस्फुटता-रहितः खल्व् आत्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणामः समुल्लसति स परोक्षतां स्वी-करोति। न चैतौ प्रकारौ विहाय प्रकारान्तरेण ज्ञान-प्रवृत्तिं पश्यामो, न चापश्यन्तः प्रमाणान्तर-परिकल्पनं क्षमामहे, न च द्वयोः प्रथमानयोर् एकं निह्नुवानम् अपेक्षामहे, विशेषाभावात्। तस्माद् एतद् एव द्वैविध्यम् उररी-कर्तव्यम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२।०] साम्प्रतं यद् अस्माभिः प्राग् विवृण्वद्भिर् व्युदपादि, यद् उत विप्रतिपन्नाव्युत्पन्न-व्यामोहापोह-सहम् इहेदं प्रमाण-लक्षणम् इति तत्-सूत्र-मात्र-दर्शनाद् एव विमल-बुद्धयोऽवगच्छेयुः। मन्द-मतयस् तु तावता न भोत्स्यन्त इति -- तद्धित-विधित्सया व्यक्तं प्रमाण-लक्षणाभिधान-फलं प्रतिपिपादयिषुर् अपि सपूर्व-पक्षं निराकाङ्क्षं लक्षयेयुस् त इति तावत् पूर्व-पक्षम् उत्थापयन्न् आह॒
प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश् च तत्-कृतः ।
प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ न्यायावतार २ ॥
[न्या०अ०२।१] इह वचनम् उच्चारयता विमृश्य-भाषिणा प्रत्यवमृश्यं, किम् इदं मामकं वचनं श्रोतृ-संस्काराधायकम् उत नेति। इतरथा पर्यालोचित-कारितास्य हीयते। श्रोतृ-संस्काराधायकं चेद् उच्चारयत्य्, अन्यथा विपर्यय इति। एतत् तु प्रमाण-लक्षण-वाक्यं सकल-जनानादि-प्ररूढार्थ-प्रत्यायकत्वाद् अश्रोतृ-संस्काराधायकम्, यत आह॒ प्रसिद्धानि प्ररुढानि, नाधुना साध्यानीत्य् अर्थः। प्रमाणानि प्रत्यक्षादीनि, परोक्ष-गत-भेदापेक्षया बहु-वचनं व्यक्ति-भेदे सामान्यम् अपि कथञ्चिद् भिद्यत इति-दर्शनार्थम्। तथा हि॒ तद् अविवक्षित-व्यक्तिकम् एक-रूपतां बिभर्ति प्रमाणम् इति॑ व्यक्त्य्-अवच्छेदेन पुनर् अवच्छिद्यमानं नानातामादत्ते प्रत्यक्षानुमान-शाब्दानि प्रमाणानीति, व्यक्ति-व्यतिरिक्ताव्यतिरिक्त-रूपत्वात् तस्य। तथा हि॒ शब्दाच् चक्षुरादेर् वा दूराद् वृक्ष इति प्रत्यये धव-खदिर-पलाशादि-विशेषानपेक्षया साधारणं वृक्षत्वम् एव चकास्ति, तस्मात् तत् तेभ्यो भिन्नं, तद्-व्यतिरेकिणाकारेण ज्ञाने प्रतिभासनाद्, घटादिवत्। परिस्फुट-धव-खदिर-पलाशादि-विशेषावलोकन-वेलायां तु न तद्, अतिरेकिणा रूपेण प्रकाशत इत्य् अभिन्नं, तद्-अव्यतिरिक्तस्य संवेदनात्, तत्-स्वरूपवत्। विशेषाभिन्नम् एव रूपं तात्त्विकं सामान्यस्य, तस्यैव दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रिया-क्षमत्वाद्, भिन्नं पुनः कल्पना-बुद्धि-विठपितत्वाद् अवस्तु-रूपम् इति चेन्, न, द्वयोः प्रकाशमानयोर् एकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। अन्यथा भिन्नम् एव रूपं स्वाभाविकम् इतरत् तु कल्पना-बुद्धि-दर्शितम् इत्य् अपि वदतां न वदन-भङ्गः स्यात्। अर्थ-क्रिया-कारिताविशेषस् तु भिन्नेऽपि रूपे न दुरुपपादस्, तस्यापि ज्ञान-साधारण-व्यवहार-करण-दक्षत्वात्। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम् इति निवेदयिष्यामस्, तस्मात् सर्वत्र भिन्नाभिन्नौ सामान्य-विशेषाव् इति दर्शनार्थो बहु-वचन-निर्देशः। आसतां तावत् प्रमाणानि।
[न्या०अ०२।२] व्यवहारश् च तत्-कृतः प्रसिद्ध इति सम्बन्धः। च-शब्दोऽपि-शब्दार्थः। तेनायम् अर्थो॒ यद्-अर्थं प्रमाण-परीक्षणम् असाव् अपि जल-पान-शीत-त्राणादिर् व्यवहारोऽनादि-प्ररूढः, तन् निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम् इत्य् अभिप्रायवान् अपि परः परुषता-परिजिहीर्षयात्मनोऽन्यथा प्राह॒ प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमासाधारण-प्रमाण-धर्म-कथन-रूपायां ज्ञायते निर्णीयतेऽस्माभिर् न प्रयोजनं तत्-फलम्, अतिसूक्ष्मत्वात् तावकाभिसन्धेर् इति काक्वा प्रश्नयत्य् उल्लुण्ठयति चेति। किं च, प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं वाभिधीयते, निश्चितं वा स्वरूपेणेति पक्ष-द्वयम्। न तावद् अनिश्चितम्, अनिश्चितस्य लक्षणत्वायोगाद्, उन्मत्तक-विरुतवत्। अथ निश्चितं, तत् किम् अप्रमाणात् प्रमाणाद् वा। न तावद् अप्रमाणाद्, अप्रमाणस्य निश्चायकत्वायोगात्। यदि पुनर् अप्रमाणम् अपि निश्चायकम् इति सङ्गीर्येत, तदा प्रमाण-पर्येषणं विशीर्येत, नैरर्थक्यापत्तेर्, अप्रमाणाद् अपि निश्चायाभ्युपगमात्। अथ प्रमाणात्, तत् किम् अलक्षणं लक्षणोपेतं वा। अलक्षणं चेन् निश्चायकं प्रमाणम्, तर्हि सर्व-प्रमाणानां लक्षणाभिधानम् अनर्थकं, तद्-व्यतिरेकेणाप्य् अर्थ-निश्चय-सिद्धेर्, भवद्-अभिप्रेत-लक्षण-निश्चायक-प्रमाणवत्। अथ लक्षणोपेतं, तत्रापि विकल्प-युगलम् अनुवारित-प्रसरम् अनुधावति॒ तल्-लक्षणं निश्चितम् अनिश्चितं वा। न तावद् अनिश्चितं लक्षणं लक्ष्यं लक्षयति। निश्चयोऽपि प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा। अप्रमाणान् निश्चयासिद्धेः प्रमाणाद् इति वक्तव्यम्। तद् अप्य् अलक्षणं सलक्षणं वा। अलक्षणत्वे पूर्वस्यार्थ-ग्रहणे किं क्षूणम्। सलक्षणत्वे तल्-लक्षणं निर्णीतम् अनिर्णीतं वेति तद् एवावर्तते। तन् न प्रमाण-लक्षणाभिधानोपायोऽस्ति, तस्मात् प्रसिद्धानि प्रमाणानीत्य् अङ्गी-कर्तव्यम् इति।
[न्या०अ०३।०] अधुनाचार्यो गृहीतस् तावकीनोऽभिप्रायोऽस्माभिर् इति परं प्रत्याययंस् तन्-मतम् अनुद्राव्य तद् एवानुमन्यमानस् तथापि लक्षणोक्तेः साफल्यमावेदयन्न् आह॒
प्रसिद्धानां प्रमाणानां लक्षणोक्तौ प्रयोजनम् ।
तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् व्यामूढ-मनसाम् इह ॥ न्यायावतार ३ ॥
[न्या०अ०३।१] एतद् अभ्यधायि भवता, यथा प्रसिद्धानि प्रमाणानि, ततस् तेषां लक्षणोक्ताव् असाधारण-धर्म-कथन-विषये प्रयोजनं फलं, किम् इति शेषस्, तद् एतद् अयुक्तम्। यतो यद्य् अपि प्रतिप्राणि-प्रसिद्धानि प्रमाणान्य्, अन्यथा तत्-कृत-निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च दृष्ट-हान्य्-आद्य्-आपत्तेः, तथापि केचिद् वितत-मोहावष्टब्धान्तः-करणास् तत्-स्वरूपम् अनुभवन्तोऽपि न लक्षयन्ति, ततस् तान् अवलोकयताम् अस्माकं तद्-विषय-कृपा-परीत-चेतसां यथावस्थित-प्रमाण-लक्षणाविर्-भावन-द्वारेण व्यामोहम् एतेषाम् अपसारयाम इति प्रमाण-लक्षणाभिधानं प्रति प्रवर्तते चेतः। तद् इदं प्रयोजनं॒ तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् इति॑ तस्मिन् प्रमाण-लक्षणे व्यामोहो विपरीताभ्युपगमवतां विपर्यास-लक्षणस् तीर्थ्यानां प्रमाणाप्रमाण-विवेक-विकलानाम्, अनध्यवसायात्मकस् तु मुग्ध-बुद्धीनां लौकिकानाम्, तस्य निवृत्तिर् अविपरीत-लक्षणावगमाद् अपगम इत्य् अर्थः, सा स्याद् भवेत्। केषाम् इत्य् आह॒ व्यामूढं विपरीत-ग्रह-ग्रस्तं विचित्ततां गतं मनोऽन्तः-करणं येषां ते तथा तेषाम्॑ इहेति लोके -- तद् अयं तात्पर्यार्थः। यद्य् अनादि प्रसिद्धं प्रमाण-लक्षणं प्रति न केचिद् अपि व्यामुह्येयुस् तदा यद् भवद्भिः प्राग् उदग्राहि॒ ‘निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम्ऽ॑ इति तद् युक्तम् एव स्यात्। न चैतद् एवं॑ तत्र व्यामूढानां दर्शनात्। एतेन यद् अदायि दूषणं ‘प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं निश्चितं वाभिधीयतऽ॑ इत्य्-आदि तद् अपि सिद्ध-साध्यता-मध्य-प्रतिबद्धत्वान् न बाधाविधाय्य् अस्माकम् इति मन्तव्यम्। व्यामूढ-मनसोऽपि प्रति प्रमाण-लक्षण-प्रकाशने तल् लगतीति चेन्, न, स्व-संवेदन-सिद्धस्य वचनेन प्रकाशनात्, तस्य व्यामोहापोह एव व्यापारात्। यथा विविक्त-भू-तलावलोकनेऽप्य् अध्यक्षात् यो घटादि-वैविक्त्यं न प्रतिपद्यते, कुदर्शन-व्यामोहात्, तं प्रत्युच्येत॒ ‘नास्त्य् अत्र घट, उपलम्भ-कारण-समग्रतायाम् अप्य् अनुपलम्भाद्ऽ, वैविक्त्यं हि तत्राध्यक्ष-सिद्धं, वचनाद् व्यामोहो निवर्त्येत॑ तथेहापि विद्वद्भिर् द्रष्टव्यम्। निर्णीतं तल्-लक्षणम् अध्यक्षेण, तस्य व्यवसाय-रूपत्वाद्, वचनं पुनर् विपरीतारोप-निराकरणे व्याप्रियत इति स्थितम्। तद् एवं प्रमाण-लक्षणं सामान्येन प्रतिपाद्य तद्-गतं कुचोद्यं पर्यहार्य् आचार्येण।
[न्या०अ०४।०] अधुना तद्-विषयाम् एव संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षता ये प्रत्यक्ष-परोक्ष-लक्षणे प्रमाण-व्यक्ती प्राक् प्रक्रान्ते, तयोर् अपि लक्षणं प्रति विप्रतिपद्यन्तेऽपरे। अतस् तल्-लक्षणम् अपि वक्तव्यम् इति तावत् प्रत्यक्ष-लक्षणम् अभिधातुकाम आह॒
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् ईदृशम् ।
प्रत्यक्षम्, इतरज् ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥ न्यायावतार ४ ॥
[न्या०अ०४।१] तत्र प्रत्यक्षम् इति लक्ष्य-निर्देशः, अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् इति लक्षण-निर्देशः। परोक्षोऽक्ष-गोचरातीतस्, ततोऽन्योऽपरोक्षस्, तद्-भावस् तत्ता तया, साक्षात्-कृततयेति यावत्। अर्यत इत्य् अर्थोऽवगम्यत इति हृदयम्॑ अर्थ्यत इति वार्थो दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रियार्थिभिर् अभिलष्यत इति यावत्। तस्य ग्राहकं व्यवसायात्मकतया साक्षात् परिच्छेदकं यज् ज्ञानं, तद् ईदृशम् इतीदृग् एव प्रत्यक्षम् इति सण्टङ्कः। तत्र ज्ञान-ग्रहणेन यत् सांख्याः प्राहुः॒ ‘श्रोत्र्-आदि-वृत्तिः प्रत्यक्षम्ऽ॑ इति तत् तिरस्-करोति, श्रोत्र्-आदीनां प्रकृति-विकारतया तद्-वृत्तेर् व्यापार-लक्षणाया जडतया प्रत्यक्षत्वायोगाद्॑ अर्थ-परिच्छित्ति-हेतुतया प्रत्यक्षत्वे आलोकादि-जड-कारण-कलाप-व्यापारस्यापि प्रत्यक्षतापद्येत, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०४।२] अर्थस्य ग्राहकम् इत्य् अस्य ग्रहणेक्षयेति वक्ष्यमाण-पद-सापेक्षत्वाद्, अमुना बहिर् अपि येऽर्थ-कलाकलन-विकलं सकलम् अपि ज्ञानं प्रलपन्ति तान् निरस्यति॑ स्वांश-ग्रहणे ह्य् अन्तः-संवेदनं व्याप्रियते यथा -- तथा बहिर् अपीतरथार्थवज् ज्ञान-सन्तानान्तराण्य् अपि विशीर्येरन्, स्वप्न-दृष्टान्तेन तद्-अनुमानस्योपप्लव-मात्रतापत्तेः, स्व-विज्ञानस्यैव तथा तथा विजृम्भणात्। तथा च प्रमाण-प्रमेय-प्रतिपाद्य-प्रतिपादक-कार्य-कारण-भावादयः प्रलीयेरन्न्, आत्म-व्यतिरेकेणात्मीय-पूर्वोत्तर-क्षणयोर् अपि ज्ञानस्य प्रवृत्ति-निरोधापत्तेः। अद्वय-विज्ञान-तत्त्व-साधनेनानुकूलम् आचरसीति चेत्, स्याद् एतत्, यदि भवतः प्रमाण-परिदृष्ट-सकल-व्यवहारोच्छेदेन कुदर्शन-वासनाहितादृष्टाद्वय-तत्त्व-परिकल्पनात् प्रतिकूलं न स्यात्। तन् नार्थ-विरहेण बहिः-प्रमाण-भूत-ज्ञानोल्लासोऽस्ति, निर्हेतुकत्व-प्रसङ्गाद् इति।
[न्या०अ०४।३] ग्राहकम् इति च निर्णायकं द्रष्टव्यम्, निर्णयाभावेऽर्थ-ग्रहणायोगात्। तेन यत् ताथागतैः प्रत्यपादि॒ ‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् अभ्रान्तम्ऽ॑ इति तद् अपास्तं भवति, तस्य युक्ति-रिक्तत्वात्। तथा हि॒ ते निर्विकल्पकत्वेऽध्यक्षस्यायुक्तीः खेटयन्ति -- किलेदम् अर्थ-सामर्थ्येनोदीयते, सन्निहितार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्राहकत्वात्। न चार्थे ध्वनयः सन्ति, तद्-धेतु-विलक्षण-कारणान्तर-जन्यत्वात्, ततश् चासाव् उपनिपत्य स्व-गोचरं संवेदनम् उत्थापयन् स्वाकारम् अनुकारयति। तन् न तद्-ग्राहिणि विज्ञाने शब्द-संश्लेषो युक्तः। किं च, यद्य् उत्पादकार्थोपयोगेऽपि तं तावन् न गृह्णीयात्, संवेदनम् अपि तु स्मरण-सम्पादितं तद्-अभिधायक-ध्वनि-संयोजनं प्रतीक्षमाणं तावद् आसीत, तर्हि दत्तो जलाञ्जलिर् अर्थ-ग्रहणस्य। तथा हि॒ तम् अर्थम् अपश्यंस् तस्मिन् गृहीत-सङ्केतं तद्-अभिधायक-ध्वनिं नानुस्मरत्य्, उपायाभावाद्, अननुस्मरंश् च पुरो-वर्तिन्य् अर्थे न योजयति, स्मृत्य्-उपस्थापन-व्यतिरेकेण तद्-योजनाशक्तेर्, अयोजयंश् च भवद्-अभिप्रायेण न पश्यतीति धान्ध्याद् आन्ध्यमापद्येत। यदि चेन्द्रियजम् अपि ज्ञानं विकल्प-कलुषितम् इष्येत, तदा तद् अपि मनो-राज्यादि-विकल्पवद् विकल्पान्तराविर्-भावे सति निवर्तेत॑ न चैतद् अस्ति, सन्निहित-गो-पिण्ड-गोचरस्य चक्षुर्ज-संवेदनस्याश्वादि-विषय-विकल्पोदयेऽप्य् अनिवर्तनात्, संहृत-सकल-विकल्पस्यापि च परिस्फुट-सन्निहितार्थ-विषय-दर्शन-सिद्धेः। तन् नाक्षजं ज्ञानं शब्द-सम्पर्कम् अनुभवतीति।
[न्या०अ०४।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यत् तावद् उक्तम्॒ अशब्दकार्थ-सामर्थ्योद्भवत्वाद् ध्वनि-रहितम् अध्यक्षम् इति, तद् अयुक्तं, न हि शब्दासम्पृक्तार्थजम् इत्य् एतावतैवाभिलाप-विना-कृतम् इति वक्तुं शक्यम्, अन्यथा जडार्थ-जनितम् इति जडम् अपि तत् स्यात्। अथ बोध-रूप-मनस्कार-साहित्यान् न जडम् इति ब्रूषे, तथा सत्य् अभिलाप-संसृष्ट-मनस्कार-सन्नियोगात् साभिलापम् अपि स्यात्। किं च, विविक्ताः परमाणवः स्वाकारार्पण-द्वारेण स्व-गोचरं ज्ञानम् उत्पादयन्तः कथम् असन्तम् आत्मनि स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं तत्र प्रथयन्ति। विभ्रमाद् इति चेन्, न, नेदानीम् अर्थे यद् अस्ति तद् एव प्रतिभाति, तत्रासतोऽपि स्थूराकारस्य प्रतिभासनात्। तथा शब्दोऽपि। यद्य् अविद्यमानोऽर्थे तद्-ग्राहिणि ज्ञाने प्रतिभासेत किं क्षूयेत? यच् चोक्तम्॒ ‘स्मरण-जनित-शब्द-संयोजनं प्रतीक्षमानम् अर्थोपयोगेऽपि यद्य् आसीतेत्य्ऽ-आदि यावद् ‘आन्ध्यम् आपद्येतऽ, तत् तावक-पक्षेऽपि समानम्। तथा हि॒ स्वलक्षण-विषयेन्द्रियज-निर्विकल्पक-ज्ञान-सद्भावेऽपि न तावद् इदं-तयानिदं-तया वार्थ-व्यवस्थितिर्, यावद् विधि-प्रतिषेध-द्वारेण विकल्प-युगलकं पाश्चात्यं नोदयते, यत्रैवांशे विकल्पं जनयति, तत्रैवास्य प्रमाणतेति-वचनान्, निर्विकल्पकस्य सतोऽपि व्यवहारं प्रत्य् असत्-कल्पत्वात्। स च विकल्पः सङ्केत-काल-भावितम् अभिलाप-सामान्यम् अनुस्मरत एवोत्पत्तुम् अर्हति, अभिलाप-सामान्य-स्मरण-बीजं च कुतः प्रबुध्येत? तादृश-दर्शनाद् इति चेन्, ननु तद् अपि दर्शनं निर्विकल्पकत्वाद् अर्थं नातिशेते, तत् कथं सामान्य-विषय-विकल्प-बीजं प्रबोधयेत्? अर्थः पुनः सामान्य-व्यवसायात्मिकां बुद्धिं न जनयेद् इति भवतां कदाग्रहः। तद् अर्थवत् तद्-विषयं दर्शनं व्यवसाय-शून्यत्वान् नाभिलाप-सामान्य-गोचर-स्मरण-बीजं प्रबोधयति॑ तद् अप्रबुद्धं न स्मरणं जनयत्य्॑ अजातं स्मरणं न शब्दं योजयत्य्॑ अयोजितः शब्दो नार्थं निश्चाययत्य्॑ अनिश्चितोऽर्थो न व्यवहारम् अवतरत्य्॑ अनवतीर्णो नादृष्टाद् विशिष्यते॑ अविशिष्टः प्रमातुर् आन्ध्यं लक्षयतीति। तस्माद् यथा कथञ्चिन्-निर्णयाभावात् स्वयम् अप्रतीतम् अपि निर्विकल्पक-दर्शनं वासना-प्रबोध-द्वारेण विकल्पम् उत्थाप्यात्म-व्यापारम् अभिलापयति कतिचिद्-अंश-विषयं, तथार्थोऽपि यदि चक्षुर्-आदि-सामग्र्य्-अन्तः-पातित्वेनाप्रतीत एव स्वयं, तथा-स्वभावत्वात्, सङ्केत-काल-भाविताभिलाप-सामान्य-विषयात्म-संस्कार-प्रबोध-द्वारेणात्म-विषयम् अभिलाप-संसृष्टं संवेदनम् उल्लासयेन् नात्यन्तम् अयुक्तं पश्यामः। न चायं सविकल्पको बोधो मनो-राज्यादि-विकल्प-कल्पश्, चक्षुरादि-सामग्री-सम्पाद्यत्वाद्, इतरस्य तु मनो-मात्र-प्रभवत्वात्। अतः कथं तद्-विकल्पान्तराविर्-भावे निवर्तेत? मानस-विकल्पस्यैव विकल्पान्तरेण निवर्तनाद्, अस्य तु कारण-सामर्थ्येन बलात् प्रवृत्तेः। एतेन संहृत-सकल-विकल्पावस्थायां नैष प्रादुःष्याद् इत्य् एतद् अपि प्रतिक्षिप्तम्, अस्य प्रमातुर् इच्छया संहर्तुम् अशक्यत्वान्, मानस-विकल्प-संहरण एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेर् इति। एतच् च शब्द-सम्पृक्त-प्रत्यक्ष-पक्षाद् अप्य् एकान्त-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-पक्षस्य पापीयस्तां दर्शयद्भिर् अस्माभिर् उदग्राहि।
[न्या०अ०४।५] परमार्थतः पुनः प्रत्यक्षे साक्षाच् छब्दोल्लेखो नेष्यते, विशद-व्यवसायेनार्थ-साक्षात्-करण-चतुरत्वात् तस्य। केवलं तद् अपि सन्निहितं परिस्फुटं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं पदार्थान्तरैः सह समानासमानाकारं स्व-परमाणूनां सामान्याकारं स्तम्भाधिकं पदार्थं गोचरयतीति सविकल्पकम् इत्य् उच्यते, पर-परिकल्पित-क्षण-क्षयि-विविक्त-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवण-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-प्रतिषेधार्थं कथञ्चिद्-अभिलाप-संसर्ग-योग्य-गोचरता-दर्शनार्थं वा। एवं च प्रत्यक्ष-गोचरी-कृतेऽर्थे संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध-ग्रहणादयस् तद्-विषयाः शाब्द-व्यवहाराः सर्व एव निरुपचरिता घटन्त इत्य् उक्तं भवति। यदि पुनः शब्द-संसर्ग-योग्य-प्रतिभासम् अध्यक्षं न स्यात्, ततः को दोष इति चेद्, विकल्पानुत्थानेन सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गः। तथा हि॒ निर्व्यवसायं दर्शनम् अत्यन्त-पाटवोपेतम् अपि स्मृति-बीजाधानं तद्-उत्तर-काल-भावि वा तादृशार्थ-दर्शनं तत्-प्रबोधनम् अभ्यास-वासना-पाटवेऽपि न विधातुम् अलं, यतः सामान्य-विकल्पोत्पत्त्या व्यवहारः प्रवर्तेत, क्षणिकत्वादिषु सकल-कालं निर्विकल्पकाध्यक्ष-दृष्टतयाभ्युपगतेष्व् अपि तद्-अदर्शनात्। तस्माद् यत्र कुत्रचिद् अर्थांशे पाश्चात्य-व्यवहार-प्रवृत्तिस् तत्र प्राचीनं संवेदनं निर्णायकम् अभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा क्षणिकत्वाद्य्-अंशवत् सर्वांशेषु व्यवहारः प्रलीयेत। तन् न कदाचन कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षस्य प्रमातुर् अपि प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति। अप्रतीतं चास्तीति श्रद्धातुं दुःशकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् अलक्षणम्।
[न्या०अ०४।६] अभ्रान्तत्वम् अपि न जाघटीति, भवद्-अभिप्रायेण स्थिर-स्थूरार्थ-ग्राहिणः संवेदनस्य विपर्यस्त-रूपत्वात्, तद्-विपरीतस्य तु स्वप्न-कालेऽप्य् अप्रकाशमानत्वात्। तद् यदि यथावस्थितार्थ-ग्राहित्वम् अभ्रान्तत्वं, तन् न सम्भवत्य् एव, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणूनां कदाचिद् अप्य् अप्रतिभासात्, तेषां च पारमार्थिकत्वात्। अथ व्यावहारिकाभिप्रायेण यद् इदं घटादिकं स्वलक्षणम् अर्थ-क्रिया-क्षमं, तत्र यन् न भ्राम्यति तद् अभ्रान्तम् इत्य् अभिप्रेतं, तर्हि कल्पनापोढ-पदम् उत्सारणीयम्, इदानीम् अनेन सहावस्थानाभावाद्, व्यवहारावतारिणो घटादि-स्वलक्षणस्य निर्णयेनैव ग्रहणाद्, अन्यथा व्यवहाराप्रवृत्तेर्, दृष्टस्याप्य् अदृष्टानतिशयनात्। तस्माद् व्यवसायात्मकम् अध्यक्षम् इत्य् एतद् एव चार्व् इति स्थितम्।
[न्या०अ०४।७] अपरोक्षतयेत्य् अनेन तु परोक्ष-लक्षण-सङ्कीर्णताम् अध्यक्षस्य परिहरति, तस्य साक्षात्-कारितया अर्थ-ग्रहण-रूपत्वाद् इति। ईदृशम् इत्य् अमुना तु पूर्वोक्त-न्यायात् सावधारणेन विशेषण-कदम्बक-सचिव-ज्ञानोपप्रदर्शनात् पर-परिकल्पित-लक्षण-युक्तस्य प्रत्यक्षतां प्रतिक्षिपति। एवं च यद् आहुर्॒ "इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" तथा "सत्-सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धि-जन्म तत् प्रत्यक्षम्" इत्य्-आदि तद् अयुक्तम् इत्य् उक्तं भवत्य्, अपूर्व-प्रादुर्-भावस्य प्रमाण-बाधितत्वाद्, अत्यन्तासतां शश-विषाणादीनाम् अप्य् उत्पत्ति-प्रसङ्गात्। तस्माद् इदम् आत्म-रूपतया विद्यमानम् एव विशेष-कृद्-धेतु-कलाप-सन्निधानात् साक्षाद् अर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपतया विवर्तेत॑ तथा चोत्पन्न-जन्मादि-विशेषणं न सम्भवेत्। अथैवं-विधार्थ-सूचकम् एवैतद् इत्य् आचक्षीथास्, तथा सत्य् अविगानम् एवेत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०४।८] अधुना परोक्ष-लक्षणं दर्शयति॒ इतरद् इत्य्-आदि। अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तम्, तस्माद् इतरद् असाक्षाद् अर्थ-ग्राहकं ज्ञानं परोक्षम् इति ज्ञेयम् अवगन्तव्यम्। एतद् अपि स्व-संवेदनापेक्षया प्रत्यक्षम् एव, बहिर्-अर्थापेक्षया तु परोक्ष-व्यपदेशम् अश्नुत इति दर्शयन्न् आह॒ ग्रहणेक्षयेति॑ इह ग्रहणं प्रक्रमाद् बहिः प्रवर्तनम् उच्यते,ऽन्यथा विशेषण-वैयर्थ्यात्॑ तस्येक्षापेक्षा तया॑ बहिः-प्रवृत्ति-पर्यालोचनयेति यावत्। तद् अयम् अर्थो॒ यद्य् अपि स्वयं प्रत्यक्षं, तथापि लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण बहिर्-विषय-ग्रहणेऽसाक्षात्-कारितया व्याप्रियत इति परोक्षम् इत्य् उच्यते। एतच् च बुभुत्सितार्थान्यथानुपपन्नार्थान्तर-प्रतीति-वशाद् उदय-धर्मकं इति। सामान्य-लक्षण-सद्भावाद् एकाकारम् अपि विप्रतिपत्ति-निराकरणार्थं द्विधा भिद्यते, तद् यथा॒ अनुमानं शाब्दं चेति। यतोऽद्यापि शब्दस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वम् एव परे न प्रतिपद्यन्ते, न चापृथक्-कृतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम्, अतो भेदेनोपन्यासः।
[न्या०अ०५।०] तत्र तावद् अनुमान-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकं स्मृतम् ।
अनुमानं, तद् अभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवत् ॥ न्यायावतार ५ ॥
[न्या०अ०५।१] इहाप्य् अनुमानम् इति लक्ष्य-निर्देशः, तस्य प्रसिद्धतया अनूद्यत्वात्। साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इति लक्षण-निर्देशः, तस्याप्रसिद्धतया विधेयत्वाद् इति। अत्राप्य् अनुमान-शब्दस्य कर्त्र्-आदि-कारक-व्युत्पत्ति-क्रमेणार्थ-कथनं प्रमाण-शब्दवद् द्रष्टव्यम्। ततश् चेहापि लिङ्ग-ग्रहण-साध्याविनाभावित्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-स्मरण-कालात् [अनु] पश्चान् मीयते परिच्छिद्यतेऽर्थोऽनुमेयः पावकादिर् येन ज्ञानेन तद् अनुमानम् इति। तत् किं-भूतम् इत्य् आह॒ साध्य-निश्चायकम् इति -- साधनम् अर्हति, साधयितुं वा शक्य इति साध्योऽनुमेय इत्य् अर्थः॑ तस्य निश्चायकं तत्-स्वरूप-निर्णायकम् इति यावत्। तत् कुत इत्य् आह॒ लिङ्गाल् -- लिङ्ग्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति लिङ्गं हेतुस् तस्मात्। किं-भूताद् इत्य् आह॒ साध्याविनाभुन इति -- विना भवतीति विनाभु, ततोऽन्यद् अविनाभु, साध्येनाविनाभु साध्याविनाभु, साध्यं विमुच्य यन् न भवतीत्य् अर्थः, तस्मात् साध्य-निश्चायकं ज्ञानं तद् अनुमानम्। स्मृतम् अभिप्रेतं नीतिविद्भिर् इति सम्बन्धः। तत्र लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इत्य् अनेनानुमानस्य प्रत्यक्ष-शाब्द-लक्षण-सङ्कीर्णतां वारयति। साध्याविनाभुन इत्य् अनेन पर-प्रणीत-लिङ्ग-लक्षण-व्युदासम् आचष्टे।
[न्या०अ०५।२] ततश् च यत् परे प्रोचुः -- पक्ष-धर्मत्वान्वय-व्यतिरेक-लक्षण-रूप-त्रयोपलक्षितानि त्रीण्य् एव लिङ्गानि॒ अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति॑ तद् उक्तम्॒
"अनुमेयेऽथ तत्-तुल्ये सद्भावो, नास्तितासति ।
निश्चितानुपलम्भात्म-कार्याख्या हेतवस् त्रय" ॥ इति॑
[न्या०अ०२] तथान्ये॒ "ऽस्येदं कार्यं कारणं संयोगि समवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्" इति, तथा॒ "पूर्ववच् छेषवत् सामान्यतो-दृष्टम्" इत्य्-आदि -- तद् बाल-प्रलपित-प्रायम् इत्य् अवगन्तव्यं, सर्वत्र साध्याविनाभावित्वस्यैव गमकत्वात्, तद्-रहितस्य तु त्रैलक्षण्य-लक्षितस्याप्य् अगमकत्वाद्, इतरथा तत्-पुत्रत्वादीनाम् अपि गमकत्व-प्रसङ्गान्, नियमवत्। त्रैलक्षण्यं लक्षणं, न यत्-किञ्चित्, तेनायम् अप्रसङ्ग इति चेन्, न, नियमेन साध्याविनाभावित्वस्यैवोद्दीपनात्॑ तच् चेद् अस्ति किं त्रैलक्षण्यापेक्षया, तस्यैव गमकत्वात्। तथा हि॒ जल-चन्द्रान् नभश्-चन्द्रं, कृत्तिकोदयाच् छकटोदयं, पुष्पितैक-चूतात् पुष्पिताशेष-चूतान्, चन्द्रोदयात् कुमुदाकर-प्रबोधं, वृक्षाच् छायाम् इत्य्-आदि पक्ष-धर्मत्व-विरहेऽप्य् अनुमिमीमहे। कालादिकस् तत्र धर्मी समस्त्य् एव, तत्र पक्ष-धर्मता लिङ्गस्य गृह्यत इति चेन्, नातिप्रसङ्गाद्, एवं हि शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये काक-कार्ष्ण्यादेर् अपि गमकत्व-प्रसक्तेस्, तत्रापि लोकादेर् धर्मिणः कल्पयितुं शक्यत्वात्। तथान्वय-विकलोऽप्य् अनित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद् इत्य् अयं सम्यग्-घेतुतया समर्थयितुं शक्य इति, नान्वयोऽपि हेतोर् लक्षणम्। तथा हि॒ तावकाकूतेनैव सकलं सत्त्वम् अनित्यतया क्रोडी-कृतम् इति भाव-धर्मः श्रावणत्वं कथम् अनित्यतां विहाय विपक्षे वर्तितुम् उत्सहेत, तद्-विकलस्य निःस्वभावतापत्तेर्, अनित्यता-विनिर्मुक्तस्य सत्त्वस्यासम्भवावत्। एतेन सात्मकं जीवच्-छरीरं, प्राणादिमत्त्वान्, निरात्मकत्वे तद्-वैकल्य-प्रसङ्गाद्, घटादिवद् इत्य् अयम् अपि गमको व्याख्यातः, साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्वस्यात्रापि सद्भावात्, पक्ष-धर्मत्वान्वययोस् त्व् अलक्षणतया प्रतिपादनात्।
[न्या०अ०५।३] तथा कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-नियमोऽपि किल तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धास्तित्वम् एतेष्व् एवेति यः क्रियते, सोऽप्य् अयुक्तः, प्रकृत-सम्बन्ध-द्वय-विकलस्यापि रूपादे रसादि-गमकत्व-दर्शनात्। मा भूत् तस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्तिभ्यां गमकत्वं, समवायाद् भविष्यति, तथापि नान्यथानुपपन्नत्वम् एव हेतोर् लक्षणम् इति यदि वैशेषिको मन्येत, सोऽन्यथा निर्लोठनीयः। स हि विकल्पतः पर्यनुयोज्यः॒ समवायिभ्यः समवायोऽभिन्नो भिन्नो वा। यद्य् अभिन्नः, समवायिन एव तर्हि, न समवायः, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेत्, स कथं तेषु वर्तेत॒ सामस्त्येनाहोस्विद् एक-देशेन? तद् यदि सामस्त्येन, तद् अयुक्तं, समवाय-बहुत्व-प्रसङ्गात्, प्रतिसमवायि तस्य परिसमाप्ततावाप्तेः। अथैक-देशेन, तद् अप्य् अचारु, सांशता-प्रसङ्गेन निरवयवत्व-क्षतेः, स्वांश-वर्तनेऽपि सामस्त्यैक-देश-चोद्यावताराच् च। तत्रापि सामस्त्य-पक्षे बहुत्वं तद्-अवस्थम् एव। एक-देश-पक्षे त्व् अंशान्तर-प्रसङ्गेनानवस्था। तन् न समवाय-बलात् गमकतां प्रत्य् आशाविधेया, तस्यैव तत्र दुःस्थितत्वात्। एतेन संयोगिनोऽपि गमकता प्रत्युक्ता, समान-दूषणत्वात्। विरोधिनोऽपि विरुद्धाभाव-गमकत्वम् अन्यथानुपपन्नत्वम् एव सूचयति, तद्-अभावे गमकत्वायोगात्।
[न्या०अ०५।४] एवं पर-परिकल्पितम् अन्यद् अपि लिङ्ग-लक्षणं यद् गमकताङ्गं तद् अन्यथानुपपन्नत्वं न व्यभिचरति, साध्यं विनाप्य् उपपद्यमानस्य गमकता-वैकल्याद् इति॑ अत्रैव व्यापके लिङ्ग-लक्षणेऽन्तर्-भावनीयं, विपरीतं तु निरसनीयम् इति स्थितम्।
[न्या०अ०५।५] तद् एवम् अनुमान-लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यच् छौद्धोदनि-शिष्यकैर् न्यगादि, यद् उत -- भ्रान्तम् अनुमानम्, सामान्य-प्रतिभासित्वात्, तस्य च बहिः-स्वलक्षणे व्यतिरेकाव्यतिरेक-विकल्पाभ्याम् अपाक्रियमाणतयायोगात्, तद्-रूपतया च तेन तस्याध्यवसायाद्, अतस्मिंस् तद्-ग्रहणस्य च भ्रान्ति-लक्षणत्वात्। प्रामाण्यं पुनः प्रणालिकया बहिः स्वलक्षण-बलायातत्वाद् अनुमानस्य। तथा हि॒ नार्थं विना तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-रूप-सम्बन्ध-प्रतिबद्ध-लिङ्ग-सद्भावो, न तद् विना तद्-विषयं ज्ञानं, न तज्-ज्ञानम् अन्तरेण प्राग्-अवधारित-सम्बन्ध-स्मरणं, तद्-अस्मरणे नानुमानम् इत्य्, अर्थाव्यभिचारित्वाद् भ्रान्तम् अपि प्रमाणम् इति सङ्गीर्यते॑ तद् उक्तम्॒ "अतस्मिंस् तद्-ग्रहो भ्रान्तिर् अपि सम्बन्धतः प्रमेति" -- तद् अपाकर्तुम् आह॒ तद् अभ्रान्तम् इत्य्-आदि। तद् अनुमानं, भ्राम्यति स्व-गोचरे विपर्यस्यतीति भ्रान्तं, ततोऽन्यद् अभ्रान्तम्, अविपरीतार्थ-ग्राहीति यावत्। इयं च प्रतिज्ञा। प्रमीयते यथावस्थितोऽर्थः परिच्छिद्यतेऽनेनेति प्रमाणं, तद्-भावस् तत्-त्वं तस्मात्। अयं तु हेतुः। सङ्गतम् अक्षाणाम् इति समक्षं, तद् इव समक्षवद् इति दृष्टान्तः। तद् इदम् अनुमानस्य भ्रान्तता-निराकारकं सम्पूर्णावयवम्, उपनय-निगमनयोर् अवयव-त्रय-प्रतिपादनेनैवाक्षिप्तत्वात्। प्रमाणं सूचितम्, प्रयोगस् त्व् एवं द्रष्टव्यो॒ऽभ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वाद्, इह यद् यत् प्रमाणं तत् तद् अभ्रान्तं यथा समक्षं, तथा च प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगम्यतेऽनुमानं, तस्मात् प्रमाणत्वाद् अभ्रान्तम् इति प्रतिपद्यन्ताम् इति। तत्रार्थ-वादी तावत् समक्ष-लक्षणे दृष्टान्ते साध्य-विकलताम् आविर्-भावयितुं न पारयति, स्वयम् एव समक्षस्याभ्रान्ततयाऽभ्युपगमात्। शून्य-वादिनः पुनः समस्तापलापित्वात् प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारं प्रत्य् अयोग्यतैवेति न तम् अधिकृत्य स्व-साधन-दोषाः परिहर्तव्याः, स्व-वचन-बाधित-प्रतिज्ञत्वेन तद्-वादोत्थानाभावात्। तथा हि॒ सर्वाभाव-प्रतिपादकं वचोऽस्ति, नास्ति वा? यद्य् अस्ति तर्हि प्रतिज्ञा-हानिः। अथ नास्ति, सकल-भाव-सिद्धिः, प्रतिषेधकाभावात्।
[न्या०अ०६।०] ज्ञान-वादी पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विकलं सकल-विकल्प-गोचरातीतं निर्विकल्पकं विविक्त-पारमार्थिक-स्व-संवेदन-वेद्यं संवेदनम् आगूर्यानादि-कालालीन-वासना-बल-प्रभावितं ग्राह्य-ग्राहकाकार-कलुषितं बहिष्-प्रथमानं निखिलम् अपि ज्ञानं विपर्यस्ततया प्रतिजानानः समक्ष-लक्षणस्य प्रकृत-दृष्टान्तस्य साध्य-शून्यताम् अभिदध्याद्, अतस् तन्-मत-विकुट्टनार्थम् आह॒
न प्रत्यक्षम् अपि भ्रान्तं प्रमाणत्व-विनिश्चयात् ।
भ्रान्तं प्रमाणम् इत्य् एतद् विरुद्धं वचनं यतः ॥ न्यायावतार ६ ॥
[न्या०अ०६।१] यद् भवतश् चेतसि विवर्तते, यद् उत न केवलम् अनुमानं भ्रान्तं, किं तर्हि यद् भवद्भिर् दृष्टान्ततयोपात्तं प्रत्यक्षं तद् अपि भ्रान्तम् एव, "सर्वम् आलम्बने भ्रान्तम्" इत्य् वचनात्, तद् एतन् न। कुत इत्य् आह॒ प्रमाणत्व-विनिश्चयाद् इति, प्रमाण-भाव-निर्णयाद् इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०६।२] ननु च प्रमाणताम् अभ्रान्ततान्यथानुपपन्नां यदि परः प्रतिपद्यते, ततस् ताम् अभ्युपगच्छन् कथं भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं विदध्याद् इति पार्श्व-स्थित-वचनावकाशम् आशङ्क्य, भ्रान्तता-प्रमाणतयोर् विरोध-साधनेन ततः प्रमाणतां व्यावर्त्यानन्य-शरणतया प्रतिज्ञाताभ्रान्तताक्रान्तां तां दर्शयन्न् आह॒ भ्रान्तम् इत्य्-आदि। भ्रान्तं विपर्यस्तम् अथ च प्रमाणं ग्राह्य-परिच्छेद-हेतुर् इत्य् एतद् वचनम् एवं-विद्धार्थ-प्रत्यायको ध्वनिर् विरुद्धं, पूर्वापर-व्याहतार्थ-गर्भत्वात्।
[न्या०अ०६।३] ननु च नैवास्य विरुद्धता, तथा ह्य्॒ अविदित-परमार्थ-व्यावहारिकाभिप्रायेण लोक-संवृतिं घटयन्तो वयं दृढतर-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताकयोः प्रत्यक्षानुमानयोः प्रमाणताम् आचक्ष्महे, तद्-अभिप्रायेण दर्शितार्थ-प्रापकत्वेन तयोर् अविसंवादकत्वात्। शिथिल-वासनाउन्मुख्य-निर्मित-जन्मकयोः पुनर् अप्रमाणतां, तद्-आकूतेनैव दर्शितेऽर्थे विप्रलम्भनाद् इति, भ्रान्ततां पुनस् तत्त्व-चिन्तकाभिप्रायेण सकलस्य बहिर् उपप्लवमानस्य ग्राह्य-ग्राहकाकार-कालुष्य-दूषितस्य प्रतिभासस्य पारमार्थिकाद्वय-संवेदन-विपर्यस्त-रूपत्वाद् अभिदध्महे, बहिः प्रतिभासस्य तद्-ग्राह्यार्थ-विचाराक्षमतयोपप्लुत-रूपत्वात्। तथा ह्य्॒ अर्थोऽवयवि-रूपोऽवयव-रूपो वा स्याद्, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् अवयवि-रूपो विचारं क्षमते,ऽवयव-विरहेऽवयवित्वायोगात्, तेषु च तद्-वृत्ति-विकल्पानुपपत्तेः। तथा हि॒ तेष्व् असाव् एकदेशेन वर्तते सामस्त्येन वा। न तावद् एकदेशेन, तस्य स्वयं निरवयवत्वात्। अवयव-वृत्ति-निमित्तम् अंशान्तर-कल्पने तद्-वृत्ताव् अप्य् अंशान्तर-कल्पन-प्रसङ्गस्, तथा चानवस्था। नापि सामस्त्येन, प्रत्य्-अवयवं परिसमाप्त-रूपतयावयवि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। भेद-पक्षे दोषोऽयम्, अभेद-पक्षे नास्तीति चेन्, न॒ तत्राप्य् अवयव-मात्रम् अवयवि-मात्रं वा स्याद्, इतरेतराव्यतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्। किं च, समस्तावयव-व्यापिनोऽवयविनोऽभ्युपगमे पटादेर् एक-देश-राग-कम्प-दर्शनादिषु सकल-राग-कम्प-दर्शनादीनि दुर्निवाराणि स्युर्, एकस्य रागारागादि-विरुद्ध-धर्माध्यासायोगाद् इति। नाप्य् अवयव-रूपोऽर्थो विचार-गोचर-चारी कर-चरण-शिरो-ग्रीवादीनाम् अवयवानां स्वावयवापेक्षयावयवि-रूपतया तद्-दूषणेनैवापास्तत्वात्। परमाणूनां निरंशतयावयवत्वम् उपपद्यत इति चेन्, न, तेषाम् अपि दिक्-षट्क-सम्बन्धेन षट्-अंशतापत्तेर्, अन्यथावस्थानाभावात्। ततश् चार्थ-विरहात् तद्-उन्मुखो ग्राह्याकारोऽलीकस्, तद्-अलीकतायां ग्राहकाकारोऽपि नावस्थानम् आबध्नाति, ग्राह्याभावे ग्राहकायोगात्। तद्-अपेक्षयैव तत्-स्वरूप-स्थितिः, ग्राह्य-ग्राहकाकार-विलये च बोधाकारोऽवशिष्यते, तस्य सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात्, तस्मात् स एव पारमार्थिक इति।
[न्या०अ०६।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यद् अवादि संवेदनम् अद्वयं पारमार्थिकं, ग्राह्य-ग्राहकाकार-प्रवृत्तं पुनर् अतात्त्विकम् इति, तद् अयुक्तं, प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ बहिर् अन्तश् चानेकाकारतया हर्ष-विषादादिभिः स्थिर-स्थूरताद्य्-अनेक-धर्म-परिकरितार्थ-ग्रहण-परिणामैश् च विवर्तमानं संवेदनम् उपलभ्यते, न पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विविक्तं यादृग् भवद्भिर् उपवर्ण्यते ज्ञानं तादृशं कस्यचित् कदाचन प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अद्वय-प्रतिभासस्य स्वप्न-दशायाम् अप्य् अननुभूतेः। न च तत्त्व-चिन्तका अपि प्रमाणम् अन्तरेण स्वाकूतं प्रतिष्ठापयन्तः प्रेक्षावताम् अवधेय-वचना भवन्त्य्, अन्यथैकम् अचेतनम् अव्ययम् अपि ब्रह्मानेकं चेतनं क्षण-भङ्गुरताक्रान्तम् अविद्यातः प्रथत इति ब्रुवाणोऽनिराकार्यः स्यात्। यद् अपि बहिर्-अर्थ-निराकरण-धिया अवयव्य्-अवयव-द्वारेण दूषणम् अदायि, तद् अपि बहिर् अन्तः प्रथमान-सकलासुमत्-प्रतीत-प्रतिभास-मुद्गर-निर्दलित-शरीरतया भक्त-मध्य-निष्ठ्यूत-दर्शिनः पुरतो विप्रतारण-प्रवण-कुट्टिनी-शपथ-प्रायम् इति न विद्वज्-जन-मनांसि रञ्जयति, प्रत्यक्ष-प्रतिभासापह्नवे तन्-मूलकत्वात् कुयुक्ति-विकल्पानाम् उत्थानाभावात्। किं च, संवेदनस्यापि सितासिताद्य्-अनेकाकारेष्व् एकस्य वर्तने भेदाभेद-सामस्त्यैक-देशादि-चोद्यं समानम् एवेति न दूषणम्। अनेकाकार-विवर्तस्यालीकत्वान् न तेन सह संवेदनस्य पारमार्थिकस्य भेदाभेदादि-चिन्तेति चेन्, नन्व् एवम् इतरेतराश्रयं दुरुत्तरम् आढौकते। तथा हि॒ तद्-अलीकत्व-सिद्धाव् अद्वय-संवेदन-सिद्धिस्, तत्-सिद्धौ च तद्-अलीकत्वम् इति न्यायात्। अन्यच् चाद्वयम् अप्य् एक-क्षण-वर्ति संवेदनं यथा पूर्वोत्तर-क्षणाभ्यां सम्बन्धम् अनुभवति, तथा निरंशा अपि यदि परमाणवो दिग्-अंशैः परमाण्व्-अन्तरैर् वा संश्लेषमागच्छेयुः किम् अयुक्तं स्यात्। न चावयव्य्-अवयवयोर् एकान्त-व्यतिरेकाव्यतिरेक-पक्षे यद् दूषणं तद् अस्मत्-पक्ष-बाधा-करं, परस्पराविनिर्लुठित-रूपयोर् विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदयोस् तयोर् अभ्युपगमाद्, बहिर् अन्तश् च तथैव प्रकाशमानतया तयोर् निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। एतेन रागाराग-कम्पाकम्पादि-विरोधोद्भावनम् अपि प्रतिव्यूढं, प्रमाण-प्रसिद्धेऽर्थे विरोधाभावात्, प्रमाण-बाधितस्यैव विरुद्धत्वात्, कुयुक्ति-विकल्पानां च प्रत्यक्षापह्नवे निर्मूलतया बाधकत्वायोगात्, तद्-उद्दलितत्वेनोत्थानाभावाद्, भिन्न-प्रवृत्ति-निमित्तत्वाच् च सर्व-धर्मानां तद्-विपर्यय-सम्पाद्यो विरोधो दूरापास्त एव। किं च, स्वयम् एव संवेदनं परमार्थ-संव्यवहारापेक्षया प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-सविकल्पकाविकल्पक-भ्रान्ताभ्रान्तादि-रूपम् अभ्युपयतो बहिर्-अर्थे विरुद्ध-धर्माध्यास-प्रतिषेध-बुद्धिः केवलं जाड्यं सूचयति। तन् न प्रमाणं कथञ्चिद् भ्रान्तं समस्ति, स्वरूप-प्रच्यव-प्रसङ्गाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०६।५] ननु च तद्-दर्शितार्थालीकतया ज्ञानस्य भ्रान्तता, न स्वरूपेण, न च तद्-उदय-समये कस्यचिद् इदम् अलीकार्थम् इदं त्व् अनलीकार्थम् इति विवेकेनावधारणं समस्ति, भ्रान्ताभ्रान्ताभिमतयोस् तद्-एक-रूपतया प्रकाशनात्। यदा च विशद-दर्शन-पथ-चारिणोऽपि शश-धर-युगलादयोऽलीकताम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तदा सकल-सत्यार्थताभिमत-प्रतिभासेष्व् अप्य् अलीकार्थताशङ्कानिवृत्तेर् अनाश्वास एव। न च तद्-अर्थ-प्राप्त्य्-आदिकम् आरेका-निराकरण-कारणं कल्पनीयं, स्वप्नावस्थायां तत्-सद्भावेऽप्य् अलीकार्थता-सिद्धेः। बाधक-प्रत्ययोपनिपातात् तस्यासत्यार्थतेति चेन्, न, तस्य स्व-गोचर-पर्यवसितत्वेन बाधकत्वायोगात्। अन्यथा नीलम् आददाना देवदत्त-बुद्धिः प्राक्-प्रवृत्त-पीत-बुद्धेर् बाधिकापद्येत। सर्व-प्रतिभासस्य बाधकाभाव-सिद्धेश् च समानता। तस्माद् भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञान-भ्रान्तिर् इयं भवतां, विवेकाभावेन सर्वस्यालीकार्थत्वाद् इति।
[न्या०अ०७।०] अत्राह॒
सकल-प्रतिभासस्य भ्रान्तत्वासिद्धितः स्फुटं ।
प्रमाणं स्वान्य-निश्चायि द्वय-सिद्धौ प्रसिध्यति ॥ न्यायावतार ७ ॥
[न्या०अ०७।१] एवं मन्यते॒ योऽपि समस्त-संवेदनस्य भ्रान्ततां प्रतिजानीते, तेनापि तत्-साधकस्याभ्रान्तताभ्युपगन्तव्या, तद्-भ्रान्तत्वे तत्-प्रतिपादितार्थालीकत्वेन सकल-ज्ञानाभ्रान्तता-प्रसङ्गाद्, अन्यथा तद्-भ्रान्ततायोगात्। एवं च तज्-जातीयम् अन्यद् अप्य् अभ्रान्तं स्यात्, ततश् च सकल-प्रतिभासस्य समस्त-संवेदनस्य भ्रान्तत्वासिद्धितो विपर्यस्तत्वानिष्पत्तेर् यत् स्फुटं स्वान्य-निश्चायि सुनिश्चिततया स्व-पर-प्रकाशकं तत् प्रमाणम् इति सम्बन्धः। तच् च द्वय-सिद्धौ स्वरूपार्थ-लक्षण-युग्म-निष्पत्तौ प्रसिद्ध्यति निष्पद्यते, अन्यथा प्रमेयाभावे प्रमाणाभावात्। तस्मात् प्रमाणम् उररी-कुर्वाणेनार्थोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अभिप्राय इति।
[न्या०अ०८।०] तद् एवं स्वार्थानुमान-लक्षणं प्रतिपाद्य तद्-वतां भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं च निराकृत्याधुनाप्रतिपादित-परार्थानुमान-लक्षण एवाल्प-वक्तव्यत्वात् तावच् छाब्द-लक्षणम् आह॒
दृष्टेष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः ।
तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ॥ न्यायावतार ८ ॥
[न्या०अ०८।१] अत्रापि शाब्दम् इति लक्ष्यम्, अनूद्यत्वात्। दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य्-आदि लक्षणं, विधेयत्वात्। दृष्टेन प्रमाणावलोकितेनेष्टः प्रतिपादयिषितोऽव्याहतोऽनिराकृतः सामर्थ्याद् अर्थो यस्मिन् वाक्ये तत्-तथा, प्रमाण-निश्चितार्थाबाधितम् इति यावत्, तस्मात्। परमोऽकृत्रिमः पुरुषोपयोगी शक्यानुष्ठानो वार्थो वाच्यस्, तम् अभिधातुं शीलं यस्य तत् परमार्थाभिधायि, विशिष्टार्थ-दर्शकम् इत्य् अर्थः। ततस् तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं प्रकृत-वाक्य-प्रतिपाद्यार्थादान-शीलतया लब्धात्म-सत्ताकं यन् मानं तच् शाब्दम् इति प्रकीर्तितम् उपवर्णितं पूर्वाचार्यैर् इति सम्बन्धः। तत्र दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य् अनेन कुतीर्थिक-वचसां लौकिक-विप्रतारकोक्तीनां च शाब्दतां निरस्यति, प्रमाण-बाधितत्वात्। वाक्याद् इत्य् अमुना तु वाक्यस्यैव नियतार्थ-दर्शकत्वात् परमार्थाभिधायितेति दर्शयन् पदाच् छाब्दाभावम् आह। परमार्थाभिधायिन इत्य् अनेन ज्वर-हर-तक्षक-चूडा-रत्नालङ्कारोपदेशादि-वचन-प्रभव-ज्ञानस्य निष्फलतया प्रामाण्यं निराचष्टे। तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नम् इत्य् अमुना त्व् एवं-भूताद् अपि वाक्याच् छ्रोतृ-दोषाद् विपरीताद्य्-अर्थ-ग्रहण-चतुरतया प्रादुर्-भूतस्य शाब्दत्वं वारयति। मानम् इत्य् अनेनान्तर्-भावित-प्रोपसर्गार्थेन शाब्दे परस्याप्रामाण्य-बुद्धिं तिरस्-कुरुते, तद्-अप्रामाण्ये परार्थानुमान-प्रलय-प्रसङ्गात्, तस्य वचन-रूपत्वात्। त्र्य्-अवयव-हेतु-सूचकत्वेनोपचारतस् तस्य प्रामाण्यं, न तत्त्वत इति चेन्, नाप्रमाणस्य सूचकत्वायोगात्। ननु च हेतु-प्रतिपादने यदि तत् प्रमाणं, ततो हेतु-समर्थक-प्रमाणान्तर-प्रतीक्षणं विशीर्येत, तेनैव निर्णीत-स्वरूपत्वात् तस्य, प्रमाण-प्रसिद्धे पुनः प्रमाणान्तर-वैयर्थ्यात्। नैतद् अस्ति, भवत्-परिकल्पिताध्यक्षस्याप्य् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्॒ तद्-दर्शितेऽर्थे विकल्प-प्रतीक्षणात् तस्यैव प्रामाण्यम् आसज्येत। तद्-गृहीतम् एवार्थम् असाव् अभिलापयतीति चेच् छब्द-प्रतिपादितं हेतुं प्रमाणान्तरं समर्थयत इति समानो न्यायः।
[न्या०अ०९।०] शाब्दं च द्विधा भवति॒ लौकिकं शास्त्र-जं चेति। तत्रेदम् द्वयोर् अपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितं। समर्थनं पुनर् अविप्रतारक-वचन-प्रभवस्येहादि-वाक्य-प्रस्ताव एव लौकिकस्य विहितं, शास्त्र-जस्य तु विधातव्यम् इति यादृशः शास्त्रात् तज्-जातं प्रमाणताम् अनुभवति तद् दर्शयति॒
आप्तोपज्ञम् अनुल्लङ्घ्यम् अदृष्टेष्ट-विरोधकम् ।
तत्त्वोपदेश-कृत् सार्वं शास्त्रं कापथ-घट्टनम् ॥ न्यायावतार ९ ॥
[न्या०अ०९।१] शास्ति शिक्षयति जीवाजीवादि-तत्त्वं ग्राहयति, शिष्यतेऽनेनेति वा शास्त्रम्। तत् किं-भूतम् इति तद्-विशेषणान्य् आह। आप्तः प्रक्षीणाशेष-रागादि-दोष-गणस्, तेनोपज्ञम् आदाव् उपलब्धम्। अनेनापौरुषेयापोहम् आह, तस्य प्रमाण-बाधितत्वात्, पुरुष-व्यापाराभावे वचनानुपलब्धेर्, उपलम्भेऽपि तद्-अर्थानवगमात्, तद्-अर्थ-निश्चयार्थं पुरुषाश्रयणे गज-स्नान-न्याय-प्रसङ्गात्, तस्य रागादि-कलुषितत्वेन वितथार्थ-कथन-प्रवृत्तेः। तद्-अनुष्ठानाद् अपि स्व-कार्य-सिद्धौ प्रणयनार्थम् अपि पुरुषः किं नेष्यते, विशेषाभावात्। तन् न क्षीण-दोष-वचनं व्यतिरिच्यान्यतः प्रेक्षावतां पर-लोकादाव् अदृष्टेऽर्थे प्रवृत्तिर् युक्ता॑ तत् तद् एव शास्त्रं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०९।२] अत एवोल्लङ्घ्यते प्राबल्येन गम्यतेऽभिभूयते अन्यैर् इत्य् उल्लङ्घ्यं, ततोऽन्यद् अनुल्लङ्घ्यं, सर्व-वचनातिशायीति यावत्। अत एव दृष्टेन प्रमाण-निर्णीतेनेष्टस्य तद्-वाच्यस्य विरोधो यस्मिंस् तत्-तथा तद् एव, यदि वा दृष्टः प्रमाणेन, इष्टो वचनान्तरेण, तयोर् विरोधकं, तद्-विरुद्धार्थाभिधानात्, ततोऽन्यद् अदृष्टेष्ट-विरोधकम्, अबाधार्थाभिधायीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०९।३] तद्-इयता शास्त्रस्य स्वार्थ-सम्पद् उक्ता। अधुना तत्त्वोपदेशादीनां परार्थत्वात् परार्थ-सम्पदम् आह॒ तत्त्वं जीवादयः पदार्थाः, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्, तेषां उपदेशः स्वरूप-प्रकाशनं तद्-रक्षणादि-विधानं वा। तं करोति तत्त्वोपदेश-कृत्। अत एव सार्वं सर्वस्मै हितं, प्राणि-रक्षणोपायोपदेश-परम-पद-दायितया विश्व-जनीनत्वात्। एतेन परार्थ-सम्पादकत्वम् उक्तम्।
[न्या०अ०९।४] अधुना परेषाम् एवानर्थ-विघातित्वम् आह॒ कुत्सिताः पन्थाः कापथास् तीर्थान्तराणि, तेषां घट्टनं विचालकं निराकारकं, सर्व-जनापकारि-कुमत-विध्वंसकम् इत्य् अर्थः। ईदृशाद् एव शास्त्राज् जातं शाब्दं प्रमाणं, नान्येभ्यो, विप्रलम्भकत्वात् तेषाम् इति।
[न्या०अ०१०।०] अधुना परार्थानुमान-लक्षणं वक्तव्यम्, तच् च प्रत्यक्षेऽपि पश्यन्न् एक-योग-क्षेमत्वात् सामान्येनाह॒
स्व-निश्चयवद् अन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः ।
परार्थं मानम् आख्यातं वाक्यं तद्-उपचारतः ॥ न्यायावतार १० ॥
[न्या०अ०१०।१] अत्र परार्थं मानम् इति लक्ष्यं, स्व-निश्चयवद् इत्य्-आदि लक्षणम्। स्व आत्मा तस्य निश्चयः प्रमेयाधिगमस्, तद्वद् अन्येशां प्रतिपाद्यानां निश्चयोत्पादनं प्रमेय-परिच्छेदक-ज्ञान-प्रादुर्-भावनं॒ यथात्मनोऽर्थ-निर्णयस् तथा परेषां निर्णय-जननम् इत्य् अर्थः। बुधैर् विद्वद्भिः, परस्मै अर्थः प्रयोजनं येन तत् परार्थं, मीयतेऽनेनेति मानम्, आख्यातं कथितम्।
[न्या०अ०१०।२] ननु च यदि निश्चयोत्पादनं परार्थ-मानं, तथा ज्ञानम् अपि पर-प्रत्यायनाय व्याप्रियमानं परार्थं प्राप्नोतीत्य् आह॒ वाक्यं परार्थं, न ज्ञानं, तस्यैवानन्तर्येण व्यापारात्, पर-प्रयोजन-मात्रत्वाच् च, इतरस्य तु व्यवहितत्वात्, स्व-परोपकारित्वाच् च। कथं वचनम् अज्ञान-रूपं प्रमाणम् इत्य् आह॒ तद्-उपचारतस्, तस्य ज्ञानस्योपचारोऽतद्-रूपस्यापि तद्-अङ्गतया तद्-रूपत्वेन ग्रहणम्, ततः। इदम् उक्तं भवति॒ प्रतिपाद्य-गतम् उत्पत्स्यमानं यज् ज्ञानं तद् अव्यवहित-कारणत्वाद् वचनम् अप्य् उपचारेण प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तत्रानुमानस्य पारार्थ्यं परैर् अभ्युपगतम् एव, प्रत्यक्षस्य न प्रतिपद्यन्ते, किलेदं शब्द-प्रवेश-शून्य-स्वलक्षण-ग्राहीति नैतद्-गोचरः परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यते। न च शब्दात् परस्य स्वलक्षण-ग्रहण-दक्षं प्रत्यक्षम् उन्मङ्क्ष्यति, शब्दस्य विकल्पोत्पादितत्वेन परस्यापि विकल्पोत्पादकत्वात्। तद् उक्तं॒
"विकल्प-योनयः शब्दा विकल्पाः शब्द-योनयः ।
कार्य-कारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्य् अपि" ॥
[न्या०अ०११।०] निर्विकल्पकं च प्रत्यक्षम्, अतो न शब्द-जन्यम् इत्य् अतोऽनुमानं दृष्टान्ती-कृत्य प्रत्यक्षस्यापि परार्थतां साधयितुम् आह॒
प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् ।
परस्य तद्-उपायत्वात् परार्थत्वं द्वयोर् अपि ॥ न्यायावतार ११ ॥
[न्या०अ०११।१] प्रत्यक्षेणाप्य् अनुमानेनेव प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् स्व-प्रतीत-प्रमेय-प्रत्यायकत्वात् परार्थत्वं प्रतिपाद्य-प्रयोजनत्वं द्वयोर् अपि प्रत्यक्षानुमानयोस्, तुल्य-कारणत्वान्, नानुमानस्यैवैकस्येत्य् अभिप्रायः। इह चाश्रूयमाणत्वात् तद्-अर्थ-गमनाच् चापीव-शब्दौ लुप्त-निर्दिष्टौ द्रष्टव्यौ। प्रत्यक्ष-प्रतीतार्थ-प्रत्यायनं च प्रतिजानानस्यायम् अभिप्रायो॒ यत् परो मन्यते -- नैतद्-गोचरं परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यत इति -- तद् अयुक्तं, निर्विकल्पकाध्यक्षापोहेन व्यवसाय-रूपस्य प्रत्यक्षस्य प्राग् एव साधितत्वात्, तद्-गोचरस्य कथञ्चिद् विकल्प-गम्यत्वेन शब्द-प्रतिपाद्यत्वात्। तद् यथानुमान-प्रतीतोऽर्थः परस्मै प्रतिपाद्यमानो वचन-रूपापन्नः परार्थम् अनुमानं, तथा प्रत्यक्ष-प्रतीतोऽपि परार्थं प्रत्यक्षं, पर-प्रत्यायनस्य तुल्यत्वाद्, वचन-व्यापारस्यैव भेदात्। तथा ह्य्॒ अनुमान-प्रतीतं प्रत्याययन्न् एवं वचनयत्य् -- अग्निर् अत्र धूमाद्, यत्र यत्र धूमस् तत्र तत्राग्निर्, यथा महानसादौ॑ वैधर्म्येण वाग्न्य्-अभावे न क्वचिद् धूमो, यथा जलाशयादौ, तथा च धूमोऽयं, तस्माद् धूमाद् अग्निर् अत्रेति, अव्युत्पन्न-विस्मृत-सम्बन्धयोस् तथैव प्रतिपादयितुं शक्यत्वात्। स्मर्यमाणे सम्बन्धे पुनर् एवम्॒ अग्निर् अत्र धूमोपपत्तेर्॑ वैधर्म्येण॒ अग्निर् अत्र, अन्यथा धूमानुपपत्तेः। प्रत्यक्ष-प्रतीतं पुनर् दर्शयन्न् एतावद् वक्ति॒ ‘पश्य राज गच्छतिऽ। ततश् च वचनाद् द्विविधाद् अपि समग्र-सामग्रीकस्य प्रतिपाद्यस्यानुमेय-प्रत्यक्षार्थ-विषया यतः प्रतीतिर् उल्लसत्य्, अतो द्वयोर् अपि परार्थतेत्य् आह॒ परस्य तद्-उपायत्वात् प्रतिपाद्यस्य प्रतीतिं प्रति प्रतिपादक-स्थ-प्रत्यक्षानुमान-निर्णीतार्थ-प्रकाशन-कारणत्वाद् इत्य् अर्थः। एतेन पूर्व-कारिकोक्तोपचार-कारणं च लक्षयति।
[न्या०अ०११।२] यच् चोक्तं॒ ‘न शब्दात् परस्य प्रत्यक्षोत्पत्तिस्, तस्य विकल्प-जनकत्वात्, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षण-विषयत्वेन निर्विकल्पकत्वात्ऽ॑ -- तद् अयुक्तं, सामान्य-विशेषात्मकार्थ-विषयस्य निर्णय-रूपस्य तस्य कथञ्चिद् एक-विषयतया शब्दोत्पाद्यत्वाविरोधाद्, एवं-विधस्य च प्राग् एव समर्थनात्। चक्षुर्-आदि-सामग्रीतस् तद् उत्पद्यते, न शब्दाद् इति चेद्, अनुमानम् अपि प्रत्यक्षादि-निश्चिताद् धेतोर् अविस्मृत-सम्बन्धस्य प्रमातुर् उल्लसति, न शब्दाद्, अतस् तस्यापि परार्थता विशीर्येत। समर्थ-हेतु-कथनात् तत्र वचनस्य परार्थतेति चेद्, अत्रापि दर्शन-योग्यार्थ-प्रतिपादनाद् इति ब्रूमः। तन् न प्रत्यक्ष-परोक्षयोः पारार्थ्यं प्रति विशेषोपलब्धिर् इति मुच्यतां पक्ष-पातः।
[न्या०अ०१२।०] तद् एवं द्वयोर् अपि परार्थतां प्रतिपाद्य तत्-स्वरूपम् आह॒
प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि च यद् वचः ।
प्रत्यक्षं प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् तद् उच्यते ॥ न्यायावतार १२ ॥
[न्या०अ०१२।१] यद् वचः प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि साक्षात्-कारि-ज्ञान-गोचर-कथन-चतुरं तत् प्रत्यक्षम् उच्यत इति सम्बन्धः। तच् च प्रत्यक्ष-रूपम् एवोच्यमानं प्रत्यक्षं, विप्रतिपन्नं प्रति पुनर् अनुमान-द्वारेणोच्यमानम् अनुमानम् एवेति च-शब्देनानेकार्थत्वाद् दर्शयति। वचनं कुतः प्रत्यक्षम् इत्य् आह॒ प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् प्रतिपाद्य-प्रत्यक्ष-प्रकाश-हेतुत्वाद् उपचारेणोच्यत इत्य् अर्थः।
[न्या०अ०१३।०] अनुमानम् आह॒
साध्याविनाभुवो हेतोर् वचो यत् प्रतिपादकम् ।
परार्थम् अनुमानं तत् पक्षादि-वचनात्मकम् ॥ न्यायावतार १३ ॥
[न्या०अ०१३।१] हिनोति गमयत्य् अर्थम् इति हेतुस्, तस्य साध्याविनाभुवः प्राङ् निरूपितस्य यद् वचः प्रतिपादकं सन्दर्शकं तद् अनुमान-प्रकाश-हेतुत्वात् परार्थम् अनुमानम्। तत् की-दृशं? इत्य् आह॒ पक्षो वक्ष्यमाण-लक्षणः स आदिर् येषां हेतु-दृष्टान्तोपनय-निगमनादीनां तानि तथा, तेषां वचनानि प्रतिपादका ध्वनयः॑ तान्य् एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् पक्षादि-वचनात्मकम्।
[न्या०अ०१३।२] ननु च हेतु-प्रतिपादकं वचः परार्थम् अनुमानम् इत्य् अभिधाय तत् पक्षादि-वचनात्मकम् इति वदतः पूर्वापर-व्याहता वाचो युक्तिः। नैतद् अस्त्य्॑ एवं मन्यते नैकः प्रकारः परार्थानुमानस्य, किं तर्हि यथा परस्य सुखेन प्रमेय-प्रतीतिर् भवति तथा यत्नतः प्रत्यायनीयः। तत्र दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः। तद् यथा -- पक्षादयः पञ्च, तच्-छुद्धयश् च। तत्र यदा प्रतिपाद्यः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षोऽविस्मृत-दृष्टान्त-स्मार्य-प्रतिबन्ध-ग्राहक-प्रमाणो व्युत्पन्न-मतित्वाच् छेषावयवाभ्यूहन-समर्थश् च भवति, यद् वात्यन्ताभ्यासेन परिकर्मित-मतित्वात् तावतैव प्रस्तुत-प्रमेयम् अवबुध्यते, तदा हेतु-प्रतिपादनम् एव क्रियते, शेषाभिधानस्य श्रोतृ-संस्काराकारितया नैरर्थक्याद् इत्य्-आदौ हेतु-प्रतिपादनं सूत्र-कृता परार्थम् अनुमानम् उक्तम्। यदा तु प्रतिपाद्यस्य नाद्यापि पक्ष-निर्णयस्, तदाकाण्ड एव हेत्ûपन्यासोऽदृष्ट-मुद्गर-पातायमानः स्याद् इति पक्षोऽपि निर्दिश्यते। तथास्मर्यमाणे प्रतिबन्ध-ग्राहिणि प्रमाणे दृष्टान्तोऽपि वर्ण्येतान्यथा हेतोः सामर्थ्यानवगतेः। स्मृतेऽपि प्रमाणे दार्ष्टान्तिके योजयितुम् अजानानस्योपनयो दर्श्यते। तथापि साकाङ्क्षस्य निगमनम् उच्यते,ऽन्यथा निराकुल-प्रस्तुतार्थासिद्धेः। तथा यत्र पक्षादौ स्वरूप-विप्रतिपत्तिस् तत्र तच्-छुद्धिः प्रमाणेन कर्तव्येतरथा तेषां स्व-साध्यासाधनात्। सर्वेषां चामीषां साधनावयवत्वं, प्रतिपाद्य-प्रतीत्य्-उपायत्वात्।
[न्या०अ०१३।३] ननु च स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तं, न च स्वार्थानुमान-काले क्रमोऽयम् अनुभूयते, सम्बन्ध-वेदिनो हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीति-सिद्धेर्, न हि प्रतिपत्ता पक्षं कृत्वा ततो हेतुं निभालयति, नापि दृष्टान्तादिकं विरचयति, तथा प्रतीतेर् अभावात्। किं चान्वय-व्यतिरेकाभ्यां हेतोर् एव सामर्थ्यम् उन्नीयते, न पक्षादीनां, तद्-व्यतिरेकेणापि साध्य-सिद्धेः, तथापि तेषां साधनांशत्व-कल्पनेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। यदि च तत्-सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्षोपन्यास-मात्राद् एव साध्यावगतेर् हेतुर् आनर्थक्यम् अश्नुवीत, उत्तरावयवाश् च, एवं हि तत्-सामर्थ्यं सिद्ध्येन् नान्यथा। तस्माद् य एव पर-निरपेक्षं साध्यं बोधयति स एव हेतुः साधनं, न पक्षादय इति।
[न्या०अ०१३।४] अत्रोच्यते -- ‘स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तम्ऽ॑ इत्य्-आदि यद् उक्तं तद् युक्तम् उक्तं, केवलं तद्-अर्थं न जानीषे, निश्चयापेक्षयैव ‘वत्ऽ-इना तुल्यताभिधानान्॑ न पुनः सर्व-सामान्यम् अभिप्रेतम्, अन्यथा ध्वनिम् अनुच्चारयन् स्वार्थानुमाने साध्यम् अवबुध्यत इति, तद्-अनुच्चारणेन पर-निश्चयोत्पादनं प्रसज्येत। न चैतद् अस्ति, शब्दानुच्चारणे पर-प्रतिपादनासम्भवात्, तद्-अर्थं शब्दाङ्गी-करणे येन येन विना पर-प्रतिपादनासम्भवस् तत् तद् उररी-कर्तव्यं, समान-न्यायात्। न च पक्षादि-विरहे प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं शक्यो, हेतु-गोचरादि-तत्-साध्यार्थ-प्रतीति-विकलतया तस्य साकाङ्क्षत्वात्। तथा च बुभुत्सितार्थ-बोधाभावाद् अप्रत्यायित एव तिष्ठेद्॑ अतस् तद्-बोधनार्थं पक्षादयो दर्शनीया इति तेऽपि साधनांशाः स्युः। यच् चोक्तम्॒ अन्वय-व्यतिरेकानुकरणाभावान् न साधनं, हेतु-मात्राद् अपि साध्य-सिद्धेस्, तद् अयुक्तम्, अविप्रतारकता-निश्चित-पुरुष-वचन-मात्राद् अप्य् अग्निर् अत्रेत्य्-आदि-रूपात् क्वचित् प्रमेयोऽर्थः सिध्यतीति हेतोर् अप्य् असाधनता-प्रसङ्गात्। तद्-विरहेणापि साध्य-सिद्धेः। युक्तं चैतद्, अविप्रतारक-वचनस्य प्राग् एव प्रामाण्य-प्रसाधनात्। यच् चोक्तम्॒ यद्य् अमीषां सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्ष-मात्राद् एव साध्य-प्रतीतेर् हेतोर् वैयर्थ्यं स्याद् इति, तद् अयुक्ततरं, भवत्-पक्षेऽपि समानत्वात्, तत्रापि समर्थ-हेत्ûपन्यासाद् एव साध्यावगतेर्, अन्यथा समर्थतायोगात्। पश्चात् तस्यैव प्रमाणेन समर्थनं सर्वत्र गृहीत-व्याप्तिकस्य च पुनः पक्ष-धर्मिण्य् उपसंहरणम् अनर्थकतां प्राप्नुवत् केन निवार्येत? तद्-अभावे हेतोः सामर्थ्यं नावगम्यते, तेन सार्थकम् इति चेत्, पक्षादीन् अपि विरहय्य प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं न पार्यत इति तेषाम् अपि सार्थकता न दुरुपपादेति मुच्यताम् आग्रहः। तस्माद् धेतुवत् पक्षादयोऽपि साधनं, हेतोर् अपि क्वचित् प्रतिपाद्ये तद्-अपेक्षतया निरपेक्षतासिद्धेर् इति। तद् इदं सकलम् आकलय्योक्तं तत् पक्षादि-वचनात्मकं इति।
[न्या०अ०१४।०] तद् एवम् अर्थतः पक्षादीन् प्रस्तुत्य तावत् पक्ष-लक्षणम् आह॒
साध्याभ्युपगमः पक्षः प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृतः ।
तत्-प्रयोगोऽत्र कर्तव्यो हेतोर् गोचर-दीपकः ॥ न्यायावतार १४ ॥
[न्या०अ०१४।१] पच्यत इति पक्षो, व्यक्ती-क्रियत इति-भावः। किं-भूत इत्य् आह॒ साध्यस्यानुमेयस्याभ्युपगमोऽङ्गी-करणं, प्राश्निकादीनां पुरतः प्रतिज्ञा-स्वी-कार इत्य् अर्थः। किम् अभ्युपगम-मात्रम्? नेत्य् आह॒ प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृत इति। प्रत्यक्षं साक्षात्-कारि संवेदनम्, आदि-शब्दाद् अनुमान-स्व-वचन-लोका गृह्यन्ते, तैर् अनिराकृतोऽबाधितः पक्ष इति सम्बन्धः। तद् यथा -- ‘सर्वम् अनेकान्तात्मकम्ऽ, ‘अस्ति सर्व-ज्ञऽ॑ इत्य्-आदि वा। अयं च केवलम् एष्टव्यो, न पुनः परार्थानुमान-काले वचनेनाभिधातव्य इति यो मन्येत तं प्रत्याह॒ तस्य पक्षस्य प्रयोगोऽभिधानम् अत्र परार्थानुमान-प्रस्तावे कर्तव्यो विधेयः। कुत इत्य् आह॒ हेतोः प्राङ्-निरूपितस्य गोचर-दीपक इति, ‘निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां प्रायो दर्शनम्ऽ॑ इति-वचनाद्, भाव-प्रधानत्वाच् च निर्देशस्य, विषय-सन्दर्शकत्वाद् इत्य् अर्थः। अयम् अत्राभिप्रायो॒ न हि सर्वत्र प्रतिवादिनः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षस्य कूर्च-शोभा-पुरः-सरं हेतुर् उपन्यस्यते,ऽपि तु क्वचित् कथञ्चित्।
[न्या०अ०१५।०] ततो यदाद्यापि प्रतिपाद्यः पक्षार्थं न जानीते, तदाकाण्ड एव हेताव् उच्यमाने विषय-व्यामोहाद् भ्रान्ति-लक्षणो दोषः स्याद् इत्य् आह॒
अन्यथा वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचर-मोहिनः ।
प्रत्याय्यस्य भवेद् धेतुर् विरुद्धारेकितो यथा ॥ न्यायावतार १५ ॥
[न्या०अ०१५।१] अन्यथेत्य् उक्त-विपरीताश्रयणे पक्ष-प्रयोगाकरण इत्य् अर्थः। वादिनो हेत्ûपन्यास-कर्तुर् अभिप्रेतोऽभिमतः स चासौ हेतु-गोचरश् च वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचरस्॑ तत्र मुह्यति दोलायते तच् छीलश् च यस्, तस्य प्रत्याय्यस्य प्रतिवादिनो हेतुर् विरुद्धारेकितो भवेद् विरोध-शङ्का-कलङ्कितः स्याद् इत्य् अर्थः। ततश् च सम्यग्-घेताव् अपि ‘विपक्ष एवायं वर्ततऽ॑ इति व्यामोहाद् विरुद्ध-दूषणम् अभिदधीत, पक्षोपन्यासात् तु निर्णीत-हेतु-गोचरस्य नैष दोषः स्याद् इत्य् अभिप्रायः। अमुम् एवार्थं स्पष्ट-दृष्टान्तेनाह यथेति। तद्-उपन्यासार्थः।
धानुष्क-गुण-सम्प्रेक्षि-जनस्य परिविध्यतः ।
धानुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन गुणेतरौ ॥ न्यायावतार १६ ॥
[न्या०अ०१६।१] यथा लक्ष्य-निर्देशं विना धानुष्कस्येषुं प्रक्षिपतो यौ गुण-दोषौ तौ तद्-दर्शि-जनस्य विपर्यस्ताव् अपि प्रतिभातः -- गुणोऽपि दोषतया, दोषोऽपि वा गुणतया -- तथा पक्ष-निर्देशं विना हेतुम् उपन्यस्यतो वादिनो यौ स्वाभिप्रेत-साध्य-साधन-समर्थत्वासमर्थत्व-लक्षणौ गुण-दोषौ तौ प्राश्निक-प्रतिवाद्यादीनां विपरीताव् अपि प्रतिभात इति भावार्थः। अक्षरार्थस् तु धनुषा चरति धानुष्कस् तस्य गुणो लक्ष्य-वेध-प्रावीण्य-लक्षणस् तत्र प्रेक्षकाणां कुतूहलम् इति तस्यैवोपादानम्, अन्यथा दोषोऽपि द्रष्टव्यः। तत्-सम्प्रेक्षि-जनस्य तत्-सम्प्रेक्षण-शील-लोकस्य परिविध्यतो यथा -- कथञ्चिद् बाणं मुञ्चत इत्य् अर्थः॑ धनुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन चाप-धरस्य वेध्य-निष्टङ्कनम् ऋते यौ गुणेतरौ गुण-दोषौ तौ यथा विरुद्धारेकितौ भवतस्, तथा वादिनोऽपीत्य् अर्थः। तस्माद् अविज्ञात-तद्-अर्थे प्रतिवादिनि वादि-धानुष्केण पक्ष-लक्ष्यं निर्दिश्यैव हेतु-शरः प्रोक्तव्य इति स्थितम्।
[न्या०अ०१७।०] साम्प्रतं हेतोर् लक्षणावसरस्, तच् च स्वार्थानुमानवन् निर्विशेषं द्रष्टव्यं॑ प्रयोगस् तु तत्र न दर्शितः, स्वार्थानुमानस्य बोध-रूपत्वाद्॑ इह तु दर्शनीयः, परार्थानुमानस्य वचन-रूपत्वाद्॑ अतस् तं दर्शयति॒
हेतोस् तथोपपत्त्या वा स्यात् प्रयोगोऽन्यथापि वा ।
द्वि-विधोऽन्यतरेणापि साध्य-सिद्धिर् भवेद् इति ॥ न्यायावतार १७ ॥
[न्या०अ०१७।१] स्वार्थानुमान-प्रस्तावे हि पर-प्रणीत-लक्षणान्तर-व्यपोहेन साध्य-व्यतिरेकात् सामस्त्येन हेतोर् व्यावृत्तिर् एवैकं लक्षणम् इति निर्णीतम्। परार्थानुमानेऽपि तद् एव प्रकाशनीयं, वचन-रचना तु क्वचित् कथञ्चित् प्रवर्तत इत्य् अभिप्रायवांस् तद्-द्वैविध्यम् आह॒ हेतोर् द्विविधः प्रयोगः स्याद् इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ तथैव साध्य-सद्भाव एवोपपत्तिर् विद्यमानता, तया तथोपपत्त्या, यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर् इति। अन्यथापि वेत्य् अनेनावयवे समुदायोपचाराद् अन्यथानुपपत्तिं लक्षयति। अन्यथा साध्य-व्यतिरेकेऽनुपपत्तिर् अविद्यमानतैव तया वान्यथानुपपत्त्या हेतोः प्रयोगः स्याद्, यथाग्निर् अत्र, धूमस्यान्यथानुपपत्तेर् इति। ‘एते च द्वे अप्य् एकस्मिन् साध्ये प्रयोक्तव्येऽ॑ इति यो मन्येत,तच्-छिष्यणार्थं आहान्यतरेणापि तथोपपत्ति-प्रयोगेणान्यथानुपपत्ति-प्रयोगेण वा साध्यस्य प्रतिपिपादयिषितार्थस्य सिद्धिर् निष्पत्तिः प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोहणं भवेद्, इति यस्मात्, तस्मान् न द्वे अपि प्रयोक्तव्ये, प्रयोग-द्वयेऽपि यस्माद् वचन-रचना भिद्यते, नार्थः॑ प्रयोगस्य च साध्य-साधनं फलं॑ तच् चेद् एकेनैव सिध्यति, द्वितीय-प्रयोगः केवलं वक्तुर् अकौशलमाचक्षीत, नैरर्थक्याद् इत्य् अभिप्रायः।
[न्या०अ०१८।०] अधुना दृष्टान्त-लक्षणावसरः। स च द्वेधा॒ साधर्म्येण वैधर्म्येण च। तत्र साधर्म्य-दृष्टान्तम् अधिकृत्याह॒
साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर् यत्र निश्चीयते-तराम् ।
साधर्म्येण स दृष्टान्तः सम्बन्ध-स्मरणान् मतः ॥ न्यायावतार १८ ॥
[न्या०अ०१८।१] दृष्टयोर् अवलोकितयोः सामर्थ्यात् साध्य-साधनयोर् अन्तः परिनिष्ठितिः अन्वयाद् व्यतिरेकाद् वा साध्य-साधन-भाव-व्यवस्थिति-निबन्धनास्मिन्न् इति दृष्टान्तः॑ समानो धर्मोऽस्येति सधर्मा तद्-भावः साधर्म्यं तेन साधर्म्येण। स किं-विधो भवतीत्य् आह॒ साध्यं जिज्ञासितार्थात्मकं, साधनं तद्-गमको हेतुः, तयोः साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर्, इदम् अनेन विना न भवतीत्य्-एवं-रूपा, यत्र क्वचिन् निश्चीयते-तरां अतिशयेन निर्णीयते स साधर्म्य-दृष्टान्तः। यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर्, महानसादिवद् इति। अयं चाविस्मृत-प्रतिबन्धे प्रतिवादिनि न प्रयोक्तव्य इत्य् आह॒ सम्बन्ध-स्मरणाद् इति, ल्यब्-लोपे पञ्चमी, प्राग्-गृहीत-विस्मृत-सम्बन्ध-स्मरणम् अधिकृत्य मतोऽभिप्रेतोऽयं नीतिविदाम्, नान्यदा। यदा हि प्रतिपाद्योऽद्यापि सम्बन्धं साध्याविनाभावित्व-लक्षणं नावबुध्यते, तदा प्रमाणेन सम्बन्धं ग्राहणीयो, न दृष्टान्त-मात्रेण, न हि सह-दर्शनाद् एव क्वचित् सर्वत्रेदम् अमुना विना न भवतीति सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। गृहीते च प्रतिबन्धे स्मर्यमाणे केवलं हेतुर् दर्शनीयः, तावतैव बुभुत्सितार्थ-सिद्धेर् दृष्टान्तो न वाच्यो, वैयर्थ्यात्। यदा तु गृहीतोऽपि विस्मृतः कथञ्चित् सम्बन्धस्, तदा तत्-स्मरणार्थं दृष्टान्तः कथ्यते।
[न्या०अ०१८।२] ननु च कथं त्रि-काल-समस्त-देश-व्यापि-सम्बन्धावगतिः? न तावन् निर्णयात्मकम् अपि प्रत्यक्षं देश-कालान्तर-संचरिष्णुनोः साध्य-साधनयोः सम्बन्धं निरीक्षितुं क्षमते, सन्निहितेऽर्थे विशदाध्यवसायेन प्रवृत्तेः। नापि शब्दात् तन्-निर्णयस्, तस्य परोपदेश-रूपतया स्वार्थानुमानाभाव-प्रसङ्गात्, तत्र परोपदेशाभावात्, तद्-अभावे सम्बन्धासिद्देस्, तद्-असिद्धाव् अनुमानानुत्थानाद् इति। अनुमानात् सम्बन्ध-ग्रहणे निरवधिर् अनवस्थानुषज्येत, सम्बन्ध-ग्राहिणोऽप्य् अनुमानस्य पुनः सम्बन्धान्तर-ग्रहण-सव्यपेक्षत्वाद् इति। अत्रोच्यते -- प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति येषां मिथ्याभिनिवेशस्, तेषां एष दोषो नास्माकम्, अन्वय-व्यतिरेक-ग्राहि-प्रत्यक्षानुपलम्भोत्तर-काल-भाविनोऽव्यभिचरित-त्रि-काल-व्यापि-गोचरस्य मति-निबन्धनस्योह-संज्ञितस्य प्रमाणान्तरस्य सम्बन्ध-ग्राहितयेष्टत्वात्, तद्-अनिष्टौ दृष्ट-व्यवहार-विलोप-प्रसङ्गात्, तद्-विलोपे च विचारानर्थक्य-प्राप्तेर् इति। अत्र प्रकरणे पुनर् अनुमानात् पार्थक्येनोहो न दर्शितः, सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-प्रवृत्तत्वाद् अस्य, शाब्दं तु पृथक् समर्थितं, तस्यात्रैव परार्थानुमानोपयोगित्वाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०१९।०] इदानीं वैधर्म्य-दृष्टान्तम् उपदर्शयन्न् आह॒
साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य् असम्भवः ।
ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधर्म्येणेति स स्मृतः ॥ न्यायावतार १९ ॥
[न्या०अ०१९।१] विसदृशो धर्मोऽस्येति विधर्मा, तद्-भावो वैधर्म्यं, तेन वैधर्म्येण दृष्टान्तः। की-दृश इत्य् आह॒ साध्ये गम्ये निवर्तमानेऽसम्भवति तु-शब्दोऽवधारणार्थो भिन्न-क्रमः, स च साधनस्यापि गमकस्याप्य् असम्भव एवेत्य् अत्र द्रष्टव्यः, ख्याप्यते प्रतिपाद्यते यत्र क्वचिद् दृष्टान्ते स वैधर्म्येण भवतीति-शब्देन सम्बन्ध-स्मरणाद् इति।
[न्या०अ०२०।०] इदम् अत्रापि सम्बध्नाति॒ अस्यापि स्मर्यमाणे सम्बन्धे प्रयोगायोगाद् इति किम् अर्थं विस्मृत-सम्बन्ध एव प्रतिवादिनि दृष्टान्तः प्रयुज्यते, नान्यदेति पर-वचनावकाशम् आशङ्क्याह॒
अन्तर्-व्याप्त्यैव साध्यस्य सिद्धेर् बहिर्-उदाहृतिः ।
व्यर्था स्यात् तद्-असद्भावेऽप्य् एवं न्याय-विदो विदुः ॥ न्यायावतार २० ॥
[न्या०अ०२०।१] अन्यदाहि स्मर्यमाणे वा सम्बन्धे प्रयुज्येतागृहीते वा। यद्य् आद्यः पक्षः, सोऽयुक्तः। यदा सर्वत्र साध्याविनाभाविनं हेतुं स्मरति प्रतिपाद्यस्, तदा पक्षेऽपि तम् अवबुध्य कथं साध्यं न प्रतिपद्येत? ततश् चान्तः पक्ष-मध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वम् अन्तर्-व्याप्तिस्, तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेर् बहिर् विवक्षित-धर्मिणोऽन्यत्र दृष्टान्त-धर्मिण्य् उदाहृतिर् व्याप्ति-दर्शन-रूपा व्यर्था निष्प्रयोजना, तत्-प्रत्याय्यार्थाभावाद् इति। द्वितीय-पक्षस्यापि निर्दोषतां निरस्यन्न् आह॒ तद्-असद्भावेऽप्य् एवं सम्बन्धाग्रहणाद् अन्तर्-व्याप्त्य्-अभावेऽप्य् एवम् इति व्यर्थैव बहिर्-उदाहृतिः। न हि सह-दर्शनात् क्वचित् सर्वत्र तद्-रूपता सिध्यति, व्यभिचार-दर्शनात्। तस्माद् अगृहीत-सम्बन्धे प्रतिपाद्ये प्रमाणेन प्रतिबन्धः साध्यः। तत्-सिद्धौ तत एव साध्य-सिद्धेर् अकिञ्चित्-करी दृष्टान्तोदाहृतिर् इति न्याय-विदो न्याय-विद्वांसो विदुर् अवबुध्यन्त इति। इह च प्रकरणे शेषावयवानाम् उपनय-निगमन-शुद्धि-पञ्चक-लक्षणानां सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-परत्वाद् अस्य, यद्य् अपि साक्षाल् लक्षणं नोक्तं, तथाप्य् अत एव प्रतिपादितावयव-त्रयाद् बुद्धिमद्भिर् उन्नेयं॑ यतोऽवयवापेक्षया जघन्य-मध्यमोत्कृष्टास् तिस्रः कथा भवन्ति। तत्र हेतु-प्रतिपादन-मात्रं जघन्या। द्व्य्-आद्य्-अवयव-निवेदनं मध्यमा। सम्पूर्ण-दशावयव-कथनम् उत्कृष्टा। तत्रेह मध्यमायाः साक्षात् कथनेन जघन्योत्कृष्टे अर्थतः सूचयति, तद्-सद्भावस्य प्रमाण-सिद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२१।०] एवं पक्षादि-लक्षणं प्रतिपाद्येदानीं हेय-ज्ञाने सत्य् उपादेयं विविक्ततरं वेद्यत इति तद्-व्युदस्ताः पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताभासा वक्तव्याः। तत्र तावत् पक्ष-लक्षण-व्युदस्तान् पक्षाभासान् आह॒
प्रतिपाद्यस्य यः सिद्धः पक्षाभासोऽक्ष-लिङ्गतः ।
लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितोऽनेकधा मतः ॥ न्यायावतार २१ ॥
[न्या०अ०२१।१] पक्ष-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणत्वाच् च पक्षवद् आभासत इति पक्षाभासः। असाव् अनेकधानेक-प्रकारो मत इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह॒ प्रतिपाद्यस्य प्रतिवादिनो यः कश्चित् सिद्धः प्रतीताव् आरूढ एव स पक्षाभासः, साध्यस्यैव पक्षत्वात्, सिद्धस्य साधनानर्हत्वाद्, अतिप्रसक्तेः। तथाक्ष-लिङ्गतोऽध्यक्ष-हेतुभ्यां लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितस् तिरस्-कृतो यः स पक्षाभासः। तत्र प्रतिपाद्य-सिद्धो यथा॒ पौद्गलिको घटः, सौगतं वा प्रति॒ सर्वं क्षणिकम् इत्य्-आदि। प्रत्यक्ष-बाधितो यथा॒ निरंशानि स्वलक्षणानि, परस्पर-विविक्तौ वा सामान्य-विशेषाव् इति। अनुमान-बाधितो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञ इति। लोक-बाधितो यथा॒ गम्या माता इति। स्व-वचन-बाधितो यथा॒ न सन्ति सर्वे भावा इति।
[न्या०अ०२२।०] साम्प्रतं हेतु-लक्षणं स्मारयंस् तद्-अपास्तान् हेत्व्-आभासान् आह॒
अन्यथानुपपन्नत्वं हेतोर् लक्षणम् ईरितम् ।
तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस् तद्-आभता ॥ न्यायावतार २२ ॥
[न्या०अ०२२।१] हेतोर् लक्षणम् असाधारण-धर्म-रूपं यद् ईरितं गमितम् अनेकार्थत्वाद् वा प्रतिपादितं स्वार्थानुमान-प्रस्तावे यद् उतान्यथानुपपन्नत्वम् इति तस्याप्रतीतिर् अनध्यवसायः, सन्देहो दोलायमानता, विपर्यासो वैपरीत्य-निर्णयो॑ऽप्रतीतिश् च सन्देहश् च विपर्यासश् चेति द्वन्द्वः॑ पश्चात् तदा सह तत्-पुरुषस्॒ तैस् तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस्॑ तद्-आभताआभानम् आभा तस्येव सम्यग्-घेतोर् इवाभास्येति तद्-आभस्, तद्-भावस् तत्ता, हेत्व्-आभासता भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०२३।०] अधुना येन लक्षणेन यन्-नामा हेत्व्-आभासो भवति तद् दर्शयति॒
असिद्धस् त्व् अप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते ।
विरुद्धो योऽन्यथाप्य् अत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु ॥ न्यायावतार २३ ॥
[न्या०अ०२३।१] यः कश्चिद् अप्रतीतः प्रतीत्या अगोचरी-कृतोऽनिश्चितः सोऽसिद्ध-नामा हेत्व्-आभासः। तु-शब्दस् त्रयस्यापि भेदोद्द्योतकः। यस् त्व् अन्यथैव साध्यं विनैव विपक्ष एवेति यावद्, उपपद्यते सम्भवति स विरुद्धाभिधानः। यः पुनर् अन्यथापि साध्य-विपर्ययेणापि युक्तो घटमानको,ऽपि-शब्दात् साध्येनापि, सोऽत्र व्यतिकरेऽनैकान्तिक-संज्ञो ज्ञातव्य इति। तत्र प्रतिप्राणि-प्रसिद्ध-प्रमाण-प्रतिष्ठितानेकान्त-विरुद्ध-बुद्धिभिः कणभक्षाक्षपाद-बुद्धादि-शिष्यकैर् उपन्यस्यमानाः सर्व एव हेतवः, तद् यथैकान्तेनानित्यः शब्दो नित्यो वा, सत्त्वाद्, उत्पत्तिमत्त्वात्, कृतकत्वात्, प्रत्यभिज्ञायमानत्वाद् इत्य्-आदयो विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकतां स्वी-कुर्वन्तीत्य् अवगन्तव्यम्।
[न्या०अ०२३।२] तथा ह्य्॒ अनित्यैकान्ते तावद् असिद्धाः सर्व एव हेतवश्, चाक्षुषत्ववत् तेषां ध्वनाव् अविद्यमानत्वाद्, असद्-आदि-व्यवच्छेदेनालीक-संवृति-विकल्पितत्वात्, पारमार्थिकत्वे त्व् एकस्यानेक-रूपापत्त्यानेकान्त-वादापत्तेः, कल्पना-रचित-सत्ताकानां च सर्व-शक्ति-विरह-रूपतया निःस्वभावत्वात्, तथापि तेषां साधनत्वे साध्यम् अपि निःस्वभावम् इति खर-विषाणं शश-विषाणस्य साधनम् आपद्यत इति शोभनः साध्य-सधन-व्यवहारः। सर्व एवायम् अनुमानानुमेय-व्यवहारो बुद्ध्य्-आरूढेन धर्म-धर्मि-न्यायेन न बहिः-सद्-असत्त्वम् अपेक्षते, तेनायम् अदोष इति चेद्, एवं तर्हि चाक्षुषत्वम् अपि शब्दे बुद्ध्याध्यारोप्य हेतुतयोच्यमानं नासिद्धतयोद्भावनीयं, विशेषाभावात्। अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदेन चाक्षुषत्वं बुद्ध्याध्यारोपयितुंपार्यते, न यथा कथञ्चिन्, न चासौ शब्देऽस्त्य्, अचक्षुर्-ग्राह्यत्वात् तस्य, तेनायम् अदोष इति चेत्, कोऽयम् अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदो नाम॒ व्यवच्छेद-मात्रं नीरूपं, व्यवच्छिन्नं वा स्वलक्षणं, व्यवच्छेदिका वा बुद्धिः स्वांश-मग्नापि बहिर्-वस्तु-ग्रहण-रूपतया प्लवमाना? नापरो वस्तु-धर्मो यत्र भेदाभेद-विकल्प-द्वारेणा दूषणं दित्सुर् भवान् इति चेत्, तर्हि स शब्दे नास्तीति कैषा भाषा? एवं हि नभः-पुण्डरीकं तत्र नास्तीति सत्त्वादिकम् अपि कल्पयितुं न शक्यम् इति प्रसज्येत। किं च, ते साधन-धर्मा धर्मिणि भवन्तोऽपि न भवद्-दर्शने प्रतीतिम् आरोहन्ति, प्रत्यक्षस्य विकल्प-विकलतया धर्म-निर्णय-शून्यत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविन्या वासना-प्रबोध-जन्याया विकल्प-बुद्धेः स्वांश-ग्रहण-पर्यवसित-शरीरत्वेन बहिः-स्वलक्षणे प्रवेशाभावात्, ततश् चाप्रतीतत्वात् सर्वस्यासिद्धत्वम्।
[न्या०अ०२३।३] नित्यैकान्तेऽपि धर्मिणोऽत्यन्त-व्यतिरिक्तानाम् अपारमार्थिकानां वा स्व-साधन-धर्माणां प्रमाणेनाप्रतीतत्वाद् असिद्धता द्रष्टव्या, धर्मिणोऽविनिर्लुठित-रूपाणां पारमार्थिकानां सकल-धर्माणां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धत्वेन निह्नोतुम् अशक्यत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।४] तथा विरुद्धतापि पक्ष-द्वयेऽपि सर्व-साधन-धर्माणाम् उन्नेयानेकान्त-प्रतिबद्ध-स्वभावत्वेन तत्-साधन-प्रवणत्वात्। एतच् चोत्तरत्र वक्ष्यामः।
[न्या०अ०२३।५] एवं पक्ष-द्वयेऽपि निर्दिश्यमानाः सर्व एव हेतवोऽनैकान्तिकताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति, परस्पर-विरुद्धाव्यभिचारित्वात्, समान-युक्त्य्-उपन्यासेन विपक्षेऽपि दर्शयितुं शक्यत्वात्।
[न्या०अ०२३।६] तथा हि॒ अनित्य-वादी नित्य-वादिनं प्रति प्रमाणयति। सर्वं क्षणिकं, सत्त्वाद्, अक्षणिके क्रम-यौगपद्याभ्याम् अर्थ-क्रिया-विरोधाद्, अर्थ-क्रिया-कारित्वस्य च भाव-लक्षणत्वात्, ततोऽर्थ-क्रिया व्यावर्तमाना स्व-क्रोडी-कृतां सत्तां व्यावर्तयेद् इति क्षणिकत्व-सिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियायां क्रमेण प्रवर्तितुम् उत्सहते, पूर्वार्थ-क्रिया-करण-स्वभावोपमर्द-द्वारेणोत्तर-क्रियायां प्रवृत्तेर्, अन्यथा पूर्वार्थ-क्रिया-करणाविराम-प्रसङ्गात्॑ तत्-स्वभाव-प्रच्यवे च नित्यतापयात्य्, अतादवस्थ्यस्यानित्य-लक्षणत्वात्। नित्योऽपि क्रम-वर्तिनं सह-कारि-कारणम् अर्थम् उदीक्षमाणस् तावद् असीत्, पश्चात् तम् आसाद्य क्रमेण कार्यं कुर्याद् इति चेन्, न, सह-कारि-कारणस्य नित्येऽकिञ्चित्-करत्वाद्, अकिञ्चित्-करस्यापि प्रतीक्षणेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियां कुरुते,ऽध्यक्ष-विरोधात्। न ह्य् एक-कालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिद् उपलभते॑ करोतु वा, तथाप्य् आद्य-क्षण एव सकल-क्रिया-परिसमाप्तेर् द्वितीयादि-क्षणेष्व् अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोर् एकस्मिन् विरुद्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२३।७] नित्य-वादी पुनर् एवं प्रमाणयति॒ सर्वं नित्यं सत्त्वात्। क्षणिके सद्-असत्-कालयोर् अर्थ-क्रिया-विरोधात्, तल्-लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातीति, ततो निवर्तमानम् अनन्य-शरणतया नित्यत्वं साधयति। तथा हि॒ क्षणिकोऽर्थः सद् वा कार्यं कुर्यात्, असद् वा, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् आद्यः पक्षः, सम-समय-वर्तिनि व्यापारायोगात्, सकल-भावानां परस्परं कार्य-कारण-भाव-प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच् च। नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्य-करण-शक्ति-विकलत्वात्। अन्यथा शश-विषाणादयोऽपि कार्य-करणायोत्सहेरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२३।८] तद् एवम् एकान्त-द्वयेऽपि ये ये हेतवस् ते ते युक्तेः समानतया विरुद्धं न व्यभिचरन्त्य्॑ अविचारित-रमणीयतया मुग्ध-जन-ध्य्-आन्ध्यं चोत्पादयन्तीति विरुधाव्यभिचारिणोऽनैकान्तिकाः, सर्व-वस्तु-धर्माणां वस्तुतोऽनेकान्त-प्रतिबद्धत्वाद् इति। तस्माद् अमी सर्व एव हेतवः सन्तोऽनेकान्तम् अन्तरेण नोपपद्यन्त इति तम् एव प्रतिपादयितुम् ईशते॑ विमूढ-बुद्धिभिः पुनः विपक्ष-साधनार्थम् उपन्यस्यमाना विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकताम् आबिभ्रतीति स्थितम्।
[न्या०अ०२४।०] तद् एवं हेत्व्-आभासान् प्रतिपाद्य दृष्तान्त-लक्षण-व्युदस्तान् दृष्टान्ताभासान् आह॒
साधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
अपलक्षण-हेत्ûत्थाः साध्यादि-विकलादयः ॥ न्यायावतार २४ ॥
[न्या०अ०२४।१] साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शयितुम् अभिप्रेतं यस्मिंस् तत् साधर्म्यं, तेन। अत्र व्यतिकरे॑ दूष्यन्त इति दोषाः। दृष्टान्ता एव दोषा दृष्टान्त-दोषाः दृष्टान्ताभासा इत्य् अर्थः। न्याय-विद्-ईरिता विद्वद्भिर् गदिताः॑ साध्यं गम्यम्॑ आदि-शब्दात् साधनोभय-परिग्रहस्॑ तद्-विकलास् तच्-छून्याः। आदि-शब्दात् सन्दिग्ध-साध्य-साधनोभय-धर्मा गृह्यन्ते। किं-भूता एते इत्य् आह॒ अपगतं लक्षणं येभ्यस् ते तथा, ते च ते हेतवः, तेभ्य उत्था उत्थानं येषां तेऽपलक्षण-हेत्ûत्थाः॑ इदं च प्रायिकं विशेषणं, सम्यग्-घेताव् अपि वक्तृ-दोष-वशात् दृष्टान्ताभासतोपपत्तेर्, यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद्, घटवद् इत्य्-आदि।
[न्या०अ०२४।२] तत्र साध्य-विकलो यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वात्, प्रत्यक्षवत्॑ प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता-विकलत्वात्॑ तद्-भ्रान्तत्वे सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च प्रमाण-प्रमेयाभावान् न किञ्चित् केनचित् साध्यत इति भ्रान्त-वादिनो मूकतापनिपद्येत। साधन-विकलो यथा॒ जाग्रत्-संवेदनं भ्रान्तं, प्रमाणत्वात्, स्वप्न-संवेदनवत्॑ स्वप्न-संवेदनस्य प्रमाणता-वैकल्यात् तत्-प्रत्यनीक-जाग्रत्-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वाद् इति। उभय-विकलो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञः, प्रत्यक्षाद्य्-अनुपलब्धत्वात्, घटवद्॑ घटस्य सत्त्वात् प्रत्यक्षादिभिर् उपलब्धत्वाच् च। सन्दिग्ध-साध्य-धर्मो यथा॒ वीत-रागोऽयं, मरण-धर्मत्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे वीत-रागत्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, विशिष्ट-चेतो-धर्माणां विशिष्ट-व्याहारादि-लिङ्ग-गम्यत्वाद् रथ्या-पुरुषे तन्-निर्णयस्याप्य् अभावाद् इति। सन्दिग्ध-साधन-धर्मो यथा॒ मरण-धर्मायं पुरुषो, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे रागादिमत्त्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, वीत-रागस्यापि तथा सम्भवाद् इति। सन्दिग्धोभय-धर्मो यथासर्व-ज्ञोऽयं, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे प्रदर्शित-न्यायेनोभयस्यापि सन्दिग्धत्वाद् इति।
[न्या०अ०२४।३] ननु च परैर् अन्यद् अपि दृष्टान्ताभास-त्रयम् उक्तम्, तद् यथानन्वयोऽप्रदर्शितान्वयो विपरीतान्वयश् चेति। तत्रानन्वयो यथा॒ रागादिमान् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद्, इष्ट-पुरुषवद् इति। यद्य् अपि किलेष्ट-पुरुषे रागादिमत्त्वं वक्तृत्वं च साध्य-साधन-धर्मौ दृष्टौ, तथापि यो यो वक्ता स स रागादिमान् इति व्याप्त्य्-असिद्धेर् अनन्वयोऽयं दृष्टान्तः। तथाप्रदर्शितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवद् इति। अत्र यद्य् अपि वास्तवोऽन्वयोऽस्ति, तथापि वादिना वचनेन न प्रकाशित इत्य् अप्रदर्शितान्वयो दृष्टान्तः। विपरितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति हेतुम् अभिधाय यद् अनित्यं तद् कृतकं घटवद् इति, विपरीत-व्याप्ति-दर्शनाद् विपरीतान्वयः, साधर्म्य-प्रयोगे हि साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शनीयम्, इह तु विपर्यास-दर्शनाद् विपरीतता। तद् एतद् भवद्भिः कस्मान् नोक्तम् इति।
[न्या०अ०२४।४] अत्रोच्यते -- परेषां न सुपर्यालोचितम् एतद् दृष्टान्ताभास-त्रयाभिधानम् इति ज्ञापनार्थम्। तथा हि॒ न तावद् अनन्वयो दृष्टान्ताभासो भवितुम् अर्हति। यदि हि दृष्टान्त-बलेन व्याप्तिः साध्य-साधनयोः प्रतिपाद्येत, ततः स्याद् अनवयो दृष्टान्ताभासः, स्व-कार्याकरणाद्, यदा तु पूर्व-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्राहि-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोदाहृतिर् इति स्थितं, तदानन्वयत्व-लक्षणो न दृष्टान्तस्य दोषः, किं तर्हि हेतोर् एव, प्रतिबन्धस्याद्यापि प्रमाणेनाप्रतिष्ठितत्वात्, प्रतिबन्धाभावे चान्वयासिद्धेः। न च हेतु-दोषोऽपि दृष्टान्ते वाच्यो,ऽतिप्रसङ्गाद् इति। तथाप्रदर्शितान्वय-विपरीतान्वयाव् अपि न दृष्टान्ताभासतां स्वी-कुरुतो,ऽन्वयाप्रदर्शनस्य विपर्यस्तान्वय-प्रदर्शनस्य च वक्तृ-दोषत्वात्, तद्-दोष-द्वरेणापि दृष्टान्ताभास-प्रतिपादने तद्-इयत्ता विशीर्येत, वक्तृ-दोषाणामानन्त्यात्। वक्तृ-दोषत्वेऽपि परार्थानुमाने तत्-कौशलम् अपेक्षत इति। एवं चोपन्यासे न बुभुत्सितार्थ-साधकाव् अतो दृष्टान्ताभासाव् एताव् इति चेद्, एवं तर्हि करणापाटवादयोऽपि दृष्टान्ताभासा वाच्याः। तथा हि॒ करण-पाटव-व्यतिरेकेणापि न पर-प्रत्यायनं समस्ति, विस्पष्ट-वर्णाग्रहणे व्यक्ततया तद्-अर्थावगमाभावाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२५।०] तद् एवं साधर्म्येण दृष्टान्ताभासान् प्रतिपाद्य वैधर्म्येणाह॒
वैधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
साध्य-साधन-युग्मानाम् अनिवृत्तेश् च संशयात् ॥ न्यायावतार २५ ॥
[न्या०अ०२५।१] साध्याभावः साधनाभाव-व्याप्तौ दर्शयितुम् अभिप्रेतो यस्मिंस् तद् वैधर्म्यम्, तेनात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिता इति दत्तार्थम्। साध्य-साधन-युग्मानां गम्य-गमकोभयानाम् अनिवृत्तेर् अनिवर्तनाच्, च-शब्दस्य व्यवहित-प्रयोगत्वात् संशयाच् च निवृत्ति-सन्देहाच् चेत्य् अर्थः। तद् अनेन षड् दृष्टान्ताभासाः सूचितास्, तद् यथा -- साध्याव्यतिरेकी, साधनाव्यतिरेकी, साध्य-साधनाव्यतिरेकी, तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकश् चेति।
[न्या०अ०२५।२] तत्र साध्याव्यतिरेकी यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानम्, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनर् भ्रान्तं न भवति न तत् प्रमाणं, तद् यथा स्वप्न-ज्ञानम् इति॑ स्वप्न-ज्ञानाद् भ्रान्ततानिवृत्तेः साध्याव्यतिरेकित्वम् इति। साधनाव्यतिरेकी यथा॒ निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनः सविकल्पकं न तत् प्रमाणं, तद् यथानुमानम्॑ अनुमानात् प्रमाणतानिवृत्तेः साधनाव्यतिरेकित्वम् इति। उभयाव्यतिरेकी यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, सत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् न नित्यानित्यः स न सन्, तद् यथा -- घटो॑ घटाद् उभयस्याप्य् अव्यावृत्तेर् उभयाव्यतिरेकित्वम् इति। तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेको यथासर्व-ज्ञा अनाप्ता वा कपिलादयो,आर्य-सत्य-चतुष्टयाप्रतिपादकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनः सर्व-ज्ञ आप्तो वाऽसाव् आर्य-सत्य-चतुष्टयं प्रत्यपीपदत्, तद् यथा -- शौद्धोदनिर् इति। अयं च साध्याव्यतिरेकी वार्य-सत्य-चतुष्टयस्य दुःख-समुदय-मार्ग-निरोध-लक्षणस्य प्रमाण-बाधितत्वेन तद्-भाषकस्यासर्वज्ञतानाप्ततोपपत्तेः। केवलं तन्-निराकारक-प्रमाण-सामर्थ्य-पर्यालोचन-विकलानां सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकतया प्रतिभातीति तथोपन्यस्तः। तथा हि॒ यद्य् अप्य् आर्य-सत्य-चतुष्टयं शौद्धोदनिः प्रतिपादितवांस्, तथापि सर्वज्ञताप्तते तस्य न सिद्ध्यतः, ताभ्यां सहार्य-सत्य-चतुष्टय-प्रतिपादनस्यान्यथानुपपत्त्य्-असिद्धेर्, असर्व-ज्ञानाप्तेनापि पर-प्रतारणाभिप्राय-प्रवृत्त-निपुण-बुद्धि-शठ-पुरुषेण तथा-विध-प्रतिपादनस्य कर्तुं शक्यत्वात्। तस्माच् छौद्धोदनेः सकाशाद् असर्व-ज्ञतानाप्तता-लक्षणस्य साध्यस्य व्यावृत्तिः सन्दिग्धेति सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेको यथा॒ऽनादेय-वाक्यः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो रागादिमत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् आदेय-वाक्यो, न स रागादिमांस्, तद् यथा -- सुगत इति। यद्य् अपि तद्-दर्शनानुरक्तान्तः-करणाणां सुगतस्यादेय-वचनता सिद्धि-सौध-मध्यारूढा, तथापि रागादिमत्त्वाभावस् तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैधुर्यात् सन्देह-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अतः सुगताद् रागादिमत्ता-व्यावृत्ति-संशयात् सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेको यथा॒ न वीत-रागाः कपिलादयः, करुणास्पदेष्व् अप्य् अकरुणापरीत-चित्ततयादत्त-निजक-मांस-शकलत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ ये पुनर् वीत-रागास् ते करुणास्पदेषु करुणा-परीत-चित्ततया दत्त-निज-मांस-शकलास्, तद् यथा -- बोधिसत्त्वा इति। अत्र साध्य-साधन-धर्मयोर् बोधिसत्त्वेभ्यो व्यावृत्तिः सन्दिग्धा॑ तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैकल्यान् न ज्ञायते किं ते रागादिमन्त उत वीत-रागाः॑ तथानुकम्प्येषु किं स्व-पिशित-खण्डानि दत्तवन्तो नेति वा। अतः सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति।
[न्या०अ०२५।३] परैर् अपरेऽपि दृष्टान्ताभासास् त्रयोऽविमृश्य-भाषितया दर्शिताः। तद् यथा -- अव्यतिरेको,ऽप्रदर्शित-व्यतिरेको, विपरीत-व्यतिरेकश् चेति। तेऽस्माभिर् अयुक्तत्वान् न दर्शयितव्याः। तथा ह्य्॒ अव्यतिरेकस् तैर् दर्शितो, यथावीत-रागः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-डृष्टान्तो॒ यः पुनर् वीत-रागो, न स वक्ता, यथोपल-खण्ड इति। यद्य् अपि किलोपल-खण्डाद् उभयं व्यावृत्तं, तथापि व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेर् अव्यतिरेकित्वम् इति। अयुक्तश् चायं वक्तुम्, अव्यतिरेकिताया हेतु-दोषत्वात्। यदि हि दृष्टान्त-बलेनैव व्यतिरेकः प्रतिपाद्येत, तदा तथा-विध-सामर्थ्य-विकलस्य तद्-आभासता युज्येत, न चैतद् अस्ति, प्राक्-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवण-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोपादानात्। न ह्य् एकत्र यो यद्-अभावे न दृष्टः, स तद्-अभावे न भवतीति प्रतिबन्ध-ग्राहि-प्रमाण-व्यतिरेकेण सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। तस्माद् असिद्ध-प्रतिबन्धस्य हेतोर् एवायं दोषो, न दृष्टान्तस्येति। तथाप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकाव् अपि वक्तुम् अयुक्तौ, तयोर् वक्तृ-दोषत्वात्। तथा ह्य्॒ अप्रदर्शित-व्यतिरेकस् तैर् उक्तो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, आकाशवद् इति। अत्र विद्यमानोऽपि व्यतिरेको वादिना वचनेन नोद्भावित इति दुष्टता। विपरीत-व्यतिरेकः पुनर् अभिहितो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यद् अकृतकं तन् नित्यं भवति, यथाकाशम् इति। अत्र विपर्यस्त-व्यतिरेक-प्रदर्शनाद् विपरीत-व्यतिरेकित्वम्। वैधर्म्य-प्रयोगे हि साध्याभावः साधनाभावाक्रान्तो दर्शनीयो, न चैएवम् अत्र, साधनाभावस्य साध्याभाव-व्याप्ततयाभिधानाद् इति।
[न्या०अ०२५।४] व्यतिरेकाप्रदर्शनं विपरीत-व्यतिरेक-प्रदर्शनं च न वस्तुनो दोषः, किं तर्हि वचन-कुशलता-विकलस्याभिधायकस्य। किं च, येषां भवताम् अदो दर्शनं॒ यद् उत स्वार्थानुमान-काले स्वयं हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीतेः परार्थानुमानावसरेऽपि हेतु-प्रतिपादनम् एव कर्तव्यं "विदुषां वाच्यो हेतुर् एव हि केवल" इति-वचनात् तेषां ‘कृतकत्वाद्ऽ॑ इतीयता हेत्ûपन्यासेनैव सिसाधयिषित-साध्य-सिद्धेः समस्त-दृष्टान्ताभास-वर्णनम् अपि पूर्वापर-व्याहत-वचन-रचना-चातुर्यम् आविर्-भावयति।आसातां तावद् एतौ, दृष्टान्तस्य साधनावयवत्वेनानभ्युपगमात्। अथेत्थम् आचक्षीथा॒ अन्वय-व्यतिरेकापरिज्ञाने प्रतिपाद्यस्य न दृष्टान्तम् अन्तरेणैतौ दर्शयितुं शक्याव्, अतोऽन्वय-व्यतिरेक-दर्शनार्थं दृष्टान्तोऽभिधातव्यस्, ततश् च तत्-कार्याकारिणां तद्-आभासतेति चेद्, गले गृहीतस्यायम् उल्लापस्, तथाप्य् अप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकौ दृष्टान्ताभासौ न वास्तवौ, किं तर्हि वक्तृ-दोष-समुत्थाव्॑ अतो नाभिधातुं युक्तौ, तथा-विधस्य विद्यमान-वस्तु-प्रकाशन-सामर्थ्य-रहितस्य निबिड-जडिमावष्टब्धस्य पुंसो वादानधिकारित्वान्, मातृका-पाठ-शाला-योग्यतया विदुषां वादयितुम् अयुक्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२६।०] तद् एवं परार्थानुमानं व्याचक्षाणेन यद् उक्तं -- यद् उत "तत् पक्षादि-वचनात्मकम्" इति -- तत् पक्ष-हेतु-दृष्टान्तानां साभासानां प्रतिपादनात् प्रायः पर्यन्तितं॑ केवलं तत् परोक्त-दूषणोद्धाराद् एव समीचीनताम् आबिभर्तीत्य् अमुना प्रस्तावेन दूषणं साभासम् अभिधातुकाम आह॒
वाद्य्-उक्ते साधने प्रोक्त-दोषाणाम् उद्भावनम् । दूषणं निरवद्ये तु दूषणाभास-नामकम् ॥ न्यायावतार २६ ॥
[न्या०अ०२६।१] वदन-शीलो वादी प्रत्यायकस्, तेनोक्त उपन्यस्ते॑ कस्मिन्? साधने॑ साध्यते प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोप्यतेऽनुमेयं येन तत् साधनम्। तच् चानेक-रूपं प्राक् प्रत्यपादि, तद् यथा -- क्वचिद् धेतुर् एवैकः, क्वचित् पक्ष-हेतू, क्वचित् पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताः, क्वचित् त एव सोपनयाः, क्वचित् सनिगमनाः, क्वचिद् एकैक-तच्-छुद्धि-वृद्ध्येति, प्रतिपाद्यस्य क्वचित् कथञ्चित् प्रत्याययितुं शक्यत्वात्, तत्-प्रत्यायनोपायस्य च साधनत्वाद् इति। तत्रेह सम्यक्-साधनस्य दूषयितुम् अशक्यत्वात्, साधनाभास एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेः, साधनाभासम् एव दूषनोपनिपातात् प्राग् अवस्थायाम् अनिर्ज्ञातं सामान्येन साधन-ध्वनिनोक्तं, तत्र प्रोक्त-दोषाणां प्रत्यक्षादि-निराकृत-पक्षासिद्धादि-हेतु-साध्यादि-विकल-दृष्टान्ताद्य्-उपन्यास-लक्षणानाम् उद्भावनं प्राश्निकानां पुरतः प्रकाशनं यत् तद् दूष्यते स्वाभिप्रेत-साध्य-प्रत्यायन-वैकल्य-लक्षणां विकृतिं नीयते साधनम् अनेनेति दूषणम् इति ज्ञेयम्।
[न्या०अ०२६।२] अधुना तद्-आभासम् आह॒ निर्गतं सम्यक्-प्रयुक्तत्वाद् अवद्यं पापं पक्षादि-दोष-लक्षणं दौष्ट्यम् अस्माद् इति निरवद्यं, तस्मिन् साधने वादिनोक्त इति वर्तते। तथापि मत्सरितया प्रमृद्योदरं यद् अविद्यमानानां दोषाणाम् उद्भावनं तद् दूषण-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणात् सम्यक्-साधने दोषोद्भावनस्य प्रलापायमानत्वाद् दूषणवदाभासत इति दूषणाभासम् इति॑ तद् एव नाम संज्ञा यस्य तत्-तथा। समर्थ-साधनोपन्यासत्वात् साधिते साध्ये सताम् अप्य् अपशब्दालङ्कारादि-दोषाणां यद् उद्भावनं तद् अपि दूषणाभास-नामकम् इति। तु-शब्देन विशेषणार्थेन दर्शयति वस्तु-सिद्ध्य्-अर्थं वाद-प्रवृत्तेस्, तस्य सिद्धत्वाद्, अपशब्दादीनाम् अप्रस्तुततया तद्-द्वरेण दोष-प्रकाशनस्यासम्बद्ध-प्रलाप-रूपत्वाद्, इतरथा तावन्-मात्रेणैव परापाकरण-सिद्धेः समर्थ-साधनान्वेषण-प्रयत्नो विशीर्येत, प्रयोजनाभावाद् इति।
[न्या०अ०२७।०] तद् एवं व्यावहारिक-प्रमाणस्य प्रत्यक्ष-परोक्ष-स्वार्थ-परार्हादि-भेद-भिन्नस्य लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यैः पारमार्थिकं समस्तावरण-विच्छेद-लभ्यम् अशेषार्थ-गोचरं केवल-ज्ञानं नाभ्युपगम्यते, तन्-मतोद्दलनार्थं तल्-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह॒
सकलावरण-मुक्तात्म केवलं यत् प्रकाशते ।
प्रत्यक्षं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् ॥ न्यायावतार २७ ॥
[न्या०अ०२७।१] सकलं समस्तम्, आवृणोत्याव्रियते वानेनेत्य् आवरणं, तत्-स्वरूप-प्रच्छादनं कर्मेत्य् अर्थः, सकलं च तद् अवारणं च सकलावरणं, तेन मुक्तो रहित, आत्मा स्वरूपं यस्य तत्-तथा। अत एव केवलम् असहायम्, आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतयैव बोधस्य नानाकारतया प्रवृत्तेः, सामस्त्येन पुनर् आवरण-निर्दलने विबन्धक-कारण-वैकल्याद् एकाकारतयैव तस्य विवर्तनात्। अतो ज्ञानान्तर-निरपेक्षं यत् प्रकाशते प्रथते निरुपाधिकं द्योतत इत्य् अर्थः, तत् परमार्थतः प्रत्यक्षम्। तद् इदं सकलावरण-मुक्तात्मेति-हेतु-द्वारेण तथा केवलं यत् प्रकाशत इति-स्वरूपतो निरूप्याधुना कार्य-द्वारेण निरूपयन्न् आह॒ सकलार्थात्मनां समस्त-वस्तु-स्वरूपाणां सतत-प्रतिभासनम् अनवरत-प्रकाशनं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् इति, प्रतिभास्यतेऽनेनेति प्रतिभासनम्, आत्मनो धर्म-रूपतया भेदवद्-विवक्षितं ज्ञानम् इति यावत्। अस्य च पारमार्थिकत्वं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेः। तथा ह्य्॒ अक्ष-शब्दो जीव-पर्यायस्, ततश् चाक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं, यत्रात्मनः साक्षाद् व्यापारः। व्यावहारिकं पुनर् इन्द्रिय-व्यवहितात्म-व्यापार-सम्पाद्यत्वात् परमार्थतः परोक्षम् एव॒ धूमाद् अग्नि-ज्ञानवत्, तिरो-धानाविशेषात्।
[न्या०अ०२७।२] ननु च प्रसिद्धं लक्ष्यम् अनूद्याप्रसिद्धं लक्षणं विधीयते -- सर्वत्रायं न्यायः। अप्रसिद्धे पुनर् लक्ष्ये लक्षणम् अभिधीयमानम् अम्बरारविन्दिनी-कुसुम-लक्षणवन् निर्गोचरतां यायात्। तद् इदं स्वरूपतोऽप्रसाध्य लक्षणम् अभिदधानस्य कोऽभिप्राय इत्य्॑ अत्रोच्यते -- ये ये मिथ्यावलेपाध्मातान्तः-करणाः प्रमाण-प्रसिद्धम् अप्य् अदः प्रति विप्रतिपद्यन्ते, तेषां ध्य्-आन्धी-कृत-बुद्धित्वाद् अवधारणीयताम् अनेन दर्शयति। किम् अस्य प्रतिपादकं प्रमाणम् इति चेद्, एते ब्रूमः॒
[न्या०अ०२७।३] समस्ति समस्त-वस्तु-विस्तार-गोचरं विशद-दर्शनं, तद्-गोचरानुमान-प्रवृत्तेः॑ इह यद्-यद्-गोचरम् अनुमानं प्रवर्तते, तस्य तस्य ग्राहकं किञ्चित् प्रत्यक्षम् उदय-पदवीं समासादयति, यथा चित्र-भानोः॑ प्रवर्तते च सकलार्थ-विषयम् अनुमानम्॑ अतस् तद्-अवलोकिना विशद-दर्शनेनापि भाव्यम् इति। सर्वार्थ-विषयं किम् अनुमानं प्रवर्तत इति चेद्, इदम् अपि ब्रूम॒ इह यद् यद् अस्ति तत् तत् सर्वं स्थित्य्-उदयापवर्ग-संसर्गम् अनुभवति, वस्तुत्वात्॑ यद् यद् वस्तु तत् तत् स्थेम-जन्म-प्रलयैः क्रोडी-कृतं॑ तद् यथाङ्गुलिर् अङ्गुलित्व-वक्रत्व-र्जुत्वापेक्षयेति॑ वस्तु च यद् अस्त्य्, अतः प्रस्तुत-त्रयाक्रान्तं तद् अवगन्तव्यम्। इदम् एव निखिलार्थ-गोचरम् अनेकान्तानुमानं ज्ञान-क्रियाभ्यासातिशयान् निखिलावरण-विच्छेदे विबन्धक-कारणाभावाद् विशद-दर्शनी-भवति। न चानुमान-प्रवृत्ताव् अप्य् अनर्थित्वादिना प्रमातुर् अप्रवृत्ताव् अनुमेय-गोचर-प्रत्यक्षासम्भवेन व्यभिचारश् चोदनीयः, सम्भवस्य साध्यतयाभिप्रेतत्वात्। न च सम्भव-मात्रेऽस्ति व्यभिचारः, सर्वानुमेयानां सम्भवत्-प्रत्यक्षतया व्याप्तत्वाद् इति।
[न्या०अ०२७।४] अथवान्यथानुमानयामः॒ सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक आत्मा, विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायत्वाद्॑ इह यो यो विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायः स स सम्भवत्-समस्त-शुद्धिको॑ यथा विद्यमान-क्षार-मृत्-पुट-पाकादि-शुद्ध्य्-उपायो रत्न-विशेषस्, तथा च विद्यमान-ज्ञानाद्य्-अभ्यास-शुद्ध्य्-उपाय आत्मातः सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक इति। सामस्त्य-शुद्धश् चात्मा ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदात् केवलम् अभिधीयत इति। ज्ञानाद्य्-अभ्यासः कथं विशुद्धि-कारणम् इति चेद्, आवरण-मल-प्रतिपक्ष-रूपत्वाद् इति ब्रूमः। प्रतिपक्ष-रूपता कथम् अवधारितेइति चेत्, तवैव दर्शनात्। तथा हि॒ दृश्यते ज्ञानाद्य्-अभ्यासतः प्रतिक्षणम् आवरण-विलयो, विशिष्ट-विशिष्टतर-तत्-कार्य-बोधाद्य्-अनुभवात्, तद्-अतिशये पुनः सामस्त्योच्छेदः स्याद् इत्य् अभिदध्महे। एतेन यत् परे प्रोचुर् -- यथा॒ प्रत्यक्षादि-प्रमाण-पञ्चक-गोचरातिक्रान्तत्वात् सर्वार्थ-संवेदनम् अभावाख्य-षष्ठ-प्रमाण-गोचरतां प्रतिपद्यते -- तद् अयुक्तं, तत्-सम्भवस्यानुमानेन प्रतिपादनात्, प्रमाण-पञ्चक-प्रवर्तनाभावासिद्धेः। किं च, प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं न प्रवर्तत इति कथं भवतो निर्णयः? किं नियत-देश-काल-व्याप्त्या यद् वा समस्त-देश-कालास्कन्दनेनेति? यद्य् आद्यः पक्षस्, ततो यथा घटादेः क्वचित् प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं निर्वर्तमानम् अभावं साधयत्य्, एवं समस्त-वस्तु-संवेदन-गोचरम् अपि तन् निवर्तमानं नियत-देश-दशावच्छिन्नम् अभावं साधयेन्, न सर्वत्र॑ ततश् च घटादिवत् तद् दुर्निवारं स्यात्। अथ द्वितीयः पक्षो,ऽसाव् असम्भव्य् एव॑ समस्त-देश-काल-वर्ति-पुरुष-परिषत्-संवेदन-साक्षात्-कारिणो ह्य् एवं वक्तुं युक्तं, यद् उत न क्वचित् समस्तार्थ-संवेदनं अस्तीति -- न भवतस्, तथा-विध-पुरुष-सम्भवानभ्युपगमात्। इतरथा य एव कश्चिन् निश्चित्यैवम् अभिदध्यात्, स एव समस्त-वस्तु-विस्तार-व्यापि-ज्ञानालोक इति समस्तार्थ-गोचर-संवेदन-सिद्धिर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०२८।०] तद् एवं प्रमाण-विषये लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराकृत्याधुना क्रम-प्राप्तां गोचर-विप्रतिपत्तिं बहु-वक्तव्यत्वाद् अनिराकृत्य तावत् फल-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षुर् आह॒
प्रमाणस्य फलं साक्षाद् अज्ञान-विनिवर्तनम् ।
केवलस्य सुखोपेक्षे शेषस्यादान-हान-धीः ॥ न्यायावतार २८ ॥
[न्या०अ०२८।१] द्वि-विधं हि प्रमाणस्य फलं॒ साक्षाद् असाक्षाच् चानन्तरं व्यवहितं चेत्य् अर्थः। तत्र साक्षाद् अज्ञानम् अनध्यवसायः प्रमेयापरिच्छित्तिस् तस्य विनिवर्तनं विशेषेण प्रलयापादनं प्रमाणस्य फलम्, अज्ञानोद्दलन-द्वारेण तस्य प्रवृत्तेस्, तस्य च सर्वानर्थ-मूलतया प्रमात्र्-अपकारित्वात्। तन्-निवर्तनस्य प्रयोजनता युक्तैव। एतच् चानन्तर-प्रयोजनं सर्व-ज्ञानानाम् एक-रूपत्वात् सामान्येनोक्तम्। व्यवहित-प्रयोजनं पुनर् विभागेनाह॒ केवलस्य सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सुखं वैषयिक-सुखातीत-परमाह्लादानुभव, उपेक्षा साक्षात् समस्तार्थानुभवेऽपि हानोपादानेच्छाभावान् मध्य-स्थ-वृत्तिता, ते सुखोपेक्षे फलम् इत्य् अर्थः। शेषस्य तद्-व्यतिरिक्त-प्राकृत-लोक-प्रमाणस्यादानं ग्रहणं हानं परित्यागस्, तयोर् आदान-हानयोर् धीर् बुद्धिर् आदान-हान-धीः, सा फलम् इति यावत्। ततश् चादेयानां सम्यग्-दर्शनादि-स्रक्-चन्दनादीनां यादित्सा, तथा हेयानां मिथ्या-दर्शनादि-विष-कण्टकादीनां या जिहासा सा प्रमाण-साध्याप्रमाणात् तद्-असिद्धेः, प्रेक्षा-पूर्व-कारिणां ततः प्रवृत्त्य्-अयोगाद् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०अ०२९।०] अधुना गोचर-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे॒
अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचरः सर्व-संविदाम् ।
एक-देश-विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः ॥ न्यायावतार २९ ॥
[न्या०अ०२९।१] अनेके बहवोऽन्ता अंशा धर्मा वात्मानः स्वरूपाणि यस्य तद् अनेकान्तात्मकम्। किं तत्? वस्तु बहिर् अन्तश् च, गोचरो विषयः, सर्व-संविदां समस्त-संवित्तीनाम्। अनेनानेकान्तम् अन्तरेण संवेदन-प्रसर-व्यवच्छेदं दर्शयति, भ्रान्त-संवेदनानाम् अप्य् अनेकान्तोद्द्योतन-पटिष्ठतया प्रवृत्तेः, केवलं केषुचिद् अंशेषु विसंवादकत्वाद् अप्रमाणानि तानि सङ्गीर्यन्ते। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यदा संवेदन-सामान्यम् अप्य् अनेकान्त-विरहेण न प्रवर्तितुम् उत्सहते, तदा तद्-विशेष-भूतं प्रमाणम् एकान्ते प्रवर्तिष्यत इति दूरापास्तावकाशैवैषा वार्ता, तथाप्य् अनादि-मिथ्याभिनिवेश-वासितान्तः-करणाः कुदर्शन-विप्रलब्ध-बुद्धयो बहवोऽत्र विप्रतिपद्यन्त इति सर्व-प्रमाणानाम् अनेकान्त-गोचरत्व-साधकं प्रमाणम् अभिधीयते॒ इह यत् प्रमाणं तत् परस्पराविनिर्लुठितानेक-धर्म-परिकरित-वस्तुनो ग्राहकं, तस्यैव तत्र प्रतिभासमानत्वाद्॑ इह यद् यत्र प्रतिभाति, तद् एव तद्-गोचरतयाभ्युपगन्तव्यं॑ तद् -- यथा निरादीनव-नयन-प्रभव-दर्शने प्रतिभासमानं पाटलतया जपा-कुसुमं तथैव तद्-गोचरतयाभ्युपगम्यते॑ परस्पराविभक्तानेक-स्वभावाक्रान्त-मूर्तिकं च बहिर् अन्तश् च वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रथत इत्य्॑ अतस् तद् एव तेषां गोचरः।
[न्या०अ०२९।२] न चेतरेतर-विशकलित-धर्मि-धर्म-भाव-वादिभिः कणभक्षाक्षपाद-शिष्यकैस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धतादि-दोषः प्रतिपादयितुं शक्यस्, तद्-अभ्युपगमम् अन्तरेण स्वाभिप्रेत-वस्तुनोऽवस्थानाभावात्। तथा ह्य्॒ एकस्मिन् धर्मिणि बहवो धर्मास् ततो भिन्न-तनवः कथं वर्तेरन्? भेदाविशेषेण सर्वत्र तद्-वृत्ति-प्रसङ्गात्। तत्रैव तेषां समवायान् नान्यत्र वर्तन्त इति चेन्, ननु सोऽपि समवायो यद्य् उपकार्योपकारक-भाव-व्यतिरेकेणापि भवति, ततः सर्वत्राविशेषेण प्रसज्येत, तद्-अभावाविशेषात्। अस्त्य् एवोपकार्योपकारक-भाव इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, अनेकोपकारकस्यानेक-स्वभावता-प्राप्तेस्, तद्-विरहेऽनेकोपकारकत्वाभावात्। न हि येन स्वभावेनैकस्योपकरोति तेनैव द्वितीयस्य, तस्य तत्रैवोपयुक्तत्वाद्, द्वितीयोपकारक-स्वभावस्य तद्-उपमर्दन-द्वारेणोत्पत्तेर्, इतरथैकम् एवोपकुर्वंस् तिष्ठेत्, तद्-एक-स्वभावात्। भिन्नाभिः शक्तिभिर् उपकरोति, न भिन्नैः स्वभावैस्, तेन नानेकान्त इति चेत्, तास् तर्हि तत्र कथं वर्तन्त इति वाच्यम्। समवायाद् इत्य्-उत्तरेऽसाव् अप्य् उपकार्योपकारक-भावम् अन्तरेण कथं न सर्वत्रेति प्राचीनं चोद्यं पश्चाल्-लग्नम् अनुधावति। उपकार्योपकारक-भावाभ्युपगमे पुनर् अप्य् अनेक-स्वभावता-प्रदर्शित-युक्तेः पुनः शक्त्य्-उपकारक-भिन्न-शक्ति-परिकल्पने तद् एवावर्तते, तन् न भिन्न-धर्म-परिकल्पनेऽप्य् अनेकान्तान् मोक्ष इति वरम् आदाव् एव मत्सरितां विहायानेक-धर्माध्यासितं वस्त्व् अभ्युपगतम्। किं भेद-कल्पनयास्थान एवात्मना परिक्लेशितेनेति। किं चानेकान्ताभ्युपगमे सत्य् एष गुणः॒ परस्पर-विभक्तेषु संयोगि-संयोग-समवायि-समवाय-गुण-गुण्य्-अवयवावयवि-व्यक्ति-सामान्यादिषु संयोग-समवाय-गुण्य्-अवयवि-सामान्यादीनां संयोगि-समवायि-गुणावयव-विशेषादिषु वर्तन-चिन्तायां यद् दूषण-जालम् उपनिपतति, तद् अपि परिहृतं भवत्य्, एकान्त-भेद एव तद्-उपपत्तेर्, अनेकान्ते तद्-उत्थानाभावात्। तथा हि॒ भिन्नाः खलु संयोगादयः संयोग्य्-आदिभ्यो विकल्पयितुं पार्यन्ते -- यद् उत कथम् एत एतेषु वर्तन्त इति? किम् एक-देशेन यद् वा सामस्त्येन? यद्य् एक-देशेन, तद् अयुक्तं, तेषां निरवयवत्वाभ्युपगमात्। सावयवत्वेऽपि तेभ्योऽवयवेभ्यो यद्य् अभिन्नास्, ततोऽनेकान्तापत्तिर्, एकस्यानेकावयवत्व-प्राप्तेः। अथ भिन्नास् तेष्व् अपि ते कथं वर्तन्त इत्य् वाच्यम्॒ एक-देशेन सामस्त्येन वा। एक-देश-पक्षे तद् एवावर्तत इत्य् अनवस्था। अथ सामस्त्येन, तद् अप्य् असाधीयः, प्रत्येकं परिसमाप्ततया संयोगादि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। तद्-अभिन्नाः पुनः संयोगादयो न विकल्प-भाजो भवन्ति। अभेद-पक्षेऽपि संयोगादि-मात्रं संयोग्य्-आदि-मात्रं वा स्याद् इति चेन्, न, तस्याप्य् एकान्तेनानभ्युपगमात्, किं तर्ह्य् अन्योन्याविश्लिष्ट-स्वरूपा विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदाः सर्व एवैतेऽभ्युपगम्यन्ते, तथा-विधानां कुयुक्ति-विकल्पोत्थापित-दूषण-समूह-निराकरण-क्षमत्वाद्, अबाधित-प्रतिभासेषु सर्वत्र तेषां तथैव प्रतिभासनाद्, अन्यथा प्रतिभासमानानाम् अन्यथा परिकल्पने दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-द्वारेणासमञ्जस-प्राप्तेस्॑ तथा च ब्रह्माद्वैत-शून्य-वादादयः सिद्धिम् अश्नुवीरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०अ०२९।३] एतेनास्य हेतोः कापिला अप्य् असिद्धतादि-दोषम् अभिधित्सवो मौक्यम् आनीताः। तथा ह्य्॒ अन्तर् एकं संवेदनम् अपरापर-हर्ष-विषादाद्य्-अनन्त-धर्म-विवर्ताक्रान्त-रूपं बहिश् च घटादिकम् अर्थं नव-पुराणादि-वर्तुल-पार्थिवत्वाद्य्-अनेक-स्वभावावष्टब्ध-शरीरं साक्षाल् लक्षयन्तः कथं तद्-विपरीत-कथने प्रवर्तेरन्? प्रकृति-पुरुषात्मकं द्रव्यम् एवैकं तात्त्विकं, पर्याय-भ्रान्ति-जनकः पुनर् विवर्तोऽपारमार्थिक इति चेन्, न, द्वयोर् अपि सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशमानयोर् अबाधितयोः सर्व-व्यवहार-निबन्धनयोः पक्ष-पातम् अन्तरेणैकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। तथा सति विवर्त एव तात्त्विको, द्रव्यं पुनर् अलीकम् इति पर्याय-पक्ष-पाती प्रसञ्जयन् दुर्निषेधः स्याद् इति। अथेत्थम् अभिदधीथा॒ द्रव्यं सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात् सत्यं, पर्यायाः पुनर् व्यभिचारिण इत्य् असत्याः, तद् अयुक्तम्। यदि नाम द्रव्यम् अभेद-रूपत्वात् सर्वत्रानुवर्तते, पर्यायास् तु भेद-रूपत्वाद् व्यवच्छिद्यन्ते, तथापि तत् सत्यम्, इतरेऽलीका इति वक्तुं न पार्यते, न हि नीलं पीत-रूपतां न बिभर्तीत्य्-एतावता तद् असत्यम्, अतिप्रसङ्गात्, सर्वस्य पर-रूप-परिहारावस्थायितयालीकत्व-प्राप्तेः। अथ द्रव्यम् एव पर्यायास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवन्, न सन्ति वा द्रव्य-व्यतिरेकिणः पर्याया, निःस्वभावत्वात्, ख-पुष्पवद् इति प्रमाणयसि, तथा सति पर्याया एव द्रव्यं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवन्, नास्ति वा पर्याय-व्यतिरिक्तं द्रव्यं, निष्पर्यायत्वाद्, आकाश-कुसुमवद् इतीतरोऽपि प्रमाणयन् केन वार्येत। तन् न पक्ष-द्वयेऽपि काचिद् विशेषोपलब्धिर् इति। यथैवानन्त-सह-क्रम-वर्ति-पर्यायाध्यासितं वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशते तथैवाभ्युपगन्तव्यं, तथा चान्यस्याभावात् तद् एव तद्-गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।४] तथा सुगत-मतानुसारिणाम् अपि मध्ये सौत्रान्तिकस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धताम् आविर्-भावयितुं नोत्सहते, तद्-अभ्युपगति-व्यतिरेकेण निज-दर्शन-व्यवस्थानुपपत्तेः। तथा हि॒ बहिस् तावद् एकं कारणम् अपरापर-सामग्र्य्-अन्तः-पातितयानेक-कार्य-कार्यावेद्यते, यथा रूपं स्वोत्तर-क्षणं स्वावगाहि-ज्ञानादिकं च युगपज् जनयति। यदि चैक-क्षण-वर्तिनः सामग्री-भेदेन भेदम् अनुभवत एव भिन्न-देश-नाना-कार्य-कारिता, तथा सति नित्य-पक्षोदितं दूषणं स्व-मस्तकोपनिपाति स्यात्, तस्यापि तथैव भिन्न-काल-कार्य-निर्वर्तनेऽपि भेदाभाव-प्रसङ्गात्। तथा प्रतिभास-भेदेन क्षण-क्षयि-रूपादि-स्वलक्षण-विलक्षणत्वाभ्युपगमश् चैवं निर्निबन्धनः स्यात्, कौटस्थ्यम् आबिभ्रतोऽपि द्रव्यस्यापरापर-कारण-कलापान्तर्-गततया नव-पुराणादि-पर्याय-रूप-रस-गन्ध-स्पर्शावभास-लक्षण-कार्य-सम्पादनाविरोध-प्रसक्तेः। किं चायम् एकं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणानि स्वलक्षणान्य् आचक्षीत नान्यथा, यथाकूतं तद्-अवभासस्य स्वप्नान्तरेऽप्य् अनुपलक्षणाल्॑ लक्षितस्य चालक्षित-व्यतिरेक-निराकरणतस् तादात्म्यं कथयन् स्व-गिरानेकान्तावभासं समर्थयते। तथा ह्य्॒ अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्य-प्रतिक्षण-विवर्तम् अपि स्वलक्षणं स्थिर-स्थूराद्य्-आत्मना दर्शयति स्वरूपम्, अन्यथा सुषुप्तं जगद् आसज्येत, तद्-अप्रकाशने प्रमाणान्तरस्याप्य् अत्यन्त-विलक्षण-स्वलक्षणावेदकस्याप्रवृत्ति-प्रसङ्गात्। तथान्तः-संवेदनम् अर्थ-स्वरूपापेक्षया बहिर्-मुखान्तर्-मुख-सविकल्पाविकल्प-भ्रान्ताभ्रान्तादि-प्रतिभासम् एकम् अभ्युपयतः कथम् अनेकान्तावभासोऽसिद्धः स्यात्? तथा नाना-देश-स्थितार्थ-सार्थ-समर्पिताकारोपरक्तम् एकम् आकार-भेदेऽप्य् अन्यथा युगपत्-प्रकाशमान-सितासिताद्य्-अर्थ-व्यवस्थित्य्-अनुपपत्तेः संवेदनम् अनुमन्यमानः कथं भिन्न-समय-भावि-हर्ष-विषादाद्य्-अनेक-विवर्त-वशात् तद्-भेदम् आत्यन्तिकम् अभिदधीत, अभिन्न-योग-क्षेमत्वाद्। युगपद्-भाविनां संविद्-अन्तर्-निविष्टाकाराणाम् एकत्वं न हर्षादीनां, तद्-विपर्ययाद् इति चेन्, न, तत्-सामर्थ्य-व्यवस्थाप्यार्थाभेद-प्रसङ्गात्, तद्-एकतया सित-पीतादिषु ज्ञानस्य बोध-रूपेणैवाविशिष्टत्वात्। तद् एवं बहिर् अन्तश् चैकानेक-रूपत्वे प्रमाणतः स्थितेः स्वलक्षणस्यान्यथा स्वाभ्युपेत-दर्शन-व्यवस्थायोगान् नार्थ-वाद्य् अनेकान्त-प्रकाशं प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति।
[न्या०अ०२९।५] तथोररी-कृत-योगाचार-मतम् अपि बलाद् अनेकान्त-प्रकाश-रज्जुर् आवेष्टयत्य्, एकस्यापि ज्ञानस्यानेक-वेद्य-वेदकाकारतया प्रथनोपगतेः। एक-योग-क्षेमत्वात् तद्-ऐक्यम् इति चेन्, न, युगपद्-उदय-प्रलयवतां सह-वेदिनां सकल-सन्तानानाम् एकत्व-प्रसङ्गात्। संवृति-दर्शितत्वाद् अनेकत्वस्य, न तेन स्व-संवेदन-साक्षात्-कृत-पारमार्थिकैकत्व-क्षतिर् इति चेन्, न, ब्रह्म-वादि-मताप्रतिषेध-प्रसक्तेर्, यतोऽनाद्य्-अविद्या-बलाद् एकम् अक्रमं सचेतनं स्व-संवेदन-साक्षात्-कृतम् अपि ब्रह्मानेकं क्रमवच् चेतनाचेतनं परोक्षापरोक्षं लक्ष्यते, भवत्-परिकल्पित-ग्राह्य-ग्राहकाकार-विविक्त-संवेदनवद् इति तेनापि न दुरुपपादम्। अस्तु वायम् अनेकान्तावभासो भ्रान्तस्, तथापि संवेदनस्याद्वयता न लक्ष्यते, तल्-लक्षणे सकलासुमताम् अधुनैव मुक्ततावाप्तेः। लक्ष्यते च तत् कथञ्चिद्, इतरथा सुषुप्त-दशावत् सर्व-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् इत्य् एकस्यापि संवेदनस्य लक्षितालक्षितत्वेनानेकान्त-प्रतिभासो दुःशकोऽपह्नोतुम् इति ज्ञान-वाद्य् अप्य् अस्य हेतोर् असिद्धताविर्-भावनं प्रति तूष्णीम् आसीत।
[न्या०अ०२९।६] शून्य-वादिनः समस्ताभावाद् असिद्धोऽनेकान्त-प्रकाश इति चेन्, न, तस्यापि प्रमाण-प्रमेयाभावे न सर्वाभावावेदनं समस्त्य्, अन्यथाप्रमाणकं सर्वं सर्वत्र विद्यत इति परस्यापि वदतो न वदन-भङ्गः स्यात्, तद्-अभ्युपगमेऽभ्युपगम-क्षतिः। तयोश् च दर्शितवद् अनेकान्त-प्रकाश इति नासिद्धो हेतुः। मरु-मरीचिका-निचय-चुम्बिनि संवेदने जलोल्लेखेऽपि तद्-गोचरत्वाभ्युपगमाभावाद् अनैकान्तिकोऽयम् इति मा शङ्किष्ठास्, तस्य भ्रान्तत्वाद्, अभ्रान्त-प्रकाशो हि तद्-अभ्युपगति-हेतुः। अथायम् अपीतरेतर-विनिर्लुठित-परमाणु-क्षण-क्षयि-बोधेन बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् आचक्षीथास्, तद् अयुक्तं, यतस् तद्-बोधः किम् उपलब्धि-मात्रम् यद् वा निर्णयः? यद्य् आद्यः कल्पस् तदानुमानं विशीर्येत, निर्गोचरत्वात्, प्राथमकल्पिकेनैव निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनेन विरोध-भीरुतया सर्वथा वस्तु-ग्रहणाभ्युपगमात्, प्रमाण-कलिते च मानान्तर-वैयर्थ्याद्, अनवस्था-प्राप्तेः। अथ द्वितीयस्, तथा सति सर्वं निर्विकल्पकम् अप्रमाणताम् अश्नुवीत। न च निर्णयोऽनेकान्त-प्रकाशं बाधते,ऽपि तु समर्थयते, बहिर् अन्तश् च तथैव तद्-विजृम्भणात्। अथ सर्वथा वस्तु-ग्रहणेऽपि निर्विकल्पकं यत्रांशे पाश्चात्यं व्यवहार-कारि-व्यवसायम् उपजनयति, तत्रैव प्रमाणताम् आस्कन्दति नान्यत्रेति मन्येथास्, तथा सति यद्-अनन्तरम् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया पुरुषः प्रवर्तते स एव निर्णयः प्रामाण्यं स्वी-कुर्यान्, न निर्विकल्पकं, तज्-जनकत्वेऽपि सन्निकर्षादिवद् इत्य् आसज्येत। निर्विकल्पकम् अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वात् प्रमाणं, न व्यवसितिस्, तद्-विकल्पत्वाद् इति चेन्, नानुमितेर् अपि तद्वद् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। न च विपरीताकार-निराकरण-चतुरतयानुमितिर् विशेषवती, निर्णीतेर् अपि तद्-अपनोद-दक्षत्वाद्, असमारोप-विषयेऽप्रवृत्तेः। त्रि-रूप-लिङ्ग-जतया विशेषोऽनुमितेर् मानता-साधक इति चेत्, साक्षाद् अनुभवाद् उत्पादस् तर्हि निर्णीतेर् महापराध इति भवतो बालताम् ईक्षामहे। किं च, यथा निर्विकल्पकम् अलक्षितं सकल-व्यावृत्त-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणम् अपि कतिचिद्-अंश-विषयं विकल्पम् उत्थापयति, तथार्थ एवेन्द्रियालोकादि-सन्निकृष्टतया कतिचिन्-निजांश-विषयं साक्षाद्-विशद-विकल्पं जनयेद् इति किम् अजा-गल-स्तन-कल्प-निर्विकल्पक-कल्पनया? तावन्तो ऽंशा बहिर्-अर्थे विरुध्यन्त इति चेत्, पाटवापाटवादयो दर्शनेऽप्य् एकस्मिन् न विरुध्यन्त इति किं राज्ञाम् आज्ञा? तस्मान् न क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-लक्षकं क्वचित् कदाचिद् दर्शनं लक्षयन्ति भवन्तोऽपि, केवलं स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणतया न तद्-असत्तां प्रतिपद्यन्ते। स्वांश-व्यापिनं कालान्तरानुयायिनम् एकं बहिर् अन्तश् चार्थं बोधं च प्रकाशयन् प्रथमानो निर्णयः, न पुनर् निर्मूलकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाध्यत इति न भ्रान्तः। किं चास्य भ्रान्ततां कथयन् सर्व-प्रमाण-प्रमेय-व्यवस्थाम् उन्मूल्यति। तथा हि॒ यत् सत्त्व-बोध-रूपत्व-सुखत्वादिषु प्रमाणं तद् एव क्षण-क्षयित्व-स्वर्ग-प्रापण-शक्ति-युक्तत्वादिष्व् अप्रमाणम्॑ तथा यद् वस्तु नील-चतुरस्रोर्ध्वतादि-रूपतया प्रमेयं तद् एव मध्य-भाग-क्षण-विवर्तादिनाप्रमेयं॑ तथा यद् बहिर्-अर्थापेक्षया सविकल्पकं स्वप्नादि-दर्शनं वा भ्रान्तं तद् एव स्वरूपापेक्षयाभ्रान्तम्॑ तथा यन् निशीथिनी-नाथ-द्वयादिकं द्वित्वेऽलीकं तद् अपि धवलता-नियत-देश-चारितादाव् अनलीकम् इति निर्णयः। यदि तु विरोधाद् बिभ्यद्भिर् भवद्भिर् अयम् अपह्नूयते, किम् अपरम् ऐकान्तिकं प्रमाणं प्रमेयं चोररी-कृत्य स्वाकूतं प्रतिष्ठापयेयुर् इति सकौतुकं नश् चेतः।
[न्या०अ०२९।७] अथ ज्ञान-वाद्य् अद्वैत-प्रकाशम् अलक्षितम् अभ्युपेत्य तेन बाहुविध्यं दधानो बोधो बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् अभिदध्यात्, तद् अयुक्तम्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाद्, अलक्षित-निर्विकल्प-दर्शनस्य च प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्। अथ युक्तिर् बोधस्य वैविध्यं बाधेत, तथा हि॒ भ्रान्ताभ्रान्त-संवेदन-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, संविन्-मात्रस्य तु सर्वत्राव्यभिचारित्वाद्, अद्वयं संवेदनं विविक्त-युक्त्या प्रकाशमानम् अनादि-कालालीन-वासना-समुपजनित-संवृति-दर्शित-सत्ताकं सितासितादि-विविध-प्रतिभासं निराकुरुते। अत्र प्रतिविदध्महे॒ किम् अयम् अनेकाकारो बोधोऽद्वय-संवेदनाद् व्यत्यरैक्षीद् वा न वा। किं चातो, यदि व्यभैत्सीत्, कथम् अदृष्ट-तत्-कार्यत्वे व्यतिरिक्तोऽयं तद् अद्वयं संवेदनम् अनुमापयेत्? अव्यतिरेक-पक्षे पुनर् अनेकः सन्न् एक-संवेदन-तादात्म्येन प्रथमानः कथम् अद्वैतं नोद्दलयेत्? अथ संवृति-दर्शितत्वाद् अलीकतयास्य सितासिताद्य्-आकार-बहिर्-मुख-कालुष्यस्य बोधेन तात्त्विकेन सह भेदाभेद-विकल्पानुपपत्तिर् इति ब्रूषे, तथा सति परो बोधस्यापारमार्थिकत्वं अविद्या-दर्शितत्वाद्, अर्थ-सत्तायाः पुनस् तत्त्व-रूपता, सर्वत्राव्यभिचाराद् इति ब्रुवाणो दुर्निवारः स्यात्। जडस्य प्रकाशायोगात् संवित्तिः सत्या, नार्थ इति चेद्, एकस्यानेकतावभासाभावाद् अनेकान्तः सत्यो, नाद्वैतम् इति प्रतिजानीमहे। संवृत्याद्वयस्यापि नाना-प्रतिभासोऽविरुद्ध इति चेद्, अनाद्य्-अविद्या-बलाज् जडस्यापि चेतनतया प्रकाशो न विरुद्ध इति परस्यापि शठोत्तरं नातिदुर्लभं भवेत्। किं च, नानाकार-कलुषित-चैतन्य-सामान्यस्यान्यथानुपपत्ति-सामर्थ्यतस् तस्य सिद्धत्वाद् अद्वयं संवेदनम् असिद्धं साधयेद् अयम्, अन्यथा निर्निबन्धनतया साधनस्याप्रवृत्तेस्, तथा च स्थिर-स्थूराद्य्-उपलक्षितार्थांश-वशाद् विशकलित-परमाणु-क्षण-क्षयि-पर्याय-तादात्म्यं साधयन् तम् अनेकान्त-वादिनं न प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति, युक्तेर् उभयत्रापि तुल्यत्वात्। किं च, योऽयं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-निर्णयोऽसाव् अपि स्व-संवेदनापेक्षयाद्वय-रूप इति भवद्-अभिप्रायो॑ यथा चानवस्था-भीरुतया सर्वं ज्ञानं स्व-प्रकाशम् अभ्युपेतं, तथा सर्वो निश्चयः स्व-निश्चायकोऽभ्युपगन्तव्यो,ऽन्यथा तत्राप्य् अनवस्था-दोषोऽनुषज्येत, निश्चयाश् च सर्वथा स्वरूपं निश्चिनुयुर्, नैक-देशेन, यतो "निश्चयैर् यन् न निश्चीयते रूपं तत् तेषां विषयः कथम्" इति स्वयम् एव स्व-वधाय प्रलपितम्। तथा चाद्वयस्य क्षण-क्षयिणः स्वरूपस्य तैर् ग्रहणे विपरीतारोपाभावाद् आदित एव अनुत्थानं संसारस्येति युक्ति-रिक्त एवामुक्तताभिमानः स्यात्, न चैवम्, भव-भावस्य प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। तन् नायम् इतरेतराविनिर्लुठित-द्रव्य-पर्याय-प्रकाशो भ्रान्तस्, तद्-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाणान्तराभावाद् इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।८] यदा तु शून्य-वादी ‘निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्न-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति पराभिप्राय-प्रवृत्तानुमान-बलाद् भ्रान्तताम् अस्य कथयेत्, तदा तं प्रति ‘सालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वाज्, जाग्रद्-दशा-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति विपरीतानुमानम् उपढौकनीयम्। स यदि दृष्टान्तस्य साध्य-विकलताम् उद्भावयेत्, तदा तद्-दृष्टान्तेऽपि सा दर्शनीया। यदि पुनर् असौ स्वप्न-प्रत्ययस्य निरालम्बनत्वं भवद्भिर् अभिप्रेतम् इति विलपन्न् आसितुं न दद्यात्, तदा स विकल्पतः पर्यनुयोज्यो॒ऽस्मद्-अभ्युपगमः प्रमाणं भवतोऽप्रमाणं वा? प्रमाणं चेद्, यथा तद्-बलाद् दृष्टान्त-समर्थनं तथा जाग्रत्-प्रत्यय-गोचरार्थ-समर्थनम् अपि किं न कुरुषे, कोऽयम् अर्ध-जरतीय-न्यायः? अथाप्रमाणम्, एवं सति स्वप्न-प्रत्यय-निरालम्बनता-साधकं प्रमाणान्तरं मृगणीयं, किम् अनेन कुश-काशावलम्बनेन। तत्रापि प्रमाणान्तरे विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ तत् किं निरालम्बनं सालम्बनं वा? निरालम्बनं चेन्, नान्य-प्रत्ययस्य निरालम्बनतां गदितुं पटिष्ठं, निर्गोचरत्वात्। अथ सालम्बनं, हन्त हतोऽसि, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्यया इति प्रतिज्ञात-क्षतेर्, अनेनैव व्यभिचाराद् इति शठः प्रतिशठाचरणेन निर्लोठनीयः। तन् नास्यानैकान्तिकत्वम्।
[न्या०अ०२९।९] विरुद्धता-शङ्का पुनर् दूरापास्त-प्रसरैव, प्रमाण-प्रकाशितेऽर्थे सर्व-वादिनां तथाभ्युपगमाविगानाद् इति। अनेन संशय-विरोधानवस्था-वैयधिकरण्यासम्भवादि-दूषणानि निर्मूलक-मिथ्या-विकल्पोत्थापितानि प्रतिभास-मुद्गर-निपात-निर्दलित-मस्तकत्वान् न जीवितुम् उत्सहन्त इति। तस्माद् असिद्धतादि-दोष-विना-कृतोऽयं तथा-प्रतिभास-लक्षणो हेतुर् अनेकान्त-गोचरतां प्रमाणस्य परान् अभ्युपगमयतीत्य् अलम् विस्तरेण। तस्मात् ‘तस्यैव तत्र प्रतिभासनात्ऽ॑ सर्व-संविदाम् अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचर इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१०] अयं च यथावस्थित-प्रमाण-व्यापार-पर्यालोचक-प्रमात्र्-अभिप्रायेण प्रमाण-गोचरो दर्शितः। नयस् तर्हि किं-भूतम् तं मन्यत इति वचनावकाशे सत्य् आह॒ एकेत्य्-आदि। अनन्त-धर्माध्यासितं वस्तु स्वाभिप्रेतैक-धर्म-विशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनम् आरोहयतीति नयः, प्रमाण-प्रवृत्तेर् उत्तर-काल-भावी परामर्श इत्य् अर्थस्॑ तस्य विषयो गोचरो मतोऽभिप्रेत एक-देशेनानित्यत्वादि-धर्म-लक्षणेन विशिष्टः पर-रूपेभ्यो विभिन्नोऽर्थः प्रमेय-रूपं, प्रमाणम् एवं-विधम् एवार्थं गृह्णातीति स्वाकुतेन तेन व्यवस्थापनाद् इति।
[न्या०अ०२९।११] अथवा प्रमाण-विषयां लक्षण-संख्या-गोचर-फल-रूपां चतुर्-विधां विप्रतिपत्तिं निराकृत्यात्रैव नय-गोचरं निरूपयन्न् आह॒ एकेत्य्-आदि। ननु चादि-वाक्येन प्रमाण-व्युत्पादन-मात्रं प्रतिज्ञानं, तत् किं अयम् अप्रस्तुतोऽत्र नय-गोचरः प्रतिपाद्यत इति। सत्यं, एवं मन्यते॒ न नयः प्रमाणाद् अत्यन्तं दूर-यायी, किं तर्हि तद्-अंश-भूत एव, नय-समुदाय-सम्पाद्यत्वात् प्रमाणस्यातस् तद्-व्युत्पादन-प्रतिज्ञानेऽसाव् अपि ‘तन्-मध्य-पतितस् तद्-ग्रहणेन गृह्यतऽ॑ इति-न्यायाद् गृहीत एव, तन् नायम् अप्रस्तुत इति।
[न्या०अ०२९।१२] अत्रापि पदार्थः स एव, केवलं वाक्यार्थ-भेदः। तथा हीहैवं घटना॒ नयस्य विषय एक-देश-विशिष्टोऽर्थो मतो नीतिविदाम् इति। ननु च यदि नयस्य प्रमाणान्तः-पातित्वेऽपि पृथग् गोचरः प्रतिपाद्यते, ततः प्रमाणवद् एतद्-विषया लक्षणादि-विप्रतिपत्तिर् अपि निराकर्तव्या। सत्यं, किं तु न परेषां नय-व्यवहारः प्रसिद्धो,ऽतो धर्मिणोऽभावात् तद्-गोचरा विप्रतिपत्तिर् नास्त्य् एव। न च ते तेन तत्त्वं प्रतिपादनीयास्, तत्त्व-प्रतिपादने प्रमाणस्यैव व्यापारान्, नयस्य पुनर् एक-देश-निष्ठत्वेन तत्-प्रतिपादन-सामर्थ्य-विकलत्वाद्, अत एवाचार्यस्य न तल्-लक्षणादि-स्वरूप-कथनेऽपि महानादरः। गोचरं पुनर् हेय-पक्षे काक्वा प्रक्षिपन् साक्षात् प्रतिपादयति॒ मा भूत् स्व-दर्शनान्तः-पातिनां मन्द-बुद्धीनां प्रमाण-प्रतिपन्नेऽप्य् अनेकान्तात्मके वस्तुन्य् एक-देश-समर्थनाभिनिवेश-लक्षणः कदाग्रह इति। अथवा स्व-दर्शनान्तः-पातिनः प्रत्य् अनेनैव गोचर-कथनेनोपलक्षणत्वाल् लक्षणादीन्य् अपि लक्षयति। तत्र प्रमाण-प्रतिपन्नार्थैक-देश-परामर्शो नय इति लक्षणं, सर्व-नय-विशेषानुयायित्वात् पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमत्वाच् चास्य। संख्यया पुनर् अनन्ता इति, अनन्त-धर्मत्वाद् वस्तुनस्, तद्-एक-धर्म-पर्यवसिताभिप्रायाणां च नयत्वात्, तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्व-सङ्ग्राहि-सप्ताभिप्राय-परिकल्पना-द्वारेण सप्त नयाः प्रतिपादिताः। तद् यथा -- ‘नैगम-सङ्ग्रह-व्यवहार-र्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवम्भूता नयाऽ॑ इति। अतोऽस्माभिर् अपि त एव वर्ण्यन्ते।
[न्या०अ०२९।१३] कथम् एते सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका इति चेद्, उच्यते॒ऽभिप्रायस् तावद् अर्थ-द्वारेण शब्द-द्वारेण वा प्रवर्तेत, गत्य्-अन्तराभावाद्॑ अर्थश् च सामान्य-रूपो विशेष-रूपो वा, शब्दोऽपि रूढितो व्युत्पत्तितश् च, व्युत्पत्तिर् अपि सामान्य-निमित्त-प्रयुक्ता तत्-काल-भावि-निमित्त-प्रयुक्ता वा स्यात्। तत्र ये केचनार्थ-निरूपण-प्रवणाः प्रमात्र्-अभिप्रायास् ते सर्वेऽप्य् आद्ये नय-चतुष्टयेऽन्तर्-भवन्ति। तत्रापि ये परस्पर-विशकलितौ सामान्य-विशेषाव् इच्छन्ति तत्-समुदाय-रूपो नैगमः। ये पुनः केवलं सामान्यं वाञ्छन्ति तत्-समूह-सम्पाद्यः सङ्ग्रहः। ये पुनर् अनपेक्षित-शास्त्रीय-सामान्य-विशेषं लोक-व्यवहारम् अवतरन्तं घटादिकं पदार्थम् अभिप्रयन्ति तन्-निचय-जन्यो व्यवहारः। ये तु क्षण-क्षयिणः परमाणु-लक्षणा विशेषाः सत्या इति मन्यन्ते तत्-सङ्घात-घटित ऋजुसूत्र इति। तथा ये रूढितः शब्दानां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति तन्-निवह-साध्यः शब्द इति। ये तु व्युत्पत्तितो ध्वनीनां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति नान्यथा तद्-वार-जन्यः समभिरूढ इति। ये तु वर्तमान-काल-भावि-व्युत्पत्ति-निमित्तम् अधिकृत्य शब्दाः प्रवर्तन्ते नान्यथेति मन्यन्ते तत्-सङ्घ-घटितः खल्व् एवम्भूत इति। तद् एवं न कश्चिद् विकल्पोऽस्ति वस्तु-गोचरो योऽत्र नय-सप्तके नान्तर्-यातीति सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका एते इति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।१४] साम्प्रतम् एषाम् एव प्रत्येकं मतम् उपवर्णयामः। तत्र गमनं गमः परिच्छेद इत्य् अर्थः। निश्चितो गमो निगमो विविक्त-वस्तु-ग्रहणं, स एव, प्रज्ञादेर् आकृति-गणतया स्वार्थिकाण्-प्रत्यय-विधानान् नैगमः। यदि वा निगम्यन्ते नियतं परिच्छिद्यन्त इति निगमा अर्थास् तेषु भवो योऽभिप्रायो नियत-परिच्छेद-रूपः स नैगम इति। अयं हि सत्ता-लक्षणं महा-सामान्यम् अवान्तर-सामान्यानि च द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्वादीनि तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारण-रूप-लक्षणान् अवान्तर-विशेषांश् चापेक्षया पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमान् सामान्याद् अत्यन्त-विनिर्लुठित-स्वरूपान् अभिप्रैति। तथा हि॒ किल संविन्-निष्ठाः पदार्थ-व्यवस्थितयो, न च सामान्य-ग्राहिणि विज्ञाने विशेषावभासोऽस्त्य्,ऽनुवर्तमानैकाकार-परामर्शेन तद्-ग्रहणाद्, अन्यथा सामान्य-ग्राहकत्वायोगात्। नापि विशेष-ग्रहण-दक्षे संवेदने सामान्यं चकास्ति, विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-पदार्थ-ग्राहितया तत्-प्रवृत्तेर्, अन्यथा विशेष-संवेदनत्वायोगात्। न चैतौ परस्पर-विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुम् युक्ताव्, अतिप्रसङ्गाद्, विभिन्न-प्रतिभासिनाम् अपि निखिलार्थात्मनाम् ऐक्य-प्राप्तेः। एवं च प्रमाणयति॒ परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ, पार्थक्येनोपलब्धेर्, इह यद् यत् पार्थक्येनोपलभ्यते तत् तत् परस्पर-विश्लिष्टं द्रव्यं, तद् यथा -- देवदत्त-यज्ञदत्ताव् इति, पार्थक्येन चोपलभ्येते सामान्य-विशेषाव्, अतः परस्पर-विभिन्नाव् इति। न सामान्यात् पृथग् विशेषोपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम्। सामान्य-व्याप्तस्येति चेन्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः, सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात्॑ ततश् च तेन बोधेन विविक्त-विशेष-ग्रहणाभावात् तद्-वाचकं ध्वनिं तत्-साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता॑ न चैतद् अस्ति, विशेषाभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्ति-दर्शनात्। तस्माद् विशेषम् अभिलषता तत्र च व्यवहारं प्रवर्तयता तद्-ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा सामान्यम् अपि विविक्ताकारतया स्व-ग्राहिणि ज्ञाने यदि न प्रकाशेत, तदा तद्-गोचराभिमत-संवेदनेन विशेषस्याप्य् आकलनात् सामान्याभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्तेर् उच्छेदस् तथैव वक्तव्यो, विविक्त-सामान्य-ग्राहि-बोध-मूलकत्वात् तयोस्, तद्-अनिष्टौ तयोर् अप्य् अभावापत्तेः। न च सामान्यं विशेषं वा तिरस्-कृत्य केवलस्य विशेषस्य सामान्यस्य वाभ्युपगमः कर्तुं युक्तो, द्वयोर् अपि स्व-ग्राहि-ज्ञाने प्रतिभासमानतया विशेषाभावात्। तस्माद् एतौ द्वाव् अपीतरेतर-विशकलिताव् अङ्गी-करणार्हाव् इति नैगमः।
[न्या०अ०२९।१५] अधुना सङ्ग्रहाभिप्रायो वर्ण्यते। तत्र सङ्गृह्णात्य् अशेष-विशेष-तिरो-धान-द्वारेण सामान्य-रूपतया जगद् आदत्त इति सङ्ग्रहः। अयं हि मन्यते॒ भाव-लक्षण-सामान्याद् व्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा विशेषाः परिकल्प्येरन्न्, अव्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा, गत्य्-अन्तराभावात्। तत्र यद्य् आद्यः पक्षस्, तदा निःस्वभावतां ते स्वी-कुर्युर्, भाव-व्यतिरेकित्वाद्, गगन-कुसुमादिवत्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तर्हि भाव-मात्रम् आपद्यन्ते। तथा हि॒ भाव-मात्रं विशेषास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वाद्, इह यद् यतोऽव्यतिरिक्तं तत् तद् एव भवति, तद् यथा -- भावस्यैव स्वरूपम्, अव्यतिरेकिणश् च विशेषा, अतस् तद्-रूपा एव। ननु च यदि भाव-मात्रम् एव तत्त्वं तदा तस्य सर्वत्राविशेषाद् य एते प्रतिप्राणि-प्रसिद्धाः स्तम्भेभ-कुम्भाम्भो-रूहादि-विशिष्ट-वस्तु-साध्या व्यवहारास् ते सर्वेऽपि प्रलयम् आपद्येरन्न्, अतो विशेषा अपि विविक्त-व्यवहार-हेतवोऽभ्युपगन्तव्याः। नैतद् अस्ति, व्यवहारस्यानाद्य्-अविद्या-बल-प्रवर्तितत्वात्, तेन पारामर्थिक-प्रमाण-प्रतिष्ठित-तत्त्व-प्रतिबन्धाभावात्। किं च, विशेषाग्रहो विशेषेण त्याज्यो, विशेष-व्यवस्थापक-प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ भेद-रूपा विशेषाः, न च किञ्चित् प्रमाणं भेदम् अवगाहते, प्रत्यक्षं हि तावद् भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षत्-कर्तुं युक्तम्, नाभावं, तस्य सकल-शक्ति-विरह-रूपतया तद्-उत्पादने व्यापाराभावाद्, अनुत्पादकस्य च साक्षात्-करणे सर्व-साक्षात्-करण-प्रसङ्गात्, तथा च विशेषाभावात् सर्वो द्रष्टासर्व-दर्शीस्यात्। अनिष्टम् चैतद् भवतां, तस्माद् भाव-ग्राहकम् एव तद् एष्टव्यम्। स च भावः सर्वत्राविशिष्ट इति तथैव तेन ग्राह्यस्, तद्-उत्तर-काल-भावी पुनर् विकल्पो घटोऽयं पटादिर् न भवतीत्य् एवम्-आकारो व्यवहारं रचयन्न् अविद्या-मूलत्वान् न प्रमाणं, तन् न प्रत्यक्षाद् विशेषावगतिः। नाप्य् अनुमानादेः, प्रत्यक्ष-मूलकत्वाच् छेष-प्रमाण-वर्गस्य, तस्मात् सामान्यम् एव परमार्थो, न विशेषा इति सङ्ग्रहः।
[न्या०अ०२९।१६] साम्प्रतं व्यवहार-मतम् उच्यते। तत्र व्यवहरणं व्यवह्रियते वानेन लौकिकैर् अभिप्रायेणेति व्यवहारः। अयं तु मन्यते॒ यथा लोक-ग्राहम् एव वस्त्व् अस्तु, किम् अनयादृष्टाव्यवह्रियमान-वस्तु-परिकल्पन-कष्ट-पिष्टिकया? यद् एव च लोक-व्यवहार-पथम् अवतरति तस्यानुग्राहकं प्रमाणम् उपलभ्यते, नेतरस्य, न हि सामान्यम् अनादि-निधनम् एकं सङ्ग्राहाभिमतं प्रमाण-भूमिस्, तथानुभवाभावात्, सर्वस्य सर्व-दर्शित्व-प्रसङ्गाच् च। नापि विशेषाः परमाणु-लक्षणाः क्षण-क्षयिणः प्रमाण-गोचरस्, तथा प्रवृत्तेर् अभावात्। तस्माद् इदम् एव निखिल-लोकाबाधितं प्रमाण-प्रसिद्धं कियत्-काल-भावि-स्थूरताम् आबिभ्राणम् उदकाहरणाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमं घटादिकं वस्तु-रूपं पारमार्थिकम् अस्तु, पूर्वोत्तर-काल-भावि-तत्-पर्याय-पर्यालोचना पुनर् अज्यायसी, तत्र प्रमाण-प्रसराभावात्, प्रमाणम् अन्तरेण च विचारस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्। अवस्तुत्वाच् च तेषां, किं तद्-गोचर-पर्यालोचनेन? तथा हि॒ पूर्वोत्तर-काल-भाविनो द्रव्य-विवर्ताः क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणा वा विशेषा न कञ्चन लोक-व्यवहारम् उपरचयन्ति, तन् न ते वस्तु-रूपा, लोक-व्यवहारोपयोगिनां एव वस्तुत्वाद् इति व्यवहारः।
[न्या०अ०२९।१७] साम्प्रतं ऋजुसूत्राभिप्रायः कथ्यते। तत्र र्जु प्रगुणम् अकुटिलम् अतीतानगत-वक्र-परित्यागाद् वर्तमान-क्षण-विवर्ति-वस्तुनो रूपं सूत्रयति निष्टङ्कितं दर्शयतीत्य् ऋजुसूत्रः। तथा ह्य्॒ अस्याभिप्रायो --ऽतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्म-लाभत्वात् खर-विषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया सकल-शक्ति-विरह-रूपत्वान् नार्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमत्वम्, अर्थ-क्रिया-क्षमं च वस्तु॑ तद्-अभावान् न तयोर् वस्तुत्वम् इति। वर्तमान-क्षणालिङ्गितं च पुनर् वस्तु-रूपं समस्तार्थ-क्रियासु व्याप्रियत इति तद् एव पारमार्थिकम्। तद् अपि च निरंशम् अभ्युपगन्तव्यम्, अंश-व्याप्तेर् युक्ति-रिक्तत्वाद्, एकस्यानेक-स्वभावताम् अन्तरेणानेक-स्वावयव-व्यापनायोगात्। अनेक-स्वभावतैवास्त्व् इति चेन्, न, विरोध-व्याघ्राघ्रातत्वात्। तथा हि॒ यद्य् एकः स्वभावः कथम् अनेकः? अनेकश् चेत् कथम् एकः? एकानेकयोः परस्पर-परिहारेणावस्थानात्॑ तस्मात् स्वरूप-निमग्नाः परमाणव एव परस्परोपसर्पण-द्वारेण कथञ्चिन् निचय-रूपताम् आपन्ना निखिल-कार्येषु व्यापार-भाज इति त एव स्वलक्षणं, न स्थूरतां धारयत् पारमार्थिकं इति। किं च, प्रमाणतोऽर्थ-व्यवस्था, न च प्रमाणं देश-काल-व्याप्ति-ग्रहणे किञ्चन प्रवर्तते, सर्व-प्रमाणानां वर्तमान-प्रकाश-रूपत्वात्। तथा हि॒ प्रत्यक्षं तावद् रूपालोक-मनस्कार-चक्षुर्-लक्षण-कारण-चतुष्टयाल् लब्ध-सत्ताकं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशते, अतीत-वर्त्स्यत्-क्षणयोर् असन्निहितत्वात्, ततश् च तत् तत्-काल-सम्बद्धम् एव वस्तुनो रूपं साक्षात्-कर्तुं क्षमते न पूर्वम् अपरं वासन्निधानाद् एव। यदि पुनर् विनष्टम् अपि पूर्व-क्षण-वर्ति-रूपमाकलयेत्, तदा विनष्टत्वाविशेषान् निरवधिः क्षण-परम्परा तत्र प्रतीयेत, तथा च सति सङ्कलिकयानादि-जन्म-परम्परा-ग्राहि प्रत्यक्षम् अनुषज्येत। एवम् अनागत-क्षण-ग्रहणेऽपि योज्यम्॑ अनिष्टं चैतत्, तस्मात् तद् वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-दक्षम् एवेत्य् अभ्युपगन्तव्यम्। ननु च यदि क्षण-भङ्गुरताम् अर्थात्मनाम् अध्यक्षम् अवलोकयति, तदा नीलतेव प्रतिभासमाना सा विप्रतिपत्ति-गोचरं न यायाद् इति तद्-विषयो लौकिकानां व्यवहारः प्रवर्तेत, न चैतद् अस्ति, स्थिरता-द्वारेण व्यवहार-प्रवृत्तेर् इति। अत्र प्रतिविधीयते -- साक्षात्-कुर्वाणा अपि क्षण-विनश्वरतां सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्ध-बुद्धयो मन्दा नाध्यवस्यन्त्य्, अनादि-काल-प्ररूढ-वासना-प्रबोध-समुपजनित-मिथ्या-विकल्प-सामर्थ्याच् च विपर्यस्त-स्थिरता-व्यवहारं प्रवर्तयन्ति, तन् नायम् अध्यक्षस्यापराधो,ऽपि तु प्रमात्ःणाम् एव। तथा घनाकारोऽपि प्रत्यक्ष-पृष्ठ-भावि-मिथ्या-विकल्प-सन्दर्शित एव, विविक्त-दर्शने तत्-प्रतिभासायोगात्, कर-चरण-शिरो-ग्रीवादयो ह्य् अवयवाः परस्पर-विभक्ता एव तत्र प्रतिभान्ति, न व्याप्य्-आकारो, न च तेऽपि स्वांश-व्यापिनः प्रतिभान्ति, तद्-अवयवानाम् अपीतरेतर-विशकलित-रूपाणां प्रतिभासात् तावद् यावत् परमाणव एव प्रथन्ते, व्यापि-रूपस्य विचाराक्षमत्वाद् इत्य् उक्त-प्रायम्। नाप्य् अनुमानात् स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिः, प्रत्यक्ष-परिगृहीतं हि सम्बन्धम् आसाद्यानुमानं प्रवर्तेत, यदा च तत् क्षण-भङ्गुर-विविक्तांश-ग्रहण-चातुर्यम् आबिभ्रद् दर्शितं तदानुमानम् अपि तत्-प्रतिबन्ध-मूलकं तद्-गोचरम् एव पारम्पर्येण प्रतिष्ठापयति, स्व-प्रतिभासिनो रूपस्यालीकतया तत्-प्रतिष्ठापन-द्वारेणैव तस्य प्रामाण्यात्। ननु च स्मरण-प्रत्यभिज्ञानादीनि स्थिर-स्थूर-वस्तु-व्यतिरेकेण नोपपद्यन्ते, पूर्वम् अदृष्टे तद्-अभावात्, पुरुषाद्य्-अवयविनां स्मरणात् प्रत्यभिज्ञानाच् च। नैतद् अस्ति, तेषाम् अलीक-वासना-प्रबोधोत्थापितत्वेन प्रामाण्यायोगात्। किं च, तान्य् अपि स्वयं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशन्ते, विप्लव-वशात् तु स्वरूपम् एव वासना-सम्पादितातीतार्थ-रूपतया व्यवस्यन्ति, घनाकारं च तस्यासन्तम् अध्यारोपयन्ति॑ तन् न तेभ्योऽपि व्यापि-वस्तु-सिद्धिः। तस्माद् व्यापिनि रूपे प्रमाणानवतारात् परस्पर-विश्लिष्टाः परमाणव एव परमार्थत इति र्जुसूत्रः।
[न्या०अ०२९।१८] तद् इदम् अर्थ-स्वरूप-निरूपण-निपुणानां नयानां मतम् उपवर्णितम्॑ अधुना शब्द-विचार-चतुराणाम् उपवर्ण्यते। तत्र त्रयाणाम् अपि शब्दादीनाम् इदं साधारणमाकूतं, यद् उत शब्द एव परमार्थो नार्थस्, तस्य तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्। पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धेः कथम् अव्यतिरेक इति चेत्, प्रमाणाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ न व्यतिरिक्तोऽर्थः शब्दात्, तत्-प्रतीतौ तस्य प्रतीयमानत्वाद्, इह यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तं भवति, तद् यथा -- शब्दे प्रतीयमाने तस्यैव स्वरूपं, प्रतीयते च शब्दे प्रतीयमानेऽर्थो,ऽतोऽसौ ततोऽव्यतिरिक्त इति। अगृहीत-सङ्केतस्य घट-शब्द-श्रवणेऽपि घट-प्रतीतेर् अभावाद् व्यतिरिक्त इति चेद्, एवं तर्हि विषस्य मारणात्मकत्वं तद्-अज्ञस्य न प्रतिभातीति तत् ततो व्यतिरिक्तम् आपद्येत, न चैतद् अस्ति, तद्-व्यतिरेकाविशेषेण गुड-खण्डवद् विषस्याप्य् अमारकत्वापत्तेः, सम्बन्धस्य च व्यतिरिक्तेन सह प्राग् एवापास्तत्वात्॑ तन् नाबुद्ध-प्रमातृ-दोषेण वस्तुनोऽन्यथात्वम्, अन्यथान्धो रूपं नेक्षत इति तद्-अभावोऽपि प्रतिपत्तव्य इति। ये निरभिधाना वर्तन्तेऽर्थास् तेषां शब्दात् पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धिर् इति चेन्, न, निरभिधानार्थाभावात्, केवलं केचिद् विशेष-शब्दैः सङ्कीर्त्यन्ते, केचित् सामान्य-ध्वनिभिर् इत्य् एतावान् विशेषः स्यात्। यदि वा सकलार्थ-वाचका विशेष-धवनयो न सन्तीति नास्त्य् अत्र प्रमाणम्। ततश् च सर्वेऽर्था विद्यमान-स्व-वाचका,ऽर्थत्वाद्, घटार्थवद् इति प्रमाणात् सर्वेषां स्व-वाचकत्वेन पूर्वोक्त-युक्तेः शब्दाद् अपार्थक्य-सिद्धिः। तस्मान् न परमार्थतोऽर्थः शब्दातिरिक्तोऽस्त्य्, उपचारतः पुनर् लौकिकैर् अपर्यालोचित-परमार्थैर् व्यवह्रियते। असाव् अप्य् औपचारिकः शब्दात्मको वार्थः प्रतिक्षण-भङ्गुरः स्वी-कर्तव्यो, वर्णानां क्षण-ध्वंसिता-प्रतीतेर्, ऋजुसूत्र-प्रतिपादित-युक्ति-कलापाच् च।
[न्या०अ०२९।१९] साम्प्रतम् एतेषाम् एव प्रत्येकम् अभिप्रायः कथ्यते। तत्र शब्दो॒ रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिद् अर्थे प्रवर्तन्ते॑ यथेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः, तेषां सर्वेषाम् अप्य् एकम् अर्थम् अभिप्रैति किल प्रतीति-वशाद्, यथा शब्दाव्यतिरेकोऽर्थस्य प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वं वानेकत्वं वा प्रतिपादनीयं॑ न चेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थ-वाचितया कदाचन प्रतीयन्ते, तेभ्यः सर्वदैवैकाकार-परामर्शोत्पत्तेर्, अस्खलद्-वृत्तितया तथैव व्यवहार-दर्शनात्। तस्माद् एक एव पर्याय-शब्दानाम् अर्थ इति शब्दः, शब्द्यत आहूयतेऽनेनाभिप्रायेणार्थ इति निरुक्ताद् एकार्थ-प्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्याय-ध्वनीनां प्रयोगाद् इति।
[न्या०अ०२९।२०] साम्प्रतं समभिरूढ-मतम् उपवर्ण्यते। तत्र सम् एकी-भावेनाभिरोहति व्युत्पत्ति-निमित्तम् आस्कन्दति शब्द-प्रवृत्तौ योऽभिप्रायः स समभिरूढः। अयं हि पर्याय-शब्दानां प्रतिविभक्तम् एवार्थम् अभिमन्यते, तद् यथेन्दनाद् इन्द्रः, परमैश्वर्यम् इन्द्र-शब्द-वाच्यं परमार्थतस्, तद्वत्य् अर्थे पुनर् उपचारतः प्रवर्तते, न वा कश्चित् तद्वान्, सर्व-शब्दानां परस्पर-विभक्तार्थ-प्रतिपादकतयाश्रयाश्रयि-भावेन प्रवृत्त्य्-असिद्धेः। एवं शकनाच् छक्रः, पूर्-दारणात् पुरन्दर इत्य्-आदि भिन्नार्थत्वं सर्व-शब्दानां दर्शयति॑ प्रमाणयति च॒ पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थाः, प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकत्वाद्, इह ये ये प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकास् ते ते भिन्नार्थाः, यथेन्द्र-घट-पुरुष-शब्दा विभिन्नार्था, विभिन्न-व्युत्पत्ति-निमित्तकाश् च पर्याय-शब्दा अप्य्, अतोऽभिन्नार्था इति। यत् पुनर् अविचारित-प्रतीति-बलाद् एकार्थाभिधायकत्वं प्रतिपाद्यते तद् अयुक्तम्, अतिप्रसङ्गात्। तथा हि॒ यदि युक्ति-रिक्ता प्रतीतिर् एव शरणी-क्रियते तदा मन्द-मन्द-प्रकाशे दवीयसि देशे सन्निविष्ट-शरीरा विभिन्ना अपि निम्ब-कदम्बाश्वत्थ-कपित्थादय एक-तर्व्-आकारताम् आबिभ्राणाः प्रतीयन्त इत्य् एकतयैवाभ्युपगन्तव्याः। न चैतद् अस्ति, विविक्त-तत्-स्वरूप-ग्राहि-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वेन पूर्व-प्रतीतेर् विविक्तानाम् एव तेषाम् अभ्युपगमात्, तन् नैकार्थ-वाचिनो ध्वनयः सन्ति, रूढिः पुनर् अविचारित-तद्-अर्थानाम् इति समभिरूढः।
[न्या०अ०२९।२१] साम्प्रतम् एवम्भूताभिप्रायः प्रतिपाद्यते। तत्रैवं-शब्दः प्रकार-वचनस्, ततश् चैवं यथा व्युत्पादितस् तं प्रकारं भूतः प्राप्तो यः शब्दः स एवम्भूतः॑ तत्-समर्थन-प्रधानोऽभिप्रायोऽप्य् एवम्भूतस्, तद्-विषयत्वात्, विषय-शब्देन च विषयिणोऽभिधानात्। अयं हि यस्मिन्न् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्ति-निमित्तम् अर्थो यदैव विवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानम् अभिप्रैति, न सामान्येन। यथोदकाद्य्-आहरण-वेलायां योषिद्-आदि-मस्तकारूढो विशिष्ट-चेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते, न शेषो, घट-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्त-शून्यत्वात्, पटादिवद् इति। अतीतां भाविनीं वा चेष्टाम् अधिकृत्य सामान्येनैवोच्यत इति चेन्, न, तयोर् विनष्टानुत्पन्नतया शश-विषाण-कल्पत्वात्॑ तथापि तद्-द्वारेण शब्द-प्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्तयितव्यो, विशेषाभावात्। किं च, यद्य् अतीत-वर्त्स्यच्-चेष्टापेक्षया घट-शब्दोऽचेष्टावत्य् अपि प्रयुज्येत, कपाल-मृत्-पिण्डादाव् अपि तत्-प्रवर्तनं दुर्निवारं स्यात्, विशेषाभावात्, तस्माद् यत्र क्षणे व्युत्पत्ति-निमित्तम् अविकलम् अस्ति तस्मिन्न् एव सोऽर्थस् तच्-छब्देन वाच्य इत्य् एवम्भूतः।
[न्या०अ०२९।२२] तद् एवम् अनेक-धर्म-परीतार्थ-ग्राहिका बुद्धिः प्रमाणं, तद्-द्वारायातः पुनर् एक-धर्म-निष्ठार्थ-समर्थन-प्रवणः परामर्शः शेष-धर्म-स्वी-कार-तिरस्-कार-परिहार-द्वारेण वर्तमानो नयः, स च धर्माणाम् आनन्त्याद् अनन्त-भेदस्, तथापि सर्व-सङ्ग्राहकाभिप्राय-परिकल्पन-मुखेनैवं सप्त-भेदो दर्शितः। अयम् एव च स्वाभिप्रेत-धर्मावधारणात्मकतयाशेष-धर्म-तिरस्-कार-द्वारेण प्रवर्तमाणः परामर्शो दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते॑ तद्-बल-प्रभावित-सत्ताका हि खल्व् एते पर-प्रवादाः। तथा हि॒ नैगम-नय-दर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। सङ्ग्रहाभिप्राय-प्रवृत्ताः सर्वेऽप्य् अद्वैत-वादाः सांख्य-दर्शनं च। व्यवहार-नयानुपाति प्रायश् चार्वाक-दर्शनम्। ऋजुसूत्राकूत-प्रवृत्त-बुद्धयस् ताथागताः। शब्दादि-नय-मतावलम्बिनो वैयाकरणादय इति। अथेत्थम् अभिदधीथा, यथा॒ कथम् एतेऽवधारण-द्वारेण स्वकम् अर्थं समर्थयन्तस् तद्-विपरीतं निराकुर्वाणा दुर्नयतां प्रतिपद्यन्त इत्य्, अत्रोच्यते -- एवं प्रवृत्तौ निर्गोचरत्वान्, निर्गोचरस्य नयत्वायोगात्। तथा हि॒ नयति केनचिद् अंशेन विशिष्टम् अर्थं प्रापयति योऽभिप्रायः स नयः, स्वाभिप्रेत-धर्माच् छेष-धर्म-प्रतिक्षेप-द्वारेण तु प्रवृत्तो न किञ्चिन् नयत्य्, एक-धर्मालिङ्गितस्य वस्तुनोऽसम्भवाद्, बहिर् अन्तश् चानेक-धर्म-परिकरित-स्वभावस्य तस्य प्रतिभासात्, तद्-अपह्नव-कारिणां कदभिप्रायाणां प्रतिभास-बाधितत्वेनालीकत्वात्।
[न्या०अ०२९।२३] तथा हि॒ यः तावन् नैगम-नयः परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ प्रत्यपीपदत्, तद् अयुक्तम्। तयोस् तथा कदाचन प्रतिभासाभावात्। यच् चोक्तम्॒ अनुवर्तमानैकाकार-परामर्श-ग्राह्यं सामान्यं यत्र न तत्र विशेष-प्रतिभासो, यत्र च विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-बोध-निर्ग्राह्यो विशेषो न तत्र सामान्यावगतिस्, तद्-वचन-मात्रम् एव, धव-खदिर-पलाशादि-समस्त-विशेषापसारणे वृक्षत्वादि-सामान्य-प्रतिभासाभावात्। दूराद् विशेषाग्रहणेऽपि केवलं तच् चकास्तीति चेन्, न, तत्राप्य् अभ्यन्तरी-भूत-विशेष-प्रतिभासात्, तद्-विरहे शश-विषाण-रूपत्वात्। एवं विशेषा अपि न सामान्याद् अत्यन्त-व्यतिरेकिणः प्रतिभान्ति, तन्-निमग्नानाम् एव तेषां ग्रहणाद्, इतरथा सत्तातोऽतिरिच्यमाना भावा निःस्वभावताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। तथा वृक्षत्वादि-सामान्येभ्योऽपि भेदिनो वृक्षादयो न स्युस्, तद्-अभेद-निबन्धनत्वात् तत्-स्वरूप-स्थितेः। तस्मात् तद् एव संवेदनम् उपसर्जनी-कृत-वैषम्यं प्रधानी-कृतैकाकारं सामान्यं गृह्णातीत्य् उच्यते, न्यक्-कृत-समत्वम् उत्कलित-नानात्वं पुनर् विशेष-ग्रहीति, समत्व-नानात्वयोः कथञ्चिद् भेदाभेदिनोः परस्परं सर्वार्थेषु भावात्, तद्-अभावे तथा-विध-प्रतिभासानुपपत्तेः। एतेन यद् अवादि "न चैतौ विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुं युक्ताव्" इत्य्-आदि, तद् अपास्तम् अवगन्तव्यं, विभिन्नयोः प्रतिभासाभावात्। व्यवहारोऽपि सर्वः प्रधानोपसर्जन-द्वारेण कथञ्चिद् इतरेतराविनिर्लुठित-सामान्य-विशेष-साध्य एव॑ न हि सामान्यं दोह-वाहादि-क्रियायाम् उपयुज्यते, विशेषाणाम् एव तत्रोपयोगान्, नापि विशेषा एव तत्-कारिणः, गोत्व-शून्यानां तेषां वृक्षाद्य्-अविशिष्टतया तत्-करण-सामर्थ्याभावात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेके सामान्य-विशेषयोर् वृक्षं छिन्धीति चोदितः किम् इति तद्-विशेषे पलाशादौछेदं विधत्ते? तत्र तस्य समवायाद् इति चेन्, न, समवाय-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, भावेऽपि विश्लिष्टयोर् अभेद-बुद्ध्य्-उत्पादनाक्षमत्वात्, तस्यापि व्यतिरिक्ततया पदार्थान्तराविशेषान् नित्यत्वैकत्व-सर्व-गतत्वादिभिश् च सर्वत्र तत्-करण-प्रसङ्गाच् च। यत् पुनर् अवादीर्, यद् उत॒ यदि सामान्यं विशेष-निष्ठं, विशेषो वा सामान्य-व्याप्तः समुपलभ्येत, ततो विविक्तयोस् तयोः क्वचिद् अनुपलम्भाद् योऽयं विविक्तेषु सामान्येषु विशेषेषु चाभिधानार्थ-क्रिया-लक्षणो व्यवहारः स समस्तः प्रलयं यायाल्, लोली-भावेन तद्-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, तद् अप्य् असमीचीनं, यतो यद्य् अपि परस्पराविविक्तयोः सामान्य-विशेषयोः सर्वत्रोपलम्भस्, तथापि यत्रैव प्रमातुर् अर्थित्वं तद् एव सामान्यं, विशेषान् वा प्रधानी-कृत्य तद्-गोचरं ध्वनिम् अर्थ-क्रियां वा प्रवर्तयतीतरस्याप्य् उपसर्जन-भावेन तत्र व्यापारात्, तद्-विकलस्येतरस्यापि शश-विशाणायमानतया क्वचिद् अनुपयोगात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेकिणि विशेषेभ्यः सामान्ये वृत्ति-विकल्पोपलम्भ-नूतन-विशेष-सम्बन्धादि-द्वारेण दूषण-मुद्गर-कदम्बकं मूर्धनि पतद् दुर्विषहं स्यात्। तथा हि॒ तत् तेषु कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वा? सामस्त्य-पक्षे प्रतिविशेषं परिसमाप्ततया सामान्य-बहुत्व-प्रसङ्गो,ऽनिष्टं चैतद्, एकत्वाभुपगम-क्षतेः। एकदेशेन वर्तने पुनर् यावन्तो विशेषास् तावन्तस् तद्-अंशाः प्रसजन्ति, न चैतद् अस्ति, सामान्यस्य निरवयवत्वात्॑ सावयवत्वेऽपि पुनस् तेऽभिन्ना भिन्ना वा। यद्य् अभिन्ना विशेषास्, तर्ह्य् अभेदिनः किं नेष्यन्ते, विशेषाभावात्। भेद-पक्षे पुनस् तेष्व् अपि तत् कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वेति? तद् एव चोद्यम् अलब्ध-परिनिष्ठम् अवतरति, तन् नात्यन्त-भेदिनो वृत्तिः सम्भवति। किं च, यद्य् एकं सामान्यं भेदवत् समस्त-विशेषेषु वर्तेत, तदैक-विशेषोपलम्भ-काले तद् उपलम्भ्यते न वा? यद्य् आद्यः पक्षस्, तस्यैकतया सर्वत्रोपलम्भात्, व्याप्य-ग्रहणाभावे व्यापक-ग्रहणासिद्धेर्, निखिल-तद्-व्याप्य-विशेष-ग्रहणम् आसज्येत, न चैतद् अस्ति, पुरो-वर्ति-विशेषस्यैव साक्षात्-करणाच्, छेष-विशेषाणाम् असन्निधानात्॑ सन्निहित-विशेष-निष्ठम् एव तद् उपलभ्यते। तस्यैव तद्-व्यञ्जकत्वाद्, इतरेषां तद्-अभावाद् इति चेन् नैक-स्वभावस्य खण्डशो व्यञ्जनायोगात् सन्निहित-विशेष-व्यञ्जितम् एव तत् सर्वत्र स्वभावान्तराभावात् सर्व-विशेष-गतं च तद्-रूपम्, अतस् तद्-दर्शनं केन वार्येत। अथ द्वितीयः कल्पस्, तथा सति यथैक-विशेषोपलम्भ-समये नोपलभ्यते, तथा शेष-विशेषोपलम्भ-कालेऽपि नोपलभ्येत, विशेषाभावात्। अतस् तद्-अभाव एवोक्तः स्यात्, केवलस्योपलम्भाभावात्। उपलम्भेऽपि स्व-स्वभाव-स्थितेर् विशेष-रूपतापत्तिः। तथा चिरन्तन-विशेष-व्यवस्थित-सत्ताकं तन् नूतन-विशेषोत्पादे सति कथं तेन सह सम्बन्धम् अनुभवेत्? न तावद् विशेषान्तरेभ्यस् तद् उत्पित्सु-विशेष-देशं गन्तुम् अर्हति, निष्क्रियत्वात्। नापि तत्रैवाभवद्, विशेषोत्पादात् प्राक् तद्-देशे तद्-उपलम्भाभावात्। नापि विशेषेणैव सहोत्पद्यते, नित्यत्वान्, नित्यस्य चोत्पत्ति-विरोधात्। अथैतद्-दोष-परिजिहीर्षया तत् सक्रियाकम् अभिधीयेत, तथापि पूर्व-व्यक्ति-त्यागेन वा नूतन-विशेष-देशम् आक्रामेत्, तद्-अभावेन वा? न तावद् अद्यः पक्षश्, चिरन्तन-व्यक्तीनां सामान्य-विकलतया तत्-सम्बन्ध-साध्य-बुद्धि-ध्वनि-विरह-प्रसङ्गात्। न चैतद् अस्त्य्, अपरापर-विशेषोत्पादेऽपि प्राचीन-व्यक्तिषु तद्-दर्शनात्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तद् अप्य् असम्बद्धं, निरवयवस्य पूर्व-व्यक्ति-त्याग-वैकल्ये सत्य् उत्पित्सु-व्यक्तिं प्रतिगमनाभावात्। सावयव-पक्षस्य पुनः प्राग् एवापास्तत्वान्, नैतद्-अभ्युपगम-द्वारेण परिहारः श्रेयान्। अन्यच् च॒ व्यतिरिक्त-सामान्य-सम्बन्धाद् यदि भावाः समाना, न स्वरूपेण, तदा सत्त्व-सम्बन्धात् प्राग् भावाः सन्तोऽसन्तो वा। सन्तश् चेद् अपार्थकः सत्ता-सम्बन्धो,ऽन्यथानवस्था प्रसज्येत, पुनः-सत्तान्तर-सम्बन्धानिवारणात्। असन्तश् चेद् अत्यन्तासताम् अपि गगनारविन्दादीनां सत्ता-सम्बन्धाद् भाव-रूपतापद्येत। एवं द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्व-गोत्वादि-सामान्येष्व् अपि समस्तम् एतद् वाच्यम्, एक-योग-क्षेमत्वात्, तन् न परस्परम् अत्यन्त-व्यतिरेकिणौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चन घटाम् आटीकेते। अत एव तत्-समर्थन-प्रवणस् तत्-तादात्म्य-प्रतिक्षेपकोऽभिप्रायो निरालम्बनत्वान् नैगम-दुर्नय-व्यपदेशम् आस्कन्दति, तादात्म्योपेक्षयैव सामान्य-विशेष-व्यतिरेक-समर्थकस्य नैगम-नयत्वाद्, व्यतिरेकिणोर् अपि तयोर् वस्तुनि कथञ्चिद् भावाद्, इतरथा विवक्षयापि तथा दर्शयितुम् अशक्यत्वात्, प्रधानोपसर्जन-भावस्य द्वय-निष्ठत्वात्, अत्यन्त-तादात्म्ये तत्-कारिण्या विवक्षाया अपि निर्गोचरता-प्रसङ्गात्। तस्मात् कथञ्चिद् भेदाभेदिनाव् एवैतौ, तद्-अन्यतर-समर्थकः पुनर् निरालम्बनत्वाद् दुर्नयतां स्वी-करोतीति स्थितम्।
[न्या०अ०२९।२४] तथा सङ्ग्रहोऽप्य् अशेष-विशेष-प्रतिक्षेप-मुखेन सामान्यम् एकं समर्थयमानो दुर्नयः, तद्-उपेक्षा-द्वारेणैव तस्य नयत्वात्, विशेष-विकलस्य सामान्यस्यासम्भवात्। तथा हि॒ यत् तावद् उक्तं -- यद् उत "विशेषाः सामान्याद् व्यतिरेकिणोऽव्यतिरेकिणो वा। व्यतिरेक-पक्षे निःस्वभावत्वं, निःसत्ताकत्वात्। अव्यतिरेक-पक्षे भाव-मात्रं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवद्" इति -- तद् अयुक्तं, विशेष-वादिनोऽप्य् एवं-विध-विकल्प-सम्भवात्। तथा हि॒ विशेषेभ्यः सामान्यं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा। व्यतिरिक्तं चेन्, न तर्हि सामान्यं, स्व-स्वरूप-व्यवस्थिततया विशेष-रूपत्वात्। अव्यतिरिक्तं चेत्, तथापि न सामान्यं, विशेषाव्यतिरिक्तत्वाद् एव तत्-स्वरूपवत्। यद् अप्य् अवाद्य् -- "अनाद्य्-अविद्या-बल-प्रवृत्तो विशेष-व्यवहारस्, तात्त्विकं सामान्यं" -- तद् अपि वचन-मात्रम् एव, युक्ति-रिक्तत्वात्, सामान्यम् एवानाद्य्-अविद्या-दर्शितं, विशेषाः पुनः पारमार्थिका इति विशेष-वादिनोऽपि वदतो वक्त्र-भङ्गाभावात्। यत् पुनर् विशेष-ग्राहक-प्रमाणाभावं प्रतिपादयताभ्यधायि, यद् उत "प्रत्यक्षं भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षात्-करोति नाभावं, तस्यानुत्पादकत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्ततरं, यतः केनेदं भवतोऽत्यन्त-सुहृदा निवेदितं॒ "भाव एव केवलः प्रत्यक्षम् उत्थापयति, न पुनर् अभावोऽपि" [इति]? अभाव-व्यापाराभाव-प्रतिपादक-युक्ति-कलापेनेति चेद् मुग्ध-विप्रतारितोऽसि, तद्-व्यापाराभावासिद्धेः, सद्-असद्-रूप-वस्तुनः समस्त-क्रियासु व्यापाराद्, भाव-तादात्म्येन व्यवस्थितस्याभावस्य व्यापारे विरोधाभावात्। कथं भावाभावयोस् तादात्म्यं, विरोधाद्? इति चेन्, न, प्रमाण-प्रसिद्धे विरोधाभावात्। तथा हि॒ घटादिकः पदार्थात्मा स्वरूपेण सन्, न पटादि-रूपेणापीति भावाभावात्मकः। यदि पुनः कथञ्चिन् नाभावात्मकः स्यात्, तदा पटादि-रूपेणापि भावात् सर्वात्मकः प्राप्नोति। युक्तम् एतद्, अत एव भेद-प्रपञ्च-विलय-सिद्धिर् इति चेत्, स्याद् एवैतद्, यदि पटाद्य्-अभावैकान्ताच् छून्य-वादिनोऽपि मनो-रथ-पूरणं न स्यात्॑ तथा हि॒ पटादि-विविक्तो घटोऽनुभूयते, न च पटाद्य्-अभावो भावेन सह तादात्म्यम् अनुभवति, तस्माद् अभावात्मक एवायम्, एवं पटादयोऽपीतरेतरापेक्षयेति शून्यत्वापत्तिः। तस्मात् स्वरूपम् आबिभ्राणं पर-रूपेभ्यो व्यावृत्तम् एव वस्तु सर्व-क्रियासु व्याप्रियत इति भावाभावात्मकस्यैव व्यापारः, स्वरूप-धारणस्य भावत्वात्, पर-रूप-व्यावर्तनस्याभावत्वाद् इति। एवं स्व-गोचर-प्रत्यक्षोत्पादनेऽपि व्याप्रियते, ततश् च तद्-रूपम् एव तत् साक्षात्-कुर्याद् इति स्वरूप-नियते पर-रूपेभ्यो व्यावृत्त एव वस्तुनि प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तज्-जन्यत्वान्, न भाव-मात्रे, तस्य केवलस्य स्वरूपाव्यवस्थितेर् उत्पादकत्वायोगात्। न च जनकत्वाद् अर्थो ग्राह्यो जन्यत्वाद् वा ज्ञानं ग्राहकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् उक्तं, किं तर्ह्य् आवरण-विच्छेदादेर् लब्ध-सत्ताकं ग्रहण-परिणामाज् ज्ञानं गृह्णात्य्, अर्थस् तु सन्निधानादेर् गृह्यते, स चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूप एव प्रतीयत इति तथा-भूतोऽभ्युपगन्तव्यो, न केवल-सामान्य-रूप इति। सद्-असद्-अंशयोः कथम् एकत्रावस्थानम् इति चेत्, तादात्म्येनेति ब्रूमः। ननु तादात्म्ये भाव-मात्रम् अभाव-मात्रं वापद्येतेतरेतराव्यवतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्, तन् नोभय-रूप-वस्तु-सिद्धिः। नैतद् अस्ति, तादात्म्यस्य सम्बन्धत्वात्, सम्बन्धस्य च द्वय-निष्ठत्वात्, तद्-अभावे कस्य केन सम्बन्धो, निर्गोचरत्वात्? तस्माद् एतौ सद्-असद्-अंशौ धर्मि-रूपतयाभेदिनौ, वस्तुनः सद्-असद्-रूपस्यैकत्वाद्, धर्म-रूपतया पुनर् विवक्षितौ भेदम् अनुभवतः, स्वरूपेण भावात्, पर-रूपेण त्व् अभावाद् इति। तद् एवं प्रत्यक्षे विविक्त-वस्तु-ग्राहिणि सकल-प्रमाण-प्रष्ठे प्रसाधिते शेष-प्रमाणान्य् अपि तद्-अनुसारितया विविक्तम् एव स्व-गोचरं स्थापयन्तीति। तद्-अपलापी केवल-सामान्य-प्रतिष्ठापकः कद्-अभिप्रायः सङ्ग्रह-दुर्नय-व्यपदेशं स्वी-कुरुते, विशेषापेक्षयैव सामान्य-स्थापकस्य सङ्ग्रह-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२५] तथा व्यवहारोऽपि प्रमाण-प्रसिद्धं वस्तु-स्वरूपं निह्नुवानो युक्ति-रिक्तम् अविचारित-रमणीयं लोक-व्यवहार-मार्गानुसारि समर्थयमानो दुर्नयताम् आत्मनि निधत्ते, लोक-व्यवहार-प्रसाधकस्यापीतरानिष्टौ व्यवस्थानाभावात्। तथा हि॒ यद् इदं कियत्-काल-भावि स्थूरताम् आबिभ्राणं लोक-व्यवहार-कारि घटादिकं भवतस् तात्त्विकम् अभिप्रेतं तन् नाकस्मिकं, किं तर्हि नित्य-परमाणु-घटितम्, इतरथा निष्कारणत्वेन सर्वदा भावाभाव-प्रसङ्गात्। न ते परमाणवस् तथा प्रतिभान्तीति चेन्, नात एव तेषाम् अनुमानतः सिद्धिः। यदि पुनर् यद् एव साक्षान् न विशद-दर्शने चकास्ति तत् सकलम् अपलप्येत, हन्त बह्व् इदानीम् अपलपनीयं, घटादि-वस्तुनोऽप्य् अर्वाग्-भाग-वर्ति-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासान् मध्य-पर-भागादीनाम् अपलाप-प्रसङ्गात्, तथा च लोक-व्यवहार-कारितापि विशीर्येत, तावता तद्-असिद्धेः। अथात्रानुमान-बलेन व्यवहार-क्षम-सम्पूर्ण-वस्तुनः साधनम्, एवं तर्हि भूत-भावि-पर्याय-परमाणु-साधनम् अपि क्रियतां, विशेषाभावात्। तथा हि॒ यथा बाह्य-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासेऽपि सर्व-वस्तूनां तावता व्यवहाराभावान् मध्य-भागादि-साधनेन सम्पूर्णानि तत्-समर्थानि तानि साध्यन्ते, तथैव कियत्-काल-भावि-घनाकार-दर्शनेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-परमाणु-तादाद्म्य-व्यवस्थित-शरीराणि तानि साध्यन्तां, तद्-अभावेऽपि तेषाम् अनुपपत्तेः। तथा हि॒ व्यवहारावतारिणो दर्शन-योग्यस्याद्य-पर्यायस्य तावद् अतीत-पर्यायानभ्युपगमे निर्हेतुकत्वं, तत्र चोक्तो दोषः। तद्-उत्पादकानन्तर-पर्यायेष्टौ पुनस् तज्-जनक-पर्यायोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अनादि-पर्याय-परम्परा सिद्धिम् अध्यासीत। तथा व्यवहारावतारि-वस्तु-पर्यन्त-पर्यायस्य पर्यायान्तरानुत्पादकत्वे बलाद् अवस्तुत्वम् आढौकते, भवन्-नीतेर् एवार्थ-क्रिया-करण-वैकल्यात्। तद्-उत्पादकत्वे पुनर् असाव् अप्य् अपर-पर्यायोत्पादक इत्य् अनन्त-पर्याय-मालोपपद्यते। तथा घनाकारोऽपि विशद-दर्शनेन साक्षात्-क्रियमाणो निष्प्रदेश-पर्यन्तावयव-व्यतिरेकेण नोपपद्यते, कर-चरणाद्य्-अवयवानां खण्डशो भिद्यमानतयावयवि-रूपत्वात्, तद्-अवयवानाम् अप्य् अवयवान्तर-घटितत्वात्। परमाणव एव पर्यन्तावयवाः परमार्थतो घनाकार-हेतवस्॑ तद्-अभावे पुनर् आकस्मिकोऽसौ सर्वत्रोपलभ्येत, न वा क्वचिद्, विशेषाभावात्। एतेन यद् अवादि॒ लोक-व्यवहारावतारिणः प्रमाणम् अनुग्राहकम् अस्ति वस्तुनो नेतरस्येत्य्-आदि, तद् अपि प्रतिक्षिप्तम् अवगन्तव्यं, दृश्यमानार्थान्यथानुपपत्त्यैव तत्-साधनात्। यत् पुनर् उक्तं॒ "किं तेषाम् अतीतानागत-पर्याय-परमाण्व्-आदीनां पर्यालोचनेन लोक-व्यवहारानुपयोगितयावस्तुत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्तम्, उपेक्षया वार्तमानिक-वस्तुनोऽनुपयोगित्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेः, सर्वस्य सर्व-लोकानुपयोगित्वात्। कस्यचिद् उपयोगितया वस्तुत्वे तेषाम् अपि सा समस्त्य् एव, सर्व-ज्ञ-ज्ञानादि-गोचरत्वाद् इत्य् आस्तां तावत्। तद् एवं प्रमाण-प्रसिद्धार्थापलापित्वाद् व्यवहारो दुर्नयः, तद्-उपेक्षया व्यवहारानुपाति-वस्तु-समर्थकस्य व्यवहार-नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२६] अथ ऋजुसूत्रोऽपि दृष्टापलापेनादृष्टम् एव क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणं वस्तु-स्वरूपं परमार्थतया मन्यमानो दुर्नयताम् आस्कन्दति, दृश्यमान-स्थिर-स्थूरार्थापह्नवे निर्मूलतया स्वाभिप्रेत-वस्तु-समर्थक-परामर्शस्योत्थानाभावात्। तथा हि॒ स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् पश्चात् कुयुक्ति-विकल्पेन विवेचयेद्, यद् उतैष स्थिर-स्थूरो दृश्यमानः खल्व् आकारो न घटाम् इयर्ति। विचाराक्षमत्वाद् इत्य्-आदिना न च दृष्टम् अदृष्ट-सन्दर्शकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाधितुं शक्यं, सर्वत्रानाश्वास-प्रसङ्गात्। अथाभिदधीथा॒ "मन्द-मन्द-प्रकाशे प्रदेशे रज्जौ विष-धर-भ्रान्तिः प्राक्तनी यथोदीचीनेन तन्-निर्णय-कारिणा विकल्पेन बाध्यते, तथेदम् अपि स्थिर-स्थूर-दर्शनं क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रसाधक-परामर्शेन, किम् अत्रायुक्तम्?" नैतद् अस्ति, रज्जु-प्रतिभासस्यैव प्राक्-प्रवृत्त-विष-धर-भ्रान्त्य्-अपनोद-दक्षत्वात्, तद्-अभावे च विकल्प-शतैर् अपि निवर्तयितुम् अशक्यत्वात्। अत्राप्य् अतीत-वर्त्स्यतोर् विनष्टानुत्पन्नतयासन्निहितत्वात्, स्थूरावयवानां च स्वावयवेषु भेदाभेद-द्वारेण पर्यालोच्यमानानाम् अवस्थानाभावात् क्षण-क्षयि-परमाणव एव प्रतिभान्ति, ततश् च प्रतिभास एव स्थिर-स्थूर-दर्शनस्य बाधक इति चेद्, एवं तर्हि प्रतिभासस्योपदेश-गम्यतानुपपत्तेस्, तथैव व्यवहारः प्रवर्तेत। पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवान् न प्रवर्तत इति चेन्, नान्यत्राप्य् अस्योत्तरस्य विप्लव-हेतुत्वात्। तथा हि॒ धवले जलजादौ प्रतिभातेऽपि नीलोऽयम् अध्यक्षेणावलोकितः॑ पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवात् तु धवलः प्रतिभातीति भवन्-न्यायेन शठः प्रतिजानानः केन वार्येत। तन् न दृष्टापलापः कर्तुं शक्य इति स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिस्, तस्यैव दर्शनाद्, इतरस्य तद्-दर्शन-द्वारेण साध्यमानस्यानुमेयत्वात्, तद्-अनिष्टौ तस्याप्य् असिद्धेः। एतेन स्थिर-स्थूर-वस्तुनोऽर्थ-क्रिया-विरह-प्रतिपादनम् अपि प्रतिव्यूढं, तथा-विधस्यैव सर्व-क्रियासु व्यापार-दर्शनात् क्षण-क्षयिणोऽर्थ-क्रिया-निषेधाच् च, यथोक्तं प्राक्॒ "क्षण-भङ्गुरो ह्य् अर्थात्मा स्वक्षने पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इत्य्-आदि। किं च, सत्त्व-पुरुषत्व-चैतन्यादिभिर् बाल-कुमार-युव-स्थविरत्व-हर्ष-विषादादिभिश् चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूपस्य सर्वस्य वस्तुनः प्रतीतेर् द्रव्य-पर्यायात्मकत्वम्, अभेदस्य द्रव्यत्वाद्, भेदस्य पर्याय-रूपत्वाद् इति। ततश् च भूत-भावि-क्षणयोर् असन्निधान-द्वारेण वार्तमानिक-क्षणस्यैवार्थ-क्रिया-कारित्व-प्रतिपादनं नास्माद्-बाधा-करं, पर्यायाणां क्रम-भावितया वर्तमान-पर्यायालिङ्गितस्यैव द्रव्यस्यार्थ-क्रिया-करण-चतुरत्वात्। [न] केवलं तत् त्रि-काल-व्यापि, द्रष्टापि द्रव्य-रूपतया तथा-भूत एव। ततश् च क्षणिक-पर्याय-तिरो-धान-द्वारेण तद्-रूप-सङ्कलनात् स्थिरम् एवेदं समस्त-क्रियासु व्याप्रियत इति प्रतीति-वीथिम् अवतरति, स्थैर्यस्यापि तात्त्विकत्वात्, क्षणिक-पर्यायाणां विद्यमानानाम् अप्य् अग्रहणात्, प्राकृत-लोक-ज्ञानस्यावरण-क्षयोपशमापेक्षितया कतिचिद्-अंश-विषयत्वात्। यदि पुनर् द्रव्य-बुद्धिः पर्याय-परम्परा-दर्शन-बलायातत्वाद् अतात्त्विकी कल्प्येत, तदा पूर्व-पर्यायस्योत्तर-पर्यायोत्पादने सान्वयत्वं निरन्वयत्वं वा वक्तव्यं, गत्य्-अन्तराभावात्। सान्वयत्वे द्रव्यं पर्यायान्तरेणाभिहितं स्यान्॑ निरन्वयत्वे पुनर् निर्हेतुतयोत्तर-पर्यायानुत्पाद-प्रसङ्गः। तन् नोभय-रूप-वस्तु-व्यतिरेकेणार्थ-क्रिया-सिद्धिः। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणं, शब्द-विद्युत्-प्रदीपादि-चरम-क्षणानां क्षनान्तरानारम्भकत्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेस्, तद्-अवस्तुत्वे पुनर् उपान्त्य-क्षणस्यापि वस्तुनि व्यापाराभावाद्॑ एवं यावत् सर्व-क्षणानां सङ्कलिकया वस्तुत्वम्। अथ क्षणान्तरानारम्भेऽपि स्व-गोचर-ज्ञान-जनकत्वम् अर्थ-क्रिया परिकल्प्येत, तथा सत्य् अतीत-भावि-पर्याय-परम्परापि योगि-ज्ञान-गोचरतां यातीति वस्तुत्वं स्वी-कुर्यात्। तन् नार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम्, अपि त्ûत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तता, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्। उत्पाद-व्ययौ ध्रौव्येन सह विरुद्धाव् इति चेत्, कुतोऽयं विरोधः॒ प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा? न तावद् आद्यः पक्षः, सर्व-प्रमाणानां बहिर् अन्तश् च तथा-विधा-वस्तु-द्योतन-पटिष्ठतया प्रसाधितत्वात्। नापि द्वितीयो,ऽप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वात्। एतेन स्थूरता-दूषणम् अपि प्रतिक्षिप्तं, प्रतिभास-हतत्वात्, तद्-अपह्नवेन विरोधोद्भावनस्य निर्मूलतया प्रलाप-मात्रत्वात्। यत् पुनर् वर्तमान-प्रकाश-रूपतया तत्-सम्बद्ध-वस्तु-ग्राहित्वं सर्व-प्रमाणानाम् उदग्राहि, तद् अयुक्तं, तेषाम् एकान्तेन वार्तमानिकत्वासिद्धेः, कथञ्चिद् आत्मा-व्यतिरेकित्वात्, तस्य च काल-त्रय-व्यापकत्वात्, तद्-रूपतया तेषाम् अप्य् अवस्थानात्। ततश् चात्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपत्वात्, सर्व-प्रमाणानां परिणामिन्य् एव वस्तुनि व्यापारो, न क्षणिके। न चातीतानागत-क्षण-वर्ति-वस्तु-ग्रहणेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-जन्म-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्ग, आवरण-विच्छेद-सापेक्षत्वात्, तस्यैव परमार्थतः संवेदनाविर्-भावान्तर-कारणत्वाद्, ग्राह्यादेर् बहिर्-अङ्गत्वात्। सामस्त्येन पुनर् आवरण-विलये सति समस्त-वस्तु-विस्तारानाद्य्-अनन्त-क्षण-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्गो न नो बाधा-कारीष्टत्वात्। तद् एक-देश-क्षयोपशमे पुनस् तद्-अनुसारिणी बोध-प्रवृत्तिर् इति कियत्-काल-भाविनि स्थूरे वस्तुनि प्राकृत-लोक-ज्ञानानि प्रवर्तन्ते, न सम्पूर्णे। न च तान्य् अलीकानि, तद्-ग्राह्यांशस्यापि वस्तुनि भावात्, तावतैव व्यवहार-सिद्धेर् इति। यच् चोक्तं॒ क्षणिकतां गृह्णन्तोऽपि सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्धत्वान् मन्दा नाध्यवस्यन्ति, मिथ्या-विकल्प-वशात् स्थिरता-व्यवहारं च प्रवर्तयन्ति, तद् अयुक्तं, भवद्-आकूटेन सादृश्याभावात्, तद्-अभावे तद्-उत्पाद्याभिमत-भ्रान्तेर् निर्बीजतयोत्पत्तेर् असम्भवात्। तथा स्थिरतारोपोऽपि क्वचिद् गृहीत-स्थिरत्वस्यैव युक्तो नान्यथा, यथा दृष्ट-विष-धरस्य मन्द-प्रकाशे रज्जु-दर्शने विष-धरारोपः। न च भवतां कदाचन स्थिरता प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति, तत् कथं प्रतिक्षणम् उदयापवर्ग-संसर्गिणि सकले वस्तुनि प्रत्यक्षेणावलोकितेऽपि तद्-आरोप इति। तस्मात् तिरो-हित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-वैविक्त्यं वस्तु सर्व-सांव्यवहारिक-प्रमाणैर् गोचरी-क्रियत इति तत्-तिरस्-कार-द्वारेणादृष्ट-क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रतिष्ठापकोऽभिप्राय ऋजुसूत्र-दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते, तद्-उपेक्षयैव तद्-दर्शकस्य नयत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२७] तथा शब्दादयोऽपि सर्वथा शब्दाव्यतिरेकम् अर्थस्य समर्थयन्तो दुर्नयास्, तत्-समर्थनार्थम् उपन्यस्तस्य तत्-प्रतीतौ प्रतीयमानत्व-लक्षणस्य हेतोर् अनैकान्तिकत्वात्। तथा हि॒ नायम् एकान्तो यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तम् एव, व्यतिरिक्तस्यापि पावकादेर् अन्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-सम्बन्ध-बलाद् धूमादि-प्रतीतौ प्रतीयमानत्वात्। एवं शब्दोऽपि व्यतिरिक्तम् अप्य् अर्थं वाचकत्वात् प्रत्याययिष्यत्य्, अव्यतिरेकस्य प्रत्यक्षादि-बाधितत्वाच्, छब्दाद् विवेकेनैवानुभूयमानत्वात्। अस्मिंश् च हेताव् अनैकान्तिके स्थिते सर्वार्थानां सस्व-वाचकत्व-साधन-द्वारेण शब्दाव्यतिरेक-साधनम् अपि दूरापास्तम् एव। न चात्रापि प्रतिबन्ध-ग्राहि प्रमाणं -- यो योऽर्थस् तेन तेन सस्व-वाचकेन भवितव्यं -- घटादि-दृष्टान्त-मात्रात् तद्-असिद्धेः, क्षणिकालक्ष्य-द्रव्य-विवर्तानां सङ्केत-ग्रहणोपायाभावेनाभिलपितुम् अशक्यतयानभिलाप्यत्व-सिद्धेश् च। क्षण-भङ्गुरता-प्रतिज्ञानं पुनर् अमीषां अप्य् ऋजुसूत्रवन् निरसितव्यम्। तथा प्रत्येक-मतापेक्षयापि स्वाभिप्रेतं प्रतिष्ठापयन्तस् तद्-विपरीतं शब्दार्थं तिरस्-कुर्वाणा दुर्नयताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। एतावद् धि प्रमाण-प्रतिष्ठितं, यद् उत विधि-मुखेन शब्दोऽर्थस्य वाचक इति॑ न पुनर् अयं नियमो यथायम् अस्यैव वाचको नान्यस्य, देश-काल-पुरुष-सङ्केतादि-विचित्रतया सर्व-शब्दानाम् अपरापरार्थ-प्रतिपादकत्वेनोपलब्धेर् अनन्त-धर्मतयापरापर-योग्यता-द्वरेणापरापरार्थाभिधायकत्वोपपत्तेर्, अर्थानाम् अप्य् अनन्त-धर्मत्वाद् एवापरापर-शब्द-वाच्यत्वाविरोधात्, तथैवाविगानेन व्यवहार-दर्शनात्, तद्-अनिष्टौ तल्-लोप-प्रसङ्गात्। तस्मात् सर्व-ध्वनयो योग्यतया सर्वार्थ-वाचका, देश-क्षयोपशमाद्य्-अपेक्षया तु क्वचित् कथञ्चित् प्रतीतिं जनयन्ति। ततश् च क्वचिद् अनपेक्षित-व्युत्पत्ति-निमित्ता रूढितः प्रवर्तन्ते, क्वचित् सामान्य-व्युत्पत्ति-सापेक्षाः, क्वचित् तत्-काल-वर्ति-व्युत्पत्ति-निमित्तापेक्षयेति न तत्र प्रामाणिकेन नियतार्थाग्रहो विधेयः। अतोऽमी शब्दादयो यदेतरेतराभिमत-शब्दार्थोपेक्षया स्वाभिमतं शब्दार्थं दर्शयन्ति, तदा नयास्, तस्यापि तत्र भावात्। परस्पर-बाधया प्रवर्तमानाः पुनर् दुर्नय-रूपतां भजन्ति, निरालम्बनत्वाद् इति।
[न्या०अ०२९।२८] ननु च यद्य् एकैक-धर्म-समर्थन-परायणाःशेष-धर्म-तिरस्-कार-कारिणोऽभिप्राया दुर्नयतां प्रतिपद्यन्ते, तदा वचनम् अप्य् एक-धर्म-कथन-द्वारेण प्रवर्तमानं सावधारणत्वाच् च शेष-धर्म-प्रतिक्षेप-कार्य् अलीकमापद्यते। ततश् चानन्त-धर्माध्यासित-वस्तु-सन्दर्शकम् एव वचनं यथावस्थितार्थ-प्रतिपादकत्वात् सत्यं॑ न चैवं वचन-प्रवृत्तिर्, घटोऽयं शुक्लो मूर्त इत्य्-आद्य् एकैक-धर्म-प्रतिपादन-निष्ठतया व्यवहारे शब्द-प्रयोग-दर्शनात्, सर्व-धर्माणां यौगपद्येन वक्तुम् अशक्यत्वात्, तद्-अभिधायकानाम् अप्यानन्त्यात्। न चैकैक-धर्म-सन्दर्शकत्वेऽप्य् अमूनि वचनान्य् अलीकानि वक्तुं पार्यन्ते, समस्त-शाब्द-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-अलीकत्वे ततः प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् इति। अत्रोच्यत -- इह तावद् द्वये वस्तु-प्रतिपादका, लौकिकास् तत्त्व-चिन्तकाश् च। तत्र प्रत्यक्षादि-प्रसिद्धम् अर्थम् अर्थित्व-वशाल् लौकिकास् तावन् मध्यस्थ-भावेन व्यवहार-काले व्यपदिश्यन्ति, यद् उत नीलम् उत्पलं सुगन्धि कोमलम् इति, न तु तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-ग्रहण-निराकरणयोराद्रियन्ते,ऽनर्थित्वात्, तावतैव विवक्षित-व्यवहार-परिसमाप्तेः। न च तद्-वचनानाम् अलीकता, शेष-धर्मान्तर-प्रतिक्षेपाभावात्, तत्-प्रतिक्षेप-कारिणाम् एवालीकत्वात्। "सर्वं वचनं सावधारणम्" इति-न्यायात् तेषाम् अपि शेष-धर्म-तिरस्-कार-कारित्व-सिद्धेर् भवन्-नीत्यालीकतापद्यत इति चेन्, न, अवधारणस्य तद्-असम्भव-मात्र-व्यवच्छेदे व्यापाराद्॑ यथानेक-पुरुष-सम्पूर्णे सदसि द्वारादौ स्थितस्य किम् अत्र देवदत्तः समस्ति नास्तीति वा दोलायमान-बुद्धेः केनचिद् अभिधीयते -- यथा देवदत्तोऽस्तीति। अत्र यद्य् अप्य् उपन्यस्त-पद-द्वयस्य सावधारणता गम्यते,ऽन्यथा तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात्, तथाप्य् अवधारणं तद्-असम्भव-मात्रं व्यवच्छिनत्ति, न शेष-पुरुषान्तराणि॑ नापि पर-रूपेण नास्तित्वं, तद्-व्यवच्छेदाभिप्रायेण प्रस्तुत-वाक्य-प्रयोगात्, प्रयोक्त्र्-अभिप्रायादि-सापेक्षतयैव ध्वनेः स्वार्थ-प्रतिपादन-सामर्थ्यात्। न च वाच्य-वाचक-भाव-लक्षण-सम्बन्धानर्थक्यं, तद्-अभावे प्रयोक्त्र्-अभिप्राय-मात्रेण रूपस्यैव नियोक्तुम् अशक्यत्वात्। न च समस्त-धर्म-युक्तम् एव वस्तु प्रतिपादयद् वचनं सत्यम् इत्य् अभिदध्महे, येनैकैक-धर्मालिङ्गित-वस्तु-सन्दर्शकानाम् अलीकता स्यात्, किं तर्हि सम्भवद्-अर्थ-प्रतिपादकं सत्यम् इति, सम्भवन्ति च शेष-धर्माप्रतिक्षेपे वचन-गोचरापन्ना धर्मास्॑ तस्मात् तत्-प्रतिपादकं सत्यम् एव। यदा तु दुर्नय-मताभिनिविष्ट-बुद्धिभिस् तीर्थान्तरीयैस् तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-निराकरणाभिप्रायेणैव सावधारणं तत् प्रयुज्यते, यथानित्यम् एव वस्तु नित्यम् एव वेत्य्-आदि, तदा निरालम्बनत्वाद् अलीकतां प्राप्नुवत् केन वार्येत? तत्त्व-चिन्तकाः पुनः प्रत्यक्षादि-प्रमाण-सिद्धम् अनेकान्तात्मकं वस्तु दर्शयन्तो द्वेधा दर्शयेयुस्, तद् यथा -- विकलादेशेन सकलादेशेन वा। तत्र विकालादेशो नयाधीनः, सकलादेशः प्रमाणायत्तः। तथा हि॒ यदा मध्यस्थ-भावेनार्थित्व-वशात् किञ्चिद् धर्मं प्रतिपिपादयिषवः शेष-धर्म-स्वी-करण-निराकरण-विमुखया धिया वाचं प्रयुञ्जते, तदा तत्त्व-चिन्तका अपि लौकिकवत् सम्मुग्धाकारतयाचक्षते, यद् उत "जीवोऽस्ति कर्ता प्रमाता भोक्तेत्य्-आदि"। अतः सम्पूर्ण-वस्तु-प्रतिपादनाभावाद् विकलादेशोऽभिधीयते, नय-मतेन सम्भवद्-धर्माणां दर्शन-मात्रम् इत्य् अर्थः। यदा तु प्रमाण-व्यापारम् अविकलं परामृश्य प्रतिपादयितुम् अभिप्रयन्ति, तदाङ्गी-कृत-गुण-प्रधान-भावाशेष-धर्म-सूचक-कथञ्चित्-पर्याय-स्याच्-छब्द-भूषितया सावधारणया च वाचा दर्शयन्ति ‘स्याद् अस्त्य् एव जीवऽ॑ इत्य्-आदिकया। अतोऽयं स्याच्-छब्द-संसूचिताभ्यन्तरी-भूतानन्त-धर्मकस्य साक्षाद्-उपन्यस्त-जीव-शब्द-क्रियाभ्यां प्रधनी-कृतात्म-भावस्यावधारण-व्यवच्छिन्न-तद्-असम्भवस्य वस्तुनः सन्दर्शकत्वात् सकलादेश इत्य् उच्यते, प्रमाण-प्रतिपन्न-सम्पूर्णार्थ-कथनम् इति यावत्। तद् उक्तं॒
सा ज्ञेय-विशेष-गतिर् नय-प्रमाणात्मिका भवेत् तत्र ।
सकल-ग्राहि तु मानं विकल-ग्राही नयो ज्ञेयः ॥
[न्या०अ०२९।२९] तद् इदम् उक्तं भवति॒ नय-प्रमाणाभिज्ञः स्याद्-वादी सकल-विकलादेशाव् अधिकृत्य वस्तु-स्वरूप-प्रतिपिपादयिषया यद् यद् ब्रूते तत् तत् सत्यं, सम्भवद्-अर्थ-गोचरत्वात्। दुर्नय-मतावलम्बिनः पुनर् एकान्त-वादिनो यद् यद् आचक्षते तत् तद् अलीकम्, असम्भवद्-अर्थ-विषयत्वाद् इति।
[न्या०अ०३०।०] साम्प्रतम् अमुम् एवार्थं द्रढयन् सिद्धान्तेऽप्य् एकैक-नय-मत-प्रवृत्तानि सूत्राणि न सम्पूर्णार्थाभिधायकानीत्य्, अपि तु तत्-समुदायाभिप्राय-प्रवृत्तम् अविकल-वस्तु-निवेदकम् इति दर्शयन्न् आह॒
नयानाम् एक-निष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुत-वर्त्मनि ।
सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि स्याद्-वाद-श्रुतम् उच्यते ॥ न्यायावतार ३० ॥
[न्या०अ०३०।१] इह त्रिविधं श्रुतं, तद् यथा -- मिथ्या-श्रुतं नय-श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतं च। तत्र श्रूयत इति श्रुतम् आगमः। मिथ्यालीकं श्रुतं मिथ्या-श्रुतं, तच् च दुर्नयाभिप्राय-प्रवृत्तं तीर्थिक-सम्बन्धि, निर्गोचरत्वात्। तथा नयैर् हेतु-भूतैः श्रुतं नय-श्रुतम्, एतच् चार्हद्-आगमान्तर्-गतम् एवैक-नयाभिप्राय-प्रतिबद्धं, यथा "पडुप्पण्णे नेरïë विणस्सï" इत्य्-आद्य्, ऋजुसूत्र-नयाभिप्रायेण क्षणिकत्वस्यापि तत्र सम्भवात्। तथा निर्दिश्यमान-धर्म-व्यतिरिक्ताशेष-धर्मान्तर-संसूचकेन स्याता युक्तो वादोऽभिप्रेत-धर्म-वचनं स्याद्-वादः, तद्-आत्मकं श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतम्। तत् किं-भूतम् उच्यत इत्य् आह॒ सम्पूर्णोऽविकलः स चासाव् अर्थश् च तद्-विनिश्चायि तन्-निर्णय-हेतुत्वाद् एवम् अभिधीयते॑ परमार्थतः पुनः समस्त-वस्तु-स्वरूप-प्रतिपादीत्य् अर्थः, शब्दात्मकत्वान्, निश्चयस्य बोध-रूपत्वाद् इति। नय-श्रुतं तर्हि सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि कस्मान् न भवतीत्य् आह॒ नयानां नैगमादीनाम् एक-निष्ट्ःानाम् एक-धर्म-ग्रहण-पर्यवसितानां श्रुत-वर्त्मन्य् आगम-मार्गे प्रवृत्तेः प्रवर्तनान् न तद् एकैकाभिप्राय-प्रतिबद्धं सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि, तत्-समुदायस्यैव सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायकत्वाद् इत्य्-आकूटम्।
[न्या०अ०३१।०] तद् एवं नय-प्रमाण-स्वरूपं प्रतिपाद्याधुनाशेष-नय-प्रमाण-व्यापकं तेषां तत्र तादात्म्येनावस्थानात् प्रमातारम् अभिधातुकाम आह॒
प्रमाता स्वान्य-निर्भासी कर्ता भोक्ता विवृत्तिमान् ।
स्व-संवेदन-संसिद्धो जीवः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः ॥ न्यायावतार ३१ ॥
[न्या०अ०३१।१] तत्र त्रि-काल-जीवनाज् जीवः, प्राण-धारक आत्मेत्य् अर्थः, स प्रमिणोतीति प्रमाता प्रमेय-परिच्छेदकः। किं-भूतः सन्न् इत्य् आह॒ स्वान्याव् आत्म-परौ निर्भासितुम् उद्द्योतयितुं शीलम् अस्येति स्वान्य-निर्भासी, स्व-स्वरूपार्थयोः प्रकाशक इति यावत्। तथा करोतीति कर्ता, भुङ्क्त इति भोक्ता, विवर्तनम् अपरापर-पर्यायेषु गमनं विवृत्तिः परिणामः, सा विद्यते यस्येति विवृत्तिमान्। स्व आत्मा संवेद्यतेऽनेनेति स्व-संवेदनं तेन सम्यक् सिद्धः प्रतिष्ठितः प्रतीतो वा स्व-संवेदन-संसिद्धः। क्षितिः पृथिव्य् आदिर् येषां तानि क्षित्य्-आदीन्य्, आदि-शब्दाद् अम्बु-तेजो-वाय्व्-आकाशानि गृह्यन्ते॑ न विद्यत आत्मा स्वरूपम् अस्येत्य् अनात्मकः, किं स्व-स्वरूपापेक्षया? न, क्षित्य्-आदीनाम् अनात्मकः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः, क्षित्य्-आदि-स्वरूपो न भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०अ०३१।२] तत्र जीवः प्रमातेत्य्-अनेन ये पारमार्थिकं प्रमातारं नाभ्युपगच्छन्त्य्, अपि तु विज्ञान-क्षण-परम्परानुभव-बल-प्रबोधितानादि-प्ररूढ-वासना-सम्पादित-सत्ताकं मिथ्या-विकल्प-परिकल्पितम् अपारमार्थिकं तं मन्यन्ते प्रतिक्षण-विलय-वादिनः तान् निराचष्टे, क्षण-विलयस्य प्राग् एव प्रतिषिद्धत्वाद्, बहिर् अन्तश् च परिणामि-वस्तुनः प्रसाधनात्।
[न्या०अ०३१।३] ननु च घटादयस् तावद् विनाशम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तेषां च विनाशो लकुटादि-कारण-कलापेनाविनश्वर-स्वभावानां वा क्रियेत, विनश्वर-स्वभावानां वा। यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, स्वभावस्य प्रच्यावयितुम् अशक्यत्वात्, तस्य नियत-रूपत्वाद्, अन्यथा स्वभावत्वायोगात्। अथैवं-भूत एव तस्य स्वभावः स्व-कारण-बलायातो यद् उत विनाश-कारणम् आसाद्य विनङ्क्ष्यतीति ब्रूषे, तथापि तद्-विनाश-कारण-सन्निधानं किं यादृच्छिकम् उत तत्-स्वभाव-सम्पाद्यम् एव। यदाद्यः कल्पस्, तदा सन्निहितस्यापि तत्-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपातेन निवर्तनात्, तत्-सन्निधापक-हेतूनां अपि स्व-सन्निधापक-कारण-कलाप-सापेक्षत्वात्, सन्निहितानाम् अपि प्रतिद्वन्द्विना निवर्तनाद्, यादृच्छिकत्वाच् च नावश्यं-भावि तत्-सन्निधानं॑ ततश् चासन्निहित-स्व-विनाश-कारण-कदम्बकः कश्चिद् घटादिर् न विनश्येद् अप्य्, अनिष्टं चैतत्, सर्व-कृतकानां विनाशाविगानात्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तथा सति पश्चाद् अपि तद्-बलाद् विनाश-हेतवः सन्निधास्यन्तीति प्रथम-क्षण एव सन्निदधतु, तथापि क्षणिकतैवार्थस्य। स्व-हेतोर् एव नियत-कालात् परतोऽयं स्व-विनाश-हेतुं सन्निधापयिष्यतीत्य् एवं-रूपो जात इति चेन्, नैवम् अपि क्षण-भङ्गुरतायाता। तथा हि॒ स्व-हेतुना किलासौ वर्षात् परतः स्व-विनाश-हेतु-सन्निधापन-क्षम-स्वभावो व्यधायि॑ स च तस्योत्पाद-क्षणाद् द्वितीय-क्षणे स्वभावोऽस्ति वा न वा? अस्ति चेत्, तथा सति पुनर् वर्षं तेन स्थातव्यम्, एवं यावद् वर्षोपान्त्य-क्षणेऽपि यदि तत्-स्वभाव एवासौ तदापरम् अपि वर्षान्तरं स्थितिर् आपद्येत, तदा चानन्त-कल्प-स्थायी-भावः स्याद्, अप्रच्युत-वर्ष-स्थायि-स्वभावत्वाद् इति। अथ द्वितीय-क्षणे नास्ति स स्वभाव इति ब्रूषे, हन्त क्षणिकत्वम् एवाढौकते,ऽतादवस्थ्यस्य तल्-लक्षणत्वात्। किं च, विनाश-हेतुर् भावस्य विनाशं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा कुर्यात्? व्यतिरिक्त-करणे न किञ्चित् कृतं स्यात्, ततश् च भावस् तादवस्थ्यम् अनुभवेत्। तत्-सम्बन्धः क्रियत इति चेन्, न सम्बन्धस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-व्यतिरिक्तस्य प्रतिषेधात्। न चानयोर् अन्यतरः सम्बन्धोऽत्र समस्ति, व्यतिरेकिणा सार्द्धं तादात्म्यायोगाद्, अन्य-हेतुकस्य पश्चाद् उत्पन्नस्य तद्-उत्पत्ति-वैकल्यात्। तन् न व्यतिरिक्तो विनाशः कर्तुं युक्तः। अव्यतिरिक्त-करणे पुनस् तम् एव भावं विनाश-हेतुः करोतीति प्राप्तम्, अव्यतिरेकस्य तद्-रूपता-लक्षणत्वात्। न चासौ कर्तव्यः, स्व-हेतोर् एव निष्पन्नत्वात्, तत्-करणे च तस्यावस्थानम् एव स्यान्, न प्रलयः। तन् नाविनश्वर-स्वभावानां पश्चात् कथञ्चिद् अपि विनाशः कर्तुं शक्यो, विनश्वर-स्वभावानां पुनः स्व-हेतु-बलायातत्वात् प्राग् अपि प्रतिक्षण-भावी, न कारणान्तरापेक्षः, स्वभावस्य नियत-रूपत्वात्॑ तस्मात् प्राणित्य् अद्यापि प्रतिक्षण-विलय इति।
[न्या०अ०३१।४] अत्रोच्यते -- सत्यम् एतत्, किं तु यथा विनाश-कारणायोगात् प्रतिक्षण-भावी विनाशो भवद्भिः प्रतिपद्यते, तथैव स्थित्य्-उत्पत्ती प्रतिक्षण-भाविन्यौ किं न प्रतिपद्येते, तद्-धेतूनाम् अपि विचार्यमाणानाम् अयोगात्। तथा हि॒ स्थिति-हेतुना तावत् स्वयम् अस्थिर-स्वभावा भावाः स्थाप्येरन् स्थिर-स्वभावा वा? न तावत् प्रथमः पक्षः क्षोदं क्षमते, स्वभावस्यान्यथा कर्तुम् अशक्यत्वात्, तस्य प्रतिनियत-रूपत्वाच्, चेतनाचेतन-स्वभाववद्, अन्यथा स्वभावता-हानेः। द्वितीय-पक्षे पुनः स्वयं स्थिर-स्वभावानां किं स्थिति-हेतुना? स्थितिर् नेष्यत एव, तेनानभ्युपगतोपालम्भ एवायम् इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, एवं हि भावाः क्षण-मात्रम् अपि न तिष्ठेयुः। क्षण-भाविनीष्यत एवेति चेत्, सा तर्ह्य् अस्थिति-स्वभावानां हेतु-शतैर् अपि कर्तुं न पार्यत इति ब्रूमः, तत्-स्वभावत्वे पुनर् हेतु-व्यापार-नैरर्थक्यात्। अहेतुका सती सकल-कालं भवतीति दत्तो जलाञ्जलिः प्रतिक्षण-विलयस्य। तथोत्पाद-हेतुर् अपि तत्-स्वभावस्योत्पत्तिं विदध्याद् अतत्-स्वभावस्य वा? न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-कर्तुं युक्तः, स्वयम् उत्पादकस्योत्पादने व्याप्रियमाणो हि हेतुः पिष्टं पिनष्टि, शङ्खं धवलयति, तद्-अभावेऽपि स्व-योग्यतयोत्पत्तेः। नापि द्वितीयः कल्पोऽङ्गी-करणार्हः, स्वयम् अनुत्पत्ति-धर्मकस्योत्पादयितुम् अशक्यत्वाद्, अन्यथा शश-विषाणादयोऽप्य् उत्पाद्य-कोटिम् अध्यासीरन्, विशेषाभावात्॑ ततश् च न कश्चिद् अत्यन्ताभावः स्यात्। तद् यथा निर्हेतुकत्वान् नाशः प्रतिक्षण-भावी, तथैव दर्शित-युक्तेः स्थित्य्-उत्पत्ती अपीति त्रयाक्रान्तं सकलं वस्तु जातम् अभ्युपगन्तव्यं॑ तथा सति जीवोऽपि जीवत्व-चैतन्य-द्रव्यत्वादिभिः स्थेमानं आबिभ्राण एव हर्ष-विषादादिभिर् अपरापरार्थ-ग्रहण-परिणामैश् चोत्पाद-व्यय-धर्मकः पारमार्थिकः प्रमातेति बलात् सिद्धिम् अध्यास्ते।
[न्या०अ०३१।५] ननु च यद्य् उत्पाद-व्यय-स्थितीनां निर्हेतुकत्वात् सकल-काल-भाविता भवद्भिः साध्यते, तदान्वय-व्यतिरेकाभ्यां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धः खल्व् अयं तत्-कारण-कलाप-व्यापारः कथं नेयः? न चायम् अपह्नोतुं शक्यः! तथा हि॒ कुलालादि-कारण-व्रात-व्यापारे घटादयः समुपलभ्यन्ते, तद्-अभावे च नोपलम्भ्यन्त इति तज्-जन्या इत्य् उच्यन्ते। स्थितिर् अपि विनाश-कारण-सन्निधानात् प्राक् तद्-बलाद् एव, तथा नाशोऽपि मुद्गरादि-सन्निधानासन्निधानाभ्यां सद्-असत्ताम् अनुभवंस् तत्-कृतः प्रतीयते, नाहेतुकः। तत् कथम् एतद् इति?
[न्या०अ०३१।६] अत्रोच्यते -- न वयं सर्वथा हेतूनां व्यापारं वारयामः, किं तर्हि स्वयम् उत्पाद-व्यय-स्थित्य्-आत्मना विवर्तमानस्य द्रव्यस्य हेतवस् तद्-विशेष-करणे व्यापारम् अनुभवन्ति, तेनैव सार्द्धं तेषाम् अन्वय-व्यतिरेकानुकरण-दर्शनाद्, दृष्टस्य चापह्नवेऽस्माकम् अप्रवृत्तत्वात्, प्रतीति-युक्ति-लक्षण-द्वय-पक्ष-पातित्वात्॑ केवलं प्रतीति-विकलां युक्तिं युक्ति-विनाकृतां वा प्रतीतिं नाङ्गी-कुर्महे,ऽसम्भवद्-अर्थ-गोचरतया निरालम्बनत्वात् तस्या इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।७] स्वान्य-निर्भासीत्य्-अनेन प्राग्-उक्त-स्व-पराभासि-प्रमाण-विशेषणवन् मीमांसकान् परोक्ष-बुद्धि-वादिनो योगाचारांश् च ज्ञान-मात्र-वादिनः प्रतिक्षिपति, ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदेन तद्-उक्त-न्यायाविशेषाद् इति।
[न्या०अ०३१।८] कर्ता भोक्तेइति विशेषण-द्वयेन सांख्य-मतं विकुट्टयति, कर्ता सन् भोक्तापीति काक्वोपन्यासाद्, अकर्तुर् भोगानुपपत्तेर्, भुजि-क्रिया-निर्वर्तन-समर्थस्यैव भोक्तृत्वात्। जपा-कुसुमादि-सन्निधान-वशात् स्फटिके रक्ततादि-व्यपदेशवद् अकर्तुर् अपि प्रकृत्य्-उपधान-वशात् सुख-दुःखादि-भोग-व्यपदेशो युक्तस्॑ तथा हि॒ प्रकृति-विकार-दर्पणाकार-बुद्धि-सङ्क्रान्तानां सुख-दुःखाद्य्-आत्मकानाम् अर्थानां पुरुषः सन्निधान-मात्रेण भोजको व्यपदिश्यते, "बुद्ध्य्-अध्यवसितम् अर्थं पुरुषश् चेतयत" इति-वचनाद् इति चेन्, न, कथञ्चित् सक्रियाकता-व्यतिरेकेण प्रकृत्य्-उपधानेऽप्य् अन्यथात्वानुपपत्तेर्, अप्रच्युत-प्राचीन-रूपस्य व्यपदेशानर्हत्वात्, तत्-प्रच्यवे च प्राक्तन-रूप-त्यागेनोत्तर-रूपाध्यासितया सक्रियत्वम् आपततीति-न्यायात्॑ स्फटिक-दृष्टान्तेऽपि जपा-कुसुमादि-सन्निधानाद् अन्धोपलादौ रक्ततानाविर्-भवन्ती तत्र पुनर् आविर्-भवन्ती तस्य तथा-विधं परिणामं लक्षयत्य्, अन्यथान्धोपलवत् तत्रापि न प्रादुःष्यात्। तन् नाक्रियस्य भोक्तृतोपपद्यत इति।
[न्या०अ०३१।९] विवृत्तिमान् इत्य्-अमुना त्व् एकान्त-नित्यम् अपरिणामिनं नैयायिक-वैशेषिकादि-प्रकल्पितं प्रमातारं निरस्यति, सर्वथाविचलित-रूपस्यार्थ-ग्रहण-परिणामानुपपत्तेः। व्यतिरिक्त-ज्ञान-समवायाद् एकान्त-नित्योऽपि प्रमिणोतीति चेन्, न, समवायस्य प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्, सम्बन्धान्तरस्य च व्यतिरेकिणा साकम् अनुपपत्तेर्, अन्यत्रान्यथानुपपन्नत्वात्। न च व्यतिरेकिणि ज्ञाने तत् समस्ति, तद्-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, अव्यतिरेकानुभवस्य च तद्-बाधकत्वात्। किं च, यदि समवाय-बलाद् आत्मनि ज्ञानं समवैति, तदात्मनां समवायस्य च विभुत्वाद् एक-रूपत्वाच् च सर्वात्मसु किं न समवैति, विशेषाभावात्? तथा च देवदत्त-ज्टानेन यज्टदत्तादयोऽप्य् अर्थ-तत्त्वं बुद्ध्येरन्। अन्यच् च विज्टानोदय-समयेऽपि यादृशः प्राग्-अवस्थायां तादृश एव सन्तिष्ठमानः प्राग् अप्रमाता पश्चात् प्रमातेति ब्रुवाणः खल्ûन्मत्तताम् आत्मन्य् आविर्-भावयति, नापरम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।१०] पश्चार्द्धेन पुनर् भूत-व्यतिरेकिणं स्व-संवेदन-प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्यं जीवं दर्शयंश् चार्वाक-दर्शनं तिरस्-कुरुते, जडात्मक-भूताव्यतिरेके हि तद्-विलक्षण-बोध-रूप-हर्ष-विषादादि-विवर्तानुभवाभाव-प्रसङ्गात्। ननु च कायाकार-परिणतानि भूतान्य् एवात्म-व्यतिरेकिणीं चेतनाम् उत्कालयन्ति॑ सा च तथा-विध-परिणाम-परिणतेषु तेषु सन्तिष्ठते, तद्-अभावे पुनस् तेष्व् एव निलीयत इति॑ तद्-व्यतिरेकानुभवेऽपि न पर-लोक-यायि-जीव-सिद्धिर्, इयतैव दृष्ट-व्यवहारोपपत्तेः। नैतद् अस्ति, द्वयं हि तावद् एतत् संयोगम् अनुभवद् उपलबभ्यते -- पट्च-भूतात्मकं शरीरं चेतना च। तत्रापि शरीरं बहिर्-मुखाकारेण बोधेनार्थ-रूपतया जडम् अनुभूयते, चेतना पुनर् अन्तर्-मुखाकारेण स्व-संवेदन-प्रत्यक्षेण साक्षात्-क्रियते॑ऽत एवाव्यतिरेक-पक्षः प्रतिभास-निराकृतत्वान् नाशङ्कितः। व्यतिरेकिणोः पुनः प्रकाशमानयोर् यदि भूतान्य् एव चेतनाम् उत्कालयन्तीति भवद्भिः परिकल्प्यते, तदा चेतनैव भवान्तराद् उत्पत्ति-स्थानमायाता पट्च-भूत-भ्रान्ति-जनकं शरीरं निर्वर्तयेत्, पुनर् भवान्तरं यातुकामा मुट्चेत्, तत् तयाधिष्ठितं गमनादि-चेष्टां कुर्यात्, तद्-वियुक्तं पुनः काष्ठवत् तिष्ठेद् इति जीव-सम्पाद्यम् एव शरीरं, न पुनर् असौ तत्-सम्पाद्य इत्य्, एतत् परिकल्पनं युक्ततरं पश्यामः, जीवस्य चेतनावतः सकर्मकतयापरापर-भव-भ्रमणापरापर-शरीर-निर्वर्तनयोर् उपपद्यमानत्वात्। भवान्तराद् आगच्छन् उत्पत्ति-स्थानं जीवोऽध्यक्षेण नोपलभ्यत इति चेद्, भूतान्य् अपि तर्हि कायाकार-धारण-द्वारेण चेतनाम् उत्कालयन्तीति प्रत्यक्षेण नोपलक्ष्यन्त इति समानो न्याहः। अथ कायाकार-परिणतेष्व् एव भूतेषु चेतनोपलभ्यते, नान्यदेत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशात् तज्-जन्येति परिकल्प्यत, एवं तर्हि मृतावस्थायां कायाकारम् आबिभ्राणेष्व् अपि नोपलब्धा, कायाकार-परिणामो वा कादाचित्कतया हेत्व्-अन्तरापेक्षीत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशाद् एव तन्-निर्वर्तन-क्षमा चेतना भवान्तरागत-जीव-सम्बन्धिनीति प्रतिपद्यामहे। किं च, जीवस् तावत् कर्म-चैतन्य-सम्बन्धाच् छरीर-निर्वर्तनार्थं प्रवरत इति युक्तम् एवैतद्, भूतानि पुनः किं-भूतानि चेतना-करणे प्रवर्तेरन्॒ सचेतनानि निश्चेतनानि वा? यद्य् आद्यः कल्पस्, ततो विकल्प-युगलम् अवतरति॒ तच् चैतन्यं तेभ्यो भिन्नम् अभिन्नम् वा? यदि भिन्नं, तदा पुरुष-शरीरवत् तत्रापि भूतैः सह वर्तमानम् अपि भूत-विलक्षणम् आत्म-कारणम् अनुमापयतीति तद्-अवस्थैव जीव-सिद्धिः। अथाभिन्नं, तथा सति समस्त-भूतानाम् ऐक्यं प्रसजत्य्, एक-चैतन्याव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। निज-निज-चैतन्याव्यतिरेकीणि भूतानि तेनायम् अदोष इति चेन्, न, तत्-सम्पाद्य-पुरुष-शरीरेऽपि तज्-जन्य-पञ्च-चैतन्य-प्रसङ्गात्। पञ्चापि सम्भूय बृहत्-पुरुष-चैतन्यं बहवस् तिला इव तैल-घटं जनयन्तीति चेत्, तत् तर्हि पुरुष-चैतन्यं किं तेषाम् एव संयोगो यद् वा तद्-उत्पाद्यम्, अन्यद् एव? यद्य् आध्यः कल्पस्, तद् अयुक्तं, चैतन्यानां परस्परं मिश्रणाभावेन संयोग-विरोधाद्, इतरथा बहु-पुरुष-चैतन्यानि सम्भूय बृहत्तम-चैतन्यान्तरम् आरभेरन्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तत्रापि तेषां किम् अन्वयोऽस्ति नास्ति वा? यद्य् अस्ति, तद् अयुक्तं, प्राग्वत् तज्-जन्य-चैतन्य-पञ्च-रूपतापत्तेः। अथ नास्ति, तद् अप्य् अचारु, निरन्वयोत्पादस्य प्रमाण-बाधितत्वात्। तन् न सचेतनानि भूतानि चेतना-करणे व्यापार-भाञ्जि भवितुम् अर्हन्ति। नापि निश्चेतनानि, तेषाम् अत्यन्त-विलक्षणतया चैतन्योत्पाद-विरोधाद्, इतरथा सिकतादयस् तैलादि-करणे व्याप्रियेरन्। किं च, तत्-समुदाय-मात्र-साध्यं वा चैतन्यं स्याद् विशिष्ट-तत्-परिणाम-साध्यं वा। न तावद् आद्या कॢप्तिर्, इला-जलानलानिल-नभस्-तल-मीलनेऽपि चेतनानुपलब्धेः। द्वितीय-विकॢप्तौ पुनः किं तद् वैशिष्ट्यम् इति वाच्यम्। कायाकार-परिणाम इति चेत्, स तर्हि सर्वदा कस्मान् न भवति? कुतश्चिद् धेत्व्-अन्तरापेक्षणाद् इति चेत्, तत् तर्हि हेत्व्-अन्तरं भवान्तरायात-जीव-चैतन्यम् इत्य् अनुमिमीमहे, तस्यैव कायाकार-परिणाम-साध्य-चैतन्यानुरूपोपादान-कारणत्वात्, तद्-विरहे कायाकार-परिणाम-सद्भावेऽपि मृतावस्थायां तद्-अभावाद् गमनादि-चेष्टानुपलब्धेः॑ तन् न कायाकार-परिणाम-जन्यं चैतन्यम्, अपि तु स एव तज्-जन्य इति युक्तं पश्यामः। न प्रत्यक्षाद् अन्यत् प्रमाणम् अस्ति, न च तेन पर-लोक-गमनागमनादिकं चैतन्यस्योपलक्ष्यते, तेन दृष्टान्य् एव भूतानि तत्-कारणतया कल्पनीयानीति चेन्, न, केवल-प्रत्यक्ष-प्रतिक्षेपेण प्रमाणान्तराणां प्राग् एव प्रसाधितत्वात्, तथा च भूयांस्य् अनुमानानि पर-लोकानुयायि-जीव-साधकानि प्रवर्तेरन्। तद् यथा -- तद्-अहर्-जात-बालकस्याद्य-स्तनाभिलाषः पूर्वाभिलाष-पूर्वको,ऽभिलाषत्वाद्, द्वितीय-दिवसादि-स्तनाभिलाषवत्। तद् इदम् अनुमानम् आद्य-स्तनाभिलाषस्याभिलाषान्तर-पूर्वकत्वम् अनुमापयद् अर्थापत्त्या पर-लोक-यायि-जीवमाक्षिपति, तज्-जन्मन्य् अभिलाषान्तराभावात्। एवम् अन्यद् अप्य् उदाहार्यम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०अ०३१।११] तद् अयं स्व-पर-प्रकाशकः कर्ता भोक्ता नित्यानित्यात्मको भूत-विलक्षणः साक्षात्-कृत-कतिचिन्-निज-पर्यायानुमितानाद्य्-अनन्त-काल-भावि-निजानन्त-पर्याय-विवर्तः प्रमाण-प्रतिष्ठितः पारमार्थिको जीवः सकल-नय-प्रमाण-व्यापकः प्रमातेति स्थितम्।
[न्या०अ०३२।०] साम्प्रतं पर्यन्त-श्लोकेन प्रकरणार्थम् उपसंहरन्न् आह॒
प्रमाणादि-व्यवस्थेयम् अनादि-निधनात्मिका ।
सर्व-संव्यवहर्त्ःणां प्रसिद्धापि प्रकीर्तिता ॥ न्यायावतार ३२ ॥
[न्या०अ०३२।१] प्रमाणानि प्रत्यक्षादीन्य्॑ आदि-शब्दान् नय-परिग्रहस्, तेषां व्यवस्था प्रतिनियत-लक्षणादि-रूपा मर्यादा, सेयम् अनन्तरोक्त-स्थित्या प्रकीर्तितेति संसर्गः। किं-भूतेत्य् आह॒ आदिः प्रभवो, निधनं पर्यन्तो, न विद्येते आदि-निधने यस्यासौ तथा-विध आत्मा स्वरूपं यस्याः सानादि-निधनात्मिका॑ सर्व-संव्यवर्त्ःणां लौकिक-तीर्थिकादि-भेद-भिन्न-समस्त-व्यवहारवतां प्रसिद्धापि रूढापि, तद्-अप्रसिद्धौ निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च विचारानुत्थाने न कस्यचित् तत्त्वस्य प्रतिष्ठितिः। प्रकीर्तिता संशब्दिताव्युत्पन्न-विप्रतिपन्न-व्यामोहापोहायेति गम्यते॑ प्रमाण-प्रसिद्धेऽप्य् अर्थे प्रबलावरण-कुदर्शन-वासनादितः केषाञ्चिद् अनध्यवसाय-विपर्यास-रूप-व्यामोह-सद्भावात्, तद्-अपनोदार्थं च सति सामर्थ्ये करुणावतां प्रवृत्तेर् इति।
स्याद्-वाद-केसरि-सुभीषण-नाद-भीतेर् उत्त्रस्त-लोल-नयनान् प्रपलायमानान् ।
हेतुर् नयाश्रित-कुतीर्थि-मृगान् अनन्यत्राणान् विहाय जिनम् एति तम् आश्रयध्वं ॥ नव्३२।१॒१ ॥
भक्तिर् मया भगवति प्रकटी-कृतेयं तच्-छासनांश-कथनान् न मतिः स्वकीया ।
मोहाद् अतो यद् इह किञ्चिद् अभूद् असाधु तत् साधवः कृत-कृपा मयि शोधयन्तु ॥ नव्३२।१॒२ ॥
न्यायावतार-विवृतिं विविधां विधित्सोः सिद्धः शुभो य इह पुण्य-चयस् ततो मे । नित्यं परार्थ-करणोद्यतम् आ भवान्ताद् भूयाज् जिनेन्द्र-मत-लम्पटम् एव चेतः ॥ नव्३२।१॒३ ॥
इति न्यायावतार-विवृतिः समाप्ता ॥
कृतिर् इयम् आचार्य-सिद्ध-व्याख्यानिकस्य तर्क-प्रकरण-वृत्तेर् इति।
</poem>
==स्रोतः ==
*[]
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2026-10-02T14:23:08Z
अनुनाद सिंह
658
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wikitext
text/x-wiki
<poem>
''' सिद्धसेनमहामति : न्यायावतार न्यायावतारविवृति (Siddharṣigaṇin)
# Header
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## Data entry: Piotr Balcerowicz
## Contribution: Piotr Balcerowicz
## Date of this version: 2020-07-31
## Source:
- Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes. 2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
## Publisher: Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages (GRETIL), SUB Göttingen
## Licence:
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- a pragmatic abbreviation of the title: Nyāyāvatāra+comm = ,
- the number of the in arabic numerals,
- the number of the verse in arabic numerals.
## Notes:
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Siddhasena Mahamati: Nyayavatara,
with the Nyayavataravivrti commentary by Siddharsi-ganin
Based on the ed. by Piotr Balcerowicz: Jaina Epistemology in Historical and Comparative Perspective : Critical Edition and English Translation of Logical-Epistemological Treatises: Nyāyāvatāra, Nyāyāvatāra-vivṛti and Nyāyāvatāra-ṭippana with Introduction and Notes.
2 Volumes. Second revised edition, Motilal Banarsidass, New Delhi 2008.
Input by Piotr Balcerowicz
p.balcerowicz@uw.edu.pl
[GRETIL-Version vom 27.3.2015]
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NA_nn = Nyāyāvatāra_verse
NAV_nn.nn:nn = Nyāyāvatāra-Vivṛti_NA-verse.NAV-section:verse quoted in NAV
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# Text
''' तर्क-पञ्चानन-श्री-सिद्धसेन-महामति-विरचितः न्यायावतारः
''' श्री-देवभद्र-सूरि-कृत-टिप्पन-संवलित-श्री-सिद्धर्षि-गणि-कृत-टीका-सहितः
अवियुत-सामान्य-विशेष-देशिनं वर्धमानम् आनम्य । न्यायावतार-विवृतिः स्मृति-बीज-विवृद्धये क्रियते ॥ न्या०वि०।०० ॥
[न्या०वि० ०।०] अस्य चेदम् आदि-वाक्यम् :
[न्या०वि० ०] प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इदम् आरभ्यते।
[न्या०वि० ०।१] प्रमाणेत्य्-आदि अनेन च तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-संबन्ध-विकलतया ध्वनेर् बहिर्-अर्थं प्रति प्रामाण्यायोगाद् अभिधेयादि-सूचन-द्वरोत्पन्नार्थ-संशय-मुखेनश्रोतारः श्रवणं प्रति प्रोत्साह्यन्त इति धर्मोत्तरो मन्यते। तद् अयुक्तम्। यदि हि शब्दस्यार्थ-प्रकाशनं प्रति सामर्थ्यं न समस्ति, तत् कथम् असाव् अभिधेयादि-सूचनेऽपि पटिष्ठः स्यात्? न च तस्याप्रामाण्य एतच्-छ्रवणाद् अर्थ-संशयं कुर्वन्ति प्रेक्षावन्तः, तद्-वत्ता-हानेर् मिथ्या-ज्ञानाद् अपि प्रवृत्त्य्-अविराम-प्रसङ्गाच् च। अर्चटस् त्व् आह : "न श्रावकोत्साहकम् एतत्, प्रामाण्याभावात्, तेषां चाप्रमाणाद् अप्रवृत्तेर्, अन्यथा प्रेक्षावत्ता-क्षतेः, किं तर्हि प्रकरणार्थ-कथनावसरोपस्थित-परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतोद्भावनार्थम्। तथा हि॒ सम्भवत्य् एवं-वादी -- नारब्धव्यम् इदम् अभिधेयादि-शून्यत्वात्, काक-दन्त-परीक्षादिवद् इति॑ तद् अनेनास्य तद्वत्ता-प्रकाशकेन वचसा तद्-धेतूनाम् असिद्धतोद्भाव्यत" इति। तद् अयुक्ततरम्॒ यतो यदीदम् अप्रमाणम् इति नाभिधेयादीनि साक्षाल् लक्षयत् प्रवर्तयति, ततः परोपन्यस्त-हेत्व्-असिद्धतां कथयतीति युक्ति-रिक्तं पश्यामः, अप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वाद्, अन्यथा प्रमाण-विचारणम् आनर्थक्यम् अश्नुवीत। तस्माद् इदं प्रमाण-भूतं सद्-अभिधेयादीनि प्रतिपादयत् प्रेक्षावतः प्रवर्तयतीति प्रकरणादाव् उपन्यस्तम्।
[न्या०वि० ०।२] सम्बन्ध-शून्यत्वाद् अस्य कथम् अर्थे प्रमाणतेति चेत्, प्रत्यक्षेऽपि कथं तर्हि सेति वाच्यम्। ग्राह्य-ग्राहक-भाव-सम्बन्ध-बलाद् इति चेद्, अत्रापि वाच्य-वाचक-भावाद् इति ब्रूमः। स एव कथम् इति चेद्, अध्यक्षेऽपि वेद्य-वेदक-भावः कथम् इति वाच्यम्। तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारताभ्याम् इति चेत्, केयं तद्-उत्पत्तिर् नाम? तज्-जन्यतेति चेत्, प्रतिक्षण-भङ्गुरत्वे सैव दुरुपपादेत्य् आचक्ष्महे। तथा हि॒ क्षण-नश्वरोऽर्थः स्व-क्षणे पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इति त्रयी गतिः। तत्र न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-करणीयः, सम-काल-भाविनि व्यापाराभावात्, इतरथैक-क्षण-वर्तिनां समस्तार्थ-क्षणानाम् इतरेतरं कार्य-कारण-भावः प्रसज्येत, तथा च तत्-प्रयुक्तो ग्राह्य-ग्राहक-भावश् चेत्य् असमञ्जसम् आपनीपद्येत। अथ स्व-क्षणात् पूर्वम् -- अचार्व् एतद् अपि, स्वयम् असतो भविष्यच्-छङ्ख-चक्रवर्त्य्-आदेर् इव पूर्व-काल-वर्तिनि कार्ये व्यापाराभावात्। अथ स्व-क्षणाद् ऊर्ध्वं कार्यं विधत्त इति मन्येथाः, एतद् अप्य् असाधीयो, विनष्टस्य कार्य-करणाक्षमत्वाद्, अन्यथा मृतस्य शिखिनः केकायितं स्यात्। तद्-आकारतापि किम् अर्थाकार-सङ्क्रान्त्या? अथ तत्-सदृशतयोत्पत्तेर् ज्ञानस्येति? यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, ज्ञाने स्वाकारार्पणाद् अर्थस्य निराकारतानुषङ्गात्, स्व-देह-पृथुतरार्थादर्शन-प्रसङ्गात्, शिरः-स्फोटन-प्लावनाद्य्-अनर्थ-प्रसक्तेश् च। उत द्वितीयस्॒ तथा सति सादृश्य-वशाद् अर्थ-व्यवस्थेत्य् आयातम्। न च सादृश्यं भवतां दर्शने तात्त्विकम् अस्ति, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षणानां पारमार्थिकत्वाभ्युपगमात्। अनादि-कालालीन-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताक-निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनोत्तर-काल-भावि-विकल्प-व्यवस्थापित-सादृश्य-वशाद् अर्थ-ग्रहण-नियमे सत्य् एक-नील-स्वलक्षणे क्षणे सकल-काल-कलाप-व्यापि-काक-कुवलयादि-गत-नीलताया व्यवस्थितिर् अविशेषेणानुषजेत, तथा च प्रतिनियतो ग्राह्य-ग्राहक-भावो न घटाम्-अटाट्येत। अङ्गुल्य्-अग्र-निर्दिश्यमान-पुरो-वर्ति-नील-स्वलक्षण-दर्शन-बलायातत्वान् नैल्य-विकल्पस्य तद् एवाध्यवस्यति, न भूतं भावि काक-कुवलयादि-गतं वेति चेत्, तर्हि विकल्पः स्वलक्षण-निष्ठः प्राप्तो, नियत-देश-दशावच्छिन्नार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्रहणात्। तथा हि॒ तद्-अध्यवसायः किं तद्-विकल्पनं उत तद्-ग्रहणं? न तावत् तद्-विकल्पनम्, विकल्पानां भवद्-अभिप्रायेण स्वलक्षणान्तः-प्रवेशाभावात्। तद् उक्तम्॒
"तेनान्यापोह-विषयाः प्रोक्ताः सामान्य-गोचराः ।
शब्दाश् च बुद्धयश् चैव वस्तुन्य् एषाम् असम्भवात्" ॥ न्या०वि० ०१ ॥
इति । न्या०वि० : ० ।
[न्या०वि० ०।३] अथ ब्रूयाद्॒ यद्य् अपि विकल्पाः सामान्यं गोचरयन्ति तत्त्वतस्, तथापि प्रत्यक्ष-विकल्पयोर् यौगपद्येन प्रवृत्तेर् विमूढः प्रतिपत्ता विकल्पस्य स्वलक्षण-निष्ठतां व्यवस्यति, तथा चोक्तम् :
"मनसोर् युगपद्-वृत्तेः सविकल्पाविकल्पयोः ।
विमूढो लघु-वृत्तेर् वा तयोर् ऐक्यं व्यवस्यति" ॥ न्या०वि० ०२ ॥
तत् किम् इदं शपथैः प्रत्येयं, यद् उत मोहाद् विकल्पेन स्वलक्षणम् अध्यवस्यति, न पुनर् विशद-निर्भासेन साक्षात्-करोति? एवं चाध्यक्षम् अपि सकलार्थ-व्यक्तीर् गोचरयति, विकल्प-मोहात् तु सन्निहित-विषयं लक्ष्यत इति परोऽनुषञ्जयन् दुर्निवारः स्यात्। उत तद्-ग्रहणम् अध्यवसायः, तदा स्वलक्षण-निष्ठता विकल्पस्य स्व-वाचा भवद्भिः प्रतिपन्ना स्यात्। एवं च विकल्प-युगलकेऽप्य् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-पर्यवसित-सत्ताकता विकल्पस्याढौकते। यदा च विकल्पः स्वलक्षण-सौध-मध्यम् अध्यास्त इत्य् अभिदध्यास्, तथा सति ध्वनेर् अपि तद्-अन्तः-प्रवेशो दुर्निवारः स्यात्, तत्-सह-चरत्वात्। यद् आह भवद्-आचार्यः॒ "स एव शब्दानां विषयो यो विकल्पानाम्" इति। न च विकल्पं व्यतिरिच्य सादृश्य-व्यवस्थापकम् अन्यद् अस्ति, प्रत्यक्षस्य सकल-जगद्-विलक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणत्वात्। तद् यदि तत्-सदृशतयोत्पत्तिस् तद्-आकारता, तदा प्रतिपादित-न्यायाद् विकल्पस्य सन्निहितार्थ-गोचरतोररी-कर्तव्या, तथा च ध्वनिर् अपि तद्-विषयः सिध्यतीति सिद्धं नः समीहितम्। अन्यथा तद्-आकारता न समस्ति, गत्य्-अन्तराभावात्। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते ग्राह्य-ग्राहक-भाव-हेतू संस्तः।
[न्या०वि० ०।४] संस्तां वा, तथापि विकल्पतः पर्यनुयोज्यो भवान्॒ किम् एते ग्रहण-कारणं पार्थक्येन उत सामस्त्येन? तद् यद्य् आद्यः पक्षः, कपाल-क्षणो घटान्त्य-क्षणस्य ग्राहकः प्राप्नोति, तज्-जन्यत्वात्, जल-चन्द्रो वा नभश्-चन्द्रस्य ग्राहकः स्यात्, तद्-आकारत्वात्। अथ द्वितीयस्, तथा सति घटोत्तर-क्षणः पूर्व-क्षणस्य ग्राहकः प्रसजति, तद्-उत्पत्तेस् तद्-आकारत्वाच् च। जडत्वाद् अर्थस्य न ग्राहकत्वम्, अपि तु ज्ञानस्य तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोः सत्योर् इति चेद्, इदम् इदानीं विदितम् अस्माभिर्, एतद् अपि समानार्थ-ग्राहि-प्राचीन-संवेदन-क्षण-लक्षण-मनस्कारोत्पाद्य-ज्ञाने ग्राहक-लक्षणं व्यभिचरत्य्, उत्पादक-प्राक्तन-क्षण-वर्ति-मनस्काराग्राहकत्वात्। तद्-अध्यवसाय-साहित्येन तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारतयोर् ग्रहण-कारणत्वं सम्पूर्णं, मनस्कारे तन् नास्तीति चेत्, किम् इदं भिन्न-गोचरेण सह साहित्यम्? तथा ह्य्॒ "अध्यवसायो वासना-प्रबोध-वशाद् उत्पन्नः सामान्यम् अनर्थ-रूपं विकल्पयति, प्रत्यक्षं बहिर्-अर्थाल् लब्धात्म-लाभं तद्-आकारं तम् एव साक्षात्-करोतीति" भवतां दर्शनम्। तन् न विकल्प-साहित्यं प्रत्यक्षस्य कञ्चन विशेषं पुष्णाति। तद् इदम् ग्राह्य-ग्राहक-भाव-कारणं प्रत्यक्षेऽपि यद् भवद्भिर् अभ्यधायि, तद् यथा यथा विचार्यते तथा तथा विशीर्यत इत्य् अनपेक्षणीयम्। तद् -- यथा कथञ्चित् प्रत्यक्षस्य प्रतिपादित-ग्राह्य-ग्राहक-भाव-लक्षण-वैकल्येऽपि ग्राहकत्वम् अर्थस्य ग्राह्यत्वं, तथा दृष्टत्वात्, अन्यथा निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् भवद्भिर् अपि प्रत्यपादि, तथा शब्दस्य वाचकत्वम् अर्थस्य वाच्यत्वं प्रतिपद्यध्वं यूयम्॑ अत्रापि दृष्ट-हानेर् व्यवहारोच्छेदस्य समानत्वात्। अथेत्थम् आचक्षीथाः॒ यथा "नद्यास् तीरे गुड-शकटं पर्यस्तं, धावत धावतडिम्भका" इत्य्-आदि-विप्रतारक-पुरुष-वचन-श्रवणात् प्रवर्तमाना विप्रलम्भ-भाजो जायन्ते,ऽतः सकल-वचनेष्व् अनाश्वास इति -- एवं तर्हि चिकिचिकायमान-मरु-मरीचिका-चक्र-चुम्बि यज् जलोल्लेखि विशद-दर्शनम् उदय-पदवीं समासादयति तद् अलीकम् अवलोकितम् इति॑ सकलाध्यक्षेष्व् अनाश्वास इत्य् अभिदध्महे। पाश्चात्य-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-बाधितत्वाद् मरु-मरीचिकासु जल-ज्ञानम् अप्रमाणं, न शेष-सत्य-स्तम्भादि-ज्ञानानि, बाधा-रहितत्वाद् इति चेत्, तर्हि ध्वनाव् अप्य् अयं न्यायः किं काकैर् भक्षितः? न हि वयं सर्व-शब्दानां प्रामाण्यं प्रतिपद्येमहि॑ किं तर्हि सुनिश्चिताप्त-प्रणेतृकाणाम् एव। तन् न प्रामाण्यं प्रति प्रत्यक्ष-शब्दयोर् विशेषम् उपलभामहे। एष तु विशेषः स्यात्, प्रत्यक्षं चक्षुर्-आदि-सामग्री-विशेष-जन्यत्वात् सन्निहित-नियतार्थ-ग्राहि स्पष्ट-प्रतिभासं, शाब्दं तु तथा-विध-कारण-विकलत्वान् नियतानियतार्थ-ग्राह्य् अस्पष्ट-प्रतिभासम्। न चैष विशेषः प्रामाण्य-क्षति-कारी, इतरथानुमानस्याप्य् अप्रामाण्यम् आसज्येत, तस्याप्य् अविशदानियतार्थ-ग्राहित्वात्। परमार्थतस् तु त्रि-काल-व्यापिनः सर्वार्थ-ग्रहण-स्वभावत्वेऽप्य् आवरण-तिरस्-कृतस्य जीव-द्रव्यस्य चक्षुर्-आदि-सामग्री-सापेक्षावरण-क्षयोपशम-वशात् सन्निहित-स्पष्टार्थ-ग्रहण-परिणामः प्रत्यक्षम् इत्य् उच्यते। शब्द-सापेक्ष-क्षयोपशमान् नियतानियताविशदार्थ-ग्रहण-परिणामस् तु शाब्दम् इति। तन् न तद्-उत्पत्ति-तद्-आकारते प्रत्यक्षे शाब्देऽन्यस्मिन् वा ज्ञाने वास्तव्यौ स्तः। तस्मात् पारमार्थिकाभिधेय-प्रयोजन-सम्बन्ध-प्रतिपादकम् एतद् आदि-वाक्यम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ०।५] तत्राभिधेयं वाच्यं, तच् चेह प्रमाणम्, तस्यैव प्रकरणेन प्रतिपाद्यत्वात्॑ तत् प्रमाणेत्य् अवयवेन लक्षयति। प्रयोजनं द्वेधा॒ श्रोतुः कर्तुश् च। पुनर् अपि द्विविधम्॒ अनन्तरं व्यवहितं च। तत्र श्रोतुर् अनन्तर-प्रयोजनं प्रमाण-विषया व्युत्पत्तिः, कर्तुर् व्युत्पद्यमानस्य प्राज्ञत्वाच् छिष्यस्य व्युत्पादनम्। तत्रात्म-प्रयोजनं दर्शयन्न् आ[हा]रभ्यत इति अस्य मयेति-पद-सव्यपेक्षत्वात्। शिष्य-प्रयोजनं तु व्युत्-पद्-इत्य् अनेनोपसर्ग-धातु-समुदायेनैव तद्-अन्तर्-अगतं लप्स्यत इत्य् अभिप्रायवान् कर्तात्म-व्यापारं णिज्-अन्तेन निर्दिशति॒ प्रमाण-व्युत्पादनार्थम् इति। व्यवहित-प्रयोजनं द्वेधा॒ व्यावहारिकं पारमार्थिकं च। व्यावहारिकं हेयोपादेयोपेक्षणीयेष्व् अर्थेषु हानोपादानोपेक्षा-लक्षणम्। पारमार्थिकं अभ्युदय-निःश्रेयसावाप्तिर् इति। एतत् तु साक्षाद् अनुक्तम् अप्य् अनन्तर-प्रयोजन-फलत्वात् तद्-वचनेनैवाक्षिप्तम् अवगन्तव्यम्। सम्बन्धस् त्ûपायोपेय-लक्षणः॑ तत्रोपेयं प्रकरणार्थ-परिज्ञानम्, प्रकरणम् उपायस्, ततस् तद्-अभिलषता प्रकरणम् इदम् आरम्भणीयम् इत्य् अनुक्तोऽपि वचनेन सम्बन्धोऽर्थाद् गम्यत इति तात्पर्यार्थः।
[न्या०वि० ०।६] अधुनाक्षरार्थो विव्रियते॒ तत्र यद्य् अपि प्रमाण-शब्दस्य सर्व-कारकैर् भावेन च व्युत्पत्तेः सुकरत्वात् "कृत्य-ल्युटो बहुलम्" अन्यत्रापीति-वचनाद् यथा-क्रमम् अमी कर्त्र्-अर्थादि-कारक-भाव-व्युत्पत्त्या प्रमाण-शब्द-वाच्याः, तद् यथा आत्मार्थ-ज्ञानार्थ-क्रिया-कारण-कलाप-क्षयोपशम-क्रिया-रूपाः तथापीह ज्ञानम् एवाधिक्रियते, तस्यैव परीक्षा-क्षमत्वाद्॑ इतरेषां परीक्षायास् तत्-पुरःसरत्वाद् वैयर्थाच् च। तथा हि॒ नार्थस् तावद् आत्मनः परीक्षया, तस्य भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञानेषु समानत्वात्। नाप्य् अर्थस्य, तस्योपेयत्वाद्, उपाय-भूत-ज्ञान-परीक्षणेनैव गतत्वात्। नार्थ-क्रियायास्, तद्-अवगतौ परीक्षा-वैयर्थ्यात्। नापि कारण-कलापस्य, ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् स्वरूपानवगतेः, पश्चात् तत्-स्वरूप-निर्णयाद् एव तत्-साद्गुण्य-वैगुण्यावगतेर् नैरर्थक्यात्। नापि क्षयोपशमस्य, तस्य ज्ञानोत्पादोन्नीयमान-रूपत्वात्। नापि प्रमिति-मात्रस्य, तस्य प्रमाण-साध्यतया तच्-चारुता-द्वारेणैव समीचीनता-सिद्धेर् इति। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यद्य् अप्य् अनन्त-धर्माध्यासिते वस्तुनि सर्व एव शब्दार्था निरुपचरिता घटन्ते, तथापि येनार्थं परिच्छिद्यार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एवेह ज्ञानम् आत्मना सह धर्मि-रूपतया तादात्म्येऽपि धर्म-रूपतया व्यतिरिक्तं प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तस्य व्युत्पादनं पर-परिकल्पित-लक्षणादि-व्युदासेन स्वाभिप्रेत-लक्षणादि-स्वरूप-प्रकाशनम्। तद्-अर्थम्॒ अर्थ-शब्दः प्रयोजन-पर्यायः। इदम् इत्य् अर्थ-रूपतया स्व-चेतसि विवर्तमानं प्रकरण-शरीरं परामृशति॑ द्विविधं हि प्रकरण-शरीरं॒ शब्दोऽर्थश् चेति, बहिः शब्द-रूपतया प्रकाशयिष्यमाणत्वेऽप्य् अन्तस् तत्त्वार्थाकारेण प्रत्यक्षत्वात्। आरभ्यत इति पद-वाक्य-श्लोकादि-रचनया प्रक्रियत इति यावत्।
[न्या०वि० ०।७] इह च लक्षण-संख्या-गोचर-फलेषु प्रमाणं प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे। तथा हि॒ लक्षणे तावत् प्रमाणम् अविसंवादि ज्ञानम् इति सौगताः। अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम् इति मीमांसकाः। अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम् इति नैयायिकादयः। तथा संख्यायां॒ प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति सौगताः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानार्थापत्त्य्-अभावाः प्रमाणानीति मीमांसकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दोपमानानि प्रमाणानीति नैयायिकाः। प्रत्यक्षानुमान-शब्दानि प्रमाणानीति वैशेषिकाः। एतान्य् एव सांख्याः। प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इति चार्वाकाः। तथा गोचरे॒ परस्पर-विनिर्लुठित-क्षण-क्षयि-परमानु-लक्षणानि स्वलक्षणानि प्रमाण-गोचरस् तात्त्विक इति बौद्धाः। सामान्य-विशेषात्मकं वस्त्व् इति मीमांसकाः। परस्पर-विभक्तौ सामान्य-विशेषाव् इति नैयायिक-वैशेषिकाः। त्रैगुण्य-रूपं सामान्यम् इति सांख्याः। भूत-चटुष्टयं प्रमाण-भूमीति चार्वाकाः। तथा फलेऽपि विप्रतिपद्यन्ते॒ अर्थाधिगतिः प्रमाण-फलम् इति सौगताः। पूर्वं पूर्वं प्रमाणम् उत्तरम् उत्तरं तु फलम् इति मीमांसकादयः।
[न्या०वि० १।०] तत्र तावल् लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराचिकीर्षुर् आह :
प्रमाणं स्व-पराभासि ज्ञानं, बाध-विवर्जितम् ।
प्रत्यक्षं च परोक्षं च द्विधा, मेय-विनिश्चयात् ॥ न्यायावतार १ ॥
[न्या०वि० १।१] तत्रापि पूर्वार्धेन लक्षण-विप्रतिपत्तिम् उत्तरार्धेन तु संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे। लक्षणं च पर-रूपेभ्यो व्यावर्तन-क्षमोऽसाधारण-धर्मः। लक्ष्यते परिच्छिद्यते विजातीयेभ्यो व्यावृत्तं लक्ष्यं येन तल् लक्षणम् इत्य् उच्यते। तच् चेह द्वये प्रत्याय्याः, स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणास् तीर्थान्तरीया विप्रतिपन्नास्, तथा मुग्ध-बुद्धयो लौकिका अव्युत्पन्नाश् चेति। ततश् च यदादौ विप्रतिपन्नान् प्रति लक्षणं तदैवं लक्ष्य-लक्षण-भावो द्रष्टव्यो॒ यद् इदं भवताम् अस्माकं च प्रमाणम् इति प्रसिद्धम्, तत् स्व-पराभासि ज्ञानं बाध-विवर्जितं मन्तव्यम्॑ प्रसिद्धं प्रमाणम् अनूद्याप्रसिद्धं स्व-पराभासित्वादि विधीयते। यदा त्व् अव्युत्पन्न-मतीन् प्रतीदं लक्षणम्, तदा प्रतिप्राणि स्व-पर-प्रकाशिनो ज्ञानस्य बाध-रहितस्य कस्यचित् सिद्धत्वाद्, अन्यथा प्रतिनियत-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद्, एवं ते बोध्यन्ते॒ यद् अदो भवतां क्वचिन् नियतार्थ-ग्राहि स्व-पर-प्रकाशकं बाध-रहितं ज्ञानं प्रसिद्धं तत् प्रमाणम् इति बुध्यन्ताम्। अत्रापि सिद्धस्यानुवादोऽसिद्धस्य विधानं योज्यम्।
[न्या०वि० १।२] अधुनाक्षरार्थस्॒ तत्र प्रमाणम् इति पूर्ववत्। स्व आत्मा स्वरूपं, परोऽर्थस्, ताव् आभासयितुं प्रकाशयितुं शीलम् यस्य तत्-तथा। ज्ञायते निर्णीयते तत्त्वं येन तज् ज्ञानम्। बाध्यतेऽनेनेति बाधः॑ विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाण-प्रवृत्तिर् इति यावत्। तेन विशेषेण वर्जितं रहितं यज् ज्ञानं तत् प्रमाणम् इति सण्टङ्कः।
[न्या०वि० १।३] इह च व्यवच्छेद्यापेक्षया लक्षणे विशेषण-प्रवृत्तेः स्व-पराभासीत्य् अनेन ये स्वाभास्य् एव ज्ञानं मन्यन्ते ज्ञान-वादिनो बौद्ध-विशेषाः, ये च पराभास्य् एव मीमांसक-नैयायिकादयस् ते निरस्ताः। ते हि बहिर्-अर्थाभावाज् ज्ञानं स्वांश-पर्यवसित-सत्ताकम् इत्य् आचक्षीरन्, तद् अयुक्तम्, ज्ञेयार्थाभावे ज्ञानाभाव-प्रसङ्गात्। अथार्थाभावेऽपि स्वप्न-दशायां वन-देव-कुलादि-नाना-प्रतिभासं ज्ञानम् अवलोकितम् इति तथा-भूतं सकलं ब्रूषे, तन् न, तस्यापि जाग्रद्-अवस्था-भावि-सद्भूतार्थ-दर्शन-सम्पादितात्म-संस्कार-मिद्धादि-कारण-कलाप-सन्निधान-प्रबोध-सव्यपेक्षत्वाद्॑ इतरथात्यन्ताननुभूत-भूत-पञ्चकातिरिक्त-षष्ठ-भूत-प्रतिभासः स्यात्। किं च, कथम् एकं ज्ञानं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-विवर्तम् इति प्रष्टव्यो भवान्। अनाद्य्-अविद्या-वासनाद् इति चेद्, अत्रापि विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ ततो ज्ञानात् सा वासना व्यभैत्सीद् वा न वा? व्यत्यरैक्षीच् चेद्, एवं सति तद्-ग्राहक-प्रमाणम् अभिधानीयम्, ज्ञान-व्यतिरिक्तायाः संवेदनाभावात्, तत्-संवेदने चार्थस्यापि व्यतिरिक्तस्य संवेदनम् इति स दुष्प्रतिषेधः स्यात्। वेद्य-वेदकाकार-कलुषिताज् ज्ञानाद् एव व्यतिरिक्ता तत्-कारण-भूता ज्ञान-रूपैव सानुमीयत इति चेन्, न, तया सह सम्बन्ध-ग्रहणाभावाद्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाच् च। किं च, यथा व्यतिरिक्त-वासना-वशाद् एकम् अपि ज्ञानं नानाकारम्, तथा जडम् अपि तद्-वशाद् एव बोध-रूपं प्रकाशत इति विपरीतापत्तेर् अर्थ एव सिद्धिम् आस्कन्देन्, न ज्ञानम्। अथाव्यतिरिक्ता, हन्त ज्ञानम् एव तन्, न वासना तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवद् इत्य् आस्तां तावत्। पराभास्य् अपि स्व-प्रकाशाभावाद् अभिदधीरंस्, तद् अप्य् असम्बद्धम्, स्व-प्रकाशाभावे पर-प्रकाशायोगात्। न हि प्रदीपः स्वरूपम् अनुद्द्योतयन् घटाद्य्-उद्द्योतने व्याप्रियते। स्वयं चाप्रतीतम् अपि यद्य् अर्थं ग्राहयति ज्ञानं, देवदत्तस्योत्पन्नं यज्ञदत्तं ग्राहयेद्, विशेषाभावात्। अन्यच् च, पर-प्रकाशन-मात्रे दूरासन्नादि-भेदः प्रथमानानाम् अर्थानां किम्-अपेक्षश् चकास्ति? शरीरापेक्ष इति चेन्, न, तस्यापि प्रकाश्यताविशेषात्, तस्माद् अन्तर्-मुखाकारस्य बहिर्-अर्थ-ग्रहणे सत्य् अयं घटाम् आटीकते नान्यथा। अथार्थापत्त्य्-आदिना प्रमाणान्तरेण तद् अन्तर्-निविष्टं गृह्यते, ततस् तद्-अपेक्षया योक्ष्यते दूरासन्नादि-भेद इति चेन्, न, तत्रापि विकल्प-युगलकानतिवृत्तेः॑ तथा हि॒ तत् प्रमाणान्तरं स्व-प्रकाशम् अन्य-प्रकाशं वा? स्व-प्रकाशं चेत्, प्रथमस्य किं क्षूणम्?! अन्य-प्रकाशं चेत्, तत्रापीयम् एव वार्तेत्य् अनवस्था। तस्मात् स्वरूपम् अवभासयद् एव ज्ञानम् अर्थ-ग्रहणाय व्याप्रियत इति स्थितम्।
[न्या०वि० १।४] ज्ञानम् इत्य् अनेन तु यन् नैयायिकादिभिः पर्यकल्पि सन्निकर्षः प्रमाणम् इति तस्य प्रामाण्यं निरस्यति। यतः स्नान-पानावगाहनाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमम् अर्थं निश्चित्याव्यवधानेन प्रवर्तन्ते प्रमातारस् तद् एव ज्ञानं प्रमाणम्, न सन्निकर्षो जडतयास्ति, अव्यवहित-निर्णयाभावाद् इत्य् आकूतम्। अर्थोपलब्धि-हेतुत्वात् तस्य प्रामाण्यम् इति चेद्, विशीर्णेदानीं प्रमाणेयत्ता, देहादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्यापत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० १।५] बाध-विवर्जितम् इत्य् अमुना तु यत् तिमिरादि-तिरस्-कृत-नयन-दीधिति-प्रसरादीनां नभस्-तलावलम्बि-निशीथिनी-नाथ-द्वयादि-प्रतिभासं, यच् च कुतर्क-भ्रान्त-चेतसां निज-निज-दर्शनाकर्णन-प्रभवं क्षण-क्षयि-सामान्य-विशेषैकान्तेश्वरादिकृत-भुवन-प्रतिभासं ज्ञानं तत्-प्रत्यनीकार्थ-प्रत्यायक-प्रमाणान्तरोपनिपात-प्लावितत्वात् प्रतिक्षिपति। विशेषार्थ-वि-शब्दोपादानात् तु यः खलु बहुल-कामलावलेप-लुप्त-लोचन-बलानां धवले जलजे पीतिमानम् आदधानो बोधः समुल्लसति, स यद्य् अपि सकल-कालं तद्-दोषाव्युपरमे प्रमातुर् निज-दर्शनेन न बाध्यते, तथापि तज्-जलज-धवलता-ग्राहिना जनान्तर-दर्शनेन बाधितत्वान् न प्रमाणम् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०वि० १।६] समस्त-लक्षणेन तु यत् परे प्रत्यपीपदन्न् "अनधिगतार्थाधिगन्तृ प्रमाणम्", "अविसंवादकं प्रमाणम्", "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य्-आदि तन् निरास्थत्। तथा ह्य्॒ अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वं किम् अभिधीयते? ज्ञानान्तरेणानधिगतम् अर्थं यद् अधिगच्छति तत् प्रमाणम् इति चेत्, तर्हि तज् ज्ञानान्तरं परकीयं स्वकीयं वा? तद् यदि परकीयं, तद् अयुक्तं, सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सकलार्थ-गोचरतया सर्व-प्राकृत-लोक-ज्ञानानाम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्, तद्-अर्थ-ग्राहि-जनान्तर-दर्शन-सम्भवाच् च। अथ स्वकीयं, तत्रापि सोऽधिगम्योऽर्थः किं द्रव्यम् उत पर्यायो यद् वा, द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः पर्याय-विशिष्टं वा द्रव्यम् इति, तथा किं सामान्यम् उत विशेष, आहोस्वित् सामान्य-विशिष्टो विशेषः, विशेष-विशिष्टं वा सामान्यम् इत्य् अष्टौ पक्षाः। तत्र यद्य् आद्यम् उररी-कुरुषे, तद् अयुक्तं, द्रव्यस्य नित्यत्वैकत्वाभ्याम् अनधिगतांशाभावात्। अथ द्वितीयं, तद् अप्य् अचारु, पर्यायस्य प्राचीन-संवेदनोदय-समय-ध्वस्तस्य संवेदनान्तर-प्रभव-कालं यावत् प्रतीक्षणासम्भवेन विशेषणानर्थक्यात्। उत तृतीयं, तद् अप्य् असाधीयो, विकल्प-द्वयानतिक्रमात्। स हि द्रव्य-विशिष्टः पर्यायः सम-काल-भाविना ज्ञानेनानधिगतोऽधिगम्यते, यद् वा कालान्तर-भाविनेति। न तावत् सम-काल-भाविना, तत्-सम्भवाभावेन विशेषण-वैफल्यात्। न हि सम्भवोऽस्त्य् एकस्य प्रमातुर् एक-कालं द्रव्य-क्रोडी-कृतैक-पर्याय-विषय-संवेदन-द्वय-वृत्तेः, तथानुभवाभवात्, परस्परम् अधिगतार्थाधिगन्तृत्वेनाप्रामाण्य-प्रसङ्गाच् च। नापि कालान्तर-भाविना, गृह्यमाण-पर्यायस्य कालान्तरानास्कन्दनात्, पूर्वोत्तर-क्षण-त्रुटित-वर्तमान-क्षण-मात्र-सम्बद्धत्वात् तस्य। एतेन पर्याय-विशिष्ट-द्रव्य-पक्षोऽपि प्रतिव्यूढः, समान-योग-क्षेमत्वात्। अथ सामान्यं, तद् अप्य् असम्बद्धं, तद्-एकतया प्रथम-ज्ञानेन साकल्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां सामान्य-ज्ञानानाम् अधिगतार्थ-गोचरतयाप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अथ विशेषः, स नित्योऽनित्यो वेति वक्तव्यम्। नित्यश् चेद्, एवं सत्य् आद्य-संवेदनेनैव तस्य सामस्त्य-ग्रहणाद् उत्तरेषां तद्-विषयाणाम् अधिगत-गोचरत्वेनाप्रामाण्य-प्रसक्तिः। अनित्यश् चेत्, पर्याय-दूषणेन प्रतिक्षिप्तिः। अथ सामान्य-विशिष्टो विशेषः, कास्य विशिष्टता॒ किं तादात्म्यम् उत तत्-सन्निधि-मात्रम्? तादात्म्यं चेत्, प्रथम-ज्ञानेन सामान्यवत् तस्यापि ग्रहःात्, अन्यथा तादात्म्य-क्षतेस्, तद्-विषयान्य-ज्ञानानाम् अप्रामाण्यं प्रसज्येत। तत्-सान्निध्य-पक्षे तु द्वयोर् अपि परस्परं विशकलित-रूपत्वात् पक्ष-द्वयोदितं दूषणं पश्चाल्-लग्नं धावति। विशेष-विशिष्ट-सामान्य-पक्षे पुनर् एतद् एव विपरीतं योज्यम्। तन् नानधिगतार्थाधिगन्तृत्वं ज्ञानस्य कथञ्चिद् विचार-भार-गौरवं सहत इत्य् अलक्षणम् इति स्थितम्। अविसंवादकत्वम् अधुना विचार्यते॒ तत् किं प्रदर्शितार्थ-प्राप्त्याहोस्विद् प्राप्ति-योग्यार्थोपदर्शकत्वेन उताविचलितार्थ-विषयत्वेन भवान् ज्ञानस्य प्रामाण्यं कथयति? यदि प्रथमः कल्पस्, तद् अयुक्तं, जल-बुद्बुद्-आदि-मुमूर्षु-पदार्थोत्पादित-संवेदनस्याप्रमाणतोत्पत्तेः, प्राप्ति-काले तस्य ध्वस्तत्वात्। अथ द्वितीयस्, तद् अप्य् अचारु, प्राप्त्य्-अयोग्य-देश-स्थित-ग्रह-नक्षत्रादि-गोचर-ज्ञानस्याप्रामाण्य-प्रसक्तेर्, अनुचित-देशावस्थानेनैव प्राप्त्य्-अनर्हत्वात् तेषाम्। अथ तृतीयः पक्षस्, तत्राप्य् अविचलित-विषयतां कथम् अवैषि? ज्ञानान्तरेण तद्-विषय-निराकरणाभावाद् इति चेद्, एतद् एवास्माभिर् उदितं॑ किं भवतः परुषम् आभाति? न हि स्व-पर-प्रकाशि ज्ञानं बाधा-रहितं विमुच्यान्यस्य विषयानिराकरणं ज्ञानान्तरेण प्रेक्षामहे। तत् तद् एव न्यायात् प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगतम् इति। "अर्थोपलब्धि-हेतुः प्रमाणम्" इत्य् एतद् अपि न परीक्षां क्षमते, शरीरादेर् अपि तत्-कारणतया प्रामाण्य-प्रसङ्गात्। अव्यवहितम् अर्थोपलम्भ-कारणं प्रमाणं, न देहादिकम् इति चेद्, एवं तर्हि ज्ञानम् एव स्व-पराविर्-भावकं निर्बाधकं च प्रमाणं, न सन्निकर्षादि, तद्-सद्भावेऽप्य् अर्थ-परिच्छेदाभावात्। तस्माद् एतद् एव चारु प्रमाण-लक्षणम् इति।
[न्या०वि० १।७] अधुना तत्-संख्याम् आह : प्रत्यक्षं चेत्य्-आदि॑ तत्र सिद्धान्त-प्रसिद्ध-पारमार्थिक-प्रत्यक्षापेक्षयाक्ष-शब्दो जीव-पर्यायतया प्रसिद्धः। इह तु व्यावहारिक-प्रत्यक्ष-प्रस्तावाद् अक्ष-ध्वनिर् इन्द्रिय-वचनो गृह्यते। ततश् चाक्षं प्रतिगतं प्रत्यक्षं। यद् इन्द्रियम् आश्रित्योज्जिहीतेऽर्थ-साक्षात्-कारि ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् इत्य् अर्थः। एतच् च प्रत्यक्ष-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्तं, न तु प्रवृत्ति-निमित्तम्। स ह्य् एवं व्युत्पादितः साक्षाद् ग्राह्य-ग्राहकं ज्ञान-विशेषं लक्षयति, तत्रैव रूढत्वात्, यथा गमन-क्रियायां व्युत्पादितोऽपि गो-शब्दः ककुद्-आदिमन्तं पिण्ड-विशेषं गच्छन्तम् अगच्छन्तं वा गोचरयति, तत्रैव तस्य प्रसिद्धत्वात्, न गमन-क्रिया-युक्तम् अपि पुरुषादिकं, विपर्ययाद् इति। ततश् च सर्व-ज्ञानानां यत् स्वरूप-संवेदनं तद् अपि प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तं भवति, तत्रापि स्वरूपस्य ग्राह्यस्य साक्षात्-करण-सद्भावाद् इति। अक्षेभ्यः परतो वर्तत इति परोक्षम्। अक्ष-व्यापार-निरपेक्षं मनो-व्यापारेणासाक्षाद्-अर्थ-परिच्छेदकं यज् ज्ञानं तत् परोक्षम् इति-भावः।
[न्या०वि० १।८] च-शब्दौ प्रत्यक्ष-परोक्षयोस् तुल्य-कक्षतां लक्षयतः। तेन यत् परे प्राहुः॒ "प्रत्यक्षं सकल-प्रमाण-ज्येष्ठम्" इत्यादि तद् अपास्तम् भवति, द्वयोर् अपि प्रामाण्यं प्रत्य् अविशेषात्, विशदाविशद-प्रतिभास-विशेषस्य सतोऽपि ज्येष्ठतां प्रत्य् अनङ्गत्वात्। प्रत्यक्षस्य पुरःसरत्वात् परोक्षस्य कनिष्ठतेति चेन्, नायम् एकान्तः, सर्वत्रान्यथानुपपन्नतावधारितोच्छ्वास-निःश्वासादि-जीव-लिङ्ग-सद्भावासद्भावाभ्यां जीव-साक्षात्-कारि-प्रत्यक्ष-क्षूणेऽपि जीवन्-मृत-प्रतीति-दर्शनाद्, अन्यथा लोक-व्यवहाराभाव-प्रसङ्गात्। क्वचित् प्रत्यक्ष-परिगृहीत-सम्बन्ध-बलात् परोक्षं प्रवर्तत इति प्रत्यक्षस्य ज्येष्ठत्व-कल्पने "पश्य मृगो धावतीत्य्"-आदि-शब्द-बलात् कृकाटिका-मोटन-द्वारेण मृग-विषयम्, तथा स्मरणात् सङ्केत-ग्रहणाद् वापूर्वापूर्वार्थ-दर्शन-कुतूहलादिना वन-देव-कुलादि-गोचरं परोक्ष-पूर्वं प्रत्यक्षं दृष्टम् इति परोक्षस्य ज्येष्ठतासज्येत।
[न्या०वि० १।९] द्विधेति। "सर्वं वाक्यं सावधारणं प्रवर्तत" इति न्यायाद्, अन्यथा नियतार्थाप्रदर्शकत्वेन तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गाद्, विपरीताकार-निराकरण-चातुर्यायोगेन निराकाङ्क्ष-प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् द्विधैवेत्य् अवधारणेन पर-परिकल्पित-विपरीत-संख्यान्तरं तिरस्-कुरुते, तस्य युक्ति-बाधितत्वात्।
[न्या०वि० १।१०] तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणम् इत्य् असत्, परोक्षाभावे तस्यैव प्रामाण्यायोगात्। स हि काश्चित् प्रत्यक्ष-व्यक्तीर् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रापकत्वेनाव्यभिचारिणीर् उपलभ्यान्यास् तद्-विपरीततया व्यभिचारिणीश् च, ततः कालान्तरे पुनर् अपि तादृशेतराणां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रमाणतेतरते समाचक्षीत। न च पूर्वापर-परामर्श-शून्यं पुरो-वर्त्य्-अर्थ-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकं प्रत्यक्षं पूर्वापर-काल-भाविनीनां प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां सादृश्यं प्रामाण्य-निबन्धनम् उपलक्षयितुं क्षमते। न चायं स्व-प्रतीति-गोचराणाम् अपि प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्यं परं प्रतिपादयितुम् ईशः। तस्माद् अवश्यन्तया यथादृष्ट-प्रत्यक्ष-व्यक्ति-साधर्म्य-द्वारेणाधुनातन-प्रत्यक्ष-व्यक्तीनां प्रामाण्य-प्रत्यायकं पर-परिपादकं च परोक्षान्तर्-गतम् अनुमान-रूपं प्रमाणान्तरम् उररी-कर्तव्यम्। परावबोधार्थं च प्रत्यक्षम् एवैकं प्रमाणं नान्यद् अस्तीत्य् उल्लपन्न् उन्मत्तताम् आत्मनो लक्षयति, प्रत्यक्षेण पर-चेतो-वृत्ति-साक्षात्-करणाभावाद् व्यापार-व्याहार-चेष्टा-विशेष-दर्शनाद् बोध-विशेषावगतौ परोक्षस्य प्रामाण्यं बलाद् आपततीति न्यायात्। स्वर्गादृष्ट-देवतादि-प्रतिषेधं न प्रत्यक्षेण कर्तुम् अर्हति, तस्य सन्निहित-मात्र-विषयत्वात्। न चायं तद्-प्रतिषेधेन खर-खरक-चार्वाकताम् आप्नोति, प्रमाणान्तरं च तत्-प्रतिषेधार्थं नेच्छतीति विषमम् एतत् कथं कुर्याद् इति सविस्मयं नश् चेतः। किं च, प्रत्यक्षम् अपि कथं प्रमाणतां स्वी-करोतीति वक्तव्यम्, गृह्यमाण-पदार्थान्वय-व्यतिरेकानुकरणात्। तथा हि॒ तत् समग्र-सामग्रीक-पदार्थ-बलेनोन्मज्जति, तत्-अभावे विस्फारितेक्षण-युगलस्यापि प्रमातुर् नोदीयत इति यदि ब्रूषे, परोक्षेऽपि तर्हि समानम् एवैतत्, तद् अपि बहिर्-अर्थ-सामर्थ्याद् एवोल्लसति, तत्-सम्बद्ध-लिङ्ग-शब्द-द्वारेण तस्योत्पत्तेर्, अन्यथा परोक्षाभासता-प्रसङ्गात्, तस्य चालीकत्वे पारमार्थिक-परोक्ष-प्रामाण्य-क्षतेर् अयोगाद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् अपि गगन-तलावलम्बि-शश-धर-युगलावलोकन-चतुरम् अलीकम् अवलोकितम् इति सकल-विशद-दर्शनानि सत्यताभिमतान्य् अप्य् अलीकताम् अश्नुवीरन्। तन् न प्रमाण-भूतं परोक्षं कदाचन गृह्यमाण-पदार्थ-सत्तां विहायोत्पत्तुम् उत्सहत इति प्रत्यक्षवत् प्रमाण-कोटिम् आरोहति बलाद् इति स्थितम्।
[न्या०वि० १।११] तथा यद् अपि परैर् उक्त-द्वयातिरिक्तं प्रमाण-संख्यान्तरं प्रत्यज्ञायि, तत्रापि यत् पर्यालोच्यमानम् उपमानार्थापत्तिवत् प्रमाणताम् आत्मसात्-करोति, तद् अनयोर् एव प्रत्यक्ष-परोक्षयोर् अन्तर्-भावनीयम्। यत् पुनर् विचार्यमाणं मीमांसक-परिकल्पिताभाववत् प्रामाण्यम् एव नास्कन्दति, न तेन बहिर्-भूतेनान्तर्-भूतेन वा किञ्चिन् नः प्रयोजनम् अवस्तुत्वाद् इत्य् अपकर्णनीयम्।
[न्या०वि० १।१२] अथ कथम् उपमानस्य प्रामाण्यम् इति ब्रूषे, तद् उच्यते॒ प्रथमं हि विशद-दर्शनाधिगत-गो-पिण्ड-विशेषस्य "यथा गौस् तथा गवय" इति वाक्याकर्णनाहितात्म-संस्कारस्य पुंसोऽटव्यां पर्यटतो गवय-पिण्ड-विशेष-विषय-विविक्त-दर्शन-पुरःसरं यत् पूर्वापर-गो-गवय-पिण्ड-गोचर-दर्शन-व्यापार-सम्पादित-जन्मकम् अयं तेन सदृशोऽनयोर् वा सादृश्यम् इति सादृश्य-विशिष्टं पिण्डं पिण्ड-विशिष्टं सादृश्यं वा गोचरयत् संवेदनम् उदीयते तद् उपमानम् इति। यथाहुस् तद्-वादिनः॒
"तस्माद् यद् दृश्यते तत् स्यात् सादृश्येन विशेषितं ।
प्रमेयम् उपमानस्य सादृश्यं वा तद्-अन्वितम्" ॥ न्या०वि० १।१२:१ ॥
इति।
[न्या०वि० १।१३] ततश् च पूर्वापर-दर्शनयोः पुरो-वर्ति-गो-गवय-पिण्ड-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात् पूर्वापर-परामर्श-शून्यत्वाद् विशद-निर्भासितया शब्दोल्लेख-रहितत्वात् तद्-अधिकम् अव्यभिचरितं व्यवहार-कारि सादृश्यम् अवस्यद् उपमानं स्व-पर-प्रकाशितया निर्बाधकत्वाच् च प्रमाणम्। पूर्वापर-पिण्डातिरिक्तम् अपरं सादृश्यं नोपलभ्यत इति चेत्, कोऽयम् उपलम्भो येन नोपलभ्यते सादृश्यं यदि प्रत्यक्षं तत्? यदि प्रत्यक्षे सादृश्यम् उपमान-गोचरत्वान् न प्रतिभाति, कोऽस्यापराधः? न हि ज्ञानान्तरे तद्-गोचरो न प्रतिभातीति निर्गोचरं तद् इति वक्तुं शक्यम्, इतरथोपमानेऽपि प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्या व्यक्तिर् न भातीति निर्गोचरम् अध्यक्षम् अनुषज्येत। तद् यथा स्व-विषयेऽध्यक्षं प्रमाणं तथोपमानम् अपि। न हि द्वयोः प्रथमानयोर् एकं प्रति विशेषाभावे पक्ष-पातः कर्तुं युक्तः। एतेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञान-स्मृत्य्-ऊहादीनाम् अविसंवादकानां परोक्ष-विशेषाणां प्रामाण्यं व्याख्यातम् अवगन्तव्यं, समान-न्यायानुपातित्वात्। तथा हि॒ प्रथमम् अर्थ-दर्शनम् आत्मनि संस्कारम् आधत्ते, तादृश-दर्शनाद् असौ संस्कारः प्रबुध्यते, प्रबुद्धः पूर्वार्थ-विषयं स एवायं तज्-जातीयो वेत्य् उल्लेखेन प्रत्यभिज्ञा-ज्ञानम् उत्थापयति, तस्योर्ध्व-तिरश्चीन-भेद-सामान्य-द्वयावस्थापकत्वाद्, असञ्जात-पूर्वार्थ-गोचर-दर्शनस्य तद्-उदयाभावात्। तथा स एव संस्कारस् तादृशार्थ-दर्शनेनाभोगादिना वा प्रबुद्धोऽनुभूत-विषयासम्प्रमोष-लक्षणं स्मरणम् उपजनयत्य्, अदृष्टार्थस्य पुंसः स्मरणानुपपत्तेर् इति। ऊहोऽपि प्रत्यक्षानुमानासंवेद्य-साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणः प्रमाणान्तरम् इति कथयिष्यते।
[न्या०वि० १।१४] अर्थापत्तिस् तु प्रत्यक्षादि-गोचरी-कृत-स्फोटादि-पदार्थान्यथानुपपत्त्या दहन-शक्त्य्-आदिकं पावकादेर् अर्थान्तरं पूर्व-दर्शन-गोचरात् समधिकम् अव्यभिचरितं परिकल्पयन्तीति प्रमाणतां स्वी-करोत्य् एव, तल्-लक्षण-योगात्। एवम् अन्यद् अपि प्रत्यक्ष-गोचराधिक्य-सम्पादकं निराकाङ्क्षतया व्यवहार-कारि यद् यत् संवेदनं तत् तत् प्रमाणम् इति समर्थनीयं, स्व-पर-प्रकाशि-निर्बाधत्वात्, पूर्वापर-सोपान-पद्धति-दर्शनोत्तर-काल-भावि-तत्-संख्या-संवेदनवत्। सर्वेषां चैतेषां परोक्षेऽन्तर्-भावो,ऽन्यथानुपपन्नार्थान्तर-दर्शन-द्वारेण प्रस्तुतार्थ-संवेदन-चतुरत्वाद् इति। किञ्चिद्-विशेषात् तु प्रमाणान्तर-परिकल्पने प्रमाणेयत्ता विशीर्येतानन्त्य-प्राप्तेर्,आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतया ज्ञान-प्रवृत्तेर् विचित्रत्वाद् इति। ननु चैवं सति यत् परोक्षस्य द्वैविध्यं वक्ष्यमाणम् अनुमान-शाब्द-भेदेन तद् अपि कथम् उपपत्स्यते, तत्रापि ह्य् आप्त-प्रणीत-वचन-प्रभव-ज्ञानस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वेनानुमानान्तर्-भावो न दुरुपपादः? ततश् चानुमानम् एवैकम् अवशिष्यते, तद् एव परोक्ष-शब्देन, यद्य् उच्यते युक्तम् आस्ते, विदुषाम् अभिधानं प्रत्य् अनादरात्॑ सत्यम् एतद्, एवं तु मन्यते॒ यद्य् अपि कयाचित् प्रक्रिययानुमाने शाब्दम् अन्तर्-भावयितुं शक्यं, तथापि तत् प्रति विप्रतिपद्यन्ते परे॑ऽतस् तस्याहत्य प्रामाण्यं समर्थनीयम्। न चापृथग्-भूतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम् इति, अतः पार्थक्येनोपन्यासः। अनेन चैतद् उपलक्षयत्य् अन्येषाम् अपि परोक्ष-विशेषाणाम् अनुमानान्तर्-भाव-सम्भवेऽपि यं यं प्रति परेषां विप्रतिपत्तिस् तं तं परोक्षान् निष्कृष्य विविक्त-युक्त्य्-उपन्यासेन तस्य तस्य प्रामाण्यम् आवेदनीयम्। तथा च शास्त्रान्तरे यद् ऊहादीनां लक्षणम् अकार्य् आचार्यैस् तद् युक्तम् एवेत्य् उक्तम् भवति।
[न्या०वि० १।१५] कथं तर्हि मीमांसक-परिकल्पितोऽभावो न प्रमाणम्? निर्गोचरत्वाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ प्रत्यक्षम् एवान्वय-व्यतिरेक-द्वारेन "भू-तलम् एवेदं, घटादिर् नास्तीति" वस्तु-परिच्छेद-प्रावीण्यम् आबिभ्राणं तद्-अधिक-ग्राह्यार्थाभावात् प्रमाणान्तरं परिकल्प्यमानं निरस्यतीति किं नश् चिन्तया, तस्य सद्-असद्-रूप-वस्तु-ग्राहिणः प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। अथ कदाचिद् अभिदध्याद्॒ अध्यक्षं भावांशम् एवाकलयतीन्द्रिय-द्वारेणोत्पत्तेस्, तस्य च भावांश एव व्यापारान्॑ नास्तिता-ज्ञानं तु वस्तु-ग्रहणोत्तर-कालं प्रतियोगि-स्मरण-सद्भावे मानसम् अक्ष-व्यापार-निरपेक्षम् उन्मज्जति। तद् उक्तम्॒
"न तावद् इन्द्रियेणैषा नास्तीत्य् उत्पाद्यते मतिः ।
भावांशेनैव संयोगो योग्यत्वाद् इन्द्रियस्य हि" ॥ न्या०वि० १।१५॒१ ॥
"गृहीत्वावस्तु-सद्भावं स्मृत्वा च प्रतियोगिनं ।
मानसं नास्तिता-ज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षया" ॥ न्या०वि० १।१५॒२ ॥
[न्या०वि० १।१६] अत्रोच्यते भावांशाद् अभावांशस् तर्ह्य् अभिन्नो भिन्नो वा? अभिन्नश् चेत्, कथम् अग्रहणम्, भावांशाद् अव्यतिरिक्तत्वाद् एव, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेद्, घटाद्य्-अभाव-विनिर्लुठितं भू-तलम् आद्य-दर्शनेन गृह्यत इति घटादयो गृह्यन्त इति प्राप्तं, तद्-अभावाग्रहणस्य तद्-भाव-ग्रहणनान्तरीयकत्वात्। तथा चाभावोऽपि पश्चात् प्रवर्तमानस् तान् उत्सारयितुम् अपटिष्ठः स्याद्, अन्यथा प्रत्यक्षम् असङ्कीर्णस्य सङ्कीर्णता-ग्रहणाद् भ्रान्तम् आपनीपद्येत। किं च, प्रमाणाभावाद् अर्थाभावोऽभाव-प्रमाणेन साध्यत इति भवतोऽभिप्रायः॒
"प्रमाण-पञ्चकं यत्र वस्तु-रूपे न जायते ।
वस्तु-सत्तावबोधार्थं तत्राभाव-प्रमाणता" ॥ न्या०वि० १।१६॒१ ॥
[न्या०वि० १।१७] इति-वचनात्, तद् अयुक्तम्, यतः प्रमाणाभावः कथं ग्राह्यः? तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावाद् इति चेत्, तस्याप्य् अभाव-ग्रहणे तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावो ग्राह्य इत्य् अनवस्था। अथ अर्थाभावात् प्रमाणस्य प्रमाणाभावाच् चार्थस्याभावः प्रतिपद्येत इति मन्येथास्, तद् एतद् इतरेतराश्रयं दुर्घटम् आपद्येत॒ न यावद् अर्थाभावोऽगृहीतस् तावत् प्रमाणाभावः सिध्यत्य्, अर्थाभावश् च प्रमाणाभावात् सेत्स्यतीत्य् आवर्तनात्। अथेन्द्रियवत् स्वयम् अविज्ञातोऽपि प्रमाणाभावोऽर्थाभावं ज्ञापयिष्यतीत्य् अभिदधीथास्, तद् अयुक्तम्, तस्य तुच्छतया सकल-शक्ति-विरह-लक्षणत्वाद्, इन्द्रियस्य तु तद्-विपर्यस्ततया ज्ञानोत्पादन-दक्षत्वात्। तस्मात् प्रत्यक्षम् एवम् भू-तलादि-प्रतिनियत-वस्तु-ग्राहितां बिभर्ति, यदि तद्-विपरीत-घटादि-प्रतियोगि-वस्त्व्-अन्तर-वैविक्त्यं तस्याकलयति नान्यथा, विजातीय-व्यवच्छेदाभावे तस्यैव प्रतिनियतत्वासिद्धेः, सकल-सङ्कीर्णतया ग्रहण-प्रसङ्गात्। अतोऽधिक-ग्राह्याभावान् निर्विषयतयाभावाख्यं प्रमाणं यत् परैः पर्यकल्पि तद् अप्रमाणम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० १।१८] द्विधेत्य् अस्मिन् सत्य् अपि प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति नियत-द्वैविध्य-प्रदर्शनेन सौगत-परिकल्पितं ‘प्रत्यक्षम् अनुमानं चेतिऽ॑ द्वैविध्यम् अपक्षिपति, तद्-आकूतेन तस्यायोगात्। प्रत्यक्षातिरिक्तं हि तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धोपलक्षित-कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-सम्पादित-जन्मकम् अनुमानम् एव प्रमाणं, न शाब्दोहादिकं, सम्बन्ध-विकलत्वाद् इति तद्-आकूतम्। अयुक्तं चैतत्, प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-प्रमाणान्तराभाव-ग्रहणोपायाभावात्। न तावत् प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तराभावावगतिस्, तस्य स्वलक्षण-विषयत्वेनाभाव-ग्राहिता-विरोधात्। नापि स्वभाव-कार्यानुमानाभ्यां, तयोर् वस्तु-साधकत्वात्। नाप्य् अनुपलब्धेस्, तस्या अप्य् अत्यन्ताभाव-साधन-विरोधात्। सा हि चतुर्-विधा वर्ण्यते मूल-भेदापेक्षया, तद् यथा -- विरुद्धोपलब्धिर् विरुद्ध-कार्योपलब्धिः कारणानुपलब्धिः स्वभावानुपलब्धिश् चेति। न तावद् विरुद्धोपलब्धेः प्रमाणान्तरस्यात्यन्ताभावो, दृश्यात्मनो विरुद्धस्य विधानेनेतराभाव-साधनात्, सन्निहित-देश एव प्रतियोग्य्-अभाव-सिद्धेः। एतेन विरुद्ध-कार्योपलब्धिर् अपि व्याख्याता, तस्या अपि प्रतिषेध्य-विरोधि-सन्निधापन-द्वारेणाभाव-साधकत्वात्। कारणानुपलब्धिर् अपि तद्-देशाशङ्कित-कार्यस्यैवाभावं साधयति न सर्वत्र, स्वयम् असिद्धत्वात्। स्वभावानुपलब्धिर् अप्य् एक-ज्ञान-संसर्गि-पदार्थोपलम्भ-रूपा तद्-देश एव प्रतिद्वन्द्व्य्-अभावं गमयति। अतः प्रमाणान्तरस्यापि क्वचिन् निषेधः स्यान्, न सर्वत्र। तन् न प्रमाणान्तर-बाधकं समस्ति।
[न्या०वि० १।१९] प्रत्यक्षानुमानयोश् च प्रामाण्यं कुत इति चिन्त्यम्। न तावत् प्रत्यक्षात्, तस्य निर्विकल्पकतया सतोऽप्य् असत्-कल्पत्वात्। तत्-पृष्ठ-भावी विकल्पस् तु न स्वलक्षणाम्भोधि-मध्यम् अवगाहते॑ तत् कथं तत्राप्रविष्टस् तत्-स्वरूपं निश्चिनुयात्। अप्रमाण-भूताच् च तस्मात् प्रामाण्य-निर्णय इति निबिड-जडिमाविष्करणं भवताम्। अनुमानात् प्रामाण्य-निर्णय इति चेन्, न, तस्यापि स्वलक्षणाद् बहिः प्लवनात्। अप्रामाण्य-व्यवच्छेदस् तेन साध्यत इति चेन्, न, व्यवच्छेदस्य व्यवच्छिन्नाव्यतिरेकाद्, इतरथान्धकार-नर्तन-कल्पम् अनुमानम् आसज्येत, निर्विषयत्वात्। किं च, तत्-प्रामाण्य-निर्णायकम् अनुमानं प्रमाणम् अप्रमाणं वा? न तावद् अप्रमाणम्, ततः प्रामाण्यासिद्धेः। नापि प्रमाणं, तत्-प्रामाण्य-साधकाभावात्। न हि प्रत्यक्षात् तत्-सिद्धिर्, विकल्प-शून्यतयाकिञ्चित्-करत्वाद् इत्य् उक्तम्। अनुमानात् तु तत्-साधने विकल्प-युगलं तद्-अवस्थम् एवावतिष्ठेत, तत्-प्रामाण्य-साधनेऽप्य् अनुमान-कल्पनेत्य् अनवस्था। किं च, गृहीत-सम्बन्धस्यानुमानं प्रवर्तेत, सम्बन्धस् त्रि-काल-गोचरो ग्राह्यो, न च प्रत्यक्षं तं लक्षयितुं क्षमते, पूर्वापर-क्षण-त्रुटित-रूप-वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविनो विकल्पस्यापि व्यावहारिकाभिप्रायेण तन्-निष्ठताभ्युपगमात्। अनुमानाद् ग्रहीष्यतीति चेन् ननु तद् अपि सम्बन्ध-पूर्वकं प्रवर्तेत, तद्-ग्रहणेऽपीयं वार्तेत्य् अनवस्था। तस्माद् अनुमानम् अभिलषता गत्य्-अन्तराभावात् तत्-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणस् त्रि-काल-गोचरोऽव्यभिचारी वितर्कोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा च प्रस्तुत-तद्-द्वैविध्यस्य विघटितत्वाद्, अन्यद् अपि यद् एवं-विधम् अविसंवादि ज्ञानं तत् प्रमाणम् अस्त्व् इत्य् अलं शुष्काभिमानेनेति। यदि पुनः साध्यार्थान्यथानुपपन्न-हेतु-सम्पादितम् अनुमानम् इष्येत, तदा प्रत्यक्षम् अनुमानं चेत्य् अपि द्वैविध्यं घटाम् अटेद् एव॑ प्रत्यक्ष-व्यतिरिक्त-ज्ञानस्य सामस्त्येनानुमानेऽन्तर्-भाव-सम्भवात्, अन्यथानुपपन्नार्थान्तरम् अन्तरेण परोक्षार्थ-विषय-प्रतीतेर् अभावाद् इति।
[न्या०वि० १।२०] साम्प्रतम् अन्यथा सूत्रावयवेनैव प्रकृत-नियम-कारणम् आह : मेय-विनिश्चयाद् इति द्विधैवेति च काकाक्षि-गोलक-न्यायेनात्रापि सम्बन्धनीयम्। ततश् चायम् अर्थो॒ द्वाभ्याम् एव प्रकाराभ्यां मेयस्य ग्राह्यार्थस्य विनिश्चयात् स्वरूप-निर्णयाद्॑ द्वे एव यथोक्ते प्रमाणे न न्यूनम् अधिकं चेति। अयम् अत्राभिप्रायः॒ स्व-संवेदनं प्रति निखिल-ज्ञानानाम् एक-रूपतया साक्षात्-करण-चतुरत्वान् नास्त्य् एव भेदः॑ बहिर्-अर्थं पुनर् अपेक्ष्य कश्चिच् चक्षुरादि-सामग्री-बल-लब्ध-सत्ताकः स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं सन्निहितं विशद-निर्भासं सामान्यम् आकारं साक्षात्-कुर्वाणः प्रकाशः प्रथते, तत्र प्रत्यक्ष-व्यवहारः प्रवर्तते। यः पुनर् लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण नियतानियत-सामान्याकारावलोकी परिस्फुटता-रहितः खल्व् आत्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणामः समुल्लसति स परोक्षतां स्वी-करोति। न चैतौ प्रकारौ विहाय प्रकारान्तरेण ज्ञान-प्रवृत्तिं पश्यामो, न चापश्यन्तः प्रमाणान्तर-परिकल्पनं क्षमामहे, न च द्वयोः प्रथमानयोर् एकं निह्नुवानम् अपेक्षामहे, विशेषाभावात्। तस्माद् एतद् एव द्वैविध्यम् उररी-कर्तव्यम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० २।०] साम्प्रतं यद् अस्माभिः प्राग् विवृण्वद्भिर् व्युदपादि, यद् उत विप्रतिपन्नाव्युत्पन्न-व्यामोहापोह-सहम् इहेदं प्रमाण-लक्षणम् इति तत्-सूत्र-मात्र-दर्शनाद् एव विमल-बुद्धयोऽवगच्छेयुः। मन्द-मतयस् तु तावता न भोत्स्यन्त इति -- तद्धित-विधित्सया व्यक्तं प्रमाण-लक्षणाभिधान-फलं प्रतिपिपादयिषुर् अपि सपूर्व-पक्षं निराकाङ्क्षं लक्षयेयुस् त इति तावत् पूर्व-पक्षम् उत्थापयन्न् आह :
प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश् च तत्-कृतः ।
प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ न्यायावतार २ ॥
[न्या०वि० २।१] इह वचनम् उच्चारयता विमृश्य-भाषिणा प्रत्यवमृश्यं, किम् इदं मामकं वचनं श्रोतृ-संस्काराधायकम् उत नेति। इतरथा पर्यालोचित-कारितास्य हीयते। श्रोतृ-संस्काराधायकं चेद् उच्चारयत्य्, अन्यथा विपर्यय इति। एतत् तु प्रमाण-लक्षण-वाक्यं सकल-जनानादि-प्ररूढार्थ-प्रत्यायकत्वाद् अश्रोतृ-संस्काराधायकम्, यत आह : प्रसिद्धानि प्ररुढानि, नाधुना साध्यानीत्य् अर्थः। प्रमाणानि प्रत्यक्षादीनि, परोक्ष-गत-भेदापेक्षया बहु-वचनं व्यक्ति-भेदे सामान्यम् अपि कथञ्चिद् भिद्यत इति-दर्शनार्थम्। तथा हि॒ तद् अविवक्षित-व्यक्तिकम् एक-रूपतां बिभर्ति प्रमाणम् इति॑ व्यक्त्य्-अवच्छेदेन पुनर् अवच्छिद्यमानं नानातामादत्ते प्रत्यक्षानुमान-शाब्दानि प्रमाणानीति, व्यक्ति-व्यतिरिक्ताव्यतिरिक्त-रूपत्वात् तस्य। तथा हि॒ शब्दाच् चक्षुरादेर् वा दूराद् वृक्ष इति प्रत्यये धव-खदिर-पलाशादि-विशेषानपेक्षया साधारणं वृक्षत्वम् एव चकास्ति, तस्मात् तत् तेभ्यो भिन्नं, तद्-व्यतिरेकिणाकारेण ज्ञाने प्रतिभासनाद्, घटादिवत्। परिस्फुट-धव-खदिर-पलाशादि-विशेषावलोकन-वेलायां तु न तद्, अतिरेकिणा रूपेण प्रकाशत इत्य् अभिन्नं, तद्-अव्यतिरिक्तस्य संवेदनात्, तत्-स्वरूपवत्। विशेषाभिन्नम् एव रूपं तात्त्विकं सामान्यस्य, तस्यैव दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रिया-क्षमत्वाद्, भिन्नं पुनः कल्पना-बुद्धि-विठपितत्वाद् अवस्तु-रूपम् इति चेन्, न, द्वयोः प्रकाशमानयोर् एकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। अन्यथा भिन्नम् एव रूपं स्वाभाविकम् इतरत् तु कल्पना-बुद्धि-दर्शितम् इत्य् अपि वदतां न वदन-भङ्गः स्यात्। अर्थ-क्रिया-कारिताविशेषस् तु भिन्नेऽपि रूपे न दुरुपपादस्, तस्यापि ज्ञान-साधारण-व्यवहार-करण-दक्षत्वात्। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम् इति निवेदयिष्यामस्, तस्मात् सर्वत्र भिन्नाभिन्नौ सामान्य-विशेषाव् इति दर्शनार्थो बहु-वचन-निर्देशः। आसतां तावत् प्रमाणानि।
[न्या०वि० २।२] व्यवहारश् च तत्-कृतः प्रसिद्ध इति सम्बन्धः। च-शब्दोऽपि-शब्दार्थः। तेनायम् अर्थो॒ यद्-अर्थं प्रमाण-परीक्षणम् असाव् अपि जल-पान-शीत-त्राणादिर् व्यवहारोऽनादि-प्ररूढः, तन् निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम् इत्य् अभिप्रायवान् अपि परः परुषता-परिजिहीर्षयात्मनोऽन्यथा प्राह॒ प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमासाधारण-प्रमाण-धर्म-कथन-रूपायां ज्ञायते निर्णीयतेऽस्माभिर् न प्रयोजनं तत्-फलम्, अतिसूक्ष्मत्वात् तावकाभिसन्धेर् इति काक्वा प्रश्नयत्य् उल्लुण्ठयति चेति। किं च, प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं वाभिधीयते, निश्चितं वा स्वरूपेणेति पक्ष-द्वयम्। न तावद् अनिश्चितम्, अनिश्चितस्य लक्षणत्वायोगाद्, उन्मत्तक-विरुतवत्। अथ निश्चितं, तत् किम् अप्रमाणात् प्रमाणाद् वा। न तावद् अप्रमाणाद्, अप्रमाणस्य निश्चायकत्वायोगात्। यदि पुनर् अप्रमाणम् अपि निश्चायकम् इति सङ्गीर्येत, तदा प्रमाण-पर्येषणं विशीर्येत, नैरर्थक्यापत्तेर्, अप्रमाणाद् अपि निश्चायाभ्युपगमात्। अथ प्रमाणात्, तत् किम् अलक्षणं लक्षणोपेतं वा। अलक्षणं चेन् निश्चायकं प्रमाणम्, तर्हि सर्व-प्रमाणानां लक्षणाभिधानम् अनर्थकं, तद्-व्यतिरेकेणाप्य् अर्थ-निश्चय-सिद्धेर्, भवद्-अभिप्रेत-लक्षण-निश्चायक-प्रमाणवत्। अथ लक्षणोपेतं, तत्रापि विकल्प-युगलम् अनुवारित-प्रसरम् अनुधावति॒ तल्-लक्षणं निश्चितम् अनिश्चितं वा। न तावद् अनिश्चितं लक्षणं लक्ष्यं लक्षयति। निश्चयोऽपि प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा। अप्रमाणान् निश्चयासिद्धेः प्रमाणाद् इति वक्तव्यम्। तद् अप्य् अलक्षणं सलक्षणं वा। अलक्षणत्वे पूर्वस्यार्थ-ग्रहणे किं क्षूणम्। सलक्षणत्वे तल्-लक्षणं निर्णीतम् अनिर्णीतं वेति तद् एवावर्तते। तन् न प्रमाण-लक्षणाभिधानोपायोऽस्ति, तस्मात् प्रसिद्धानि प्रमाणानीत्य् अङ्गी-कर्तव्यम् इति।
[न्या०वि० ३।०] अधुनाचार्यो गृहीतस् तावकीनोऽभिप्रायोऽस्माभिर् इति परं प्रत्याययंस् तन्-मतम् अनुद्राव्य तद् एवानुमन्यमानस् तथापि लक्षणोक्तेः साफल्यमावेदयन्न् आह :
प्रसिद्धानां प्रमाणानां लक्षणोक्तौ प्रयोजनम् ।
तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् व्यामूढ-मनसाम् इह ॥ न्यायावतार ३ ॥
[न्या०वि० ३।१] एतद् अभ्यधायि भवता, यथा प्रसिद्धानि प्रमाणानि, ततस् तेषां लक्षणोक्ताव् असाधारण-धर्म-कथन-विषये प्रयोजनं फलं, किम् इति शेषस्, तद् एतद् अयुक्तम्। यतो यद्य् अपि प्रतिप्राणि-प्रसिद्धानि प्रमाणान्य्, अन्यथा तत्-कृत-निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च दृष्ट-हान्य्-आद्य्-आपत्तेः, तथापि केचिद् वितत-मोहावष्टब्धान्तः-करणास् तत्-स्वरूपम् अनुभवन्तोऽपि न लक्षयन्ति, ततस् तान् अवलोकयताम् अस्माकं तद्-विषय-कृपा-परीत-चेतसां यथावस्थित-प्रमाण-लक्षणाविर्-भावन-द्वारेण व्यामोहम् एतेषाम् अपसारयाम इति प्रमाण-लक्षणाभिधानं प्रति प्रवर्तते चेतः। तद् इदं प्रयोजनं॒ तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् इति॑ तस्मिन् प्रमाण-लक्षणे व्यामोहो विपरीताभ्युपगमवतां विपर्यास-लक्षणस् तीर्थ्यानां प्रमाणाप्रमाण-विवेक-विकलानाम्, अनध्यवसायात्मकस् तु मुग्ध-बुद्धीनां लौकिकानाम्, तस्य निवृत्तिर् अविपरीत-लक्षणावगमाद् अपगम इत्य् अर्थः, सा स्याद् भवेत्। केषाम् इत्य् आह : व्यामूढं विपरीत-ग्रह-ग्रस्तं विचित्ततां गतं मनोऽन्तः-करणं येषां ते तथा तेषाम्॑ इहेति लोके -- तद् अयं तात्पर्यार्थः। यद्य् अनादि प्रसिद्धं प्रमाण-लक्षणं प्रति न केचिद् अपि व्यामुह्येयुस् तदा यद् भवद्भिः प्राग् उदग्राहि॒ ‘निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम्ऽ॑ इति तद् युक्तम् एव स्यात्। न चैतद् एवं॑ तत्र व्यामूढानां दर्शनात्। एतेन यद् अदायि दूषणं ‘प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं निश्चितं वाभिधीयतऽ॑ इत्य्-आदि तद् अपि सिद्ध-साध्यता-मध्य-प्रतिबद्धत्वान् न बाधाविधाय्य् अस्माकम् इति मन्तव्यम्। व्यामूढ-मनसोऽपि प्रति प्रमाण-लक्षण-प्रकाशने तल् लगतीति चेन्, न, स्व-संवेदन-सिद्धस्य वचनेन प्रकाशनात्, तस्य व्यामोहापोह एव व्यापारात्। यथा विविक्त-भू-तलावलोकनेऽप्य् अध्यक्षात् यो घटादि-वैविक्त्यं न प्रतिपद्यते, कुदर्शन-व्यामोहात्, तं प्रत्युच्येत॒ ‘नास्त्य् अत्र घट, उपलम्भ-कारण-समग्रतायाम् अप्य् अनुपलम्भाद्ऽ, वैविक्त्यं हि तत्राध्यक्ष-सिद्धं, वचनाद् व्यामोहो निवर्त्येत॑ तथेहापि विद्वद्भिर् द्रष्टव्यम्। निर्णीतं तल्-लक्षणम् अध्यक्षेण, तस्य व्यवसाय-रूपत्वाद्, वचनं पुनर् विपरीतारोप-निराकरणे व्याप्रियत इति स्थितम्। तद् एवं प्रमाण-लक्षणं सामान्येन प्रतिपाद्य तद्-गतं कुचोद्यं पर्यहार्य् आचार्येण।
[न्या०वि० ४।०] अधुना तद्-विषयाम् एव संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षता ये प्रत्यक्ष-परोक्ष-लक्षणे प्रमाण-व्यक्ती प्राक् प्रक्रान्ते, तयोर् अपि लक्षणं प्रति विप्रतिपद्यन्तेऽपरे। अतस् तल्-लक्षणम् अपि वक्तव्यम् इति तावत् प्रत्यक्ष-लक्षणम् अभिधातुकाम आह :
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् ईदृशम् ।
प्रत्यक्षम्, इतरज् ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥ न्यायावतार ४ ॥
[न्या०वि० ४।१] तत्र प्रत्यक्षम् इति लक्ष्य-निर्देशः, अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् इति लक्षण-निर्देशः। परोक्षोऽक्ष-गोचरातीतस्, ततोऽन्योऽपरोक्षस्, तद्-भावस् तत्ता तया, साक्षात्-कृततयेति यावत्। अर्यत इत्य् अर्थोऽवगम्यत इति हृदयम्॑ अर्थ्यत इति वार्थो दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रियार्थिभिर् अभिलष्यत इति यावत्। तस्य ग्राहकं व्यवसायात्मकतया साक्षात् परिच्छेदकं यज् ज्ञानं, तद् ईदृशम् इतीदृग् एव प्रत्यक्षम् इति सण्टङ्कः। तत्र ज्ञान-ग्रहणेन यत् सांख्याः प्राहुः॒ ‘श्रोत्र्-आदि-वृत्तिः प्रत्यक्षम्ऽ॑ इति तत् तिरस्-करोति, श्रोत्र्-आदीनां प्रकृति-विकारतया तद्-वृत्तेर् व्यापार-लक्षणाया जडतया प्रत्यक्षत्वायोगाद्॑ अर्थ-परिच्छित्ति-हेतुतया प्रत्यक्षत्वे आलोकादि-जड-कारण-कलाप-व्यापारस्यापि प्रत्यक्षतापद्येत, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० ४।२] अर्थस्य ग्राहकम् इत्य् अस्य ग्रहणेक्षयेति वक्ष्यमाण-पद-सापेक्षत्वाद्, अमुना बहिर् अपि येऽर्थ-कलाकलन-विकलं सकलम् अपि ज्ञानं प्रलपन्ति तान् निरस्यति॑ स्वांश-ग्रहणे ह्य् अन्तः-संवेदनं व्याप्रियते यथा -- तथा बहिर् अपीतरथार्थवज् ज्ञान-सन्तानान्तराण्य् अपि विशीर्येरन्, स्वप्न-दृष्टान्तेन तद्-अनुमानस्योपप्लव-मात्रतापत्तेः, स्व-विज्ञानस्यैव तथा तथा विजृम्भणात्। तथा च प्रमाण-प्रमेय-प्रतिपाद्य-प्रतिपादक-कार्य-कारण-भावादयः प्रलीयेरन्न्, आत्म-व्यतिरेकेणात्मीय-पूर्वोत्तर-क्षणयोर् अपि ज्ञानस्य प्रवृत्ति-निरोधापत्तेः। अद्वय-विज्ञान-तत्त्व-साधनेनानुकूलम् आचरसीति चेत्, स्याद् एतत्, यदि भवतः प्रमाण-परिदृष्ट-सकल-व्यवहारोच्छेदेन कुदर्शन-वासनाहितादृष्टाद्वय-तत्त्व-परिकल्पनात् प्रतिकूलं न स्यात्। तन् नार्थ-विरहेण बहिः-प्रमाण-भूत-ज्ञानोल्लासोऽस्ति, निर्हेतुकत्व-प्रसङ्गाद् इति।
[न्या०वि० ४।३] ग्राहकम् इति च निर्णायकं द्रष्टव्यम्, निर्णयाभावेऽर्थ-ग्रहणायोगात्। तेन यत् ताथागतैः प्रत्यपादि॒ ‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् अभ्रान्तम्ऽ॑ इति तद् अपास्तं भवति, तस्य युक्ति-रिक्तत्वात्। तथा हि॒ ते निर्विकल्पकत्वेऽध्यक्षस्यायुक्तीः खेटयन्ति -- किलेदम् अर्थ-सामर्थ्येनोदीयते, सन्निहितार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्राहकत्वात्। न चार्थे ध्वनयः सन्ति, तद्-धेतु-विलक्षण-कारणान्तर-जन्यत्वात्, ततश् चासाव् उपनिपत्य स्व-गोचरं संवेदनम् उत्थापयन् स्वाकारम् अनुकारयति। तन् न तद्-ग्राहिणि विज्ञाने शब्द-संश्लेषो युक्तः। किं च, यद्य् उत्पादकार्थोपयोगेऽपि तं तावन् न गृह्णीयात्, संवेदनम् अपि तु स्मरण-सम्पादितं तद्-अभिधायक-ध्वनि-संयोजनं प्रतीक्षमाणं तावद् आसीत, तर्हि दत्तो जलाञ्जलिर् अर्थ-ग्रहणस्य। तथा हि॒ तम् अर्थम् अपश्यंस् तस्मिन् गृहीत-सङ्केतं तद्-अभिधायक-ध्वनिं नानुस्मरत्य्, उपायाभावाद्, अननुस्मरंश् च पुरो-वर्तिन्य् अर्थे न योजयति, स्मृत्य्-उपस्थापन-व्यतिरेकेण तद्-योजनाशक्तेर्, अयोजयंश् च भवद्-अभिप्रायेण न पश्यतीति धान्ध्याद् आन्ध्यमापद्येत। यदि चेन्द्रियजम् अपि ज्ञानं विकल्प-कलुषितम् इष्येत, तदा तद् अपि मनो-राज्यादि-विकल्पवद् विकल्पान्तराविर्-भावे सति निवर्तेत॑ न चैतद् अस्ति, सन्निहित-गो-पिण्ड-गोचरस्य चक्षुर्ज-संवेदनस्याश्वादि-विषय-विकल्पोदयेऽप्य् अनिवर्तनात्, संहृत-सकल-विकल्पस्यापि च परिस्फुट-सन्निहितार्थ-विषय-दर्शन-सिद्धेः। तन् नाक्षजं ज्ञानं शब्द-सम्पर्कम् अनुभवतीति।
[न्या०वि० ४।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यत् तावद् उक्तम्॒ अशब्दकार्थ-सामर्थ्योद्भवत्वाद् ध्वनि-रहितम् अध्यक्षम् इति, तद् अयुक्तं, न हि शब्दासम्पृक्तार्थजम् इत्य् एतावतैवाभिलाप-विना-कृतम् इति वक्तुं शक्यम्, अन्यथा जडार्थ-जनितम् इति जडम् अपि तत् स्यात्। अथ बोध-रूप-मनस्कार-साहित्यान् न जडम् इति ब्रूषे, तथा सत्य् अभिलाप-संसृष्ट-मनस्कार-सन्नियोगात् साभिलापम् अपि स्यात्। किं च, विविक्ताः परमाणवः स्वाकारार्पण-द्वारेण स्व-गोचरं ज्ञानम् उत्पादयन्तः कथम् असन्तम् आत्मनि स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं तत्र प्रथयन्ति। विभ्रमाद् इति चेन्, न, नेदानीम् अर्थे यद् अस्ति तद् एव प्रतिभाति, तत्रासतोऽपि स्थूराकारस्य प्रतिभासनात्। तथा शब्दोऽपि। यद्य् अविद्यमानोऽर्थे तद्-ग्राहिणि ज्ञाने प्रतिभासेत किं क्षूयेत? यच् चोक्तम्॒ ‘स्मरण-जनित-शब्द-संयोजनं प्रतीक्षमानम् अर्थोपयोगेऽपि यद्य् आसीतेत्य्ऽ-आदि यावद् ‘आन्ध्यम् आपद्येतऽ, तत् तावक-पक्षेऽपि समानम्। तथा हि॒ स्वलक्षण-विषयेन्द्रियज-निर्विकल्पक-ज्ञान-सद्भावेऽपि न तावद् इदं-तयानिदं-तया वार्थ-व्यवस्थितिर्, यावद् विधि-प्रतिषेध-द्वारेण विकल्प-युगलकं पाश्चात्यं नोदयते, यत्रैवांशे विकल्पं जनयति, तत्रैवास्य प्रमाणतेति-वचनान्, निर्विकल्पकस्य सतोऽपि व्यवहारं प्रत्य् असत्-कल्पत्वात्। स च विकल्पः सङ्केत-काल-भावितम् अभिलाप-सामान्यम् अनुस्मरत एवोत्पत्तुम् अर्हति, अभिलाप-सामान्य-स्मरण-बीजं च कुतः प्रबुध्येत? तादृश-दर्शनाद् इति चेन्, ननु तद् अपि दर्शनं निर्विकल्पकत्वाद् अर्थं नातिशेते, तत् कथं सामान्य-विषय-विकल्प-बीजं प्रबोधयेत्? अर्थः पुनः सामान्य-व्यवसायात्मिकां बुद्धिं न जनयेद् इति भवतां कदाग्रहः। तद् अर्थवत् तद्-विषयं दर्शनं व्यवसाय-शून्यत्वान् नाभिलाप-सामान्य-गोचर-स्मरण-बीजं प्रबोधयति॑ तद् अप्रबुद्धं न स्मरणं जनयत्य्॑ अजातं स्मरणं न शब्दं योजयत्य्॑ अयोजितः शब्दो नार्थं निश्चाययत्य्॑ अनिश्चितोऽर्थो न व्यवहारम् अवतरत्य्॑ अनवतीर्णो नादृष्टाद् विशिष्यते॑ अविशिष्टः प्रमातुर् आन्ध्यं लक्षयतीति। तस्माद् यथा कथञ्चिन्-निर्णयाभावात् स्वयम् अप्रतीतम् अपि निर्विकल्पक-दर्शनं वासना-प्रबोध-द्वारेण विकल्पम् उत्थाप्यात्म-व्यापारम् अभिलापयति कतिचिद्-अंश-विषयं, तथार्थोऽपि यदि चक्षुर्-आदि-सामग्र्य्-अन्तः-पातित्वेनाप्रतीत एव स्वयं, तथा-स्वभावत्वात्, सङ्केत-काल-भाविताभिलाप-सामान्य-विषयात्म-संस्कार-प्रबोध-द्वारेणात्म-विषयम् अभिलाप-संसृष्टं संवेदनम् उल्लासयेन् नात्यन्तम् अयुक्तं पश्यामः। न चायं सविकल्पको बोधो मनो-राज्यादि-विकल्प-कल्पश्, चक्षुरादि-सामग्री-सम्पाद्यत्वाद्, इतरस्य तु मनो-मात्र-प्रभवत्वात्। अतः कथं तद्-विकल्पान्तराविर्-भावे निवर्तेत? मानस-विकल्पस्यैव विकल्पान्तरेण निवर्तनाद्, अस्य तु कारण-सामर्थ्येन बलात् प्रवृत्तेः। एतेन संहृत-सकल-विकल्पावस्थायां नैष प्रादुःष्याद् इत्य् एतद् अपि प्रतिक्षिप्तम्, अस्य प्रमातुर् इच्छया संहर्तुम् अशक्यत्वान्, मानस-विकल्प-संहरण एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेर् इति। एतच् च शब्द-सम्पृक्त-प्रत्यक्ष-पक्षाद् अप्य् एकान्त-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-पक्षस्य पापीयस्तां दर्शयद्भिर् अस्माभिर् उदग्राहि।
[न्या०वि० ४।५] परमार्थतः पुनः प्रत्यक्षे साक्षाच् छब्दोल्लेखो नेष्यते, विशद-व्यवसायेनार्थ-साक्षात्-करण-चतुरत्वात् तस्य। केवलं तद् अपि सन्निहितं परिस्फुटं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं पदार्थान्तरैः सह समानासमानाकारं स्व-परमाणूनां सामान्याकारं स्तम्भाधिकं पदार्थं गोचरयतीति सविकल्पकम् इत्य् उच्यते, पर-परिकल्पित-क्षण-क्षयि-विविक्त-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवण-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-प्रतिषेधार्थं कथञ्चिद्-अभिलाप-संसर्ग-योग्य-गोचरता-दर्शनार्थं वा। एवं च प्रत्यक्ष-गोचरी-कृतेऽर्थे संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध-ग्रहणादयस् तद्-विषयाः शाब्द-व्यवहाराः सर्व एव निरुपचरिता घटन्त इत्य् उक्तं भवति। यदि पुनः शब्द-संसर्ग-योग्य-प्रतिभासम् अध्यक्षं न स्यात्, ततः को दोष इति चेद्, विकल्पानुत्थानेन सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गः। तथा हि॒ निर्व्यवसायं दर्शनम् अत्यन्त-पाटवोपेतम् अपि स्मृति-बीजाधानं तद्-उत्तर-काल-भावि वा तादृशार्थ-दर्शनं तत्-प्रबोधनम् अभ्यास-वासना-पाटवेऽपि न विधातुम् अलं, यतः सामान्य-विकल्पोत्पत्त्या व्यवहारः प्रवर्तेत, क्षणिकत्वादिषु सकल-कालं निर्विकल्पकाध्यक्ष-दृष्टतयाभ्युपगतेष्व् अपि तद्-अदर्शनात्। तस्माद् यत्र कुत्रचिद् अर्थांशे पाश्चात्य-व्यवहार-प्रवृत्तिस् तत्र प्राचीनं संवेदनं निर्णायकम् अभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा क्षणिकत्वाद्य्-अंशवत् सर्वांशेषु व्यवहारः प्रलीयेत। तन् न कदाचन कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षस्य प्रमातुर् अपि प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति। अप्रतीतं चास्तीति श्रद्धातुं दुःशकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् अलक्षणम्।
[न्या०वि० ४।६] अभ्रान्तत्वम् अपि न जाघटीति, भवद्-अभिप्रायेण स्थिर-स्थूरार्थ-ग्राहिणः संवेदनस्य विपर्यस्त-रूपत्वात्, तद्-विपरीतस्य तु स्वप्न-कालेऽप्य् अप्रकाशमानत्वात्। तद् यदि यथावस्थितार्थ-ग्राहित्वम् अभ्रान्तत्वं, तन् न सम्भवत्य् एव, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणूनां कदाचिद् अप्य् अप्रतिभासात्, तेषां च पारमार्थिकत्वात्। अथ व्यावहारिकाभिप्रायेण यद् इदं घटादिकं स्वलक्षणम् अर्थ-क्रिया-क्षमं, तत्र यन् न भ्राम्यति तद् अभ्रान्तम् इत्य् अभिप्रेतं, तर्हि कल्पनापोढ-पदम् उत्सारणीयम्, इदानीम् अनेन सहावस्थानाभावाद्, व्यवहारावतारिणो घटादि-स्वलक्षणस्य निर्णयेनैव ग्रहणाद्, अन्यथा व्यवहाराप्रवृत्तेर्, दृष्टस्याप्य् अदृष्टानतिशयनात्। तस्माद् व्यवसायात्मकम् अध्यक्षम् इत्य् एतद् एव चार्व् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ४।७] अपरोक्षतयेत्य् अनेन तु परोक्ष-लक्षण-सङ्कीर्णताम् अध्यक्षस्य परिहरति, तस्य साक्षात्-कारितया अर्थ-ग्रहण-रूपत्वाद् इति। ईदृशम् इत्य् अमुना तु पूर्वोक्त-न्यायात् सावधारणेन विशेषण-कदम्बक-सचिव-ज्ञानोपप्रदर्शनात् पर-परिकल्पित-लक्षण-युक्तस्य प्रत्यक्षतां प्रतिक्षिपति। एवं च यद् आहुर्॒ "इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" तथा "सत्-सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धि-जन्म तत् प्रत्यक्षम्" इत्य्-आदि तद् अयुक्तम् इत्य् उक्तं भवत्य्, अपूर्व-प्रादुर्-भावस्य प्रमाण-बाधितत्वाद्, अत्यन्तासतां शश-विषाणादीनाम् अप्य् उत्पत्ति-प्रसङ्गात्। तस्माद् इदम् आत्म-रूपतया विद्यमानम् एव विशेष-कृद्-धेतु-कलाप-सन्निधानात् साक्षाद् अर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपतया विवर्तेत॑ तथा चोत्पन्न-जन्मादि-विशेषणं न सम्भवेत्। अथैवं-विधार्थ-सूचकम् एवैतद् इत्य् आचक्षीथास्, तथा सत्य् अविगानम् एवेत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ४।८] अधुना परोक्ष-लक्षणं दर्शयति॒ इतरद् इत्य्-आदि। अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तम्, तस्माद् इतरद् असाक्षाद् अर्थ-ग्राहकं ज्ञानं परोक्षम् इति ज्ञेयम् अवगन्तव्यम्। एतद् अपि स्व-संवेदनापेक्षया प्रत्यक्षम् एव, बहिर्-अर्थापेक्षया तु परोक्ष-व्यपदेशम् अश्नुत इति दर्शयन्न् आह : ग्रहणेक्षयेति॑ इह ग्रहणं प्रक्रमाद् बहिः प्रवर्तनम् उच्यते,ऽन्यथा विशेषण-वैयर्थ्यात्॑ तस्येक्षापेक्षा तया॑ बहिः-प्रवृत्ति-पर्यालोचनयेति यावत्। तद् अयम् अर्थो॒ यद्य् अपि स्वयं प्रत्यक्षं, तथापि लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण बहिर्-विषय-ग्रहणेऽसाक्षात्-कारितया व्याप्रियत इति परोक्षम् इत्य् उच्यते। एतच् च बुभुत्सितार्थान्यथानुपपन्नार्थान्तर-प्रतीति-वशाद् उदय-धर्मकं इति। सामान्य-लक्षण-सद्भावाद् एकाकारम् अपि विप्रतिपत्ति-निराकरणार्थं द्विधा भिद्यते, तद् यथा॒ अनुमानं शाब्दं चेति। यतोऽद्यापि शब्दस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वम् एव परे न प्रतिपद्यन्ते, न चापृथक्-कृतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम्, अतो भेदेनोपन्यासः।
[न्या०वि० ५।०] तत्र तावद् अनुमान-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह :
साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकं स्मृतम् ।
अनुमानं, तद् अभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवत् ॥ न्यायावतार ५ ॥
[न्या०वि० ५।१] इहाप्य् अनुमानम् इति लक्ष्य-निर्देशः, तस्य प्रसिद्धतया अनूद्यत्वात्। साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इति लक्षण-निर्देशः, तस्याप्रसिद्धतया विधेयत्वाद् इति। अत्राप्य् अनुमान-शब्दस्य कर्त्र्-आदि-कारक-व्युत्पत्ति-क्रमेणार्थ-कथनं प्रमाण-शब्दवद् द्रष्टव्यम्। ततश् चेहापि लिङ्ग-ग्रहण-साध्याविनाभावित्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-स्मरण-कालात् [अनु] पश्चान् मीयते परिच्छिद्यतेऽर्थोऽनुमेयः पावकादिर् येन ज्ञानेन तद् अनुमानम् इति। तत् किं-भूतम् इत्य् आह : साध्य-निश्चायकम् इति -- साधनम् अर्हति, साधयितुं वा शक्य इति साध्योऽनुमेय इत्य् अर्थः॑ तस्य निश्चायकं तत्-स्वरूप-निर्णायकम् इति यावत्। तत् कुत इत्य् आह : लिङ्गाल् -- लिङ्ग्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति लिङ्गं हेतुस् तस्मात्। किं-भूताद् इत्य् आह : साध्याविनाभुन इति -- विना भवतीति विनाभु, ततोऽन्यद् अविनाभु, साध्येनाविनाभु साध्याविनाभु, साध्यं विमुच्य यन् न भवतीत्य् अर्थः, तस्मात् साध्य-निश्चायकं ज्ञानं तद् अनुमानम्। स्मृतम् अभिप्रेतं नीतिविद्भिर् इति सम्बन्धः। तत्र लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इत्य् अनेनानुमानस्य प्रत्यक्ष-शाब्द-लक्षण-सङ्कीर्णतां वारयति। साध्याविनाभुन इत्य् अनेन पर-प्रणीत-लिङ्ग-लक्षण-व्युदासम् आचष्टे।
[न्या०वि० ५।२] ततश् च यत् परे प्रोचुः -- पक्ष-धर्मत्वान्वय-व्यतिरेक-लक्षण-रूप-त्रयोपलक्षितानि त्रीण्य् एव लिङ्गानि॒ अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति॑ तद् उक्तम्॒
"अनुमेयेऽथ तत्-तुल्ये सद्भावो, नास्तितासति ।
निश्चितानुपलम्भात्म-कार्याख्या हेतवस् त्रय" ॥ इति॑
[न्या०वि० २] तथान्ये॒ "ऽस्येदं कार्यं कारणं संयोगि समवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्" इति, तथा॒ "पूर्ववच् छेषवत् सामान्यतो-दृष्टम्" इत्य्-आदि -- तद् बाल-प्रलपित-प्रायम् इत्य् अवगन्तव्यं, सर्वत्र साध्याविनाभावित्वस्यैव गमकत्वात्, तद्-रहितस्य तु त्रैलक्षण्य-लक्षितस्याप्य् अगमकत्वाद्, इतरथा तत्-पुत्रत्वादीनाम् अपि गमकत्व-प्रसङ्गान्, नियमवत्। त्रैलक्षण्यं लक्षणं, न यत्-किञ्चित्, तेनायम् अप्रसङ्ग इति चेन्, न, नियमेन साध्याविनाभावित्वस्यैवोद्दीपनात्॑ तच् चेद् अस्ति किं त्रैलक्षण्यापेक्षया, तस्यैव गमकत्वात्। तथा हि॒ जल-चन्द्रान् नभश्-चन्द्रं, कृत्तिकोदयाच् छकटोदयं, पुष्पितैक-चूतात् पुष्पिताशेष-चूतान्, चन्द्रोदयात् कुमुदाकर-प्रबोधं, वृक्षाच् छायाम् इत्य्-आदि पक्ष-धर्मत्व-विरहेऽप्य् अनुमिमीमहे। कालादिकस् तत्र धर्मी समस्त्य् एव, तत्र पक्ष-धर्मता लिङ्गस्य गृह्यत इति चेन्, नातिप्रसङ्गाद्, एवं हि शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये काक-कार्ष्ण्यादेर् अपि गमकत्व-प्रसक्तेस्, तत्रापि लोकादेर् धर्मिणः कल्पयितुं शक्यत्वात्। तथान्वय-विकलोऽप्य् अनित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद् इत्य् अयं सम्यग्-घेतुतया समर्थयितुं शक्य इति, नान्वयोऽपि हेतोर् लक्षणम्। तथा हि॒ तावकाकूतेनैव सकलं सत्त्वम् अनित्यतया क्रोडी-कृतम् इति भाव-धर्मः श्रावणत्वं कथम् अनित्यतां विहाय विपक्षे वर्तितुम् उत्सहेत, तद्-विकलस्य निःस्वभावतापत्तेर्, अनित्यता-विनिर्मुक्तस्य सत्त्वस्यासम्भवावत्। एतेन सात्मकं जीवच्-छरीरं, प्राणादिमत्त्वान्, निरात्मकत्वे तद्-वैकल्य-प्रसङ्गाद्, घटादिवद् इत्य् अयम् अपि गमको व्याख्यातः, साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्वस्यात्रापि सद्भावात्, पक्ष-धर्मत्वान्वययोस् त्व् अलक्षणतया प्रतिपादनात्।
[न्या०वि० ५।३] तथा कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-नियमोऽपि किल तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धास्तित्वम् एतेष्व् एवेति यः क्रियते, सोऽप्य् अयुक्तः, प्रकृत-सम्बन्ध-द्वय-विकलस्यापि रूपादे रसादि-गमकत्व-दर्शनात्। मा भूत् तस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्तिभ्यां गमकत्वं, समवायाद् भविष्यति, तथापि नान्यथानुपपन्नत्वम् एव हेतोर् लक्षणम् इति यदि वैशेषिको मन्येत, सोऽन्यथा निर्लोठनीयः। स हि विकल्पतः पर्यनुयोज्यः॒ समवायिभ्यः समवायोऽभिन्नो भिन्नो वा। यद्य् अभिन्नः, समवायिन एव तर्हि, न समवायः, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेत्, स कथं तेषु वर्तेत॒ सामस्त्येनाहोस्विद् एक-देशेन? तद् यदि सामस्त्येन, तद् अयुक्तं, समवाय-बहुत्व-प्रसङ्गात्, प्रतिसमवायि तस्य परिसमाप्ततावाप्तेः। अथैक-देशेन, तद् अप्य् अचारु, सांशता-प्रसङ्गेन निरवयवत्व-क्षतेः, स्वांश-वर्तनेऽपि सामस्त्यैक-देश-चोद्यावताराच् च। तत्रापि सामस्त्य-पक्षे बहुत्वं तद्-अवस्थम् एव। एक-देश-पक्षे त्व् अंशान्तर-प्रसङ्गेनानवस्था। तन् न समवाय-बलात् गमकतां प्रत्य् आशाविधेया, तस्यैव तत्र दुःस्थितत्वात्। एतेन संयोगिनोऽपि गमकता प्रत्युक्ता, समान-दूषणत्वात्। विरोधिनोऽपि विरुद्धाभाव-गमकत्वम् अन्यथानुपपन्नत्वम् एव सूचयति, तद्-अभावे गमकत्वायोगात्।
[न्या०वि० ५।४] एवं पर-परिकल्पितम् अन्यद् अपि लिङ्ग-लक्षणं यद् गमकताङ्गं तद् अन्यथानुपपन्नत्वं न व्यभिचरति, साध्यं विनाप्य् उपपद्यमानस्य गमकता-वैकल्याद् इति॑ अत्रैव व्यापके लिङ्ग-लक्षणेऽन्तर्-भावनीयं, विपरीतं तु निरसनीयम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ५।५] तद् एवम् अनुमान-लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यच् छौद्धोदनि-शिष्यकैर् न्यगादि, यद् उत -- भ्रान्तम् अनुमानम्, सामान्य-प्रतिभासित्वात्, तस्य च बहिः-स्वलक्षणे व्यतिरेकाव्यतिरेक-विकल्पाभ्याम् अपाक्रियमाणतयायोगात्, तद्-रूपतया च तेन तस्याध्यवसायाद्, अतस्मिंस् तद्-ग्रहणस्य च भ्रान्ति-लक्षणत्वात्। प्रामाण्यं पुनः प्रणालिकया बहिः स्वलक्षण-बलायातत्वाद् अनुमानस्य। तथा हि॒ नार्थं विना तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-रूप-सम्बन्ध-प्रतिबद्ध-लिङ्ग-सद्भावो, न तद् विना तद्-विषयं ज्ञानं, न तज्-ज्ञानम् अन्तरेण प्राग्-अवधारित-सम्बन्ध-स्मरणं, तद्-अस्मरणे नानुमानम् इत्य्, अर्थाव्यभिचारित्वाद् भ्रान्तम् अपि प्रमाणम् इति सङ्गीर्यते॑ तद् उक्तम्॒ "अतस्मिंस् तद्-ग्रहो भ्रान्तिर् अपि सम्बन्धतः प्रमेति" -- तद् अपाकर्तुम् आह : तद् अभ्रान्तम् इत्य्-आदि। तद् अनुमानं, भ्राम्यति स्व-गोचरे विपर्यस्यतीति भ्रान्तं, ततोऽन्यद् अभ्रान्तम्, अविपरीतार्थ-ग्राहीति यावत्। इयं च प्रतिज्ञा। प्रमीयते यथावस्थितोऽर्थः परिच्छिद्यतेऽनेनेति प्रमाणं, तद्-भावस् तत्-त्वं तस्मात्। अयं तु हेतुः। सङ्गतम् अक्षाणाम् इति समक्षं, तद् इव समक्षवद् इति दृष्टान्तः। तद् इदम् अनुमानस्य भ्रान्तता-निराकारकं सम्पूर्णावयवम्, उपनय-निगमनयोर् अवयव-त्रय-प्रतिपादनेनैवाक्षिप्तत्वात्। प्रमाणं सूचितम्, प्रयोगस् त्व् एवं द्रष्टव्यो॒ऽभ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वाद्, इह यद् यत् प्रमाणं तत् तद् अभ्रान्तं यथा समक्षं, तथा च प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगम्यतेऽनुमानं, तस्मात् प्रमाणत्वाद् अभ्रान्तम् इति प्रतिपद्यन्ताम् इति। तत्रार्थ-वादी तावत् समक्ष-लक्षणे दृष्टान्ते साध्य-विकलताम् आविर्-भावयितुं न पारयति, स्वयम् एव समक्षस्याभ्रान्ततयाऽभ्युपगमात्। शून्य-वादिनः पुनः समस्तापलापित्वात् प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारं प्रत्य् अयोग्यतैवेति न तम् अधिकृत्य स्व-साधन-दोषाः परिहर्तव्याः, स्व-वचन-बाधित-प्रतिज्ञत्वेन तद्-वादोत्थानाभावात्। तथा हि॒ सर्वाभाव-प्रतिपादकं वचोऽस्ति, नास्ति वा? यद्य् अस्ति तर्हि प्रतिज्ञा-हानिः। अथ नास्ति, सकल-भाव-सिद्धिः, प्रतिषेधकाभावात्।
[न्या०वि० ६।०] ज्ञान-वादी पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विकलं सकल-विकल्प-गोचरातीतं निर्विकल्पकं विविक्त-पारमार्थिक-स्व-संवेदन-वेद्यं संवेदनम् आगूर्यानादि-कालालीन-वासना-बल-प्रभावितं ग्राह्य-ग्राहकाकार-कलुषितं बहिष्-प्रथमानं निखिलम् अपि ज्ञानं विपर्यस्ततया प्रतिजानानः समक्ष-लक्षणस्य प्रकृत-दृष्टान्तस्य साध्य-शून्यताम् अभिदध्याद्, अतस् तन्-मत-विकुट्टनार्थम् आह :
न प्रत्यक्षम् अपि भ्रान्तं प्रमाणत्व-विनिश्चयात् ।
भ्रान्तं प्रमाणम् इत्य् एतद् विरुद्धं वचनं यतः ॥ न्यायावतार ६ ॥
[न्या०वि० ६।१] यद् भवतश् चेतसि विवर्तते, यद् उत न केवलम् अनुमानं भ्रान्तं, किं तर्हि यद् भवद्भिर् दृष्टान्ततयोपात्तं प्रत्यक्षं तद् अपि भ्रान्तम् एव, "सर्वम् आलम्बने भ्रान्तम्" इत्य् वचनात्, तद् एतन् न। कुत इत्य् आह : प्रमाणत्व-विनिश्चयाद् इति, प्रमाण-भाव-निर्णयाद् इत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ६।२] ननु च प्रमाणताम् अभ्रान्ततान्यथानुपपन्नां यदि परः प्रतिपद्यते, ततस् ताम् अभ्युपगच्छन् कथं भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं विदध्याद् इति पार्श्व-स्थित-वचनावकाशम् आशङ्क्य, भ्रान्तता-प्रमाणतयोर् विरोध-साधनेन ततः प्रमाणतां व्यावर्त्यानन्य-शरणतया प्रतिज्ञाताभ्रान्तताक्रान्तां तां दर्शयन्न् आह : भ्रान्तम् इत्य्-आदि। भ्रान्तं विपर्यस्तम् अथ च प्रमाणं ग्राह्य-परिच्छेद-हेतुर् इत्य् एतद् वचनम् एवं-विद्धार्थ-प्रत्यायको ध्वनिर् विरुद्धं, पूर्वापर-व्याहतार्थ-गर्भत्वात्।
[न्या०वि० ६।३] ननु च नैवास्य विरुद्धता, तथा ह्य्॒ अविदित-परमार्थ-व्यावहारिकाभिप्रायेण लोक-संवृतिं घटयन्तो वयं दृढतर-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताकयोः प्रत्यक्षानुमानयोः प्रमाणताम् आचक्ष्महे, तद्-अभिप्रायेण दर्शितार्थ-प्रापकत्वेन तयोर् अविसंवादकत्वात्। शिथिल-वासनाउन्मुख्य-निर्मित-जन्मकयोः पुनर् अप्रमाणतां, तद्-आकूतेनैव दर्शितेऽर्थे विप्रलम्भनाद् इति, भ्रान्ततां पुनस् तत्त्व-चिन्तकाभिप्रायेण सकलस्य बहिर् उपप्लवमानस्य ग्राह्य-ग्राहकाकार-कालुष्य-दूषितस्य प्रतिभासस्य पारमार्थिकाद्वय-संवेदन-विपर्यस्त-रूपत्वाद् अभिदध्महे, बहिः प्रतिभासस्य तद्-ग्राह्यार्थ-विचाराक्षमतयोपप्लुत-रूपत्वात्। तथा ह्य्॒ अर्थोऽवयवि-रूपोऽवयव-रूपो वा स्याद्, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् अवयवि-रूपो विचारं क्षमते,ऽवयव-विरहेऽवयवित्वायोगात्, तेषु च तद्-वृत्ति-विकल्पानुपपत्तेः। तथा हि॒ तेष्व् असाव् एकदेशेन वर्तते सामस्त्येन वा। न तावद् एकदेशेन, तस्य स्वयं निरवयवत्वात्। अवयव-वृत्ति-निमित्तम् अंशान्तर-कल्पने तद्-वृत्ताव् अप्य् अंशान्तर-कल्पन-प्रसङ्गस्, तथा चानवस्था। नापि सामस्त्येन, प्रत्य्-अवयवं परिसमाप्त-रूपतयावयवि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। भेद-पक्षे दोषोऽयम्, अभेद-पक्षे नास्तीति चेन्, न॒ तत्राप्य् अवयव-मात्रम् अवयवि-मात्रं वा स्याद्, इतरेतराव्यतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्। किं च, समस्तावयव-व्यापिनोऽवयविनोऽभ्युपगमे पटादेर् एक-देश-राग-कम्प-दर्शनादिषु सकल-राग-कम्प-दर्शनादीनि दुर्निवाराणि स्युर्, एकस्य रागारागादि-विरुद्ध-धर्माध्यासायोगाद् इति। नाप्य् अवयव-रूपोऽर्थो विचार-गोचर-चारी कर-चरण-शिरो-ग्रीवादीनाम् अवयवानां स्वावयवापेक्षयावयवि-रूपतया तद्-दूषणेनैवापास्तत्वात्। परमाणूनां निरंशतयावयवत्वम् उपपद्यत इति चेन्, न, तेषाम् अपि दिक्-षट्क-सम्बन्धेन षट्-अंशतापत्तेर्, अन्यथावस्थानाभावात्। ततश् चार्थ-विरहात् तद्-उन्मुखो ग्राह्याकारोऽलीकस्, तद्-अलीकतायां ग्राहकाकारोऽपि नावस्थानम् आबध्नाति, ग्राह्याभावे ग्राहकायोगात्। तद्-अपेक्षयैव तत्-स्वरूप-स्थितिः, ग्राह्य-ग्राहकाकार-विलये च बोधाकारोऽवशिष्यते, तस्य सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात्, तस्मात् स एव पारमार्थिक इति।
[न्या०वि० ६।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यद् अवादि संवेदनम् अद्वयं पारमार्थिकं, ग्राह्य-ग्राहकाकार-प्रवृत्तं पुनर् अतात्त्विकम् इति, तद् अयुक्तं, प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ बहिर् अन्तश् चानेकाकारतया हर्ष-विषादादिभिः स्थिर-स्थूरताद्य्-अनेक-धर्म-परिकरितार्थ-ग्रहण-परिणामैश् च विवर्तमानं संवेदनम् उपलभ्यते, न पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विविक्तं यादृग् भवद्भिर् उपवर्ण्यते ज्ञानं तादृशं कस्यचित् कदाचन प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अद्वय-प्रतिभासस्य स्वप्न-दशायाम् अप्य् अननुभूतेः। न च तत्त्व-चिन्तका अपि प्रमाणम् अन्तरेण स्वाकूतं प्रतिष्ठापयन्तः प्रेक्षावताम् अवधेय-वचना भवन्त्य्, अन्यथैकम् अचेतनम् अव्ययम् अपि ब्रह्मानेकं चेतनं क्षण-भङ्गुरताक्रान्तम् अविद्यातः प्रथत इति ब्रुवाणोऽनिराकार्यः स्यात्। यद् अपि बहिर्-अर्थ-निराकरण-धिया अवयव्य्-अवयव-द्वारेण दूषणम् अदायि, तद् अपि बहिर् अन्तः प्रथमान-सकलासुमत्-प्रतीत-प्रतिभास-मुद्गर-निर्दलित-शरीरतया भक्त-मध्य-निष्ठ्यूत-दर्शिनः पुरतो विप्रतारण-प्रवण-कुट्टिनी-शपथ-प्रायम् इति न विद्वज्-जन-मनांसि रञ्जयति, प्रत्यक्ष-प्रतिभासापह्नवे तन्-मूलकत्वात् कुयुक्ति-विकल्पानाम् उत्थानाभावात्। किं च, संवेदनस्यापि सितासिताद्य्-अनेकाकारेष्व् एकस्य वर्तने भेदाभेद-सामस्त्यैक-देशादि-चोद्यं समानम् एवेति न दूषणम्। अनेकाकार-विवर्तस्यालीकत्वान् न तेन सह संवेदनस्य पारमार्थिकस्य भेदाभेदादि-चिन्तेति चेन्, नन्व् एवम् इतरेतराश्रयं दुरुत्तरम् आढौकते। तथा हि॒ तद्-अलीकत्व-सिद्धाव् अद्वय-संवेदन-सिद्धिस्, तत्-सिद्धौ च तद्-अलीकत्वम् इति न्यायात्। अन्यच् चाद्वयम् अप्य् एक-क्षण-वर्ति संवेदनं यथा पूर्वोत्तर-क्षणाभ्यां सम्बन्धम् अनुभवति, तथा निरंशा अपि यदि परमाणवो दिग्-अंशैः परमाण्व्-अन्तरैर् वा संश्लेषमागच्छेयुः किम् अयुक्तं स्यात्। न चावयव्य्-अवयवयोर् एकान्त-व्यतिरेकाव्यतिरेक-पक्षे यद् दूषणं तद् अस्मत्-पक्ष-बाधा-करं, परस्पराविनिर्लुठित-रूपयोर् विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदयोस् तयोर् अभ्युपगमाद्, बहिर् अन्तश् च तथैव प्रकाशमानतया तयोर् निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। एतेन रागाराग-कम्पाकम्पादि-विरोधोद्भावनम् अपि प्रतिव्यूढं, प्रमाण-प्रसिद्धेऽर्थे विरोधाभावात्, प्रमाण-बाधितस्यैव विरुद्धत्वात्, कुयुक्ति-विकल्पानां च प्रत्यक्षापह्नवे निर्मूलतया बाधकत्वायोगात्, तद्-उद्दलितत्वेनोत्थानाभावाद्, भिन्न-प्रवृत्ति-निमित्तत्वाच् च सर्व-धर्मानां तद्-विपर्यय-सम्पाद्यो विरोधो दूरापास्त एव। किं च, स्वयम् एव संवेदनं परमार्थ-संव्यवहारापेक्षया प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-सविकल्पकाविकल्पक-भ्रान्ताभ्रान्तादि-रूपम् अभ्युपयतो बहिर्-अर्थे विरुद्ध-धर्माध्यास-प्रतिषेध-बुद्धिः केवलं जाड्यं सूचयति। तन् न प्रमाणं कथञ्चिद् भ्रान्तं समस्ति, स्वरूप-प्रच्यव-प्रसङ्गाद् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ६।५] ननु च तद्-दर्शितार्थालीकतया ज्ञानस्य भ्रान्तता, न स्वरूपेण, न च तद्-उदय-समये कस्यचिद् इदम् अलीकार्थम् इदं त्व् अनलीकार्थम् इति विवेकेनावधारणं समस्ति, भ्रान्ताभ्रान्ताभिमतयोस् तद्-एक-रूपतया प्रकाशनात्। यदा च विशद-दर्शन-पथ-चारिणोऽपि शश-धर-युगलादयोऽलीकताम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तदा सकल-सत्यार्थताभिमत-प्रतिभासेष्व् अप्य् अलीकार्थताशङ्कानिवृत्तेर् अनाश्वास एव। न च तद्-अर्थ-प्राप्त्य्-आदिकम् आरेका-निराकरण-कारणं कल्पनीयं, स्वप्नावस्थायां तत्-सद्भावेऽप्य् अलीकार्थता-सिद्धेः। बाधक-प्रत्ययोपनिपातात् तस्यासत्यार्थतेति चेन्, न, तस्य स्व-गोचर-पर्यवसितत्वेन बाधकत्वायोगात्। अन्यथा नीलम् आददाना देवदत्त-बुद्धिः प्राक्-प्रवृत्त-पीत-बुद्धेर् बाधिकापद्येत। सर्व-प्रतिभासस्य बाधकाभाव-सिद्धेश् च समानता। तस्माद् भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञान-भ्रान्तिर् इयं भवतां, विवेकाभावेन सर्वस्यालीकार्थत्वाद् इति।
[न्या०वि० ७।०] अत्राह॒
सकल-प्रतिभासस्य भ्रान्तत्वासिद्धितः स्फुटं ।
प्रमाणं स्वान्य-निश्चायि द्वय-सिद्धौ प्रसिध्यति ॥ न्यायावतार ७ ॥
[न्या०वि० ७।१] एवं मन्यते॒ योऽपि समस्त-संवेदनस्य भ्रान्ततां प्रतिजानीते, तेनापि तत्-साधकस्याभ्रान्तताभ्युपगन्तव्या, तद्-भ्रान्तत्वे तत्-प्रतिपादितार्थालीकत्वेन सकल-ज्ञानाभ्रान्तता-प्रसङ्गाद्, अन्यथा तद्-भ्रान्ततायोगात्। एवं च तज्-जातीयम् अन्यद् अप्य् अभ्रान्तं स्यात्, ततश् च सकल-प्रतिभासस्य समस्त-संवेदनस्य भ्रान्तत्वासिद्धितो विपर्यस्तत्वानिष्पत्तेर् यत् स्फुटं स्वान्य-निश्चायि सुनिश्चिततया स्व-पर-प्रकाशकं तत् प्रमाणम् इति सम्बन्धः। तच् च द्वय-सिद्धौ स्वरूपार्थ-लक्षण-युग्म-निष्पत्तौ प्रसिद्ध्यति निष्पद्यते, अन्यथा प्रमेयाभावे प्रमाणाभावात्। तस्मात् प्रमाणम् उररी-कुर्वाणेनार्थोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अभिप्राय इति।
[न्या०वि० ८।०] तद् एवं स्वार्थानुमान-लक्षणं प्रतिपाद्य तद्-वतां भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं च निराकृत्याधुनाप्रतिपादित-परार्थानुमान-लक्षण एवाल्प-वक्तव्यत्वात् तावच् छाब्द-लक्षणम् आह :
दृष्टेष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः ।
तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ॥ न्यायावतार ८ ॥
[न्या०वि० ८।१] अत्रापि शाब्दम् इति लक्ष्यम्, अनूद्यत्वात्। दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य्-आदि लक्षणं, विधेयत्वात्। दृष्टेन प्रमाणावलोकितेनेष्टः प्रतिपादयिषितोऽव्याहतोऽनिराकृतः सामर्थ्याद् अर्थो यस्मिन् वाक्ये तत्-तथा, प्रमाण-निश्चितार्थाबाधितम् इति यावत्, तस्मात्। परमोऽकृत्रिमः पुरुषोपयोगी शक्यानुष्ठानो वार्थो वाच्यस्, तम् अभिधातुं शीलं यस्य तत् परमार्थाभिधायि, विशिष्टार्थ-दर्शकम् इत्य् अर्थः। ततस् तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं प्रकृत-वाक्य-प्रतिपाद्यार्थादान-शीलतया लब्धात्म-सत्ताकं यन् मानं तच् शाब्दम् इति प्रकीर्तितम् उपवर्णितं पूर्वाचार्यैर् इति सम्बन्धः। तत्र दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य् अनेन कुतीर्थिक-वचसां लौकिक-विप्रतारकोक्तीनां च शाब्दतां निरस्यति, प्रमाण-बाधितत्वात्। वाक्याद् इत्य् अमुना तु वाक्यस्यैव नियतार्थ-दर्शकत्वात् परमार्थाभिधायितेति दर्शयन् पदाच् छाब्दाभावम् आह। परमार्थाभिधायिन इत्य् अनेन ज्वर-हर-तक्षक-चूडा-रत्नालङ्कारोपदेशादि-वचन-प्रभव-ज्ञानस्य निष्फलतया प्रामाण्यं निराचष्टे। तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नम् इत्य् अमुना त्व् एवं-भूताद् अपि वाक्याच् छ्रोतृ-दोषाद् विपरीताद्य्-अर्थ-ग्रहण-चतुरतया प्रादुर्-भूतस्य शाब्दत्वं वारयति। मानम् इत्य् अनेनान्तर्-भावित-प्रोपसर्गार्थेन शाब्दे परस्याप्रामाण्य-बुद्धिं तिरस्-कुरुते, तद्-अप्रामाण्ये परार्थानुमान-प्रलय-प्रसङ्गात्, तस्य वचन-रूपत्वात्। त्र्य्-अवयव-हेतु-सूचकत्वेनोपचारतस् तस्य प्रामाण्यं, न तत्त्वत इति चेन्, नाप्रमाणस्य सूचकत्वायोगात्। ननु च हेतु-प्रतिपादने यदि तत् प्रमाणं, ततो हेतु-समर्थक-प्रमाणान्तर-प्रतीक्षणं विशीर्येत, तेनैव निर्णीत-स्वरूपत्वात् तस्य, प्रमाण-प्रसिद्धे पुनः प्रमाणान्तर-वैयर्थ्यात्। नैतद् अस्ति, भवत्-परिकल्पिताध्यक्षस्याप्य् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्॒ तद्-दर्शितेऽर्थे विकल्प-प्रतीक्षणात् तस्यैव प्रामाण्यम् आसज्येत। तद्-गृहीतम् एवार्थम् असाव् अभिलापयतीति चेच् छब्द-प्रतिपादितं हेतुं प्रमाणान्तरं समर्थयत इति समानो न्यायः।
[न्या०वि० ९।०] शाब्दं च द्विधा भवति॒ लौकिकं शास्त्र-जं चेति। तत्रेदम् द्वयोर् अपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितं। समर्थनं पुनर् अविप्रतारक-वचन-प्रभवस्येहादि-वाक्य-प्रस्ताव एव लौकिकस्य विहितं, शास्त्र-जस्य तु विधातव्यम् इति यादृशः शास्त्रात् तज्-जातं प्रमाणताम् अनुभवति तद् दर्शयति॒
आप्तोपज्ञम् अनुल्लङ्घ्यम् अदृष्टेष्ट-विरोधकम् ।
तत्त्वोपदेश-कृत् सार्वं शास्त्रं कापथ-घट्टनम् ॥ न्यायावतार ९ ॥
[न्या०वि० ९।१] शास्ति शिक्षयति जीवाजीवादि-तत्त्वं ग्राहयति, शिष्यतेऽनेनेति वा शास्त्रम्। तत् किं-भूतम् इति तद्-विशेषणान्य् आह। आप्तः प्रक्षीणाशेष-रागादि-दोष-गणस्, तेनोपज्ञम् आदाव् उपलब्धम्। अनेनापौरुषेयापोहम् आह, तस्य प्रमाण-बाधितत्वात्, पुरुष-व्यापाराभावे वचनानुपलब्धेर्, उपलम्भेऽपि तद्-अर्थानवगमात्, तद्-अर्थ-निश्चयार्थं पुरुषाश्रयणे गज-स्नान-न्याय-प्रसङ्गात्, तस्य रागादि-कलुषितत्वेन वितथार्थ-कथन-प्रवृत्तेः। तद्-अनुष्ठानाद् अपि स्व-कार्य-सिद्धौ प्रणयनार्थम् अपि पुरुषः किं नेष्यते, विशेषाभावात्। तन् न क्षीण-दोष-वचनं व्यतिरिच्यान्यतः प्रेक्षावतां पर-लोकादाव् अदृष्टेऽर्थे प्रवृत्तिर् युक्ता॑ तत् तद् एव शास्त्रं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ९।२] अत एवोल्लङ्घ्यते प्राबल्येन गम्यतेऽभिभूयते अन्यैर् इत्य् उल्लङ्घ्यं, ततोऽन्यद् अनुल्लङ्घ्यं, सर्व-वचनातिशायीति यावत्। अत एव दृष्टेन प्रमाण-निर्णीतेनेष्टस्य तद्-वाच्यस्य विरोधो यस्मिंस् तत्-तथा तद् एव, यदि वा दृष्टः प्रमाणेन, इष्टो वचनान्तरेण, तयोर् विरोधकं, तद्-विरुद्धार्थाभिधानात्, ततोऽन्यद् अदृष्टेष्ट-विरोधकम्, अबाधार्थाभिधायीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ९।३] तद्-इयता शास्त्रस्य स्वार्थ-सम्पद् उक्ता। अधुना तत्त्वोपदेशादीनां परार्थत्वात् परार्थ-सम्पदम् आह : तत्त्वं जीवादयः पदार्थाः, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्, तेषां उपदेशः स्वरूप-प्रकाशनं तद्-रक्षणादि-विधानं वा। तं करोति तत्त्वोपदेश-कृत्। अत एव सार्वं सर्वस्मै हितं, प्राणि-रक्षणोपायोपदेश-परम-पद-दायितया विश्व-जनीनत्वात्। एतेन परार्थ-सम्पादकत्वम् उक्तम्।
[न्या०वि० ९।४] अधुना परेषाम् एवानर्थ-विघातित्वम् आह : कुत्सिताः पन्थाः कापथास् तीर्थान्तराणि, तेषां घट्टनं विचालकं निराकारकं, सर्व-जनापकारि-कुमत-विध्वंसकम् इत्य् अर्थः। ईदृशाद् एव शास्त्राज् जातं शाब्दं प्रमाणं, नान्येभ्यो, विप्रलम्भकत्वात् तेषाम् इति।
[न्या०वि० १०।०] अधुना परार्थानुमान-लक्षणं वक्तव्यम्, तच् च प्रत्यक्षेऽपि पश्यन्न् एक-योग-क्षेमत्वात् सामान्येनाह॒
स्व-निश्चयवद् अन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः ।
परार्थं मानम् आख्यातं वाक्यं तद्-उपचारतः ॥ न्यायावतार १० ॥
[न्या०वि० १०।१] अत्र परार्थं मानम् इति लक्ष्यं, स्व-निश्चयवद् इत्य्-आदि लक्षणम्। स्व आत्मा तस्य निश्चयः प्रमेयाधिगमस्, तद्वद् अन्येशां प्रतिपाद्यानां निश्चयोत्पादनं प्रमेय-परिच्छेदक-ज्ञान-प्रादुर्-भावनं॒ यथात्मनोऽर्थ-निर्णयस् तथा परेषां निर्णय-जननम् इत्य् अर्थः। बुधैर् विद्वद्भिः, परस्मै अर्थः प्रयोजनं येन तत् परार्थं, मीयतेऽनेनेति मानम्, आख्यातं कथितम्।
[न्या०वि० १०।२] ननु च यदि निश्चयोत्पादनं परार्थ-मानं, तथा ज्ञानम् अपि पर-प्रत्यायनाय व्याप्रियमानं परार्थं प्राप्नोतीत्य् आह : वाक्यं परार्थं, न ज्ञानं, तस्यैवानन्तर्येण व्यापारात्, पर-प्रयोजन-मात्रत्वाच् च, इतरस्य तु व्यवहितत्वात्, स्व-परोपकारित्वाच् च। कथं वचनम् अज्ञान-रूपं प्रमाणम् इत्य् आह : तद्-उपचारतस्, तस्य ज्ञानस्योपचारोऽतद्-रूपस्यापि तद्-अङ्गतया तद्-रूपत्वेन ग्रहणम्, ततः। इदम् उक्तं भवति॒ प्रतिपाद्य-गतम् उत्पत्स्यमानं यज् ज्ञानं तद् अव्यवहित-कारणत्वाद् वचनम् अप्य् उपचारेण प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तत्रानुमानस्य पारार्थ्यं परैर् अभ्युपगतम् एव, प्रत्यक्षस्य न प्रतिपद्यन्ते, किलेदं शब्द-प्रवेश-शून्य-स्वलक्षण-ग्राहीति नैतद्-गोचरः परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यते। न च शब्दात् परस्य स्वलक्षण-ग्रहण-दक्षं प्रत्यक्षम् उन्मङ्क्ष्यति, शब्दस्य विकल्पोत्पादितत्वेन परस्यापि विकल्पोत्पादकत्वात्। तद् उक्तं॒
"विकल्प-योनयः शब्दा विकल्पाः शब्द-योनयः ।
कार्य-कारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्य् अपि" ॥
[न्या०वि० ११।०] निर्विकल्पकं च प्रत्यक्षम्, अतो न शब्द-जन्यम् इत्य् अतोऽनुमानं दृष्टान्ती-कृत्य प्रत्यक्षस्यापि परार्थतां साधयितुम् आह :
प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् ।
परस्य तद्-उपायत्वात् परार्थत्वं द्वयोर् अपि ॥ न्यायावतार ११ ॥
[न्या०वि० ११।१] प्रत्यक्षेणाप्य् अनुमानेनेव प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् स्व-प्रतीत-प्रमेय-प्रत्यायकत्वात् परार्थत्वं प्रतिपाद्य-प्रयोजनत्वं द्वयोर् अपि प्रत्यक्षानुमानयोस्, तुल्य-कारणत्वान्, नानुमानस्यैवैकस्येत्य् अभिप्रायः। इह चाश्रूयमाणत्वात् तद्-अर्थ-गमनाच् चापीव-शब्दौ लुप्त-निर्दिष्टौ द्रष्टव्यौ। प्रत्यक्ष-प्रतीतार्थ-प्रत्यायनं च प्रतिजानानस्यायम् अभिप्रायो॒ यत् परो मन्यते -- नैतद्-गोचरं परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यत इति -- तद् अयुक्तं, निर्विकल्पकाध्यक्षापोहेन व्यवसाय-रूपस्य प्रत्यक्षस्य प्राग् एव साधितत्वात्, तद्-गोचरस्य कथञ्चिद् विकल्प-गम्यत्वेन शब्द-प्रतिपाद्यत्वात्। तद् यथानुमान-प्रतीतोऽर्थः परस्मै प्रतिपाद्यमानो वचन-रूपापन्नः परार्थम् अनुमानं, तथा प्रत्यक्ष-प्रतीतोऽपि परार्थं प्रत्यक्षं, पर-प्रत्यायनस्य तुल्यत्वाद्, वचन-व्यापारस्यैव भेदात्। तथा ह्य्॒ अनुमान-प्रतीतं प्रत्याययन्न् एवं वचनयत्य् -- अग्निर् अत्र धूमाद्, यत्र यत्र धूमस् तत्र तत्राग्निर्, यथा महानसादौ॑ वैधर्म्येण वाग्न्य्-अभावे न क्वचिद् धूमो, यथा जलाशयादौ, तथा च धूमोऽयं, तस्माद् धूमाद् अग्निर् अत्रेति, अव्युत्पन्न-विस्मृत-सम्बन्धयोस् तथैव प्रतिपादयितुं शक्यत्वात्। स्मर्यमाणे सम्बन्धे पुनर् एवम्॒ अग्निर् अत्र धूमोपपत्तेर्॑ वैधर्म्येण॒ अग्निर् अत्र, अन्यथा धूमानुपपत्तेः। प्रत्यक्ष-प्रतीतं पुनर् दर्शयन्न् एतावद् वक्ति॒ ‘पश्य राज गच्छतिऽ। ततश् च वचनाद् द्विविधाद् अपि समग्र-सामग्रीकस्य प्रतिपाद्यस्यानुमेय-प्रत्यक्षार्थ-विषया यतः प्रतीतिर् उल्लसत्य्, अतो द्वयोर् अपि परार्थतेत्य् आह : परस्य तद्-उपायत्वात् प्रतिपाद्यस्य प्रतीतिं प्रति प्रतिपादक-स्थ-प्रत्यक्षानुमान-निर्णीतार्थ-प्रकाशन-कारणत्वाद् इत्य् अर्थः। एतेन पूर्व-कारिकोक्तोपचार-कारणं च लक्षयति।
[न्या०वि० ११।२] यच् चोक्तं॒ ‘न शब्दात् परस्य प्रत्यक्षोत्पत्तिस्, तस्य विकल्प-जनकत्वात्, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षण-विषयत्वेन निर्विकल्पकत्वात्ऽ॑ -- तद् अयुक्तं, सामान्य-विशेषात्मकार्थ-विषयस्य निर्णय-रूपस्य तस्य कथञ्चिद् एक-विषयतया शब्दोत्पाद्यत्वाविरोधाद्, एवं-विधस्य च प्राग् एव समर्थनात्। चक्षुर्-आदि-सामग्रीतस् तद् उत्पद्यते, न शब्दाद् इति चेद्, अनुमानम् अपि प्रत्यक्षादि-निश्चिताद् धेतोर् अविस्मृत-सम्बन्धस्य प्रमातुर् उल्लसति, न शब्दाद्, अतस् तस्यापि परार्थता विशीर्येत। समर्थ-हेतु-कथनात् तत्र वचनस्य परार्थतेति चेद्, अत्रापि दर्शन-योग्यार्थ-प्रतिपादनाद् इति ब्रूमः। तन् न प्रत्यक्ष-परोक्षयोः पारार्थ्यं प्रति विशेषोपलब्धिर् इति मुच्यतां पक्ष-पातः।
[न्या०वि० १२।०] तद् एवं द्वयोर् अपि परार्थतां प्रतिपाद्य तत्-स्वरूपम् आह :
प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि च यद् वचः ।
प्रत्यक्षं प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् तद् उच्यते ॥ न्यायावतार १२ ॥
[न्या०वि० १२।१] यद् वचः प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि साक्षात्-कारि-ज्ञान-गोचर-कथन-चतुरं तत् प्रत्यक्षम् उच्यत इति सम्बन्धः। तच् च प्रत्यक्ष-रूपम् एवोच्यमानं प्रत्यक्षं, विप्रतिपन्नं प्रति पुनर् अनुमान-द्वारेणोच्यमानम् अनुमानम् एवेति च-शब्देनानेकार्थत्वाद् दर्शयति। वचनं कुतः प्रत्यक्षम् इत्य् आह : प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् प्रतिपाद्य-प्रत्यक्ष-प्रकाश-हेतुत्वाद् उपचारेणोच्यत इत्य् अर्थः।
[न्या०वि० १३।०] अनुमानम् आह :
साध्याविनाभुवो हेतोर् वचो यत् प्रतिपादकम् ।
परार्थम् अनुमानं तत् पक्षादि-वचनात्मकम् ॥ न्यायावतार १३ ॥
[न्या०वि० १३।१] हिनोति गमयत्य् अर्थम् इति हेतुस्, तस्य साध्याविनाभुवः प्राङ् निरूपितस्य यद् वचः प्रतिपादकं सन्दर्शकं तद् अनुमान-प्रकाश-हेतुत्वात् परार्थम् अनुमानम्। तत् की-दृशं? इत्य् आह : पक्षो वक्ष्यमाण-लक्षणः स आदिर् येषां हेतु-दृष्टान्तोपनय-निगमनादीनां तानि तथा, तेषां वचनानि प्रतिपादका ध्वनयः॑ तान्य् एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् पक्षादि-वचनात्मकम्।
[न्या०वि० १३।२] ननु च हेतु-प्रतिपादकं वचः परार्थम् अनुमानम् इत्य् अभिधाय तत् पक्षादि-वचनात्मकम् इति वदतः पूर्वापर-व्याहता वाचो युक्तिः। नैतद् अस्त्य्॑ एवं मन्यते नैकः प्रकारः परार्थानुमानस्य, किं तर्हि यथा परस्य सुखेन प्रमेय-प्रतीतिर् भवति तथा यत्नतः प्रत्यायनीयः। तत्र दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः। तद् यथा -- पक्षादयः पञ्च, तच्-छुद्धयश् च। तत्र यदा प्रतिपाद्यः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षोऽविस्मृत-दृष्टान्त-स्मार्य-प्रतिबन्ध-ग्राहक-प्रमाणो व्युत्पन्न-मतित्वाच् छेषावयवाभ्यूहन-समर्थश् च भवति, यद् वात्यन्ताभ्यासेन परिकर्मित-मतित्वात् तावतैव प्रस्तुत-प्रमेयम् अवबुध्यते, तदा हेतु-प्रतिपादनम् एव क्रियते, शेषाभिधानस्य श्रोतृ-संस्काराकारितया नैरर्थक्याद् इत्य्-आदौ हेतु-प्रतिपादनं सूत्र-कृता परार्थम् अनुमानम् उक्तम्। यदा तु प्रतिपाद्यस्य नाद्यापि पक्ष-निर्णयस्, तदाकाण्ड एव हेत्ûपन्यासोऽदृष्ट-मुद्गर-पातायमानः स्याद् इति पक्षोऽपि निर्दिश्यते। तथास्मर्यमाणे प्रतिबन्ध-ग्राहिणि प्रमाणे दृष्टान्तोऽपि वर्ण्येतान्यथा हेतोः सामर्थ्यानवगतेः। स्मृतेऽपि प्रमाणे दार्ष्टान्तिके योजयितुम् अजानानस्योपनयो दर्श्यते। तथापि साकाङ्क्षस्य निगमनम् उच्यते,ऽन्यथा निराकुल-प्रस्तुतार्थासिद्धेः। तथा यत्र पक्षादौ स्वरूप-विप्रतिपत्तिस् तत्र तच्-छुद्धिः प्रमाणेन कर्तव्येतरथा तेषां स्व-साध्यासाधनात्। सर्वेषां चामीषां साधनावयवत्वं, प्रतिपाद्य-प्रतीत्य्-उपायत्वात्।
[न्या०वि० १३।३] ननु च स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तं, न च स्वार्थानुमान-काले क्रमोऽयम् अनुभूयते, सम्बन्ध-वेदिनो हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीति-सिद्धेर्, न हि प्रतिपत्ता पक्षं कृत्वा ततो हेतुं निभालयति, नापि दृष्टान्तादिकं विरचयति, तथा प्रतीतेर् अभावात्। किं चान्वय-व्यतिरेकाभ्यां हेतोर् एव सामर्थ्यम् उन्नीयते, न पक्षादीनां, तद्-व्यतिरेकेणापि साध्य-सिद्धेः, तथापि तेषां साधनांशत्व-कल्पनेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। यदि च तत्-सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्षोपन्यास-मात्राद् एव साध्यावगतेर् हेतुर् आनर्थक्यम् अश्नुवीत, उत्तरावयवाश् च, एवं हि तत्-सामर्थ्यं सिद्ध्येन् नान्यथा। तस्माद् य एव पर-निरपेक्षं साध्यं बोधयति स एव हेतुः साधनं, न पक्षादय इति।
[न्या०वि० १३।४] अत्रोच्यते -- ‘स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तम्ऽ॑ इत्य्-आदि यद् उक्तं तद् युक्तम् उक्तं, केवलं तद्-अर्थं न जानीषे, निश्चयापेक्षयैव ‘वत्ऽ-इना तुल्यताभिधानान्॑ न पुनः सर्व-सामान्यम् अभिप्रेतम्, अन्यथा ध्वनिम् अनुच्चारयन् स्वार्थानुमाने साध्यम् अवबुध्यत इति, तद्-अनुच्चारणेन पर-निश्चयोत्पादनं प्रसज्येत। न चैतद् अस्ति, शब्दानुच्चारणे पर-प्रतिपादनासम्भवात्, तद्-अर्थं शब्दाङ्गी-करणे येन येन विना पर-प्रतिपादनासम्भवस् तत् तद् उररी-कर्तव्यं, समान-न्यायात्। न च पक्षादि-विरहे प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं शक्यो, हेतु-गोचरादि-तत्-साध्यार्थ-प्रतीति-विकलतया तस्य साकाङ्क्षत्वात्। तथा च बुभुत्सितार्थ-बोधाभावाद् अप्रत्यायित एव तिष्ठेद्॑ अतस् तद्-बोधनार्थं पक्षादयो दर्शनीया इति तेऽपि साधनांशाः स्युः। यच् चोक्तम्॒ अन्वय-व्यतिरेकानुकरणाभावान् न साधनं, हेतु-मात्राद् अपि साध्य-सिद्धेस्, तद् अयुक्तम्, अविप्रतारकता-निश्चित-पुरुष-वचन-मात्राद् अप्य् अग्निर् अत्रेत्य्-आदि-रूपात् क्वचित् प्रमेयोऽर्थः सिध्यतीति हेतोर् अप्य् असाधनता-प्रसङ्गात्। तद्-विरहेणापि साध्य-सिद्धेः। युक्तं चैतद्, अविप्रतारक-वचनस्य प्राग् एव प्रामाण्य-प्रसाधनात्। यच् चोक्तम्॒ यद्य् अमीषां सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्ष-मात्राद् एव साध्य-प्रतीतेर् हेतोर् वैयर्थ्यं स्याद् इति, तद् अयुक्ततरं, भवत्-पक्षेऽपि समानत्वात्, तत्रापि समर्थ-हेत्ûपन्यासाद् एव साध्यावगतेर्, अन्यथा समर्थतायोगात्। पश्चात् तस्यैव प्रमाणेन समर्थनं सर्वत्र गृहीत-व्याप्तिकस्य च पुनः पक्ष-धर्मिण्य् उपसंहरणम् अनर्थकतां प्राप्नुवत् केन निवार्येत? तद्-अभावे हेतोः सामर्थ्यं नावगम्यते, तेन सार्थकम् इति चेत्, पक्षादीन् अपि विरहय्य प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं न पार्यत इति तेषाम् अपि सार्थकता न दुरुपपादेति मुच्यताम् आग्रहः। तस्माद् धेतुवत् पक्षादयोऽपि साधनं, हेतोर् अपि क्वचित् प्रतिपाद्ये तद्-अपेक्षतया निरपेक्षतासिद्धेर् इति। तद् इदं सकलम् आकलय्योक्तं तत् पक्षादि-वचनात्मकं इति।
[न्या०वि० १४।०] तद् एवम् अर्थतः पक्षादीन् प्रस्तुत्य तावत् पक्ष-लक्षणम् आह :
साध्याभ्युपगमः पक्षः प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृतः ।
तत्-प्रयोगोऽत्र कर्तव्यो हेतोर् गोचर-दीपकः ॥ न्यायावतार १४ ॥
[न्या०वि० १४।१] पच्यत इति पक्षो, व्यक्ती-क्रियत इति-भावः। किं-भूत इत्य् आह : साध्यस्यानुमेयस्याभ्युपगमोऽङ्गी-करणं, प्राश्निकादीनां पुरतः प्रतिज्ञा-स्वी-कार इत्य् अर्थः। किम् अभ्युपगम-मात्रम्? नेत्य् आह : प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृत इति। प्रत्यक्षं साक्षात्-कारि संवेदनम्, आदि-शब्दाद् अनुमान-स्व-वचन-लोका गृह्यन्ते, तैर् अनिराकृतोऽबाधितः पक्ष इति सम्बन्धः। तद् यथा -- ‘सर्वम् अनेकान्तात्मकम्ऽ, ‘अस्ति सर्व-ज्ञऽ॑ इत्य्-आदि वा। अयं च केवलम् एष्टव्यो, न पुनः परार्थानुमान-काले वचनेनाभिधातव्य इति यो मन्येत तं प्रत्याह॒ तस्य पक्षस्य प्रयोगोऽभिधानम् अत्र परार्थानुमान-प्रस्तावे कर्तव्यो विधेयः। कुत इत्य् आह : हेतोः प्राङ्-निरूपितस्य गोचर-दीपक इति, ‘निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां प्रायो दर्शनम्ऽ॑ इति-वचनाद्, भाव-प्रधानत्वाच् च निर्देशस्य, विषय-सन्दर्शकत्वाद् इत्य् अर्थः। अयम् अत्राभिप्रायो॒ न हि सर्वत्र प्रतिवादिनः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षस्य कूर्च-शोभा-पुरः-सरं हेतुर् उपन्यस्यते,ऽपि तु क्वचित् कथञ्चित्।
[न्या०वि० १५।०] ततो यदाद्यापि प्रतिपाद्यः पक्षार्थं न जानीते, तदाकाण्ड एव हेताव् उच्यमाने विषय-व्यामोहाद् भ्रान्ति-लक्षणो दोषः स्याद् इत्य् आह :
अन्यथा वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचर-मोहिनः ।
प्रत्याय्यस्य भवेद् धेतुर् विरुद्धारेकितो यथा ॥ न्यायावतार १५ ॥
[न्या०वि० १५।१] अन्यथेत्य् उक्त-विपरीताश्रयणे पक्ष-प्रयोगाकरण इत्य् अर्थः। वादिनो हेत्ûपन्यास-कर्तुर् अभिप्रेतोऽभिमतः स चासौ हेतु-गोचरश् च वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचरस्॑ तत्र मुह्यति दोलायते तच् छीलश् च यस्, तस्य प्रत्याय्यस्य प्रतिवादिनो हेतुर् विरुद्धारेकितो भवेद् विरोध-शङ्का-कलङ्कितः स्याद् इत्य् अर्थः। ततश् च सम्यग्-घेताव् अपि ‘विपक्ष एवायं वर्ततऽ॑ इति व्यामोहाद् विरुद्ध-दूषणम् अभिदधीत, पक्षोपन्यासात् तु निर्णीत-हेतु-गोचरस्य नैष दोषः स्याद् इत्य् अभिप्रायः। अमुम् एवार्थं स्पष्ट-दृष्टान्तेनाह यथेति। तद्-उपन्यासार्थः।
धानुष्क-गुण-सम्प्रेक्षि-जनस्य परिविध्यतः ।
धानुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन गुणेतरौ ॥ न्यायावतार १६ ॥
[न्या०वि० १६।१] यथा लक्ष्य-निर्देशं विना धानुष्कस्येषुं प्रक्षिपतो यौ गुण-दोषौ तौ तद्-दर्शि-जनस्य विपर्यस्ताव् अपि प्रतिभातः -- गुणोऽपि दोषतया, दोषोऽपि वा गुणतया -- तथा पक्ष-निर्देशं विना हेतुम् उपन्यस्यतो वादिनो यौ स्वाभिप्रेत-साध्य-साधन-समर्थत्वासमर्थत्व-लक्षणौ गुण-दोषौ तौ प्राश्निक-प्रतिवाद्यादीनां विपरीताव् अपि प्रतिभात इति भावार्थः। अक्षरार्थस् तु धनुषा चरति धानुष्कस् तस्य गुणो लक्ष्य-वेध-प्रावीण्य-लक्षणस् तत्र प्रेक्षकाणां कुतूहलम् इति तस्यैवोपादानम्, अन्यथा दोषोऽपि द्रष्टव्यः। तत्-सम्प्रेक्षि-जनस्य तत्-सम्प्रेक्षण-शील-लोकस्य परिविध्यतो यथा -- कथञ्चिद् बाणं मुञ्चत इत्य् अर्थः॑ धनुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन चाप-धरस्य वेध्य-निष्टङ्कनम् ऋते यौ गुणेतरौ गुण-दोषौ तौ यथा विरुद्धारेकितौ भवतस्, तथा वादिनोऽपीत्य् अर्थः। तस्माद् अविज्ञात-तद्-अर्थे प्रतिवादिनि वादि-धानुष्केण पक्ष-लक्ष्यं निर्दिश्यैव हेतु-शरः प्रोक्तव्य इति स्थितम्।
[न्या०वि० १७।०] साम्प्रतं हेतोर् लक्षणावसरस्, तच् च स्वार्थानुमानवन् निर्विशेषं द्रष्टव्यं॑ प्रयोगस् तु तत्र न दर्शितः, स्वार्थानुमानस्य बोध-रूपत्वाद्॑ इह तु दर्शनीयः, परार्थानुमानस्य वचन-रूपत्वाद्॑ अतस् तं दर्शयति॒
हेतोस् तथोपपत्त्या वा स्यात् प्रयोगोऽन्यथापि वा ।
द्वि-विधोऽन्यतरेणापि साध्य-सिद्धिर् भवेद् इति ॥ न्यायावतार १७ ॥
[न्या०वि० १७।१] स्वार्थानुमान-प्रस्तावे हि पर-प्रणीत-लक्षणान्तर-व्यपोहेन साध्य-व्यतिरेकात् सामस्त्येन हेतोर् व्यावृत्तिर् एवैकं लक्षणम् इति निर्णीतम्। परार्थानुमानेऽपि तद् एव प्रकाशनीयं, वचन-रचना तु क्वचित् कथञ्चित् प्रवर्तत इत्य् अभिप्रायवांस् तद्-द्वैविध्यम् आह : हेतोर् द्विविधः प्रयोगः स्याद् इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह : तथैव साध्य-सद्भाव एवोपपत्तिर् विद्यमानता, तया तथोपपत्त्या, यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर् इति। अन्यथापि वेत्य् अनेनावयवे समुदायोपचाराद् अन्यथानुपपत्तिं लक्षयति। अन्यथा साध्य-व्यतिरेकेऽनुपपत्तिर् अविद्यमानतैव तया वान्यथानुपपत्त्या हेतोः प्रयोगः स्याद्, यथाग्निर् अत्र, धूमस्यान्यथानुपपत्तेर् इति। ‘एते च द्वे अप्य् एकस्मिन् साध्ये प्रयोक्तव्येऽ॑ इति यो मन्येत,तच्-छिष्यणार्थं आहान्यतरेणापि तथोपपत्ति-प्रयोगेणान्यथानुपपत्ति-प्रयोगेण वा साध्यस्य प्रतिपिपादयिषितार्थस्य सिद्धिर् निष्पत्तिः प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोहणं भवेद्, इति यस्मात्, तस्मान् न द्वे अपि प्रयोक्तव्ये, प्रयोग-द्वयेऽपि यस्माद् वचन-रचना भिद्यते, नार्थः॑ प्रयोगस्य च साध्य-साधनं फलं॑ तच् चेद् एकेनैव सिध्यति, द्वितीय-प्रयोगः केवलं वक्तुर् अकौशलमाचक्षीत, नैरर्थक्याद् इत्य् अभिप्रायः।
[न्या०वि० १८।०] अधुना दृष्टान्त-लक्षणावसरः। स च द्वेधा॒ साधर्म्येण वैधर्म्येण च। तत्र साधर्म्य-दृष्टान्तम् अधिकृत्याह॒
साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर् यत्र निश्चीयते-तराम् ।
साधर्म्येण स दृष्टान्तः सम्बन्ध-स्मरणान् मतः ॥ न्यायावतार १८ ॥
[न्या०वि० १८।१] दृष्टयोर् अवलोकितयोः सामर्थ्यात् साध्य-साधनयोर् अन्तः परिनिष्ठितिः अन्वयाद् व्यतिरेकाद् वा साध्य-साधन-भाव-व्यवस्थिति-निबन्धनास्मिन्न् इति दृष्टान्तः॑ समानो धर्मोऽस्येति सधर्मा तद्-भावः साधर्म्यं तेन साधर्म्येण। स किं-विधो भवतीत्य् आह : साध्यं जिज्ञासितार्थात्मकं, साधनं तद्-गमको हेतुः, तयोः साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर्, इदम् अनेन विना न भवतीत्य्-एवं-रूपा, यत्र क्वचिन् निश्चीयते-तरां अतिशयेन निर्णीयते स साधर्म्य-दृष्टान्तः। यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर्, महानसादिवद् इति। अयं चाविस्मृत-प्रतिबन्धे प्रतिवादिनि न प्रयोक्तव्य इत्य् आह : सम्बन्ध-स्मरणाद् इति, ल्यब्-लोपे पञ्चमी, प्राग्-गृहीत-विस्मृत-सम्बन्ध-स्मरणम् अधिकृत्य मतोऽभिप्रेतोऽयं नीतिविदाम्, नान्यदा। यदा हि प्रतिपाद्योऽद्यापि सम्बन्धं साध्याविनाभावित्व-लक्षणं नावबुध्यते, तदा प्रमाणेन सम्बन्धं ग्राहणीयो, न दृष्टान्त-मात्रेण, न हि सह-दर्शनाद् एव क्वचित् सर्वत्रेदम् अमुना विना न भवतीति सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। गृहीते च प्रतिबन्धे स्मर्यमाणे केवलं हेतुर् दर्शनीयः, तावतैव बुभुत्सितार्थ-सिद्धेर् दृष्टान्तो न वाच्यो, वैयर्थ्यात्। यदा तु गृहीतोऽपि विस्मृतः कथञ्चित् सम्बन्धस्, तदा तत्-स्मरणार्थं दृष्टान्तः कथ्यते।
[न्या०वि० १८।२] ननु च कथं त्रि-काल-समस्त-देश-व्यापि-सम्बन्धावगतिः? न तावन् निर्णयात्मकम् अपि प्रत्यक्षं देश-कालान्तर-संचरिष्णुनोः साध्य-साधनयोः सम्बन्धं निरीक्षितुं क्षमते, सन्निहितेऽर्थे विशदाध्यवसायेन प्रवृत्तेः। नापि शब्दात् तन्-निर्णयस्, तस्य परोपदेश-रूपतया स्वार्थानुमानाभाव-प्रसङ्गात्, तत्र परोपदेशाभावात्, तद्-अभावे सम्बन्धासिद्देस्, तद्-असिद्धाव् अनुमानानुत्थानाद् इति। अनुमानात् सम्बन्ध-ग्रहणे निरवधिर् अनवस्थानुषज्येत, सम्बन्ध-ग्राहिणोऽप्य् अनुमानस्य पुनः सम्बन्धान्तर-ग्रहण-सव्यपेक्षत्वाद् इति। अत्रोच्यते -- प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति येषां मिथ्याभिनिवेशस्, तेषां एष दोषो नास्माकम्, अन्वय-व्यतिरेक-ग्राहि-प्रत्यक्षानुपलम्भोत्तर-काल-भाविनोऽव्यभिचरित-त्रि-काल-व्यापि-गोचरस्य मति-निबन्धनस्योह-संज्ञितस्य प्रमाणान्तरस्य सम्बन्ध-ग्राहितयेष्टत्वात्, तद्-अनिष्टौ दृष्ट-व्यवहार-विलोप-प्रसङ्गात्, तद्-विलोपे च विचारानर्थक्य-प्राप्तेर् इति। अत्र प्रकरणे पुनर् अनुमानात् पार्थक्येनोहो न दर्शितः, सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-प्रवृत्तत्वाद् अस्य, शाब्दं तु पृथक् समर्थितं, तस्यात्रैव परार्थानुमानोपयोगित्वाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० १९।०] इदानीं वैधर्म्य-दृष्टान्तम् उपदर्शयन्न् आह :
साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य् असम्भवः ।
ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधर्म्येणेति स स्मृतः ॥ न्यायावतार १९ ॥
[न्या०वि० १९।१] विसदृशो धर्मोऽस्येति विधर्मा, तद्-भावो वैधर्म्यं, तेन वैधर्म्येण दृष्टान्तः। की-दृश इत्य् आह : साध्ये गम्ये निवर्तमानेऽसम्भवति तु-शब्दोऽवधारणार्थो भिन्न-क्रमः, स च साधनस्यापि गमकस्याप्य् असम्भव एवेत्य् अत्र द्रष्टव्यः, ख्याप्यते प्रतिपाद्यते यत्र क्वचिद् दृष्टान्ते स वैधर्म्येण भवतीति-शब्देन सम्बन्ध-स्मरणाद् इति।
[न्या०वि० २०।०] इदम् अत्रापि सम्बध्नाति॒ अस्यापि स्मर्यमाणे सम्बन्धे प्रयोगायोगाद् इति किम् अर्थं विस्मृत-सम्बन्ध एव प्रतिवादिनि दृष्टान्तः प्रयुज्यते, नान्यदेति पर-वचनावकाशम् आशङ्क्याह॒
अन्तर्-व्याप्त्यैव साध्यस्य सिद्धेर् बहिर्-उदाहृतिः ।
व्यर्था स्यात् तद्-असद्भावेऽप्य् एवं न्याय-विदो विदुः ॥ न्यायावतार २० ॥
[न्या०वि० २०।१] अन्यदाहि स्मर्यमाणे वा सम्बन्धे प्रयुज्येतागृहीते वा। यद्य् आद्यः पक्षः, सोऽयुक्तः। यदा सर्वत्र साध्याविनाभाविनं हेतुं स्मरति प्रतिपाद्यस्, तदा पक्षेऽपि तम् अवबुध्य कथं साध्यं न प्रतिपद्येत? ततश् चान्तः पक्ष-मध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वम् अन्तर्-व्याप्तिस्, तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेर् बहिर् विवक्षित-धर्मिणोऽन्यत्र दृष्टान्त-धर्मिण्य् उदाहृतिर् व्याप्ति-दर्शन-रूपा व्यर्था निष्प्रयोजना, तत्-प्रत्याय्यार्थाभावाद् इति। द्वितीय-पक्षस्यापि निर्दोषतां निरस्यन्न् आह : तद्-असद्भावेऽप्य् एवं सम्बन्धाग्रहणाद् अन्तर्-व्याप्त्य्-अभावेऽप्य् एवम् इति व्यर्थैव बहिर्-उदाहृतिः। न हि सह-दर्शनात् क्वचित् सर्वत्र तद्-रूपता सिध्यति, व्यभिचार-दर्शनात्। तस्माद् अगृहीत-सम्बन्धे प्रतिपाद्ये प्रमाणेन प्रतिबन्धः साध्यः। तत्-सिद्धौ तत एव साध्य-सिद्धेर् अकिञ्चित्-करी दृष्टान्तोदाहृतिर् इति न्याय-विदो न्याय-विद्वांसो विदुर् अवबुध्यन्त इति। इह च प्रकरणे शेषावयवानाम् उपनय-निगमन-शुद्धि-पञ्चक-लक्षणानां सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-परत्वाद् अस्य, यद्य् अपि साक्षाल् लक्षणं नोक्तं, तथाप्य् अत एव प्रतिपादितावयव-त्रयाद् बुद्धिमद्भिर् उन्नेयं॑ यतोऽवयवापेक्षया जघन्य-मध्यमोत्कृष्टास् तिस्रः कथा भवन्ति। तत्र हेतु-प्रतिपादन-मात्रं जघन्या। द्व्य्-आद्य्-अवयव-निवेदनं मध्यमा। सम्पूर्ण-दशावयव-कथनम् उत्कृष्टा। तत्रेह मध्यमायाः साक्षात् कथनेन जघन्योत्कृष्टे अर्थतः सूचयति, तद्-सद्भावस्य प्रमाण-सिद्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २१।०] एवं पक्षादि-लक्षणं प्रतिपाद्येदानीं हेय-ज्ञाने सत्य् उपादेयं विविक्ततरं वेद्यत इति तद्-व्युदस्ताः पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताभासा वक्तव्याः। तत्र तावत् पक्ष-लक्षण-व्युदस्तान् पक्षाभासान् आह :
प्रतिपाद्यस्य यः सिद्धः पक्षाभासोऽक्ष-लिङ्गतः ।
लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितोऽनेकधा मतः ॥ न्यायावतार २१ ॥
[न्या०वि० २१।१] पक्ष-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणत्वाच् च पक्षवद् आभासत इति पक्षाभासः। असाव् अनेकधानेक-प्रकारो मत इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह : प्रतिपाद्यस्य प्रतिवादिनो यः कश्चित् सिद्धः प्रतीताव् आरूढ एव स पक्षाभासः, साध्यस्यैव पक्षत्वात्, सिद्धस्य साधनानर्हत्वाद्, अतिप्रसक्तेः। तथाक्ष-लिङ्गतोऽध्यक्ष-हेतुभ्यां लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितस् तिरस्-कृतो यः स पक्षाभासः। तत्र प्रतिपाद्य-सिद्धो यथा॒ पौद्गलिको घटः, सौगतं वा प्रति॒ सर्वं क्षणिकम् इत्य्-आदि। प्रत्यक्ष-बाधितो यथा॒ निरंशानि स्वलक्षणानि, परस्पर-विविक्तौ वा सामान्य-विशेषाव् इति। अनुमान-बाधितो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञ इति। लोक-बाधितो यथा॒ गम्या माता इति। स्व-वचन-बाधितो यथा॒ न सन्ति सर्वे भावा इति।
[न्या०वि० २२।०] साम्प्रतं हेतु-लक्षणं स्मारयंस् तद्-अपास्तान् हेत्व्-आभासान् आह :
अन्यथानुपपन्नत्वं हेतोर् लक्षणम् ईरितम् ।
तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस् तद्-आभता ॥ न्यायावतार २२ ॥
[न्या०वि० २२।१] हेतोर् लक्षणम् असाधारण-धर्म-रूपं यद् ईरितं गमितम् अनेकार्थत्वाद् वा प्रतिपादितं स्वार्थानुमान-प्रस्तावे यद् उतान्यथानुपपन्नत्वम् इति तस्याप्रतीतिर् अनध्यवसायः, सन्देहो दोलायमानता, विपर्यासो वैपरीत्य-निर्णयो॑ऽप्रतीतिश् च सन्देहश् च विपर्यासश् चेति द्वन्द्वः॑ पश्चात् तदा सह तत्-पुरुषस्॒ तैस् तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस्॑ तद्-आभताआभानम् आभा तस्येव सम्यग्-घेतोर् इवाभास्येति तद्-आभस्, तद्-भावस् तत्ता, हेत्व्-आभासता भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० २३।०] अधुना येन लक्षणेन यन्-नामा हेत्व्-आभासो भवति तद् दर्शयति॒
असिद्धस् त्व् अप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते ।
विरुद्धो योऽन्यथाप्य् अत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु ॥ न्यायावतार २३ ॥
[न्या०वि० २३।१] यः कश्चिद् अप्रतीतः प्रतीत्या अगोचरी-कृतोऽनिश्चितः सोऽसिद्ध-नामा हेत्व्-आभासः। तु-शब्दस् त्रयस्यापि भेदोद्द्योतकः। यस् त्व् अन्यथैव साध्यं विनैव विपक्ष एवेति यावद्, उपपद्यते सम्भवति स विरुद्धाभिधानः। यः पुनर् अन्यथापि साध्य-विपर्ययेणापि युक्तो घटमानको,ऽपि-शब्दात् साध्येनापि, सोऽत्र व्यतिकरेऽनैकान्तिक-संज्ञो ज्ञातव्य इति। तत्र प्रतिप्राणि-प्रसिद्ध-प्रमाण-प्रतिष्ठितानेकान्त-विरुद्ध-बुद्धिभिः कणभक्षाक्षपाद-बुद्धादि-शिष्यकैर् उपन्यस्यमानाः सर्व एव हेतवः, तद् यथैकान्तेनानित्यः शब्दो नित्यो वा, सत्त्वाद्, उत्पत्तिमत्त्वात्, कृतकत्वात्, प्रत्यभिज्ञायमानत्वाद् इत्य्-आदयो विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकतां स्वी-कुर्वन्तीत्य् अवगन्तव्यम्।
[न्या०वि० २३।२] तथा ह्य्॒ अनित्यैकान्ते तावद् असिद्धाः सर्व एव हेतवश्, चाक्षुषत्ववत् तेषां ध्वनाव् अविद्यमानत्वाद्, असद्-आदि-व्यवच्छेदेनालीक-संवृति-विकल्पितत्वात्, पारमार्थिकत्वे त्व् एकस्यानेक-रूपापत्त्यानेकान्त-वादापत्तेः, कल्पना-रचित-सत्ताकानां च सर्व-शक्ति-विरह-रूपतया निःस्वभावत्वात्, तथापि तेषां साधनत्वे साध्यम् अपि निःस्वभावम् इति खर-विषाणं शश-विषाणस्य साधनम् आपद्यत इति शोभनः साध्य-सधन-व्यवहारः। सर्व एवायम् अनुमानानुमेय-व्यवहारो बुद्ध्य्-आरूढेन धर्म-धर्मि-न्यायेन न बहिः-सद्-असत्त्वम् अपेक्षते, तेनायम् अदोष इति चेद्, एवं तर्हि चाक्षुषत्वम् अपि शब्दे बुद्ध्याध्यारोप्य हेतुतयोच्यमानं नासिद्धतयोद्भावनीयं, विशेषाभावात्। अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदेन चाक्षुषत्वं बुद्ध्याध्यारोपयितुंपार्यते, न यथा कथञ्चिन्, न चासौ शब्देऽस्त्य्, अचक्षुर्-ग्राह्यत्वात् तस्य, तेनायम् अदोष इति चेत्, कोऽयम् अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदो नाम॒ व्यवच्छेद-मात्रं नीरूपं, व्यवच्छिन्नं वा स्वलक्षणं, व्यवच्छेदिका वा बुद्धिः स्वांश-मग्नापि बहिर्-वस्तु-ग्रहण-रूपतया प्लवमाना? नापरो वस्तु-धर्मो यत्र भेदाभेद-विकल्प-द्वारेणा दूषणं दित्सुर् भवान् इति चेत्, तर्हि स शब्दे नास्तीति कैषा भाषा? एवं हि नभः-पुण्डरीकं तत्र नास्तीति सत्त्वादिकम् अपि कल्पयितुं न शक्यम् इति प्रसज्येत। किं च, ते साधन-धर्मा धर्मिणि भवन्तोऽपि न भवद्-दर्शने प्रतीतिम् आरोहन्ति, प्रत्यक्षस्य विकल्प-विकलतया धर्म-निर्णय-शून्यत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविन्या वासना-प्रबोध-जन्याया विकल्प-बुद्धेः स्वांश-ग्रहण-पर्यवसित-शरीरत्वेन बहिः-स्वलक्षणे प्रवेशाभावात्, ततश् चाप्रतीतत्वात् सर्वस्यासिद्धत्वम्।
[न्या०वि० २३।३] नित्यैकान्तेऽपि धर्मिणोऽत्यन्त-व्यतिरिक्तानाम् अपारमार्थिकानां वा स्व-साधन-धर्माणां प्रमाणेनाप्रतीतत्वाद् असिद्धता द्रष्टव्या, धर्मिणोऽविनिर्लुठित-रूपाणां पारमार्थिकानां सकल-धर्माणां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धत्वेन निह्नोतुम् अशक्यत्वाद् इति।
[न्या०वि० २३।४] तथा विरुद्धतापि पक्ष-द्वयेऽपि सर्व-साधन-धर्माणाम् उन्नेयानेकान्त-प्रतिबद्ध-स्वभावत्वेन तत्-साधन-प्रवणत्वात्। एतच् चोत्तरत्र वक्ष्यामः।
[न्या०वि० २३।५] एवं पक्ष-द्वयेऽपि निर्दिश्यमानाः सर्व एव हेतवोऽनैकान्तिकताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति, परस्पर-विरुद्धाव्यभिचारित्वात्, समान-युक्त्य्-उपन्यासेन विपक्षेऽपि दर्शयितुं शक्यत्वात्।
[न्या०वि० २३।६] तथा हि॒ अनित्य-वादी नित्य-वादिनं प्रति प्रमाणयति। सर्वं क्षणिकं, सत्त्वाद्, अक्षणिके क्रम-यौगपद्याभ्याम् अर्थ-क्रिया-विरोधाद्, अर्थ-क्रिया-कारित्वस्य च भाव-लक्षणत्वात्, ततोऽर्थ-क्रिया व्यावर्तमाना स्व-क्रोडी-कृतां सत्तां व्यावर्तयेद् इति क्षणिकत्व-सिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियायां क्रमेण प्रवर्तितुम् उत्सहते, पूर्वार्थ-क्रिया-करण-स्वभावोपमर्द-द्वारेणोत्तर-क्रियायां प्रवृत्तेर्, अन्यथा पूर्वार्थ-क्रिया-करणाविराम-प्रसङ्गात्॑ तत्-स्वभाव-प्रच्यवे च नित्यतापयात्य्, अतादवस्थ्यस्यानित्य-लक्षणत्वात्। नित्योऽपि क्रम-वर्तिनं सह-कारि-कारणम् अर्थम् उदीक्षमाणस् तावद् असीत्, पश्चात् तम् आसाद्य क्रमेण कार्यं कुर्याद् इति चेन्, न, सह-कारि-कारणस्य नित्येऽकिञ्चित्-करत्वाद्, अकिञ्चित्-करस्यापि प्रतीक्षणेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियां कुरुते,ऽध्यक्ष-विरोधात्। न ह्य् एक-कालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिद् उपलभते॑ करोतु वा, तथाप्य् आद्य-क्षण एव सकल-क्रिया-परिसमाप्तेर् द्वितीयादि-क्षणेष्व् अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोर् एकस्मिन् विरुद्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २३।७] नित्य-वादी पुनर् एवं प्रमाणयति॒ सर्वं नित्यं सत्त्वात्। क्षणिके सद्-असत्-कालयोर् अर्थ-क्रिया-विरोधात्, तल्-लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातीति, ततो निवर्तमानम् अनन्य-शरणतया नित्यत्वं साधयति। तथा हि॒ क्षणिकोऽर्थः सद् वा कार्यं कुर्यात्, असद् वा, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् आद्यः पक्षः, सम-समय-वर्तिनि व्यापारायोगात्, सकल-भावानां परस्परं कार्य-कारण-भाव-प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच् च। नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्य-करण-शक्ति-विकलत्वात्। अन्यथा शश-विषाणादयोऽपि कार्य-करणायोत्सहेरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० २३।८] तद् एवम् एकान्त-द्वयेऽपि ये ये हेतवस् ते ते युक्तेः समानतया विरुद्धं न व्यभिचरन्त्य्॑ अविचारित-रमणीयतया मुग्ध-जन-ध्य्-आन्ध्यं चोत्पादयन्तीति विरुधाव्यभिचारिणोऽनैकान्तिकाः, सर्व-वस्तु-धर्माणां वस्तुतोऽनेकान्त-प्रतिबद्धत्वाद् इति। तस्माद् अमी सर्व एव हेतवः सन्तोऽनेकान्तम् अन्तरेण नोपपद्यन्त इति तम् एव प्रतिपादयितुम् ईशते॑ विमूढ-बुद्धिभिः पुनः विपक्ष-साधनार्थम् उपन्यस्यमाना विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकताम् आबिभ्रतीति स्थितम्।
[न्या०वि० २४।०] तद् एवं हेत्व्-आभासान् प्रतिपाद्य दृष्तान्त-लक्षण-व्युदस्तान् दृष्टान्ताभासान् आह :
साधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
अपलक्षण-हेत्ûत्थाः साध्यादि-विकलादयः ॥ न्यायावतार २४ ॥
[न्या०वि० २४।१] साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शयितुम् अभिप्रेतं यस्मिंस् तत् साधर्म्यं, तेन। अत्र व्यतिकरे॑ दूष्यन्त इति दोषाः। दृष्टान्ता एव दोषा दृष्टान्त-दोषाः दृष्टान्ताभासा इत्य् अर्थः। न्याय-विद्-ईरिता विद्वद्भिर् गदिताः॑ साध्यं गम्यम्॑ आदि-शब्दात् साधनोभय-परिग्रहस्॑ तद्-विकलास् तच्-छून्याः। आदि-शब्दात् सन्दिग्ध-साध्य-साधनोभय-धर्मा गृह्यन्ते। किं-भूता एते इत्य् आह : अपगतं लक्षणं येभ्यस् ते तथा, ते च ते हेतवः, तेभ्य उत्था उत्थानं येषां तेऽपलक्षण-हेत्ûत्थाः॑ इदं च प्रायिकं विशेषणं, सम्यग्-घेताव् अपि वक्तृ-दोष-वशात् दृष्टान्ताभासतोपपत्तेर्, यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद्, घटवद् इत्य्-आदि।
[न्या०वि० २४।२] तत्र साध्य-विकलो यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वात्, प्रत्यक्षवत्॑ प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता-विकलत्वात्॑ तद्-भ्रान्तत्वे सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च प्रमाण-प्रमेयाभावान् न किञ्चित् केनचित् साध्यत इति भ्रान्त-वादिनो मूकतापनिपद्येत। साधन-विकलो यथा॒ जाग्रत्-संवेदनं भ्रान्तं, प्रमाणत्वात्, स्वप्न-संवेदनवत्॑ स्वप्न-संवेदनस्य प्रमाणता-वैकल्यात् तत्-प्रत्यनीक-जाग्रत्-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वाद् इति। उभय-विकलो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञः, प्रत्यक्षाद्य्-अनुपलब्धत्वात्, घटवद्॑ घटस्य सत्त्वात् प्रत्यक्षादिभिर् उपलब्धत्वाच् च। सन्दिग्ध-साध्य-धर्मो यथा॒ वीत-रागोऽयं, मरण-धर्मत्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे वीत-रागत्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, विशिष्ट-चेतो-धर्माणां विशिष्ट-व्याहारादि-लिङ्ग-गम्यत्वाद् रथ्या-पुरुषे तन्-निर्णयस्याप्य् अभावाद् इति। सन्दिग्ध-साधन-धर्मो यथा॒ मरण-धर्मायं पुरुषो, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे रागादिमत्त्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, वीत-रागस्यापि तथा सम्भवाद् इति। सन्दिग्धोभय-धर्मो यथासर्व-ज्ञोऽयं, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे प्रदर्शित-न्यायेनोभयस्यापि सन्दिग्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २४।३] ननु च परैर् अन्यद् अपि दृष्टान्ताभास-त्रयम् उक्तम्, तद् यथानन्वयोऽप्रदर्शितान्वयो विपरीतान्वयश् चेति। तत्रानन्वयो यथा॒ रागादिमान् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद्, इष्ट-पुरुषवद् इति। यद्य् अपि किलेष्ट-पुरुषे रागादिमत्त्वं वक्तृत्वं च साध्य-साधन-धर्मौ दृष्टौ, तथापि यो यो वक्ता स स रागादिमान् इति व्याप्त्य्-असिद्धेर् अनन्वयोऽयं दृष्टान्तः। तथाप्रदर्शितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवद् इति। अत्र यद्य् अपि वास्तवोऽन्वयोऽस्ति, तथापि वादिना वचनेन न प्रकाशित इत्य् अप्रदर्शितान्वयो दृष्टान्तः। विपरितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति हेतुम् अभिधाय यद् अनित्यं तद् कृतकं घटवद् इति, विपरीत-व्याप्ति-दर्शनाद् विपरीतान्वयः, साधर्म्य-प्रयोगे हि साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शनीयम्, इह तु विपर्यास-दर्शनाद् विपरीतता। तद् एतद् भवद्भिः कस्मान् नोक्तम् इति।
[न्या०वि० २४।४] अत्रोच्यते -- परेषां न सुपर्यालोचितम् एतद् दृष्टान्ताभास-त्रयाभिधानम् इति ज्ञापनार्थम्। तथा हि॒ न तावद् अनन्वयो दृष्टान्ताभासो भवितुम् अर्हति। यदि हि दृष्टान्त-बलेन व्याप्तिः साध्य-साधनयोः प्रतिपाद्येत, ततः स्याद् अनवयो दृष्टान्ताभासः, स्व-कार्याकरणाद्, यदा तु पूर्व-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्राहि-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोदाहृतिर् इति स्थितं, तदानन्वयत्व-लक्षणो न दृष्टान्तस्य दोषः, किं तर्हि हेतोर् एव, प्रतिबन्धस्याद्यापि प्रमाणेनाप्रतिष्ठितत्वात्, प्रतिबन्धाभावे चान्वयासिद्धेः। न च हेतु-दोषोऽपि दृष्टान्ते वाच्यो,ऽतिप्रसङ्गाद् इति। तथाप्रदर्शितान्वय-विपरीतान्वयाव् अपि न दृष्टान्ताभासतां स्वी-कुरुतो,ऽन्वयाप्रदर्शनस्य विपर्यस्तान्वय-प्रदर्शनस्य च वक्तृ-दोषत्वात्, तद्-दोष-द्वरेणापि दृष्टान्ताभास-प्रतिपादने तद्-इयत्ता विशीर्येत, वक्तृ-दोषाणामानन्त्यात्। वक्तृ-दोषत्वेऽपि परार्थानुमाने तत्-कौशलम् अपेक्षत इति। एवं चोपन्यासे न बुभुत्सितार्थ-साधकाव् अतो दृष्टान्ताभासाव् एताव् इति चेद्, एवं तर्हि करणापाटवादयोऽपि दृष्टान्ताभासा वाच्याः। तथा हि॒ करण-पाटव-व्यतिरेकेणापि न पर-प्रत्यायनं समस्ति, विस्पष्ट-वर्णाग्रहणे व्यक्ततया तद्-अर्थावगमाभावाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० २५।०] तद् एवं साधर्म्येण दृष्टान्ताभासान् प्रतिपाद्य वैधर्म्येणाह॒
वैधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
साध्य-साधन-युग्मानाम् अनिवृत्तेश् च संशयात् ॥ न्यायावतार २५ ॥
[न्या०वि० २५।१] साध्याभावः साधनाभाव-व्याप्तौ दर्शयितुम् अभिप्रेतो यस्मिंस् तद् वैधर्म्यम्, तेनात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिता इति दत्तार्थम्। साध्य-साधन-युग्मानां गम्य-गमकोभयानाम् अनिवृत्तेर् अनिवर्तनाच्, च-शब्दस्य व्यवहित-प्रयोगत्वात् संशयाच् च निवृत्ति-सन्देहाच् चेत्य् अर्थः। तद् अनेन षड् दृष्टान्ताभासाः सूचितास्, तद् यथा -- साध्याव्यतिरेकी, साधनाव्यतिरेकी, साध्य-साधनाव्यतिरेकी, तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकश् चेति।
[न्या०वि० २५।२] तत्र साध्याव्यतिरेकी यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानम्, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनर् भ्रान्तं न भवति न तत् प्रमाणं, तद् यथा स्वप्न-ज्ञानम् इति॑ स्वप्न-ज्ञानाद् भ्रान्ततानिवृत्तेः साध्याव्यतिरेकित्वम् इति। साधनाव्यतिरेकी यथा॒ निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनः सविकल्पकं न तत् प्रमाणं, तद् यथानुमानम्॑ अनुमानात् प्रमाणतानिवृत्तेः साधनाव्यतिरेकित्वम् इति। उभयाव्यतिरेकी यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, सत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् न नित्यानित्यः स न सन्, तद् यथा -- घटो॑ घटाद् उभयस्याप्य् अव्यावृत्तेर् उभयाव्यतिरेकित्वम् इति। तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेको यथासर्व-ज्ञा अनाप्ता वा कपिलादयो,आर्य-सत्य-चतुष्टयाप्रतिपादकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनः सर्व-ज्ञ आप्तो वाऽसाव् आर्य-सत्य-चतुष्टयं प्रत्यपीपदत्, तद् यथा -- शौद्धोदनिर् इति। अयं च साध्याव्यतिरेकी वार्य-सत्य-चतुष्टयस्य दुःख-समुदय-मार्ग-निरोध-लक्षणस्य प्रमाण-बाधितत्वेन तद्-भाषकस्यासर्वज्ञतानाप्ततोपपत्तेः। केवलं तन्-निराकारक-प्रमाण-सामर्थ्य-पर्यालोचन-विकलानां सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकतया प्रतिभातीति तथोपन्यस्तः। तथा हि॒ यद्य् अप्य् आर्य-सत्य-चतुष्टयं शौद्धोदनिः प्रतिपादितवांस्, तथापि सर्वज्ञताप्तते तस्य न सिद्ध्यतः, ताभ्यां सहार्य-सत्य-चतुष्टय-प्रतिपादनस्यान्यथानुपपत्त्य्-असिद्धेर्, असर्व-ज्ञानाप्तेनापि पर-प्रतारणाभिप्राय-प्रवृत्त-निपुण-बुद्धि-शठ-पुरुषेण तथा-विध-प्रतिपादनस्य कर्तुं शक्यत्वात्। तस्माच् छौद्धोदनेः सकाशाद् असर्व-ज्ञतानाप्तता-लक्षणस्य साध्यस्य व्यावृत्तिः सन्दिग्धेति सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेको यथा॒ऽनादेय-वाक्यः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो रागादिमत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् आदेय-वाक्यो, न स रागादिमांस्, तद् यथा -- सुगत इति। यद्य् अपि तद्-दर्शनानुरक्तान्तः-करणाणां सुगतस्यादेय-वचनता सिद्धि-सौध-मध्यारूढा, तथापि रागादिमत्त्वाभावस् तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैधुर्यात् सन्देह-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अतः सुगताद् रागादिमत्ता-व्यावृत्ति-संशयात् सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेको यथा॒ न वीत-रागाः कपिलादयः, करुणास्पदेष्व् अप्य् अकरुणापरीत-चित्ततयादत्त-निजक-मांस-शकलत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ ये पुनर् वीत-रागास् ते करुणास्पदेषु करुणा-परीत-चित्ततया दत्त-निज-मांस-शकलास्, तद् यथा -- बोधिसत्त्वा इति। अत्र साध्य-साधन-धर्मयोर् बोधिसत्त्वेभ्यो व्यावृत्तिः सन्दिग्धा॑ तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैकल्यान् न ज्ञायते किं ते रागादिमन्त उत वीत-रागाः॑ तथानुकम्प्येषु किं स्व-पिशित-खण्डानि दत्तवन्तो नेति वा। अतः सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति।
[न्या०वि० २५।३] परैर् अपरेऽपि दृष्टान्ताभासास् त्रयोऽविमृश्य-भाषितया दर्शिताः। तद् यथा -- अव्यतिरेको,ऽप्रदर्शित-व्यतिरेको, विपरीत-व्यतिरेकश् चेति। तेऽस्माभिर् अयुक्तत्वान् न दर्शयितव्याः। तथा ह्य्॒ अव्यतिरेकस् तैर् दर्शितो, यथावीत-रागः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-डृष्टान्तो॒ यः पुनर् वीत-रागो, न स वक्ता, यथोपल-खण्ड इति। यद्य् अपि किलोपल-खण्डाद् उभयं व्यावृत्तं, तथापि व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेर् अव्यतिरेकित्वम् इति। अयुक्तश् चायं वक्तुम्, अव्यतिरेकिताया हेतु-दोषत्वात्। यदि हि दृष्टान्त-बलेनैव व्यतिरेकः प्रतिपाद्येत, तदा तथा-विध-सामर्थ्य-विकलस्य तद्-आभासता युज्येत, न चैतद् अस्ति, प्राक्-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवण-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोपादानात्। न ह्य् एकत्र यो यद्-अभावे न दृष्टः, स तद्-अभावे न भवतीति प्रतिबन्ध-ग्राहि-प्रमाण-व्यतिरेकेण सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। तस्माद् असिद्ध-प्रतिबन्धस्य हेतोर् एवायं दोषो, न दृष्टान्तस्येति। तथाप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकाव् अपि वक्तुम् अयुक्तौ, तयोर् वक्तृ-दोषत्वात्। तथा ह्य्॒ अप्रदर्शित-व्यतिरेकस् तैर् उक्तो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, आकाशवद् इति। अत्र विद्यमानोऽपि व्यतिरेको वादिना वचनेन नोद्भावित इति दुष्टता। विपरीत-व्यतिरेकः पुनर् अभिहितो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यद् अकृतकं तन् नित्यं भवति, यथाकाशम् इति। अत्र विपर्यस्त-व्यतिरेक-प्रदर्शनाद् विपरीत-व्यतिरेकित्वम्। वैधर्म्य-प्रयोगे हि साध्याभावः साधनाभावाक्रान्तो दर्शनीयो, न चैएवम् अत्र, साधनाभावस्य साध्याभाव-व्याप्ततयाभिधानाद् इति।
[न्या०वि० २५।४] व्यतिरेकाप्रदर्शनं विपरीत-व्यतिरेक-प्रदर्शनं च न वस्तुनो दोषः, किं तर्हि वचन-कुशलता-विकलस्याभिधायकस्य। किं च, येषां भवताम् अदो दर्शनं॒ यद् उत स्वार्थानुमान-काले स्वयं हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीतेः परार्थानुमानावसरेऽपि हेतु-प्रतिपादनम् एव कर्तव्यं "विदुषां वाच्यो हेतुर् एव हि केवल" इति-वचनात् तेषां ‘कृतकत्वाद्ऽ॑ इतीयता हेत्ûपन्यासेनैव सिसाधयिषित-साध्य-सिद्धेः समस्त-दृष्टान्ताभास-वर्णनम् अपि पूर्वापर-व्याहत-वचन-रचना-चातुर्यम् आविर्-भावयति।आसातां तावद् एतौ, दृष्टान्तस्य साधनावयवत्वेनानभ्युपगमात्। अथेत्थम् आचक्षीथा॒ अन्वय-व्यतिरेकापरिज्ञाने प्रतिपाद्यस्य न दृष्टान्तम् अन्तरेणैतौ दर्शयितुं शक्याव्, अतोऽन्वय-व्यतिरेक-दर्शनार्थं दृष्टान्तोऽभिधातव्यस्, ततश् च तत्-कार्याकारिणां तद्-आभासतेति चेद्, गले गृहीतस्यायम् उल्लापस्, तथाप्य् अप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकौ दृष्टान्ताभासौ न वास्तवौ, किं तर्हि वक्तृ-दोष-समुत्थाव्॑ अतो नाभिधातुं युक्तौ, तथा-विधस्य विद्यमान-वस्तु-प्रकाशन-सामर्थ्य-रहितस्य निबिड-जडिमावष्टब्धस्य पुंसो वादानधिकारित्वान्, मातृका-पाठ-शाला-योग्यतया विदुषां वादयितुम् अयुक्तत्वाद् इति।
[न्या०वि० २६।०] तद् एवं परार्थानुमानं व्याचक्षाणेन यद् उक्तं -- यद् उत "तत् पक्षादि-वचनात्मकम्" इति -- तत् पक्ष-हेतु-दृष्टान्तानां साभासानां प्रतिपादनात् प्रायः पर्यन्तितं॑ केवलं तत् परोक्त-दूषणोद्धाराद् एव समीचीनताम् आबिभर्तीत्य् अमुना प्रस्तावेन दूषणं साभासम् अभिधातुकाम आह :
वाद्य्-उक्ते साधने प्रोक्त-दोषाणाम् उद्भावनम् । दूषणं निरवद्ये तु दूषणाभास-नामकम् ॥ न्यायावतार २६ ॥
[न्या०वि० २६।१] वदन-शीलो वादी प्रत्यायकस्, तेनोक्त उपन्यस्ते॑ कस्मिन्? साधने॑ साध्यते प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोप्यतेऽनुमेयं येन तत् साधनम्। तच् चानेक-रूपं प्राक् प्रत्यपादि, तद् यथा -- क्वचिद् धेतुर् एवैकः, क्वचित् पक्ष-हेतू, क्वचित् पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताः, क्वचित् त एव सोपनयाः, क्वचित् सनिगमनाः, क्वचिद् एकैक-तच्-छुद्धि-वृद्ध्येति, प्रतिपाद्यस्य क्वचित् कथञ्चित् प्रत्याययितुं शक्यत्वात्, तत्-प्रत्यायनोपायस्य च साधनत्वाद् इति। तत्रेह सम्यक्-साधनस्य दूषयितुम् अशक्यत्वात्, साधनाभास एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेः, साधनाभासम् एव दूषनोपनिपातात् प्राग् अवस्थायाम् अनिर्ज्ञातं सामान्येन साधन-ध्वनिनोक्तं, तत्र प्रोक्त-दोषाणां प्रत्यक्षादि-निराकृत-पक्षासिद्धादि-हेतु-साध्यादि-विकल-दृष्टान्ताद्य्-उपन्यास-लक्षणानाम् उद्भावनं प्राश्निकानां पुरतः प्रकाशनं यत् तद् दूष्यते स्वाभिप्रेत-साध्य-प्रत्यायन-वैकल्य-लक्षणां विकृतिं नीयते साधनम् अनेनेति दूषणम् इति ज्ञेयम्।
[न्या०वि० २६।२] अधुना तद्-आभासम् आह : निर्गतं सम्यक्-प्रयुक्तत्वाद् अवद्यं पापं पक्षादि-दोष-लक्षणं दौष्ट्यम् अस्माद् इति निरवद्यं, तस्मिन् साधने वादिनोक्त इति वर्तते। तथापि मत्सरितया प्रमृद्योदरं यद् अविद्यमानानां दोषाणाम् उद्भावनं तद् दूषण-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणात् सम्यक्-साधने दोषोद्भावनस्य प्रलापायमानत्वाद् दूषणवदाभासत इति दूषणाभासम् इति॑ तद् एव नाम संज्ञा यस्य तत्-तथा। समर्थ-साधनोपन्यासत्वात् साधिते साध्ये सताम् अप्य् अपशब्दालङ्कारादि-दोषाणां यद् उद्भावनं तद् अपि दूषणाभास-नामकम् इति। तु-शब्देन विशेषणार्थेन दर्शयति वस्तु-सिद्ध्य्-अर्थं वाद-प्रवृत्तेस्, तस्य सिद्धत्वाद्, अपशब्दादीनाम् अप्रस्तुततया तद्-द्वरेण दोष-प्रकाशनस्यासम्बद्ध-प्रलाप-रूपत्वाद्, इतरथा तावन्-मात्रेणैव परापाकरण-सिद्धेः समर्थ-साधनान्वेषण-प्रयत्नो विशीर्येत, प्रयोजनाभावाद् इति।
[न्या०वि० २७।०] तद् एवं व्यावहारिक-प्रमाणस्य प्रत्यक्ष-परोक्ष-स्वार्थ-परार्हादि-भेद-भिन्नस्य लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यैः पारमार्थिकं समस्तावरण-विच्छेद-लभ्यम् अशेषार्थ-गोचरं केवल-ज्ञानं नाभ्युपगम्यते, तन्-मतोद्दलनार्थं तल्-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह :
सकलावरण-मुक्तात्म केवलं यत् प्रकाशते ।
प्रत्यक्षं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् ॥ न्यायावतार २७ ॥
[न्या०वि० २७।१] सकलं समस्तम्, आवृणोत्याव्रियते वानेनेत्य् आवरणं, तत्-स्वरूप-प्रच्छादनं कर्मेत्य् अर्थः, सकलं च तद् अवारणं च सकलावरणं, तेन मुक्तो रहित, आत्मा स्वरूपं यस्य तत्-तथा। अत एव केवलम् असहायम्, आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतयैव बोधस्य नानाकारतया प्रवृत्तेः, सामस्त्येन पुनर् आवरण-निर्दलने विबन्धक-कारण-वैकल्याद् एकाकारतयैव तस्य विवर्तनात्। अतो ज्ञानान्तर-निरपेक्षं यत् प्रकाशते प्रथते निरुपाधिकं द्योतत इत्य् अर्थः, तत् परमार्थतः प्रत्यक्षम्। तद् इदं सकलावरण-मुक्तात्मेति-हेतु-द्वारेण तथा केवलं यत् प्रकाशत इति-स्वरूपतो निरूप्याधुना कार्य-द्वारेण निरूपयन्न् आह : सकलार्थात्मनां समस्त-वस्तु-स्वरूपाणां सतत-प्रतिभासनम् अनवरत-प्रकाशनं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् इति, प्रतिभास्यतेऽनेनेति प्रतिभासनम्, आत्मनो धर्म-रूपतया भेदवद्-विवक्षितं ज्ञानम् इति यावत्। अस्य च पारमार्थिकत्वं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेः। तथा ह्य्॒ अक्ष-शब्दो जीव-पर्यायस्, ततश् चाक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं, यत्रात्मनः साक्षाद् व्यापारः। व्यावहारिकं पुनर् इन्द्रिय-व्यवहितात्म-व्यापार-सम्पाद्यत्वात् परमार्थतः परोक्षम् एव॒ धूमाद् अग्नि-ज्ञानवत्, तिरो-धानाविशेषात्।
[न्या०वि० २७।२] ननु च प्रसिद्धं लक्ष्यम् अनूद्याप्रसिद्धं लक्षणं विधीयते -- सर्वत्रायं न्यायः। अप्रसिद्धे पुनर् लक्ष्ये लक्षणम् अभिधीयमानम् अम्बरारविन्दिनी-कुसुम-लक्षणवन् निर्गोचरतां यायात्। तद् इदं स्वरूपतोऽप्रसाध्य लक्षणम् अभिदधानस्य कोऽभिप्राय इत्य्॑ अत्रोच्यते -- ये ये मिथ्यावलेपाध्मातान्तः-करणाः प्रमाण-प्रसिद्धम् अप्य् अदः प्रति विप्रतिपद्यन्ते, तेषां ध्य्-आन्धी-कृत-बुद्धित्वाद् अवधारणीयताम् अनेन दर्शयति। किम् अस्य प्रतिपादकं प्रमाणम् इति चेद्, एते ब्रूमः॒
[न्या०वि० २७।३] समस्ति समस्त-वस्तु-विस्तार-गोचरं विशद-दर्शनं, तद्-गोचरानुमान-प्रवृत्तेः॑ इह यद्-यद्-गोचरम् अनुमानं प्रवर्तते, तस्य तस्य ग्राहकं किञ्चित् प्रत्यक्षम् उदय-पदवीं समासादयति, यथा चित्र-भानोः॑ प्रवर्तते च सकलार्थ-विषयम् अनुमानम्॑ अतस् तद्-अवलोकिना विशद-दर्शनेनापि भाव्यम् इति। सर्वार्थ-विषयं किम् अनुमानं प्रवर्तत इति चेद्, इदम् अपि ब्रूम॒ इह यद् यद् अस्ति तत् तत् सर्वं स्थित्य्-उदयापवर्ग-संसर्गम् अनुभवति, वस्तुत्वात्॑ यद् यद् वस्तु तत् तत् स्थेम-जन्म-प्रलयैः क्रोडी-कृतं॑ तद् यथाङ्गुलिर् अङ्गुलित्व-वक्रत्व-र्जुत्वापेक्षयेति॑ वस्तु च यद् अस्त्य्, अतः प्रस्तुत-त्रयाक्रान्तं तद् अवगन्तव्यम्। इदम् एव निखिलार्थ-गोचरम् अनेकान्तानुमानं ज्ञान-क्रियाभ्यासातिशयान् निखिलावरण-विच्छेदे विबन्धक-कारणाभावाद् विशद-दर्शनी-भवति। न चानुमान-प्रवृत्ताव् अप्य् अनर्थित्वादिना प्रमातुर् अप्रवृत्ताव् अनुमेय-गोचर-प्रत्यक्षासम्भवेन व्यभिचारश् चोदनीयः, सम्भवस्य साध्यतयाभिप्रेतत्वात्। न च सम्भव-मात्रेऽस्ति व्यभिचारः, सर्वानुमेयानां सम्भवत्-प्रत्यक्षतया व्याप्तत्वाद् इति।
[न्या०वि० २७।४] अथवान्यथानुमानयामः॒ सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक आत्मा, विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायत्वाद्॑ इह यो यो विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायः स स सम्भवत्-समस्त-शुद्धिको॑ यथा विद्यमान-क्षार-मृत्-पुट-पाकादि-शुद्ध्य्-उपायो रत्न-विशेषस्, तथा च विद्यमान-ज्ञानाद्य्-अभ्यास-शुद्ध्य्-उपाय आत्मातः सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक इति। सामस्त्य-शुद्धश् चात्मा ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदात् केवलम् अभिधीयत इति। ज्ञानाद्य्-अभ्यासः कथं विशुद्धि-कारणम् इति चेद्, आवरण-मल-प्रतिपक्ष-रूपत्वाद् इति ब्रूमः। प्रतिपक्ष-रूपता कथम् अवधारितेइति चेत्, तवैव दर्शनात्। तथा हि॒ दृश्यते ज्ञानाद्य्-अभ्यासतः प्रतिक्षणम् आवरण-विलयो, विशिष्ट-विशिष्टतर-तत्-कार्य-बोधाद्य्-अनुभवात्, तद्-अतिशये पुनः सामस्त्योच्छेदः स्याद् इत्य् अभिदध्महे। एतेन यत् परे प्रोचुर् -- यथा॒ प्रत्यक्षादि-प्रमाण-पञ्चक-गोचरातिक्रान्तत्वात् सर्वार्थ-संवेदनम् अभावाख्य-षष्ठ-प्रमाण-गोचरतां प्रतिपद्यते -- तद् अयुक्तं, तत्-सम्भवस्यानुमानेन प्रतिपादनात्, प्रमाण-पञ्चक-प्रवर्तनाभावासिद्धेः। किं च, प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं न प्रवर्तत इति कथं भवतो निर्णयः? किं नियत-देश-काल-व्याप्त्या यद् वा समस्त-देश-कालास्कन्दनेनेति? यद्य् आद्यः पक्षस्, ततो यथा घटादेः क्वचित् प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं निर्वर्तमानम् अभावं साधयत्य्, एवं समस्त-वस्तु-संवेदन-गोचरम् अपि तन् निवर्तमानं नियत-देश-दशावच्छिन्नम् अभावं साधयेन्, न सर्वत्र॑ ततश् च घटादिवत् तद् दुर्निवारं स्यात्। अथ द्वितीयः पक्षो,ऽसाव् असम्भव्य् एव॑ समस्त-देश-काल-वर्ति-पुरुष-परिषत्-संवेदन-साक्षात्-कारिणो ह्य् एवं वक्तुं युक्तं, यद् उत न क्वचित् समस्तार्थ-संवेदनं अस्तीति -- न भवतस्, तथा-विध-पुरुष-सम्भवानभ्युपगमात्। इतरथा य एव कश्चिन् निश्चित्यैवम् अभिदध्यात्, स एव समस्त-वस्तु-विस्तार-व्यापि-ज्ञानालोक इति समस्तार्थ-गोचर-संवेदन-सिद्धिर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० २८।०] तद् एवं प्रमाण-विषये लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराकृत्याधुना क्रम-प्राप्तां गोचर-विप्रतिपत्तिं बहु-वक्तव्यत्वाद् अनिराकृत्य तावत् फल-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षुर् आह :
प्रमाणस्य फलं साक्षाद् अज्ञान-विनिवर्तनम् ।
केवलस्य सुखोपेक्षे शेषस्यादान-हान-धीः ॥ न्यायावतार २८ ॥
[न्या०वि० २८।१] द्वि-विधं हि प्रमाणस्य फलं॒ साक्षाद् असाक्षाच् चानन्तरं व्यवहितं चेत्य् अर्थः। तत्र साक्षाद् अज्ञानम् अनध्यवसायः प्रमेयापरिच्छित्तिस् तस्य विनिवर्तनं विशेषेण प्रलयापादनं प्रमाणस्य फलम्, अज्ञानोद्दलन-द्वारेण तस्य प्रवृत्तेस्, तस्य च सर्वानर्थ-मूलतया प्रमात्र्-अपकारित्वात्। तन्-निवर्तनस्य प्रयोजनता युक्तैव। एतच् चानन्तर-प्रयोजनं सर्व-ज्ञानानाम् एक-रूपत्वात् सामान्येनोक्तम्। व्यवहित-प्रयोजनं पुनर् विभागेनाह॒ केवलस्य सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सुखं वैषयिक-सुखातीत-परमाह्लादानुभव, उपेक्षा साक्षात् समस्तार्थानुभवेऽपि हानोपादानेच्छाभावान् मध्य-स्थ-वृत्तिता, ते सुखोपेक्षे फलम् इत्य् अर्थः। शेषस्य तद्-व्यतिरिक्त-प्राकृत-लोक-प्रमाणस्यादानं ग्रहणं हानं परित्यागस्, तयोर् आदान-हानयोर् धीर् बुद्धिर् आदान-हान-धीः, सा फलम् इति यावत्। ततश् चादेयानां सम्यग्-दर्शनादि-स्रक्-चन्दनादीनां यादित्सा, तथा हेयानां मिथ्या-दर्शनादि-विष-कण्टकादीनां या जिहासा सा प्रमाण-साध्याप्रमाणात् तद्-असिद्धेः, प्रेक्षा-पूर्व-कारिणां ततः प्रवृत्त्य्-अयोगाद् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०वि० २९।०] अधुना गोचर-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे॒
अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचरः सर्व-संविदाम् ।
एक-देश-विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः ॥ न्यायावतार २९ ॥
[न्या०वि० २९।१] अनेके बहवोऽन्ता अंशा धर्मा वात्मानः स्वरूपाणि यस्य तद् अनेकान्तात्मकम्। किं तत्? वस्तु बहिर् अन्तश् च, गोचरो विषयः, सर्व-संविदां समस्त-संवित्तीनाम्। अनेनानेकान्तम् अन्तरेण संवेदन-प्रसर-व्यवच्छेदं दर्शयति, भ्रान्त-संवेदनानाम् अप्य् अनेकान्तोद्द्योतन-पटिष्ठतया प्रवृत्तेः, केवलं केषुचिद् अंशेषु विसंवादकत्वाद् अप्रमाणानि तानि सङ्गीर्यन्ते। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यदा संवेदन-सामान्यम् अप्य् अनेकान्त-विरहेण न प्रवर्तितुम् उत्सहते, तदा तद्-विशेष-भूतं प्रमाणम् एकान्ते प्रवर्तिष्यत इति दूरापास्तावकाशैवैषा वार्ता, तथाप्य् अनादि-मिथ्याभिनिवेश-वासितान्तः-करणाः कुदर्शन-विप्रलब्ध-बुद्धयो बहवोऽत्र विप्रतिपद्यन्त इति सर्व-प्रमाणानाम् अनेकान्त-गोचरत्व-साधकं प्रमाणम् अभिधीयते॒ इह यत् प्रमाणं तत् परस्पराविनिर्लुठितानेक-धर्म-परिकरित-वस्तुनो ग्राहकं, तस्यैव तत्र प्रतिभासमानत्वाद्॑ इह यद् यत्र प्रतिभाति, तद् एव तद्-गोचरतयाभ्युपगन्तव्यं॑ तद् -- यथा निरादीनव-नयन-प्रभव-दर्शने प्रतिभासमानं पाटलतया जपा-कुसुमं तथैव तद्-गोचरतयाभ्युपगम्यते॑ परस्पराविभक्तानेक-स्वभावाक्रान्त-मूर्तिकं च बहिर् अन्तश् च वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रथत इत्य्॑ अतस् तद् एव तेषां गोचरः।
[न्या०वि० २९।२] न चेतरेतर-विशकलित-धर्मि-धर्म-भाव-वादिभिः कणभक्षाक्षपाद-शिष्यकैस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धतादि-दोषः प्रतिपादयितुं शक्यस्, तद्-अभ्युपगमम् अन्तरेण स्वाभिप्रेत-वस्तुनोऽवस्थानाभावात्। तथा ह्य्॒ एकस्मिन् धर्मिणि बहवो धर्मास् ततो भिन्न-तनवः कथं वर्तेरन्? भेदाविशेषेण सर्वत्र तद्-वृत्ति-प्रसङ्गात्। तत्रैव तेषां समवायान् नान्यत्र वर्तन्त इति चेन्, ननु सोऽपि समवायो यद्य् उपकार्योपकारक-भाव-व्यतिरेकेणापि भवति, ततः सर्वत्राविशेषेण प्रसज्येत, तद्-अभावाविशेषात्। अस्त्य् एवोपकार्योपकारक-भाव इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, अनेकोपकारकस्यानेक-स्वभावता-प्राप्तेस्, तद्-विरहेऽनेकोपकारकत्वाभावात्। न हि येन स्वभावेनैकस्योपकरोति तेनैव द्वितीयस्य, तस्य तत्रैवोपयुक्तत्वाद्, द्वितीयोपकारक-स्वभावस्य तद्-उपमर्दन-द्वारेणोत्पत्तेर्, इतरथैकम् एवोपकुर्वंस् तिष्ठेत्, तद्-एक-स्वभावात्। भिन्नाभिः शक्तिभिर् उपकरोति, न भिन्नैः स्वभावैस्, तेन नानेकान्त इति चेत्, तास् तर्हि तत्र कथं वर्तन्त इति वाच्यम्। समवायाद् इत्य्-उत्तरेऽसाव् अप्य् उपकार्योपकारक-भावम् अन्तरेण कथं न सर्वत्रेति प्राचीनं चोद्यं पश्चाल्-लग्नम् अनुधावति। उपकार्योपकारक-भावाभ्युपगमे पुनर् अप्य् अनेक-स्वभावता-प्रदर्शित-युक्तेः पुनः शक्त्य्-उपकारक-भिन्न-शक्ति-परिकल्पने तद् एवावर्तते, तन् न भिन्न-धर्म-परिकल्पनेऽप्य् अनेकान्तान् मोक्ष इति वरम् आदाव् एव मत्सरितां विहायानेक-धर्माध्यासितं वस्त्व् अभ्युपगतम्। किं भेद-कल्पनयास्थान एवात्मना परिक्लेशितेनेति। किं चानेकान्ताभ्युपगमे सत्य् एष गुणः॒ परस्पर-विभक्तेषु संयोगि-संयोग-समवायि-समवाय-गुण-गुण्य्-अवयवावयवि-व्यक्ति-सामान्यादिषु संयोग-समवाय-गुण्य्-अवयवि-सामान्यादीनां संयोगि-समवायि-गुणावयव-विशेषादिषु वर्तन-चिन्तायां यद् दूषण-जालम् उपनिपतति, तद् अपि परिहृतं भवत्य्, एकान्त-भेद एव तद्-उपपत्तेर्, अनेकान्ते तद्-उत्थानाभावात्। तथा हि॒ भिन्नाः खलु संयोगादयः संयोग्य्-आदिभ्यो विकल्पयितुं पार्यन्ते -- यद् उत कथम् एत एतेषु वर्तन्त इति? किम् एक-देशेन यद् वा सामस्त्येन? यद्य् एक-देशेन, तद् अयुक्तं, तेषां निरवयवत्वाभ्युपगमात्। सावयवत्वेऽपि तेभ्योऽवयवेभ्यो यद्य् अभिन्नास्, ततोऽनेकान्तापत्तिर्, एकस्यानेकावयवत्व-प्राप्तेः। अथ भिन्नास् तेष्व् अपि ते कथं वर्तन्त इत्य् वाच्यम्॒ एक-देशेन सामस्त्येन वा। एक-देश-पक्षे तद् एवावर्तत इत्य् अनवस्था। अथ सामस्त्येन, तद् अप्य् असाधीयः, प्रत्येकं परिसमाप्ततया संयोगादि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। तद्-अभिन्नाः पुनः संयोगादयो न विकल्प-भाजो भवन्ति। अभेद-पक्षेऽपि संयोगादि-मात्रं संयोग्य्-आदि-मात्रं वा स्याद् इति चेन्, न, तस्याप्य् एकान्तेनानभ्युपगमात्, किं तर्ह्य् अन्योन्याविश्लिष्ट-स्वरूपा विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदाः सर्व एवैतेऽभ्युपगम्यन्ते, तथा-विधानां कुयुक्ति-विकल्पोत्थापित-दूषण-समूह-निराकरण-क्षमत्वाद्, अबाधित-प्रतिभासेषु सर्वत्र तेषां तथैव प्रतिभासनाद्, अन्यथा प्रतिभासमानानाम् अन्यथा परिकल्पने दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-द्वारेणासमञ्जस-प्राप्तेस्॑ तथा च ब्रह्माद्वैत-शून्य-वादादयः सिद्धिम् अश्नुवीरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० २९।३] एतेनास्य हेतोः कापिला अप्य् असिद्धतादि-दोषम् अभिधित्सवो मौक्यम् आनीताः। तथा ह्य्॒ अन्तर् एकं संवेदनम् अपरापर-हर्ष-विषादाद्य्-अनन्त-धर्म-विवर्ताक्रान्त-रूपं बहिश् च घटादिकम् अर्थं नव-पुराणादि-वर्तुल-पार्थिवत्वाद्य्-अनेक-स्वभावावष्टब्ध-शरीरं साक्षाल् लक्षयन्तः कथं तद्-विपरीत-कथने प्रवर्तेरन्? प्रकृति-पुरुषात्मकं द्रव्यम् एवैकं तात्त्विकं, पर्याय-भ्रान्ति-जनकः पुनर् विवर्तोऽपारमार्थिक इति चेन्, न, द्वयोर् अपि सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशमानयोर् अबाधितयोः सर्व-व्यवहार-निबन्धनयोः पक्ष-पातम् अन्तरेणैकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। तथा सति विवर्त एव तात्त्विको, द्रव्यं पुनर् अलीकम् इति पर्याय-पक्ष-पाती प्रसञ्जयन् दुर्निषेधः स्याद् इति। अथेत्थम् अभिदधीथा॒ द्रव्यं सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात् सत्यं, पर्यायाः पुनर् व्यभिचारिण इत्य् असत्याः, तद् अयुक्तम्। यदि नाम द्रव्यम् अभेद-रूपत्वात् सर्वत्रानुवर्तते, पर्यायास् तु भेद-रूपत्वाद् व्यवच्छिद्यन्ते, तथापि तत् सत्यम्, इतरेऽलीका इति वक्तुं न पार्यते, न हि नीलं पीत-रूपतां न बिभर्तीत्य्-एतावता तद् असत्यम्, अतिप्रसङ्गात्, सर्वस्य पर-रूप-परिहारावस्थायितयालीकत्व-प्राप्तेः। अथ द्रव्यम् एव पर्यायास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवन्, न सन्ति वा द्रव्य-व्यतिरेकिणः पर्याया, निःस्वभावत्वात्, ख-पुष्पवद् इति प्रमाणयसि, तथा सति पर्याया एव द्रव्यं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवन्, नास्ति वा पर्याय-व्यतिरिक्तं द्रव्यं, निष्पर्यायत्वाद्, आकाश-कुसुमवद् इतीतरोऽपि प्रमाणयन् केन वार्येत। तन् न पक्ष-द्वयेऽपि काचिद् विशेषोपलब्धिर् इति। यथैवानन्त-सह-क्रम-वर्ति-पर्यायाध्यासितं वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशते तथैवाभ्युपगन्तव्यं, तथा चान्यस्याभावात् तद् एव तद्-गोचर इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।४] तथा सुगत-मतानुसारिणाम् अपि मध्ये सौत्रान्तिकस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धताम् आविर्-भावयितुं नोत्सहते, तद्-अभ्युपगति-व्यतिरेकेण निज-दर्शन-व्यवस्थानुपपत्तेः। तथा हि॒ बहिस् तावद् एकं कारणम् अपरापर-सामग्र्य्-अन्तः-पातितयानेक-कार्य-कार्यावेद्यते, यथा रूपं स्वोत्तर-क्षणं स्वावगाहि-ज्ञानादिकं च युगपज् जनयति। यदि चैक-क्षण-वर्तिनः सामग्री-भेदेन भेदम् अनुभवत एव भिन्न-देश-नाना-कार्य-कारिता, तथा सति नित्य-पक्षोदितं दूषणं स्व-मस्तकोपनिपाति स्यात्, तस्यापि तथैव भिन्न-काल-कार्य-निर्वर्तनेऽपि भेदाभाव-प्रसङ्गात्। तथा प्रतिभास-भेदेन क्षण-क्षयि-रूपादि-स्वलक्षण-विलक्षणत्वाभ्युपगमश् चैवं निर्निबन्धनः स्यात्, कौटस्थ्यम् आबिभ्रतोऽपि द्रव्यस्यापरापर-कारण-कलापान्तर्-गततया नव-पुराणादि-पर्याय-रूप-रस-गन्ध-स्पर्शावभास-लक्षण-कार्य-सम्पादनाविरोध-प्रसक्तेः। किं चायम् एकं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणानि स्वलक्षणान्य् आचक्षीत नान्यथा, यथाकूतं तद्-अवभासस्य स्वप्नान्तरेऽप्य् अनुपलक्षणाल्॑ लक्षितस्य चालक्षित-व्यतिरेक-निराकरणतस् तादात्म्यं कथयन् स्व-गिरानेकान्तावभासं समर्थयते। तथा ह्य्॒ अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्य-प्रतिक्षण-विवर्तम् अपि स्वलक्षणं स्थिर-स्थूराद्य्-आत्मना दर्शयति स्वरूपम्, अन्यथा सुषुप्तं जगद् आसज्येत, तद्-अप्रकाशने प्रमाणान्तरस्याप्य् अत्यन्त-विलक्षण-स्वलक्षणावेदकस्याप्रवृत्ति-प्रसङ्गात्। तथान्तः-संवेदनम् अर्थ-स्वरूपापेक्षया बहिर्-मुखान्तर्-मुख-सविकल्पाविकल्प-भ्रान्ताभ्रान्तादि-प्रतिभासम् एकम् अभ्युपयतः कथम् अनेकान्तावभासोऽसिद्धः स्यात्? तथा नाना-देश-स्थितार्थ-सार्थ-समर्पिताकारोपरक्तम् एकम् आकार-भेदेऽप्य् अन्यथा युगपत्-प्रकाशमान-सितासिताद्य्-अर्थ-व्यवस्थित्य्-अनुपपत्तेः संवेदनम् अनुमन्यमानः कथं भिन्न-समय-भावि-हर्ष-विषादाद्य्-अनेक-विवर्त-वशात् तद्-भेदम् आत्यन्तिकम् अभिदधीत, अभिन्न-योग-क्षेमत्वाद्। युगपद्-भाविनां संविद्-अन्तर्-निविष्टाकाराणाम् एकत्वं न हर्षादीनां, तद्-विपर्ययाद् इति चेन्, न, तत्-सामर्थ्य-व्यवस्थाप्यार्थाभेद-प्रसङ्गात्, तद्-एकतया सित-पीतादिषु ज्ञानस्य बोध-रूपेणैवाविशिष्टत्वात्। तद् एवं बहिर् अन्तश् चैकानेक-रूपत्वे प्रमाणतः स्थितेः स्वलक्षणस्यान्यथा स्वाभ्युपेत-दर्शन-व्यवस्थायोगान् नार्थ-वाद्य् अनेकान्त-प्रकाशं प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति।
[न्या०वि० २९।५] तथोररी-कृत-योगाचार-मतम् अपि बलाद् अनेकान्त-प्रकाश-रज्जुर् आवेष्टयत्य्, एकस्यापि ज्ञानस्यानेक-वेद्य-वेदकाकारतया प्रथनोपगतेः। एक-योग-क्षेमत्वात् तद्-ऐक्यम् इति चेन्, न, युगपद्-उदय-प्रलयवतां सह-वेदिनां सकल-सन्तानानाम् एकत्व-प्रसङ्गात्। संवृति-दर्शितत्वाद् अनेकत्वस्य, न तेन स्व-संवेदन-साक्षात्-कृत-पारमार्थिकैकत्व-क्षतिर् इति चेन्, न, ब्रह्म-वादि-मताप्रतिषेध-प्रसक्तेर्, यतोऽनाद्य्-अविद्या-बलाद् एकम् अक्रमं सचेतनं स्व-संवेदन-साक्षात्-कृतम् अपि ब्रह्मानेकं क्रमवच् चेतनाचेतनं परोक्षापरोक्षं लक्ष्यते, भवत्-परिकल्पित-ग्राह्य-ग्राहकाकार-विविक्त-संवेदनवद् इति तेनापि न दुरुपपादम्। अस्तु वायम् अनेकान्तावभासो भ्रान्तस्, तथापि संवेदनस्याद्वयता न लक्ष्यते, तल्-लक्षणे सकलासुमताम् अधुनैव मुक्ततावाप्तेः। लक्ष्यते च तत् कथञ्चिद्, इतरथा सुषुप्त-दशावत् सर्व-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् इत्य् एकस्यापि संवेदनस्य लक्षितालक्षितत्वेनानेकान्त-प्रतिभासो दुःशकोऽपह्नोतुम् इति ज्ञान-वाद्य् अप्य् अस्य हेतोर् असिद्धताविर्-भावनं प्रति तूष्णीम् आसीत।
[न्या०वि० २९।६] शून्य-वादिनः समस्ताभावाद् असिद्धोऽनेकान्त-प्रकाश इति चेन्, न, तस्यापि प्रमाण-प्रमेयाभावे न सर्वाभावावेदनं समस्त्य्, अन्यथाप्रमाणकं सर्वं सर्वत्र विद्यत इति परस्यापि वदतो न वदन-भङ्गः स्यात्, तद्-अभ्युपगमेऽभ्युपगम-क्षतिः। तयोश् च दर्शितवद् अनेकान्त-प्रकाश इति नासिद्धो हेतुः। मरु-मरीचिका-निचय-चुम्बिनि संवेदने जलोल्लेखेऽपि तद्-गोचरत्वाभ्युपगमाभावाद् अनैकान्तिकोऽयम् इति मा शङ्किष्ठास्, तस्य भ्रान्तत्वाद्, अभ्रान्त-प्रकाशो हि तद्-अभ्युपगति-हेतुः। अथायम् अपीतरेतर-विनिर्लुठित-परमाणु-क्षण-क्षयि-बोधेन बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् आचक्षीथास्, तद् अयुक्तं, यतस् तद्-बोधः किम् उपलब्धि-मात्रम् यद् वा निर्णयः? यद्य् आद्यः कल्पस् तदानुमानं विशीर्येत, निर्गोचरत्वात्, प्राथमकल्पिकेनैव निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनेन विरोध-भीरुतया सर्वथा वस्तु-ग्रहणाभ्युपगमात्, प्रमाण-कलिते च मानान्तर-वैयर्थ्याद्, अनवस्था-प्राप्तेः। अथ द्वितीयस्, तथा सति सर्वं निर्विकल्पकम् अप्रमाणताम् अश्नुवीत। न च निर्णयोऽनेकान्त-प्रकाशं बाधते,ऽपि तु समर्थयते, बहिर् अन्तश् च तथैव तद्-विजृम्भणात्। अथ सर्वथा वस्तु-ग्रहणेऽपि निर्विकल्पकं यत्रांशे पाश्चात्यं व्यवहार-कारि-व्यवसायम् उपजनयति, तत्रैव प्रमाणताम् आस्कन्दति नान्यत्रेति मन्येथास्, तथा सति यद्-अनन्तरम् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया पुरुषः प्रवर्तते स एव निर्णयः प्रामाण्यं स्वी-कुर्यान्, न निर्विकल्पकं, तज्-जनकत्वेऽपि सन्निकर्षादिवद् इत्य् आसज्येत। निर्विकल्पकम् अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वात् प्रमाणं, न व्यवसितिस्, तद्-विकल्पत्वाद् इति चेन्, नानुमितेर् अपि तद्वद् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। न च विपरीताकार-निराकरण-चतुरतयानुमितिर् विशेषवती, निर्णीतेर् अपि तद्-अपनोद-दक्षत्वाद्, असमारोप-विषयेऽप्रवृत्तेः। त्रि-रूप-लिङ्ग-जतया विशेषोऽनुमितेर् मानता-साधक इति चेत्, साक्षाद् अनुभवाद् उत्पादस् तर्हि निर्णीतेर् महापराध इति भवतो बालताम् ईक्षामहे। किं च, यथा निर्विकल्पकम् अलक्षितं सकल-व्यावृत्त-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणम् अपि कतिचिद्-अंश-विषयं विकल्पम् उत्थापयति, तथार्थ एवेन्द्रियालोकादि-सन्निकृष्टतया कतिचिन्-निजांश-विषयं साक्षाद्-विशद-विकल्पं जनयेद् इति किम् अजा-गल-स्तन-कल्प-निर्विकल्पक-कल्पनया? तावन्तो ऽंशा बहिर्-अर्थे विरुध्यन्त इति चेत्, पाटवापाटवादयो दर्शनेऽप्य् एकस्मिन् न विरुध्यन्त इति किं राज्ञाम् आज्ञा? तस्मान् न क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-लक्षकं क्वचित् कदाचिद् दर्शनं लक्षयन्ति भवन्तोऽपि, केवलं स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणतया न तद्-असत्तां प्रतिपद्यन्ते। स्वांश-व्यापिनं कालान्तरानुयायिनम् एकं बहिर् अन्तश् चार्थं बोधं च प्रकाशयन् प्रथमानो निर्णयः, न पुनर् निर्मूलकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाध्यत इति न भ्रान्तः। किं चास्य भ्रान्ततां कथयन् सर्व-प्रमाण-प्रमेय-व्यवस्थाम् उन्मूल्यति। तथा हि॒ यत् सत्त्व-बोध-रूपत्व-सुखत्वादिषु प्रमाणं तद् एव क्षण-क्षयित्व-स्वर्ग-प्रापण-शक्ति-युक्तत्वादिष्व् अप्रमाणम्॑ तथा यद् वस्तु नील-चतुरस्रोर्ध्वतादि-रूपतया प्रमेयं तद् एव मध्य-भाग-क्षण-विवर्तादिनाप्रमेयं॑ तथा यद् बहिर्-अर्थापेक्षया सविकल्पकं स्वप्नादि-दर्शनं वा भ्रान्तं तद् एव स्वरूपापेक्षयाभ्रान्तम्॑ तथा यन् निशीथिनी-नाथ-द्वयादिकं द्वित्वेऽलीकं तद् अपि धवलता-नियत-देश-चारितादाव् अनलीकम् इति निर्णयः। यदि तु विरोधाद् बिभ्यद्भिर् भवद्भिर् अयम् अपह्नूयते, किम् अपरम् ऐकान्तिकं प्रमाणं प्रमेयं चोररी-कृत्य स्वाकूतं प्रतिष्ठापयेयुर् इति सकौतुकं नश् चेतः।
[न्या०वि० २९।७] अथ ज्ञान-वाद्य् अद्वैत-प्रकाशम् अलक्षितम् अभ्युपेत्य तेन बाहुविध्यं दधानो बोधो बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् अभिदध्यात्, तद् अयुक्तम्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाद्, अलक्षित-निर्विकल्प-दर्शनस्य च प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्। अथ युक्तिर् बोधस्य वैविध्यं बाधेत, तथा हि॒ भ्रान्ताभ्रान्त-संवेदन-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, संविन्-मात्रस्य तु सर्वत्राव्यभिचारित्वाद्, अद्वयं संवेदनं विविक्त-युक्त्या प्रकाशमानम् अनादि-कालालीन-वासना-समुपजनित-संवृति-दर्शित-सत्ताकं सितासितादि-विविध-प्रतिभासं निराकुरुते। अत्र प्रतिविदध्महे॒ किम् अयम् अनेकाकारो बोधोऽद्वय-संवेदनाद् व्यत्यरैक्षीद् वा न वा। किं चातो, यदि व्यभैत्सीत्, कथम् अदृष्ट-तत्-कार्यत्वे व्यतिरिक्तोऽयं तद् अद्वयं संवेदनम् अनुमापयेत्? अव्यतिरेक-पक्षे पुनर् अनेकः सन्न् एक-संवेदन-तादात्म्येन प्रथमानः कथम् अद्वैतं नोद्दलयेत्? अथ संवृति-दर्शितत्वाद् अलीकतयास्य सितासिताद्य्-आकार-बहिर्-मुख-कालुष्यस्य बोधेन तात्त्विकेन सह भेदाभेद-विकल्पानुपपत्तिर् इति ब्रूषे, तथा सति परो बोधस्यापारमार्थिकत्वं अविद्या-दर्शितत्वाद्, अर्थ-सत्तायाः पुनस् तत्त्व-रूपता, सर्वत्राव्यभिचाराद् इति ब्रुवाणो दुर्निवारः स्यात्। जडस्य प्रकाशायोगात् संवित्तिः सत्या, नार्थ इति चेद्, एकस्यानेकतावभासाभावाद् अनेकान्तः सत्यो, नाद्वैतम् इति प्रतिजानीमहे। संवृत्याद्वयस्यापि नाना-प्रतिभासोऽविरुद्ध इति चेद्, अनाद्य्-अविद्या-बलाज् जडस्यापि चेतनतया प्रकाशो न विरुद्ध इति परस्यापि शठोत्तरं नातिदुर्लभं भवेत्। किं च, नानाकार-कलुषित-चैतन्य-सामान्यस्यान्यथानुपपत्ति-सामर्थ्यतस् तस्य सिद्धत्वाद् अद्वयं संवेदनम् असिद्धं साधयेद् अयम्, अन्यथा निर्निबन्धनतया साधनस्याप्रवृत्तेस्, तथा च स्थिर-स्थूराद्य्-उपलक्षितार्थांश-वशाद् विशकलित-परमाणु-क्षण-क्षयि-पर्याय-तादात्म्यं साधयन् तम् अनेकान्त-वादिनं न प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति, युक्तेर् उभयत्रापि तुल्यत्वात्। किं च, योऽयं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-निर्णयोऽसाव् अपि स्व-संवेदनापेक्षयाद्वय-रूप इति भवद्-अभिप्रायो॑ यथा चानवस्था-भीरुतया सर्वं ज्ञानं स्व-प्रकाशम् अभ्युपेतं, तथा सर्वो निश्चयः स्व-निश्चायकोऽभ्युपगन्तव्यो,ऽन्यथा तत्राप्य् अनवस्था-दोषोऽनुषज्येत, निश्चयाश् च सर्वथा स्वरूपं निश्चिनुयुर्, नैक-देशेन, यतो "निश्चयैर् यन् न निश्चीयते रूपं तत् तेषां विषयः कथम्" इति स्वयम् एव स्व-वधाय प्रलपितम्। तथा चाद्वयस्य क्षण-क्षयिणः स्वरूपस्य तैर् ग्रहणे विपरीतारोपाभावाद् आदित एव अनुत्थानं संसारस्येति युक्ति-रिक्त एवामुक्तताभिमानः स्यात्, न चैवम्, भव-भावस्य प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। तन् नायम् इतरेतराविनिर्लुठित-द्रव्य-पर्याय-प्रकाशो भ्रान्तस्, तद्-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाणान्तराभावाद् इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।८] यदा तु शून्य-वादी ‘निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्न-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति पराभिप्राय-प्रवृत्तानुमान-बलाद् भ्रान्तताम् अस्य कथयेत्, तदा तं प्रति ‘सालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वाज्, जाग्रद्-दशा-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति विपरीतानुमानम् उपढौकनीयम्। स यदि दृष्टान्तस्य साध्य-विकलताम् उद्भावयेत्, तदा तद्-दृष्टान्तेऽपि सा दर्शनीया। यदि पुनर् असौ स्वप्न-प्रत्ययस्य निरालम्बनत्वं भवद्भिर् अभिप्रेतम् इति विलपन्न् आसितुं न दद्यात्, तदा स विकल्पतः पर्यनुयोज्यो॒ऽस्मद्-अभ्युपगमः प्रमाणं भवतोऽप्रमाणं वा? प्रमाणं चेद्, यथा तद्-बलाद् दृष्टान्त-समर्थनं तथा जाग्रत्-प्रत्यय-गोचरार्थ-समर्थनम् अपि किं न कुरुषे, कोऽयम् अर्ध-जरतीय-न्यायः? अथाप्रमाणम्, एवं सति स्वप्न-प्रत्यय-निरालम्बनता-साधकं प्रमाणान्तरं मृगणीयं, किम् अनेन कुश-काशावलम्बनेन। तत्रापि प्रमाणान्तरे विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ तत् किं निरालम्बनं सालम्बनं वा? निरालम्बनं चेन्, नान्य-प्रत्ययस्य निरालम्बनतां गदितुं पटिष्ठं, निर्गोचरत्वात्। अथ सालम्बनं, हन्त हतोऽसि, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्यया इति प्रतिज्ञात-क्षतेर्, अनेनैव व्यभिचाराद् इति शठः प्रतिशठाचरणेन निर्लोठनीयः। तन् नास्यानैकान्तिकत्वम्।
[न्या०वि० २९।९] विरुद्धता-शङ्का पुनर् दूरापास्त-प्रसरैव, प्रमाण-प्रकाशितेऽर्थे सर्व-वादिनां तथाभ्युपगमाविगानाद् इति। अनेन संशय-विरोधानवस्था-वैयधिकरण्यासम्भवादि-दूषणानि निर्मूलक-मिथ्या-विकल्पोत्थापितानि प्रतिभास-मुद्गर-निपात-निर्दलित-मस्तकत्वान् न जीवितुम् उत्सहन्त इति। तस्माद् असिद्धतादि-दोष-विना-कृतोऽयं तथा-प्रतिभास-लक्षणो हेतुर् अनेकान्त-गोचरतां प्रमाणस्य परान् अभ्युपगमयतीत्य् अलम् विस्तरेण। तस्मात् ‘तस्यैव तत्र प्रतिभासनात्ऽ॑ सर्व-संविदाम् अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचर इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।१०] अयं च यथावस्थित-प्रमाण-व्यापार-पर्यालोचक-प्रमात्र्-अभिप्रायेण प्रमाण-गोचरो दर्शितः। नयस् तर्हि किं-भूतम् तं मन्यत इति वचनावकाशे सत्य् आह : एकेत्य्-आदि। अनन्त-धर्माध्यासितं वस्तु स्वाभिप्रेतैक-धर्म-विशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनम् आरोहयतीति नयः, प्रमाण-प्रवृत्तेर् उत्तर-काल-भावी परामर्श इत्य् अर्थस्॑ तस्य विषयो गोचरो मतोऽभिप्रेत एक-देशेनानित्यत्वादि-धर्म-लक्षणेन विशिष्टः पर-रूपेभ्यो विभिन्नोऽर्थः प्रमेय-रूपं, प्रमाणम् एवं-विधम् एवार्थं गृह्णातीति स्वाकुतेन तेन व्यवस्थापनाद् इति।
[न्या०वि० २९।११] अथवा प्रमाण-विषयां लक्षण-संख्या-गोचर-फल-रूपां चतुर्-विधां विप्रतिपत्तिं निराकृत्यात्रैव नय-गोचरं निरूपयन्न् आह : एकेत्य्-आदि। ननु चादि-वाक्येन प्रमाण-व्युत्पादन-मात्रं प्रतिज्ञानं, तत् किं अयम् अप्रस्तुतोऽत्र नय-गोचरः प्रतिपाद्यत इति। सत्यं, एवं मन्यते॒ न नयः प्रमाणाद् अत्यन्तं दूर-यायी, किं तर्हि तद्-अंश-भूत एव, नय-समुदाय-सम्पाद्यत्वात् प्रमाणस्यातस् तद्-व्युत्पादन-प्रतिज्ञानेऽसाव् अपि ‘तन्-मध्य-पतितस् तद्-ग्रहणेन गृह्यतऽ॑ इति-न्यायाद् गृहीत एव, तन् नायम् अप्रस्तुत इति।
[न्या०वि० २९।१२] अत्रापि पदार्थः स एव, केवलं वाक्यार्थ-भेदः। तथा हीहैवं घटना॒ नयस्य विषय एक-देश-विशिष्टोऽर्थो मतो नीतिविदाम् इति। ननु च यदि नयस्य प्रमाणान्तः-पातित्वेऽपि पृथग् गोचरः प्रतिपाद्यते, ततः प्रमाणवद् एतद्-विषया लक्षणादि-विप्रतिपत्तिर् अपि निराकर्तव्या। सत्यं, किं तु न परेषां नय-व्यवहारः प्रसिद्धो,ऽतो धर्मिणोऽभावात् तद्-गोचरा विप्रतिपत्तिर् नास्त्य् एव। न च ते तेन तत्त्वं प्रतिपादनीयास्, तत्त्व-प्रतिपादने प्रमाणस्यैव व्यापारान्, नयस्य पुनर् एक-देश-निष्ठत्वेन तत्-प्रतिपादन-सामर्थ्य-विकलत्वाद्, अत एवाचार्यस्य न तल्-लक्षणादि-स्वरूप-कथनेऽपि महानादरः। गोचरं पुनर् हेय-पक्षे काक्वा प्रक्षिपन् साक्षात् प्रतिपादयति॒ मा भूत् स्व-दर्शनान्तः-पातिनां मन्द-बुद्धीनां प्रमाण-प्रतिपन्नेऽप्य् अनेकान्तात्मके वस्तुन्य् एक-देश-समर्थनाभिनिवेश-लक्षणः कदाग्रह इति। अथवा स्व-दर्शनान्तः-पातिनः प्रत्य् अनेनैव गोचर-कथनेनोपलक्षणत्वाल् लक्षणादीन्य् अपि लक्षयति। तत्र प्रमाण-प्रतिपन्नार्थैक-देश-परामर्शो नय इति लक्षणं, सर्व-नय-विशेषानुयायित्वात् पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमत्वाच् चास्य। संख्यया पुनर् अनन्ता इति, अनन्त-धर्मत्वाद् वस्तुनस्, तद्-एक-धर्म-पर्यवसिताभिप्रायाणां च नयत्वात्, तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्व-सङ्ग्राहि-सप्ताभिप्राय-परिकल्पना-द्वारेण सप्त नयाः प्रतिपादिताः। तद् यथा -- ‘नैगम-सङ्ग्रह-व्यवहार-र्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवम्भूता नयाऽ॑ इति। अतोऽस्माभिर् अपि त एव वर्ण्यन्ते।
[न्या०वि० २९।१३] कथम् एते सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका इति चेद्, उच्यते॒ऽभिप्रायस् तावद् अर्थ-द्वारेण शब्द-द्वारेण वा प्रवर्तेत, गत्य्-अन्तराभावाद्॑ अर्थश् च सामान्य-रूपो विशेष-रूपो वा, शब्दोऽपि रूढितो व्युत्पत्तितश् च, व्युत्पत्तिर् अपि सामान्य-निमित्त-प्रयुक्ता तत्-काल-भावि-निमित्त-प्रयुक्ता वा स्यात्। तत्र ये केचनार्थ-निरूपण-प्रवणाः प्रमात्र्-अभिप्रायास् ते सर्वेऽप्य् आद्ये नय-चतुष्टयेऽन्तर्-भवन्ति। तत्रापि ये परस्पर-विशकलितौ सामान्य-विशेषाव् इच्छन्ति तत्-समुदाय-रूपो नैगमः। ये पुनः केवलं सामान्यं वाञ्छन्ति तत्-समूह-सम्पाद्यः सङ्ग्रहः। ये पुनर् अनपेक्षित-शास्त्रीय-सामान्य-विशेषं लोक-व्यवहारम् अवतरन्तं घटादिकं पदार्थम् अभिप्रयन्ति तन्-निचय-जन्यो व्यवहारः। ये तु क्षण-क्षयिणः परमाणु-लक्षणा विशेषाः सत्या इति मन्यन्ते तत्-सङ्घात-घटित ऋजुसूत्र इति। तथा ये रूढितः शब्दानां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति तन्-निवह-साध्यः शब्द इति। ये तु व्युत्पत्तितो ध्वनीनां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति नान्यथा तद्-वार-जन्यः समभिरूढ इति। ये तु वर्तमान-काल-भावि-व्युत्पत्ति-निमित्तम् अधिकृत्य शब्दाः प्रवर्तन्ते नान्यथेति मन्यन्ते तत्-सङ्घ-घटितः खल्व् एवम्भूत इति। तद् एवं न कश्चिद् विकल्पोऽस्ति वस्तु-गोचरो योऽत्र नय-सप्तके नान्तर्-यातीति सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका एते इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।१४] साम्प्रतम् एषाम् एव प्रत्येकं मतम् उपवर्णयामः। तत्र गमनं गमः परिच्छेद इत्य् अर्थः। निश्चितो गमो निगमो विविक्त-वस्तु-ग्रहणं, स एव, प्रज्ञादेर् आकृति-गणतया स्वार्थिकाण्-प्रत्यय-विधानान् नैगमः। यदि वा निगम्यन्ते नियतं परिच्छिद्यन्त इति निगमा अर्थास् तेषु भवो योऽभिप्रायो नियत-परिच्छेद-रूपः स नैगम इति। अयं हि सत्ता-लक्षणं महा-सामान्यम् अवान्तर-सामान्यानि च द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्वादीनि तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारण-रूप-लक्षणान् अवान्तर-विशेषांश् चापेक्षया पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमान् सामान्याद् अत्यन्त-विनिर्लुठित-स्वरूपान् अभिप्रैति। तथा हि॒ किल संविन्-निष्ठाः पदार्थ-व्यवस्थितयो, न च सामान्य-ग्राहिणि विज्ञाने विशेषावभासोऽस्त्य्,ऽनुवर्तमानैकाकार-परामर्शेन तद्-ग्रहणाद्, अन्यथा सामान्य-ग्राहकत्वायोगात्। नापि विशेष-ग्रहण-दक्षे संवेदने सामान्यं चकास्ति, विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-पदार्थ-ग्राहितया तत्-प्रवृत्तेर्, अन्यथा विशेष-संवेदनत्वायोगात्। न चैतौ परस्पर-विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुम् युक्ताव्, अतिप्रसङ्गाद्, विभिन्न-प्रतिभासिनाम् अपि निखिलार्थात्मनाम् ऐक्य-प्राप्तेः। एवं च प्रमाणयति॒ परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ, पार्थक्येनोपलब्धेर्, इह यद् यत् पार्थक्येनोपलभ्यते तत् तत् परस्पर-विश्लिष्टं द्रव्यं, तद् यथा -- देवदत्त-यज्ञदत्ताव् इति, पार्थक्येन चोपलभ्येते सामान्य-विशेषाव्, अतः परस्पर-विभिन्नाव् इति। न सामान्यात् पृथग् विशेषोपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम्। सामान्य-व्याप्तस्येति चेन्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः, सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात्॑ ततश् च तेन बोधेन विविक्त-विशेष-ग्रहणाभावात् तद्-वाचकं ध्वनिं तत्-साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता॑ न चैतद् अस्ति, विशेषाभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्ति-दर्शनात्। तस्माद् विशेषम् अभिलषता तत्र च व्यवहारं प्रवर्तयता तद्-ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा सामान्यम् अपि विविक्ताकारतया स्व-ग्राहिणि ज्ञाने यदि न प्रकाशेत, तदा तद्-गोचराभिमत-संवेदनेन विशेषस्याप्य् आकलनात् सामान्याभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्तेर् उच्छेदस् तथैव वक्तव्यो, विविक्त-सामान्य-ग्राहि-बोध-मूलकत्वात् तयोस्, तद्-अनिष्टौ तयोर् अप्य् अभावापत्तेः। न च सामान्यं विशेषं वा तिरस्-कृत्य केवलस्य विशेषस्य सामान्यस्य वाभ्युपगमः कर्तुं युक्तो, द्वयोर् अपि स्व-ग्राहि-ज्ञाने प्रतिभासमानतया विशेषाभावात्। तस्माद् एतौ द्वाव् अपीतरेतर-विशकलिताव् अङ्गी-करणार्हाव् इति नैगमः।
[न्या०वि० २९।१५] अधुना सङ्ग्रहाभिप्रायो वर्ण्यते। तत्र सङ्गृह्णात्य् अशेष-विशेष-तिरो-धान-द्वारेण सामान्य-रूपतया जगद् आदत्त इति सङ्ग्रहः। अयं हि मन्यते॒ भाव-लक्षण-सामान्याद् व्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा विशेषाः परिकल्प्येरन्न्, अव्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा, गत्य्-अन्तराभावात्। तत्र यद्य् आद्यः पक्षस्, तदा निःस्वभावतां ते स्वी-कुर्युर्, भाव-व्यतिरेकित्वाद्, गगन-कुसुमादिवत्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तर्हि भाव-मात्रम् आपद्यन्ते। तथा हि॒ भाव-मात्रं विशेषास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वाद्, इह यद् यतोऽव्यतिरिक्तं तत् तद् एव भवति, तद् यथा -- भावस्यैव स्वरूपम्, अव्यतिरेकिणश् च विशेषा, अतस् तद्-रूपा एव। ननु च यदि भाव-मात्रम् एव तत्त्वं तदा तस्य सर्वत्राविशेषाद् य एते प्रतिप्राणि-प्रसिद्धाः स्तम्भेभ-कुम्भाम्भो-रूहादि-विशिष्ट-वस्तु-साध्या व्यवहारास् ते सर्वेऽपि प्रलयम् आपद्येरन्न्, अतो विशेषा अपि विविक्त-व्यवहार-हेतवोऽभ्युपगन्तव्याः। नैतद् अस्ति, व्यवहारस्यानाद्य्-अविद्या-बल-प्रवर्तितत्वात्, तेन पारामर्थिक-प्रमाण-प्रतिष्ठित-तत्त्व-प्रतिबन्धाभावात्। किं च, विशेषाग्रहो विशेषेण त्याज्यो, विशेष-व्यवस्थापक-प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ भेद-रूपा विशेषाः, न च किञ्चित् प्रमाणं भेदम् अवगाहते, प्रत्यक्षं हि तावद् भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षत्-कर्तुं युक्तम्, नाभावं, तस्य सकल-शक्ति-विरह-रूपतया तद्-उत्पादने व्यापाराभावाद्, अनुत्पादकस्य च साक्षात्-करणे सर्व-साक्षात्-करण-प्रसङ्गात्, तथा च विशेषाभावात् सर्वो द्रष्टासर्व-दर्शीस्यात्। अनिष्टम् चैतद् भवतां, तस्माद् भाव-ग्राहकम् एव तद् एष्टव्यम्। स च भावः सर्वत्राविशिष्ट इति तथैव तेन ग्राह्यस्, तद्-उत्तर-काल-भावी पुनर् विकल्पो घटोऽयं पटादिर् न भवतीत्य् एवम्-आकारो व्यवहारं रचयन्न् अविद्या-मूलत्वान् न प्रमाणं, तन् न प्रत्यक्षाद् विशेषावगतिः। नाप्य् अनुमानादेः, प्रत्यक्ष-मूलकत्वाच् छेष-प्रमाण-वर्गस्य, तस्मात् सामान्यम् एव परमार्थो, न विशेषा इति सङ्ग्रहः।
[न्या०वि० २९।१६] साम्प्रतं व्यवहार-मतम् उच्यते। तत्र व्यवहरणं व्यवह्रियते वानेन लौकिकैर् अभिप्रायेणेति व्यवहारः। अयं तु मन्यते॒ यथा लोक-ग्राहम् एव वस्त्व् अस्तु, किम् अनयादृष्टाव्यवह्रियमान-वस्तु-परिकल्पन-कष्ट-पिष्टिकया? यद् एव च लोक-व्यवहार-पथम् अवतरति तस्यानुग्राहकं प्रमाणम् उपलभ्यते, नेतरस्य, न हि सामान्यम् अनादि-निधनम् एकं सङ्ग्राहाभिमतं प्रमाण-भूमिस्, तथानुभवाभावात्, सर्वस्य सर्व-दर्शित्व-प्रसङ्गाच् च। नापि विशेषाः परमाणु-लक्षणाः क्षण-क्षयिणः प्रमाण-गोचरस्, तथा प्रवृत्तेर् अभावात्। तस्माद् इदम् एव निखिल-लोकाबाधितं प्रमाण-प्रसिद्धं कियत्-काल-भावि-स्थूरताम् आबिभ्राणम् उदकाहरणाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमं घटादिकं वस्तु-रूपं पारमार्थिकम् अस्तु, पूर्वोत्तर-काल-भावि-तत्-पर्याय-पर्यालोचना पुनर् अज्यायसी, तत्र प्रमाण-प्रसराभावात्, प्रमाणम् अन्तरेण च विचारस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्। अवस्तुत्वाच् च तेषां, किं तद्-गोचर-पर्यालोचनेन? तथा हि॒ पूर्वोत्तर-काल-भाविनो द्रव्य-विवर्ताः क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणा वा विशेषा न कञ्चन लोक-व्यवहारम् उपरचयन्ति, तन् न ते वस्तु-रूपा, लोक-व्यवहारोपयोगिनां एव वस्तुत्वाद् इति व्यवहारः।
[न्या०वि० २९।१७] साम्प्रतं ऋजुसूत्राभिप्रायः कथ्यते। तत्र र्जु प्रगुणम् अकुटिलम् अतीतानगत-वक्र-परित्यागाद् वर्तमान-क्षण-विवर्ति-वस्तुनो रूपं सूत्रयति निष्टङ्कितं दर्शयतीत्य् ऋजुसूत्रः। तथा ह्य्॒ अस्याभिप्रायो --ऽतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्म-लाभत्वात् खर-विषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया सकल-शक्ति-विरह-रूपत्वान् नार्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमत्वम्, अर्थ-क्रिया-क्षमं च वस्तु॑ तद्-अभावान् न तयोर् वस्तुत्वम् इति। वर्तमान-क्षणालिङ्गितं च पुनर् वस्तु-रूपं समस्तार्थ-क्रियासु व्याप्रियत इति तद् एव पारमार्थिकम्। तद् अपि च निरंशम् अभ्युपगन्तव्यम्, अंश-व्याप्तेर् युक्ति-रिक्तत्वाद्, एकस्यानेक-स्वभावताम् अन्तरेणानेक-स्वावयव-व्यापनायोगात्। अनेक-स्वभावतैवास्त्व् इति चेन्, न, विरोध-व्याघ्राघ्रातत्वात्। तथा हि॒ यद्य् एकः स्वभावः कथम् अनेकः? अनेकश् चेत् कथम् एकः? एकानेकयोः परस्पर-परिहारेणावस्थानात्॑ तस्मात् स्वरूप-निमग्नाः परमाणव एव परस्परोपसर्पण-द्वारेण कथञ्चिन् निचय-रूपताम् आपन्ना निखिल-कार्येषु व्यापार-भाज इति त एव स्वलक्षणं, न स्थूरतां धारयत् पारमार्थिकं इति। किं च, प्रमाणतोऽर्थ-व्यवस्था, न च प्रमाणं देश-काल-व्याप्ति-ग्रहणे किञ्चन प्रवर्तते, सर्व-प्रमाणानां वर्तमान-प्रकाश-रूपत्वात्। तथा हि॒ प्रत्यक्षं तावद् रूपालोक-मनस्कार-चक्षुर्-लक्षण-कारण-चतुष्टयाल् लब्ध-सत्ताकं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशते, अतीत-वर्त्स्यत्-क्षणयोर् असन्निहितत्वात्, ततश् च तत् तत्-काल-सम्बद्धम् एव वस्तुनो रूपं साक्षात्-कर्तुं क्षमते न पूर्वम् अपरं वासन्निधानाद् एव। यदि पुनर् विनष्टम् अपि पूर्व-क्षण-वर्ति-रूपमाकलयेत्, तदा विनष्टत्वाविशेषान् निरवधिः क्षण-परम्परा तत्र प्रतीयेत, तथा च सति सङ्कलिकयानादि-जन्म-परम्परा-ग्राहि प्रत्यक्षम् अनुषज्येत। एवम् अनागत-क्षण-ग्रहणेऽपि योज्यम्॑ अनिष्टं चैतत्, तस्मात् तद् वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-दक्षम् एवेत्य् अभ्युपगन्तव्यम्। ननु च यदि क्षण-भङ्गुरताम् अर्थात्मनाम् अध्यक्षम् अवलोकयति, तदा नीलतेव प्रतिभासमाना सा विप्रतिपत्ति-गोचरं न यायाद् इति तद्-विषयो लौकिकानां व्यवहारः प्रवर्तेत, न चैतद् अस्ति, स्थिरता-द्वारेण व्यवहार-प्रवृत्तेर् इति। अत्र प्रतिविधीयते -- साक्षात्-कुर्वाणा अपि क्षण-विनश्वरतां सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्ध-बुद्धयो मन्दा नाध्यवस्यन्त्य्, अनादि-काल-प्ररूढ-वासना-प्रबोध-समुपजनित-मिथ्या-विकल्प-सामर्थ्याच् च विपर्यस्त-स्थिरता-व्यवहारं प्रवर्तयन्ति, तन् नायम् अध्यक्षस्यापराधो,ऽपि तु प्रमात्ःणाम् एव। तथा घनाकारोऽपि प्रत्यक्ष-पृष्ठ-भावि-मिथ्या-विकल्प-सन्दर्शित एव, विविक्त-दर्शने तत्-प्रतिभासायोगात्, कर-चरण-शिरो-ग्रीवादयो ह्य् अवयवाः परस्पर-विभक्ता एव तत्र प्रतिभान्ति, न व्याप्य्-आकारो, न च तेऽपि स्वांश-व्यापिनः प्रतिभान्ति, तद्-अवयवानाम् अपीतरेतर-विशकलित-रूपाणां प्रतिभासात् तावद् यावत् परमाणव एव प्रथन्ते, व्यापि-रूपस्य विचाराक्षमत्वाद् इत्य् उक्त-प्रायम्। नाप्य् अनुमानात् स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिः, प्रत्यक्ष-परिगृहीतं हि सम्बन्धम् आसाद्यानुमानं प्रवर्तेत, यदा च तत् क्षण-भङ्गुर-विविक्तांश-ग्रहण-चातुर्यम् आबिभ्रद् दर्शितं तदानुमानम् अपि तत्-प्रतिबन्ध-मूलकं तद्-गोचरम् एव पारम्पर्येण प्रतिष्ठापयति, स्व-प्रतिभासिनो रूपस्यालीकतया तत्-प्रतिष्ठापन-द्वारेणैव तस्य प्रामाण्यात्। ननु च स्मरण-प्रत्यभिज्ञानादीनि स्थिर-स्थूर-वस्तु-व्यतिरेकेण नोपपद्यन्ते, पूर्वम् अदृष्टे तद्-अभावात्, पुरुषाद्य्-अवयविनां स्मरणात् प्रत्यभिज्ञानाच् च। नैतद् अस्ति, तेषाम् अलीक-वासना-प्रबोधोत्थापितत्वेन प्रामाण्यायोगात्। किं च, तान्य् अपि स्वयं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशन्ते, विप्लव-वशात् तु स्वरूपम् एव वासना-सम्पादितातीतार्थ-रूपतया व्यवस्यन्ति, घनाकारं च तस्यासन्तम् अध्यारोपयन्ति॑ तन् न तेभ्योऽपि व्यापि-वस्तु-सिद्धिः। तस्माद् व्यापिनि रूपे प्रमाणानवतारात् परस्पर-विश्लिष्टाः परमाणव एव परमार्थत इति र्जुसूत्रः।
[न्या०वि० २९।१८] तद् इदम् अर्थ-स्वरूप-निरूपण-निपुणानां नयानां मतम् उपवर्णितम्॑ अधुना शब्द-विचार-चतुराणाम् उपवर्ण्यते। तत्र त्रयाणाम् अपि शब्दादीनाम् इदं साधारणमाकूतं, यद् उत शब्द एव परमार्थो नार्थस्, तस्य तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्। पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धेः कथम् अव्यतिरेक इति चेत्, प्रमाणाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ न व्यतिरिक्तोऽर्थः शब्दात्, तत्-प्रतीतौ तस्य प्रतीयमानत्वाद्, इह यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तं भवति, तद् यथा -- शब्दे प्रतीयमाने तस्यैव स्वरूपं, प्रतीयते च शब्दे प्रतीयमानेऽर्थो,ऽतोऽसौ ततोऽव्यतिरिक्त इति। अगृहीत-सङ्केतस्य घट-शब्द-श्रवणेऽपि घट-प्रतीतेर् अभावाद् व्यतिरिक्त इति चेद्, एवं तर्हि विषस्य मारणात्मकत्वं तद्-अज्ञस्य न प्रतिभातीति तत् ततो व्यतिरिक्तम् आपद्येत, न चैतद् अस्ति, तद्-व्यतिरेकाविशेषेण गुड-खण्डवद् विषस्याप्य् अमारकत्वापत्तेः, सम्बन्धस्य च व्यतिरिक्तेन सह प्राग् एवापास्तत्वात्॑ तन् नाबुद्ध-प्रमातृ-दोषेण वस्तुनोऽन्यथात्वम्, अन्यथान्धो रूपं नेक्षत इति तद्-अभावोऽपि प्रतिपत्तव्य इति। ये निरभिधाना वर्तन्तेऽर्थास् तेषां शब्दात् पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धिर् इति चेन्, न, निरभिधानार्थाभावात्, केवलं केचिद् विशेष-शब्दैः सङ्कीर्त्यन्ते, केचित् सामान्य-ध्वनिभिर् इत्य् एतावान् विशेषः स्यात्। यदि वा सकलार्थ-वाचका विशेष-धवनयो न सन्तीति नास्त्य् अत्र प्रमाणम्। ततश् च सर्वेऽर्था विद्यमान-स्व-वाचका,ऽर्थत्वाद्, घटार्थवद् इति प्रमाणात् सर्वेषां स्व-वाचकत्वेन पूर्वोक्त-युक्तेः शब्दाद् अपार्थक्य-सिद्धिः। तस्मान् न परमार्थतोऽर्थः शब्दातिरिक्तोऽस्त्य्, उपचारतः पुनर् लौकिकैर् अपर्यालोचित-परमार्थैर् व्यवह्रियते। असाव् अप्य् औपचारिकः शब्दात्मको वार्थः प्रतिक्षण-भङ्गुरः स्वी-कर्तव्यो, वर्णानां क्षण-ध्वंसिता-प्रतीतेर्, ऋजुसूत्र-प्रतिपादित-युक्ति-कलापाच् च।
[न्या०वि० २९।१९] साम्प्रतम् एतेषाम् एव प्रत्येकम् अभिप्रायः कथ्यते। तत्र शब्दो॒ रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिद् अर्थे प्रवर्तन्ते॑ यथेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः, तेषां सर्वेषाम् अप्य् एकम् अर्थम् अभिप्रैति किल प्रतीति-वशाद्, यथा शब्दाव्यतिरेकोऽर्थस्य प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वं वानेकत्वं वा प्रतिपादनीयं॑ न चेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थ-वाचितया कदाचन प्रतीयन्ते, तेभ्यः सर्वदैवैकाकार-परामर्शोत्पत्तेर्, अस्खलद्-वृत्तितया तथैव व्यवहार-दर्शनात्। तस्माद् एक एव पर्याय-शब्दानाम् अर्थ इति शब्दः, शब्द्यत आहूयतेऽनेनाभिप्रायेणार्थ इति निरुक्ताद् एकार्थ-प्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्याय-ध्वनीनां प्रयोगाद् इति।
[न्या०वि० २९।२०] साम्प्रतं समभिरूढ-मतम् उपवर्ण्यते। तत्र सम् एकी-भावेनाभिरोहति व्युत्पत्ति-निमित्तम् आस्कन्दति शब्द-प्रवृत्तौ योऽभिप्रायः स समभिरूढः। अयं हि पर्याय-शब्दानां प्रतिविभक्तम् एवार्थम् अभिमन्यते, तद् यथेन्दनाद् इन्द्रः, परमैश्वर्यम् इन्द्र-शब्द-वाच्यं परमार्थतस्, तद्वत्य् अर्थे पुनर् उपचारतः प्रवर्तते, न वा कश्चित् तद्वान्, सर्व-शब्दानां परस्पर-विभक्तार्थ-प्रतिपादकतयाश्रयाश्रयि-भावेन प्रवृत्त्य्-असिद्धेः। एवं शकनाच् छक्रः, पूर्-दारणात् पुरन्दर इत्य्-आदि भिन्नार्थत्वं सर्व-शब्दानां दर्शयति॑ प्रमाणयति च॒ पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थाः, प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकत्वाद्, इह ये ये प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकास् ते ते भिन्नार्थाः, यथेन्द्र-घट-पुरुष-शब्दा विभिन्नार्था, विभिन्न-व्युत्पत्ति-निमित्तकाश् च पर्याय-शब्दा अप्य्, अतोऽभिन्नार्था इति। यत् पुनर् अविचारित-प्रतीति-बलाद् एकार्थाभिधायकत्वं प्रतिपाद्यते तद् अयुक्तम्, अतिप्रसङ्गात्। तथा हि॒ यदि युक्ति-रिक्ता प्रतीतिर् एव शरणी-क्रियते तदा मन्द-मन्द-प्रकाशे दवीयसि देशे सन्निविष्ट-शरीरा विभिन्ना अपि निम्ब-कदम्बाश्वत्थ-कपित्थादय एक-तर्व्-आकारताम् आबिभ्राणाः प्रतीयन्त इत्य् एकतयैवाभ्युपगन्तव्याः। न चैतद् अस्ति, विविक्त-तत्-स्वरूप-ग्राहि-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वेन पूर्व-प्रतीतेर् विविक्तानाम् एव तेषाम् अभ्युपगमात्, तन् नैकार्थ-वाचिनो ध्वनयः सन्ति, रूढिः पुनर् अविचारित-तद्-अर्थानाम् इति समभिरूढः।
[न्या०वि० २९।२१] साम्प्रतम् एवम्भूताभिप्रायः प्रतिपाद्यते। तत्रैवं-शब्दः प्रकार-वचनस्, ततश् चैवं यथा व्युत्पादितस् तं प्रकारं भूतः प्राप्तो यः शब्दः स एवम्भूतः॑ तत्-समर्थन-प्रधानोऽभिप्रायोऽप्य् एवम्भूतस्, तद्-विषयत्वात्, विषय-शब्देन च विषयिणोऽभिधानात्। अयं हि यस्मिन्न् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्ति-निमित्तम् अर्थो यदैव विवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानम् अभिप्रैति, न सामान्येन। यथोदकाद्य्-आहरण-वेलायां योषिद्-आदि-मस्तकारूढो विशिष्ट-चेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते, न शेषो, घट-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्त-शून्यत्वात्, पटादिवद् इति। अतीतां भाविनीं वा चेष्टाम् अधिकृत्य सामान्येनैवोच्यत इति चेन्, न, तयोर् विनष्टानुत्पन्नतया शश-विषाण-कल्पत्वात्॑ तथापि तद्-द्वारेण शब्द-प्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्तयितव्यो, विशेषाभावात्। किं च, यद्य् अतीत-वर्त्स्यच्-चेष्टापेक्षया घट-शब्दोऽचेष्टावत्य् अपि प्रयुज्येत, कपाल-मृत्-पिण्डादाव् अपि तत्-प्रवर्तनं दुर्निवारं स्यात्, विशेषाभावात्, तस्माद् यत्र क्षणे व्युत्पत्ति-निमित्तम् अविकलम् अस्ति तस्मिन्न् एव सोऽर्थस् तच्-छब्देन वाच्य इत्य् एवम्भूतः।
[न्या०वि० २९।२२] तद् एवम् अनेक-धर्म-परीतार्थ-ग्राहिका बुद्धिः प्रमाणं, तद्-द्वारायातः पुनर् एक-धर्म-निष्ठार्थ-समर्थन-प्रवणः परामर्शः शेष-धर्म-स्वी-कार-तिरस्-कार-परिहार-द्वारेण वर्तमानो नयः, स च धर्माणाम् आनन्त्याद् अनन्त-भेदस्, तथापि सर्व-सङ्ग्राहकाभिप्राय-परिकल्पन-मुखेनैवं सप्त-भेदो दर्शितः। अयम् एव च स्वाभिप्रेत-धर्मावधारणात्मकतयाशेष-धर्म-तिरस्-कार-द्वारेण प्रवर्तमाणः परामर्शो दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते॑ तद्-बल-प्रभावित-सत्ताका हि खल्व् एते पर-प्रवादाः। तथा हि॒ नैगम-नय-दर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। सङ्ग्रहाभिप्राय-प्रवृत्ताः सर्वेऽप्य् अद्वैत-वादाः सांख्य-दर्शनं च। व्यवहार-नयानुपाति प्रायश् चार्वाक-दर्शनम्। ऋजुसूत्राकूत-प्रवृत्त-बुद्धयस् ताथागताः। शब्दादि-नय-मतावलम्बिनो वैयाकरणादय इति। अथेत्थम् अभिदधीथा, यथा॒ कथम् एतेऽवधारण-द्वारेण स्वकम् अर्थं समर्थयन्तस् तद्-विपरीतं निराकुर्वाणा दुर्नयतां प्रतिपद्यन्त इत्य्, अत्रोच्यते -- एवं प्रवृत्तौ निर्गोचरत्वान्, निर्गोचरस्य नयत्वायोगात्। तथा हि॒ नयति केनचिद् अंशेन विशिष्टम् अर्थं प्रापयति योऽभिप्रायः स नयः, स्वाभिप्रेत-धर्माच् छेष-धर्म-प्रतिक्षेप-द्वारेण तु प्रवृत्तो न किञ्चिन् नयत्य्, एक-धर्मालिङ्गितस्य वस्तुनोऽसम्भवाद्, बहिर् अन्तश् चानेक-धर्म-परिकरित-स्वभावस्य तस्य प्रतिभासात्, तद्-अपह्नव-कारिणां कदभिप्रायाणां प्रतिभास-बाधितत्वेनालीकत्वात्।
[न्या०वि० २९।२३] तथा हि॒ यः तावन् नैगम-नयः परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ प्रत्यपीपदत्, तद् अयुक्तम्। तयोस् तथा कदाचन प्रतिभासाभावात्। यच् चोक्तम्॒ अनुवर्तमानैकाकार-परामर्श-ग्राह्यं सामान्यं यत्र न तत्र विशेष-प्रतिभासो, यत्र च विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-बोध-निर्ग्राह्यो विशेषो न तत्र सामान्यावगतिस्, तद्-वचन-मात्रम् एव, धव-खदिर-पलाशादि-समस्त-विशेषापसारणे वृक्षत्वादि-सामान्य-प्रतिभासाभावात्। दूराद् विशेषाग्रहणेऽपि केवलं तच् चकास्तीति चेन्, न, तत्राप्य् अभ्यन्तरी-भूत-विशेष-प्रतिभासात्, तद्-विरहे शश-विषाण-रूपत्वात्। एवं विशेषा अपि न सामान्याद् अत्यन्त-व्यतिरेकिणः प्रतिभान्ति, तन्-निमग्नानाम् एव तेषां ग्रहणाद्, इतरथा सत्तातोऽतिरिच्यमाना भावा निःस्वभावताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। तथा वृक्षत्वादि-सामान्येभ्योऽपि भेदिनो वृक्षादयो न स्युस्, तद्-अभेद-निबन्धनत्वात् तत्-स्वरूप-स्थितेः। तस्मात् तद् एव संवेदनम् उपसर्जनी-कृत-वैषम्यं प्रधानी-कृतैकाकारं सामान्यं गृह्णातीत्य् उच्यते, न्यक्-कृत-समत्वम् उत्कलित-नानात्वं पुनर् विशेष-ग्रहीति, समत्व-नानात्वयोः कथञ्चिद् भेदाभेदिनोः परस्परं सर्वार्थेषु भावात्, तद्-अभावे तथा-विध-प्रतिभासानुपपत्तेः। एतेन यद् अवादि "न चैतौ विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुं युक्ताव्" इत्य्-आदि, तद् अपास्तम् अवगन्तव्यं, विभिन्नयोः प्रतिभासाभावात्। व्यवहारोऽपि सर्वः प्रधानोपसर्जन-द्वारेण कथञ्चिद् इतरेतराविनिर्लुठित-सामान्य-विशेष-साध्य एव॑ न हि सामान्यं दोह-वाहादि-क्रियायाम् उपयुज्यते, विशेषाणाम् एव तत्रोपयोगान्, नापि विशेषा एव तत्-कारिणः, गोत्व-शून्यानां तेषां वृक्षाद्य्-अविशिष्टतया तत्-करण-सामर्थ्याभावात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेके सामान्य-विशेषयोर् वृक्षं छिन्धीति चोदितः किम् इति तद्-विशेषे पलाशादौछेदं विधत्ते? तत्र तस्य समवायाद् इति चेन्, न, समवाय-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, भावेऽपि विश्लिष्टयोर् अभेद-बुद्ध्य्-उत्पादनाक्षमत्वात्, तस्यापि व्यतिरिक्ततया पदार्थान्तराविशेषान् नित्यत्वैकत्व-सर्व-गतत्वादिभिश् च सर्वत्र तत्-करण-प्रसङ्गाच् च। यत् पुनर् अवादीर्, यद् उत॒ यदि सामान्यं विशेष-निष्ठं, विशेषो वा सामान्य-व्याप्तः समुपलभ्येत, ततो विविक्तयोस् तयोः क्वचिद् अनुपलम्भाद् योऽयं विविक्तेषु सामान्येषु विशेषेषु चाभिधानार्थ-क्रिया-लक्षणो व्यवहारः स समस्तः प्रलयं यायाल्, लोली-भावेन तद्-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, तद् अप्य् असमीचीनं, यतो यद्य् अपि परस्पराविविक्तयोः सामान्य-विशेषयोः सर्वत्रोपलम्भस्, तथापि यत्रैव प्रमातुर् अर्थित्वं तद् एव सामान्यं, विशेषान् वा प्रधानी-कृत्य तद्-गोचरं ध्वनिम् अर्थ-क्रियां वा प्रवर्तयतीतरस्याप्य् उपसर्जन-भावेन तत्र व्यापारात्, तद्-विकलस्येतरस्यापि शश-विशाणायमानतया क्वचिद् अनुपयोगात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेकिणि विशेषेभ्यः सामान्ये वृत्ति-विकल्पोपलम्भ-नूतन-विशेष-सम्बन्धादि-द्वारेण दूषण-मुद्गर-कदम्बकं मूर्धनि पतद् दुर्विषहं स्यात्। तथा हि॒ तत् तेषु कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वा? सामस्त्य-पक्षे प्रतिविशेषं परिसमाप्ततया सामान्य-बहुत्व-प्रसङ्गो,ऽनिष्टं चैतद्, एकत्वाभुपगम-क्षतेः। एकदेशेन वर्तने पुनर् यावन्तो विशेषास् तावन्तस् तद्-अंशाः प्रसजन्ति, न चैतद् अस्ति, सामान्यस्य निरवयवत्वात्॑ सावयवत्वेऽपि पुनस् तेऽभिन्ना भिन्ना वा। यद्य् अभिन्ना विशेषास्, तर्ह्य् अभेदिनः किं नेष्यन्ते, विशेषाभावात्। भेद-पक्षे पुनस् तेष्व् अपि तत् कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वेति? तद् एव चोद्यम् अलब्ध-परिनिष्ठम् अवतरति, तन् नात्यन्त-भेदिनो वृत्तिः सम्भवति। किं च, यद्य् एकं सामान्यं भेदवत् समस्त-विशेषेषु वर्तेत, तदैक-विशेषोपलम्भ-काले तद् उपलम्भ्यते न वा? यद्य् आद्यः पक्षस्, तस्यैकतया सर्वत्रोपलम्भात्, व्याप्य-ग्रहणाभावे व्यापक-ग्रहणासिद्धेर्, निखिल-तद्-व्याप्य-विशेष-ग्रहणम् आसज्येत, न चैतद् अस्ति, पुरो-वर्ति-विशेषस्यैव साक्षात्-करणाच्, छेष-विशेषाणाम् असन्निधानात्॑ सन्निहित-विशेष-निष्ठम् एव तद् उपलभ्यते। तस्यैव तद्-व्यञ्जकत्वाद्, इतरेषां तद्-अभावाद् इति चेन् नैक-स्वभावस्य खण्डशो व्यञ्जनायोगात् सन्निहित-विशेष-व्यञ्जितम् एव तत् सर्वत्र स्वभावान्तराभावात् सर्व-विशेष-गतं च तद्-रूपम्, अतस् तद्-दर्शनं केन वार्येत। अथ द्वितीयः कल्पस्, तथा सति यथैक-विशेषोपलम्भ-समये नोपलभ्यते, तथा शेष-विशेषोपलम्भ-कालेऽपि नोपलभ्येत, विशेषाभावात्। अतस् तद्-अभाव एवोक्तः स्यात्, केवलस्योपलम्भाभावात्। उपलम्भेऽपि स्व-स्वभाव-स्थितेर् विशेष-रूपतापत्तिः। तथा चिरन्तन-विशेष-व्यवस्थित-सत्ताकं तन् नूतन-विशेषोत्पादे सति कथं तेन सह सम्बन्धम् अनुभवेत्? न तावद् विशेषान्तरेभ्यस् तद् उत्पित्सु-विशेष-देशं गन्तुम् अर्हति, निष्क्रियत्वात्। नापि तत्रैवाभवद्, विशेषोत्पादात् प्राक् तद्-देशे तद्-उपलम्भाभावात्। नापि विशेषेणैव सहोत्पद्यते, नित्यत्वान्, नित्यस्य चोत्पत्ति-विरोधात्। अथैतद्-दोष-परिजिहीर्षया तत् सक्रियाकम् अभिधीयेत, तथापि पूर्व-व्यक्ति-त्यागेन वा नूतन-विशेष-देशम् आक्रामेत्, तद्-अभावेन वा? न तावद् अद्यः पक्षश्, चिरन्तन-व्यक्तीनां सामान्य-विकलतया तत्-सम्बन्ध-साध्य-बुद्धि-ध्वनि-विरह-प्रसङ्गात्। न चैतद् अस्त्य्, अपरापर-विशेषोत्पादेऽपि प्राचीन-व्यक्तिषु तद्-दर्शनात्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तद् अप्य् असम्बद्धं, निरवयवस्य पूर्व-व्यक्ति-त्याग-वैकल्ये सत्य् उत्पित्सु-व्यक्तिं प्रतिगमनाभावात्। सावयव-पक्षस्य पुनः प्राग् एवापास्तत्वान्, नैतद्-अभ्युपगम-द्वारेण परिहारः श्रेयान्। अन्यच् च॒ व्यतिरिक्त-सामान्य-सम्बन्धाद् यदि भावाः समाना, न स्वरूपेण, तदा सत्त्व-सम्बन्धात् प्राग् भावाः सन्तोऽसन्तो वा। सन्तश् चेद् अपार्थकः सत्ता-सम्बन्धो,ऽन्यथानवस्था प्रसज्येत, पुनः-सत्तान्तर-सम्बन्धानिवारणात्। असन्तश् चेद् अत्यन्तासताम् अपि गगनारविन्दादीनां सत्ता-सम्बन्धाद् भाव-रूपतापद्येत। एवं द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्व-गोत्वादि-सामान्येष्व् अपि समस्तम् एतद् वाच्यम्, एक-योग-क्षेमत्वात्, तन् न परस्परम् अत्यन्त-व्यतिरेकिणौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चन घटाम् आटीकेते। अत एव तत्-समर्थन-प्रवणस् तत्-तादात्म्य-प्रतिक्षेपकोऽभिप्रायो निरालम्बनत्वान् नैगम-दुर्नय-व्यपदेशम् आस्कन्दति, तादात्म्योपेक्षयैव सामान्य-विशेष-व्यतिरेक-समर्थकस्य नैगम-नयत्वाद्, व्यतिरेकिणोर् अपि तयोर् वस्तुनि कथञ्चिद् भावाद्, इतरथा विवक्षयापि तथा दर्शयितुम् अशक्यत्वात्, प्रधानोपसर्जन-भावस्य द्वय-निष्ठत्वात्, अत्यन्त-तादात्म्ये तत्-कारिण्या विवक्षाया अपि निर्गोचरता-प्रसङ्गात्। तस्मात् कथञ्चिद् भेदाभेदिनाव् एवैतौ, तद्-अन्यतर-समर्थकः पुनर् निरालम्बनत्वाद् दुर्नयतां स्वी-करोतीति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।२४] तथा सङ्ग्रहोऽप्य् अशेष-विशेष-प्रतिक्षेप-मुखेन सामान्यम् एकं समर्थयमानो दुर्नयः, तद्-उपेक्षा-द्वारेणैव तस्य नयत्वात्, विशेष-विकलस्य सामान्यस्यासम्भवात्। तथा हि॒ यत् तावद् उक्तं -- यद् उत "विशेषाः सामान्याद् व्यतिरेकिणोऽव्यतिरेकिणो वा। व्यतिरेक-पक्षे निःस्वभावत्वं, निःसत्ताकत्वात्। अव्यतिरेक-पक्षे भाव-मात्रं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवद्" इति -- तद् अयुक्तं, विशेष-वादिनोऽप्य् एवं-विध-विकल्प-सम्भवात्। तथा हि॒ विशेषेभ्यः सामान्यं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा। व्यतिरिक्तं चेन्, न तर्हि सामान्यं, स्व-स्वरूप-व्यवस्थिततया विशेष-रूपत्वात्। अव्यतिरिक्तं चेत्, तथापि न सामान्यं, विशेषाव्यतिरिक्तत्वाद् एव तत्-स्वरूपवत्। यद् अप्य् अवाद्य् -- "अनाद्य्-अविद्या-बल-प्रवृत्तो विशेष-व्यवहारस्, तात्त्विकं सामान्यं" -- तद् अपि वचन-मात्रम् एव, युक्ति-रिक्तत्वात्, सामान्यम् एवानाद्य्-अविद्या-दर्शितं, विशेषाः पुनः पारमार्थिका इति विशेष-वादिनोऽपि वदतो वक्त्र-भङ्गाभावात्। यत् पुनर् विशेष-ग्राहक-प्रमाणाभावं प्रतिपादयताभ्यधायि, यद् उत "प्रत्यक्षं भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षात्-करोति नाभावं, तस्यानुत्पादकत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्ततरं, यतः केनेदं भवतोऽत्यन्त-सुहृदा निवेदितं॒ "भाव एव केवलः प्रत्यक्षम् उत्थापयति, न पुनर् अभावोऽपि" [इति]? अभाव-व्यापाराभाव-प्रतिपादक-युक्ति-कलापेनेति चेद् मुग्ध-विप्रतारितोऽसि, तद्-व्यापाराभावासिद्धेः, सद्-असद्-रूप-वस्तुनः समस्त-क्रियासु व्यापाराद्, भाव-तादात्म्येन व्यवस्थितस्याभावस्य व्यापारे विरोधाभावात्। कथं भावाभावयोस् तादात्म्यं, विरोधाद्? इति चेन्, न, प्रमाण-प्रसिद्धे विरोधाभावात्। तथा हि॒ घटादिकः पदार्थात्मा स्वरूपेण सन्, न पटादि-रूपेणापीति भावाभावात्मकः। यदि पुनः कथञ्चिन् नाभावात्मकः स्यात्, तदा पटादि-रूपेणापि भावात् सर्वात्मकः प्राप्नोति। युक्तम् एतद्, अत एव भेद-प्रपञ्च-विलय-सिद्धिर् इति चेत्, स्याद् एवैतद्, यदि पटाद्य्-अभावैकान्ताच् छून्य-वादिनोऽपि मनो-रथ-पूरणं न स्यात्॑ तथा हि॒ पटादि-विविक्तो घटोऽनुभूयते, न च पटाद्य्-अभावो भावेन सह तादात्म्यम् अनुभवति, तस्माद् अभावात्मक एवायम्, एवं पटादयोऽपीतरेतरापेक्षयेति शून्यत्वापत्तिः। तस्मात् स्वरूपम् आबिभ्राणं पर-रूपेभ्यो व्यावृत्तम् एव वस्तु सर्व-क्रियासु व्याप्रियत इति भावाभावात्मकस्यैव व्यापारः, स्वरूप-धारणस्य भावत्वात्, पर-रूप-व्यावर्तनस्याभावत्वाद् इति। एवं स्व-गोचर-प्रत्यक्षोत्पादनेऽपि व्याप्रियते, ततश् च तद्-रूपम् एव तत् साक्षात्-कुर्याद् इति स्वरूप-नियते पर-रूपेभ्यो व्यावृत्त एव वस्तुनि प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तज्-जन्यत्वान्, न भाव-मात्रे, तस्य केवलस्य स्वरूपाव्यवस्थितेर् उत्पादकत्वायोगात्। न च जनकत्वाद् अर्थो ग्राह्यो जन्यत्वाद् वा ज्ञानं ग्राहकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् उक्तं, किं तर्ह्य् आवरण-विच्छेदादेर् लब्ध-सत्ताकं ग्रहण-परिणामाज् ज्ञानं गृह्णात्य्, अर्थस् तु सन्निधानादेर् गृह्यते, स चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूप एव प्रतीयत इति तथा-भूतोऽभ्युपगन्तव्यो, न केवल-सामान्य-रूप इति। सद्-असद्-अंशयोः कथम् एकत्रावस्थानम् इति चेत्, तादात्म्येनेति ब्रूमः। ननु तादात्म्ये भाव-मात्रम् अभाव-मात्रं वापद्येतेतरेतराव्यवतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्, तन् नोभय-रूप-वस्तु-सिद्धिः। नैतद् अस्ति, तादात्म्यस्य सम्बन्धत्वात्, सम्बन्धस्य च द्वय-निष्ठत्वात्, तद्-अभावे कस्य केन सम्बन्धो, निर्गोचरत्वात्? तस्माद् एतौ सद्-असद्-अंशौ धर्मि-रूपतयाभेदिनौ, वस्तुनः सद्-असद्-रूपस्यैकत्वाद्, धर्म-रूपतया पुनर् विवक्षितौ भेदम् अनुभवतः, स्वरूपेण भावात्, पर-रूपेण त्व् अभावाद् इति। तद् एवं प्रत्यक्षे विविक्त-वस्तु-ग्राहिणि सकल-प्रमाण-प्रष्ठे प्रसाधिते शेष-प्रमाणान्य् अपि तद्-अनुसारितया विविक्तम् एव स्व-गोचरं स्थापयन्तीति। तद्-अपलापी केवल-सामान्य-प्रतिष्ठापकः कद्-अभिप्रायः सङ्ग्रह-दुर्नय-व्यपदेशं स्वी-कुरुते, विशेषापेक्षयैव सामान्य-स्थापकस्य सङ्ग्रह-नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२५] तथा व्यवहारोऽपि प्रमाण-प्रसिद्धं वस्तु-स्वरूपं निह्नुवानो युक्ति-रिक्तम् अविचारित-रमणीयं लोक-व्यवहार-मार्गानुसारि समर्थयमानो दुर्नयताम् आत्मनि निधत्ते, लोक-व्यवहार-प्रसाधकस्यापीतरानिष्टौ व्यवस्थानाभावात्। तथा हि॒ यद् इदं कियत्-काल-भावि स्थूरताम् आबिभ्राणं लोक-व्यवहार-कारि घटादिकं भवतस् तात्त्विकम् अभिप्रेतं तन् नाकस्मिकं, किं तर्हि नित्य-परमाणु-घटितम्, इतरथा निष्कारणत्वेन सर्वदा भावाभाव-प्रसङ्गात्। न ते परमाणवस् तथा प्रतिभान्तीति चेन्, नात एव तेषाम् अनुमानतः सिद्धिः। यदि पुनर् यद् एव साक्षान् न विशद-दर्शने चकास्ति तत् सकलम् अपलप्येत, हन्त बह्व् इदानीम् अपलपनीयं, घटादि-वस्तुनोऽप्य् अर्वाग्-भाग-वर्ति-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासान् मध्य-पर-भागादीनाम् अपलाप-प्रसङ्गात्, तथा च लोक-व्यवहार-कारितापि विशीर्येत, तावता तद्-असिद्धेः। अथात्रानुमान-बलेन व्यवहार-क्षम-सम्पूर्ण-वस्तुनः साधनम्, एवं तर्हि भूत-भावि-पर्याय-परमाणु-साधनम् अपि क्रियतां, विशेषाभावात्। तथा हि॒ यथा बाह्य-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासेऽपि सर्व-वस्तूनां तावता व्यवहाराभावान् मध्य-भागादि-साधनेन सम्पूर्णानि तत्-समर्थानि तानि साध्यन्ते, तथैव कियत्-काल-भावि-घनाकार-दर्शनेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-परमाणु-तादाद्म्य-व्यवस्थित-शरीराणि तानि साध्यन्तां, तद्-अभावेऽपि तेषाम् अनुपपत्तेः। तथा हि॒ व्यवहारावतारिणो दर्शन-योग्यस्याद्य-पर्यायस्य तावद् अतीत-पर्यायानभ्युपगमे निर्हेतुकत्वं, तत्र चोक्तो दोषः। तद्-उत्पादकानन्तर-पर्यायेष्टौ पुनस् तज्-जनक-पर्यायोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अनादि-पर्याय-परम्परा सिद्धिम् अध्यासीत। तथा व्यवहारावतारि-वस्तु-पर्यन्त-पर्यायस्य पर्यायान्तरानुत्पादकत्वे बलाद् अवस्तुत्वम् आढौकते, भवन्-नीतेर् एवार्थ-क्रिया-करण-वैकल्यात्। तद्-उत्पादकत्वे पुनर् असाव् अप्य् अपर-पर्यायोत्पादक इत्य् अनन्त-पर्याय-मालोपपद्यते। तथा घनाकारोऽपि विशद-दर्शनेन साक्षात्-क्रियमाणो निष्प्रदेश-पर्यन्तावयव-व्यतिरेकेण नोपपद्यते, कर-चरणाद्य्-अवयवानां खण्डशो भिद्यमानतयावयवि-रूपत्वात्, तद्-अवयवानाम् अप्य् अवयवान्तर-घटितत्वात्। परमाणव एव पर्यन्तावयवाः परमार्थतो घनाकार-हेतवस्॑ तद्-अभावे पुनर् आकस्मिकोऽसौ सर्वत्रोपलभ्येत, न वा क्वचिद्, विशेषाभावात्। एतेन यद् अवादि॒ लोक-व्यवहारावतारिणः प्रमाणम् अनुग्राहकम् अस्ति वस्तुनो नेतरस्येत्य्-आदि, तद् अपि प्रतिक्षिप्तम् अवगन्तव्यं, दृश्यमानार्थान्यथानुपपत्त्यैव तत्-साधनात्। यत् पुनर् उक्तं॒ "किं तेषाम् अतीतानागत-पर्याय-परमाण्व्-आदीनां पर्यालोचनेन लोक-व्यवहारानुपयोगितयावस्तुत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्तम्, उपेक्षया वार्तमानिक-वस्तुनोऽनुपयोगित्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेः, सर्वस्य सर्व-लोकानुपयोगित्वात्। कस्यचिद् उपयोगितया वस्तुत्वे तेषाम् अपि सा समस्त्य् एव, सर्व-ज्ञ-ज्ञानादि-गोचरत्वाद् इत्य् आस्तां तावत्। तद् एवं प्रमाण-प्रसिद्धार्थापलापित्वाद् व्यवहारो दुर्नयः, तद्-उपेक्षया व्यवहारानुपाति-वस्तु-समर्थकस्य व्यवहार-नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२६] अथ ऋजुसूत्रोऽपि दृष्टापलापेनादृष्टम् एव क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणं वस्तु-स्वरूपं परमार्थतया मन्यमानो दुर्नयताम् आस्कन्दति, दृश्यमान-स्थिर-स्थूरार्थापह्नवे निर्मूलतया स्वाभिप्रेत-वस्तु-समर्थक-परामर्शस्योत्थानाभावात्। तथा हि॒ स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् पश्चात् कुयुक्ति-विकल्पेन विवेचयेद्, यद् उतैष स्थिर-स्थूरो दृश्यमानः खल्व् आकारो न घटाम् इयर्ति। विचाराक्षमत्वाद् इत्य्-आदिना न च दृष्टम् अदृष्ट-सन्दर्शकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाधितुं शक्यं, सर्वत्रानाश्वास-प्रसङ्गात्। अथाभिदधीथा॒ "मन्द-मन्द-प्रकाशे प्रदेशे रज्जौ विष-धर-भ्रान्तिः प्राक्तनी यथोदीचीनेन तन्-निर्णय-कारिणा विकल्पेन बाध्यते, तथेदम् अपि स्थिर-स्थूर-दर्शनं क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रसाधक-परामर्शेन, किम् अत्रायुक्तम्?" नैतद् अस्ति, रज्जु-प्रतिभासस्यैव प्राक्-प्रवृत्त-विष-धर-भ्रान्त्य्-अपनोद-दक्षत्वात्, तद्-अभावे च विकल्प-शतैर् अपि निवर्तयितुम् अशक्यत्वात्। अत्राप्य् अतीत-वर्त्स्यतोर् विनष्टानुत्पन्नतयासन्निहितत्वात्, स्थूरावयवानां च स्वावयवेषु भेदाभेद-द्वारेण पर्यालोच्यमानानाम् अवस्थानाभावात् क्षण-क्षयि-परमाणव एव प्रतिभान्ति, ततश् च प्रतिभास एव स्थिर-स्थूर-दर्शनस्य बाधक इति चेद्, एवं तर्हि प्रतिभासस्योपदेश-गम्यतानुपपत्तेस्, तथैव व्यवहारः प्रवर्तेत। पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवान् न प्रवर्तत इति चेन्, नान्यत्राप्य् अस्योत्तरस्य विप्लव-हेतुत्वात्। तथा हि॒ धवले जलजादौ प्रतिभातेऽपि नीलोऽयम् अध्यक्षेणावलोकितः॑ पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवात् तु धवलः प्रतिभातीति भवन्-न्यायेन शठः प्रतिजानानः केन वार्येत। तन् न दृष्टापलापः कर्तुं शक्य इति स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिस्, तस्यैव दर्शनाद्, इतरस्य तद्-दर्शन-द्वारेण साध्यमानस्यानुमेयत्वात्, तद्-अनिष्टौ तस्याप्य् असिद्धेः। एतेन स्थिर-स्थूर-वस्तुनोऽर्थ-क्रिया-विरह-प्रतिपादनम् अपि प्रतिव्यूढं, तथा-विधस्यैव सर्व-क्रियासु व्यापार-दर्शनात् क्षण-क्षयिणोऽर्थ-क्रिया-निषेधाच् च, यथोक्तं प्राक्॒ "क्षण-भङ्गुरो ह्य् अर्थात्मा स्वक्षने पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इत्य्-आदि। किं च, सत्त्व-पुरुषत्व-चैतन्यादिभिर् बाल-कुमार-युव-स्थविरत्व-हर्ष-विषादादिभिश् चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूपस्य सर्वस्य वस्तुनः प्रतीतेर् द्रव्य-पर्यायात्मकत्वम्, अभेदस्य द्रव्यत्वाद्, भेदस्य पर्याय-रूपत्वाद् इति। ततश् च भूत-भावि-क्षणयोर् असन्निधान-द्वारेण वार्तमानिक-क्षणस्यैवार्थ-क्रिया-कारित्व-प्रतिपादनं नास्माद्-बाधा-करं, पर्यायाणां क्रम-भावितया वर्तमान-पर्यायालिङ्गितस्यैव द्रव्यस्यार्थ-क्रिया-करण-चतुरत्वात्। [न] केवलं तत् त्रि-काल-व्यापि, द्रष्टापि द्रव्य-रूपतया तथा-भूत एव। ततश् च क्षणिक-पर्याय-तिरो-धान-द्वारेण तद्-रूप-सङ्कलनात् स्थिरम् एवेदं समस्त-क्रियासु व्याप्रियत इति प्रतीति-वीथिम् अवतरति, स्थैर्यस्यापि तात्त्विकत्वात्, क्षणिक-पर्यायाणां विद्यमानानाम् अप्य् अग्रहणात्, प्राकृत-लोक-ज्ञानस्यावरण-क्षयोपशमापेक्षितया कतिचिद्-अंश-विषयत्वात्। यदि पुनर् द्रव्य-बुद्धिः पर्याय-परम्परा-दर्शन-बलायातत्वाद् अतात्त्विकी कल्प्येत, तदा पूर्व-पर्यायस्योत्तर-पर्यायोत्पादने सान्वयत्वं निरन्वयत्वं वा वक्तव्यं, गत्य्-अन्तराभावात्। सान्वयत्वे द्रव्यं पर्यायान्तरेणाभिहितं स्यान्॑ निरन्वयत्वे पुनर् निर्हेतुतयोत्तर-पर्यायानुत्पाद-प्रसङ्गः। तन् नोभय-रूप-वस्तु-व्यतिरेकेणार्थ-क्रिया-सिद्धिः। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणं, शब्द-विद्युत्-प्रदीपादि-चरम-क्षणानां क्षनान्तरानारम्भकत्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेस्, तद्-अवस्तुत्वे पुनर् उपान्त्य-क्षणस्यापि वस्तुनि व्यापाराभावाद्॑ एवं यावत् सर्व-क्षणानां सङ्कलिकया वस्तुत्वम्। अथ क्षणान्तरानारम्भेऽपि स्व-गोचर-ज्ञान-जनकत्वम् अर्थ-क्रिया परिकल्प्येत, तथा सत्य् अतीत-भावि-पर्याय-परम्परापि योगि-ज्ञान-गोचरतां यातीति वस्तुत्वं स्वी-कुर्यात्। तन् नार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम्, अपि त्ûत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तता, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्। उत्पाद-व्ययौ ध्रौव्येन सह विरुद्धाव् इति चेत्, कुतोऽयं विरोधः॒ प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा? न तावद् आद्यः पक्षः, सर्व-प्रमाणानां बहिर् अन्तश् च तथा-विधा-वस्तु-द्योतन-पटिष्ठतया प्रसाधितत्वात्। नापि द्वितीयो,ऽप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वात्। एतेन स्थूरता-दूषणम् अपि प्रतिक्षिप्तं, प्रतिभास-हतत्वात्, तद्-अपह्नवेन विरोधोद्भावनस्य निर्मूलतया प्रलाप-मात्रत्वात्। यत् पुनर् वर्तमान-प्रकाश-रूपतया तत्-सम्बद्ध-वस्तु-ग्राहित्वं सर्व-प्रमाणानाम् उदग्राहि, तद् अयुक्तं, तेषाम् एकान्तेन वार्तमानिकत्वासिद्धेः, कथञ्चिद् आत्मा-व्यतिरेकित्वात्, तस्य च काल-त्रय-व्यापकत्वात्, तद्-रूपतया तेषाम् अप्य् अवस्थानात्। ततश् चात्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपत्वात्, सर्व-प्रमाणानां परिणामिन्य् एव वस्तुनि व्यापारो, न क्षणिके। न चातीतानागत-क्षण-वर्ति-वस्तु-ग्रहणेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-जन्म-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्ग, आवरण-विच्छेद-सापेक्षत्वात्, तस्यैव परमार्थतः संवेदनाविर्-भावान्तर-कारणत्वाद्, ग्राह्यादेर् बहिर्-अङ्गत्वात्। सामस्त्येन पुनर् आवरण-विलये सति समस्त-वस्तु-विस्तारानाद्य्-अनन्त-क्षण-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्गो न नो बाधा-कारीष्टत्वात्। तद् एक-देश-क्षयोपशमे पुनस् तद्-अनुसारिणी बोध-प्रवृत्तिर् इति कियत्-काल-भाविनि स्थूरे वस्तुनि प्राकृत-लोक-ज्ञानानि प्रवर्तन्ते, न सम्पूर्णे। न च तान्य् अलीकानि, तद्-ग्राह्यांशस्यापि वस्तुनि भावात्, तावतैव व्यवहार-सिद्धेर् इति। यच् चोक्तं॒ क्षणिकतां गृह्णन्तोऽपि सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्धत्वान् मन्दा नाध्यवस्यन्ति, मिथ्या-विकल्प-वशात् स्थिरता-व्यवहारं च प्रवर्तयन्ति, तद् अयुक्तं, भवद्-आकूटेन सादृश्याभावात्, तद्-अभावे तद्-उत्पाद्याभिमत-भ्रान्तेर् निर्बीजतयोत्पत्तेर् असम्भवात्। तथा स्थिरतारोपोऽपि क्वचिद् गृहीत-स्थिरत्वस्यैव युक्तो नान्यथा, यथा दृष्ट-विष-धरस्य मन्द-प्रकाशे रज्जु-दर्शने विष-धरारोपः। न च भवतां कदाचन स्थिरता प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति, तत् कथं प्रतिक्षणम् उदयापवर्ग-संसर्गिणि सकले वस्तुनि प्रत्यक्षेणावलोकितेऽपि तद्-आरोप इति। तस्मात् तिरो-हित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-वैविक्त्यं वस्तु सर्व-सांव्यवहारिक-प्रमाणैर् गोचरी-क्रियत इति तत्-तिरस्-कार-द्वारेणादृष्ट-क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रतिष्ठापकोऽभिप्राय ऋजुसूत्र-दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते, तद्-उपेक्षयैव तद्-दर्शकस्य नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२७] तथा शब्दादयोऽपि सर्वथा शब्दाव्यतिरेकम् अर्थस्य समर्थयन्तो दुर्नयास्, तत्-समर्थनार्थम् उपन्यस्तस्य तत्-प्रतीतौ प्रतीयमानत्व-लक्षणस्य हेतोर् अनैकान्तिकत्वात्। तथा हि॒ नायम् एकान्तो यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तम् एव, व्यतिरिक्तस्यापि पावकादेर् अन्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-सम्बन्ध-बलाद् धूमादि-प्रतीतौ प्रतीयमानत्वात्। एवं शब्दोऽपि व्यतिरिक्तम् अप्य् अर्थं वाचकत्वात् प्रत्याययिष्यत्य्, अव्यतिरेकस्य प्रत्यक्षादि-बाधितत्वाच्, छब्दाद् विवेकेनैवानुभूयमानत्वात्। अस्मिंश् च हेताव् अनैकान्तिके स्थिते सर्वार्थानां सस्व-वाचकत्व-साधन-द्वारेण शब्दाव्यतिरेक-साधनम् अपि दूरापास्तम् एव। न चात्रापि प्रतिबन्ध-ग्राहि प्रमाणं -- यो योऽर्थस् तेन तेन सस्व-वाचकेन भवितव्यं -- घटादि-दृष्टान्त-मात्रात् तद्-असिद्धेः, क्षणिकालक्ष्य-द्रव्य-विवर्तानां सङ्केत-ग्रहणोपायाभावेनाभिलपितुम् अशक्यतयानभिलाप्यत्व-सिद्धेश् च। क्षण-भङ्गुरता-प्रतिज्ञानं पुनर् अमीषां अप्य् ऋजुसूत्रवन् निरसितव्यम्। तथा प्रत्येक-मतापेक्षयापि स्वाभिप्रेतं प्रतिष्ठापयन्तस् तद्-विपरीतं शब्दार्थं तिरस्-कुर्वाणा दुर्नयताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। एतावद् धि प्रमाण-प्रतिष्ठितं, यद् उत विधि-मुखेन शब्दोऽर्थस्य वाचक इति॑ न पुनर् अयं नियमो यथायम् अस्यैव वाचको नान्यस्य, देश-काल-पुरुष-सङ्केतादि-विचित्रतया सर्व-शब्दानाम् अपरापरार्थ-प्रतिपादकत्वेनोपलब्धेर् अनन्त-धर्मतयापरापर-योग्यता-द्वरेणापरापरार्थाभिधायकत्वोपपत्तेर्, अर्थानाम् अप्य् अनन्त-धर्मत्वाद् एवापरापर-शब्द-वाच्यत्वाविरोधात्, तथैवाविगानेन व्यवहार-दर्शनात्, तद्-अनिष्टौ तल्-लोप-प्रसङ्गात्। तस्मात् सर्व-ध्वनयो योग्यतया सर्वार्थ-वाचका, देश-क्षयोपशमाद्य्-अपेक्षया तु क्वचित् कथञ्चित् प्रतीतिं जनयन्ति। ततश् च क्वचिद् अनपेक्षित-व्युत्पत्ति-निमित्ता रूढितः प्रवर्तन्ते, क्वचित् सामान्य-व्युत्पत्ति-सापेक्षाः, क्वचित् तत्-काल-वर्ति-व्युत्पत्ति-निमित्तापेक्षयेति न तत्र प्रामाणिकेन नियतार्थाग्रहो विधेयः। अतोऽमी शब्दादयो यदेतरेतराभिमत-शब्दार्थोपेक्षया स्वाभिमतं शब्दार्थं दर्शयन्ति, तदा नयास्, तस्यापि तत्र भावात्। परस्पर-बाधया प्रवर्तमानाः पुनर् दुर्नय-रूपतां भजन्ति, निरालम्बनत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२८] ननु च यद्य् एकैक-धर्म-समर्थन-परायणाःशेष-धर्म-तिरस्-कार-कारिणोऽभिप्राया दुर्नयतां प्रतिपद्यन्ते, तदा वचनम् अप्य् एक-धर्म-कथन-द्वारेण प्रवर्तमानं सावधारणत्वाच् च शेष-धर्म-प्रतिक्षेप-कार्य् अलीकमापद्यते। ततश् चानन्त-धर्माध्यासित-वस्तु-सन्दर्शकम् एव वचनं यथावस्थितार्थ-प्रतिपादकत्वात् सत्यं॑ न चैवं वचन-प्रवृत्तिर्, घटोऽयं शुक्लो मूर्त इत्य्-आद्य् एकैक-धर्म-प्रतिपादन-निष्ठतया व्यवहारे शब्द-प्रयोग-दर्शनात्, सर्व-धर्माणां यौगपद्येन वक्तुम् अशक्यत्वात्, तद्-अभिधायकानाम् अप्यानन्त्यात्। न चैकैक-धर्म-सन्दर्शकत्वेऽप्य् अमूनि वचनान्य् अलीकानि वक्तुं पार्यन्ते, समस्त-शाब्द-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-अलीकत्वे ततः प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् इति। अत्रोच्यत -- इह तावद् द्वये वस्तु-प्रतिपादका, लौकिकास् तत्त्व-चिन्तकाश् च। तत्र प्रत्यक्षादि-प्रसिद्धम् अर्थम् अर्थित्व-वशाल् लौकिकास् तावन् मध्यस्थ-भावेन व्यवहार-काले व्यपदिश्यन्ति, यद् उत नीलम् उत्पलं सुगन्धि कोमलम् इति, न तु तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-ग्रहण-निराकरणयोराद्रियन्ते,ऽनर्थित्वात्, तावतैव विवक्षित-व्यवहार-परिसमाप्तेः। न च तद्-वचनानाम् अलीकता, शेष-धर्मान्तर-प्रतिक्षेपाभावात्, तत्-प्रतिक्षेप-कारिणाम् एवालीकत्वात्। "सर्वं वचनं सावधारणम्" इति-न्यायात् तेषाम् अपि शेष-धर्म-तिरस्-कार-कारित्व-सिद्धेर् भवन्-नीत्यालीकतापद्यत इति चेन्, न, अवधारणस्य तद्-असम्भव-मात्र-व्यवच्छेदे व्यापाराद्॑ यथानेक-पुरुष-सम्पूर्णे सदसि द्वारादौ स्थितस्य किम् अत्र देवदत्तः समस्ति नास्तीति वा दोलायमान-बुद्धेः केनचिद् अभिधीयते -- यथा देवदत्तोऽस्तीति। अत्र यद्य् अप्य् उपन्यस्त-पद-द्वयस्य सावधारणता गम्यते,ऽन्यथा तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात्, तथाप्य् अवधारणं तद्-असम्भव-मात्रं व्यवच्छिनत्ति, न शेष-पुरुषान्तराणि॑ नापि पर-रूपेण नास्तित्वं, तद्-व्यवच्छेदाभिप्रायेण प्रस्तुत-वाक्य-प्रयोगात्, प्रयोक्त्र्-अभिप्रायादि-सापेक्षतयैव ध्वनेः स्वार्थ-प्रतिपादन-सामर्थ्यात्। न च वाच्य-वाचक-भाव-लक्षण-सम्बन्धानर्थक्यं, तद्-अभावे प्रयोक्त्र्-अभिप्राय-मात्रेण रूपस्यैव नियोक्तुम् अशक्यत्वात्। न च समस्त-धर्म-युक्तम् एव वस्तु प्रतिपादयद् वचनं सत्यम् इत्य् अभिदध्महे, येनैकैक-धर्मालिङ्गित-वस्तु-सन्दर्शकानाम् अलीकता स्यात्, किं तर्हि सम्भवद्-अर्थ-प्रतिपादकं सत्यम् इति, सम्भवन्ति च शेष-धर्माप्रतिक्षेपे वचन-गोचरापन्ना धर्मास्॑ तस्मात् तत्-प्रतिपादकं सत्यम् एव। यदा तु दुर्नय-मताभिनिविष्ट-बुद्धिभिस् तीर्थान्तरीयैस् तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-निराकरणाभिप्रायेणैव सावधारणं तत् प्रयुज्यते, यथानित्यम् एव वस्तु नित्यम् एव वेत्य्-आदि, तदा निरालम्बनत्वाद् अलीकतां प्राप्नुवत् केन वार्येत? तत्त्व-चिन्तकाः पुनः प्रत्यक्षादि-प्रमाण-सिद्धम् अनेकान्तात्मकं वस्तु दर्शयन्तो द्वेधा दर्शयेयुस्, तद् यथा -- विकलादेशेन सकलादेशेन वा। तत्र विकालादेशो नयाधीनः, सकलादेशः प्रमाणायत्तः। तथा हि॒ यदा मध्यस्थ-भावेनार्थित्व-वशात् किञ्चिद् धर्मं प्रतिपिपादयिषवः शेष-धर्म-स्वी-करण-निराकरण-विमुखया धिया वाचं प्रयुञ्जते, तदा तत्त्व-चिन्तका अपि लौकिकवत् सम्मुग्धाकारतयाचक्षते, यद् उत "जीवोऽस्ति कर्ता प्रमाता भोक्तेत्य्-आदि"। अतः सम्पूर्ण-वस्तु-प्रतिपादनाभावाद् विकलादेशोऽभिधीयते, नय-मतेन सम्भवद्-धर्माणां दर्शन-मात्रम् इत्य् अर्थः। यदा तु प्रमाण-व्यापारम् अविकलं परामृश्य प्रतिपादयितुम् अभिप्रयन्ति, तदाङ्गी-कृत-गुण-प्रधान-भावाशेष-धर्म-सूचक-कथञ्चित्-पर्याय-स्याच्-छब्द-भूषितया सावधारणया च वाचा दर्शयन्ति ‘स्याद् अस्त्य् एव जीवऽ॑ इत्य्-आदिकया। अतोऽयं स्याच्-छब्द-संसूचिताभ्यन्तरी-भूतानन्त-धर्मकस्य साक्षाद्-उपन्यस्त-जीव-शब्द-क्रियाभ्यां प्रधनी-कृतात्म-भावस्यावधारण-व्यवच्छिन्न-तद्-असम्भवस्य वस्तुनः सन्दर्शकत्वात् सकलादेश इत्य् उच्यते, प्रमाण-प्रतिपन्न-सम्पूर्णार्थ-कथनम् इति यावत्। तद् उक्तं॒
सा ज्ञेय-विशेष-गतिर् नय-प्रमाणात्मिका भवेत् तत्र ।
सकल-ग्राहि तु मानं विकल-ग्राही नयो ज्ञेयः ॥
[न्या०वि० २९।२९] तद् इदम् उक्तं भवति॒ नय-प्रमाणाभिज्ञः स्याद्-वादी सकल-विकलादेशाव् अधिकृत्य वस्तु-स्वरूप-प्रतिपिपादयिषया यद् यद् ब्रूते तत् तत् सत्यं, सम्भवद्-अर्थ-गोचरत्वात्। दुर्नय-मतावलम्बिनः पुनर् एकान्त-वादिनो यद् यद् आचक्षते तत् तद् अलीकम्, असम्भवद्-अर्थ-विषयत्वाद् इति।
[न्या०वि० ३०।०] साम्प्रतम् अमुम् एवार्थं द्रढयन् सिद्धान्तेऽप्य् एकैक-नय-मत-प्रवृत्तानि सूत्राणि न सम्पूर्णार्थाभिधायकानीत्य्, अपि तु तत्-समुदायाभिप्राय-प्रवृत्तम् अविकल-वस्तु-निवेदकम् इति दर्शयन्न् आह :
नयानाम् एक-निष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुत-वर्त्मनि ।
सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि स्याद्-वाद-श्रुतम् उच्यते ॥ न्यायावतार ३० ॥
[न्या०वि० ३०।१] इह त्रिविधं श्रुतं, तद् यथा -- मिथ्या-श्रुतं नय-श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतं च। तत्र श्रूयत इति श्रुतम् आगमः। मिथ्यालीकं श्रुतं मिथ्या-श्रुतं, तच् च दुर्नयाभिप्राय-प्रवृत्तं तीर्थिक-सम्बन्धि, निर्गोचरत्वात्। तथा नयैर् हेतु-भूतैः श्रुतं नय-श्रुतम्, एतच् चार्हद्-आगमान्तर्-गतम् एवैक-नयाभिप्राय-प्रतिबद्धं, यथा "पडुप्पण्णे नेरïë विणस्सï" इत्य्-आद्य्, ऋजुसूत्र-नयाभिप्रायेण क्षणिकत्वस्यापि तत्र सम्भवात्। तथा निर्दिश्यमान-धर्म-व्यतिरिक्ताशेष-धर्मान्तर-संसूचकेन स्याता युक्तो वादोऽभिप्रेत-धर्म-वचनं स्याद्-वादः, तद्-आत्मकं श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतम्। तत् किं-भूतम् उच्यत इत्य् आह : सम्पूर्णोऽविकलः स चासाव् अर्थश् च तद्-विनिश्चायि तन्-निर्णय-हेतुत्वाद् एवम् अभिधीयते॑ परमार्थतः पुनः समस्त-वस्तु-स्वरूप-प्रतिपादीत्य् अर्थः, शब्दात्मकत्वान्, निश्चयस्य बोध-रूपत्वाद् इति। नय-श्रुतं तर्हि सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि कस्मान् न भवतीत्य् आह : नयानां नैगमादीनाम् एक-निष्ट्ःानाम् एक-धर्म-ग्रहण-पर्यवसितानां श्रुत-वर्त्मन्य् आगम-मार्गे प्रवृत्तेः प्रवर्तनान् न तद् एकैकाभिप्राय-प्रतिबद्धं सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि, तत्-समुदायस्यैव सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायकत्वाद् इत्य्-आकूटम्।
[न्या०वि० ३१।०] तद् एवं नय-प्रमाण-स्वरूपं प्रतिपाद्याधुनाशेष-नय-प्रमाण-व्यापकं तेषां तत्र तादात्म्येनावस्थानात् प्रमातारम् अभिधातुकाम आह :
प्रमाता स्वान्य-निर्भासी कर्ता भोक्ता विवृत्तिमान् ।
स्व-संवेदन-संसिद्धो जीवः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः ॥ न्यायावतार ३१ ॥
[न्या०वि० ३१।१] तत्र त्रि-काल-जीवनाज् जीवः, प्राण-धारक आत्मेत्य् अर्थः, स प्रमिणोतीति प्रमाता प्रमेय-परिच्छेदकः। किं-भूतः सन्न् इत्य् आह : स्वान्याव् आत्म-परौ निर्भासितुम् उद्द्योतयितुं शीलम् अस्येति स्वान्य-निर्भासी, स्व-स्वरूपार्थयोः प्रकाशक इति यावत्। तथा करोतीति कर्ता, भुङ्क्त इति भोक्ता, विवर्तनम् अपरापर-पर्यायेषु गमनं विवृत्तिः परिणामः, सा विद्यते यस्येति विवृत्तिमान्। स्व आत्मा संवेद्यतेऽनेनेति स्व-संवेदनं तेन सम्यक् सिद्धः प्रतिष्ठितः प्रतीतो वा स्व-संवेदन-संसिद्धः। क्षितिः पृथिव्य् आदिर् येषां तानि क्षित्य्-आदीन्य्, आदि-शब्दाद् अम्बु-तेजो-वाय्व्-आकाशानि गृह्यन्ते॑ न विद्यत आत्मा स्वरूपम् अस्येत्य् अनात्मकः, किं स्व-स्वरूपापेक्षया? न, क्षित्य्-आदीनाम् अनात्मकः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः, क्षित्य्-आदि-स्वरूपो न भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ३१।२] तत्र जीवः प्रमातेत्य्-अनेन ये पारमार्थिकं प्रमातारं नाभ्युपगच्छन्त्य्, अपि तु विज्ञान-क्षण-परम्परानुभव-बल-प्रबोधितानादि-प्ररूढ-वासना-सम्पादित-सत्ताकं मिथ्या-विकल्प-परिकल्पितम् अपारमार्थिकं तं मन्यन्ते प्रतिक्षण-विलय-वादिनः तान् निराचष्टे, क्षण-विलयस्य प्राग् एव प्रतिषिद्धत्वाद्, बहिर् अन्तश् च परिणामि-वस्तुनः प्रसाधनात्।
[न्या०वि० ३१।३] ननु च घटादयस् तावद् विनाशम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तेषां च विनाशो लकुटादि-कारण-कलापेनाविनश्वर-स्वभावानां वा क्रियेत, विनश्वर-स्वभावानां वा। यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, स्वभावस्य प्रच्यावयितुम् अशक्यत्वात्, तस्य नियत-रूपत्वाद्, अन्यथा स्वभावत्वायोगात्। अथैवं-भूत एव तस्य स्वभावः स्व-कारण-बलायातो यद् उत विनाश-कारणम् आसाद्य विनङ्क्ष्यतीति ब्रूषे, तथापि तद्-विनाश-कारण-सन्निधानं किं यादृच्छिकम् उत तत्-स्वभाव-सम्पाद्यम् एव। यदाद्यः कल्पस्, तदा सन्निहितस्यापि तत्-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपातेन निवर्तनात्, तत्-सन्निधापक-हेतूनां अपि स्व-सन्निधापक-कारण-कलाप-सापेक्षत्वात्, सन्निहितानाम् अपि प्रतिद्वन्द्विना निवर्तनाद्, यादृच्छिकत्वाच् च नावश्यं-भावि तत्-सन्निधानं॑ ततश् चासन्निहित-स्व-विनाश-कारण-कदम्बकः कश्चिद् घटादिर् न विनश्येद् अप्य्, अनिष्टं चैतत्, सर्व-कृतकानां विनाशाविगानात्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तथा सति पश्चाद् अपि तद्-बलाद् विनाश-हेतवः सन्निधास्यन्तीति प्रथम-क्षण एव सन्निदधतु, तथापि क्षणिकतैवार्थस्य। स्व-हेतोर् एव नियत-कालात् परतोऽयं स्व-विनाश-हेतुं सन्निधापयिष्यतीत्य् एवं-रूपो जात इति चेन्, नैवम् अपि क्षण-भङ्गुरतायाता। तथा हि॒ स्व-हेतुना किलासौ वर्षात् परतः स्व-विनाश-हेतु-सन्निधापन-क्षम-स्वभावो व्यधायि॑ स च तस्योत्पाद-क्षणाद् द्वितीय-क्षणे स्वभावोऽस्ति वा न वा? अस्ति चेत्, तथा सति पुनर् वर्षं तेन स्थातव्यम्, एवं यावद् वर्षोपान्त्य-क्षणेऽपि यदि तत्-स्वभाव एवासौ तदापरम् अपि वर्षान्तरं स्थितिर् आपद्येत, तदा चानन्त-कल्प-स्थायी-भावः स्याद्, अप्रच्युत-वर्ष-स्थायि-स्वभावत्वाद् इति। अथ द्वितीय-क्षणे नास्ति स स्वभाव इति ब्रूषे, हन्त क्षणिकत्वम् एवाढौकते,ऽतादवस्थ्यस्य तल्-लक्षणत्वात्। किं च, विनाश-हेतुर् भावस्य विनाशं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा कुर्यात्? व्यतिरिक्त-करणे न किञ्चित् कृतं स्यात्, ततश् च भावस् तादवस्थ्यम् अनुभवेत्। तत्-सम्बन्धः क्रियत इति चेन्, न सम्बन्धस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-व्यतिरिक्तस्य प्रतिषेधात्। न चानयोर् अन्यतरः सम्बन्धोऽत्र समस्ति, व्यतिरेकिणा सार्द्धं तादात्म्यायोगाद्, अन्य-हेतुकस्य पश्चाद् उत्पन्नस्य तद्-उत्पत्ति-वैकल्यात्। तन् न व्यतिरिक्तो विनाशः कर्तुं युक्तः। अव्यतिरिक्त-करणे पुनस् तम् एव भावं विनाश-हेतुः करोतीति प्राप्तम्, अव्यतिरेकस्य तद्-रूपता-लक्षणत्वात्। न चासौ कर्तव्यः, स्व-हेतोर् एव निष्पन्नत्वात्, तत्-करणे च तस्यावस्थानम् एव स्यान्, न प्रलयः। तन् नाविनश्वर-स्वभावानां पश्चात् कथञ्चिद् अपि विनाशः कर्तुं शक्यो, विनश्वर-स्वभावानां पुनः स्व-हेतु-बलायातत्वात् प्राग् अपि प्रतिक्षण-भावी, न कारणान्तरापेक्षः, स्वभावस्य नियत-रूपत्वात्॑ तस्मात् प्राणित्य् अद्यापि प्रतिक्षण-विलय इति।
[न्या०वि० ३१।४] अत्रोच्यते -- सत्यम् एतत्, किं तु यथा विनाश-कारणायोगात् प्रतिक्षण-भावी विनाशो भवद्भिः प्रतिपद्यते, तथैव स्थित्य्-उत्पत्ती प्रतिक्षण-भाविन्यौ किं न प्रतिपद्येते, तद्-धेतूनाम् अपि विचार्यमाणानाम् अयोगात्। तथा हि॒ स्थिति-हेतुना तावत् स्वयम् अस्थिर-स्वभावा भावाः स्थाप्येरन् स्थिर-स्वभावा वा? न तावत् प्रथमः पक्षः क्षोदं क्षमते, स्वभावस्यान्यथा कर्तुम् अशक्यत्वात्, तस्य प्रतिनियत-रूपत्वाच्, चेतनाचेतन-स्वभाववद्, अन्यथा स्वभावता-हानेः। द्वितीय-पक्षे पुनः स्वयं स्थिर-स्वभावानां किं स्थिति-हेतुना? स्थितिर् नेष्यत एव, तेनानभ्युपगतोपालम्भ एवायम् इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, एवं हि भावाः क्षण-मात्रम् अपि न तिष्ठेयुः। क्षण-भाविनीष्यत एवेति चेत्, सा तर्ह्य् अस्थिति-स्वभावानां हेतु-शतैर् अपि कर्तुं न पार्यत इति ब्रूमः, तत्-स्वभावत्वे पुनर् हेतु-व्यापार-नैरर्थक्यात्। अहेतुका सती सकल-कालं भवतीति दत्तो जलाञ्जलिः प्रतिक्षण-विलयस्य। तथोत्पाद-हेतुर् अपि तत्-स्वभावस्योत्पत्तिं विदध्याद् अतत्-स्वभावस्य वा? न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-कर्तुं युक्तः, स्वयम् उत्पादकस्योत्पादने व्याप्रियमाणो हि हेतुः पिष्टं पिनष्टि, शङ्खं धवलयति, तद्-अभावेऽपि स्व-योग्यतयोत्पत्तेः। नापि द्वितीयः कल्पोऽङ्गी-करणार्हः, स्वयम् अनुत्पत्ति-धर्मकस्योत्पादयितुम् अशक्यत्वाद्, अन्यथा शश-विषाणादयोऽप्य् उत्पाद्य-कोटिम् अध्यासीरन्, विशेषाभावात्॑ ततश् च न कश्चिद् अत्यन्ताभावः स्यात्। तद् यथा निर्हेतुकत्वान् नाशः प्रतिक्षण-भावी, तथैव दर्शित-युक्तेः स्थित्य्-उत्पत्ती अपीति त्रयाक्रान्तं सकलं वस्तु जातम् अभ्युपगन्तव्यं॑ तथा सति जीवोऽपि जीवत्व-चैतन्य-द्रव्यत्वादिभिः स्थेमानं आबिभ्राण एव हर्ष-विषादादिभिर् अपरापरार्थ-ग्रहण-परिणामैश् चोत्पाद-व्यय-धर्मकः पारमार्थिकः प्रमातेति बलात् सिद्धिम् अध्यास्ते।
[न्या०वि० ३१।५] ननु च यद्य् उत्पाद-व्यय-स्थितीनां निर्हेतुकत्वात् सकल-काल-भाविता भवद्भिः साध्यते, तदान्वय-व्यतिरेकाभ्यां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धः खल्व् अयं तत्-कारण-कलाप-व्यापारः कथं नेयः? न चायम् अपह्नोतुं शक्यः! तथा हि॒ कुलालादि-कारण-व्रात-व्यापारे घटादयः समुपलभ्यन्ते, तद्-अभावे च नोपलम्भ्यन्त इति तज्-जन्या इत्य् उच्यन्ते। स्थितिर् अपि विनाश-कारण-सन्निधानात् प्राक् तद्-बलाद् एव, तथा नाशोऽपि मुद्गरादि-सन्निधानासन्निधानाभ्यां सद्-असत्ताम् अनुभवंस् तत्-कृतः प्रतीयते, नाहेतुकः। तत् कथम् एतद् इति?
[न्या०वि० ३१।६] अत्रोच्यते -- न वयं सर्वथा हेतूनां व्यापारं वारयामः, किं तर्हि स्वयम् उत्पाद-व्यय-स्थित्य्-आत्मना विवर्तमानस्य द्रव्यस्य हेतवस् तद्-विशेष-करणे व्यापारम् अनुभवन्ति, तेनैव सार्द्धं तेषाम् अन्वय-व्यतिरेकानुकरण-दर्शनाद्, दृष्टस्य चापह्नवेऽस्माकम् अप्रवृत्तत्वात्, प्रतीति-युक्ति-लक्षण-द्वय-पक्ष-पातित्वात्॑ केवलं प्रतीति-विकलां युक्तिं युक्ति-विनाकृतां वा प्रतीतिं नाङ्गी-कुर्महे,ऽसम्भवद्-अर्थ-गोचरतया निरालम्बनत्वात् तस्या इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।७] स्वान्य-निर्भासीत्य्-अनेन प्राग्-उक्त-स्व-पराभासि-प्रमाण-विशेषणवन् मीमांसकान् परोक्ष-बुद्धि-वादिनो योगाचारांश् च ज्ञान-मात्र-वादिनः प्रतिक्षिपति, ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदेन तद्-उक्त-न्यायाविशेषाद् इति।
[न्या०वि० ३१।८] कर्ता भोक्तेइति विशेषण-द्वयेन सांख्य-मतं विकुट्टयति, कर्ता सन् भोक्तापीति काक्वोपन्यासाद्, अकर्तुर् भोगानुपपत्तेर्, भुजि-क्रिया-निर्वर्तन-समर्थस्यैव भोक्तृत्वात्। जपा-कुसुमादि-सन्निधान-वशात् स्फटिके रक्ततादि-व्यपदेशवद् अकर्तुर् अपि प्रकृत्य्-उपधान-वशात् सुख-दुःखादि-भोग-व्यपदेशो युक्तस्॑ तथा हि॒ प्रकृति-विकार-दर्पणाकार-बुद्धि-सङ्क्रान्तानां सुख-दुःखाद्य्-आत्मकानाम् अर्थानां पुरुषः सन्निधान-मात्रेण भोजको व्यपदिश्यते, "बुद्ध्य्-अध्यवसितम् अर्थं पुरुषश् चेतयत" इति-वचनाद् इति चेन्, न, कथञ्चित् सक्रियाकता-व्यतिरेकेण प्रकृत्य्-उपधानेऽप्य् अन्यथात्वानुपपत्तेर्, अप्रच्युत-प्राचीन-रूपस्य व्यपदेशानर्हत्वात्, तत्-प्रच्यवे च प्राक्तन-रूप-त्यागेनोत्तर-रूपाध्यासितया सक्रियत्वम् आपततीति-न्यायात्॑ स्फटिक-दृष्टान्तेऽपि जपा-कुसुमादि-सन्निधानाद् अन्धोपलादौ रक्ततानाविर्-भवन्ती तत्र पुनर् आविर्-भवन्ती तस्य तथा-विधं परिणामं लक्षयत्य्, अन्यथान्धोपलवत् तत्रापि न प्रादुःष्यात्। तन् नाक्रियस्य भोक्तृतोपपद्यत इति।
[न्या०वि० ३१।९] विवृत्तिमान् इत्य्-अमुना त्व् एकान्त-नित्यम् अपरिणामिनं नैयायिक-वैशेषिकादि-प्रकल्पितं प्रमातारं निरस्यति, सर्वथाविचलित-रूपस्यार्थ-ग्रहण-परिणामानुपपत्तेः। व्यतिरिक्त-ज्ञान-समवायाद् एकान्त-नित्योऽपि प्रमिणोतीति चेन्, न, समवायस्य प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्, सम्बन्धान्तरस्य च व्यतिरेकिणा साकम् अनुपपत्तेर्, अन्यत्रान्यथानुपपन्नत्वात्। न च व्यतिरेकिणि ज्ञाने तत् समस्ति, तद्-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, अव्यतिरेकानुभवस्य च तद्-बाधकत्वात्। किं च, यदि समवाय-बलाद् आत्मनि ज्ञानं समवैति, तदात्मनां समवायस्य च विभुत्वाद् एक-रूपत्वाच् च सर्वात्मसु किं न समवैति, विशेषाभावात्? तथा च देवदत्त-ज्टानेन यज्टदत्तादयोऽप्य् अर्थ-तत्त्वं बुद्ध्येरन्। अन्यच् च विज्टानोदय-समयेऽपि यादृशः प्राग्-अवस्थायां तादृश एव सन्तिष्ठमानः प्राग् अप्रमाता पश्चात् प्रमातेति ब्रुवाणः खल्ûन्मत्तताम् आत्मन्य् आविर्-भावयति, नापरम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।१०] पश्चार्द्धेन पुनर् भूत-व्यतिरेकिणं स्व-संवेदन-प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्यं जीवं दर्शयंश् चार्वाक-दर्शनं तिरस्-कुरुते, जडात्मक-भूताव्यतिरेके हि तद्-विलक्षण-बोध-रूप-हर्ष-विषादादि-विवर्तानुभवाभाव-प्रसङ्गात्। ननु च कायाकार-परिणतानि भूतान्य् एवात्म-व्यतिरेकिणीं चेतनाम् उत्कालयन्ति॑ सा च तथा-विध-परिणाम-परिणतेषु तेषु सन्तिष्ठते, तद्-अभावे पुनस् तेष्व् एव निलीयत इति॑ तद्-व्यतिरेकानुभवेऽपि न पर-लोक-यायि-जीव-सिद्धिर्, इयतैव दृष्ट-व्यवहारोपपत्तेः। नैतद् अस्ति, द्वयं हि तावद् एतत् संयोगम् अनुभवद् उपलबभ्यते -- पट्च-भूतात्मकं शरीरं चेतना च। तत्रापि शरीरं बहिर्-मुखाकारेण बोधेनार्थ-रूपतया जडम् अनुभूयते, चेतना पुनर् अन्तर्-मुखाकारेण स्व-संवेदन-प्रत्यक्षेण साक्षात्-क्रियते॑ऽत एवाव्यतिरेक-पक्षः प्रतिभास-निराकृतत्वान् नाशङ्कितः। व्यतिरेकिणोः पुनः प्रकाशमानयोर् यदि भूतान्य् एव चेतनाम् उत्कालयन्तीति भवद्भिः परिकल्प्यते, तदा चेतनैव भवान्तराद् उत्पत्ति-स्थानमायाता पट्च-भूत-भ्रान्ति-जनकं शरीरं निर्वर्तयेत्, पुनर् भवान्तरं यातुकामा मुट्चेत्, तत् तयाधिष्ठितं गमनादि-चेष्टां कुर्यात्, तद्-वियुक्तं पुनः काष्ठवत् तिष्ठेद् इति जीव-सम्पाद्यम् एव शरीरं, न पुनर् असौ तत्-सम्पाद्य इत्य्, एतत् परिकल्पनं युक्ततरं पश्यामः, जीवस्य चेतनावतः सकर्मकतयापरापर-भव-भ्रमणापरापर-शरीर-निर्वर्तनयोर् उपपद्यमानत्वात्। भवान्तराद् आगच्छन् उत्पत्ति-स्थानं जीवोऽध्यक्षेण नोपलभ्यत इति चेद्, भूतान्य् अपि तर्हि कायाकार-धारण-द्वारेण चेतनाम् उत्कालयन्तीति प्रत्यक्षेण नोपलक्ष्यन्त इति समानो न्याहः। अथ कायाकार-परिणतेष्व् एव भूतेषु चेतनोपलभ्यते, नान्यदेत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशात् तज्-जन्येति परिकल्प्यत, एवं तर्हि मृतावस्थायां कायाकारम् आबिभ्राणेष्व् अपि नोपलब्धा, कायाकार-परिणामो वा कादाचित्कतया हेत्व्-अन्तरापेक्षीत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशाद् एव तन्-निर्वर्तन-क्षमा चेतना भवान्तरागत-जीव-सम्बन्धिनीति प्रतिपद्यामहे। किं च, जीवस् तावत् कर्म-चैतन्य-सम्बन्धाच् छरीर-निर्वर्तनार्थं प्रवरत इति युक्तम् एवैतद्, भूतानि पुनः किं-भूतानि चेतना-करणे प्रवर्तेरन्॒ सचेतनानि निश्चेतनानि वा? यद्य् आद्यः कल्पस्, ततो विकल्प-युगलम् अवतरति॒ तच् चैतन्यं तेभ्यो भिन्नम् अभिन्नम् वा? यदि भिन्नं, तदा पुरुष-शरीरवत् तत्रापि भूतैः सह वर्तमानम् अपि भूत-विलक्षणम् आत्म-कारणम् अनुमापयतीति तद्-अवस्थैव जीव-सिद्धिः। अथाभिन्नं, तथा सति समस्त-भूतानाम् ऐक्यं प्रसजत्य्, एक-चैतन्याव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। निज-निज-चैतन्याव्यतिरेकीणि भूतानि तेनायम् अदोष इति चेन्, न, तत्-सम्पाद्य-पुरुष-शरीरेऽपि तज्-जन्य-पञ्च-चैतन्य-प्रसङ्गात्। पञ्चापि सम्भूय बृहत्-पुरुष-चैतन्यं बहवस् तिला इव तैल-घटं जनयन्तीति चेत्, तत् तर्हि पुरुष-चैतन्यं किं तेषाम् एव संयोगो यद् वा तद्-उत्पाद्यम्, अन्यद् एव? यद्य् आध्यः कल्पस्, तद् अयुक्तं, चैतन्यानां परस्परं मिश्रणाभावेन संयोग-विरोधाद्, इतरथा बहु-पुरुष-चैतन्यानि सम्भूय बृहत्तम-चैतन्यान्तरम् आरभेरन्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तत्रापि तेषां किम् अन्वयोऽस्ति नास्ति वा? यद्य् अस्ति, तद् अयुक्तं, प्राग्वत् तज्-जन्य-चैतन्य-पञ्च-रूपतापत्तेः। अथ नास्ति, तद् अप्य् अचारु, निरन्वयोत्पादस्य प्रमाण-बाधितत्वात्। तन् न सचेतनानि भूतानि चेतना-करणे व्यापार-भाञ्जि भवितुम् अर्हन्ति। नापि निश्चेतनानि, तेषाम् अत्यन्त-विलक्षणतया चैतन्योत्पाद-विरोधाद्, इतरथा सिकतादयस् तैलादि-करणे व्याप्रियेरन्। किं च, तत्-समुदाय-मात्र-साध्यं वा चैतन्यं स्याद् विशिष्ट-तत्-परिणाम-साध्यं वा। न तावद् आद्या कॢप्तिर्, इला-जलानलानिल-नभस्-तल-मीलनेऽपि चेतनानुपलब्धेः। द्वितीय-विकॢप्तौ पुनः किं तद् वैशिष्ट्यम् इति वाच्यम्। कायाकार-परिणाम इति चेत्, स तर्हि सर्वदा कस्मान् न भवति? कुतश्चिद् धेत्व्-अन्तरापेक्षणाद् इति चेत्, तत् तर्हि हेत्व्-अन्तरं भवान्तरायात-जीव-चैतन्यम् इत्य् अनुमिमीमहे, तस्यैव कायाकार-परिणाम-साध्य-चैतन्यानुरूपोपादान-कारणत्वात्, तद्-विरहे कायाकार-परिणाम-सद्भावेऽपि मृतावस्थायां तद्-अभावाद् गमनादि-चेष्टानुपलब्धेः॑ तन् न कायाकार-परिणाम-जन्यं चैतन्यम्, अपि तु स एव तज्-जन्य इति युक्तं पश्यामः। न प्रत्यक्षाद् अन्यत् प्रमाणम् अस्ति, न च तेन पर-लोक-गमनागमनादिकं चैतन्यस्योपलक्ष्यते, तेन दृष्टान्य् एव भूतानि तत्-कारणतया कल्पनीयानीति चेन्, न, केवल-प्रत्यक्ष-प्रतिक्षेपेण प्रमाणान्तराणां प्राग् एव प्रसाधितत्वात्, तथा च भूयांस्य् अनुमानानि पर-लोकानुयायि-जीव-साधकानि प्रवर्तेरन्। तद् यथा -- तद्-अहर्-जात-बालकस्याद्य-स्तनाभिलाषः पूर्वाभिलाष-पूर्वको,ऽभिलाषत्वाद्, द्वितीय-दिवसादि-स्तनाभिलाषवत्। तद् इदम् अनुमानम् आद्य-स्तनाभिलाषस्याभिलाषान्तर-पूर्वकत्वम् अनुमापयद् अर्थापत्त्या पर-लोक-यायि-जीवमाक्षिपति, तज्-जन्मन्य् अभिलाषान्तराभावात्। एवम् अन्यद् अप्य् उदाहार्यम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।११] तद् अयं स्व-पर-प्रकाशकः कर्ता भोक्ता नित्यानित्यात्मको भूत-विलक्षणः साक्षात्-कृत-कतिचिन्-निज-पर्यायानुमितानाद्य्-अनन्त-काल-भावि-निजानन्त-पर्याय-विवर्तः प्रमाण-प्रतिष्ठितः पारमार्थिको जीवः सकल-नय-प्रमाण-व्यापकः प्रमातेति स्थितम्।
[न्या०वि० ३२।०] साम्प्रतं पर्यन्त-श्लोकेन प्रकरणार्थम् उपसंहरन्न् आह :
प्रमाणादि-व्यवस्थेयम् अनादि-निधनात्मिका ।
सर्व-संव्यवहर्त्ःणां प्रसिद्धापि प्रकीर्तिता ॥ न्यायावतार ३२ ॥
[न्या०वि० ३२।१] प्रमाणानि प्रत्यक्षादीन्य्॑ आदि-शब्दान् नय-परिग्रहस्, तेषां व्यवस्था प्रतिनियत-लक्षणादि-रूपा मर्यादा, सेयम् अनन्तरोक्त-स्थित्या प्रकीर्तितेति संसर्गः। किं-भूतेत्य् आह : आदिः प्रभवो, निधनं पर्यन्तो, न विद्येते आदि-निधने यस्यासौ तथा-विध आत्मा स्वरूपं यस्याः सानादि-निधनात्मिका॑ सर्व-संव्यवर्त्ःणां लौकिक-तीर्थिकादि-भेद-भिन्न-समस्त-व्यवहारवतां प्रसिद्धापि रूढापि, तद्-अप्रसिद्धौ निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च विचारानुत्थाने न कस्यचित् तत्त्वस्य प्रतिष्ठितिः। प्रकीर्तिता संशब्दिताव्युत्पन्न-विप्रतिपन्न-व्यामोहापोहायेति गम्यते॑ प्रमाण-प्रसिद्धेऽप्य् अर्थे प्रबलावरण-कुदर्शन-वासनादितः केषाञ्चिद् अनध्यवसाय-विपर्यास-रूप-व्यामोह-सद्भावात्, तद्-अपनोदार्थं च सति सामर्थ्ये करुणावतां प्रवृत्तेर् इति।
स्याद्-वाद-केसरि-सुभीषण-नाद-भीतेर् उत्त्रस्त-लोल-नयनान् प्रपलायमानान् ।
हेतुर् नयाश्रित-कुतीर्थि-मृगान् अनन्यत्राणान् विहाय जिनम् एति तम् आश्रयध्वं ॥ न्या०वि० ३२।१॒१ ॥
भक्तिर् मया भगवति प्रकटी-कृतेयं तच्-छासनांश-कथनान् न मतिः स्वकीया ।
मोहाद् अतो यद् इह किञ्चिद् अभूद् असाधु तत् साधवः कृत-कृपा मयि शोधयन्तु ॥ न्या०वि० ३२।१॒२ ॥
न्यायावतार-विवृतिं विविधां विधित्सोः सिद्धः शुभो य इह पुण्य-चयस् ततो मे । नित्यं परार्थ-करणोद्यतम् आ भवान्ताद् भूयाज् जिनेन्द्र-मत-लम्पटम् एव चेतः ॥ न्या०वि० ३२।१॒३ ॥
इति न्यायावतार-विवृतिः समाप्ता ॥
कृतिर् इयम् आचार्य-सिद्ध-व्याख्यानिकस्य तर्क-प्रकरण-वृत्तेर् इति।
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==स्रोतः ==
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[न्या०वि० १।१७] इति-वचनात्, तद् अयुक्तम्, यतः प्रमाणाभावः कथं ग्राह्यः? तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावाद् इति चेत्, तस्याप्य् अभाव-ग्रहणे तद्-ग्राहक-प्रमाणान्तराभावो ग्राह्य इत्य् अनवस्था। अथ अर्थाभावात् प्रमाणस्य प्रमाणाभावाच् चार्थस्याभावः प्रतिपद्येत इति मन्येथास्, तद् एतद् इतरेतराश्रयं दुर्घटम् आपद्येत॒ न यावद् अर्थाभावोऽगृहीतस् तावत् प्रमाणाभावः सिध्यत्य्, अर्थाभावश् च प्रमाणाभावात् सेत्स्यतीत्य् आवर्तनात्। अथेन्द्रियवत् स्वयम् अविज्ञातोऽपि प्रमाणाभावोऽर्थाभावं ज्ञापयिष्यतीत्य् अभिदधीथास्, तद् अयुक्तम्, तस्य तुच्छतया सकल-शक्ति-विरह-लक्षणत्वाद्, इन्द्रियस्य तु तद्-विपर्यस्ततया ज्ञानोत्पादन-दक्षत्वात्। तस्मात् प्रत्यक्षम् एवम् भू-तलादि-प्रतिनियत-वस्तु-ग्राहितां बिभर्ति, यदि तद्-विपरीत-घटादि-प्रतियोगि-वस्त्व्-अन्तर-वैविक्त्यं तस्याकलयति नान्यथा, विजातीय-व्यवच्छेदाभावे तस्यैव प्रतिनियतत्वासिद्धेः, सकल-सङ्कीर्णतया ग्रहण-प्रसङ्गात्। अतोऽधिक-ग्राह्याभावान् निर्विषयतयाभावाख्यं प्रमाणं यत् परैः पर्यकल्पि तद् अप्रमाणम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० १।१८] द्विधेत्य् अस्मिन् सत्य् अपि प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति नियत-द्वैविध्य-प्रदर्शनेन सौगत-परिकल्पितं ‘प्रत्यक्षम् अनुमानं चेतिऽ॑ द्वैविध्यम् अपक्षिपति, तद्-आकूतेन तस्यायोगात्। प्रत्यक्षातिरिक्तं हि तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धोपलक्षित-कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-सम्पादित-जन्मकम् अनुमानम् एव प्रमाणं, न शाब्दोहादिकं, सम्बन्ध-विकलत्वाद् इति तद्-आकूतम्। अयुक्तं चैतत्, प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त-प्रमाणान्तराभाव-ग्रहणोपायाभावात्। न तावत् प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तराभावावगतिस्, तस्य स्वलक्षण-विषयत्वेनाभाव-ग्राहिता-विरोधात्। नापि स्वभाव-कार्यानुमानाभ्यां, तयोर् वस्तु-साधकत्वात्। नाप्य् अनुपलब्धेस्, तस्या अप्य् अत्यन्ताभाव-साधन-विरोधात्। सा हि चतुर्-विधा वर्ण्यते मूल-भेदापेक्षया, तद् यथा -- विरुद्धोपलब्धिर् विरुद्ध-कार्योपलब्धिः कारणानुपलब्धिः स्वभावानुपलब्धिश् चेति। न तावद् विरुद्धोपलब्धेः प्रमाणान्तरस्यात्यन्ताभावो, दृश्यात्मनो विरुद्धस्य विधानेनेतराभाव-साधनात्, सन्निहित-देश एव प्रतियोग्य्-अभाव-सिद्धेः। एतेन विरुद्ध-कार्योपलब्धिर् अपि व्याख्याता, तस्या अपि प्रतिषेध्य-विरोधि-सन्निधापन-द्वारेणाभाव-साधकत्वात्। कारणानुपलब्धिर् अपि तद्-देशाशङ्कित-कार्यस्यैवाभावं साधयति न सर्वत्र, स्वयम् असिद्धत्वात्। स्वभावानुपलब्धिर् अप्य् एक-ज्ञान-संसर्गि-पदार्थोपलम्भ-रूपा तद्-देश एव प्रतिद्वन्द्व्य्-अभावं गमयति। अतः प्रमाणान्तरस्यापि क्वचिन् निषेधः स्यान्, न सर्वत्र। तन् न प्रमाणान्तर-बाधकं समस्ति।
[न्या०वि० १।१९] प्रत्यक्षानुमानयोश् च प्रामाण्यं कुत इति चिन्त्यम्। न तावत् प्रत्यक्षात्, तस्य निर्विकल्पकतया सतोऽप्य् असत्-कल्पत्वात्। तत्-पृष्ठ-भावी विकल्पस् तु न स्वलक्षणाम्भोधि-मध्यम् अवगाहते॑ तत् कथं तत्राप्रविष्टस् तत्-स्वरूपं निश्चिनुयात्। अप्रमाण-भूताच् च तस्मात् प्रामाण्य-निर्णय इति निबिड-जडिमाविष्करणं भवताम्। अनुमानात् प्रामाण्य-निर्णय इति चेन्, न, तस्यापि स्वलक्षणाद् बहिः प्लवनात्। अप्रामाण्य-व्यवच्छेदस् तेन साध्यत इति चेन्, न, व्यवच्छेदस्य व्यवच्छिन्नाव्यतिरेकाद्, इतरथान्धकार-नर्तन-कल्पम् अनुमानम् आसज्येत, निर्विषयत्वात्। किं च, तत्-प्रामाण्य-निर्णायकम् अनुमानं प्रमाणम् अप्रमाणं वा? न तावद् अप्रमाणम्, ततः प्रामाण्यासिद्धेः। नापि प्रमाणं, तत्-प्रामाण्य-साधकाभावात्। न हि प्रत्यक्षात् तत्-सिद्धिर्, विकल्प-शून्यतयाकिञ्चित्-करत्वाद् इत्य् उक्तम्। अनुमानात् तु तत्-साधने विकल्प-युगलं तद्-अवस्थम् एवावतिष्ठेत, तत्-प्रामाण्य-साधनेऽप्य् अनुमान-कल्पनेत्य् अनवस्था। किं च, गृहीत-सम्बन्धस्यानुमानं प्रवर्तेत, सम्बन्धस् त्रि-काल-गोचरो ग्राह्यो, न च प्रत्यक्षं तं लक्षयितुं क्षमते, पूर्वापर-क्षण-त्रुटित-रूप-वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-पर्यवसित-सत्ताकत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविनो विकल्पस्यापि व्यावहारिकाभिप्रायेण तन्-निष्ठताभ्युपगमात्। अनुमानाद् ग्रहीष्यतीति चेन् ननु तद् अपि सम्बन्ध-पूर्वकं प्रवर्तेत, तद्-ग्रहणेऽपीयं वार्तेत्य् अनवस्था। तस्माद् अनुमानम् अभिलषता गत्य्-अन्तराभावात् तत्-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवणस् त्रि-काल-गोचरोऽव्यभिचारी वितर्कोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा च प्रस्तुत-तद्-द्वैविध्यस्य विघटितत्वाद्, अन्यद् अपि यद् एवं-विधम् अविसंवादि ज्ञानं तत् प्रमाणम् अस्त्व् इत्य् अलं शुष्काभिमानेनेति। यदि पुनः साध्यार्थान्यथानुपपन्न-हेतु-सम्पादितम् अनुमानम् इष्येत, तदा प्रत्यक्षम् अनुमानं चेत्य् अपि द्वैविध्यं घटाम् अटेद् एव॑ प्रत्यक्ष-व्यतिरिक्त-ज्ञानस्य सामस्त्येनानुमानेऽन्तर्-भाव-सम्भवात्, अन्यथानुपपन्नार्थान्तरम् अन्तरेण परोक्षार्थ-विषय-प्रतीतेर् अभावाद् इति।
[न्या०वि० १।२०] साम्प्रतम् अन्यथा सूत्रावयवेनैव प्रकृत-नियम-कारणम् आह : मेय-विनिश्चयाद् इति द्विधैवेति च काकाक्षि-गोलक-न्यायेनात्रापि सम्बन्धनीयम्। ततश् चायम् अर्थो॒ द्वाभ्याम् एव प्रकाराभ्यां मेयस्य ग्राह्यार्थस्य विनिश्चयात् स्वरूप-निर्णयाद्॑ द्वे एव यथोक्ते प्रमाणे न न्यूनम् अधिकं चेति। अयम् अत्राभिप्रायः॒ स्व-संवेदनं प्रति निखिल-ज्ञानानाम् एक-रूपतया साक्षात्-करण-चतुरत्वान् नास्त्य् एव भेदः॑ बहिर्-अर्थं पुनर् अपेक्ष्य कश्चिच् चक्षुरादि-सामग्री-बल-लब्ध-सत्ताकः स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं सन्निहितं विशद-निर्भासं सामान्यम् आकारं साक्षात्-कुर्वाणः प्रकाशः प्रथते, तत्र प्रत्यक्ष-व्यवहारः प्रवर्तते। यः पुनर् लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण नियतानियत-सामान्याकारावलोकी परिस्फुटता-रहितः खल्व् आत्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणामः समुल्लसति स परोक्षतां स्वी-करोति। न चैतौ प्रकारौ विहाय प्रकारान्तरेण ज्ञान-प्रवृत्तिं पश्यामो, न चापश्यन्तः प्रमाणान्तर-परिकल्पनं क्षमामहे, न च द्वयोः प्रथमानयोर् एकं निह्नुवानम् अपेक्षामहे, विशेषाभावात्। तस्माद् एतद् एव द्वैविध्यम् उररी-कर्तव्यम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० २।०] साम्प्रतं यद् अस्माभिः प्राग् विवृण्वद्भिर् व्युदपादि, यद् उत विप्रतिपन्नाव्युत्पन्न-व्यामोहापोह-सहम् इहेदं प्रमाण-लक्षणम् इति तत्-सूत्र-मात्र-दर्शनाद् एव विमल-बुद्धयोऽवगच्छेयुः। मन्द-मतयस् तु तावता न भोत्स्यन्त इति -- तद्धित-विधित्सया व्यक्तं प्रमाण-लक्षणाभिधान-फलं प्रतिपिपादयिषुर् अपि सपूर्व-पक्षं निराकाङ्क्षं लक्षयेयुस् त इति तावत् पूर्व-पक्षम् उत्थापयन्न् आह :
प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश् च तत्-कृतः ।
प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥ न्यायावतार २ ॥
[न्या०वि० २।१] इह वचनम् उच्चारयता विमृश्य-भाषिणा प्रत्यवमृश्यं, किम् इदं मामकं वचनं श्रोतृ-संस्काराधायकम् उत नेति। इतरथा पर्यालोचित-कारितास्य हीयते। श्रोतृ-संस्काराधायकं चेद् उच्चारयत्य्, अन्यथा विपर्यय इति। एतत् तु प्रमाण-लक्षण-वाक्यं सकल-जनानादि-प्ररूढार्थ-प्रत्यायकत्वाद् अश्रोतृ-संस्काराधायकम्, यत आह : प्रसिद्धानि प्ररुढानि, नाधुना साध्यानीत्य् अर्थः। प्रमाणानि प्रत्यक्षादीनि, परोक्ष-गत-भेदापेक्षया बहु-वचनं व्यक्ति-भेदे सामान्यम् अपि कथञ्चिद् भिद्यत इति-दर्शनार्थम्। तथा हि॒ तद् अविवक्षित-व्यक्तिकम् एक-रूपतां बिभर्ति प्रमाणम् इति॑ व्यक्त्य्-अवच्छेदेन पुनर् अवच्छिद्यमानं नानातामादत्ते प्रत्यक्षानुमान-शाब्दानि प्रमाणानीति, व्यक्ति-व्यतिरिक्ताव्यतिरिक्त-रूपत्वात् तस्य। तथा हि॒ शब्दाच् चक्षुरादेर् वा दूराद् वृक्ष इति प्रत्यये धव-खदिर-पलाशादि-विशेषानपेक्षया साधारणं वृक्षत्वम् एव चकास्ति, तस्मात् तत् तेभ्यो भिन्नं, तद्-व्यतिरेकिणाकारेण ज्ञाने प्रतिभासनाद्, घटादिवत्। परिस्फुट-धव-खदिर-पलाशादि-विशेषावलोकन-वेलायां तु न तद्, अतिरेकिणा रूपेण प्रकाशत इत्य् अभिन्नं, तद्-अव्यतिरिक्तस्य संवेदनात्, तत्-स्वरूपवत्। विशेषाभिन्नम् एव रूपं तात्त्विकं सामान्यस्य, तस्यैव दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रिया-क्षमत्वाद्, भिन्नं पुनः कल्पना-बुद्धि-विठपितत्वाद् अवस्तु-रूपम् इति चेन्, न, द्वयोः प्रकाशमानयोर् एकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। अन्यथा भिन्नम् एव रूपं स्वाभाविकम् इतरत् तु कल्पना-बुद्धि-दर्शितम् इत्य् अपि वदतां न वदन-भङ्गः स्यात्। अर्थ-क्रिया-कारिताविशेषस् तु भिन्नेऽपि रूपे न दुरुपपादस्, तस्यापि ज्ञान-साधारण-व्यवहार-करण-दक्षत्वात्। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम् इति निवेदयिष्यामस्, तस्मात् सर्वत्र भिन्नाभिन्नौ सामान्य-विशेषाव् इति दर्शनार्थो बहु-वचन-निर्देशः। आसतां तावत् प्रमाणानि।
[न्या०वि० २।२] व्यवहारश् च तत्-कृतः प्रसिद्ध इति सम्बन्धः। च-शब्दोऽपि-शब्दार्थः। तेनायम् अर्थो॒ यद्-अर्थं प्रमाण-परीक्षणम् असाव् अपि जल-पान-शीत-त्राणादिर् व्यवहारोऽनादि-प्ररूढः, तन् निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम् इत्य् अभिप्रायवान् अपि परः परुषता-परिजिहीर्षयात्मनोऽन्यथा प्राह॒ प्रमाण-लक्षणस्योक्तौ पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमासाधारण-प्रमाण-धर्म-कथन-रूपायां ज्ञायते निर्णीयतेऽस्माभिर् न प्रयोजनं तत्-फलम्, अतिसूक्ष्मत्वात् तावकाभिसन्धेर् इति काक्वा प्रश्नयत्य् उल्लुण्ठयति चेति। किं च, प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं वाभिधीयते, निश्चितं वा स्वरूपेणेति पक्ष-द्वयम्। न तावद् अनिश्चितम्, अनिश्चितस्य लक्षणत्वायोगाद्, उन्मत्तक-विरुतवत्। अथ निश्चितं, तत् किम् अप्रमाणात् प्रमाणाद् वा। न तावद् अप्रमाणाद्, अप्रमाणस्य निश्चायकत्वायोगात्। यदि पुनर् अप्रमाणम् अपि निश्चायकम् इति सङ्गीर्येत, तदा प्रमाण-पर्येषणं विशीर्येत, नैरर्थक्यापत्तेर्, अप्रमाणाद् अपि निश्चायाभ्युपगमात्। अथ प्रमाणात्, तत् किम् अलक्षणं लक्षणोपेतं वा। अलक्षणं चेन् निश्चायकं प्रमाणम्, तर्हि सर्व-प्रमाणानां लक्षणाभिधानम् अनर्थकं, तद्-व्यतिरेकेणाप्य् अर्थ-निश्चय-सिद्धेर्, भवद्-अभिप्रेत-लक्षण-निश्चायक-प्रमाणवत्। अथ लक्षणोपेतं, तत्रापि विकल्प-युगलम् अनुवारित-प्रसरम् अनुधावति॒ तल्-लक्षणं निश्चितम् अनिश्चितं वा। न तावद् अनिश्चितं लक्षणं लक्ष्यं लक्षयति। निश्चयोऽपि प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा। अप्रमाणान् निश्चयासिद्धेः प्रमाणाद् इति वक्तव्यम्। तद् अप्य् अलक्षणं सलक्षणं वा। अलक्षणत्वे पूर्वस्यार्थ-ग्रहणे किं क्षूणम्। सलक्षणत्वे तल्-लक्षणं निर्णीतम् अनिर्णीतं वेति तद् एवावर्तते। तन् न प्रमाण-लक्षणाभिधानोपायोऽस्ति, तस्मात् प्रसिद्धानि प्रमाणानीत्य् अङ्गी-कर्तव्यम् इति।
[न्या०वि० ३।०] अधुनाचार्यो गृहीतस् तावकीनोऽभिप्रायोऽस्माभिर् इति परं प्रत्याययंस् तन्-मतम् अनुद्राव्य तद् एवानुमन्यमानस् तथापि लक्षणोक्तेः साफल्यमावेदयन्न् आह :
प्रसिद्धानां प्रमाणानां लक्षणोक्तौ प्रयोजनम् ।
तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् व्यामूढ-मनसाम् इह ॥ न्यायावतार ३ ॥
[न्या०वि० ३।१] एतद् अभ्यधायि भवता, यथा प्रसिद्धानि प्रमाणानि, ततस् तेषां लक्षणोक्ताव् असाधारण-धर्म-कथन-विषये प्रयोजनं फलं, किम् इति शेषस्, तद् एतद् अयुक्तम्। यतो यद्य् अपि प्रतिप्राणि-प्रसिद्धानि प्रमाणान्य्, अन्यथा तत्-कृत-निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च दृष्ट-हान्य्-आद्य्-आपत्तेः, तथापि केचिद् वितत-मोहावष्टब्धान्तः-करणास् तत्-स्वरूपम् अनुभवन्तोऽपि न लक्षयन्ति, ततस् तान् अवलोकयताम् अस्माकं तद्-विषय-कृपा-परीत-चेतसां यथावस्थित-प्रमाण-लक्षणाविर्-भावन-द्वारेण व्यामोहम् एतेषाम् अपसारयाम इति प्रमाण-लक्षणाभिधानं प्रति प्रवर्तते चेतः। तद् इदं प्रयोजनं॒ तद्-व्यामोह-निवृत्तिः स्याद् इति॑ तस्मिन् प्रमाण-लक्षणे व्यामोहो विपरीताभ्युपगमवतां विपर्यास-लक्षणस् तीर्थ्यानां प्रमाणाप्रमाण-विवेक-विकलानाम्, अनध्यवसायात्मकस् तु मुग्ध-बुद्धीनां लौकिकानाम्, तस्य निवृत्तिर् अविपरीत-लक्षणावगमाद् अपगम इत्य् अर्थः, सा स्याद् भवेत्। केषाम् इत्य् आह : व्यामूढं विपरीत-ग्रह-ग्रस्तं विचित्ततां गतं मनोऽन्तः-करणं येषां ते तथा तेषाम्॑ इहेति लोके -- तद् अयं तात्पर्यार्थः। यद्य् अनादि प्रसिद्धं प्रमाण-लक्षणं प्रति न केचिद् अपि व्यामुह्येयुस् तदा यद् भवद्भिः प्राग् उदग्राहि॒ ‘निरर्थकं प्रमाण-लक्षणाभिधानम्ऽ॑ इति तद् युक्तम् एव स्यात्। न चैतद् एवं॑ तत्र व्यामूढानां दर्शनात्। एतेन यद् अदायि दूषणं ‘प्रमाण-लक्षणम् अनिश्चितं निश्चितं वाभिधीयतऽ॑ इत्य्-आदि तद् अपि सिद्ध-साध्यता-मध्य-प्रतिबद्धत्वान् न बाधाविधाय्य् अस्माकम् इति मन्तव्यम्। व्यामूढ-मनसोऽपि प्रति प्रमाण-लक्षण-प्रकाशने तल् लगतीति चेन्, न, स्व-संवेदन-सिद्धस्य वचनेन प्रकाशनात्, तस्य व्यामोहापोह एव व्यापारात्। यथा विविक्त-भू-तलावलोकनेऽप्य् अध्यक्षात् यो घटादि-वैविक्त्यं न प्रतिपद्यते, कुदर्शन-व्यामोहात्, तं प्रत्युच्येत॒ ‘नास्त्य् अत्र घट, उपलम्भ-कारण-समग्रतायाम् अप्य् अनुपलम्भाद्ऽ, वैविक्त्यं हि तत्राध्यक्ष-सिद्धं, वचनाद् व्यामोहो निवर्त्येत॑ तथेहापि विद्वद्भिर् द्रष्टव्यम्। निर्णीतं तल्-लक्षणम् अध्यक्षेण, तस्य व्यवसाय-रूपत्वाद्, वचनं पुनर् विपरीतारोप-निराकरणे व्याप्रियत इति स्थितम्। तद् एवं प्रमाण-लक्षणं सामान्येन प्रतिपाद्य तद्-गतं कुचोद्यं पर्यहार्य् आचार्येण।
[न्या०वि० ४।०] अधुना तद्-विषयाम् एव संख्या-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षता ये प्रत्यक्ष-परोक्ष-लक्षणे प्रमाण-व्यक्ती प्राक् प्रक्रान्ते, तयोर् अपि लक्षणं प्रति विप्रतिपद्यन्तेऽपरे। अतस् तल्-लक्षणम् अपि वक्तव्यम् इति तावत् प्रत्यक्ष-लक्षणम् अभिधातुकाम आह :
अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् ईदृशम् ।
प्रत्यक्षम्, इतरज् ज्ञेयं परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥ न्यायावतार ४ ॥
[न्या०वि० ४।१] तत्र प्रत्यक्षम् इति लक्ष्य-निर्देशः, अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानम् इति लक्षण-निर्देशः। परोक्षोऽक्ष-गोचरातीतस्, ततोऽन्योऽपरोक्षस्, तद्-भावस् तत्ता तया, साक्षात्-कृततयेति यावत्। अर्यत इत्य् अर्थोऽवगम्यत इति हृदयम्॑ अर्थ्यत इति वार्थो दाह-पाकाद्य्-अर्थ-क्रियार्थिभिर् अभिलष्यत इति यावत्। तस्य ग्राहकं व्यवसायात्मकतया साक्षात् परिच्छेदकं यज् ज्ञानं, तद् ईदृशम् इतीदृग् एव प्रत्यक्षम् इति सण्टङ्कः। तत्र ज्ञान-ग्रहणेन यत् सांख्याः प्राहुः॒ ‘श्रोत्र्-आदि-वृत्तिः प्रत्यक्षम्ऽ॑ इति तत् तिरस्-करोति, श्रोत्र्-आदीनां प्रकृति-विकारतया तद्-वृत्तेर् व्यापार-लक्षणाया जडतया प्रत्यक्षत्वायोगाद्॑ अर्थ-परिच्छित्ति-हेतुतया प्रत्यक्षत्वे आलोकादि-जड-कारण-कलाप-व्यापारस्यापि प्रत्यक्षतापद्येत, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० ४।२] अर्थस्य ग्राहकम् इत्य् अस्य ग्रहणेक्षयेति वक्ष्यमाण-पद-सापेक्षत्वाद्, अमुना बहिर् अपि येऽर्थ-कलाकलन-विकलं सकलम् अपि ज्ञानं प्रलपन्ति तान् निरस्यति॑ स्वांश-ग्रहणे ह्य् अन्तः-संवेदनं व्याप्रियते यथा -- तथा बहिर् अपीतरथार्थवज् ज्ञान-सन्तानान्तराण्य् अपि विशीर्येरन्, स्वप्न-दृष्टान्तेन तद्-अनुमानस्योपप्लव-मात्रतापत्तेः, स्व-विज्ञानस्यैव तथा तथा विजृम्भणात्। तथा च प्रमाण-प्रमेय-प्रतिपाद्य-प्रतिपादक-कार्य-कारण-भावादयः प्रलीयेरन्न्, आत्म-व्यतिरेकेणात्मीय-पूर्वोत्तर-क्षणयोर् अपि ज्ञानस्य प्रवृत्ति-निरोधापत्तेः। अद्वय-विज्ञान-तत्त्व-साधनेनानुकूलम् आचरसीति चेत्, स्याद् एतत्, यदि भवतः प्रमाण-परिदृष्ट-सकल-व्यवहारोच्छेदेन कुदर्शन-वासनाहितादृष्टाद्वय-तत्त्व-परिकल्पनात् प्रतिकूलं न स्यात्। तन् नार्थ-विरहेण बहिः-प्रमाण-भूत-ज्ञानोल्लासोऽस्ति, निर्हेतुकत्व-प्रसङ्गाद् इति।
[न्या०वि० ४।३] ग्राहकम् इति च निर्णायकं द्रष्टव्यम्, निर्णयाभावेऽर्थ-ग्रहणायोगात्। तेन यत् ताथागतैः प्रत्यपादि॒ ‘प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् अभ्रान्तम्ऽ॑ इति तद् अपास्तं भवति, तस्य युक्ति-रिक्तत्वात्। तथा हि॒ ते निर्विकल्पकत्वेऽध्यक्षस्यायुक्तीः खेटयन्ति -- किलेदम् अर्थ-सामर्थ्येनोदीयते, सन्निहितार्थ-क्रिया-समर्थार्थ-ग्राहकत्वात्। न चार्थे ध्वनयः सन्ति, तद्-धेतु-विलक्षण-कारणान्तर-जन्यत्वात्, ततश् चासाव् उपनिपत्य स्व-गोचरं संवेदनम् उत्थापयन् स्वाकारम् अनुकारयति। तन् न तद्-ग्राहिणि विज्ञाने शब्द-संश्लेषो युक्तः। किं च, यद्य् उत्पादकार्थोपयोगेऽपि तं तावन् न गृह्णीयात्, संवेदनम् अपि तु स्मरण-सम्पादितं तद्-अभिधायक-ध्वनि-संयोजनं प्रतीक्षमाणं तावद् आसीत, तर्हि दत्तो जलाञ्जलिर् अर्थ-ग्रहणस्य। तथा हि॒ तम् अर्थम् अपश्यंस् तस्मिन् गृहीत-सङ्केतं तद्-अभिधायक-ध्वनिं नानुस्मरत्य्, उपायाभावाद्, अननुस्मरंश् च पुरो-वर्तिन्य् अर्थे न योजयति, स्मृत्य्-उपस्थापन-व्यतिरेकेण तद्-योजनाशक्तेर्, अयोजयंश् च भवद्-अभिप्रायेण न पश्यतीति धान्ध्याद् आन्ध्यमापद्येत। यदि चेन्द्रियजम् अपि ज्ञानं विकल्प-कलुषितम् इष्येत, तदा तद् अपि मनो-राज्यादि-विकल्पवद् विकल्पान्तराविर्-भावे सति निवर्तेत॑ न चैतद् अस्ति, सन्निहित-गो-पिण्ड-गोचरस्य चक्षुर्ज-संवेदनस्याश्वादि-विषय-विकल्पोदयेऽप्य् अनिवर्तनात्, संहृत-सकल-विकल्पस्यापि च परिस्फुट-सन्निहितार्थ-विषय-दर्शन-सिद्धेः। तन् नाक्षजं ज्ञानं शब्द-सम्पर्कम् अनुभवतीति।
[न्या०वि० ४।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यत् तावद् उक्तम्॒ अशब्दकार्थ-सामर्थ्योद्भवत्वाद् ध्वनि-रहितम् अध्यक्षम् इति, तद् अयुक्तं, न हि शब्दासम्पृक्तार्थजम् इत्य् एतावतैवाभिलाप-विना-कृतम् इति वक्तुं शक्यम्, अन्यथा जडार्थ-जनितम् इति जडम् अपि तत् स्यात्। अथ बोध-रूप-मनस्कार-साहित्यान् न जडम् इति ब्रूषे, तथा सत्य् अभिलाप-संसृष्ट-मनस्कार-सन्नियोगात् साभिलापम् अपि स्यात्। किं च, विविक्ताः परमाणवः स्वाकारार्पण-द्वारेण स्व-गोचरं ज्ञानम् उत्पादयन्तः कथम् असन्तम् आत्मनि स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं तत्र प्रथयन्ति। विभ्रमाद् इति चेन्, न, नेदानीम् अर्थे यद् अस्ति तद् एव प्रतिभाति, तत्रासतोऽपि स्थूराकारस्य प्रतिभासनात्। तथा शब्दोऽपि। यद्य् अविद्यमानोऽर्थे तद्-ग्राहिणि ज्ञाने प्रतिभासेत किं क्षूयेत? यच् चोक्तम्॒ ‘स्मरण-जनित-शब्द-संयोजनं प्रतीक्षमानम् अर्थोपयोगेऽपि यद्य् आसीतेत्य्ऽ-आदि यावद् ‘आन्ध्यम् आपद्येतऽ, तत् तावक-पक्षेऽपि समानम्। तथा हि॒ स्वलक्षण-विषयेन्द्रियज-निर्विकल्पक-ज्ञान-सद्भावेऽपि न तावद् इदं-तयानिदं-तया वार्थ-व्यवस्थितिर्, यावद् विधि-प्रतिषेध-द्वारेण विकल्प-युगलकं पाश्चात्यं नोदयते, यत्रैवांशे विकल्पं जनयति, तत्रैवास्य प्रमाणतेति-वचनान्, निर्विकल्पकस्य सतोऽपि व्यवहारं प्रत्य् असत्-कल्पत्वात्। स च विकल्पः सङ्केत-काल-भावितम् अभिलाप-सामान्यम् अनुस्मरत एवोत्पत्तुम् अर्हति, अभिलाप-सामान्य-स्मरण-बीजं च कुतः प्रबुध्येत? तादृश-दर्शनाद् इति चेन्, ननु तद् अपि दर्शनं निर्विकल्पकत्वाद् अर्थं नातिशेते, तत् कथं सामान्य-विषय-विकल्प-बीजं प्रबोधयेत्? अर्थः पुनः सामान्य-व्यवसायात्मिकां बुद्धिं न जनयेद् इति भवतां कदाग्रहः। तद् अर्थवत् तद्-विषयं दर्शनं व्यवसाय-शून्यत्वान् नाभिलाप-सामान्य-गोचर-स्मरण-बीजं प्रबोधयति॑ तद् अप्रबुद्धं न स्मरणं जनयत्य्॑ अजातं स्मरणं न शब्दं योजयत्य्॑ अयोजितः शब्दो नार्थं निश्चाययत्य्॑ अनिश्चितोऽर्थो न व्यवहारम् अवतरत्य्॑ अनवतीर्णो नादृष्टाद् विशिष्यते॑ अविशिष्टः प्रमातुर् आन्ध्यं लक्षयतीति। तस्माद् यथा कथञ्चिन्-निर्णयाभावात् स्वयम् अप्रतीतम् अपि निर्विकल्पक-दर्शनं वासना-प्रबोध-द्वारेण विकल्पम् उत्थाप्यात्म-व्यापारम् अभिलापयति कतिचिद्-अंश-विषयं, तथार्थोऽपि यदि चक्षुर्-आदि-सामग्र्य्-अन्तः-पातित्वेनाप्रतीत एव स्वयं, तथा-स्वभावत्वात्, सङ्केत-काल-भाविताभिलाप-सामान्य-विषयात्म-संस्कार-प्रबोध-द्वारेणात्म-विषयम् अभिलाप-संसृष्टं संवेदनम् उल्लासयेन् नात्यन्तम् अयुक्तं पश्यामः। न चायं सविकल्पको बोधो मनो-राज्यादि-विकल्प-कल्पश्, चक्षुरादि-सामग्री-सम्पाद्यत्वाद्, इतरस्य तु मनो-मात्र-प्रभवत्वात्। अतः कथं तद्-विकल्पान्तराविर्-भावे निवर्तेत? मानस-विकल्पस्यैव विकल्पान्तरेण निवर्तनाद्, अस्य तु कारण-सामर्थ्येन बलात् प्रवृत्तेः। एतेन संहृत-सकल-विकल्पावस्थायां नैष प्रादुःष्याद् इत्य् एतद् अपि प्रतिक्षिप्तम्, अस्य प्रमातुर् इच्छया संहर्तुम् अशक्यत्वान्, मानस-विकल्प-संहरण एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेर् इति। एतच् च शब्द-सम्पृक्त-प्रत्यक्ष-पक्षाद् अप्य् एकान्त-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-पक्षस्य पापीयस्तां दर्शयद्भिर् अस्माभिर् उदग्राहि।
[न्या०वि० ४।५] परमार्थतः पुनः प्रत्यक्षे साक्षाच् छब्दोल्लेखो नेष्यते, विशद-व्यवसायेनार्थ-साक्षात्-करण-चतुरत्वात् तस्य। केवलं तद् अपि सन्निहितं परिस्फुटं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुं स्थगित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्यं पदार्थान्तरैः सह समानासमानाकारं स्व-परमाणूनां सामान्याकारं स्तम्भाधिकं पदार्थं गोचरयतीति सविकल्पकम् इत्य् उच्यते, पर-परिकल्पित-क्षण-क्षयि-विविक्त-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवण-निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष-प्रतिषेधार्थं कथञ्चिद्-अभिलाप-संसर्ग-योग्य-गोचरता-दर्शनार्थं वा। एवं च प्रत्यक्ष-गोचरी-कृतेऽर्थे संज्ञा-संज्ञि-सम्बन्ध-ग्रहणादयस् तद्-विषयाः शाब्द-व्यवहाराः सर्व एव निरुपचरिता घटन्त इत्य् उक्तं भवति। यदि पुनः शब्द-संसर्ग-योग्य-प्रतिभासम् अध्यक्षं न स्यात्, ततः को दोष इति चेद्, विकल्पानुत्थानेन सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गः। तथा हि॒ निर्व्यवसायं दर्शनम् अत्यन्त-पाटवोपेतम् अपि स्मृति-बीजाधानं तद्-उत्तर-काल-भावि वा तादृशार्थ-दर्शनं तत्-प्रबोधनम् अभ्यास-वासना-पाटवेऽपि न विधातुम् अलं, यतः सामान्य-विकल्पोत्पत्त्या व्यवहारः प्रवर्तेत, क्षणिकत्वादिषु सकल-कालं निर्विकल्पकाध्यक्ष-दृष्टतयाभ्युपगतेष्व् अपि तद्-अदर्शनात्। तस्माद् यत्र कुत्रचिद् अर्थांशे पाश्चात्य-व्यवहार-प्रवृत्तिस् तत्र प्राचीनं संवेदनं निर्णायकम् अभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा क्षणिकत्वाद्य्-अंशवत् सर्वांशेषु व्यवहारः प्रलीयेत। तन् न कदाचन कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षस्य प्रमातुर् अपि प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति। अप्रतीतं चास्तीति श्रद्धातुं दुःशकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् अलक्षणम्।
[न्या०वि० ४।६] अभ्रान्तत्वम् अपि न जाघटीति, भवद्-अभिप्रायेण स्थिर-स्थूरार्थ-ग्राहिणः संवेदनस्य विपर्यस्त-रूपत्वात्, तद्-विपरीतस्य तु स्वप्न-कालेऽप्य् अप्रकाशमानत्वात्। तद् यदि यथावस्थितार्थ-ग्राहित्वम् अभ्रान्तत्वं, तन् न सम्भवत्य् एव, विविक्त-क्षण-क्षयि-परमाणूनां कदाचिद् अप्य् अप्रतिभासात्, तेषां च पारमार्थिकत्वात्। अथ व्यावहारिकाभिप्रायेण यद् इदं घटादिकं स्वलक्षणम् अर्थ-क्रिया-क्षमं, तत्र यन् न भ्राम्यति तद् अभ्रान्तम् इत्य् अभिप्रेतं, तर्हि कल्पनापोढ-पदम् उत्सारणीयम्, इदानीम् अनेन सहावस्थानाभावाद्, व्यवहारावतारिणो घटादि-स्वलक्षणस्य निर्णयेनैव ग्रहणाद्, अन्यथा व्यवहाराप्रवृत्तेर्, दृष्टस्याप्य् अदृष्टानतिशयनात्। तस्माद् व्यवसायात्मकम् अध्यक्षम् इत्य् एतद् एव चार्व् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ४।७] अपरोक्षतयेत्य् अनेन तु परोक्ष-लक्षण-सङ्कीर्णताम् अध्यक्षस्य परिहरति, तस्य साक्षात्-कारितया अर्थ-ग्रहण-रूपत्वाद् इति। ईदृशम् इत्य् अमुना तु पूर्वोक्त-न्यायात् सावधारणेन विशेषण-कदम्बक-सचिव-ज्ञानोपप्रदर्शनात् पर-परिकल्पित-लक्षण-युक्तस्य प्रत्यक्षतां प्रतिक्षिपति। एवं च यद् आहुर्॒ "इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" तथा "सत्-सम्प्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धि-जन्म तत् प्रत्यक्षम्" इत्य्-आदि तद् अयुक्तम् इत्य् उक्तं भवत्य्, अपूर्व-प्रादुर्-भावस्य प्रमाण-बाधितत्वाद्, अत्यन्तासतां शश-विषाणादीनाम् अप्य् उत्पत्ति-प्रसङ्गात्। तस्माद् इदम् आत्म-रूपतया विद्यमानम् एव विशेष-कृद्-धेतु-कलाप-सन्निधानात् साक्षाद् अर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपतया विवर्तेत॑ तथा चोत्पन्न-जन्मादि-विशेषणं न सम्भवेत्। अथैवं-विधार्थ-सूचकम् एवैतद् इत्य् आचक्षीथास्, तथा सत्य् अविगानम् एवेत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ४।८] अधुना परोक्ष-लक्षणं दर्शयति॒ इतरद् इत्य्-आदि। अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् इत्य् उक्तम्, तस्माद् इतरद् असाक्षाद् अर्थ-ग्राहकं ज्ञानं परोक्षम् इति ज्ञेयम् अवगन्तव्यम्। एतद् अपि स्व-संवेदनापेक्षया प्रत्यक्षम् एव, बहिर्-अर्थापेक्षया तु परोक्ष-व्यपदेशम् अश्नुत इति दर्शयन्न् आह : ग्रहणेक्षयेति॑ इह ग्रहणं प्रक्रमाद् बहिः प्रवर्तनम् उच्यते,ऽन्यथा विशेषण-वैयर्थ्यात्॑ तस्येक्षापेक्षा तया॑ बहिः-प्रवृत्ति-पर्यालोचनयेति यावत्। तद् अयम् अर्थो॒ यद्य् अपि स्वयं प्रत्यक्षं, तथापि लिङ्ग-शब्दादि-द्वारेण बहिर्-विषय-ग्रहणेऽसाक्षात्-कारितया व्याप्रियत इति परोक्षम् इत्य् उच्यते। एतच् च बुभुत्सितार्थान्यथानुपपन्नार्थान्तर-प्रतीति-वशाद् उदय-धर्मकं इति। सामान्य-लक्षण-सद्भावाद् एकाकारम् अपि विप्रतिपत्ति-निराकरणार्थं द्विधा भिद्यते, तद् यथा॒ अनुमानं शाब्दं चेति। यतोऽद्यापि शब्दस्यार्थान्यथानुपपन्नत्वम् एव परे न प्रतिपद्यन्ते, न चापृथक्-कृतस्य तद्-विविक्तं वक्तुं शक्यम्, अतो भेदेनोपन्यासः।
[न्या०वि० ५।०] तत्र तावद् अनुमान-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह :
साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकं स्मृतम् ।
अनुमानं, तद् अभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवत् ॥ न्यायावतार ५ ॥
[न्या०वि० ५।१] इहाप्य् अनुमानम् इति लक्ष्य-निर्देशः, तस्य प्रसिद्धतया अनूद्यत्वात्। साध्याविनाभुनो लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इति लक्षण-निर्देशः, तस्याप्रसिद्धतया विधेयत्वाद् इति। अत्राप्य् अनुमान-शब्दस्य कर्त्र्-आदि-कारक-व्युत्पत्ति-क्रमेणार्थ-कथनं प्रमाण-शब्दवद् द्रष्टव्यम्। ततश् चेहापि लिङ्ग-ग्रहण-साध्याविनाभावित्व-लक्षण-लिङ्ग-सम्बन्ध-स्मरण-कालात् [अनु] पश्चान् मीयते परिच्छिद्यतेऽर्थोऽनुमेयः पावकादिर् येन ज्ञानेन तद् अनुमानम् इति। तत् किं-भूतम् इत्य् आह : साध्य-निश्चायकम् इति -- साधनम् अर्हति, साधयितुं वा शक्य इति साध्योऽनुमेय इत्य् अर्थः॑ तस्य निश्चायकं तत्-स्वरूप-निर्णायकम् इति यावत्। तत् कुत इत्य् आह : लिङ्गाल् -- लिङ्ग्यते गम्यतेऽर्थोऽनेनेति लिङ्गं हेतुस् तस्मात्। किं-भूताद् इत्य् आह : साध्याविनाभुन इति -- विना भवतीति विनाभु, ततोऽन्यद् अविनाभु, साध्येनाविनाभु साध्याविनाभु, साध्यं विमुच्य यन् न भवतीत्य् अर्थः, तस्मात् साध्य-निश्चायकं ज्ञानं तद् अनुमानम्। स्मृतम् अभिप्रेतं नीतिविद्भिर् इति सम्बन्धः। तत्र लिङ्गात् साध्य-निश्चायकम् इत्य् अनेनानुमानस्य प्रत्यक्ष-शाब्द-लक्षण-सङ्कीर्णतां वारयति। साध्याविनाभुन इत्य् अनेन पर-प्रणीत-लिङ्ग-लक्षण-व्युदासम् आचष्टे।
[न्या०वि० ५।२] ततश् च यत् परे प्रोचुः -- पक्ष-धर्मत्वान्वय-व्यतिरेक-लक्षण-रूप-त्रयोपलक्षितानि त्रीण्य् एव लिङ्गानि॒ अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति॑ तद् उक्तम्॒
"अनुमेयेऽथ तत्-तुल्ये सद्भावो, नास्तितासति ।
निश्चितानुपलम्भात्म-कार्याख्या हेतवस् त्रय" ॥ इति॑
[न्या०वि० २] तथान्ये॒ "ऽस्येदं कार्यं कारणं संयोगि समवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्" इति, तथा॒ "पूर्ववच् छेषवत् सामान्यतो-दृष्टम्" इत्य्-आदि -- तद् बाल-प्रलपित-प्रायम् इत्य् अवगन्तव्यं, सर्वत्र साध्याविनाभावित्वस्यैव गमकत्वात्, तद्-रहितस्य तु त्रैलक्षण्य-लक्षितस्याप्य् अगमकत्वाद्, इतरथा तत्-पुत्रत्वादीनाम् अपि गमकत्व-प्रसङ्गान्, नियमवत्। त्रैलक्षण्यं लक्षणं, न यत्-किञ्चित्, तेनायम् अप्रसङ्ग इति चेन्, न, नियमेन साध्याविनाभावित्वस्यैवोद्दीपनात्॑ तच् चेद् अस्ति किं त्रैलक्षण्यापेक्षया, तस्यैव गमकत्वात्। तथा हि॒ जल-चन्द्रान् नभश्-चन्द्रं, कृत्तिकोदयाच् छकटोदयं, पुष्पितैक-चूतात् पुष्पिताशेष-चूतान्, चन्द्रोदयात् कुमुदाकर-प्रबोधं, वृक्षाच् छायाम् इत्य्-आदि पक्ष-धर्मत्व-विरहेऽप्य् अनुमिमीमहे। कालादिकस् तत्र धर्मी समस्त्य् एव, तत्र पक्ष-धर्मता लिङ्गस्य गृह्यत इति चेन्, नातिप्रसङ्गाद्, एवं हि शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये काक-कार्ष्ण्यादेर् अपि गमकत्व-प्रसक्तेस्, तत्रापि लोकादेर् धर्मिणः कल्पयितुं शक्यत्वात्। तथान्वय-विकलोऽप्य् अनित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद् इत्य् अयं सम्यग्-घेतुतया समर्थयितुं शक्य इति, नान्वयोऽपि हेतोर् लक्षणम्। तथा हि॒ तावकाकूतेनैव सकलं सत्त्वम् अनित्यतया क्रोडी-कृतम् इति भाव-धर्मः श्रावणत्वं कथम् अनित्यतां विहाय विपक्षे वर्तितुम् उत्सहेत, तद्-विकलस्य निःस्वभावतापत्तेर्, अनित्यता-विनिर्मुक्तस्य सत्त्वस्यासम्भवावत्। एतेन सात्मकं जीवच्-छरीरं, प्राणादिमत्त्वान्, निरात्मकत्वे तद्-वैकल्य-प्रसङ्गाद्, घटादिवद् इत्य् अयम् अपि गमको व्याख्यातः, साध्यार्थान्यथानुपपन्नत्वस्यात्रापि सद्भावात्, पक्ष-धर्मत्वान्वययोस् त्व् अलक्षणतया प्रतिपादनात्।
[न्या०वि० ५।३] तथा कार्य-स्वभावानुपलब्धि-रूप-लिङ्ग-त्रय-नियमोऽपि किल तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-लक्षण-सम्बन्धास्तित्वम् एतेष्व् एवेति यः क्रियते, सोऽप्य् अयुक्तः, प्रकृत-सम्बन्ध-द्वय-विकलस्यापि रूपादे रसादि-गमकत्व-दर्शनात्। मा भूत् तस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्तिभ्यां गमकत्वं, समवायाद् भविष्यति, तथापि नान्यथानुपपन्नत्वम् एव हेतोर् लक्षणम् इति यदि वैशेषिको मन्येत, सोऽन्यथा निर्लोठनीयः। स हि विकल्पतः पर्यनुयोज्यः॒ समवायिभ्यः समवायोऽभिन्नो भिन्नो वा। यद्य् अभिन्नः, समवायिन एव तर्हि, न समवायः, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। भिन्नश् चेत्, स कथं तेषु वर्तेत॒ सामस्त्येनाहोस्विद् एक-देशेन? तद् यदि सामस्त्येन, तद् अयुक्तं, समवाय-बहुत्व-प्रसङ्गात्, प्रतिसमवायि तस्य परिसमाप्ततावाप्तेः। अथैक-देशेन, तद् अप्य् अचारु, सांशता-प्रसङ्गेन निरवयवत्व-क्षतेः, स्वांश-वर्तनेऽपि सामस्त्यैक-देश-चोद्यावताराच् च। तत्रापि सामस्त्य-पक्षे बहुत्वं तद्-अवस्थम् एव। एक-देश-पक्षे त्व् अंशान्तर-प्रसङ्गेनानवस्था। तन् न समवाय-बलात् गमकतां प्रत्य् आशाविधेया, तस्यैव तत्र दुःस्थितत्वात्। एतेन संयोगिनोऽपि गमकता प्रत्युक्ता, समान-दूषणत्वात्। विरोधिनोऽपि विरुद्धाभाव-गमकत्वम् अन्यथानुपपन्नत्वम् एव सूचयति, तद्-अभावे गमकत्वायोगात्।
[न्या०वि० ५।४] एवं पर-परिकल्पितम् अन्यद् अपि लिङ्ग-लक्षणं यद् गमकताङ्गं तद् अन्यथानुपपन्नत्वं न व्यभिचरति, साध्यं विनाप्य् उपपद्यमानस्य गमकता-वैकल्याद् इति॑ अत्रैव व्यापके लिङ्ग-लक्षणेऽन्तर्-भावनीयं, विपरीतं तु निरसनीयम् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ५।५] तद् एवम् अनुमान-लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यच् छौद्धोदनि-शिष्यकैर् न्यगादि, यद् उत -- भ्रान्तम् अनुमानम्, सामान्य-प्रतिभासित्वात्, तस्य च बहिः-स्वलक्षणे व्यतिरेकाव्यतिरेक-विकल्पाभ्याम् अपाक्रियमाणतयायोगात्, तद्-रूपतया च तेन तस्याध्यवसायाद्, अतस्मिंस् तद्-ग्रहणस्य च भ्रान्ति-लक्षणत्वात्। प्रामाण्यं पुनः प्रणालिकया बहिः स्वलक्षण-बलायातत्वाद् अनुमानस्य। तथा हि॒ नार्थं विना तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-रूप-सम्बन्ध-प्रतिबद्ध-लिङ्ग-सद्भावो, न तद् विना तद्-विषयं ज्ञानं, न तज्-ज्ञानम् अन्तरेण प्राग्-अवधारित-सम्बन्ध-स्मरणं, तद्-अस्मरणे नानुमानम् इत्य्, अर्थाव्यभिचारित्वाद् भ्रान्तम् अपि प्रमाणम् इति सङ्गीर्यते॑ तद् उक्तम्॒ "अतस्मिंस् तद्-ग्रहो भ्रान्तिर् अपि सम्बन्धतः प्रमेति" -- तद् अपाकर्तुम् आह : तद् अभ्रान्तम् इत्य्-आदि। तद् अनुमानं, भ्राम्यति स्व-गोचरे विपर्यस्यतीति भ्रान्तं, ततोऽन्यद् अभ्रान्तम्, अविपरीतार्थ-ग्राहीति यावत्। इयं च प्रतिज्ञा। प्रमीयते यथावस्थितोऽर्थः परिच्छिद्यतेऽनेनेति प्रमाणं, तद्-भावस् तत्-त्वं तस्मात्। अयं तु हेतुः। सङ्गतम् अक्षाणाम् इति समक्षं, तद् इव समक्षवद् इति दृष्टान्तः। तद् इदम् अनुमानस्य भ्रान्तता-निराकारकं सम्पूर्णावयवम्, उपनय-निगमनयोर् अवयव-त्रय-प्रतिपादनेनैवाक्षिप्तत्वात्। प्रमाणं सूचितम्, प्रयोगस् त्व् एवं द्रष्टव्यो॒ऽभ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वाद्, इह यद् यत् प्रमाणं तत् तद् अभ्रान्तं यथा समक्षं, तथा च प्रमाणं भवद्भिर् अभ्युपगम्यतेऽनुमानं, तस्मात् प्रमाणत्वाद् अभ्रान्तम् इति प्रतिपद्यन्ताम् इति। तत्रार्थ-वादी तावत् समक्ष-लक्षणे दृष्टान्ते साध्य-विकलताम् आविर्-भावयितुं न पारयति, स्वयम् एव समक्षस्याभ्रान्ततयाऽभ्युपगमात्। शून्य-वादिनः पुनः समस्तापलापित्वात् प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारं प्रत्य् अयोग्यतैवेति न तम् अधिकृत्य स्व-साधन-दोषाः परिहर्तव्याः, स्व-वचन-बाधित-प्रतिज्ञत्वेन तद्-वादोत्थानाभावात्। तथा हि॒ सर्वाभाव-प्रतिपादकं वचोऽस्ति, नास्ति वा? यद्य् अस्ति तर्हि प्रतिज्ञा-हानिः। अथ नास्ति, सकल-भाव-सिद्धिः, प्रतिषेधकाभावात्।
[न्या०वि० ६।०] ज्ञान-वादी पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विकलं सकल-विकल्प-गोचरातीतं निर्विकल्पकं विविक्त-पारमार्थिक-स्व-संवेदन-वेद्यं संवेदनम् आगूर्यानादि-कालालीन-वासना-बल-प्रभावितं ग्राह्य-ग्राहकाकार-कलुषितं बहिष्-प्रथमानं निखिलम् अपि ज्ञानं विपर्यस्ततया प्रतिजानानः समक्ष-लक्षणस्य प्रकृत-दृष्टान्तस्य साध्य-शून्यताम् अभिदध्याद्, अतस् तन्-मत-विकुट्टनार्थम् आह :
न प्रत्यक्षम् अपि भ्रान्तं प्रमाणत्व-विनिश्चयात् ।
भ्रान्तं प्रमाणम् इत्य् एतद् विरुद्धं वचनं यतः ॥ न्यायावतार ६ ॥
[न्या०वि० ६।१] यद् भवतश् चेतसि विवर्तते, यद् उत न केवलम् अनुमानं भ्रान्तं, किं तर्हि यद् भवद्भिर् दृष्टान्ततयोपात्तं प्रत्यक्षं तद् अपि भ्रान्तम् एव, "सर्वम् आलम्बने भ्रान्तम्" इत्य् वचनात्, तद् एतन् न। कुत इत्य् आह : प्रमाणत्व-विनिश्चयाद् इति, प्रमाण-भाव-निर्णयाद् इत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ६।२] ननु च प्रमाणताम् अभ्रान्ततान्यथानुपपन्नां यदि परः प्रतिपद्यते, ततस् ताम् अभ्युपगच्छन् कथं भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं विदध्याद् इति पार्श्व-स्थित-वचनावकाशम् आशङ्क्य, भ्रान्तता-प्रमाणतयोर् विरोध-साधनेन ततः प्रमाणतां व्यावर्त्यानन्य-शरणतया प्रतिज्ञाताभ्रान्तताक्रान्तां तां दर्शयन्न् आह : भ्रान्तम् इत्य्-आदि। भ्रान्तं विपर्यस्तम् अथ च प्रमाणं ग्राह्य-परिच्छेद-हेतुर् इत्य् एतद् वचनम् एवं-विद्धार्थ-प्रत्यायको ध्वनिर् विरुद्धं, पूर्वापर-व्याहतार्थ-गर्भत्वात्।
[न्या०वि० ६।३] ननु च नैवास्य विरुद्धता, तथा ह्य्॒ अविदित-परमार्थ-व्यावहारिकाभिप्रायेण लोक-संवृतिं घटयन्तो वयं दृढतर-वासना-प्रबोध-सम्पादित-सत्ताकयोः प्रत्यक्षानुमानयोः प्रमाणताम् आचक्ष्महे, तद्-अभिप्रायेण दर्शितार्थ-प्रापकत्वेन तयोर् अविसंवादकत्वात्। शिथिल-वासनाउन्मुख्य-निर्मित-जन्मकयोः पुनर् अप्रमाणतां, तद्-आकूतेनैव दर्शितेऽर्थे विप्रलम्भनाद् इति, भ्रान्ततां पुनस् तत्त्व-चिन्तकाभिप्रायेण सकलस्य बहिर् उपप्लवमानस्य ग्राह्य-ग्राहकाकार-कालुष्य-दूषितस्य प्रतिभासस्य पारमार्थिकाद्वय-संवेदन-विपर्यस्त-रूपत्वाद् अभिदध्महे, बहिः प्रतिभासस्य तद्-ग्राह्यार्थ-विचाराक्षमतयोपप्लुत-रूपत्वात्। तथा ह्य्॒ अर्थोऽवयवि-रूपोऽवयव-रूपो वा स्याद्, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् अवयवि-रूपो विचारं क्षमते,ऽवयव-विरहेऽवयवित्वायोगात्, तेषु च तद्-वृत्ति-विकल्पानुपपत्तेः। तथा हि॒ तेष्व् असाव् एकदेशेन वर्तते सामस्त्येन वा। न तावद् एकदेशेन, तस्य स्वयं निरवयवत्वात्। अवयव-वृत्ति-निमित्तम् अंशान्तर-कल्पने तद्-वृत्ताव् अप्य् अंशान्तर-कल्पन-प्रसङ्गस्, तथा चानवस्था। नापि सामस्त्येन, प्रत्य्-अवयवं परिसमाप्त-रूपतयावयवि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। भेद-पक्षे दोषोऽयम्, अभेद-पक्षे नास्तीति चेन्, न॒ तत्राप्य् अवयव-मात्रम् अवयवि-मात्रं वा स्याद्, इतरेतराव्यतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्। किं च, समस्तावयव-व्यापिनोऽवयविनोऽभ्युपगमे पटादेर् एक-देश-राग-कम्प-दर्शनादिषु सकल-राग-कम्प-दर्शनादीनि दुर्निवाराणि स्युर्, एकस्य रागारागादि-विरुद्ध-धर्माध्यासायोगाद् इति। नाप्य् अवयव-रूपोऽर्थो विचार-गोचर-चारी कर-चरण-शिरो-ग्रीवादीनाम् अवयवानां स्वावयवापेक्षयावयवि-रूपतया तद्-दूषणेनैवापास्तत्वात्। परमाणूनां निरंशतयावयवत्वम् उपपद्यत इति चेन्, न, तेषाम् अपि दिक्-षट्क-सम्बन्धेन षट्-अंशतापत्तेर्, अन्यथावस्थानाभावात्। ततश् चार्थ-विरहात् तद्-उन्मुखो ग्राह्याकारोऽलीकस्, तद्-अलीकतायां ग्राहकाकारोऽपि नावस्थानम् आबध्नाति, ग्राह्याभावे ग्राहकायोगात्। तद्-अपेक्षयैव तत्-स्वरूप-स्थितिः, ग्राह्य-ग्राहकाकार-विलये च बोधाकारोऽवशिष्यते, तस्य सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात्, तस्मात् स एव पारमार्थिक इति।
[न्या०वि० ६।४] अत्र प्रतिविधीयते -- यद् अवादि संवेदनम् अद्वयं पारमार्थिकं, ग्राह्य-ग्राहकाकार-प्रवृत्तं पुनर् अतात्त्विकम् इति, तद् अयुक्तं, प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ बहिर् अन्तश् चानेकाकारतया हर्ष-विषादादिभिः स्थिर-स्थूरताद्य्-अनेक-धर्म-परिकरितार्थ-ग्रहण-परिणामैश् च विवर्तमानं संवेदनम् उपलभ्यते, न पुनर् वेद्य-वेदकाकार-विविक्तं यादृग् भवद्भिर् उपवर्ण्यते ज्ञानं तादृशं कस्यचित् कदाचन प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अद्वय-प्रतिभासस्य स्वप्न-दशायाम् अप्य् अननुभूतेः। न च तत्त्व-चिन्तका अपि प्रमाणम् अन्तरेण स्वाकूतं प्रतिष्ठापयन्तः प्रेक्षावताम् अवधेय-वचना भवन्त्य्, अन्यथैकम् अचेतनम् अव्ययम् अपि ब्रह्मानेकं चेतनं क्षण-भङ्गुरताक्रान्तम् अविद्यातः प्रथत इति ब्रुवाणोऽनिराकार्यः स्यात्। यद् अपि बहिर्-अर्थ-निराकरण-धिया अवयव्य्-अवयव-द्वारेण दूषणम् अदायि, तद् अपि बहिर् अन्तः प्रथमान-सकलासुमत्-प्रतीत-प्रतिभास-मुद्गर-निर्दलित-शरीरतया भक्त-मध्य-निष्ठ्यूत-दर्शिनः पुरतो विप्रतारण-प्रवण-कुट्टिनी-शपथ-प्रायम् इति न विद्वज्-जन-मनांसि रञ्जयति, प्रत्यक्ष-प्रतिभासापह्नवे तन्-मूलकत्वात् कुयुक्ति-विकल्पानाम् उत्थानाभावात्। किं च, संवेदनस्यापि सितासिताद्य्-अनेकाकारेष्व् एकस्य वर्तने भेदाभेद-सामस्त्यैक-देशादि-चोद्यं समानम् एवेति न दूषणम्। अनेकाकार-विवर्तस्यालीकत्वान् न तेन सह संवेदनस्य पारमार्थिकस्य भेदाभेदादि-चिन्तेति चेन्, नन्व् एवम् इतरेतराश्रयं दुरुत्तरम् आढौकते। तथा हि॒ तद्-अलीकत्व-सिद्धाव् अद्वय-संवेदन-सिद्धिस्, तत्-सिद्धौ च तद्-अलीकत्वम् इति न्यायात्। अन्यच् चाद्वयम् अप्य् एक-क्षण-वर्ति संवेदनं यथा पूर्वोत्तर-क्षणाभ्यां सम्बन्धम् अनुभवति, तथा निरंशा अपि यदि परमाणवो दिग्-अंशैः परमाण्व्-अन्तरैर् वा संश्लेषमागच्छेयुः किम् अयुक्तं स्यात्। न चावयव्य्-अवयवयोर् एकान्त-व्यतिरेकाव्यतिरेक-पक्षे यद् दूषणं तद् अस्मत्-पक्ष-बाधा-करं, परस्पराविनिर्लुठित-रूपयोर् विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदयोस् तयोर् अभ्युपगमाद्, बहिर् अन्तश् च तथैव प्रकाशमानतया तयोर् निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। एतेन रागाराग-कम्पाकम्पादि-विरोधोद्भावनम् अपि प्रतिव्यूढं, प्रमाण-प्रसिद्धेऽर्थे विरोधाभावात्, प्रमाण-बाधितस्यैव विरुद्धत्वात्, कुयुक्ति-विकल्पानां च प्रत्यक्षापह्नवे निर्मूलतया बाधकत्वायोगात्, तद्-उद्दलितत्वेनोत्थानाभावाद्, भिन्न-प्रवृत्ति-निमित्तत्वाच् च सर्व-धर्मानां तद्-विपर्यय-सम्पाद्यो विरोधो दूरापास्त एव। किं च, स्वयम् एव संवेदनं परमार्थ-संव्यवहारापेक्षया प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष-सविकल्पकाविकल्पक-भ्रान्ताभ्रान्तादि-रूपम् अभ्युपयतो बहिर्-अर्थे विरुद्ध-धर्माध्यास-प्रतिषेध-बुद्धिः केवलं जाड्यं सूचयति। तन् न प्रमाणं कथञ्चिद् भ्रान्तं समस्ति, स्वरूप-प्रच्यव-प्रसङ्गाद् इति स्थितम्।
[न्या०वि० ६।५] ननु च तद्-दर्शितार्थालीकतया ज्ञानस्य भ्रान्तता, न स्वरूपेण, न च तद्-उदय-समये कस्यचिद् इदम् अलीकार्थम् इदं त्व् अनलीकार्थम् इति विवेकेनावधारणं समस्ति, भ्रान्ताभ्रान्ताभिमतयोस् तद्-एक-रूपतया प्रकाशनात्। यदा च विशद-दर्शन-पथ-चारिणोऽपि शश-धर-युगलादयोऽलीकताम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तदा सकल-सत्यार्थताभिमत-प्रतिभासेष्व् अप्य् अलीकार्थताशङ्कानिवृत्तेर् अनाश्वास एव। न च तद्-अर्थ-प्राप्त्य्-आदिकम् आरेका-निराकरण-कारणं कल्पनीयं, स्वप्नावस्थायां तत्-सद्भावेऽप्य् अलीकार्थता-सिद्धेः। बाधक-प्रत्ययोपनिपातात् तस्यासत्यार्थतेति चेन्, न, तस्य स्व-गोचर-पर्यवसितत्वेन बाधकत्वायोगात्। अन्यथा नीलम् आददाना देवदत्त-बुद्धिः प्राक्-प्रवृत्त-पीत-बुद्धेर् बाधिकापद्येत। सर्व-प्रतिभासस्य बाधकाभाव-सिद्धेश् च समानता। तस्माद् भ्रान्ताभ्रान्त-ज्ञान-भ्रान्तिर् इयं भवतां, विवेकाभावेन सर्वस्यालीकार्थत्वाद् इति।
[न्या०वि० ७।०] अत्राह॒
सकल-प्रतिभासस्य भ्रान्तत्वासिद्धितः स्फुटं ।
प्रमाणं स्वान्य-निश्चायि द्वय-सिद्धौ प्रसिध्यति ॥ न्यायावतार ७ ॥
[न्या०वि० ७।१] एवं मन्यते॒ योऽपि समस्त-संवेदनस्य भ्रान्ततां प्रतिजानीते, तेनापि तत्-साधकस्याभ्रान्तताभ्युपगन्तव्या, तद्-भ्रान्तत्वे तत्-प्रतिपादितार्थालीकत्वेन सकल-ज्ञानाभ्रान्तता-प्रसङ्गाद्, अन्यथा तद्-भ्रान्ततायोगात्। एवं च तज्-जातीयम् अन्यद् अप्य् अभ्रान्तं स्यात्, ततश् च सकल-प्रतिभासस्य समस्त-संवेदनस्य भ्रान्तत्वासिद्धितो विपर्यस्तत्वानिष्पत्तेर् यत् स्फुटं स्वान्य-निश्चायि सुनिश्चिततया स्व-पर-प्रकाशकं तत् प्रमाणम् इति सम्बन्धः। तच् च द्वय-सिद्धौ स्वरूपार्थ-लक्षण-युग्म-निष्पत्तौ प्रसिद्ध्यति निष्पद्यते, अन्यथा प्रमेयाभावे प्रमाणाभावात्। तस्मात् प्रमाणम् उररी-कुर्वाणेनार्थोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अभिप्राय इति।
[न्या०वि० ८।०] तद् एवं स्वार्थानुमान-लक्षणं प्रतिपाद्य तद्-वतां भ्रान्तता-विप्रतिपत्तिं च निराकृत्याधुनाप्रतिपादित-परार्थानुमान-लक्षण एवाल्प-वक्तव्यत्वात् तावच् छाब्द-लक्षणम् आह :
दृष्टेष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः ।
तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ॥ न्यायावतार ८ ॥
[न्या०वि० ८।१] अत्रापि शाब्दम् इति लक्ष्यम्, अनूद्यत्वात्। दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य्-आदि लक्षणं, विधेयत्वात्। दृष्टेन प्रमाणावलोकितेनेष्टः प्रतिपादयिषितोऽव्याहतोऽनिराकृतः सामर्थ्याद् अर्थो यस्मिन् वाक्ये तत्-तथा, प्रमाण-निश्चितार्थाबाधितम् इति यावत्, तस्मात्। परमोऽकृत्रिमः पुरुषोपयोगी शक्यानुष्ठानो वार्थो वाच्यस्, तम् अभिधातुं शीलं यस्य तत् परमार्थाभिधायि, विशिष्टार्थ-दर्शकम् इत्य् अर्थः। ततस् तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नं प्रकृत-वाक्य-प्रतिपाद्यार्थादान-शीलतया लब्धात्म-सत्ताकं यन् मानं तच् शाब्दम् इति प्रकीर्तितम् उपवर्णितं पूर्वाचार्यैर् इति सम्बन्धः। तत्र दृष्टेष्टाव्याहताद् इत्य् अनेन कुतीर्थिक-वचसां लौकिक-विप्रतारकोक्तीनां च शाब्दतां निरस्यति, प्रमाण-बाधितत्वात्। वाक्याद् इत्य् अमुना तु वाक्यस्यैव नियतार्थ-दर्शकत्वात् परमार्थाभिधायितेति दर्शयन् पदाच् छाब्दाभावम् आह। परमार्थाभिधायिन इत्य् अनेन ज्वर-हर-तक्षक-चूडा-रत्नालङ्कारोपदेशादि-वचन-प्रभव-ज्ञानस्य निष्फलतया प्रामाण्यं निराचष्टे। तत्त्व-ग्राहितयोत्पन्नम् इत्य् अमुना त्व् एवं-भूताद् अपि वाक्याच् छ्रोतृ-दोषाद् विपरीताद्य्-अर्थ-ग्रहण-चतुरतया प्रादुर्-भूतस्य शाब्दत्वं वारयति। मानम् इत्य् अनेनान्तर्-भावित-प्रोपसर्गार्थेन शाब्दे परस्याप्रामाण्य-बुद्धिं तिरस्-कुरुते, तद्-अप्रामाण्ये परार्थानुमान-प्रलय-प्रसङ्गात्, तस्य वचन-रूपत्वात्। त्र्य्-अवयव-हेतु-सूचकत्वेनोपचारतस् तस्य प्रामाण्यं, न तत्त्वत इति चेन्, नाप्रमाणस्य सूचकत्वायोगात्। ननु च हेतु-प्रतिपादने यदि तत् प्रमाणं, ततो हेतु-समर्थक-प्रमाणान्तर-प्रतीक्षणं विशीर्येत, तेनैव निर्णीत-स्वरूपत्वात् तस्य, प्रमाण-प्रसिद्धे पुनः प्रमाणान्तर-वैयर्थ्यात्। नैतद् अस्ति, भवत्-परिकल्पिताध्यक्षस्याप्य् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्॒ तद्-दर्शितेऽर्थे विकल्प-प्रतीक्षणात् तस्यैव प्रामाण्यम् आसज्येत। तद्-गृहीतम् एवार्थम् असाव् अभिलापयतीति चेच् छब्द-प्रतिपादितं हेतुं प्रमाणान्तरं समर्थयत इति समानो न्यायः।
[न्या०वि० ९।०] शाब्दं च द्विधा भवति॒ लौकिकं शास्त्र-जं चेति। तत्रेदम् द्वयोर् अपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितं। समर्थनं पुनर् अविप्रतारक-वचन-प्रभवस्येहादि-वाक्य-प्रस्ताव एव लौकिकस्य विहितं, शास्त्र-जस्य तु विधातव्यम् इति यादृशः शास्त्रात् तज्-जातं प्रमाणताम् अनुभवति तद् दर्शयति॒
आप्तोपज्ञम् अनुल्लङ्घ्यम् अदृष्टेष्ट-विरोधकम् ।
तत्त्वोपदेश-कृत् सार्वं शास्त्रं कापथ-घट्टनम् ॥ न्यायावतार ९ ॥
[न्या०वि० ९।१] शास्ति शिक्षयति जीवाजीवादि-तत्त्वं ग्राहयति, शिष्यतेऽनेनेति वा शास्त्रम्। तत् किं-भूतम् इति तद्-विशेषणान्य् आह। आप्तः प्रक्षीणाशेष-रागादि-दोष-गणस्, तेनोपज्ञम् आदाव् उपलब्धम्। अनेनापौरुषेयापोहम् आह, तस्य प्रमाण-बाधितत्वात्, पुरुष-व्यापाराभावे वचनानुपलब्धेर्, उपलम्भेऽपि तद्-अर्थानवगमात्, तद्-अर्थ-निश्चयार्थं पुरुषाश्रयणे गज-स्नान-न्याय-प्रसङ्गात्, तस्य रागादि-कलुषितत्वेन वितथार्थ-कथन-प्रवृत्तेः। तद्-अनुष्ठानाद् अपि स्व-कार्य-सिद्धौ प्रणयनार्थम् अपि पुरुषः किं नेष्यते, विशेषाभावात्। तन् न क्षीण-दोष-वचनं व्यतिरिच्यान्यतः प्रेक्षावतां पर-लोकादाव् अदृष्टेऽर्थे प्रवृत्तिर् युक्ता॑ तत् तद् एव शास्त्रं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ९।२] अत एवोल्लङ्घ्यते प्राबल्येन गम्यतेऽभिभूयते अन्यैर् इत्य् उल्लङ्घ्यं, ततोऽन्यद् अनुल्लङ्घ्यं, सर्व-वचनातिशायीति यावत्। अत एव दृष्टेन प्रमाण-निर्णीतेनेष्टस्य तद्-वाच्यस्य विरोधो यस्मिंस् तत्-तथा तद् एव, यदि वा दृष्टः प्रमाणेन, इष्टो वचनान्तरेण, तयोर् विरोधकं, तद्-विरुद्धार्थाभिधानात्, ततोऽन्यद् अदृष्टेष्ट-विरोधकम्, अबाधार्थाभिधायीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ९।३] तद्-इयता शास्त्रस्य स्वार्थ-सम्पद् उक्ता। अधुना तत्त्वोपदेशादीनां परार्थत्वात् परार्थ-सम्पदम् आह : तत्त्वं जीवादयः पदार्थाः, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्, तेषां उपदेशः स्वरूप-प्रकाशनं तद्-रक्षणादि-विधानं वा। तं करोति तत्त्वोपदेश-कृत्। अत एव सार्वं सर्वस्मै हितं, प्राणि-रक्षणोपायोपदेश-परम-पद-दायितया विश्व-जनीनत्वात्। एतेन परार्थ-सम्पादकत्वम् उक्तम्।
[न्या०वि० ९।४] अधुना परेषाम् एवानर्थ-विघातित्वम् आह : कुत्सिताः पन्थाः कापथास् तीर्थान्तराणि, तेषां घट्टनं विचालकं निराकारकं, सर्व-जनापकारि-कुमत-विध्वंसकम् इत्य् अर्थः। ईदृशाद् एव शास्त्राज् जातं शाब्दं प्रमाणं, नान्येभ्यो, विप्रलम्भकत्वात् तेषाम् इति।
[न्या०वि० १०।०] अधुना परार्थानुमान-लक्षणं वक्तव्यम्, तच् च प्रत्यक्षेऽपि पश्यन्न् एक-योग-क्षेमत्वात् सामान्येनाह॒
स्व-निश्चयवद् अन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः ।
परार्थं मानम् आख्यातं वाक्यं तद्-उपचारतः ॥ न्यायावतार १० ॥
[न्या०वि० १०।१] अत्र परार्थं मानम् इति लक्ष्यं, स्व-निश्चयवद् इत्य्-आदि लक्षणम्। स्व आत्मा तस्य निश्चयः प्रमेयाधिगमस्, तद्वद् अन्येशां प्रतिपाद्यानां निश्चयोत्पादनं प्रमेय-परिच्छेदक-ज्ञान-प्रादुर्-भावनं॒ यथात्मनोऽर्थ-निर्णयस् तथा परेषां निर्णय-जननम् इत्य् अर्थः। बुधैर् विद्वद्भिः, परस्मै अर्थः प्रयोजनं येन तत् परार्थं, मीयतेऽनेनेति मानम्, आख्यातं कथितम्।
[न्या०वि० १०।२] ननु च यदि निश्चयोत्पादनं परार्थ-मानं, तथा ज्ञानम् अपि पर-प्रत्यायनाय व्याप्रियमानं परार्थं प्राप्नोतीत्य् आह : वाक्यं परार्थं, न ज्ञानं, तस्यैवानन्तर्येण व्यापारात्, पर-प्रयोजन-मात्रत्वाच् च, इतरस्य तु व्यवहितत्वात्, स्व-परोपकारित्वाच् च। कथं वचनम् अज्ञान-रूपं प्रमाणम् इत्य् आह : तद्-उपचारतस्, तस्य ज्ञानस्योपचारोऽतद्-रूपस्यापि तद्-अङ्गतया तद्-रूपत्वेन ग्रहणम्, ततः। इदम् उक्तं भवति॒ प्रतिपाद्य-गतम् उत्पत्स्यमानं यज् ज्ञानं तद् अव्यवहित-कारणत्वाद् वचनम् अप्य् उपचारेण प्रमाणम् इत्य् उच्यते। तत्रानुमानस्य पारार्थ्यं परैर् अभ्युपगतम् एव, प्रत्यक्षस्य न प्रतिपद्यन्ते, किलेदं शब्द-प्रवेश-शून्य-स्वलक्षण-ग्राहीति नैतद्-गोचरः परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यते। न च शब्दात् परस्य स्वलक्षण-ग्रहण-दक्षं प्रत्यक्षम् उन्मङ्क्ष्यति, शब्दस्य विकल्पोत्पादितत्वेन परस्यापि विकल्पोत्पादकत्वात्। तद् उक्तं॒
"विकल्प-योनयः शब्दा विकल्पाः शब्द-योनयः ।
कार्य-कारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्य् अपि" ॥
[न्या०वि० ११।०] निर्विकल्पकं च प्रत्यक्षम्, अतो न शब्द-जन्यम् इत्य् अतोऽनुमानं दृष्टान्ती-कृत्य प्रत्यक्षस्यापि परार्थतां साधयितुम् आह :
प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् ।
परस्य तद्-उपायत्वात् परार्थत्वं द्वयोर् अपि ॥ न्यायावतार ११ ॥
[न्या०वि० ११।१] प्रत्यक्षेणाप्य् अनुमानेनेव प्रसिद्धार्थ-प्रकाशनात् स्व-प्रतीत-प्रमेय-प्रत्यायकत्वात् परार्थत्वं प्रतिपाद्य-प्रयोजनत्वं द्वयोर् अपि प्रत्यक्षानुमानयोस्, तुल्य-कारणत्वान्, नानुमानस्यैवैकस्येत्य् अभिप्रायः। इह चाश्रूयमाणत्वात् तद्-अर्थ-गमनाच् चापीव-शब्दौ लुप्त-निर्दिष्टौ द्रष्टव्यौ। प्रत्यक्ष-प्रतीतार्थ-प्रत्यायनं च प्रतिजानानस्यायम् अभिप्रायो॒ यत् परो मन्यते -- नैतद्-गोचरं परेभ्यः प्रतिपादयितुं पार्यत इति -- तद् अयुक्तं, निर्विकल्पकाध्यक्षापोहेन व्यवसाय-रूपस्य प्रत्यक्षस्य प्राग् एव साधितत्वात्, तद्-गोचरस्य कथञ्चिद् विकल्प-गम्यत्वेन शब्द-प्रतिपाद्यत्वात्। तद् यथानुमान-प्रतीतोऽर्थः परस्मै प्रतिपाद्यमानो वचन-रूपापन्नः परार्थम् अनुमानं, तथा प्रत्यक्ष-प्रतीतोऽपि परार्थं प्रत्यक्षं, पर-प्रत्यायनस्य तुल्यत्वाद्, वचन-व्यापारस्यैव भेदात्। तथा ह्य्॒ अनुमान-प्रतीतं प्रत्याययन्न् एवं वचनयत्य् -- अग्निर् अत्र धूमाद्, यत्र यत्र धूमस् तत्र तत्राग्निर्, यथा महानसादौ॑ वैधर्म्येण वाग्न्य्-अभावे न क्वचिद् धूमो, यथा जलाशयादौ, तथा च धूमोऽयं, तस्माद् धूमाद् अग्निर् अत्रेति, अव्युत्पन्न-विस्मृत-सम्बन्धयोस् तथैव प्रतिपादयितुं शक्यत्वात्। स्मर्यमाणे सम्बन्धे पुनर् एवम्॒ अग्निर् अत्र धूमोपपत्तेर्॑ वैधर्म्येण॒ अग्निर् अत्र, अन्यथा धूमानुपपत्तेः। प्रत्यक्ष-प्रतीतं पुनर् दर्शयन्न् एतावद् वक्ति॒ ‘पश्य राज गच्छतिऽ। ततश् च वचनाद् द्विविधाद् अपि समग्र-सामग्रीकस्य प्रतिपाद्यस्यानुमेय-प्रत्यक्षार्थ-विषया यतः प्रतीतिर् उल्लसत्य्, अतो द्वयोर् अपि परार्थतेत्य् आह : परस्य तद्-उपायत्वात् प्रतिपाद्यस्य प्रतीतिं प्रति प्रतिपादक-स्थ-प्रत्यक्षानुमान-निर्णीतार्थ-प्रकाशन-कारणत्वाद् इत्य् अर्थः। एतेन पूर्व-कारिकोक्तोपचार-कारणं च लक्षयति।
[न्या०वि० ११।२] यच् चोक्तं॒ ‘न शब्दात् परस्य प्रत्यक्षोत्पत्तिस्, तस्य विकल्प-जनकत्वात्, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षण-विषयत्वेन निर्विकल्पकत्वात्ऽ॑ -- तद् अयुक्तं, सामान्य-विशेषात्मकार्थ-विषयस्य निर्णय-रूपस्य तस्य कथञ्चिद् एक-विषयतया शब्दोत्पाद्यत्वाविरोधाद्, एवं-विधस्य च प्राग् एव समर्थनात्। चक्षुर्-आदि-सामग्रीतस् तद् उत्पद्यते, न शब्दाद् इति चेद्, अनुमानम् अपि प्रत्यक्षादि-निश्चिताद् धेतोर् अविस्मृत-सम्बन्धस्य प्रमातुर् उल्लसति, न शब्दाद्, अतस् तस्यापि परार्थता विशीर्येत। समर्थ-हेतु-कथनात् तत्र वचनस्य परार्थतेति चेद्, अत्रापि दर्शन-योग्यार्थ-प्रतिपादनाद् इति ब्रूमः। तन् न प्रत्यक्ष-परोक्षयोः पारार्थ्यं प्रति विशेषोपलब्धिर् इति मुच्यतां पक्ष-पातः।
[न्या०वि० १२।०] तद् एवं द्वयोर् अपि परार्थतां प्रतिपाद्य तत्-स्वरूपम् आह :
प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि च यद् वचः ।
प्रत्यक्षं प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् तद् उच्यते ॥ न्यायावतार १२ ॥
[न्या०वि० १२।१] यद् वचः प्रत्यक्ष-प्रतिपन्नार्थ-प्रतिपादि साक्षात्-कारि-ज्ञान-गोचर-कथन-चतुरं तत् प्रत्यक्षम् उच्यत इति सम्बन्धः। तच् च प्रत्यक्ष-रूपम् एवोच्यमानं प्रत्यक्षं, विप्रतिपन्नं प्रति पुनर् अनुमान-द्वारेणोच्यमानम् अनुमानम् एवेति च-शब्देनानेकार्थत्वाद् दर्शयति। वचनं कुतः प्रत्यक्षम् इत्य् आह : प्रतिभासस्य निमित्तत्वात् प्रतिपाद्य-प्रत्यक्ष-प्रकाश-हेतुत्वाद् उपचारेणोच्यत इत्य् अर्थः।
[न्या०वि० १३।०] अनुमानम् आह :
साध्याविनाभुवो हेतोर् वचो यत् प्रतिपादकम् ।
परार्थम् अनुमानं तत् पक्षादि-वचनात्मकम् ॥ न्यायावतार १३ ॥
[न्या०वि० १३।१] हिनोति गमयत्य् अर्थम् इति हेतुस्, तस्य साध्याविनाभुवः प्राङ् निरूपितस्य यद् वचः प्रतिपादकं सन्दर्शकं तद् अनुमान-प्रकाश-हेतुत्वात् परार्थम् अनुमानम्। तत् की-दृशं? इत्य् आह : पक्षो वक्ष्यमाण-लक्षणः स आदिर् येषां हेतु-दृष्टान्तोपनय-निगमनादीनां तानि तथा, तेषां वचनानि प्रतिपादका ध्वनयः॑ तान्य् एवात्मा स्वरूपं यस्य तत् पक्षादि-वचनात्मकम्।
[न्या०वि० १३।२] ननु च हेतु-प्रतिपादकं वचः परार्थम् अनुमानम् इत्य् अभिधाय तत् पक्षादि-वचनात्मकम् इति वदतः पूर्वापर-व्याहता वाचो युक्तिः। नैतद् अस्त्य्॑ एवं मन्यते नैकः प्रकारः परार्थानुमानस्य, किं तर्हि यथा परस्य सुखेन प्रमेय-प्रतीतिर् भवति तथा यत्नतः प्रत्यायनीयः। तत्र दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः। तद् यथा -- पक्षादयः पञ्च, तच्-छुद्धयश् च। तत्र यदा प्रतिपाद्यः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षोऽविस्मृत-दृष्टान्त-स्मार्य-प्रतिबन्ध-ग्राहक-प्रमाणो व्युत्पन्न-मतित्वाच् छेषावयवाभ्यूहन-समर्थश् च भवति, यद् वात्यन्ताभ्यासेन परिकर्मित-मतित्वात् तावतैव प्रस्तुत-प्रमेयम् अवबुध्यते, तदा हेतु-प्रतिपादनम् एव क्रियते, शेषाभिधानस्य श्रोतृ-संस्काराकारितया नैरर्थक्याद् इत्य्-आदौ हेतु-प्रतिपादनं सूत्र-कृता परार्थम् अनुमानम् उक्तम्। यदा तु प्रतिपाद्यस्य नाद्यापि पक्ष-निर्णयस्, तदाकाण्ड एव हेत्ûपन्यासोऽदृष्ट-मुद्गर-पातायमानः स्याद् इति पक्षोऽपि निर्दिश्यते। तथास्मर्यमाणे प्रतिबन्ध-ग्राहिणि प्रमाणे दृष्टान्तोऽपि वर्ण्येतान्यथा हेतोः सामर्थ्यानवगतेः। स्मृतेऽपि प्रमाणे दार्ष्टान्तिके योजयितुम् अजानानस्योपनयो दर्श्यते। तथापि साकाङ्क्षस्य निगमनम् उच्यते,ऽन्यथा निराकुल-प्रस्तुतार्थासिद्धेः। तथा यत्र पक्षादौ स्वरूप-विप्रतिपत्तिस् तत्र तच्-छुद्धिः प्रमाणेन कर्तव्येतरथा तेषां स्व-साध्यासाधनात्। सर्वेषां चामीषां साधनावयवत्वं, प्रतिपाद्य-प्रतीत्य्-उपायत्वात्।
[न्या०वि० १३।३] ननु च स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तं, न च स्वार्थानुमान-काले क्रमोऽयम् अनुभूयते, सम्बन्ध-वेदिनो हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीति-सिद्धेर्, न हि प्रतिपत्ता पक्षं कृत्वा ततो हेतुं निभालयति, नापि दृष्टान्तादिकं विरचयति, तथा प्रतीतेर् अभावात्। किं चान्वय-व्यतिरेकाभ्यां हेतोर् एव सामर्थ्यम् उन्नीयते, न पक्षादीनां, तद्-व्यतिरेकेणापि साध्य-सिद्धेः, तथापि तेषां साधनांशत्व-कल्पनेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। यदि च तत्-सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्षोपन्यास-मात्राद् एव साध्यावगतेर् हेतुर् आनर्थक्यम् अश्नुवीत, उत्तरावयवाश् च, एवं हि तत्-सामर्थ्यं सिद्ध्येन् नान्यथा। तस्माद् य एव पर-निरपेक्षं साध्यं बोधयति स एव हेतुः साधनं, न पक्षादय इति।
[न्या०वि० १३।४] अत्रोच्यते -- ‘स्व-निश्चयवत् पर-निश्चयोत्पादनं परार्थम् अनुमानम् उक्तम्ऽ॑ इत्य्-आदि यद् उक्तं तद् युक्तम् उक्तं, केवलं तद्-अर्थं न जानीषे, निश्चयापेक्षयैव ‘वत्ऽ-इना तुल्यताभिधानान्॑ न पुनः सर्व-सामान्यम् अभिप्रेतम्, अन्यथा ध्वनिम् अनुच्चारयन् स्वार्थानुमाने साध्यम् अवबुध्यत इति, तद्-अनुच्चारणेन पर-निश्चयोत्पादनं प्रसज्येत। न चैतद् अस्ति, शब्दानुच्चारणे पर-प्रतिपादनासम्भवात्, तद्-अर्थं शब्दाङ्गी-करणे येन येन विना पर-प्रतिपादनासम्भवस् तत् तद् उररी-कर्तव्यं, समान-न्यायात्। न च पक्षादि-विरहे प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं शक्यो, हेतु-गोचरादि-तत्-साध्यार्थ-प्रतीति-विकलतया तस्य साकाङ्क्षत्वात्। तथा च बुभुत्सितार्थ-बोधाभावाद् अप्रत्यायित एव तिष्ठेद्॑ अतस् तद्-बोधनार्थं पक्षादयो दर्शनीया इति तेऽपि साधनांशाः स्युः। यच् चोक्तम्॒ अन्वय-व्यतिरेकानुकरणाभावान् न साधनं, हेतु-मात्राद् अपि साध्य-सिद्धेस्, तद् अयुक्तम्, अविप्रतारकता-निश्चित-पुरुष-वचन-मात्राद् अप्य् अग्निर् अत्रेत्य्-आदि-रूपात् क्वचित् प्रमेयोऽर्थः सिध्यतीति हेतोर् अप्य् असाधनता-प्रसङ्गात्। तद्-विरहेणापि साध्य-सिद्धेः। युक्तं चैतद्, अविप्रतारक-वचनस्य प्राग् एव प्रामाण्य-प्रसाधनात्। यच् चोक्तम्॒ यद्य् अमीषां सामर्थ्यं स्यात्, तदा पक्ष-मात्राद् एव साध्य-प्रतीतेर् हेतोर् वैयर्थ्यं स्याद् इति, तद् अयुक्ततरं, भवत्-पक्षेऽपि समानत्वात्, तत्रापि समर्थ-हेत्ûपन्यासाद् एव साध्यावगतेर्, अन्यथा समर्थतायोगात्। पश्चात् तस्यैव प्रमाणेन समर्थनं सर्वत्र गृहीत-व्याप्तिकस्य च पुनः पक्ष-धर्मिण्य् उपसंहरणम् अनर्थकतां प्राप्नुवत् केन निवार्येत? तद्-अभावे हेतोः सामर्थ्यं नावगम्यते, तेन सार्थकम् इति चेत्, पक्षादीन् अपि विरहय्य प्रतिपाद्य-विशेषः प्रतिपादयितुं न पार्यत इति तेषाम् अपि सार्थकता न दुरुपपादेति मुच्यताम् आग्रहः। तस्माद् धेतुवत् पक्षादयोऽपि साधनं, हेतोर् अपि क्वचित् प्रतिपाद्ये तद्-अपेक्षतया निरपेक्षतासिद्धेर् इति। तद् इदं सकलम् आकलय्योक्तं तत् पक्षादि-वचनात्मकं इति।
[न्या०वि० १४।०] तद् एवम् अर्थतः पक्षादीन् प्रस्तुत्य तावत् पक्ष-लक्षणम् आह :
साध्याभ्युपगमः पक्षः प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृतः ।
तत्-प्रयोगोऽत्र कर्तव्यो हेतोर् गोचर-दीपकः ॥ न्यायावतार १४ ॥
[न्या०वि० १४।१] पच्यत इति पक्षो, व्यक्ती-क्रियत इति-भावः। किं-भूत इत्य् आह : साध्यस्यानुमेयस्याभ्युपगमोऽङ्गी-करणं, प्राश्निकादीनां पुरतः प्रतिज्ञा-स्वी-कार इत्य् अर्थः। किम् अभ्युपगम-मात्रम्? नेत्य् आह : प्रत्यक्षाद्य्-अनिराकृत इति। प्रत्यक्षं साक्षात्-कारि संवेदनम्, आदि-शब्दाद् अनुमान-स्व-वचन-लोका गृह्यन्ते, तैर् अनिराकृतोऽबाधितः पक्ष इति सम्बन्धः। तद् यथा -- ‘सर्वम् अनेकान्तात्मकम्ऽ, ‘अस्ति सर्व-ज्ञऽ॑ इत्य्-आदि वा। अयं च केवलम् एष्टव्यो, न पुनः परार्थानुमान-काले वचनेनाभिधातव्य इति यो मन्येत तं प्रत्याह॒ तस्य पक्षस्य प्रयोगोऽभिधानम् अत्र परार्थानुमान-प्रस्तावे कर्तव्यो विधेयः। कुत इत्य् आह : हेतोः प्राङ्-निरूपितस्य गोचर-दीपक इति, ‘निमित्त-कारण-हेतुषु सर्वासां प्रायो दर्शनम्ऽ॑ इति-वचनाद्, भाव-प्रधानत्वाच् च निर्देशस्य, विषय-सन्दर्शकत्वाद् इत्य् अर्थः। अयम् अत्राभिप्रायो॒ न हि सर्वत्र प्रतिवादिनः प्रक्रमाद् एव निर्णीत-पक्षस्य कूर्च-शोभा-पुरः-सरं हेतुर् उपन्यस्यते,ऽपि तु क्वचित् कथञ्चित्।
[न्या०वि० १५।०] ततो यदाद्यापि प्रतिपाद्यः पक्षार्थं न जानीते, तदाकाण्ड एव हेताव् उच्यमाने विषय-व्यामोहाद् भ्रान्ति-लक्षणो दोषः स्याद् इत्य् आह :
अन्यथा वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचर-मोहिनः ।
प्रत्याय्यस्य भवेद् धेतुर् विरुद्धारेकितो यथा ॥ न्यायावतार १५ ॥
[न्या०वि० १५।१] अन्यथेत्य् उक्त-विपरीताश्रयणे पक्ष-प्रयोगाकरण इत्य् अर्थः। वादिनो हेत्ûपन्यास-कर्तुर् अभिप्रेतोऽभिमतः स चासौ हेतु-गोचरश् च वाद्य्-अभिप्रेत-हेतु-गोचरस्॑ तत्र मुह्यति दोलायते तच् छीलश् च यस्, तस्य प्रत्याय्यस्य प्रतिवादिनो हेतुर् विरुद्धारेकितो भवेद् विरोध-शङ्का-कलङ्कितः स्याद् इत्य् अर्थः। ततश् च सम्यग्-घेताव् अपि ‘विपक्ष एवायं वर्ततऽ॑ इति व्यामोहाद् विरुद्ध-दूषणम् अभिदधीत, पक्षोपन्यासात् तु निर्णीत-हेतु-गोचरस्य नैष दोषः स्याद् इत्य् अभिप्रायः। अमुम् एवार्थं स्पष्ट-दृष्टान्तेनाह यथेति। तद्-उपन्यासार्थः।
धानुष्क-गुण-सम्प्रेक्षि-जनस्य परिविध्यतः ।
धानुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन गुणेतरौ ॥ न्यायावतार १६ ॥
[न्या०वि० १६।१] यथा लक्ष्य-निर्देशं विना धानुष्कस्येषुं प्रक्षिपतो यौ गुण-दोषौ तौ तद्-दर्शि-जनस्य विपर्यस्ताव् अपि प्रतिभातः -- गुणोऽपि दोषतया, दोषोऽपि वा गुणतया -- तथा पक्ष-निर्देशं विना हेतुम् उपन्यस्यतो वादिनो यौ स्वाभिप्रेत-साध्य-साधन-समर्थत्वासमर्थत्व-लक्षणौ गुण-दोषौ तौ प्राश्निक-प्रतिवाद्यादीनां विपरीताव् अपि प्रतिभात इति भावार्थः। अक्षरार्थस् तु धनुषा चरति धानुष्कस् तस्य गुणो लक्ष्य-वेध-प्रावीण्य-लक्षणस् तत्र प्रेक्षकाणां कुतूहलम् इति तस्यैवोपादानम्, अन्यथा दोषोऽपि द्रष्टव्यः। तत्-सम्प्रेक्षि-जनस्य तत्-सम्प्रेक्षण-शील-लोकस्य परिविध्यतो यथा -- कथञ्चिद् बाणं मुञ्चत इत्य् अर्थः॑ धनुष्कस्य विना लक्ष्य-निर्देशेन चाप-धरस्य वेध्य-निष्टङ्कनम् ऋते यौ गुणेतरौ गुण-दोषौ तौ यथा विरुद्धारेकितौ भवतस्, तथा वादिनोऽपीत्य् अर्थः। तस्माद् अविज्ञात-तद्-अर्थे प्रतिवादिनि वादि-धानुष्केण पक्ष-लक्ष्यं निर्दिश्यैव हेतु-शरः प्रोक्तव्य इति स्थितम्।
[न्या०वि० १७।०] साम्प्रतं हेतोर् लक्षणावसरस्, तच् च स्वार्थानुमानवन् निर्विशेषं द्रष्टव्यं॑ प्रयोगस् तु तत्र न दर्शितः, स्वार्थानुमानस्य बोध-रूपत्वाद्॑ इह तु दर्शनीयः, परार्थानुमानस्य वचन-रूपत्वाद्॑ अतस् तं दर्शयति॒
हेतोस् तथोपपत्त्या वा स्यात् प्रयोगोऽन्यथापि वा ।
द्वि-विधोऽन्यतरेणापि साध्य-सिद्धिर् भवेद् इति ॥ न्यायावतार १७ ॥
[न्या०वि० १७।१] स्वार्थानुमान-प्रस्तावे हि पर-प्रणीत-लक्षणान्तर-व्यपोहेन साध्य-व्यतिरेकात् सामस्त्येन हेतोर् व्यावृत्तिर् एवैकं लक्षणम् इति निर्णीतम्। परार्थानुमानेऽपि तद् एव प्रकाशनीयं, वचन-रचना तु क्वचित् कथञ्चित् प्रवर्तत इत्य् अभिप्रायवांस् तद्-द्वैविध्यम् आह : हेतोर् द्विविधः प्रयोगः स्याद् इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह : तथैव साध्य-सद्भाव एवोपपत्तिर् विद्यमानता, तया तथोपपत्त्या, यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर् इति। अन्यथापि वेत्य् अनेनावयवे समुदायोपचाराद् अन्यथानुपपत्तिं लक्षयति। अन्यथा साध्य-व्यतिरेकेऽनुपपत्तिर् अविद्यमानतैव तया वान्यथानुपपत्त्या हेतोः प्रयोगः स्याद्, यथाग्निर् अत्र, धूमस्यान्यथानुपपत्तेर् इति। ‘एते च द्वे अप्य् एकस्मिन् साध्ये प्रयोक्तव्येऽ॑ इति यो मन्येत,तच्-छिष्यणार्थं आहान्यतरेणापि तथोपपत्ति-प्रयोगेणान्यथानुपपत्ति-प्रयोगेण वा साध्यस्य प्रतिपिपादयिषितार्थस्य सिद्धिर् निष्पत्तिः प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोहणं भवेद्, इति यस्मात्, तस्मान् न द्वे अपि प्रयोक्तव्ये, प्रयोग-द्वयेऽपि यस्माद् वचन-रचना भिद्यते, नार्थः॑ प्रयोगस्य च साध्य-साधनं फलं॑ तच् चेद् एकेनैव सिध्यति, द्वितीय-प्रयोगः केवलं वक्तुर् अकौशलमाचक्षीत, नैरर्थक्याद् इत्य् अभिप्रायः।
[न्या०वि० १८।०] अधुना दृष्टान्त-लक्षणावसरः। स च द्वेधा॒ साधर्म्येण वैधर्म्येण च। तत्र साधर्म्य-दृष्टान्तम् अधिकृत्याह॒
साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर् यत्र निश्चीयते-तराम् ।
साधर्म्येण स दृष्टान्तः सम्बन्ध-स्मरणान् मतः ॥ न्यायावतार १८ ॥
[न्या०वि० १८।१] दृष्टयोर् अवलोकितयोः सामर्थ्यात् साध्य-साधनयोर् अन्तः परिनिष्ठितिः अन्वयाद् व्यतिरेकाद् वा साध्य-साधन-भाव-व्यवस्थिति-निबन्धनास्मिन्न् इति दृष्टान्तः॑ समानो धर्मोऽस्येति सधर्मा तद्-भावः साधर्म्यं तेन साधर्म्येण। स किं-विधो भवतीत्य् आह : साध्यं जिज्ञासितार्थात्मकं, साधनं तद्-गमको हेतुः, तयोः साध्य-साधनयोर् व्याप्तिर्, इदम् अनेन विना न भवतीत्य्-एवं-रूपा, यत्र क्वचिन् निश्चीयते-तरां अतिशयेन निर्णीयते स साधर्म्य-दृष्टान्तः। यथाग्निर् अत्र, धूमस्य तथैवोपपत्तेर्, महानसादिवद् इति। अयं चाविस्मृत-प्रतिबन्धे प्रतिवादिनि न प्रयोक्तव्य इत्य् आह : सम्बन्ध-स्मरणाद् इति, ल्यब्-लोपे पञ्चमी, प्राग्-गृहीत-विस्मृत-सम्बन्ध-स्मरणम् अधिकृत्य मतोऽभिप्रेतोऽयं नीतिविदाम्, नान्यदा। यदा हि प्रतिपाद्योऽद्यापि सम्बन्धं साध्याविनाभावित्व-लक्षणं नावबुध्यते, तदा प्रमाणेन सम्बन्धं ग्राहणीयो, न दृष्टान्त-मात्रेण, न हि सह-दर्शनाद् एव क्वचित् सर्वत्रेदम् अमुना विना न भवतीति सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। गृहीते च प्रतिबन्धे स्मर्यमाणे केवलं हेतुर् दर्शनीयः, तावतैव बुभुत्सितार्थ-सिद्धेर् दृष्टान्तो न वाच्यो, वैयर्थ्यात्। यदा तु गृहीतोऽपि विस्मृतः कथञ्चित् सम्बन्धस्, तदा तत्-स्मरणार्थं दृष्टान्तः कथ्यते।
[न्या०वि० १८।२] ननु च कथं त्रि-काल-समस्त-देश-व्यापि-सम्बन्धावगतिः? न तावन् निर्णयात्मकम् अपि प्रत्यक्षं देश-कालान्तर-संचरिष्णुनोः साध्य-साधनयोः सम्बन्धं निरीक्षितुं क्षमते, सन्निहितेऽर्थे विशदाध्यवसायेन प्रवृत्तेः। नापि शब्दात् तन्-निर्णयस्, तस्य परोपदेश-रूपतया स्वार्थानुमानाभाव-प्रसङ्गात्, तत्र परोपदेशाभावात्, तद्-अभावे सम्बन्धासिद्देस्, तद्-असिद्धाव् अनुमानानुत्थानाद् इति। अनुमानात् सम्बन्ध-ग्रहणे निरवधिर् अनवस्थानुषज्येत, सम्बन्ध-ग्राहिणोऽप्य् अनुमानस्य पुनः सम्बन्धान्तर-ग्रहण-सव्यपेक्षत्वाद् इति। अत्रोच्यते -- प्रत्यक्षानुमाने द्वे एव प्रमाणे इति येषां मिथ्याभिनिवेशस्, तेषां एष दोषो नास्माकम्, अन्वय-व्यतिरेक-ग्राहि-प्रत्यक्षानुपलम्भोत्तर-काल-भाविनोऽव्यभिचरित-त्रि-काल-व्यापि-गोचरस्य मति-निबन्धनस्योह-संज्ञितस्य प्रमाणान्तरस्य सम्बन्ध-ग्राहितयेष्टत्वात्, तद्-अनिष्टौ दृष्ट-व्यवहार-विलोप-प्रसङ्गात्, तद्-विलोपे च विचारानर्थक्य-प्राप्तेर् इति। अत्र प्रकरणे पुनर् अनुमानात् पार्थक्येनोहो न दर्शितः, सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-प्रवृत्तत्वाद् अस्य, शाब्दं तु पृथक् समर्थितं, तस्यात्रैव परार्थानुमानोपयोगित्वाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० १९।०] इदानीं वैधर्म्य-दृष्टान्तम् उपदर्शयन्न् आह :
साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य् असम्भवः ।
ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधर्म्येणेति स स्मृतः ॥ न्यायावतार १९ ॥
[न्या०वि० १९।१] विसदृशो धर्मोऽस्येति विधर्मा, तद्-भावो वैधर्म्यं, तेन वैधर्म्येण दृष्टान्तः। की-दृश इत्य् आह : साध्ये गम्ये निवर्तमानेऽसम्भवति तु-शब्दोऽवधारणार्थो भिन्न-क्रमः, स च साधनस्यापि गमकस्याप्य् असम्भव एवेत्य् अत्र द्रष्टव्यः, ख्याप्यते प्रतिपाद्यते यत्र क्वचिद् दृष्टान्ते स वैधर्म्येण भवतीति-शब्देन सम्बन्ध-स्मरणाद् इति।
[न्या०वि० २०।०] इदम् अत्रापि सम्बध्नाति॒ अस्यापि स्मर्यमाणे सम्बन्धे प्रयोगायोगाद् इति किम् अर्थं विस्मृत-सम्बन्ध एव प्रतिवादिनि दृष्टान्तः प्रयुज्यते, नान्यदेति पर-वचनावकाशम् आशङ्क्याह॒
अन्तर्-व्याप्त्यैव साध्यस्य सिद्धेर् बहिर्-उदाहृतिः ।
व्यर्था स्यात् तद्-असद्भावेऽप्य् एवं न्याय-विदो विदुः ॥ न्यायावतार २० ॥
[न्या०वि० २०।१] अन्यदाहि स्मर्यमाणे वा सम्बन्धे प्रयुज्येतागृहीते वा। यद्य् आद्यः पक्षः, सोऽयुक्तः। यदा सर्वत्र साध्याविनाभाविनं हेतुं स्मरति प्रतिपाद्यस्, तदा पक्षेऽपि तम् अवबुध्य कथं साध्यं न प्रतिपद्येत? ततश् चान्तः पक्ष-मध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वम् अन्तर्-व्याप्तिस्, तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेर् बहिर् विवक्षित-धर्मिणोऽन्यत्र दृष्टान्त-धर्मिण्य् उदाहृतिर् व्याप्ति-दर्शन-रूपा व्यर्था निष्प्रयोजना, तत्-प्रत्याय्यार्थाभावाद् इति। द्वितीय-पक्षस्यापि निर्दोषतां निरस्यन्न् आह : तद्-असद्भावेऽप्य् एवं सम्बन्धाग्रहणाद् अन्तर्-व्याप्त्य्-अभावेऽप्य् एवम् इति व्यर्थैव बहिर्-उदाहृतिः। न हि सह-दर्शनात् क्वचित् सर्वत्र तद्-रूपता सिध्यति, व्यभिचार-दर्शनात्। तस्माद् अगृहीत-सम्बन्धे प्रतिपाद्ये प्रमाणेन प्रतिबन्धः साध्यः। तत्-सिद्धौ तत एव साध्य-सिद्धेर् अकिञ्चित्-करी दृष्टान्तोदाहृतिर् इति न्याय-विदो न्याय-विद्वांसो विदुर् अवबुध्यन्त इति। इह च प्रकरणे शेषावयवानाम् उपनय-निगमन-शुद्धि-पञ्चक-लक्षणानां सङ्क्षिप्त-रुचि-सत्त्वानुग्रह-परत्वाद् अस्य, यद्य् अपि साक्षाल् लक्षणं नोक्तं, तथाप्य् अत एव प्रतिपादितावयव-त्रयाद् बुद्धिमद्भिर् उन्नेयं॑ यतोऽवयवापेक्षया जघन्य-मध्यमोत्कृष्टास् तिस्रः कथा भवन्ति। तत्र हेतु-प्रतिपादन-मात्रं जघन्या। द्व्य्-आद्य्-अवयव-निवेदनं मध्यमा। सम्पूर्ण-दशावयव-कथनम् उत्कृष्टा। तत्रेह मध्यमायाः साक्षात् कथनेन जघन्योत्कृष्टे अर्थतः सूचयति, तद्-सद्भावस्य प्रमाण-सिद्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २१।०] एवं पक्षादि-लक्षणं प्रतिपाद्येदानीं हेय-ज्ञाने सत्य् उपादेयं विविक्ततरं वेद्यत इति तद्-व्युदस्ताः पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताभासा वक्तव्याः। तत्र तावत् पक्ष-लक्षण-व्युदस्तान् पक्षाभासान् आह :
प्रतिपाद्यस्य यः सिद्धः पक्षाभासोऽक्ष-लिङ्गतः ।
लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितोऽनेकधा मतः ॥ न्यायावतार २१ ॥
[न्या०वि० २१।१] पक्ष-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणत्वाच् च पक्षवद् आभासत इति पक्षाभासः। असाव् अनेकधानेक-प्रकारो मत इति सम्बन्धः। कथम् इत्य् आह : प्रतिपाद्यस्य प्रतिवादिनो यः कश्चित् सिद्धः प्रतीताव् आरूढ एव स पक्षाभासः, साध्यस्यैव पक्षत्वात्, सिद्धस्य साधनानर्हत्वाद्, अतिप्रसक्तेः। तथाक्ष-लिङ्गतोऽध्यक्ष-हेतुभ्यां लोक-स्व-वचनाभ्यां च बाधितस् तिरस्-कृतो यः स पक्षाभासः। तत्र प्रतिपाद्य-सिद्धो यथा॒ पौद्गलिको घटः, सौगतं वा प्रति॒ सर्वं क्षणिकम् इत्य्-आदि। प्रत्यक्ष-बाधितो यथा॒ निरंशानि स्वलक्षणानि, परस्पर-विविक्तौ वा सामान्य-विशेषाव् इति। अनुमान-बाधितो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञ इति। लोक-बाधितो यथा॒ गम्या माता इति। स्व-वचन-बाधितो यथा॒ न सन्ति सर्वे भावा इति।
[न्या०वि० २२।०] साम्प्रतं हेतु-लक्षणं स्मारयंस् तद्-अपास्तान् हेत्व्-आभासान् आह :
अन्यथानुपपन्नत्वं हेतोर् लक्षणम् ईरितम् ।
तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस् तद्-आभता ॥ न्यायावतार २२ ॥
[न्या०वि० २२।१] हेतोर् लक्षणम् असाधारण-धर्म-रूपं यद् ईरितं गमितम् अनेकार्थत्वाद् वा प्रतिपादितं स्वार्थानुमान-प्रस्तावे यद् उतान्यथानुपपन्नत्वम् इति तस्याप्रतीतिर् अनध्यवसायः, सन्देहो दोलायमानता, विपर्यासो वैपरीत्य-निर्णयो॑ऽप्रतीतिश् च सन्देहश् च विपर्यासश् चेति द्वन्द्वः॑ पश्चात् तदा सह तत्-पुरुषस्॒ तैस् तद्-अप्रतीति-सन्देह-विपर्यासैस्॑ तद्-आभताआभानम् आभा तस्येव सम्यग्-घेतोर् इवाभास्येति तद्-आभस्, तद्-भावस् तत्ता, हेत्व्-आभासता भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० २३।०] अधुना येन लक्षणेन यन्-नामा हेत्व्-आभासो भवति तद् दर्शयति॒
असिद्धस् त्व् अप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते ।
विरुद्धो योऽन्यथाप्य् अत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु ॥ न्यायावतार २३ ॥
[न्या०वि० २३।१] यः कश्चिद् अप्रतीतः प्रतीत्या अगोचरी-कृतोऽनिश्चितः सोऽसिद्ध-नामा हेत्व्-आभासः। तु-शब्दस् त्रयस्यापि भेदोद्द्योतकः। यस् त्व् अन्यथैव साध्यं विनैव विपक्ष एवेति यावद्, उपपद्यते सम्भवति स विरुद्धाभिधानः। यः पुनर् अन्यथापि साध्य-विपर्ययेणापि युक्तो घटमानको,ऽपि-शब्दात् साध्येनापि, सोऽत्र व्यतिकरेऽनैकान्तिक-संज्ञो ज्ञातव्य इति। तत्र प्रतिप्राणि-प्रसिद्ध-प्रमाण-प्रतिष्ठितानेकान्त-विरुद्ध-बुद्धिभिः कणभक्षाक्षपाद-बुद्धादि-शिष्यकैर् उपन्यस्यमानाः सर्व एव हेतवः, तद् यथैकान्तेनानित्यः शब्दो नित्यो वा, सत्त्वाद्, उत्पत्तिमत्त्वात्, कृतकत्वात्, प्रत्यभिज्ञायमानत्वाद् इत्य्-आदयो विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकतां स्वी-कुर्वन्तीत्य् अवगन्तव्यम्।
[न्या०वि० २३।२] तथा ह्य्॒ अनित्यैकान्ते तावद् असिद्धाः सर्व एव हेतवश्, चाक्षुषत्ववत् तेषां ध्वनाव् अविद्यमानत्वाद्, असद्-आदि-व्यवच्छेदेनालीक-संवृति-विकल्पितत्वात्, पारमार्थिकत्वे त्व् एकस्यानेक-रूपापत्त्यानेकान्त-वादापत्तेः, कल्पना-रचित-सत्ताकानां च सर्व-शक्ति-विरह-रूपतया निःस्वभावत्वात्, तथापि तेषां साधनत्वे साध्यम् अपि निःस्वभावम् इति खर-विषाणं शश-विषाणस्य साधनम् आपद्यत इति शोभनः साध्य-सधन-व्यवहारः। सर्व एवायम् अनुमानानुमेय-व्यवहारो बुद्ध्य्-आरूढेन धर्म-धर्मि-न्यायेन न बहिः-सद्-असत्त्वम् अपेक्षते, तेनायम् अदोष इति चेद्, एवं तर्हि चाक्षुषत्वम् अपि शब्दे बुद्ध्याध्यारोप्य हेतुतयोच्यमानं नासिद्धतयोद्भावनीयं, विशेषाभावात्। अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदेन चाक्षुषत्वं बुद्ध्याध्यारोपयितुंपार्यते, न यथा कथञ्चिन्, न चासौ शब्देऽस्त्य्, अचक्षुर्-ग्राह्यत्वात् तस्य, तेनायम् अदोष इति चेत्, कोऽयम् अचाक्षुषत्व-व्यवच्छेदो नाम॒ व्यवच्छेद-मात्रं नीरूपं, व्यवच्छिन्नं वा स्वलक्षणं, व्यवच्छेदिका वा बुद्धिः स्वांश-मग्नापि बहिर्-वस्तु-ग्रहण-रूपतया प्लवमाना? नापरो वस्तु-धर्मो यत्र भेदाभेद-विकल्प-द्वारेणा दूषणं दित्सुर् भवान् इति चेत्, तर्हि स शब्दे नास्तीति कैषा भाषा? एवं हि नभः-पुण्डरीकं तत्र नास्तीति सत्त्वादिकम् अपि कल्पयितुं न शक्यम् इति प्रसज्येत। किं च, ते साधन-धर्मा धर्मिणि भवन्तोऽपि न भवद्-दर्शने प्रतीतिम् आरोहन्ति, प्रत्यक्षस्य विकल्प-विकलतया धर्म-निर्णय-शून्यत्वात्, तद्-उत्तर-काल-भाविन्या वासना-प्रबोध-जन्याया विकल्प-बुद्धेः स्वांश-ग्रहण-पर्यवसित-शरीरत्वेन बहिः-स्वलक्षणे प्रवेशाभावात्, ततश् चाप्रतीतत्वात् सर्वस्यासिद्धत्वम्।
[न्या०वि० २३।३] नित्यैकान्तेऽपि धर्मिणोऽत्यन्त-व्यतिरिक्तानाम् अपारमार्थिकानां वा स्व-साधन-धर्माणां प्रमाणेनाप्रतीतत्वाद् असिद्धता द्रष्टव्या, धर्मिणोऽविनिर्लुठित-रूपाणां पारमार्थिकानां सकल-धर्माणां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धत्वेन निह्नोतुम् अशक्यत्वाद् इति।
[न्या०वि० २३।४] तथा विरुद्धतापि पक्ष-द्वयेऽपि सर्व-साधन-धर्माणाम् उन्नेयानेकान्त-प्रतिबद्ध-स्वभावत्वेन तत्-साधन-प्रवणत्वात्। एतच् चोत्तरत्र वक्ष्यामः।
[न्या०वि० २३।५] एवं पक्ष-द्वयेऽपि निर्दिश्यमानाः सर्व एव हेतवोऽनैकान्तिकताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति, परस्पर-विरुद्धाव्यभिचारित्वात्, समान-युक्त्य्-उपन्यासेन विपक्षेऽपि दर्शयितुं शक्यत्वात्।
[न्या०वि० २३।६] तथा हि॒ अनित्य-वादी नित्य-वादिनं प्रति प्रमाणयति। सर्वं क्षणिकं, सत्त्वाद्, अक्षणिके क्रम-यौगपद्याभ्याम् अर्थ-क्रिया-विरोधाद्, अर्थ-क्रिया-कारित्वस्य च भाव-लक्षणत्वात्, ततोऽर्थ-क्रिया व्यावर्तमाना स्व-क्रोडी-कृतां सत्तां व्यावर्तयेद् इति क्षणिकत्व-सिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियायां क्रमेण प्रवर्तितुम् उत्सहते, पूर्वार्थ-क्रिया-करण-स्वभावोपमर्द-द्वारेणोत्तर-क्रियायां प्रवृत्तेर्, अन्यथा पूर्वार्थ-क्रिया-करणाविराम-प्रसङ्गात्॑ तत्-स्वभाव-प्रच्यवे च नित्यतापयात्य्, अतादवस्थ्यस्यानित्य-लक्षणत्वात्। नित्योऽपि क्रम-वर्तिनं सह-कारि-कारणम् अर्थम् उदीक्षमाणस् तावद् असीत्, पश्चात् तम् आसाद्य क्रमेण कार्यं कुर्याद् इति चेन्, न, सह-कारि-कारणस्य नित्येऽकिञ्चित्-करत्वाद्, अकिञ्चित्-करस्यापि प्रतीक्षणेऽनवस्था-प्रसङ्गात्। नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थ-क्रियां कुरुते,ऽध्यक्ष-विरोधात्। न ह्य् एक-कालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिद् उपलभते॑ करोतु वा, तथाप्य् आद्य-क्षण एव सकल-क्रिया-परिसमाप्तेर् द्वितीयादि-क्षणेष्व् अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोर् एकस्मिन् विरुद्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २३।७] नित्य-वादी पुनर् एवं प्रमाणयति॒ सर्वं नित्यं सत्त्वात्। क्षणिके सद्-असत्-कालयोर् अर्थ-क्रिया-विरोधात्, तल्-लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातीति, ततो निवर्तमानम् अनन्य-शरणतया नित्यत्वं साधयति। तथा हि॒ क्षणिकोऽर्थः सद् वा कार्यं कुर्यात्, असद् वा, गत्य्-अन्तराभावात्। न तावद् आद्यः पक्षः, सम-समय-वर्तिनि व्यापारायोगात्, सकल-भावानां परस्परं कार्य-कारण-भाव-प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच् च। नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्य-करण-शक्ति-विकलत्वात्। अन्यथा शश-विषाणादयोऽपि कार्य-करणायोत्सहेरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० २३।८] तद् एवम् एकान्त-द्वयेऽपि ये ये हेतवस् ते ते युक्तेः समानतया विरुद्धं न व्यभिचरन्त्य्॑ अविचारित-रमणीयतया मुग्ध-जन-ध्य्-आन्ध्यं चोत्पादयन्तीति विरुधाव्यभिचारिणोऽनैकान्तिकाः, सर्व-वस्तु-धर्माणां वस्तुतोऽनेकान्त-प्रतिबद्धत्वाद् इति। तस्माद् अमी सर्व एव हेतवः सन्तोऽनेकान्तम् अन्तरेण नोपपद्यन्त इति तम् एव प्रतिपादयितुम् ईशते॑ विमूढ-बुद्धिभिः पुनः विपक्ष-साधनार्थम् उपन्यस्यमाना विवक्षयासिद्ध-विरुद्धानैकान्तिकताम् आबिभ्रतीति स्थितम्।
[न्या०वि० २४।०] तद् एवं हेत्व्-आभासान् प्रतिपाद्य दृष्तान्त-लक्षण-व्युदस्तान् दृष्टान्ताभासान् आह :
साधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
अपलक्षण-हेत्ûत्थाः साध्यादि-विकलादयः ॥ न्यायावतार २४ ॥
[न्या०वि० २४।१] साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शयितुम् अभिप्रेतं यस्मिंस् तत् साधर्म्यं, तेन। अत्र व्यतिकरे॑ दूष्यन्त इति दोषाः। दृष्टान्ता एव दोषा दृष्टान्त-दोषाः दृष्टान्ताभासा इत्य् अर्थः। न्याय-विद्-ईरिता विद्वद्भिर् गदिताः॑ साध्यं गम्यम्॑ आदि-शब्दात् साधनोभय-परिग्रहस्॑ तद्-विकलास् तच्-छून्याः। आदि-शब्दात् सन्दिग्ध-साध्य-साधनोभय-धर्मा गृह्यन्ते। किं-भूता एते इत्य् आह : अपगतं लक्षणं येभ्यस् ते तथा, ते च ते हेतवः, तेभ्य उत्था उत्थानं येषां तेऽपलक्षण-हेत्ûत्थाः॑ इदं च प्रायिकं विशेषणं, सम्यग्-घेताव् अपि वक्तृ-दोष-वशात् दृष्टान्ताभासतोपपत्तेर्, यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, श्रावणत्वाद्, घटवद् इत्य्-आदि।
[न्या०वि० २४।२] तत्र साध्य-विकलो यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानं, प्रमाणत्वात्, प्रत्यक्षवत्॑ प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता-विकलत्वात्॑ तद्-भ्रान्तत्वे सकल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च प्रमाण-प्रमेयाभावान् न किञ्चित् केनचित् साध्यत इति भ्रान्त-वादिनो मूकतापनिपद्येत। साधन-विकलो यथा॒ जाग्रत्-संवेदनं भ्रान्तं, प्रमाणत्वात्, स्वप्न-संवेदनवत्॑ स्वप्न-संवेदनस्य प्रमाणता-वैकल्यात् तत्-प्रत्यनीक-जाग्रत्-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वाद् इति। उभय-विकलो यथा॒ नास्ति सर्व-ज्ञः, प्रत्यक्षाद्य्-अनुपलब्धत्वात्, घटवद्॑ घटस्य सत्त्वात् प्रत्यक्षादिभिर् उपलब्धत्वाच् च। सन्दिग्ध-साध्य-धर्मो यथा॒ वीत-रागोऽयं, मरण-धर्मत्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे वीत-रागत्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, विशिष्ट-चेतो-धर्माणां विशिष्ट-व्याहारादि-लिङ्ग-गम्यत्वाद् रथ्या-पुरुषे तन्-निर्णयस्याप्य् अभावाद् इति। सन्दिग्ध-साधन-धर्मो यथा॒ मरण-धर्मायं पुरुषो, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे रागादिमत्त्वस्य सन्दिग्धत्वाद्, वीत-रागस्यापि तथा सम्भवाद् इति। सन्दिग्धोभय-धर्मो यथासर्व-ज्ञोऽयं, रागादिमत्त्वाद्, रथ्या-पुरुषवद्॑ रथ्या-पुरुषे प्रदर्शित-न्यायेनोभयस्यापि सन्दिग्धत्वाद् इति।
[न्या०वि० २४।३] ननु च परैर् अन्यद् अपि दृष्टान्ताभास-त्रयम् उक्तम्, तद् यथानन्वयोऽप्रदर्शितान्वयो विपरीतान्वयश् चेति। तत्रानन्वयो यथा॒ रागादिमान् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद्, इष्ट-पुरुषवद् इति। यद्य् अपि किलेष्ट-पुरुषे रागादिमत्त्वं वक्तृत्वं च साध्य-साधन-धर्मौ दृष्टौ, तथापि यो यो वक्ता स स रागादिमान् इति व्याप्त्य्-असिद्धेर् अनन्वयोऽयं दृष्टान्तः। तथाप्रदर्शितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, घटवद् इति। अत्र यद्य् अपि वास्तवोऽन्वयोऽस्ति, तथापि वादिना वचनेन न प्रकाशित इत्य् अप्रदर्शितान्वयो दृष्टान्तः। विपरितान्वयो यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति हेतुम् अभिधाय यद् अनित्यं तद् कृतकं घटवद् इति, विपरीत-व्याप्ति-दर्शनाद् विपरीतान्वयः, साधर्म्य-प्रयोगे हि साधनं साध्याक्रान्तम् उपदर्शनीयम्, इह तु विपर्यास-दर्शनाद् विपरीतता। तद् एतद् भवद्भिः कस्मान् नोक्तम् इति।
[न्या०वि० २४।४] अत्रोच्यते -- परेषां न सुपर्यालोचितम् एतद् दृष्टान्ताभास-त्रयाभिधानम् इति ज्ञापनार्थम्। तथा हि॒ न तावद् अनन्वयो दृष्टान्ताभासो भवितुम् अर्हति। यदि हि दृष्टान्त-बलेन व्याप्तिः साध्य-साधनयोः प्रतिपाद्येत, ततः स्याद् अनवयो दृष्टान्ताभासः, स्व-कार्याकरणाद्, यदा तु पूर्व-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्राहि-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोदाहृतिर् इति स्थितं, तदानन्वयत्व-लक्षणो न दृष्टान्तस्य दोषः, किं तर्हि हेतोर् एव, प्रतिबन्धस्याद्यापि प्रमाणेनाप्रतिष्ठितत्वात्, प्रतिबन्धाभावे चान्वयासिद्धेः। न च हेतु-दोषोऽपि दृष्टान्ते वाच्यो,ऽतिप्रसङ्गाद् इति। तथाप्रदर्शितान्वय-विपरीतान्वयाव् अपि न दृष्टान्ताभासतां स्वी-कुरुतो,ऽन्वयाप्रदर्शनस्य विपर्यस्तान्वय-प्रदर्शनस्य च वक्तृ-दोषत्वात्, तद्-दोष-द्वरेणापि दृष्टान्ताभास-प्रतिपादने तद्-इयत्ता विशीर्येत, वक्तृ-दोषाणामानन्त्यात्। वक्तृ-दोषत्वेऽपि परार्थानुमाने तत्-कौशलम् अपेक्षत इति। एवं चोपन्यासे न बुभुत्सितार्थ-साधकाव् अतो दृष्टान्ताभासाव् एताव् इति चेद्, एवं तर्हि करणापाटवादयोऽपि दृष्टान्ताभासा वाच्याः। तथा हि॒ करण-पाटव-व्यतिरेकेणापि न पर-प्रत्यायनं समस्ति, विस्पष्ट-वर्णाग्रहणे व्यक्ततया तद्-अर्थावगमाभावाद् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० २५।०] तद् एवं साधर्म्येण दृष्टान्ताभासान् प्रतिपाद्य वैधर्म्येणाह॒
वैधर्म्येणात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिताः ।
साध्य-साधन-युग्मानाम् अनिवृत्तेश् च संशयात् ॥ न्यायावतार २५ ॥
[न्या०वि० २५।१] साध्याभावः साधनाभाव-व्याप्तौ दर्शयितुम् अभिप्रेतो यस्मिंस् तद् वैधर्म्यम्, तेनात्र दृष्टान्त-दोषा न्याय-विद्-ईरिता इति दत्तार्थम्। साध्य-साधन-युग्मानां गम्य-गमकोभयानाम् अनिवृत्तेर् अनिवर्तनाच्, च-शब्दस्य व्यवहित-प्रयोगत्वात् संशयाच् च निवृत्ति-सन्देहाच् चेत्य् अर्थः। तद् अनेन षड् दृष्टान्ताभासाः सूचितास्, तद् यथा -- साध्याव्यतिरेकी, साधनाव्यतिरेकी, साध्य-साधनाव्यतिरेकी, तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकः, सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकश् चेति।
[न्या०वि० २५।२] तत्र साध्याव्यतिरेकी यथा॒ भ्रान्तम् अनुमानम्, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनर् भ्रान्तं न भवति न तत् प्रमाणं, तद् यथा स्वप्न-ज्ञानम् इति॑ स्वप्न-ज्ञानाद् भ्रान्ततानिवृत्तेः साध्याव्यतिरेकित्वम् इति। साधनाव्यतिरेकी यथा॒ निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं, प्रमाणत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यत् पुनः सविकल्पकं न तत् प्रमाणं, तद् यथानुमानम्॑ अनुमानात् प्रमाणतानिवृत्तेः साधनाव्यतिरेकित्वम् इति। उभयाव्यतिरेकी यथा॒ नित्यानित्यः शब्दः, सत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् न नित्यानित्यः स न सन्, तद् यथा -- घटो॑ घटाद् उभयस्याप्य् अव्यावृत्तेर् उभयाव्यतिरेकित्वम् इति। तथा सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेको यथासर्व-ज्ञा अनाप्ता वा कपिलादयो,आर्य-सत्य-चतुष्टयाप्रतिपादकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनः सर्व-ज्ञ आप्तो वाऽसाव् आर्य-सत्य-चतुष्टयं प्रत्यपीपदत्, तद् यथा -- शौद्धोदनिर् इति। अयं च साध्याव्यतिरेकी वार्य-सत्य-चतुष्टयस्य दुःख-समुदय-मार्ग-निरोध-लक्षणस्य प्रमाण-बाधितत्वेन तद्-भाषकस्यासर्वज्ञतानाप्ततोपपत्तेः। केवलं तन्-निराकारक-प्रमाण-सामर्थ्य-पर्यालोचन-विकलानां सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकतया प्रतिभातीति तथोपन्यस्तः। तथा हि॒ यद्य् अप्य् आर्य-सत्य-चतुष्टयं शौद्धोदनिः प्रतिपादितवांस्, तथापि सर्वज्ञताप्तते तस्य न सिद्ध्यतः, ताभ्यां सहार्य-सत्य-चतुष्टय-प्रतिपादनस्यान्यथानुपपत्त्य्-असिद्धेर्, असर्व-ज्ञानाप्तेनापि पर-प्रतारणाभिप्राय-प्रवृत्त-निपुण-बुद्धि-शठ-पुरुषेण तथा-विध-प्रतिपादनस्य कर्तुं शक्यत्वात्। तस्माच् छौद्धोदनेः सकाशाद् असर्व-ज्ञतानाप्तता-लक्षणस्य साध्यस्य व्यावृत्तिः सन्दिग्धेति सन्दिग्ध-साध्य-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेको यथा॒ऽनादेय-वाक्यः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो रागादिमत्त्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यः पुनर् आदेय-वाक्यो, न स रागादिमांस्, तद् यथा -- सुगत इति। यद्य् अपि तद्-दर्शनानुरक्तान्तः-करणाणां सुगतस्यादेय-वचनता सिद्धि-सौध-मध्यारूढा, तथापि रागादिमत्त्वाभावस् तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैधुर्यात् सन्देह-गोचर-चारिताम् अनुभवत्य्, अतः सुगताद् रागादिमत्ता-व्यावृत्ति-संशयात् सन्दिग्ध-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति। सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेको यथा॒ न वीत-रागाः कपिलादयः, करुणास्पदेष्व् अप्य् अकरुणापरीत-चित्ततयादत्त-निजक-मांस-शकलत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ ये पुनर् वीत-रागास् ते करुणास्पदेषु करुणा-परीत-चित्ततया दत्त-निज-मांस-शकलास्, तद् यथा -- बोधिसत्त्वा इति। अत्र साध्य-साधन-धर्मयोर् बोधिसत्त्वेभ्यो व्यावृत्तिः सन्दिग्धा॑ तत्-प्रतिपादक-प्रमाण-वैकल्यान् न ज्ञायते किं ते रागादिमन्त उत वीत-रागाः॑ तथानुकम्प्येषु किं स्व-पिशित-खण्डानि दत्तवन्तो नेति वा। अतः सन्दिग्ध-साध्य-साधन-व्यतिरेकित्वम् इति।
[न्या०वि० २५।३] परैर् अपरेऽपि दृष्टान्ताभासास् त्रयोऽविमृश्य-भाषितया दर्शिताः। तद् यथा -- अव्यतिरेको,ऽप्रदर्शित-व्यतिरेको, विपरीत-व्यतिरेकश् चेति। तेऽस्माभिर् अयुक्तत्वान् न दर्शयितव्याः। तथा ह्य्॒ अव्यतिरेकस् तैर् दर्शितो, यथावीत-रागः कश्चिद् विवक्षितः पुरुषो, वक्तृत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-डृष्टान्तो॒ यः पुनर् वीत-रागो, न स वक्ता, यथोपल-खण्ड इति। यद्य् अपि किलोपल-खण्डाद् उभयं व्यावृत्तं, तथापि व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेर् अव्यतिरेकित्वम् इति। अयुक्तश् चायं वक्तुम्, अव्यतिरेकिताया हेतु-दोषत्वात्। यदि हि दृष्टान्त-बलेनैव व्यतिरेकः प्रतिपाद्येत, तदा तथा-विध-सामर्थ्य-विकलस्य तद्-आभासता युज्येत, न चैतद् अस्ति, प्राक्-प्रवृत्त-सम्बन्ध-ग्रहण-प्रवण-प्रमाण-गोचर-स्मरण-सम्पादनार्थं दृष्टान्तोपादानात्। न ह्य् एकत्र यो यद्-अभावे न दृष्टः, स तद्-अभावे न भवतीति प्रतिबन्ध-ग्राहि-प्रमाण-व्यतिरेकेण सिध्यत्य्, अतिप्रसङ्गात्। तस्माद् असिद्ध-प्रतिबन्धस्य हेतोर् एवायं दोषो, न दृष्टान्तस्येति। तथाप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकाव् अपि वक्तुम् अयुक्तौ, तयोर् वक्तृ-दोषत्वात्। तथा ह्य्॒ अप्रदर्शित-व्यतिरेकस् तैर् उक्तो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद्, आकाशवद् इति। अत्र विद्यमानोऽपि व्यतिरेको वादिना वचनेन नोद्भावित इति दुष्टता। विपरीत-व्यतिरेकः पुनर् अभिहितो, यथानित्यः शब्दः, कृतकत्वाद् इति। अत्र वैधर्म्य-दृष्टान्तो॒ यद् अकृतकं तन् नित्यं भवति, यथाकाशम् इति। अत्र विपर्यस्त-व्यतिरेक-प्रदर्शनाद् विपरीत-व्यतिरेकित्वम्। वैधर्म्य-प्रयोगे हि साध्याभावः साधनाभावाक्रान्तो दर्शनीयो, न चैएवम् अत्र, साधनाभावस्य साध्याभाव-व्याप्ततयाभिधानाद् इति।
[न्या०वि० २५।४] व्यतिरेकाप्रदर्शनं विपरीत-व्यतिरेक-प्रदर्शनं च न वस्तुनो दोषः, किं तर्हि वचन-कुशलता-विकलस्याभिधायकस्य। किं च, येषां भवताम् अदो दर्शनं॒ यद् उत स्वार्थानुमान-काले स्वयं हेतु-दर्शन-मात्रात् साध्य-प्रतीतेः परार्थानुमानावसरेऽपि हेतु-प्रतिपादनम् एव कर्तव्यं "विदुषां वाच्यो हेतुर् एव हि केवल" इति-वचनात् तेषां ‘कृतकत्वाद्ऽ॑ इतीयता हेत्ûपन्यासेनैव सिसाधयिषित-साध्य-सिद्धेः समस्त-दृष्टान्ताभास-वर्णनम् अपि पूर्वापर-व्याहत-वचन-रचना-चातुर्यम् आविर्-भावयति।आसातां तावद् एतौ, दृष्टान्तस्य साधनावयवत्वेनानभ्युपगमात्। अथेत्थम् आचक्षीथा॒ अन्वय-व्यतिरेकापरिज्ञाने प्रतिपाद्यस्य न दृष्टान्तम् अन्तरेणैतौ दर्शयितुं शक्याव्, अतोऽन्वय-व्यतिरेक-दर्शनार्थं दृष्टान्तोऽभिधातव्यस्, ततश् च तत्-कार्याकारिणां तद्-आभासतेति चेद्, गले गृहीतस्यायम् उल्लापस्, तथाप्य् अप्रदर्शित-व्यतिरेक-विपरीत-व्यतिरेकौ दृष्टान्ताभासौ न वास्तवौ, किं तर्हि वक्तृ-दोष-समुत्थाव्॑ अतो नाभिधातुं युक्तौ, तथा-विधस्य विद्यमान-वस्तु-प्रकाशन-सामर्थ्य-रहितस्य निबिड-जडिमावष्टब्धस्य पुंसो वादानधिकारित्वान्, मातृका-पाठ-शाला-योग्यतया विदुषां वादयितुम् अयुक्तत्वाद् इति।
[न्या०वि० २६।०] तद् एवं परार्थानुमानं व्याचक्षाणेन यद् उक्तं -- यद् उत "तत् पक्षादि-वचनात्मकम्" इति -- तत् पक्ष-हेतु-दृष्टान्तानां साभासानां प्रतिपादनात् प्रायः पर्यन्तितं॑ केवलं तत् परोक्त-दूषणोद्धाराद् एव समीचीनताम् आबिभर्तीत्य् अमुना प्रस्तावेन दूषणं साभासम् अभिधातुकाम आह :
वाद्य्-उक्ते साधने प्रोक्त-दोषाणाम् उद्भावनम् । दूषणं निरवद्ये तु दूषणाभास-नामकम् ॥ न्यायावतार २६ ॥
[न्या०वि० २६।१] वदन-शीलो वादी प्रत्यायकस्, तेनोक्त उपन्यस्ते॑ कस्मिन्? साधने॑ साध्यते प्रतिपाद्य-प्रतीताव् आरोप्यतेऽनुमेयं येन तत् साधनम्। तच् चानेक-रूपं प्राक् प्रत्यपादि, तद् यथा -- क्वचिद् धेतुर् एवैकः, क्वचित् पक्ष-हेतू, क्वचित् पक्ष-हेतु-दृष्टान्ताः, क्वचित् त एव सोपनयाः, क्वचित् सनिगमनाः, क्वचिद् एकैक-तच्-छुद्धि-वृद्ध्येति, प्रतिपाद्यस्य क्वचित् कथञ्चित् प्रत्याययितुं शक्यत्वात्, तत्-प्रत्यायनोपायस्य च साधनत्वाद् इति। तत्रेह सम्यक्-साधनस्य दूषयितुम् अशक्यत्वात्, साधनाभास एव तत्-सामर्थ्योपपत्तेः, साधनाभासम् एव दूषनोपनिपातात् प्राग् अवस्थायाम् अनिर्ज्ञातं सामान्येन साधन-ध्वनिनोक्तं, तत्र प्रोक्त-दोषाणां प्रत्यक्षादि-निराकृत-पक्षासिद्धादि-हेतु-साध्यादि-विकल-दृष्टान्ताद्य्-उपन्यास-लक्षणानाम् उद्भावनं प्राश्निकानां पुरतः प्रकाशनं यत् तद् दूष्यते स्वाभिप्रेत-साध्य-प्रत्यायन-वैकल्य-लक्षणां विकृतिं नीयते साधनम् अनेनेति दूषणम् इति ज्ञेयम्।
[न्या०वि० २६।२] अधुना तद्-आभासम् आह : निर्गतं सम्यक्-प्रयुक्तत्वाद् अवद्यं पापं पक्षादि-दोष-लक्षणं दौष्ट्यम् अस्माद् इति निरवद्यं, तस्मिन् साधने वादिनोक्त इति वर्तते। तथापि मत्सरितया प्रमृद्योदरं यद् अविद्यमानानां दोषाणाम् उद्भावनं तद् दूषण-स्थानोपन्यस्तत्वात् तत्-कार्याकरणात् सम्यक्-साधने दोषोद्भावनस्य प्रलापायमानत्वाद् दूषणवदाभासत इति दूषणाभासम् इति॑ तद् एव नाम संज्ञा यस्य तत्-तथा। समर्थ-साधनोपन्यासत्वात् साधिते साध्ये सताम् अप्य् अपशब्दालङ्कारादि-दोषाणां यद् उद्भावनं तद् अपि दूषणाभास-नामकम् इति। तु-शब्देन विशेषणार्थेन दर्शयति वस्तु-सिद्ध्य्-अर्थं वाद-प्रवृत्तेस्, तस्य सिद्धत्वाद्, अपशब्दादीनाम् अप्रस्तुततया तद्-द्वरेण दोष-प्रकाशनस्यासम्बद्ध-प्रलाप-रूपत्वाद्, इतरथा तावन्-मात्रेणैव परापाकरण-सिद्धेः समर्थ-साधनान्वेषण-प्रयत्नो विशीर्येत, प्रयोजनाभावाद् इति।
[न्या०वि० २७।०] तद् एवं व्यावहारिक-प्रमाणस्य प्रत्यक्ष-परोक्ष-स्वार्थ-परार्हादि-भेद-भिन्नस्य लक्षणं प्रतिपाद्याधुना यैः पारमार्थिकं समस्तावरण-विच्छेद-लभ्यम् अशेषार्थ-गोचरं केवल-ज्ञानं नाभ्युपगम्यते, तन्-मतोद्दलनार्थं तल्-लक्षणम् अभिधित्सुर् आह :
सकलावरण-मुक्तात्म केवलं यत् प्रकाशते ।
प्रत्यक्षं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् ॥ न्यायावतार २७ ॥
[न्या०वि० २७।१] सकलं समस्तम्, आवृणोत्याव्रियते वानेनेत्य् आवरणं, तत्-स्वरूप-प्रच्छादनं कर्मेत्य् अर्थः, सकलं च तद् अवारणं च सकलावरणं, तेन मुक्तो रहित, आत्मा स्वरूपं यस्य तत्-तथा। अत एव केवलम् असहायम्, आवरण-क्षयोपशम-विचित्रतयैव बोधस्य नानाकारतया प्रवृत्तेः, सामस्त्येन पुनर् आवरण-निर्दलने विबन्धक-कारण-वैकल्याद् एकाकारतयैव तस्य विवर्तनात्। अतो ज्ञानान्तर-निरपेक्षं यत् प्रकाशते प्रथते निरुपाधिकं द्योतत इत्य् अर्थः, तत् परमार्थतः प्रत्यक्षम्। तद् इदं सकलावरण-मुक्तात्मेति-हेतु-द्वारेण तथा केवलं यत् प्रकाशत इति-स्वरूपतो निरूप्याधुना कार्य-द्वारेण निरूपयन्न् आह : सकलार्थात्मनां समस्त-वस्तु-स्वरूपाणां सतत-प्रतिभासनम् अनवरत-प्रकाशनं सकलार्थात्म-सतत-प्रतिभासनम् इति, प्रतिभास्यतेऽनेनेति प्रतिभासनम्, आत्मनो धर्म-रूपतया भेदवद्-विवक्षितं ज्ञानम् इति यावत्। अस्य च पारमार्थिकत्वं, निरुपचरित-शब्दार्थोपपत्तेः। तथा ह्य्॒ अक्ष-शब्दो जीव-पर्यायस्, ततश् चाक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं, यत्रात्मनः साक्षाद् व्यापारः। व्यावहारिकं पुनर् इन्द्रिय-व्यवहितात्म-व्यापार-सम्पाद्यत्वात् परमार्थतः परोक्षम् एव॒ धूमाद् अग्नि-ज्ञानवत्, तिरो-धानाविशेषात्।
[न्या०वि० २७।२] ननु च प्रसिद्धं लक्ष्यम् अनूद्याप्रसिद्धं लक्षणं विधीयते -- सर्वत्रायं न्यायः। अप्रसिद्धे पुनर् लक्ष्ये लक्षणम् अभिधीयमानम् अम्बरारविन्दिनी-कुसुम-लक्षणवन् निर्गोचरतां यायात्। तद् इदं स्वरूपतोऽप्रसाध्य लक्षणम् अभिदधानस्य कोऽभिप्राय इत्य्॑ अत्रोच्यते -- ये ये मिथ्यावलेपाध्मातान्तः-करणाः प्रमाण-प्रसिद्धम् अप्य् अदः प्रति विप्रतिपद्यन्ते, तेषां ध्य्-आन्धी-कृत-बुद्धित्वाद् अवधारणीयताम् अनेन दर्शयति। किम् अस्य प्रतिपादकं प्रमाणम् इति चेद्, एते ब्रूमः॒
[न्या०वि० २७।३] समस्ति समस्त-वस्तु-विस्तार-गोचरं विशद-दर्शनं, तद्-गोचरानुमान-प्रवृत्तेः॑ इह यद्-यद्-गोचरम् अनुमानं प्रवर्तते, तस्य तस्य ग्राहकं किञ्चित् प्रत्यक्षम् उदय-पदवीं समासादयति, यथा चित्र-भानोः॑ प्रवर्तते च सकलार्थ-विषयम् अनुमानम्॑ अतस् तद्-अवलोकिना विशद-दर्शनेनापि भाव्यम् इति। सर्वार्थ-विषयं किम् अनुमानं प्रवर्तत इति चेद्, इदम् अपि ब्रूम॒ इह यद् यद् अस्ति तत् तत् सर्वं स्थित्य्-उदयापवर्ग-संसर्गम् अनुभवति, वस्तुत्वात्॑ यद् यद् वस्तु तत् तत् स्थेम-जन्म-प्रलयैः क्रोडी-कृतं॑ तद् यथाङ्गुलिर् अङ्गुलित्व-वक्रत्व-र्जुत्वापेक्षयेति॑ वस्तु च यद् अस्त्य्, अतः प्रस्तुत-त्रयाक्रान्तं तद् अवगन्तव्यम्। इदम् एव निखिलार्थ-गोचरम् अनेकान्तानुमानं ज्ञान-क्रियाभ्यासातिशयान् निखिलावरण-विच्छेदे विबन्धक-कारणाभावाद् विशद-दर्शनी-भवति। न चानुमान-प्रवृत्ताव् अप्य् अनर्थित्वादिना प्रमातुर् अप्रवृत्ताव् अनुमेय-गोचर-प्रत्यक्षासम्भवेन व्यभिचारश् चोदनीयः, सम्भवस्य साध्यतयाभिप्रेतत्वात्। न च सम्भव-मात्रेऽस्ति व्यभिचारः, सर्वानुमेयानां सम्भवत्-प्रत्यक्षतया व्याप्तत्वाद् इति।
[न्या०वि० २७।४] अथवान्यथानुमानयामः॒ सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक आत्मा, विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायत्वाद्॑ इह यो यो विद्यमान-शुद्ध्य्-उपायः स स सम्भवत्-समस्त-शुद्धिको॑ यथा विद्यमान-क्षार-मृत्-पुट-पाकादि-शुद्ध्य्-उपायो रत्न-विशेषस्, तथा च विद्यमान-ज्ञानाद्य्-अभ्यास-शुद्ध्य्-उपाय आत्मातः सम्भवत्-समस्त-शुद्धिक इति। सामस्त्य-शुद्धश् चात्मा ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदात् केवलम् अभिधीयत इति। ज्ञानाद्य्-अभ्यासः कथं विशुद्धि-कारणम् इति चेद्, आवरण-मल-प्रतिपक्ष-रूपत्वाद् इति ब्रूमः। प्रतिपक्ष-रूपता कथम् अवधारितेइति चेत्, तवैव दर्शनात्। तथा हि॒ दृश्यते ज्ञानाद्य्-अभ्यासतः प्रतिक्षणम् आवरण-विलयो, विशिष्ट-विशिष्टतर-तत्-कार्य-बोधाद्य्-अनुभवात्, तद्-अतिशये पुनः सामस्त्योच्छेदः स्याद् इत्य् अभिदध्महे। एतेन यत् परे प्रोचुर् -- यथा॒ प्रत्यक्षादि-प्रमाण-पञ्चक-गोचरातिक्रान्तत्वात् सर्वार्थ-संवेदनम् अभावाख्य-षष्ठ-प्रमाण-गोचरतां प्रतिपद्यते -- तद् अयुक्तं, तत्-सम्भवस्यानुमानेन प्रतिपादनात्, प्रमाण-पञ्चक-प्रवर्तनाभावासिद्धेः। किं च, प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं न प्रवर्तत इति कथं भवतो निर्णयः? किं नियत-देश-काल-व्याप्त्या यद् वा समस्त-देश-कालास्कन्दनेनेति? यद्य् आद्यः पक्षस्, ततो यथा घटादेः क्वचित् प्रमाण-पञ्चकं तद्-गोचरं निर्वर्तमानम् अभावं साधयत्य्, एवं समस्त-वस्तु-संवेदन-गोचरम् अपि तन् निवर्तमानं नियत-देश-दशावच्छिन्नम् अभावं साधयेन्, न सर्वत्र॑ ततश् च घटादिवत् तद् दुर्निवारं स्यात्। अथ द्वितीयः पक्षो,ऽसाव् असम्भव्य् एव॑ समस्त-देश-काल-वर्ति-पुरुष-परिषत्-संवेदन-साक्षात्-कारिणो ह्य् एवं वक्तुं युक्तं, यद् उत न क्वचित् समस्तार्थ-संवेदनं अस्तीति -- न भवतस्, तथा-विध-पुरुष-सम्भवानभ्युपगमात्। इतरथा य एव कश्चिन् निश्चित्यैवम् अभिदध्यात्, स एव समस्त-वस्तु-विस्तार-व्यापि-ज्ञानालोक इति समस्तार्थ-गोचर-संवेदन-सिद्धिर् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० २८।०] तद् एवं प्रमाण-विषये लक्षण-संख्या-विप्रतिपत्ती निराकृत्याधुना क्रम-प्राप्तां गोचर-विप्रतिपत्तिं बहु-वक्तव्यत्वाद् अनिराकृत्य तावत् फल-विप्रतिपत्तिं निराचिकीर्षुर् आह :
प्रमाणस्य फलं साक्षाद् अज्ञान-विनिवर्तनम् ।
केवलस्य सुखोपेक्षे शेषस्यादान-हान-धीः ॥ न्यायावतार २८ ॥
[न्या०वि० २८।१] द्वि-विधं हि प्रमाणस्य फलं॒ साक्षाद् असाक्षाच् चानन्तरं व्यवहितं चेत्य् अर्थः। तत्र साक्षाद् अज्ञानम् अनध्यवसायः प्रमेयापरिच्छित्तिस् तस्य विनिवर्तनं विशेषेण प्रलयापादनं प्रमाणस्य फलम्, अज्ञानोद्दलन-द्वारेण तस्य प्रवृत्तेस्, तस्य च सर्वानर्थ-मूलतया प्रमात्र्-अपकारित्वात्। तन्-निवर्तनस्य प्रयोजनता युक्तैव। एतच् चानन्तर-प्रयोजनं सर्व-ज्ञानानाम् एक-रूपत्वात् सामान्येनोक्तम्। व्यवहित-प्रयोजनं पुनर् विभागेनाह॒ केवलस्य सर्व-ज्ञ-ज्ञानस्य सुखं वैषयिक-सुखातीत-परमाह्लादानुभव, उपेक्षा साक्षात् समस्तार्थानुभवेऽपि हानोपादानेच्छाभावान् मध्य-स्थ-वृत्तिता, ते सुखोपेक्षे फलम् इत्य् अर्थः। शेषस्य तद्-व्यतिरिक्त-प्राकृत-लोक-प्रमाणस्यादानं ग्रहणं हानं परित्यागस्, तयोर् आदान-हानयोर् धीर् बुद्धिर् आदान-हान-धीः, सा फलम् इति यावत्। ततश् चादेयानां सम्यग्-दर्शनादि-स्रक्-चन्दनादीनां यादित्सा, तथा हेयानां मिथ्या-दर्शनादि-विष-कण्टकादीनां या जिहासा सा प्रमाण-साध्याप्रमाणात् तद्-असिद्धेः, प्रेक्षा-पूर्व-कारिणां ततः प्रवृत्त्य्-अयोगाद् इत्य् उक्तं भवति।
[न्या०वि० २९।०] अधुना गोचर-विप्रतिपत्तिं निराचष्टे :
अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचरः सर्व-संविदाम् ।
एक-देश-विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः ॥ न्यायावतार २९ ॥
[न्या०वि० २९।१] अनेके बहवोऽन्ता अंशा धर्मा वात्मानः स्वरूपाणि यस्य तद् अनेकान्तात्मकम्। किं तत्? वस्तु बहिर् अन्तश् च, गोचरो विषयः, सर्व-संविदां समस्त-संवित्तीनाम्। अनेनानेकान्तम् अन्तरेण संवेदन-प्रसर-व्यवच्छेदं दर्शयति, भ्रान्त-संवेदनानाम् अप्य् अनेकान्तोद्द्योतन-पटिष्ठतया प्रवृत्तेः, केवलं केषुचिद् अंशेषु विसंवादकत्वाद् अप्रमाणानि तानि सङ्गीर्यन्ते। तद् अयम् अभिप्रायो॒ यदा संवेदन-सामान्यम् अप्य् अनेकान्त-विरहेण न प्रवर्तितुम् उत्सहते, तदा तद्-विशेष-भूतं प्रमाणम् एकान्ते प्रवर्तिष्यत इति दूरापास्तावकाशैवैषा वार्ता, तथाप्य् अनादि-मिथ्याभिनिवेश-वासितान्तः-करणाः कुदर्शन-विप्रलब्ध-बुद्धयो बहवोऽत्र विप्रतिपद्यन्त इति सर्व-प्रमाणानाम् अनेकान्त-गोचरत्व-साधकं प्रमाणम् अभिधीयते॒ इह यत् प्रमाणं तत् परस्पराविनिर्लुठितानेक-धर्म-परिकरित-वस्तुनो ग्राहकं, तस्यैव तत्र प्रतिभासमानत्वाद्॑ इह यद् यत्र प्रतिभाति, तद् एव तद्-गोचरतयाभ्युपगन्तव्यं॑ तद् -- यथा निरादीनव-नयन-प्रभव-दर्शने प्रतिभासमानं पाटलतया जपा-कुसुमं तथैव तद्-गोचरतयाभ्युपगम्यते॑ परस्पराविभक्तानेक-स्वभावाक्रान्त-मूर्तिकं च बहिर् अन्तश् च वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रथत इत्य्॑ अतस् तद् एव तेषां गोचरः।
[न्या०वि० २९।२] न चेतरेतर-विशकलित-धर्मि-धर्म-भाव-वादिभिः कणभक्षाक्षपाद-शिष्यकैस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धतादि-दोषः प्रतिपादयितुं शक्यस्, तद्-अभ्युपगमम् अन्तरेण स्वाभिप्रेत-वस्तुनोऽवस्थानाभावात्। तथा ह्य्॒ एकस्मिन् धर्मिणि बहवो धर्मास् ततो भिन्न-तनवः कथं वर्तेरन्? भेदाविशेषेण सर्वत्र तद्-वृत्ति-प्रसङ्गात्। तत्रैव तेषां समवायान् नान्यत्र वर्तन्त इति चेन्, ननु सोऽपि समवायो यद्य् उपकार्योपकारक-भाव-व्यतिरेकेणापि भवति, ततः सर्वत्राविशेषेण प्रसज्येत, तद्-अभावाविशेषात्। अस्त्य् एवोपकार्योपकारक-भाव इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, अनेकोपकारकस्यानेक-स्वभावता-प्राप्तेस्, तद्-विरहेऽनेकोपकारकत्वाभावात्। न हि येन स्वभावेनैकस्योपकरोति तेनैव द्वितीयस्य, तस्य तत्रैवोपयुक्तत्वाद्, द्वितीयोपकारक-स्वभावस्य तद्-उपमर्दन-द्वारेणोत्पत्तेर्, इतरथैकम् एवोपकुर्वंस् तिष्ठेत्, तद्-एक-स्वभावात्। भिन्नाभिः शक्तिभिर् उपकरोति, न भिन्नैः स्वभावैस्, तेन नानेकान्त इति चेत्, तास् तर्हि तत्र कथं वर्तन्त इति वाच्यम्। समवायाद् इत्य्-उत्तरेऽसाव् अप्य् उपकार्योपकारक-भावम् अन्तरेण कथं न सर्वत्रेति प्राचीनं चोद्यं पश्चाल्-लग्नम् अनुधावति। उपकार्योपकारक-भावाभ्युपगमे पुनर् अप्य् अनेक-स्वभावता-प्रदर्शित-युक्तेः पुनः शक्त्य्-उपकारक-भिन्न-शक्ति-परिकल्पने तद् एवावर्तते, तन् न भिन्न-धर्म-परिकल्पनेऽप्य् अनेकान्तान् मोक्ष इति वरम् आदाव् एव मत्सरितां विहायानेक-धर्माध्यासितं वस्त्व् अभ्युपगतम्। किं भेद-कल्पनयास्थान एवात्मना परिक्लेशितेनेति। किं चानेकान्ताभ्युपगमे सत्य् एष गुणः॒ परस्पर-विभक्तेषु संयोगि-संयोग-समवायि-समवाय-गुण-गुण्य्-अवयवावयवि-व्यक्ति-सामान्यादिषु संयोग-समवाय-गुण्य्-अवयवि-सामान्यादीनां संयोगि-समवायि-गुणावयव-विशेषादिषु वर्तन-चिन्तायां यद् दूषण-जालम् उपनिपतति, तद् अपि परिहृतं भवत्य्, एकान्त-भेद एव तद्-उपपत्तेर्, अनेकान्ते तद्-उत्थानाभावात्। तथा हि॒ भिन्नाः खलु संयोगादयः संयोग्य्-आदिभ्यो विकल्पयितुं पार्यन्ते -- यद् उत कथम् एत एतेषु वर्तन्त इति? किम् एक-देशेन यद् वा सामस्त्येन? यद्य् एक-देशेन, तद् अयुक्तं, तेषां निरवयवत्वाभ्युपगमात्। सावयवत्वेऽपि तेभ्योऽवयवेभ्यो यद्य् अभिन्नास्, ततोऽनेकान्तापत्तिर्, एकस्यानेकावयवत्व-प्राप्तेः। अथ भिन्नास् तेष्व् अपि ते कथं वर्तन्त इत्य् वाच्यम्॒ एक-देशेन सामस्त्येन वा। एक-देश-पक्षे तद् एवावर्तत इत्य् अनवस्था। अथ सामस्त्येन, तद् अप्य् असाधीयः, प्रत्येकं परिसमाप्ततया संयोगादि-बहुत्व-प्रसङ्गात्। तद्-अभिन्नाः पुनः संयोगादयो न विकल्प-भाजो भवन्ति। अभेद-पक्षेऽपि संयोगादि-मात्रं संयोग्य्-आदि-मात्रं वा स्याद् इति चेन्, न, तस्याप्य् एकान्तेनानभ्युपगमात्, किं तर्ह्य् अन्योन्याविश्लिष्ट-स्वरूपा विवक्षया सन्दर्शनीय-भेदाः सर्व एवैतेऽभ्युपगम्यन्ते, तथा-विधानां कुयुक्ति-विकल्पोत्थापित-दूषण-समूह-निराकरण-क्षमत्वाद्, अबाधित-प्रतिभासेषु सर्वत्र तेषां तथैव प्रतिभासनाद्, अन्यथा प्रतिभासमानानाम् अन्यथा परिकल्पने दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-द्वारेणासमञ्जस-प्राप्तेस्॑ तथा च ब्रह्माद्वैत-शून्य-वादादयः सिद्धिम् अश्नुवीरन्, विशेषाभावाद् इति।
[न्या०वि० २९।३] एतेनास्य हेतोः कापिला अप्य् असिद्धतादि-दोषम् अभिधित्सवो मौक्यम् आनीताः। तथा ह्य्॒ अन्तर् एकं संवेदनम् अपरापर-हर्ष-विषादाद्य्-अनन्त-धर्म-विवर्ताक्रान्त-रूपं बहिश् च घटादिकम् अर्थं नव-पुराणादि-वर्तुल-पार्थिवत्वाद्य्-अनेक-स्वभावावष्टब्ध-शरीरं साक्षाल् लक्षयन्तः कथं तद्-विपरीत-कथने प्रवर्तेरन्? प्रकृति-पुरुषात्मकं द्रव्यम् एवैकं तात्त्विकं, पर्याय-भ्रान्ति-जनकः पुनर् विवर्तोऽपारमार्थिक इति चेन्, न, द्वयोर् अपि सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशमानयोर् अबाधितयोः सर्व-व्यवहार-निबन्धनयोः पक्ष-पातम् अन्तरेणैकस्य निह्नोतुम् अशक्यत्वात्। तथा सति विवर्त एव तात्त्विको, द्रव्यं पुनर् अलीकम् इति पर्याय-पक्ष-पाती प्रसञ्जयन् दुर्निषेधः स्याद् इति। अथेत्थम् अभिदधीथा॒ द्रव्यं सर्वत्राव्यभिचरित-रूपत्वात् सत्यं, पर्यायाः पुनर् व्यभिचारिण इत्य् असत्याः, तद् अयुक्तम्। यदि नाम द्रव्यम् अभेद-रूपत्वात् सर्वत्रानुवर्तते, पर्यायास् तु भेद-रूपत्वाद् व्यवच्छिद्यन्ते, तथापि तत् सत्यम्, इतरेऽलीका इति वक्तुं न पार्यते, न हि नीलं पीत-रूपतां न बिभर्तीत्य्-एतावता तद् असत्यम्, अतिप्रसङ्गात्, सर्वस्य पर-रूप-परिहारावस्थायितयालीकत्व-प्राप्तेः। अथ द्रव्यम् एव पर्यायास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवन्, न सन्ति वा द्रव्य-व्यतिरेकिणः पर्याया, निःस्वभावत्वात्, ख-पुष्पवद् इति प्रमाणयसि, तथा सति पर्याया एव द्रव्यं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात् तत्-स्वरूपवन्, नास्ति वा पर्याय-व्यतिरिक्तं द्रव्यं, निष्पर्यायत्वाद्, आकाश-कुसुमवद् इतीतरोऽपि प्रमाणयन् केन वार्येत। तन् न पक्ष-द्वयेऽपि काचिद् विशेषोपलब्धिर् इति। यथैवानन्त-सह-क्रम-वर्ति-पर्यायाध्यासितं वस्तु सर्व-प्रमाणेषु प्रकाशते तथैवाभ्युपगन्तव्यं, तथा चान्यस्याभावात् तद् एव तद्-गोचर इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।४] तथा सुगत-मतानुसारिणाम् अपि मध्ये सौत्रान्तिकस् तावद् अस्य हेतोर् असिद्धताम् आविर्-भावयितुं नोत्सहते, तद्-अभ्युपगति-व्यतिरेकेण निज-दर्शन-व्यवस्थानुपपत्तेः। तथा हि॒ बहिस् तावद् एकं कारणम् अपरापर-सामग्र्य्-अन्तः-पातितयानेक-कार्य-कार्यावेद्यते, यथा रूपं स्वोत्तर-क्षणं स्वावगाहि-ज्ञानादिकं च युगपज् जनयति। यदि चैक-क्षण-वर्तिनः सामग्री-भेदेन भेदम् अनुभवत एव भिन्न-देश-नाना-कार्य-कारिता, तथा सति नित्य-पक्षोदितं दूषणं स्व-मस्तकोपनिपाति स्यात्, तस्यापि तथैव भिन्न-काल-कार्य-निर्वर्तनेऽपि भेदाभाव-प्रसङ्गात्। तथा प्रतिभास-भेदेन क्षण-क्षयि-रूपादि-स्वलक्षण-विलक्षणत्वाभ्युपगमश् चैवं निर्निबन्धनः स्यात्, कौटस्थ्यम् आबिभ्रतोऽपि द्रव्यस्यापरापर-कारण-कलापान्तर्-गततया नव-पुराणादि-पर्याय-रूप-रस-गन्ध-स्पर्शावभास-लक्षण-कार्य-सम्पादनाविरोध-प्रसक्तेः। किं चायम् एकं स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणानि स्वलक्षणान्य् आचक्षीत नान्यथा, यथाकूतं तद्-अवभासस्य स्वप्नान्तरेऽप्य् अनुपलक्षणाल्॑ लक्षितस्य चालक्षित-व्यतिरेक-निराकरणतस् तादात्म्यं कथयन् स्व-गिरानेकान्तावभासं समर्थयते। तथा ह्य्॒ अलक्षित-परमाणु-पारिमाण्डल्य-प्रतिक्षण-विवर्तम् अपि स्वलक्षणं स्थिर-स्थूराद्य्-आत्मना दर्शयति स्वरूपम्, अन्यथा सुषुप्तं जगद् आसज्येत, तद्-अप्रकाशने प्रमाणान्तरस्याप्य् अत्यन्त-विलक्षण-स्वलक्षणावेदकस्याप्रवृत्ति-प्रसङ्गात्। तथान्तः-संवेदनम् अर्थ-स्वरूपापेक्षया बहिर्-मुखान्तर्-मुख-सविकल्पाविकल्प-भ्रान्ताभ्रान्तादि-प्रतिभासम् एकम् अभ्युपयतः कथम् अनेकान्तावभासोऽसिद्धः स्यात्? तथा नाना-देश-स्थितार्थ-सार्थ-समर्पिताकारोपरक्तम् एकम् आकार-भेदेऽप्य् अन्यथा युगपत्-प्रकाशमान-सितासिताद्य्-अर्थ-व्यवस्थित्य्-अनुपपत्तेः संवेदनम् अनुमन्यमानः कथं भिन्न-समय-भावि-हर्ष-विषादाद्य्-अनेक-विवर्त-वशात् तद्-भेदम् आत्यन्तिकम् अभिदधीत, अभिन्न-योग-क्षेमत्वाद्। युगपद्-भाविनां संविद्-अन्तर्-निविष्टाकाराणाम् एकत्वं न हर्षादीनां, तद्-विपर्ययाद् इति चेन्, न, तत्-सामर्थ्य-व्यवस्थाप्यार्थाभेद-प्रसङ्गात्, तद्-एकतया सित-पीतादिषु ज्ञानस्य बोध-रूपेणैवाविशिष्टत्वात्। तद् एवं बहिर् अन्तश् चैकानेक-रूपत्वे प्रमाणतः स्थितेः स्वलक्षणस्यान्यथा स्वाभ्युपेत-दर्शन-व्यवस्थायोगान् नार्थ-वाद्य् अनेकान्त-प्रकाशं प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति।
[न्या०वि० २९।५] तथोररी-कृत-योगाचार-मतम् अपि बलाद् अनेकान्त-प्रकाश-रज्जुर् आवेष्टयत्य्, एकस्यापि ज्ञानस्यानेक-वेद्य-वेदकाकारतया प्रथनोपगतेः। एक-योग-क्षेमत्वात् तद्-ऐक्यम् इति चेन्, न, युगपद्-उदय-प्रलयवतां सह-वेदिनां सकल-सन्तानानाम् एकत्व-प्रसङ्गात्। संवृति-दर्शितत्वाद् अनेकत्वस्य, न तेन स्व-संवेदन-साक्षात्-कृत-पारमार्थिकैकत्व-क्षतिर् इति चेन्, न, ब्रह्म-वादि-मताप्रतिषेध-प्रसक्तेर्, यतोऽनाद्य्-अविद्या-बलाद् एकम् अक्रमं सचेतनं स्व-संवेदन-साक्षात्-कृतम् अपि ब्रह्मानेकं क्रमवच् चेतनाचेतनं परोक्षापरोक्षं लक्ष्यते, भवत्-परिकल्पित-ग्राह्य-ग्राहकाकार-विविक्त-संवेदनवद् इति तेनापि न दुरुपपादम्। अस्तु वायम् अनेकान्तावभासो भ्रान्तस्, तथापि संवेदनस्याद्वयता न लक्ष्यते, तल्-लक्षणे सकलासुमताम् अधुनैव मुक्ततावाप्तेः। लक्ष्यते च तत् कथञ्चिद्, इतरथा सुषुप्त-दशावत् सर्व-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गाद् इत्य् एकस्यापि संवेदनस्य लक्षितालक्षितत्वेनानेकान्त-प्रतिभासो दुःशकोऽपह्नोतुम् इति ज्ञान-वाद्य् अप्य् अस्य हेतोर् असिद्धताविर्-भावनं प्रति तूष्णीम् आसीत।
[न्या०वि० २९।६] शून्य-वादिनः समस्ताभावाद् असिद्धोऽनेकान्त-प्रकाश इति चेन्, न, तस्यापि प्रमाण-प्रमेयाभावे न सर्वाभावावेदनं समस्त्य्, अन्यथाप्रमाणकं सर्वं सर्वत्र विद्यत इति परस्यापि वदतो न वदन-भङ्गः स्यात्, तद्-अभ्युपगमेऽभ्युपगम-क्षतिः। तयोश् च दर्शितवद् अनेकान्त-प्रकाश इति नासिद्धो हेतुः। मरु-मरीचिका-निचय-चुम्बिनि संवेदने जलोल्लेखेऽपि तद्-गोचरत्वाभ्युपगमाभावाद् अनैकान्तिकोऽयम् इति मा शङ्किष्ठास्, तस्य भ्रान्तत्वाद्, अभ्रान्त-प्रकाशो हि तद्-अभ्युपगति-हेतुः। अथायम् अपीतरेतर-विनिर्लुठित-परमाणु-क्षण-क्षयि-बोधेन बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् आचक्षीथास्, तद् अयुक्तं, यतस् तद्-बोधः किम् उपलब्धि-मात्रम् यद् वा निर्णयः? यद्य् आद्यः कल्पस् तदानुमानं विशीर्येत, निर्गोचरत्वात्, प्राथमकल्पिकेनैव निर्विकल्पक-विविक्त-दर्शनेन विरोध-भीरुतया सर्वथा वस्तु-ग्रहणाभ्युपगमात्, प्रमाण-कलिते च मानान्तर-वैयर्थ्याद्, अनवस्था-प्राप्तेः। अथ द्वितीयस्, तथा सति सर्वं निर्विकल्पकम् अप्रमाणताम् अश्नुवीत। न च निर्णयोऽनेकान्त-प्रकाशं बाधते,ऽपि तु समर्थयते, बहिर् अन्तश् च तथैव तद्-विजृम्भणात्। अथ सर्वथा वस्तु-ग्रहणेऽपि निर्विकल्पकं यत्रांशे पाश्चात्यं व्यवहार-कारि-व्यवसायम् उपजनयति, तत्रैव प्रमाणताम् आस्कन्दति नान्यत्रेति मन्येथास्, तथा सति यद्-अनन्तरम् अर्थ-क्रिया-समर्थार्थ-प्रार्थनया पुरुषः प्रवर्तते स एव निर्णयः प्रामाण्यं स्वी-कुर्यान्, न निर्विकल्पकं, तज्-जनकत्वेऽपि सन्निकर्षादिवद् इत्य् आसज्येत। निर्विकल्पकम् अनधिगतार्थाधिगन्तृत्वात् प्रमाणं, न व्यवसितिस्, तद्-विकल्पत्वाद् इति चेन्, नानुमितेर् अपि तद्वद् अप्रामाण्य-प्रसङ्गात्। न च विपरीताकार-निराकरण-चतुरतयानुमितिर् विशेषवती, निर्णीतेर् अपि तद्-अपनोद-दक्षत्वाद्, असमारोप-विषयेऽप्रवृत्तेः। त्रि-रूप-लिङ्ग-जतया विशेषोऽनुमितेर् मानता-साधक इति चेत्, साक्षाद् अनुभवाद् उत्पादस् तर्हि निर्णीतेर् महापराध इति भवतो बालताम् ईक्षामहे। किं च, यथा निर्विकल्पकम् अलक्षितं सकल-व्यावृत्त-स्वलक्षण-ग्रहण-प्रवणम् अपि कतिचिद्-अंश-विषयं विकल्पम् उत्थापयति, तथार्थ एवेन्द्रियालोकादि-सन्निकृष्टतया कतिचिन्-निजांश-विषयं साक्षाद्-विशद-विकल्पं जनयेद् इति किम् अजा-गल-स्तन-कल्प-निर्विकल्पक-कल्पनया? तावन्तो ऽंशा बहिर्-अर्थे विरुध्यन्त इति चेत्, पाटवापाटवादयो दर्शनेऽप्य् एकस्मिन् न विरुध्यन्त इति किं राज्ञाम् आज्ञा? तस्मान् न क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षण-स्वलक्षण-लक्षकं क्वचित् कदाचिद् दर्शनं लक्षयन्ति भवन्तोऽपि, केवलं स्व-दर्शनानुरक्तान्तः-करणतया न तद्-असत्तां प्रतिपद्यन्ते। स्वांश-व्यापिनं कालान्तरानुयायिनम् एकं बहिर् अन्तश् चार्थं बोधं च प्रकाशयन् प्रथमानो निर्णयः, न पुनर् निर्मूलकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाध्यत इति न भ्रान्तः। किं चास्य भ्रान्ततां कथयन् सर्व-प्रमाण-प्रमेय-व्यवस्थाम् उन्मूल्यति। तथा हि॒ यत् सत्त्व-बोध-रूपत्व-सुखत्वादिषु प्रमाणं तद् एव क्षण-क्षयित्व-स्वर्ग-प्रापण-शक्ति-युक्तत्वादिष्व् अप्रमाणम्॑ तथा यद् वस्तु नील-चतुरस्रोर्ध्वतादि-रूपतया प्रमेयं तद् एव मध्य-भाग-क्षण-विवर्तादिनाप्रमेयं॑ तथा यद् बहिर्-अर्थापेक्षया सविकल्पकं स्वप्नादि-दर्शनं वा भ्रान्तं तद् एव स्वरूपापेक्षयाभ्रान्तम्॑ तथा यन् निशीथिनी-नाथ-द्वयादिकं द्वित्वेऽलीकं तद् अपि धवलता-नियत-देश-चारितादाव् अनलीकम् इति निर्णयः। यदि तु विरोधाद् बिभ्यद्भिर् भवद्भिर् अयम् अपह्नूयते, किम् अपरम् ऐकान्तिकं प्रमाणं प्रमेयं चोररी-कृत्य स्वाकूतं प्रतिष्ठापयेयुर् इति सकौतुकं नश् चेतः।
[न्या०वि० २९।७] अथ ज्ञान-वाद्य् अद्वैत-प्रकाशम् अलक्षितम् अभ्युपेत्य तेन बाहुविध्यं दधानो बोधो बाध्यमानत्वाद् भ्रान्त इत्य् अभिदध्यात्, तद् अयुक्तम्, दृष्ट-हान्य्-अदृष्ट-परिकल्पना-प्रसङ्गाद्, अलक्षित-निर्विकल्प-दर्शनस्य च प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्। अथ युक्तिर् बोधस्य वैविध्यं बाधेत, तथा हि॒ भ्रान्ताभ्रान्त-संवेदन-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, संविन्-मात्रस्य तु सर्वत्राव्यभिचारित्वाद्, अद्वयं संवेदनं विविक्त-युक्त्या प्रकाशमानम् अनादि-कालालीन-वासना-समुपजनित-संवृति-दर्शित-सत्ताकं सितासितादि-विविध-प्रतिभासं निराकुरुते। अत्र प्रतिविदध्महे॒ किम् अयम् अनेकाकारो बोधोऽद्वय-संवेदनाद् व्यत्यरैक्षीद् वा न वा। किं चातो, यदि व्यभैत्सीत्, कथम् अदृष्ट-तत्-कार्यत्वे व्यतिरिक्तोऽयं तद् अद्वयं संवेदनम् अनुमापयेत्? अव्यतिरेक-पक्षे पुनर् अनेकः सन्न् एक-संवेदन-तादात्म्येन प्रथमानः कथम् अद्वैतं नोद्दलयेत्? अथ संवृति-दर्शितत्वाद् अलीकतयास्य सितासिताद्य्-आकार-बहिर्-मुख-कालुष्यस्य बोधेन तात्त्विकेन सह भेदाभेद-विकल्पानुपपत्तिर् इति ब्रूषे, तथा सति परो बोधस्यापारमार्थिकत्वं अविद्या-दर्शितत्वाद्, अर्थ-सत्तायाः पुनस् तत्त्व-रूपता, सर्वत्राव्यभिचाराद् इति ब्रुवाणो दुर्निवारः स्यात्। जडस्य प्रकाशायोगात् संवित्तिः सत्या, नार्थ इति चेद्, एकस्यानेकतावभासाभावाद् अनेकान्तः सत्यो, नाद्वैतम् इति प्रतिजानीमहे। संवृत्याद्वयस्यापि नाना-प्रतिभासोऽविरुद्ध इति चेद्, अनाद्य्-अविद्या-बलाज् जडस्यापि चेतनतया प्रकाशो न विरुद्ध इति परस्यापि शठोत्तरं नातिदुर्लभं भवेत्। किं च, नानाकार-कलुषित-चैतन्य-सामान्यस्यान्यथानुपपत्ति-सामर्थ्यतस् तस्य सिद्धत्वाद् अद्वयं संवेदनम् असिद्धं साधयेद् अयम्, अन्यथा निर्निबन्धनतया साधनस्याप्रवृत्तेस्, तथा च स्थिर-स्थूराद्य्-उपलक्षितार्थांश-वशाद् विशकलित-परमाणु-क्षण-क्षयि-पर्याय-तादात्म्यं साधयन् तम् अनेकान्त-वादिनं न प्रतिक्षेप्तुम् अर्हति, युक्तेर् उभयत्रापि तुल्यत्वात्। किं च, योऽयं सित-पीताद्य्-अनेकाकार-निर्णयोऽसाव् अपि स्व-संवेदनापेक्षयाद्वय-रूप इति भवद्-अभिप्रायो॑ यथा चानवस्था-भीरुतया सर्वं ज्ञानं स्व-प्रकाशम् अभ्युपेतं, तथा सर्वो निश्चयः स्व-निश्चायकोऽभ्युपगन्तव्यो,ऽन्यथा तत्राप्य् अनवस्था-दोषोऽनुषज्येत, निश्चयाश् च सर्वथा स्वरूपं निश्चिनुयुर्, नैक-देशेन, यतो "निश्चयैर् यन् न निश्चीयते रूपं तत् तेषां विषयः कथम्" इति स्वयम् एव स्व-वधाय प्रलपितम्। तथा चाद्वयस्य क्षण-क्षयिणः स्वरूपस्य तैर् ग्रहणे विपरीतारोपाभावाद् आदित एव अनुत्थानं संसारस्येति युक्ति-रिक्त एवामुक्तताभिमानः स्यात्, न चैवम्, भव-भावस्य प्रतिप्राणि-प्रसिद्धत्वात्। तन् नायम् इतरेतराविनिर्लुठित-द्रव्य-पर्याय-प्रकाशो भ्रान्तस्, तद्-विपरीतार्थोपस्थापक-प्रमाणान्तराभावाद् इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।८] यदा तु शून्य-वादी ‘निरालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्न-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति पराभिप्राय-प्रवृत्तानुमान-बलाद् भ्रान्तताम् अस्य कथयेत्, तदा तं प्रति ‘सालम्बनाः सर्वे प्रत्ययाः, प्रत्ययत्वाज्, जाग्रद्-दशा-प्रत्ययवद्ऽ॑ इति विपरीतानुमानम् उपढौकनीयम्। स यदि दृष्टान्तस्य साध्य-विकलताम् उद्भावयेत्, तदा तद्-दृष्टान्तेऽपि सा दर्शनीया। यदि पुनर् असौ स्वप्न-प्रत्ययस्य निरालम्बनत्वं भवद्भिर् अभिप्रेतम् इति विलपन्न् आसितुं न दद्यात्, तदा स विकल्पतः पर्यनुयोज्यो॒ऽस्मद्-अभ्युपगमः प्रमाणं भवतोऽप्रमाणं वा? प्रमाणं चेद्, यथा तद्-बलाद् दृष्टान्त-समर्थनं तथा जाग्रत्-प्रत्यय-गोचरार्थ-समर्थनम् अपि किं न कुरुषे, कोऽयम् अर्ध-जरतीय-न्यायः? अथाप्रमाणम्, एवं सति स्वप्न-प्रत्यय-निरालम्बनता-साधकं प्रमाणान्तरं मृगणीयं, किम् अनेन कुश-काशावलम्बनेन। तत्रापि प्रमाणान्तरे विकल्प-युगलम् अमलम् अवतरति॒ तत् किं निरालम्बनं सालम्बनं वा? निरालम्बनं चेन्, नान्य-प्रत्ययस्य निरालम्बनतां गदितुं पटिष्ठं, निर्गोचरत्वात्। अथ सालम्बनं, हन्त हतोऽसि, निरालम्बनाः सर्वे प्रत्यया इति प्रतिज्ञात-क्षतेर्, अनेनैव व्यभिचाराद् इति शठः प्रतिशठाचरणेन निर्लोठनीयः। तन् नास्यानैकान्तिकत्वम्।
[न्या०वि० २९।९] विरुद्धता-शङ्का पुनर् दूरापास्त-प्रसरैव, प्रमाण-प्रकाशितेऽर्थे सर्व-वादिनां तथाभ्युपगमाविगानाद् इति। अनेन संशय-विरोधानवस्था-वैयधिकरण्यासम्भवादि-दूषणानि निर्मूलक-मिथ्या-विकल्पोत्थापितानि प्रतिभास-मुद्गर-निपात-निर्दलित-मस्तकत्वान् न जीवितुम् उत्सहन्त इति। तस्माद् असिद्धतादि-दोष-विना-कृतोऽयं तथा-प्रतिभास-लक्षणो हेतुर् अनेकान्त-गोचरतां प्रमाणस्य परान् अभ्युपगमयतीत्य् अलम् विस्तरेण। तस्मात् ‘तस्यैव तत्र प्रतिभासनात्ऽ॑ सर्व-संविदाम् अनेकान्तात्मकं वस्तु गोचर इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।१०] अयं च यथावस्थित-प्रमाण-व्यापार-पर्यालोचक-प्रमात्र्-अभिप्रायेण प्रमाण-गोचरो दर्शितः। नयस् तर्हि किं-भूतम् तं मन्यत इति वचनावकाशे सत्य् आह : एकेत्य्-आदि। अनन्त-धर्माध्यासितं वस्तु स्वाभिप्रेतैक-धर्म-विशिष्टं नयति प्रापयति संवेदनम् आरोहयतीति नयः, प्रमाण-प्रवृत्तेर् उत्तर-काल-भावी परामर्श इत्य् अर्थस्॑ तस्य विषयो गोचरो मतोऽभिप्रेत एक-देशेनानित्यत्वादि-धर्म-लक्षणेन विशिष्टः पर-रूपेभ्यो विभिन्नोऽर्थः प्रमेय-रूपं, प्रमाणम् एवं-विधम् एवार्थं गृह्णातीति स्वाकुतेन तेन व्यवस्थापनाद् इति।
[न्या०वि० २९।११] अथवा प्रमाण-विषयां लक्षण-संख्या-गोचर-फल-रूपां चतुर्-विधां विप्रतिपत्तिं निराकृत्यात्रैव नय-गोचरं निरूपयन्न् आह : एकेत्य्-आदि। ननु चादि-वाक्येन प्रमाण-व्युत्पादन-मात्रं प्रतिज्ञानं, तत् किं अयम् अप्रस्तुतोऽत्र नय-गोचरः प्रतिपाद्यत इति। सत्यं, एवं मन्यते॒ न नयः प्रमाणाद् अत्यन्तं दूर-यायी, किं तर्हि तद्-अंश-भूत एव, नय-समुदाय-सम्पाद्यत्वात् प्रमाणस्यातस् तद्-व्युत्पादन-प्रतिज्ञानेऽसाव् अपि ‘तन्-मध्य-पतितस् तद्-ग्रहणेन गृह्यतऽ॑ इति-न्यायाद् गृहीत एव, तन् नायम् अप्रस्तुत इति।
[न्या०वि० २९।१२] अत्रापि पदार्थः स एव, केवलं वाक्यार्थ-भेदः। तथा हीहैवं घटना॒ नयस्य विषय एक-देश-विशिष्टोऽर्थो मतो नीतिविदाम् इति। ननु च यदि नयस्य प्रमाणान्तः-पातित्वेऽपि पृथग् गोचरः प्रतिपाद्यते, ततः प्रमाणवद् एतद्-विषया लक्षणादि-विप्रतिपत्तिर् अपि निराकर्तव्या। सत्यं, किं तु न परेषां नय-व्यवहारः प्रसिद्धो,ऽतो धर्मिणोऽभावात् तद्-गोचरा विप्रतिपत्तिर् नास्त्य् एव। न च ते तेन तत्त्वं प्रतिपादनीयास्, तत्त्व-प्रतिपादने प्रमाणस्यैव व्यापारान्, नयस्य पुनर् एक-देश-निष्ठत्वेन तत्-प्रतिपादन-सामर्थ्य-विकलत्वाद्, अत एवाचार्यस्य न तल्-लक्षणादि-स्वरूप-कथनेऽपि महानादरः। गोचरं पुनर् हेय-पक्षे काक्वा प्रक्षिपन् साक्षात् प्रतिपादयति॒ मा भूत् स्व-दर्शनान्तः-पातिनां मन्द-बुद्धीनां प्रमाण-प्रतिपन्नेऽप्य् अनेकान्तात्मके वस्तुन्य् एक-देश-समर्थनाभिनिवेश-लक्षणः कदाग्रह इति। अथवा स्व-दर्शनान्तः-पातिनः प्रत्य् अनेनैव गोचर-कथनेनोपलक्षणत्वाल् लक्षणादीन्य् अपि लक्षयति। तत्र प्रमाण-प्रतिपन्नार्थैक-देश-परामर्शो नय इति लक्षणं, सर्व-नय-विशेषानुयायित्वात् पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमत्वाच् चास्य। संख्यया पुनर् अनन्ता इति, अनन्त-धर्मत्वाद् वस्तुनस्, तद्-एक-धर्म-पर्यवसिताभिप्रायाणां च नयत्वात्, तथापि चिरन्तनाचार्यैः सर्व-सङ्ग्राहि-सप्ताभिप्राय-परिकल्पना-द्वारेण सप्त नयाः प्रतिपादिताः। तद् यथा -- ‘नैगम-सङ्ग्रह-व्यवहार-र्जुसूत्र-शब्द-समभिरूढैवम्भूता नयाऽ॑ इति। अतोऽस्माभिर् अपि त एव वर्ण्यन्ते।
[न्या०वि० २९।१३] कथम् एते सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका इति चेद्, उच्यते॒ऽभिप्रायस् तावद् अर्थ-द्वारेण शब्द-द्वारेण वा प्रवर्तेत, गत्य्-अन्तराभावाद्॑ अर्थश् च सामान्य-रूपो विशेष-रूपो वा, शब्दोऽपि रूढितो व्युत्पत्तितश् च, व्युत्पत्तिर् अपि सामान्य-निमित्त-प्रयुक्ता तत्-काल-भावि-निमित्त-प्रयुक्ता वा स्यात्। तत्र ये केचनार्थ-निरूपण-प्रवणाः प्रमात्र्-अभिप्रायास् ते सर्वेऽप्य् आद्ये नय-चतुष्टयेऽन्तर्-भवन्ति। तत्रापि ये परस्पर-विशकलितौ सामान्य-विशेषाव् इच्छन्ति तत्-समुदाय-रूपो नैगमः। ये पुनः केवलं सामान्यं वाञ्छन्ति तत्-समूह-सम्पाद्यः सङ्ग्रहः। ये पुनर् अनपेक्षित-शास्त्रीय-सामान्य-विशेषं लोक-व्यवहारम् अवतरन्तं घटादिकं पदार्थम् अभिप्रयन्ति तन्-निचय-जन्यो व्यवहारः। ये तु क्षण-क्षयिणः परमाणु-लक्षणा विशेषाः सत्या इति मन्यन्ते तत्-सङ्घात-घटित ऋजुसूत्र इति। तथा ये रूढितः शब्दानां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति तन्-निवह-साध्यः शब्द इति। ये तु व्युत्पत्तितो ध्वनीनां प्रवृत्तिं वाञ्छन्ति नान्यथा तद्-वार-जन्यः समभिरूढ इति। ये तु वर्तमान-काल-भावि-व्युत्पत्ति-निमित्तम् अधिकृत्य शब्दाः प्रवर्तन्ते नान्यथेति मन्यन्ते तत्-सङ्घ-घटितः खल्व् एवम्भूत इति। तद् एवं न कश्चिद् विकल्पोऽस्ति वस्तु-गोचरो योऽत्र नय-सप्तके नान्तर्-यातीति सर्वाभिप्राय-सङ्ग्राहका एते इति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।१४] साम्प्रतम् एषाम् एव प्रत्येकं मतम् उपवर्णयामः। तत्र गमनं गमः परिच्छेद इत्य् अर्थः। निश्चितो गमो निगमो विविक्त-वस्तु-ग्रहणं, स एव, प्रज्ञादेर् आकृति-गणतया स्वार्थिकाण्-प्रत्यय-विधानान् नैगमः। यदि वा निगम्यन्ते नियतं परिच्छिद्यन्त इति निगमा अर्थास् तेषु भवो योऽभिप्रायो नियत-परिच्छेद-रूपः स नैगम इति। अयं हि सत्ता-लक्षणं महा-सामान्यम् अवान्तर-सामान्यानि च द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्वादीनि तथान्त्यान् विशेषान् सकलासाधारण-रूप-लक्षणान् अवान्तर-विशेषांश् चापेक्षया पर-रूप-व्यावर्तन-क्षमान् सामान्याद् अत्यन्त-विनिर्लुठित-स्वरूपान् अभिप्रैति। तथा हि॒ किल संविन्-निष्ठाः पदार्थ-व्यवस्थितयो, न च सामान्य-ग्राहिणि विज्ञाने विशेषावभासोऽस्त्य्,ऽनुवर्तमानैकाकार-परामर्शेन तद्-ग्रहणाद्, अन्यथा सामान्य-ग्राहकत्वायोगात्। नापि विशेष-ग्रहण-दक्षे संवेदने सामान्यं चकास्ति, विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-पदार्थ-ग्राहितया तत्-प्रवृत्तेर्, अन्यथा विशेष-संवेदनत्वायोगात्। न चैतौ परस्पर-विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुम् युक्ताव्, अतिप्रसङ्गाद्, विभिन्न-प्रतिभासिनाम् अपि निखिलार्थात्मनाम् ऐक्य-प्राप्तेः। एवं च प्रमाणयति॒ परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ, पार्थक्येनोपलब्धेर्, इह यद् यत् पार्थक्येनोपलभ्यते तत् तत् परस्पर-विश्लिष्टं द्रव्यं, तद् यथा -- देवदत्त-यज्ञदत्ताव् इति, पार्थक्येन चोपलभ्येते सामान्य-विशेषाव्, अतः परस्पर-विभिन्नाव् इति। न सामान्यात् पृथग् विशेषोपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम्। सामान्य-व्याप्तस्येति चेन्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः, सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात्॑ ततश् च तेन बोधेन विविक्त-विशेष-ग्रहणाभावात् तद्-वाचकं ध्वनिं तत्-साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता॑ न चैतद् अस्ति, विशेषाभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्ति-दर्शनात्। तस्माद् विशेषम् अभिलषता तत्र च व्यवहारं प्रवर्तयता तद्-ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः। तथा सामान्यम् अपि विविक्ताकारतया स्व-ग्राहिणि ज्ञाने यदि न प्रकाशेत, तदा तद्-गोचराभिमत-संवेदनेन विशेषस्याप्य् आकलनात् सामान्याभिधान-व्यवहारयोः प्रवृत्तेर् उच्छेदस् तथैव वक्तव्यो, विविक्त-सामान्य-ग्राहि-बोध-मूलकत्वात् तयोस्, तद्-अनिष्टौ तयोर् अप्य् अभावापत्तेः। न च सामान्यं विशेषं वा तिरस्-कृत्य केवलस्य विशेषस्य सामान्यस्य वाभ्युपगमः कर्तुं युक्तो, द्वयोर् अपि स्व-ग्राहि-ज्ञाने प्रतिभासमानतया विशेषाभावात्। तस्माद् एतौ द्वाव् अपीतरेतर-विशकलिताव् अङ्गी-करणार्हाव् इति नैगमः।
[न्या०वि० २९।१५] अधुना सङ्ग्रहाभिप्रायो वर्ण्यते। तत्र सङ्गृह्णात्य् अशेष-विशेष-तिरो-धान-द्वारेण सामान्य-रूपतया जगद् आदत्त इति सङ्ग्रहः। अयं हि मन्यते॒ भाव-लक्षण-सामान्याद् व्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा विशेषाः परिकल्प्येरन्न्, अव्यतिरिच्यमान-मूर्तयो वा, गत्य्-अन्तराभावात्। तत्र यद्य् आद्यः पक्षस्, तदा निःस्वभावतां ते स्वी-कुर्युर्, भाव-व्यतिरेकित्वाद्, गगन-कुसुमादिवत्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तर्हि भाव-मात्रम् आपद्यन्ते। तथा हि॒ भाव-मात्रं विशेषास्, तद्-अव्यतिरिक्तत्वाद्, इह यद् यतोऽव्यतिरिक्तं तत् तद् एव भवति, तद् यथा -- भावस्यैव स्वरूपम्, अव्यतिरेकिणश् च विशेषा, अतस् तद्-रूपा एव। ननु च यदि भाव-मात्रम् एव तत्त्वं तदा तस्य सर्वत्राविशेषाद् य एते प्रतिप्राणि-प्रसिद्धाः स्तम्भेभ-कुम्भाम्भो-रूहादि-विशिष्ट-वस्तु-साध्या व्यवहारास् ते सर्वेऽपि प्रलयम् आपद्येरन्न्, अतो विशेषा अपि विविक्त-व्यवहार-हेतवोऽभ्युपगन्तव्याः। नैतद् अस्ति, व्यवहारस्यानाद्य्-अविद्या-बल-प्रवर्तितत्वात्, तेन पारामर्थिक-प्रमाण-प्रतिष्ठित-तत्त्व-प्रतिबन्धाभावात्। किं च, विशेषाग्रहो विशेषेण त्याज्यो, विशेष-व्यवस्थापक-प्रमाणाभावात्। तथा हि॒ भेद-रूपा विशेषाः, न च किञ्चित् प्रमाणं भेदम् अवगाहते, प्रत्यक्षं हि तावद् भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षत्-कर्तुं युक्तम्, नाभावं, तस्य सकल-शक्ति-विरह-रूपतया तद्-उत्पादने व्यापाराभावाद्, अनुत्पादकस्य च साक्षात्-करणे सर्व-साक्षात्-करण-प्रसङ्गात्, तथा च विशेषाभावात् सर्वो द्रष्टासर्व-दर्शीस्यात्। अनिष्टम् चैतद् भवतां, तस्माद् भाव-ग्राहकम् एव तद् एष्टव्यम्। स च भावः सर्वत्राविशिष्ट इति तथैव तेन ग्राह्यस्, तद्-उत्तर-काल-भावी पुनर् विकल्पो घटोऽयं पटादिर् न भवतीत्य् एवम्-आकारो व्यवहारं रचयन्न् अविद्या-मूलत्वान् न प्रमाणं, तन् न प्रत्यक्षाद् विशेषावगतिः। नाप्य् अनुमानादेः, प्रत्यक्ष-मूलकत्वाच् छेष-प्रमाण-वर्गस्य, तस्मात् सामान्यम् एव परमार्थो, न विशेषा इति सङ्ग्रहः।
[न्या०वि० २९।१६] साम्प्रतं व्यवहार-मतम् उच्यते। तत्र व्यवहरणं व्यवह्रियते वानेन लौकिकैर् अभिप्रायेणेति व्यवहारः। अयं तु मन्यते॒ यथा लोक-ग्राहम् एव वस्त्व् अस्तु, किम् अनयादृष्टाव्यवह्रियमान-वस्तु-परिकल्पन-कष्ट-पिष्टिकया? यद् एव च लोक-व्यवहार-पथम् अवतरति तस्यानुग्राहकं प्रमाणम् उपलभ्यते, नेतरस्य, न हि सामान्यम् अनादि-निधनम् एकं सङ्ग्राहाभिमतं प्रमाण-भूमिस्, तथानुभवाभावात्, सर्वस्य सर्व-दर्शित्व-प्रसङ्गाच् च। नापि विशेषाः परमाणु-लक्षणाः क्षण-क्षयिणः प्रमाण-गोचरस्, तथा प्रवृत्तेर् अभावात्। तस्माद् इदम् एव निखिल-लोकाबाधितं प्रमाण-प्रसिद्धं कियत्-काल-भावि-स्थूरताम् आबिभ्राणम् उदकाहरणाद्य्-अर्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमं घटादिकं वस्तु-रूपं पारमार्थिकम् अस्तु, पूर्वोत्तर-काल-भावि-तत्-पर्याय-पर्यालोचना पुनर् अज्यायसी, तत्र प्रमाण-प्रसराभावात्, प्रमाणम् अन्तरेण च विचारस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्। अवस्तुत्वाच् च तेषां, किं तद्-गोचर-पर्यालोचनेन? तथा हि॒ पूर्वोत्तर-काल-भाविनो द्रव्य-विवर्ताः क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणा वा विशेषा न कञ्चन लोक-व्यवहारम् उपरचयन्ति, तन् न ते वस्तु-रूपा, लोक-व्यवहारोपयोगिनां एव वस्तुत्वाद् इति व्यवहारः।
[न्या०वि० २९।१७] साम्प्रतं ऋजुसूत्राभिप्रायः कथ्यते। तत्र र्जु प्रगुणम् अकुटिलम् अतीतानगत-वक्र-परित्यागाद् वर्तमान-क्षण-विवर्ति-वस्तुनो रूपं सूत्रयति निष्टङ्कितं दर्शयतीत्य् ऋजुसूत्रः। तथा ह्य्॒ अस्याभिप्रायो --ऽतीतस्य विनष्टत्वाद् अनागतस्यालब्धात्म-लाभत्वात् खर-विषाणादिभ्योऽविशिष्यमाणतया सकल-शक्ति-विरह-रूपत्वान् नार्थ-क्रिया-निर्वर्तन-क्षमत्वम्, अर्थ-क्रिया-क्षमं च वस्तु॑ तद्-अभावान् न तयोर् वस्तुत्वम् इति। वर्तमान-क्षणालिङ्गितं च पुनर् वस्तु-रूपं समस्तार्थ-क्रियासु व्याप्रियत इति तद् एव पारमार्थिकम्। तद् अपि च निरंशम् अभ्युपगन्तव्यम्, अंश-व्याप्तेर् युक्ति-रिक्तत्वाद्, एकस्यानेक-स्वभावताम् अन्तरेणानेक-स्वावयव-व्यापनायोगात्। अनेक-स्वभावतैवास्त्व् इति चेन्, न, विरोध-व्याघ्राघ्रातत्वात्। तथा हि॒ यद्य् एकः स्वभावः कथम् अनेकः? अनेकश् चेत् कथम् एकः? एकानेकयोः परस्पर-परिहारेणावस्थानात्॑ तस्मात् स्वरूप-निमग्नाः परमाणव एव परस्परोपसर्पण-द्वारेण कथञ्चिन् निचय-रूपताम् आपन्ना निखिल-कार्येषु व्यापार-भाज इति त एव स्वलक्षणं, न स्थूरतां धारयत् पारमार्थिकं इति। किं च, प्रमाणतोऽर्थ-व्यवस्था, न च प्रमाणं देश-काल-व्याप्ति-ग्रहणे किञ्चन प्रवर्तते, सर्व-प्रमाणानां वर्तमान-प्रकाश-रूपत्वात्। तथा हि॒ प्रत्यक्षं तावद् रूपालोक-मनस्कार-चक्षुर्-लक्षण-कारण-चतुष्टयाल् लब्ध-सत्ताकं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशते, अतीत-वर्त्स्यत्-क्षणयोर् असन्निहितत्वात्, ततश् च तत् तत्-काल-सम्बद्धम् एव वस्तुनो रूपं साक्षात्-कर्तुं क्षमते न पूर्वम् अपरं वासन्निधानाद् एव। यदि पुनर् विनष्टम् अपि पूर्व-क्षण-वर्ति-रूपमाकलयेत्, तदा विनष्टत्वाविशेषान् निरवधिः क्षण-परम्परा तत्र प्रतीयेत, तथा च सति सङ्कलिकयानादि-जन्म-परम्परा-ग्राहि प्रत्यक्षम् अनुषज्येत। एवम् अनागत-क्षण-ग्रहणेऽपि योज्यम्॑ अनिष्टं चैतत्, तस्मात् तद् वार्तमानिक-क्षण-ग्रहण-दक्षम् एवेत्य् अभ्युपगन्तव्यम्। ननु च यदि क्षण-भङ्गुरताम् अर्थात्मनाम् अध्यक्षम् अवलोकयति, तदा नीलतेव प्रतिभासमाना सा विप्रतिपत्ति-गोचरं न यायाद् इति तद्-विषयो लौकिकानां व्यवहारः प्रवर्तेत, न चैतद् अस्ति, स्थिरता-द्वारेण व्यवहार-प्रवृत्तेर् इति। अत्र प्रतिविधीयते -- साक्षात्-कुर्वाणा अपि क्षण-विनश्वरतां सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्ध-बुद्धयो मन्दा नाध्यवस्यन्त्य्, अनादि-काल-प्ररूढ-वासना-प्रबोध-समुपजनित-मिथ्या-विकल्प-सामर्थ्याच् च विपर्यस्त-स्थिरता-व्यवहारं प्रवर्तयन्ति, तन् नायम् अध्यक्षस्यापराधो,ऽपि तु प्रमात्ःणाम् एव। तथा घनाकारोऽपि प्रत्यक्ष-पृष्ठ-भावि-मिथ्या-विकल्प-सन्दर्शित एव, विविक्त-दर्शने तत्-प्रतिभासायोगात्, कर-चरण-शिरो-ग्रीवादयो ह्य् अवयवाः परस्पर-विभक्ता एव तत्र प्रतिभान्ति, न व्याप्य्-आकारो, न च तेऽपि स्वांश-व्यापिनः प्रतिभान्ति, तद्-अवयवानाम् अपीतरेतर-विशकलित-रूपाणां प्रतिभासात् तावद् यावत् परमाणव एव प्रथन्ते, व्यापि-रूपस्य विचाराक्षमत्वाद् इत्य् उक्त-प्रायम्। नाप्य् अनुमानात् स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिः, प्रत्यक्ष-परिगृहीतं हि सम्बन्धम् आसाद्यानुमानं प्रवर्तेत, यदा च तत् क्षण-भङ्गुर-विविक्तांश-ग्रहण-चातुर्यम् आबिभ्रद् दर्शितं तदानुमानम् अपि तत्-प्रतिबन्ध-मूलकं तद्-गोचरम् एव पारम्पर्येण प्रतिष्ठापयति, स्व-प्रतिभासिनो रूपस्यालीकतया तत्-प्रतिष्ठापन-द्वारेणैव तस्य प्रामाण्यात्। ननु च स्मरण-प्रत्यभिज्ञानादीनि स्थिर-स्थूर-वस्तु-व्यतिरेकेण नोपपद्यन्ते, पूर्वम् अदृष्टे तद्-अभावात्, पुरुषाद्य्-अवयविनां स्मरणात् प्रत्यभिज्ञानाच् च। नैतद् अस्ति, तेषाम् अलीक-वासना-प्रबोधोत्थापितत्वेन प्रामाण्यायोगात्। किं च, तान्य् अपि स्वयं वर्तमान-क्षण एव प्रकाशन्ते, विप्लव-वशात् तु स्वरूपम् एव वासना-सम्पादितातीतार्थ-रूपतया व्यवस्यन्ति, घनाकारं च तस्यासन्तम् अध्यारोपयन्ति॑ तन् न तेभ्योऽपि व्यापि-वस्तु-सिद्धिः। तस्माद् व्यापिनि रूपे प्रमाणानवतारात् परस्पर-विश्लिष्टाः परमाणव एव परमार्थत इति र्जुसूत्रः।
[न्या०वि० २९।१८] तद् इदम् अर्थ-स्वरूप-निरूपण-निपुणानां नयानां मतम् उपवर्णितम्॑ अधुना शब्द-विचार-चतुराणाम् उपवर्ण्यते। तत्र त्रयाणाम् अपि शब्दादीनाम् इदं साधारणमाकूतं, यद् उत शब्द एव परमार्थो नार्थस्, तस्य तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्। पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धेः कथम् अव्यतिरेक इति चेत्, प्रमाणाद् इति ब्रूमः। तथा हि॒ न व्यतिरिक्तोऽर्थः शब्दात्, तत्-प्रतीतौ तस्य प्रतीयमानत्वाद्, इह यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तं भवति, तद् यथा -- शब्दे प्रतीयमाने तस्यैव स्वरूपं, प्रतीयते च शब्दे प्रतीयमानेऽर्थो,ऽतोऽसौ ततोऽव्यतिरिक्त इति। अगृहीत-सङ्केतस्य घट-शब्द-श्रवणेऽपि घट-प्रतीतेर् अभावाद् व्यतिरिक्त इति चेद्, एवं तर्हि विषस्य मारणात्मकत्वं तद्-अज्ञस्य न प्रतिभातीति तत् ततो व्यतिरिक्तम् आपद्येत, न चैतद् अस्ति, तद्-व्यतिरेकाविशेषेण गुड-खण्डवद् विषस्याप्य् अमारकत्वापत्तेः, सम्बन्धस्य च व्यतिरिक्तेन सह प्राग् एवापास्तत्वात्॑ तन् नाबुद्ध-प्रमातृ-दोषेण वस्तुनोऽन्यथात्वम्, अन्यथान्धो रूपं नेक्षत इति तद्-अभावोऽपि प्रतिपत्तव्य इति। ये निरभिधाना वर्तन्तेऽर्थास् तेषां शब्दात् पार्थक्येन वस्तुत्व-सिद्धिर् इति चेन्, न, निरभिधानार्थाभावात्, केवलं केचिद् विशेष-शब्दैः सङ्कीर्त्यन्ते, केचित् सामान्य-ध्वनिभिर् इत्य् एतावान् विशेषः स्यात्। यदि वा सकलार्थ-वाचका विशेष-धवनयो न सन्तीति नास्त्य् अत्र प्रमाणम्। ततश् च सर्वेऽर्था विद्यमान-स्व-वाचका,ऽर्थत्वाद्, घटार्थवद् इति प्रमाणात् सर्वेषां स्व-वाचकत्वेन पूर्वोक्त-युक्तेः शब्दाद् अपार्थक्य-सिद्धिः। तस्मान् न परमार्थतोऽर्थः शब्दातिरिक्तोऽस्त्य्, उपचारतः पुनर् लौकिकैर् अपर्यालोचित-परमार्थैर् व्यवह्रियते। असाव् अप्य् औपचारिकः शब्दात्मको वार्थः प्रतिक्षण-भङ्गुरः स्वी-कर्तव्यो, वर्णानां क्षण-ध्वंसिता-प्रतीतेर्, ऋजुसूत्र-प्रतिपादित-युक्ति-कलापाच् च।
[न्या०वि० २९।१९] साम्प्रतम् एतेषाम् एव प्रत्येकम् अभिप्रायः कथ्यते। तत्र शब्दो॒ रूढितो यावन्तो ध्वनयः कस्मिंश्चिद् अर्थे प्रवर्तन्ते॑ यथेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः, तेषां सर्वेषाम् अप्य् एकम् अर्थम् अभिप्रैति किल प्रतीति-वशाद्, यथा शब्दाव्यतिरेकोऽर्थस्य प्रतिपाद्यते तथैव तस्यैकत्वं वानेकत्वं वा प्रतिपादनीयं॑ न चेन्द्र-शक्र-पुरन्दरादयः पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थ-वाचितया कदाचन प्रतीयन्ते, तेभ्यः सर्वदैवैकाकार-परामर्शोत्पत्तेर्, अस्खलद्-वृत्तितया तथैव व्यवहार-दर्शनात्। तस्माद् एक एव पर्याय-शब्दानाम् अर्थ इति शब्दः, शब्द्यत आहूयतेऽनेनाभिप्रायेणार्थ इति निरुक्ताद् एकार्थ-प्रतिपादनाभिप्रायेणैव पर्याय-ध्वनीनां प्रयोगाद् इति।
[न्या०वि० २९।२०] साम्प्रतं समभिरूढ-मतम् उपवर्ण्यते। तत्र सम् एकी-भावेनाभिरोहति व्युत्पत्ति-निमित्तम् आस्कन्दति शब्द-प्रवृत्तौ योऽभिप्रायः स समभिरूढः। अयं हि पर्याय-शब्दानां प्रतिविभक्तम् एवार्थम् अभिमन्यते, तद् यथेन्दनाद् इन्द्रः, परमैश्वर्यम् इन्द्र-शब्द-वाच्यं परमार्थतस्, तद्वत्य् अर्थे पुनर् उपचारतः प्रवर्तते, न वा कश्चित् तद्वान्, सर्व-शब्दानां परस्पर-विभक्तार्थ-प्रतिपादकतयाश्रयाश्रयि-भावेन प्रवृत्त्य्-असिद्धेः। एवं शकनाच् छक्रः, पूर्-दारणात् पुरन्दर इत्य्-आदि भिन्नार्थत्वं सर्व-शब्दानां दर्शयति॑ प्रमाणयति च॒ पर्याय-शब्दा विभिन्नार्थाः, प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकत्वाद्, इह ये ये प्रतिविभक्त-व्युत्पत्ति-निमित्तकास् ते ते भिन्नार्थाः, यथेन्द्र-घट-पुरुष-शब्दा विभिन्नार्था, विभिन्न-व्युत्पत्ति-निमित्तकाश् च पर्याय-शब्दा अप्य्, अतोऽभिन्नार्था इति। यत् पुनर् अविचारित-प्रतीति-बलाद् एकार्थाभिधायकत्वं प्रतिपाद्यते तद् अयुक्तम्, अतिप्रसङ्गात्। तथा हि॒ यदि युक्ति-रिक्ता प्रतीतिर् एव शरणी-क्रियते तदा मन्द-मन्द-प्रकाशे दवीयसि देशे सन्निविष्ट-शरीरा विभिन्ना अपि निम्ब-कदम्बाश्वत्थ-कपित्थादय एक-तर्व्-आकारताम् आबिभ्राणाः प्रतीयन्त इत्य् एकतयैवाभ्युपगन्तव्याः। न चैतद् अस्ति, विविक्त-तत्-स्वरूप-ग्राहि-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपात-बाधितत्वेन पूर्व-प्रतीतेर् विविक्तानाम् एव तेषाम् अभ्युपगमात्, तन् नैकार्थ-वाचिनो ध्वनयः सन्ति, रूढिः पुनर् अविचारित-तद्-अर्थानाम् इति समभिरूढः।
[न्या०वि० २९।२१] साम्प्रतम् एवम्भूताभिप्रायः प्रतिपाद्यते। तत्रैवं-शब्दः प्रकार-वचनस्, ततश् चैवं यथा व्युत्पादितस् तं प्रकारं भूतः प्राप्तो यः शब्दः स एवम्भूतः॑ तत्-समर्थन-प्रधानोऽभिप्रायोऽप्य् एवम्भूतस्, तद्-विषयत्वात्, विषय-शब्देन च विषयिणोऽभिधानात्। अयं हि यस्मिन्न् अर्थे शब्दो व्युत्पाद्यते स व्युत्पत्ति-निमित्तम् अर्थो यदैव विवर्तते तदैव तं शब्दं प्रवर्तमानम् अभिप्रैति, न सामान्येन। यथोदकाद्य्-आहरण-वेलायां योषिद्-आदि-मस्तकारूढो विशिष्ट-चेष्टावान् एव घटोऽभिधीयते, न शेषो, घट-शब्द-व्युत्पत्ति-निमित्त-शून्यत्वात्, पटादिवद् इति। अतीतां भाविनीं वा चेष्टाम् अधिकृत्य सामान्येनैवोच्यत इति चेन्, न, तयोर् विनष्टानुत्पन्नतया शश-विषाण-कल्पत्वात्॑ तथापि तद्-द्वारेण शब्द-प्रवर्तने सर्वत्र प्रवर्तयितव्यो, विशेषाभावात्। किं च, यद्य् अतीत-वर्त्स्यच्-चेष्टापेक्षया घट-शब्दोऽचेष्टावत्य् अपि प्रयुज्येत, कपाल-मृत्-पिण्डादाव् अपि तत्-प्रवर्तनं दुर्निवारं स्यात्, विशेषाभावात्, तस्माद् यत्र क्षणे व्युत्पत्ति-निमित्तम् अविकलम् अस्ति तस्मिन्न् एव सोऽर्थस् तच्-छब्देन वाच्य इत्य् एवम्भूतः।
[न्या०वि० २९।२२] तद् एवम् अनेक-धर्म-परीतार्थ-ग्राहिका बुद्धिः प्रमाणं, तद्-द्वारायातः पुनर् एक-धर्म-निष्ठार्थ-समर्थन-प्रवणः परामर्शः शेष-धर्म-स्वी-कार-तिरस्-कार-परिहार-द्वारेण वर्तमानो नयः, स च धर्माणाम् आनन्त्याद् अनन्त-भेदस्, तथापि सर्व-सङ्ग्राहकाभिप्राय-परिकल्पन-मुखेनैवं सप्त-भेदो दर्शितः। अयम् एव च स्वाभिप्रेत-धर्मावधारणात्मकतयाशेष-धर्म-तिरस्-कार-द्वारेण प्रवर्तमाणः परामर्शो दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते॑ तद्-बल-प्रभावित-सत्ताका हि खल्व् एते पर-प्रवादाः। तथा हि॒ नैगम-नय-दर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। सङ्ग्रहाभिप्राय-प्रवृत्ताः सर्वेऽप्य् अद्वैत-वादाः सांख्य-दर्शनं च। व्यवहार-नयानुपाति प्रायश् चार्वाक-दर्शनम्। ऋजुसूत्राकूत-प्रवृत्त-बुद्धयस् ताथागताः। शब्दादि-नय-मतावलम्बिनो वैयाकरणादय इति। अथेत्थम् अभिदधीथा, यथा॒ कथम् एतेऽवधारण-द्वारेण स्वकम् अर्थं समर्थयन्तस् तद्-विपरीतं निराकुर्वाणा दुर्नयतां प्रतिपद्यन्त इत्य्, अत्रोच्यते -- एवं प्रवृत्तौ निर्गोचरत्वान्, निर्गोचरस्य नयत्वायोगात्। तथा हि॒ नयति केनचिद् अंशेन विशिष्टम् अर्थं प्रापयति योऽभिप्रायः स नयः, स्वाभिप्रेत-धर्माच् छेष-धर्म-प्रतिक्षेप-द्वारेण तु प्रवृत्तो न किञ्चिन् नयत्य्, एक-धर्मालिङ्गितस्य वस्तुनोऽसम्भवाद्, बहिर् अन्तश् चानेक-धर्म-परिकरित-स्वभावस्य तस्य प्रतिभासात्, तद्-अपह्नव-कारिणां कदभिप्रायाणां प्रतिभास-बाधितत्वेनालीकत्वात्।
[न्या०वि० २९।२३] तथा हि॒ यः तावन् नैगम-नयः परस्पर-विश्लिष्टौ सामान्य-विशेषौ प्रत्यपीपदत्, तद् अयुक्तम्। तयोस् तथा कदाचन प्रतिभासाभावात्। यच् चोक्तम्॒ अनुवर्तमानैकाकार-परामर्श-ग्राह्यं सामान्यं यत्र न तत्र विशेष-प्रतिभासो, यत्र च विशिष्ट-देश-दशावच्छिन्न-बोध-निर्ग्राह्यो विशेषो न तत्र सामान्यावगतिस्, तद्-वचन-मात्रम् एव, धव-खदिर-पलाशादि-समस्त-विशेषापसारणे वृक्षत्वादि-सामान्य-प्रतिभासाभावात्। दूराद् विशेषाग्रहणेऽपि केवलं तच् चकास्तीति चेन्, न, तत्राप्य् अभ्यन्तरी-भूत-विशेष-प्रतिभासात्, तद्-विरहे शश-विषाण-रूपत्वात्। एवं विशेषा अपि न सामान्याद् अत्यन्त-व्यतिरेकिणः प्रतिभान्ति, तन्-निमग्नानाम् एव तेषां ग्रहणाद्, इतरथा सत्तातोऽतिरिच्यमाना भावा निःस्वभावताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। तथा वृक्षत्वादि-सामान्येभ्योऽपि भेदिनो वृक्षादयो न स्युस्, तद्-अभेद-निबन्धनत्वात् तत्-स्वरूप-स्थितेः। तस्मात् तद् एव संवेदनम् उपसर्जनी-कृत-वैषम्यं प्रधानी-कृतैकाकारं सामान्यं गृह्णातीत्य् उच्यते, न्यक्-कृत-समत्वम् उत्कलित-नानात्वं पुनर् विशेष-ग्रहीति, समत्व-नानात्वयोः कथञ्चिद् भेदाभेदिनोः परस्परं सर्वार्थेषु भावात्, तद्-अभावे तथा-विध-प्रतिभासानुपपत्तेः। एतेन यद् अवादि "न चैतौ विभिन्नाव् अपि प्रतिभासमानौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चिन् मिश्रयितुं युक्ताव्" इत्य्-आदि, तद् अपास्तम् अवगन्तव्यं, विभिन्नयोः प्रतिभासाभावात्। व्यवहारोऽपि सर्वः प्रधानोपसर्जन-द्वारेण कथञ्चिद् इतरेतराविनिर्लुठित-सामान्य-विशेष-साध्य एव॑ न हि सामान्यं दोह-वाहादि-क्रियायाम् उपयुज्यते, विशेषाणाम् एव तत्रोपयोगान्, नापि विशेषा एव तत्-कारिणः, गोत्व-शून्यानां तेषां वृक्षाद्य्-अविशिष्टतया तत्-करण-सामर्थ्याभावात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेके सामान्य-विशेषयोर् वृक्षं छिन्धीति चोदितः किम् इति तद्-विशेषे पलाशादौछेदं विधत्ते? तत्र तस्य समवायाद् इति चेन्, न, समवाय-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, भावेऽपि विश्लिष्टयोर् अभेद-बुद्ध्य्-उत्पादनाक्षमत्वात्, तस्यापि व्यतिरिक्ततया पदार्थान्तराविशेषान् नित्यत्वैकत्व-सर्व-गतत्वादिभिश् च सर्वत्र तत्-करण-प्रसङ्गाच् च। यत् पुनर् अवादीर्, यद् उत॒ यदि सामान्यं विशेष-निष्ठं, विशेषो वा सामान्य-व्याप्तः समुपलभ्येत, ततो विविक्तयोस् तयोः क्वचिद् अनुपलम्भाद् योऽयं विविक्तेषु सामान्येषु विशेषेषु चाभिधानार्थ-क्रिया-लक्षणो व्यवहारः स समस्तः प्रलयं यायाल्, लोली-भावेन तद्-विवेकस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, तद् अप्य् असमीचीनं, यतो यद्य् अपि परस्पराविविक्तयोः सामान्य-विशेषयोः सर्वत्रोपलम्भस्, तथापि यत्रैव प्रमातुर् अर्थित्वं तद् एव सामान्यं, विशेषान् वा प्रधानी-कृत्य तद्-गोचरं ध्वनिम् अर्थ-क्रियां वा प्रवर्तयतीतरस्याप्य् उपसर्जन-भावेन तत्र व्यापारात्, तद्-विकलस्येतरस्यापि शश-विशाणायमानतया क्वचिद् अनुपयोगात्। किं चात्यन्त-व्यतिरेकिणि विशेषेभ्यः सामान्ये वृत्ति-विकल्पोपलम्भ-नूतन-विशेष-सम्बन्धादि-द्वारेण दूषण-मुद्गर-कदम्बकं मूर्धनि पतद् दुर्विषहं स्यात्। तथा हि॒ तत् तेषु कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वा? सामस्त्य-पक्षे प्रतिविशेषं परिसमाप्ततया सामान्य-बहुत्व-प्रसङ्गो,ऽनिष्टं चैतद्, एकत्वाभुपगम-क्षतेः। एकदेशेन वर्तने पुनर् यावन्तो विशेषास् तावन्तस् तद्-अंशाः प्रसजन्ति, न चैतद् अस्ति, सामान्यस्य निरवयवत्वात्॑ सावयवत्वेऽपि पुनस् तेऽभिन्ना भिन्ना वा। यद्य् अभिन्ना विशेषास्, तर्ह्य् अभेदिनः किं नेष्यन्ते, विशेषाभावात्। भेद-पक्षे पुनस् तेष्व् अपि तत् कथं वर्तेत -- सामस्त्येनैकदेशेन वेति? तद् एव चोद्यम् अलब्ध-परिनिष्ठम् अवतरति, तन् नात्यन्त-भेदिनो वृत्तिः सम्भवति। किं च, यद्य् एकं सामान्यं भेदवत् समस्त-विशेषेषु वर्तेत, तदैक-विशेषोपलम्भ-काले तद् उपलम्भ्यते न वा? यद्य् आद्यः पक्षस्, तस्यैकतया सर्वत्रोपलम्भात्, व्याप्य-ग्रहणाभावे व्यापक-ग्रहणासिद्धेर्, निखिल-तद्-व्याप्य-विशेष-ग्रहणम् आसज्येत, न चैतद् अस्ति, पुरो-वर्ति-विशेषस्यैव साक्षात्-करणाच्, छेष-विशेषाणाम् असन्निधानात्॑ सन्निहित-विशेष-निष्ठम् एव तद् उपलभ्यते। तस्यैव तद्-व्यञ्जकत्वाद्, इतरेषां तद्-अभावाद् इति चेन् नैक-स्वभावस्य खण्डशो व्यञ्जनायोगात् सन्निहित-विशेष-व्यञ्जितम् एव तत् सर्वत्र स्वभावान्तराभावात् सर्व-विशेष-गतं च तद्-रूपम्, अतस् तद्-दर्शनं केन वार्येत। अथ द्वितीयः कल्पस्, तथा सति यथैक-विशेषोपलम्भ-समये नोपलभ्यते, तथा शेष-विशेषोपलम्भ-कालेऽपि नोपलभ्येत, विशेषाभावात्। अतस् तद्-अभाव एवोक्तः स्यात्, केवलस्योपलम्भाभावात्। उपलम्भेऽपि स्व-स्वभाव-स्थितेर् विशेष-रूपतापत्तिः। तथा चिरन्तन-विशेष-व्यवस्थित-सत्ताकं तन् नूतन-विशेषोत्पादे सति कथं तेन सह सम्बन्धम् अनुभवेत्? न तावद् विशेषान्तरेभ्यस् तद् उत्पित्सु-विशेष-देशं गन्तुम् अर्हति, निष्क्रियत्वात्। नापि तत्रैवाभवद्, विशेषोत्पादात् प्राक् तद्-देशे तद्-उपलम्भाभावात्। नापि विशेषेणैव सहोत्पद्यते, नित्यत्वान्, नित्यस्य चोत्पत्ति-विरोधात्। अथैतद्-दोष-परिजिहीर्षया तत् सक्रियाकम् अभिधीयेत, तथापि पूर्व-व्यक्ति-त्यागेन वा नूतन-विशेष-देशम् आक्रामेत्, तद्-अभावेन वा? न तावद् अद्यः पक्षश्, चिरन्तन-व्यक्तीनां सामान्य-विकलतया तत्-सम्बन्ध-साध्य-बुद्धि-ध्वनि-विरह-प्रसङ्गात्। न चैतद् अस्त्य्, अपरापर-विशेषोत्पादेऽपि प्राचीन-व्यक्तिषु तद्-दर्शनात्। अथ द्वितीयः कल्पस्, तद् अप्य् असम्बद्धं, निरवयवस्य पूर्व-व्यक्ति-त्याग-वैकल्ये सत्य् उत्पित्सु-व्यक्तिं प्रतिगमनाभावात्। सावयव-पक्षस्य पुनः प्राग् एवापास्तत्वान्, नैतद्-अभ्युपगम-द्वारेण परिहारः श्रेयान्। अन्यच् च॒ व्यतिरिक्त-सामान्य-सम्बन्धाद् यदि भावाः समाना, न स्वरूपेण, तदा सत्त्व-सम्बन्धात् प्राग् भावाः सन्तोऽसन्तो वा। सन्तश् चेद् अपार्थकः सत्ता-सम्बन्धो,ऽन्यथानवस्था प्रसज्येत, पुनः-सत्तान्तर-सम्बन्धानिवारणात्। असन्तश् चेद् अत्यन्तासताम् अपि गगनारविन्दादीनां सत्ता-सम्बन्धाद् भाव-रूपतापद्येत। एवं द्रव्यत्व-गुणत्व-कर्मत्व-गोत्वादि-सामान्येष्व् अपि समस्तम् एतद् वाच्यम्, एक-योग-क्षेमत्वात्, तन् न परस्परम् अत्यन्त-व्यतिरेकिणौ सामान्य-विशेषौ कथञ्चन घटाम् आटीकेते। अत एव तत्-समर्थन-प्रवणस् तत्-तादात्म्य-प्रतिक्षेपकोऽभिप्रायो निरालम्बनत्वान् नैगम-दुर्नय-व्यपदेशम् आस्कन्दति, तादात्म्योपेक्षयैव सामान्य-विशेष-व्यतिरेक-समर्थकस्य नैगम-नयत्वाद्, व्यतिरेकिणोर् अपि तयोर् वस्तुनि कथञ्चिद् भावाद्, इतरथा विवक्षयापि तथा दर्शयितुम् अशक्यत्वात्, प्रधानोपसर्जन-भावस्य द्वय-निष्ठत्वात्, अत्यन्त-तादात्म्ये तत्-कारिण्या विवक्षाया अपि निर्गोचरता-प्रसङ्गात्। तस्मात् कथञ्चिद् भेदाभेदिनाव् एवैतौ, तद्-अन्यतर-समर्थकः पुनर् निरालम्बनत्वाद् दुर्नयतां स्वी-करोतीति स्थितम्।
[न्या०वि० २९।२४] तथा सङ्ग्रहोऽप्य् अशेष-विशेष-प्रतिक्षेप-मुखेन सामान्यम् एकं समर्थयमानो दुर्नयः, तद्-उपेक्षा-द्वारेणैव तस्य नयत्वात्, विशेष-विकलस्य सामान्यस्यासम्भवात्। तथा हि॒ यत् तावद् उक्तं -- यद् उत "विशेषाः सामान्याद् व्यतिरेकिणोऽव्यतिरेकिणो वा। व्यतिरेक-पक्षे निःस्वभावत्वं, निःसत्ताकत्वात्। अव्यतिरेक-पक्षे भाव-मात्रं, तद्-अव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवद्" इति -- तद् अयुक्तं, विशेष-वादिनोऽप्य् एवं-विध-विकल्प-सम्भवात्। तथा हि॒ विशेषेभ्यः सामान्यं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा। व्यतिरिक्तं चेन्, न तर्हि सामान्यं, स्व-स्वरूप-व्यवस्थिततया विशेष-रूपत्वात्। अव्यतिरिक्तं चेत्, तथापि न सामान्यं, विशेषाव्यतिरिक्तत्वाद् एव तत्-स्वरूपवत्। यद् अप्य् अवाद्य् -- "अनाद्य्-अविद्या-बल-प्रवृत्तो विशेष-व्यवहारस्, तात्त्विकं सामान्यं" -- तद् अपि वचन-मात्रम् एव, युक्ति-रिक्तत्वात्, सामान्यम् एवानाद्य्-अविद्या-दर्शितं, विशेषाः पुनः पारमार्थिका इति विशेष-वादिनोऽपि वदतो वक्त्र-भङ्गाभावात्। यत् पुनर् विशेष-ग्राहक-प्रमाणाभावं प्रतिपादयताभ्यधायि, यद् उत "प्रत्यक्षं भाव-सम्पादित-सत्ताकं तम् एव साक्षात्-करोति नाभावं, तस्यानुत्पादकत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्ततरं, यतः केनेदं भवतोऽत्यन्त-सुहृदा निवेदितं॒ "भाव एव केवलः प्रत्यक्षम् उत्थापयति, न पुनर् अभावोऽपि" [इति]? अभाव-व्यापाराभाव-प्रतिपादक-युक्ति-कलापेनेति चेद् मुग्ध-विप्रतारितोऽसि, तद्-व्यापाराभावासिद्धेः, सद्-असद्-रूप-वस्तुनः समस्त-क्रियासु व्यापाराद्, भाव-तादात्म्येन व्यवस्थितस्याभावस्य व्यापारे विरोधाभावात्। कथं भावाभावयोस् तादात्म्यं, विरोधाद्? इति चेन्, न, प्रमाण-प्रसिद्धे विरोधाभावात्। तथा हि॒ घटादिकः पदार्थात्मा स्वरूपेण सन्, न पटादि-रूपेणापीति भावाभावात्मकः। यदि पुनः कथञ्चिन् नाभावात्मकः स्यात्, तदा पटादि-रूपेणापि भावात् सर्वात्मकः प्राप्नोति। युक्तम् एतद्, अत एव भेद-प्रपञ्च-विलय-सिद्धिर् इति चेत्, स्याद् एवैतद्, यदि पटाद्य्-अभावैकान्ताच् छून्य-वादिनोऽपि मनो-रथ-पूरणं न स्यात्॑ तथा हि॒ पटादि-विविक्तो घटोऽनुभूयते, न च पटाद्य्-अभावो भावेन सह तादात्म्यम् अनुभवति, तस्माद् अभावात्मक एवायम्, एवं पटादयोऽपीतरेतरापेक्षयेति शून्यत्वापत्तिः। तस्मात् स्वरूपम् आबिभ्राणं पर-रूपेभ्यो व्यावृत्तम् एव वस्तु सर्व-क्रियासु व्याप्रियत इति भावाभावात्मकस्यैव व्यापारः, स्वरूप-धारणस्य भावत्वात्, पर-रूप-व्यावर्तनस्याभावत्वाद् इति। एवं स्व-गोचर-प्रत्यक्षोत्पादनेऽपि व्याप्रियते, ततश् च तद्-रूपम् एव तत् साक्षात्-कुर्याद् इति स्वरूप-नियते पर-रूपेभ्यो व्यावृत्त एव वस्तुनि प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तज्-जन्यत्वान्, न भाव-मात्रे, तस्य केवलस्य स्वरूपाव्यवस्थितेर् उत्पादकत्वायोगात्। न च जनकत्वाद् अर्थो ग्राह्यो जन्यत्वाद् वा ज्ञानं ग्राहकम्, अतिप्रसङ्गाद् इत्य् उक्तं, किं तर्ह्य् आवरण-विच्छेदादेर् लब्ध-सत्ताकं ग्रहण-परिणामाज् ज्ञानं गृह्णात्य्, अर्थस् तु सन्निधानादेर् गृह्यते, स चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूप एव प्रतीयत इति तथा-भूतोऽभ्युपगन्तव्यो, न केवल-सामान्य-रूप इति। सद्-असद्-अंशयोः कथम् एकत्रावस्थानम् इति चेत्, तादात्म्येनेति ब्रूमः। ननु तादात्म्ये भाव-मात्रम् अभाव-मात्रं वापद्येतेतरेतराव्यवतिरिक्तत्वाद्, इतरेतर-स्वरूपवत्, तन् नोभय-रूप-वस्तु-सिद्धिः। नैतद् अस्ति, तादात्म्यस्य सम्बन्धत्वात्, सम्बन्धस्य च द्वय-निष्ठत्वात्, तद्-अभावे कस्य केन सम्बन्धो, निर्गोचरत्वात्? तस्माद् एतौ सद्-असद्-अंशौ धर्मि-रूपतयाभेदिनौ, वस्तुनः सद्-असद्-रूपस्यैकत्वाद्, धर्म-रूपतया पुनर् विवक्षितौ भेदम् अनुभवतः, स्वरूपेण भावात्, पर-रूपेण त्व् अभावाद् इति। तद् एवं प्रत्यक्षे विविक्त-वस्तु-ग्राहिणि सकल-प्रमाण-प्रष्ठे प्रसाधिते शेष-प्रमाणान्य् अपि तद्-अनुसारितया विविक्तम् एव स्व-गोचरं स्थापयन्तीति। तद्-अपलापी केवल-सामान्य-प्रतिष्ठापकः कद्-अभिप्रायः सङ्ग्रह-दुर्नय-व्यपदेशं स्वी-कुरुते, विशेषापेक्षयैव सामान्य-स्थापकस्य सङ्ग्रह-नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२५] तथा व्यवहारोऽपि प्रमाण-प्रसिद्धं वस्तु-स्वरूपं निह्नुवानो युक्ति-रिक्तम् अविचारित-रमणीयं लोक-व्यवहार-मार्गानुसारि समर्थयमानो दुर्नयताम् आत्मनि निधत्ते, लोक-व्यवहार-प्रसाधकस्यापीतरानिष्टौ व्यवस्थानाभावात्। तथा हि॒ यद् इदं कियत्-काल-भावि स्थूरताम् आबिभ्राणं लोक-व्यवहार-कारि घटादिकं भवतस् तात्त्विकम् अभिप्रेतं तन् नाकस्मिकं, किं तर्हि नित्य-परमाणु-घटितम्, इतरथा निष्कारणत्वेन सर्वदा भावाभाव-प्रसङ्गात्। न ते परमाणवस् तथा प्रतिभान्तीति चेन्, नात एव तेषाम् अनुमानतः सिद्धिः। यदि पुनर् यद् एव साक्षान् न विशद-दर्शने चकास्ति तत् सकलम् अपलप्येत, हन्त बह्व् इदानीम् अपलपनीयं, घटादि-वस्तुनोऽप्य् अर्वाग्-भाग-वर्ति-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासान् मध्य-पर-भागादीनाम् अपलाप-प्रसङ्गात्, तथा च लोक-व्यवहार-कारितापि विशीर्येत, तावता तद्-असिद्धेः। अथात्रानुमान-बलेन व्यवहार-क्षम-सम्पूर्ण-वस्तुनः साधनम्, एवं तर्हि भूत-भावि-पर्याय-परमाणु-साधनम् अपि क्रियतां, विशेषाभावात्। तथा हि॒ यथा बाह्य-त्वङ्-मात्र-प्रतिभासेऽपि सर्व-वस्तूनां तावता व्यवहाराभावान् मध्य-भागादि-साधनेन सम्पूर्णानि तत्-समर्थानि तानि साध्यन्ते, तथैव कियत्-काल-भावि-घनाकार-दर्शनेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-परमाणु-तादाद्म्य-व्यवस्थित-शरीराणि तानि साध्यन्तां, तद्-अभावेऽपि तेषाम् अनुपपत्तेः। तथा हि॒ व्यवहारावतारिणो दर्शन-योग्यस्याद्य-पर्यायस्य तावद् अतीत-पर्यायानभ्युपगमे निर्हेतुकत्वं, तत्र चोक्तो दोषः। तद्-उत्पादकानन्तर-पर्यायेष्टौ पुनस् तज्-जनक-पर्यायोऽप्य् अभ्युपगन्तव्य इत्य् अनादि-पर्याय-परम्परा सिद्धिम् अध्यासीत। तथा व्यवहारावतारि-वस्तु-पर्यन्त-पर्यायस्य पर्यायान्तरानुत्पादकत्वे बलाद् अवस्तुत्वम् आढौकते, भवन्-नीतेर् एवार्थ-क्रिया-करण-वैकल्यात्। तद्-उत्पादकत्वे पुनर् असाव् अप्य् अपर-पर्यायोत्पादक इत्य् अनन्त-पर्याय-मालोपपद्यते। तथा घनाकारोऽपि विशद-दर्शनेन साक्षात्-क्रियमाणो निष्प्रदेश-पर्यन्तावयव-व्यतिरेकेण नोपपद्यते, कर-चरणाद्य्-अवयवानां खण्डशो भिद्यमानतयावयवि-रूपत्वात्, तद्-अवयवानाम् अप्य् अवयवान्तर-घटितत्वात्। परमाणव एव पर्यन्तावयवाः परमार्थतो घनाकार-हेतवस्॑ तद्-अभावे पुनर् आकस्मिकोऽसौ सर्वत्रोपलभ्येत, न वा क्वचिद्, विशेषाभावात्। एतेन यद् अवादि॒ लोक-व्यवहारावतारिणः प्रमाणम् अनुग्राहकम् अस्ति वस्तुनो नेतरस्येत्य्-आदि, तद् अपि प्रतिक्षिप्तम् अवगन्तव्यं, दृश्यमानार्थान्यथानुपपत्त्यैव तत्-साधनात्। यत् पुनर् उक्तं॒ "किं तेषाम् अतीतानागत-पर्याय-परमाण्व्-आदीनां पर्यालोचनेन लोक-व्यवहारानुपयोगितयावस्तुत्वाद्" इत्य्-आदि, तद् अयुक्तम्, उपेक्षया वार्तमानिक-वस्तुनोऽनुपयोगित्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेः, सर्वस्य सर्व-लोकानुपयोगित्वात्। कस्यचिद् उपयोगितया वस्तुत्वे तेषाम् अपि सा समस्त्य् एव, सर्व-ज्ञ-ज्ञानादि-गोचरत्वाद् इत्य् आस्तां तावत्। तद् एवं प्रमाण-प्रसिद्धार्थापलापित्वाद् व्यवहारो दुर्नयः, तद्-उपेक्षया व्यवहारानुपाति-वस्तु-समर्थकस्य व्यवहार-नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२६] अथ ऋजुसूत्रोऽपि दृष्टापलापेनादृष्टम् एव क्षण-क्षयि-परमाणु-लक्षणं वस्तु-स्वरूपं परमार्थतया मन्यमानो दुर्नयताम् आस्कन्दति, दृश्यमान-स्थिर-स्थूरार्थापह्नवे निर्मूलतया स्वाभिप्रेत-वस्तु-समर्थक-परामर्शस्योत्थानाभावात्। तथा हि॒ स्वावयव-व्यापिनं कालान्तर-संचरिष्णुम् आकारं साक्षाल् लक्षयन् पश्चात् कुयुक्ति-विकल्पेन विवेचयेद्, यद् उतैष स्थिर-स्थूरो दृश्यमानः खल्व् आकारो न घटाम् इयर्ति। विचाराक्षमत्वाद् इत्य्-आदिना न च दृष्टम् अदृष्ट-सन्दर्शकैः कुयुक्ति-विकल्पैर् बाधितुं शक्यं, सर्वत्रानाश्वास-प्रसङ्गात्। अथाभिदधीथा॒ "मन्द-मन्द-प्रकाशे प्रदेशे रज्जौ विष-धर-भ्रान्तिः प्राक्तनी यथोदीचीनेन तन्-निर्णय-कारिणा विकल्पेन बाध्यते, तथेदम् अपि स्थिर-स्थूर-दर्शनं क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रसाधक-परामर्शेन, किम् अत्रायुक्तम्?" नैतद् अस्ति, रज्जु-प्रतिभासस्यैव प्राक्-प्रवृत्त-विष-धर-भ्रान्त्य्-अपनोद-दक्षत्वात्, तद्-अभावे च विकल्प-शतैर् अपि निवर्तयितुम् अशक्यत्वात्। अत्राप्य् अतीत-वर्त्स्यतोर् विनष्टानुत्पन्नतयासन्निहितत्वात्, स्थूरावयवानां च स्वावयवेषु भेदाभेद-द्वारेण पर्यालोच्यमानानाम् अवस्थानाभावात् क्षण-क्षयि-परमाणव एव प्रतिभान्ति, ततश् च प्रतिभास एव स्थिर-स्थूर-दर्शनस्य बाधक इति चेद्, एवं तर्हि प्रतिभासस्योपदेश-गम्यतानुपपत्तेस्, तथैव व्यवहारः प्रवर्तेत। पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवान् न प्रवर्तत इति चेन्, नान्यत्राप्य् अस्योत्तरस्य विप्लव-हेतुत्वात्। तथा हि॒ धवले जलजादौ प्रतिभातेऽपि नीलोऽयम् अध्यक्षेणावलोकितः॑ पाश्चात्य-मिथ्या-विकल्प-विप्लवात् तु धवलः प्रतिभातीति भवन्-न्यायेन शठः प्रतिजानानः केन वार्येत। तन् न दृष्टापलापः कर्तुं शक्य इति स्थिर-स्थूर-वस्तु-सिद्धिस्, तस्यैव दर्शनाद्, इतरस्य तद्-दर्शन-द्वारेण साध्यमानस्यानुमेयत्वात्, तद्-अनिष्टौ तस्याप्य् असिद्धेः। एतेन स्थिर-स्थूर-वस्तुनोऽर्थ-क्रिया-विरह-प्रतिपादनम् अपि प्रतिव्यूढं, तथा-विधस्यैव सर्व-क्रियासु व्यापार-दर्शनात् क्षण-क्षयिणोऽर्थ-क्रिया-निषेधाच् च, यथोक्तं प्राक्॒ "क्षण-भङ्गुरो ह्य् अर्थात्मा स्वक्षने पूर्वं पश्चाद् वा कार्यं कुर्याद् इत्य्-आदि। किं च, सत्त्व-पुरुषत्व-चैतन्यादिभिर् बाल-कुमार-युव-स्थविरत्व-हर्ष-विषादादिभिश् चानुवर्तमान-व्यावर्तमान-रूपस्य सर्वस्य वस्तुनः प्रतीतेर् द्रव्य-पर्यायात्मकत्वम्, अभेदस्य द्रव्यत्वाद्, भेदस्य पर्याय-रूपत्वाद् इति। ततश् च भूत-भावि-क्षणयोर् असन्निधान-द्वारेण वार्तमानिक-क्षणस्यैवार्थ-क्रिया-कारित्व-प्रतिपादनं नास्माद्-बाधा-करं, पर्यायाणां क्रम-भावितया वर्तमान-पर्यायालिङ्गितस्यैव द्रव्यस्यार्थ-क्रिया-करण-चतुरत्वात्। [न] केवलं तत् त्रि-काल-व्यापि, द्रष्टापि द्रव्य-रूपतया तथा-भूत एव। ततश् च क्षणिक-पर्याय-तिरो-धान-द्वारेण तद्-रूप-सङ्कलनात् स्थिरम् एवेदं समस्त-क्रियासु व्याप्रियत इति प्रतीति-वीथिम् अवतरति, स्थैर्यस्यापि तात्त्विकत्वात्, क्षणिक-पर्यायाणां विद्यमानानाम् अप्य् अग्रहणात्, प्राकृत-लोक-ज्ञानस्यावरण-क्षयोपशमापेक्षितया कतिचिद्-अंश-विषयत्वात्। यदि पुनर् द्रव्य-बुद्धिः पर्याय-परम्परा-दर्शन-बलायातत्वाद् अतात्त्विकी कल्प्येत, तदा पूर्व-पर्यायस्योत्तर-पर्यायोत्पादने सान्वयत्वं निरन्वयत्वं वा वक्तव्यं, गत्य्-अन्तराभावात्। सान्वयत्वे द्रव्यं पर्यायान्तरेणाभिहितं स्यान्॑ निरन्वयत्वे पुनर् निर्हेतुतयोत्तर-पर्यायानुत्पाद-प्रसङ्गः। तन् नोभय-रूप-वस्तु-व्यतिरेकेणार्थ-क्रिया-सिद्धिः। न चार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणं, शब्द-विद्युत्-प्रदीपादि-चरम-क्षणानां क्षनान्तरानारम्भकत्वेनावस्तुत्व-प्राप्तेस्, तद्-अवस्तुत्वे पुनर् उपान्त्य-क्षणस्यापि वस्तुनि व्यापाराभावाद्॑ एवं यावत् सर्व-क्षणानां सङ्कलिकया वस्तुत्वम्। अथ क्षणान्तरानारम्भेऽपि स्व-गोचर-ज्ञान-जनकत्वम् अर्थ-क्रिया परिकल्प्येत, तथा सत्य् अतीत-भावि-पर्याय-परम्परापि योगि-ज्ञान-गोचरतां यातीति वस्तुत्वं स्वी-कुर्यात्। तन् नार्थ-क्रिया वस्तु-लक्षणम्, अपि त्ûत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तता, प्रमाण-प्रतिष्ठितत्वात्। उत्पाद-व्ययौ ध्रौव्येन सह विरुद्धाव् इति चेत्, कुतोऽयं विरोधः॒ प्रमाणाद् अप्रमाणाद् वा? न तावद् आद्यः पक्षः, सर्व-प्रमाणानां बहिर् अन्तश् च तथा-विधा-वस्तु-द्योतन-पटिष्ठतया प्रसाधितत्वात्। नापि द्वितीयो,ऽप्रमाणस्याकिञ्चित्-करत्वात्। एतेन स्थूरता-दूषणम् अपि प्रतिक्षिप्तं, प्रतिभास-हतत्वात्, तद्-अपह्नवेन विरोधोद्भावनस्य निर्मूलतया प्रलाप-मात्रत्वात्। यत् पुनर् वर्तमान-प्रकाश-रूपतया तत्-सम्बद्ध-वस्तु-ग्राहित्वं सर्व-प्रमाणानाम् उदग्राहि, तद् अयुक्तं, तेषाम् एकान्तेन वार्तमानिकत्वासिद्धेः, कथञ्चिद् आत्मा-व्यतिरेकित्वात्, तस्य च काल-त्रय-व्यापकत्वात्, तद्-रूपतया तेषाम् अप्य् अवस्थानात्। ततश् चात्मनोऽर्थ-ग्रहण-परिणाम-रूपत्वात्, सर्व-प्रमाणानां परिणामिन्य् एव वस्तुनि व्यापारो, न क्षणिके। न चातीतानागत-क्षण-वर्ति-वस्तु-ग्रहणेऽप्य् अनाद्य्-अनन्त-जन्म-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्ग, आवरण-विच्छेद-सापेक्षत्वात्, तस्यैव परमार्थतः संवेदनाविर्-भावान्तर-कारणत्वाद्, ग्राह्यादेर् बहिर्-अङ्गत्वात्। सामस्त्येन पुनर् आवरण-विलये सति समस्त-वस्तु-विस्तारानाद्य्-अनन्त-क्षण-परम्परा-ग्रहण-प्रसङ्गो न नो बाधा-कारीष्टत्वात्। तद् एक-देश-क्षयोपशमे पुनस् तद्-अनुसारिणी बोध-प्रवृत्तिर् इति कियत्-काल-भाविनि स्थूरे वस्तुनि प्राकृत-लोक-ज्ञानानि प्रवर्तन्ते, न सम्पूर्णे। न च तान्य् अलीकानि, तद्-ग्राह्यांशस्यापि वस्तुनि भावात्, तावतैव व्यवहार-सिद्धेर् इति। यच् चोक्तं॒ क्षणिकतां गृह्णन्तोऽपि सदृशापरापरोत्पत्ति-विप्रलब्धत्वान् मन्दा नाध्यवस्यन्ति, मिथ्या-विकल्प-वशात् स्थिरता-व्यवहारं च प्रवर्तयन्ति, तद् अयुक्तं, भवद्-आकूटेन सादृश्याभावात्, तद्-अभावे तद्-उत्पाद्याभिमत-भ्रान्तेर् निर्बीजतयोत्पत्तेर् असम्भवात्। तथा स्थिरतारोपोऽपि क्वचिद् गृहीत-स्थिरत्वस्यैव युक्तो नान्यथा, यथा दृष्ट-विष-धरस्य मन्द-प्रकाशे रज्जु-दर्शने विष-धरारोपः। न च भवतां कदाचन स्थिरता प्रतीति-गोचर-चारिताम् अनुभवति, तत् कथं प्रतिक्षणम् उदयापवर्ग-संसर्गिणि सकले वस्तुनि प्रत्यक्षेणावलोकितेऽपि तद्-आरोप इति। तस्मात् तिरो-हित-क्षण-विवर्तम् अलक्षित-परमाणु-वैविक्त्यं वस्तु सर्व-सांव्यवहारिक-प्रमाणैर् गोचरी-क्रियत इति तत्-तिरस्-कार-द्वारेणादृष्ट-क्षण-क्षयि-परमाणु-प्रतिष्ठापकोऽभिप्राय ऋजुसूत्र-दुर्नय-संज्ञाम् अश्नुते, तद्-उपेक्षयैव तद्-दर्शकस्य नयत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२७] तथा शब्दादयोऽपि सर्वथा शब्दाव्यतिरेकम् अर्थस्य समर्थयन्तो दुर्नयास्, तत्-समर्थनार्थम् उपन्यस्तस्य तत्-प्रतीतौ प्रतीयमानत्व-लक्षणस्य हेतोर् अनैकान्तिकत्वात्। तथा हि॒ नायम् एकान्तो यत्-प्रतीतौ यत् प्रतीयते तत् ततोऽव्यतिरिक्तम् एव, व्यतिरिक्तस्यापि पावकादेर् अन्यथानुपपन्नत्व-लक्षण-सम्बन्ध-बलाद् धूमादि-प्रतीतौ प्रतीयमानत्वात्। एवं शब्दोऽपि व्यतिरिक्तम् अप्य् अर्थं वाचकत्वात् प्रत्याययिष्यत्य्, अव्यतिरेकस्य प्रत्यक्षादि-बाधितत्वाच्, छब्दाद् विवेकेनैवानुभूयमानत्वात्। अस्मिंश् च हेताव् अनैकान्तिके स्थिते सर्वार्थानां सस्व-वाचकत्व-साधन-द्वारेण शब्दाव्यतिरेक-साधनम् अपि दूरापास्तम् एव। न चात्रापि प्रतिबन्ध-ग्राहि प्रमाणं -- यो योऽर्थस् तेन तेन सस्व-वाचकेन भवितव्यं -- घटादि-दृष्टान्त-मात्रात् तद्-असिद्धेः, क्षणिकालक्ष्य-द्रव्य-विवर्तानां सङ्केत-ग्रहणोपायाभावेनाभिलपितुम् अशक्यतयानभिलाप्यत्व-सिद्धेश् च। क्षण-भङ्गुरता-प्रतिज्ञानं पुनर् अमीषां अप्य् ऋजुसूत्रवन् निरसितव्यम्। तथा प्रत्येक-मतापेक्षयापि स्वाभिप्रेतं प्रतिष्ठापयन्तस् तद्-विपरीतं शब्दार्थं तिरस्-कुर्वाणा दुर्नयताम् आत्मसात्-कुर्वन्ति। एतावद् धि प्रमाण-प्रतिष्ठितं, यद् उत विधि-मुखेन शब्दोऽर्थस्य वाचक इति॑ न पुनर् अयं नियमो यथायम् अस्यैव वाचको नान्यस्य, देश-काल-पुरुष-सङ्केतादि-विचित्रतया सर्व-शब्दानाम् अपरापरार्थ-प्रतिपादकत्वेनोपलब्धेर् अनन्त-धर्मतयापरापर-योग्यता-द्वरेणापरापरार्थाभिधायकत्वोपपत्तेर्, अर्थानाम् अप्य् अनन्त-धर्मत्वाद् एवापरापर-शब्द-वाच्यत्वाविरोधात्, तथैवाविगानेन व्यवहार-दर्शनात्, तद्-अनिष्टौ तल्-लोप-प्रसङ्गात्। तस्मात् सर्व-ध्वनयो योग्यतया सर्वार्थ-वाचका, देश-क्षयोपशमाद्य्-अपेक्षया तु क्वचित् कथञ्चित् प्रतीतिं जनयन्ति। ततश् च क्वचिद् अनपेक्षित-व्युत्पत्ति-निमित्ता रूढितः प्रवर्तन्ते, क्वचित् सामान्य-व्युत्पत्ति-सापेक्षाः, क्वचित् तत्-काल-वर्ति-व्युत्पत्ति-निमित्तापेक्षयेति न तत्र प्रामाणिकेन नियतार्थाग्रहो विधेयः। अतोऽमी शब्दादयो यदेतरेतराभिमत-शब्दार्थोपेक्षया स्वाभिमतं शब्दार्थं दर्शयन्ति, तदा नयास्, तस्यापि तत्र भावात्। परस्पर-बाधया प्रवर्तमानाः पुनर् दुर्नय-रूपतां भजन्ति, निरालम्बनत्वाद् इति।
[न्या०वि० २९।२८] ननु च यद्य् एकैक-धर्म-समर्थन-परायणाःशेष-धर्म-तिरस्-कार-कारिणोऽभिप्राया दुर्नयतां प्रतिपद्यन्ते, तदा वचनम् अप्य् एक-धर्म-कथन-द्वारेण प्रवर्तमानं सावधारणत्वाच् च शेष-धर्म-प्रतिक्षेप-कार्य् अलीकमापद्यते। ततश् चानन्त-धर्माध्यासित-वस्तु-सन्दर्शकम् एव वचनं यथावस्थितार्थ-प्रतिपादकत्वात् सत्यं॑ न चैवं वचन-प्रवृत्तिर्, घटोऽयं शुक्लो मूर्त इत्य्-आद्य् एकैक-धर्म-प्रतिपादन-निष्ठतया व्यवहारे शब्द-प्रयोग-दर्शनात्, सर्व-धर्माणां यौगपद्येन वक्तुम् अशक्यत्वात्, तद्-अभिधायकानाम् अप्यानन्त्यात्। न चैकैक-धर्म-सन्दर्शकत्वेऽप्य् अमूनि वचनान्य् अलीकानि वक्तुं पार्यन्ते, समस्त-शाब्द-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-अलीकत्वे ततः प्रवृत्त्य्-असिद्धेर् इति। अत्रोच्यत -- इह तावद् द्वये वस्तु-प्रतिपादका, लौकिकास् तत्त्व-चिन्तकाश् च। तत्र प्रत्यक्षादि-प्रसिद्धम् अर्थम् अर्थित्व-वशाल् लौकिकास् तावन् मध्यस्थ-भावेन व्यवहार-काले व्यपदिश्यन्ति, यद् उत नीलम् उत्पलं सुगन्धि कोमलम् इति, न तु तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-ग्रहण-निराकरणयोराद्रियन्ते,ऽनर्थित्वात्, तावतैव विवक्षित-व्यवहार-परिसमाप्तेः। न च तद्-वचनानाम् अलीकता, शेष-धर्मान्तर-प्रतिक्षेपाभावात्, तत्-प्रतिक्षेप-कारिणाम् एवालीकत्वात्। "सर्वं वचनं सावधारणम्" इति-न्यायात् तेषाम् अपि शेष-धर्म-तिरस्-कार-कारित्व-सिद्धेर् भवन्-नीत्यालीकतापद्यत इति चेन्, न, अवधारणस्य तद्-असम्भव-मात्र-व्यवच्छेदे व्यापाराद्॑ यथानेक-पुरुष-सम्पूर्णे सदसि द्वारादौ स्थितस्य किम् अत्र देवदत्तः समस्ति नास्तीति वा दोलायमान-बुद्धेः केनचिद् अभिधीयते -- यथा देवदत्तोऽस्तीति। अत्र यद्य् अप्य् उपन्यस्त-पद-द्वयस्य सावधारणता गम्यते,ऽन्यथा तद्-उच्चारण-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात्, तथाप्य् अवधारणं तद्-असम्भव-मात्रं व्यवच्छिनत्ति, न शेष-पुरुषान्तराणि॑ नापि पर-रूपेण नास्तित्वं, तद्-व्यवच्छेदाभिप्रायेण प्रस्तुत-वाक्य-प्रयोगात्, प्रयोक्त्र्-अभिप्रायादि-सापेक्षतयैव ध्वनेः स्वार्थ-प्रतिपादन-सामर्थ्यात्। न च वाच्य-वाचक-भाव-लक्षण-सम्बन्धानर्थक्यं, तद्-अभावे प्रयोक्त्र्-अभिप्राय-मात्रेण रूपस्यैव नियोक्तुम् अशक्यत्वात्। न च समस्त-धर्म-युक्तम् एव वस्तु प्रतिपादयद् वचनं सत्यम् इत्य् अभिदध्महे, येनैकैक-धर्मालिङ्गित-वस्तु-सन्दर्शकानाम् अलीकता स्यात्, किं तर्हि सम्भवद्-अर्थ-प्रतिपादकं सत्यम् इति, सम्भवन्ति च शेष-धर्माप्रतिक्षेपे वचन-गोचरापन्ना धर्मास्॑ तस्मात् तत्-प्रतिपादकं सत्यम् एव। यदा तु दुर्नय-मताभिनिविष्ट-बुद्धिभिस् तीर्थान्तरीयैस् तद्-धर्मि-गत-धर्मान्तर-निराकरणाभिप्रायेणैव सावधारणं तत् प्रयुज्यते, यथानित्यम् एव वस्तु नित्यम् एव वेत्य्-आदि, तदा निरालम्बनत्वाद् अलीकतां प्राप्नुवत् केन वार्येत? तत्त्व-चिन्तकाः पुनः प्रत्यक्षादि-प्रमाण-सिद्धम् अनेकान्तात्मकं वस्तु दर्शयन्तो द्वेधा दर्शयेयुस्, तद् यथा -- विकलादेशेन सकलादेशेन वा। तत्र विकालादेशो नयाधीनः, सकलादेशः प्रमाणायत्तः। तथा हि॒ यदा मध्यस्थ-भावेनार्थित्व-वशात् किञ्चिद् धर्मं प्रतिपिपादयिषवः शेष-धर्म-स्वी-करण-निराकरण-विमुखया धिया वाचं प्रयुञ्जते, तदा तत्त्व-चिन्तका अपि लौकिकवत् सम्मुग्धाकारतयाचक्षते, यद् उत "जीवोऽस्ति कर्ता प्रमाता भोक्तेत्य्-आदि"। अतः सम्पूर्ण-वस्तु-प्रतिपादनाभावाद् विकलादेशोऽभिधीयते, नय-मतेन सम्भवद्-धर्माणां दर्शन-मात्रम् इत्य् अर्थः। यदा तु प्रमाण-व्यापारम् अविकलं परामृश्य प्रतिपादयितुम् अभिप्रयन्ति, तदाङ्गी-कृत-गुण-प्रधान-भावाशेष-धर्म-सूचक-कथञ्चित्-पर्याय-स्याच्-छब्द-भूषितया सावधारणया च वाचा दर्शयन्ति ‘स्याद् अस्त्य् एव जीवऽ॑ इत्य्-आदिकया। अतोऽयं स्याच्-छब्द-संसूचिताभ्यन्तरी-भूतानन्त-धर्मकस्य साक्षाद्-उपन्यस्त-जीव-शब्द-क्रियाभ्यां प्रधनी-कृतात्म-भावस्यावधारण-व्यवच्छिन्न-तद्-असम्भवस्य वस्तुनः सन्दर्शकत्वात् सकलादेश इत्य् उच्यते, प्रमाण-प्रतिपन्न-सम्पूर्णार्थ-कथनम् इति यावत्। तद् उक्तं॒
सा ज्ञेय-विशेष-गतिर् नय-प्रमाणात्मिका भवेत् तत्र ।
सकल-ग्राहि तु मानं विकल-ग्राही नयो ज्ञेयः ॥
[न्या०वि० २९।२९] तद् इदम् उक्तं भवति॒ नय-प्रमाणाभिज्ञः स्याद्-वादी सकल-विकलादेशाव् अधिकृत्य वस्तु-स्वरूप-प्रतिपिपादयिषया यद् यद् ब्रूते तत् तत् सत्यं, सम्भवद्-अर्थ-गोचरत्वात्। दुर्नय-मतावलम्बिनः पुनर् एकान्त-वादिनो यद् यद् आचक्षते तत् तद् अलीकम्, असम्भवद्-अर्थ-विषयत्वाद् इति।
[न्या०वि० ३०।०] साम्प्रतम् अमुम् एवार्थं द्रढयन् सिद्धान्तेऽप्य् एकैक-नय-मत-प्रवृत्तानि सूत्राणि न सम्पूर्णार्थाभिधायकानीत्य्, अपि तु तत्-समुदायाभिप्राय-प्रवृत्तम् अविकल-वस्तु-निवेदकम् इति दर्शयन्न् आह :
नयानाम् एक-निष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुत-वर्त्मनि ।
सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि स्याद्-वाद-श्रुतम् उच्यते ॥ न्यायावतार ३० ॥
[न्या०वि० ३०।१] इह त्रिविधं श्रुतं, तद् यथा -- मिथ्या-श्रुतं नय-श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतं च। तत्र श्रूयत इति श्रुतम् आगमः। मिथ्यालीकं श्रुतं मिथ्या-श्रुतं, तच् च दुर्नयाभिप्राय-प्रवृत्तं तीर्थिक-सम्बन्धि, निर्गोचरत्वात्। तथा नयैर् हेतु-भूतैः श्रुतं नय-श्रुतम्, एतच् चार्हद्-आगमान्तर्-गतम् एवैक-नयाभिप्राय-प्रतिबद्धं, यथा "पडुप्पण्णे नेरïë विणस्सï" इत्य्-आद्य्, ऋजुसूत्र-नयाभिप्रायेण क्षणिकत्वस्यापि तत्र सम्भवात्। तथा निर्दिश्यमान-धर्म-व्यतिरिक्ताशेष-धर्मान्तर-संसूचकेन स्याता युक्तो वादोऽभिप्रेत-धर्म-वचनं स्याद्-वादः, तद्-आत्मकं श्रुतं स्याद्-वाद-श्रुतम्। तत् किं-भूतम् उच्यत इत्य् आह : सम्पूर्णोऽविकलः स चासाव् अर्थश् च तद्-विनिश्चायि तन्-निर्णय-हेतुत्वाद् एवम् अभिधीयते॑ परमार्थतः पुनः समस्त-वस्तु-स्वरूप-प्रतिपादीत्य् अर्थः, शब्दात्मकत्वान्, निश्चयस्य बोध-रूपत्वाद् इति। नय-श्रुतं तर्हि सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि कस्मान् न भवतीत्य् आह : नयानां नैगमादीनाम् एक-निष्ट्ःानाम् एक-धर्म-ग्रहण-पर्यवसितानां श्रुत-वर्त्मन्य् आगम-मार्गे प्रवृत्तेः प्रवर्तनान् न तद् एकैकाभिप्राय-प्रतिबद्धं सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायि, तत्-समुदायस्यैव सम्पूर्णार्थ-विनिश्चायकत्वाद् इत्य्-आकूटम्।
[न्या०वि० ३१।०] तद् एवं नय-प्रमाण-स्वरूपं प्रतिपाद्याधुनाशेष-नय-प्रमाण-व्यापकं तेषां तत्र तादात्म्येनावस्थानात् प्रमातारम् अभिधातुकाम आह :
प्रमाता स्वान्य-निर्भासी कर्ता भोक्ता विवृत्तिमान् ।
स्व-संवेदन-संसिद्धो जीवः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः ॥ न्यायावतार ३१ ॥
[न्या०वि० ३१।१] तत्र त्रि-काल-जीवनाज् जीवः, प्राण-धारक आत्मेत्य् अर्थः, स प्रमिणोतीति प्रमाता प्रमेय-परिच्छेदकः। किं-भूतः सन्न् इत्य् आह : स्वान्याव् आत्म-परौ निर्भासितुम् उद्द्योतयितुं शीलम् अस्येति स्वान्य-निर्भासी, स्व-स्वरूपार्थयोः प्रकाशक इति यावत्। तथा करोतीति कर्ता, भुङ्क्त इति भोक्ता, विवर्तनम् अपरापर-पर्यायेषु गमनं विवृत्तिः परिणामः, सा विद्यते यस्येति विवृत्तिमान्। स्व आत्मा संवेद्यतेऽनेनेति स्व-संवेदनं तेन सम्यक् सिद्धः प्रतिष्ठितः प्रतीतो वा स्व-संवेदन-संसिद्धः। क्षितिः पृथिव्य् आदिर् येषां तानि क्षित्य्-आदीन्य्, आदि-शब्दाद् अम्बु-तेजो-वाय्व्-आकाशानि गृह्यन्ते॑ न विद्यत आत्मा स्वरूपम् अस्येत्य् अनात्मकः, किं स्व-स्वरूपापेक्षया? न, क्षित्य्-आदीनाम् अनात्मकः क्षित्य्-आद्य्-अनात्मकः, क्षित्य्-आदि-स्वरूपो न भवतीत्य् अर्थः।
[न्या०वि० ३१।२] तत्र जीवः प्रमातेत्य्-अनेन ये पारमार्थिकं प्रमातारं नाभ्युपगच्छन्त्य्, अपि तु विज्ञान-क्षण-परम्परानुभव-बल-प्रबोधितानादि-प्ररूढ-वासना-सम्पादित-सत्ताकं मिथ्या-विकल्प-परिकल्पितम् अपारमार्थिकं तं मन्यन्ते प्रतिक्षण-विलय-वादिनः तान् निराचष्टे, क्षण-विलयस्य प्राग् एव प्रतिषिद्धत्वाद्, बहिर् अन्तश् च परिणामि-वस्तुनः प्रसाधनात्।
[न्या०वि० ३१।३] ननु च घटादयस् तावद् विनाशम् आविशन्तो दृश्यन्ते, तेषां च विनाशो लकुटादि-कारण-कलापेनाविनश्वर-स्वभावानां वा क्रियेत, विनश्वर-स्वभावानां वा। यद्य् आद्यः कल्पस् तद् अयुक्तं, स्वभावस्य प्रच्यावयितुम् अशक्यत्वात्, तस्य नियत-रूपत्वाद्, अन्यथा स्वभावत्वायोगात्। अथैवं-भूत एव तस्य स्वभावः स्व-कारण-बलायातो यद् उत विनाश-कारणम् आसाद्य विनङ्क्ष्यतीति ब्रूषे, तथापि तद्-विनाश-कारण-सन्निधानं किं यादृच्छिकम् उत तत्-स्वभाव-सम्पाद्यम् एव। यदाद्यः कल्पस्, तदा सन्निहितस्यापि तत्-प्रत्यनीक-प्रत्ययोपनिपातेन निवर्तनात्, तत्-सन्निधापक-हेतूनां अपि स्व-सन्निधापक-कारण-कलाप-सापेक्षत्वात्, सन्निहितानाम् अपि प्रतिद्वन्द्विना निवर्तनाद्, यादृच्छिकत्वाच् च नावश्यं-भावि तत्-सन्निधानं॑ ततश् चासन्निहित-स्व-विनाश-कारण-कदम्बकः कश्चिद् घटादिर् न विनश्येद् अप्य्, अनिष्टं चैतत्, सर्व-कृतकानां विनाशाविगानात्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तथा सति पश्चाद् अपि तद्-बलाद् विनाश-हेतवः सन्निधास्यन्तीति प्रथम-क्षण एव सन्निदधतु, तथापि क्षणिकतैवार्थस्य। स्व-हेतोर् एव नियत-कालात् परतोऽयं स्व-विनाश-हेतुं सन्निधापयिष्यतीत्य् एवं-रूपो जात इति चेन्, नैवम् अपि क्षण-भङ्गुरतायाता। तथा हि॒ स्व-हेतुना किलासौ वर्षात् परतः स्व-विनाश-हेतु-सन्निधापन-क्षम-स्वभावो व्यधायि॑ स च तस्योत्पाद-क्षणाद् द्वितीय-क्षणे स्वभावोऽस्ति वा न वा? अस्ति चेत्, तथा सति पुनर् वर्षं तेन स्थातव्यम्, एवं यावद् वर्षोपान्त्य-क्षणेऽपि यदि तत्-स्वभाव एवासौ तदापरम् अपि वर्षान्तरं स्थितिर् आपद्येत, तदा चानन्त-कल्प-स्थायी-भावः स्याद्, अप्रच्युत-वर्ष-स्थायि-स्वभावत्वाद् इति। अथ द्वितीय-क्षणे नास्ति स स्वभाव इति ब्रूषे, हन्त क्षणिकत्वम् एवाढौकते,ऽतादवस्थ्यस्य तल्-लक्षणत्वात्। किं च, विनाश-हेतुर् भावस्य विनाशं व्यतिरिक्तम् अव्यतिरिक्तं वा कुर्यात्? व्यतिरिक्त-करणे न किञ्चित् कृतं स्यात्, ततश् च भावस् तादवस्थ्यम् अनुभवेत्। तत्-सम्बन्धः क्रियत इति चेन्, न सम्बन्धस्य तादात्म्य-तद्-उत्पत्ति-व्यतिरिक्तस्य प्रतिषेधात्। न चानयोर् अन्यतरः सम्बन्धोऽत्र समस्ति, व्यतिरेकिणा सार्द्धं तादात्म्यायोगाद्, अन्य-हेतुकस्य पश्चाद् उत्पन्नस्य तद्-उत्पत्ति-वैकल्यात्। तन् न व्यतिरिक्तो विनाशः कर्तुं युक्तः। अव्यतिरिक्त-करणे पुनस् तम् एव भावं विनाश-हेतुः करोतीति प्राप्तम्, अव्यतिरेकस्य तद्-रूपता-लक्षणत्वात्। न चासौ कर्तव्यः, स्व-हेतोर् एव निष्पन्नत्वात्, तत्-करणे च तस्यावस्थानम् एव स्यान्, न प्रलयः। तन् नाविनश्वर-स्वभावानां पश्चात् कथञ्चिद् अपि विनाशः कर्तुं शक्यो, विनश्वर-स्वभावानां पुनः स्व-हेतु-बलायातत्वात् प्राग् अपि प्रतिक्षण-भावी, न कारणान्तरापेक्षः, स्वभावस्य नियत-रूपत्वात्॑ तस्मात् प्राणित्य् अद्यापि प्रतिक्षण-विलय इति।
[न्या०वि० ३१।४] अत्रोच्यते -- सत्यम् एतत्, किं तु यथा विनाश-कारणायोगात् प्रतिक्षण-भावी विनाशो भवद्भिः प्रतिपद्यते, तथैव स्थित्य्-उत्पत्ती प्रतिक्षण-भाविन्यौ किं न प्रतिपद्येते, तद्-धेतूनाम् अपि विचार्यमाणानाम् अयोगात्। तथा हि॒ स्थिति-हेतुना तावत् स्वयम् अस्थिर-स्वभावा भावाः स्थाप्येरन् स्थिर-स्वभावा वा? न तावत् प्रथमः पक्षः क्षोदं क्षमते, स्वभावस्यान्यथा कर्तुम् अशक्यत्वात्, तस्य प्रतिनियत-रूपत्वाच्, चेतनाचेतन-स्वभाववद्, अन्यथा स्वभावता-हानेः। द्वितीय-पक्षे पुनः स्वयं स्थिर-स्वभावानां किं स्थिति-हेतुना? स्थितिर् नेष्यत एव, तेनानभ्युपगतोपालम्भ एवायम् इति चेद्, हन्त हतोऽस्य्, एवं हि भावाः क्षण-मात्रम् अपि न तिष्ठेयुः। क्षण-भाविनीष्यत एवेति चेत्, सा तर्ह्य् अस्थिति-स्वभावानां हेतु-शतैर् अपि कर्तुं न पार्यत इति ब्रूमः, तत्-स्वभावत्वे पुनर् हेतु-व्यापार-नैरर्थक्यात्। अहेतुका सती सकल-कालं भवतीति दत्तो जलाञ्जलिः प्रतिक्षण-विलयस्य। तथोत्पाद-हेतुर् अपि तत्-स्वभावस्योत्पत्तिं विदध्याद् अतत्-स्वभावस्य वा? न तावद् आद्यः पक्षः कक्षी-कर्तुं युक्तः, स्वयम् उत्पादकस्योत्पादने व्याप्रियमाणो हि हेतुः पिष्टं पिनष्टि, शङ्खं धवलयति, तद्-अभावेऽपि स्व-योग्यतयोत्पत्तेः। नापि द्वितीयः कल्पोऽङ्गी-करणार्हः, स्वयम् अनुत्पत्ति-धर्मकस्योत्पादयितुम् अशक्यत्वाद्, अन्यथा शश-विषाणादयोऽप्य् उत्पाद्य-कोटिम् अध्यासीरन्, विशेषाभावात्॑ ततश् च न कश्चिद् अत्यन्ताभावः स्यात्। तद् यथा निर्हेतुकत्वान् नाशः प्रतिक्षण-भावी, तथैव दर्शित-युक्तेः स्थित्य्-उत्पत्ती अपीति त्रयाक्रान्तं सकलं वस्तु जातम् अभ्युपगन्तव्यं॑ तथा सति जीवोऽपि जीवत्व-चैतन्य-द्रव्यत्वादिभिः स्थेमानं आबिभ्राण एव हर्ष-विषादादिभिर् अपरापरार्थ-ग्रहण-परिणामैश् चोत्पाद-व्यय-धर्मकः पारमार्थिकः प्रमातेति बलात् सिद्धिम् अध्यास्ते।
[न्या०वि० ३१।५] ननु च यद्य् उत्पाद-व्यय-स्थितीनां निर्हेतुकत्वात् सकल-काल-भाविता भवद्भिः साध्यते, तदान्वय-व्यतिरेकाभ्यां प्रत्यक्षादि-प्रमाण-प्रसिद्धः खल्व् अयं तत्-कारण-कलाप-व्यापारः कथं नेयः? न चायम् अपह्नोतुं शक्यः! तथा हि॒ कुलालादि-कारण-व्रात-व्यापारे घटादयः समुपलभ्यन्ते, तद्-अभावे च नोपलम्भ्यन्त इति तज्-जन्या इत्य् उच्यन्ते। स्थितिर् अपि विनाश-कारण-सन्निधानात् प्राक् तद्-बलाद् एव, तथा नाशोऽपि मुद्गरादि-सन्निधानासन्निधानाभ्यां सद्-असत्ताम् अनुभवंस् तत्-कृतः प्रतीयते, नाहेतुकः। तत् कथम् एतद् इति?
[न्या०वि० ३१।६] अत्रोच्यते -- न वयं सर्वथा हेतूनां व्यापारं वारयामः, किं तर्हि स्वयम् उत्पाद-व्यय-स्थित्य्-आत्मना विवर्तमानस्य द्रव्यस्य हेतवस् तद्-विशेष-करणे व्यापारम् अनुभवन्ति, तेनैव सार्द्धं तेषाम् अन्वय-व्यतिरेकानुकरण-दर्शनाद्, दृष्टस्य चापह्नवेऽस्माकम् अप्रवृत्तत्वात्, प्रतीति-युक्ति-लक्षण-द्वय-पक्ष-पातित्वात्॑ केवलं प्रतीति-विकलां युक्तिं युक्ति-विनाकृतां वा प्रतीतिं नाङ्गी-कुर्महे,ऽसम्भवद्-अर्थ-गोचरतया निरालम्बनत्वात् तस्या इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।७] स्वान्य-निर्भासीत्य्-अनेन प्राग्-उक्त-स्व-पराभासि-प्रमाण-विशेषणवन् मीमांसकान् परोक्ष-बुद्धि-वादिनो योगाचारांश् च ज्ञान-मात्र-वादिनः प्रतिक्षिपति, ज्ञान-ज्ञानिनोः कथञ्चिद् अभेदेन तद्-उक्त-न्यायाविशेषाद् इति।
[न्या०वि० ३१।८] कर्ता भोक्तेइति विशेषण-द्वयेन सांख्य-मतं विकुट्टयति, कर्ता सन् भोक्तापीति काक्वोपन्यासाद्, अकर्तुर् भोगानुपपत्तेर्, भुजि-क्रिया-निर्वर्तन-समर्थस्यैव भोक्तृत्वात्। जपा-कुसुमादि-सन्निधान-वशात् स्फटिके रक्ततादि-व्यपदेशवद् अकर्तुर् अपि प्रकृत्य्-उपधान-वशात् सुख-दुःखादि-भोग-व्यपदेशो युक्तस्॑ तथा हि॒ प्रकृति-विकार-दर्पणाकार-बुद्धि-सङ्क्रान्तानां सुख-दुःखाद्य्-आत्मकानाम् अर्थानां पुरुषः सन्निधान-मात्रेण भोजको व्यपदिश्यते, "बुद्ध्य्-अध्यवसितम् अर्थं पुरुषश् चेतयत" इति-वचनाद् इति चेन्, न, कथञ्चित् सक्रियाकता-व्यतिरेकेण प्रकृत्य्-उपधानेऽप्य् अन्यथात्वानुपपत्तेर्, अप्रच्युत-प्राचीन-रूपस्य व्यपदेशानर्हत्वात्, तत्-प्रच्यवे च प्राक्तन-रूप-त्यागेनोत्तर-रूपाध्यासितया सक्रियत्वम् आपततीति-न्यायात्॑ स्फटिक-दृष्टान्तेऽपि जपा-कुसुमादि-सन्निधानाद् अन्धोपलादौ रक्ततानाविर्-भवन्ती तत्र पुनर् आविर्-भवन्ती तस्य तथा-विधं परिणामं लक्षयत्य्, अन्यथान्धोपलवत् तत्रापि न प्रादुःष्यात्। तन् नाक्रियस्य भोक्तृतोपपद्यत इति।
[न्या०वि० ३१।९] विवृत्तिमान् इत्य्-अमुना त्व् एकान्त-नित्यम् अपरिणामिनं नैयायिक-वैशेषिकादि-प्रकल्पितं प्रमातारं निरस्यति, सर्वथाविचलित-रूपस्यार्थ-ग्रहण-परिणामानुपपत्तेः। व्यतिरिक्त-ज्ञान-समवायाद् एकान्त-नित्योऽपि प्रमिणोतीति चेन्, न, समवायस्य प्राग् एव प्रतिक्षिप्तत्वात्, सम्बन्धान्तरस्य च व्यतिरेकिणा साकम् अनुपपत्तेर्, अन्यत्रान्यथानुपपन्नत्वात्। न च व्यतिरेकिणि ज्ञाने तत् समस्ति, तद्-ग्राहक-प्रमाणाभावाद्, अव्यतिरेकानुभवस्य च तद्-बाधकत्वात्। किं च, यदि समवाय-बलाद् आत्मनि ज्ञानं समवैति, तदात्मनां समवायस्य च विभुत्वाद् एक-रूपत्वाच् च सर्वात्मसु किं न समवैति, विशेषाभावात्? तथा च देवदत्त-ज्टानेन यज्टदत्तादयोऽप्य् अर्थ-तत्त्वं बुद्ध्येरन्। अन्यच् च विज्टानोदय-समयेऽपि यादृशः प्राग्-अवस्थायां तादृश एव सन्तिष्ठमानः प्राग् अप्रमाता पश्चात् प्रमातेति ब्रुवाणः खल्ûन्मत्तताम् आत्मन्य् आविर्-भावयति, नापरम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।१०] पश्चार्द्धेन पुनर् भूत-व्यतिरेकिणं स्व-संवेदन-प्रत्यक्ष-निर्ग्राह्यं जीवं दर्शयंश् चार्वाक-दर्शनं तिरस्-कुरुते, जडात्मक-भूताव्यतिरेके हि तद्-विलक्षण-बोध-रूप-हर्ष-विषादादि-विवर्तानुभवाभाव-प्रसङ्गात्। ननु च कायाकार-परिणतानि भूतान्य् एवात्म-व्यतिरेकिणीं चेतनाम् उत्कालयन्ति॑ सा च तथा-विध-परिणाम-परिणतेषु तेषु सन्तिष्ठते, तद्-अभावे पुनस् तेष्व् एव निलीयत इति॑ तद्-व्यतिरेकानुभवेऽपि न पर-लोक-यायि-जीव-सिद्धिर्, इयतैव दृष्ट-व्यवहारोपपत्तेः। नैतद् अस्ति, द्वयं हि तावद् एतत् संयोगम् अनुभवद् उपलबभ्यते -- पट्च-भूतात्मकं शरीरं चेतना च। तत्रापि शरीरं बहिर्-मुखाकारेण बोधेनार्थ-रूपतया जडम् अनुभूयते, चेतना पुनर् अन्तर्-मुखाकारेण स्व-संवेदन-प्रत्यक्षेण साक्षात्-क्रियते॑ऽत एवाव्यतिरेक-पक्षः प्रतिभास-निराकृतत्वान् नाशङ्कितः। व्यतिरेकिणोः पुनः प्रकाशमानयोर् यदि भूतान्य् एव चेतनाम् उत्कालयन्तीति भवद्भिः परिकल्प्यते, तदा चेतनैव भवान्तराद् उत्पत्ति-स्थानमायाता पट्च-भूत-भ्रान्ति-जनकं शरीरं निर्वर्तयेत्, पुनर् भवान्तरं यातुकामा मुट्चेत्, तत् तयाधिष्ठितं गमनादि-चेष्टां कुर्यात्, तद्-वियुक्तं पुनः काष्ठवत् तिष्ठेद् इति जीव-सम्पाद्यम् एव शरीरं, न पुनर् असौ तत्-सम्पाद्य इत्य्, एतत् परिकल्पनं युक्ततरं पश्यामः, जीवस्य चेतनावतः सकर्मकतयापरापर-भव-भ्रमणापरापर-शरीर-निर्वर्तनयोर् उपपद्यमानत्वात्। भवान्तराद् आगच्छन् उत्पत्ति-स्थानं जीवोऽध्यक्षेण नोपलभ्यत इति चेद्, भूतान्य् अपि तर्हि कायाकार-धारण-द्वारेण चेतनाम् उत्कालयन्तीति प्रत्यक्षेण नोपलक्ष्यन्त इति समानो न्याहः। अथ कायाकार-परिणतेष्व् एव भूतेषु चेतनोपलभ्यते, नान्यदेत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशात् तज्-जन्येति परिकल्प्यत, एवं तर्हि मृतावस्थायां कायाकारम् आबिभ्राणेष्व् अपि नोपलब्धा, कायाकार-परिणामो वा कादाचित्कतया हेत्व्-अन्तरापेक्षीत्य्-अन्यथानुपपत्ति-वशाद् एव तन्-निर्वर्तन-क्षमा चेतना भवान्तरागत-जीव-सम्बन्धिनीति प्रतिपद्यामहे। किं च, जीवस् तावत् कर्म-चैतन्य-सम्बन्धाच् छरीर-निर्वर्तनार्थं प्रवरत इति युक्तम् एवैतद्, भूतानि पुनः किं-भूतानि चेतना-करणे प्रवर्तेरन्॒ सचेतनानि निश्चेतनानि वा? यद्य् आद्यः कल्पस्, ततो विकल्प-युगलम् अवतरति॒ तच् चैतन्यं तेभ्यो भिन्नम् अभिन्नम् वा? यदि भिन्नं, तदा पुरुष-शरीरवत् तत्रापि भूतैः सह वर्तमानम् अपि भूत-विलक्षणम् आत्म-कारणम् अनुमापयतीति तद्-अवस्थैव जीव-सिद्धिः। अथाभिन्नं, तथा सति समस्त-भूतानाम् ऐक्यं प्रसजत्य्, एक-चैतन्याव्यतिरिक्तत्वात्, तत्-स्वरूपवत्। निज-निज-चैतन्याव्यतिरेकीणि भूतानि तेनायम् अदोष इति चेन्, न, तत्-सम्पाद्य-पुरुष-शरीरेऽपि तज्-जन्य-पञ्च-चैतन्य-प्रसङ्गात्। पञ्चापि सम्भूय बृहत्-पुरुष-चैतन्यं बहवस् तिला इव तैल-घटं जनयन्तीति चेत्, तत् तर्हि पुरुष-चैतन्यं किं तेषाम् एव संयोगो यद् वा तद्-उत्पाद्यम्, अन्यद् एव? यद्य् आध्यः कल्पस्, तद् अयुक्तं, चैतन्यानां परस्परं मिश्रणाभावेन संयोग-विरोधाद्, इतरथा बहु-पुरुष-चैतन्यानि सम्भूय बृहत्तम-चैतन्यान्तरम् आरभेरन्। अथ द्वितीयः पक्षस्, तत्रापि तेषां किम् अन्वयोऽस्ति नास्ति वा? यद्य् अस्ति, तद् अयुक्तं, प्राग्वत् तज्-जन्य-चैतन्य-पञ्च-रूपतापत्तेः। अथ नास्ति, तद् अप्य् अचारु, निरन्वयोत्पादस्य प्रमाण-बाधितत्वात्। तन् न सचेतनानि भूतानि चेतना-करणे व्यापार-भाञ्जि भवितुम् अर्हन्ति। नापि निश्चेतनानि, तेषाम् अत्यन्त-विलक्षणतया चैतन्योत्पाद-विरोधाद्, इतरथा सिकतादयस् तैलादि-करणे व्याप्रियेरन्। किं च, तत्-समुदाय-मात्र-साध्यं वा चैतन्यं स्याद् विशिष्ट-तत्-परिणाम-साध्यं वा। न तावद् आद्या कॢप्तिर्, इला-जलानलानिल-नभस्-तल-मीलनेऽपि चेतनानुपलब्धेः। द्वितीय-विकॢप्तौ पुनः किं तद् वैशिष्ट्यम् इति वाच्यम्। कायाकार-परिणाम इति चेत्, स तर्हि सर्वदा कस्मान् न भवति? कुतश्चिद् धेत्व्-अन्तरापेक्षणाद् इति चेत्, तत् तर्हि हेत्व्-अन्तरं भवान्तरायात-जीव-चैतन्यम् इत्य् अनुमिमीमहे, तस्यैव कायाकार-परिणाम-साध्य-चैतन्यानुरूपोपादान-कारणत्वात्, तद्-विरहे कायाकार-परिणाम-सद्भावेऽपि मृतावस्थायां तद्-अभावाद् गमनादि-चेष्टानुपलब्धेः॑ तन् न कायाकार-परिणाम-जन्यं चैतन्यम्, अपि तु स एव तज्-जन्य इति युक्तं पश्यामः। न प्रत्यक्षाद् अन्यत् प्रमाणम् अस्ति, न च तेन पर-लोक-गमनागमनादिकं चैतन्यस्योपलक्ष्यते, तेन दृष्टान्य् एव भूतानि तत्-कारणतया कल्पनीयानीति चेन्, न, केवल-प्रत्यक्ष-प्रतिक्षेपेण प्रमाणान्तराणां प्राग् एव प्रसाधितत्वात्, तथा च भूयांस्य् अनुमानानि पर-लोकानुयायि-जीव-साधकानि प्रवर्तेरन्। तद् यथा -- तद्-अहर्-जात-बालकस्याद्य-स्तनाभिलाषः पूर्वाभिलाष-पूर्वको,ऽभिलाषत्वाद्, द्वितीय-दिवसादि-स्तनाभिलाषवत्। तद् इदम् अनुमानम् आद्य-स्तनाभिलाषस्याभिलाषान्तर-पूर्वकत्वम् अनुमापयद् अर्थापत्त्या पर-लोक-यायि-जीवमाक्षिपति, तज्-जन्मन्य् अभिलाषान्तराभावात्। एवम् अन्यद् अप्य् उदाहार्यम् इत्य् आस्तां तावत्।
[न्या०वि० ३१।११] तद् अयं स्व-पर-प्रकाशकः कर्ता भोक्ता नित्यानित्यात्मको भूत-विलक्षणः साक्षात्-कृत-कतिचिन्-निज-पर्यायानुमितानाद्य्-अनन्त-काल-भावि-निजानन्त-पर्याय-विवर्तः प्रमाण-प्रतिष्ठितः पारमार्थिको जीवः सकल-नय-प्रमाण-व्यापकः प्रमातेति स्थितम्।
[न्या०वि० ३२।०] साम्प्रतं पर्यन्त-श्लोकेन प्रकरणार्थम् उपसंहरन्न् आह :
प्रमाणादि-व्यवस्थेयम् अनादि-निधनात्मिका ।
सर्व-संव्यवहर्त्ःणां प्रसिद्धापि प्रकीर्तिता ॥ न्यायावतार ३२ ॥
[न्या०वि० ३२।१] प्रमाणानि प्रत्यक्षादीन्य्॑ आदि-शब्दान् नय-परिग्रहस्, तेषां व्यवस्था प्रतिनियत-लक्षणादि-रूपा मर्यादा, सेयम् अनन्तरोक्त-स्थित्या प्रकीर्तितेति संसर्गः। किं-भूतेत्य् आह : आदिः प्रभवो, निधनं पर्यन्तो, न विद्येते आदि-निधने यस्यासौ तथा-विध आत्मा स्वरूपं यस्याः सानादि-निधनात्मिका॑ सर्व-संव्यवर्त्ःणां लौकिक-तीर्थिकादि-भेद-भिन्न-समस्त-व्यवहारवतां प्रसिद्धापि रूढापि, तद्-अप्रसिद्धौ निखिल-व्यवहारोच्छेद-प्रसङ्गात्, तद्-उच्छेदे च विचारानुत्थाने न कस्यचित् तत्त्वस्य प्रतिष्ठितिः। प्रकीर्तिता संशब्दिताव्युत्पन्न-विप्रतिपन्न-व्यामोहापोहायेति गम्यते॑ प्रमाण-प्रसिद्धेऽप्य् अर्थे प्रबलावरण-कुदर्शन-वासनादितः केषाञ्चिद् अनध्यवसाय-विपर्यास-रूप-व्यामोह-सद्भावात्, तद्-अपनोदार्थं च सति सामर्थ्ये करुणावतां प्रवृत्तेर् इति।
स्याद्-वाद-केसरि-सुभीषण-नाद-भीतेर् उत्त्रस्त-लोल-नयनान् प्रपलायमानान् ।
हेतुर् नयाश्रित-कुतीर्थि-मृगान् अनन्यत्राणान् विहाय जिनम् एति तम् आश्रयध्वं ॥ न्या०वि० ३२।१:१ ॥
भक्तिर् मया भगवति प्रकटी-कृतेयं तच्-छासनांश-कथनान् न मतिः स्वकीया ।
मोहाद् अतो यद् इह किञ्चिद् अभूद् असाधु तत् साधवः कृत-कृपा मयि शोधयन्तु ॥ न्या०वि० ३२।१:२ ॥
न्यायावतार-विवृतिं विविधां विधित्सोः सिद्धः शुभो य इह पुण्य-चयस् ततो मे । नित्यं परार्थ-करणोद्यतम् आ भवान्ताद् भूयाज् जिनेन्द्र-मत-लम्पटम् एव चेतः ॥ न्या०वि० ३२।१:३ ॥
इति न्यायावतार-विवृतिः समाप्ता ॥
कृतिर् इयम् आचार्य-सिद्ध-व्याख्यानिकस्य तर्क-प्रकरण-वृत्तेर् इति।
</poem>
==स्रोतः ==
*[https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_siddhasenamahAmati-nyAyAvatAra-comm.txt सिद्धसेनमहामति : न्यायावतार, न्यायावतारविवृति सहितम्]
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सदस्य वार्ता:AMAN KUMAR
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तैत्तिरीय उपनिषद
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"'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]'' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। यह शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली औ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]'' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। यह शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली इन तीन खंडों में विभक्त है - कुल ५३ मंत्र हैं जो ४० अनुवाकों में व्यवस्थित है।
शिक्षा, ब्रह्मानंद और तपस्या द्वारा साक्षात्कार — तीन भागों में विभक्त यह उपनिषद् 'सत्यं वद, धर्मं चर' जैसे दीक्षांत उपदेश और पंचकोश सिद्धांत प्रदान करता है। गुरुकुल की शैक्षिक परंपरा का आधार-स्तंभ मानी जाने वाली यह कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]''' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। शिक्षा, ब्रह्मानन्द और तपस्या द्वारा साक्षात्कार — तीन भागों में विभक्त यह उपनिषद् 'सत्यं वद, धर्मं चर' जैसे दीक्षांत उपदेश और पंचकोश सिद्धांत प्रदान करता है। गुरुकुल की शैक्षिक परंपरा का आधार-स्तंभ मानी जाने वाली यह कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
== उद्धरण ==
* '' वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवछेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
: वेदों को भली-भांति पढ़ाकर, आचार्य अन्तेवासी को शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना । धर्म करना । (गृहस्थ-जीवन प्रारम्भ करने पर भी) स्वाध्याय बिना प्रमाद के करते रहना । (जाते-जाते) आचार्य के प्रिय धन से उसको तृप्त करके, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके प्रजा के धागे को मत तोड़ना, अर्थात् सन्तति उत्पन्न करके कुल को बढ़ाना (उस समय यह भय होता था कि स्नातक इतना निर्मोही कहीं न हो जाए, कि विवाह ही न करे । आजकल तो यह भय ही हास्यास्पद है !) । सत्य से कभी मत डिगना । धर्म से कभी मत डिगना । शुभ, कल्याणकारी कर्मों में आलस्य कभी मत करना । भौतिक उन्नति के प्रयास से मत विरत होना । स्वाध्याय और प्रवचन – अपनी और अन्यों की धर्म में शिक्षा – से कभी विरत मत होना । देव = ज्ञानियों और पितृ = परिवार के वृद्धों की सेवा में कभी चूक मत करना ।)
* ''मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकँ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
: माता तेरे लिए देव-तुल्य हो । एवमेव पिता, आचार्य और घर आए साधु-सन्त रूपी अतिथि को देव मानना । (उनके सत्कार और सेवा में कमी न होने पाए ।) जो हमारे प्रशंसित कर्म हैं, उनका अनुसरण कर, हमारे अन्य (दुष्कर्मों) का नहीं । जो हमारे गुण हैं, उनको प्राप्त कर, अन्यों (दुर्गुणों) को नहीं । हममें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनकी आसन आदि से सेवा-सत्कार कर । दान करते समय ध्यान रखना कि – श्रद्धा (पूर्ण मनोभाव) से देना । अश्रद्धा से मत देना (यहां ’अश्रद्धया देयम्’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ किया जाता है कि सुपात्र को, श्रद्धा-भाव न होने पर भी, देना) । अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना । अहंकार-शून्य होकर देना । परमात्मा के भय से देना । सुपात्र जानकर, विवेकपूर्वक देना ।)
* ''अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
: तुझे किसी कर्म में कोई शंका हो, या किसी आचार के विषय में शंका हो, तो तेरे आसपास जो विचारशील, स्वयं उस कार्य में लगे हुए, अथवा नियुक्त किए हुए, स्नेहमय, धर्म की कामना करने वाले ब्राह्मण हों, वे उस आचरण में जैसे वर्तें, वैसे ही तू भी वर्तना । इसी प्रकार किसी विवादास्पद कार्य और मनुष्य में भी तू उनके समान वर्तना । (अर्थात् जो ज्ञानी, आचारनिपुण और धार्मिक व्यक्ति हों, उनसे सीख लेकर अपना आचार सुधारना । आचार ऐसा विषय है जिसमें कभी भी पूर्णतया सब स्थितियां नहीं बताई जा सकतीं । जो हमने न बताया हो, जिसमें तुझे शंका हो, उसे अन्य विद्वानों के आचरण से सीखना ।) यह ही हमारी आज्ञा है । यही हमारा तुमको परामर्श है । यही वेद का गूढ़ उपदेश है । यही परम्परागत सीख है । इस प्रकार ही करने योग्य है । निश्चय से इसी प्रकार करने योग्य है ।)
सूक्तियाँ
* ''अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ २।२ ॥
: खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए ’अन्न’ कहा जाता है ।
* ''अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् ॥ ३।७ ॥
: अन्न ही जीवन का आधार है, इसलिए अन्न की निन्दा कभी न करना । यह तुम्हारा व्रत हो ।
* ''सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ २।१ ॥
: ब्रह्म सत्यस्वरूप (सत्ता वाला), ज्ञानस्वरूप (सर्वज्ञ) और अनन्त (काल और दिशा के परे) है ।
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]''' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। शिक्षा, ब्रह्मानन्द और तपस्या द्वारा साक्षात्कार — तीन भागों में विभक्त यह उपनिषद् 'सत्यं वद, धर्मं चर' जैसे दीक्षांत उपदेश और पंचकोश सिद्धांत प्रदान करता है। गुरुकुल की शैक्षिक परंपरा का आधार-स्तंभ मानी जाने वाली यह कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
== उद्धरण ==
* '' वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवछेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
: वेदों को भली-भांति पढ़ाकर, आचार्य अन्तेवासी को शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना । धर्म करना । (गृहस्थ-जीवन प्रारम्भ करने पर भी) स्वाध्याय बिना प्रमाद के करते रहना । (जाते-जाते) आचार्य के प्रिय धन से उसको तृप्त करके, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके प्रजा के धागे को मत तोड़ना, अर्थात् सन्तति उत्पन्न करके कुल को बढ़ाना (उस समय यह भय होता था कि स्नातक इतना निर्मोही कहीं न हो जाए, कि विवाह ही न करे । आजकल तो यह भय ही हास्यास्पद है !) । सत्य से कभी मत डिगना । धर्म से कभी मत डिगना । शुभ, कल्याणकारी कर्मों में आलस्य कभी मत करना । भौतिक उन्नति के प्रयास से मत विरत होना । स्वाध्याय और प्रवचन – अपनी और अन्यों की धर्म में शिक्षा – से कभी विरत मत होना । देव = ज्ञानियों और पितृ = परिवार के वृद्धों की सेवा में कभी चूक मत करना ।)
* ''मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकँ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
: माता तेरे लिए देव-तुल्य हो । एवमेव पिता, आचार्य और घर आए साधु-सन्त रूपी अतिथि को देव मानना । (उनके सत्कार और सेवा में कमी न होने पाए ।) जो हमारे प्रशंसित कर्म हैं, उनका अनुसरण कर, हमारे अन्य (दुष्कर्मों) का नहीं । जो हमारे गुण हैं, उनको प्राप्त कर, अन्यों (दुर्गुणों) को नहीं । हममें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनकी आसन आदि से सेवा-सत्कार कर । दान करते समय ध्यान रखना कि – श्रद्धा (पूर्ण मनोभाव) से देना । अश्रद्धा से मत देना (यहां ’अश्रद्धया देयम्’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ किया जाता है कि सुपात्र को, श्रद्धा-भाव न होने पर भी, देना) । अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना । अहंकार-शून्य होकर देना । परमात्मा के भय से देना । सुपात्र जानकर, विवेकपूर्वक देना ।)
* ''अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
: तुझे किसी कर्म में कोई शंका हो, या किसी आचार के विषय में शंका हो, तो तेरे आसपास जो विचारशील, स्वयं उस कार्य में लगे हुए, अथवा नियुक्त किए हुए, स्नेहमय, धर्म की कामना करने वाले ब्राह्मण हों, वे उस आचरण में जैसे वर्तें, वैसे ही तू भी वर्तना । इसी प्रकार किसी विवादास्पद कार्य और मनुष्य में भी तू उनके समान वर्तना । (अर्थात् जो ज्ञानी, आचारनिपुण और धार्मिक व्यक्ति हों, उनसे सीख लेकर अपना आचार सुधारना । आचार ऐसा विषय है जिसमें कभी भी पूर्णतया सब स्थितियां नहीं बताई जा सकतीं । जो हमने न बताया हो, जिसमें तुझे शंका हो, उसे अन्य विद्वानों के आचरण से सीखना ।) यह ही हमारी आज्ञा है । यही हमारा तुमको परामर्श है । यही वेद का गूढ़ उपदेश है । यही परम्परागत सीख है । इस प्रकार ही करने योग्य है । निश्चय से इसी प्रकार करने योग्य है ।)
* ''अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ २।२ ॥
: खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए ’अन्न’ कहा जाता है ।
* ''अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् ॥ ३।७ ॥
: अन्न ही जीवन का आधार है, इसलिए अन्न की निन्दा कभी न करना । यह तुम्हारा व्रत हो ।
* ''सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ २।१ ॥
: ब्रह्म सत्यस्वरूप (सत्ता वाला), ज्ञानस्वरूप (सर्वज्ञ) और अनन्त (काल और दिशा के परे) है ।
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'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]''' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। शिक्षा, ब्रह्मानन्द और तपस्या द्वारा साक्षात्कार — तीन भागों में विभक्त यह उपनिषद् 'सत्यं वद, धर्मं चर' जैसे दीक्षांत उपदेश और पंचकोश सिद्धांत प्रदान करता है। गुरुकुल की शैक्षिक परंपरा का आधार-स्तंभ मानी जाने वाली यह कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
== उद्धरण ==
* '' वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवछेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
: वेदों को भली-भांति पढ़ाकर, आचार्य अन्तेवासी को शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना । धर्म करना । (गृहस्थ-जीवन प्रारम्भ करने पर भी) स्वाध्याय बिना प्रमाद के करते रहना । (जाते-जाते) आचार्य के प्रिय धन से उसको तृप्त करके, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके प्रजा के धागे को मत तोड़ना, अर्थात् सन्तति उत्पन्न करके कुल को बढ़ाना (उस समय यह भय होता था कि स्नातक इतना निर्मोही कहीं न हो जाए, कि विवाह ही न करे । आजकल तो यह भय ही हास्यास्पद है !) । सत्य से कभी मत डिगना । धर्म से कभी मत डिगना । शुभ, कल्याणकारी कर्मों में आलस्य कभी मत करना । भौतिक उन्नति के प्रयास से मत विरत होना । स्वाध्याय और प्रवचन – अपनी और अन्यों की धर्म में शिक्षा – से कभी विरत मत होना । देव = ज्ञानियों और पितृ = परिवार के वृद्धों की सेवा में कभी चूक मत करना ।)
* ''मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकँ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
: माता तेरे लिए देव-तुल्य हो । एवमेव पिता, आचार्य और घर आए साधु-सन्त रूपी अतिथि को देव मानना । (उनके सत्कार और सेवा में कमी न होने पाए ।) जो हमारे प्रशंसित कर्म हैं, उनका अनुसरण कर, हमारे अन्य (दुष्कर्मों) का नहीं । जो हमारे गुण हैं, उनको प्राप्त कर, अन्यों (दुर्गुणों) को नहीं । हममें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनकी आसन आदि से सेवा-सत्कार कर । दान करते समय ध्यान रखना कि – श्रद्धा (पूर्ण मनोभाव) से देना । अश्रद्धा से मत देना (यहां ’अश्रद्धया देयम्’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ किया जाता है कि सुपात्र को, श्रद्धा-भाव न होने पर भी, देना) । अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना । अहंकार-शून्य होकर देना । परमात्मा के भय से देना । सुपात्र जानकर, विवेकपूर्वक देना ।)
* ''अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
: तुझे किसी कर्म में कोई शंका हो, या किसी आचार के विषय में शंका हो, तो तेरे आसपास जो विचारशील, स्वयं उस कार्य में लगे हुए, अथवा नियुक्त किए हुए, स्नेहमय, धर्म की कामना करने वाले ब्राह्मण हों, वे उस आचरण में जैसे वर्तें, वैसे ही तू भी वर्तना । इसी प्रकार किसी विवादास्पद कार्य और मनुष्य में भी तू उनके समान वर्तना । (अर्थात् जो ज्ञानी, आचारनिपुण और धार्मिक व्यक्ति हों, उनसे सीख लेकर अपना आचार सुधारना । आचार ऐसा विषय है जिसमें कभी भी पूर्णतया सब स्थितियां नहीं बताई जा सकतीं । जो हमने न बताया हो, जिसमें तुझे शंका हो, उसे अन्य विद्वानों के आचरण से सीखना ।) यह ही हमारी आज्ञा है । यही हमारा तुमको परामर्श है । यही वेद का गूढ़ उपदेश है । यही परम्परागत सीख है । इस प्रकार ही करने योग्य है । निश्चय से इसी प्रकार करने योग्य है ।)
* ''अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ २।२ ॥
: खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए ’अन्न’ कहा जाता है ।
* ''अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् ॥ ३।७ ॥
: अन्न ही जीवन का आधार है, इसलिए अन्न की निन्दा कभी न करना । यह तुम्हारा व्रत हो ।
* ''सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ २।१ ॥
: ब्रह्म सत्यस्वरूप (सत्ता वाला), ज्ञानस्वरूप (सर्वज्ञ) और अनन्त (काल और दिशा के परे) है ।
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'''[[:w:तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय उपनिषद]]''' कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक [[उपनिषद]] है। यह प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। शिक्षा, ब्रह्मानन्द और तपस्या द्वारा साक्षात्कार — तीन भागों में विभक्त यह उपनिषद् 'सत्यं वद, धर्मं चर' जैसे दीक्षांत उपदेश और पंचकोश सिद्धांत प्रदान करता है। गुरुकुल की शैक्षिक परंपरा का आधार-स्तंभ मानी जाने वाली यह कृति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
== उद्धरण ==
* '' वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवछेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
: वेदों को भली-भांति पढ़ाकर, आचार्य अन्तेवासी को शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना । धर्म करना । (गृहस्थ-जीवन प्रारम्भ करने पर भी) स्वाध्याय बिना प्रमाद के करते रहना । (जाते-जाते) आचार्य के प्रिय धन से उसको तृप्त करके, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके प्रजा के धागे को मत तोड़ना, अर्थात् सन्तति उत्पन्न करके कुल को बढ़ाना (उस समय यह भय होता था कि स्नातक इतना निर्मोही कहीं न हो जाए, कि विवाह ही न करे । आजकल तो यह भय ही हास्यास्पद है !) । सत्य से कभी मत डिगना । धर्म से कभी मत डिगना । शुभ, कल्याणकारी कर्मों में आलस्य कभी मत करना । भौतिक उन्नति के प्रयास से मत विरत होना । स्वाध्याय और प्रवचन – अपनी और अन्यों की धर्म में शिक्षा – से कभी विरत मत होना । देव = ज्ञानियों और पितृ = परिवार के वृद्धों की सेवा में कभी चूक मत करना ।)
* ''मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकँ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
: माता तेरे लिए देव-तुल्य हो । एवमेव पिता, आचार्य और घर आए साधु-सन्त रूपी अतिथि को देव मानना । (उनके सत्कार और सेवा में कमी न होने पाए ।) जो हमारे प्रशंसित कर्म हैं, उनका अनुसरण कर, हमारे अन्य (दुष्कर्मों) का नहीं । जो हमारे गुण हैं, उनको प्राप्त कर, अन्यों (दुर्गुणों) को नहीं । हममें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनकी आसन आदि से सेवा-सत्कार कर । दान करते समय ध्यान रखना कि – श्रद्धा (पूर्ण मनोभाव) से देना । अश्रद्धा से मत देना (यहां ’अश्रद्धया देयम्’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ किया जाता है कि सुपात्र को, श्रद्धा-भाव न होने पर भी, देना) । अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना । अहंकार-शून्य होकर देना । परमात्मा के भय से देना । सुपात्र जानकर, विवेकपूर्वक देना ।)
* ''अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
: तुझे किसी कर्म में कोई शंका हो, या किसी आचार के विषय में शंका हो, तो तेरे आसपास जो विचारशील, स्वयं उस कार्य में लगे हुए, अथवा नियुक्त किए हुए, स्नेहमय, धर्म की कामना करने वाले ब्राह्मण हों, वे उस आचरण में जैसे वर्तें, वैसे ही तू भी वर्तना । इसी प्रकार किसी विवादास्पद कार्य और मनुष्य में भी तू उनके समान वर्तना । (अर्थात् जो ज्ञानी, आचारनिपुण और धार्मिक व्यक्ति हों, उनसे सीख लेकर अपना आचार सुधारना । आचार ऐसा विषय है जिसमें कभी भी पूर्णतया सब स्थितियां नहीं बताई जा सकतीं । जो हमने न बताया हो, जिसमें तुझे शंका हो, उसे अन्य विद्वानों के आचरण से सीखना ।) यह ही हमारी आज्ञा है । यही हमारा तुमको परामर्श है । यही वेद का गूढ़ उपदेश है । यही परम्परागत सीख है । इस प्रकार ही करने योग्य है । निश्चय से इसी प्रकार करने योग्य है ।)
* ''असन्नेव स भवति। असद् ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो विदुरिति।तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य। अथातोऽनुप्रश्नाः। उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य।कश्चन गच्छती३ उ। आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ।
:''सोऽकामयत।बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।इदं सर्वमसृजत। यदिदं किञ्च। तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयनं चानिलयनं च।विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्।यदिदं किं च। तत्सत्यमित्याचक्षते।तदप्येष श्लोको भवति॥
: यदि कोई 'ब्रह्म' को 'असत्' रूप समझता है तो वह स्वयं असत् समान (अस्तित्वहीन) बन जाता है; किन्तु यदि वह 'ब्रह्म' को इस रूप में जानता है कि वह है, तो लोग उसे सन्त की तरह जानते हैं तथा वह उनके लिए एक यथार्थ सत्य है। और यह 'आनन्दात्मा' 'विज्ञानमय आत्मा' के लिए शरीर में आत्मा-सदृश है। और इसके विषय में ये प्रश्न उठते हैं-''जब कोई इस 'ज्ञान' के बिना इस लोक से अन्य लोक में प्रयाण करता है तो क्या ऐसा व्यक्ति उससे भी आगे यात्रा करता है? अथवा ऐसा कोई व्यक्ति जो विद्वान् है, जब इस लोक से अन्य लोक में प्रयाण करता है तो क्या वह प्रभुत्व का आनन्दभोग करता है?"
:'परमात्म तत्त्व' ने आदिकाल में कामना की ''मैं अपनी प्रजा के जन्म के हेतु बहुरूप हो जाऊँ।" अतः 'उसने' 'स्वयं' को पूर्णतया चिन्तन में एकाग्र किया, तथा 'अपने' चिन्तन की शक्ति से, अपने तप से 'उसने' इस समस्त विश्व की सृष्टि की, हाँ, जो कुछ भी विद्यमान है, उसको रचा। और फिर जब 'उसने' यह रच डाला तो जो 'उसने' रचा उसी में 'वह ' प्रवेश कर गया, तथा प्रविष्ट होकर यहाँ 'है' (सत्) बन गया वहाँ 'सम्भाव्य' (त्यच्) बन गया; 'वह' 'निरुक्त' (निर्वचनीय) तथा 'अनिरुक्त' (अनिर्वचनीय) बन गया; 'वह' 'निलयन' अर्थात् आवासभूत तत्त्व तथा 'अनिलयन' अर्थात् आवासरहित तत्त्व बन गया; वही 'ज्ञान' बन गया तथा 'वही' 'अज्ञान' बन गया; 'वही' 'सत्य' बन गया तथा 'वही' अनृतं अर्थात् असत्य बन गया। सम्पूर्ण सत्य 'वही' बन गया, जो कुछ भी यहाँ विद्यमान है वह सब कुछ 'वही' बन गया। इसीलिए 'उसके' विषय में कहा जाता है कि 'वह' 'सत्य-स्वरूप' है। जिसके सम्बन्ध में श्रुति का यह वचन है।
* ''अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ २।२ ॥
: खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए ’अन्न’ कहा जाता है ।
* ''अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् ॥ ३।७ ॥
: अन्न ही जीवन का आधार है, इसलिए अन्न की निन्दा कभी न करना । यह तुम्हारा व्रत हो ।
* ''सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ २।१ ॥
: ब्रह्म सत्यस्वरूप (सत्ता वाला), ज्ञानस्वरूप (सर्वज्ञ) और अनन्त (काल और दिशा के परे) है ।
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"'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं। == उक्तियाँ == * ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। : ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
(इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
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/* उक्तियाँ */
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
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अनुनाद सिंह
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
</poem>
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अनुनाद सिंह
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है, पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
</poem>
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अनुनाद सिंह
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: ''यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: ''यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
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* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
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* ''सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ।
: ''राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ॥'' -- हितोपदेश
: यदि सांप, बाघ, हाथी और सिंह आदि हिंसक पशुओं को वश में किया जा सकता है, तो राजा को क्यों नहीं प्रसन्न किया जा सकता?
* ''बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
: ''पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥'' -- हितोपदेश
: जिसके पास बुद्धि है वही बलशाली है,निर्बुद्धि के पास बल कहाँ ? देखो न, अपनी शक्ति से मदोन्मत्त सिंह को खरगोश ने (कुएँ में) गिरा दिया।
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: ''यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
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* ''सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ।
: ''राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ॥'' -- हितोपदेश
: यदि सांप, बाघ, हाथी और सिंह आदि हिंसक पशुओं को वश में किया जा सकता है, तो राजा को क्यों नहीं प्रसन्न किया जा सकता?
* ''बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
: ''पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥'' -- हितोपदेश
: जिसके पास बुद्धि है वही बलशाली है,निर्बुद्धि के पास बल कहाँ ? देखो न, अपनी शक्ति से मदोन्मत्त सिंह को खरगोश ने (कुएँ में) गिरा दिया।
==इन्हें भी देखें==
*[[शक्ति]]
*[[बल]]
*[[क्षत्रिय]]
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शेर
0
9339
33300
2026-10-03T08:08:40Z
अनुनाद सिंह
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[[सिंह]] को अनुप्रेषित
33300
wikitext
text/x-wiki
#पुनर्प्रेषित [[सिंह]]
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