विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.22 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विकिसूक्ति:चौपाल 4 3256 33310 33141 2026-10-04T04:27:35Z अनिरुद्ध कुमार 3422 /* संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 अक्तूबर के प्रस्तावित नियम पर मत दें */ 33310 wikitext text/x-wiki <!-- आवश्यक निर्देश -->{{/शीर्षक}}<!-- कृपया इस लाइन को न बदलें --> <!--  चर्चाएँ एवं संदेश पृष्ठ पर क्रम में सबसे नीचे जोड़ें  --> == Marathon == Dear colleagues, hello! My name is S. Marchenko, I am a user of Wikimedia Foundation Russian language projects and a VRT agent. I actively edit the Russian version of Wikiquote, and recently I had the idea to hold an international marathon to improve and expand Wikiquote articles in different languages. In connection with this, I created a competition page on Meta [[m:Wiki Loves Quotes 2026]], where you can also register your local community. I really hope you find it interesting! Sincerely, [[सदस्य:S.Marchenko|S.Marchenko]] ([[सदस्य वार्ता:S.Marchenko|वार्ता]]) १५:४२, २६ जुलाई २०२६ (IST) == संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 अक्तूबर के प्रस्तावित नियम पर मत दें == [[w:hi: विकिपीडिया:संपर्क सूत्र|विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर आगामी अक्तूबर में होने वाले संपर्क सूत्र के निर्वाचन के नियम प्रस्तावित किए गए हैं। पिछले वर्ष के निर्वाचन के दौरान हुई चर्चाओं के आधार पर प्रबंधक बैठक में चर्चा के उपरांत संशोधित नियम प्रस्तावित किए गए हैं। इनपर सदस्यों के मत का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:४१, २२ अगस्त २०२६ (IST) == संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 == [[w:hi:विकिपीडिया:संपर्क सूत्र|विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के 3 संपर्कसूत्रों के निर्वाचन की प्रक्रिया शुरु की गई है। नियमावली के अनुरूप सदस्य इस पृष्ठ पर 1-7 अक्टूबर तक उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन कर सकते हैं। हिंदी विकि के सदस्यों से अनुरोध है कि 9-22 अक्टूबर तक वे उम्मिदवारों पर अपना मत देकर संपर्क सूत्र के निर्वाचन में अपना सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०९:५७, ४ अक्टूबर २०२६ (IST) fbr8s0csfwk1gkj1sb3ynkew73ysaz1 सत्य 0 4969 33308 32951 2026-10-03T14:42:17Z अनुनाद सिंह 658 /* उद्धरण */ 33308 wikitext text/x-wiki '''सत्य''' का अर्थ है, वास्तविकता। जो सन्देह, अज्ञान या भ्रम से परे हो। == उद्धरण == * ''सत्यं ब्रह्म । : सत्य ही ब्रह्म है। * ''सत्यं शिवं सुन्दरम्''॥ : सत्य ही शिव (कल्याणकारी) है, शिव ही सुन्दर है। * ''सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा। : ''सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥'' -- वाल्मीकि रामायण : संसार में सत्य ही ईश्वर है। सत्य ही लक्ष्मी (= धन-धान्य) का निवास है। सत्य ही सभी (अच्छाइयों) का मूल है। संसार में सत्य से बढ़कर और कोई परम पद नहीं है। *''सत्यमेव परं मित्रं स्वीकृते सति मानवे । :''सत्यमेव परं शत्रुः धिक्कृते सति मानवे ॥ : हम सत्य को स्वीकार करते है तो सत्य हमारा सबसे श्रेष्ठ मित्र बन जाता है। लेकिन अगर हम सत्य का स्वीकार न करके धिक्कारते है, तो जीवन में आगे चलकर वही सत्य हमारे लिए परं शत्रु बन जाता है। * ''नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् । : ''अतः सर्वेषु कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते ॥'' -- महाभारत, आदि पर्व में शकुन्तला का कथन : सत्य से बढ़कर धर्म और असत्य से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। अतः सभी कार्यों में सत्य को ही श्रेष्ठ माना गया है। * ''सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्। : ''यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्॥ -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व : सत्य बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जो हितकर हो। मैं (अर्थात् श्लोककर्ता नारद) उसी को सत्य कहता हूँ जो सभी प्राणियों के लिये अत्यन्त हितकर हो। * ''सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। : ''येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥ -- मुण्डकोपनिषद् : सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं ; 'सत्य' के द्वारा ही देवों का यात्रा-पथ विस्तीर्ण हुआ, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिगण वहां आरोहण करते हैं जहाँ 'सत्य' का परम धाम है। * ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। : ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'' -- ईशोपनिषद् : सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। (इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।) * ''अमॄतं चैव मॄत्युश्च द्वयं देहप्रातिष्ठितम् । : ''मोहादापद्यते मॄत्युः सत्येनापद्यतेऽमॄतम् ॥ : मृत्यु तथा अमरत्व दोनों एक ही देह में निवास करती हैं। मोह (भ्रम, असत्य) के से मृत्यु आती है तथा सत्य के पीछे चलने से अमरता प्रााप्त होता है। * ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। : ''प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥ : सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये। जो सत्य हो किन्तु अप्रिय हो उसे भी नहीं बोलना चाहिये। लेकिन जो प्रिय हो, किन्तु सत्य न हो, उसे भी नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है। * ''सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याऽभ्यासेन रक्ष्यते । : ''मृज्यया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥ : धर्म का रक्षण सत्य से, विद्या का अभ्यास से, रुप का सफाई से, और कुल का रक्षण आचरण करने से होता है । * ''सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः । : ''सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ : सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है । सब सत्य पर आधारित है । * ''नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् । : ''न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥ : सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं । * ''सत्यमेव व्रतं यस्य दया दीनेषु सर्वदा । : ''कामक्रोधौ वशे यस्य स साधुः कथ्यते बुधैः ॥ : 'केवल सत्य' ऐसा जिसका व्रत है, जो सदा दीन की सेवा करता है, काम-क्रोध जिसके वश में है, उसी को ज्ञानी लोग 'साधु' कहते हैं । * ''सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः । : ''येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥ : जय सत्य का होता है, असत्य का नहीं । दैवी मार्ग सत्य से फैला हुआ है । जिस मार्ग पे जाने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का परम् धाम है । * ''नानृतात्पातकं किञ्चित् न सत्यात् सुकृतं परम् । : ''विवेकात् न परो बन्धुः इति वेदविदो विदुः ॥ : वेदों के जानकार कहते हैं कि अनृत (असत्य) के अलावा और कोई पातक नहीं; सत्य के अलावा अन्य कोई सुकृत नहीं और विवेक के अलावा अन्य कोई भाई नहीं । * ''सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। : ''अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥'' : लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती हैं, कीर्ति त्याग का अनुसरण करती है, विद्या अभ्यास का अनुसरण करती है और बुद्धि कर्म का अनुसरण क्रती है। * ''सत्यं परम धीमहि'' -- श्रीमद्भागवद् 1.1.1 : हम परम सत्य का ध्यान करते हैँ। * सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। -- [[आर्य समाज]] के दस नियमों में से चतुर्थ नियम * सत्य का मार्ग हमेशा सरल नहीं होता, लेकिन वह निश्चित रूप से सबसे शक्तिशाली होता है।" — रवीन्द्रनाथ ठाकुर * ''सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा : ''शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥''-- चाणक्यनीतिः १२-११ : ये छः मेरे सगे सम्बधी हैं- सत्य मेरी मा है, ज्ञान मेरे पिता हैं, धर्म मेरा भाई है, दया मेरा मित्र है, शांति मेरी पत्नी है, और क्षमा मेरा पुत्र है। * अगर आप कभी भी राजनीति में सच्चाई डाल देते हैं तो वो राजनीति नहीं रह जाती। -- विल रोजर्स * अगर आप सच बोलते हैं तो आपको कुछ याद रखने की ज़रुरत नहीं रहती। -- मार्क ट्वैन * "सत्य को कभी छिपाया नहीं जा सकता, वह स्वयं प्रकाशित हो जाता है।" — गौतम बुद्ध * अगर आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * अगर आप कभी भी राजनीति में सच्चाई डाल देते हैं तो वो राजनीति नहीं रह जाती । -- विल रोजर्स * अगर मैंने वो सारा सच लिख दिया होता जो मुझे पिछले दस साल से पता है, तो मुझे लेकर लगभग 600 लोग रिओ से सीएटल तक जेलों में सड़ रहे होते । पूर्ण सत्य पेशेवर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दुर्लभ और खतरनाक वस्तु है। -- हंटर एस. थोम्प्सन * अर्धसत्य अक्सर एक बड़ा झूठ होता है। -- बेंजामिन फ्रैंकलिन * इस में कुछ भी आश्चर्य नहीं की सच कल्पना से अनोखा है। कल्पना का कोई अर्थ होना चाहिए। -- मार्क ट्वैन * एक टिप्पणी आम तौर पर अपनी सच्चाई के अनुपात में चोट पहुंचाती है। -- विल रोजर्स * कट्टरता सच को उन हाथों में सुरक्षित रखने की कोशिश करती है जो उसे मारना चाहते हैं। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * कल तक हम राजाओं की आज्ञा का पालन करते थे और सम्राटों के सामने सर झुकाते थे । लेकिन आज हम सच के सामने घुटने टेकते हैं, सुन्दरता का अनुसरण करते हैं, और केवल प्रेम की आज्ञा मानते हैं। -- खलिल गिबरान * काफी कुछ सच, मज़ाक-मज़ाक में कहा जाता है। -- एमिनेम * किसी भी सत्य के तीन चरण होते है। पहला, उसका उपहास किया जाता है। दूसरा, उसका हिंसक विरोध किया जाता है। तीसरा, उसे स्वतः ही अपनाया जाता है। -- आर्थर इस्कोपेन्हौर * किसी विवाद में हम जैसे ही क्रोधित होते हैं हम सच का मार्ग छोड़ देते हैं, और अपने लिए प्रयास करने लगते हैं। -- गौतम बुद्ध * किसी समाधि लेख में सबसे कम पाया जाने वाला गुण सच्चाई है। -- हेनरी डेविड थोरीयो * केवल प्रेम ही वास्तविकता है, ये महज एक भावना नहीं है। यह एक परम सत्य है जो सृजन के ह्रदय में वास करता है। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * कोई औरत अपने पति के बारे में शादी के एक महीने पहले क्या सोचती है और शादी के एक साल बाद क्या सोचती है, इनका औसत निकाल लीजिये और आपको उस आदमी की सच्चाई पता चल जाएगी। -- एच एल मेंकेन * कोई त्रुटि तर्क-वितर्क करने से सत्य नहीं बन सकती और ना ही कोई सत्य इसलिए त्रुटि नहीं बन सकता है क्योंकि कोई उसे देख नहीं रहा। -- महात्मा गाँधी * जब आप खुश हों तब अपने ह्रदय में गहराई से देखिये और आप पायेंगे कि जिस चीज ने आपको दुखी किया था वही आपको ख़ुशी दे रही है। जब आप दुखी हों, तब फिर अपने हृदय में झांकिए, और आप देखेंगे की असल में आप जिसके लिए रो रहे हैं वही आपकी ख़ुशी रहा है। -- खलिल गिबरान * जब आप संदेह में हों तो तब सच बोल दें। -- मार्क ट्वैन * जब मैं सच कहता हूँ तो वह उन्हें समझाने के लिए नहीं होता जो इसे नहीं जानते, बल्कि ये उनका पक्ष लेने के लिए होता है जो इसे जानते हैं। -- विल्लियम ब्लैक * जब संदेह में हों तो सच बोल दें। -- मार्क ट्वैन * जिस चीज से आप डरते हैं उसमें कोई शक्ति नहीं है। शक्ति आपके उस डर में है। वास्तविक रूप में सच का सामना करना आपको मुक्त कर देगा। -- ओपरा विनफ्रे * जो कुछ भी आत्मा को संतुष्ट करे वह सत्य है। -- वेट व्हिटमैन * जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में सच्चाई को गंभीरता से नहीं लेता उस पर बड़ी बातों में भी विश्वास नहीं किया जा सकता। -- ऐल्बर्ट आइन्स्टीन * तथ्य कई हैं, पर सत्य एक है । -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * तीन चीजें बहुत देर तक नहीं छुप सकती, सूरज, चंद्रमा और सत्य। -- गौतम बुद्ध * दृढ विश्वास, झूठ की तुलना में सत्य का खतरनाक शत्रु है। -- फ्रीद्रीच नीत्ज़े * पृथ्वी सत्य की शक्ति द्वारा समर्थित है; ये सत्य की शक्ति ही है जो सूरज को चमक और हवा को वेग देती है; दरअसल सभी चीजें सत्य पर निर्भर करती हैं। -- चाणक्य * प्रेम महज आवेग नहीं है, इसमें सच्चाई होनी चाहिए। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * प्रेम, दौलत, शोहरत की बजाय मुझे सच दो। -- हेनरी डेविड थोरीयो * प्लेटो मुझे प्रिय है पर सच उससे भी ज्यादा। -- अरस्तु * बर्तन में रखा पानी चमकता है; समुद्र का पानी अस्पष्ट होता है। लघु सत्य स्पष्ठ शब्दों से बताया जा सकता है, महान सत्य मौन रहता है। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * बहुत हद तक भाषा सच को छुपाने का उपकरण है। -- जार्ज कार्लिन * बिना किसी शक के सच का झूठ से वही सम्बन्ध है जो उजाले का अँधेरे से है। -- लेनार्डो द विन्ची * बिना संदेह के सच सुन्दर है; पर झूठ भी ऐसे ही है। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन * बुरी नियत से कहा गया एक सच आप जितना झूठ सोच सकते हैं उन सभी को मात देता है । -- विल्लियम ब्लैक * मुखर होना आसान है जब आप पूर्ण सत्य बोलने की प्रतीक्षा नहीं करते। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * मुझे पता है मैं कहाँ जा रहा हूँ और मुझे वह नहीं बनना है जो आप चाहते हैं। मैं जो भी चाहता हूँ वो बनने के लिए स्वतंत्र हूँ। -- मोहम्मद अली * मेरा एक सिद्धांत है कि सच कभी भी नौ से पांच बजे के बीच नहीं बोला जाता। -- हंटर एस. थोम्प्सन * मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है और अहिंसा उसे पाने का साधन। -- महात्मा गाँधी * मैं ऐसा सोचने के लिए क्षमा चाहता हूँ कि किसी व्यक्ति कि सबसे प्रभावी आलोचना तब तक नहीं मिलती जब तक आप उसे उकसाए नहीं । कटु सत्य कुछ कडवाहट के साथ ही व्यक्त किया जाता है । -- हेनरी डेविड थोरीयो * मैंने अपनी पत्नी से सच कहा । मैंने कहा कि मैं एक मनोचिकित्सक को देख रहा था । तब उसने भी मुझे सच बता दिया कि वह एक मनोचिकित्सक, दो प्लंबर और एक बारटेंडर को देख रही थी। -- रोडनी डेनजर्फील्ड * यदि आप सच बोलते हैं तो आपको कुछ याद रखने की ज़रुरत नहीं रहती। -- मार्क ट्वैन * यदि आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * यद्यपि आप अल्पमत में हों, पर सच तो सच है। -- महात्मा गाँधी * ये मत कहिये कि "मुझे सत्य मिल गया ह", बल्कि ये कहिये कि, "मुझे एक सत्य मिल गया है।" -- खलिल गिबरान * ये यकीन करना कि कोई आदमी सच कह रहा; तब बहुत मुश्किल होता है जब आप जानते हों कि इसी परिस्थिति में आप झूठ बोलते । -- एच एल मेंकेन * वकील का सच सच नहीं है, बल्कि सामंजस्य बैठाने का तरीका या तर्कयुक्त अवसरवादिता है । -- हेनरी डेविड थोरीयो * विमुख होना आसान है जब आप पूर्ण सत्य बोलने की प्रतीक्षा नहीं करते। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * विरोधाभास का होना झूठ का प्रतीक नहीं है और ना ही इसका ना होना सत्य का । -- ब्लेज़ पास्कल * व्यक्ति कभी कभी झूठ बोल सकता है, लेकिन उसके साथ जो उसका चेहरा बनता है वह सच कह देता है। -- फ्रीद्रीच नीत्ज़े * व्यक्ति जब अपने को सामने रखकर बात करता है तब वो सबसे कम वास्तविक होता है। उसे एक मुखौटा दे दीजिये और वो सच बोलेगा। -- आस्कर वाइल्ड * शांति अगर संभव हो, सच किसी भी कीमत पर। -- मार्टिन लूथर किंग * शिक्षा का लक्ष्य ज्ञान और सत्य का प्रचार-प्रसार है। -- जॉन ऍफ़. केनेडी * सच इतना दुर्लभ है कि इसे बताने में ख़ुशी होती है। -- एमिली डिकिन्सन * सच बहुत कम ही शुद्ध होता है और सरल तो कभी नहीं। -- आस्कर वाइल्ड * सच बोलने के लिए दो लोग चाहिए होते हैं: एक बोलने के लिए, और दूसरा सुनने के लिए। -- हेनरी डेविड थोरीयो * सच सभी के लिए नहीं होता, वह केवल उसे खोजने वालों के लिए होता है । -- ऐनी रैंड * सच सूरज की तरह है। आप उस पर कुछ देर के लिए पर्दा डाल सकते हैं पर वह कहीं जाने वाला नहीं। -- एल्विस प्रेस्ले * सच्चाई ये है कि जिनके भी पास सत्ता है उनपर यकीन नहीं करना चाहिए । -- जेम्स मैडिसन * सत्य अकाट्य है। दोष इस पर हमला कर सकता है, अज्ञानता इसका उपहास उड़ा सकती है लेकिन अंत में सत्य ही रहता है। -- विंस्टन चर्चिल * सत्य और तथ्य में बहुत बड़ा अंतर है। तथ्य सत्य को छुपा सकता है। -- माया एंजेलो * सत्य कभी-कभी ऐसे कारण को क्षति नहीं पहुंचाता जो उचित हो। -- महात्मा गाँधी * सत्य का महान शत्रु अधिकतर जानबूझकर,काल्पनिक, या बेईमानी से बोला गया झूठ नहीं होता बल्कि दृढ, प्रेरक,और अवास्तविक मिथक होता हैं। -- जॉन ऍफ़. केनेडी * सत्य किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं है बल्कि ये सभी व्यक्तियों का खजाना है। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन * सत्य के मार्ग पर चलते हुए कोई दो ही गलतियाँ कर सकता है। पूरा रास्ता ना तय करना और इसकी शुरआत ही ना करना। -- गौतम बुद्ध * सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। -- स्वामी विवेकानन्द * सत्य बिना जन समर्थन के भी खड़ा रहता है। वह आत्मनिर्भर है। -- महात्मा गाँधी * सत्य बोलने के लिए दो लोग चाहिए होते हैं: एक बोलने के लिए और दूसरा सुनने के लिए। -- हेनरी डेविड थोरीयो * सत्य वो है जो काम करता है । -- विल्लियाम जेम्स * सत्य श्रेष्ठ व्यक्ति की वस्तु है। -- कन्फ्युशियस * सभी सच तीन चरणों से होकर गुजरते हैं। पहला, उसका उपहास किया जाता है। दूसरा, उसका हिंसक विरोध किया जाता है। तीसरा, उसे स्वतः सिद्ध रूप में मान लिया जाता है। -- आर्थर इस्कोपेन्हौर * सिर्फ गलतियों को सरकार के समर्थन की ज़रुरत होती है। सत्य अपने से खड़ा रह सकता है। -- थोमस जेफ्फेर्सन * सुन्दरता सत्य में मुस्कान है जब वो खुद अपना चेहरा आईने में निहारती है। -- रबीन्द्रनाथ टैगोर * हमारा कर्तव्य है कि हम हर किसी को उसके संघर्ष में खुद के सर्वोच्च विचार के मुताबिक जीने के लिए उत्साहित करें,और साथ ही ये प्रयास करें की उसके आदर्श सत्य के बिलकुल निकट हों। -- स्वामी विवेकानंदा * हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है।ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो। यह कड़वा सच है। -- चाणक्य * हर सुनी-सुनाई बात पर यकीन मत करिए। एक कहानी के हमेशा तीन पहलू होते हैं। आपका, उनका और सच। -- ब्रह्माकुमारी शिवानी * हालाँकि आप अल्पमत में हों पर सच तो सच है। -- महात्मा गाँधी ==इन्हें भी देखें== *[[यथार्थता|सत्यता]] *[[सत्यार्थ प्रकाश]] ==बाहरी कड़ियाँ== * [https://www.uttarakhandsanskrit.com/2021/02/mahabharat-sanskrit-shlok-saty-asty.html महाभारत में सत्य] 90f4des281u36lndeti4051y1njvurt मनु स्मृति 0 6475 33311 31915 2026-10-04T07:19:30Z अनुनाद सिंह 658 /* राजा एवं राज्य */ 33311 wikitext text/x-wiki '''मनुस्मृति''' [[हिन्दू धर्म]] का एक स्मृतिग्रन्थ है जिसकी रचना मनु ने की थी। == उद्धरण == === धर्म === * ''धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: । : ''धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥'' -- ६।९२ : धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (साफ-सफाई), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) – ये [[धर्म]] के दश लक्षण हैं । * ''आचारः परमो धर्मः'' ॥ '' -- मनुस्मृति: १।१०८ ॥ : आचरण ही परम धर्म है। * ''वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विराम्। : ''आचारश्चैव साधूनामात्मस्तुष्टिरेव च ॥ : सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय, वेदज्ञाताओं मनु आदि के स्मृति ग्रन्थ तथा उनका शिष्ट व्यवहार, महापुरुषों के सत्याचरण, अपने मन की प्रसन्नता-ये सभी धर्म के प्रमाण रूप में ग्रहण करने चाहिए। * ''श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिठन् हि मानवः। : ''इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम॥ : मनुष्य वेदों व स्मृतियों में कहे गये धर्म का सेवन करते हुए संसार में निर्मल कीर्ति प्राप्त करता है तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में परमानन्द को अधिगत कर लेता है। * ''योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः। : ''स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः॥ : जो कोई विद्वान द्विज धर्म की मूलाधार श्रुतियों एवं स्मृतियों की निन्दा या अपमान करे तो सत्पुरुषों को उस वेद निन्दक अधम व्यक्ति को समस्त श्रेष्ठ कर्मों से अलग कर देना चाहिए। * ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । : ''प्रियं च नानृतं च ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥ ४।१३८ ॥ : सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगाने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है । === वर्ण-व्यवस्था === * ''सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः । : ''मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत् ॥'' -- मनुस्मृति (१- ८७ ) : भावार्थ - इस सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिये उस अत्यन्त कान्तियुक्त ( सृष्टिकर्ता) ने अपने मुख, भुजा, जंघाए, तथा पैरों से उत्पन्न किये हुए (क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र ) के लिये अलग-अलग कर्मों की रचना की। * ''अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। : ''षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च॥'' (मनुस्मृति ८.३३७) : ''ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्। : ''द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ॥ (मनुस्मृति ८.३३८) : चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। (अर्थात् जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। ) * ''सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव। : ''अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥'' (मनुस्मृति-२.१६२) : ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो। * ''शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। : ''क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥'' (मनुस्मृति-१०.६५) : शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है। === संस्कार === * ''वैदिकेः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम्। : ''कार्यः शरीरसंस्कार : पावनः प्रेत्य चेह च ॥ : भृगु ऋषि निर्देश देते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्गों के पवित्र वैदिक मन्त्रों द्वारा इस लोक में तथा मृत्यु पश्चात् सम्पूर्ण शारीरिक गर्भाधानादि संस्कार अवश्य करने चाहिए। * ''प्राड्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते। : ''मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरभ्यमधुसर्पिषाम ॥ : इस श्लोक में नवजात बालकों का जातकर्म संस्कार का विधान बताया जाता है। यथा नाल काटने से पूर्व नवजात शिशु का जातकर्म संस्कार सम्पन्न होता है। इस समय स्वर्ण को सलाई से घृत, मधुमिश्रित प्राशन किया जाता है। अर्थात् बालक का पिता मन्त्र-उच्चारण पूर्वक बच्चे को मधु और घी चटाता है और बच्चे की जीभ पर ' ओउम् ' लिखता है। * ''माडुल्य ब्राह्मणस्य त्र्याक्षत्रियस्य बलान्वितम्। : ''वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ : ब्राह्मण शिशु का नाम मांगलिक, क्षत्रिय शिशु का नाम बल युक्त, वैश्य के बालक का नाम समृद्धि सूचक तथा शुद्ध के बच्चे का नाम निन्दनीय होना चाहिये। * ''चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्कमणं गृहात्। : ''षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मलं कुले ॥ : चतुर्थ मास में बालकों को घर से बाहर निकालना चाहिये। छठेमास में दाल-भात आदि सुपाच्य आहार देना चाहिये। अथवा कुल के अनुसार मांगलिक सभी आचार सम्पादित करने चाहिये। * ''गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वोत ब्राह्मणस्योपनायनम्। : ''गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तुं द्वादशे विशः ॥ : ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के शिशु का गर्भ से बारहवें वर्ष में सम्पन्न कराना चाहिये। * ''अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः। : ''सावित्रीपतिताः व्रत्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ : पूर्वोक्त समय के बाद ये तीनों ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य वर्ण समुचित समय में जिनका उपनयन संस्कार सम्पादित नहीं हुआ है गायत्री मन्त्र के अधिकार से वंचित अतः पतित एवं शिष्टों द्वारा निन्दनीय शूद्रत्व के प्राप्त कर लेते हैं। * ''कार्ष्णंरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः। : ''वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ : यहाँ भृगुऋषि तीनों वर्गों के ब्रह्मचारियों के लिए धारणा करने योग्य वस्त्रों का विधान बतलाते हैं। ब्राह्मण आदि वर्गों के ब्रह्मचारी क्रमशः कृष्णमृग, रूरूमृग तथा बकरे के चमड़े की धोती एवं कौपीन के स्थान पर धारण करें, और सन, रेशम और भेड़ के बाल अर्थात् ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करें। * ''केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणत। : ''ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ : अब ऋषि ब्रहाचारियों के धारण योग्य दण्ड का मान बताते हैं। धर्मशास्त्र के प्रमाणानुसार ब्राहाण अपने सिर के केशों तक, क्षत्रिय मस्तक पर्यन्त और वैश्य नाक पर्यन्त परिमाण अनुवाद ( लम्बाई ) वाले दण्ड को धारण करे। * ''प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्। : ''प्रदक्षिणं परीत्याग्नि चरेद् भैक्षं यथाविधि ॥ : ब्राह्मणादि वर्गों के ब्रह्मचारियों को शास्त्र के नियमानुसार अपने इष्ट दण्ड को ग्रहण कर सूर्य का उपस्थान कर, अग्नि को प्रदक्षिणा कर भिक्षाचरण करना चाहिए। * ''मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनी निजाम्। : ''भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ : ब्रह्मचारी को सबसे पहले अपनी माता, अपनी बहिन, तथा मौसी से भिक्षा की याचना करनी चाहिए और उन्हें भी किसी प्रकार ब्रह्मचारी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। * ''उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः। : ''भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत ॥ : ब्रह्मचारी तथा गृहस्थद्विज भी एकाग्रचित हो आचमन कर जल से आचमन करे तथा इन्द्रियों, आँख, नाक तथा कानों के छिन्द्रो को भी जल स्पर्श करे। * ''ब्राह्मण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत्। : ''कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन॥ : विप्र को सदा ब्राह्म नामक तीर्थ से अथवा प्राजापत्य और दैवतीर्थों से आचमन करना चाहिए, पितृतीर्थ द्वारा तो कभी भी आजमन नहीं करना चाहिए। * ''अष्ठमूलस्य तले बाह्य तीर्थ प्रचक्षते। : ''कायम लिमूलेऽगे दैवं पियं तयोरधः ॥ : हाथ के अंगूठे के पास ब्राह्म तीर्थ, कनिष्ठिका अंगुली के मूल के पास 'प्रजापति' तीर्थ, अंगुलियों के आगे 'दैवतीर्थ' और अंगूठे तथा प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के मध्य पितृतीर्थ होता है। * ''मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम्। : ''अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ : ब्रह्मचारी के यदि मेखला, मृग चर्म, पालाशादि से बना हुआ दण्ड, यज्ञोपवीत, कमण्डलु-ये नष्ट हो गये हों तो इन्हें जल में फेंककर अन्य नवीन मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहण कर लेने चाहिए। * ''अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः। : ''ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लधुवासा जितेन्द्रियः ॥ : विद्याध्यन के लिये उद्यत, आचमन किया हुआ, ब्रह्मान्जलि से युक्त, अल्प और हलके वस्त्र धारण करने वाला, इन्द्रियजयी शिष्य ही शास्त्रानुसार अध्यापन के योग्य है। * ''ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा। : ''स्रवत्यनोड्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्चविशीर्यति ॥ : वेद-विधा के अध्ययन की विधि बतलाई जाती है। ब्रह्मचारी को सदा अपने गुरूचरणों में वेदाध्ययन के पूर्व और अवसान में ' ओमकार ' का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि ' ओऽम ' इस मंत्र के उच्चारण से विहीन वेदाध्ययन शनैः शनैः नष्ट हो जाता है विस्मृत हो जाता है। * ''एतयर्चा विसंयुक्तः काले न क्रियया स्वया। : ''ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां जाति साधुषु ॥ : इस गायत्री महामन्त्र के जप से और अपने सदाचारादि कर्तव्यों से विरहित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सज्जनों में निन्दा को प्राप्त करता है। * ''योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः। : ''स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूत खमूर्तिमान् ॥ : जो द्विज आलस्य छोड़कर प्रतिदिन प्रणय और व्यहतियों के साथ गायत्री-महामन्त्र का तीन वर्षपर्यन्त जप करता है, वह इस मन्त्र के प्रभाव से अपना गायत्री मन्त्रमय परमात्मा के अनुग्रह से आकाशरूप होकर सच्चिदानन्दस्वरूप पर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। === राजा एवं राज्य === *''अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । : ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनु० ७।३ ॥ : अर्थात् बिना राजा के इस लोक में सब ओर अराजकता फैल जायेगी, जिसके कारण सब लोग सब ओर से भय को प्राप्त होंगे (इस स्थिति का आज हम पर्याप्त मात्रा में अनुभव कर रहे हैं !) । इन सबकी रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा को बनाया । अर्थात् राजा का प्रमुख [[धर्म]] प्रजा की रक्षा करना है । * ''इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । : ''चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ मनु० ७।४ ॥ : ईश्वर ने जो राजा की सृष्टि की (उपर्युक्त श्लोक में), उसमें इन्द्र, अनिल = वायु, यम, अर्क (= सूर्य), अग्नि, वरुण, चन्द्र और वित्तेश (= कुबेर) के शाश्वत् अंश, अर्थात् उनके मुख्य, सार-रूप अंश होने चाहिए । अर्थात् राजा में इन दैवी शक्तियों के मुख्य गुण पाए जाने चाहिए । * ''वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति । : ''तथाभिवर्षेत् स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ मनु० ९।३०४ ॥ : जिस प्रकार इन्द्र, या प्रकृति की वृष्टि-शक्ति, वर्ष में चार माह वर्षा करके सबको तृप्त कर देता है, वैसे ही राजा को अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि-शान्ति-उन्नति की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहिए । उसको अपनी प्रजा को ऐश्वर्य-युक्त करना चाहिए । यह उसका '''इन्द्रव्रत''' कहलाता है । * ''अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः । : ''तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ मनु० ९।३०५ ॥ : जिस प्रकार शेष आठ मास सूर्य, अपनी किरणों के द्वारा, सब वस्तुओं में से जल हरता रहता है, उसी प्रकार राजा भी, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, नित्य कर की वसूली करे । यह उसका '''अर्कव्रत''' होता है । * ''प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः । : ''तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ मनु० ९।३०६ ॥ : जिस प्रकार वायु सब वस्तुओं में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा अपनी राष्ट्र के हर भाग में प्रवेश करके, वहां की सूचना रखनी चाहिए । यह उसका '''मारुतव्रत''' कहलाता है । जो राजा अपनी प्रजा के अनकहे दुःख-दर्द नहीं जानेगा, और उनका समाधान नहीं करेगा, वह आगे जाकर स्वयं अपने पद से च्युत होगा । * ''यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति । : ''*तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतं ॥ मनु० ९।३०७ ॥ : जिस प्रकार यम, अर्थात् परमात्मा का नियन्त्रक स्वरूप, समय आने पर कर्मानुसार सब को प्रिय या अप्रिय कर्मफल देकर नियन्त्रित करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा को दण्ड और लाभ देकर नियन्त्रण में रखना चाहिए । यह उसका '''यमव्रत''' होता है । * ''वरुणेन यथा पाशैर्बद्धः एवाभिदृश्यते । : ''तथा पापान् निगृह्णीयाद्व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ मनु० ९।३०८ ॥ : जिस प्रकार मनुष्य पानी के भँवर में वरुण द्वारा जाल में बांधा हुआ सा दीखता है, उसी प्रकार राजा को पापियों को कारागार के बन्धन में डालना चाहिए, जिससे अन्य प्रजा भय-रहित होकर रह सके । यह उसका '''वारुणव्रत''' होता है । * ''परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः । : ''तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ मनु० ९।३०९ ॥ : जिस प्रकार पूरे चाँद को देखकर मानव हर्ष करते हैं, वैसी ही प्रकृति राजा की होनी चाहिए । अर्थात् राजा की आर्थिक व नैयायिक व्यवस्था से सन्तुष्ट जन उसको देखकर आह्लादित होने चाहिए । वही राजा '''चान्द्रव्रतिक''' कहलाता है । * ''प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु । : ''दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतं ॥ मनु० ९।३१० ॥ : जिस प्रकार अग्नि शाक, धातु, आदि के दोषों को जला देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह पापकर्मों में प्रतापी और तेजस्वी हो, अर्थात् स्वयं भयभीत न हो, अपितु पापी को भय दिलाए, और दुष्ट मन्त्री, अधिकारी तक को भी कठोर दण्ड दे । राजा के प्रतिनिधि ही यदि अत्याचार करेंगे, तो प्रजा में न्यायव्यवस्था स्थापित ही नहीं हो सकती । यह राजा का '''आग्नेयव्रत''' होता है । * ''यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् । : ''तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतं ॥ मनु० ९।३११ ॥ : जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को, बिना भेद-भाव के, समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार राजा को सारी प्रजा का पक्षपात-रहित होकर पालन-पोषण करना चाहिए । यह उसका '''पार्थिव व्रत''' कहलाता है । * ''एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः । : ''स्तेनान् राजा निगृह्णीयात् स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ मनु० ९।३१२ ॥ : ऊपर दिए सारे व्रतों के द्वारा और अन्य उपायों के द्वारा भी, आलस-रहित होकर, राजा सर्वदा अपने राष्ट्र और दूसरे देशों से आए हुए घुसपैठी चोरों को अपने वश में रखे । किसी भी प्रकार की हानि से, हर सम्भव उपाय के द्वारा, प्रजा और राष्ट्र को राजा बचाए । * ''वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगो यथा यथा । : ''तथा तथा दमः कार्यो हिंसायामिति धारणा ॥ मनु० ८.२८५ ॥ : वृक्ष आदि सब पौधों के फल, फूल, पत्ता तथा लकड़ी आदि के द्वारा जैसा-जैसा उपयोग होता हो, उनको (काटने आदि से) नष्ट करने वाले अपराधी को वैसा-वैसा ही दण्ड देना चाहिए, ऐसा शास्त्रनिर्णय है। === नारी === * ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। : ''यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥" : जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती, (उनका सम्मान नही होता) वहाँ किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं। * ''शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । : ''न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥'' -- मनुस्मृति ३/५७ : जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।) * ''स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्। : ''विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ॥ (मनुस्मृति-२.२४०) : स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सबसे (सब देशों तथा सब मनुष्यों से) ग्रहण करें। * ''वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृत। : ''पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ : नारियों का पाणि-ग्रहण संस्कार ही गृहम सूत्रों में कहा गया संस्कार है। निष्ठापूर्वक पतिसेवा ही गुरूकूल में निवास है। गृहकार्य को कुशलता से करना ही यज्ञ का अनुष्ठान है। === गृहस्थ === * ''यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम् । : ''गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥'' -- मनुस्मृतिः ३।७८ ॥ : क्योंकि बाकी तीनों ही आश्रमी गृहस्थ से प्रतिदिन अन्न, वस्त्रादि, दान प्राप्त करते हैं, इसलिए वस्तुतः गृहस्थी ही उनको धारण करता है । इस कारण से, गृहस्थाश्रम ही सबमें बड़ा है । * ''दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥'' -- मनु० ३।७५ ॥ : गृहस्थ देवयज्ञ के द्वारा सारे चराचर जगत् का भरण करता है । === भारत या आर्यावर्त === * ''आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्। : ''तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्त विदुर्बुधाः ॥ : पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में जो प्रदेश ( भू-भाग ) विराजमान है, उसे विद्वान् पुरुष ' आर्यावर्त ' नाम से जानते हैं। * ''एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। : ''स्वं स्त्रं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ : ऋषि संसार के मनुष्यों को सम्बोधित करते हैं कि भूतल के सम्पूर्ण मनुष्यों की ब्रह्मावर्त देश में उत्पन्न ज्ञान साधनारत ब्राह्मण के चरित्र से अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। === विविध === * ''अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः । : ''अज्ञं हि बालं इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ।। : जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता है, और जो मन्त्रद (अर्थात् दूसरे को विचार देने वाला) है वह पिता है, क्यों कि अज्ञानी को ही बालक कहा गया है और मन्त्रद को पिता कहा गया है। * '' वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । : '' तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥'' मनु० ४।१४७ ॥ : जितना समय मिले, उतना समय, बिना आलस्य किए, नित्य वेदाभ्यास करना चाहिए क्योंकि वही परम धर्म है; अन्य सभी धर्म उपधर्म ही हैं । * '' सर्वान् परित्यजेतर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः । : ''यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥'' मनु० ४।१७ ॥ : जो भी कार्य स्वाध्याय के विरोधी हैं, उन सभी को छोड़ता जाए, और किस भी तरह थोड़ा पढ़ाए, क्योंकि स्वाध्याय की कृतकृत्यता इसी में है । * ''दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम् । : ''परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥'' -- मनु० ४।२२७ ॥ : अर्थात् सुखी होकर (वस्तु से मोह पूर्णतया हटाते हुए), गृहस्थ को नित्य यथाशक्ति ऐष्टिक और पौर्तिक कार्यों के लिये पात्र को ढूढ़ कर उसको दान देना चाहिए । ( ऐष्टिक = यज्ञों का आयोजन, और पौर्तिक = रुग्णालय, पाठशाला, आदि बनवाना)। (पात्र का योग्य होना बहुत ही आवश्यक है । गलत पात्र को देने से पुण्य तो क्या, केवल पाप का ही अर्जन होता है।) * ''त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यर्जितं धनम् । : ''दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥'' -- मनु० ४।१९३ ॥ : तीन प्रकार के गलत पात्रों को देने से, धर्मानुसार अर्जित धन भी, दाता के लिए इसी जन्म में अनर्थ का कारण बन जाता है, और दान लेने वाले के लिए परजन्म में दुःख पहुंचाता है । * '' सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । : '' एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥'' -- मनु० ४।१६० ॥ * '' सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । : '' सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥'' -- मनु० ४।१२ ॥ : परम सन्तोष में स्थित हो, सुख चाहने वाला इच्छाओं को वश में रखे, क्योंकि सन्तोष ही सुख का मूल है, और असन्तोष दुःख का जनक है । * '' नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । : '' आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥'' -- मनु० ४।१३७ ॥ : यदि अनेक प्रयासों के बाद भी हम दीन बने रहें, तब भी हमें अपनी अवस्था के लिए अपने को दोष नहीं देना चाहिए, और श्री की प्राप्ति को कभी भी दुर्लभ न समझते हुए, मृत्यु-पर्यन्त प्रयत्न करते ही रहना चाहिए। * '' नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । : '' द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत ॥'' मनु० ४।१६३ ॥ : हमें नास्तिक, वेदों की निन्दा करने वाला, विद्वानों की निन्दा करने वाला, द्वेष, कुटिल, अभिमान, क्रोध या कटाक्ष करने वाला - नहीं होना चाहिए । * ''दृढकारो मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । : ''अहिंस्रो दमदानभ्यां जयेत् स्वर्गं तथाव्रतः ॥'' -- मनु० ४।२४६ ॥ : हमें क्या-क्या होना चाहिए, इस विषय में कहते हैं – सदा धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए, सबों से कोमल व्यवहार करना चाहिए, क्रूरों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए, स्वयं अहिंसक होना चाहिए, जितेन्द्रिय और दानशील होना चाहिए । * ''अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कहिंचित्। : ''यद्यद्धि कुरुते किञ्चितत्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥ : इस जगत् में कभी भी बिना इच्छा के कोई भी क्रिया या कर्म सम्पन्न होता दिखाई नहीं देता है, क्योंकि मनुष्य जो जो कर्म करता है, वह कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा का परिणाम है-ऐसा मानना चाहिये। * ''यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। : ''स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ : मनु ने जिन सम्पूर्ण चारों वर्गों के गुणस्वभावादि धर्मों का उल्लेख किया है। वे सब वेदों में कहे गये है, क्योंकि भगवान मनु समस्त वेदों के अर्थ ज्ञाता है। * ''नोच्छिप्टं कस्यचिद्दद्यान्नद्याच्चैव तथाऽन्तरा। : ''न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिप्टः क्वचित् व्रजेत् ॥ : किसी को जूठा भोजन नहीं देना चाहिए। प्रातः और सायंकाल के भोजन के अतिरिक्त बीच में भोजन नहीं करना चाहिए अत्यधिक भोजन नहीं लेना चाहिए। कहीं भी जूठे मुँह नहीं जाना चाहिए। * ''एकादशं मनोज्ञयं स्वगुणेनोभयात्मकम्। : ''यस्मिजिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ॥ : मन अपने गुणों के प्रभाव से ग्यारहवीं उभयात्मक ( दोनों ही ) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय भी है। इसीलिए मन के जीत लेने पर ये दोनों ज्ञान व कर्मेन्द्रियाँ स्वमेव विजित हो जाती है। * ''वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। : ''न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित्॥ : दूषित हृदय वाले व्यक्ति का वेदाध्ययन, त्याग, यज्ञादि का अनुष्ठान, यम-नियमों का पालन, अभ्यास ये कभी सिद्धि प्राप्त नहीं करते हैं। * ''आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः। : ''आप्तः शक्तोऽर्थदः साधुः स्वोऽध्याप्या दश धर्मत ॥ : कौन-कौन शिक्षा देने योग्य हैं? इस सम्बन्ध में कहते हैं कि आचार्य का पुत्र, सेवापरायण, अन्य विषय की शिक्षा या गुरू को व्यवहार के सम्बन्ध में परामर्श देने वाला, धर्मतत्पर, पवित्र मन वाला, श्रेष्ठ, सत्यवादी, पाठ को धारण करने में समर्थ, धन देने वाला, सज्जन और स्वजातीय में दश ही गुरु के द्वारा धर्मानुसार अध्यापन योग्य हैं। * ''नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः। : ''जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥ : बुद्धिमान मनुष्य को यह उचित है कि वह श्रद्धापूवक प्रश्न न करने वाले को अथवा अन्याय के साथ पूछने वाले को उत्तर न दे। वह जानकार होते हुए भी जड़ या मूर्ख की भाँति आचरण करें। * ''फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। : ''न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥ (६.६७) : रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है। *'' बलाद्दत्तं बलाद् भुक्त बलाद्यच्चापि लेखितम् । : ''सर्वान्बल कृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् ॥ : बलात्कार से जो नहीं देने योग्य वस्तु दी गई है, जो भूमि, भूषणादि भोगा गया हो, ऋण लेने या ब्याज सम्बन्धी लेख लिखवाया गया हो, बलात् किये गये ये सभी कार्य अमान्य हैं (ऐसा मनु कहते हैं )। * चुगली, साहस कर्म, द्रोह, ईर्ष्या , असूया, अर्थदूषण, कठोर वचन और क्रूरता - ये आठ क्रोधजन्य व्यसन हैं। (7.48) * विद्वानों ने दोनों प्रकार के व्यसनों का मूल लोभ कहा है। उस लोभ को प्रयत्न से जीतें। (7.49) * काम जन्य व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्री सहवास व शिकार यथाक्रम अत्यन्त दुखदायी है। (7.50) * मृत्यु और व्यसन में व्यसन ही विशेष कष्टप्रद है क्योकि व्यसनी पुरुष निरन्तर नीचे गिरता जाता है तथा अव्यसनी स्वर्ग प्राप्त करता है। (7.53) * सुसाध्य कर्म भी कोई केवल अकेले नहीं कर सकता है फिर महान फल वाले राजकाज को सहायकों से रहित राजा अकेला कैसे चला सकता है। (7.55) * राजा को चाहिए की मंत्रियों में जो शूर, दक्ष, श्रेस्ठ कुल वाले सदाचारी हों उन्हें खान एवम अन्न भंडार आदि पर नियुक्त करे तथा भीरु स्वभाव का पुरुषों को अन्तःपुर के सामान्य कार्यों पर लगाए। (7.62) * चेष्ठा से मनोभाव समझने वाले पवित्र, चतुर तथा कुलीन पुरुष को दूत नियुक्त करे। (7.64) * यह निश्चय जानिए कि जैसे अग्नि में ईंधन और घी डालने से अग्नि की ज्वाला और अधिक बढ़ जाती है, वैसे ही कामों के उपभोग से कभी भी काम शांत नहीं होता है बल्कि निरंतर बढ़ता ही जाता है। * शुद्धाचरण से, चरित्रवान बनने से, स्त्री. पुरुष निश्चित रूप से दीर्घायु प्राप्त करते हैं। * सब दानों में ब्रह्म (विद्या) का दान सबसे श्रेष्ठ है। * बिना हिंसा के मांस नहीं मिलता, हिंसा पाप है। अत: मांस खाना भी पाप है। * चोरी करने वाले के हाथ काट दो। दुष्ट कर्म करने वाले की आँख निकाल दो। व्यभिचारी पुरुष को गर्म-गर्म विशाल तवे पर डाल कर मार दो। * व्यभिचारिणी स्त्री को कुत्ते से नुचवा कर मरवा दो। यह दण्ड दुष्टों को सार्वजनिक स्थान पर दिया जाए जिससे कि अधिकाधिक लोग देख कर शिक्षा ग्रहण करें और भय के कारण स्वप्न में भी कभी पाप करने का विचार न करें। * न्याययुत दंड का नाम ‘राजा’ और ‘धर्म’ है। यदि दण्ड नहीं तो राजा का कोई औचित्य नहीं। यदि दण्ड नहीं तो धर्म का भी कोई आधार नहीं। * शरीर जल से साफ होता है, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा धर्म से साफ होती है। * क्रूर स्वभाव का परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। * उचित रीति से स्त्री की रक्षा करने से अपने कुल, संतान, आत्मा व धर्म की रक्षा होती है। * पति-पत्नी को इस विधि से जीवन व्यतीत करना चाहिए कि जिसमें परस्पर मरणपर्यन्त वियोग न हो। * स्त्रियाँ सन्तान को जन्म देती हैं। वे घर का सौभाग्य हैं, वे पूजा के योग्य हैं, वे घर की चिराग (गृह दीप्ति) हैं। * कन्या विवाह योग्य होने पर भी मरणपर्यन्त घर में बैठी रहे परंतु उस कन्या का कभी गुणहीन पुरुष को दान न करें। * जिस कुल या परिवार में स्त्रियाँ कष्ट प्राप्त करती हैं, उन्हें पीड़ित किया जाता है, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जहाँ वे कष्ट या दुख को प्राप्त नहीं होती, वह कुल, परिवार सदा वृद्धि को प्राप्त करता है। * गृहस्थाश्रम के आश्रम ही अन्य तीन आश्रमों के पालन-पोषण आदि की व्यवस्था की जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम सबसे बड़ा आश्रम है। * सन्तानों को जन्म देना, जन्मे हुओं का पालन-पोषण – ये महत्तम कार्य नारी के ही हैं। दैनिक लोकव्यवहार रूपी कार्यों का प्रत्यक्ष मुख्य आधार नारी ही है। * अध्ययन नहीं करने से, आचार का पालन नहीं करने से, आलस्य और अन्य दोषों के कारण असमय मृत्यु होती है। * जहाँ सब एक हैं, वहाँ सब कुछ अपने आप खिंच कर चला आता है। एकता सर्वदात्री है। * दान लेने का पात्र होने पर भी बार-बार दान न लें क्योंकि उससे ब्रह्म तेज नष्ट हो जाता है। * अध्ययन, तप, ज्ञान पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह और ‘आत्म-चिंतन ‘- ये सब सात्त्विक गुण के लक्षण हैं। * ब्रह्मचारी को चाहिए कि अखण्डित ब्रह्मचर्य तथा अपनी कुल परम्परा का पालन करते हुए तीनों वेदों अथवा दो वेदों या एक वेद का पूर्ण अध्ययन समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे। * प्रात:काल उठ कर राजा तीनों वेदों में कुशल वृद्ध विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हो और उनके निर्देशों के अनुसार राज्य का कार्य संचालन करें। * मनुष्यों को ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद के अतिरिक्त अन्य विविध मंत्रों को जानना चाहिए। ये जीवों के लिए कल्याणपरक होते हैं। जो इन तीन वेदों को भली-भांति जानता है, वही वेदवेत्ता कहलाता है। * देश, धर्म, शील व संस्कृति की हिंसा करने वाले को मारने में कोई पाप नहीं है। == मनु और मनुस्मृति के बारे में उद्धरण == * मनुस्मृति, सृष्टि के प्रथम राजा मनु द्वारा रचित प्रथम संविधान है। -- [[स्वामी दयानन्द सरस्वती]] * मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। -- लुई जैकोलिऑट (Louis Jacolliot), बाइबल इन इण्डिया' नामक ग्रन्थ में <ref>V. Krishna Rao. Expansion of Cultural Imperalism Through Globalisation. Manak Publications. p. 82.</ref> * [[बाइबल]] को बन्द करो और मनुस्मृति को खोलो। इसमें जीवन की सकारात्मक छबि है। -- जर्मनी के महान दार्शनिक [[फ्रेडरिक नीत्से|फ्रेदरिक नीत्से]] (Friedrich Nietzsche) * मनुस्मृति भारत में जातिवाद के लिये उत्तरदायी है। -- [[भीमराव आम्बेडकर]] * यद्यपि जातिगत भेदभाव आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास के लिये हानिकारक है, जातिवाद का हिन्दू धर्म और मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह ग्रन्थ व्यवसायों की भिन्नता और विविधता के महत्व को प्रतिपादित करता है। यह किसी के अधिकार की परिभाषा नहीं करता बल्कि उनके कर्तव्यों की परिभाषा करता है। सभी कार्य, चाहे वे शिक्षण के हों या सफाई के, समान रूप से आवश्यक हैं और उनका स्थान भी बराबरी का है। मैं चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ को सम्पूर्णतः पढ़ना चाहिए लेकिन उन भागों को नहीं मानन चहिये जो सत्य और [[अहिंसा]] से मेल न खाते हों। -- [[महात्मा गांधी]] * मनु और अन्य ऋषियों की संहिताएं, कर्म-कांड में निर्धारित श्लोकों का पालन करते हुए, मुख्य रूप से समय, स्थान और व्यक्तियों की आवश्यकताओं के अनुसार सामाजिक कल्याण के लिए अनुकूल आचरण के नियम निर्धारित करती हैं। -- [[एनी बेसेन्ट]] ==इन्हें भी देखें== * [[धर्म]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} tg4w50v8uqm0ucvb4bpb4520fgrf743 33312 33311 2026-10-04T08:03:04Z अनुनाद सिंह 658 33312 wikitext text/x-wiki '''[[:w:मनुस्मृति|मनुस्मृति]]''' [[हिन्दू धर्म]] का एक [[:w:स्मृति|स्मृतिग्रन्थ]] है जिसकी रचना मनु ने की थी। == उद्धरण == === धर्म === * ''धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: । : ''धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥'' -- ६।९२ : धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (साफ-सफाई), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) – ये [[धर्म]] के दश लक्षण हैं । * ''आचारः परमो धर्मः'' ॥ '' -- मनुस्मृति: १।१०८ ॥ : आचरण ही परम धर्म है। * ''वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विराम्। : ''आचारश्चैव साधूनामात्मस्तुष्टिरेव च ॥ : सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय, वेदज्ञाताओं मनु आदि के स्मृति ग्रन्थ तथा उनका शिष्ट व्यवहार, महापुरुषों के सत्याचरण, अपने मन की प्रसन्नता-ये सभी धर्म के प्रमाण रूप में ग्रहण करने चाहिए। * ''श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिठन् हि मानवः। : ''इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम॥ : मनुष्य वेदों व स्मृतियों में कहे गये धर्म का सेवन करते हुए संसार में निर्मल कीर्ति प्राप्त करता है तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में परमानन्द को अधिगत कर लेता है। * ''योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः। : ''स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः॥ : जो कोई विद्वान द्विज धर्म की मूलाधार श्रुतियों एवं स्मृतियों की निन्दा या अपमान करे तो सत्पुरुषों को उस वेद निन्दक अधम व्यक्ति को समस्त श्रेष्ठ कर्मों से अलग कर देना चाहिए। * ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । : ''प्रियं च नानृतं च ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥ ४।१३८ ॥ : सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगाने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है । === वर्ण-व्यवस्था === * ''सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः । : ''मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत् ॥'' -- मनुस्मृति (१- ८७ ) : भावार्थ - इस सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिये उस अत्यन्त कान्तियुक्त ( सृष्टिकर्ता) ने अपने मुख, भुजा, जंघाए, तथा पैरों से उत्पन्न किये हुए (क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र ) के लिये अलग-अलग कर्मों की रचना की। * ''अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। : ''षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च॥'' (मनुस्मृति ८.३३७) : ''ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्। : ''द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ॥ (मनुस्मृति ८.३३८) : चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। (अर्थात् जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। ) * ''सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव। : ''अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥'' (मनुस्मृति-२.१६२) : ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो। * ''शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। : ''क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥'' (मनुस्मृति-१०.६५) : शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है। === संस्कार === * ''वैदिकेः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम्। : ''कार्यः शरीरसंस्कार : पावनः प्रेत्य चेह च ॥ : भृगु ऋषि निर्देश देते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्गों के पवित्र वैदिक मन्त्रों द्वारा इस लोक में तथा मृत्यु पश्चात् सम्पूर्ण शारीरिक गर्भाधानादि संस्कार अवश्य करने चाहिए। * ''प्राड्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते। : ''मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरभ्यमधुसर्पिषाम ॥ : इस श्लोक में नवजात बालकों का जातकर्म संस्कार का विधान बताया जाता है। यथा नाल काटने से पूर्व नवजात शिशु का जातकर्म संस्कार सम्पन्न होता है। इस समय स्वर्ण को सलाई से घृत, मधुमिश्रित प्राशन किया जाता है। अर्थात् बालक का पिता मन्त्र-उच्चारण पूर्वक बच्चे को मधु और घी चटाता है और बच्चे की जीभ पर ' ओउम् ' लिखता है। * ''माडुल्य ब्राह्मणस्य त्र्याक्षत्रियस्य बलान्वितम्। : ''वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ : ब्राह्मण शिशु का नाम मांगलिक, क्षत्रिय शिशु का नाम बल युक्त, वैश्य के बालक का नाम समृद्धि सूचक तथा शुद्ध के बच्चे का नाम निन्दनीय होना चाहिये। * ''चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्कमणं गृहात्। : ''षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मलं कुले ॥ : चतुर्थ मास में बालकों को घर से बाहर निकालना चाहिये। छठेमास में दाल-भात आदि सुपाच्य आहार देना चाहिये। अथवा कुल के अनुसार मांगलिक सभी आचार सम्पादित करने चाहिये। * ''गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वोत ब्राह्मणस्योपनायनम्। : ''गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तुं द्वादशे विशः ॥ : ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के शिशु का गर्भ से बारहवें वर्ष में सम्पन्न कराना चाहिये। * ''अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः। : ''सावित्रीपतिताः व्रत्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ : पूर्वोक्त समय के बाद ये तीनों ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य वर्ण समुचित समय में जिनका उपनयन संस्कार सम्पादित नहीं हुआ है गायत्री मन्त्र के अधिकार से वंचित अतः पतित एवं शिष्टों द्वारा निन्दनीय शूद्रत्व के प्राप्त कर लेते हैं। * ''कार्ष्णंरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः। : ''वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ : यहाँ भृगुऋषि तीनों वर्गों के ब्रह्मचारियों के लिए धारणा करने योग्य वस्त्रों का विधान बतलाते हैं। ब्राह्मण आदि वर्गों के ब्रह्मचारी क्रमशः कृष्णमृग, रूरूमृग तथा बकरे के चमड़े की धोती एवं कौपीन के स्थान पर धारण करें, और सन, रेशम और भेड़ के बाल अर्थात् ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करें। * ''केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणत। : ''ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ : अब ऋषि ब्रहाचारियों के धारण योग्य दण्ड का मान बताते हैं। धर्मशास्त्र के प्रमाणानुसार ब्राहाण अपने सिर के केशों तक, क्षत्रिय मस्तक पर्यन्त और वैश्य नाक पर्यन्त परिमाण अनुवाद ( लम्बाई ) वाले दण्ड को धारण करे। * ''प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्। : ''प्रदक्षिणं परीत्याग्नि चरेद् भैक्षं यथाविधि ॥ : ब्राह्मणादि वर्गों के ब्रह्मचारियों को शास्त्र के नियमानुसार अपने इष्ट दण्ड को ग्रहण कर सूर्य का उपस्थान कर, अग्नि को प्रदक्षिणा कर भिक्षाचरण करना चाहिए। * ''मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनी निजाम्। : ''भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ : ब्रह्मचारी को सबसे पहले अपनी माता, अपनी बहिन, तथा मौसी से भिक्षा की याचना करनी चाहिए और उन्हें भी किसी प्रकार ब्रह्मचारी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। * ''उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः। : ''भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत ॥ : ब्रह्मचारी तथा गृहस्थद्विज भी एकाग्रचित हो आचमन कर जल से आचमन करे तथा इन्द्रियों, आँख, नाक तथा कानों के छिन्द्रो को भी जल स्पर्श करे। * ''ब्राह्मण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत्। : ''कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन॥ : विप्र को सदा ब्राह्म नामक तीर्थ से अथवा प्राजापत्य और दैवतीर्थों से आचमन करना चाहिए, पितृतीर्थ द्वारा तो कभी भी आजमन नहीं करना चाहिए। * ''अष्ठमूलस्य तले बाह्य तीर्थ प्रचक्षते। : ''कायम लिमूलेऽगे दैवं पियं तयोरधः ॥ : हाथ के अंगूठे के पास ब्राह्म तीर्थ, कनिष्ठिका अंगुली के मूल के पास 'प्रजापति' तीर्थ, अंगुलियों के आगे 'दैवतीर्थ' और अंगूठे तथा प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के मध्य पितृतीर्थ होता है। * ''मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम्। : ''अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ : ब्रह्मचारी के यदि मेखला, मृग चर्म, पालाशादि से बना हुआ दण्ड, यज्ञोपवीत, कमण्डलु-ये नष्ट हो गये हों तो इन्हें जल में फेंककर अन्य नवीन मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहण कर लेने चाहिए। * ''अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः। : ''ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लधुवासा जितेन्द्रियः ॥ : विद्याध्यन के लिये उद्यत, आचमन किया हुआ, ब्रह्मान्जलि से युक्त, अल्प और हलके वस्त्र धारण करने वाला, इन्द्रियजयी शिष्य ही शास्त्रानुसार अध्यापन के योग्य है। * ''ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा। : ''स्रवत्यनोड्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्चविशीर्यति ॥ : वेद-विधा के अध्ययन की विधि बतलाई जाती है। ब्रह्मचारी को सदा अपने गुरूचरणों में वेदाध्ययन के पूर्व और अवसान में ' ओमकार ' का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि ' ओऽम ' इस मंत्र के उच्चारण से विहीन वेदाध्ययन शनैः शनैः नष्ट हो जाता है विस्मृत हो जाता है। * ''एतयर्चा विसंयुक्तः काले न क्रियया स्वया। : ''ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां जाति साधुषु ॥ : इस गायत्री महामन्त्र के जप से और अपने सदाचारादि कर्तव्यों से विरहित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सज्जनों में निन्दा को प्राप्त करता है। * ''योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः। : ''स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूत खमूर्तिमान् ॥ : जो द्विज आलस्य छोड़कर प्रतिदिन प्रणय और व्यहतियों के साथ गायत्री-महामन्त्र का तीन वर्षपर्यन्त जप करता है, वह इस मन्त्र के प्रभाव से अपना गायत्री मन्त्रमय परमात्मा के अनुग्रह से आकाशरूप होकर सच्चिदानन्दस्वरूप पर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। === राजा एवं राज्य === *''अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । : ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनु० ७।३ ॥ : अर्थात् बिना राजा के इस लोक में सब ओर अराजकता फैल जायेगी, जिसके कारण सब लोग सब ओर से भय को प्राप्त होंगे (इस स्थिति का आज हम पर्याप्त मात्रा में अनुभव कर रहे हैं !) । इन सबकी रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा को बनाया । अर्थात् राजा का प्रमुख [[धर्म]] प्रजा की रक्षा करना है । * ''इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । : ''चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ मनु० ७।४ ॥ : ईश्वर ने जो राजा की सृष्टि की (उपर्युक्त श्लोक में), उसमें इन्द्र, अनिल = वायु, यम, अर्क (= सूर्य), अग्नि, वरुण, चन्द्र और वित्तेश (= कुबेर) के शाश्वत् अंश, अर्थात् उनके मुख्य, सार-रूप अंश होने चाहिए । अर्थात् राजा में इन दैवी शक्तियों के मुख्य गुण पाए जाने चाहिए । * ''वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति । : ''तथाभिवर्षेत् स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ मनु० ९।३०४ ॥ : जिस प्रकार इन्द्र, या प्रकृति की वृष्टि-शक्ति, वर्ष में चार माह वर्षा करके सबको तृप्त कर देता है, वैसे ही राजा को अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि-शान्ति-उन्नति की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहिए । उसको अपनी प्रजा को ऐश्वर्य-युक्त करना चाहिए । यह उसका '''इन्द्रव्रत''' कहलाता है । * ''अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः । : ''तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ मनु० ९।३०५ ॥ : जिस प्रकार शेष आठ मास सूर्य, अपनी किरणों के द्वारा, सब वस्तुओं में से जल हरता रहता है, उसी प्रकार राजा भी, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, नित्य कर की वसूली करे । यह उसका '''अर्कव्रत''' होता है । * ''प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः । : ''तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ मनु० ९।३०६ ॥ : जिस प्रकार वायु सब वस्तुओं में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा अपनी राष्ट्र के हर भाग में प्रवेश करके, वहां की सूचना रखनी चाहिए । यह उसका '''मारुतव्रत''' कहलाता है । जो राजा अपनी प्रजा के अनकहे दुःख-दर्द नहीं जानेगा, और उनका समाधान नहीं करेगा, वह आगे जाकर स्वयं अपने पद से च्युत होगा । * ''यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति । : ''*तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतं ॥ मनु० ९।३०७ ॥ : जिस प्रकार यम, अर्थात् परमात्मा का नियन्त्रक स्वरूप, समय आने पर कर्मानुसार सब को प्रिय या अप्रिय कर्मफल देकर नियन्त्रित करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा को दण्ड और लाभ देकर नियन्त्रण में रखना चाहिए । यह उसका '''यमव्रत''' होता है । * ''वरुणेन यथा पाशैर्बद्धः एवाभिदृश्यते । : ''तथा पापान् निगृह्णीयाद्व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ मनु० ९।३०८ ॥ : जिस प्रकार मनुष्य पानी के भँवर में वरुण द्वारा जाल में बांधा हुआ सा दीखता है, उसी प्रकार राजा को पापियों को कारागार के बन्धन में डालना चाहिए, जिससे अन्य प्रजा भय-रहित होकर रह सके । यह उसका '''वारुणव्रत''' होता है । * ''परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः । : ''तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ मनु० ९।३०९ ॥ : जिस प्रकार पूरे चाँद को देखकर मानव हर्ष करते हैं, वैसी ही प्रकृति राजा की होनी चाहिए । अर्थात् राजा की आर्थिक व नैयायिक व्यवस्था से सन्तुष्ट जन उसको देखकर आह्लादित होने चाहिए । वही राजा '''चान्द्रव्रतिक''' कहलाता है । * ''प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु । : ''दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतं ॥ मनु० ९।३१० ॥ : जिस प्रकार अग्नि शाक, धातु, आदि के दोषों को जला देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह पापकर्मों में प्रतापी और तेजस्वी हो, अर्थात् स्वयं भयभीत न हो, अपितु पापी को भय दिलाए, और दुष्ट मन्त्री, अधिकारी तक को भी कठोर दण्ड दे । राजा के प्रतिनिधि ही यदि अत्याचार करेंगे, तो प्रजा में न्यायव्यवस्था स्थापित ही नहीं हो सकती । यह राजा का '''आग्नेयव्रत''' होता है । * ''यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् । : ''तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतं ॥ मनु० ९।३११ ॥ : जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को, बिना भेद-भाव के, समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार राजा को सारी प्रजा का पक्षपात-रहित होकर पालन-पोषण करना चाहिए । यह उसका '''पार्थिव व्रत''' कहलाता है । * ''एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः । : ''स्तेनान् राजा निगृह्णीयात् स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ मनु० ९।३१२ ॥ : ऊपर दिए सारे व्रतों के द्वारा और अन्य उपायों के द्वारा भी, आलस-रहित होकर, राजा सर्वदा अपने राष्ट्र और दूसरे देशों से आए हुए घुसपैठी चोरों को अपने वश में रखे । किसी भी प्रकार की हानि से, हर सम्भव उपाय के द्वारा, प्रजा और राष्ट्र को राजा बचाए । * ''वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगो यथा यथा । : ''तथा तथा दमः कार्यो हिंसायामिति धारणा ॥ मनु० ८.२८५ ॥ : वृक्ष आदि सब पौधों के फल, फूल, पत्ता तथा लकड़ी आदि के द्वारा जैसा-जैसा उपयोग होता हो, उनको (काटने आदि से) नष्ट करने वाले अपराधी को वैसा-वैसा ही दण्ड देना चाहिए, ऐसा शास्त्रनिर्णय है। === नारी === * ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। : ''यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥" : जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती, (उनका सम्मान नही होता) वहाँ किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं। * ''शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । : ''न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥'' -- मनुस्मृति ३/५७ : जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।) * ''स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्। : ''विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ॥ (मनुस्मृति-२.२४०) : स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सबसे (सब देशों तथा सब मनुष्यों से) ग्रहण करें। * ''वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृत। : ''पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ : नारियों का पाणि-ग्रहण संस्कार ही गृहम सूत्रों में कहा गया संस्कार है। निष्ठापूर्वक पतिसेवा ही गुरूकूल में निवास है। गृहकार्य को कुशलता से करना ही यज्ञ का अनुष्ठान है। === गृहस्थ === * ''यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम् । : ''गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥'' -- मनुस्मृतिः ३।७८ ॥ : क्योंकि बाकी तीनों ही आश्रमी गृहस्थ से प्रतिदिन अन्न, वस्त्रादि, दान प्राप्त करते हैं, इसलिए वस्तुतः गृहस्थी ही उनको धारण करता है । इस कारण से, गृहस्थाश्रम ही सबमें बड़ा है । * ''दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥'' -- मनु० ३।७५ ॥ : गृहस्थ देवयज्ञ के द्वारा सारे चराचर जगत् का भरण करता है । === भारत या आर्यावर्त === * ''आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्। : ''तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्त विदुर्बुधाः ॥ : पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में जो प्रदेश ( भू-भाग ) विराजमान है, उसे विद्वान् पुरुष ' आर्यावर्त ' नाम से जानते हैं। * ''एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। : ''स्वं स्त्रं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ : ऋषि संसार के मनुष्यों को सम्बोधित करते हैं कि भूतल के सम्पूर्ण मनुष्यों की ब्रह्मावर्त देश में उत्पन्न ज्ञान साधनारत ब्राह्मण के चरित्र से अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। === विविध === * ''अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः । : ''अज्ञं हि बालं इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ।। : जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता है, और जो मन्त्रद (अर्थात् दूसरे को विचार देने वाला) है वह पिता है, क्यों कि अज्ञानी को ही बालक कहा गया है और मन्त्रद को पिता कहा गया है। * '' वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । : '' तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥'' मनु० ४।१४७ ॥ : जितना समय मिले, उतना समय, बिना आलस्य किए, नित्य वेदाभ्यास करना चाहिए क्योंकि वही परम धर्म है; अन्य सभी धर्म उपधर्म ही हैं । * '' सर्वान् परित्यजेतर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः । : ''यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥'' मनु० ४।१७ ॥ : जो भी कार्य स्वाध्याय के विरोधी हैं, उन सभी को छोड़ता जाए, और किस भी तरह थोड़ा पढ़ाए, क्योंकि स्वाध्याय की कृतकृत्यता इसी में है । * ''दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम् । : ''परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥'' -- मनु० ४।२२७ ॥ : अर्थात् सुखी होकर (वस्तु से मोह पूर्णतया हटाते हुए), गृहस्थ को नित्य यथाशक्ति ऐष्टिक और पौर्तिक कार्यों के लिये पात्र को ढूढ़ कर उसको दान देना चाहिए । ( ऐष्टिक = यज्ञों का आयोजन, और पौर्तिक = रुग्णालय, पाठशाला, आदि बनवाना)। (पात्र का योग्य होना बहुत ही आवश्यक है । गलत पात्र को देने से पुण्य तो क्या, केवल पाप का ही अर्जन होता है।) * ''त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यर्जितं धनम् । : ''दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥'' -- मनु० ४।१९३ ॥ : तीन प्रकार के गलत पात्रों को देने से, धर्मानुसार अर्जित धन भी, दाता के लिए इसी जन्म में अनर्थ का कारण बन जाता है, और दान लेने वाले के लिए परजन्म में दुःख पहुंचाता है । * '' सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । : '' एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥'' -- मनु० ४।१६० ॥ * '' सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । : '' सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥'' -- मनु० ४।१२ ॥ : परम सन्तोष में स्थित हो, सुख चाहने वाला इच्छाओं को वश में रखे, क्योंकि सन्तोष ही सुख का मूल है, और असन्तोष दुःख का जनक है । * '' नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । : '' आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥'' -- मनु० ४।१३७ ॥ : यदि अनेक प्रयासों के बाद भी हम दीन बने रहें, तब भी हमें अपनी अवस्था के लिए अपने को दोष नहीं देना चाहिए, और श्री की प्राप्ति को कभी भी दुर्लभ न समझते हुए, मृत्यु-पर्यन्त प्रयत्न करते ही रहना चाहिए। * '' नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । : '' द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत ॥'' मनु० ४।१६३ ॥ : हमें नास्तिक, वेदों की निन्दा करने वाला, विद्वानों की निन्दा करने वाला, द्वेष, कुटिल, अभिमान, क्रोध या कटाक्ष करने वाला - नहीं होना चाहिए । * ''दृढकारो मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । : ''अहिंस्रो दमदानभ्यां जयेत् स्वर्गं तथाव्रतः ॥'' -- मनु० ४।२४६ ॥ : हमें क्या-क्या होना चाहिए, इस विषय में कहते हैं – सदा धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए, सबों से कोमल व्यवहार करना चाहिए, क्रूरों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए, स्वयं अहिंसक होना चाहिए, जितेन्द्रिय और दानशील होना चाहिए । * ''अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कहिंचित्। : ''यद्यद्धि कुरुते किञ्चितत्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥ : इस जगत् में कभी भी बिना इच्छा के कोई भी क्रिया या कर्म सम्पन्न होता दिखाई नहीं देता है, क्योंकि मनुष्य जो जो कर्म करता है, वह कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा का परिणाम है-ऐसा मानना चाहिये। * ''यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। : ''स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ : मनु ने जिन सम्पूर्ण चारों वर्गों के गुणस्वभावादि धर्मों का उल्लेख किया है। वे सब वेदों में कहे गये है, क्योंकि भगवान मनु समस्त वेदों के अर्थ ज्ञाता है। * ''नोच्छिप्टं कस्यचिद्दद्यान्नद्याच्चैव तथाऽन्तरा। : ''न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिप्टः क्वचित् व्रजेत् ॥ : किसी को जूठा भोजन नहीं देना चाहिए। प्रातः और सायंकाल के भोजन के अतिरिक्त बीच में भोजन नहीं करना चाहिए अत्यधिक भोजन नहीं लेना चाहिए। कहीं भी जूठे मुँह नहीं जाना चाहिए। * ''एकादशं मनोज्ञयं स्वगुणेनोभयात्मकम्। : ''यस्मिजिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ॥ : मन अपने गुणों के प्रभाव से ग्यारहवीं उभयात्मक ( दोनों ही ) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय भी है। इसीलिए मन के जीत लेने पर ये दोनों ज्ञान व कर्मेन्द्रियाँ स्वमेव विजित हो जाती है। * ''वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। : ''न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित्॥ : दूषित हृदय वाले व्यक्ति का वेदाध्ययन, त्याग, यज्ञादि का अनुष्ठान, यम-नियमों का पालन, अभ्यास ये कभी सिद्धि प्राप्त नहीं करते हैं। * ''आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः। : ''आप्तः शक्तोऽर्थदः साधुः स्वोऽध्याप्या दश धर्मत ॥ : कौन-कौन शिक्षा देने योग्य हैं? इस सम्बन्ध में कहते हैं कि आचार्य का पुत्र, सेवापरायण, अन्य विषय की शिक्षा या गुरू को व्यवहार के सम्बन्ध में परामर्श देने वाला, धर्मतत्पर, पवित्र मन वाला, श्रेष्ठ, सत्यवादी, पाठ को धारण करने में समर्थ, धन देने वाला, सज्जन और स्वजातीय में दश ही गुरु के द्वारा धर्मानुसार अध्यापन योग्य हैं। * ''नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः। : ''जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥ : बुद्धिमान मनुष्य को यह उचित है कि वह श्रद्धापूवक प्रश्न न करने वाले को अथवा अन्याय के साथ पूछने वाले को उत्तर न दे। वह जानकार होते हुए भी जड़ या मूर्ख की भाँति आचरण करें। * ''फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। : ''न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥ (६.६७) : रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है। *'' बलाद्दत्तं बलाद् भुक्त बलाद्यच्चापि लेखितम् । : ''सर्वान्बल कृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् ॥ : बलात्कार से जो नहीं देने योग्य वस्तु दी गई है, जो भूमि, भूषणादि भोगा गया हो, ऋण लेने या ब्याज सम्बन्धी लेख लिखवाया गया हो, बलात् किये गये ये सभी कार्य अमान्य हैं (ऐसा मनु कहते हैं )। * चुगली, साहस कर्म, द्रोह, ईर्ष्या , असूया, अर्थदूषण, कठोर वचन और क्रूरता - ये आठ क्रोधजन्य व्यसन हैं। (7.48) * विद्वानों ने दोनों प्रकार के व्यसनों का मूल लोभ कहा है। उस लोभ को प्रयत्न से जीतें। (7.49) * काम जन्य व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्री सहवास व शिकार यथाक्रम अत्यन्त दुखदायी है। (7.50) * मृत्यु और व्यसन में व्यसन ही विशेष कष्टप्रद है क्योकि व्यसनी पुरुष निरन्तर नीचे गिरता जाता है तथा अव्यसनी स्वर्ग प्राप्त करता है। (7.53) * सुसाध्य कर्म भी कोई केवल अकेले नहीं कर सकता है फिर महान फल वाले राजकाज को सहायकों से रहित राजा अकेला कैसे चला सकता है। (7.55) * राजा को चाहिए की मंत्रियों में जो शूर, दक्ष, श्रेस्ठ कुल वाले सदाचारी हों उन्हें खान एवम अन्न भंडार आदि पर नियुक्त करे तथा भीरु स्वभाव का पुरुषों को अन्तःपुर के सामान्य कार्यों पर लगाए। (7.62) * चेष्ठा से मनोभाव समझने वाले पवित्र, चतुर तथा कुलीन पुरुष को दूत नियुक्त करे। (7.64) * यह निश्चय जानिए कि जैसे अग्नि में ईंधन और घी डालने से अग्नि की ज्वाला और अधिक बढ़ जाती है, वैसे ही कामों के उपभोग से कभी भी काम शांत नहीं होता है बल्कि निरंतर बढ़ता ही जाता है। * शुद्धाचरण से, चरित्रवान बनने से, स्त्री. पुरुष निश्चित रूप से दीर्घायु प्राप्त करते हैं। * सब दानों में ब्रह्म (विद्या) का दान सबसे श्रेष्ठ है। * बिना हिंसा के मांस नहीं मिलता, हिंसा पाप है। अत: मांस खाना भी पाप है। * चोरी करने वाले के हाथ काट दो। दुष्ट कर्म करने वाले की आँख निकाल दो। व्यभिचारी पुरुष को गर्म-गर्म विशाल तवे पर डाल कर मार दो। * व्यभिचारिणी स्त्री को कुत्ते से नुचवा कर मरवा दो। यह दण्ड दुष्टों को सार्वजनिक स्थान पर दिया जाए जिससे कि अधिकाधिक लोग देख कर शिक्षा ग्रहण करें और भय के कारण स्वप्न में भी कभी पाप करने का विचार न करें। * न्याययुत दंड का नाम ‘राजा’ और ‘धर्म’ है। यदि दण्ड नहीं तो राजा का कोई औचित्य नहीं। यदि दण्ड नहीं तो धर्म का भी कोई आधार नहीं। * शरीर जल से साफ होता है, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा धर्म से साफ होती है। * क्रूर स्वभाव का परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। * उचित रीति से स्त्री की रक्षा करने से अपने कुल, संतान, आत्मा व धर्म की रक्षा होती है। * पति-पत्नी को इस विधि से जीवन व्यतीत करना चाहिए कि जिसमें परस्पर मरणपर्यन्त वियोग न हो। * स्त्रियाँ सन्तान को जन्म देती हैं। वे घर का सौभाग्य हैं, वे पूजा के योग्य हैं, वे घर की चिराग (गृह दीप्ति) हैं। * कन्या विवाह योग्य होने पर भी मरणपर्यन्त घर में बैठी रहे परंतु उस कन्या का कभी गुणहीन पुरुष को दान न करें। * जिस कुल या परिवार में स्त्रियाँ कष्ट प्राप्त करती हैं, उन्हें पीड़ित किया जाता है, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जहाँ वे कष्ट या दुख को प्राप्त नहीं होती, वह कुल, परिवार सदा वृद्धि को प्राप्त करता है। * गृहस्थाश्रम के आश्रम ही अन्य तीन आश्रमों के पालन-पोषण आदि की व्यवस्था की जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम सबसे बड़ा आश्रम है। * सन्तानों को जन्म देना, जन्मे हुओं का पालन-पोषण – ये महत्तम कार्य नारी के ही हैं। दैनिक लोकव्यवहार रूपी कार्यों का प्रत्यक्ष मुख्य आधार नारी ही है। * अध्ययन नहीं करने से, आचार का पालन नहीं करने से, आलस्य और अन्य दोषों के कारण असमय मृत्यु होती है। * जहाँ सब एक हैं, वहाँ सब कुछ अपने आप खिंच कर चला आता है। एकता सर्वदात्री है। * दान लेने का पात्र होने पर भी बार-बार दान न लें क्योंकि उससे ब्रह्म तेज नष्ट हो जाता है। * अध्ययन, तप, ज्ञान पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह और ‘आत्म-चिंतन ‘- ये सब सात्त्विक गुण के लक्षण हैं। * ब्रह्मचारी को चाहिए कि अखण्डित ब्रह्मचर्य तथा अपनी कुल परम्परा का पालन करते हुए तीनों वेदों अथवा दो वेदों या एक वेद का पूर्ण अध्ययन समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे। * प्रात:काल उठ कर राजा तीनों वेदों में कुशल वृद्ध विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हो और उनके निर्देशों के अनुसार राज्य का कार्य संचालन करें। * मनुष्यों को ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद के अतिरिक्त अन्य विविध मंत्रों को जानना चाहिए। ये जीवों के लिए कल्याणपरक होते हैं। जो इन तीन वेदों को भली-भांति जानता है, वही वेदवेत्ता कहलाता है। * देश, धर्म, शील व संस्कृति की हिंसा करने वाले को मारने में कोई पाप नहीं है। == मनु और मनुस्मृति के बारे में उद्धरण == * मनुस्मृति, सृष्टि के प्रथम राजा मनु द्वारा रचित प्रथम संविधान है। -- [[स्वामी दयानन्द सरस्वती]] * मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। -- लुई जैकोलिऑट (Louis Jacolliot), बाइबल इन इण्डिया' नामक ग्रन्थ में <ref>V. Krishna Rao. Expansion of Cultural Imperalism Through Globalisation. Manak Publications. p. 82.</ref> * [[बाइबल]] को बन्द करो और मनुस्मृति को खोलो। इसमें जीवन की सकारात्मक छबि है। -- जर्मनी के महान दार्शनिक [[फ्रेडरिक नीत्से|फ्रेदरिक नीत्से]] (Friedrich Nietzsche) * मनुस्मृति भारत में जातिवाद के लिये उत्तरदायी है। -- [[भीमराव आम्बेडकर]] * यद्यपि जातिगत भेदभाव आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास के लिये हानिकारक है, जातिवाद का हिन्दू धर्म और मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह ग्रन्थ व्यवसायों की भिन्नता और विविधता के महत्व को प्रतिपादित करता है। यह किसी के अधिकार की परिभाषा नहीं करता बल्कि उनके कर्तव्यों की परिभाषा करता है। सभी कार्य, चाहे वे शिक्षण के हों या सफाई के, समान रूप से आवश्यक हैं और उनका स्थान भी बराबरी का है। मैं चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ को सम्पूर्णतः पढ़ना चाहिए लेकिन उन भागों को नहीं मानन चहिये जो सत्य और [[अहिंसा]] से मेल न खाते हों। -- [[महात्मा गांधी]] * मनु और अन्य ऋषियों की संहिताएं, कर्म-कांड में निर्धारित श्लोकों का पालन करते हुए, मुख्य रूप से समय, स्थान और व्यक्तियों की आवश्यकताओं के अनुसार सामाजिक कल्याण के लिए अनुकूल आचरण के नियम निर्धारित करती हैं। -- [[एनी बेसेन्ट]] ==इन्हें भी देखें== * [[धर्म]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} 75sennocsjcjgx4mxn7lfvdop54kr2q 33313 33312 2026-10-04T08:08:28Z अनुनाद सिंह 658 /* राजा एवं राज्य */ 33313 wikitext text/x-wiki '''[[:w:मनुस्मृति|मनुस्मृति]]''' [[हिन्दू धर्म]] का एक [[:w:स्मृति|स्मृतिग्रन्थ]] है जिसकी रचना मनु ने की थी। == उद्धरण == === धर्म === * ''धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: । : ''धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥'' -- ६।९२ : धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (साफ-सफाई), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) – ये [[धर्म]] के दश लक्षण हैं । * ''आचारः परमो धर्मः'' ॥ '' -- मनुस्मृति: १।१०८ ॥ : आचरण ही परम धर्म है। * ''वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विराम्। : ''आचारश्चैव साधूनामात्मस्तुष्टिरेव च ॥ : सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय, वेदज्ञाताओं मनु आदि के स्मृति ग्रन्थ तथा उनका शिष्ट व्यवहार, महापुरुषों के सत्याचरण, अपने मन की प्रसन्नता-ये सभी धर्म के प्रमाण रूप में ग्रहण करने चाहिए। * ''श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिठन् हि मानवः। : ''इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम॥ : मनुष्य वेदों व स्मृतियों में कहे गये धर्म का सेवन करते हुए संसार में निर्मल कीर्ति प्राप्त करता है तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में परमानन्द को अधिगत कर लेता है। * ''योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः। : ''स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः॥ : जो कोई विद्वान द्विज धर्म की मूलाधार श्रुतियों एवं स्मृतियों की निन्दा या अपमान करे तो सत्पुरुषों को उस वेद निन्दक अधम व्यक्ति को समस्त श्रेष्ठ कर्मों से अलग कर देना चाहिए। * ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । : ''प्रियं च नानृतं च ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥ ४।१३८ ॥ : सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगाने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है । === वर्ण-व्यवस्था === * ''सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः । : ''मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत् ॥'' -- मनुस्मृति (१- ८७ ) : भावार्थ - इस सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिये उस अत्यन्त कान्तियुक्त ( सृष्टिकर्ता) ने अपने मुख, भुजा, जंघाए, तथा पैरों से उत्पन्न किये हुए (क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र ) के लिये अलग-अलग कर्मों की रचना की। * ''अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। : ''षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च॥'' (मनुस्मृति ८.३३७) : ''ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्। : ''द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ॥ (मनुस्मृति ८.३३८) : चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। (अर्थात् जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। ) * ''सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव। : ''अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥'' (मनुस्मृति-२.१६२) : ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो। * ''शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। : ''क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥'' (मनुस्मृति-१०.६५) : शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है। === संस्कार === * ''वैदिकेः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम्। : ''कार्यः शरीरसंस्कार : पावनः प्रेत्य चेह च ॥ : भृगु ऋषि निर्देश देते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्गों के पवित्र वैदिक मन्त्रों द्वारा इस लोक में तथा मृत्यु पश्चात् सम्पूर्ण शारीरिक गर्भाधानादि संस्कार अवश्य करने चाहिए। * ''प्राड्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते। : ''मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरभ्यमधुसर्पिषाम ॥ : इस श्लोक में नवजात बालकों का जातकर्म संस्कार का विधान बताया जाता है। यथा नाल काटने से पूर्व नवजात शिशु का जातकर्म संस्कार सम्पन्न होता है। इस समय स्वर्ण को सलाई से घृत, मधुमिश्रित प्राशन किया जाता है। अर्थात् बालक का पिता मन्त्र-उच्चारण पूर्वक बच्चे को मधु और घी चटाता है और बच्चे की जीभ पर ' ओउम् ' लिखता है। * ''माडुल्य ब्राह्मणस्य त्र्याक्षत्रियस्य बलान्वितम्। : ''वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ : ब्राह्मण शिशु का नाम मांगलिक, क्षत्रिय शिशु का नाम बल युक्त, वैश्य के बालक का नाम समृद्धि सूचक तथा शुद्ध के बच्चे का नाम निन्दनीय होना चाहिये। * ''चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्कमणं गृहात्। : ''षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मलं कुले ॥ : चतुर्थ मास में बालकों को घर से बाहर निकालना चाहिये। छठेमास में दाल-भात आदि सुपाच्य आहार देना चाहिये। अथवा कुल के अनुसार मांगलिक सभी आचार सम्पादित करने चाहिये। * ''गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वोत ब्राह्मणस्योपनायनम्। : ''गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तुं द्वादशे विशः ॥ : ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के शिशु का गर्भ से बारहवें वर्ष में सम्पन्न कराना चाहिये। * ''अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः। : ''सावित्रीपतिताः व्रत्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ : पूर्वोक्त समय के बाद ये तीनों ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य वर्ण समुचित समय में जिनका उपनयन संस्कार सम्पादित नहीं हुआ है गायत्री मन्त्र के अधिकार से वंचित अतः पतित एवं शिष्टों द्वारा निन्दनीय शूद्रत्व के प्राप्त कर लेते हैं। * ''कार्ष्णंरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः। : ''वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ : यहाँ भृगुऋषि तीनों वर्गों के ब्रह्मचारियों के लिए धारणा करने योग्य वस्त्रों का विधान बतलाते हैं। ब्राह्मण आदि वर्गों के ब्रह्मचारी क्रमशः कृष्णमृग, रूरूमृग तथा बकरे के चमड़े की धोती एवं कौपीन के स्थान पर धारण करें, और सन, रेशम और भेड़ के बाल अर्थात् ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करें। * ''केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणत। : ''ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ : अब ऋषि ब्रहाचारियों के धारण योग्य दण्ड का मान बताते हैं। धर्मशास्त्र के प्रमाणानुसार ब्राहाण अपने सिर के केशों तक, क्षत्रिय मस्तक पर्यन्त और वैश्य नाक पर्यन्त परिमाण अनुवाद ( लम्बाई ) वाले दण्ड को धारण करे। * ''प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्। : ''प्रदक्षिणं परीत्याग्नि चरेद् भैक्षं यथाविधि ॥ : ब्राह्मणादि वर्गों के ब्रह्मचारियों को शास्त्र के नियमानुसार अपने इष्ट दण्ड को ग्रहण कर सूर्य का उपस्थान कर, अग्नि को प्रदक्षिणा कर भिक्षाचरण करना चाहिए। * ''मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनी निजाम्। : ''भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ : ब्रह्मचारी को सबसे पहले अपनी माता, अपनी बहिन, तथा मौसी से भिक्षा की याचना करनी चाहिए और उन्हें भी किसी प्रकार ब्रह्मचारी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। * ''उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः। : ''भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत ॥ : ब्रह्मचारी तथा गृहस्थद्विज भी एकाग्रचित हो आचमन कर जल से आचमन करे तथा इन्द्रियों, आँख, नाक तथा कानों के छिन्द्रो को भी जल स्पर्श करे। * ''ब्राह्मण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत्। : ''कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन॥ : विप्र को सदा ब्राह्म नामक तीर्थ से अथवा प्राजापत्य और दैवतीर्थों से आचमन करना चाहिए, पितृतीर्थ द्वारा तो कभी भी आजमन नहीं करना चाहिए। * ''अष्ठमूलस्य तले बाह्य तीर्थ प्रचक्षते। : ''कायम लिमूलेऽगे दैवं पियं तयोरधः ॥ : हाथ के अंगूठे के पास ब्राह्म तीर्थ, कनिष्ठिका अंगुली के मूल के पास 'प्रजापति' तीर्थ, अंगुलियों के आगे 'दैवतीर्थ' और अंगूठे तथा प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के मध्य पितृतीर्थ होता है। * ''मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम्। : ''अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ : ब्रह्मचारी के यदि मेखला, मृग चर्म, पालाशादि से बना हुआ दण्ड, यज्ञोपवीत, कमण्डलु-ये नष्ट हो गये हों तो इन्हें जल में फेंककर अन्य नवीन मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहण कर लेने चाहिए। * ''अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः। : ''ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लधुवासा जितेन्द्रियः ॥ : विद्याध्यन के लिये उद्यत, आचमन किया हुआ, ब्रह्मान्जलि से युक्त, अल्प और हलके वस्त्र धारण करने वाला, इन्द्रियजयी शिष्य ही शास्त्रानुसार अध्यापन के योग्य है। * ''ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा। : ''स्रवत्यनोड्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्चविशीर्यति ॥ : वेद-विधा के अध्ययन की विधि बतलाई जाती है। ब्रह्मचारी को सदा अपने गुरूचरणों में वेदाध्ययन के पूर्व और अवसान में ' ओमकार ' का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि ' ओऽम ' इस मंत्र के उच्चारण से विहीन वेदाध्ययन शनैः शनैः नष्ट हो जाता है विस्मृत हो जाता है। * ''एतयर्चा विसंयुक्तः काले न क्रियया स्वया। : ''ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां जाति साधुषु ॥ : इस गायत्री महामन्त्र के जप से और अपने सदाचारादि कर्तव्यों से विरहित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सज्जनों में निन्दा को प्राप्त करता है। * ''योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः। : ''स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूत खमूर्तिमान् ॥ : जो द्विज आलस्य छोड़कर प्रतिदिन प्रणय और व्यहतियों के साथ गायत्री-महामन्त्र का तीन वर्षपर्यन्त जप करता है, वह इस मन्त्र के प्रभाव से अपना गायत्री मन्त्रमय परमात्मा के अनुग्रह से आकाशरूप होकर सच्चिदानन्दस्वरूप पर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। === राजा एवं राज्य === *''अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । : ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनु० ७।३ ॥ : अर्थात् बिना राजा के इस लोक में सब ओर अराजकता फैल जायेगी, जिसके कारण सब लोग सब ओर से भय को प्राप्त होंगे (इस स्थिति का आज हम पर्याप्त मात्रा में अनुभव कर रहे हैं !) । इन सबकी रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा को बनाया । अर्थात् राजा का प्रमुख [[धर्म]] प्रजा की रक्षा करना है । * ''इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । : ''चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ मनु० ७।४ ॥ : ईश्वर ने जो राजा की सृष्टि की (उपर्युक्त श्लोक में), उसमें इन्द्र, अनिल = वायु, यम, अर्क (= सूर्य), अग्नि, वरुण, चन्द्र और वित्तेश (= कुबेर) के शाश्वत् अंश, अर्थात् उनके मुख्य, सार-रूप अंश होने चाहिए । अर्थात् राजा में इन दैवी शक्तियों के मुख्य गुण पाए जाने चाहिए । * ''वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति । : ''तथाभिवर्षेत् स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ मनु० ९।३०४ ॥ : जिस प्रकार इन्द्र, या प्रकृति की वृष्टि-शक्ति, वर्ष में चार माह वर्षा करके सबको तृप्त कर देता है, वैसे ही राजा को अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि-शान्ति-उन्नति की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहिए । उसको अपनी प्रजा को ऐश्वर्य-युक्त करना चाहिए । यह उसका '''इन्द्रव्रत''' कहलाता है । * ''अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः । : ''तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ मनु० ९।३०५ ॥ : जिस प्रकार शेष आठ मास सूर्य, अपनी किरणों के द्वारा, सब वस्तुओं में से जल हरता रहता है, उसी प्रकार राजा भी, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, नित्य कर की वसूली करे । यह उसका '''अर्कव्रत''' होता है । * ''प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः । : ''तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ मनु० ९।३०६ ॥ : जिस प्रकार वायु सब वस्तुओं में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा अपनी राष्ट्र के हर भाग में प्रवेश करके, वहां की सूचना रखनी चाहिए । यह उसका '''मारुतव्रत''' कहलाता है । जो राजा अपनी प्रजा के अनकहे दुःख-दर्द नहीं जानेगा, और उनका समाधान नहीं करेगा, वह आगे जाकर स्वयं अपने पद से च्युत होगा । * ''यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति । : ''*तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतं ॥ मनु० ९।३०७ ॥ : जिस प्रकार यम, अर्थात् परमात्मा का नियन्त्रक स्वरूप, समय आने पर कर्मानुसार सब को प्रिय या अप्रिय कर्मफल देकर नियन्त्रित करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा को दण्ड और लाभ देकर नियन्त्रण में रखना चाहिए । यह उसका '''यमव्रत''' होता है । * ''वरुणेन यथा पाशैर्बद्धः एवाभिदृश्यते । : ''तथा पापान् निगृह्णीयाद्व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ मनु० ९।३०८ ॥ : जिस प्रकार मनुष्य पानी के भँवर में वरुण द्वारा जाल में बांधा हुआ सा दीखता है, उसी प्रकार राजा को पापियों को कारागार के बन्धन में डालना चाहिए, जिससे अन्य प्रजा भय-रहित होकर रह सके । यह उसका '''वारुणव्रत''' होता है । * ''परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः । : ''तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ मनु० ९।३०९ ॥ : जिस प्रकार पूरे चाँद को देखकर मानव हर्ष करते हैं, वैसी ही प्रकृति राजा की होनी चाहिए । अर्थात् राजा की आर्थिक व नैयायिक व्यवस्था से सन्तुष्ट जन उसको देखकर आह्लादित होने चाहिए । वही राजा '''चान्द्रव्रतिक''' कहलाता है । * ''प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु । : ''दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतं ॥ मनु० ९।३१० ॥ : जिस प्रकार अग्नि शाक, धातु, आदि के दोषों को जला देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह पापकर्मों में प्रतापी और तेजस्वी हो, अर्थात् स्वयं भयभीत न हो, अपितु पापी को भय दिलाए, और दुष्ट मन्त्री, अधिकारी तक को भी कठोर दण्ड दे । राजा के प्रतिनिधि ही यदि अत्याचार करेंगे, तो प्रजा में न्यायव्यवस्था स्थापित ही नहीं हो सकती । यह राजा का '''आग्नेयव्रत''' होता है । * ''यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् । : ''तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतं ॥ मनु० ९।३११ ॥ : जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को, बिना भेद-भाव के, समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार राजा को सारी प्रजा का पक्षपात-रहित होकर पालन-पोषण करना चाहिए । यह उसका '''पार्थिव व्रत''' कहलाता है । * ''एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः । : ''स्तेनान् राजा निगृह्णीयात् स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ मनु० ९।३१२ ॥ : ऊपर दिए सारे व्रतों के द्वारा और अन्य उपायों के द्वारा भी, आलस-रहित होकर, राजा सर्वदा अपने राष्ट्र और दूसरे देशों से आए हुए घुसपैठी चोरों को अपने वश में रखे । किसी भी प्रकार की हानि से, हर सम्भव उपाय के द्वारा, प्रजा और राष्ट्र को राजा बचाए । * ''वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगो यथा यथा । : ''तथा तथा दमः कार्यो हिंसायामिति धारणा ॥ मनु० ८.२८५ ॥ : वृक्ष आदि सब पौधों के फल, फूल, पत्ता तथा लकड़ी आदि के द्वारा जैसा-जैसा उपयोग होता हो, उनको (काटने आदि से) नष्ट करने वाले अपराधी को वैसा-वैसा ही दण्ड देना चाहिए, ऐसा शास्त्रनिर्णय है।<ref>[https://enjoylearningsanskrit.com/scriptures/manu-smriti/chapter-8/?d=1&r=1&n=1&a=1&t=1&b=1&en=1&hi=0&es=0&he=0 Enjoy Learning Sanskrit]</ref> === नारी === * ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। : ''यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥" : जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती, (उनका सम्मान नही होता) वहाँ किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं। * ''शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । : ''न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥'' -- मनुस्मृति ३/५७ : जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।) * ''स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्। : ''विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ॥ (मनुस्मृति-२.२४०) : स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सबसे (सब देशों तथा सब मनुष्यों से) ग्रहण करें। * ''वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृत। : ''पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ : नारियों का पाणि-ग्रहण संस्कार ही गृहम सूत्रों में कहा गया संस्कार है। निष्ठापूर्वक पतिसेवा ही गुरूकूल में निवास है। गृहकार्य को कुशलता से करना ही यज्ञ का अनुष्ठान है। === गृहस्थ === * ''यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम् । : ''गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥'' -- मनुस्मृतिः ३।७८ ॥ : क्योंकि बाकी तीनों ही आश्रमी गृहस्थ से प्रतिदिन अन्न, वस्त्रादि, दान प्राप्त करते हैं, इसलिए वस्तुतः गृहस्थी ही उनको धारण करता है । इस कारण से, गृहस्थाश्रम ही सबमें बड़ा है । * ''दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥'' -- मनु० ३।७५ ॥ : गृहस्थ देवयज्ञ के द्वारा सारे चराचर जगत् का भरण करता है । === भारत या आर्यावर्त === * ''आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्। : ''तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्त विदुर्बुधाः ॥ : पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में जो प्रदेश ( भू-भाग ) विराजमान है, उसे विद्वान् पुरुष ' आर्यावर्त ' नाम से जानते हैं। * ''एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। : ''स्वं स्त्रं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ : ऋषि संसार के मनुष्यों को सम्बोधित करते हैं कि भूतल के सम्पूर्ण मनुष्यों की ब्रह्मावर्त देश में उत्पन्न ज्ञान साधनारत ब्राह्मण के चरित्र से अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। === विविध === * ''अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः । : ''अज्ञं हि बालं इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ।। : जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता है, और जो मन्त्रद (अर्थात् दूसरे को विचार देने वाला) है वह पिता है, क्यों कि अज्ञानी को ही बालक कहा गया है और मन्त्रद को पिता कहा गया है। * '' वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । : '' तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥'' मनु० ४।१४७ ॥ : जितना समय मिले, उतना समय, बिना आलस्य किए, नित्य वेदाभ्यास करना चाहिए क्योंकि वही परम धर्म है; अन्य सभी धर्म उपधर्म ही हैं । * '' सर्वान् परित्यजेतर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः । : ''यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥'' मनु० ४।१७ ॥ : जो भी कार्य स्वाध्याय के विरोधी हैं, उन सभी को छोड़ता जाए, और किस भी तरह थोड़ा पढ़ाए, क्योंकि स्वाध्याय की कृतकृत्यता इसी में है । * ''दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम् । : ''परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥'' -- मनु० ४।२२७ ॥ : अर्थात् सुखी होकर (वस्तु से मोह पूर्णतया हटाते हुए), गृहस्थ को नित्य यथाशक्ति ऐष्टिक और पौर्तिक कार्यों के लिये पात्र को ढूढ़ कर उसको दान देना चाहिए । ( ऐष्टिक = यज्ञों का आयोजन, और पौर्तिक = रुग्णालय, पाठशाला, आदि बनवाना)। (पात्र का योग्य होना बहुत ही आवश्यक है । गलत पात्र को देने से पुण्य तो क्या, केवल पाप का ही अर्जन होता है।) * ''त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यर्जितं धनम् । : ''दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥'' -- मनु० ४।१९३ ॥ : तीन प्रकार के गलत पात्रों को देने से, धर्मानुसार अर्जित धन भी, दाता के लिए इसी जन्म में अनर्थ का कारण बन जाता है, और दान लेने वाले के लिए परजन्म में दुःख पहुंचाता है । * '' सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । : '' एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥'' -- मनु० ४।१६० ॥ * '' सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । : '' सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥'' -- मनु० ४।१२ ॥ : परम सन्तोष में स्थित हो, सुख चाहने वाला इच्छाओं को वश में रखे, क्योंकि सन्तोष ही सुख का मूल है, और असन्तोष दुःख का जनक है । * '' नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । : '' आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥'' -- मनु० ४।१३७ ॥ : यदि अनेक प्रयासों के बाद भी हम दीन बने रहें, तब भी हमें अपनी अवस्था के लिए अपने को दोष नहीं देना चाहिए, और श्री की प्राप्ति को कभी भी दुर्लभ न समझते हुए, मृत्यु-पर्यन्त प्रयत्न करते ही रहना चाहिए। * '' नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । : '' द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत ॥'' मनु० ४।१६३ ॥ : हमें नास्तिक, वेदों की निन्दा करने वाला, विद्वानों की निन्दा करने वाला, द्वेष, कुटिल, अभिमान, क्रोध या कटाक्ष करने वाला - नहीं होना चाहिए । * ''दृढकारो मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । : ''अहिंस्रो दमदानभ्यां जयेत् स्वर्गं तथाव्रतः ॥'' -- मनु० ४।२४६ ॥ : हमें क्या-क्या होना चाहिए, इस विषय में कहते हैं – सदा धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए, सबों से कोमल व्यवहार करना चाहिए, क्रूरों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए, स्वयं अहिंसक होना चाहिए, जितेन्द्रिय और दानशील होना चाहिए । * ''अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कहिंचित्। : ''यद्यद्धि कुरुते किञ्चितत्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥ : इस जगत् में कभी भी बिना इच्छा के कोई भी क्रिया या कर्म सम्पन्न होता दिखाई नहीं देता है, क्योंकि मनुष्य जो जो कर्म करता है, वह कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा का परिणाम है-ऐसा मानना चाहिये। * ''यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। : ''स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ : मनु ने जिन सम्पूर्ण चारों वर्गों के गुणस्वभावादि धर्मों का उल्लेख किया है। वे सब वेदों में कहे गये है, क्योंकि भगवान मनु समस्त वेदों के अर्थ ज्ञाता है। * ''नोच्छिप्टं कस्यचिद्दद्यान्नद्याच्चैव तथाऽन्तरा। : ''न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिप्टः क्वचित् व्रजेत् ॥ : किसी को जूठा भोजन नहीं देना चाहिए। प्रातः और सायंकाल के भोजन के अतिरिक्त बीच में भोजन नहीं करना चाहिए अत्यधिक भोजन नहीं लेना चाहिए। कहीं भी जूठे मुँह नहीं जाना चाहिए। * ''एकादशं मनोज्ञयं स्वगुणेनोभयात्मकम्। : ''यस्मिजिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ॥ : मन अपने गुणों के प्रभाव से ग्यारहवीं उभयात्मक ( दोनों ही ) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय भी है। इसीलिए मन के जीत लेने पर ये दोनों ज्ञान व कर्मेन्द्रियाँ स्वमेव विजित हो जाती है। * ''वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। : ''न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित्॥ : दूषित हृदय वाले व्यक्ति का वेदाध्ययन, त्याग, यज्ञादि का अनुष्ठान, यम-नियमों का पालन, अभ्यास ये कभी सिद्धि प्राप्त नहीं करते हैं। * ''आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः। : ''आप्तः शक्तोऽर्थदः साधुः स्वोऽध्याप्या दश धर्मत ॥ : कौन-कौन शिक्षा देने योग्य हैं? इस सम्बन्ध में कहते हैं कि आचार्य का पुत्र, सेवापरायण, अन्य विषय की शिक्षा या गुरू को व्यवहार के सम्बन्ध में परामर्श देने वाला, धर्मतत्पर, पवित्र मन वाला, श्रेष्ठ, सत्यवादी, पाठ को धारण करने में समर्थ, धन देने वाला, सज्जन और स्वजातीय में दश ही गुरु के द्वारा धर्मानुसार अध्यापन योग्य हैं। * ''नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः। : ''जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥ : बुद्धिमान मनुष्य को यह उचित है कि वह श्रद्धापूवक प्रश्न न करने वाले को अथवा अन्याय के साथ पूछने वाले को उत्तर न दे। वह जानकार होते हुए भी जड़ या मूर्ख की भाँति आचरण करें। * ''फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्। : ''न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥ (६.६७) : रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है। *'' बलाद्दत्तं बलाद् भुक्त बलाद्यच्चापि लेखितम् । : ''सर्वान्बल कृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् ॥ : बलात्कार से जो नहीं देने योग्य वस्तु दी गई है, जो भूमि, भूषणादि भोगा गया हो, ऋण लेने या ब्याज सम्बन्धी लेख लिखवाया गया हो, बलात् किये गये ये सभी कार्य अमान्य हैं (ऐसा मनु कहते हैं )। * चुगली, साहस कर्म, द्रोह, ईर्ष्या , असूया, अर्थदूषण, कठोर वचन और क्रूरता - ये आठ क्रोधजन्य व्यसन हैं। (7.48) * विद्वानों ने दोनों प्रकार के व्यसनों का मूल लोभ कहा है। उस लोभ को प्रयत्न से जीतें। (7.49) * काम जन्य व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्री सहवास व शिकार यथाक्रम अत्यन्त दुखदायी है। (7.50) * मृत्यु और व्यसन में व्यसन ही विशेष कष्टप्रद है क्योकि व्यसनी पुरुष निरन्तर नीचे गिरता जाता है तथा अव्यसनी स्वर्ग प्राप्त करता है। (7.53) * सुसाध्य कर्म भी कोई केवल अकेले नहीं कर सकता है फिर महान फल वाले राजकाज को सहायकों से रहित राजा अकेला कैसे चला सकता है। (7.55) * राजा को चाहिए की मंत्रियों में जो शूर, दक्ष, श्रेस्ठ कुल वाले सदाचारी हों उन्हें खान एवम अन्न भंडार आदि पर नियुक्त करे तथा भीरु स्वभाव का पुरुषों को अन्तःपुर के सामान्य कार्यों पर लगाए। (7.62) * चेष्ठा से मनोभाव समझने वाले पवित्र, चतुर तथा कुलीन पुरुष को दूत नियुक्त करे। (7.64) * यह निश्चय जानिए कि जैसे अग्नि में ईंधन और घी डालने से अग्नि की ज्वाला और अधिक बढ़ जाती है, वैसे ही कामों के उपभोग से कभी भी काम शांत नहीं होता है बल्कि निरंतर बढ़ता ही जाता है। * शुद्धाचरण से, चरित्रवान बनने से, स्त्री. पुरुष निश्चित रूप से दीर्घायु प्राप्त करते हैं। * सब दानों में ब्रह्म (विद्या) का दान सबसे श्रेष्ठ है। * बिना हिंसा के मांस नहीं मिलता, हिंसा पाप है। अत: मांस खाना भी पाप है। * चोरी करने वाले के हाथ काट दो। दुष्ट कर्म करने वाले की आँख निकाल दो। व्यभिचारी पुरुष को गर्म-गर्म विशाल तवे पर डाल कर मार दो। * व्यभिचारिणी स्त्री को कुत्ते से नुचवा कर मरवा दो। यह दण्ड दुष्टों को सार्वजनिक स्थान पर दिया जाए जिससे कि अधिकाधिक लोग देख कर शिक्षा ग्रहण करें और भय के कारण स्वप्न में भी कभी पाप करने का विचार न करें। * न्याययुत दंड का नाम ‘राजा’ और ‘धर्म’ है। यदि दण्ड नहीं तो राजा का कोई औचित्य नहीं। यदि दण्ड नहीं तो धर्म का भी कोई आधार नहीं। * शरीर जल से साफ होता है, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा धर्म से साफ होती है। * क्रूर स्वभाव का परित्याग सबसे बड़ा धर्म है। * उचित रीति से स्त्री की रक्षा करने से अपने कुल, संतान, आत्मा व धर्म की रक्षा होती है। * पति-पत्नी को इस विधि से जीवन व्यतीत करना चाहिए कि जिसमें परस्पर मरणपर्यन्त वियोग न हो। * स्त्रियाँ सन्तान को जन्म देती हैं। वे घर का सौभाग्य हैं, वे पूजा के योग्य हैं, वे घर की चिराग (गृह दीप्ति) हैं। * कन्या विवाह योग्य होने पर भी मरणपर्यन्त घर में बैठी रहे परंतु उस कन्या का कभी गुणहीन पुरुष को दान न करें। * जिस कुल या परिवार में स्त्रियाँ कष्ट प्राप्त करती हैं, उन्हें पीड़ित किया जाता है, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जहाँ वे कष्ट या दुख को प्राप्त नहीं होती, वह कुल, परिवार सदा वृद्धि को प्राप्त करता है। * गृहस्थाश्रम के आश्रम ही अन्य तीन आश्रमों के पालन-पोषण आदि की व्यवस्था की जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम सबसे बड़ा आश्रम है। * सन्तानों को जन्म देना, जन्मे हुओं का पालन-पोषण – ये महत्तम कार्य नारी के ही हैं। दैनिक लोकव्यवहार रूपी कार्यों का प्रत्यक्ष मुख्य आधार नारी ही है। * अध्ययन नहीं करने से, आचार का पालन नहीं करने से, आलस्य और अन्य दोषों के कारण असमय मृत्यु होती है। * जहाँ सब एक हैं, वहाँ सब कुछ अपने आप खिंच कर चला आता है। एकता सर्वदात्री है। * दान लेने का पात्र होने पर भी बार-बार दान न लें क्योंकि उससे ब्रह्म तेज नष्ट हो जाता है। * अध्ययन, तप, ज्ञान पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह और ‘आत्म-चिंतन ‘- ये सब सात्त्विक गुण के लक्षण हैं। * ब्रह्मचारी को चाहिए कि अखण्डित ब्रह्मचर्य तथा अपनी कुल परम्परा का पालन करते हुए तीनों वेदों अथवा दो वेदों या एक वेद का पूर्ण अध्ययन समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे। * प्रात:काल उठ कर राजा तीनों वेदों में कुशल वृद्ध विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हो और उनके निर्देशों के अनुसार राज्य का कार्य संचालन करें। * मनुष्यों को ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद के अतिरिक्त अन्य विविध मंत्रों को जानना चाहिए। ये जीवों के लिए कल्याणपरक होते हैं। जो इन तीन वेदों को भली-भांति जानता है, वही वेदवेत्ता कहलाता है। * देश, धर्म, शील व संस्कृति की हिंसा करने वाले को मारने में कोई पाप नहीं है। == मनु और मनुस्मृति के बारे में उद्धरण == * मनुस्मृति, सृष्टि के प्रथम राजा मनु द्वारा रचित प्रथम संविधान है। -- [[स्वामी दयानन्द सरस्वती]] * मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। -- लुई जैकोलिऑट (Louis Jacolliot), बाइबल इन इण्डिया' नामक ग्रन्थ में <ref>V. Krishna Rao. Expansion of Cultural Imperalism Through Globalisation. Manak Publications. p. 82.</ref> * [[बाइबल]] को बन्द करो और मनुस्मृति को खोलो। इसमें जीवन की सकारात्मक छबि है। -- जर्मनी के महान दार्शनिक [[फ्रेडरिक नीत्से|फ्रेदरिक नीत्से]] (Friedrich Nietzsche) * मनुस्मृति भारत में जातिवाद के लिये उत्तरदायी है। -- [[भीमराव आम्बेडकर]] * यद्यपि जातिगत भेदभाव आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास के लिये हानिकारक है, जातिवाद का हिन्दू धर्म और मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह ग्रन्थ व्यवसायों की भिन्नता और विविधता के महत्व को प्रतिपादित करता है। यह किसी के अधिकार की परिभाषा नहीं करता बल्कि उनके कर्तव्यों की परिभाषा करता है। सभी कार्य, चाहे वे शिक्षण के हों या सफाई के, समान रूप से आवश्यक हैं और उनका स्थान भी बराबरी का है। मैं चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ को सम्पूर्णतः पढ़ना चाहिए लेकिन उन भागों को नहीं मानन चहिये जो सत्य और [[अहिंसा]] से मेल न खाते हों। -- [[महात्मा गांधी]] * मनु और अन्य ऋषियों की संहिताएं, कर्म-कांड में निर्धारित श्लोकों का पालन करते हुए, मुख्य रूप से समय, स्थान और व्यक्तियों की आवश्यकताओं के अनुसार सामाजिक कल्याण के लिए अनुकूल आचरण के नियम निर्धारित करती हैं। -- [[एनी बेसेन्ट]] ==इन्हें भी देखें== * [[धर्म]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} s47rbga0ex110i6w8jfkc5276199bc4 भारतीय गणित 0 6599 33305 32671 2026-10-03T14:23:11Z अनुनाद सिंह 658 /* भारतीय गणित पर आधुनिक विद्वानों के विचार */ 33305 wikitext text/x-wiki '''भारतीय गणित''' से यहाँ आशय प्राचीन भारतीयों द्वारा संस्कृत आदि भाषाओं में रचित ग्रन्थों में अन्तर्निहित [[गणित]] से है। == भारतीय ग्रन्थों से उद्धरण== [[चित्र:Pavo Real Venezolano.jpg|अंगूठाकार|275px|दाएँ|जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है,<br>वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है।]] * ''यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा। :''तथा वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥'' -- वेदाङ्ग ज्योतिष : जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है। * ''बहुभिर्प्रलापैः किम् त्रयलोके सचरारे। : ''यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् गणितेन् बिना न हि॥'' -- [[:w:महावीराचार्य|महावीराचार्य]], जैन गणितज्ञ : बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है। उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता। * ''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः। : ''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥'' -- महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्रप्रशंसा के अन्तर्गत : अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है। * ''गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।'' -- भारतीय गणितज्ञ गणेश दैवज्ञ, अपने ग्रन्थ '''बुद्धिविलासिनी''' में : जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है। * यदि आत्मा को जानना है, तो सूक्ष्मता, क्रम और संख्या को जानना होगा। -- [[छान्दोग्य उपनिषद]] में सनत्कुमार, नारद से * ''परिकर्मविंशतिं यस्सङ्कलिताद्यां पृथक्विजानाति। :''अष्टौ च व्यवहारान् छायान्तान् भवति गणकस्सस्॥'' -- ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त *''लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः। :''व्यक्तिकरांकविशिष्टैर् गणकोऽष्टाभिर् गुणैर् ज्ञेयः॥'' -- गणितसारसंग्रह, गणकगुणनिरुपणम् : लघुकरण, उह, अपोह, अनालस्य, ग्रहण, धारण, उपाय, व्यक्तिकरांकविशिष्ट - इन आठ गुणों से गणक को जाना जाता है। * '' भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च। : ''सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र॥ -- भास्कराचार्य, सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4 : खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य, तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा महत्वहीन होती है। * ''उक्तं बीजोपयोगीदं संक्षिप्तं गणितं किल । : ''अतो बीजं प्रवक्ष्यामि गणकानन्दकारकम् ॥'' -- भास्कराचार्य, बीजगणितम् * ''पूर्व प्रोक्तं व्यक्तमव्यक्तं वीजं प्रायः प्रश्नानोविनऽव्यक्त युक्तया । : ''ज्ञातुं शक्या मन्धीमिर्नितान्तः यस्मान्तस्यविच्मि वीज क्रियां च ॥'' -- भास्कर आचार्य : अर्थात् मंदबुद्धि के लोग व्यक्ति गणित (अंकगणित) की सहायता से जो प्रश्न हल नहीं कर पाते हैं, वे प्रश्न अव्यक्त गणित (बीजगणित) की सहायता से हल कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, बीजगणित से अंकगणित की कठिन समस्याओं का हल सरल हो जाता है। * ''पाटीसूत्रोपमं बीजं गूढमित्यवभाषते। : ''नास्ति गूढमूढानां नैव षोढेत्यनेकधा॥ : ''अस्ति त्रैराशिकं पाटी बीजं च विमला मतिः। : ''किमज्ञातं सुबुद्धीनामतो मन्दार्थमुच्यते॥'' -- भास्कर द्वितीय कृत लीलावती : बीजगणित भी पाटीगणित की तरह ही है जिसे 'गूढ़' कहा जाता है। किन्तु बुद्धिमानों के लिये यह गूढ़ नहीं है। : त्रैराशिक ही पाटी गणित है और निर्मल बुद्धि ही बीजगणित है। सुबुद्धि से युक्त के लिये कौन सी वस्तु अज्ञात है? अतः यह ('अज्ञात') मन्द बुद्धि वालों के लिये कही जती है। * ''जन संसदि दैवविदां तेजो नाशयति भानुरिव भानाम् । : ''कुट्टाकार–प्रश्नैः पठितैः किं पुनः शतशः ॥'' -- ब्रह्मगुप्त : जैसे सूर्य नक्षत्रों के तेज को नष्ट कर देता है उसी प्रकार कुट्टक के प्रश्न कहने मात्र से ज्योतिर्विदों के मुख की कांति नष्ट हो जाती है, और जो ज्योतिर्विद कुट्टक के शतशः प्रश्नों को निकालना जानता हो उसका तो कहना ही क्या? * ''लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः। : ''व्यक्तिकरांकविशिष्टैर् गणकोऽष्टाभिर् गुणैर् ज्ञेयः॥'' -- महावीराचार्य , गणितसारसंग्रह के संज्ञाधिकार के अन्त में , गणकों (गणितज्ञों) के ८ गुण : लघुकरण, उह, अपोह, अनालस्य, ग्रहण, धारण, उपाय, व्यक्तिकरांकविशिष्ट - इन आठ गुणों से गणक को जाना जाता है। * ''जानाति विंशतिमिमां परिकर्माणां यश्छायाष्टमीर् व्यवहृतिरपि मिश्रिताद्याम्। : ''व्यक्तं स वेत्ति गणितं गणितप्रवीणगोष्टीषु वैष भजते गणकाग्रणीत्वम् ॥'' -- श्रीपति, सिद्धान्तशेखर : जो इन २० परिकर्मों को जानता है और मिश्रिता से लेकर छाया तक की ८ व्यवहृति को जानता है, वह प्रकट गणित (व्यक्त-गणित) को जानता है [और] गणित में प्रवीण लोगों की गोष्ठी में सबसे प्रमुख स्थान रखता है। * ''अपूर्वं विहितं शास्त्रं यत्र कोणावबोधनात् । : ''क्षेत्रेषु जायते सम्यक् व्युत्पत्तिर्गणिते तथा ॥ : ''शिल्पशास्त्रमिदं प्रोक्तं ब्रह्मणा विश्वकर्मणे । : ''पारम्पयवर्क्षामदेतदागतं धरणीतले ॥ : ''तदुच्छिन्नं महाराजजयसिंहाज्ञया पुनः । : ''प्रकाशितं मया सम्यग् गणकानन्दहेतवे ॥'' -- सम्राट जगन्नाथ, 'रेखागणित' के आरम्भ में === महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्र की प्रशंसा === *''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः। :''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥९॥ *''कामतन्त्रेऽर्थशास्त्रे च गान्धर्वे नाटकेऽपि वा। :''सूपशास्त्रे तथा वैद्ये वास्तुविद्यादिवस्तुषु॥१०॥ *''छन्दोऽलंकारकाव्येषु तर्कव्याकरणादिषु। :''कलागुणेषु सर्वेषु प्रस्तुतं गणितं परम्॥११॥ *''सूर्यादिग्रहचारेषु ग्रहणे ग्रहसंयुतौ। :''त्रिप्रश्ने चन्द्रवृत्तौ च सर्वत्रांगीकृतं हि तत्॥१२॥ *''द्वीपसागरशैलानां संख्याव्यासपरिक्षिपः। :''भवनव्यन्तरज्योतिर्लोककल्पाधिवासिनाम्॥१३॥ *''नारकाणां च सर्वेषां श्रेणीबन्धेन्द्रकोत्कराः। :''प्रकीर्णकप्रमाणाद्या बुध्यन्ते गणितेन् ते॥१४॥ *''प्राणिनां तत्र संस्थानमायुरष्टगुणादयः। :''यात्राद्यास्संहिताद्याश्च सर्वे ते गणिताश्रयाः॥१५॥ *''बहुभिर्प्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे। :''यत्किंचिद्वस्तु तत् सर्वं गणितेन् बिना न हि॥१६॥ * ''तीर्थकृद्भ्यः कृतार्थेभ्यः पूज्येभ्यो जगदीश्वरैः। : ''तेषां शिष्यप्रशिष्येभ्यः प्रसिद्धाद्गुरुपर्वतः ॥१७॥ * ''जलधेरिव रत्नानि पाषाणादिव काञ्चनम्। : ''शुक्तेर्मुक्ताफलानीव सङ्ख्याज्ञान महोदधे ॥१८॥'' <ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/पृष्ठम्:गणितसारसङ्ग्रहः॒रङ्गाचार्येणानूदितः॒१९१२.djvu/३४ गणितसारसङ्ग्रहः रङ्गाचार्येणानूदितः]</ref> '''अर्थ''': लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है। कामशास्त्र, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र, गायन, नाट्यशास्त्र, पाकशास्त्र, आयुर्वेद, छन्द, अलंकार, काव्य, तर्क, व्याकरण आदि में तथा कलाओं में समस्त गुणों में गणित अत्यन्त उपयोगी है। सूर्य आदि ग्रहों की गति ज्ञात करने में, देश और काल को ज्ञात करने में सर्वत्र गणित अंगीकृत है। द्वीपों, समूहों और पर्वतों की संख्या, व्यास और परिधि, लोक, अन्तर्लोक, स्वर्ग और नरक के निवासी, सब श्रेणीबद्ध भवनों, सभा एवं मन्दिरों के निर्माण गणित की सहायता से ही जाने जाते हैं। अधिक कहने से क्या प्रयोजन? तीनों लोकों में जो भी वस्तुएँ हैं उनका अस्तित्व गणित के बिना नहीं हो सकता। === भारतीय ग्रन्थों में गणित के कुछ सूत्र === * ''दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यकं मानी च। '' : ''यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयांकरोति ॥'' -- वेदाङ्गज्योतिष : किसी आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। * ''स्थानं स्थानं दश गुणम्'' -- आर्यभटीय के गणितपाद में (१०-आधार वाले स्थानीय मान पद्धति की परिभाषा) : एक स्थान से दूसरे स्थान का मान दस गुना होता है। * ''चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। : ''अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥'' -- आर्यभट, आर्यभटीयम् (गणितपाद) के दूसरे भाग में ; वृत्त की परिधि और उसके व्यास के अनुपात (पाई) के मान के बारे में : १०० में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर ६२००० जोड़ें। इस नियम से २०००० परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है। :: (१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६ *'' त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः ।'' -- आर्यभटीय, गणितपाद ६ में, त्रिभुज के क्षेत्रफल के बारे में : किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है। * ''मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व। : ''घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झशंव क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥'' -- आर्यभटीय के 'दशगीतिका' नामक प्रथम अध्याय का १२वाँ छन्द : इसमें आर्यभट ने श्लोक रूप में अक्षर-समूहों का प्रयोग करते हुए ज्या (sine) के मान दिये हैं। == भारतीय गणित पर आधुनिक विद्वानों के विचार == * भारतवर्ष में बीजगणित का अंकुर कब और पहिले कहाँ जमा यह अब स्पष्टरूप से जानना अत्यन्त कठिन है । तथापि जहां तक विचार से अनुभव होता है, यह जान पड़ता है कि इस देश में लिखने की विद्या प्रकट होने के पूर्व ही से बीजगणित का प्रचार था । पहिले के लोग जो कि अक्षरों के संकेत से अपरिचित थे, अव्यक्त पदार्थो के मानने के लिये जुदे जुदे रंगों की गोलियों का व्यवहार करते थे। जब पीछे से लिखने का विद्या प्रचलित हुई तव बीजगणित की पोथियों में उन्हीं रंगों के सूचक शब्दों का व्यवहार होने लगा। जैसा कि संस्कृत के बीजगणितों में अव्यक्तों के मान मानने के लिये जा यावत्तावत्, कालक, नीलक, पीतक, लोहितक, श्वेतक, चित्रक, कपिलक, पिंगलक, पाटलक, धूम्रक, श्यामक, मेचक इत्यादि शब्द रक्खे हैं। आर्ष ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त ( जिसकी रचना काल का अनुसन्धान अभी तक स्पष्ट रूप से नहीं हो सका है ) को देखने से यह अनुमान होता है कि बीजगणित भारत में ही पहिले उत्पन्न हुआ फिर यहाँ से सर्वत्र फैला है। -- '''[[सुधाकर द्विवेदी]]''', अपने 'समीकरण-मीमांसा' नामक ग्रन्थ की भूमिका में * भारतीय 'गणित' , मैथमेटिक्स से अलग है। भारतीय गणित, मैथमेटिक्स को सरल बना देता है। इससे विज्ञान का हित होता है। -- '''[[चन्द्रकान्त राजू]]''', भारतीय गणितज्ञ एवं विज्ञान के आलोचक * पश्चिम में गणित का अध्ययन लम्बे समय से कुछ हद तक राष्ट्र केंद्रित पूर्वाग्रह से प्रभावित रहा है, एक ऐसा पूर्वाग्रह जो प्रायः बड़बोले जातिवाद के रूप में नहीं बल्कि गैरपश्चिमी सभ्यताओं के वास्तविक योगदान को नकारने या मिटाने के प्रयास के रूप में परिलक्षित होता है। पश्चिम अन्य सभ्यताओं विशेषकर भारत का ऋणी रहा है। और यह ऋण ’’पश्चिमी’’ वैज्ञानिक परंपरा के प्राचीनतम काल - ग्रीक सम्यता के युग से प्रारंभ होकर आधुनिक काल के प्रारंभ, पुनरुत्थान काल तक जारी रहा है - जब यूरोप अपने अंधयुग से जाग रहा था। -- '''डेविड ग्रे''' (David Grey), भारत और वैज्ञानिक क्रांति' (Indic Mathematics: India and the Scientific Revolution) में <ref>[http://veda.wikidot.com/article:indic-mathematics Indic Mathematics: India and the Scientific Revolution]</ref><ref>[http://hinduonline.co/FactsAboutHinduism/Mathematics.html Facts About Hinduism : Mathematics]</ref><ref>[http://www.stephen-knapp.com/greatness_of_ancient_india's_developments.htm THE GREATNESS OF ANCIENT INDIA’S DEVELOPMENTS]</ref> * यूरोप में वैज्ञानिक क्रांति के विकास में भारत का योगदान केवल हासिये पर लिखी जाने वाली टिप्पणी नहीं है जिसे आसानी से और अतार्किक तौर पर यूरोप केंद्रित पूर्वाग्रह के आडम्बर में छिपा दिया गया है। ऐसा करना इतिहास को विकृत करना है और वैश्विक सभ्यता में भारत के महानतम योगदान को नकारना है। -- '''डेविड ग्रे''', भारत और वैज्ञानिक क्रांति' (Indic Mathematics: India and the Scientific Revolution) में * गिनती की भारतीय पद्धति शायद मानव द्वारा खोजी गयी सबसे सफल बौद्धिक नवाचार है। इसे सभी देशों ने अपना लिया है। यह सार्वदेशिक भाषा के सबसे निकट है। -- '''जॉन डी बैरो''', The Book of Nothing (2009) पहला अध्याय "Zero—The Whole Story" * ...विश्व भारत का गणित के क्षेत्र में सबसे अधिक ऋणी है। गुप्त काल में भारत में भारतीय गणित उस ऊँचाई पर पहुँच गया था जैसा प्राचीन काल के किसी भी अन्य राष्ट्र में नहीं पहुँच सका था। -- '''[[ए एल बाशम]]''', आस्ट्रेलिया के भारतविद् * यह (भास्कर की चक्रवाल पद्धति) सभी प्रशंसा से परे है: निश्चित रूप से यह लैग्रेंज से पहले संख्या-सिद्धान्त में हासिल की गई सबसे बेहतरीन चीज है। -- '''हर्मन हैंकेल''' (1839 - 1873), प्रसिद्ध जर्मन गणितज्ञ * भारत ही है जिसने हमें दस प्रतीकों के माध्यम से सभी संख्याओं को व्यक्त करने की सरल विधि दी है, प्रत्येक प्रतीक को स्थानीय मान के साथ-साथ पूर्ण मान भी प्राप्त होता है। आर्किमिडीज और अपोलोनियस की प्रतिभा भी यहाँ तक नहीं पहुँच पायी। -- '''पी. एस. लाप्लास''', प्रमुख फ्रांसीसी गणितज्ञ * हर संभव संख्या को दस संकेतों के समुच्चय द्वारा प्रकट करने की विचित्र विधि जिस में हर संकेत का एक स्थानीय मान और एक परम मान हो, भारत में ही उद्भूत हुई। यह विधि आजकल इतनी सरल लगती है कि इस के गंभीर और प्रभावशाली महत्व पर ध्यान ही नहीं जाता। इस ने अपनी सरल विधि द्वारा गणना को अत्यधिक आसान बना दिया और अंकगणित को उपयोगी अविष्कारों की श्रेणी में अग्रगण्य बना दिया। -- -- '''पी. एस. लाप्लास''', महान फ्रांसीसी गणितज्ञ * सभी दार्शनिक और गणितीय सिद्धान्त जो पाइथागोरस के बताये जाते हैं, लगभग वे सभी भारत से प्राप्त हुए हैं। -- '''लियोपोल्ड वॉन श्रोएडर''' (1851-1920) जर्मन भारतविद् * हम भारतीयों के अत्यन्त ऋणी हैं जिन्होंने हमें गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती। -- '''अल्बर्ट आइंस्टीन'''<ref>[https://web.archive.org/web/20170518124725/http://meandmybrags.blogspot.in/2014/12/collection-of-quotes-on-indian.html Collection of Quotes on Indian Mathematics]</ref> * संस्कृत में केवल ज्योतिष शास्त्र की ही १ लाख से अधिक पाण्डुलिपियाँ हैं। इनमें से कम से कम ३० हजार पाण्डुलिपियाँ गणित या खगोलिकी से हैं। -- अमेरिकी विद्वान '''डेविड पिंगरी''', 'Census of Exact Sciences in Sanskrit' में।<ref>[https://mdl.mandayamsabha.in/uploads/book/bk_1609405474.pdf THE UNTAPPED WEALTH OF MANUSCRIPTS ON INDIAN ASTRONOMY AND MATHEMATICS]</ref><ref>[https://www.thehindu.com/society/history-and-culture/decoding-manuscripts-on-mathematics/article30809672.ece Decoding manuscripts on mathematics]</ref> *...nor did he [Thibaut] formulate the obvious conclusion, namely, that the Greeks were not the inventors of plane geometry, rather it was the Indians. -- '''A Seidenberg''' <ref>[https://www.ias.ac.in/article/fulltext/reso/007/04/0004-0019 Mathematics in Ancient India]</ref> * Anyway, the damage had been done and the Sulvasutras have never taken the position in the history of mathematics that they deserve. -- '''A Seidenberg'''<ref>[https://www.ias.ac.in/article/fulltext/reso/007/04/0004-0019 Mathematics in Ancient India]</ref> * I ndeed, if one understands by algebra, the application of arithmetical operations to complex magnitudes of all sorts, whether rational or irrational numbers or space-magnitudes, then the learned Brahmins of Hindostan are the real inventors of algebra. -- '''H Hankel''' * The intellectual potentialities of the Indian nation are unlimited and not many years would perhaps be needed before India can take a worthy place in world Mathematics. -- '''Andre Weil''' in 1936 * The Hindus solved problems in interest, discount, partnership, alligation, summation of arithmetical and geometric series, and devised rules for determining the numbers of combinations and permutations. It may here be added that chess, the profoundest of all games, had its origin in India. -- '''F Cajori'''<ref>F Cajori, History of Mathematics, Mac ~illan, 193</ref> * मुझे यह स्पष्ट हो गया है कि अल्जेब्रा के विकास में ब्रह्मगुप्त की मुख्य भूमिका है। -- '''David Mumford''' , अमर्त्य कुमार दत्त द्वारा उद्धृत <ref>[https://bhavana.org.in/mathematics-in-india-6/ Mathematics in Indiaa]</ref> * अल-ख्वारिज्मी का अलजेब्रा से सम्बन्धित कार्य मौलिक नहीं है। -- Eves, गणित के इतिहासकार (1985)<ref>[https://research-repository.griffith.edu.au/server/api/core/bitstreams/87fe4afc-0c99-5aa8-bf36-6063c0919d6d/content Investigating the Development of Arithmetic and Algebra in Vedic India : Tribute to Swami Dayananda Saraswati] (Gurudeo Anand Tularam)</ref> * भारत में गणित की उत्पत्ति बेबिलोनिया, मिस्र, या यूनान के पहले हुई थी। -- Seidenberg (1962) * प्राचीन काल से ही भारत में गणित का विकास [[कृषि]], [[व्यापार]], निर्माण, नौकायन, और [[इंजीनियरी]] के व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिये तथा इसके द्वारा मानव जीवन को भौतिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने के लिये होता रहा है। -- [[चन्द्रकान्त राजू]]<ref>[https://www.academia.edu/64058507/Raju_on_Images_of_Mathematics_in_the_West_since_5_th_Century_BCE?email_work_card=view-paper Raju on Images of Mathematics in the West since 5 th Century BCE] (By balbir sihag)</ref> ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== * [[ज्योतिष]] * [[गणित]] * [[भारतीय ज्ञान परम्परा]] 4ll8b8eeuwyilxlbyq4ij9lipjccp69 चन्द्रकान्त राजू 0 8527 33306 32004 2026-10-03T14:29:23Z अनुनाद सिंह 658 33306 wikitext text/x-wiki '''[[:w:चन्द्रकान्त राजू|चन्द्रकान्त राजू]]''' (जन्म 7 मार्च 1954) भारत के कम्प्यूटर विज्ञानी, गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक एवं बहुज्ञ अनुसंधानकर्ता हैं। सम्प्रति वे नयी दिल्ली के सभ्यता अध्ययन केन्द्र (Centre for Studies in Civilizations) से जुड़े हुए हैं। भारत के प्रथम सुपरकम्प्यूटर 'परम' (1988-91) में उनका उल्लेखनीय एवं प्रमुख योगदान रहा। == उक्तियाँ == * 'गणित', मैथमेटिक्स को सरल बना देता है। इससे विज्ञान का हित होता है। * उपनिवेशवादियों ने हमे केवल पश्चिमी 'मैथेमटिक्स' पढ़ाया जो कि सार्वभौम नहीं है। भारतीय 'गणित' इससे भिन्न है। यह सदा से व्यावहारिक रहा है। * मजहब और सियासत के मेल से इतिहास विकृत होता है। पश्चिम में सियासत के साथ मजहब का गठजोड़ 1700 साल पहले शुरू हुआ। इसका पश्चिम के इतिहास पर क्या असर हुआ, इसकी एक झलक विज्ञान के इतिहास लेखन में दिखती है। -- अपने लेख "क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?" में * गणित और विज्ञान को व्यावहारिक उद्देश्यों से जोड़कर पश्चिमी धर्मशास्त्र से दूर रखना होगा और पश्चिमी सामाजिक स्वीकृति के मानदंड से खुद को अलग करना होगा। -- अपने लेख "क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?" में * विज्ञान के पश्चिमी दर्शन, जिसमें समय और गणितीय प्रमाण की प्रकृति से संबंधित पहलू भी सम्मिलित हैं, की जड़ें रोमन कैथोलिक चर्च के ईश्वरवादी आवश्यकताओं में निहित हैं।<ref>{{cite journal |last= |first= |date=28 September 2017 |title=GroundUp: UCT invites 'conspiracy theorist' to talk about decolonisation of science |url=https://www.dailymaverick.co.za/article/2017-09-29-groundup-uct-invites-conspiracy-theorist-to-talk-about-decolonisation-of-science/ |journal=Daily Maverick |archive-url=https://web.archive.org/web/20170929025427/https://www.dailymaverick.co.za/article/2017-09-29-groundup-uct-invites-conspiracy-theorist-to-talk-about-decolonisation-of-science/#.Wc215mF_pqY |archive-date=September 29, 2017}}</ref> * कहानी से तथ्यों पर ध्यान लाने के लिये मैंने एक लाख अस्सी हजार रुपये का पुरस्कार घोषित किया है। जो कोई भी "युक्लिड" के बारे में गम्भीर साक्ष्य देगा, वह इस पुरस्कार का अधिकारी होगा। अभी तक किसी ने भी इस पुरस्कार के लिये अपना दावा नहीं ठोका है। अब भी "युक्लिड" को स्कूली पुस्तकों में श्वेत पुरुष के रूप में चित्रित किया जा रहा है, जबकि वह सम्भवतः वह अफ्रीका का निवासी बताया जाता है। * १९वीं शताब्दी के लन्दन के प्रोफेसर (डी मार्गन) को ऋणात्मक संख्याओं की समझ नहीं थी। <ref>[https://hindupost.in/education/practical-ganita-vs-religious-mathematics/# Practical ganita vs religious mathematics]</ref> * कम से कम १५०० ईसापूर्व, या इससे भी पूर्व, से ही भारतीयों और मिस्र के लोगों को भिन्नों की जानकारी थी। किन्तु यूरोप के लोगों को भिन्न की जानकारी १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक नहीं हो पायी थी। * पश्चिम के लोग भारत से कैलकुलस चुराकर ले गये। किन्तु सभी ज्ञान-चोरों की तरह ही वे चुराये हुए इस ज्ञान को पूर्णतः आत्मसात करने में असफल रहे। * तर्क का स्वरूप सभी संस्कृतियों में एक जैसा नहीं है। उदाहरण के लिये, बौद्धों का चतुष्कोटि या जैनों का स्यादवाद अर्ध-सत्य-कार्यकारी (quasi-truth-functional) है, न कि द्वि-मान वाले। इसी प्रकार, तर्क अनुभव की दृष्टि से 'निश्चित' (empirically certain) नहीं है, उदाहरण के लिये क्वाण्टम तर्क। * योरप में : १) प्राचीन काल में गणित को मैथेसिस (mathesis) माना जाता था और यह आत्मा को जागृत करने और लोगों को "धन्य जीवन" जीने के लिए गुणी बनाने वाला माना जाता था, : २) अंधकार युग के दौरान यह बेकार हो गया, : ३) मध्य युग के दौरान तर्क और प्रमाण के रूप में पुनर्जीवित हुआ; और : ४) २०वीं शताब्दी के दौरान औपचारिक प्रतिनिधित्व में बदल गया। * प्राचीन काल से ही भारत में गणित का विकास [[कृषि]], [[व्यापार]], निर्माण, नौकायन, और [[इंजीनियरी]] के व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिये तथा इसके द्वारा मानव जीवन को भौतिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने के लिये होता रहा है। <ref>[https://www.academia.edu/64058507/Raju_on_Images_of_Mathematics_in_the_West_since_5_th_Century_BCE?email_work_card=view-paper Raju on Images of Mathematics in the West since 5 th Century BCE] (By balbir sihag)</ref> * [[:w:क्रूसेड|क्रूसेड]] (युरोपीय धर्मयुद्ध) और [[:w:न्यायाधिकरण (इनक्विज़िशन)|इंक्विजिशन]] के दौरान [[:w:विज्ञान का इतिहास|विज्ञान के इतिहास]] की "वर्ल्ड क्लास" जालसाजी की गयी। * ''[[:w:युक्लिड|युक्लिड]]'' और ''[[:w:टॉलेमी|क्लॉडियस टॉलेमी]]'' के अस्तित्व का कोई गंभीर सबूत नहीं है। उन्हें जिन किताबों का रचनाकार बताया जाता है, वे किताबें बहुत बाद की हैं। * [[:w:निकोलस कोपरनिकस|कोपर्निकस]] ने अरब लेखकों से शब्दशः नक़ल की। * [[:w:न्यूटन (इकाई)|न्यूटन]], [[भारत]] से आयातित [[:w:कलन|कैलकुलस]] पर अत्यधिक निर्भर था। * विकृत पश्चिमी इतिहास के साथ-साथ पश्चिमी [[:w:धर्मशास्त्र]] से रँगे मैथमेटिक्स और विज्ञान की बिना समीक्षा किये धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के रूप में स्कूली बच्चों को पढ़ाया जाता है। * '''''विज्ञान में स्वराज'' की मांग''' : गणित और विज्ञान को व्यावहारिक उद्देश्यों से जोड़कर पश्चिमी धर्मशास्त्र से दूर रखना होगा और पश्चिमी सामाजिक स्वीकृति के मानदंड से खुद को अलग करना होगा। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} j9rixkri4hsv0hpipc5avagrgiyu548 गुरमीत कड़ियालवी 0 9326 33307 33230 2026-10-03T14:36:29Z Mulkh Singh 3596 33307 wikitext text/x-wiki '''गुरमीत कड़ियालवी''' (जन्म 23 दिसंबर 1968) एक पंजाबी लघु-कथा लेखक, नाटककार, उपन्यासकार, बाल साहित्यकार, कवि और गद्य लेखक हैं। == कथन == * जैसा कि अक्सर होता है—खराब आर्थिक स्थिति और बीमारी (कष्ट) इंसान को अंधविश्वासी बना देते हैं। ** रेखाचित्र "पचास कक्षाएं पास", कहानी पंजाब (पंजाबी), अंक 107, जनवरी-दिसंबर 2027 में प्रकाशित, पृष्ठ 42 * दरिया अपना बहाव खुद तय नहीं करता... धरती की ढलान के अनुसार ही पानी बहता है। ठीक वैसे ही जैसे इंसान की दिशा वक्त तय करता है। ** कहानी "गुरचरना गाडर" से, '''हुण''' मैगज़ीन (पंजाबी), जनवरी-अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित * जिसने अपने साथ हुए अन्याय (धक्के) के ख़िलाफ़ भी आवाज़ नहीं उठाई, वो काहे का इंसान...? ** कहानी "गुरचरना गाडर" से, '''हुण''' मैगज़ीन(पंजाबी), जनवरी-अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित [[श्रेणी:पंजाबी कथाकार]] l9nu4ilcdymzmf7xa4d67vihp17mlc9 गुरमेल बीरोके 0 9340 33303 2026-10-03T14:16:06Z Mulkh Singh 3596 "'''गुरमेल बीरोके''' कनाडा में रहने वाला पंजाबी लेखक है। उसने कनाडा के टैक्सी कारोबार एवं टैक्सी चालकों के अनुभवों को खास साहित्यक अंदाज़ में ब्यान किया है। == कथन == * मैं र..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33303 wikitext text/x-wiki '''गुरमेल बीरोके''' कनाडा में रहने वाला पंजाबी लेखक है। उसने कनाडा के टैक्सी कारोबार एवं टैक्सी चालकों के अनुभवों को खास साहित्यक अंदाज़ में ब्यान किया है। == कथन == * मैं राजनीति, धर्म और कॉर्पोरेटवाद की बातों में नहीं पड़ना चाहती। ये कभी मेहनतकश लोगों के हितैषी नहीं होते। ** * टैक्सी फ़ाइलें, '''कहानी पंजाब-107'''(पंजाबी), जनवरी-दिसंबर 2027, पृष्ठ 121 63jk277dsmxf52yd5ftbx1yp6f2pedq 33304 33303 2026-10-03T14:16:50Z Mulkh Singh 3596 33304 wikitext text/x-wiki '''गुरमेल बीरोके''' कनाडा में रहने वाला पंजाबी लेखक है। उसने कनाडा के टैक्सी कारोबार एवं टैक्सी चालकों के अनुभवों को खास साहित्यक अंदाज़ में ब्यान किया है। == कथन == * मैं राजनीति, धर्म और कॉर्पोरेटवाद की बातों में नहीं पड़ना चाहती। ये कभी मेहनतकश लोगों के हितैषी नहीं होते। ** * टैक्सी फ़ाइलें, '''कहानी पंजाब-107'''(पंजाबी), जनवरी-दिसंबर 2027, पृष्ठ 121 [[श्रेणी:पंजाबी कथाकार]] obavr733pb1yfjtpbj58jc1sturmchw 33309 33304 2026-10-04T03:24:58Z Mulkh Singh 3596 33309 wikitext text/x-wiki '''गुरमेल बीरोके''' कनाडा में रहने वाला पंजाबी लेखक है। उसने कनाडा के टैक्सी कारोबार एवं टैक्सी चालकों के अनुभवों को खास साहित्यक अंदाज़ में ब्यान किया है। == कथन == * मैं राजनीति, धर्म और कॉर्पोरेटवाद की बातों में नहीं पड़ना चाहती। ये कभी मेहनतकश लोगों के हितैषी नहीं होते। ** टैक्सी फ़ाइलें, '''कहानी पंजाब-107'''(पंजाबी वार्षिक), जनवरी-दिसंबर 2027, पृष्ठ 121 * नशा बहुत बुरी बीमारी है। इससे रूह की चमक मर जाती है। इंसान को प्यार का नशा करना चाहिए, जो रूह को रोशन करता है। ** टैक्सी फ़ाइलें, '''कहानी पंजाब-107'''(पंजाबी वार्षिक), जनवरी-दिसंबर 2027, पृष्ठ 12 [[श्रेणी:पंजाबी कथाकार]] smehyyu70ymbak3ux0rkz1g9ijhva25 अर्जुन पंचारिया सिंधू 0 9341 33314 2026-10-04T11:55:41Z SD 78 5580 "'''अर्जुन पंचारिया सिंधु''' राजस्थान के लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। == उद्धरण == * "..." ** — ''समय का प्रबंधन'', 2021 * "..." ** — ''संघर्ष ही जीवन है'', 2022 * "..." ** — ''अन्य प्रकाशित स्रोत'', वर्ष..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33314 wikitext text/x-wiki '''अर्जुन पंचारिया सिंधु''' राजस्थान के लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। == उद्धरण == * "..." ** — ''समय का प्रबंधन'', 2021 * "..." ** — ''संघर्ष ही जीवन है'', 2022 * "..." ** — ''अन्य प्रकाशित स्रोत'', वर्ष == संबंधित पृष्ठ == * [[अर्जुन पंचारिया सिंधु]] * [[हिंदी विकिपीडिया]] [[श्रेणी:भारतीय लेखक]] [[श्रेणी:राजस्थान के लोग]] rfdm9t1bfjv0d5u2u8d5cpxeztncvba सदस्य वार्ता:SD 78 3 9342 33315 2026-10-04T11:55:42Z New user message 2225 स्वागत 33315 wikitext text/x-wiki {{साँचा:स्वागत|name=SD 78}} -- [[सदस्य:New user message|New user message]] ([[सदस्य वार्ता:New user message|वार्ता]]) १७:२५, ४ अक्टूबर २०२६ (IST) h01kpmjrnw80af2i6u1rxo7n68u1h3w