विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.22 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk हिन्दी साहित्य 0 6653 33323 32183 2026-10-06T11:24:09Z अनुनाद सिंह 658 33323 wikitext text/x-wiki '''हिन्दी साहित्य''' से आशय [[हिन्दी]] एवं उसकी बोलियों के साहित्य से है। == उक्तियाँ == * किसी भी अवस्था के अनुकरण को नाट्य कहते है। -- [[श्यामसुन्दर दास]] (रूपक रहस्य) * हमें अपनी दृष्टि से दूसरे देशों के साहित्य को देखना होगा, दूसरे देशों की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं। -- आचार्य [[रामचन्द्र शुक्ल]] (चिन्तामणि भाग-2) * जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। -- आचार्य शुक्ल (रस मीमांसा) * सर्वभूत को आत्मभूत करके अनुभव करना ही काव्य का चरम लक्ष्य है। -- आचार्य शुक्ल (काव्य में प्राकृतिक दर्शन) * जिस कवि में कल्पना की समाहार-शक्ति के साथ भाषा की समास-शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतना ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से वर्तमान थी। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * ये (घनानन्द) साक्षात् रस-मूर्ति और ब्रज भाषा के प्रधान स्तंभों में है। प्रेम की गूढ़ अन्तर्दशा का उद्घाटन जैसा इनमें है वैसा हिन्दी के अन्य शृंगारी कवि में नहीं। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * इनका-सा (देव कवि सा) अर्थ सौष्ठव और नवोन्मेष विरले ही कवियों में मिलता है। रीतिकाल के कवियों में से बङे ही प्रगल्भ और प्रतिभासंपन्न कवि थे, इसमें संदेह नहीं। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * कामायनी में उन्होंने (प्रसाद ने) नर-जीवन के विकास में भिन्न-भिन्न भावात्मिका वृत्तियों का योग और संघर्ष बङी प्रगल्भ और रमणीय कल्पना द्वारा चित्रित करके मानवता का रसात्मक इतिहास प्रस्तुत किया है। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * संगीत को काव्य और काव्य को संगीत के अधिक निकट लाने का सबसे अधिक प्रयास निराला जी ने किया है। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * कविता का संबंध ब्रह्म की व्यक्त सत्ता से है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * अनूठी से अनूठी उक्ति तभी काव्य हो सकती है, जबकि उसका संबंध कुछ दूर का ही सही हृदय के किसी भाव या वृत्ति से होगा। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के अधिक निकट लाने का सबसे अधिक प्रयास निराला जी ने किया है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यथार्थवाद की विशेषता में प्रधान है – लघुता की ओर साहित्यिक दृष्टिपात -- [[जयशंकर प्रसाद]] * यथार्थवाद में स्वभावतः दुःख ही प्रधानता और वेदना की अनुभूति आवश्यक है। -- जयशंकर प्रसाद * चीटीं से लेकर हाथी पर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत सभी पर कविता हो सकती है। -- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (रसज्ञ रंजन ; 1920) * कविता की भाषा से मनोरंजन तो होता है, परन्तु वह जीवन-संग्राम के काम नहीं आता। -- सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ * सत्य अपनी एकता में असीम रहता है, तो सौन्दर्य अपनी अनेकता में अनंत। -- महादेवी वर्मा * राजनीति और साहित्य मात्र अभिव्यक्ति में भिन्न है, उनका मूल है आज का यथार्थ, उसके लक्ष्य, उसके अभिप्रेत, उसके संघर्ष। -- मुक्तिबोध * चरम व्यक्तिवाद ही ’प्रयोगवाद’ का केन्द्र बिन्दु है। -- डाॅ. नामवर सिंह * मैंने कला-पक्ष की अवहेलना न करते हुए भी भाव-पक्ष को अधिक मुख्यता दी है। -- बाबू गुलाब राय (अध्ययन और आस्वाद) * काव्य संसार के प्रति कवि की भाव-प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं की कल्पना के ढांचे में ढली हुई, श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादक अभिव्यक्ति है। -- बाबू गुलाबराय (सिद्धान्त और अध्ययन) * दमित प्रवृत्तियों के उदात्तीकरण द्वारा ही मनुष्य स्थूल पशुचेतना से ऊपर उठा और मानव में काव्यात्मक सौन्दर्य-चेतना तभी जगी, किसी दूसरे कारण से नहीं। -- देखा-परखा, इलाचन्द्र जोशी * छायावाद और ग्रामीण बोलियों के नये गीत एक ही रस-परिवार के है, सहोदर है। इन गीतों से प्रगतिवाद और प्रयोगवाद फीका लगने लगा है। दोनों बासी हो गये है। ताजगी की दृष्टि से नये गीत ही नयी कविता है। -- वृत्त और विकास, पं. शांतिप्रिय द्विवेदी * साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (साहित्य सहचर) * मैं कविता को जीवन तक पहुँचने की सबसे सीधी और सबसे छोटी राह मानता हूँ। यह मस्तिष्क नहीं हृदय की राह है। -- रामधारी सिंह दिनकर (अर्द्धनारीश्वर) * कला सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरुद्ध अपने को प्रमाणित करने का प्रयत्न-अपर्याप्तता के विरुद्ध विद्रोह है। -- अज्ञेय (त्रिशंकु) * कला और विषय वस्तु दोनों ही समान रूप से साहित्य-रचना के लिए निर्णायक महत्त्व की नहीं है। निर्णायक भूमिका हमेशा विषय-वस्तु की ही होती है। -- रामविलास शर्मा (प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ) * शुक्ल जी का आदिकाल वास्तविक मध्यकाल है, हिन्दी जनपदों के इतिहास का ’सामंतकाल’ है। वीरगाथा काल ’रीतिकाल’ का प्रथम उत्थान है। पूर्व मध्यकाल (रीतिकाल) ’रीतिवाद’ का द्वितीय उत्थान है। -- रामविलास शर्मा (हिन्दी जाति की समस्या) * सौन्दर्य कोई निरपेक्ष वस्तु नहीं है। उसका निर्माण भी तो कलाकार की अपनी भावनाओं और धारणाओं के आधार पर हीे होता है। -- डाॅ. नगेन्द्र (आलोचक की आस्था) * ’रस’ एक व्यापक शब्द है, ’वह’ विभावानुभाव व्याभिचारी संयुक्त स्थायी’-अर्थात् परिपाक अवस्था का ही वाचक नहीं है, वरन् उसमें काव्यगत संपूर्ण भाव-सम्पदा का अन्तर्भाव है। -- डाॅ. नगेन्द्र (रस सिद्धान्त) * सच्चा कलाकार सौन्दर्य की सृष्टि करने के लिए ही कला की साधना करता है – अपनी भावनाओं, मान्यताओं अथवा विचारों का प्रसार सच्चे कलाकार का उद्देश्य नहीं होता। -- डाॅ. नगेन्द्र (आलोचक की आस्था) * भक्ति-आन्दोलन एक जातीय और जनवादी आन्दोलन हैं। -- रामविलास शर्मा (भारत की भाषा समस्या) * कला की विषय वस्तु न वेदान्तियों का ब्रह्म है, न हेगेल का निरपेक्ष विचार। मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसके भाव, उसके विचार, उसका सौन्दर्यबोध कला की विषय वस्तु है। -- रामविलास शर्मा (आस्था और सौन्दर्य) * जीवन एक विस्मयकर विभूति है, और मानवीय संबंध और भी विस्मयकर। -- अज्ञेय (आत्मनेपद) * कविता तो कवि की आत्मा का आलोक है, उसके हृदय का रस है, जो बाहर की वस्तु का अवलम्ब लेकर फूट पङती है। -- रामधारी सिंह दिनकर (मिट्टी की ओर) * साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- हजारी प्रसाद द्विवेदी (ज्ञान शिखा) * मनुष्य की सीमित बुद्धि के बाहर, मानव के चेतन तत्त्व से संबद्ध, ज्ञान की सीमा से परे कोई भी शक्ति है जिससे समस्त सृष्टि शासित है। -- भगवतीचरण वर्मा (साहित्य के सिद्धान्त तथा रूप) * सौन्दर्य को हम वस्तुगत गुणों वा रूपों का ऐसा सामंजस्य कह सकते है, जो हमारे भावों में साम्य उत्पन्न कर हमको प्रसन्नता प्रदान करे तथा हमको तन्मय कर ले। सौन्दर्य रस का वस्तुगत पक्ष है। -- बाबू गुलाबराय (सिद्धान्त और अध्ययन) * कला कलाकार के आनन्द की श्रेय और प्रेय तथा आदर्श को समन्वित करने वाली प्रभावोत्पादक अभिव्यक्ति है। -- बाबू गुलाब राय * नयी कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है, जो छायावाद में निराला की थी। -- डाॅ. नामवर सिंह * मुक्तिबोध की कविता अदभुत संकेतों से भरी, जिज्ञासाओं से अस्थिर कमी दूर से ही शोर मचाती कभी कानों में चुपचाप राज की बातें कहते चलती है। -- शमशेर बहादुर सिंह * भावना, ज्ञान और कर्म जब एक सम पर मिलते हैं तभी युग प्रवर्तक साहित्यकार प्राप्त होता है। -- महादेवी वर्मा * साहित्य का उद्देश्य सार्वदेशिक और सार्वकालिक होना चाहिए। हमें अपने साहित्य का उद्देश्य सार्वभौमिक करना है, संकीर्ण एकदेशीय नहीं। -- सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला * कविता की भाषा चित्रात्मक होनी चाहिए। काव्य में शब्द और अर्थ का अभिन्न संबंध होता है तथा भावों की अभिव्यक्ति और भाषा सौष्ठव मुक्त छन्द में अधिक सुगमता से व्यक्त किया जा सकता है। -- सुमित्रानंदन पन्त * आदर्शवाद जहाँ आकाश है, उच्चता है वहीं यथार्थवाद का विषय पथरीली धरती है लघुता है। -- जयशंकर प्रसाद * यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, विषमताओं तथा क्रूरताओं का नग्न चित्रण होता है। -- प्रेमचन्द * रस ऐसी वस्ती है, जो अनुभवसिद्ध है, इसके मानने में प्राचीनों की कोई आवश्यकता नहीं, कवि अनुभव में आवे मानिए न आवे मानिए। -- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * स्थायी साहित्य जीवन की चिरन्तन समस्याओं का समाधान है। मनुष्य मात्र की मनोवृत्तियों, उनकी आशाओं, आकांक्षाओं और उनके भावों, विचारों का यह अक्षय भण्डार है। -- श्यामसुन्दर दास * कवियों का यह काम है कि, वे जिस पात्र अथवा वस्तु का वर्णन करते है, उसका रस अपने अन्तःकरण में लेकर उसे ऐसा शब्द-स्वरूप देते हैं कि उन शब्दों को सुनने से वह रस सुनने वालों के हृदय में जागृत हो जाता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी (रसज्ञ-रंजन) * प्राचीन और नवीन का सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * जगत् अव्यक्त की अभिव्यक्त है, काव्य उस अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * ’छायावाद’ के भीतर माने जाने वाले सब कवियों में प्रकृति के साथ सीधा प्रेम-संबंध पंत जी का ही दिखाई पङता है। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * वे (भारतेन्दु) सिद्ध वाणी के अत्यंत-सरस हृदय कवि थे। प्राचीन और नवीन का यही सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास ) * अपनी भावनाओं के अनूठे रूप-रंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधङक प्रयोग करने वाला हिन्दी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * इनकी (पद्माकर) की मधुर कल्पना ऐसी स्वाभावित और हाव-भावपूर्ण मूर्ति-विधान करती है कि पाठक मानो अनुभूति में मग्न हो जाता है। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * केशव को कवि-हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी जो एक कवि में होनी चाहिए। -- आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) * तुलसी और सूर ऐसे सगुणोपासक भक्त राम और कृष्ण की सौन्दर्य-भावना में मग्न होकर ऐसी मंगलदशा का अनुभव कर गये है, जिसके सामने कैवल्य या मुक्ति की कामना का कहीं पता नहीं लगता। -- आचार्य शुक्ल (चिंतामणि-भाग-1) * हृदय की अनुभूति ही साहित्य में ’रस’ और ’भाव’ कहलाती है। -- आचार्य शुक्ल, चिंतामणि भाग-2 * शब्द-शक्ति, रस और अलंकार, ये विषम-विभाग काव्य-समीक्षा के लिए इतने उपयोगी हैं कि इनको अन्तर्भूत करके संसार की नयी पुरानी सब प्रकार की कविताओं की बहुत ही सूक्ष्म, मार्मिक और स्वच्छ आलोचना हो सकती है। -- आचार्य शुक्ल (काव्य में अभिव्यंजनावाद) ---- * पंडिअ सअल सत्य वक्खाणअ । : देहहिं बुद्ध बसन्त न जाणअ ॥ --''' सरहपा : भावार्थ- पंडित सभी शास्त्रों का बखान करते हैं परन्तु देह में बसने वाले बुद्ध ( ब्रह्म ) को नहीं जानते । * जाहि मन पवन न संचरई । : रवि ससि नहीं पवेस । --''' सरहपा * भल्ला हुआ जो मारिया बहिणी म्हारा कंतु । : लज्जेजंतु वयस्सयहु जइ भग्गा घरु एंतु ॥ : भावार्थ- अच्छा हुआ जो मेरा पति युद्ध में मारा गया ; हे बहिन ! यदि वह भागा हुआ घर आता तो मैं अपनी समवयस्काओं ( सहेलियों ) के सम्मुख लज्जित होती । ) --''' हेमचंद्र * बालचंद विज्जवि भाषा । : दुनु नहीं लग्यै दुजन भाषा ॥ : भावार्थ- जिस तरह बाल चंद्रमा निर्दोष है उसी तरह विद्यापति की भाषा ; दोनों का दुर्जन उपहास नहीं कर सकते ) --''' विद्यापति * षटभाषा पुराणं च कुराणंग कथित मया । : भावार्थ- मैंने अपनी रचना षटभाषा में की है और इसकी प्रेरणा पुराण व कुरान दोनों से ली है ) --''' चंदबरदाई * मैंने एक बूंद चखी है और पाया है कि घाटियों में खोया हआ पक्षी अब तक महानदी के विस्तार से अपरिचित था ' ( संस्कृत साहित्य के संबंध में ) --''' अमीर खुसरो * बड़ी कठिन है डगर पनघट की ( कव्वाली ) --''' अमीर खुसरो * छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके ( पूर्वी अवधी में रचित कव्वाली ) --''' अमीर खुसरो * एक थाल मोती से भरा , सबके सिर पर औंधा धरा । : चारो ओर वह थाल फिरे , मोती उससे एक न गिरे ( पहेली ) --''' अमीर खुसरो * नित मेरे घर आवत है रात गये फिर जावत है । : फंसत अमावस गोरी के फंदा । :हे सखि साजन , ना सखि , चंदा ( मुकरी / कहमुकरनी ) --''' अमीर खुसरो * खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय । : आया कुत्ता खा गया तू बैठी ढोल बजाय ॥ --''' अमीर खुसरो ( ढकोसला ) * जेहाल मिसकी मकुन तगाफुल दुराय नैना बनाय बतियाँ । : के ताब-ए-हिज्रा न दारम-ए-जां न लेहु काहे लगाय छतियाँ । : अर्थ-प्रिय मेरे हाल से बेखबर मत रह , नजरों से दूर रहकर यूँ बातें न बनाओ कि मैं जुदाई को सहने की ताकत नहीं रखता , मुझे अपने सीने से लगा क्यों नहीं लेते ( फारसी-हिन्दी मिश्रित गजल) --''' अमीर खुसरो * गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस / चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस ( अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु पर ) --''' अमीर खुसरो * खुसरो दरिया प्रेम का , उल्टी वाकी धार । : मनमा का जो उबरा सो डूब गया , जो डूबा सो पार । --''' अमीर खुसरो * खुसरो पाती प्रेम की , बिरला बांचे कोय । :वेद करआन पोथी पढ़े , बिना प्रेम का होय । --''' अमीर खुसरो * खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग । : तन मेरो मन पीव को दोऊ भय एक रंग । --''' अमीर खुसरो * तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब ( अर्थात मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ , हिन्दवी में जवाब देता हूँ । ) --''' अमीर खुसरो * बारह बरस लौं कूकर जीवै अरु तेरह लौं जिये सियार / बरस अठारह क्षत्रिय जीवै आगे जीवन को धिक्कार । --''' जगनिक * जोइ जोइ पिण्डे सोई ब्रह्माण्डे । : भावार्थ- जो शरीर में है वही ब्रह्माण्ड में है । --''' गोरखनाथ * गगन मंडल मैं ऊँधा कूबा , वहाँ अमृत का बासा। : सगुरा होइ सु भरि-भरि पीवै , निगुरा जाइ पियासा ॥ --''' गोरखनाथ * काहे को बियाहे परदेस सुन बाबुल मोरे ( गीत ) --''' अमीर खुसरो * प्राइव मुणिहै वि भंतडी ते मणिअडा गणंति। : अखइ निरामइ परम-पइ अज्जवि लउ न लहंति ॥ : भावार्थ- प्रायः मुनियों को भी भ्रांति हो जाती है , वे मनका गिनते हैं । अक्षय निरामय परम पद में आज भी लौ नहीं लगा पाते । --''' हेमचन्द्र ( प्राकृत व्याकरण ) * पिय-संगमि कउ निद्दडी पिअहो परोक्खहो केम । : मइँ विन्निवि विन्नासिया निद्द न एम्ब न तेम्ब ॥ : भावार्थ- प्रिय के संगम में नींद कहाँ ? प्रिय के परोक्ष में ( सामने न रहने पर ) नींद कहाँ ? मैं दोनों प्रकार से नष्ट हुई ? नींद न यों , न त्यों । --''' हेमचन्द्र ( प्राकृत व्याकरण ) * जो गुण गोवइ अप्पणा पयडा करइ परस्सु । : तसु हउँ कलजुगि दुल्लहहो बलि किज्जऊँ सुअणस्सु ॥ : भावार्थ- जो अपना गुण छिपाए , दूसरे का प्रकट करे , कलियुग में दुर्लभ सुजन पर मैं बलि जाउँ । --''' हेमचन्द्र ( प्राकृत व्याकरण ) * माधव हम परिनाम निरासा । --''' विद्यापति * कनक कदलिं पर सिंह समारल ता पर मेरु समाने । --''' विद्यापति * अवधू रहिया हाटे वाटे रूप विरष की छाया । : तजिवा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया ॥ --''' गोरखनाथ * पुस्तक जल्हण हाथ दै चलि गज्जन नृप काज । --''' चंदबरदाई * मनहु कला सभसान कला सोलह सौ बन्निय । --''' चंदबरदाई * राम सो बड़ो है कौन , मोसो कौन छोटो ? : राम सो खरो है कौन , मोसो कौन खोटो । --''' तुलसीदास * प्रभुजी तुम चंदन हम पानी । --''' रैदास * सुखिया सब संसार है खावे अरु सोवे , : दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै । --''' कबीरदास * नारी नसावे तीन गुन , जो नर पासे होय । : भक्ति मुक्ति नित ध्यान में , पैठि सकै नहीं कोय ॥ --''' कबीरदास * ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब है तारन के आधिकारी ॥ --''' तुलसीदास * पांणी ही तैं हिम भया , हिम हवै गया बिलाई । : जो कुछ था सोई भया , अब कछू कह्या न जाइ ॥ --''' कबीरदास * एक जोति थें सब उपजा , कौन ब्राह्मण कौन सूदा । --''' कबीरदास * एक कहै तो है नहीं , दोइ कहै तो गारी । : है जैसा तैसा रहे कहे कबीर उचारि ॥ --''' कबीरदास * सतगुरु है रंगरेज मन की चुनरी रंग डारी । --''' कबीरदास * संसकिरत ( संस्कृत ) है कूप जल भाषा बहता नीर । --''' कबीरदास * अवधु मेरा मन मतवारा । : गुड़ करि ज्ञान , ध्यान करि महुआ , पीवै पीवनहारा ॥ --''' कबीरदास * पंडित मुल्ला जो कह दिया । झाड़ि चले हम कुछ नहीं लिया ॥ --''' कबीरदास * पंडित वाद वदन्ते झूठा । --''' कबीरदास * पठत-पठत किते दिन बीते गति एको नहीं जानि । --''' कबीरदास * मैं कहता हूँ आँखिन देखी : तू कहता है कागद लेखी ॥ --''' कबीरदास * गंगा में नहाये कहो को नर तरिए । : मछिरी न तरि जाको पानी में घर है ॥ --'''-कबीरदास * कंकड़ पाथड़ जोड़ि के मस्जिद लिये बनाय । : ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय ॥ --''' कबीरदास * जो तू बाभन बाभनि जाया तो आन बाट काहे न आया । : जो तू तुरक तुरकनि जाया तो भीतर खतना क्यों न कराया ॥ --''' कबीरदास * हिन्दु तुरक का कर्ता एके , ता गति लखि न जाय । --''' कबीरदास * हिन्दुअन की हिन्दुआइ देखी , तुरकन की तुरकाइ अरे इन दोऊ कहीं राह न पाई । --''' कबीरदास * जाति न पूछो साधु की , पूछ लीजिए ज्ञान । : मोल करो तलवार का , पड़ा रहने दो म्यान ॥ --''' कबीरदास * जात भी ओछी , करम भी ओछा , ओछा करब करम हमारा । : नीचे से फिर ऊंचा कीन्हा , कह रैदास खलास चमारा ॥ --''' रैदास * झिलमिल झगरा झूलते बाकी रहु न काहु । : गोरख अटके कालपुर कौन कहाचे साधु ॥ --''' कबीरदास * दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना , राम नाम का मरम है आना । --''' कबीरदास * शूरा सोइ ( सती ) सराहिए जो लड़े धनी के हेत । : पुर्जा-पुर्जा कटि पडै तौ ना छाड़े खेत ॥ --''' कबीरदास * आगा जो लागा नीर में कादो जरिया झारि । : उत्तर दक्षिण के पंडिता , मुए विचारि विचारि ॥ --''' कबीरदास * संतन को कहा सीकरी सो काम ? : आवत जात पनहियाँ टूटी , बिसरि गयो हरिनाम । : जिनको मुख देखे दुख उपजत , तिनको करिबे परी सलाम । --''' कुंभनदास * नाहिन रहियो मन में ठौर नंद नंदन अक्षत कैसे आनिअ उर और । --''' सूरदास * हऊं तो चाकर राम के पटी लिखौ दरबार , : अब का तुलसी होहिंगे नर के मनसबदार । --''' तुलसीदास * आँखड़ियाँ झाँई पड़ी , पंथ निहारि-निहारि जीभड़ियाँ झाला पड़याँ , राम पुकारि पुकारि । --''' कबीरदास * तीरथ बरत न करौ अंदेशा । तुम्हारे चरन कमल मतेसा ॥ : जह तह जाओ तुम्हारी पूजा । तुमसा देव और नहीं दूजा ॥ --''' जायसी * तलफत रहति मीन चातक ज्यों , जल बिनु तृषानु छीजे अँखियां हरि दर्शन की भूखी । --''' सूरदास * हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोई । --''' मीरा * एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास । : एक राम घनश्याम हित , चातक तुलसीदास । --''' तुलसीदास * गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाई । : बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताई ॥ --''' कबीरदास * पाँड़े कौन कुमति तोहि लागे , कसरे मुल्ला बाँग नेवाजा । --''' कबीरदास * बंदऊ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि । : महामोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर ॥ --''' तुलसीदास * राम नांव ततसार है ॥ --''' कबीरदास * कबीर सुमिरण सार है और सकल जंजाल । --''' कबीरदास * पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोई । : ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई ॥ --''' कबीरदास * आयो घोष बड़ो व्यापारी । : लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आय उतारी । --''' सरदास * मूक होई वाचाल , पंगु चढई गिरिवर गहन । : जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कली मल दहन ॥ --''' तुलसीदास : सिया राममय सब जग जानी , करऊ प्रणाम जोरि जुग पानि । --''' तुलसीदास * जांति-पांति पूछ नहीं कोई , हरि को भजै सो हरि का होई । --''' रामानंद * साईं के सब जीव है कीरी कुंजर दोय । : सब घाट साईयां सूनी सेज न कोय । --''' कबीरदास * मैं राम का कुता मोतिया मेरा नाम । --''' कबीरदास * जिस तरह के उन्मुक्त समाज की कल्पना अंग्रेज कवि शेली की है ठीक उसी तरह का उन्मुक्त समाज है गोपियों का । --''' आचार्य राम चन्द्र शुक्ल * गोपियों का वियोग-वर्णन , वर्णन के लिए ही है उसमें रिस्थितियों का अनुरोध नहीं है । राधा या गोपियों के विरह वह तीव्रता और गंभीरता नहीं है जो समुद्र पार अशोक जन में बैठी सीता के विरह में है । --'''-आचार्य रामचंद्र शुक्ल * अति मलीन वृषभानु कुमारी । : छूटे चिहुर वदन कुभिलाने , ज्यों नलिनी हिमकर की मारी । --''' सूरदास * सास कहे ननद खिजाये राणा रह्यो रिसाय पहरा राखियो , : चौकी बिठायो , तालो दियो जराय । --''' मीरा * संतन ठीग बैठि-बैठि लोक लाज खोई । --''' मीरा * या लकुटि अरु कंवरिया पर । : राज तिहु पुर का ताज डारा । --''' रसखान * काग के भाग को का कहिये , हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी । --''' रसखान * मानुस हौं तो वही रसखान बसो संग गोकुल गांव के ग्वारन । --''' रसखान * ' जिस प्रकार रामचरित का गान करने वाले भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास जी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है उसी प्रकार कृष्णचरित गानेवाले भक्त कवियों में महात्मा सूरदास जी का । वास्तव में ये हिन्दी काव्यगगन के सूर्य और चंद्र हैं । --''' आचार्य शुक्ल * रचि महेश निज मानस राखा पाई सुसमय शिवासन भाखा । --''' तुलसीदास * मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदशरथ अजिर बिहारी । --''' तुलसीदास * सबहिं नचावत राम गोसाईं हि नचावत तुलसी गोसाई । --''' फादर कामिल बुल्के * हे खग, हे मृग मधुकर श्रेणी क्या तुने देखी सीता मृगनयनी । --''' तुलसीदास * पूजिए विप्र शील गण हीना . शूद्र न गण गन ज्ञान प्रवीना । --''' तुलसीदास * छिति,जल , पावक , गगन , समीरा । --''' तुलसीदास * कत विधि सृजी नारी जग माहीं , पराधीन सपनेहु सुख नाहीं । --''' तुलसीदास * गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग । ( कवितावली ) --''' तुलसीदास * गुपुत रहहु , कोऊ लखय न पावे , परगट भये कछ हाथ आवे । : गुपुत रहे तेई जाई पहुँचे , परगट नीचे गए विगुचे ॥ --''' उसमान * पहले प्रीत गुरु से कीजै , प्रेम बाट में तब पग दीजै । --''' उसमान * रवि ससि नखत दियहि ओहि जोती, रतन पदारथ माणिक मोती । : जहँ तहँ विहसि सुभावहि हँसी, तहँ जहँ छिटकी जोति परगसी ॥ --''' जायसी * बसहि पक्षी बोलहि बहुभाखा , करहि हुलास देखिके शाखा । --''' जायसी * तन चितउर , मन राजा कीन्हा । : हिय सिंघल , बुधि पदमिनी चीन्हा ॥ : गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा । : बिनु गुरु जगत को निरगुण पावा ॥ : नागमती यह दुनिया धंधा । : बांचा सोई न एहि चित्त बंधा ॥ : राघव दूत सोई सैतान । : माया अलाउदी सुल्तान ॥ --''' जायसी * जहाँ न राति न दिवस है , जहाँ न पौन न घरानि । : तेहि वन होई सुअरा बसा , को रे मिलावे आनि ॥ --''' जायसी * मानुस प्रेम भएउँ बैकुंठी नाहि त काह छार भरि मूठि --''' जायसी : : प्रेम ही मनुष्य के जीवन का चरम मूल्य है , जिसे पाकर मनुष्य बैकुंठी हो जाता है , अन्यथा वह एक मुट्ठी राख नहीं तो और क्या है ? ) * छार उठाइ लीन्हि एक मुठी . दीन्हि उड़ाइ पिरिथमी झूठी । --''' जायसी * सोलह सहस्त्र पीर तनु एकै , राधा जीव सब देह । --''' सूरदास * पुख नछत्र सिर ऊपर आवा । : हौं बिनु नाँह मंदिर को छावा । : बरिसै मघा अँकोरि सँकोरि । : मोर दुइ नैन चुवहिं जसि ओरी । --''' जायसी * पिउ सो कहहू संदेसड़ा हे भौंरा हे काग । : सो धनि बिरहें जरि मुई तेहिक धुंआ हम लाग ॥ --''' जायसी * जसोदा हरि पालने झुलावे । : सोवत जानि मौन है रहि करि करि सैन बतावे । : इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि , जसुमती मधुरै गावे । --''' सूरदास * सिखवत चलत जसोदा मैया अरबराय करि पानि गहावत डगमगाय धरनी धरि पैंया । --''' सूरदास * मैया हौं न चरैहों गाय । --''' सूरदास * मैया री मोहिं माखन भावे । --''' सूरदास * मैया कबहि बढेगी चोटी। --''' सूरदास * अखिल विश्व यह मोर उपाया सब पर मोहि बराबर माया । --''' तुलसीदास * काह कहीं छवि आजुकि भले बने हो नाथ । : तुलसी मस्तक तव नवै धरो धनुष शर हाथ ॥ --''' तुलसीदास * सब मम प्रिय सब मम उपजायेगा सबते अधिक मनुज मोहिं भावे । --''' तुलसीदास * मेरी न जात पाँत , न चहौ काहू की जात-पाँत । --'''-तुलसीदास * सुन रे मानुष भाई , : सबार ऊपर मानुष सत्य ताहार ऊपर किछ नाई । --''' चण्डी दास * बड़ा भाग मानुष तन पावा , : सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा । --''' तुलसीदास । * हिन्दी काव्य की सब प्रकार की रचना शैली के ऊपर गोस्वामी तुलसीदास ने अपना ऊँचा आसन प्रतिष्ठित किया है । यह उच्चता और किसी को प्राप्त नहीं । --'''-रामचन्द्र शुक्ल * जनकसुता , जगजननि जानकी । अतिसय प्रिय करुणानिधान की । --''' तुलसीदास * तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही । --''' तुलसीदास * अंसुवन जल सींचि-सींचि , प्रेम बेल बोई । --''' मीरा * सावन माँ उमग्यो हियरा भणक सुण्या हरि आवण री । --''' मीरा * घायलं की गति घायल जानै और न जानै कोई । --''' मीरा * मोर पंखा सिर ऊपर राखिहौं , : गुंज की माल गरे पहिरौंगी । : ओढ़ि पिताबंर लै लकुटी बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी । : भावतो सोई मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी । : या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी । --''' रसखान * जब जब होइ धरम की हानी । : बढहिं असुर महा अभिमानी ॥ : तब तब धरि प्रभु मनुज सरीरा । : हरहिं सकल सज्जन भवपीरा ॥ --''' तुलसीदास * समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है । --''' हजारी प्रसाद द्विवेदी * जब मैं था तब हरि नहीं , : अब हरि हैं मैं नाहिं । : प्रेम गली अती सांकरी , : ता में दो न समाहि ॥ --''' कबीरदास * मो सम कौन कुटिल खल कामी । --''' सूरदास * भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो । --''' सूरदास * धुनि ग्रमे उत्पन्नो , दादू योगेंद्रा महामुनि । --'''-रज्जब * सब ते भले विमूढ़ जन , जिन्हें न व्यापै जगत गति । --''' तुलसीदास * संत हृदय नवनीत समाना । --''' तुलसीदास * रामझरोखे बैठ के जग का मुजरा देख । --''' कबीरदास * निर्गुण रूप सुलभ अति , सगुन जान नहिं कोई । : सुगम अगम नाना चरित , सुनि मुनि-मन भ्रम होई ॥ --'''-तुलसीदास * स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥ --''' तुलसीदास * दीरघ दोहा अरथ के , आखर थोरे मांहि । : ज्यों रहीम नटकुंडली , सिमिट कूदि चलि जांहि ॥ --''' रहीम * प्रेम प्रेम ते होय प्रेम ते पारहिं पइए । --''' सूरदास * तब लग ही जीबो भला देबौ होय न धीम । : जन में रहिबो कुंचित गति उचित न होय रहीम ॥ --''' रहीम * सेस महेस गनेस दिनेस , : सुरेसहुँ जाहि निरंतर गावैं । : जाहिं अनादि अनन्त अखंड , : अछेद अभेद सुबेद बतावैं ॥ --''' रसखान * बहु बीती थोरी रही , सोऊ बीती जाय । : हित ध्रुव बेगि विचारि कै बसि बृंदावन आय ॥ --''' ध्रुवदास * वासर की संपति उलूक ज्यों न चितवत । : भावार्थ : जिस तरह दिन में उल्लू संपत्ति की ओर नहीं ताकते उसी तरह राम अन्य स्त्रियों की तरफ नहीं देखते । --''' केशवदास * आगे के कवि रीझिहें , तो कविताई , : न तौ राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है । : भावार्थ आगे के कवि रीझें तो कविता है अन्यथा राधा-कृष्ण क स्मरण का बहाना ही सही । --''' भिखारी दास * जान्यौ चहै जु थोरे ही , रस कविता को बंस । : तिन्ह रसिकन के हेतु यह , कान्हों रस सारंस ॥ --''' भिखारी दास * काव्य की रीति सिखी सुकवीन सों । : ( मैने काव्य की रीति कवियों से ही सीखी है । ) --''' भिखारीदास * तुलसी गंग दुवौ भए सुकविन के सरदार । --''' भिखारीदास * रीति सुभाषा कवित की बरनत बुधि अनुसार । --''' चिन्तामणि * अपनी-अपनी रीति के काव्य और कवि-रीति । --''' देव * पुष्टिमार्ग का जहाज जात है सो जाको कछु लेना लेउ । --''' विट्ठलदास * हरि है राजनीति पढि आए । --''' सूरदास * अजगर करे न चाकरी , पंछी करे न काम । : दास मलूका कह गए , सबके दाता राम ॥ --''' मलूकदास * हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी , केस जरै ज्यों घास । : सब जग जलता देख , भया कबीर उदास ॥ --''' कबीरदास * विक्रम धंसा प्रेम का बारा , सपनावती कहँ गयऊ पतारा । --''' मंझन * कब घर में बैठे रहे , नाहिंन हाट बाजार , : मधुमालती , मृगावती पोथी दोउ उचार । --''' बनारसी दास * मुझको क्या तू ढूँढे बंदे , मैं तो तेरे पास रे । --''' कबीरदास * रुकमिनि पुनि वैसहि मरि गई, कुलवंती सत सो सति भई । --''' कुतबन * बलंदीप देखा अँगरेजा , तहाँजाई जेहि कठिन करेजा । --''' उसमान * यह सिर नवे न राम कू , नाहीं गिरियो टूट । : आन देव नहिं परसिये , यह तन जायो छूट ॥ --''' चरनदास * सुरतिय , नरतिय , नागतिय , सब चाहत अस होय । : गोद लिए हुलसी फिरै , तुलसी सो सुत होय ॥ --''' रहीम * मो मन गिरिधर छवि पै अटक्यो । : ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै , चिबुक चारु गड़ि ठटक्यो। --''' कृष्णदास * कहा करौ बैकुंठहि जाय जहाँ नहिं नंद , जहाँ न जसोदा , नहिं जहँ गोपी , ग्वाल न गाय । --''' परमानंद दास * बसो मेरे नैनन में नंदलाल, : मोहनि मूरत , साँवरि सूरत , नैना बने रसाल । --''' मीरा * लोटा तुलसीदास को लाख टका को मोल । --''' होलराय * साखी सबद दोहरा , कहि कहिनी उपखान । : भगति निरूपहिं निंदहि बेद पुरान ॥ --''' तुलसीदास * माता पिता जग जाइ तज्यो । : विधिहू न लिख्यो कछु भाल भलाई । --''' तुलसीदास * निर्गुण ब्रह्म को कियो समाधु तब ही चले कबीरा साधु । --''' दादू * अपना मस्तक काटिकै बीर हुआ कबीर । --''' दादू * सो जागी जाके मन में मुद्रा / रात-दिवस ना करई निद्रा । --''' कबीरदास * काहे री नलिनी तू कुम्हलानी / तेरे ही नालि सरोवर पानी । --''' कबीरदास * कलि कुटिल जीव निस्तार हित वाल्मीकि तुलसी भयो । --''' नाभादास * युक्ति सराही मुक्ति हेतु , मुक्ति भुक्ति को धाम । : युक्ति, मक्ति और भुक्ति को मूल सो कहिये काम ॥ --''' देव * दृग अरूझत ,टूटत कुटुम्ब ,जुरत चतुर चित प्रीति । : पडति गांठ दुर्जन हिये दई नई यह रीति ॥ --''' बिहारी लाल * फागु के भीर अभीरन में गहि, : गोविंदै लै गई भीतर गोरी । : भाई करी मन की पद्माकर , : ऊपर नाहिं अबीर की झोरी । : छीनी पितंबर कम्मर ते सु, : विदा दई मीड़ि कपोलन रोरी, : नैन नचाय कही मुसकाय , : लला फिर आइयो खेलन होरी ' । --''' पद्माकर * आँखिन मूंदिबै के मिस , : आनि अचानक पीठि उरोज लगावै । --''' चिंतामणि * मानस की जात सभै एकै पहिचानबो । --''' गुरु गोविंद सिंह * अभिधा उत्तम काव्य है मध्य लक्षणा लीन अधम व्यंजना रस विरस , उलटी कहत प्रवीन । --''' देव * अमिय , हलाहल , मदभरे , सेत , स्याम , रतनार । : जियत , मरत , झुकि-झुकि परत , जेहि चितवत एक बार ॥ --''' रसलीन * भले बुरे सम , जौ लौ बोलत नाहिं जानि परत है काक पिक , ऋत बसंत के माहि । --''' वृन्द * कनक छुरी सी कामिनी काहे को कटि छीन । --''' आलम * नेहीं महा ब्रजभाषा प्रवीन और सुंदरतानि के भेद को जानै । --''' ब्रजनाथ * एक सुभान कै आनन पै करबान जहाँ लगि रूप जहाँ को । --''' बोधा * आलम नेवाज सिरताज पातसाहन के, : गाज ते दराज कौन नजर तिहारी है । --''' चन्द्रशेखर * देखे मुख भावै अनदेखे कमल चंद ति मुख मुरझे कमला न चंद । --''' केशवदास * रोवहु सब मिलि , आवहु ' भारत भाई । : पानी हा ! हा ! भारत-दुर्दशा न देखी जाई ॥ --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * कठिन सिपाही द्रोह अनल जा जल बल नासी । : जिन भय सिर न हिलाय सकत कहुँ भारतवासी ॥ --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * यह जीय धरकत यह न होई कहूं कोउ सुनि लेई । : कछु दोष दै मारहिं और रोवन न दइहिं ॥ --''' प्रताप नारायण मिश्र * अमिय की कटोरिया सी चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी । --''' अंबिका दत्त व्यास * अँगरेज-राज सुख साज सजे सब भारी । : पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी ॥ --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * भीतर-भीतर सब रस चसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै । : जाहिर बातन में अति तेज, : क्यों सखि सज्जन ! नही अंगरेज । --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * सब गुरुजन को बुरा बतावै , : अपनी खिचड़ी अलग पकावै । : भीतर तत्व न , झूठी तेजी , : क्यों सखि साजन नहिं अंगरेजी । --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * सर्वसु लिए जात अँगरेज , : हम केवल लेक्चर के तेज । --''' प्रताप नारायण मिश्र * अभी देखिये क्या दशा देश की हो , : बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे । --''' प्रताप नारायण मिश्र * हाँ , वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है , : ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है ? : भारत-भारती ' --''' मैथिली शरण गुप्त * देशभक्त वीरों , मरने से नेक नहीं डरना होगा । : पर प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा । --''' नाथूराम शर्मा शंकर * धरती हिलाकर नींद भगा दे । : वज्रनाद से व्योम जगा दे । : दैव , और कुछ लाग लगा दे । --''' मैथिली शरण गुप्त ( स्वदेश-संगीत ) * जिसको नहीं गौरव तथा निज देश का अभिमान है । : वह नर नहीं नरपशु निरा है , और मृतक समान है ॥ --''' मैथिलीशरण गुप्त * वन्दनीय वह देश जहाँ के देशी निज अभिमानी हों । : बांधवता में बँधे परस्पर परता के अज्ञानी हों ॥ --''' श्रीधर पाठक * पराधीन रहकर अपना सुख शोक न कह सकता है : यह अपमान जगत में केवल पशु ही सह सकता है ॥ --''' राम नरेश त्रिपाठी * सखि , वे मुझसे कहकर जाते । ( ' यशोधरा ' ) --''' मैथिली शरण गुप्त * अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी । : आँचल में है दूध और आँखों में पानी । ( ' यशोधरा ' ) --''' मैथिली शरण गुप्त * नारी पर नर का कितना अत्याचार है । : लगता है विद्रोह मात्र ही अब उसका प्रतिकार है ॥ --''' मैथिली शरण गुप्त * राम तुम मानव हो ईश्वर नहीं हो क्या ? : विश्व में रमे हुए सब कहीं नहीं हो क्या ? --''' मैथिलीशरण गुप्त * साहित्य समाज का दर्पण है । --''' महावीर प्रसाद द्विवेदी * केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए । उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए । --''' मैथिली शरण गुप्त * अधिकार खोकर बैठना यह महा दुष्कर्म है । : न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है । --''' मैथिली शरण गुप्त * अन्न नहीं है वस्त्र नहीं है रहने का न ठिकाना , : कोई नहीं किसी का साथी अपना और बिगाना । --''' रामनरेश त्रिपाठी * हिन्दू मुस्लिम जैन पारसी इसाई सब जात । : सुखी होय भरे प्रेमधन सकल ' भारती भ्रात ' । --''' बदरी नारायण चौधरी ' प्रेमघन ' * कौन करेजो नहिं कसकत , : विपत्ति बाल विधवन की । --''' प्रताप नारायण मिश्र * बहुत फैलाये धर्म , बढाया छुआछूत का कर्म । --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * सभी धर्म में वही सत्य , सिद्धांत न और विचारो । --''' भारतेन्दु हरिश्चंद्र * परदेसी की बुद्धि और वस्तुन की कर आस । : परवस कै कबलौ कहौं रहिहों तुम वै दास ॥ --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * तबहि लख्यौ जहँ रहयो एक दिन कंचन बरसत । : तहँ चौथाई जन रुखी रोटिहुँ को तरसत ॥ --''' प्रताप नारायण मिश्र * सखा पियारे कृष्ण के गुलाम राधा रानी के । --''' भारतेन्दु हरिश्चंद्र * साँझ सवेरे पंछी सब क्या कहते हैं कुछ तेरा है । : हम सब इक दिन उड़ जायेंगे यह दिन चार बसेरा है । --''' भारतेन्दु हरिश्चंद्र * समस्या --''' आँखियाँ दुखिया नहीं मानति हैं । : समस्या पूर्ति --''' यह संग में लागिये डोले सदा बिन देखे न धीरज आनति प्रिय प्यारे तिहारे बिना आँखियाँ दुखिया नहीं मानति हैं । --''' भारतेन्दु हरिश्चंद्र * निज भाषा उन्नति अहै . सब उन्नति को मूल । : बिनु निज भाषा ज्ञान के , मिटत न हिय को शूल ॥ --''' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र * पढेि कमाय कीन्हों कहा , हरे देश कलेस । : जैसे कन्ता घर रहै , तैसे रहे विदेस ॥ --''' प्रताप नारायण मिश्र * भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी साहित्य को एक नये मार्ग पर खड़ा किया ।के नये युग के प्रवर्तक हुए । --''' रामचन्द्र शुक्ल * इन मुसलमान जनन पर कोटिन हिंदू बारहि । --''' भारतेन्दु हरिश्चंद्र * अहा , ग्राम्य जीवन भी क्या है , क्यों न इसे सबका मन चाहे । --''' मैथिली शरण गुप्त * खरीफ के खेतों में जब सुनसान है , : रब्बी के ऊपर किसान का ध्यान है । --''' श्रीधर पाठक * विजन वन-प्रांत था , प्रकृति मुख शांत था , : अटन का समय था , रजनि का उदय था । --''' श्रीधर पाठक * लख अपार-प्रसार गिरीन्द में । : ब्रज धराधिप के प्रिय-पुत्र का । : सकल लोग लगे कहने , : उसे रख लिया है उँगली पर श्याम ने । --''' ' हरिऔध ' ( ' प्रियप्रवास ' ) * संदेश नहीं मैं यहाँ स्वर्ग का लाया , : इस धरती को ही स्वर्ग बनाने आया । : इसके ( ' साकेत ' ) --''' मैथिली शरण गुप्त * मैं आया उनके हेतु कि जो शापित हैं , : जो विवश , बलहीन दीन शापित है। --''' मैथिलीशरण गुप्त ( ' साकेत ' में राम की उक्ति ) * हम राज्य लिये मरते हैं । --''' मैथिलीशरण गुप्त * मैंने मैं शैली अपनाई देखा एक दुःखी निज भाई । --''' निराला * व्यर्थ हो गया जीवन मैं रण में गया हार । --''' निराला * धन्ये , मैं पिता निरर्थक था , : कुछ भी तेरे हित न कर सका । : जाना तो अर्थागमोपाय , : पर रहा सदा संकुचित काय, : लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर, : हारता रहा मैं स्वार्थ समर । --''' निराला * छोटे से घर की लघु सीमा में, : बंधे है क्षुद्र भाव , : यह सच है प्रिय, : प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है , : सदा ही निःसीम भू पर । --''' निराला * ताल-ताल से रे सदियों के जकड़े हृदय कपाट खोल दे कर-कर कठिन प्रहार आए अभ्यन्तर संयत चरणों से नव्य विराट करे दर्शन पाये आभार । --''' निराला * हाँ सखि ! आओ बाँह खोलकर हम, : लगकर गले जुड़ा ले प्राण फिर तुम तम में , मैं प्रियतम में हो जावें द्रुत अंतर्धान । --''' सुमित्रानंदन पंत * बीती विभावरी जाग री ! : अम्बर-पनघट में डूबो रही, : तारा-घट-ऊषा-नागरी । --''' जयशंकर प्रसाद * दिवसावसान का समय , : मेघमय आसमान से उतर रही है । : वह संध्या सुंदरी परी-सी धीरे-धीरे- धीरे । --''' निराला * छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, : तोड़ प्रकृति से भी माया , : बाले तेरे बाल-जाल में। --''' सुमित्रानंदन पंत * विजन-वन-वल्लरी पर , : सोती थी सुहाग भरी, : स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल तन तरूणी, --''' निराला * खुल गये छंद के बंध प्रास के रजत पाश । --''' सुमित्रानंदन पंत * मुक्त छंद महज प्रकाशन वह मन का सिर निज भावों का प्रकट अकृत्रिम चित्र । --''' निराला * तमूल कोलाहल में मिला _ _ _ मैं हृदय की बात रे मन । --''' जयशंकर प्रसाद * प्रथम रश्मि का आना रंगिणि ! तूने कैसे पहचाना ? --''' सुमित्रानंदन पंत * जो घनीभूत पीड़ा थी की हर किया मस्तक में स्मृति-सी छाई , दुर्दिन में आँसू बनकर तालाब के मन वह आज बरसने आई । --''' जयशंकर प्रसाद * बाँधो न नाव इस ठाँव , बधु पूछेगा सारा गाँव , बंधु ! --''' निराला * हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर अपार्थिव पूजन । : जब विषण्ण निर्जीव पडा हो जग का जीवन । --''' सुमित्रानंदन पंत * प्रसाद पढाने योग्य है निराला पढे जाने योग्य है और पतजी से काव्यभाषा सीखने योग्य है । --'''-अज्ञेय * छायावादी कविता का गौरव अक्षय है उसकी समृद्धि की । कवल भक्ति काव्य ही कर सकता है ' । --'''-डॉ० नगेन्द्र * निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है । --''' हजारी प्रसाद द्विवेदी * मै मजदूर हूँ , मजदरी किए बिना मुझे भोजन करने का अधिकार नहीं। --''' प्रेमचंद * नील परिधान बीच सुकुमारास खुल रहा मृदुल अधखुला अंग भक खिला हो ज्यों बिजली का फूल माला मेघ बीच गुलाबी रंग । --''' जयशंकर प्रसाद * तोड़ दो यह झितिज , मैं भी देख लूं उस ओर क्या है ? : जा रहे जिस पंथ से युग कल्प , उसका छोर क्या है ? --''' महादेवी वर्मा * स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार : चकित रहता शिश सा नादान , : विश्व के पलकों पर सुकुमार, : विचरते हैं स्वप्न अजान ! : न जाने , नक्षत्रों से कौन ? : निमंत्रण देता मुझको मौन ! ! --''' सुमित्रानंदन पंत ( ' मौन निमंत्रण ' ) * हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार । --''' जयशंकर प्रसाद * राजनीति का प्रश्न नहीं रे आज जगत के सम्मुख एक वृहत सांस्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित। --''' सुमित्रानंदन पंत * छोड़ो मत ये सुख का कण है । --''' जयशंकर प्रसाद * आह ! वेदना मिली विदाई । --''' जयशंकर प्रसाद * अरुण यह मधुमय देश हमारा । : जहाँ पहुँच अनजान झितिज को मिलता एक सहारा । --''' जयशंकर प्रसाद * हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती : स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती, : अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो , : प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो , बढ़े चलो । --''' सुमित्रानंदन पंत * भारत माता ग्रामवासिनी । --'''-सुमित्रानंदन पंत * मार हथौड़ा कर-कर चोट , : लाल हुए काले लोहे को , : जैसा चाहे वैसा मोड़ । --''' केदार नाथ अग्रवाल * घुन खाए शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बाँचे, : फटी भीत है , छत चूती है , आले पर विसतुइया नाचे , : बरसाकर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पाँच तमाचे, : दुखरन मास्टर गढ़ते रहते किसी तरह आदम के साँचे । --''' नागार्जुन * बापू के भी ताऊ निकले, : तीनों बंदर बापू के, : सरल सूत्र उलझाऊ निकले : तीनों बंदर बापू के । --''' नागाजुन * काटो-काटो-काटो करवीर, : साइत और कुसाइत क्या है ? : मारो- मारो-मारो-हंसिया, : हिंसा और अहिंसा क्या है ? : जीवन से बढ़ हिंसा क्या है । --''' केदार नाथ अग्रवाल * भारत माता ग्रामवासिनी । --''' सुमित्रानंदन पंत * एक बीते के बराबर यह हरा ठिंगना चना , : बाँधे मुरैठा शीश पर छोटे गुलाबी फूल, : सजकर खड़ा है । --''' केदार नाथ अग्रवाल * हवा हूँ , हवा हूँ मैं वसंती हवा हूँ । --''' केदार नाथ अग्रवाल * तेज धार का कर्मठ पानी , : चट्टानों के ऊपर चढ़कर , : मार रहा है चूंसे कसकर तोड़ रहा है तट चट्टानी । --''' केदार नाथ अग्रवाल * मझे जगत जीवन का प्रेमी लाट बना रहा है प्यार तुम्हारा । --''' त्रिलोचन * खेत हमारे , भूमि हमारी सारा देश हमारा है बाजार : इसलिए तो हमको इसका म चप्पा-चप्पा प्यारा है । --''' नागार्जुन * झुका यूनियन जैक, : तिरंगा फिर ऊँचा लहरायाला , : बांध तोड़ कर देखो कैसे जन समूह लहराया । --''' राम विलास शर्मा * कन्हाई ने प्यार किया , : कितनी गोपियों को कितनी बार , : पर उड़ेलते रहे अपना सदा एक रूप पर , : जिसे कभी पाया नहीं । : जो किसी रूप में समाया नहीं , : का यदि किसी प्रेयसी में उसे पा लिया होता , तो फिर दूसरे को प्यार क्यों करता । --''' अज्ञेय * किन्तु हम है द्वीप हम धारा नहीं हैं । : स्थिर समर्पण है हमारा । : द्वीप हैं हम । --''' अजेय * हम तो ' सारा-का-सारा ' लेंगे जीवन ' कम-से-कम ' वाली बात न हमसे कहिए । --''' रघुवीर सहाय * मौन भी अभिव्यंजना है . . . जितना तुम्हारा सच है , : उतना ही कहो मिति तम व्याप नहीं सकते महामारी तुममें जो व्यापा है उसे ही निबाहो । --''' अज्ञेय * जी हाँ , हुजूर , मैं गीत बेचता हूँ । म पनि तिल मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ मैं किसिम-किसिम के मालिक गीत बेचता हूँ । --''' भवानी प्रसाद मिश्र * हम सब बौने हैं , : मन से , मस्तिष्क से गिर भावना से , चेतना से भी बुद्धि से : विवेक से भी क्योकि हम जन हाफोर-साधारण हैं हम नहीं विशिष्ट । --''' गिरजा कुमार माथुर * मैं प्रस्तुत हूँ .-एक यह क्षण भी कहीं न खो जाय । अभिमान नाम का , पद का भी तो होता है । --''' कीर्ति चौधरी * कुछ होगा , कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा ज ल न टूटे , न टूटे तिलिस्म सत्ता काम मेरे अंदर एक कायर टूटेगा , टूट् । --''' रघुवीर सहाय * जो कुछ है , उससे बेहतर चाहिए पूरी दुनिया साफ करने के लिए एक मेहतर चाहिए जो मैं हो नहीं सकता । --''' मुक्तिबोध * भागता मैं दम छोड़ , : घूम गया कयी मोड । --''' मुक्तिबोध * दुखों के दागों को तमगा सा पहना। --''' मुक्तिबोध * कहीं आग लग गयी , : कहीं गोली चल गयी । --''' मुक्तिबोध * जिंदगी , दो उंगलियों में दबी सस्ती सिगरेट के जलते हुए टुकड़े की तरह है । जिसे कुछ लम्हों में पीकर गली में फेंक दूंगा । --''' नरेश मेहता * मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ लेकिन मुझे फेक मतदार इतिहासों की सामूहिक गतिमा कामही सहसा झूठी पड़ जाने पर क्या जाने सच्चाई टूटे हुए पहिये का आश्रय ले । --''' धर्मवीर भारती * इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है। --''' हरिशंकर परसाई * न्याय को अंधा कहा गया है। मैं समझता हूँ कि न्याय अंधा नहीं काणा है, वह एक ही तरफ देख पाता है। --''' हरिशंकर परसाई == इन्हें भी देखें == *[[हिन्दी]] *[[भक्तिकाल]] ==बाहरी कड़ियाँ== *[https://thehindipage.com/hindi-sahitya/ramchander-shukla-ke-kathan/ रामचन्द्र शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन] cp45qkzz9t26jpn89ys1sp7d8weedrd तन्त्र 0 7445 33319 32939 2026-10-06T04:53:12Z अनुनाद सिंह 658 33319 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Chakras.jpg|right|thumb|240px|भारतीय तंत्र के '''चक्र''']] '''[[:w:तन्त्र|तन्त्र]]''', साधना की एक पद्धति तथा कर्मकाण्ड है जिसका विकास भारत में कम से कम ५वीं शताब्दी से पूर्व हुआ। 'तन्त्र' शब्द का सबसे पुराना प्रयोग [[ऋग्वेद]] में मिलता है (१०.७१.९)। तन्त्र ने हिन्दू, बोन, बौद्ध और जैन सभी परम्पराओं को प्रभावित किया। बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ तन्त्र पूर्व और दक्षिण-पूर्व के देशों में गया। तन्त्र का अभ्यास/साधना करने वालों को 'तान्त्रिक' कहा जाता है। हिन्दू धर्म में आध्यात्मिक साधना की तीन पद्धतियाँ हैं, मन्त्र, तन्त्र और यन्त्र। == उद्धरण == * ''तन्यते विस्तार्यते ज्ञानम् अनेन इति तन्त्रम् ।'' -- कायिक आगम : इसके (तन्त्र के) द्वारा ताना जता है या विस्तारित किया जाता है, इसलिये यह तन्त्र है। * ''तनोति विपुलान् अर्थान् तन्त्रमन्त्र समविन्तान् । : ''त्राणं च कुरुते यस्मात् तन्त्रमित्यभिधीयते ॥ -- तन्त्रान्तर पटक * ''घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पञ्चमी । : ''कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः ॥ : ''पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः॥ : घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा - ये पाँच तथा कुल, शील और जाति - कुल आठ 'पाश' कहलाते हैं। पाशबद्ध है वह जीव है, जो पाशमुक्त है वह सदाशिव है। * ''मुदं कुर्वन्ति देवानां मनांसि तारयन्ति च । : ''तस्मात् तन्त्र (मुद्रा) इति ख्यातो दर्शितव्यः कुलेश्वरी ॥ -- कुलार्णव तन्त्र में शिव, पार्वती से : जो देवताओं को आनन्द (मुद) प्रदान करे और साधक के मन को (भवसागर से) पार लगाए, इसलिए इसे तन्त्र (या मुद्रा) कहा गया है। हे कुलेश्वरी (पार्वती)! इसका दर्शन/प्रदर्शन अवश्य करना चाहिए। * ''सर्वेऽथा येन तन्यन्ते त्रायन्ते च भयाज्जनान्। : ''इति तन्त्रस्य तन्त्रत्वं तन्त्रज्ञाः परिचक्षते॥ : जिस शास्त्र के द्वारा सभी मन्त्रों का अर्थ विस्तारपूर्वक जाना जाता हि उर जिसके अनुसार कर्म करने से लोगों को भय से मुक्ति मिलती है, उसे ‘तन्त्र’ कहते हैं। * ''यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । : ''तत्र तत्र परानन्दस्वारूपं सम्प्रवर्तते ॥'' -- विज्ञानभैरवतन्त्र : अर्थात् जहाँ-जहाँ मन को सन्तोष प्राप्त होता है मन को वहीं लगाना चाहिये। वहाँ-वहाँ परमानन्द स्वरूप प्रकाशित होता है। * ''तान्त्रिक साधना का निगूढ़ रहस्य तो बहुत दूर रहा, साधारण तत्त्व भी अभी तक इस प्रकार आलोचित नही हुआ है कि सुगमता से लोगों को हृदयङ्गम हो सके । -- [[गोपीनाथ कविराज]], अपनी पुस्तक 'तान्त्रिक साधना' की भूमिका में * [[सनातन धर्म]] में सांख्य, ब्रह्माण्डीय संरचना प्रदान करता है; [[वेदान्त]] अविभाज्य अस्तित्व, ज्ञान और परमानन्द सम्बन्धी अटल सत्य प्रदान करता है ; तथा तन्त्र और योग विधि एवं साधना (प्रक्टिस) प्रदान करते हैं। -- बाबाजि बॉब किन्डलर के लेख , १६ दिसम्बर २०१३ को लिया गया। * योग, वेदान्त और तन्त्र का आविर्भाव अधिकांशतः सांख्य दर्शन से हुआ है जिसमें २४ तत्त्वों का वर्णन है। -- बाबाजि बॉब किन्डलर * वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही सम्प्रदाय अति प्रचीन काल से ही भारत में साथ-साथ अस्तिव में रहे हैं। उसी समय से ही तन्त्र कुछ गिनति के लोगों तक सीमित था। तन्तर के सिद्धान्त और अभ्यास को यदि समझ लिया जाय और अधिक संख्या में लोग इसे स्वीकार कर लें तो मानव समुदाय में कोई वर्ग-भेद नहीं होगा। -- हमारे बारे में, श्रीपुरम संस्था, १६ दिसम्बर २०१३ को लिया गया * तंत्र तकनीक नहीं बल्कि प्रार्थना है। यह दिमाग से नहीं होता वरन यह अपने हृदय के भीतर विश्रांत हो जाना है। कृप्या इसे स्मरण रखना। तंत्र पर बहुत सी किताबें लिखी गयी हैं, वे सब तकनीक की बात करती हैं पर वास्तविक तंत्र का तकनीक से कुछ लेना-देना नहीं है। वास्तविक तंत्र के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं जा सकता, वास्तविक तंत्र को तो आत्मसात करना होता है। वास्तविक तंत्र को कैसे आत्मसात करें? इसके लिए तुम्हें अपना पूरा दृष्टिकोण बदलना होगा।<br> अपनी प्रेमिका के साथ प्रार्थना करो, अपनी प्रेमिका के साथ गाओ, अपनी प्रेमिका के साथ खेलो, अपनी प्रेमिका के साथ नाचो, बिना यौनक्रिया के बारे में कोई विचार किए। यही मत सोचते रहो, कि ‘हम बिस्तर में कब जायेंगे?’ उसको भूल जाओ। कुछ और करो और उसमे खो जाओ। और किसी दिन इसी खो जाने में प्रेम उठेगा, अचानक तुम देखोगे की तुम प्रेम कर रहे हो और तुम करने वाले नहीं हो। वह बस हो रहा है, तुम इससे आविष्ट हो। तब यह तुम्हारा पहला तंत्र अनुभव है – अपने से किसी महान से आविष्ट। तुम साथ में नाच-गा रहे थे या साथ में कुछ रहे थे या साथ में प्रार्थना-जप कर रहे थे या साथ में ध्यान कर रहे थे, और अचानक तुम दोनों पाते हो कि तुम किसी नए ही आकाश पर पहुंच गए। और तुम्हें नहीं पता कि कब तुम प्रेम क्रिया में रत हो गए; तुम्हें कुछ याद ही नहीं रहा। तब तुम तंत्र की उर्जा के अधीन हो गए। और तब पहली बार तुम उस गैर-तकनिकी अनुभव को देखोगे। -- ओशो रजनीश * दुर्भाग्य से पश्चिमी देशों में तंत्र को इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि इसका अर्थ उन्मुक्त सेक्स है। इसका बहुत गलत मतलब निकाला गया है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि तंत्र के बारे में ज्यादातर पुस्तकें उन लोगों ने लिखी हैं, जिनका मकसद बस किताबें बेचना है। वे किसी भी अर्थ में तांत्रिक नहीं हैं। तंत्र का शाब्दिक अर्थ होता है तकनीक या टेक्नालाजी। यह इंसान की अंदरूनी टेक्नालाजी है। तंत्र की विधियां व्यक्तिपरक (सब्जेक्टीव) होती हैं, विषयपरक (ऑब्जेक्टीव) नहीं। लेकिन आज-कल समाज में यह समझा जा रहा है कि तंत्र शब्द का अर्थ है परंपरा के विरुद्ध या समाज को मंजूर ना होने वाली विधियां। मगर बात बस इतनी है कि तंत्र में कुछ खास पहलुओं का खास तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। यह योग से कतई अलग नहीं है। दरअसल योग के एक छोटे-से अंग को तंत्र-योग कहा जाता है। -- सद्‌गुरु, जग्गी वासुदेव === तन्त्र पर विवेकानन्द के विचार === * इस गंदे वामाचार को छोड़ दो जो तुम्हारे देश को नष्ट कर रहा है। तुमने भारत के दूसरे भागों को नहीं देखा है। जब मैं देखता हूँ कि वामाचार हमारे समाज में कितना घुस गया है, तो मुझे यह अपनी संस्कृति के घमंड के बावजूद सबसे अपमानजनक स्थान लगता है। ये वामाचार संप्रदाय बंगाल में हमारे समाज में मधुमक्खियाँ बन गए हैं। जो लोग दिन में बाहर निकलते हैं और आचार के बारे में सबसे ऊँची आवाज़ में उपदेश देते हैं, वे ही रात में भयंकर व्यभिचार करते हैं और सबसे भयानक पुस्तकों का समर्थन करते हैं। उन्हें ये काम करने के लिए पुस्तकों द्वारा आदेश दिया जाता है। तुम जो बंगाल के हो, यह जानते हो। बंगाली शास्त्र वामाचार तंत्र हैं। वे गाड़ी भरकर प्रकाशित होते हैं, और तुम अपने बच्चों को अपनी श्रुतियाँ सिखाने के बजाय उनके द्वारा उनके मन में ज़हर भरते हो। कलकत्ता के पिताओं, क्या आपको शर्म नहीं आती कि इन वामाचार तंत्रों जैसी भयानक सामग्री, अनुवाद सहित, आपके लड़के-लड़कियों के हाथों में दी जाए, और उनके दिमाग में जहर भरा जाए, और उन्हें यह सिखाया जाए कि ये हिंदुओं के शास्त्र हैं? अगर आपको शर्म आती है, तो उन्हें अपने बच्चों से दूर रखें, और उन्हें सच्चे शास्त्र, वेद, गीता, उपनिषद पढ़ने दें। * हमारे सामान्य जीवन में हम ज़्यादातर पौराणिक या तांत्रिक हैं, और, जहाँ भी भारत के ब्राह्मणों द्वारा कुछ वैदिक ग्रंथों का उपयोग किया जाता है, वहाँ भी ग्रंथों का समायोजन ज़्यादातर वेदों के अनुसार नहीं, बल्कि तंत्र या पुराणों के अनुसार होता है। इस प्रकार, वेदों के कर्म कांड का पालन करने के अर्थ में खुद को वैदिक कहना, मुझे नहीं लगता, उचित होगा। लेकिन दूसरा तथ्य यह है कि हम सभी वेदान्ती हैं। जो लोग खुद को हिंदू कहते हैं, उन्हें वेदान्ती कहलाना बेहतर होगा, और, जैसा कि मैंने आपको दिखाया है, उस एक नाम के तहत हमारे सभी विभिन्न संप्रदायों में वैदिक आते हैं, चाहे वे द्वैतवादी हों या अद्वैतवादी। * इसीलिए श्री रामकृष्ण आए। उस तरह से तंत्र साधना के दिन चले गए हैं। उन्होंने भी तंत्र साधना की, लेकिन उस तरह से नहीं। जहाँ शराब पीने का आदेश है, वहाँ वे बस एक बूँद शराब अपने माथे पर लगा लेते थे। तांत्रिक उपासना पद्धति बहुत फिसलन भरी है। इसलिए मैं कहता हूँ कि इस प्रांत में तंत्र का बहुत हो चुका है। अब इसे आगे बढ़ना चाहिए। वेदों का अध्ययन किया जाना चाहिए। चार तरह के योगों का सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए और पूर्ण शुद्धता बनाए रखी जानी चाहिए। * पुराण, तंत्र और अन्य सभी ग्रन्थ, यहाँ तक कि व्यास-सूत्र भी द्वितीयक, तृतीयक प्रमाण हैं, लेकिन प्राथमिक वेद हैं। मनु, पुराण और अन्य सभी पुस्तकों को उसी सीमा तक माना जाना चाहिए जहाँ तक वे उपनिषदों के प्रमाण से सहमत हैं, और जहाँ वे असहमत हैं, उन्हें बिना दया के अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। * तंत्र शब्द का वास्तविक अर्थ शास्त्र है, जैसे कपिल तंत्र। लेकिन तंत्र शब्द का प्रयोग सामान्यतः सीमित अर्थ में किया जाता है। बौद्ध धर्म अपनाने वाले और अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार करने वाले राजाओं के शासन में वैदिक याग-यज्ञों का प्रदर्शन अतीत की बात हो गई, और राजा के डर से कोई भी व्यक्ति बलि में किसी पशु की हत्या नहीं कर सकता था। लेकिन बाद में बौद्धों ने - जो हिंदू धर्म से धर्मांतरित हुए थे - इन याग-यज्ञों के सर्वश्रेष्ठ भागों को अपना लिया और गुप्त रूप से उनका अभ्यास किया। इन्हीं से तंत्रों की उत्पत्ति हुई। तंत्रों में वामाचार आदि कुछ घृणित बातों को छोड़कर, तंत्र उतने बुरे नहीं हैं जितना लोग सोचते हैं। उनमें कई उच्च और उत्कृष्ट वेदांतिक विचार हैं। वास्तव में, वेदों के ब्राह्मण भागों को थोड़ा संशोधित करके तंत्रों के शरीर में शामिल किया गया था। हमारी पूजा के सभी रूप और वर्तमान समय के अनुष्ठान, जिनमें कर्मकाण्ड भी शामिल है, तंत्र के अनुसार मनाए जाते हैं। * जैसा कि हमने कहा, तंत्र वैदिक अनुष्ठानों को संशोधित रूप में प्रस्तुत करते हैं; और इससे पहले कि कोई उनके बारे में सबसे बेतुके निष्कर्ष पर पहुंचे, मैं उसे ब्राह्मणों, विशेष रूप से अध्वर्यु भाग के साथ तंत्रों को पढ़ने की सलाह दूंगा। और तंत्रों में प्रयुक्त अधिकांश मंत्र उनके ब्राह्मणों से शब्दशः लिए गए पाए जाएंगे। उनके प्रभाव के अनुसार, श्रौत और स्मार्त अनुष्ठानों के अलावा, हिमालय से कोमोरिन तक प्रचलित सभी प्रकार के अनुष्ठान तंत्रों से लिए गए हैं, और वे शाक्त, या शैव, या वैष्णव और अन्य सभी की पूजा को निर्देशित करते हैं। ==== शिष्य से बातचीत (अंश) ==== :'''शिष्य''' : सर, जब आप पहली बार पश्चिम से लौटे थे, तो स्टार थियेटर में अपने व्याख्यान में आपने तंत्र की तीखी आलोचना की थी। अब आप तंत्र में बताई गई महिलाओं की पूजा का समर्थन करके खुद का ही विरोध कर रहे हैं। :'''स्वामीजी''' : मैंने केवल तंत्रों के वर्तमान भ्रष्ट वामाचार रूप की निन्दा की है। मैंने तंत्रों की माता-पूजा या वास्तविक वामाचार की निन्दा नहीं की है। तंत्रों का अभिप्राय देवत्व की भावना से स्त्रियों की पूजा करना है। बौद्ध धर्म के पतन के समय वामाचार बहुत भ्रष्ट हो गया था और वह भ्रष्ट रूप आज भी विद्यमान है। आज भी भारत का तंत्र साहित्य उन्हीं विचारों से प्रभावित है। मैंने केवल इन भ्रष्ट और भयंकर प्रथाओं की निन्दा की है-जो मैं अब भी करता हूँ। मैंने कभी उन स्त्रियों की पूजा का विरोध नहीं किया जो दिव्य माता का सजीव स्वरूप हैं, जिनकी बाह्य अभिव्यक्तियाँ इन्द्रियों को लुभाने वाली हैं, परन्तु जिनकी आंतरिक अभिव्यक्तियाँ, जैसे ज्ञान, भक्ति, विवेक और वैराग्य, मनुष्य को सर्वज्ञ, अचूक उद्देश्य वाली और ब्रह्मज्ञ बनाती हैं। “[(संस्कृत)]- वे प्रसन्न होने पर मंगलकारी और मनुष्य की मुक्ति का कारण बनती हैं” (चण्डी, 1. 57)। माता की पूजा और वंदना के बिना ब्रह्मा और विष्णु में भी उनकी पकड़ से बचकर मुक्ति पाने की शक्ति नहीं है। इसलिए इन कुलदेवियों की पूजा के लिए, उनके भीतर के ब्रह्म को प्रकट करने के लिए, मैं महिलाओं के मठ की स्थापना करूँगा। ==== तंत्र पर प्रश्न ==== :( नोट : 17 अगस्त 1889 को प्रमोद मित्र को लिखे एक पत्र में स्वामी विवेकानन्द ने तंत्र से जुड़े दो सवाल पूछे थे। ये पत्र मूल रूप से बंगाली में लिखे गए थे। पता नहीं कि मित्र महोदय ने उस पत्र का जवाब दिया या नहीं और अगर दिया भी तो उनके जवाब क्या थे!) * तंत्र में आचार्य शंकर को 'गुप्त बौद्ध' कहा गया है; बौद्ध महायान ग्रंथ प्रज्ञापारमिता में व्यक्त विचार आचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदान्तिक विचारों से पूरी तरह मेल खाते हैं। पंचदशी के लेखक ने भी कहा है, "जिसे हम ब्रह्म कहते हैं, वही बौद्धों का शून्य सत्य है।" इन सबका क्या मतलब है? * तंत्र कहता है, कलियुग में वेद-मंत्र व्यर्थ हैं। तो भगवान शिव की कौन सी आज्ञा का पालन किया जाना चाहिए? ==इन्हें भी देखें== * [[योग]] * [[मन्त्र]] ==बाहरी कड़ियाँ== *[https://www.osho.com/hi/highlights-of-oshos-world/osho-on-tantra-quotes तंत्र पर ओशो के उद्धरण] *[https://www.goodreads.com/work/quotes/89804435-mahanirvana-tantra Mahanirvana Tantra Quotes] g1a7kxvnm24j9x5pu14s3quha9cosa8 सिंह 0 9338 33320 33302 2026-10-06T08:42:42Z अनुनाद सिंह 658 33320 wikitext text/x-wiki '''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं। == उक्तियाँ == * ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। : ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥ : जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है। * ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। : ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥ : कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है। * ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा। : ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥ : सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ। : (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।) * ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः : ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति । : ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या : ''यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥ : लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है) * समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र : जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में : यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं! * चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ : सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]] <poem> * इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर। रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥ पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर। ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥ दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर। भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥ तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर। त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में : जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है। </poem> * ''सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान्‌ दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ⁠। : ''राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ⁠॥'' -- हितोपदेश : यदि सांप, बाघ, हाथी और सिंह आदि हिंसक पशुओं को वश में किया जा सकता है, तो राजा को क्यों नहीं प्रसन्न किया जा सकता? * ''बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् । : ''पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥'' -- हितोपदेश : जिसके पास बुद्धि है वही बलशाली है,निर्बुद्धि के पास बल कहाँ ? देखो न, अपनी शक्ति से मदोन्मत्त सिंह को खरगोश ने (कुएँ में) गिरा दिया। ==इन्हें भी देखें== *[[शक्ति]] *[[बल]] *[[क्षत्रिय]] [[en:Lions]] m5or8z6e4z7iqsualkd54u87kb0ultl रघुवीर सहाय 0 9343 33321 2026-10-06T11:19:55Z अनुनाद सिंह 658 "'''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' () एक प्रमुख हिन्दी साहित्यकार थे। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33321 wikitext text/x-wiki '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' () एक प्रमुख हिन्दी साहित्यकार थे। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवंत और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो वृक्ष को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * फूल को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीक़ा यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। c4e1xquqc0yi4uti20iiq4z637kafnb 33322 33321 2026-10-06T11:21:55Z अनुनाद सिंह 658 33322 wikitext text/x-wiki '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' () एक प्रमुख हिन्दी साहित्यकार थे। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवंत और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो वृक्ष को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * फूल को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीक़ा यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। 4ummhbr07islvvwp66xlrfgjddtvogt 33324 33322 2026-10-06T11:28:14Z अनुनाद सिंह 658 33324 wikitext text/x-wiki '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) [[हिन्दी]] के साहित्यकार व पत्रकार थे। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। १९४६ से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। पत्रकारिता की शुरुआत १९४९ में दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से किया। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७) रहे। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से आपका विवाह हुआ। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवंत और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो वृक्ष को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * फूल को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीक़ा यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। 07fr30qciehmhds92hu4sg3sirdjdem 33325 33324 2026-10-06T11:29:19Z अनुनाद सिंह 658 33325 wikitext text/x-wiki [[चित्र:रघुवीर सहाय.jpg|right|thumb|300px|रघुवीर सहाय]] '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) [[हिन्दी]] के साहित्यकार व पत्रकार थे। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। १९४६ से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। पत्रकारिता की शुरुआत १९४९ में दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से किया। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७) रहे। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से आपका विवाह हुआ। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवंत और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो वृक्ष को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * फूल को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीक़ा यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। ja7vvz2t568hms9mdul7u69ggctqo33 33326 33325 2026-10-06T11:29:48Z अनुनाद सिंह 658 33326 wikitext text/x-wiki [[चित्र:रघुवीर सहाय.jpg|right|thumb|200px|रघुवीर सहाय]] '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) [[हिन्दी]] के साहित्यकार व पत्रकार थे। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। १९४६ से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। पत्रकारिता की शुरुआत १९४९ में दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से किया। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७) रहे। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से आपका विवाह हुआ। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवंत और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो वृक्ष को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * फूल को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीक़ा यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। oen2f4ofag2hc00ykdklsisceeleqmx 33327 33326 2026-10-06T11:35:14Z अनुनाद सिंह 658 /* उक्तियाँ */ 33327 wikitext text/x-wiki [[चित्र:रघुवीर सहाय.jpg|right|thumb|200px|रघुवीर सहाय]] '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) [[हिन्दी]] के साहित्यकार व पत्रकार थे। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। १९४६ से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। पत्रकारिता की शुरुआत १९४९ में दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से किया। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७) रहे। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से आपका विवाह हुआ। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुजरती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस [[सभ्यता]] में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की [[संस्कृति]] में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवन्त और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं, इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो [[वृक्ष]] को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े [[राष्ट्र]] की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में [[जल|पानी]] के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा [[भय|डर]] मेरा सच एक [[आश्चर्य]] है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * [[पुष्प|फूल]] को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * [[यात्रा]]-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीका यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। 5mrweag07cyjvzqv179o1jzdcwqk3l0 33328 33327 2026-10-06T11:50:21Z अनुनाद सिंह 658 33328 wikitext text/x-wiki [[चित्र:रघुवीर सहाय.jpg|right|thumb|200px|रघुवीर सहाय]] '''[[:w:रघुवीर सहाय|रघुवीर सहाय]]''' (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) [[हिन्दी]] के साहित्यकार व पत्रकार थे। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। १९४६ से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। पत्रकारिता की शुरुआत १९४९ में दैनिक नवजीवन (लखनऊ) से किया। १९५१ के आरंभ तक उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। इसी वर्ष दिल्ली आए। यहाँ प्रतीक के सहायक संपादक (१९५१-५२), आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक (१९५३-५७) रहे। १९५५ में विमलेश्वरी सहाय से आपका विवाह हुआ। == उक्तियाँ == * हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। * प्रत्येक रचना सत्ता के ख़िलाफ़ होती है। * मुझे पाने दो पहले ऐसी बोली जिसके दो अर्थ न हों। * नाटक मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न हुआ है। * कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है। * कविता बहुत कुछ एक अनुशासन है। * कविता के संसार में कोई बड़ा परिवर्तन समाज के संसार में उतने ही बड़े प्रयत्न के बिना संभव नहीं है। * विचारवस्‍तु की कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों। * कविता जिन चीज़ों को बचा रख सकती है; उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर वे अन्ततः वही होंगी, जो कि आदमी को कहीं-न-कहीं आज़ाद करती हैं। * अगर कवि की कोई यात्रा हो सकती है तो वह अवश्य ही किसी ऐसी जगह जाने की होगी जिसको वह जानता नहीं। * कविता एक बनाई हुई चीज़ है, इस बात को बिल्कुल खुले दिल से और सारा गँवारपन छोड़ करके मानना चाहिए। * किसी भी आदमी को कविता की जाँच के लिए कविता में दी गई शर्तों के अलावा किन्ही शर्तों की इजाज़त नहीं दी जा सकती। * कविता... जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। * गद्य लिखना भाषा को सार्वजनिक बनाते जाना है। * गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है। * कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है। * साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा। * चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुजरती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन। * इस [[सभ्यता]] में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है। * हत्या की [[संस्कृति]] में प्रेम नहीं होता है। * एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा। * सावधान, अपनी हत्या का उसे एकमात्र साक्षी मत बनने दो। * राजनीति केवल कार्यकुशलता नहीं है। * इस सामाजिक व्यवस्था में ही नहीं, एक जीवन्त और उल्लसित भावी व्यवस्था में भी ज्ञान का माध्यम सदा कष्ट ही रहेगा। * हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए। * यात्राएँ अब भी हो सकती हैं, इसी व्यर्थ जीवन में। * ऐसा नहीं कि एक सामाजिक विद्रोह के बिना एक कलाकार का विद्रोह नहीं हो सकता, परंतु ऐसा है कि यदि कलाकार सामाजिक विद्रोह को पहचानता नहीं, तो वह अपने मनुष्य को भी नहीं पहचानता—वह मनुष्य जिसके पहचानने पर कलाकार सामाजिक विद्रोह को भटकने से बचा सकता है। * मैं बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक ज़िम्मेदारी महसूस करता हूँ, पर जो कुछ रचता हूँ; सिर्फ़ अपनी ज़िम्मेदारी पर रचता हूँ या फिर नहीं रचता। फ़िलहाल अपने को रचने योग्य बनाए रखता हूँ। * सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए। * अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है। * कविता उस आदमी को; जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। * मैं जो करता हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी पर करता हूँ और मेरी बेईमानी की सज़ा मेरे साहित्यकार की मृत्यु है। * यदि आप कवि से चाहते हैं कि वह कविता की उपलब्धियाँ बताए, तो आपको उससे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपके मनोरंजन के लिए साहित्यिक ले-दे में शामिल होगा। * देखो [[वृक्ष]] को देखो, वह कुछ कर रहा है। * किताबी होगा कवि जो कहेगा कि हाय पत्ता झर रहा है। * एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है। * बच्चे की ज़िंदगी एक लंबी ज़िंदगी है। उसमें एक किताब आकर चली नहीं जानी चाहिए। * बड़े [[राष्ट्र]] की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है। * मन में [[जल|पानी]] के अनेक संस्मरण हैं। * मेरा [[भय|डर]] मेरा सच एक [[आश्चर्य]] है। * अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं। * लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में। * संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए। * सेना किसी राष्ट्र के आंतरिक शौर्य का कुल जमा हासिल होती है, उस शौर्य से अपने राष्ट्र को ‘सबक़’ नहीं सिखाया जाता। * पानी का स्वरूप ही शीतल है। * [[पुष्प|फूल]] को शक्ति के संसार में धकेलकर प्रवेश करने वाली संस्कृति का एक चिह्न गुलाब का फूल है। इस धक्के में जिस फूल को चोट आई है वह गेंदा है। * जब से भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का नया तरीक़ा शुरू हुआ है, राजनीति की शक्ल ही बदल गई है। * [[यात्रा]]-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है। * किसी एक व्यक्ति से उसके एकांत में कोई ईमानदार बात सुनने की आशा भी करो तो अकेला नहीं मिलता है। * नया तरीका यह है कि राजनीति विकल्प नहीं खोजती है, बदल खोजती है। * हँसो पर चुटकुलों से बचो, उनमें शब्द हैं। * हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है? * इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता। * लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता। * पीले और बसंती के बीच फ़र्क़ न कर पाना एक तरह की आलोचना है, जो पीला रंग बसंती कहकर बेचने वाले पंसारियों ने हमारे ऊपर थोप दी है। * राज्य और व्यक्ति के संबंध को अधिकाधिक समझना आधुनिक संवेदना की शर्त है। * आज़ादी दो गुटों में से किसी एक की ग़ुलामी से मिलती है। * हमारी [[हिंदी]] एक दुहाजू की नई बीवी है—बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली। * कितना संपूर्ण होगा वह व्‍यक्ति जो सुन्‍दर को देख सकता है पर कुरूप की उपस्थिति में विचलित नहीं होता। निश्‍चय ही उसका अस्‍वीकार असुन्‍दर से है, कुरूप से नहीं। * दायित्‍व कभी प्रतिकूल नहीं होता। वह एक निरंतर उद्योग है जो मेरा दायित्‍व है। यह जीवन को उन्नत करेगा; अपनी जिजीविषा को किसी तात्‍कालिक तुष्टि को समर्पित कर देने की भूल नहीं करूँगा। * .. बनिया बनिया रहे : बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे : पर जब कविता लिखे तो आधुनिक हो जाए। : खीसें बा दे जब कहो तब गा दे॥ == रघुवीर सहाय के बारे में अन्य लोगों के विचार == * रघुवीर सहाय एक आत्‍मचेतना कलाकार हैं, और यह आत्‍मचेतना उनकी आधुनिकता की बुनियाद है। -- अज्ञेय * सहाय जी की कविता में एक भी पंक्ति ऐसी न मिलेगी जिस पर अप्रेषणीयता, क्ल्ष्टिता या दुरूहता का आरोप लगाया जा सकता हो। -- अज्ञेय m733nqd5t1wg1zlo7lqm4ifkx3mnge2