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रावण
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2026-10-07T06:57:51Z
अनुनाद सिंह
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'''[[:w:रावण|रावण]]''' राक्षस कुल का अत्यन्त ही बलशाली, महापराक्रमी राजा था। लेकिन इसके साथ ही वो शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान, पण्डित एवं महाज्ञानी था। जब [[धरती]] पर उसका पाप बढ़ गया तब भगवान विष्णु ने [[राम]] के रूप में धरती पर जन्म लेकर रवण का वध किया था। तब रावण ने मरने से पहले भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण को कुछ उपदेश दिए थे, जो आज के समय में भी लोगों के लिए सफलता की कुंजी है।
==रावण के उपदेश==
* अच्छे कार्य में कभी विलम्ब नहीं करना चाहिए (''शुभस्य शीघ्रम्'')। अशुभ कार्य को मोह वश करना ही पड़े तो उसे जितना हो सके उतना टालने का प्रयास करना चाहिए।
* शक्ति और पराक्रम के मद में इतना अंधा नहीं हो जाना चाहिए की हर शत्रु तुच्छ और निम्न लगने लगे। मुझे ब्रह्मा जी से वर मिला था की वानर और मानव के अलावा कोई मुझे मार नहीं सकता। फिर भी मैं उन्हें तुच्छ और निम्न समझ कर अहम में लिप्त रहा, जिस कारण मेरा समूल विनाश हुआ।
* अपने जीवन के गूढ रहस्य स्वजन को भी नहीं बताने चाहिए। चूंकि रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं। जैसे की विभीषण जब लंका में था तब मेरा शुभेच्छु था। पर श्री राम की शरण में आने के बाद मेरे विनाश का माध्यम बना।
* हे लक्ष्मण! अपने सारथी, अपने द्वारपाल, अपने रसोईया और अपने भाई के दुश्मन मत बनो। वे कभी भी तुम्हें क्षति पहुंचा सकते है, जैसे मैंने अपने भाई विभीषण को अपना शत्रु बनाने की भूल की थी और वह तुम्हारे पक्ष में शामिल हो गया था। वह उन सभी रहस्यों को जानता था जिससे तुमने इस लड़ाई को जीत लिया। यदि वह मेरे पक्ष में होता तो तुम लोग कभी भी लंका के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते और ना ही इस युद्ध को जीत पाते।
* लक्ष्मण यह मत सोचो कि तुम हमेशा विजयी बनोगे, भले ही तुम अपने जीवनकाल में अजेय रहे हो। मगर कोई नहीं जानता है कि भाग्य कब तुम्हें ऐसे परिस्थिति में ला दे जहां तुम्हे हार के अतिरिक्त कुछ प्राप्त नहीं होगा। हमें एक ना एक दिन मृत्यु के आगे हार मानना ही पड़ेगा, इसीलिए जीवन के युद्ध में हार का सामना करने की मंशा से आगे बढ़ो। मैंने पाताल एवं स्वर्ग को जीत लिया था और पृथ्वी के अधिकांश हिस्से को भी प्राप्त किया था। कहीं महारथियों को युद्ध में धूल चटाया, देवता, दानव, गंधर्व सभी मुझसे भयभीत थे। इससे मेरा गर्व औए अहंकार और भी दृढ़ (मजबूत) हो गया जिससे मुझे लगा कि मैं अजेय हूँ और यही सोच मेरे पतन का कारण सिद्ध हुआ।
*हे सौमित्र! कोई भी व्यक्ति जो यश प्राप्ति के लिए उत्सुक हो उसे लोभ नामक राक्षस से दूर रहना चाहिए। जब भी यह अपना फन उठाने का प्रयत्न करें उसके फन को उसी समय कुचल देना चाहिए। जब हमारी जरूरते बहुत अधिक असंतोषजनक हो जाती हैं तो यह लोभ एक भयानक राक्षस का रूप लेता है। यह पता भी नहीं चलता है, कब यह राक्षस धीरे-धीरे हमें अपने नियंत्रण में ले लेता है, मेरे साथ भी वही हुआ। मैं एक बहुभक्षक या लोभी बन गया था, सत्ता के लिए, साम्राज्य के लिए, भूमि के लिए, शक्ति के लिए, धन के लिए और सुंदर महिलाओं के लिए यह लोभ बढ़ते-बढ़ते कब मुझे निगल गया यह मुझे ज्ञात नहीं है। मेरा सारा ज्ञान, मेरी शक्तियां, मेरी भक्ति, मेरे वरदान बुद्धि के इस लोभ जनित राक्षस के कारण नष्ट हो गया। अधिक लोभ तुम्हें अहंकारी, कुकर्मी और घोर पापी बना देता है। इसलिए हम जो चाहते हैं और जो हमें मिलता है हम उसी से संतुष्ट रहें हैं, सुनिश्चित करें कि हमारी जरूरतें कभी भी लोभ ना बन जाए।
* हे लक्ष्मण! एक महान राजा को अपनी प्रजा की देखभाल अपने पुत्र की भाँति करना चाहिए। जो कुछ भी अपने राज्य को खुशहाल बनाता हो वे वास्तव में एक राजा के लिए सुख होता है। वह किसी भी अन्य संबंध से पहले अपने प्रजा का राजा होता है यहां तक कि अगर उसे अपने स्त्री, पुत्र, परिजनों या अपनी इच्छा के विरुद्ध भी कोई निर्णय लेना पड़े, तो उसे निसंकोच वे निर्णय लेना चाहिए। यही एक महान राजा का कर्तव्य है और राजधर्म भी। अपने प्रबल, लोभ और अहंकार के कारण मैं यह करने में असमर्थ हुआ। अपने राज्यकाल में मैंने हमेशा अपने अहंकार और लोभ को ही प्रमुखता दिया। मैंने अपने प्रजा और राज्य का हित कभी नहीं देखा और ना ही सोचा। प्रजा को प्रमुखता दिए बिना मैंने प्रभु श्रीराम के शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, यह केवल मेरे विनाश का कारण नहीं बना, बल्कि संपूर्ण लंका के विनाश का कारण बना।
* हे सौमित्र! ध्यान से सुनो मेरी बात। हमेशा ऐसे मंत्री पर भरोसा करना जो राजा की आलोचना करता है। जो बिना किसी भय के तुम्हारी सामने निंदा करेगा, वह बिना किसी भय के ऐसा करता है चुकिं वे तुम्हें प्रसन्न करने हेतु तुमसे झूठ नहीं कहता है बल्कि वह हमेशा चाहता है कि तुम एक आदर्श राजा या व्यक्ति बनो। लेकिन उन मंत्रियों और व्यक्तियों से अवश्य भय करना जो हमेशा तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, भले ही तुम कितने गलत क्यों ना हो। इन लोगों के कारण तुम्हारे पूरे साम्राज्य का विनाश हो सकता है।
* लक्ष्मण कभी यह ना सोचना कि तुम अपने भाग्य, ग्रहों और नक्षत्रों को मार्ग दे सकते हो। वे तुम्हारे लिए वही लाएंगे जो तुम्हारे भाग्य में लिखा होगा। कोई भी मणि या रत्न धारण अथवा यज्ञ, हवन इत्यादि तुम्हारा भाग्य नहीं बदल सकता है। तुम्हारा अतीत एवं वर्तमान कर्म के फल प्राप्त करने से तुम्हें कोई नही रोक सकता है। तुम्हारे कर्म और तुम्हारे ग्रह तुम्हारे अंतिम भाग्य को तय करेंगे, इसलिए अपने जीवनकाल में सर्वदा छः कर्म करना और पूर्ण निष्टा से अपने इष्ट की भक्ति करते रहना, यही तुम्हारे जीवन में शुभ फल देगा और मोक्ष भी।
* हे रामानुज! ईश्वर से या तो प्रेम करो या घृणा, परन्तु तुम जो भी करो वह अपार एवं दृढ होना चाहिए। यदि तुम एक भक्त होना चाहते हो, तो जब भी तुम्हारा पूज्य तुम्हारी प्रार्थना का उत्तर देने के लिए अधिक समय लेता है तो निराश ना होना। पूर्ण भक्ति, आस्था एवं विश्वास सहित उनकी भक्ति करना, यही ईश्वर को तुम्हारे पास ले आएगा और तुम्हें मोक्ष प्रदान करेगा। और अगर शत्रु बनो तो ऐसा बनो कि स्वयं ईश्वर के हाथों तुम्हारी मृत्यु हो। जो प्राणी इनके बीच फंसे हुए रहते हैं अर्थात कभी ईश्वर की भक्ति करते हैं और कभी उन्हें कोसते रहते हैं वह प्राणी अजीवन नर्क भोग करते हैं उन्हें कभी सुख प्राप्त नहीं होता है। उनका मन निरंतर चंचल एवं अशांत रहता है। मैंने हमेशा प्रभु से घृणा की, उनका परम शत्रु बना और इसीलिए उनके ही हाथों मुझे मोक्ष मिला।
==इन्हें भी देखें==
*[[दुर्जन]]
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मनु स्मृति
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2026-10-06T14:17:23Z
अनुनाद सिंह
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'''[[:w:मनुस्मृति|मनुस्मृति]]''' [[हिन्दू धर्म]] का एक [[:w:स्मृति|स्मृतिग्रन्थ]] है जिसकी रचना मनु ने की थी।
== उद्धरण ==
=== धर्म ===
* ''धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: ।
: ''धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥'' -- ६।९२
: धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (साफ-सफाई), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) – ये [[धर्म]] के दश लक्षण हैं ।
* ''आचारः परमो धर्मः'' ॥ '' -- मनुस्मृति: १।१०८ ॥
: आचरण ही परम धर्म है।
* ''वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विराम्।
: ''आचारश्चैव साधूनामात्मस्तुष्टिरेव च ॥
: सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय, वेदज्ञाताओं मनु आदि के स्मृति ग्रन्थ तथा उनका शिष्ट व्यवहार, महापुरुषों के सत्याचरण, अपने मन की प्रसन्नता-ये सभी धर्म के प्रमाण रूप में ग्रहण करने चाहिए।
* ''श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिठन् हि मानवः।
: ''इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम॥
: मनुष्य वेदों व स्मृतियों में कहे गये धर्म का सेवन करते हुए संसार में निर्मल कीर्ति प्राप्त करता है तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में परमानन्द को अधिगत कर लेता है।
* ''योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः।
: ''स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः॥
: जो कोई विद्वान द्विज धर्म की मूलाधार श्रुतियों एवं स्मृतियों की निन्दा या अपमान करे तो सत्पुरुषों को उस वेद निन्दक अधम व्यक्ति को समस्त श्रेष्ठ कर्मों से अलग कर देना चाहिए।
* ''सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
: ''प्रियं च नानृतं च ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥ ४।१३८ ॥
: सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, परन्तु अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय लगाने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है ।
=== वर्ण-व्यवस्था ===
* ''सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः ।
: ''मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत् ॥'' -- मनुस्मृति (१- ८७ )
: भावार्थ - इस सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिये उस अत्यन्त कान्तियुक्त ( सृष्टिकर्ता) ने अपने मुख, भुजा, जंघाए, तथा पैरों से उत्पन्न किये हुए (क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र ) के लिये अलग-अलग कर्मों की रचना की।
* ''अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
: ''षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च॥'' (मनुस्मृति ८.३३७)
: ''ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्।
: ''द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ॥ (मनुस्मृति ८.३३८)
: चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। (अर्थात् जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। )
* ''सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।
: ''अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥'' (मनुस्मृति-२.१६२)
: ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो।
* ''शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
: ''क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥'' (मनुस्मृति-१०.६५)
: शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है।
=== संस्कार ===
* ''वैदिकेः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम्।
: ''कार्यः शरीरसंस्कार : पावनः प्रेत्य चेह च ॥
: भृगु ऋषि निर्देश देते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्गों के पवित्र वैदिक मन्त्रों द्वारा इस लोक में तथा मृत्यु पश्चात् सम्पूर्ण शारीरिक गर्भाधानादि संस्कार अवश्य करने चाहिए।
* ''प्राड्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते।
: ''मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरभ्यमधुसर्पिषाम ॥
: इस श्लोक में नवजात बालकों का जातकर्म संस्कार का विधान बताया जाता है। यथा नाल काटने से पूर्व नवजात शिशु का जातकर्म संस्कार सम्पन्न होता है। इस समय स्वर्ण को सलाई से घृत, मधुमिश्रित प्राशन किया जाता है। अर्थात् बालक का पिता मन्त्र-उच्चारण पूर्वक बच्चे को मधु और घी चटाता है और बच्चे की जीभ पर ' ओउम् ' लिखता है।
* ''माडुल्य ब्राह्मणस्य त्र्याक्षत्रियस्य बलान्वितम्।
: ''वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥
: ब्राह्मण शिशु का नाम मांगलिक, क्षत्रिय शिशु का नाम बल युक्त, वैश्य के बालक का नाम समृद्धि सूचक तथा शुद्ध के बच्चे का नाम निन्दनीय होना चाहिये।
* ''चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्कमणं गृहात्।
: ''षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मलं कुले ॥
: चतुर्थ मास में बालकों को घर से बाहर निकालना चाहिये। छठेमास में दाल-भात आदि सुपाच्य आहार देना चाहिये। अथवा कुल के अनुसार मांगलिक सभी आचार सम्पादित करने चाहिये।
* ''गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वोत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
: ''गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तुं द्वादशे विशः ॥
: ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के शिशु का गर्भ से बारहवें वर्ष में सम्पन्न कराना चाहिये।
* ''अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
: ''सावित्रीपतिताः व्रत्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥
: पूर्वोक्त समय के बाद ये तीनों ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य वर्ण समुचित समय में जिनका उपनयन संस्कार सम्पादित नहीं हुआ है गायत्री मन्त्र के अधिकार से वंचित अतः पतित एवं शिष्टों द्वारा निन्दनीय शूद्रत्व के प्राप्त कर लेते हैं।
* ''कार्ष्णंरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः।
: ''वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥
: यहाँ भृगुऋषि तीनों वर्गों के ब्रह्मचारियों के लिए धारणा करने योग्य वस्त्रों का विधान बतलाते हैं। ब्राह्मण आदि वर्गों के ब्रह्मचारी क्रमशः कृष्णमृग, रूरूमृग तथा बकरे के चमड़े की धोती एवं कौपीन के स्थान पर धारण करें, और सन, रेशम और भेड़ के बाल अर्थात् ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करें।
* ''केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणत।
: ''ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥
: अब ऋषि ब्रहाचारियों के धारण योग्य दण्ड का मान बताते हैं। धर्मशास्त्र के प्रमाणानुसार ब्राहाण अपने सिर के केशों तक, क्षत्रिय मस्तक पर्यन्त और वैश्य नाक पर्यन्त परिमाण अनुवाद ( लम्बाई ) वाले दण्ड को धारण करे।
* ''प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम्।
: ''प्रदक्षिणं परीत्याग्नि चरेद् भैक्षं यथाविधि ॥
: ब्राह्मणादि वर्गों के ब्रह्मचारियों को शास्त्र के नियमानुसार अपने इष्ट दण्ड को ग्रहण कर सूर्य का उपस्थान कर, अग्नि को प्रदक्षिणा कर भिक्षाचरण करना चाहिए।
* ''मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनी निजाम्।
: ''भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥
: ब्रह्मचारी को सबसे पहले अपनी माता, अपनी बहिन, तथा मौसी से भिक्षा की याचना करनी चाहिए और उन्हें भी किसी प्रकार ब्रह्मचारी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
* ''उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः।
: ''भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत ॥
: ब्रह्मचारी तथा गृहस्थद्विज भी एकाग्रचित हो आचमन कर जल से आचमन करे तथा इन्द्रियों, आँख, नाक तथा कानों के छिन्द्रो को भी जल स्पर्श करे।
* ''ब्राह्मण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत्।
: ''कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन॥
: विप्र को सदा ब्राह्म नामक तीर्थ से अथवा प्राजापत्य और दैवतीर्थों से आचमन करना चाहिए, पितृतीर्थ द्वारा तो कभी भी आजमन नहीं करना चाहिए।
* ''अष्ठमूलस्य तले बाह्य तीर्थ प्रचक्षते।
: ''कायम लिमूलेऽगे दैवं पियं तयोरधः ॥
: हाथ के अंगूठे के पास ब्राह्म तीर्थ, कनिष्ठिका अंगुली के मूल के पास 'प्रजापति' तीर्थ, अंगुलियों के आगे 'दैवतीर्थ' और अंगूठे तथा प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के मध्य पितृतीर्थ होता है।
* ''मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम्।
: ''अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥
: ब्रह्मचारी के यदि मेखला, मृग चर्म, पालाशादि से बना हुआ दण्ड, यज्ञोपवीत, कमण्डलु-ये नष्ट हो गये हों तो इन्हें जल में फेंककर अन्य नवीन मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहण कर लेने चाहिए।
* ''अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः।
: ''ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लधुवासा जितेन्द्रियः ॥
: विद्याध्यन के लिये उद्यत, आचमन किया हुआ, ब्रह्मान्जलि से युक्त, अल्प और हलके वस्त्र धारण करने वाला, इन्द्रियजयी शिष्य ही शास्त्रानुसार अध्यापन के योग्य है।
* ''ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
: ''स्रवत्यनोड्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्चविशीर्यति ॥
: वेद-विधा के अध्ययन की विधि बतलाई जाती है। ब्रह्मचारी को सदा अपने गुरूचरणों में वेदाध्ययन के पूर्व और अवसान में ' ओमकार ' का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि ' ओऽम ' इस मंत्र के उच्चारण से विहीन वेदाध्ययन शनैः शनैः नष्ट हो जाता है विस्मृत हो जाता है।
* ''एतयर्चा विसंयुक्तः काले न क्रियया स्वया।
: ''ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां जाति साधुषु ॥
: इस गायत्री महामन्त्र के जप से और अपने सदाचारादि कर्तव्यों से विरहित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सज्जनों में निन्दा को प्राप्त करता है।
* ''योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः।
: ''स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूत खमूर्तिमान् ॥
: जो द्विज आलस्य छोड़कर प्रतिदिन प्रणय और व्यहतियों के साथ गायत्री-महामन्त्र का तीन वर्षपर्यन्त जप करता है, वह इस मन्त्र के प्रभाव से अपना गायत्री मन्त्रमय परमात्मा के अनुग्रह से आकाशरूप होकर सच्चिदानन्दस्वरूप पर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
=== राजा एवं राज्य ===
*''अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
: ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनु० ७।३ ॥
: अर्थात् बिना राजा के इस लोक में सब ओर अराजकता फैल जायेगी, जिसके कारण सब लोग सब ओर से भय को प्राप्त होंगे (इस स्थिति का आज हम पर्याप्त मात्रा में अनुभव कर रहे हैं !) । इन सबकी रक्षा के लिए परमात्मा ने राजा को बनाया । अर्थात् राजा का प्रमुख [[धर्म]] प्रजा की रक्षा करना है ।
* ''इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
: ''चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ मनु० ७।४ ॥
: ईश्वर ने जो राजा की सृष्टि की (उपर्युक्त श्लोक में), उसमें इन्द्र, अनिल = वायु, यम, अर्क (= सूर्य), अग्नि, वरुण, चन्द्र और वित्तेश (= कुबेर) के शाश्वत् अंश, अर्थात् उनके मुख्य, सार-रूप अंश होने चाहिए । अर्थात् राजा में इन दैवी शक्तियों के मुख्य गुण पाए जाने चाहिए ।
* ''वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
: ''तथाभिवर्षेत् स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ मनु० ९।३०४ ॥
: जिस प्रकार इन्द्र, या प्रकृति की वृष्टि-शक्ति, वर्ष में चार माह वर्षा करके सबको तृप्त कर देता है, वैसे ही राजा को अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि-शान्ति-उन्नति की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहिए । उसको अपनी प्रजा को ऐश्वर्य-युक्त करना चाहिए । यह उसका '''इन्द्रव्रत''' कहलाता है ।
* ''अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
: ''तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ मनु० ९।३०५ ॥
: जिस प्रकार शेष आठ मास सूर्य, अपनी किरणों के द्वारा, सब वस्तुओं में से जल हरता रहता है, उसी प्रकार राजा भी, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, नित्य कर की वसूली करे । यह उसका '''अर्कव्रत''' होता है ।
* ''प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
: ''तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ मनु० ९।३०६ ॥
: जिस प्रकार वायु सब वस्तुओं में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा अपनी राष्ट्र के हर भाग में प्रवेश करके, वहां की सूचना रखनी चाहिए । यह उसका '''मारुतव्रत''' कहलाता है । जो राजा अपनी प्रजा के अनकहे दुःख-दर्द नहीं जानेगा, और उनका समाधान नहीं करेगा, वह आगे जाकर स्वयं अपने पद से च्युत होगा ।
* ''यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति ।
: ''तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतं ॥ मनु० ९।३०७ ॥
: जिस प्रकार यम, अर्थात् परमात्मा का नियन्त्रक स्वरूप, समय आने पर कर्मानुसार सब को प्रिय या अप्रिय कर्मफल देकर नियन्त्रित करता है, उसी प्रकार राजा को प्रजा को दण्ड और लाभ देकर नियन्त्रण में रखना चाहिए । यह उसका '''यमव्रत''' होता है ।
* ''वरुणेन यथा पाशैर्बद्धः एवाभिदृश्यते ।
: ''तथा पापान् निगृह्णीयाद्व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ मनु० ९।३०८ ॥
: जिस प्रकार मनुष्य पानी के भँवर में वरुण द्वारा जाल में बांधा हुआ सा दीखता है, उसी प्रकार राजा को पापियों को कारागार के बन्धन में डालना चाहिए, जिससे अन्य प्रजा भय-रहित होकर रह सके । यह उसका '''वारुणव्रत''' होता है ।
* ''परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
: ''तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ मनु० ९।३०९ ॥
: जिस प्रकार पूरे चाँद को देखकर मानव हर्ष करते हैं, वैसी ही प्रकृति राजा की होनी चाहिए । अर्थात् राजा की आर्थिक व नैयायिक व्यवस्था से सन्तुष्ट जन उसको देखकर आह्लादित होने चाहिए । वही राजा '''चान्द्रव्रतिक''' कहलाता है ।
* ''प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु ।
: ''दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतं ॥ मनु० ९।३१० ॥
: जिस प्रकार अग्नि शाक, धातु, आदि के दोषों को जला देती है, उसी प्रकार राजा को चाहिए कि वह पापकर्मों में प्रतापी और तेजस्वी हो, अर्थात् स्वयं भयभीत न हो, अपितु पापी को भय दिलाए, और दुष्ट मन्त्री, अधिकारी तक को भी कठोर दण्ड दे । राजा के प्रतिनिधि ही यदि अत्याचार करेंगे, तो प्रजा में न्यायव्यवस्था स्थापित ही नहीं हो सकती । यह राजा का '''आग्नेयव्रत''' होता है ।
* ''यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
: ''तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतं ॥ मनु० ९।३११ ॥
: जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को, बिना भेद-भाव के, समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार राजा को सारी प्रजा का पक्षपात-रहित होकर पालन-पोषण करना चाहिए । यह उसका '''पार्थिव व्रत''' कहलाता है ।
* ''एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
: ''स्तेनान् राजा निगृह्णीयात् स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ मनु० ९।३१२ ॥
: ऊपर दिए सारे व्रतों के द्वारा और अन्य उपायों के द्वारा भी, आलस-रहित होकर, राजा सर्वदा अपने राष्ट्र और दूसरे देशों से आए हुए घुसपैठी चोरों को अपने वश में रखे । किसी भी प्रकार की हानि से, हर सम्भव उपाय के द्वारा, प्रजा और राष्ट्र को राजा बचाए ।
* ''वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगो यथा यथा ।
: ''तथा तथा दमः कार्यो हिंसायामिति धारणा ॥ मनु० ८.२८५ ॥
: वृक्ष आदि सब पौधों के फल, फूल, पत्ता तथा लकड़ी आदि के द्वारा जैसा-जैसा उपयोग होता हो, उनको (काटने आदि से) नष्ट करने वाले अपराधी को वैसा-वैसा ही दण्ड देना चाहिए, ऐसा शास्त्रनिर्णय है।<ref>[https://enjoylearningsanskrit.com/scriptures/manu-smriti/chapter-8/?d=1&r=1&n=1&a=1&t=1&b=1&en=1&hi=0&es=0&he=0 Enjoy Learning Sanskrit]</ref>
=== नारी ===
* ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
: ''यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥"
: जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती, (उनका सम्मान नही होता) वहाँ किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं।
* ''शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
: ''न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥'' -- मनुस्मृति ३/५७
: जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।)
* ''स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्।
: ''विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ॥ (मनुस्मृति-२.२४०)
: स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सबसे (सब देशों तथा सब मनुष्यों से) ग्रहण करें।
* ''वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृत।
: ''पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥
: नारियों का पाणि-ग्रहण संस्कार ही गृहम सूत्रों में कहा गया संस्कार है। निष्ठापूर्वक पतिसेवा ही गुरूकूल में निवास है। गृहकार्य को कुशलता से करना ही यज्ञ का अनुष्ठान है।
=== गृहस्थ ===
* ''यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम् ।
: ''गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥'' -- मनुस्मृतिः ३।७८ ॥
: क्योंकि बाकी तीनों ही आश्रमी गृहस्थ से प्रतिदिन अन्न, वस्त्रादि, दान प्राप्त करते हैं, इसलिए वस्तुतः गृहस्थी ही उनको धारण करता है । इस कारण से, गृहस्थाश्रम ही सबमें बड़ा है ।
* ''दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥'' -- मनु० ३।७५ ॥
: गृहस्थ देवयज्ञ के द्वारा सारे चराचर जगत् का भरण करता है ।
=== भारत या आर्यावर्त ===
* ''आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।
: ''तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्त विदुर्बुधाः ॥
: पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य में जो प्रदेश ( भू-भाग ) विराजमान है, उसे विद्वान् पुरुष ' आर्यावर्त ' नाम से जानते हैं।
* ''एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
: ''स्वं स्त्रं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥
: ऋषि संसार के मनुष्यों को सम्बोधित करते हैं कि भूतल के सम्पूर्ण मनुष्यों की ब्रह्मावर्त देश में उत्पन्न ज्ञान साधनारत ब्राह्मण के चरित्र से अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
=== विविध ===
* ''अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
: ''संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥'' मनु० ५१॥
: (मारने की) अनुमति देने वाला, अंग काटने वाला, मारने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला, खाने वाले – ये सब घातक (कसाई) हैं । अर्थात् मारने वाले आठ कसाई होते हैं ।
* ''अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
: ''अज्ञं हि बालं इत्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥
: जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता है, और जो मन्त्रद (अर्थात् दूसरे को विचार देने वाला) है वह पिता है, क्यों कि अज्ञानी को ही बालक कहा गया है और मन्त्रद को पिता कहा गया है।
* '' वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः ।
: '' तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥'' मनु० ४।१४७ ॥
: जितना समय मिले, उतना समय, बिना आलस्य किए, नित्य वेदाभ्यास करना चाहिए क्योंकि वही परम धर्म है; अन्य सभी धर्म उपधर्म ही हैं ।
* '' सर्वान् परित्यजेतर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ।
: ''यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥'' मनु० ४।१७ ॥
: जो भी कार्य स्वाध्याय के विरोधी हैं, उन सभी को छोड़ता जाए, और किस भी तरह थोड़ा पढ़ाए, क्योंकि स्वाध्याय की कृतकृत्यता इसी में है ।
* ''दानधर्म निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम् ।
: ''परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥'' -- मनु० ४।२२७ ॥
: अर्थात् सुखी होकर (वस्तु से मोह पूर्णतया हटाते हुए), गृहस्थ को नित्य यथाशक्ति ऐष्टिक और पौर्तिक कार्यों के लिये पात्र को ढूढ़ कर उसको दान देना चाहिए । ( ऐष्टिक = यज्ञों का आयोजन, और पौर्तिक = रुग्णालय, पाठशाला, आदि बनवाना)। (पात्र का योग्य होना बहुत ही आवश्यक है । गलत पात्र को देने से पुण्य तो क्या, केवल पाप का ही अर्जन होता है।)
* ''त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यर्जितं धनम् ।
: ''दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥'' -- मनु० ४।१९३ ॥
: तीन प्रकार के गलत पात्रों को देने से, धर्मानुसार अर्जित धन भी, दाता के लिए इसी जन्म में अनर्थ का कारण बन जाता है, और दान लेने वाले के लिए परजन्म में दुःख पहुंचाता है ।
* '' सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
: '' एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥'' -- मनु० ४।१६० ॥
* '' सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् ।
: '' सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥'' -- मनु० ४।१२ ॥
: परम सन्तोष में स्थित हो, सुख चाहने वाला इच्छाओं को वश में रखे, क्योंकि सन्तोष ही सुख का मूल है, और असन्तोष दुःख का जनक है ।
* '' नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः ।
: '' आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥'' -- मनु० ४।१३७ ॥
: यदि अनेक प्रयासों के बाद भी हम दीन बने रहें, तब भी हमें अपनी अवस्था के लिए अपने को दोष नहीं देना चाहिए, और श्री की प्राप्ति को कभी भी दुर्लभ न समझते हुए, मृत्यु-पर्यन्त प्रयत्न करते ही रहना चाहिए।
* '' नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् ।
: '' द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत ॥'' मनु० ४।१६३ ॥
: हमें नास्तिक, वेदों की निन्दा करने वाला, विद्वानों की निन्दा करने वाला, द्वेष, कुटिल, अभिमान, क्रोध या कटाक्ष करने वाला - नहीं होना चाहिए ।
* ''दृढकारो मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् ।
: ''अहिंस्रो दमदानभ्यां जयेत् स्वर्गं तथाव्रतः ॥'' -- मनु० ४।२४६ ॥
: हमें क्या-क्या होना चाहिए, इस विषय में कहते हैं – सदा धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए, सबों से कोमल व्यवहार करना चाहिए, क्रूरों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए, स्वयं अहिंसक होना चाहिए, जितेन्द्रिय और दानशील होना चाहिए ।
* ''अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कहिंचित्।
: ''यद्यद्धि कुरुते किञ्चितत्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥
: इस जगत् में कभी भी बिना इच्छा के कोई भी क्रिया या कर्म सम्पन्न होता दिखाई नहीं देता है, क्योंकि मनुष्य जो जो कर्म करता है, वह कर्म उसकी इच्छा की ही चेष्टा का परिणाम है-ऐसा मानना चाहिये।
* ''यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः।
: ''स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥
: मनु ने जिन सम्पूर्ण चारों वर्गों के गुणस्वभावादि धर्मों का उल्लेख किया है। वे सब वेदों में कहे गये है, क्योंकि भगवान मनु समस्त वेदों के अर्थ ज्ञाता है।
* ''नोच्छिप्टं कस्यचिद्दद्यान्नद्याच्चैव तथाऽन्तरा।
: ''न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिप्टः क्वचित् व्रजेत् ॥
: किसी को जूठा भोजन नहीं देना चाहिए। प्रातः और सायंकाल के भोजन के अतिरिक्त बीच में भोजन नहीं करना चाहिए अत्यधिक भोजन नहीं लेना चाहिए। कहीं भी जूठे मुँह नहीं जाना चाहिए।
* ''एकादशं मनोज्ञयं स्वगुणेनोभयात्मकम्।
: ''यस्मिजिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ॥
: मन अपने गुणों के प्रभाव से ग्यारहवीं उभयात्मक ( दोनों ही ) अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय भी है। इसीलिए मन के जीत लेने पर ये दोनों ज्ञान व कर्मेन्द्रियाँ स्वमेव विजित हो जाती है।
* ''वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
: ''न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित्॥
: दूषित हृदय वाले व्यक्ति का वेदाध्ययन, त्याग, यज्ञादि का अनुष्ठान, यम-नियमों का पालन, अभ्यास ये कभी सिद्धि प्राप्त नहीं करते हैं।
* ''आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः।
: ''आप्तः शक्तोऽर्थदः साधुः स्वोऽध्याप्या दश धर्मत ॥
: कौन-कौन शिक्षा देने योग्य हैं? इस सम्बन्ध में कहते हैं कि आचार्य का पुत्र, सेवापरायण, अन्य विषय की शिक्षा या गुरू को व्यवहार के सम्बन्ध में परामर्श देने वाला, धर्मतत्पर, पवित्र मन वाला, श्रेष्ठ, सत्यवादी, पाठ को धारण करने में समर्थ, धन देने वाला, सज्जन और स्वजातीय में दश ही गुरु के द्वारा धर्मानुसार अध्यापन योग्य हैं।
* ''नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः।
: ''जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्॥
: बुद्धिमान मनुष्य को यह उचित है कि वह श्रद्धापूवक प्रश्न न करने वाले को अथवा अन्याय के साथ पूछने वाले को उत्तर न दे। वह जानकार होते हुए भी जड़ या मूर्ख की भाँति आचरण करें।
* ''फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
: ''न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥ (६.६७)
: रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है।
*'' बलाद्दत्तं बलाद् भुक्त बलाद्यच्चापि लेखितम् ।
: ''सर्वान्बल कृतानर्थानकृतान्मनुरब्रवीत् ॥
: बलात्कार से जो नहीं देने योग्य वस्तु दी गई है, जो भूमि, भूषणादि भोगा गया हो, ऋण लेने या ब्याज सम्बन्धी लेख लिखवाया गया हो, बलात् किये गये ये सभी कार्य अमान्य हैं (ऐसा मनु कहते हैं )।
* चुगली, साहस कर्म, द्रोह, ईर्ष्या , असूया, अर्थदूषण, कठोर वचन और क्रूरता - ये आठ क्रोधजन्य व्यसन हैं। (7.48)
* विद्वानों ने दोनों प्रकार के व्यसनों का मूल लोभ कहा है। उस लोभ को प्रयत्न से जीतें। (7.49)
* काम जन्य व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्री सहवास व शिकार यथाक्रम अत्यन्त दुखदायी है। (7.50)
* मृत्यु और व्यसन में व्यसन ही विशेष कष्टप्रद है क्योकि व्यसनी पुरुष निरन्तर नीचे गिरता जाता है तथा अव्यसनी स्वर्ग प्राप्त करता है। (7.53)
* सुसाध्य कर्म भी कोई केवल अकेले नहीं कर सकता है फिर महान फल वाले राजकाज को सहायकों से रहित राजा अकेला कैसे चला सकता है। (7.55)
* राजा को चाहिए की मंत्रियों में जो शूर, दक्ष, श्रेस्ठ कुल वाले सदाचारी हों उन्हें खान एवम अन्न भंडार आदि पर नियुक्त करे तथा भीरु स्वभाव का पुरुषों को अन्तःपुर के सामान्य कार्यों पर लगाए। (7.62)
* चेष्ठा से मनोभाव समझने वाले पवित्र, चतुर तथा कुलीन पुरुष को दूत नियुक्त करे। (7.64)
* यह निश्चय जानिए कि जैसे अग्नि में ईंधन और घी डालने से अग्नि की ज्वाला और अधिक बढ़ जाती है, वैसे ही कामों के उपभोग से कभी भी काम शांत नहीं होता है बल्कि निरंतर बढ़ता ही जाता है।
* शुद्धाचरण से, चरित्रवान बनने से, स्त्री. पुरुष निश्चित रूप से दीर्घायु प्राप्त करते हैं।
* सब दानों में ब्रह्म (विद्या) का दान सबसे श्रेष्ठ है।
* बिना हिंसा के मांस नहीं मिलता, हिंसा पाप है। अतः मांस खाना भी पाप है।
* चोरी करने वाले के हाथ काट दो। दुष्ट कर्म करने वाले की आँख निकाल दो। व्यभिचारी पुरुष को गर्म-गर्म विशाल तवे पर डाल कर मार दो।
* व्यभिचारिणी स्त्री को कुत्ते से नुचवा कर मरवा दो। यह दण्ड दुष्टों को सार्वजनिक स्थान पर दिया जाए जिससे कि अधिकाधिक लोग देख कर शिक्षा ग्रहण करें और भय के कारण स्वप्न में भी कभी पाप करने का विचार न करें।
* न्याययुत दंड का नाम ‘राजा’ और ‘धर्म’ है। यदि दण्ड नहीं तो राजा का कोई औचित्य नहीं। यदि दण्ड नहीं तो धर्म का भी कोई आधार नहीं।
* शरीर जल से साफ होता है, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा धर्म से साफ होती है।
* क्रूर स्वभाव का परित्याग सबसे बड़ा धर्म है।
* उचित रीति से स्त्री की रक्षा करने से अपने कुल, संतान, आत्मा व धर्म की रक्षा होती है।
* पति-पत्नी को इस विधि से जीवन व्यतीत करना चाहिए कि जिसमें परस्पर मरणपर्यन्त वियोग न हो।
* स्त्रियाँ सन्तान को जन्म देती हैं। वे घर का सौभाग्य हैं, वे पूजा के योग्य हैं, वे घर की चिराग (गृह दीप्ति) हैं।
* कन्या विवाह योग्य होने पर भी मरणपर्यन्त घर में बैठी रहे परंतु उस कन्या का कभी गुणहीन पुरुष को दान न करें।
* जिस कुल या परिवार में स्त्रियाँ कष्ट प्राप्त करती हैं, उन्हें पीड़ित किया जाता है, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जहाँ वे कष्ट या दुख को प्राप्त नहीं होती, वह कुल, परिवार सदा वृद्धि को प्राप्त करता है।
* गृहस्थाश्रम के आश्रम ही अन्य तीन आश्रमों के पालन-पोषण आदि की व्यवस्था की जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम सबसे बड़ा आश्रम है।
* सन्तानों को जन्म देना, जन्मे हुओं का पालन-पोषण – ये महत्तम कार्य नारी के ही हैं। दैनिक लोकव्यवहार रूपी कार्यों का प्रत्यक्ष मुख्य आधार नारी ही है।
* अध्ययन नहीं करने से, आचार का पालन नहीं करने से, आलस्य और अन्य दोषों के कारण असमय मृत्यु होती है।
* जहाँ सब एक हैं, वहाँ सब कुछ अपने आप खिंच कर चला आता है। एकता सर्वदात्री है।
* दान लेने का पात्र होने पर भी बार-बार दान न लें क्योंकि उससे ब्रह्म तेज नष्ट हो जाता है।
* अध्ययन, तप, ज्ञान पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह और ‘आत्म-चिंतन ‘- ये सब सात्त्विक गुण के लक्षण हैं।
* ब्रह्मचारी को चाहिए कि अखण्डित ब्रह्मचर्य तथा अपनी कुल परम्परा का पालन करते हुए तीनों वेदों अथवा दो वेदों या एक वेद का पूर्ण अध्ययन समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।
* प्रात:काल उठ कर राजा तीनों वेदों में कुशल वृद्ध विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हो और उनके निर्देशों के अनुसार राज्य का कार्य संचालन करें।
* मनुष्यों को ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद के अतिरिक्त अन्य विविध मंत्रों को जानना चाहिए। ये जीवों के लिए कल्याणपरक होते हैं। जो इन तीन वेदों को भली-भांति जानता है, वही वेदवेत्ता कहलाता है।
* देश, धर्म, शील व संस्कृति की हिंसा करने वाले को मारने में कोई पाप नहीं है।
== मनु और मनुस्मृति के बारे में उद्धरण ==
* मनुस्मृति, सृष्टि के प्रथम राजा मनु द्वारा रचित प्रथम संविधान है। -- [[स्वामी दयानन्द सरस्वती]]
* मनुस्मृति ही वह आधारशिला है जिसके ऊपर मिस्र, परसिया, ग्रेसियन और रोमन कानूनी संहिताओं का निर्माण हुआ। आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। -- लुई जैकोलिऑट (Louis Jacolliot), बाइबल इन इण्डिया' नामक ग्रन्थ में <ref>V. Krishna Rao. Expansion of Cultural Imperalism Through Globalisation. Manak Publications. p. 82.</ref>
* [[बाइबल]] को बन्द करो और मनुस्मृति को खोलो। इसमें जीवन की सकारात्मक छबि है। -- जर्मनी के महान दार्शनिक [[फ्रेडरिक नीत्से|फ्रेदरिक नीत्से]] (Friedrich Nietzsche)
* मनुस्मृति भारत में जातिवाद के लिये उत्तरदायी है। -- [[भीमराव आम्बेडकर]]
* यद्यपि जातिगत भेदभाव आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास के लिये हानिकारक है, जातिवाद का हिन्दू धर्म और मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह ग्रन्थ व्यवसायों की भिन्नता और विविधता के महत्व को प्रतिपादित करता है। यह किसी के अधिकार की परिभाषा नहीं करता बल्कि उनके कर्तव्यों की परिभाषा करता है। सभी कार्य, चाहे वे शिक्षण के हों या सफाई के, समान रूप से आवश्यक हैं और उनका स्थान भी बराबरी का है। मैं चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ को सम्पूर्णतः पढ़ना चाहिए लेकिन उन भागों को नहीं मानन चहिये जो सत्य और [[अहिंसा]] से मेल न खाते हों। -- [[महात्मा गांधी]]
* मनु और अन्य ऋषियों की संहिताएं, कर्म-कांड में निर्धारित श्लोकों का पालन करते हुए, मुख्य रूप से समय, स्थान और व्यक्तियों की आवश्यकताओं के अनुसार सामाजिक कल्याण के लिए अनुकूल आचरण के नियम निर्धारित करती हैं। -- [[एनी बेसेन्ट]]
==इन्हें भी देखें==
* [[धर्म]]
==सन्दर्भ==
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सिंह
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अनुनाद सिंह
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'''सिंह''' एक वन्य जन्तु है। इसे शेर, ब्याघ्र, वनराज, मृगेन्द्र आदि भी कहते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
: ''विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
: जंगल के अन्य पशु मिलकर शेर का कोई राज्याभिषेक या संस्कार नहीं करते हैं। शेर अपनी वीरता, पराक्रम और पुरुषार्थ के बल पर स्वयं ही जंगल का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।
* ''उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
: ''नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
: कार्य केवल परिश्रम (उद्यम) करने से ही सिद्ध होते हैं, मात्र मन में इच्छा करने या कल्पना करने से नहीं। जिस प्रकार सोए हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता, उसे भी अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार करना ही पड़ता है।
* ''अहिं नृपं च शार्दूलं वृद्धं च बालकं तथा।
: ''परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत॥
: सांप, राजा, शेर, वृद्ध व्यक्ति, बालक, किसी अन्य व्यक्ति का कुत्ता तथा एक मूर्ख व्यक्ति - यदि ये सात सोये हुए हों तो उन्हें नींद से कभी भी ना जगाएँ।
: (इन सातों का व्यवहार नींद से जागने के बाद अप्रत्याशित या हानिकारक हो सकता हैं, अतः इन्हें जितनी आवश्यक हैं उतनी नींद में रहने देना श्रेयस्कर हैं।)
* ''उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
: ''दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
: ''दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
: ''यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
: लक्ष्मी (धन की देवी) कर्म करने वाले पुरुष-सिंह के पास आती है, "देवता (भाग्य) देने वाला हैं" ये तो कायर पुरुष कहते हैं। इसलिए देव (भाग्य) को छोड़ कर अपनी शक्ति से पौरुष (कर्म) करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध नहीं होता है तो तुम्हारी क्या कमी (दोष) है ? (आपका कोई दोष नहीं है)
* समर शेष है एक अकेला दोषी नहीं है व्याध्र
: जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। -- [[रामधारी सिंह 'दिनकर']], 'परशुराम प्रतिज्ञा' में
: यह विदित है कि व्याघ्र का शिकार व्याघ्र नहीं करते! बाघ केवल खरगोश, हिरण या अपने से कमजोर जानवरों का ही शिकार करते हैं!
* चिड़ियों से मै बाज लडाऊ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ
: सवा लाख से एक लडाऊ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ॥ -- [[गुरु गोविन्द सिंह]]
<poem>
* इन्द्र जिमि जंभ पर , वाडव सुअंभ पर।
रावन सदंभ पर , रघुकुल राज है ॥१॥
पौन बरिबाह पर , संभु रतिनाह पर।
ज्यों सहसबाह पर , राम द्विजराज है ॥२॥
दावा द्रुमदंड पर , चीता मृगझुंड पर।
भूषण वितुण्ड पर , जैसे मृगराज है ॥३॥
तेजतम अंस पर , कान्ह जिमि कंस पर।
त्यों म्लेच्छ बंस पर , शेर सिवराज है ॥४॥ -- कवि भूषण, शिवराज भूषण में
: जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है। पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।
</poem>
* ''सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ।
: ''राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ॥'' -- हितोपदेश
: यदि सांप, बाघ, हाथी और सिंह आदि हिंसक पशुओं को वश में किया जा सकता है, तो राजा को क्यों नहीं प्रसन्न किया जा सकता?
* ''बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
: ''पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥'' -- हितोपदेश
: जिसके पास बुद्धि है वही बलशाली है,निर्बुद्धि के पास बल कहाँ ? देखो न, अपनी शक्ति से मदोन्मत्त सिंह को खरगोश ने (कुएँ में) गिरा दिया।
* ''सिंहवत्सर्ववेगेन पतन्त्यर्थे किलार्थिनः॥'' -- योगवाशिष्ठ
: जो कार्य संपन्न करना चाहते हैं, वे सिंह की तरह अधिकतम वेग से कार्य पर टूट पड़ते हैं।
==इन्हें भी देखें==
*[[शक्ति]]
*[[बल]]
*[[क्षत्रिय]]
[[en:Lions]]
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रघु वीर
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"'''डॉ० रघुवीर''' [[संस्कृत]] के विद्वान, कोशकार एवं भारतीय राजनेता थे। == उद्धरण == * महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं। * [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है। * शब..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''डॉ० रघुवीर''' [[संस्कृत]] के विद्वान, कोशकार एवं भारतीय राजनेता थे।
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
==सन्दर्भ==
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:रघु वीर|डॉ० रघुवीर]]''' [[संस्कृत]] के विद्वान, कोशकार एवं भारतीय राजनेता थे।
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
==सन्दर्भ==
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:रघु वीर|आचार्य रघुवीर]]''' (३०, दिसम्बर १९०२ - १४ मई १९६३) प्रख्यात विद्वान्, महान भाषाविद, कोशकार, शब्दशास्त्री, राजनेता तथा भारतीय धरोहर के मनीषी थे। एक ओर आपने कोशों की रचना कर राष्ट्रभाषा [[हिंदी]] एवं भारतीय भाषाओं का शब्दभण्डार संपन्न किया, तो दूसरी ओर विश्व में विशेषतः एशिया में फैली हुई [[भारतीय संस्कृति]] की खोज कर उसका संग्रह एवं संरक्षण किया। आप [[भारतीय संविधान]] सभा के सदस्य थे। वे केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन [[संस्कृत]], फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलगु, पंजाबी पर भी उनका अधिकार था। इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है) पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी।
भारतीय संस्कृति को जगत्गुरू के पद पर आसीन करने के लिये उन्होने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों को एकत्र किया। आचार्य रघुवीर ने ४ लाख शब्दों वाला अंग्रेजी-हिन्दी तकनीकी शब्दकोश के निर्माण का महान कार्य भी किया। उनकी कृतित्व की महत्ता इस बात में निहित है कि उन्होंने अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक और वैज्ञानिक आधार वाली है।
यह स्मरणीय है कि हिंदी में शब्दावली निर्माण का कार्य वैज्ञानिक ढंग से सर्वप्रथम डॉ० रघुवीर ने प्रारंभ किया। उन्होंने शब्दावली निर्माण के जो सिद्धांत स्थिर किए थे उन सिद्धांतों का शब्दावली रचना के अधिकाश क्षेत्र में अनुसरण किया जा रहा है। डॉ रघुवीर जीवनपर्यन्त अंग्रेजी के एकाधिकार के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में कार्यरत रहे।
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
* जर्मन भाषा की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य बेहद सरल हैं। किंतु हिंदी की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य उलझी हुई जटिलता के नमूने हैं। विशेषण उपवाक्यों (adjectival clauses) और वाक्यांशों के एक के ऊपर एक ढेर लगने से, एक ही वाक्य में पांच, आठ या उससे भी अधिक क्रियाएं हो सकती हैं, जिनमें निरपेक्ष संरचनाएं (absolute constructions) आपस में गुंथी होती हैं। वाक्य के कर्ता और क्रिया के बीच की दूरी इतनी अधिक हो जाती है कि साधारण मानव बुद्धि उसे पहली या दूसरी बार पढ़ने पर भी समझने में विफल रहती है। अंग्रेजी के वाक्य, विशेष रूप से कानूनी दस्तावेजों में, ऐसा जटिल जाल होते हैं कि केवल एक विशेष रूप से प्रशिक्षित दिमाग ही उनसे होकर मार्ग निकाल सकता है। जब किसी को ऐसे वाक्यों का अनुवाद करना होता है, इस भय से कि कि किसी भी शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग या कुछ नया जोड़ना कानून में अप्रमेय अनर्थ कर सकता है, व्यक्ति शब्दों और वाक्यांशों के क्रम, उनके अंतर-संबंधों और सबसे बढ़कर उनके मुश्किल से समझ आने वाले जुड़ाव को बनाए रखने में पूरी निष्ठा बरतने के लिए विवश होता है। अंग्रेजी भाषा सभी प्रकार के लालित्य से विहीन है, यद्यपि यह बाल की खाल निकालने के लिए बहुत उपयुक्त है। प्रत्येक पद या वाक्यांश, तथा शब्दों के प्रत्येक समूह की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। उनमें से किसी एक पर कोई न्यायिक निर्णय दिया गया हो सकता है। वहां संसद का कोई नियम या किसी महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला हो सकता है जो उस वाक्यांश के किसी एक शब्द या उसके पीछे छिपे विचार पर टिका हो। इस प्रकार, वे सभी नियम जो सामान्यतः साहित्यिक कृतियों के अनुवाद पर लागू होते हैं, यहां निष्फल हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जिसका आकर्षण, सुंदरता या पठन-सुगमता (readability) की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अत्यंत निरंतरता और निकटता से पालन किया जाना अनिवार्य है।<ref> India's National language by Dr Raghu Vir, page 240</ref>
==सन्दर्भ==
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'''[[:w:रघु वीर|आचार्य रघुवीर]]''' (३०, दिसम्बर १९०२ - १४ मई १९६३) प्रख्यात विद्वान्, महान भाषाविद, कोशकार, शब्दशास्त्री, राजनेता तथा भारतीय धरोहर के मनीषी थे। एक ओर आपने कोशों की रचना कर राष्ट्रभाषा [[हिंदी]] एवं भारतीय भाषाओं का शब्दभण्डार संपन्न किया, तो दूसरी ओर विश्व में विशेषतः एशिया में फैली हुई [[भारतीय संस्कृति]] की खोज कर उसका संग्रह एवं संरक्षण किया। आप [[भारतीय संविधान]] सभा के सदस्य थे। वे केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन [[संस्कृत]], फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलगु, पंजाबी पर भी उनका अधिकार था। <ref>[https://www.bhartiyadharohar.com/achrya-raghuveer/ आचार्य रघुवीर : ज्ञान के अक्षय कोष, एक महापुरुष, एक द्रष्टा, जिसे देश ने भुला दिया…]</ref> इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है) पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी।
भारतीय संस्कृति को जगत्गुरू के पद पर आसीन करने के लिये उन्होने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों को एकत्र किया। आचार्य रघुवीर ने ४ लाख शब्दों वाला अंग्रेजी-हिन्दी तकनीकी शब्दकोश के निर्माण का महान कार्य भी किया। उनकी कृतित्व की महत्ता इस बात में निहित है कि उन्होंने अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक और वैज्ञानिक आधार वाली है।
यह स्मरणीय है कि हिंदी में शब्दावली निर्माण का कार्य वैज्ञानिक ढंग से सर्वप्रथम डॉ० रघुवीर ने प्रारंभ किया। उन्होंने शब्दावली निर्माण के जो सिद्धांत स्थिर किए थे उन सिद्धांतों का शब्दावली रचना के अधिकाश क्षेत्र में अनुसरण किया जा रहा है। डॉ रघुवीर जीवनपर्यन्त अंग्रेजी के एकाधिकार के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में कार्यरत रहे।
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
* जर्मन भाषा की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य बेहद सरल हैं। किंतु हिंदी की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य उलझी हुई जटिलता के नमूने हैं। विशेषण उपवाक्यों (adjectival clauses) और वाक्यांशों के एक के ऊपर एक ढेर लगने से, एक ही वाक्य में पांच, आठ या उससे भी अधिक क्रियाएं हो सकती हैं, जिनमें निरपेक्ष संरचनाएं (absolute constructions) आपस में गुंथी होती हैं। वाक्य के कर्ता और क्रिया के बीच की दूरी इतनी अधिक हो जाती है कि साधारण मानव बुद्धि उसे पहली या दूसरी बार पढ़ने पर भी समझने में विफल रहती है। अंग्रेजी के वाक्य, विशेष रूप से कानूनी दस्तावेजों में, ऐसा जटिल जाल होते हैं कि केवल एक विशेष रूप से प्रशिक्षित दिमाग ही उनसे होकर मार्ग निकाल सकता है। जब किसी को ऐसे वाक्यों का अनुवाद करना होता है, इस भय से कि कि किसी भी शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग या कुछ नया जोड़ना कानून में अप्रमेय अनर्थ कर सकता है, व्यक्ति शब्दों और वाक्यांशों के क्रम, उनके अंतर-संबंधों और सबसे बढ़कर उनके मुश्किल से समझ आने वाले जुड़ाव को बनाए रखने में पूरी निष्ठा बरतने के लिए विवश होता है। अंग्रेजी भाषा सभी प्रकार के लालित्य से विहीन है, यद्यपि यह बाल की खाल निकालने के लिए बहुत उपयुक्त है। प्रत्येक पद या वाक्यांश, तथा शब्दों के प्रत्येक समूह की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। उनमें से किसी एक पर कोई न्यायिक निर्णय दिया गया हो सकता है। वहां संसद का कोई नियम या किसी महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला हो सकता है जो उस वाक्यांश के किसी एक शब्द या उसके पीछे छिपे विचार पर टिका हो। इस प्रकार, वे सभी नियम जो सामान्यतः साहित्यिक कृतियों के अनुवाद पर लागू होते हैं, यहां निष्फल हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जिसका आकर्षण, सुंदरता या पठन-सुगमता (readability) की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अत्यंत निरंतरता और निकटता से पालन किया जाना अनिवार्य है।<ref> India's National language by Dr Raghu Vir, page 240</ref>
* भारत एक नये युग में प्रवेश कर रहा है। इसे दिशा देने की आवश्यकता है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में
* यह केवल अस्सी वर्ष पुरानी बात है, 1867 में, कि जापान की सरकार ने अपने देश को विदेशियों के लिए खोलने का निर्णय लिया। बीस साल बाद उन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन शुरू किया। यह एक कठिन कार्य था, लेकिन जापानी लोग घबराए नहीं। वे ऊर्जा से भरे हुए थे। उनके पास युवाओं का उत्साह था। जापान कोई गुलामों का देश नहीं था। यह एक ऐसा देश था जो हमेशा से स्वतंत्र रहा था, हमेशा ऊर्जावान और तरोताज़ा रहा था। यदि उन्होंने एक बार आधुनिक बनने का मन बना लिया, तो कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता था। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* ...लेकिन जापानी लोग बहुत अधिक जल्दबाजी में थे। वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। चाहे अच्छे हों, बुरे हों या साधारण, उन्होंने अपनी भाषा में शब्द तैयार कर लिए। विज्ञान की शब्दावली विशाल है। उनकी टीमों ने दिन-रात, महीनों और वर्षों तक तब तक काम किया, जब तक कि वे अपने स्वयं के तकनीशियनों, उद्योगपतियों, खनिकों, जहाजरानी विशेषज्ञों, इलेक्ट्रिशियनों और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को विज्ञान के सभी विभागों में प्रशिक्षित नहीं कर सके—चाहे वे केवल अकादमिक रुचि के हों या व्यावसायिक मूल्य के। जापानियों ने जिस भी काम में हाथ डाला, जिस भी चीज़ में अपना मन लगाया, वह सब अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही किया। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* कोई सोचेगा कि एक औसत जापानी दुनिया के बाकी हिस्सों में हो रहे वैज्ञानिक विकास से कैसे जुड़ सका। जापानियों के पास इसके लिए एक व्यवस्था (सिस्टम) थी। प्रत्येक शोधकर्ता अपने क्षेत्र में दुनिया के किसी भी हिस्से में हुए काम के बारे में जान सकता था। यह जानकारी उसे बिना किसी अधिक देरी के उपलब्ध करा दिया जाता था। यह व्यवस्था जटिल नहीं थी; यह सरल लेकिन प्रभावी थी। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* हमारे देश में शिक्षा जबरन अंग्रेजी के माध्यम से दी गई। इस कारण हमने अपनी भाषा के प्रति संवेदनशीलता खो दी है। हम दूसरों की गुलामी के तले इतने लंबे समय तक रहे हैं कि हम 'अपने आप की शक्ति' के महत्व को समझने की शक्ति ही खो चुके हैं। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* इस देश (भारत) में लगभग एक हजार अंग्रेजी शब्द इतने प्रचलित हो चुके हैं कि उनका अनुवाद करना ईशनिन्दा (ब्लासफेमी) से कम नहीं माना जायेगा। लेकिन जापानी लोगों ने जब यूरोपीय सभ्यता को अपनाया तब वे स्वतंत्र थे। वे किसी भी विदेशी भाषा के बोझ तले दबे नहीं थे और वे स्वयं को तथा अपनी आने वाली पीढ़ियों को किसी विदेशी भाषा के बोझ तले दबाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वे अपनी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा के माध्यम से सोचने में पूरी तरह असमर्थ थे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* विज्ञान को अपना बनाने के लिए हमारे पास अपने शब्द होने चाहिए। अंग्रेजी से तकनीकी शब्दों को उधार लेना हमें हमेशा अंग्रेजों का गुलाम बनाए रखेगा। यह सच है कि हमें अपना स्वयं का वैज्ञानिक साहित्य निर्मित करना है। अपनी भाषा के आने से वैज्ज्यानिक साहित्य उससे कहीं अधिक तेजी से निर्मित होगा जितना यह किसी अन्य तरीके से हो सकता है। अपनी भाषा को चिंतन का माध्यम बनाने और अपने स्वयं के तकनीकी शब्दों के होने से, विज्ञान वास्तव में हमारा अपना बन जाएगा। यह विदेशी नहीं रहेगा। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
==सन्दर्भ==
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'''[[:w:रघु वीर|आचार्य रघुवीर]]''' (३०, दिसम्बर १९०२ - १४ मई १९६३) प्रख्यात विद्वान्, महान भाषाविद, कोशकार, शब्दशास्त्री, राजनेता तथा भारतीय धरोहर के मनीषी थे। एक ओर आपने कोशों की रचना कर राष्ट्रभाषा [[हिंदी]] एवं भारतीय भाषाओं का शब्दभण्डार संपन्न किया, तो दूसरी ओर विश्व में विशेषतः एशिया में फैली हुई [[भारतीय संस्कृति]] की खोज कर उसका संग्रह एवं संरक्षण किया। आप [[भारतीय संविधान]] सभा के सदस्य थे। वे केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन [[संस्कृत]], फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलगु, पंजाबी पर भी उनका अधिकार था। <ref>[https://www.bhartiyadharohar.com/achrya-raghuveer/ आचार्य रघुवीर : ज्ञान के अक्षय कोष, एक महापुरुष, एक द्रष्टा, जिसे देश ने भुला दिया…]</ref> इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है) पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी।
भारतीय संस्कृति को जगत्गुरू के पद पर आसीन करने के लिये उन्होने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों को एकत्र किया। आचार्य रघुवीर ने ४ लाख शब्दों वाला अंग्रेजी-हिन्दी तकनीकी शब्दकोश के निर्माण का महान कार्य भी किया। उनकी कृतित्व की महत्ता इस बात में निहित है कि उन्होंने अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक और वैज्ञानिक आधार वाली है।
यह स्मरणीय है कि हिंदी में शब्दावली निर्माण का कार्य वैज्ञानिक ढंग से सर्वप्रथम डॉ० रघुवीर ने प्रारंभ किया। उन्होंने शब्दावली निर्माण के जो सिद्धांत स्थिर किए थे उन सिद्धांतों का शब्दावली रचना के अधिकाश क्षेत्र में अनुसरण किया जा रहा है। डॉ रघुवीर जीवनपर्यन्त अंग्रेजी के एकाधिकार के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में कार्यरत रहे।
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
* जर्मन भाषा की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य बेहद सरल हैं। किंतु हिंदी की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य उलझी हुई जटिलता के नमूने हैं। विशेषण उपवाक्यों (adjectival clauses) और वाक्यांशों के एक के ऊपर एक ढेर लगने से, एक ही वाक्य में पांच, आठ या उससे भी अधिक क्रियाएं हो सकती हैं, जिनमें निरपेक्ष संरचनाएं (absolute constructions) आपस में गुंथी होती हैं। वाक्य के कर्ता और क्रिया के बीच की दूरी इतनी अधिक हो जाती है कि साधारण मानव बुद्धि उसे पहली या दूसरी बार पढ़ने पर भी समझने में विफल रहती है। अंग्रेजी के वाक्य, विशेष रूप से कानूनी दस्तावेजों में, ऐसा जटिल जाल होते हैं कि केवल एक विशेष रूप से प्रशिक्षित दिमाग ही उनसे होकर मार्ग निकाल सकता है। जब किसी को ऐसे वाक्यों का अनुवाद करना होता है, इस भय से कि कि किसी भी शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग या कुछ नया जोड़ना कानून में अप्रमेय अनर्थ कर सकता है, व्यक्ति शब्दों और वाक्यांशों के क्रम, उनके अंतर-संबंधों और सबसे बढ़कर उनके मुश्किल से समझ आने वाले जुड़ाव को बनाए रखने में पूरी निष्ठा बरतने के लिए विवश होता है। अंग्रेजी भाषा सभी प्रकार के लालित्य से विहीन है, यद्यपि यह बाल की खाल निकालने के लिए बहुत उपयुक्त है। प्रत्येक पद या वाक्यांश, तथा शब्दों के प्रत्येक समूह की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। उनमें से किसी एक पर कोई न्यायिक निर्णय दिया गया हो सकता है। वहां संसद का कोई नियम या किसी महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला हो सकता है जो उस वाक्यांश के किसी एक शब्द या उसके पीछे छिपे विचार पर टिका हो। इस प्रकार, वे सभी नियम जो सामान्यतः साहित्यिक कृतियों के अनुवाद पर लागू होते हैं, यहां निष्फल हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जिसका आकर्षण, सुंदरता या पठन-सुगमता (readability) की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अत्यंत निरंतरता और निकटता से पालन किया जाना अनिवार्य है।<ref> India's National language by Dr Raghu Vir, page 240</ref>
* भारत एक नये युग में प्रवेश कर रहा है। इसे दिशा देने की आवश्यकता है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में
* यह केवल अस्सी वर्ष पुरानी बात है, 1867 में, कि जापान की सरकार ने अपने देश को विदेशियों के लिए खोलने का निर्णय लिया। बीस साल बाद उन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन शुरू किया। यह एक कठिन कार्य था, लेकिन जापानी लोग घबराए नहीं। वे ऊर्जा से भरे हुए थे। उनके पास युवाओं का उत्साह था। जापान कोई गुलामों का देश नहीं था। यह एक ऐसा देश था जो हमेशा से स्वतंत्र रहा था, हमेशा ऊर्जावान और तरोताज़ा रहा था। यदि उन्होंने एक बार आधुनिक बनने का मन बना लिया, तो कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता था। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* ...लेकिन जापानी लोग बहुत अधिक जल्दबाजी में थे। वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। चाहे अच्छे हों, बुरे हों या साधारण, उन्होंने अपनी भाषा में शब्द तैयार कर लिए। विज्ञान की शब्दावली विशाल है। उनकी टीमों ने दिन-रात, महीनों और वर्षों तक तब तक काम किया, जब तक कि वे अपने स्वयं के तकनीशियनों, उद्योगपतियों, खनिकों, जहाजरानी विशेषज्ञों, इलेक्ट्रिशियनों और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को विज्ञान के सभी विभागों में प्रशिक्षित नहीं कर सके—चाहे वे केवल अकादमिक रुचि के हों या व्यावसायिक मूल्य के। जापानियों ने जिस भी काम में हाथ डाला, जिस भी चीज़ में अपना मन लगाया, वह सब अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही किया। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* कोई सोचेगा कि एक औसत जापानी दुनिया के बाकी हिस्सों में हो रहे वैज्ञानिक विकास से कैसे जुड़ सका। जापानियों के पास इसके लिए एक व्यवस्था (सिस्टम) थी। प्रत्येक शोधकर्ता अपने क्षेत्र में दुनिया के किसी भी हिस्से में हुए काम के बारे में जान सकता था। यह जानकारी उसे बिना किसी अधिक देरी के उपलब्ध करा दिया जाता था। यह व्यवस्था जटिल नहीं थी; यह सरल लेकिन प्रभावी थी। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* हमारे देश में शिक्षा जबरन अंग्रेजी के माध्यम से दी गई। इस कारण हमने अपनी भाषा के प्रति संवेदनशीलता खो दी है। हम दूसरों की गुलामी के तले इतने लंबे समय तक रहे हैं कि हम 'अपने आप की शक्ति' के महत्व को समझने की शक्ति ही खो चुके हैं। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* इस देश (भारत) में लगभग एक हजार अंग्रेजी शब्द इतने प्रचलित हो चुके हैं कि उनका अनुवाद करना ईशनिन्दा (ब्लासफेमी) से कम नहीं माना जायेगा। लेकिन जापानी लोगों ने जब यूरोपीय सभ्यता को अपनाया तब वे स्वतंत्र थे। वे किसी भी विदेशी भाषा के बोझ तले दबे नहीं थे और वे स्वयं को तथा अपनी आने वाली पीढ़ियों को किसी विदेशी भाषा के बोझ तले दबाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वे अपनी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा के माध्यम से सोचने में पूरी तरह असमर्थ थे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* विज्ञान को अपना बनाने के लिए हमारे पास अपने शब्द होने चाहिए। अंग्रेजी से तकनीकी शब्दों को उधार लेना हमें हमेशा अंग्रेजों का गुलाम बनाए रखेगा। यह सच है कि हमें अपना स्वयं का वैज्ञानिक साहित्य निर्मित करना है। अपनी भाषा के आने से वैज्ज्यानिक साहित्य उससे कहीं अधिक तेजी से निर्मित होगा जितना यह किसी अन्य तरीके से हो सकता है। अपनी भाषा को चिंतन का माध्यम बनाने और अपने स्वयं के तकनीकी शब्दों के होने से, विज्ञान वास्तव में हमारा अपना बन जाएगा। यह विदेशी नहीं रहेगा। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* भारतीय वनस्पतिशास्त्री, अर्थात् वे वनस्पतिशास्त्री जिनकी मातृभाषा कोई भारतीय भाषा है, किंतु जिन्होंने वनस्पति विज्ञान का अपना ज्ञान अंग्रेजी के माध्यम से अर्जित किया है, उनका यह दृढ़ विश्वास है कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में वर्णनात्मक शब्दावली का अनुवाद तो कर सकता है, लेकिन वर्गों (classes), वंशों (genera), प्रजातियों (species), उप-प्रजातियों (sub-species) आदि के नाम इतने पवित्र हैं कि उन्हें भारतीय नाम नहीं दिए जाने चाहिये। वे इस बात का दावा करते हैं कि पौधों के नाम लैटिन भाषा में हैं और हम भारतीयों को लैटिन को संस्कृत से बदलने का कोई अधिकार नहीं है। उनका तर्क है कि लैटिन नाम सभी यूरोपीय देशों में समान हैं और बाकी दुनिया को भी इन्हें स्वीकार करना चाहिए या स्वीकार करना ही चाहिए। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* हमारे पास एक समृद्ध [[आयुर्वेद|आयुर्वेदिक साहित्य]] है जिसमें एक हजार से अधिक पौधों और जड़ी-बूटियों के नामों को सहेज कर रखा गया है। इन नामों का उपयोग अनादि काल से पूरे भारतवर्ष में होता आ रहा है। इन शब्दों का प्रयोग वनस्पति विज्ञान के अध्ययन को उन लोगों के लिए भी सहज और सुलभ बना देगा जो अंग्रेज़ी का एक अक्षर भी नहीं जानते। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* भारतीय शब्दों में एक अपनापन और सहजता है। अंग्रेज़ी शब्द, वास्तव में लैटिन शब्द, पत्थर की तरह कठोर होते हैं और उन्हें आसानी से पचाया नहीं जा सकता। वर्तमान में हमारे लड़के-लड़कियां अपने दिमाग में लैटिन शब्दों को ठूंसने की कोशिश में हफ़्तों और महीनों की कड़ी मेहनत बेकार गंवाते हैं। यदि वनस्पति विज्ञान को भारतीय शब्दों के माध्यम से पढ़ाया जाए, तो यह सबसे रोचक और आनंददायक अध्ययन बन सकता है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* जो लोग अंग्रेजी शब्दों को बनाए रखने की वकालत करते हैं, वे उन लाभों से अनजान हैं जो एक भारतीय शब्दावली के आने से मिलेंगे। इतना ही नहीं, उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं है कि कोई भारतीय शब्दावली संभव भी है। तीसरा, वे आलसी हैं और उनमें एक नई शब्दावली सीखने के उत्साह की कमी है, भले ही वह उनकी अपनी ही क्यों न हो। उनका देशभक्ति का भाव और जन-सामान्य में वैज्ञानिक ज्ञान फैलाने का प्रेम अभी आकार नहीं ले पाया है। लेकिन जिस क्षण उनके सामने भारतीय शब्दावली प्रस्तुत की जाएगी और वे इसके अद्भुत परिणामों को देखेंगे, वे पूरी तरह से इसके समर्थन में आ जाएंगे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* समय-समय पर किए गए शैक्षणिक प्रयोगों में यह पाया गया है कि जर्मन और रूसी लोग अंग्रेज़ों या फ्रांसीसियों की तुलना में अपनी भाषा के अधिक शब्द जानते हैं। इतना ही नहीं, ये लोग अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की तुलना में नये शब्द जल्दी सीखने में समर्थ हैं। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
* इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भारतीय भाषाओं में संस्कृत का वर्चस्व है। लेकिन यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि संस्कृत का प्रभाव ग्रीक और लैटिन में भी एक सीमा तक विद्यमान है। वैज्ञानिक शब्दावली के स्रोतों के रूप में ग्रीक और लैटिन का उपयोग यूरोप के सभी देश करते हैं और उसमें रूस भी शामिल है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
* भविष्य के भारत में, स्कूलों और कॉलेजों में संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य होगा। हमारी भाषाएं संस्कृत की पोतियां हैं। संस्कृत उनकी प्राण-वायु है। वे संस्कृत के बिना विकसित नहीं हो सकतीं। जो लोग वैज्ञानिक शिक्षण के संदर्भ में सोच रहे हैं, वे इस बात से प्रसन्न होंगे कि संस्कृत वह महान स्रोत है जिससे हमारे विज्ञान और उच्च चिंतन के सभी शब्द निरंतर फूटते और प्रवाहित होते रहेंगे—जो कभी खत्म या शुष्क नहीं होंगे, तथा अपनी मधुरता और स्पष्टता (पारदर्शिता) से सदा तरोताज़ा और स्फूर्तिदायक बने रहेंगे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
==सन्दर्भ==
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:रघु वीर|आचार्य रघुवीर]]''' (३०, दिसम्बर १९०२ - १४ मई १९६३) प्रख्यात विद्वान्, महान भाषाविद, कोशकार, शब्दशास्त्री, राजनेता तथा भारतीय धरोहर के मनीषी थे। एक ओर आपने कोशों की रचना कर राष्ट्रभाषा [[हिंदी]] एवं भारतीय भाषाओं का शब्दभण्डार संपन्न किया, तो दूसरी ओर विश्व में विशेषतः एशिया में फैली हुई [[भारतीय संस्कृति]] की खोज कर उसका संग्रह एवं संरक्षण किया। आप [[भारतीय संविधान]] सभा के सदस्य थे। वे केवल हिन्दी भाषा में ही पारंगत नहीं थे वरन [[संस्कृत]], फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलगु, पंजाबी पर भी उनका अधिकार था। <ref>[https://www.bhartiyadharohar.com/achrya-raghuveer/ आचार्य रघुवीर : ज्ञान के अक्षय कोष, एक महापुरुष, एक द्रष्टा, जिसे देश ने भुला दिया…]</ref> इतना ही नहीं, यूरोप की अधिकांश भाषाओं (जिनमें अंग्रेजी भी शामिल है) पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी।
भारतीय संस्कृति को जगत्गुरू के पद पर आसीन करने के लिये उन्होने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया तथा अनेक प्राचीन ग्रन्थों को एकत्र किया। आचार्य रघुवीर ने ४ लाख शब्दों वाला अंग्रेजी-हिन्दी तकनीकी शब्दकोश के निर्माण का महान कार्य भी किया। उनकी कृतित्व की महत्ता इस बात में निहित है कि उन्होंने अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय परम्परा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक और वैज्ञानिक आधार वाली है।
यह स्मरणीय है कि हिंदी में शब्दावली निर्माण का कार्य वैज्ञानिक ढंग से सर्वप्रथम डॉ० रघुवीर ने प्रारंभ किया। उन्होंने शब्दावली निर्माण के जो सिद्धांत स्थिर किए थे उन सिद्धांतों का शब्दावली रचना के अधिकाश क्षेत्र में अनुसरण किया जा रहा है। डॉ रघुवीर जीवनपर्यन्त अंग्रेजी के एकाधिकार के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में कार्यरत रहे।
; प्रमुख कोशकर्म
* A Comprehensive English Hindi Dictionary of Governmental amp Educational Words amp Phrases Vol.-35., 99999990076431. Vira, Dr. Raghu. 1965. English. Literature. 1742 pgs.
* A Dictionary of English-Indian Terms of Administration., 99999990821061. Raghu Vira. 0. english. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 246 pgs.
* Comprehensive English-Hindi Dictionary., 6010010078898. Raghuvira Dr.. 0. english. English Amp Anglo-Saxon. 1762 pgs.
* Comprehensive English-Hindi Dictionary., 99999990006955. Dr, Raghu Vira. 1981. hindi. General. 1554 pgs.
* Compresive English Hindi Dictionary VoLI (1955)., 99999990821824. Dr. Raghu Vira.. 1955. english. . 1770 pgs.
* Elementary English Indian Dictionary of Scientific., 99999990074385. Vira, Dr. Raghu. 1948. english. Literature. 248 pgs.
* Hindi English Dictionary of Technical Terms Vol.-XXV., 99999990076538. Vira, Dr. Raghu. 1951. hindi. Literature. 134 pgs.
* The Consolidated Great English-Indian Dictionary Of Technical Terms., 6010010079331. Vira Raghu Dr. 1950. english. . 1034 pgs.
* The Great English-Indian Dictionary of Technical Terms., 99999990821053. Raghu Vira. 0. english. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 1652 pgs.
== उद्धरण ==
* महत्व की दृष्टि से सभी भाषाएँ समान नहीं हैं।
* [[संस्कृत]], विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है।
* शब्दों के बिना ज्ञान को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। … वैज्ञानिक शब्दावली के संबंध में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं।
* वैज्ञानिक शब्दावली के संदर्भ में, हम ग्रीक और लैटिन की तुलना में संस्कृत से अधिक स्वतंत्रता, सुगमता और सटीकता के साथ नए शब्दों का निर्माण कर सकते हैं। ('इण्डियानाइजेशन ऑफ साइंटिफिक टर्म्स' में)<ref>[https://bharatabharati.in/2020/08/06/sanskrit-richest-language-of-the-world-raghu-vira/ Sanskrit : Richest language of the world – Raghu Vira]</ref>
* जर्मन भाषा की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य बेहद सरल हैं। किंतु हिंदी की तुलना में अंग्रेजी के वाक्य उलझी हुई जटिलता के नमूने हैं। विशेषण उपवाक्यों (adjectival clauses) और वाक्यांशों के एक के ऊपर एक ढेर लगने से, एक ही वाक्य में पांच, आठ या उससे भी अधिक क्रियाएं हो सकती हैं, जिनमें निरपेक्ष संरचनाएं (absolute constructions) आपस में गुंथी होती हैं। वाक्य के कर्ता और क्रिया के बीच की दूरी इतनी अधिक हो जाती है कि साधारण मानव बुद्धि उसे पहली या दूसरी बार पढ़ने पर भी समझने में विफल रहती है। अंग्रेजी के वाक्य, विशेष रूप से कानूनी दस्तावेजों में, ऐसा जटिल जाल होते हैं कि केवल एक विशेष रूप से प्रशिक्षित दिमाग ही उनसे होकर मार्ग निकाल सकता है। जब किसी को ऐसे वाक्यों का अनुवाद करना होता है, इस भय से कि कि किसी भी शब्द का गलत स्थान पर प्रयोग या कुछ नया जोड़ना कानून में अप्रमेय अनर्थ कर सकता है, व्यक्ति शब्दों और वाक्यांशों के क्रम, उनके अंतर-संबंधों और सबसे बढ़कर उनके मुश्किल से समझ आने वाले जुड़ाव को बनाए रखने में पूरी निष्ठा बरतने के लिए विवश होता है। अंग्रेजी भाषा सभी प्रकार के लालित्य से विहीन है, यद्यपि यह बाल की खाल निकालने के लिए बहुत उपयुक्त है। प्रत्येक पद या वाक्यांश, तथा शब्दों के प्रत्येक समूह की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। उनमें से किसी एक पर कोई न्यायिक निर्णय दिया गया हो सकता है। वहां संसद का कोई नियम या किसी महत्वपूर्ण मुकदमे का फैसला हो सकता है जो उस वाक्यांश के किसी एक शब्द या उसके पीछे छिपे विचार पर टिका हो। इस प्रकार, वे सभी नियम जो सामान्यतः साहित्यिक कृतियों के अनुवाद पर लागू होते हैं, यहां निष्फल हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जिसका आकर्षण, सुंदरता या पठन-सुगमता (readability) की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अत्यंत निरंतरता और निकटता से पालन किया जाना अनिवार्य है।<ref> India's National language by Dr Raghu Vir, page 240</ref>
* भारत एक नये युग में प्रवेश कर रहा है। इसे दिशा देने की आवश्यकता है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में
* यह केवल अस्सी वर्ष पुरानी बात है, 1867 में, कि जापान की सरकार ने अपने देश को विदेशियों के लिए खोलने का निर्णय लिया। बीस साल बाद उन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन शुरू किया। यह एक कठिन कार्य था, लेकिन जापानी लोग घबराए नहीं। वे ऊर्जा से भरे हुए थे। उनके पास युवाओं का उत्साह था। जापान कोई गुलामों का देश नहीं था। यह एक ऐसा देश था जो हमेशा से स्वतंत्र रहा था, हमेशा ऊर्जावान और तरोताज़ा रहा था। यदि उन्होंने एक बार आधुनिक बनने का मन बना लिया, तो कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता था। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* ...लेकिन जापानी लोग बहुत अधिक जल्दबाजी में थे। वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। चाहे अच्छे हों, बुरे हों या साधारण, उन्होंने अपनी भाषा में शब्द तैयार कर लिए। विज्ञान की शब्दावली विशाल है। उनकी टीमों ने दिन-रात, महीनों और वर्षों तक तब तक काम किया, जब तक कि वे अपने स्वयं के तकनीशियनों, उद्योगपतियों, खनिकों, जहाजरानी विशेषज्ञों, इलेक्ट्रिशियनों और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को विज्ञान के सभी विभागों में प्रशिक्षित नहीं कर सके—चाहे वे केवल अकादमिक रुचि के हों या व्यावसायिक मूल्य के। जापानियों ने जिस भी काम में हाथ डाला, जिस भी चीज़ में अपना मन लगाया, वह सब अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही किया। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* कोई सोचेगा कि एक औसत जापानी दुनिया के बाकी हिस्सों में हो रहे वैज्ञानिक विकास से कैसे जुड़ सका। जापानियों के पास इसके लिए एक व्यवस्था (सिस्टम) थी। प्रत्येक शोधकर्ता अपने क्षेत्र में दुनिया के किसी भी हिस्से में हुए काम के बारे में जान सकता था। यह जानकारी उसे बिना किसी अधिक देरी के उपलब्ध करा दिया जाता था। यह व्यवस्था जटिल नहीं थी; यह सरल लेकिन प्रभावी थी। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* हमारे देश में शिक्षा जबरन अंग्रेजी के माध्यम से दी गई। इस कारण हमने अपनी भाषा के प्रति संवेदनशीलता खो दी है। हम दूसरों की गुलामी के तले इतने लंबे समय तक रहे हैं कि हम 'अपने आप की शक्ति' के महत्व को समझने की शक्ति ही खो चुके हैं। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* इस देश (भारत) में लगभग एक हजार अंग्रेजी शब्द इतने प्रचलित हो चुके हैं कि उनका अनुवाद करना ईशनिन्दा (ब्लासफेमी) से कम नहीं माना जायेगा। लेकिन जापानी लोगों ने जब यूरोपीय सभ्यता को अपनाया तब वे स्वतंत्र थे। वे किसी भी विदेशी भाषा के बोझ तले दबे नहीं थे और वे स्वयं को तथा अपनी आने वाली पीढ़ियों को किसी विदेशी भाषा के बोझ तले दबाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वे अपनी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा के माध्यम से सोचने में पूरी तरह असमर्थ थे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* विज्ञान को अपना बनाने के लिए हमारे पास अपने शब्द होने चाहिए। अंग्रेजी से तकनीकी शब्दों को उधार लेना हमें हमेशा अंग्रेजों का गुलाम बनाए रखेगा। यह सच है कि हमें अपना स्वयं का वैज्ञानिक साहित्य निर्मित करना है। अपनी भाषा के आने से वैज्ज्यानिक साहित्य उससे कहीं अधिक तेजी से निर्मित होगा जितना यह किसी अन्य तरीके से हो सकता है। अपनी भाषा को चिंतन का माध्यम बनाने और अपने स्वयं के तकनीकी शब्दों के होने से, विज्ञान वास्तव में हमारा अपना बन जाएगा। यह विदेशी नहीं रहेगा। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'जापानी लोगों ने विज्ञान को कैसे अपना बनाया?'
* भारतीय वनस्पतिशास्त्री, अर्थात् वे वनस्पतिशास्त्री जिनकी मातृभाषा कोई भारतीय भाषा है, किंतु जिन्होंने वनस्पति विज्ञान का अपना ज्ञान अंग्रेजी के माध्यम से अर्जित किया है, उनका यह दृढ़ विश्वास है कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में वर्णनात्मक शब्दावली का अनुवाद तो कर सकता है, लेकिन वर्गों (classes), वंशों (genera), प्रजातियों (species), उप-प्रजातियों (sub-species) आदि के नाम इतने पवित्र हैं कि उन्हें भारतीय नाम नहीं दिए जाने चाहिये। वे इस बात का दावा करते हैं कि पौधों के नाम लैटिन भाषा में हैं और हम भारतीयों को लैटिन को संस्कृत से बदलने का कोई अधिकार नहीं है। उनका तर्क है कि लैटिन नाम सभी यूरोपीय देशों में समान हैं और बाकी दुनिया को भी इन्हें स्वीकार करना चाहिए या स्वीकार करना ही चाहिए। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* हमारे पास एक समृद्ध [[आयुर्वेद|आयुर्वेदिक साहित्य]] है जिसमें एक हजार से अधिक पौधों और जड़ी-बूटियों के नामों को सहेज कर रखा गया है। इन नामों का उपयोग अनादि काल से पूरे भारतवर्ष में होता आ रहा है। इन शब्दों का प्रयोग वनस्पति विज्ञान के अध्ययन को उन लोगों के लिए भी सहज और सुलभ बना देगा जो अंग्रेज़ी का एक अक्षर भी नहीं जानते। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* भारतीय शब्दों में एक अपनापन और सहजता है। अंग्रेज़ी शब्द, वास्तव में लैटिन शब्द, पत्थर की तरह कठोर होते हैं और उन्हें आसानी से पचाया नहीं जा सकता। वर्तमान में हमारे लड़के-लड़कियां अपने दिमाग में लैटिन शब्दों को ठूंसने की कोशिश में हफ़्तों और महीनों की कड़ी मेहनत बेकार गंवाते हैं। यदि वनस्पति विज्ञान को भारतीय शब्दों के माध्यम से पढ़ाया जाए, तो यह सबसे रोचक और आनंददायक अध्ययन बन सकता है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* जो लोग अंग्रेजी शब्दों को बनाए रखने की वकालत करते हैं, वे उन लाभों से अनजान हैं जो एक भारतीय शब्दावली के आने से मिलेंगे। इतना ही नहीं, उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं है कि कोई भारतीय शब्दावली संभव भी है। तीसरा, वे आलसी हैं और उनमें एक नई शब्दावली सीखने के उत्साह की कमी है, भले ही वह उनकी अपनी ही क्यों न हो। उनका देशभक्ति का भाव और जन-सामान्य में वैज्ञानिक ज्ञान फैलाने का प्रेम अभी आकार नहीं ले पाया है। लेकिन जिस क्षण उनके सामने भारतीय शब्दावली प्रस्तुत की जाएगी और वे इसके अद्भुत परिणामों को देखेंगे, वे पूरी तरह से इसके समर्थन में आ जाएंगे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'INDIAN SCIENTIFIC NOMENCLATURE OF PLANTS' के अन्तर्गत
* समय-समय पर किए गए शैक्षणिक प्रयोगों में यह पाया गया है कि जर्मन और रूसी लोग अंग्रेज़ों या फ्रांसीसियों की तुलना में अपनी भाषा के अधिक शब्द जानते हैं। इतना ही नहीं, ये लोग अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की तुलना में नये शब्द जल्दी सीखने में समर्थ हैं। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
* इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भारतीय भाषाओं में संस्कृत का वर्चस्व है। लेकिन यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि संस्कृत का प्रभाव ग्रीक और लैटिन में भी एक सीमा तक विद्यमान है। वैज्ञानिक शब्दावली के स्रोतों के रूप में ग्रीक और लैटिन का उपयोग यूरोप के सभी देश करते हैं और उसमें रूस भी शामिल है। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
* भविष्य के भारत में, स्कूलों और कॉलेजों में संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य होगा। हमारी भाषाएं संस्कृत की पोतियां हैं। संस्कृत उनकी प्राण-वायु है। वे संस्कृत के बिना विकसित नहीं हो सकतीं। जो लोग वैज्ञानिक शिक्षण के संदर्भ में सोच रहे हैं, वे इस बात से प्रसन्न होंगे कि संस्कृत वह महान स्रोत है जिससे हमारे विज्ञान और उच्च चिंतन के सभी शब्द निरंतर फूटते और प्रवाहित होते रहेंगे—जो कभी खत्म या शुष्क नहीं होंगे, तथा अपनी मधुरता और स्पष्टता (पारदर्शिता) से सदा तरोताज़ा और स्फूर्तिदायक बने रहेंगे। -- "Elementary English Indian Dictionary Of Scientific Terms" (१९४८) के प्राक्कथन में, 'ROMANCE OF A SANSKRIT ROOT' के अन्तर्गत
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"'''कामदेव''' यानि [[काम]] के देवता। मन्मथ, मनसिज आदि इनके पर्याय हैं। == उद्धरण == * ''एकवस्तुम् द्विधा कर्तुम् बहव: सन्ति धन्विन: । : ''धन्वी स मार एवैको द्वयो: ऐक्य: करोति य: ॥ : ऐसे..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''कामदेव''' यानि [[काम]] के देवता। मन्मथ, मनसिज आदि इनके पर्याय हैं।
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* ''एकवस्तुम् द्विधा कर्तुम् बहव: सन्ति धन्विन: ।
: ''धन्वी स मार एवैको द्वयो: ऐक्य: करोति य: ॥
: ऐसे बहुत से धनुर्धर हैं जो एक वस्तु को (तोड़कर) दो बना सकते हैं। किन्तु कामदेव ही ऐसे धनुर्धर हैं जो दो वस्तुओं को (मिलाकर) एक कर सकते हैं।
==इन्हें भी देखें==
*[[प्रेम]]
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'''कामदेव''' यानि [[काम]] के देवता। मन्मथ, मनसिज आदि इनके पर्याय हैं।
== उद्धरण ==
* '' शम्भुस्वयम्भुहरयो हरिणेक्षणानां येनाक्रियंत सततं गृहकर्मदासाः ।
: '' वाचामगोचरचरित्रविचित्रिताय तस्मै नमो भगवते कुसुमायुधाय ॥'' -- [[भर्तृहरि]], शृंगारशतक के मङ्गलाचरण में
: जिसने विष्णु और शिव को मृग के समान नयनों वाली कामिनियों के गृहकार्य करने के लिये सतत् दास बना रखा है, जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ है, ऐसे चरित्रों से विचित्र प्रतीत होने वाले उस भगवान पुष्पायुध (कामदेव) को नमस्कार है।
* '' धनुः पौश्पं मौर्वी मधुकरमयी चञ्चलदृशां
: '' दृषां कोणो बाणः सुहृदविजितात्मा हिमकरः ।
:'' तथाप्येकोऽनङ्गस्त्रिभुवनमपि व्याकुलयति
:'' क्रियासिद्धिः सत्वे भवति महतां नोपकरणे ॥'' -- सुभाषित रत्नाकर (महाजनप्रशंसा)
: प्रेम के देवता कामदेव का धनुष पुष्पों से बना हुआ है तथा उसकी प्रत्यंचा भ्रमरों से बनी है, चञ्चल नेत्रों की तिरछी दृष्टि उसके बाण हैं तथा सबके मन को प्रभावित करने वाला चन्द्रमा उसका मित्र है फिर भी अकेला ही कामदेव तीनों लोकों को अपने प्रभाव से व्याकुल कर देता है। सच है महान और शक्तिशाली व्यक्तियों के कार्य उनके आत्मबल और संकल्प (सत्व) से सिद्ध होते हैं न कि उनके विभिन्न उपकरणों और संसाधनों से।
* ''एकवस्तुम् द्विधा कर्तुम् बहव: सन्ति धन्विन: ।
: ''धन्वी स मार एवैको द्वयो: ऐक्य: करोति य: ॥
: ऐसे बहुत से धनुर्धर हैं जो एक वस्तु को (तोड़कर) दो बना सकते हैं। किन्तु कामदेव ही ऐसे धनुर्धर हैं जो दो वस्तुओं को (मिलाकर) एक कर सकते हैं।
* ''अप्रार्थितानुकूलः मन्मथः प्रकटीकरिष्यति।'' -- बाणभट्ट (कादम्बरी में)
: बिना किसी प्रार्थना के ही अनुकूल (प्रसन्न) रहने वाले कामदेव स्वयं इस बात को प्रकट (स्पष्ट) कर देंगे। (ऐसा कादंबरी के अनुराग के कारणों के विषय में चंद्रापीड कहता है।)
* मैं उच्च विचार वाले, अच्छे कुल में जन्म लेकर भी केवल तुम्हारे कारण इस प्रेम-पाश में फँसकर नीच कर्म करता हूँ। कामदेव ने मेरे गुणों को नष्ट कर दिया है, किन्तु मैं फिर भी मान को बचाए रहता हूँ। -- शूद्रक कृत मृच्छकटिकम्
==इन्हें भी देखें==
*[[प्रेम]]
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