विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.23 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk वैराग्य 0 9350 33356 2026-10-12T16:46:57Z अनुनाद सिंह 658 "'''वैराग्य''' अर्थात किसी भी वस्तु से राग की समाप्ति। == उक्तियाँ == * ''भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयम्‌। : ''माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्‌॥ : ''श..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33356 wikitext text/x-wiki '''वैराग्य''' अर्थात किसी भी वस्तु से राग की समाप्ति। == उक्तियाँ == * ''भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयम्‌। : ''माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्‌॥ : ''शास्त्रे वादभयं गुणे खलअभयं काये कृतान्ताद्भयम्‌। : ''सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्‌॥'' -- [[भर्तृहरि]], वैराग्यशतकम् : भोग में रोग का भय रहता है; पारिवारिक प्रतिष्ठा गिरने का भय रहता है; धन में राजाओं का भय रहता है; प्रतिष्ठा में अपमान का भय रहता है; सत्ता में शत्रु या विरोधी का भय रहता है; सुंदरता में बुढ़ापे का डर होता है; शास्त्र-विद्या में विद्वान् विरोधियों का भय रहता है; सदाचार में दुष्ट निंदा करने वाले व्यक्ति का भय रहता है; शरीर में मृत्यु का भय रहता है। मनुष्य के लिए, इस दुनिया में हर चीज़ भय से जुड़ी है। वैराग्य ही अभय प्रदान करता है। plaitw4eac6j4gt8tixh4hexj2zfjde 33357 33356 2026-10-12T16:52:09Z अनुनाद सिंह 658 33357 wikitext text/x-wiki '''वैराग्य''' अर्थात किसी भी वस्तु से राग की समाप्ति। == उक्तियाँ == * ''भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयम्‌। : ''माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्‌॥ : ''शास्त्रे वादभयं गुणे खलअभयं काये कृतान्ताद्भयम्‌। : ''सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्‌॥'' -- [[भर्तृहरि]], वैराग्यशतकम् : भोग में रोग का भय रहता है; पारिवारिक प्रतिष्ठा गिरने का भय रहता है; धन में राजाओं का भय रहता है; प्रतिष्ठा में अपमान का भय रहता है; सत्ता में शत्रु या विरोधी का भय रहता है; सुंदरता में बुढ़ापे का डर होता है; शास्त्र-विद्या में विद्वान् विरोधियों का भय रहता है; सदाचार में दुष्ट निंदा करने वाले व्यक्ति का भय रहता है; शरीर में मृत्यु का भय रहता है। मनुष्य के लिए, इस दुनिया में हर चीज़ भय से जुड़ी है। वैराग्य ही अभय प्रदान करता है। * ''क्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च। : '' निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥ : ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय, लोभ रहित, मद से रहित, भयरहित, शोकरहित। * ''अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।'' -- महर्षि पतञ्जलि, योगसूत्र समाधिपाद १२ : अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चंचल मन को, चित्त की वृत्तियों को रोकना चाहिए। * राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥ : सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥ -- [[तुलसीदास]] : श्री रामचंद्रजी के निवास से वन की सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मंत्री है। 9g2t6nrv3ym3ueyd8h0wg763ksgxeuw 33358 33357 2026-10-12T16:53:45Z अनुनाद सिंह 658 33358 wikitext text/x-wiki '''वैराग्य''' अर्थात किसी भी वस्तु से राग की समाप्ति। == उक्तियाँ == * ''भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयम्‌। : ''माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्‌॥ : ''शास्त्रे वादभयं गुणे खलअभयं काये कृतान्ताद्भयम्‌। : ''सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्‌॥'' -- [[भर्तृहरि]], वैराग्यशतकम् : भोग में रोग का भय रहता है; पारिवारिक प्रतिष्ठा गिरने का भय रहता है; धन में राजाओं का भय रहता है; प्रतिष्ठा में अपमान का भय रहता है; सत्ता में शत्रु या विरोधी का भय रहता है; सुंदरता में बुढ़ापे का डर होता है; शास्त्र-विद्या में विद्वान् विरोधियों का भय रहता है; सदाचार में दुष्ट निंदा करने वाले व्यक्ति का भय रहता है; शरीर में मृत्यु का भय रहता है। मनुष्य के लिए, इस दुनिया में हर चीज़ भय से जुड़ी है। वैराग्य ही अभय प्रदान करता है। * ''क्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च। : '' निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥ : ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय, लोभ रहित, मद से रहित, भयरहित, शोकरहित। * ''अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।'' -- महर्षि पतञ्जलि, योगसूत्र समाधिपाद १२ : अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चंचल मन को, चित्त की वृत्तियों को रोकना चाहिए। * राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥ : सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥ -- [[तुलसीदास]] : श्री रामचंद्रजी के निवास से वन की सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मंत्री है। * दुखियों के लिए वैराग्य ही सुख है। -- [[यशपाल]] antu17lovpvx5d7ngdmq44bz2gbukd9