विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk शिक्षा 0 6053 33390 32514 2026-10-16T08:39:25Z अनुनाद सिंह 658 /* इन्हें भी देखें */ 33390 wikitext text/x-wiki * ''सा विद्या या विमुक्तये'' : विद्या वह है जो (व्यक्ति को) विमुक्त करती है। * ''नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः।'' -- [[महाभारत]] , 12/339/6 : विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तप नहीं है। *''माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः । : ''न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥ : जो माता-पिता अपने बच्चो को पढ़ाते नहीं है ऐसे माँ-बाप बच्चो के शत्रु के समान है। विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता। वह वहां हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है। * जिससे मनुष्य विद्या आदि शुभगुणों की प्राप्ति और अविद्यादि दोषों को छोड़ के सदा आनन्दित हो सकें, वह शिक्षा कहाती है। -- [[दयानन्द सरस्वती]], "शिक्षा किसको कहते हैं ?" के उत्तर में * जिससे पदार्थ का स्वरूप यथावत् जानकर उससे उपकार लेके अपने और दूसरों के लिए सब सुखों को सिद्ध कर सकें वह 'विद्या' और जिससे पदार्थों के स्वरूप को अन्यथा जानकर अपना और पराया अनुपकार करे वह 'अविद्या' कहाती है। -- [[दयानन्द सरस्वती]], "विद्या और अविद्या किसको कहते हैं ?" के उत्तर में * मैने जो कुछ भी सीखा है, किताबों से सीखा है। -- [[अब्राहम लिंकन]] * समय और शिक्षा का सही उपयोग व्यक्ति को सफल बनाता है।” -- [[अमिताभ बच्चन]] * जिम्मेदारी शिक्षित करती है। -- वेन्डेल फिलिप्स * एक सभ्य घर जैसा कोई स्कूल नहीं है और एक भद्र अभिभावक जैसा कोई शिक्षक नहीं है। -- [[महात्मा गाँधी]] * व्यक्ति की समस्त शक्तियों के सामंजस्यपूर्ण विकास ही शिक्षा का उद्देश्य है। -- जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी * केवल एक चीज जो मुझे सीखने में हस्तक्षेप करती है वो है मेरी शिक्षा। -- [[अल्बर्ट आइन्स्टीन]] * अगर आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो आप सिर्फ एक पुरुष को शिक्षित करते हैं; लेकिन अगर आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो आप एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित करते हैं। -- ब्रिघम यंग * अगर लोग छोटी छोटी नादानियाँ नहीं करते तो कुछ भी बड़ा बुद्धिमत्तापूर्ण काम नहीं होता। -- लुडविग वित्त्गेंस्तें * शिक्षा की जड़ें कड़वी होती हैं, लेकिन फल मीठा। -- अरस्तु * अनदेखी करना अज्ञानता के समान नहीं है, आपको इस पर काम करना होता है। -- मार्गरेट ऐटवुड * अमेरिका इतना शिक्षित होता जा रहा है कि अज्ञानता एक नयी बात होगी. मैं कुछ गिने चुने लोगो में रहना चाहूँगा। -- [[विल रोजर्स ]] * असल ज़िन्दगी में, मैं यकीन दिलाता हूँ, अलजेब्रा जैसा कुछ भी नहीं है। -- फ्रैन लेबोविज़ * आंकड़े जानकारी नहीं हैं, जानकारी ज्ञान नहीं हैं, ज्ञान समझ नहीं है, समझ बुद्धिमानी नहीं है। -- क्लिफोर्ड स्टोल * आधुनिक शिक्षक का कार्य जंगलों की कटौती करना नहीं, बल्कि रेगिस्तान की सिंचाई करना है। -- सी एस लुईस * आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं; आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं। आप एक औरत को शिक्षित करते हैं; आप एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित करते हैं। -- ब्रिघम यंग * आप कभी भी ओवरड्रेस्ड या ओवरएजुकेटेड नहीं हो सकते। -- ऑस्कर वाइल्ड * आप हमेशा एक छात्र हैं, कभी मास्टर नहीं हैं आपको आगे चलते रहना होगा। -- कोनार्ड हाल * एक आदमी जो कभी स्कूल नहीं गया, वह माल गाड़ी से चोरी कर सकता है; लेकिन अगर उसके पास विश्वविद्यालय की शिक्षा है, तो वह पूरी रेल चोरी कर सकता है। -- Theodore Roosevelt * एक आधुनिक शिक्षक का काम जंगलों को काटना नहीं बल्कि रेगिस्तान को सींचना है। -- सी.एस.लेविस * एक उदार समाज के मूल में उदार शिक्षा होती है ,और एक उदार शिक्षा के मूल में शिक्षण का कार्य होता है। -- ए. बार्टलेट जियामेट्टी * एक बार प्रबुद्ध हुआ मन फिर से अंधकारमय नहीं हो सकता। -- थॉमस पेन * एक शिक्षक दरवाजा खोल सकता है, लेकिन उस दरवाजे के अन्दर प्रवेश आपको खुद ही करना है। -- चीनी कहावत * एक शिक्षित व्यक्ति वो है जिसने जान लिया है कि सूचना लगभग हमेशा ही अधूरी , अक्सर गलत ,भटकाने वाली, -- रस्सेल बेकर * ऐसे जियो जैसे कि तुम्हे कल मर जाना हो। ऐसे सीखो जैसे कि तुम्हे हेमशा के लिए जीना हो। -- महात्मा गाँधी * औपचारिक शिक्षा आपको जीवन यापन करने योग्य बनती है; स्व:शिक्षा आपको सफल बनती है। -- जिम रोहन * किसी सेना की अपेक्षा शिक्षा स्वतंत्रता के लिए एक बेहतर सुरक्षा है। -- एडवर्ड एवरेट * केवल एक पीढ़ी के पाठक एक पीढ़ी के लेखकों को जन्म देंगे। -- स्टीवन स्पीलबर्ग * कोई भी,जिसने सीखना छोड़ दिया चाहे उसकी उम्र बीस साल हो या अस्सी साल,वो बूढा है। कोई भी जिसने ज्ञान प्राप्त करना जारी रखा हुआ है वो युवा है। -- हेनरी फोर्ड * जब कोई विषय पूरी तरह से अप्रचलित हो जाता है तो हम उसे आवश्यक पाठ्यक्रम बना देते हैं। -- पीटर ड्रकर * जब तक आप रुकते नहीं ये मायने नहीं रखता कि आप कितना धीमे जा रहे हैं। -- कन्फ्यूशियस * जितना अधिक मैं जीता हूँ, उतना अधिक मैं सीखता हूँ। जितना अधिक यो कि आप कल मर जायेंगे, ज्ञान ऐसे प्राप्त करो कि आप अमर हैं। -- मोहनदास करमचंद गांधी * जीवन में बस वही वास्तविक असफलता है जिससे आपने सीख नहीं ली। -- अन्थोनी जे. डी’ एंजिलो * जो आपने सीखा है उसे भूल जाने के बाद जो रह जाता है वो शिक्षा है। -- बी. ऍफ़. स्किन्नर * जो कुछ भी हमने स्कूल में सीखा है, वो सब भूल जाने के बाद भी जो हमें याद रहता है, वो ही हमारी शिक्षा है। -- अल्बर्ट आइंस्टीन * जो कोई भी सीखना छोड़ देता है, चाहे बीस पे या अस्सी पे बूढ़ा है। जो कोई भी सीखता रहता है जवान रहता है। -- हेनरी फोर्ड * ज्ञान वो सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे आप पूरी दुनिया बदल सकते है। -- नेल्सन मंडेला * ज्ञान ही शक्ति है। जानकारी स्वतंत्रता है। प्रत्येक परिवार और समाज में शिक्षा, प्रगति का आधार है। -- कोफी अन्नान * दिमाग भरा जाने वाला पात्र नहीं है, बल्कि जलाई जाने वाली आग है। -- प्लूटार्क * दुनिया एक किताब है और वे जो घूमते नहीं केवल एक पन्ना पढ़ते हैं। -- अगस्टीन ऑफ़ हिप्पो * निर्देश कक्षा के बहार समाप्त हो जाते हैं लेकिन शिक्षा जीवन के साथ समाप्त होती है। -- फ्रेदेरिच्क व.रोबेर्त्सों * परिवर्तन सभी प्रकार की शिक्षाओं का अंतिम परिणाम है। -- लेओबुस्कैग्लिया * परिवर्तन ही सच्ची विद्या का अंतिम परिणाम है। -- लियो बुस्काग्लिया * पहले भगवान ने बेवकूफ लोग बनाये, वो अभ्यास के लिए था। फिर उन्होंने स्कूल बोर्ड्स बनाये। -- मार्क ट्वैन * प्रथम स्थान पर, भगवान ने बेवकूफों को बनाया। वह अभ्यास के लिए था। उसके पश्चात उन्होंने स्कूल बोर्ड बनाया। -- बेस्ट शिक्षा पर विचार * फॉर्मल ऐजुकेशन आपको जीविका दे देगी; सेल्फ-ऐजुकेशन आपको अमीर बना देगी। -- जिम रौन * बच्चे ये याद नहीं रखते कि आपने उन्हें क्या पढ़ाने की कोशिश की थी। वे ये याद रखते हैं कि आप क्या हैं। -- जिम हेंसन * बच्चों को ये सिखाया जाना चाहिए कि कैसे सोचें, ना कि क्या सोचें -- मार्गरेट मीड * बच्चों को शिक्षित किया जाना चाहिए , पर उन्हें खुद को शिक्षित करने के लिए भी छोड़ दिया जाना चाहिए। -- एर्न्स्ट डीम्नेट * बच्चों को सिखाईये कि कैसे सोचा जाये, न कि क्या सोचा जाये। -- मार्गरेट मीड * बिना अपना आपा और आत्म विश्वास खोये, कुछ भी सुन सकने की योग्यता ही शिक्षा है। -- रोबर्ट फ्रॉस्ट * बिना इच्छा के पढ़ाई यादाश्त खराब कर देती है, और वो जो कुछ भी लेती है उसमे से कुछ नहीं रखती। -- लियोनार्डो डा विन्ची * बिना दिल को शिक्षित किये दिमाग को शिक्षित करना कोई शिक्षा नहीं है। -- अरस्तु * बिना शिक्षा के कामन सेन्स होना, शिक्षा प्राप्त करके भी कामन सेन्स ना होने से हज़ार गुना बेहतर है। -- रोबर्ट ग्रीन इन्गेर्सोल * बिना शिक्षा प्राप्त किये कोई व्यक्ति अपनी परम ऊँचाइयों को नहीं छू सकता। -- होरेस मैन * बुद्धि और चरित्र – यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर * भले ही शिक्षा का जड़ बहुत कड़वा होता है, परन्तु इसका फल बहुत मीठा व स्वादिष्ट होता है। -- अरस्तु * भविष्य में वो अनपढ़ नहीं होगा जो पढ़ ना पाए। अनपढ़ वो होगा जो ये नहीं जानेगा की सीखा कैसे जाता है । -- अल्विन टोफ्फ्लर * मुझमें कोई विशिष्ट प्रतिभा नहीं है। मुझे केवल जुनून की हद तक उत्सुकता है। -- अल्बर्ट आइंस्टीन * मुझे बताओ और मैं भूल जाऊंगा,मुझे दिखाओ और शायद मैं याद रखूँगा,मुझे शामिल करो और मैं समझूंगा। -- चीनी कहावत * मूल्यों के बिना शिक्षा, उतना ही उपयोगी है जितना कि ऐसा है, मनुष्य को और अधिक चालाक शैतान बनाने की बजाय। बिना मूल्यों के शिक्षा उतनी ही उपयोगी है, जैसे कि वो एक इंसान को और चालाक शैतान बना रही हो। -- सी.एस लुईस * मैं पढ़ाने वाला नहीं बल्कि जगाने वाला हूँ। -- रॉबर्ट फ्रॉस्ट * '''मैं स्कूल जाता हूँ, लेकिन मैं जो जानना चाहता हूँ वो कभी नहीं सीखता। -- बिल वाटरसन''' * मैंने कभी भी अपनी स्कूलिंग को अपनी शिक्षा के मार्ग में नहीं आने दिया है। -- मार्क ट्वेन * यदि आपको लगता है शिक्षा महंगी है तो अज्ञानता को ट्राई कर लीजिये। -- रॉबर्ट और्बेन * यह एक शिक्षित दिमाग का लक्षण है, जो एक विचार को स्वीकार किए बिना भी उससे मनोरंजन करने में सक्षम है। -- अरस्तु * युवा पीढ़ी को इस काबिल बनाना कि वो जीवन भर अपने आप को प्रशिक्षित करते रहें, ये शिक्षा का असली उद्देश्य है। -- रोबर्ट मेनार्ड हुत्चिंस * वो जो स्कूल के दरवाजे खोलता है, जेल के दरवाजे बंद करता है। -- विक्टर ह्यूगो * वो व्यक्ति जो एक विद्यालय खोलता है, एक कारावास बंद करता है। -- विक्टर ह्यूगो * व्यावहारिक विवेक का होना शिक्षित होने से हजार गुना बेहतर है। -- रोबर्ट जी.इन्गेर्सोल्ल * शादी इंतज़ार कर सकती है, शिक्षा नहीं। -- खालिद हुसैनी * शिक्षा अचानक से प्राप्त नहीं की जा सकती, इसे उत्साह और परिश्रम के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए। -- अबीगैल एडम्स * शिक्षा अपने क्रोध या अपने आत्म विश्वास को खोये बिना लगभग कुछ भी सुनने की क्षमता है। -- राबर्ट फ्रोस्ट * शिक्षा एक सराहनीय चीज है, पर समय समय पर ये बात याद कर लेनी चाहिए की ऐसा कुछ भी जो जानने योग्य है उसे सिखाया नहीं जा सकता। -- ऑस्कार वाइल्ड * शिक्षा एक सराहनीय वस्तु है, परन्तु अच्छा है समय-समय पर याद रखें कि जो कुछ भी जानने योग्य है वह सिखाया जाये। -- ऑस्कर वाइल्ड * शिक्षा का अर्थ है वो जानना ,जो आपको पता भी नहीं था कि वो आपको पता नहीं था। -- डेनियल जे. बूर्स्तिन * शिक्षा का उच्चतम परिणाम सहनशीलता है। -- हेलेन केलर * शिक्षा का उद्देश्य है युवाओं को खुद को जीवन भर शिक्षित करने के लिए तैयार करना। -- राबर्ट एम्. हचिंस * शिक्षा का कार्य गहराई से और गंभीर रूप से सोचना सिखाना है। बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र – यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है। -- मार्टिन लूथर किंग जूनियर। * शिक्षा का मकसद है एक खाली दिमाग को खुले दिमाग में परिवर्तित करना। -- मैल्कम फ़ोर्ब्स * शिक्षा का ये मतलब नहीं है कि आपने कितना कुछ याद किया हुआ है, या ये कि आप कितना जानते हैं। इसका मतलब है आप जो जानते हैं और जो नहीं जानते हैं उसमे अंतर कर पाना। -- अनाटोले फ्रांस * शिक्षा का लक्ष्य ज्ञान की प्रगति और सच्चाई का प्रसार है। -- जॉन एफ कैनेडी * शिक्षा का सही उद्देश्य तथ्यों का नहीं, बल्कि मूल्यों का ज्ञान होना चाहिए। -- विलियम एस ब्यूर शिक्षा पर अनमोल वचन * शिक्षा की जड़ कडवी है, पर उसके फल मीठे हैं। -- अरस्तु * शिक्षा के बिना, हम पर शिक्षित लोगों को गंभीरता से लेने का एक भयानक और घातक खतरा रहता है। -- जी के चेस्टरटन * शिक्षा ज़िन्दगी की तैयारी नहीं है; शिक्षा खुद ज़िन्दगी है। -- जॉन डेवे * शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं है; शिक्षा ही जीवन है। -- जॉन देवे * शिक्षा ने ऐसी बहुत बड़ी आबादी पैदा की है जो पढ़ तो सकती है पर ये नहीं पहचान सकती की क्या पढने लायक है। -- जी. एम् . ट्रेवेल्यन * शिक्षा प्राप्त करना कुछ-कुछ फैलने वाली सेक्स डिजीज जैसा था। ये आपको कई कामों के लिए अनुप्य्युक्त बना देता है और फिर आपके अन्दर इसे आगे फैलाने की तीव्र इच्छा होती है। -- टेरी प्रैचेट * शिक्षा बाल्टी भरना नहीं है, ये तो आग जलाना है। -- विल्लियम बटलर यीट्स * शिक्षा भविष्य के लिए पासपोर्ट है जो आज इसके लिए तैयारी करते हैं। -- माल्कॉम एक्स * शिक्षा भीतर से आती है; आप इसे विचार करके, संघर्ष करके और प्रयास करके प्राप्त कर सकते हैं। -- नेपोलियन हिल * शिक्षा राष्ट्रों की सस्ती रक्षा का माध्यम है। -- [[एडम्ण्ड बुर्क]] * शिक्षा वह नींव है जिस पर हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। -- क्रिस्टीनग्रेगोइर * शिक्षा शिक्षा है। हमें सब कुछ सीखना चाहिए और फिर चुनाव करना चाहिए कि हमें कौन से मार्ग पर चलना है। शिक्षा ना ईस्टर्न है ना ही वेस्टर्न, ये ह्यूमन है। -- मलाला युसुफजई * शिक्षा सज्जनता को शुरू करती है, लेकिन पढ़ाई, अच्छी कंपनी और दिखावा उसे खत्म कर देता है । -- जॉन लोक * शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसे आप दुनिया को बदलने के लिए उपयोग कर सकते हैं। -- नेल्सन मंडेला * शिक्षा समृद्धि और प्रतिकूल परिस्थितियों में एक आभूषण है। -- अरस्तु * सिद्धांतों के बिना शिक्षा, एक मनुष्य को चालाक दैत्य बनाने जैसा है। -- सी. एस. लेविस * सीखने के लिए एक जूनून पैदा कीजिये. यदि आप कर लेंगे तो आपका विकास कभी नहीं रुकेगा। -- अन्थोनी जे. डी’एंजेलो * सीखने में आप सिखायेंगे, और सिखाने में आप सीखेंगे। -- फिल कॉलिन्स * स्कूल का सबसे सीधा लड़का भी अब उस सत्य को जानता है जिसके लिए आर्कमडीज ने अपना जीवन बलिदान कर दिया होता। -- एर्न्स्ट रेनैन * स्पून फीडिंग आखिरकार कुछ नहीं सिखाता बस स्पून का शेप सिखा देता है। -- इ एम् फोरस्टर * हमने स्कूल में जो सीखा है वह सब भूलने के बाद जो याद रहता है, वही शिक्षा है। ज्ञान का निवेश सर्वोत्तम भुगतान करता है। -- बेंजामिन फ्रैंकलिन * हमारे पुस्तकालयों की जो भी लागत हो, उसकी कीमत एक अज्ञानी राष्ट्र की तुलना में कम है। -- वाल्टर क्रोंकाईट * शिक्षा जीवन में सफलता की कुंजी है, और शिक्षक अपने छात्रों के जीवन पर स्थायी प्रभाव डालते हैं जिससे वह अपने जीवन में सफल होते हैं। -- सोलोमन ऑर्टिज़ * शिक्षा हमारे समाज की आत्मा है जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है। -- जी.के.चेस्तेरसों * शिक्षा हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाती है। -- एलान ब्लूम * शिक्षित व्यक्ति को आसानी से शाषित किया जा सकता है। -- फ्रेडरिक दी ग्रेट * सच है, अल्प ज्ञान खतरनाक है,पर फिर भी ये पूर्ण रूप से अज्ञानी होने से बेहतर है। -- अबीगेल वैन बरेन * सच्ची शिक्षा के दो लक्ष्य हैं; एक बुद्धिमत्ता, दूसरा चरित्र। -- मार्टिन लुथर किंग * शिक्षा स्वतंत्रता के स्वर्ण द्वार खोलने के कुंजी है। -- जार्ज वाशिंगटन करवर * हर देश के बच्चों को दो प्रमुख विचार सिखाए जाने चाहिए। वे हैं : व्यक्ति का मूल्य, और यह तथ्य कि मानवता एक है। ~ एलिस बेली<ref>https://en.wikiquote.org/wiki/Alice_Bailey</ref> * शिक्षा की समस्याएं हमारे युग की गहनतम समस्याओं का प्रतिबिम्ब मात्र हैं। उन्हें संगठन, प्रशासन या अधिक धन व्यय से नहीं सुलझाया जा सकता, यद्यपि इन चीजों के महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में हम एक रोग से ग्रस्त हैं जो तत्वमीमांसीय है और उसका इलाज भी इसलिए तत्वमीमांसीय ही हो सकता है। जो शिक्षा हमारे प्रमुख विश्वासों को स्पष्ट न कर सके, वह केवल प्रशिक्षण या व्यसन मात्र है। जब तक हमारे विश्वास गड्ड-मड्डु रहेंगे और वर्तमान तत्वमीमांसा-विरोधी वातावरण बना रहेगा, अव्यवस्था बदतर होती जाएगी। -- [[ई० एफ० शुमाकर]] * विद्या किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा करते हुए शास्त्रकारों ने सूत्र रूप में कह दिया है कि- 'सा विद्या या विमुक्तये' अर्थात् विद्या वह है कि जो मुक्ति प्रदान करे। जिसके द्वारा हम रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि की दासता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है। ऐसी विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते हैं।<br>प्राचीन समय में आज के जितने स्कूल कालेज न थे। पढ़ने वाले छात्रों को एक गधे के बोझ की बराबर पुस्तकें लादकर यों स्कूल न जाना पड़ता था। दिन-रात आवश्यक बातें रटाने की पद्धति की आज की शिक्षा प्रणाली का कहीं दर्शन भी न था। तो भी लोग विद्वान होते थे। उपयोगी शिक्षा और विद्या का इतना अधिक प्रचलन था कि हर ग्राम और नगर स्वतः एक कालेज था। वहाँ के निवासी अपने घर वालों, कुटुम्बियों और नगर निवासियों से ही बहुमूल्य ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। तोता रटंत की अपेक्षा जीवन की उपयोगी और आवश्यक शिक्षा क्रियात्मक रीति से प्राप्त की जाती थी। प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुभव द्वारा वे तथ्य शिक्षार्थियों को भली प्रकार हृदयंगम हो जाते थे।<br>मेघनाद, कुम्भकरण, अंगद, हनुमान, जामवंत से योद्धा, अर्जुन, भीम, भीष्म, द्रौण जैसे महारथी बी. ए. पास थे या मेट्रिक्युलेट थे इसका कुछ पता नहीं चलता। दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, खगोल, भूगर्भ, प्राणिशास्त्र, रसायन, शिल्प, वास्तु, अर्थ, नीति, धर्म, अध्यात्म आदि विषयों के विशेषज्ञ घर-घर में होते थे। इन विषयों की वे क्रियात्मक जीवन में अनुभव पूर्ण शिक्षा प्राप्त करते थे और अपने विषय के सुयोग्य ज्ञाता बन जाते थे। पुरुष के समान स्त्रियाँ भी अपनी विद्वत्ता में शिक्षा में आगे बढ़ी चढ़ी थीं। स्त्रियों के कालेज कहीं थे इसका पता इतिहास के पन्ने नहीं देते पर इतना जरूर बताते हैं कि आज की 'कालेज गर्ल्स' की अपेक्षा उस समय की ललनाएं हर दृष्टि से अधिक सुशिक्षित होती थीं।<br>कबीर, रैदास, दादू आदि संत शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए कहे जा सकते हैं। वे साहित्य और व्याकरण के उतने विद्वान न थे तो भी आज के एल. टी. प्रोफेसरों की अपेक्षा उनकी विद्या वास्तविक थी। अकबर पढ़े-लिखे न थे, पंजाब केशरी महाराणा रणजीतसिंह की शिक्षा नहीं के बराबर थी, छत्रपति शिवाजी शिक्षित न थे पर जो कुछ उनने सीखा था वह आज के फटे हाल ग्रेजुएटों की अपेक्षा बहुत उपयोगी एवं वास्तविक था।<br>हम क्या पढ़ें ? एवं बच्चों को क्या पढ़ावें ? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर शास्त्रकार इस प्रकार देते हैं कि जिस ज्ञान के आधार पर दुखदायी बन्धनों से छुटकारा प्राप्त किया जा सके वही विद्या है, उसे ही पढ़ो। रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बन्धनों से मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता - शक्ति जिस उपाय द्वारा मिले वहीं विद्या है उसे ही सीखना और सिखाना उचित है।<br>आज की शिक्षा उपरोक्त कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त बिल्कुल निकम्मी सिद्ध होती है। जीवन का एक तिहाई भाग स्कूल कालेजों के कैद खाने में व्यतीत करने के बाद हमारे बालक जब बाहर आते हैं तो वे उपरोक्त बंधनों से छूटना तो दूर उलटे जब स्कूल में प्रवेश हुए थे उसकी अपेक्षा भी अधिक जकड़े हुए निकलते हैं। शील, स्वास्थ्य, संयम, विवेक, विनय, श्रद्धा, उत्साह, वीरत्व, सेवा, सहयोग आदि विद्या द्वारा प्राप्त होने वाले स्वाभाविक फल जब उनमें दृष्टिगोचर नहीं होते तो फिर किस प्रकार कहा जा सकता है कि उन्होंने विद्या प्राप्त की है या वे विद्वान हो गये हैं।<br>अन्धानुकरण करके अपने बालकों के इस निरर्थक एवं हानिकर शिक्षा का भार लादकर उनके स्वास्थ्य और जीवन विकास से रोकना उचित नहीं । इतनी खर्चीली, इतनी श्रम साध्य शिक्षा जब विद्या से प्राप्त होने वाले सुफल की उपस्थित नहीं करती वरन् उलटे परिणाम उत्पन्न करती है तो उसे अविद्या या कुशिक्षा ही कह सकते हैं। इस कुशिक्षा में बालकों के जीवन कि विकासोन्मुखी प्रमुख भाग बर्बाद कर दिये जाने पर भविष्य में वे कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगे इसकी संभावना बहुत कम रह जाती है। किशोरावस्था का पुष्प, तोता रटन्त में रात-रात भर जागकर जब मसल डाला जाय तो फिर उस पर उत्तम फल लगने की क्या आशा की जा सकती है?<br>उच्च शिक्षा के नाम पर प्रचलित वर्तमान अनुपयोगी शिक्षा से हमारा कुछ भी भला नहीं हो सकता। अब हमें ऐसी शिक्षा का निर्माण करना होगा जो क्लर्क बाबू ढालने की फैक्टरी न रह कर शिक्षार्थी के जीवन विकास में सर्वतोमुखी सहायता प्रदान करे। उस शिक्षा में अनावश्यक पुस्तकों का गर्दभ भार न रह कर अनुभवी क्रिया कुशल आचार्यों द्वारा जीवनोपयोगी व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था होगी। वही शिक्षा हमारे बालकों को सफल योद्धा, व्यापारी, नेता, सेवक, शिल्पी वैज्ञानिक आदि बना सकेगी। उस धार्मिक आधार पर खड़े हुए शिक्षण से ही मनुष्यों के बीच सच्चे प्रेम और सद्भाव की स्थापना होगी और सुख शान्तिमय लोक परलोक का निर्माण होगा।<br>आइए, हम लोग ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण करें, उसके निर्माण की आज के अन्धकार युग में सर्वोपयोगी आवश्यकता है।-- '''[[श्रीराम शर्मा|श्रीरम शर्मा आचार्य]]''', मई १९४६ में अखण्ड ज्योति में 'सा विद्या या विमुक्तये' शीर्षक से लेख में == अंग्रेजों के शासन के पहले की भारतीय शिक्षा == * ''सा विद्या या विमुक्तये।'' : विद्या वह है जो (व्यक्ति को) मुक्ति प्रदान करे। * ''सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमद।'' : सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय से प्रमाद मत करना। * ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay) * ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो, या जिसने इतना स्थायी ओर शक्तिशली प्रभाव उत्पन्न किया हो, जितना भारत में। -- एफ डब्ल्यु थॉमस * विद्यारम्भ संस्कार, उपनयन संस्कार के अनेक वर्षों बाद उस समय आरम्भ हुआ, जब वैदिक संस्कृत, जनसाधारण की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई थी। -- डॉ० ए० एस० अल्तेकर * यह संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतः सब जातियों के बालकों के लिए था। -- डॉ० वेद मित्र, विद्यारम्भ संस्कार के सम्बन्ध में * ‘प्रेसीडेंसी के सभी गावों में पाठशालाएं हैं’। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६) * (मद्रास) प्रेसीडेंसी में 12,498 पाठशालाएं हैं, जिन में 1,88,650 विद्यार्थी पढ़ते हैं। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६) * पूरे प्रेसीडेन्सी में मुश्किल से कोई छोटा या बड़ा गाँव होगा जिसमें कम से कम एक विद्यालय न हो। -- जी एल प्रेण्डरगास्ट की बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में रपट, मार्च १८२४ * बंगाल और बिहार में एक लाख के लगभग स्कूल्स हैं। इन दोनों प्रान्तों की जनसंख्या चार करोड़ के बराबर है। अर्थात प्रति 400 व्यक्तियों पर एक शाला है। -- विलियम एडम्स की बंगाल प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर पहली रपट, 1835 से 1838 तक * भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला हैं, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीनें आवंटित हैं, जिनकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। ... ‘इन में से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता हैं।' -- ब्रिटिश आई सी एस अधिकारी जी. डब्लू. लेटनर "History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882" में पंजाब में शिक्ष की स्थिति के बारे में सन १८८२ में * इस होशियारपुर जिले में साक्षरता की दर 84% है। -- जी. डब्लू. लेटनर, उत्तरी पंजाब के होशियारपुर जिले के बृहद सर्वेक्षण के आधार पर, १८७०-७५ * मालाबार के साहित्य का आधार एक जैसा है और इसमें सभी हिंदू राष्ट्रों (भारत क सभी भागों) की तरह ही शिक्षा-सामग्री शामिल है। शिक्षा हर परिवार में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। उनकी कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। बच्चों को हिंसा के बिना और विशेष रूप से सरल प्रक्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है। .... शिष्य एक-दूसरे के मॉनिटर हैं और अक्षरों/ अंकों को रेत पर उंगली से लिखा जाता है। -- ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, अलेक्जेंडर वॉकर (1764 – 1831) अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 263 पर * ...ब्रिटिश प्रशासक, जब भारत आये, तो चीज़ों को ज्यों का त्यों अपने कब्जे में लेने के बजाय, उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने जड़ से मिट्टी हटायी और जड़ को देखने लगे, और जड़ को वैसे ही (बिना मिट्टी के) छोड़ दिया। और वह सुन्दर वृक्ष नष्ट हो गया। -- महात्मा गांधी, 20 अक्टूबर, 1931 को चैथम हाउस, लंदन में * हालाँकि, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक की अवधि के दौरान इतिहास या शिक्षा की स्थिति पर बहुत कम लिखा गया है। -- डॉ [[धरमपाल|धर्मपाल]], 'द ब्युटीफुल ट्री' की प्रस्तावना में * इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि स्वदेशी शिक्षा पाठशालाओं, मदरसों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। इन पारंपरिक संस्थानों का कर्यकलाप 'शिक्षा' कहलाता था और इसे सारे लोग वित्तीय सहयोग देकर जीवित रखते थे। यहाँ तक कि उन लोगों से भी सहयोग मिलता था जो स्वयं अशिक्षित थे। इस शिक्षा में प्रज्ञा, शील और समाधि के विचार शामिल थे। वास्तव में ये संस्थाएँ उस कूप के समान थीं जो समाज की जड़ों को सींचने का कार्य करतीं थीं। इसलिए ये संस्थाएँ आजकल के 'स्कूल' की अपेक्षा बहुत बड़ी भूमिका निभातीं थीं। -- 'द ब्युटीफुल ट्री' में * प्राचीन "गुरुकुल" प्रणाली को अधिक समालोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है और पहला कदम इन गुरुकुलों के इतिहास के रिकार्डों से यह ढूँढना होगा कि उनके क्रियाकलाप क्या-क्या थे। इसके बिना हम प्राचीन गौरव के बारे में ये निरर्थक बातचीत करते रहेंगे और वर्तमान स्कूल प्रणाली को ऐसी दिशा में धकेलते रहेंगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसी होगी। -- डॉ धर्मपाल, 'द ब्युटीफुल ट्री' में == आधुनिक और वर्तमान भारतीय शिक्षा == * हमें वर्तमान में व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए जो रक्त और रंग में भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेजी हो। -- लॉर्ड मैकाले, भारतीय शिक्षा पर विवरण पत्र, १८३५ * इस देश में 175 साल के ब्रिटिश शासन के बाद भी 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय अशिक्षित हैं। यह एक असहनीय स्थिति है जो त्वरित कार्रवाई की मांग करती है। -- [[श्यामा प्रसाद मुखर्जी]], भारत की स्वतन्त्रता के बाद == शिक्षा (वेदाङ्ग) == * ''छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते । : ''ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।। : ''शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् । : ''तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥'' -- पाणिनीयशिक्षा, 41-42 : छन्द वेद के चरण हैं, कल्प वेद के हाथ हैं। [[ज्योतिष]] को वेदपुरुष के [[आँख|नेत्र]] तथा निरुक्त को श्रोत्र कहा गया है। शिक्षा वेद की नासिका तथा [[व्याकरण]] इसका मुख है। इस प्रकार अंगों सहित [[वेद]] का अध्ययन करने पर व्यक्ति ब्रह्मलोक (अर्थात् ज्ञानलोक) में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। * ''स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते सा शिक्षा ।'' -- सायण, ऋग्वेदभाष्यभूमिका, पृ.सं. 49 : जहाँ स्वर, वर्ण आदि के उच्चारणभेदों का शिक्षण या उपदेश किया जाता है वह शास्त्र शिक्षा शब्द से कहा जाता है। * ''शिक्ष्यते यया सा शिक्षा'' : जिसके द्वारा शिक्षण किया जाता है वह शिक्षा है। * ''शक्तुमिच्छा शिक्षा'' : शक्ति की इच्छा या 'कर सकने' की इच्छा ही शिक्षा है। * शिक्ष्यन्ते वर्णाः यया, शिक्ष्यते वर्णानां उच्चारणविधिः यया सा शिक्षा । ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== * [[गुरु]] * [[विद्यार्थी]] * [[विद्या]] * [[शिक्षक]] * [[गुरुकुल]] * [[गिजुभाई बधेका]] pb1zwxc9x6ytqp98m3shg43u0cdrexv भय 0 6431 33389 32710 2026-10-16T08:34:58Z अनुनाद सिंह 658 33389 wikitext text/x-wiki भय, या डर। भय की अनुपस्थिति को अभय या निडरता कहते हैं। ==उक्तियाँ == * ''ओउम् मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व धिषणे वीड्वीसती । : ''वीडयेथामूर्ज दधाथाम् । पाप्मा हतो न सोमः ॥'' -- यजुर्वेद 6.35 : हे मानव ! डर मत , कम्पायमान मत हो, मत घबड़ा। बल, साहस, पराक्रम धारण कर । वाणी और विद्या का आश्रय लेकर और इन दोनों के आश्रय से बलवान् होकर पुरूषार्थ करो पराक्रम करो, जौहर दिखाओ । पाप करनेवाला शत्रु, पापी मारा जाए, नष्ट हो जाए । सौम्यगुणयुक्त, सदाचारी पुरूषों का नाश न हो। * ''यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥१॥ : ''यथाहश्च रात्रीं च न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥२॥ : ''यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥३॥ : ''यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥४॥ : ''यथा सत्यं चानृतं न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥५॥ : ''यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः । : ''एवा मे प्राण मा विभेः ॥६॥'' -- (अथर्ववेद, काण्ड 2, सूक्त 15 :(१) जिस प्रकार आकाश एवं पृथिवी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम भी भयमुक्त रहो । :(२) जिस प्रकार दिन एवं रात को भय नहीं होता और इनका नाश नहीं होता, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होवे । :(३) जिस प्रकार सूर्य एवं चंद्र को भय नहीं सताता और इनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय अनुभव न करो । :(४) जैसे ब्रह्म एवं उसकी शक्ति को कोई भय नहीं होता और उनका विनाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम भय से मुक्त रहो । :(५) जैसे सत्य तथा असत्य किसी से भय नहीं खाते और इनका नाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होना चाहिए । :(६) जिस भांति भूतकाल तथा भविष्यत्काल को किसी का भय नहीं होता और जिनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय से मुक्त रहो । * ''अभीता नो स्याम : हे प्रभु हमे निर्भय बनाओ। * हे मेरे प्राण! जैसे वायु और आकाश न भय को प्राप्त होते हैं और न क्षीण होते हैं, वैसे ही तू भी न भय को प्राप्त हो और न क्षीण हो। -- अथर्ववेद * ''यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। : ''शं नः कुरु प्रजाभ्यो अभयं नः पशुभ्यः।।'' -- यजुर्वेद ३६.२२। : हे परमेश्वर! आप जिस-जिस देश से जगत् के रचना और पालन के अर्थ चेष्टा करते हैं, उस-उस देश से हमको भय से रहित करिए, अर्थात् किसी देश (स्थान) से हमको किञ्चित् भी भय न हो, वैसे ही सब दिशाओं में जो आपकी प्रजा और पशु हैं, उनसे भी हमको भयरहित करें तथा हमसे उनको सुख हो, और उनको भी हम से भय न हो तथा आपकी प्रजा में जो मनुष्य और पशुआदि हैं, उन सबसे जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पदार्थ हैं, उनको आपके अनुग्रह से हमलोग शीघ्र प्राप्त हों, जिससे मनुष्य जन्म के धर्मादि जो फल हैं, वे सुख से सिद्ध हों। (ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका) * ''द्वितीयाद्वै भयं भवति।'' -- बृहदारण्यक उपनिषद् [ सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षांचक्रेः यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभेष्यद्द्वितीयाद्वै भयं भवति॥ ] : किसी दूसरी वस्तु (द्वैत) से ही भय होता है। (Fear always arises from duality) * ''न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्। : ''विश्वासाद्भयमुत्पन्नमपि मूलान्यपि निकृन्तति॥'' -- [[महाभारत]] : जो व्यक्ति अविश्वसनीय हैं उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए। विश्वसनीय व्यक्ति पर भी अत्यधिक विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि अत्यधिक विश्वास के कारण समूल नाश होने का संकट संभव हैं। चाहें तो दूसरों के मन में अपने प्रति जरूर विश्वास निर्माण करें, लेकिन उन पर आत्यंतिक विश्वास न रखें। *''अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः । : ''तस्यापि सर्वभूतेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥'' -- विष्णुपुराण ३/९/३१ * ''अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। : ''दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।'' -- [[गीता]], 16.1 * ''स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥'' -- [[गीता]] : धर्म (निष्काम कर्मयोग) का अति अल्प अनुष्ठान भी महान भय से रक्षा करता है। *''तावत् भयस्य भेतव्यं यावत् भयं न आगतम् । :''आगतं हि भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यं अशंकया ॥'' -- [[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]] : भय से तब तक ही डरना चाहिये जब तक भय (पास) न आया हो । आये हुए भय को देखकर बिना शंका के उस पर प्रहार करना चाहिये । *''व्यवस्थितः प्रशांतात्मा कुपितोऽप्यभयंकरः । : ''अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादोऽपि भयंकरः ॥'' -- समयोचितपद्यमालिका : व्यवस्थित और शान्त चित्त वाला व्यक्ति कुपित भी हो जाय तो भयंकर नहीं होता। किन्तु अव्यवस्थित चित्त का व्यक्ति यदि प्रसन्न होकर प्रसाद भी दे तो वह भयंकर होता है। * ''भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं : ''माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । : ''शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं : ''सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥'' -- भर्तृहरि, वैराग्यशतक : भोग में रोग का भय, पद में पतन का भय, धन में शत्रुओं का भय, मान में अपमान का भय, बल में शत्रुओं का भय, सौन्दर्य में बुढ़ापे का भय, शास्त्र-विद्या में विरोधियों का भय, सद्गुण में निन्दा करने वालों का भय, शरीर में मृत्यु का भय। इस संसार की सभी वस्तुएँ मनुष्य के लिए भय से युक्त हैं; त्याग ही निर्भयता का प्रतीक है। * ''महतामपि दानानां कालेन क्षीयते फलम् । : ''भीताऽभय प्रदानस्य क्षय एव न विद्यते ॥'' -- : बडे से बड़े दान का भी समय के साथ क्षय हो जाता है। पर भयभीत हुए को अभयदान दिया गया हो, तो उसका क्षय कभी नहीं होता। *''भूताभयप्रदानेन सर्वान्कामानवामुयात् । : ''दीर्घमायुः च लभते सुखी चैव सदा भवेत् ॥ : प्राणियों को अभय देकर सब कामना प्राप्त होती है, दीर्घायुष्य और सदा सुख प्राप्त होता है । *''यो ददाति सहस्त्राणि गवामश्व शतानि च । :''अभयं सर्वसत्वेभ्य स्तद्दानमिति चोच्यते ॥ : जो हजारों गाय और सैंकडो घोडे देता है, और सब प्राणियों को अभय देता है, उसे दान कहते हैं । *''अभयं सर्वसत्वेभ्यो यो ददाति दयापरः । :''तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ : जो दयालु सब प्राणियों को अभय देता है, उसे मृत्यु के पश्चात् कहीं से भी भय नहीं रहता । *''यो भूतेष्वभयं दद्यात् भूतेभ्यस्तस्य नो भयम् । :''यादृग् वितीर्यते दानं तादृगासाद्यते फलम् ॥ : जो प्राणियों को अभय देता है, उसे प्राणियों से भय नहीं रहेता । जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही फल मिलता है । *''एकतः काञ्चनो मेरुः बहुरत्ना वसुन्धरा । :''एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् ॥'' -- : (तराजू के) एक पलड़े में सुवर्ण का मेरु पर्वत, और बहुरत्ना वसुंधरा है, और दूसरे में भयभीत प्राणी को दिया हुआ जीवनदान है (दोनों समान हैं) । * ''एकतः क्रतवः सर्वे समाप्तवरदक्षिणाः ॥ : ''एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम्॥'' -- स्कन्दपुराण * ''एकतः क्रतवः सर्वे समग्रवरदक्षिणाः। : ''एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम्॥'' -- नारदपुराण * ''एकतो दानमेवाहुः समग्रवरदक्षिणम् । : ''एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् ॥'' -- गरुडपुराण *''महतामपि दानानां कालेन क्षीयते फलम् । :''भीताऽभय प्रदानस्य क्षय एव न विद्यते ॥ : बडे दान का भी समय आने पर क्षय होता है । पर भयभीत हुए को अभयदान दिया हो, उसका क्षय नहीं होता । *''दत्तमिष्टं तपस्तप्तं तीर्थसेवा तथा श्रुतम् । :''सर्वेऽप्यभय दानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ : इच्छित वस्तु का दान, तप का आचरण, तीर्थसेवा, ज्ञान – ये सब अभयदान की शोभा के सोलहवें भाग जितने भी नहीं । *''यो दद्यात् काञ्चनं मेरुं कृत्स्नां चैव वसुन्धराम् । :''एकस्य जीवितं दद्यात् न च तुल्यं युधिष्ठिर ॥ : हे युधिष्ठिर ! जो सुवर्ण, मेरु और समग्र पृथ्वी दान में देता है, वह (फिर भी) एक मनुष्य को जीवनदान देनेवाले दान का मुकाबला नहीं कर सकता । *''हेमधेनुधरादीनां दातारः सुलभा भुवि । :''दुर्लभः पुरुषः लोके यः प्राणिष्वभयप्रदः ॥ : इस दुनिया में सोना (सुवर्ण), गाय, पृथ्वी (ज़मीन) इ. देनेवाले सुलभ है, पर प्राणीयों को अभयदान देनेवाले इन्सान दुर्लभ हैं । *''वरमेकस्य सत्वस्य दत्ता ह्यभय दक्षिणा । : ''न तु विप्रसहस्त्रेभ्यो गोसहस्र मलड्कतम् ॥ : हजार विप्रों को, सजायी हुई हजारों गायों के मुकाबले केवल एखाद प्राणी को “अभय” दक्षिणा देना अधिक योग्य है । *''जीवानां रक्षणं श्रेष्ठं जीवा जीवितकांक्षिणः । : ''तस्मात्समस्त दानेभ्योऽभयदानं प्रशस्यते ॥ : जीवों का रक्षण श्रेष्ठ है । जीव जीने की इच्छा रखनेवाले होते हैं, इस लिए सब दानों में अभयदान प्रशंसा के पात्र हैं। * '' यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः । : ''निग्रहानुग्रहौ न स्तः स रुष्टः किं करिष्यति ॥'' -- सुभाषितरत्नभाण्डागारः पु. १५७.१७६ : जिसके क्रुद्ध होने पर (हमारा) भय नहीं है, सन्तुष्ट होने पर धनलाभ नहीं हो पाता, जिसका अनुग्रह और निग्रह नहीं हैं, वह क्रोधित होकर क्या करेगा? * ''बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। : ''बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥'' -- रामचरितमानस * ''जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ , गहिरें पानी पैठ । : ''मैं बपुरा बूड़न डरा , रहा किनारे बैठ ॥'' -- कबीरदास : जो लोग मेहनत, साहस और लगन (गहरे पानी में पैठना) के साथ प्रयास करते हैं, उन्हें सफलता (मोती) अवश्य मिलती है। जो डूबने से डर जाते हैं वे कुछ भी नहीं कर पाते। * जो लोग भय का हेतु अथवा हर्ष का कारण उपस्थित होने पर भी विचार विमर्श से काम लेते हैं तथा कार्य की जल्दी से नहीं कर डालते, वे कभी भी सन्ताप को प्राप्त नहीं होते। -- पञ्चतन्त्र * ‘भय’ और ‘घृणा’ ये दोनों भाई-बहन लाख बुरे हों पर अपनी मां बर्बरता के प्रति बहुत ही भक्ति रखते हैं। जो कोई इनका सहारा लेना चाहता है, उसे ये सब से पहले अपनी मां के चरणों में डाल जाते हैं। -- बर्ट्रेंड रसेल * मित्र से, अमित्र से, ज्ञात से, अज्ञात से हम सब के लिए अभय हों। रात्रि के समय हम सब निर्भय हों और सब दिशाओं में रहनेवाले हमारे मित्र बनकर रहें। -- अथर्ववेद * मनुष्य केवल दो लीवर के द्वारा चलता रहता है : डर तथा स्वार्थ । -- नेपोलियन * डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है। -- एमर्सन * अभय-दान सबसे बडा दान है। * '''<sub>भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं। -- विवेकानन्द</sub>''' * ‘भय’ और ‘घृणा’ ये दोनों भाई-बहन लाख बुरे हों पर अपनी मां बर्बरता के प्रति बहुत ही भक्ति रखते हैं। जो कोई इनका सहारा लेना चाहता है, उसे ये सब से पहले अपनी मां के चरणों में डाल जाते हैं। -- बर्ट्रेंड रसेल * अगर आज हम अपने डर पे काबू नहीं पा लेते है तो कल हमारा डर हम पे काबू पा लेंगा । -- Gautama Buddha * अगर सांप जहरीला न भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए । -- चाणक्य * अधिनायकवादी राज्य की सबसे बड़ी शक्ति यह है की जो लोग उसका अनुशरण करने से डरते हैं वह उनपर बल प्रयोग करता है। -- एडोल्फ हिटलर * अपमान का डर क़ानून के डर से कम क्रियाशील नहीं होता। -- प्रेमचंद * अपराध करने के बाद भय उत्पन्न होता है और यही उसका दंड है। -- वाल्टेयर * अहंकार,दरअसल वास्तविकता में आप नहीं हैं। अहंकार आपकी अपनी छवि है; ये आपका सामजिक मुखौटा है; ये वो पात्र है जो आप खेल रहे हैं। आपका सामजिक मुखौटा प्रशंशा पर जीता है।वो नियंत्रण चाहता है, सत्ता के दम पर पनपता… -- दीपक चोपड़ा * आप जिस काम को करने से डरते है उसे करिए और करते रहिये, अपने डर पर काबू पाने का यह अब तक खोजा गया सबसे अच्छा तरीका है। -- डेल कारनेगी * आपका जीवन महान हो इसके लिए आपका विश्वास आपके भय से बड़ा होना चाहिये। -- रोबिन शर्मा * आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत । -- भगवान महावीर * इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी कि हम सभी सदा एक-दुसरे से डरे रहते हैं। -- वेदान्त तीर्थ * उनसे मत डरो जो बहस करते हैं, उनसे डरो जो छल करते हैं। -- डेल कारनेगी * उस तरह मत चलिए जिस तरह डर आपको चलाये। उस तरह चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये। उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये। -- ओशो रजनीश * उस तरह से मत चलिए जिस तरह से डर आपको चलाये, बल्कि उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये, उस तरह चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये। -- ओशो * उस शिक्षा का क्या महत्व जो हमारे अंदर गलत को सही करने का जूनून और निडरता न पैदा कर सके। -- किरण बेदी * उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है, ना कभी था ना कभी होगा।जो वास्तविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। -- भगवत्गीता * एक नायक बनो और सदैव यह कहो “मुझे कोई डर नहीं है” । -- स्वामी विवेकानन्द * एक बार धोखा खाया हुआ मनुष्य सत्य में भी विनाश का संदेह करने लगता है। सांप का काटा रस्सी से भी डरने लगता है।- नारायण पंडित * एक शेर से ज्यादा एक दमनकारी सरकार से डरना चाहिए। -- कन्फ्यूसिअस * एक शेर से ज्यादा दमनकारी सरकार से डरना चाहिए । -- कन्फुशियस * एक सबसे अच्छी बात जो शेर से सीखी जा सकती है, वह यह है कि व्यक्ति जो कुछ भी करना चाहता है उसे पूरे दिल से एक जोरदार प्रयास के साथ करे । -- चाणक्य * ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हम फेंक देते यदि हमें इस बात का चिंता नहीं होती की कोई और उन्हें उठा लेगा। -- Oscar Wilde * औरत एक मात्र ऐसा प्राणी है जिससे मैं ये जानते हुए भी की वो मुझे चोट नहीं पहुंचाएगी, डरता हूँ। -- अब्राहम लिंकन * कामयाबी उन्ही लोगों के कदम चूमती है, जो अपनें फ़ैसलों से दुनियाँ बदल कर रख देते हैं और नाकामयाबी उन लोगों का मुकद्दर बन कर रह जाती है जो लोग दुनियाँ के डर से अपनें फैसले बदल दिया करते हैं। -- अज्ञात * किसी जंगली जानवर की अपेक्षा एक कपटी एवं दुष्ट मित्र से जयादा डरना चाहिए, जानवर तो केवल आपके शरीर को नुक्सान पहुंचा सकता है, परन्तु एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुक्सान पहुंचा सकता है। -- * मृत्यु अटल है, अतः उससे भी भय नहीं। असली भय तो मृत्युपूर्व किये कर्मों का है। -- [[वाल्मीकि]] * केवल एक ही चीज है जो सपने को पूरा होना असंभव बनाती है, और वह है असफलता का डर। -- पाउलो कोयलों * कोई भी उस व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जिससे वह डरता है। -- आरस्तु * कोई भी व्यक्ति बहुत ज्यादा बोलते रहने से कुछ नहीं सीख पाता; समझदार व्यक्ति धीरज रखने वाला, क्रोधित न होने वाला एवं निडर होता है। -- गौतम बुद्ध * खतरा उनके सिर पर सदैव मंडराता रहता है, जो उससे डरते हैं। -- जार्ज बर्नाड शॉ * जन साधारण की दृष्टि में सब धनी व्यक्ति ऊँचे दिखाई देते हैं। लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं कि वे धनी, शक्तिशाली, सम्मानित, आदरणीय हैं। किन्तु वे धनी हर घड़ी कांपते रहते हैं कि उन्हें जो समझा जाता है, वस्तुतः वे ऐसे हैं नहीं। वे भयभीत हैं कि कहीं उनकी कलई न खुल जाए। -- स्वेट मार्डेन * जब आप किसी काम की शुरुआत करें, तो असफलता से न डरें और उस काम को न छोड़ें। जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं वह सबसे प्रसन्न होते हैं । -- चाणक्य * जब सभी लालची हो जाते हैं तो हम डर के रहते है, और जब सभी डर जाते है तब हम लालची बन जाते हैं। -- वारेन बफेट * जब सभी लालची हो जाते हैं तो हम डर के रहते हैं, और जब सभी डर जाते हैं तब हम लालची बन जाते हैं। -- वारेन बफेट * जहाँ सम्मान है वहां डर है, पर ऐसी हर जगह सम्मान नहीं है जहाँ डर है, क्योंकि संभवता डर सम्मान से ज्यादा व्यापक है। -- सुकरात * जिंदगी की सबसे बड़ी जोखिम, कोई भी “जोखिम न लेना” हैं। -- बिल गेट्स * जिन्हें पसीना सिर्फ गर्मी और भय से आता है, वो श्रम के पसीने से बहुत डरते है। -- हरिशंकर परसाई * जिस प्रकार बच्चे अधेंरे में जाने से भयभीत होते हैं, उसी प्रकार मनुष्य मृत्यु से भयभीत होते हैं। -- जर्मन लोकोक्ति * जिससे प्रायः हम डरते हैं, कालान्तर में उसी से घृणा करते हैं।- शेक्सपीयर * जिसे जीत लिए जाने का भय होता है, उसकी हार निश्चित होती है। -- नेपोलियन बोनापार्ट * जिसे भविष्य का भय नहीं है, वही वर्तमान का आनंद उठा सकता है। -- * जैसे पके फलों को गिरने के अतिरिक्त कोई भय नहीं, उसी प्रकार जिसने ज्ञान लिया है, उस मनुष्य को मृत्यु * जैसे ही भय आपके करीब आये, तुरंत उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये। -- चाणक्य * जो भविष्य का भय नहीं करता वहीं वर्तमान का आनंद ले सकता हैं। -- फुलर * जो यही सोचकर भयभीत रहता है कि कहीं हार न जाए, वह निश्चित रूप से हारेगा। -- नेपोलियन बोनापार्ट * डर अन्धविश्वास और क्रूरता का मुख्या श्रोत है, डर को जीतना ज्ञान की शुरुआत है। -- बर्त्रंद रसेल * डर कहीं और नहीं बस आपके दिमाग में होता है। -- डेल कारनेगी * डर का न होना सहस नहीं है, बल्कि डर पर विजय पाना साहस है बहदुर वह नहीं है जो भयभीत नहीं होता, बल्कि वह है जो डर को परास्त करता है। -- नेल्सन मंडेला * डर दूरदर्शिता की जननी है। -- थॉमस हार्डी * डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाले दर्द है। -- अरस्तू * डर में जीना आधे जीवित रहने जैसा है। -- * डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है। -- एमर्सन * डर, मन की एक स्थिति के आलावा और कुछ भी नहीं है। -- नैपोलियन हिल * धर्म भय पर विजय है; असफलता और मौत का मारक है। -- सर्वेपल्ली राधाकृष्णन् * निडरता से डर को भी डर लगता है। -- * निष्क्रियता संदेह एवं भय को जन्म देती है, कार्यवाही विश्वास और साहस को। -- डेल कारनेगी * बिना भय के साहस नहीं हो सकता। -- * बुद्धिमानी से जीनेवालों को मौत से भी डर नहीं लगता। -- गौतम बुद्ध * भय की भावनाओं से धर्मों का प्रारम्भ हुआ, यह बात झूठी नहीं। -- जैनेन्द्र * भय के बिना प्रीति नहीं होती। -- तुलसीदास * भय से पैदा हुई कुप्रवृत्तियां पुरूषार्थ को खा जाती हैं। -- सर पी. सिडनी * भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं । -- स्वामी विवेकानन्द * भय ही पतन और पाप का निश्चित कारण है। -- स्वामी विवेकानंद * भयमुक्त जीवन ही मानव मस्तिष्क की अव्यक्त अभिलाषा है। -- मिल्टन * भीरू को भय से जितनी पीड़ा होती है, उतनी सच्चे साहसी को उसका सामना करते भी नहीं होती। -- सिडनी * भूतों से सिर्फ उन्ही को डर लगता है, जो उनके बारे में सोचते है। -- * भूल से भी दुसरे के सर्वनाश का विचार न करो, क्योंकि न्याय उसके विनाश की युक्ति सोचता है, जो दूसरों के साथ बुराई करना चाहता है। -- तिरूवल्लुवर * मनुष्य के दिल और दिमाग पर भय जितना प्रभाव डालता है, उतना प्रभाव कोई अन्य शक्ति नहीं। -- अज्ञात * मृत्यु से भय खाना कायरता है, क्योंकि जीवन का रहस्य तो मृत्यु में ही छिपा हैं। -- सुकरात * मैं आपसे बताता हूँ की आपके अंदर एक परमानंद का फव्बारा है, प्रशनंता का झरना है। आपके मूल के भीतर सत्य, प्रकाश, प्रेम है, वहां कोई अपराध बोध नहीं है, वहां कोई डर नहीं है। मनोवैज्ञानिकों ने कभी इतनी गहरे में नहीं देखा। -- श्री श्री रवि शंकर * मैं उस आदमी से नहीं डरता जिसने १०,००० किक्स की प्रेक्टिस एक बार की हो, बल्कि उस आदमी से डरता हूँ जिसने एक किक की प्रेक्टिस १०,००० बार की हो। -- ब्रूस ली * मैंने ये जाना है कि डर का ना होना साहस नही है, बल्कि डर पर विजय पाना साहस है। बहादुर वह नहीं है जो भयभीत नहीं होता, बल्कि वह है जो इस भय को परास्त करता है। -- नेल्सन मण्डेला * यदि आप भय और क्रोध से बिना उनका मतलब जाने छुटकारा पाना चाहते है, तो वो और शक्तिशाली होकर लौटेंगे। -- दीपक चोपडा * यदि आप भय पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं तो घर पर बैठ कर उसके बारे में सोचिए मत, बाहर निकलिए और व्यस्त हो जाईये। -- डेल कारनेगी * यदि तुम डरते हो तो किससे? यदि तुम ईश्वर से डरते हो तो मूर्ख हो, यदि तुम मनुष्य से डरते हो तो कायर हो, यदि तुम पंचभूतों से डरते हो तो उनका सामना करो। यदि तुम अपने आपसे डरते हो तो अपने आपको पहचानो और कहो कि मैं ही ब्रह्मा हूँ। -- [[स्वामी रामतीर्थ]] * याद रखिये सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है। -- [[सुभाष चन्द्र बोस]] * लोग क्या सोंचेंगे इस बात की चिंता करने के बजाय क्यों ना हम कुछ ऐसा करने में समय लगाये जिसे प्राप्त करने पर लोग आपकी प्रसंशा करें। -- डेल कारनेगी * <u><sub>वह जो अपने परिवार के साथ बहुत अधिक जुडा हुआ है, उसे भय और चिंता का सामना करना पड़ता है, क्योकि सभी दुखो की वजह लगाव है, इसलिए खुश रहने के लिए लगाव छोड़ देना चाहिए। -- आचार्य चाणक्य</sub></u> * वह व्यक्ति जो भय या शंका से प्रभावित होता है, वहीं भय उसके नाश का कारण बन जाता है। -- अज्ञात * विपत्ति में हार तभी तक होती है, जब तक मनुष्य उससे डरता है। -- कन्फ्यूशियस * सभी प्रकार के भय में से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है। -- आचार्य चाणक्य * सभी व्यक्तियों को सजा से डर लगता है, एवं सभी मौत से डरते है| बाकी लोगों को अपने जैसा ही समझिये| इसीलिए खुद किसी जीव को न मारें और दूसरों को भी मना करें। -- गौतम बुद्ध * समय से साथ जिससे हम अक्सर डरते है उससे नफ़रत करने लगते हैं। -- विलियम शेक्सपियर * साहस यह जानने में है कि हमें किससे नहीं डरना है। -- प्लेटो * साहस ये जानना है कि किससे नहीं डरना है। -- प्लेटो * स्वतः भय से अधिक भयानक और कुछ भी नहीं। -- स्वामी विवेकनन्द * स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी है। इसीलिए ज्यादातर लोग इससे डरते हैं। -- जार्ज बर्नार्ड शॉ * स्वभाव में जब भय घुल जाए तब कायरता का आरम्भ हो जाता हैं। -- रामचन्द्र शुक्ल * हजार छूरों की तुलना में चार विरोधी अखबारों से अधिक डरना चाहिए। -- नेपोलियन बोनापार्ट * हम निडर तब बनते है जब हम वो करते है जो करने से हमें डर लगता है। -- रोबिन शर्मा * हम यह प्रार्थना न करें की हमारे ऊपर खतरे न आये, बल्कि यह कहें की हम उनका सामना करने में निडर रहें। -- रविन्द्र नाथ टैगोर * हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की आशा में होते हैं। इसलिए ये डर पर आधारित हैं। -- दीपक चोपड़ा * हमें अतीत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, न ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए। विवेकवान व्यक्ति हमेशा वर्तमान में ही जीते हैं। -- चाणक्य * हमेशा डरते रहने से एक बार ख़तरे का सामना कर डालना अच्छा है। -- नीतिसूत्र * हमेशा वो काम करो जिससे आपको डर लगता है। -- एमर्सन ==इन्हें भी देखें== * [[साहस]] * [[मृत्यु]] * [[वीरता]] o7inh1cyjbutzh8cy8qv3nmujj6e82v आर्य 0 6573 33385 24510 2026-10-16T07:50:10Z अनुनाद सिंह 658 33385 wikitext text/x-wiki '''आर्य''' का शाब्दिक अर्थ है- श्रेष्ठ । * ''नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत।'' -- [[महाभारत]], सभापर्व 59.11 : आर्य कभी कठोर वचन नहीं बोलते हैं और ना ही छल करते हैं। * ''वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया।'' -- महाभारत, उद्योगपर्व 90.53 : मनुष्य सदाचार से ही आर्य होता धन या विद्या से नहीं। * ''आशाभंगं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्याः कथञ्चम्।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 33.9 : आर्य अपने भक्त की आशा को कभी भंग नहीं करते हैं। * ''आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्मं।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : आर्य के लिये अच्छा कर्म करना सरल है। * ''अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : संसार में आर्य के द्वारा नीच कर्म का किया जाना अत्यंत कठिन है। * ''आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 195.21 : आर्य को कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये। * ''यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद् बुधः।'' -- महाभारत, शान्तिपर्व 94.10 : बुद्धिमान् उस कर्म को न करे जिसको आर्यजन अनुचित समझते हों। * ''लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति।'' -- महाभारत, अनुशासनपर्व 122.2 : आर्य के गुणों की ही लोग अधिक प्रशंसा करते हैं। * ''न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।'' : ''अहिंसा सब्बपाणानं अरियोऽति पवुच्‍चति॥'' -- धम्मपद २७० (धम्मट्ठवग्गो) : प्राणियोको हनन करने से (कोई ) आर्य गहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से ( बस ) आर्य कहा जाता है। * दुर्लभ मानव भव पाकर भी, आर्यत्व मिलाना दुर्लभतर। : हैं दस्यु-म्लेच्छ, करोड़ों ही नर, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१६॥ : पाकर भी आर्यत्व पूर्ण, इन्द्रिय का पाना अति दुष्कर। : हैं कितने इन्द्रिय-विकल यहाँ, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१७॥ --- उत्तराध्ययनसूत्र, अध्याय १० (द्रुमपत्रक) का हिन्दी काव्यरूपानतरण === आर्य-आक्रमण सिद्धान्त पर == ==इन्हें भी देखें== *[[आर्यसमाज]] jsfi20o1l072zgl4yeepotnzaziz542 33386 33385 2026-10-16T07:50:48Z अनुनाद सिंह 658 33386 wikitext text/x-wiki '''[[:w:आर्य|आर्य]]''' का शाब्दिक अर्थ है- श्रेष्ठ । ==उद्धरण == * ''नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत।'' -- [[महाभारत]], सभापर्व 59.11 : आर्य कभी कठोर वचन नहीं बोलते हैं और ना ही छल करते हैं। * ''वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया।'' -- महाभारत, उद्योगपर्व 90.53 : मनुष्य सदाचार से ही आर्य होता धन या विद्या से नहीं। * ''आशाभंगं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्याः कथञ्चम्।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 33.9 : आर्य अपने भक्त की आशा को कभी भंग नहीं करते हैं। * ''आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्मं।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : आर्य के लिये अच्छा कर्म करना सरल है। * ''अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : संसार में आर्य के द्वारा नीच कर्म का किया जाना अत्यंत कठिन है। * ''आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 195.21 : आर्य को कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये। * ''यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद् बुधः।'' -- महाभारत, शान्तिपर्व 94.10 : बुद्धिमान् उस कर्म को न करे जिसको आर्यजन अनुचित समझते हों। * ''लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति।'' -- महाभारत, अनुशासनपर्व 122.2 : आर्य के गुणों की ही लोग अधिक प्रशंसा करते हैं। * ''न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।'' : ''अहिंसा सब्बपाणानं अरियोऽति पवुच्‍चति॥'' -- धम्मपद २७० (धम्मट्ठवग्गो) : प्राणियोको हनन करने से (कोई ) आर्य गहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से ( बस ) आर्य कहा जाता है। * दुर्लभ मानव भव पाकर भी, आर्यत्व मिलाना दुर्लभतर। : हैं दस्यु-म्लेच्छ, करोड़ों ही नर, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१६॥ : पाकर भी आर्यत्व पूर्ण, इन्द्रिय का पाना अति दुष्कर। : हैं कितने इन्द्रिय-विकल यहाँ, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१७॥ --- उत्तराध्ययनसूत्र, अध्याय १० (द्रुमपत्रक) का हिन्दी काव्यरूपानतरण === आर्य-आक्रमण सिद्धान्त पर == ==इन्हें भी देखें== *[[आर्यसमाज]] ei9qhrizxbibuhgtgqtwfmjomtod1ds 33387 33386 2026-10-16T07:51:03Z अनुनाद सिंह 658 /* = आर्य-आक्रमण सिद्धान्त पर */ 33387 wikitext text/x-wiki '''[[:w:आर्य|आर्य]]''' का शाब्दिक अर्थ है- श्रेष्ठ । ==उद्धरण == * ''नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत।'' -- [[महाभारत]], सभापर्व 59.11 : आर्य कभी कठोर वचन नहीं बोलते हैं और ना ही छल करते हैं। * ''वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया।'' -- महाभारत, उद्योगपर्व 90.53 : मनुष्य सदाचार से ही आर्य होता धन या विद्या से नहीं। * ''आशाभंगं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्याः कथञ्चम्।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 33.9 : आर्य अपने भक्त की आशा को कभी भंग नहीं करते हैं। * ''आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्मं।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : आर्य के लिये अच्छा कर्म करना सरल है। * ''अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 143.10 : संसार में आर्य के द्वारा नीच कर्म का किया जाना अत्यंत कठिन है। * ''आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः।'' -- महाभारत, द्रोणपर्व 195.21 : आर्य को कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये। * ''यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद् बुधः।'' -- महाभारत, शान्तिपर्व 94.10 : बुद्धिमान् उस कर्म को न करे जिसको आर्यजन अनुचित समझते हों। * ''लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति।'' -- महाभारत, अनुशासनपर्व 122.2 : आर्य के गुणों की ही लोग अधिक प्रशंसा करते हैं। * ''न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।'' : ''अहिंसा सब्बपाणानं अरियोऽति पवुच्‍चति॥'' -- धम्मपद २७० (धम्मट्ठवग्गो) : प्राणियोको हनन करने से (कोई ) आर्य गहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से ( बस ) आर्य कहा जाता है। * दुर्लभ मानव भव पाकर भी, आर्यत्व मिलाना दुर्लभतर। : हैं दस्यु-म्लेच्छ, करोड़ों ही नर, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१६॥ : पाकर भी आर्यत्व पूर्ण, इन्द्रिय का पाना अति दुष्कर। : हैं कितने इन्द्रिय-विकल यहाँ, गौतम! प्रमाद क्षण का मतकर ॥१७॥ --- उत्तराध्ययनसूत्र, अध्याय १० (द्रुमपत्रक) का हिन्दी काव्यरूपानतरण === आर्य-आक्रमण सिद्धान्त पर === ==इन्हें भी देखें== *[[आर्यसमाज]] qil94xwa46g5y4yj2bmouss632zep1j नकल 0 6993 33383 31139 2026-10-16T03:07:43Z SM7 1879 सफाई 33383 wikitext text/x-wiki * किसी को अपना व्यक्तित्व छोड़कर दूसरे का व्यक्तित्व नहीं अपनाना चाहिए। -- चैनिंग * मानव नकल करने वाला प्राणी है और जो सबसे आगे रहता है वो नेत्रित्व करता है। -- शिलर * जहाँ नकल है वहां खाली दिखावा होगा, जहाँ खाली दिखावा है वहां मूर्खता होगी। -- जॉन्सन * दुनिया भर की सभी कलायें प्रकृति की ही नकल हैं। -- लुसिअस अन्निअस सेनिसा * आप अपनी मौलिकता के साथ पैदा हुए थे, किसी की नक़ल के साथ मत मरिये। -- जॉन मेसन '''मौलिकता''' का अर्थ है – अपने विचार, कार्य और दृष्टिकोण में स्वयं का योगदान देना, किसी की नक़ल न करना। इसके विपरीत '''नकल''' (अनुकरण) का अर्थ है – किसी और के विचार, शैली या कार्य को बिना परिवर्तन के दोहराना। == परिभाषा == * **मौलिकता** – नई सोच, आत्म-चिंतन और आत्म-अभिव्यक्ति की निशानी। * **नकल** – सृजनात्मकता की कमी या आत्मविश्वास की कमी का प्रतीक। == उद्धरण == === मौलिकता के पक्ष में === * "किसी को अपना व्यक्तित्व छोड़कर दूसरे का व्यक्तित्व नहीं अपनाना चाहिए।" — '''चैनिंग''' * "आप अपनी मौलिकता के साथ पैदा हुए थे, किसी की नक़ल के साथ मत मरिये।" — '''जॉन मेसन''' === नकल पर विचार === * "मानव नकल करने वाला प्राणी है और जो सबसे आगे रहता है, वही नेतृत्व करता है।" — '''शिलर''' * "जहाँ नकल है, वहाँ खाली दिखावा होगा; जहाँ खाली दिखावा है, वहाँ मूर्खता होगी।" — '''सैमुएल जॉन्सन''' * "दुनिया भर की सभी कलायें प्रकृति की ही नकल हैं।" — '''लुसिअस अन्निअस सेनेका''' == देखें भी == * [[मौलिकता]] * [[नेतृत्व]] * [[व्यक्तित्व]] * [[रचनात्मकता]] * [[प्रेरणा]] * [[स्वावलम्बन]] == श्रेणियाँ == [[Category:नीति]] [[Category:व्यक्तित्व विकास]] [[Category:मौलिक विचार]] [[Category:प्रेरक विचार]] [[Category:नकल बनाम मौलिकता]] nkwtbmigwhnoperdnks8f9x6oyztgnw धीरे-धीरे 0 7130 33384 25283 2026-10-16T07:46:48Z अनुनाद सिंह 658 33384 wikitext text/x-wiki * ''शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतमस्तके । : ''शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥ : धीरे-धीरे (धैर्य से) रास्ता काटना या चलना चाहिए , धीरे-धीरे सिलाई करना (या वैराग्य लेना) चाहिये, धीरे धीरे पर्वत पर चढ़ना चाहिए, धीरे-धीरे विद्या प्राप्त करना चाहिए और पैसे भी धीरे कमाना चाहिए। * ''क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । : ''क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥ : एक-एक क्षण गँवाए बिना विद्या पानी चाहिए और एक-एक कण बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए। क्षण गँवाने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती, और कण नष्ट करने वाले को धन नहीं मिलता। * ''यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः। : ''तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम्॥'' -- शाण्डिल्योपनिषद / हठयोगप्रदीपिका : जिस प्रकार सिंह, गज और व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में आते हैं, उसी प्रकार वायु भी प्राणायाम के अभ्यास से धीरे-धीरे वश में आ जाती है; लेकिन इसके विपरीत नियम से चलने पर यानी जल्दबाजी करने से वायु साधक (योगी) का विनाश कर देती है। * धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । : माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ -- कबीर * यह 'रहीम' निज संग लै, जनमत जगत् न कोय । : बैर प्रीति अभ्यास जस होत होत ही होय ॥ : बैर, प्रीति, अभ्यास और यश इनके साथ संसार में कोई भी जन्म नहीं लेता। ये सारी चीजें तो धीरे-धीरे ही आती हैं। * भविष्य धीरे-धीरे आता है, वर्तमान उड़ जाता है और अतीत हमेशा के लिए खड़ा हो जाता है। -- फ्रेडरिक शीलर * लाभ धीरे-धीरे दिया जाना चाहिए; और इस तरह वे बेहतर स्वाद लेंगे। -- निकोलो मैकियावेली * सामाजिक और आर्थिक मौलिक परिवर्तन क्रमिक रूप से धीरे-धीरे किया जाना चाहिए। -- विक्रम साराभाई == इन्हें भी देखें == * [[समय]] * [[धैर्य]] o5ljdj2tuzdmu5mb8ay4vpgftv95n23 33388 33384 2026-10-16T08:27:40Z अनुनाद सिंह 658 33388 wikitext text/x-wiki * ''शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतमस्तके । : ''शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥ : धीरे-धीरे (धैर्य से) रास्ता काटना या चलना चाहिए , धीरे-धीरे सिलाई करना (या वैराग्य लेना) चाहिये, धीरे धीरे पर्वत पर चढ़ना चाहिए, धीरे-धीरे विद्या प्राप्त करना चाहिए और पैसे भी धीरे कमाना चाहिए। * ''क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । : ''क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥ : एक-एक क्षण गँवाए बिना विद्या पानी चाहिए और एक-एक कण बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए। क्षण गँवाने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती, और कण नष्ट करने वाले को धन नहीं मिलता। * '' जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । : '' स हेतुः सर्वशास्त्राणां धर्मस्य च धनस्य च ॥'' -- [[हितोपदेश]] २.४ : पानी की बूंदो के गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है। वही बात सभी शास्त्रों पर, धर्म व धन पर भी लागू होती है। * ''यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः। : ''तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम्॥'' -- शाण्डिल्योपनिषद / हठयोगप्रदीपिका : जिस प्रकार सिंह, गज और व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में आते हैं, उसी प्रकार वायु भी प्राणायाम के अभ्यास से धीरे-धीरे वश में आ जाती है; लेकिन इसके विपरीत नियम से चलने पर यानी जल्दबाजी करने से वायु साधक (योगी) का विनाश कर देती है। * धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । : माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ -- कबीर * यह 'रहीम' निज संग लै, जनमत जगत् न कोय । : बैर प्रीति अभ्यास जस होत होत ही होय ॥ : बैर, प्रीति, अभ्यास और यश इनके साथ संसार में कोई भी जन्म नहीं लेता। ये सारी चीजें तो धीरे-धीरे ही आती हैं। * भविष्य धीरे-धीरे आता है, वर्तमान उड़ जाता है और अतीत हमेशा के लिए खड़ा हो जाता है। -- फ्रेडरिक शीलर * लाभ धीरे-धीरे दिया जाना चाहिए; और इस तरह वे बेहतर स्वाद लेंगे। -- निकोलो मैकियावेली * सामाजिक और आर्थिक मौलिक परिवर्तन क्रमिक रूप से धीरे-धीरे किया जाना चाहिए। -- विक्रम साराभाई == इन्हें भी देखें == * [[समय]] * [[धैर्य]] ltin8uvjx1bz8d8s71vkl8hsttgpf2p इस्मत चुगताई 0 8576 33380 31027 2026-10-16T03:03:21Z SM7 1879 सफाई 33380 wikitext text/x-wiki '''इस्मत चुग़ताई''' उर्दू की एक प्रमुख लेखिका होने के साथ-साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। उनके लेखन ने समाज को झकझोर कर रख दिया था और उस समय मजहब की चार दीवारी में प्रताड़ित होती प्रताड़ित महिलाओं को आवाज़ दी। इस्मत चुग़ताई का जन्म 21 अगस्त, 1915 को भारत के लाहौर में हुआ था।1936 में… स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक दोहरेपन और मानवीय भावनाओं पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी राय अपने लेखों में लिखी थी। उन्होंने अपने समय की कई रूढ़ियों को तोड़ने का जिम्मा उठाया और उसमें काफी हद तक वह सफ़ल भी हुईं। उनकी कहानियों और उपन्यासों में महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखाया गया है। इस्मत चुग़ताई की प्रमुख कहानियों में “लिहाफ़”, “फूलों का हार”, “ज़िंदगीनामा”, “जैसे कि” तथा प्रमुख उपन्यासों की श्रेणी में “टेढ़ी लकीर”, “उसकी कहानी”, “फ़िलहाल” इत्यादि को गिना जाता है। साहित्य में अपना योगदान देने के लिए वर्ष 1961 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा वर्ष 1981 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 24 अक्टूबर, 1991 को उर्दू की एक महान लेखिका इस्मत चुग़ताई जी का निधन लाहौर में हुआ था। <ref>Ismat Chughtai, *Tedhi Lakeer*, 1943</ref> [[Category:भारतीय लेखक]] [[Category:उर्दू साहित्यकार]] [[Category:नारीवादी लेखक]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://en.wikipedia.org/wiki/Ismat_Chughtai इस्मत चुगताई (अंग्रेज़ी विकिपीडिया)] * [https://rekhta.org/ इस्मत चुगताई की कहानियाँ - रेख़्ता] == उक्तियाँ == * औरत अपने घर की दीवारों के अंदर एक पिंजरे में बंद चिड़िया होती है, जिसके पंख छोटे कर दिए गए हैं। * एक औरत वही चिड़िया है जो अगर अपने पिंजरे के दरवाजे खोल दे और बाहर हवाओं में उड़ान भर ले, तो उसे दुनिया पागल कहती है। * औरतों को औरतों से अधिक समझने का दावा न कीजिए तो अच्छा है। हम खुद उन गुत्थियों को सुलझा नहीं पाए हैं, जिन्हें आप सुलझा लेने का दावा करते हैं। * मर्द के बिना औरत का अस्तित्व नहीं होता, यह झूठ है! * औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। * यह समाज जो औरत की आवाज़ बंद कर देना चाहता है, उसकी इच्छाओं को कुचल देना चाहता है, वही समाज उसके शरीर पर तमाशा करता है, उसकी बेज्जती उड़ाता है। * हमारी संस्कृति ने औरत के शरीर को शर्म का पर्दा पहना दिया है, लेकिन मर्द के शरीर को नहीं। ये दोहरापन ही हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। * प्रेम और नफरत के दरमियान एक पतली सी लकीर होती है, जिसे पार करना कभी-कभी बहुत आसान होता है। * जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किल किसी को पाना नहीं है, बल्कि उसे खोने के बाद खुद को बचाकर रखना है। * हर इंसान के अंदर एक अंधेरा कोना होता है, जिसे वो दुनिया से छुपाता है। वही अंधेरा कभी-कभी सबसे सच्चा होता है। * अपने अंदर झांकने की हिम्मत रखो, वहां बहुत सारी कहानियां छिपी हुई हैं। * जो समाज का बनाया हुआ रास्ता चलता है, वो कभी मंजिल तक नहीं पहुंच पाता। * सच बोलना मुश्किल होता है, लेकिन झूठ बोलकर जीना और भी मुश्किल होता है। * पढ़ना मत रोको, लिखना मत रोको, सोचना मत रोको। * मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूं, क्या यह बहुत बड़ा सपना है? * किसी की आवाज बन्द करना आसान है, लेकिन सच को दबाना मुश्किल होता है। * जो किताबें औरतों की कहानियां नहीं सुनातीं, वो अधूरी हैं। * "औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।" : "A woman has an identity; she just wants to live on her own terms." ejmosbttqbe6hl7gtxac7jmoyjecmil 33381 33380 2026-10-16T03:05:19Z SM7 1879 सफाई 33381 wikitext text/x-wiki '''इस्मत चुग़ताई''' उर्दू की एक प्रमुख लेखिका होने और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। इस्मत चुग़ताई का जन्म 21 अगस्त, 1915 को भारत के लाहौर में हुआ था। 1936 मेँ स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक दोहरेपन और मानवीय भावनाओं पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी राय अपने लेखों में लिखी थी। उन्होंने अपने समय की कई रूढ़ियों को तोड़ने का जिम्मा उठाया और उसमें काफी हद तक वह सफ़ल भी हुईं। उनकी कहानियों और उपन्यासों में महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखाया गया है। इस्मत चुग़ताई की प्रमुख कहानियों में “लिहाफ़”, “फूलों का हार”, “ज़िंदगीनामा”, “जैसे कि” तथा प्रमुख उपन्यासों की श्रेणी में “टेढ़ी लकीर”, “उसकी कहानी”, “फ़िलहाल” इत्यादि को गिना जाता है। साहित्य में अपना योगदान देने के लिए वर्ष 1961 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा वर्ष 1981 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 24 अक्टूबर, 1991 को चुग़ताई का निधन लाहौर में हुआ था। == उक्तियाँ == * औरत अपने घर की दीवारों के अंदर एक पिंजरे में बंद चिड़िया होती है, जिसके पंख छोटे कर दिए गए हैं। * एक औरत वही चिड़िया है जो अगर अपने पिंजरे के दरवाजे खोल दे और बाहर हवाओं में उड़ान भर ले, तो उसे दुनिया पागल कहती है। * औरतों को औरतों से अधिक समझने का दावा न कीजिए तो अच्छा है। हम खुद उन गुत्थियों को सुलझा नहीं पाए हैं, जिन्हें आप सुलझा लेने का दावा करते हैं। * मर्द के बिना औरत का अस्तित्व नहीं होता, यह झूठ है! * औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। * यह समाज जो औरत की आवाज़ बंद कर देना चाहता है, उसकी इच्छाओं को कुचल देना चाहता है, वही समाज उसके शरीर पर तमाशा करता है, उसकी बेज्जती उड़ाता है। * हमारी संस्कृति ने औरत के शरीर को शर्म का पर्दा पहना दिया है, लेकिन मर्द के शरीर को नहीं। ये दोहरापन ही हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। * प्रेम और नफरत के दरमियान एक पतली सी लकीर होती है, जिसे पार करना कभी-कभी बहुत आसान होता है। * जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किल किसी को पाना नहीं है, बल्कि उसे खोने के बाद खुद को बचाकर रखना है। * हर इंसान के अंदर एक अंधेरा कोना होता है, जिसे वो दुनिया से छुपाता है। वही अंधेरा कभी-कभी सबसे सच्चा होता है। * अपने अंदर झांकने की हिम्मत रखो, वहां बहुत सारी कहानियां छिपी हुई हैं। * जो समाज का बनाया हुआ रास्ता चलता है, वो कभी मंजिल तक नहीं पहुंच पाता। * सच बोलना मुश्किल होता है, लेकिन झूठ बोलकर जीना और भी मुश्किल होता है। * पढ़ना मत रोको, लिखना मत रोको, सोचना मत रोको। * मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूं, क्या यह बहुत बड़ा सपना है? * किसी की आवाज बन्द करना आसान है, लेकिन सच को दबाना मुश्किल होता है। * जो किताबें औरतों की कहानियां नहीं सुनातीं, वो अधूरी हैं। * "औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।" : "A woman has an identity; she just wants to live on her own terms." == बाहरी कड़ियाँ == * [https://en.wikipedia.org/wiki/Ismat_Chughtai इस्मत चुगताई (अंग्रेज़ी विकिपीडिया)] * [https://rekhta.org/ इस्मत चुगताई की कहानियाँ - रेख़्ता] [[श्रेणी:भारतीय लेखक]] [[श्रेणी:उर्दू साहित्यकार]] [[श्रेणी:नारीवादी लेखक]] 7t7dapx0zajr3m1dosdetoja9obnww5 33382 33381 2026-10-16T03:06:21Z SM7 1879 +unref 33382 wikitext text/x-wiki '''इस्मत चुग़ताई''' उर्दू की एक प्रमुख लेखिका होने और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। इस्मत चुग़ताई का जन्म 21 अगस्त, 1915 को भारत के लाहौर में हुआ था। 1936 मेँ स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक दोहरेपन और मानवीय भावनाओं पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी राय अपने लेखों में लिखी थी। उन्होंने अपने समय की कई रूढ़ियों को तोड़ने का जिम्मा उठाया और उसमें काफी हद तक वह सफ़ल भी हुईं। उनकी कहानियों और उपन्यासों में महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखाया गया है। इस्मत चुग़ताई की प्रमुख कहानियों में “लिहाफ़”, “फूलों का हार”, “ज़िंदगीनामा”, “जैसे कि” तथा प्रमुख उपन्यासों की श्रेणी में “टेढ़ी लकीर”, “उसकी कहानी”, “फ़िलहाल” इत्यादि को गिना जाता है। साहित्य में अपना योगदान देने के लिए वर्ष 1961 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से तथा वर्ष 1981 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 24 अक्टूबर, 1991 को चुग़ताई का निधन लाहौर में हुआ था। == उक्तियाँ == {{unref}} * औरत अपने घर की दीवारों के अंदर एक पिंजरे में बंद चिड़िया होती है, जिसके पंख छोटे कर दिए गए हैं। * एक औरत वही चिड़िया है जो अगर अपने पिंजरे के दरवाजे खोल दे और बाहर हवाओं में उड़ान भर ले, तो उसे दुनिया पागल कहती है। * औरतों को औरतों से अधिक समझने का दावा न कीजिए तो अच्छा है। हम खुद उन गुत्थियों को सुलझा नहीं पाए हैं, जिन्हें आप सुलझा लेने का दावा करते हैं। * मर्द के बिना औरत का अस्तित्व नहीं होता, यह झूठ है! * औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। * यह समाज जो औरत की आवाज़ बंद कर देना चाहता है, उसकी इच्छाओं को कुचल देना चाहता है, वही समाज उसके शरीर पर तमाशा करता है, उसकी बेज्जती उड़ाता है। * हमारी संस्कृति ने औरत के शरीर को शर्म का पर्दा पहना दिया है, लेकिन मर्द के शरीर को नहीं। ये दोहरापन ही हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। * प्रेम और नफरत के दरमियान एक पतली सी लकीर होती है, जिसे पार करना कभी-कभी बहुत आसान होता है। * जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किल किसी को पाना नहीं है, बल्कि उसे खोने के बाद खुद को बचाकर रखना है। * हर इंसान के अंदर एक अंधेरा कोना होता है, जिसे वो दुनिया से छुपाता है। वही अंधेरा कभी-कभी सबसे सच्चा होता है। * अपने अंदर झांकने की हिम्मत रखो, वहां बहुत सारी कहानियां छिपी हुई हैं। * जो समाज का बनाया हुआ रास्ता चलता है, वो कभी मंजिल तक नहीं पहुंच पाता। * सच बोलना मुश्किल होता है, लेकिन झूठ बोलकर जीना और भी मुश्किल होता है। * पढ़ना मत रोको, लिखना मत रोको, सोचना मत रोको। * मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूं, क्या यह बहुत बड़ा सपना है? * किसी की आवाज बन्द करना आसान है, लेकिन सच को दबाना मुश्किल होता है। * जो किताबें औरतों की कहानियां नहीं सुनातीं, वो अधूरी हैं। * "औरत का अस्तित्व है, वो सिर्फ अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।" : "A woman has an identity; she just wants to live on her own terms." == बाहरी कड़ियाँ == * [https://en.wikipedia.org/wiki/Ismat_Chughtai इस्मत चुगताई (अंग्रेज़ी विकिपीडिया)] * [https://rekhta.org/ इस्मत चुगताई की कहानियाँ - रेख़्ता] [[श्रेणी:भारतीय लेखक]] [[श्रेणी:उर्दू साहित्यकार]] [[श्रेणी:नारीवादी लेखक]] klcqzp4rbo29m7qonwpbjvbpkkm5oa8 गिजुभाई बधेका 0 9356 33391 2026-10-16T08:48:55Z अनुनाद सिंह 658 "'''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33391 wikitext text/x-wiki '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। == उक्तियाँ == * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] f5x37b268my18205kcmzplapzb58ct0 33392 33391 2026-10-16T08:57:13Z अनुनाद सिंह 658 33392 wikitext text/x-wiki '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885 - 23 जून, 1939) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। ; कृतियाँ <poem> 1. दिवास्वप्न 2. कठिन है माता-पिता बनना 3. माता-पिता की अपेक्षाए और प्रश्न 4. माता-पिताओं की मातपच्ची 5. कथा कहानी का शास्त्र 6. शिक्षक हो तो 7. बाल शिक्षण जैसा मैं समझ पाया 8. प्राथमिक विद्यालय भाषा-शिक्षण और चिट्ठी वाचन 9. प्राथमिक विद्यालय शिक्षक और शिक्षण पद्धतियां 10. मांटेसरी-पद्धति 11. प्राथमिक विद्यालय में कला-कारीगिरी की शिक्षा 12. चलते-फिरते </poem> == उक्तियाँ == * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] rm7wxohsbm2iqmg8o192lju1i6k7c5j 33393 33392 2026-10-16T09:09:26Z अनुनाद सिंह 658 33393 wikitext text/x-wiki '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885 - 23 जून, 1939) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। ; कृतियाँ <poem> 1. दिवास्वप्न 2. कठिन है माता-पिता बनना 3. माता-पिता की अपेक्षाए और प्रश्न 4. माता-पिताओं की मातपच्ची 5. कथा कहानी का शास्त्र 6. शिक्षक हो तो 7. बाल शिक्षण जैसा मैं समझ पाया 8. प्राथमिक विद्यालय भाषा-शिक्षण और चिट्ठी वाचन 9. प्राथमिक विद्यालय शिक्षक और शिक्षण पद्धतियां 10. मांटेसरी-पद्धति 11. प्राथमिक विद्यालय में कला-कारीगिरी की शिक्षा 12. चलते-फिरते </poem> == उक्तियाँ == * हमारे जीवन की पाठशाला में अध्ययन हेतु ऐसे प्रणाली को अपनायें ताकि उसमें सेवा की भावना, रात-दिन विकसित होती रहे। * शिक्षक को शाला में माता-पिता की भूमिका ही निभानी चाहिये। * मेरे छात्रों को मेरा आदेश है कि घोड़ों के अस्‍तबल जैसी धूल भरी इन शालाओं को जमींदोज़ कर दो। मारपीट और भय दिखाने वाले इन बाल कत्तलखानों की नीवों को बारूद भरकर उड़ा दो। इन्‍हें नेस्‍तानाबूद कर दो। * पहले वाचन पर बल देना चाहिये इसके पश्चात् लेखन पर। अँगुलियों से कलम पकड़ने का तरीका, पेन्सिल पर काबू, इच्छानुसार मोड़ना और विभिन्न आकृतियों से अक्षर आकृति तक आना लेखन की पहली आवश्यकता है। * अनेक शालाओं में व्याकरण शिक्षण का कालांश अलग होता है। ऐसा नहीं होना चाहिये क्योंकि व्याकरण भाषा शिक्षण का ही एक भाग है। पाठ में संज्ञा, क्रिया, सर्वनाम तथा विश्लेषण आदि की पहचान बालक को खेल-खेल में ही करानी चाहिये। * बालकों के लिये कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाने से विषय रोचक बन जाता है। कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाते समय, शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मूल घटना के आसपास कल्पित घटनाओं को इस प्रकार सजाकर पढ़ाना चाहिये कि उन्हें वास्तविकता का ध्यान कहानी के माध्यम से ही हो जाये। भूगोल पढ़ाने में ग्लोब तथा मानचित्रों की सहायता लेकर तथ्यों को स्पष्ट करना चाहिये। * छात्रों का लोकगीतों के माध्यम से काव्य शिक्षण आरम्भ किया जाना चाहिये। लोकगीतों या ग्राम्य गीतों में स्पष्टता और उचित विषय वस्तु होने के कारण बालक उनकी ओर शीघ्र आकृष्ट होते हैं। बालक के सामने वह कविता रखी जाय जिसकी भाषा बोधगम्य हो। उस कविता की विषय वस्तु वर्णनात्मक या रुचिपूर्ण हो। कविता का परिचय गाकर भी कराया जा सकता है, उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती। कविता की रसानुभूति होने पर ही पूर्ण आत्मसात हो जाती है। कविता के भाव विभिन्न मुद्राओं में प्रकट किये जाने चाहिये। * चित्रकला में बालकों को वस्तुओं के नाम या वह वस्तु देकर उनकी आकृति बनाने हेतु कहना चाहिये। प्रारम्भ में उनके चित्र सुन्दर न बन सके परन्तु अभ्यास से वे ठीक चित्र बनान लगेंगे। बाद में उनके पेंसिल से जैसा भी सम्भव हो चित्र बनवाने चाहिये। अच्छे चित्रों को प्रदर्शन हेतु रखवाना चाहिये। इससे बालकों को प्रोत्साहन मिलता है। * गिजूभाई के अनुसार बालकों की पाठ्य-पुस्तक में महान पुरुषों एवं ईश्वर के चित्र तथा उनके जीवन के प्रसंगों पर कथाएँ होनी चाहिये। धर्म से सम्बन्धित गूढ़ बातों को बालक नहीं समझ पाते। अतः उन्हें कुरान, उपनिषद् की कहानियाँ एवं कथाएँ कही जानी चाहिये। कर्मकाण्ड, श्लोक पाठ, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आदि को हम भविष्य के लिये छोड़ सकते हैं। * गिजूभाई के अनुसार नियत समय पर खेलने-कूदने हेतु बालकों को मुक्त किया जाना चाहिये। खेलने-कूदने का अर्थ खेलना, कूदना तथा मौज-भरना है। इसमें हारने-जीतने का कोई महत्व नहीं होना चाहिये। जीतने वालों को पुरस्कार आदि के वितरण से बालकों में हीन भावनाएँ जागृत हो जाती है। * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] nlgdxvx1hg8sgtltzu1ld192sru1t5d 33394 33393 2026-10-16T09:20:42Z अनुनाद सिंह 658 33394 wikitext text/x-wiki '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885 - 23 जून, 1939) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। ; कृतियाँ <poem> १) दिवास्वप्न २) कठिन है माता-पिता बनना ३) माता-पिता की अपेक्षाए और प्रश्न ४) माता-पिताओं की मातपच्ची ५) कथा कहानी का शास्त्र ६) शिक्षक हो तो ७) बाल शिक्षण जैसा मैं समझ पाया ८) प्राथमिक विद्यालय भाषा-शिक्षण और चिट्ठी वाचन ९) प्राथमिक विद्यालय शिक्षक और शिक्षण पद्धतियां १०) मांटेसरी-पद्धति ११) प्राथमिक विद्यालय में कला-कारीगिरी की शिक्षा १२) चलते-फिरते </poem> == उक्तियाँ == * हमारे जीवन की पाठशाला में अध्ययन हेतु ऐसे प्रणाली को अपनायें ताकि उसमें सेवा की भावना, रात-दिन विकसित होती रहे। * शिक्षक को शाला में माता-पिता की भूमिका ही निभानी चाहिये। * मेरे छात्रों को मेरा आदेश है कि घोड़ों के अस्‍तबल जैसी धूल भरी इन शालाओं को जमींदोज़ कर दो। मारपीट और भय दिखाने वाले इन बाल कत्तलखानों की नीवों को बारूद भरकर उड़ा दो। इन्‍हें नेस्‍तानाबूद कर दो। * पहले वाचन पर बल देना चाहिये इसके पश्चात् लेखन पर। अँगुलियों से कलम पकड़ने का तरीका, पेन्सिल पर काबू, इच्छानुसार मोड़ना और विभिन्न आकृतियों से अक्षर आकृति तक आना लेखन की पहली आवश्यकता है। * अनेक शालाओं में व्याकरण शिक्षण का कालांश अलग होता है। ऐसा नहीं होना चाहिये क्योंकि व्याकरण भाषा शिक्षण का ही एक भाग है। पाठ में संज्ञा, क्रिया, सर्वनाम तथा विश्लेषण आदि की पहचान बालक को खेल-खेल में ही करानी चाहिये। * बालकों के लिये कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाने से विषय रोचक बन जाता है। कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाते समय, शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मूल घटना के आसपास कल्पित घटनाओं को इस प्रकार सजाकर पढ़ाना चाहिये कि उन्हें वास्तविकता का ध्यान कहानी के माध्यम से ही हो जाये। भूगोल पढ़ाने में ग्लोब तथा मानचित्रों की सहायता लेकर तथ्यों को स्पष्ट करना चाहिये। * छात्रों का लोकगीतों के माध्यम से काव्य शिक्षण आरम्भ किया जाना चाहिये। लोकगीतों या ग्राम्य गीतों में स्पष्टता और उचित विषय वस्तु होने के कारण बालक उनकी ओर शीघ्र आकृष्ट होते हैं। बालक के सामने वह कविता रखी जाय जिसकी भाषा बोधगम्य हो। उस कविता की विषय वस्तु वर्णनात्मक या रुचिपूर्ण हो। कविता का परिचय गाकर भी कराया जा सकता है, उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती। कविता की रसानुभूति होने पर ही पूर्ण आत्मसात हो जाती है। कविता के भाव विभिन्न मुद्राओं में प्रकट किये जाने चाहिये। * चित्रकला में बालकों को वस्तुओं के नाम या वह वस्तु देकर उनकी आकृति बनाने हेतु कहना चाहिये। प्रारम्भ में उनके चित्र सुन्दर न बन सके परन्तु अभ्यास से वे ठीक चित्र बनान लगेंगे। बाद में उनके पेंसिल से जैसा भी सम्भव हो चित्र बनवाने चाहिये। अच्छे चित्रों को प्रदर्शन हेतु रखवाना चाहिये। इससे बालकों को प्रोत्साहन मिलता है। * गिजूभाई के अनुसार बालकों की पाठ्य-पुस्तक में महान पुरुषों एवं ईश्वर के चित्र तथा उनके जीवन के प्रसंगों पर कथाएँ होनी चाहिये। धर्म से सम्बन्धित गूढ़ बातों को बालक नहीं समझ पाते। अतः उन्हें कुरान, उपनिषद् की कहानियाँ एवं कथाएँ कही जानी चाहिये। कर्मकाण्ड, श्लोक पाठ, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आदि को हम भविष्य के लिये छोड़ सकते हैं। * गिजूभाई के अनुसार नियत समय पर खेलने-कूदने हेतु बालकों को मुक्त किया जाना चाहिये। खेलने-कूदने का अर्थ खेलना, कूदना तथा मौज-भरना है। इसमें हारने-जीतने का कोई महत्व नहीं होना चाहिये। जीतने वालों को पुरस्कार आदि के वितरण से बालकों में हीन भावनाएँ जागृत हो जाती है। * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। * मुझको किसी ने कहा कि भारी-भरकम तात्त्विक लेखों के बजाय यदि मैं कथा-शैली में शैक्षिक विचारों को संजोऊं , तो ? मुझको प्रयत्न करने की प्रेरणा मिली और फलस्वरूप यह ‘ दिवास्वप्न ‘ रचा गया । दिवास्वप्नों का मूल वास्तविक अनुभव हो , तो वे मिथ्या नहीं जाते । यह दिवास्वप्न मेरे जीवंत अनुभवों में से उपजा है , और मुझे विश्वास है कि प्राणवान , क्रियावान , निष्ठावान शिक्षक अपने लिए भी इसे वास्तविक स्वरूप प्रदान कर सकेंगे । -- गिजुभाई, अपनी रचना 'दिवास्वप्न' के बारे में * वस्तुतः हम अपनी मान्यताओं को बालक पर लादने के लिये इनाम एवं सजा देने के लिये दमनात्मक साधनों का प्रयोग करते हैं। बालों के मन में यह स्थिति जेल की प्रथम सजा जैसी है। -- बालकों के अनुशासन के विषय में गिजूभाई * दण्ड के भय से तभी तक अनुशासन रहता है, जब तक दण्ड का भय स्थिर रहता है। जैसे ही दण्ड का भय चला जाता है, अनुशासन भी समाप्त हो जाता है। दण्ड का भय स्थिर नहीं रह सकता। अतः अनुशासन बालकों पर बहुत समय पर लागू नहीं रह सकता। * माँ-बाप तथा शिक्षक इस बात को समझ लें कि मारने या ललचाने से बालकों में उच्छृंखलता आती है। भय और लालच से बालक ढीठ-हीन बन जाते हैं। == गिजुभाई के बारे में अन्य लोगों के विचार == * दिवा स्वप्न सचमुच दिव्य है। कला के प्राथमिक शाला की समालोचना इस पुस्तक में प्राप्त होती है। साथ ही साथ भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला की मनोहर एवं स्पष्ट रूप की सुन्दर झाँकी मिलती है। -- गिजुभाई के समकालीन साथी और सहयोगी हरिभाई द्विवेदी, 'दिवास्वप्न' नामक उनकी कृति पर * यद्यपि लगभग तीस वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी 'दिवास्वप्न' और 'प्राथमिक शाला में भाषा-शिक्षा' - दोनों आज भी उतनी ही ताजी , उतनी ही प्रेरक और मार्गदर्शक हैं जितनी 30-35 साल पहले थीं । प्राथमिक पाठशालाओं की पढ़ाई में जो भारी दोष आ घुसे हैं , उनकी ओर इशारा करके उसके रूप-स्वरूप को बदलने की अत्यन्त मूलगामी , मूल्यवान और व्यावहारिक सूचनायें इन दोनों मौलिक पुस्तकों में भरी पड़ी हैं । इन पुस्तकों के अध्ययन , अनुशीलन और अनुसरण से नई पीढ़ी के उत्साही और निष्ठावान शिक्षक भाई-बहनों को अपनी शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करने की स्वस्थ और सबल प्रेरणा मिल सकेगी । इसी एक विचार से प्रेरित होकर मैंने इन्हें फिर छपाने का साहस किया है । आशा है , नई पीढ़ी के शिक्षक , शिक्षाधिकारी और शिक्षा संस्थाओं के कर्ता-धर्ता इन दोनों पुस्तकों को अपनाकर इनसे भरपूर लाभ उठायेंगे । -- काशिनाथ त्रिवेदी ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] 8v6isz6pa4tqa1ununb8xsrrn6ulzdc 33395 33394 2026-10-16T09:25:41Z अनुनाद सिंह 658 33395 wikitext text/x-wiki '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885 - 23 जून, 1939) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजा शंकर बधेका था। गुजरात में परंपरागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। ; कृतियाँ <poem> १) दिवास्वप्न २) कठिन है माता-पिता बनना ३) माता-पिता की अपेक्षाए और प्रश्न ४) माता-पिताओं की मातपच्ची ५) कथा कहानी का शास्त्र ६) शिक्षक हो तो ७) बाल शिक्षण जैसा मैं समझ पाया ८) प्राथमिक विद्यालय भाषा-शिक्षण और चिट्ठी वाचन ९) प्राथमिक विद्यालय शिक्षक और शिक्षण पद्धतियां १०) मांटेसरी-पद्धति ११) प्राथमिक विद्यालय में कला-कारीगिरी की शिक्षा १२) चलते-फिरते </poem> == उक्तियाँ == * हमारे जीवन की पाठशाला में अध्ययन हेतु ऐसे प्रणाली को अपनायें ताकि उसमें सेवा की भावना, रात-दिन विकसित होती रहे। * शिक्षक को शाला में माता-पिता की भूमिका ही निभानी चाहिये। * मेरे छात्रों को मेरा आदेश है कि घोड़ों के अस्‍तबल जैसी धूल भरी इन शालाओं को जमींदोज़ कर दो। मारपीट और भय दिखाने वाले इन बाल कत्तलखानों की नीवों को बारूद भरकर उड़ा दो। इन्‍हें नेस्‍तानाबूद कर दो। * पहले वाचन पर बल देना चाहिये इसके पश्चात् लेखन पर। अँगुलियों से कलम पकड़ने का तरीका, पेन्सिल पर काबू, इच्छानुसार मोड़ना और विभिन्न आकृतियों से अक्षर आकृति तक आना लेखन की पहली आवश्यकता है। * अनेक शालाओं में व्याकरण शिक्षण का कालांश अलग होता है। ऐसा नहीं होना चाहिये क्योंकि व्याकरण भाषा शिक्षण का ही एक भाग है। पाठ में संज्ञा, क्रिया, सर्वनाम तथा विश्लेषण आदि की पहचान बालक को खेल-खेल में ही करानी चाहिये। * बालकों के लिये कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाने से विषय रोचक बन जाता है। कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाते समय, शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मूल घटना के आसपास कल्पित घटनाओं को इस प्रकार सजाकर पढ़ाना चाहिये कि उन्हें वास्तविकता का ध्यान कहानी के माध्यम से ही हो जाये। भूगोल पढ़ाने में ग्लोब तथा मानचित्रों की सहायता लेकर तथ्यों को स्पष्ट करना चाहिये। * छात्रों का लोकगीतों के माध्यम से काव्य शिक्षण आरम्भ किया जाना चाहिये। लोकगीतों या ग्राम्य गीतों में स्पष्टता और उचित विषय वस्तु होने के कारण बालक उनकी ओर शीघ्र आकृष्ट होते हैं। बालक के सामने वह कविता रखी जाय जिसकी भाषा बोधगम्य हो। उस कविता की विषय वस्तु वर्णनात्मक या रुचिपूर्ण हो। कविता का परिचय गाकर भी कराया जा सकता है, उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती। कविता की रसानुभूति होने पर ही पूर्ण आत्मसात हो जाती है। कविता के भाव विभिन्न मुद्राओं में प्रकट किये जाने चाहिये। * चित्रकला में बालकों को वस्तुओं के नाम या वह वस्तु देकर उनकी आकृति बनाने हेतु कहना चाहिये। प्रारम्भ में उनके चित्र सुन्दर न बन सके परन्तु अभ्यास से वे ठीक चित्र बनान लगेंगे। बाद में उनके पेंसिल से जैसा भी सम्भव हो चित्र बनवाने चाहिये। अच्छे चित्रों को प्रदर्शन हेतु रखवाना चाहिये। इससे बालकों को प्रोत्साहन मिलता है। * गिजूभाई के अनुसार बालकों की पाठ्य-पुस्तक में महान पुरुषों एवं ईश्वर के चित्र तथा उनके जीवन के प्रसंगों पर कथाएँ होनी चाहिये। धर्म से सम्बन्धित गूढ़ बातों को बालक नहीं समझ पाते। अतः उन्हें कुरान, उपनिषद् की कहानियाँ एवं कथाएँ कही जानी चाहिये। कर्मकाण्ड, श्लोक पाठ, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आदि को हम भविष्य के लिये छोड़ सकते हैं। * गिजूभाई के अनुसार नियत समय पर खेलने-कूदने हेतु बालकों को मुक्त किया जाना चाहिये। खेलने-कूदने का अर्थ खेलना, कूदना तथा मौज-भरना है। इसमें हारने-जीतने का कोई महत्व नहीं होना चाहिये। जीतने वालों को पुरस्कार आदि के वितरण से बालकों में हीन भावनाएँ जागृत हो जाती है। * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। * मुझको किसी ने कहा कि भारी-भरकम तात्त्विक लेखों के बजाय यदि मैं कथा-शैली में शैक्षिक विचारों को संजोऊं , तो ? मुझको प्रयत्न करने की प्रेरणा मिली और फलस्वरूप यह ‘ दिवास्वप्न ‘ रचा गया । दिवास्वप्नों का मूल वास्तविक अनुभव हो , तो वे मिथ्या नहीं जाते । यह दिवास्वप्न मेरे जीवंत अनुभवों में से उपजा है , और मुझे विश्वास है कि प्राणवान , क्रियावान , निष्ठावान शिक्षक अपने लिए भी इसे वास्तविक स्वरूप प्रदान कर सकेंगे । -- गिजुभाई, अपनी रचना 'दिवास्वप्न' के बारे में * वस्तुतः हम अपनी मान्यताओं को बालक पर लादने के लिये इनाम एवं सजा देने के लिये दमनात्मक साधनों का प्रयोग करते हैं। बालों के मन में यह स्थिति जेल की प्रथम सजा जैसी है। -- बालकों के अनुशासन के विषय में गिजूभाई * दण्ड के भय से तभी तक अनुशासन रहता है, जब तक दण्ड का भय स्थिर रहता है। जैसे ही दण्ड का भय चला जाता है, अनुशासन भी समाप्त हो जाता है। दण्ड का भय स्थिर नहीं रह सकता। अतः अनुशासन बालकों पर बहुत समय पर लागू नहीं रह सकता। * माँ-बाप तथा शिक्षक इस बात को समझ लें कि मारने या ललचाने से बालकों में उच्छृंखलता आती है। भय और लालच से बालक ढीठ-हीन बन जाते हैं। == गिजुभाई के बारे में अन्य लोगों के विचार == * एक दिन उनका काम उग निकलेगा। -- गिजुभाई बधेका के बारे में [[महात्मा गांधी]] * दिवा स्वप्न सचमुच दिव्य है। कला के प्राथमिक शाला की समालोचना इस पुस्तक में प्राप्त होती है। साथ ही साथ भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला की मनोहर एवं स्पष्ट रूप की सुन्दर झाँकी मिलती है। -- गिजुभाई के समकालीन साथी और सहयोगी हरिभाई द्विवेदी, 'दिवास्वप्न' नामक उनकी कृति पर * यद्यपि लगभग तीस वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी 'दिवास्वप्न' और 'प्राथमिक शाला में भाषा-शिक्षा' - दोनों आज भी उतनी ही ताजी , उतनी ही प्रेरक और मार्गदर्शक हैं जितनी 30-35 साल पहले थीं । प्राथमिक पाठशालाओं की पढ़ाई में जो भारी दोष आ घुसे हैं , उनकी ओर इशारा करके उसके रूप-स्वरूप को बदलने की अत्यन्त मूलगामी , मूल्यवान और व्यावहारिक सूचनायें इन दोनों मौलिक पुस्तकों में भरी पड़ी हैं । इन पुस्तकों के अध्ययन , अनुशीलन और अनुसरण से नई पीढ़ी के उत्साही और निष्ठावान शिक्षक भाई-बहनों को अपनी शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करने की स्वस्थ और सबल प्रेरणा मिल सकेगी । इसी एक विचार से प्रेरित होकर मैंने इन्हें फिर छपाने का साहस किया है । आशा है , नई पीढ़ी के शिक्षक , शिक्षाधिकारी और शिक्षा संस्थाओं के कर्ता-धर्ता इन दोनों पुस्तकों को अपनाकर इनसे भरपूर लाभ उठायेंगे । -- काशिनाथ त्रिवेदी ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] c3fd1wnbl2ay0x0jy1fzb0nyspcmf99 33396 33395 2026-10-16T09:28:52Z अनुनाद सिंह 658 33396 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Gijubhai Badheka.jpg|right|thumb|300px|गिजुभाई बधेका]] '''[[:w:गिजुभाई बधेका|गिजुभाई बधेका]]''' (15 नवम्बर,1885 - 23 जून, 1939) [[भारत]] के एक [[शिक्षा]]शास्त्री थे। उनका असली नाम गिरिजाशंकर बधेका था। गुजरात में परम्परागत शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने के लिए साहित्य सर्जन और नूतन शिक्षा पद्धति द्वारा क्रांति करने वाले गिजुभाई बधेका का शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदान रहा है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रयोगों करके शिक्षा क्षेत्र के शून्यावकाश को भरने का प्रयत्न किया है। [[महात्मा गांधी]] ने गिजुभाई को ‘मुछाळी मा’ (मूछवाली माँ) कहा है तो [[काका साहब कालेलकर]] ने उनको ‘बालसाहित्य के ब्रह्मा’ कहा है। गिजुभाई का का जन्म 15 नवम्बर,1885 को गुजरात के अमरेली जिले के चित्तळ गांव में हुआ था। माता का नाम काशीबा और पिता का नाम भगवानजी था। गिजुभाई प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भावनगर में पूर्ण करके 1905 में मेट्रिक हुए। फिर दो वर्ष अफ्रीका गए। भारत लौटकर मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार की और साथ-साथ वकालत की पढ़ाई शुरू की। वकालत का अभ्यास पूर्ण करके कुछ समय वकालत की। सन् 1913 से 1916 तक वढवाण कैम्प में डिस्ट्रीक्ट हाई कोर्ट प्लीडर के रूप में काम किया। 27 फरवरी, 1913 उनके घर पुत्र नरेंद्र का जन्म हुआ। अपने पुत्र को परंपरागत शिक्षा पद्धति से मुक्त रखने का निर्णय किया। उनको प्रचलित शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई दी। उन्होंने मारिया मॊन्टेसोरी की पुस्तकें पढ़ी जिससे उनको बाल-शिक्षा की सच्ची समझ प्राप्त हुई। 13 नवम्बर, 1916 को ‘दक्षिणामूर्ति’ के साथ जुड़े और 1918 में कुमार मंदिर के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान उनमें छिपा हुआ सच्चा शिक्षक और बच्चों का प्यारा साथी जागृत हुआ। उन्होंने गुजरात के शिक्षा क्षेत्र को नई दिशा देकर उसकी दशा बदलने का सघन प्रयत्न किया। इसके लिए उन्होंने मॊन्टेसोरी पद्धति द्वारा बालमंदिर की शिक्षा का प्रारंभ किया। गिजुभाई का संपूर्ण शिक्षा दर्शन बालक के इर्द-गिर्द घूमता है। उनकी स्‍वाभाविक वृत्तियों का सही तरीके से विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य है। गिजुभाई के शिक्षण का आधार व्‍याख्‍यान नहीं वार्तालाप था। वह बालकों को खेल पद्धति द्वारा पढ़ाते हुए, गाना गाते हुए कार्य करना, वाद्य यंत्र बजाकर नृत्‍य कराते हुए, कहानी लिखवाकर, नाटक करके, बागवानी द्वारा, प्रकृति के निरीक्षण द्वारा स्‍वतंत्र भ्रमण कराते हुए ज्ञान प्रदान करते थे। उनका मानना था कि इस प्रकार से प्राप्‍त ज्ञान स्‍थायी होता है और बालक का पूर्णरूपेण सर्वांगीक व भावात्‍मक विकास होता है। ; कृतियाँ <poem> १) दिवास्वप्न २) कठिन है माता-पिता बनना ३) माता-पिता की अपेक्षाए और प्रश्न ४) माता-पिताओं की मातपच्ची ५) कथा कहानी का शास्त्र ६) शिक्षक हो तो ७) बाल शिक्षण जैसा मैं समझ पाया ८) प्राथमिक विद्यालय भाषा-शिक्षण और चिट्ठी वाचन ९) प्राथमिक विद्यालय शिक्षक और शिक्षण पद्धतियां १०) मांटेसरी-पद्धति ११) प्राथमिक विद्यालय में कला-कारीगिरी की शिक्षा १२) चलते-फिरते </poem> == उक्तियाँ == * हमारे जीवन की पाठशाला में अध्ययन हेतु ऐसे प्रणाली को अपनायें ताकि उसमें सेवा की भावना, रात-दिन विकसित होती रहे। * शिक्षक को शाला में माता-पिता की भूमिका ही निभानी चाहिये। * मेरे छात्रों को मेरा आदेश है कि घोड़ों के अस्‍तबल जैसी धूल भरी इन शालाओं को जमींदोज़ कर दो। मारपीट और भय दिखाने वाले इन बाल कत्तलखानों की नीवों को बारूद भरकर उड़ा दो। इन्‍हें नेस्‍तानाबूद कर दो। * पहले वाचन पर बल देना चाहिये इसके पश्चात् लेखन पर। अँगुलियों से कलम पकड़ने का तरीका, पेन्सिल पर काबू, इच्छानुसार मोड़ना और विभिन्न आकृतियों से अक्षर आकृति तक आना लेखन की पहली आवश्यकता है। * अनेक शालाओं में व्याकरण शिक्षण का कालांश अलग होता है। ऐसा नहीं होना चाहिये क्योंकि व्याकरण भाषा शिक्षण का ही एक भाग है। पाठ में संज्ञा, क्रिया, सर्वनाम तथा विश्लेषण आदि की पहचान बालक को खेल-खेल में ही करानी चाहिये। * बालकों के लिये कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाने से विषय रोचक बन जाता है। कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाते समय, शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मूल घटना के आसपास कल्पित घटनाओं को इस प्रकार सजाकर पढ़ाना चाहिये कि उन्हें वास्तविकता का ध्यान कहानी के माध्यम से ही हो जाये। भूगोल पढ़ाने में ग्लोब तथा मानचित्रों की सहायता लेकर तथ्यों को स्पष्ट करना चाहिये। * छात्रों का लोकगीतों के माध्यम से काव्य शिक्षण आरम्भ किया जाना चाहिये। लोकगीतों या ग्राम्य गीतों में स्पष्टता और उचित विषय वस्तु होने के कारण बालक उनकी ओर शीघ्र आकृष्ट होते हैं। बालक के सामने वह कविता रखी जाय जिसकी भाषा बोधगम्य हो। उस कविता की विषय वस्तु वर्णनात्मक या रुचिपूर्ण हो। कविता का परिचय गाकर भी कराया जा सकता है, उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती। कविता की रसानुभूति होने पर ही पूर्ण आत्मसात हो जाती है। कविता के भाव विभिन्न मुद्राओं में प्रकट किये जाने चाहिये। * चित्रकला में बालकों को वस्तुओं के नाम या वह वस्तु देकर उनकी आकृति बनाने हेतु कहना चाहिये। प्रारम्भ में उनके चित्र सुन्दर न बन सके परन्तु अभ्यास से वे ठीक चित्र बनान लगेंगे। बाद में उनके पेंसिल से जैसा भी सम्भव हो चित्र बनवाने चाहिये। अच्छे चित्रों को प्रदर्शन हेतु रखवाना चाहिये। इससे बालकों को प्रोत्साहन मिलता है। * गिजूभाई के अनुसार बालकों की पाठ्य-पुस्तक में महान पुरुषों एवं ईश्वर के चित्र तथा उनके जीवन के प्रसंगों पर कथाएँ होनी चाहिये। धर्म से सम्बन्धित गूढ़ बातों को बालक नहीं समझ पाते। अतः उन्हें कुरान, उपनिषद् की कहानियाँ एवं कथाएँ कही जानी चाहिये। कर्मकाण्ड, श्लोक पाठ, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आदि को हम भविष्य के लिये छोड़ सकते हैं। * गिजूभाई के अनुसार नियत समय पर खेलने-कूदने हेतु बालकों को मुक्त किया जाना चाहिये। खेलने-कूदने का अर्थ खेलना, कूदना तथा मौज-भरना है। इसमें हारने-जीतने का कोई महत्व नहीं होना चाहिये। जीतने वालों को पुरस्कार आदि के वितरण से बालकों में हीन भावनाएँ जागृत हो जाती है। * शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक को स्‍वावलम्बी, निर्भय, सृजनशील या हुनरमंद और अभिव्‍यक्‍तिशील बनाये। * बाल-विकास के अवलोकन की कोशिश तथा प्रबंध में बालकों का शिक्षण प्रबंध भी स्‍वतः होता जायेगा। * मुझको किसी ने कहा कि भारी-भरकम तात्त्विक लेखों के बजाय यदि मैं कथा-शैली में शैक्षिक विचारों को संजोऊं , तो ? मुझको प्रयत्न करने की प्रेरणा मिली और फलस्वरूप यह ‘ दिवास्वप्न ‘ रचा गया । दिवास्वप्नों का मूल वास्तविक अनुभव हो , तो वे मिथ्या नहीं जाते । यह दिवास्वप्न मेरे जीवंत अनुभवों में से उपजा है , और मुझे विश्वास है कि प्राणवान , क्रियावान , निष्ठावान शिक्षक अपने लिए भी इसे वास्तविक स्वरूप प्रदान कर सकेंगे । -- गिजुभाई, अपनी रचना 'दिवास्वप्न' के बारे में * वस्तुतः हम अपनी मान्यताओं को बालक पर लादने के लिये इनाम एवं सजा देने के लिये दमनात्मक साधनों का प्रयोग करते हैं। बालों के मन में यह स्थिति जेल की प्रथम सजा जैसी है। -- बालकों के अनुशासन के विषय में गिजूभाई * दण्ड के भय से तभी तक अनुशासन रहता है, जब तक दण्ड का भय स्थिर रहता है। जैसे ही दण्ड का भय चला जाता है, अनुशासन भी समाप्त हो जाता है। दण्ड का भय स्थिर नहीं रह सकता। अतः अनुशासन बालकों पर बहुत समय पर लागू नहीं रह सकता। * माँ-बाप तथा शिक्षक इस बात को समझ लें कि मारने या ललचाने से बालकों में उच्छृंखलता आती है। भय और लालच से बालक ढीठ-हीन बन जाते हैं। == गिजुभाई के बारे में अन्य लोगों के विचार == * एक दिन उनका काम उग निकलेगा। -- गिजुभाई बधेका के बारे में [[महात्मा गांधी]] * दिवा स्वप्न सचमुच दिव्य है। कला के प्राथमिक शाला की समालोचना इस पुस्तक में प्राप्त होती है। साथ ही साथ भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला की मनोहर एवं स्पष्ट रूप की सुन्दर झाँकी मिलती है। -- गिजुभाई के समकालीन साथी और सहयोगी हरिभाई द्विवेदी, 'दिवास्वप्न' नामक उनकी कृति पर * यद्यपि लगभग तीस वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी 'दिवास्वप्न' और 'प्राथमिक शाला में भाषा-शिक्षा' - दोनों आज भी उतनी ही ताजी , उतनी ही प्रेरक और मार्गदर्शक हैं जितनी 30-35 साल पहले थीं । प्राथमिक पाठशालाओं की पढ़ाई में जो भारी दोष आ घुसे हैं , उनकी ओर इशारा करके उसके रूप-स्वरूप को बदलने की अत्यन्त मूलगामी , मूल्यवान और व्यावहारिक सूचनायें इन दोनों मौलिक पुस्तकों में भरी पड़ी हैं । इन पुस्तकों के अध्ययन , अनुशीलन और अनुसरण से नई पीढ़ी के उत्साही और निष्ठावान शिक्षक भाई-बहनों को अपनी शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन करने की स्वस्थ और सबल प्रेरणा मिल सकेगी । इसी एक विचार से प्रेरित होकर मैंने इन्हें फिर छपाने का साहस किया है । आशा है , नई पीढ़ी के शिक्षक , शिक्षाधिकारी और शिक्षा संस्थाओं के कर्ता-धर्ता इन दोनों पुस्तकों को अपनाकर इनसे भरपूर लाभ उठायेंगे । -- काशिनाथ त्रिवेदी ==इन्हें भी देखें== *[[शिक्षा]] e527lvj68hqeldk2r38dc57jy66mfsi काका साहब कालेलकर 0 9357 33397 2026-10-16T09:30:30Z अनुनाद सिंह 658 [[काका कालेलकर]] को अनुप्रेषित 33397 wikitext text/x-wiki #पुनर्प्रेषित [[काका कालेलकर]] hu6anl7vy7kw8lp8z75xh8j761eidrp काका कालेलकर 0 9358 33398 2026-10-16T09:51:34Z अनुनाद सिंह 658 "'''काका साहब कालेलकर''' (१ दिसम्बर, १८८५ ई -- २१ अगस्त, १९८१) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रभक्त, [[हिन्दी]]सेवी एवं साहित्यकार थे। उनका वास्तविक नाम 'दत्तात्रेय बालकृ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 33398 wikitext text/x-wiki '''काका साहब कालेलकर''' (१ दिसम्बर, १८८५ ई -- २१ अगस्त, १९८१) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रभक्त, [[हिन्दी]]सेवी एवं साहित्यकार थे। उनका वास्तविक नाम 'दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर' था। उन्होंने 'फ़र्ग्यूसन कॉलेज', पुणे में शिक्षा प्राप्त की और शिक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया। १९१० में वे बेलगांव के गणेश विद्यालय के प्रधानाध्यापक के रूप में बड़ौदा चले गए। कुछ वर्षों बाद वे मोक्ष की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े। लगभग तीन वर्ष तक देश के विभिन्न भागों की २५०० मील की पैदल यात्रा करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करना ही सबसे उत्तम मार्ग है और इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना चाहिए। कुछ दिन हरिद्वार और कुछ दिन हैदराबाद (सिंध) में अध्यापन करने के बाद वे शिक्षक के रूप में शांति निकेतन पहुँचे। मराठी भाषी होने पर भी काकासाहेब ने मराठी से अधिक गुजराती और राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा की है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, भाषा आदि के क्षेत्रों में उनका योगदान अनुपम है। वे सही मायने में विश्वकोश थे। राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, अध्यात्म आदि कोई भी ऐसा विषय नहीं है जिस पर उन्होंने प्रामाणिक लेखन न किया हो। १९५२ से १९६४ तक वे संसद के सदस्य भी रहे। १९६४ में उन्हें 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। वे 'पिछड़ा वर्ग आयोग', 'बेसिक एजुकेशन बोर्ड', 'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा', 'गांधी विचार परिषद' के अध्यक्ष तथा 'गांधी स्मारक संग्रहालय' के निदेशक रहे। सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ ने उन्हें मानद् डी. लिट्. से और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘फ़ैलो’ से अलंकृत किया। आचार्य काकासाहेब कालेलकर का निधन २१ अगस्त, १९८१ को नई दिल्ली में उनके ‘संनिधि’ आश्रम में हुआ। हिंदी, गुजराती और मराठी में उन्होंने लगभग १०० पुस्तकें लिखीं। == उद्धरण == * जीवन-शुद्धि और जीवन-समृद्धि यही हमारा आदर्श हो। * मैंने मृत्यु का चिंतन तो काफ़ी किया है, लेकिन मृत्यु की चिंता मैं नहीं करता। * इतिहास का अर्थ है मनुष्य जाति के सम्मुख उपस्थित हुए प्रश्नों का उल्लेखन। * भारतीय धर्म ने और भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं कहा कि केवल हमारा ही एक धर्म सच्चा है और बाक़ी के झूठे हैं। हम तो मानते हैं कि सब धर्म सच्चे हैं, मनुष्य के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। सब मिल कर इनका एक विश‍ाल परिवार बनता है। इस पारिवारिकता को और आत्मीयता को को जो चीज़ें खंडित करती है उनकी छोड़ देने के लिए सब को तैयार रहना ही चाहिए। हर एक धर्म-समाज अंतर्मुख होकर अपने दिल को टटोल कर देखे कि जागतिक मानवीय एकता का द्रोह हमसे कहाँ तक हो रहा है। * धर्म और रिलिजन' एक नहीं है। ये अलग धर्म, पंथ और संप्रदाय जिस हद तक धर्म या सार्वभौम धर्म का उपजीवन करते हैं उस हद तक ही इन सारे धर्मों की शक्ति और पवित्रता है। इन सारे अलग-अलग धर्मों ने विशिष्ट ग्रंथ, विशिष्ट रूढ़ि और विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लोगों को बाँधकर अपने को बिगाड़ दिया है। धर्म के ग्रंथ-परतंत्र, व्यक्ति-परतंत्र, या रूढ़ि-परतंत्र नहीं करना चाहिए था। धर्म के स्वयं-शासित और स्वयंभू रखना चाहिए। हर-एक युग के श्रेष्ठ पुरुषों के हृदय में जो धर्मभाव जाग्रत होता है। उसी के अनुसार सबको चलना चाहिए। ऐसे सारवभौम, सर्वकल्याणकारी, सर्वोदयी धर्म के द्वारा ही व्यक्ति का और समाज का जीवन कृतार्थ होता है। * कट्टरता से धार्मिकता थोड़ी बहुत मज़ूबत होती है, सही, लेकिन, साथ-साथ सच्ची धार्मिकता काफ़ी निष्प्राण हो जाती है। कट्टरता हरेक धर्म के लिए श्मशान भूमि बनती है। * जहाँ पाप है, वहाँ पाप-पुंज-हारी भी हैं। * जो भाव इंद्रियगम्य नहीं है, वहाँ तर्क कभी सफल नहीं होता। * अधूरे ज्ञान से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने का उपाय पूर्ण ज्ञान है, अज्ञान नहीं। * जीवन न तो सुखमय है, न केवल भार रूप है, जीवन एक साधना है। * मृत्यु का अखंड स्मरण रखकर ही जो जीता है, वह अपने जीवन का दुरुपयोग नहीं करेगा। * मरण का स्मरण ही है व्यापक जीवन की सुंदर साधना। * विवाह संबंध और गृहस्थाश्रम पवित्र इसीलिए माना गया है कि उसमें संगम, परस्परार्पण, त्याग, निष्ठा और सेवा के आदर्श को प्रधानता दी है। * [[उपवास]] करने से चित्त अंतर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है। * जब आहार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पुष्टि की साधना छोड़कर केवल इंद्रियतृप्ति और विलास का साधन बन जाता है, तब वह खाने वाले को ही खा जाता है। धन की बात हम छोड़ दें। जो लोग ईमानदार हैं, सदाचारी हैं, जिनकी नेकी पर समाज का विश्वास है, वे ही समाज का उत्तम धन हैं। लोगों की चारित्र्य-संपत्ति ही किसी भी समाज की पूंजी है। * प्राचीन काल में आर्य लोग उत्तर प्रदेश में सर्वत्र फैले फिर दक्षिण में आए और उन्होंने यहां संस्कृत भाषा चलाई। मैं संस्कृत का भक्त हूं। आप केरल वासियों ने उसे सीखने में सबसे अधिक उत्साह दिखाया है। इसके बाद आए पठान और मुगल। उनकी धर्म भाषा अरबी और संस्कृति की भाषा फारसी है। उन भाषाओं का राज चला। वे दोनों भाषा उत्तर की इस देसी भाषा के साथ मिलीं और उर्दू पैदा हुई। इसके बाद पश्चिम के लोग आए, वह इतिहास आप जानते हैं उनकी भाषा अंग्रेजी है। उनका राज हम पर चल रहा है। उनकी अंग्रेजी यहां की प्रजा की भाषा नहीं है। किंतु यह भाषा की बात आपको विस्तार से समझाऊं इससे पहले मैं अपनी बात आपसे कहना चाहता हूं। आपके ऊपर कोई आक्रमण करें तो आप संगठित होकर अपने बचाव की तैयारी करते हैं। मैं आपको समझाने आया हूं कि केवल आत्मरक्षा करना उत्तम लक्षण नहीं है। संकट देखकर,दीवार बांधकर अंदर रहकर आत्मरक्षा करने के बदले आक्रमण कारियों के विरुद्ध आप ही आक्रमण क्यों ना करें।अब आप ही बताइए कि पिछले 1000 वर्षों में केरल का सबसे बड़ा आदमी कौन था ? बेशक आद्य शंकराचार्य हुए थे। केरल के नंबूदरी ब्राह्मण केरल के बचाव के लिए, यहां पर उन्होंने सांस्कृतिक किले नहीं गढ़े। उन्होंने उत्तर के लोगों की भाषा सीख ली और उन पर आक्रमण किया। यह अकेला लघुकाय केरल का ब्राह्मण सारे देश में हर जगह जाता था और वाद-विवाद के लिए विद्वानों का आह्वान करता था। उत्तर की भाषा सीख कर उत्तर के शास्त्रों में प्रवीण होकर उन्होंने दिग्विजय किया। सारा देश जीतकर उन्होंने चार छोरों पर आध्यात्मिक मठो की स्थापना की। वे चार मठ आज भी मजबूती से काम कर रहे हैं। पश्चिम में द्वारका के पास,पूर्व में जगन्नाथ पुरी,उत्तर में हिमालय की गोद में जोशीमठ और दक्षिण में श्रृंगेरी अथवा कन्याकुमारी। तब से इन स्थानों पर शंकराचार्य के शिष्य धर्म प्रचार करते आ रहे हैं। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में * मैं आपको बताने आया हूं कि अब हम ब्राह्मण, मुल्लवी, अंग्रेज आईसीएस या मिशनरियों का राज नहीं चाहते, हम भारतीय प्रजा का राज चाहते हैं। वह राज प्रजा की भाषा में चलना चाहिए। केरल का राज न अंग्रेजी में चलना चाहिए न हिंदी में, वह तो मलयालम में ही चलना चाहिए और भारत की एकता संभालनी है ना, वह संभव होगा राष्ट्रभाषा द्वारा। बिना एकता के नहीं टिक सकेगी हमारी स्वतंत्रता और न टिक सकता है हमारा सामर्थ्य। दुनिया में हमारे देश की प्रतिष्ठा भी नहीं रह पाएगी और इस देश की भाषाओ में, जिस भाषा को बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होगी, ऐसी स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा बन सकेगी। इसलिए मैं आपसे कहने आया हूं कि मलयालम की मदद से उत्तर भारत की जनता की भाषा हिंदी, एक दूसरी ज़रूरी भाषा के तौर पर आप सीख ले और फिर शंकराचार्य की तरह उत्तर भारत पर धावा बोलें। आपको सिर्फ आत्मरक्षा करनी है या सर्व संग्रह एकता की भाषा लेकर सर्वत्र पहुंचना है उत्तर भारत से कटकर यदि आप दक्षिण भारत के लोग अलग रहेंगे और अंग्रेजों की छत्रछाया में रहना चाहेंगे तो देश के आप टुकड़े करेंगे। फिर एक-एक टुकड़ा भिन्न-भिन्न जबरदस्त राष्ट्र की शक्तियों के हाथ में चला जाएगा। यह सब टालने के लिए उत्तर की प्रजा की भाषा सीख कर उसका प्रचार करने का काम आप ले लीजिए जो काम एक समय श्री शंकराचार्य ने किया वहीं आज आपको दूसरे ढंग से करना है किंतु उसके लिए अखिल भारतीय एकता का आग्रह आपको संभालना होगा। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में p6szysvcji515g6dipe7py2q3ngymp1 33399 33398 2026-10-16T09:53:39Z अनुनाद सिंह 658 33399 wikitext text/x-wiki '''[[:w:काका साहब कालेलकर|काका साहब कालेलकर]]''' (१ दिसम्बर, १८८५ ई -- २१ अगस्त, १९८१) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रभक्त, [[हिन्दी]]सेवी एवं साहित्यकार थे। उनका वास्तविक नाम 'दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर' था। उन्होंने 'फ़र्ग्यूसन कॉलेज', पुणे में शिक्षा प्राप्त की और शिक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया। १९१० में वे बेलगांव के गणेश विद्यालय के प्रधानाध्यापक के रूप में बड़ौदा चले गए। कुछ वर्षों बाद वे मोक्ष की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े। लगभग तीन वर्ष तक देश के विभिन्न भागों की २५०० मील की पैदल यात्रा करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करना ही सबसे उत्तम मार्ग है और इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना चाहिए। कुछ दिन हरिद्वार और कुछ दिन हैदराबाद (सिंध) में अध्यापन करने के बाद वे शिक्षक के रूप में शांति निकेतन पहुँचे। मराठी भाषी होने पर भी काकासाहेब ने मराठी से अधिक गुजराती और राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा की है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, भाषा आदि के क्षेत्रों में उनका योगदान अनुपम है। वे सही मायने में विश्वकोश थे। राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, अध्यात्म आदि कोई भी ऐसा विषय नहीं है जिस पर उन्होंने प्रामाणिक लेखन न किया हो। १९५२ से १९६४ तक वे संसद के सदस्य भी रहे। १९६४ में उन्हें 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। वे 'पिछड़ा वर्ग आयोग', 'बेसिक एजुकेशन बोर्ड', 'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा', 'गांधी विचार परिषद' के अध्यक्ष तथा 'गांधी स्मारक संग्रहालय' के निदेशक रहे। सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ ने उन्हें मानद् डी. लिट्. से और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘फ़ैलो’ से अलंकृत किया। आचार्य काकासाहेब कालेलकर का निधन २१ अगस्त, १९८१ को नई दिल्ली में उनके ‘संनिधि’ आश्रम में हुआ। हिंदी, गुजराती और मराठी में उन्होंने लगभग १०० पुस्तकें लिखीं। == उद्धरण == * जीवन-शुद्धि और जीवन-समृद्धि यही हमारा आदर्श हो। * मैंने मृत्यु का चिंतन तो काफ़ी किया है, लेकिन मृत्यु की चिंता मैं नहीं करता। * इतिहास का अर्थ है मनुष्य जाति के सम्मुख उपस्थित हुए प्रश्नों का उल्लेखन। * भारतीय धर्म ने और भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं कहा कि केवल हमारा ही एक धर्म सच्चा है और बाक़ी के झूठे हैं। हम तो मानते हैं कि सब धर्म सच्चे हैं, मनुष्य के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। सब मिल कर इनका एक विश‍ाल परिवार बनता है। इस पारिवारिकता को और आत्मीयता को को जो चीज़ें खंडित करती है उनकी छोड़ देने के लिए सब को तैयार रहना ही चाहिए। हर एक धर्म-समाज अंतर्मुख होकर अपने दिल को टटोल कर देखे कि जागतिक मानवीय एकता का द्रोह हमसे कहाँ तक हो रहा है। * धर्म और रिलिजन' एक नहीं है। ये अलग धर्म, पंथ और संप्रदाय जिस हद तक धर्म या सार्वभौम धर्म का उपजीवन करते हैं उस हद तक ही इन सारे धर्मों की शक्ति और पवित्रता है। इन सारे अलग-अलग धर्मों ने विशिष्ट ग्रंथ, विशिष्ट रूढ़ि और विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लोगों को बाँधकर अपने को बिगाड़ दिया है। धर्म के ग्रंथ-परतंत्र, व्यक्ति-परतंत्र, या रूढ़ि-परतंत्र नहीं करना चाहिए था। धर्म के स्वयं-शासित और स्वयंभू रखना चाहिए। हर-एक युग के श्रेष्ठ पुरुषों के हृदय में जो धर्मभाव जाग्रत होता है। उसी के अनुसार सबको चलना चाहिए। ऐसे सारवभौम, सर्वकल्याणकारी, सर्वोदयी धर्म के द्वारा ही व्यक्ति का और समाज का जीवन कृतार्थ होता है। * कट्टरता से धार्मिकता थोड़ी बहुत मज़ूबत होती है, सही, लेकिन, साथ-साथ सच्ची धार्मिकता काफ़ी निष्प्राण हो जाती है। कट्टरता हरेक धर्म के लिए श्मशान भूमि बनती है। * जहाँ पाप है, वहाँ पाप-पुंज-हारी भी हैं। * जो भाव इंद्रियगम्य नहीं है, वहाँ तर्क कभी सफल नहीं होता। * अधूरे ज्ञान से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने का उपाय पूर्ण ज्ञान है, अज्ञान नहीं। * जीवन न तो सुखमय है, न केवल भार रूप है, जीवन एक साधना है। * मृत्यु का अखंड स्मरण रखकर ही जो जीता है, वह अपने जीवन का दुरुपयोग नहीं करेगा। * मरण का स्मरण ही है व्यापक जीवन की सुंदर साधना। * विवाह संबंध और गृहस्थाश्रम पवित्र इसीलिए माना गया है कि उसमें संगम, परस्परार्पण, त्याग, निष्ठा और सेवा के आदर्श को प्रधानता दी है। * [[उपवास]] करने से चित्त अंतर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है। * जब आहार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पुष्टि की साधना छोड़कर केवल इंद्रियतृप्ति और विलास का साधन बन जाता है, तब वह खाने वाले को ही खा जाता है। धन की बात हम छोड़ दें। जो लोग ईमानदार हैं, सदाचारी हैं, जिनकी नेकी पर समाज का विश्वास है, वे ही समाज का उत्तम धन हैं। लोगों की चारित्र्य-संपत्ति ही किसी भी समाज की पूंजी है। * प्राचीन काल में आर्य लोग उत्तर प्रदेश में सर्वत्र फैले फिर दक्षिण में आए और उन्होंने यहां संस्कृत भाषा चलाई। मैं संस्कृत का भक्त हूं। आप केरल वासियों ने उसे सीखने में सबसे अधिक उत्साह दिखाया है। इसके बाद आए पठान और मुगल। उनकी धर्म भाषा अरबी और संस्कृति की भाषा फारसी है। उन भाषाओं का राज चला। वे दोनों भाषा उत्तर की इस देसी भाषा के साथ मिलीं और उर्दू पैदा हुई। इसके बाद पश्चिम के लोग आए, वह इतिहास आप जानते हैं उनकी भाषा अंग्रेजी है। उनका राज हम पर चल रहा है। उनकी अंग्रेजी यहां की प्रजा की भाषा नहीं है। किंतु यह भाषा की बात आपको विस्तार से समझाऊं इससे पहले मैं अपनी बात आपसे कहना चाहता हूं। आपके ऊपर कोई आक्रमण करें तो आप संगठित होकर अपने बचाव की तैयारी करते हैं। मैं आपको समझाने आया हूं कि केवल आत्मरक्षा करना उत्तम लक्षण नहीं है। संकट देखकर,दीवार बांधकर अंदर रहकर आत्मरक्षा करने के बदले आक्रमण कारियों के विरुद्ध आप ही आक्रमण क्यों ना करें।अब आप ही बताइए कि पिछले 1000 वर्षों में केरल का सबसे बड़ा आदमी कौन था ? बेशक आद्य शंकराचार्य हुए थे। केरल के नंबूदरी ब्राह्मण केरल के बचाव के लिए, यहां पर उन्होंने सांस्कृतिक किले नहीं गढ़े। उन्होंने उत्तर के लोगों की भाषा सीख ली और उन पर आक्रमण किया। यह अकेला लघुकाय केरल का ब्राह्मण सारे देश में हर जगह जाता था और वाद-विवाद के लिए विद्वानों का आह्वान करता था। उत्तर की भाषा सीख कर उत्तर के शास्त्रों में प्रवीण होकर उन्होंने दिग्विजय किया। सारा देश जीतकर उन्होंने चार छोरों पर आध्यात्मिक मठो की स्थापना की। वे चार मठ आज भी मजबूती से काम कर रहे हैं। पश्चिम में द्वारका के पास,पूर्व में जगन्नाथ पुरी,उत्तर में हिमालय की गोद में जोशीमठ और दक्षिण में श्रृंगेरी अथवा कन्याकुमारी। तब से इन स्थानों पर शंकराचार्य के शिष्य धर्म प्रचार करते आ रहे हैं। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में * मैं आपको बताने आया हूँ कि अब हम ब्राह्मण, मुल्लवी, अंग्रेज आईसीएस या मिशनरियों का राज नहीं चाहते, हम भारतीय प्रजा का राज चाहते हैं। वह राज प्रजा की भाषा में चलना चाहिए। केरल का राज न अंग्रेजी में चलना चाहिए न हिंदी में, वह तो मलयालम में ही चलना चाहिए और भारत की एकता संभालनी है ना, वह संभव होगा राष्ट्रभाषा द्वारा। बिना एकता के नहीं टिक सकेगी हमारी स्वतंत्रता और न टिक सकता है हमारा सामर्थ्य। दुनिया में हमारे देश की प्रतिष्ठा भी नहीं रह पाएगी और इस देश की भाषाओ में, जिस भाषा को बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होगी, ऐसी स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा बन सकेगी। इसलिए मैं आपसे कहने आया हूं कि मलयालम की मदद से उत्तर भारत की जनता की भाषा हिंदी, एक दूसरी ज़रूरी भाषा के तौर पर आप सीख ले और फिर शंकराचार्य की तरह उत्तर भारत पर धावा बोलें। आपको सिर्फ आत्मरक्षा करनी है या सर्व संग्रह एकता की भाषा लेकर सर्वत्र पहुंचना है उत्तर भारत से कटकर यदि आप दक्षिण भारत के लोग अलग रहेंगे और अंग्रेजों की छत्रछाया में रहना चाहेंगे तो देश के आप टुकड़े करेंगे। फिर एक-एक टुकड़ा भिन्न-भिन्न जबरदस्त राष्ट्र की शक्तियों के हाथ में चला जाएगा। यह सब टालने के लिए उत्तर की प्रजा की भाषा सीख कर उसका प्रचार करने का काम आप ले लीजिए जो काम एक समय श्री शंकराचार्य ने किया वहीं आज आपको दूसरे ढंग से करना है किंतु उसके लिए अखिल भारतीय एकता का आग्रह आपको संभालना होगा। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में kjwuljy3p4jz9s16lv4g0yqaa7bo3qp 33400 33399 2026-10-16T09:55:57Z अनुनाद सिंह 658 /* उद्धरण */ 33400 wikitext text/x-wiki '''[[:w:काका साहब कालेलकर|काका साहब कालेलकर]]''' (१ दिसम्बर, १८८५ ई -- २१ अगस्त, १९८१) भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रभक्त, [[हिन्दी]]सेवी एवं साहित्यकार थे। उनका वास्तविक नाम 'दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर' था। उन्होंने 'फ़र्ग्यूसन कॉलेज', पुणे में शिक्षा प्राप्त की और शिक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया। १९१० में वे बेलगांव के गणेश विद्यालय के प्रधानाध्यापक के रूप में बड़ौदा चले गए। कुछ वर्षों बाद वे मोक्ष की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े। लगभग तीन वर्ष तक देश के विभिन्न भागों की २५०० मील की पैदल यात्रा करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करना ही सबसे उत्तम मार्ग है और इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना चाहिए। कुछ दिन हरिद्वार और कुछ दिन हैदराबाद (सिंध) में अध्यापन करने के बाद वे शिक्षक के रूप में शांति निकेतन पहुँचे। मराठी भाषी होने पर भी काकासाहेब ने मराठी से अधिक गुजराती और राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा की है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, भाषा आदि के क्षेत्रों में उनका योगदान अनुपम है। वे सही मायने में विश्वकोश थे। राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, अध्यात्म आदि कोई भी ऐसा विषय नहीं है जिस पर उन्होंने प्रामाणिक लेखन न किया हो। १९५२ से १९६४ तक वे संसद के सदस्य भी रहे। १९६४ में उन्हें 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। वे 'पिछड़ा वर्ग आयोग', 'बेसिक एजुकेशन बोर्ड', 'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा', 'गांधी विचार परिषद' के अध्यक्ष तथा 'गांधी स्मारक संग्रहालय' के निदेशक रहे। सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ ने उन्हें मानद् डी. लिट्. से और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘फ़ैलो’ से अलंकृत किया। आचार्य काकासाहेब कालेलकर का निधन २१ अगस्त, १९८१ को नई दिल्ली में उनके ‘संनिधि’ आश्रम में हुआ। हिंदी, गुजराती और मराठी में उन्होंने लगभग १०० पुस्तकें लिखीं। == उद्धरण == * जीवन-शुद्धि और जीवन-समृद्धि यही हमारा आदर्श हो। * मैंने [[मृत्यु]] का चिंतन तो काफ़ी किया है, लेकिन मृत्यु की चिंता मैं नहीं करता। * [[इतिहास]] का अर्थ है मनुष्य जाति के सम्मुख उपस्थित हुए प्रश्नों का उल्लेखन। * भारतीय धर्म ने और भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं कहा कि केवल हमारा ही एक धर्म सच्चा है और बाक़ी के झूठे हैं। हम तो मानते हैं कि सब धर्म सच्चे हैं, मनुष्य के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। सब मिल कर इनका एक विश‍ाल परिवार बनता है। इस पारिवारिकता को और आत्मीयता को को जो चीज़ें खंडित करती है उनकी छोड़ देने के लिए सब को तैयार रहना ही चाहिए। हर एक धर्म-समाज अंतर्मुख होकर अपने दिल को टटोल कर देखे कि जागतिक मानवीय एकता का द्रोह हमसे कहाँ तक हो रहा है। * [[धर्म]] और रिलिजन' एक नहीं है। ये अलग धर्म, पंथ और संप्रदाय जिस हद तक धर्म या सार्वभौम धर्म का उपजीवन करते हैं उस हद तक ही इन सारे धर्मों की शक्ति और पवित्रता है। इन सारे अलग-अलग धर्मों ने विशिष्ट ग्रंथ, विशिष्ट रूढ़ि और विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लोगों को बाँधकर अपने को बिगाड़ दिया है। धर्म के ग्रंथ-परतंत्र, व्यक्ति-परतंत्र, या रूढ़ि-परतंत्र नहीं करना चाहिए था। धर्म के स्वयं-शासित और स्वयंभू रखना चाहिए। हर-एक युग के श्रेष्ठ पुरुषों के हृदय में जो धर्मभाव जाग्रत होता है। उसी के अनुसार सबको चलना चाहिए। ऐसे सारवभौम, सर्वकल्याणकारी, सर्वोदयी धर्म के द्वारा ही व्यक्ति का और समाज का जीवन कृतार्थ होता है। * कट्टरता से धार्मिकता थोड़ी बहुत मज़ूबत होती है, सही, लेकिन, साथ-साथ सच्ची धार्मिकता काफ़ी निष्प्राण हो जाती है। कट्टरता हरेक धर्म के लिए श्मशान भूमि बनती है। * जहाँ पाप है, वहाँ पाप-पुंज-हारी भी हैं। * जो भाव इंद्रियगम्य नहीं है, वहाँ तर्क कभी सफल नहीं होता। * अधूरे ज्ञान से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने का उपाय पूर्ण ज्ञान है, अज्ञान नहीं। * जीवन न तो सुखमय है, न केवल भार रूप है, जीवन एक साधना है। * [[मृत्यु]] का अखंड स्मरण रखकर ही जो जीता है, वह अपने जीवन का दुरुपयोग नहीं करेगा। * मरण का स्मरण ही है व्यापक जीवन की सुंदर साधना। * [[विवाह]] संबंध और गृहस्थाश्रम पवित्र इसीलिए माना गया है कि उसमें संगम, परस्परार्पण, त्याग, निष्ठा और सेवा के आदर्श को प्रधानता दी है। * [[उपवास]] करने से चित्त अंतर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है। * जब आहार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पुष्टि की साधना छोड़कर केवल इंद्रियतृप्ति और विलास का साधन बन जाता है, तब वह खाने वाले को ही खा जाता है। * [[धन]] की बात हम छोड़ दें। जो लोग ईमानदार हैं, सदाचारी हैं, जिनकी नेकी पर समाज का विश्वास है, वे ही समाज का उत्तम धन हैं। लोगों की चारित्र्य-संपत्ति ही किसी भी समाज की पूंजी है। * प्राचीन काल में आर्य लोग उत्तर प्रदेश में सर्वत्र फैले फिर दक्षिण में आए और उन्होंने यहां संस्कृत भाषा चलाई। मैं संस्कृत का भक्त हूँ। आप केरल वासियों ने उसे सीखने में सबसे अधिक उत्साह दिखाया है। इसके बाद आए पठान और मुगल। उनकी धर्म भाषा अरबी और संस्कृति की भाषा फारसी है। उन भाषाओं का राज चला। वे दोनों भाषा उत्तर की इस देसी भाषा के साथ मिलीं और उर्दू पैदा हुई। इसके बाद पश्चिम के लोग आए, वह इतिहास आप जानते हैं उनकी भाषा अंग्रेजी है। उनका राज हम पर चल रहा है। उनकी अंग्रेजी यहां की प्रजा की भाषा नहीं है। किंतु यह भाषा की बात आपको विस्तार से समझाऊं इससे पहले मैं अपनी बात आपसे कहना चाहता हूं। आपके ऊपर कोई आक्रमण करें तो आप संगठित होकर अपने बचाव की तैयारी करते हैं। मैं आपको समझाने आया हूं कि केवल आत्मरक्षा करना उत्तम लक्षण नहीं है। संकट देखकर,दीवार बांधकर अंदर रहकर आत्मरक्षा करने के बदले आक्रमण कारियों के विरुद्ध आप ही आक्रमण क्यों ना करें।अब आप ही बताइए कि पिछले 1000 वर्षों में केरल का सबसे बड़ा आदमी कौन था ? बेशक आद्य शंकराचार्य हुए थे। केरल के नंबूदरी ब्राह्मण केरल के बचाव के लिए, यहां पर उन्होंने सांस्कृतिक किले नहीं गढ़े। उन्होंने उत्तर के लोगों की भाषा सीख ली और उन पर आक्रमण किया। यह अकेला लघुकाय केरल का ब्राह्मण सारे देश में हर जगह जाता था और वाद-विवाद के लिए विद्वानों का आह्वान करता था। उत्तर की भाषा सीख कर उत्तर के शास्त्रों में प्रवीण होकर उन्होंने दिग्विजय किया। सारा देश जीतकर उन्होंने चार छोरों पर आध्यात्मिक मठो की स्थापना की। वे चार मठ आज भी मजबूती से काम कर रहे हैं। पश्चिम में द्वारका के पास,पूर्व में जगन्नाथ पुरी,उत्तर में हिमालय की गोद में जोशीमठ और दक्षिण में श्रृंगेरी अथवा कन्याकुमारी। तब से इन स्थानों पर शंकराचार्य के शिष्य धर्म प्रचार करते आ रहे हैं। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में * मैं आपको बताने आया हूँ कि अब हम ब्राह्मण, मुल्लवी, अंग्रेज आईसीएस या मिशनरियों का राज नहीं चाहते, हम भारतीय प्रजा का राज चाहते हैं। वह राज प्रजा की भाषा में चलना चाहिए। केरल का राज न अंग्रेजी में चलना चाहिए न हिंदी में, वह तो मलयालम में ही चलना चाहिए और भारत की एकता संभालनी है ना, वह संभव होगा राष्ट्रभाषा द्वारा। बिना एकता के नहीं टिक सकेगी हमारी स्वतंत्रता और न टिक सकता है हमारा सामर्थ्य। दुनिया में हमारे देश की प्रतिष्ठा भी नहीं रह पाएगी और इस देश की भाषाओ में, जिस भाषा को बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होगी, ऐसी स्वदेशी भाषा ही राष्ट्रभाषा बन सकेगी। इसलिए मैं आपसे कहने आया हूं कि मलयालम की मदद से उत्तर भारत की जनता की भाषा हिंदी, एक दूसरी ज़रूरी भाषा के तौर पर आप सीख ले और फिर शंकराचार्य की तरह उत्तर भारत पर धावा बोलें। आपको सिर्फ आत्मरक्षा करनी है या सर्व संग्रह एकता की भाषा लेकर सर्वत्र पहुंचना है उत्तर भारत से कटकर यदि आप दक्षिण भारत के लोग अलग रहेंगे और अंग्रेजों की छत्रछाया में रहना चाहेंगे तो देश के आप टुकड़े करेंगे। फिर एक-एक टुकड़ा भिन्न-भिन्न जबरदस्त राष्ट्र की शक्तियों के हाथ में चला जाएगा। यह सब टालने के लिए उत्तर की प्रजा की भाषा सीख कर उसका प्रचार करने का काम आप ले लीजिए जो काम एक समय श्री शंकराचार्य ने किया वहीं आज आपको दूसरे ढंग से करना है किंतु उसके लिए अखिल भारतीय एकता का आग्रह आपको संभालना होगा। -- केरल में हिन्दी प्रचार करते समय एक सभा में g7ygcwyr5c3kp9aw3ijtgjr3489y0nq