विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.24 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk राम 0 5986 33405 32999 2026-10-20T05:59:31Z अनुनाद सिंह 658 33405 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Lord Rama with arrows.jpg|अंगूठाकार|धनुष और बाण धारण किए '''राम''' का चित्र]] '''[[w:राम|राम]]''' हिंदू भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। वे अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के पुत्र थे। [[रामायण]] में उनकी कथा है। उन्हें 14 साल के वनवास पर भेज दिया गया। रावण ने श्री राम की पत्नी “सीता” का अपहरण कर लिया और लंका ले गया। बहुत समझाने पर भी रावण सीता को लौटाने को तैयार नहीं हुआ तब श्री राम ने रावण से युद्ध की और “शुक्ला दशमी“ के दिन रावण का वध किया। == श्रीराम के सुवचन == * ''द्विः शरं नाभिसन्धत्ते द्विः स्थापयति नाश्रितान्। : ''द्विर्ददाति न चार्थिभ्यो, रामो द्विर्नाभिभाषते ॥ : (राम) बाण को दो बार निशाने पर नहीं साधते, (राम) शरणागत आश्रित को दो बार स्थापित नहीं करते, (राम) माँगनेवाले को दो बार नहीं देते, राम (एक ही बात) दो बार नहीं कहते। अर्थात् एक ही बार में कार्य पूर्ण करते हैं, दूसरी बार करने की आवश्यकता ही रहती। * '' न सुप्रीतकरं तत्तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम् : कोई व सन्तान अपने माता एवं पिता का ऋण कभी नहीं चुका सकता चाहे वह अपने माता पिता के लिए कितना व श्रेष्ठ कार्य क्यों न कर दे। वह कभी इस ऋण से मुक्त नहीं हो सकता है। * ''लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । : ''अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ : (श्री राम ऋषि वशिष्ठ जी से कहते हैं कि) चन्द्रमा अपनी शोभा छोड़ सकता है, गिरिराज हिमालय हिमहीन हो सकता है और सागर अपना तट बदल सकता है लेकिन में अपने माता-पिता के वचनों का उल्लंघन कभी नहीं कर सकता। * ''कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम् । : ''चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाऽशुचिम् ॥ : (श्री राम ऋषि जाबालि से कहते है कि) मनुष्य का चरित्र ही इसकी व्यख्य करता है कि कोई पुरुष कुलीन है या अकुलीन, कपटी है या सज्जन, वीर है यह डरपोक। * ''दुर्लभं हि सदा सुखम् ॥'' -- वाल्मीकि रामायण : सदा रहने वाला सुख दुर्लभ है। ( सुख सदा नहीं बना रहता।) : भगवान राम जब अपने पिता दशरथ जी को टूटा हुआ देखते है तब प्रभु राम माता कैकेयी से कहते है कि अगर इस जीवन में अगर कोई मनुष्य सदैव खुश रहना चाहता है तो वह ब्रह्म में है। * परहित बस जिन्ह के मन माही। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कुछ नाही॥ : जिनके मन में सदैव दूसरे का हित करने की अभिलाषा रहती है। अथवा जो सदा दूसरों की सहायता करने में लगे रहते हैं, उनके लिए संपूर्ण जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। * देखिअहिं रूप नाम आधीना, रूप ज्ञान नहिं नाम बिहीना। : व्यक्ति सामने ना होने पर भी नाम से उसको जाना जा सकता है, परंतु नाम के बिना व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकती। == स्तोत्र == :'' लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। :'' कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ :'' शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं :'' ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌। :'' रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं :'' वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ :'' नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। :'' पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ :'' रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। :'' रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ :'' नमामि भक्त वत्सलम्। कृपालु शील कोमलम्॥ :'' भजामि ते पदाम्बुजं। अकामिनां स्वधामदम्॥ :'' निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मन्दरम्॥ :'' प्रफुल्ल कञ्ज लोचनं। मदादि दोष मोचनम्॥ :'' प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवम्॥ :'' निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥ :'' दिनेश वंश मण्डनं। महेश चाप खण्डनम्॥ :'' मुनीन्द्र सन्त रञ्जनं। सुरारि वृन्द भंजनम्॥ :'' मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितम्॥ :'' विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहम्॥ :'' नमामि इन्दिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिम्॥ :'' भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजम्॥ :'' त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजन्ति हीन मत्सराः॥ :'' पतन्ति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ :'' विविक्त वासिनः सदा। भजन्ति मुक्तये मुदा॥ :'' निरस्य इन्द्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ :'' तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुम्॥ :'' जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलम्॥ :'' भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभम्॥ :'' स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहम्॥ :'' अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिम्॥ :'' प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ :'' पठन्ति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदम्॥ :'' व्रजन्ति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता॥ == राम के बारे में कथन == * ''इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः । : ''नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।। 1 ।। : ''बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिवर्हणः । : ''विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ।। 2 ।। : ''महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । : ''आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ।। ३ ।। : ''समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्। : ''पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥4॥'' -- वाल्मीकि रामायण (नारद, वाल्मीकि से) : इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में राम नाम से विख्यात हैं। : वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, कांतिमान, धैर्यवान और जितेन्द्रिय हैं। : वे बुद्धिमान, नीति में पारंगत, वाक्पटु (वाग्मी), धन-सम्पन्न हैं। वे शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। : उनकी भुजाएँ विशाल और मजबूत हैं, गर्दन लंबी और वे महान योद्धा हैं। : राम का हँसना बड़ा प्रभावशाली है, उनकी साँस भारी है, वे छुपे हुए शत्रुओं के नाशक हैं। : उनके बाजू बिना कोहनी वले हैं। सिर सुंदर, माथा चौड़ा है। वे साहसी हैं। : उनका शरीर समान रूप से विभाजित है। उनका वर्ण स्निग्ध है। वे प्रतापी हैं। : उनकी छाती गहरी, आँखें बड़ी हैं। वे लक्ष्मीवान हैं तथा शुभलक्षणों से युक्त हैं। * ''रामो विग्रहवान् धर्मः ।'' -- वाल्मीकि रामायण : राम, धर्म के मूर्त रूप हैं। अर्थात धर्म ने शरीर धारण करके राम के रूप में अवतार लिया है। * ''राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।'' : ''सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥'' -- : राम राम कहो। एक बार राम कहने से विष्णुसहस्रनाम का सम्पूर्ण फल मिल जाता है। क्योंकि श्रीराम नाम ही विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। : (इस मंत्र को 'श्री राम तारक मंत्र' भी कहा जाता है और इसका जाप सम्पूर्ण विष्णु सहश्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है। यह मंत्र 'श्री राम रक्षा स्तोत्रम्' के नाम से भी जाना जाता है।) * तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ : ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ -- [[रामचरितमानस]] : (विभीषण रावण से कहते हैं कि) हे बन्धु, राम लोगों के राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के स्वामी (भुवनेश्वर) और काल के भी महाकाल हैं। वे विकाररहित (अनामय), अजन्मे (अज), और संपूर्ण ऐश्वर्य-ज्ञान के भंडार भगवान हैं। वे सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं। * सहस नाम सम सुनि शिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥ -- [[रामचरितमानस]] १-१९-६ : जव शंकर जी ने कहा कि राम-नाम अकेले विष्णु के हजार नामों के बराबर है, तब राम नाम का जाप करके पार्वती जी ने प्रसन्न होकर शिवजी के साथ भोजन किया। * मंत्र महामनि विषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥ -- रामचरितमानस – बालकाण्ड : श्री राम के च्रित्र क चिन्त्न विषय रूपी सर्पों के लिये मंत्र और महाऔषध हि। जिस प्रकार मंत्र, महाऔषध और मणि सर्प विष को उतार देता है, ठीक उसी प्रकार श्रीराम चरित्र का स्मरण-चिन्तन करने से विषय भोग रूपी जहर को उतर जाता है। और ललाट पर लिखे हुए कठिन कुअंक (बुरे अंक / दुर्भाग्य) मिट जाते हैं। * सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ -- रामचरितमानस (बालकाण्ड) : (तुलसीदास जी कहते हैं कि) मैं पूरे संसार को सीता और राम से युक्त जानता हूँ। इसलिये दोनों हाथ जोड़कर (सारे संसार को) प्रणाम कर रहा हूँ। * राम के बिना हिन्दू जीवन नीरस है – फीका है। यही रामरस उसका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम ही का मुख देख हिन्दू जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार काट सकी, न धन-मान का लोभ, न उपदेशों की तड़क-भड़क। -- [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] “गोस्वामी तुलसीदास” नामक अपनी पुस्तक में * ''है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ '' : ''अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद'' -- अलम्मा इक़बाल === रामराज्य === : राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥ : बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥ : दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ : अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ : नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ : सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ : राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं। : काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ -- [[रामचरितमानस]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[रामायण]] k5hzjzgqjb2zfpgkzazo8yxu2uk12wd विजय 0 6511 33402 29725 2026-10-20T05:18:46Z अनुनाद सिंह 658 33402 wikitext text/x-wiki '''विजय''' अर्थात् जीत। ==सूक्तियाँ == * ''यतो धर्मः ततो जयः।'' -- [[महाभारत]] : जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। * ''सत्यमेव जयते'' । -- मुण्डकोपनिषद् : सत्य की ही विजय होती है। * ''सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलं अर्थः। अर्थस्य मूलं राज्यं। राज्यस्य मूलं '''इन्द्रियजयः'''। इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥ -- आचार्य चाणक्य : सुख का मूल है, धर्म। धर्म का मूल है, अर्थ। अर्थ का मूल है, राज्य। राज्य का मूल है, इन्द्रियों पर विजय। इन्द्रियजय का मूल है, विनय। विनय का मूल है, वृद्धों की सेवा। * ''अल्पायां वा महत्यां वा सेनायमिति निश्चयः । : ''हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥'' -- महाभारत, भीष्मपर्व : सेना छोटी हो या बड़ी, हर एक सैनिक में लड़ने का उत्साह होना ही विजय प्राप्त करने का एकमात्र लक्षण है। * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- संजय, गीता के उपदेश के अन्त में : जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है। * ''अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । : ''जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥'' -- महाभारतम्/उद्योग पर्व/३९/७३ : क्रोध को अक्रोध से जीतना चाहिये। असाधु को साधुता से जीतना चाहिये। दान द्वारा कंजूसी को जीतना चाहिये और असत्य को सत्य से जीतना चाहिये। * ''मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न सोचति। : ''कामं हित्वा अर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥ : (मनुष्य) अहंकार को मारकर प्रिय हो जाता है। क्रोध को मारकर शोक नहीं करता। काम को मारकर धनवान बनता है और लोभ को मारकर सुखी होता है। * कायागढ भीतर नव लख खाई, दसवेँ द्वार अवधू ताली लाई ॥ : कायागढ भीतर देव देहुरा कासी, सहज सुभाइ मिले अवनासी ॥ : बदन्त गोरखनाथ सुणौ नर लोइ, कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई ॥ -- गुरु गोरखनाथ * अच्छी तैयारी आधी विजय है। -- Miguel de Cervantes * चुनौतियों को स्वीकार करें ताकि आप जीत की भावना को महसूस कर सकें। -- जॉर्ज एस पैटों * जीत मीलों में नहीं बल्कि इंच में जीती जाती है। थोड़ा-थोड़ा जीतो, अपने फैसले पर अडिग रहो और बाद में, थोड़ा और जीतो। -- Louis L’Amour * भगवान जो करना था वह पहले से ही सब कुछ कर चुका है। गेंद अब आपके पाले में है। यदि आप विजय हासिल करना चाहते हैं, यदि आप ज्ञान चाहते हैं, यदि आप समृद्ध और स्वस्थ होना चाहते हैं, तो आपको ध्यान और विश्वास से भी आगे बढ़कर अधिक काम करना होगा। -- Joel Osteen * उस व्यक्ति के लिए जीत हमेशा संभव है जो हार मानने से इनकार करता है। -- नेपोलियन हिल * संतोष आपकी कोशिश में निहित है, प्राप्ति में नहीं, पूर्ण प्रयास पूर्ण विजय है। -- महात्मा गांधी * जीत का अधिकार देने के लिए, खूनी गोलियां (bullets) नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण मतपत्र (ballet) ही आवश्यक हैं। -- अब्राहम लिंकन * मैं उसे बहादुर मानता हूं जो मन पर काबू पाता है, उसे नही जो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है; सबसे कठिन जीत स्वयं पर विजय हासिल करना है। -- अरस्तू * विजय के एक हजार पिता हैं, लेकिन हार एक अनाथ है। -- John F. Kennedy * पहली और सबसे बड़ी जीत खुद को जीतना है; -- Plato * वो जीत बहुत अधिक सार्थक हो जाती है जब यह सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि कई व्यक्तियों की संयुक्त उपलब्धियों से आती है। -- Howard Schultz * जीत हासिल करने के लिए सबसे पहली जगह हमारे अपने दिमाग में है। अगर आपको नहीं लगता कि आप सफल हो सकते हैं, तो आप कभी सफल नहीं होंगे। -- Joel Osteen * विजयी योद्धा पहले मन में जीतते हैं और फिर युद्ध में जाते हैं, जबकि पराजित योद्धा पहले युद्ध में जाते हैं और फिर जीतना चाहते हैं। -- Sun Tzu * विजय उन लोगों की होती है जो इसमें सबसे अधिक विश्वास करते हैं और इसमें सबसे लंबे समय तक विश्वास करते हैं। -- Randall Wallace * विजय उसी को मिलती है जो दृढ़ता से टिका रहता है। -- नेपोलियन बोनापार्ट * हमारी अंदरूनी विजय एक दैनिक संघर्ष है। मजबूत बनो और हार मत मानो। -- Lailah Gifty Akita * विजय, जीत या हार से परिभाषित नहीं होती है। यह आपकी कोशिश द्वारा परिभाषित है। अगर आप सच में कह सकते हैं कि, ‘मैंने जो कुछ भी किया सबसे अच्छा किया, मैंने वह सब कुछ दिया जो मेरे पास था,’ तो आप विजेता हैं। -- Wolfgang Schadler * महान जीत, जो आज इतनी सरल प्रतीत होती है, वो छोटी छोटी जीत की एक श्रृंखला का परिणाम थी जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया। -- Paulo Coelho * विजय केवल उन लोगों के लिए आती है जो इसे पाने के लिए तैयार हैं, और इसे पा लेते हैं। -- Tom Clancy * वो जीत ओर ज्यादा खूबसूरत लगने लग जाती है जब आप पहले हार चुके हो। -- Malcolm Forbes * आपकी जीत किसी कोने पर आपके आसपास ही है। इसलिए कभी हार मत मानो। -- Nicki Minaj ==इन्हें भी देखें== *[[सफलता]] 3exso33tua1tp8p0ol34avuioczshh8 33403 33402 2026-10-20T05:43:30Z अनुनाद सिंह 658 /* सूक्तियाँ */ 33403 wikitext text/x-wiki '''विजय''' अर्थात् जीत। ==सूक्तियाँ == * ''यतो धर्मः ततो जयः।'' -- [[महाभारत]] : जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। * ''सत्यमेव जयते'' । -- मुण्डकोपनिषद् : सत्य की ही विजय होती है। * ''सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलं अर्थः। अर्थस्य मूलं राज्यं। राज्यस्य मूलं '''इन्द्रियजयः'''। इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥ -- आचार्य चाणक्य : सुख का मूल है, धर्म। धर्म का मूल है, अर्थ। अर्थ का मूल है, राज्य। राज्य का मूल है, इन्द्रियों पर विजय। इन्द्रियजय का मूल है, विनय। विनय का मूल है, वृद्धों की सेवा। * ''अल्पायां वा महत्यां वा सेनायमिति निश्चयः । : ''हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥'' -- महाभारत, भीष्मपर्व : सेना छोटी हो या बड़ी, हर एक सैनिक में लड़ने का उत्साह होना ही विजय प्राप्त करने का एकमात्र लक्षण है। * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- संजय, गीता के उपदेश के अन्त में : जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है। * ''अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । : ''जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥'' -- महाभारतम्/उद्योग पर्व/३९/७३ : क्रोध को अक्रोध से जीतना चाहिये। असाधु को साधुता से जीतना चाहिये। दान द्वारा कंजूसी को जीतना चाहिये और असत्य को सत्य से जीतना चाहिये। * ''मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न सोचति। : ''कामं हित्वा अर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥ : (मनुष्य) अहंकार को मारकर प्रिय हो जाता है। क्रोध को मारकर शोक नहीं करता। काम को मारकर धनवान बनता है और लोभ को मारकर सुखी होता है। * कायागढ भीतर नव लख खाई, दसवेँ द्वार अवधू ताली लाई ॥ : कायागढ भीतर देव देहुरा कासी, सहज सुभाइ मिले अवनासी ॥ : बदन्त गोरखनाथ सुणौ नर लोइ, कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई ॥ -- गुरु गोरखनाथ * '''तुलसी द्वारा वर्णित धर्ममय रथ''' : रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। : अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। : नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ : सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ : सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ : बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥ : ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ : दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥ : अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ : कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥ : सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥ : महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। : जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।। : '''अर्थ''' - रावण को रथ पर और श्रीराम को पैदल देखकर बिभीषन अधीर हो गए। श्रीराम के चरणों की वंदना कर विभीषण बोले। हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर की रक्षा करने वाला कवच और न पैरों में पादुकाएं। इस तरह से रावण जैसे बलवान वीर को आप कैसे जीत सकेंगे? कृपानिधान प्रभु राम बोले- हे सखा सुनो, जिस रथ से विजय होती है, वह रथ ये नहीं कोई दूसरा ही है॥ : धैर्य और शौर्य उस रथ के पहिए हैं। सदाचार और सत्य उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। विवेक, बल, इंद्रियों को वश में करने की शक्ति और परोपकार ये चारों उसके अश्व हैं। ये क्षमा, दया और समता रूपी डोरी के जरिए रथ में जोड़े गए हैं। : ईश्वर का भजन ही रथ का चतुर सारथी है । वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है। : पाप से मुक्त और स्थिर मन तरकस के समान है। वश में किया हुआ मन, यम-नियम, ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। : हे मित्र (बिभीषण), यदि किसी योद्धा के पास ऐसा धर्ममय रथ हो तो उसके सामने शत्रु होता ही नहीं, वह हर क्षेत्र में विजयी होता है। : हे धीरबुद्धि वाले सखा सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म मरण का चक्र) रूपी महान दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है,फिर रावण को जीतना मुश्किल कैसे हो सकता है। * अच्छी तैयारी आधी विजय है। -- Miguel de Cervantes * चुनौतियों को स्वीकार करें ताकि आप जीत की भावना को महसूस कर सकें। -- जॉर्ज एस पैटों * जीत मीलों में नहीं बल्कि इंच में जीती जाती है। थोड़ा-थोड़ा जीतो, अपने फैसले पर अडिग रहो और बाद में, थोड़ा और जीतो। -- Louis L’Amour * भगवान जो करना था वह पहले से ही सब कुछ कर चुका है। गेंद अब आपके पाले में है। यदि आप विजय हासिल करना चाहते हैं, यदि आप ज्ञान चाहते हैं, यदि आप समृद्ध और स्वस्थ होना चाहते हैं, तो आपको ध्यान और विश्वास से भी आगे बढ़कर अधिक काम करना होगा। -- Joel Osteen * उस व्यक्ति के लिए जीत हमेशा संभव है जो हार मानने से इनकार करता है। -- नेपोलियन हिल * संतोष आपकी कोशिश में निहित है, प्राप्ति में नहीं, पूर्ण प्रयास पूर्ण विजय है। -- महात्मा गांधी * जीत का अधिकार देने के लिए, खूनी गोलियां (bullets) नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण मतपत्र (ballet) ही आवश्यक हैं। -- अब्राहम लिंकन * मैं उसे बहादुर मानता हूं जो मन पर काबू पाता है, उसे नही जो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है; सबसे कठिन जीत स्वयं पर विजय हासिल करना है। -- अरस्तू * विजय के एक हजार पिता हैं, लेकिन हार एक अनाथ है। -- John F. Kennedy * पहली और सबसे बड़ी जीत खुद को जीतना है; -- Plato * वो जीत बहुत अधिक सार्थक हो जाती है जब यह सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि कई व्यक्तियों की संयुक्त उपलब्धियों से आती है। -- Howard Schultz * जीत हासिल करने के लिए सबसे पहली जगह हमारे अपने दिमाग में है। अगर आपको नहीं लगता कि आप सफल हो सकते हैं, तो आप कभी सफल नहीं होंगे। -- Joel Osteen * विजयी योद्धा पहले मन में जीतते हैं और फिर युद्ध में जाते हैं, जबकि पराजित योद्धा पहले युद्ध में जाते हैं और फिर जीतना चाहते हैं। -- Sun Tzu * विजय उन लोगों की होती है जो इसमें सबसे अधिक विश्वास करते हैं और इसमें सबसे लंबे समय तक विश्वास करते हैं। -- Randall Wallace * विजय उसी को मिलती है जो दृढ़ता से टिका रहता है। -- नेपोलियन बोनापार्ट * हमारी अंदरूनी विजय एक दैनिक संघर्ष है। मजबूत बनो और हार मत मानो। -- Lailah Gifty Akita * विजय, जीत या हार से परिभाषित नहीं होती है। यह आपकी कोशिश द्वारा परिभाषित है। अगर आप सच में कह सकते हैं कि, ‘मैंने जो कुछ भी किया सबसे अच्छा किया, मैंने वह सब कुछ दिया जो मेरे पास था,’ तो आप विजेता हैं। -- Wolfgang Schadler * महान जीत, जो आज इतनी सरल प्रतीत होती है, वो छोटी छोटी जीत की एक श्रृंखला का परिणाम थी जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया। -- Paulo Coelho * विजय केवल उन लोगों के लिए आती है जो इसे पाने के लिए तैयार हैं, और इसे पा लेते हैं। -- Tom Clancy * वो जीत ओर ज्यादा खूबसूरत लगने लग जाती है जब आप पहले हार चुके हो। -- Malcolm Forbes * आपकी जीत किसी कोने पर आपके आसपास ही है। इसलिए कभी हार मत मानो। -- Nicki Minaj ==इन्हें भी देखें== *[[सफलता]] qdb6ac0gw6j6aqzhcnh2mj8ukbaxawj 33404 33403 2026-10-20T05:49:25Z अनुनाद सिंह 658 33404 wikitext text/x-wiki '''विजय''' अर्थात् जीत। ==सूक्तियाँ == * ''यतो धर्मः ततो जयः।'' -- [[महाभारत]] : जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। * ''सत्यमेव जयते'' । -- मुण्डकोपनिषद् : सत्य की ही विजय होती है। * ''सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलं अर्थः। अर्थस्य मूलं राज्यं। राज्यस्य मूलं '''इन्द्रियजयः'''। इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥ -- आचार्य चाणक्य : सुख का मूल है, धर्म। धर्म का मूल है, अर्थ। अर्थ का मूल है, राज्य। राज्य का मूल है, इन्द्रियों पर विजय। इन्द्रियजय का मूल है, विनय। विनय का मूल है, वृद्धों की सेवा। * ''अल्पायां वा महत्यां वा सेनायमिति निश्चयः । : ''हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥'' -- महाभारत, भीष्मपर्व : सेना छोटी हो या बड़ी, हर एक सैनिक में लड़ने का उत्साह होना ही विजय प्राप्त करने का एकमात्र लक्षण है। * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- संजय, गीता के उपदेश के अन्त में : जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है। * ''अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । : ''जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥'' -- महाभारतम्/उद्योग पर्व/३९/७३ : क्रोध को अक्रोध से जीतना चाहिये। असाधु को साधुता से जीतना चाहिये। दान द्वारा कंजूसी को जीतना चाहिये और असत्य को सत्य से जीतना चाहिये। * ''मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न सोचति। : ''कामं हित्वा अर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥ : (मनुष्य) अहंकार को मारकर प्रिय हो जाता है। क्रोध को मारकर शोक नहीं करता। काम को मारकर धनवान बनता है और लोभ को मारकर सुखी होता है। * कायागढ भीतर नव लख खाई, दसवेँ द्वार अवधू ताली लाई ॥ : कायागढ भीतर देव देहुरा कासी, सहज सुभाइ मिले अवनासी ॥ : बदन्त गोरखनाथ सुणौ नर लोइ, कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई ॥ -- [[गुरु गोरखनाथ]] * '''तुलसी द्वारा वर्णित धर्ममय रथ''' : रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। : अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। : नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ : सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ : सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ : बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥ : ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ : दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥ : अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ : कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥ : सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥ : महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। : जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥ -- [[रामचरितमानस]], लंकाकाण्ड : '''अर्थ''' - रावण को रथ पर और श्रीराम को पैदल देखकर बिभीषन अधीर हो गए। श्रीराम के चरणों की वंदना कर विभीषण बोले। हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर की रक्षा करने वाला कवच और न पैरों में पादुकाएं। इस तरह से रावण जैसे बलवान वीर को आप कैसे जीत सकेंगे? कृपानिधान प्रभु राम बोले- हे सखा सुनो, जिस रथ से विजय होती है, वह रथ ये नहीं कोई दूसरा ही है॥ : धैर्य और शौर्य उस रथ के पहिए हैं। सदाचार और सत्य उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। विवेक, बल, इंद्रियों को वश में करने की शक्ति और परोपकार ये चारों उसके अश्व हैं। ये क्षमा, दया और समता रूपी डोरी के जरिए रथ में जोड़े गए हैं। : ईश्वर का भजन ही रथ का चतुर सारथी है । वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है। : पाप से मुक्त और स्थिर मन तरकस के समान है। वश में किया हुआ मन, यम-नियम, ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। : हे मित्र (बिभीषण), यदि किसी योद्धा के पास ऐसा धर्ममय रथ हो तो उसके सामने शत्रु होता ही नहीं, वह हर क्षेत्र में विजयी होता है। : हे धीरबुद्धि वाले सखा सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म मरण का चक्र) रूपी महान दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है,फिर रावण को जीतना मुश्किल कैसे हो सकता है। * अच्छी तैयारी आधी विजय है। -- Miguel de Cervantes * चुनौतियों को स्वीकार करें ताकि आप जीत की भावना को महसूस कर सकें। -- जॉर्ज एस पैटों * जीत मीलों में नहीं बल्कि इंच में जीती जाती है। थोड़ा-थोड़ा जीतो, अपने फैसले पर अडिग रहो और बाद में, थोड़ा और जीतो। -- Louis L’Amour * भगवान जो करना था वह पहले से ही सब कुछ कर चुका है। गेंद अब आपके पाले में है। यदि आप विजय हासिल करना चाहते हैं, यदि आप ज्ञान चाहते हैं, यदि आप समृद्ध और स्वस्थ होना चाहते हैं, तो आपको ध्यान और विश्वास से भी आगे बढ़कर अधिक काम करना होगा। -- Joel Osteen * उस व्यक्ति के लिए जीत हमेशा संभव है जो हार मानने से इनकार करता है। -- नेपोलियन हिल * संतोष आपकी कोशिश में निहित है, प्राप्ति में नहीं, पूर्ण प्रयास पूर्ण विजय है। -- महात्मा गांधी * जीत का अधिकार देने के लिए, खूनी गोलियां (bullets) नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण मतपत्र (ballet) ही आवश्यक हैं। -- अब्राहम लिंकन * मैं उसे बहादुर मानता हूं जो मन पर काबू पाता है, उसे नही जो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है; सबसे कठिन जीत स्वयं पर विजय हासिल करना है। -- अरस्तू * विजय के एक हजार पिता हैं, लेकिन हार एक अनाथ है। -- John F. Kennedy * पहली और सबसे बड़ी जीत खुद को जीतना है; -- Plato * वो जीत बहुत अधिक सार्थक हो जाती है जब यह सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि कई व्यक्तियों की संयुक्त उपलब्धियों से आती है। -- Howard Schultz * जीत हासिल करने के लिए सबसे पहली जगह हमारे अपने दिमाग में है। अगर आपको नहीं लगता कि आप सफल हो सकते हैं, तो आप कभी सफल नहीं होंगे। -- Joel Osteen * विजयी योद्धा पहले मन में जीतते हैं और फिर युद्ध में जाते हैं, जबकि पराजित योद्धा पहले युद्ध में जाते हैं और फिर जीतना चाहते हैं। -- Sun Tzu * विजय उन लोगों की होती है जो इसमें सबसे अधिक विश्वास करते हैं और इसमें सबसे लंबे समय तक विश्वास करते हैं। -- Randall Wallace * विजय उसी को मिलती है जो दृढ़ता से टिका रहता है। -- नेपोलियन बोनापार्ट * हमारी अंदरूनी विजय एक दैनिक संघर्ष है। मजबूत बनो और हार मत मानो। -- Lailah Gifty Akita * विजय, जीत या हार से परिभाषित नहीं होती है। यह आपकी कोशिश द्वारा परिभाषित है। अगर आप सच में कह सकते हैं कि, ‘मैंने जो कुछ भी किया सबसे अच्छा किया, मैंने वह सब कुछ दिया जो मेरे पास था,’ तो आप विजेता हैं। -- Wolfgang Schadler * महान जीत, जो आज इतनी सरल प्रतीत होती है, वो छोटी छोटी जीत की एक श्रृंखला का परिणाम थी जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया। -- Paulo Coelho * विजय केवल उन लोगों के लिए आती है जो इसे पाने के लिए तैयार हैं, और इसे पा लेते हैं। -- Tom Clancy * वो जीत ओर ज्यादा खूबसूरत लगने लग जाती है जब आप पहले हार चुके हो। -- Malcolm Forbes * आपकी जीत किसी कोने पर आपके आसपास ही है। इसलिए कभी हार मत मानो। -- Nicki Minaj ==इन्हें भी देखें== *[[सफलता]] ddksdmhtvnc59hip9j91cmd9avdx8ic 33409 33404 2026-10-20T07:55:39Z अनुनाद सिंह 658 33409 wikitext text/x-wiki '''विजय''' अर्थात् जीत। ==सूक्तियाँ == * ''यतो धर्मः ततो जयः।'' -- [[महाभारत]] : जहाँ धर्म है वहाँ जय (जीत) है। * ''सत्यमेव जयते'' । -- मुण्डकोपनिषद् : सत्य की ही विजय होती है। * ''सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलं अर्थः। अर्थस्य मूलं राज्यं। राज्यस्य मूलं '''इन्द्रियजयः'''। इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥ -- आचार्य चाणक्य : सुख का मूल है, धर्म। धर्म का मूल है, अर्थ। अर्थ का मूल है, राज्य। राज्य का मूल है, इन्द्रियों पर विजय। इन्द्रियजय का मूल है, विनय। विनय का मूल है, वृद्धों की सेवा। * ''अल्पायां वा महत्यां वा सेनायमिति निश्चयः । : ''हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते ॥'' -- महाभारत, भीष्मपर्व : सेना छोटी हो या बड़ी, हर एक सैनिक में लड़ने का उत्साह होना ही विजय प्राप्त करने का एकमात्र लक्षण है। * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- संजय, गीता के उपदेश के अन्त में : जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है। * ''अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत् । : ''जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥'' -- महाभारतम्/उद्योग पर्व/३९/७३ : क्रोध को अक्रोध से जीतना चाहिये। असाधु को साधुता से जीतना चाहिये। दान द्वारा कंजूसी को जीतना चाहिये और असत्य को सत्य से जीतना चाहिये। * ''मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न सोचति। : ''कामं हित्वा अर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥ : (मनुष्य) अहंकार को मारकर प्रिय हो जाता है। क्रोध को मारकर शोक नहीं करता। काम को मारकर धनवान बनता है और लोभ को मारकर सुखी होता है। * ''विजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधि : ''विपक्ष: पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्च कपयः ॥ : ''तथाप्येको राम:सकलमवधीद्राक्षसकुमं । : ''क्रियासिद्धि: सत्वे भव्ति महतां नोपकरणे ॥ : प्रभु श्रीराम को रावण को हराने हेतु समुद्र को पार करना पड़ा। उनके शत्रु रावण शक्तिशाली थे जबकि राम के सैनिक वानर थे अर्थात् परिस्थितियां विपरीत थीं तथापि प्रभु श्रीरामने असुरों का संहार किया । महान व्यक्तियों के यश उनकी स्वयं की क्षमता पर निर्भर करता है, वे यशस्वी होने हेतु किस माध्यम (उपकरण) का प्रयोग करते हैं उस पर नहीं निर्भर करता ! * कायागढ भीतर नव लख खाई, दसवेँ द्वार अवधू ताली लाई ॥ : कायागढ भीतर देव देहुरा कासी, सहज सुभाइ मिले अवनासी ॥ : बदन्त गोरखनाथ सुणौ नर लोइ, कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई ॥ -- [[गुरु गोरखनाथ]] * '''तुलसी द्वारा वर्णित धर्ममय रथ''' : रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। : अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। : नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ : सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ : सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ : बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥ : ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ : दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥ : अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ : कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥ : सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥ : महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। : जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥ -- [[रामचरितमानस]], लंकाकाण्ड : '''अर्थ''' - रावण को रथ पर और श्रीराम को पैदल देखकर बिभीषन अधीर हो गए। श्रीराम के चरणों की वंदना कर विभीषण बोले। हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर की रक्षा करने वाला कवच और न पैरों में पादुकाएं। इस तरह से रावण जैसे बलवान वीर को आप कैसे जीत सकेंगे? कृपानिधान प्रभु राम बोले- हे सखा सुनो, जिस रथ से विजय होती है, वह रथ ये नहीं कोई दूसरा ही है॥ : धैर्य और शौर्य उस रथ के पहिए हैं। सदाचार और सत्य उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। विवेक, बल, इंद्रियों को वश में करने की शक्ति और परोपकार ये चारों उसके अश्व हैं। ये क्षमा, दया और समता रूपी डोरी के जरिए रथ में जोड़े गए हैं। : ईश्वर का भजन ही रथ का चतुर सारथी है । वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है। : पाप से मुक्त और स्थिर मन तरकस के समान है। वश में किया हुआ मन, यम-नियम, ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। : हे मित्र (बिभीषण), यदि किसी योद्धा के पास ऐसा धर्ममय रथ हो तो उसके सामने शत्रु होता ही नहीं, वह हर क्षेत्र में विजयी होता है। : हे धीरबुद्धि वाले सखा सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म मरण का चक्र) रूपी महान दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है,फिर रावण को जीतना मुश्किल कैसे हो सकता है। * अच्छी तैयारी आधी विजय है। -- Miguel de Cervantes * चुनौतियों को स्वीकार करें ताकि आप जीत की भावना को महसूस कर सकें। -- जॉर्ज एस पैटों * जीत मीलों में नहीं बल्कि इंच में जीती जाती है। थोड़ा-थोड़ा जीतो, अपने फैसले पर अडिग रहो और बाद में, थोड़ा और जीतो। -- Louis L’Amour * भगवान जो करना था वह पहले से ही सब कुछ कर चुका है। गेंद अब आपके पाले में है। यदि आप विजय हासिल करना चाहते हैं, यदि आप ज्ञान चाहते हैं, यदि आप समृद्ध और स्वस्थ होना चाहते हैं, तो आपको ध्यान और विश्वास से भी आगे बढ़कर अधिक काम करना होगा। -- Joel Osteen * उस व्यक्ति के लिए जीत हमेशा संभव है जो हार मानने से इनकार करता है। -- नेपोलियन हिल * संतोष आपकी कोशिश में निहित है, प्राप्ति में नहीं, पूर्ण प्रयास पूर्ण विजय है। -- महात्मा गांधी * जीत का अधिकार देने के लिए, खूनी गोलियां (bullets) नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण मतपत्र (ballet) ही आवश्यक हैं। -- अब्राहम लिंकन * मैं उसे बहादुर मानता हूं जो मन पर काबू पाता है, उसे नही जो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है; सबसे कठिन जीत स्वयं पर विजय हासिल करना है। -- अरस्तू * विजय के एक हजार पिता हैं, लेकिन हार एक अनाथ है। -- John F. Kennedy * पहली और सबसे बड़ी जीत खुद को जीतना है; -- Plato * वो जीत बहुत अधिक सार्थक हो जाती है जब यह सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि कई व्यक्तियों की संयुक्त उपलब्धियों से आती है। -- Howard Schultz * जीत हासिल करने के लिए सबसे पहली जगह हमारे अपने दिमाग में है। अगर आपको नहीं लगता कि आप सफल हो सकते हैं, तो आप कभी सफल नहीं होंगे। -- Joel Osteen * विजयी योद्धा पहले मन में जीतते हैं और फिर युद्ध में जाते हैं, जबकि पराजित योद्धा पहले युद्ध में जाते हैं और फिर जीतना चाहते हैं। -- Sun Tzu * विजय उन लोगों की होती है जो इसमें सबसे अधिक विश्वास करते हैं और इसमें सबसे लंबे समय तक विश्वास करते हैं। -- Randall Wallace * विजय उसी को मिलती है जो दृढ़ता से टिका रहता है। -- नेपोलियन बोनापार्ट * हमारी अंदरूनी विजय एक दैनिक संघर्ष है। मजबूत बनो और हार मत मानो। -- Lailah Gifty Akita * विजय, जीत या हार से परिभाषित नहीं होती है। यह आपकी कोशिश द्वारा परिभाषित है। अगर आप सच में कह सकते हैं कि, ‘मैंने जो कुछ भी किया सबसे अच्छा किया, मैंने वह सब कुछ दिया जो मेरे पास था,’ तो आप विजेता हैं। -- Wolfgang Schadler * महान जीत, जो आज इतनी सरल प्रतीत होती है, वो छोटी छोटी जीत की एक श्रृंखला का परिणाम थी जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया। -- Paulo Coelho * विजय केवल उन लोगों के लिए आती है जो इसे पाने के लिए तैयार हैं, और इसे पा लेते हैं। -- Tom Clancy * वो जीत ओर ज्यादा खूबसूरत लगने लग जाती है जब आप पहले हार चुके हो। -- Malcolm Forbes * आपकी जीत किसी कोने पर आपके आसपास ही है। इसलिए कभी हार मत मानो। -- Nicki Minaj ==इन्हें भी देखें== *[[सफलता]] nyrmi5qfb1ge7nvx34ie3r26hnqszzq मूर्ख 0 6771 33410 33194 2026-10-20T08:02:13Z अनुनाद सिंह 658 /* उद्धरण */ 33410 wikitext text/x-wiki '''मूर्ख''' या मूढ़ । वह व्यक्ति जो छोटी-मोटी बातों को भी ठीक से नहीं समझ पाता। == उद्धरण == * ''मूर्खस्य पञ्चचिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा। : ''क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः॥'' : मूर्ख के पाँच लक्षण हैं - गर्व, अपशब्द, क्रोध, हठ और दूसरों की बातों का अनादर। * ''अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । : ''ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ॥'' -- भर्तृहरि विरचित नीतिशतकम् : अज्ञानी मनुष्य को समझाना सामान्यतः सरल होता है। उससे भी आसान होता है जानकार या विशेषज्ञ अर्थात् चर्चा में निहित विषय को जानने वाले को समझाना । किन्तु जो व्यक्ति अल्पज्ञ होता है, जिसकी जानकारी आधी-अधूरी होती है, उसे समझाना तो स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के भी वश से बाहर होता है। * ''काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। : ''व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥ : जो बुद्धिमान (ज्ञानी) मनुष्य होते है उनका ज्यादातर समय काव्य, शास्त्र के ज्ञान को पाने उसके आनन्द को प्राप्त करने में व्यतीत होता है वहीं जो मूर्ख व्यक्ति है उनका अधिकांश समय व्यसन , निद्रा और कलह (झगड़े) करने में नष्ट हो जाता है। * ''शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपः : ''नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ। : ''व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं : ''सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्॥'' -- नीतिशतक : जल से आग बुझाई जा सकती है, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले हाथी को तीखे अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को दण्ड से वश में किया जा सकता है, औषधियों से रोग भी शान्त हो सकता है, विष को भी अनेक मन्त्रों के प्रयोगों से शान्त कर सकते हैं - इस तरह सब उपद्रवों की औषधि शास्त्र में है, परन्तु मूर्ख की कोई औषधि नहीं है। * ''प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरदंष्ट्रान्तरात् : ''समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् । : ''भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत् : ''न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ : अर्थः मनुष्य कठिन प्रयास करते हुए मगरमच्छ के मुँह से मणि बाहर ला सकता है, वह उठती-गिरती लहरों से व्याप्त समुद्र को तैरकर पार कर सकता है, क्रुद्ध सर्प को फूलों की भांति सिर पर धारण कर सकता है, किंतु दुराग्रह से ग्रस्त मूर्ख व्यक्ति को अपनी बातों से संतुष्ट नहीं कर सकता है । * ''उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये। : ''पयःपानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम्॥'' -- पञ्चतन्त्र : मूर्ख व्यक्ति को दी जाने वाली सलाह या ज्ञान उसकी शांति का कारण बनने के बजाय उसके क्रोध (प्रकोप) को और अधिक बढ़ाने का काम करती है। == विदुर के अनुसार मूर्ख (मूढ) == *'' स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमुनुतिष्ठति। : मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते॥ : जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करता है, तथा मित्र के साथ असत् आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है। *'' अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्। :'' बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम्॥ : जो न चाहने वालों को चाहता है, और चाहने वालों को त्याग देता है, जो अपने से बलवान के साथ बैर करता है, उसे मूढ़ विचार वाला मनुष्य कहते हैं। *'' अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च। :'' कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्॥ : जो शत्रु को मित्र बनाता और मित्र से द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मों का आरम्भ किया करता है, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं। *'' संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते। :'' चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ॥ : भरतश्रेष्ठ! जो अपने कर्मों को व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र संदेह करता है तथा शीघ्र होने वाले काम में भी देर लगता है, वह मूढ है। *'' श्राद्धं पित्रुभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति। :'' सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम्॥ : जो पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् नहीं मिलता, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं। *'' अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते। :'' अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥ : मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मुनुष्य पर भी विश्वास करता है। *'' परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा। :'' यश्च कृध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः॥ : दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरे पर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी क्रोध सकता है, वह मुष्य महामूर्ख है। *'' आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवरिजितम्। :'' अलभ्यमिच्छन् नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरहोच्यते॥ : जो अपने बल को न समझकर विना काम किये ही धर्म और अर्थ से विरुद्ध तथा न पाने योग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसार में मूढबुद्धि कहलाता है। *'' अशिष्यं शास्ति यो राजन् यश्च शून्यमुपासते। :'' कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम्॥ : जो अनधिकारी को उपदेश देता है और शून्य की उपासना करता है, तथा जो कृपण का आश्रय लेता है, उसे मूढचित्तवाला कहते है। ==इन्हें भी देखें== * [[पण्डित]] * [[बुद्धि]] * [[ज्ञान]] * [[अनुभव]] * [[विद्या]] * [[शिक्षा]] jyw7fntac46z39j0k5ltqja4eue8wfw नासिरा शर्मा 0 9316 33406 33178 2026-10-20T06:34:09Z शीतल सिन्हा 3627 33406 wikitext text/x-wiki नासिरा शर्मा हिंदी की एक प्रसिद्ध लेखिका है। पारिजात उनकी प्रसिद्ध रचना है।2016 में पारिजात को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। qyabt8aaslwq7mz7wrvatv00vzy3zsb 33407 33406 2026-10-20T06:36:44Z शीतल सिन्हा 3627 पारिजात 33407 wikitext text/x-wiki नासिरा शर्मा हिंदी की एक प्रसिद्ध लेखिका है। पारिजात उनकी प्रसिद्ध रचना है।2016 में पारिजात को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ====== ==पारिजात के संदेश== ====== 7iur52hapxhlrx91f1tvhcjwsjfo0v3 33408 33407 2026-10-20T06:38:18Z शीतल सिन्हा 3627 /* ==पारिजात के संदेश== */ 33408 wikitext text/x-wiki नासिरा शर्मा हिंदी की एक प्रसिद्ध लेखिका है। पारिजात उनकी प्रसिद्ध रचना है।2016 में पारिजात को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ====== ==पारिजात के संदेश== ====== मां के वजूद के कान इस बातें पानी में कहाँ धुंडू कहां तक दौड़े मां के बिना मैं कितना अधूरा हूं? c7jedrllylwo3wavkoidb12xbs0uhai