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सहायता:देवनागरी लिपि में कैसे लिखें
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/* */ * आप जो सोचते हैं, वही बनते हैं।
* आप वही सोचते हैं, वही बन जाते हैं, जो आप सोचते हैं वही बनते हैं।
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==उपलब्ध लिखने के साधन==
{| class="wikitable" style="width:100%"
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! लिखने का तरीका !! नाम !! जानकारी
|-
| kaise ho → कैसे हो || [[विकिसूक्ति:माइक्रोसॉफ़्ट इंडिक टायपिंग टूल]]
|| उदाहरण
|-
| लिपि बद्ध तरीका || इनस्क्रिप्ट || उदाहरण
|-
| फॉन्ट द्वारा जैसे कृति देव || कृति देव
|}
[[श्रेणी:लिखने के तरीके]]
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सदस्य वार्ता:शीतल सिन्हा
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/* नए पन्नों को विकिडेटा से जोड़ना */ नया अनुभाग
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{{साँचा:स्वागत|realName=|name=शीतल सिन्हा}}
-- [[सदस्य:Sfic|Sfic]] ([[सदस्य वार्ता:Sfic|वार्ता]]) २३:३६, २२ फ़रवरी २०२० (IST)
== नए पन्नों को विकिडेटा से जोड़ना ==
नमस्ते शीतल जी, वैसे तो मैंने आपके बनाए नए पन्नों को विकिडेटा से जोड़ दिया है। चूँकि इन लोगों के पन्ने अंग्रेजी विकिसूक्ति पर उपलब्ध नहीं थे इन्हें सीधे यहाँ से जोड़ना संभव नहीं था जैसे हमलोग आमतौर पर विकिपीडिया पर करते हैं। इसके लिये पहले आपको उन व्यक्तियों के विकिडेटा आइटम तक पहूँच कर फिर विकिसूक्ति वाले अनुभाग में नाम जोड़ना होता है। हाँ, आप यह कर सकती हैं कि हिंदी विकिपीडिया पर संबंधित लेख खोल लें और वहाँ साइडबार में विकिडेटा आइटम की कड़ी से उनके विकिडेटा आइटम तक पहुँच जाएँ।
शुभकामनायें। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--talk--</small>]]</sup> २१:०२, २१ अक्टूबर २०२६ (IST)
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दुःख
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अनुनाद सिंह
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'''दुःख''', आपदा, विपदा, दुर्दिन आदि समानार्थी हैँ।
== सूक्तियाँ ==
* ''शोकस्थान सहस्राणि भयस्थान शतानि च
: ''दिवसे दिवसे मूढम आविशन्ति न पण्डितम्॥
: शोक के एक हजार स्थान हैं, भय के सौ स्थान हैं। ये हर दिन मूर्ख को आवेशित करते हैं (अर्थात मूर्ख ही शोक और भय से ग्रसित होते हैं) पण्डित को नहीं।
* ''ये केचिद् दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
: ''ये केचित् सुखिता लोके सर्वे ते ऽन्यसुखेच्छया॥'' --बोधिचर्यावतार
: जगत में जो लोग दुखी हैं उसका कारण उनकी अपनी सुख की इच्छा है और जो लोग सुखी हैं उसका कारण उनकी दूसरों के सुखी होने की इच्छा करने के कारण है। अर्थात् जो स्वार्थी हैं वह दुःखी हैं और जो परार्थी है वह सुखी हैं।
* ''सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
: ''एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयोः॥
: जो लोग दूसरों पर आश्रित है वह दुःखी हैं, और स्वाश्रित हैं वे सुखी हैं।
* ''ये च मूढतमाः लोके ये च बुद्धेः परं गताः ।
: ''ते एव सुखम् एधन्ते मध्यमः क्लिश्यते जनः ॥'' -- [[महाभारत]]
: इस लोक में वे ही सुख से रहते हैं जो जो सबसे मूर्ख हैं या जो बुद्धि के परे चले गये हैं। इन दोनों के बीच में रहने वाला व्यक्ति दुखी रहता है।
* रहिमन विपदा भी भली, जो थोरे दिन होय।
: हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।। -- रहीम
: थोड़े दिनों की विपदा भी अच्छी होती है क्योंकि इसी से ये पता चलता है कि संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन हमारा बुरा चाहने वाला।
* रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
: सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥ -- रहीम
: अपने दुख को अपने मन में ही रखना चाहिए। दूसरों को अपने दुःख के बारे में बताने से लोग उसका मजाक उड़ाते है, उसे कोई बांट नहीं लेता।
* आँसू दिल से आते हैं, मस्तिष्क से नहीं। -- लियोनार्डॉ डा विन्सी
* दुःख हमारे पास आता है, हमें दुखी लेकिन संयमी बनाने के लिए; हमें उदास नहीं बल्कि बुद्धिमान बनाने के लिए। -- एच जी वेल्स
* दुखी दिल, आकाश में भारी बादलों की तरह, थोड़ा पानी गिराने से सबसे अच्छा राहत मिलती है। -- क्रिस्टोफर मोर्ली
* जब आप परेशान, उदास, ईर्ष्या या प्यार में निर्णय लेते हैं तो कभी भी निर्णय न लें। -- Mario Teguh
* आज के अच्छे समय, कल के दुखद विचार हैं। -- बॉब मार्ले
* प्रिय भगवान, जब कमजोरी, असुरक्षा, और आत्म-संदेह की भावना मेरे दिल में रेंगती है, तो मुझे अपने तरीके से खुद को देखने में मदद करें। -- अज्ञात
* जिस दिन आपको लगता है कि कोई सुधार नहीं किया गया है वह किसी भी खिलाड़ी के लिए दुखद है। -- Lionel Messi
* गरीबी आपको दुखी और बुद्धिमान बनाती है। -- Bertolt Brecht
* मुश्किल सड़कें अक्सर सुन्दर स्थलों की ओर ले जाती है। -- जिग जिगलर
* यह दुख की बात है कि हम कभी भी धारणाओं को छोड़ने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं। -- Sebastian Thrun
* मेरा प्राकृतिक स्वभाव बहुत आनन्दपूर्ण है, लेकिन आप जानते हैं, मेरे पास किसी और की तरह बुरे दिन और दुखद क्षण हैं। -- Tracee Ellis Ros
* अच्छा समय अच्छी यादें बन जाता है; बुरे समय अच्छे सबक बन जाते हैं। -- अज्ञात
* सबसे पहले, उदासी स्वीकार करें। महसूस करें कि हारने के बिना, जीत इतना महान नहीं है। -- Alyssa Milano
* मुझे विश्वास है कि अगर आपने उदासी के बारे में नहीं सीखा है, तो आप खुशी की सराहना नहीं कर सकते। -- Nana Mouskouri
* रोना सफाई है। आँसू, खुशी या उदासी का कारण है। -- Dionne Warwick
* अवसाद भविष्य का निर्माण करने में असमर्थता है। -- रोलो मे
* गहरी उदासी में भावनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है। -- William S. Burroughs
* हम कभी भी एक परिपूर्ण खुशी का स्वाद नहीं लेते; हमारी सबसे खुशहाल सफलताओं को उदासी से मिश्रित किया जाता है। -- Pierre Corneille
* हम दुःख को दूर रखने के लिए अपने चारों ओर जो दीवारें बनाते हैं, वह आनन्द को भी दूर रखता है। -- Jim Rohn
* ऊबने का कोई बहाना नहीं है। दुख, हाँ। गुस्सा, हाँ। निराश, हाँ। पागल, हाँ। लेकिन बोरियत के लिए कभी भी कोई बहाना नहीं है। -- Viggo Mortensen
* आंसू किसी और के दुख को समझता नहीं है, और न ही किसी की खुशी को. -- Franz Schubert
* दुख भी एक तरह की रक्षा है। -- Ivo Andric
* हमारे सबसे प्यारे गाने वे हैं जो सबसे बुरे विचारों के बारे में बताते हैं। -- पी बी शेली
* गुलाब और कांटा, और दुख और खुशी एक साथ जुड़े हुए हैं। -- सादी
* समय के पंखों पर उदासी दूर उड़ जाती है। -- Jean de La Fontaine
* अंत में मेरे दिल ने कहा "अब बहुत हो गया है।" -- MC
* उदासी और क्रोध का अनुभव करने से आप अधिक रचनात्मक महसूस कर सकते हैं, और रचनात्मक होने के कारण, आप अपने दर्द या नकारात्मकता से परे हो सकते हैं। -- Yoko Ono
* आँसू आत्मा के लिए ग्रीष्मकालीन बौछार हैं। -- Alfred Austin
* मैं स्वर्ग छोड़ने के लिए हमेशा दुखी हूं, लेकिन मैं जल्द ही आने की आशाओं को पीछे छोड़ देता हूं। -- Irina Shayk
* राजनीति का दुखद कर्तव्य एक पापी दुनिया में न्याय स्थापित करना है। -- Reinhold Niebuhr
* दुखद चीजें होती हैं। वे करते हैं। लेकिन हमें हमेशा के लिए दुखी रहने की जरूरत नहीं है। -- Mattie Stepanek
* क्या मैं किसी और की दुःख देख सकता हूं, और दुख में भी नहीं? क्या मैं किसी और का दुःख देख सकता हूं, और दयालु राहत की तलाश नहीं कर सकता? -- William Blake
* मैं एक दुखी बच्चा था। -- Post Malone
* मुझे अपने आस-पास के लोगों को उदासीनता पसंद नहीं है। मुझे लोगों को खुश करना पसंद है। -- Tyler
==इन्हें भी देखें==
*[[सुख]]
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ब्राह्मण
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अनुनाद सिंह
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'''ब्राह्मण''' का शाब्दिक अर्थ है - [[ब्रह्म]]-ज्ञानी। सनातन वर्ण व्यवस्था में से ब्राह्मण एक वर्ण है।
== उक्तियाँ ==
* ''ब्राह्मणोस्य मुखमासीद बहुराजन्यकृतः, उरुत दस्य यद्वैश्यः पदभ्यांशूद्रो अजायत।'' -- पुरुष सूक्त
: ब्राह्मण परमपुरुष के मुख से, क्षत्रिय बाहुओं से, वैश्य जांघों से तथा शूद्र पैर से उत्पन्न हुए।
* ''धिग्बलं क्षात्रियबलं ब्रह्मतेजोबलमं बलम् ।
: ''एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे ॥'' -- वाल्मीकि रामयण , बालकाण्ड (विश्वामित्र द्वारा कहा गया)
: क्षत्रिय के बल (बाहुबल) को धिक्कार है। ज्ञानी के तेज (ब्रह्मतेज) का बल ही वास्तविक बल है। एक ही ब्रह्म्दण्ड से मेरे सभी अस्त्र नष्ट हो गये।
* ''न योनिर्नापि सँस्कारो न श्रुतं नापिसन्ततिः ।
: ''कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् ।'' -- [[महाभारत]] अनुशासन पर्व
: न जन्म, न संस्कार, न शास्त्र, और न कुल आदि द्विजत्व के कारण हैं (अर्थात इनसे कोई द्विज नहीं हो जाता।) (द्विजत्व का वास्तविक कारण) तो वृत्त (सदाचार) है।
* ''एकवर्णमिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर
: ''कर्म-क्रियाविशेषेण चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्।41।
: ''सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरीषिणः
: ''एकेन्द्रियेन्द्रियार्थाश्च तस्माच्छीलगुणैर्द्विजाः।42।
: ''शूद्रोपि शीलसम्पन्नो गुणवान ब्राह्मणो भवेत्
: ''ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः शूद्रात्प्रत्यवरो भवेत।43।'' -- [[महाभारत]]
: (फिर वैशम्पायन ने इसकी व्याख्या करते हुए बताया—)
: हे युधिष्ठिर ! इस संसार में पहले एक ही वर्ण था । गुण और कर्म में भेद पड़ने से चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र माने गये। क्या ब्राह्मण, क्या शुद्ध सब मनुष्यों की उत्पत्ति मूत्र और पूरीष के स्थान योनि से ही होती हैं; सब ही मनुष्य मल-मूत्र त्यागते हैं, सब मनुष्यों की इन्द्रिय, वासनायें समान हैं अर्थात् सब खाते हैं, पीते हैं, देखते हैं, सुनते हैं, चलते हैं, मैथुन करते हैं इत्यादि ( इसलिये जन्म से ऊंच नीच मानना उचित नहीं )। शील की प्रधानता से ही द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) होते हैं यदि शूद्र शीलसम्पन्न और गुणवान् हो तो ब्राह्मण होता है। और ब्राह्मण भी यदि क्रियाहीन हो जाय, तो वह शूद्र से भर नीच हो जाता है।
* ''तब ब्राह्मण किसे माना जाय? जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त न हो; जाति, गुण और क्रिया से भी युक्त न हो; षड् ऊर्मियों और षड्भावों आदि समस्त दोषों से मुक्त हो; सत्य, ज्ञान, आनन्द स्वरूप, स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला, अशेष कल्पों को आधार रूप, समस्त प्राणियों के अन्त में निवास करने वाला, अन्दर-बाहर आकाशवत् संव्याप्त; अखण्ड आनन्दवान्, अप्रमेय, अनुभवगम्य, अप्रत्यक्ष भासित होने वाले आत्मा का करतल आमलकवत् परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला; काम - रागद्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला; शम-दम आदि से सम्पन्न; मात्सर्य, तृष्णा, आशा, मोह आदि भावों से रहित; दम्भ, अहङ्कार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, वही ब्राह्मण है; ऐसा श्रुति, स्मृति-पुराण और इतिहास का अभिप्राय है। इस (अभिप्राय) के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व सिद्ध नहीं हो सकता। आत्मा ही सत्-चित् और आनन्द स्वरूप तथा अद्वितीय है। इस प्रकार के ब्रह्म भाव से सम्पन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता है। यही उपचिषद् का मत है॥'' -- [[:w:वज्रसूचिकोपनिषद|वज्रसूचिका उपनिषद]]
: यहां तक कि कोई [[शूद्र]] भी शील एवं सदाचार का अनुसरण करके ब्राह्मण बन सकता है। यदि कोई ब्राह्मण गुण-शील से हीन, स्वार्थी और परिग्रही है, जो क्रोधी, कामी और लालची है, वह शूद्र से भी गिरा हुआ है।43।
* '' येन सर्वमिदं बुद्धं प्रकृतिर्विकृतिश्च यया
: '' गतिज्ञः सर्वभूतानां तं देवा ब्राह्मणा विदुः ॥
: जिसको इस सम्पूर्ण जगत की नश्वरता का ज्ञान है, जो प्रकृति और विकृति से परिचित है तथा जिसे सम्पूर्ण प्राणियों की गति का ज्ञान है, उसे देवता लोग ब्राह्मण जानते हैं।
* ''ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः
: ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है।
* ''दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम्।
: ''तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिः स्मृतः॥
: ''सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुजते।
: ''एकस्तान्मंत्रवित्प्रीत: सर्वानर्हति धर्मतः॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मण की परीक्षा प्रथम से ही करना चाहिए, क्योंकि वही देव, पितर के लिए दिये गये पदार्थों के लिए योग्य अधिकारी और पात्र है। जहाँ लाखों मूर्खों के खिलाने से जितना धर्म होता है वहाँ एक ही वेद-वेदांग के ज्ञाता को भोजनादि से सन्तुष्ट करने से उतना ही पुण्य होता है।
* ''भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः,
: ''बुद्धिमास्तु नराःश्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः।
: ''ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वस्तु कृतबुद्धयः,
: ''कृतबुध्दिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः।
: ''उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती
: ''सहि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते।
: ''ब्राह्मणो जयमानो हि पृथिव्यामधिजायते,
: ''ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये!'' -- [[मनुस्मृति]], अध्याय -१
: अर्थात भूतों (जो पैदा हुए हैं) में प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धि के आधर पर जीने वले प्रणी श्रेष्ठ हैं, बुद्धिमानों में मनुष्य श्रेष्ठ है, और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणों में विद्वान् और विद्वानों में कर्मज्ञ जिसे कृतबुद्धि कहा जाता है वे श्रेष्ठ होते हैं। कर्मज्ञों में आचारवान श्रेष्ठ होते हैं और आचारवानो में ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ होते हैं। ब्राह्मण धर्म के लिए उत्पन्न होता है क्योंकि ब्राह्मण ही सभी प्राणियों में धर्मसमूह की रक्षा करने में समर्थ होता है।
* ''ब्राम्हणः समक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः।
: ''स्त्रवते ब्रम्ह तस्यापि भिन्नभाण्डात् पयो यथा ॥'' -- श्रीमद्भागवत्, चतुर्थ स्कन्द
: ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव वाला भी हो तो भी दीनों की उपेक्षा करने से उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़े में से जल बह जाता है।
* ''वृत्तस्थमपि चाण्डालाम तं देवा ब्राह्मणं विदुः।'' -- पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड
: चरित्रवान चाण्डाल को भी देवता ब्राह्मण मानते हैं।
*''ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामायनेष्यते ।
: ''कृच्छ्रायतपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥'' -- भागवत पुराण , ब्राह्मणधर्मम् में
: ब्राह्मण का शरीर (जन्म) तुच्छ विषयभोग के लिए नहीं है। यह जीवन पर्यन्त कष्ट सहते हुए तपस्या करने और अन्त में आनन्दस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति करने के लिए है।
* न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
: यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥'' -- भगवान बुद्ध
: ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।
* ''अलंकतो चेपि समं चरेथ्य सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।
: ''सब्बेसु भूतेसु' निधाय दण्ड सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खू ॥'' -- धम्मपद, दंडवग्ग
: वस्त्र, आभूषण आदि से अलंकृत रहते हुये भी यदि कोई शांत, दान्त, स्थिर ब्रहमचारी है और सारे प्राणियों के प्रति दंड त्याग कर समता का आचरण करता है तो वह ब्राह्मण है, श्रमण है, भिक्षु है।
* ''न ब्राह्मणस्स पहरेय्य, नास्स मुञ्चेथ ब्राह्मणो
: ''धि ब्राह्मणस्स हन्तारं, ततो धि यस्स मुञ्चति ॥'' -- धम्मपद ३८९
: ब्राह्मण पर प्रहार न करें, न ब्राह्मण उस (प्रहार करने वाले) को जाने दे।
: ब्राह्मण की हत्या करने वाले को धिक्कार है ; उसको भी धिक्कार है जो प्रहार करने वाले को जाने देता है।
* '' तसपाणे वियाणेत्ता संगहेण य थावरे।
: ''जो न हिंसइ तिविहेण तं वयं बूम माहणं॥'' -- महावीर स्वामी
: जो इस बात को जानता है कि कौन प्राणी त्रस है, कौन स्थावर है। और मन, वचन और काया से किसी भी जीव की हिंसा नहीं करता, उसी को हम ब्राह्मण कहते हैं।
* ''न वि मुंडिएण समणो न ओंकारेण बंभणो।
: ''न मुणी रण्णवासेणं कुसचीरेण न तावसो॥'' -- महावीर स्वामी
: सिर मुंडा लेने से ही कोई श्रमण नहीं बन जाता। ‘ओंकार’ का जप कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। केवल जंगल में जाकर बस जाने से ही कोई मुनि नहीं बन जाता। वल्कल वस्त्र पहन लेने से ही कोई तपस्वी नहीं बन जाता।
* ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन,
: पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीन॥ -- सन्त रविदास
: किसी को केवल इसलिए नहीं पूजना चाहिए क्योंकि वह किसी पूजनीय पद पर है। यदि व्यक्ति में उस पद के योग्य गुण नहीं हैं तो उसे नहीं पूजना चाहिए। इसकी जगह अगर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो किसी ऊंचे पद पर तो नहीं है लेकिन बहुत गुणवान है तो उसका पूजन अवश्य करना चाहिए।
== इन्हें भी देखिये ==
* [[वर्ण]]
* [[ब्रह्म]]
* [[आत्मा]]
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सदस्य वार्ता:Rdxss
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स्वागत
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-- [[सदस्य:New user message|New user message]] ([[सदस्य वार्ता:New user message|वार्ता]]) २२:३९, २१ अक्टूबर २०२६ (IST)
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शान्तिदेव
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2026-10-22T10:01:40Z
अनुनाद सिंह
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"'''आचार्य शान्तिदेव''' (जीवनकाल : सम्भवतया ७वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के दार्शनिक थे। उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों में महायान के अन्य प्रत्ययों के सा..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''आचार्य शान्तिदेव''' (जीवनकाल : सम्भवतया ७वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के दार्शनिक थे। उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों में महायान के अन्य प्रत्ययों के साथ-साथ शून्यता का प्रतिपादन किया। बताया जाता है कि शान्तिदेव ने आचार्य जयदेव से प्रवज्या ग्रहण की थी। उस समय वे नालंदा महाविहार के पीठ स्थविर धर्मपाल के उत्तराधिकारी थे। प्रव्रज्या ग्रहण करने बाद आचार्य शान्तिदेव ने नालन्दा महाविहार में रह कर ही अध्ययन किया और वहीं पर रहकर अध्यापन भी किया (डॉ धर्मकीर्ति : महान बौद्ध दार्शनिक पृष्ठ 391)।
आचार्य शान्तिदेव संभवतया 7 वी सदी में हुए थे । तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ (एम विंटरनिट्ज : ए हिस्टरी ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, भाग-२, पृष्ठ 65-366) के अनुसार ये गुजरात के किसी राजा के पुत्र थे और कुछ समय तक ये राजा पञ्चसिंह के राज्य में मंत्री रहे थे। किन्तु उन्हें दुनियादारी और झंझट पसंद नहीं आए और इसलिए वे गृह त्याग कर भिक्खु हो गए थे (भूमिका : बोधिचर्यावतार : अनुवादक शांति भिक्षु शास्त्री )।
आचार्य शान्तिदेव के तीन ग्रन्थ बतलाएं जाते हैं- १) शिक्षा समुच्चय २) बोधिचार्यवातर ३) सूत्र समुच्चय।
सूत्रसमुच्चय, वर्तमान में अनुपलब्ध है। शिक्षा समुच्चय और बोधिचर्यावतार का विषय एक ही है। भेद केवल निरूपण और व्याख्या शैली का है। बिना काव्य का प्रयत्न किए ही आचार्य ने उसे धर्म का काव्य बना दिया। दूसरे, बोधिचर्यावतार और शिक्षासमुच्चय दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बोधिचर्यावतार में शून्यवाद का प्रतिपादन किया गया है जबकि शिक्षा समुच्चय में उसका नाम कीर्तन मात्र है। शिक्षा समुच्चय सूत्रों के उध्दरणोँ से विपुल ग्रंथ हो गया है जबकि बोधिचर्यावतार में सूत्रों का यत्र-तत्र संकेत ही है।
;बोधिचर्यावतार
यह किसी समय बहुत ही लोकप्रिय ग्रन्थ था। इस कारण इस पर अनेकों विद्वानों ने इस पर टिकाएं लिखी थी। भोट देश (तिब्बत) में इस ग्रन्थ का पाठ आज भी होता है। इसके पाठ को बहुत ही पवित्र कार्य और धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। महायान धर्म और दर्शन को समझने के लिए यह उत्तम ग्रन्थ है। बोधिचर्यावतार में सर्व-जन कल्याण सुभाषितों का बुद्ध वचन के रूप में उदात्त भाव में समावेश है किया गया है।
;शिक्षासमुच्चय
इसमें २७ कारिकाओं के द्वारा महायान शाखा की धार्मिक चर्चा का स्वरूप सूत्र रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके उपरांत उन सूत्रों को प्रमाणित एवं समर्थन प्रदान करने के लिए उनके चारों ओर महायान सूत्रों के उद्धहरणों से उन्हें सजाया गया है।
== सुभाषित ==
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अनुनाद सिंह
658
/* सुभाषित */
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'''आचार्य शान्तिदेव''' (जीवनकाल : सम्भवतया ७वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के दार्शनिक थे। उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों में महायान के अन्य प्रत्ययों के साथ-साथ शून्यता का प्रतिपादन किया। बताया जाता है कि शान्तिदेव ने आचार्य जयदेव से प्रवज्या ग्रहण की थी। उस समय वे नालंदा महाविहार के पीठ स्थविर धर्मपाल के उत्तराधिकारी थे। प्रव्रज्या ग्रहण करने बाद आचार्य शान्तिदेव ने नालन्दा महाविहार में रह कर ही अध्ययन किया और वहीं पर रहकर अध्यापन भी किया (डॉ धर्मकीर्ति : महान बौद्ध दार्शनिक पृष्ठ 391)।
आचार्य शान्तिदेव संभवतया 7 वी सदी में हुए थे । तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ (एम विंटरनिट्ज : ए हिस्टरी ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, भाग-२, पृष्ठ 65-366) के अनुसार ये गुजरात के किसी राजा के पुत्र थे और कुछ समय तक ये राजा पञ्चसिंह के राज्य में मंत्री रहे थे। किन्तु उन्हें दुनियादारी और झंझट पसंद नहीं आए और इसलिए वे गृह त्याग कर भिक्खु हो गए थे (भूमिका : बोधिचर्यावतार : अनुवादक शांति भिक्षु शास्त्री )।
आचार्य शान्तिदेव के तीन ग्रन्थ बतलाएं जाते हैं- १) शिक्षा समुच्चय २) बोधिचार्यवातर ३) सूत्र समुच्चय।
सूत्रसमुच्चय, वर्तमान में अनुपलब्ध है। शिक्षा समुच्चय और बोधिचर्यावतार का विषय एक ही है। भेद केवल निरूपण और व्याख्या शैली का है। बिना काव्य का प्रयत्न किए ही आचार्य ने उसे धर्म का काव्य बना दिया। दूसरे, बोधिचर्यावतार और शिक्षासमुच्चय दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बोधिचर्यावतार में शून्यवाद का प्रतिपादन किया गया है जबकि शिक्षा समुच्चय में उसका नाम कीर्तन मात्र है। शिक्षा समुच्चय सूत्रों के उध्दरणोँ से विपुल ग्रंथ हो गया है जबकि बोधिचर्यावतार में सूत्रों का यत्र-तत्र संकेत ही है।
;बोधिचर्यावतार
यह किसी समय बहुत ही लोकप्रिय ग्रन्थ था। इस कारण इस पर अनेकों विद्वानों ने इस पर टिकाएं लिखी थी। भोट देश (तिब्बत) में इस ग्रन्थ का पाठ आज भी होता है। इसके पाठ को बहुत ही पवित्र कार्य और धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। महायान धर्म और दर्शन को समझने के लिए यह उत्तम ग्रन्थ है। बोधिचर्यावतार में सर्व-जन कल्याण सुभाषितों का बुद्ध वचन के रूप में उदात्त भाव में समावेश है किया गया है।
;शिक्षासमुच्चय
इसमें २७ कारिकाओं के द्वारा महायान शाखा की धार्मिक चर्चा का स्वरूप सूत्र रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके उपरांत उन सूत्रों को प्रमाणित एवं समर्थन प्रदान करने के लिए उनके चारों ओर महायान सूत्रों के उद्धहरणों से उन्हें सजाया गया है।
== सुभाषित ==
* ''न हि किञ्चिदपूर्वमत्र वाच्यं न च संग्रथनकौशलं ममास्ति।
: ''अत एव न मे परार्थचिन्ता स्वमनो वासयितुं कृतं मयेदम्॥
: यहाँ मैं कुछ भी ऐसा नहीं कहूँगा जिसको पहले नहीं कहा गया है और जिसमें मेरा संग्रथनकौशल नहीं है।
: इसलिये यह ग्रन्थ में किसी दूसरे के लिये नहीं लिखा है बल्कि अपने मन को वास देने के लिये इसकी रचना की है।
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अनुनाद सिंह
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/* सुभाषित */
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text/x-wiki
'''आचार्य शान्तिदेव''' (जीवनकाल : सम्भवतया ७वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के दार्शनिक थे। उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों में महायान के अन्य प्रत्ययों के साथ-साथ शून्यता का प्रतिपादन किया। बताया जाता है कि शान्तिदेव ने आचार्य जयदेव से प्रवज्या ग्रहण की थी। उस समय वे नालंदा महाविहार के पीठ स्थविर धर्मपाल के उत्तराधिकारी थे। प्रव्रज्या ग्रहण करने बाद आचार्य शान्तिदेव ने नालन्दा महाविहार में रह कर ही अध्ययन किया और वहीं पर रहकर अध्यापन भी किया (डॉ धर्मकीर्ति : महान बौद्ध दार्शनिक पृष्ठ 391)।
आचार्य शान्तिदेव संभवतया 7 वी सदी में हुए थे । तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ (एम विंटरनिट्ज : ए हिस्टरी ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, भाग-२, पृष्ठ 65-366) के अनुसार ये गुजरात के किसी राजा के पुत्र थे और कुछ समय तक ये राजा पञ्चसिंह के राज्य में मंत्री रहे थे। किन्तु उन्हें दुनियादारी और झंझट पसंद नहीं आए और इसलिए वे गृह त्याग कर भिक्खु हो गए थे (भूमिका : बोधिचर्यावतार : अनुवादक शांति भिक्षु शास्त्री )।
आचार्य शान्तिदेव के तीन ग्रन्थ बतलाएं जाते हैं- १) शिक्षा समुच्चय २) बोधिचार्यवातर ३) सूत्र समुच्चय।
सूत्रसमुच्चय, वर्तमान में अनुपलब्ध है। शिक्षा समुच्चय और बोधिचर्यावतार का विषय एक ही है। भेद केवल निरूपण और व्याख्या शैली का है। बिना काव्य का प्रयत्न किए ही आचार्य ने उसे धर्म का काव्य बना दिया। दूसरे, बोधिचर्यावतार और शिक्षासमुच्चय दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बोधिचर्यावतार में शून्यवाद का प्रतिपादन किया गया है जबकि शिक्षा समुच्चय में उसका नाम कीर्तन मात्र है। शिक्षा समुच्चय सूत्रों के उध्दरणोँ से विपुल ग्रंथ हो गया है जबकि बोधिचर्यावतार में सूत्रों का यत्र-तत्र संकेत ही है।
;बोधिचर्यावतार
यह किसी समय बहुत ही लोकप्रिय ग्रन्थ था। इस कारण इस पर अनेकों विद्वानों ने इस पर टिकाएं लिखी थी। भोट देश (तिब्बत) में इस ग्रन्थ का पाठ आज भी होता है। इसके पाठ को बहुत ही पवित्र कार्य और धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। महायान धर्म और दर्शन को समझने के लिए यह उत्तम ग्रन्थ है। बोधिचर्यावतार में सर्व-जन कल्याण सुभाषितों का बुद्ध वचन के रूप में उदात्त भाव में समावेश है किया गया है।
;शिक्षासमुच्चय
इसमें २७ कारिकाओं के द्वारा महायान शाखा की धार्मिक चर्चा का स्वरूप सूत्र रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके उपरांत उन सूत्रों को प्रमाणित एवं समर्थन प्रदान करने के लिए उनके चारों ओर महायान सूत्रों के उद्धहरणों से उन्हें सजाया गया है।
== सुभाषित ==
* ''न हि किञ्चिदपूर्वमत्र वाच्यं न च संग्रथनकौशलं ममास्ति।
: ''अत एव न मे परार्थचिन्ता स्वमनो वासयितुं कृतं मयेदम्॥
: यहाँ मैं कुछ भी ऐसा नहीं कहूँगा जिसको पहले नहीं कहा गया है और जिसमें मेरा संग्रथनकौशल नहीं है।
: इसलिये यह ग्रन्थ में किसी दूसरे के लिये नहीं लिखा है बल्कि अपने मन को वास देने के लिये इसकी रचना की है।<ref>[https://bodhicitta.tsadra.org/index.php/Texts/Bodhicary%C4%81vat%C4%81ra/Verses/1.2 बोधिचित्त]</ref>
* ''ये केचिद् दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
: ''ये केचित् सुखिता लोके सर्वे ते ऽन्यसुखेच्छया॥'' --बोधिचर्यावतार
: जगत में जो लोग दुखी हैं उसका कारण उनकी अपनी सुख की इच्छा है और जो लोग सुखी हैं उसका कारण उनकी दूसरों के सुखी होने की इच्छा करने के कारण है। अर्थात् जो स्वार्थी हैं वह दुःखी हैं और जो परार्थी है वह सुखी हैं।
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अनुनाद सिंह
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text/x-wiki
'''आचार्य शान्तिदेव''' (जीवनकाल : सम्भवतया ७वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म की महायान शाखा के दार्शनिक थे। उन्होंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों में महायान के अन्य प्रत्ययों के साथ-साथ शून्यता का प्रतिपादन किया। बताया जाता है कि शान्तिदेव ने आचार्य जयदेव से प्रवज्या ग्रहण की थी। उस समय वे नालंदा महाविहार के पीठ स्थविर धर्मपाल के उत्तराधिकारी थे। प्रव्रज्या ग्रहण करने बाद आचार्य शान्तिदेव ने नालन्दा महाविहार में रह कर ही अध्ययन किया और वहीं पर रहकर अध्यापन भी किया (डॉ धर्मकीर्ति : महान बौद्ध दार्शनिक पृष्ठ 391)।
आचार्य शान्तिदेव संभवतया 7 वी सदी में हुए थे । तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ (एम विंटरनिट्ज : ए हिस्टरी ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, भाग-२, पृष्ठ 65-366) के अनुसार ये गुजरात के किसी राजा के पुत्र थे और कुछ समय तक ये राजा पञ्चसिंह के राज्य में मंत्री रहे थे। किन्तु उन्हें दुनियादारी और झंझट पसंद नहीं आए और इसलिए वे गृह त्याग कर भिक्खु हो गए थे (भूमिका : बोधिचर्यावतार : अनुवादक शांति भिक्षु शास्त्री )।
आचार्य शान्तिदेव के तीन ग्रन्थ बतलाएं जाते हैं- १) शिक्षा समुच्चय २) बोधिचार्यवातर ३) सूत्र समुच्चय।
सूत्रसमुच्चय, वर्तमान में अनुपलब्ध है। शिक्षा समुच्चय और बोधिचर्यावतार का विषय एक ही है। भेद केवल निरूपण और व्याख्या शैली का है। बिना काव्य का प्रयत्न किए ही आचार्य ने उसे धर्म का काव्य बना दिया। दूसरे, बोधिचर्यावतार और शिक्षासमुच्चय दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बोधिचर्यावतार में शून्यवाद का प्रतिपादन किया गया है जबकि शिक्षा समुच्चय में उसका नाम कीर्तन मात्र है। शिक्षा समुच्चय सूत्रों के उध्दरणोँ से विपुल ग्रंथ हो गया है जबकि बोधिचर्यावतार में सूत्रों का यत्र-तत्र संकेत ही है।
;बोधिचर्यावतार
यह किसी समय बहुत ही लोकप्रिय ग्रन्थ था। इस कारण इस पर अनेकों विद्वानों ने इस पर टिकाएं लिखी थी। भोट देश (तिब्बत) में इस ग्रन्थ का पाठ आज भी होता है। इसके पाठ को बहुत ही पवित्र कार्य और धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। महायान धर्म और दर्शन को समझने के लिए यह उत्तम ग्रन्थ है। बोधिचर्यावतार में सर्व-जन कल्याण सुभाषितों का बुद्ध वचन के रूप में उदात्त भाव में समावेश है किया गया है।
;शिक्षासमुच्चय
इसमें २७ कारिकाओं के द्वारा महायान शाखा की धार्मिक चर्चा का स्वरूप सूत्र रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके उपरांत उन सूत्रों को प्रमाणित एवं समर्थन प्रदान करने के लिए उनके चारों ओर महायान सूत्रों के उद्धहरणों से उन्हें सजाया गया है।
== सुभाषित ==
* ''न हि किञ्चिदपूर्वमत्र वाच्यं न च संग्रथनकौशलं ममास्ति।
: ''अत एव न मे परार्थचिन्ता स्वमनो वासयितुं कृतं मयेदम्॥
: यहाँ मैं कुछ भी ऐसा नहीं कहूँगा जिसको पहले नहीं कहा गया है और जिसमें मेरा संग्रथनकौशल नहीं है।
: इसलिये यह ग्रन्थ में किसी दूसरे के लिये नहीं लिखा है बल्कि अपने मन को वास देने के लिये इसकी रचना की है।<ref>[https://bodhicitta.tsadra.org/index.php/Texts/Bodhicary%C4%81vat%C4%81ra/Verses/1.2 बोधिचित्त]</ref>
* ''ये केचिद् दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया।
: ''ये केचित् सुखिता लोके सर्वे ते ऽन्यसुखेच्छया॥'' --बोधिचर्यावतार
: जगत में जो लोग दुखी हैं उसका कारण उनकी अपनी सुख की इच्छा है और जो लोग सुखी हैं उसका कारण उनकी दूसरों के सुखी होने की इच्छा करने के कारण है। अर्थात् जो स्वार्थी हैं वह दुःखी हैं और जो परार्थी है वह सुखी हैं।
==सन्दर्भ==
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