विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.6 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/४२१ 250 2685 662739 573445 2026-06-10T10:24:30Z Vanshiikaa 6602 /* समस्याकारक */ proofread 662739 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="2" user="Vanshiikaa" /></noinclude>________________ <noinclude>{{rh|४१६||स्लोवेनीज़}}</noinclude>लेण्ड, हंगरी और जर्मनी के समाजवादी मजदूर दल सोशल डेमोक्रेटन कहलाते हैं । जर्मनी मे, नात्सीवाद के उदय के समय से, यह दल गैर-कानूनी करार दे दिया गया है। स्कोदा कारखाना-वद बोहेमिया मे, pil पिल्सेन नामक स्थान पर. अन्नशस्त्र बनाने और लोहे की ढलाई करने वाले बटे कारलानो का विशाल समूह है । युद्ध का सामान बनाने वाले यह ससार के बडे कारखानों में से है। लडाई से पूर्व इसमे २२,००० मजदूर काम करते थे। फ्रान्सीसी कम्पनी-ममूह श्नीदर-क्रूसत का यह कारनाना चैकोल्लोवाकिया पर जर्मन-याविपत्य स्थापित होने के बाद जर्मनी के अधिकार में चला गया है ।। स्लोवाक-यह जाति स्लाव कौम के अन्तर्गत है, जो चैक-जाति ते बहुत मिलती-जुलती है । स्लोवाक लोग सदियों तक हगरी के तावे रहे और पिछले युद्ध के फलस्वरूप, १६१८ मे, चेकोस्लोवाकिया के निर्माण के समय, इन का उद्वार हुा । २० साल तक स्लोवाक चैको के साथ एक राज्य में रहते रहे, किन्तु उसके बाद वह अपनी राजनीतिक स्वाधीनता अलग मॉगने लगे, जो म्युनिख समझौते के अनुसार, अक्टूबर १६३८ मे, चेकोस्लोवाकिया का पुनसंगठन होते समय, उनको मिल गई और नात्सी-ढंग की डिक्टेटरशाही वहाँ कायम हुई। १० मार्च १६३६ को स्लोवाक राजधानी, बातीस्लावा, मे जमनी के नास्तियों ने विद्रोह करा दिया और स्लोवाक पूर्ण-स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी गई, तब से स्लोवाकिया में, जर्मन-संरक्षण मे, एक कठपुतली सरकार कायम है । जर्मन फौजे वहाँ काबिज हैं और स्लोवाक लोगो को, जर्मनी के पक्ष में, पोलेण्ड और रूस से लडना पडा है । प्रवासी स्लोवाक चैको से मिलकर मित्रराष्ट्रो की सहायता कर रहे हैं और वह लन्दन-प्रवासी डाक्टर बेनेश की अस्थायी चेकोस्लोवाकी सरकार के सचालन में भाग ले रहे हैं। स्लोवेनीज-दक्षिणी स्लाव जन-समूह जो आल्प्स पर्वत के दक्षिण-पूर्व भाग मे बसा हुआ है, इनकी संख्या दस लाख, रोमन कैथलिक ईसाई । सदियों तक यह जाति आस्ट्रिया के अधीन रही है। पिछले महायुद्ध के बाद यह लोग यूगोस्लावी राज्य के अन्तर्गत सर्बिया, क्रोशिया तथा अन्य दक्षिणी स्लाव देशों के साथ मिला दिये गये और इनके प्रदेश का नाम स्लोवेनिया रख<noinclude></noinclude> g6r5cc34uja6y1yvk7urewl59jj1x3w 662740 662739 2026-06-10T10:47:35Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662740 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude>________________ <noinclude>{{rh|४१६||स्लोवेनीज़}}</noinclude>लेण्ड, हंगरी और जर्मनी के समाजवादी मजदूर दल सोशल डेमोक्रेटन कहलाते हैं । जर्मनी मे, 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पूर्ण-स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी गई, तब से स्लोवाकिया में, जर्मन-संरक्षण मे, एक कठपुतली सरकार कायम है । जर्मन फौजे वहाँ काबिज हैं और स्लोवाक लोगो को, जर्मनी के पक्ष में, पोलेण्ड और रूस से लडना पडा है । प्रवासी स्लोवाक चैको से मिलकर मित्रराष्ट्रो की सहायता कर रहे हैं और वह लन्दन-प्रवासी डाक्टर बेनेश की अस्थायी चेकोस्लोवाकी सरकार के सचालन में भाग ले रहे हैं। स्लोवेनीज-दक्षिणी स्लाव जन-समूह जो आल्प्स पर्वत के दक्षिण-पूर्व भाग मे बसा हुआ है, इनकी संख्या दस लाख, रोमन कैथलिक ईसाई । सदियों तक यह जाति आस्ट्रिया के अधीन रही है। पिछले महायुद्ध के बाद यह लोग यूगोस्लावी राज्य के अन्तर्गत सर्बिया, क्रोशिया तथा अन्य दक्षिणी स्लाव देशों के साथ मिला दिये गये और इनके प्रदेश का नाम स्लोवेनिया रख<noinclude></noinclude> mnbait8dl0lcas3v7onzupg03f14pl5 662741 662740 2026-06-10T11:00:38Z Vanshiikaa 6602 662741 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude>________________ <noinclude>{{rh|४१६||स्लोवेनीज़}}</noinclude>लेण्ड, हंगरी और जर्मनी के समाजवादी मजदूर दल 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नास्तियों ने विद्रोह करा दिया और स्लोवाक पूर्ण-स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी गई, तब से स्लोवाकिया में, जर्मन-संरक्षण मे, एक कठपुतली सरकार कायम है । जर्मन फौजे वहाँ काबिज हैं और स्लोवाक लोगो को, जर्मनी के पक्ष में, पोलेण्ड और रूस से लडना पडा है । प्रवासी स्लोवाक चैको से मिलकर मित्रराष्ट्रो की सहायता कर रहे हैं और वह लन्दन-प्रवासी डाक्टर बेनेश की अस्थायी चेकोस्लोवाकी सरकार के सचालन में भाग ले रहे हैं। स्लोवेनीज-दक्षिणी स्लाव जन-समूह जो आल्प्स पर्वत के दक्षिण-पूर्व भाग मे बसा हुआ है, इनकी संख्या दस लाख, रोमन कैथलिक ईसाई । सदियों तक यह जाति आस्ट्रिया के अधीन रही है। पिछले महायुद्ध के बाद यह लोग यूगोस्लावी राज्य के अन्तर्गत सर्बिया, क्रोशिया तथा अन्य दक्षिणी स्लाव देशों के साथ मिला दिये गये और इनके प्रदेश का नाम स्लोवेनिया रख<noinclude></noinclude> e9negpd6ztn0tj2eglhwbkk04gfwmv1 पृष्ठ:सूरसागर.djvu/१६४ 250 28653 662734 574690 2026-06-09T14:18:03Z Krupal (OKI) 6598 662734 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||नवमस्कन्ध-९|(७१)}}</noinclude> रघुवीर ॥ १४ ॥ अयोध्या बाजत आज बधाई । गर्भ मुच्यो कौशल्या माता रामचन्द्र निधि आई ॥ गावैं सखी परस्पर मंगल ऋषि अभिषेक कराई । भीर भई दशरथके आंगन साम वेद ध्वनि गाई ॥ पूछत ऋषिहि अयोध्याको पति कहि हो जन्म गुसाईं । बुद्धवार नौमी तिथि नीकी चौदह भुवन बड़ाई ॥ चारि पुत्र दशरथ के उपजे तिहूँलोक ठकुराई । सदा सर्वदा राज राम को सूरदादि तहां पाई ॥ १५ ॥ रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर । देश देश ते टीका आयो रतन कनक मनि हीर ॥ घर घर मंगल होत बधाई अति पुरवासिन भीर । आनंद मगन भये सब डोलत कछू न शोध शरीर ॥ मागध बंदी सूत लुटाए गज गयंद हय चीर । देत अशीश सूर चिरजीयो रामचन्द्र रणधीर ॥ १६॥ शर क्रीडा वर्णन । राग विहावल ॥ करतल सोभितः बान धनुहियां । खेलत फिरत कनक मय आंगन पहिरे लाल पनाहियां ॥ दशरथ कौशल्या के आगे लसत सुमन की छहियां । मानो चारि हंस सरवर ते बैठे आइ सदहियां ॥ रघुकुल कुमुद चंद चिंतामणि प्रगटे भूतल महिया । यहै देन आए रघुकुल को आनंद निधि सब गहियां ॥ ये सुख तीनि लोकमें नाहीं जो पाए प्रभु पहियां । सूरदास हरि बोलि भगतको निरवाहतदै बहियां ॥१७॥ राग विहावल॥ धनुही बान लये कर डोलत । चारोबीर संग इक सोहत बचन मनोहर बोलत लछिमन भरत शत्रुघन सुंदर राजिवलोचन राम । अति सुकुमार परम पुरुषारथ मुक्ति धर्म धन काम॥ कटि पट पीत पिछौरी बांधे काग पच्छ शिप शीश । शर क्रीड़ा दिन देखत आवत नारद- सुर तैंतीस ॥ शिवमन शोच इन्द्रमन आनंद सुख दुख ब्रह्म समान ॥ दिति दुर्बल अति अदिति हृष्ट चित देखि सूर संधान ॥ १८ ॥ विश्वामित्र यज्ञ रक्षा ताडका वध सीतास्वयंवर । वन । ॥ राग सारंग ॥ दशरथसों ऋषि आनि कह्यो । असुरन सों यज्ञ होन न पावत राम लछन तब संग दयो ॥ मारि ताड़का यज्ञ करायो विश्वामित्र आनंद भयो । सीय स्वयंवर जानि सूर प्रभुको ऋषिलै ता ठौर गयो ॥ १९ ॥ सीतापति दर्शन ॥ राग विहावल॥ देखनको मंदिर आनि चढ़ी । रघुपति पूरनचंद विलोकत मानो उदधि तरंग बढ़ी ॥ पिय दरशन प्यासी अति आतुर निशिवासर गुन आन रढ़ी । तजिं कुलकानि पीय मुख निरखत शीशनाइ आशीश पढ़ी ॥भई देह जों खेह करम- वश ज्यों तट गंगा अनलदढ़ी । सूरदास प्रभु दृष्टिं सुधानिधि मानो फेरिं बनाइ गढ़ी ॥ २० ॥ सीता मनोरथ पूरण ॥ राग सारंग ॥ चितै रघुनाथ बदनकी ओर । रघुपतिसों अब नेम हमारो विधि सों करति निहोर ॥ यह अति दुसह पिनाक पिताप्रण राघव वयस किशोर । इहते दीरघ धनुष चढ़ै क्यों यह सखि संशयमोर ॥ सिय अंदेश जानि सूरज प्रभु लियो करजकी कोर । टूटत धनु नृप लुके जहां तहां ज्यों तारागण भोर ॥ २१ ॥ दशरथ को जनकपुर आगमन रामजूके विवाहहेतु ॥ महाराज दशरथ तहँ आये । ठाढे जाय जनक मंदिरमें मोतिन चौक पुराये ॥ विप्र लगे ध्वनि वेद उचारन युवतिन मंगल गाये । सुर गंधर्वगन कोटिक आए गगन विमानन छाये ॥ राम लक्ष्मण भरत शत्रुघन ब्याह निरखि सुखपाये । सूर भयो आनंद नृपतिमन दिवि दुंदुभी बजाए ॥ २२ ॥ कंगना छोडन ॥ राग आसावरी ॥ कर कंपै कंगन नहिं छूटै । राम सुपरस मगन भय कौतुक निरखि सखी सुख लूटै ॥ गावत नारि गारि सब दैदै तात भ्रात की कौन चलावै । तब कर डोर छुटै रघुपति जूं जो कौशल्या माइ बुलावै ॥ पुंगीफल युत जल निर्मल धरि आनी भरि कुंडी जु कनककी । खेलत जूप युगल युवतिनमें हारे रघुपति जीति जनककी ॥ घेरे निशान अजिर गृह मंगल विप्रवेद अभिषेक करायो । सूर अमित आनं दकुशलपुर सोई शुकदेव पुराणनि गायो॥२३॥<noinclude></noinclude> 4anar2g4jf7d6wlq6xouoeurf3smj94 662735 662734 2026-06-09T14:21:43Z Krupal (OKI) 6598 /* शोधित */ 662735 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Krupal (OKI)" />{{rh||नवमस्कन्ध-९|(७१)}} 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6598 /* शोधित */ 662736 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Krupal (OKI)" /></noinclude>प्राचीन भाषाए १३ की भाषा भी मानते हैं । किंतु प्राचीन ग्रंथों में पिशाच के नाम से कई देश गिनाए गए हैं---- <br> <poem>पाण्ड्य केनाहूलीक सिंहनेपालकुन्तलाः । सुदेष्ण-वोट- गन्धार - हैव कन्नौजनास्तथा । एते पिशाचादेशाः स्युस्तद्दश्यस्तद्गुणेो भवेत् ॥</poem> इसमें कई नाम ऐसे भी हैं जिनकी पहचान अब तक नहीं हो सकी । मार्कंडेय ने अपने व्याकरण 'प्राकृतसर्वस्व' में पैशाची के जो नियम लिखे हैं, उनमें से एक है--' पञ्चस्वाधा वितरयेाः' । इसका अर्थ यह है- पांचों वर्गों में तृतीय और चतुर्थ वर्णों के स्थान में प्रथम और द्वितीय वर्ण होते हैं। इसकी प्रवृत्ति पंजाबी भाषा में देख पड़ती है । उसमें साधारणतः लोग भाई का पाई, अध्यापक का हत्तापक, घर का कर, धन्य का तन्न या इससे कुछ मिलता जुलता उच्चारण करते हैं। उसमें एक और नियम "युक्त विकर्पो बहुलम्” (संयुक्त वर्णों का विश्लेषण ) भी देस पड़ता है । कसर, सनान, परस, पतनी श्रादि उदाहरण पंजाबी में दुर्लभ नहीं । इससे जान पड़ता है कि चाहे पैशाची पंजाब की भाषा न भी रही हो, पर उसका प्रभाव श्रवश्य पंजाबी पर पड़ा है। राजशेखर ने, जो विक्रम संवत् की दसवीं शताब्दी के मध्य भाग था, अपनी काव्यमीमांसा में एक पुराना श्लोक उद्धृत किया है जिसमें उस समय की भाषाओं का स्थल-निर्देश है— गौड़ ( बंगाल ) श्रादि संस्कृत में स्थित हैं, लाट (गुजरात) देशियों की रुचि प्राकृत में परि मित है, मरुभूमि, टक्क ( टांक, दक्षिण पश्चिमी पंजाब) और भादानक (संभवतः यह राजपूताना का कोई प्रांत था ) के वासी भूत भाषा की सेवा करते हैं, जो कवि मध्यदेश ( कन्नौज, अंतर्वेद, पंचाल श्रादि ) में रहता है, वह सर्व भाषाओं में स्थित है। इससे उस समय किस भाषा का कहाँ अधिक प्रचार था, इसका पता चल जाता है। मार्कडेय और <br> रामशर्मा ने अपने व्याकरणों में इस भाषा का विशेष रूप से उल्लेख किया है। डाक्टर ग्रियर्सन ने अपने एक लेख में रामशर्मा के प्राकृत कल्पतरु के उस श्रंश का विशेष रूप से वर्णन किया है, जिसमें पैशाची भाषा का विवरण है। उस लेख में बतलाया गया है कि रामशर्मा के अनुसार पैशाची या पैशाचिका भाषा के दो मुख्य भेद हैं-- एक शुद्ध और दूसरा संकीर्ण । पहली तो शुद्ध पैशाची, जैसा कि उसके नाम से ही प्रकट होता है, और दूसरी मिश्र पैशाची है। पहली के सात और दूसरी के चार उपभेद गिनाए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-<br> (१) कैकेय पैशाचिका,<noinclude></noinclude> ittptbopckj1h63ltol7mwgf7zdk7wx 662737 662736 2026-06-10T08:53:45Z Krupal (OKI) 6598 662737 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Krupal (OKI)" />प्राचीन भाषाए १३</noinclude> की भाषा भी मानते हैं । किंतु प्राचीन ग्रंथों में पिशाच के नाम से कई देश गिनाए गए हैं---- <br> <poem>पाण्ड्य केनाहूलीक सिंहनेपालकुन्तलाः । सुदेष्ण-वोट- गन्धार - हैव कन्नौजनास्तथा । एते पिशाचादेशाः स्युस्तद्दश्यस्तद्गुणेो भवेत् ॥</poem> {{gap}}इसमें कई नाम ऐसे भी हैं जिनकी पहचान अब तक नहीं हो सकी । मार्कंडेय ने अपने व्याकरण 'प्राकृतसर्वस्व' में पैशाची के जो नियम लिखे हैं, उनमें से एक है--' पञ्चस्वाधा वितरयेाः' । इसका अर्थ यह है- पांचों वर्गों में तृतीय और चतुर्थ वर्णों के स्थान में प्रथम और द्वितीय वर्ण होते हैं। इसकी प्रवृत्ति पंजाबी भाषा में देख पड़ती है । उसमें साधारणतः लोग भाई का पाई, अध्यापक का हत्तापक, घर का कर, धन्य का तन्न या इससे कुछ मिलता जुलता उच्चारण करते हैं। उसमें एक और नियम "युक्त विकर्पो बहुलम्” (संयुक्त वर्णों का विश्लेषण ) भी देस पड़ता है । कसर, सनान, परस, पतनी श्रादि उदाहरण पंजाबी में दुर्लभ नहीं । इससे जान पड़ता है कि चाहे पैशाची पंजाब की भाषा न भी रही हो, पर उसका प्रभाव श्रवश्य पंजाबी पर पड़ा है। राजशेखर ने, जो विक्रम संवत् की दसवीं शताब्दी के मध्य भाग था, अपनी काव्यमीमांसा में एक पुराना श्लोक उद्धृत किया है जिसमें उस समय की भाषाओं का स्थल-निर्देश है— गौड़ ( बंगाल ) श्रादि संस्कृत में स्थित हैं, लाट (गुजरात) देशियों की रुचि प्राकृत में परि मित है, मरुभूमि, टक्क ( टांक, दक्षिण पश्चिमी पंजाब) और भादानक (संभवतः यह राजपूताना का कोई प्रांत था ) के वासी भूत भाषा की सेवा करते हैं, जो कवि मध्यदेश ( कन्नौज, अंतर्वेद, पंचाल श्रादि ) में रहता है, वह सर्व भाषाओं में स्थित है। इससे उस समय किस भाषा का कहाँ अधिक प्रचार था, इसका पता चल जाता है। मार्कडेय और <br> {{gap}}रामशर्मा ने अपने व्याकरणों में इस भाषा का विशेष रूप से उल्लेख किया है। डाक्टर ग्रियर्सन ने अपने एक लेख में रामशर्मा के प्राकृत कल्पतरु के उस श्रंश का विशेष रूप से वर्णन किया है, जिसमें पैशाची भाषा का विवरण है। उस लेख में बतलाया गया है कि रामशर्मा के अनुसार पैशाची या पैशाचिका भाषा के दो मुख्य भेद हैं-- एक शुद्ध और दूसरा संकीर्ण । पहली तो शुद्ध पैशाची, जैसा कि उसके नाम से ही प्रकट होता है, और दूसरी मिश्र पैशाची है। पहली के सात और दूसरी के चार उपभेद गिनाए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-<br> {{gap}}{{gap}}(१) कैकेय पैशाचिका,<noinclude></noinclude> ppan83rstuzeqsscskmz8mhml3dtncl पृष्ठ:हिंदी भाषा.djvu/१५० 250 54728 662738 608509 2026-06-10T09:05:11Z Krupal (OKI) 6598 /* शोधित */ 662738 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Krupal (OKI)" /></noinclude>{{center|'''पहला अध्याय'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} {{sidenote|left|साहित्य की मूल<br />मनोवृत्तियाँ}}मनुष्य मात्र की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वह अपने भावों तथा विचारों को दूसरों पर प्रकट करे और स्वयं बड़ी उत्सुकता से दूसरे के भावों और विचारों को सुने और समझे। वह अपनी कल्पना की सहायता से ईश्वर, जीव तथा जगत् के विविध विषयों के संबंध में कितनी ही बातें सोचता है तथा वाणी के द्वारा उन्हें व्यक्त करने की चेष्टा करता है। वाणी का वरदान उसे चिर काल से प्राप्त है और उसका उपयोग भी वह चिरकाल से करता आ रहा है। प्रेम, दया, करुणा, द्वेष, घृणा तथा क्रोध आदि मानसिक वृत्तियों का अभिव्यंजन तो मानव समाज अत्यंत प्राचीन काल से करता ही है, साथ ही प्रकृति के नाना रूपों से उद्भूत अपने मनोविकारों तथा जीवन की अन्यान्य परिस्थितियों के संबंध में अपने अनुभवों को व्यक्त करने में भी उसे एक प्रकार का संतोष, तृप्ति अथवा आनंद प्राप्त होता है। यह सत्य है कि सब मनुष्यों में न तो अभिव्यंजन की शक्ति एक-सी होती है और न सब मनुष्यों के अनुभवों की मात्रा तथा विचारों की गंभीरता ही एक-सी होती है, परंतु साधारणतः यह प्रवृत्ति प्रत्येक मनुष्य में पाई जाती है। मनुष्य की इसी प्रवृत्ति की प्रेरणा से ज्ञान और शक्ति के उस भांडार का सृजन, संचय और संवर्द्धन होता है जिसे हम साहित्य कहते हैं। साहित्य के मूल में स्थित इन मनोवृत्तियों के अतिरिक्त एक दूसरी प्रवृत्ति भी है जो सभ्य मानव-समाज में सर्वत्र पाई जाती है और जिससे साहित्य में एक अलौकिक चमत्कार तथा मनोहारिता आ जाती है। इसे हम सौंदर्य-प्रियता की भावना कह सकते हैं। सौंदर्य-प्रियता की ही सहायता से मनुष्य अपने उद्गारों में "रस" भर देता है जिससे एक प्रकार के अलौकिक और अनिर्वचनीय आनंद की उपलब्धि होती है और जिसे साहित्यकारों ने "ब्रह्मानंद-सहोदर" की उपाधि दी है। सौंदर्य-प्रियता की भावना ही शुद्ध साहित्य को एक ओर तो जटिल और नीरस दार्शनिक तत्त्वों से अलग करती तथा दूसरी ओर उसे मानव मात्र के<noinclude></noinclude> 6pv86ec5ueslnmnmpqbsc61to8z0986