विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.7 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२५ 250 12682 663596 591300 2026-06-21T19:58:07Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663596 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(५)|}}</noinclude> जान पड़ता है कि 'पद्मावत' की कथा को लेकर थोड़े से पद्य जायसी ने रचे थे। उसके पीछे वे जायस छोड़कर बहुत दिनों तक इधर उधर रहे। अंत में जब वे जायस में पाकर रहने लगे तब उन्होंने इस ग्रंथ को उठाया और पूरा किया। इस बात का संकेत इन पंक्तियों में पाया जाता है-- {{c|जायस नगर धरम अस्थान्। तहाँ पाइ कवि कीन्ह बखानू।।}} 'तहाँ आइ' से पं० सुधाकर और डाक्टर ग्रियर्सन ने यह अनुमान किया था कि मलिक मुहम्मद किसी और जगह से पाकर जायस में बसे थे। पर यह ठोक नहीं। जायसवाले ऐसा नहीं कहते। उनके कथनानुसार मलिक मुहम्मद जायस ही के रहनेवाले थे। उनके घर का स्थान अब तक लोग वहाँ के कंवाने मुहल्ले में बताते हैं। 'पद्मावत' में कवि ने अपने चार दोस्तों के नाम लिए हैं--यूशुफ़ मलिक, सालार कादिम, सलोने मियाँ और बड़े शेख। ये चारों जायस हो के थे। सलोने मियाँ के संबंध में अब तक जायस में यह जनश्रुति चलो आती है कि वे बड़े बलवान थे और एक बार हाथी से लड़ गए थे। इन चारों में से दो एक के खानदान अब तक हैं। जायसी का वंश नहीं चला, पर उनके भाई के खानदान में एक साहब मौजद हैं जिनके पास वंशवृक्ष भी है। यह वंशवृक्ष कुछ गड़बड़ सा है। जायसी कुरूप और काने थे। कुछ लोगों के अनुसार वे जन्म से ही ऐसे थे पर अधिकतर लोगों का कहना है कि शीतल या अर्धांग रोग से उनका शरीर विकृत हो गया था। अपने काने होने का उल्लेख, कवि ने आप ही इस प्रकार किया है-- 'एकनयन कवि मुहमद गुनो'। उनको दाहिनी आँख फूटी थी या बाईं, इसका उत्तर शायद इस दोहे से मिले-- {{c|मुहमद बाई दिसि तजा, एक सरवन एक आँखि।}} इससे अनुमान होता है कि बाएँ कान से भी उन्हें कम सुनाई पड़ता था। जायस में प्रसिद्ध है कि वे एक बार शेरशाह के दरबार में गए। शेरशाह उनके भद्दे चेहरे को देख हँस पड़ा। उन्होंने अत्यंत शांत भाव से पूछा--'मोहि हससि, कि कोहरहि?' अर्थात् तू मुझपर हँसा या उस कुम्हार (गढ़नेवाले ईश्वर) पर? इसपर शेरशाह ने लज्जित होकर क्षमा माँगी। कुछ लोग कहते हैं कि वे शेरशाह के दरबार में नहीं गए थे; शेरशाह ही उनका नाम सुनकर उनके पास आया था। मलिक मुहम्मद एक गृहस्थ किसान के रूप में ही जायस में रहते थे। वे प्रारंभ से बड़े ईश्वरभक्त और साधु प्रकृति के थे। उनका नियम था कि जब वे अपने खेतों में होते तब अपना खाना वहीं मँगा लिया करते थे। खाना वे अकेले कभी न खाते; जो आसपास दिखाई पड़ता उसके साथ बैठकर खाते थे। एक दिन उन्हें इधर उधर कोई न दिखाई पड़ा। बहुत देर तक आसरा देखते देखते अंत में एक कोढ़ी दिखाई पड़ा। जायसो ने बड़े आग्रह से उसे अपने साथ खाने का बिठाया और एक ही बरतन में उसके साथ भोजन करने लगे। उसके शरीर में कोड़ चू रहा था। कुछ थोड़ा सा मवाद भोजन में भी चू पड़ा। जायसी ने उस अंश को खाने के लिये उठाया पर उस कोड़ो ने हाय थान लिया और कहा, 'इसे मैं खाऊँगा, आप साफ हिस्सा खाइए' पर जायसी झट से उसे खा गए। इसके पोछे वह कोड़ी अदृश्य<noinclude></noinclude> t28vb3ergfbc1zh3z73gmpze34g5rxu पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२६ 250 12693 663601 591311 2026-06-21T20:05:39Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663601 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(६)|}}</noinclude> हो गया। इस घटना के उपरांत जायसी की मनोवृत्ति ईश्वर की ओर और भी अधिक हो गई। उक्त घटना की ओर संकेत लोग अखरावट के इस दोहे में बताते हैं-- {{c|बंदहि समद्र समान, यह अचरज कासौं कही।<br> जो हेरा सो हेरानद, मुहमद आपुहिं आपु महँ।।}} कहते हैं कि जायसी के पुत्र थे, पर वे मकान के नीचे दबकर, या ऐसी ही किसी और दुर्घटना से मर गए। तब से जायसी संसार से और भी अधिक विरक्त हो गए और कुछ दिनों में घरबार छोड़कर इधर उधर फकीर हो कर घूमने लगे। वे अपने समय के एक सिद्ध फकीर माने जाते थे और चारों ओर उनका बड़ा मान था। अमेठी के राजा रामसिंह उनपर बड़ी श्रद्धा रखते थे। जीवन के अंतिम दिना में जायसी अमेठी से कुछ दूर एक घने जंगल में रहा करते थे। कहते हैं कि उनका मृत्यु विचित्र ढंग से हुई। जब उनका अंतिम समय निकट आया तब उन्होंने अमेठी के राजा से कह दिया कि मैं किसी शिकारी की गोली खाकर मरूँगा। इसपर अमेठी के राजा ने पास पास के जंगलों में शिकार की मनाही कर दी। जिस जंगल में जायसी रहते थे उसमें एक दिन एक शिकरी को एक बड़ा भारी बाघ दिखाई पड़ा। उसने डरकर उसपर गोली छोड़ दी। पास जाकर देखा तो बाघ के स्थान पर जायसी मरे पड़े थे। कहते हैं कि जायसी कभी कभी योगबल से इस प्रकार के रूप धारण कर लिया करते थे। काजी नसरुद्दीन हुसैन जायसी ने, जिन्हें अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सनद मिली थी अपनी याददाश्त में मलिक मुहम्मद जायसी का मत्युकाल रज्जब हिजरी (सन् १५४२ ई०) दिया है। यह काल कहाँ तक ठीक है, नहीं कहा जा सकता। इसे ठीक मानने पर जायसी दीर्घाय नहीं ठहरते। उनका परलोकवास ४६ वर्ष से भी कम की अवस्था में सिद्ध होता है, पर जायसी ने 'पदमावत' के उपसँहार में वृद्धावस्था का जो वर्णन किया है वह स्वतः अनुभूत सा जान पड़ता है। जायसी की कब्र अमेठी के राजा के वर्तमान कोट से पौन मील के लगभग है। यह वर्तमान कोट जायसी के मरने के बहुत पीछे बना है। अमेठी के राजानों का पुराना कोट जायसी की कब्र से डेढ़ कोस की दूरी पर था। अतः यह प्रवाद कि अमेठी के राजा को जायसी की दुग्रा से पुत्र हुआ और उन्होंने अपने कोट के पास उनकी कब्र बनवाई, निराधार है। मलिक मुहम्मद, निजामुद्दीन औलिया की शिष्यपरंपरा में थे। इस परंपरा की दो शाखाएँ हुईं--एक मानिकपुर, कालपी ग्रादि की, दूसरी जायस की। पहली शाखा के पीरों की परंपरा जायसी ने बहुत दूर तक दी है। पर जायसवाली शाखा की पूरी परंपरा उन्होंने नहीं दी है। अपने पीर या दीक्षागुरु सैयद अशरफ जहाँगीर तथा उनके पुत्र पौत्रों का ही उल्लेख किया है। सूफी लोग निजामुद्दीन औलिया की मानिकपुर कालपीवाली शिष्य-परंपरा इस प्रकार बतलाते हैं<noinclude></noinclude> 1jl7qvglo40pbza4p4updpguh23o3b0 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७ 250 12704 663602 614749 2026-06-21T20:06:13Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663602 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(७)|}}</noinclude>&nbsp; {{familytree/start|align=center}} {{familytree|border=0|||||nz||||nz=निजामुद्दीन औलिया (मृत्यु सन् १३२५ ई°)}} {{familytree|border=0||||||!||||}} {{familytree|border=0|||||sr||||sr=सिराजुद्दीन}} {{familytree|border=0||||||!||||}} {{familytree|border=0|||||sa||||sa=शेख अलाउल हक}} {{familytree|border=0|||,|-|-|^|-|-|-|.|jy|jy=(जायस)}} {{familytree|border=0|sk||||||xa|sk=शेख कुतुब आलम (पंडोई के, सन् १४१५)|xa=x}} {{familytree|border=0|||!|||||||!|}} {{familytree|border=0||sh|||||xa|sh=शेख हशमुद्दीन (मानिकपुर)|xa=x}} {{familytree|border=0|||!|||||||!|}} {{familytree|border=0||srh|||||xa|srh=सैयद राजे हामिदशाह|xa=x}} {{familytree|border=0|||!|||||||!|}} {{familytree|border=0||sd||||||!|sd=शेख दानियाल}} {{familytree|border=0|||!|||||||!|}} {{familytree|border=0||sm||||||!|sm=सैयद मुहम्मद}} {{familytree|border=0|||!||||||saj|saj=सैयद अशरफ जहाँगीर}} {{familytree|border=0||sha||||||!|sha=शेख अलहदाद}} {{familytree|border=0|||!||||||shz|shz=शेख हाजी}} {{familytree|border=0||sb||||||!|sb=शेख बुरहान (कालपी)}} {{familytree|border=0|||!|||||,|-|(|}} {{familytree|border=0||smm|||shm|skm|smm=शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन)|shm=शेख मुहम्मद या मुबारक|skm=शेख कमाल}} {{familytree/end}} 'पदमावत' और 'अखरावट' दोनों में जायसी ने मानिकपुर कालपीवाली गुरुपरंपरा का उल्लेख विस्तार से किया है, इससे डाक्टर ग्रियर्सन ने शेख मोहिदी को ही उनका दीक्षा गुरु माना है। गुरुवंदना से इस बात का ठीक ठीक निश्चय नहीं होता कि वे मानिकपुर के मुहीउद्दीन के मुरीद थे अथवा जायस के सैयद अशरफ के। पदमावत में दोनों पीरों का उल्लेख इस प्रकार है— {{Block center|<poem>सैयद असरफ पीर पियारा। जेइ मोहिं पंथ दीन्ह उजियारा। गुरु मोहिदी खेवक मैं सेवा। चलै उताइल जेहि कर खेवा।</poem>}} अखरावट में इन दोनों की चर्चा इस प्रकार है— {{Block center|<poem>कही सरीअत चिस्ती पीरू। उधरी असरफ औ जहँगीरू। पा पाएउँ गुरु मोहिदी मीठा। मिला पंथ सो दरसन दीठा।</poem>}} 'आखिरी कलाम' में केवल सैयद अशरफ जहाँगीर का ही उल्लेख है। 'पीर' शब्द का प्रयोग भी जायसी ने सैयद अशरफ के नाम के पहले किया है और अपने को उनके घर का बंदा कहा है। इससे हमारा अनुमान है कि उनके दीक्षागुरु तो थे सैयद अशरफ पर पीछे से उन्होंने मुहीउद्दीन की भी सेवा करके उनसे बहुत कुछ<noinclude></noinclude> 1ml8ou5quhfazmlmfo36go0js24vas0 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२८ 250 12715 663603 591332 2026-06-21T20:06:59Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663603 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(८)|}}</noinclude> ज्ञानोपदेश और शिक्षा प्राप्त की। जायसवाले तो सैयद अशरफ के पोते मबारकशाह बोदले को उनका पीर बताते हैं, पर यह ठीक नहीं जंचता। सूफी मुसलमान फकीरों के सिवा कई संप्रदायों (जैसे, गोरखपंथी, रसायनी, वेदांती) के हिंदू साधुनों से भी उनका बहुत सत्संग रहा, जिनसे उन्होंने बहुत सी बातों की जानकारी प्राप्त की। हठयोग, वेदांत, रसायन आदि की बहुत सी बातों का सन्निवेश उनकी रचना में मिलता है। हठयोग में मानी हुई इला, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों की ही चर्चा उन्होंने नहीं की है बल्कि सुषुम्ना नाड़ी में मस्तिष्क नाभिचक्र (कुंडलिनी), हृत्कमल और दशमहार (ब्रह्मरंध्र) का भी बार बार उल्लेख किया है। योगी ब्रह्म की अनुभूति के लिये कुंडलिनी को जगाकर ब्रह्मद्वार तक पहुँचने का यत्न करता है। उसकी इस साधना में अनेक अंतराय (विघ्न) होते हैं। जायसी ने योग के इस निरूपण में अपने इसलाम की कथा का भी विचित्र मिश्रण किया है। अंतराय के स्थान पर उन्होंने शैतान को रखा है और उसे 'नारद' नाम दिया है। यही नारद दशमद्वार का पहरेदार है और काम, क्रोध आदि इसके सिपाही हैं। यही साधकों को बहकाया करता है (दे० अखरावट)। कवि ने नारद को झगड़ा लगानेवाला सुनकर ही शायद शैतान बनाया है। इसी प्रकार 'पदमावत' में रसायनियों की बहुत सी बातें आई हैं। 'जोड़ा करना' आदि उनके कुछ पारिभाषिक शब्द भी पाए जाते हैं। गोरखपंथियों की तो जायसी ने बहुत सी बातें रखी हैं। सिंहलद्वीप में पद्मिनी स्त्रियों का होना और योगियों का सिद्ध होने के लिये वहाँ जाना उन्हीं की कथाओं के अनुसार है। इन सब बातों से पता चलता है कि जायसी साधारण मुसलमान फकीरों के समान नहीं थे। वे सच्चे जिज्ञासु थे और हर एक मत के साधु महात्माओं से मिलते जुलते रहते थे और उनकी बातें सुना करते थे। सूफी तो वे थे ही। इस उदार सारग्राहिणी प्रवृत्ति के साथ ही साथ उन्हें अपने इसलाम धर्म और पैगंबर पर भी पूरी आस्था थी, यद्यपि कवीरदास के समान उन्होंने भी उदारतापूर्वक ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्गों का होना तत्वतः स्वीकार किया है। {{c|विधिना के मारग हैं तेते। सरग नखत, तन रोवाँ जेते।।}} पर इन असंख्य मार्गों के होते हुए भी मुहम्मद साहब के मार्ग पर अपनी श्रद्धा प्रकट की है। {{c|तिन्ह महँ पंथ कहौं भल गाई। जेहि दूनौं जग छाज बड़ाई॥<br> सो बड़ पंथ मुहम्मद केरा। है निरमल कैलास बसेरा॥}} जायसी बड़े भावुक भगवद्भक्त थे और अपने समय में बड़े ही सिद्ध पहुँचे हए फकीर माने जाते थे, पर कबीरदास के समान 'अपना एक 'निराला पंथ' निकालने का हौसला उन्होंने कभी न किया। जिस मिल्लत या समाज में उनका जन्म हया उसके प्रति अपने विशेष कर्तव्यों के पालन के साथ साथ वे सामान्य मनुष्यधर्म के सच्चे अनयायी थे। सच्चे भक्त का प्रधान गुण देन्य उनमें पूरा पूरा था। कबीरदास के समान उन्होंने अपने को सबसे अधिक पहुँचा हुआ कहीं नहीं कहा है। कबीर ने वो यहाँ तक कह डाला कि इस चादर को सुर, नर, मुनि सबने ओढ़कर मैली किया,<noinclude></noinclude> o70xnkll9mtqtlzu17sulspg12ehbjx पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२९ 250 12726 663604 591343 2026-06-21T20:07:26Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663604 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(९)|}}</noinclude> 'पर मैंने 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया'। इस प्रकार की गर्वोक्तियों से जायसी बहुत दूर थे। उनके भगवत्प्रेमपूर्ण मानस में अहंकार के लिये कहीं जगह न थी। उनका औदार्य वह प्रच्छन्न औद्धत्य न था जो किसी धर्म के चिढ़ाने के काम में आ सके। उनकी वह उदारता ऐसीथा जिससे कट्टरपन को भी चोट नहीं पहुँच सकती थी। प्रत्येक प्रकार का महत्व स्वीकार करने की क्षमता उनमें थी। वीरता, ऐश्वर्य, रूप, गुण, शील सबके उत्कर्ष पर मुग्ध होनेवाला हृदय उन्हें प्राप्त था, तभी 'पद्मावत' ऐसा चरितकाव्य लिखने को उत्कंठा उन्हें हुई। अपने को सर्वज्ञ मानकर पंडितों और विद्वानों की निंदा और उपहास करने की प्रवृत्ति उनमें न थी। वे जो कुछ थोड़ा बहुत जानते थे उसे पंडितों का प्रसाद मानते थे-- {{c|हौं पंडितन्ह केर पछलगा। किछ कहि चला तबल देइ डगा॥}} यद्यपि कबीरदास की और उनकी प्रवृत्ति में बहुत भेद था--कबीर विधि विरोधी थे और वे विधि पर आस्था रखनेवाले, कवीर लोकव्यवस्था का तिरस्कार करनेवाले थे और वे संमान करनेवाले--पर कबीर को वे बड़ा साधक मानते थे, जैसा कि इन चौपाइयों से प्रकट होता है-- {{c|ना--नारद तब रोइ पुकारा। एक जोलाहे सौं मैं हारा।<br> प्रेम तंतु निति ताना तनई। जप तप साधि सैकरा भरई॥}} जायसी को सिद्ध योगी मानकर बहुत से लोग उनके शिष्य हुए। कहते हैं कि पद्मावत के कई अंशों को वे गाते फिरते थे और चेले लोग भी साथ साथ गाते चलते थे। परंपरा से प्रसिद्ध है कि एक चेला अमेठी (अवध) में जाकर उनका नागमती का बारहमासा गा गाकर घर घर भीख माँगा करता था। एक दिन अमेठी के राजा ने उस बारहमासे को सुना। उन्हें वह बहुत अच्छा लगा, विशेषतः उसका यह अंश-- {{c|कँवल जो बिगसा मानसर, विनु जल गयउ सुखाइ।<br> सूखि बेलि पुनि पलुहै, जो पिय सींचै आइ।}} राजा इस पर मुग्ध हो गए। उन्होंने फकीर से पूछा, 'शाह जी! यह दोहा किसका बनाया है?' उस फकीर से मलिक मुहम्मद का नाम सुनकर राजा ने बड़े संमान और विनय के साथ उन्हें अपने यहाँ बुलवाया था। 'पदमावत' को पढ़ने से यह प्रकट हो जायगा कि जायसी का हृदय कैसा कोमल और 'प्रेम की पीर' से भरा हना था। क्या लोकपक्ष में और क्या भगवत्पक्ष में, दोनों ओर उसकी गूढ़ता और गंभीरता विलक्षण दिखाई देती है। जायसी की 'पदमावत' बहुत प्रसिद्ध हुई। मुसलमानों के भक्त घरानों में इसका बहुत आदर है। यद्यपि उसको समझनेवाले अब बहुत कम है, पर वे उसे गूढ़ पोथी मानकर यत्न से रखते हैं। जायसी की एक और छोटी सी पुस्तक 'अखरावट' है जो मिरजापुर में एक वृद्ध मुसलमान के घर मिली थी। इसमें वर्णमाला के एक एक अक्षर को लेकर सिद्धांत संबंधी कुछ बातें कही गई हैं। तीसरी पुस्तक 'आखिरी कलाम' के नाम से फारसी अक्षरों में छपी है। यह भी दोहे चौपाइयों में है और बहुत छोटी है। इसमें मरणोपरांत जीव की दशा और कयामत के अंतिम न्याय आदि का वर्णन है। बस ये ही तीन पुस्तकें जायसी की मिली हैं। इनमें से जायसी की कीर्ति का आधार<noinclude></noinclude> 3su3merygv8j2d5f4jh89nswhwahwd7 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३० 250 12738 663605 630059 2026-06-21T20:07:50Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663605 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( १० )|}}</noinclude> 'पदमावत' ही है। यह प्रबंध काव्य हिंदी में अपने ढंग का निराला है। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका अनुवाद बंगभाषा में सन् १६५० ई० के आसपास अराकान में हुआ। जायसवाले इन तीन पुस्तकों के अतिरिक्त जायसी की दो और पुस्तकें बतलाते हैं--पोस्तीनामा' तथा 'नैनावत' नामकी प्रेमकहानी। 'पोस्तीनामा' के संबंध में उनका कहना है कि मुबारकशाह बोदले को लक्ष्य करके लिखी गई थी, जो चंडू पिया करते थे। <section end="1" /> <section begin="1" /> <center>{{x-larger|'''पदमावत की कथा'''}}</center> कवि सिंहलद्वीप, उसके राजा गंधर्वसेन, राजसभा, नगर, बगीचे इत्यादि का वर्णन करके पद्मावती के जन्म का उल्लेख करता है। राजभवन में हीरामन नाम का एक अद्भत सूआ था। जिसे पद्मावती बहुत चाहती थी और सदा उसीके पास रहकर अनेक प्रकार की बातें कहा करती थी। पद्मावती क्रमशः सयानी हुई और उसके रूप को ज्याति भमंडल में सबके ऊपर हुईं। जब उसका कहीं विवाह न हुआ तब वह रात दिन हीरामन से इसी बात की चर्चा किया करती थी। सूए ने एक दिन कहा कि यदि कहो तो देश देशांतर में फिरकर मैं तुम्हारे योग्य वर ढूँढूँ। राजा को जब इस बात चीत का पता लगा तब उसने क्रुद्ध होकर सूए को मार डालने की आज्ञा दी। पद्मावती ने विनती कर किसी प्रकार सूए के प्राण बचाए। सूए ने पद्मावती से बिदा माँगी, पर पद्मावती ने प्रेम के मारे सूए को रोक लिया। सूया उस समय तो रुक गया, पर उसके मन में खटका बना रहा। एक दिन पद्मावती सखियों को लिए हुए मानसरोवर में स्नान और जलक्रीड़ा करने गई। सूए ने सोचा कि अब यहाँ से चटपट और उड़ा, जहाँ पक्षियों ने उसका बड़ा सत्कार किया। दस दिन पीछे एक बहेलिया हरी पत्तियों की टट्टी लिए उस बन में चला आ रहा था। और पक्षी तो उस चलते पेड़ को देखकर उड़ गए पर हीरामन चारे के लोभ से वहीं रहा। अंत में बहेलिए ने उसे पकड़ लिया और बाजार में उसे बेचने के लिए ले गया। चित्तौर के एक व्यापारी के साथ एक दीन ब्राह्मण भी कहीं से रुपए लेकर लोभ की आशा से सिंघल की हाट में आया था। उसने सूए को पंडित देख मोल ले लिया और लेकर चित्तौर पाया। चित्तौर में उस समय राजा चित्रसेन मर चुका था और उसका बेटा रत्नसेन गद्दी पर बैठा था। प्रशंसा सुनकर रत्नसेन ने लाख रुपये देकर हीरामन सूए को मोल ले लिया। एक दिन रत्नसेन कहीं शिकार को गया था। उसकी रानी नागमती सूए के पास आई और बोली 'मेरे समान सुंदरी और भी कोई संसार में है?' इसपर सूत्रा हँसा और उसने सिंघल की पद्मिनी स्त्रियों का वर्णन करके कहा कि उनमें और तुममें दिन और अँधेरी रात का अंतर है। रानी ने सोचा कि यदि यह तोता रहेगा तो किसी दिन राजा से भी ऐसा ही कहेगा और वह मुझसे प्रेम करना छोड़कर पद्मावती के लिये जोगी होकर निकल पड़ेगा। उसनी अपनी धाय से उसे ले जाकर मार डालने को कहा। धाय ने परिणाम सोचकर उसे मारा नहीं, छिपा रखा।<noinclude></noinclude> 7myhn1tzshijqyuerfhl8c5mbdxixl1 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३१ 250 12749 663606 591364 2026-06-21T20:08:19Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663606 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( ११ )|}}</noinclude> जब राजा ने लौटकर सूए को न देखा तब उसने बड़ा कोप किया। अंत में हीरामन उसके सामने लाया गया और उसने सब वृत्तांत कह सुनाया। राजा की पद्मावती का रूपवर्णन सुनने की बड़ी उत्कंठा हुई और हीरामन ने उसके रूप का बड़ा लंबा चौड़ा वर्णन किया। उस वर्णन को सुन राजा वेसुध हो गया। उसके हृदय में ऐसा प्रवल अभिलाष जगा कि वह रास्ता बताने के लिये हीरामन को साथ ले जोगी होकर घर से निकल पड़ा। उसके साथ सोलह हजार कुँवर भी जोगी होकर चले। मध्यप्रदेश के नाना दुर्गम स्थानों के बीच होते हए सब लोग कलिंग देश में पहुँचे। वहाँ के राजा गजपति से जहाज लेकर रत्नसेन ने और सब जोगियों के सहित सिंघलद्वीप को ओर प्रस्थान किया। क्षार समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र, उदधि समुद्र, सुरा समुद्र और किलकिला समुद्र को पार करके वे सातवें मानसरोवर समुद्र में पहुँचे जो सिंघल द्वीप के चारों ओर है। सिंघलद्वीप में उतरकर जोगी रत्नसेन तो अपने सब जोगियों के साथ महादेव के मंदिर में बैठकर तप और पद्मावती का ध्यान करने लगा और हीरामन पद्मावती से भेंट करने गया। जाते समय वह रत्नसेन से कहता गया कि बसंत पंचमी के दिन पद्मावती इसी महादेव के मंडप में बसंतपूजा करने आएगी; उस समय तुम्हें उसका दर्शन होगा और तुम्हारी आशा पूर्ण होगी। बहुत दिन पर हीरामन को देख पद्मावती बहुत रोई। हीरामन ने अपने निकल भागने और बेचे जाने का वृत्तांत कह सुनाया। इसके उपरांत उसने रत्नसेन के रूप, कूल, ऐश्वर्य, तेज आदि को बड़ी प्रशंसा करके कहा कि वह सब प्रकार से तम्हारे योग्य वर है और तुम्हारे प्रेम में जोगो होकर यहाँ तक आ पहुँचा है। पद्मावती ने उसकी प्रेमव्यथा को सुनकर जयमाल देने की प्रतिज्ञा की और कहा कि बसंत पंचमी के दिन पूजा के बहाने मैं उसे देखने जाऊँगी। सूआ यह सब समाचार लेकर राजा के पास मंडप में लौट आया। बसंत पंचमी के दिन पद्मावती सखियों के सहित मंडप में गई और उधर भी पाँची जिधर रत्नसेन और उसके साथी जोगी थे। पर ज्योंही रत्नसेन की आँखें उसपर पड़ी, वह मुर्छित होकर गिर पड़ा। पद्मावती ने रत्नसेन को सब प्रकार से वैसा ही पाया जैसा सूए ने कहा था। वह मुर्छित जोगी के पास पहुँची और उसे दोश में लाने के लिये उसपर चंदन छिड़का। जब वह न जागा तब चंदन से उसके हदय पर यह बात लिखकर वह चली गई कि 'जोगी, तूने भिक्षा प्राप्त करने योग्य योग नहीं सीखा, जब फलप्राप्ति का समय आया सब तू सो गया।' राजा को जब होश आया तब वह बहुत पछताने लगा और जल मरने को तैयार हुआ। सब देवताओं को भय हुआ कि यदि कहीं यह जला तो इनको घोर विरहाग्नि से सारे लोक भस्म हो जायेंगे। उन्होंने जाकर महादेव पार्वती के यहाँ पूकार की। महादेव कोढी के वेश में बैल पर चढ़े राजा के पास आए और जलने का कारण पूछने लगे। इधर पार्वती की, जो महादेव के साथ आई थीं, यह इच्छा हुई कि राजा के प्रेम की परीक्षा लें। वे अत्यंत सुंदरी अप्सरा का रूप धरकर पाई और बोलीं मझे इंद्र ने भेजा है। पद्मावती को जाने दे, तुझे अप्सरा प्राप्त हुई। रत्नसेन ने कहा 'मझे पद्मावती को छोड़ और किसी से कुछ प्रयोजन नहीं।' पार्वती ने महादेव से कहा कि रत्नसेन का प्रेम सच्चा है। रत्नसेन ने देखा कि इस कोढ़ी की छाया<noinclude></noinclude> 2i5srk4ps609d1e8jyzps0ob215ebxn पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३२ 250 12760 663609 571748 2026-06-21T20:08:39Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663609 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( १२ )|}}</noinclude> नहीं पड़ती है, इसके शरीर पर मक्खियाँ नहीं बैठती हैं और इसकी पलकें नहीं गिरती हैं अतः यह निश्चय कोई सिद्ध पुरुष है। फिर महादेव को पहचानकर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा। महादेव ने उसे सिद्धि गुटिका दी और सिंघलगढ़ में घुसने का मार्ग बताया। सिद्धि गुटिका पाकर रत्‍नसेन सब जोगियों को लिए हुए सिंघलगढ़ पर चढ़ने लगा। राजा गंधर्वसेन के यहाँ जब यह खबर पहुँची तब उसने दूत भेजे। दूतों से जोगी रत्नसेन ने पद्मिनी के पाने का अभिप्राय कहा। दूत क्रुद्ध होकर लौट गए। इस बीच हीरामन रत्‍नसेन का प्रेमसंदेश लेकर पद्मावती के पास गया और पद्मावती का प्रेम भरा संदेसा पाकर उसने रत्‍नसेन से कहा। इस संदेसे से रत्‍नसेन के शरीर में और भी बल आ गया। गढ़ के भीतर जो अगाध कुंड था वह रात को उसमें धँसा और भीतरी द्वार को, जिसमें वज्र के किवाड़ लगे थे, उसने जा खोला। पर इसी बीच सवेरा हो गया और वह अपने साथी जोगियों के सहित घेर लिया गया। राजा गंधर्वसेन के यहाँ यह विचार हुआ कि जोगियों को पकड़कर सूली दे दी जाय। दल बल के सहित सब सरदारों ने जोगियों पर चढ़ाई की। रत्‍नसेन के साथी युद्ध के लिये उत्सुक हुए पर रत्‍नसेन ने उन्हें यह उपदेश देकर शांत किया कि प्रेममार्ग में क्रोध करना उचित नहीं। अंत में सब जोगियों सहित रत्‍नसेन पकड़ा गया। इधर यह सब समाचार सुन पद्मावती की बुरी दशा हो रही थी। हीरामन सूए ने जाकर उसे धीरज बँधाया कि रत्‍नसेन पूर्ण सिद्ध हो गया है, वह मर नहीं सकता। जब रत्‍नसेन को बाँधकर सूली देने के लिये लाए तब जिसने जिसने उसे देखा सबने कहा कि यह कोई राजपुत्र जान पड़ता है। इधर सूली की तैयारी हो रही थी, उधर रत्‍नसेन पद्मावती का नाम रट रहा था। महादेव ने जब जोगी पर ऐसा संकट देखा तब वे और पार्वती भाँट भाँटिनी का रूप धरकर वहाँ पहुँचे। इसी बीच हीरामन सुआ भी रत्‍नसेन के पास पद्मावती का यह संदेसा लेकर आया कि 'मैं भी हुथेला पर प्राण लिए बैठी हूँ, मेरा जीना मरना तुम्हारे साथ है।' भाँट (जो वास्तव में महादेव थे) ने राजा गंधर्वसेन को बहुत समझाया कि यह जोगी नहीं राजा है और तुम्हारी कन्या के योग्य वर है, पर राजा इसपर और भी क्रुद्ध हुआ। २० जोगियों का दल चारों ओर से लड़ाई के लिये चढ़ा। महादेव के साथ हनुमान् आदि सब देवता जोगियों की सहायता के लिये आ खड़े हुए। गंधर्वसेन की सेना के हाथियों का समूह जब आगे बढ़ा तब हनुमान जी ने अपनी लंबी पूंछ में सबको लपेटकर आकाश में फेंक दिया। राजा गंधर्वसेन को फिर महादेव का घंटा और विष्णु का शंख जोगियों की ओर सुनाई पड़ा और साक्षात् शिव युद्धस्थल में दिखाई पड़े। यह देखते ही गंधर्वसेन महादेव के चरणों पर जा गिरा और बोला 'कन्या आपकी है, जिसे चाहिए उसे दीजिए'। इसके उपरांत हीरामन सुए ने आकर राजा रत्‍नसेन के चित्तौर से आने का सब वृत्तांत कह सुनाया और गंधर्वसेन ने बड़ी धूमधाम से रत्‍नसेन के साथ पद्मावती का विवाह कर दिया। रत्‍नसेन के साथी जो सोलह हजार कुँवर थे उन सबका विवाह भी पद्मिनी स्त्रियों के साथ हो गया और सब लोग बड़े आनंद के साथ कुछ दिनों तक सिंहल में रहे। इधर चित्तौर में वियोगिनी नागमती को राजा की बाट जोहते एक वर्ष हो<noinclude></noinclude> 7umpkolsuxm9ztly30zbnaothq23ibz पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३३ 250 12771 663611 591384 2026-06-21T20:09:04Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663611 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( १३ )|}}</noinclude> गया। उसके विलाप से पशु पक्षी विकल हो गए। अंत में आधी रात को एक पक्षी ने नागमती के दुःख का कारण पूछा। नागमती ने उससे रत्नसेन के पास पहुंचाने के लिये अपना संदेसा कहा। वह पक्षी नागमती का संदेसा लेकर सिंहलद्वीप गया और समुद्र के किनारे एक पेड़ पर बैठा। संयोग से रत्नसेन शिकार खेलते खेलते उसी पेड़ के नीचे जा खड़ा हा। पक्षी ने पेड़ पर नागमती की दुःख कथा और चित्तौर की हीन दशा का वर्णन किया। रत्नसेन का जी सिंहल से उचटा और उसने स्वदेश की ओर प्रस्थान किया। चलते समय उसे सिंहल के राजा के यहाँ से विदाई में बहुत सामान और धन मिला। इतनी अधिक संपत्ति देख राजा के मन में गर्व और लोभ हुआ। वह सोचने लगा कि इतना अधिक धन लेकर यदि मैं स्वदेश पहुँचा तो फिर मेरे समान संसार में कौन है। इस प्रकार लोभ ने राजा को आ घेरा। समुद्रतट पर जब रत्नसेन आया तब समुद्र याचक का रूप धरकर राजा से दान माँगने आया, पर राजा ने लोभवश उसका तिरस्कार कर दिया। राजा आधे समुद्र में भी नहीं पहुँचा था कि बड़े जोर का तूफान आया जिससे जहाज दविखन लंका की ओर बह गए। वहाँ विभीषण का एक राक्षस माँझी मछली मार रहा था। वह अच्छा आहार देख राजा से पाकर बोला कि चलो हम तुम्हें रास्ते पर लगा दें। राजा उसकी बातों में आ गया। वह राक्षस सब जहाजों को एक भयंकर समुद्र में ले गया जहाँ से निकलना कठिन था। जहाज चक्कर खाने लगे और हाथी, घोड़े, मनुष्य आदि डूबने लगे। वह राक्षस आनंद से नाचने लगा। इस बीच समद्र का एक राजपक्षी वहाँ आ पहुँचा जिसके डैनों का ऐसा घोर शब्द हुया मानों पहाड़ के शिखर टूट रहे हैं। वह पक्षी उस दुष्ट राक्षस को चंगुल में दबाकर उड़ गया। जहाज के एक तख्ते पर एक ओर राजा बहा और दूसरे तख्ते पर दूसरी ओर रानी। पद्मावती बहते बहते वहाँ जा लगी जहाँ समुद्र की कन्या लक्ष्मी अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी। लक्ष्मी मूर्छित पद्मावती को अपने घर ले गई। पद्मावती को जब चेत हुआ तब वह रत्नसेन के लिये विलाप करने लगी। लक्ष्मी ने उसे धीरज बँधाया और अपने पिता समुद्र से राजा की खोज कराने का वचन दिया। इधर राजा बहते बहते एक ऐसे निर्जन स्थान में पहुँचा जहाँ गूँगों के टीलों के सिवा और कुछ न था। राजा पद्मिनी के लिये बहुत विलाप करने लगा और कटार लेकर अपने गले में मारा ही चाहता था कि ब्राह्मण का रूप धरकर समुद्र उसके सामने आ खड़ा हुआ और उसे मरने से रोका। अंत में समुद्र ने राजा से कहा कि तुम मेरी लाठी पकड़कर आँख मूंद लो; मैं तुम्हें जहाँ पद्मावती है उसी तट पर पहुंचा दूंगा। जब राजा उस तट पर पहुँच गया तब लक्ष्मी उसकी परीक्षा लेने के लिये पद्मावती का रूप धारण कर रास्ते में जा बैठी। रत्नसेन उन्हें पद्मावती समझ उनकी ओर लपका। पास जाने पर वे कहने लगीं 'मैं पद्मावती हूँ।' पर रत्नसेन ने जब देखा कि यह तो पद्मावती नहीं है तब चट मुँह फेर लिया। अंत में लक्ष्मी रत्नसेन को पद्मावती के पास ले गई। रत्नसेन और पद्मावती कई दिनों तक समुद्र और लक्ष्मी के मेहमान रहे। पद्मावती की प्रार्थना पर लक्ष्मी ने उन सब साथियों को भी ला खड़ा किया जो इधर उधर बह गए थे। जो मर गए थे वे भी<noinclude></noinclude> 8mf11kgafb2orpwddj9owf75i06csw1 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३५ 250 12793 663612 591402 2026-06-21T20:09:45Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663612 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(१५)|}}</noinclude> दिल्ली से एक पत्र अलाउद्दीन को मिला जिसमें हरेव लोगों के फिर से चढ़ पानेका समाचार लिखा था। बादशाह ने जब यह देखा कि गढ़ नहीं टूटता है तब उसने कपट की एक चाल सोची। उसने रत्नसेन के पास संधि का एक प्रस्ताव भेजा और यह कहलाया कि मुझे पद्मिनी नहीं चाहिए; समुद्र से जो पाँच, अमूल्य वस्तुएं तुम्हें मिली हैं उन्हें देकर मेल कर लो। राजा ने स्वीकार कर लिया और बादशाह को चित्तौरगढ़ के भीतर ले जाकर बड़ी धमधाम से उसकी दावत की। गोरा और बादल नामक विश्वासपात्र सरदारों ने राजा को बहुत समझाया कि मुसलमानों का विश्वास करना ठीक नहीं, पर राजा ने ध्यान न दिया। वे दोनों वीर नीतिज्ञ सरदार रूठकर अपने घर चले गए। कई दिनों तक बादशाह की मेहमानदारी होती रही। एक दिन वह टहलते टहलते पद्मिनी के महलों की ओर भी जा निकला, जहाँ एक से एक रूपवती स्त्रियाँ स्वागत के लिये खड़ी थीं। बादशाह ने राघव से, जो बराबर उसके साथ साथ था, पूछा कि 'इनमें पद्मिनी कौन है?' राघव ने कहा 'पद्मिनी इनमें कहाँ? ये तो उसकी दासियाँ हैं।' बादशाह पद्मिनी के महल के सामने ही एक स्थान पर बैठकर राजा के साथ शतग्ज खेलने लगा। जहाँ वह बैठा था वहाँ उसने एक दर्पण भी रख दिया था कि पद्मिनी यदि झरोखे पर आवेगी तो उसका प्रतिबिंब दर्पण में देखेगा। पद्मिनी कुतूहलवश झरोखे के पास आई और बादशाह ने उसका प्रतिबिंब दर्पण में देखा। देखते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ा। अंत में बादशाह ने राजा से विदा माँगी। राजा उसे पहुँचाने के लिये साथ साथ चला। एक एक फाटक पर बादशाह राजा को कुछ न कुछ देता चला। अंतिम फाटक पार होते ही राघव के इशारे से वादशाह ने रत्नसेन को पकड़ लिया और बाँधकर दिल्ली ले गया। वहाँ राजा को तंग कोठरी में बंद करके वह अनेक प्रकार के भयंकर कष्ट देने लगा। इधर चित्तौर में हाहाकार मच गया। दोनों रानियाँ रो रोकर प्राण देने लगीं। इस अवसर पर राजा रत्नसेन के शत्रु कुंभलनेर के राजा देवपाल को दुष्टता सूझी। उसने कूमदिनी नाम की दूती को पद्मावती के पास भेजा। पहले तो पद्मिनी अपने मायके की स्त्री सूनकर बड़े प्रेम से मिली और उससे अपना दु:ख कहने लगी, पर जब धीरे धीरे उसका भेद खुला तब उसने उचित दंड देकर उसे निकलवा दिया। इसके पीछे अलाउद्दीन ने भी जोगिन के वेश में एक दूतो इस आशा से भेजा कि वह रत्नसेन से भेंट कराने के बहाने पद्मिनी को जोगिन बनाकर अपने साथ दिल्ली लावेगी। पर उसकी दाल भी न गली। अंत में पद्मिनी गोरा और बादल के घर गई और उन दोनों क्षत्रिय वीरों के सामने अपना दु:ख रोकर उससे उनसे राजा को छुड़ाने की प्रार्थना की। दोनों ने राजा को छुड़ाने की दृढ़ प्रतिज्ञा की और रानी को बहुत धीरज बँधाया। दोनों ने सोचा कि जिस प्रकार मुसलमानों ने धोखा दिया है उसी प्रकार उनके साथ भी चाल चलनी चाहिए। उन्होंने सोलह सौ ढकी पालकियों के भीतर सशस्त्र राजपूत सरदारों को बिठाया और जो सबसे उत्तम और बहुमूल्य पालकी थी उसके भीतर औजार के साथ एक लोहार का बिठाया। इस प्रकार वे यह प्रसिद्ध करके चले कि सोलह सौ दासियों के सहित पद्मिनी दिल्ली जा रही है।<noinclude></noinclude> 06h57g3ow591dvvx7bqqt1tx8be41ie पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३८ 250 12826 663613 591404 2026-06-21T20:10:46Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663613 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(१८) |}}</noinclude> केवल बारह वर्ष का था, बड़ी वीरता के साथ लड़कर जीता बच पाया। उसके मुँह से अपने पति की वीरता का वृत्तांत सुनकर गोरा की स्त्री सती हो गई। 'अलाउद्दीन ने सवत् १३४६ (सन् १२६० ई०; पर फरिश्ता के अनुसार सन् १३०३ ई० जो कि ठीक माना जाता है) में फिर चित्तौरगढ़ पर चढ़ाई की। इसी दूसरी चढ़ाई में राणा अपने ग्यारह पुत्रों सहित मारे गए। जव राणा के ग्यारह पुत्र मारे जा चुके और स्वयं राणा के युद्ध क्षेत्र में जाने की बारी आई तब पद्मिनी ने जौहर किया। कई सहल राजपूत ललनात्रों के साथ पद्मिनी ने चित्तौरगढ़ के उस गुप्त भूधरे में प्रवेश किया जहाँ उन सती स्त्रियों को अपने गोद में लेने के लिये आग दहक रही थी। इधर यह कांड समप्त हुआ उधर वीर भीमसी ने रणक्षेत्र में शरीरत्याग किया। टाड ने जो वृत्त दिया है वह राजपूताने में रक्षित चारणों के इतिहासों के आधार पर है। दो चार व्योरों को छोड़कर ठीक यही वृत्तांत 'आइने अकबरी' में दिया हुआ है। 'आइने अकबरी' में भीमसी के स्थान पर रतनसी (रत्नसिंह या रत्नसेन) नाम है। रतनसी के मारे जाने का व्योरा भी दूसरे ढंग पर है। 'आइने अकबरी' में लिखा है कि अलाउद्दीन दूसरी चढ़ाई में भी हारकर लौटा। वह लौटकर चित्तौर से सात कोस पहुँचा था कि रुक गया और मैत्री का नया प्रस्ताव भेजकर रतनसी को मिलने के लिये बुलाया। अलाउद्दीन की बार बार की चढ़ाइयों से रतनसी ऊब गया था इससे उसने मिलना स्वीकार किया। एक विश्वासघाती को साथ लेकर वह अलाउद्दीन से मिलने गया और धोखे से मार डाला गया। उसका संबंधी अरसी चटपट चित्तौर के सिंहासन पर बिठाया गया। अलाउद्दीन चित्तौर की ओर फिर लौटा और उसपर प्राधिकार किया। अरसी मारा गया और पद्मिनी सब स्त्रियों के सहित सती हो गई।' इन दोनों ऐतिहासिक वृत्तों के साथ जायसी द्वारा वर्णित कथा का मिलान करने से कई बातों का पता चलता है। पहली बात तो यह है कि जायसी ने जो 'रत्नसेन' नाम दिया है यह उनका कल्पित नहीं है, क्योंकि प्रायः उनके समसामयिक या थोड़े ही पीछे के ग्रंथ 'आइने अकबरी' में भी यही नाम आया था। यह नाम अवश्य इतिहासज्ञों में प्रसिद्ध था। जायसी को इतिहास की जानकारी थी। यह 'जायसी की जानकारी' के प्रकरण में हम दिखावेंगे। दूसरी बात यह है कि जायसी ने रत्नसेन का मुसलमानों के हाथ से मारा जाना लिखा है उसका आधार शायद विश्वासघाती के साथ बादशाह से मिलने जानेवाला यह प्रवाद हो जिसका उल्लेख पाइने अकबरीकार ने किया है। अपनी कथा को काव्योपयोगी स्वरूप देने के लिये ऐतिहासिक घटनाओं के व्योरों में कुछ फेरफार करने का अधिकार कवि को बराबर रहता है। जायसी ने भी इस अधिकार का उपयोग कई स्थलों पर किया है। सबसे पहले तो हमें राघव चेतन की कल्पना मिलती है। इसके उपरांत अलाउद्दीन के चित्तौरगढ़ घेरने पर संभिकी जो शर्त (समुद्र से पाई हुई पाँच वस्तुओं को देने की) अलाउद्दीन की ओर से पेश की गई वह भी कल्पित है। इतिहास में दर्पण के बीच पद्मिनी की छाया देखने की शर्त प्रसिद्ध है। पर दर्पण के प्रतिबिंब देखने की बात का जायसी ने<noinclude></noinclude> ailer2kgmj31c3gggroy74p9ltqirj5 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९ 250 12837 663615 591405 2026-06-21T20:11:08Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663615 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( १९ )|}}</noinclude> आकस्मिक घटना के रूप में वर्णन किया है। इतना परिवर्तन कर देने से नायक रत्नसेन के गौरव की पूर्ण रूप से रक्षा हुई है। पद्मिनी की छाया भी दूसरे को दिखाने पर संमत होना रत्नसेन ऐसे पुरुषार्थी के लिये कवि ने अच्छा नहीं समझा। तीसरा परिवर्तन कवि ने यह किया है कि अलाउद्दीन के शिविर में बंदी होने के स्थान पर रत्नसेन का दिल्ली में दंदी होना लिखा है। रत्नसेन को दिल्ली में ले जाने से कवि को दूती और जोगिन के वृत्तांत, रानियों के विरह और विलाप तथा गोरा बादल के प्रयत्नविस्तार का पूरा अवकाश मिला है। इस अवकाश के भीतर जायसी ने पद्मिनी के सतीत्व की मनोहर व्यजना के अनंतर बालक बादल का वह क्षात्र तेज तथा कर्तव्य की कठोरता का वह दिव्य और मर्मस्पर्शी दृश्य दिखाया है जो पाठक के हृदय को द्रवीभूत कर देता है। देवपाल और अलाउद्दीन का दूती भेजना तथा बादल और उसकी स्त्री का संवाद, ये दोनों प्रसंग इसी निमित्त कल्पित किए गए हैं। देवपाल कल्पित पात्र है, पीछा करते हुए अलाउद्दीन के चित्तौर पहुँचने के पहले ही रत्नसेन का देवपाल के हाथ से मारा जाना और अलाउद्दीन के हाथ से न पराजित होना दिखाकर कवि ने अपने चरितनायक की पान रखी है। पद्मिनी क्या सचमुच सिंहल की थी? पद्मिनी सिंहलद्वीप की हो नहीं सकती। यदि 'सिंहल' नाम ठीक मानें तो वह राजपूताने या गुजरात का कोई स्थान होगा। न तो सिंहलद्वीप में चौहान आदि राजपूतों की बस्ती का कोई पता है, न इधर हजार वर्ष से कूपमंडूक बने हुए हिंदुओं के सिंहलद्वीप में जाकर विवाह संबंध करने का। दुनिया जानती है कि सिंहलद्वीप के लोग (तमिल और सिंहली दोनों) कैसे काले कलूटे होते हैं। वहाँ पर पद्मिनी स्त्रियों का पाया जाना गोरखपंथी साधुनों की कल्पना है। नाथपंथ की परंपरा वास्तव में महायान शाखा के योगमार्गी बौद्धों की थी जिसे गोरखनाथ ने शैव रूप दिया। बौद्धधर्म जब भारतवर्ष से उठ गया तब उसके शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन का प्रचार यहाँ न रह गया। सिंहलद्वीप में ही बौद्ध शास्त्रों के अच्छे अच्छे पंडित रह गए। इसी से भारतवर्ष के अवशिष्ट योगमार्गी बौद्धों में सिंहलद्वीप एक सिद्धपीठ समझा जाता रहा। इसी धारणा के अनुसार गोरखनाथ के अनुयायी भी सिंहलद्वीप को एक सिद्ध पीठ मानते हैं। उनका कहना है कि योगियों को पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिये सिंहलद्वीप जाना पड़ता है जहाँ साक्षात् शिव परीक्षा के पीछे सिद्धि प्रदान करते हैं। पर वहाँ जानेवाले योगियों के शम दम की पूरी परीक्षा होती है। वहाँ सुवर्ण और रत्नों की अतुल राशि सामने आती है तथा पद्मिनी स्त्रियाँ अनेक प्रकार से लुभाती हैं। बहुत से योगी उन पद्मिनियों के हाव भाव में फंस योगभ्रष्ट हो जाते हैं। कहते हैं, गोरखनाथ (वि० संवत् १४०७) के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) जब सिंहल में सिद्धि की पूर्णता के लिये गए तब पद्मिनियों के जाल में इसी प्रकार फंस गए। पद्मिनियों ने उन्हें एक कएँ में डाल रखा था। अपने गुरु की खोज में गोरखनाथ भी सिंहल गए और उसी कुएँ के पास से होकर निकले। उन्होंने अपने गुरु की आवाज पहचानी और कुएँ के किनारे खड़े होकर बोले 'जाग मछंदर गोरख पाया!' इसी प्रकार की और कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।<noinclude></noinclude> haaa8egqjymwny7p78rikz8kc4akpxn पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४० 250 12848 663616 630069 2026-06-21T20:11:35Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663616 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २० )|}}</noinclude>अब 'पद्मावत' की पूर्वार्ध कथा के संबंध में एक और प्रश्न यह होता है कि वह जायसी द्वारा कल्पित है अथवा जायसी के पहले से कहानी के रूप में जनसाधारण के बीच प्रचलित चली आती है। उत्तर भारत में, विशेषतः अवध में, 'पद्मिनी रानी और हीरामन सूए' की कहानी अबतक प्रायः उसी रूप में कही जाती है जिस रूप में जायसी ने उसका वर्णन किया है। जायसी इतिहासविज्ञ थे इससे उन्होंने रत्नसेन, अलाउद्दीन आदि नाम दिए हैं, पर कहानी कहनेवाले नाम नहीं लेते हैं; केवल यही कहते हैं कि 'एक राजा था', 'दिल्ली का एक बादशाह था', इत्यादि। यह कहानी बीच बीच में गा गाकर कही जाती है। जैसे, राजा की पहली रानी जब दर्पण में अपना मुँह देखती है तब सूए से पूछती है {{c|देस देस तुम फिरौ हो सुग्रटा! मोरे रूप और कहु कोई?}} सूआ उत्तर देता है-- {{c|काह बखानौं सिंहल के रानी। तोरे रूप भरै सब पानी।}} इसी प्रकार 'वाला लखन देव' आदि की और रसात्मक कहानियाँ अवध में प्रचलित हैं जो बीच बीच में गा गाकर कही जाती हैं। इस संबंध में हमारा अनुमान है कि जायसी ने प्रचलित कहानी को ही लेकर सूक्ष्म व्योरों की मनोहर कल्पना करके, उसे काव्य का सुंदर स्वरूप दिया है। इस मनोहर कहानी को कई लोगों ने काव्य के रूप में बाँधा। हुसैन गजनवी ने 'किस्सए पद्मावत' नाम का एक फारसी काव्य लिखा। सन् १६५२ ई० में रायगोविंद मुंशी ने पद्मावती की कहानी फारसी गद्य में 'तुकफतुल कुलूब' के नाम से लिखी। उसके पीछे मीर जियाउद्दीन 'इव्रत' और गुलाम अली 'इशरत' ने मिलकर सन् १७६६ ई० में उर्दू शेरों में इस कहानी को लिखा। यह कहा जा चुका है कि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी 'पदमावत' सन् १५२० ई० में लिखी थी। <section end="1" /> <section begin="1" /> <center>{{x-larger|'पदमावत' की प्रेमपद्धति}}</center> 'पदमावत' की जो आख्यायिका ऊपर दी जा चुकी है उससे स्पष्ट है कि वह एक प्रेम कहानी है। अब संक्षेप में यह देखना चाहिए कि कवियों में दांपत्य प्रेम का याविर्भाव वर्णन करने की जो प्रणालियाँ प्रचलित हैं उनमें से 'पदमावत' में वरिणत प्रेम किसके अंतर्गत पाता है। (१) सबसे पहले उस प्रेम को लीजिए जो आदिकाव्य रामायण में दिखाया गया है। इसका विकास विवाहसंबंध हो जाने के पीछे और पूर्ण उत्कर्ष जीवन की विकट स्थितियों में दिखाई पड़ता है। राम के वन जाने की तैयारी के साथ ही सीता के प्रेम का स्फुरण होता है; सीताहरण होने पर राम के प्रेम की कांति सहसा फूटती हुई दिखाई पड़ती है। वन के जीवन में इस पारस्परिक प्रेम की नंदविधायिनी शक्ति लक्षित है और लंका की चढ़ाई में इसका तेज, साहस और पौरुष। यह प्रेम अत्यंत स्वाभाविक, शुद्ध और निर्मल है। यह विलासिता या कामकता के रूप में हमारे सामने नहीं आता बल्कि मनुष्य जीवन के बीच एक मानसिक<noinclude></noinclude> 4x53x41gv4jggc2lcaiseewj5scnwby पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४१ 250 12859 663618 591414 2026-06-21T20:11:56Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663618 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||(२१)|}}</noinclude> शक्ति के रूप में दिखाई पड़ता है। उभय पक्ष में सम होने पर भी नायक पक्ष में यह कर्तव्यबुद्धि द्वारा कुछ संयत सा दिखाई पड़ता है। (२) दूसरे प्रकार का प्रेम विवाह के पूर्व का होता है, विवाह जिसका फलस्वरूप होता है। इसमें नायक नायिका संसारक्षेत्र में घूमते फिरते हुए कहीं जैसे उपवन, नदीतट, वीथी इत्यादि में--एक दूसरे को देख मोहित होते हैं और दोनों में प्रीति हो जाती है। अधिकतर नायक की ओर से नायकिा को प्राप्ति का प्रयत्न होता है। इसी प्रयत्नकाल में संयोग और विप्रलंभ दोनों के अवसरों का संनिवेश रहता है और विवाह हो जाने पर प्रायः कथा की समाप्ति हो जाती है। इसमें कहीं बाहर घूमते फिरते साक्षात्कार होता है, इससे मनुष्य के आदिम प्राकृतिक जीवन की स्वाभाविकता बनी रहती है। अभिज्ञान शाकुंतल, विक्रमोर्वशीय आदि की कथा इसी प्रकार की है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने सीता और राम के प्रेम का प्रारंभ विवाह से पूर्व दिखाने के लिये ही उनका जनक की वाटिका में परस्पर साक्षात्कार कराया है। पर साक्षात्कार और विवाह के बीच के थोड़े से अवकाश में परशुरामवाले झमेले को छोड़ प्रयत्न का कोई विस्तार दिखाई नहीं पड़ता। अतः रामकथा को इस दूसरे प्रकार की प्रेमकथा का स्वरूप न प्राप्त हो सका। (३) तीसरे प्रकार के प्रेम का उदय प्रायः राजाओं के अंत:पुर, उद्यान आदि के भीतर भोगविलास या रंग रहस्य के रूप में दिखाया जाता है, जिसमें सपत्नियों के द्वेष, विदूषक आदि के हास परिहास और राजाओं को स्त्रैणता आदि का दृश्य होता है। उत्तरकाल के सस्कृत नाटकों में इसी प्रकार के पौरुषहीन, निःसार और विलासमय प्रेम का प्रायः वर्णन हुआ है, जैसे रत्नावली, प्रियदर्शिका, कपरमंजरी इत्यादि में। इसमें नायक को कहीं वन, पर्वत आदि के बीच नहीं जाना पड़ा है; वह घर के भीतर ही लुकता छिपता, चौकड़ी भरता दिखाया गया है। (४) चौथे प्रकार का वह प्रेम है जो गुणश्रवण चित्रदर्शन, स्वप्नदर्शन आदि से बैठे बिठाए उत्पन्न होता है और नायक या नायिका को संयोग के लिये प्रयत्नवान् करता है। उपा और अनिरुद्ध का प्रेम इसी प्रकार का समझिए जिसमें प्रयत्न स्त्री जाति की ओर से होने के कारण कुछ अधिक विस्तार या उत्कर्ष नहीं प्राप्त कर सका है। पर स्त्रियों का प्रयत्न भी यह विस्तार या उत्कर्ष प्राप्त कर सकता है इसकी सूचना भारतेंदु ने 'पगन में छाले पर', नाँघबे को नाले परे तऊ लाल, लाले परे रावरे दरस को, के द्वारा दिया है। इन चार प्रकार के प्रेमों का वर्णन नए और पुराने भारतीय साहित्य में है। ध्यान देने को बात यह है कि विरह की व्याकुलता और असह्य वेदना स्त्रियों के मत्थे अधिक मढ़ी गई है। प्रेम के वेग को मात्रा स्त्रियों में अधिक दिखाई गई है। नायक के दिन दिन क्षीण होने, विरहताप में भस्म होने, सूखकर ठठरी होने, के वर्णन में कवियों का जी उतना नहीं लगा है। बात यह है कि स्त्रियों की शृंगारचेष्टा वर्णन करने में पुरुषों को जो आनंद आता है, वह पुरुषों की दशा का वर्णन करने में नहीं। इसी से स्त्रियों का विरहवर्णन हिंदी काव्य का एक प्रधान अंग ही बन गया। ऋतुवर्णन तो केवल इसी को बदौलत रह गया।<noinclude></noinclude> cumxpg8rcvdh9rd6vyqlwwrkkcv00d9 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४२ 250 12870 663621 591425 2026-06-21T20:12:54Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663621 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २२ )|}}</noinclude> कहने की आवश्यकता नहीं कि जायसी ने 'पद्मावत' में जिस प्रेम का वर्णन किया है वह चौथे ढंग का है। पर इसमें वे कुछ विशेषता भी लाए हैं। जायसी के शृंगार में मानसिक पक्ष प्रधान है, शारीरिक गौण है। चुंबन, आलिंगन आदि का वर्णन कवि ने बहुत कम किया है, केवल मन के उल्लास और वेदना का कथन अधिक किया है। प्रयत्न नायक की ओर से है और उसकी कठिनता द्वारा कवि ने नायक के प्रेम को नापा है। नायक का यह आदर्श लैला मजनू, शीरी फरहाद आदि उन अरबी फारसी कहानियों के आदर्श से मिलता जलता है जिनमें हड़ी की ठठरी भर लिए हुए टाँकियों से पहाड़ खोद डालनेवाले पाशिक पाए जाते हैं। फारस के प्रेम में नायक के प्रेम का वेग अधिक तीव्र दिखाई पड़ता है और भारत के प्रेम में नायिका के प्रेम का। जायसी ने आगे चलकर नायक और नायिका दोनों के प्रेम की तीव्रता समान करके दोनों आदर्शों का एक में मेल कर दिया है। राजा रत्नसेन सुए के मुँह से पद्मावती का रूपवर्णन सुन योगी होकर घर से निकल जाता है और मार्ग के अनेक दुःखों को झेलता हुआ सात समुद्र पार करके सिंहलद्वीप पहुँचता है। उधर पद्मावती भी राजा के प्रेम को सुन विरहाग्नि में जलती हई साक्षात्कार के लिये विह्वल होती है और जब रत्नसेन को सूली की आज्ञा होती है तब उसके लिये मरने को तैयार होती है। एक प्रकार का और मेल भी कवि ने किया है। फारसी की मसनवियों का प्रेम ऐकांतिक, लोकबाह्य और आदर्शात्मक (ग्राइडियलिस्टिक) होता है। वह संसार की वास्तविक परिस्थिति के बीच नहीं दिखाया जाता, संसार की प्रार सब बातों से अलग एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में दिखाया जाता है। उसमें जा घटनाए आती हैं वे केवल प्रेममार्ग की होती हैं, संसार के और और व्यवहारों से उत्पन्न नहीं। साहस, दृढ़ता और वीरता भी यदि कहीं दिखाई पड़ती है तो प्रेमोन्माद के रूप में, लोककर्तव्य के रूप में नहीं। भारतीय प्रेमपद्धति आदि में तो लोकसंबद्ध और व्यवहारात्मक थी ही, पीछे भी अधिकतर वैसी ही रही। यदि कवि के काव्य में प्रेम लोकव्यवहार से कहीं अलग नहीं दिखाया गया है, जीवन के और और विभागों के सौंदर्य के बीच उसके सौंदर्य की प्रभा फटती दिखाई पड़ती है। राम के समुद्र में पूल बाँधने और रावण ऐसे प्रचंड शत्रु के मार गिराने को हम केवल एक प्रेमी के प्रयत्न के रूप में नहीं देखते, वीर धर्मानुसार पृथ्वी का भार उतारने के प्रयत्न के रूप में देखते हैं। पीछे कृष्णचरित, कादंबरी, नैषधीय चरित, माधवानल कामकदला आदि एकांतिक प्रेम कहानियों का भी भारतीय साहित्य में प्रचुर प्रचार हुआ। ये कहानियाँ अब फारस की प्रेमपद्धति के अधिक मेल में थीं। नल दमयंती की प्रेम कहानी का अनुवाद बहुत पहले फारसी क्या अरबी तक में हुआ। इन कहानियों का उल्लेख 'पद्मावत' में स्थान स्थान पर हुआ है। जायसी ने यद्यपि इश्क के दास्तानवाली मसनवियों के प्रेम के स्वरूप को प्रधान रखा है पर बीच बीच में भारत के लोक-व्यवहार-संलग्न स्वरूप को भी मेल किया है। इश्क की मसनवियों के समान 'पदमावत' लोकपक्षशून्य नहीं है। राजा जोगी होकर घर से निकलता है, इतना कहकर कवि यह भी कहता है कि चलते समय उसकी माता और रानी दोनों उसे रो रोकर रोकती हैं। जैसे कवि ने राजा से<noinclude></noinclude> it3gek8lr0kw6iynuxkojad5dpr5rhu पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४३ 250 12881 663622 591436 2026-06-21T20:13:15Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663622 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २३ )|}}</noinclude> संयोग होने पर पद्मावती के रसरंग का वर्णन किया वैसे ही सिंहलद्वीप से विदा होते समय परिजनों और सखियों से अलग होने का स्वाभाविक दुःख भी। कवि ने जगह जगह पद्मावती को जैसे चंद्र, कमल इत्यादि के रूप में देखा है, वैसे ही उसे प्रथम समागम से डरते, सपत्नी से झगड़ते और प्रिय के हित के अनुकूल लोकव्यवहार करते भी देखा है। राघव चेतन के निकाले जाने पर राजा और राज्य के अनिष्ट की आशंका से पद्मावती उस ब्राह्मण को अपना खास कंगन दान देकर संतुष्ट करना चाहती है। प्रेम का लोकपक्ष कैसा सुंदर है! लोकव्यवहार के बीच भी अपनी प्राभा का प्रसार करनेवाली प्रेमज्योति का महत्व कुछ कम नहीं। जायसी ऐकांतिक प्रेम की गढ़ता और गंभीरता के बीच बीच में जीवन के और और अंगों के साथ भी उस प्रेम के संपर्क का स्वरूप कुछ दिखाते गए हैं, इससे उनकी प्रेमगाथा पारिवारिक और सामाजिक जीवन से विच्छिन्न होने से बच गई है। उसमें भावात्मक और व्यवहारात्मक दोनों शैलियों का मेल है। पर है वह प्रेमगाथा ही, पूर्ण जीवनगाथा नहीं। ग्रंथ का पूर्वार्ध--आधे से अधिक भाग--तो प्रेममार्ग के विवरण से ही भरा है। उत्तरार्ध में जीवन के और और अंगों का संनिवेश मिलता है पर वे पूर्णतया परिस्फट नहीं है। दांपत्य प्रेम के अतिरिक्त मनुष्य की और वृत्तियाँ जिनका कुछ विस्तार के साथ समावेश है, वे यात्रा, युद्ध, सपत्नीकलह, मातृस्नेह, स्वामिभक्ति, वीरता, कृतघ्नता, छल और सतीत्व हैं। पर इनके होते हुए भी 'पदमावत' को हम शृंगाररस प्रधान काव्य हो कह सकते हैं। 'रामचरित' के समान मनुष्य जीवन की भिन्न भिन्न बहुत सी परिस्थितियों और संबंधों का इसमें समन्वय नहीं है। तोते के मुँह से पद्मावती का रूपवर्णन सुनने से राजा रत्नसेन को जो पूर्वराग हुआ, अब उसपर थोड़ा विचार कीजिए। देखने में तो वह उसी प्रकार का जान पड़ता है जिस प्रकार का हंस के मुख से दमयंती का रूपवर्णन सुनकर नल को या नल का रूपवर्णन सुनकर दमयंती को हुआ था। पर ध्यान देकर विचार करने से दोनों में एक ऐसा अंतर दिखाई पड़ेगा जिसके कारण एक की तीव्रता जितनी अयुक्त दिखाई देगी उतनी दूसरे को नहीं। पूर्वराग में ही विप्रलंभ शृंगार की बहुत सी दशानों की योजना श्रीहर्ष ने भी की है और जायसी ने भी। पूर्वराग पूर्ण रति नहीं है, अतः उसमें केवल 'अभिलाष' स्वाभाविक जान पड़ता है; शरीर का सूखकर काँटा होना, मूर्छा, उन्माद आदि नहीं। तोते के मुँह से पहले ही पहले पद्मावती का वर्णन सुनते ही रत्नसेन का मुर्छित हो जाना और पूर्ण वियोगी बन जाना अस्वाभाविक सा लगता है। पर हंस के मुँह से रूप गुण आदि की प्रशंसा सुनने पर जो विरह की दारुण दशा दिखाई गई है वह इसलिये अधिक नहीं खटकती कि नल और दमयंती दोनों बहुत दिनों से एक दूसरे के रूप गण की प्रशंसा सुनते आ रहे थे जिससे उनका पूर्वराग 'मंजिष्ठा राग' की अवस्था को पहुँच गया था। जब तक पूर्वराग आगे चलकर पूर्ण रति या प्रेम के रूप में परिणत नहीं होता तब तक उसे हम चित्त की कोई उदात्त या गंभीर वृत्ति नहीं कह सकते। हमारी समझ में तो दूसरे के द्वारा, चाहे वह चिड़िया हो या आदमी, किसी पुरुष या स्त्री के रूप, गुण आदि को सुनकर चट उसकी प्राप्ति की इच्छा उत्पन्न करनेवाला भाव<noinclude></noinclude> 3tkio3ne1ytnjlmy3b19kz93ajtuw18 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४४ 250 12892 663624 591447 2026-06-21T20:13:35Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663624 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २४ )|}}</noinclude> लोभ मात्र कहला सकता है, परिपुष्ट प्रेम नहीं। लोभ और प्रेम के लक्ष्य में सामान्य और विशेष का ही अंतर समझा जाता है। कहीं कोई अच्छी चीज सुनकर दौड़ पड़ना, यह लोभ है। विशेष वस्तु--चाहे दूसरों के निकट वह अच्छी हो या बुरी देख उसमें इस प्रकार रम जाना कि उससे कितनी ही बढ़कर अच्छी वस्तुओं के सामने आने पर भी उनकी ओर ध्यान न जाय, प्रेम है। व्यवहार में भी प्रायः देखा जाता है कि वस्तूविशेष के ही प्रति जो लोभ होता है वह लोभ नहीं कहलाता जैसे, यदि कोई मनुष्य पकवान या मिठाई का नाम सुनते ही चंचल हो जाय तो लोग कहेंगे कि वह बड़ा लालची है, पर यदि कोई केवल गलाबजामुन का नाम आने पर चाह प्रकट करे तो लोग यही कहेंगे कि इन्हें गुलाबजामुन बहुत अच्छी लगती है। तत्काल सुने हुए रूपवर्णन से उत्पन्न 'पूर्वराग' और 'प्रेम' में भी इसी प्रकार का अंतर समझिये। पूर्वराग रूपगुणप्रधान होने के कारण सामान्योन्मुख होता है पर प्रेम व्यक्तिप्रधान होने के कारण विशेषोन्मुख होता है। एक ने आकर कहा, अमुक बहुत सुंदर है; फिर कोई दूसरा आकर कहता है कि अमुक नहीं अमुक बहुत सुंदर है। इस अवस्था में बुद्धि का व्यभिचार बना रहेगा। प्रेम में पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती है। कोई वस्तु बहुत बढ़िया है, जैसे यह सुनकर हमें उसका लोभ हो जाता है, वैसे ही कोई व्यक्ति बहुत सुंदर है, इतना सुनते ही उसकी जो चाह उत्पन्न हो जाती है वह साधारण लोभ से भिन्न नहीं कही जा सकती। प्रेम भी लोभ ही है पर विशेषान्मुख। वह मन और मन के बीच का लोभ है हदय और हृदय के बीच का सबंध है। उसके एक पक्ष में भी हृदय है और दूसरे पक्ष में भी। अतः सच्चा सजीव प्रेम प्रेमपात्र के हृदय को स्पर्श करने का प्रयत्न पहले करता है, शरीर पर अधिकार करने का प्रयत्न पीछे करता है, सुंदर स्त्री कोई बहमूल्य पत्थर नहीं है कि अच्छा सूना और लेने के लिये दौड़ पड़े। इस प्रकार का दौडना रूपलोभ ही कहा जायगा, प्रेम नहीं। बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। यह परिचय पूर्णतया तो साक्षात्कार से होता है; पर बहुत दिनों तक किसी के रूप, गुण, कर्म आदि का ब्योरा सुनते सुनते भी उसका ध्यान मन में जगह कर लेता है। किसी के रूप गण की प्रशंसा सनते ही एकबारगी प्रेम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक नहीं जान पड़ता। प्रम दूसरे की आँखो नहीं देखता; अपनी आँखों देखता है। अतः राजा रत्नसेन तोतके मुँह से पद्मावती का अलौकिक रूपवर्णन सन जिस भाव की प्रेरणा से निकल पड़ता है वह पहले रूपलोभ ही कहा जा सकता है। इस दष्टि से देखने पर कवि जो उस के प्रयत्न को तप का स्वरूप देता हुआ आत्मत्याग और विरहविकलता का विस्तृत वर्णन करता है वह एक नकल सा मालूम होता है। प्रेम लक्षण उसी समय दिखाई पड़ता है जब वह शिवमदिर में पद्मावती की झलक देख बेसुध हो जाता है। इस प्रेम की पूर्णता उस समय स्फुट होती है जब पार्वती अप्सरा का रूप धारण करके उसके सामने आती हैं और वह उनके रूप की ओर ध्यान न देकर कहता है कि-- {{c|भलेहि रंग अछरी तोर राता। मोहिं दूसरे सौं भाव न बाता।।}} उक्त कथन से रूपलोभ की व्यंजना नहीं होती, प्रेम की व्यंजना होती है।<noinclude></noinclude> jwldjdmd5kcv9z3jealn3fm7b5o8y20 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४५ 250 12903 663626 591458 2026-06-21T20:13:51Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663626 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २५ )|}}</noinclude> प्रेम दूसरा रूप चाहता नहीं, चाहे वह प्रेमपात्र के रूप से कितना ही बढ़कर हो। लैला कुछ बहुत खूबसूरत न थी, पर मजनूँ उसी पर मरता था। यही विशिष्टता और एकनिष्टता प्रेम है। पर इस विशिष्टता के लिए निर्दिष्ट भावना चाहिए जो एक तोते के वर्णन मात्र से नहीं प्राप्त हो सकती। भावना को निदिष्ट करने के लिये ही मनस्तत्व से अभिज्ञ कवि पूर्वराग के बीच चित्रदर्शन को योजना करते हैं। पर यह रूपभावना पूर्व रूप से निर्दिष्ट साक्षात्कार द्वारा ही होती है। शिवमंदिर में पद्मावती की एक झलक जब राजा ने देखी तभी उसकी भावना निर्दिष्ट हई। मंदिर में उस साक्षात्कार के पूर्व राजा की भावना निर्दिष्ट नहीं कही जा सकती। मान लीजिए कि सिंहल के तट पर उतरते ही वही अप्सरा कहती कि 'मैं ही पद्मावती हूँ, और होता भी सकारता, तो रत्नसेन उसे स्वीकार ही कर लेता। ऐसी अवस्था में उसके प्रेम का लक्ष्य निर्दिष्ट कैसे कहा जा सकता? अतः रूपवर्णन सुनते ही रत्नसेन के प्रेम का जो प्रवल और अदम्य स्वरूप दिखाया गया है वह प्राकृतिक व्यवहार की दृष्टि से उपयुक्त नहीं दिखाई पड़ता। राजा रत्नसेन तोते के मुँह से पद्मावती का रूपवर्णन सुन उसके लिये जोगी होकर निकल पड़ा और अलाउद्दीन ने राघव चेतन के मुँह से वैसा ही वर्णन सुन उसके लिये चित्तौर पर चढ़ाई कर दी। क्यों एक प्रेमी के रूप में दिखाई पड़ता है और दूसरा रूपलोभी लंपट के रूप में? अलाउद्दीन के विपक्ष में दो बातें ठहरती हैं--(१) पद्मावती का दूसरे की विवाहिता स्त्री होना और (२) अलाउद्दीन का उग्र प्रयत्न करना। दोनों प्रकार के अनौचित्य अलाउद्दीन की चाह को प्रेम का स्वरूप प्राप्त नहीं होने देते। यदि इस अनौचित्य का विचार छोड़ दें तो रूपवर्णन सुनते ही तत्काल दोनों के हृदय में जो चाह उत्पन्न हुई वह एक दूसरे से भिन्न नहीं जान पड़ती। रत्नसेन के पूर्वराग के वर्णन में जो यह अस्वाभाविकता पाई है इसका कारण है लौकिक प्रेम और ईश्वरप्रेम दोनों को एक स्थान पर व्यंजित करने का प्रयत्न। शिष्य जिस प्रकार गुरु से परोक्ष ईश्वर के स्वरूप का कुछ आभास पाकर प्रेममग्न होता है उसी प्रकार रत्नसेन तोते के मह से पद्मिनी का रूपवर्णन जाता है। ऐसी ही अलौकिकता पद्मिनी के पक्ष में कवि ने दिखाई है। राजा रत्नसेन के सिंहल पहुँचते ही कवि ने पद्मावती की बेचैनी का वर्णन किया है। पद्मावती को अभी तक रत्नसेन के आने को कुछ भी खबर नहीं है। अतः यह व्याकुलता केवल काम की कही जा सकती है, वियोग को नहीं। बाह्य या आभ्यंतर संयोग के पीछे ही वियोगदशा संभव है। यद्यपि प्राचार्यों ने वियोगदशा को कामदशा ही कहा है पर दोनों में अंतर है। समागम के सामान्य अभाव का दुःख कामवेदना है और विशेष के समागम के अभाव का दुःख वियोग है। जायसी के वर्णन में दोनों का मिश्रण है। रत्नसेन का नाम तक सूनने के पहले वियोग को व्याकुलता कैसे हुई, इसका समाधान कवि के पास यदि कुछ है तो रत्नसेन के योग का अलक्ष्य प्रभाव। {{c|पदमावति तेहि जोग सँजोगा। परी प्रेम बस गहे वियोगा।}} साधनात्मक रहस्यवाद योग जिस प्रकार अज्ञात ईश्वर के प्रति होता है उसी<noinclude></noinclude> k46pu9vr74rychmoilni4mltz0xdzz5 पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६ 250 12914 663627 591469 2026-06-21T20:14:05Z Manvikesarwani09 6620 /* प्रमाणित */ 663627 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Manvikesarwani09" />{{rh||( २६ )|}}</noinclude> प्रकार सूफियों का प्रेमयोग भी अज्ञात के प्रति होता है; पर इस प्रकार के परोक्षवाद या योग के चमत्कार पर ध्यान जाने पर भी वर्णन के अनौचित्य की ओरर बिना गए नहीं रह सकता। जब कोई व्यक्ति निर्दिष्ट ही नहीं तब कहाँ का प्रेम और कहाँ का वियोग? उस कामदशा में पद्मावती को धाय समझा ही रही है कि हीरामन सूत्रा आकर रत्नसेन के रूप गण का वर्णन करता है और पद्मावती उसकी प्रेमव्यथा और तप को सुनकर दया और पूर्वरागयुक्त होती है। का प्रारंभ पद्मावती में यहीं से समझना चाहिए। अतः इसके पहिले योग की दुहाई देकर भी वियोग का नाम लेना ठीक नहीं जँचता। विवाह हो जाने के पीछे पद्मावती का प्रेम दो अवसरों पर अपना बल दिखाता है। एक तो उस समय जब राजा रत्नसेन के दिल्ली में बंदी होने का समाचार मिलता है और फिर उस समय जब राजा यद्ध में मारा जाता है। ये दोनों अवसर विपत्ति के हैं। साधारण दष्टि से एक में प्राशा के लिये स्थान है, दूसरे में नहीं। पर सच्च पहुंचे हए प्रेमी के समान प्रथम स्थिति में तो पद्मावती संसार की ओर दृष्टि रखती हुई विह्वल और क्षुब्ध दिखाई पड़ती है; और दूसरी स्थिति में दूसरे लाक का और दष्टि फेरे हए पूर्ण पानंदमयी और प्रशांत। राजा के बंदी होने का समाचार पाने पर रानी के विरहविह्वल हृदय में उद्योग और साहस का उदय होता है वह गोरा और बादल के पास आप दौड़ी जाती है और रो रोकर अपने पति के उद्धार का प्रार्थना करती है। राजा रत्नसेन के मरने पर रोना धोना नहीं सुनाई देता। नागमती और पद्मावती दोनों श्रृंगार करके प्रिय से उस लोक में मिलने के लिये तैयार होती हैं। यह दृश्य हिंदू स्त्री के जीवनदीपक की अत्यंत उज्ज्वल और दिव्य प्रभा है जो निर्वाण के पूर्व दिखाई पड़ती है। राजा के बंदी होने पर जिस प्रकार कवि ने पद्मावती के प्रेमप्रसूत साहस का दृश्य दिखाया है उसी प्रकार सतीत्व की दढ़ता का भी। पर यह कहना पड़ता है कि कवि ने जो कसौटी तैयार की है वह इतने बड़े प्रेम के उपयुक्त नहीं हुई है। कुंभलनर का राजा देवपाल रूप, गुण, ऐश्वर्य, पराक्रम, प्रतिष्ठा किसी में भी रत्नसेन का बराबरी का न था। अतः उसका दूती भेजकर पद्मावती को बहकाने का प्रयत्न गड़ा हया खंभा ढकेलने का बालप्रयत्न सा लगता है। इस घटना के संनिवेशसे पद्मावती के सतीत्व की उज्ज्वल कांति में और अधिक प्रोप चढ़ती नहीं दिखाई देती। यदि वह दुती दिल्ली के बादशाह की होती और वह दिल्लीश्वर की सारी शक्ति और विभूति का लोभ दिखाती तो वभूति का लोभ दिखाती तो अलबत यह घटना किसी हद तक इतने बड़े प्रेम की परीक्षा का पद प्राप्त कर सकती थी, क्योंकि देवलदेवी और कमलादेवी के विपयाचरण का दृष्टांत इतिहासविज्ञ जानते ही हैं। पद्मावती के नवप्रस्फुटित प्रेम के साथ साथ नागमती का गार्हस्थ्यपरिपुष्ट प्रेम भी अत्यंत मनोहर है। पद्मावती प्रेमिका के रूप में अधिक लक्षित होती है, पर नागमती पतिप्राणा हिंदू पत्नी के मधुर रूप में ही हमारे सामने आती है। उसे पहले पहल हम रूपविता और प्रेमविता के रूप में देखते हैं। ये दोनों प्रकार के गर्व दांपत्य सुख के द्योतक हैं। राजा के निकल जाने के पीछे फिर हम उसे प्रोषितपतिका के उस निर्मल स्वरूप में देखते हैं जिसका भारतीय काव्य और संगीत में<noinclude></noinclude> aufq0skkabty7yv5yk3t9kw54msoms5 पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/१९८ 250 28305 663537 572397 2026-06-21T18:20:59Z Anu7hka 6687 /* शोधित */ 663537 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" /></noinclude>________________ हिन्दुस्तान को आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन । १७९ दूसरा परिच्छेद । हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन | सम्पत्तिशास्त्र में वहुधा व्यापक सिद्धान्तोंहों का विवेचन किया जाता है । किसी देश विशेष से सम्बन्ध रखनेवाले सिद्धान्तों का विचार प्रायः कम किया जाता है । पर हमारी समझ में ऐसा ज़रूर होना चाहिए । सम्पत्तिशास्त्र का सम्बन्ध व्यवहार की बातों से हैं । अतएव व्यवहार की बातों में अन्तर होने से शास्त्रीय सिद्धान्तों में ज़रूरी अन्तर पड़ जाता है । फिर क्यों न प्रत्येक देश की व्यवस्था को अलग अलग विचार हो? इस तरह के विचार से जो देश सम्पत्ति में हीन है उसकी हीनता के कारण मालूम हो जाते हैं और उन्हें दूर करने में सुभीता होता है । इस देश की आर्थिक अवस्था हीन है । इसमें कोई सन्देह नहीं । इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिन बातों से देश की आर्थिक दशा सुधरती है उन सबको करना इस देशवालों के हाथ में नहीं । उनमें से बहुतेरी बातों को राजा ने अपने हाथ में ले रक्खा है । जिसमें वह अपनी, अपने देश की, अपने देशवासियों की हानि समझता है उसे नहीं करता । फिर उससे चाहे हिंदुस्तान का कितना ही लाभ क्यों न होता हो । इँगलिस्तान में ज़मीदारों को ज़मीन का लगान नहीं देना पड़ता । हिन्दुस्तान में देना पड़ता है; और थोड़ा नहीं बहुत देना पड़ता है । फिर वह बीस बीस तीस तीस वर्ष बढ़ वह भी जाता है । यही नहीं, किसान और ज़मींदार दोनों बेदखल भी कर दिये जा सकते हैं । हाँ बंगाल में इस्तिमगरी बन्दोबस्त हैं । वहां न बेदखली का डर है और न लगाने में इज़ाफ़े का । सरकार जमीन की जो मालगुजारी लेती हैं वह मज़दूरी आदि बाद देकर बची हुई पैदावार का आधा है । अर्थात् ५० फ़ी सदी मालगुज़ारी सरकार को देनी पड़ती है । यह शरह मामूली फ़सल के हिसाब से बाँधी गई है । पर यदि फ़सल ख़राब जाती हैं तो भी प्रजा को अकसर उतनी ही मालगुज़ारी देनी पड़ती है जितनी कि अच्छी फसल होने पर देनी पड़ती । फिर यह ५० फ़ी सदी को शरह सब कहीं प्रचलित नहीं । कहीं कहीं ६० फ़ी सदी तक लगान देना पड़ता है । और पटवारी, चौकीदारी, स्कूल, शफ़ाख़ाने आदि<noinclude></noinclude> a37lluzr8y27jo9bwakoum2h9lgtk62 पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/१९९ 250 28306 663573 572398 2026-06-21T18:55:59Z Anu7hka 6687 /* शोधित */ 663573 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" /></noinclude>१८० सम्पत्ति-शास्त्र । का कर लगाकर वह कहीं कहीं ६५ फ़ी सदी से भी अधिक हो जाती है । इसका फल यह होता है कि काश्तकारों को बहुत ही कम क्या, किसी किसी को प्रायः कुछ भी नहीं बचता और उनकी ज़मीन नीलाम हो जाती है । यहां के वाणिज्य-व्यवसाय की भी बुरी दशा और कृषी की भी । यही दो मदें देश की सम्पत्ति बढ़ानेवाली हैं । सो दोनों की दुर्दशा हैं । इस भूमण्डल का कोई देश, फिर चाहे वह कैसा ही सम्पत्तिमान् क्यों न हो, इस दशा में कभी उन्नत नहीं हो सकता । साठ साठ फ़ी सदी के हिसाब से कृषी की पैदावार को काश्तकारों में लेने पर काई देश बरबाद होने से नहीं बच सकता । इस देश की आर्थिक अवनति का एक कारण यह भी है कि विदेशी राज्य होने के कारण विदेशी अधिकारी और विदेशी फ़ौज रखने तथा विदेशी सामान खरीदने में बेअन्दाज़ सम्पत्ति खर्च होती हैं । फिर यह ख़र्च हुई सम्पत्ति यहीं नहीं रहतीं । इँगलैंड चली जाती है । और भारत उससे हमेशा के लिए हाथ धो बैठता है । हिंदुस्तान के ख़र्च खाते इँगलैंड में हर साल कोई २० करोड़ रुपया लिखा जाता है । यह सत्र हिन्दुस्तान को देना पड़ता हैं । प्रजा से गवर्नमेंट जो मालगुजारी वसूल करती हैं उसका एक चतुर्थांश विलायत जाता है । जो अँगरेज़ इस देश में सरकारी नौकरी करते हैं वे जो द्रव्य अपने देश को, अपनी तनख़्वाह से बचा कर, भेजते हैं वह यदि इसे हिसाब में जोड़ लिया जाए तो इस देश से विलायत जानेवाली सम्पत्ति का परिमाण और भी अधिक हो जाए । हर साल इसी तरह इस देश की सम्पत्ति की धारा बिलायत को बहती है और इस देश की दरिद्रता बढ़ाने का कारण होती हैं । इस सम्पत्ति का कई बदला हिन्दुस्तान को नहीं मिलता । इस दशा में यदि भारत की भूमि सुवर्णमय हो जाए तो भी किसी दिन यह देश कंगाल हुए बिना न रहे । विलायत में हर आदमी की सालाना आमदनी का औसत कोई ६०० रुपया है और हिन्दुस्तान में हर आदमी का सिर्फ ३० रुपया ! इस पर भी विलायतवाले "होम चार्जेज़" के नाम से यहां के फ़ी आदमी से औसतन् ७६ रुपया वसूल करके अपने देश के ले जाते हैं । फिर भला क्यों न यह देश दिनों दिन दरिद्रता की फाँस में हँसता जाए?<noinclude></noinclude> 0tdaihbsbim14u1fxjrh862rrh56l9s 663575 663573 2026-06-21T18:56:29Z Anu7hka 6687 663575 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" /></noinclude>१८० सम्पत्ति-शास्त्र । का कर लगाकर वह कहीं कहीं ६५ फ़ी सदी से भी अधिक हो जाती है । इसका फल यह होता है कि काश्तकारों को बहुत ही कम क्या, किसी किसी को प्रायः कुछ भी नहीं बचता और उनकी ज़मीन नीलाम हो जाती है । यहां के वाणिज्य-व्यवसाय की भी बुरी दशा और कृषी की भी । यही दो मदें देश की सम्पत्ति बढ़ानेवाली हैं । सो दोनों की दुर्दशा हैं । इस भूमण्डल का कोई देश, फिर चाहे वह कैसा ही सम्पत्तिमान् क्यों न हो, इस दशा में कभी उन्नत नहीं हो सकता । साठ साठ फ़ी सदी के हिसाब से कृषी की पैदावार को काश्तकारों में लेने पर काई देश बरबाद होने से नहीं बच सकता । इस देश की आर्थिक अवनति का एक कारण यह भी है कि विदेशी राज्य होने के कारण विदेशी अधिकारी और विदेशी फ़ौज रखने तथा विदेशी सामान खरीदने में बेअन्दाज़ सम्पत्ति खर्च होती हैं । फिर यह ख़र्च हुई सम्पत्ति यहीं नहीं रहतीं । इँगलैंड चली जाती है । और भारत उससे हमेशा के लिए हाथ धो बैठता है । हिंदुस्तान के ख़र्च खाते इँगलैंड में हर साल कोई २० करोड़ रुपया लिखा जाता है । यह सत्र हिन्दुस्तान को देना पड़ता हैं । प्रजा से गवर्नमेंट जो मालगुजारी वसूल करती हैं उसका एक चतुर्थांश विलायत जाता है । जो अँगरेज़ इस देश में सरकारी नौकरी करते हैं वे जो द्रव्य अपने देश को, अपनी तनख़्वाह से बचा कर, भेजते हैं वह यदि इसे हिसाब में जोड़ लिया जाए तो इस देश से विलायत जानेवाली सम्पत्ति का परिमाण और भी अधिक हो जाए । हर साल इसी तरह इस देश की सम्पत्ति की धारा बिलायत को बहती है और इस देश की दरिद्रता बढ़ाने का कारण होती हैं । इस सम्पत्ति का कई बदला हिन्दुस्तान को नहीं मिलता । इस दशा में यदि भारत की भूमि सुवर्णमय हो जाए तो भी किसी दिन यह देश कंगाल हुए बिना न रहे । विलायत में हर आदमी की सालाना आमदनी का औसत कोई ६०० रुपया है और हिन्दुस्तान में हर आदमी का सिर्फ ३० रुपया ! इस पर भी विलायतवाले "होम चार्जेज़" के नाम से यहां के फ़ी आदमी से औसतन् ७६ रुपया वसूल करके अपने देश के ले जाते हैं । फिर भला क्यों न यह देश दिनों दिन दरिद्रता की फाँस में फँसता जाए?<noinclude></noinclude> 42bn6dh9esilbbrtlep4s1bqt5tx9gp पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/२०० 250 28309 663647 572401 2026-06-21T21:07:10Z Anu7hka 6687 /* शोधित */ 663647 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८१}}</noinclude>हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन । १८१ यहां की साम्पत्तिक अवस्था अच्छी न होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि गवर्नमेंट का अकसर करोड़ों रुपया क़र्ज़ लेना पड़ता है । इस समय कई अरब रुपये क़र्ज़ हिन्दुस्तान के सिर पर है । उस पर जैश सूद सरकार की देना पड़ता है उससे यही का पहले ही से बढ़ा हुआ ख़र्च और भी बढ़ जाता है । हम लोगों की रग रग में पुरानापन घुसा हुआ है । पुरानी आदतें हमारी छूटती ही नहीं । वही पुराना चर्चा और वही पुराना हुल अब तक चल रहा है । यहां की ज़मीन और आबोहवा ऐसी है कि कच्चा पाना यहाँ बहुत पैदा होता है । मज़दूर जितने चाहो मिल सकते हैं; और मज़दूरी भी सस्ती है । पर मज़दूर न तो चुस्त और चालाकही हैं और न कामही अच्छा करना जानते हैं । मज़दूरों से मतलब कुलियों से नहीं, किन्तु हाथ से काम करनेवाले जितने श्रमजीवी हैं सबसे हैं । पूँजी बहुत कम हैं । जितनी है भी उसका अधिकांश जेवर या प्रामिसरी नोट आदि के रूप में पड़ा हुआ है । उससे काई उद्योग-धन्धा किया ही नहीं जाता । फिर पूँजी चाहे ऐसे तंगदिल आदमी हैं कि व्यापार-व्यवसाय में रुपया लागने का उन्हें साहस ही नहीं होता । वे डरते हैं कि कहीं हमारा रुपया डूब न जाए । सम्भूय-समुत्थान का तो नाम ही न लीजिए । कम्पनियां खड़ी करके बड़े बड़े व्यवसाय करना यहां बालों के मालूम ही नहीं । सब लोगों की जीविका प्रायः खेती से चलती है । सो खेती की यह दशा है कि जमीन को उर्धरा बनाने–असकी उत्पादक शक्ति बढ़ाने-की उत्तम तरकीबें लोगों को न मालूम होने से उसकी पैदावार कम होती जाती है । फिर किसी साल पानी बरसता है, किसी साल नहीं बरसता । जिस साल जहाँ नहीं बरसता वहां कुछ नहीं पैदा होता । कलकत्ते, बंबई और कानपुर आदि में जो बड़े बड़े कारखाने हैं वे अभी कल के हैं । बड़े बड़े व्यापारी भी बहुत कम हैं । ऐसे कुछ ही व्यापारी होंगे जिनके जहाज़ चलते हैं । जितने व्यापार और उद्यम-धन्धे हैं सब थोड़ी पूँजी से चलते हैं । ज़मीन पर प्रजा का कोई हक़ नहीं, गवर्नमेंट कहती हैं वह हमारी हैं । सञ्चय करना लोग जानते नहीं । अभी सौ सवा सौ वर्ष पहले हुक तो किसी के जान-माल तक का ठिकाना न था । सञ्चय लोग लुटेरों के लिए थोड़े ही करते ! हाँ अब अंगरेजी राज्य की बदौलत अमन चैन हैं । इससे कुछ सञ्चय होने लगा हैं । धार्मिक ख़याल लोगों के कुछ ऐसे हो रहे हैं कि सम्पत्ति बुरी चीज़ समझी जाती है । वह न हो सोई बेहतर ।<noinclude></noinclude> 6pq8sh9m4fxcjrlcqcymtdy7wr51n2i 663648 663647 2026-06-21T21:07:46Z Anu7hka 6687 663648 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८१}}</noinclude>यहां की साम्पत्तिक अवस्था अच्छी न होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि गवर्नमेंट का अकसर करोड़ों रुपया क़र्ज़ लेना पड़ता है । इस समय कई अरब रुपये क़र्ज़ हिन्दुस्तान के सिर पर है । उस पर जैश सूद सरकार की देना पड़ता है उससे यही का पहले ही से बढ़ा हुआ ख़र्च और भी बढ़ जाता है । हम लोगों की रग रग में पुरानापन घुसा हुआ है । पुरानी आदतें हमारी छूटती ही नहीं । वही पुराना चर्चा और वही पुराना हुल अब तक चल रहा है । यहां की ज़मीन और आबोहवा ऐसी है कि कच्चा पाना यहाँ बहुत पैदा होता है । मज़दूर जितने चाहो मिल सकते हैं; और मज़दूरी भी सस्ती है । पर मज़दूर न तो चुस्त और चालाकही हैं और न कामही अच्छा करना जानते हैं । मज़दूरों से मतलब कुलियों से नहीं, किन्तु हाथ से काम करनेवाले जितने श्रमजीवी हैं सबसे हैं । पूँजी बहुत कम हैं । जितनी है भी उसका अधिकांश जेवर या प्रामिसरी नोट आदि के रूप में पड़ा हुआ है । उससे काई उद्योग-धन्धा किया ही नहीं जाता । फिर पूँजी चाहे ऐसे तंगदिल आदमी हैं कि व्यापार-व्यवसाय में रुपया लागने का उन्हें साहस ही नहीं होता । वे डरते हैं कि कहीं हमारा रुपया डूब न जाए । सम्भूय-समुत्थान का तो नाम ही न लीजिए । कम्पनियां खड़ी करके बड़े बड़े व्यवसाय करना यहां बालों के मालूम ही नहीं । सब लोगों की जीविका प्रायः खेती से चलती है । सो खेती की यह दशा है कि जमीन को उर्धरा बनाने–असकी उत्पादक शक्ति बढ़ाने-की उत्तम तरकीबें लोगों को न मालूम होने से उसकी पैदावार कम होती जाती है । फिर किसी साल पानी बरसता है, किसी साल नहीं बरसता । जिस साल जहाँ नहीं बरसता वहां कुछ नहीं पैदा होता । कलकत्ते, बंबई और कानपुर आदि में जो बड़े बड़े कारखाने हैं वे अभी कल के हैं । बड़े बड़े व्यापारी भी बहुत कम हैं । ऐसे कुछ ही व्यापारी होंगे जिनके जहाज़ चलते हैं । जितने व्यापार और उद्यम-धन्धे हैं सब थोड़ी पूँजी से चलते हैं । ज़मीन पर प्रजा का कोई हक़ नहीं, गवर्नमेंट कहती हैं वह हमारी हैं । सञ्चय करना लोग जानते नहीं । अभी सौ सवा सौ वर्ष पहले हुक तो किसी के जान-माल तक का ठिकाना न था । सञ्चय लोग लुटेरों के लिए थोड़े ही करते ! हाँ अब अंगरेजी राज्य की बदौलत अमन चैन हैं । इससे कुछ सञ्चय होने लगा हैं । धार्मिक ख़याल लोगों के कुछ ऐसे हो रहे हैं कि सम्पत्ति बुरी चीज़ समझी जाती है । वह न हो सोई बेहतर ।<noinclude></noinclude> r2p5gvhlvukshbxiqajf5dux5jy826c पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/२०१ 250 28310 663665 572402 2026-06-22T07:44:51Z Anu7hka 6687 /* शोधित */ 663665 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" />{{rh|१८२|सम्पत्ति-शास्त्र।|}}</noinclude>ऐसी ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो देश की सम्पत्ति बढ़ाने की बाधक हैं । अतएव यदि हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था हीन हो; यदि उसके अधिकांश निवासियों के दोनों चक, पेट भर खाने के न मिले; एक साल पानी न बरसने पर, दरिद्रता के कारण, यदि हजारों आदमी भूखों मर जायें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । यहां के व्यापार को देखिए । विलायत की चीज़ों से यहां की बाज़ारें भरी हुई हैं । शुरू शुरू में इँगलिस्तान की गवर्नमेंट ने यहाँ पे कपड़े की रफ्तनी को, विलायत में उसपर कड़ा महसूल लगा कर, बिल्कुल ही रोक दिया । यहाँ का व्यापार-यहां का फलाकौशल–मारा गया । अब जब उसके पुनरुजीवन की ओर लोगों का ध्यान गया है तब यथेष्ट कर लगा कर विलायती वस्तुओं की आमदनी रोकी नहीं जाती । अगर किसी विलायती चीज़ पर कुछ महसूल है भी तो इतना कम है कि न होने के बराबर है । एक समय था कि डच, अरब और अंगरेज़ सौदागर इस देश की बनी हुई चीज़ों से सारे योरप के बाज़ार पाट देते थे । पर अब वह सब स्वप्न हो गया है । मंच तो सिर्फ़ कथा माल, विशेष करके प्रजा के पेट पालने का अनाज, देशान्तर को जाता है और अकाल पड़ने पर यहां चालों का दाने दाने के लिए मुहताज होना पड़ता है । प्रजा-वत्सल राजा को चाहिए कि इस अन्धेर को रोके । प्रतिवन्ध-हीन व्यापार से इस देश को बड़ी हानि पहुँच रही है - इसकी आर्थिक दशा दिनों दिन खराब हो रही है । इँगलैंड एक छोटा सा टापू है । उसे खाने पीने तक की चीजों के लिए भी और देशों का मुँह ताकना पड़ता है । अतएव वह यदि इस तरह के व्यापार का पक्षपाती हो तो हो सकता है । हिन्दुस्तान क्यों हो? वह तो अपने व्यवहार को प्रायः सारी चीजें आपही पैदा कर सकता है । यदि इस देश में बाहर से आने वाला माल कर लगा कर रोका जाए, या उसकी आमदनी कम की जाए, तो यहाँ की आर्थिक अवस्था को बहुत जल्द उन्नति हो जाए । इँगलैंड ने खुद ही शुरू शुरू में यह पक्ष की थी । हिन्दुस्तानी माल पर उसने कड़े से कड़ा कर लगा कर विलायत में उसकी आमदनी रोक दी और विलायती माल बिना कर, या बहुत थोड़ा कर लगा कर, हिन्दुस्तान में भर दिया । फल यह हुआ कि यहाँ का प्रायः सारा व्यापार और प्रायः सारे उद्योग-धन्धे मारे गये । वही इँगलैंड अब हमारे<noinclude></noinclude> bsmjxvywvf0rq4lt0ab6d0up3kz17nx पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/२०२ 250 28311 663666 572403 2026-06-22T08:14:08Z Anu7hka 6687 /* शोधित */ 663666 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८३}}</noinclude>लिए अबाध वाणिज्य की ज़रूरत समझता है । क्या अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और खुद अंग्रेज़ों ही का उपनिवेश आस्ट्रेलिया आदि देश मूर्ख हैं जो अबाध वाणिज्य के खिलाफ़ हैं? नहों, वे बड़े दूरन्देश और बड़े स्वदेशहित-चिन्तक हैं । इससे वे व्यापार-विषयक "संरक्षण" के पक्षपाती हैं । अँगरेज़-अधिकारी भी इस बात को समझते हैं । पर वे करें क्या? उन्हें ,खुद अपने देश के, अपने घर के, अपनी जाति के व्यवसायियों और व्यापारियों का भी ख़याल हैं । यदि उनके तैयार किए हुए माल पर कर लगा दिया जाएगा तो उनके मुँह की रोटी छिन जाएगी ! उनके कारख़ाने बन्द पड़ जाएंगे । इँगलैंड में हाहाकार मच जाएगा । अतएव अंगरेज़-व्यापारियों को हानि पहुँचा कर हिन्दुस्तान का भला गवर्नमेंट कैसे कर सकती है? इसके लिए गवर्नमेंट विशेष दोषी भी नहीं, क्योंकि - "अव्वल ख़ेश, बादहू दरवेश" । हिन्दुस्तान के कुछ प्रान्त ऐसे हैं जो बेतरह बने वसे हुए हैं । वहां बीघे भर भी परती ज़मीन न मिलेगी । पर मध्य भारत में कई रियासतें ऐसी हैं जहाँ लाखों बीघे अच्छी ज़मीन योहीं पड़ी हुई हैं । कोई जोतने बोने वाला ही नहीं । ऐसे और भी कई प्रान्त हैं जहां ज़मीन बहुत है, पर उसे जोतने वाले कम ! यदि लोग ऐसी ऐसी जगहों में जाकर आबाद हो तो सम्पत्ति की वृद्धि हुए बिना न रहे । नौ-आबाद आदमियों की आर्थिक अवस्थी बहुत कुछ सुधर जाए । पंजाब के कुछ जिलों में गवर्नमेंट ने जो उपनिवेश-स्थापना शुरू कर दी हैं उसके कारण हज़ारों बीघे परती ज़मीन उपयोग में आ गई हैं और कितने ही नये नये गांव आबाद हो गये हैं । यदि गवर्नमेंट अन्यत्र भी ऐसा ही करे, और यहां की देशी रियासतें भी गवर्नमेंट का अनुकरण करें, तो देश को बड़ा उपकार हो । राजा जो कर प्रजा से लेता है वह प्रजा ही की रक्षा के लिए - प्रजा ही के लाभ के लिए - लेता है । प्रजा को अर्थकरी शिक्षा देना भी रजा ही का काम है । पर औद्योगिक कला-कौशल सम्बन्धी शिक्षा देने का गवर्नमेंट ने आज तक इस देश में कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । जो कुछ किया भी है वह न करने के बराबर है । जिस जाति को - जिस देश को - इस सभ्यता और व्यापार-विषयक चढ़ा ऊपरी के ज़माने में औद्योगिक शिक्षा नहीं मिलती उसकी आर्थिक दशा कभी उन्नत नहीं हो सकती । जिस देश के लोग दास्यवृत्ति करके पेट भर लेना ही शिक्षा का एक मात्र उद्देश समझते<noinclude></noinclude> 51p67rd75o3h12gw9dw2pq89eat0s3v 663667 663666 2026-06-22T08:17:57Z Anu7hka 6687 663667 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Anu7hka" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८३}}</noinclude>लिए अबाध वाणिज्य की ज़रूरत समझता है । क्या अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और खुद अंग्रेज़ों ही का उपनिवेश आस्ट्रेलिया आदि देश मूर्ख हैं जो अबाध वाणिज्य के खिलाफ़ हैं? नहीं, वे बड़े दूरन्देश और बड़े स्वदेशहित-चिन्तक हैं । इससे वे व्यापार-विषयक "संरक्षण" के पक्षपाती हैं । अँगरेज़-अधिकारी भी इस बात को समझते हैं । पर वे करें क्या? उन्हें ,खुद अपने देश के, अपने घर के, अपनी जाति के व्यवसायियों और व्यापारियों का भी ख़याल हैं । यदि उनके तैयार किए हुए माल पर कर लगा दिया जाएगा तो उनके मुँह की रोटी छिन जाएगी ! उनके कारख़ाने बन्द पड़ जाएंगे । इँगलैंड में हाहाकार मच जाएगा । अतएव अंगरेज़-व्यापारियों को हानि पहुँचा कर हिन्दुस्तान का भला गवर्नमेंट कैसे कर सकती है? इसके लिए गवर्नमेंट विशेष दोषी भी नहीं, क्योंकि - "अव्वल ख़ेश, बादहू दरवेश" । हिन्दुस्तान के कुछ प्रान्त ऐसे हैं जो बेतरह बने वसे हुए हैं । वहां बीघे भर भी परती ज़मीन न मिलेगी । पर मध्य भारत में कई रियासतें ऐसी हैं जहाँ लाखों बीघे अच्छी ज़मीन योहीं पड़ी हुई हैं । कोई जोतने बोने वाला ही नहीं । ऐसे और भी कई प्रान्त हैं जहां ज़मीन बहुत है, पर उसे जोतने वाले कम ! यदि लोग ऐसी ऐसी जगहों में जाकर आबाद हो तो सम्पत्ति की वृद्धि हुए बिना न रहे । नौ-आबाद आदमियों की आर्थिक अवस्थी बहुत कुछ सुधर जाए । पंजाब के कुछ जिलों में गवर्नमेंट ने जो उपनिवेश-स्थापना शुरू कर दी हैं उसके कारण हज़ारों बीघे परती ज़मीन उपयोग में आ गई हैं और कितने ही नये नये गांव आबाद हो गये हैं । यदि गवर्नमेंट अन्यत्र भी ऐसा ही करे, और यहां की देशी रियासतें भी गवर्नमेंट का अनुकरण करें, तो देश को बड़ा उपकार हो । राजा जो कर प्रजा से लेता है वह प्रजा ही की रक्षा के लिए - प्रजा ही के लाभ के लिए - लेता है । प्रजा को अर्थकरी शिक्षा देना भी रजा ही का काम है । पर औद्योगिक कला-कौशल सम्बन्धी शिक्षा देने का गवर्नमेंट ने आज तक इस देश में कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । जो कुछ किया भी है वह न करने के बराबर है । जिस जाति को - जिस देश को - इस सभ्यता और व्यापार-विषयक चढ़ा ऊपरी के ज़माने में औद्योगिक शिक्षा नहीं मिलती उसकी आर्थिक दशा कभी उन्नत नहीं हो सकती । जिस देश के लोग दास्यवृत्ति करके पेट भर लेना ही शिक्षा का एक मात्र उद्देश समझते<noinclude></noinclude> ig7m3u1folx9sii968c8akudimk2z03 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८ 250 163843 663551 516961 2026-06-21T18:40:57Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ३४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय न काता हो वे त्यागपत्र दें, आलस्य छोड़कर नियमपूर्वक कातने का अभ्यास करें और तब कांग्रेसमें फिर प्रवेश करें। इस तरह कांग्रेस दिन-प्रतिदिन शुद्ध और शक्तिमान संस्था बनती जायेगी। लेकिन गुजरातमें जो लोग प्रतिनिधि नहीं है उन्होंने काफी मात्रामें सूत भेजकर प्रतिनिधियोंके इस दोषको ढंक दिया है। १५ अगस्ततक सूत भेजनेवालोंकी कुल संख्या ६७२ थी। इसका अर्थ यह है कि प्रतिनिधियों के अलावा अन्य ५०३ भाइयों और बहनोंने अपना सूतका हिस्सा भेजा है। मैं इस स्थितिको आशाजनक मानता हूँ। इतनी सख्यासे मुझं आश्चर्य नहीं होता। कांग्रेस के प्रस्तावका मुद्दा ही यह है कि प्रतिनिधियोंकी देखा-देखी, उनके प्रयाससे लाखों भाई और बहन हमें यजके रूपमें अर्थात् मुफ्त प्रतिदिन अपनी आध घंटेकी मेहनत दें। अतएव मझे उम्मीद है कि आगामी मासमें ५०३ के बजाय बहुत अधिक भाई और बहन हमें अपने हाथका कता हुआ सूत भेजेंगे। सूत भेजनेवाले प्रतिनिधियोंका विवरण इस तरह है: । कुल प्रतिनिधि सूत भेजनेवाले सूत न भेजनेवाले अ०भा० कां० कमेटी प्रान्तीय कमेटी अहमदाबाद २३ २९ खेड़ा ११७ भड़ौंच ८२ सूरत ७८ पंचमहाल ४०८ २२ २६ roc २३९ ५३ ८४ फुटकर सूत भेजनेवालोंका विवरण निम्न प्रकार है: सूत भेजनेवाले अहमदाबाद आश्रम खेड़ा बोरसद पेटलाद कपडवंज नडियाद भादरण बड़ौदा आनन्द महमदाबाद खम्भात م م ه م م ه س به<noinclude></noinclude> rw6lbgg6ip7tkec06jwyak6djsdj0ua पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६९ 250 163844 663554 516962 2026-06-21T18:44:36Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ पहली परीक्षा ६१ सूरत -- बारडोली अन्य भड़ौंच खादी मंडल २१ १६ कुल ५०३ इन आँकड़ोंसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जहाँ अधिक काम हुआ है वहाँसे हमें अधिक सूत मिला है। खेड़ा जिलेके लोगोंको अधिक सूत कातना आता है इससे खेड़ाने ज्यादा सूत भेजा है, सो बात नहीं। बल्कि वहाँपर ज्यादा काम हुआ है इसीलिए वहाँके ज्यादा भाइयों और बहनोंने सूत भेजा है। पंचमहालसे सूतका ढेर मिलना चाहिए था। यह खेदकी बात है कि वहाँके प्रतिनिधियोंके नामोंके आगे कुछ भी नहीं मिलता। भड़ौंचके केवल १२ लोग ही सूत कातें, इसका क्या अर्थ हो सकता है ? काठियावाड़का एक भी नाम फुटकर सूत कातनेवालोंमें नहीं है, इससे क्या पता चलता है? पैसा देना आसान था। आधे घंटेकी मेहनत देना मुसीबतकी बात जान पड़ती है! कुछ लोग कह सकते हैं कि हम तो अपनी इच्छासे जैसे चाहे वैसे मेहनत करनेके लिए स्वतन्त्र हैं। यदि कोई ऐसा कहता है तो वह संगठनकी कीमत नहीं जानता। वर्षा ऋतमें बंदकी कोई कीमत नहीं होती; परन्तु अनेक बंदे मिलकर अकालको सुकालमें बदल सकती है। अनेक होने के बावजूद यदि ये सारी बूंदें स्वेच्छाचारी बन जायें और एक निश्चित नियमका अनुसरण न करें तो ये सब बूंदे निष्फल हो जायेंगी। इसी तरह यदि अनेक स्त्री-पुरुष अपनी इच्छानुसार सेवा करते रहें तो भी वह सेवा व्यर्थ सिद्ध होगी। किन्तु यदि अनेक स्त्री-पुरुष किसी नियमके अधीन होकर कुछ कार्य करें तो वह कार्य चमक उठता है। इसलिए जो सेवा करना चाहते हैं उन्हें एक नियमके अधीन रहकर कार्य करना चाहिए, इसीमें उनकी और देशकी भलाई है। अतएव गुजरातने फुटकर संख्यामें जो सूत भेजा है वह यद्यपि आशाजनक है, तथापि आश्चर्यजनक नहीं। वह आशाजनक इस तरह है कि प्रत्येक मास सूत भेजनेवालोंकी संख्या बढ़ती जायेगी। मुझे उम्मीद है कि जिन ६७२ लोगोंने शुरुआत की है वे लोग तो नियमका पालन करते हुए प्रति मास सूत कातकर भेजते रहेंगे। अभी एक खुशीकी बात लिखनी बाकी है और वह यह कि कुछ लोगोंने बहुत ज्यादा सूत काता है। अब्बास साहब और वल्लभभाई दोनोंमें से प्रत्येकने ५,००० गज सूत भेजा है। एक भाईने ४३,००० गज' सूत काता और भेजा है। दूसरेने २७,००० गज काता है और इसमें से ११,००० गज भेजा है। तीसरेने २४,००० गज सूत काता है और उसमें से १२,००० गज भेजा है। अन्तिम दो व्यक्ति तो बहुत ज्यादा कार्य-व्यस्त रहने के बावजूद इतना कात सके हैं। एक युवकने ४६,००० गज सूत काता है; किन्तु उसने दान केवल ३,००० गजका ही किया है, क्योंकि सारेकेसारे सूतको दानमें देना उनकी शक्तिसे बाहर है। इस तरह अधिक कातनेवाले लोग<noinclude></noinclude> bsd5faehjuqi765f4d4hjv94hko2xz3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६४७ 250 166750 663556 523381 2026-06-21T18:46:48Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ भाषण : शामलदास कालेज, भावनगरमें ६११ ही सिखाये जाते थे। मंत्र क्या है ? संक्षिप्त भाषामें कहा हुआ सार-तत्त्व | इसके बाद उसपर टीकाएँ हुई । आज तो पुस्तकोंका ढेर लग गया है। मैं यदि अपने ही कालकी बात करूँ तो मुझे ऐसी अनेक चीजें याद आती हैं, जो त्याग करने लायक थीं। छठी-सातवीं श्रेणीके विद्यार्थियोंमें कौन रेनॉल्ड्सके उपन्यास नहीं पढ़ता था, यह कहना कठिन है । पर मैं तो था मन्द-बुद्धि । मैं महज पास होनेका ही खयाल करता था । पिता की सेवा करना और पास होनेके लायक किताबें पढ़ लेना, यही मेरा काम था। इससे मैं उन उपन्यासोंसे बच गया । औरोंपर ऐसी पुस्तकोंका क्या असर होता है, सो मैं नहीं जानता । पर विलायत में मैंने देखा कि समाजके शिष्ट वर्गोंमें ये पुस्तकें पढ़ी नहीं जाती थीं। उनका पढ़ना अच्छा नहीं समझा जाता था । सो मैंने देखा कि उनके न पढ़नेसे मेरी कुछ हानि न हुई । इसी प्रकार आज अनेक चीजें ऐसी हैं जिनसे मुँह मोड़ने की जरूरत है । हम बड़ी विषम स्थिति में आ फँसे हैं । आज तो १२ सालकी उम्र में आजीविकाका विचार करना पड़ता है। यह विद्यार्थी आश्रम के साथ गृहस्थाश्रमका संकर हुआ । गंगा-जमनाका संगम तो सुन्दर है; पर यह संगम नहीं, संकर है । अतएव विद्यार्थियोंको आज यह जान लेना चाहिए कि देश में क्या हो रहा है। आज शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा होता है जो अखवार न पढ़ता हो । मैं किस तरह कहूँ कि आपको अखबार न पढ़ना चाहिए ? पर विद्यार्थियोंसे में इतना तो जरूर कहूँगा कि अखबारोंके क्षणिक साहित्यकी ओर आंख उठाकर न देखना । उसमें सच्चा साहित्य, शिष्ट भाषा नहीं मिलती । उनसे जो बातें मिलती हैं वे क्षणिक होती हैं। हमें जरूरत तो स्थायी भाषा ग्रहण करने की है। विद्यार्थी जीवन, जीवनको बुनियाद है, जीवनकी तैयारी है। इस कालमें हम अपने लिए अखबारोंसे विचार-सामग्री किस तरह ले सकते हैं । यदि तुम कहो कि हम अखबार नहीं पढ़ेंगे तो तुम्हारा यह कहना स्वाभाविक नहीं होगा । क्योंकि तुम तो दास या गांधीका भाषण पढ़कर कहो कि अमुक भाषण बढ़िया था और अमुक यों ही था -- यह स्थिति दयाजनक है, भयंकर है। इससे हमें बाहर निकलना ही होगा । यह बात मैं इसीलिए कहता हूँ कि मैंने शिक्षाके अनेक प्रयोग किये हैं। अपने लड़के- बच्चे और औरोंके लड़के-लड़की या जवान लड़के-लड़कियोंको साथ रखकर शिक्षा देनेकी भयंकर जोखिम मैंने उठा देखी है । पर मैं पार हो गया; क्योंकि जिस तरह माता-पिता की आँख जवान लड़की की गतिविधिका निरीक्षण करती रहती है उसी तरह मैं भी चारों ओर नजर रखता था । मैंने उन लड़के-लड़कियोंके माँ-बापका स्थान लिया था; उनपर डिटेक्टिव की तरह नजर रखता था । राजा भी था और गुलाम भी था । इससे मुझे इस बातका अनुभव हुआ कि शिक्षा क्या चीज है ? कैसी होनी चाहिए ? और इसका विचार करते-करते मैंने सत्याग्रहको पाया, मुझे असहयोगका दर्शन हुआ । और इसलिए मुझे इन प्रयोगोंका साहस हुआ । आप ऐसा न समझना कि मैंने ये प्रयोग केवल स्थूल स्वराज्य के लिए किये हैं। मैंने तो संसार के सामने एक चिरंतन सनातन धार्मिक वस्तु रख दी है। इसकी जड़ें गहरी पहुँच गई हैं, इसलिए लड़कों के सामने भी इसे पेश करते हुए मुझे संकोच नहीं होता। इसकी निर्दोषताको मैं किस प्रकार प्रकट करूँ ? मैंने जब देखा कि मेरे शान्तिके प्रयोगसे अशान्ति फैली तो मैंने<noinclude></noinclude> ixnz8dud4fc3btig3vg7ue2zbk7epes पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६४८ 250 166751 663557 523382 2026-06-21T18:47:54Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663557 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६१२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय तुरन्त अपने हथियार वापस खींच लिये और सिर्फ एक ही शान्तिका हथियार -- चरखा -- देश के सामने रख दिया। इसे देखकर पहले तो लोग हँसे, फिर तिरस्कार प्रकट करने लगे और अब उसका स्वागत करनेका समय आ रहा है। अब में विद्यार्थियोंसे कह रहा हूँ कि इसे अपनाओ । कांग्रेस में भी चरखेका प्रस्ताव हुआ और यदि लॉर्ड रीडिंगसे मिलने का अवसर आये तो अब मैं उनसे भी यही कहूँगा कि जनाब चरखा कातिए । यह सुनकर आपको हँसी आई, पर मैं गंभीरता के साथ कह रहा हूँ । मैं उन्हें यह कहते हुए जरा भी न हिचकूंगा और यदि वे न माने तो नुकसान उनकी है, मेरा बिलकुल नहीं। जो भिक्षा माँगता हो उसका क्या नुकसान होगा ? उसका तो वह धर्म ही है, पेशा ही है । मेरा यह धर्म है कि उनके सामने हाथ फैलाकर उन्हें पुण्य करनेका अवसर दूं । अच्छी से अच्छी चीज ग्रहण करनेका मौका उनके सामने उपस्थित करूँ। अगर वे उसे न अपनावें तो हानि उनकी होगी । कलकत्तेके बड़े पादरी साहब से मैंने अपनी भजन - मण्डली में बैठनेका अनुरोध किया। वे बैठे और उन्होंने भजन गाया । इससे उनके और मेरे बीच प्रेमकी गाँठ बँध गई। पर इतने से ही मुझे सन्तोष न हुआ । मैंने उनसे चरखेकी बात कही । कर्तल मैडॉकने मेरी जान बचानेके लिए मेरे पेटमें नश्तर लगाया । अनेक औजारों का प्रयोग किया। मैंने उनके सामने भी चरखेकी बात पेश की । श्रीमती मैडॉक जब विलायत जाने लगीं तो मैंने उन्हें खादीका तौलिया देकर चरखेका संदेश वहाँ भेजा। उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर लिया और कह गई हैं कि मैं घर-घर इस तौलियेका सन्देश पहुँचाऊँगी | यह चीज बिलकुल निर्दोष है । इसमें स्वाद नहीं हो सकता । आरोग्यप्रद भोजन चटपटा और तेज नहीं होता । राजकोटमें एक हलवाई था; वह बहुत तेज भजिये बनाता था। उनमें बहुत तरहके मसाले डालता था और इन भजियोंके लिए सैकड़ों लोग उसी दुकानपर दौड़ते थे। लेकिन उनमें ऐसा कोई गुण तो था नहीं कि वे खानेवालेका आरोग्य-वर्धन कर सकें। अनेक चीजें ऐसी होती हैं जो नीरस मालूम होती हैं पर दरअसल होती सरस हैं। इसी कारण 'गीता' का यह महावचन है, 'जो बात आरम्भ में कड़वी परन्तु परिणाममें अमृतमय हो' उसे ग्रहण करो। ऐसी अमृतप्राय वस्तु सूतका तार है । आत्माको शान्ति देनेके लिए, विद्यार्थी कालमें जीवनको शान्ति देने के लिए, जीवन में धर्मको स्थान देनेके लिए, इसके सदृश सामर्थ्यवान् यज्ञ दूसरा नहीं है । हिन्दुस्तान के लिए मैं आज दूसरी चीज नहीं दे सकता -- गायत्रीको भी सारे हिन्दुस्तान के सामने पेश नहीं कर सकता। क्योंकि यह युग व्यावहारिक युग है, तत्काल परिणाम देखना चाहता है । मैं गायत्री जरूर उपस्थित कर सकता हूँ, पर तत्काल परिणाम क्या दिखाऊँगा ? पर चरखा ऐसी चीज है कि आप सूतका तार निकालते जाइए, रामका नाम लेते जाइए और आपको सब कुछ मिल जायेगा । ट्यूडर ओवन साहब यहाँ एक बड़े हाकिम थे। आज वे पंचमहालमें हैं। उन्हें मैंने अपनी पाँत में मिला लिया । उसका छुपा भेद में आज प्रकट करता हूँ । उन्होंने मुझे लिखा है कि चरखा मुझे बड़ा प्रिय हो गया है । मेरी अंग्रेजी 'कॉमनसेंस' ( व्यवहार-बुद्धि) कहती है कि वह मेरी बढ़िया 'हॉबी' (शौक) है । मैंने उनसे कहा कि आपके लिए यह 'हॉबी' होगी हमारे लिए तो यह कल्पद्रुम है । अंग्रेजी जीवन<noinclude></noinclude> d1qo4qunkbvi3zmypcgi9g895tbvnua पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६४९ 250 166752 663558 523383 2026-06-21T18:48:51Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ स्वराज्यके व्यापारी ६१३ क्योंकि मधु- मुझे पसन्द नहीं । पर उसके कितने ही रसका स्वाद मैं लेता हूँ- मक्खियोंकी तरह मैं तो मधुरताकी खोज करता रहता हूँ । इन लोगोंकी 'हॉबी' में बहुत रहस्य भरा रहता है। कर्नल मैडॉक एक आँखसे अंधे थे। नश्तर लगाते हुए ही एक आँख चली गई। उनकी उम्र भी कोई साठ सालकी होगी, फिर भी वे शल्य क्रिया में निपुण थे। चाकूसे सीधा नश्तर लगाते, पर खबरतक न होती। वे चौबीसों घंटे नश्तर नहीं लगाया करते थे । परन्तु दो घंटे वे अपनी 'हॉबी' को -- बगीचेमें काम करनेके लिए देते थे । और इससे उनका जीवन रसमय बना हुआ था । मैं तुम्हारे सामने चरखा इसलिए रख रहा हूँ कि तुम्हारा जीवन रसमय हो, तुम्हें धर्म मिले, कर्म मिले, शान्ति मिले, विवेक मिले। विद्यार्थी जीवनमें श्रद्धा बड़ी जरूरी चीज है । किसी बातको बुद्धि स्वीकार न करती हो तो भी उसे मान लेना पड़ता है. : -- मेरे पारसी मित्र स्वीकार करेंगे, क्योंकि भूमितिमें वे मेरे ही जैसे शून्य होते हैं। • कितनी ही बातें मान लेनी पड़ती हैं। भूमितिमें मेरी गति ही रुक जाती थी । २४वाँ साध्य तो समझ में आता ही न था । पर मैं किसी तरह गाड़ी खींचता । आज वह विषय मुझे बड़ा आनन्दमय मालूम होता है । आज अगर भूमितिकी पुस्तक हाथमें आ जाय तो मैं उसमें डूब सकता हूँ । विद्यार्थी जीवनमें चित्त श्रद्धामय होनेके कारण ही मैंने यह मान लिया था कि किसी-न-किसी दिन इसका मर्म समझ में आ जायेगा। तुममें भी यदि श्रद्धा होगी तो तुम्हें मालूम हो जायेगा कि एक व्यक्तिने जो बात कही थी, वह सच थी । चरखेपर खूब विचार करके ही एक शास्त्रीने 'गीता 'का यह श्लोक चरखेपर घटाया है -- [ गुजरातीसे ] 'नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।। नवजीवन, १८-१-१९२५ ४२७. स्वराज्यके व्यापारी सदस्यता की शर्तों में जो नवीन परिवर्तन हुए हैं, ऐसा लगता है, वे अब भी बहुतों को भयानक मालूम होते हैं। इसपर मुझे ताज्जुब नहीं होता। नई चीज बहुतोंको कई बार दुविधा में डाल देती है, कितनी ही बार डर पैदा कर देती है। मुझे आशा है कि वक्त साथ-साथ डर जाता रहेगा और लोग सदस्यता की शर्तमें चरखेको स्थान मिलनेका महत्त्व समझ जायेंगे । इसे समझने में मदद करनेके लिए इतना आवश्यक है कि जिन लोगोंका चरखेपर विश्वास है, उसपर अटल रहकर अपना विश्वास साबित करें । प्रान्तीय कमेटियोंकी राह न देखकर जो पहलेसे कात रहे हैं वे ज्यादा नियम- पूर्वक कातें और जो न कातते हों, वे कातना शुरू कर दें। जैसे-जैसे दो-दो हजार गजकी ऑटियाँ तैयार होती जायें, वैसे-वैसे वे उन्हें अपनी-अपनी प्रान्तीय कमेटियों को १. भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ४० ।<noinclude></noinclude> muhnzetcwyyly768tk9ludau8w8izfc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५० 250 166753 663559 523384 2026-06-21T18:49:37Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663559 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६१४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय भेजते जायें और अपने नाम दर्ज कराते जायें। इसके लिए प्रान्तीय कमेटीके नोटिस की राह देखने की जरूरत नहीं । जो लोग कातते हैं, उन्हें औरोंको समझाने का भी काम शुरू कर देना चाहिए । और जो बात कताईपर घटती है, वही खादीपर भी घटती है। अभी खादी- का काफी प्रचार करनेकी जरूरत है । दाहोद और गोधराके सफर में मैंने देखा कि अभी बहुत थोड़े लोग खादी पहनते हैं । यह भी सुनता हूँ कि बहुतेरे लोग सिर्फ सभा सम्मेलन में ही खादी पहनते हैं । इस तरह कहीं विदेशी कपड़ेका बहिष्कार हो सकता है ? स्त्रियों में तो मुझे खादीका बहुत कम प्रचलन देखनेको मिला। सो दाहोद और गोधराके स्वयंसेवकोंको मेरी खास सलाह है कि वे इन दोनों शहरों में घर-घर जाकर लोगोंको खादी के इस्तेमालकी जरूरत और कताईका कर्त्तव्य समझायें । व्यापारी जिस तरह रात-दिन अपने व्यापारकी बढ़तीकी योजना ही बनाता रहता है, उसी तरह हमें भी करना चाहिए। हम स्वराज्य के व्यापारी हैं । हम जानते हैं कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार सम्पन्न होने से ही स्वराज्यका व्यापार बढ़ सकता है । हरएक स्वयंसेवकको अपनी जिम्मेवारी समझ लेनी चाहिए। हर व्यक्ति डायरी रखे और रातको अपने मनसे नीचे लिखे सवाल पूछे और उनके जो जवाब मिलें उन्हें उसमें लिख ले | १. आज मैंने कितना गज सूत काता ? २. आज मैंने कितनोंको सूत कातनेके लिए समझाया ? ३. आज मैंने कितनोंको खादी पहननेपर रजामन्द किया ? जो व्यक्ति ईमानदारी के साथ इन सवालोंके जवाब हमेशा अपनी डायरीमें लिखता रहेगा, वह शीघ्र ही यह देखेगा कि उसकी काम करनेकी शक्ति बढ़ रही है । थोड़ा-बहुत पुरुषार्थं तो मनुष्य मात्रमें है और हमेशा अपनी हारकी बातें लिखना उसे पसन्द नहीं आता । इसलिए ईमानदार आदमी उस हारको हरा देता है और फतह हासिल करता है । अच्छा व्यापारी अपने कामका रोजनामचा रखता है और उसका अमूल्य लाभ जानता है । जहाज के कप्तान के लिए तो रोजनामचा रखना लाजिमी होता है । फिर, स्वराज्यके व्यापारी क्यों न रोजनामचा रखें ? हताश जनता यदि आशावान बनना चाहे तो उसके लिए कांग्रेसने प्रशस्त राजमार्ग दिखा दिया है । हम यदि आलस्यको छोड़ देंगे और उद्यम करेंगे तो हमें तुरन्त उसका मीठा फल चखने को मिलेगा। यह समय न तो टीका-टिप्पणीका है, न शंका-संशयका है । यह मुँह बन्द करके चुपचाप सिर्फ काम करनेका, अर्थात् सूत कातनेका और कतवानेका, खादी पहनने का और दूसरोंको उसे पहननेके लिए राजी करनेका समय है । [ गुजराती से ] नवजीवन, ११-१-१९२५<noinclude></noinclude> 5ogdguxcpi77q6hofnlj2twm45qobkq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५१ 250 166754 663560 523385 2026-06-21T18:50:01Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663560 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ४२८. पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको पोष वदी २ [ १२ जनवरी, १९२५] काठियावाड़ की यात्रामें तुम्हारी और आनन्दकी याद आती रही। तुम्हारी उप- स्थितिकी और आनन्दके स्वास्थ्य की कामना की । आश्रम पहुँचकर तुम्हारे पत्रकी बाट जोहूँगा । आनन्दसे कहना कि मैं रोज उसे याद करता हूँ । [ गुजरातीसे ] बापुनी प्रसादी भाईश्री देवचन्द भाई, ४२९. पत्र : देवचन्द पारेखकों सोमवार [ १२ जनवरी, १९२५] मैं वहाँ कल मंगलवारको तीन बजे पहुँचूँगा और सीधे बाबू साहब यशवन्त प्रसाद सिंहके यहाँ जाऊँगा । वे कल यहाँ मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझसे अपने यहाँ ठहरनेका आग्रह किया था। आप वहाँ मिलेंगे न ? क्या आप सोजित्रा आयेंगे ? न आनेवाले हों तो कमसे कम धोलातक अथवा उसके निकटवर्ती किसी स्थानतक जरूर आ जायें, ताकि हम भविष्यके कार्यक्रमके सम्बन्ध में कुछ सलाह-मशविरा करना चाहें तो कर सकें । जो रुई इकट्ठी की गई है, उसकी क्या व्यवस्था की गई है, सो जानना चाहता हूँ । यदि हम छोटीसे-छोटी बातोंके बारेमें समुचित व्यवस्था करेंगे तो हमें सुपरिणाम प्राप्त होगा । रुई यहाँ भी इकट्ठी की जा रही है । पट्टणी साहबका कातना जारी है। मुझे मेरे सौ नाम चाहिए। आपको इस वर्ष और कोई काम नहीं करना है । आप तो अन्त्यजोंके लिए राज्योंसे, जहाँ कहीं से भी ला सकें वहाँसे, यथासम्भव सहायता लाइयेगा । शेष मिलनेपर | मोहनदास गांधी वन्देमातरम् गुजराती पत्र ( जी० एन० ५७१६) की फोटो नकलसे । १. साधन-सूत्रके अनुसार । २. गांधीजी त्रापजसे अहमदाबादके लिए १२ तारीखको रवाना हुए थे और वहाँसे १६ तारीखको सोजित्रा गये; पट्टणीजीके कताईसे सम्बन्धित उल्लेखसे विदित होता है कि यह पत्र त्रापजमें लिखा गया था। ३. भावनगर ।<noinclude></noinclude> ldsb0tgyz0kv4ny19hvylkay6shuzh5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५२ 250 166755 663561 523386 2026-06-21T18:50:46Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663561 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ४३०. भाषण : गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठकमें अहमदाबाद १४ जनवरी, १९२५ आज शाम गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी एक बैठक कांग्रेसके नये संविधानके अनुसार एक योजना निर्धारित करनेके लिए हुई। श्री गांधीने, जो बैठकमें उपस्थित थे, सुझाव दिया कि उन्हें कांग्रेसके सदस्य बनानेका काम शुरू कर देना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि कौन स्वयं सूत कातेगा और कौन दूसरोंका काता हुआ सूत देगा। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि कांग्रेसके लिए वे कितने सदस्य बनायेंगे । श्री गांधीने स्वयं सूत कातने और काठियावाड़ते १०० सदस्य बनानेका वादा किया। किसीने कहा कि श्री गांधीको भारत-भरसे कांग्रेसके दो लाख सदस्य बनाने चाहिए। श्री गांधीने उत्तर दिया कि अतिरिक्त सदस्य मैं आपको दे दूंगा। कुल मिलाकर ७४ सदस्योंने स्वयं सूत कातनेका वादा किया, तीनने दूसरोंका काता हुआ सूत देनेका वादा किया और सब मिलाकर १,७०० सदस्य बनानेके वादे किये गये। इसके बाद श्री गांधीने सुझाव दिया कि स्वयं सूत कातनेवालों और दूसरोंका काता सूत देनेवालोंके अलावा ऐसे सदस्य भी होंगे जिन्हें यदि रुई दी जाये तो वे रोजाना आधा घंटा सूत कालेंगे। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूँ, रुई इकट्ठी की जाये । श्री वल्लभभाई पटेलने ५०० मन रुई इकट्ठी करनेका वादा किया और श्री अब्बास तैयबजीने २५ मन रुई । [ अंग्रेजीसे ] बॉम्बे क्रॉनिकल, १५-१-१९२५ ४३१. दीक्षान्त भाषण : गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबादमें विद्यार्थीगण, भाइयो और बहनो, १४ जनवरी १९२५ आप विद्यार्थियोंने आज जो उपाधि प्राप्त की है, उसके लिए मैं आप लोगोंको बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि ली हुई प्रतिज्ञाको आप पूरा करेंगे। ऐसा प्रसंग जब-जब आता है, तब-तब सामान्य संस्थाओंकी रिपोर्टोंमें ऐसा कुछ उल्लेख होता है कि इस वर्ष विद्यार्थियों और शिक्षकोंकी संख्या बढ़ी, और संस्थाकी विविध प्रवृत्तियों- में भी हर तरह से वृद्धि हुई । आज महामात्र [रजिस्ट्रार]ने जब रिपोर्ट पढ़ी तब हमने देखा कि इस विद्यापीठके चार वर्षके कार्य-कालमें संख्या घटती ही गई है। सामान्य रूपसे इससे निराशा होगी। लेकिन मुझे निराशा नहीं हुई। इतना अवश्य स्वीकार करता हूँ कि अगर हम विद्यार्थियोंकी संख्या में वृद्धि बता सकते अथवा दुनिया जिसे<noinclude></noinclude> fab2yk9n8dh3qlai25sdfbvkjvfiamw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५३ 250 166756 663562 523387 2026-06-21T18:51:33Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663562 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ दीक्षान्त भाषण : गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबादमें ६१७ प्रगति कहती है, कोई वैसी बात बता सकते तो मुझे खुशी होती । आजकी स्थिति में मुझे प्रसन्नता होती है, ऐसा नहीं कह सकता; परन्तु मैं निराश भी नहीं हुआ हूँ । बहुत-से दूसरे लोग और मैं ऐसी उम्मीद रखते ही थे कि यह कार्य हमें एक ही वर्ष चलाना होगा और एक वर्ष (अर्थात् स्वराज्य-प्राप्ति) के बाद तो जिन संस्थाओं में से आप निकले हैं, उन्हीं संस्थाओंमें आप फिरसे शिक्षा लेने लगेंगे । एकके बदले तो चार वर्ष हो गये, और आगे कितने वर्ष यह देश निकाला भोगना पड़ेगा, सो नहीं कहा जा सकता। मैं तो अब ऐसा मानने लगा हूँ कि यह देश निकाला है ही नहीं । कदाचित् स्वराज्य मिलनेपर भी ऐसी कितनी ही संस्थाएँ सरकारसे स्वतन्त्र रहकर चलती रहेंगी। उस समय सिर्फ इतना होगा कि इन संस्थाओंको सरकारी संस्थाओंसे प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ेगी, सरकारी संस्थाएँ विरोधी नहीं मानी जायेंगी, त्याज्य नहीं मानी जायेंगी । तथापि उस समय भी अनेक प्रयोग तो होते ही रहेंगे और उनमें हमारी जैसी संस्थाओंके लिए स्थान रहेगा । इसलिए जो विद्यार्थी विद्यापीठके आश्रय में पढ़ते हैं वे किसी तरह निराश न हों और ऐसा न मानें कि हम जितने वर्ष यहाँ पढ़े हैं, वे सब निष्फल गये । आज सवेरे मैं जब आश्रम पहुँचा तो एक पोस्टकार्ड आया हुआ था। इसमें महाविद्यालयपर आक्षेप किया गया था । पोस्टकार्डपर लिखनेवालेका नाम-पता कुछ नहीं था । मैं 'नवजीवन' में अनेक बार कह चुका हूँ कि कोई भी व्यक्ति अपना नाम- पता दिये बिना पत्र न लिखे। यह नामूसीकी बात है, इसमें एक प्रकारकी भीरुता है और हमें इसे छोड़ देना चाहिए। जिन विचारोंको दुनिया के सामने रखने की हमारी हिम्मत न हो, उन्हें भूल जाना, दफना देना ही अच्छा है । तथापि यह प्रथा इस देश में कितने ही बरसोंसे चलती आ रही है और कदाचित् आगे भी चलती रहेगी । इसलिए पत्रको मैं पढ़ गया। इसमें लिखा है : आप महाविद्यालयको बन्द क्यों नहीं करते ? आपकी आँखें क्यों नहीं खुलतीं ? विद्यार्थी आपको भुलावेमें डालते हैं; यहाँसे निकलने के बाद बहुत-से विद्यार्थी सरकारी संस्थाओंमें चले जाते हैं । आप चाहे जो मानें, लेकिन छात्रों और छात्राओंको चरखेपर तनिक भी श्रद्धा नहीं है । इसलिए आप विद्यापीठ और उसकी सब संस्थाओंको बन्द कर दीजिए।" मुझे यह सलाह मान्य नहीं है, और मैं चाहता हूँ, आपको भी मान्य न हो । दुनिया में किसी भी कामका महत्त्व इस बातसे नहीं आँका जा सकता कि उसमें कितने लोग लगे हुए हैं और उसपर कितना पैसा खर्च किया जा रहा है। इस तरह हिसाब करने बैठें तो भ्रम में पड़नेका भय रहता है । इस देश में आत्म-शुद्धिकी प्रवृत्ति चल रही है. • हमने असहयोगको दुनिया के सामने आत्म-शुद्धिके प्रयत्नके रूपमें ही पेश किया है। तो ऐसे समय हमारी संस्थाओं में विद्यार्थियोंकी संख्या बढ़ेगी, यह सोचना ही भूल है । संख्या बढ़े तो अच्छा है, न बढ़े तो भी हमें श्रद्धा रखनी चाहिए और जबतक हममें विश्वास है तबतक हमें इस प्रवृत्तिमें लगे रहना चाहिए । १. गांधीजी उसी दिन सुबह भावनगर से साबरमती लौटे थे ।<noinclude></noinclude> esvhq72lq3dcl7azvr1lcke2wwffqf1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५४ 250 166757 663563 523388 2026-06-21T18:52:00Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663563 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६१८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय अगर यह सच हो कि विद्यार्थियों को चरखेपर श्रद्धा नहीं है तो दुःखकी बात है । जिसे चरखेपर श्रद्धा न हो, उसे विद्यापीठका त्याग ही कर देना चाहिए । राष्ट्रीय स्कूलोंके सम्बन्ध में कांग्रेसका प्रस्ताव तो आपको याद ही होगा । उसकी याद मैं यहाँ फिर दिलाता हूँ । इसमें राष्ट्रीय शिक्षा-संस्थाकी जो व्याख्या की गई है, वहाँ उपस्थित लोगोंको उससे कोई विरोध न था । विरोध मनमें था, परन्तु उन्होंने उसे प्रकट नहीं किया, ऐसा मानना तो मेरे लिए, उनके लिए, उनके देशके लिए अप्रतिष्ठाकी बात है । इतने अधिक बुद्धिमान, स्वतन्त्रचेता और प्रौढ़ व्यक्ति जो सम्मति दें, वह सच्चे मनसे नहीं दी गयी है, हार्दिक नहीं है, ऐसा मैं कैसे मान सकता हूँ ? इसीलिए मैं कहता हूँ कि इस व्याख्यासे हजारों व्यक्ति सहमत थे । अब काठियावाड़ परिषद् ने भी यह व्याख्या स्वीकार कर ली है । यह व्याख्या क्या है ? राष्ट्रीय विद्यामन्दिरकी गिनतीमें वही पाठशाला आ सकती है, जिसमें चरखेका काम चलता है, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी आधा घंटा चरखा चलाते हैं और दोनों हाथ - कते सूत से बनी खादी ही पहनते हैं, जिसमें शिक्षाका माध्यम मातृभाषा अथवा हिन्दुस्तानी है, जिसमें व्यायामको पूरा-पूरा स्थान है, जिसमें आत्म-रक्षाकी भी शिक्षा दी जाती है, जिसमें हिन्दुओं और मुसलमानोंको एक हृदय बनानेके लिए प्रयत्न किया जाता है और जिसमें अन्त्यजोंका किसी भी तरहसे बहिष्कार नहीं किया जाता है। कांग्रेसने राष्ट्रीय विद्यामन्दिरकी यह व्याख्या की है। इसलिए मैं जब कहता हूँ कि जिन्हें चरखेपर श्रद्धा न हो उन्हें विद्यापीठके अधीन चलनेवाली सभी संस्थाओंका त्याग कर देना चाहिए तो आप यह न मानें कि मैं कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कह रहा हूँ । इसमें प्रगति निहित है । ऐसा करनेसे मालूम हो जायेगा कि हम किस दिशामें जा रहे हैं और कितने स्त्री-पुरुष तथा छात्र-छात्राएँ हमारे साथ हैं । मेरा ध्यान 'साबरमती' में प्रकाशित एक लेखकी टीकाकी ओर आकर्षित किया गया था। उसमें उठाई गई कुछ शंकाएँ निराधार हैं, क्योंकि उनमें मुझपर जो विचार रखनेका आरोप है, वे मेरे हैं ही नहीं । चरखेको विद्यार्थी अपना सारा समय दें, ऐसा तो मैंने कहा ही नहीं । मेरे विचार ऐसे हैं ही नहीं, सो बात नहीं। मैं यदि विद्यार्थियोंको और देशको समझा सकूं कि यही बात देशके लिए उत्तम है तो अवश्य हूँ कि आप सारा समय चरखा चलानेमें लगायें। लेकिन आज मैं यह बात देशको समझा नहीं सकता । आज मैं स्वयं ही यह नहीं कर सकता। मैं स्वयं सारा समय चरखा चलाने में लगा सकूँ तो देशसे और विद्यार्थियोंसे भी कहूँ। मेरी आकांक्षा यह अवश्य है कि मैं हिन्दुस्तानको बता सकूँ कि चौबीस घंटे चरखा चलानेमें ही शुद्ध विद्या निहित है । वैसे तो यदि हम किसी भी स्वच्छ वस्तुको लेकर बैठ जायें और उसमें एकाग्रता प्राप्त करें तो उसमें भी शुद्ध विद्या है ही। कारण, इस तरह हम योगकी साधना करते हैं। लेकिन अभी मैं यह बात नहीं कहता। अभी तो मैं विद्यार्थियोंसे इतना ही कहता हूँ कि आप श्रद्धापूर्वक, आनन्दसे चरखा चलायें, अच्छी तरह् कातें तथा चरखा चलानेकी कला सीख लें एवं जितनी आतुरता व प्रेम आप १. गुजरात महाविद्यालयका एक गुजराती द्वि मासिक ।<noinclude></noinclude> 30t931qmofzuqee0jh21a39oa2oy0zz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५५ 250 166758 663564 523389 2026-06-21T18:52:19Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ दीक्षान्त भाषण : गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबादमें ६१९ दूसरी किसी विद्याके सम्बन्धमें रखते हैं, उतनी ही इसके सम्बन्धमें भी रखें। बाकीका सारा समय अन्य विषयोंको दें, इसके खिलाफ मुझे कोई शिकायत नहीं। मैं तो आपसे सिर्फ इतना ही माँगता हूँ कि जो कीजिए, श्रद्धापूर्वक कीजिए, बेगार न टालिए । दूसरा आक्षेप यह है कि मैंने एक समय कहा था कि विद्यापीठको ऐसा पाठ्य- क्रम गढ़ना चाहिए जिससे आपको आजीविका मिले और यहाँ उसीको चलाना चाहिए । यह बात मैं अभी भी कहता हूँ । लेकिन विद्यापीठके लिए और आपके लिए भी यह मुख्य उद्देश्य नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। अगर विद्याको आप केवल आजीविका- का साधन मानने लगेंगे तो यह किसी समय आपकी अधोगतिका कारण सिद्ध होगा । विद्याकी जो व्याख्या विद्यापीठने स्वीकार की है, वह यह है कि जो मुक्ति दे, वही विद्या है। इसलिए ऐसे आदर्शवाली संस्थामें केवल आजीविकाको ध्यान में रखकर विद्या ग्रहण करना उचित नहीं । आजीविकाके अनेक साधन हैं। विद्या तो तन, मन और आत्माकी उन्नति के लिए है। जिसके अंग सुघड़ हैं, शरीर सुव्यवस्थित और मजबूत है, जो सख्त गरमी और सर्दी सहन कर सकता है, जिसमें ऐसी प्रबल संकल्प- शक्ति है कि वह निश्चित किया हुआ काम कर सकता है, जो संयमी है, जिसकी आत्मा स्वच्छ है • इतनी स्वच्छ कि वह कह सके कि मैं अपने हृदयका सुक्ष्म स्पंदन भी सुन सकता हूँ और चूंकि आत्माका स्थान हृदय है इसलिए उसका हृदय भी स्वच्छ होना चाहिए -- उसीने सच्ची विद्या सीखी है । ये तीन वस्तुएँ जिसने प्राप्त कर ली हैं उसे आजीविका का पाठ सीखने की जरूरत क्यों होनी चाहिए, आजीविका के लिए चिन्ता क्यों होनी चाहिए ? ऐसे लोगोंको तो विश्वास होना चाहिए कि जिसने दाँत दिये हैं, वह चबाने को भी कुछ देगा ही । मुझसे कहा गया है कि विद्यार्थियोंको घर-संसार चलाना होता है, उन्हें दो-दो तीन-तीन जनोंका पोषण करना होता है । पोषण करना होता हो तो हो; पोषण करना भी चाहिए और उसे करनेमें बहादुरी भी है; लेकिन उपर्युक्त वस्तुओंको साधनेसे ही आजीविका मिल जाती है, आजीविका ढूंढ़ने से नहीं मिलती। आजीविका मिल सके, ऐसी व्यवस्था तो विद्यापीठ आज भी कर रहा है । यदि विद्यापीठ ऐसा आश्वासन दे अथवा यह पत्र लिख दे कि विद्यार्थीको विद्यापीठसे निकलनेपर तुरन्त ही तीन सौ अथवा तीस रुपये वेतन मिलने लगेगा तो यह आपको अपंग बनाना होगा । बादमें आप देश सेवा नहीं कर सकते, तब आपसे पुरुषार्थं भी नहीं होगा । विद्यापीठ तो आपको केवल मुसीबतके आगे टिके रहनेकी, उससे निकल जानेकी शक्ति देता है। वस्तुतः देखा जाये तो विद्यापीठ आपकी कुछ भी नहीं दे सकता; वह तो आपमें जो कुछ होगा, उसीको विकसित कर सकेगा । इसलिए आप आजसे यह मानें कि विद्यापीठमें आकर आपने कुछ खोया नहीं है, कुछ खोनेवाले भी नहीं है । विद्यापीठका और महाविद्यालयका भविष्य क्या है और उन्हें किस मार्गपर ले जाया जाये, महामात्रने मुझसे इसके बारेमें सुझाव देनेके लिए कहा है। इसके बारेमें कुछ भी सुझाव देना मेरी शक्तिके बाहर है। इस वर्ष हिन्दुस्तान में वातावरण क्या स्वरूप धारण करेगा, सो मैं नहीं जानता। मुझे आशाएँ तो बहुत हैं। मैं आशावादी हूँ और मरणपर्यन्त आशावादी रहूँगा । लेकिन इस समय मैं आपके सामने इन<noinclude></noinclude> 7zpu0ceevv98tldoxeigl9tlevgjouj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५६ 250 166759 663565 523390 2026-06-21T18:52:52Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६२० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आशाओंको रखूं, यह उचित नहीं है । आपसे तो इतना ही कहूँगा कि विद्यापीठका भविष्य क्या होगा, इसके प्रपंचमें आप विद्यार्थी लोग न पड़ें। आप मान लें कि आप जो विद्यापीठमें हैं सो उचित ही है, सरकारी स्कूलोंमें जाना उचित नहीं है और सचमुच जो शिक्षा मिलनी चाहिए वह वर्तमान स्थितिमें वहाँ मिलनेवाली नहीं है । आपके मनमें जबतक यह बात है कि सरकारी स्कूलोंसे हिन्दुस्तानको जो चाहिए वह नहीं मिला है और न आगे मिलनेवाला है, तभीतक आप विद्यापीठमें रहें। यदि आपको लगे कि सरकारी संस्थाओं में यह सब मिल जाता है तो आपका सरकारी संस्थाओंमें जाना ही ठीक है । उस हालत में आपको इस झंझट में पड़नेका कोई कारण नहीं कि विद्यापीठका भविष्य क्या होगा । सरकारी पाठशालाओंके सम्बन्धमें आपके मनमें दृढ़ विराग होना चाहिए। विराग होना अर्थात् उन पाठशालाओंके बारेमें आपमें त्यागवृत्ति हो, राग नहीं । जबतक राग होगा तबतक आप विद्यापीठकी सरकारी स्कूलोंके साथ तुलना करते ही रहेंगे। हर समय मनमें कहेंगे कि वहाँ इतनी सुविधाएँ हैं और यहाँ वे नहीं हैं । विद्यापीठमें सुविधाएँ नहीं हैं, यही इसकी विशेषता है। अगर यहाँ भी सुविधाएँ जुटा देंगे, तो फिर हम मुसीबतोंको लांबना नहीं सीख सकेंगे । अथवा यों कहें कि यहाँ भिन्न प्रकारकी सुविधाएँ हैं अतः यहाँ कुछ विशेषता तो होनी ही चाहिए । सरकारी स्कूलोंके साथ इस विद्यापीठके स्कूलोंकी तुलना तो की ही नहीं जा सकती । इतनी ही बात यदि आपके मनमें घर कर जाये तो फिर विद्यापीठका भविष्य क्या होगा, इसकी आपको क्या चिन्ता ? आप अपना कर्त्तव्य पालन करके इतना कह सकें कि हमने स्वराज्यकी लड़ाईमें पूरी-पूरी मदद की, यही पर्याप्त है। इससे अधिक जाननेका आपको और मुझे अधिकार नहीं है । मैं तो इतना ही जानता हूँ कि जबतक विद्यापीठ स्वराज्य की लड़ाईमें सहायक होगा - • तबतक वह चलेगा, जब स्वराज्यकी लड़ाईमें सहायक नहीं होगा, उसी समय इसका नाश हो जायेगा । और तब अगर उसका नाश हो तो इसमें बुरा क्या है ? बल्कि तब उसका नाश इष्ट ही है। हिन्दुस्तान के स्वराज्यका भविष्य ही विद्यापीठका भविष्य है । हमें जो अच्छा लगता है, वही हमेशा हितकर नहीं होता। मैं बूढ़ा हो गया हूँ फिर भी मुझे लगता है कि मुझे जो अच्छा लगता है, वह सब मेरे लिए हितकर नहीं होता । अतएव, अनेक बातों में हमें बड़ोंकी सलाह लेनी पड़ती है। इसीसे हमारे यहाँ यह प्राचीन प्रथा चल रही है कि गुरुकी खोज करके उसकी शरण लो, उसका आधार लो, उसकी गोदमें सिर रखकर कहो कि आप अपनी इच्छानुसार मुझे चलायें, आपको जो अच्छा लगे सो हमारी बुद्धिमें भरें। आजकल तो वैसा गुरु कहीं मिल नहीं सकता, इसलिए आज ऐसे स्वार्पणकी बात नहीं उठती । यहाँ तो मात्र ऐसी श्रद्धाकी ही जरूरत है कि शिक्षक हमें अच्छे मागकी ओर प्रेरित करते हैं, बुरे मार्गकी ओर नहीं । अनेक वस्तुएँ आरम्भमें कड़वी होती हैं, लेकिन उनका फल अमृतमय होता है, ऐसी श्रद्धा रखकर आप कड़वे घूँट भी पी जायें। यही मेरी सलाह है और मेरी विनती है । अब मैं फिर, आपने जो प्रतिज्ञा ली है, उसपर वापस आना चाहता हूँ । भाई आठवलेने जो प्रार्थना पढ़ी है, उसकी ओर भी आपने ध्यान दिया होगा। दोनों १. आर० वी० आठवले, गुजरात विद्यापीठमें संस्कृतके आचार्यं ।<noinclude></noinclude> pkih8dot9mdv8j1b7arbqptlyeul9sy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५७ 250 166760 663566 523391 2026-06-21T18:53:12Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ तार : सुरेन्द्रनाथ बिश्वासको ६२१ वस्तुएँ बहुत सामान्य थीं। जो वस्तु सामान्य होती है, उसमें कितना जोर होता है, सो हम नहीं देख सकते। किसी चित्रकारने भले ही कोई बहुत मामूली चित्र बनाया हो, उसे देखकर हम वाह-वाह कर उठते हैं । कारण, हमें आदत ही ऐसी पड़ी हुई है । लेकिन हमारे सिरके ऊपर जो भव्य चित्र है, उसकी कोई कद्र नहीं करता । यह विशाल आकाश और उसमें जगमगाते तारे व चन्द्र, सूर्योदय और सूर्यास्तके समय उभरनेवाले अनेक रंग, यह सब कौन चितेरा चित्रित कर सकता है ? तथापि हम उस पर ध्यान नहीं देते। कारण, हमारी दृष्टि नीचे ही नीचे रहती है और मामूली चित्रों पर हम मुग्ध हो जाते हैं । यह दयनीय स्थिति है । इसलिए आपने आज जो प्रार्थना सुनी है और जो प्रतिज्ञा महामात्रने आपसे कराई है, सम्भव है, उसके रहस्यको आप समझ सकें हों। उसपर आप बार-बार मनन कीजिएगा, प्रतिज्ञाका पालन कीजिएगा । इस प्रार्थनामें कहे गये भव्य मंत्रोंसे वह पोषण मिलता है, जो भाषणों और लेखोंसे नहीं मिलता । यह माताके दूध जैसी स्वाभाविक खुराक है । यदि माता बच्चेको अपना दूध न दे और दूसरी स्त्री उसे तरह-तरह की अन्य खुराकें दे तो उसका क्या परिणाम होगा? कोई बालक जीवित न बचेगा । ये सामान्य वस्तुएँ ही अमृतके समान हैं, और यदि हम अपने पूर्वजोंकी इस विरासतपर मनन करें, उसे हृदयमें उतारें, उसके अनुसार आचरण करें तो हमारा जीवन सार्थक है । आप मेरे भाषणको भूल जायें, और सब कुछ भूल जायें, परन्तु इस प्रार्थनाके मंत्रोंको तथा अपनी प्रतिज्ञाको न भूलें तो माना जायेगा कि आपका और मेरा समय निरर्थक नहीं गया । [ गुजराती से ] नवजीवन, १८-१-१९२५ ४३२. तार : सुरेन्द्रनाथ बिश्वासको ' [१५ जनवरी, १९२५ या उससे पूर्व ] सम्मेलनमें शामिल होनेको उत्सुक हूँ । कृपया फरवरीके अन्तमें याद दिला दें। [अंग्रेजीसे ] गांधी अमृत बाजार पत्रिका १६-१-१९२५ १. बंगाल प्रान्तीय सम्मेलनकी स्वागत समितिके अध्यक्ष। यह सम्मेलन फरीदपुरमें होनेवाला था ।<noinclude></noinclude> g73lamu4az5ayjghb1mmp3r3y77616s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५८ 250 166761 663567 523392 2026-06-21T18:53:47Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ४३३. मेरी आस्था राजगोपालाचारीकी ओरसे यह अयाचित घोषणा सुनकर मेरे हृदयको बड़ी राहत मिली है । पाठक जानते हैं कि उनकी विवेकशीलता और परखका मैं कितना सम्मान करता हूँ। उनको सन्देहों और आशंकाओंमें उलझा देखकर मेरा मन बड़ा दुःखी था । चरखा - कार्यक्रम में 'सत्यके साथ खिलवाड़ करन' की कोई बात नहीं है, क्योंकि सत्याग्रह मुख्यतः सविनय अवज्ञा नहीं, बल्कि शान्त मनसे सत्यका अडिग अनुगमन है । सविनय अवज्ञाका रूप तो वह कभी-कभी ही धारण करता है। लेकिन, जहाँ बहुत सारे कार्यकर्त्ताओं द्वारा सविनय अवज्ञा करनेका सवाल हो, वहाँ इस राहपर चलने से पूर्व उन्हें जान-बूझकर, अपनी इच्छासे आज्ञा-पालन करना सीखना चाहिए। चरखा स्वेच्छापूर्वक आज्ञापालन और शान्त प्रयत्नशीलताका मूर्त रूप है, इसलिए सविनय अवज्ञासे पहले उसे सफल कर दिखाना नितान्त आवश्यक है । जबतक इस बातका पूरा भरोसा नहीं हो जाता कि सविनय अवज्ञाके लिए उपर्युक्त वातावरण तैयार हो गया है तबतक मनमें उसका कोई खयाल भी लानेमें मुझे ऐसा लगता है कि यह सत्यके साथ खिल- वाड़ करना होगा । इसीलिए मुझे चरखेके कार्यक्रमपर और स्वराज्यवादियोंके सामने तो क्या, सभी सम्बन्धित लोगोंके सामने पूर्ण आत्म-समर्पण करने का आग्रह रखना ही है, भले ही मेरे साथ फिर अँगुलियोंपर गिनने लायक कार्यकर्त्ता ही रह जायें । हमें सविनय अवज्ञाकी आड़ में हिंसापूर्ण अवज्ञाको पनपने का मौका नहीं देना चाहिए। चौरी- चौराकी सीख मेरे मनमें इतनी गहरी उतर चुकी है कि उसे आसानीसे भुलाया नहीं जा सकता। बारडोलीके निर्णयको लेकर मेरे मन में कोई खेद होना तो दूर, मैं तो उसे देशके प्रति की गई अपनी सबसे बड़ी सेवाओंमें से एक मानता हूँ । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५ ४३४. नोटिस ? मुझे बेलगाँव में निम्नलिखित नोटिस दिया गया था : नीचे हस्ताक्षर करनेवाले हम, महाराष्ट्र प्रान्तको कोलाबा जिला कांग्रेस कमेटीके प्रतिनिधिगण, अपने जिलेकी विशेष परिस्थितिकी ओर आपका ध्यान दिलाने की अनुमति चाहते हैं। कोलाबा जिलेमें न तो कपास ही पैदा होती है और न वह कपासके किसी केन्द्रके नजदीक ही है । इसलिए स्वभावतः कताईकी तरफ वहाँके लोगोंका झुकाव नहीं है । यहाँतक कि असहयोगके शुरूके दिनों में भी बड़ी मुश्किलसे वहाँ कुछ चरखे चलाये गये थे, सो भी कुछ ही महीने चल पाये। १. देखिए परिशिष्ट २ ।<noinclude></noinclude> e8iuxz1javgvs0sea2haqcqtavp3wzp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६५९ 250 166762 663568 523393 2026-06-21T18:54:09Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ नोटिस ? ६२३ सो इन सब तथ्योंपर खूब अच्छी तरह विचार करके कोलाबा जिला कांग्रेस कमेटीने पिछले सितम्बर माहमें एक प्रस्ताव पास किया, जिसका आशय यह था कि इस जिलेमें कताई सदस्यता सफल नहीं हो सकती और कांग्रेसके विधान में उसका समावेश हो जानसे जिलेकी प्रायः तमाम समितियोंका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा, इसलिए कांग्रेस द्वारा कताई सदस्यता के स्वीकृत होते ही हम आपको शीघ्र से शीघ्र सूचित करते हैं कि हममें से बहुतेरे लोगोंने, उस प्रस्तावके हकमें जो राय दी है या उसके खिलाफ राय देनेसे अपने-आपको रोका है, उसकी वजह यही थी कि एक तो स्वराज्य दलने इसे अपने दलका सवाल बना लिया था और दूसरे, कांग्रेस में एकता बनाये रखनेके खयालसे ऐसा रुख अपनाना लाजिमी हो गया था। लेकिन इसपर अमल करना हमारे लिए मुश्किल है। हम पहलेसे आपको खबर किये देते हैं, जिससे आपको हताश न होना पड़े । इसपर २७ दिसम्बरकी तारीख पड़ी है और १२ सदस्योंके दस्तखत हैं, जिनमें सभापति और मंत्री भी शामिल हैं। मुझे आशा है कि ये महाशय अपनी धमकीको कार्यरूपमें परिणत नहीं करना चाहेंगे। अगर इन सज्जनोंने अनुशासन या एकताके खयालसे ही कताईवाले प्रस्तावके पक्ष में राय न दी हो या उसके सम्बन्धमें तटस्थ रहे हों तो मैं उन्हें यह बताना चाहता हूँ कि खिलाफ राय न देने या तटस्थ रहनेसे ही अनुशासन या एकताकी शर्तें पूरी नहीं हो जातीं । अनुशासनका वास्तविक पालन तो तभी हो सकता है, जब प्रस्तावपर सच्चे सिपाही की तरह आज्ञा-पालनकी भावनासे अमल किया जाये, भले ही वह बुद्धिको ठीक न जँचता हो । 'लाइट ब्रिगेड' ने जिसकी अविस्मरणीय वीरताको टेनीसनने प्रसिद्ध कर दिया है - ऐसी ही भावनासे काम लिया था । बोअर युद्धमें उन सिपाहियोंने भी इसी भावनाका परिचय दिया था, जो यह जानते हुए भी कि हम मौत के मुँह में जा रहे हैं, बराबर अपने जनरलके पीछे-पीछे गये और बोअरोंकी गोलियाँ खाते हुए स्पिअनकॉपकी पहाड़ियोंपर खेत रहे । जनरलके इस प्रस्तावपर कि पहाड़ीपर कब्जा कर लिया जाये, यदि वे कठ- पुतलियोंकी तरह 'हाँ' कह देते तो उसका कोई महत्त्व न होता, बल्कि यह चीज उनके लिए अप्रतिष्ठाका कारण बन जाती । वे इसीलिए शूरवीरोंकी श्रेणी में प्रतिष्ठित हो गये कि उन्होंने मनमें हिचक होते हुए भी ऐसा साहस दिखाया, जो प्रबलतम विश्वाससे ही सम्भव होता है। याद रखने की बात यह है कि उन्हें ऐसी लड़ाई लड़नी थी, जिसमें पराजय बिलकुल निश्चित थो। लेकिन शूरवीरोंका उदय तो पराजय सामने दिखने- पर ही होता है । किसीने ठीक ही कहा है : 'गौरवपूर्ण पराजयके क्रमकी परिणति ही सफलता है'। इसलिए अगर सालके अन्त में सदस्यताकी यह नई शर्त विफल साबित 1 १. रूस तथा मित्र देश तुर्की, इंग्लैंड, फ्रांस और सार्डिनियाके बीच (१८५३-५६ में) हुई क्रीमियाकी लड़ाई में लाइट ब्रिगेडने सेनापतिके इशारेपर अपने-आपको आग उगलती तोपोंके मुकाबले झोंक दिया था। इसी घटनाको टेनीसनने अपनी कवितामें प्रसिद्धि प्रदान की ।<noinclude></noinclude> kigw0vvcovy1s2431shpo7fc7maptq6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६० 250 166763 663569 523394 2026-06-21T18:54:31Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६२४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हो जाये, तो भी हर्ज क्या ? यदि कांग्रेस- जन इस बातका खयाल किये बिना कि वे किस दलके हैं और इस बात से सहमत हैं अथवा नहीं, इसे सफल बनानेके लिए जुटकर कार्य करें तो वह असफलता भी एक गौरवपूर्ण. असफलता होगी । अगर लोगोंका इरादा प्रस्तावके अनुसार काम करनेका नहीं था तो यह कहना भी, जैसा कि हस्ताक्षर - कर्त्ता सज्जनोंने कहा है, गैरमुनासिब है कि बहुत-से लोगोंने सिर्फ एकताके खयालसे उस प्रस्तावके हकमें राय दी थी । एकता इतनी आसानी से हासिल नहीं हो सकती । एकता कोई ऐसी चीज नहीं जो मात्र दिखावेके लिए हो और जिसे कागजपर महज प्रस्तावके रूपमें लिख देनेसे काम चल सकता हो । एकता तो तभी कायम हो सकती है जब प्रस्तावके अनुसार ठोस काम करके दिखाया जाये । विधान सभाओंपर मेरा विश्वास नहीं । पर मेरे दूसरे साथियोंको उनपर विश्वास है, इसलिए मैंने उन्हें कांग्रेसके नामका इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी है। पर अब अगर मैं दिल में कुछ महसूस करूँ और मुँहसे कुछ और कहूँ या कलमसे कुछ और लिखूं तो मैं एकतामें सच्चा विश्वास रखनेवाला नहीं, बल्कि पाखण्डी साबित होऊँगा । कौंसिल-प्रवेशका अधिकार देनेवाले प्रस्तावके हक में एक बार राय दे चुकने के बाद मुझे चाहिए कि मैं स्वराज्यवादियोंका भला मनाऊँ। मुझे अपने किसी भी कामसे उनके कार्यक्रमको नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। यही नहीं, बल्कि जहाँ-कहीं मुझसे हो सके, अपनी पूरी शक्ति के साथ उन्हें मदद भी पहुँचानी चाहिए, और यदि इतने पर भी उन्हें असफलता मिले तो उन्हें यह कह सकनेका मौका नहीं देना चाहिए कि वे इसलिए नाकामयाब हुए कि हमने पहलेसे परस्पर निर्धारित मर्यादाके अन्दर भी उन्हें मदद नहीं दी। फर्ज कीजिए कि अपरिवर्तनवादी किसी भी तरहसे स्वराज्य- वादियोंका काम न बिगाड़ें तो उस हालत में यदि वे असफल भी हों तो वह असफलता - - एक तरह की सफलता ही होगी; क्योंकि तब हमें अपने ध्येयतक पहुँचनेका दूसरा रास्ता मिल जायेगा । ठीक इसी तरह, यदि देशके तमाम दल कताईकी शर्तको सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगाकर देखें और फिर भी सफलता न मिले तो हम सब उसे स्पष्ट रूपमें महसूस कर सकेंगे, और अपनी हार कबूल करते हुए सब मिलकर सफलता के लिए कोई और मार्ग निकालने की कोशिश करेंगे; क्योंकि यदि हम सचमुच तुले हुए हों तो हम अवश्य ही असफलताओंके बीचसे अपनी मंजिलतक पहुँचनेका मार्ग पा जायेंगे । कोलाबाके इन सज्जनोंकी कठिनाई है क्या ? वह खुद उन्हीं की पैदा की हुई तो है । अगर खुद उनके जिलेमें कपास पैदा नहीं होती तो वे खरीद लें। कोलाबा मैंचेस्टरकी अपेक्षा बम्बईसे कहीं नजदीक है । क्या उन्हें यह जानकर ताज्जुब न होगा कि मैंचेस्टरके आसपास कपासका एक टेंट भी नहीं फलता, पर वहाँके लोगोंको कपास बाहरसे मँगाने, धुनने और कातनेमें जरा भी दिक्कत महसूस नहीं होती ? मैं कोलाबाके इन मित्रोंको यकीन दिलाता हूँ कि ऐसा करनेमें उन्हें मँचेस्टरके लोगोंके मुकाबले आधी परेशानी भी नहीं उठानी पड़ेगी। उनका दिल बढ़ानेके लिए मैं यह भी कह देता हूँ कि यदि उन्हें कपास मँगाने और धुनने तथा कातनेकी इच्छा न हो तो<noinclude></noinclude> a7fn2ncyzj2a4s3tfrxlb5qqddbh5en पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६१ 250 166764 663570 523395 2026-06-21T18:54:53Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663570 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ शाबाश ! ६२५ काँग्रेसके प्रस्तावने उन्हें यह छुट्टी दे रखी है कि वे आवश्यक हाथ-कता सूत खरीद कर कांग्रेसको दे दें। क्या वे सूत खरीदना चाहते हैं ? यदि सूत हाथ-कता हो और एक-सा तथा मजबूत हो तो खरीदकर देना भी बुरा नहीं रहेगा । [ अंग्रेजीसे ]. यंग इंडिया, १५-१-१९२५ ४३५. शाबाश ! देशबन्धुने लॉर्ड लिटनके खिलाफ हालमें जो हाथ दिखाया है, वह सचमुच कमालका है। उनकी बीमारी और फिर कौंसिल हॉलतक डोलीपर उनका पहुँचाया जाना -- इन बातोंने उनकी शानदार जीतमें एक नाटकीयता पैदा कर दी है। बीमारी की हालत में उनकी वहाँ मौजूदगी अपने-आपमें इतना कुछ कह गई कि प्रभाव शालीसे- प्रभावशाली भाषण भी उतना कारगर नहीं हो सकता था । यदि लॉर्ड लिटनमें काफी सूझबूझ और खिलाड़ियोंके योग्य भावना हो तो उनको इतनी बार मात खाने के बाद अब अध्यादेश वापस ले लेना चाहिए, कैदियोंको रिहा कर देना चाहिए और वे जो ऐसा मानते हैं कि बंगालमें हत्याका षड्यंत्र चल रहा है, उस षड़यन्त्र से निबटने की जिम्मेदारी उन लोगोंपर छोड़ देनी चाहिए जिन्होंने देशबन्धुके पक्ष में मतदान किया है। बंगाल-कौंसिलने उनके विरुद्ध मतदान किया है, इसपर उनको शिकायत नहीं करनी चाहिए। लोक-निर्वाचित विधान सभाओंका सार तत्त्व यही है कि उनका निर्माण करनेवाली सरकारको अपने अस्तित्वके लिए उनके विवेकशील समर्थनपर ही निर्भर रहना चाहिए। विधान-सभाएँ कभी-कभी हठधर्मी या मूढ़ता कर सकती हैं या कभी-कभी सरकारके प्रति उनका भाव सन्देहका हो सकता है । वैसी हालतमें सरकारको तबतक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए जबतक कि वे उसके दृष्टिकोणकी हामी न हो जायें और इस बीच कुशासन या उससे भी बुरी स्थिति पैदा होनेके खतरे उठा लेने चाहिए। हमें यह उम्मीद क्यों करनी चाहिए कि लोक-निर्वाचित विधान सभाएँ निरंकुश शासनके दोषोंसे मुक्त ही होंगी ? लॉर्ड लिटन ऐसा कोई दावा नहीं करते कि उन्होंने जो कुछ किया है उससे देश राजनीतिक अपराधोंसे सर्वथा मुक्त हो जायेगा। लेकिन मुझे बहुत आशंका है कि भारतीय पत्रकार आदि जो सुन्दर- सटीक तर्क पेश कर रहे हैं, उनसे लोकमतकी अवहेलना करनेकी आदी इस सरकार के कानोंपर जूं तक नहीं रेंगेंगी, हालांकि उन सभीने लगभग एक स्वरसे लॉर्ड लिटनकी नीतिकी निन्दा की है । इसीलिए मैं भारतीय लोकसेवी जनोंसे कहता हूँ कि यदि वे अपने तर्कोंमें बल पैदा करना चाहते हैं तो उनको चरखा चलाना चाहिए। राष्ट्रको यही एक रचनात्मक शक्ति सहज सुलभ है । देशबन्धु दासने बंगाल - कौंसिलमें जो अनुशासन स्थापित कर दिया है, उसका बड़ा जबरदस्त प्रभाव पड़ेगा; लेकिन तभी, जब चरखा घर-घरमें प्रतिष्ठापित हो जायेगा और उसके फलस्वरूप, विदेशी वस्त्रोंका २५-४०<noinclude></noinclude> lwk4o16bveq1rjkh0uv9ysttjlhwkyq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६२ 250 166765 663571 523396 2026-06-21T18:55:16Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663571 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ६२६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय बहिष्कार एक वास्तविकता बन जायेगा; उससे पहले नहीं । काश समूचा राष्ट्र इस एक रचनात्मक कार्यका श्रेय ले सकता ! [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५ ४३६. काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्को मैंने यह सलाह यों ही नहीं दे दी थी कि वह ऐसी शिकायतोंको लेकर प्रस्तावपर प्रस्ताव पास करने न बैठे, जिनको दूर कराने के तरीकेपर अमल करना प्रतिनिधियोंके वशके बाहर हो, भले ही उनके पास ऐसे प्रमाण हों, जिनसे जनताको उन शिकायतोंके सही होनेका विश्वास दिलाया जा सकता हो । मैंने उनसे कहा कि परिषद् में पहले सार्वजनिक सेवा और त्यागकी भावनाका विकास करें और फिर शिकायतों को दूर करानेके लिए प्रयत्न प्रारम्भ करें। तब आप उन भिन्न-भिन्न मामलोंसे, जो आपको बहुत खटकते हैं और जिनके बारेमें आपको शिकायत है, निबटने में कहीं अधिक समर्थ हो पायेंगे । शान्तिपूर्ण प्रतिरोधका यही तरीका है । विषय समितिने इस सलाहको बिना किसी हिचकिचाहटके स्वीकार कर लिया । परन्तु परिषद् के संचालकों द्वारा तैयार किये गये कताई सदस्यता सम्बन्धी प्रस्तावपर दिलचस्प बहस हुई। पर वह बहुत भारी बहुमतसे पास हो गया । यह प्रस्ताव कांग्रेसके प्रस्तावसे एक बात में भिन्न है । इस प्रस्ताव द्वारा हर बुनियादी सदस्य के लिए विशेष राजनीतिक आयोजनोंके समय ही नहीं, बल्कि सदा-सर्वदा खादी पहनना लाजिमी बना दिया गया है। यहाँ संगठनके अनुशासन के खयालसे राय देनेकी कोई बात न थी । हर शख्स अपनी मर्जीके मुताबिक राय देनेके लिए आजाद था । अब यह देखना है कि इस प्रस्तावपर अमल किस तरह होता है। हर शख्स इस बातको तस्लीम करता हुआ दिखाई देता था कि इसकी सफलता उन मुख्य कार्यकर्त्ताओंके उत्साह, लगन और कार्य-क्षमतापर निर्भर है जो इस प्रस्तावको पास करानेके जिम्मेवार हैं । सर प्रभाशंकर कातेंगे। इस परिषद् में सबसे अधिक अद्भुत बात तो सर प्रभाशंकर पट्टणीकी यह प्रतिज्ञा थी कि वे खाना खानेके पहले कमसे कम आधा घंटा रोजाना कातेंगे • सिवा उस वक्त के जब वे इतने बीमार हों कि चरखा चला ही न सकें। उन्होंने सफरमें भी इससे छूट न लेनेकी ठानी है। उनका कहना है और वह ठीक ही है कि वे पहले दर्जे में सफर करते हैं और इसलिए सफरमें चरखा साथ ले जानेमें और कातनेमें भी उन्हें कोई दिक्कत पेश नहीं आनी चाहिए। सर प्रभाशंकरके लिए यह एक बड़ा भारी कदम है। मुझे आशा है कि वे अपने निश्चयपर जरूर अमल कर पायेंगे। उनके इस उदाहरणसे काठियावाड़ में कताई आन्दोलनको बड़ा उत्तेजन मिलेगा। यह कहनेकी तो कोई आवश्यकता ही नहीं कि काठियावाड़ सभामें शामिल होनेकी उनसे कोई आशा<noinclude></noinclude> ncf5wey6jp0ibis6xe3t50y9ax0lsey पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६३ 250 166766 663572 523397 2026-06-21T18:55:40Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663572 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् ६२७ नहीं करता। मैं यह खुलासा करनेके लिए उत्सुक था कि यद्यपि कातनेका एक राज- नीतिक पहलू है तो भी हरएक कातनेवालेको उसके राजनीतिक पहलूसे सम्बन्ध रखनेकी जरूरत नहीं । यदि राजा लोग और उनके मंत्री मिसाल पेश करनेके लिए और प्रजाके साथ अपने तादात्म्यके चिन्ह-स्वरूप कातें तो मैं उसे ही काफी मानूंगा । काठियावाड़के किसानोंको खुब फुरसत रहती है। लोग गरीब हैं। और यदि राजे-रजवाड़ों और उनके प्रतिनिधियोंके द्वारा कातनेका रिवाज चलाया जाये तो आम लोग भी, जिनपर वे शासन करते हैं, उसे अपना लेंगे और इससे राष्ट्रीय सम्पदामें भरपूर वृद्धि होगी । व्यक्तियोंपर चाहे इस वृद्धिका असर स्पष्ट मालूम न हो, लेकिन लोगोंपर समष्टि- रूपसे उसका असर काफी बड़ा होगा । पाठक यह जानना चाहेंगे कि सर प्रभाशंकरने यह प्रतिज्ञा क्यों और कैसे की थी। वे दर्शककी हैसियतसे विषय समितिमें आमन्त्रित होकर आये थे । कातनेका प्रस्ताव पास हो जानेपर, मैंने सदस्योंको कातनेवालोंमें नाम लिखानेके लिए आमंत्रित किया । मैंने उनसे कहा कि बेलगाँव में दूसरे लोगोंके साथ मैंने भी अपने सिर यह भार लिया था कि पहली मार्चके पहले-पहले, प्रतिमास २००० गज सूत कातनेवाले १०० सदस्य बनाऊँगा; मैंने यह भी कहा कि "अनिच्छुक" लोगों में से दो कातनेवालोंको तैयार करूँगा; मैंने श्रोताओंसे यह भी कहा कि बेलगाँवमें जब मैंने यह बीड़ा उठाया, मुझे आशा थी कि ये १०० सदस्य मुझे काठियावाड़से मिल जायेंगे और इच्छा न होनेपर भी कातनेवाले दो सदस्योंमें एक सर प्रभाशंकर मेरे खयालमें थे। यह सुनते ही सर प्रभाशंकर फौरन खड़े हुए और हर्ष-ध्वनिके बीच बड़े संकल्पके साथ उन्होंने अपना पूर्वोक्त निश्चय प्रकट किया। सर प्रभाशंकरका शिक्षक मुझे ही बनना था । यह लिखते समयतक उन्हें सिर्फ तीन बार अभ्यास कराया गया है। तीसरे ही दिन वे २ घंटे से भी कम समय में ८ नम्बरका एक-सा और अच्छा बटा हुआ ४८ गज सूत कात सके थे। सच बात तो यह है कि पहली बार ही आध घंटेके अभ्याससे वे तार निकालने लगे थे। इसके बाद उन्होंने कहा कि अब चरखे के साथ मुझे कुछ देर अकेले ही जूझने दीजिए । मुझे आशा है कि दूसरे राज्याधिकारी और मंत्री भी सर प्रभाशंकरके इस सुन्दर संकल्पका अनुकरण करेंगे, जो खुद उनके लिए भी और उनके अधीनस्थ प्रजाजनोंके 'लिए भी लाभदायक है । रुईका संग्रह रुईका केन्द्र होनेके कारण भावनगर में उन गरीब कातनेवालोंको, जो आध घंटेकी मजदूरी देनेपर राजी हो सकते हैं, लेकिन जो रुई नहीं दे सकते और न माँग ही सकते हैं, रुई देने के लिए कपास संग्रह करने का भी निश्चय हुआ । उसका नतीजा यह हुआ कि २७५ मनसे ज्यादा रुई इकट्ठी हो गई। दो दिनके माँगनेपर इतनी रुई इकट्ठी हो जानेपर कोई बुरा नहीं । यदि जोश ऐसा ही रहा तो काठियावाड़ में कताई आन्दोलन खूब चल पड़ेगा । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५<noinclude></noinclude> 3onimh9j0u5dj6pqyadl0tezbl7520b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६४ 250 166767 663574 523398 2026-06-21T18:56:03Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663574 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ४३७. घूमता चक्र पाठक जानते ह कि बड़ो दादा द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर मेरे प्रति बहुत स्नेह-भाव रखते हैं । मैं जो भी कहता या करता हूँ, लगभग सभीको वे पसन्द किये बिना नहीं रह पाते। इसलिए पाठकगण मेरे विचारों और मेरी योजनाओंके उनके अनुमोदनको यदि बहुत अधिक महत्त्व न दें तो उनको इसका पूरा-पूरा हक है । लेकिन पाठक देशके प्रति बड़ो दादाके उत्साह और उनकी निष्ठाकी सराहना किये बिना नहीं रह सकते। बड़ो दादा अपने इसी उत्साह और निष्ठाके कारण देशकी राजनीति में आनेवाले नये-नये विचारोंसे अपना सम्पर्क बनाये रहते हैं । इधर हालमें उन्होंने चरखेके बारेमें मुझे यह लिखा है : सिद्धान्तमें तो नहीं, परन्तु व्यवहारमें अत्यन्त अहंमन्य लोगोंका एक मूढ़ विश्वास बन जाता है कि जो काम उनको असाध्य लगता है वह असम्भव है और जो उनको साध्य लगता है वही सम्भव है । नेपोलियनके शत्रु कभी खयाल करते थे कि किसी भी सेनाके लिए शीत ऋतुमें आल्प्स पर्वत पार करना उतना ही असम्भव है, जितना गुब्बारेके सहारे चन्द्रलोककी यात्रा करना; किन्तु नेपोलियनका खयाल इससे भिन्न था। उसकी पैनी दृष्टि देख रही थी कि आल्प्सको पार करना ही इटलीमें प्रवेशका एकमात्र सम्भव साधन है । इसी तरह हमारे देशके अधिकांश लोग समझते हैं कि चरखा चलाना एक ऐसा सीधा-सादा काम है जिससे राजनीतिक तो दूर आर्थिक स्वतन्त्रताकी ओर भी हमारा एक कदमतक आगे बढ़ना बिलकुल असम्भव है; जबकि दूसरी ओर महात्माजी खयाल करते हैं कि हम जिस ध्येयकी प्राप्तिका प्रयत्न कर रहे हैं, उसे केवल इसी एक साधनसे प्राप्त करना सम्भव है । बड़ो दादाने एक पाद-टिप्पणी देते हुए यह भी लिखा है कि शाब्दिक दृष्टिसे चरखा, चक्रका पर्याय है और लाक्षणिक दृष्टिसे घूमते हुए संसार-चक्रका । कबीरके एक भजनमें चरखेका वर्णन उसके इसी लाक्षणिक अर्थमें हुआ है। लेकिन बड़ो दादाके पत्रका सबसे महत्त्वपूर्ण भाग वह है जिसमें इस कठोर सत्यपर जोर दिया गया है कि सांसारिक दृष्टिसे सयाने लोगोंको चरखे द्वारा देशकी वास्तविक प्रगति चाहे जितनी असम्भव जान पड़े, किन्तु उसका केवल यही एक सम्भव उपाय है । देश जो कोई अहम राजनीतिक कदम उठा सकता है, उसको यह चरखा - कार्य ही ठोस आधार प्रदान कर सकता है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५<noinclude></noinclude> 9jf50gfmxsnr1pav7eivuexrnjz42tr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६५ 250 166768 663576 523399 2026-06-21T18:56:33Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663576 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>________________ ४३८. अब्राह्मण क्रॉनिकल' ने बेलगाँवमें हुए अब्राह्मण सम्मेलनके बारेमें मुझसे अपनी सक्रियता या निष्क्रियताका स्पष्टीकरण करनेको कहा है । इस सम्मेलनके सम्बन्धमें कांग्रेसी 'नेताओंकी उपेक्षाकी शिकायतें सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ है । अपने सम्बन्धमें तो मैं यही कह सकता हूँ कि मैं बेलगाँवमें जिस कार्यके लिए गया था उसके उचित सम्पादनको ध्यान में रखते हुए, मुझसे जहाँतक सम्भव था, सभी सम्मेलनोंमें जानेका प्रयत्न कर रहा था। मुझे बताया गया है कि वहाँ जो अब्राह्मण सम्मेलन किया गया, वह मौलाना मुहम्मद अलीके आमंत्रणपर नहीं किया गया था । वह कांग्रेस अधिवेशनकी हृदमें भी नहीं हुआ था । जहाँतक मैं जानता हूँ, उसके सम्बन्धमें किसी कांग्रेसीसे सलाह नहीं ली गई थी। सम्मेलनके समय और स्थानकी जानकारी मुझे एक प्रवेश-पत्र से मिली थी; किन्तु उस तरहके तो, न जाने कितने प्रवेश-पत्र मेरे पास आते रहते थे। फिर भी मैं उसमें जानेके लिए उत्सुक था और यह प्रयत्न कर रहा था कि अपने दूसरे कार्यक्रमोंको निभाते हुए उसमें जा सकूँ । दुर्भाग्यसे मैं उस समय काममें लगा हुआ था, सो जब सम्मेलन चल रहा था, तब मैं उस कामको छोड़कर उसमें नहीं जा सका। जब मेरा काम खत्म हुआ और मैंने पूछा, तब पता चला कि सम्मेलन तो खत्म हो चुका है । मैं ये बातें केवल यह दिखाने के लिए बतला रहा हूँ कि सम्मेलनके प्रति मैंने कोई अरुचि या अशिष्टता नहीं दिखाई। जो बात मुझपर लागू होती है वहीं अन्य अधिकांश नेताओंपर भी लागू होती है । मेरी राय में सम्मेलनके संगठनकर्त्ताओंका यह कर्त्तव्य था कि वे सम्मेलनका समय मुझसे पूछकर ऐसा रखते जिससे मैं उसमें जा सकता । तब मैं दूसरे कांग्रेसी नेताओं का भी वहाँ पहुँचना सम्भव बना देता । मौलाना मुहम्मद अलीके आमंत्रणका प्रयोजन केवल इतना नहीं था कि बिना कुछ सोचे-विचारे सभी अन्य सम्मेलन कांग्रेस सप्ताह के दौरान ही आयोजित किये जायें। उसका उद्देश्य तो सब पक्षोंका हार्दिक सम्मिलन था । मैं अब्राह्मण सम्मेलनके संगठनकर्त्ताओंपर दोषा- रोपण नहीं कर रहा हूँ । मैं तो केवल यह दिखानेका प्रयत्न कर रहा हूँ कि कांग्रेसी नेता यदि सम्मेलनमें जा सकते और उनको उसका मौका दिया जाता तो वे खुशीसे जाते । इन पंक्तियोंको लिखनके बाद मैंने श्री गंगाधर रावका स्पष्टीकरण देख लिया है, इससे स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १५-१-१९२५<noinclude></noinclude> a47ksxww8w44148sa1svq5grijdqcmf सदस्य वार्ता:Skirti.codes 3 193510 663534 663417 2026-06-21T18:12:28Z Skirti.codes 6559 /* आपके द्वारा शोधित पृष्ठ */ उत्तर 663534 wikitext text/x-wiki {{स्वागत}} —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०८:३३, १८ जून २०२६ (UTC) == आपके द्वारा शोधित पृष्ठ == @[[सदस्य:Skirti.codes|Skirti.codes]]जी, आपके द्वारा शोधित किए जा रहे पृष्ठों में त्रुटियाँ छूट जा रही हैं। कृपया उन त्रुटियों को अच्छी तरह से सुधारे बगैर पृष्ठ को शोधित चिह्नित (पृष्ठ का रंग बदलना) ना करें। आप पृष्ठों के रंग बदले बगैर अपना संपादन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद।—[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०८:३३, १८ जून २०२६ (UTC) :@[[सदस्य:Skirti.codes|Skirti.codes]]जी, पहली चेतावनी के बाद भी आप पृष्ठों को सुधारे बगैर उनका रंग बदल (शोधित चिह्नित कर) रहे हैं। आपके इस तरह के संपादनों को बर्बरता मानकर आपको प्रतिबंधित भी किया जा सकता है। मेरी सलाह है कि शुरूआत में आप पृष्ठों का रंग बदले बगैर अपना संपादन कार्य जारी रखें। धन्यवाद।--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १४:०२, २० जून २०२६ (UTC) ::जानकारीपूर्ण सुझाव के लिए धन्यवाद। भविष्य में मैं अपने संपादन का ध्यान रखूँगी। [[सदस्य:Skirti.codes|Skirti.codes]] ([[सदस्य वार्ता:Skirti.codes|वार्ता]]) १८:१२, २१ जून २०२६ (UTC) j7cuvrt0fi36a9shxq822xgwawwujee विषयसूची:दिगम्बरजैनग्रन्थकर्त्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf 252 193528 663656 663318 2026-06-22T05:04:47Z VishnudevButla 6641 VishnudevButla ने पृष्ठ [[विषयसूची:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf]] को [[विषयसूची:दिगम्बरजैनग्रन्थकर्त्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf]] पर स्थानांतरित किया: शीर्षक में गलत वर्तनी 663318 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ। |Language=hi |Volume= |Author=नाथूराम प्रेमी |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीजैनग्रन्थरलाकर |Address=बम्बई |Year=1911 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist 1to852 /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 3jcvsn05byqyl6kk9nik9e0vz2shgeg विषयसूची:उर्म्मिला.pdf 252 193546 663658 663437 2026-06-22T05:07:50Z VishnudevButla 6641 VishnudevButla ने पृष्ठ [[विषयसूची:उर्मिला.pdf]] को [[विषयसूची:उर्म्मिला.pdf]] पर स्थानांतरित किया: शीर्षक में गलत वर्तनी 663437 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=उर्मिला |Language=hi |Volume= |Author=बालकृष्ण शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=अत्तरचन्द कपूर एएड सन्ज़ |Address=दिल्ली |Year=1950 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} ehsa8jca9xst25k7r0eaoaj0vq4m963 विषयसूची:कविता कौमुदी.pdf 252 193564 663515 2026-06-21T13:01:45Z Manvikesarwani09 6620 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663515 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=कविता कौमुदी |Language=hi |Volume=भाग १ |Author=[[Author:रामनरेश त्रिपाठी|रामनरेश त्रिपाठी]] |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor=[[Author:रामनरेश त्रिपाठी|रामनरेश त्रिपाठी]] |Illustrator= |Publisher=हिंदी मंदिर |Address=प्रयाग |Year=1917 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} l0f8fpadinb1me2lgk453p2mdnxmmyy 663516 663515 2026-06-21T13:03:16Z Manvikesarwani09 6620 663516 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=कविता कौमुदी |Language=hi |Volume=भाग १ |Author=[[Author:रामनरेश त्रिपाठी|रामनरेश त्रिपाठी]] |Co-author1= 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2026-06-21T15:00:04Z Navishth 6636 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663518 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=कर्त्तव्य शास्त्र |Language=hi |Volume= |Author=Babu Gulabrai |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor=Shyamsundar Das |Illustrator= |Publisher=काशी नागरीप्रचारिणी सभा |Address=वाराणसी |Year=1919 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:हिंदी साहित्य]] e637hk54cyptljknhdnyekbqc4m2f7y विषयसूची:1925 आँसू जयशंकर प्रसाद Hindi PDF.pdf 252 193567 663519 2026-06-21T15:17:39Z Skirti.codes 6559 जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध खंडकाव्य, जिसमें विरह, करुणा तथा मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। 663519 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=आँसू |Language=hi |Volume= |Author=जयशंकर प्रसाद |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1925 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 7n7x6hfxv93yww4sxzurlpv553va1re आँसू 0 193568 663520 2026-06-21T15:22:38Z Skirti.codes 6559 "{{header|title=आँसू|author=[[लेखक:जयशंकर प्रसाद]]|year=1925}}{{विषयसूची कड़ी|1925_आँसू_जयशंकर_प्रसाद_Hindi_PDF.pdf}}" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663520 wikitext text/x-wiki {{header|title=आँसू|author=[[लेखक:जयशंकर प्रसाद]]|year=1925}}{{विषयसूची कड़ी|1925_आँसू_जयशंकर_प्रसाद_Hindi_PDF.pdf}} 162d00mwagqaq9pswtbmt314bf8s7z1 663521 663520 2026-06-21T15:30:48Z Skirti.codes 6559 663521 wikitext text/x-wiki {{header | title = आँसू | author = जयशंकर प्रसाद | section = खण्डकाव्य | year = 1925 }} == विषयसूची == [[विषयसूची:1925_आँसू_जयशंकर_प्रसाद_Hindi_PDF.pdf]] a3ewsa3jpx3htt9dd74wcs7buqk6v64 उम्मेद सिंह चरित्र 0 193569 663522 2026-06-21T15:32:51Z Skirti.codes 6559 "'''उम्मेद सिंह चरित्र''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1913 == विषयसूची == [[विषयसूची:1913_Ummed_Singh_Charitra_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम शर्मा द्वारा रचित एक जीवनीपरक ऐतिहासि..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663522 wikitext text/x-wiki '''उम्मेद सिंह चरित्र''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1913 == विषयसूची == [[विषयसूची:1913_Ummed_Singh_Charitra_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम शर्मा द्वारा रचित एक जीवनीपरक ऐतिहासिक कृति है, जिसमें उम्मेद सिंह के जीवन, व्यक्तित्व, कार्यों तथा उनके समय की ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। bppxjb7gfa9j02x5q7go93pteisaz8j निःसहाय हिन्दू 0 193570 663523 2026-06-21T15:36:39Z Skirti.codes 6559 "'''निःसहाय हिन्दू''' लेखक: [[लेखक:राधाकृष्ण दास]] प्रथम प्रकाशन: 1890 == विषयसूची == [[विषयसूची:निःसहाय_हिन्दू.pdf]] == परिचय == यह राधाकृष्ण दास द्वारा रचित हिन्दी कृति है। इसमें तत..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663523 wikitext text/x-wiki '''निःसहाय हिन्दू''' लेखक: [[लेखक:राधाकृष्ण दास]] प्रथम प्रकाशन: 1890 == विषयसूची == [[विषयसूची:निःसहाय_हिन्दू.pdf]] == परिचय == यह राधाकृष्ण दास द्वारा रचित हिन्दी कृति है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज तथा हिन्दू समाज की स्थिति का वर्णन और विवेचन प्रस्तुत किया गया है। m76n206yqw3h0e7ks03qaijnnp6w0sq पराक्रमी हाड़ाराव 0 193571 663524 2026-06-21T15:38:40Z Skirti.codes 6559 "'''पराक्रमी हाड़ाराव''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1915 == विषयसूची == [[विषयसूची:1915_Parakrami_Hadarav_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम शर्मा द्वारा रचित ऐतिहासिक जीवनीपरक कृ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663524 wikitext text/x-wiki '''पराक्रमी हाड़ाराव''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1915 == विषयसूची == [[विषयसूची:1915_Parakrami_Hadarav_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम शर्मा द्वारा रचित ऐतिहासिक जीवनीपरक कृति है। इसमें हाड़ाराव के जीवन, पराक्रम, नेतृत्व तथा उनसे संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। b8qi3da7kvxj0l6ne5sosfr72i6bcxf महारानी विक्टोरिया का चरित्र 0 193572 663525 2026-06-21T15:40:30Z Skirti.codes 6559 "'''महारानी विक्टोरिया का चरित्र''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1901 == विषयसूची == [[विषयसूची:1901_महारानी_विक्टोरिया_का_चरित्र_हिन्दी_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663525 wikitext text/x-wiki '''महारानी विक्टोरिया का चरित्र''' लेखक: [[लेखक:लज्जाराम शर्मा]] प्रथम प्रकाशन: 1901 == विषयसूची == [[विषयसूची:1901_महारानी_विक्टोरिया_का_चरित्र_हिन्दी_PDF.pdf]] == परिचय == यह लज्जाराम शर्मा द्वारा रचित जीवनीपरक कृति है, जिसमें महारानी विक्टोरिया के जीवन, शासनकाल तथा समकालीन ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। tuehzu78kox5y793iv61p8btd306gl4 छत्रपति महाराज शिवाजी का जीवन चरित्र 0 193573 663526 2026-06-21T15:41:55Z Skirti.codes 6559 "'''छत्रपति महाराज शिवाजी का जीवन चरित्र''' लेखक: [[लेखक:कार्तिक प्रसाद]] प्रथम प्रकाशन: 1911 == विषयसूची == [[विषयसूची:1911_छत्रपति_महाराज_शिवाजी_का_जीवन_चरित्र_हिन्दी_PDF.pdf]] == परिच..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663526 wikitext text/x-wiki '''छत्रपति महाराज शिवाजी का जीवन चरित्र''' लेखक: [[लेखक:कार्तिक प्रसाद]] प्रथम प्रकाशन: 1911 == विषयसूची == [[विषयसूची:1911_छत्रपति_महाराज_शिवाजी_का_जीवन_चरित्र_हिन्दी_PDF.pdf]] == परिचय == यह कार्तिक प्रसाद द्वारा रचित जीवनीपरक ऐतिहासिक कृति है, जिसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन, संघर्ष, राज्य-निर्माण, सैन्य कौशल तथा ऐतिहासिक योगदान का वर्णन किया गया है। c0e1hfwpn379b9latyon2xitmqeek80 विषयसूची:1946 हिन्दी राज्यशास्त्र अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf 252 193574 663527 2026-06-21T15:49:09Z Skirti.codes 6559 अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी का 1946 का हिन्दी राज्यशास्त्र ग्रन्थ 663527 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=हिन्दी राज्यशास्त्र |Language=hi |Volume= |Author=अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग |Address= |Year=1946 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 92wdj3397cv7w199q10pwkmnn24uszl विषयसूची:आहार तत्त्व.pdf 252 193575 663528 2026-06-21T16:58:38Z ~2026-35949-90 6694 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663528 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=hi |Volume= |Author=पाठक रामनारायण |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1947 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist 1to6=- 7=1 7to9=roman 10=1 /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} n8f47so602eoxg4terl49wpwyc05pyy 663529 663528 2026-06-21T17:02:23Z ~2026-35949-90 6694 663529 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=hi |Volume= |Author=पाठक रामनारायण |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1947 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist 1to7=- 8=1 8to10=roman 11=1 /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 1wm78uzibuewx26l4khl92i7muumthm 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2manfb7v07n4hgz3mhb2egry8urw7nn विषयसूची:कालिदास की निरंकुशता.pdf 252 193577 663532 2026-06-21T17:19:34Z Manvikesarwani09 6620 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663532 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=कालिदास की निरंकुशता |Language=hi |Volume= |Author=[[Author:महावीर प्रसाद द्विवेदी|महावीर प्रसाद द्विवेदी]] |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address=बम्बई |Year=1912 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} ofxv4wuryfr57imacayr79r7qh37ddk विषयसूची:बुद्धचरित.pdf 252 193578 663533 2026-06-21T17:26:28Z Manvikesarwani09 6620 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663533 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=बुद्धचरित |Language=hi |Volume= |Author=[[Author:रामचन्द्र शुक्ल|रामचन्द्र शुक्ल]] |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= 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विषयसूची == [[विषयसूची:1914_बुन्देल_वैभव_गौरीशंकर_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == '''बुन्देल-वैभव''' गौरीशंकर द्विवेदी 'शंकर'..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663555 wikitext text/x-wiki {{header | title = बुन्देल-वैभव | author = गौरीशंकर द्विवेदी | section = इतिहास | year = 1914 }} == विषयसूची == [[विषयसूची:1914_बुन्देल_वैभव_गौरीशंकर_Hindi_PDF.pdf]] == परिचय == '''बुन्देल-वैभव''' गौरीशंकर द्विवेदी 'शंकर' द्वारा रचित एक साहित्येतिहास सम्बन्धी ग्रन्थ है। इसमें बुन्देलखण्ड के हिन्दी कवियों, उनकी कृतियों तथा हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का विस्तृत विवेचन किया गया है। jqv5uao7gne1zhuxm7uqbk35wtzp45c पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/१२ 250 193586 663577 2026-06-21T18:59:38Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 663577 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>'''हिंदी नाटकों के उद्भव के पूर्व''' ''संस्कृत नाटकों की परंपरा'' हिंदी के उपन्यास, कहानी तथा निबंध संस्कृत-साहित्य की क्रमागत परपरा से बहुत कम प्राप्त कर सके हैं। किंतु काव्य और नाटक सीधे उसके विकास क्रम में पड़ते हैं । भारतेन्दु तथा उनका महल संस्कृत की नाट्य प्रणाली से बहुत कुछ प्रभावित रहा; संस्कृत नाटकों के काव्यात्मक वातावरण, रूमानियत तथा टेकनीक की छाप प्रसाद के नाटकों पर स्पष्ट देखी जा सकती है। प्रसाद के परवर्ती नाटककारो की कृतियों भी किन्हीं ग्रंथों में संस्कृत नाटकों से अनुप्राणित हैं । ऐसी स्थिति में संस्कृत नाटकों का संक्षिप्त विश्ले- केवल श्रृंखला की कड़ियों मिलाने का औपचारिक कार्य नहीं माना जा सकता बल्कि समग्र गाय साहित्य के नैरन्तर्य तथा नवीन परिवर्तनों को समझने-समझाने में विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है । संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनुमान और कल्पना के आधार पर ही कुछ कहा जा सकता है । नाट्यशास्त्र में उल्लिखित देवी उत्पत्ति तर्क से पुष्ट न होने के कारण मान्य नहीं हो सकती । लेकिन 'न वेद व्यवहारोंयं संश्राव्यः शूद्रजातिषु । तस्थात्सृजापर वेद" पश्चमं सार्ववणिकम्' से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि नाटक अत्यन्त लोक प्रिय साहित्य था। सभी वर्णों के स्त्री-पुरुष समान रूप से इसका रसास्वादन कर सकते थे। ऋग्वेद में पाए जाने वाले सूक्तों (जो संख्या में लगभग पंद्रह है) के संवाद तत्व से नाटक की उत्पत्ति का सम्बन्ध मोड़ लेना कम भ्रमपूर्ण नहीं है। मैक्समूलर और<noinclude></noinclude> 6dulp4b0bt8ai45rtttlp3u1zyklick विषयसूची:1916 भारतीय शासन पद्धति भाग 1 अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf 252 193587 663578 2026-06-21T19:01:52Z Skirti.codes 6559 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663578 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=भारतीय शासन-पद्धति |Language=hi |Volume= |Author=अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=इण्डियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग |Address= |Year=1916 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} t8zm1hfk99y2on8kwchr6tm82cq8ain 663581 663578 2026-06-21T19:21:11Z Skirti.codes 6559 663581 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=भारतीय शासन-पद्धति |Language=hi |Volume= |Author=अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी 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56baofhgcv3hfswxldf19xexm6y6ov0 हिन्दी कौमुदी 0 193591 663583 2026-06-21T19:25:14Z Skirti.codes 6559 "{{header | title = हिन्दी कौमुदी | author = अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी | year = 1924 | section = हिन्दी व्याकरण }} '''हिन्दी कौमुदी''' पंडित अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी द्वारा रचित हिन्दी व्याकरण का प्रसिद्ध ग्..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663583 wikitext text/x-wiki {{header | title = हिन्दी कौमुदी | author = अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी | year = 1924 | section = हिन्दी व्याकरण }} '''हिन्दी कौमुदी''' पंडित अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी द्वारा रचित हिन्दी व्याकरण का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। == विषयसूची == [[विषयसूची:1924_हिन्दी_कौमुदी_अम्बिका_प्रसाद_वाजपेयी_Hindi_PDF.pdf]] ccazvm7k4bpa8yxeivs50r0hrmgg67d विषयसूची:Karmabhumi - Munshi Premchand.djvu 252 193592 663584 2026-06-21T19:39:05Z Aryanraj26 6695 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663584 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=hi |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= 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<pagelist from="1" to="427" />" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663600 wikitext text/x-wiki {{विषयसूची | शीर्षक = कर्मभूमि | लेखक = मुंशी प्रेमचंद | वर्ष = १९३२ | स्रोत = https://archive.org/details/rangbhoomi-upanyas-hindi | चित्र = Rangbhoomi - Munshi Premchand.djvu }} <pagelist from="1" to="427" /> kip162jz0t0bmyfne4jawigfzqgat4y विषयसूची:BihariSatsaiKiBhumika.pdf 252 193600 663607 2026-06-21T20:08:21Z Arnav Bharadwaj 6588 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663607 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=hi |Volume= |Author=Mahakavi Bihari |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1930 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} hpfq0vlvhtdbznkg1fmeiwz8auwr9og पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/२ 250 193601 663608 2026-06-21T20:08:27Z Aryanraj26 6695 /* अशोधित */ "गबन बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं । रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 663608 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Aryanraj26" /></noinclude>गबन बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं । रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के बाग़ में झूला पड़ा हुआ है। लड़कियाँ भी झूल रहीं हैं और उनकी माताएँ भी । दो-चार झूल रहीं हैं, दो चार झुला रही हैं । कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा । इस ऋतु में महिलाओं की बाल - स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं । ये फुहारें मानो चिंताओं को ह्रदय से धो डालती हैं । मानो मुरझाए हुए मन को भी हरा कर देती हैं । सबके दिल उमंगों से भरे हुए हैं । घानी साडियों ने प्रकृति की हरियाली से नाता जोड़ा है । इसी समय एक बिसाती आकर झूले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही झूला बंद हो गया। छोटी-बडी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती - दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कच्चे मोतियों के गहने थे, कच्चे लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुडियां और गुडियों के गहने, बच्चों के लट्टू और झुनझुने। किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। एक बडी-बडी आंखों वाली बालिका ने वह चीज पसंद की, जो उन चमकती हुई चीजों में सबसे सुंदर थी। वह गिरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। मां से बोली--अम्मां, मैं यह हार लूंगी। मां ने बिसाती से पूछा -- बाबा, यह हार कितने का है - बिसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हुए कहा- खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें। माता ने कहा- यह तो बडा महंगा है। चार दिन में इसकी चमक दमक जाती रहेगी। बिसाती ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा --बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जाएगा! माता के ह्रदय पर इन सहृदयता से भरे हुए शब्दों ने चोट की। हार ले लिया गया। बालिका के आनंद की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से भी उसे इतना आनंद न होता। उसे पहनकर वह सारे गांव में नाचती गिरी। उसके पास जो बाल-संपत्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे प्रिय यही बिल्लौर का हार था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी। महाशय दीनदयाल प्रयाग के छोटे - से गांव में रहते थे। वह किसान न थे पर खेती करते थे। वह जमींदार न थे पर जमींदारी करते थे। थानेदार न थे पर थानेदारी करते थे। वह थे जमींदार के मुख्तार। गांव पर उन्हीं की धाक थी। उनके पास चार चपरासी थे, एक घोडा, कई गाएं- - भैंसें। वेतन कुल पांच रूपये पाते थे, जो उनके तंबाकू के खर्च को भी काफी न होता था । उनकी आय के और कौन से मार्ग थे, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं की लडकी थी। पहले उसके तीन भाई और थे, पर इस समय वह अकेली थी। उससे कोई पूछता--तेरे भाई क्या हुए, तो वह बडी सरलता से कहती--बडी दूर खेलने गए हैं। कहते हैं, मुख्तार साहब ने एक गरीब आदमी को इतना पिटवाया था कि वह मर गया था। उसके तीन वर्ष के अंदर तीनों लङके जाते रहे। तब से बेचारे बहुत संभलकर चलते थे। फूंक-फूंककर पांव रखते, दूध के जले थे, छाछ भी फूंक - फूंककर पीते थे। माता और पिता के जीवन में और क्या अवलंब? दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते, तो जालपा के लिए कोई न कोई आभूषण जरूर लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से अधिक प्रसन्न हो सकती है। गुडियां और खिलौने वह व्यर्थ समझते थे, इसलिए जालपा आभूषणों से ही खेलती थी। यही उसके खिलौने थे। वह बिल्लौर का हार, जो उसने बिसाती से लिया था, अब उसका सबसे प्यारा खिलौना था। असली<noinclude></noinclude> 19gl7br39v2u8uyi8a2rzi11z9xoed4 663610 663608 2026-06-21T20:08:43Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663610 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>गबन बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं । रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है; पर ऐसा मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के बाग़ में झूला पड़ा हुआ है। लड़कियाँ भी झूल रहीं हैं और उनकी माताएँ भी । दो-चार झूल रहीं हैं, दो चार झुला रही हैं । कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा । इस ऋतु में महिलाओं की बाल - स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं । ये फुहारें मानो चिंताओं को ह्रदय से धो डालती हैं । मानो मुरझाए हुए मन को भी हरा कर देती हैं । सबके दिल उमंगों से भरे हुए हैं । घानी साडियों ने प्रकृति की हरियाली से नाता जोड़ा है । इसी समय एक बिसाती आकर झूले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही झूला बंद हो गया। छोटी-बडी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती - दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कच्चे मोतियों के गहने थे, कच्चे लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गुडियां और गुडियों के गहने, बच्चों के लट्टू और झुनझुने। किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। एक बडी-बडी आंखों वाली बालिका ने वह चीज पसंद की, जो उन चमकती हुई चीजों में सबसे सुंदर थी। वह गिरोजी रंग का एक चन्द्रहार था। मां से बोली--अम्मां, मैं यह हार लूंगी। मां ने बिसाती से पूछा -- बाबा, यह हार कितने का है - बिसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हुए कहा- खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें। माता ने कहा- यह तो बडा महंगा है। चार दिन में इसकी चमक दमक जाती रहेगी। बिसाती ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा --बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जाएगा! माता के ह्रदय पर इन सहृदयता से भरे हुए शब्दों ने चोट की। हार ले लिया गया। बालिका के आनंद की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से भी उसे इतना आनंद न होता। उसे पहनकर वह सारे गांव में नाचती गिरी। उसके पास जो बाल-संपत्ति थी, उसमें सबसे मूल्यवान, सबसे प्रिय यही बिल्लौर का हार था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी। महाशय दीनदयाल प्रयाग के छोटे - से गांव में रहते थे। वह किसान न थे पर खेती करते थे। वह जमींदार न थे पर जमींदारी करते थे। थानेदार न थे पर थानेदारी करते थे। वह थे जमींदार के मुख्तार। गांव पर उन्हीं की धाक थी। उनके पास चार चपरासी थे, एक घोडा, कई गाएं- - भैंसें। वेतन कुल पांच रूपये पाते थे, जो उनके तंबाकू के खर्च को भी काफी न होता था । उनकी आय के और कौन से मार्ग थे, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं की लडकी थी। पहले उसके तीन भाई और थे, पर इस समय वह अकेली थी। उससे कोई पूछता--तेरे भाई क्या हुए, तो वह बडी सरलता से कहती--बडी दूर खेलने गए हैं। कहते हैं, मुख्तार साहब ने एक गरीब आदमी को इतना पिटवाया था कि वह मर गया था। उसके तीन वर्ष के अंदर तीनों लङके जाते रहे। तब से बेचारे बहुत संभलकर चलते थे। फूंक-फूंककर पांव रखते, दूध के जले थे, छाछ भी फूंक - फूंककर पीते थे। माता और पिता के जीवन में और क्या अवलंब? दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते, तो जालपा के लिए कोई न कोई आभूषण जरूर लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से अधिक प्रसन्न हो सकती है। गुडियां और खिलौने वह व्यर्थ समझते थे, 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बनवाया है, मेरे लिए क्यों नहीं बनवातीं? मां ने मुस्कराकर कहा-तेरे लिए तेरी ससुराल से आएगा। यह हार छ सौ में बना था। इतने रूपये जमा कर लेना, दीनदयाल के लिए आसान न था । ऐसे कौन बडे ओहदेदार थे। बरसों में कहीं यह हार बनने की नौबत आई जीवन में फिर कभी इतने रूपये आयेंगे, इसमें उन्हें संदेह था। जालपा लजाकर भाग गई, पर यह शब्द उसके ह्रदय में अंकित हो गए। ससुराल उसके लिए अब उन भंयकर न थी। ससुराल से चन्द्रहार आएगा, वहां के लोग उसे माता-पिता से अधिक प्यार करेंगे, तभी तो जो चीज ये लोग नहीं बनवा सकते, वह वहां से आएगी। लेकिन ससुराल से न आए तो उसके सामने तीन लड़कियों के विवाह चुके थे, किसी की ससुराल से चन्द्रहार न आया था। कहीं उसकी ससुराल से भी न आया तो उसने सोचा -- तो क्या माताजी अपना हार मुझे दे देंगी ? अवश्य दे देंगी। इस तरह हंसते-खेलते सात वर्ष कट गए। और वह दिन भी आ गया, जब उसकी चिरसंचित अभिलाषा पूरी होगी। 3<noinclude></noinclude> 675mkxhbkmcu9192sj1ygdyt52jlk7r पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/४ 250 193603 663617 2026-06-21T20:11:54Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663617 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>दो मुंशी दीनदयाल की जान - पहचान के आदमियों में एक महाशय दयानाथ थे, बडे ही सज्जन और सह्रदय कचहरी में नौकर थे और पचास रूपये वेतन पाते थे। दीनदयाल अदालत के कीड़े थे। दयानाथ को उनसे सैकड़ों ही बार काम पड़ चुका था। चाहते, तो हजारों वसूल करते, पर कभी एक पैसे के भी रवादार नहीं हुए थे। दीनदयाल के साथ ही उनका यह सलूक न था ? - यह उनका स्वभाव था। यह बात भी न थी कि वह बहुत ऊँचे आदर्श के आदमी हों, पर रिश्वत को हराम समझते थे। शायद इसलिए कि वह अपनी आंखों से इस तरह के दृश्य देख चुके थे। किसी को जेल जाते देखा था, किसी को संतान से हाथ धोते, किसी को दुर्व्यसनों के पंजे में फंसते। ऐसी उन्हें कोई मिसाल न मिलती थी, जिसने रिश्वत लेकर चैन किया हो उनकी यह दृढ़ धारणा हो गई थी कि हराम की कमाई हराम ही में जाती है। यह बात वह कभी न भूलते इस जमाने में पचास रुपए की भुगुत ही क्या पांच आदमियों का पालन बडी मुश्किल से होता था । लङके अच्छे कपड़ों को तरसते, स्त्री गहनों को तरसती, पर दयानाथ विचलित न होते थे। बडा लड़का दो ही महीने तक कालेज में रहने के बाद पढ़ना छोड़ बैठा। पिता ने साफ कह दिया--मैं तुम्हारी डिग्री के लिए सबको भूखा और नंगा नहीं रख सकता। पढ़ना चाहते हो, तो अपने पुरूषार्थ से पढ़ो। बहुतों ने किया है, तुम भी कर सकते हो । लेकिन रमानाथ में इतनी लगन न थी। इधर दो साल से वह बिलकुल बेकार था। शतरंज खेलता, सैर सपाटे करता और मां और छोटे भाइयों पर रोब जमाता। दोस्तों की बदौलत शौक पूरा होता रहता था। किसी का चेस्टर मांग लिया और शाम को हवा खाने निकल गए। किसी का पंपःशू पहन लिया, किसी की घड़ी कलाई पर बांधा ली। कभी बनारसी फैशन में निकले, कभी लखनवी फैशन मेंब दस मित्रों ने एक-एक कपडा बनवा लिया, तो दस सूट बदलने का उपाय हो गया । सहकारिता का यह बिलकुल नया उपयोग था। इसी युवक को दीनदयाल ने जालपा के लिए पसंद किया। दयानाथ शादी नहीं करना चाहते थे। उनके पास न रूपये थे और न एक नए परिवार का भार उठाने की हिम्मत, पर जागेश्वरी ने त्रिया-हठ से काम लिया और इस शक्ति के सामने पुरूष को झुकना पड़ा। जागेश्वरी बरसों से पुत्रवधू के लिए तड़प रही थी। जो उसके सामने बहुएं बनकर आइ, वे आज पोते खिला रही हैं, फिर उस दुखिया को कैसे धैर्य होता। वह कुछ- कुछ निराश हो चली थी। ईश्वर से मनाती थी कि कहीं से बात आए । दीनदयाल ने संदेश भेजा, तो उसको आंखें- सी मिल गई। अगर कहीं यह शिकार हाथ से निकल गया, तो फिर न जाने कितने दिनों और राह देखनी पड़े। कोई यहां क्यों आने लगा। न धन ही है, न जायदाद। लङके पर कौन रीझता है। लोग तो धन देखते हैं, इसलिए उसने इस अवसर पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई। दयानाथ ने कहा, भाई, तुम जानो तुम्हारा काम जाने । मुझमें समाई नहीं है । जो आदमी अपने पेट की फिक्र नहीं कर सकता, उसका विवाह करना मुझे तो अधर्म - सा मालूम होता है । फिर रूपये की भी तो फिक्र है। एक हजार तो टीमटाम के लिए चाहिए, जोड़े और गहनों के लिए अलग। (कानों पर हाथ रखकर ) ना बाबा! यह बोझ मेरे मान का नहीं। जागेश्वरी पर इन दलीलों का कोई असर न हुआ, बोली- वह भी तो कुछ देगा- मैं उससे मांगने तो जाऊंगा नहीं । तुम्हारे मांगने की जरूरत ही न पड़ेगी। वह खुद ही देंगे। लडकी के ब्याह में पैसे का मुंह कोई नहीं देखता। हां, मकदूर चाहिए, सो दीनदयाल पोढ़े आदमी हैं । और फिर यही एक संतान है; बचाकर रखेंगे, तो किसके लिए? दयानाथ को अब कोई बात न सूझी, केवल यही कहा--वह चाहे लाख दे दें, चाहे एक न दें, मैं न कहूंगा कि दो, न 4<noinclude></noinclude> bsno334dwcs5sz7zxuy5zzhuydsurfp पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/५ 250 193604 663619 2026-06-21T20:12:16Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663619 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>कहूंगा कि मत दो। कर्ज मैं लेना नहीं चाहता, और लूं, तो दूंगा किसके घर से? जागेश्वरी ने इस बाधा को मानो हवा में उडाकर कहा -- मुझे तो विश्वास है कि वह टीके में एक हजार से कम न देंगे। तुम्हारे टीमटाम के लिए इतना बहुत है । गहनों का प्रबंध किसी सर्राफ से कर लेना । टीके में एक हजार देंगे, तो क्या द्वार पर एक हजार भी न देंगे- वही रूपये सर्राफ को दे देना । दो-चार सौ बाकी रहे, वह धीरे-धीरे चुक जाएंगे। बच्चा के लिए कोई न कोई द्वार खुलेगा ही । दयानाथ ने उपेक्षा-भाव से कहा--' खुल चुका, जिसे शतरंज और सैर-सपाटे से फुरसत न मिले, उसे सभी द्वार बंद मिलेंगे। जागेश्वरी को अपने विवाह की बात याद आई। दयानाथ भी तो गुलछर्रे उडाते थे लेकिन उसके आते ही उन्हें चार पैसे कमाने की फिक्र कैसी सिर पर सवार हो गई थी। साल भर भी न बीतने पाया था कि नौकर हो गए। बोली--बहू आ जाएगी, तो उसकी आंखें भी खुलेंगी, देख लेना। अपनी बात याद करो। जब तक गले में जुआ नहीं पडा है, तभी तक यह कुलेलें हैं। जुआ पडा और सारा नशा हिरन हुआ । निकम्मों को राह पर लाने का इससे बढ़कर और कोई उपाय ही नहीं। जब दयानाथ परास्त हो जाते थे, तो अख़बार पढ़ने लगते थे। अपनी हार को छिपाने का उनके पास यही संकेत था। 5<noinclude></noinclude> ti3seypbzbss1uuor7qrkb7qxsg3bkc पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/६ 250 193605 663620 2026-06-21T20:12:50Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663620 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>तीन मुंशी दीनदयाल उन आदमियों में से थे, जो सीधों के साथ सीधे होते हैं, पर टेढ़ों के साथ टेढ़े ही नहीं, शैतान हो जाते हैं। दयानाथ बडा-सा मुंह खोलते, हजारों की बातचीत करते, तो दीनदयाल उन्हें ऐसा चकमा देते कि वह उम्र - भर याद करते । दयानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर लिया। उनका विचार एक हजार देने का था, पर एक हजार टीके ही में दे आए। मानकी ने कहा -- -- जब टीके में एक हजार दिया, तो इतना ही घर पर भी देना पड़ेगा। आएगा कहां से - दीनदयाल चिढ़कर बोले-- भगवान मालिक है। जब उन लोगों ने उदारता दिखाई और लड़का मुझे सौंप दिया, तो मैं भी दिखा देना चाहता हूं कि हम भी शरीफ हैं और शील का मूल्य पहचानते हैं। अगर उन्होंने हेकड़ी जताई होती, तो अभी उनकी खबर लेता। दीनदयाल एक हजार तो दे आए, पर दयानाथ का बोझ हल्का करने के बदले और भारी कर दिया। वह कर्ज से कोसों भागते थे। इस शादी में उन्होंने मियां की जूती मियां की चांद वाली नीति निभाने की ठानी थी पर दीनदयाल की सहृदयता ने उनका संयम तोड़ दिया। वे सारे टीमटाम, नाच - तमाशे, जिनकी कल्पना का उन्होंने गला घोंट दिया था, वही रूप धारण करके उनके सामने आ गए। बंधा हुआ घोडाथान से खुल गया, उसे कौन रोक सकता है। धूमधाम से विवाह करने की ठन गई। पहले जोडे--गहने को उन्होंने गौण समझ रखा था, अब सबसे मुख्य हो गया। ऐसा चढ़ावा हो कि मड़वे वाले देखकर भङक उठें। सबकी आंखें खुल जाएं। कोई तीन हजार का सामान बनवा डाला। सर्राफ को एक हजार नगद मिल गए, एक हजार के लिए एक सप्ताह का वादा हुआ, तो उसने कोई आपत्ति न की । सोचा -- दो हजार सीधे हुए जाते हैं, पांच-सात सौ रूपये रह जाएंगे, वह कहां जाते हैं। व्यापारी की लागत निकल आती है, तो नगद को तत्काल पाने के लिए आग्रह नहीं करता। फिर भी चन्द्रहार की कसर रह गई। जडाऊ चन्द्रहार एक हजार से नीचे अच्छा नहीं मिल सकता था। दयानाथ का जी तो लहराया कि लगे हाथ उसे भी ले लो, किसी को नाक सिकोड़ने की जगह तो न रहेगी, पर जागेश्वरी इस पर राजी न हुई । बाजी पलट चुकी थी। दयानाथ ने गर्म होकर कहा- तुम्हें क्या, तुम तो घर में बैठी रहोगी। मौत तो मेरी होगी, जब उधार के लोग नाकभौं सिकोड़ने लगेंगे। जागेश्वरी--दोगे कहां से, कुछ सोचा है? दयानाथ -- कम-से-कम एक हजार तो वहां मिल ही जाएंगे। जागेश्वरी -- खून मुंह लग गया क्या ? दयानाथ ने शरमाकर कहा - नहीं - नहीं, मगर आखिर वहां भी तो कुछ मिलेगा? जागेश्वरी--वहां मिलेगा, तो वहां खर्च भी होगा । नाम जोड़े गहने से नहीं होता, दान-दक्षिणा से होता है। इस तरह चन्द्रहार का प्रस्ताव रद्द हो गया। मगर दयानाथ दिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझें, रमानाथ उसे परमावश्यक समझता था। बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गांव-भर में शोर मच जाय। पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था। रमानाथ ने मोटर पर जोर दिया। उसके मित्रों ने इसका अनुमोदन किया, प्रस्ताव स्वीकृत हो गया । दयानाथ एकांतप्रिय जीव थे, न किसी से मित्रता थी, न किसी से मेल-जोल। रमानाथ मिलनसार युवक था, उसके मित्र ही इस समय हर एक काम में अग्रसर हो रहे थे। वे जो काम करते, दिल खोल कर । आतिशबाजियां बनवाई, तो अव्वल दर्जे की। नाच ठीक किया, तो अव्वल दर्जे का ; बाजे-गाजे भी अव्वल दर्जे के, दोयम या सोयम का वहां 6<noinclude></noinclude> 2b696p011bgc1f0zjwrk0k314jyvxdg पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/७ 250 193606 663623 2026-06-21T20:13:25Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663623 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>जिक्र ही न था। दयानाथ उसकी उच्छृंखलता देखकर चिंतित तो हो जाते थे पर कुछ कह न सकते थे। क्या कहते ! 7<noinclude></noinclude> 9byvi4bfocavu8iloo7bf4a577truk4 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/८ 250 193607 663625 2026-06-21T20:13:49Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663625 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>चार नाटक उस वक्त पास होता है, जब रसिक समाज उसे पंसद कर लेता है। बरात का नाटक उस वक्त पास होता है, जब राह चलते आदमी उसे पंसद कर लेते हैं। नाटक की परीक्षा चार-पांच घंटे तक होती रहती है, बरात की परीक्षा के लिए केवल इतने ही मिनटों का समय होता है। सारी सजावट, सारी दौड़धूप और तैयारी का निबटारा पांच मिनटों में हो जाता है। अगर सबके मुंह से वाह-वाह निकल गया, तो तमाशा पास नहीं तो ! रूपया, मेहनत, फिक्र, सब अकारथ। दयानाथ का तमाशा पास हो गया। शहर में वह तीसरे दर्जे में आता, गांव में अव्वल दर्जे में आया। कोई बाजों की धोंधों-पों-पों सुनकर मस्त हो रहा था, कोई मोटर को आंखें गाड़-गाड़कर देख रहा था। कुछ लोग फुलवारियों के तख्त देखकर लोट- लोट जाते थे । आतिशबाजी ही मनोरंजन का केंद्र थी। हवाइयां जब सकै से ऊपर जातीं और आकाश में लाल, हरे, नीले, पीले, कुमकुमे-से बिखर जाते, जब चर्खियां छूटतीं और उनमें नाचते हुए मोर निकल आते, तो लोग मंत्रमुग्ध-से हो जाते थे। वाह, क्या कारीगरी है! जालपा के लिए इन चीजों में लेशमात्र भी आकर्षण न था। हां, वह वर को एक आंख देखना चाहती थी, वह भी सबसे छिपाकर; पर उस भीड़-भाड़ में ऐसा अवसर कहां। द्वारचार के समय उसकी सखियां उसे छत पर खींच ले गई और उसने रमानाथ को देखा। उसका सारा विराग, सारी उदासीनता, सारी मनोव्यथा मानो छू-मंतर हो गई थी। मुंह पर हर्ष की लालिमा छा गई। अनुराग स्फूर्ति का भंडार है। द्वारचार के बाद बरात जनवासे चली गई। भोजन की तैयारियां होने लगीं। किसी ने पूरियां खाई, किसी ने उपलों पर खिचड़ी पकाई । देहात के तमाशा देखने वालों के मनोरंजन के लिए नाच-गाना होने लगा। दस बजे सहसा फिर बाजे बजने लगे। मालूम हुआ कि चढ़ावा आ रहा है। बरात में हर एक रस्म डंके की चोट पर अदा होती है। दूल्हा कलेवा करने आ रहा है, बाजे बजने लगे। समधी मिलने आ रहा है, बाजे बजने लगे। चढ़ावा ज्योंही पहुंचा, घर में हलचल मच गई। स्त्री-पुरूष, बूढ़े- जवान, सब चढ़ावा देखने के लिए उत्सुक हो उठे। ज्योंही किश्तियां मंडप में पहुंचीं, लोग सब काम छोड़कर देखने दौड़े। आपस में धक्कम - धक्का होने लगा। मानकी प्यास से बेहाल हो रही थी, कंठ सूखा जाता था, चढ़ावा आते ही प्यास भाग गई। दीनदयाल मारे भूख-प्यास के निर्जीव-से पड़े थे, यह समाचार सुनते ही सचेत होकर दौड़े। मानकी एक-एक चीज़ को निकाल - निकालकर देखने और दिखाने लगी। वहां सभी इस कला के विशेषज्ञ थे। मदोऊ ने गहने बनवाए थे, औरतों ने पहने थे, सभी आलोचना करने लगे। चूहेदन्ती कितनी सुंदर है, कोई दस तोले की होगी वाह! साढे। ग्यारह तोले से रत्ती भर भी कम निकल जाए, तो कुछ हार जाऊं ! यह शेरदहां तो देखो, क्या हाथ की सफाई है! जी चाहता है कारीगर के हाथ चूम लें। यह भी बारह तोले से कम न होगा। वाह ! कभी देखा भी है, सोलह तोले से कम निकल जाए, तो मुंह न दिखाऊं। हां, माल उतना चोखा नहीं है। यह कंगन तो देखो, बिलकुल पक्की जडाई है, कितना बारीक काम है कि आंख नहीं ठहरती ! कैसा दमक रहा है। सच्चे नगीने हैं। झूठे नगीनों में यह आब कहां। चीज तो यह गुलूबंद है, कितने खूबसूरत फूल हैं! और उनके बीच के हीरे कैसे चमक रहे हैं! किसी बंगाली सुनार ने बनाया होगा। क्या बंगालियों ने कारीगरी का ठेका ले लिया है, हमारे देश में एक-से-एक कारीगर पड़े हुए हैं। बंगाली सुनार बेचारे उनकी क्या बराबरी करेंगे। इसी तरह एक-एक चीज की आलोचना होती रही । सहसा किसी ने कहा--चन्द्रहार नहीं है क्या! मानकी ने रोनी सूरत बनाकर कहा -- नहीं, चन्द्रहार नहीं आया। एक महिला बोली--अरे, चन्द्रहार नहीं आया? 8<noinclude></noinclude> m0jo1b0qadpzbwsw3hra9ph57j2bsl7 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/९ 250 193608 663628 2026-06-21T20:14:27Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663628 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>दीनदयाल ने गंभीर भाव से कहा -- और सभी चीजें तो हैं, एक चन्द्रहार ही तो नहीं है। उसी महिला ने मुंह बनाकर कहा -- चन्द्रहार की बात ही और है! मानकी ने चढ़ाव को सामने से हटाकर कहा--बेचारी के भाग में चन्द्रहार लिखा ही नहीं है। इस गोलाकार जमघट के पीछे अंधेरे में आशा और आकांक्षा की मूर्ति - सी जालपा भी खड़ी थी। और सब गहनों के नाम कान में आते थे, चन्द्रहार का नाम न आता था। उसकी छाती धक-धक कर रही थी। चन्द्रहार नहीं है क्या? शायद सबके नीचे हो इस तरह वह मन को समझाती रही। जब मालूम हो गया चन्द्रहार नहीं है तो उसके कलेजे पर चोट-सी लग गई। मालूम हुआ, देह में रक्त की बूंद भी नहीं है। मानो उसे मूर्च्छा आ जायगी। वह उन्माद की सी दशा में अपने कमरे में आई और फूट-फूटकर रोने लगी। वह लालसा जो आज सात वर्ष हुए, उसके ह्रदय में अंकुरित हुई थी, जो इस समय पुष्प और पल्लव से लदी खड़ी थी, उस पर वज्रपात हो गया। वह हरा-भरा लहलहाता हुआ पौधा जल गया ? - केवल उसकी राख रह गई। आज ही के दिन पर तो उसकी समस्त आशाएं अवलंबित थीं। दुर्दैव ने आज वह अवलंब भी छीन लिया। उस निराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने लगा कि अपना मुंह नोच डाले। उसका वश चलता, तो वह चढ़ावे को उठाकर आग में गेंक देती। कमरे में एक आले पर शिव की मूर्ति रक्खी हुई थी। उसने उसे उठाकर ऐसा पटका कि उसकी आशाओं की भांति वह भी चूर- चूर हो गई। उसने निश्चय किया, मैं कोई आभूषण न पहनूंगी। आभूषण पहनने से होता ही क्या है। जो रूप- विहीन हों, वे अपने को गहने से सजाएं, मुझे तो ईश्वर ने यों ही सुंदरी बनाया है, मैं गहने न पहनकर भी बुरी न लगूंगी। सस्ती चीजें उठा लाए, जिसमें रूपये खर्च होते थे, उसका नाम ही न लिया। अगर गिनती ही गिनानी थी, तो इतने ही दामों में इसके दूने गहने आ जाते ! वह इसी क्रोध में भरी बैठी थी कि उसकी तीन सखियां आकर खड़ी हो गई। उन्होंने समझा था, जालपा को अभी चढ़ाव की कुछ खबर नहीं है। जालपा ने उन्हें देखते ही आंखें पोंछ डालीं और मुस्कराने लगी। राधा मुस्कराकर बोली -- जालपा - मालूम होता है, तूने बडी तपस्या की थी, ऐसा चढ़ाव मैंने आज तक नहीं देखा था। अब तो तेरी सब साध पूरी हो गई। जालपा ने अपनी लंबी-लंबी पलकें उठाकर उसकी ओर ऐसे दीन - नजर से देखा, मानो जीवन में अब उसके लिए कोई आशा नहीं है ? हां बहन, सब साध पूरी हो गई। इन शब्दों में कितनी अपार मर्मान्तक वेदना भरी हुई थी, इसका अनुमान तीनों युवतियों में कोई भी न कर सकी । तीनों कौतूहल से उसकी ओर ताकने लगीं, मानो उसका आशय उनकी समझ में न आया हो बासन्ती ने कहा--जी चाहता है, कारीगर के हाथ चूम लूं। शहजादी बोली--चढ़ावा ऐसा ही होना चाहिए, कि देखने वाले भड़क उठें। बासन्ती--तुम्हारी सास बडी चतुर जान पड़ती हैं, कोई चीज नहीं छोड़ी। जालपा ने मुंह उधरकर कहा--ऐसा ही होगा। राधा --और तो सब कुछ है, केवल चन्द्रहार नहीं है। शहजादी--एक चन्द्रहार के न होने से क्या होता है बहन, उसकी जगह गुलूबंद तो है। जालपा ने वक्रोक्ति के भाव से कहा-- हां, देह में एक आंख के न होने से क्या होता है, और सब अंग होते ही हैं, आंखें हुई तो क्या, न हुई तो क्या ! 9<noinclude></noinclude> r6tjjn56y7906ai5uuzpamelv55v3qv पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१० 250 193609 663629 2026-06-21T20:14:50Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663629 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>बालकों के मुंह से गंभीर बातें सुनकर जैसे हमें हंसी आ जाती है, उसी तरह जालपा के मुंह से यह लालसा से भरी हुई बातें सुनकर राधा और बासन्ती अपनी हंसी न रोक सकीं। हां, शहजादी को हंसी न आई। यह आभूषण लालसा उसके लिए हंसने की बात नहीं, रोने की बात थी। कृत्रिम सहानुभूति दिखाती हुई बोली--सब न जाने कहां के जंगली हैं कि और सब चीजें तो लाए, चन्द्रहार न लाए, जो सब गहनों का राजा है। लाला अभी आते हैं तो पूछती हूं कि तुमने यह कहां की रीति निकाली है ? - ऐसा अनर्थ भी कोई करता है। राधा और बासन्ती दिल में कांप रही थीं कि जालपा कहीं ताड़ न जाय। उनका बस चलता तो शहजादी का मुंह बंद कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का इशारा कर रही थीं, मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग्य, संवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली -- क्या करोगी पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया ! शहजादी--तुम पूछने को कहती हो, मैं रूलाकर छोडूंगी। मेरे चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त मन ऐसा खक्रा हुआ कि सारे गहनों पर लात मार दूं। जब तक कंगन न बन गए, मैं नींद भर सोई नहीं । --तो क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा। राधा-- शहजादी--बनेगा तब बनेगा, इस अवसर पर तो नहीं बना। दस - पांच की चीज़ तो है नहीं, कि जब चाहा बनवा लिया, सैकड़ों का खर्च है, फिर कारीगर तो हमेशा अच्छे नहीं मिलते। जालपा का भग्न ह्रदय शहजादी की इन बातों से मानो जी उठा, वह रूंधे कंठ से बोली -- यही तो मैं भी सोचती हूं बहन, जब आज न मिला, तो फिर क्या मिलेगा ! राधा और बासन्ती मन-ही-मन शहजादी को कोस रही थीं, और थप्पड़ दिखा-दिखाकर धमका रही थीं, पर शहजादी को इस वक्त तमाशे का मजा आ रहा था। बोली -- नहीं, यह बात नहीं है जल्ली; आग्रह करने से सब कुछ हो सकता है, सास-ससुर को बार-बार याद दिलाती रहना । बहनोईजी से दो-चार दिन रूठे रहने से भी बहुत कुछ काम निकल सकता है। बस यही समझ लो कि घरवाले चैन न लेने पाएं, यह बात हरदम उनके ध्यान में रहे। उन्हें मालूम हो जाय कि बिना चन्द्रहार बनवाए कुशल नहीं । तुम ज़रा भी ढीली पड़ीं और काम बिगडा । राधा ने हंसी को रोकते हुए कहा--इनसे न बने तो तुम्हें बुला लें, क्यों - अब उठोगी कि सारी रात उपदेश ही करती रहोगी! शहजादी--चलती हूं, ऐसी क्या भागड़ पड़ी है। हां, खूब याद आई, क्यों जल्ली, तेरी अम्मांजी के पास बडा अच्छा चन्द्रहार है। तुझे न देंगी। जालपा ने एक लंबी सांस लेकर कहा -- क्या कहूं बहन, मुझे तो आशा नहीं है। शहजादी--एक बार कहकर देखो तो, अब उनके कौन पहनने-ओढ़ने के दिन बैठे हैं। -- मुझसे तो न कहा जायगा । जालपा -- शहजादी -- मैं कह दूंगी। जालपा--नहीं-नहीं, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं। मैं ज़रा उनके मातृस्नेह की परीक्षा लेना चाहती हूं। बासन्ती ने शहजादी का हाथ पकड़कर कहा -- अब उठेगी भी कि यहां सारी रात उपदेश ही देती रहेगी। शहजादी उठी, पर जालपा रास्ता रोककर खड़ी हो गई और बोली -- नहीं, अभी बैठो बहन, तुम्हारे पैरों 10<noinclude></noinclude> ei4w1tr2vhp9bk78vo1eut5xz3cla31 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/११ 250 193610 663630 2026-06-21T20:15:07Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663630 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>पड़ती हूं। शहजादी- --जब यह दोनों चुड़ैलें बैठने भी दें। मैं तो तुम्हें गुर सिखाती हूं और यह दोनों मुझ पर झल्लाती हैं। सुन नहीं रही हो, मैं भी विष की गांठ हूं। हैं। बासन्ती--विष की गांठ तो तू है ही । शहजादी--तुम भी तो ससुराल से सालभर बाद आई हो, कौन - कौन - सी नई चीजें बनवा लाई । बासन्ती--और तुमने तीन साल में क्या बनवा लिया। शहजादी--मेरी बात छोड़ो, मेरा खसम तो मेरी बात ही नहीं पूछता। राधा--प्रेम के सामने गहनों का कोई मूल्य नहीं । शहजादी--तो सूखा प्रेम तुम्हीं को गले । इतने में मानकी ने आकर कहा- तुम तीनों यहां बैठी क्या कर रही हो, चलो वहां लोग खाना खाने आ रहे तीनों युवतियां चली गई। जालपा माता के गले में चन्द्रहार की शोभा देखकर मन ही मन सोचने लगी? - गहनों से इनका जी अब तक नहीं भरा। 11<noinclude></noinclude> tqx7u2tamkmvj1znp0ux7maqmjqda1l पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१२ 250 193611 663631 2026-06-21T20:15:26Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663631 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>पांच महाशय दयानाथ जितनी उमंगों से ब्याह करने गए थे, उतना ही हतोत्साह होकर लौटे। दीनदयाल ने खूब दिया, लेकिन वहां से जो कुछ मिला, वह सब नाच - तमाशे, नेगचार में खर्च हो गया। बार-बार अपनी भूल पर पछताते, क्यों दिखावे और तमाशे में इतने रूपये खर्च किए। इसकी जरूरत ही क्या थी, ज्यादा-से-ज्यादा लोग यही तो कहते--महाशय बडे कृपण हैं। उतना सुन लेने में क्या हानि थी ? मैंने गांव वालों को तमाशा दिखाने का ठेका तो नहीं लिया था। यह सब रमा का दुस्साहस है। उसी ने सारे खर्च बढ़ा-बढ़ाकर मेरा दिवाला निकाल दिया। और सब तकाजे तो दस-पांच दिन टल भी सकते थे, पर सर्राफ किसी तरह न मानता था। शादी के सातवें दिन उसे एक हजार रूपये देने का वादा था। सातवें दिन सर्राफ आया, मगर यहां रूपये कहां थे? दयानाथ में लल्लो-चप्पो की आदत न थी, मगर आज उन्होंने उसे चकमा देने की खूब कोशिश की । किस्त बांधकर सब रूपये छः महीने में अदा कर देने का वादा किया। फिर तीन महीने पर आए, मगर सर्राफ भी एक ही घुटा हुआ आदमी था, उसी वक्त टला, जब दयानाथ ने तीसरे दिन बाकी रकम की चीजें लौटा देने का वादा किया और यह भी उसकी सज्जनता ही थी। वह तीसरा दिन भी आ गया, और अब दयानाथ को अपनी लाज रखने का कोई उपाय न सूझता था। कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले - हवाले करके महाजन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में अनाड़ी थे। जागेश्वरी ने आकर कहा - भोजन कब से बना ठंडा हो रहा है। खाकर तब बैठो। दयानाथ ने इस तरह गर्दन उठाई, मानो सिर पर सैकड़ों मन का बोझ लदा हुआ है। बोले-- तुम लोग जाकर खा लो, मुझे भूख नहीं है । जागेश्वरी--भूख क्यों नहीं है, रात भी तो कुछ नहीं खाया था! इस तरह दाना-पानी छोड़ देने से महाजन के रूपये थोड़े ही अदा हो जाएंगे। दयानाथ--मैं सोचता हूं, उसे आज क्या जवाब दूंगा- मैं तो यह विवाह करके बुरा फंस गया। बहू कुछ गहने लौटा तो देगी । जागेश्वरी--बहू का हाल तो सुन चुके, फिर भी उससे ऐसी आशा रखते हो उसकी टेक है कि जब तक चन्द्रहार न बन जायगा, कोई गहना ही न पहनूंगी। सारे गहने संदूक में बंद कर रखे हैं। बस, वही एक बिल्लौरी हार गले में डाले हुए है। बहुएं बहुत देखीं, पर ऐसी बहू न देखी थी। फिर कितना बुरा मालूम होता है कि कल आई बहू, उससे गहने छीन लिए जाएं। दयानाथ ने चिढ़कर कहा- तुम तो जले पर नमक छिड़कती हो बुरा मालूम होता है तो लाओ एक हजार निकालकर दे दो, महाजन को दे आऊं, देती हो ? बुरा मुझे खुद मालूम होता है, लेकिन उपाय क्या है? गला कैसे छूटेगा ? जागेश्वरी--बेटे का ब्याह किया है कि ठट्ठा है? शादी-ब्याह में सभी कर्ज़ लेते हैं, तुमने कोई नई बात नहीं की। खाने-पहनने के लिए कौन कर्ज लेता है। धर्मात्मा बनने का कुछ फल मिलना चाहिए या नहीं - तुम्हारे ही दर्जे पर सत्यदेव हैं, पक्का मकान खडाकर दिया, जमींदारी खरीद ली, बेटी के ब्याह में कुछ नहीं तो पांच हज़ार तो खर्च किए ही होंगे। दयानाथ--जभी दोनों लङके भी तो चल दिए ! 12<noinclude></noinclude> 2h4z7g7noez7ghjbhj3uwee8ipqisog पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१३ 250 193612 663632 2026-06-21T20:15:45Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663632 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>जागेश्वरी- --मरना-जीना तो संसार की गति है, लेते हैं, वह भी मरते हैं, नहीं लेते, वह भी मरते हैं। अगर तुम चाहो तो छः महीने में सब रूपये चुका सकते हो' दयानाथ ने त्योरी चढ़ाकर कहा--जो बात जिंदगी ? भर नहीं की, वह अब आखिरी वक्त नहीं कर सकता बहू से साफ-साफ कह दो, उससे पर्दा रखने की जरूरत ही क्या है, और पर्दा रह ही कितने दिन सकता है। आज नहीं तो कल सारा हाल मालूम ही हो जाएगा। बस तीन-चार चीजें लौटा दे, तो काम बन जाय। तुम उससे एक बार कहो तो। जागेश्वरी झुंझलाकर बोली--उससे तुम्हीं कहो, मुझसे तो न कहा जायगा। सहसा रमानाथ टेनिस-रैकेट लिये बाहर से आया। सफेद टेनिस शर्ट था, सफेद पतलून, कैनवस का जूता, गोरे रंग और सुंदर मुखाकृति पर इस पहनावे ने रईसों की शान पैदा कर दी थी। रूमाल में बेले के गजरे लिये हुए था। उससे सुगंध उड़ रही थी। माता-पिता की आंखें बचाकर वह जीने पर जाना चाहता था, कि जागेश्वरी ने टोका--इन्हीं के तो सब कांटे बोए हुए हैं, इनसे क्यों नहीं सलाह लेते? (रमा से) तुमने नाच - तमाशे में बारह-तेरह सौ रूपये उडा दिए, बतलाओ सर्राफ को क्या जवाब दिया जाय- बडी मुश्किलों से कुछ गहने लौटाने पर राजी हुआ, मगर बहू से गहने मांगे कौन - यह सब तुम्हारी ही करतूत है। रमानाथ ने इस आक्षेप को अपने ऊपर से हटाते हुए कहा -- मैंने क्या खर्च किया - जो कुछ किया बाबूजी ने किया। हां, जो कुछ मुझसे कहा गया, वह मैंने किया। रमानाथ के कथन में बहुत कुछ सत्य था। यदि दयानाथ की इच्छा न होती तो रमा क्या कर सकता था? जो कुछ हुआ उन्हीं की अनुमति से हुआ। रमानाथ पर इल्जाम रखने से तो कोई समस्या हल न हो सकती थी बोले--मैं तुम्हें इल्जाम नहीं देता भाई | किया तो मैंने ही, मगर यह बला तो किसी तरह सिर से टालनी चाहिए। सर्राफ का तकाजा है। कल उसका आदमी आवेगा। उसे क्या जवाब दिया जाएगा? मेरी समझ में तो यही एक उपाय है कि उतने रूपये के गहने उसे लौटा दिए जायें। गहने लौटा देने में भी वह झंझट करेगा, लेकिन दस- बीस रूपये के लोभ में लौटाने पर राजी हो जायगा । तुम्हारी क्या सलाह है ? रमानाथ ने शरमाते हुए कहा -- मैं इस विषय में क्या सलाह दे सकता हूं, मगर मैं इतना कह सकता हूं कि इस प्रस्ताव को वह खुशी से मंजूर न करेगी। अम्मां तो जानती हैं कि चढ़ावे में चन्द्रहार न जाने से उसे कितना बुरा लगा था। प्रण कर लिया है, जब तक चन्द्रहार न बन जाएगा, कोई गहना न पहनूंगी। जागेश्वरी ने अपने पक्ष का समर्थन होते देख, खुश होकर कहा -- यही तो मैं इनसे कह रही हूं। रमानाथ--रोना-धोना मच जायगा और इसके साथ घर का पर्दा भी खुल जायगा। दयानाथ ने माथा सिकोड़कर कहा--उससे पर्दा रखने की जरूरत ही क्या! अपनी यथार्थ स्थिति को वह जितनी ही जल्दी समझ ले, उतना ही अच्छा। 13<noinclude></noinclude> sfkhl39l5ln0bpvly0bexzcmr6lfmbn पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१४ 250 193613 663633 2026-06-21T20:15:59Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663633 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>छः रमानाथ ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीभ उडाई थी। खूब बढ़ - बढ़कर बातें की थीं। जमींदारी है, उससे कई हजार का नफा है। बैंक में रूपये हैं, उनका सूद आता है। जालपा से अब अगर गहने की बात कही गई, तो रमानाथ को वह पूरा लबाडिया समझेगी। बोला--पर्दा तो एक दिन खुल ही जायगा, पर इतनी जल्दी खोल देने का नतीजा यही होगा कि वह हमें नीच समझने लगेगी। शायद अपने घरवालों को भी लिख भेजे। चारों तरफ बदनामी होगी। दयानाथ--हमने तो दीनदयाल से यह कभी न कहा था कि हम लखपती हैं। रमानाथ--तो आपने यही कब कहा था कि हम उधार गहने लाए हैं और दो-चार दिन में लौटा देंगे! आखिर यह सारा स्वांग अपनी धाक बैठाने के लिए ही किया था या कुछ और? दयानाथ--तो फिर किसी दूसरे बहाने से मांगना पड़ेगा। बिना मांगे काम नहीं चल सकता कल या तो रूपये देने पड़ेंगे, या गहने लौटाने पड़ेंगे। और कोई राह नहीं । रमानाथ ने कोई जवाब न दिया । जागेश्वरी बोली -- और कौन-सा बहाना किया जायगा- अगर कहा जाय, किसी को मंगनी देना है, तो शायद वह देगी नहीं । देगी भी तो दो-चार दिन में लौटाएंगे कैसे ? दयानाथ को एक उपाय सूझा। बोले--अगर उन गहनों के बदले मुलम्मे के गहने दे दिए जाएं? मगर तुरंत ही उन्हें ज्ञात हो गया कि यह लचर बात है, खुद ही उसका विरोध करते हुए कहा- हां, बाद मुलम्मा उड़ जायगा तो फिर लज्जित होना पड़ेगा। अक्ल कुछ काम नहीं करती। मुझे तो यही सूझता है, यह सारी स्थिति उसे समझा जाय। ज़रा देर के लिए उसे दुख तो जरूर होगा, लेकिन आगे के वास्ते रास्ता साफ हो जाएगा। संभव था, जैसा दयानाथ का विचार था, कि जालपा रो-धोकर शांत हो जायगी, पर रमा की इसमें किरकिरी होती थी। फिर वह मुंह न दिखा सकेगा। जब वह उससे कहेगी, तुम्हारी जमींदारी क्या हुई- बैंक के रूपये क्या हुए, तो उसे क्या जवाब देगा - विरक्त भाव से बोला- इसमें बेइज्जती के सिवा और कुछ न होगा। आप क्या सर्राफ को दो-चार छः महीने नहीं टाल सकते ? आप देना चाहें, तो इतने दिनों में हजार-बारह सौ रूपये बडी आसानी से दे सकते हैं। दयानाथ ने पूछा--कैसे ? रमानाथ--उसी तरह जैसे आपके और भाई करते हैं! दयानाथ--वह मुझसे नहीं हो सकता। तीनों कुछ देर तक मौन बैठे रहे। दयानाथ ने अपना फैसला सुना दिया। जागेश्वरी और रमा को यह फैसला मंजूर न था। इसलिए अब इस गुत्थी के सुलझाने का भार उन्हीं दोनों पर था। जागेश्वरी ने भी एक तरह से निश्चय कर लिया था। दयानाथ को झख मारकर अपना नियम तोड़ना पड़ेगा। यह कहां की नीति है कि हमारे ऊपर संकट पडा हुआ हो और हम अपने नियमों का राग अलापे जायं। रमानाथ बुरी तरह फंसा था। वह खूब जानता था कि पिताजी ने जो काम कभी नहीं किया, वह आज न करेंगे। उन्हें जालपा से गहने मांगने में कोई संकोच न होगा और यही वह न चाहता था। वह पछता रहा था कि मैंने क्यों जालपा से डींगें मारीं। अब अपने मुंह की लाली रखने का सारा भार उसी पर था। जालपा की अनुपम छवि ने पहले ही दिन उस पर मोहिनी डाल दी थी। वह 14<noinclude></noinclude> olvqft93gtqx6lha2dyq7l8glz597xu पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१५ 250 193614 663634 2026-06-21T20:16:16Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663634 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>अपने सौभाग्य पर फूला न समाता था। क्या यह घर ऐसी अनन्य सुंदरी के योग्य था? जालपा के पिता पांच रूपये के नौकर थे, पर जालपा ने कभी अपने घर में झाडू न लगाई थी। कभी अपनी धोती न छांटी थी। अपना बिछावन न बिछाया था। यहां तक कि अपनी के धोती की खींच तक न सी थी। दयानाथ पचास रूपये पाते थे, पर यहां केवल चौका-बासन करने के लिए महरी थी। बाकी सारा काम अपने ही हाथों करना पड़ता था। जालपा शहर और देहात का फर्क क्या जाने! शहर में रहने का उसे कभी अवसर ही न पडा था। वह कई बार पति और सास से साश्चर्य पूछ चुकी थी, क्या यहां कोई नौकर नहीं है? जालपा के घर दूध-दही - घी की कमी नहीं थी। यहां बच्चों को भी दूध मयस्सर न था । इन सारे अभावों की पूर्ति के लिए रमानाथ के पास मीठी-मीठी बडी-बडी बातों के सिवा और क्या था। घर का किराया पांच रूपया था, रमानाथ ने पंद्रह बतलाए थे। लड़कों की शिक्षा का खर्च मुश्किल से दस रूपये था, रमानाथ ने चालीस बतलाए थे। उस समय उसे इसकी ज़रा भी शंका न थी, कि एक दिन सारा भंडा फट जायगा। मिथ्या दूरदर्शी नहीं होता, लेकिन वह दिन इतनी जल्दी आयगा, यह कौन जानता था। अगर उसने ये डींगें न मारी होतीं, तो जागेश्वरी की तरह वह भी सारा भार दयानाथ पर छोड़कर निश्चिन्त हो जाता, लेकिन इस वक्त वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस गया था। कैसे निकले ! उसने कितने ही उपाय सोचे, लेकिन कोई ऐसा न था, जो आगे चलकर उसे उलझनों में न डाल देता, दलदल 'न फंसा देता। एकाएक उसे एक चाल सूझी। उसका दिल उछल पडा, पर इस बात को वह मुंह तक न ला सका, ओह! कितनी नीचता है ! कितना कपट ! कितनी निर्दयता ! अपनी प्रेयसी के साथ ऐसी धूर्तता ! उसके मन ने उसे धिक्काराब अगर इस वक्त उसे कोई एक हजार रूपया दे देता, तो वह उसका उम्रभर के लिए गुलाम हो जाता। दयानाथ ने पूछा--कोई बात सूझी ? मुझे तो कुछ नहीं सूझता । कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा। आप ही सोचिए, मुझे तो कुछ नहीं सूझता । क्यों नहीं उससे दो-तीन गहने मांग लेते ? तुम चाहो तो ले सकते हो, हमारे लिए मुश्किल है। मुझे शर्म आती है। विचित्र आदमी हो, न खुद मांगोगे न मुझे मांगने दोगे, तो आखिर यह नाव कैसे चलेगी? मैं एक बार नहीं, हजार बार कह चुका कि मुझसे कोई आशा मत रक्खो। मैं अपने आखिरी दिन जेल में नहीं काट सकता इसमें शर्म की क्या बात है, मेरी समझ में नहीं आता । किसके जीवन में ऐसे कुअवसर नहीं आते ? तुम्हीं अपनी मां से पूछो। जागेश्वरी ने अनुमोदन किया -- मुझसे तो नहीं देखा जाता था कि अपना आदमी चिंता में पडा रहे, मैं गहने पहने बैठी रहूं। नहीं तो आज मेरे पास भी गहने न होते ? एक-एक करके सब निकल गए। विवाह में पांच हजार से कम का चढ़ावा नहीं गया था, मगर पांच ही साल में सब स्वाहा हो गया। तब से एक छल्ला बनवाना भी नसीब न हुआ। दयानाथ ज़ोर देकर बोले-- शर्म करने का यह अवसर नहीं है। इन्हें मांगना पड़ेगा ! रमानाथ ने झेंपते हुए कहा -- मैं मांग तो नहीं सकता, कहिए उठा लाऊं। यह कहते-कहते लज्जा, क्षोभ और अपनी नीचता के ज्ञान से उसकी आंखें सजल हो गई। 15<noinclude></noinclude> oov0bgqa6z4nv548gqah9juwk4pukq7 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१६ 250 193615 663635 2026-06-21T20:16:37Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663635 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>दयानाथ ने भौंचक्ध होकर कहा -- उठा लाओगे, उससे छिपाकर? रमानाथ ने तीव्र कंठ से कहा -- और आप क्या समझ रहे हैं? दयानाथ ने माथे पर हाथ रख लिया, और एक क्षण के बाद आहत कंठ से बोले -- नहीं, मैं ऐसा न करने दूंगा। मैंने छल कभी नहीं किया, और न कभी करूंगा। वह भी अपनी बहू के साथ ! छिः छिः, जो काम सीधे से चल सकता है, उसके लिए यह फरेब - कहीं उसकी निगाह पड़ गई, तो समझते हो, वह तुम्हें दिल में क्या समझेगी? मांग लेना इससे कहीं अच्छा है। रमानाथ--आपको इससे क्या मतलब। मुझसे चीज़ें ले लीजिएगा, मगर जब आप जानते थे, यह नौ आएगी, तो इतने जेवर ले जाने की जरूरत ही क्या थी ? व्यर्थ की विपत्ति मोल ली। इससे कई लाख गुना अच्छा था कि आसानी से जितना ले जा सकते, उतना ही ले जाते। उस भोजन से क्या लाभ कि पेट में पीडा होने लगे? मैं तो समझ रहा था कि आपने कोई मार्ग निकाल लिया होगा। मुझे क्या मालूम था कि आप मेरे सिर यह मुसीबतों की टोकरी पटक देंगे। वरना मैं उन चीज़ों को कभी न ले जाने देता। दयानाथ कुछ लज्जित होकर बोले--इतने पर भी चन्द्रहार न होने से वहां हाय-तोबा मच गई। रमानाथ--उस हाय-तोबा से हमारी क्या हानि हो सकती थी । जब इतना करने पर भी हाय-तोबा मच गई, तो मतलब भी तो न पूरा हुआ। उधर बदनामी हुई, इधर यह आफत सिर पर आई। मैं यह नहीं दिखाना चाहता कि हम इतने फटेहाल हैं। चोरी हो जाने पर तो सब्र करना ही पड़ेगा। दयानाथ चुप हो गए। उस आवेश में रमा ने उन्हें खूब खरी-खरी सुनाई और वह चुपचाप सुनते रहे। आखिर जब न सुना गया, तो उठकर पुस्तकालय चले गए। यह उनका नित्य का नियम था। जब तक दो-चार पत्र- पत्रिकाएं न पढ़लें, उन्हें खाना न हजम होता था। उसी सुरक्षित गढ़ी में पहुंचकर घर की चिंताओं और बाधाओं से उनकी जान बचती थी । रमा भी वहां से उठा, पर जालपा के पास न जाकर अपने कमरे में गया। उसका कोई कमरा अलग तो था नहीं, एक ही मर्दाना कमरा था, इसी में दयानाथ अपने दोस्तों से गप-शप करते, दोनों लङके पढ़ते और रमा मित्रों के साथ शतरंज खेलता। रमा कमरे में पहुंचा, तो दोनों लङके ताश खेल रहे थे। गोपी का तेरहवां साल था, विश्वम्भर का नवां । दोनों रमा से थरथर कांपते थे। रमा खुद खूब ताश और शतरंज खेलता, पर भाइयों को खेलते देखकर हाथ में खुजली होने लगती थी। खुद चाहे दिनभर सैर-सपाटे किया करे, मगर क्या मजाल कि भाई कहीं घूमने निकल जायं । दयानाथ खुद लड़कों को कभी न मारते थे। अवसर मिलता, तो उनके साथ खेलते थे। उन्हें कनकौवे उडाते देखकर उनकी बाल - प्रकृति सजग हो जाती थी। दो-चार पेंच लडादेते। बच्चों के साथ कभी-कभी गुल्ली-डंडा भी खेलते थे। इसलिए लङके जितना रमा से डरते, उतना ही पिता से प्रेम करते थे। रमा को देखते ही लड़कों ने ताश को टाट के नीचे छिपा दिया और पढ़ने लगे। सिर झुकाए चपत की प्रतीक्षा कर रहे थे, पर रमानाथ ने चपत नहीं लगाई, मोढ़े पर बैठकर गोपीनाथ से बोला--तुमने भंग की दुकान देखी है न, नुक्कड़ पर ? गोपीनाथ प्रसन्न होकर बोला- हां, देखी क्यों नहीं। जाकर चार पैसे का माजून ले लो, दौड़े हुए आना। हां, हलवाई की दुकान से आधा सेर मिठाई भी लेते आना। यह रूपया लो। कोई पंद्रह मिनट में रमा ये दोनों चीज़ें ले, जालपा के कमरे की ओर चला। रात के दस बज गए थे। जालपा 16<noinclude></noinclude> n5gmbuvel1mbvyuabzywf53dukih6z9 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१७ 250 193616 663636 2026-06-21T20:16:54Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663636 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>खुली हुई छत पर लेटी हुई थी। जेठ की सुनहरी चांदनी में सामने फैले हुए नगर के कलश, गुंबद और वृक्ष स्वप्न- चित्रों से लगते थे। जालपा की आंखें चंद्रमा की ओर लगी हुई थीं। उसे ऐसा मालूम हो रहा था, मैं चंद्रमा की ओर उड़ी जा रही हूं। उसे अपनी नाक में खुश्की, आंखों में जलन और सिर में चक्कर मालूम हो रहा था। कोई बात ध्यान में आते ही भूल जाती, और बहुत याद करने पर भी याद न आती थी। एक बार घर की याद आ गई, रोने लगी। एक ही क्षण में सहेलियों की याद आ गई, हंसने लगी । सहसा रमानाथ हाथ में एक पोटली लिये, मुस्कराता हुआ आया और चारपाई पर बैठ गया। जालपा ने उठकर पूछा -- पोटली में क्या है ? रमानाथ--बूझ जाओ तो जानूं । जालपा--हंसी का गोलगप्पा है! (यह कहकर हंसने लगी । ) रमानाथ— मलतब ? जालपा--नींद की गठरी होगी ! रमानाथ--मलतब ? जालपा -- तो प्रेम की पिटारी होगी ! रमानाथ- ठीक, आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊंगा। जालपा खिल उठी। रमा ने बडे अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू किए, फूलों के शीतल कोमल स्पर्श से जालपा के कोमल शरीर में गुदगुदी -सी होने लगी। उन्हीं फूलों की भांति उसका एक-एक रोम प्रफुल्लित हो गया। रमा ने मुस्कराकर कहा--कुछ उपहार? जालपा ने कुछ उत्तर न दिया । इस वेश में पति की ओर ताकते हुए भी उसे संकोच हुआ। उसकी बडी इच्छा हुई कि ज़रा आईने में अपनी छवि देखे। सामने कमरे में लैंप जल रहा था, वह उठकर कमरे में गई और आईने के सामने खड़ी हो गई। नशे की तरंग में उसे ऐसा मालूम हुआ कि मैं सचमुच फूलों की देवी हूं। उसने पानदान उठा लिया और बाहर आकर पान बनाने लगी। रमा को इस समय अपने कपट - व्यवहार पर बडी ग्लानि हो रही थी । जालपा ने कमरे से लौटकर प्रेमोल्लसित नजरों से उसकी ओर देखा, तो उसने मुंह उधर लिया। उस सरल विश्वास से भरी हुई आंखों के सामने वह ताक न सका। उसने सोचा -- मैं कितना बडा कायर हूं। क्या मैं बाबूजी को साफ- साफ जवाब न दे सकता था? मैंने हामी ही क्यों भरी - क्या जालपा से घर की दशा साफ-साफ कह देना मेरा कर्तव्य न था - उसकी आंखें भर आई। जाकर मुंडेर के पास खड़ा हो गया । प्रणय के उस निर्मल प्रकाश में उसका मनोविकार किसी भंयकर जंतु की भांति घूरता हुआ जान पड़ता था । उसे अपने ऊपर इतनी घृणा हुई कि एक बार जी में आया, सारा कपट-व्यवहार खोल दूं, लेकिन संभल गया। कितना भयंकर परिणाम होगा। जालपा की नज़रों से फिर जाने की कल्पना ही उसके लिए असह्य थी। जालपा ने प्रेम-सरस नजरों से देखकर कहा - मेरे दादाजी तुम्हें देखकर गए और अम्मांजी से तुम्हारा बखान करने लगे, तो मैं सोचती थी कि तुम कैसे होगे । मेरे मन में तरह-तरह के चित्र आते थे। ' रमानाथ ने एक लंबी सांस खींची। कुछ जवाब न दिया । 17<noinclude></noinclude> 6cpwtd9itswea2bfej6iikq94qd1n7y पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१८ 250 193617 663637 2026-06-21T20:17:16Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663637 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>जालपा ने फिर कहा - मेरी सखियां तुम्हें देखकर मुग्ध हो गई। शहजादी तो खिड़की के सामने से हटती ही न थी। तुमसे बातें करने की उसकी बडी इच्छा थी। जब तुम अंदर गए थे तो उसी ने तुम्हें पान के बीड़े दिए थे, याद है?' रमा ने कोई जवाब न दिया । जालपा--अजी, वही जो रंग-रूप में सबसे अच्छी थी, जिसके गाल पर एक तिल था, तुमने उसकी ओर बड़े प्रेम से देखा था, बेचारी लाज के मारे गड़ गई थी। मुझसे कहने लगी, जीजा तो बडे रसिक जान पड़ते हैं। सखियों ने उसे खूब चिढ़ाया, बेचारी रूआंसी हो गई। याद है? ' रमा ने मानो नदी में डूबते हुए कहा- मुझे तो याद नहीं आता।' जालपा--अच्छा, अबकी चलोगे तो दिखा दूंगी। आज तुम बाज़ार की तरफ गए थे कि नहीं ?' रमा ने सिर झुकाकर कहा-- आज तो फुरसत नहीं मिली। ' जालपा--जाओ, मैं तुमसे न बोलूंगी ! रोज हीले-हवाले करते हो अच्छा, कल ला दोगे न ?' रमानाथ का कलेजा मसोस उठा। यह चन्द्रहार के लिए इतनी विकल हो रही है। इसे क्या मालूम कि दुर्भाग्य इसका सर्वस्व लूटने का सामान कर रहा है। जिस सरल बालिका पर उसे अपने प्राणों को न्योछावर करना चाहिए था, उसी का सर्वस्व अपहरण करने पर वह तुला हुआ है ! वह इतना व्यग्र हुआ, कि जी में आया, कोठे से कूदकर प्राणों का अंत कर दे। 18<noinclude></noinclude> 8trb8rfc4da9avnaiyfle90yyn1npe7 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/१९ 250 193618 663638 2026-06-21T20:17:37Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663638 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>सात आधी रात बीत चुकी थी । चन्द्रमा चोर की भांति एक वृक्ष की आड़ से झांक रहा था। जालपा पति के गले हाथ डाले हुए निद्रा में मग्न थी । रमा मन में विकट संकल्प करके धीरे से उठा, पर निद्रा की गोद में सोए हुए पुष्प प्रदीप ने उसे अस्थिर कर दिया। वह एक क्षण खडा मुग्ध नजरों से जालपा के निद्रा - विहसित मुख की ओर देखता रहा। कमरे में जाने का साहस न हुआ। फिर लेट गया । जालपा ने चौंककर पूछा -- कहां जाते हो, क्या सवेरा हो गया ? रमानाथ--अभी तो बडी रात है। जालपा --तो तुम बैठे क्यों हो? रमानाथ--कुछ नहीं, ज़रा पानी पीने उठा था। जालपा ने प्रेमातुर होकर रमा के गले में बांहें डाल दीं और उसे सुलाकर कहा- तुम इस तरह मुझ पर टोना करोगे, तो मैं भाग जाऊंगी । न जाने किस तरह ताकते हो, क्या करते हो, क्या मंत्र पढ़ते हो कि मेरा मन चंचल हो जाता है। बासन्ती सच कहती थी, पुरूषों की आंख में टोना होता है। रमा ने फटे हुए स्वर में कहा --टोना नहीं कर रहा हूं, आंखों की प्यास बुझा रहा हूं। दोनों फिर सोए, एक उल्लास में डूबी हुई, दूसरा चिंता में मग्न । तीन घंटे और गुजर गए । द्वादशी के चांद ने अपना विश्व - दीपक बुझा दिया। प्रभात की शीतल - समीर प्रकृति को मद के प्याले पिलाती फिरती थी। आधी रात तक जागने वाला बाज़ार भी सो गया। केवल रमा अभी तक जाग रहा था। मन में भांति-भांति के तर्क-वितर्क उठने के कारण वह बार-बार उठता था और फिर लेट जाता था। आखिर जब चार बजने की आवाज़ कान में आई, तो घबराकर उठ बैठा और कमरे में जा पहुंचा। गहनों का संदूकचा आलमारी में रक्खा हुआ था, रमा ने उसे उठा लिया, और थरथर कांपता हुआ नीचे उतर गया। इस घबराहट में उसे इतना अवकाश न मिला कि वह कुछ गहने छांटकर निकाल लेता । दयानाथ नीचे बरामदे में सो रहे थे। रमा ने उन्हें धीरे से जगाया, उन्होंने हकबकाकर पूछा – कौन रमा ने होंठ पर उंगली रखकर कहा -- मैं हूं। यह संदूकची लाया हूं। रख लीजिए। दयानाथ सावधन होकर बैठ गए। अभी तक केवल उनकी आंखें जागी थीं, अब चेतना भी जाग्रत हो गई। रमा ने जिस वक्त उनसे गहने उठा लाने की बात कही थी, उन्होंने समझा था कि यह आवेश में ऐसा कह रहा है। उन्हें इसका विश्वास न आया था कि रमा जो कुछ कह रहा है, उसे भी पूरा कर दिखाएगा। इन कमीनी चालों से वह अलग ही रहना चाहते थे। ऐसे कुत्सित कार्य में पुत्र से साठ-गांठ करना उनकी अंतरात्मा को किसी तरह स्वीकार न था। पूछा -- इसे क्यों उठा लाए ? रमा ने ध ृष्टता से कहा-- आप ही का तो हुक्म था। दयानाथ - - झूठ कहते हो ! रमानाथ -- तो क्या फिर रख आऊं ? 19<noinclude></noinclude> kseil81ud8cg3ktovyx7ua9408b4d5b पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/२० 250 193619 663639 2026-06-21T20:17:53Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663639 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>रमा के इस प्रश्न ने दयानाथ को घोर संकट में डाल दिया। झेंपते हुए बोले--अब क्या रख आओगे, कहीं देख ले, तो गजब ही हो जाए। वही काम करोगे, जिसमें जग हंसाई हो खड़े क्या हो, संदूकची मेरे बडे संदूक में रख आओ और जाकर लेट रहो कहीं जाग पड़े तो बस ! बरामदे के पीछे दयानाथ का कमरा था। उसमें एक देवदार का पुराना संदूक रखा था। रमा ने संदूकची उसके अंदर रख दी और बडी फुर्ती से ऊपर चला गया। छत पर पहुंचकर उसने आहट ली, जालपा पिछले पहर की सुखद निद्रा में मग्न थी। रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट गई। रमा ने पूछा- क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं? जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा- कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही थी। तुम बैठे क्यों हो, कितनी रात है अभी? रमा ने लेटते हुए कहा--सवेरा हो रहा है, क्या स्वप्न देखती थीं? जालपा--जैसे कोई चोर मेरे गहनों की संदूकची उठाए लिये जाता हो। रमा का ह्रदय इतने जोर से धक-धक करने लगा, मानो उस पर हथौड़े पड़ रहे हैं। खून सर्द हो गया। परंतु संदेह हुआ, कहीं इसने मुझे देख तो नहीं लिया। वह ज़ोर से चिल्ला पडा--चोर! चोर! नीचे बरामदे में दयानाथ भी चिल्ला उठे--चोर! चोर! जालपा घबडाकर उठी । दौड़ी हुई कमरे में गई, झटके से आलमारी खोली । संदूकची ari न थी? मूर्छित होकर फिर पड़ी। सवेरा होते ही दयानाथ गहने लेकर सर्राफ के पास पहुंचे और हिसाब होने लगा। सर्राफ के पंद्रह सौ रू. आते थे, मगर वह केवल पंद्रह सौ रू. के गहने लेकर संतुष्ट न हुआ । बिके हुए गहनों को वह बने पर ही ले सकता था। बिकी हुई चीज़ कौन वापस लेता है। रोकड़ पर दिए होते, तो दूसरी बात थी। इन चीज़ों का तो सौदा हो चुका था। उसने कुछ ऐसी व्यापारिक सिद्धान्त की बातें कीं, दयानाथ को कुछ ऐसा शिकंजे में कसा कि बेचारे को हां-हां करने के सिवा और कुछ न सूझा। दफ्तर का बाबू चतुर दुकानदार से क्या पेश पाता - पंद्रह सौ रू. में पच्चीस सौ रू. के गहने भी चले गए, ऊपर से पचास रू. और बाकी रह गए। इस बात पर पिता-पुत्र में कई दिन खूब वाद-विवाद हुआ। दोनों एकदूसरे को दोषी ठहराते रहे। कई दिन आपस में बोलचाल बंद रही, मगर इस चोरी का हाल गुप्त रखा गया। पुलिस को खबर हो जाती, तो भंडा फट जाने का भय था । जालपा से यही कहा गया कि माल तो मिलेगा नहीं, व्यर्थ का झंझट भले ही होगा। जालपा ने भी सोचा, जब माल ही न मिलेगा, तो रपट व्यर्थ क्यों की जाय । जालपा को गहनों से जितना प्रेम था, उतना कदाचित संसार की और किसी वस्तु से न था, और उसमें आश्चर्य की कौन-सी बात थी। जब वह तीन वर्ष की अबोध बालिका थी, उस वक्त उसके लिए सोने के चूड़े बनवाए गए थे। दादी जब उसे गोद में खिलाने लगती, तो गहनों की ही चर्चा करती -- तेरा दूल्हा तेरे लिए बड़े सुंदर गहने लाएगा। ठुमक ठुमककर चलेगी। जालपा पूछती--चांदी के होंगे कि सोने के, दादीजी? दादी कहती--सोने के होंगे बेटी, चांदी के क्यों लाएगा- चांदी के लाए तो तुम उठाकर उसके मुंह पर पटक देना। मानकी छेड़कर कहती -- चांदी के तो लाएगा ही। सोने के उसे कहां मिले जाते हैं ! 20<noinclude></noinclude> 6zoa3xoer3b0lfuy1d4y0fkvgg7g059 पृष्ठ:Gaban - Munshi Premchand.djvu/२१ 250 193620 663640 2026-06-21T20:18:10Z Aryanraj26 6695 /* शोधित */ 663640 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aryanraj26" /></noinclude>जालपा रोने लगती, इस बूढ़ी दादी, मानकी, घर की महरियां, पड़ोसिनें और दीनदयाल - --सब हंसते। उन लोगों के लिए यह विनोद का अशेष भ ंडार था। बालिका जब ज़रा और बडी हुई, तो गुडियों के ब्याह करने लगी। लडके की ओर से चढ़ावे जाते, दुलहिन को गहने पहनाती, डोली में बैठाकर विदा करती, कभी-कभी दुलहिन गुडिया अपने ये दूल्हे से गहनों के लिए मान करती, गुड्डा बेचारा कहीं-न-कहीं से गहने लाकर स्त्री को प्रसन्न करता था। उन्हीं दिनों बिसाती ने उसे वह चन्द्रहार दिया, जो अब तक उसके पास सुरक्षित था। ज़रा और बडी हुई तो बडी-बूढियों में बैठकर गहनों की बातें सुनने लगी। महिलाओं के उस छोटे-से संसार में इसके सिवा और कोई चर्चा ही न थी। किसने कौन-कौन गहने बनवाए, कितने दाम लगे, ठोस हैं या पोले, जडाऊ हैं या सादे, किस लडकी के विवाह में कितने गहने आए ? इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर नित्य आलोचना - प्रत्यालोचना, टीका-टिप्पणी होती रहती थी। कोई दूसरा विषय इतना रोचक, इतना ग्राह्य हो ही नहीं सकता था। इस आभूषण-मंडित संसार में पली हुई जालपा का यह आभूषण - प्रेम स्वाभाविक ही था। महीने-भर से ऊपर हो गया। उसकी दशा ज्यों-की-त्यों है। न कुछ खाती-पीती है, न किसी से हंसती- बोलती है। खाट पर पड़ी हुई शून्य नजरों से शून्याकाश की ओर ताकती रहती है। सारा घर समझाकर हार गया, पड़ोसिनें समझाकर हार गई, दीनदयाल आकर समझा गए, पर जालपा ने रोग - शय्या न छोड़ी। उसे अब घर में किसी पर विश्वास नहीं है, यहां तक कि रमा से भी उदासीन रहती है। वह समझती है, सारा घर मेरी उपेक्षा कर रहा है। सबके- सब मेरे प्राण के ग्राहक हो रहे हैं। जब इनके पास इतना धन है, तो फिर मेरे गहने क्यों नहीं बनवाते? जिससे हम सबसे अधिक स्नेह रखते हैं, उसी पर सबसे अधिक रोष भी करते हैं। जालपा को सबसे अधिक क्रोध रमानाथ पर था। अगर यह अपने माता-पिता से जोर देकर कहते, तो कोई इनकी बात न टाल सकता, पर यह कुछ कहें भी इनके मुंह में तो दही जमा हुआ है । मुझसे प्रेम होता, तो यों निश्चिंत न बैठे रहते। जब तक सारी चीज़ें न बनवा लेते, रात को नींद न आती । मुंह देखे की मुहब्बत है, मां-बाप से कैसे कहें, जाएंगे तोअपनी ही ओर, मैं कौन हूं! वह रमा से केवल खिंची ही न रहती थी, वह कभी कुछ पूछता तो दोचार जली- कटी सुना देती। बेचारा अपना-सा मुंह लेकर रह जाता! गरीब अपनी ही लगाई हुई आग में जला जाता था। अगर वह जानता कि उन डींगों का यह फल होगा, तो वह जबान पर मुहर लगा लेता । चिंता और ग्लानि उसके ह्रदय को कुचले डालती थी। कहां सुबह से शाम तक हंसी - कहकहे, सैर सपाटे में कटते थे, कहां अब नौकरी की तलाश में ठोकरें खाता फिरता था। सारी मस्ती गायब हो गई। बार-बार अपने पिता पर क्रोध आता, यह चाहते तो दो- चार महीने में सब रूपये अदा हो जाते, मगर इन्हें क्या फिक्र ! मैं चाहे मर जाऊं पर यह अपनी टेक न छोड़ेंगे। उसके प्रेम से भरे हुए, निष्कपट ह्रदय में आग सी सुलगती रहती थी। जालपा का मुरझाया हुआ मुख देखकर उसके मुंह से ठंडी सांस निकल जाती थी। वह सुखद प्रेम - स्वप्न इतनी जल्द भंग हो गया, क्या वे दिन फिर कभी आएंगे- तीन हज़ार के गहने कैसे बनेंगे - अगर नौकर भी हुआ, तो ऐसा कौन - सा बडा ओहदा मिल जाएगा- तीन हज़ार तो शायद तीन जन्म में भी न जमा हों। वह कोई ऐसा उपाय सोच निकालना चाहता था, जिसमें वह जल्द-से- जल्द अतुल संपत्ति का स्वामी हो जाय। कहीं उसके नाम कोई लाटरी निकल आती ! फिर तो वह जालपा को आभूषणों से मढ़ देता। सबसे पहले चन्द्रहार बनवाता। उसमें हीरे जड़े होते। अगर इस वक्त उसे जाली नोट बनाना आ जाता तो अवश्य बनाकर चला देता । एक दिन वह शाम तक नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरता रहा। 21<noinclude></noinclude> b23zjssxtuzxx0uj2p9okqj7cvpigo4 विषयसूची:1944 हंसराज की डायरी गोपालराम गहमरी Hindi PDF.pdf 252 193621 663641 2026-06-21T20:25:00Z Skirti.codes 6559 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663641 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=हंसराज की डायरी |Language=hi |Volume= |Author=गोपालराम गहमरी |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=इंडियन प्रेस लिमिटेड |Address=प्रयाग |Year=1944 |Key= |ISBN= |Source=_empty_ |Image=6 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} hc9fpcm10inhucvdggpycbipoco0jqx हंसराज की डायरी 0 193622 663642 2026-06-21T20:25:34Z Skirti.codes 6559 "{{header | title = हंसराज की डायरी | author = गोपालराम गहमरी | year = 1944 | section = रहस्य उपन्यास }} == विषयसूची == 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