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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude>कोंग्रेस के अवसर पर, कांग्रेस में दो विचार-धाराये होगई । क्रियात्मक राजनीतिक-दल के नेता लोकमान्य तिलक थे तथा निष्किय परावलम्बी दल के नेता श्री गोपाल कृष्ण गोखले तथा बाबू सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आदि। सन् १६१६ में इन दोनो दलो मे मेल होगया और कांग्रेस मे एक प्रकार से क्रियाशील राज-नीतिक दल का प्राधान्य होगया । लोकमान्य के बाद श्रीमती ऐनी बीसेण्ट ने देश को क्रियाशीलता का पाठ पढाया। उन्होने १६१६ में होमरूल लीग स्थापित की और प्राय: दो वर्ष तक भारतद्धार के लिये बलिदानपूर्वक प्रयत्नशील रही, जिसके लिये राष्ट्र उनका आभारी रहेगा । सन् १६१८ मे जब काग्रेस ने प्रस्तावित मांटेग्यू-चेम्सफर्ड-सुघारो पर असन्तोष प्रकट किया, तब नरम दल के नेताऔ ने अपनी अलग संस्था स्थापित की । सन् १६१६ में महात्मा गांधी कांग्रेस के सामीप्य मे आये, जब रौलट कानून के विरूद्ध उन्होने देश व्यापी सत्याग्रह छेडा । १६२० में स्पष्ट रूप से कांग्रेस की बागडोर गान्धीजी के हाथ में आगई । तब से तीन बार सत्याग्रह आन्दोलन किया जा चुका है । पहले सन् १६२०-२१ मे असहयोग-आन्दोलन चला, जिसकी समाप्ति पर, देश मे साम्प्रदायिक कलह के बढ जाने से, गान्धीजी कांग्रेस के व्यावहारिक क्षेत्र से पृथ्क् होकर, साबरमती सत्याग्रहाश्रम मे रहकर, खादी-प्रचार, अछूतोद्धार, हिन्दू-मुसलिम ऐक्य आदि रचनात्मक कार्यक्रम का संचालन करने लगे । परिवर्तनवादी और अपरिवर्त्नवादी दो विचारधाराये, इस अवसर पर, काग्रेस मे होगई थी । सन् १६२२ मे, परिवर्तनवादियो मे अग्रगण्य स्व्र्गीय पं० मोतीलाल नेहरू और देशबन्धु चित्तरंजनदास, ने कांग्रेस के समक्ष एक नई विचारधारा रखी और, धारा-सभाऔ मे घुसकर भीतर से असहयोग करने अथवा, देश की इच्छा के विरुद्ध चलाए जाने वाले, शासन मे अड्गा लगाने की नीति कांग्रेस द्वारा १६२३ मे स्वीकार करली गई । स्वराज-दल बना, चुनाव लडे गये और देश को उनमे सफलता मिली, किन्तु अड्गा-नीति असफल रही । १६२३ मे, चुनाव के अवसर पर, मालवीयजी और लाला लाजपतराय ने 'स्वतन्त्र कांग्रेस दल' बनाया और उन्होने अपने चुनाव अमग लडे । लेकिन कुछ अवसरवादियों के भले के सिवा इन दोनो बुजुर्गो को अपने प्रयास में कामयाबी नही मिली ।<noinclude>[[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय ज्ञानकोश]]</noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२५६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude><noinclude>'''{{rh|२५०||भारतीय राष्ट्रीय महासभा}}'''</noinclude>
देश आन्दोलन की स्थिति में रहा । १६२८ में साइमन जॉच-कमीशन आया, जिसका काग्रेस द्वारा बहिष्कार किया गया । फिर भी उसकी रिपोर्ट तैयार हुई और साथ ही नेहरू कमिटी की रिपोर्ट भी । सरकार ने नेहरू रिपोर्ट की सिफारशों को नहीं माना । फलतः, रिपोर्ट पेश करते समय ब्रिटिश सरकार को दीगई पूर्व सूचना के अनुसार, सन् ३० में नमक-सत्याग्रह शुरू कर दिया गया । सन् १६३१ मे चुनाव फिर आये । काग्रेस ने इनमें क्रियात्मक सहयोग नहीं दिया । किन्तु प्रतिक्रियावादियों को धारासभाओ में घुसने से रोकने के लिये, व्यक्तिगत रूप से, कांग्रेस-कार्यकर्ताओं ने, जगह जगह से, अछूत और निम्न कोटि के कहे जानेवाले देशवासियों को उम्मेदवार खडा किया और चुनावों मे यथेष्ट सफलता प्राप्त की । मेहतर तक आनरेबल मेम्बर बन गये । सन् ३१ मे भद्र अवज्ञा आन्दोलन चला और गान्धी-इरविन समझौते के रूप मे वह व्यवहारतः समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि सरकार का दमनकारी रुख नहीं बदला था । सन् १६३४ में काग्रेस ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया । इसके बाद जब नया शासन-विधान बनाने की तैयारी की जारही थी तब कांग्रेसी नेताओं को प्रलोभन उत्पन्न हुश्रा, अथवा मोर्चे से निराश लौटे हुए एक सेनानी ने दूसरे मोर्चे को आजमाने की बात फिर सोची । तय किया गया कि नवीन असेम्बलियो में प्रवेश कर अड़गा नीति का अवलम्बन किया जाय । सन् १६२६ की भॉति गान्धीजी उदारतापूर्वक इस दल के समक्ष फिर झुके । सत्याग्रह के स्थगित होजाने से अब काग्रेस के समक्ष कोई क्रान्तिकारी कार्यक्रम नही रहा था । इसलिये महात्मा गान्धी तो वर्धा को अपना केन्द्र बनाकर ग्राम-सुधार तथा ग्रामोद्योग आन्दोलन के सचालन में लग गये और दूसरी ओर विधानवादी मनोवृत्ति के काग्रेसी, जिनका कांग्रेस में विशाल बहुमत होगया था, सन् १६३४ के केन्द्रीय असेम्बली के चुनाव की तैयारी मे लग पडे ।
डा० विधानचन्द्र राय, डा० असारी, श्री भूलाभाई देसाई, प० गोविन्दवल्लभ पन्त, श्री सत्यमूर्ति विधानवादी-दल के प्रमुख नेता थे । काग्रेस-पार्लमेटरी बोर्ड बनाया गया और केन्द्रीय चुनाव में सफलता प्राप्त करने के लिये ज़ोरदार आन्दोलन हुआ । कांग्रेस-दल के ४४ सदस्य केन्द्रीय असेम्बली में चुने गये । यह केन्द्रीय असेम्बली का सबसे बड़ा दल था । कांग्रेस में कुछ व्यक्ति<noinclude>[[श्रेणी:अंतर्राष्ट्रीय ज्ञानकोश]]</noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२५८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude> <noinclude>{{rh|२५२ ||भारतीय व्यापारी मएढल-संघ्}}</noinclude>
के परिणाम के प्रकाशित होजाने के बाद महात्मा गांधी ने अपने एक वक्तव्य मे डा० सीतारामेया की पराजय को अपनी पराजय बतलाया। कांग्रेस-कार्य-समिति के सदस्यों से गांधीजी ने त्याग-पत्र दिला दिये और यह कांग्रेस का आन्तरिक सकट तथा गांधीवादी नेताओ का श्री बोस के साथ असहयोग उस समय तक बराबर जारी रहा जब तक कि,मई १६३६ में, उन्होने राष्ट्पति के पद से त्याग-पत्र नही देदिया । सुभाष बाबू ने काग्रेंस से अलग होकर ‘फारवर्ड व्लाक’ बनाया । चुनाव-संबंधी एक वक्तव्य के कारण सुभाष बाबू के विरुद्ध अनुशासन की कार्यवाही कीगई और वह कांग्रेस से पृथक् कर दिये गये । इसके बाद शेष समय के लिये बाबू राजेन्द्र्प्र्साद राष्ट्रपति चुने गये । सन १६४० के अधिवेशन ( रामगढ )के लिये मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद राष्ट्र्पति निर्वाचित हुये,जो अब तक है।
कांग्रेस का सालाना अधिवेशन प्र्ति वर्प नियत स्थान पर होता रहा है और सन १६३७ से किसी ग्राम मे होने लगा है । इसमे १ लाख से ३ लाख तक कांग्रेज़ तथा जनता भाग लेती है । एक सप्ताह तक बडा समारोह रह्ता है । सन ’४० के बाद, विशेष परिस्थितियो के कारण, कांग्रेस का अधिवेशन नहीं हुआ है । ( विशेष जानकारी के लिये पढिये- ‘भारत’ )
'''भारतीय व्यापारी-मण्डल संघ ( फेडरेशन आफ् इंडियन चेम्बर्स आफ् कामर्स)'''-बम्बई के प्रतिष्ठित व्यापारी सर फजलभाई करीमभाई ने, सन १६१३ मे, इंडियन कामर्स कांग्रेस नामक स्ंस्था स्थापन करने का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य भारतीय व्यापार के हितो की रक्षा करना था । सन् १६१५ मे इस कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन बम्बई मे हुआ, जिसके स्वागताध्यक्ष सर दीनशाह बाचा थे, और सर फजलभाई करीमभाई अध्यक्ष । उक्त कांग्रेस ने एक प्र्स्ताव द्वारा एसोशियेटेड चेम्बर आफ कामर्स की स्थापना के लिये एक प्रान्तीय कमिटी नियुक्त की । सद्स्य बनाने तथा रजिस्टी कराने का कार्य इस समिति को सौपा गया । किन्तु इसका कार्य अनेक वर्षों तक शिथिल रहा । सन १६२३ मे, विनिमय-दर के महत्वपूर्ण प्रश्न्न के उपस्थित हो जाने के कारण, व्यापारी-समाज फिर जाग्र्त होगया और सन् १६२३ मे ली तथा १६२७ मे कलकत्ता की व्यापारिक कांग्रेसो मे व्यापक व्यापारी-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२५९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude><noinclude>'''{{rh|भारतीय सेना||२५३}}'''</noinclude>
मण्डल की स्थापना की तजवीज़ कीगई । फलतः १ जनवरी १६२७ को फेडरेशन आफ् इंडियन चेम्बर्स आफ् कामर्स की स्थापना कीगई । आयात तथा निर्यात व्यापार की उन्नति करना इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है ।
इस अखिल भारतवर्षीय व्यापारी-सघ के दो प्रकार के सदस्य हैं : ( १ ) प्रान्तीय चेम्बर्स आफ् कामर्स, तथा ( २ ) व्यापारी समितियॉ । इस संस्था के सदस्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओ तथा परिषदो में प्रतिनिधि के रूप में भाग लेते हैं । यह भारत के व्यापारियो की सर्वोच्च प्रतिनिधि-सस्था है।
'''भारतीय सेना'''-भारत की सेना का वर्गीकरण इस प्रकार हैः-( १ ) ब्रिटिश सेना, (२) भारतीय सेना, (३) सहायक सेना, (४) भारतीय देशरक्षिणी ( टैरीटोरियल ) सेना, (५) भारतीय रियासतो की सेना । वर्तमान युद्ध के आरम्भ से पूर्व भारत के सेना-विभाग का संचालन इंडिया आफ़िस का युद्ध-मत्री (मिलिटरी सेक्रेटरी) करता है । भारत में एक प्रधान सेनाध्यक्ष होता है । वह समस्त सेनाओं का संचालन करता है । यहाँ सेना तीन प्रकार की हैः-थल-सेना, जल-सेना तथा हवाई-सेना । सन् १६३७ में सेना के अधिकारी तथा सैनिक इस प्रकार थे—( १ ) भारतीय थल-सेनाः—ब्रिटिश अफ़सर ( किंग्स कमीशन ) ६,५७०; भारतीय अफसर ( भारतीय कमीशन ) १६१ ; ब्रिटिश सैनिक ५५,१८७ ; भारतीय अफ़सर ( वाइसराय कमीशन) ४,२२५; भारतीय सैनिक १,३६,०७४ ; क्लर्क आदि १०,०११ ; नौकर ३२,८३६ तथा भारतीय सुरक्षित सैनिक ४१,८८७ । (२) हवाई-सेनाः ब्रिटिश अफसर २६० ; चालक १,८८७ ; देशी अफ़सर और सैनिक ६४५;सामान्य नौकर ५३० । ( ३ ) जल-सेनाः-मुख्य अफ़सर ३, अन्य अफ़सर १५, सी ट्रान्सपोर्टस्टाफ ३, सिविल गज़टेड अफसर ४, कप्तान ८, कमांडर १८, लेफ्टिनेन्ट कमाण्डर ५०, इंजीनियर कप्तान १३, इं० लेफ्टिनेट कमाण्डर ३७, नाविक १७, अन्य २७, जहाज़ १६ ।
युद्ध के आरम्भ होने के बाद से भारत मे थल-सेना, जल-सेना तथा नभ-सेना, तीनो के विस्तार में भारी प्रयत्न किया गया और किया जा रहा है । कमीशन-याफ्ता भारतीय अफ़सर अब सेना में अधिक संख्या मे लिये जा रहे हैं । लाखो भारतीय सैनिक इस समय समुद्र पार, बरतानवी साम्राज्य के अन्य भागो में, लड़ रहे हैं ।<noinclude></noinclude>
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