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== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|बाल्टिक राष्ट्र-समूह||३१३}}</noinclude>पूरे तीन साल लगे । २०० इंजीनियर तथा १,६०,००० मज़दूरों ने काम किया। इसके बनाने मे १ करोड ६० लाख डालर व्यय हुए ।
चीनी सरकार को सयुक्त-राष्ट्र अमरीका, भारत, ब्रह्मा तथा ब्रिटेन से मदद न मिले——इस विचार से जापान ने, फ्रान्स के पतन के वाद, हिन्द-चीन की सरकार से हेपहांंग्-हैनोई-कुमनिंग्-रेलवे मार्ग को बन्द करने के लिये आग्रह किया और विशी-सरकार ने, २० जून १६४० को, उसे बंद कर दिया । चीन के समुद्र-तट पर जापान को अधिकार होगया था। यह मार्ग फ्रान्स ने बन्द करा दिया। तब चीन के लिये ब्रह्मा-चीन-मार्ग ही रह गया था।
'''वार्डिया'''——लीबिया( अफ्रीका ) मे, जो इटली के अधीन था, एक बन्दरगाह । इसकी क़िलेबन्दी को अंग्रेजों ने तोड़ दिया और ७ जनवरी १६४१ को इस पर अपना अधिकार जमा लिया ।
'''वालफोर घोषणा'''———२ नवम्बर १६१७ को ब्रिटेन के तात्कालिक वैदेशिक मंत्री मि० जे० ए० बालफोर द्वारा, ब्रिटिश यहूदी संघ के अध्यक्ष, लार्ड राथ्सचाइल्ड, को लिखा गया पत्र, जिसमे मि० बालफोर ने लिखा——“ब्रिटिश सरकार यह चाहती है कि फिलस्तीन मे यहूदी जनता के लिये एक राष्ट्रीय उपनिवेश स्थापित किया जाय । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह भरसक प्रयत्न करेगी । यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि कोई ऐसा कार्य नहीं किया जायेगा जिससे फिलस्तीन-अधिवासी दूसरी जनता के नागरिक तथा धार्मिक अधिकारी में हस्तक्षेप हो अथवा दूसरे देशों में यहूदियो की जो स्थिति है, उस पर कोई असर पड़े । इसी पत्र के आधार पर यहूदी अपना आन्दोलन फिलस्तीन में कर रहे हैं ।
'''वाल्टिक राष्ट्र-समृह'''———लिथुआनिया, लैटविया एस्टोनिया और फिनलैण्ड बाल्टिक राष्ट्र कहलाते हैं । सन् १६१८ से पूर्व यह रूस के प्रान्त थे । तब से यह राज्य सोवियत रूस और पश्चिमी योरप के बीच स्वतन्त्र राष्ट्र बने रहे । स्वभावतः ही रूस इन देशों पर अपना पुनराधिकार प्राप्त करके बाल्टिक सागर पर अपना प्रभुत्व चाहता था । अक्टूबर १६३६ में रूस ने, इस युद्ध भे, अवसर से लाभ उठा लिया । दिसम्बर १६३६ में फिनलैंड पर उसने आक्रमण किया और मार्च १६४० में उसके बहुत से प्रदेशों पर अधिकार कर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२०
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|'''२१४'''||'''ब्राज़ील'''}}</noinclude>लिया । १६४० के जून-जुलाई में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लैटविया में रूस ने पूर्ण अधिपत्य करके अपनी नौ-सेना के अड्डे बना लिये तथा किलेबन्दी क़ायम करदी । तीनों देशो मे सोवियत ( जनता की पचायती )-शासन-प्रणाली क़ायम करके रूसी पचायती राज में इनको मिला लिया। बाल्टिक राष्ट्रो मे रूस का प्रभुत्व है । जर्मन प्रभाव को रूस ने यहाँ से उखाड़ फेका, साथ ही यहाँ बसी हुई अल्पसंख्यक जर्मन जाति को जर्मनी भेज दिया।
'''ब्राजील'''-( ब्राजील का ) सयुक्त राज्य । दक्षिण अमरीका का सबसे बडा प्रजातत्र । क्षेत्रफल ३२,८५,००० वर्गमील, जनसख्या ४,५०,००,०००; राजधानी रियो द-जनीरो, राष्ट्रभाषा पुर्तगाली । सन् १८८६ से इस देश का विधान संयुक्त राज्य अमरीका जैसा रहा, किन्तु १६३० मे राष्ट्रपति बरगस ने सत्ता अपने हाथ में लेली और एक कानून बनाकर दो धारासभाएँ स्थापित करदी । १६३७ मे सैनिक-विद्रोह के बल पर बरगस यहाँ का अधिनायक बन गया । वह जर्मनी और इटली का मित्र था, किन्तु १६३८ में नात्सीवाद तथा फासिज्म के विरुद्ध होगया और देश के फासिस्त दल का दमन किया । अब ब्राजील संयुक्त-राज्य अमरीका का मित्र देश है ।
ब्राजील देश की गणना ससार के सबसे बडे धनी देशो मे है । किन्तु अपेक्षाकृत वह अविकसित है। वहाँ कहवा ( काफी ) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है । इसकी अधिक पैदावार तथा सस्ते मूल्य के कारण कई बार यहाँ उथल-पुथल होचुकी है । क़हवा यहाँ की राजनीतिक समस्या बना हुआ है । साथ ही ब्राजीली सयुक्त-राज्य के अन्तर्गत बीस राज्यो की भी समस्या है । यह रियासते, केन्द्रीय सरकार के अधीन न रहकर, स्थानिक स्वायत्त के लिए, सदैव आन्दोलन करती रहती हैं। लाखो टन क़हवा प्रतिवर्ष इसलिए समुद्र
मे बहाकर नष्ट कर दिया जाता है - कि उसका मूल्य महँगा होजाय ।
[ब्राजील का मानचित्र]
* शैदिक मार्म *रभर अरू ।
क
।
मूर, स्था-
/
दक्षिणी प्रशान्तमहासा,
बोलीवया ।
|
म;
•
कलित
44 F<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|२१६||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>है, और अब इनकी सख्या, युध्द की पूर्वकालीन सख्या से, बहुत अधिक है । १६४० के पतभ्कड मे सयुक्त-राष्ट्र अमरीका से ५० विब्बन्सक ब्रिटिश जल-सेना को मिले ।
युध्द से पूर्व नौ-सेना मे १,३३,००० सैनिक थे । इनके अतिरित्क ७०,००० सुरक्षित नौ-सैनिक थे । उपर्युक्त अंको मे आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड और कनाडा की युध्द-पूर्व संख्या भी शामिल है ।
ब्रिटिश नौ-सेना ससार में सबसे शक्तिशाली थी । सयुक्त-राष्ट्र अमरीका का नम्बर प्रथम मान लिया गया है, किन्तु, वास्तव में, लड़ाई से पूर्व, वजन मे अमरीकी नौ-सेना के युध्द-पोत आदि कुछ कम थे । अब तो अमरीका मित्र राष्ट्रो के लिये बहुत बडी मात्रा मे युध्द-सामग्री तेजी से बना रहा है, जिनमे नौ सेना की सामग्री भी है । ब्रिटेन लन्दन नौ-सेना-सन्धि का एक सदस्य है ।
'''ब्रिटिश युनियन'''— सर ओसवाल्ड मोसले का फासिस्त आन्दोलन ।
'''ब्रिटिश साम्राज्य'''— ( ब्रिटिश ऐम्पायर, किन्तु ‘ब्रिटिश कामनवैल्थ’ जिसे अब अधिकतर कहा जाता है ) क्षेत्रफल १,३२,६०,००० वर्गमील अथवा समस्त भूमंडल का पॉचवॉ भाग । जन-संख्या ४८,७०,००,००० अर्थात् मानव-जाति का पचमाश । ब्रिटिश-साम्राज्य अथवा ब्रिटिश राष्ट्र-समूह ( कामन-वैल्थ ) मे, भूमंडल के विभिन्न भूमागो मे, निम्नलिखित देश हैं—
'''योरप'''— ग्रेटब्रिटेन और उत्तरी आयलैंएड, आयर, जिब्राल्टर, माल्टा ।
'''एशिया'''— अदन, पैरिम और बन्दरगाह, बाहरीन द्वीप-समूह, वोर्नियो ( जापान द्वारा, अप्रैल '४२ मे विजित ), ब्रुनी और सारावाक, ब्रम्हा (अप्रैल ’४२ मे जापान द्वारा विजित,किन्तु जिसे वापस लेने के लिये, अगस्त ’४२ से सयुक्त-राष्ट्र प्राणपन से चेष्टा कर रहे है), लड्का, साइप्रस, हाग्कांग ( जापान द्वारा विजित ), भारत, स्टेट्स सेट्लमेएट ( जापान के विश्वास-घात का शिकार ), मलय स्टेट्स ( सघशासित और असघ-शासित दोनो, सुदूरपूर्व के युध्द मे जापानी-साम्राज्य-लिप्सा के शिकार ), फिलस्तीन ।
'''अफ्रीका'''— केन्या उपनिवेश और बन्दरगाह, यूगाएडा, जॅजीवार ( पैम्बा के भाग सहित ); मारीशस, न्यासालैएड, सेन्ट हैलीना और असेन्शन; सेच— ,शुमालीलैएड; बसुतोलैएड, बेचुआनालैएड, दक्षिण रोडेशिया, उत्तरी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२०||ब्रिटिश-सेना}}</noinclude>ब्रिटिश-सेना—वर्तमान महायुद्ध आरंभ होने से पूर्व ब्रिटिश-सेना के तीन अंग थेः—
'''(१) स्थायी सेना'''—इसमें सैनिक सात वर्ष के लिये भर्ती किये जाते हैं, किन्तु आगामी ५ वर्ष तक, रक्षित सैन्य की भाँति, आवश्यकता पड़ने पर, इसके सैनिकों को बुलाया जा सकता है। इसमें १,६४,००० सैनिक रहते थे। जिनमें ५७,००० सैनिक भारत में थे और इनका व्यय भारत-सरकार को देना पड़ता था।
'''(२) देश-रक्षिणी सेना'''—यह नागरिकों की सेना है। इसमें चार वषों तक शिक्षण की व्यवस्था है। इस सेना के सैनिकों के व्यावसायिक अथवा नागरिके धन्धों में कोई बाधा नहीं पड़ती थी, सायकाल की कवायद में केवल सप्ताह में एक बार अथवा सालाना शिविर में शामिल होना पड़ता था। अप्रैल १९३६ मे यह सेना दूनी कर दी गई और इसकी सख्या ४,४०,००० होगई। इस सेना में एक स्त्री-सेना की शाखा भी हैं, जो असैनिक सहायक कार्य करती हैं।
'''(३) अनिवार्य नागरिक सेना।''' २६ मई १९३९ के मिलिटरी ट्रेनिग् ऐक्ट (सैनिक-शिक्षण कानून) के अनुसार प्रत्येक २० वर्ष के या इससे अधिक आयु के स्वस्थ पुरुष को इसमे ६ महीने के लिये भर्ती होना अनिवार्य हैं।
युद्ध आरम्भ होजाने पर यह समस्त सेनाएँ मिलाकर एक कर दी गई। १८ से ४१ वर्ष के लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया। १९४१ के पतझड़ तक २० और ३६ वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग ६० लाख आदमी इसमे भरती हुए और २० लाख सशस्त्र सैनिक तैयार होगये। १९४१ के दिसम्बर मे अनिवार्य भरती की उम्र पुरुषों के लिये ५० और स्त्रियों के लिये ३० वर्ष कर दीगई। जून १९४० मे नागरिक स्वयसेवको का मुल्की गारद जर्मन छतरी-सैनिकों से लड़ने के लिये बना। इसके सदस्य अपना कारबार करते हुए फालतू समय में सैनिक कार्य करते हैं। आवश्यकता के अवसर पर पूरे समय के लिये बुला लिये जाते हैं। इनकी सेवाओं को अनिवार्य भी बनाया जा सकता है। इन सेनाओं के अतिरिक्त समुद्र पार की भारतीय तथा अनेक उपनिवेशों की सेनाएँ अलग हैं।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" /></noinclude> <noinclude>{{rh|२५२ ||भारतीय व्यापारी मएढल-संघ्}}</noinclude>
के परिणाम के प्रकाशित होजाने के बाद महात्मा गांधी ने अपने एक वक्तव्य मे डा० सीतारामेया की पराजय को अपनी पराजय बतलाया। कांग्रेस-कार्य-समिति के सदस्यों से गांधीजी ने त्याग-पत्र दिला दिये और यह कांग्रेस का आन्तरिक सकट तथा गांधीवादी नेताओ का श्री बोस के साथ असहयोग उस समय तक बराबर जारी रहा जब तक कि,मई १६३६ में, उन्होने राष्ट्पति के पद से त्याग-पत्र नही देदिया । सुभाष बाबू ने काग्रेंस से अलग होकर ‘फारवर्ड व्लाक’ बनाया । चुनाव-संबंधी एक वक्तव्य के कारण सुभाष बाबू के विरुद्ध अनुशासन की कार्यवाही कीगई और वह कांग्रेस से पृथक् कर दिये गये । इसके बाद शेष समय के लिये बाबू राजेन्द्र्प्र्साद राष्ट्रपति चुने गये । सन १६४० के अधिवेशन ( रामगढ )के लिये मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद राष्ट्र्पति निर्वाचित हुये,जो अब तक है।
कांग्रेस का सालाना अधिवेशन प्र्ति वर्प नियत स्थान पर होता रहा है और सन १६३७ से किसी ग्राम मे होने लगा है । इसमे १ लाख से ३ लाख तक कांग्रेज़ तथा जनता भाग लेती है । एक सप्ताह तक बडा समारोह रह्ता है । सन ’४० के बाद, विशेष परिस्थितियो के कारण, कांग्रेस का अधिवेशन नहीं हुआ है । ( विशेष जानकारी के लिये पढिये- ‘भारत’ )
'''भारतीय व्यापारी-मण्डल संघ ( फेडरेशन आफ् इंडियन चेम्बर्स आफ् कामर्स )'''-बम्बई के प्रतिष्ठित व्यापारी सर फजलभाई करीमभाई ने, सन १६१३ मे, इंडियन कामर्स कांग्रेस नामक स्ंस्था स्थापन करने का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य भारतीय व्यापार के हितो की रक्षा करना था । सन् १६१५ मे इस कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन बम्बई मे हुआ, जिसके स्वागताध्यक्ष सर दीनशाह बाचा थे, और सर फजलभाई करीमभाई अध्यक्ष । उक्त कांग्रेस ने एक प्र्स्ताव द्वारा एसोशियेटेड चेम्बर आफ कामर्स की स्थापना के लिये एक प्रान्तीय कमिटी नियुक्त की । सद्स्य बनाने तथा रजिस्टी कराने का कार्य इस समिति को सौपा गया । किन्तु इसका कार्य अनेक वर्षों तक शिथिल रहा । सन १६२३ मे, विनिमय-दर के महत्वपूर्ण प्रश्न्न के उपस्थित हो जाने के कारण, व्यापारी-समाज फिर जाग्र्त होगया और सन् १६२३ मे ली तथा १६२७ मे कलकत्ता की व्यापारिक कांग्रेसो मे व्यापक व्यापारी-<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>________________
सातवाँ भाग ।
देशों की आर्थिक अवस्था की तुलना ।
पहला परिच्छेद ।
सर्व-साधारण बातें ।
जैसे सब आदमी एक से नहीं होते, वैसे ही सब देश भी एक से नहीं होते । किसी की आर्थिक अवस्था अच्छी होती है, किसी की बुरी । किसी में किसी चीज़ की अधिकता होती है, किसी में किसी चीज़ की कमी । सम्पत्ति की उत्पत्ति के जो तीन साधन हैं वें सब कहीं एक से नहीं पाये जाते । इँगलैंड में पूँजी वृत्र है, मज़दूरों की भी कमी नहीं हैं, पर ज़मीन बहुत कम है । अमेरिका में पूँजी भी है, ज़मीन भी है, पर मज़दूरी बड़ी महंगी है । हिन्दुस्तान को देखिए । यहां जमीन और मज़दूरी दोनों की कमी नहीं, कमी है पूँजी की । इसी तरह हर एक देश की स्थिति जुदा जुदा होती है । इँगलैंड के पास भूमि कम है । पर पूँजी बहुत है और उद्योग-धन्धे से लोगों को बहुत प्रेम है । इससे भूमि की कमी उसे बहुत कम हानि पहुँचाती है । उसके कम होने पर भी इँगलैंड में अनन्त सम्पत्ति भरी हुई है । अमेरिका का भी यही हाल है । उद्योग-प्रियता और पूँजी के चल से, मज़दूरी महंगी होने पर भी, वहां लक्ष्मी का अखण्ड वास है । इससे साबित है कि सम्पत्ति की अधिक उत्पत्ति के लिए पूँजी चार उद्योग, ये दो बातें ही प्रधान हैं । जिस देश में पूँजी है और इसे लगाकर लोग उद्योग-धन्धा करना जानते हैं वहाँ और साधनों की कमी होने पर भी सम्पत्ति का ह्रास नहीं होती । वह बराबर बढ़ती ही जाती है ।
किसी देश में कम, किसी में अधिक सम्पत्ति होने के और भी कितने ही कारण हो सकते है । कभी कभी ऐसा होता है कि उत्पन्न की गई सम्पत्ति को लीग बहुत ही बुरी तरह से खर्च करते हैं । वे उसका अनुत्पादक उपयोग करते हैं । इससे पूँजी कम हो जाती है और मज़दूरों का काफ़ी मज़दूरी नहीं मिलती । कभी कभी सम्पत्ति का वितरण ऐसे बुरे नियमों के अनु-<noinclude></noinclude>
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१७६
सम्पत्ति-शास्त्र ।
सार होता है कि उसके पैदा करनेवालों में से किसी किसी के बहुत नुक़सान उठाना पड़ता है । इसी तरह कभी कभी ऐसे कारण उपस्थित हो जाते हैं कि सम्पत्ति की उत्पत्ति रुक जाती है, या बहुत कम हो जाती है । उदाहरण के लिए, कड़ा महसूल लग जाने से माल की रफ्तनी बन्द हो जाती है । इससे बड़े बड़े कारख़ाने धूल में मिल जाते हैं । देश का व्यापार मारा जाता है । कारीगर और श्रमजीवी भूखों मरने लगते हैं । ऐसे ही ऐसे अनेक कारणों से सम्पत्ति घटा बढ़ा करती है । कोई देश सम्पत्तिमान् होता चला जाता है, कोई कंगाल !
कभी कभी प्राकृतिक कारणों से भी देशों की सम्पत्ति घट बढ़ जाती है । यदि किसी ज्वालामुखी के स्फोट से कई देश या देशांश बरबाद हो जाए; या तूफ़ान से उसके जहाज़ डूब जाएँ; फसलें नष्ट हो जाएँ, या अकस्मात् आग लगने से बड़े बड़े शहर जल जाएँ, तो इन आपदाओं से जो सम्पत्ति नाश होगा उसका कारण प्राकृतिक माना जाएगा । इसी तरह यदि अचानक सोने, चाँदी, लोहे, कोयले आदि की खानों को पता किसी देश में लग जाए और उनसे ये चीजें खूब निकलने लगें तो देश की सम्पत्ति ज़रूर बढ़ जाएगी । इस सम्पत्ति-वृद्धि के कारण को भी प्राकृतिक ही कहेंगे ।
जितने देश हैं सम्पत्ति पैदा करने की शक्ति सब की जुदा जुदा हैं । यही नहीं, किन्तु प्रत्येक देश की शक्ति समय समय पर बदला करती है । इतिहास में इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि एक ही देश की सम्पत्ति का परिमाण भिन्न भिन्न समय में भिन्न भिन्न रहा है । जिस समय जिस देश की जैसी अवस्था होती है उस समय उतनी ही सम्पत्ति वहां पैदा होती है । अपने ही देश के देखिए । सौ वर्ष पहले इसमें जितनी सम्पत्ति उत्पन्न करने की शक्ति थी, इस समय उतनी नहीं रह गई ।
शिक्षा से भी सम्पत्ति की उत्पत्ति बढ़ जाती है । जिस देश के लोग शिक्षित हैं, उद्योग-धन्धा करना जानते हैं, दस्तकारी के कामों में निपुण हैं वहां अधिक सम्पत्ति उत्पन्न होती है । यदि दो देश एक ही राजा के अधीन हों, और प्राकृतिक अवस्था भी दोनों की एक ही सी हो, तो भी सम्पत्ति के उत्पादन में प्रशिक्षित देश कभी शिक्षित की बराबरी न कर सकेगा । प्राकृतिक पदार्थों का जितना अच्छा उपयोग शिक्षित दम कर सकेंगे, अशिक्षित कभी न कर सकेंगे । जो चीज़ ज़मीन के पेट में भरी पड़ी हैं उनका शान,<noinclude></noinclude>
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सर्व-साधारण बातें । १७७
अशिक्षितों को नहीं हो सकता । और यदि हो भी तो मैं उनसे यथेष्ट लाभ नहीं उठा सकने । शिक्षा, विद्या और विज्ञान के बल से एक चीज़ें ज़मीन में जितनी पैदावार हो सकती है उतनी अशिक्षित आदमियों के किये कभी नहीं हो सकती । जिस देश में खनिज, रसायन, ऋषि, भूगर्भ आदि विद्याओं के जानने वाले हैं वह देश उन देशों से ज़रूर ही अधिक सम्पत्ति उत्पन्न कर सकेगा जो इन विद्याओं के नहीं जानते । कला-कौशल के विषय में भी यहीं बात कही जा सकती है ।
किसी किसी देश के रहनेवाले सम्पत्ति की कम परवा करते हैं । यह बात पूर्वी देशों में अधिकतर पाई जाती है । हिन्दुस्तानी की लीजिए: यहां हम लोग सन्तोष की एक बहुत ही श्रेष्ठ गुण समझते हैं, और भाग्य के भरोसे रह कर जो कुछ सुबह से शाम तक मिल जाता है, उसी पर ख़ुशी से गुज़ारा करते हैं । यहां की धार्मिक शिक्षा हो कुछ इस तरह की है । इसी से तो यह कहावत अकसर लोगों के मुँह से सुनने में आती हैं :-
आज ग्वाय और कल को भक्खै - उसका गोरख संग न रक्खै ।
पश्चिमी देशों का हाल इसका उलटा है। वे तक़दीर से सदर को श्रेष्ठ समझते हैं और हमेशा सम्पत्ति के बढ़ाने की फ़िक्र में रहते हैं । सन्तोष को वे बुरी दृष्टि से देते हैं । छोटे से लेकर बड़े तक सब को किसी न किसी तरह का हौसला रहता ही हैं । सन्तोष किसी के किसी बात से नहीं । पूर्वी और पश्चिमी देशों में सम्पत्ति-विषयक यह बात ध्यान में रखने लायक़ है ।
मज़दूरों और हर पेशे के कारीगरों के चुस्त, चालाक और शिक्षित होने से भी देश की सम्पत्ति बढ़ती है । जहां के कारीगर अच्छा काम कर सकते हैं और पढ़े लिखे होते हैं, जहां के मज़दूर खूब मजबूत होने हैं और शराबी कबाबी नहीं होते, वह देश औरों की अपेक्षा अधिक सम्पत्तिमान् होता है । जिस देश के श्रमजीवी सुस्त, अनपढ़, कमज़ोर और कम समझ होते हैं वह देश बहुत कम सम्पत्ति पैदा कर सकता है । दूरन्देश और ईमानदार कारीगरों से देश को जितना लाभ पहुँचता हैं कम समझ, काहिल और कामचोर कारीगरों से उतनी ही हानि पहुँचती है ! श्रमजीवी आदमियों को यह शिक्षा देना कि विश्वासपात्र, चालाक और दूरन्देश बनने से उन्हीं को नहीं, किन्तु सारे देश को लाभ पहुँच सकता है, देश के सभी शुभ-<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>१७८ सम्पत्ति-शास्त्र ।
चिन्तकों का कर्तव्य है । यदि यह शिक्षा इन लोगों के दिलों पर असर कर जाए और ये काहिली आदि दोप छोड़ दें तो बहुत जल्द देश में सम्पत्ति की वृद्धि होने लगे । जो कारीगर, जौ दस्तकार, जो मज़दूर सम्पत्ति के अवरोधक दोपों को नहीं छोड़ते वे अपने ही नहीं, अपनी जाति और अपने देश के भी दुश्मन हैं । और, जो लोग उनको बुरी आदतें छोड़ने की शिक्षा देने के योग्य हो कर भी नहीं देते, वे भी मानों अपनी, अपनी जाति की और अपने देश की भलाई की जड़ काटते हैं ।
जिस देश में वाणिज्य-व्यवसाय अधिक होता है और थोड़ी थोड़ी पूँजी इकट्ठी करके बड़े बड़े कारोबार किये जाते हैं वह देश औरों की अपेक्षा अधिक सम्पत्तिशाली हो जाता है । जिस देश में पूँजी की कमी है उसके लिए तो कम्पनियां खड़ी कर के व्यवसाय करने की बड़ी ही जरूरत है ।
आबादी बढ़ने से भी देश की सम्पत्ति कम हो जाती है । यदि लड़ाइयों और हैजा, प्लेग अादि रोगों से आबादी कम न होती जाए तो तीस ही वर्ष में वह दूनी हो जाए | इस दशा में जीवन-जंजाल का भागड़ा दूना बढ़ जाएगा और एक की जगह दो खाने वाले हो जाएंगे । आबादी बढ़ने से ज़मीन अपनी उत्पादक शक्ति की अन्तिम सीमा तक जल्द पहुँच जाती है । क्योंकि खाने को दूना चाहिए । इस लिए लोग जी जान से मेहनत कर के उसकी शक्ति को बढ़ाते हैं । पर बढ़ती है वह अपनों हद ही तक । इधर आबादी की हद नहीं । वह बढ़ती ही रहती हैं । इससे देश की सम्पत्ति सौरा होने लगती है । यदि ऐसी अवस्था में कुछ लोग देशान्तर न कर जायें, या प्राकृतिक कारणों से आबादी कम न हो जाए, तो देश की आर्थिक दशा बहुत नाज़ुक होने से नहीं बच सकती है ।
सम्पत्ति के बटने बढ़ने के जो कारण हैं उनमें से कुछ ऐसे हैं जो शास्त्रीय-सिद्धान्तों के अधीन हैं । अर्थात् उन कारणों से हुई सम्पत्ति की न्यूनाधिकता शास्त्रीय नियमों का अनुसरण करती है । पर कुछ कारण ऐसे हैं जिनके नियम ढूँढ निकालना बहुत मुश्किल है। सम्पत्ति-शास्त्र-विषयक अंग्रेज़ी की बड़ी बड़ी किताबों में इन बातों का सविस्तर विचार किया गया है । उसके लिए इस छोटी सी पुस्तक में जगह नहीं ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>________________
हिन्दुस्तान को आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन । १७९
दूसरा परिच्छेद ।
हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन |
सम्पत्तिशास्त्र में वहुधा व्यापक सिद्धान्तोंहों का विवेचन किया जाता है । किसी देश विशेष से सम्बन्ध रखनेवाले सिद्धान्तों का विचार प्रायः कम किया जाता है । पर हमारी समझ में ऐसा ज़रूर होना चाहिए । सम्पत्तिशास्त्र का सम्बन्ध व्यवहार की बातों से हैं । अतएव व्यवहार की बातों में अन्तर होने से शास्त्रीय सिद्धान्तों में ज़रूरी अन्तर पड़ जाता है । फिर क्यों न प्रत्येक देश की व्यवस्था को अलग अलग विचार हो? इस तरह के विचार से जो देश सम्पत्ति में हीन है उसकी हीनता के कारण मालूम हो जाते हैं और उन्हें दूर करने में सुभीता होता है ।
इस देश की आर्थिक अवस्था हीन है । इसमें कोई सन्देह नहीं । इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिन बातों से देश की आर्थिक दशा सुधरती है उन सबको करना इस देशवालों के हाथ में नहीं । उनमें से बहुतेरी बातों को राजा ने अपने हाथ में ले रक्खा है । जिसमें वह अपनी, अपने देश की, अपने देशवासियों की हानि समझता है उसे नहीं करता । फिर उससे चाहे हिंदुस्तान का कितना ही लाभ क्यों न होता हो ।
इँगलिस्तान में ज़मीदारों को ज़मीन का लगान नहीं देना पड़ता । हिन्दुस्तान में देना पड़ता है; और थोड़ा नहीं बहुत देना पड़ता है । फिर वह बीस बीस तीस तीस वर्ष बढ़ वह भी जाता है । यही नहीं, किसान और ज़मींदार दोनों बेदखल भी कर दिये जा सकते हैं । हाँ बंगाल में इस्तिमगरी बन्दोबस्त हैं । वहां न बेदखली का डर है और न लगाने में इज़ाफ़े का ।
सरकार जमीन की जो मालगुजारी लेती हैं वह मज़दूरी आदि बाद देकर बची हुई पैदावार का आधा है । अर्थात् ५० फ़ी सदी मालगुज़ारी सरकार को देनी पड़ती है । यह शरह मामूली फ़सल के हिसाब से बाँधी गई है । पर यदि फ़सल ख़राब जाती हैं तो भी प्रजा को अकसर उतनी ही मालगुज़ारी देनी पड़ती है जितनी कि अच्छी फसल होने पर देनी पड़ती । फिर यह ५० फ़ी सदी को शरह सब कहीं प्रचलित नहीं । कहीं कहीं ६० फ़ी सदी तक लगान देना पड़ता है । और पटवारी, चौकीदारी, स्कूल, शफ़ाख़ाने आदि<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>१८० सम्पत्ति-शास्त्र ।
का कर लगाकर वह कहीं कहीं ६५ फ़ी सदी से भी अधिक हो जाती है । इसका फल यह होता है कि काश्तकारों को बहुत ही कम क्या, किसी किसी को प्रायः कुछ भी नहीं बचता और उनकी ज़मीन नीलाम हो जाती है । यहां के वाणिज्य-व्यवसाय की भी बुरी दशा और कृषी की भी । यही दो मदें देश की सम्पत्ति बढ़ानेवाली हैं । सो दोनों की दुर्दशा हैं । इस भूमण्डल का कोई देश, फिर चाहे वह कैसा ही सम्पत्तिमान् क्यों न हो, इस दशा में कभी उन्नत नहीं हो सकता । साठ साठ फ़ी सदी के हिसाब से कृषी की पैदावार को काश्तकारों में लेने पर काई देश बरबाद होने से नहीं बच सकता ।
इस देश की आर्थिक अवनति का एक कारण यह भी है कि विदेशी राज्य होने के कारण विदेशी अधिकारी और विदेशी फ़ौज रखने तथा विदेशी सामान खरीदने में बेअन्दाज़ सम्पत्ति खर्च होती हैं । फिर यह ख़र्च हुई सम्पत्ति यहीं नहीं रहतीं । इँगलैंड चली जाती है । और भारत उससे हमेशा के लिए हाथ धो बैठता है । हिंदुस्तान के ख़र्च खाते इँगलैंड में हर साल कोई २० करोड़ रुपया लिखा जाता है । यह सत्र हिन्दुस्तान को देना पड़ता हैं ।
प्रजा से गवर्नमेंट जो मालगुजारी वसूल करती हैं उसका एक चतुर्थांश विलायत जाता है । जो अँगरेज़ इस देश में सरकारी नौकरी करते हैं वे जो द्रव्य अपने देश को, अपनी तनख़्वाह से बचा कर, भेजते हैं वह यदि इसे हिसाब में जोड़ लिया जाए तो इस देश से विलायत जानेवाली सम्पत्ति का परिमाण और भी अधिक हो जाए । हर साल इसी तरह इस देश की सम्पत्ति की धारा बिलायत को बहती है और इस देश की दरिद्रता बढ़ाने का कारण होती हैं । इस सम्पत्ति का कई बदला हिन्दुस्तान को नहीं मिलता । इस दशा में यदि भारत की भूमि सुवर्णमय हो जाए तो भी किसी दिन यह देश कंगाल हुए बिना न रहे । विलायत में हर आदमी की सालाना आमदनी का औसत कोई ६०० रुपया है और हिन्दुस्तान में हर आदमी का सिर्फ ३० रुपया ! इस पर भी विलायतवाले "होम चार्जेज़" के नाम से यहां के फ़ी आदमी से औसतन् ७६ रुपया वसूल करके अपने देश के ले जाते हैं । फिर भला क्यों न यह देश दिनों दिन दरिद्रता की फाँस में फँसता जाए?<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८१}}</noinclude>यहां की साम्पत्तिक अवस्था अच्छी न होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि गवर्नमेंट का अकसर करोड़ों रुपया क़र्ज़ लेना पड़ता है । इस समय कई अरब रुपये क़र्ज़ हिन्दुस्तान के सिर पर है । उस पर जैश सूद सरकार की देना पड़ता है उससे यही का पहले ही से बढ़ा हुआ ख़र्च और भी बढ़ जाता है ।
हम लोगों की रग रग में पुरानापन घुसा हुआ है । पुरानी आदतें हमारी छूटती ही नहीं । वही पुराना चर्चा और वही पुराना हुल अब तक चल रहा है । यहां की ज़मीन और आबोहवा ऐसी है कि कच्चा पाना यहाँ बहुत पैदा होता है । मज़दूर जितने चाहो मिल सकते हैं; और मज़दूरी भी सस्ती है । पर मज़दूर न तो चुस्त और चालाकही हैं और न कामही अच्छा करना जानते हैं । मज़दूरों से मतलब कुलियों से नहीं, किन्तु हाथ से काम करनेवाले जितने श्रमजीवी हैं सबसे हैं । पूँजी बहुत कम हैं । जितनी है भी उसका अधिकांश जेवर या प्रामिसरी नोट आदि के रूप में पड़ा हुआ है । उससे काई उद्योग-धन्धा किया ही नहीं जाता । फिर पूँजी चाहे ऐसे तंगदिल आदमी हैं कि व्यापार-व्यवसाय में रुपया लागने का उन्हें साहस ही नहीं होता । वे डरते हैं कि कहीं हमारा रुपया डूब न जाए । सम्भूय-समुत्थान का तो नाम ही न लीजिए । कम्पनियां खड़ी करके बड़े बड़े व्यवसाय करना यहां बालों के मालूम ही नहीं । सब लोगों की जीविका प्रायः खेती से चलती है । सो खेती की यह दशा है कि जमीन को उर्धरा बनाने–असकी उत्पादक शक्ति बढ़ाने-की उत्तम तरकीबें लोगों को न मालूम होने से उसकी पैदावार कम होती जाती है । फिर किसी साल पानी बरसता है, किसी साल नहीं बरसता । जिस साल जहाँ नहीं बरसता वहां कुछ नहीं पैदा होता । कलकत्ते, बंबई और कानपुर आदि में जो बड़े बड़े कारखाने हैं वे अभी कल के हैं । बड़े बड़े व्यापारी भी बहुत कम हैं । ऐसे कुछ ही व्यापारी होंगे जिनके जहाज़ चलते हैं । जितने व्यापार और उद्यम-धन्धे हैं सब थोड़ी पूँजी से चलते हैं । ज़मीन पर प्रजा का कोई हक़ नहीं, गवर्नमेंट कहती हैं वह हमारी हैं । सञ्चय करना लोग जानते नहीं । अभी सौ सवा सौ वर्ष पहले हुक तो किसी के जान-माल तक का ठिकाना न था । सञ्चय लोग लुटेरों के लिए थोड़े ही करते ! हाँ अब अंगरेजी राज्य की बदौलत अमन चैन हैं । इससे कुछ सञ्चय होने लगा हैं । धार्मिक ख़याल लोगों के कुछ ऐसे हो रहे हैं कि सम्पत्ति बुरी चीज़ समझी जाती है । वह न हो सोई बेहतर ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|१८२|सम्पत्ति-शास्त्र।|}}</noinclude>ऐसी ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो देश की सम्पत्ति बढ़ाने की बाधक हैं । अतएव यदि हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था हीन हो; यदि उसके अधिकांश निवासियों के दोनों चक, पेट भर खाने के न मिले; एक साल पानी न बरसने पर, दरिद्रता के कारण, यदि हजारों आदमी भूखों मर जायें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं ।
यहां के व्यापार को देखिए । विलायत की चीज़ों से यहां की बाज़ारें भरी हुई हैं । शुरू शुरू में इँगलिस्तान की गवर्नमेंट ने यहाँ पे कपड़े की रफ्तनी को, विलायत में उसपर कड़ा महसूल लगा कर, बिल्कुल ही रोक दिया । यहाँ का व्यापार-यहां का फलाकौशल–मारा गया । अब जब उसके पुनरुजीवन की ओर लोगों का ध्यान गया है तब यथेष्ट कर लगा कर विलायती वस्तुओं की आमदनी रोकी नहीं जाती । अगर किसी विलायती चीज़ पर कुछ महसूल है भी तो इतना कम है कि न होने के बराबर है । एक समय था कि डच, अरब और अंगरेज़ सौदागर इस देश की बनी हुई चीज़ों से सारे योरप के बाज़ार पाट देते थे । पर अब वह सब स्वप्न हो गया है । मंच तो सिर्फ़ कथा माल, विशेष करके प्रजा के पेट पालने का अनाज, देशान्तर को जाता है और अकाल पड़ने पर यहां चालों का दाने दाने के लिए मुहताज होना पड़ता है । प्रजा-वत्सल राजा को चाहिए कि इस अन्धेर को रोके ।
प्रतिवन्ध-हीन व्यापार से इस देश को बड़ी हानि पहुँच रही है - इसकी आर्थिक दशा दिनों दिन खराब हो रही है । इँगलैंड एक छोटा सा टापू है । उसे खाने पीने तक की चीजों के लिए भी और देशों का मुँह ताकना पड़ता है । अतएव वह यदि इस तरह के व्यापार का पक्षपाती हो तो हो सकता है । हिन्दुस्तान क्यों हो? वह तो अपने व्यवहार को प्रायः सारी चीजें आपही पैदा कर सकता है । यदि इस देश में बाहर से आने वाला माल कर लगा कर रोका जाए, या उसकी आमदनी कम की जाए, तो यहाँ की आर्थिक अवस्था को बहुत जल्द उन्नति हो जाए । इँगलैंड ने खुद ही शुरू शुरू में यह पक्ष की थी । हिन्दुस्तानी माल पर उसने कड़े से कड़ा कर लगा कर विलायत में उसकी आमदनी रोक दी और विलायती माल बिना कर, या बहुत थोड़ा कर लगा कर, हिन्दुस्तान में भर दिया । फल यह हुआ कि यहाँ का प्रायः सारा व्यापार और प्रायः सारे उद्योग-धन्धे मारे गये । वही इँगलैंड अब हमारे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पत्ति-शास्त्र.pdf/२०२
250
28311
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2026-06-23T17:03:10Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||हिन्दुस्तान की आर्थिक अवस्था का दिग्दर्शन।|१८३}}</noinclude>लिए अबाध वाणिज्य की ज़रूरत समझता है । क्या अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और खुद अंग्रेज़ों ही का उपनिवेश आस्ट्रेलिया आदि देश मूर्ख हैं जो अबाध वाणिज्य के खिलाफ़ हैं? नहीं, वे बड़े दूरन्देश और बड़े स्वदेशहित-चिन्तक हैं । इससे वे व्यापार-विषयक "संरक्षण" के पक्षपाती हैं । अँगरेज़-अधिकारी भी इस बात को समझते हैं । पर वे करें क्या? उन्हें ,खुद अपने देश के, अपने घर के, अपनी जाति के व्यवसायियों और व्यापारियों का भी ख़याल हैं । यदि उनके तैयार किए हुए माल पर कर लगा दिया जाएगा तो उनके मुँह की रोटी छिन जाएगी ! उनके कारख़ाने बन्द पड़ जाएंगे । इँगलैंड में हाहाकार मच जाएगा । अतएव अंगरेज़-व्यापारियों को हानि पहुँचा कर हिन्दुस्तान का भला गवर्नमेंट कैसे कर सकती है? इसके लिए गवर्नमेंट विशेष दोषी भी नहीं, क्योंकि - "अव्वल ख़ेश, बादहू दरवेश" ।
हिन्दुस्तान के कुछ प्रान्त ऐसे हैं जो बेतरह बने वसे हुए हैं । वहां बीघे भर भी परती ज़मीन न मिलेगी । पर मध्य भारत में कई रियासतें ऐसी हैं जहाँ लाखों बीघे अच्छी ज़मीन योहीं पड़ी हुई हैं । कोई जोतने बोने वाला ही नहीं । ऐसे और भी कई प्रान्त हैं जहां ज़मीन बहुत है, पर उसे जोतने वाले कम ! यदि लोग ऐसी ऐसी जगहों में जाकर आबाद हो तो सम्पत्ति की वृद्धि हुए बिना न रहे । नौ-आबाद आदमियों की आर्थिक अवस्थी बहुत कुछ सुधर जाए । पंजाब के कुछ जिलों में गवर्नमेंट ने जो उपनिवेश-स्थापना शुरू कर दी हैं उसके कारण हज़ारों बीघे परती ज़मीन उपयोग में आ गई हैं और कितने ही नये नये गांव आबाद हो गये हैं । यदि गवर्नमेंट अन्यत्र भी ऐसा ही करे, और यहां की देशी रियासतें भी गवर्नमेंट का अनुकरण करें, तो देश को बड़ा उपकार हो ।
राजा जो कर प्रजा से लेता है वह प्रजा ही की रक्षा के लिए - प्रजा ही के लाभ के लिए - लेता है । प्रजा को अर्थकरी शिक्षा देना भी रजा ही का काम है । पर औद्योगिक कला-कौशल सम्बन्धी शिक्षा देने का गवर्नमेंट ने आज तक इस देश में कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया । जो कुछ किया भी है वह न करने के बराबर है । जिस जाति को - जिस देश को - इस सभ्यता और व्यापार-विषयक चढ़ा ऊपरी के ज़माने में औद्योगिक शिक्षा नहीं मिलती उसकी आर्थिक दशा कभी उन्नत नहीं हो सकती । जिस देश के लोग दास्यवृत्ति करके पेट भर लेना ही शिक्षा का एक मात्र उद्देश समझते<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०
250
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2026-06-23T16:46:02Z
सौरभ तिवारी 05
49
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663683
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{blockcenter|
'''भूमिका'''
}}
{{blockcenter|
पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरशीतलचंद्रसूयों च नेत्र ।<br />
कर्णा वाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो, यस्य वासोऽयमच्छि ।<br />
अन्तस्थं यस्य विश्वं । सुरनरखगगो भोगिन्धिर्वदैत्यैः ।<br />
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ १॥
}}
इतिहास प्राचीनों के अनुभव का खजाना है। व्यक्ति का, समाज का और देश का चरित्र संगठन करने के लिये इतिहास ही एक पथ दर्शक है। लाखों, करोड़ों का अटूट खजाना नष्ट-भ्रष्ट होकर राजा से रंक हो सकता है किन्तु अनुभव की धरोहर यदि लिपिबद्ध कर ली जाय तो वह अटल, अविचल और वर्द्धमान सम्पत्ति है। बस इसी उद्देश्यसे इतिहास ग्रंथों की सृष्टि हुई है। मैं इसमें कहां तक कृतार्थ हुआ हूं—सो कह नहीं सकता परंतु जब मैं सुलेख नहीं, विद्वान् नहीं और बुद्धिमान् नहीं और इसी तरह इतिहास लेखन की सामग्री भी पूर्णतया उपलब्ध नहीं तब कहना चाहिये कि मेरा यह कार्य अपूर्ण होगा—अनुचित साहस कहलावैगा। हाँ! एक वात अवश्य है। यदि मैं इस उद्योग में सफल न होसकूं तो न सही किन्तु मुझे भरोसा है कि मेरे बाद कोई महाशय बूंदी के इतिहास लिखने का यदि उद्योग करेंगे तो उन्हें इस पोथी से बहुत सामग्री मिल जायगी। यदि मुझे इतनी भी सफलता प्राप्त हो जायगी तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा।
जब यह "उम्मेदसिंह चरित्र" पाठकों के सामने है तब इस पोथी में क्या है—सो दिखलाने की आवश्यकता नहीं और भूमिका में पुस्तक का आशय लिख देने की प्रायः चाल भी नहीं है। हां! इस जगह इतना अवश्य लिख देना चाहिये कि इसमें विक्रमीय संवत् १७५२ से १८७८ तक के १२६ वर्षों का इतिहास है। उस समय मुसलमानी बादशाहद का सर्वनाश होकर क्यों-कर देशभर में अराजकता फैल गई थी, क्यों कर "जिसकी लाठी उसकी भैंस" की कहावत चरितार्थ होती थी और क्योंकर भारतवर्ष के उस प्रारब्ध परिवर्तन के जमाने में राजपूताने के क्षत्रिय नरेशों ने आपस के द्वेष से, दुर्व्यसनों से और इसी प्रकार के अनेक कारणों से आपस में लड़कर, अपने भाइयों का नाश करके देश के नाश करने का उद्योग किया। परमेश्वर की कृपा से उस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५
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सौरभ तिवारी 05
49
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{blockcenter|(१०)}}
यह पोथी संवत् १९६३ में तैयार हुई थी और प्रकाशित होने का सौभाग्य इसे अब प्राप्त हुआ है। इतना विलम्ब होने का कुछ भी कारण हो उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं। हां! “श्रीवेङ्कटेश्वर” यंत्रालय के स्वामी सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी को भी मैं धन्यवाद देताहूँ जिन्होंने मुझ जैसे अकिंचन की पोथियां प्रकाशित करने का अनुग्रह किया है। मेरी पूर्व प्रकाशित और पुस्तकों की तरह इसे छापने, प्रकाशित करने और दुबारा छापने का अधिकार भी उन्हीं को है।
इतिहास अथवा जीवनचरित्र लिखने में यह मेरा तीसरा उद्योग है। इस से पहले श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र और काबुल के अमीर अबदुुर्रहमानखाँ का चरित्र- यों दो पुस्तकें प्रकाशित होचुकी हैं। इसके अतिरिक्त दो पुस्तकें अभी अमुद्रित हैं सो समय पड़नै पर छपैं ही गी। अब रहा आगे लिखने का कार्य सो उसका आधार पाठकों के- समालोचकों के अनुग्रह पर है। यदि समय मिला, यदि सामग्री मिली और साथ ही यदि उत्साह बढ़ाया गया तो शरीर आरोग्य रहने पर फिर भी उद्योग करना मनुष्य का कर्तव्य है। परमेश्वर ऐसी ही कृपा करै।
इस भूमिका को समाप्त करते पूर्व उन हिन्दी रसिकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जो “अंगीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति” के अनुसार मेरी पुस्तकों का आदर करते हैं और जिन समालोचकों की नीर क्षीर को अलग कर देनेवाली बुद्धि है वे भी धन्यवाद के भागी हैं।
{{left|
बूँदी राजपुताना
माघ कृष्ण ७
सं० १९६९ वि०
}}
{{right|
हिन्दी का एक लघु सेवक-
लज्जाराम शर्म्मा.
}}
[अलंकरण]<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६
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सौरभ तिवारी 05
49
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663685
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{blockcenter|महता लज्जाराम शर्मा रचित पुस्तकें।}}
(१) श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र १।)
(२) काबुल के अमीर अबदुर्रहमानखां का चरित्र ।।।)
(३) उम्मेद सिंह चरित्र
(४) बीरबल विनोद १।)
(५) धूर्तरसिकलाल ।)
(६) स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी ।-)
(७) हिन्दू गृहस्थ ।।=)
(८) आदर्श दम्पती ।।=)
(९) सुशीला विधवा ।।=)
(१०) बिगड़ेका सुधार ।-)
(११) विपत्ति की कसौटी (छपरही है)
(१२) पराक्रमी हाड़ाराव (तैयार है)
(१३) विचित्र स्त्रीचरित्र ।।)
(१४) भारत की कारीगरी ।)
{{blockcenter|
पुस्तक मिलने का ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस- बम्बई।
}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८
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सौरभ तिवारी 05
49
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663681
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}}
{{blockcenter|{{xxx-larger|'''उम्मेदसिंहचरित्र की-'''}}}}
{{blockcenter|{{larger|विषयानुक्रमणिका।}}}}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| १
| १
| वंशपरिचय ।
|
|-
|
|
| चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति।
| १
|-
|
|
| अग्निकुल चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति।
| {{ditto}}
|-
|
|
| अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी
| ४
|-
|
|
| जाहिर पीर गोगाजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले
| {{ditto}}
|-
|
|
| रमणेशजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| शाकंभरी का सांग्भर में मंदिर बनवानेवाले महानंदजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| चितोड का किला बनानेवाले चित्रांगजी।
| {{ditto}}
|-
|
|
| बीसल सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| आना सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले आनाजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| शरणागत वत्सल हम्मीरजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी
| ५
|-
|
|
| पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी
| ७
|-
|
|
| मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी
| {{ditto}}
|-
|
|
| बूंदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी
| {{ditto}}
|-
| १
| २
| बूंदी राज्य का संस्थापन ।
|
|-
|
|
| देवसिंहजी ने बादशाह को घोड़ा न दिया
| ८
|-
|
|
| बाँदू के नले में बूंदी ३०० घरों की बस्ती थी
| {{ditto}}
|-
|
|
| देवसिंहजी ने मीनों से बूंदी छीन ली.....
| {{ditto}}
|-
|
|
| कोटा बसा......
| {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९
250
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सौरभ तिवारी 05
49
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663682
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूँदी के चार राजाओं का वानप्रस्थ आश्रम
| ९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| गणगौरि छीन लेगया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| गणगौरि और रानी को शेरगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये<br>
जब संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर<br>
काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया
| १०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| श्वसुर ने दामाद रानाजी की मारा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले भांडाजी
| ११
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| समरकंद (श्यामजी)
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया
| १२
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| नारायणदासजी की बहादुरी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने मांडू के बादशाह का<br>
इक्का मारा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अफीम न मिलने से सांप की जोड़ी
| १३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अपना घात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित<br>
मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये
| १४
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| माता के स्तनों से दूध की धारा
| १५
|-
| १
| ३
| बूँदी राज्य की उन्नति
|
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सुरतानजी के अत्यांचार
| १६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सुरजनजी को गद्दी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटा और रणथंभोर में सुरजनजी का अधिकार
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जलेवदार के वेश में बादशाह अकबर
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह से सात वा दश शर्तें लिखवाकर और सात परगने<br>
लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसमेत बावन<br>
परगने पाये
| १७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सुरजनजी को काशीवास
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| राजमन्दिर आदि बनाये गये
| {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०
250
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663686
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="text-align:center;" | '''विषयानुक्रमणिका ।'''
| style="text-align:right;" | '''(३)'''
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| १
| ३
| दूदा लक्कडखां
| १८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सूरत के बादशाह को मारकर अहमदनगर की बेगम को जीतने-<br>
पर भोजजी ने बादशाह से चार शर्तें लिखवाई
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सूरत के बादशाह की पगडी का हीरा भोजजी ने अकबर को न दिया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह की बेगम मरने पर भोजजी ने मोंछें न मुंडवाई
| १९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुरहानपुर विजयी रत्नजी का अधिकार
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटेमें माधवसिंहजी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाही डेरों को गोवध न करने का रत्नजी ने बादशाह<br>
जहाँगीर से प्रण करवाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| हरिसिंहजी ने शाहजादे खुर्रम से चिलमें भरवाईं
| २०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कुंवर गोपीनाथजी की मृत्यु
| २१
|-
| १
| ४
| पराक्रम की परिसीमा।
|
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| रावराजा शत्रुशल्य जी को गद्दी।
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह शाहजहाँ के लिये अनेक युद्ध जीतकर शत्रुशल्यजी ने<br>
दिल्ली का राज्य बढ़ाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| शाहजादा दारा के लिये लड़कर धौलपुर में बड़ी बहादुरी के<br>
साथ शत्रुशल्यजी मारे गये
| २२
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| शत्रुशल्यजी ने बावन युद्धों में विजय पाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| रावराजा भावसिंहजी को गद्दी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| औरंगाबाद की सूबेदारी
| २३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| हिन्दूधर्म की रक्षा के लिये औरंगजेब से न डरे
| २४
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| मंदिरों की रक्षा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भगवान के विमानों को बादशाह की सेनासे भावसिंहजी ने बचाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भावसिंहजी की बहनका बादशाह की सेनासे युद्ध
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अनिरुद्धसिंहजी को गद्दी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| दक्षिण के युद्ध में विजय
| २५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह की बेगम को छुड़ाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| काबुल में विजयकर वहां ही अनिरुद्धसिंहजी का देहान्त
| {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२१
250
193517
663687
663383
2026-06-23T16:47:44Z
सौरभ तिवारी 05
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/* शोधित नहीं */
663687
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{left|(४)}}
{{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| २
| १
| पिता का शासन।
| २६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| पिताके पराक्रम
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी का जन्म, विवाह ...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी ग्यारहवर्ष की उमर में काबुल गये
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| आमेरनरेश ने इन की वीरता देख अपनी कन्या विवाह दी ...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाही दर्बार में इन्हों ने एक मुगल मार डाला
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| औरंगजेब का अंतिम पश्चाताप
| २७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जाजव के मैदान में बुधसिंहजी का पराक्रम
| २८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटे से शत्रुता का बीजारोपण
| २९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| महारावराजा की पदवी और चौवन परगने मिले...
| {{ditto}}
|-
| २
| {{ditto}}
| कोटा और दतिया के राजा तथा शाहजादा मारेगये ...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| २
| पिताका पतन ।
| ३०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी बाममार्गी होगये ...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भाई जोधसिंहजी गणगौरि समेत तालाब में डूबगये ...
| ३१
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बादशाह ने बूंदी कोटानरेश को देदी ...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी को फिर बूंदी मिलगई ...
| ३२
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजीने बादशाह के प्राण बचाये...
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटे के महारावजी का बूंदी में अधिकार
| ३३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी ने फिर बूंदी लेली
| {{ditto}}
|-
| २
| ३
| आमेर से शत्रुता<br>“आमेर नरेश से बुधसिंहजी की शत्रुता के कारण”
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी के साले आमेर नरेश जयसिंहजी का बूंदी लेने का लोभ
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी का रानी कछवाहीजी से विरोध
| ३४
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| पांचों लास में बुधसिंहजी से आमेर की सेना का संग्राम
| ३६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूंदी की गद्दी आमेर के जयसिंहजी ने दलेल सिंहजी को देदी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी को हारकर बेंगू जाना पड़ा
| ३७
|-
| {{ditto}}
| ४
| बूंदी छूट गई
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| छः वर्ष में छः बादशाह
| {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२
250
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663688
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका ।}}
{{right|(५)}}
{{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| २
| ४
| देश में अराजकता फैली हुई थी
| ३७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बुधसिंहजी का स्वर्गवास
| ३८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी का जन्म
| {{ditto}}
|-
| ३
|
| बूंदी का उद्धार
| ३९
|-
| {{ditto}}
| १
| जन्म से तेरह वर्ष
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बालवय के कष्ट
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अकबर की बाल्यावस्था की घटनाओं से मेल
| ४०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| माता का स्नेह, राज्याभिषेक
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी को मंत्रदीक्षा देने का वल्लभ संप्रदायवालों ने डर से निषेध कर दिया
| ४२
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| रामानुज संप्रदाय
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी की शिक्षा दीक्षा और भगवद्भक्ति
| ४३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उनका आचरण और स्वभाव
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भाई भाई में कलह, वेगूं से निकाले गये
| ४४
|-
| {{ditto}}
| २
| कार्य का आरंभ- पहली जीत ।
| ४५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| पहला विवाह
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उन्हें मारने के लिये दलेलसिंहजी ने हाथी भेजा
| ४६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर नरेश जयसिंहजी का देहान्त
| ४७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी ने पाटन और गैंडोली पर अपना अधिकार कर लिया
| ४८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटा नरेश दुर्जनशल्यजी ने उम्मेदसिंहजी की सहायता की
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| युद्ध क्षेत्र में पहली बार उम्मेदसिंहजी, बूंदी विजय
| ४९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटेवालों का लोभ
| ५१
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी ने बूंदी छोड़ दी और जोधपुर गये
| ५२
|-
| {{ditto}}
| ३
| माता का देहान्त ।
| ५३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटे पर जयपुर की चढ़ाई, कोटा लूटा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| माता का वियोग
| ५५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| दूसरा विवाह
| ५६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| विमाता कछवाहीजी से मेल
| ५७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३
250
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663689
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text/x-wiki
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{{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ३
| ४
| बूंदी में उम्मेदसिंहजी
| ५७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| मीना जाति का उम्मेदसिंहजी पर प्रेम
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूढ लुहारी का संग्राम
| ५८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| वीचडी के मैदान में उम्मेदसिंहजी ने बूंदी की सेनासे विजय पाया
| ५९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूंदीमें सोलह दिन उम्मेदसिंहजी का राज्य
| ६०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| दलेल सिंहजी ने उम्मेद सिंहजी के डर से जयपुर नरेश को<br>
बूंदी के लिये फारिगखती लिख दी
| ६२
|-
| {{ditto}}
| ५
| लोमहर्षण संग्राम, बूंदी छूटगई ।
| ६३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर नरेश की बूंदी पर चढ़ाई
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुरवालों से लड़ने के लिये उम्मेदसिंहजी की तैयारी
| ६५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| अमर पुरे के संग्राम में उम्मेदसिंहजी की बहादुरी
| ६६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उनके घोड़े की टांग टूट गई
| ६७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उमरावों ने रणभूमि से चले जाने के लिये<br>
उम्मेदसिंहजी को शपथ दिलवाया
| ६८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| पैदल चलकर उम्मेद सिंहजी इन्द्रगढ गये
| ६९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| युद्ध में पराक्रम करने पर उम्मेद सिंहजी की प्रशंसा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| देवसिंहजी ने घोडा न देकर कटु वचन कहे
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| उम्मेदसिंहजी मधुकर गढ चले गये
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| ६
| हारने पर भी न हारे ।
| ७१
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर के लिये यह लड़ाई बड़ी भारी पड़ी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर ने कोटे को मिलाया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| दो सो रुपया दैनिक लेकर कोटे ने<br>
उम्मेदसिंहजी को न दिया
| ७२
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| रानाजी ने उम्मेदसिंहजी के लिये घोड़ा भेजा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| तीसरा विवाह
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भोग विलास में रत न हुए
| ७३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कोटेवालों ने उम्मेदसिंहजी को लड़ने से रोका
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| टाड साहब कहते हैं कि कोटे की सहायता से<br>
उम्मेदसिंहजी ने बूंदी ली तो सही परंतु<br>
जयपुरवालों ने फिर बूंदी छीन ली
| ७४
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663690
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{right|(७)}}
{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका ।}}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ३
| ६
| चारण को उम्मेदसिंहजी ने बहुत धन दिया
| ७५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| खर्च की तंगी से उम्मेदसिंहजी ने हाथी बेचा और गैंडोली लूट<br>
कर खंडार में निवास
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| ७
| बूंदी का उद्धार ।
| ७६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| राजमहल से जयपुर से युद्ध
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूंदी के राज परिवार को कोटेवालों ने अपनी शरण में रक्खा
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर नरेश ईश्वरीसिंहजी का गिराव
| ७७
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| कामदार की लड़की पर ईश्वरीसिंहजी आसक्त हो गये
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| होलकर से उम्मेद सिंहजी मिले
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| होलकर ने उम्मेद सिंहजी को बूंदी देदेने का जयपुर पर जोर डाला
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| होलकर ने जयपुर पर चढ़ाई की
| ७८
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर होलकर का भयानक संग्राम
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुर हार गया
| ७९
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयपुरवालों को उम्मेदसिंहजी के तांई लाचारी से बूंदी देनी पड़ी,<br>
जयपुर से बूंदी का झगड़ा मिट गया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| टाड साहब के मत से माता कछवाहीजी ने होलकर के राखी<br>
बांधकर जयपुर पर चढ़ाया
| ८०
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| टाड साहब के मत का बूंदी के इतिहास से मिलान और उस<br>
पर इस चरित्र लेखक की राय
| ८१
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| सदा के लिये उम्मेदसिंहजी ने बूंदी प्राप्त की
| ८२
|-
| {{ditto}}
| ८
| उम्मेदसिंहजी का बूंदी में राज्याभिषेक ।
| ८३
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| ईश्वरीसिंहजी ने गैंडोली के परगनेके लिये लालच किया
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| बूंदी में उम्मेद सिंहजी को होलकर ने राज तिलक किया
| ८५
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| मेहमानों की पहरावनी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| जयश्रीकृष्ण के बदले "जयश्रीरंगनाथजी की"
| ८६
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| भूमिवालों को खोजकर उन की भूमि लौटा दी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| शत्रुओं की दीहुई भूमि भी बहाल रक्खी
| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}
| {{ditto}}
| दलेलसिंहजी का देहान्त
| {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५
250
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663691
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="width:15%; text-align:left;" | '''(८)'''
| style="width:70%; text-align:center;" | '''उम्मेदसिंहचरित्र की—'''
| style="width:15%;" |
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ३
| ९
| कोटेवालों का प्रपंच ।
| ८७
|-
| „
| „
| जोधपुर नरेश का अपने भाई से कलह, उम्मेदसिंहजी सहायता के लिये गये …
| „
|-
| „
| „
| मारवाड़ की सेना में घुसकर अकेले उम्मेदसिंहजी ने अपने शरर्णागत के घातक को मारा
| ८८
|-
| „
| „
| उम्मेदसिंहजी ने बूंदी के कांटे निकाल राजभक्तों को प्रसन्न किया
| ८९
|-
| „
| „
| कोटेवालों ने दलेलसिंहजी के बेटे कृष्णसिंह जी को बहकाया
| „
|-
| „
| „
| कोटेवालों ने रानाजी को और पेशवा के मंत्री को बहकाया
| ९०
|-
| „
| „
| बूंदी में श्रावणी तीज का नया उत्सव आरंभ हुआ
| ९१
|-
| „
| „
| उम्मेदसिंहजी की दक्षिणयात्रा, होलकर से मिले
| „
|-
| „
| „
| बूंदी के कामदार का प्रजा पर अत्याचार
| ९२
|-
| „
| „
| उम्मेद सिंहजी की आज्ञा से भजनेरी के जागरिदार ने आकर कामदार कैद कर लिया, कोटेवालों ने कामदार को सहायता दी
| „
|-
| „
| „
| सतारा के राजा से उम्मेदसिंहजी मिले
| ९३
|-
| „
| „
| कोटेवालों ने उदयपुरवालों को बहकाया
| „
|-
| „
| „
| कोटेवालों की बहकावट से दलेल सिंह जी के पुत्रने बूंदी पर चढ़ाई की
| „
|-
| „
| „
| कोटेवालों ने कृष्ण सिंह जी को सहायता न दी तब वह भाग गये
| ९४
|-
| ३
| „
| उम्मेदसिंहजी का बूंदी आगमन
| „
|-
| „
| १०
| होलकर जयपुर का संग्राम, जयपुर का रनवास
| „
|-
| „
| „
| रानाजी ने उम्मेद सिंह जी के लिये राज तिलक का दस्तूर भेजा
| „
|-
| „
| „
| होलकर की जयपुर पर चढ़ाई
| ९५
|-
| „
| „
| जयपुर नरेश का उम्मेदसिंहजी के नाम पत्र
| „
|-
| „
| „
| अपनी लड़की पर आसक्त हो जाने का जयपुर के कामदार ने ईश्वरीसिंहजी से बदला लिया
| ९६
|-
| „
| „
| ईश्वरीसिंहजी जहर खाकर मरगये
| ९७
|-
| „
| „
| पराये कफन से उनका दाह हुआ
| ९८
|-
| „
| „
| ईश्वरी सिंहजी के कुकर्मों की कथा
| „
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६
250
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663387
2026-06-23T16:48:57Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663692
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="text-align:center;" | '''विषयानुक्रमणिका ।'''
| style="text-align:right;" | '''(९)'''
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ३
| १०
| होलकर के पुत्रने जयपुर की रानियों पर मन चलाया
| ९९
|-
| „
| „
| उम्मेद सिंह जी ने जयपुर के जनाने की इज्जत बचाई
| „
|-
| „
| „
| माधवसिंहजी को जयपुर की गद्दी
| „
|-
| „
| „
| टाड साहब के मतसे उम्मेद सिंह जी को बूंदी दिलाने में होलकर का स्वार्थ
| १०१
|-
| „
| „
| पाटन के तीन हिस्से
| „
|-
| „
| ११
| भाई की बंहकावट, देवसिंहजी का बध
| १०२
|-
| „
| „
| महाराज कुमार अजितसिंह जी का जन्म
| „
|-
| „
| „
| उम्मेदसिंह जी ने भाई दीपसिंह जी का विवाह किया
| १०३
|-
| „
| „
| कोटेवालों की बंहकावट से दीपसिंह जी कोटे चले गये
| „
|-
| „
| „
| इन्द्रगढवाले देवसिंह जी ने दीपसिंहजी को राज्य का लालच दिलाकर जयपुर भेजा
| „
|-
| „
| „
| उम्मेद सिंह जी को भाई रूठ जानेका खेद, उन्हें बुलाने का उद्योग
| १०४
|-
| „
| „
| बूंदी के महल में श्रीरंगनाथजी की स्थापना
| १०५
|-
| „
| „
| महाराज कुमार बहादुर सिंह जी का जन्म
| „
|-
| „
| „
| कलकत्ते की काल कोठरी में अंगरेज कैद, झांसी में अंगरेजों का विजय
| „
|-
| „
| „
| देवसिंह जी की चिट्ठी पकड़ी गई
| १०६
|-
| „
| „
| उम्मेद सिंह जी ने यह चिट्ठी होलकर आदि को दिखलाई तब उन्होंने देव सिंह जी को मार डालने की सलाह दी...
| „
|-
| „
| „
| करवर में उम्मेद सिंह जी ने देवसिंह जी को मारकर उन के पुत्र को कैद किया
| १०७
|-
| „
| „
| इन्द्रगढ़ खातोली आदि में उम्मेद सिंह जी ने अपना अधिकार कर किले बनवाकर देव सिंह जी के भाई को इन्द्रगढ़ देदिया
| „
|-
| „
| „
| टाड साहब का देव सिंहजी के मारने पर उम्मेद सिंह जी को कलंकित मानना, देव सिंहजी के अपराधों पर दृष्टि देकर टाड साहब के मतका खंडन
| १०८
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२७
250
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663693
663388
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सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663693
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="width:15%; text-align:left;" | '''(१०)'''
| style="width:70%; text-align:center;" | '''उम्मेदसिंह चरित्र की—'''
| style="width:15%;" |
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ३
| १२
| सेंधिया से बत बढ़ाव, भाई को क्षमा
| १११
|-
| "
| "
| सेंधियाने देव सिंह जी की स्त्री का पक्षकर उम्मेद सिंहजी को दबाना चाहा परंतु वह जब लड़ने को तैयार हुए तब होलकर ने बीच बिचाव करादिया
| ११२
|-
| "
| "
| रणथंभोर का किला जयपुर के अधिकार में
| "
|-
| "
| "
| पंजाब की चढ़ाई में उम्मेद सिंह जी होलकर के साथ गये
| ११३
|-
| "
| "
| भाई दीप सिंह जी को बूंदी बुलाकर उनके क्षमा मांगने पर उम्मेद सिंह जी ने अपराध क्षमा किये...
| ११४
|-
| "
| "
| दीप सिंह जी को जागीर में कापरैन, उनके पुत्र पौत्रों का असद्भाव
| "
|-
| ३
| १३
| सेंधिया से संग्राम, जयपुर में युवराज
| ११५
|-
| "
| "
| जयपुर पर मरहटों की चढ़ाई, बूंदी के महाराज कुमार जयपुर सहायता के लिये गये
| ११६
|-
| "
| "
| जयपुरवालों ने अजित सिंह जी का सत्कार कर बुधसिंहजी का पत्र लौटा दिया
| "
|-
| "
| "
| उम्मेद सिंह जी जयपुर नरेश से मिले
| ११७
|-
| "
| "
| महारानी उदावतजी का देहान्त
| "
|-
| "
| "
| सेंधिया का मारवाड नरेश से युद्ध बूंदी नरेश ने मारवाड़ को सहायता दी
| ११८
|-
| "
| "
| चौथा विवाह
| "
|-
| "
| "
| कोटेवालों ने फिर सेंधिया को बूंदी के विरुद्ध बंहकाया
| "
|-
| "
| "
| सेंधिया से उम्मेद सिंह जी का संग्राम, जब यह न हारे तब सेंधियाने मेल कर लिया
| ११९
|-
| "
| "
| निर्भय उम्मेद सिंह जी अकेले ही शत्रु सेना में घुस गये
| १२०
|-
| "
| "
| इन की बहन का जोधपुर नरेश से विवाह
| "
|-
| ३
| १४
| उपद्रवियों का दमन, जयपुर पर जाट
| १२१
|-
| "
| "
| अंगरेजों का दौर दौरा
| "
|-
| "
| "
| मेवाडी सरदारों का उपद्रव, उन को कैद किया,...
| १२२
|-
| "
| "
| रानाजी की सिफारिस से उनको छोड़ दिया
| "
|-
| "
| "
| मीनो का उपद्रव, पगारु जागीर
| १२३
|-
| "
| "
| भरतपुर के जाट का जयपुर से मन मुटाव
| "
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२८
250
193538
663694
663389
2026-06-23T16:49:26Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* शोधित नहीं */
663694
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="text-align:center;" | '''विषयानुक्रमणिका ।'''
| style="text-align:right;" | '''(११)'''
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| „
| „
| भौजाई पर देवर आसक्त
| १२४
|-
| „
| „
| जयपुर नरेश ने शरणागत को निकाल दिया, सती का मरण
| १२५
|-
| „
| „
| जाट जयपुर संग्राम, अजित सिंह जी जयपुर की सहायता के लिये फिर जयपुर गये
| „
|-
| „
| „
| जयपुर नरेश माधव सिंह जी का देहान्त, पुत्र का विवाह, पुत्र के पराक्रम, पुत्रों को जागीर
| १२६
|-
| ३
| १५
| श्रीजी साहब का राज्य त्याग, पुत्र को राज्य
| १२७
|-
| „
| „
| बूंदी के छः राजाओं की उत्कृष्टता, उम्मेद सिंह जी की प्रशंसा,
| „
|-
| „
| „
| महाराज कुमार अजित सिंह जी को राज्य देकर श्रीजी साहब का वानप्रस्थ, श्रीजी साहब कहलाये, पुत्र को उपदेश
| १२८
|-
| „
| „
| टाड साहब की कल्पना,
| १३२
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब का केदारेश्वर के निकट निवास,
| १३४
|-
| „
| १६
| परिशिष्ट
| १३५
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब के विवाह, उन की संतान की संख्या,
| „
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब के बनाये हुए स्थान.
| १३७
|-
| ४
| „
| श्रीजी साहब का तीसरा आश्रम
| १३९
|-
| „
| १
| पूर्व देशों की यात्रा, बीलहटे का झगडा
| „
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब की पुष्कर यात्रा, कृष्णगढ़ नरेश और रानाजी मिले
| „
|-
| „
| „
| अजित सिंह जी ने मीनो का दमन किया.
| १४०
|-
| „
| „
| पौत्र का जन्म, अजित सिंह जी ने बीलहटे में किला बनवाया,
| „
|-
| „
| „
| जहाजपुर के रानावतों की बीलहटे पर चढाई. श्रीजी साहब ने उन्हें मार भगाया;
| „
|-
| „
| „
| अजित सिंह जी का बांसवाडे विवाह.
| १४१
|-
| „
| „
| पौत्र का देहान्त, पूर्व देशों की यात्रा, काशी नरेश ने सत्कार किया, जगदीश के दर्शन, नरवर नरेश ने एक तोप भेट की,
| „
|-
| „
| „
| राना जी ने अजित सिंह जी के भाई को बुलाकर बीलहटा जागीर में देने का प्रण भी किया,
| १४२
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२९
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सौरभ तिवारी 05
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%; border:none;"
|-
| style="width:20%; text-align:left; border:none;" | '''(१२)'''
| style="width:60%; text-align:center; border:none;" | '''उम्मेदसिंहचरित्र की—'''
| style="width:20%; border:none;" |
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ४
| १
| श्रीजी साहब ने बेगूं जाकर नानी को गंगा स्नान कराया, श्रीजी साहब के पौत्र विष्णुसिंह जी का जन्म, कुलपहरावनी
| १४३
|-
| „
| „
| शंकरगढ़ में श्रीजीसाहब रानाजी से मिले,
| १४४
|-
| „
| „
| रानाजी ने अजितसिंहजी के पास अपना मंत्री भेजा. मंत्री की ढिठाई.
| „
|-
| „
| २
| रानाजी का वध ।
| १४६
|-
| „
| „
| रानाजी के वध के कारण
| „
|-
| „
| „
| टाड साहब के मत का खंडन,
| १५१
|-
| „
| ३
| पुत्र का परलोक
| १५६
|-
| „
| „
| अजितसिंहजी की मृत्यु, एक रानीजी सती हुईं शोक का स्वरूप, श्रीजी साहब ने शोक का वज्र सह लिया,
| १५७
|-
| „
| „
| अजित सिंहजी की अंतिम क्रिया,
| १५९
|-
| „
| „
| पौत्र को राज्य,
| „
|-
| „
| ४
| यात्रा का दिग्दर्शन "टाड राजस्थान" से
| १६०
|-
| „
| „
| टाड साहब ने उम्मेद सिंहजी की असाधारण प्रशंसा की है,
| „
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब की यात्रा में उत्तम २ वस्तुओं का संग्रह …
| १६१
|-
| „
| „
| कावाओं का दमन,
| १६३
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब के शस्त्रों का संग्रह,
| १६६
|-
| „
| ५
| पौत्र को राज्य, द्वारका यात्रा,
| „
|-
| „
| „
| विष्णुसिंहजी की शिक्षा, राज्य की रक्षा का प्रबंध कर के श्रीजी साहब ने द्वारका की यात्रा की, …
| „
|-
| „
| „
| सेंधिया के कहने से बीलहटा लौटादिया,
| १६८
|-
| „
| „
| बेगूंपर सेंधिया की चढाई, बूंदीवालों ने बेगूंकी सहायता की
| „
|-
| „
| „
| कोटेवालों से मेल
| १६९
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब की महारानी राठोडजी का देहान्त,
| „
|-
| „
| ६
| लखनऊ के नव्वाब ने काशी का परगना अंगरेजों को देदिया,
| १७०
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब पुष्कर, जोधपुर, बाबगांव, राजकोट, गिरनार होते हुए द्वारका गये, कावाओंसे युद्ध, उन का दमन,
| „
|-
| „
| „
| टाड साहब का मतभेद
| १७२
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३०
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{| style="width:100%;"
| style="text-align:center;" | '''विषयानुक्रमणिका ।'''
| style="text-align:right;" | '''(१३)'''
|}
{| class="wikitable"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| ४
| ६
| बदरिकाश्रम की यात्रा
| १७३
|-
| „
| „
| उन्नीसवें शतक में भारत के अनेक राज्यों का बिगाड़ बनाव
| „
|-
| „
| „
| बदरिकाश्रम की यात्रा में जाते हुए श्रीजीसाहब जयपुरनरेश से मिलते, अचरोल, बहादुरगढ, सामली नगर के राजाओं का सत्कार ग्रहण करते हरद्वार पहुंचे,
| १७४
|-
| „
| „
| बदरिकाश्रम के मुख्य २ तीर्थों के नाम, यात्रा का स्वरूप,...
| १७५
|-
| „
| „
| बर्फ के ढेर में सत्रह आदमियों का प्राणत्याग,
| १७६
|-
| „
| „
| श्रीनगर के राजा ने, उणियारे के रावजी ने सत्कार किया,
| „
|-
| „
| „
| विष्णुसिंहजी का पहला विवाह
| १७७
|-
| „
| ७
| रामेश्वर की यात्रा
| „
|-
| „
| „
| उज्जैन में श्रीजी साहब ने संन्यासियों के प्राण बचाये
| १७८
|-
| „
| „
| विष्णुसिंहजी का दूसरा विवाह,
| १७९
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब की भतीजी से जयपुर नरेश का विवाह
| „
|-
| „
| „
| जयपुर अलवर संग्राम में जयपुर की बूंदी ने सहायता की,
| „
|-
| „
| „
| टीपू सुलतान का अंगरेजों से युद्ध
| १८०
|-
| „
| ८
| राजा का चक्र, दादा नाती का मन मुटाव
| १८१
|-
| „
| „
| विष्णुसिंहजी को लोगों ने बहकाकर, श्रीजी साहब के निषेध करने पर भी जालिम सिंहजी की कन्या से विवाह करवाया,
| १८२
|-
| „
| „
| जालिम सिंहजी ने लाग पाकर अपने आदमी राजप्रबंध में घुसेड दिये
| १८३
|-
| „
| „
| श्रीजी साहब के परपोते का जन्म
| „
|-
| „
| „
| जगदीश पुरी की दूसरी यात्रा,
| १८४
|-
| „
| „
| विष्णुसिंहजी ने श्रीजीसाहब से काशी में कहलाया कि “आप बूंदी न पधारिये” — दादा नाती का प्रेम कलह,
| „
|-
| „
| „
| लखनऊ के नव्वाब ने बुलाया परंतु श्रीजी साहब न गये....
| १८५
|-
| „
| „
| धाभाईजी पर दंड, बूंदी में जालिमसिंहजी का चक्र,
| १८६
|-
| „
| „
| किलेदार ने विष्णुसिंहजी के साथ कुचक्रियों को किले में न जाने दिया, इसी बात पर, लोगों ने उनको श्रीजी साहब के विरुद्ध उभारा,
| „
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पृष्ठ:19270101 HindiNatak Hindi PDF.pdf/१२
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>'''हिंदी नाटकों के उद्भव के पूर्व'''
''संस्कृत नाटकों की परंपरा''
हिंदी के उपन्यास, कहानी तथा निबंध संस्कृत-साहित्य की
क्रमागत परपरा से बहुत कम प्राप्त कर सके हैं। किंतु काव्य और नाटक
सीधे उसके विकास क्रम में पड़ते हैं । भारतेन्दु तथा उनका महल
संस्कृत की नाट्य प्रणाली से बहुत कुछ प्रभावित रहा; संस्कृत
नाटकों के काव्यात्मक वातावरण, रूमानियत तथा टेकनीक की
छाप प्रसाद के नाटकों पर स्पष्ट देखी जा सकती है। प्रसाद के
परवर्ती नाटककारो की कृतियों भी किन्हीं ग्रंथों में संस्कृत नाटकों
से अनुप्राणित हैं । ऐसी स्थिति में संस्कृत नाटकों का संक्षिप्त विश्ले-
केवल श्रृंखला की कड़ियों मिलाने का औपचारिक कार्य नहीं
माना जा सकता बल्कि समग्र गाय साहित्य के नैरन्तर्य तथा नवीन
परिवर्तनों को समझने-समझाने में विशेष उपयोगी सिद्ध हो
सकता है ।
संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनुमान और कल्पना
के आधार पर ही कुछ कहा जा सकता है । नाट्यशास्त्र में उल्लिखित
देवी उत्पत्ति तर्क से पुष्ट न होने के कारण मान्य नहीं हो सकती ।
लेकिन 'न वेद व्यवहारोंयं संश्राव्यः शूद्रजातिषु । तस्थात्सृजापर
वेद" पश्चमं सार्ववणिकम्' से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि नाटक
अत्यन्त लोक प्रिय साहित्य था। सभी वर्णों के स्त्री-पुरुष समान रूप
से इसका रसास्वादन कर सकते थे। ऋग्वेद में पाए जाने वाले
सूक्तों (जो संख्या में लगभग पंद्रह है) के संवाद तत्व से नाटक की
उत्पत्ति का सम्बन्ध मोड़ लेना कम भ्रमपूर्ण नहीं है। मैक्समूलर और<noinclude></noinclude>
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सदस्य वार्ता:Anu7hka
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सौरभ तिवारी 05
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== आपके द्वारा शोधित पृष्ठ ==
@[[सदस्य:Anu7hka|Anu7hka]]जी, आपके द्वारा शोधित किए जा रहे पृष्ठों में त्रुटियाँ छूट जा रही हैं। कृपया उन त्रुटियों को अच्छी तरह से सुधारे बगैर पृष्ठ को शोधित चिह्नित (पृष्ठ का रंग बदलना) ना करें। आप पृष्ठों के रंग बदले बगैर अपना संपादन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद।—[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १७:०८, २३ जून २०२६ (UTC)
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