विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.12 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३२ 250 45964 668730 668724 2026-07-26T17:41:07Z Shivaniya shaw 4129 668730 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|१३| गणपाथ-- गज मण्डली}}</noinclude>गजपाल (सं० पु० ) महावत, हाथोवान, वह जो हाथो | गजपुर (सं० क्लो० ) गस्य हस्तिनाम नृपस्य पुरं इ-तत् ! fafष्ठरको राजधानी हस्तिनापुर । को चलाता हो । गजपिप्पली (सं० स्त्री० ) गजपूर्वा, गजप्रिया वा पिप्पली । fatuatfaशेष, एक तरहको पीपर। इसका पर्याय -करि- पिप्पली, इभकणा, कपिवली, कपिल्लिका, श्रेयसी, वसिर, गजाना, कोलवलो, इभोषणा, चव्यजा, छिद्रविद हो, दीर्घ ग्रन्थो, तजसी, वन्तल और स्थल बेदेही है । भावप्रकाश- यह मंझोले आकारका एक पौधा है। इसकी पत्तियां चौड़ी होती है। किनारे पर लहरिया नोकोला कटाव होता है। इसमें दो या तीन पत्तोंके बाद एक पतला सोका निकलता है। इसके सिरे पर प्रायः एक चकी मोटी मंजरी छोटे छोटे फुलके माथ निकलती है। यही मंजरी सुखाने पर घोषधक काममं बाजार में fail है। इसका गुण-कट, उष्ण, वातनाशक, स्तनकर्ण- efree तथा वेदना और मलनाशक है । के मतसे इसके फलका नाम गजपिप्पली है । इसका गुचकट, वात, कफनाशक, अग्निहडिकारो, पति- सार, खास, किण्ठरोग और कमिनाशक है। गजपोपर (हिं० स्त्री० ) पियल देखो।" पीपल ( हिं० स्त्री० ) गजपियो देखा। पुङ्गव (सं० पु० ) बड़ा और सुन्दर हाथी । गजपुट ( ० पु० ) गजाञ्जयः पुरः शाकपार्थिववत्समासः । गर्तविशेष, एक तरहका गडा । यह प्रोषध पाक और सोमारन प्रभृति कार्यके लिये उपयोगी है। कोई वैश्वक एक हाथ गहरा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ लम्बा गर्तको गजपुट कहते हैं। हस्तप्रमाथी गर्यो यः पुटः स तु माय ।" (या) भावप्रकाशके मतमे मवा हाथ लम्बा, मवा हाथ चौड़ा और सवा हाथ गहरा गत को गनपुट कहते हैं । ऐसा गत प्रस्तुत कर उसमें पांच मी बिनुए कई विका कर मध्यमें जिम घोषधको रखना होता है, उसे रख कर उपरसे फिर ५०० कण्ड देकर गत के मुख पर चारो तरफ से मिट्टो डाल देते हैं सिर्फ थोड़ी जगह मध्यमे । gee छोड़ दो जाती है और तब उसमें भाग लगा देते है, गजपुट इसी प्रणालीने पाक होता है। सब प्रकार- के पुट पुट है "समियो गमपुराण के परिवारितः । " ( भारत चमु० १५०० ) गजपुष्पी ( सं० स्त्री० ) गस्तमद इव गन्धयुत पुष्पमस्याः यह व्रो० ततो ङोप | नागपुष्पलता, नागदोन । "तसो गिरिसटे जातामाया सदुरामदाम् । ° लायो गजपुष्पों तो तम्य कष्ठं समवान् ॥" ( रामः ४१२२४५) गजप्रिया (मं० [स्त्री०) गजस्य प्रिया, ६-तत् । शसकी त सलईका पेड़ । गजब ( ० पु० ) क्रोध, कोप, विलक्षण, अपूर्व, अन्याय । गजबदन (सं० पु० ) गणेश । गजबन्ध (सं० पु० ) एक प्रकारका चित्रकाव्य । इसमें किसी कविता के पतरोंकी हाथीका धाकार बना कर उनके अङ्ग प्रत्यन्नको परिपूर्ण कर देते हैं । गजबन्धनी (सं० स्त्री०) गजा बध्यन्ते ऽत्र बन्ध-ल्य ुट् ङीप् च । हाथो बांधनेका स्थान, हाथोशाला । इसका पर्याय वारी, वारि और प्रारम्भ है। गजबन्धिनी (मं० [स्त्री०) गजस्य बन्धोऽस्ताव गजबन्ध- इनि- डीप । गजशाला, वह स्थान जहां हाथो रखा जाता हो । गजवला (सं० [स्त्री०) गोरली. एक प्रकारको बड़ी झाड़ी। गजबाग (हिं० पु० ) हाथीका अङ्क ुश । गजबीधी (सं० स्ती) रोहिणी, मृगशिरा धीर भाद्रक ममूहका नाम जिसके मध्य होकर शुक्र गमन करे । गजयेति (हिं स्त्री०) एक प्रकारका लोहा । गजभतक (सं० पु० ) गजो भक्तकोऽस्य बहुवो। पोपल पोपलका पे | गजभक्षा (सं० खो) भच्यतेऽसा भय विच कर्मणि प् ततः टाप् । मल्लको वृक्ष, सलईका पेड़ । (शब्दरत्नावली) गजभच्या (सं० स्त्री०) गजेन भक्ष्या, ३- तत् । शनको वृक्ष । ( अमर ) गजमणि (सं० पु० स्त्री० ) गजमुक्ता गजमोती। गजमण्डन (सं० क्ली० ) गजस्य मण्डनं ६ तत् । हस्ति- भूषण, हाथीका अलङ्कार । ° गजमण्डली (सं० सी० ) मजानाम् मण्डलो वेष्टनाकार- परिधि -सत् १ हाथोको वेष्टनाकार परिधि । २ ि समूह ।<noinclude></noinclude> evsp7ivil64wq8jfr16zrlga437zzic पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२८२ 250 83555 668731 668670 2026-07-27T04:54:03Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आवश्यक नहीं */ पृष्ठ का दोहराव। 668731 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude><noinclude></noinclude> aepnu4wruspn5dbg8c87ncz9rb1sejm पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 2.pdf/१ 250 84580 668727 488921 2026-07-26T13:20:09Z ममता साव9 2453 668727 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" /></noinclude>{{dhr}} {{c|{{x-larger|{{x-larger|'''प्रेमघन सर्वस्व'''}}}}<br> {{x-larger|'''[द्वितीय भाग]'''}}}} {{dhr}} {{c|गोलोकवासी}} {{c|{{x-larger|'''चौधरी पं॰ बदरीनारायण उपाध्याय'''}}<br> {{larger|'प्रेमघन', 'अन्न' का गद्य काव्य संग्रह}}}} {{dhr}} {{c|संपादक}} {{c|{{x-larger|'''श्री प्रभाकरेश्वर प्रसाद उपाध्याय<br>श्री दिनेश नारायण उपाध्याय'''<br>एम॰ ए॰, 'साहित्यरत्न'}}}} {{Dhr|4em}} {{Css image crop |Image = प्रेमघन_सर्वस्व_भाग_2.pdf |Page = 1 |bSize = 410 |cWidth = 132 |cHeight = 131 |oTop = 341 |oLeft = 120 |Location = center |Description = }} {{dhr|4em}} {{c|२००७}} {{c|{{larger|'''हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग}}}}<noinclude></noinclude> 0leodik43j2ehk1tyo53qm767glrmbn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४६८ 250 88357 668732 352660 2026-07-27T08:40:54Z सौरभ तिवारी 05 49 668732 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" /></noinclude>अनुपपत्ति - अनुपरिधि १ कथनाभाव, जो बात उपन्यास अथवा गल्प न ठहरे । २ प्रमाण अथवा प्रयोजनका पतन, सुबूत या इरादेका ज्वाल, जिस बातका कोई ठौर-ठीक न हो या जिसका मतलब न निकले । ३ अनस्थिरता, बेसबाती, ठीक-ठाक न गंठनेको हालत । ४ सन्देह, शक । अनुपपत्ति ( (सं० स्त्री० ) उप-पद-क्तिन् ; न उपपत्तिः, नञ-तत् । १ असङ्गति, अनुत्पत्ति, असिद्धि, ना- कमालियत, नाकामयाबी । २ अयुक्ति, असाम्यता, नामुताबिक, नामुवाफ़िक्त । अनुपपन्न (सं० त्रि० ) न उपपन्नम् । १ असिड, पूरे न पड़ा, जो हासिल न हुवा हो । २ अप्रमाणित, गैर- साबित, जिसका सुबूत न सुना हो । ३ असम्भव, 'नामुमकिन, जो लगा न हो । अनुपपादक (सं० पु० ) 'ध्यानोबुद्ध' कहते हैं । ४६ १. जुदायी, अनोखापन । २ दक्षिण-पूर्व अथवा उत्तर- पूर्वको हथिनी । अनुपमित (सं० त्रि०) उपमा न दिया गया, मिसाल न मिलाया हुवा, अद्वितीय, बेनज़र, लासानी, अनोखा, बेजोड़ । अनुपमेय (सं० त्रि. ) केनापि न उपमीयतेऽसौ, उप- मा-कर्मणि यत् ; नञ् - तत् । उपमा देनेके अयोग्य, जिसकी मिसाल न मिले । अनुपयुक्त (सं० त्रि० ) न उपयुक्त उचितं भुक्त वा । १ अयोग्य, अनुचित, नाकाबिल, गैरवाजिब, जो ठीक न पड़े। २ अकाम, बेकार, सेवा साधनेके अयोग्य, जो ख़िदमत गुज़ारने काबिल न हो । ३ अभुक्त, खाया न गया । अनुपयुक्तता (सं० स्त्री० ) अनुपयोग देखो । बौद्ध मूर्ति- विशेष, जिसे अनुपयोग (स० पु० ) न उपयोगः आनुकूल्यं' भोजनं वा । १ आनुकूल्यका अभाव, बेकारी, सेवा न साधने की स्थिति, जिस हालमें ख़िदमत न बजा सकें । २ भोजनका अभाव, खानेका न मिलना । (त्रि०) नास्ति उपयोगो यस्य । ३ भोजनशून्य, खानेसे ख़ाली । ४ आनुकूल्यशून्य, बेमुरव्वत, जो किसी कामका न निकले । अनुपप्लव (सं० त्रि० ) अनभिभवनीय, बाधारहित, . गहरी आफ तसे आज़ाद, जिसे खराब से भी खुराब होनेका डर न लगे । अनुपप्लुत (सं० त्रि०) अप्रतिहत, अबाधित, दबाया · न गया, जो डबा न हो । अनुपबाध ( सं ० वि० ) नास्ति उपबाधा प्रतिबन्धो : यत्र । बाधाशून्ध, प्रतिबन्धविहीन, बेरोक | अनुपभुक्त (स० त्रि०) अविलसित, मजा न मरा गया, • जिसका जायका न मिला हो । अनुपभुज्यमान (सं० त्रि०) विलसा न जाते हुवा, • जिसका लुफ्फ़ उठाया न जा रहा हो । अनुपम (सं० त्रि०) नास्ति उपमा यत्र । उपमा • विहीन, जिसकी उपमा न उठे, बेमिसाल, लासानी, जिसका मुकाबिल न निकले । २ अत्युत्कृष्ट, निहायत उम्दा, सबसे अच्छा । `अनुपममति (स ं० पु० ) शाक्यमुनिके सहयोगि विशेष, शाक्यमुनिके किसी साथीका नाम । अनुपमर्दन (सं० क्ली० ) अभियोगको निष्पत्ति, मुकद्दमेकी तरदीद | अनुपयोगिता (सं० स्त्री० ) अनुपयुक्तता, अयोग्यता, अर्थराहित्य, बेकारी, फजूली, नाकाबिलियत, नालायकी, बेमुरव्वती । अनुपयोगिन् (सं० त्रि ० ) उपयोगशून्य, औचित्यरहित, बेकार, नाकाम, नालायक, नाकाबिल, बेमसरफ, फज़ूल, बेफ़ायदा, जिससे कोई मतलब न निकले । अनुपयोगी, अनुपयोगिन् देखो । अनुपरत (सं० त्रि०) उप-रम्-क्त ; न उपरत निवृत्तः, नञ्-तत्। अनिवृत्त, लगा हुवा, मशगूल, जो रोका या ठहराया न गया हो । अनुपरति ( स ० स्त्री० ) उप-रम- क्तिन् ; न उपरतिः विषयरागः, अभावार्थे नञ - तत् । विषय रागका अभाव, दुनियादारीका न दौड़ना । अनुपरिधि (सं० अव्य० ) यज्ञीय अग्निके तीन अनुपमा, (स ं॰ स्त्री॰ ) १ उपमाविहीनता, जोड़को परिधिपर । 1161<noinclude></noinclude> evnfkayrifun8bbg32c0uqpdbepdn9o पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४९१ 250 90553 668733 355018 2026-07-27T08:41:39Z सौरभ तिवारी 05 49 668733 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अविनाश कुमार सिंह" /></noinclude>४८४ अनुमोदन – अनुयाजप्रसव अनुमोदन (सं० क्लो० ) अनु- मुद- ल्युट् । १ सम्मति- दान, तायोद, किसी बातको हामोंका भरना । २ प्रसन्नताप्रकाश, आह्लादोत्पादन, खुश करना । ३ करुणामय, आह्लाद, रहमसे भरी खुशी । अनुमोदित (सं० ० ) अनु-मुद्-भावे आदिकर्मणि चत । १ प्रीत, प्रसन्न, खुश, रजामन्द । स्वीकार करने योग्य, खुशगवार, मजूर फरमाने काबिल । ३ सम्मति दिया गया, जिसपर आह्लाद लगा हो, मजूर । अनुम्लोचा ( परीका नाम । २ ग्राह्य, (सं० स्त्री० ) अप्सरा-विशेष, किसी अनुयव (सं० अव्य०) अव्ययो० । यव सट्टश, यव- जैसा, यवके बराबर । ( पु० ) २ निःशुकयव, छोटा यव । अनुया (सं० त्र०) १ पश्चाद्गामो, पीछे पड़नेवाला, जो पौछा पकड़ रहा हो। (वै० स्त्री०) २ भोजन, खुराक । अनुयाग (सं० पु० ) पूर्व अथवा पश्चात् यज्ञ, जो यज्ञ पहले या पीछे लगाया जाये । अनुयाज (सं० पु० ) अनु प्रधानात् पश्चाद इज्यते ; अनु-यज-घञ्, निपातनात् न कुत्वम् । प्रयाजानुयाजी यज्ञाङ्ग । पा ७६२ । १ दशपौर्णमास यागवाले प्रधान अङ्गके पोछेका अङ्ग, यागका शेष अङ्ग । २ देवता-विशेष, देवोद्दार प्रभृति एकादश देवता । आजकल यह समझने में कितना ही कष्ट पड़ता - अनुयाज, प्रयाज और उपयाज शब्द क्या हैं । बहुकाल पूर्व यास्कने भी इन सकल शब्दपर बड़ा गड़बड़ लगाया था । उनके मतमें अनुयाज, प्रयाज शब्द अग्निदेवताका मतलब रखते हैं । यथा- "अथ किम् । देवताः प्रयाजानुयाजाः । श्राने या इत्येके । आग्नेया `वे प्रथाजा पाने या अनुयाजा इति च ब्राह्मणम् । छन्दोदेवता इत्यपरम् । छन्दांसि वै प्रयाजाञ्कन्दांस्यनुयात्रा इति च ब्राह्मणम् । ऋभुदैवता इव्यपरम् । "ऋभुवो वै प्रयाजा ऋभुवोऽनुयाजा इति च ब्राह्मणम् । पशुदेवता इत्थपरम् । पशवो वै प्रयाजाः पशवोऽनुयाजा इति च ब्राह्मणम् । प्राणदेवता इत्यपरम् । प्राणा वै प्रयाज्ञाः प्राणा वै अनुयाजा इति च ब्राह्मणम् । आत्मदेवता इत्य- परम् । आत्मा वै प्रयाजा आत्मा वै अनुयाजा इति च ब्राह्मणम् । आने वा इति तु स्तुतिः । भक्तिभावमितरत् । किमर्थ पुनरिति ? उच्यते यस्तु देवताबे होतं खात् तं मनसा ध्यायेद वषट् करिष्यन्निति ह विज्ञायते ।” (निख ५२१ ) ऐतरेय ब्राह्मणमें स्पष्ट हो लिखा, कि अनुयाज शब्दका अर्थ देवताविशेष होता, जिनकी संख्या ग्यारह रहती है । यथा- “वयस्त्रि ंशदुवै देवाः सोमपास्त्रयस्त्रि' शद सोमपाः । अष्टौ वसव एका- दश रुद्राः द्वादशादित्याः प्रजापतिश्च वषट कारचं ते देवाः सोमपाः । एकादश प्रयाजा एकादशानुग्राजा एकादशोपयाजा एते असोमपाः पशु- भाजनाः । सोमेन सोमपान् प्रीणाति पशुना । असोमपान् ।" ( ऐतरेय ब्राह्मण २/१८ ) ग्यारह प्रयाज देवता यह हैं, -१ देवोद्दार, २ उषा नक्ता, ३ देवोज्योष्ट्रि, ४ उर्ज और आहुति, ५ देवहोता, ६ तिस्रदेवीः (तीन देवी - इला, सरखती और भारती), ७ वहिस, ८ नराशंस, ८ वनस्पति, १० वहिर्वादितोनाम् (जलपूर्ण कुम्भमें निक्षिप्त कुश ) और ११ अग्निस्विष्टकृत् । यज्ञ लगानेसे पहले ऋत्विक् होम किया करता, यज्ञके शेषभाग में अनुयाज मन्त्र पढ़ना पड़ता था । प्रथम मन्त्र बहिर्देवताके उद्देश्य से ( यज्ञीय वेदी और कुशासन) पढ़ते रहे । यथा - 'देवं वहिर्वसुवने वसुधेयस्य वेत्। इसीतरह एक-एक मन्त्र पढ़ एकादश अनुयाजके नामसे होम करनेको विधि बंधी है । अवशेष में उपयाज अङ्ग होता है । होता वलि - स्थानका काष्ट उठा किसी धिष्णा में रख, उसके पीछे बैठ जाते रहा । धिष्ण्यकी एक ओर अग्नित्र, दूसरी और मार्जालि अग्नि जलता था । उसके बाद ऋत्विक् वलि चढ़नेवाले पशुको पूंछ पकड़ धिष्ण्यके अग्निमें होम देते। एकादश अनुयाजको पत्नी पूछके होमसे अतिशय सन्तुष्ट होते रहीं । अनुयाजादि यज्ञक विस्तारित विवरण हिरण्यके शिश्रौतसूत्र, ४।१६ १७ श्रश्वलायन श्रौतसूत्र 'और तैत्तिरीय ब्राह्मणमे' देखो। प्रयाज शब्द से यज्ञके प्रथम अङ्गका अर्थ निकलता, अनुयाज शब्द शेष अङ्ग और उपयाज परिशिष्ट अङ्गका बोधक है। इनके तैंतीस देवताके नाम प्रायः एक ही प्रकार रहते हैं । “प्रयाजान्म े अनुयाजांश्च केवलानुर्ज खन्त ं हविषी दत्तभागम् ।” (ऋक् १०।५११८). अनुयाजप्रसव (सं० पु० ) अनुयाज यज्ञ करनेकी আমা!<noinclude></noinclude> repbbqaodp09vi6wr7f9viiin0jfqxb पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 2.pdf/४१३ 250 97377 668726 492341 2026-07-26T13:04:28Z ममता साव9 2453 668726 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||भारतीय नागरी भाषा|३८१}}</noinclude>जब वह सामान्य जनों की भाषा न रही, वरञ्च प्रश्वान भाषा प्राकृत हुई, तो उस का नाम देववाणी, वैदिक भाषा और संस्कृत हुआ और यह भाषा ही कहलाती रही। जब इसके भी भेद हो चले और प्रान्तिक भाषायें नये नये रुप बदलकर नवीन नामों को धारण कर चली, तो वह आर्य प्राकृत या महाराष्ट्री, योही भिन्न भिन्न प्रान्तों के नामों में प्रान्तिक भाषायें पुकारी जाने लगी। किन्तु हमारे मध्य देश की प्रधान भाषा भाषा ही कहलाती रही, जिस के पश्चिमी छोर पर शौरसेनी, पूर्वी सीमा पर मागधी का अधिकार था, यही दक्षिण में बावन्ती दाक्षिणात्या और उत्तर में उदीची का प्रचार था। बीच के पूर्वी भाग की भाषा को अर्द्ध मागधी भी पुकारते थे, योही पश्चिमी को अर्द्ध शौरसेनी वा नागर। परन्तु ये सब विशेषण उन्हीं भाषायों के प्रचार के साथ हुए जैसे कि आज ब्रजभाषा, मिश्रित भाषा, हिन्दी, नागरी, खरी बोली, अथवा उसके अनेक भेद, जो बहुधा आज केवल विभेद बढ़ाने ही के लिये बढ़ाकर कहे जाते हैं। क्योंकि स्थानिक बोलियाँ भाषा नहीं कहलायेंगी। भाषा वही है कि जिस में उन सब स्थानों वा प्रान्तों के सभ्यजन अदल में मिलकर एक दूसरे से बात करते हों, वा जिसका कोई पृथक साहित्य हो। यों तो इस महादेश की बोलियों के सम्बंध में यह कहावत है कि—"दस बिगहा पर पानी बदलै, दस कोसै पर वानौ!" अस्तु, हमारी भाषा और सब प्रान्तिक भापात्रों से प्रधान<ref>डाक्टर राजेन्द्र लाल मित्र कहते है कि हिन्दी अत्यंत महत्व की भाषा है। यह हिन्दू जाति के सब से सुरक्षित लोगों की भाषा है।</ref> और प्राचीन<ref>सुप्रसिद्ध बीभ्स साहीब (Beams) कहते हैं कि—"आर्यों की सब से प्राचीन भाषा हिन्दी ही है और इस में तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधीक हैं।<br>सर विलियम जोन्स का मत हैं कि—उत्तर भारतवर्ष की भाषा की आदि भाषा है।<br>मि॰ पिनकाट लिखते हैं कि—उत्तर भारतवर्ष की भाषा सदा से हिन्दी थी और अब भी है।</ref> है, तथा एक लेखे यही सब की जननी है। क्योंकि सामान्यतः संस्कृत और विशेषतः प्रधान वा महाराष्ट्री प्राकृत से इसका अद्यावधि साक्षात् सम्बन्ध वर्तमान है। पीछे से पड़ा, इस का हिन्दी नाम भी यही राक्षी देता है, अर्थात् वह भाषा कि जो समस्त हिन्द वा हिन्दोस्तान की हो। अवश्य ही यह शब्द<noinclude>{{rule}} {{smallrefs}}</noinclude> czsp9l6ftp6fypwso7lwzy7ct6xeuqf 668728 668726 2026-07-26T13:23:43Z ममता साव9 2453 [[Special:Contributions/ममता साव9|ममता साव9]] ([[User talk:ममता साव9|वार्ता]]) द्वारा किए गए बदलाव [[Special:Diff/668726|668726]] को पूर्ववत किया 668728 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||भारतीय नागरी भाषा|३८१}}</noinclude>जब वह सामान्य जनों की भाषा न रही, वरञ्च प्रश्वान भाषा प्राकृत हुई, तो उस का नाम देववाणी, वैदिक भाषा और संस्कृत हुआ और यह भाषा ही कहलाती रही। जब इसके भी भेद हो चले और प्रान्तिक भाषायें नये नये रुप बदलकर नवीन नामों को धारण कर चली, तो वह आर्य प्राकृत या महाराष्ट्री, योही भिन्न भिन्न प्रान्तों के नामों में प्रान्तिक भाषायें पुकारी जाने लगी। किन्तु हमारे मध्य देश की प्रधान भाषा भाषा ही कहलाती रही, जिस के पश्चिमी छोर पर शौरसेनी, पूर्वी सीमा पर मागधी का अधिकार था, यही दक्षिण में बावन्ती दाक्षिणात्या और उत्तर में उदीची का प्रचार था। बीच के पूर्वी भाग की भाषा को अर्द्ध मागधी भी पुकारते थे, योही पश्चिमी को अर्द्ध शौरसेनी वा नागर। परन्तु ये सब विशेषण उन्हीं भाषायों के प्रचार के साथ हुए जैसे कि आज ब्रजभाषा, मिश्रित भाषा, हिन्दी, नागरी, खरी बोली, अथवा उसके अनेक भेद, जो बहुधा आज केवल विभेद बढ़ाने ही के लिये बढ़ाकर 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हिन्द वा हिन्दोस्तान की हो। अवश्य ही यह शब्द<noinclude>{{rule}} {{reflist}}</noinclude> cek8sfajs58vebz6okuwzy06lkve2nt 668729 668728 2026-07-26T13:26:10Z ममता साव9 2453 668729 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||भारतीय नागरी भाषा|३८१}}</noinclude>जब वह सामान्य जनों की भाषा न रही, वरञ्च प्रश्वान भाषा प्राकृत हुई, तो उस का नाम देववाणी, वैदिक भाषा और संस्कृत हुआ और यह भाषा ही कहलाती रही। जब इसके भी भेद हो चले और प्रान्तिक भाषायें नये नये रुप बदलकर नवीन नामों को धारण कर चली, तो वह आर्य प्राकृत या महाराष्ट्री, योही भिन्न भिन्न प्रान्तों के नामों में प्रान्तिक भाषायें पुकारी जाने लगी। किन्तु हमारे मध्य देश की प्रधान भाषा भाषा ही कहलाती रही, जिस के पश्चिमी छोर पर शौरसेनी, पूर्वी सीमा पर मागधी का अधिकार था, यही दक्षिण में बावन्ती दाक्षिणात्या और उत्तर में उदीची का प्रचार था। बीच के पूर्वी भाग की भाषा को अर्द्ध मागधी भी पुकारते थे, योही पश्चिमी को अर्द्ध शौरसेनी वा नागर। परन्तु ये सब विशेषण उन्हीं भाषायों के प्रचार के साथ हुए जैसे कि आज ब्रजभाषा, मिश्रित भाषा, हिन्दी, नागरी, खरी बोली, अथवा उसके अनेक भेद, जो बहुधा आज केवल विभेद बढ़ाने ही के लिये बढ़ाकर कहे जाते हैं। क्योंकि स्थानिक बोलियाँ भाषा नहीं कहलायेंगी। भाषा वही है कि जिस में उन सब स्थानों वा प्रान्तों के सभ्यजन अदल में मिलकर एक दूसरे से बात करते हों, वा जिसका कोई पृथक साहित्य हो। यों तो इस महादेश की बोलियों के सम्बंध में यह कहावत है कि—"दस बिगहा पर पानी बदलै, दस कोसै पर वानौ!" अस्तु, हमारी भाषा और सब प्रान्तिक भापात्रों से प्रधान<ref>डाक्टर राजेन्द्र लाल मित्र कहते है कि हिन्दी अत्यंत महत्व की भाषा है। यह हिन्दू जाति के सब से सुरक्षित लोगों की भाषा है।</ref> और प्राचीन<ref>सुप्रसिद्ध बीभ्स साहीब (Beams) कहते हैं कि—"आर्यों की सब से प्राचीन भाषा हिन्दी ही है और इस में तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधीक हैं।<br>सर विलियम जोन्स का मत हैं कि—उत्तर भारतवर्ष की भाषा की आदि भाषा है।<br>मि॰ पिनकाट लिखते हैं कि—उत्तर भारतवर्ष की भाषा सदा से हिन्दी थी और अब भी है।</ref> है, तथा एक लेखे यही सब की जननी है। क्योंकि सामान्यतः संस्कृत और विशेषतः प्रधान वा महाराष्ट्री प्राकृत से इसका अद्यावधि साक्षात् सम्बन्ध वर्तमान है। पीछे से पड़ा, इस का हिन्दी नाम भी यही राक्षी देता है, अर्थात् वह भाषा कि जो समस्त हिन्द वा हिन्दोस्तान की हो। अवश्य ही यह शब्द<noinclude>{{rule}} {{reflist}}</noinclude> n3fpxu8jyin00icciqjfnibr90hfru9 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/७ 250 101964 668734 666294 2026-07-27T09:25:17Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित नहीं */ 668734 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />​{{rh||कपिवकत्र-कपिस्थल|७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|कपिध्वज (सं० पु०) कपिर्वानरध्वजे यस्येति यद्वा, बहुव्री०। १ देवर्षि नारद। महाभारतमें नारदके वानरमुख होनेपर इस प्रकार लिखा,— किसी समय देवर्षि नारद और उनके भागिनेय पर्वत ऋषि इस लोकमें या मनुष्योंके साथ एकत्र रहनेकी विचार किया। फिर दोनों ऋषियोंने छद्मवेष धारणकर राजा द्रौपदीकी कन्या दमयन्तीके पास पहुँचे थे। (स्वयं) इच्छा वर्तमान नाम रूपसे है। यह मेदिनीपुरके दक्षिणभागमें प्रवाहित होकर सागरमें जा गिरी है। ४ पिशाचोंकी माता। यह यक्षोंकी एक पुरी रही।}} {{outdent|कपिध्वज (सं० पु०) पाश्चात्यकच्छ, धान्यका पेड़।}} {{outdent|कपिञ्जिका, कपिञ्ज देखौ।}} {{outdent|कपिञ्जल (सं० पु०) कपीनां कपिशेण वत वक्षी, मयूरमध्यपदलो। गजपिप्पली, गजयीपर। २ कपिञ्जल, कैथीका पेड़।}} {{outdent|कपितास (सं० पु०) पारिजातवृक्ष, किसी वृक्षके रोपणका पेड़।}} {{outdent|कपिलोचन (सं० क्ली०) मरिच, मिर्च।}} {{outdent|कपिरोचि, कपिरोचन देखो।}} {{outdent|कपिलोग (सं० स्त्री०) वृक्षविशेष्योल, देवांचा वृक्ष।}} {{outdent|कपिवृक्ष (सं० पु०) पारिजातवृक्ष, किसी वृक्षका रोपन।}} {{outdent|कपिश (सं० पु०) कपिः वर्णविशेष्यः; कपिस नाम वा भट्स्या, कपि-श। <Small>सेणपिपल्यादिप्राणिगः मनेवषः। वा श्यस्तम।</small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{smaller|५|२|१००|१}} श्यामावर्ष, मटमैला रंग। यह कृष्ण एवं पीत उभय वर्ण मिलनेसे बनता है। २ शिवइस नाम मनेद्रय, नोमान। ३ द्वापरसमय, चतुरी अदश। "कस्स न गकाद पविसं नियमत:।" (नाम) {{outdent|कपिश (वि०) ६ सच्छिमवर्णयुक्त, मटमैला।}} {{outdent|कपिशा (सं० स्त्री०) जचिम-टापू। १ सुरा, मराव। २ सायमीलता, चमेली। ३ नदीविशेष, एक दरबा। रघुराजा इसी नदीको पारकर उत्कच्च पहुँचे थे। (स्वयं) इच्छा वर्तमान नाम रूपसे है। यह मेदिनीपुरके दक्षिणभागमें प्रवाहित होकर वंगोप- सागरमें जा गिरी है। ४ पिशाचोंकी माता। यह यक्षोंकी एक पुरी रही।}} {{outdent|कपिश्रासन (सं० पु०) कपीनां ध्वजार्थे कपिप्रयुक्तं वा धर्मार्थं वस्त्र, बहुव्री०। मित्र।}} {{outdent|कपिशाचुल (सं० पु०) कपिशाचा: मद्योन्मत्ताप: पिशाच्चा: पुरुष: ६-तत्। पिशाच, शैतान।}} {{outdent|कपिलायन (सं० पु०) १ देवता। २ मद्यविशेष, किसी विल्वाको मराव। यह कपिश दैत्यमें चक्षुरसे बनायी जाती है।}} {{outdent|कपिलिका, कपिलिका देखौ।}} {{outdent|कपिलोवा (सं० स्त्री०) कपिय कार्ये वायुधकालू कंकुच् टाप् च। मद्यविशेष, किसी विल्वाकी मराव।}} {{outdent|कपिशीर्ष (सं० क्ली०) कपीनां प्रियं शीर्ष प्राका- रादीनां चयप्रदेश, मयूरपदवी। प्राकोरादिका अग्रभाग, दौवारका सिरा।}} {{outdent|कपिशीर्षक (सं० क्ली०) कपीनां मौर्य वर्षवत् कायति प्रकाशते, कपिशीर्ष-क-क। १ दिलुच, मित्ररण, ईसुर। २ प्राचीरादिका अग्रभाग, दौवारका सिरा।}} {{outdent|कपिशोर्षानी (सं० स्त्री०) वादिलविशेष, किसी विल्वाका बाला।}} {{outdent|कपिसल (सं० पु०) पक्षिविशेष, वाविप्रय देखौ।}} {{outdent|कपिस्कन्ध (सं० पु०) कपीनां स्कन्ध इव स्कन्धो यस्य, मयूरमध्यपदलो। दानवविशेष। (हरिवंश)}} {{outdent|कपिहस्त (सं० स्त्री०) कपीनां हस्तं पाखासम्, ६-तत्।}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 7u0pg5gjoiorhnm9ocl8a3vlnkrm12z