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विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१०
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( ११ ) आवश्यक है। सचारी भाव को व्यभिचारी भाव भी कहते है । व्यभिचारी भाव के ३३ भेद है । यथा — निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, श्रम, मद, ' वृति, आलस्य, विषाद, मति, चिंता, मोह, स्वप्न,..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/११
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १२ ) उन्मदमदनमनोरथ पथिकवधूजनजनितविलापे । अलिकुलसंकुलकुसुमसमूहनिराकुलवकुलकलापे ॥ * * पतति पतत्रे विचलित पत्रे * शङ्कित भवदुपयानम् । रचयति शयन सचकित नयन पश्यति तव प..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१२
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १३ ) रस के सहायक छद भी है । मंदाक्रान्ता, द्रुतविलम्बित, शिखरिणी ' और मालिनी छद मे शृङ्गार, शात और करुण रस अधिक मनोहर हो जाते हैं । भुजङ्गप्रयात, वंशस्थ और शार्दूलविक्र..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१३
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १४ ) का उपभोग करता है, और जब उन्मत्त होजाता है, तब उसके प्रलाप रूप मे उसकी उन्मत्तता का कुल प्रसाद सहृदय जनो को मिल जाता है ॥ वह प्रलाप ही काव्य है । तत्ववेत्ता और कवि मे..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१४
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १५ ) चमत्कार होता है । उसकी दृष्टि साधारण लोगो की दृष्टि से भिन्न होती है । उसका कथन निराले ढग का होता है । ससार की तुच्छ से तुच्छ बातो मे भी वह सौन्दर्य ढूंढ निकालता है..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१५
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १६ ) कवि है; पर जो मनुष्य के मन के सौन्दर्य का भी वर्णन करता है वह / महाकवि है । भीतरी सौन्दर्य के वर्णन करने में हो कवि की कवित्व- शक्ति का पता चल सकता है। देखिये तुलसीदास..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१६
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १७ ) चूमि हाथ नाथ के लगाइ रही श्रखिन सों कही, प्रानपति ! यह अति श्रनुचित है ॥ "यह अति अनुचित है” बताकर कवि ने जो स्त्री के हृदय की छटा 'दिखलाई है, वह चित्रकार नही दिखला सकत..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१७
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( १८ ) कवि कैसी ही हीन दशा मे क्यो न हो, वह स्वभाव में राजा और उदारता मे हरिश्चन्द्र से कम नही होता। किसी राजा को एक वटा देश विजय करने में उतना आनन्द नहीं होता, जितना कवि को..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१८
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "(?ε). ⋅ एक जनसमूह की सरस्वती उनके द्वारा प्रकट हुई। उन्होने उस जनसमूह के हृदय की बात कही । वह जनसमूह तुलसीदास के कथन को अपनी सम्पत्ति समझता है । इसीसे वह कथन अजर और अमर हो..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१९
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Chahar 009
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/* अशोधित */ "( २० ) शुचिर्दक्ष शान्त सुजनविनत सूनृततर. कलावेदी विद्वानतिमृदुपद काव्यचतुर रसज्ञो दैवज्ञः सरस हृदय सत्कुलभव शुभाकारश्छन्दोगुणगणविवेको स च कवि इतने गुण जिस पुरुष..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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