विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.12 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 668735 667537 2026-07-27T14:34:20Z सौरभ तिवारी 05 49 /* परिणाम */ 668735 wikitext text/x-wiki 3byzfpy0dxgx1hjw7ozho3pxyhmod4n 668736 668735 2026-07-27T14:39:30Z सौरभ तिवारी 05 49 /* प्रतिभागी */ एक भी पृष्ठ शोधित नहीं करने वाले प्रतिभागी। 668736 wikitext text/x-wiki jq2c3sacvtluy0e0s2y9z4kzbe4iij6 पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१० 250 196396 668737 2026-07-28T10:49:58Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( ११ ) आवश्यक है। सचारी भाव को व्यभिचारी भाव भी कहते है । व्यभिचारी भाव के ३३ भेद है । यथा — निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, श्रम, मद, ' वृति, आलस्य, विषाद, मति, चिंता, मोह, स्वप्न,..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668737 proofread-page text/x-wiki 3etrf4mzr38j37llo7imvi1w96mw71m पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/११ 250 196397 668738 2026-07-28T10:50:19Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १२ ) उन्मदमदनमनोरथ पथिकवधूजनजनितविलापे । अलिकुलसंकुलकुसुमसमूहनिराकुलवकुलकलापे ॥ * * पतति पतत्रे विचलित पत्रे * शङ्कित भवदुपयानम् । रचयति शयन सचकित नयन पश्यति तव प..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668738 proofread-page text/x-wiki lizxzv4k0zvmbevad7hwnzlfw5e36ye पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१२ 250 196398 668739 2026-07-28T10:50:57Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १३ ) रस के सहायक छद भी है । मंदाक्रान्ता, द्रुतविलम्बित, शिखरिणी ' और मालिनी छद मे शृङ्गार, शात और करुण रस अधिक मनोहर हो जाते हैं । भुजङ्गप्रयात, वंशस्थ और शार्दूलविक्र..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668739 proofread-page text/x-wiki 976sa96nqqv97ag0ozpdrpjm9ngidkb पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१३ 250 196399 668740 2026-07-28T10:51:09Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १४ ) का उपभोग करता है, और जब उन्मत्त होजाता है, तब उसके प्रलाप रूप मे उसकी उन्मत्तता का कुल प्रसाद सहृदय जनो को मिल जाता है ॥ वह प्रलाप ही काव्य है । तत्ववेत्ता और कवि मे..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668740 proofread-page text/x-wiki q4j6ol1jre4nq9nw0h1o1ev6hsugca0 पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१४ 250 196400 668741 2026-07-28T10:51:23Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १५ ) चमत्कार होता है । उसकी दृष्टि साधारण लोगो की दृष्टि से भिन्न होती है । उसका कथन निराले ढग का होता है । ससार की तुच्छ से तुच्छ बातो मे भी वह सौन्दर्य ढूंढ निकालता है..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668741 proofread-page text/x-wiki hxjhg0zyropt67xcu0bbsm2bum0et6t पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१५ 250 196401 668742 2026-07-28T10:51:38Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १६ ) कवि है; पर जो मनुष्य के मन के सौन्दर्य का भी वर्णन करता है वह / महाकवि है । भीतरी सौन्दर्य के वर्णन करने में हो कवि की कवित्व- शक्ति का पता चल सकता है। देखिये तुलसीदास..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668742 proofread-page text/x-wiki do7ceuj1cknbp9jfjxw0h5d2x4txfdm पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१६ 250 196402 668743 2026-07-28T10:51:52Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १७ ) चूमि हाथ नाथ के लगाइ रही श्रखिन सों कही, प्रानपति ! यह अति श्रनुचित है ॥ "यह अति अनुचित है” बताकर कवि ने जो स्त्री के हृदय की छटा 'दिखलाई है, वह चित्रकार नही दिखला सकत..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668743 proofread-page text/x-wiki eu82qb01km8le56y3qtu6d9svj2xg96 पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१७ 250 196403 668744 2026-07-28T10:52:03Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( १८ ) कवि कैसी ही हीन दशा मे क्यो न हो, वह स्वभाव में राजा और उदारता मे हरिश्चन्द्र से कम नही होता। किसी राजा को एक वटा देश विजय करने में उतना आनन्द नहीं होता, जितना कवि को..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668744 proofread-page text/x-wiki emgx0z168p98ssxe6s6816envk7gtnu पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१८ 250 196404 668745 2026-07-28T10:52:49Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "(?ε). ⋅ एक जनसमूह की सरस्वती उनके द्वारा प्रकट हुई। उन्होने उस जनसमूह के हृदय की बात कही । वह जनसमूह तुलसीदास के कथन को अपनी सम्पत्ति समझता है । इसीसे वह कथन अजर और अमर हो..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668745 proofread-page text/x-wiki 1t43dh14sgyzgj0d3h6cnh0u5ht5xd2 पृष्ठ:कविता कौमुदी.pdf/१९ 250 196405 668746 2026-07-28T10:53:01Z Chahar 009 6627 /* अशोधित */ "( २० ) शुचिर्दक्ष शान्त सुजनविनत सूनृततर. कलावेदी विद्वानतिमृदुपद काव्यचतुर रसज्ञो दैवज्ञः सरस हृदय सत्कुलभव शुभाकारश्छन्दोगुणगणविवेको स च कवि इतने गुण जिस पुरुष..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 668746 proofread-page text/x-wiki hyw1aurny7k6hkd4x4j1sa308sr04kc