विकिस्रोत
hiwikisource
https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.14
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिस्रोत
विकिस्रोत वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
लेखक
लेखक वार्ता
अनुवाद
अनुवाद वार्ता
पृष्ठ
पृष्ठ वार्ता
विषयसूची
विषयसूची वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
पृष्ठ:बुद्ध-चरित.djvu/२२२
250
81926
668774
441489
2026-08-05T10:57:27Z
Rajkumar7275
6768
668774
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="नीलम" />{{rh||(१६२)}}</noinclude>{{Block center|<poem>या घोर दुख को अंत यों सुख भए बिनु रहि जायहै
ह्वै सकत ऐसो नाहिँ;' आगम परत कछुक जनाय है।
छायो उछाह अपार यदपि न कोउ जानत का भयो।
सुनसान बंजर बीच हू संगीत को सुर भरि गयो।
आगम तथागत को निरखि निज मुक्ति-आस बँधाय कै
मिलि भूत, प्रेत, पिशाच गावत पवन में हरखाय कै।
'जगकाज पूरा ह्वै गयो' नभ देववाणी यह भई;
अति चकित पुरजन बीच पंडित खड़े बीथिन मे कई
लखि स्वर्णज्योति-प्रवाह सो जो गगन बोरत जात है,
योँ कहत "भाई! भइ अलौकिक अवसि कोऊ बात है।"
बन, ग्राम के सब जीव बैर बिहाय बिहरत लखि परे।
जहँ दूध बाघिन प्यावती तहँ चित्रमृग सोहत खरे।
वृक मेष मेल मिलाप सों हैं चलत एकहि बाट पै।
गो सिंह पानी पियत हैँ मिलि जाय एकहि घाट पै।
भितराय गरल भुजंग मणिधर फन रहे लहराय हैं;
बसि पास चोँचन सोँ गरुड़ निज पंख रहे खुजाय हैं।
कढ़ि सामने सोँ जात बाजन के लवा, कछु भय नहीँ।
बैठे मगन बक ध्यान में, बहु मीन खेलत हैं वहीँ।</poem>}}<noinclude></noinclude>
3gb90x9dvg140kb122kpovjtfhiwf7d
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/३४५
250
191262
668775
657598
2026-08-05T11:02:49Z
Rajkumar7275
6768
668775
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७०. पत्र : रामेश्वरदास बिड़ला को'''}}}}
{{right|वर्धा<br>माघ कृष्ण १३ [२१ फरवरी, १९२५]<ref>साधन-सूत्र में यहां ३-२-१९२५ है, मगर १९२५ में माघ कृष्ण १३, २१ फरवरी को थीं।</ref>}}
{{left|भाई रामेश्वरदासजी,}}
भाई जगजीवनदास मेहता मुझे कहते हैं कि यदि मैं उनका अंत्यजों के लिये मंदिर बनाने का साहस को पसंद करूं तो आप उनको धन देने के लिये तैयार हैं। भाई जगजीवनदास को मैं जानता हूं। वे सज्जन और परोपकारी कामों में हिस्सा लेते हैं। अंत्यज मंदीर की उनकी योजना मैंने देख ली है। दूसरे अंत्यज सेवकों से अभिप्राय लेने का भी मैंने उनको कहा था वह भी उन्होंने लिया है। जिस प्रकार का मंदिर बनाना चाहते हैं उसमें रु॰ २५०० का खर्च बताते हैं। मैं भी मानता हुं कि ऐसा मकान और बाद में कितना खर्च होगा यदि आप इतना दान देना चाहें तो यह कार्य अच्छा है।
{{right| आपका
''''''मोहनदास करमचंद गाँधी'''''' ''''''बोल्ड टेक्स्ट''''''बोल्ड टेक्स्ट''''''
'''बापुकी प्रेम प्रसादी''', पृ॰ २०–२१
{{c|{{larger|'''३७१. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को'''}}}}
{{right|सोमवार, माघ वदी [२३ फरवरी, १९२५]<ref>
मथुरादास को यह पत्र २३ फरवरी, १९२५ को मिला था। सम्भवतः यह पत्र २३ फरवरी, १९२५ को मौलाना शौकत अली को लिखे पत्र के साथ–साथ ही दिया गया था: देखिए "पत्र: शौकत अली को", २३-२-१९२५।</ref>}}
{{left|चि॰ मथुरादास,}}
इसके साथ का पत्र पढ़कर हाथोंहाथ मौलाना को स्वयं ही दे देना। इसका उत्तर वे स्वयं भेज देंगे। दिल्ली के लिए मैं २६ की रात को या २७ की सुबह रवाना होऊंगा।
मां की तबीयत बिलकुल ठीक हो गई होगी। कल से यहां शादियां शुरू हो रही हैं—तीन हैं।<ref>विवरण के लिए देखिए "पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को", २६-२-१९२५।</ref>
{{right|'''बापू के आशीर्वाद'''}}
मूल गुजराती से : प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू–स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य : बेलादेवी नैयर और डॉ॰ सुशीला नैयर<noinclude>{{smallrefs}}
{{rh||३०५|}}</noinclude>
e0z7b30lpmxyjikr3x8jzprqgo0137k