विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.14 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३५९ 250 49534 668794 668777 2026-08-09T18:25:57Z नीलम 26 668794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh|<u>विनय-पत्रिका</u>||३६४}}</noinclude>{{c|[२२८]}} प्रिय रामनामतें जाहि न गमो । ताको भलो कठिन कलिकालहुँ आदि मध्य- परिनामो ॥ १ ॥ सकुचत समुझि नाम महिमा मद लोभ मोह-कोह-कामो । राम-नाम-जप-निरत सुजन पर करत छाँह घोर घामो ॥ २ ॥ नाम-प्रभाउ सही जो कहे कोउ सिला सरोरुह जामो । सुन-सुमिरि भाग -भाजन भइ सुकृत सील भील-भामो ॥ ३ ॥ बालमीकि - अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो । उलटे पलटे नाम महातम गुंजनि जितो ललामो ॥ ४ ॥ राम तें अधिक नाम करतव, जेहि किये नगर-गत गामो । भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदास से वामो ॥ ५ ॥ भावार्थ - जिसे श्रीरामजी भी राम-नामकी अपेक्षा अधिक प्यारे नहीं हैं (यदि कोई कहे कि तुम्हें राम मिल जायँगे, पर राम-नाम छोड़ना होगा, तो वह इस बात को भी स्वीकार नहीं करता । वह कहता है कि यदि श्रीरामके मिलनेसे राम-नाम छोड़ना पड़े तो मुझे' श्रीरामके मिलने की आवश्यकता नहीं है। मुझे तो उनका नाम ही सदा चाहिये । ऐसे नाम-प्रेमी से राम कितना प्रेम करते हैं, सो तो केवल राम ही जानते हैं; गोसाईंजी कहते हैं कि जो इस प्रकार राम-नामका मतवाला है ) उसका इस कराल कलिकालमें, आदि, मध्य और अन्त, तीनों ही कालोंमें कल्याण होगा ॥ १ ॥ नामकी महिमा समझकर अभिमान, लोभ, अज्ञान, क्रोध और काम सकुचा, जाते हैं, सामने नहीं आते। जो सज्जन सदा राम-नामका जप करते. रहते हैं, उनपर कडी धूप भी छाया कर देती है ( महान् से महान<noinclude></noinclude> 6h0h1ztolq3ghn1ot8yfh4cskcor54v 668795 668794 2026-08-09T18:33:25Z नीलम 26 668795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh|<u>विनय-पत्रिका</u>||३६४}}</noinclude>{{c|[२२८]}} प्रिय रामनामतें जाहि न गमो। ताको भलो कठिन कलिकालहुँ आदि मध्य-परिनामो ॥ १ ॥ सकुचत समुझि नाम महिमा मद-लोभ मोह-कोह-कामो । राम-नाम-जप-निरत सुजन पर करत छाँह घोर घामो ॥ २ ॥ नाम-प्रभाउ सही जो कहै कोउ सिला सरोरुह जामो । जो सुनि-सुमिरि भाग-भाजन भइ सुकृत सील भील-भामो ॥ ३ ॥ बालमीकि-अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो । उलटे पलटे नाम महातम गुंजनि जितो ललामो ॥ ४ ॥ राम तें अधिक नाम करतव, जेहि किये नगर-गत गामो । भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदाससे वामो ॥ ५ ॥ ''भावार्थ''—जिसे श्रीरामजी भी राम-नामकी अपेक्षा अधिक प्यारे नहीं हैं (यदि कोई कहे कि तुम्हें राम मिल जायँगे, पर राम-नाम छोड़ना होगा, तो वह इस बात को भी स्वीकार नहीं करता । वह कहता है कि यदि श्रीरामके मिलनेसे राम-नाम छोड़ना पड़े तो मुझे' श्रीरामके मिलने की आवश्यकता नहीं है। मुझे तो उनका नाम ही सदा चाहिये । ऐसे नाम-प्रेमी से राम कितना प्रेम करते हैं, सो तो केवल राम ही जानते हैं; गोसाईंजी कहते हैं कि जो इस प्रकार राम-नामका मतवाला है ) उसका इस कराल कलिकालमें, आदि, मध्य और अन्त, तीनों ही कालोंमें कल्याण होगा ॥ १ ॥ नामकी महिमा समझकर अभिमान, लोभ, अज्ञान, क्रोध और काम सकुचा, जाते हैं, सामने नहीं आते। जो सज्जन सदा राम-नामका जप करते. रहते हैं, उनपर कडी धूप भी छाया कर देती है ( महान् से महान<noinclude></noinclude> glrfy3g43qnq8iw0k74c0m3prmzcq8e