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पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२
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अजीत कुमार तिवारी
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{{c|श्रीसीतारामाभ्यां नमः<br>{{x-larger|'''विनय-पत्रिका'''}}<br>{{larger|'''श्रीगणेश स्तुति'''}}<br>राग बिलावल<br>[१]}}
{{block center|<poem>गाइये गनपति जगवंदन। संकर सुवन भवानी-नंदन॥१॥
सिद्धि-सदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक॥
मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्यावारिधि, बुद्धि-विधाता॥३॥
माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥४॥</poem>}}
''भावार्थ—''सम्पूर्ण जगत्के वन्दनीय, गणोंके स्वामी श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये, जो शिव-पार्वती के पुत्र और उनको प्रसन्न करनेवाले हैं॥१॥ जो सिद्धियोंके स्थान हैं, जिनका हाथीका सा मुख है, जो समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी विघ्नोंको हटानेवाले हैं, कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर है, सब प्रकारसे योग्य हैं॥२॥ जिन्हें लड्डू बहुत प्रिय है, जो आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं, विद्या के अथाह सागर हैं, बुद्धिके विधाता हैं॥३॥ ऐसे श्रीगणेशजी से यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मनमन्दिरमें श्रीसीतारामजी सदा निवास करें॥४॥<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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सिद्धि-सदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक॥
मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्या-वारिधि, बुद्धि-विधाता॥३॥
माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥४॥</poem>}}
''भावार्थ—''सम्पूर्ण जगत्के वन्दनीय, गणोंके स्वामी श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये, जो शिव-पार्वती के पुत्र और उनको प्रसन्न करनेवाले हैं॥१॥ जो सिद्धियोंके स्थान हैं, जिनका हाथीका सा मुख है, जो समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी विघ्नोंको हटानेवाले हैं, कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर है, सब प्रकारसे योग्य हैं॥२॥ जिन्हें लड्डू बहुत प्रिय है, जो आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं, विद्याके अथाह सागर हैं, बुद्धिके विधाता हैं॥३॥ ऐसे श्रीगणेशजी से यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मनमन्दिरमें श्रीसीतारामजी सदा निवास करें॥४॥<noinclude></noinclude>
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विकिस्रोत:विषय/संस्कृत
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सौरभ तिवारी 05
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यह संस्कृत साहित्य से संबंधित पुस्तकों की सूची है।
== पूर्ण पुस्तकें ==
# [[रघुवंश]]
# [[पंचतन्त्र]] - [[लेखक:विष्णुशर्मा|विष्णुशर्मा]], विकिस्रोत पर उपलब्ध संस्करण १९५२ ई.
== सुधारी जा रही पुस्तकों की सूची ==
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