विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.15 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२ 250 47103 668800 551346 2026-08-13T03:26:21Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित */ 668800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>&nbsp; {{c|श्रीसीतारामाभ्यां नमः<br>{{x-larger|'''विनय-पत्रिका'''}}<br>{{larger|'''श्रीगणेश स्तुति'''}}<br>राग बिलावल<br>[१]}} {{block center|<poem>गाइये गनपति जगवंदन। संकर सुवन भवानी-नंदन॥१॥ सिद्धि-सदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक॥ मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्यावारिधि, बुद्धि-विधाता॥३॥ माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥४॥</poem>}} ''भावार्थ—''सम्पूर्ण जगत्‌के वन्दनीय, गणोंके स्वामी श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये, जो शिव-पार्वती के पुत्र और उनको प्रसन्न करनेवाले हैं॥१॥ जो सिद्धियोंके स्थान हैं, जिनका हाथीका सा मुख है, जो समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी विघ्नोंको हटानेवाले हैं, कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर है, सब प्रकारसे योग्य हैं॥२॥ जिन्हें लड्‌डू बहुत प्रिय है, जो आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं, विद्या के अथाह सागर हैं, बुद्धिके विधाता हैं॥३॥ ऐसे श्रीगणेशजी से यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मनमन्दिरमें श्रीसीतारामजी सदा निवास करें॥४॥<noinclude></noinclude> 05qk7fmkfdxbxeazm3xer8d35dzwu3n 668801 668800 2026-08-13T04:54:31Z ममता साव9 2453 /* प्रमाणित */ 668801 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="ममता साव9" /></noinclude>&nbsp; {{c|श्रीसीतारामाभ्यां नमः<br>{{x-larger|'''विनय-पत्रिका'''}}<br>{{larger|'''श्रीगणेश स्तुति'''}}<br>राग बिलावल<br>[१]}} {{block center|<poem>गाइये गनपति जगवंदन। संकर सुवन भवानी-नंदन॥१॥ सिद्धि-सदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक॥ मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्या-वारिधि, बुद्धि-विधाता॥३॥ माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥४॥</poem>}} ''भावार्थ—''सम्पूर्ण जगत्‌के वन्दनीय, गणोंके स्वामी श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये, जो शिव-पार्वती के पुत्र और उनको प्रसन्न करनेवाले हैं॥१॥ जो सिद्धियोंके स्थान हैं, जिनका हाथीका सा मुख है, जो समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी विघ्नोंको हटानेवाले हैं, कृपाके समुद्र हैं, सुन्दर है, सब प्रकारसे योग्य हैं॥२॥ जिन्हें लड्‌डू बहुत प्रिय है, जो आनन्द और कल्याणको देनेवाले हैं, विद्याके अथाह सागर हैं, बुद्धिके विधाता हैं॥३॥ ऐसे श्रीगणेशजी से यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है कि मेरे मनमन्दिरमें श्रीसीतारामजी सदा निवास करें॥४॥<noinclude></noinclude> rx3vog090t2ttwuibp1gk6f32kf7s9u विकिस्रोत:विषय/संस्कृत 4 157541 668799 668798 2026-08-12T13:11:35Z सौरभ तिवारी 05 49 [[Special:Contributions/गीताव्रत|गीताव्रत]] ([[User talk:गीताव्रत|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 618863 wikitext text/x-wiki यह संस्कृत साहित्य से संबंधित पुस्तकों की सूची है। == पूर्ण पुस्तकें == # [[रघुवंश]] # [[पंचतन्त्र]] - [[लेखक:विष्णुशर्मा|विष्णुशर्मा]], विकिस्रोत पर उपलब्ध संस्करण १९५२ ई. == सुधारी जा रही पुस्तकों की सूची == {{Special:IndexPages|key=संस्कृत}} [[श्रेणी:संस्कृत]] [[श्रेणी:विषय]] 2y486a6lbz2yi817adbawlqxro93nwt