विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.16 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण.pdf/३ 250 135774 671857 671287 2026-08-19T17:31:19Z सौरभ तिवारी 05 49 /* प्रमाणित */ 671857 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>&nbsp; {{dhr|12em}} {{rule|32em}}{{rule|32em}} {{c|मुद्रक—गणपति कृष्ण गुर्जर श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस, बनारस सिटी। १०४१-२४}} {{rule|32em}}{{rule|32em}} {{dhr|12em}}<noinclude></noinclude> bn06795a7qaz9v3ga3o3bycegvhbnkv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४९ 250 159568 671933 508758 2026-08-20T06:11:02Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : पारसियोंकी सभामें|३१९}}</noinclude>कर लिया है। मैं आपकी झूठी प्रशंसा करने नहीं जा रहा हूँ। मेरा ऐसा करनेका इरादा नहीं है। मैं वही कह रहा हूँ जो मैं सचमुच महसूस करता हूँ। संसारमें अनेक ऐसी जातियाँ हैं जो संख्यामें पारसियोंके समान ही कम हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें उनके देशसे बाहर भी सारी दुनिया जानती हो। संसारमें ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँके लोग पारसी समाजसे परिचित नहीं हैं, हालाँकि उनकी संख्या सिर्फ ८०,००० है। अगर बम्बई सुन्दर है, अगर बम्बई अपनी उदारताके लिए प्रसिद्ध है, अगर बम्बई अपनी लोक-भावनाके लिए प्रसिद्ध है तो यह सब आप लोगोंके कारण ही है। अगर पारसी न होते तो बम्बई भी भारतके किसी अन्य नगरके समान ही होता। इसके लिए सारा भारत आप लोगोंका आभारी है। अगर राजनीतिक क्षेत्रमें किसीने भारतीयोंको नेतृत्व दिया है तो पारसियोंने ही दिया है। और मैं अपने हिन्दू और मुसलमान मित्रोंसे कहूँगा कि वे पारसियोंपर किसी तरहका दोषारोपण न करें। अगर सभी समुदायोंके लोग परस्पर एक हो जायें तो आप इसी क्षण स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। कमसे-कम मुझे तो इस बातपर बड़ा गर्व है कि पारसी किसी और देशमें न जाकर इसी देशमें आये और मुझे इस बातकी भी बड़ी खुशी है कि उन्हें गुजरातने आश्रय दिया, जिसकी उन्होंने बहुमूल्य सेवा की। दक्षिण आफ्रिकामें जब गोरोंने आधी रातको मेरे मकानको घेर लिया था और वे मुझे मार डालना चाहते थे, उस समय जिन सज्जनने अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर अपना तथा अपने परिवारका सब-कुछ खतरेमें डालकर मेरी रक्षा की थी और मेरा साथ दिया था, वे पारसी रुस्तमजी ही थे। जबतक मैं जीवित रहूँगा तबतक पारसी रुस्तमजीने मेरे लिए जो-कुछ किया है, उसे कभी नहीं भूल पाऊँगा। पारसी लोग पवित्रता, सत्य और ईमानदारीसे भरपूर हैं और मुझे एक जातिके रूपमें आपपर अभिमान है। अगर आप लोगोंने ३०,००० रुपये इकट्ठे न किये होते और मुझे सिर्फ पाँच रुपये ही दिये होते तो भी मैं आप लोगोंसे सन्तुष्ट रहता। श्री गोदरेज मुझे पहले ही तीन लाख रुपये दे चुके हैं और उन्होंने समस्त भारतको दिखा दिया है कि पारसी लोग क्या-कुछ कर सकते हैं। पारसियोंने मुक्त-हस्त होकर न जाने मुझे कितना-कुछ दिया है और यह झूठ है कि भारत आकर आपने इस देशकी कोई सेवा नहीं की है। मेरे विचारसे तो आपने इस देशके प्रति अपना ऋण पूरा-पूरा चुका दिया है। स्वभावसे आप लोगोंकी जाति एक व्यावसायिक जाति है और यह दुःखकी बात है कि अभी थोड़े समयसे आप लोग सरकारी नौकरी भी करने लगे हैं। यह न केवल पारसी समाजकी बल्कि समस्त भारतकी क्षति है। लेकिन आपने जो शिक्षा प्राप्त की है उसने आपको सरकारी नौकरी करनेको विवश कर दिया है और यह सचमुच बड़े दुःखकी बात है। व्यापारने आपको ईमानदार बनना, पैसा इकट्ठा करके इस देशके अन्य वर्गीकी सहायता करना सिखाया है और अब मैं आपसे वर्तमान परिस्थिति और अपने भविष्यका लेखा-जोखा करनेके लिए कहता हूँ। आपने दादाभाई नौरोजी,<noinclude></noinclude> ttvo84y1yd8ecrixytmgm77ilcagvn3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४२ 250 159647 671797 508839 2026-08-19T15:11:22Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671797 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मददकी आशा रख सकते हैं। इसमें हमारे पास निर्दोष बहनोंके अमूल्य आभूषण आये हैं। कितनी ही बालिकाओंने वे सब आभूषण दे डाले हैं जो उन्हें अत्यन्त प्रिय थे। मैं कितनोंका नाम जानता हूँ लेकिन मैं उन्हें प्रकट नहीं करना चाहता। उन्होंने भी नामसे कोई सरोकार नहीं रखा। स्त्रियोंके धनको उनका नाम प्रकट करके देना मुझे अच्छा ही नहीं लगता। उसमें मैं इतनी ज्यादा पवित्रताका आरोप करता हूँ कि उनका नाम प्रकट करना मुझे पाप-जैसा लगता है। उन्होंने वे आभूषण सिर्फ धर्मार्थं ही दिये हैं। एक विधवा बहनने अपने पास रखे हुए मोती- माणिकके सब आभूषण दिये हैं। उन्हें लेते समय मेरा हृदय भर आया। क्या हम इन आभूषणोंके अधिकारी हैं? विधवा अपने आभूषणोंको दे डालनेकी कभी इच्छा नहीं करती, वह उन्हें सँभालकर रखती है। इस बहनको मैंने सावधान किया। मैंने कहा कि अगर ये आभूषण संकोच अथवा शर्मके मारे दिये हों तो वापस ले लो। लेकिन वह क्यों लेती? उसने तो निश्चय कर रखा था। इस तरह मिले पैसेका हम गफलतसे, मूर्खतापूर्ण ढंगसे, बेईमानीसे दुरुपयोग करें तो? तो हमें स्वराज्य तो कभी नहीं मिल सकता, इस तरह हम नरकके भी अधिकारी बनेंगे। इन बहनोंका पुण्य, इनकी श्रद्धा हमें निभा लेगी, हमारी लाज रखेगी तथा हमारे मनोरथको पूर्ण करेगी। {{C|'''पारसियोंकी उदारता'''}} पारसी संघर्षमें भाग नहीं ले रहे हैं—ऐसा मैंने जब-जब सुना है तब-तब मुझे हँसी ही आई है। कुल मिलाकर हिन्दुस्तानमें एक लाख पारसी हैं। अगर हम संख्याके हिसाबसे ही विचार करें तो इनसे ४,१२० रुपया, उतने ही सदस्य और ८२४ चरखे मिल जायें तो हम कह सकते हैं कि उन्होंने अपना भाग अदा कर दिया। लेकिन ४,१२० रुपया तो उन्होंने छुटपुट दान द्वारा ही पूरा कर दिया है। अनेक गुमनाम भाइयोंने जो रुपया भेजा है उससे ही यह रकम पूरी हो गई होगी। पारसी रुस्तमजीने ५२,००० रुपया भेजा है, इसे भी मैं उसीमें शामिल करता हूँ और मैं मानता हूँ कि उन सबने मिलकर ४,१२० सदस्य भी अवश्य दिये होंगे। कितने ही पारसी स्वयंसेवक कांग्रेसके सदस्य बनानेका काम कर रहे हैं। वे बम्बईमें अच्छा कार्य कर रहे हैं। पारसी वकीलोंने वकालत भी छोड़ी है। एक सज्जनने अपना विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान प्रजाको देनेका निश्चय किया है। चरखे अवश्य कम चलते हैं, तथापि कुछ-एक पारसी बहनों और भाइयोंने चरखेके कामको हाथमें ले लिया है। वे शराबकी दुकानोंपर धरना भी देते हैं। इसलिए क्या यह कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी भी क्षेत्रमें कम काम किया है? उनके समस्त समाचारपत्र इस आन्दोलनके विरुद्ध नहीं हैं। 'साँझ वर्तमान' की सेवा प्रसिद्ध है। भाई भरूचाकी मेहनतसे कौन परिचित नहीं है? पारसी बहनें पर्याप्त संख्यामें जो काम कर रही हैं उसका विवरण तो मैं किसी अन्य स्थानपर दूँगा लेकिन उनमें से एकका नाम दिये बिना बात नहीं बन सकती। भारतके पितामहकी पौत्री तनतोड़ काम कर रही हैं। वे पूरी तरह खादीकी पोशाक ही पहनती हैं। यदि पारसी समाजने इतना ही किया होता तो भी हमने उनका उपकार माना होता, उनकी ओर हमने अँगुली न उठाई होती।<noinclude></noinclude> scre2ksh6sbs6vq8lus8pyd2srf3rhi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४३ 250 159648 671803 508840 2026-08-19T15:26:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671803 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३१३}}</noinclude>लेकिन भाई गोदरेजने तो बिलकुल हद ही कर दी है। उन्होंने तो तीन लाख रुपयेका दान दिया है। इतना तो किसी एक व्यक्तिने अबतक नहीं दिया। यह सच है कि यह रकम इस समय हमारे पास नकदीके रूपमें नहीं है, लेकिन यह तो सोनेकी मोहरके समान है। उन्होंने यह रकम हमारी प्रवृत्तिके दो शुद्धतम अंगोंके लिए अर्थात् मद्य-निषेध और अन्त्यजोंकी उन्नतिके लिए दी है। उन्होंने यह रकम खास तौरसे अन्त्यजोंकी उन्नतिके लिए दी है। इस कार्यके लिए मैं खुद तो सिर्फ हिन्दुओंका पैसा ही लेना चाहता हूँ। यह सुधार हिन्दुओंको ही करना है। लेकिन इस भाईने अपने निर्मल हृदयसे जब इसे देनेका निश्चय किया तो मैं इसे कैसे अस्वीकार कर सकता था? इस रकमको मिलाकर, जहाँतक मैं जानता हूँ, पारसियोंकी ओरसे कमसे-कम चार लाख रुपये हो जाते हैं। उनकी ओरसे जो भेंट मिलनेवाली है वह अलग है। भाई गोदरेज और पारसियोंको हम जितना धन्यवाद दें उतना कम है। दक्षिण आफ्रिकासे भी मदद आ चुकी है। पाटीदार मण्डलने ८,२७५ रुपया, खत्री मण्डलने ९६० रुपया तार द्वारा भेजा है। मैं अभी और अधिककी उम्मीद रखता हूँ।<ref>यहाँ मूलमें एक पादटिप्पणी दी गई है जिसमें कहा गया है : "यह लिखनेके बाद तार द्वारा सूचना मिली है कि स्टेनरकी इंडियन एसोसिएशनकी ओरसे लगभग १०० पौंड तथा नैरोबीसे १,२७४ रु॰ प्राप्त हुए है।"</ref> दक्षिण आफ्रिकाके पाटीदारोंकी दानशीलताका तो मुझे हमेशा अच्छा अनुभव होता रहा है। कुछ लोग यह मानते जान पड़ते हैं कि जूनके बाद उन्हें अनुमति लिये बिना पैसा इकट्ठा करना अथवा भेजना नहीं चाहिए। यह तो निरा वहम है। आजतक हमने बेजवाड़ामें तय की गई तीन वस्तुओंपर ही ध्यान दिया है। उसका अर्थ यह नहीं है कि जूनके बाद नये सदस्य अथवा नये चरखे नहीं बनवाने चाहिए और पैसे इकट्ठे नहीं करने चाहिए। एक करोड़ रुपया इकट्ठा करनेके बाद तिलक स्वराज्य-कोषको हम भले बन्द कर दें। लेकिन एक करोड़ पूरा होने तक तो पैसा इकट्ठा करनेके लिए हम बँधे हुए हैं। हमारी प्रतिज्ञाके दो अंग है। एक करोड़ रुपया इकट्ठा करना और वह भी ३० जूनतक। अगर हम तीस जूनतक न कर सके और उसके बाद भी मेहनत करके एक करोड़ रुपया इकट्ठा करें तो हम ऋणमुक्त तो हो ही जायेंगे। अवधि बीतनेपर लज्जित हों। लेकिन बीतनेपर भी न देकर अथवा कम देकर हम निर्लज्ज तो नहीं बन सकते। इसलिए मुझे उम्मीद है कि जिन्हें इस कोषमें अभी चन्दा देना है वे अवश्य देंगे। गुजरातको उसके लिए प्रयत्न करनेकी जरूरत नहीं होगी क्योंकि गुजरात अपना फर्ज अदा कर चुका होगा। यह तो हुआ तिलक स्वराज्य-कोषके सम्बन्धमें। लेकिन सदस्यों और चरखोंका क्या हो? [वचन तो] सिर्फ इतना ही कि तीस जूनतक हम गुजरातसे कमसे-कम तीन लाख सदस्य बनायें और एक लाख चरखे चलायें। लेकिन हमारा कर्त्तव्य तो यह है कि गुजरात इस वर्ष २१ वर्षके लगभग प्रत्येक स्त्री-पुरुषको सदस्य बनाये, गुजरातके प्रत्येक घरमें चरखेका प्रवेश हो और आबाल-वृद्धको चरखा चलानेके लिए प्रेरित किया जाये। यदि हम गुजरात प्रान्तकी नौ लाख आबादी मानें और प्रति पाँच<noinclude></noinclude> pc3updsh7a7do5kotc38azok4oivyex पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४४ 250 159649 671825 508841 2026-08-19T16:03:51Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>व्यक्तियोंको एक घर गिनें तो अठारह लाख घर हुए। इसलिए जबतक हम ढाई लाख चरखे न चलाने लगें तबतक हमें सन्तोष नहीं होना चाहिए। चरखे और सदस्योंकी संख्यामें वृद्धि करनेकी प्रवृत्तिकी कोई सीमा नहीं हो सकती। जैसे-जैसे इसमें वृद्धि होगी वैसे-वैसे हमारा बल बढ़ेगा, स्वराज्यके झंडेका तेज और भी प्रखर होगा, स्वराज्यका जहाज आगे बढ़ानेके लिए हवा और प्रचण्ड होगी और स्वराज्यके जहाजकी गतिमें भी तीव्रता आयेगी। जून मासतक अमुक संख्यामें चरखे बढ़ाकर और सदस्य बनाकर हमने अपनी गतिके वेगको आँका और अनुमान लगाया कि हमारा उत्साह कम हुआ कि बढ़ा; हमारा विश्वास कम हुआ कि बढ़ा। इन दोनों प्रवृत्तियोंके निरन्तर जारी रहनेपर ही हमारे स्वराज्यका आधार निर्भर करता है। {{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', ३-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४१. पत्र : लाला लाजपतरायको'''}}}} {{Right|[३० जून, १९२१ के पूर्व]}} {{Left|प्रिय लालाजी,}} मुझे पूरी आशा है कि इस महीनेकी अन्तिम तिथिके पहले ही गुजरात जितना चन्दा देनेकी आशा कर रहा है, पंजाब भी उतना दे चुकेगा। मेरे ऐसा कहनेका कारण यह है कि मैं अमृतसरको बहुत अच्छी तरहसे जानता हूँ। अमृतसरने चन्दा वसूल करनेके सम्बन्धमें अबतक बहुत ही कम काम किया है। धनके मामलेमें अमृतसरका पंजाबमें वही स्थान है जो गुजरातमें अहमदाबादका है। भारतमें सभी स्थानोंसे अधिक जोरका धक्का अमृतसरको लगा है और इसलिए अमानवीय अपमानोंको असम्भव बनानेके लिए चलाये जानेवाले संघर्षमें भी उसे अगुआ होना चाहिए। मेरी कामना है कि आपके प्रयत्नोंसे अमृतसरके धनाढ्य व्यक्तियोंको उनका महान् उत्तरदायित्व समझाना सम्भव हो सकेगा। {{Right|'''हृदयसे आपका,'''}} गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी मसविदे (एस॰ एन॰ ७५५६) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> rfvj4i3hk5rm5lurvd1wse7m9hkikdx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४५ 250 159650 671832 508842 2026-08-19T16:12:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 671832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१४२. भाषण : बोरीवलीको सभामें'''<ref></ref>}}}} {{Right|३० जून, १९२१}} '''श्री गांधीने कहा कि बृहस्पतिवार आखिरी और सबसे महत्त्वपूर्ण दिन है। यह भारतकी परीक्षाका समय है और मुझे उम्मीद है आप इस परीक्षा उत्तीर्ण होंगे। आज समय बहुत मूल्यवान है और मैं कोई लम्बा भाषण देने नहीं जा रहा हूँ। आज ही एक करोड़ रुपया इकट्ठा करना है और मैं आशा करता हूँ कि आप अपने कर्त्तव्यको पूरी तरह निभायेंगे। मैं नहीं जानता कि में यह रकम कैसे इकट्ठी कर पाऊँगा, लेकिन मुझे भारतीयोंकी योग्यता और देशभक्तिमें अत्यधिक विश्वास है और मेरे अन्तमको इस बातका पक्का यकीन है कि हम यह जरूरी रकम इकट्ठी कर लेंगे। मुझे नहीं मालूम कि बम्बईमें कितना रुपया इकट्ठा हुआ है, क्योंकि मैं अहमदाबाद गया हुआ था। मुझे यह भी नहीं मालूम कि गुजरात में कितना रुपया इकट्ठा हुआ है। गुजरातने दस लाख रुपया इकट्ठा करनेका जिम्मा लिया था; किन्तु गुजरात के लोगोंने वस्तुतः लगभग १२ लाख रुपया इकट्ठा कर लिया है और उन्हें पन्द्रह लाखकी पूरी-पूरी उम्मीद है। जब में अहमदाबादसे बम्बई आ रहा था तो रास्तेमें एक सज्जनने मुझे एक लाख रुपयेका चेक दिया और कहा कि वे बम्बईके समीप जमीनका एक बेशकीमती टुकड़ा भी दानमें वेंगे। पंडालके द्वारपर मुझे २५,००० रुपयेका एक चेक दिया गया है। जोहानिसबर्ग मुझे ९,००० रुपयेकी एक हुंडी और खत्री समाजसे १,००० रुपये मिले हैं। मुझे बड़ी आशा है कि बम्बईके लोग मुझे आवश्यक रकम देंगे, क्योंकि चन्दा इकट्ठा करनेका बहुत बड़ा दायित्व बम्बईके कन्धोंपर ही है। जब में बम्बई से रवाना हुआ था तबतक आप लोगोंने लगभग पन्द्रह-बीस लाख रुपया इकट्ठा कर लिया था और मुझे पूरी उम्मीद है कि भारतकी आज जो कसौटी हो रही है, उसमें वह खरा उतरेगा। मैंने वहाँ सिर्फ यह सुना ही है कि बोरीवली में बहुतसे धनवान व्यापारी रहते हैं और में भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि वे इस कोषमें मुक्त हस्त होकर दान देंगे । मैंने अहमदाबाद और बम्बई में सुना है कि वैष्णवोंको इस आन्दोलनके प्रति बहुत ज्यादा शंकाएँ हैं। में उन्हें एक पत्र लिख चुका हूँ जिसे शायद आप सब लोग १. बोरीवलीको जनताने गुरुवार की सुबह गांधीजीको तिलक स्वराज्य कोषके लिए एक थैली भेंट की। स्त्री-पुरुष बहुत बड़ी तादाद में इकट्ठे हुए थे। उपस्थित लोगोंमें वि० झ० पटेल, अली बन्धु और सरोजिनी नायडू भी थे । २. देखिए " वैष्णवोंसे ", ३-७-१९२१ । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> a067egyqquyhca2qerhv7k009qwu3r8 671910 671832 2026-08-20T04:54:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१४२. भाषण : बोरीवलीको सभामें'''<ref>बोरीवलीकी जनताने गुरुवार की सुबह गांधीजीको तिलक स्वराज्य-कोषके लिए एक थैली भेंट की। स्त्री-पुरुष बहुत बड़ी तादादमें इकट्ठे हुए थे। उपस्थित लोगोंमें वि॰ झ॰ पटेल, अली बन्धु और सरोजिनी नायडू भी थे।</ref>}}}} {{Right|३० जून, १९२१}} '''श्री गांधीने कहा कि बृहस्पतिवार आखिरी और सबसे महत्त्वपूर्ण दिन है। यह भारतकी परीक्षाका समय है और मुझे उम्मीद है आप इस परीक्षामें उत्तीर्ण होंगे। आज समय बहुत मूल्यवान है और मैं कोई लम्बा भाषण देने नहीं जा रहा हूँ। आज ही एक करोड़ रुपया इकट्ठा करना है और मैं आशा करता हूँ कि आप अपने कर्त्तव्यको पूरी तरह निभायेंगे। मैं नहीं जानता कि मैं यह रकम कैसे इकट्ठी कर पाऊँगा, लेकिन मुझे भारतीयोंकी योग्यता और देशभक्तिमें अत्यधिक विश्वास है और मेरे अन्तर्तमको इस बातका पक्का यकीन है कि हम यह जरूरी रकम इकट्ठी कर लेंगे। मुझे नहीं मालूम कि बम्बईमें कितना रुपया इकट्ठा हुआ है, क्योंकि मैं अहमदाबाद गया हुआ था। मुझे यह भी नहीं मालूम कि गुजरातमें कितना रुपया इकट्ठा हुआ है। गुजरातने दस लाख रुपया इकट्ठा करनेका जिम्मा लिया था; किन्तु गुजरातके लोगोंने वस्तुतः लगभग १२ लाख रुपया इकट्ठा कर लिया है और उन्हें पन्द्रह लाखकी पूरी-पूरी उम्मीद है। जब मैं अहमदाबादसे बम्बई आ रहा था तो रास्तेमें एक सज्जनने मुझे एक लाख रुपयेका चेक दिया और कहा कि वे बम्बईके समीप जमीनका एक बेशकीमती टुकड़ा भी दानमें देंगे। पंडालके द्वारपर मुझे २५,००० रुपयेका एक चेक दिया गया है। जोहानिसबर्ग मुझे ९,००० रुपयेकी एक हुंडी और खत्री समाजसे १,००० रुपये मिले हैं।''' '''मुझे बड़ी आशा है कि बम्बईके लोग मुझे आवश्यक रकम देंगे, क्योंकि चन्दा इकट्ठा करनेका बहुत बड़ा दायित्व बम्बईके कन्धोंपर ही है। जब मैं बम्बईसे रवाना हुआ था तबतक आप लोगोंने लगभग पन्द्रह-बीस लाख रुपया इकट्ठा कर लिया था और मुझे पूरी उम्मीद है कि भारतकी आज जो कसौटी हो रही है, उसमें वह खरा उतरेगा। मैंने वहाँ सिर्फ यह सुना ही है कि बोरीवलीमें बहुतसे धनवान व्यापारी रहते हैं और मैं भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि वे इस कोषमें मुक्त-हस्त होकर दान देंगे।''' '''मैंने अहमदाबाद और बम्बईमें सुना है कि वैष्णवोंको इस आन्दोलनके प्रति बहुत ज्यादा शंकाएँ हैं। मैं उन्हें एक पत्र<ref>देखिए "वैष्णवोंसे", ३-७-१९२१।</ref> लिख चुका हूँ जिसे शायद आप सब लोग'''<noinclude></noinclude> jgkhmcedim55o8kd77rpngk3m3o7s7m पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४६ 250 159651 671914 508843 2026-08-20T05:10:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''देखेंगे। आज तो भारत यही अपेक्षा रखता है कि सभी समुदायोंके लोग एक होकर स्वराज्य प्राप्तिके लिए महान् प्रयत्न करेंगे। तथापि इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपना-अपना धर्म छोड़ दें। जबतक यह संसार है तबतक विचारोंमें अनेकता और मतभेद तथा भिन्न-भिन्न धर्म भी रहेंगे ही। लेकिन आपको स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए एक होकर प्रयत्न करना है। तथापि समाजके निम्न वर्गोंको इस पतितावस्थामें रखकर आप कभी स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे। उनको दबाकर रखना, हेय दृष्टिसे देखना, उनसे नफरत करना, उन्हें गालियाँ देना, उन्हें अपने कुओंसे पानी न भरने देना, अपने गाँवोंसे अलग रखना—यह सब निश्चय ही वैष्णव धर्म नहीं है। वह तो ईश्वर-विहीन धर्म है। वैष्णव धर्म तो कुछ और ही चीज है। वल्लभाचार्यने अपने शिष्योंको घृणा और असहिष्णुताको शिक्षा कभी नहीं दी थी। उनके उपदेशोंका आशय था कि आपको दलित वर्गोंको, गरीबी और अज्ञानके अन्धकारमें डूबे हुए लोगोंको उठाना चाहिए। वल्लभाचार्यने आपको यह नहीं बताया है कि आप अपने भाइयोंको दलित करके रखें। मैं इन बातोंके सम्बन्धमें जितना ज्यादा सोचता हूँ, मेरा यह विश्वास उतना ही दृढ़ होता जाता है कि इस सवालके बारेमें वैष्णवोंने जो रुख अपना रखा है वह गलत है।''' '''मैं आपसे यह सब एक दुनियादार व्यक्तिकी हैसियतसे और एक ऐसे व्यक्तिकी हैसियतसे कह रहा हूँ जिसे इन सब बातोंका बहुत अनुभव है। मैं अपने दक्षिण आफ्रिकाके अनुभवोंसे यह समझ गया हूँ कि किसी दलित वर्गका सदस्य होनेका मतलब क्या होता है। दक्षिण आफ्रिकामें मेरे साथ दलित वर्गके व्यक्तिकी तरह व्यवहार किया गया था। वहाँ मुझे गोरे लोगोंसे अलग उस स्थानपर रहना पड़ा था, जिसे "बस्ती" कहते थे। वह स्थान सचमुच एक ढेढ़वाड़ा (भंगियोंके रहनेका स्थान) ही था। वहाँ सफाई वगैरहका कोई इन्तजाम नहीं था और न रोशनी, सड़कें अथवा किसी सभ्य शहरमें सुलभ होनेवाली सुविधाएँ ही थीं। वहाँ मैंने जाना कि अन्त्यज होनेका मतलब क्या होता है और मैंने वे सारे कष्ट सहे हैं जिनसे भारतमें आज मेरे भाई कराह रहे हैं। अगर आप अपने भाइयोंके साथ अच्छा बरताव नहीं कर सकते तो आपके भारतीय होनेसे क्या फायदा है, और आपके इस देशमें जन्म लेनेसे क्या लाभ है?''' '''अंग्रेजोंके हाथों आपको जो अपमान और अत्याचार सहना पड़ा है उसीके कारण आपने इस सरकारको शैतानी सरकार कहा है और आपने उसके साथ सहयोग न करनेका निश्चय किया है। तो क्या आप भारतीय लोग भी अपने भाइयोंके साथ वही बरताव करेंगे जो गोरे आपके साथ कर रहे हैं? आप जो-कुछ कर रहे हैं, क्या उसका हिसाब-किताब करना उचित न होगा? क्या यह उचित नहीं होगा कि आप जो-कुछ कर रहे हैं, तनिक रुककर उसपर विचार करें? मैंने आपसे अस्पृश्योंके हाथका भोजन खानेके लिए नहीं कहा है, मैंने तो आपसे सिर्फ उनके साथ भाइयोंका-सा बरताव'''<noinclude></noinclude> sid11owpkkung6gh22hb3skbu3x5yij पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४७ 250 159652 671928 508844 2026-08-20T05:44:32Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बोरीवलीकी सभामें|३१७}}</noinclude>करनेके लिए ही कहा है। अगर आप सब एक होकर संकल्प करें, तो आप इसी क्षण स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन आप तो इतनी सारी जातियोंमें विभक्त हैं। अगर हिन्दू यह सोचें कि मुसलमान उनके जन्मजात शत्रु हैं और इसलिए उनसे घृणा करना अपना कर्त्तव्य मान लें, तो आप कभी स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकते। आप भयके कारण ही अस्पृश्यताको दूर करनेसे भागते हैं। जून मासके इस आखिरी दिन, उच्च संकल्प और महत्त्वके इस दिन मैं आपसे कहूँगा कि इसी भयने आपको अपने भाइयोंको दलित रखने और उनसे पृथक जीवन व्यतीत करनेके लिए विवश किया है। जबतक आपके दिलोंमें गरीबोंके लिए करुणा और दयाका भाव नहीं जागता, जबतक आपके दिलोंमें अपने भाइयोंके प्रति प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होता तबतक आप भारतीय स्वराज्यके योग्य नहीं होंगे। मुझे एक करोड़ रुपयोंकी उतनी चिन्ता नहीं, मैं उसकी इतनी परवाह नहीं करता, क्योंकि किसी-न-किसी तरह आप यह रकम इकट्ठी कर ही लेंगे। लेकिन मैं आपसे जो चाहता हूँ वह यह है कि आप अपने दलित भाइयोंसे प्यार करें। मैं जिस स्वराज्यकी स्थापना करना चाहता हूँ वह घृणा और भयपर आधारित नहीं होगा, मेरा स्वराज्य तो न्याय और सत्यपर आधारित होगा। वह धर्मराज्य होगा। कलसे आप लोग मुझे पैसा माँगते हुए, उसकी चर्चा करते हुए नहीं सुनेंगे। आप मुझसे कुछ और ही सुनेंगे। कलसे आपको सभी विदेशी वस्तुओंका व्यापार छोड़ना होगा। जो विदेशी कपड़ेका लेन-देन करते हैं, उन्हें उसे छोड़ देना होगा। विलायती कपड़ेका व्यापार करनेवालों को यह व्यापार छोड़ देना होगा और मैं बहनोंसे अपील करता हूँ कि वे विदेशी वस्त्र पहनना छोड़ दें और खद्दर पहनें। अगर आप देशके प्रति अपना कर्त्तव्य निभाना चाहते हैं तो आपको विदेशी वस्त्रोंका त्याग करके खद्दर पहनना चाहिए। अगर मेरी बहनें और बेटियाँ मुझे प्यार करती हैं और अगर उनके दिलोंमें मेरे प्रति तनिक भी आदर-भाव है तो मैं उनसे अपील करता हूँ कि वे विदेशी वस्त्र पहनना छोड़ दें और हमेशाके लिए विलासिताके इन उपकरणोंको त्याग देनेका पक्का निश्चय कर लें। यहाँ मैं आपको एक व्यक्तिगत अनुभव सुनाऊँगा। अभी पिछले दिन ही मेरी पत्नीने मुझसे कहा कि वह जो मोटे खद्दरकी साड़ी पहने हुए है, उससे उसे खाना पकाने और घरका काम-काज करनेमें असुविधा होती है और वह मुझसे कुछ हलका और महीन वस्त्र पहननेकी अनुमति चाहती है। जैसे मैं जो कुछ करना चाहूँ वह करनेकी उसने मुझे पूरी स्वतन्त्रता दे रखी है, वैसे ही मैंने भी उसे सभी बातोंमें पूरी स्वतन्त्रता दे रखी है। इस हालतमें मैं स्वभावतः उससे कुछ करनेको नहीं कहना चाहता था। लेकिन मुझे अपनी पत्नीसे कहना पड़ा कि अगर वह मेरा भोजन खादी पहनकर नहीं पका सकती तो अच्छा हो कि वह मेरे लिए कुछ पकाये ही नहीं, क्योंकि मैं अपवित्र विदेशी कपड़े पहनकर बनाये गये भोजनमें से कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा। मैं अपनी<noinclude></noinclude> soy1hik83nbm8px3ngcy74c2np3mpfo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४८ 250 159653 671929 508845 2026-08-20T06:02:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पत्नी द्वारा विदेशी वस्त्र पहनकर पकाये गये भोजनको हाथ भी नहीं लगाऊँगा। अगर भारतीय स्त्रियाँ इतना त्याग भी नहीं करना चाहतीं, अगर वे इतना कष्ट उठानेको भी तैयार नहीं हैं तो आपको अभी जलियाँवाला बाग-जैसी बहुत सारी विभीषिकाएँ झेलनी होंगी। अगर आप मेरे कथनकी ओर ध्यान नहीं देंगी तो आपको महीनेकी इस आखिरी तारीखको जो कष्ट उठाना पड़ रहा है आगे उससे भी अधिक कष्ट सहन करने होंगे। अन्तमें उन्होंने सभी हिन्दुओं और मुसलमानोंसे उत्कटता-पूर्वक अपील की कि वे सभी विदेशी वस्तुओंका त्याग कर दें और सिर्फ स्वदेशमें ही बनी वस्तुओंका इस्तेमाल करें। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४३. भाषण : पारसियोंकी सभामें'''<ref>पारसियोंकी यह सभा गांधीजीको ३०,००१ की एक थैली भेंट करनेके लिए बम्बईके एक्सलसियर थियेटरमें हुई थी। सभामें वि॰ झ॰ पटेल, सरोजिनी नायडू, श्री और श्रीमती पिक्थॉल, अली बन्धु और डाक्टर किचलू भी मौजूद थे।</ref>}}}} {{Right|३० जून, १९२१}} श्री गांधीने अपने लम्बे भाषणके दौरान श्रोताओंसे अनुरोध किया कि मेरे बोलते समय आप लोग कोई बाधा न डालें और हर्षध्वनि वगैरह न करें। उन्होंने कहा, मैंने ऐसा कभी नहीं कहा कि पारसी लोग मुझे अच्छी तरहसे नहीं जानते और वे मेरे साथ नहीं है। जब मैं छोटा बच्चा था, तभीसे मैं पारसियोंको जानता हूँ और पारसी मुझे जानते हैं। मेरे सबसे अच्छे और अन्तरंग मित्र पारसी है और पारसी समाजसे मेरा सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ है। दादाभाई मेरे पिताके, बल्कि पितामहके समान थे और अगर आपको कभी स्वराज्य मिला तो यह दादाभाईके प्रयत्नों और इस देशके लिए उन्होंने जो शानदार काम किया है उसकी बदौलत होगा। जब मैं नवयुवक था, तब उन्होंने ही मुझे स्वराज्यका प्रथम पाठ पढ़ाया था। जब मैं दक्षिण आफ्रिकासे एक शिष्टमण्डल लेकर इंग्लैंड गया था तब दादाभाई नौरोजी और श्री फीरोजशाह मेहता मुझसे जो कहते थे, मैं वही बोलता और करता था। मेरे मनमें ऐसा खयाल कभी नहीं आया कि पारसी लोग मेरे विरुद्ध हैं। मुझे बराबर पूरी उम्मीद रही है कि इस आन्दोलनमें वे मेरा साथ देंगे। मुझे इस बातका तनिक भी दुःख नहीं है कि उनके मनमें शंकाएँ हैं। ये सिर्फ पारसी लोग ही हैं जो सैकड़ों वर्षोसे तीस करोड़ भारतीयोंके बीच रहते आये हैं और तब भी उन्होंने दुनियाको अपने अस्तित्वका विशेष बोध कराया है और इस देशके जीवन के विभिन्न क्षेत्रोंमें एक प्रमुख स्थान प्राप्त<noinclude></noinclude> q91nsilpzfwr0jplsuuqf4helvkxnqu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५० 250 159654 671977 508846 2026-08-20T07:58:46Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671977 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>फीरोजशाह मेहता और जमशेदजी टाटा जैसे नर-रत्नोंको जन्म देकर देशके प्रति अपना ऋण पूरा-पूरा चुका दिया है। मैं आप लोगोंसे स्वराज्य-आन्दोलनमें, जो अब जोरोंपर है, भाग लेनेका अनुरोध करता हूँ। आप लोग जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें अन्य समुदायोंका मुकाबला कर सकते हैं। अगर आपने अतीतमें इस देशके लिए इतना किया है, तो इस समय आप अपने-आपको इस आन्दोलनसे अलग क्यों रख रहे हैं? आप लोग बहुत समृद्ध हैं, आपके पास करोड़ों रुपये है, तो फिर आपने कोषके लिए और ज्यादा पैसा क्यों नहीं दिया? दादाभाईन राजनीतिक संन्यासीका जीवन व्यतीत करते हुए भारतको जो सेवा की थी वह भारतको, सिर्फ पारसियोंको ही नहीं वरन् समस्त समुदायों और जातियोंको, स्वतन्त्र करनेके लिए ही की थी। मैं आपसे आपके मित्रके रूपमें इसलिए बात करने नहीं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं आप लोगोंका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ और दीर्घकालसे आप लोगोंके साथ मेरा बहुत निकट सम्पर्क रहा है। महात्माजीने आगे कहा कि अगर आप चाहें तो कोई भी काम बड़ी आसानीसे कर सकते हैं, क्योंकि आपका समाज सिर्फ अस्सी हजार लोगोंका एक छोटा और सुगठित समाज है। हिन्दुओं और मुसलमानोंके सम्बन्धमें यह बात नहीं कही जा सकती। अगर आप अंग्रेजोंके आनेसे पूर्व स्वतन्त्र रह सकते थे तो मेरी समझमें नहीं आता कि आप स्वराज्य प्राप्त करनेके बाद स्वतन्त्र क्यों नहीं रह सकते? इस देशमें छोटे समुदायोंकी रक्षा करना हिन्दुओं और मुसलमानोंका प्रथम कर्त्तव्य है। अगर हिन्दू और मुसलमान स्वयं अपने प्रति सच्चे हैं तो वे इस बातका ध्यान रखेंगे कि वे किसी भी पारसीके भूखे रहते अपने मुँहमें अन्नका एक कौर भी न डालेंगे। अगर हिन्दू और मुसलमान इसके अतिरिक्त कुछ और करना चाहते हैं तो माना जायेगा कि वे धर्मराज्यके लिए काम नहीं कर रहे हैं। मैं आपको निर्भय बनाना चाहता हूँ और आपके मनमें किसी तरहको शंका नहीं रहने देना चाहता। मैं चाहता हूँ कि आप अपनी सारी शक्ति देशके कल्याणके लिए लगायें। अगर आप ऐसा करें तो आप इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं तथा आप खिलाफत और पंजाब सम्बन्धी अन्यायोंका भी निराकरण कर सकते हैं। अगर आप संसारपर अंग्रेजोंकी तरह राज्य करना चाहते हैं तब मैं कहूँगा कि भारतीय उसके लायक नहीं हैं और मैं ईश्वरसे प्रार्थना करूँगा कि वे कभी उसके लायक भी न हों। क्या भारतीय हब्शी लोगोंको गुलाम बनाना चाहते हैं अथवा उन्हें कैदी बनाना चाहते हैं अथवा उनसे बेगार करवाना चाहते हैं और उन्हें भिखमंगा बनाकर रखना चाहते हैं? मैं चाहता हूँ कि आप आत्मशुद्धिके द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करें और फिर समस्त संसारसे बुराइयोंको दूर करें। मैं आपसे कहूँगा कि आप इसी क्षणसे स्वराज्यवादी बन जायें। आप स्वराज्यवादी तो है ही, लेकिन आपके मनमें अभी कुछ शंकाएँ हैं; मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप सच्चे स्वराज्यवादी बनें। आप इन प्रश्नोंपर अच्छी तरहसे विचार करें और अपने-आपसे पूछे कि गांधी जो यह-सब बातें करता है, सो क्या वह मूर्ख है।<noinclude></noinclude> 0vns65wzpvddetc1w7xijuyv0jiykdl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५१ 250 159655 671987 508847 2026-08-20T08:13:47Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671987 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : पारसियोंकी सभामें|३२१}}</noinclude>भारत जो स्वराज्य प्राप्त करनेवाला है वह धर्मराज्य है। भारतीय असत्यपर नहीं, बल्कि सत्यपर आधारित स्वराज्यकी स्थापना करना चाहते हैं और हम उन सभी चीजोंसे दूर रहना चाहते हैं जो असत्य हैं। मुझे शैतानसे असहयोग करनेकी शिक्षा पारसी समाजसे ही मिली है। इसने मुझे शैतानसे, सभी बुराइयोंसे अलग रहना सिखाया है। मैं अंग्रेजोंसे घृणा नहीं करता और न मैं उन्हें इस देशसे ही निकाल बाहर करना चाहता हूँ, लेकिन मुझे भारतीयोंको लॉर्ड रीडिंगकी तरह अंग्रेजोंकी प्रजा बताना पसन्द नहीं है। इन बातोंपर विचार करते हुए मेरी आत्मा काँप उठती है। आपमें किसी भी बुराईका प्रतिरोध करनेकी शक्ति होनी चाहिए। स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए आपके पास रिवाल्वरोंका होना अथवा आपका बैरिस्टर और वकील बनना जरूरी नहीं है। जो चीज आवश्यक है वह है आत्मविश्वास, किन्तु मुझे दुःख है कि पारसी लोग शंकाओंसे इस तरह भरे हुए हैं। मैं आपसे याचना करता हूँ कि आप अपनी शंकाओंको दूर कर दें। मैं आपसे अपील करता हूँ कि आप सब स्वराज्यवादी बन जायें और स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके निमित्त अन्य समुदायोंके साथ मिलकर काम करें। इसके बाद श्री गांधीने शराबकी दुकानोंकी चर्चा की। उन्होंने कहा कि बम्बईमें पारसियोंके सिरपर एक बहुत बड़ा दायित्व है। बम्बईमें देशी शराबकी लगभग नौ सौ दुकानें हैं और अधिकांश दुकानोंके मालिक पारसी हैं। मेरे पास अनेक पारसी आये और उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने सरकारको एक सालकी पूरी रकम पहले ही दे दी है और अगर उनकी दुकानोंपर धरना दिया गया तो वे बरबाद हो जायेंगे और अपनी सारी पूँजी गँवा बैठेंगे। मैंने इन बातोंपर विचार किया है और मुझे दुकानदारोंसे बहुत सहानुभूति है। आप लोग सरकारके साथ सहयोग कर रहे हैं और आपने अपने खिताब नहीं छोड़े हैं, मुझे इसका तनिक भी दुःख नहीं है। लेकिन शराबकी दुकानोंकी बात अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर है। मुझे दुःख है कि धरना देनेवालोंमें सिर्फ हिन्दू और मुसलमान ही हैं। क्या ही अच्छा होता, अगर मेरे पारसी भाई-बहन भी धरना देनेके इस काममें शामिल होते। मैं नहीं चाहता कि जोर-जबरदस्ती की जाये, मैं नहीं चाहता कि इस पवित्र उद्देश्यके लिए किसी प्रकारके आपत्तिजनक साधनोंका उपयोग किया जाये। जब पारसी स्त्रियाँ शराबकी दुकानोंपर जानेवाले पारसियोंकी राहमें खड़ी हो जायेंगी तब उन्हें शराबकी दुकानोंके अन्दर घुसनेमें शर्म आयेगी और उन्हें गाली देनेमें शर्म आयेगी तथा वे उनपर हाथ भी नहीं उठायेंगे। श्री गांधीने पारसियोंसे कहा कि आप शराब पीना छोड़ दें तथा अपने उन भाइयोंकी मदद करें जिन्हें धरना दिये जानेके कारण अपनी दुकानोंको बन्द करना पड़ा है। आप उन्हें सरकारसे उनकी रकम वापस दिलानेमें मदद करें और जिस तरह सम्भव हो, सहायता दें। अहमदाबादमें एक पारसी ठेकेदारने मुझसे शिकायत की कि धरना देनेवालोंने उसपर हमला किया लेकिन जाँच करनेपर उसकी यह बात गलत साबित हुई। सच तो यह है कि स्वयंसेवकोंपर ही हमला किया गया था और अब वे अपने सिरपर पट्टी बांधकर धरना दे रहे हैं। उन्होंने बदलेमें हाथ नहीं उठाया।<noinclude>{{Left|२०–२१}}</noinclude> dhr7ahhkl5mis1fz9ompf627x4tl6mz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५२ 250 159656 671995 508848 2026-08-20T08:22:41Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 671995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''श्री गांधीने अपने पारसी भाइयों और बहनोंसे अपील की कि वे अन्य समुदायों द्वारा शराबखोरीको रोकनेके लिए किये जानेवाले प्रयत्नोंमें सहायता दें। मैं नहीं समझता कि जो लखपती पारसी इस सभामें शामिल नहीं हुए हैं, वे मेरे आन्दोलनके विरुद्ध हैं और उन लोगोंसे मेरी प्रार्थना है कि वे शराबके ठेकेदारोंकी जितनी बने उतनी सहायता करें। इस बीच मैं आप लोगों [दुकानदारों] से स्वराज्यके काममें मदद देनेकी बात कहता हूँ। मैं भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि वह पारसी समाजको, स्वराज्य-प्राप्तिके लिए इस समय जो संघर्ष चल रहा है, उसमें उचित हिस्सा लेनेका बल प्रदान करे और इस समय उसका क्या कर्त्तव्य है, यह समझने की सबुद्धि दे।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४४. भाषण: बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें<ref>यह भाषण कपड़ा-व्यापारी संघके तत्त्वावधानमें हुई एक सभामें दिया गया था जिसमें कपड़ा-व्यापारियों और कर्मचारियोंने तिलक स्वराज्य-कोषके लिए गांधीजीको २,५०,००० की थैली भेंट की थी।</ref>}}}} {{Right|३० जून, १९२१}} '''महात्मा गांधीने कहा कि आप लोगोंने देशको स्वतन्त्र करनेके निमित्त जो धन मुझे दिया है, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूँ। मैं आशा करता हूँ कि आप मुझसे इस समय लम्बे भाषणकी अपेक्षा नहीं करेंगे, क्योंकि शामको मुझे और भी दो सभाओंमें जाना है। आप लोगोंसे मुझे केवल यही कहना है कि यदि कोलाबाके सूतके व्यापारियोंकी तरह अन्य व्यापारियोंने देशकी स्थितिको पहचान लिया तो पंजाब और खिलाफतके प्रति किये गये अन्यायोंका निराकरण करवाना कदापि कठिन नहीं होगा। मैं चाहता हूँ कि देशके व्यापारी अब अपने देशकी राजनीतिमें प्रमुख हिस्सा लिया करें। जबतक व्यवसायमें लगे हुए लोग देशके मामलोंमें अधिक दिलचस्पी लेना शुरू नहीं करते तबतक हमें अपने उद्देश्यमें सफलताकी जरा भी आशा नहीं करनी चाहिए। परन्तु इन वर्गोंमें जागृतिके शुभ लक्षण दिखाई देने लगे हैं। और यदि यही क्रम जारी रहा तो इस वर्षके भीतर ही स्वराज्य मिलना निश्चित समझिए। अपने देशकी राजनैतिक स्थितिमें प्रमुख भाग लेना व्यापारी-वर्गोंका प्रथम कर्त्तव्य है। श्री मथुरादासने ठीक ही कहा है कि स्वराज्य-कोषमें हमने जो-कुछ दिया है वह उतना नहीं है जितना कि होना चाहिए था। इस कथनका कारण यह है कि हम करोड़ों रुपयेके मूल्यका सूत प्रतिवर्ष बाहर भेज देते हैं और हमें उस पापके प्रायश्चित्तस्वरूप एक करोड़ रुपयमें जितनी कसर रहती हो उसे पूरा करना चाहिए था। ये एक करोड़ रुपये आज राततक इकट्ठे हो जाने चाहिए। मुझे भारतीयोंपर पूरा विश्वास है; आशा'''<noinclude></noinclude> 05syy2vhwtvo3r174snswhbe8k8o8mb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५३ 250 159657 672003 508849 2026-08-20T08:31:32Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672003 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी सभामें|३२३}}</noinclude>'''है कि वे कांग्रेसके आदेशकी उपेक्षा नहीं करेंगे। हम अन्य प्रान्तोंसे ४० लाखकी उम्मीद कर सकते हैं और बाकीका ६० लाख आप लोग बम्बईमें पूरा करें। मुझे पूरी आशा है कि आप इस रकमको इकट्ठा करनेकी भरसक कोशिश करेंगे और इस तरह देशकी प्रतिष्ठाकी रक्षा करेंगे। हमने बेजवाड़ामें जो शपथ ली थी, आज उसे पूरा करनेका अन्तिम दिन है और यदि आज राततक यह धन नहीं प्राप्त किया जा सका तो सारे भारतकी आँखें नीची होंगी। आज तो राष्ट्रका सम्मान व्यापारियोंपर निर्भर है। धनके मामलेमें सिर्फ वे ही मदद कर सकते हैं। मेरे जैसे भिखारीसे तो कोई आर्थिक मददकी आशा नहीं की जा सकती। भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने ईश्वरसे प्रार्थना की कि वह आवश्यक धन मुहैया करके देशकी प्रतिष्ठा बनाये रखनेकी सामर्थ्य प्रदान करे।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४५. भाषण : बम्बईकी सभाम<ref>न्यू चिंचबन्दरमें मांडवी हलकेकी कांग्रेस समितिके तत्त्वावधानमें तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा करनेके लिए शामको की गई एक सभामें।</ref>}}}} {{Right|३० जून, १९२१}} '''महात्माजीने कहा कि बम्बईमें स्त्री-पुरुषोंमें जो जोश मैंने देखा है, उससे मुझे भविष्य आशामय लगता है और मुझे उम्मीद है कि हमने जो शपथ कलकत्तामें और फिर दुबारा नागपुरमें ली थी, उसे हम पूरा कर सकेंगे। मुझे इस वक्ततक ठीक नहीं मालूम कि देशमें कितना रुपया चन्देमें आ चुका है। परन्तु केवल कुछ ही मिनट पहले मुझे सूचना मिली है कि काठियावाड़में दो लाखसे ज्यादा चन्दा हो गया है और आज सुबह एक सज्जनका भेजा हुआ २५,००० रुपयका चैक मुझे मिला है। हमें काठियावाड़से ५०,००० रुपये से ज्यादाको आशा नहीं थी। मैं जो-कुछ देख रहा हूँ, उससे आशा होती है कि एक करोड़ जमा हो जायेगा। परन्तु मैं इस सम्बन्धमें निश्चित रूपसे जानना चाहता हूँ और इसलिए बम्बईके कुछ मिल-मालिकोंसे आश्वासन चाहता हूँ कि यदि अपेक्षित रकम जमा न हो सकी तो वे कमीको पूरा कर देंगे। मुझे पूरी आशा है कि इस तरहका आश्वासन मिल जायेगा। आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस अवसरका लाभ उठाकर मैं कुछ शब्द महिलाओंसे अपने देशके हृदयमें पैठे हुए विश्वास और उसकी प्रतिष्ठाके विषयमें कहूँगा। जैसा कि सभी लोग जानते हैं स्त्रियाँ ही हम लोगोंके विश्वासकी न्यासी हैं और राष्ट्रकी अन्नपूर्णा हैं। राष्ट्र सशक्त या आदर्श राष्ट्र केवल तभी हो सकता है जब हमारी महिलाएँ पूर्णतया धार्मिक और देशभक्त हों। फिलहाल तो भारतीय महिलाओंकी पवित्रता और उनका धर्म'''<noinclude></noinclude> tltbt8vddetevuwahd5wt2fnirjrcoz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५४ 250 159658 672006 508851 2026-08-20T08:40:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''खद्दरमें ही समाहित है। इसलिए मैं अपील करता हूँ कि आजसे महिलाएँ सभी विदेशी वस्त्रोंका परित्याग कर दें और अपनी तथा अपने बच्चोंकी पोशाक शुद्ध खद्दरकी ही बनाया करें।''' {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४६. एक महिलाको लिखे पत्रका अंश'''}}}} {{Right|रेलगाड़ीमें<br>३० जून, १९२१}} समाचारपत्रोंमें आपके जेवरोंके बारेमें प्रकाशित एक अंशने आपके दानकी सारी खूबसूरती ही नष्ट कर दी है। मैंने यह आशा कर रखी थी कि वह दान त्यागका एक मौन कार्य होगा। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि कई लड़कियोंने आपसे ज्यादा रकमें दानमें दी हैं। उन्होंने अपने नामका ढिंढोरा पीटनेकी इच्छा नहीं की। आजसे दो दिन पहले एक बहनने मुझे अपने सारे कीमती जेवर—मोतीका हार, मानिकके कंगन और बुन्दे दे डाले। उस बह्नने ये सब चीजें बड़ी विनम्रता और शोभायुक्त ढंगसे दीं। वे अपना नाम प्रकाशित कराना नहीं चाहतीं। उन्होंने यह सब ईश्वरके नामपर दिया है। मुझे आपके लिए खेद है। इस कटु सत्यके लिए मुझे क्षमा कीजियेगा...।< {{Left|[अंग्रेजीसे]|1em}} {{Left|महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरीसे।<br>सौजन्य : नारायण देसाई|2em}} {{C|{{larger|'''१४७. भाषण: बाँदराकी सभामें'''<ref>गांधीजीने उत्तरी बम्बईके इस उपनगरमें सुबहके वक्त की गई एक सार्वजनिक सभामें भाषण दिया था। यह सभा उनको तिलक स्वराज्यकोषके लिए १५,००० रुपयेका चैक देनेके उद्देश्यसे आयोजित की गई थी।</ref>}}}} {{Right|१ जुलाई, १९२१}} '''महात्मा गांधीन कहा : कल रात हम सो नहीं सके हैं। हम दो बजेतक नाट्यशालामें रहे। हम वहाँ नाटक देखने नहीं गये थे बल्कि तिलक स्वराज्य-कोषके लिए रुपया इकट्ठा करने गये थे। जब मैंने अपने मित्र मुहम्मद अलीको अपने थैलेमें जेवरोंके अतिरिक्त २५,००० रुपयेकी रकम लाते हुए देखा तो मुझे ३० वर्ष बाद फिर नाट्यशालामें प्रवेश करनेपर अपार हर्ष हुआ। इसी कारण अली बन्धु सभामें नहीं आ सके'''<noinclude></noinclude> lqxhz72hgyja097p2eyzqj1pvsd8ll7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५५ 250 159659 672060 508852 2026-08-20T10:13:16Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672060 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बाँदराकी सभामें|३२५}}</noinclude>हैं, वे बिलकुल थक गये थे। यदि मैंने श्री पटेलको वचन न दिया होता तो स्वयं मेरे लिए भी यहाँ आ सकना कठिन था। श्री पटेल चाहते हैं कि यह राशि छोटी-छोटी रकमोंके रूपमें गरीब लोगोंसे इकट्ठी की जाये। मैं इस बारेमें उनसे सहमत हूँ और यदि इस देशके गरीब लोग थोड़ा-थोड़ा चन्दा देकर एक करोड़ रुपया पूरा कर दें तो मुझे प्रसन्नता हो। हम लगभग एक करोड़ रुपया इकट्ठा करनेमें समर्थ हो गये हैं। ४४ लाख रुपये शेष भारतने दिये हैं और बाकी रुपया इसी महाप्रान्तमें इकट्ठा किया गया है। मैं इस बातको प्रकाशित कर देना चाहता था कि हमने एक करोड़ रुपया इकट्ठा कर लिया है और इस देशकी लाज रह गई है। कल आधी राततक हम ८१-८२ लाखतक ही इकट्ठा कर पाये थे। जब हमने थोड़ेसे दिनोंमें इतनी बड़ी रकम इकट्ठी कर ली है तो हम शेष रकम भी बहुत आसानीसे इकट्ठी कर सकेंगे। फिर भी मैंने अपने ४ या ५ धनी मित्रोंसे इस कमीके बारेमें बातचीत की है और उन्होंने शेष रकमकी पूर्ति करनेका वचन दे दिया है। मैं इस बातको संसारके सम्मुख प्रकट करना नहीं चाहता कि मैंने इस प्रकारका आश्वासन प्राप्त कर लिया है, क्योंकि मेरे मित्रोंने मुझसे कहा है कि यदि उनका नाम प्रकट कर दिया जायेगा तो इसका अर्थ उनका विज्ञापन करना ही होगा; इसके अतिरिक्त अन्य लोग अपना-अपना चन्दा रोक लेंगे। इसलिए मुझे आपके सम्मुख यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता होती है कि एक करोड़ रुपया तो पूरा हो ही जायेगा। यदि यह रकम छोटे-छोटे चन्दोंके रूपमें इकट्ठी की जाती तो मैं कहता कि बाँदराके लोग स्वराज्यके योग्य हैं। यदि बाँदराके धनी लोगोंने कुछ नहीं दिया है तो मेरे लिए यह चिन्ताकी बात नहीं है। वे आगे चलकर देंगे। जब मुझे श्री पटेलने यह सूचना दी कि बाँदरामें तो केवल १०,००० रुपये इकट्ठे किये जा सकेंगे तो मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा। यद्यपि इस रकमके इकट्ठा करनेपर मैं आपको बधाई देता हूँ, किन्तु आपमें से कुल मिलाकर कांग्रेसके जितने सदस्य बने हैं और बाँदरामें जितने चरखे चल रहे हैं उसपर आपको मैं बधाई नहीं दे सकता। मुझे एक करोड़ रुपयकी चिन्ता नहीं है, किन्तु मुझे कांग्रेसके एक करोड़ सदस्य बनानेकी चिन्ता जरूर है। जितने रुपयोंकी जरूरत मुझे है उसके बारेमें जब मैं अपने एक मित्रसे बात कर रहा था और उससे यह कह रहा था कि मैं एक करोड़ रुपयेसे सन्तुष्ट नहीं होऊँगा, मुझे तो कई करोड़ रुपये चाहिए, तब मेरे उस मित्रने कहा कि विक्टोरिया स्मारक-कोषमें भी लगभग ५२ लाख रुपये ही इकट्ठे हो पाये थे और वह कोष अधिकारियोंके प्रभावको काममें लाते हुए दबाव और खुशामदके जरिये इकट्ठा किया गया था। तिलक स्वराज्य-कोष बिना किसी दबावके और केवल स्वेच्छासे दिये गये पैसोंसे इकट्ठा किया गया है। तो फिर भला उस रकमको इकट्ठा करनेमें कितना प्रयत्न न किया गया होगा! हमने बेजवाड़ाका कार्यक्रम पूरा कर लिया है। लेकिन अब हमें कांग्रेसके सदस्य बनाने हैं और घर-घरमें संकल्पित संख्यामें चरखे चलवाने हैं। इस देशमें ६ करोड़<noinclude></noinclude> nuv2dq6pvr4zzrruopp7s3psgaqit5s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५६ 250 159660 672067 508853 2026-08-20T10:20:24Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>परिवार रहते हैं; प्रत्येक घरमें चरखा होना चाहिए। मैं केवल चरखोंकी संख्यासे या उनके कते हुए सूतकी मात्रासे सन्तुष्ट होनेवाला नहीं हूँ। मुझे उससे भी बड़ी चीज चाहिए। मैं आपके शरीरोंपर चरखेकी छाप देखना चाहता हूँ। मेरे कहनेका अर्थ यह है कि आप सबको खद्दर पहनना चाहिए। यदि आप खद्दरका व्यवहार करते हैं तो साफ जाहिर है कि आप चरखेका उपयोग कर रहे हैं। हम इतने सालोंसे एक भ्रममें फँसे रहे और इसलिए हम विदेशी कपड़ेका व्यवहार करते रहे। यदि हम स्वराज्य चाहते हैं तो हमें केवल खद्दरका ही उपयोग करना चाहिए। भारतीयोंको केवल स्वदेशी वस्त्र ही पहनने चाहिए और हर कार्यके लिए खद्दर ही काममें लाना चाहिए। लोकमान्य तिलकने एक बार अपने एक मित्रसे कहा था कि यदि हमारा देश रोगों और मौसमी बुखारका घर बन जाये तब भी हम भारत छोड़कर इंग्लैंड नहीं जायेंगे और वहाँ रहकर स्वराज्य लेनेका प्रयत्न नहीं करेंगे। भारत हमारी मातृभूमि है और उसका जलवायु चाहे जितना बुरा हो तो भी हमें यहीं रहना है और यहीं मरना है। जब-तक हम ऐसा नहीं कर पाते तबतक इस देशके लोग कभी सुखी नहीं रह सकेंगे। यदि हमें भारतसे प्रेम है, यदि हम उन तिलक महाराजका आदर करते हैं जिन्होंने यह कहा था कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, तो भारतीयोंको विदेशी कपड़ेका व्यवहार छोड़ देना चाहिए। अभी उस दिन एक पारसी महिलाने मुझे अपने एक हजारके विदेशी जेवर भेजे; मैंने उस महिलाको नहीं देखा है और मैं उसका नाम भी नहीं जानता। भारतीयोंको विदेशी जेवर क्यों पहनने चाहिए? क्या भारतके सब सुनार मर गये हैं? जबतक भारतमें सुनार हैं और उन्हें काफी काम नहीं मिल रहा है तबतक हम विदेशोंमें बने आभूषण क्यों पहनें? मुझे निश्चय है कि जिस पारसी बहनने मुझे अपने आभूषण दिये हैं वह अब खद्दर पहन रही होगी या यदि अबतक खद्दर नहीं पहनती होगी, तो अब जल्दी ही पहनने लगेगी। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप शुद्ध स्वदेशीका व्यवहार करें। मैं आपसे धन देनेका अनुरोध नहीं करता, क्यों कि धन तो किसी-न-किसी तरह इकट्ठा किया ही जा सकता है; किन्तु मेरी आपसे पहली प्रार्थना यही है कि आप विदेशी कपड़ा पहनना छोड़ दें। सितम्बरके बाद मैं आपसे ये बातें नहीं कहूँगा। सितम्बरके बाद मैं अपने मुसलमान मित्रोंसे यह कहने जा रहा हूँ कि यदि वे खिलाफतके प्रश्नका निपटारा अपनी इच्छाके अनुसार कराना चाहते हैं तो वे केवल स्वदेशी कपड़े का व्यवहार करें। आपमें से हरएक स्त्री-पुरुषको चरखेका प्रयोग करना चाहिए और आजसे केवल स्वदेशी कपड़ेका व्यवहार करनेका निश्चय कर लेना चाहिए। हमारे कार्योंमें एक नया दौर शुरू हुआ है और यदि हम स्वदेशी कपड़ेका उपयोग करेंगे तो हमारी शक्ति कई गुनी हो जायेगी। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude> 8ulvmguy79s7f56apnrpz3kocd4vso3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५७ 250 159661 672070 508854 2026-08-20T10:27:40Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672070 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१४८. 'नवजीवन' को तार'''<ref>यह सन्देश तार द्वारा बम्बईसे भेजा गया था।</ref>}}}} {{Right|बम्बई<br>[१ जुलाई, १९२१]}} भारत लोकमान्य की स्मृति और स्वराज्य-स्थापनाके लिए बनाये गये कोषमे जून मासके अन्ततक लगभग ८० लाख रुपया इकट्ठा करनेमें सफल हो गया है। मुझे उम्मीद है कि शेष बीस लाख रुपया जनता बिना किसी देरके पूरा कर देगी। यद्यपि बेजवाड़ाके कार्यक्रमको अक्षरशः पूरा हुआ नहीं कहा जा सकता तथापि यह कह सकते हैं कि जनताने कांग्रेसकी माँगका सुन्दर उत्तर दिया है। बम्बईने अपनी उदारता और दान देनेकी क्षमताके अपने पहले सभी रेकार्ड तोड़ दिये है। उसे और दूसरे प्रान्तोंको मिलकर अब बाकी रकम को तुरन्त पूरा कर लेना चाहिए। लेकिन इस समय तो सबसे ज्यादा ध्यान विदेशी कपड़ेके सम्पूर्ण बहिष्कार और कांग्रेसके करोड़ सदस्य बनानेके कार्यको पूरा करनेकी ओर लगाना चाहिए। {{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', ३-७-१९२१|1em}} {{Dhr|}} {{C|{{larger|'''१४९. 'नवजीवन'को तार'''<ref>यह तार पिछले शीर्षकमें जिस तारका उल्लेख है उसके तुरन्त बाद दिया गया था।</ref>}}}} {{Right|बम्बई<br>[१ जुलाई, १९२१]}} देशबन्धु चित्तरंजन दास तार द्वारा खबर देते हैं कि तिलक स्वराज्य-कोषमें बंगालने २५ लाख रुपया दिया है। इस तरह हिन्दुस्तानने अपनी प्रतिज्ञाका एक करोड़ रुपया पूरा कर लिया है। {{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', ३-७-१९२१|1em}} {{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude> n4rdr5mcs1fjj9lt4tar49nezptp5h2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५८ 250 159662 672116 508855 2026-08-20T11:37:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 672116 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१५०. विदेशी कपड़ेका बहिष्कार'''<ref></ref>}}}} ईश्वर महान् है। जिधरसे आशा नहीं होती वह उधरसे सहायता भेज देता है। अभी कुछ ही दिन पहले श्री दासने<ref></ref> मुझे तार द्वारा यह सूचित किया था कि बंगालमें तीन लाखसे ज्यादा रुपया इकट्ठा नहीं हुआ है। मेरे लिए यह घोषणा करना कोई छोटी बात नहीं थी कि भारतमें नियत तिथितक पूरा एक करोड़ रुपया एकत्रित नहीं हो पाया। मैंने मित्रोंसे कम पड़नेवाली रकमकी पूर्तिका जिम्मा लेनेका बहुत आग्रह किया है। वे मुझे यह रकम देनेके लिए तैयार हो गये लेकिन उन्होंने यह ठीक नहीं समझा कि उनके नाम संसारके सम्मुख प्रकट किये जायें, क्योंकि उनकी रायमें यह प्रसिद्धि पानेके प्रयत्न-जैसा लगता है। उन्होंने कहा कि रकमको जहाँका तहाँ मानकर कांग्रेस महासमितिको बैठकसे पहले बाकी रकम सार्वजनिक रूपसे इकट्ठी करनेका प्रयत्न किया जाये तो ज्यादा अच्छा होगा। मैंने हार तो मान ली, लेकिन मेरा हृदय बहुत खिन्न हुआ कि ईश्वरने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी। फिर भी मैं यह जानता था कि ईश्वर सहायता देनेसे कभी नहीं चूकता। उसने बंगालको मेरी रक्षाके लिए भेज दिया और बेजवाड़ामें राष्ट्रने जो संकल्प किया था वह हो गया। हमें नम्र भावसे उसके चरणोंमें सिर झुकाना चाहिए; खुशियाँ मनानेके लिए हमें मार्गमें हरगिज नहीं रुकना है। हमें आगे बढ़ते जाना चाहिए। यद्यपि संग्रह की हुई कुल रकम अब एक करोड़ ५ लाख<ref></ref> रुपयेसे ऊपर पहुँच गई है, फिर भी प्रत्येक प्रान्तको एक करोड़ रुपयेमें से अपनी आनुपातिक रकम तो पूरी करनी ही चाहिए। लेकिन हमारा अगला आवश्यक कदम विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार करना है। पहली अगस्तको हम लोकमान्य तिलककी पुण्यतिथि मनाते हैं। यदि हम निश्चित रूपसे और विशेष प्रयास करें तो हम इस तारीखसे पहले ही विदेशी कपड़ेका लगभग पूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं। मैं जानता हूँ कि इसके लिए हमें बहुत बड़े बहुमतका समर्थन चाहिए। लेकिन यदि हम उतने ही उत्साहसे काम करें जितना हमने धनसंग्रह करनेमें दिखाया है तो सबका ऐसा समर्थन प्राप्त करना असम्भव नहीं है। भारतमें स्वराज्यकी स्थापना करनेकी शक्ति तभी आयेगी, उससे पहले नहीं। हम विदेशी कपड़े- {{Dhr|}} १. इस लेखका मूल शीर्षक था "अब हमें क्या करना चाहिए: एक अगस्ततक कपड़ेका बहिष्कार"। २. चितरंजन दास। ३. २-७-१९२१ के '''बॉम्बे क्रॉनिकल'''में छपी रिपोर्टके अनुसार इस रकममें प्रान्तोंका भाग (लाखोंमें) इस तरह था : बम्बई नगर ३७; बंगाल २५; गुजरात और काठियावाड़ १५; पंजाब ५; मद्रास और आन्ध्र ४; मध्य प्रदेश और बरार ३; महाराष्ट्र (बम्बईके उपनगरों सहित) ३; बिहार ३; सिन्ध २; उत्तर प्रदेश २; कर्नाटक १; दिल्ली २; अजमेर और मारवाड़ १/२; उड़ीसा और असम है १/४; वर्मा १४।<noinclude></noinclude> ba5fv4ct6r52dr60lbxomy9yfuet5kr 672118 672116 2026-08-20T11:44:41Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 672118 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१५०. विदेशी कपड़ेका बहिष्कार'''<ref>इस लेखका मूल शीर्षक था "अब हमें क्या करना चाहिए: एक अगस्ततक कपड़ेका बहिष्कार"।</ref>}}}} ईश्वर महान् है। जिधरसे आशा नहीं होती वह उधरसे सहायता भेज देता है। अभी कुछ ही दिन पहले श्री दासने<ref>चितरंजन दास।</ref> मुझे तार द्वारा यह सूचित किया था कि बंगालमें तीन लाखसे ज्यादा रुपया इकट्ठा नहीं हुआ है। मेरे लिए यह घोषणा करना कोई छोटी बात नहीं थी कि भारतमें नियत तिथितक पूरा एक करोड़ रुपया एकत्रित नहीं हो पाया। मैंने मित्रोंसे कम पड़नेवाली रकमकी पूर्तिका जिम्मा लेनेका बहुत आग्रह किया है। वे मुझे यह रकम देनेके लिए तैयार हो गये लेकिन उन्होंने यह ठीक नहीं समझा कि उनके नाम संसारके सम्मुख प्रकट किये जायें, क्योंकि उनकी रायमें यह प्रसिद्धि पानेके प्रयत्न-जैसा लगता है। उन्होंने कहा कि रकमको जहाँका तहाँ मानकर कांग्रेस महासमितिको बैठकसे पहले बाकी रकम सार्वजनिक रूपसे इकट्ठी करनेका प्रयत्न किया जाये तो ज्यादा अच्छा होगा। मैंने हार तो मान ली, लेकिन मेरा हृदय बहुत खिन्न हुआ कि ईश्वरने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी। फिर भी मैं यह जानता था कि ईश्वर सहायता देनेसे कभी नहीं चूकता। उसने बंगालको मेरी रक्षाके लिए भेज दिया और बेजवाड़ामें राष्ट्रने जो संकल्प किया था वह हो गया। हमें नम्र भावसे उसके चरणोंमें सिर झुकाना चाहिए; खुशियाँ मनानेके लिए हमें मार्गमें हरगिज नहीं रुकना है। हमें आगे बढ़ते जाना चाहिए। यद्यपि संग्रह की हुई कुल रकम अब एक करोड़ ५ लाख<ref>२-७-१९२१ के '''बॉम्बे क्रॉनिकल'''में छपी रिपोर्टके अनुसार इस रकममें प्रान्तोंका भाग (लाखोंमें) इस तरह था : बम्बई नगर ३७; बंगाल २५; गुजरात और काठियावाड़ १५; पंजाब ५; मद्रास और आन्ध्र ४; मध्य प्रदेश और बरार ३; महाराष्ट्र (बम्बईके उपनगरों सहित) ३; बिहार ३; सिन्ध २; उत्तर प्रदेश २; कर्नाटक १; दिल्ली २; अजमेर और मारवाड़ १/२; उड़ीसा और असम है १/४; वर्मा १ १/४।</ref> रुपयेसे ऊपर पहुँच गई है, फिर भी प्रत्येक प्रान्तको एक करोड़ रुपयेमें से अपनी आनुपातिक रकम तो पूरी करनी ही चाहिए। लेकिन हमारा अगला आवश्यक कदम विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार करना है। पहली अगस्तको हम लोकमान्य तिलककी पुण्यतिथि मनाते हैं। यदि हम निश्चित रूपसे और विशेष प्रयास करें तो हम इस तारीखसे पहले ही विदेशी कपड़ेका लगभग पूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं। मैं जानता हूँ कि इसके लिए हमें बहुत बड़े बहुमतका समर्थन चाहिए। लेकिन यदि हम उतने ही उत्साहसे काम करें जितना हमने धनसंग्रह करनेमें दिखाया है तो सबका ऐसा समर्थन प्राप्त करना असम्भव नहीं है। भारतमें स्वराज्यकी स्थापना करनेकी शक्ति तभी आयेगी, उससे पहले नहीं। हम विदेशी कपड़े- {{Dhr|}}<noinclude></noinclude> 8jn3reqgco8lgib28ftm88xe130v5nu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७६ 250 159691 671851 508917 2026-08-19T16:44:16Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671851 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तथा उन मजदूरोंसे जो बन्दरगाहोंपर काम करते हैं, कहें कि वे विदेशी जहाजोंपर माल न चढ़ायें। मैं तो समझता हूँ कि ये दोनों सुझाव अस्वाभाविक है और उनको कार्यरूपमें परिणत करना भी असम्भव है। जरा देरके लिए मान लीजिए कि हम एक क्षणमें राली ब्रदर्सका कारोबार चौपट कर सकते हैं, पर इसका असर यूनानपर क्या पड़ सकता है? राली ब्रदर्स सारा या ज्यादातर माल यूनान नहीं भेजते। उनका व्यापार तो सारी दुनियामें फैला हुआ है। अतएव स्वदेशीका काम उठानेकी अपेक्षा उनके व्यापारके साथ झगड़ना ज्यादा कठिन होगा। ऐसा करना गलत है इस बातको जाने दें तो भी इस तरहके काम करके हम अपनी हँसी करायेंगे, जो ठीक ही होगी। विदेश जानेवाले जहाजोंपर काम करनेवाले मजदूरोंके काममें बाधा डालना भी उतना ही असंगत है। यदि जनतापर हमारा इतना पूर्ण नियन्त्रण होता तो हम इस समरमें अबतक कभीके जीत गये होते। मालका बाहर जाना बन्द कर देने के लिए हमें आज काम करनेवाले सारे मजदूरोंका काम हमेशाके लिए या एक अनिश्चित समयतक बन्द रखना होगा। यही नहीं बल्कि ऐसा करते समय यह पहले ही मान लिया जाता है कि जो मजदूर काम बन्द कर देंगे उनकी जगह दूसरे मजदूरोंको कामपर न आने देनेकी सामर्थ्य हममें है। मेरा तो खयाल है कि अभी हम इतने संगठित नहीं है। ऐसी कोशिशमें नाकामयाब होने के सिवा और कुछ हासिल नहीं होगा। और भी बुरा नतीजा न निकले तो गनीमत समझिए। इसका एक ही सम्भव उपाय है कि हम तुरन्त सविनय अवज्ञा शुरू कर दें। परन्तु मुझे इतमीनान हो गया है कि देश अभी बड़े पैमानेपर इसे करनेके लिए तैयार नहीं है। पर यदि देश इस बातको दिखा दे कि उसमें संगठनकी इतनी काफी क्षमता है, उसके पास इतने विभिन्न साधन हैं और उसमें इतनी नियमबद्धता है जितनी कि स्वदेशी जैसे सर्वथा व्यवहार्य कार्यको पूर्णत: सफल बनानेके लिए आवश्यक है, तो कानूनका सविनय भंग बिना जोखिमके सफलतापूर्वक शुरू किया जा सकता है। आइए, हम यह आशा और प्रभुसे प्रार्थना करें कि देश ऐसा कर दिखाये। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude> mjv3xyfmt3iyfra7v3bgfu0fondyi6b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७७ 250 159693 671852 508919 2026-08-19T16:53:05Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671852 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२७०. द्वेषपूर्ण अभियोग'''}}}} संयुक्त प्रान्तके दौरे में दमनकी अजीब कहानियाँ मेरे सुनने में आई। अभी तो मैं केवल उन दो अभियोगोंकी चर्चा करना चाहता हूँ जिनको द्वेषपूर्ण कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है। सीतापुरके जमींदार मोहनसिंह दरमल और भूतपूर्व तहसीलदार शम्भुनाथको सम्मन भेजे गये हैं और पूछा गया है कि उनसे जमानत क्यों न माँगी जाये। उनका अपराध सम्मनमें यह बताया गया है: :{{gap}}'''चूँकि रामगढ़के पटवारीकी सूचनासे यह प्रकट होता है कि''' :{{gap}}'''१. ठा॰ मोहनसिंह रामगढ़वाले''' :{{gap}}'''२. बा॰ शम्भुनाथ, भूतपूर्व नायब तहसीलदार, जो अब भुवाली और भुन्या-घरमें हैं, सरकारके विरुद्ध आन्दोलनमें भाग ले रहे है और तिलक स्वराज्य-कोषकी हुण्डियाँ बेच रहे हैं। चूँकि कानून द्वारा संस्थापित सरकारके विरुद्ध ऐसे आन्दोलनसे आम लोगोंके अमन चैनमें विघ्न पड़ने और शान्तिके भंग होनेका अन्देशा है, अतः इन लोगोंसे स्पष्टीकरण माँगा जाता है कि उनमें से हर एकसे एक साल तक शान्ति कायम रखने के लिए १,००० रुपयेके मुचलके और ५००-५०० रुपयेकी दो जमानतें क्यों न ली जानी चाहिए।''' ऊपरी तौरपर सम्मनसे कोई अपराध प्रकट नहीं होता। परन्तु पटवारीका बयान पढ़कर स्थितिकी दुःखजनक हास्यास्पदता बढ़ जाती है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्तने पण्डित मोतीलाल नेहरूको चन्दा दिया है और उसे रामगढ़-जैसी हवाखोरी-की जगहमें पण्डित (मोतीलाल) नेहरू-जैसे पक्के असहयोगीके साथ देखा गया है। यह सच है कि न्यायाधीशमें ऐसे प्रसंगोचित तथ्यका जिक्र करनेका साहस नहीं है, परन्तु जैसा कि दूसरे अभियुक्तके बयानसे सुस्पष्ट हो जाता है, उसका एकमात्र अपराध पण्डितजीके साथ रहना और उनकी सेवा करना ही है। अभियुक्त अपने जिलेका एक प्रसिद्ध व्यक्ति है। यह भी सभी जानते हैं कि वह क्षयरोगसे पीड़ित है और अब उसका रोग चरम अवस्थामें है। उसका दाहिना फेफड़ा समाप्त-प्रायः है। उसका बायाँ फेफड़ा और उसकी आँतें भी बहुत खराब हैं। उसने महीनोंसे किसी राजनैतिक काममें भाग नहीं लिया है। उसने भाषण भी नहीं दिये हैं। वह रामगढ़में पण्डितजीकी तरह स्वास्थ्य सुधार रहा है। अतः न्यायाधीशके लिए उसे गिरफ्तार करनेका या गिरफ्तारीके बाद उसपर मुकदमा चालू रखनेका कोई कारण ही नहीं है। तथ्य यह है कि न्याया- धीश असहयोगसे तनिक भी सम्बद्ध लोगोंको स्पष्टतः आतंकित करना चाहता है। इसमें वे लोग भी आ जाते हैं जो गाँवमें चन्दा इकट्ठा करते हैं या असहयोगियोंकी सहायता करते हैं। कहा जा सकता है कि ऐसी घटनाएँ वास्तवमें अपवाद-स्वरूप हैं और उनके महत्त्वकी अतिरंजनाकी कोई जरूरत नहीं। मैं इस सिद्धान्तको मानने में असमर्थ हूँ। इस दृष्टान्तमें न्यायाधीशने सम्भवतः एक मौलिक तरीका अपनाया है, परन्तु<noinclude>{{left|२०-३५|1em}}</noinclude> 8qyc00qng5gtz0zb8emuml7u3ikcbiy 671853 671852 2026-08-19T16:53:26Z अँजली चौधरी 2439 671853 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२७०. द्वेषपूर्ण अभियोग'''}}}} संयुक्त प्रान्तके दौरे में दमनकी अजीब कहानियाँ मेरे सुनने में आई। अभी तो मैं केवल उन दो अभियोगोंकी चर्चा करना चाहता हूँ जिनको द्वेषपूर्ण कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है। सीतापुरके जमींदार मोहनसिंह दरमल और भूतपूर्व तहसीलदार शम्भुनाथको सम्मन भेजे गये हैं और पूछा गया है कि उनसे जमानत क्यों न माँगी जाये। उनका अपराध सम्मनमें यह बताया गया है: :{{gap}}'''चूँकि रामगढ़के पटवारीकी सूचनासे यह प्रकट होता है कि''' :{{gap}}'''१. ठा॰ मोहनसिंह रामगढ़वाले''' :{{gap}}'''२. बा॰ शम्भुनाथ, भूतपूर्व नायब तहसीलदार, जो अब भुवाली और भुन्या-घरमें हैं, सरकारके विरुद्ध आन्दोलनमें भाग ले रहे है और तिलक स्वराज्य-कोषकी हुण्डियाँ बेच रहे हैं। चूँकि कानून द्वारा संस्थापित सरकारके विरुद्ध ऐसे आन्दोलनसे आम लोगोंके अमन चैनमें विघ्न पड़ने और शान्तिके भंग होनेका अन्देशा है, अतः इन लोगोंसे स्पष्टीकरण माँगा जाता है कि उनमें से हर एकसे एक साल तक शान्ति कायम रखने के लिए १,००० रुपयेके मुचलके और ५००-५०० रुपयेकी दो जमानतें क्यों न ली जानी चाहिए।''' ऊपरी तौरपर सम्मनसे कोई अपराध प्रकट नहीं होता। परन्तु पटवारीका बयान पढ़कर स्थितिकी दुःखजनक हास्यास्पदता बढ़ जाती है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्तने पण्डित मोतीलाल नेहरूको चन्दा दिया है और उसे रामगढ़-जैसी हवाखोरी-की जगहमें पण्डित (मोतीलाल) नेहरू-जैसे पक्के असहयोगीके साथ देखा गया है। यह सच है कि न्यायाधीशमें ऐसे प्रसंगोचित तथ्यका जिक्र करनेका साहस नहीं है, परन्तु जैसा कि दूसरे अभियुक्तके बयानसे सुस्पष्ट हो जाता है, उसका एकमात्र अपराध पण्डितजीके साथ रहना और उनकी सेवा करना ही है। अभियुक्त अपने जिलेका एक प्रसिद्ध व्यक्ति है। यह भी सभी जानते हैं कि वह क्षयरोगसे पीड़ित है और अब उसका रोग चरम अवस्थामें है। उसका दाहिना फेफड़ा समाप्त-प्रायः है। उसका बायाँ फेफड़ा और उसकी आँतें भी बहुत खराब हैं। उसने महीनोंसे किसी राजनैतिक काममें भाग नहीं लिया है। उसने भाषण भी नहीं दिये हैं। वह रामगढ़में पण्डितजीकी तरह स्वास्थ्य सुधार रहा है। अतः न्यायाधीशके लिए उसे गिरफ्तार करनेका या गिरफ्तारीके बाद उसपर मुकदमा चालू रखनेका कोई कारण ही नहीं है। तथ्य यह है कि न्याया-धीश असहयोगसे तनिक भी सम्बद्ध लोगोंको स्पष्टतः आतंकित करना चाहता है। इसमें वे लोग भी आ जाते हैं जो गाँवमें चन्दा इकट्ठा करते हैं या असहयोगियोंकी सहायता करते हैं। कहा जा सकता है कि ऐसी घटनाएँ वास्तवमें अपवाद-स्वरूप हैं और उनके महत्त्वकी अतिरंजनाकी कोई जरूरत नहीं। मैं इस सिद्धान्तको मानने में असमर्थ हूँ। इस दृष्टान्तमें न्यायाधीशने सम्भवतः एक मौलिक तरीका अपनाया है, परन्तु<noinclude>{{left|२०-३५|1em}}</noinclude> 1nug2r806r5m134hdoqrvoq44chknq6 671854 671853 2026-08-19T16:54:39Z अँजली चौधरी 2439 671854 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२७०. द्वेषपूर्ण अभियोग'''}}}} संयुक्त प्रान्तके दौरे में दमनकी अजीब कहानियाँ मेरे सुनने में आई। अभी तो मैं केवल उन दो अभियोगोंकी चर्चा करना चाहता हूँ जिनको द्वेषपूर्ण कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है। सीतापुरके जमींदार मोहनसिंह दरमल और भूतपूर्व तहसीलदार शम्भुनाथको सम्मन भेजे गये हैं और पूछा गया है कि उनसे जमानत क्यों न माँगी जाये। उनका अपराध सम्मनमें यह बताया गया है: :{{gap}}'''चूँकि रामगढ़के पटवारीकी सूचनासे यह प्रकट होता है कि''' :{{gap}}'''१. ठा॰ मोहनसिंह रामगढ़वाले''' :{{gap}}'''२. बा॰ शम्भुनाथ, भूतपूर्व नायब तहसीलदार, जो अब भुवाली और भुन्या-घरमें हैं, सरकारके विरुद्ध आन्दोलनमें भाग ले रहे है और तिलक स्वराज्य-कोषकी हुण्डियाँ बेच रहे हैं। चूँकि कानून द्वारा संस्थापित सरकारके विरुद्ध ऐसे आन्दोलनसे आम लोगोंके अमन चैनमें विघ्न पड़ने और शान्तिके भंग होनेका अन्देशा है, अतः इन लोगोंसे स्पष्टीकरण माँगा जाता है कि उनमें से हर एकसे एक साल तक शान्ति कायम रखने के लिए १,००० रुपयेके मुचलके और ५००-५०० रुपयेकी दो जमानतें क्यों न ली जानी चाहिए।''' ऊपरी तौरपर सम्मनसे कोई अपराध प्रकट नहीं होता। परन्तु पटवारीका बयान पढ़कर स्थितिकी दुःखजनक हास्यास्पदता बढ़ जाती है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्तने पण्डित मोतीलाल नेहरूको चन्दा दिया है और उसे रामगढ़-जैसी हवाखोरी-की जगहमें पण्डित (मोतीलाल) नेहरू-जैसे पक्के असहयोगीके साथ देखा गया है। यह सच है कि न्यायाधीशमें ऐसे प्रसंगोचित तथ्यका जिक्र करनेका साहस नहीं है, परन्तु जैसा कि दूसरे अभियुक्तके बयानसे सुस्पष्ट हो जाता है, उसका एकमात्र अपराध पण्डितजीके साथ रहना और उनकी सेवा करना ही है। अभियुक्त अपने जिलेका एक प्रसिद्ध व्यक्ति है। यह भी सभी जानते हैं कि वह क्षयरोगसे पीड़ित है और अब उसका रोगचरम अवस्थामें है। उसका दाहिना फेफड़ा समाप्त-प्रायः है। उसका बायाँ फेफड़ा और उसकी आँतें भी बहुत खराब हैं। उसने महीनोंसे किसी राजनैतिक काममें भाग नहीं लिया है। उसने भाषण भी नहीं दिये हैं। वह रामगढ़में पण्डितजीकी तरह स्वास्थ्य सुधार रहा है। अतः न्यायाधीशके लिए उसे गिरफ्तार करनेका या गिरफ्तारीके बाद उसपर मुकदमा चालू रखनेका कोई कारण ही नहीं है। तथ्य यह है कि न्याया-धीश असहयोगसे तनिक भी सम्बद्ध लोगोंको स्पष्टतः आतंकित करना चाहता है। इसमें वे लोग भी आ जाते हैं जो गाँवमें चन्दा इकट्ठा करते हैं या असहयोगियोंकी सहायता करते हैं। कहा जा सकता है कि ऐसी घटनाएँ वास्तवमें अपवाद-स्वरूप हैं और उनके महत्त्वकी अतिरंजनाकी कोई जरूरत नहीं। मैं इस सिद्धान्तको मानने में असमर्थ हूँ। इस दृष्टान्तमें न्यायाधीशने सम्भवतः एक मौलिक तरीका अपनाया है, परन्तु<noinclude>{{left|२०-३५|1em}}</noinclude> q998dccpysfmrw4b0bfub2kxlggw8hy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७८ 250 159694 671876 508920 2026-08-20T00:44:29Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>संयुक्त-प्रान्तमें मैंने जो-कुछ देखा उससे मैं इस निष्कर्षपर पहुँचा हूँ कि वहाँ एक ऐसा परोक्ष आतंकवाद चालू है जैसा शायद सिन्धको छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य असहयोगकी समस्त प्रवृत्तियोंको कुचल डालना है, चाहे वे कितनी ही अहिंसात्मक और सब प्रकारसे निर्दोष क्यों न हों। अली भाइयोंके क्षमा-याचनाके वक्तव्यका भी अत्यन्त बेईमानीभरा उपयोग किया जा रहा है उसका उपयोग करनेवाले अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाकी रीति और विधिसे परिचित है। परन्तु अली भाइयोंके इस वीरतापूर्ण कार्यको विकृत रूपमें प्रस्तुत करना इन लोगोंकी उन धूर्तताओं-की तुलनामें कुछ नहीं है जिन्हें ये असहयोगियोंको झुकाने और दूसरोंको उनके मार्गसे हटाने के उद्देश्यसे प्रयोगमें लाते हैं। मुझे पक्का पता है कि असहयोगका झण्डा उठानेकी हिम्मत करनेवाले निर्धनोंको इसलिए सताया जाता है कि वे कांग्रेस कमेटीमें शामिल न हों और उनको वैसे ही आपत्तिजनक तरीकोंसे उन शान्ति सभाओंमें शामिल होनेके लिए बाध्य किया जाता है जो वस्तुतः गैरकानूनी हैं; क्योंकि उनके बनाने और चलाने में अवैध और अनैतिक विधियाँ अपनाई जाती है। संयुक्त-प्रान्तकी सरकार कूट और भीरु ढंगसे वही कर रही है जो सर माइकेल ओ’डायरकी सरकारने लट्ठमार तरीकेसे किया था। उन्होंने अपनी नीतिके अनुरूप अमल किया और सब नेताओंको गिरफ्तार कर खुलेआम जलियाँवालाका वातावरण बनानेका साहस दिखाया था। मैं इस तथ्यकी ओर दूसरे स्थानोंपर पाठकोंका ध्यान आकृष्ट कर चुका हूँ कि पंजाबमें सैनिक भरतीके दिनोंमें जलियाँवालासे भी भीषण घटनाएँ हो चुकी हैं, किन्तु उनकी ओर किसीका ध्यान नहीं गया, क्योंकि नेता गिरफ्तार नहीं किये गये थे। संयुक्त-प्रान्तकी सरकार श्री शेरवानीके जैसे इक्के-दुक्के उदाहरणोंको छोड़कर बड़े नेताओंको गिरफ्तार नहीं करेगी। सरकारने श्री रंगा अय्यरको गिरफ्तार किया है। उसने अभी तक पण्डित जवाहरलाल नेहरू या श्री जोजेफको हाथ भी नहीं लगाया है, हालाँकि चुनौती तीनोंने साथ-ही-साथ दी थी। मैंने संयुक्त-प्रान्तके अपने निरीक्षणको लेखबद्ध करनेका झंझट इसलिए उठाया है कि मैंने श्री चिन्तामणिका वह भाषण पढ़ा है जिसमें उन्होंने सरकारकी कार्रवाईका जोरदार समर्थन किया है और मुझपर यह जोर भी डाला गया है कि मैं पूर्ण उत्तरदायी सरकारकी तरह सुधारोंको कार्यान्वित करनेवाले उन मन्त्रियोंको प्रोत्साहन दूँ। मेरे तुच्छ विचारमें जहाँ भी सम्भव है वहाँ सुधारोंको और सुधारोंके अन्तर्गत बनाये गये मन्त्रियोंका उपयोग चतुर परन्तु बेईमान नौकरशाहीको सहारा देनेके लिये किया जा रहा है। मंत्री इस बातको नहीं जानते और वे अनचाहे उसके हाथोंकी कठपुतली बन रहे हैं, किन्तु इससे नीतिकी सदोषतामें कोई कमी नहीं आती। हाँ, इस स्थितिमें मंत्रियोंका दोष कुछ हलका जरूर मालूम पड़ता है। मुझे यह विश्वास करने में हिचक है कि राजा साहब महमूदाबाद और श्री चिन्तामणि यह जानते है कि वे क्या कर रहे हैं। मेरा खयाल तो यही होता है कि वे नौकरशाहीके जालमें मजबूरन फँस गये हैं और उनके सम्मुख जो प्रत्यक्षतः उचित दिखनेवाली दलीलें रखी गई हैं उनके कारण वे उन बातोंको क्षम्य मान लेते हैं जिन्हें बेहिचक निन्दित ठहराते। ‘इंडिपेंडेंट’ ने लिखा है कि राजा महमूदाबादने उस जिला न्यायाधीशके कार्यका समर्थन किया है जिसने पूर्वी बदायूँके एक मुन्सरिमको अपने बेटेका, अन्यथा<noinclude></noinclude> h5hhdiw988sw4encftryytakykvpet3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७९ 250 159696 671877 508922 2026-08-20T00:49:40Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||मेरी भूल|५४७}}</noinclude>जिसे दफा १४४ के अन्तर्गत नोटिस दिया गया था, राजभक्तिका शपथ-पत्र दाखिल न करनेपर मुअत्तिल कर दिया था। वह जबतक आवश्यक शपथ-पत्र दाखिल न करे तबतक के लिए १० मईको मुअत्तिल किया गया। यह बात सच है कि पुत्र पिताके साथ रहता था। फल यह हुआ कि मुन्सरिमने ६ जूनको अपने बेटेकी ओरसे अमन सभामें शामिल होनेकी अर्जी पेश कर दी और अपने बेटेकी इच्छानुसार काम करनेकी स्वतन्त्रताको बेचकर नौकरीपर अपनी बहाली हासिल कर ली। यदि हम पर्देके पीछे झाँककर देख सकते तो सम्भवतः हमें बेचारे मुन्सरिमकी मुअत्तिलीके समर्थक गुप्त खरीते मिल जाते। खैर, जो भी हो यह दुःखजनक तथ्य है कि सरकारी नौकरोंपर यह दबाव डाला जा रहा है कि वे अपने लड़कोंको असहयोग आन्दोलनसे हटा लें। मुझे कोई शक नहीं कि तीन साल पहले राजा साहब स्वयं सरकारी नौकरों और उनके परिवारोंके ऐसे भयंकर पतनके विरुद्ध मुझसे कहीं अधिक सशक्त रूपसे लिखते और भाषण देते थे। मंत्रिगण बेईमान लोगोंके हाथों कठपुतली बनाये जा रहे हैं इस सत्यकी ओर लोगोंका ध्यान आकृष्ट करने से भी अधिक मतलबकी बात यह है कि असहयोगियों-को सरकारके यहाँ उल्लिखित अवैध और अनैतिक कार्योंसे हतोत्साह न होना चाहिए प्रत्युत यह समझ लेना चाहिए कि हमें ऐसे और इससे भी कड़े दमनकी आशा रखने और उसे यह मानकर कि विश्वके सब सुधारकोंके भाग्यमें यही बदा है, प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करने की जरूरत है। आततायी सचमुच यही विश्वास रखते हैं कि हम गलती कर रहे हैं और देशको हानि पहुँचा रहे है और जिस आन्दोलनके हम समर्थक हैं वह कुचला जाता हो तो उसको कुचलने में कैसे साधन प्रयुक्त किये जाते हैं यह बात कोई महत्त्व नहीं रखती। अतः हमें दमनको विजयकी प्रस्तावना समझना चाहिए, और इस कारण उसका स्वागत करना चाहिए और उससे अपने निश्चयको दृढ़तर बनाना चाहिए। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''२७१. मेरी भूल'''}}}} परमात्मा ही जानता है कि मैंने कितनी बार भूलें की हैं। जो लोग यह समझते हैं कि मुझसे भूल नहीं होती वे मुझे नहीं पहचानते। मेरे निजी अनुभवोंने तो मुझे नम्रतापूर्वक इस बातको जानना और मानना ही सिखाया है कि भूलोंसे संग्राम करना ही जीवन है। १९१९में जब मैने बड़ी प्रसन्नतासे सत्याग्रह आरम्भ किया, मैंने देखा कि मैंने बड़ी भारी गलती की है। नडियादमें ज्यों ही मैंने दूरदेशीकी कमी देखी त्यों ही कहा कि यह तो ‘हिमालय जैसी गलत-अन्दाजी’ है। इसमें कोई अत्युक्ति नहीं थी। और यदि इससे भारतकी नैतिक उन्नतिकी क्षति नहीं हुई है तो इसका कारण यह है कि भूलको साफ और पूरे तौरपर कबूल कर लेनेकी बुद्धि मुझमें थी। अब अगले कुछ सप्ताहोंमें एकाग्न होकर “स्वदेशी” का आन्दोलन करते समय<noinclude></noinclude> 01n267cjwctcgeq7s5gz5ktpe0unnfr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८० 250 159699 671878 508925 2026-08-20T00:54:23Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671878 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मैं एक और भूल स्वीकार कर लेना चाहता हूँ। अध्यापकों और विद्यार्थियों के साथ बातचीतमें तो मैंने वह भूल पहले ही कबूल कर ली है। परन्तु अपने चित्तकी शान्ति और साथ ही वर्तमान स्वदेशी-प्रचारके कार्य के लिए उसे सब लोगोंके सामने अधिक निश्चित रूपसे स्वीकार कर लेना आवश्यक है। इन नौ महीनोंके अनुभवने यह बात पक्की कर दी है कि सरकारी शिक्षा-संस्थाओंका बहिष्कार करना ठीक ही था। परन्तु उस समय विद्यार्थियोंको जो मार्ग बताया गया उसमें मेरी कमजोरी थी। इसे मैं कमजोरी इसलिए कहता हूँ कि मुझे अपनी बातपर दूसरोंको विश्वास करा देनेकी अपनी क्षमतापर विश्वास नहीं था। मैने इसके नतीजेको भगवान्पर छोड़नेकी बजाय उसकी चिन्ता खुद ही की। इससे मुझमें दुर्बलता आ गई और मैंने लड़कोंसे कहा, मदरसे छोड़ देनेपर, चाहे गलियोंमें घूमते फिरो, चाहे वैसी ही पढ़ाई पढ़ो या, सबसे बेहतर, स्वराज्य स्थापित होनेतक हाथ-कताईके काममें लग जाओ। परन्तु नागपुर कांग्रेसके प्रस्तावके बाद ही मैंने जान लिया कि लड़कोंको कई मार्ग बताकर मैंने गलती की है।परन्तु अनर्थ तो हो ही चुका था। वह पिछले सितम्बरमें शुरू हुआ और जनवरीसे मैं उसे सुधारने लगा। परन्तु मरम्मत तो हमेशा पैबन्दका काम देती है। और इसीलिए अधिकतर असहयोगी विद्यालयोंमें चरखा कातना एक अनावश्यक कार्य या कालक्षेपका साधन हो गया है। मुझे साहस करके सारी सच्ची बात कहनी थी और बताना था कि हाथसे कातना और बुनना शिक्षा-संस्थाओंके बहिष्कारके प्रस्तावका अभिन्न अंग है। हाँ, यह सच है कि इससे शायद कम लड़कोंने स्कूल छोड़े होते। परन्तु उन्होंने उन हजारों लड़कोंकी बनिस्बत, जिन्होंने इस मार्गके विषयमें निश्चित कल्पना किये बिना ही स्कूल और कालेज छोड़ दिये हैं, बहुत ज्यादा काम किया होता। अबतक तो वे हाथ-कताई और हाथ-बुनाईमें प्रवीण हो गये होते और हमारा स्वदेशीका काम ज्यादा आसान हो गया होता। मैं जानता हूँ कि असहयोगी विद्यालयोंके अध्यापक और विद्यार्थी अपनी पूरी शक्ति इसमें लगा रहे हैं। परन्तु यह मानना होगा कि वे उसे दिक्कतके साथ कर रहे हैं। वे सामान्य रूपसे स्वदेशी या हाथ-कताईके विषयमें कोई विश्वास लेकर नहीं आये हैं। उन्होंने इस प्रश्नपर सिर्फ शिक्षाकी दृष्टिसे ही विचार किया है और ऐसा करनेका उन्हें अधिकार भी था। उनके लिए तो बस इतना ही काफी था कि वे सरकारी शिक्षालयोंसे निकल आयें और इस तरह उन्होंने सरकारका मान घटा दिया। अब यह कहना उनको अखरेगा कि तुम्हारा बहिष्कार पूर्ण तभी हो सकता है जब तुम सूत कातो और खादी तैयार करो, और इस नई (स्वराजी) शिक्षा-विधिकी आरम्भिक पढ़ाई तो यही है कि संग्रामके समयमें हाथ-कताईका तथा कपड़ा तैयार करनेकी दूसरी क्रियाओंका ज्ञान प्राप्त किया जाये। परन्तु अब जब कि गलती हो चुकी है, मुझे उसकी सजा भोगनी लाजिम है; और वह इस रूपमें कि मैं धीरजके साथ शंकालुओंको यह विश्वास करानेका प्रयत्न करूँ कि यदि मैने हाथ-कताईको भी असहयोगके शिक्षा-सम्बन्धी कार्यक्रमका एक आवश्यक अंग बनानेपर जोर दिया होता तो अच्छा होता। अतएव मैं उन सब लोगोंका, जिनका मत मुझसे मिलता है, आह्वान करता हूँ कि वे अब इस भूलको सुधारने में जल्दी करें और जिन राष्ट्रीय शिक्षा-संस्थाओंपर उनका प्रभाव है उनमें सूत और<noinclude></noinclude> r7g0rwu4j8wo9kwe4l3ops6jpgf5prx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६१ 250 159737 671788 508963 2026-08-19T14:38:51Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671788 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||अस्पृश्यता और राष्ट्रीयता|५२९}}</noinclude>उन्हें किस तरह गुलाम बनाया है, इसका जब मैं विचार करता हूँ तब मुझे अपना जीवन भार लगने लगता है। लेकिन मेरी समझमें तो हमारे अत्याचारोंमें अज्ञान है, इरादा नहीं; इसीलिए शब्द-प्रहारोंके बावजूद मैं अत्यन्त प्रेम और विनयसे हिन्दू-संसारको जाग्रत कर रहा हूँ और जी रहा हूँ। अन्त्यजोंके प्रति आज हमारा जो व्यवहार है उसके लिए हमारे पास एक भी नैतिक कारण नहीं है। किसी मैली चीजसे छू जानेपर नहानेकी बात मुझे अच्छी लगती है। मैं स्वयं भी नहाता हूँ। दूसरोंको भी वैसा करनेकी सलाह देता हूँ। लेकिन जो मेरे जैसे ही शरीरसे शुद्ध जान पड़ते हैं उनकी जात पूछकर अगर वे अन्त्यज हों तो उनको त्यागने-का न्याय तो मुझे असह्य है। स्वराज्यमें दुर्बलकी रक्षा प्रधान है। यदि हम उनकी रक्षा करनेके लिए तैयार न हों, अपने कुओंसे उन्हें पानी न भरने दें, उन्हें गन्देसे-गन्दे मुहल्लोंमें रखें, उन्हें अपने स्कूलोंमें न आने दें, और आने भी दें तो उन्हें अलग आसन दें, हमसे भी ज्यादा साफ होकर आनेपर भी उनसे छू जानेपर हम नहायें तो यह हिन्दू-शास्त्र नहीं है; अपितु शास्त्रोंकी ज्यादती है और डायरशाही है। अन्त्यजोंके पक्षके एक भाई मुझे लिखते हैं कि लॉर्ड क्लाइवने<ref>लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव (१७२५-१७७४)।</ref> अन्त्यजोंकी सहायता लेकर अन्य लोगोंका दमन किया था। मैंने इस बातकी जाँच नहीं की है, लेकिन उसकी सचाईके सम्बन्धमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। आज भी अगर अन्त्यज भुलावेमें पड़ जायें तो ऐसे अनेक क्लाइव पड़े हैं जो उसका मनमाना लाभ उठाकर सिर उठानेवालों को कुचलने के लिए तैयार हैं। गोरखोंमें हमारा ही खून है; चाँदपुरमें निर्दोष मजदूरोंपर उनका उपयोग किसने किया? अब सिखोंकी आँखें खुली हैं। लेकिन इस राज्य-व्यवस्थामें हमें दबानेके लिए क्या इस बहादुर कौमका कम उपयोग किया गया है? अपनी दुर्बलताओंको छिपानेसे, सबलता कहकर उनका वर्णन करनेसे, उनमें सुधार करनेकी बातको मुल्तवी रखनेसे हम अपने ही गलेमें फन्दा डालते हैं। जिस धर्ममें गरीबका भाग निकालकर खानेका रिवाज है उसी धर्मके अनुयायी अगर दूरसे ही अन्त्यजोंकी झोलीमें अपनी थालीकी बची हुई जूठन और सड़ा हुआ अनाज फेंकें तो उनके इस अकृत्यको डायरशाही न कहकर और क्या कहा जायेगा? प्रस्तुत पत्र-लेखक कहते हैं कि भडौंच परिषदें जब अन्त्यजोंको दाखिल किया गया उस समय सब लोग वहाँ बैठे रहे सो केवल संकोचवश; लेकिन उनके दिलोंको ठेस पहुँची थी। यदि ऐसी बात है तो इसका मुझे दुःख है। अगर हम स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं तो हम एक-दो व्यक्ति ही क्यों न हों, हमें अपने विचारोंको प्रकट करना चाहिए और उनपर अमल करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि अस्पृश्यताके सम्बन्धमें लेख लिखकर अथवा भाषण देकर मैंने अनेक भावुक हिन्दुओंके दिलोंको दुखाया है। लेकिन साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि इसमें द्वेष नहीं है और न कभी था। वैद्य जब रोगीको चिरायता देता है तब<noinclude>{{smallrefs}} {{left|२०-३४}}</noinclude> tu92miappejt73dth74gm9a09txsdcr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६२ 250 159741 671789 508967 2026-08-19T14:46:49Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रोगी बुरा मुँह बनाते हुए भी जानता है कि यह चिरायता उसके लिए सबसे अच्छी औषध है। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' १४-८-१९२१|1em}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''२६०. समझौता?'''}}}} इस तरहके मिले हुए पत्रोंमें यह कोई अकेला पत्र<ref>उक्त पत्र यहाँ उद्धृत नहीं किया गया। यह पत्र एक सनातनी हिन्दूने लिखा था जिसमें उसने शास्त्री वसन्तरामके लेखपर गांधीजीने जो आलोचना की थी उसके विरुद्ध शिकायत की थी; देखिए “टिप्पणियाँ”,१७-७-१९२१।</ref> नहीं है। मैंने भी वसन्त-राम शास्त्रीके लेखको पसन्द किया, इसके लिए मुझे कितने ही मित्रोंने उलाहना दिया है; तथापि इस सम्बन्धमें व्यक्त किये गये विचारोंपर मैं दृढ़ हूँ। उपर्युक्त पत्र और इस तरहकी टीकाएँ मुझे प्रिय हैं। यह एक सन्तोषजनक बात है कि अब बहुत सारे लोग अस्पृश्यताके दोषको देखने लगे हैं और उनका यह सुझाव है कि इसमें समझौतेको कोई स्थान नहीं है। शास्त्रीजीके लेखको आलोचक अपनी दृष्टिसे देखते हैं। मैंने शास्त्रीजीकी दृष्टिसे ही उसका अवलोकन किया और जब यह देखा कि शास्त्रीजी अस्पृश्यताको एक शौच-क्रियाके रूपमें मानते हैं तब मुझे प्रसन्नता हुई। रजस्वला माता-को न छूने जितनी अस्पृश्यता अगर अन्त्यजोंके सम्बन्धमें भी बरती जाये तो उसे मैं समझ सकता हूँ। ‘चांडाल’ को न छूनेकी प्रथा कैसे पड़ी होगी, इस बातको मैं बिना किसी अड़चनके समझ सकता हूँ। जो सुधारक स्वयं अपना स्थान न छोड़कर अपने समीप आनेवाले लोगोंका स्वागत करता है——क्योंकि उसे पूरी आशा होती है कि वे लोग कभी-न-कभी सुधारोंके स्वरूपसे अवगत हो जायेंगे——वही सच्चा सुधारक है। मैंने शास्त्रके नामसे प्रचलित अस्पृश्यताको निन्दा की है और इसमें मैं कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता। लेकिन जो अन्त्यजोंसे छू जानेपर नहानेके बावजूद अन्त्यजोंके प्रति प्रेमभाव रखेंगे, उनके लिए जलाशय बनवायेंगे, उन्हें पढ़ायेंगे, उनके दुःखमें दुःखी होंगे, उन्हें खिलाकर खायेंगे, उन्हें आदरसहित ट्रेनमें बिठायेंगे, उनके बीमार पड़नेपर उनकी सेवा-शुश्रूषा करेंगे उनकी मैं वंदना करूँगा। जो अन्त्यजोंके स्पर्शसे अपनी आत्माको कलुषित हुआ मानेगा उसके लिए मैं भगवान्से प्रार्थना करूँगा कि वह उसे क्षमा कर दे। मैं अपनी मान्यतामें, अपनी पद्धतिमें अथवा अपने व्यवहारमें कोई परिवर्तन नहीं करनेवाला हूँ। लेकिन जो लोग इस आदर्शको जितना ज्यादा अपनायेंगे, मैं उतना ही उनका सम्मान करूँगा। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' १४-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> 93y4p3petnaiouoctwkwnr85lun94pw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६३ 250 159743 671792 508969 2026-08-19T14:54:37Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671792 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६१. टिप्पणियां'''}}}} {{c|'''टोपियोंकी आहुति'''}} बम्बईने उत्साहपूर्वक जो कार्य आरम्भ किया था वह खूब जोर-शोरसे चल रहा है। हमारी यात्रामें प्रत्येक स्थानपर मलमल, मखमल और फेल्टकी टोपियोंका ढेर लग जाता है। मुसलमान अपनी तुर्की और अस्तरखानी टोपियाँ फेंकते हैं तो कोई अपनी पगड़ी फेंकता है। एक मित्रने कहा कि हिन्दुस्तानके आन्तरिक तारके आगे टेलीफोन अथवा टेलीग्राफ किसी कामके नहीं है। पवनवेगसे हिन्दुस्तानने जान लिया है कि विदेशी कपड़ा पहनना अथवा घरमें रखना पाप है। मुझे आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि अपने कपड़े जलानेके लिए देते समय कदाचित् ही कोई हिचकिचाता है। {{c|'''हमारा दल'''}} इस बारकी यात्रामें हमारे दलमें केवल अली भाई और मैं ही नहीं हैं बल्कि कानपुरके मौलाना आजाद सोबानी तथा शिमलेके पास कोटगढ़में रहनेवाले श्री स्टोक्स भी हैं। श्री स्टोक्स कांग्रेसके सदस्य हैं। और पहाड़ोंमें बेगार लेनेका जो रिवाज है इन्होंने अपना सारा समय उसे दूर करनेके कार्यमें दे दिया है। श्री स्टोक्सने एक भारतीय ईसाई महिलासे विवाह किया है और उनके छः पुत्र हैं। लड़कोंको उन्होंने अभीतक अंग्रेजीका एक अक्षर भी नहीं सिखाया है। वे सिर्फ पहाड़ी और हिन्दी, यही दो भाषाएँ जानते हैं। उन्होंने भी ३१ जुलाईके यज्ञमें अपने कपड़ोंकी आहुति दी। इनकी पोशाक अब धोती, कुर्ता और टोपी है और ये सब चीजें खादीकी होती है। फिलहाल अवकाश होनेसे हमारी यात्राके अनुभवोंको ग्रहण करनेके विचारसे वे हमारे साथ हैं। श्री स्टोक्सने अनेक वर्षोंसे अपना रहन-सहन सर्वथा भारतीय ही रखा है। पोशाकमें परिवर्तन इन्होंने अभी-अभी किया है। {{c|'''जयघोष और चरण-स्पर्श'''}} जयघोष और चरण-स्पर्शकी व्याधि अभीतक गई नहीं है। मुझे उम्मीद थी कि इनके सम्बन्धमें मेरे लेखोंके बाद परिवर्तन हो गया होगा। लेकिन मैंने जबसे संयुक्त-प्रान्तमें प्रवेश किया है तबसे जयघोष और चरण-स्पर्शसे मैं घबरा गया हूँ। लोगोंके उत्साहकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन यह सारा उत्साह जयघोष और चरण-स्पर्शमें ही बह जाता दिखाई देता है। मेरे कान भी अब इतने मजबूत नहीं रह गये हैं कि मैं बहुत ज्यादा शोर सहन कर सकूँ। हजारोंकी भीड़में चरण-स्पर्श इतनी अधिक अव्यवस्था फैलाता है कि प्रतिक्षण गिर जानेका भय बना रहता है। {{c|'''स्वयंसेवक'''}} स्वयंसेवक तो बहुत सारे लोग बन गये हैं लेकिन उन्हें अभीतक अपने कर्तव्यका पूरा भान नहीं हुआ है। उनमें शिक्षाकी कमी है। यदि हमें कानूनका सविनय भंग<noinclude></noinclude> an30a7r4szl6949c9x5uhqjjst2nenu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०० 250 176016 671865 644613 2026-08-19T18:15:34Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अमंगलकारी प्रतिबन्धको दूर करना । कांग्रेस कार्यकर्त्ताओंको इसके खिलाफ एक जब- र्दस्त आन्दोलन चलानेकी जरूरत महसूस करनी चाहिए। इससे उनके स्वदेशी के कार्य में किसी तरहका विघ्न नहीं पड़ सकता, क्योंकि स्वयं स्वदेशी के गहन कार्यका प्रभाव हमारे दलित देशवासियोंके लिए बहुत ही शक्तिशाली और हितकारी होता है। यदि चरखेका सन्देश हमारे देशके इन अत्यन्त निःसहाय भाइयोंके घरोंमें नहीं पहुँचेगा तो, भारत आत्म-निर्भर नहीं हो सकेगा । और यह सन्देश इनतक तबतक नहीं पहुँचाया जा सकेगा जबतक हम इन्हें अपने सगे भाई-बहनों की तरह नहीं समझेंगे, जिन्हें हमारे अधिक से अधिक सौजन्य और प्रेमकी आवश्यकता है। {{C|'''डेरा इस्माइलखाँ'''}} डेरा इस्माइलखांकी जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्रीने लिखा है कि सर्वश्री प्याराखां, देवीदास, निर्मलदास, किशनचन्द भाटिया, हाजी अमद्दीन, अल्लाबख्श और मुहम्मद रमजान द्वारा कराची प्रस्तावको दोहराने के कारण उनसे जमानत दाखिल करने को कहा गया था। चूंकि उन्होंने जमानत देने से इनकार कर दिया था, इसलिए उन्हें दो-दो वर्षकी साधारण कारावासकी सजा दे दी गई । मन्त्रीने आगे लिखा है कि मुकदमा एक तमाशा था जो सिर्फ दो घंटे चला। लाला प्याराखाँ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं । वे बलूचिस्तानमें पन्दह साल सरकारी नौकरी कर चुके हैं। जलियाँवाला बागके हत्याकांड के बाद वे सरकारी नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गये थे और गिरफ्तारी के समय उसके स्थानीय मन्त्री थे । उन्होंने पत्रमें लिखा है कि ये सजायें कराचीके मुकदमोंके फैसलेसे पहले सुनाई गई हैं। किन्तु इससे भी आश्चर्यकी बात तो यह है किं जिन्होंने यह प्रस्ताव बम्बई में दुहराया और रहनुमाई की उन्हें तो छुआ भी नहीं गया; परन्तु जिन्होंने बम्बई घोषणा-पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओंका अनुसरण किया उन्हें जेलमें बन्द कर दिया गया। मैं डेरा इस्माइलखाँके इन अधिक सौभाग्यशाली लोगोंको बधाई देता हूँ । {{C|'''कुरान छीन ली गई'''}} मीरपुर खासकी जिला खिलाफत कमेटीके मन्त्री लिखते हैं कि मौलवी अब्दुल करीम साहबसे, जिन्हें हाल ही में सजा हुई है और जो इस समय हैदराबाद जेलमें कैद भुगत रहे हैं, 'कुरान' छीन ली गई है। मौलवी उतने प्रसिद्ध नहीं हैं, क्या इसीलिए उनसे 'कुरान' छीन ली गई है ? क्योंकि कराचीके प्रसिद्ध बन्दियोंके साथ तो ऐसा व्यवहार किया नहीं गया है । इसी तरहके अविचारपूर्ण और अनावश्यक अत्या- चारसे दुर्भावना पैदा होती है, जिसे रोकना कठिन हो जाता है। कायदेकी लड़ाई किसीको बुरी नहीं लगती, परन्तु कैदीसे उसकी धार्मिक पुस्तक ले लेना नीचताकी हद है । {{C|'''पूर्वाग्रह और धृष्टता'''}} तंजौर जिलेसे एक मनुष्यने लिखा है, "मैं और मेरे भाई यद्यपि ब्राह्मण हैं, परन्तु हमने आलसी जीवन बितानेकी अपेक्षा कुछ काम करना ठीक समझा और 'हल चलाना' शुरू कर दिया । इस तरह हम खेती करने लगे । यह बात हमारे गाँवके लोगोंको बहुत बुरी लगी और उन्होंने हमें बिरादरीसे निकाल दिया। परन्तु हम अपने निश्चयपर दृढ़<noinclude></noinclude> 9kt3t4ink1chwekl6i44n4x0dtnt9s2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९५ 250 176046 671780 644607 2026-08-19T12:44:14Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671780 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|४६३}}</noinclude>{{c|'''एक रहस्यवादी द्वारा कताईकी प्रशंसा'''}} एक मित्रने मुझे हाथ कताईपर जॉर्ज मैकडॉनल्डकी 'द प्रिंस एण्ड कर्डी' पुस्तकसे यह उद्धरण भेजा है : वह झिझक ही रहा था कि तभी उसे चरखेकी धूं-धूं सुनाई दी। इस आवाजको वह तुरन्त पहचान गया। क्योंकि बहुत पहले उसने अपनी माँके चरखेसे ही बहुत कुछ सीखा था, और वह अब भी उससे बहुत कुछ सीखता था । पहले-पहल उसने चरखेसे ही छन्द बनाना, गीत गाना और यह सोचना सीखा था कि उसके अन्तःकरणमें सब कुछ ठीक है या नहीं ? अथवा उसे कम से कम इन सब बातोंमें उससे सहायता अवश्य मिली थी। इसलिए, चरखके संगीतको सुनते ही पहचान जाना इसके लिए कोई आश्चर्यकी बात नहीं थी । " {{C|'''चटगाँवका उपद्रव'''<ref>१. देखिए “ एक और गोरखा हमला ", ३-११-१९२१ ।</ref>}} मेरे तारके<ref> २. उपलब्ध नहीं है ।</ref> उत्तरमें प्रसन्न बाबूने विस्तृत विवरण भेजा है। इसे यहाँ दे रहा हूँ : :'''यद्यपि लोगोंने पूर्णतया अहिंसाका पालन किया था, और गोरखोंने ही उनपर हमला करके मारपीट की थी, फिर भी नौकरशाहीने गिरफ्त में आनसे बचनेका एक शानदार तरीका निकाला है। उसने धारा १४४के अधीन नेताओं, स्वयंसेवकों और बाहरके लोगोंके नाम अन्धाधुन्ध नोटिस जारी किये हैं। इनमें बताया गया है कि वे न तो सार्वजनिक रास्तोंपर जुलूस निकालें और न ही उनमें शामिल हों, और इसका कारण यह बताया है कि २० तारीखके जुलूस में जो लोग शामिल थे उन्होंने पुलिसपर पत्थर बरसाये थे और अन्य हिंसात्मक कार्रवाइयाँ की थीं। इस तरहके नोटिस इसी २७ तारीखको जारी किये गये । उनमें यह कहा गया है कि मजिस्ट्रेटको जुलूसके बारेमें और पुलिसको लोगोंके प्रहार करनेपर जो चोटें आईं उनके बारेमें पुलिस सुपरिटेंडेंटकी रिपोर्टसे २५ तारीखको ही जानकारी मिली थी ।''' :'''कल भारतीय दण्ड संहिता की धारा १४४ और धारा १४७के अधीन खिलाफत कमेटीके अध्यक्ष मौलवी मुहम्मद काजिम अली, श्रीयुत कालीशंकर चक्रवर्ती सम्पादक 'ज्योति' (स्थानीय बंगाली दैनिक) तथा प्रेमानन्द दत्त, सुखेन्दु-विकास सेन और मुहम्मद सिराजुल हक नामक स्वयंसेवकोंके खिलाफ एक झूठा मुकदमा भी किसी तरह बनाकर दायर कर दिया गया है। ये पाँचों अभियुक्त गिरफ्तार कर लिये गये हैं, जिनमें से दूसरे और पाँचवें अभियुक्त जमानत देकर बाहर आ गए हैं और बाकीने हवालात में ही रहना पसन्द किया है। प्रेमानन्द दत्त २० तारीखको ढाकामें थे और फिर भी उनका नाम अभियुक्तोंमें दर्ज है ।'''<noinclude>{{dhr|}} {{Smallrefs}}</noinclude> 2ganr1bv7l5g2q5h6o5ptb0ti19j3e7 671782 671780 2026-08-19T12:47:21Z Shivaniya shaw 4129 671782 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|४६३}}</noinclude>{{c|'''एक रहस्यवादी द्वारा कताईकी प्रशंसा'''}} एक मित्रने मुझे हाथ कताईपर जॉर्ज मैकडॉनल्डकी 'द प्रिंस एण्ड कर्डी' पुस्तकसे यह उद्धरण भेजा है : :'''वह झिझक ही रहा था कि तभी उसे चरखेकी धूं-धूं सुनाई दी इस आवाजको वह तुरन्त पहचान गया। क्योंकि बहुत पहले उसने अपनी माँकेचरखेसे ही बहुत कुछ सीखा था, और वह अब भी उससे बहुत कुछ सीखता था । पहले-पहल उसने चरखेसे ही छन्द बनाना, गीत गाना और यह सोचना सीखा था कि उसके अन्तःकरणमें सब कुछ ठीक है या नहीं ? अथवा उसे कम से कम इन सब बातोंमें उससे सहायता अवश्य मिली थी। इसलिए, चरखके संगीतको सुनते ही पहचान जाना इसके लिए कोई आश्चर्यकी बात नहीं थी । "''' {{C|'''चटगाँवका उपद्रव'''<ref>१. देखिए “ एक और गोरखा हमला ", ३-११-१९२१ ।</ref>}} मेरे तारके<ref> २. उपलब्ध नहीं है ।</ref>उत्तरमें प्रसन्न बाबूने विस्तृत विवरण भेजा है। इसे यहाँ दे रहा हूँ : :'''यद्यपि लोगोंने पूर्णतया अहिंसाका पालन किया था, और गोरखोंने ही उनपर हमला करके मारपीट की थी, फिर भी नौकरशाहीने गिरफ्त मेंआने से बचनेका एक शानदार तरीका निकाला है। उसने धारा १४४के अधीन नेताओं, स्वयंसेवकों और बाहरके लोगोंके नाम अन्धाधुन्ध नोटिस जारी किये हैं। इनमें बताया गया है कि वे न तो सार्वजनिक रास्तोंपर जुलूस निकालें और न ही उनमें शामिल हों, और इसका कारण यह बताया है कि २० तारीखके जुलूस में जो लोग शामिल थे उन्होंने पुलिसपर पत्थर बरसाये थे और अन्य हिंसात्मक कार्रवाइयाँ की थीं। इस तरहके नोटिस इसी २७ तारीखको जारी किये गये । उनमें यह कहा गया है कि मजिस्ट्रेटको जुलूसके बारेमें और पुलिसको लोगोंके प्रहार करनेपर जो चोटें आईं उनके बारेमें पुलिस सुपरिटेंडेंटकी रिपोर्टसे २५ तारीखको ही जानकारी मिली थी ।''' :'''कल भारतीय दण्ड संहिता की धारा १४४ और धारा १४७के अधीन खिलाफत कमेटीके अध्यक्ष मौलवी मुहम्मद काजिम अली, श्रीयुतकालीशंकर चक्रवर्ती सम्पादक 'ज्योति' (स्थानीय बंगाली दैनिक) तथा प्रेमानन्द दत्त, सुखेन्दु-विकास सेन और मुहम्मद सिराजुल हक नामक स्वयंसेवकोंके खिलाफ एक झूठा मुकदमा भी किसी तरह बनाकर दायर कर दिया गया है। ये पाँचों अभियुक्त गिरफ्तार कर लिये गये हैं, जिनमें से दूसरे और पाँचवें अभियुक्त जमानत देकर बाहर आ गए हैं और बाकीने हवालात में ही रहना पसन्द किया है। प्रेमानन्द दत्त २० 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निश्चय ही अन्य वर्णोंके लिए निषिद्ध नहीं हैं। क्या वीरता केवल क्षत्रियका ही और संयम केवल ब्राह्मणका ही विशेषाधिकार है ? क्या ब्राह्मणों, क्षत्रियों और शूद्रोंको गो-रक्षा नहीं करनी चाहिए ? जो व्यक्ति गौ के लिए मरने को तैयार न हो, क्या वह हिन्दू रह सकता है ? फिर भी यह बहुत ही अजीब बात है कि मद्रास अहातेसे आये एक पत्रमें गम्भी- रतापूर्वक यह कहा गया है कि वैश्योंके सिवाय अन्य किसीका गो-रक्षासे कोई सरोकार नहीं है । जब धृष्टताके साथ इतना अधिक अज्ञान भी हो तो सर्वश्रेष्ठ उपाय यही है कि मनुष्य तमाम खतरे उठाकर सुधारके मार्गपर चलता रहे और यह आशा रखे कि समय आनेपर उसकी सच्चाई सिद्ध हो जायेगी। यदि हम दृढ़ता और प्रेमसे काम करें तो अन्तमें हम समस्त विरोधको निरस्त्र कर देंगे । सुधारकोंको न तो पश्चात्ताप करना चाहिए और न क्रुद्ध ही होना चाहिए । {{C|'''थियेटरोंमें खादी'''}} एक पत्रमें सुझाव दिया गया है कि यदि बम्बई और अन्य स्थानोंके सभी थिएटर अपनी वेशभूषाके लिए खादीका उपयोग करने लगें, तो इससे खादीका चलन बढ़ जायेगा । विचार निश्चय ही बहुत अच्छा है । परन्तु इसका लागू होना बहुत हदतक दर्शकों- पर निर्भर करता है। यदि दर्शक खादीकी वेशभूषाके लिए आग्रह करने लगें तो थिएटरोंके मालिक उसे प्रयोगमें लानेको बाध्य हो जायेंगे। उनकी रुचि आम तौरपर वैसी ही होती है जैसी जनता बनाती है । थिएटरोंमें खादीकी पोशाकोंका उपयोग जारी करनेका सबसे अच्छा तरीका यही है कि नाटकोंके दर्शक खादीकी पोशाकोंकी माँग करने लगें। उन्हें इस बातपर भी नजर रखनी होगी कि कहीं चुपकेसे वहाँ नकली खादी न आ घुसे, क्योंकि अन्य स्थानोंकी अपेक्षा थिएटरोंमें तथाकथित कला या रुचिके नामपर सत्यकी बलि दिये जानेकी अधिक संभावना रहती है। मैं समझता हूँ कि दर्शक रंगों और तड़क-भड़कपर जोर देंगे। उधर, खादीमें रंगोंका हल्का और सुन्दर समन्वय तो पूर्णतया सम्भव है और उसमें कुछ सजावट भी लाई जा सकती है; परन्तु मोटी किस्ममें और उसीको लोकप्रिय बनाना जरूरी है -विचित्र रंगोंका मेल करने से वह भद्दी ही लगेगी। इसलिए थिएटरोंमें खादीको बड़े पैमानेपर अपनानेका अर्थ है जनताकी रुचिमें क्रान्ति लाना और उसे फिर सादगी और स्वाभाविक सौन्दर्यकी ओर मोड़ना । हमारे आजके थिएटर अन्य देशोंके थिएटरोंकी तरह राष्ट्रीय नैतिकता या राष्ट्रीय रुचिकी कसौटी नहीं हैं, बल्कि वे विकृत रुचियों और राष्ट्रके अप्राकृतिक व अपरिपक्व विकासके फल हैं। यदि कोई साहसी व्यवस्थापक लोक- रुचिमें प्रगतिकारी<noinclude></noinclude> ihmh62qo22m8d69sagwbttb0szowfx9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१७ 250 183014 672041 630699 2026-08-20T09:48:40Z सीमा1 430 672041 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="2409:4060:40B:83D3:0:0:1B36:78AC" /></noinclude>लगता पत्र : एशियाई पंजीयकको २८१ कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ? एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे । किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :इंडियन ओपिनियन, २०-७-१९१२ २४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको' [सेवा में एशियाई पंजीयक प्रिटोरिया महोदय,] जुलाई २२, १९१२ आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने १. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " इंडियन ओपिनियन, ३-८-१९१२ । Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude> nqe95sgx6ogby3uxkcpzw8o4a2ga6iu 672042 672041 2026-08-20T09:50:06Z सीमा1 430 672042 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="2409:4060:40B:83D3:0:0:1B36:78AC" />{{rh|२८१०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])|पत्र : एशियाई पंजीयकको|}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ? एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे । किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :इंडियन ओपिनियन, २०-७-१९१२ २४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको' [सेवा में एशियाई पंजीयक प्रिटोरिया महोदय,] जुलाई २२, १९१२ आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने १. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " इंडियन ओपिनियन, ३-८-१९१२ । Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude> siggndaaty5aryft7jwvgwftujtk6ay 672045 672042 2026-08-20T09:55:08Z सीमा1 430 672045 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="2409:4060:40B:83D3:0:0:1B36:78AC" />{{rh|पत्र : एशियाई पंजीयकको|२८१|}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही 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हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :इंडियन ओपिनियन, २०-७-१९१२ {{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको'''}}}} {{right|जुलाई २२, १९१२}} [{{Left|सेवा में एशियाई पंजीयक प्रिटोरिया महोदय,}}] आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने १. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " इंडियन ओपिनियन, ३-८-१९१२ । Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude> 90jrznl3l5z53xo3yvtq0vaxw1s3em5 672047 672046 2026-08-20T09:58:27Z सीमा1 430 672047 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="2409:4060:40B:83D3:0:0:1B36:78AC" />{{rh||पत्र : एशियाई पंजीयकको|२८१|}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ? एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता 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हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२ {{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>१. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}} {{right|जुलाई २२, १९१२}} :[सेवा में :एशियाई पंजीयक :प्रिटोरिया :महोदय,] आपका इसी माहकी १३ 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सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे । किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२ {{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>१. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}} {{right|जुलाई २२, १९१२}} :[सेवा में :एशियाई पंजीयक :प्रिटोरिया :महोदय,] आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude></noinclude> a9jcs17iqo58t2ptvlyi7pcbllj8bm7 672052 672051 2026-08-20T10:04:46Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672052 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{Rh||पत्र: एशियाई पंजीयकको|२८१}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ? एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे । किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है । यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये । :[ गुजरातीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२ {{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>१. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}} {{right|जुलाई २२, १९१२}} :[सेवा में :एशियाई पंजीयक :प्रिटोरिया :महोदय,] आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude></noinclude> r0o4xl51z2w7jcn9gswkc29u7l3edlp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१६ 250 183071 672036 630873 2026-08-20T09:40:54Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672036 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है। परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center> डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] वीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude> 7gbosa71u05981mpspwp6wabmaw153q 672037 672036 2026-08-20T09:41:23Z सीमा1 430 672037 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है। परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center> डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] वीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude> kxoldi749s3aewx3pp216uz1bd4up30 672038 672037 2026-08-20T09:41:50Z सीमा1 430 672038 proofread-page 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जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है। परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center> डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] वीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude> i6yfohwj9abtn5ymnxg98vhobtbli9v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१५ 250 183116 671860 631140 2026-08-19T18:00:06Z सीमा1 430 /* शोधित */ 671860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी । " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका जिक्र किया था उसके उत्तरमें प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> 9lymsxdpe1epjqma2my29j70mvan4j3 671862 671860 2026-08-19T18:04:14Z सीमा1 430 671862 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी । " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका <ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> pi0w8s5dq9f3xfi2806cj60m4m8gulj 671864 671862 2026-08-19T18:13:08Z सीमा1 430 671864 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>१. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> d0xrcalobavvo6ggn9185b7wv5lgkat 672016 671864 2026-08-20T09:08:44Z सीमा1 430 672016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>१. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही 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१९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> 39hbgoy9pm5rlre19yj45f8rc7swzdn 672017 672016 2026-08-20T09:08:57Z सीमा1 430 672017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० 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अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> suaksap30stp64ofs5s4pu7eetru1dy 672018 672017 2026-08-20T09:09:55Z सीमा1 430 672018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>१. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ० १. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ । २. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं। ३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।<noinclude></noinclude> d0xrcalobavvo6ggn9185b7wv5lgkat 672020 672018 2026-08-20T09:11:46Z सीमा1 430 672020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>१. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित 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अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे। यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center> हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude></noinclude> bbv4pcaxb6j0r3qyvyoy6mcb37aw9f1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१४ 250 183117 671808 671268 2026-08-19T15:39:02Z सीमा1 430 671808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} माननीय गृह-मन्त्री प्रिटोरिया महोदय, प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने- पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं • यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? • वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> iwi7yf85tvp6lamdmsnxf7s1nc9wx9u 672022 671808 2026-08-20T09:15:02Z सीमा1 430 672022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} माननीय गृह-मन्त्री प्रिटोरिया महोदय, प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ 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बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं-यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?-वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> c0dkb9nx23iiuw3el1vwpx27gyw6dp8 672025 672024 2026-08-20T09:21:03Z सीमा1 430 672025 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} माननीय गृह-मन्त्री प्रिटोरिया महोदय, प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं-यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?-वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> 7o6zfjv5siy5u01nsgpbz85td04g1q3 672026 672025 2026-08-20T09:21:15Z सीमा1 430 672026 proofread-page text/x-wiki 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प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> rblqw1hqxahl2z15h0df12zqfj2h6ci 672030 672029 2026-08-20T09:26:59Z सीमा1 430 672030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके 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जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> 4hm6ib98n510d27gccbaka0o4ab6aiu 672033 672030 2026-08-20T09:32:14Z सीमा1 430 672033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} {{Left|माननीय गृह-मन्त्री<br> प्रिटोरिया<br>महोदय,}} प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> f9vdonmxlg3qer7qkvlz4jd8f16uzq8 672039 672033 2026-08-20T09:43:42Z सीमा1 430 672039 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} {{Left|माननीय गृह-मन्त्री<br> प्रिटोरिया<br>महोदय,}} {{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका}} {{right|[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी । <center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center> श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude> 6i1xaxvatauppem0xtuq2p80ydmn2i5 672100 672039 2026-08-20T11:13:25Z सीमा1 430 672100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center> {{right|[ लॉली ]}} {{right|जुलाई १७, १९१२}} {{Left|माननीय गृह-मन्त्री<br> प्रिटोरिया<br>महोदय,}} {{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद । मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें। {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० 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भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है । " {{right|मो० क० गांधी}} :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४१. पत्र : गृह-सचिवको'''}}</center> {{right|जुलाई २२, १९१२}} :गृह-सचिव :प्रिटोरिया :महोदय, १९ तारीखका आपका तार और पत्र प्राप्त हुए । तदर्थ धन्यवाद ! इस वर्षके छ: शिक्षित भारतीय प्रवेशाथियोंके नामोंकी सूची में यथासमय भेजूंगा । {{right|आपका}} {{right|मो० क० गांधी}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६८) तथा २७-७-१९१२ के''''इंडियन ओपिनियन''''' से । १. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको-- जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ । २. देखिए " पत्र : गृह-मन्त्रीको ", पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २७८ । ३. यदि गांधीजीने सूची भेजी हो तो वह उपलब्ध नहीं है ।<noinclude></noinclude> bl7gtdqu764o9hu28f7qtv8h2p4ts53 672055 672053 2026-08-20T10:08:05Z सीमा1 430 672055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तक काफी रुकना पड़ता है । अनिश्चित समय तक बाहर सड़कपर खड़े रहना, और कुछ न सही, बहुत थका देनवाला तो होता ही है। वस्तुतः जिन लोगोंको वहाँ खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ी है, उन्होंने अक्सर ब्रिटिश भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>१. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको-- जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन 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वस्तुतः जिन लोगोंको वहाँ खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ी है, उन्होंने अक्सर ब्रिटिश भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>१. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको-- जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना 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पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको-- जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref> {{right|मो० क० गांधी}} :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४१. पत्र : गृह-सचिवको'''}}</center> {{right|जुलाई २२, १९१२}} :गृह-सचिव :प्रिटोरिया :महोदय, {{gap|1em}}१९ तारीखका आपका तार और पत्र प्राप्त हुए ।<ref>२. देखिए " पत्र : गृह-मन्त्रीको ", पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २७८ ।</ref> तदर्थ धन्यवाद ! इस वर्षके छ: शिक्षित भारतीय प्रवेशाथियोंके नामोंकी सूची में यथासमय भेजूंगा ।<ref>३. यदि गांधीजीने सूची भेजी हो तो वह उपलब्ध नहीं है ।</ref> {{right|आपका<br>मो० क० गांधी}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६८) तथा २७-७-१९१२ के ''''इंडियन ओपिनियन'''' से ।<noinclude></noinclude> r5bfxpde88phzkctm4abdgky2327tfh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१९ 250 183129 672062 631132 2026-08-20T10:14:34Z सीमा1 430 672062 proofread-page text/x-wiki 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विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude></noinclude> cwd53s1swc71fd7w481fpzb3pcl6q7h 672063 672062 2026-08-20T10:14:51Z सीमा1 430 672063 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude> <center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>१. एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें । " - (एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center> {{right|जुलाई २२, १९१२}} :गृह-सचिव :प्रिटोरिया :महोदय, {{gap|1em}}जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा 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चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो । {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो - नकलसे । <center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center> संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>२. जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>३. २० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>४. देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude></noinclude> fzp87bhdt06kix1mmb3dk48zite2l8s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२० 250 183130 672068 631131 2026-08-20T10:20:31Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap|3em}}परन्तु लॉर्ड ऍम्टहिलके, जो हमारे पक्षका समर्थन अनथक उत्साहसे करते रहे हैं, आक्षेपोंका उत्तर अबतक नहीं दिया गया है।<ref>१. लॉर्ड सभामें अस्थायी समझौतेके अमलके विषय में लॉर्ड ऍम्टहिलके १७ जुलाई, १९१२ को किये गये प्रश्नके लिए देखिए परिशिष्ट १८ ।</ref> उनका प्रधान आक्षेप यह है कि समझौते के शब्दोंका तो पालन किया जा रहा है, परन्तु उसकी भावनाको भंग कर दिया गया है। भावना यह है--और जनरल बोथाकी सार्वजनिक घोषणाएँ<ref>२. सन् १९०९ में बोथाने लॉर्ड कर्ज़नको आश्वासन दिया था कि वे ब्रिटिश भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार करेंगे; देखिए खण्ड ९, पृष्ठ १७४ । २३ मई १९११ को अस्थायी समझौतेपर अपने विचार प्रकट करते हुए जनरल बोयाने कहा था कि समझौता बहुत उपयुक्त समयपर हुआ। उन्होंने यह चेतावनी तो दी थी कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल उन्हीं भारतीयोंको प्रवेश करने दिया जायेगा, जिन्हें समझौते के अनुसार ऐसा करनेका अधिकार होगा; किन्तु साथ ही उन्होंने यह वचन भी दिया था कि भविष्य में भारतीय क जीवनकी परिस्थितियोंको दक्षिण आफ्रिकामें जितना सा बनाया जा सकता है, उतना सा बनानेकी पूरी कोशिश की जायेगी । सच तो यह है कि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनके मनमें भारतीयों के प्रति कोई दुर्भाव नहीं है । लन्दन में शादी परिषद् में भाग लेनेके बाद, २६ सितम्बर, १९१२ को रीट फॉटोनमें बोलते हुए उन्होंने कहा था कि एशियाई सवालको हल करनेकी कोशिश में जनरल स्मट्सने इतना परिश्रम किया कि वे सूख कर काँटा हो गये ।</ref> भी यही हैं -- कि जो भारतीय दक्षिण आफ्रिकामें बस चुके हैं उन्हें शान्तिपूर्वक रहने दिया जायेगा । परन्तु जबतक भारतके कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त पत्नियोंको यहाँ से लौटाया जाता रहेगा, जबतक स्वर्ण-अधिनियम<ref>३. देखिए “कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५ और परिशिष्ट २१ ।</ref> और कस्बा-कानूनका<ref>४. स्वर्ण- अधिनियम या करवा-कानूनके द्वारा उन भारतीयोंको बस्तियोंमें जाकर बसनेपर मजबूर किया जा रहा था, जो " घोषित क्षेत्रों " तथा अन्य ऐसे क्षेत्रोंमें रह रहे थे, जहाँ उन्होंने अपना खासा कारोबार बना लिया था । जो स्थान इससे प्रत्यक्ष रूपसे प्रभावित होते थे उनमें क्लार्क्सडॉर्प (“ कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५) क्रूगर्सडॉप (“ तूफान उमड़ रहा है ", पृ४ १३५ ) और रूडीपूर्ट तथा जस्टिन ( " जर्मिस्टनके भारतीय", पृष्ठ १५२-५३ और २४४ ) आदि शामिल थे ।</ref> प्रयोग इस प्रकार किया जाता रहेगा कि भारतीय व्यापारी लगभग तबाह हो जायें, जबतक पुराने निवासियोंके बसनेके लिए पहले जो वस्तियाँ निर्दिष्ट की गई थीं उन्हें उनसे निकलनेपर विवश किया जाता रहेगा, जबतक निवासके प्रमाणपत्रोंकी उपेक्षा की जाती रहेगी, जबतक विवाह अथवा अधिवास प्रमाणित करने के लिए असम्भव प्रमाणोंकी माँग की जाती रहेगी और जबतक परवाना कानूनोंके अत्याचारपूर्ण अमलके द्वारा व्यापार करना प्रायः असम्भव किया जाता रहेगा, तबतक शान्ति नहीं हो सकेगी ।<ref>५. भारतीयों के विरोध के परिणाम स्वरूप सन् १९११ और १९१२ के संघ प्रवासी विधेयक में जनरल स्मट्स द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनोंसे सहमत होते हुए गांधीजीने कहा था कि अपनी दूसरी शिकायतों (जिनका खासा ब्योरा इस लेख में मिल जाता है) को लेकर भारतीय भविष्य में संघर्ष कर सकते हैं; देखिए “तार : गृह-मन्त्रीको", पृष्ठ २२४-२५ और “ आखिरकार ! " पृष्ठ ९१-९२ ।</ref> :[अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२<noinclude></noinclude> 64itg2zy6sv1m063riv9o5htnlrr7fn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२१ 250 183140 672069 631130 2026-08-20T10:25:51Z सीमा1 430 672069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center> प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है : {{gap|5em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।''' परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center> श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude> 6syn14jgcknx6skzpoeiternv0jrz2z 672071 672069 2026-08-20T10:27:42Z सीमा1 430 672071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center> प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है : {{gap|3em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।''' परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center> श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude> j1pw5alp52cbymrj972gqve07eup5bd 672072 672071 2026-08-20T10:29:02Z सीमा1 430 672072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center> {{gap|1em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा 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शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।''' {{gap|1em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे 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भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center> {{gap|1em}}श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude> gh8lt8hiqmekzriufk3lb2ukxj13d0r 672075 672074 2026-08-20T10:30:27Z सीमा1 430 672075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center> {{gap|1em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है : {{gap|3em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।''' {{gap|1em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center> श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude> h4pxt8x81yxack2j3rpaksekt9jbr73 672076 672075 2026-08-20T10:30:43Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center> {{gap|1em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है : {{gap|3em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।''' {{gap|1em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center> श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude> svwdq4zllut12q49m979nq7sf0i1ptv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२२ 250 183144 672077 631129 2026-08-20T10:33:00Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>१. देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref> २. सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन _______________________ किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude></noinclude> kp1xd3vwurc44j11b1nv6m34i70optc 672078 672077 2026-08-20T10:33:45Z सीमा1 430 672078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>१. देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref> २. सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन _______________________ किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude></noinclude> m5m4lbc4wy4eo168nez7bnhia8y0n44 672079 672078 2026-08-20T10:34:00Z सीमा1 430 672079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>१. देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref> २. सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन _______________________ किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude></noinclude> kp1xd3vwurc44j11b1nv6m34i70optc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२३ 250 183145 672080 631128 2026-08-20T10:36:45Z सीमा1 430 672080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>१. गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा । अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे। :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>२. यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है । मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म}} {{right|लॉली स्टेशन}} {{right|ट्रान्सवाल}} {{right|आषाढ शुक्ल १४, [ जुलाई २७, १९१२]}}<ref>३. पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref> भाई श्री मनसुख, आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>४. मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude></noinclude> 66fs3klnc46gfln51fyxmvhdwwntn36 672081 672080 2026-08-20T10:41:21Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672081 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>१. गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा । अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे। :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>२. यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है । मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br> ट्रान्सवाल<br>आषाढ शुक्ल १४, [ जुलाई २७, १९१२]}}<ref>३. पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref> भाई श्री मनसुख, आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>४. मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude></noinclude> aa5dmnvx54b60ztbtv9xc74iblahr9x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२४ 250 183161 672083 631125 2026-08-20T10:46:20Z सीमा1 430 672083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये। {{gap|2em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना। {{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य|450}} गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो - नकलसे । <center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म}} {{right|लॉली स्टेशन}} {{right|ट्रान्सवाल}} {{right|जुलाई २८, १९१२}} प्रिय श्री गोखले, आपका तार<ref>३. जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं। यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा। आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था । {{right|हृदयसे आपका,}} {{right|मो० क० गांधी}} [गो० कृ० गोखले इंग्लैंड ] गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> ontdkv894i00zkj9ad3ech9u4zy3rfy 672084 672083 2026-08-20T10:46:54Z सीमा1 430 672084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये। {{gap|2em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना। {{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य|450px}} गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो - नकलसे । <center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म}} {{right|लॉली स्टेशन}} {{right|ट्रान्सवाल}} {{right|जुलाई २८, १९१२}} प्रिय श्री गोखले, आपका तार<ref>३. जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं। यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा। आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था । {{right|हृदयसे आपका,}} {{right|मो० क० गांधी}} [गो० कृ० गोखले इंग्लैंड ] गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> qnoqm4ng28rm5l2dmtc6ta5eol301tr 672085 672084 2026-08-20T10:48:25Z सीमा1 430 672085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude> मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये। {{gap|2em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना। {{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य}} गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो - नकलसे । <center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म}} {{right|लॉली स्टेशन}} {{right|ट्रान्सवाल}} {{right|जुलाई २८, १९१२}} प्रिय श्री गोखले, आपका तार<ref>३. जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं। यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा। आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था । {{right|हृदयसे आपका,}} {{right|मो० क० गांधी}} [गो० कृ० गोखले इंग्लैंड ] गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> arkz0mvpijde93luh9sk6jwqz0nsbr9 672086 672085 2026-08-20T10:49:09Z सीमा1 430 672086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality 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आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा। आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था । {{right|हृदयसे आपका,}} {{right|मो० क० गांधी}} [गो० कृ० गोखले इंग्लैंड ] गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> bjnrjmnkgngwcg46p18ivs5navan7nb 672087 672086 2026-08-20T10:49:26Z सीमा1 430 672087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude> {{gap|2em}}मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये। {{gap|1em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० 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level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude> {{gap|2em}}मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये। {{gap|1em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना। {{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य}} गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो - नकलसे । <center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>जुलाई २८, १९१२}} प्रिय श्री गोखले, आपका तार<ref>३. जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं। यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई 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सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता। मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो । {{right|मो० क० गांधी}} [ अंग्रेजीसे ]<br>'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई - सभा में<ref>२. इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुत-से यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे। ११-१९</ref>'''}}</center> {{right|अगस्त १, १९१२}} '''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude></noinclude> 5ozp5n6tzliyxthup79wjmdq4et3qpg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२६ 250 183165 672093 631116 2026-08-20T11:04:16Z सीमा1 430 /* शोधित */ 672093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''यह सब श्री वी० ए० चेट्टियारके सम्मान में दिये गये भोजके अवसरपर हुआ, . . .श्री चेट्टियार मद्रास वापस जानेवाले हैं। श्री गांधीने, जिन्हें श्री हॉस्केनने सत्याग्रहका मन्त्र-दृष्टा और गुरु बताया, अपने श्रोताओं को चेतावनी दी कि दक्षिण अफ्रिकाका महान संघर्ष अभी हरगिज समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वह थम-भर गया है और हो सकता है कि समाजको फिर काफी कष्ट झेलना पड़े। "अतिथियों" के लिए शुभकामना व्यक्त करते हुए श्री गांधीने श्री हॉस्केन तथा अन्य उपस्थित यूरोपीयोंकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप लोगोंकी बदौलत ही आज हम सब इस मेजपर बराबरीको हैसियतसे इकट्ठा हुए हैं। मेरी समझमें तो हर सभ्य देशमें, और विशेष रूपसे हर ईसाई समाजमें, समानताकी भावना एक साधारण-सी बात होनी चाहिए। किन्तु चूंकि हमें भयंकर कठिनाइयों और पूर्वग्रहोंसे गुजरना पड़ रहा है, इसलिए किसी भी प्रकारकी समानताका दर्जा प्राप्त कर सकना हमारे लिए सौभाग्य की बात बन जाती है।''' [ अंग्रेजीसे ]<br>'''ट्रान्सवाल लीडर,''' २-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५०. जर्मिस्टनकी बस्ती'''}}</center> जस्टिन में जिस स्थानपर नया एशियाई बाजार खोलनेका विचार किया जा रहा है, हम उसके विषय में अन्यत्र संघ-सरकारके कार्यकारी स्वास्थ्य चिकित्साधिकारी (मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ) डॉ० एफ० आरनॉल्डका विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। हमारी सम्मतिम विवरण नगर परिषद द्वारा चुने हुए स्थानकी विशेष वकालत करता है। डॉ० मैकनैबने इस स्थानके विरुद्ध जो सख्त बातें कही थीं इसमें उनकी उपेक्षा कर दी गई है। यह ठीक है कि डॉ० मैकनैबने अपने कुछ एतराज वापस ले लिए हैं, परन्तु उनकी मुख्य आपत्ति--कि बस्तीका स्थान एक लम्बे-चौड़े घूरेके समीप रखा जानेवाला है और जहाँ घिनौने पशु-ज्वरसे बीमार होकर मरनेवाले जानवरोंको दफनाया जाता रहा है--अब भी कायम है। डॉ० आरनॉल्डने कुछ शर्तें लगा रखी हैं, जिनके पूरा होनेपर ही स्थानको एक चिकित्सा-सम्बन्धी दृष्टिसे उपयुक्त ठहराया जा सकेगा। इससे भी यही सिद्ध होता है कि डॉ० मैकनैबकी कठोर आलोचना सर्वथा उचित थी । फिर यह भुला देना भी ठीक नहीं होगा कि जस्टिनकी नगरपालिका द्वारा चुनी हुई जगहमें वह खास टुकड़ा भी आ जाता है जहाँ नगरका मलमूत्र डाला जाता रहा है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसे यह बात अलबत्ता कुछ सन्तोषकी हो सकती है कि बस्तीका यह भाग कुछ समय तक इमारतें बनाने के काममें नहीं लाया जायेगा; परन्तु इस प्रकारके मामलोंमें केवल चिकित्साधिकारीकी अनुकूल सम्मतिको विभिन्न आपत्तियों का निर्णयात्मक उत्तर नहीं माना जा सकता। वैद्यकीय दृष्टिसे कोई पुराना<noinclude></noinclude> k7fwop4g79e8lri5s9psu3iswfberqx 672094 672093 2026-08-20T11:04:44Z सीमा1 430 672094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''यह सब श्री वी० ए० चेट्टियारके सम्मान में दिये गये भोजके अवसरपर हुआ, . . . श्री चेट्टियार मद्रास वापस जानेवाले हैं। श्री गांधीने, जिन्हें श्री हॉस्केनने सत्याग्रहका मन्त्र-दृष्टा और गुरु बताया, अपने श्रोताओं को चेतावनी दी कि दक्षिण अफ्रिकाका महान संघर्ष अभी हरगिज समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वह थम-भर गया है और हो सकता है कि समाजको फिर काफी कष्ट झेलना पड़े। "अतिथियों" के लिए शुभकामना व्यक्त करते हुए श्री गांधीने श्री हॉस्केन तथा अन्य उपस्थित यूरोपीयोंकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप लोगोंकी बदौलत ही आज हम सब इस मेजपर बराबरीको हैसियतसे इकट्ठा हुए हैं। मेरी समझमें तो हर सभ्य देशमें, और विशेष रूपसे हर ईसाई समाजमें, समानताकी भावना एक साधारण-सी बात होनी चाहिए। किन्तु चूंकि हमें भयंकर कठिनाइयों और पूर्वग्रहोंसे गुजरना पड़ रहा है, इसलिए किसी भी प्रकारकी समानताका दर्जा प्राप्त कर सकना हमारे लिए सौभाग्य की बात बन जाती है।''' [ अंग्रेजीसे ]<br>'''ट्रान्सवाल लीडर,''' २-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५०. जर्मिस्टनकी बस्ती'''}}</center> जस्टिन में जिस स्थानपर नया एशियाई बाजार खोलनेका विचार किया जा रहा है, हम उसके विषय में अन्यत्र संघ-सरकारके कार्यकारी स्वास्थ्य चिकित्साधिकारी (मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ) डॉ० एफ० आरनॉल्डका विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। हमारी सम्मतिम विवरण नगर परिषद द्वारा चुने हुए स्थानकी विशेष वकालत करता है। डॉ० मैकनैबने इस स्थानके विरुद्ध जो सख्त बातें कही थीं इसमें उनकी उपेक्षा कर दी गई है। यह ठीक है कि डॉ० मैकनैबने अपने कुछ एतराज वापस ले लिए हैं, परन्तु उनकी मुख्य आपत्ति--कि बस्तीका स्थान एक लम्बे-चौड़े घूरेके समीप रखा जानेवाला है और जहाँ घिनौने पशु-ज्वरसे बीमार होकर मरनेवाले जानवरोंको दफनाया जाता रहा है--अब भी कायम है। डॉ० आरनॉल्डने कुछ शर्तें लगा रखी हैं, जिनके पूरा होनेपर ही स्थानको एक चिकित्सा-सम्बन्धी दृष्टिसे उपयुक्त ठहराया जा सकेगा। इससे भी यही सिद्ध होता है कि डॉ० मैकनैबकी कठोर आलोचना सर्वथा उचित थी । फिर यह भुला देना भी ठीक नहीं होगा कि जस्टिनकी नगरपालिका द्वारा चुनी हुई जगहमें वह खास टुकड़ा भी आ जाता है जहाँ नगरका मलमूत्र डाला जाता रहा है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसे यह बात अलबत्ता कुछ सन्तोषकी हो सकती है कि बस्तीका यह भाग कुछ समय तक इमारतें बनाने के काममें नहीं लाया जायेगा; परन्तु इस प्रकारके मामलोंमें केवल चिकित्साधिकारीकी अनुकूल सम्मतिको विभिन्न आपत्तियों का निर्णयात्मक उत्तर नहीं माना जा सकता। वैद्यकीय दृष्टिसे कोई पुराना<noinclude></noinclude> 1ofhacu60cimwwipzt0ogk0qxgypiy8 672095 672094 2026-08-20T11:05:31Z सीमा1 430 672095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''यह सब श्री वी० ए० चेट्टियारके सम्मान में दिये गये भोजके अवसरपर हुआ, . . . श्री चेट्टियार मद्रास वापस जानेवाले हैं।''' '''श्री गांधीने, जिन्हें श्री हॉस्केनने सत्याग्रहका मन्त्र-दृष्टा और गुरु बताया, अपने श्रोताओं को चेतावनी दी कि दक्षिण अफ्रिकाका महान संघर्ष अभी हरगिज समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वह थम-भर गया है और हो सकता है कि समाजको फिर काफी कष्ट झेलना पड़े।''' '''"अतिथियों" के लिए शुभकामना व्यक्त करते हुए श्री गांधीने श्री हॉस्केन तथा अन्य उपस्थित यूरोपीयोंकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप लोगोंकी बदौलत ही आज हम सब इस मेजपर बराबरीको हैसियतसे इकट्ठा हुए हैं। मेरी समझमें तो हर सभ्य देशमें, और विशेष रूपसे हर ईसाई समाजमें, समानताकी भावना एक साधारण-सी बात होनी चाहिए। किन्तु चूंकि हमें भयंकर कठिनाइयों और पूर्वग्रहोंसे गुजरना पड़ रहा है, इसलिए किसी भी प्रकारकी समानताका दर्जा प्राप्त कर सकना हमारे लिए सौभाग्य की बात बन जाती है।''' [ अंग्रेजीसे ]<br>'''ट्रान्सवाल लीडर,''' २-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५०. जर्मिस्टनकी बस्ती'''}}</center> जस्टिन में जिस स्थानपर नया एशियाई बाजार खोलनेका विचार किया जा रहा है, हम उसके विषय में अन्यत्र संघ-सरकारके कार्यकारी स्वास्थ्य चिकित्साधिकारी (मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ) डॉ० एफ० आरनॉल्डका विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। हमारी सम्मतिम विवरण नगर परिषद द्वारा चुने हुए स्थानकी विशेष वकालत करता है। डॉ० मैकनैबने इस स्थानके विरुद्ध जो सख्त बातें कही थीं इसमें उनकी उपेक्षा कर दी गई है। यह ठीक है कि डॉ० मैकनैबने अपने कुछ एतराज वापस ले लिए हैं, परन्तु उनकी मुख्य आपत्ति--कि बस्तीका स्थान एक लम्बे-चौड़े घूरेके समीप रखा जानेवाला है और जहाँ घिनौने पशु-ज्वरसे बीमार होकर मरनेवाले जानवरोंको दफनाया जाता रहा है--अब भी कायम है। डॉ० आरनॉल्डने कुछ शर्तें लगा रखी हैं, जिनके पूरा होनेपर ही स्थानको एक चिकित्सा-सम्बन्धी दृष्टिसे उपयुक्त ठहराया जा सकेगा। इससे भी यही सिद्ध होता है कि डॉ० मैकनैबकी कठोर आलोचना सर्वथा उचित थी । फिर यह भुला देना भी ठीक नहीं होगा कि जस्टिनकी नगरपालिका द्वारा चुनी हुई जगहमें वह खास टुकड़ा भी आ जाता है जहाँ नगरका मलमूत्र डाला जाता रहा है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसे यह बात अलबत्ता कुछ सन्तोषकी हो सकती है कि बस्तीका यह भाग कुछ समय तक इमारतें बनाने के काममें नहीं लाया जायेगा; परन्तु इस प्रकारके मामलोंमें केवल चिकित्साधिकारीकी अनुकूल सम्मतिको विभिन्न आपत्तियों का निर्णयात्मक उत्तर नहीं माना जा सकता। वैद्यकीय दृष्टिसे कोई पुराना<noinclude></noinclude> bc2fe5z3gn2335o5q08cb2lmw3frh0v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२७ 250 183166 672096 631123 2026-08-20T11:08:41Z सीमा1 430 672096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१अगस्त२}} [ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय, आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,' संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र' है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ। मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना १. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।<noinclude></noinclude> 29ssbull5p4wq827kk3m0dyypaqlw9q 672097 672096 2026-08-20T11:09:43Z सीमा1 430 672097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे । [ अंग्रेजीसे ] '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}} :[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय, आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,' संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र' है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ। मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना १. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।<noinclude></noinclude> ktenwsq0tvcf9jfvhvnzpo45xtiz9rg 672098 672097 2026-08-20T11:10:40Z सीमा1 430 672098 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे । [ अंग्रेजीसे ]<br>'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}} :[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय, आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र' है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ। मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude> kmcqw48dw9dg8c1x43oxhuvdmxticqp 672099 672098 2026-08-20T11:11:06Z सीमा1 430 672099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}} :[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय, आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया 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user="सीमा1" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे । :[ अंग्रेजीसे ] :'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ <center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center> {{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}} :[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय, आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ। मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude> 99thz9lce8rimjphq5929r9l9vmllgb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२८ 250 183168 672105 631122 2026-08-20T11:20:25Z सीमा1 430 672105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।' {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{right|[ अगस्त ३, १९१२ के बाद ]}} चि० बली और चंची, तुम दोनोंके पत्र मिले । मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। चि० वेणीने' लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर १. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६ ) २. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा। ३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।<noinclude></noinclude> l15mgix6dokw00l9hfchmfumkf55sir 672106 672105 2026-08-20T11:22:24Z सीमा1 430 672106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६ )</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{right|[ अगस्त ३, १९१२ के बाद ]}}<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । :मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude> scrbws9uqt32ultx3boo4dmpsb7s5ui 672108 672106 2026-08-20T11:23:02Z सीमा1 430 672108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६ )</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]}}<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । :मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude> cxkwlblcs4i3o4nkxtc1y3hbvhkcgbz 672109 672108 2026-08-20T11:23:48Z सीमा1 430 672109 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६ )</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]}}<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । :मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। :चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे 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किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]}}<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। :चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude> 6nznwq6mdqtwck3emo0wba3ac609vir 672113 672112 2026-08-20T11:27:36Z सीमा1 430 672113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{gap|24em}}[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। :चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब 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एक नकल मुझे भेज दें तो कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref> {{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}} टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे । <center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center> {{gap|23em}}[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref> चि० बली और चंची, :तुम दोनोंके पत्र मिले । मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है। :चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude> dkz8gga2h6p5rf0157wgq8e9a0g5sa6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९७ 250 183200 671786 644609 2026-08-19T13:35:07Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671786 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ४६५}}</noinclude>औषधि खोजने और उसे प्रयुक्त करनेमें अपनी शक्ति लगायेंगे, वे ही सच्चे सर्जन और डाक्टर बन जायेंगे और जब यह व्यापक व्याधि दूर हो जायेगी तो दूसरी बहुत-सी व्याधियाँ बिना किसी उपचारके ही गायब हो जायेंगी । उसके पश्चात् जो व्याधियाँ शेष रह जायेंगी उनके इलाजके लिए देश पुरुष और महिला चिकित्सक तैयार करनेकी ज्यादा अच्छी स्थितिमें होगा । {{C|'''देशी रियासतें'''}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने कांग्रेसकी परराष्ट्र सम्बन्धी नीति निश्चित कर दी है । अतः हमारी देशी-रियासत सम्बन्धी नीतिको निश्चित करनेकी माँग भी रखी गई। यह स्वाभाविक ही था। नागपुरके अधिवेशनमें इस विषयकी स्थल रूपरेखा बनाई गई थी - अर्थात् यह बात तय पाई गई थी कि इन रियासतोंके भीतरी मामलोंमें हस्तक्षेप न किया जाये । देशी राज्य खुद भी इससे ज्यादा अच्छी या ज्यादा स्पष्ट बातकी अपेक्षा नहीं कर सकते थे। और अ० भा० कांग्रेस कमेटी तो सिर्फ उस प्रस्ता- वकी सीमाके अन्दर-ही-अन्दर अपनी नीति निश्चित कर सकती है । अ० भा० कांग्रेस कमेटीके कार्यकर्त्ताओंने बिलकुल उस प्रस्ताव के अनुसार कार्य किया है। वे असहयोगका सन्देश देशी- राज्यों में नहीं ले गये हैं । हाँ, उसके चिरस्थायी, आत्मशुद्धिकारी या आर्थिक भाग इसके अपवाद हैं; और वे बातें तो असहयोगके अलावा भी हितकर ही साबित होंगी। वे क्या हैं -- शराबखोरी छुड़ाना, स्वदेशीका इस्तेमाल करना, हिन्दू-मुस्लिम एकताको बढ़ाना, अहिंसाका अवलम्बन लेना और छुआछूतको मिटाना । अ० भा० कांग्रेस कमेटी तो इन राज्योंके प्रति जबतक वहाँकी प्रजाके साथ अच्छा सलूक किया जाता है, सद्भावना ही रख सकती है। और उसके साथ दुर्व्यवहार किये जानेपर भी अ० भा० कांग्रेस कमेटी लोकमतके सिवा किसी दूसरे बल या दबावका प्रयोग नहीं कर सकती और न करेगी। इसलिए, जब आवश्यकता होती है, राष्ट्रीय दलके पत्र किसी राज्यकी प्रजाके दुख-दर्दकी पुकारपर कड़ी आलोचना करनेमें नहीं हिचकिचाते। एक मिसाल लीजिए। सेठ जमनालालजी और उनके कुछ साथी बीकानेर राज्यमें गये थे । वहाँ वे महज स्वदेशी प्रचारका उद्योग करना चाहते थे । परन्तु राज्यकी ओरसे उनके साथ नादानीका और मनमाना बुरा बरताव किया गया। उसपर पत्रोंमें इसकी बहुत तीखी आलोचना की जाती रही है। यह ठीक है । जो राज्य प्रगतिशील हैं वे अ० भा० कांग्रेस कमेटीसे हर तरह के प्रोत्साहनकी और जो प्रतिक्रियावादी हैं वे अपनी कार्य-प्रणालियों और कार्य-साधनोंकी कड़ीसे-कड़ी नुक्ताचीनीकी आशा रख सकते हैं। इसके सिवा अ० भा० कांग्रेस कमेटी इन देशी राज्योंकी इस अपमानजनक हालत में उनके साथ हमदर्दी रखनेके सिवा और क्या कर सकती है ? साम्राज्य शक्तिने अपनी आर्थिक लूट-खसोटकी बाजीमें उन्हें अपना मोहरा बना रखा है। समय-समयपर जो नाजायज और दाव पेंच भरा दबाव उनपर डाला जाता है, उसको रोकनेकी उनमें बहुत ही कम जुर्रत है । अतएव उन्हें यह जानना चाहिए कि जन-शक्तिकी बढ़तीका अर्थ है मेरे बताये हुए उस अपमानजनक प्रभावमें कमी । {{Gap}}२१-३०<noinclude></noinclude> r9f6uzj1icl7tcsuyhuutxmtej7md4b 671827 671786 2026-08-19T16:04:30Z Shivaniya shaw 4129 671827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ४६५}}</noinclude>औषधि खोजने और उसे प्रयुक्त करनेमें अपनी शक्ति लगायेंगे, वे ही सच्चे सर्जन और डाक्टर बन जायेंगे और जब यह व्यापक व्याधि दूर हो जायेगी तो दूसरी बहुत-सी व्याधियाँ बिना किसी उपचारके ही गायब हो जायेंगी । उसके पश्चात् जो व्याधियाँ शेष रह जायेंगी उनके इलाजके लिए देश पुरुष और महिला चिकित्सक तैयार करनेकी ज्यादा अच्छी स्थितिमें होगा । {{C|'''देशी रियासतें'''}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने कांग्रेसकी परराष्ट्र सम्बन्धी नीति निश्चित कर दी है । अतः हमारी देशी-रियासत सम्बन्धी नीतिको निश्चित करनेकी माँग भी रखी गई। यह स्वाभाविक ही था। नागपुरके अधिवेशनमें इस विषयकी स्थल रूपरेखा बनाई गई थी - अर्थात् यह बात तय पाई गई थी कि इन रियासतोंके भीतरी मामलोंमें हस्तक्षेप न किया जाये । देशी राज्य खुद भी इससे ज्यादा अच्छी या ज्यादा स्पष्ट बातकी अपेक्षा नहीं कर सकते थे। और अ० भा० कांग्रेस कमेटी तो सिर्फ उस प्रस्ता- वकी सीमाके अन्दर-ही-अन्दर अपनी नीति निश्चित कर सकती है । अ० भा० कांग्रेस कमेटीके कार्यकर्त्ताओंने बिलकुल उस प्रस्ताव के अनुसार कार्य किया है। वे असहयोगका सन्देश देशी- राज्यों में नहीं ले गये हैं । हाँ, उसके चिरस्थायी, आत्मशुद्धिकारी या आर्थिक भाग इसके अपवाद हैं; और वे बातें तो असहयोगके अलावा भी हितकर ही साबित होंगी। वे क्या हैं -- शराबखोरी छुड़ाना, स्वदेशीका इस्तेमाल करना, हिन्दू-मुस्लिम एकताको बढ़ाना, अहिंसाका अवलम्बन लेना और छुआछूतको मिटाना । अ० भा० कांग्रेस कमेटी तो इन राज्योंके प्रति जबतक वहाँकी प्रजाके साथ अच्छा सलूक किया जाता है, सद्भावना ही रख सकती है। और उसके साथ दुर्व्यवहार किये जानेपर भी अ० भा० कांग्रेस कमेटी लोकमतके सिवा किसी दूसरे बल या दबावका प्रयोग नहीं कर सकती और न करेगी। इसलिए, जब आवश्यकता होती है, राष्ट्रीय दलके पत्र किसी राज्यकी प्रजाके दुख-दर्दकी पुकारपर कड़ी आलोचना करनेमें नहीं हिचकिचाते। एक मिसाल लीजिए। सेठ जमनालालजी और उनके कुछ साथी बीकानेर राज्यमें गये थे । वहाँ वे महज स्वदेशी प्रचारका उद्योग करना चाहते थे । परन्तु राज्यकी ओरसे उनके साथ नादानीका और मनमाना बुरा बरताव किया गया। उसपर पत्रोंमें इसकी बहुत तीखी आलोचना की जाती रही है। यह ठीक है । जो राज्य प्रगतिशील हैं वे अ० भा० कांग्रेस कमेटीसे हर तरह के प्रोत्साहनकी और जो प्रतिक्रियावादी हैं वे अपनी कार्य-प्रणालियों और कार्य-साधनोंकी कड़ीसे-कड़ी नुक्ताचीनीकी आशा रख सकते हैं। इसके सिवा अ० भा० कांग्रेस कमेटी इन देशी राज्योंकी इस अपमानजनक हालत में उनके साथ हमदर्दी रखनेके सिवा और क्या कर सकती है ? साम्राज्य शक्तिने अपनी आर्थिक लूट-खसोटकी बाजीमें उन्हें अपना मोहरा बना रखा है। समय-समयपर जो नाजायज और दाव पेंच भरा दबाव उनपर डाला जाता है, उसको रोकनेकी उनमें बहुत ही कम जुर्रत है । अतएव उन्हें यह जानना चाहिए कि जन-शक्तिकी बढ़तीका अर्थ है मेरे बताये हुए उस 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प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&curid=45922&diff=667454&oldid=664893 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:३४, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :ताकि हम उसके रूल देख ले आप ने जो भेजा है उससे उतना समझ नहीं अर्ह [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५६, ११ जुलाई २०२६ (UTC) ::@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, मैंने उसी पुस्तक के पृष्ठ 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छोटी परिधि का चयन किया है, तो आप इस परिधि को खत्म करके किसी अन्य परिधि का चुनाव कर सकती हैं। :::::अगर आप हमें बता सकें कि आपको पृष्ठ शोधित करते समय क्या समस्या आ रही है तो हम आपकी सहायता कर सकते हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १३:५८, १९ अगस्त २०२६ (UTC) clynir9zzcj61vql6nd52tmz9bu1qt1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३ 250 184080 671806 639945 2026-08-19T15:38:08Z सीमा1 430 671806 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|चित्र-सूची|}} {|width=100% |- ||| स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप — गांधीजीके स्वाक्षरोंमें “केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है!” (व्यंग्य चित्र) || १०४ |- ||| बिलजी ऑस्केन्धी ( " )|| १०४ |- ||| “पच्चर ठोकी जा रही है” (व्यंग्य चित्र) || १०४ |- ||| “डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ) || ४१६ |- ||| श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति || ४१७ |- |}<noinclude></noinclude> l3sir63vkbr4g86bppxt1aqd41ufaf2 671821 671806 2026-08-19T16:00:22Z सीमा1 430 671821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude> {|width=100% |+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}} |- |स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप — गांधीजीके स्वाक्षरोंमें || {{Gap|3em}}मुखचित्र |- |“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है!” (व्यंग्य चित्र) || १०४ के सामने |- |बिलजी ऑस्केन्धी {{ditto}}|| १०४ {{ditto}} |- |“पच्चर ठोकी जा रही है” (व्यंग्य चित्र)|| १०४ {{ditto}} |- | “डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ) || ४१६ {{ditto}} |- |श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति ||४१७ {{ditto}} |- |}<noinclude></noinclude> g0act9opfcq6wb2r6b92kzjp3dy63o9 671822 671821 2026-08-19T16:02:28Z सीमा1 430 671822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude> {|width=100% |+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}} |- |स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप — गांधीजीके स्वाक्षरोंमें || {{Gap|3em}}मुखचित्र |- |“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है !”|| (व्यंग्य चित्र) || १०४ के सामने |- |बिलजी ऑस्केन्धी ||{{ditto}}|| १०४ {{ditto}} |- |“पच्चर ठोकी जा रही है” || (व्यंग्य चित्र)|| १०४ {{ditto}} |- | “डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ) || ४१६ {{ditto}} |- |श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति ||४१७ {{ditto}} |- |}<noinclude></noinclude> b3u6gw8ui5jnt8w03ywrik420ik0ga7 671824 671822 2026-08-19T16:02:57Z सीमा1 430 671824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude> {|width=100% |+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}} |- |स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप — गांधीजीके स्वाक्षरोंमें || {{Gap|3em}}मुखचित्र |- |“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है !”|| (व्यंग्य चित्र) || १०४ के सामने |- |बिलजी ऑस्केन्धी ||{{ditto}}|| १०४ {{ditto}} |- |“पच्चर ठोकी जा रही है” || (व्यंग्य चित्र)|| १०४ {{ditto}} |- | “डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ) || ||४१६ {{ditto}} |- |श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति || ||४१७ {{ditto}} |- |}<noinclude></noinclude> itnu0xu3a7m0xrpf5dq9pevj0ib8vuz 671826 671824 2026-08-19T16:04:24Z सीमा1 430 671826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude> {|width=100% |+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}} |- |स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप —||गांधीजीके स्वाक्षरोंमें || {{Gap|3em}}मुखचित्र |- |“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है !”|| (व्यंग्य चित्र) || १०४ के सामने |- |बिलजी ऑस्केन्धी ||{{ditto}}|| १०४ {{ditto}} |- |“पच्चर ठोकी जा रही है” || (व्यंग्य चित्र)|| १०५ {{ditto}} |- | “डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ) || ||४१६ {{ditto}} |- |श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति || ||४१७ {{ditto}} |- |}<noinclude></noinclude> 50wkxo469o3jmvzfehneukztp8d7cka पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६४ 250 186158 671793 644473 2026-08-19T15:01:09Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671793 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करना है तो स्वयंसेवकोंको सम्पूर्ण बनना चाहिए। उनमें शोर बन्द करनेकी, चरण-स्पर्श रोकनेकी और लोगोंतक अपनी आवाज पहुँचानेकी शक्ति होनी ही चाहिए। वैसा न हो तो दिक्कत के समय स्वयंसेवक सेवा करनेमें असमर्थ सिद्ध होंगे। अतएव हमें अपनी लड़ाईमें स्वयंसेवकोंकी तालीमको एक महत्त्वपूर्ण अंग मानना चाहिए। {{c|'''जाँच-पड़ताल'''}} हम स्वदेशीका पालन करते हैं अथवा नहीं इसकी जाँच कैसे हो सकेगी, लोग प्रायः यह बात मुझसे पूछते रहते हैं। यह जाँच दो प्रकारसे की जा सकती है। इस समय तो बाजारोंमें हमें अपने देशके स्त्री-पुरुषोंके शरीरपर विदेशी कपड़ोंके अलावा कदाचित् ही कोई और वस्त्र दिखाई देता है। हमें तोरणों और सजावट आदिमें भी मैनचेस्टरका कपड़ा ही चाहिए। हमारे झंडे और चपरासके परतले आदि भी विदेशी कपड़ेके ही होते हैं।मन्दिरोंमें, मस्जिदोंमें यही देखने में आता है। इसके बदले जब हम सब स्थानोंपर खादीका उपयोग करने लगेंगे तब हम समझेंगे कि खादीका जमाना आया। इससे भी पक्का सबूत हमारी कपड़ेकी दुकानें और बुनकरोंकी बस्ती हमें देगी। यदि हमारी दुकानोंमें विदेशी कपड़ा आसानीसे न मिल सके और सिर्फ खादी ही नजर आये तथा बुनकरोंके करघोंपर विदेशी सूत न हो तो हमें समझ जाना चाहिए कि अब स्वदेशीका युग आ गया है। यदि विदेशी माल माँगनेवाला कोई होगा ही नहीं तो विदेशी मालकी दुकानें कहाँसे होंगी? इस महत्त्वपूर्ण उपलब्धिको हिन्दू-मुसलमान दोनों समझ जायें तभी सफलता मिलेगी। करोड़ों हिन्दू अगर बारीक मलमलके शौकको न छोड़ें तो अकेले मुसलमान क्या कर सकते हैं? करोड़ों मुसलमान वैसा न करें तो हिन्दू अकेले क्या कर सकते हैं? {{c|'''अपने कियेका फल'''}} हमने जनताके अन्य अंगोंकी उपेक्षा की, इसीसे अब हमपर मुश्किल आई है। मैं जहाँ कहीं जाता हूँ वहीं मुझे व्यापारियों तथा बुनकरोंमें सहयोगका अभाव दिखाई देता है। व्यापारी तो कुछ हदतक प्रवृत्ति में शामिल हो गये हैं, लेकिन बुनकरोंमें तो हमने अभीतक प्रवेश ही नहीं किया। अतएव हमें अब उन्हें शिक्षा देनी चाहिए। जबतक हम उन्हें शिक्षित नहीं करते तबतक हमारी दिक्कतें बढ़ती ही चली जायेंगी। व्यापारी विदेशी माल लाते रहेंगे और बुनकर विदेशी सूत कातते रहेंगे और हाथकते सूतको छुएँगे भी नहीं। फिर हमारा क्या हाल होगा? कांग्रेस कमेटी के प्रत्येक अधिकारीको अब बुनकरों और व्यापारियोंसे मिलना चाहिए, उन्हें सदस्य बनाना चाहिए और उन्हें उनके धन्धेमें उचित परिवर्तन करनेके लिए समझाना चाहिए। मुरादाबादमें ऐसा प्रयत्न सफल हुआ। वहाँकी कमेटीने कार्य करनेवालों और व्यापारियों, दोनोंको इकट्ठा किया था। उन्होंने बात समझने और अपनी गुत्थियोंको सुलझानेके बाद खुशी-खुशी विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रतिज्ञा की। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ वहाँ-वहाँ गुजरातियोंकी एक अच्छी संख्या दिखाई देती है। उनमें से अनेक तो सौ-सौ, दो-दो सौ वर्षोंसे अमुक-अमुक प्रान्तोंमें रहते आये हैं। वे लोग अब सभी स्थानोंपर बड़ी स्पर्धासे काम कर रहे हैं और जहाँ रहते हैं वहाँके लोगोंसे मिल-जुलकर रहते हैं। किसी-किसी<noinclude></noinclude> 11x77nr7z2mks695oh9co990owqmcd3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६५ 250 186159 671796 644474 2026-08-19T15:08:22Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५३३}}</noinclude>स्थानपर तो उनकी मेहनतसे कांग्रेसका कार्य अच्छी तरह जमा हुआ दिखाई देता कांग्रेसके कार्य में भाग लेते हुए भी वे स्वयं निरभिमानी हैं। इस तरह गुजरातसे बाहर गुजराती अपने गुणोंको प्रगट कर रहे हैं, यह देखकर मुझे बहुत सन्तोष होता है। अगर हम हर तरहके भयसे मुक्त हो जायें तो अभी और भी ज्यादा देशसेवा कर सकते हैं। {{c|'''शान्तिका बल'''}} प्रत्येक स्थानपर मैं यह देखता हूँ कि जहाँ लोग शान्तिके पाठको अच्छी तरह समझ गये हैं वहाँ उन्होंने ज्यादासे-ज्यादा तरक्की की है। भय अथवा दुर्बलताके मारे जिस शान्तिका पालन किया जाता है वह सच्ची शान्ति नहीं है। सच्ची शान्ति वही हो सकती है जिसमें बल और तेज हो। अंग्रेजोंके प्रति अपने सम्बन्धों में जैसे हमने शान्ति नहीं खोई उसी तरह हमें अपने ही अधिकारियों, सिपाहियों और पुलिस आदिके प्रति भी नहीं खोनी है। एक भाई मुझसे पूछते हैं कि हमें परस्पर शान्ति बनाये रखनी चाहिए अथवा सिर्फ अंग्रेजोंके प्रति। इस प्रश्नके लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं हो सकती। हम अपने लोगोंके प्रति शान्तिका पालन नहीं करेंगे तो भी हार जायेंगे। असहयोगी सबके प्रति विनयी रहता है, सबके प्रति शान्त और नम्र रहता है।व्यक्ति जितना शूरवीर हो उसे उतना ही शान्त होना चाहिए; वह जितना बड़ा हो उसे उतना ही नम्र होना चाहिए। उद्धत व्यक्ति, जो बात-बात में मारने और गाली देनेके लिए तैयार रहता है, अपना बल खो बैठता है। शान्ति भी सूक्ष्म वीर्य है; उसको संचित करनेवाला भी प्रौढ़ ब्रह्मचारी और तेजस्वी बनता है। हमने ब्रह्मचर्यकी व्याख्याको स्थूल स्वरूप प्रदान करके जो व्यक्ति प्रतिक्षण क्रोधसे भड़क उठते हैं उन्हें दोषी मानना छोड़ दिया है। शरीर सुखके लिए जिस तरह स्थूल ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है उसी तरह आध्यात्मिक ब्रह्मचर्यकी भी आवश्यकता है। मेरा तो विश्वास है कि हमने सहयोगियोंपर क्रोध करके, पुलिसको गाली देकर अपनी लड़ाईको लम्बा कर दिया है। यदि हम मन, वचन और कर्मसे सब विरोधियोंके प्रति शान्त, विनम्र और विनयी रहे होते तो अभीतक समस्त सत्ताको अपने हाथमें लेकर बैठ गये होते। {{c|'''पारसी बहनोंसे'''}} मैं जानता हूँ कि एक अच्छी संख्यामें पारसी बहनें ‘नवजीवन’ पढ़ती हैं। उन्हें ‘नवजीवन’ की भाषाको समझने में जरा कठिनाई होती होगी। मैं जहाँतक बने सरल भाषा लिखने और संयुक्ताक्षरोंको न आने देनेका प्रयत्न करता हूँ, लेकिन भाषाके नियमोंकी एकदम उपेक्षा नहीं की जा सकती। पारसियोंने गुजरातीको इतना ज्यादा बिगाड़ दिया है कि उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना भाषाका खून करनेके समान होगा। इसलिए बहनोंसे मेरी प्रार्थना है कि उन्हें जो शब्द कठिन लगे उन्हें जाननेके लिए मेहनत करें, किसीसे पूछ लें। थोड़ेसे अंकोंको इस तरह प्रयत्नपूर्वक पढ़नेके बाद उन्हें फिर बिलकुल अड़चन नहीं होगी। पारसी भाइयों और बहनोंको यही शोभा देता है कि वे भाषाको सुधारनेका प्रयत्न करें। अब तो पारसी गुजराती, मुसलमान गुजराती और हिन्दू गुजराती——<noinclude></noinclude> 3x4p4b2xf4ykews4jdcs53rx2micn7h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६६ 250 186160 671800 644475 2026-08-19T15:21:45Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भाषाके ये तीन वर्ग हो गये जान पड़ते हैं। फिर मुसलमान भाई गुजरातीको पारसियों जितना नहीं बिगाड़ते और उन्हें ‘नवजीवन’ की गुजरातीको समझनेमें भी कोई दिक्कत नहीं आती। खबरदार,{{sfn|व|}}मलबारी{{sfn|पारसी कवि।|}}आदि लेखकोंने बता दिया है कि पारसी चाहें तो अच्छी गुजराती लिख अवश्य सकते हैं। मेरे पास कितने ही पारसियोंके पत्र आते हैं; उनमें मैं शुद्ध गुजराती पाता हूँ। केवल भाषाके प्रति थोड़ेसे अभिमानकी जरूरत है। इतना होनेपर पारसियोंकी गुजराती धीरे-धीरे सामान्य स्तरपर पहुँच जायेगी। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' १४-८-१९२१|1em}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''२६२. पत्र: ओंकारनाथ पुरोहितको'''}}}} {{right|पटना जाते हुए<br> १५ अगस्त, १९२१}} {{left|भाई ओंकारनाथ,}} आपका पत्र मीला। छपेला पत्र मैं भेजता हूं। उस पत्र में ऐसी कोई अनीतिमय बात नहि देखता हुं जिसलीये आपको अनीति प्रकट करनेके कारन खतको छापना चाहिये। उस खतको न प्रकट करनेकी प्रतिज्ञाका पालन करना हि चाहिये। उसमें दीइ हुई सलाहका पालन न करना या करना आपका हि हृदयपर निर्भर रहता है। {{right|'''मोहनदास गांधी'''}} {{left|ओंकारनाथ पुरोहित<br> द्वारा/लाला चन्दूलाल<br> राजाका बाजार<br> आगरा}} गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल पत्र (जी॰ एन॰ ६०८८) की फोटो- नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}} {{smallrefs}}</noinclude> 0dkhtrw6ndoj4bamu2po8iap2yve3re पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६७ 250 186161 671805 644476 2026-08-19T15:36:36Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671805 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६३. सन्देश: शिमला-पहाड़ियोंकी जनता के नाम'''}}}} {{right|१५ अगस्त, १९२१}} {{left|भाइयो,}} मुंशी कपूरसिंह और उनके साथी आपके लिए कष्ट भोग रहे हैं। उनका उद्देश्य है कि आप उन सब अन्यायोंसे बचें जो आप बहुत दिनोंसे भोग रहे हैं। क्या आप अपने इन साथियोंके लिए कोई यत्न करेंगे? मुझे विश्वास है कि जबतक आपके साथी जेलमें हैं आप सरकार और रियासतको बेगार न देंगे। इस मामलेमें श्री स्टोक्सका कहना आपको मानना चाहिए। आप कोई उपद्रव न करें। जबतक आपके भाई जेल-खानेमें हैं आप अपने दिलसे क्रोध हटा दें। आपके लिए तकलीफ उठाना और जेल जाना अच्छा है पर किसी अफसरको बेगार नहीं देना चाहिए। याद रखिए यदि इस अवसरपर आप पीछे हटे तो आप अपनी दासता और दृढ़ करेंगे और सदाके लिए दास बने रहेंगे। इस बारे में मैं पूरी तरह आपके साथ हूँ। '''आज,''' १७-८-१९२१ {{dhr}} {{c|{{larger|'''२६४. पत्र: महादेव देसाईको'''}}}} {{right|कलकत्ता जाते हुए<br> [१७ अगस्त, १९२१ के पूर्व]<ref>गांधीजी १७ अगस्त, १९२१ को कलकत्ता में थे।</ref>}} {{left|भाईश्री ५ महादेव,}} तुम्हारा पत्र मिला। मोतीलालजी तो यही चाहते हैं कि तुम रहो, किन्तु मुख्य बात तो तुम्हारी इच्छा ही है——यदि वहाँ बहुत मेहनत पड़े या तुम्हारी तबीयत ही अच्छी न रहे तो निश्चय ही चले आना। किसी आदमीका दाहिना हाथ बननेसे अधिक महत्त्वपूर्ण और क्या हो सकता है? यह वाक्य कि “यदि मैं दाहिना हाथ बन सकता” केवल दुःखमें अथवा ज्ञानपूर्वक लिखा जा सकता है। यदि दुःखमें लिखा हो, तो फिर तुमने मुझे नहीं समझा है। यदि ज्ञानपूर्वक लिखा है, तब तो कुशल है। दो दिमाग एक-दूसरेसे विलग रह सकते हैं, किन्तु हाथ दिमागसे विलग होकर क्या कर सकता है? मैं तुम्हें दिमाग मानकर शिक्षित कर रहा हूँ। सन्तराम तो “पर्मनेंट अंडर-सेक्रेटरी” है, इसलिए वह तो खिसक नहीं सकता।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> qcven39txw4onog2opoxxn9aazsv98u पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६८ 250 186162 671812 644477 2026-08-19T15:44:27Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671812 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>&nbsp; मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी सही परिस्थितिको समझो। मैं प्यारेलालको<ref>प्यारेलाल नय्यर, १९२० में गांधीजीके साथ हुए और महादेव देसाईकी मृत्युके बाद उनके मुख्य सचिव बने।</ref> क्यों रखे हुए हूँ, यह भेद तुम नहीं समझोगे। मेरी जिन्दगीके इस भागको तुम समझ नहीं सकोगे। बाका और मेरा स्वभाव एक नहीं है। बा मुझे नहीं समझती। आश्रममें अभी तक तो मुझे जैसी चाहिए वैसी एक भी स्त्री नहीं मिली। रसोई-घरके काम-काजको सँभालना [विकट] काम है। विरला ही उसे सँभाल सकता है। मैं उसे तुम्हारी शक्तिके बाहर मानता हूँ। उसके लिए तो फिलहाल मगनलाल, विनोबा, छोटेलाल,<ref> छोटेलाल जैन, सत्याग्रह आश्रमवासी।</ref> मैं और कुछ अंश में भुँवरजीने<ref>सत्याग्रह आश्रमवासी।</ref> अपनेको सिद्ध किया है। हमारा भोजन तो एक शास्त्र के अनुसार है। गोकीबेनको<ref>गांधीजीकी बहन।</ref> लेकर काफी परेशानियाँ थीं। हमें एक प्रौढ़ मनुष्यकी निश्चय ही आवश्यकता है। मैं अपनी समझमें प्यारेलालका अच्छेसे अच्छा उपयोग कर रहा हूँ। वक्त आनेपर मैं उसे अन्यत्र रख सकूँगा। जोजेफके बाहर रहते हुए तुम्हारा देवदास अथवा प्यारेलालको माँगना तो ज्यादती जान पड़ती है। तुम्हें इन दोनोंसे कुछ हलके दर्जेके व्यक्तिसे सन्तोष करना चाहिए। तुम प्रभुदासको रख सकते हो। दुर्गाके अच्छे हो जानेपर क्या तुम जोजेफके साथ रह सकते हो? लेकिन यह तो दूरकी बात हुई। पहले तो मुझे तुम्हारी इच्छा ही जाननी है । मैं तुम्हें अभी ‘यंग इंडिया’ में नहीं भेजूँगा। क्या तुम्हें मेरा पिछला पत्र मिला था? फिलहाल तो मैं इसी तरह सोचता हूँ कि या तो तुम वहीं रहो या फिर मेरे साथ। तुम्हारे लेख पढ़े। सभी अच्छे हैं यानी उनपर कोई टीका-टिप्पणी जरूरी नहीं है। विपिनचन्द्रको<ref>विपिनचन्द्र पाल।</ref> ठीक जवाब दिया गया है। मुझे गौहाटी लिखना। मैं २५ तक गौहाटीके आसपास रहूँगा।क्रिस्टोदास<ref>कृष्णदास।</ref> ‘यंग इंडिया’ के विचारसे साथ है। उसके आनेकी बात थी और वह आ गया है। वह मेरे साथ ही है। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} मूल गुजराती पत्र (एस॰ एन॰ ११४१३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> scurvueda71bgk0md8kv3exneva8u17 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६९ 250 186163 671814 644478 2026-08-19T15:53:42Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671814 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६५. भाषण: कलकत्तेके मिर्जापुर पार्क में'''<ref>यह सभा साढ़े चार बजे शामको हुई थी। इसमें १५,००० से ऊपर हिन्दू-मुसलमान उपस्थित थे। उपस्थित लोगों में मौलाना अबुल कलाम आजाद और मुहम्मद अली भी थे।</ref>}}}} {{right|१७ अगस्त, १९२१}} '''महात्मा गांधीने भाषणके प्रारम्भमें कहा कि मैं ५ मिनटसे ज्यादा नहीं बोलूँगा, क्योंकि मुझे आज शामको ही दार्जिलिंग मेलसे असमके लिए रवाना होना है, इसलिए मैं आशा करता हूँ, सब लोग मेरी बात धैर्यसे सुनेंगे।''' '''मुझे विश्वास है आप सबने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीका प्रस्ताव पढ़ा होगा। उसमें कहा गया है कि आगामी ३० सितम्बर से पहले विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण रूपसे बहिष्कार हो जाना चाहिए। इसलिए मैं आप लोगोंसे जोर देकर कहता हूँ कि आप प्रस्तावको अमल में लायें। मैं आपसे अपील करता हूँ कि आप स्वदेशी वस्त्रोंका उपयोग करें और जिन विदेशी वस्त्रोंको आप अब भी पहने हुए हैं उन्हें जला दें या स्मरना भेज दें। अपने खादीके कपड़े और ‘स्वराजी टोपी’ की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा: यद्यपि खादी कुछ खुरदरी होती है फिर भी आप हतोत्साहित न हों। मैं आपको याद दिलाता हूँ कि यदि आप प्रस्तावपर पूर्ण रूपसे अमल करनेके लिए कृतसंकल्प है तो मैं आपको आगामी अक्तूबर में स्वराज्य दिला दूँगा और खिलाफत तथा पंजाबपर किये गये अत्याचारोंका प्रतिकार भी हो जायेगा। मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप हिन्दू और मुसलमान, दोनों एक माँके दो बेटोंके समान मिलकर कार्य करें और अपने संघर्ष में शान्तिके साथ जूझने के लिए तैयार रहें।स्वतन्त्रताके संघर्ष में साहसके साथ मोर्चा लें और अहिंसक साधनोंको अपनायें। भाषण समाप्त करते हुए महात्मा गांधीने श्रोताओंसे पुनः अपील की कि वे अपने सब विदेशी कपड़ोंको उतारकर फेंक दें और यदि जरूरत हो तो उन्हें जला दें। उन्होंने यह भी कहा कि वे कुछ दिनोंमें ही असमके दौरेसे कलकत्ता लौटेंगे और तब उनके बीच अधिक समयतक भाषण दे सकेंगे। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''अमृतबाजार पत्रिका,''' १८-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}} {{smallrefs}}</noinclude> qugswcrhlgyas6g6yyek41azodqs9bh 671815 671814 2026-08-19T15:54:38Z अँजली चौधरी 2439 671815 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६५. भाषण: कलकत्तेके मिर्जापुर पार्क में'''<ref>यह सभा साढ़े चार बजे शामको हुई थी। इसमें १५,००० से ऊपर हिन्दू-मुसलमान उपस्थित थे। उपस्थित लोगों में मौलाना अबुल कलाम आजाद और मुहम्मद अली भी थे।</ref>}}}} {{right|१७ अगस्त, १९२१}} '''महात्मा गांधीने भाषणके प्रारम्भमें कहा कि मैं ५ मिनटसे ज्यादा नहीं बोलूँगा, क्योंकि मुझे आज शामको ही दार्जिलिंग मेलसे असमके लिए रवाना होना है, इसलिए मैं आशा करता हूँ, सब लोग मेरी बात धैर्यसे सुनेंगे।''' '''मुझे विश्वास है आप सबने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीका प्रस्ताव पढ़ा होगा। उसमें कहा गया है कि आगामी ३० सितम्बर से पहले विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण रूपसे बहिष्कार हो जाना चाहिए। इसलिए मैं आप लोगोंसे जोर देकर कहता हूँ कि आप प्रस्तावको अमल में लायें। मैं आपसे अपील करता हूँ कि आप स्वदेशी वस्त्रोंका उपयोग करें और जिन विदेशी वस्त्रोंको आप अब भी पहने हुए हैं उन्हें जला दें या स्मरना भेज दें। अपने खादीके कपड़े और ‘स्वराजी टोपी’ की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा: यद्यपि खादी कुछ खुरदरी होती है फिर भी आप हतोत्साहित न हों। मैं आपको याद दिलाता हूँ कि यदि आप प्रस्तावपर पूर्ण रूपसे अमल करनेके लिए कृतसंकल्प है तो मैं आपको आगामी अक्तूबर में स्वराज्य दिला दूँगा और खिलाफत तथा पंजाबपर किये गये अत्याचारोंका प्रतिकार भी हो जायेगा। मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप हिन्दू और मुसलमान, दोनों एक माँके दो बेटोंके समान मिलकर कार्य करें और अपने संघर्ष में शान्तिके साथ जूझने के लिए तैयार रहें।स्वतन्त्रताके संघर्ष में साहसके साथ मोर्चा लें और अहिंसक साधनोंको अपनायें।''' '''भाषण समाप्त करते हुए महात्मा गांधीने श्रोताओंसे पुनः अपील की कि वे अपने सब विदेशी कपड़ोंको उतारकर फेंक दें और यदि जरूरत हो तो उन्हें जला दें। उन्होंने यह भी कहा कि वे कुछ दिनोंमें ही असमके दौरेसे कलकत्ता लौटेंगे और तब उनके बीच अधिक समयतक भाषण दे सकेंगे।''' {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''अमृतबाजार पत्रिका,''' १८-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}} {{smallrefs}}</noinclude> 5dkz2t162bswfewh8hj8p935hna6lxl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७० 250 186164 671823 644479 2026-08-19T16:02:52Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671823 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६६. पत्र: ख्वाजाको'''}}}} {{right|[१७ अगस्त, १९२१ के बाद]<ref>यह पत्र ख्वाजाके २६ तारीखके उस तारके जवाब में लिखा गया था जो गांधीजीको १७ अगस्त-को मुंगेर में मिला था। तार इस प्रकार है: “पिछले वर्षकी ६ गौओंके मुकाबले इस वर्ष कल २ की कुर्बानी की गयी। ...स्वदेशीके सम्बन्धमें प्रतिक्रिया अत्यन्त आशाजनक। रुपयेका ४ सेर गेहूँ। अधिक महँगा होने की अफवाह। इससे नगर में महान् विक्षोभ। खतरनाक स्थिति उत्पन्न होनेकी आशंका। कृपया तारसे सलाद दें।”</ref>}} {{left|प्रिय ख्वाजा साहब,<ref>अनुमानतः अलीगढ़के राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालयके उप-कुलपति ख्वाजा अब्दुल मजीद।</ref>}} मैं गोवधके सम्बन्धमें आपके तारका जवाब पहले नहीं भेज सका इसके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगे। मैं जानता हूँ, भारतके बहुतसे भागों में सचमुच बहुत ही अच्छा कार्य हुआ है। आप अन्नकी कमीके बारेमें तार चाहते थे। अब तार देनेका कोई उपयोग नहीं बचा है। मैं ४ तारीखको<ref>गांधीजीको ६ सितम्बर को होनेवाली कार्यकारिणी की बैठकमें शामिल होनेके लिए ४ तारीखको कलकत्ता पहुँचना था।</ref> आपसे मिलनेकी आशा करता हूँ। यदि स्थितिपर फिर भी विचार करनेकी जरूरत हो तो उस समय आप इसका उल्लेख करें। {{right|'''हृदयसे आपका,'''}} अंग्रेजी पत्र (एस॰ एन॰ ७५९९ ) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२६७. संयुक्त प्रान्तमें दमन'''}}}} पण्डित जवाहरलाल नेहरूने मेरे लिए आजसे दो मास पूर्व निम्नलिखित टिप्पणी<ref>टिप्पणीके पाठके लिए देखिए परिशिष्ट ५।</ref> तैयार की थी। इसमें उन्होंने ३० मईतक संयुक्त प्रान्तमें होनेवाले दमनके तरीकोंकी समीक्षा की है। दूसरे मामलोंमें व्यस्त रहनेके कारण मैं पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी इन टिप्पणियोंपर ध्यान नहीं दे सका। किन्तु वे आज भी उतनी ही ताजी लगती हैं जितनी जूनमें थीं। सरकारकी ओरसे उत्पीड़नके आरोपका जो निराकरण किया गया है उसका लगभग पूरा जवाब पाठकको इन टिप्पणियोंमें पढ़नेको मिलेगा। {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> 1gq1c1qighzwzam9id952z39gwsbr6p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७१ 250 186165 671831 644480 2026-08-19T16:10:57Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671831 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२६८. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''‘हिन्दी नवजीवन’'''}} बहुतसे हिन्दी-भाषी मित्र इस बातके लिए उत्सुक थे कि मैं ‘नवजीवन’ के हिन्दी संस्करणके प्रकाशनका दायित्व अपने ऊपर ले लूँ । मैं स्वयं भी उसके लिए उत्सुक था। किन्तु यह अबतक सम्भव नहीं हो सका। ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ के सम्पादनका काम सँभालना काफी कठिन होता है। किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैं अपने विचारों और सिद्धान्तोंको पसन्द करता हूँ। मेरी पक्की राय है कि वे भारतके लिए हितकर हैं और यदि मुझे पूर्ण विनम्रतासे इतना कहनेकी अनुमति हो तो वे सभीके लिए हितकर हैं। इस कारण में मित्रों और कार्यकर्त्ताओंके हिन्दी संस्करण निकालने के दबावके आगे झुक रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि भारतके विभिन्न भागों में मेरे लेखोंके अनेक हिन्दी अनुवाद छपते हैं। किन्तु सभी चाहते थे कि ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ के चुने हुए लेखोंका एक अधिकृत स्वतन्त्र अनुवाद एक जगह छपे। यह कार्य अब किया जा रहा है। इस संस्करणकी हिन्दी वस्तुतः हिन्दुस्तानी होगी जो ऐसे हिन्दी और उर्दू सरल शब्दोंसे बनी मिली-जुली भाषा होगी जिन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनों समझते हैं। प्रयत्न यह किया जायेगा कि इसमें कोई सजावट न की जाये। असल बात तो यह है कि मैं चाहता था कि इसका उर्दू रूप भी साथ ही निकले। किन्तु अभी यह नहीं निकाला जा सकता। मैं पाठकोंसे यह भेद भी छिपाना नहीं चाहता कि ‘हिन्दी नवजीवन’ के प्रकाशनमें जो यह जल्दी की गई है उसके पीछे मेरा अपने मारवाड़ी भाइयों और खास तौरसे जमनालालजीके प्रति आदरभाव है। जमनालालजीने प्रकाशकके रूपमें और श्री शंकरलाल बैंकरने मुद्रकके रूपमें अपने नामकी सूचना अदालत में दे दी है। गुजराती और अंग्रेजी संस्करणोंकी तरह ‘हिन्दी नवजीवन’ में भी विज्ञापन नहीं रहेंगे। इसे उन दोनोंकी तरह स्वावलम्बी भी बनाना होगा; इसलिए इसे जो सहायता मिलेगी, इसका अस्तित्व उसीपर कायम रहेगा। हिन्दी संस्करणका चन्दा ४ रुपये वार्षिक होगा और ६ मासका २ रुपये होगा। जो लोग ग्राहक बनना चाहते हैं उनको मेरी सलाह है कि वे अभी आधे सालका चन्दा भेजें। ‘हिन्दी नव-जीवन' का प्रकाशन अभी परीक्षणके रूपमें किया जा रहा है। मेरे पास कार्यकर्त्ता सीमित हैं। यदि मुझे स्वामी आनन्दानन्दकी अथक शक्ति और सूझबूझका सहारा न मिलता तो मैं इस जिम्मेवारीको उठानेसे इनकार कर देता। हमने यह देख लिया है कि सबसे अच्छा काम वे लोग ही करते हैं जो स्वेच्छासे काम करते हैं।और इस प्रकारका शारीरिक या मानसिक श्रम करनेवाले लोगोंको ढूँढ़ना आसान नहीं है। इसलिए मैं उन हिन्दी-प्रेमियोंका, जिन्होंने असहयोगको जीवनका सिद्धान्त बना लिया है, आह्वान करता हूँ कि वे ‘नवजीवन’ को परीक्षणके रूपमें छः मासतक अपना संरक्षण दें। यह कहनेकी जरूरत नहीं कि ये पत्र मुनाफा कमानेके लिए नहीं निकाले गये हैं। इसलिए<noinclude></noinclude> 997u2ihsjbif9f7beb1o9qifpw4jwud पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७२ 250 186166 671835 644481 2026-08-19T16:17:08Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671835 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यदि कोई बचत होगी तो वह तीनों संस्करणोंके विकासमें लगाई जायेगी। पाठकोंकी दिलचस्पी यह जानने में भी होगी और उन्हें इससे प्रसन्नता होगी कि मौलाना मुहम्मद अलीने अपनी ‘कामरेड’ की मशीनें, टाइप और अन्य सामग्री बिना कुछ लिये हमें दे दी है। इस प्रकार अशुभ शक्तियोंसे असह्योगकी लड़ाई शुभ शक्तियोंके निकटतम सहयोगपर निर्भर है। मैं सरकारकी शक्तियोंको अशुभ शक्तियाँ और असह्योगकी शक्तियोंको असहयोगियोंकी समस्त त्रुटियों और सीमाओंके बावजूद शुभ मानता हूँ। {{c|'''नकली माल'''}} एक मित्र मद्राससे लिखते हैं—— :{{gap}}'''इसके साथ में कपड़ेका एक नमूना भेजता हूँ। यह मद्रासमें बॉम्बे स्वदेशी स्टोर द्वारा १०-१५ आने गजके भाव, शुद्ध खादी——अर्थात् हाथकती और हाथबुनी खादीके नामसे बेचा जा रहा है। ऐसी धोखेबाजीसे लोगोंका बचाव किस तरह किया जाये? मुझे इसमें शक नहीं कि नमूनेका यह कपड़ा विदेशका बना है।''' मैंने नमूने के कपड़ेको देखा है। इसमें तो जरा भी सन्देह नहीं कि वह न तो हाथके कते सूतका बना है और न हाथसे बुना हुआ है। मुमकिन है कि वह हिन्दुस्तानकी मिलों में तैयार हुआ हो। परन्तु मुझे तो उसकी चमक-दमक और सफाई हिन्दुस्तानकी अपेक्षा जापानी अधिक मालूम होती है। दुःखकी बात तो यह है कि ऐसा माल स्वदेशी भण्डारों द्वारा बेचा जाता है। परन्तु ऐसी कुछ-न-कुछ धोखेबाजी तो होती ही रहेगी। हमें उसका सामना करनेके लिए सदा तैयार रहना चाहिए। वे इस बात के जीते-जागते प्रमाण हैं कि स्वदेशीका जोश बढ़ता जा रहा है। परन्तु सवाल यह है कि इस धोखेबाजीको किस तरह पहचाना और रोका जाये। इसका अचूक उपाय तो यही है कि हम अपने लिए खुद ही सूत कातें और उसे जुलाहोंसे, अपनी ही देखरेख में बनवा लें। निस्सन्देह ऐसा समय आ रहा है। जब हम खुद कात न सकें तब हमें सारे देशमें जो हजारों कातनेवाले तैयार हो रहे हैं उनसे सूत कतवा लेना चाहिए। यदि हमसे यह भी न हो सके तो जब हम खादी खरीदने लगें तब जो कपड़ा किसी भी तरह मिलका बना जैसा मालूम हो उसे न खरीदें। मोटे सूतके कपड़ोंमें यह पहचान करना बड़ा ही कठिन है कि कौन-सा विदेशसे आया है और कौन-सा यहाँकी मिलोंका बना है। हाथ-कते सूतकी खादीमें मिलकी-सी निस्तेज चमक नहीं रहती, बल्कि वह देखनेमें मोटी, झिरझिरी बुनावटकी, हलकी और छूने में मुलायम मालूम होती है। वह चिकनी और चमकदार तो होती ही नहीं। बचावका एक दूसरा उपाय यह है कि कपड़ा पाउडरसे सफेद किया हुआ न होना चाहिए। तीसरी एक और बात है परन्तु वह धोखेसे खाली नहीं। प्रत्येक कांग्रेस जिलेमें ऐसी स्वदेशी दूकानें होनी चाहिए जिन्हें कांग्रेसकी ओरसे प्रमाणित किया जाये। अच्छे जानकार निरीक्षक रखे जायें जो लगातार ऐसी दूकानोंके मालकी जाँच किया करें। मुमकिन हो तो हरएक चीजपर मुहर लगी रहे। मैं जानता हूँ कि अभी हममें इतना संगठन नहीं<noinclude></noinclude> 1zbzubm141rb0blz3iaxjkupav6tb2a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७३ 250 186167 671837 644482 2026-08-19T16:24:26Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671837 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५४१}}</noinclude>हुआ है और हमें इतनी तालीम नहीं मिली है कि हम बहुत बड़े पैमानपर इस कामको उठा सकें। परन्तु जबतक हरएक जिला अपने लिए आवश्यक खादी तैयार न करने लगे तबतक ऐसी निगरानीकी तो निश्चय ही आवश्यकता है और सच्चे दिलसे जो- कुछ इसके लिए किया जा सकता है वह किया जाना चाहिए। {{c|'''लखनऊ के पाप-स्थान'''}} एक अंग्रेज मित्रने मुझे लखनऊसे लिखा है: :{{gap}}'''मैं यह पत्र आपसे यह अनुरोध करते हुए लिख रहा हूँ कि आप यहाँसे जानेके पहले लखनऊ के वेश्यागृहोंके सम्बन्धमें यहाँके किसी अधिकारीको, जो आपके मतका समर्थक हो, कुछ लिख दें। आज सुबह मैं अमीनाबादमें फौजी पुलिस के सिपाहीसे बातचीत कर रहा था। उससे मालूम होता है कि उस तरफकी बस्ती में ऐसे कोई पचास मुकाम हैं, जहाँ यूरोपीय और एंग्लो-इंडियन सिपाही अक्सर जाया करते हैं। (इनमें से कुछ लोग फौजी अदालतोंमें पेश भी किये जा चुके हैं, क्योंकि उस बस्ती में फौजियोंका जाना मना है)। उसने हिन्दुस्तानियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा; परन्तु मुझे बादमें किसीने बताया कि वे भी उन स्त्रियोंके यहाँ जाते हैं। मनुष्यके इस अधःपतन और असंयमके सम्बन्धमें आप यदि कुछ शब्द लिख देंगे तो वह इस बुराईको दूर करने में अन्य सब बातोंसे अधिक कारगर होगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि इस काममें जितनी सहायता मुझसे हो सकती है, मैं करूँगा।''' मैं चाहता हूँ कि मैं भी इन अंग्रेज मित्रकी तरह विश्वास कर सकता कि मेरे शब्दोंमें वह प्रभाव है, जो उन्होंने बताया है। इन पंक्तियोंको लिखते समय बार-बार मेरी आँखोंके सामने उन प्यारी बहनोंका चित्र आता है जो मुझसे रातके समय कोको-नाडामें मिली थीं। जब मुझे उनकी लज्जाजनक स्थितिका हाल मालूम हुआ तब वे तो मुझे और भी प्यारी लगने लगीं। वे केवल संकेतसे मुझे अपने जीवनकी दशा बता सकी थीं। जो स्त्री उनकी तरफसे मुझसे बात कर रही थी उसकी आँखोंमें लज्जा और दुःख अंकित था। मैं उन्हें दोषी कहनेके लिए तैयार न हो सका। इस मुलाकातके बाद मैंने ‘व्यक्तिगत चरित्र-शुद्धि’ की आवश्यकतापर ही भाषण दिया। इसलिए आज मेरे हृदयमें लखनऊकी इन पतित बह्नोंके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है। वे ऐसा लज्जा-जनक जीवन बितानेके लिए मजबूर की गई हैं। मुझे यकीन हो गया है कि वे अपनी खुशीसे ऐसा जीवन स्वीकार नहीं करतीं। यह तो मनुष्यकी पशुवृत्ति है जिसने इस घृणित कुकर्मको एक ‘धन कमानेका धन्धा’ बना दिया है। लखनऊ अपनी आराम-तलबीके लिए मशहूर है। परन्तु वह एक मुसलमान औलियाका भी स्थान है। इस्लाममें जो कुछ भी उत्कृष्ट व महान् है वह सब लखनऊमें है। हिन्दुओंके लिए तो लखनऊ उस प्रान्तका सदर मुकाम है जो सती सीता और रामकी पुण्यभूमि थी। वह हिन्दुओं-की पवित्रता, उदात्तता, शौर्य और सत्यपरायणताके श्रेष्ठ युगकी याद दिलाता है।<noinclude></noinclude> fg1loo6miltsgthi0ph6ru6m86cpqje 671838 671837 2026-08-19T16:24:55Z अँजली चौधरी 2439 671838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५४१}}</noinclude>हुआ है और हमें इतनी तालीम नहीं मिली है कि हम बहुत बड़े पैमानपर इस कामको उठा सकें। परन्तु जबतक हरएक जिला अपने लिए आवश्यक खादी तैयार न करने लगे तबतक ऐसी निगरानीकी तो निश्चय ही आवश्यकता है और सच्चे दिलसे जो- कुछ इसके लिए किया जा सकता है वह किया जाना चाहिए। {{c|'''लखनऊ के पाप-स्थान'''}} एक अंग्रेज मित्रने मुझे लखनऊसे लिखा है: :{{gap}}'''मैं यह पत्र आपसे यह अनुरोध करते हुए लिख रहा हूँ कि आप यहाँसे जानेके पहले लखनऊ के वेश्यागृहोंके सम्बन्धमें यहाँके किसी अधिकारीको, जो आपके मतका समर्थक हो, कुछ लिख दें। आज सुबह मैं अमीनाबादमें फौजी पुलिस के सिपाहीसे बातचीत कर रहा था। उससे मालूम होता है कि उस तरफकी बस्ती में ऐसे कोई पचास मुकाम हैं, जहाँ यूरोपीय और एंग्लो-इंडियन सिपाही अक्सर जाया करते हैं। (इनमें से कुछ लोग फौजी अदालतोंमें पेश भी किये जा चुके हैं, क्योंकि उस बस्ती में फौजियोंका जाना मना है)। उसने हिन्दुस्तानियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा; परन्तु मुझे बादमें किसीने बताया कि वे भी उन स्त्रियोंके यहाँ जाते हैं। मनुष्यके इस अधःपतन और असंयमके सम्बन्धमें आप यदि कुछ शब्द लिख देंगे तो वह इस बुराईको दूर करने में अन्य सब बातोंसे अधिक कारगर होगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि इस काममें जितनी सहायता मुझसे हो सकती है, मैं करूँगा।''' मैं चाहता हूँ कि मैं भी इन अंग्रेज मित्रकी तरह विश्वास कर सकता कि मेरे शब्दोंमें वह प्रभाव है, जो उन्होंने बताया है। इन पंक्तियोंको लिखते समय बार-बार मेरी आँखोंके सामने उन प्यारी बहनोंका चित्र आता है जो मुझसे रातके समय कोको-नाडामें मिली थीं। जब मुझे उनकी लज्जाजनक स्थितिका हाल मालूम हुआ तब वे तो मुझे और भी प्यारी लगने लगीं। वे केवल संकेतसे मुझे अपने जीवनकी दशा बता सकी थीं। जो स्त्री उनकी तरफसे मुझसे बात कर रही थी उसकी आँखोंमें लज्जा और दुःख अंकित था। मैं उन्हें दोषी कहनेके लिए तैयार न हो सका। इस मुलाकातके बाद मैंने ‘व्यक्तिगत चरित्र-शुद्धि’ की आवश्यकतापर ही भाषण दिया। इसलिए आज मेरे हृदयमें लखनऊकी इन पतित बह्नोंके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है। वे ऐसा लज्जा-जनक जीवन बितानेके लिए मजबूर की गई हैं। मुझे यकीन हो गया है कि वे अपनी खुशीसे ऐसा जीवन स्वीकार नहीं करतीं। यह तो मनुष्यकी पशुवृत्ति है जिसने इस घृणित कुकर्मको एक ‘धन कमानेका धन्धा’ बना दिया है। लखनऊ अपनी आराम-तलबीके लिए मशहूर है। परन्तु वह एक मुसलमान औलियाका भी स्थान है। इस्लाममें जो कुछ भी उत्कृष्ट व महान् है वह सब लखनऊमें है। हिन्दुओंके लिए तो लखनऊ उस प्रान्तका सदर मुकाम है जो सती सीता और रामकी पुण्यभूमि थी। वह हिन्दुओं-की पवित्रता, उदात्तता, शौर्य और सत्यपरायणताके श्रेष्ठ युगकी याद दिलाता है।<noinclude></noinclude> ia22jnsnrxik99zxxkjkkp90gwpatpa पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७४ 250 186168 671843 644483 2026-08-19T16:31:32Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय |}}</noinclude>असहयोग आत्मशुद्धि है, और मैं सभी असहयोगियों तथा अन्य लोगोंसे भी कहता हूँ कि वे लखनऊकी इस नैतिक व्याधिको दूर करनेका उपाय करें। मैं आशा करता हूँ कि लखनऊकी शोहरतका हिमायती कोई भी व्यक्ति मुझसे यह नहीं कहेगा कि लखनऊ भारतके दूसरे शहरोंसे तो बुरा नहीं है। लखनऊका जिक्र तो यहाँ उदाहरणके तौरपर संयोगसे आ गया है। हम तो सारे भारतमें स्त्री जातिकी सुरक्षा और पवित्रताके लिए उत्तरदायी हैं। लखनऊ इसमें अगुआ क्यों न हो? {{left|[अंग्रेजीसे]<br> '''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''२६९. मुसलमानोंकी बेचैनी'''}}}} मैंने लखनऊ में मुसलमानोंको खिलाफतके मामलेमें बेचैन पाया।उनकी बेचैनी स्वाभाविक है। मौलवी सलामतुल्लाने कहा कि अंग्रेजोंका रुख तो अब असह्य होता जाता है। यह कहकर उन्होंने सौम्य भाषामें अंकारा सरकारकी स्थितिके विषयमें लोगोंकी जो भावनाएँ हैं उन्हींको व्यक्त किया है। इसमें कोई शक नहीं कि तुर्कोंके साथ मित्र-भाव रखनेके सम्बन्धमें अंग्रेजोंने जो आश्वासन दिये हैं उनके प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है। अब इन दोमें से किसी बातपर कोई विश्वास नहीं करता कि अंग्रेजोंके आश्वासन बिलकुल सच्चे हैं या ब्रिटिश सरकार तुर्कोंकी मदद करनेमें असमर्थ है, अतएव अधीर और क्रोधित होकर मुसलमान तुरन्त कांग्रेस और खिलाफत कमेटीकी ओरसे कोई कड़ी और जोरदार कार्रवाईकी माँग करते हैं। मुसलमान तो स्वराज्यका अर्थ यह समझते हैं, और उनका ऐसा समझना ठीक है कि हिन्दुस्तान खिलाफतके मामलेका निपटारा पक्के तौरपर करनेके लायक हो जाये। इसलिए वे कहते हैं कि अगर स्वराज्यके मिलनेमें काफी देरी है या उसके लिए प्रयत्न करते हुए मुसलमानोंको कायरोंकी तरह लाचार भूमध्य सागरमें टर्कीकी बरबादी देखते रहना पड़े तो मुसलमान उसके लिए तैयार नहीं हैं। यह नामुमकिन बात है कि ऐसी हालत में मुसलमानोंके लिए हमदर्दी न पैदा हो। यदि कोई कारगर इलाज मेरे खयालमें आया होता तो मैं जरूर खुशीसे कोई फौरी कार्रवाई करनेकी सिफारिश करता। अगर मैं देखता कि स्वराज्यकी हलचलको मुल्तवी कर देनेसे हम खिलाफतको ज्यादा फायदा पहुँचा सकेंगे तो मैं खुशीसे ऐसी सलाह देता। करोड़ों मुसलमानोंका दिल हलका करनेके लिए अगर असहयोगके अलावा भी मुझे कोई उपाय नजर आता तो मैं खुशीसे उसमें लग जाता। मगर मेरी नाकिस रायमें तो खिलाफतके अन्यायको जल्दीसे-जल्दी मिटानेका अगर कोई साधन है तो वह स्वराज्य ही है। और यही कारण है कि मेरे लिए तो स्वराज्यका पाना ही खिलाफतके सवालका हल होना है और खिलाफतके सवाल- का हल होना ही स्वराज्य पाना है। मुसीबतके मारे हुए तुर्कोंको मदद पहुँचानेका सिर्फ एक ही उपाय हिन्दुस्तानके लिए है और वह है खुद अपने अन्दर इतनी ताकत<noinclude></noinclude> 73e8en1tdxrl0l985dxrqdsopkgt0fx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५७५ 250 186169 671850 644484 2026-08-19T16:38:31Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 671850 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||मुसलमानोंकी बेचैनी|५४३}}</noinclude>पैदा कर लेना, जिससे वह अपने स्वत्वको प्रदर्शित कर सके।यदि वह एक मियादके भीतर इतनी शक्ति नहीं बढ़ा सकता तो फिर हिन्दुस्तानके लिए दैवाधीन होनेके सिवा बाहर निकलनेका दूसरा कोई रास्ता नहीं है। जिसे खुद लकवा मार गया है वह अगर दूसरेकी मददके लिए हाथ बढ़ाना चाहे तो वह पहले खुद लकवेसे अपना पीछा छुड़ाने के सिवा और क्या कर सकता है? इसके बजाय अगर हम केवल नासमझी, नादानी और गुस्से में आकर खून-खराबी कर बैठें तो इससे अन्दरकी आग भले ही बाहर आकर धधक उठे, टर्कीका दुःख दूर नहीं हो सकता। और न इससे हिन्दुस्तान में ऐसी ताकत ही आ सकती है कि वह अपने स्वत्वको प्रदर्शित कर सके । और इसके अलावा उस दंगे-फसादको दबानेके लिए जो उपाय काममें लाये जायेंगे उनसे सम्भव है हमारा वह वेग, जिसके साथ आज हम अपने लक्ष्यकी ओर दौड़े चले जा रहे हैं, बहुत मन्द पड़ जाये। तो भी हमें किसी तरह निराश होनेका कोई कारण नहीं। कांग्रेसका सारा कार्यक्रम ऐसा ही बनाया गया है और ऐसे ही उपाय किये जा रहे हैं जिनसे खिलाफतके संकटका सामना किया जा सके। स्वदेशीके कार्यको पूरा करनेकी मियाद दो मासकी रखी गई है। यह निस्सन्देह एक ऐसा तीव्र और प्रबल उपाय है जिसके द्वारा देशका सम्पूर्ण सत्त्व प्रकट हो सकेगा। और यदि भारतने सितम्बरतक पूरा बहिष्कार कर दिखाया और अक्तुबरमें वह अपने पाँवोंपर खड़ा हो गया तो निश्चय ही इससे बड़े-बड़े तेज मिजाजवाले लोगों और मुझ जैसे अधीर तथा जोशीले खिलाफतियोंकी आत्माको भी सन्तोष होगा। पर बात यह है कि अभी हमारे काम करनेवाले सभी लोगोंको न तो इस बातका यकीन हो पाया है कि बताई हुई मियादके भीतर स्वदेशीका कार्यक्रम पूरा हो जायेगा और जो करामात इसमें बताई जाती है न वे उसके कायल हो पाये हैं। ऐसे संशयात्मा लोगोंको जबतक कि वे इससे बेहतर और जल्दी असर करनेवाला दूसरा उपाय नहीं बता सकते और उसे देशसे स्वीकृत नहीं करा सकते, इससे अलग ही रहना लाजिम है। अथवा शंकालु होते हुए भी उन्हें शुद्ध हृदयसे स्वदेशीके काममें जुट जाना चाहिए और इस प्रयोगको सचाईके साथ आजमाना चाहिए। सन्देह करना ठीक हो तो भी क्या यह सन्देह करना कि भारत स्वदेशीके कार्यक्रम के अनुसार काम करनेमें समर्थ नहीं है, यह नहीं बतलाता कि खिलाफत के काममें भारतको वास्तवमें कोई अनुराग नहीं है और वह उसके लिए कुछ भी त्याग करना नहीं चाहता? क्या हर हिन्दू और मुसलमानके लिए विदेशी वस्त्र-मात्रको छोड़कर सिर्फ खादी पहनना, कोई बड़ा भारी स्वार्थ-त्याग है? यदि भारतवर्ष ऐसी क्षमता प्राप्त नहीं करता तो क्या यह इस बातका सबूत नहीं होगा कि वह इससे अधिक स्वार्थ त्यागके लायक नहीं है और इसलिए टर्कीकी सहायताके योग्य भी नहीं है? आइए, हम सब मिलकर विदेशी कपड़ोंका पूरा बहिष्कार करें और जितनी जरूरत है उतनी खादी बनायें; इतना करनेपर हमें अपना लक्ष्य समीप आता दिखाई देने लगेगा। लखनऊमें यह मसला बड़ी संजीदगीके साथ पेश किया गया था कि हम राली ब्रदर्सका जो कि एक यूनानी कम्पनी है, बहिष्कार करके यूनानियोंसे बदला चुका लें<noinclude></noinclude> 88n8e7rvoqdm5kl2qneurj2g6pczn7e पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९६ 250 186265 671783 644608 2026-08-19T12:54:59Z Shivaniya shaw 4129 /* अशोधित */ 671783 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''लोग शान्तिसे कांग्रेसके कार्यक्रमपर अमल कर रहे हैं। सड़कोंपर शायद ही कोई आदमी विलायती कपड़े पहने नजर आता हो। हम आपको यह विश्वास दिला सकते हैं कि यहाँपर बहिष्कार आन्दोलन सफल रहा ।''' {{Gap}}आन्दोलनका गला घोंटने का यह सुचिन्तित प्रयास निश्चय ही विफल होना है। उपद्रवकी पिछली सूचनामें जिस गैर-सरकारी आयोगका जिक्र था उसने बहुत ही फुर्तीसे काम किया है और अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी है। उससे स्थानीय कांग्रेसके मन्त्री द्वारा दिये गये तथ्योंकी पुष्टि होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमसे कम १०४ लोगोंको चोटें लगीं और घाव आये। उनमें एक नौ सालका लड़का और कमसे कम एक तो औरत भी थी । वह बेचारी यह चिल्लाती रही, मैं तो स्त्री हूँ, परन्तु उससे कोई लाभ नहीं हुआ। कुछ लोगोंको गहरे घाव आये हैं। {{C|'''बहादुर विद्यार्थी'''}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीका जब अधिवेशन हो रहा था, तभी विशाखा- पट्टमसे मेडिकल कालेजके बहादुर विद्यार्थियोंका नीचे दिया हुआ दिलचस्प तार मिला । पाठकों को यह स्मरण होगा कि इन विद्यार्थियोंको खादी पहननेकी धृष्ठताके कारण कालेजसे निकाल दिया गया है : :'''खादी टोपी पहननेके कारण मेडिकल कालेजसे निकाले गये, विशाखापट्टमके हम उनतालीस छात्र कांग्रेस समिति इस महत्वपूर्ण अधिवेशन के अवसरपर जिसमें ६ दिसम्बर तक स्वराज्यके प्रश्नका फैसला अवश्य कर दिया जायेगा, अपना सादर प्रणाम निवेदन करते हैं । भारतमाताको पुकारपर, हमने संघर्षके दौरान पढ़ाई बन्द रखने और राष्ट्रीय सेवामें भाग लेनेका संकल्प किया है। इसीलिए हमने रामडाण्डु सेवा समितिके रूपमें अपना संगठन बना लिया है और हम घर-घर जाकर स्वदेशीका प्रचार कर रहे हैं। धनके लिए हम अभीतक अपने ऊपर ही निर्भर रहे हैं; आपको और कांग्रेस समितिको स्वराज्यके ध्येयके प्रति अपनी निष्ठाका विश्वास दिलाते हैं और विनम्रतापूर्वक अपनी सेवाएँ अर्पित करते हैं। हम भावी संघर्षमें कठिनाइयाँ झेलनके लिए तैयार हैं। आपकी आज्ञाओं और सहायताकी हमें प्रतीक्षा है जो हमें हमारे प्रधान, सुन्दरराव या बैरिस्टर प्रकाशमके द्वारा भेजी जा सकती हैं।''' मैं हर विद्यार्थीका ध्यान इस तारकी ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। इन नवयुवकोंने खादी टोपी पहनकर और आत्मसम्मान के लिए बहादुरीके साथ कष्ट उठाकर अपने स्वाभिमानी होनेका तथा अपना समय राष्ट्रकी सेवामें लगाकर देशप्रेमका परिचय दिया है ।<ref>१. देखिए टिप्पणियों, २४-११-१९२१ का उप-शीर्षक चिकित्सा- शास्त्रके छात्रोंके बारेमें कुछ और । ”</ref> यह देश दासताकी जीर्णव्याधिसे पीड़ित है । जो लोग इस व्याधिकी वास्तविक<noinclude>{{dhr|2em}} {{Smallrefs}}</noinclude> qlmqkvgnhy2pkwb0x4u2w91x55e5vfb 671785 671783 2026-08-19T13:03:38Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671785 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''लोग शान्तिसे कांग्रेसके कार्यक्रमपर अमल कर रहे हैं। सड़कोंपर शायद ही कोई आदमी विलायती कपड़े पहने नजर आता हो। हम आपको यह विश्वास दिला सकते हैं कि यहाँपर बहिष्कार आन्दोलन सफल रहा ।''' {{Gap}}आन्दोलनका गला घोंटने का यह सुचिन्तित प्रयास निश्चय ही विफल होना है। उपद्रवकी पिछली सूचनामें जिस गैर-सरकारी आयोगका जिक्र था उसने बहुत ही फुर्तीसे काम किया है और अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी है। उससे स्थानीय कांग्रेसके मन्त्री द्वारा दिये गये तथ्योंकी पुष्टि होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमसे कम १०४ लोगोंको चोटें लगीं और घाव आये। उनमें एक नौ सालका लड़का और कमसे कम एक तो औरत भी थी । वह बेचारी यह चिल्लाती रही, मैं तो स्त्री हूँ, परन्तु उससे कोई लाभ नहीं हुआ। कुछ लोगोंको गहरे घाव आये हैं। {{C|'''बहादुर विद्यार्थी'''}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीका जब अधिवेशन हो रहा था, तभी विशाखा- पट्टमसे मेडिकल कालेजके बहादुर विद्यार्थियोंका नीचे दिया हुआ दिलचस्प तार मिला । पाठकों को यह स्मरण होगा कि इन विद्यार्थियोंको खादी पहननेकी धृष्ठताके कारण कालेजसे निकाल दिया गया है : :'''खादी टोपी पहननेके कारण मेडिकल कालेजसे निकाले गये, विशाखापट्टमके हम उनतालीस छात्र कांग्रेस समिति इस महत्वपूर्ण अधिवेशन के अवसरपर जिसमें ६ दिसम्बर तक स्वराज्यके प्रश्नका फैसला अवश्य कर दिया जायेगा, अपना सादर प्रणाम निवेदन करते हैं । भारतमाताको पुकारपर, हमने संघर्षके दौरान पढ़ाई बन्द रखने और राष्ट्रीय सेवामें भाग लेनेका संकल्प किया है। इसीलिए हमने रामडाण्डु सेवा समितिके रूपमें अपना संगठन बना लिया है और हम घर-घर जाकर स्वदेशीका प्रचार कर रहे हैं। धनके लिए हम अभीतक अपने ऊपर ही निर्भर रहे हैं; आपको और कांग्रेस समितिको स्वराज्यके ध्येयके प्रति अपनी निष्ठाका विश्वास दिलाते हैं और विनम्रतापूर्वक अपनी सेवाएँ अर्पित करते हैं। हम भावी संघर्षमें कठिनाइयाँ झेलनके लिए तैयार हैं। आपकी आज्ञाओं और सहायताकी हमें प्रतीक्षा है जो हमें हमारे प्रधान, सुन्दरराव या बैरिस्टर प्रकाशमके द्वारा भेजी जा सकती हैं।''' मैं हर विद्यार्थीका ध्यान इस तारकी ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। इन नवयुवकोंने खादी टोपी पहनकर और आत्मसम्मान के लिए बहादुरीके साथ कष्ट उठाकर अपने स्वाभिमानी होनेका तथा अपना समय राष्ट्रकी सेवामें लगाकर देशप्रेमका परिचय दिया है ।<ref>१. देखिए टिप्पणियों, २४-११-१९२१ का उप-शीर्षक चिकित्सा- शास्त्रके छात्रोंके बारेमें कुछ और । ”</ref> यह देश दासताकी जीर्णव्याधिसे पीड़ित है । जो लोग इस व्याधिकी वास्तविक<noinclude>{{dhr|2em}} {{Smallrefs}}</noinclude> racodqt06e3d4uotq0o5ut5cm9w4q4v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९८ 250 186266 671858 644610 2026-08-19T17:47:44Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671858 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{c|'''समुद्र पारसे'''}} कराचीके मुकदमोंकी समुद्र-पारके देशोंमें भी कितनी सराहना की गई है, यह ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्ष, श्री अस्वातके अभी-अभी मिले इस तारसे मालूम होगा : :'''अली-बन्धुओं, डा० किचलू और मातृभूमिके निमित्त जेल जानेवाले अन्य लोगोंके परिवारोंको सारी बिरादरीकी हार्दिक बधाइयाँ । ईश्वरसे प्रार्थना है कि आन्दोलन सफल हो ।''' हमें अपने भारतसे बाहर रहनेवाले देशवासियोंकी ओरसे इस तरहके जो अनेक तार या पत्र प्राप्त हुए हैं मैंने यहाँ उनमें से केवल एक तार ही छापा है । अमेरिकामें बसे हुए हमारे देशवासी भी देशके इस कार्यमें सक्रिय सहायता दे रहे हैं। हाल ही में न्यूयार्कसे दो तार प्राप्त हुए हैं। उनमें से आखिर में मिले तारको मैं यहाँ देता हूँ: :'''एक हजार अमेरिकियोंकी खुले मैदान में की गई सभाका अभिनन्दन स्वीकार करें। हम सविनय अवज्ञा आन्दोलनको सफलताको कामना करते हैं ।''' सुदूर पश्चिममें रहनेवाले सभी युवक छात्रों व अन्य लोगोंसे मैं दो शब्द कहना चाहता हूँ। वे देशकी सबसे अधिक सेवा इस प्रकार कर सकते हैं कि वे इस आन्दोलनकी व्याख्या उसके यथार्थ रूपमें और पूर्वके अर्थोंमें करें, वे इसकी पाश्चात्य मिसालें खोजने और इसे पाश्चात्य रंग देनेकी कोशिश न करें। मेरा यह विश्वास है कि इसके वर्तमान रूपकी कोई मिसाल नहीं है। इसकी कल्पना प्राच्य बल्कि उससे भी अधिक भारतीय है और वह भारतकी स्थितियोंमें विशेष रूपसे उपयुक्त है। अभी यह कुछ कहा नहीं जा सकता कि जब इसकी जड़ें इतनी गहरी पहुँच जायेंगी कि अपनी शाखाएँ पश्चिममें फैला सकेँ तब आधुनिक दौड़में लगा पश्चिम इसको किस रूपमें अपनायेगा । अभी तो यह अपनी शैशवावस्थामें है और रूपरंगमें प्रायः पाश्चात्य दिखता है। दुर्भाग्यसे यह स्वीकार करना पड़ता है कि अभीतक इसका रूप बहुतोंको केवल विनाशात्मक दिखता है और वे उसे इसी रूपमें ग्रहण करते हैं। यद्यपि इसका यह विनाशात्मक रूप नितान्त आवश्यक फिर भी इसका स्थायी और सर्वश्रेष्ठ भाग तो रचनात्मक ही है । मैं इस तथ्यसे अभिज्ञ हूँ और मुझे इससे बहुत दुःख होता है कि बहुतसे लोगोंको यह असहयोग आन्दोलन केवल हिंसाकी तैयारी मात्र लगता है; जबकि अहिंसा इसका केवल अभिन्न अंग ही नहीं है बल्कि एकमात्र पोषक अंग है । यह स्वयं निर्माणका सबसे बड़ा भाग है । साथ ही अहिंसा इसको एक धार्मिक आन्दोलनका रूप दे देती है और मनुष्यको केवल ईश्वरपर आश्रित बना देती है । अहिंसा द्वारा असहयोगी दृढ़तासे अपने मार्गपर डटा रहता है और सभी अवस्थाओं में धीर गतिसे आगे बढ़ता है। अहिंसा द्वारा असहयोगी अपने सिरजनहारके सामने नग्न रूपमें आ जाता है और दिव्य सहायता प्राप्त कर लेता है । वह उसके सम्मुख एक हाथमें 'बाइबिल, ' 'कुरान' या 'गीता' लेकर और दूसरे में बन्दूक लेकर उपस्थित नहीं हो सकता । इसके विपरीत वह उसके महान धवल सिंहासन के<noinclude></noinclude> 7usnx9ram5sbu854fl4m8hjb003ydqx 671859 671858 2026-08-19T17:48:13Z Shivaniya shaw 4129 671859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{c|'''समुद्र पारसे'''}} {{Gap}}कराचीके मुकदमोंकी समुद्र-पारके देशोंमें भी कितनी सराहना की गई है, यह ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्ष, श्री अस्वातके अभी-अभी मिले इस तारसे मालूम होगा : :'''अली-बन्धुओं, डा० किचलू और मातृभूमिके निमित्त जेल जानेवाले अन्य लोगोंके परिवारोंको सारी बिरादरीकी हार्दिक बधाइयाँ । ईश्वरसे प्रार्थना है कि आन्दोलन सफल हो ।''' हमें अपने भारतसे बाहर रहनेवाले देशवासियोंकी ओरसे इस तरहके जो अनेक तार या पत्र प्राप्त हुए हैं मैंने यहाँ उनमें से केवल एक तार ही छापा है । अमेरिकामें बसे हुए हमारे देशवासी भी देशके इस कार्यमें सक्रिय सहायता दे रहे हैं। हाल ही में न्यूयार्कसे दो तार प्राप्त हुए हैं। उनमें से आखिर में मिले तारको मैं यहाँ देता हूँ: :'''एक हजार अमेरिकियोंकी खुले मैदान में की गई सभाका अभिनन्दन स्वीकार करें। हम सविनय अवज्ञा आन्दोलनको सफलताको कामना करते हैं ।''' सुदूर पश्चिममें रहनेवाले सभी युवक छात्रों व अन्य लोगोंसे मैं दो शब्द कहना चाहता हूँ। वे देशकी सबसे अधिक सेवा इस प्रकार कर सकते हैं कि वे इस आन्दोलनकी व्याख्या उसके यथार्थ रूपमें और पूर्वके अर्थोंमें करें, वे इसकी पाश्चात्य मिसालें खोजने और इसे पाश्चात्य रंग देनेकी कोशिश न करें। मेरा यह विश्वास है कि इसके वर्तमान रूपकी कोई मिसाल नहीं है। इसकी कल्पना प्राच्य बल्कि उससे भी अधिक भारतीय है और वह भारतकी स्थितियोंमें विशेष रूपसे उपयुक्त है। अभी यह कुछ कहा नहीं जा सकता कि जब इसकी जड़ें इतनी गहरी पहुँच जायेंगी कि अपनी शाखाएँ पश्चिममें फैला सकेँ तब आधुनिक दौड़में लगा पश्चिम इसको किस रूपमें अपनायेगा । अभी तो यह अपनी शैशवावस्थामें है और रूपरंगमें प्रायः पाश्चात्य दिखता है। दुर्भाग्यसे यह स्वीकार करना पड़ता है कि अभीतक इसका रूप बहुतोंको केवल विनाशात्मक दिखता है और वे उसे इसी रूपमें ग्रहण करते हैं। यद्यपि इसका यह विनाशात्मक रूप नितान्त आवश्यक फिर भी इसका स्थायी और सर्वश्रेष्ठ भाग तो रचनात्मक ही है । मैं इस तथ्यसे अभिज्ञ हूँ और मुझे इससे बहुत दुःख होता है कि बहुतसे लोगोंको यह असहयोग आन्दोलन केवल हिंसाकी तैयारी मात्र लगता है; जबकि अहिंसा इसका केवल अभिन्न अंग ही नहीं है बल्कि एकमात्र पोषक अंग है । यह स्वयं निर्माणका सबसे बड़ा भाग है । साथ ही अहिंसा इसको एक धार्मिक आन्दोलनका रूप दे देती है और मनुष्यको केवल ईश्वरपर आश्रित बना देती है । अहिंसा द्वारा असहयोगी दृढ़तासे अपने मार्गपर डटा रहता है और सभी अवस्थाओं में धीर गतिसे आगे बढ़ता है। अहिंसा द्वारा असहयोगी अपने सिरजनहारके सामने नग्न रूपमें आ जाता है और दिव्य सहायता प्राप्त कर लेता है । वह उसके सम्मुख एक हाथमें 'बाइबिल, ' 'कुरान' या 'गीता' लेकर और दूसरे में बन्दूक लेकर उपस्थित नहीं हो सकता । इसके विपरीत वह उसके महान धवल सिंहासन के<noinclude></noinclude> ma0d47txpce525biwgdzmiiopiupd38 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९९ 250 186267 671863 644611 2026-08-19T18:07:03Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 671863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ| ४६७}}</noinclude> आगे हाथ जोड़े एक विनम्र प्रार्थी के रूप में उपस्थित होता है। दूसरे देशों में रहने वाले भारतीय युवकों को इस आंदोलन के मूल अंग को पहले समझना चाहिए और उसके बाद ही पश्चिम के सामने इसकी व्याख्या करने की कोशिश करनी चाहिए। वे देखेंगे कि इसी प्रकार समझदारी से दी गई सहायता से, जो परिणाम अब तक निकले हैं उनसे कहीं अच्छे परिणाम निकलेंगे। {{C|'''कांग्रेस अधिवेशन की नई विशेषताएँ'''}} आशा है कि आगामी कांग्रेस अधिवेशन की कुछ नई विशेषताएँ होंगी। इसकी एक विशेषता यह होगी कि इसमें प्रख्यात व्यक्ति, चाहे उनकी राजनीतिक मान्यता कुछ भी हो, अपने-अपने विशिष्ट विषयों पर भाषण देंगे। इसकी दूसरी विशेषता होगी एक संगीत सम्मेलन, जिसमें समस्त भारत के संगीतकार भाग लेने के लिए आमंत्रित किए गए हैं। गंधर्व महाविद्यालय के संगीताचार्य श्री ना० मो० खरे उसका आयोजन कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि देश की ओर से इसे आम समर्थन मिलेगा। प्रांतीय और जिला कांग्रेस समितियों के मंत्री इस आयोजन में सहायता दे सकते हैं। हो सकता है कि कुछ कलाकारों की निगाह कांग्रेस की सूचनाओं पर न जाए। उच्च कोटि का भारतीय संगीत प्रोत्साहन न मिलने के कारण ह्रास को प्राप्त हो रहा है। सीधे-सादे भारतीय वाद्य यंत्र कितना आश्चर्यजनक प्रभाव उत्पन्न करते हैं, इसका हमें ज्ञान नहीं है। कारण चाहे कुछ भी रहा हो, परंतु हम इस भ्रांति में हैं कि जिस चीज पर बहुत खर्च नहीं आता या जो पश्चिम से नहीं आई है उसमें कोई वास्तविक कला या विशेषता नहीं हो सकती। कांग्रेस के मंच से संगीत सम्मेलन के आयोजन का उद्देश्य यही है कि सर्वसाधारण के मन से यह भ्रांति निकाल दी जाए। संगीत सम्मेलन के साथ भारतीय वाद्य यंत्रों की एक प्रदर्शनी भी होगी। मुझे आशा है कि भारतीय संगीत के प्रेमी श्री खरे से शीघ्रातिशीघ्र पत्र-व्यवहार करेंगे और उनके कार्य में हाथ बँटायेंगे। यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि कांग्रेस अधिकारियों को उन्हीं को आमंत्रित करना चाहिए जो इस क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखते हों। {{C|'''अमंगलकारी प्रतिबंध'''}} मेरा यह विश्वास है कि ईश्वर हमारे द्वारा, व्यक्तियों और राष्ट्रों के निमित्त या विरुद्ध कार्य करता है, और मेरा यह विश्वास उतना ही निश्चित है जितना सूर्य के नियमित रूप से एक निश्चित समय पर उदय होने का विश्वास। इसलिए जब मैं यह सुनता हूँ कि किसी खास स्कूल में अछूतों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा है तो मैं काँप जाता हूँ और यह जान लेता हूँ कि हम अभी स्वराज्य के योग्य नहीं हैं। मेरे सामने मद्रास अहाते से आया एक पत्र है जिसमें यह शिकायत की गई है कि एक स्कूल के प्रधानाध्यापक ने अपने छात्रों को एक प्रवेशार्थी पंचम लड़के के प्रवेश के विरुद्ध भड़का दिया है। मैं आशा करता हूँ कि इस प्रकार का अचिंतनीय पूर्वाग्रह तेजी से कम हो रहा है और इस तरह की घटनाएँ विरल होती जा रही हैं। मुझे इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है कि हम यदि स्वराज्य से अभी दूर लगते हैं तो इसका कारण हमारी अपनी कमजोरियाँ हैं और यह तथ्य है कि हमने अपने लिए खुद जो शर्तें रखी थीं वे पूरी नहीं की हैं। उनमें सबसे बड़ी शर्त है, अपने देशवासियों के छठे भाग के खिलाफ लगे इस<noinclude></noinclude> ghy22yebfaxn5tewbiby2fevf0vr6hb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५७६ 250 186489 672119 644851 2026-08-20T11:53:01Z ~2026-45378-53 6821 /*शोधित*/ 672119 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="~2026-45378-53" /></noinclude>{{rh|५४०| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} लोगोंके ध्यानमें लानेकी जरूरत है । हम मामूली लकड़ियोंके गट्ठोंको निकाल देते हैं किसी द्वेषके कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि उनके रखनेसे देखनेवालोंका ध्यान बिलकुल सादी लकड़ी जिसे प्रचार ओर संरक्षणकी आवश्यकता नहीं है तथा ऐसी लकड़ीमें बँट जायेगा, जिसे लोगोंके सामने लाना चाहिए और संरक्षण देना चाहिए । इसलिए जब एक पत्र - प्रेषकने मेरा ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि असम कांग्रेस कमेटीने ऐसी वस्तुएँ प्रदर्शनीमें शामिल कर ली हैं जो पुतलीघरोंके सूतसे बनी हैं या मशीन-करघोंसे बुनी गई हैं, तब मुझे आश्चर्य हुआ । इस प्रकार गौहाटी कांग्रेसके अवसरपर की गई प्रदर्शनीमें विलायती सूत या कपड़ेतकको भी स्थान दिया गया । मैंने वहाँकी स्वागतकारिणी कमेटीके नाम तार भेजा । पाठकोंको यह जानकर हर्ष होगा कि कमेटीने फौरन जवाबमें यह लिखा कि मिलके सूतकी चीज इत्यादि भूलसे लेली गई थीं और फौरन हटाई जा रही हैं। में उक्त कमेटीके सदस्योंको इस भूलको कुबूल करने तथा सुधारनेमें तत्परता दिखानेपर बधाई देता हूँ। में यहाँ यह भी बता देना चाहता हूँ कि अन्य वस्तुओंका वर्णन भी इतना सन्दिग्ध और अनिश्चित है कि उसके अन्तर्गत करीब-करीब हरएक चीज शामिल की जा सकती है । यदि कांग्रेस प्रदर्शनियोंका हेतु यह हो कि उनसे लोगोंकी जानकारी बढ़े, वे शिक्षा पायें और झोंपड़ोंके धन्धोंको प्रोत्साहन दें तथा लोगोंको यह मालूम हो कि खद्दरके विकासकी शक्यता कितनी है, तो गत प्रदर्शनियोंकी बाँधी हुई मर्यादाका पालन कड़ाईके साथ करना चाहिए । <Br>[ अंग्रेजीसे ] <br>यंग इंडिया, २१-१०-१९२६ {{C|''' ५५९. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}} {{Rh|||२१ अक्तूबर, १९२६}} <Br>प्रिय सतीशबाबू, {{Gap}}लगता है जैसे मुद्दतके बाद आपका पत्र मिला। मुझे शक तो था कि आपका हाल, जैसा में चाहता हूँ, शायद उतना अच्छा नहीं है। मैं कोई मदद कर सकूं या नहीं, लेकिन आपको मुझे अपने दुःख-दर्द से आगाह तो रखना ही चाहिये। अगर आप मुझे अपना सुख बता देते हैं तो दुःख भी मुझे जानने चाहिए। इसलिए मेहरबानी करके लिखिए कौन-सी अप्रत्याशित कठिनाइयाँ आ पड़ी हैं ? {{Gap}}'इंगलिशमैन' से ली गई कतरन मैंने पढ़ी है । हम जानते हैं कि अभीतक खादी लोकप्रिय नहीं हो पाई है। जब हो जायेगी तब हम जो चाहते हैं उसे पानेमें देर नहीं लगेगी। {{Gap}}खादी सेवाके बारेमें आपके विचार मैंने नोट कर लिये हैं । {{Gap}}१ व २. देखिए “पत्र : क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको ", १४-१०-१९२६ ।<noinclude></noinclude> gqq1gaqonpox0crot70ejvnfnesrgz0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८० 250 186495 671937 644857 2026-08-20T06:31:40Z ~2026-45378-53 6821 /* अशोधित */ 671937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="2409:40E0:103C:47BF:A07A:AC2B:2519:BB74" /></noinclude>{{rh|५४४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}बावजूद जिन्दगी तककी जोखिम उठानी पड़ी थी।' बारडोलीकी 'हिमालय' जैसी बड़ी 'भूल' की याद तो अभी ताजी ही है । बम्बई सरकारने मेहरबानी करके यरवदा जेलमें मुझे डाल दिया नहीं तो बहुत-सी लिखा-पढ़ी करनेकी परेशानी उठानी पड़ती । मुझे आज भी नहीं लगता कि बारडोलीके निर्णयमें कोई भूल थी । वरन् में उसे प्रौढ़ अहिंसा तथा मूल्यवान सेवाका एक कार्य मानता हूँ ! इन कुत्तोंके सम्बन्धमें अपने मतके बारेमें भी मुझे वैसा ही लग रहा है। मुझे लगता है कि अहिंसामय होनेका दावा करते हुए भी इस मतका समर्थन किया जा सकता है । लेकिन शत्रु, मित्र और सुहृद् सभी पाठकोंको धैर्य तो रखना ही चाहिए। शत्रुके रूपमें लिखनेवालोंने मर्यादा त्याग दी है; उनके पत्रोंमें अविनय और रोष भरा है । उन्होंने मेरी स्थितिको समझनेका प्रयत्न नहीं किया है । उन्हें मेरा मत असह्य लगा है । पत्र लेखकोंके निकट या तो में सुधारक तथा शिक्षक हूँ या फिर वे स्वयं मुझे शिक्षा देनेकी इच्छा रखते हैं। यदि वे मुझे शिक्षक मानते हों तो उन्हें चाहिए कि वे विनय, शान्ति और श्रद्धापूर्वक मुझसे प्रश्न करें और जो मैं लिखूं उसपर मनन करें; यदि वे मुझे शिक्षा देना चाहते हों तो उन्हें मेरे ऊपर ममता रखकर प्रेम तथा धीरजसे मुझे मीठे शब्दोंमें समझाना चाहिए। में क्रोध करके अपने संरक्षणमें रहनेवाले बालकोंको कुछ नहीं सिखा सकता । मैं उनके प्रति प्रेम रखता हूँ, उनका अज्ञान सहन करता हूँ और उनके साथ हँसता-खेलता हूँ, तब उन्हें सिखाता हूँ । मैं इसी सहनशीलता, इसी प्रेम और इसी विनोदकी आशा अपने क्रोधी शिक्षकोंसे करता हूँ। मैंने कुत्तोंके विषयमें अपना मत सद्भावनासे तथा अपना धर्म समझकर दिया है । अगर उसमें कोई त्रुटि हो तो मेरे शिक्षक मुझे धैर्यपूर्वक तर्कपूर्ण ढंगसे समझायें। अगर वे मुझपर क्रोध करेंगे या मुझसे अनेक प्रकारके अप्रस्तुत प्रश्न करेंगे तो उनकी बात मेरी समझमें कैसे आयेगी ? एक भाई मुझसे असमय मिलनेके लिए आये । मैं अतिशय कार्यव्यस्त रहता हूँ - यह बात वे जानते थे । उन्होंने मुझसे वार्तालाप किया, मुझे कटु बातें सुनाईं तथा मुझ पर क्रोध उतारा। मैंने उन्हें विनोदमें तथा विवेकपूर्वक जवाब दिया । उन्होंने वार्तालाप- को एक पत्रिकाके रूपमें छपवा लिया है; और उसे बेच रहे हैं। उसकी एक प्रति मेरे पास पड़ी हुई है । उसमें सत्यकी मर्यादा नहीं है - फिर विनय कैसे हो ? उन्होंने मुझसे उस वार्तालापको छपवानेकी अनुमति नहीं ली और न मुझे उसे दिखाया ही । ऐसा करके वे मुझे क्या सिखा सकते हैं ? जो सत्यको छोड़ता है, वह अहिंसाकी जड़ काटता है । जो क्रोध करता है, वह खून करता है। वह मुझे जीवदया कैसे सिखा सकता है ? लेकिन शत्रुतापूर्ण व्यवहार करनेवालों सहित ये सब लोग मुझे आत्म-निरीक्षण करना सिखा रहे हैं। इससे मुझे यह देखनेका मौका मिलता है कि मैं क्रोधकी {{Gap}}१. गांधीजीपर १९०८ में मीर आलम द्वारा किये गये इमलेकी ओर संकेत है। देखिए खण्ड ८, <Br>पृष्ठ ७४ ।<noinclude></noinclude> gu6imh4iw2e5i0yfpznn7d0akfpt3ej पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३९ 250 186865 671777 645262 2026-08-19T12:05:48Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||बारडोली यज्ञ|४०७}}</noinclude>सरकारी नौकरी करनेवालेको लोगोंको लूटनेका जो अवसर मिलता है, उसे अच्छा मौका समझनेके बदले एक बुरी बात समझकर उससे दूर रहना सीखें, तो सरकारके हाथ-पैर ढीले पड़ जायें। हमारे ही आदमी सरकारके हाथ और पैर हैं। वे हट जायें तो सरकारकी तोप और बन्दूक तथा हवाई जहाज सभी निरर्थक हो जायें। सरकारकी विज्ञप्ति में असत्य, अविनय और प्रजा-पक्षका तिरस्कार भरा है। उसमें सरकारने जो लालच दिखलाया है, मैं आशा करता हूँ कि उसमें बारडोलीका कोई किसान नहीं फँसेगा। सरकारने साम, दाम, दण्ड और भेदका पूरा उपयोग किया है, और अभी कर रही है। इसमें दण्ड तो कमसे कम दूषित वस्तु है। दण्डको हम पहचान सकते हैं। उसे सहन कर लें, तो उसके भयसे उबर गये। साम, दाम और भेद सूक्ष्म वस्तुएँ हैं। उसमें प्रलोभन हैं। इसलिए जिस तरह मछली काँटेपर लगी आटेकी गोलीको चाटने जाकर उसमें फँस जाती है, उसी तरह इस जहरीली त्रिवेणीमें भोले और भीरु लोग फँस जाते हैं। उन्नीस जूनके पहले लगान भरनेवालेको जिस सुभीतेका लालच दिया गया है, वह दाम-नीति है। उस घूसके मधुमें मक्खीके समान फँसकर एक भी किसान अपनी प्रतिज्ञा न तोड़ेगा, ऐसी आशा रखनेका प्रजाको अधिकार है। सारे भारतवर्षपर बारडोलीने जिस निडरता और सहन-शीलताकी जो छाप डाली है, उसे वह कभी नष्ट न होने दे। भेदनीति दामनीतिसे भी गई बीती है। अनेक तरहकी अफवाहें सुननेमें आ रही हैं। कोई कहता है कि सरकार समझौता करना चाहती है; कोई कहता है लोग कमजोर पड़ गए हैं, कोई कहता है कि लोग चुपचाप जा-जाकर चोरी से लगान भरने लगे हैं; कोई कहता है कि बहिष्कारका भय न हो तो लोग लगान भरनेको तैयार हैं, कोई कहता है कि बाहर से आये हुए श्री वल्लभभाई और उनके साथियोंके डरके कारण लोग लगान नहीं चुका रहे हैं, नहीं तो बेचारे किसान लगान देकर शान्तिसे बैठ जाना चाहते हैं। यह सब भेदनीति है। मेरे कहनेका यह आशय भी नहीं है कि ऐसा कहनेकी प्रेरणा कोई खास आदमी देता है, किन्तु जिस शासन में ऊपर बतलाई चार नीतियोंको स्थान मिला है, वहाँ वह इनके जरिये काम किया करता है। सारा नौकर वर्ग समझता है कि सरकारी नीतिके अनुकूल बननेमें ही हमारे वेतन और ओहदेकी वृद्धि छिपी हुई है। भीष्म द्रोणादिको भी धर्मराजके आगे अपना पेट दिखलाना पड़ा था। इसलिए जैसे-जैसे लड़ाई जमती जायेगी, भेदनीतिमें वृद्धि होती जायेगी, इस मोहजालसे सभी सत्याग्रही दूर भागें। एक भी अफवाह न मानें। जो कुछ सुनें, सरदारके पास पेश करके खुद उसे भूल जायें। सत्याग्रहीका समाधान एक ही होता है। जहाँ उसकी प्रतिज्ञाका पालन पूरा हुआ, वहाँ उसका काम समाप्त हो गया। वह अधिक न माँगे और कमसे सन्तोष न करे। उसने तो अपनी प्रतिज्ञाकी वेदीपर प्यारीसे-प्यारी वस्तुको होम करनेका निश्चय कर लिया है। ऐसे आदमीका अफवाहोंसे क्या सम्बन्ध? फिर जो अपने माने हुए सरदारको पराया बनानेका औद्धत्य दिखायें,<noinclude></noinclude> g86x0887z725lsnv825w6lynlg4pagn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४० 250 186866 671778 645263 2026-08-19T12:16:22Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671778 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>उसके वचनोंसे भ्रममें क्या पड़ना और क्या लालच में पड़ना? समझौता होना होगा तो सरदार चेतावनी देगा ही। चुपचाप लगान भरनेवालोंकी बातसे भुलावेमें पड़नेकी जरूरत नहीं है। हरएक कौममें कुछ निर्बल व्यक्ति तो होते ही हैं। मेरा अनुभव यह है कि डरके मारे चुपचाप दबाव मान लेनेवाले कम होते हैं, किन्तु उनकी संख्या ज्यादा बताई जाती है, इसलिए सत्याग्रहीको चोरी-छिपे लगान मरनेकी बात न मानना ही शोभा देगा। वह माने कि मुझमें जो शक्ति है, वह दूसरेमें भी हो सकती है। किन्तु अन्तमें चोरी-छिपे हुक्म मान लेनेवाले निकल भी आयें तो आप निराश न हों। धर्म तो उसका है, जो उसे पालता है। {{c|'हरिनो मारग छे शूरानो, नहि कायरनुं काम जोने।'}} {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन,''' १०-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''४६७. बारडोली-दिवस'''}}}} १२ जूनका दिन बारडोलीके सत्याग्रहियोंसे सहानुभूति प्रकट करनेके लिए और उनको अन्य प्रकारकी सहायता देनेके लिए नियत किया गया है। हम इस दिनको किस तरह मनायें? सत्याग्रहकी सभी लड़ाइयाँ आत्मशुद्धिकी लड़ाइयाँ होती हैं। सत्याग्रही अपने सत्यकी विजय अपनी शुद्धिसे, अपनी तपस्यासे प्राप्त करनेका प्रयत्न करता है और इसी प्रयत्नमें विश्वास रखता है। इसलिए १२ जूनको हम जितने शुद्ध हो सकें हमें उतना शुद्ध होना चाहिए और हमें ईश्वरसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें, सत्यकी इस जयमें जितने भी दुख आयें उनको सहन करनेकी शक्ति दे। यह सहायता प्रथम कोटिकी सहायता है। बारडोली गुजरातमें है इसलिए बारडोलीके प्रति अन्य प्रान्तोंकी अपेक्षा गुजरातका कर्त्तव्य कुछ अधिक है, गुजरात ऐसा समझकर १२ जूनको आत्मशुद्धिका यज्ञ करे। यदि सम्भव हो तो सभी जगह उस दिन लोग स्वेच्छासे अपना सामान्य कामकाज अथवा आजीविकाका धन्धा बन्द रखें और बारडोलीकी लड़ाईमें सहायता देनेके लिए धन संग्रह करें: वे शामके वक्त बड़ी-बड़ी सभाएँ करें और उनमें इस लड़ाईके प्रति सहानुभूति सूचक और सरकारकी अराजकताके प्रति रोषसूचक प्रस्ताव पास करें और दिनमें जिन लोगोंसे चन्दा लेना रह गया हो वे यदि सभामें आये हों तो उनसे चन्दा लें। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन''' १०-६-१९२८}}<noinclude></noinclude> ee3qbbkukx7her9fw5z7mbykpc2w1hu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४१ 250 186867 671779 645264 2026-08-19T12:30:38Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671779 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४६८. गोविन्द बड़े या गुरु?'''}}}} ऊपरके शीर्षकसे एक गृहस्थने यह लेख भेजा है <ref>लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है। लेखकने गांधीजीके इस कथनका समर्थन किया था कि जीवित मनुष्योंका पूजन नहीं करना चाहिए। (देखिए "भक्तिके नामपर भोग", ६-५-१९२८)। किन्तु साथ ही उनका ध्यान गुरुके माहात्म्यको ओर खींचा था।</ref> लेखकने मारवाड़ी भक्तके बारेमें जो लिखा है, वह मैं नहीं जानता। लेखकने 'सिद्धान्त रहस्य'<ref>वल्लभाचार्य कृत।</ref> नामक पुस्तकमें से जिन तीन श्लोकोंका अर्थ भेजा है, वे श्लोक भी मैंने नहीं देखे हैं। किन्तु इस लेखमें जो लिखा है, वैसी मान्यता हिन्दू-धर्ममें है इस विषय में शंका नहीं है। मैं स्वयं नित्य प्रातःकाल नीचेके श्लोकका पाठ करता हूँ: {{block center|<poem> गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥</poem>}} और यह भी मानता हूँ कि गुरुके माहात्म्यके बारेमें हिन्दू धर्मकी मान्यताके लिए सबल कारण होंगे, इसीलिए गुरु शब्दका शुद्ध अर्थ ढूँढ़ रहा हूँ। और जब-तब कहता हूँ कि मैं गुरुकी खोजमें हूँ। जिस गुरुमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरका लय हो, और जो साक्षात् परब्रह्म सम हो, वह देहधारी, विकारी और रोगी मनुष्य नहीं होगा, किन्तु उसमें तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी सारी शक्ति होगी, यानी वह आदमी मुख्यतया हमारी कल्पनामें ही होगा। और वह गुरु, इष्टदेव केवल सत्यकी मूर्ति परमात्मा ही होगा। इसलिए गुरुकी खोज परमात्माकी खोजके बराबर हुई। यह विचार करते हुए जो-जो वस्तुएँ लेखकने लिखी हैं, वे सरल हो जाती हैं। जो गोविन्दको बता सके वह अवश्य ही गुरु होने लायक है और चाहे वह पीछे भले ही गोविन्दसे भी बड़ा गिना जाये। गोविन्दके बनाये जीवोंको अनेकों दुःख भोगते हुए हम देखते हैं, किन्तु हमें जो इस फन्देसे छुड़ा सके वह खुशी से गोविन्दसे भी बड़ा पद ले सकता है। यही आशय 'रामसे अधिक राम कर दासा'में है। इन सभी महावचनोंका अर्थ इतना स्पष्ट है कि अगर हम सरल हृदयसे ढूंढे तो न किसी प्रपंच में पड़ें न अनर्थ में। हरएक महावचनमें यह अनिवार्य शर्त जुड़ी हुई होती ही है। जो हमें प्रेमधर्म सिखलाये, जो हमें भयमुक्त करे, सादगी सिखलाये, गरीबसे-गरीबके साथ भी ऐक्य साधनेकी बुद्धि ही नहीं बल्कि ऐक्यका अनुभव करनेका हृदयबल भी दे, वह हमारे लिए अवश्य ईश्वरसे भी बड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि ईश्वरका ऐसा दास अलग और स्वतन्त्र रूपमें ईश्वरसे बड़ा है। हम समुद्रमें जा पड़ें तो डूब जायेंगे, मगर इसी समुद्रकी ओर बहनेवाली गंगाके मूलसे एक लोटा जल प्यास लगने पर लेकर पी लें तो उस समय यह गंगाजल हमारे लिए समुद्र से भी बड़ा है। किन्तु यही गंगाजल वहाँसे लेने जायें जहाँ समुद्र में गंगा मिलती है तो वह जहरके समान {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> nepfcr3bwsc3nbcb1u9onc7av23iscl पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४२ 250 186868 671781 645265 2026-08-19T12:45:27Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671781 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हो जाता है। ऐसा ही गुरुके विषयमें समझना चाहिए। जिनमें दंभ है, ईर्ष्या है जो सेवाके भूखे हैं, उन्हें गुरु मान बैठना तो अनेक प्रकारके गन्दे पानीको समुद्र में ले जा रही गंगा नदीके जहरीले पानीके समान समझना चाहिए। अभी तो हम धर्मके नामपर अधर्मका आचरण करते हैं। सत्यके नामपर पाखण्डका पोषण करते हैं और ज्ञानी होनेका ढोंग करके अनेक प्रकारकी पूजा स्वीकार करके आप अधोगतिको प्राप्त होते हैं और साथ में दूसरोंको भी ले डूबते हैं। ऐसे समयमें किसीको गुरु बनानेके बारेमें बिलकुल इनकार करना ही धर्म है। सच्चा गुरु न मिले तो मिट्टीके पुतलेको गुरु बना लेनेमें दुहरा पाप है। किन्तु जबतक सच्चा गुरु न मिले, तबतक 'नेति नेति' कहनेमें पुण्य है। इतना ही नहीं, उससे किसी दिन सच्चे गुरुके मिलनेका भी प्रसंग आ सकता है। इसके मुझे बहुतसे कड़वे मीठे अनुभव हुए हैं और अब भी हुआ करते हैं कि चलती धाराका विरोध करनेमें बहुत-सी मुसीबतें रहती हैं। किन्तु उनसे मैंने एक बात यह सीखी है कि जिस वस्तुमें अनीति है, जिसका खण्डन होना ही चाहिए उसका विरोध एकाकी होनेपर भी हमें करना ही चाहिए और यदि हमारा यह विरोध सच्चा है तो जरूर सफल होगा। ऐसा विश्वास सदैव रखना उचित है। जो भक्त स्तुतिका या पूजाका भूखा है, जो मान न मिलनेसे चिढ़ जाता है, वह भक्त नहीं है। भक्तकी सच्ची सेवा स्वयं भक्त बननेमें हैं। इसलिए आजकल चलनेवाली मनुष्य-पूजाका जहाँतक हो सकता है मैं विरोध ही करता हूँ और सबको विरोध करनेके लिए प्रेरित करता हूँ। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''नवजीवन''' १०-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''४६९. संयमकी आवश्यकता किसे?'''}}}} विवाद करनेके इच्छुक एक भाई लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। लेखकने पूछा था कि संयम पालनके लिए क्या पत्नीकी सहमतिकी जरूरत नहीं है।</ref> यह मेरा अनुभव है कि जिस संयमको दूसरेकी सहमतिकी आवश्यकता हो वह संयम टिक नहीं सकता। संयमको अन्तर्नादकी ही जरूरत होती है। संयमका आधार हृदयबल है और जो संयम ज्ञानमय और प्रेममय होता है, उसकी छाप आसपासके वातावरणपर पड़े बिना नहीं रह सकती। अन्तमें विरोध करनेवाला भी अनुकूल बन जाता है। पति-पत्नीके बारेमें भी यही बात है। अगर जबतक पत्नी तैयार न हो, तबतक पति रुके और जबतक पति तैयार न हो, तबतक पत्नी, तो बहुत करके दोनों ही भोग-पाशसे नहीं छूट सकेंगे। बहुतसे उदाहरणोंमें देखा गया है कि जहाँ संयमके लिए एक दूसरे पर निर्भर रहा जाता है, वहाँ अन्तमें वह संयम टूट जाता है। यह {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 77b0sx3lb9paboxg4i5b3r1csmsko2a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४३ 250 186869 671811 645266 2026-08-19T15:44:03Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्रः ना॰ र॰ मलकानीको|४११}}</noinclude>कच्चापन ही उसका कारण है। और गहरे उतर कर हम देखें तो जान पड़ेगा कि जहाँपर एक दूसरेकी सहमतिकी राह देखी जाती है, वहाँपर तो संयमकी सच्ची तैयारी नहीं है या उसके लिए सच्ची लगन नहीं है। इसीलिए निष्कुलानन्दनने लिखा है कि, "त्याग न टिके रे वैराग्य विना।" अगर वैराग्यको भी रागके साथकी जरूरत हो तो संयम पालनेकी इच्छा रखनेवालेको भी इच्छा रखनेवालेकी सहमतिकी जरूरत हो सकती है। इस पत्रके लेखकका मार्ग तो सीधा है। वह अभी अविवाहित है और अगर ब्रह्मचर्य पालन करनेका उसका सच्चा निश्चय हो तो वह विवाहके झगड़े में पड़े ही क्यों? माता-पिता और दूसरे सगे-सम्बन्धी तो अपने अनुभवसे अवश्य ही कहेंगे कि किसी युवकके लिए ब्रह्मचर्य समुद्र-मंथन करनेके समान है; और यों कहकर वे धमकी देकर, क्रोध करके, और दण्ड देकर भी, ब्रह्मचर्यकी शुभेच्छासे डिगानेका प्रयत्न करेंगे। किन्तु जिसके लिए ब्रह्मचर्यका भंग ही बड़ेसे-बड़ा दण्ड है, और जो साम्राज्य मिलने के लालच से भी ब्रह्मचर्य भंग करनेको तैयार न हो, वह किसीकी भी धमकी के वश होकर विवाह क्यों करे? जिसका आग्रह ऐसा तीव्र नहीं है और जिसने ब्रह्मचर्य आदि संयमोंकी कीमत इतनी बड़ी नहीं आँकी है उसके लिए मेरा वह लेख था ही नहीं, जिसमें से उक्त वाक्यको उद्धृत करके दिया गया है। {{left|[गुजराती से]<br> '''नवजीवन,''' १०-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''४७०. पत्र: ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० जून, १९२८}} {{left|प्रिय मलकानी,}} तुम्हारा पत्र मिला। अभी तुम्हें मुझसे किसी बड़े पत्रकी आशा नहीं करनी चाहिए। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि मथुरादासका काम उतना ठोस है जैसा तुम कहते हो। निर्देशन देनेकी उसकी योग्यता के बारेमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। वह एक अच्छा कार्यकर्त्ता है। मुझे इस बातसे प्रसन्नता हुई कि तुम खादीकी क्षमताके बारेमें एक दिशाके बजाय अनेक दिशाओंमें खोज रहे हो। पर निश्चय ही तुम्हारा मुख्य कार्य बाढ़ सहायता कार्यको पूरी तरहसे व्यावसायिक ढंगसे चलाना है। यदि तुम्हें कार्यकर्त्ताओंके रूपमें मददकी आवश्यकता हो तो तुम मुझसे कहने में तनिक भी संकोच न करना।<noinclude></noinclude> 9fmk8qd9n9rorwqhiy28lvcktn0zugh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४४ 250 186870 671818 645267 2026-08-19T15:57:57Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671818 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हो सकता है कि मैं तुम्हारी माँग पूरी न कर सकूँ पर कमसे-कम मुझे ना कहनेका मौका तो मिलना ही चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम सवालको भूल जाइए। इसमें विशेषज्ञोंको सिर खपाने दें। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्रीयुत ना॰ र॰ मलकानी<br> केन्द्रीय बाढ़ सहायता समिति<br> हैदराबाद, सिन्ध}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४१०) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''४७१. पत्र: जनकधारी प्रसादको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० जून, १९२८}} {{left|प्रिय जनकधारी बाबू,}} आपका पत्र मिला। 'श्रम' शब्दमें सेवाकार्य, जैसा कि आप कर रहे हैं<ref>जनकधारी प्रसादने अपने पत्रमें पूछा था: 'ईमानदार श्रमिक' का क्या अर्थ है। क्या आप इसका प्रयोग शारीरिक श्रम करनेवालोंके लिए करते हैं या विस्तृत अर्थ में। क्या इसमें साहित्यिक, कला सम्बन्धी तथा सौन्दर्य शास्त्रके कार्य-कलापोंको स्थान है?</ref>, का समावेश हो जाता है। पर कला, साहित्य तथा आमोद-प्रमोदके कार्य-कलापोंका समावेश इसमें नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि आपका इशारा विन्ध्येश्वरी बाबूके बड़े पुत्रकी ओर है। मुझे गलती हो जानेका दुख है। निश्चय ही आपकी पत्नीके सम्बन्धमें मैं किसी दिक्कतकी आशंका नहीं करता।<ref>जनकधारी प्रसादने लिखा था: पत्नीको आश्रम भेजनेका विचार करनेसे पहले में आपको अवश्य लिखूँगा।</ref> {{right|हृदयसे आपका,<br> {{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५२) की फोटो-नकलसे। {{dhr|7em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 9hq4dqr0w7pom40v65r7pwvj03con3f 671819 671818 2026-08-19T15:58:28Z अनुश्री साव 80 671819 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हो सकता है कि मैं तुम्हारी माँग पूरी न कर सकूँ पर कमसे-कम मुझे ना कहनेका मौका तो मिलना ही चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम सवालको भूल जाइए। इसमें 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{{right|हृदयसे आपका,<br> {{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}} अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५२) की फोटो-नकलसे। {{dhr|5em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 7gfr5ez68hbml5gqz78ohl6hrllrav5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४५ 250 186871 671833 645268 2026-08-19T16:15:30Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४७२. पत्र: आर्थर मूरको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० जून, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके तारकी<ref>आर्थर मूरने लिखा था: क्या यह सम्भव नहीं है कि इन गर्मियोंके दौरान हम मैत्रीपूर्ण चर्चा द्वारा मिल-जुलकर अपने विचारोंको स्पष्ट करें और भावी संविधानकी रूप रेखाके सम्बन्धमें किसी सर्व-सम्मत नतीजेपर पहुँच जायें या उसकी ओर अग्रसर हों? मेरा विचार है कि यह चर्चा संवैधानिक आयोग (स्टेच्यूटरी कमीशन) को ध्यान में रखते हुए चलानी चाहिए जिससे कि इसमें दोनों तरहके लोग, यानी जो कमीशनसे सहयोग करना चाहते हो और जो सहयोग नहीं करना चाहते, शामिल हो जायें।</ref> प्राप्ति-स्वीकृति न देनेके लिए मुझे आपसे क्षमा माँगनी चाहिए। और इस बीच आपका पत्र आ गया है। जबसे आपका तार मिला है, मैं 'स्टेट्समैन'-की कतरनें ले रहा हूँ, जिन्हें मैं अपने डेस्क पर रखे हुए हूँ। मैंने पहले दो लेख बड़े चावसे पढ़े हैं। अभी मैं बाकी लेखों तक नहीं पहुँचा हूँ। बात यह है कि अपने कार्यक्षेत्र से बाहर दूसरी किसी भी चीजकी ओर ध्यान देनेका मेरे पास वक्त नहीं रहता। आपने जो चर्चा आरम्भ की है, उसमें यदि मेरा भाग लेना उपयोगी हो तो अवश्य लूँगा। परन्तु मैं आपके सामने स्वीकार करता हूँ कि न तो संवैधानिक आयोग (स्टेच्यूटरी कमीशन) में और न ही संविधानके बनानेमें मेरी कोई रुचि है। मैं अपना ध्यान स्वराज्य प्राप्त करनेके साधनों पर केन्द्रित कर रहा हूँ। और स्वराज्यके साधनोंके रूपमें मुझे संवैधानिक आयोग या संविधानके निर्माणका कार्य, दोनोंमें कोई आकर्षण महसूस नहीं होता। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री आर्थर मूर<br> सम्पादक<br> 'स्टेट्समैन'<br> ६, चौरंगी<br> कलकत्ता}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४११) की फोटो-नकलसे। {{dhr|5em}}<noinclude></noinclude> fw7al0148f4nerqlk58ipg3vp1degm2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४६ 250 186872 671861 645269 2026-08-19T18:03:42Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671861 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४७३. पत्र: सदानन्दको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० जून, १९२८}} {{left|प्रिय सदानन्द,}} एंग्लो अमेरिकी न्यूज पेपर सर्विसके लिए लिखे गये मेरे तथाकथित लेखकी प्रतिके साथ आपका पत्र मिला। इस प्रतिमें उल्लिखित विषयपर मैंने इस अथवा अन्य किसी संस्थाको कोई लेख नहीं भेजा। पर आपके द्वारा भेजी गई प्रतिको पढ़कर मुझे पता चला कि यह मेरे लंकाके दौरे<ref>गांधीजी लंका नवम्बर १९२७ में गये थे। देखिए खण्ड ३५।</ref> में कोलम्बोमें दिये गये मेरे भाषणकी लापरवाहीसे लिखा गया कोई विवरण है। इस भाषणकी एक अच्छी रिपोर्ट मेरे लंकाके दौरेपर महादेव देसाई द्वारा लिखित पुस्तकमें<ref>विद गांधीजी इन सोलोन।</ref> छपी है। मुझे प्रसन्नता हुई कि आपने इसे नहीं छापा और मेरी अनुमतिके लिए इसकी प्रति मुझे भेजी। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४१३) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''४७४. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० जून, १९२८}} {{left|प्रिय सतीश बाबू,}} यदि पबना समझौतेका आपने जो अर्थ निकाला वह सही है तो यह कितनी दुःखद बात होगी? पर फिर भी मुझे चुप रहना चाहिए। मैंने सोचा था कि हमने जेलका डर अपने मनसे निकाल दिया है। पर निश्चय ही हमारे मनसे डर नहीं निकला है। निखिल कैसा है? हेमप्रभादेवीको मुझे प्रति सप्ताह पत्र लिखना चाहिए। क्या [मैंने आपको बताया]<ref> यह अंश पत्रमें मिटा हुआ है।</ref> कि मैंने डा॰ रायको लिखा है? सस्नेह, अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १५९४) की फोटो-नकलसे। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 7j86zvusl84voxf6v4ir5nyhyxtbwc2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४७ 250 186873 671866 645270 2026-08-19T19:04:32Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671866 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४७५. भाषण: गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष'''}}}} {{right|११ जून, १९२८}} इस समय आप विद्यार्थीगण शायद मन ही मन उदास हैं। आपकी यह त्रिशंकु जैसी स्थिति टल जाये इस कारण आपने मुझे यहाँ आकर रहनेको आमन्त्रित किया था। कारण कोई और हो तो भी आपकी यह दशा हलकी करने या टालनेके लिए ही मैंने यह निमन्त्रण स्वीकार किया था। किन्तु यह निमन्त्रण भेजनेवाले सभी या उनमें से अधिकांश कायर निकले। उन्होंने मुझे बुलानेके बाद मुझे बाहर निकाल दिया। बादमें फिर बुलानेपर ऐसी शर्तें रखीं जिन्हें मेरे जैसा मानी स्वीकार नहीं कर सकता था। ऐसा करके आपने निकट आनेका सुअवसर हाथसे निकल जाने दिया, किन्तु हम अलग नहीं हुए। विद्यापीठके आदर्शोंके माध्यमसे आपके और मेरे बीच एक सम्बन्ध बना हुआ है। मैं चाहता था कि इन आदर्शोको आप अच्छी तरह आत्मसात कर लें। किन्तु तब यह काम सिद्ध नहीं हुआ। इस अवकाशमें आपने विद्यापीठके ध्येय पढ़े होंगे, उनपर विचार किया होगा। यदि आपने उनका मनन किया होगा तो कितनी वस्तुएँ आपकी समझमें आ गई होंगी। छुट्टीका उपयोग अगर आपने इस तरह न किया हो तो फिर आप जैसे गये थे वैसे ही आये हैं। मैंने तो महाविद्यालय में कई बार कहा है कि संख्याबलकी जरा भी परवाह न की जाये। मैं यह कहना नहीं चाहता कि अगर संख्याबल हो तो यह हमें अप्रिय होगा। किन्तु वह न हो तो हम निराश न हों। ऐसा न मान लें कि हमने सब खो दिया, बाजी हाथसे जाती रही। हम संख्यामें कम हों अथवा अधिक, हमारा असली बल तो सिद्धान्तोंको स्वीकार करनेमें और मनुष्यकी शक्तिके अनुसार उनका पालन करनेमें है। ऐसे विद्यार्थी कमसे कम हों, तो भी हमें विद्यापीठसे जो काम लेना है, और वह काम मुक्ति है––अन्तिम मुक्ति नहीं, स्वराज्य रूपी मुक्ति––विद्यापीठ जिस स्वराज्यके लिए स्थापित हुआ है, वह उसे जरूर प्राप्त हो जायेगा। अगर हम झूठे होंगे तब तो स्वराज्य मिलनेसे रहा। अभी हालमें जो फेरफार हुए हैं और अब आप जिन्हें देखेंगे, वे तो हम इस तरह डरते-डरते कर सके हैं कि वे कहीं आपकी शक्तिके बाहर न हो जायें। यह कैसी दयनीय स्थिति है। इसमें न तो आपकी शोभा है न हमारी। होना तो यह चाहिए कि आप अपने अध्यापकों और संचालकोंको यह अभयदान दे दें कि हम इन सिद्धान्तोंके पालनमें जरा भी कच्चापन न रखेंगे। यह अभयदान नहीं है। मैं उसकी याचना करने आया हूँ। सत्रके आरम्भ से ही आप अध्यापक वर्गको निश्चिन्त कर दें तभी काम चमक उठेगा। आपके काममें असत्यका जरा भी स्पर्श नहीं होना चाहिए। आप विद्यापीठको तभी शोभित कर सकेंगे जब आप अपने ही मनको, अध्यापकोंको, गुरुजनोंको और भारतवर्षको धोखा नहीं देंगे। आप अध्यापकोंसे हरएक बातका खुलासा माँग सकते हैं। आपकी हरएक<noinclude></noinclude> bhm896na45x8bz2lve034cqe7tgz5vg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४८ 250 186874 671892 645271 2026-08-20T03:07:26Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कठिनाईको सुलझाना उनका धर्म है। यह न करके अगर आप जैसे-तैसे यहाँ बैठे रहें तो विद्यापीठकी व्यवस्थामें संगति नहीं आयेगी। विद्यापीठका काम इतनी अच्छी तरह चलना चाहिए कि वह संगीतके समान लगे। तंबूरेके पीछेका संगीत तो स्थूल है। सच्चा संगीत तो सुजीवन है, जिसका जीवन सुजीवन है, वही सच्चा संगीत जानता है। यह जीवन संगीत बालक भी जानता है, अगर माँ-बापने उसे ठीक रास्ते चलाया हो तो। बालकके पास वाणी केवल रोना ही है; मगर होनहार बालकको वह भी शोभा देता है। विद्यार्थियोंमें बच्चोंके ही समान माधुर्य होना चाहिए। अगर आप सत्यका आचरण करें तो सहज ही यह स्थिति लाई जा सकती है। विद्यार्थी अगर सत्यका आचरण करनेवाले हों तो उनके द्वारा हिन्दुस्तानका स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है। यह बात विद्यापीठके सिद्धान्तमें ही है कि अहिंसा और सत्यके ही रास्ते हमें स्वराज्य लेना है, इसलिए इसे सिद्ध करना भी नहीं रह जाता है। जिसे इसमें शंका हो, उसके लिए यहाँ स्थान नहीं है। अथवा जिसे इसमें कोई शंका हो, उसे प्रारम्भमें ही उसका निवारण कर लेना चाहिए। सरकारी शाला और हमारी शालाका भेद समझना चाहिए। हमारे कई विद्यार्थी जेल गये और कई अभी जायेंगे। वे विद्यापीठके भूषण हैं। क्या सरकारी शालाओंके विद्यार्थियोंकी भी मजाल है कि वे वल्लभभाईकी मदद कर सकें? अथवा मदद करनेके बाद अपने शिक्षकको धोखा दिये बिना कालेजमें रह सकें? पीछे उन्हें चाहे जितना ज्ञान मिलता रहे, मगर वह किस कामका? सत्व हर लेनेके बाद ज्ञान दिया हो तो क्या हुआ? खोटे सिक्केकी क्या कीमत, उसे काममें लानेवाला धोखेबाज तो सजाका पात्र होता है। सरकारी शालाओंके विद्यार्थियोंकी खोटे रुपयेके समान बुरी स्थिति है। हमारे यहाँ सत्व तो कायम है ही, और इतना ही नहीं बल्कि उसमें वृद्धि होनी है। एक और भेद ध्यानमें रखना चाहिए। मैं कई बार बता चुका हूँ कि सरकारी कालेजकी शिक्षाके साथ तुम्हारी शिक्षाका मुकाबला नहीं हो सकता। इस जंजाल में पड़ोगे तो मारे जाओगे। उसकी हम बराबरी नहीं कर सकेंगे। अंग्रेजी जिस ढंगसे वहाँ सिखाई जाती है, उस ढंगसे हमें नहीं सिखानी है। पर साहित्यका जो सूक्ष्म ज्ञान है, वह हमें गुजराती जबानके जरिये देना है। जिससे गुजराती भाषाका विस्तार हो, उसकी शोभा बढ़े, उसमें गहरे से-गहरे विचार प्रकट हो सकें, वह काम करना है। गुजराती बोलते वक्त बीच-बीचमें अंग्रेजीके शब्द या वाक्य काममें लाने पड़ें, यह खराब और निहायत शर्मकी बात है। दुनियाके और किसी मुल्ककी ऐसी हालत नहीं है। अंग्रेजी साहित्यकी जितनी जानकारी जरूरी होगी, वह आगे चलकर ऊपरके दर्जेमें दी जायेगी। अभी तो जो ज्ञान लेंगे वह गुजरातीके जरिये ही लेंगे। विज्ञान भी अपनी भाषामें ही सीखेंगे। पारिभाषिक शब्द नये नहीं बना सकेंगे तो अंग्रेजी शब्द लेंगे, पर उनकी व्याख्या तो गुजरातीमें ही करेंगे। इससे हमारी भाषा जोरदार बनेगी। जो अलंकार हमें इस्तेमाल करने होंगे, वे हमारी जबान और कलमपर चढ़ जायेंगे। अभीकी बेहूदा हालतसे जितनी जल्दी निकला जा सके, उतनी जल्दी निकल जाना चाहिए। इस बारेमें मैंने 'नवजीवन' में जो कुछ लिखा है, उसे वेदवाक्य समझना।<noinclude></noinclude> 8kp57tr8lvj0nu98hiazkf4w37ryjr6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४९ 250 186875 671894 645272 2026-08-20T03:30:14Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||भाषण: गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष|४१७}}</noinclude>अंग्रेजीके जरिये ज्ञान दिया जाता है, इससे जनताका कितना नुकसान होता है। हमने धर्म छोड़ दिया, कर्म छोड़ दिया, इसका यह एक उदाहरण है। दूसरा उदाहरण अर्थशास्त्रका है। वहाँ जो अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है, वह गलत है। आप जिज्ञासु होंगे तो देखेंगे कि जर्मन, अमेरिकी या फ्रेंच भाषामें जो अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है, वह अलग-अलग होता है। मेरे पास हंगरीका एक आदमी आया था। वह जो बात कहता था उससे मुझे लगा कि वहाँका अर्थशास्त्र दूसरा ही होना चाहिए। हर देशकी स्थिति के आधार पर वहाँका अर्थशास्त्र तैयार किया जाता है। यह मानना ठीक नहीं कि एक देशका अर्थशास्त्र सारी दुनियाके लिए सच्चा है। आज जो अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है, वह हिन्दुस्तानको पामाल कर रहा है। हमें हिन्दुस्तान के अर्थशास्त्रका पता ही नहीं, हमें तो उसकी खोज करनी है। यही बात इतिहासकी है। अध्यापकोंको सोचना चाहिए कि हिन्दुस्तानका इतिहास क्या हो सकता है। कोई फ्रान्सका आदमी हिन्दुस्तानका इतिहास लिखेगा तो एक तरह लिखेगा, अंग्रेज दूसरी तरह लिखेगा। हिन्दुस्तानका आदमी मूल लेखोंको ढूँढ़ कर हिन्दुस्तान के वातावरणको देखकर लिखेगा, तो जरूर दूसरा इतिहास लिखा जायेगा। फ्रांसीसियों और अंग्रेजोंकी लड़ाईके अंग्रेजोंके लिखे हुए हालको क्या तुम वेद-वाक्य मानते हो? जिसने लिखा होगा उसने ठीक लिखा होगा? फिर भी उसने अपने दृष्टिकोणसे लिखा है। वह उसी किस्मकी घटनाएँ बयान करेगा जिनमें अंग्रेजोंकी जीत हुई हो। हम भी ऐसा ही करेंगे। फ्रांसीसी भी ऐसा ही करेंगे। हम हिन्दुस्तानका अलग ही इतिहास लिखेंगे। महाभारतका अर्थ भी अंग्रेज विद्वान एक तरह करेगा, हिन्दुस्तानी विद्वान दूसरी तरह करेगा और अगर वह दिलमें गहराई से सोचकर करे, तो उससे भी दूसरे ही ढंग से करेगा। विन्सेंट स्मिथकी शैली बढ़िया और विद्वत्तापूर्ण है, इसलिए उसका लिखा अच्छा लगता है। पर यह ठीक नहीं। अंग्रेज विद्वान ही बताते हैं कि उसमें बहुत कुछ गलत है, बहुत कुछ रह गया है। विलियम विल्सन इंटरकी भी यही बात है। यहाँ इन पुस्तकोंसे इतिहास नहीं पढ़ाया जायेगा। अध्यापकने हिन्दुस्तानका खूब अध्ययन किया होगा, निरीक्षण किया होगा और वह हिन्दुस्तानका भक्त होगा, तो इतिहास एक ढंगसे पढ़ायेगा। और अगर उसने अंग्रेजी इतिहासोंसे ही अपना दिमाग भर रखा होगा, तो न आपको लाभ होगा और न शिक्षकको; उसे तो शनिको दशा लगी ही है। हमारे यहाँ हर चीज सरकारी स्कूलसे उलटी ही तरह सिखाई जायेगी। गणित-शास्त्र के उदाहरण भी हमारा शिक्षक दूसरी ही तरह बतायेगा। ग्रेग जिन हिन्दुस्तानी बच्चोंको पढ़ाते हैं, उनके लिए वे नया गणितशास्त्र बना रहे हैं। हमारा शिक्षक मैन्चेस्टर से लिवरपूलकी दूरी नहीं पढ़ायेगा। वह यहाँके हालात पर से उदाहरण तैयार करेगा, ताकि गणितशास्त्र से ही इतिहास और भूगोलकी भी शिक्षा मिल जाये। गणित, इतिहास, अर्थशास्त्र और भूगोल सब हमें नये तैयार करने हैं। इसमें आप विद्यार्थी मदद न देंगे तो अध्यापक क्या करेंगे और अध्यापक ही अगर कच्चे होंगे, तो यह साफ है कि सिद्धान्त टूट जायेंगे। {{left|३६–२७}}<noinclude></noinclude> 5fyip3qal213iuza1bo6jadjfyjaqap पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५० 250 186876 671898 645273 2026-08-20T03:43:09Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आपको अपना विश्वास, धीरज और उद्यम नहीं खोना चाहिए। अध्यापकों और सिद्धान्तों पर भरोसा होगा तो आप नहीं डरेंगे। तादाद थोड़ी होगी, तो भी नहीं डरेंगे और विद्यापीठकी शोभा बढ़ायेंगे। अध्यापकोंको पूरा-पूरा देनेके लिए मजबूर करेंगे। आप पढ़नेवाले होंगे तो मैंने जो-कुछ कहा है, उसमें से भी सवाल पूछ-पूछ कर अध्यापकोंको तंग कर सकेंगे। पूरी दिलचस्पीके साथ काम करेंगे, तो रसके घूँट तो यहीं मिलेंगे। आपके शरीर तेजस्वी होंगे, मन तेजस्वी होगा और आत्मा भी तेजस्वी होगी। यहाँ जो आप आते हैं, तो आत्माको तेजस्वी बनाने के लिए ही। इसलिए जिस उद्योगकी शिक्षा रखी गई है उसमें दिलचस्पी लेकर काम करेंगे, तो आपमें उद्योग-बुद्धि न होने पर भी वह जाग उठेगी। लेकिन अगर जड़की तरह रहकर रंदा लगायेंगे, तो यह नहीं हो सकेगा। दिलचस्पी लेंगे तो देखेंगे कि यह भी एक शास्त्र है। जाग्रत रहकर उद्योग करेंगे तो देखेंगे कि इसमें बहुत रस है और यह साबित कर सकेंगे कि इसका भी शास्त्र है। यह निश्चय करना है कि मुझे जुलाहा बनना है, बढ़ई बनना है और हिन्दुस्तानको स्वराज्य दिलाना है; नौकरी नहीं करनी है, मुंशी नहीं बनना है। यह निश्चय रखना है कि मजदूरी करके, खादी बुनकर, खादी-सेवक बनकर गुजारा करना है। {{left|[गुजराती से]<br> '''नवजीवन,''' १७-६-१९२८}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''४७६. पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको'''}}}} {{right|११ जून, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} तुम्हारी तरफसे रु॰ १०० तो दो दिन पहले मिल गये थे। पत्र आज ही मिला है। तुम्हारा नाम प्रकट न हो अगर ऐसा अब भी हो सका तो करेंगे। यह तभी सम्भव है यदि वह अभी तक छपा न हो। मेरा स्वास्थ्य ठीक रहता है। फिर कब आओगी? {{right|{{larger|मोहनदासके वन्देमातरम्}}}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४८१२) की फोटो-नकलसे। सौजन्य: प्रेमलीला ठाकरसी<noinclude></noinclude> ek9fuhb8x36x8l8hd73o67gaqpb38jm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५१ 250 186877 671901 645274 2026-08-20T03:54:01Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''४७७. पत्र: एस॰ मुराटोरीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १३ जून, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके १५ मईके पत्रके सम्बन्धमें मेरा यह कहना है कि आपके 'आत्मकथा' (दि स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरीमेंट्स विद ट्रुथ) के प्रथम खण्डका असंक्षिप्त इतालवी अनुवाद छापने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं कोई विशेष शर्तें नहीं रखता हूँ पर आप जो कुछ भी देंगे वह मेरी सार्वजनिक गतिविधियोंको आगे बढ़ानेके काम में ही इस्तेमाल किया जायेगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री एस॰ मुराटोरी<br> द्वारा इतालवी वाणिज्यालय<br> बेलियार्ड एस्टेट<br> बम्बई}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४७४७) की माइक्रोफिल्म से। {{dhr}} {{c|{{larger|'''४७८. सत्याग्रह आश्रम'''}}}} सत्याग्रह आश्रमकी स्थापनाको १३ साल हो गये। इसकी स्थापना २५ मई, १९१५ को हुई थी। आश्रमके प्रति लोगोंका अनुराग बढ़ता गया है। अगर इसके बढ़ने का कोई कारण है तो वह आश्रम में विद्यमान सत्यका आग्रह ही है। आश्रमके बारेमें 'नवजीवन' में प्राय: कुछ भी लिखनेकी इच्छा नहीं रहती। इच्छा हमेशा यह रही है कि उसमें जो कुछ है, उसकी परीक्षा केवल उसके कामोंसे ही हो। छः साल हुए आश्रमकी नियमावलीकी छपी प्रतियाँ चुक गई हैं और तबसे अबतक नियमावली फिरसे छपाई ही नहीं गई। इसका एक कारण समयका अभाव भी था। नियमावली फिरसे तैयार कर देनेका बोझ मुझपर था। यह काम कठिन होनेसे, जाने-अनजाने मनसे इसे हमेशा टालता रहा। किन्तु साथी मुझसे हमेशा ही उसका तकाजा करते ही रहे।<ref>'''यंग इंडिया'''के अंग्रेजी पाठमें यहाँ इतना और है, "मगनलालके देहान्तके कारण इसे और अधिक जल्दी पूरा करना जरूरी हो गया।"</ref> यह नियमावली अब तैयार हो गई है और नीचे छापी जा रही है। पहला मसविदा होनेको मेरा ही था, मगर जिस रूपमें वह प्रस्तुत हो रही है, उसमें बहुतसे {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> lbs1ctluxzlc3sypqtkbn04btvm9y78 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५२ 250 186878 671904 645275 2026-08-20T04:05:41Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 671904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>साथियोंका हाथ है। इसमें कोई फेरफार होने तक फिलहाल इसे स्वीकृत नियमावली माननेका प्रस्ताव कार्यवाहक मण्डलने स्वीकार कर लिया है। किन्तु अभी तो यह नियमावली कच्चे मसविदेके तौर पर ही छापी जा रही है। आश्रमका हित चाहनेवाले, और नैतिक दृष्टिसे आश्रमको बढ़ते हुए देखना चाहनेवाले बहुत लोग हैं। नियमावलीके बारेमें उनका भी मत जानना, इसे छापनेका उद्देश्य है। इसलिए आश्रमके साथ सम्बन्ध रखनेवाले, न रखनेवाले, मित्रों और टीकाकार आलोचकों, सबसे इसमें सुधार करनेके बारेमें अपनी सलाह भेजनेकी प्रार्थना में करता हूँ। मैं मानता हूँ कि आश्रमका प्रयोग शास्त्रीय पद्धति से चलता है। यानी जो नियम बनाये गये हैं उनसे आजका आश्रम-जीवन सूचित होता है। उसका अर्थ ऐसा नहीं है कि उनमें दिये गये व्रतोंका सर्वाश में पालन करनेवाला एक भी आश्रमवासी है, मगर उसका अर्थ यह अवश्य है कि प्रत्येक आश्रमवासी इन नियमोंका पालन करनेका सतत् प्रयत्न किया ही करता है और १३ वर्षोके अनुभवके बाद उनका पालन आवश्यक लगा है और इनका थोड़े-बहुत अंशोंमें पालन हो भी सका है। {{c|'''स्थापना'''}} कोचरव (अहमदाबाद) में वैशाख सुदी ११, सं॰ १९७१ तदनुसार २५वीं मई सन् १९१५; अब साबरमती में। {{c|'''उद्देश्य'''}} जगतके हितसे अविरोध रखनेवाली देशसेवा करनेकी शिक्षा लेना और ऐसी देशसेवा करनेका सतत् प्रयत्न करना इस आश्रमके उद्देश्य हैं। {{c|'''नियम'''}} नियम: इन उद्देश्योंकी पूर्ति के लिए नीचेके नियमोंका पालन आवश्यक है: {{left|'''१. सत्य'''}} सामान्य व्यवहार में असत्य न बोलना या उसका आचरण न करना ही सत्यका अर्थ नहीं है। किन्तु सत्य ही परमेश्वर है और उसके अलावा और कुछ नहीं है। दूसरे सभी नियमोंकी आवश्यकता इस सत्यकी खोज और साधनाके लिए ही पड़ती है और उसीमें से उसकी उत्पत्ति है। इस सत्यका उपासक अपने कल्पित देशहित के लिए भी असत्य नहीं बोलता, असत्यका आचरण नहीं करता। सत्यके लिए प्रह्लादके समान माता-पितादि गुरुजनोंकी आज्ञाका भी विनयपूर्वक मंग करने में धर्म समझता है। {{left|'''२. अहिंसा'''}} प्राणियोंका वध न करना ही इस व्रतके पालनके लिए बस नहीं है। अहिंसा अर्थात् सूक्ष्म जीवोंसे लेकर मनुष्य तक सभी प्राणियोंके प्रति समभाव रखना। इस व्रतका पालक घोर अन्याय करनेवालेके प्रति भी क्रोध नहीं करता किन्तु उसके प्रति प्रेमभाव रखता है, उसका हित चाहता और करता है। किन्तु प्रेम करते हुए भी अन्यायी के अन्यायका अंकुश नहीं मानता, बल्कि अन्यायका विरोध करता है, और वैसा करनेमें जो कष्ट हों, उन्हें धैर्यपूर्वक और द्वेष किये बिना अन्यायको सहता है।<noinclude></noinclude> 6bz5s20b27be4mmlmqhwr61twruulq7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५३ 250 186879 672044 645276 2026-08-20T09:53:42Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672044 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||सत्याग्रह आश्रम|४२१}}</noinclude>{{left|'''३. ब्रह्मचर्य'''}} ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना ऊपरके व्रतोंका पालन करना असम्भव है। ब्रह्मचारी किसी स्त्री या पुरुष पर कुदृष्टि न डाले, केवल इतना ही बस नहीं, किन्तु वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन या सेवन न करे। और यदि वह विवाहित हो तो अपनी पत्नी या अपने पतिके साथ भी विषयभोग न करे, किन्तु उसे मित्र समझकर उसके साथ निर्मल सम्बन्ध रखे। अपनी पत्नी या दूसरी स्त्रीका अथवा अपने पति या दूसरे पुरुषका विकारमय स्पर्श या उसके साथ विकारमय भाषण या अन्य विकारमय चेष्टा भी स्थूल ब्रह्मचर्यका भंग है। {{left|'''४. अस्वाद'''}} ऐसा अनुभव होनेसे कि मनुष्य जबतक जीभके रसोंको नहीं जीतता, तबतक ब्रह्मचर्य का पालन अति कठिन है, अस्वादको अलग व्रत गिना गया है। भोजन केवल शरीरयात्राके लिए ही हो, भोगके लिए कभी नहीं। इसलिए उसे औषध समझकर संयमपूर्वक भोजन करनेकी जरूरत है। इस व्रतका पालन करनेवाला ऐसे मसालों वगैराका त्याग करेगा जो विकार उत्पन्न करते हैं। मांसाहार, मद्यपान, तम्बाकू, भाँग इत्यादिका सेवन करना आश्रम में निषिद्ध है। इस व्रतमें स्वादके लिए उत्सव या भोजनके आग्रहका निषेध है। {{left|'''५. अस्तेय'''}} इस व्रतके पालनके लिए यही काफी नहीं है कि दूसरेकी वस्तु उसकी अनुमतिके बिना न ली जाये। जो वस्तु जिस उपयोगके लिए हमें मिली हो, उसके अलावा उसका अन्य किसी प्रकारसे उपयोग करना या जितने समय के लिए मिली हो उससे अधिक समय तक उसका उपयोग करना भी चोरी है। इस व्रतके मूलमें सूक्ष्म सत्य तो यह छिपा हुआ है कि परमात्मा प्राणियोंकी नित्यकी आवश्यक वस्तुएँ ही नित्य उत्पन्न करता और देता है। उससे तनिक भी अधिक पैदा नहीं करता। इसलिए अपनी कमसे कम आवश्यकतासे अधिक जो कुछ भी मनुष्य लेता है वह चोरी करता है। {{left|'''६. अपरिग्रह'''}} अपरिग्रह अस्तेयके अन्तर्गत ही है। जिस तरह अनावश्यक वस्तु नहीं ली जा सकती, उसी तरह उसका संग्रह भी नहीं किया जा सकता। इसलिए जिस खूराक या साज-सामानकी जरूरत न हो, उसका संग्रह करना इस व्रतका भंग है। जिसका काम कुर्सीके बिना चल जाये वह कुर्सी न रखे; अपरिग्रही दिनोंदिन अपने जीवनको और भी सादा बनाता जाये। {{left|'''७. शारीरिक श्रम'''}} अस्तेय और अपरिग्रहके पालनके लिए स्वयं काम करनेका नियम जरूरी है। फिर मनुष्य मात्र शारीरिक श्रमसे शरीर-निर्वाह करें तभी वे सामाजिक और आत्म-द्रोहसे बच सकते हैं। जिनका शरीर चल सकता है और जिन्हें समझ आ गई है,<noinclude></noinclude> qakubkb46qpa5y2utpse10sl4620svp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५४ 250 186880 672054 645277 2026-08-20T10:07:21Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>उन स्त्री-पुरुषोंको अपने नित्यका सारा काम, जो वे आप कर सकते हों, कर लेना चाहिए और बिना कारण दूसरेकी सेवा नहीं लेनी चाहिए। किन्तु बालकों, अन्य अपंग लोगों और वृद्ध स्त्री-पुरुषोंकी सेवा करनेका अवसर मिले तो उनकी सेवा करना सामाजिक जिम्मेदारीको समझनेवाले प्रत्येक मनुष्यका धर्म है। इस आदर्शका अवलम्बन करके आश्रम में मजदूर वहीं रखे जाते हैं, जहाँ वे अनिवार्य हों, और उनके साथ मालिक-नौकरका व्यवहार नहीं किया जाता। {{left|'''८. स्वदेशी'''}} मनुष्य सर्वशक्तिमान् प्राणी नहीं है। इसलिए वह अपने पड़ोसीकी सेवा करके जगतकी सेवा करता है। इस भावनाका नाम स्वदेशी है। जो अपने नजदीकके लोगोंकी सेवा छोड़कर दूरवालोंकी सेवा करने या लेनेको दौड़ता है, वह स्वदेशीका भंग करता है। इस भावनाके पोषणसे संसार सुव्यवस्थित रह सकता है। उसके भंगसे अव्यवस्था होगी। इस नियमके आधार पर, जहाँतक बने, हम अपने पड़ोसकी दुकानसे व्यवहार रखें, देशमें जो वस्तु बनती हो या सहज ही बन सकती हो, वह विदेशसे न मँगायें। स्वदेशीमें स्वार्थके लिए स्थान नहीं है। कुटुम्बके लिए अपने-आपको, शहरके लिए कुटुम्बको, देशके लिए शहरको, और जगत्के कल्याणार्थ देशको होम कर दिया जाये। {{left|'''९. अभय'''}} सत्य, अहिंसा आदि व्रतोंका पालन निर्भयताके बिना असम्भव है। और फिलहाल जहाँ सर्वत्र भय व्याप रहा है, वहाँ निर्भयताका चिन्तन और उसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक होनेसे, उसे व्रतोंमें स्थान दिया गया है। जो सत्यपरायण रहना चाहता है, वह न जात-बिरादरीसे डरता है, न सरकारसे डरता है, न चोरसे डरता है, न गरीबी से डरता है और न मौतसे डरता है। {{left|'''१०. अस्पृश्यता-निवारण'''}} हिन्दू-धर्म में अस्पृश्यताकी रूढ़िने जड़ जमा ली है। यह धर्म नहीं, अधर्म है। हमारी ऐसी मान्यता होनेके कारण अस्पृश्यता-निवारणको नियमावलीमें स्थान दिया गया है। आश्रममें अस्पृश्य माने जानेवाले लोगोंके लिए दूसरी जातियोंके बराबर ही स्थान है। आश्रम जाति-भेद नहीं मानता। वह ऐसा मानता है कि जाति-भेदसे हिन्दू-धर्मको नुकसान हुआ है। उसमें छिपी हुई ऊँच-नीच और छुआछूतकी भावना अहिंसा-धर्मकी घातक है। आश्रम वर्णाश्रम-धर्मको मानता है। वर्णाश्रम-धर्मकी वर्ण-व्यवस्था केवल धन्धोंके आधारपर जान पड़ती है। इसलिए वर्ण नीतिका पालन करनेवाला ऐसे धन्धेसे, जो माँ-बापके धन्धेका अविरोधी हो, अपनी आजीविका पैदा करे और बाकी समय शुद्ध ज्ञान लेनेमें और बढ़ानेमें लगाये। स्मृतियोंमें दी गई वर्ण-व्यवस्था जगतका हित करनेवाली है, किन्तु वर्णाश्रम-धर्म मान्य होने पर भी आश्रम-जीवन 'गीता' मान्य व्यापक और भावना-प्रधान संन्यासको आगे रखकर रचा गया है, इसलिए आश्रम में वर्णभेदको अवकाश नहीं है।<noinclude></noinclude> igaoie5zralkgzkfreuoo3ukjzd17fi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५५ 250 186881 672061 645278 2026-08-20T10:13:56Z अनुश्री साव 80 /* अशोधित */ 672061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh||सत्याग्रह आश्रम|४२३}}</noinclude>११. सहिष्णुता आश्रमकी ऐसी मान्यता है कि जगतमें प्रचलित प्रख्यात धर्मं सत्यको व्यक्त करनेवाले हैं । किन्तु वे सब अपूर्ण मनुष्यके द्वारा व्यक्त किये गये हैं, इसलिए सभीमें अपूर्णता अथवा असत्यका मिश्रण हो गया है। इसलिए हमारे मनमें अपने धर्मके लिए जैसा मान हो, वैसा ही हमें प्रत्येक धर्मके लिए रखना चाहिए। जहाँ ऐसी सहिष्णुता हो, वहाँ एक-दूसरेके धर्मका विरोध सम्भव नहीं होता और न परधर्मीको अपने धर्म में लानेका ही प्रयत्न सम्भव होता है। किन्तु नित्य यही प्रार्थना और यही भावना रखी जानी चाहिए कि सभी धर्मोके दोष दूर हों । काम ऊपर बताये हुए नियमोंका पालन करते हुए और उनका पालन किया जा सके इस उद्देश्यसे निम्नलिखित काम आश्रममें किये जाते हैं । १. उपासना आश्रमकी सामाजिक प्रवृत्तियोंका आरम्भ सबेरे ४-१५ बजेकी सामाजिक प्रार्थनासे होता है और साँझके सात बजेसे ७.३० बजे तक होनेवाली प्रार्थनाके साथ समाप्त होता है। सुबह-शामकी यह उपासना सभी आश्रमवासियोंके लिए अनिवार्य है; इसका हेतु चित्त-शुद्धि करना और ईश्वरको समर्पित होना है । २. शौच-सुधार यह काम अत्यन्त आवश्यक और पवित्र होने पर भी अपवित्र गिना जाता है, और उसके प्रति समाजमें बहुत अरुचि है; और इसलिए सामान्यतः सफाई करनेके काम में आरोग्य और सफाईकी दृष्टिसे सुधार करनेकी बहुत गुंजाइश होनेके कारण भी, इसमें मजदूरी देकर दूसरोंके जरिए काम न लेनेका खास आग्रह रखा जाता है । पाखाना इत्यादिकी सफाई आश्रमके व्यक्ति ही बारी-बारी से करते हैं । सामान्य नियम नये आगन्तुकको पहले यही काम सिखानेका है । मलको हमेशा नौ इंचका गढ़ा खोद कर, जो गढ्ढे में से निकलती है उस तथा दूसरी सूखी मिट्टीसे ढँक दिया जाता है और उसका खाद बनाया जाता है। निश्चित स्थानों पर ही लोग पाखाने या पेशाबके लिए जाते हैं। रास्तेमें न थूकने या किसी दूसरी तरहसे आश्रमके रास्ते न बिगाड़नेका खयाल रखा जाता है । ३. कातनेका यज्ञ भारतवर्षका महादुःख उसके करोड़ों लोगोंकी भुखमरी है । इस भुखमरीका मुख्य कारण उसके मुख्य धन्धे सूत कताईका विदेशी राज्य द्वारा जानबूझकर किया गया नाश है । इसलिए इस क्रियाका पुनरुद्धार करनेके लिए कताईको केन्द्र बनाया गया है और वह राष्ट्रयज्ञके रूपमें आश्रमवासीके लिए अनिवार्य है। उसके सम्बन्धमें आश्रम में निम्नलिखित काम होते हैं : १. जुदा-जुदा जातिकी कपासकी खेती, Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 7tcbg3o5r2jf5gcbmo3vjhd63lurg5m 672082 672061 2026-08-20T10:46:18Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||सत्याग्रह आश्रम|४२३}}</noinclude>{{left|'''११. सहिष्णुता'''}} आश्रमकी ऐसी मान्यता है कि जगतमें प्रचलित प्रख्यात धर्मं सत्यको व्यक्त करनेवाले हैं। किन्तु वे सब अपूर्ण मनुष्यके द्वारा व्यक्त किये गये हैं, इसलिए सभीमें अपूर्णता अथवा असत्यका मिश्रण हो गया है। इसलिए हमारे मनमें अपने धर्मके लिए जैसा मान हो, वैसा ही हमें प्रत्येक धर्मके लिए रखना चाहिए। जहाँ ऐसी सहिष्णुता हो, वहाँ एक-दूसरेके धर्मका विरोध सम्भव नहीं होता और न परधर्मीको अपने धर्म में लानेका ही प्रयत्न सम्भव होता है। किन्तु नित्य यही प्रार्थना और यही भावना रखी जानी चाहिए कि सभी धर्मोके दोष दूर हों। {{c|'''काम'''}} ऊपर बताये हुए नियमोंका पालन करते हुए और उनका पालन किया जा सके इस उद्देश्यसे निम्नलिखित काम आश्रममें किये जाते हैं। {{left|'''१. उपासना'''}} आश्रमकी सामाजिक प्रवृत्तियोंका आरम्भ सबेरे ४-१५ बजेकी सामाजिक प्रार्थनासे होता है और साँझके सात बजेसे ७.३० बजे तक होनेवाली प्रार्थनाके साथ समाप्त होता है। सुबह-शामकी यह उपासना सभी आश्रमवासियोंके लिए अनिवार्य है; इसका हेतु चित्त-शुद्धि करना और ईश्वरको समर्पित होना है। {{left|'''२. शौच-सुधार'''}} यह काम अत्यन्त आवश्यक और पवित्र होने पर भी अपवित्र गिना जाता है, और उसके प्रति समाजमें बहुत अरुचि है; और इसलिए सामान्यतः सफाई करनेके काम में आरोग्य और सफाईकी दृष्टिसे सुधार करनेकी बहुत गुंजाइश होनेके कारण भी, इसमें मजदूरी देकर दूसरोंके जरिए काम न लेनेका खास आग्रह रखा जाता है। पाखाना इत्यादिकी सफाई आश्रमके व्यक्ति ही बारी-बारी से करते हैं। सामान्य नियम नये आगन्तुकको पहले यही काम सिखानेका है। मलको हमेशा नौ इंचका गढ़ा खोद कर, जो गढ्ढे में से निकलती है उस तथा दूसरी सूखी मिट्टीसे ढँक दिया जाता है और उसका खाद बनाया जाता है। निश्चित स्थानों पर ही लोग पाखाने या पेशाबके लिए जाते हैं। रास्तेमें न थूकने या किसी दूसरी तरहसे आश्रमके रास्ते न बिगाड़नेका खयाल रखा जाता है। {{left|'''३. कातनेका यज्ञ'''}} भारतवर्षका महादुःख उसके करोड़ों लोगोंकी भुखमरी है। इस भुखमरीका मुख्य कारण उसके मुख्य धन्धे सूत-कताईका विदेशी राज्य द्वारा जानबूझकर किया गया नाश है। इसलिए इस क्रियाका पुनरुद्धार करनेके लिए कताईको केन्द्र बनाया गया है और वह राष्ट्रयज्ञके रूपमें आश्रमवासीके लिए अनिवार्य है। उसके सम्बन्धमें आश्रम में निम्नलिखित काम होते हैं: १. जुदा-जुदा जातिकी कपासकी खेती,<noinclude></noinclude> 1wtl9eh7jql7kdadrfceh8dsp02z81t पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५६ 250 186882 672092 645279 2026-08-20T10:58:22Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>२. चरखा, तकुवा, धुनकी वगैरा बनानेके लिए लोहार और बढ़ई विभाग। ३. कपास लोढ़ना या चुनना। ४. धुनना। ५. डोरी, निवाड़ या बिस्तरकी पट्टी, खादी बुनना। ६. रंगना तथा छापना। {{left|'''४. खेती'''}} आश्रमके निर्वाहके सम्बन्धमें तथा उसे यथासम्भव स्वाश्रयी बनानेके लिए उसमें कपासके अलावा शाक-भाजी, फल वगैराकी खेती की जाती है। {{left|'''५. दुग्धालय'''}} आश्रमकी दूधकी आवश्यकता पूरी करनेके लिए दुग्धालय चलाया जाता है और उसे आदर्श बनानेका प्रयत्न किया जा रहा है। गत वर्षसे यह दुग्धालय अखिल भारतीय गोरक्षा मण्डलकी सहायतासे, किन्तु आश्रमकी एक स्वतन्त्र प्रवृत्तिके रूपमें चलता है। उसमें २७ गायें, १० बैल, ४७ बछड़े-बछड़ियाँ और ८ साँड़ हैं। इसमें रोज ५ मन दूध होता है। {{left|'''६. चर्मालय'''}} दुग्धालयकी प्रवृत्तिके सम्बन्ध में चर्मालय स्थापित किया गया है। इसमें केवल मरे हुए ढोरका ही चमड़ा लिया जाता है और उसे कमाया जाता है। साथ ही मोचीका काम भी चलता है। यदि इस देशमें गोपालनका यथेष्ट सुधार न हो तो गायकी दूध देनेकी शक्ति में वृद्धि नहीं होगी, और मरे हुए ढोरके चमड़ेका सदुपयोग इसी देशमें न हो तो गोरक्षाका दावा करनेवाले इस अहिंसा-प्रधान देशमें मवेशी बिना मौत ही मरेंगे और फलस्वरूप मनुष्य भी। इन दो (५ और ६) कामोंके पीछे यही मान्यता है। {{left|'''७. राष्ट्रीय शिक्षा'''}} आश्रम में राष्ट्रके लिए पोषक शिक्षा देनेका प्रयत्न किया जाता है। उसमें नीचेके सिद्धान्तों पर अमल करनेका प्रयत्न किया जाता है। शारीरिक, बौद्धिक और आत्मिक विकासको साथ ही साथ चलानेके लिए औद्योगिक वातावरणका निर्माण किया जाता है। अक्षरज्ञान पर जितना जरूरी हो, उतना ही जोर दिया जाता है और चरित्र दृढ़ करनेकी दृष्टिसे हरएक सूक्ष्म से-सूक्ष्म कार्य में भी उसकी आवश्यकता पर जोर दिया जाता है। अन्त्यज बालकोंको दाखिल करनेकी पूरी छूट है। स्त्रियोंकी स्थिति सुधारनेके हेतुसे उनपर खास ध्यान दिया जाता है और उन्हें अपने विकासके लिए पुरुषोंके बराबर ही स्वतन्त्रता दी जाती है। विद्यापीठके नीचे लिखे सिद्धान्तोंको आश्रम स्वीकार करता है: १. विद्यापीठका मुख्य काम स्वराज्य प्राप्तिके लिए चलनेवाले आन्दोलनोंके लिए चरित्रवान्, शक्तिसम्पन्न, संस्कारी और कर्त्तव्यनिष्ठ कार्यकर्त्ता तैयार करना है।<noinclude></noinclude> q15ovnrd04hd7cz1db3hn70fuzg2ek7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५७ 250 186883 672107 645280 2026-08-20T11:22:26Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||सत्याग्रह आश्रम|४२५}}</noinclude>२. विद्यापीठकी ओरसे चलनेवाली और उनसे सम्बद्ध सभी संस्थाओंका पूर्ण रूपसे असहयोगी होना आवश्यक है; इसलिए वे किसी किस्मका सरकारी आश्रय नहीं ले सकेंगी। ३. विद्यापीठ, स्वराज्य और स्वराज्य-प्राप्तिके साधन अहिंसामय असहयोगके सम्बन्धमें खुला था, इसलिए उसके शिक्षक और संचालक ऐसे ही होने चाहिए जो स्वराज्य प्राप्तिके लिए अहिंसा और सत्यके अविरोधी साधन ही स्वीकार करें और उन्हें अमल में लाने के लिए प्रयत्नशील हों। ४. विद्यापीठ तथा विद्यापीठसे सम्बद्ध संस्थाओंके संचालक और शिक्षक अस्पृश्यताको कलंक रूप माननेवाले और उसे दूर करनेको प्रयत्नशील होने चाहिए और उन्हें किसी लड़के या लड़कीको अस्पृश्य होनेके कारण न तो बाहर रखना चाहिए और न उसे दाखिल कर लेनेके बाद उसके साथ किसी प्रकारका अलग व्यवहार ही करना चाहिए। ५. विद्यापीठके सम्बन्धमें काम करनेवाले शिक्षकों, संचालकों तथा सम्बद्ध संस्थाओंको चरखा आन्दोलनमें विश्वास करना, कोई अनिवार्य कारण उपस्थित हो जानेके सिवाय नियमित रूपसे कातना और सदा खादी पहनना चाहिए। ६. विद्यापीठसे सम्बन्धित सभी संस्थाओं में सभी धर्मो के प्रति आदरभाव रखनेकी शिक्षा दी जाये और विद्यार्थियोंके आत्मविकासके लिए अहिंसा और सत्यको दृष्टिमें रखते हुए धर्मकी शिक्षा दी जायें। ७. विद्यापीठमें प्रान्तीय भाषाको प्रधान पद दिया जायेगा और सारी शिक्षा उसीके जरिए दी जायेगी। स्पष्टीकरण––दूसरी भाषाएँ पढ़ाते समय उन्हीं भाषाओंके उपयोगमें इस नियम से बाधा नहीं आती। ८. विद्यापीठके पाठ्यक्रम में राष्ट्रभाषा हिन्दी-हिन्दुस्तानीका आवश्यक स्थान होगा। स्पष्टीकरण हिन्दी––हिन्दुस्तानी वह भाषा है जिसे उत्तरमें आम हिन्दू-मुस्लिम जनता बोलती है और जो देवनागरी तथा फारसी लिपियोंमें लिखी जाती है। ९. विद्यापीठमें औद्योगिक शिक्षाको भी बौद्धिक शिक्षाके बराबर ही महत्व दिया जायेगा; इसमें जो उद्योग राष्ट्रके पोषक होंगे, केवल उन्हींको स्थान दिया जायेगा, दूसरोंको नहीं। १०. भारतवर्षका उत्कर्ष शहरों पर नहीं, किन्तु गाँवों पर अवलम्बित है, इसलिए विद्यापीठके शिक्षकोंका मुख्य उपयोग गाँवोंमें राष्ट्रको पोषण देनेवाली शिक्षाका प्रचार करनेमें होगा। ११. शिक्षा-क्रम बनाते समय गाँववालोंकी जरूरतोंको प्रधानता दी जायेगी। १२. लोगोंके शारीरिक विकासके लिए व्यायाम और शारीरिक श्रमकी तालीम विद्यापीठमें आवश्यक गिनी जायेगी। इस शालामें अब तक १५ विद्यार्थी और २ विद्यार्थिनियाँ तैयार हुई हैं।<noinclude></noinclude> qhftin2e67lsx2wubzbf94te0e8w139 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६१ 250 186887 672115 645284 2026-08-20T11:37:18Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 672115 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||सत्याग्रह आश्रम|४२९}}</noinclude>{{c|'''कार्यवाहक मण्डल'''}} आश्रमकी व्यवस्था १९८२ के आषाढ़ सुदी १४, शनिवार २४–७–१९२६ से कार्यवाहक मण्डल के अधीन चलती है। इस समय उसके निम्नलिखित सदस्य: श्री महादेव हरिभाई देसाई (प्रमुख) श्री इमाम अब्दुल कादिर बावजीर (उप-प्रमुख) {{c|'''सदस्य'''}} :श्री विनोबा भावे :श्री खुशालचन्द गांधी :श्री नरहरि द्वारिकादास परीख :श्री लक्ष्मीदास पुरुषोत्तम आसर :श्री रमणीकलाल मगनलाल मोदी :श्री चिमनलाल नरसिंहदास शाह :श्री छगनलाल नथुभाई जोशी :श्री नारणदास खुशालचन्द गांधी :श्री सुरेन्द्रजी इस मण्डल में से किसीकी मृत्यु हो जाने, अथवा किसी दूसरी तरहसे किसीकी जगह खाली हो जाने पर उसे भरनेका अधिकार मण्डलको है। कार्यवाहकका चुनाव, यह मण्डल कमसे कम तीन चौथाईके बहुमत से करे। इस मण्डलको दो और कार्यवाहक चुननेका अधिकार है। इस मण्डलमें कमसे कम तीन कार्यवाहक होने चाहिए। आश्रमकी कुल व्यवस्थाका अधिकार कार्यवाहक मण्डलको है। विशेष: गांधीजी और काकासाहब कालेलकर स्वेच्छासे ही कार्यवाहक मण्डल में नहीं हैं। {{c|'''आश्रमवासी'''}} आश्रमवासी वह है जो आश्रमके उद्देश्य और नियमोंको माने, और आश्रम में या आश्रमकी सम्मतिसे बाहर रहकर नियमों का पालन करनेका सतत प्रयत्न करे और कार्यवाहक मण्डल या उसके चुने हुए व्यवस्थापक जो भी काम बताये, उस काम में एकनिष्ठासे लगा रहे। {{c|'''कार्यवाहक'''}} इक्कीस वर्षके या उससे बड़े वे ही आश्रमवासी स्त्रियाँ या पुरुष कार्यवाहक मण्डलके सदस्य बन सकते हैं जिन्होंने कमसे-कम ५ वर्ष आश्रम में बिताये हों, और जिन्होंने आश्रम में या आश्रम की ओरसे चलनेवाले किसी काममें आजन्म रहनेकी प्रतिज्ञा की हो।<noinclude></noinclude> ltkx7t8dn4am45k9mtsymldcc4ybry4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५६२ 250 186988 671931 645385 2026-08-20T06:08:47Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 671931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Multicol|line=1px solid black}} श्रद्धानन्द, ६८ श्रद्धानन्द, स्वामी, १४, २२८, २६८ श्राद्ध; और बिरादरी भोज, ५९-६० श्रीनाथसिंह, २७३ श्रीनिवासन, के० ४७० श्लेशिन, ४९ {{C|''' स'''}} संडरलैंड, डा० जे० टी०, ४४४ पा० टि० सत्य, ७, ८, १०, २८, ६८, ७८, ८६, १४६, १७०, १७९, २८३, २७९, ४१६, ४२३, ४२५, ४३९, ४६१, ४८४; - आत्म-बलिदान, ४६५; -और अभय, ४२०; -और असत्य, ४०; - और ईश्वर २९३, ४०९, ४१९- २०; और पाखण्ड, ४१०; -और युद्ध, ९१-९२; के पालनमें देह बाधा, १७७ {{C|''' सत्य के प्रयोग, देखिए, आत्मकथा,'''}} सत्यवादी स्कूल, ४६६ सत्याग्रह, २४, १४२, १५८, २१०, २३०, २३३, ३४० -अफसरोंके उद्धत बर्ताव- के विरुद्ध, २९६; -और आत्मशुद्धि, ३९; -और आत्मसम्मान, ३९; -और पशु बल, ३३४, ३४९; - बारडोली में, देखिए बारडोली सत्याग्रह; - मान्य और कानूनी शस्त्र, ४४१; -मान्य और कानूनी शस्त्र, ४६५ - लोगोंके साहसकी कसौटी, ४९५ - शब्दकी उत्पत्ति, २७९; -श्राद्धके बिरादरी भोजके विरुद्ध, ५९-६०; -सर्वव्यापक, ५८; - स्वेच्छासे कष्ट सहनका अचूक गाण्डीव, ४६५ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सत्याग्रह आश्रम, साबरमती, -का आदर्श, २३७-३८; - का खादी विद्यालय, ४२६-२८; - की दिनचर्या, ४३१; -की सदस्यताके लिए योग्यता, ४२९-३० -की स्थापनाका कारण, ३०६; -के उद्देश्य, २३७-३८, ४२९-३१; -के काम, ४२३-२५; -गांधीजीकी सर्वश्रेष्ठ कृति, १, २६७; - में प्रार्थना, ३२३ सत्याग्रह इन साउथ आफ्रिका, ४७३ सत्याग्रही, ८६, १६३, ४५१; -और जनता- का उनके प्रति कर्त्तव्य, ३७५; -और बहिष्कारका शस्त्र, १२५; -बारडोलीके, ३८२; -[ हियों ] का दमन, १८२-८३, ४५७-६२ सत्यानन्द, १९०, ४१४, ४८५ सदाशिवम्, १८८ सनाढ्य, तोताराम, २९० सनातनी हिन्दू, ३२ सन्तति-निग्रह, २८२-८३; - कृत्रिम उपायोंसे हो तो अनैतिक है, २८३ सभ्यता का आधुनिक बनावटीपन, १४०; -पश्चिमी, ४७९-८० समाचारपत्र, - [ ]द्वारा लूटका व्यवसाय, ४३८-३९ समाज सेवा और राजनीति, १०७ सरकार, नीलरतन, ११९ सर्वदलीय सम्मेलन, बनारस, १० पा० टि०, ६२ पा० टि०, ८०; और पृथक निर्वाचक मण्डल, ८२ सहिष्णुता, ४२३, ४८५ साँडर्स, ए० जे०, ८८ साइमन, सर जॉन, ६२, ७८, ३९९<noinclude></noinclude> fobocwqcelmoq2twmles59erb8ud5ht पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८२ 250 187262 671795 645682 2026-08-19T15:05:45Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्थान सबसे ऊँचा है। हो सकता है कि दूसरे अनुयायी भी ऐसे हों, जिन्होंने मेरे समान ही प्रयत्न किया हो, परन्तु मैं यह नहीं मानता कि स्वराज्यके इस मन्त्रकी सिद्धिके लिए कोई अन्य व्यक्ति मुझसे अधिक प्रयत्न करनेका दावा कर सकता है, क्योंकि में जानता हूँ कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार मात्र ही नहीं, वरन् उसे प्राप्त करना हमारा पवित्र कर्तव्य है, क्योंकि हम स्वराज्यसे जितने दूर कर दिये जाते हैं, मनुष्यत्वसे भी उतने ही दूर पड़ जाते हैं। स्वराज्यके बिना, हमारी सभी शक्तियोंकी उचित अभिव्यक्ति हो पाना असम्भव है। किन्तु जो स्वराज्य लोकमान्य की कल्पनाका स्वराज्य है, वह मात्र रत्नागिरिवासियोंका या महाराष्ट्रियोंका ही स्वराज्य नहीं, बल्कि सारे देशका स्वराज्य है। वह देशके अमीर और गरीब सभी लोगोंका स्वराज्य है, और गरीबोंके लिए स्वराज्य तबतक कोई माने नहीं रखता जबतक कि उन्हें खानेको पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। किन्तु आप पूछते हैं कि हम अपनी मिलोंकी सेवा क्यों न करें? शोलापुर मिलके मालिक सेठ नरोत्तम मोरारजी मेरे मित्र हैं। मैं उनके पुत्रका अतिथि था, जिसने बहुत प्रेमके साथ मेरा आतिथ्य सत्कार किया। तो क्या इससे मुझे उनकी मिलका कपड़ा इस्तेमाल करना चाहिए, 'गरीब' नरोत्तम सेठ और उनके बेटेकी सेवा करनी चाहिए? यह तो वे भी नहीं कहेंगे कि उनकी मिलोंका कपड़ा इस्तेमाल करके मैं गरीबोंकी सेवा करूँगा। हर जगह लोगोंने मुझसे कहा है कि कोंकण कंगाल है। अगर ऐसी बात हो तो आपको यह स्थिति असह्य होनी चाहिए। आप कहते हैं कि आपके यहाँके गरीब आदमी बम्बईमें जाकर रोजी कमाते हैं। क्या आप जानते हैं कि इस रोजीकी उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ती है? वहाँ वे बिना हवा और रोशनीकी कुछ वर्गफुटकी कोठरियोंमें रहते हैं; उन कोठरियोंकी इतनी कम जगहमें कई मर्द और औरतें भरी रहती हैं। वे वहाँ अपने शरीरकी सफाई और शिष्टताका भी ध्यान नहीं रख पाते। क्या आप वहाँ ऐसी स्थितिमें रहने के लिए अपनी माँ-बहनोंको भेजनेके लिए तैयार हैं? क्या आप नहीं मानते कि जो स्त्रियाँ वहाँ जाती हैं, वे आपकी माँ और बहन के समान हैं और जो पुरुष वहाँ जाते हैं वे आपके भाई हैं? क्या आप चाहते हैं कि वे वहाँ जाकर मद्यपान और व्यभिचार सीखें? क्या आप यह सहन करनेके लिए तैयार हैं कि आपके भाई-बहन वहाँ शराबियों और दुराचारियोंका जीवन बितायें और घर लौटनेपर लोगोंमें अपनी वही गन्दी आदतें फैलायें? क्या इतनी बड़ी कीमत चुकाकर आठ आनेकी रोजी कमाना उचित है? हिन्दुस्तानमें पशु नष्ट होते हैं क्योंकि हम गोरक्षा करना नहीं जानते। उसी प्रकार हमारे गाँव बरबाद हो रहे हैं क्योंकि हम सच्चा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र नहीं जानते। हमारी इस विनाशकी प्रक्रियाको चरखा रोक सकता है। क्या आप जानते हैं कि हमारी दैनिक औसत राष्ट्रीय आय क्या है? हमारे अर्थशास्त्री कहते हैं है कि वह डेढ़ आना है। हालांकि मेरा खयाल है कि औसत आय इतनी कहना भी भ्रामक गलतबयानी है। यदि कोई व्यक्ति किसी नदीकी औसत गहराई चार फुट यह हिसाब लगाकर निकाले कि कहींपर तो वह छ: फीट गहरी है और कहीं दो<noinclude></noinclude> f6jgqalj0pte5n94ljfltwx47asmaj8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८३ 250 187263 671798 645683 2026-08-19T15:14:37Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671798 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: रत्नागिरिमैं|१४५}}</noinclude>और उसी हिसावसे ही उसे पार करने लगे तो क्या वह डूब नहीं जायेगा? ठीक इसी तरह यह औसत आँकड़े गलत ढंगसे निकाले हुए हैं क्योंकि इस डेढ़ आने रोजमें वाइसरायसे लेकर दूसरे सभी सरकारी अफसरों और लखपतियोंकी कमाईका भी औसत आ जाता है। इसलिए अगर उस कमाईको इसमें से निकाल दें तो सचमुच औसत कमाई तीन पैसे रोजसे अधिक न होगी। और अगर मैं इस कमाईमें तीन पैसे रोज भी बढ़ा सकूं तो फिर क्या मेरा चरखेको कामधेनु कहना उचित नहीं है? कुछ लोग कहते हैं कि मुझमें कुछ दैवी शक्तियाँ हैं, कुछका कहना है कि मुझमें असाधारण चरित्रबल है। भगवान ही जाने कि में क्या हूँ। मेरे सत्याग्रहकी उपयोगिताके विषयमें मतभेद रखा जा सकता है। मगर चरखेसे सम्बन्धित इन जाहिरा चीजोंके बारेमें मतभेदकी गुंजाइश नहीं है। अगर आज कोई मुझे समझा दे कि हिन्दुस्तान के करोड़ों लोग गरीब नहीं हैं और दिनमें कुछ पैसे भी न कमा सकनेके कारण भूखे मरनेवाले लोगोंकी संख्या नगण्य है, तो में स्वयं मान लूंगा कि में भूल कर रहा हूँ और चरखा तुड़वा डालूंगा। इसलिए में आपसे कहना चाहता हूँ कि जब आप कोंकणको एक गरीब प्रान्त कहते हैं, तब ऐसा कहनेसे आपका अभिप्राय क्या है इसे ध्यान में रखें। यदि आप लोग वास्तवमें गरीब हैं, तो चरखेके अतिरिक्त और कोई चीज ऐसी नहीं है जो आपकी गरीबी दूर कर सके और जिसके द्वारा आपकी स्त्रियोंकी मर्यादा रक्षित रह सके। पहले चरखा चलाना शुरू करें, उससे सम्बन्धित जितने भी काम हैं उन्हें हाथमें ले लें, फिर बाकीकी हर चीज आपको स्वयं मिलती जायेगी। जो वस्तु इतने राष्ट्रीय और सार्वभौम महत्त्वकी है, उसकी आप अवहेलना कैसे कर सकते हैं? क्या तिलक महाराजके अनुयायियोंको यह शोभा देता है कि वे चरखेकी हँसी उड़ायें या उसको नितान्त अनुपयोगी वस्तु ठहरा कर त्याग दें? हाँ, आप उस युवककी तरह जो मुझे परेशान करने आया था, यह पूछ सकते हैं कि यदि लोकमान्यजीको चरखा पसन्द था तो उन्होंने देशवासियोंसे चरखा चलाने की बात क्यों नहीं कही? मैं इस प्रश्नसे भ्रमित होनेवाला नहीं हूँ। लोकमान्य ने जब स्वदेशीकी परिभाषा बताई उस समय भले ही उनके दिमागमें खादी रही हो या न रही हो, मगर उनकी स्वदेशीकी परिभाषामें खादीका समावेश हुए बिना नहीं रह सकता। मैं तो लोकमान्यके मन्त्रका केवल उत्तराधिकारी हूँ और यदि मैं उनकी छोड़ी पैतृक निधिमें वृद्धि न करूँ तो में उस योग्य पिताकी योग्य सन्तान नहीं माना जाऊँगा। मैंने लोकमान्यके सन्देशपर ध्यानपूर्वक विचार किया है, उसमें अपने अनेक वर्षोंके अनुभवसे भी काम लिया है और में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि लोकमान्यके सन्देशका आशय खादी अवश्य था। क्या आप लोगोंको मालूम है कि वे क्या करते थे? मैं आपको उनके देहावसानके कुछ घंटे पूर्वकी एक घटना सुनाता हूँ। जब उनसे मौ० शौकत अलीने खिलाफतके विषयमें उनका मत जानना चाहा तब उन्होंने कहा, "जिसपर गांधी अपनी सही कर देंगे, उसपर मैं भी अपने हस्ताक्षर कर दूंगा, क्योंकि मेरा विश्वास है कि इस बारेमें उनका ज्ञान मेरे ज्ञानसे अधिक है।" इसलिए {{Left|३३-१०|2em}}<noinclude></noinclude> 3at69bwxi82rr54mvhzhs96dvap46vt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८४ 250 187264 671801 645684 2026-08-19T15:23:06Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671801 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यदि स्वदेशीकी बातके संदर्भ में लोकमान्यके ध्यानमें खादीकी बात न रही हो तो भी क्या हुआ? कल्पना कीजिए कि यहाँ भारतमें स्वदेशी चश्मे बनाये जाते हैं और कोई व्यक्ति यह शंका कर बैठता है कि चूंकि लोकमान्यने हम लोगोंको देशी चश्मे इस्तेमाल करनेकी बात नहीं कही है इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो क्या यह उचित होगा? ऐसा मनुष्य वितण्डावादी ही कहा जायेगा। 'गीता' ऐसे लोगोंको 'वेदवादरत' कहती है। जिस प्रकार वेदवादरत मनुष्य 'वेद' के अनन्त अर्थोंको नहीं समझता, उसी प्रकार यह आदमी भी लोकमान्यके मन्त्रकी अनन्त शक्तिको नहीं समझ पाता। मगर कुछ लोग कहते हैं कि मुसलमान हिन्दुओंका धर्म परिवर्तन करके और तबलीग करके उन्हें मुसलमान बना रहे हैं, ऐसी हालतमें भला आपका खादीका सन्देश कौन सुनेगा? मैं पूछता हूँ कि क्या आप ऐसे नामर्द बन गये हैं कि चूंकि आपको कोई इस्लाम धर्म अपनाने को मजबूर करता है इसलिए आप मुसलमान बन जायेंगे। अगर आपका धर्म सच्चा हो तो उसे कोई भ्रष्ट नहीं कर सकता। पर मैं तो खादीकी मार्फत अपने धर्मकी भी रक्षा करना चाहता हूँ। खादीसे हिन्दू स्त्रियोंकी ही नहीं, मुसलमान स्त्रियोंकी भी सेवा होती है, क्योंकि मुसलमान स्त्रियाँ भी चरखा चलाती हैं। बंगालमें एक मौलवीने कुछ मुसलमान स्त्रियोंको चरखा छोड़ देनेको कहा, क्योंकि खादी आन्दोलन हिन्दुओंका आन्दोलन है। दो दिन तो उन्होंने चरखा बन्द रखा मगर तीसरे दिन वे रुई मांगने आ पहुँचीं। वे बेचारी करती ही क्या? वे लगातार भूखी नहीं मर सकती थीं और मौलवीके पास उन्हें खानेके लिए देने लायक कुछ नहीं था। 'महाभारत' के विद्वान लेखक व्यासजीने ऋषि विश्वामित्रके भूखकी मारसे पीड़ित होनेपर अभक्ष्य खाने और चोरी करनेको तत्पर होनेका वर्णन किया है। कोई नहीं कह सकता कि भूखा आदमी क्या नहीं कर गुजरेगा। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि अगर आपको स्त्रियोंके धर्मकी रक्षा करनी है और गरीबीको दूर करना है, तो खादी अवश्य अपनाइये। मुझसे कहा जाता है कि में शुद्धि आन्दोलनमें भाग लूँ। में यह कैसे कर सकता हूँ, जबकि मैं यह चाहता हूँ कि मुसलमानों और ईसाइयोंको भी लोगोंको मुसलमान व ईसाई बनाना बन्द कर देना चाहिए। यह बात कि कोई व्यक्ति अपना धर्म छोड़ कर कोई विशेष धर्म हिन्दू, ईसाई या इस्लामको अपना ले, तभी वह अच्छा बनेगा या मोक्ष पायेगा, समझमें आने लायक बात नहीं है। चरित्रकी पवित्रता और मोक्ष तो हृदयकी शुद्धिपर निर्भर है। इसलिए मैं हिन्दुओंसे कहता हूँ कि तुम्हें जो करना हो वह करो, पर मेरे जैसे व्यक्तिको जो बहुत अनुभवके बाद किन्हीं निष्कर्षोपर पहुँचनेवाला व्यक्ति हो--वह काम करने को न कहो, जिसे वह कर ही नहीं सकता है। आखिरकार मनुष्यकी शक्ति सीमित है। मैं वही कर सकता हूँ जिसकी मुझमें शक्ति है, उससे अधिक नहीं। मैं कोई शतावधानी नहीं, अष्टावधानी भी नहीं। मैं तो एक समयमें एक काम भी ठीक-ठीक कर सकूं तो अपनेको सौभाग्यशाली<noinclude></noinclude> 2rcljui2zbmax77rd38qq0n86kfkw1a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८५ 250 187265 671804 645685 2026-08-19T15:36:24Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671804 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: पी० ए० वाडियाको|१४७}}</noinclude>मानूँगा। अगर आपको लगे कि चरखा ही सर्वोत्तम संगठनका सम्भाव्य जरिया है तो उसमें आपसे जितनी मदद बन पड़े आप मुझे दें। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१७-३-१९२७}} {{C|{{larger|'''१३३. विनायक दामोदर सावरकरसे बातचीत'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। वि० दा० सावरकर बीमार थे। गांधीजी रत्नागिरिमें उनके निवास स्थानपर उनसे मिलने गये थे।</ref>}}}} {{Right|१ मार्च, १९२७}} '''श्रीयुत सावरकर ने गांधीजीसे अपना अस्पृश्यता और शुद्धि सम्बन्धी रुख स्पष्ट करने को कहा। गांधीजीने अपने रुखके सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातोंका स्पष्टीकरण किया और कहा:''' हम आज लम्बी बातचीत नहीं कर सकते परन्तु आप जानते ही हैं कि सत्यप्रेमी तथा सत्यके लिए प्राणतक न्योछावर कर सकनेवाले व्यक्तिके रूपमें आपके लिए मेरे मनमें कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अन्ततः हम दोनोंका ध्येय भी एक है और मैं चाहूँगा कि उन सभी बातोंके सम्बन्धमें आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमें आपका मुझसे मतभेद है। और दूसरी बातोंके बारेमें भी लिखें। मैं जानता हूँ कि आप रत्नागिरिसे बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरूरी हो तो इन बातोंपर जी भरकर बातचीत करनेके लिए मुझे दो तीन दिनका समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा।<ref>सावरकर ने इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा: “आप स्वतन्त्र है और मैं बन्धनमें हूँ। मैं आपको भी अपनी जैसी हालतमें नहीं डालना चाहता। फिर भी मैं आपसे पत्र-व्यवहार अवश्य करूँगा।"</ref> {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१३४. पत्र: पी० ए० वाडियाको'''}}}} {{Right|दौरेपर<br>महाड<br>२ मार्च, १९२७}} {{Left|प्रिय मित्र,}} श्री मदानके साथ मेरे पत्र-व्यवहारका परिणाम यह रहा। श्री मदानकी युक्ति काफी जोरदार प्रतीत होती है। उनको लिखे अपने पत्रकी नकल मैं आपको भेज रहा हूँ। मैं आपके उत्तरकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा करूँगा। मुझे अब लगता है कि निर्णय कर सकने योग्य पर्याप्त सामग्री मुझे मिल रही है।<noinclude></noinclude> 8ce51yujkqhu3r48w95vwyr6soll3x6 671807 671804 2026-08-19T15:38:32Z रितु कुमारी साव 6333 671807 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: पी० ए० वाडियाको|१४७}}</noinclude>मानूँगा। अगर आपको लगे कि चरखा ही सर्वोत्तम संगठनका सम्भाव्य जरिया है तो उसमें आपसे जितनी मदद बन पड़े आप मुझे दें। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१७-३-१९२७}} {{C|{{larger|'''१३३. विनायक दामोदर सावरकरसे बातचीत'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। वि० दा० सावरकर बीमार थे। गांधीजी रत्नागिरिमें उनके निवास स्थानपर उनसे मिलने गये थे।</>ref>}}}} {{Right|१ मार्च, १९२७}} '''श्रीयुत सावरकर ने गांधीजीसे अपना अस्पृश्यता और शुद्धि सम्बन्धी रुख स्पष्ट करने को कहा। गांधीजीने अपने रुखके सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातोंका स्पष्टीकरण किया और कहा:''' हम आज लम्बी बातचीत नहीं कर सकते परन्तु आप जानते ही हैं कि सत्यप्रेमी तथा सत्यके लिए प्राणतक न्योछावर कर सकनेवाले व्यक्तिके रूपमें आपके लिए मेरे मनमें कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अन्ततः हम दोनोंका ध्येय भी एक है और मैं चाहूँगा कि उन सभी बातोंके सम्बन्धमें आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमें आपका मुझसे मतभेद है। और दूसरी बातोंके बारेमें भी लिखें। मैं जानता हूँ कि आप रत्नागिरिसे बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरूरी हो तो इन बातोंपर जी भरकर बातचीत करनेके लिए मुझे दो तीन दिनका समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा।<ref>सावरकर ने इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा: “आप स्वतन्त्र है और मैं बन्धनमें हूँ। मैं आपको भी अपनी जैसी हालतमें नहीं डालना चाहता। फिर भी मैं आपसे पत्र-व्यवहार अवश्य करूँगा।"</ref> {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१३४. पत्र: पी० ए० वाडियाको'''}}}} {{Right|दौरेपर<br>महाड<br>२ मार्च, १९२७}} {{Left|प्रिय मित्र,}} श्री मदानके साथ मेरे पत्र-व्यवहारका परिणाम यह रहा। श्री मदानकी युक्ति काफी जोरदार प्रतीत होती है। उनको लिखे अपने पत्रकी नकल मैं आपको भेज रहा हूँ। मैं आपके उत्तरकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा करूँगा। मुझे अब लगता है कि निर्णय कर सकने योग्य पर्याप्त सामग्री मुझे मिल रही है।<noinclude></noinclude> awbl0gj87oq30f9y87h2n43tlfi9tji 671809 671807 2026-08-19T15:39:18Z रितु कुमारी साव 6333 671809 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: पी० ए० वाडियाको|१४७}}</noinclude>मानूँगा। अगर आपको लगे कि चरखा ही सर्वोत्तम संगठनका सम्भाव्य जरिया है तो उसमें आपसे जितनी मदद बन पड़े आप मुझे दें। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१७-३-१९२७}} {{C|{{larger|'''१३३. विनायक दामोदर सावरकरसे बातचीत'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। वि० दा० सावरकर बीमार थे। गांधीजी रत्नागिरिमें उनके निवास स्थानपर उनसे मिलने गये थे।</ref>}}}} {{Right|१ मार्च, १९२७}} '''श्रीयुत सावरकर ने गांधीजीसे अपना अस्पृश्यता और शुद्धि सम्बन्धी रुख स्पष्ट करने को कहा। गांधीजीने अपने रुखके सम्बन्ध में कुछ भ्रामक बातोंका स्पष्टीकरण किया और कहा:''' हम आज लम्बी बातचीत नहीं कर सकते परन्तु आप जानते ही हैं कि सत्यप्रेमी तथा सत्यके लिए प्राणतक न्योछावर कर सकनेवाले व्यक्तिके रूपमें आपके लिए मेरे मनमें कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अन्ततः हम दोनोंका ध्येय भी एक है और मैं चाहूँगा कि उन सभी बातोंके सम्बन्धमें आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमें आपका मुझसे मतभेद है। और दूसरी बातोंके बारेमें भी लिखें। मैं जानता हूँ कि आप रत्नागिरिसे बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरूरी हो तो इन बातोंपर जी भरकर बातचीत करनेके लिए मुझे दो तीन दिनका समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा।<ref>सावरकर ने इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा: “आप स्वतन्त्र है और मैं बन्धनमें हूँ। मैं आपको भी अपनी जैसी हालतमें नहीं डालना चाहता। फिर भी मैं आपसे पत्र-व्यवहार अवश्य करूँगा।"</ref> {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१३४. पत्र: पी० ए० वाडियाको'''}}}} {{Right|दौरेपर<br>महाड<br>२ मार्च, १९२७}} {{Left|प्रिय मित्र,}} श्री मदानके साथ मेरे पत्र-व्यवहारका परिणाम यह रहा। श्री मदानकी युक्ति काफी जोरदार प्रतीत होती है। उनको लिखे अपने पत्रकी नकल मैं आपको भेज रहा हूँ। मैं आपके उत्तरकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा करूँगा। मुझे अब लगता है कि निर्णय कर सकने योग्य पर्याप्त सामग्री मुझे मिल रही है।<noinclude></noinclude> 8ce51yujkqhu3r48w95vwyr6soll3x6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८७ 250 187267 671813 645687 2026-08-19T15:49:41Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671813 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||क्या भारत मद्यनिषेधवादी है?|१४९}}</noinclude>'''उन स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं, जमींदारों, देशी रियासतों, सहकारी समितियोंको जो अपने अधिकार क्षेत्रमें बड़े पैमानेपर कोस शुरू करना चाहती हैं, एक साथ ही ५० या अधिक कोसोंके क्रयके लिए उनके प्रार्थनापत्र भेजनेपर विशेष [रियायती] मूल्य सूचित किया जायेगा। कोसके बंडल एक साथ बाँधने और रेलसे भेजनेके किराये वगैरहमें होनेवाली बचतके अनुसार उनके दामोंमें और भी कमी की जा सकेगी।''' '''कोस मँगाते समय ग्राहक कृपया कुएँकी तहसे लेकर कुऍकी जगत तककी पूरी गहराई लिख भेजें और यह भी बतलायें कि बाल्टी कितनी बड़ी चाहिए।''' सभी माँगोंके साथ आधी रकम नकद पेशगी आनी चाहिए। बाकी रकमके लिए सामान वी० पी० से भेजा जायेगा। पेशगी रुपया प्राप्त हो जानेके कोई एक महीने बाद माँगोंके क्रमानुसार कोस भेजा जायेगा। आश्रमने अपने लिए कोई नफा नहीं रखा है। केवल लागत दर और माल पहुँचानेका खर्च लिया जाता है। आश्रममें जो कोस अबतक चल रहा है, उससे पूरा-पूरा सन्तोष मिला है और आश्रमके सामने अब यह सवाल है कि [आश्रमके] गैरजरूरी बैलोंका क्या उपयोग किया जाये। एक सचित्र सूची पूरे ब्यौरेके साथ छाप ली गई है। जो सज्जन यह सूची लेना चाहें, आश्रमके व्यवस्थापकको एक आनेका डाक टिकट भेजकर मँगा सकते हैं। जिन लोगोंने इस कोसके बारेमें श्रीयुत रामचन्द्र अय्यरसे या मुझसे पत्र-व्यवहार किया था वे सब लोग ऊपर लिखी शर्तोंपर अपने लिए कोस अब मँगा सकते हैं। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ३-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१३६. क्या भारत मद्यनिषेधवादी है?'''}}}} एक अंग्रेज बहन, जो हिन्दुस्तानमें मद्यनिषेध प्रचारका काम हाथ में लेनेको उत्सुक हैं, लिखती हैं:<ref>कुमारी म्मूरियल लेस्टर; देखिए "पत्र: म्यूरिल लेस्टरको”, १७-३-१९२७।</ref> '''मैं जानती हूँ कि सब लोग मुझसे यही कहेंगे कि खुद हिन्दुस्तानियोंने मद्यनिषेधके लिए कोई जबरदस्त ख्वाहिश जाहिर नहीं की है और चूंकि उन्होंने इसके लिए कोई आन्दोलन संगठित नहीं किया है, इसलिए हम लोगोंका इस मामलेमें पहल करना अनुचित हस्तक्षेप करना होगा और फिर सारी कौंसिलोंमें से भी केवल एक या दो ने ही मद्यनिषेधके पक्षमें अपनेको घोषित किया है। लोग अभीसे ही मुझसे ये बातें कह रहे हैं। में बराबर ही उन्हें असहयोग आन्दोलनकी याद दिलाती हूँ, जब स्वयंसेवकोंने शराबकी दुकानोंपर धरना दिया था।<noinclude></noinclude> 9rm88299dhss1dv5lkjkmahw33ukoo8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८८ 250 187268 671816 645688 2026-08-19T15:55:10Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''मगर जब वे कहते हैं कि वह तो पाँच साल पहलेकी बात है, उसके बाद तो उन्होंने कोई खास उत्साह नहीं दिखलाया है तो इसका क्या जवाब दिया जाये?''' यह बहन मुझसे जो समस्या हल कराना चाहती हैं, वह कोई नई समस्या नहीं है। जो व्यक्ति हिन्दुस्तानमें पूर्ण मद्यनिषेधके आन्दोलनका इतिहास नहीं जानता, उसके मनमें यह सवाल उठेगा ही। और हमारे यहाँ आनेवाले परदेशीके मनमें यह प्रश्न उठे बिना नहीं रह सकता कि "अगर हिन्दुस्तान पूर्ण मद्यनिषेध चाहता है तो फिर जैसे वह और कितनी ही चीजोंके लिए आन्दोलन करता है, वैसे मद्यनिषेधके लिए क्यों नहीं करता? "यह देखनेमें आया है कि जब लोग अपनेको नितान्त बेबस महसूस करते हैं तब आन्दोलनमें नहीं पड़ते। यह हमारी बेबसी ही है जो हम कोई आन्दोलन नहीं करते, सिवाय इसके कि कुछ मद्यनिषेव सभाएँ प्रस्ताव पास कर देती हैं और कभी-कभी विधानसभाओंमें हम प्रार्थनापत्र भेज देते हैं। अपने कल्याणके अत्यन्त महत्त्वके विषयोंमें हमारी बढ़ती हुई वेवसीके एहसासके फलस्वरूप ही स्वराज्यकी पुकार शुरू हुई थी। सैनिक खर्चको लीजिए। सभी महसूस करते हैं कि यह उस धनका, जिसकी वसूली भूखे रहनेवाले करोड़ों लोगोंसे की जाती है, घोर अपराधयुक्त अपव्यय है। हम लोग सैनिक खर्चमें कमी करानेके बजाय स्वराज्यके लिए आन्दोलन करते हैं, क्योंकि स्वराज्यके बिना कुछ हो ही नहीं सकता। कौन कह सकता है कि इस तर्क में बहुत कुछ सच्चाई नहीं है १९२० में जब हमने अनुभव किया कि हमें स्वराज्य मिलने ही वाला है, हम कानूनके विधाता वन बैठे; शराबकी दुकानों और भट्ठियोंपर हमने सफलतापूर्वक धरना दिया और सरकार अपनी आबकारी आमदनी तत्काल कम होते देखकर डर गई। मदिरा-विक्रेताओंके दिल काँप उठे और हमें एक क्षणके लिए ऐसा मालूम हुआ कि शराबकी कुप्रथा समाप्त हो गई है। दुर्भाग्यसे अहिंसावादी दल पूरी तौरसे जनताको काबूमें नहीं रख पाया और हिंसा फूट पड़ी। यह पता चला कि धरना देनेवाले लोगोंने हिंसाकी धमकी या हिसाका सहारा लिए बिना शराबबन्दी रोकनेसे सम्बन्धित हिदायतोंका हर जगह पालन नहीं किया था। इसलिए धरना रोक देना पड़ा। पर १९२०-२१ का इतिहास स्पष्ट रूपसे यह प्रकट करता है कि अगर हिन्दुस्तानके पास ताकत होती, तो वह क्या करता या जब उसने अपनेको ताकतवर समझा, तब उसने क्या किया। इसके अलावा यह भी याद रखना चाहिए कि हिन्दुस्तानके करोड़ों निवासी अपने मजहबके कारण या आदतन मादक द्रव्योंसे पूरा परहेज करते हैं। इसलिए ये करोड़ों लोग शरावका परम हानिकर व्यापार चालू रखने में दिल-चस्पी नहीं रख सकते इसलिए यह जो कहा जाता है कि हिन्दुस्तानमें पूर्ण मद्य-निषेधके लिए कोई आन्दोलन नहीं है, उसके बारेमें यह जवाब दिया जा सकता है कि आन्दोलनके अभावका कारण यह नहीं है कि लोगों में पूर्ण मद्यनिषेध करानेकी इच्छाका अभाव है, बल्कि इसका कारण यह है कि वे जानते हैं कि वे असहाय हैं। दूसरा कारण यह है कि वे पूरी तरहसे जानते हैं कि यह आन्दोलन स्वराज्य प्राप्तिके बड़े आन्दोलनका एक अंग है।<noinclude></noinclude> htmzv0x99j0mm9lxfhtd6wcd7kk05ve पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८९ 250 187269 671820 645689 2026-08-19T15:59:16Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671820 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||क्या भारत मद्यनिषेधवादी है?|१५१}}</noinclude>खुद यही बात कि किसी अंग्रेजको शराबकी चुंगीसे होनेवाली आमदनीका इस-लिए समर्थन करना पड़े कि हमारे बीच उसकी पूर्ण बन्दीका कोई आन्दोलन नहीं है, स्वराज्य प्राप्तिकी अनिवार्यताके पक्ष में एक बहुत जबर्दस्त दलील बन जाती है। क्योंकि जिन क्षेत्रोंमें यह धारणा ईमानदारीके साथ बनाई गई है कि यहाँ मद्यनिषेधका आन्दोलन नहीं है तो उससे केवल यही प्रकट होता है कि उन क्षेत्रोंके लोगोंको भारतकी मौजूदा परिस्थितियोंका जरा भी ज्ञान नहीं है। मलेरिया ज्वर या बीसों दूसरी बीमारियोंके विरुद्ध भी तो जनताकी ओरसे कोई आन्दोलन नहीं किया जा रहा है। तो क्या यह बात इन बीमारियोंको समूल नष्ट करनेके उपाय न करने की कोई दलील हो सकती है? एक जानी-मानी बुराईको दूर करनेके लिए तुरन्त उपाय करनेके लिए किसी आन्दोलनकी जरूरत नहीं होनी चाहिए। कई दृष्टियोंसे तो शराब और विषैली दवाइयोंकी हानिकर पद्धति मलेरिया या उस जैसी दूसरी बीमारियोंसे कहीं ज्यादा बुरी है; क्योंकि मलेरियासे तो केवल शरीरको ही हानि पहुँचती है परन्तु शराब वगैरह तो शरीर तथा आत्मा दोनोंको खोखला कर डालती है। शरावसे आमदनी करना, सैनिक खर्च लादना और अपने लंकाशायरके कपड़ोंके जरिये भारतको शोषित करना इन्हीं तीन तरीकोंसे ब्रिटिश शासनने भारतपर ज्यादती की है। जब अंग्रेज लोगोंके दिलमें यह बात बैठ जायेगी कि गरीब हिन्दुस्तानी मजदूरोंकी शराबकी आदतपर तिजारत करना पाप है, हिन्दुस्तान की धरतीपर इंग्लैंड या अन्य विदेशोंके कपड़ेको पाटना गुनाह है जबकि यहाँके भूखों मरनेवाले लाखों आदमी सहज ही अपनी जरूरतका काफी कपड़ा अपने खाली वक्तमें बना सकते हैं, और जब उनको यह बात सूझ जायेगी कि हिन्दुस्तानके ऊपर इतना लम्बा- चौड़ा सैनिक खर्च लादना, जो जाहिरा तौरपर तो हिन्दुस्तान की सीमाओंकी रक्षाके लिए बताया जाता है परन्तु वास्तवमें जो भारतीयोंको उनकी इच्छा के विरुद्ध गुलाम बनाये रखनेके लिए हैं, तब उनके हृदय परिवर्तनका पूरा-पूरा सबूत मिल जायेगा और पूरी बराबरीके दर्जेपर भारतीयोंका अंग्रेजों के साथ पारस्परिक सहयोगका होना सचमुच में सम्भव हो जायेगा। इसलिए एकमात्र आन्दोलन जिसे हिन्दुस्तान कर सकता है वह है उस शासन प्रणालीका ही अन्त करना, जो ऐसी बुराइयोंको होने और चलने देती है। दूसरे शब्दोंमें कह सकते हैं कि स्वराज्यका आन्दोलन ही इन सभी बुराइयोंको दूर करनेका आन्दोलनहै। मेरे खयाल से इन बुराइयोंके दूर करनेका काम अंग्रेजोंके लिए उनकी भारतके प्रति नेकनीयती साबित करनेकी खरी कसौटी है। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''३-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude> gkh09gjo0sdfebqhi5ucvjw93h0lp6p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९१ 250 187271 671829 645691 2026-08-19T16:08:42Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : वैश्य विद्याश्रम, सासविनमें|१५३}}</noinclude>सदस्यको जिसका नाम बारहवें महीने लाटरीमें निकलता है, सिवाय इसके कि वह सस्तेमें खादी खरीदना सीख जाता है और कोई लाभ नहीं मिलता। समिति उसका सेविंग्स बैंक' बनी रहेगी और वह सालके अन्तमें बिना किसी असुविधाके अपने पूरे चौबीस रुपयोंकी खादी एक बारमें ही ले सकेगा। अगर यह प्रबन्ध १ सालसे कुछ और अवधिके लिए बढ़ाया जा सके, और थोड़ा परिवर्तन करनेपर ऐसा किया जा सकता है, तो सबको एक-सा लाभ मिलेगा। मगर शायद इस योजनाका आकर्षण ही लाभकी अनिश्चितता और बहुत छोटी-सी हानि होनेमें ही है। इस योजनाकी सफलता सदस्योंकी ईमानदारीपर ही पूर्णतया निर्भर है, क्योंकि जिस सदस्यने २४ रुपयेका अपना कपड़ा पा लिया है वह अगर अपना हिस्सा देना बन्द कर देता है, तो दूसरे लोग घाटेमें रहेंगे। इसलिए अगर इस योजनाको बिना खर्चके और फिर भी सफलताके साथ चलाना है, तो इसके सदस्योंकी संख्या जरूर ही कम रखनी होगी और संस्थामें केवल उन्हीं लोगोंको लेना होगा जो दूसरेको जानते हों, और शायद एक ही दफ्तर या संस्थामें काम करते हों, जिससे किसीकी मृत्यु या बेईमानीके कारण होनेवाला खतरा कमसे कम हो। मैं आशा करता हूँ कि श्रीयुत नैयर और उनके मित्रोंने जो उदाहरण प्रस्तुत किया है उसका अनुकरण और लोग भी करेंगे। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ३-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१३९. भाषण : वैश्य विद्याश्रम, सासविनमें'''<ref>महादेव देसाईकी “साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[३ मार्च, १९२७]<ref>यंग इंडिया, १०-३-१९२७ में छपी “साप्ताहिक चिट्टी” से।</ref>}} न केवल मेरे वरन् गरीबोंके प्रति प्रेमके द्योतक इन उपहारोंको<ref>विद्याश्रमके वैश्य वालकोंने गांधीजीको १,६०,००० गज हाथ कता सूत, हाथसे बुने कपड़े का एक टुकड़ा, वैश्य जातिको ओरसे ५०१ रुपये तथा आसपासके गांवोंसे संग्रहीत १९० रुपये भेंट किये थे।</ref> पानेके लिये मैं तैयार न था और फिर ये उपहार जिस रूपमें दिये गये हैं उससे मुझे बहुतही ज्यादा खुशी हुई है। ६ रुपये ३<ref>एक सप्ताहतक घी, चीनी, दूध तथा गेहूँ न लेनेके फलस्वरूप देशबन्धु स्मारक कोषके लिए एकत्र धनराशि।</ref> आनेका यह दान मुझे स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्दके उस पवित्र दानकी याद दिलाता है जो दक्षिण आफ्रिकामें किए गए मेरे कामके लिए मुझे उनसे मिला था और जो उन ब्रह्मचारियों द्वारा प्रेमवश किये गये परिश्रमका सूचक था। मेरे लिए इस दानकी कीमत लाखों रुपयोंसे भी बढ़कर है। और इसीलिए इस कोषका सही उपयोग करनेके सम्बन्धमें मेरा दायित्व और भी बढ़ जाता है आपका सूत भी अपने वजनके सोनेके बराबर कीमत रखता है। आखिरकार सोनेका मूल्य उसके लिए किये<noinclude></noinclude> fad04hq9vvlowlhfvzzhuemm1jmd6g0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९२ 250 187272 671836 645692 2026-08-19T16:20:03Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गये श्रमका मूल्य ही तो है। क्या आपकी मेहनत किसी प्रकार कम है। वह तो और भी पवित्र है, क्योंकि यह सारा काम त्यागकी भावनासे प्रेरित होकर किया गया है। '''उसके बाद गांधीजीने वैश्य होने के नाते वैश्य बालकोंको यह सलाह दी:''' जब ब्रह्मचर्य रूपी कवच और ढाल तुम्हारे पास हो तो तुम्हें जीवनके किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करते समय कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यदि तुम अपने स्वभाव-सिद्ध कर्म अर्थात् कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यको ठीक ढंगसे अपनाओगे तो तुम अपनी जाति और देश दोनों ही की सेवा करोगे। पर इस बातका ध्यान रखना कि इस पेशेको अपनानेका अर्थ वैसा शोषण ही न हो जैसा कि इस समय हो रहा है। यदि तुम लोभयुक्त वाणिज्यके अनिष्टकारी स्वरूपको मिटाना चाहते हो तो वाणिज्यको चरखेके आसपास केन्द्रित करना होगा। दूसरोंका शोषण करने वाले इस पृथ्वीपर बहुत हैं। यदि हम भी उनका अनुकरण करना चाहते हैं तो हमें शोषण करने योग्य लोगोंकी तलाश पृथ्वी छोड़ दूसरे ग्रहोंमें करनी पड़ेगी। खादी ही एक मात्र ऐसा हितकर राष्ट्रीय धन्वा है जिसे हम सब अपना सकते हैं। मेरा आपसे यही अनुरोध है कि वैश्य होने के नाते आप उसके प्रति उदासीन न हों। '''फूल मालाएँ थीं... लेकिन गांधीजीने उन्हें नीलाम नहीं किया और न चन्दा देनेकी अपील ही की। उन्होंने कहा:''' मैं यहाँ कामकाजी दृष्टिसे नहीं आया था। लेकिन आप लोगोंने मुझे जरूरतसे ज्यादा दे दिया है। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१४०. पत्र : मगनलाल गांधीको '''<ref>पत्रका केवल अंतिम भाग ही उपलब्ध है।</ref>}}}} {{Right|[४ मार्च, १९२७ से पूर्व]<ref>मणिलाल अपने विवाहके लिए ४-३-१९२७ को अकोला रवाना होनेवाले थे।</ref>}} ...इसके सिवा एक तकली और उसका डिब्बा चाहिए; वर-वधूको देना है। तकली तो मणिलाल नहीं चलाता, इसलिए सुशीलाको हो देनी है। मणिलालसे पूछ लेना। वह चलाये तो उसे भी दूंगा, तुम दो भेजना। जब मणिलाल आये तब ये चीजें अपने साथ लेता आये। {{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{Left|[पुनश्च :]}} आचार्य जुगलकिशोरकी देखभाल करना। {{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७७६५) से।<br>सौजन्य : रावाबहन चौधरी|2em}}<noinclude></noinclude> nxjdu37esfc8nqviudvw9bqc22xuhsa पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९३ 250 187273 671906 645693 2026-08-20T04:36:20Z रितु कुमारी साव 6333 /* शोधित */ 671906 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४१. भाषण: वैश्य विद्याश्रमको व्यायामशालामें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[४ मार्च, १९२७]}} '''प्रातःकाल गांधीजीने व्यायामशालामें हनुमानजीको मूर्तिके प्रतिष्ठापन सम्बन्धी उत्सवका उद्घाटन किया। उन्होंने कहा:''' मैं मरुतसुत हनुमानजीकी मूर्तिका प्रतिष्ठापन यहाँ केवल इसीलिए नहीं कर रहा हूँ कि वे बल और पराक्रममें बहुत बढ़े चढ़े थे। बल और पराक्रम तो रावणमें भी था। मारुतिमें आत्मबल प्रधान था। उनका शरीरबल तो उनके आत्मबलका ही द्योतक था, और आत्मबल, उनके नैष्ठिक ब्रह्मचर्य तथा रामजीके प्रति उनके अनन्य प्रेमका सीधा प्रतिफल था। उस ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह आप सबमें हनुमानके अद्वितीय पराक्रमका जो आपके ब्रह्मचर्य व्रत पालनसे आ सकता है, प्रादुर्भाव हो और ईश्वर करे आपका वह पराक्रम देशसेवाके लिए अर्पित हो। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१४२. भाषण : पूनामें'''<ref>महादेव देसाईंकी “साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[४ मार्च, १९२७]<ref>बॉम्बे क्रॉनिकल, ११-३-१९२७ से।</ref>}} '''गांधीजीने अपना महाराष्ट्रका दौरा समाप्त करते हुए रे मार्केटमें एक सार्व-जनिक सभामें भाषण दिया। उन्होंने कहा:''' हनुमानने अपनी छाती चीरकर दिखला दिया था कि उसमें रामनामके सिवा और कुछ नहीं है। मुझमें अपना हृदय चीरकर दिखानेकी हनुमान जैसी शक्ति नहीं है; मगर आपमें से कोई देखना ही चाहे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपको उसमें सिवा रामके प्रेमके और कुछ नहीं मिलेगा। मुझे उस रामका साक्षात् दर्शन हिन्दुस्तानके करोड़ों भूखे लोगों में होता है। '''गांधीजीने लगभग आधी रातके समय छात्रोंकी सभा [भाषण दिया]। ... छात्रोंकी ओरसे 'अंग्रेजी' 'अंग्रेजी' की पुकार सुननेमें आई। उन्हें इससे बहुत दुःख हुआ; किन्तु उन्होंने छात्रोंके प्रति अगाध प्रेमके कारण अंग्रेजीमें बोलना स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा:'''<noinclude></noinclude> mgn9szl2tj4mhl39oevw8hybq7i3mi8 671907 671906 2026-08-20T04:36:45Z रितु कुमारी साव 6333 671907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४१. भाषण: वैश्य विद्याश्रमको व्यायामशालामें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[४ मार्च, १९२७]}} '''प्रातःकाल गांधीजीने व्यायामशालामें हनुमानजीको मूर्तिके प्रतिष्ठापन सम्बन्धी उत्सवका उद्घाटन किया। उन्होंने कहा:''' मैं मरुतसुत हनुमानजीकी मूर्तिका प्रतिष्ठापन यहाँ केवल इसीलिए नहीं कर रहा हूँ कि वे बल और पराक्रममें बहुत बढ़े चढ़े थे। बल और पराक्रम तो रावणमें भी था। मारुतिमें आत्मबल प्रधान था। उनका शरीरबल तो उनके आत्मबलका ही द्योतक था, और आत्मबल, उनके नैष्ठिक ब्रह्मचर्य तथा रामजीके प्रति उनके अनन्य प्रेमका सीधा प्रतिफल था। उस ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह आप सबमें हनुमानके अद्वितीय पराक्रमका जो आपके ब्रह्मचर्य व्रत पालनसे आ सकता है, प्रादुर्भाव हो और ईश्वर करे आपका वह पराक्रम देशसेवाके लिए अर्पित हो। {{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १७-३-१९२७|2em}} {{C|{{larger|'''१४२. भाषण : पूनामें'''<ref>महादेव देसाईंकी “साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}} {{Right|[४ मार्च, १९२७]<ref>बॉम्बे क्रॉनिकल, ११-३-१९२७ से।</ref>}} '''गांधीजीने अपना महाराष्ट्रका दौरा समाप्त करते हुए रे मार्केटमें एक सार्व-जनिक सभामें भाषण दिया। उन्होंने कहा:''' हनुमानने अपनी छाती चीरकर दिखला दिया था कि उसमें रामनामके सिवा और कुछ नहीं है। मुझमें अपना हृदय चीरकर दिखानेकी हनुमान जैसी शक्ति नहीं है; मगर आपमें से कोई देखना ही चाहे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपको उसमें सिवा रामके प्रेमके और कुछ नहीं मिलेगा। मुझे उस रामका साक्षात् दर्शन हिन्दुस्तानके करोड़ों भूखे लोगों में होता है। '''गांधीजीने लगभग आधी रातके समय छात्रोंकी सभा [भाषण दिया]। ... छात्रोंकी ओरसे 'अंग्रेजी' 'अंग्रेजी' की पुकार सुननेमें आई। उन्हें इससे बहुत दुःख हुआ; किन्तु उन्होंने छात्रोंके प्रति अगाध प्रेमके कारण अंग्रेजीमें बोलना स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा:'''<noinclude></noinclude> q6os03i09fe05033a5gqdv1p55w3ohs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७० 250 187350 671784 645770 2026-08-19T13:00:31Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 671784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude> &nbsp; {{C|{{larger|'''२२४. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको'''}}}} {{Right|६ अप्रैल, १९२७}} {{Left|प्रिय मित्र,}} यह पत्र में आपको बीमारीकी हालत में बिस्तरपर पड़ा हुआ लिख रहा हूँ । मुझे आशा थी कि में आपसे बंगलोर में मिलकर अपने दावेके लिए जोर दूंगा। परन्तु अभी कुछ और समयतक ऐसा नहीं हो सकता। आपने मेरे तारका कोई उत्तर नहीं दिया। मुझे आशा है कि वह तार आपको जरूर मिल गया होगा। यदि आप दक्षिण आफ्रिका नहीं जायेंगे, तो वहाँके भारतीयोंका दिल टूट जायेगा । श्रीमती शास्त्रीको अवश्य आपके साथ जाना चाहिए।<ref>१. श्रीमती शास्त्री उनके साथ नहीं गई थी।</ref>मैं नहीं जानता कि दोनों ही, मेजबान दम्पती यदि बहुत बढ़िया अंग्रेजी बोलनेवाले हों तो लाभ रहता है या नहीं। आप श्रीमती शास्त्रीके लिए दुभाषियेका काम कर सकते हैं या फिर आप उनके लिए एक प्रतिभासम्पन्न तमिल स्नातक लड़की, जैसी आपके पास बहुत-सी हैं, साथ ले जा सकते हैं। वह लड़की उनकी सखी, अध्यापिका और दुभाषियेका काम करेगी। रानी विक्टो- रिया, जब फारसके शाह, जो अंग्रेजी नहीं जानते थे, की मेजबान बनी थीं, तो क्या करती थीं? आप लॉर्ड इर्विनको यह साफ बता दें कि आप जब रायल कमीशन आये उस समय यहाँ होना चाहेंगे; और आखिर में में यह कहूँगा कि जबतक लॉर्ड इविन वाइसराय हैं, तबतक छोटी-छोटी संतापकी बातोंका कोई अन्देशा नहीं होगा । वह आपको अच्छी तरह जानते हैं। में आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप अपने निर्णयपर पुनर्विचार करें और चाहे एक सालके लिए ही सही, लेकिन वहाँ जायें जरूर । केवल आप ही दोनों पक्षोंके बीच समझौतेका सूत्रपात कर सकते हैं। केवल आप ही वातावरण में सुधार ला सकते हैं । ईश्वर आपका पथ-प्रदर्शन करे । {{Right|हृदयसे आपका,<br> '''मो० क० गांधी'''}} {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री'''}} {{Smallrefs}}<noinclude></noinclude> hqf155zvypszkg5cus1emjalu8eyvzm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७१ 250 187351 671930 645771 2026-08-20T06:08:43Z Sweta rani Gupta 6713 /* अशोधित */ 671930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२५. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको'''}}}} {{Right|अम्बोली, सावन्तवाड़ी राज्य<br> ६ अप्रैल, १९२७}} {{Left|भाई सातवलेकर,}} प्रकृति ने मुझको बीमारी के बिछौने पर डाल दिया है। इस कारण मुझको आपकी "ब्रह्मचर्य" पुस्तक पढ़ने का समय शीघ्रता से मिला। मुझको यह पुस्तक प्रिय लगी है। वर्षों से मैंने आपको सत्य का पुजारी माना है। इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ। (१) क्या आसन को आप ब्रह्मचर्य के लिये अमोघ साधन मानते हैं? (२) यदि वैसा ही है, तो इसका अर्थ यह ही है न कि आसन का प्रयोग करने- वाला मनुष्य हर हालत में वीर्य की रक्षा कर लेता है। इसका यह अर्थ भी है क्या कि वह ब्रह्मचारी विकार से भी रहित हो जाता है? आप जानते होंगे कि पाश्चात्य चिकित्सा ग्रंथों में एक क्रिया है जिससे मनुष्य वीर्य की रक्षा कर लेता है, परंतु विकार को कायम रखता है। यह क्रिया उन्हीं लोगों के लिये की जाती है जो वीर्य की रक्षा करते हुए रति-सुख का अनुभव करना चाहते हैं। ऊर्ध्वरेता बनने का हमारे शास्त्रों में यह तो अर्थ नहीं है? अगर यही अर्थ होगा तो ऊर्ध्वरेतापन शुद्ध ब्रह्मचर्य का विनाशक बन जाता है। और आसन से की हुई वीर्य की रक्षा का परिणाम उल्टा आने का भय कुछ प्रतीत होता है। एक मित्र दिल्ली से मुझको लिखते हैं कि आसनों से उन्होंने ब्रह्मचर्य यहाँ तक सिद्ध किया है कि वे कुछ भी और कितना ही खुराक खा सकते हैं और भोगी मनुष्य जैसी प्रायः सब चेष्टाएँ करते हुए वीर्य-रक्षा कर लेते हैं। उनके पत्र का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, इस कारण मैंने ज़्यादा पत्र-व्यवहार उनसे नहीं चलाया। दूसरे मित्र लिखते हैं कि छह महीने में प्राणायाम, आसन इत्यादि से ब्रह्मचर्य की सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है। इनको मैं जानता हूँ। वह भोले सीधे-सादे हैं। और आसनादि का अभ्यास करने का मुझको बड़ा आग्रह कर रहे हैं। मैंने अब तक उनका कहा नहीं माना है। परंतु आपकी पुस्तक ने मुझको हिलाया है। अनेक विद्यार्थियों के सम्बन्ध में मुझको आना पड़ता है और इन सबको मेरे ही प्रयोगों से मैं संतुष्ट नहीं रख सकता हूँ। आहारादि की मर्यादा के उपरांत मेरे सब प्रयोग केवल मानसिक ही रहते हैं। विद्यार्थीगण में से कितने एक वैसे घिरे हुए हैं कि उनके लिये आसनादि लाभदायी होने की सम्भावना लगती है, इस कारण यह पत्र लिख रहा हूँ। (३) वनस्पत्यादि के ब्रह्मचर्य के बारे में जो कुछ आपने लिखा है, वह अनुभवसिद्ध है? आप जानते होंगे कि प्रकृति-शास्त्र के जानने वाले पश्चिम के लोग ब्रह्मचर्य के विरोध में आजकल लिख रहे हैं। मैंने तो इसका खण्डन मेरे ही अल्प अनुभव से और बुद्धि- प्रयोग से किया है। परंतु हमारे शास्त्रज्ञ लोगों की लेखनी से पाश्चात्य ग्रंथों के निरीक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि इन ग्रंथों का प्रभाव हमारे नवयुवकों के ऊपर बहुत पड़ता है।<noinclude></noinclude> idtaz0qgrfzgsdhbac6yzrhv9dozzhe 671932 671930 2026-08-20T06:10:49Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 671932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२५. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको'''}}}} {{Right|अम्बोली, सावन्तवाड़ी राज्य<br> ६ अप्रैल, १९२७}} {{Left|भाई सातवलेकर,}} प्रकृति ने मुझको बीमारी के बिछौने पर डाल दिया है। इस कारण मुझको आपकी "ब्रह्मचर्य" पुस्तक पढ़ने का समय शीघ्रता से मिला। मुझको यह पुस्तक प्रिय लगी है। वर्षों से मैंने आपको सत्य का पुजारी माना है। इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ। (१) क्या आसन को आप ब्रह्मचर्य के लिये अमोघ साधन मानते हैं? (२) यदि वैसा ही है, तो इसका अर्थ यह ही है न कि आसन का प्रयोग करने- वाला मनुष्य हर हालत में वीर्य की रक्षा कर लेता है। इसका यह अर्थ भी है क्या कि वह ब्रह्मचारी विकार से भी रहित हो जाता है? आप जानते होंगे कि पाश्चात्य चिकित्सा ग्रंथों में एक क्रिया है जिससे मनुष्य वीर्य की रक्षा कर लेता है, परंतु विकार को कायम रखता है। यह क्रिया उन्हीं लोगों के लिये की जाती है जो वीर्य की रक्षा करते हुए रति-सुख का अनुभव करना चाहते हैं। ऊर्ध्वरेता बनने का हमारे शास्त्रों में यह तो अर्थ नहीं है? अगर यही अर्थ होगा तो ऊर्ध्वरेतापन शुद्ध ब्रह्मचर्य का विनाशक बन जाता है। और आसन से की हुई वीर्य की रक्षा का परिणाम उल्टा आने का भय कुछ प्रतीत होता है। एक मित्र दिल्ली से मुझको लिखते हैं कि आसनों से उन्होंने ब्रह्मचर्य यहाँ तक सिद्ध किया है कि वे कुछ भी और कितना ही खुराक खा सकते हैं और भोगी मनुष्य जैसी प्रायः सब चेष्टाएँ करते हुए वीर्य-रक्षा कर लेते हैं। उनके पत्र का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, इस कारण मैंने ज़्यादा पत्र-व्यवहार उनसे नहीं चलाया। दूसरे मित्र लिखते हैं कि छह महीने में प्राणायाम, आसन इत्यादि से ब्रह्मचर्य की सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है। इनको मैं जानता हूँ। वह भोले सीधे-सादे हैं। और आसनादि का अभ्यास करने का मुझको बड़ा आग्रह कर रहे हैं। मैंने अब तक उनका कहा नहीं माना है। परंतु आपकी पुस्तक ने मुझको हिलाया है। अनेक विद्यार्थियों के सम्बन्ध में मुझको आना पड़ता है और इन सबको मेरे ही प्रयोगों से मैं संतुष्ट नहीं रख सकता हूँ। आहारादि की मर्यादा के उपरांत मेरे सब प्रयोग केवल मानसिक ही रहते हैं। विद्यार्थीगण में से कितने एक वैसे घिरे हुए हैं कि उनके लिये आसनादि लाभदायी होने की सम्भावना लगती है, इस कारण यह पत्र लिख रहा हूँ। (३) वनस्पत्यादि के ब्रह्मचर्य के बारे में जो कुछ आपने लिखा है, वह अनुभवसिद्ध है? आप जानते होंगे कि प्रकृति-शास्त्र के जानने वाले पश्चिम के लोग ब्रह्मचर्य के विरोध में आजकल लिख रहे हैं। मैंने तो इसका खण्डन मेरे ही अल्प अनुभव से और बुद्धि- प्रयोग से किया है। परंतु हमारे शास्त्रज्ञ लोगों की लेखनी से पाश्चात्य ग्रंथों के निरीक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि इन ग्रंथों का प्रभाव हमारे नवयुवकों के ऊपर बहुत पड़ता है।<noinclude></noinclude> 464rsalrd1t2potqz7759fdz16fai8b 671934 671932 2026-08-20T06:11:14Z Sweta rani Gupta 6713 671934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२५. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको'''}}}} {{Right|अम्बोली, सावन्तवाड़ी राज्य<br> ६ अप्रैल, १९२७}} {{Left|भाई सातवलेकर,}} प्रकृति ने मुझको बीमारी के बिछौने पर डाल दिया है। इस कारण मुझको आपकी "ब्रह्मचर्य" पुस्तक पढ़ने का समय शीघ्रता से मिला। मुझको यह पुस्तक प्रिय लगी है। वर्षों से मैंने आपको सत्य का पुजारी माना है। इसलिए यह पत्र लिख रहा हूँ। (१) क्या आसन को आप ब्रह्मचर्य के लिये अमोघ साधन मानते हैं? (२) यदि वैसा ही है, तो इसका अर्थ यह ही है न कि आसन का प्रयोग करने- वाला मनुष्य हर हालत में वीर्य की रक्षा कर लेता है। इसका यह अर्थ भी है क्या कि वह ब्रह्मचारी विकार से भी रहित हो जाता है? आप जानते होंगे कि पाश्चात्य चिकित्सा ग्रंथों में एक क्रिया है जिससे मनुष्य वीर्य की रक्षा कर लेता है, परंतु विकार को कायम रखता है। यह क्रिया उन्हीं लोगों के लिये की जाती है जो वीर्य की रक्षा करते हुए रति-सुख का अनुभव करना चाहते हैं। ऊर्ध्वरेता बनने का हमारे शास्त्रों में यह तो अर्थ नहीं है? अगर यही अर्थ होगा तो ऊर्ध्वरेतापन शुद्ध ब्रह्मचर्य का विनाशक बन जाता है। और आसन से की हुई वीर्य की रक्षा का परिणाम उल्टा आने का भय कुछ प्रतीत होता है। एक मित्र दिल्ली से मुझको लिखते हैं कि आसनों से उन्होंने ब्रह्मचर्य यहाँ तक सिद्ध किया है कि वे कुछ भी और कितना ही खुराक खा सकते हैं और भोगी मनुष्य जैसी प्रायः सब चेष्टाएँ करते हुए वीर्य-रक्षा कर लेते हैं। उनके पत्र का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, इस कारण मैंने ज़्यादा पत्र-व्यवहार उनसे नहीं चलाया। दूसरे मित्र लिखते हैं कि छह महीने में प्राणायाम, आसन इत्यादि से ब्रह्मचर्य की सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है। इनको मैं जानता हूँ। वह भोले सीधे-सादे हैं। और आसनादि का अभ्यास करने का मुझको बड़ा आग्रह कर रहे हैं। मैंने अब तक उनका कहा नहीं माना है। परंतु आपकी पुस्तक ने मुझको हिलाया है। अनेक विद्यार्थियों के सम्बन्ध में मुझको आना पड़ता है और इन सबको मेरे ही प्रयोगों से मैं संतुष्ट नहीं रख सकता हूँ। आहारादि की मर्यादा के उपरांत मेरे सब प्रयोग केवल मानसिक ही रहते हैं। विद्यार्थीगण में से कितने एक वैसे घिरे हुए हैं कि उनके लिये आसनादि लाभदायी होने की सम्भावना लगती है, इस कारण यह पत्र लिख रहा हूँ। (३) वनस्पत्यादि के ब्रह्मचर्य के बारे में जो कुछ आपने लिखा है, वह अनुभवसिद्ध है? आप जानते होंगे कि प्रकृति-शास्त्र के जानने वाले पश्चिम के लोग ब्रह्मचर्य के विरोध में आजकल लिख रहे हैं। मैंने तो इसका खण्डन मेरे ही अल्प अनुभव से और बुद्धि- प्रयोग से किया है। परंतु हमारे शास्त्रज्ञ लोगों की लेखनी से पाश्चात्य ग्रंथों के निरीक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि इन ग्रंथों का प्रभाव हमारे नवयुवकों के ऊपर बहुत पड़ता है।<noinclude></noinclude> i1i2lie66a41hd3iguuoo8o1vlzw6g5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७२ 250 187352 671940 645772 2026-08-20T06:41:55Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित नहीं */ 671940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२३४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} (४) आपकी सूर्य-भेदन व्यायाम पुस्तक भी मैंने पढ़ ली है। क्या आप ऐसा मानते हैं कि यह व्यायाम मेरे जैसा मनुष्य भी केवल पुस्तक की मदद से कर ले तो भी कोई हानि नहीं हो सकती है? (५) वेद के मंत्रों के अर्थ करने में 'ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका' में जो नियम दिये हैं, उसमें और आपकी प्रणाली में कुछ भेद-सा मुझको प्रतीत होता है। यह मेरा मन्तव्य ठीक है क्या? अम्बोली में मैं इस मास की अठारह तारीख तक हूँ। {{Right|आपका,<br> '''मोहनदास गांधी'''}} मूल (एस० एन० १२७७१) की फोटो-नकल से। {{c|{{larger|'''२२६. पत्र : फूलचन्द शाह को}}}} {{Right|अम्बोली [बरास्ता] बेलगाँव<br> सत्याग्रह दिवस [६ अप्रैल, १९२७]}} भाईश्री ५ फूलचन्द, मैंने आपको पत्र लिखा था उसका जवाब नहीं मिला। तबीयत बिगड़ने से पैसा इकट्ठा करने की मेरी शक्ति काफी कम रह गई है। मैंने एक जगह कोशिश की भी, किन्तु वहाँ से अभी मिलने की सम्भावना नहीं है। यदि मैं बीमार न हुआ होता तो जैसे-तैसे प्रबन्ध कर देता। भाई अमृतलाल 'बापा' के भाषण के विषय में देवचन्द भाई को लिखने के लिए मैंने महादेव से कहा था। उसके विषय में पूरी तरह विचार कर लेना चाहिए। मुझे लगता है कि राजकीय परिषद् और चरखा कार्य, ये दोनों प्रवृत्तियाँ अलग-अलग होनी चाहिए। ऐसा हो तो अच्छा रहे। खर्च की तीन मदें हैं। उनकी व्यवस्था इस प्रकार की जाये: (१) खादी प्रवृत्ति चरखा संघ को सौंप दें, क्योंकि यह मण्डल मेरे बाद भी बना रहेगा और यथाशक्ति अपना काम चलायेगा। (२) विद्यालयों का और अन्त्यजों की सेवा का कार्य विद्यापीठ को सौंप दें। वह भी मेरे जाने के बाद बना रहेगा। और (३) काठियावाड़ की अलग प्रवृत्ति। इन तीनों विषयों के सम्बन्ध में हम ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर पाये हैं जो स्वतन्त्र रूप से चल सके। इसलिए मुझे तो ऊपर सुझाई गई व्यवस्था ही ठीक लगती है। खादी का कार्य गुजरात खादी मण्डल को भी सौंपा जा सकता है—इस विषय में भाई लक्ष्मीदास के साथ बातचीत करने के बाद। इन तीन कार्यों के सिवा चौथी किसी चीज़ में मेरा मन अभी नहीं लग सकता। १. लक्ष्मीदास आसर।<noinclude></noinclude> 6a7a0gewuyuc23uqr1lvmuqwxfi5fc4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७३ 250 187353 671947 645773 2026-08-20T07:02:07Z Sweta rani Gupta 6713 /* अशोधित */ 671947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||पत्र : वा० गो० देसाईको| २३५}} पर मैं देखता हूँ कि जो लोग इससे भिन्न कुछ करना चाहते हैं उनके लिए अलग संस्था होनी चाहिए। राजकीय परिषद इस प्रयोजनके काम आ सकती है । पर ये तो एक बीमार आदमीके विचार हैं । आप देवचन्दभाई आदिसे मिलें और शान्तिसे कोई हल ढूंढ़े । मेरे पास आना हो तो सभी अपने-अपने खर्चसे आयें, वह भी पन्द्रह दिनके बाद। मुझे लगता है कि अभी मुझमें लम्बी बातचीत करनेकी शक्ति नहीं है । प्रभुकी इच्छा हुई तो जून मासकी तारीख निभानेकी आशा रखता हूँ । पर अभी निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता । जो कुछ करना हो, स्वयं-नियुक्त न्यासियोंकी तरह तटस्थ भाव से घबराये बिना करना| {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [ पुनश्च : ] सम्भवतः मुझे १९ तारीखको बेलगाँवसे नन्दी हिल्स ले जायेंगे । नन्दी हिल्स बंगलोरके पास है । वहाँ हम २० तारीखको पहुँचेंगे । गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २८५६ ) से । सौजन्य : शारदाबहन शाह भाईश्री ५ वालजी, {{c|{{larger|'''२२७. पत्र : वा० गो० देसाईको}}}} {{Right|अम्बोली<br> चैत्र सुदी ५ [ ६ अप्रैल, १९२७]}} आदरणीय रेवाशंकरभाईका पत्र पढ़ा, उनका कहना ठीक तो है। सभा तथा संस्थाके नियमोंको तो तुम्हें जान ही लेना चाहिए। जो प्रस्ताव पास हों उनकी नकल कोषाध्यक्षको तुरन्त ही भेज देनी चाहिए। उसपर तुम्हारे हस्ताक्षर. .' हैं ? अन्य सदस्योंको भी. प्रस्ताव ही अब रेवाशंकरभाईको .* वर्षामें पास किये गये प्रस्ताव और उसके बाद साधारण बैठकमें पास किये गये प्रस्तावोंकी नकलें भी अपने हस्ताक्षर सहित भिजवा दें । उचित तो यही जान पड़ता है कि ये नकलें समितिके सदस्योंको भी भेजी जायें । जिन नये सदस्योंका चुनाव हुआ है उन्हें उनके चुनावके सम्बन्धमें लिख दें तथा उनसे अपनी स्वीकृति देनेका अनुरोध करें । १, २, ३ व ४. मूलमें अस्पष्ट है।<noinclude></noinclude> a60ae6ifrcm51sjqz5mg4lwx6qrozjn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७४ 250 187354 671962 645774 2026-08-20T07:31:45Z Sweta rani Gupta 6713 /* अशोधित */ 671962 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude> {{Rh|२३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} चम्पा का क्या हालचाल है? प्रस्तावों आदि की नकल 'नवजीवन' में भी प्रकाशित होनी चाहिए थी। मैं तो जल्दी में भाग निकला इसलिए तुमसे कहना भूल गया। किन्तु इन सारी चिन्ताओं का बोझ क्या तुम नहीं उठाओगे? हरिइच्छा आदि बिना किराया दिये भी रह सकती हैं। स्थान के सम्बन्ध में मगनलाल से पूछकर उन्हें बुला लो। यदि ऐसा लगे कि कहीं जगह नहीं निकल रही है तो हमें कुछ दिनों रुकना होगा। {{Right|मोहनदास}} [पुनश्च :] पैसा भेज देने के लिए रेवाशंकरभाई को मैं पहले ही लिख चुका हूँ। मोहनदास गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७३९१) से। सौजन्य : वा० गो० देसाई {{c|{{larger|'''२२८. पत्र : गंगाबहन वैद्य को}}}} {{Right|चैत्र सुदी ५ [६ अप्रैल, १९२७]1}} चि० गंगाबहन, तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। तुम चि० ममा को देखने गई इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा तनिक भी भंग नहीं होती। ऐसे अवसर पर जाना होगा, यह तो पहले ही सोच लिया था। अब चि० ममा को पूर्ण शान्ति मिलने के बाद ही तुम आश्रम वापस जाना। चि० ममा को यह मंत्र जरूर देती रहना कि देह रहे या जाये उससे हमें क्या? आत्मा थोड़ी ही कहीं जा सकती है। हम अपनी देह की चिन्ता किसलिए करें? चिन्ता तो उस आत्मा की करें जो अमर है और प्रसन्न रहें। {{Right|बापू के आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मैं बिलकुल ठीक हूँ। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८८२५) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य १. गंगाबहन वैद्य की पुत्री ममा बीमार थी और उसका देहान्त १९२७ में हुआ था। देखिए "पत्र : दामोदर लक्ष्मीदास को" और "पत्र : गंगाबहन वैद्य को", १०-४-१९२७।<noinclude></noinclude> fnqg3jtimyp1xpg2al5edki0mdp5eti 671964 671962 2026-08-20T07:33:43Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 671964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh|२३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}चम्पा का क्या हालचाल है? प्रस्तावों आदि की नकल 'नवजीवन' में भी प्रकाशित होनी चाहिए थी। मैं तो जल्दी में भाग निकला इसलिए तुमसे कहना भूल गया। किन्तु इन सारी चिन्ताओं का बोझ क्या तुम नहीं उठाओगे? हरिइच्छा आदि बिना किराया दिये भी रह सकती हैं। स्थान के सम्बन्ध में मगनलाल से पूछकर उन्हें बुला लो। यदि ऐसा लगे कि कहीं जगह नहीं निकल रही है तो हमें कुछ दिनों रुकना होगा। {{Right|मोहनदास}} [पुनश्च :] पैसा भेज देने के लिए रेवाशंकरभाई को मैं पहले ही लिख चुका हूँ। :गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७३९१) से। :सौजन्य : वा० गो० देसाई {{c|{{larger|'''२२८. पत्र : गंगाबहन वैद्य को}}}} {{Right|चैत्र सुदी ५ [६ अप्रैल, १९२७]1}} {{Left|चि० गंगाबहन,}} तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। तुम चि० ममा को देखने गई इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा तनिक भी भंग नहीं होती। ऐसे अवसर पर जाना होगा, यह तो पहले ही सोच लिया था। अब चि० ममा को पूर्ण शान्ति मिलने के बाद ही तुम आश्रम वापस जाना। चि० ममा को यह मंत्र जरूर देती रहना कि देह रहे या जाये उससे हमें क्या? आत्मा थोड़ी ही कहीं जा सकती है। हम अपनी देह की चिन्ता किसलिए करें? चिन्ता तो उस आत्मा की करें जो अमर है और प्रसन्न रहें। {{Right|बापू के आशीर्वाद}} [पुनश्च :] मैं बिलकुल ठीक हूँ। :गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८८२५) से। :सौजन्य : गंगाबहन वैद्य १. गंगाबहन वैद्य की पुत्री ममा बीमार थी और उसका देहान्त १९२७ में हुआ था। देखिए "पत्र : दामोदर लक्ष्मीदास को" और "पत्र : गंगाबहन वैद्य को", १०-४-१९२७।<noinclude></noinclude> paeg31tansu2ckwx5m4m0b1zzw1ijc3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७५ 250 187355 671973 645775 2026-08-20T07:47:33Z Sweta rani Gupta 6713 /* अशोधित */ 671973 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२९. मैं क्या करूँ?}}}} सत्याग्रह-सप्ताह फिर आ गया है। इसके छपते-छपते भी अमूल्य सप्ताह में से एक दिन बीत जायेगा। पाठकों से मैं जोर देकर कहूँगा कि वे सप्ताह को यों ही यह सवाल पूछकर न गँवा दें कि 'हम क्या करें?' बल्कि यह सवाल पूछकर कि 'मैं क्या करूँ?' सप्ताह का अधिक-से-अधिक लाभ उठायें। एक समय था जब यह सवाल पूछने में भी लाभ था, और हम पूछते भी थे। अगर हर शख्स अपने कर्त्तव्य का पूरा- पूरा पालन करे तो हम शीघ्र ही यह पूछने लायक भी हो जायेंगे कि 'अब हम आगे क्या करें?' निःसन्देह सत्याग्रह की नींव भी राष्ट्र-निर्माण की ही नींव के समान आत्मशुद्धि, आत्मसमर्पण और आत्मत्याग है। हर कोई अपने-आपसे पूछे कि 'राष्ट्रीय दृष्टि से मैं कैसे आत्मशुद्धि कर सकता हूँ?' खानगी जीवन की पवित्रता निश्चय ही आत्मशुद्धि की नींव है। अगर मेरा खानगी जीवन गंदला है तो मैं पोले ढोल के समान हूँ। तब अगर मेरा अन्तर ठीक नहीं है, तो मुझे जरूर इसी क्षण अपने को सुधारना होगा, बलिदान के योग्य पात्र बनना होगा। इसमें सरकार मेरी सहायता नहीं कर सकती और उसमें आड़े भी नहीं आ सकती। मेरा बनना-बिगड़ना बिलकुल मेरे ही हाथों की बात है। अपना खानगी जीवन शुद्ध कर लेने के बाद मैं अपने-आपसे दूसरा सवाल पूछूँगा कि राष्ट्र का सेवक बनकर मैं क्या करूँ? अगर मैं हिन्दू होकर मुसलमान से या किसी दूसरे धर्मावलम्बी व्यक्ति से घृणा करता हूँ तो मुझे उससे तुरन्त सम्माननीय समझौता जरूर करना पड़ेगा। अगर मैं घमण्ड से या अज्ञान से एक भी आदमी को अछूत मानता हूँ, तो अब मुझे अपने मन से यह कलुष मिटा देना पड़ेगा, और उसे गले से लगा लेना होगा और इस बात की निशानी के तौर पर उसकी कुछ निजी सेवा करनी होगी; चाहे वह इतनी ही हो कि उसके यहाँ जाकर उसके लड़कों को इकट्ठा कर उनके साथ खेल भर लूँ। इन बातों में भी मुझे सरकार की किसी भी मदद की जरूरत नहीं है और फिर भी पूरे मनोयोग से ये काम करके मैं निश्चय ही स्वराज्य को अधिक निकट ले आता हूँ, और जब कभी मौका आयेगा उस वक्त के लिए अपने-आपको संगठित सेवा के अधिक योग्य बना लेता हूँ। क्या मेरे पड़ोस में शराब की कोई दुकान है? एक भूले-भटके भाई को अपने विनाश-स्थल पर जाने से मुझे विमुख करना ही होगा। १९२१ में हमने यह काम बड़े अच्छे ढंग से शुरू किया था। हमारी हिंसा-वृत्ति से यह काम उतने ही भद्दे ढंग से खत्म हुआ। यद्यपि अभी फिलहाल सार्वजनिक रूप से इस मामले में प्रयत्न करने योग्य वातावरण नहीं है, फिर भी व्यक्तिगत रूप से कोशिश की जा सकती है। अन्त में मैं यह कहूँगा, मगर यह किसी से कम महत्त्व की बात नहीं है कि यदि मेरा ऐसा विश्वास है कि चरखे में गरीब-से-गरीब व्यक्ति का भी दुःख दूर करने की|<noinclude></noinclude> 9wtbxyalac8tss9dt13q7p39e61bsy1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७६ 250 187356 671975 645776 2026-08-20T07:52:45Z Sweta rani Gupta 6713 /* अशोधित */ 671975 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२३८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} क्षमता है, जिसका इतना विशद वर्णन मरखाम के उन शब्दों में किया गया जिन्हें पिछले सप्ताह के 'यंग इंडिया'¹ में उद्धृत किया गया था, तो मुझे अपने हिस्से का सूत जरूर कातना होगा। खादी की फेरी लगानी पड़ेगी। अगर मेरे पास प्रोत्साहन देने की ताकत हो तो अपने पड़ोसी को भी दरिद्रनारायण के लिए कातने को प्रोत्साहित करना होगा, और अगर वह विलायती कपड़ा पहनता हो तो उसे उसका त्याग करने को समझाना होगा। इस राष्ट्रीय सप्ताह के दौरान श्री वल्लभभाई ने काठियावाड़, गुजरात और विदेशों में रहने वाले गुजरातियों से गुजरात के दलित वर्गों के हित के लिए चन्दा इकट्ठा करने का प्रस्ताव किया है। फिलहाल गुजरात के दलित वर्गों के उद्धार के लिए जो प्रयत्न किये जा रहे हैं, उन्हें सहायता पहुँचाने के लिए एक लाख रुपये की अपील की है। मैं अपना नाम वल्लभभाई के स्वयंसेवक के रूप में लिखवाना चाहूँगा और भिक्षा-पात्र हाथ में लिये घर-घर घूमूँगा। मैं अपने प्रिय मित्रों से इस भिक्षा-पात्र को भरने की प्रार्थना करूँगा और उनसे भी अनुरोध करूँगा कि वे धन-संग्रह के लिए अपना नाम स्वयंसेवक के रूप में लिखायें। स्कूल जाने वाली लड़कियों एवं युवा स्त्रियों से भी, अपने माता-पिता की आज्ञा लेकर ऐसा करने के लिए एवं वल्लभभाई की थैली भरने में सहयोग देने के लिए अनुरोध करूँगा।² निश्चय ही यह सूची बड़ी नहीं है। मैंने तो व्यक्तिगत प्रयत्नों की बड़ी सम्भावना की तरफ इशारा भर कर दिया है। इस सप्ताह में हर कोई अपने लिए सेवा करने का अच्छे-से-अच्छा रास्ता खोज निकाले। खोजी व्यक्तिगत प्रयत्न करने पर शान्ति और मर्यादित ढंग से सफल सामूहिक कार्यवाही की जबरदस्त सम्भावनाएँ देखकर चकित हो जायेगा। सामूहिक कामों की बहुतायत से ही हमारे हाथ-पाँव सुन्न न हो जायें या आँखें न चौंधिया जायें। आज जो दो-एक व्यक्तियों के बारे में सच साबित होगा, कल वही सारे देश के बारे में भी सच होगा, बशर्ते कि वे आशा न छोड़ें, हिम्मत न हार बैठें। [अंग्रेजी से] यंग इंडिया, ७-४-१९२७ १. "हूम खादी स्टैन्ड्स फॉर", शीर्षक के अन्तर्गत। देखिए परिशिष्ट ४। २. यह अनुच्छेद नवजीवन, १०-४-१९२७ से लिया गया है।<noinclude></noinclude> ewb03wgxp08gid4bb78j67d7mlckbcx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५१ 250 187601 671834 671059 2026-08-19T16:15:49Z सौरभ तिवारी 05 49 671834 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||सांकेतिका|६१५}}{{Multicol}}</noinclude>:२८१, ५९७; —के नामपर देवदासी प्रथा, ५७४-५; —गुणातीत, १७३; —दरिद्रनारायणके रूपमें, ४२५-६; —पूर्णतः सत्स्वरूप, ९७; —महाजीवके रूपमें, ९८; —में आस्थाकी आवश्यकता, ४३२ {{outdent|ईसाई, १०९, १६५, २१६, २५९, २८१, ३३०, ३६६, ३६८, ४११, ४४०, ४५१, ४९४, ५०२, ५४९, ५५५; —[इयों] के प्रति गांधीजी नरम क्यों हैं, ५८२}} {{outdent|ईसाई धर्म, २८२-३, ५४९; —और पाश्चात्य तौर-तरीके, १७४; —को यूरोपीय रंगमें रँग देना, २८१-२; —ही एकमात्र सत्य नहीं है, २८३}} {{outdent|ईसाई मिशनरी, ८२; —और धर्म-परिवर्तन, १३०; —और बाइबिल, ११; —[रियों] को सलाह, १७४, २८०-३}} {{outdent|ईसा मसीह, ११, २५९, २८१-३, ४६८; —अगर शिकागो आयें, ५८}} {{c|{{larger|'''उ'''}}}} {{outdent|उत्तम, भिक्खु, १९७}} {{outdent|उत्तमचन्द, २१०, ४०९}} {{outdent|उद्योग; —को संरक्षण, २४३}} {{outdent|उद्योगवाद, ३६७}} {{outdent|उपवास; —आत्म-दण्डके रूपमें, ४२-३; —आत्मशुद्धिके लिए, ४२४; —प्रायश्चितके रूपमें, २-३}} {{outdent|उर्दू, १८०; —देवनागरी लिपिमें, ६६}} {{outdent|उर्मिलादेवी, १२८}} {{c|{{larger|'''ए'''}}}} {{outdent|एकता; —अनेकतामें, ३४३}} {{outdent|एडगर, लिलियन, १२४}} {{outdent|एडीसन, ३४५-६}} {{outdent|एन्डर्सन, ५०१}} <noinclude>{{multicol-break}}</noinclude> {{outdent|एन्ड्रयूज, सी॰ एफ॰, ३१, १०, ११४, १८५, १९४, २८२, २९०, ३२६, ३३८, ३४१, ३६३, ३७४, ३७६, ४३६, ४५४, ४५५-६, ४७२, ४७९}} {{outdent|एलोपैथी, बनाम आयुर्वेद, २१२}} {{outdent|एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया, ९३ पा॰ टि॰, ४५५ पा॰ टि॰, ४५७ पा॰ टि॰}} {{outdent|एस्क‍्‍विथ, ३९}} {{c|{{larger|'''औ'''}}}} {{outdent|औदार्य, १}} {{c|{{larger|'''क'''}}}} {{outdent|कताई, ६१, ७२, ९१, १०१, १२४, १६६, १९०, १९४, २१७, २२५, २५६, ३०२, ३३२, ३४९, ३५१, ३५९, ३६६, ३८३, ३९८, ४६०, ४६४, ४७६, ५२७, ५३३; —ऊनकी, २६५, ३५३-४; —का महत्त्व, ४७१; —के बारेमें सुझाव, १२४-५; —पर निबन्ध, १०८; —बेरोजगारीको दूर करनेके लिए, १०९; —मैसूर में, २३९, ४५०; —यज्ञ, १०३-४; —यज्ञ सेवा है, ३५५, ४०६, ४११, ४३३-४, ४९६-७; —स्कूलोंमें, ४०७-८; देखिए चरखा भी}} {{outdent|कबीर, ३९१}} {{outdent|करेंट थॉट, ३७६}} {{outdent|कर्त्तव्य, ६९, ७४; —और अधिकार, ४४७; —का पालन, ३८४, ३८८; —जब आत्महत्या करनी ही हो, ४७८; —मजदूरोंका, २०२; —यज्ञका, ४४४}} {{outdent|कला; —सच्ची और क्षणजीवी, ३४८-९}} {{outdent|कलानी, टी॰ डब्ल्यू॰, ४०३}} {{outdent|कविवर, देखिए ठाकुर, रवीन्द्रनाथ}} {{outdent|कांग्रेस, देखिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस}} {{outdent|काकी, देखिए कालेलकर, श्रीमती द॰ बा॰}} {{outdent|काकोरी; —के निकट सशस्त्र डकैती, ५७१ पा॰ टि॰}}<noinclude>{{multicol-end}}</noinclude> 1x0lignzbe0wj4vfms0ul7h35lk49tb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५६ 250 187606 671974 671524 2026-08-20T07:48:45Z Avantika Shaw 4732 671974 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|६२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|दास, मधुसूदन, २८, ११०}} {{outdent|दास, राधासुन्दर, २७६}} {{outdent|दासगुप्त, कमला, २८४, ४२१}} {{outdent|दासगुप्त, सतीशचन्द्र, २२, ७२-३, १०९, ११७, २१३, २९५, ३२३, ३२८, ३५१, ३५९, ४२१, ४७०}} {{outdent|दास्ताने, वी० वी०, २८६, २९५}} {{outdent|दिलीपसिंह, न्यायमूर्ति, १५२, ४७२}} {{outdent|दीक्षा; -कौन ले, ४४२-३}} {{outdent|दीवान; -मैसूरके, १२९, १३२, १८७, २८१}} {{outdent|दुग्ध-व्यवसाय, २४, ३८, १७५, ४५१; -एक ग्रामोद्योग, ६४-५; -और पिंजरापोल, १३५-७}} {{outdent|दुर्गा, ३९७}} {{outdent|दुर्योधन, ४१०}} {{outdent|देवचन्द भाई, ८०}} {{outdent|देवता; -और राक्षस, ४९}} {{outdent|देवदासी-प्रथा, ५४६, ५५६, ५६५, ५९६; -ईश्वरका अपमान, ५७४-५}} {{outdent|देवधर, गो० कृ०, ४८, २९०, ३९६}} {{outdent|देवधर, श्रीमती, ४८}} {{outdent|देवनागरी; -अखिल भारतीय लिपिके रूपमें, १५६, १७९-८०, २७३-४; -नवजीवनके लिए, १७९-८०; -में सुधार, २७४}} {{outdent|देव, नानासाहेब, २३८}} {{outdent|देवेश्वर, सिद्धांतालंकार, ३९०}} {{outdent|देशपांडे, गंगाधरराव, २९, ३१, ४८, ८४, ९४, ११०-१, ११७, १५५, १८७ पा० टि०, २०० पा० टि०, २२३, २२५ पा०टि०, २३४, २४९ पा०टि०, ३७५, ४४४}} {{outdent|देशभक्ति, ५०}} {{outdent|देसाई, कुसुमबहन, २३७, २७९, ३६२, ४०९}} {{outdent|देसाई, चिमनलाल भोगीलाल, ३३१}} {{multicol-break}} {{outdent|देसाई, महादेव, १८, ८८, ११२, १४२, १५४, ३२७, ३६९, ३७५, ३७८, ३८३, ४११, ४१४, ४२३, ५७७ पा० टि०, ५८७}} {{outdent|देसाई, वालजी गो०, ४१, ६९, ३३६}} {{outdent|देसाई, डॉ० हरिलाल, १५६, ३८४}} {{outdent|देसाई, हरिलाल माणिकलाल; -का देहान्त, ३१९}} {{outdent|देसाई, हरिलाल माणेकभाई, २३७, २५३, २७९, ४०९}} {{c|ध}} {{outdent|धर्म, ६०}} {{outdent|धर्म, ३, २६, ७८, ९७, १५१, १९२, २०२, २२६, २४०, ४५७; -अहिंसाके रूपमें, ५८१; -अहिंसा-का, ३६५; -और अधर्म, ४८६; -और अर्थशास्त्र, ४८९; -और एकता, ४५९; -और मोक्ष, ३८७; -और राजनीति, ५४३-४; -और विवेक-बुद्धि, २८७; -का सुधार, ३५-६; -की शिक्षा, ४२७-९; -के नामपर झगड़ा, २५-६; -के नामपर विनाश, १३८, देखिए अहिंसा भी}} {{outdent|धर्म-परिवर्तन; -और ईसाई मिशनरी, २८०-१}} {{c|न}} {{outdent|नगरपरिषद्; -[दों] की भूमिका, २३०-२, ५७२; -के सदस्योंका कर्त्तव्य, ५८०}} {{outdent|नटराजन्, के० एस०, ११६, ३२६}} {{outdent|नन्दनार; -सच्चा सत्याग्रही, ५६०-१, ५६३-४}} {{outdent|नम्बूद्रिपाद, के० जे० नारायण, १९८}} {{outdent|नया करार (न्यू टेस्टामेन्ट), २५९}} {{outdent|'''नवजीवन,''' ७८, ८७ पा० टि०, १०२, १२७, १९०, २१५, ३०५, ३०८, ३१९,}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> krfrnf8cng7bykyx7r55t7d2eo24rud पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६६० 250 187610 671956 646042 2026-08-20T07:14:09Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 671956 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh|६२४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|भागवत, १६}} {{outdent|भारत; -एक राष्ट्र है, ३४३, ५५२; -के बारेमें मिस मेयोकी पुस्तककी गांधीजी द्वारा आलोचना, ५८४-९४}} {{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ३३, २४४, ४३८, ५२६, ५४७; -और अब्राह्मण, ४५५; -और नागपुर सत्याग्रह, १४०-२; -और मद्रासका नीलकी मूर्तिको हटानेका सत्याग्रह, ५०७-१९; -और सत्याग्रह आन्दोलन, १८२; -का बेलगाँव अधिवेशन, ३९७; -का हिन्दू-मुस्लिम एकतापर प्रस्ताव, २०२; -की अखिल भारतीय समिति, १४, ८०, ४३८, ५३४; -की अध्यक्षता, ६२, ९४, २२८-९; -के अखिल भारतीय चरखा संघसे सम्बन्ध, १३३-४}} {{outdent|भावे, विनोबा, देखिए विनोबा}} {{outdent|भीष्म, २२३}} {{outdent|भूस्वामी; -वर्गको सलाह, ५७४}} {{outdent|भौतिकवाद; -की पाश्चात्य प्रणालीकी नकल नहीं करनी है, ५७-८; -बनाम नैतिक प्रगति, १०}} {{outdent|भ्रष्टाचार; -चुनावके दिनोंमें, ५८०}} {{c|म}} {{outdent|मछन्दर, ३४}} {{outdent|मथुरादास, ३३}} {{outdent|मथुरादास, डॉ० लाला, ६७}} {{outdent|मदर इंडिया, ५४७ पा० टि०; -के बारेमें गांधीजीका लेख, ५८४-९४}} {{outdent|मद्य-निषेध (शराबबन्दी), ७-८, ४८८; -और शराबसे प्राप्त होनेवाला राजस्व, ८; -की आवश्यकता, ५४२-३, ५०१-५, ५४५, ५५६, ६००; -के लिए आवश्यक उपाय, ५३०-१; -पर मद्रासके मन्त्रीका भाषण, ५२९-३१; -बंसडा राज्यमें, ७-८}} {{multicol-break}} {{outdent|मद्यपान (शराबखोरी); -और रानीपरज लोग, ७; -का त्याग, लम्बाणी समाजमें ७ पा० टि०; -की बुराई, ५३६; -के त्यागकी आदि द्रविड़ों/कर्नाटकोंको सलाह, १८८, १९१-२, ४४८, ५६१-२; -मजदूरोंको छोड़ देना चाहिए, ५२७; -विज्ञापनों द्वारा, ५५}} {{outdent|मध्वाचार्य, ९९}} {{outdent|मनुष्य; -अपूर्ण है, ५९७; -और ईश्वर, ३७०; -और पशु, १३८-९; -और मोक्ष, ७४; -और यन्त्र ५८, १००-१; -और समाज, ४८०; -और समानता ३४३; -व्यक्तिके साथ-साथ सामाजिक प्राणी, ४५४}} {{outdent|मनोरमादेवी, २३}} {{outdent|मन्दिर; -प्रवेश, २२६, ४७६; -का नन्दनारका आदर्श ५६०-१; -[रों] का स्थान, ४७६}} {{outdent|मलकानी, एन० आर०, ६८, १४८, १५४, २०४, २०६-७, २४१, ३९८}} {{outdent|महाभारत, १३२}} {{outdent|महाराजा बंसडा, ७}} {{outdent|महाराजा महमूदाबाद, ९४ पा० टि०}} {{outdent|महाराजा मैसूर, १६, १०७, १८८, २२५, ४४९, ४५१-२; -की मानवीयता, २४०-१; -की रजत जयन्ती, २९९, ३१२, ३६८}} {{outdent|महिलाएँ, देखिए स्त्रियाँ}} {{outdent|माडर्न रिव्यु, ८६-७}} {{outdent|माथुर, सुन्दरलाल, २४७}} {{outdent|माथुर, सूरजप्रसाद, २१०}} {{outdent|मालवीय, मदनमोहन, १००, १०७, १११, १२२, २२२, २३९, २९५, ४५२; -और हिन्दू जातिको सुधारना, ३५}} {{outdent|मृत्यु, का शोक नहीं करना चाहिए, ३६२}} {{outdent|मृत्युंजय, ४०९}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 0z4x5fiv3msifw6dfsbosizfsl0pmvw 671957 671956 2026-08-20T07:15:43Z Avantika Shaw 4732 671957 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh|६२४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|भागवत, १६}} {{outdent|भारत; -एक राष्ट्र है, ३४३, ५५२; -के बारेमें मिस मेयोकी पुस्तककी गांधीजी द्वारा आलोचना, ५८४-९४}} {{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ३३, २४४, ४३८, ५२६, ५४७; -और अब्राह्मण, ४५५; -और नागपुर सत्याग्रह, १४०-२; -और मद्रासका नीलकी मूर्तिको हटानेका सत्याग्रह, ५०७-१९; -और सत्याग्रह आन्दोलन, १८२; -का बेलगाँव अधिवेशन, ३९७; -का हिन्दू-मुस्लिम एकतापर प्रस्ताव, २०२; -की अखिल भारतीय समिति, १४, ८०, ४३८, ५३४; -की अध्यक्षता, ६२, ९४, २२८-९; -के अखिल भारतीय चरखा संघसे सम्बन्ध, १३३-४}} {{outdent|भावे, विनोबा, देखिए विनोबा}} {{outdent|भीष्म, २२३}} {{outdent|भूस्वामी; -वर्गको सलाह, ५७४}} {{outdent|भौतिकवाद; -की पाश्चात्य प्रणालीकी नकल नहीं करनी है, ५७-८; -बनाम नैतिक प्रगति, १०}} {{outdent|भ्रष्टाचार; -चुनावके दिनोंमें, ५८०}} {{c|म}} {{outdent|मछन्दर, ३४}} {{outdent|मथुरादास, ३३}} {{outdent|मथुरादास, डॉ० लाला, ६७}} {{outdent|मदर इंडिया, ५४७ पा० टि०; -के बारेमें गांधीजीका लेख, ५८४-९४}} {{outdent|मद्य-निषेध (शराबबन्दी), ७-८, ४८८; -और शराबसे प्राप्त होनेवाला राजस्व, ८; -की आवश्यकता, ५४२-३, ५०१-५, ५४५, ५५६, ६००; -के लिए आवश्यक उपाय, ५३०-१; -पर मद्रासके मन्त्रीका भाषण, ५२९-३१; -बंसडा राज्यमें, ७-८}} {{multicol-break}} {{outdent|मद्यपान (शराबखोरी); -और रानीपरज लोग, ७; -का त्याग, लम्बाणी समाजमें ७ पा० टि०; -की बुराई, ५३६; -के त्यागकी आदि द्रविड़ों/कर्नाटकोंको सलाह, १८८, १९१-२, ४४८, ५६१-२; -मजदूरोंको छोड़ देना चाहिए, ५२७; -विज्ञापनों द्वारा, ५५}} {{outdent|मध्वाचार्य, ९९}} {{outdent|मनुष्य; -अपूर्ण है, ५९७; -और ईश्वर, ३७०; -और पशु, १३८-९; -और मोक्ष, ७४; -और यन्त्र ५८, १००-१; -और समाज, ४८०; -और समानता ३४३; -व्यक्तिके साथ-साथ सामाजिक प्राणी, ४५४}} {{outdent|मनोरमादेवी, २३}} {{outdent|मन्दिर; -प्रवेश, २२६, ४७६; -का नन्दनारका आदर्श ५६०-१; -[रों] का स्थान, ४७६}} {{outdent|मृत्यु, का शोक नहीं करना चाहिए, ३६२}} {{outdent|मृत्युंजय, ४०९}} {{outdent|मलकानी, एन० आर०, ६८, १४८, १५४, २०४, २०६-७, २४१, ३९८}} {{outdent|महाभारत, १३२}} {{outdent|महाराजा बंसडा, ७}} {{outdent|महाराजा महमूदाबाद, ९४ पा० टि०}} {{outdent|महाराजा मैसूर, १६, १०७, १८८, २२५, ४४९, ४५१-२; -की मानवीयता, २४०-१; -की रजत जयन्ती, २९९, ३१२, ३६८}} {{outdent|महिलाएँ, देखिए स्त्रियाँ}} {{outdent|माडर्न रिव्यु, ८६-७}} {{outdent|माथुर, सुन्दरलाल, २४७}} {{outdent|माथुर, सूरजप्रसाद, २१०}} {{outdent|मालवीय, मदनमोहन, १००, १०७, १११, १२२, २२२, २३९, २९५, ४५२; -और हिन्दू जातिको सुधारना, ३५}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> h8j4h9tq0w6g7lc2z0x5uk59jid2a47 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६६१ 250 187611 671959 646043 2026-08-20T07:28:16Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 671959 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||सांकेतिका|६२५}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|मासिक धर्म की अवधि में अलगाव बरतना, २५१, ३७२-३, ४३४-५}} {{outdent|मित्र, जामिनीभूषण, ७२, ३२८}} {{outdent|मित्र, देवेन्द्रनाथ, ३८}} {{outdent|मिल उद्योग; और खादी, ५१-२; -की रक्षा, ५०-१; - के मालिक, उन्हें सरकारी सहायता, २७८; -बनाम हाथ करघा, ३६७}} {{outdent|मिशनरी (धर्म प्रचारक), ईसाई, देखिए ईसाई मिशनरी}} {{outdent|मीठूबहन, ११४, ११९, १९८, २६९-७०}} {{outdent|मीराबहन, १, ३९, ४५, ११२-३, १२०, १४४, १४७, १५६-७, १६९, १९४, २०३, २१७, २३३, २५१, २६२, २६४, २८९, ३१०-१, ३२०, ३६९, ३७२, ३८३, ४११, ४३४, ४५५, ४७९, ४९७, ५०६, ५६५, ५७०, ५७७}} {{outdent|मीराबेन, देखिए मीराबहन}} {{outdent|मुंजे, डॉ० बा० शि०, १७, २८५}} {{outdent|मुखर्जी, सर आशुतोष, १६२}} {{outdent|मुत्तुलक्ष्मी, डॉ०, ५३९}} {{outdent|मुमुक्षु, ९९}} {{outdent|मुसलमान, ६२, १०७, १०९, १४६, १५२, १७४, १८८, २१६, २२७, २७४, ३२१, ३३०, ३३२, ३६६, ३६८, ३९०, ४११, ४२८, ४४०, ४५१, ४७२, ४७६, ५५५; -और गो-रक्षा, ६३, २२७, ३६६; -और हिन्दू, २-३, २५, ६६, १८०, १८६-७, २२३, ३४३, ३९०, ४३१, ४५७, ४६२; -धर्म-प्रचारक, और धर्म-परिवर्तन, १३०; - राष्ट्रीय विचारोंवाले, २२९; - [ नों] के प्रति गांधीजी नरम क्यों हैं, ५८२}} {{outdent|मुस्लिम, देखिए मुसलमान}} {{outdent|मुहम्मद, पैगम्बर, १५२, १८१, २८३, ३२१, ३३३}} {{multicol-break}} {{outdent|मेयो, कैथरीन (कुमारी), ५४७, ५६६, ५७८; -की पुस्तक भारतके बारेमें, गांधीजीका उसपर लेख, ५८४-९४}} {{outdent|मेहता, बलवन्तराय, ४७७}} {{outdent|मेहता, सर फीरोजशाह, ३३, २३०}} {{outdent|मेहरोत्रा, राजकिशोरी, ७६, २५६}} {{outdent|मँचेस्टर गाजियन, २६६}} {{outdent|मैक्लियड, जोजेफिन, ८६}} {{outdent|मैडॉक, कर्नल, ५८८}} {{outdent|मैथुन (सहवास), २०९}} {{outdent|मोक्ष, ३६, ७३, १५९; -का अभिलाषी और धर्म, ३८७}} {{outdent|मोघेजी, ३७३}} {{outdent|मोती, ७५, १६०, २३८}} {{outdent|मोदी, तारा, ७०}} {{outdent|मोरारजी, शान्तिकुमार, ५००}} {{outdent|मोहनलाल, ३०७}} {{outdent|मोहनलाल (लाहौरवाले), ३८७}} {{c|'''य'''}} {{outdent|'''यंग इंडिया,''' ७ पा० टि०, ३२, ३८, ४०, ४६, ५०, ६१, ६३, ८६-७ पा० टि०, ८८, १०६, १२७, १२९, १३७, १६२, १९०, १९७, २१५, २४४, २६१, २६६, २७४, २९६, ३०५, ३०७, पा० टि०, ३१५, ३२१, ३२६, ३३१, ३५५-६, ४०१, ४३७, ४३९, ४६८, ४७२, ५०२, ५०८, ५११, ५१३, ५१५, ५१९, ५४४ पा० टि०, ५५१, ५६२}} {{outdent|यन्त्र; - और मनुष्य, ५८; -कपास चुननेके लिए, १००-१}} {{outdent|यशवन्तप्रसाद, २६९}} {{outdent|यहूदी, २१६, ४९४}} {{outdent|युवराज (प्रिंस आफ वेल्स), ५८९}} {{outdent|युद्ध; -का प्रभाव, ३४५-६}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> hfu2xlfb9tdzmym99pzr1uaphhmis1n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६६२ 250 187612 671988 646044 2026-08-20T08:14:28Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 671988 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|६२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|यूरोपीय, १३१}} {{outdent|यौगिक क्रियाएँ, १८, ७४, ७७, १०५, २४६; -चिकित्साका निरापद तरीका, १८, ४१९}} {{c|र}} {{outdent|रंगीला रसूल, १५२, १५३, ३२१, ३५५, ३५६, ४७२}} {{outdent|''' रघुबंश,''' १०५}} {{outdent|रतनबहन, १९८}} {{outdent|रमणिकलाल, २६२, ४५६}} {{outdent|रंभा, १५८}} {{outdent|रशीद, अब्दुल, ५७१}} {{outdent|रसिक, २९१, ४१७}} {{outdent|रस्किन, ५८}} {{outdent|राजकीय पशुपालन व दुग्धशाला संस्थान, बंगलोर, देखिए इम्पीरियल ऐनिमल हस्बेंडरी ऐंड डेयरी इंस्टिट्यूट, बंगलोर}} {{outdent|राजगोपालाचारी, ४०, ११, २१, ४८, ८४, ८९, ९४-५, १०६-७, ११७, १२३, १४५, १६८, २०१, २५४, ३७५, ३७९, ४००, ४६२ पा० टि०, ५६२, ५६६}} {{outdent|राजचन्द्र, २५, ४९८}} {{outdent|राजनीति; और धार्मिकता (आध्यात्मिकता), ५४३-४}} {{outdent|राजेन्द्रप्रसाद, २९, १२३, २२१, ३५९}} {{outdent|राधा, ४३५}} {{outdent|रानडे, न्यायमूर्ति, २४४}} {{outdent|रानडे, श्रीमती रमाबाई, ५२३}} {{outdent|राम, ३२६, ३६०; देखिए रामनाम भी}} {{outdent|रामकृष्ण, परमहंस, ३६४}} {{outdent|रामचन्द्र, ५३१}} {{outdent|रामचरितमानस, ३६१; देखिए रामायण भी}} {{outdent|रामनाथन्, एस०, १७२, २६९, ५६२}} {{outdent|रामनाम, १०५, २१६, २३८, ४०३, ४०५, ४५४, ५६६; -मनुष्यके लिए शान्तिप्रद, १७३}} {{multicol-break}} {{outdent|रामविनोद, ३५९}} {{outdent|'''रामानुजाचार्य,''' ९९}} {{outdent|'''रामायण,'''१०५, १३२, ५७९; -तुलसी और वाल्मीकिकी, ३६०; -में बाली-वध, ३६०-१}} {{outdent|राय, आचार्य, देखिए राय, प्रफुल्लचन्द्र}} {{outdent|राय, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र, १०९}} {{outdent|राय, डॉ० २१३, ३२३, ३२८}} {{outdent|राय, डॉ० सूरदास, २९४}} {{outdent|राय, डॉ० विधानचन्द्र, ४०, ८३}} {{outdent|राय, मोतीलाल, ३५२}} {{outdent|रायचन्द भाई, देखिए राजचन्द्र}} {{outdent|रायटर, ३१९}} {{outdent|राव, डॉ० कृष्णस्वामी, ५३}} {{outdent|राव, डॉ० सुब्बा, १०६}} {{outdent|राव, वेंकटसुब्बा, ४४६}} {{outdent|राष्ट्रीयता; -भारतमें, ५०, ५५२}} {{outdent|रीति-रिवाज, देखिए परम्परा}} {{outdent|रोटी-व्यवहार; -शेर महादेवी गुरुकुलमें, १७२}} {{outdent|रोलॉ, एम० रोमाँ, ३२}} {{c|ल}} {{outdent|लक्ष्मी (देवी), २६}} {{outdent|लक्ष्मीकान्त, ३५}} {{outdent|लक्ष्मीदास, ७४}} {{outdent|लक्ष्मीबहन, १, २९}} {{outdent|लक्ष्मीबेन, देखिए लक्ष्मीबहन}} {{outdent|लॉरेंस; -की मूर्तिको हटानेका प्रयास, ४२९}} {{outdent|लाजपतराय, १९, २२२, ४२३}} {{outdent|लिपि; -अखिल भारतीय, १७९-८०; देवनागरी, अपनी-अपनी मातृभाषाओंके लिए, १५५-६, २७३-४}} {{outdent|लीलावहन, ४४, २१३, ३८६}} {{outdent|लैंग, रेवरेंड, ५४८}} {{outdent|लैंसेट, ३४६}} {{outdent|स्तुआँसितावस्की, डब्ल्यू०, ३१६, ३४२ पा० टि०}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> pdma6zte0u2fg7lnl2ofx7sa4v6dhqk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६६३ 250 187613 672040 646045 2026-08-20T09:46:48Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 672040 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||सांकेतिका|६२७}}</noinclude>{{Multicol}} {{c|व}} {{outdent|वसे, एल० जी०, ४७३}} {{outdent|वरदराजुलु, डॉ०, २२४}} {{outdent|वरदाचारी, एन० एस०, १०८, ४८२}} {{outdent|वर्णाश्रम, १०१}} {{outdent|वर्णाश्रम धर्म ५५५-६}} {{outdent|वल्लभाचार्य, ९९}} {{outdent|वाछा, सर दिनशा, २४४}} {{outdent|वाडिया, प्रोफेसर, ३७९}} {{outdent|वालुंजकर, ११२, २०२, ३२०, ४१२, ४९८}} {{outdent|वाल्मीकि, ३६०}} {{outdent|वाशिंगटन, बुकर टी०, ३००}} {{outdent|विजयपालसिंह, १९६}} {{outdent|विज्ञान; -सच्चा और तात्कालिक, ३४७}} {{outdent|विज्ञापन; -[णों] के प्रकाशनके लिए पत्रकारोंको नैतिक नियमोंकी आवश्यकता, ५५}} {{outdent|विदुर, ४१०}} {{outdent|विट्ठल, लीलाधर, ३५२}} {{outdent|विदेशी वस्त्र (कपड़ा); -और भारतीय मिल उद्योग, ५०-१; -[त्रों] का त्याग करें, १६५, १८३, ४८६-७, ५८३}} {{outdent|विद्यार्थी; -सुधारोंके मोर्चेपर सबसे आगे ५८०; -[थियों] का कर्त्तव्य, १६४-६, १६७-८; -की शिक्षाकी योजना, १०३-५; -को गीता पढ़ना जानना चाहिए, ४२७-९, ४५९, ४९५-६, ५९५-६; ५९७-८; -को सलाह, २१६-७, ४५७-६१, ४८३; -को सलाह, विधवा पुनर्विवाहके बारेमें, ५२२-३; -को सलाह, सिगरेट न पीनेकी, ५२५; -को सलाह, सुलेखके बारेमें, ३६०; -द्वारा बाढ़ सहायता-कार्य, ५५७}} {{outdent|विधवा, -वन्दना करने योग्य, १५७, ५२३}} {{outdent|विधवा-पुनर्विवाह, ८९, १५०-१, २५०, ५२२-४, ५३४, ५४६}} {{outdent|विनम्रता, -व्यक्तिके विकासके लिए आवश्यक, ५४९}} {{multicol-break}} {{outdent|विनय, -शील बननेकी जरूरत, २८३}} {{outdent|विनोबा, भावे, ११२ पा० टि०, १५९, २०३, २३८, २५४, ३७२-३, ४१२}} {{outdent|विलार्ड, ओ० जी०, ५७८}} {{outdent|विवाह; -की न्यूनतम आयु, ५२४; -जीवनमें परिवर्तन लानेवाला, ५८१; -बचपनमें, देखिए बाल-विवाह; -में कोई रस नहीं है, १५८; -में फिजूलखर्ची, ३७; -सुधार, ४६५-६}} {{outdent|विवेक बुद्धि; -और धर्म, २८७; -और परम्परा, ५९७-८}} {{outdent|विवेकानन्द, ८७}} {{outdent|विश्वकर्मादर्क, २७५}} {{outdent|विश्वनाथन्, वी० के०, ३५२}} {{outdent|विश्वेश्वरैया, सर एम०, २४१, २५०, २७२, ३९९, ४४६, ४५०, ४८९}} {{outdent|विषय-वासना, -देखिए मैथुन, हस्तमैथुन; -जनित उत्तेजना और हस्तमैथुन, ४०५-६; -पर नियन्त्रण, ११९, २११; -युक्त कर्म, ६१०-१}} {{outdent|विष्णु, ३७०, ५६०}} {{outdent|वेंकटकृष्णय्या, एम०, २२३}} {{outdent|वेंकटप्पय्या, कोण्डा, ५, ६, ३२७}} {{outdent|वेंकटराव, डॉ० एम०, ३५२}} {{outdent|वेद, ३३६; -और अस्पृश्यता, २८७; -[दों] की व्याख्या, २६८; देखिए अस्पृश्यता और हिन्दू धर्म}} {{outdent|वेस्टम, देवी (एडा), ४२}} {{outdent|वैदिक धर्म, ३३६}} {{outdent|वैद्य, गंगाबहन, ५६७}} {{outdent|वैद्य, सी० वी०, २६८, २९४, ३३६}} {{outdent|वैष्णव, २६; -तिलक, का मदर इंडियामें उल्लेख, ५९३}} {{outdent|व्यक्ति; -और समाज, ५५२; -के विकास की शर्तें, ५४९-५०}} {{outdent|व्यायाम, १८-९, ११९}} {{outdent|व्रजलाल, ६९}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 0520xmhifgn35twr7ur6sveh9961nzf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४७ 250 196466 672117 668851 2026-08-20T11:41:32Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 672117 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||स्वयंसेवकका कर्त्तव्य|९}}</noinclude>&nbsp; {{c|'''दूसरा क्रम'''}} इस तरह जितने विद्यार्थियोंकी टुकड़ी गई हो उन सबकी सामग्रीका मिलान करके उससे निकलनेवाले परिमाणोंकी दूसरे कृषि-प्रधान देशोंके साथ तुलना की जाये और तुलना करनेके बाद इस बातकी छानबीन हो कि भारतकी स्थिति में और उन देशों की स्थितिमें क्या फर्क है। {{c|'''तीसरा क्रम'''}} भारतमें जो अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है, उसके साथ इन स्वतन्त्र परिणामोंकी तुलना करके, उनमें घट-बढ़ करना जरूरी हो तो करे और इस तरह अभ्यासके अन्त में अनुभव द्वारा ही प्रत्येक विद्यार्थी भारतका अर्थशास्त्र सिद्ध कर ले। '''टिप्पणी'''—उक्त क्रमके अनुसार अगर हरएक साल नये विद्यार्थी इसी तरह अर्थशास्त्रका अभ्यास करें तो उसमें उन्हें हानिकी कोई सम्भावना नहीं, यही नहीं, बल्कि इस तरह काम करते रहने से नई खोज की जा सकती है, अथवा माने हुए परिणाम दिन-दिन अधिक दृढ़ हो सकते हैं। जिस गाँवका निरीक्षण-परीक्षण एक बार हो चुका हो उसमें दुबारा जाने की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। '''हिन्दी नवजीवन,''' १७-१०-१९२९ {{c|{{x-larger|'''८. स्वयंसेवकका कर्त्तव्य'''}}}} संयुक्त प्रान्तके दौरेमें स्वयंसेवकोंसे परिचय हो रहा है; और मैं देखता हूँ कि उनको तालीमकी बड़ी आवश्यकता है। स्वयंसेवकोंकी भावना शुद्ध है, उनके प्रेममें कोई न्यूनता नहीं, परन्तु भावना और प्रेममें से जो शक्ति पैदा होनी चाहिए वह शिक्षाके अभावसे हो नहीं रही है। स्वयंसेवकोंमें प्रबन्ध-शक्ति बहुत कम है। इस कारण अकसर उनसे सहायता मिलनेके बदले नई मुसीबतें खड़ी हो जाती हैं। अतएव उनके लिए तालीमकी बड़ी आवश्यकता है। वे दिलसे भले स्वयंसेवक बन जाते हों, मगर इस तरह कोई काम पूरा नहीं होता। जो आसान से आसान काम माने जाते हैं उनके लिए भी कुछ-न-कुछ तालीमकी तो आवश्यकता मानी ही गई है। भंगीका काम भी बगैर तालीमके नहीं हो सकता। फिर भला स्वयंसेवकका काम बगैर तालीमके कैसे सफल हो सकता है। स्वयंसेवक राष्ट्रका सिपाही है। उसके द्वारा हम अन्तमें स्वराज्य पानेकी आशा रखते हैं। राष्ट्रीय दलके ऐसे लोगों में बड़ी योग्यता होनी चाहिए। स्वयंसेवकमें— १. बड़ी-बड़ी सभाओंमें शान्ति रखनेकी शक्ति होनी चाहिए। २. राष्ट्रभाषाका ज्ञान होना चाहिए। ३. इशारेसे अपने विचार दूसरे स्वयंसेवकको समझानेकी शक्ति होनी चाहिए।<noinclude></noinclude> hnonhxwmymzdgj5v3qdv4tai7tmhn6r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४८ 250 196467 672120 668852 2026-08-20T11:53:54Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 672120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>&nbsp; ४. कोलाहलको बन्द करनेकी शक्ति होनी चाहिए। ५. भीड़ में रास्ता बनानेकी शक्ति होनी चाहिए। ६. एक साथ, तालबद्ध कूच करनेकी शक्ति होनी चाहिए। ७. किसीको चोट लगनेपर उसके तात्कालिक उपचारका ज्ञान होना चाहिए। ८. लोगोंकी गालियाँ, उनके कटु वचन, प्रहार, ताने-तिश्‍ने वगैरा सहनेकी शक्ति होनी चाहिए। ९. सरकारी दण्ड, जैसे कि जेल इत्यादिको सह सकनेकी शक्ति होनी चाहिए। १०. धीरज, सत्य, दृढ़ता वीरता, अहिंसादि गुण होने चाहिए। इनके अलावा मेरी दृष्टि में स्वयंसेवकों को हमेशा खद्दर पहनना चाहिए। उन्हें नियमपूर्वक यज्ञार्थ सूत भी कातना चाहिए। इस तरहकी तालीमके लिए प्रत्येक प्रान्त में स्वयंसेवक शिक्षागृह होने चाहिए और इसके लिए हमारे देशके अनुकूल पाठ्य-पुस्तकें भी होनी चाहिए। हिंसक सिपाही में जिस शक्तिकी आवश्यकता है, उसमें से हिंसाके अंशको छोड़कर शेष सब शक्ति एक अहिंसक सिपाहीके लिए भी आवश्यक है। परन्तु अहिंसक सिपाही में हिंसक सिपाहीकी अपेक्षा दूसरे बहुतेरे गुणोंकी भी आवश्यकता रहती है। पाठक उन्हें जानते होंगे। '''हिन्दी नवजीवन,''' १७-१०-१९२९ {{c|{{x-larger|'''९. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}} {{right|मसूरी}} {{right|१७ अक्टूबर, १९२९}} चि॰ वसुमती, तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें अलमोड़ा जानेकी सलाह तो फिलहाल मैं नहीं दूँगा। वहाँ आजकल अशान्ति फैली हुई है। मेरे सामने यह भी सवाल है कि प्रभुदासको<ref>छगनलाल गांधीके पुत्र।</ref> वहाँ भेजा जाये या नहीं। किन्तु इस बारे में बादमें देखा जायेगा। यदि तुम्हारी किसी भी पहाड़ी स्थानपर जानेकी इच्छा हो तो कोई दूसरा बन्दोबस्त अवश्य किया जा सकता है। या फिर अलमोड़ा में मथुरादासके साथ तुम्हारे रहनेका प्रबन्ध किया जा सकता है। किन्तु यदि तुम्हारा स्वास्थ्य बीजापुर में ठीक रहता हो तो पहाड़पर जाने से क्या लाभ? तिसपर इन दिनों तो पहाड़ोंपर कड़ाके की सरदी पड़ती है। मसूरी में मैं इस वक्त खूब कम्बल लपेटकर बैठा हुआ हूँ। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (एस॰ एन॰ ९२६७) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 6hfk5824gf2g1jmuugzi71th6a3y7w9 विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६ 4 196812 672043 671604 2026-08-20T09:50:12Z Avantika Shaw 4732 /* पुस्तक सूची */ 672043 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) — # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) — # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 6bspx264ljgzfwv0e1osjki3qx2pf5p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९८ 250 196818 671855 669203 2026-08-19T17:11:42Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 671855 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कमेटीपर छोड़ दें तो नुकसान हो सकता है। आप उसमें जो पसन्द करें ठीक कर दें। वर्किंग कमेटी प्रस्तावको सबजेक्ट्स कमेटी के सामने पेश करती है। वहाँ भी छानबीन होती है और फिर यह आपके सामने पेश होता है। जो प्रस्ताव आपके सामने मेरे नामसे, पण्डितजीके नामसे रखा गया है उसकी छानबीन हो गई है; इसलिए आप इसमें अब कोई परिवर्तन न करें। जरा देखिए, कि इसमें क्या-क्या बातें बतलाई गई हैं। एक चीज तो वाइसरायके बारेमें है। मैं कहूँगा कि जो हिन्दुस्तानकी आजादी चाहते हैं, वे भी बुनियादी उसूल नहीं छोड़ेंगे। उसमें अपनी दृढ़ता और वीरता, बहादुरी नहीं छोड़ेंगे। बहादुरी घमण्ड नहीं है। आपको इसका विरोध नहीं करना चाहिए। सच्चा बहादुर तो दुश्मनकी भी तारीफ करनेपर तैयार होगा। मान लो कि वाइसराय हमारा दुश्मन है। ब्रिटिश सल्तनतका हिन्दुस्तान में प्रतिनिधि है। सल्तनतको दुश्मन मानते हैं, इसलिए मानते हैं कि वह दुश्मन है―लेकिन दुश्मन में भी इन्सानियत होती है। तो इन्सानियत के तौरपर यह बात की गई है――लेकिन वाइसराय तो असर रखता है। हमारी कौमपर हुकूमत करता है। हर इन्सानका खयाल रखना हमारा काम है। यह सत्य है कि वाइसराय सल्तनतको कायम रखनेके लिए काम करता है। परन्तु फिर भी जो कुछ उन्होंने किया है उसके लिए यह लिखा गया है। और चूँकि सबजेक्ट्स कमेटी (विषय समिति) में इसपर बहस हुई थी इसलिए कुछ-न-कुछ इस वक्त यहाँ भी कह दिया है। दूसरे अमेंडमेंट (संशोधन) भी दिये गये हैं――उनके बारेमें भी कह देना चाहता हूँ। एक यह भी कि “मौजूदा हालात में कान्फ्रेंस (परिषद) में नहीं जाना चाहिए” तो ‘मौजूदा हालात’ का लफ्ज निकाल देना चाहिए। इस बारेमें निहायत अदबके साथ मेरा कहना यह है कि ऐसी कोई बात मेरे जहन में नहीं है कि आपके प्रतिनिधिको कान्फ्रेंस (परिषद) में जानेकी जरूरत है। जब भी इग्लैंड मजबूर होगा तो ऐसी बात हो सकती है कि जाना जरूरी हो जाये। मौजूदा हालात में ऐसा मौका नहीं है। लेकिन आ भी सकता है। तो इतना इसके बारेमें कह देना चाहता हूँ कि इससे यह माना जायेगा कि कान्फ्रेंस (परिषद) में जा भी सकते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा हालातमें जा सकते हैं। अगर ‘मौजूदा हालात’ को निकाल दें तो क्या रह जाता है? तो इस चीजको आप नहीं निकाल सकते। एक चीज और है जो सब्जेक्ट्स कमेटी (विषय-समिति) में कही गई थी।कौंसिल के बारेमें कहा गया। मेरे भाई जमनादास मेहताने कहा कि गांधीने यह नहीं कहा है कि कौंसिलोंका बहिष्कार करना चाहिए–तो यह कहना पड़ेगा कि आपको जो चीज पसन्द हो वह करें। कैसा भी बड़ा आदमी हो वह हुक्म तो नहीं दे सकता। मैं क्या हूँ? मैं कोमका बन्दा कीमका नौकर बनकर, प्रस्ताव बनाता हूँ। तो मुझे क्या अधिकार है कि हुक्म दूँ? मैं तो राय दे सकता हूँ। यह साफ है कि बुरे विचारसे नहीं कहता हूँ सब काम और बातको विचार कर यह कहा जाता है। मेरा कहना है कि कौंसिलोंसे बहुत-कुछ मिल सकता है। जितना चाहें ले लें। आप कौंसिलों और एसेम्बलीसे लिया ही करते हैं। जो कुछ चाहें अपने भाइयों और<noinclude></noinclude> hsr54nkttnjyvahz7hdrsk34j07t1o8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९९ 250 196819 671856 669204 2026-08-19T17:20:16Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 671856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―२|३६१}}</noinclude>भतीजोंके लिए आपको मिल सकता है। भाई-भतीजोंको छोड़कर हिन्दुस्तानके लिए भी मिल सकता है। मदरसोंके लिए हजार गुना रुपया मिल सकता है। लोग घरोंमें कुत्ते और बैल भी तो रखते ही हैं। जानवर भी रखते हैं। गुलामोंको भी रखते थे। गाय, कुत्ते, बैलोंको कुछ-न-कुछ मिलता ही है। गुलामोंको खाना तो खिला देते हैं। लेकिन जानवर तो जानवर ही होता है? कौसिंल और एसेम्बलीसे कुछ-न-कुछ मिल सकता है इसमें शक नहीं लेकिन अगर आप आजादी चाहते हैं तो उनसे क्या मिल सकता है? मेरा विश्वास तो मदरसोंके बहिष्कारके लिए भी है और वकीलोंके लिए भी मेरा विश्वास तो बहुत-सी चीजोंके [बहिष्कारके] लिए है। लेकिन चूँकि मैं तो राय देनेवाला हूँ, साथ देनेवाला हूँ――मैं तो वही कहना चाहता हूँ जो और लोगोंकी रायमें भी होनेवाला है। जैसे पण्डित मोतीलालजी――उन्होंने एसेम्बलीका तजुरबा वहाँ बैठकर कर लिया है। उन्होंने एसेम्बलीमें जाकर कुछ-न-कुछ मुल्कका काम किया। और कुछ नहीं तो वे आज कौंसिलोंके खिलाफ हो गये। अब इन लोगोंने देख लिया। पहले इन लोगोंने एसेम्बली और कौंसिलमें जानेका खयाल किया था। मैंने देखा, यह लोग चाहते हैं तो अच्छी तरह काम करके देख लें, क्या होता है। यह आप लोग जानते हैं। आप लोग यहाँ ५ या ६ हजारकी संख्या में आये हैं। आप अपने अनुभवसे कहें कि यह चीज जरूरी है, इसके बिना स्वराज्य मिलने में देरी लगेगी तो आप जरूर इस प्रस्तावको फेंक दें अगर आपका अनुभव कहता हो कि इस चीजसे नहीं दूसरी चीजसे स्वराज्य हासिल करेंगे, तो आप सोच लें। मैं मानता हूँ कि कौंसिलोंसे कुछ नहीं होगा। पण्डित मोतीलालजी भी ऐसा मानते हैं। वह तो अपने तजुरबेसे यह मानते हैं। तो आप उचित समझते हैं तो बायकाट [बहिष्कार] को कायम करें और अमेंडमेंट (संशोधन) को छोड़ दें। अब मदरसोंकी बात आती है। लोग कहते हैं कि मदरसोंका बायकाट (बहिष्कार) क्यों नहीं रखा जाता। मैं तो चाहता हूँ सब लड़के नौजवान भेंट चढ़ जायें। कमसे-कम १६ वर्षसे ज्यादाके जो हैं वह मैदानमें आ जायें लेकिन, क्या वायुमण्डल ऐसा है? मैं तो कहता हूँ कि नहीं है। तालीम उनको क्या मिलती है; २५ करोड़ रुपया शराबमें से, अफीम में से आता है, उससे तालीम पाते हैं――वह तालीम किस कामकी चीज हो सकती है? लेकिन क्या यह समझानेका अवसर है ? इतने वर्ष हो गये. हमने देख लिया। क्या आप समझते हैं कि वकील लोग कचरियोंसे निकलकर पत्थर तोड़ेंगे, चरखा चलायेंगे? एक वकील ऐसा नहीं है। सबको खाना-पीना चाहिए, उनको खर्च चाहिए। वह कहते हैं कि हमारा काम नहीं चलेगा। १९२० में जब वकालत छोड़ने को कहा था तो पण्डित मोतीलाल और देशबन्धु चित्तरंजनदासने तो अपना काम छोड़ दिया था। लेकिन और छोटे-मोटे वकीलोंने नहीं छोड़ा। इसलिए इन सब चीजोको साथ-साथ चलाने के लायक वायुमण्डल नहीं है। इसलिए इन चीजोंको छोड़ दिया गया है। हम यह नहीं कहते कि अपनी वकालत छोड़ अगर वकील रचनात्मक कार्यों में हिस्सा लेनेके लिए गावोंमें जायें तो यह उनके लिए ठीक नहीं<noinclude></noinclude> dwy00m718pxxjzkibrdypgu001d05e0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९२ 250 197012 672013 669401 2026-08-20T09:01:32Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 672013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh|५५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} विद्यालय, अलीगढ़में, १०७; -मेरठ कालेज, मेरठमें, ६९-७०; - सार्वजनिक सभा मेरठमें, ६२-६३; - सर्वेन्ट्स ऑफ पीपल सोसाइटी, लाहौरमें, ३२०-२१; - साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें, ४२४-२६, ४९४; - सार्वजनिक सभा, इलाहाबादमें, १९०-९१; - सार्वजनिक सभा, दिल्ली में, ८८-९० भेंट, -' डेली एक्सप्रेस' के प्रतिनिधिसे, ४३२- ३५; - पत्र - प्रतिनिधियोंसे, ३७१-७२; - समाचारपत्रोंको, ६८ राष्ट्रभाषा, १२१-२२, ३२८-२९ वक्तव्य, - अहमदाबाद मजदूरोंके झगड़े के सम्बन्धमें, १-२; –'न्यूयार्क वर्ल्ड 'को, ३८२-८३ वर्णधर्म और श्रमधर्म, - [१], ४७४-७५, -[२], ४९१-९३, – [३], ५०८- ९, – [४], ५२८-२९ संयुक्त प्रान्तका दौरा, - [६], ४२-४५, - [७], ७४-७८, - [८], ११२- १४, –[९], १६२-६६, – [१०], २०९-१२, –[११], २२६-२९ सन्देश, 'द इंडियन लेबर जर्नल 'को, १२ {{c|'''विविध'''}} अंग्रेज मित्रोंसे, ४३८-४०; अकालमें सहायताका साधन चरखा, ७८; अछूतोंके लिए मन्दिर, २३३-३४; 'अमोघ अस्त्र, ४९८-५००; आगामी कांग्रेस, ४१३-१६; आचरणकी कठिनाई, ४५१-५३; आत्म- संयमकी श्रेष्ठता, १२०-२१; आदर्श मानपत्र, १६७-६८; आश्चर्यजनक परिणाम, ५२- {{Multicol-break}} १८१-८२ ; ५७; उपले या खाद ?, ऊँच-नीच, ८३-८४; एक पत्र, ३९८; एक महत्त्वपूर्ण घोषणापत्र, ८१; एक महत्त्वपूर्ण फैसला, २७२-७३; एक वकीलकी दुविधा, ४८३-८४; एक हो जाइए, ११९; 'कथा- कुसुमांजलि' की प्रस्तावना, ४४७; कांग्रेस, ३८५-९१; कांग्रेस कार्यसमितिके प्रस्तावका मसविदा, १९२; कांग्रेस किसकी ? ; ३०४- ५, कांग्रेस में हिन्दी, ३७५-७६; किंकर्त्तव्य- विमूढ़ पति, २८१-८२; किसानोंके लिए क्या करना चाहिए ?, ३१२-१३; कुएँ और तालाब, ४०२-३ - कुछ प्रश्न, २१३-१६; कुछ महत्त्व के प्रश्न, २५९-६२; कुछ सवाल, ५००-३; क्या अहिंसा छोड़ दी ?, ४४३; क्या यह ग्राम सुधार है, ३-४; खादी और ईमानदारी, २५१-५२; 'खादी प्रदर्शक ', ४७४; 'गांधी-शिक्षण', ४७८, गोवा- निवासी, ३२७; ग्रामसुधार, १५२-५९; चरखेका गूढार्थ, २०६-७; चेचकका इलाज, ४८७-८८; छब्बीसको यह याद रखिए, ४४०-४२; २६ जनवरीकी घोषणाका मस- विदा, ३९५-९७; जब मैं गिरफ्तार हो जाऊँ; ५१६-१८; जमींदार और ताल्लुके- दार, २५०-५१ ; जवाहरलाल नेहरू, ३९१- ९२; झूठी आशाएँ, ५२४-२५; झूठी खबर, २८९; डाकिनीकी आखिरी साँस, २३६-३७; तथ्य यह है, ४६५-६६; तीसरे दर्जेका डिब्बा, २७१-७२; दिवालियेपनकी सीमा, ५२८; देशी राज्य, २३४-३५; देहातकी गलियाँ और सड़कें, ४७९-८०; देहातकी बीमारियाँ, २९०-९१; दो तकुओंवाला चरखा, ४७८; धर्मके नामपर २०८; धर्मक्षेत्रमें {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> polis6sfkiff0ddt3iysb8k650l04qk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९३ 250 197013 671828 669402 2026-08-19T16:06:09Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 671828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||शीर्षक सांकेतिका|५५५}}</noinclude>{{Multicol}} अधर्म, २७४; धर्म-संकट, १८३-८४; नमक और कैंसर, ५१९; नमक-कर, ५१९-२२; नमक निकालनेका इतिहास, ५२३; 'नवजी- वन' कार्यालय, ४४६; नवजीवन ट्रस्ट; २३७-३८; नवयुवक और खेती, १३९-४०; नवयुवक क्या करें ?, ११५-१६ नवयुवक न्यायाधीश, ३७७-७८; निर्वाचित बोर्ड, ३९- ४१; निश्चित परामर्श, ३२४-२६; न्यासका घोषणापत्र, २२१-२५; पत्रलेखकोंसे, ५१३; पर्दाफाश हो गया, ४४७-५१; पशुपालनका आर्थिक महत्त्व, ३९; पूँजीपतियोंका कर्त्तव्य, ३०३-४; पूर्ण स्वराज्य क्यों, ४७१-७२; प्रस्तुत प्रश्न, ४१६-१७; फिर वही प्रश्न, १८२-८३; बमकी उपासना, ३७२-७५; बारडोलीकी कहानी, २५२-५३; बारडोलीकी भूल ?, १३७-३८; बालक बनो, २१८-१९ ; भारतके अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम, ८-९; भार- तीय आलोचकोंसे, ४३५-३७; भौतिक और नैतिक गन्दगी, ८१-८३; -महीन खादी पहनने वालोंसे, २८९-९०; मिल मजदूरोंकी माँग, २८५-८८; मेरठ-षड्यन्त्रके कैदियोंसे बात- चीत, ६०-६२; मेरी असंगतियाँ, ४८५-८६; मेरी चुप्पी, ७-८; मेरी स्थिति, १६०-६१; यह क्रूर प्रथा, ३२६; राक्षसी विवाह, ४५४-५५; राजाओंकी आय, १६१-६२; ५५५ {{Multicol-break}} राष्ट्रीय शिक्षाकी कीमत, १८०; लालाजीकी पुण्यतिथि, ४२; लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा, – [२], ३२९-३१; लुटेरी सरकार, ५०४-५; लोक-वित्त और हमारी दरिद्रता, २३२-३३; ' वकीलोंका कर्त्तव्य, ' ४८५; विचारोंकी अराजकता, २३-२६; विचारोंकी उलझन, ४७२-७३; विद्यापीठका विकास, ३३७-३८; विद्यापीठकी भिक्षा, २८०-८१; शुद्ध मतभेद, २०३-५; शुष्क 'नवजीवन '?, ९०-९२; संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार, २३०-३२; संयुक्त प्रान्त राष्ट्र- सेवा संघ, २७०; संवेदना, १५२; सचित्र खादी तालिका, २०९, सत्याग्रहीकी नियमा- वली, ५१०-१२; सदाबहार पेनिंगटन, ३९१; सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य, ८६-८७; सहयोगकी शर्तें, १४१-४२; सिख नेताओंसे बातचीत, ३३६; सैनिकीकरणका कार्यक्रम, २९९-३०३; स्त्रियाँ और गहने, ३१३-१६; स्त्रियोंका स्थान, ४-६; स्त्रियोंकी दुरवस्था, २८८-८९; स्वतन्त्रता दिवस, ४११- १२; स्वयंसेवकका कर्त्तव्य, ९-१० ; स्वयंसेवक या सरकार ?, ४५-४६; स्वाधीनताके गर्भ में, ४६७-७०; हमारा भ्रम, २५३; हमारे भाईबन्द- पेड़, २४८-४९; हानिकारक ताड़का पेड़, ५२७ {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bjgrmr7k5hb6b465emkyai2yavabqbi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९४ 250 197014 671847 669403 2026-08-19T16:35:27Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 671847 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{c|{{larger|'''अ'''}}}} {{outdent|अंग्रेजी, -भाषा भण्डार, १२२}} {{outdent|अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, १०८ पा० टि०, १९१, ३३०, ३३३, ३३९, ३४६, ३४७, ३५१, ३५६, ३५८, ३६२, ३६८, ३८७}} {{outdent|अखिल भारतीय चरखा-संघ, ४०, ४८, ७२, १००, ११५, १७१, १८३, १८५ पा० टि०, २०२, २०७, २०९, २३१, २५१, २५६, २७०, २७७, २८९, ३१२, ३२६, ३३०, ३४७, ४१५, ४७४}} {{outdent|अखिल भारतीय दलित वर्ग-सम्मेलन, ३२२}} {{outdent|अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, ३१० पा० टि०, ४०७}} {{outdent|अग्रवाल, खेमराज, २९२}} {{outdent|अग्रवाल, मूलचन्द, २९}} {{outdent|अग्रवाल, शंकरलाल, २४७}} {{outdent|अछूत, देखिए, अस्पृश्य}} {{outdent|अजमलखाँ, हकीम, ८८}} {{outdent|अणे, माधव श्रीहरि, ८६ पा० टि०, ३५०}} {{outdent|अनसूयाबहन, १९९, २००, २४१}} {{outdent|अन्तरात्माकी आवाज, का अर्थ देवी या आसुरी सन्देश, ४९०; -को सुनना और मानना सम्भव, ४३५; या षड् रिपु, २४६}} {{outdent|अन्तर्यामी, ४९६}} {{outdent|अन्त्यज, ९२, २३६, २६७, ३०८}} {{outdent|अन्सारी, डा० मु० अ०, ४८, ८६ पा० टि०, ११९, १२२, ३२०, ३३६ पा० टि०, ३५४ पा० टि०, ३७०, ४९५}} {{outdent|अपराध, और दण्ड, ४७३}} {{Multicol-break}} {{outdent|अप्फेल, डा० एल्फ्रेड, ४८५}} {{outdent|अब्दुस्समद, ४४}} {{outdent|अब्बासी, मुहम्मद आदिल, १६}} {{outdent|अभय आश्रम, ७८, ४२८}} {{outdent|अभय, पण्डित देवशर्मा, ४४, ९४, १९६}} {{outdent|अमरसिंह, ३३६ पा० टि०}} {{outdent|अमावाकी रानी, ४७}} {{outdent|अयोध्याप्रसाद, २९८}} {{outdent|अय्यर, पी०, ८६ पा० टि०}} {{outdent|अय्यर, पी० रंगनाथ, १४, ४०, ४१}} {{outdent|अर्जुन, १४०, २३८}} {{outdent|अर्जुन, ४२८}} {{outdent|अर्थशास्त्र, - भारतीय, पाठ्यक्रम, ८-९}} {{outdent|अलवी, १७०}} {{outdent|अलादीन, अली मुहम्मद ए०, १६९}} {{outdent|अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, १०७, १६३}} {{outdent|अलीबन्धु, ४०८}} {{outdent|असहयोग, ११४, १६०, २१३, २३१, २३४, २८१, ३४४, ३८४; -और सत्याग्रह, २५; - उचित शस्त्र, ६१, देखिए बहिष्कार भी}} {{outdent|असहयोग आन्दोलन (१९२१ का), १३७ पा० टि०, २१३; -और लाहौर कांग्रेस द्वारा उसका संकल्पित रूप, ३७१}} {{outdent|अस्पृश्य, ४२, ७५, ७७, ८१, ११४, १६४, २५३, ३२२, ४०८, ४११; - [ों] के लिए मन्दिरोंका खोला जाना, २३३-३४, ३५८-९, ४८९}} {{outdent|अस्पृश्यता, ४०, ६३, ७७, ८१ पा० टि०, ८९, १४२, २२२, २३३, २५३, २६८, २७०, ३०१, ३२२, ३२५, ३५८, ३८३; -रूपी डाकिनीकी आखिरी साँस, २३६-७}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> o34rfh7y30194vjee3v5md2u7auc3m9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९५ 250 197015 672089 669404 2026-08-20T10:53:02Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 672089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||सांकेतिका|५५७}}</noinclude>{{Multicol}} {{Outdent|अस्पृश्यता निवारण समिति, ८१, ३३०, ३४७, ३४८, ४८९}} {{Outdent|अहमदाबाद कपड़ा मजदूर-संघ, १ पा० टि०, २७२-३}} {{Outdent|अहमदाबाद कपड़ा मिल मजदूर-साम्राज्यीय पुरस्कार, २५७, २७२-३, २८६-७}} {{Outdent|अहमदाबाद मिल मालिक संघ, २७२ अहिंसा, ६१, २०४, ३४२, ३४४, ३५४, ३६६, ३७१, ३७३, २७४, ३८९, ४००, ४३४, ४९५, ४९६, ४९८-५००, ५०६, ५११, ५१६३; -और कायरता, ७९; -और हिंसा, ४५१; -और हिंसाहीनता, ४५०; -का तात्पर्य शत्रुके प्रति सौजन्य, ३५३, ३६४; -की राजनीतिक संघर्षमें प्रभावशीलता, ३७२; -की श्रेष्ठतापर अटल विश्वास, ४०१; -को लाहौर-कांग्रेसकी स्वीकृति, ३८१-२; -के मार्ग में एक बड़ी बाधा, ४६९; -को कभी छोड़ा नहीं जा सकता, ४४३; -मुझे सर्वाधिक प्रिय, ५०२; -सिद्धान्त केवल नीति नहीं, ४०८}} {{c|{{larger|'''आ'''}}}} {{Outdent|आंग्ल भारतीय, -और भारतीय ९४}} {{Outdent|आत्म-बल ४९०, ५१०}} {{Outdent|आत्मशुद्धि, ९१, ४०७; -भक्ति द्वारा ही प्राप्त, १४०}} {{Outdent|आत्मसंयम, -और विवाह, २४७; -का पालन विद्यार्थियोंका कर्तव्य, ६९; -की श्रेष्ठता, १२०; -भक्तिके माध्यमसे, १४०; देखिए ब्रह्मचर्य भी}} {{Outdent|आत्मा, २३८, २४६}} {{Outdent|आदम, ४७९}} {{Outdent|आदमी, -ईश्वरकी शेष सृष्टिसे भिन्न है, ४९०}} {{Multicol-break}} {{Outdent|आनन्द, स्वामी, २२२, २३३, २३७, ४४६}} {{Outdent|आप्टे, २६३}} {{Outdent|आफ्टर मदर इंडिया, २०}} {{Outdent|आयंगार, ए० रंगास्वामी, ८६ पा० टि०}} {{Outdent|आर्य प्रतिनिधि सेवा-समिति, ४४}} {{Outdent|आलम, डा०, ३५४}} {{Outdent|आवारी, आवागढ़के राजासाहेब, ४८८}} {{Outdent|आश्रम-समाचार, १०९, २९२, ३१२}} {{Outdent|आश्रम, साबरमती -में विवाह, २४७}} {{Outdent|आसर, लक्ष्मीदास, ३०२}} {{Outdent|आहार, अनपकेके प्रयोग, १२-१३}} {{c|{{larger|'''इ'''}}}} {{Outdent|इंडिपेंडेंट, २९९}} {{Outdent|इंडियन ओपिनियन, ४०४, ४६०}} {{Outdent|इंडियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस, २१८ पा० टि०}} {{Outdent|इंडियन लेबर जर्नल, १२}} {{Outdent|इंडियन सैंडहर्स्ट स्कूल, देहरादून, ७४}} {{Outdent|इन्द्रजी, जयकृष्ण, ३१६}} {{Outdent|इन्द्रप्रस्थ गुरुकुल, १६२}} {{Outdent|इन्सीडेंट्स ऑफ़ गांधीजीत लाइफ़, २४४ पा० टिο}} {{Outdent|इमर्सन, -का वचन संगतिपर, ४८५}} {{Outdent|इविन, लॉर्ड, ३, ८६, ९३ पा० टि०, ११९, १३१, १९१, १९८, २१५, २३५, २५४ पा० टि०, २५९, २६०, २६१, २६३ पा० टि०, ३०८, ३१०, ३२२, ३३३, ३४२, ३४३-४४, ३४६, ३५२, ३५७, ३६४, ३८२, ४३५, ४३८, ४४९, ४६५, ४६६, ४८६, ४९६, ५००, ५१४, ५२८ -के विचारोंकी उलझन, ४७२-३; -पर बम फेंकनेकी निन्दा, ३२९, ३५२, ३७२-३}} {{Outdent|इविन, लेडी ३२९, ३५३}} {{Outdent|इलाहाबाद विश्वविद्यालय, १८७}} {{Outdent| इस्लाम, १०७, १६३}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> sc9mg4f1uo6nuoe4gn6s6ojpt6gqwlq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७५ 250 197134 671936 671563 2026-08-20T06:14:15Z Kumari Arpana Sinha 2191 671936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''भाषण : अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|१३३}} हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ? लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी; भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे। ६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ? यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ? मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला। जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण करनेकी शक्ति दे। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|२६ मार्च, १९३०}} सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो । हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है। सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude> 7hnohad0yyosh1l3i0rap2wxnlenc4u 671958 671936 2026-08-20T07:17:12Z Kumari Arpana Sinha 2191 671958 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''भाषण : अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|१३३}} हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है? लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी; भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे। ६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा? यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है? मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला। जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण करनेकी शक्ति दे। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|२६ मार्च, १९३०}} सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो । हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है। सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude> 4tptpo4fsh80f5816gbnbybputdja56 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११२ 250 197156 671978 669672 2026-08-20T08:02:03Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671978 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्थानीय सम्मेलनका व्याख्यान द्वारा प्रचार कार्य। एक तीसरे विभागकी और आवश्यकता है, और वह है शिक्षाको सुलभ करनेके उपायोंका संशोधन। तज्ज्ञ और तत्परायण शिक्षक पाठ्यक्रमको शीघ्रतासे सफल बनानेके लिए प्रतिदिन उपायोंकी खोज करते रहते हैं। बंगला और असमिया भाषाओंके बहुतेरे शब्द हिन्दीसे मिलते-जुलते हैं। इस विषयपर परिचय करानेवाली पुस्तकें लिखना, स्वयंशिक्षक तैयार करना, हिन्दी-बंगला और बंगला-हिन्दी के छोटे-छोटे शब्दकोश प्रकाशित करना और नागरी लिपि में बंगला पुस्तकें तथा बंगला लिपिमें हिन्दी पुस्तकें छापना आदि काम बहुत ही जरूरी हैं। ऐसी पुस्तकें स्वावलंबी बन सकती हैं, जैसे कि मद्रासमें आज लगभग बन चुकी हैं। जब पुस्तकें सचमुच ही उपयोगी और अच्छी होती हैं, तब उनकी प्रतिष्ठा अपने-आप बढ़ जाती है और लोगोंसे उन्हें प्रोत्साहन भी खूब मिलता है। एक बात और। बंगाल मारवाड़ी व्यापारियोंका एक बड़ा केन्द्र है। बंगालमें हिन्दी-प्रचारका काम इन्हीं भाइयोंकी एक खास जिम्मेदारी है। अतः इस प्रचार कार्य में धनाभावके कारण कोई रुकावट नहीं पड़नी चाहिए। {{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' १३-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६०. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ मीरा,}} जबतक समय है, तुम्हें पत्र लिखने चाहिए और वह भी पूरे विस्तारसे या जितने विस्तारसे लिखनेका समय मिले उतने विस्तारसे। कलका प्रदर्शन अहिंसाकी विजय थी। मैं जानता हूँ कि इस संग्राममें हर जगह और हर समय ऐसा ही नहीं होगा, परन्तु यह एक महान् और अच्छा प्रारम्भ था। तुम धीरज रखना, किसी बातकी चिन्ता न करना और उन लोगोंके प्रति उदार बनना जो तुम्हारी इच्छानुसार न बरतें। तुम्हारा मुख्य काम स्त्रियों और बच्चोंमें है। निगाह रखना कि रेजिनाल्ड अपनी सँभाल रखे और उतावली न करे। हर बात पूरी तरह व्यवस्थित होनी चाहिए। तुम्हारा रोजनामचा पूरा रखा जाये। और मेरी चिन्ता न करना। जबतक भगवान्‌को मेरी जरूरत है, वह मुझे ठीक रखेगा। सस्नेह, {{right|'''बापू'''}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४२६) से; सौजन्य : मीराबहन; जी॰ एन॰ ९६६० से भी।<noinclude></noinclude> gejs4es8rfp9q93ypn4t3ofqvkb10gb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११३ 250 197157 671979 669673 2026-08-20T08:03:56Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''६१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|प्रिय जवाहरलाल,}} आशा है, तुम्हें मेरा वह पत्र<ref>देखिए "पत्र जवाहरलाल नेहरूको", ११-३-१९३०।</ref> मिल गया होगा, जो आखिरी हो सकता था। मेरी होनेवाली गिरपतारीकी जो खबर मुझे दी गई थी, वह बिलकुल विश्वस्त बताई गई थी। परन्तु हम दूसरी मंजिल तक सुरक्षित पहुँच गये हैं। तीसरी आज रातको शुरू करेंगे। मैं तुम्हें कार्यक्रम<ref>पद उपलब्ध नहीं है, देखिए "सत्याग्रही दलका कूच" ९-३-१९३०।</ref> भेज रहा हूँ। सभी साथियोंका आग्रह है कि मुझे कार्य समितिके लिए अहमदाबाद नहीं जाना चाहिए। इस सुझावमें काफी बल है। इसलिए कार्य समिति उस जगह आ जाये, जहाँ उस दिन हम हों या तुम अकेले आ सकते हो। यह भावना कि हम लड़ाईको पूर्ण किये बिना स्वेच्छासे वापस नहीं लौटेंगे, अच्छी तरह पोषित की जा रही है। मेरे वापस जानेसे इसमें कुछ बट्टा लग जायेगा। जमनालालजी ने मुझे बताया कि उन्होंने इस बारेमें तुम्हें लिखा था। आशा है, कमलाका स्वास्थ्य अच्छा होगा। मैंने कल कह दिया था कि तुम्हें पूरे तार भेजे जायें। {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} {{right|'''बापू'''|2em}} {{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स'''|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६२. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}} {{right|१३ मार्च १९३०}} {{left|प्रिय रेनॉल्ड्स,}} अपना पूरा ध्यान रखना। 'यंग इंडिया' की देख-रेख करनेके अलावा आश्रमके कार्यों में भी पूरे तन-मनसे रुचि लेना। मेरी लालसा है कि यह शान्ति, शुचिता और शक्तिका घर बन जाये तुम्हें मैं इस कामको आगे बढ़ानेके लिए विका भेजा वरदान मानता हूँ। {{right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४३१ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया।<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> 46zp40q0068p203efwbtyhiftmpz9am पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११४ 250 197158 671980 669674 2026-08-20T08:05:09Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671980 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''६३. पत्र : गंगाबहन झवेरीको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ गंगाबहन झवेरी,}} मैं समझता हूँ कि तुम संयुक्त रसोईमें शामिल हो गई होगी; लेकिन क्या तुम रहोगी भी छात्रालयमें ही? नानीबहनको दूध और फलोंपर ही रहना होगा। यदि वह ऐसा करेगी तो उसकी तबीयत अवश्य ठीक हो जायेगी। यह बहनोंके लिए अपूर्व अवसर है। यदि आश्रमकी आन्तरिक प्रबन्ध-व्यवस्थाका भार बहनें अपने कन्धोंपर उठा लेंगी तो मैं समझता हूँ यह एक महान् कार्य होगा। अधिक लिखनेके लिए समय नहीं है। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३०९९) की फोटो-नकलसे। {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६४. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ प्रेमा,}} तू पागल तो है ही, लेकिन तेरा पागलपन मुझे प्यारा लगता है। तू आशासे अधिक अनन्यतासे काम कर रही है और ईश्वर तेरा शरीर पूर्ण स्वस्थ रख रहा है। अधीर मत होना। आवाजको हलकी करना। धीरे-धीरे बोलनेसे गलेकी गिल्टियोंको नुकसान नहीं होगा। कुसुमसे कहना कि उसकी जीभका अभी थोड़ा और उपचार बाकी है; जब डाक्टरकी इच्छा हो तब यह इलाज कराया जाये। मुझे पत्र लिखना । ज्यादा लिखनेका मुझे समय नहीं है। {{right|'''बापू'''}} {{left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो–५ : कुमारी प्रेमाबहेन कंटकने'''|1em}}<noinclude></noinclude> jqnzp72e0yf0efamouf5ag1cgr7jysd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११५ 250 197159 671982 669675 2026-08-20T08:09:29Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671982 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''६५. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ कुसुम<ref>आश्रमवासी पुरुषोंकी अनुपस्थितिमें कुसुम देसाई आश्रमके मन्त्रीके रूपमें काम किया करती थीं।</ref>,}} तेरा पत्र मिला। यह पत्र कल मिलना चाहिए था, परन्तु प्यारेलाल भूल गये। आज जब बा का पत्र पूरा कर रहा था, तब यह मेरे हाथमें आया। छात्रालय में जानेका निश्चय हुआ, यह बहुत ठीक हुआ है। अब दूधीवनको समझाना। वे अलग रहती हैं इसके बजाय छात्रालय में रहें तो उनकी देखभाल की जा सकती है। सरोजिनीको काममें लगा देना। उसे जोर देकर कहनेमें संकोच मत करना। शांतुके<ref>चरखा संघका विद्यार्थी।</ref> दाँत हरिभाईको<ref>अहमदाबादके डाक्टर श्री ह॰ म॰ देसाई।</ref> दिखा देना। सब बीमारोंकी खबर देना। डायरी लिखना न भूलना। 'गीता 'का अध्ययन अच्छी तरह करना। गुजराती फाइल निबटा डालना। दिन-भरका कार्यक्रम भेज देना। मुझे कब पकड़ा जायेगा इसका कोई पता नहीं चलता। जब इच्छा हो तब पकड़ें। तू तो नियमपूर्वक पत्र लिखती रहना। अभी एक दिन तो वहाँसे मोटर आयेगी।<ref>अहमदाबादसे।</ref> फिरसे हरिभाईके बारेमें लिखनेका प्रयत्न करना।<ref>कुसुम देसाई अपने दिवंगत पति हरिभाई देसाईका जो जीवन-वृत्तान्त लिखनेवाली थीं उसकी ओर संकेत किया गया है।</ref> हारना नहीं। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी॰ एन॰ १७९२) की फोटो-नकलसे। {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६६. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ महादेव,}} तुम्हारा पत्र मिला। भगवान् तुम्हें सब कुछ देगा। हम कह सकते हैं कि आश्रमने अभी तक अपने नामको रोशन किया है। तथापि जिसे सही अर्थोंमें जागृति कह सकते हैं वह तो अभी आनी बाकी है। हम अपनी इस छोटी-सी सफलतापर एकदम खुशीसे फूल नहीं सकते। यदि मैं गिरफ्तार न होऊँ तो तुम चक्कर लगा<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> nwkcrskv7lkmerpt177uwxsvxtykgjw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११६ 250 197160 671984 669676 2026-08-20T08:11:54Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>ही जाना। दुर्गाको उपवाससे जो हानि-लाभ हुआ हो, मैं उसका ब्योरा जानना चाहता हूँ। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{left|'''[पुनश्च :]'''}} मेरा उसे अलग से पत्र लिखनेका विचार था लेकिन अब नहीं लिखता। गुजराती (एस॰ एन॰ ११४७१) की फोटो-नकलसे। {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६७. भाषण : बारेजामें'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} कूच करनेके बाद यह हमारा दूसरा पड़ाव है और जिस प्रकार पहले पड़ाव पर मुझे गाँवके बारेमें जानकारी मिल गई थी उसी प्रकार यहाँ भी मिली है। उसे पढ़कर मुझे दुःख हुआ है। अहमदाबादके इतने पास होनेके बावजूद खादीकी खपत, खादी पहननेवाले तथा चरखेके खानोंमें शून्य लगा हुआ है। उत्तर और दक्षिण भारतके अपने दौरेके समय मैंने खादी पहननेवाले हज्जामसे ही हजामत करानेका नियम बना लिया था। किन्तु यहाँ तो आप खादीसे बहुत दूर हैं। खादी स्वतन्त्रताकी लड़ाईकी नींव है। खादी सभीको प्रिय है; किन्तु आजकल खादीके बारेमें लोग कुछ ऐसा मानने लगे हैं कि यदि हम खादी पहनेंगे तो जेल जाना पड़ेगा और जान देनी पड़ेगी। यह तो बहुत ही दुःखकी बात है कि बारेजा गाँवमें खादी पहननेवाला एक भी व्यक्ति नहीं है। यहाँ खादी भण्डार है; आप इस कमीको तो निश्चय ही दूर कर सकते हैं। मोटी या कुरूप होनेके कारण हम अपनी माँ को छोड़कर उसके बदले किसी अन्य सुन्दर महिलाको माँ नहीं मान लेते। विदेशी कपड़ोंसे हमें स्वाधीनता कभी नहीं मिल सकती। मैं आप सब लोगोंसे प्रार्थना करता हूँ कि ऐश-आरामको छोड़कर आप इस ढेरमें से खादी लें। आजकल सरदार तो जेल में हैं; और मैं आपसे यह कहने आया हूँ कि आप हमारी इस लड़ाईमें भाग लें। आप सब लोग सोच-विचार करके इस लड़ाईमें भाग लेनेके लिए तैयार रहें। आज हमारे गाँवोंकी हालत अनेक प्रकारसे चिन्ताजनक हो उठी है। इन सैनिकोंकी मदद से आप अपने गाँवोंकी सफाई कर सकेंगे। इस काम में बहुत ज्यादा समय नहीं लगता। थोड़ी जागरूकता और कुशलताकी ही जरूरत होती है। यहाँकी आबादी तो २५००के लगभग है। आप चाहें तो इस गाँवको चमका सकते हैं। और जितनी चाहें, उतनी सुविधाओंकी व्यवस्था कर सकते हैं। यदि आप यह काम करेंगे तो इससे आपको खेतीके काम में भी मदद मिलेगी और उससे आपमें शक्ति भी आयेगी। स्कूलोंमें जो शिक्षा दी जाती है उसे मैं सच्ची शिक्षा ही नहीं मानता। इस गाँवमें ईसाई और मुसलमान भी काफी संख्या में हैं। आप सब<noinclude></noinclude> t75wnmo2qj4a1nb85vcsik32gvyxin6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११७ 250 197161 671986 669678 2026-08-20T08:13:22Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671986 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : नवागाँवमें|७५}}</noinclude>मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं। पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करनेके लिए तो हम सबको एक होना ही पड़ेगा। भंगियोंके बारेमें तो आप यही मानते हैं न कि वे इस धरती के अधमतम प्राणी हैं। हम उनके लिए तो कुछ करते ही नहीं। उन्हें नीच मानकर हम स्वयं ही नीच बन जाते हैं। किन्तु मैंने जो कुछ कहा उसके सिवा मैं फिलहाल कुछ और बातें कहना चाहूँगा। यह सरकार जो जुल्म कर रही है हम तो उसके मुकाबिले स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका संकल्प करके निकले हैं। यदि हम अपनी ही व्यवस्था नहीं कर सकते तो शासन कैसे चलायेंगे? अतः आपको व्यवस्थित बननेकी चेष्टा करनी चाहिए। आप गोरक्षाके बारेमें भी विचार करें। इस दलमें मेरे साथ गायसे सम्बन्धित समस्याके विशेषज्ञ भी हैं। वे इस मामलेमें आपकी सहायता कर सकेंगे। आप धीरे-धीरे सुधार करते हुए गोरक्षाके प्रश्नको भी हल कर सकते हैं। आप इन सब बातों पर विचार करें। हमने सरकार के विरुद्ध जो लड़ाई ठान दी है उसमें दस-बीस या लाखों व्यक्तियोंके काम आ जानेपर भी यह लड़ाई खत्म होनेवाली नहीं है। और हमें ये सभी काम साथ-साथ ही करने हैं। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १६-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६८. भाषण : नवागाँवमें'''}}}} {{right|१३ मार्च, १९३०}} खेड़ा जिलेमें प्रवेश करते हुए मुझे कड़वे-मीठे कुछ संस्मरण याद आ रहे हैं। खेड़ा जिलेमें काम करके ही मैं आपके जीवन में घुल-मिल सका हूँ। मैंने यहाँके लगभग सभी गाँव देखे हैं। बहुत-सी जगहों में पैदल गाँवमें घूमा हूँ। मैं अब इस नवागाँवमें लड़ाईके दिनोंमें आया हूँ। हमारा यह तीसरा पड़ाव है। पहला पड़ाव असलालीमें था, दूसरा बारेजामें और अब तीसरा नवागाँव में है। वल्लभभाईको खेड़ा जिलेसे बहुत आशा थी। इस जिलेमें गिरफ्तार होकर उन्होंने सम्मान अर्जित कर लिया। सरकारने कोई मनमाना बहाना ढूंढकर उन्हें पकड़ लिया क्योंकि सरकार यह जान गई थी कि यदि वे बाहर रहेंगे तो खेड़ा जिलेमें सरकारकी हुकूमत नहीं बल्कि वल्लभभाईकी हुकूमत चलेगी। सरकारने तो मनमाने ढंगसे मजिस्ट्रेटपर दबाव डालकर नोटिस निकलवा दिया और वे पकड़ लिये गये। जहाँका वातावरण ही कलुषित हो, वहाँ बेचारा मजिस्ट्रेट क्या करें। अबतक हममें इतना त्याग और आत्मविश्वास नहीं आ पाया है कि कोई मजिस्ट्रेट सरकारसे यह कह सके कि ऐसा नोटिस मैं नहीं निकाल सकता। सरकार द्वारा दिया जानेवाला वेतन किस कामका है? और फिर यह वेतन देता कौन है? वेतन देनेवाला तो ईश्वर ही है, यह बात मजि-<noinclude></noinclude> 7thmy1bfdh2zwq4ck108ymwqpe4rrx2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११८ 250 197162 671989 669679 2026-08-20T08:15:23Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्ट्रेटको समझानेवाला मैं कौन होता हूँ? मेरी क्या बिसात है? मजिस्ट्रेटके लिए तो ईश्वर, खुदा, परवरदिगार सब कुछ सरकार ही है। खेड़ा जिलेकी पाटीदार और धाराला, दोनों जातियाँ बहादुर हैं। इन जातियोंके लोग ऐसी सरकारके विरुद्ध क्या करेंगे, यह पूछने के पहले [मैं बता दूं कि] आपके सभी मतादारोंने मेरे सामने बड़ी बहादुरी दिखाई है।<ref>विभिन्न गाँवोंके मतादारों और मुखियोंने इस्तीफे दे दिये थे। देखिए "भाषण : वासणामें", १४-३-१९३०।</ref> उन सभीने जब मुखियापद न लेनेका निर्णय किया तो दूसरे मुखियोंने इस्तीफे दे दिये। आप सबने इस्तीफे दिये इसके लिए मैं आप सबको धन्यवाद देता हूँ। यदि आप सबने किसी दबावमें आकर इस्तीफे दिये हों तो मैं आपसे कहूँगा कि आप अपना-अपना इस्तीफा वापस ले लें। इससे मुझे दुःख नहीं होगा; इतना ही नहीं बल्कि दबाव डालनेवालोंके विरुद्ध मैं आपकी रक्षा करूँगा। यह सत्यकी लड़ाई है, झूठी मदद लेकर मैं जीत हासिल नहीं करना चाहता। लगातार कई दिन रातके हृदय-मंथनके बाद मैंने इस आखिरी लड़ाईमें अपनी जानकी बाजी लगा दी है तथा अपने साथियोंको भी इस तरह अपने प्राण न्योछावर कर देनेके लिए मैंने साथ ले लिया है। मुझे तो सत्यके बलपर ही यह लड़ाई जीतनी है। इसमें यदि आप मेरा साथ देंगे तो अच्छा है। यदि आप इस्तीफा न दें तो उससे भी मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वराज्य प्राप्त कर लेनेके बाद तो भंगी भी वल्लभभाईको धमका सकेगा। वल्लभभाई जेलमें कहा करते थे कि चपरासीसे लेकर ऊपरके सभी अधिकारी भारतीय हैं, ऐसी स्थिति में मैं उनसे क्या लड़ें। आप इस बातको याद रखें। इस सरकारके राजमें तो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली बात है। मेरे-जैसे व्यक्ति के लिए तो इनकी बन्दूकें और गोला-बारूद कंकर और धूलके समान हैं। किन्तु आपको फिलहाल काम करके इस सरकारको अपनी ताकत दिखानी है। यदि आपको पूर्ण स्वराज्य लेना हो तो मुखिया और मतादारोंको अपने वचनका पालन करना चाहिए। मुखिया और मतादार तुलसीदासजी के इन वचनोंका पालन करें: {{c|रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुं बरु वचनु न जाई।}} यहाँ उपस्थित सभी लोगोंके सामने मैं यह याद दिला देना चाहता हूँ कि आप मेरी बात सुननेके बाद सच-सच कहें कि आपमें इस्तीफा देनेकी हिम्मत है या नहीं। खेड़ा जिलेके निवासियोंने मुझे अपने प्रेमसे शराबोर कर दिया है। इस जिलेके निवासी पहले वचन देकर फिर मेरी पीठमें छुरा न भोंके। यदि आप ईमानदारीसे अपने इस्तीफे वापस ले लेंगे तो मैं आपको बहादुर मानूंगा और जमे रहेंगे तो भी बहादुर मानूंगा।<ref>इसपर मुखिया तथा मतादारोंने बताया कि उन्होंने खेच्छासे इस्तीफे दिये हैं तथा मुखियाने गाँवकी ओरसे १२५ रु० गांधीजी को भेंट किये।</ref> राम-राज्यकी स्थापनाके लिए हमने<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> cjalydcmnd9z1iv5bwh58v8chyn1km2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११९ 250 197163 671990 669680 2026-08-20T08:17:21Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||बातचीत : समाचारपत्रोंके प्रतिनिधियोंसे|७७}}</noinclude>जो लड़ाई छेड़ी है उसमें गरीब-अमीर सभी मुझे आर्थिक सहायता देनेको तैयार हैं किन्तु आपसे तो मैं बलकी आशा करता हूँ। यदि आप मेरे पीछे-पीछे नमक बनाने निकलेंगे तो उससे मेरा सवा सेर खून बढ़ जायेगा। आप सबको अपने रास्तेपर लाकर मैं सभीको यशका भागी बनाना चाहता हूँ। मैं आपसे इस्तीफे माँग सकता हूँ, पैसे माँग सकता हूँ किन्तु फिलहाल तो मैं इस लड़ाईके लिए सैनिक माँगता हूँ। इस नमक कानूनको तो स्त्री-पुरुष, युवा और बच्चे सभी तोड़ सकते हैं। मैंने नवागाँव के आँकड़े देखे हैं। इस एक हजारकी बस्ती में सिर्फ एक खादीधारी है और कसम खानेको एक चरखा है। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि अबसे आप खादीका व्रत लें। ऐसा करके आप हर साल ५,००० रुपये बचा सकेंगे। बहनें भी चरखा चलाकर अपनी काफी शक्ति बढ़ा सकती हैं। आप यह याद रखें कि आपने जो इस्तीफे दिये हैं उसके पीछे मुझे भगवान्का हाथ दिखाई देता है और खेड़ा जिलेमें यह शुभ मुहूर्त हुआ है। भगवान्‌को मेरे हाथों इतना काम कराना है; इसलिए मैं अपने जीवनकी यह आखिरी लड़ाई लड़ रहा हूँ। मैंने जो अपना हाड़-पंजर आपके सामने खोलकर रख दिया है, उसको चलाने-फिरानेवाला तो ईश्वर है और यदि कोई अच्छा काम कराना होगा तो वही उसे करेगा। अब हम रामनाम लेते हुए अलग हो जायेंगे। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १६-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''६९. बातचीत : समाचारपत्रोंके प्रतिनिधियोंसे'''<ref>यह बातचीत प्रातःकालीन प्रार्थना सभा के बाद हुई थी।</ref>}}}} {{right|नवागाँव<br>१४ मार्च, १९३०}} समाचारपत्रोंके जो प्रतिनिधि यहाँ उपस्थित हैं उन्हें मैं कुछ आश्वासन देना चाहता हूँ क्योंकि मैंने आश्रमके नियमोंके बारेमें कुछ सख्ती बरती है। मैं लोगोंसे भीख माँग रहा हूँ; हालाँकि मुझे भीख माँगनेका अधिकार नहीं है। अतः लोगोंकी भिक्षाके बलपर मैं सबको अपने साथ नहीं ले जा सकता। हमें वर्तमान समाचारपत्रोंकी सहायता की आवश्यकता तो है ही। किन्तु इस लड़ाईका स्वरूप कुछ अलग ही है। यदि इस लड़ाईके प्रति उनके मनमें श्रद्धा हो तो उन्हें इसमें मदद देनी चाहिए। मेरी वजहसे किसीको कुछ लिखनेकी जरूरत नहीं; वे चाहें तो मेरी आलोचना भी कर सकते हैं। गाँवके लोगोंसे मैं नपा-तुला सीधा लेता हूँ; और नियमानुसार कोई भी उससे अधिक नहीं ले सकता। सभी आश्रमवासियों और समाचारपत्रोंके प्रतिनिधियोंसे मैं प्रार्थना करता हूँ कि यदि उन्हें किसी अतिरिक्त चीजकी आवश्यकता हो तो वे मेरी अनुमतिसे ही वह चीज ले सकते हैं। आखिरकार [पत्र] प्रतिनिधि भी तो परोपकारका ही काम करने आये हैं न?<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> slx4fi6plq2yglkjpi8gmxjzn1td0k8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२० 250 197164 671991 669681 2026-08-20T08:19:12Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671991 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude> ७८ मनुष्योंकी यह टुकड़ी जो-कुछ करेगी, लाखों लोग उसका अनुकरण करनेको निकल आयेंगे। यदि हम अपनेमें त्याग-वृत्तिका विकास नहीं करेंगे तो लोग हमारी निन्दा करेंगे। यदि लोगोंको हमारे बारेमें जरा भी अविश्वास होगा तो वे इस पूरी लड़ाईकी ही निन्दा करेंगे। इसलिए हमें जोर-जबरदस्तीसे नहीं बल्कि प्रेमसे ही काम करना है। जिस प्रकार पर्वत रजकणोंका समूह है उसी प्रकार संसारके सभी महान् कार्य सजातीय हैं। यदि हम कोई विजातीय कार्य करेंगे तो उसका परिणाम कुछ और ही होगा। गंगामें हर तरहके पानीको पवित्र करनेका गुण है। इसी कारण हर तरहकी गन्दगीको वह अपनेमें समा लेती है। यदि सत्याग्रही सत्यको पहचानकर यह लड़ाई लड़ेंगे तो हिन्दुस्तानकी तो बात ही क्या, वे सारी दुनियाको यह बता सकेंगे कि यह धर्मयुद्ध है। कल मैंने जो भाषण दिया था वह भी मेरी सबसे प्रार्थना ही थी। जो बीमार पड़ता है वह अपनी लापरवाहीके कारण ही बीमार होता है। बीमार पड़ जानेवाले लोगोंके लिए यह नियम रखा है कि जो जहाँ बीमार पड़े उसे वहीं छोड़ दिया जाये। मैं आप सबसे नहीं मिल सकता इस बातका तो मुझे दुःख है ही। इसलिए आपको जब कभी काम हो तो आप मुझसे मिल लें। मुझपर कामका भार होनेके कारण आपसे मिलनेका मुझे समय ही नहीं मिलता। मैं सब लोगोंको यह सलाह दूंगा कि विशेष रूपसे अनुमति प्राप्त किये बिना कोई व्यक्ति यहाँ न आये। पहलेसे अनुमति लेकर ही कोई व्यक्ति हमारे साथ चल सकता है। मैं चाहता हूँ कि जिन लोगोंको यहाँ आनेके बाद लौट जानेकी इच्छा होने लगती है वे जहाँ रहते हों वहीं रहकर अपना काम करें, सभीको सविनय कानून भंग करना सिखायें और स्वयं भी उसका पालन करें। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १६-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''७०. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}} {{right|१४ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ वसुमती,}} तुम्हारे लिए जो व्यवस्था की गई है उसकी मुझे पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। अपनी दिनचर्या लिख भेजना। तबीयतका समाचार देना। 'गीता' का अनुवाद ठीक-ठीक समझमें आता है या नहीं सो मुझे लिखना । इसे ध्यानपूर्वक पढ़ना। मन पूरी तरहसे शान्त रहता है या नहीं? {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{left|[ पुनश्च :]}} कमलाको आशीर्वाद। वह क्या काम करती है? गुजराती (एस॰ एन॰ ९२८१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> 5ntkgaxr7lp9it3oezou9y04qkk7mc5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२१ 250 197165 671993 669682 2026-08-20T08:20:22Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''७१. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}} {{right|१४ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ सुशीला,}} तुम्हें कितनी बधाई दूँ? अपने विवाहसे पहले जब तुम मुझसे पहली बार मिली थी तुम्हारी दृढ़तासे तो मैं तभी परिचित हो गया था। लेकिन तुमने प्रकट रूपसे जिस दृढ़ताका परिचय दिया है वह तो मेरी धारणासे भी कहीं अधिक है। यदि तुम्हारा मन वहाँ शान्त न रहे तो अकोला जानेमें तनिक भी संकोच न करना। तुम्हारा मन शान्त रहे, तुम्हारा और सीताका स्वास्थ्य अच्छा रहे तो तुम्हारे वहाँ रहनेकी बात मुझे अच्छी लगती है। क्योंकि इस समय आश्रम स्त्रियोंके लिए सर्वोत्तम पाठशाला है। वहाँ आजकल जो अनुभव मिल रहा है वह अन्य किसी समय नहीं मिलेगा। मणिलालकी चिन्ता तुम कदापि न करना। भगवान्ने उसे स्वास्थ्य तो अच्छा ही दिया है और वह भोला बादशाह किसी बात में दुःख नहीं मानता। उसकी बहादुरीकी तो कोई सीमा नहीं। उसे क्या परेशानी हो सकती है? वह मेरी सेवामें रहता है। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी॰ एन॰ ४७६५) की फोटो नकलसे। {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''७२. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{right|१४ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ कुसुम,}} कृष्णकुमारीकी आंखें जलती हों तो उसे हरिभाईको दिखाना। चन्द्रकान्तासे कहना कि उससे मैं बड़ी आशा रखता हूँ। शान्तुके दाँत हरिभाईको दिखा देना और जो हिलते हैं उन्हें उखाड़ देने को कहना। धीरूके और अन्य कोई बीमार हो तो उनके स्वास्थ्यके समाचार भेजना। अपनी दिनचर्या भेजना। रहनेकी कोठरी अलग ही है न? वहाँ कैसा लगता है? {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (जी॰ एन॰ १७९३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> mhakmu9cwbb3ofzph16vn52apmnp2jq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२२ 250 197166 671994 669683 2026-08-20T08:22:03Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''७३. भाषण : वासणामें'''<ref>यह सभा दोपहर बाद ३ बजे हुई थी।</ref>}}}} {{right|१४ मार्च, १९३०}} आप लोगोंने हमारा बड़े उत्साहसे स्वागत किया है और कोई कसर नहीं रखी। आपने यह मण्डप बनाया और मेरे लिए एक झोंपड़ी तैयार की। मुझे वह बहुत अच्छी लगी है। आपने मेरी रुचिके अनुसार व्यवस्था की, इससे मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। किन्तु आपके गाँवके बारेमें मेरे मनमें एक तरहकी शंका उठ खड़ी हुई है, जिसे मैं एक सत्याग्रहीके तौरपर आपको बताना चाहता हूँ। मनुष्यका अपने मनके सभी विचारोंको प्रकट करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। किन्तु मैं तो अपनेको बहुत व्यावहारिक मानता हूँ। जो व्यावहारिकता जगत्के कल्याणके विरुद्ध हो, वह सर्वथा त्याज्य है। अपने इस दृष्टिकोण के कारण मैंने या मेरे संगी-साथियोंने कभी कुछ गँवाया नहीं है। मेरे साथ दलमें पाँच अन्त्यज हैं और कुछ मुसलमान भी इसमें शामिल हो सकते हैं। 'यह व्यक्ति ऐसे लोगोंको साथ लाता है इसलिए उसे तो गाँवके बाहर ही ठहराना चाहिए', ऐसा सोचकर कहीं आपने अपनी मुसीबत तो नहीं टाली है? इस बारेमें पहले मैंने लोगोंसे जाँच करनेको कहा; किन्तु बादमें मैंने इस सभामें ही यह बात पूछना तय किया। मेरे पास तो जो कुछ भी है वह सब आपको सौंपकर मुझे जलालपुर पहुँचना ही है। मेरे साथ तो सिर्फ विद्यार्थी हैं। सच्चे विद्यार्थी वे हैं जो हमेशा ज्ञानके भूखे होते हैं और जो जगत्‌को पाठशाला तथा प्रकृति व मानव-जातिको पुस्तक समझकर उसकी गुत्थियोंको सुलझाकर कुछ सीखनेका प्रयत्न करते हैं। बहुत से सन्त लिखना पढ़ना नहीं जानते थे किन्तु अच्छी तरह सोच-विचार सकते थे इसलिए वे ऐसे ही विद्यार्थी थे। यहाँके अन्त्यजोंके मुहल्लेका निरीक्षण करनेके लिए मैंने कुछ लोगोंको भेजा था। यह तो सत्य और अहिंसाकी लड़ाई है, और हम सच्चे सत्याग्रही हैं; इसलिए आप मेरी इस भविष्यवाणीको सच मानें कि एक दिन ऐसा आयेगा जब अंग्रेजोंको हमसे माफी माँगनी पड़ेगी। श्री वल्लभभाईने जान-बूझकर अंग्रेजोंकी मदद करनेमें रात-दिन एक कर दिया। उन्होंने जनताकी सेवा की और उसका बदला सरकारने उन्हें गिरफ्तार करके चुकाया है। मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि श्री वल्लभभाई-जैसे व्यक्तिको गिरफ्तार किया गया है किन्तु इसके लिए सरकारको माफी माँगनी पड़ेगी, हालाँकि श्री वल्लभभाईको इसकी जरा भी चिन्ता नहीं है। मेरे तो वे हाथ-पैर ही थे। यदि उन्होंने इस जिलेमें काम न किया होता तो मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं आज आपके सामने इतना भी बोल पाता। आप नमक कानूनका क्या उत्तर देनेवाले हैं? आप सबको अपनेको सुधारना और सरकारके विरुद्ध लड़ना है। हम अन्त्यज भाइयोंकी सेवा करके पूर्ण स्वराज्य<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> 65tjhpqbupuifcw4h75pkpjcnj7i1z2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२३ 250 197167 671996 669684 2026-08-20T08:23:57Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : वासणामें|८१}}</noinclude>लेनेकी तैयारी कर सकते हैं। मैं यह कामना करता हूँ कि आपके गाँवके बारेमें मेरे मनमें जो सन्देह था वह सच न हो। आप लोग सबकी सेवा करें। नमक कानून रद्द हो जाने या अन्य कर रद्द हो जानेसे भला कहीं स्वराज्य मिलनेवाला है? स्वराज्य मिलना इतनी सहज बात नहीं है। यह तो एक उपाय है और इस उपायके सहारे हम स्वराज्य प्राप्त करनेके अपने उद्देश्य तक पहुँच सकेंगे। नवागाँव, वावड़ी, आगम, महेलज सभी गाँवोंके मुखियोंने इस्तीफे देकर ठीक ही किया है। पाँच रुपल्लीके लिए मुखियोंने सरकारकी नौकरी क्यों स्वीकार को? यदि मुखियोंको कलक्टर बुलाये तो उन्हें कहना चाहिए कि "लाओ हमारे सरदारको और लगान कम करो।" सरकारी नौकरी छोड़नेका मतलब है आई बलाको अपने घरसे खदेड़ना। मुखियोंने जो काम किया है वह पुण्यका काम किया है। जब सत्ता हमारे हाथमें आ जायेगी तो हम देखेंगे कि हमें क्या करना चाहिए। सरकारके किसी भी कानूनको न माननेका नाम सत्याग्रह है। इस सत्याग्रहका एक अंग नमक कानून तोड़ना है। यह हमारा धर्म है; हमारा अधिकार है। इस लड़ाई में मुझे आपकी सहायताकी आवश्यकता है। मुझे पैसोंकी नहीं, मनुष्योंकी सहायता चाहिए। मेरे कार्यक्रममें दूसरी चीज खादी है। यह कितनी बुरी बात है कि सूचीमें चरखा और खादी पहननेवाले लोगोंके खानेमें आपके गाँवके आगे शून्य लगा हुआ है। यदि अब तक आपने खादी पहनना शुरू नहीं किया है तो अब तो आप जागें। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप खादीके द्वारा अपने गरीब देशकी मदद करें। मैं तो यह चाहता हूँ कि आप लोगोंमें कोई भी ऐसा व्यक्ति न रहे जो खादी न पहनता हो। मैं आपको खादी पहननेका निमन्त्रण देता हूँ। बहनोंके लिए तो कातना एक प्राचीन यज्ञ है। आप पहले तो पंचयज्ञ करते थे। उनमें पहला था चूल्हा यज्ञ। मेरी माँ पहले गो-ग्रास निकालती थी और यज्ञ करती थी। दूसरा था चक्की-यज्ञ। तीसरा झाड़-यज्ञ, चौथा चरखा यज्ञ और पाँचवां यज्ञ था पानी भरनेका। आज तो हम इन सब यज्ञोंको भूल बैठे हैं। हम लोगोंमें स्वार्थकी भावना पैदा हो जानेसे ऐसा हुआ। यदि आप धर्मका पालन करना चाहते हों तो आपको फिर चरखा यज्ञ करना चाहिए। ईश्वर आपको सन्मति दे और आप तदनुसार व्यवहार करें। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १६-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|10em}} {{left|४३–६}}</noinclude> h7sskk6bng6zvhls945x1mjix3gp4el पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२४ 250 197168 671997 669685 2026-08-20T08:25:04Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 671997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''७४. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{right|दाँडी कूचके दौरान<br>१५ मार्च, १९३०}} {{left|चि॰ नारणदास,}} जो रकम मिले उसे 'नवजीवन' के हिसाबमें डालना। मैं मैथ्यूको लिख तो रहा हूँ। उसका काम ही ऐसा है। जबतक उसका मन काममें नहीं लगता तबतक उसका गां॰ से॰ सं॰ में<ref>गांधी सेवा संघ।</ref> जाना भी व्यर्थ है। प्रभुदाससे लिखनेके लिए कहना। अभी तो मुझे चलते हुए कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८०९०) से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''७५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{right|[१५ मार्च, १९३०]<ref>तिथि ऐट द फीट ऑफ बापूसे ली गई है।</ref>}} {{left|चि॰ ब्रजकृष्ण,}} तुमको सख्त शब्द कहते हुए मुझे दुःख हुआ। परंतु अनिवार्य था। तुमारा हृदय-दौर्बल्यको मैं नीकालना चाहता हूं। तुमारी शक्तिका पूरा उपयोग तब तक नह हो सकता है जब तक तुमारा हृदय दृढ़ नहि होगा। हृदयकी कोमलता आवश्यक है। सच्ची कोमलताके लीये दृढ़ता अत्यावश्यक है। कौटुंबिक संबंध निर्मल बनता है। मोहका नाश होता है। मुझको मीलनेका लोभ भी छोड़ देना चाहीये। मैं जो-कुछ दे सकता था तुमको दे चुका हूं। तुमारा समय आनेसे तुमारे भी जेलमें जानेका होगा। अब तो वहांका काम तुमारी जेल है। इसलीये किसी आवश्यक कारण बिना विजापुर मत छोड़ो। शरीरको अच्छा बनाओ और जो मदद दे सकते हैं देते रहो। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} जी॰ एन॰ २३७७ की फोटो नकलसे।<noinclude>{{Dhr|2em}} {{Smallrefs}}</noinclude> cvkok8xzjf9vi4zlzx7m06cbhwb21fx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२५ 250 197169 672000 669686 2026-08-20T08:29:26Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672000 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''७६. भाषण : डभाणमें'''}}}} {{right|[१५ मार्च, १९३०]}} मुझे पता चला है कि कनकापुरासे भी एक मुखिया, एक मतादार और एकचौकीदारने इस्तीफा दे दिया है। मैं आशा करता हूँ कि आपने उक्त इस्तीफे स्वेच्छासे ही दिये होंगे और मुझे आशा है कि किसी अधिकारीके दबाव डालनेपर आपमें से कोई झुकेगा नहीं और माफी माँगते हुए कोई अपना इस्तीफा वापस नहीं लेगा। जब हमने एक बार प्रतिज्ञा कर ली है तो भले ही हमारी जान चली जाये, किन्तु हम अपनी प्रतिज्ञाको भंग नहीं होने देंगे।<ref>यह और इसके बादके तीन अनुच्छेद १६-३-१९३० '''के प्रजाबन्धु'''से लिये गये हैं।</ref> आपके मुखियाने इस्तीफा दे दिया है किन्तु उनके बूढ़े काकाने तो अपना नाम स्वयंसेवकके रूपमें दर्ज करवाया है। नवयुवक ही इस लड़ाई में भाग ले सकते हों, ऐसी कोई बात नहीं है। यह धर्मयुद्ध, अहिसात्मक युद्ध है और इसमें बच्चे भी भाग ले सकते हैं। कुछ एक स्त्रियोंके नाम भी मेरे पास पहुँच चुके हैं। १५ वर्षके बालकोंके नाम भी मेरे पास आये हैं और उनका नाम स्वीकार करते हुए मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। मेरे पास कुछ अन्य वृद्ध लोगोंके नाम भी आये हैं और उनका कहना है कि जेलके बाहर मरनेकी बजाय जेलमें मरनेमें क्या बुराई है। किन्तु सोच-विचारकर ही मैं उन्हें अपने साथ नहीं लेता। दाँडी पहुँचने पर मैं पहले उन्हें बुलाऊँगा और पहले उन्हें जेलमें पहुँचा दूंगा। आशा है कि आसपास के गाँवोंके मुखिया और मतादार भी इस्तीफे दे देंगे। हम दावा तो गोरक्षा [या गोसेवा] का करते हैं किन्तु अब हमें उसे गोरक्षाके बजाय भैंस-रक्षा या भैंस-सेवा कहना चाहिए। इस डभाण गाँवमें तीन सौ भैंसोंपर तीन गायें हैं। इससे ज्ञात होता है कि हमें पशु-पालनका ज्ञान नहीं है। इस जिलेमें रोगियों या गोसेवा व्रतधारियोंके लिए गायका दूध या घी प्राप्त करना असम्भव है। मुसलमानों या अंग्रेजोंके हाथोंसे गायोंको बचा लेना या छुड़ाना ही गोसेवा नहीं है; वह तो गोवध हो जाता है। गोसेवाका यह उलटा अर्थ है।<ref>यह और इसके बादके दो अनुच्छेद ३०-३-१९३० '''के नवजीवन'''में प्रकाशित '''स्वराज गीता'''से लिये गये हैं।</ref> मुसलमान जितनी गायोंकी हत्या करते हैं उसकी अपेक्षा सैकड़ों गुनी अधिक गायें कटनेके लिए आस्ट्रेलिया भेज दी जाती हैं। यदि आप चाहते हों कि गायें विदेश न भेजी जायें तो आप सब लोगोंको गो-पालनकी कला सीखकर तदनुसार अमल करना चाहिए। भैंस के दूधका स्वाद मुझे याद नहीं पड़ता इसलिए गाय और भैंसके दूधका अन्तर मैं नहीं बता सकता। किन्तु वैद्योंने यह सिद्ध कर दिया है कि भैसका दूध-घी<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> 1xj57wxvszuy5afby8pscp9ea0pudsk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२६ 250 197170 672001 669687 2026-08-20T08:31:13Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गायके दूध-घी जितना सात्त्विक नहीं होता और यूरोपके लोग तो भैसके दूधको छूते तक नहीं। यह तो धर्मयुद्ध है, अहिंसात्मक युद्ध है। इसमें तो स्त्रियाँ और बच्चे भी भाग ले सकते हैं। सामान्य सिपाहीके हाथों होनेवाला कोई भी काम सत्याग्रही सिपाहीके हाथों नहीं हो सकता। आपके गाँवमें ८०० मन नमककी खपत होती है और इस प्रकार आप नाहक इस सरकारको पैसा देते हैं। आपके द्वारा दिया गया पूरा कर ज्योंका त्यों सरकार डकार जाती है। हम इस बोझको अपने सिरसे उतार फेंकना चाहते हैं और इसलिए पूर्ण स्वराज्य माँगते हैं। यदि आपमें हिम्मत हो तो सरकारी नौकरियाँ छोड़ दें, नमक सत्याग्रह में सैनिकके रूपमें अपना नाम दर्ज करा दें और विदेशी कपड़ोंको जलाकर खादी धारण कर लें। आप शराब पीना छोड़ दें। आपके पास ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनके माध्यम से आप स्वाधीनता प्राप्त करनेकी कुंजी पा सकते हैं।<ref>यह अनुच्छेद २३-३-१९३० के गुजरातीसे लिया गया है।</ref> {{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १६-३-१९३०, '''नवजीवन,''' ३०-३-१९३० '''तथा गुजराती,''' २३-३१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''७७. भाषण : नडियाद में'''}}}} {{right|१५ मार्च, १९३०}} मैं नडियाद कई बार आया हूँ और यहाँ कई बार भाषण भी दिये हैं किन्तु मैंने इतनी अधिक भीड़ कभी नहीं देखी। आज हम गुलामीकी जंजीरोंमें जकड़े हुए हैं, जिनसे हम मुक्त होना चाहते हैं। आप यहाँ मेरी या मेरे ८० साथियोंकी वजह से नहीं बल्कि पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेकी दृष्टिसे आये हैं। अहमदाबादसे रवाना होकर यहाँ पहुँचने तक हमें बहुत आशीर्वाद मिले हैं, मानों आशीर्वादोंकी बाढ़ आ गई हो। आप भी इसके साक्षी हैं। खेड़ा जिलेमें वल्लभभाईने बहुत काम किया है। बाढ़ के समय उन्होंने हजारों लोगोंको बचाया था और वही वल्लभभाई अब जेलमें पड़े हैं। खेड़ा जिलेमें तो मैंने भी थोड़ा-बहुत काम किया है। इस प्रकार आपका कर्त्तव्य तिहरा है। वल्लभभाईको गिरफ्तार करनेका मतलब आप ही लोगोंको गिरफ्तार करना है। उन्हें खेड़ामें गिरफ्तार करनेका मतलब खेड़ाको गिरफ्तार करनेके समान है। इस गिरफ्तारी से वल्लभभाईका तो सम्मान बढ़ा है; किन्तु आपका अपमान हुआ है। इस अपमानका बदला आप किस प्रकार ले सकेंगे? पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करके ही तो आप इस अपमानका बदला ले सकेंगे। और पूर्ण स्वराज्य आप किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे? जो मार्ग मैंने अपनाया है उसी मार्गको अपनाकर आप पूर्ण स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। यह दो और दो चारकी तरह स्पष्ट है।<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> 0zsn821qaplgj9xf7ofz5fk9p4e76zj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२७ 250 197171 672005 669688 2026-08-20T08:34:37Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : दुर्गा गिरिको|८५}}</noinclude> मैं चाहता हूँ कि कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी न करे। आखिर सरकारी नौकरीमें क्या धरा है? सरकारी नौकरी करनेसे जुल्म करनेकी ताकत आती है। सरकारी नौकरी में मिलता ही क्या है? अपने बल-बूतेपर आदमी हजारों रुपये कमा सकता है। यहाँके मुखियोंने इस्तीफे दे दिये हैं। किन्तु इससे क्या होता है? नडियाद तो गोवर्धनराम, मणिलाल नभुभाई-जैसे साहित्यिकोंका नगर है। क्या यहाँ ऐसे विद्वान् व्यक्तियोंकी विरासत देखनेको मिलेगी? विद्वानोंके इस नगरके विद्यार्थियोंका कर्त्तव्य क्या है? आपको इन सब बातोंका उत्तर देना है। आप सभीको स्वयंसेवक बन जाना होगा। मैं जेल चला जाऊँ या जैसे ही कांग्रेसकी ओरसे आदेश मिले आप जेल जानेके लिए तैयार हो जायें तो मैं यह समझँगा कि नडियादने कुछ किया है। नडियादकी जनसंख्या ३१ हजार है। आप लोग तीन लाख दस हजार रुपये कपड़ेपर खर्च करते हैं। यदि यह रुपया बाहर जानेकी बजाय आपके ही घरमें रहे तो? तो यह कहा जा सकेगा कि आपने प्रकृतिके सुन्दरतम नियमका पालन किया। गोवर्धनराम और मणिलालके वारिसोंको भी मैं यह सीधा हिसाब लगानेको कहता हूँ। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो नडियादकी इज्जत चली जायेगी। नडियाद, जो गुजरातकी नाक है, क्या इतना भी नहीं कर सकेगा? भगवान् आपको ऐसा करनेकी शक्ति दे! {{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती,''' २३-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''७८. पत्र : दुर्गा गिरिको'''<ref>मूल गुजराती उपलब्ध नहीं है।</ref>}}}} {{right|[१५ मार्च, १९३० को या उसके पश्चात्]<ref> पत्रमें द॰ बा॰ कालेलकरके पुत्र शंकर द्वारा इसी दिन दांडी-कूचमें सम्मिलित होनेका उल्लेख है, जिसके आधारपर यह तारीख निर्धारित की गई है।</ref>}} {{left|चि॰ दुर्गा,}} तेरा अच्छे अक्षरों में लिखा गया अच्छा पत्र मिला है। महावीरके बारेमें तूने जो लिखा है, सो ठीक है। जो सबको समान समझना जानता है, वह जीतता है। काकाका शंकर भी इस काफिलेमें आ पहुँचा है। सेवाके कामोंमें भली-भाँति लीन हो जाना। किसी भी काममें आलस न करना। हम सब तो यहाँ मजे में हैं। मैत्रीसे कहना कि वह आलस जरा भी न करे। लाल पानीमें हाथ डुबाती है न? खाने में मर्यादा रखे। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{left|'''बापूकी विराट् वत्सलतासे'''|1em}}<noinclude>{{Dhr|3em}} {{Smallrefs}}</noinclude> kt9xt677pav50wtuqz901u9ehhh3mzn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२८ 250 197172 672008 669689 2026-08-20T08:42:03Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {{larger|{{c|'''७९. हम सब एक हैं'''}}}} ईश्वर हम सबमें है। इसलिए अनेक होते हुए भी हम सब एक ही हैं। मै तो इस सत्यका प्रतिक्षण दर्शन करता हूँ। हम सबमें वह समान रूपसे जाग्रत नहीं रहता अथवा हममें से हरएक का हृदय एक जैसा नहीं होता इसीलिए वह एक रूपमें दिखाई नहीं पड़ता—ठीक उसी तरह, जिस तरह कि जुदा रंग और जुदा ढंगके दर्पणमें चीजें जुदा रंग और आकार-प्रकारकी दिखाई देती हैं। इस सत्यके अनुसार एकका पाप सबका पाप है। इसलिए हम दुष्टोंको मारते नहीं, उनके लिए कष्ट सहन करते हैं। इस विचारसे सत्याग्रहकी उत्पत्ति हुई, और इसीसे कानूनकी सविनय अवज्ञा शुरू हुई। आपराधिक, हिंसक, या अविनय अवज्ञा पाप है, और इसलिए त्याज्य है। अहिंसक अवज्ञा पुण्य हो सकती है, धर्म हो सकती है। इन्हीं विचारोंके आधारपर दीनबन्धु ऐन्ड्रयूज बहुधा कहा करते हैं कि वे अंग्रेजोंकी तरफसे प्रायश्चित्त कर रहे हैं, इसीलिए मीराबहन आश्रममें आई हैं और रेजीनाल्ड रेनॉल्ड्स भी इसी कारण आश्रममें आकर रह रहे हैं। श्री खड्गबहादुर गिरिको सब लोग जानते हैं। एक व्यभिचारीके व्यभिचारको सहन न कर सकनेके कारण उन्होंने उसका खून किया और फिर कानूनकी शरण ली। इससे पहले श्री गिरि आश्रममें रह चुके थे। अपने वक्तव्यमें उन्होंने अपनेको आश्रमके सिद्धान्तोंको माननेवाला बताया था। मैं उनका तात्पर्य समझ नहीं सका था, तो भी उस समय इस कृत्यकी जाँच करनेके लिए तैयार न था, और यही वजह थी कि उन दिनों बहुतेरे लोगोंने मेरे नाम जो कड़ी चिट्टियाँ भेजी थीं, उनका उत्तर न देकर मैं चुप बना रहा। उस समय अपनी राय जाहिर करना मैंने अपना धर्म नहीं समझा। यही भाई अब इस धर्मयात्रामें भाग लेने आ पहुँचे हैं। गाड़ी चूक जानेसे वे एक दिन देरसे पहुँचे थे। इसलिए बिना मेरी आज्ञाके आ नहीं सकते थे, जिससे उन्हें आश्रम में रुक जाना पड़ा। मेरा यह विश्वास होनेसे कि इस युद्धका आरम्भ आश्रमके नियमों का पालन करनेवालों द्वारा ही होना चाहिए, मैंने उन्हें लिखा : "अगर आपको आश्रमके सब नियम मंजूर हों तो आप आ जायें।" लेकिन इस लेखमें ये सब बातें तो अप्रासंगिक हैं। ये तो सिर्फ भाई खड्ग-बहादुरका परिचय करानेके लिए ही लिखी गई हैं। उनका नाम देनेका कारण तो यह है कि खड्गबहादुर गिरि भी दूसरोंके पापका प्रायश्चित्त करने आये हैं। और पहली ही टुकड़ीमें शामिल होनेका आग्रह करते हुए उन्होंने नीचे लिखे कारण बताये हैं :<ref>पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> इस पत्र में महावीरका जिक्र है। महावीर स्वर्गीय दलबहादुर गिरिका पुत्र है। स्वयं दलबहादुर गिरि भी इन्हीं विचारोंके कारण १९२१ के असहयोग आन्दोलनमें शामिल हुए थे और जेल भी गये थे। जेलसे वे पेचिशकी सख्त बीमारी लेकर छूटे<noinclude>{{Dhr}} {{Smallrefs}}</noinclude> 7dhtdxrgk60e1om5lu2ecth6zgkvsa0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१२९ 250 197173 672009 669690 2026-08-20T08:48:40Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||प्रयाण|८७}}</noinclude>थे। पर यह बीमारी उनके लिए घातक सिद्ध हुई। उन्होंने अपनी विधवा पत्नीको आश्रममें आकर रहनेकी सलाह दी थी। विधवाने आश्रम आनेका अपना निश्चय व्यक्त किया। दलबहादुर गिरिसे मेरी जान-पहचान हो चुकी थी। उन्होंने मरते समय जो इच्छा प्रकट की थी उसे, और तदनुसार काम करनेवाली उनकी पत्नीकी इच्छाको मैं टाल न सका। उनकी इच्छाको पूरा करना मैंने अपना धर्म समझा। इस विधवा माताने अपने पुत्रको इस युद्ध में सम्मिलित होनेके लिए प्रेरित किया। नौ वर्षोंसे बालक महावीर आश्रममें रह रहा है। एक संरक्षककी हैसियतसे दलमें शामिल होनेकी अनुमति मैंने महावीरको दे दी। ऐसे बालक जो पूरे पन्द्रह वर्षके हो चुके हों, वे चाहें तो उन्हें शामिल होनेकी अनुमति दी जा चुकी थी। महावीर स्वेच्छासे और गुरुजनोंका आशीर्वाद प्राप्त करके युद्धमें शामिल हुआ है। उसके सम्बन्धमें मेरा अनुभव मधुर है। सम्भव है इन तथ्योंसे पाठक इस युद्धको अधिक अच्छी तरह समझ सकेंगे, और सत्याग्रह क्या चीज है, यह भली भाँति जान सकेंगे। यह पूरी कल्पना अहिंसाकी अमोघ शक्तिके असीम विश्वासपर रची गई है। सत्याग्रही अपना प्रत्येक काम प्रायश्चित्तके रूपमें ही करता है। राजा या प्रजाके पापोंमें वह अपनेको भागीदार मानता है और खुद भी अपनेको पापी समझता है। जिसके सम्बन्धमें जहाँतक पापकी सम्भावना है, वहाँतक वह पापी ही है। जिसमें विकारकी सम्भावना है वह विकारी है। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''८०. प्रयाण'''}}}} अहमदाबादके हजारों नागरिक भाई-बहन ११ तारीखको रात भर जागे। हजारोंने आश्रमको घेर लिया। रात भर अफवाह उड़ती ही रही : 'ये आये, वे आये।' अपने चेहरेको गम्भीर बनाकर दो बार मेरे कानमें कोई कह गया : "विश्वसनीय खबर है कि आज शामको एक खास गाड़ी आयेगी और उसमें आपको मांडले भेजनेके लिए ले जाया जायेगा। मेरे लेखे तो जेलके भीतर और जेलके बाहर रहना एक ही बात है; इस कारण मुझपर इस खबर का असर नहीं हुआ और मैं आरामसे सो गया। लेकिन अपने आसपास मजदूरों और मालिकोंको रात-भर घेरा डाले हुए देखकर मुझे आनन्द हुए बिना न रहा। 'वे' आखिरकार नहीं आये और ईश्वरने हमें ठीक समय, निश्चित क्षणपर रवाना किया। चन्दोला तालाब तक विदा देनको आये हुए नर-नारियोंकी भीड़में से हम गुजरे। इस दृश्यको मैं कभी नहीं भुला सकता। मेरे लिए तो वह ईश्वरका आशीर्वाद था। ऐसे दृश्यके बावजूद मैं यह क्यों मानूँ कि इस युद्धमें जीत न होगी? अमीर और गरीब दोनों अपने ठीक अनुपातमें उपस्थित थे। अगर इस दृश्यका कोई मतलब हो तो वह यह है और इतना तो जरूर है कि सब लोगों<noinclude></noinclude> qgrxfo4ivaz1lp1m4d2p91esuk8n8tw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३० 250 197174 672011 669691 2026-08-20T08:57:41Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>को स्वाधीनता चाहिए, और यह स्वाधीनता वे शान्तिपूर्ण मार्गसे ही पाना चाहते हैं। आश्रमसे एलिस ब्रिज तक कतारोंमें खड़े हुए स्त्री-पुरुषोंकी आँखोंमें मैंने विष नहीं, अमृत देखा। मुझे उनकी आँखोंमें अंग्रेजी राज्य या अंग्रेज अफसरोंके प्रति गुस्सा नहीं बल्कि यह विश्वास और तज्जन्य आनन्द दिखाई दिया कि अब तो पूर्ण स्वराज्य आ ही रहा है। इस अवसरपर शासकोंने भी बुद्धिमानीसे काम लिया। रास्तेमें मुझे एक भी सिपाही नहीं दिखाई दिया। जहाँ लोग उत्सव मनाने आये हों, वहाँ भला सिपाहीका क्या काम है, सिपाही क्या कर सकता है? अहमदाबादके नागरिकोंने पिछले दिनों मेरे प्रति विश्वास प्रकट किया है, अगर वह कायम रहा और सारे देशमें फैल गया तो थोड़े ही प्रयत्नसे पूर्ण स्वराज्य मिल जायेगा। अगर पूर्ण स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है तो उसे पानेमें हमें कितना समय लगना चाहिए! साँस लेना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, अतः सहज ही मेरी साँस चलती रहती है। लम्बे अरसेसे चली आ रही गुलामीने हमारे मनमें यह भ्रम पैदा कर दिया है कि गुलामी ही हमारी कुदरती हालत है। पर सच्ची बात तो यह है कि गुलामी किसी भी आदमीकी स्वाभाविक स्थिति नहीं है। तीस करोड़ स्त्री-पुरुष जब स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका पक्का निश्चय कर लेंगे तो वे अवश्य स्वतन्त्र हो जायेंगे। १२ तारीखका दृश्य इस निश्चयका एक चिह्न था। लेकिन मैं इस तरह जल्दी भुलावेमें नहीं आता। देखनेमें आता है कि सारी दुनियामें जन-समाजका प्रवाह भेड़ियाधसानकी तरह होता है। यही हाल १२ तारीखको भी था। एक-दूसरेकी देखा-देखी बहुत-से लोग निकल पड़े थे; या यों कहा जाये कि इस तरह उत्सवमें भाग लेना ही बहुतों के त्यागका आरम्भ और अन्त था। अगर बात ऐसी ही हो तो वह आजादीकी निशानी नहीं थी। जब एक लाख आदमी तीस करोड़ मनुष्योंको दबायें और उस दबावसे अपना पिण्ड छुड़ानेके लिए तीस करोड़ मनुष्य एक होकर मेहनत करें तो थोड़ी-सी मेहनत और बहुत ही कम त्याग से वे गुलामीके बन्धनोंको काट सकते हैं। लेकिन कुछ-न-कुछ त्याग तो होना ही चाहिए। यह निरा बच्चोंका खेल नहीं है। यह विचार कर सकने वालोंकी मेहनतसे प्राप्त होता है। इसलिए अगर तीस करोड़ खादी पहननेवाले न हों तो भी तीस लाख सविनय कानून तोड़नेवाले तो तैयार हों? इस स्वराज्य-यज्ञमें जितने ज्यादा लोग भाग लेंगे उतना ही परिश्रम उनमें बँट जायेगा। अगर कम हुए तो उन्हें ज्यादा बोझ उठाना पड़ेगा। क्योंकि स्वराज्य पानेके लिए परिश्रम तो जितना चाहिए उतना लगेगा ही। इसलिए सवाल यही उठता है कि वह परिश्रम कौन करे और किस तरह करे। इस कूचको सफल बनानेका तात्कालिक दायित्व गुजरातियोंपर है। कूचको सफल बनाने का मतलब दलको नियमानुसार भोजन कराना और उसकी खातिरदारी करना ही नहीं है। यह काम तो गाँवोंके महाजन प्रेमपूर्वक कर ही रहे हैं। कूचको सफल बनानेका अर्थ है, उसमें भरती होनेके लिए स्त्री-पुरुषोंका निकल पड़ना-तैयार हो जाना। इसके जलालपुर पहुँचते ही नमक कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेवालोंकी टुकड़ियाँ तैयार<noinclude></noinclude> 8jn7bued32oxpnkr38ja6q675d47xy8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३१ 250 197175 672015 669692 2026-08-20T09:06:44Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 672015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||'भगवद्गीता' अथवा 'अनासक्तियोग'|८९}}</noinclude>रहनी चाहिए और हरएक गाँवको ऐसे 'भंगी' [कानून भंग करनेवाले] तैयार रखने चाहिए जो मौका पड़नेपर अपनेको होम सकें। {{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}} {{Dhr|2em}} {{larger|{{c|'''८१. 'भगवद्गीता' अथवा 'अनासक्तियोग''''}}}} 'गीता' पढ़ते, विचारते और उसका अनुसरण करते हुए अब मुझे चालीस सालसे ज्यादा हो चुके हैं। मित्रोंने यह इच्छा प्रकट की थी कि मैं गुजरातियोंको बताऊँ कि मैंने 'गीता' को किस रूपमें समझा है। फलतः मैंने उसका अनुवाद शुरू किया। विद्वत्ताकी दृष्टिसे देखने लगूँ तो अनुवाद करनेकी मेरी अपनी योग्यता कुछ भी नहीं ठहरती; हाँ, आचरण करनेवालेकी दृष्टिसे वह साधारणतया ठीक मानी जा सकती है। यह अनुवाद अब प्रकाशित हो चुका है।<ref>देखिए खण्ड ४१</ref> बहुत-से अनुवादोंके साथ मूल संस्कृत भी होती है। किन्तु संस्कृत इसमें जान-बूझकर नहीं दी गई है। सब लोग संस्कृत जानें-समझें तो मुझे अच्छा लगे; लेकिन सब लोग संस्कृत कभी नहीं जान पायेंगे और संस्कृत '-गीता' के तो अनेक सस्ते संस्करण मिलते ही हैं। इसलिए संस्कृतको छोड़कर आकार और कीमत कम रखनेका निश्चय किया। अतएव १९ पृष्ठकी प्रस्तावना और १८७ पृष्ठ अनुवाद मिलाकर दस हजारका जेबी संस्करण छपवाया है। इसकी कीमत दो आना रखी गई है। मेरा लोभ तो यह है कि हरएक गुजराती इस 'गीता' को पढ़े, विचारे और तदनुकूल आचरण करे। इसपर विचार करनेका सरल उपाय यह है कि संस्कृतका खयाल किये बिना ही इसके अर्थको समझनेका प्रयत्न किया जाये और फिर तदनुसार आचरण किया जाये। उदाहरणार्थ, जो लोग यह कहते हैं कि 'गीता' तो अपने-परायेका भेद रखे बिना दुष्टोंका संहार करनेकी शिक्षा देती है, उन्हें अपने दुष्ट माता-पिता या अन्य प्रियजनोंका संहार शुरू कर देना चाहिए। पर वे वैसा तो कर नहीं सकते, तो फिर जहाँ संहारका वर्णन आता है, वहाँ उसका कोई दूसरा अर्थ होना सम्भव है, यह बात पाठकोंको सहज ही सूझ जायेगी। अपने-परायेके बीच भेद न करनेकी बात तो 'गीता' के पन्ने पन्नेपर मिलती है। पर यह कैसे हो सकता है? इस प्रकार सोचते-सोचते हम इस निश्चयपर पहुँचेंगे कि अनासक्तिपूर्वक सब काम करना ही 'गीता' का प्रधान स्वर है। क्योंकि पहले ही अध्यायमें अर्जुनके सामने अपने-परायेका झगड़ा खड़ा हो जाता है। 'गीता' के प्रत्येक अध्यायमें यह बताया गया है कि उक्त भेद मिथ्या है। 'गीता' को मैंने 'अनासक्तियोग' का नाम दिया है। यह क्या है, कैसे सिद्ध हो सकता है, अनासक्तिके लक्षण क्या हैं; आदि तमाम बातोंका उत्तर जिज्ञासुको इस पुस्तकमें मिल सकता है। 'गीता' का अनुकरण करते हुए मैं इस युद्धको आरम्भ किये बिना न रह सका। जैसा कि एक मित्रने अपने तारमें कहा है, मेरे<noinclude>{{dhr}} {{smallrefs}}</noinclude> mf6wh8uuaazyc0cnqpcmc3w3bv8udwm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७७ 250 197219 671938 671571 2026-08-20T06:39:15Z Kumari Arpana Sinha 2191 671938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''१२९. खोदा पहाड़ निकली चुहिया''''}}}} रंगूनमें पहाड़ खोदा जा रहा था। उस पहाड़से एक हास्यास्पद चुहिया निकली है। एक ताकतवर सल्तनतने भारतके एक सुप्रसिद्ध सपूत पर, जो खतरनाक रोगसे रुग्ण थे, एक सर्वथा अनावश्यक मुकदमा चलाकर उन्हें और भी परेशानीमें डाला और जनतासे लिया हुआ धन बेकार खर्च किया। इस मामलेका जाहिरा कारण यह था कि श्री सेनगुप्तने बर्मासे गुजरते हुए दो भाषण दिये थे। वास्तविकता यह है कि ऐसे भाषण हर दिन सारे देशमें हजारों मंचोसे दिये जाते हैं, लेकिन इनकी ओर सरकारका ध्यान भी नहीं जाता । इस्तगासेको ऐसा एक भी गवाह नहीं मिला जिसके दिल पर उन 'राजद्रोहात्मक' भाषणोंका असर हुआ हो। मजिस्ट्रेटने जो फैसला सुनाया उसे सुनानेके लिए उसने अफसोस सा जाहिर किया। अगर उस मजिस्ट्रेटके आसपासका वातावरण स्वतन्त्रताका होता तो अवश्य ही उसने अपने प्रतिष्ठित कैदीको निर्दोष बताकर छोड़ दिया होता और इस तरह ख्वाहमख्वाह मुकदमा चलानेके लिए सरकारकी मलामतकी होती । इस मुकदमेसे श्रीयुत सेनगुप्तका तो कुछ बिगड़ा नहीं, उलटे इसके कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। उन्होंने जिस दृढ़ताके साथ अपना बचाव करने तथा अदालत के सवालोंका जवाब देनेसे इनकार किया है, वह उनकी चिरपरिचित हिम्मतका एक और सबूत हमारे सामने पेश करती है। लेकिन इस फैसलेका एक गूढ़ अर्थ भी है। सरदार वल्लभभाईपर जो अभि-योग लगाया गया था, यदि सचमुच वे उसके अपराधी थे तो उन्हें अधिक कठोर दण्ड मिलना चाहिए था। अगर श्रीयुत सेनगुप्त राजद्रोह के अपराधी थे तो उन्हें मात्र दस दिनकी सादी सजाके बजाय दूसरोंको एक सबक सिखानेके खयालसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी। अगर जनता में राज्यके प्रति असन्तोष फैलाना जुर्म है और इस दफा में थोड़ी भी सचाई है तो राजद्रोहको धर्म माननेवाले मुझ जैसे व्यक्तिपर तो सरकारको कब का मुकदमा चलाकर मुझे कड़ीसे-कड़ी सजा दे देनी चाहिए थी । कोई यह न सोचे कि सरकार डर गई है और इसलिए वह ये हल्की सजाएँ देती है, अथवा मुझे गिरफ्तार नहीं कर रही है। इसका सच्चा कारण तो और भी गूढ़ है, और वह शायद सरकार के लिए भी श्रेयकी बात है। लोगोंको उनके खास विचारोंके कारण या उन विचारोंको सार्वजनिक सभाओं में जाहिर करनेके कारण सजा देनेसे सरकार शरमाती है। ऐसे कार्योंसे दुनियाका लोकमत उसका विरोधी बन रहा है और सरकारको उसकी चिन्ता है। रंगूनके मजिस्ट्रेटको लाचार होकर यह कहना पड़ा कि चूंकि श्री सेनगुप्त के भाषण में लोगोंको हिंसाके लिए उभारनेका कोई प्रयत्न नहीं है, इसलिए उन्हें राजद्रोह के अपराधके योग्य सजा देनेका मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता । दफा १२४ ए का वास्तविक सम्बन्ध तो हिंसासे है। इस दफाके बनाने वालोंके दिमागमें यह बात शायद आई ही नहीं कि कोई ऐसा भी आदमी हो सकता<noinclude></noinclude> ptbv48yj8etm57tek1vjed328j4a1wn 671939 671938 2026-08-20T06:39:44Z Kumari Arpana Sinha 2191 671939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''१२९. खोदा पहाड़ निकली चुहिया'''}}}} रंगूनमें पहाड़ खोदा जा रहा था। उस पहाड़से एक हास्यास्पद चुहिया निकली है। एक ताकतवर सल्तनतने भारतके एक सुप्रसिद्ध सपूत पर, जो खतरनाक रोगसे रुग्ण थे, एक सर्वथा अनावश्यक मुकदमा चलाकर उन्हें और भी परेशानीमें डाला और जनतासे लिया हुआ धन बेकार खर्च किया। इस मामलेका जाहिरा कारण यह था कि श्री सेनगुप्तने बर्मासे गुजरते हुए दो भाषण दिये थे। वास्तविकता यह है कि ऐसे भाषण हर दिन सारे देशमें हजारों मंचोसे दिये जाते हैं, लेकिन इनकी ओर सरकारका ध्यान भी नहीं जाता । इस्तगासेको ऐसा एक भी गवाह नहीं मिला जिसके दिल पर उन 'राजद्रोहात्मक' भाषणोंका असर हुआ हो। मजिस्ट्रेटने जो फैसला सुनाया उसे सुनानेके लिए उसने अफसोस सा जाहिर किया। अगर उस मजिस्ट्रेटके आसपासका वातावरण स्वतन्त्रताका होता तो अवश्य ही उसने अपने प्रतिष्ठित कैदीको निर्दोष बताकर छोड़ दिया होता और इस तरह ख्वाहमख्वाह मुकदमा चलानेके लिए सरकारकी मलामतकी होती । इस मुकदमेसे श्रीयुत सेनगुप्तका तो कुछ बिगड़ा नहीं, उलटे इसके कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। उन्होंने जिस दृढ़ताके साथ अपना बचाव करने तथा अदालत के सवालोंका जवाब देनेसे इनकार किया है, वह उनकी चिरपरिचित हिम्मतका एक और सबूत हमारे सामने पेश करती है। लेकिन इस फैसलेका एक गूढ़ अर्थ भी है। सरदार वल्लभभाईपर जो अभि-योग लगाया गया था, यदि सचमुच वे उसके अपराधी थे तो उन्हें अधिक कठोर दण्ड मिलना चाहिए था। अगर श्रीयुत सेनगुप्त राजद्रोह के अपराधी थे तो उन्हें मात्र दस दिनकी सादी सजाके बजाय दूसरोंको एक सबक सिखानेके खयालसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी। अगर जनता में राज्यके प्रति असन्तोष फैलाना जुर्म है और इस दफा में थोड़ी भी सचाई है तो राजद्रोहको धर्म माननेवाले मुझ जैसे व्यक्तिपर तो सरकारको कब का मुकदमा चलाकर मुझे कड़ीसे-कड़ी सजा दे देनी चाहिए थी । कोई यह न सोचे कि सरकार डर गई है और इसलिए वह ये हल्की सजाएँ देती है, अथवा मुझे गिरफ्तार नहीं कर रही है। इसका सच्चा कारण तो और भी गूढ़ है, और वह शायद सरकार के लिए भी श्रेयकी बात है। लोगोंको उनके खास विचारोंके कारण या उन विचारोंको सार्वजनिक सभाओं में जाहिर करनेके कारण सजा देनेसे सरकार शरमाती है। ऐसे कार्योंसे दुनियाका लोकमत उसका विरोधी बन रहा है और सरकारको उसकी चिन्ता है। रंगूनके मजिस्ट्रेटको लाचार होकर यह कहना पड़ा कि चूंकि श्री सेनगुप्त के भाषण में लोगोंको हिंसाके लिए उभारनेका कोई प्रयत्न नहीं है, इसलिए उन्हें राजद्रोह के अपराधके योग्य सजा देनेका मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता । दफा १२४ ए का वास्तविक सम्बन्ध तो हिंसासे है। इस दफाके बनाने वालोंके दिमागमें यह बात शायद आई ही नहीं कि कोई ऐसा भी आदमी हो सकता<noinclude></noinclude> 37p1q4akko6ww374x3nrn880rgrev41 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७९ 250 197221 671941 671691 2026-08-20T06:43:12Z Kumari Arpana Sinha 2191 671941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ? और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'। वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}} सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं। इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले ‌हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सौ) लोगोंका एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude> fluj80tm2pgc563qs8fevl6eothfnre 671960 671941 2026-08-20T07:29:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 671960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था? और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'। वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}} सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं। इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले ‌हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सौ) लोगोंका एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude> kykursb2glom7fanqs7ek2k7y9u36j2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८० 250 197222 671942 671700 2026-08-20T06:46:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 671942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है और वह दुनिया भर में सबसे अधिक शक्तिशाली है। इनको मालगुजारीकी एक न्यूनतम निश्चित रकम वसूल करनी पड़ती है, और इसलिए अक्सर लोगोंके साथ इनका व्यवहार अत्यन्त सिद्धान्तहीन पाया जाता है। यह राज्य प्रणाली भारतवर्षके करोड़ों बाशिन्दोंके हृदयहीन रक्त शोषणपर ही कायम है, और यह बात कबूल भी की जाती है। गांवके पटेलसे लेकर अपने निजी सहायक तक, इन क्षत्रपोंने मातहतोंकी एक ऐसी जमात बना ली है जो अपने विदेशी मालिकोंके तो तलवे चाटती है, पर आम रिआयाके साथ उसका रात-दिनका व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदाराना और बेरहमी भरा होता है कि लोगोंका नैतिक बल समाप्त हो जाता है और उसकी आतंककी नीति के कारण उनमें उसके भ्रष्टाचारका प्रतिरोध करनेकी क्षमता नहीं रह जाती । अतः जिन लोगोंने भारत सरकारकी इस प्रणालीकी घोर बुराईको समझ लिया है, उनका यह कर्तव्य है कि वे इससे द्रोह करें और प्रकट तथा सक्रिय रूपसे इसके प्रति द्रोहका प्रचार करें। वस्तुतः ऐसे भ्रष्ट राज्यके प्रति भक्ति रखना पाप है, और अभक्ति रखना पुण्य । तीस करोड़ लोग तीन सौ आदमियों के भयसे त्रस्त रहें, यह बात उन स्वेच्छा-चारी शासकों और उनसे त्रस्त लोगों, दोनों के लिए पतनकारी है। अतएव जिन लोगोंने इस प्रणालीकी बुराईको समझ लिया है, उनका कर्तव्य है कि वे जितनी जल्दी हो सके, इसका नाश कर दें फिर भले ही इस प्रणालीकी कुछ इनी-गिनी बातें सन्दर्भसे अलग करके देखनेपर कितनी ही लुभावनी क्यों न मालूम होती हों। इसका नाश करनेके लिए ऐसे लोगोंको किसी भी तरह की जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि तीस करोड़ लोगोंका इस प्रणालीके इन तीन सौ रचयिताओं या प्रशासकोंको मिटा डालनेकी चेष्टा करना कायरता होगी। इन प्रशासकों या इनके नौकरोंको समाप्त कर डालने के उपाय रचना घोर अज्ञान प्रकट करना होगा। इसके सिवा, ये लोग तो परिस्थितिकी उपज हैं। कोई शुद्धसे शुद्ध वृत्तियोंवाला मनुष्य भी यदि इस प्रणाली में शामिल हो जाये तो वह इससे जरूर प्रभावित होगा और इसकी बुराइयोंके प्रचार में सहायक बनेगा। अतएव स्वभावतः इन प्रशासकोंपर गुस्सा होना और फलतः उन्हें कष्ट पहुँचाना इस बुराईका इलाज नहीं है। इसका सच्चा इलाज तो इस प्रणालीके साथ हर तरहका स्वेच्छया सहयोग करना बन्द कर देना और इससे होनेवाले तथाकथित लाभोंका त्याग कर देना है। थोड़े विचारसे ही पता चल जायेगा कि सविनय अवज्ञा असहयोगका एक आवश्यक अंग है। किसी राज्यकी आज्ञाओं और आदेशोंको मानना, उस राज्यकी सबसे प्रभाव-कारी सहायता करना है। बुरा शासन इस तरहकी वफादारीका पात्र नहीं है। उसके प्रति वफादार होना उसकी बुराई में शामिल होना है। अतएव जो भला आदमी है,वह तो किसी भी बुरी प्रणालीका अपनी ताकत भर घोर विरोध ही करेगा। इसलिए बुरे राज्यके कानूनोंका सविनय अनादर करना कर्त्तव्य है। याद रहे कि हिंसात्मक अवज्ञाका सम्बन्ध मनुष्यों से होता है, और उनको समाप्त कर देनेके बाद फिर दूसरे लोग उनका स्थान ले सकते हैं। इससे बुराईका कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि अक्सर तो<noinclude></noinclude> 5w3bm8h27q3j6f95u27h9d767mnoius 671961 671942 2026-08-20T07:30:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 671961 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है और वह दुनिया भर में सबसे अधिक शक्तिशाली है। इनको मालगुजारीकी एक न्यूनतम निश्चित रकम वसूल करनी पड़ती है, और इसलिए अक्सर लोगोंके साथ इनका व्यवहार अत्यन्त सिद्धान्तहीन पाया जाता है। यह राज्य प्रणाली भारतवर्षके करोड़ों बाशिन्दोंके हृदयहीन रक्त शोषणपर ही कायम है, और यह बात कबूल भी की जाती है। गांवके पटेलसे लेकर अपने निजी सहायक तक, इन क्षत्रपोंने मातहतोंकी एक ऐसी जमात बना ली है जो अपने विदेशी मालिकोंके तो तलवे चाटती है, पर आम रिआयाके साथ उसका रात-दिनका व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदाराना और बेरहमी भरा होता है कि लोगोंका नैतिक बल समाप्त हो जाता है और उसकी आतंककी नीति के कारण उनमें उसके भ्रष्टाचारका प्रतिरोध करनेकी क्षमता नहीं रह जाती । अतः जिन लोगोंने भारत सरकारकी इस प्रणालीकी घोर बुराईको समझ लिया है, उनका यह कर्तव्य है कि वे इससे द्रोह करें और प्रकट तथा सक्रिय रूपसे इसके प्रति द्रोहका प्रचार करें। वस्तुतः ऐसे भ्रष्ट राज्यके प्रति भक्ति रखना पाप है, और अभक्ति रखना पुण्य। तीस करोड़ लोग तीन सौ आदमियों के भयसे त्रस्त रहें, यह बात उन स्वेच्छा-चारी शासकों और उनसे त्रस्त लोगों, दोनों के लिए पतनकारी है। अतएव जिन लोगोंने इस प्रणालीकी बुराईको समझ लिया है, उनका कर्तव्य है कि वे जितनी जल्दी हो सके, इसका नाश कर दें फिर भले ही इस प्रणालीकी कुछ इनी-गिनी बातें सन्दर्भसे अलग करके देखनेपर कितनी ही लुभावनी क्यों न मालूम होती हों। इसका नाश करनेके लिए ऐसे लोगोंको किसी भी तरह की जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि तीस करोड़ लोगोंका इस प्रणालीके इन तीन सौ रचयिताओं या प्रशासकोंको मिटा डालनेकी चेष्टा करना कायरता होगी। इन प्रशासकों या इनके नौकरोंको समाप्त कर डालने के उपाय रचना घोर अज्ञान प्रकट करना होगा। इसके सिवा, ये लोग तो परिस्थितिकी उपज हैं। कोई शुद्धसे शुद्ध वृत्तियोंवाला मनुष्य भी यदि इस प्रणाली में शामिल हो जाये तो वह इससे जरूर प्रभावित होगा और इसकी बुराइयोंके प्रचार में सहायक बनेगा। अतएव स्वभावतः इन प्रशासकोंपर गुस्सा होना और फलतः उन्हें कष्ट पहुँचाना इस बुराईका इलाज नहीं है। इसका सच्चा इलाज तो इस प्रणालीके साथ हर तरहका स्वेच्छया सहयोग करना बन्द कर देना और इससे होनेवाले तथाकथित लाभोंका त्याग कर देना है। थोड़े विचारसे ही पता चल जायेगा कि सविनय अवज्ञा असहयोगका एक आवश्यक अंग है। किसी राज्यकी आज्ञाओं और आदेशोंको मानना, उस राज्यकी सबसे प्रभाव-कारी सहायता करना है। बुरा शासन इस तरहकी वफादारीका पात्र नहीं है। उसके प्रति वफादार होना उसकी बुराई में शामिल होना है। अतएव जो भला आदमी है,वह तो किसी भी बुरी प्रणालीका अपनी ताकत भर घोर विरोध ही करेगा। इसलिए बुरे राज्यके कानूनोंका सविनय अनादर करना कर्त्तव्य है। याद रहे कि हिंसात्मक अवज्ञाका सम्बन्ध मनुष्यों से होता है, और उनको समाप्त कर देनेके बाद फिर दूसरे लोग उनका स्थान ले सकते हैं। इससे बुराईका कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि अक्सर तो<noinclude></noinclude> k00fcedijcgexae336ms7g8zyy0jd8y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८२ 250 197224 671963 671718 2026-08-20T07:33:06Z Kumari Arpana Sinha 2191 671963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दारी बहुत बड़ी है। इस प्रतिज्ञा-पत्रका कोई यह मतलब न समझे कि साम्प्रदायिक एकता, खादी, अस्पृश्यता-निवारण या मद्य-निषेधको अबसे हम त्याग देनेवाले हैं। इसका मतलब यह है कि ये चीजें कांग्रेसके कार्यक्रमका अभिन्न अंग है। यह सीधा-सादा प्रतिज्ञा-पत्र हमने इसलिए तैयार किया है कि स्वराज्यकी लड़ाई लड़नेके लिए हजारों स्त्री-पुरुष कांग्रेस में शामिल हो सकें, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस विश्वाससे प्रेरित रहे हैं कि कांग्रेस के कर्ता-धर्ता कांग्रेस कार्यक्रमके इन अभिन्न हिस्सोंपर किसी भी तरहसे आंच नहीं आने देंगे। वर्तमान योजनाका आधार यह निश्चित विश्वास है कि कांग्रेसका संचालन पूरी ईमानदारी के साथ किया जा रहा है। और अन्तमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि इस प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर करनेवाले स्वयंसेवकोंको कांग्रेसकी सदस्यता प्राप्त हो जाती हो, ऐसी बात नहीं है। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{Larger|'''१३३. कुछ सुझाव'''}}}} अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी अहमदाबादकी बैठक में पास किये गये प्रस्ताव में देश भर में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेका संकेत देनेकी जिम्मेदारी, बशर्ते कि मैं दांडी पहुँचने तक मुक्त रहूँ, मुझे सौंपी गई है। कारण स्पष्ट है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी हर अवांछनीय स्थितिके विरुद्ध सभी समुचित पूर्वोपाय कर लेना चाहती है। मेरे गिरफ्तार कर लिये जानेपर आन्दोलन स्थगित करना खतरनाक होगा। दूसरी ओर, कमेटी यह भी नहीं चाहती कि मेरे गिरफ्तार किये जानेसे पूर्व ही वह, मैं क्या चाहूँगा, इसका अनुमान लगाकर पहलेसे ही कोई कदम तय कर ले। जहाँतक अभी मैं समझ सकता हूँ, कार्यकर्त्ता ऐसा मानकर चल सकते हैं कि इस आन्दोलनको अखिल भारतीय स्तर पर प्रारम्भ करनेकी तिथि ६ अप्रैल होगी। उसी दिन राष्ट्रीय सप्ताह शुरू होता है। यही १९१९ के उस सत्याग्रहका दिन है जिसमें जनसाधारणमें अभूतपूर्व जागृति आई थी। बादके सात दिनोंमें हमने कुछ दुष्कृत्य किये और उनका परिणाम जलियांवाला बागके नृशंस हत्याकाण्डके रूप में सामने आया। अगर सब कुछ ठीक-ठीक चला तो मैं ५ अप्रैलको दाँडी पहुंचूंगा। इसलिए मुझे ६ अप्रैल सत्याग्रह प्रारम्भ करनेकी सबसे स्वाभाविक तिथि प्रतीत होती है। कार्यकर्त्ता तैयारी तो कर सकते हैं, मगर अन्तिम संकेत के लिए प्रतीक्षा करें। किन्तु प्रतिबन्ध हटा लिये जाने का मतलब यह नहीं कि हरएक प्रान्त या हरएक जिला सविनय अवज्ञा शुरू ही कर दे। जिस प्रान्त अथवा जिस जिलेकी इसके लिए तैयारी न हो और जिसका प्रथम सेवक इसे प्रारम्भ करनेकी आन्तरिक प्रेरणाका अनुभव न करता हो वह प्रान्त अथवा जिला इसे शुरू न करे। अगर किसी प्रथम सेवकमें आत्मविश्वास न हो अथवा उसे अपने आसपास के परिवेशपर भरोसा न हो तो वह जल्दबाजी में कोई कदम उठानेसे इनकार करे। निष्क्रियताके लिए किसीको दोष नहीं<noinclude></noinclude> 47t77hdeqphcqov47vcuyd1c3v5g3vr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८३ 250 197225 671965 671731 2026-08-20T07:34:12Z Kumari Arpana Sinha 2191 671965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाहमें बह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा। हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा। यह अवज्ञा कराई नहीं ज सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयं-स्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा। हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर-विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है। इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी क्रुद्ध समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे, मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे-बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों। तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं। इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक-कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है। इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक-कर पूरी करता है। इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक-कर नहीं चाहते। चौकीदारी कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude> hymtsvohz8lwut1kjuv83fl76fpeij0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८४ 250 197226 671867 671756 2026-08-19T19:21:44Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671867 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो। यदि बात ऐसी है तो जबतक विरोध किये जानेके लिए दूसरे कर या दूसरे कानून हैं तब तक हमें इस करको हाथ नहीं लगाना चाहिए। फिर, वन सम्बन्धी कानून हैं। उनका अध्ययन मैने नहीं किया है। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं लिख सकता । निस्सन्देह, हम यह नहीं चाहते कि हमारे जंगलोंको बिलकुल नष्ट कर दिया जाये या आर्थिक लाभ-हानिका खयाल किये बिना लकड़ियाँ काटी जायें। मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि इन कानूनों में सुधार करनेकी आवश्यकता है। और इन कानूनोंपर अमल करते हुए ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण रखना तो शायद और अधिक आवश्यक है। लेकिन इस सुधारके लिए स्वराज्य प्राप्त होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है। साथ ही, जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन कानूनोंके या उन्हें जिस तरह लागू किया जाता है उसके खिलाफ हमारी जो शिकायतें हैं, उनके बारेमें आम जनताको ठीकसे बताया भी नहीं गया है। फिर चरागाहोंकी बात लें, जिनका जंगलोंसे बहुत निकटका सम्बन्ध है। मैं कह नहीं सकता कि जनता द्वारा उनके उपयोगको विनियमित करनेवाले विनियम इतने खराब हैं कि उनके खिलाफ कोई उचित शिकायत हो सकती है। मेरे विचारसे तो इससे बहुत अच्छा होगा शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी कपड़ोंकी दुकानोंपर धरना देना । यद्यपि धरना देना अपने-आपमें गैर-कानूनी काम नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभवसे प्रकट होता है कि सरकार कारगर धरनेदारीको रोकना चाहेगी। लेकिन, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने सिद्धान्त अनुरूप जहाँ कहीं उसका प्रतिरोध कर सकते हैं वहाँ प्रतिरोध करनेका निश्चय करके ही चल रहे हैं। लेकिन मुझे शराब बेचनेवालोंके धोखा-धड़ी-भरे व्यवहार और विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंके अज्ञानजनित क्रोधका भय है। मैं चाहूँगा कि इन दो बुराइयोंके खिलाफ जनमत और भी अच्छी तरह तैयार किया जाये और कार्यकर्तागण विक्रेताओं और ग्राहकोंको अधिक सुचारु ढंगसे इन बुराइयोंसे अवगत करायें। हमें इन दोनों बुराइयोंको आज या कल दूर करना ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओंको पूरा भरोसा है कि मैंने जिस ढंगके खतरोंका उल्लेख किया है उस ढंगके अवांछनीय खतरे उठाये बिना वे धरना देनेका काम चला सकते हैं, वहाँ उन्हें यह अभियान शुरू कर देना चाहिए। लेकिन किसी भी हालत में उन्हें सिर्फ इसलिए यह अभियान शुरू नहीं करना चाहिए कि जब आगे बढ़नेका संकेत मिल चुका है और नमक सम्बन्धी कानूनोंको तोड़नेका कोई उपाय उनके सामने नहीं है तो उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना ही है। फिलहाल तो मुझे नमक-सम्बन्धी कानूनोंको भंग करना ही सबसे अधिक निरापद जान पड़ता है। ऊपर मैंने जो कुछ कहा है वह तो एहतियातन ही कहा है। जहाँ कहीं कार्यकर्ता यह महसूस करते हों कि उनकी अन्तरात्मा उन्हें आगे बढ़नेका आदेश दे रही है और वे खुद हिंसाकी भावनासे पूर्णतः मुक्त हैं, वहीं उन्हें संकेत मिलते ही, वे जैसी सविनय अवज्ञा करना आवश्यक और वांछनीय समझें, वैसी अवज्ञा शुरू कर देनेकी उन्हें पूरी छूट है, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके नियन्त्रणमें ही ।<noinclude></noinclude> 0ai0rq7608jbakhh7y17w6j21f6kutq 671943 671867 2026-08-20T06:50:43Z Kumari Arpana Sinha 2191 671943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो। यदि बात ऐसी है तो जबतक विरोध किये जानेके लिए दूसरे कर या दूसरे कानून हैं तब तक हमें इस करको हाथ नहीं लगाना चाहिए। फिर, वन सम्बन्धी कानून हैं। उनका अध्ययन मैने नहीं किया है। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं लिख सकता । निस्सन्देह, हम यह नहीं चाहते कि हमारे जंगलोंको बिलकुल नष्ट कर दिया जाये या आर्थिक लाभ-हानिका खयाल किये बिना लकड़ियाँ काटी जायें। मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि इन कानूनों में सुधार करनेकी आवश्यकता है। और इन कानूनोंपर अमल करते हुए ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण रखना तो शायद और अधिक आवश्यक है। लेकिन इस सुधारके लिए स्वराज्य प्राप्त होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है। साथ ही, जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन कानूनोंके या उन्हें जिस तरह लागू किया जाता है उसके खिलाफ हमारी जो शिकायतें हैं, उनके बारेमें आम जनताको ठीकसे बताया भी नहीं गया है। फिर चरागाहोंकी बात लें, जिनका जंगलोंसे बहुत निकटका सम्बन्ध है। मैं कह नहीं सकता कि जनता द्वारा उनके उपयोगको विनियमित करनेवाले विनियम इतने खराब हैं कि उनके खिलाफ कोई उचित शिकायत हो सकती है। मेरे विचारसे तो इससे बहुत अच्छा होगा शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी कपड़ोंकी दुकानोंपर धरना देना । यद्यपि धरना देना अपने-आपमें गैर-कानूनी काम नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभवसे प्रकट होता है कि सरकार कारगर धरनेदारीको रोकना चाहेगी। लेकिन, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने सिद्धान्त अनुरूप जहाँ कहीं उसका प्रतिरोध कर सकते हैं वहाँ प्रतिरोध करनेका निश्चय करके ही चल रहे हैं। लेकिन मुझे शराब बेचनेवालोंके धोखा-धड़ी-भरे व्यवहार और विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंके अज्ञानजनित क्रोधका भय है। मैं चाहूँगा कि इन दो बुराइयोंके खिलाफ जनमत और भी अच्छी तरह तैयार किया जाये और कार्यकर्तागण विक्रेताओं और ग्राहकोंको अधिक सुचारु ढंगसे इन बुराइयोंसे अवगत करायें। हमें इन दोनों बुराइयोंको आज या कल दूर करना ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओंको पूरा भरोसा है कि मैंने जिस ढंगके खतरोंका उल्लेख किया है उस ढंगके अवांछनीय खतरे उठाये बिना वे धरना देनेका काम चला सकते हैं, वहाँ उन्हें यह अभियान शुरू कर देना चाहिए। लेकिन किसी भी हालत में उन्हें सिर्फ इसलिए यह अभियान शुरू नहीं करना चाहिए कि जब आगे बढ़नेका संकेत मिल चुका है और नमक सम्बन्धी कानूनोंको तोड़नेका कोई उपाय उनके सामने नहीं है तो उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना ही है। फिलहाल तो मुझे नमक-सम्बन्धी कानूनोंको भंग करना ही सबसे अधिक निरापद जान पड़ता है। ऊपर मैंने जो कुछ कहा है वह तो एहतियातन ही कहा है। जहाँ कहीं कार्यकर्ता यह महसूस करते हों कि उनकी अन्तरात्मा उन्हें आगे बढ़नेका आदेश दे रही है और वे खुद हिंसाकी भावनासे पूर्णतः मुक्त हैं, वहीं उन्हें संकेत मिलते ही, वे जैसी सविनय अवज्ञा करना आवश्यक और वांछनीय समझें, वैसी अवज्ञा शुरू कर देनेकी उन्हें पूरी छूट है, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके नियन्त्रणमें ही ।<noinclude></noinclude> 8dt4ni56h2139f1oixtjgxs367junyk 671966 671943 2026-08-20T07:35:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 671966 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो। यदि बात ऐसी है तो जबतक विरोध किये जानेके लिए दूसरे कर या दूसरे कानून हैं तब तक हमें इस करको हाथ नहीं लगाना चाहिए। फिर, वन सम्बन्धी कानून हैं। उनका अध्ययन मैने नहीं किया है। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं लिख सकता। निस्सन्देह, हम यह नहीं चाहते कि हमारे जंगलोंको बिलकुल नष्ट कर दिया जाये या आर्थिक लाभ-हानिका खयाल किये बिना लकड़ियाँ काटी जायें। मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि इन कानूनों में सुधार करनेकी आवश्यकता है। और इन कानूनोंपर अमल करते हुए ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण रखना तो शायद और अधिक आवश्यक है। लेकिन इस सुधारके लिए स्वराज्य प्राप्त होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है। साथ ही, जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन कानूनोंके या उन्हें जिस तरह लागू किया जाता है उसके खिलाफ हमारी जो शिकायतें हैं, उनके बारेमें आम जनताको ठीकसे बताया भी नहीं गया है। फिर चरागाहोंकी बात लें, जिनका जंगलोंसे बहुत निकटका सम्बन्ध है। मैं कह नहीं सकता कि जनता द्वारा उनके उपयोगको विनियमित करनेवाले विनियम इतने खराब हैं कि उनके खिलाफ कोई उचित शिकायत हो सकती है। मेरे विचारसे तो इससे बहुत अच्छा होगा शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी कपड़ोंकी दुकानोंपर धरना देना। यद्यपि धरना देना अपने-आपमें गैर-कानूनी काम नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभवसे प्रकट होता है कि सरकार कारगर धरनेदारीको रोकना चाहेगी। लेकिन, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने सिद्धान्त अनुरूप जहाँ कहीं उसका प्रतिरोध कर सकते हैं वहाँ प्रतिरोध करनेका निश्चय करके ही चल रहे हैं। लेकिन मुझे शराब बेचनेवालोंके धोखा-धड़ी-भरे व्यवहार और विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंके अज्ञानजनित क्रोधका भय है। मैं चाहूँगा कि इन दो बुराइयोंके खिलाफ जनमत और भी अच्छी तरह तैयार किया जाये और कार्यकर्तागण विक्रेताओं और ग्राहकोंको अधिक सुचारु ढंगसे इन बुराइयोंसे अवगत करायें। हमें इन दोनों बुराइयोंको आज या कल दूर करना ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओंको पूरा भरोसा है कि मैंने जिस ढंगके खतरोंका उल्लेख किया है उस ढंगके अवांछनीय खतरे उठाये बिना वे धरना देनेका काम चला सकते हैं, वहाँ उन्हें यह अभियान शुरू कर देना चाहिए। लेकिन किसी भी हालत में उन्हें सिर्फ इसलिए यह अभियान शुरू नहीं करना चाहिए कि जब आगे बढ़नेका संकेत मिल चुका है और नमक सम्बन्धी कानूनोंको तोड़नेका कोई उपाय उनके सामने नहीं है तो उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना ही है। फिलहाल तो मुझे नमक-सम्बन्धी कानूनोंको भंग करना ही सबसे अधिक निरापद जान पड़ता है। ऊपर मैंने जो कुछ कहा है वह तो एहतियातन ही कहा है। जहाँ कहीं कार्यकर्ता यह महसूस करते हों कि उनकी अन्तरात्मा उन्हें आगे बढ़नेका आदेश दे रही है और वे खुद हिंसाकी भावनासे पूर्णतः मुक्त हैं, वहीं उन्हें संकेत मिलते ही, वे जैसी सविनय अवज्ञा करना आवश्यक और वांछनीय समझें, वैसी अवज्ञा शुरू कर देनेकी उन्हें पूरी छूट है, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके नियन्त्रणमें ही।<noinclude></noinclude> g6tjtsho6qkfw5w9jhw7g9t100htq0c पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८५ 250 197227 671868 671765 2026-08-19T19:28:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671868 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि वह अवसर आते ही अपने सैनिकों- को संघर्ष में उतार दे । [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}} आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूर्ति निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूर्तिमें टोटा पड़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो उनके खाद-कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा । {{C|{{larger|'''मीराबाई प्रबन्धक नहीं'''}}}} मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है, जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास<noinclude></noinclude> 9el9ox03l3qui55rpgdkj3q9unlwfob 671944 671868 2026-08-20T06:58:49Z Kumari Arpana Sinha 2191 671944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि वह अवसर आते ही अपने सैनिकों- को संघर्ष में उतार दे । [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}} आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इस उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूर्ति निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूर्तिमें टोटा पड़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो उनके खाद-कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा । {{C|{{larger|'''मीराबाई प्रबन्धक नहीं'''}}}} मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है, जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास<noinclude></noinclude> fzvmm49adqqehqaeiprlzjo5eg68l95 671967 671944 2026-08-20T07:37:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 671967 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि वह अवसर आते ही अपने सैनिकों- को संघर्ष में उतार दे। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}} आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इस उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूर्ति निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूर्तिमें टोटा पड़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो उनके खाद-कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा। {{C|{{larger|'''मीराबाई प्रबन्धक नहीं'''}}}} मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है, जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास<noinclude></noinclude> djl1y4l992e9kc8c91eae5ld5wopho0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८६ 250 197228 671869 669748 2026-08-19T19:36:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671869 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गांधी है। पुरुष मेरे साथ कूचमें शामिल हो सकें, इसलिए जिस प्रकार बहुत-सी स्त्रियोंने आश्रमके विभिन्न विभागोंका काम अपने-अपने हाथोंमें ले लिया उसी तरह मीराबाई भी सफाई विभागकी प्रधान बन गई है। साथ ही वे शिशु कक्षाओंको पढ़ाने में भी हाथ बँटा रही हैं और दूसरी जो सेवाएँ उनसे हो सकती हैं, कर रही हैं। अन्तमें वे क्या बनेंगी, यह तो कोई नहीं कह सकता और वे खुद तो कह ही नहीं सकती। पाठकोंके लिए इतनी ही जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए कि उन्होंने अपना भाग्य आश्रमके और मेरे साथ सदाके लिए जोड़ लिया है। उन्हें भारतकी सेवाकी प्रबल लगन है । आश्रमको वे प्राप्त हो सकीं, यह हमारा सौभाग्य था। मैं उनसे तभी से स्नेह करता रहा हूँ जब मैं उनके कुल-गोत्रके बारेमें भी कुछ नहीं जानता था और उनके बारेमें जो कुछ जानता था वह सिर्फ दो संक्षिप्त पत्रोंसे ही जानता था, जो उन्होंने आश्रम में दाखिले के लिए मुझे पहले-पहल लिखे थे। तबसे आज चार वर्षोंसे भी अधिक समय से उनसे मेरा निकटतम सम्पर्क रहा है, किन्तु मेरे उस स्नेहमें कोई कमी नहीं आई है । आश्रमके नियमोंका पालन करने और उसके आदर्शोंको चरितार्थं करनेके लिए आश्रमके किसी भी सदस्यने उनसे अधिक लगनसे काम नहीं किया है। लेकिन वे आश्रमकी प्रधान नहीं हैं। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३५. तलवारका न्याय'''}}}} एक अध्यापक महोदय लिखते हैं: इस लेसको पढ़कर मुझे मेमने और भेड़ियेके किस्सा स्मरण हो आया। भेड़िया किसी-न-किसी तरह मेमनेको खा जाना चाहता था, परन्तु किसी न्याय्य बहानेकी लोजमें था । जब कोई ठीक-सा बहाना न मिला तब मेमनेके बाप-दादोंका दोष बताकर उसने उसे मार खाया। लोगोंके पास जमीन है, परन्तु न्यायतः उसका मालिक कौन है, इस सवालकी छानबीनसे सल्तनतको क्या वास्ता? सल्तनत तो रुपयोंकी भूखी है और तलवारके बलसे रुपये वसूल करती है। धारासभायें नौकरशाही लम्बी-चौड़ी बहस होने देती है, पर उस बहसके पीछे विश्वास तो यह रहा है कि आखिर सरकारकी मालगुजारीमें कुछ कमी नहीं होगी - फिर भले ही जमीन किसीकी क्यों न मानी जाये। --- इसलिए हमारे सामने सच्चा सवाल तो यह है कि हम इस तलवार बलका मुकाबला कैसे करें ? क्या तलवारसे करेंगे ? यदि तलवार बलका मुकाबला तलवार से ही करना है तो अभी हमें वर्षों तक गुलामीमें रहना पड़ेगा, क्योंकि कैसा भी शासन १. पत्र यहाँ उस नहीं किया जा रहा है। पत्र लेखकने अंग्रेजों द्वारा भारतमें लागू मालगुजारी की आलोचना की थी।<noinclude></noinclude> jd8yyunq9iicidnjqtwfgcjiq5nibsh 671870 671869 2026-08-19T19:42:56Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गांधी है। पुरुष मेरे साथ कूचमें शामिल हो सकें, इसलिए जिस प्रकार बहुत-सी स्त्रियोंने आश्रमके विभिन्न विभागोंका काम अपने-अपने हाथोंमें ले लिया उसी तरह मीराबाई भी सफाई विभागकी प्रधान बन गई है। साथ ही वे शिशु कक्षाओंको पढ़ाने में भी हाथ बँटा रही हैं और दूसरी जो सेवाएँ उनसे हो सकती हैं, कर रही हैं। अन्तमें वे क्या बनेंगी, यह तो कोई नहीं कह सकता और वे खुद तो कह ही नहीं सकती। पाठकोंके लिए इतनी ही जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए कि उन्होंने अपना भाग्य आश्रमके और मेरे साथ सदाके लिए जोड़ लिया है। उन्हें भारतकी सेवाकी प्रबल लगन है । आश्रमको वे प्राप्त हो सकीं, यह हमारा सौभाग्य था। मैं उनसे तभी से स्नेह करता रहा हूँ जब मैं उनके कुल-गोत्रके बारेमें भी कुछ नहीं जानता था और उनके बारेमें जो कुछ जानता था वह सिर्फ दो संक्षिप्त पत्रोंसे ही जानता था, जो उन्होंने आश्रम में दाखिले के लिए मुझे पहले-पहल लिखे थे। तबसे आज चार वर्षोंसे भी अधिक समय से उनसे मेरा निकटतम सम्पर्क रहा है, किन्तु मेरे उस स्नेहमें कोई कमी नहीं आई है । आश्रमके नियमोंका पालन करने और उसके आदर्शोंको चरितार्थं करनेके लिए आश्रमके किसी भी सदस्यने उनसे अधिक लगनसे काम नहीं किया है। लेकिन वे आश्रमकी प्रधान नहीं हैं। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३५. तलवारका न्याय'''}}}} एक अध्यापक महोदय लिखते हैं: इस लेखको पढ़कर मुझे मेमने और भेड़ियेके किस्सा स्मरण हो आया। भेड़िया किसी न-किसी तरह मेमनेको खा जाना चाहता था, परन्तु किसी न्याय्य बहानेकी खोजमें था। जब कोई ठीक-सा बहाना न मिला तब मेमनेके बाप-दादोंका दोष बताकर उसने उसे मार खाया। लोगोंके पास जमीन है, परन्तु न्यायतः उसका मालिक कौन है, इस सवालकी छानबीनसे सल्तनतको क्या वास्ता? सल्तनत तो रुपयोंकी भूखी है और तलवारके बलसे रुपये वसूल करती है। धारासभामें नौकरशाही लम्बी-चौड़ी बहस होने देती है, पर उस बहसके पीछे विश्वास तो यह रहा है कि आखिर सरकारकी मालगुजारीमें कुछ कमी नहीं होगी - फिर भले ही जमीन किसीकी क्यों न मानी जाये। इसलिए हमारे सामने सच्चा सवाल तो यह है कि हम इस तलवार बलका मुकाबला कैसे करें ? क्या तलवारसे करेंगे ? यदि तलवार बलका मुकाबला तलवार से ही करना है तो अभी हमें वर्षों तक गुलामीमें रहना पड़ेगा, क्योंकि कैसा भी शासन १. पत्र यहाँ उस नहीं किया जा रहा है। पत्र-लेखकने अंग्रेजों द्वारा भारतमें लागू मालगुजारी की आलोचना की थी।<noinclude></noinclude> 5pq3v56lk5c9s9pbie19kda8sdkrg3g 671945 671870 2026-08-20T07:00:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 671945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गांधी है। पुरुष मेरे साथ कूचमें शामिल हो सकें, इसलिए जिस प्रकार बहुत-सी स्त्रियोंने आश्रमके विभिन्न विभागोंका काम अपने-अपने हाथोंमें ले लिया उसी तरह मीराबाई भी सफाई विभागकी प्रधान बन गई है। साथ ही वे शिशु कक्षाओंको पढ़ाने में भी हाथ बँटा रही हैं और दूसरी जो सेवाएँ उनसे हो सकती हैं, कर रही हैं। अन्तमें वे क्या बनेंगी, यह तो कोई नहीं कह सकता और वे खुद तो कह ही नहीं सकती। पाठकोंके लिए इतनी ही जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए कि उन्होंने अपना भाग्य आश्रमके और मेरे साथ सदाके लिए जोड़ लिया है। उन्हें भारतकी सेवाकी प्रबल लगन है । आश्रमको वे प्राप्त हो सकीं, यह हमारा सौभाग्य था। मैं उनसे तभी से स्नेह करता रहा हूँ जब मैं उनके कुल-गोत्रके बारेमें भी कुछ नहीं जानता था और उनके बारेमें जो कुछ जानता था वह सिर्फ दो संक्षिप्त पत्रोंसे ही जानता था, जो उन्होंने आश्रम में दाखिले के लिए मुझे पहले-पहल लिखे थे। तबसे आज चार वर्षोंसे भी अधिक समय से उनसे मेरा निकटतम सम्पर्क रहा है, किन्तु मेरे उस स्नेहमें कोई कमी नहीं आई है । आश्रमके नियमोंका पालन करने और उसके आदर्शोंको चरितार्थं करनेके लिए आश्रमके किसी भी सदस्यने उनसे अधिक लगनसे काम नहीं किया है। लेकिन वे आश्रमकी प्रधान नहीं हैं। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३५. तलवारका न्याय'''}}}} एक अध्यापक महोदय लिखते हैं: इस लेखको पढ़कर मुझे मेमने और भेड़ियेके किस्सा स्मरण हो आया। भेड़िया किसी न-किसी तरह मेमनेको खा जाना चाहता था, परन्तु किसी न्याय्य बहानेकी खोजमें था। जब कोई ठीक-सा बहाना न मिला तब मेमनेके बाप-दादोंका दोष बताकर उसने उसे मार खाया। लोगोंके पास जमीन है, परन्तु न्यायतः उसका मालिक कौन है, इस सवालकी छानबीनसे सल्तनतको क्या वास्ता? सल्तनत तो रुपयोंकी भूखी है और तलवारके बलसे रुपये वसूल करती है। धारासभामें नौकरशाही लम्बी-चौड़ी बहस होने देती है, पर उस बहसके पीछे विश्वास तो यह रहा है कि आखिर सरकारकी मालगुजारीमें कुछ कमी नहीं होगी - फिर भले ही जमीन किसीकी क्यों न मानी जाये। इसलिए हमारे सामने सच्चा सवाल तो यह है कि हम इस तलवार बलका मुकाबला कैसे करें ? क्या तलवारसे करेंगे ? यदि तलवार बलका मुकाबला तलवार से ही करना है तो अभी हमें वर्षों तक गुलामीमें रहना पड़ेगा, क्योंकि कैसा भी शासन १. पत्र यहाँ उस नहीं किया जा रहा है। पत्र-लेखकने अंग्रेजों द्वारा भारतमें लागू मालगुजारी की आलोचना की थी।<noinclude></noinclude> 04whooxhybu9x6g1e2ee8p5n8kt0d7f 671968 671945 2026-08-20T07:38:28Z Kumari Arpana Sinha 2191 671968 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गांधी है। पुरुष मेरे साथ कूचमें शामिल हो सकें, इसलिए जिस प्रकार बहुत-सी स्त्रियोंने आश्रमके विभिन्न विभागोंका काम अपने-अपने हाथोंमें ले लिया उसी तरह मीराबाई भी सफाई विभागकी प्रधान बन गई है। साथ ही वे शिशु कक्षाओंको पढ़ाने में भी हाथ बँटा रही हैं और दूसरी जो सेवाएँ उनसे हो सकती हैं, कर रही हैं। अन्तमें वे क्या बनेंगी, यह तो कोई नहीं कह सकता और वे खुद तो कह ही नहीं सकती। पाठकोंके लिए इतनी ही जानकारी पर्याप्त होनी चाहिए कि उन्होंने अपना भाग्य आश्रमके और मेरे साथ सदाके लिए जोड़ लिया है। उन्हें भारतकी सेवाकी प्रबल लगन है। आश्रमको वे प्राप्त हो सकीं, यह हमारा सौभाग्य था। मैं उनसे तभी से स्नेह करता रहा हूँ जब मैं उनके कुल-गोत्रके बारेमें भी कुछ नहीं जानता था और उनके बारेमें जो कुछ जानता था वह सिर्फ दो संक्षिप्त पत्रोंसे ही जानता था, जो उन्होंने आश्रम में दाखिले के लिए मुझे पहले-पहल लिखे थे। तबसे आज चार वर्षोंसे भी अधिक समय से उनसे मेरा निकटतम सम्पर्क रहा है, किन्तु मेरे उस स्नेहमें कोई कमी नहीं आई है। आश्रमके नियमोंका पालन करने और उसके आदर्शोंको चरितार्थं करनेके लिए आश्रमके किसी भी सदस्यने उनसे अधिक लगनसे काम नहीं किया है। लेकिन वे आश्रमकी प्रधान नहीं हैं। [ अंग्रेजीसे ] '''यंग इंडिया''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३५. तलवारका न्याय'''}}}} एक अध्यापक महोदय लिखते हैं: इस लेखको पढ़कर मुझे मेमने और भेड़ियेके किस्सा स्मरण हो आया। भेड़िया किसी न-किसी तरह मेमनेको खा जाना चाहता था, परन्तु किसी न्याय्य बहानेकी खोजमें था। जब कोई ठीक-सा बहाना न मिला तब मेमनेके बाप-दादोंका दोष बताकर उसने उसे मार खाया। लोगोंके पास जमीन है, परन्तु न्यायतः उसका मालिक कौन है, इस सवालकी छानबीनसे सल्तनतको क्या वास्ता? सल्तनत तो रुपयोंकी भूखी है और तलवारके बलसे रुपये वसूल करती है। धारासभामें नौकरशाही लम्बी-चौड़ी बहस होने देती है, पर उस बहसके पीछे विश्वास तो यह रहा है कि आखिर सरकारकी मालगुजारीमें कुछ कमी नहीं होगी-फिर भले ही जमीन किसीकी क्यों न मानी जाये। इसलिए हमारे सामने सच्चा सवाल तो यह है कि हम इस तलवार बलका मुकाबला कैसे करें? क्या तलवारसे करेंगे? यदि तलवार बलका मुकाबला तलवार से ही करना है तो अभी हमें वर्षों तक गुलामीमें रहना पड़ेगा, क्योंकि कैसा भी शासन १. पत्र यहाँ उस नहीं किया जा रहा है। पत्र-लेखकने अंग्रेजों द्वारा भारतमें लागू मालगुजारी की आलोचना की थी।<noinclude></noinclude> ccu2u0sb699buznt3z182onewiiw513 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८७ 250 197229 671871 669749 2026-08-19T19:50:02Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671871 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी । '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} सजोद २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] हिन्दू, २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा ? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम- चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत । २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> 710cydnofcf58nvdh6jkaclb9afh9n4 671872 671871 2026-08-19T19:56:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी । '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा ? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत । २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> 24nk4e0ymj338573jayvd4fcs65b9xi 671946 671872 2026-08-20T07:01:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 671946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी । '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा ? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत । २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> i7b1tdh6zw35jvqqal65gpo0hfpi4xs 671969 671946 2026-08-20T07:40:07Z Kumari Arpana Sinha 2191 671969 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी। '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> 6133vagnwzteqihwjxkei13r3oy8jio 671970 671969 2026-08-20T07:40:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 671970 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी। '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> r8jdqwqo1sisj6otb38k4d5ku3qa20p 671971 671970 2026-08-20T07:41:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 671971 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण प्रार्थना सभा, सजोदमें|१४५}}</noinclude>क्यों न हो, मालगुजारी भरनेवाले करोड़ों किसानोंका तलवार बल एक ही दिनमें कभी नहीं बढ़ सकता। जमीनपर किसानका स्वामित्व सिद्ध करनेका एक ही मार्ग है। और वह यह कि किसानोंमें सत्याग्रहका मंत्र फूंक दिया जाये। यह एक ऐसा बल है जो सबमें छिपा हुआ है। किसानको इस बलका ज्ञान-भर हो जाना चाहिए। यदि कोई किसान यह समझ ले कि शान्तिपूर्वक अन्यायका विरोध करनेसे उसकी जमीनको उससे कोई नहीं छीन सकता, तो वह कदापि अन्यायके वश नहीं होगा। इसी सत्याग्रहका सबक आज सारा हिन्दुस्तान सीख रहा है। यदि इस पाठशालामें किसान भी शामिल हो गये तो अच्छा ही है। उस हालतमें जमीनके स्वामित्वकी यह जटिल समस्या अपने आप हल हो जायेगी। '''हिन्दी नवजीवन''', २७-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३६. सन्देश : हिन्दुस्तानी सेवा दलको'''}}}} {{Right|सजोद}} २७ मार्च, १९३० हिन्दुस्तानी सेवा दलके स्वयंसेवकोंसे मैं आशा करता हूँ कि वे हर परिस्थितिमें अहिंसाकी प्रतिज्ञाका पालन करेंगे। [ अंग्रेजीसे ] '''हिन्दू,''' २९-३-१९३० {{C|{{larger|'''१३७. भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें''' '}}}} {{Right|[ २७ मार्च, १९३०}} हम एक-दूसरेका कहना नहीं मानते यह तो बुरी बात है। यदि एक व्यक्ति सभीकी बात सुनता चला जाये तो आखिरकार सब लोग उसे उपदेश देना बन्द कर देंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्तिको नम्र बनना चाहिए। किसी व्यक्तिको दूसरेकी गलतियां नहीं निकालनी चाहिए; बल्कि उसे खुद अपनी गलतियाँ निकालकर उन्हें दूर करना चाहिए। किसीको इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिए कि इतने दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा है, अतः अब तो हम दांडी पहुँच ही गये। यह कौन जानता है कि कल या अगले क्षण क्या होगा? अभिषेकसे पहलेकी रातको राम-चन्द्रजी और लोगोंको यह विश्वास था कि प्रातः राजतिलक होगा, किन्तु प्रभुकी १. " धर्म यात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने अंकलेश्धरसे रवाना होनेके एक दिन बाद यह भाषण दिया था। ४३-१०<noinclude></noinclude> 5xhtmbi4gpmh6bafh2777g8clcdg0po पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८८ 250 197230 671873 669750 2026-08-19T20:07:23Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लीला अगम्य है । अतः हम एक क्षणके लिए भी ईश्वरको न भूलें। आश्रमसे रवाना होते समय यह शर्त रखी गई थी कि जो लोग इसमें भाग न लेना चाहें, वे कूच करनेके पहले ही उससे अलग हो जायें। आज मैं इससे भी आगे बढ़कर कहता हूँ कि जो इससे अलग होना चाहें वे दांडी पहुँचनेसे पहले अलग हो जायें। यदि मैं अकेला रह जाऊँ तो भी काफी होगा। मैं प्रसन्न रहूँगा । यदि दुनिया मेरी निन्दा करेगी तो मैं भी उनका साथ दूंगा और यह मानूंगा कि मैं मूर्खताके आरोपका पात्र हूँ। किन्तु इसके बावजूद मैं अकेला ही जूझता रहूँगा और नमक बनाऊँगा । आजसे अग्रिम टुकड़ी अन्तमें रहेगी और अन्तिम टुकड़ीसे पंक्ति आरम्भ होगी। जो लोग बीमार या कमजोर हैं या जिन्हें धूलसे डर लगता हो ये आगे निकलकर अगले पड़ावपर सुस्ता सकते हैं या फिर वे बादमें आ सकते हैं। यदि लोगोंकी भीड़ बीचमें घुस आये तो हमें सबसे पीछे हो जाना चाहिए। यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। सम्भवतः वे इस बात को समझ जायेंगे और इससे हमारा मार्ग सरल हो जायेगा । [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१३८. भाषण: सजोदमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} कल सुबह भड़ौच जिलेका दौरा पूरा हो जायेगा इसलिए यदि उसका हिसाब- किताब समझ लिया जाये तो अनुचित न होगा। अबतक जो कुछ हुआ है यदि हम उसीके बलपर स्वराज्य लेना चाहें तो मुझे लगता है कि उसमें बहुत देर लगेगी; क्योंकि सभाओं या नमक कानून भंग करनेमें अधिक लोग भाग लें, केवल इस आधारपर स्वराज्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अन्य जिलोंमें बहुत ही कम रचना- त्मक काम हुआ है और यहां भी काफी कम काम हो पाया है। हम अबतक पूरी तरहसे विदेशी कपड़ोंको नहीं छोड़ सके हैं और खादीका प्रचार नहीं कर पाये हैं। खादी उत्पादनकी मात्राके उत्तरमें शून्य ही हाथ लगता है। यहाँ कपास तो खूब होती है किन्तु उसका उपयोग कोई नहीं करता। शरावकी खपत खूब बढ़ती जा रही है। फिर भी इस परिस्थितिके बावजूद मुझे आशा है कि हम लोगोंमें इस लड़ाईसे खूब जागृति आ जायेगी। आजकल तो पूरे हिन्दुस्तानमें खादीका प्रचार दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। इसके फलस्वरूप यदि खादीकी कमी पड़े तो आप उसके उत्पादनमें सहायता दे सकते हैं। यहांसे मुझे दांडी पहुँचने दिया जाये या न पहुँचने दिया जाये, किन्तु यह निश्चित है कि नमक कर समाप्त हो गया। जैसा कि मैंने कहा, यदि आप ये सारी बातें करने लगें तो आप यह मान लें कि मैंने इस एक किलेके साथ अन्य बहुत-से किले जीत लिये हैं। आप सब लोगोंके आशीर्वादसे नमकके इस राक्षसी<noinclude></noinclude> 6nvj3zqfuoggtno7ssbm0ltauq1txxw 671874 671873 2026-08-19T20:12:49Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लीला अगम्य है । अतः हम एक क्षणके लिए भी ईश्वरको न भूलें। आश्रमसे रवाना होते समय यह शर्त रखी गई थी कि जो लोग इसमें भाग न लेना चाहें, वे कूच करनेके पहले ही उससे अलग हो जायें। आज मैं इससे भी आगे बढ़कर कहता हूँ कि जो इससे अलग होना चाहें वे दांडी पहुँचनेसे पहले अलग हो जायें। यदि मैं अकेला रह जाऊँ तो भी काफी होगा। मैं प्रसन्न रहूँगा । यदि दुनिया मेरी निन्दा करेगी तो मैं भी उनका साथ दूंगा और यह मानूंगा कि मैं मूर्खताके आरोपका पात्र हूँ। किन्तु इसके बावजूद मैं अकेला ही जूझता रहूँगा और नमक बनाऊँगा । आजसे अग्रिम टुकड़ी अन्तमें रहेगी और अन्तिम टुकड़ीसे पंक्ति आरम्भ होगी। जो लोग बीमार या कमजोर हैं या जिन्हें धूलसे डर लगता हो ये आगे निकलकर अगले पड़ावपर सुस्ता सकते हैं या फिर वे बादमें आ सकते हैं। यदि लोगोंकी भीड़ बीचमें घुस आये तो हमें सबसे पीछे हो जाना चाहिए। यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। सम्भवतः वे इस बात को समझ जायेंगे और इससे हमारा मार्ग सरल हो जायेगा । [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१३८. भाषण: सजोदमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} कल सुबह भड़ौच जिलेका दौरा पूरा हो जायेगा इसलिए यदि उसका हिसाब- किताब समझ लिया जाये तो अनुचित न होगा। अबतक जो कुछ हुआ है यदि हम उसीके बलपर स्वराज्य लेना चाहें तो मुझे लगता है कि उसमें बहुत देर 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671874 2026-08-20T07:04:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 671948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लीला अगम्य है। अतः हम एक क्षणके लिए भी ईश्वरको न भूलें। आश्रमसे रवाना होते समय यह शर्त रखी गई थी कि जो लोग इसमें भाग न लेना चाहें, वे कूच करनेके पहले ही उससे अलग हो जायें। आज मैं इससे भी आगे बढ़कर कहता हूँ कि जो इससे अलग होना चाहें वे दांडी पहुँचनेसे पहले अलग हो जायें। यदि मैं अकेला रह जाऊँ तो भी काफी होगा। मैं प्रसन्न रहूँगा । यदि दुनिया मेरी निन्दा करेगी तो मैं भी उनका साथ दूंगा और यह मानूंगा कि मैं मूर्खताके आरोपका पात्र हूँ। किन्तु इसके बावजूद मैं अकेला ही जूझता रहूँगा और नमक बनाऊँगा। आजसे अग्रिम टुकड़ी अन्तमें रहेगी और अन्तिम टुकड़ीसे पंक्ति आरम्भ होगी। जो लोग बीमार या कमजोर हैं या जिन्हें धूलसे डर लगता हो ये आगे निकलकर अगले पड़ावपर सुस्ता सकते हैं या फिर वे बादमें आ सकते हैं। यदि लोगोंकी भीड़ बीचमें घुस आये तो हमें सबसे पीछे हो जाना चाहिए। यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। सम्भवतः वे इस बात को समझ जायेंगे और इससे हमारा मार्ग सरल हो जायेगा। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१३८. भाषण: सजोदमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} कल सुबह भड़ौच जिलेका दौरा पूरा हो जायेगा इसलिए यदि उसका हिसाब-किताब समझ लिया जाये तो अनुचित न होगा। अबतक जो कुछ हुआ है यदि हम उसीके बलपर स्वराज्य लेना चाहें तो मुझे लगता है कि उसमें बहुत देर लगेगी; क्योंकि सभाओं या नमक कानून भंग करनेमें अधिक लोग भाग लें, केवल इस आधारपर स्वराज्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अन्य जिलोंमें बहुत ही कम रचनात्मक काम हुआ है और यहां भी काफी कम काम हो पाया है। हम अबतक पूरी तरहसे विदेशी कपड़ोंको नहीं छोड़ सके हैं और खादीका प्रचार नहीं कर पाये हैं। खादी उत्पादनकी मात्राके उत्तरमें शून्य ही हाथ लगता है। यहाँ कपास तो खूब होती है किन्तु उसका उपयोग कोई नहीं करता। शराबकी खपत खूब बढ़ती जा रही है। फिर भी इस परिस्थितिके बावजूद मुझे आशा है कि हम लोगोंमें इस लड़ाईसे खूब जागृति आ जायेगी। आजकल तो पूरे हिन्दुस्तानमें खादीका प्रचार दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। इसके फलस्वरूप यदि खादीकी कमी पड़े तो आप उसके 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आप मद्यपान छोड़ दें तभी ऐसा होना सम्भव है। ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़े, २५ करोड़ रुपये शराबके और ६ करोड़ रुपये नमक कर के यदि हम यह पूरी रकम बचा सकें तो हमारे चेहरे चमकने लगेंगे और इस प्रकार स्वराज्य भी मिला ही समझें। नमक कर तो अब उठ ही गया समझें, इसलिए आप लोगों में से जो इस लड़ाई में भाग न ले रहे हों वे इन दो कामोंको पूरा करनेमें मदद दें। विदेशी कपड़ा छोड़कर आप सब भाई-बहन खादी पहनें और जो सच्चा धर्म है उसे पहचानें। [ गुजराती से ] प्रजाबन्धु ३०-२-१९३० {{C|{{Larger|'''१३९. भाषण : मॉंगरोलमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} हम किसी प्रकारके भ्रममें न रहें। यदि हम यह मानते हैं कि सभी चीजोंके पीछे भगवान्का हाथ होता है तो हमें हिम्मत और आत्मविश्वासपूर्वक यह मानकर चलना चाहिए कि नमक कर उठ गया । अबतक तो हम लोग नमकहराम थे और अब हमें नमकहलाल बनना है। नमक-कानून तोड़नेकी बात तो हमने १२ तारीखसे कहनी शुरू की है किन्तु अन्य दो-तीन बातें तो हम १९२० से ही कहते आ रहे हैं। यदि आपको याद हो तो बेजवाड़ा कांग्रेस के कार्यक्रमके अनुसार २० लाख परसे चलवाने थे। विदेशी कपड़ेका त्याग करना था । किन्तु आज हम इसमें से कितना कर पाये हैं? यह तो हमारे लिए दुःख और लज्जाकी बात है। यही बात शराब के बारेमें है इसका भी खुलकर उपयोग हो रहा है। इन दोनों चीजोंके बारेमें हम यह मान बैठे थे कि जब हमारे हाथमें शक्ति आ जायेगी तभी हम इन्हें दूर कर पायेंगे। किन्तु मेरा यह कहना है कि यदि हम इन चीजोंको हटा सकें तो इसका मतलब होगा कि हमने सरकारको हटा दिया। यदि हम काम करना चाहें तो इस गाँव में जितने लोग नमक खाते हैं उन्हें चाहिए कि वे स्वयं अपने हाथका बना नमक उपयोग में लायें। सभी बालकोंको खुलेआम नमककी 'चोरी' करनी चाहिए और विदेशी कपड़ों-को जलाकर खादी खरीद लेनी चाहिए या तैयार कर लेनी चाहिए। दूसरी तरफ यदि हम मालिकोंसे मिलकर शरावके ठेकोंको बन्द करा सकें तो आनन्द ही आ जाये और स्वराज्यकी लड़ाई में भी रस आने लगे। जब हम ये सारे काम कर पायेंगे तभी<noinclude></noinclude> 3g2hjc8et0f2etmo8ieulx3zyz4nsdr 671882 671881 2026-08-20T01:43:49Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण मांगरोलमें|१४१}}</noinclude>कर --- इसके लिए हम चाहे 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यह मानकर चलना चाहिए कि नमक-कर उठ गया । अबतक तो हम लोग नमकहराम थे और अब हमें नमकहलाल बनना है। नमक-कानून तोड़नेकी बात तो हमने १२ तारीखसे कहनी शुरू की है किन्तु अन्य दो-तीन बातें तो हम १९२० से ही कहते आ रहे हैं। यदि आपको याद हो तो बेजवाड़ा कांग्रेस के कार्यक्रमके अनुसार २० लाख चरखे चलवाने थे। विदेशी कपड़ेका त्याग करना था । किन्तु आज हम इसमें से कितना कर पाये हैं? यह तो हमारे लिए दुःख और लज्जाकी बात है। यही बात शराब के बारेमें है इसका भी खुलकर उपयोग हो रहा है। इन दोनों चीजोंके बारेमें हम यह मान बैठे थे कि जब हमारे हाथमें शक्ति आ जायेगी तभी हम इन्हें दूर कर पायेंगे। किन्तु मेरा यह कहना है कि यदि हम इन चीजोंको हटा सकें तो इसका मतलब होगा कि हमने सरकारको हटा दिया। यदि हम काम करना चाहें तो इस गाँव में जितने लोग नमक खाते हैं उन्हें चाहिए कि वे स्वयं अपने हाथका बना नमक उपयोग में लायें। सभी बालकोंको खुलेआम नमककी 'चोरी' करनी चाहिए और विदेशी कपड़ों-को जलाकर खादी खरीद लेनी चाहिए या तैयार कर लेनी चाहिए। दूसरी तरफ यदि हम मालिकोंसे मिलकर शराबके ठेकोंको बन्द करा सकें तो आनन्द ही आ जाये और स्वराज्यकी लड़ाई में भी रस आने लगे। जब हम ये सारे काम कर पायेंगे तभी<noinclude></noinclude> qrfejtey0c9iy36jnlwyomx2w19bgh5 671949 671882 2026-08-20T07:05:34Z Kumari Arpana Sinha 2191 671949 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण मांगरोलमें|१४१}}</noinclude>कर --- इसके लिए हम चाहे जितने भी विशेषणोंका प्रयोग करें वे कम ही है--का नाश अवश्य होगा। यदि आप ऐसा वातावरण तैयार करें और उसे फैलायें तो इसके बाद विदेशी कपड़ोंका त्याग करके दूसरा किला भी जीता जा सकता है। इसका मतलब है साठ करोड़ रुपये हस्तगत कर लेना। हम महज होश खो देनेके कारण २५ करोड़ रुपये शराव और अफीम में दे डालते हैं। हमें यह दूसरा किला अवश्य जीतना है। यदि आप मद्यपान छोड़ दें तभी ऐसा होना सम्भव है। ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़ेके, २५ करोड़ रुपये शराबके और ६ करोड़ रुपये नमक-कर के। यदि हम यह पूरी रकम बचा सकें तो हमारे चेहरे चमकने लगेंगे और इस प्रकार स्वराज्य भी मिला ही समझें। नमक-कर तो अब उठ ही गया समझें, इसलिए आप लोगों में से जो इस लड़ाई में भाग न ले रहे हों वे इन दो कामोंको पूरा करनेमें मदद दें। विदेशी कपड़ा छोड़कर आप सब भाई-बहन खादी पहनें और जो सच्चा धर्म है उसे पहचानें। [ गुजराती से ] '''प्रजाबन्धु''' ३०-२-१९३० {{C|{{Larger|'''१३९. भाषण : मॉंगरोलमें'''}}}} {{Right|२७ मार्च, १९३०}} हम किसी प्रकारके भ्रममें न रहें। यदि हम यह मानते हैं कि सभी चीजोंके पीछे भगवान् का हाथ होता है तो हमें हिम्मत और आत्मविश्वासपूर्वक यह मानकर चलना चाहिए कि नमक-कर उठ गया । अबतक तो हम लोग नमकहराम थे और अब हमें नमकहलाल बनना है। नमक-कानून तोड़नेकी बात तो हमने १२ तारीखसे कहनी शुरू की है किन्तु अन्य दो-तीन बातें तो हम १९२० से ही कहते आ रहे हैं। यदि आपको याद हो तो बेजवाड़ा कांग्रेस के कार्यक्रमके अनुसार २० लाख चरखे चलवाने थे। विदेशी कपड़ेका त्याग करना था । किन्तु आज हम इसमें से कितना कर पाये हैं? यह तो हमारे लिए दुःख और लज्जाकी बात है। यही बात शराब के बारेमें है इसका भी खुलकर उपयोग हो रहा है। इन दोनों चीजोंके बारेमें हम यह मान बैठे थे कि जब हमारे हाथमें शक्ति आ जायेगी तभी हम इन्हें दूर कर पायेंगे। किन्तु मेरा यह कहना है कि यदि हम इन चीजोंको हटा सकें तो इसका मतलब होगा कि हमने सरकारको हटा दिया। यदि हम काम करना चाहें तो इस गाँव में जितने लोग नमक खाते हैं उन्हें चाहिए कि वे स्वयं अपने हाथका बना नमक उपयोग में लायें। सभी बालकोंको खुलेआम नमककी 'चोरी' करनी चाहिए और विदेशी कपड़ों-को जलाकर खादी खरीद लेनी चाहिए या तैयार कर लेनी चाहिए। दूसरी तरफ यदि हम मालिकोंसे मिलकर शराबके ठेकोंको बन्द करा सकें तो आनन्द ही आ जाये और स्वराज्यकी लड़ाई में भी रस आने लगे। जब हम ये सारे काम कर पायेंगे तभी<noinclude></noinclude> 16wczbmiwc891yuwawplhyywompdd53 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९० 250 197232 671883 669752 2026-08-20T01:57:21Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||१४८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>स्वराज्य मिलेगा । लड़ाई तो ६ तारीखसे पहले ही शुरू हो जायेगी; बस मेरे पकड़े जाने-भर की देर है । मुझे ज्यों ही गिरफ्तार किया जाये त्यों ही आप नमक बनाना शुरू कर दें। यदि मैं पकड़ा जाऊँ तो आप लंगोटी पहनना भले ही पसन्द कर लें किन्तु विदेशी वस्त्र कदापि न पहनें। मैं आज इस बातको फिर दुहराता हूँ कि खादी और हाथकते सूतके धागे में स्वराज्य निहित है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१४०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{Right|रायमा}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} चि० शान्तिकुमार, तुम्हारा खयाल मनमें आता ही रहता है। पिताजी द्वारा दी हुई पड़ी, जो मेरी कमरसे लटकी हुई है, निरन्तर मुझे उनकी याद दिलाती रहती है। महादेवने कुछ एक पत्र मेरे देखनेके लिए भेजे हैं; साथका पत्र उन पत्रोंमें से एक है। इसमें पिताजी का उल्लेख मिलता है, इसलिए तुम्हारे पढ़नेके लिए मैं इसे भेज रहा हूँ। इसे वापस न भेजना। मुझे उम्मीद है, तुम कठिन समय में भी शान्त रहते होगे। अब कुछ भार हलका हुआ या नहीं? यदि तुम मुझे कूचके दौरान ही लिखना चाहो तो पत्र सूरतके पतेपर भेजना अथवा आश्रमके ये लोग वहाँसे मुझे भेज देंगे। माताजी मनसे शान्त रहती हैं या नहीं ? मुझे पत्र अवश्य लिखना । ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१७ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude></noinclude> pqletm2dra48tus6iccmj6bh0ik4nwn 671885 671883 2026-08-20T02:07:10Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||१४८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>स्वराज्य मिलेगा। लड़ाई तो ६ तारीखसे पहले ही शुरू हो जायेगी; बस मेरे पकड़े जाने-भर की देर है। मुझे ज्यों ही गिरफ्तार किया जाये त्यों ही आप नमक बनाना शुरू कर दें। यदि मैं पकड़ा जाऊँ तो आप लंगोटी पहनना भले ही पसन्द कर लें किन्तु विदेशी वस्त्र कदापि न पहनें। मैं आज इस बातको फिर दुहराता हूँ कि खादी और हाथकते सूतके धागे में स्वराज्य निहित है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१४०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{Right|रायमा}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} चि० शान्तिकुमार, तुम्हारा खयाल मनमें आता ही रहता है। पिताजी द्वारा दी हुई घड़ी, जो मेरी कमरसे लटकी हुई है, निरन्तर मुझे उनकी याद दिलाती रहती है। महादेवने कुछ एक पत्र मेरे देखनेके लिए भेजे हैं; साथका पत्र उन पत्रोंमें से एक है। इसमें पिताजी का उल्लेख मिलता है, इसलिए तुम्हारे पढ़नेके लिए मैं इसे भेज रहा हूँ। इसे वापस न भेजना। मुझे उम्मीद है, तुम कठिन समय में भी शान्त रहते होगे। अब कुछ भार हलका हुआ या नहीं? यदि तुम मुझे कूचके दौरान ही लिखना चाहो तो पत्र सूरतके पतेपर भेजना अथवा आश्रमके। ये लोग वहाँसे मुझे भेज देंगे। माताजी मनसे शान्त रहती हैं या नहीं ? मुझे पत्र अवश्य लिखना । ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१७ ) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude></noinclude> asgvtax2deuf72kkwnh6o30usiawyw9 671950 671885 2026-08-20T07:07:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 671950 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>स्वराज्य मिलेगा। लड़ाई तो ६ तारीखसे पहले ही शुरू हो जायेगी; बस मेरे पकड़े जाने-भर की देर है। मुझे ज्यों ही गिरफ्तार किया जाये त्यों ही आप नमक बनाना शुरू कर दें। यदि मैं पकड़ा जाऊँ तो आप लंगोटी पहनना भले ही पसन्द कर लें किन्तु विदेशी वस्त्र कदापि न पहनें। मैं आज इस बातको फिर दुहराता हूँ कि खादी और हाथकते सूतके धागे में स्वराज्य निहित है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१४०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{Right|रायमा}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} चि० शान्तिकुमार, तुम्हारा खयाल मनमें आता ही रहता है। पिताजी द्वारा दी हुई घड़ी, जो मेरी कमरसे लटकी हुई है, निरन्तर मुझे उनकी याद दिलाती रहती है। महादेवने कुछ एक पत्र मेरे देखनेके लिए भेजे हैं; साथका पत्र उन पत्रोंमें से एक है। इसमें पिताजी का उल्लेख मिलता है, इसलिए तुम्हारे पढ़नेके लिए मैं इसे भेज रहा हूँ। इसे वापस न भेजना। मुझे उम्मीद है, तुम कठिन समय में भी शान्त रहते होगे। अब कुछ भार हलका हुआ या नहीं? यदि तुम मुझे कूचके दौरान ही लिखना चाहो तो पत्र सूरतके पतेपर भेजना अथवा आश्रमके। ये लोग वहाँसे मुझे भेज देंगे। माताजी मनसे शान्त रहती हैं या नहीं ? मुझे पत्र अवश्य लिखना । ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१७ ) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude></noinclude> lveht1lsnoufe63ztl8y1ftkgo1tqjq 671972 671950 2026-08-20T07:43:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 671972 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>स्वराज्य मिलेगा। लड़ाई तो ६ तारीखसे पहले ही शुरू हो जायेगी; बस मेरे पकड़े जाने-भर की देर है। मुझे ज्यों ही गिरफ्तार किया जाये त्यों ही आप नमक बनाना शुरू कर दें। यदि मैं पकड़ा जाऊँ तो आप लंगोटी पहनना भले ही पसन्द कर लें किन्तु विदेशी वस्त्र कदापि न पहनें। मैं आज इस बातको फिर दुहराता हूँ कि खादी और हाथकते सूतके धागे में स्वराज्य निहित है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु''', ३०-३-१९३० {{C|{{larger|'''१४०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}} {{Right|रायमा}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} चि० शान्तिकुमार, तुम्हारा खयाल मनमें आता ही रहता है। पिताजी द्वारा दी हुई घड़ी, जो मेरी कमरसे लटकी हुई है, निरन्तर मुझे उनकी याद दिलाती रहती है। महादेवने कुछ एक पत्र मेरे देखनेके लिए भेजे हैं; साथका पत्र उन पत्रोंमें से एक है। इसमें पिताजी का उल्लेख मिलता है, इसलिए तुम्हारे पढ़नेके लिए मैं इसे भेज रहा हूँ। इसे वापस न भेजना। मुझे उम्मीद है, तुम कठिन समय में भी शान्त रहते होगे। अब कुछ भार हलका हुआ या नहीं? यदि तुम मुझे कूचके दौरान ही लिखना चाहो तो पत्र सूरतके पतेपर भेजना अथवा आश्रमके। ये लोग वहाँसे मुझे भेज देंगे। माताजी मनसे शान्त रहती हैं या नहीं ? मुझे पत्र अवश्य लिखना। ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१७ ) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude></noinclude> 9edc5krp2bjyfo1zznk0sif64e9aocy पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९१ 250 197233 671886 669753 2026-08-20T02:13:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />१४१. भाषण : रायमामें '</noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें ''''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो में वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया । ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बयूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे ? संसारके पूरे इतिहासमें नमक -कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तुनमक- कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्यकार्य भी करते हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनया लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० १. पद भाषण अपराह्न ३ बजे दिया गया था।<noinclude></noinclude> r22i8tewt3p2lbgpitqjoysa8sini4w 671888 671886 2026-08-20T02:23:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />१४१. भाषण : रायमामें '</noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें ''''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो मैं वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया। ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बबूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे ? संसारके पूरे इतिहासमें नमक-कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तु नमक-कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्य कार्य भी करने हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनवा लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० १. पद भाषण अपराह्न में ३ बजे दिया गया था।<noinclude></noinclude> ap1112cd8jmjgev0usb5idniri46g3e 671951 671888 2026-08-20T07:08:25Z Kumari Arpana Sinha 2191 671951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />१४१. भाषण : रायमामें '</noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें ''''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो मैं वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया। ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बबूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे? संसारके पूरे इतिहासमें नमक-कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तु नमक-कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्य कार्य भी करने हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनवा लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० १. पद भाषण अपराह्न में ३ बजे दिया गया था।<noinclude></noinclude> p8d24xg1p9sjt8jxaskjs732xqj6mf6 671952 671951 2026-08-20T07:08:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 671952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४१. भाषण : रायमामें ''''}}}} {{Right|२८ मार्च, १९३०}} जिस जिलेमें नमक बनानेका स्थान न हो मैं वहां नहीं रुक सकता। अत: आप सबके प्रेमको ध्यान में रखते हुए भी फिलहाल मैं दांडी जा रहा हूँ। हालांकि इस जिलेको छोड़ते हुए मुझे बुरा लग रहा है; किन्तु मुझे तो दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ना ही है। यदि १२ तारीखको हिन्दु मुसलमान, ईसाई, पारसी सभीके आशीर्वादसे हम इस कर का विरोध कर सके तो आप यह मान लें कि उक्त कर हट ही गया। ६ तारीखको आप सब हिन्दू-मुसलमान मिलकर नमक बनाने में जुट जायें। यदि सरकार जमीनकी खुदी हुई मिट्टीपर कर लेनेका निर्णय करे तो ले सकती है, वैसे ही आज वह नमक पर कर लेती है। किन्तु हम यह कर क्यों दें? जिस तरह गरीब स्त्रियाँ बबूलकी दातुनें बेचने निकलती हैं, उसी प्रकार हम सब भी नमक लेकर बेचने निकल पड़ें। क्या हम करोड़ों गरीबोंकी खातिर इतना भी नहीं करेंगे? संसारके पूरे इतिहासमें नमक-कर-जैसे अन्यायपूर्ण कर का मुझे कहीं उल्लेख नहीं मिला। किन्तु नमक-कर उठ जानेसे ही हमें स्वराज्य नहीं मिल जायेगा। हमें सजगतापूर्वक अन्य कार्य भी करने हैं। हमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना है। पंजाबकी खादी पहनने से हमारा काम नहीं चलेगा। हरएकको स्वयं ही कातना और उससे अपना कपड़ा बुनवा लेना होगा। यह हमारी मूढ़ता ही है कि हम बच्चोंसे लेकर बूढ़ों तक यह सहज और सुन्दर काम नहीं करते। इससे हिन्दुस्तानके प्रति हमारी बेबफाई ही जाहिर होती है। विदेशी वस्त्रों और शराबका बहिष्कार करके हम तुरन्त ही स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दुस्तानको स्वतन्त्र कर लेनेके बाद हम अपना सारा काम गद्दीपर बैठकर करेंगे। इसलिए आप इस नमक सत्याग्रहमें भाग लेकर अन्य दो कामोंको पूरा कर दिखायें तथा जो इस लड़ाई में भाग नहीं ले रहे हैं वे आपके साथ मिलकर यह सिद्ध कर दिखायें कि भड़ौच जिला तो पूरी तरहसे हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रताकी लड़ाई में ही जुटा हुआ है। [ गुजरातीसे ] '''प्रजाबन्धु,''' ३०-३-१९३० १. पद भाषण अपराह्न में ३ बजे दिया गया था।<noinclude></noinclude> 7y72lkov2n9z55aaqjqp38xbe41hl81 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९२ 250 197234 671889 669754 2026-08-20T02:32:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४२. भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष' '''}}}} {{Right|[ २८ मार्च १९३०]²}} हमारी यात्राका यह अन्तिम सप्ताह है। इसके आरम्भ में ही हमें सारी मलिनता दूर कर देनी होगी। प्रत्येक जिलेकी सीमा पार करते समय हमें नदी मिली है। नदीको हम पवित्र मानते हैं। नदी आदि तो शुद्धिके बाह्य चिह्न हैं। इसकी मददसे हम शुद्ध बनें, नम्र बनें। दांडीको हमने हरिद्वार माना है तो हरिद्वार-जैसे पवित्र धाममें जानेकी योग्यता हममें आनी चाहिए। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन,''' १३-४-१९३० १४३. भाषण: उमराछीमें ' {{Right|२८ मार्च १९३०}} यदि कोई व्यक्ति ६१ वर्षकी आयुमें कूच शुरू करना चाहता है तो उसे हिमालयकी यात्रा पर जाना चाहिए ताकि उसे मोक्षका लाभ तो मिले, परमेश्वरके दर्शन तो हों ? लेकिन मैंने तो उलटा धर्म सीखा है। मुझे तो ईश्वरके दर्शन इसी तरह कूच करते हुए प्राप्त करने हैं। आप लोगोंके भी दर्शन करके मैं आपसे उसमें भाग लेनेकी याचना करता हूँ। क्योंकि जबतक देशमें जो राक्षसी राज्य है उसमें उथल-पुथल नहीं होती तबतक हम सब उसके भागीदार है। ऐसा भागीदार यदि धवलगिरि तक भी जाये तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। परमेश्वरके दर्शन तो दुष्कर है। वह तो ३० कोटि मनुष्योंके हृदयमें वास करता है। वहाँ जाना हो तो व्यक्तिको इन हृदयोंसे तादात्म्य स्थापित करना चाहिए। इन तीस कोटिमें उत्कलके हड्डियोंके पंजर, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा सिख, पुरुष और स्त्रियां, ये सब आ जाते हैं। जबतक हम इसके प्रत्येक अंगके साथ एक नहीं हो जाते, उसमें लीन नहीं हो जाते तबतक हम आस्तिक नहीं, नास्तिक हैं। इसीसे मैंने मनमें विचार किया कि ६१ वर्षकी उम्र में भी तुझे शान्तिसे नहीं बैठना है। जबतक इस साम्राज्यका नाश नहीं हो जाता तबतक तेरे लिए कैसा आराम ? आजतक मैं मौन था। मित्रोंके कटाक्षोंको सुनता था और सहता था। मुझे भय था कि लोग शायद गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे? मैं कहूँ और लोग न करें तो क्या होगा ? लेकिन मुझे लगा कि १. "धर्म-पात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने ये शब्द उस समय कहे जबकि वे और उनकी पार्टी सूरत जिलेमें कीम नदी पार कर रही थी, उस दिन २८ मार्च थी। ३. "खराज गीता" से उद्धृत।<noinclude></noinclude> t4y6a0lzuxaybncnqpnxj99xkfp1dd9 671890 671889 2026-08-20T02:39:57Z Kumari Arpana Sinha 2191 671890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४२. भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष' '''}}}} {{Right|[ २८ मार्च १९३०]²}} हमारी यात्राका यह अन्तिम सप्ताह है। इसके आरम्भ में ही हमें सारी मलिनता दूर कर देनी होगी। प्रत्येक जिलेकी सीमा पार करते समय हमें नदी मिली है। नदीको हम पवित्र मानते हैं। नदी आदि तो शुद्धिके बाह्य चिह्न हैं। इसकी मददसे हम शुद्ध बनें, नम्र बनें। दांडीको हमने हरिद्वार माना है तो हरिद्वार-जैसे पवित्र धाममें जानेकी योग्यता हममें आनी चाहिए। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन,''' १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४३. भाषण: उमराछीमें''''}}}} {{Right|२८ मार्च १९३०}} यदि कोई व्यक्ति ६१ वर्षकी आयुमें कूच शुरू करना चाहता है तो उसे हिमालयकी यात्रा पर जाना चाहिए ताकि उसे मोक्षका लाभ तो मिले, परमेश्वरके दर्शन तो हों ? लेकिन मैंने तो उलटा धर्म सीखा है। मुझे तो ईश्वरके दर्शन इसी तरह कूच करते हुए प्राप्त करने हैं। आप लोगोंके भी दर्शन करके मैं आपसे उसमें भाग लेनेकी याचना करता हूँ। क्योंकि जबतक देशमें जो राक्षसी राज्य है उसमें उथल-पुथल नहीं होती तबतक हम सब उसके भागीदार है। ऐसा भागीदार यदि धवलगिरि तक भी जाये तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। परमेश्वरके दर्शन तो दुष्कर है। वह तो ३० कोटि मनुष्योंके हृदयमें वास करता है। वहाँ जाना हो तो व्यक्तिको इन हृदयोंसे तादात्म्य स्थापित करना चाहिए। इन तीस कोटिमें उत्कलके हड्डियोंके पंजर, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा सिख, पुरुष और स्त्रियां, ये सब आ जाते हैं। जबतक हम इसके प्रत्येक अंगके साथ एक नहीं हो जाते, उसमें लीन नहीं हो जाते तबतक हम आस्तिक नहीं, नास्तिक हैं। इसीसे मैंने मनमें विचार किया कि ६१ वर्षकी उम्र में भी तुझे शान्तिसे नहीं बैठना है। जबतक इस साम्राज्यका नाश नहीं हो जाता तबतक तेरे लिए कैसा आराम? आजतक मैं मौन था। मित्रोंके कटाक्षोंको सुनता था और सहता था। मुझे भय था कि लोग शायद गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे? मैं कहूँ और लोग न करें तो क्या होगा? लेकिन मुझे लगा कि १. "धर्म-पात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने ये शब्द उस समय कहे जबकि वे और उनकी पार्टी सूरत जिलेमें कीम नदी पार कर रही थी, उस दिन २८ मार्च थी। ३. "खराज गीता" से उद्धृत।<noinclude></noinclude> 1a34yaqwq4nftf74d81hh2ugghcx4jf 671891 671890 2026-08-20T02:40:14Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४२. भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष' '''}}}} {{Right|[ २८ मार्च १९३०]²}} हमारी यात्राका यह अन्तिम सप्ताह है। इसके आरम्भ में ही हमें सारी मलिनता दूर कर देनी होगी। प्रत्येक जिलेकी सीमा पार करते समय हमें नदी मिली है। नदीको हम पवित्र मानते हैं। नदी आदि तो शुद्धिके बाह्य चिह्न हैं। इसकी मददसे हम शुद्ध बनें, नम्र बनें। दांडीको हमने हरिद्वार माना है तो हरिद्वार-जैसे पवित्र धाममें जानेकी योग्यता हममें आनी चाहिए। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन,''' १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४३. भाषण: उमराछीमें''''}}}} {{Right|२८ मार्च १९३०}} यदि कोई व्यक्ति ६१ वर्षकी आयुमें कूच शुरू करना चाहता है तो उसे हिमालयकी यात्रा पर जाना चाहिए ताकि उसे मोक्षका लाभ तो मिले, परमेश्वरके दर्शन तो हों ? लेकिन मैंने तो उलटा धर्म सीखा है। मुझे तो ईश्वरके दर्शन इसी तरह कूच करते हुए प्राप्त करने हैं। आप लोगोंके भी दर्शन करके मैं आपसे उसमें भाग लेनेकी याचना करता हूँ। क्योंकि जबतक देशमें जो राक्षसी राज्य है उसमें उथल-पुथल नहीं होती तबतक हम सब उसके भागीदार है। ऐसा भागीदार यदि धवलगिरि तक भी जाये तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। परमेश्वरके दर्शन तो दुष्कर है। वह तो ३० कोटि मनुष्योंके हृदयमें वास करता है। वहाँ जाना हो तो व्यक्तिको इन हृदयोंसे तादात्म्य स्थापित करना चाहिए। इन तीस कोटिमें उत्कलके हड्डियोंके पंजर, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा सिख, पुरुष और स्त्रियां, ये सब आ जाते हैं। जबतक हम इसके प्रत्येक अंगके साथ एक नहीं हो जाते, उसमें लीन नहीं हो जाते तबतक हम आस्तिक नहीं, नास्तिक हैं। इसीसे मैंने मनमें विचार किया कि ६१ वर्षकी उम्र में भी तुझे शान्तिसे नहीं बैठना है। जबतक इस साम्राज्यका नाश नहीं हो जाता तबतक तेरे लिए कैसा आराम? आजतक मैं मौन था। मित्रोंके कटाक्षोंको सुनता था और सहता था। मुझे भय था कि लोग शायद गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे? मैं कहूँ और लोग न करें तो क्या होगा? लेकिन मुझे लगा कि १. "धर्म-पात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने ये शब्द उस समय कहे जबकि वे और उनकी पार्टी सूरत जिलेमें कीम नदी पार कर रही थी, उस दिन २८ मार्च थी। ३. "खराज गीता" से उद्धृत।<noinclude></noinclude> 994udm7630r4nugb7k3xtwpbqc98wr3 671953 671891 2026-08-20T07:10:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 671953 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४२. भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष' '''}}}} {{Right|[ २८ मार्च १९३०]²}} हमारी यात्राका यह अन्तिम सप्ताह है। इसके आरम्भ में ही हमें सारी मलिनता दूर कर देनी होगी। प्रत्येक जिलेकी सीमा पार करते समय हमें नदी मिली है। नदीको हम पवित्र मानते हैं। नदी आदि तो शुद्धिके बाह्य चिह्न हैं। इसकी मददसे हम शुद्ध बनें, नम्र बनें। दांडीको हमने हरिद्वार माना है तो हरिद्वार-जैसे पवित्र धाममें जानेकी योग्यता हममें आनी चाहिए। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन,''' १३-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४३. भाषण: उमराछीमें''''}}}} {{Right|२८ मार्च १९३०}} यदि कोई व्यक्ति ६१ वर्षकी आयुमें कूच शुरू करना चाहता है तो उसे हिमालयकी यात्रा पर जाना चाहिए ताकि उसे मोक्षका लाभ तो मिले, परमेश्वरके दर्शन तो हों? लेकिन मैंने तो उलटा धर्म सीखा है। मुझे तो ईश्वरके दर्शन इसी तरह कूच करते हुए प्राप्त करने हैं। आप लोगोंके भी दर्शन करके मैं आपसे उसमें भाग लेनेकी याचना करता हूँ। क्योंकि जबतक देशमें जो राक्षसी राज्य है उसमें उथल-पुथल नहीं होती तबतक हम सब उसके भागीदार है। ऐसा भागीदार यदि धवलगिरि तक भी जाये तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। परमेश्वरके दर्शन तो दुष्कर है। वह तो ३० कोटि मनुष्योंके हृदयमें वास करता है। वहाँ जाना हो तो व्यक्तिको इन हृदयोंसे तादात्म्य स्थापित करना चाहिए। इन तीस कोटिमें उत्कलके हड्डियोंके पंजर, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा सिख, पुरुष और स्त्रियां, ये सब आ जाते हैं। जबतक हम इसके प्रत्येक अंगके साथ एक नहीं हो जाते, उसमें लीन नहीं हो जाते तबतक हम आस्तिक नहीं, नास्तिक हैं। इसीसे मैंने मनमें विचार किया कि ६१ वर्षकी उम्र में भी तुझे शान्तिसे नहीं बैठना है। जबतक इस साम्राज्यका नाश नहीं हो जाता तबतक तेरे लिए कैसा आराम? आजतक मैं मौन था। मित्रोंके कटाक्षोंको सुनता था और सहता था। मुझे भय था कि लोग शायद गलत रास्ते पर चल पड़ेंगे? मैं कहूँ और लोग न करें तो क्या होगा? लेकिन मुझे लगा कि १. "धर्म-पात्रा" से उद्धृत। २. गांधीजी ने ये शब्द उस समय कहे जबकि वे और उनकी पार्टी सूरत जिलेमें कीम नदी पार कर रही थी, उस दिन २८ मार्च थी। ३. "खराज गीता" से उद्धृत।<noinclude></noinclude> fuzsc9dbxdrjbfp3338g3i7ebcvyby3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९३ 250 197235 671917 669755 2026-08-20T05:17:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भटगाम में|१५१}}</noinclude>मैं डरपोक था। यह मेरे हृदयकी दुर्बलता थी। लोगोंका अविश्वास करनेका मुझे क्या अधिकार था ? [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४४. भाषण : भटगाम में'''}}}} {{Right|२९ मार्च, १९३०}} उपदेश शब्द तो सरल है लेकिन उपदेश देना अत्यन्त कठिन काम है। मनुष्य में उपदेश देनेकी योग्यता होनी चाहिए। मुझमें वह योग्यता कितनी है, इसकी मुझे खबर नहीं। लेकिन आज में कुछ एक बातें कबूल करना चाहता हूँ; इसे यदि आप उपदेश मानना चाहें तो मानें और कोई दूसरा अर्थ निकालना चाहें तो वह भी निकाल सकते हैं। -- आप गुजरातके लोग सच पूछें तो सारे हिन्दुस्तान के लोग मेरे एक स्वभावसे अच्छी तरह परिचित हो गये हैं, लेकिन अन्य लोगोंकी अपेक्षा गुजराती लोग विशेष रूपसे मेरे स्वभावको जान गये हैं। और यहाँ सूरत जिलेमें तो मेरे निकट सम्पर्क में आनेवाले अनेक साथी भरे हुए हैं। ये तो मेरे स्वभावसे वाकिफ हैं ही तथा उनके द्वारा आपको भी मेरा परिचय होना चाहिए। मैं स्पष्टवादी हूँ। सरकारके पहाड़ जैसे दोषोंको पहाड़ जैसा बता सकता हूँ । हमारे यदि रजकण-जितने दोष हों तो भी वे मुझे पहाड़के बराबर प्रतीत होते हैं और मैं उन्हें उतने ही बड़े बताता भी हूँ। सामान्य नियम तो यह है कि कोई अपने दोष नहीं देखता । इसमें स्वीकार करने लायक क्या बात है, ऐसा कहकर व्यक्ति अपने मनको चुप कर देता है। मैने इस सामान्य नियमकी वर्षोंसे अवहेलना की है और इससे अनेक मित्रों और साथियोंको दुःख हुआ है, उन्हें रोना पड़ा है तथा किसी-किसीने "दूरके: ढोल सुहावने", कहकर मेरा त्याग भी किया है। आज मैं अपने इस स्वभावका परिचय कराना चाहता हूँ। मेरे साथ लोगोंका जो जत्था चल रहा है उससे मैंने पहले ही कह दिया है। कि हमारे कुचका यह अन्तिम सप्ताह है। आगामी शनिवारको हम निर्धारित स्थलपर पहुँच जायेंगे, इसलिए कूच करनेकी जरूरत न रहेगी, लेकिन अन्य कार्यक्रम हमारे सामने होगा। इस अन्तिम सप्ताहमें हमें सूरत जिलेसे होकर गुजरना है। जहाँ हमारे निकटतम साथी बिखरे हुए हैं वहाँ हमें सावधान होकर जाना चाहिए और आत्मशुद्धिके विशेष प्रयत्न करने चाहिए। हम कोई फरिश्ते नहीं हैं। हम अनेक दोषों और लालचोंसे भरे हुए हैं और हमें उन सबको दूर करना है। इतनी चेतावनी देनेके बाद अधिक कहने की जरूरत न होगी, ऐसा मैने सोचा था लेकिन ईश्वर मुझ पर हमेशासे कृपा करता आया है। एक ही दिनमें हमें एक के बाद एक अपने असंख्य Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 8ze3vjsh14fu4bgl1wgsi2gh3ti9v1p 671919 671917 2026-08-20T05:20:22Z Kumari Arpana Sinha 2191 671919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भटगाम में|१५१}}</noinclude>मैं डरपोक था। यह मेरे हृदयकी दुर्बलता थी। लोगोंका अविश्वास करनेका मुझे क्या अधिकार था ? [गुजरातीसे] '''नवजीवन''', ६-४-१९३० {{C|{{larger|'''१४४. भाषण : भटगाम में'''}}}} {{Right|२९ मार्च, १९३०}} उपदेश शब्द तो सरल है लेकिन उपदेश देना अत्यन्त कठिन काम है। मनुष्य में उपदेश देनेकी योग्यता होनी चाहिए। मुझमें वह योग्यता कितनी है, इसकी मुझे खबर नहीं। लेकिन आज में कुछ एक बातें कबूल करना चाहता हूँ; इसे यदि आप उपदेश मानना चाहें तो मानें और कोई दूसरा अर्थ निकालना चाहें तो वह भी निकाल सकते हैं। आप गुजरातके लोग-- सच पूछें तो सारे हिन्दुस्तान के लोग मेरे एक स्वभावसे अच्छी तरह परिचित हो गये हैं, लेकिन अन्य लोगोंकी अपेक्षा गुजराती लोग विशेष रूपसे मेरे स्वभावको जान गये हैं। और यहाँ सूरत जिलेमें तो मेरे निकट सम्पर्क में आनेवाले अनेक साथी भरे हुए हैं। ये तो मेरे स्वभावसे वाकिफ हैं ही तथा उनके द्वारा आपको भी मेरा परिचय होना चाहिए। मैं स्पष्टवादी हूँ। सरकारके पहाड़ जैसे दोषोंको पहाड़ जैसा बता सकता हूँ। हमारे यदि रजकण-जितने दोष हों तो भी वे मुझे पहाड़के बराबर प्रतीत होते हैं और मैं उन्हें उतने ही बड़े बताता भी हूँ। सामान्य नियम तो यह है कि कोई अपने दोष नहीं देखता। इसमें स्वीकार करने लायक क्या बात है, ऐसा कहकर व्यक्ति अपने मनको चुप कर देता है। मैने इस सामान्य नियमकी वर्षोंसे अवहेलना की है और इससे अनेक मित्रों और साथियोंको दुःख हुआ है, उन्हें रोना पड़ा है तथा किसी-किसीने "दूरके: ढोल सुहावने", कहकर मेरा त्याग भी किया है। आज मैं अपने इस स्वभावका परिचय कराना चाहता हूँ। मेरे साथ लोगोंका जो जत्था चल रहा है उससे मैंने पहले ही कह दिया है। कि हमारे कुचका यह अन्तिम सप्ताह है। आगामी शनिवारको हम निर्धारित स्थलपर पहुँच जायेंगे, इसलिए कूच करनेकी जरूरत न रहेगी, लेकिन अन्य कार्यक्रम हमारे सामने होगा। इस अन्तिम सप्ताहमें हमें सूरत जिलेसे होकर गुजरना है। जहाँ हमारे निकटतम साथी बिखरे हुए हैं वहाँ हमें सावधान होकर जाना चाहिए और आत्मशुद्धिके विशेष प्रयत्न करने चाहिए। हम कोई फरिश्ते नहीं हैं। हम अनेक दोषों और लालचोंसे भरे हुए हैं और हमें उन सबको दूर करना है। इतनी चेतावनी देनेके बाद अधिक कहने की जरूरत न होगी, ऐसा मैने सोचा था लेकिन ईश्वर मुझ पर हमेशासे कृपा करता आया है। एक ही दिनमें हमें एक के बाद एक अपने असंख्य<noinclude></noinclude> 4udyovunwtrbc13uf7gznta96tyzct7 671935 671919 2026-08-20T06:12:00Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भटगाम में|१५१}}</noinclude>मैं डरपोक था। यह मेरे हृदयकी दुर्बलता थी। लोगोंका अविश्वास करनेका मुझे क्या अधिकार था ? 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वाइसराय हिन्दुस्तानके प्रति व्यक्तिकी आयसे पांच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, इसके लिए मैंने उनकी कटु आलोचना की थी। यह वेतन उनको कैसे पच सकता है? और हम उसे कैसे पचने दें? इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। ईश्वरने उनको पैसा दिया है, उन्हें वेतनकी कोई जरूरत नहीं है। पत्रमें मैंने लिखा कि आप सारा पैसा परोपकारमें लगा देते होंगे; और बादमें मैंने ऐसा सुना भी; बहुत सम्भव है, ऐसा ही होता हो। ये, यह पैसा परोपकारमें लगाते हों तो भी मुझे तो उन्हें इतना ज्यादा पैसा देना खलेगा। मैं तो २१,००० रुपये उन्हें कदापि न दूं, शायद २,१०० रुपये भी न दूं। लेकिन ऐसा कब किया जा सकता है? मैं स्वयं गरीबोंकी तरह रहता होऊँ तभी न? हम अपनेको गरीब कहकर घरोंसे निकले, किन्तु यदि जत्येके प्रत्येक व्यक्तिपर गरीबोंकी कमाईसे पचास गुना ज्यादा खर्च होता हो, तो ऐसा कहनेका मुझे क्या अधिकार है? अपने पर होनेवाले खर्चका हिसाब मैंने अपने साथियोंसे मांगा है और मैं उसे लेनेवाला हूँ। हिन्दुस्तानकी दैनिक आय ७ पैसे है असम्भव नहीं कि हम उससे पचास गुना ज्यादा खाते हों। देशमें जहाँसे भी मिले यहाँसे आप अंगूर मँगवाते हैं, नारंगी लाते हैं, जहाँ बारह चाहिए वहाँ १२० इकट्ठा करते हैं। जहाँ १ सेर दूधकी जरूरत होती है वहाँ आप ३ सेर ले आते हैं। आप दूध-घी हमें देते हैं और हम यह सोचकर उसे ग्रहण कर लेते हैं कि मना करनेपर आपकी भावनाको ठेस पहुंचेगी। आप अमरूद आदि भेंट करते हैं, उन्हें कैसे अस्वीकार किया जा सकता है, ऐसा सोचकर हम खा लेते हैं और बादमें हलके मनसे विलायती कलमसे वाइसरायको लिखते हैं कि आप पाँच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, तो यह बात कैसे शोभा दे सकती है ? क अखा भगतने गाया है, "काचो पारो खावो अन्न, तेनुं छे चोरीनुं धन अपनी गरीबीको जो शोभा दे, उतना खर्च न करके अधिक पैसे खर्च करना चोरी ही है। और चोरी करके इस युद्धमें विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, इस तरह विजय प्राप्त करनेके लिए मैं निकला भी नहीं हूँ। अभी तो झुण्डके-झुण्ड स्वयंसेवक आयेंगे। उन सवपर व्यर्थका खर्च करेंगे तो कैसे निर्वाह होगा! मेरी तो ऐसी दीन दशा है कि मैं अपने साथके इन अस्सी व्यक्तियोंको भी नहीं पहचान पाता। ऐसी स्थिति में मुझे सार्वजनिक रूपसे मैलको धोकर सन्तोष मानना होगा। यदि आप इसे जल्दी ही नहीं समझेंगे तो स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा न रखें। मैंने यह बताया कि हम अस्सी लोग कितने दुर्बल हैं और हमने वाइसरायको जो पत्र लिखा है वैसा पत्र लिखकर हमने उचित नहीं किया। हालांकि मैंने पूरा ब्योरा आपके सामने नहीं रखा फिर भी वैसा करना मुझ जैसे स्पष्टवक्ता के लिए भी मुश्किल है। १. तात्पर्य यह कि चोरीका धन ऐसा ही है जैसे कच्चा पारा खाना<noinclude></noinclude> awxcanhjn1mica7k2tu6lwua3c3j2xb 671924 671922 2026-08-20T05:28:10Z Kumari Arpana Sinha 2191 671924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५२| सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>दोष दिखाई दिये। इसके लिए मुझे अपने साथियोंसे कहना पड़ा। मैंने जो दोष बताये वे केवल उतने ही नहीं रहे हैं अपितु दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। मेरे साथके जत्थेके लोगोंके दोष मुझे खटकते रहते हैं। बाइसरायको पत्र लिखनेवाला मैं कौन होता हूँ? वाइसराय हिन्दुस्तानके प्रति व्यक्तिकी आयसे पांच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, इसके लिए मैंने उनकी कटु आलोचना की थी। यह वेतन उनको कैसे पच सकता है? और हम उसे कैसे पचने दें? इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। ईश्वरने उनको पैसा दिया है, उन्हें वेतनकी कोई जरूरत नहीं है। पत्रमें मैंने लिखा कि आप सारा पैसा परोपकारमें लगा देते होंगे; और बादमें मैंने ऐसा सुना भी; बहुत सम्भव है, ऐसा ही होता हो। ये, यह पैसा परोपकारमें लगाते हों तो भी मुझे तो उन्हें इतना ज्यादा पैसा देना खलेगा। मैं तो २१,००० रुपये उन्हें कदापि न दूं, शायद २,१०० रुपये भी न दूं। लेकिन ऐसा कब किया जा सकता है? मैं स्वयं गरीबोंकी तरह रहता होऊँ तभी न? हम अपनेको गरीब कहकर घरोंसे निकले, किन्तु यदि जत्येके प्रत्येक व्यक्तिपर गरीबोंकी कमाईसे पचास गुना ज्यादा खर्च होता हो, तो ऐसा कहनेका मुझे क्या अधिकार है? अपने पर होनेवाले खर्चका हिसाब मैंने अपने साथियोंसे मांगा है और मैं उसे लेनेवाला हूँ। हिन्दुस्तानकी दैनिक आय ७ पैसे है असम्भव नहीं कि हम उससे पचास गुना ज्यादा खाते हों। देशमें जहाँसे भी मिले यहाँसे आप अंगूर मँगवाते हैं, नारंगी लाते हैं, जहाँ बारह चाहिए वहाँ १२० इकट्ठा करते हैं। जहाँ १ सेर दूधकी जरूरत होती है वहाँ आप ३ सेर ले आते हैं। आप दूध-घी हमें देते हैं और हम यह सोचकर उसे ग्रहण कर लेते हैं कि मना करनेपर आपकी भावनाको ठेस पहुंचेगी। आप अमरूद आदि भेंट करते हैं, उन्हें कैसे अस्वीकार किया जा सकता है, ऐसा सोचकर हम खा लेते हैं और बादमें हलके मनसे विलायती कलमसे वाइसरायको लिखते हैं कि आप पाँच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, तो यह बात कैसे शोभा दे सकती है ? क अखा भगतने गाया है, "काचो पारो खावो अन्न, तेनुं छे चोरीनुं धन अपनी गरीबीको जो शोभा दे, उतना खर्च न करके अधिक पैसे खर्च करना चोरी ही है। और चोरी करके इस युद्धमें विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, इस तरह विजय प्राप्त करनेके लिए मैं निकला भी नहीं हूँ। अभी तो झुण्डके-झुण्ड स्वयंसेवक आयेंगे। उन सवपर व्यर्थका खर्च करेंगे तो कैसे निर्वाह होगा! मेरी तो ऐसी दीन दशा है कि मैं अपने साथके इन अस्सी व्यक्तियोंको भी नहीं पहचान पाता। ऐसी स्थिति में मुझे सार्वजनिक रूपसे मैलको धोकर सन्तोष मानना होगा। यदि आप इसे जल्दी ही नहीं समझेंगे तो स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा न रखें। मैंने यह बताया कि हम अस्सी लोग कितने दुर्बल हैं और हमने वाइसरायको जो पत्र लिखा है वैसा पत्र लिखकर हमने उचित नहीं किया। हालांकि मैंने पूरा ब्योरा आपके सामने नहीं रखा फिर भी वैसा करना मुझ जैसे स्पष्टवक्ता के लिए भी मुश्किल है। १. तात्पर्य यह कि चोरीका धन ऐसा ही है जैसे कच्चा पारा खाना<noinclude></noinclude> tpbgmv6m8ca11xeylx85rp5s77a1qwu 671927 671924 2026-08-20T05:39:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५२| सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>दोष दिखाई दिये। इसके लिए मुझे अपने साथियोंसे कहना पड़ा। मैंने जो दोष बताये वे केवल उतने ही नहीं रहे हैं अपितु दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। मेरे साथके जत्थेके लोगोंके दोष मुझे खटकते रहते हैं। बाइसरायको पत्र लिखनेवाला मैं कौन होता हूँ? वाइसराय हिन्दुस्तानके प्रति व्यक्तिकी आयसे पांच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, इसके लिए मैंने उनकी कटु आलोचना की थी। यह वेतन उनको कैसे पच सकता है? और हम उसे कैसे पचने दें? इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। ईश्वरने उनको पैसा दिया है, उन्हें वेतनकी कोई जरूरत नहीं है। पत्रमें मैंने लिखा कि आप सारा पैसा परोपकारमें लगा देते होंगे; और बादमें मैंने ऐसा सुना भी; बहुत सम्भव है, ऐसा ही होता हो। वे, यह पैसा परोपकारमें लगाते हों तो भी मुझे तो उन्हें इतना ज्यादा पैसा देना खलेगा। मैं तो २१,००० रुपये उन्हें कदापि न दूं, शायद २,१०० रुपये भी न दूं। लेकिन ऐसा कब किया जा सकता है? मैं स्वयं गरीबोंकी तरह रहता होऊँ तभी न? हम अपनेको गरीब कहकर घरोंसे निकले, किन्तु यदि जत्थेके प्रत्येक व्यक्तिपर गरीबोंकी कमाईसे पचास गुना ज्यादा खर्च होता हो, तो ऐसा कहनेका मुझे क्या अधिकार है? अपने पर होनेवाले खर्चका हिसाब मैंने अपने साथियोंसे मांगा है और मैं उसे लेनेवाला हूँ। हिन्दुस्तानकी दैनिक आय ७ पैसे है असम्भव नहीं कि हम उससे पचास गुना ज्यादा खाते हों। देशमें जहाँसे भी मिले वहाँसे आप अंगूर मँगवाते हैं, नारंगी लाते हैं, जहाँ बारह चाहिए वहाँ १२० इकट्ठा करते हैं। जहाँ १ सेर दूधकी जरूरत होती है वहाँ आप ३ सेर ले आते हैं। आप दूध-घी हमें देते हैं और हम यह सोचकर उसे ग्रहण कर लेते हैं कि मना करनेपर आपकी भावनाको ठेस पहुंचेगी। आप अमरूद आदि भेंट करते हैं, उन्हें कैसे अस्वीकार किया जा सकता है, ऐसा सोचकर हम खा लेते हैं और बादमें हलके मनसे विलायती कलमसे वाइसरायको लिखते हैं कि आप पाँच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, तो यह बात कैसे शोभा दे सकती है? अखा भगतने गाया है, "काचो पारो खावो अन्न, तेनुं छे चोरीनुं धन"अपनी गरीबीको जो शोभा दे, उतना खर्च न करके अधिक पैसे खर्च करना चोरी ही है। और चोरी करके इस युद्धमें विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, इस तरह विजय प्राप्त करनेके लिए मैं निकला भी नहीं हूँ। अभी तो झुण्डके-झुण्ड स्वयंसेवक आयेंगे। उन सवपर व्यर्थका खर्च करेंगे तो कैसे निर्वाह होगा! मेरी तो ऐसी दीन दशा है कि मैं अपने साथके इन अस्सी व्यक्तियोंको भी नहीं पहचान पाता। ऐसी स्थिति में मुझे सार्वजनिक रूपसे मैलको धोकर सन्तोष मानना होगा। यदि आप इसे जल्दी ही नहीं समझेंगे तो स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा न रखें। मैंने यह बताया कि हम अस्सी लोग कितने दुर्बल हैं और हमने वाइसरायको जो पत्र लिखा है वैसा पत्र लिखकर हमने उचित नहीं किया। हालांकि मैंने पूरा ब्योरा आपके सामने नहीं रखा फिर भी वैसा करना मुझ जैसे स्पष्टवक्ताके लिए भी मुश्किल है। १. तात्पर्य यह कि चोरीका धन ऐसा ही है जैसे कच्चा पारा खाना<noinclude></noinclude> gkl2xn2zqf5iykmu1fa5seqjxjfce97 671955 671927 2026-08-20T07:13:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 671955 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५२| सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>दोष दिखाई दिये। इसके लिए मुझे अपने साथियोंसे कहना पड़ा। मैंने जो दोष बताये वे केवल उतने ही नहीं रहे हैं अपितु दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। मेरे साथके जत्थेके लोगोंके दोष मुझे खटकते रहते हैं। बाइसरायको पत्र लिखनेवाला मैं कौन होता हूँ? वाइसराय हिन्दुस्तानके प्रति व्यक्तिकी आयसे पांच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, इसके लिए मैंने उनकी कटु आलोचना की थी। यह वेतन उनको कैसे पच सकता है? और हम उसे कैसे पचने दें? इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं है। ईश्वरने उनको पैसा दिया है, उन्हें वेतनकी कोई जरूरत नहीं है। पत्रमें मैंने लिखा कि आप सारा पैसा परोपकारमें लगा देते होंगे; और बादमें मैंने ऐसा सुना भी; बहुत सम्भव है, ऐसा ही होता हो। वे, यह पैसा परोपकारमें लगाते हों तो भी मुझे तो उन्हें इतना ज्यादा पैसा देना खलेगा। मैं तो २१,००० रुपये उन्हें कदापि न दूं, शायद २,१०० रुपये भी न दूं। लेकिन ऐसा कब किया जा सकता है? मैं स्वयं गरीबोंकी तरह रहता होऊँ तभी न? हम अपनेको गरीब कहकर घरोंसे निकले, किन्तु यदि जत्थेके प्रत्येक व्यक्तिपर गरीबोंकी कमाईसे पचास गुना ज्यादा खर्च होता हो, तो ऐसा कहनेका मुझे क्या अधिकार है? अपने पर होनेवाले खर्चका हिसाब मैंने अपने साथियोंसे मांगा है और मैं उसे लेनेवाला हूँ। हिन्दुस्तानकी दैनिक आय ७ पैसे है असम्भव नहीं कि हम उससे पचास गुना ज्यादा खाते हों। देशमें जहाँसे भी मिले वहाँसे आप अंगूर मँगवाते हैं, नारंगी लाते हैं, जहाँ बारह चाहिए वहाँ १२० इकट्ठा करते हैं। जहाँ १ सेर दूधकी जरूरत होती है वहाँ आप ३ सेर ले आते हैं। आप दूध-घी हमें देते हैं और हम यह सोचकर उसे ग्रहण कर लेते हैं कि मना करनेपर आपकी भावनाको ठेस पहुंचेगी। आप अमरूद आदि भेंट करते हैं, उन्हें कैसे अस्वीकार किया जा सकता है, ऐसा सोचकर हम खा लेते हैं और बादमें हलके मनसे विलायती कलमसे वाइसरायको लिखते हैं कि आप पाँच हजार गुना ज्यादा वेतन लेते हैं, तो यह बात कैसे शोभा दे सकती है? अखा भगतने गाया है, "काचो पारो खावो अन्न, तेनुं छे चोरीनुं धन"अपनी गरीबीको जो शोभा दे, उतना खर्च न करके अधिक पैसे खर्च करना चोरी ही है। और चोरी करके इस युद्धमें विजय प्राप्त नहीं की जा सकती, इस तरह विजय प्राप्त करनेके लिए मैं निकला भी नहीं हूँ। अभी तो झुण्डके-झुण्ड स्वयंसेवक आयेंगे। उन सवपर व्यर्थका खर्च करेंगे तो कैसे निर्वाह होगा! मेरी तो ऐसी दीन दशा है कि मैं अपने साथके इन अस्सी व्यक्तियोंको भी नहीं पहचान पाता। ऐसी स्थिति में मुझे सार्वजनिक रूपसे मैलको धोकर सन्तोष मानना होगा। यदि आप इसे जल्दी ही नहीं समझेंगे तो स्वराज्य प्राप्त करनेकी आशा न रखें। मैंने यह बताया कि हम अस्सी लोग कितने दुर्बल हैं और हमने वाइसरायको जो पत्र लिखा है वैसा पत्र लिखकर हमने उचित नहीं किया। हालांकि मैंने पूरा ब्योरा आपके सामने नहीं रखा फिर भी वैसा करना मुझ जैसे स्पष्टवक्ताके लिए भी मुश्किल है। १. तात्पर्य यह कि चोरीका धन ऐसा ही है जैसे कच्चा पारा खाना<noinclude></noinclude> qq3hs7wvajqxythe2rjn25ld8u6vl14 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९५ 250 197237 671981 669757 2026-08-20T08:07:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 671981 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : भटगाममें|१५३</noinclude>अब यहाँ रहनेवाले अपने साथियोंसे में कहता हूँ, आप लोग मुझे क्यों बिगाड़ते है? मैं ठहरा 'दीन, हीन और मलिन व्यक्ति', उसे आप और ज्यादा क्यों बिगाड़ते हैं? यह रही आपकी गैसकी बत्ती! ऐसी बत्ती यहाँ अच्छी नहीं लगती। ऐसी वस्तु-को हम गाँवोंमें कैसे आने दे सकते हैं? पहले ही एक लाख व्यक्ति हमें लूटते हैं, यह बात हमें बरदाश्त नहीं होती। यदि हम ३० करोड़ लोग परस्पर एक-दूसरेको। लूटने लगेंगे तो हमारी क्या हालत होगी? तब तो हमारी हड्डियाँ कौए और कुत्ते खायेंगे। किसी एक स्थानपर तो मैंने आग्रहपूर्वक इस बत्तीको बन्द करवा दिया था। हम खानेके लिए इकट्ठे नहीं होते। रही भाषण सुनने की बात, सो अँधेरेमें भी सुना जा सकता है। मेरा मुँह देखनेकी इसमें कोई जरूरत नहीं। और फिर मुझ जैसे ६१ वर्षीय बुढ़के दन्त-आदि-विहीन चेहरेको देखनेकी जरूरत भी क्या है? बत्ती तो चूंकि मेरी आँखोंके आगे टंगी हुई है इसलिए मैंने उसका उदाहरण दिया। लेकिन यत्तीके उदाहरणसे मैं स्वयंसेवक मात्रको जाग्रत करना चाहता हूँ कि वे एक-एक कौड़ीका हिसाब करके मुझे दें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप मेरा जीवन धूलमें मिला देंगे। यदि मुझे सरकारके विरुद्ध सत्याग्रह करना आता है तो स्वयंसेवक और सत्याग्रही सब कोई अच्छी तरहसे जान लें कि मुझे सगे-सम्बन्धियों तथा साथियोंके विरुद्ध और भी अधिक सत्याग्रह करना आता है। सरकार के साथ युद्ध ठानने में तो मैंने अनेक वर्ष लगाये लेकिन सगे-साथियोंके विरुद्ध सत्याग्रह करनेमें में तनिक भी समय नहीं लगाऊँगा। इसमें जो जोखिम है वह हृदयको आघात पहुँचनेकी है। अतः आप इसे चेतावनीके रूपमें मानें कि इस युद्धमें आप जो दें सो कंजूसीके साथ दें, उदार होकर नहीं। मैं इस बातकी शिकायत नहीं करूँगा कि मुझे अमुक चीज क्यों नहीं मिली ? अथवा बकरीका दूध क्यों नहीं मिला ? यदि किसी बीमारके लिए बकरीका दूध रखा हुआ हो और आप यह कहकर उससे जबरदस्ती दूध ले आयें कि 'महात्मा' को देना है तो मेरे लिए वह दूध विषके समान है। मैं ऐसा दूध नहीं पीना चाहता। सूरतसे दूध और साग-सब्जी आये और हम उसे खायें, ऐसे दूध-सब्जी के बिना कोई मरनेवाला नहीं है और यदि दो-चार व्यक्ति मर भी जायें तो क्या होता है? यदि वे इस तरह ईश्वरका नाम लेते हुए और दिलमें तनिक भी रोष किये बिना मरेंगे तो उनका कार्य पूरा हुआ माना जायेगा। मोटर आदि अथवा अन्य किसी चीज पर जो खर्च करें सो सोच-समझकर करें। पैदल चलकर जायाजा सके तो मोटर पर न जायें। [ बैल ] गाड़ीसे काम चले तो घोड़ेपर न चढ़ें और यदि घोड़ेसे काम चलता हो तो मोटरमें न बैठें। यह ३० करोड़का युद्ध है। यह युद्ध रुपये अथवा मोटरसे लड़ा जा सकेगा, ऐसा न समझें। इसमें तो भूखे भी भाग ले सकते हैं, यदि इस बातका मुझे विश्वास न हो तो मैं करोड़ों लोगोंको इसमें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित न करूँ। पैसा इकट्ठा करके करोड़ोंको खिलाते हुए यह युद्ध करना मेरी शक्तिके बाहर है। इस युद्धमें मौज-शौक क्षण-भरके लिए नहीं चलेगा। हमें तो इसके बिना ही यह लड़ाई लड़नी है। आप कहेंगे, " तो इतने लोगोंको इकट्ठा नहीं किया जा सकता ",<noinclude></noinclude> cc8v5mkmafm4wa6fuleeetrfa6n2id8 671985 671981 2026-08-20T08:12:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 671985 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भटगाममें|१५३}}</noinclude>अब यहाँ रहनेवाले अपने साथियोंसे में कहता हूँ, आप लोग मुझे क्यों बिगाड़ते है? मैं ठहरा 'दीन, हीन और मलिन व्यक्ति', उसे आप और ज्यादा क्यों बिगाड़ते हैं? यह रही आपकी गैसकी बत्ती! ऐसी बत्ती यहाँ अच्छी नहीं लगती। ऐसी वस्तु-को हम गाँवोंमें कैसे आने दे सकते हैं? पहले ही एक लाख व्यक्ति हमें लूटते हैं, यह बात हमें बरदाश्त नहीं होती। यदि हम ३० करोड़ लोग परस्पर एक-दूसरेको। लूटने लगेंगे तो हमारी क्या हालत होगी? तब तो हमारी हड्डियाँ कौए और कुत्ते खायेंगे। किसी एक स्थानपर तो मैंने आग्रहपूर्वक इस बत्तीको बन्द करवा दिया था। हम खानेके लिए इकट्ठे नहीं होते। रही भाषण सुनने की बात, सो अँधेरेमें भी सुना जा सकता है। मेरा मुँह देखनेकी इसमें कोई जरूरत नहीं। और फिर मुझ जैसे ६१ वर्षीय बुढ़के दन्त-आदि-विहीन चेहरेको देखनेकी जरूरत भी क्या है? बत्ती तो चूंकि मेरी आँखोंके आगे टंगी हुई है इसलिए मैंने उसका उदाहरण दिया। लेकिन यत्तीके उदाहरणसे मैं स्वयंसेवक मात्रको जाग्रत करना चाहता हूँ कि वे एक-एक कौड़ीका हिसाब करके मुझे दें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप मेरा जीवन धूलमें मिला देंगे। यदि मुझे सरकारके विरुद्ध सत्याग्रह करना आता है तो स्वयंसेवक और सत्याग्रही सब कोई अच्छी तरहसे जान लें कि मुझे सगे-सम्बन्धियों तथा साथियोंके विरुद्ध और भी अधिक सत्याग्रह करना आता है। सरकार के साथ युद्ध ठानने में तो मैंने अनेक वर्ष लगाये लेकिन सगे-साथियोंके विरुद्ध सत्याग्रह करनेमें में तनिक भी समय नहीं लगाऊँगा। इसमें जो जोखिम है वह हृदयको आघात पहुँचनेकी है। अतः आप इसे चेतावनीके रूपमें मानें कि इस युद्धमें आप जो दें सो कंजूसीके साथ दें, उदार होकर नहीं। मैं इस बातकी शिकायत नहीं करूँगा कि मुझे अमुक चीज क्यों नहीं मिली? अथवा बकरीका दूध क्यों नहीं मिला? यदि किसी बीमारके लिए बकरीका दूध रखा हुआ हो और आप यह कहकर उससे जबरदस्ती दूध ले आयें कि 'महात्मा' को देना है तो मेरे लिए वह दूध विषके समान है। मैं ऐसा दूध नहीं पीना चाहता। सूरतसे दूध और साग-सब्जी आये और हम उसे खायें, ऐसे दूध-सब्जी के बिना कोई मरनेवाला नहीं है और यदि दो-चार व्यक्ति मर भी जायें तो क्या होता है? यदि वे इस तरह ईश्वरका नाम लेते हुए और दिलमें तनिक भी रोष किये बिना मरेंगे तो उनका कार्य पूरा हुआ माना जायेगा। मोटर आदि अथवा अन्य किसी चीज पर जो खर्च करें सो सोच-समझकर करें। पैदल चलकर जायाजा सके तो मोटर पर न जायें। [बैल] गाड़ीसे काम चले तो घोड़ेपर न चढ़ें और यदि घोड़ेसे काम चलता हो तो मोटरमें न बैठें। यह ३० करोड़का युद्ध है। यह युद्ध रुपये अथवा मोटरसे लड़ा जा सकेगा, ऐसा न समझें। इसमें तो भूखे भी भाग ले सकते हैं, यदि इस बातका मुझे विश्वास न हो तो मैं करोड़ों लोगोंको इसमें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित न करूँ। पैसा इकट्ठा करके करोड़ोंको खिलाते हुए यह युद्ध करना मेरी शक्तिके बाहर है। इस युद्धमें मौज-शौक क्षण-भरके लिए नहीं चलेगा। हमें तो इसके बिना ही। यह लड़ाई लड़नी है। आप कहेंगे, " तो इतने लोगोंको इकट्ठा नहीं किया जा सकता ",<noinclude></noinclude> m59d9zquoqintgumpntjqbc0xzcvkr1 671999 671985 2026-08-20T08:26:12Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 671999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भटगाममें|१५३}}</noinclude>अब यहाँ रहनेवाले अपने साथियोंसे में कहता हूँ, आप लोग मुझे क्यों बिगाड़ते है? मैं ठहरा 'दीन, हीन और मलिन व्यक्ति', उसे आप और ज्यादा क्यों बिगाड़ते हैं? यह रही आपकी गैसकी बत्ती! ऐसी बत्ती यहाँ अच्छी नहीं लगती। ऐसी वस्तु-को हम गाँवोंमें कैसे आने दे सकते हैं? पहले ही एक लाख व्यक्ति हमें लूटते हैं, यह बात हमें बरदाश्त नहीं होती। यदि हम ३० करोड़ लोग परस्पर एक-दूसरेको लूटने लगेंगे तो हमारी क्या हालत होगी? तब तो हमारी हड्डियाँ कौए और कुत्ते खायेंगे। किसी एक स्थानपर तो मैंने आग्रहपूर्वक इस बत्तीको बन्द करवा दिया था। हम खानेके लिए इकट्ठे नहीं होते। रही भाषण सुनने की बात, सो अँधेरेमें भी सुना जा सकता है। मेरा मुँह देखनेकी इसमें कोई जरूरत नहीं। और फिर मुझ जैसे ६१ वर्षीय बुढ़के दन्त-आदि-विहीन चेहरेको देखनेकी जरूरत भी क्या है? बत्ती तो चूंकि मेरी आँखोंके आगे टंगी हुई है इसलिए मैंने उसका उदाहरण दिया। लेकिन वत्तीके उदाहरणसे मैं स्वयंसेवक मात्रको जाग्रत करना चाहता हूँ कि वे एक-एक कौड़ीका हिसाब करके मुझे दें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप मेरा जीवन धूलमें मिला देंगे। यदि मुझे सरकारके विरुद्ध सत्याग्रह करना आता है तो स्वयंसेवक और सत्याग्रही सब कोई अच्छी तरहसे जान लें कि मुझे सगे-सम्बन्धियों तथा साथियोंके विरुद्ध और भी अधिक सत्याग्रह करना आता है। सरकार के साथ युद्ध ठानने में तो मैंने अनेक वर्ष लगाये लेकिन सगे-साथियोंके विरुद्ध सत्याग्रह करनेमें मैं तनिक भी समय नहीं लगाऊँगा। इसमें जो जोखिम है वह हृदयको आघात पहुँचनेकी है। अतः आप इसे चेतावनीके रूपमें मानें कि इस युद्धमें आप जो दें सो कंजूसीके साथ दें, उदार होकर नहीं। मैं इस बातकी शिकायत नहीं करूँगा कि मुझे अमुक चीज क्यों नहीं मिली? अथवा बकरीका दूध क्यों नहीं मिला? यदि किसी बीमारके लिए बकरीका दूध रखा हुआ हो और आप यह कहकर उससे जबरदस्ती दूध ले आयें कि 'महात्मा' को देना है तो मेरे लिए वह दूध विषके समान है। मैं ऐसा दूध नहीं पीना चाहता। सूरतसे दूध और साग-सब्जी आये और हम उसे खायें, ऐसे दूध-सब्जी के बिना कोई मरनेवाला नहीं है और यदि दो-चार व्यक्ति मर भी जायें तो क्या होता है? यदि वे इस तरह ईश्वरका नाम लेते हुए और दिलमें तनिक भी रोष किये बिना मरेंगे तो उनका कार्य पूरा हुआ माना जायेगा। मोटर आदि अथवा अन्य किसी चीज पर जो खर्च करें सो सोच-समझकर करें। पैदल चलकर जाया जा सके तो मोटर पर न जायें। [बैल] गाड़ीसे काम चले तो घोड़ेपर न चढ़ें और यदि घोड़ेसे काम चलता हो तो मोटरमें न बैठें। यह ३० करोड़का युद्ध है। यह युद्ध रुपये अथवा मोटरसे लड़ा जा सकेगा, ऐसा न समझें। इसमें तो भूखे भी भाग ले सकते हैं, यदि इस बातका मुझे विश्वास न हो तो मैं करोड़ों लोगोंको इसमें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित न करूँ। पैसा इकट्ठा करके करोड़ोंको खिलाते हुए यह युद्ध करना मेरी शक्तिके बाहर है। इस युद्धमें मौज-शौक क्षण-भरके लिए नहीं चलेगा। हमें तो इसके बिना ही यह लड़ाई लड़नी है। आप कहेंगे,"तो इतने लोगोंको इकट्ठा नहीं किया जा सकता",<noinclude></noinclude> tuweh6imowy8ymoozduxftf51szpmgs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९६ 250 197238 672010 669758 2026-08-20T08:51:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 672010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तब मुझे दो-चार लोगोंसे भी बात करनी आती है तब आप कहेंगे, "बादमें अखबारोंमें रिपोर्ट नहीं छपेगी।" मैं कह देना चाहता हूँ कि हमें यह लड़ाई अखबारोंकी मार्फत नहीं जीतनी यह तो श्रीरामके नामपर जीती जानी है और उसके पास जानेके लिए हमें बत्तीकी जरूरत नहीं, विलायती कलम आदि सामग्रीकी जरूरत नहीं, जीभकी भी जरूरत नहीं। उसके पास तो हाथ-पैर कटे होनेपर भी प्रार्थनापत्र पहुँच सकता है। हम आज जिन लोगोंको कहारोंकी श्रेणीमें रखते हैं वैसा कोई एक व्यक्ति सिरपर गैसकी बत्ती रखकर मेरे आगे चल रहा था। यदि आप लोग इस बत्तीको अपने कन्धों पर रखें तो आपको शर्म आयेगी। आपके अध्यक्ष महोदय अथवा मीठू-बहन इसे अपने सिरपर रखकर चलें तो मैं यह बात सहन कर सकता हूँ। बत्तीवाले को 'चलो, चलो,' कहकर दौड़ाया जा रहा था। लेकिन कहनेवालेकी यह हिम्मत नहीं होती थी कि वह उस बत्तीको उससे लेकर अपने सिरपर रख ले। मैं मन-ही-मन क्रोधित हो रहा था और वायु वेगसे चल रहा था। यूरोप अथवा अमेरिकामें आदमीसे इस तरह बत्ती नहीं उठवाई जाती। यह काम तो हिन्दुस्तानके भोले-भाले लोगोंसे ही लिया जा सकता है। हम कहते हैं कि स्वराज्य में बेगार नहीं चल सकती। आपको और मुझे ऐसा कहनेका क्या अधिकार है? आप इसे कैसे सहन करते हैं? हाथमें लालटेन लेकर चलना ही क्या पर्याप्त नहीं है? ऐसी भारी यती यदि आप मेरे सिरपर रखें तो मेरी हड्डियाँ चूर-चूर हो जायें; फिर हम अपने उस भाईसे यह काम कैसे ले सकते हैं? वह एक दिन हिन्दुस्तानका बादशाह भी बन सकता है, हमारा प्रतिनिधि हो सकता है। मैं इस समय जो येवाक्य बोल रहा हूँ उनके आधारपर आप यह न समझ लें कि मैं भागनेवाला हूँ। मैंने एक बार जो प्रतिज्ञा ले ली है उससे मैं पीछे हटनेवाला नहीं हूँ। मैं कौए कुत्ते की मौत मरूँगा, स्वराज्यकी रट लगाते हुए घूमते-भटकते हुए मरूँगा, लेकिन पीछे नहीं हटूंगा। बत्ती और दूधके मैंने जो उदाहरण दिये हैं, आप यदि समझदार होंगे तो 'हैडियाका एक चावल' वाली कहावतके अनुसार आचरण करना चाहिए सो समझ गये होंगे। ये बहनें कितनी श्रद्धासे मुझे पैसा दे रही है!लेकिन बहनो, सुनो! मैं आज स्वीकार करता हूँ कि श्रद्धासे दिये गये आपके पैसेका में दुरुपयोग करता हूँ। अभी-अभी यहाँ जो गीत गाया गया है उसमें चांडालोंके प्रति तिरस्कारका भाव दिखाया गया है, वैसा ही मैं भी हूँ। मेरा त्याग करना। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude> 9wwe9cxflmpnxuvnh24ra9z8mtf8986 672035 672010 2026-08-20T09:38:48Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 672035 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तब मुझे दो-चार लोगोंसे भी बात करनी आती है तब आप कहेंगे, "बादमें अखबारोंमें रिपोर्ट नहीं छपेगी।" मैं कह देना चाहता हूँ कि हमें यह लड़ाई अखबारोंकी मार्फत नहीं जीतनी यह तो श्रीरामके नामपर जीती जानी है और उसके पास जानेके लिए हमें बत्तीकी जरूरत नहीं, विलायती कलम आदि सामग्रीकी जरूरत नहीं, जीभकी भी जरूरत नहीं। उसके पास तो हाथ-पैर कटे होनेपर भी प्रार्थनापत्र पहुँच सकता है। हम आज जिन लोगोंको कहारोंकी श्रेणीमें रखते हैं वैसा कोई एक व्यक्ति सिरपर गैसकी बत्ती रखकर मेरे आगे चल रहा था। यदि आप लोग इस बत्तीको अपने कन्धों पर रखें तो आपको शर्म आयेगी। आपके अध्यक्ष महोदय अथवा मीठू-बहन इसे अपने सिरपर रखकर चलें तो मैं यह बात सहन कर सकता हूँ। बत्तीवाले को 'चलो, चलो,' कहकर दौड़ाया जा रहा था। लेकिन कहनेवालेकी यह हिम्मत नहीं होती थी कि वह उस बत्तीको उससे लेकर अपने सिरपर रख ले। मैं मन-ही-मन क्रोधित हो रहा था और वायु वेगसे चल रहा था। यूरोप अथवा अमेरिकामें आदमीसे इस तरह बत्ती नहीं उठवाई जाती। यह काम तो हिन्दुस्तानके भोले-भाले लोगोंसे ही लिया जा सकता है। हम कहते हैं कि स्वराज्य में बेगार नहीं चल सकती। आपको और मुझे ऐसा कहनेका क्या अधिकार है? आप इसे कैसे सहन करते हैं? हाथमें लालटेन लेकर चलना ही क्या पर्याप्त नहीं है? ऐसी भारी वती यदि आप मेरे सिरपर रखें तो मेरी हड्डियाँ चूर-चूर हो जायें; फिर हम अपने उस भाईसे यह काम कैसे ले सकते हैं? वह एक दिन हिन्दुस्तानका बादशाह भी बन सकता है, हमारा प्रतिनिधि हो सकता है। मैं इस समय जो ये वाक्य बोल रहा हूँ उनके आधारपर आप यह न समझ लें कि मैं भागनेवाला हूँ। मैंने एक बार जो प्रतिज्ञा ले ली है उससे मैं पीछे हटनेवाला नहीं हूँ। मैं कौए कुत्ते की मौत मरूँगा, स्वराज्यकी रट लगाते हुए घूमते-भटकते हुए मरूँगा, लेकिन पीछे नहीं हटूंगा। बत्ती और दूधके मैंने जो उदाहरण दिये हैं, आप यदि समझदार होंगे तो 'हंडियाका एक चावल' वाली कहावतके अनुसार आचरण करना चाहिए सो समझ गये होंगे। ये बहनें कितनी श्रद्धासे मुझे पैसा दे रही है!लेकिन बहनो, सुनो! मैं आज स्वीकार करता हूँ कि श्रद्धासे दिये गये आपके पैसेका मैं दुरुपयोग करता हूँ। अभी-अभी यहाँ जो गीत गाया गया है उसमें चांडालोंके प्रति तिरस्कारका भाव दिखाया गया है, वैसा ही मैं भी हूँ। मेरा त्याग करना। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude> be393qe4wwoza8biodqcbpt3oph7fge पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९७ 250 197239 672014 669759 2026-08-20T09:04:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 672014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४५. बहिष्कारको मर्यादा'''}}}} इस यात्राके दौरान बहिष्कारके बारेमें में अपने भाषणोंमें बहुत कुछ कह चुका हूँ। मेरे भाषणोंके ये अंश समाचारपत्रों में किस रूपमें छपे हैं, यह में नहीं जानता। महत्त्वका विषय होनेके कारण यहाँ पर विचार कर लेना और बहिष्कारकी मर्यादा निश्चित कर लेना आवश्यक है। चूंकि यह युद्ध पवित्र, सत्य और अहिंसामय होनेके कारण धार्मिक है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसमें जाने-अनजाने भी किसी तरह की भूल न हो। इस सम्बन्धमें छोटी-सी भूल भी इस लड़ाईको नुकसान पहुँचायेगी। आज वहिष्कार दो तरहसे काम कर रहा है: एक सरकारी अधिकारियोंका और दूसरा ऐसे लोगोंका जो लोकमतकी परवाह नहीं करते यथा मुखिया आदिका । अफसरों या अधिकारियोंके हमारे गाँवों में आने पर उन्हें सलाम न करना, उनकी सलामी बजानेके लिए न जाना आवश्यक है। यह हमारा धर्म है हम उनका आतिथ्य नहीं कर सकते, उन्हें किसी प्रकारकी सहूलियत नहीं दे सकते। यह असहयोग है। गाड़ीवाला गाड़ी न दे, कुम्हार पानी न भरे, मोदी ओढ़ने बिछाने के कपड़े न दे। क्योंकि अधिकारीगण ये सब सहूलियतें अपने अधिकारके बलपर लेते हैं। अधिकारीको ये सब सुविधाएँ न देनेका उद्देश्य उसे दुःख देना नहीं, बल्कि उसकी सत्ताका अन्त करना है, और इसमें सविनय अवज्ञा भी निहित हो सकती है। अब सवाल यह है कि अगर कोई अधिकारी भूखों मरता हो, दुःखसे तड़प रहा हो और कोई उसका मददगार न हो तो क्या करें ? ऐसे समय हमें दुःख उठाकर भी उस अधिकारीकी सेवा करनी चाहिए। मान लीजिए किसी अधिकारीकी मोटर टूट गई हो और उसे भोजनकी जरूरत हो तो उस हालत में उसे हम भोजन करायें और यदि उसके पास पैसे न हों तो पैसोंकी आशा भी न रखें; मान लीजिए कोई अधिकारी एकाएक बीमार हो गया और उसकी सेवा करनेवाला कोई नहीं है, तो उस हालत में हम उसकी सेवा उतने ही प्रेमसे करें जितने प्रेमसे अपने किसी प्रियजनकी करते हैं। एक मनुष्यके नाते हमें उससे कोई बैर नहीं है। हमारा वैर तो उसके अधिकारसे है। अभी तक सरकारने अपना होश-हवास नहीं खोया है; अभी शासन करनेमें उसे बहुत कठिनाइयों नहीं उठानी पड़ी हैं। लेकिन जब उसे शासन-कार्य में कठिनाई होने लगेगी, तो यह सर्वथा सम्भव है कि वह अपने होश- हवास सहज ही भूल जाये और सीमाका उल्लंघन कर बैठे। ऐसा होनपर यह मुमकिन है कि उसके अमलोंको यह हुक्म मिल जाये कि वे लोगोंसे जबरदस्ती जो चाहे सो लें। ऐसे समय पर इस बहिष्कारका भली भाँति उपयोग किया जा सकता है। हमें तब पता चल जायेगा कि बहिष्कार ही सच्चा धर्म है। सरकारी कर्मचारी यह मानता ही है कि अधिकारकी रूसे उसे सहूलियतें देना लोगोंका फर्ज है। जब लोग उसके इस खयाल- को झूठा साबित कर देंगे और ऐसा करते हुए जो भी कष्ट उठाने पड़ेंगे उन्हें सह लेंगे, तभी उन्हें स्वतन्त्र माना जा सकता है। जब लोग इस तरहकी जबरदस्तीके<noinclude></noinclude> 7wuuxi1vo6wmhozwmzwpj8x3u2hfxtv 672019 672014 2026-08-20T09:11:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 672019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४५. बहिष्कारको मर्यादा'''}}}} इस यात्राके दौरान बहिष्कारके बारेमें मैं अपने भाषणोंमें बहुत-कुछ कह चुका हूँ। मेरे भाषणोंके ये अंश समाचारपत्रों में किस रूपमें छपे हैं, यह मैं नहीं जानता। महत्त्वका विषय होनेके कारण यहाँ पर विचार कर लेना और बहिष्कारकी मर्यादा निश्चित कर लेना आवश्यक है। चूंकि यह युद्ध पवित्र, सत्य और अहिंसामय होनेके कारण धार्मिक है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसमें जाने-अनजाने भी किसी तरह की भूल न हो। इस सम्बन्धमें छोटी-सी भूल भी इस लड़ाईको नुकसान पहुँचायेगी। आज वहिष्कार दो तरहसे काम कर रहा है: एक सरकारी अधिकारियोंका और दूसरा ऐसे लोगोंका जो लोकमतकी परवाह नहीं करते-यथा, मुखिया आदिका। अफसरों या अधिकारियोंके हमारे गाँवों में आने पर उन्हें सलाम न करना, उनकी सलामी बजानेके लिए न जाना आवश्यक है। यह हमारा धर्म है हम उनका आतिथ्य नहीं कर सकते, उन्हें किसी प्रकारकी सहूलियत नहीं दे सकते। यह असहयोग है। गाड़ीवाला गाड़ी न दे, कुम्हार पानी न भरे, मोदी ओढ़ने बिछाने के कपड़े न दे। क्योंकि अधिकारीगण ये सब सहूलियतें अपने अधिकारके बलपर लेते हैं। अधिकारीको ये सब सुविधाएँ न देनेका उद्देश्य उसे दुःख देना नहीं, बल्कि उसकी सत्ताका अन्त करना है, और इसमें सविनय अवज्ञा भी निहित हो सकती है। अब सवाल यह है कि अगर कोई अधिकारी भूखों मरता हो, दुःखसे तड़प रहा हो और कोई उसका मददगार न हो तो क्या करें ? ऐसे समय हमें दुःख उठाकर भी उस अधिकारीकी सेवा करनी चाहिए। मान लीजिए किसी अधिकारीकी मोटर टूट गई हो और उसे भोजनकी जरूरत हो तो उस हालत में उसे हम भोजन करायें और यदि उसके पास पैसे न हों तो पैसोंकी आशा भी न रखें; मान लीजिए कोई अधिकारी एकाएक बीमार हो गया और उसकी सेवा करनेवाला कोई नहीं है, तो उस हालत में हम उसकी सेवा उतने ही प्रेमसे करें जितने प्रेमसे अपने किसी प्रियजनकी करते हैं। एक मनुष्यके नाते हमें उससे कोई बैर नहीं है। हमारा वैर तो उसके अधिकारसे है अभी तक सरकारने अपना होश-हवास नहीं खोया है; अभी शासन करनेमें उसे बहुत कठिनाइयों नहीं उठानी पड़ी हैं। लेकिन जब उसे शासन-कार्य में कठिनाई होने लगेगी, तो यह सर्वथा सम्भव है कि वह अपने होश-हवास सहज ही भूल जाये और सीमाका उल्लंघन कर बैठे। ऐसा होनपर यह मुमकिन है कि उसके अमलोंको यह हुक्म मिल जाये कि वे लोगोंसे जबरदस्ती जो चाहे सो लें। ऐसे समय पर इस बहिष्कारका भली भाँति उपयोग किया जा सकता है। हमें तब पता चल जायेगा कि बहिष्कार ही सच्चा धर्म है। सरकारी कर्मचारी यह मानता ही है कि अधिकारकी रूसे उसे सहूलियतें देना लोगोंका फर्ज है। जब लोग उसके इस खयाल-को झूठा साबित कर देंगे और ऐसा करते हुए जो भी कष्ट उठाने पड़ेंगे उन्हें सह लेंगे, तभी उन्हें स्वतन्त्र माना जा सकता है। जब लोग इस तरहकी जबरदस्तीके<noinclude></noinclude> ap0ges65albgc8f68cf8h2ax1tzl1ah 672021 672019 2026-08-20T09:11:51Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 672021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४५. बहिष्कारको मर्यादा'''}}}} इस यात्राके दौरान बहिष्कारके बारेमें मैं अपने भाषणोंमें बहुत-कुछ कह चुका हूँ। मेरे भाषणोंके ये अंश समाचारपत्रों में किस रूपमें छपे हैं, यह मैं नहीं जानता। महत्त्वका विषय होनेके कारण यहाँ पर विचार कर लेना और बहिष्कारकी मर्यादा निश्चित कर लेना आवश्यक है। चूंकि यह युद्ध पवित्र, सत्य और अहिंसामय होनेके कारण धार्मिक है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसमें जाने-अनजाने भी किसी तरह की भूल न हो। इस सम्बन्धमें छोटी-सी भूल भी इस लड़ाईको नुकसान पहुँचायेगी। आज वहिष्कार दो तरहसे काम कर रहा है: एक सरकारी अधिकारियोंका और दूसरा ऐसे लोगोंका जो लोकमतकी परवाह नहीं करते-यथा, मुखिया आदिका। अफसरों या अधिकारियोंके हमारे गाँवों में आने पर उन्हें सलाम न करना, उनकी सलामी बजानेके लिए न जाना आवश्यक है। यह हमारा धर्म है हम उनका आतिथ्य नहीं कर सकते, उन्हें किसी प्रकारकी सहूलियत नहीं दे सकते। यह असहयोग है। गाड़ीवाला गाड़ी न दे, कुम्हार पानी न भरे, मोदी ओढ़ने बिछाने के कपड़े न दे। क्योंकि अधिकारीगण ये सब सहूलियतें अपने अधिकारके बलपर लेते हैं। अधिकारीको ये सब सुविधाएँ न देनेका उद्देश्य उसे दुःख देना नहीं, बल्कि उसकी सत्ताका अन्त करना है, और इसमें सविनय अवज्ञा भी निहित हो सकती है। अब सवाल यह है कि अगर कोई अधिकारी भूखों मरता हो, दुःखसे तड़प रहा हो और कोई उसका मददगार न हो तो क्या करें ? ऐसे समय हमें दुःख उठाकर भी उस अधिकारीकी सेवा करनी चाहिए। मान लीजिए किसी अधिकारीकी मोटर टूट गई हो और उसे भोजनकी जरूरत हो तो उस हालत में उसे हम भोजन करायें और यदि उसके पास पैसे न हों तो पैसोंकी आशा भी न रखें; मान लीजिए कोई अधिकारी एकाएक बीमार हो गया और उसकी सेवा करनेवाला कोई नहीं है, तो उस हालत में हम उसकी सेवा उतने ही प्रेमसे करें जितने प्रेमसे अपने किसी प्रियजनकी करते हैं। एक मनुष्यके नाते हमें उससे कोई बैर नहीं है। हमारा वैर तो उसके अधिकारसे है अभी तक सरकारने अपना होश-हवास नहीं खोया है; अभी शासन करनेमें उसे बहुत कठिनाइयों नहीं उठानी पड़ी हैं। लेकिन जब उसे शासन-कार्य में कठिनाई होने लगेगी, तो यह सर्वथा सम्भव है कि वह अपने होश-हवास सहज ही भूल जाये और सीमाका उल्लंघन कर बैठे। ऐसा होनपर यह मुमकिन है कि उसके अमलोंको यह हुक्म मिल जाये कि वे लोगोंसे जबरदस्ती जो चाहे सो लें। ऐसे समय पर इस बहिष्कारका भली भाँति उपयोग किया जा सकता है। हमें तब पता चल जायेगा कि बहिष्कार ही सच्चा धर्म है। सरकारी कर्मचारी यह मानता ही है कि अधिकारकी रूसे उसे सहूलियतें देना लोगोंका फर्ज है। जब लोग उसके इस खयाल-को झूठा साबित कर देंगे और ऐसा करते हुए जो भी कष्ट उठाने पड़ेंगे उन्हें सह लेंगे, तभी उन्हें स्वतन्त्र माना जा सकता है। जब लोग इस तरहकी जबरदस्तीके<noinclude></noinclude> cw2suyzaogynk9dnfynr2z4xxk6u1bs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९८ 250 197240 672027 669760 2026-08-20T09:21:23Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 672027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सामने नहीं झुकेंगे तभी उन्हें विजयी माना जा सकता है। आज तो बहिष्कार एक खिलवाड़ सा है। लेकिन जब सरकार अपने नौकरोंको लूट-पाट करनेकी आजादी दे देगी, उस हालत में हर तरहकी बरबादीका सामना करते हुए भी लोग स्वेच्छासे अधिकारियोंको दातुन तक न दें; तभी बहिष्कारके धर्मका पूरा पालन हुआ कहा जा सकता है। लेकिन यह याद रहे कि ऐसे समय भी यदि कोई अधिकारी, जैसा ऊपर कहा गया है वैसी, मुसीबत में फँस जाये और उसका अधिकार उसकी रक्षा न कर सके तो हमें उसकी सेवा करनी चाहिए। मित्र और शत्रुको एक समान माननेका जो धर्म है, उसे पालनेका यही अवसर है। सत्याग्रहीका इस दुनियामें कोई दुश्मन नहीं होता, न हो सकता है; वह किसीको अपना दुश्मन न समझे। अपना लड़का या पिता भी अगर अधिकारी हो तो वह उसका भी बहिष्कार करे। सत्याग्रहीके लिए स्वजन या परजनमें कोई भेद नहीं होता। सत्याग्रही जो काम अपनोंके लिए नहीं कर सकता, वह दूसरोंके लिए कभी न करे। अब हम मुखियाके दृष्टान्त पर विचार करें। गाँवके सब लोग तो चाहते हैं कि मुखिया इस्तीफा दे, लेकिन उसमें इस्तीफा देनेकी हिम्मत नहीं है, अथवा स्वार्थ-वश वह इस्तीफा नहीं देना चाहता। ऐसी हालत में मुखियाका बहिष्कार नहीं किया जा सकता। इस तरहका बहिष्कार जबरदस्ती है। इस प्रकार मुखियाको लाचार करना तो उससे जबरदस्ती पुण्य करानेके समान है। परन्तु धर्ममें जबरदस्तीका कोई स्थान नहीं होता। किसीसे जबरदस्ती कोई काम करवाकर प्रजातन्त्र कभी कायम नहीं किया जा सकता। इस देशके मृतप्राय लोगोंके साथ जबरदस्ती करना महापाप है, और यदि केवल बुद्धिमानीसे इसपर विचार करें तो हमें पता चलेगा कि इस तरहकी जबरदस्ती से हमारा उद्देश्य कभी सिद्ध नहीं हो सकेगा। हमारा उद्देश्य सफल हो या न हो, इस तरहकी जबरदस्ती निःसन्देह हिंसा है। मुखिया इस्तीफा दे या न दे, यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। लोकमतका आदर करके भी अगर वह इस्तीफा देता है तो अच्छा है, अन्यथा हम उसके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते। लेकिन मुखिया अपनी सत्ता नहीं चला सकता; सत्ताके बलपर लोगोसे कोई काम नहीं करा सकता। मुखियाकी दो अवस्थाएँ हैं : वह अधिकारी है, और वह ग्रामवासी है। अधिकारीके रूपमें यदि वह बेगार आदि मांगेगा तो वह नहीं मिलेगी; और ग्रामवासीके नाते सीधा वगैरा मांगनेका उसे अधिकार है। उसे खाने-पीनेके लिए कुछ न देनेका अर्थ तो उसे इस्तीफा देनेके लिए मजबूर करने जैसा है। सत्याग्रही यह नहीं कर सकता। लोकमत के खिलाफ काम करनेवालोंका मर्यादित और सामाजिक बहिष्कार करना हमारा अधिकार है, और कभी-कभी ऐसा करना हमारा कर्तव्य भी हो जाता है। जो मुखिया स्वार्थके लिए अपनी मुखियागिरीसे चिपटा रहता है, समाज उसकी इज्जत न करे, अर्थात् उसकी दैनिक आवश्यकताओंकी पूर्तिको छोड़कर समाज और सब तरहसे उसका बहिष्कार करे; विवाह आदिके अवसरोंपर लोग उसके यहाँ न जायें, उसके यहाँसे मिले न्यौते आदिको स्वीकार न करें। सारांश यह कि उसके दुःख में<noinclude></noinclude> inygvoo74yg4u1bz12hytb0jwj2ct8s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१९९ 250 197241 672028 669761 2026-08-20T09:26:16Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 672028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|बहिष्कार की मर्यादा|१५७}}</noinclude>लोग उसके भागीदार हों, किन्तु भोगमें कभी नहीं। इस तरहके बहिष्कार में ईर्ष्या-द्वेष,हिंसा आदिको स्थान नहीं होना चाहिए। अगर मुखिया हमारा सगा भाई हुआ तो हम क्या करेंगे? अपनी अमूच्छित अवस्थामें हम समझ-बूझकर समाजसे जैसे व्यवहारकी आशा रखते हैं, वैसा ही व्यवहार हम मुखिया वगैराके साथ भी करें। अबतक हमने तीन प्रकारके बहिष्कारपर विचार किया: १. अधिकारीके अधिकारोंका बहिष्कार; २. मुखिया वगैराका जबरदस्ती किया गया बहिष्कार; और ३. मुखियोंकी तरह जो लोग लोकमतकी कद्र नहीं करते उनका मर्यादित बहिष्कार । पहला बहिष्कार करने योग्य है, और वैसा करना धर्म है जिसमें हिम्मत हो वही इस तरहका बहिष्कार करे। यह याद रहे कि इस बहिष्कारके सिलसिले में भारी दुःख सहनेका मौका भी आ सकता है। कांग्रेस आज इस तरहके बहिष्कारकी आज्ञा नहीं दे रही है। यह बहिष्कार गुजरातके कुछ हिस्सोंमें ही शुरू हुआ है, क्योंकि गुजरातियोंको इसका अभ्यास हो चुका है, और इसकी उन्हें ठीक-ठीक जानकारी भी है। सरदार वल्लभभाईकी गिरफ्तारी और सजाके कारण इस तरहका बहिष्कार करना गुजरातका विशेष धर्म है। लेकिन संकटके समय इसका निर्वाह न कर सकने-वाले यदि इसमें भाग न लें तो कोई नुकसान नहीं, लेकिन एक बार कदम बढ़ा चुकने पर उसे पीछे हटाने में हानि होगी। दूसरा जबरदस्ती थोपा गया बहिष्कार हमेशा त्याज्य है, क्योंकि उसमें हिंसा है और इस कारण उससे निश्चय ही लोगोंकी बहुत कुछ हानि हो सकती है। तीसरा मर्यादित बहिष्कार करने योग्य है। सत्याग्रहीका प्रत्येक काम स्वयं दुःख सहनेके लिए होता है, विरोधीको दुःख देनेके लिए कदापि नहीं । स्वयं दुःख उठाते या धर्मका पालन करते हुए यदि विरोधीको कष्ट पहुँचे या असुविधा हो तो सत्याग्रही उसके लिए लाचार है। फिलहाल तो मैं लोगोंसे नमक- कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेकी ही आशा करता हूँ। इसके सिवा यदि और कुछ न हो सके तो सब भले चुपचाप बैठे रहें, लेकिन एक बार आगे कदम बढ़ाकर पीछे हटाने में खतरा और नुकसान है। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ३०-३-१९३०<noinclude></noinclude> jc1kobbz5dmk7fjbblbulfbe9so6w7a 672031 672028 2026-08-20T09:27:35Z Kumari Arpana Sinha 2191 672031 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहिष्कार की मर्यादा|१५७}}</noinclude>लोग उसके भागीदार हों, किन्तु भोगमें कभी नहीं। इस तरहके बहिष्कार में ईर्ष्या-द्वेष,हिंसा आदिको स्थान नहीं होना चाहिए। अगर मुखिया हमारा सगा भाई हुआ तो हम क्या करेंगे? अपनी अमूच्छित अवस्थामें हम समझ-बूझकर समाजसे जैसे व्यवहारकी आशा रखते हैं, वैसा ही व्यवहार हम मुखिया वगैराके साथ भी करें। अबतक हमने तीन प्रकारके बहिष्कारपर विचार किया: १. अधिकारीके अधिकारोंका बहिष्कार; २. मुखिया वगैराका जबरदस्ती किया गया बहिष्कार; और ३. मुखियोंकी तरह जो लोग लोकमतकी कद्र नहीं करते उनका मर्यादित बहिष्कार । पहला बहिष्कार करने योग्य है, और वैसा करना धर्म है जिसमें हिम्मत हो वही इस तरहका बहिष्कार करे। यह याद रहे कि इस बहिष्कारके सिलसिले में भारी दुःख सहनेका मौका भी आ सकता है। कांग्रेस आज इस तरहके बहिष्कारकी आज्ञा नहीं दे रही है। यह बहिष्कार गुजरातके कुछ हिस्सोंमें ही शुरू हुआ है, क्योंकि गुजरातियोंको इसका अभ्यास हो चुका है, और इसकी उन्हें ठीक-ठीक जानकारी भी है। सरदार वल्लभभाईकी गिरफ्तारी और सजाके कारण इस तरहका बहिष्कार करना गुजरातका विशेष धर्म है। लेकिन संकटके समय इसका निर्वाह न कर सकने-वाले यदि इसमें भाग न लें तो कोई नुकसान नहीं, लेकिन एक बार कदम बढ़ा चुकने पर उसे पीछे हटाने में हानि होगी। दूसरा जबरदस्ती थोपा गया बहिष्कार हमेशा त्याज्य है, क्योंकि उसमें हिंसा है और इस कारण उससे निश्चय ही लोगोंकी बहुत कुछ हानि हो सकती है। तीसरा मर्यादित बहिष्कार करने योग्य है। सत्याग्रहीका प्रत्येक काम स्वयं दुःख सहनेके लिए होता है, विरोधीको दुःख देनेके लिए कदापि नहीं । स्वयं दुःख उठाते या धर्मका पालन करते हुए यदि विरोधीको कष्ट पहुँचे या असुविधा हो तो सत्याग्रही उसके लिए लाचार है। फिलहाल तो मैं लोगोंसे नमक- कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेकी ही आशा करता हूँ। इसके सिवा यदि और कुछ न हो सके तो सब भले चुपचाप बैठे रहें, लेकिन एक बार आगे कदम बढ़ाकर पीछे हटाने में खतरा और नुकसान है। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ३०-३-१९३०<noinclude></noinclude> ej332ykf6u1988nnn6aoq7chrrszief 672032 672031 2026-08-20T09:31:41Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 672032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहिष्कार की मर्यादा|१५७}}</noinclude>लोग उसके भागीदार हों, किन्तु भोगमें कभी नहीं। इस तरहके बहिष्कार में ईर्ष्या-द्वेष,हिंसा आदिको स्थान नहीं होना चाहिए। अगर मुखिया हमारा सगा भाई हुआ तो हम क्या करेंगे? अपनी अमूर्च्छित अवस्थामें हम समझ-बूझकर समाजसे जैसे व्यवहारकी आशा रखते हैं, वैसा ही व्यवहार हम मुखिया वगैराके साथ भी करें। अबतक हमने तीन प्रकारके बहिष्कारपर विचार किया: १. अधिकारीके अधिकारोंका बहिष्कार; २. मुखिया वगैराका जबरदस्ती किया गया बहिष्कार; और ३. मुखियोंकी तरह जो लोग लोकमतकी कद्र नहीं करते उनका मर्यादित बहिष्कार । पहला बहिष्कार करने योग्य है, और वैसा करना धर्म है जिसमें हिम्मत हो वही इस तरहका बहिष्कार करे। यह याद रहे कि इस बहिष्कारके सिलसिले में भारी दुःख सहनेका मौका भी आ सकता है। कांग्रेस आज इस तरहके बहिष्कारकी आज्ञा नहीं दे रही है। यह बहिष्कार गुजरातके कुछ हिस्सोंमें ही शुरू हुआ है, क्योंकि गुजरातियोंको इसका अभ्यास हो चुका है, और इसकी उन्हें ठीक-ठीक जानकारी भी है। सरदार वल्लभभाईकी गिरफ्तारी और सजाके कारण इस तरहका बहिष्कार करना गुजरातका विशेष धर्म है। लेकिन संकटके समय इसका निर्वाह न कर सकने-वाले यदि इसमें भाग न लें तो कोई नुकसान नहीं, लेकिन एक बार कदम बढ़ा चुकने पर उसे पीछे हटाने में हानि होगी। दूसरा जबरदस्ती थोपा गया बहिष्कार हमेशा त्याज्य है, क्योंकि उसमें हिंसा है और इस कारण उससे निश्चय ही लोगोंकी बहुत कुछ हानि हो सकती है। तीसरा मर्यादित बहिष्कार करने योग्य है। सत्याग्रहीका प्रत्येक काम स्वयं दुःख सहनेके लिए होता है, विरोधीको दुःख देनेके लिए कदापि नहीं। स्वयं दुःख उठाते या धर्मका पालन करते हुए यदि विरोधीको कष्ट पहुँचे या असुविधा हो तो सत्याग्रही उसके लिए लाचार है। फिलहाल तो मैं लोगोंसे नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेकी ही आशा करता हूँ। इसके सिवा यदि और कुछ न हो सके तो सब भले चुपचाप बैठे रहें, लेकिन एक बार आगे कदम बढ़ाकर पीछे हटाने में खतरा और नुकसान है। [ गुजरातीसे ] '''नवजीवन''', ३०-३-१९३०<noinclude></noinclude> 8ng1z20rp5eu85spmwlz3of5vuqbdnj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०५ 250 197448 671879 669974 2026-08-20T01:22:06Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671879 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||बहिष्कार और खादी|३६१}}</noinclude>उसे अपने दरवाजे बन्द कर देने चाहिए। इस सम्बन्ध में बातचीत करते हुए मैंने श्री विट्ठलदास जेराजाणीसे कहा: " भविष्यमें आप ग्राहकोंसे पैसोंके बजाय हाथकता सूत मांगें। ऐसा करनेसे वहीं लोग खादी खरीदने आयेंगे, जो सचमुच खादी द्वारा ही बहिष्कारको सफल बनाना चाहते हैं। इस तरकीबसे खादीकी खपतमें स्वच्छता आयेगी, कातनेवालों की संख्या बढ़ेगी और पर्याप्त सूत तैयार होने लगेगा। और जब प्रत्येक काम व्यवस्थित हो जायेगा तो फिर खादीका पहाड़ ही खड़ा हो जायेगा। सूत स्वयं पहननेवाले के हाथका कता हुआ हो तो बेहतर है, पर यदि ऐसा न हो सके तो सारे कुटुम्बका सूत इकट्ठा किया जाये। चतुर लोग गांवों में जाकर सूत कतवा- कर ले आयें करोड़ों लोगोंको सूतके उत्पादनमें लगा सकना बिलकुल आसान है । सूत मिलते ही उसे बनवाने की व्यवस्था आपको कर लेनी चाहिए। बम्बई में बहुतेरे जुलाहे हैं। बहिष्कार होनेपर बाजारमें विदेशी सूत आना ही नहीं चाहिए। स्वदेशी मिलोंका सूत हो सकता है। ये मिलें भी, यदि समझें तो, हाथकते सूतके साथ कभी होड़ न करें। जिन जुलाहोंमें स्वदेश प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है वे भी हाथकता सूत ही बुनेंगे।" “लेकिन हम ऐसा करें और यदि लोग खादी न अपनायें तो ? " भाई जेराजाणीने पूछा। "जानकार तो ऐसा कभी नहीं करेंगे, अनजान करें तो भले करें यदि वे खादी नहीं पहनेंगे तो नुकसान उठायेंगे, इससे खादीकी कोई हानि नहीं होगी।" मेरी इस पद्धतिके अनुसार अमल करनेवालेको इस बातका ठीक-ठीक पता चल जायेगा कि बहिष्कारमें खादीका स्थान कहाँ है। यदि हमें इस बातका पक्का विश्वास हो कि खादीके बिना बहिष्कार सफल हो ही नहीं सकता तो फिर हम सच बात कहने से क्यों डरें ? हमारा कर्त्तव्य सही काम करने कराने का है, पर परिणाम ईश्वरा- धीन है। लेकिन यदि मैं बम्बईको पहचानता हूँ, तो मुझे विश्वास है कि बम्बईवासी मेरी इस युक्तिको समझ जायेंगे, वे इस तरीकेके प्रति कभी उदासीनता नहीं दिखायेंगे, बल्कि यथाशक्ति मदद ही करेंगे। तकलीको आपद्धर्मं समझकर बांस और खपरेके टुकड़ेको गोल करके सुन्दर तकली बनाकर तथा खुद ही रुई पीजकर सब लोग सूत कातना शुरू कर दें। यदि हर रोज दो घंटे भी दिये जायें तो काफी होंगे। खादी भण्डारके सब कर्मचारी भी तकली विशारद बन जायें; और जो लोग आयें उन्हें तकली बनाना, पीजना तथा सूतकी पहचान करना सिखा दें। यदि इस रफ्तारसे छः महीनेतक लगातार काम चलता रहे तो कभी खादीकी कमी न पड़े। यहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि यदि खादीकी भावना व्यापक रूप धारण कर ले तो गांवों में खादीकी कमी कभी होगी ही नहीं। क्योंकि गांववाले तो फौरन ही अपनी जरूरतकी खादी पैदा कर लेंगे। एक सवाल बम्बई में सर्वत्र पूछा जा सकता है " आप एक ओर तो सामूहिक सविनय अवज्ञा करा रहे हैं और दूसरी ओर तकली चलानेको कहते हैं। सविनय अवज्ञा Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> mamze38ll105t0qb1eg9afx3bljqbnd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०६ 250 197449 671880 669975 2026-08-20T01:26:56Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671880 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करनेवाले को कानून-भंगकी उत्तेजनामें तकली चलाना कैसे सूझेगा।" "स्वयं कानून-भंग में उत्तेजना हो सकती है, किन्तु सविनय अवज्ञामें उसकी क्या जरूरत ? सविनय अर्थात् शान्तिमय । शान्ति तो उत्तेजनाका विरोधी शब्द है। हमारी अवज्ञामें यदि सच्ची शान्ति होगी तो तकली और जोरसे चलेगी, क्योंकि तकली तो शान्तिकी मूर्ति है।" स्वयं- सेवकोंकी छावनियोंमें घूमते हुए मैं देखता हूँ कि बहुत से स्थानोंपर सैनिक आलस्य में समय बिताते हैं और कहते हैं: "हमें काम दो या गिरफ्तार कराओ।" गिरफ्तार कराना कोई मेरे हाथकी बात नहीं है। मैं काम दे सकता हूँ और वह तकली हैं, पिजाई है। आज तो हजारों सैनिक हजारों तोले सुत रोज दे सकते हैं। हजार तोले सुतका मतलब [ कच्चा ] २५ सेर सूत होता है। अर्थात् कमसे कम पोन सौ वर्ग गज खादी। हमारी कपड़ेकी एक दिनकी औसत आवश्यकता सवा इंच मानी जाती है, इस हिसाब से प्रतिदिन २,१०० आदमियोंकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। यह परि-णाम हरएकको आचर्यमें डालनेवाला है। लेकिन जो कहते हैं कि 'अब बहुत कत चुका' उन्हें इससे आश्चर्य नहीं होगा। एक तोला सूत कातनेवाला अपने लिए और दूसरे सवा आदमीके लिए खादीका सामान तैयार करता है। एक आदमी एक तोला सूत हँसते-खेलते काल सकता है। और यदि हम शान्तिपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हों तो धरना देते हुए या गोली खाते हुए भी तकली चला सकते हैं। हमें शरीरकी रक्षा तो करनी नहीं है। मान लीजिए कि हम नमककी सरकारी क्यारियोंपर कब्जा करने गये और वे कब्जा करने नहीं देते। हम मोर्चा बाँधकर खड़े हुए हैं, इसपर वे या तो हमें पकड़ेंगे, गोली चलायेंगे या लाठियोंसे मारेंगे। ऐसी स्थिति आनेतक क्या हम सब शान्तचित्तसे तकली नहीं चला सकते ? तकली सत्याग्रहीका हथियार है। उनकी बन्दूकोंके मुकाबले हमारी ठीकरे तथा बाँसकी बनी हुई तकलियां हैं। मुझे तो इससे बढ़कर और कुछ भव्य नहीं लगता। क्या बम्बई तथा दूसरे शहर और गाँव इस सुझावका स्वागत नहीं करेंगे ? और अब सोचिए। करोड़ों आदमी गोली खानेको मैदानमें नहीं आयेंगे, पूरे दिन नमक नहीं बनायेंगे और न करोड़ों लोग जलूसोंमें ही शामिल होंगे। औरतें, बच्चे, बूढ़े क्या करेंगे? यदि ये सब लोग भी सूत कातें तो ये भी स्वराज्य-यज्ञ में पूरी तरह हाथ बँटायेंगे । {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> grsrbg42hkhq17f48dwzkhjr0bivpcx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०७ 250 197450 671884 669976 2026-08-20T01:59:52Z अंजली राजभर 4516 /* अशोधित */ 671884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४१. मेरी कसौटी'''}}}} सरकार मुझे अच्छी तरह कसौटी पर कस रही है। उसे ऐसा करनेका अधिकार है। सरकार सोचती होगी कि यदि वह मेरे हाथ काट डाले तो शायद मैं हार जाऊँगा, या अगर न हारा तो भी अकेला तो पड़ ही जाऊँगा। सांसारिक दृष्टिसे यह बात ठीक भी मालूम होती है। इसी कारण महादेव पकड़े गये, स्वामी पकड़े गये। दूसरे पुराने और भाई मुंशी जैसे नये साथियोंको में छोड़े देता हूँ । महादेव और स्वामी अर्थात् 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन'। स्वामी अलग भले हो गये हों, किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उनका सम्बन्ध 'नवजीवन' से टूट गया है। यहाँ तो वैसी ही स्थिति है कि मैं आश्रमके संरक्षकोंमें नहीं हूँ, तो भी आश्रमका हूँ। 'नवजीवन' अर्थात् स्वामी। बम्बई में बैठे हुए भी वे 'नवजीवन' की देखभाल किया करते थे। अथक परिश्रमपूर्वक उन्होंने जमनालालजी को अस्पृश्यता-निवारणके काममें मदद दी थी। रात-दिन मेहनत करके उन्होंने विलेपार्लेके कामको चमकाया था। महादेवने आजकल जो काम अपने हाथमें ले रखा हुआ था उसे, यहाँ इस कोनेमें बैठे हुए, जितना मैं जानता हूँ उससे कहीं अधिक अहमदाबादके निकट रहनेवाले गुजराती भाई बहन जानते है। लेकिन जहां महादेव और स्वामी गये हैं, वहाँ मेरा प्रत्येक साथी चला जाये तो भी चिन्ताकी क्या बात है ? मैं अपनेको अकेला मानता ही नहीं। मेरा साथी, रक्षक, सलाहकार जो भी कहूँ एक ईश्वर है। महादेव स्वामी या सरदार अथवा किसी मनुष्यके भरोसे यह जंग नहीं छेड़ी गई है। अतएव चाहे जितने साथी क्यों न चले जायें, मैं तो निश्चिन्त हैं। निर्बलको चिन्ता किस बातकी ? बलवानके वलको नष्ट किया जा सकता है, पर निर्बलके बलका नाश कौन कर सकता है ? लेकिन निर्बल होते हुए भी मैं अपनेको बलवान मानता हूँ; क्योंकि मैं ईश्वर के बलपर जूझता हूँ। उसकी प्रेरणासे खाता हूँ, पीता हूँ, लिखता हूँ, बोलता हूँ । इसलिए मैं अपनेपर किसी तरहके बोझका अनुभव नहीं करता। महादेव, स्वामी या रमणीकलालकी गिरफ्तारी मुझे खटकती नहीं। उन्हें तो जेल में आराम मिल जायेगा, आरामकी उन्हें जरूरत भी थी। यदि मैं चिन्ता करूँ ही तो मुझे चटगांव और पेशावरकी चिन्ता करनी होगी । यों इन घटनाओंका प्रभाव हृदयपर पड़ता है,परन्तु चिन्ता नहीं होती । यह हिंसा-अहिंसाका द्वन्द्व है। मुझमें जिस हदतक अहिंसा होगी उस हदतक मुझे अहिंसक उपाय सूझते रहेंगे और जबतक में बाहर हूँ, उन्हें जनताके सामने रखता रहूँगा। अगर अहिंसा व्यापक होगी तो मेरी गैरहाजिरीमें भी लोग उसी रास्ते पर चलते रहेंगे। यदि लोगोंमें सच्ची अहिंसा आ गई होगी तो जो अहिंसाके निकट नहीं आये हैं वे भी आखिरकार उसके निकट आये बिना न रहेंगे । {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> f7ap37ewtz7g8a5h0p403e27wwewlhp 671893 671884 2026-08-20T03:17:31Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४१. मेरी कसौटी'''}}}} सरकार मुझे अच्छी तरह कसौटी पर कस रही है। उसे ऐसा करनेका अधिकार है। सरकार सोचती होगी कि यदि वह मेरे हाथ काट डाले तो शायद मैं हार जाऊँगा, या अगर न हारा तो भी अकेला तो पड़ ही जाऊँगा। सांसारिक दृष्टिसे यह बात ठीक भी मालूम होती है। इसी कारण महादेव पकड़े गये, स्वामी पकड़े गये। दूसरे पुराने और भाई मुंशी जैसे नये साथियोंको में छोड़े देता हूँ । महादेव और स्वामी अर्थात् 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन'। स्वामी अलग भले हो गये हों, किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उनका सम्बन्ध 'नवजीवन' से टूट गया है। यहाँ तो वैसी ही स्थिति है कि मैं आश्रमके संरक्षकोंमें नहीं हूँ, तो भी आश्रमका हूँ। 'नवजीवन' अर्थात् स्वामी। बम्बई में बैठे हुए भी वे 'नवजीवन' की देखभाल किया करते थे। अथक परिश्रमपूर्वक उन्होंने जमनालालजी को अस्पृश्यता-निवारणके काममें मदद दी थी। रात-दिन मेहनत करके उन्होंने विलेपार्लेके कामको चमकाया था। महादेवने आजकल जो काम अपने हाथमें ले रखा हुआ था उसे, यहाँ इस कोनेमें बैठे हुए, जितना मैं जानता हूँ उससे कहीं अधिक अहमदाबादके निकट रहनेवाले गुजराती भाई बहन जानते है। लेकिन जहां महादेव और स्वामी गये हैं, वहाँ मेरा प्रत्येक साथी चला जाये तो भी चिन्ताकी क्या बात है ? मैं अपनेको अकेला मानता ही नहीं। मेरा साथी, रक्षक, सलाहकार जो भी कहूँ एक ईश्वर है। महादेव स्वामी या सरदार अथवा किसी मनुष्यके भरोसे यह जंग नहीं छेड़ी गई है। अतएव चाहे जितने साथी क्यों न चले जायें, मैं तो निश्चिन्त हैं। निर्बलको चिन्ता किस बातकी ? बलवानके वलको नष्ट किया जा सकता है, पर निर्बलके बलका नाश कौन कर सकता है ? लेकिन निर्बल होते हुए भी मैं अपनेको बलवान मानता हूँ; क्योंकि मैं ईश्वर के बलपर जूझता हूँ। उसकी प्रेरणासे खाता हूँ, पीता हूँ, लिखता हूँ, बोलता हूँ । इसलिए मैं अपनेपर किसी तरहके बोझका अनुभव नहीं करता। महादेव, स्वामी या रमणीकलालकी गिरफ्तारी मुझे खटकती नहीं। उन्हें तो जेल में आराम मिल जायेगा, आरामकी उन्हें जरूरत भी थी। यदि मैं चिन्ता करूँ ही तो मुझे चटगांव और पेशावरकी चिन्ता करनी होगी । यों इन घटनाओंका प्रभाव हृदयपर पड़ता है,परन्तु चिन्ता नहीं होती । यह हिंसा-अहिंसाका द्वन्द्व है। मुझमें जिस हदतक अहिंसा होगी उस हदतक मुझे अहिंसक उपाय सूझते रहेंगे और जबतक में बाहर हूँ, उन्हें जनताके सामने रखता रहूँगा। अगर अहिंसा व्यापक होगी तो मेरी गैरहाजिरीमें भी लोग उसी रास्ते पर चलते रहेंगे। यदि लोगोंमें सच्ची अहिंसा आ गई होगी तो जो अहिंसाके निकट नहीं आये हैं वे भी आखिरकार उसके निकट आये बिना न रहेंगे । {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> o2uoghwzmiviq7gz1tdi98ftz37nf61 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०८ 250 197451 671887 669977 2026-08-20T02:23:02Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४२. पत्र : अमीना तैयबजीको'''}}}} {{Right|२७ अप्रैल, १९३०}} {{Left|प्रिय बहन,}} साथमें वाइसरायको लिखा पत्र<ref>१. देखिए "वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा", २७-४-१९३० अथवा उसके पूर्व ।</ref> भेज रहा हूँ। कृपया इसपर हस्ताक्षर कर इसे ले जानेवाले व्यक्तिको लौटा दें ताकि इसे वाइसरायको भेजा जा सके । रेहाना कैसी है ? हमीदा ओलपाडमें बहुत अच्छा काम कर रही है। {{Right|आपका,<br> मो० क० गांधी}} अंग्रेजी (एस० एन० ९६८८ ) की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''३४३. आसफअलीको लिखे पत्रका अंश'''}}}} {{Right|२७ अप्रैल, १९३०}} व्यक्तिगत रूपसे मेरा विचार यह है कि धरना देना कहीं भी स्थगित नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु यदि स्थानीय कांग्रेस कमेटीने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे धरना स्थगित करनेका वचन दिया है तो हर हालतमें और किसी भी कीमत पर उसे अपना वचन निभाना चाहिए। प्रतिज्ञाका सम्पूर्ण पालन ही सत्याग्रहका सार है। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]}} अ० भा० क० क० की फाइल संख्या १८२ एफ, १९३० ।। सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> lv10fszh7cgef1e1yfofepos7ayzyck पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०९ 250 197452 671895 669978 2026-08-20T03:34:05Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४४. पत्र : लीलावती आसरको'''}}}} {{Right|२७ अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० लीलावती,}} तेरा पत्र मिला। पढ़कर खुशी हुई। इसी तरहसे यदि तु विचारपूर्वक संयमका पालन करेगी तो अधीरता समाप्त हो जायेगी। मुझे नहीं लगता कि छालेपर मरहम लगानेसे कोई नुकसान होगा। लेकिन तू यदि कटि-स्नान लेगी तो मासिक धर्म अवश्य आयेगा । यदि तू कवायद में भाग न ले तो अच्छा हो। यदि तु मनको शान्त रखेगी और सीमासे बाहर मेहनत नहीं करेगी तथा खुले आकाशके नीचे सोयेगी तो तेरे मूच्छके दौरे बन्द हो जायेंगे । पाखाना न आनेपर एनीमा लेना ही चाहिए। अंतड़ियाँ २४ घंटेसे ज्यादा साफ हुए बिना नहीं रहनी चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ९५६२) की फोटो नकलसे । {{C|{{larger|'''३४५. पत्र : रामेश्वरदास बिड़लाको'''}}}} {{Right|जलालपुर<br> २८ अप्रैल, १९३०}} {{Left|भाई रामेश्वरदासजी,}} आपका खत मीला है। आपका खादीका प्रेम मुझे मालुम है। इसलिये आपकी योजनाकी टीका करनेमें संकोच होता है। तदपि इतना कह दूं कि योजना चलनेवाली नहि है। क्योंकि मिल-मालेक स्वार्थ नहि छोड़ेंगे। सलतनतकी मदद बहोत चीजोंमें आवश्यक है जो बहिष्कारके लिये कभी नहि मीलेगी। यदि मिल-मालेकोंके उद्योगसे बहिष्कार सफल हो सकता है तो बहिष्कारमें खादीको कुछ स्थान नहि होना चाहिये । परंतु मेरा विश्वास है कि खादीसे हि बहिष्कार सिद्ध हो सकता है। इसका मतलब यह नहि है कि मिलको स्थान हि नहि है। खादी भावनासे ही मिलको अपना योग्य स्थान मिल जाता है। भगवानमें देवतादिका समावेश होता हि है के न्याय से । और देवताकी स्वतंत्र पूजासे देवताका नाश होता है क्योंकि उसका स्वतंत्र हसति नहि है और भगवान मिलता नहि है। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> cdcywb18p24bzjb3hc0lrwl1n6p9277 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१० 250 197453 671896 669979 2026-08-20T03:39:02Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इन सब कारणोंसे मिलका क्षेम और बहिष्कारकी सफलता खादी भावना पैदा करनेसे और खादी उत्पन्न करनेसे हि हो सकती है। सुज्ञेषु किं बहुना ? मेरे अक्षर पढ़ने में कष्ट नहि होगा । {{Right|आपका,<br> मोहनदास}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} जमनालालका कष्ट कालांतरसे दूर हो जावेगा। थोड़े दुःखका भले अनुभव कर लें। सी० डब्ल्यू० ६१८४ से सौजन्य : घ० दा० बिड़ला {{C|{{larger|'''३४६. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}} {{Right|[२८]<ref>१. काका कालेलकर इसी तारीखको गिरफ्तार किये गये थे। अप्रैल, १९३०}} {{Left|भाई नरहरि,}} काकाके गिरफ्तार होनेकी मुझे अभी-अभी खबर मिली है। एक तरहसे अच्छा ही हुआ, बशर्ते कि वे जेलमें लड़कर भी दूध आदि आवश्यक खुराक लेते रहें। अब तुम क्या करना चाहते हो सो बताना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} सरावकी दुकानवाले पारसीके बारेमें मैंने खुर्शीदबहनको समझा दिया है। स्त्रियां उसकी दुकानपर धरना दें, जलूस निकालें, उसके पास जायें; प्रस्ताव भी पास करें । यह सब अनसूयावह्नकी इच्छा हो तभी करें। गुजराती (एस० एन० ९०४७) की फोटो नकलसे । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> pw05qepevnyusu1lmpple58j02mst4r 671897 671896 2026-08-20T03:39:33Z अंजली राजभर 4516 671897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इन सब कारणोंसे मिलका क्षेम और बहिष्कारकी सफलता खादी भावना पैदा करनेसे और खादी उत्पन्न करनेसे हि हो सकती है। सुज्ञेषु किं बहुना ? मेरे अक्षर पढ़ने में कष्ट नहि होगा । {{Right|आपका,<br> मोहनदास}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} जमनालालका कष्ट कालांतरसे दूर हो जावेगा। थोड़े दुःखका भले अनुभव कर लें। सी० डब्ल्यू० ६१८४ से सौजन्य : घ० दा० बिड़ला {{C|{{larger|'''३४६. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}} {{Right|[२८]<ref>१. काका कालेलकर इसी तारीखको गिरफ्तार किये गये थे।</ref> अप्रैल, १९३०}} {{Left|भाई नरहरि,}} काकाके गिरफ्तार होनेकी मुझे अभी-अभी खबर मिली है। एक तरहसे अच्छा ही हुआ, बशर्ते कि वे जेलमें लड़कर भी दूध आदि आवश्यक खुराक लेते रहें। अब तुम क्या करना चाहते हो सो बताना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|[ पुनश्च : ]}} सरावकी दुकानवाले पारसीके बारेमें मैंने खुर्शीदबहनको समझा दिया है। स्त्रियां उसकी दुकानपर धरना दें, जलूस निकालें, उसके पास जायें; प्रस्ताव भी पास करें । यह सब अनसूयावह्नकी इच्छा हो तभी करें। गुजराती (एस० एन० ९०४७) की फोटो नकलसे । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> l5mhk4h9vy8baw8tfiurw19g313wnrg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४११ 250 197454 671899 669980 2026-08-20T03:45:26Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४७. भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|जलालपुर<br> २८ अप्रैल, १९३०}} सरकारके नमक-भण्डारोंपर धावा बोलना अवश्यम्भावी है, लेकिन यह काम किस तरह किया जाये, इसकी योजना अभी पूरी तरहसे तैयार नहीं हुई है। '''महात्माजी से जब यह पूछा गया कि धरासणा नमक भण्डारपर धावा बोलनेकी बात क्या अन्तिम रूपसे तय हो गई है, तो उन्होंने कहा :''' मैंने अभी कोई अन्तिम निर्णय नहीं लिया है। मैं भगवान्से प्रकाशके लिए प्रार्थना कर रहा हूँ । '''इस प्रश्न के उत्तरमें कि क्या वे धावा बोलने पहलेसे वाइसरायको उसके बारेमें सूचित करेंगे, गांधीजी ने कहा :''' वाइसरायको सूचित किये बिना में निश्चय ही कोई कदम नहीं उठाऊँगा । यदि धावा बोला ही गया तो ऐसा बहुत जल्द होगा । '''यह पूछने पर कि यदि नमक बनानेकी जगहतक जानेका रास्ता रोककर पुलिस खड़ी रहे तो यह काम कैसे किया जायेगा, गांधीजी ने कहा :''' यह तो मैं नहीं कह सकता; लेकिन जब मेरे रास्तेमें व्यवधान आयेगा तब मुझे कोई-न-कोई रास्ता सूझ ही जायेगा । जब मैं धावा बोलनेकी बात करता हूँ, तो समझना चाहिए कि वास्तवमें, जैसी कि मेरी आदत है, प्रकट चिन्तन ही कर रहा हूँ। लेकिन जहाँतक मैं देख सकता हूँ, धावा अवश्यम्भावी है। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २९-४-१९३०}} {{C|{{larger|'''३४८. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}} {{Right|२९ अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० नरहरि,}} ऐसी शंका भी मनमें क्यों लाते हो कि मैं यदि तुम्हें धरासणा नहीं ले जाता तो वह तुम्हारी अयोग्यताके कारण ही लेकिन इस समय हम जैसों का संयम धरासणा पर कब्जा करते हुए मरनेमें नहीं, बल्कि उस भोगका त्याग करके शान्त चित्तसे अपने कर्त्तव्यका निर्वाध पालन करनेमें है। अभी तो तुम्हारा कर्तव्य इमाम साहबके निकट रहकर उनकी सेवा करना है। तथापि मुझे आवश्यक या उचित लगा तो तुम्हें बुला लूंगा। यदि मौका आये तो तुम भी काकाकी तरह समर्पित हो जाना । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> nx1kittul44j941ffm4warcm8nvz23r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१२ 250 197455 671900 669981 2026-08-20T03:50:38Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671900 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>महादेवके कार्यके बारेमें क्या तुम्हें मेरा पत्र मिला ? उसमें मैंने उसके कार्यका विस्तारसे निरूपण किया है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ९०४८ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''३४९. भाषण : बिलीमोरामें'''}}}} {{Right|२९ अप्रैल, १९३०}} '''गांधीजी ने सभाको सम्बोधित करते हुए कहा कि हम भाषण द्वारा अथवा नमक- कानून तोड़कर देशी रियासतोंको अटपटी स्थितिमें नहीं डालना चाहते। हम पहले ब्रिटिश सरकार के साथ हर बातका निबटारा कर लें और देशी रियासतोंके साथ हमें जो कुछ भी तय करना है वह बादमें किया जायेगा।''' मैं आपसे नमक-कानून तोड़नेके लिए नहीं कहूँगा, लेकिन मैं आपसे खद्दर अपनाने और शराबके विरुद्ध जबरदस्त अभियान चलानेके लिए अवश्य अपील करूँगा । आप विदेशी कपड़े और शराबकी दुकानें, इन दो तरहके बहिष्कारोंमें शामिल हो सकते हैं। शराबके व्यापारने हमारे श्रमिक वर्गको तबाह कर दिया है और यह प्रत्येक नागरिकका - चाहे वह देशी रियासतकी प्रजा हो अथवा ब्रिटिश सरकारकी - कर्त्तव्य है कि उन्हें इस तबाहीसे बचाये, और केवल महिलाएँ ही शराबियोंका हृदय- परिवर्तन कर सकती हैं, जो इतना जरूरी है। कुछ हलकोंमें ऐसी धारणा फैली हुई है कि मैं केवल पारसी मालिकोंकी शराबकी दुकानोंके विरुद्ध ही धरना दिलाने जा रहा हूँ। लेकिन यह बात सच नहीं है। धरना तो शराबकी सभी दुकानोंपर दिया जायेगा, चाहे उनके मालिक हिन्दू, मुसलमान, सिख अथवा अन्य किसी भी जातिके हों। पारसी तो मेरे भाइयोंके समान हैं। मैं तो अंग्रेजोंकी दुकानोंपर भी धरना दिलाना चाहूँगा, लेकिन फिलहाल मैं ऐसा करने से डरता हूँ। वे हमारे भाई नहीं बनना चाहते, वे हमारे स्वामी ही बने रहना चाहते। यदि हम शराबकी बुराईको अपने वीचसे दूर नहीं करते तो हम अहिंसा द्वारा स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे। हम नहीं चाहते कि स्वराज्यमें कोई शराबी हमारा राष्ट्रपति हो और न हम किसी शराबीको मतदाताके रूपमें ही देखना चाहते हैं । हमें शैतानके इस प्यालेको, जहाँ-जहाँ वह हमें दिखाई दे, तोड़ देना चाहिए ।। और अन्तमें उन्होंने सभामें उपस्थित लोगों से कहा कि उन्हें अपने झगड़ोंका निपटारा पंचायत द्वारा कराना चाहिए। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ३०-४-१९३०}} Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 7u2ej4duvkjgsf6lijok64p9mbxbu8v पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१३ 250 197456 671902 669982 2026-08-20T03:54:54Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३५०. छद्म सैनिक कानून'''<ref>१. बॉम्बे क्रॉनिकलके प्रतिनिधिके साथ हुई एक भेंट-वाचक आधारपर भेंटवार्ता इस टिप्पणीके साथ प्रकाशित हुई थी " नीचे उस प्रेस अधिनियम के बारेमें गांधीजीका वक्तव्य दिया जा रहा है जो अंग्रेजी अखबारोंमें कमोवेश काट-छाँटकर छापा गया है।"</ref>}}}} {{Right|[बिलीमोरा<br> २९ अप्रैल, १९३० ]}} जिस प्रेस अधिनियमको सर्वथा निष्प्राण निष्प्रभाव माना जाता था, उसे एक अध्यादेशके रूपमें फिरसे लागू कर दिया गया है। मगर इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं; यह तो वही हुआ है, जिसकी आशा की जाती थी। इस नये रूपमें उक्त अधिनियम में कई अतिरिक्त धाराएँ भी हैं, जिनके कारण इसकी धार पहलेसे भी अधिक तेज हो गई है। चाहे हम इस चीजको महसूस करें या न करें, लेकिन वास्त-विकता यही है कि पिछले कुछ दिनोंसे हम एक प्रकारके छद्म सैनिक कानूनके अन्तर्गत रह रहे हैं। आखिरकार सैनिक कानूनका मतलब यही तो होता है कि कुछ समयके लिए सेनाध्यक्षकी इच्छा ही देशका कानून बन जाये। वह सेनाध्यक्ष वाइसराय हैं और उनको जहाँ कहीं भी जरूरी लगता है, वहाँ वे देशके लिखित और प्रथागत दोनों तरहके कानूनोंको रौंदकर उनके स्थानपर एक ऐसे जन-समाजपर अपने अध्यादेश थोप देते हैं जो इतना दब्बू है कि वह न इसपर कोई नाराजगी जाहिर कर सकता है और न उसका विरोध ही कर सकता है। लेकिन मैं आशा करता हूँ कि अंग्रेज शासकोंके प्रत्येक आदेशका दुम हिलाकर पालन करनेका समय अब सदाके लिए समाप्त हो गया है। आशा है, लोग इस अधिनियमसे नहीं डरेंगे। पत्रकार लोग यदि जन-मतके सच्चे प्रतिनिधि हैं तो ये इस अध्यादेशसे भयभीत नहीं होंगे। हमें थोरोके इस सूत्र वाक्यके मर्मको समझ लेना चाहिए कि अत्याचारपूर्ण शासनमें ईमानदार लोगोंके लिए धनी होना कठिन है। और यदि हमने अपने शरीरको तनिक भी आनाकानी किये बिना खुशी-खुशी सत्ताधारियोंके हवाले कर देनेका निश्चय किया है तो हमें इसी तरह अपनी सम्पत्ति भी उनके सुपुर्द कर देनेके लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन अपनी आत्माको हरगिज न बेचना चाहिए। इसलिए पत्रकारों तथा प्रकाशकोंसे मेरा अनुरोध है कि वे कोई जमानत न दें, और यदि उनसे जमानत देने को कहा जाये तो वे या तो अपना प्रका-शन बन्द कर दें या फिर अधिकारियोंको, वे जो कुछ चाहें, जब्त कर लेनेकी चुनौती दें। आज जब कि स्वतन्त्रता सचमुच हमारा दरवाजा खटखटा रही है और जब कि इसे प्राप्त करनेके लिए हजारों लोगोंने न जाने कितनी यातना सही है, आप किसीकोvयह कहनेका मौका न दें कि पत्रकारोंकी कसौटी हुई तो वे पूरी तरह खरे नहीं पाये गये। वे भले ही आपका टाइप और आपकी मशीनें जब्त कर लें, लेकिन आपकी कलम तो नहीं छीन लेंगे, और न आपकी वाणी ही छीन लेंगे। लेकिन में यह मानता हूँ कि ४३-२४ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> c4iii5lyds5z3bg9rawpmcpd8gvt1co पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१४ 250 197457 671903 669983 2026-08-20T04:04:53Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३७०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>ये ये दोनों चीजें भी छीन सकते हैं। मगर एक चीज ऐसी है जिसे वे कभी दवा नहीं सकेंगे। वह है राष्ट्रका संकल्प और वास्तवमें महत्त्वकी चीज भी तो यहीं है। आज भारत में शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री हो जिसकी हर साँससे असन्तोष, राजद्रोह, राज्यके प्रति अभक्ति, और वर्तमान शासन प्रणालीको समाप्त कर देने को कटिवद्ध राष्ट्रकी मनोवृत्तिका वर्णन चाहे जिस शब्दमें कीजिए, उसकी आहट न आती हो । {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' ८-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३५१. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|२९ अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० मीरा,}} मैं तुम्हें कल कुछ भी नहीं लिख सका, हालांकि लिखनेका पूरा इरादा था। लेकिन मैं आधी राततक 'यंग इंडिया' का काम करता रहा। और अभी रेलगाड़ीमें तुम्हें ये चन्द पंक्तियाँ लिखकर भेज रहा हूँ । {{Left|सस्नेह}} {{Right|बापू}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९४) से; सौजन्य: मीराबहन जी० एन० ९६२८ से भी । {{C|{{larger|'''३५२. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}} {{Right|२९ अप्रैल, १९३०}} {{Left|भाई सतीशबाबु}} तुमारा पत्र पाकर मुझको बड़ा दुःख हुआ। कृष्णदासका खत भी आज आया । उसका खत इसके साथ भेजता हूँ। कुछ गैरसमझ-सा लगता है। कृष्णदास जान- बूझकर द्वेषभाव रखें ऐसा तो मैंने तो कभी नहि सोचा है। उनसे मिलो और बातें करो। ऐसा उनको भी लिखा है। हमारे युद्धमें यह भी है ना कि एक-दूसरोंका विरोधको मिटानेकी चेष्टा करना । यदि हिंदीमें समझाने में कष्ट हो तो इंग्रेजीमें लिखो । इस बखत तो काम यहि है कि हम एक-दूसरों कि बात पूरी समझ लें। यदि हिंदीसे न हो सके तो इंग्रेजीसे निपटावे। समय मीले तो दोनोंमें लिखो इंग्रेजी और हिंदी । उपवासका कुछ असर अब है ? हेमप्रभादेवीको कहो खत लिखे । {{Right|बापुके आशीर्वाद}} जी० एन० १६१८ की फोटो नकलसे । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> rpk31q2zlgokrwxh40nx2obvesgxm8b पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१५ 250 197458 671983 669984 2026-08-20T08:11:50Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671983 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३५३. भेंट : 'लीडर' के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|बिलीमोरा<br> २९ अप्रैल, १९३०}} कहने की जरूरत नहीं कि श्री विट्ठलभाई पटेल द्वारा त्यागपत्र देनेपर उन्हें जिन बेशुमार लोगोंकी बधाइयाँ मिल रही हैं, उनमें में भी शामिल हैं। हममें से अनेक लोग हर दिन उनसे यह कदम उठानेकी आशा कर रहे थे। और जब राष्ट्रके कदा-चित् सबसे वयोवृद्ध सेवक पण्डित मालवीयजीने, जो १९२१ में असहयोगके चरमोत्कर्षके दिनोंमें भी विरोधी आलोचनाओंको बरदान्त करके सरकारके साथ कन्धे से कन्धा मिला-कर खड़े रहे थे और विधान सभा छोड़ने को तैयार नहीं हुए थे, बहुत सोच-समझकर त्यागपत्र दे दिया तब तो हम श्री विट्ठलभाई पटेल द्वारा त्यागपत्र देनेकी और अधिक आशा करने लगे थे। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''लीडर,''' २-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३५४. वक्तव्य : नमककी क्यारीमें विष मिलाये जानेके सम्बन्ध में'''}}}} {{Right|जलालपुर<br> ३० अप्रैल, १९३०}} नमकी क्यारीमें विष मिलाने के समाचारका सरकार द्वारा खण्डन किये जानेके बाद मुझे सूचना देनेवाले व्यक्तिने इस विषय में सावधानीपूर्वक और भी जाँच-पड़ताल करनेके पश्चात् कहा है कि उसने पहले जो कुछ कहा था, उसपर वह अब भी दृढ़ है। मैंने नमूनेकी जाँच करवाई थी और मेरी सारी जांच-पड़तालसे यही नतीजा निकला है कि नमककी इस क्यारीमें कुछ मिलाया अवश्य गया था। उसमें जो चीज मिलाई गई उससे नमक विषाक्त हुआ या नहीं, यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन उससे नमक दुषित अवश्य हो गया। नमककी क्यारी तथा पानीका रंग एकाएक बदल गया, इसमें तो सन्देहकी कोई गुंजाइश ही नहीं है। इसलिए अब जिस बातका पता लगाना है वह यह है कि रंग किसी मनुष्य द्वारा कुछ किये जानेपर बदला या किसी प्राकृतिक कारणसे और यदि इसमें किसी मनुष्यका हाथ है तो वह सर- कारका कोई आदमी है अथवा कोई अन्य। यह देखते हुए कि सरकारी अधिकारी नमककी क्यारियोंको दूषित करते रहे हैं, उनमें कीचड़ मिलाकर और अन्य तरीकोंसे Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dcb52nunjqjydb1swshs85vu0broh2n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१६ 250 197459 671992 669985 2026-08-20T08:19:30Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671992 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उन्हें नष्ट करते रहे हैं, यह सिद्ध करना सरकारी अधिकारियोंका ही काम है कि इसमें ऐसा कुछ नहीं मिलाया गया जिससे नमक आदमीके उपयोगका न रह जाये। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''हिन्दू,''' ४-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३५५. दिल्लीके पत्रकारोंको बधाइयाँ'''}}}} {{Right|नवसारी<br> ३० अप्रैल १९३०}} सरकारने प्रेस अधिनियम के अन्तर्गत दिल्लीके अखबारोंको तत्काल मुचलका देनका आदेश दिया था। उसपर उनकी जो प्रतिक्रिया हुई है,<ref>१. उन्होंने विशेषस्वरूप अलवारोंका प्रकाशन स्थगित कर देनेका निश्चय किया था।</ref> उससे मैं बड़ा प्रसन्न हूँ। यदि इस अध्यादेशके प्रयोगके पहले ही दौरमें महत्वपूर्ण अखबार इसमें निहित अपमानको चुपचाप पी जाते तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात होती । मुझे आशा है कि उन्होंने जो मुचलके देकर अखबार न चलानेका निश्चय किया है, वह स्थायी होगा और दिल्लीके सम्पादकों तथा प्रकाशकों द्वारा पेश किये गये इस साहसपूर्ण उदाहरणका दूसरे अखबार भी अनुकरण करेंगे। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १-५-१९३०}} {{C|{{larger|'''३५६. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}} {{Right|३० अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० नरहरि,}} चीखलीमें मुसलमानोंकी आबादीके कारण ही कुरैशीकी जरूरत है। कुछ समय के बाद तुम उसे भेज सकते हो। महुड़ा कानूनको भंग करना इस समय बुद्धिमानीका काम नहीं होगा। जो तीन वस्तुएँ हमने ले ली हैं वे ही काफी हैं और अब सरकारी प्रेस अधिनियमसे और भी मौके मिलेंगे। छोटेलाल वहाँ आ रहा है। उसका उपयोग करना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ९०४९) की फोटो नकलसे। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> jg0sqp81h8kj19gxkslphjkplwubnq4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१७ 250 197460 671998 669986 2026-08-20T08:25:08Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 671998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३५७. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}} {{Right|३० अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० नरहरि,}} इमाम साहब बीमार हैं, इसलिए तुम्हारा उन्हें आफिसमें बुलाना ठीक नहीं है। आश्रम में बैठे-बैठे वे जो निर्णय लेना चाहें, लें। उन्हें यदि शहर आना ही पड़े तो मोटरमें आयें और अन्य तरीकोंसे भी तुम उनकी शक्तिको बनाये रखना । जबतक वे लाचार नहीं हो जाते तबतक हमें अभी कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए। जब वे बिलकुल काम न कर सकें, उस हालत में क्या करना चाहिए, क्या इसपर तुम सबने अच्छी तरहसे विचार कर लिया है? ऐसा लगता है कि तब तुम्हें कारोबार सँभालना होगा। लेकिन मुझे स्थितिको पूरी जानकारी नहीं है और बहाँकी परिस्थितियोंके बारेमें मुझे क्या मालूम हो सकता है ? जो उचित लगे सो करना । बालुभाईका क्या हुआ ? 'नवजीवन' के बारेमें मगनभाई तुमसे मिलेंगे तो बतायेंगे; इसलिए उस सम्बन्धमें कुछ नहीं लिखता । मैं पकड़ा जाऊँ तो मोहनलाल सम्पादक और प्रकाशक दोनों पदोंको सँभाल लें। कमलनयन कैसा है ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ९०५०) की फोटो - नकलसे। {{C|{{larger|'''३५८. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|३० अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० गंगाबहन,}} काका लिखते हैं कि उनके जेल जानेसे तुम्हारे मनकी व्याकुलता बढ़ जायेगी । उनका वृढ़ मत है कि तुम्हारा त्याग आश्रममें बने रहने में ही है। मेरा भी यही विचार है। सब कुछ शान्तिपूर्वक सहन करना। आसपास होलिका दहन होनेके बावजूद मनको शान्त रखना; इसीमें कला है, साधना है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७४८ ) से । सौजन्य : गंगाबहन वैद्य Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 9u6pnaocg10ykvx9vou2ba4sbxvlfcw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१८ 250 197461 672002 669987 2026-08-20T08:31:31Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 672002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३५९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|३० अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० गंगाबहन,}} तुम चने-मुरमुरे खाकर अपने स्वास्थ्यको ठीक रखो तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा। लेकिन अपने-आपको धोखा मत देना। शरीर जो खुराक मांगे वह खुराक उसे देना और इस तरह अपनेको सेवाके योग्य बनाये रखना । जो लड़कियाँ और बहनें आदि मुझसे आकर नहीं मिल गई हैं यदि वे आना चाहें तो उन्हें लेकर तुम एक बार आ सकती हो। आनेसे कोई लाभ होगा, ऐसी तो कोई बात नहीं है, क्योंकि आकर वापस भी तो जाना होगा न । शारीरिक सम्बन्ध झूठे हैं, मृगजलके समान हैं; इसलिए इनका मोह क्यों करें ? शरीरके द्वारा आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लें और जान लें कि वे कभी टूटते नहीं हैं और ऐसे ही सम्बन्ध निर्मल और मोहरहित होते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४७ ) से । सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''३६०. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}} {{Right|[ ३० अप्रैल, १९३० ]<ref>१. ढाक्की मुहरसे।</ref> {{Left|चि० वसुमती,}} मैं तो पत्रकी बाट जोह रहा था। अब रातके दस बज गये हैं; इसलिए अधिक नहीं लिखता । कमलाबहनको भी पत्र लिखना चाहिए। कूच करने में एक सप्ताहका समय लग जायेगा। इस बीच तुम आ जाना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} श्रीमती वसुमतीवहन सत्याग्रह पड़ाव, भीमराड बरास्ता -- सूरत गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ५४४ ) से सौजन्य वसुमती पण्डित एस० एन० ९२८० से भी । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> s7bnr8onmgwse9tw80h1fmlluup5olp 672004 672002 2026-08-20T08:32:20Z अंजली राजभर 4516 672004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३५९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|३० अप्रैल, १९३०}} {{Left|चि० गंगाबहन,}} तुम चने-मुरमुरे खाकर अपने स्वास्थ्यको ठीक रखो तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा। लेकिन अपने-आपको धोखा मत देना। शरीर जो खुराक मांगे वह खुराक उसे देना और इस तरह अपनेको सेवाके योग्य बनाये रखना । जो लड़कियाँ और बहनें आदि मुझसे आकर नहीं मिल गई हैं यदि वे आना चाहें तो उन्हें लेकर तुम एक बार आ सकती हो। आनेसे कोई लाभ होगा, ऐसी तो कोई बात नहीं है, क्योंकि आकर वापस भी तो जाना होगा न । शारीरिक सम्बन्ध झूठे हैं, मृगजलके समान हैं; इसलिए इनका मोह क्यों करें ? शरीरके द्वारा आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लें और जान लें कि वे कभी टूटते नहीं हैं और ऐसे ही सम्बन्ध निर्मल और मोहरहित होते हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४७ ) से । सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''३६०. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}} {{Right|[ ३० अप्रैल, १९३० ]<ref>१. ढाक्की मुहरसे।</ref>}} {{Left|चि० वसुमती,}} मैं तो पत्रकी बाट जोह रहा था। अब रातके दस बज गये हैं; इसलिए अधिक नहीं लिखता । कमलाबहनको भी पत्र लिखना चाहिए। कूच करने में एक सप्ताहका समय लग जायेगा। इस बीच तुम आ जाना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} श्रीमती वसुमतीवहन सत्याग्रह पड़ाव, भीमराड बरास्ता -- सूरत गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ५४४ ) से सौजन्य वसुमती पण्डित एस० एन० ९२८० से भी । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> c3auj08qxne039tijlv55cxq8ru9dg0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१९ 250 197462 672007 669988 2026-08-20T08:42:01Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 672007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३६१. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}} {{Right|[ अप्रैल १९३० ]<ref>१. नमककी पारियोंमे मिलानेकी बातसे लगता है कि यह पत्र अप्रैल १९३० में लिखा गया होगा ।</ref>}} {{Left|चि० मणि,}} तुम्हारा पत्र मिला । तुमने जो टिप्पणी माँगी थी वह कल आखिरकार मैं लिस ही नहीं पाया। अब तुम तो जाओगी ही। इसके साथ यह टिप्पणी भेज तो रहा हूँ, लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं है। देखना, मेरी, बापूकी तथा अपनी लाज रखना, नाम रोशन करना । 'गीता' तथा गुजराती पुस्तकें पढ़ना और उन्हें समझने की कोशिश करना । मुझे नियमपूर्वक पत्र लिखती रहना । खेड़ा में नमककी क्यारियोंको जहरीला बनानेकी खबर सुनी थी, उसकी जाँच करना तथा मुझे लिखना । {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|चि० मणिवहन पटेल<br> नडियाद}} {{Left|[ गुजरातीसे ]<br> '''बापुना पत्रो ४: मणिबहेन पटेलने'''}} {{C|{{larger|'''३६२. स्वराज्यके कार्यकर्त्ताओंके लिए प्रतिज्ञा'''}}}} {{Right|[ अप्रैल १९३०]<ref>२. बापुना पत्री - ९ : श्री नारणदास गांधीनेमें इसे २६-४-१९३० तथा ३-५-१९३० के पत्रोंके बीच रखा गया है।</ref> }} हम, निम्न हस्ताक्षरकर्ता, पूर्ण स्वराज्यकी लड़ाईमें भाग लेना स्वीकार करते हैं, और जबतक स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक सौंपे गये कार्यके अतिरिक्त हम अन्य कोई काम हाथमें नहीं लेंगे। गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०८) से । सौजन्य : नारणदास गांधी Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> dcpa65ghw4m8eg4v2o2ciy0uqirmuks पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८१ 250 197780 671839 670504 2026-08-19T16:29:01Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२०५. पत्र: रुक्मिणी बजाजको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १२ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ रुक्मिणी,}} तेरा पत्र मिला। मैं तेरे पत्रका इन्तजार ही कर रहा था। अब तेरा स्वास्थ्य कैसा है? क्या बीजापुर तुझे माफिक नहीं आया? आशा है तू बनारसीके बारेमें तनिक भी चिन्ता नहीं करती होगी। वह आगा-पीछा सोचकर चलनेवाला व्यक्ति है। और आखिरकार तो ईश्वर ही हम सबकी रक्षा करता है। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ ९०५२) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२०६. पत्र: कुसुम देसाईको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १२ सितम्बर १९३०}} {{left|चि॰ कुसुम (देसाई),}} तेरा पत्र मिला। मैं राह देख रहा था, प्यारेलालके समाचार मिलनेकी आशासे। प्यारेलाल यहाँ है, यह खबर भी मुझे तब मालूम हुई जब मैंने अनायास ही तेरा तार जेलरके पास देखा। फिर छगनलाल (जोशी) के पत्रसे उसकी तबीयत खराब होनेका समाचार मिला। यहाँ तो मुझे बताया गया है कि वह आनन्दसे है। अब तेरे पत्रसे पता चलेगा। नियत कर्मके बारेमें तू आलस्य न करना। श्रद्धा रखना। श्रद्धाका काम तो वहीं होगा न, जहाँ बुद्धि काम न दे? जो कार्य आलस्यके कारण या और किसी कारणसे न हो उसके बारेमें मुझे लिखते हुए संकोच न करना। मुझे लिखनेसे भी तू सुरक्षित रहेगी, क्योंकि मुझे लिखना पड़ेगा, यह बात ही तुझे नियमित बनाने में सहायक सिद्ध होगी। बा के विषय में मैं यहाँसे क्या कर सकता हूँ? तू ही मीठुवहनसे शिकायत कर। बा स्वतन्त्र रूपसे तो हरगिज कोई काम नहीं कर सकती। वह मीठुबनके नेतृत्वमें वहाँ गई है इसलिए उसे उसके अधीन काम करना चाहिए। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी॰ एन॰ १८०३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> 2gclie80incdzigyjc9yoeqc18pr1lr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८२ 250 197781 671840 670505 2026-08-19T16:30:04Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२०७. पत्र: माधवदासको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १२ सितम्बर १९३०}} {{left|चि॰ माधवदास,}} आश्रमसे मिले पत्रसे ज्ञात हुआ कि तुम रामदास आदिसे मिलने गये थे। ठीक किया। तुम्हारा क्या हाल है? कृष्णा कैसी है? क्या अब उसका शरीर स्वस्थ हुआ? क्या तुम दोनों वर्तमान आन्दोलनमें किसी प्रकार हाथ बँटा सकते हो? तुम कहाँ रहते हो? {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/२२) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२०८. पत्र: मणिबहन परीखको'''}}}} {{right|१३ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ मणिबहन (परीख),}} नरहरिकी हड्डी कैसे बढ़ गई, यदि तुम्हें इसका पता हो तो मुझे लिखना। आशा है तुम्हारी तबीयत ठीक होगी। बच्चे कैसे हैं? क्या वे कुछ लिखते-पढ़ते हैं? तुम्हारा दिन कैसे बीतता है? मुझे विस्तारपूर्वक पत्र लिखना। इस पत्र-व्यवहारको सर्वथा अनिश्चित समझना, क्योंकि यह कभी भी बन्द हो सकता है। हालाँकि फिलहाल ऐसा कोई लक्षण नजर नहीं आता; किन्तु कैदी तो कैदी ही है। कैदीका व्यक्तिगत कोई अधिकार नहीं होता। {{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}} {{left|[पुनश्च:]}} मोहनको पीलिया हो जानेका मतलब है उसकी खुराकमें लापरवाही होना। गुजराती (जी॰ एन॰ ५९६०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> a2wnbcprgf5rkea7am8r547iklmo866 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८३ 250 197782 671841 670506 2026-08-19T16:31:04Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२०९. पत्र प्रभावतीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १३ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ प्रभावती,}} तेरा पत्र मिला। मैं तो एक भी डाक नहीं छोड़ता, लेकिन हो सकता है कि यहींसे पत्र नियमपूर्वक न जाते हों। जयप्रकाश अब ठीक हो गया होगा। वहाँ कोई अखबार क्यों नहीं आता? आश्रममें बहुत सारे अखबार आते हैं, वे चाहें तो कुछ अखवार तुझे भेज सकते हैं। तेरी सास अब ठीक हो गई होगी। मैं तुझे अपने वजनके बारेमें तो बता ही चुका हूँ। हम दोनों आरामसे हैं। तू वहाँ घूमने-फिरने जाती है अथवा नहीं? नियमपूर्वक प्रार्थना भी करती है? दिन किस तरह बिताती है? वहाँकी आबादी कितनी है? जयप्रकाश अब क्या करेगा? यह कुछ काम करेगा अथवा नहीं? और कोई चिन्ता करता है या नहीं? यदि तू मुझे सीधे पत्र लिखेगी तो बहुत करके वह मुझे मिल जायेगा। आजकल तो [सभी पत्र] मिलते हैं। तुझे सीधे में अधिक पत्र नहीं लिख सकता। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३३६९) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२१०. पत्र: मीराबहन को'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १४ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ मीरा,}} कोयम्बटूरसे लिखा तुम्हारा पत्र मेरे सामने है। यह विलक्षण बात है कि इतनी जबर्दस्त भागदौड़में भी तुम कुल मिलाकर इतनी स्वस्थ रह सकी। मैं समझता हूँ कि यह मानसिक शान्तिका चिह्न है। केशुने बाँसका चरखा भेजनेका प्रस्ताव अवश्य किया था। लेकिन मैंने नहीं भेजने दिया। यह मेरी गलती है कि जब मेरे पास पर्याप्त अवसर था तब मैने उसके प्रयोग की तफसीलों में निपुणता प्राप्त नहीं कर ली। अब मैं प्रायश्चित्त-स्वरूप गलती कर-करके उसको चलाने में निपुणता प्राप्त कर रहा हूँ। मैं देखता हूँ कि माल और उसे कम-ज्यादा करके ठीक तरहसे काममें लानेका चरखेकी गति और उसके बढ़िया चलनेसे बहुत सम्बन्ध है। मेरा काम ठीक चल रहा है। मैं तनिक भी निराश नहीं हूँ। जो असाधारण थकान होती थी वह खत्म हो गई है। इसलिए चरखेके बारेमें चिन्ता {{left|४४–१०}}<noinclude></noinclude> bdaj62srw2qgxvo0x7bbp38i9v3snf8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८४ 250 197783 671844 670507 2026-08-19T16:32:48Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करनेकी कोई जरूरत नहीं है। काका तुम्हारा चरखा चलाते हैं। अभी भी वह प्रति घंटे सूतके ८० तारसे अधिक नहीं निकाल पाते। श्रीमती ऐशरके गर्भपातका मुझे दुख है। यदि वे लोग एक पूर्ण विकसित और स्वस्थ बच्चा चाहते हैं और श्रीमती ऐशरको एक मजबूत और स्वस्थ माँ होना है तो मुख्य चीज यह है कि वे अपनी विषय-वासनापर तीन वर्षतक संयम रखें। इसके लिए यदि जरूरत हो तो उन्हें अलग-अलग रहना चाहिए। अवश्य इस संयमके अलावा उन्हें सादा भोजन करना और खुलेमें रहना चाहिए और हलकी कसरत खूब करनी चाहिए। यदि श्रीमती ऐशर कूका कटि-स्नान और बैठकर स्नान दोनों करें, तो उन्हें जबर्दस्त लाभ होगा। मुझे विश्वास है कि यदि वह यह स्नान तीन वर्षतक लें और धीरजसे काम लें तो वह बिलकुल नई स्त्री बन जायेंगी। अगर तुम चाहो तो इसे तुम श्रीमती ऐशरको भेज सकती हो। मेरा टहलना अब भी सीमित ही है। लेकिन मैं काफी ठीक-ठाक हूँ। चरखा चलाते और चरखेके बारेमें सोचते हुए समय जल्दी ही बीत जाता है। दिनके अन्तमें में अच्छी नींद सोता हूँ जो मेरे लिए भोजनसे भी बढ़कर है। मैंने ६५ भजनका अनुवाद समाप्त कर दिया है। लेकिन अभी भी बहुत दूरी तय करनी हैं। मुझे एकसे ज्यादा करनेका अवसर कदाचित् ही मिलता है और प्रतिदिन एकसे कम करूँ, ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। अतः यद्यपि प्रगति सुस्थिर है, किन्तु निःसन्देह धीमी तो है ही। सप्रेम, {{right|{{larger|बापू}}}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४११) से। सौजन्य: मीराबहन; जी॰ एन॰ ९६४५ से भी। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२११. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १४ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ मणि (पटेल),}} चूँकि तू मुझसे पत्रकी आशा रखती है, इसलिए यह लिख रहा हूँ तुझे यह कैसे मिलेगा, यह तो दैव ही जाने तेरा पत्र बापूको पढ़नेके लिए जाने दिया गया था। तुझे लिखनेकी छूट मिले तो लिखना। भले ही लाचारी क्यों न हो, अब तुझे शान्तिका अवसर मिला है, उसका पूरा उपयोग करना।<ref>मणिबहन उस समय बम्बईकी आर्थर रोड जेलमें थीं।</ref> इसे भी मैं सेवा मानता हूँ। स्वास्थ्यको सँभालना। कार्यक्रम ठीक बनाना। खाने-पीनेको क्या मिलता है, इत्यादि बातें लिखना। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} {{left|[गुजरातीसे]<br> '''बापुना पत्रो- ४: मणिबहेन पटेलने'''}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 73pxwpmh8uj6ehko2yaxxedd8hu2tv0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८५ 250 197784 671845 670508 2026-08-19T16:33:45Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१२. छगनलाल जोशीको लिखे पत्रका अंश'''}}}} {{right|[१४ सितम्बर,]<ref>देखिए अगला शीर्षक। वर्ष साधन-सूत्रके अनुसार दिया गया है।</ref> १९३०}} सूक्ष्म हिंसाकी गन्ध तो मुझे यहाँ बैठे हुए भी आती है। लोगोंने अहिंसाको धर्मके रूपमें कम समझा है। वे उसे एक युक्तिके रूपमें आजमा रहे हैं। वैसे यह भी एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। किसी दिन इससे धर्म भी समझ जायेंगे। यदि हम उसे मूर्तिमन्त कर सकें तो आसपासका वातावरण निर्बल होनेपर भी हम दुगुने जागृत हों, दुगुनी तपश्चर्या करें। बहनोंके बारेमें तुमने जिस भयकी बात की है, उसे हम बहुत बड़ा नहीं मानते, क्योंकि पुरुष-वर्गके दोषोंको दरगुजर करनेकी हमें आदत पड़ी हुई है। बहनें बाहर निकली है। यह अच्छा ही हुआ है। उस कसौटी पर जो सफल हुई, उसने व्रतोंका पालन किया और अपना धर्म समझा, ऐसा हम कह सकेंगे। जो असफल हुई, वह प्रयत्न करने पर भी गिरेगी तो बादमें फिर प्रयत्न करेगी और ऊँचा उठेगी। जो मनमें विषयोंका सेवन करती है और मौका मिलने पर उसका पोषण करती है उसने तो किसी दिन भी व्रत-पालन नहीं किया था। उसमें दम्भ था, जो फूट निकला। यह भी अच्छा ही मानें। इसलिए तुम निर्भय रहना। उनकी चिन्ता न करना। सब अपने-आपको सँभालें। ईश्वर सबका रखवाला है। थोड़े भी बचे रहेंगे तो भूले-भटकोंको सहारा मिलता रहेगा। मेरा तो यही विश्वास है कि बहुत-से बच जायेंगे। आजकी खिचड़ी मुझे अच्छी तो नहीं लगती, किन्तु वह अनिवार्य है। जबतक मानपूर्वक लिख सकता हूँ तबतक पत्रोंके द्वारा प्रयत्न करता ही रहूँगा। फिर प्रार्थना भी मेरा प्रयत्न ही है; उसे तो कोई छीन नहीं सकता। {{left|[गुजरातीसे]<br> '''बावुना पत्रो-७: श्री छगनलाल जोशीन'''}} {{dhr|7em}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> qtb4hti4w3mtvum5z13qcu0hbuy2kxi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८६ 250 197785 671846 670510 2026-08-19T16:34:49Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२१३. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १४/१६ सितम्बर, १९३०}} {{left|चि॰ नारणदास,}} तुम्हारा पत्र मिला। बहनोंके बारेमें तुम्हारा इशारा समझ गया हूँ। छगनलाल जोशीका पत्र पढ़ लेना। बाहर काम करने गई हुई बहनोंके साथ तुम या गंगाबहन पत्र-व्यवहार करते रहना। आवश्यकता लगे और समय मिले तो गंगाबहन किसी-किसी जगह तो चक्कर भी लगा सकती है। कहीं गलती भी हो जायेगी; तो भी हमें निर्भय रहना है। आवश्यकतानुसार सावधान भर रहें, दूसरोंको भी सावधान करें और परिणाम ईश्वर पर छोड़ दें। जिस संयमकी हम आशा या इच्छा करते हैं उसके मुकाबले में हमारी तपश्चर्या कितनी है? फिर भी हमें तो उसी मार्गपर चलते रहना है। बहनोंकी स्वतन्त्रताकी पूर्ण रूपसे रक्षा करनी है। चाहे रास्ता चलते भूल जायें, ठोकर लगे, काँटा चुभे, या गिर पड़ें। मैंने तो कागज नियमके अनुसार मंगलवारको ही दिया था। किन्तु यहाँके दफ्तर की गड़बड़के कारण या जानबूझकर देरसे डाकमें भेजा गया होगा। मैंने शिकायत नहीं की। जब-जब डाक समयसे न मिले, मुझे तो लिख ही देना अच्छा हुआ पूँजाभाई आ गये। क्या आश्रममें से किसीको सेवाके लिए नियुक्त किया है? कविश्री के<ref> राजचन्द्र।</ref> स्मारकके लिए जो रकम रेवाशंकरभाईके पास है उसके बारेमें मणिभाईको<ref>मणिभाई रेवाशंकर झवेरी।</ref> लिख रहा हूँ। जोलिंगर बहनसे कहना कि मैं उनके जयाबकी राह देख रहा हूँ। निःसंकोच लिखें। कमलावन लुंडीके बारेमें तुमने ठीक किया है। फिलहाल वह न बोले, न लिखे, यही इष्ट है। मूक सेवाकी तो कोई सीमा ही नहीं है। बलभद्रने तो पिंजाईमें खूब कमाल किया है। इससे मालूम होता है कि हम किसीको मूर्ख न मानकर प्रोत्साहन देते रहें और उससे आशा करते रहें तो उसका फल अच्छा ही निकलेगा। मेरी गाड़ी अभी तो चल रही है। हमेशाकी तरह दूध-दही ले रहा हूँ। मुनक्का और खजूर के बदले दिनमें सात या आठ टमाटर, चार या पाँच भुने हुए बड़े रतालू और कोई ६ चम्मच गोभीके या जो भी सब्जी बनी हो। इससे पाखाना ठीक होता है। सुबहके ७-३० बजे एक खट्टे नींबूका रस गर्म पानी और नमकके साथ लेता हूँ। दोपहरको एक नींबूका रस सोडाके साथ यह माफिक आ जाये तो कब्जकी समस्या दूर हो और खर्च तो बहुत ही बच जाये। जो सब्जी यहाँ बगीचेमें उगती है, उसीमें से लेता हूँ। किन्तु उसका खर्च गिनें तो रोज दो आनासे ज्यादा नहीं होता होगा। जबकि खजूर और मुनक्केका खर्च कमसे-कम ६ आने<noinclude></noinclude> 8o8qwofqe3zcxr0mezql3b6wa27r7um पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८७ 250 197786 671848 670512 2026-08-19T16:35:49Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671848 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१४९}}</noinclude>होता होगा। जिन्हें कब्जकी शिकायत है वे इस खुराकको आजमाकर देखें। यह नहीं कह सकते कि सभीको लाभ ही होगा। मुझपर भी यह असर बना ही रहेगा, इस समय यह भी नहीं कह सकते। इस प्रयोगमें दूसरी खुराक निषिद्ध मानी जानी चाहिए। सिर्फ भुने हुए रतालू ही खूब चबाकर खाने चाहिए। उसे दूध या दही में भिगोना नहीं चाहिए। छिलका खा लेनेमें शायद कोई बुराई नहीं थोड़ा-सा तो खाता ही हूँ। पाचनशक्ति नाजुक है इसलिए सारा खाते हुए डरता हूँ। यदि नाजुक पाचनशक्तिवाला कोई व्यक्ति यह प्रयोग करना चाहे तो वह भी छिलकेको छोड़ दे मेरी चप्पल मिल जाये तो सचमुच अच्छा हो। कुसुमको खबर होनी चाहिए। शायद उसने उन्हें प्रेमावहनको सौंपा हो। रुई अभी न भेजी हो तो आखिर डाकसे ही भेज देना छः तार और आठ तारकी दोनों ही माल बहुत पतली मालूम हुई। चरखीसे खिसक जाती हैं और उसे फिराये बिना खुद ही घूम जाती हैं। मुझे और न भेजना। मेरे पास थोड़ी-सी तैयार पड़ी हैं और दूसरी जब चाहूँ तब बना ही सकता हूँ। कोई अच्छा तरीका मालूम हो तो उससे कुछ समय बच जायेगा, इस विचारसे पूछा था। {{right|१५ सितम्बर, १९३०}} अभी मौन छोड़ा है। रामदासने काकासाहब को जो पत्र लिखा था, सो उन्होंने मुझे सुनाया। रामदासने लिखा है कि उसने मुझे पत्र लिखा था किन्तु वह पत्र मुझे मिला नहीं रामदासने अपने स्वास्थ्य और अध्ययनके बारेमें विस्तारपूर्वक लिखा है। उससे बहुत सन्तोष हुआ। उसके जेलमेंसे निकलनेके बाद पत्र लिख सकूँगा और वह भी लिख सकेगा। उसके पत्र जबतक यह पत्र-व्यवहार निभेगा, तबतक मिलते रहेंगे। अभी तुम्हें पत्र कपड़े अस्तरवाले लिफाफे में भेज रहा हूँ। अभी तो तुम्हारे भेजे हुए लिफाफे हैं, उनका फिर वहाँ इस्तेमाल कर सको इस इरादेसे यहाँसे आकार न बदल कर भेजता हूँ। नहीं तो मेरा काम तो उसे छोटा करके भी चल जाता। {{right|मंगल प्रभात, १६ सितम्बर, १९३०}} बा को सूरत में पुलिसने तंग किया––ऐसा समाचार देखा है। उसमें कुछ सत्य है क्या? शरीर-श्रम सभी मनुष्योंके लिए अनिवार्य है, यह बात पहले-पहल टॉल्स्टॉयका एक निबन्ध पढ़कर मेरे मनमें बैठी थी। यह बात इतनी साफ जाननेके पहले उसपर अमल तो मैं रस्किनका 'अनटू दिस लास्ट' ('सर्वोदय') पढ़कर ही करने लगा था। यहाँ 'शरीर-श्रम' अंग्रेजी शब्द 'ब्रेड लेबर' का तरजुमा है। 'ब्रेड लेवर' का शब्द मुताबिक अनुवाद है रोटी (के लिए) मजदूरी रोटी के लिए हरएक मनुष्यको मजदूरी करनी चाहिए, शरीरको (कमरको) झुकाना चाहिए, यह ईश्वरका कानून है। यह मूल खोज टॉल्स्टॉयकी नहीं है, लेकिन उससे बहुत कम मशहूर रूसी लेखक बन्दकी है। टॉल्स्टॉयने उसे रोशन किया और अपनाया। इसकी झाँकी मेरी आँखें 'भगवद्गीता' के तीसरे अध्यायमें करती हैं। जो यज्ञ किये बिना खाता है, वह चोरीका अन्न खाता है, ऐसा कठिन शाप यज्ञ नहीं करनेवालेको दिया गया है। यहाँ<noinclude></noinclude> 6daac410zawdohzoa6v2qa5jcops0rs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८८ 250 197787 671849 670513 2026-08-19T16:36:48Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 671849 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यज्ञका अर्थ शरीर-श्रम या रोटीके लिए की गई मजदूरी ही ठीक बैठता है। और मेरी राय में वही मुमकिन है। जो भी हो, हमारे इस व्रतुका जन्म इस तरह हुआ है। बुद्धि भी उस चीजकी ओर हमें ले जाती है। जो मजदूरी नहीं करता उसे खानेका क्या हक है? 'बाइबिल' कहती है: "अपनी रोटी तू अपना पसीना बहाकर कमा और खा।" करोड़पति भी अगर अपने पलंगपर पड़ा रहे और जब उसके मुँहमें कोई खाना डाले तब खाये, तो वह ज्यादा दिनों तक खा नहीं सकेगा, इसमें उसको मजा भी नहीं आयेगा। इसलिए वह कसरत वगैरा करके भूख पैदा करता है और खाता तो है अपने ही हाथ-मुँह हिलाकर अगर यों किसी-न-किसी रूपमें अंगोंकी कसरत राय-रंक सबको करनी ही पड़ती है, तो रोटी पैदा करनेके लिए ही सब क्यों कसरत न करें? यह सवाल कुदरती तौर पर उठता है। किसानको हवाखोरी या कसरत करनेके लिए कोई कहता नहीं है और दुनियाके ९० फीसदी से भी ज्यादा लोगोंका निबाह खेतीपर होता है। बाकीके दस फीसदी लोग अगर इनकी नकल करें तो जगतमें कितना सुख, कितनी शान्ति और कितनी तन्दुरुस्ती फैल जाये? और अगर खेतीके साथ बुद्धि भी मिले तो खेती से सम्बन्ध रखनेवाली बहुतसी मुसीबतें आसानीसे दूर हो जायेंगी। फिर अगर इस शरीर-श्रमके निरपवाद कानूनको सब मानें, तो ऊँच-नीच का भेद मिट जाये। आज तो जहाँ ऊँच-नीचकी बू भी नहीं थी वहाँ यानी वर्ण-व्यवस्थामें भी वह घुस गई है। मालिक-मजदूरका भेद एक आम बात हो गई है और गरीब धनवानसे जलता है। अगर सब रोटीके लिए मजदूरी करें, तो ऊँच-नीचका भेद न रहे; और फिर भी धनिक वर्ग रहेगा तो वह खुदको मालिक नहीं बल्कि उस धनका रखवाला या ट्रस्टी मानेगा और उसका ज्यादातर उपयोग सिर्फ लोगोंकी सेवाके लिए करेगा। जिसे अहिंसाका पालन करना है, सत्यकी भक्ति करनी है, ब्रह्मचर्यको कुदरती बनाना है, उसके लिए तो शरीर-श्रम रामबाण-सा हो जाता है। यह मेहनत सचमुच तो खेतीमें ही है। लेकिन सब खेती नहीं कर सकते, ऐसी आज तो हालत है ही। इसलिए खेतीके आदर्शको खयालमें रखकर खेतीके एवज में आदमी भले दूसरी मजदूरी करे––जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, लुहारी वगैरा वगैरा। सबको अपना भंगी स्वयं ही बनना चाहिए। जो खाता है यह मल त्याग तो करेगा ही। जो मल-त्याग करता है वहीं उसे जमीनमें गाड़ दे, यह उत्तम बात हो। अगर यह नहीं ही हो सके तो प्रत्येक कुटुम्ब अपने यहाँ मल-मूत्रकी सफाई स्वयं करे। जिस समाजमें भंगीका अलग पेशा माना गया है, वहाँ कोई बड़ा दोष पैठ गया है, ऐसा मुझे तो बरसोंसे लगता रहा है। इस जरूरी और तन्दुरुस्ती बढ़ानेवाले (आरोग्य-पोषक) कामको सबसे नीच काम पहले-पहल किसने माना, इसका इतिहास हमारे पास नहीं है जिसने माना उसने हमपर उपकार तो नहीं ही किया। हम सब भंगी हैं, यह भावना हमारे मनमें बचपन से ही जम जानी चाहिए और उसका सबसे आसान तरीका यह है कि जो इसे समझ गये हैं वे शरीर-श्रमका आरम्भ पाखाना-सफाईसे करें जो समझ-बूझकर, ज्ञानपूर्वक यह करेगा, यह उसी क्षणसे धर्मको निराले ढंगसे और सही तरीकोंसे समझने लगेगा। बालक, बूढ़े और बीमारीसे जो लोग अपंग हो गये हैं वे अगर मजदूरी न करें, तो उसे कोई अपवाद न समझे। बालक माँ में<noinclude></noinclude> jeoiq9hqfgrf4wa8dxbtyjslh1hefpw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१९ 250 198018 671920 670750 2026-08-20T05:21:53Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|''' परिशिष्ट '''}} {{C|''' परिशिष्ट १ (क)'''}} {{C|''' नेहरू द्वयकी टिप्पणी'''}} {{Rh|||सेंट्रल जेल}} {{Rh|||नैनी, इलाहाबाद}} {{Rh|||२८ जुलाई, १९३०}} {{Gap}}सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरसे हमारी एक लम्बी बातचीत हुई। उन्होंने उन विभिन्न घटनाओंका जिक्र किया जिनके फलस्वरूप उन्होंने गांधीजी और हमारे साथ जेलमें मुलाकात करनेका निश्चय किया ताकि यदि सम्भव हो तो भारतकी जनता और ब्रिटिश सरकारके बीच चल रहे वर्तमान संघर्षको समाप्त या स्थगित किया जा सके। शान्तिकी उनकी हार्दिक कामनाकी हम कद्र करते हैं और हम खुशीसे उन सभी तरीकोंपर विचार करेंगे जिनसे कि शान्ति स्थापित हो सके, बशर्ते कि यह शान्ति भारतकी उस जनताके लिए, जिसने राष्ट्रीय लड़ाईमें पहले ही इतना ज्यादा बलिदान किया है और जो हमारे देशकी आजादी चाहती है, सम्मानजनक हो । कांग्रेस के प्रतिनिधिकी हैसियतसे हमें कांग्रेसके प्रस्तावोंमें कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करनेका अधिकार नहीं है, लेकिन कांग्रेसने जो बुनियादी स्थिति अपनाई है, यदि उसे स्वीकार कर लिया जाये तो अमुक परिस्थितियोंमें हम तफसीलके मामले में मामूली हेर-फेर की सिफारिश करनेको राजी हो सकते हैं। लेकिन हमारे सामने एक आरम्भिक कठिनाई है। हम दोनों ही जेलमें हैं और पिछले कुछ समयसे बाहरी दुनियासे तथा राष्ट्रीय आन्दोलनसे हमारा सम्पर्क बिलकुल छूटा हुआ है। हममें से एक व्यक्तिको लगभग तीन महीनेतक कोई दैनिक अखबार दिया ही नहीं गया। गांधीजी भी कई महीने से जेल में हैं। वस्तुतः मूल कार्य समितिके हमारे लगभग सभी सहयोगी जेलमें हैं और खुद कार्य समितिको ही एक अवैध संगठन घोषित कर दिया गया है। राष्ट्रीय कांग्रेस संगठन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ही सबसे बड़ी सत्ता है जिसके निर्णय केवल कांग्रेसके पूर्ण अधिवेशनमें ही बदले जा सकते हैं। उस अ० भा० कांग्रेस कमेटीके ३६० सदस्योंमें से ७५ प्रतिशत सदस्य जेलमें हैं। राष्ट्रीय आन्दोलनसे हमारा सम्पर्क बिलकुल छूटा हुआ है, और ऐसी स्थितिमें हम अपने सहयोगियोंके साथ, विशेष रूपसे गांधीजी के साथ पूरी तरह विचार-विमर्श किये बिना कोई निश्चित कदम उठानेकी जिम्मेदारी नहीं ले सकते। जहाँतक गोलमेज सम्मेलनका सवाल है, जबतक सभी महत्वपूर्ण विषयोंपर पहले ही से समझौता नहीं हो जाता, तबतक उससे हमें किसी {{Gap}}१. देखिए "पत्र मोतीलाल नेहरूको, २३-७-१९३० ।<noinclude></noinclude> m9n7wje2vfw1h2i2q0hjpcwart2zs3d पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२० 250 198019 671921 670751 2026-08-20T05:26:05Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३८२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}लाभकी आशा नहीं लगती। इस प्रकारके समझौतेको हम अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। समझौता निश्चित ढंगका होना चाहिए और उसमें किसी प्रकारकी गलतफहमी होने या गलत अर्थ करनेकी गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरने यह बात बिलकुल स्पष्ट कर दी है और लॉर्ड इविनने भी उनको लिखे अपने प्रकाशित पत्रमें कह दिया है कि वे दोनों अपनी ही ओर से यह बात- चीत कर रहे हैं और वे वाइसराय या वाइसरायकी सरकारकी तरफसे कोई वादा नहीं कर सकते। फिर भी यह सम्भव है कि वे कांग्रेस और सरकार के बीच इस प्रकारके समझौतेका रास्ता निकालने में सफल हों। चूंकि हम गांधीजी और अन्य सह- योगियोंसे परामर्श किये बिना युद्ध विरामके लिए कोई निश्चित शर्त नहीं सुझा सकते, इसलिए हम सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरके सुझावोंपर और गांधीजी द्वारा २३ जुलाईकी टिप्पणीमें, जो हमें दिखाई गई है, दिये गये सुझावोंपर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। हम गांधीजीकी टिप्पणीके मुद्दा संख्या २ और ३ पर सामान्य रूपसे सहमत हो सकते हैं, लेकिन हम इन मुद्दोंकी, और विशेष रूपसे उनके मुद्दा संख्या १ की तफसीलों पर उनके (गांधीजीके) और अन्य लोगोंके साथ चर्चा करनेके बाद ही अन्तमें अपने सुझाव दे सकते हैं। हम चाहेंगे कि हमारी इस टिप्पणीको गोपनीय माना जाये और इसे केवल उन्हीं लोगोंको दिखाया जाये जो गांधीजीकी २३-७-१९३० की टिप्पणी देखें। <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>हिन्दू, ५-९-१९३० {{C|'''परिशिष्ट १ (ख)'''}} {{C|'''जवाहरलाल नेहरूका पत्र १'''}} {{Rh|||सेंट्रल जेल}} {{Rh|||`नैनी}} {{Rh||||२८ जुलाई, १९३०}} <Br>प्रिय बापूजी, {{Gap}}एक लम्बे अन्तरालके बाद आपको फिरसे चिट्ठी लिखते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है, भले ही यह एक जेलसे दूसरे जेलको ही भेजी जा रही है। मैं विस्तारसे लिखना चाहूँगा, लेकिन मुझे भय है कि मैं इस समय वैसा कर नहीं सकता। इसलिए मैं केवल विचाराधीन मसलेकी ही चर्चा करूँगा। डा० सप्रू और श्री जयकर कल आये थे और उन्होंने पिताजी तथा मेरे साथ लम्बी बातचीत की। आज वे लोग फिर आ रहे हैं। चूंकि उन्होंने हमें सारे तथ्योंसे अवगत करा दिया है और आपकी टिप्पणी तथा पत्र भी हमें दिखा दिया है, इसलिए हमें लगा कि बिना दूसरी मुला- {{Gap}}१. देखिए " पत्र : मोतीलाल नेहरूको, २३-७-१९३० ।<noinclude></noinclude> p42wbgb957tb3vauzz8x9dfgsgn0qlz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२१ 250 198020 671923 670752 2026-08-20T05:27:37Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ३८३}} {{Gap}}कातका इन्तजार किये हुए हम दोनों इस मसलेपर चर्चा करके कोई निर्णय ले सकते हैं। बेशक, अगर दूसरी मुलाकात में कोई नई चीज सामने आती है तो हम अपनी पूर्व निर्धारित रायमें यथोचित परिवर्तन करने को तैयार हैं। फिलहाल हम जिन निष्कर्षोपर पहुँचे हैं वे उस टिप्पणी में दिये हुए हैं जो हम सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरको दे रहे हैं। यह टिप्पणी कुल मिला कर संक्षिप्त ही है लेकिन मुझे आशा है कि इससे आपको पता चल जायेगा कि हम किस प्रकार सोच रहे हैं। मैं यह भी कह दूं कि हमारा क्या रुख होना चाहिए, इसके बारेमें मेरे और पिताजी के बीच पूरी सहमति है। मैं स्वीकार करता हूँ कि संवैधानिक प्रश्नसे सम्ब न्धित आपका मुद्दा (१) मुझे कायल नहीं कर सका है और पिताजीको भी वह पसन्द नहीं आया। मैं नहीं देख पाता कि हमारी स्थिति या हमारी प्रतिज्ञाओं या वर्तमान वास्तविकताओंके साथ इसका मेल किस प्रकार बैठ सकता है। पिताजी और मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि हम "ऐसे किसी युद्ध विरामका समर्थन नहीं कर सकते जो हमारी उस स्थितिको व्यर्थ कर दे जिसपर कि हम आज पहुँचे हैं।" यही कारण है कि किसी अन्तिम निर्णयपर पहुँचनेसे पहले पूरी तरह विचार करना अत्यावश्यक है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि प्रतिपक्षीकी ओरसे कोई उल्लेख- नीय अगला कदम अभी तक नहीं उठाया गया है, और मुझे बहुत भय है कि कहीं हम कोई गलत या कमजोर कदम न उठा बैठें। मैं अपनी बात कहने में संयमसे काम ले रहा हूँ। मुझे तो लड़ाई लड़ने में मजा आता है। उससे मुझे लगता है कि हाँ, मैं जिन्दा हूँ। भारतमें पिछले चार महीनोंमें जो घटनाएँ हुई हैं उनसे मेरा दिल खुश हुआ है, और भारतके मर्दों, औरतों और बच्चों पर मुझे और ज्यादा गर्व होने लगा है। लेकिन मैं जानता हूँ कि ज्यादातर लोग लड़ाकू किस्मके नहीं हैं और शान्ति पसन्द करते हैं, इसीलिए मैं अपने-आपको दबानेकी और शान्तिपूर्ण दृष्टिकोणसे काम लेनेकी जबर्दस्त कोशिश करता है। आपने अपने जादू भरे स्पर्शसे जो एक नवीन भारतकी रचना कर दी है, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। भविष्य क्या लायेगा सो मैं नहीं जानता, लेकिन अतीतने जीवनको जीने लायक बना दिया है, और हमारे नीरस अस्तित्वने अपने अन्दर एक अद्भुत गरिमा और महानता पैदा कर ली है। यहाँ नैनी जेलमें बैठे हुए मैंने शस्त्र के रूपमें अहिंसाकी विलक्षण प्रभाव- कारिता पर विचार किया है और अहिंसामें मेरी आस्था और विश्वास पहलेसे कहीं ज्यादा बड़े हैं। देशने अहिंसाके सिद्धान्तमें अपने विश्वासका जो प्रदर्शन किया है, आशा है उससे आप असन्तुष्ट नहीं हैं। इक्का-दुक्का चूकोंको छोड़कर देशने अहिंसाका जिस दृढ़ताके साथ पालन किया है वह आश्चर्यजनक है। मैंने तो इतनी आशा नहीं की थी। मुझे भय है कि आपके ग्यारह सूत्रोंपर मुझे अभी भी आपत्ति है। ऐसी बात नहीं कि मैं उनमें से किसी एकसे भी असहमत हूँ। वस्तुतः वे अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। फिर भी मुझे ऐसा नहीं लगता कि वे स्वतन्त्रताका स्थान ले सकते हैं। लेकिन आपकी इस बातसे में अवश्य ही सहमत हूँ कि हमें " ऐसी किसी चीज से कोई सरो- कार नहीं रखना चाहिए जो देशको उन्हें (११ सूत्रोंको) तत्काल लागू करनेकी शक्ति न प्रदान करता हो।" पिताजीने आठ दिन हुए एक सुई लगवाई थी, और<noinclude></noinclude> me0qknhcja42e8r99pfuvsedzwain8a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२२ 250 198021 671925 670753 2026-08-20T05:32:10Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३८४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}तबसे ही वह अस्वस्थ हैं। वह बहुत कमजोर हो गये हैं। कल शामकी लम्बी बात- चीतने उन्हें बिलकुल थका दिया है। {{Rh|||जवाहरलाल}} {{Gap}}कृपया मेरे बारेमें चिन्ता न करें। यह तकलीफ तो अपने-आप ठीक हो जायेगी और मैं दो-तीन दिनमें उससे मुक्त हो जाऊँगा । <Br>सप्रेम, {{Rh|||मोतीलाल नेहरू}} <Br>[ पुनश्च : ] {{Gap}}हमारी सर तेजबहादुर सप्रु और श्री जयकरसे दुबारा बातचीत हुई है। उनके सुझावपर हमने अपनी टिप्पणी में कुछ परिवर्तन किये हैं, लेकिन उनसे कोई महत्व- पूर्ण अन्तर नहीं पड़ता। हमारी स्थिति बिलकुल स्पष्ट है, और उसके बारेमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। मुझे आशा है आप उसे पसन्द करेंगे। <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>हिन्दू, ५-९-१९३० {{C|'''परिशिष्ट २'''}} {{C|'''तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरका पत्र कांग्रेस नेताओंको'''}} {{Rh|||विंटर रोड, मलाबार हिल}} {{Rh|||बम्बई}} {{Rh|||१६ अगस्त, १९३०}} <Br>प्रिय मित्रो, {{Gap}}हमने पूना और इलाहाबादमें आप लोगोंसे कई बार भेंट की, और इन सभी अवसरोंपर आपने जिस सौजन्यता और धीरजके साथ हमारी बातें सुनी उसके लिए हम आप सबको धन्यवाद देते हैं। इन लम्बी वार्ताओंके कारण आपको हमने जो असुविधा पहुँचाई उसका हमें खेद है। हमें इस बातका विशेष दुख है कि पंडित मोतीलाल नेहरूको पूना आनेका कष्ट उठाना पड़ा, विशेषकर उस समय जबकि उनकी तबीयत इतनी खराब थी। हम औपचारिक रूपसे उस पत्र की प्राप्ति भी स्वीकार करते हैं जो आपने हमें दिया था और जिसमें आपने उन शर्तोंका उल्लेख किया है जिनके आधारपर आप कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलनको स्थागित करने और गोलमेज सम्मेलनमें भाग लेनेकी सिफारिश करनेको तैयार हैं। {{Gap}}१. देखिए "पत्रः समू और जयकरको १५-८-१९३०<noinclude></noinclude> gopwr05p4jieypol0juoneb3bsxhj7d पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२३ 250 198022 671926 670754 2026-08-20T05:36:13Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३८५|''' परिशिष्ट'''}} {{Gap}}जैसा कि हम आपको बता चुके हैं, हमने मध्यस्थता करनेका काम {{Gap}}(१) कांग्रेसके तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष, पंडित मोतीलाल नेहरूने २० जून, १९३० को श्री स्लोकोम्बको दी गई भेंटमें जो शर्ते रखी थीं उनके आधारपर और विशेष रूप से {{Gap}}(२) उस वक्तव्यकी शर्तों के आधारपर हाथमें लिया था जिन्हें श्री स्लोकोम्बने १५ जून, १९३० को बम्बईमें पंडित मोतीलाल नेहरूको दिया था और जिसे उन्होंने (पंडित मोतीलाल नेहरूने) स्वीकार किया था और माना था कि हम उन शर्तों के आधारपर वाइसराय से अनौपचारिक वार्ता आरम्भ कर सकते हैं। श्री लोकोम्बने दोनों दस्तावेज हमें दे दिये और उसके बाद हमने बाइसराय महोदयसे अनुमति मांगी कि समझौते की सम्भावनाएँ खोजने के खयाल से वह हमें महात्मा गांधी, पंडित मोतीलाल नेहरू और पंडित जवाहरलाल नेहरूसे मुलाकात करनेकी अनुमति प्रदान करें। ऊपर जिस दूसरे दस्तावेजका जिक्र किया गया है उसकी एक प्रति आपने हमसे ले ली है। {{Gap}}अब हम देखते हैं कि आपने हमें इसी १४ तारीखको जो पत्र दिया है उसमें उल्लिखित शर्तें ऐसी हैं कि उस पत्रको, जैसा कि हमारे बीच सहमति हुई थी, वाइस- राय महोदय के सामने उनके विचारार्थं पेश किया जाना चाहिए और उनके निर्णयकी हमें प्रतीक्षा करनी होगी । {{Gap}}हमने आपकी इस इच्छाको ध्यान में रख लिया है कि इन शान्ति वार्ताओ सम्बन्धित सारे महत्वपूर्ण दस्तावेजोंको, जिनमें आपका हमारे नाम लिखा उपर्युक्त पत्र भी शामिल है, प्रकाशित कर दिया जाये। वाइसराय महोदय द्वारा आपके पत्र पर विचार कर चुकनेके बाद हम उन्हें प्रकाशित कर देंगे। {{Gap}}पत्र समाप्त करनेसे पूर्व आपसे हम यह कहने की इजाजत चाहेंगे कि जैसाकि हमने आपसे कहा था, हमारे पास ऐसा माननेके कारण थे कि सविनय अवज्ञा आन्दो- लनको वास्तव में स्थगित करनेके साथ ही सामान्य स्थिति काफी सुधर जायेंगी, अहिंसक राजनीतिक कैदी रिहा कर दिये जायेंगे, चटगांव और लाहौरके षड्यन्त्रके मामलोंसे सम्बन्धित अध्यादेशोंको छोड़ कर शेष सभी अध्यादेश वापस ले लिये जायेंगे, और गोलमेज सम्मेलनमें कांग्रेसको अन्य किसी भी राजनीतिक पार्टीके मुकाबले ज्यादा बढ़ा प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह कहने की जरूरत नहीं कि हमने इस बातपर भी जोर दिया था कि हमारी रायमें अपनी भेंट' में पंडित मोतीलाल नेहरूने जो रुख अख्तियार किया था और पंडित मोतीलालको सहमतिसे श्री स्लोकोम्ब द्वारा हमारे पास भेजे गये वक्तव्यमें तथा वाइसराय महोदय द्वारा हमें लिखे गये पत्र में तत्वतः कोई अन्तर नहीं है। {{Rh|||हृदयसे आपके,}} {{Rh|||ते० ब० सप्रू}} {{Rh|||मु० रा० जयकर}} <Br>[ अंग्रेजीसे ] {{Gap}}गांधी-सप्रू करेस्पांडेन्स । सौजन्य: प्रकाशनारायण समू <Br>४४-२५<noinclude></noinclude> t1v8l7cxrjz6ug9i5lzm7g2vnnzqb5t पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२४ 250 198023 671909 670755 2026-08-20T04:52:40Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट ३'''}} {{C|'''वाइसरायका पत्र सर तेजबहादुर सप्रूको'''}} {{Rh|||वाइसरीगल लॉज}} {{Rh|||शिमला}} {{Rh|||२८ अगस्त, १९३०}} <Br>प्रिय सर तेजबहादुर, {{Gap}}कांग्रेसके जो नेता इस समय जेल में हैं, उनके साथ श्री जयकर और आपने सूचना देने तथा उनके उसके उत्तरकी प्रतियां १५ अगस्तके संयुक्त पत्र भेजनेके लिए मैं आपको जो बातचीतकी उनके परिणामोंकी और आप लोगों द्वारा दिये गये धन्यवाद देता हूँ। मैं आपको और श्री जयकरको बताना चाहता हूँ कि भारतमें फिरसे सामान्य स्थिति स्थापित करने में मदद देनेके लिए लोक-कल्याणके इस आत्मधारित काममें आपने जिस भावनाके साथ प्रयत्न किया है उसकी में बहुत कद्र करता हूँ। आपने जिन परिस्थितियोंमें इस कामको हाथमें लिया उसकी यहाँ चर्चा करना उपयुक्त होगा। मैंने अपने १६ जुलाईके पत्र में आपको विश्वास दिलाया था कि मेरी, मेरी सरकारकी, और मुझे कोई शक नहीं था कि सम्राट्की सरकारकी भी, यह हार्दिक इच्छा है कि भारतके लोगोंको अपने मामलोंकी व्यवस्था स्वयं करनेका ज्यादासे ज्यादा अधिकार प्राप्त करने में मदद देनेके लिए हम जो कुछ कर सकते हों, करें, और केवल उन्हीं विषयोंके बारेमें हम अलगसे व्यवस्था करें जिनकी जिम्मेदारी सँभालने की स्थिति में वे अभी नहीं है। सम्मेलनका एक यह भी काम होगा कि वह सभी उपलब्ध सामग्री के आधारपर इस बातकी जाँच करे कि ये विषय क्या हैं, और इनके बारेमें क्या व्यवस्था की जाये। इससे पूर्व ९ जुलाईको विधान सभाके सामने अपने भाषण में मैने दो अन्य मुद्दोंको भी स्पष्ट कर दिया था। पहला यह है कि सम्मेलनमें भाग लेने- बाले सभी लोगोंको इस बातका पूरा अधिकार होगा कि वे सम्पूर्ण संवैधानिक समस्या- की उसके पूरे परिप्रेक्ष्यमें जांच करें। दूसरे, सम्मेलन आपसी सहमतिसे जो भी सम- झौता करेगा, सम्राट्की सरकार बादमें उसी समझौते के आधारपर अपने प्रस्ताव संसदके सामने पेश करेगी। जैसा कि आप मानेंगे, मुझे भय है कि आपने जो काम स्वेच्छासे अपने ऊपर लिया है उसमें कांग्रेसके नेताओं द्वारा आपको लिखे गये पत्रसे मदद नहीं मिलती। पत्रमें जो सामान्य लहजा अख्तियार किया गया दिखता है, और उसमें जो बातें कही गई हैं, साथ ही जिस तरह पत्रमें कांग्रेसकी नीतिके फलस्वरूप देशको होनेवाली गम्भीर हानि, विशेष रूपसे आर्थिक क्षेत्रमें होनेवाली हानि, को स्वीकार करनेसे साफ इनकार किया गया है, उसे देखते मुझे नहीं लगता कि उस {{Gap}}१. देखिए पत्र : सप्रू और जयकरको ", ५-९-१९३० ।<noinclude></noinclude> 8qmcrno0ownjed45ey3acugi26k2x7r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२५ 250 198024 671911 670756 2026-08-20T04:58:01Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ३८७}} {{Gap}}पत्र में दिये गये सुझावोंपर मेरा विस्तारपूर्वक चर्चा करना जरा भी उपयोगी होगा; और मैं स्पष्ट रूपसे कहना चाहूँगा कि उस पत्र में निहित प्रस्तावोंके आधारपर कोई चर्चा करना में असम्भव मानता हूँ। मुझे आशा है कि यदि आप कांग्रेस के नेताओंसे फिर मिलना चाहते हों तो यह बात आप उन्हें साफ तौर पर बता देंगे। {{Gap}}आपने उन्हें १६ अगस्तको उत्तर देते हुए जो पत्र लिखा है, उसके अन्तिम अनुच्छेद के बारेमें में एक बात और कहना चाहूँगा। जब हमने इन मामलों पर बातचीत की थी उस समय मैंने कहा था कि यदि सविनय अवज्ञा आन्दोलन वास्तवमें बन्द कर दिया जाता है तो में लाहौर षड्यन्त्र केस और चटगाँव षड्यन्त्र केससे सम्बन्धित अध्यादेशोंको छोड़ शेष सारे अध्यादेश वापस ले लूंगा क्योंकि तब उनकी आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी। लेकिन मैंने यह बात स्पष्ट कर देनेकी सावधानी बरती थी कि मैं ऐसा कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त होनेके बाद स्थानीय सरकारें आन्दोलन से सम्बन्धित अपराधोंके सिलसिले में उन सजा- प्राप्त या नजरबन्द कैदियोंको रिहा कर देंगी जिनके विरुद्ध हिंसात्मक कार्रवाई करनेका आरोप नहीं है। मैं चाहूँगा कि इस मामले में उदार नीति वरती जाये, लेकिन में ज्यादासे ज्यादा यह वादा कर सकता हूँ कि स्थानीय सरकारोंसे अनुरोध करूँ कि वे प्रत्येक व्यक्ति मामलेवर उसके गुणोंके आधारपर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें। {{Gap}}कांग्रेस यदि सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द कर दे और उसके बाद यदि वह सम्मेलन में भाग लेना चाहे तो सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधित्व के सवालका आपने जो उल्लेख किया है उसके बारेमें मेरी स्मृतिके अनुसार आपने यह स्पष्ट किया था कि कांग्रेसकी मांग यह नहीं है कि उसे सम्मेलन में बहुसंख्याके अर्थमें अन्य दलोंकी अपेक्षा प्रातिनिधिक प्रधानता दी जाये, और मैंने यह विचार व्यक्त किया था कि सम्राट्को सरकारसे यह सिफारिश करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं दिखाई पड़ती कि कांग्रेसको समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए। मैंने यह भी कहा था कि यदि सूरत वैसी बनी तो मैं कांग्रेस पार्टीके नेताओं द्वारा ऐसे लोगोंके नामकी एक सूत्री मांगने को तैयार रहूंगा जिन्हें वे उपयुक्त प्रतिनिधि मानते हैं। मुझे लगता है कि आप और श्री जयकर चाहेंगे कि मैं आपको अपनी और अपनी सरकारकी स्थितिसे स्पष्ट रूपसे अवगत करा दूं क्योंकि यह शायद उचित होगा कि हमारे पत्र- व्यवहारको शीघ्र ही प्रकाशित कर दिया जाये ताकि जनताको पता चल जाये कि वे क्या परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण आपके प्रयत्नोंका वैसा वांछित परिणाम नहीं निकल सका जिसकी कि आप आशा करते थे, और जो निकलना भी चाहिए था। {{Rh|||हृदयसे आपका}} {{Rh|||इविन}} <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>हिन्दू, ५-९-१९३०<noinclude></noinclude> 2sxy1u47qwylg63wibahila0lwlpawn पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२६ 250 198025 671912 670757 2026-08-20T05:02:57Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट ४'''}} {{C|'''वाइसरायके साथ हुई बातचीतका सार-संक्षेप'''}} {{Gap}}(क) संवैधानिक प्रश्नपर स्थिति वही होगी जोकि वाइसरायने २८ अगस्तको हमें लिखे गये अपने पत्रके अनुच्छेद २ में उल्लिखित चार मूलभूत मुद्दोंमें बताई है। {{Gap}}(ख) इस सवालपर, कि क्या श्री गांधीको गोलमेज सम्मेलन में भारत द्वारा जब भी इच्छा हो तब साम्राज्यसे अलग होने के अधिकारका सवाल उठानेकी अनुमति दी जायेगी, स्थिति इस प्रकार थी " जैसा कि वाइसरायने हमें भेजे गये अपने पूर्वोक्त पत्र में कहा है, सम्मेलन एक स्वतन्त्र सम्मेलन होगा। अतः कोई भी व्यक्ति जो सवाल चाहे उठा सकता है। लेकिन वाइसरायकी राय थी कि श्री गांधी द्वारा इस सवालको अभी उठाना बिलकुल बुद्धिमानी की बात नहीं होगी । लेकिन यदि वह भारत सरकार के सामने यह सवाल उठायेंगे तो वाइसराय कह देंगे कि सरकार इस सवालको विचार- णीय सवाल मानने को तैयार नहीं है। अगर इसके बावजूद श्री गांधी इस सवालको उठाना चाहें तो सरकार भारत-मन्त्रीको सूचित कर देगी कि श्री गांधी गोलमेज सम्मेलनमें यह सवाल उठानेका इरादा रखते हैं। " {{Gap}}(ग) जहाँतक अमुक वित्तीय जिम्मेदारियोंके बारेमें भारतके दायित्वका सवाल उठाने के और उनकी एक स्वतन्त्र अधिकरण द्वारा जांच करानेके अधिकारका सवाल है, स्थिति यह थी कि वाइसराय किसी भी ऐसे प्रस्तावपर विचार करने को तैयार नहीं थे जिसके तहत भारत सारे ऋणोंकी देनदारीको मानने से इनकार करता हो, लेकिन गोलमेज सम्मेलन में कोई भी व्यक्ति भारतके वित्तीय दायित्वका सवाल उठाने और उसकी जाँचकी मांग करनेको स्वतन्त्र होगा । {{Gap}}(घ) जहाँतक नमक अधिनियम के खिलाफ राहत देनेका सवाल है, वाइसरायकी स्थिति यह थी कि (१) यदि साइमन कमीशनकी सिफारिश मंजूर कर ली गई तो नमक-करका प्रान्तीयकरण कर दिया जानेवाला है, और (२) पहले ही राजस्वमें बहुत कमी हो गई है और इसलिए सरकार राजस्वके इस साधनको छोड़ना नहीं चाहेगी; लेकिन यदि विधान सभाको यह अधिनियम रद करने के लिए राजी कर लिया गया, और अगर कोई ऐसा प्रस्ताव रखा गया जिससे कि उक्त अधिनियमको रद करनेसे होनेवाला घाटा पूरा किया जा सके तो वाइसराय और उनकी सरकार इस प्रन पर उसके गुणावगुणकी दृष्टिसे विचार करेंगे। लेकिन जबतक नमक अधिनियम कानूनके रूपमें जारी है aere वाइसरायके लिए उस अधिनियमके खुल्लमखुल्ला उल्लंघनको माफ करना सम्भव नहीं है। सद्भावना और शान्ति स्थापित हो जाने के बाद यदि भारतीय नेतागण गरीब वर्गोको आर्थिक राहत देने के तरीकोंके बारेमें बाइसराय {{Gap}}१. यह बातचीत २१ और २८ अगस्तको शिमला में सर तेजबहादुर सप्रु और श्री मु० रा० जयकर तथा बाइसरायके बीच हुई थी देखिए पृष्ठ ११७ की पाद-टिप्पणी ।<noinclude></noinclude> nk69hs7sug7poiyzef5w0rvmwuojibr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२७ 250 198026 671913 670759 2026-08-20T05:06:37Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ३८९}} {{Gap}}और उनकी सरकारके साथ बातचीत करना भारतीय नेताओंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलायेंगे । {{Gap}}(ङ) धरनोंके बारेमें स्थिति यह थी कि यदि धरनेके कारण किसी वर्गके लोगोंको किसी प्रकारकी उलझन या परेशानी होती है या धरना देनेके अलावा लोगों को सताया भी जाता है या धमकी दी जाती है या बल-प्रयोग किया जाता है तो बाइसराय सरकारका यह अधिकार मानते हैं कि कानूनके अनुसार जो कदम उठाये जा सकते हैं, वे उठाये जायें, अथवा यदि कोई आपत्कालीन स्थिति उत्पन्न हो जाये तो उसका सामना करनेके लिए जो भी कानूनी अधिकार जरूरी हों वे अधिकार प्राप्त किये जायें। ऊपरकी शर्तोंके तहत, जब शान्ति स्थापित हो जायेगी तब धरनोंके खिलाफ जारी किया गया अध्यादेश वापस ले लिया जायेगा । {{Gap}}(च) उन अफसरों के बारेमें जिन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान इस्तीफा दे दिया था या जिन्हें निकाल दिया गया था, स्थिति यह है कि वह मुख्यतः स्थानीय सरकारोंके विवेकाधिकारकी बात है। स्थानीय सरकारोंसे अपेक्षा की जायेगी कि जिन लोगोंने भावावेशमें आकर या जोश में बिना विचारे अपने पदोंसे त्यागपत्र दे दिया था उन्हें ये फिर नौकरी में बहाल कर लें, बशर्ते कि स्थान रिक्त हों, और बातें कि उनको बहाल करने के लिए राजनिष्ठ कर्मचारियोंको निकालने की जरूरत न पड़े। {{Gap}}(छ) जहाँतक प्रेस अध्यादेशके अन्तर्गत जब्त किये गये छापेखानोंको वापस करनेका सवाल है, इसमें कोई कठिनाई नहीं होगी। {{Gap}}(ज) जहाँतक राजस्व कानून के अन्तर्गत किये गये जुर्मानों और जब्त की गई सम्पत्तिको वापस करने का सवाल है, उसकी और बारीक व्याख्या करने की जरूरत है। राजस्व कानूनके अन्तर्गत जब्त की गई या बेची गई सम्पतिमें तीसरे पक्ष के हित भी निहित हो सकते हैं। जहाँ तक जुर्माने वापस करनेकी बात है, इसमें कठिनाइयाँ हैं। संक्षेपमें, वाइसराय महोदय केवल इतना ही कह सकते थे कि स्थानीय सरकारें न्यायपूर्वक अपने विवेकाधिकारका प्रयोग करेंगी और सभी परिस्थितियों पर विचार करेंगी और जो कुछ कर सकती हैं करेंगी । {{Gap}}(स) जहाँ तक कैदियोंकी रिहाईका सवाल है, वाइसराय महोदयने हमें लिखे गये अपने २८ जुलाईके पत्र में अपने विचार पहले ही बता दिये हैं। <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>हिन्दू, ५-९-१९३०<noinclude></noinclude> rdufdd8qgr9dpz1fg1iji0eq9tyx0c7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२८ 250 198027 671915 670760 2026-08-20T05:11:26Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट ५'''}} {{C|'''नेहरू द्वयको टिप्पणी''''}} {{Rh|||नैनी सेंट्रल जेल}} {{Rh|||३१ अगस्त, १९३०}} {{Gap}}हम लोगोंकी श्री मु० रा० जयकर और सर तेजबहादुर सप्रुके साथ कल तथा आज आगे और मुलाकातें हुई और लम्बी बातचीत हुई। उन्होंने हमें वाइसराय द्वारा उनको लिखे गये २३ अगस्तके पत्रकी एक नकल दी है। इस पत्र में यह बात स्पष्ट रूपसे कही गई है कि सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरके नाम लिखे हमारे १५ अगस्तके संयुक्त पत्रमें जो सुझाव दिये गये हैं, उनके आधार पर किसी प्रकारकी बातचीतको वाइसराय महोदय असम्भव मानते हैं, और इन परिस्थितियों में उन्होंने यह निष्कर्ष ठीक ही निकाला है कि उनके प्रयत्न विफल मनोरथ हुए हैं। यह संयुक्त पत्र, जैसा कि आप जानते हैं, पत्र पर हस्ताक्षर करनेवालों द्वारा पूरी तरह विचार-विमर्श करनेके बाद लिखा गया था और हस्ताक्षरकर्ता अपनी व्यक्तिगत हैसियतमें ज्यादासे ज्यादा जिस हद तक जानेको तैयार थे, वह इसमें बताया गया था । हमने उस पत्र में कहा था कि कोई समझीता तबतक सन्तोषजनक नहीं होगा जबतक कि वह कुछ महत्वपूर्ण शर्तोंको पूरा न करता हो, और जबतक उस आशयकी एक सन्तोषजनक घोषणा ब्रिटिश सरकार नहीं कर देती। यदि ऐसी घोषणा कर दी जाये तो हम कार्य समितिसे सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त करनेकी सिफारिश करनेको तैयार हैं, बशर्ते कि उसके साथ ही भारत सरकार हमारे पत्र में उल्लिखित अमुक कदम उठाये । {{Gap}}इन आरम्भिक मुद्दों पर सन्तोषजनक समझौता हो जानेके बाद ही प्रस्तावित लन्दन सम्मेलनके गठनका सयाल और उसमें कांग्रेसके प्रतिनिधित्वके सवालको तय किया जा सकता था। लॉर्ड इविन अपने पत्र में इन प्रस्तावोंके आधार पर बातचीत तकको असम्भव बताते हैं। ऐसी स्थितिमें हमारे बीच बातचीतका कोई समान आधार नहीं है, और न हो सकता है। पत्रमें जो कुछ बातें कही गई है उनके अलावा भी पत्रकी ध्वनि, और भारतमें ब्रिटिश सरकारकी हालकी कार्रवाइयाँ इस बातकी सूचक हैं कि सरकारके मनमें शान्तिकी कोई इच्छा नहीं है। कार्य समितिने दिल्ली में अपनी बैठक बुलाने की घोषणा की थी, लेकिन इसके फौरन बाद ही सरकार द्वारा दिल्ली प्रान्त में कांग्रेस कार्य समितिको एक अवैध संगठन घोषित कर देने, और बादमें उसके अधिकांश सदस्योंको गिरफ्तार कर लेनेके अर्थ इसके सिया दूसरे नहीं हो सकते कि उसकी शान्तिकी इच्छा नहीं है। हमें इन या अन्य गिरफ्तारियोंके खिलाफ या सरकारकी अन्य कार्रवाइयोंके खिलाफ कोई शिकायत नहीं है, हालांकि इनमें से कुछ {{Gap}}१. देखिए पृष्ठ १२७ की पाद-टिप्पणी।<noinclude></noinclude> 9cpa1kv61sj0l3wduuki9u2uh6gxsn5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२९ 250 198028 671916 670761 2026-08-20T05:15:02Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ३९१}} {{Gap}}कार्रवाइयोंको हम 'असभ्यतापूर्ण' और 'वर्वरतापूर्ण' समझते हैं। हम उनका स्वागत करते हैं। लेकिन हमें लगता है कि हमारा यह कहना उचित ही है कि एक तरफ तो शान्तिकी इच्छा करना, और दूसरी ओर एक ऐसे संगठन पर आक्रमण करना जो शान्ति दे सकता है और जिसके साथ सरकार समझौतेकी बातचीत भी करना चाहती है, ये दो ऐसी बातें हैं जिनका मेल नहीं बैठता। समस्त भारतमें कार्य समितिके गैर-कानूनी करार दिये जाने और उसकी बैठकको रोकने के अर्थ ही हैं कि जो भी परिणाम हों, लेकिन राष्ट्रीय संघर्ष जारी ही रहेगा और शान्तिकी कोई सम्भावना नहीं होगी, क्योंकि जिन लोगोंको भारतकी जनताका प्रतिनिधित्व करनेका कुछ अधिकार है, वे भारतकी ब्रिटिश जेलोंमें बन्द होंगे । {{Gap}}लॉर्ड इर्विन के पत्र तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई कार्रवाईसे साफ हो जाता है कि सर तेजबहादुर सप्रु और श्री जयकरके प्रयत्न निष्फल हो गये हैं। वस्तुतः उनका पत्र और हमें जो कैफियतें दी गई थीं, वे हमें कुछ दृष्टियोंसे पहलेकी स्थिति से भी पीछे ले जाते हैं। हमारी स्थिति और लॉर्ड इविनकी स्थिति के बीच जो गहरा अन्तर है, उसे देखते तफसीलमें जानेकी जरूरत ही नहीं है; लेकिन हम आपको उनके पत्रकी कुछ बातें बताना चाहेंगे। उनके पत्रका प्रथम अंश तो विधान सभामें दिये गये उनके भाषण और १६ जुलाईको श्री जयकर और सर तेजबहादुर सप्रुको लिये गये उनके पत्रकी भाषा-शैलीकी पुनरावृत्ति ही । जैसाकि हमने अपने संयुक्त पत्रमें कहा था, उसकी यह भाषा और शैली इतनी अस्पष्ट है कि हम उसका मूल्यांकन नहीं कर सकते। उसके कुछ भी अर्थ निकाले जा सकते हैं। अपने संयुक्त पत्र में हमने स्पष्ट कर दिया है कि एक पूर्णतः राष्ट्रीय सरकार, जोकि भारतकी जनता के प्रति उत्तरदायी हो और जिसे सशस्त्र सेना और आर्थिक मामलों पर पूरा नियन्त्रण प्राप्त हो, भारतकी तात्कालिक मांगके रूपमें स्वीकार की जानी चाहिए। इसमें आम तौर पर जिन्हें पूर्वोपाय कहा जाता है उनका, अथवा किसी विलम्बका कोई प्रश्न नहीं पैदा होता। सत्ताके हस्तान्तरणके लिए कुछ मामलों में समंजनकी आवश्यकता जरूर होगी, और इसके बारेमें हमारा कहना है कि इसका निर्धारण भारतके निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा । {{Gap}}जहाँ तक भारत द्वारा जब मर्जी हो तब ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग हो जाने के अधिकारका और ब्रिटेनके दावों और ब्रिटेनको प्राप्त रियायतोंके मामलेको एक स्वतन्त्र अधिकरणको सौंपनेके उसके अधिकारका सवाल है, हमें केवल यह बताया जाता है कि सम्मेलन एक स्वतन्त्र सम्मेलन होगा और उसमें कोई भी मुद्दा उठाया जा सकता है। इसे तो पिछली स्थितिसे कुछ आगे बढ़ना नहीं कहा जायेगा। तथापि हमें आगे यह भी बताया गया है कि यदि भारत में ब्रिटिश सरकारको यह सम्भावना लगी कि भारत द्वारा साम्राज्यसे अलग होनेका सवाल उसके सामने उठाया ही जायेगा तो लॉर्ड इविन कह देंगे कि यह सवाल कोई खुला सवाल नहीं है। उनके अनुसार भारतकी ब्रिटिश सरकार तो केवल इतना ही कर सकती है कि वह इस सवालको सम्मेलनमें उठाके हमारे इरादेकी सूचना भारत-मन्त्रीको दे दे।<noinclude></noinclude> 2p418yr60ej49dd1y8dsds7rnyow123 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३० 250 198029 671918 670762 2026-08-20T05:18:24Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३९२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}} nhi जहाँ तक दूसरे प्रस्तावका सवाल है, हमें बताया गया है कि लॉर्ड इविन कुछ वैयक्तिक आर्थिक लेन-देनके मामलोंकी छानबीनकी बातपर ही विचार कर सकते हैं। व्यक्तिगत मामलोंमें ऐसी छानबीन अवश्य की जा सकती है, लेकिन इस छानबीनकी परिधिको फैलाना होगा ताकि उसमें ब्रिटेन के सारे दावे भी आ जायें, जिनमें भारतका तथाकथित सार्वजनिक ऋण भी शामिल है। हम इन दोनों प्रश्नोंको अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं और हमारी दृष्टिमें इसपर हमारे संयुक्त पत्र में पहले ही सहमति हो जाना अत्यावश्यक है। {{Gap}}कैदियोंकी रिहाईके बारेमें लॉर्ड इविनने जो कुछ कहा है उसका दायरा अत्यन्त सीमित और असन्तोषजनक है। वह हमें यह आश्वासन देने में असमर्थ हैं कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके सिलसिले में गिरफ्तार सभी अहिंसक कैदी रिहा कर दिये जायेंगे । वह केवल इतना करना चाहते हैं कि इस मामलेको स्थानीय सरकारोंके हाथमें छोड़ दें हम ऐसे मामले में स्थानीय सरकारों या स्थानीय अधिकारियोंकी उदारता या सहानुभूतिपर भरोसा नहीं करना चाहते। लेकिन इसके सिवा लॉर्ड इविनके पत्र में अन्य अहिंसक कैदियोंका कोई जिक्र नहीं है। ऐसे कांग्रेसजन और अन्य लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं जिन्हें सविनय अवज्ञा आन्दोलनसे पहले राजनीतिक अपराधोंके कारण जेल में डाल दिया गया था। इस सिलसिले में हम मेरठवाले मामलेके कैदियोंका उल्लेख करना चाहेंगे जो डेढ़ साल से जेल में हैं और जिनपर अभी मुकदमा चलना शुरू भी नहीं हुआ है। हमने अपने संयुक्त पत्रमें स्पष्ट कर दिया है कि इन सभी व्यक्तियोंको रिहा कर दिया जाना चाहिए। {{Gap}}बंगाल और लाहौर केस अध्यादेशोंके सम्बन्धमें लॉर्ड इविनने कहा है कि इन्हें छोड़कर अन्य सभी अध्यादेश वापस ले लिये जायेंगे। हमें लगता है कि इन्हें भी वापस ले लिया जाना चाहिए। हमने यदि उन राजनीतिक कैदियोंकी रिहाई की मांग नहीं की है जो हिंसात्मक कार्योंके दोषी हैं, तो उसका कारण यह नहीं है कि हम उनकी रिहाईका स्वागत नहीं करेंगे बल्कि इस कारण कि हमें लगा कि चूंकि हमारा आन्दोलन पूरी तरह अहिंसात्मक है अतः हम मामलेको उलझायेंगे नहीं। लेकिन हम कमसे कम जो कर सकते हैं वह यह है कि हम आग्रह करें कि हमारे अपने इन देशभाइयोंके ऊपर साधारण अदालतमें मुकदमा चलाया जाये, किसी ऐसे अध्यादेश के अन्तर्गत संगठित एक असाधारण अदालतमें नहीं जो उन्हें अपील करनेके अधिकारसे और किसी अभियुक्तको जो साधारण अधिकार प्राप्त होते हैं, उनसे वंचित करता हो । {{Gap}}खुली अदालत में तथाकथित मुकदमेके दौरान क्रूरतापूर्वक मारने-पीटने तककी जो विस्मयकारी घटनाएँ हुई हैं, उनको देखते यह अत्यावश्यक है कि अदालत में मुकदमा चलाने की साधारण प्रक्रियाका अनुगमन किया जाये। हम समझते हैं कि कुछ अभियुक्त अपने साथ किये जानेवाले व्यवहारके विरोध में काफी अर्सेसे भूख-हड़ताल कर रहे हैं और अब मौतके दरवाजे पर पहुँच गये हैं। हम समझते हैं कि बंगाल- अध्यादेशका स्थान अब बंगाल विधान परिषद के एक अधिनियमने ले लिया है। हम इस अध्यादेशको और उसपरसे पास किये गये किसी भी अधिनियमको अत्यन्त आपत्तिजनक<noinclude></noinclude> kexcormhd1whm6ltgp52mazp6hxvikq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३१ 250 198030 671905 670763 2026-08-20T04:35:42Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>प{{rh||रिशिष्ट| ३९३}} {{Gap}}मानते हैं, और इस तथ्यसे बात कुछ सुधर नहीं जाती कि बंगालकी वर्तमान विधान- परिषद जैसी गैर-प्रातिनिधिक संस्थाने यह अधिनियम पास किया है। {{Gap}}जहाँ तक विदेशी वस्त्रों और शराबकी दुकानों पर धरना देनेका सवाल है, हमें बताया गया है कि लॉर्ड इविन धरनेके विरुद्ध जारी किया गया अध्यादेश वापस लेनेको तैयार हैं, लेकिन वह यह भी कहते हैं कि यदि उन्होंने जरूरी समझा तो धरनोंका मुकाबला करनेके लिए वह नये कानून बनायेंगे। दूसरे शब्दोंमें, वह हमें सूचित करते हैं कि वह जब भी जरूरी समझेंगे, इस अध्यादेशको फिरसे जारी करेंगे या शिमला में बैठकर इसी प्रकारकी कोई दूसरी चीज करेंगे। हमारे संयुक्त पत्र में नमक -अधिनियम तथा अन्य चीजोंके बारेमें जो कुछ कहा गया था उसके सम्बन्धमें भी उनका जवाब बिलकुल असन्तोषजनक है। आप नमकके जाने-माने विशेषज्ञ हैं, अतः हमें यहाँ उसके विषय में विस्तारसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। हम इतना ही कहेंगे कि इन विषयों पर हमने पहले जो स्थिति अपनाई है, उसमें परिवर्तन करनेका हमें कोई कारण नहीं दिखता । {{Gap}}इस प्रकार हमारे संयुक्त पत्रमें जो मुख्य प्रस्ताव थे उन सभीको, तथा बहुतसे छोटे-मोटे प्रस्तावोंको लॉर्ड इविनने स्वीकार करनेसे इनकार कर दिया है। उनके और हमारे दृष्टिकोण में बहुत अन्तर है, बल्कि यह अन्तर बुनियादी है। हमें आशा है कि आप इस टिप्पणीको श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्री वल्लभभाई पटेल, और श्री जयरामदास दौलतरामको दिखा देंगे और उनसे परामर्श करके श्री जयकर तथा सर तेजबहादुर सप्रूको अपना उत्तर देंगे। हमें लगता है कि पत्र-व्यवहारके प्रकाशनमें और अधिक विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए, और हमारा जनताको अँधेरेमें रखना उचित नहीं है। इनके प्रकाशन के प्रश्नके अतिरिक्त, हम सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरसे अनुरोध कर रहे हैं कि ये सारे पत्र-व्यवहार तथा सभी प्रासंगिक कागज-पत्रोंको भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके कार्यवाहक अध्यक्ष श्री खलीकुज्जमाके पास भेज दें। कार्य समिति अभी काम कर रही है, इसलिए हमें लगता है कि उसे तत्काल सूचना भेजे बिना हमें कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। {{Rh|||मोतीलाल}} {{Rh|||रिशिष्सैयद महमूद}} {{Rh|||जवाहरलाल}} <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>हिन्दू, ५-९-१९३०<noinclude></noinclude> gfsqx8ktedofoxzwkgkaspzjl4fw9uj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३२ 250 198031 671908 670764 2026-08-20T04:43:59Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 671908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट ६'''}} {{C|आश्रम भजनावलि १}} {{Rh|''' १'''}} प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरद् आत्म-तत्त्वम् {{Gap}}सत्-चित्-सुखं परमहंस-गति तुरीयम् । यत् स्वप्न जागर सुषुप्तम् अवैति नित्यम् {{Gap}}तद् ब्रह्म निष्कलम् अहं न च भूत-संघः ॥ {{Rh|||२०-१२-१९३०}} {{Rh|'''२'''}} प्रातर् भजामि मनसो वचसाम् अगम्यम् {{Gap}}वाचो विभान्ति निखिला यद् अनुग्रहेण । यन् 'नेति नेति' वचनैर् निगमा अवोचुस् {{Gap}}तं देव-देवम् अजम् अच्युतम् आहुर् अस्यम् ॥ {{Rh|||७-५-१९३०}} {{Rh|'''३'''}} प्रातर् नमामि तमसः परम् अर्क-वर्णम् {{Gap}}पूर्ण सनातन-पदं पुरुषोत्तमाख्यम् । यस्मिन् इदं जगद् अशेषम् अशेष-मूर्ती {{Gap}}रज्ज्वा भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ।। {{Rh|||८-५-१९३०}} {{Gap}}१. आश्रम भजनावलि गांधीजी के आश्रमोंमें होनेवाली सुबह-शामको प्रार्थनाओं और प्रधानतः विविध भारतीय भाषाओंके भजनसंग्रह है। ये भजन अधिकांशतः सुप्रसिद्ध संत-कवियोंके हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी है जिनके रचयिताओंका ठीक पता नहीं है किन्तु जो भजनानन्दी गायकों के गीत-साहित्यका अंग हो गये है और इस भजनावलिमें इसीलिए स्थान पा गये है। सन् १९३० में जब गांधीजी परवडा जेल में थे, उन्होंने मीरायहनके उपयोगके लिए इनमें से अधिकांश प्रार्थनाओं और भजनोंका अंग्रेजी अनुवाद किया था। अनुवाद कार्य ६ मई, १९३० को आरम्भ हुआ और १५ दिसम्बर को पूरा हुआ था। अंग्रेजी अनुवादके लिए पाठक इस ग्रन्थावलीका ४४ देखें तो हम उस अंग्रेजी अनुवादमें गृहीत क्रमके अनुसार मूल श्लोक आदि और अमन ही दे रहे हैं और जहां कहीं गांधीजीने अपने अंग्रेजी अनुवादमें मूल भाव या विचारको स्पष्ट करनेके लिए कुछ जोड़ा है या कोई टिप्पणी दी है उसे भी दे रहे हैं। प्रत्येक श्लोक और भजनके अन्त में रही हुई तारीख सूचित करती है कि उसका अंग्रेजी अनुवाद गांधीजीने किस दिन किया था। हिन्दी पाठकों के सूचनायें यहां इतना और कहना जरूरी लगता है कि नवजीवन प्रकाशन मन्दिर द्वारा प्रकाशित आश्रम भजनावलि में संस्कृत स्टोफका गांधीजीके निकट सहयोगी किशोरलाल मशरूवाला कृत हिन्दी अनुवाद प्राप्त है जिसे गांधीजीका स्वीकार किया हुआ माना जा सकता है और उसमें अन्त में भजनों में आये हुए कठिन शब्दोंका कोष भी दिया गया है। {{Gap}}२. गांधीजी की टिप्पणी: "प्रथम श्लोकफा अनुवाद २०-१२-१९३० को दोबारा किया गया।" गांधीजीने पहले इसका अनुवाद ६ मईको किया, दोबारा २० नवम्बरको और फिर अन्तमें २०-१२-१९३० को।<noinclude></noinclude> dypt3lbmmqwotvygm2bbedr7ul06f1w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२९ 250 198128 671790 671704 2026-08-19T14:53:05Z Koyal Singh 6351 671790 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||सांकेतिका|४९१}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|खरे, रामभाऊ, ११, ९४, १६४, १७३, २८५}} {{outdent|खरे, लक्ष्मीबहन, ४, ११, ७९, ९४, १५५, २५०, २८५}} {{outdent|खादी (खद्दर), १७, ५०, ५१, १६४, १७७, २१७, २२१, २६९, २९९}} {{outdent|खुराक, १३४, १४६, १५८, १७७, १८५, २१६, २२३, २४३, २९३, ३००, ३२२, ३४२, ३५३, ३५५, ३६५, ३६६, ३७३, ३७६; –और दूध, ३३९; –और फल, ३३२; –जेलमें, ३३४-५; –में प्रयोग, १४९, १६२, २३८-९, २४८, २७७, २९३-४, ३०६, ३४४, ३४६, ३६४, ३६६, ३७१-२, ३७७}} {{outdent|खुर्शेदबहन, १२४, १५१, १७२, १८८, २०५}} {{c|'''ग'''}} {{outdent|गंगाबहन, देखिए झवेरी, गंगाबहन}} {{outdent|गंगाबहन रामजी, १२}} {{outdent|गंजीवाला कान्तु, १३६}} {{outdent|गलिआरा, मणिभाई, ११}} {{outdent|गांधी, उमिया, १७९}} {{outdent|गांधी, कमला, १६५}} {{outdent|गांधी, कसुम्बा, १२३, १७९, २३५}} {{outdent|गांधी, कस्तूरबा, १०, ४७, १११, १४३, १४९, २१०}} {{outdent|गांधी, कान्ति, ११४, १८७, २८०}} {{outdent|गांधी, काशी, २९२}} {{outdent|गांधी, कुसुम, ३६६; देखिए कुसुम भी}} {{outdent|गांधी, केतु, ५७, ९६, १०२, १२४, १४५, १८५, १९८, २१८, २४६, २७२, २९१, २९५, ३६४, ३६६, ३६७}} {{outdent|गांधी, छगनलाल, ३२४}} {{outdent|गांधी, जमनादास, १०२, १२४, ३२०, ३५५}} {{multicol-break}} {{outdent|गांधी, जयसुखलाल, १२३, १७९, २३५, २९०}} {{outdent|गांधी, जेठालाल, ११}} {{outdent|गांधी, देवदास, ३, २५, ६६, १०२, ११४, २५६, २६२, ३१५, ३४७}} {{outdent|गांधी, नारणदास, ८, १६, २३, २४, २८, ३१, ५७, ६७, ७१, ८०, ९०, १०२, ११४, १२२-४, १३४, १३९, १४८, १५४, १६५, १७२, १८१, १८२, १८५, १९४, २०१, २०२, २११, २१२, २१७, २२२, २३८, २५६, २७२, २७५, २९१, ३१३, ३२०, ३२२, ३२५, ३२७, ३३१, ३४७, ३५१, ३५५, ३६५, ३७८}} {{outdent|गांधी, नीमु, २१७}} {{outdent|गांधी, पुरुषोत्तम, ३२०, ३५५, ३६५}} {{outdent|गांधी, प्रभुदास, ९, ३९, ४९, २६८}} {{outdent|गांधी, मगनलाल, ३६७}} {{outdent|गांधी, मणिलाल, १०१, २२३, २२७, २५०, २५६, २७८, ३०९, ३१४, ३४७, ३६२}} {{outdent|गांधी, मनमोहन, ५७}} {{outdent|गांधी, मनु, ३, ४६, ४७, ७२, १९९, २२३, २८९, ३५४, ३५५}} {{outdent|गांधी, मोहनदास करमचन्द, ११७ पा० टि०; –की ते० ब० सप्रू और मु० रा० जयकरसे भेंट, ८२ पा० टि०; –ने सप्रू और जयकरको मोतीलाल नेहरू और जवाहरलालको देनेके लिए एक ज्ञापिका दी, ४३ पा० टि०}} {{outdent|गांधी, राधाबहन, १९, ६७, ७२, ८५, ९६, १०५, १४०, १८१, २१८, २३०, २४६, २६५, ३११, ३७७}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 54smvua5z8z1nploaewwtvg3m87b0wb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३० 250 198129 671791 670867 2026-08-19T14:53:53Z Koyal Singh 6351 /* अशोधित */ 671791 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Koyal Singh" />{{rh|४९२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गांधी, रामदास, ३, १०२, १४८, १४९, १७५, २१७, २५७, ३३७ गांधी, रामी, ४७, ७२ गांधी, वेणीलाल, १८१ गांधी, सन्तोक, ३७७ गांधी, सुशीला, १०१ १२८, २२३, २२७, २७८, ३०९, ३१५, ३५५, ३६२, ३७६ गांधी, हरिलाल, ३ पा० टि० गोकी बहन, १३२, १५३, १८७, २२६ गोखले, गोपालकृष्ण, २०८, २५६ गोडसे, १२ गोदरेज, अर्देशिर २३७ गोपालराव ११, ३७१ गोमती, २७८ गोविन्दजी, २७३ गोविल, प्यारेलाल, ३१८ ज्ञान, १०४, २२२, २७४ और सत्य, ४१ ग्रे, थामस, ७२ गाण्डीव चरखा, १०९, २०३, २१५, २१६, २२०, २३३, २३९, २४७, २९३, २९६, ३२४, ३४६, ३६४. गिडवानी, ए० टी०, १५२ पा० दि० २७५, ग्रेग दम्पति २९५ घ घोष, अरविन्द, १०५ गिडवानी, गंगाबहन, १५२ गिरधर, १२ च गिरि, दलबहादुर, १९ गिरि, दुर्गा, १९ गिरि, धर्मकुमार १६१, ३२८, ३५५ गिरि, महावीर, ११, ९७ २०९, ३१० गिरि, मैत्री, ११, ७३, १०७, २२८ गिरि, सत्यादेवी, ७५, ९९, १६१, ३०७ गिरिराज, १२, ३०, ६८, १०२, १८६, १८७, २०२, २११, २१८, २३९, २४५, ३६५ गीताबोध, २७४ पा० टि०, ३३४ गुजरात विद्यापीठ, १२५ -द्वारा उपाधियोंका वितरण, १३३ गुजराती गीता देखिए अनासक्तियोग गुरुदेव, देखिए ठाकुर, रवीन्द्रनाथ गुलाबबहन मणिलाल, १२ गैलविन, बी० जे० बी०, ३१८ गो-सेवा, ३३७ चतुर्वेदी, बनारसीदास, २३६ चन्दन, ७८, २०७, ३३६ चन्द्र, ३१२ चन्द्रकान्ता, २५६, ३३३ चन्द्रशंकर, २०३ चम्पा, ३३३ चरखा, ९, २१, २३, २७, ३३, ४९, ५२, ५७, ६४, ६८, ७६, ८९, १००, ११४, १२७, १३१, १४५, १६२, १७८, १९७, १९८, २०६, २३२, २४३, २७१, २८९, २९७-९, ३१७, ३२२, ३३१, ३५५, ३६९ चांदीवाला, ब्रजकृष्ण, २५, ६६, १०९, २५७, ३७० चारु, ३८, ५१, ७६, १८३, २३३, २६७ चितालिया करसनदास, १२, २१८, २५६, २७३ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> d9hmok7jtgaxc2adxpch1mx6osnxxbb 671794 671791 2026-08-19T15:04:49Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 671794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh|४९२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}{{outdent|</noinclude> ४९२ संपूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{outdent|गांधी, रामराव, ३, १०२, १४४, १४९, १७३, २१७, २५७, ३३७}} {{outdent|गांधी, राघो, ४७, ७२}} {{outdent|गांधी, वेणीलाल, १८१}} {{outdent|गांधी, सन्तोक, २७७}} {{outdent|गांधी, सुशीला, १०१, १२८, २२३, २२७, २५८, ३०९, ३१५, ३५५, ३६२, ३७६}} {{outdent|गांधी, हरिलाल, ३ पा० टि०}} {{outdent|गांधीजी/वरमा, १०९, २०३, २१५, २१६, २२०, २३३, २३६, २४७, २७५, २९३, २९६, ३२४, ३३६, ३६४}} {{outdent|गिल्वसती, ए० टी०, १९३ पा० टि०}} {{outdent|गिल्वसती, नंसाबहन, १५२}} {{outdent|गिरधर, १२}} {{outdent|गिरि, दलबहादुर, १९}} {{outdent|गिरि, दुर्गा, १९}} {{outdent|गिरि, धर्मकुमार, १६१, ३२८, ३५५}} {{outdent|गिरि, महाबीर, ६१, ९७, २०९, ३१०}} {{outdent|गिरि, मैत्री, ११, ७३, १०७, २४८}} {{outdent|गिरि, लाभावेणी, ७५, ९९, १६१, ३०७}} {{outdent|गिरिराज, १२, ३०, ६८, १०२, १८६, १८७, २०२, २११, २४८, २५९, २७९, २९५}} {{outdent|गीताबोध, २७४ पा० टि०, ३३४}} {{outdent|गुजरात विद्यापीठ, १२५; —द्वारा अनुवादिता किताब, ११३}} {{outdent|गुजराती गीता, देखिए अनासक्तियोग}} {{outdent|गुरुदेव, देखिए ठाकुर, रवीन्द्रनाथ}} {{outdent|गुलाबचन्द मणिलाल, ६२}} {{outdent|गॉवढिन, बी० जे० बी०, ३१८}} {{outdent|गौ-सेवा, ३३०<noinclude>}}{{Multicol-break}}{{outdent|</noinclude>गोपीमोहन, १३३, १५३, १८०, ३१६}} {{outdent|गोखले, गोपालकृष्ण, २०८, २५६}} {{outdent|गोखले, १२}} {{outdent|गोवंदेल, अरविन्द, २५७}} {{outdent|गोसावकार, ११, ३०१}} {{outdent|गोमती, २७८}} {{outdent|गोविन्दजी, २७३}} {{outdent|गोविल, प्यारेलाल, ११८}} {{outdent|ग्रन्थ, १०४, २२२, २४४; —और सत्य, ४१}} {{outdent|ग्रे, वाकर, ७२}} {{outdent|ग्रेस-दम्पति, २९५}} {{c|घ}} {{outdent|घोष, अरविन्द, १८०}} {{c|च}} {{outdent|चतुर्वेदी, बनारसीदास, २३६}} {{outdent|चन्दन, ७८, २०७, ३३६}} {{outdent|चन्द्र, ३१२}} {{outdent|चन्द्रकान्ता, २५६, ३३३}} {{outdent|चन्द्रशंकर, २०१}} {{outdent|चम्मा, ३१३}} {{outdent|चरखा, ९, २६, ३२, ९७, ३५, ४६, ५१, ५७, ६४, ६८, ७६, ८९, १००, ११६, १२७, १३६, १४५, १५६, १७८, १९३, १९८, २०६, २३६, २४५, २५१, २८५, २९७-९, ३१०, ३३३, ३३६, ३५५, ३६९}} {{outdent|चरखेवाला, कन्हैया, २-५, ६६, १०९, २५५, २७०}} {{outdent|चार, ३६, ९१, ७५, १८१, ३३३, ३६७}} {{outdent|चितलिया, करसनदास, १२, २४८, २५६, २७३<noinclude>}}{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> hgh5767e8phxze148dq9mheput5wqnc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३१ 250 198130 671799 670868 2026-08-19T15:16:13Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 671799 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||सांकेतिका|४९३}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|चिमनालाल, देखिए शाह, चिमनालाल}} {{outdent|चोकसी, नानुकलाल, ११२}} {{outdent|चोकसी, मोतीबहन, ४, ११, ९६, १११, १३२, १३७, १६८, २०९}} {{c|छ}} {{outdent|छोटूभाई, २}} {{outdent|छोटेलाल, १२, १७०, १८२}} {{c|ज}} {{outdent|जगन्नाथ, १२}} {{outdent|जनक, राजा, २३३}} {{outdent|जनक, ३५}} {{outdent|जमना, २७०}} {{outdent|जयकर, मु० रा०, ३८ पा० टि०, ४३ पा० टि०, ४४, ४५, ४६, ६०, ८२, ८४ पा० टि०, ११७}} {{outdent|जयप्रकाश नारायण, २५, २८, ८९, १०१, १०७, ११२, १४५, १७६, २०८, २३१, २५३, २५४, २७३, २८५, ३१३, ३२५, ३८०}} {{outdent|जयरामदास दौलतराम, ८४, १२१, १२८, ३३४, ३३५}} {{outdent|जरथुश्त धर्म, १८९}} {{outdent|जानकीबाई, ११}} {{outdent|जानकीमैया, ३०५}} {{outdent|जालभाई, १४८}} {{outdent|जीवन चरखा, २७४}} {{outdent|जीवनदास, १३२}} {{outdent|जीवनलाल, २९०}} {{outdent|जीवनशोधन, ३५, २५६}} {{outdent|जीवरामभाई, देखिए कोठारी, जीवरामभाई}} {{outdent|जुगतराम, ३७६}} {{multicol-break}} {{outdent|जुलू विद्रोह, ३६२}} {{outdent|जूठाभाई, १३}} {{outdent|जेठालाल, १३२, १८७, ३६६}} {{outdent|जेराजानी, विट्ठलदास, ५१, २१०, २५९}} {{outdent|जैनू, १६६, २०२}} {{outdent|जोलियर, श्रीमती, ४०, १०२, ११४, १४८, १८०, १८५}} {{outdent|जोशी, ईश्वरलाल, १४}} {{outdent|जोशी, छगनलाल, ११, ७९, १४३, १४७, १४८, १६६, १९५, २०२, २१८, २२५, २३४, २५६, ३३५}} {{outdent|जोशी, तहमीना पी०, २३७, ३०२}} {{outdent|जोशी, रमाबहन, ११, ३२, ९३, १३७, २१०, २३४, ३३५, ३५२}} {{outdent|ज्योत्स्ना, ३५२}} {{c|झ}} {{outdent|झवेरी, गंगाबहन, २, १२, ४८, १११, १७४, २४९, ३०६, ३६६}} {{outdent|झवेरी, नानीबहन, २, १२, १११, १७४, २४९, ३६६}} 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२५६}} {{outdent|नवीन, १२४, २०२, २४६, ३६६}} {{outdent|नाथ, ५४, १९४, २२५}} {{outdent|नाथजी, १२, ५४, २०३, २१४, ३२५}} {{outdent|नामदेव, १०५ पा० टि०}} {{outdent|नानाभाई, देखिए मशरूवाला, नानाभाई इच्छाराम}} {{outdent|नानावटी, अमृतलाल, १३}} {{outdent|नानीबहन, देखिए झवेरी, नानीबहन}} {{outdent|नानीबहन बुधाभाई, १२, १६६, ३४८}} {{outdent|नायडू, पद्मजा, १३}} {{outdent|नायडू, सरोजिनी, ८४, १२१, २१४, ३७५}} {{outdent|नायर, कृष्ण, १८, २५, ६२, ६६, १०९}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> lmefuu7v8nikszajdc1ome09wenmrvw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३४ 250 198133 671830 670871 2026-08-19T16:10:20Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 671830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh|४९६|संपूर्ण गांधी वाङ्मय }}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|निर्भयता, ९०, ११५}} {{outdent|निर्मला, १८, २३४; देखिए पण्ड्या, निर्मला भी}} {{outdent|निर्मला केवलराम, १२}} {{outdent|निर्मलाबाई, ११}} {{outdent|नूरबानू, ११}} {{outdent|नेवटिया, कमला, १५२}} 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6351 /* शोधित */ 671842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||सांकेतिका|४९७}}</noinclude>{{Multicol}} {{outdent|पूंजाभाई, जूनियर, १३}} {{outdent|पेटिट, मीठूबहन, ११, १४३}} {{outdent|पोद्दार, रामेश्वरदास, ३६, १५३, १९७}} {{outdent|पोलक, एच० एस० एल०, २५}} {{outdent|पोलक, मिली, २६}} {{outdent|पोलक, लिऑन, २६}} {{outdent|पोलक, मेलिक, २६}} {{outdent|प्यार अली, ११}} {{outdent|प्यारेलाल, देखिए नय्यर, प्यारेलाल}} {{outdent|प्रभावती, १४, २५, २८, ५४, ७५, ८८, १०१, १०७, ११२, १५८, १६५, १७६, १९८, २००, २०८, २३१, २३९, २५३, २६३, २६४, २७३, २८६, २९२, ३११, ३१३, ३२५, ३३८, ३६८, ३८०}} {{outdent|प्रभुभाई, ७३, २४३}} {{outdent|प्रह्लाद, ४२}} {{outdent|प्रागजी, देखिए देसाई, प्रागजी}} {{outdent|प्रायश्चित, ३१८ पा० टि०, ३१९, ३६३}} {{outdent|प्रार्थना, ५५, ३२६, ३२८, ३६१; –अपने अन्तरमें स्थित ईश्वरकी, ३२०; –की आवश्यकता, ८५}} {{outdent|पृथुराज, १२}} {{outdent|प्रेम, ३, १२}} {{outdent|प्रेमकुंवर, २७०}} {{outdent|प्रेमरामाजी, ३५५}} {{outdent|प्रेमाबाई, १२}} {{outdent|प्रेस अधिनियम, ४३, ८४}} {{c|'''फ'''}} {{outdent|फडके, मामा, १३}} {{outdent|फाटक, हरिभाई, १३}} {{outdent|फीनिक्स आश्रम, २७८}} {{multicol-break}} {{c|'''ब'''}} {{outdent|बजाज, कमलनयन, १२, १७, ५०, ६२, १२६, १६३}} {{outdent|बजाज, गुलाब, १३}} {{outdent|बजाज, जमनालाल, ५०, ६८, ११४, १६०, २३९, २७३, ३१४, ३४७, ३५०}} {{outdent|बजाज, जानकीदेवी, १२, १७, ५०, १२६, १६०}} {{outdent|बजाज, बनारसीलाल, १४२, २४६, ३१२}} {{outdent|बजाज, राधाकिशन, ६२}} {{outdent|बजाज, रुक्मिणी, ६६, ७२, ७४, ८६, १४३, २४६, २५५, ३१२}} {{outdent|बनर्जी, सर गुरुदास, २०४}} {{outdent|बर्न्स, ३४५}} {{outdent|बलदेव, ३५५}} {{outdent|बलभद्र, १३, १३९, १४८, १८२, २०१, २४४, ३२२}} {{outdent|बलवीरसिंह, १९५}} {{outdent|बली, देखिए वोरा, वलीबहन}} {{outdent|'''बाइबिल''', १५०}} {{outdent|बाबलो, २४७}} {{outdent|बार, लक्ष्मीबहन, ११}} {{outdent|बालकृष्ण, ११, ३९, ५७}} {{outdent|बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर, १०८, १५२, ३०४, ३३९, ३४०}} {{outdent|बिड़ला, घनश्यामदास, ५६, २६०, २६४, २७३, ३४७, ३५०}} {{outdent|बिहारी चरखा, २४०, ३२४, ३४६}} {{outdent|बीथोवन, २९८}} 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१११, ११२, ११४, १३५, १३७, १४९, १६६, १६९, १८३, १८६, २०९, २१० पा० टि०, २१२, २२५, २३२ पा० टि०, २४०-२, २५६, २६७, २७४, २७९, २८४, २९५, ३०२, ३०८, ३२१, ३२४, ३२८, ३३४, २४९, ३५०, ३७०; –का पारायण, २१६}} {{outdent|भणसाली, जयकृष्ण, ८, १२, ९२, २९२}} {{outdent|भण्डारकर, २५६}} {{outdent|भाऊ, २३९}} {{outdent|भागवत-पुराण, २९९}} {{outdent|भाटिया, जेठालाल, १२}} {{outdent|भारती, २२८, २७८, ३०९}} {{multicol-break}} {{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ४५, ४५, ८२, ११८-२१; –का संगठन, १२१; –की अखिल भारतीय कमेटी, ८१; –की कार्यसमिति, २२१}} {{outdent|भावे, बालकृष्ण, १६६, १८६, २३९, २९१}} {{outdent|भावे, विनोबा, ११, १५, १६६, १८१, १८६, २९१, ३१६, ३३३, ३४९}} {{c|'''म'''}} {{outdent|मंगलदास, सेठ, ३६८}} {{outdent|मंगला, १३}} {{outdent|मगनभाई, १७, २३९, २५६}} {{outdent|मगनलाल, १८८}} {{outdent|मजीद, मिर्ज़ा अब्दुल, १५७}} {{outdent|मणि, १५३}} {{outdent|मणिबहन, २०५, २१४}} {{outdent|मथुरादास त्रिकमजी, ५१, १३०, २३९, २८१, ३५२}} {{outdent|मथुरादास पुरुषोत्तम, ११, १८, ३२, ३३, ९५, ९६, १३३, १५४, १६६, २०१, २४५, ३३०, ३५९}} {{outdent|मदालसा, १७, ६२}} {{outdent|मनु, २०२}} {{outdent|मन्नालाल, १२}} {{outdent|मनुड़ी, देखिए गांधी, मनु}} {{outdent|मशरूवाला, किशोरलाल, २५, ६८, २५६, २७२}} {{outdent|मशरूवाला, गोमतीबाई, ११}} {{outdent|मशरूवाला, तारा, १०१, २२८, २८२, २८१, ३७६; देखिए तारा भी}} {{outdent|मशरूवाला, नानाभाई इच्छाराम, १०१, २२८, २८२, ३७६}} {{multicol-end}}<noinclude></noinclude> hii8qb6lktwiy8ldy6i3hyc7ky8oxgq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३७ 250 198136 672012 670874 2026-08-20T08:58:30Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 672012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|सांकेतिका}}{{right|४९९}}{{Multicol}}{{outdent|मशरूवाला, सुरेन्द्र, २९३, ३७६}}{{outdent|महमूद, डा० सैयद, ८२ पा० टि०, ८४, ११७, ११९}}{{outdent|महालक्ष्मी, १३}}{{outdent|महावीर प्रसाद, १६, १९५, २१२, २६०, ३५१}}{{outdent|मांड, २६}}{{outdent|माधवदास, १४४}}{{outdent|माधवलाल, ११४}}{{outdent|मार्टिन, आर० वी०, १०, १५५, १८४, १९०, १९५, २२४, २३८ पा० टि०}}{{outdent|मालवीय, मदनमोहन, २२१, २९९, ३५०}}{{outdent|'''मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम''', १०८}}{{outdent|मीराबहन ७, २०, २३ पा० टि०, २७, ३३, ४०, ५२, ६४, ६७, ७६, ८९, १००, १०९, १२२, १२६, १३४, १४५, १७८, १८७, १८८, १९७, २०३, २१५, २२०, २२१, २३३, २३६, २४७, २५६, २७५, २७६, २९४, २९५, ३०१, ३१५, ३२४, ३४३, ३४४, ३४९, ३५०, ३६४, ३६७, ३७०; –निषेधाज्ञाके बावजूद कलकत्तामें महिलाओंके जलूसमें शामिल हुईं, १६२}}{{outdent|मीराबाई, ३७१}}{{outdent|'''मुंबई समाचार,''' २९२}}{{outdent|मुंशी, लीलावती, ९७}}{{outdent|मुखर्जी, सतीश, १०२}}{{outdent|मुत्तु, डा०, २९१}}{{outdent|मुन्नालाल, ३९}}{{outdent|मुसलमान, १८८, ३२३}}{{outdent|मूर्तियूजा, ५०, २३१}}{{multicol-break}}{{outdent|मृत्युंजय, ५४, १०७, १५८}}{{outdent|मृत्यु, १६४, २०८, २२६, २६७, ३२०}}{{outdent|मेघजी, २९, १६८}}{{outdent|मेन्टल रेडियो, २६१}}{{outdent|मेहता, कपिलराय, १३, ९५, २०७}}{{outdent|मेहता, कुँवरजी, २५०, २८६, ३७६}}{{outdent|मेहता, चम्पाबहन, १२}}{{outdent|मेहता, छोटाभाई कल्याणजी, ३७६}}{{outdent|मेहता, डा० जीवराज, १६२, १८५, १८७}}{{outdent|मेहता, नरसिंह, १९३}}{{outdent|मेहता, वल्लभभाई, १२, २१७, ३६३}}{{outdent|मेहता, भगवानजी अनूपचन्द, २५३}}{{outdent|मेहता, रतिलाल, ८, १२}}{{outdent|मेहता, राजचन्द्र रावजीभाई, ३५, ७७, १४८}}{{outdent|मेहता, शारदाबहन, १२}}{{outdent|मेहरोत्रा, परशुराम, ६४, १९६}}{{outdent|मैथ्यू, १२}}{{outdent|मैथ्यू, पी० वी०, १३१, १६१, २९२, ३३२}}{{outdent|'''मैमनॴर्ट''', २६१}}{{outdent|मोक्ष, १७३}}{{outdent|मोतीबहन रामजी, १२}}{{outdent|मोतीबाई मधूरादास, ११, १३३, १९६}}{{outdent|मोतीबाई रणछोडलाल, ११}}{{outdent|मोतीलाल (बड़वाणका दर्जी), २५८}}{{outdent|मोदी, रमणीकलाल, ६८, १७२}}{{outdent|मोरारजी, शान्तिकुमार, १३२}}{{outdent|मोहन, १७२}}{{c|'''य'''}}{{outdent|'''यज्ञ,''', २४०-१, २५७, २६०; –आत्मशुद्धिके लिए, १००; –और कताई, २९९, ३१५, ३३१, ३४८; –का अर्थ, २७३}}{{outdent|यशोदा, २२}}{{multicol-end}}<noinclude></noinclude> fgom2waywykf7fy5ymx8cbdevwiuu7x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३८ 250 198137 672023 670875 2026-08-20T09:16:03Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 672023 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|५००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}{{Multicol}}{{outdent|याज्ञिक, इन्दुलाल, ६३}}{{outdent|युक्ति, १७०}}{{outdent|योग, १९२, ३००, ३५०; –और अनासक्ति, ३४९}}{{c|'''र'''}}{{outdent|रणछोडभाई, ५८}}{{outdent|रतिलाल, १५६}}{{outdent|रतिलाल, सेठ, २२७}}{{outdent|रतुभाई, ३३३}}{{outdent|रमाबहन, ६, २६६; देखिए जोशी, रमाबहन भी}}{{outdent|रमाबहन रणछोडलाल, ११, ५८}}{{outdent|रमीबाई, देखिए कामदार, रमीबाई}}{{outdent|रस्किन, १७९}}{{outdent|रहीम, भगवान, ३३९}}{{outdent|राजगोपालाचारी, च०, १८५, २३९}}{{outdent|राजस्व अधिनियम, ४३, ८४,}}{{outdent|राजेन्द्र प्रसाद, ५४}}{{outdent|राधाकृष्णन्, डा० सर्वपल्ली, २५२}}{{outdent|राम, भगवान, ९, ४२, १८८, २६२, ३२७}}{{outdent|रामचन्द्रन, १३}}{{outdent|रामजीभाई, १९६}}{{outdent|रामदास, स्वामी, ७९, १७१, ३२९}}{{outdent|रामदेवजी, ३५५}}{{outdent|रामनाम, ४, ३६, १५३, १९७, २७१, २७९, २९९, ३६१}}{{outdent|रामभाऊ, देखिए खरे, रामभाऊ}}{{outdent|रामराज्य, १३८}}{{outdent|रामायण, १६९, २०८, २५६, २६७, ३७८}}{{outdent|राय, डा० प्रफुल्लचन्द्र, ३८}}{{outdent|रायचन्द भाई, देखिए मेहता, राजचन्द्र रावजीभाई}}{{multicol-break}}{{outdent|रायपेन, जोसेफ, १८९}}{{outdent|रावण, २६२, ३०५}}{{outdent|राष्ट्रीय मांग, ८३}}{{outdent|रूपी (रुक्मिणी), देखिए बजाज, रुक्मिणी}}{{outdent|रुस्तमजी, सेठ, १८८}}{{outdent|ऋग्वेद, ९२}}{{outdent|रेनॉल्ड्स, रेजिनाल्ड, ११०}}{{outdent|रोमां रोलां, २९८}}{{c|'''ल'''}}{{outdent|लक्ष्मी, १३२, १३४}}{{outdent|लक्ष्मी दादाभाई, १२}}{{outdent|लक्ष्मीदास, १४, २५०, ३३१}}{{outdent|लक्ष्मी राजगोपालाचारी, १३}}{{outdent|ललिता, १२, २८४}}{{outdent|लालजी, १२}}{{outdent|लालवानी, कीकीबहन, १२}}{{outdent|लिमये, प्रो०, १३८, २४९}}{{outdent|लीलाबहन, ८, १२}}{{outdent|लीलावती, देखिए आसर, लीलावती}}{{outdent|लुंडी, कमलाबहन, १३८, १४८, १९८, ३६६}}{{outdent|लुकमानी, श्रीमती, ५५, ८७}}{{c|'''व'''}}{{outdent|वर्णश्रम, –और विवाह, ३२३}}{{outdent|वसिष्ठ, २०४}}{{outdent|वसंत, ७८, २०७}}{{outdent|वाइसराय, देखिए इर्विन, लॉर्ड}}{{outdent|विक्रम, ३३०}}{{outdent|विट्ठल, १२, १७८, २०९, २४५, ३३०, ३५९}}{{outdent|विठ्ठलदास, लेडी, १२, ३१७}}{{multicol-end}}<noinclude></noinclude> 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