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विकिस्रोत:चौपाल
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2026-08-21T02:29:27Z
अनिरुद्ध कुमार
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/* Migration to Parsoid */
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wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
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== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
:समर्थन
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
:विरोध
:तटस्थ
:परिणाम
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672371
2026-08-21T03:39:48Z
अजीत कुमार तिवारी
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/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */ समर्थन+टिप्पणी.
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{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
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== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[w:en:Wikipedia:Non-free content|Wikipedia:Non-free content]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं Exemption Doctrine Policy भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[w:en:Wikipedia:Non-free content criteria|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
8uki8o3j5lntdjhpnowp2cfqse2zfi8
672378
672377
2026-08-21T03:48:09Z
अजीत कुमार तिवारी
12
/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */ कड़ी सुधार.
672378
wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
----
== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[w:en:Wikipedia:Non-free content|Wikipedia:Non-free content]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
9ji674kecos8rznjvjv8m1gsik5854t
672380
672378
2026-08-21T03:58:23Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */ समर्थन।
672380
wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
----
== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[w:en:Wikipedia:Non-free content|Wikipedia:Non-free content]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# {{समर्थन}} विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड की सुविधा होनी चाहिए। कई ऐसी पुस्तकें हैं जिनके djvu फ़ाइल का आकार ज्यादा होने के कारण कॉमन्स पर अपलोड करने में असुविधा होती है। इसके साथ ही कई ऐसी फ़ाइलें हैं जो कॉमन्स पर गलत नाम से मौजूद हैं। ऐसी फ़ाइलों का नाम बदलवाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार नाम बदल भी नहीं पाता है। स्थानीय अपलोड की सुविधा होने से चित्र वाले पृष्ठों का शोधन कार्य भी आसान होगा। —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०३:५८, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
lau6ythebpgd86mj8uryhbnhk4gr1gj
672424
672380
2026-08-21T06:35:26Z
अजीत कुमार तिवारी
12
/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */ कड़ी सुधार. विकिपीडिया की जगह विकिस्रोत की कड़ी.
672424
wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
----
== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[s:en:Wikisource:Copyright policy | Wikisource:Copyright policy]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# {{समर्थन}} विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड की सुविधा होनी चाहिए। कई ऐसी पुस्तकें हैं जिनके djvu फ़ाइल का आकार ज्यादा होने के कारण कॉमन्स पर अपलोड करने में असुविधा होती है। इसके साथ ही कई ऐसी फ़ाइलें हैं जो कॉमन्स पर गलत नाम से मौजूद हैं। ऐसी फ़ाइलों का नाम बदलवाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार नाम बदल भी नहीं पाता है। स्थानीय अपलोड की सुविधा होने से चित्र वाले पृष्ठों का शोधन कार्य भी आसान होगा। —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०३:५८, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
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विकिस्रोत:समाज
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अनिरुद्ध कुमार
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/* आयोजन */
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text/x-wiki
<center><big>आपका स्वागत है।!</big></center>
समाज सदस्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए निर्मित पृष्ठ है। यहाँ आप --
अपनी रुचि अनुसार कार्य चुन सकते हैं * अन्य सदस्यों से अपने कार्य में सहायता माँग सकते हैं * दूसरे सदस्यों की सहायता करने के लिये कार्य चुन सकते हैं। * जान सकते हैं कि विकिस्रोत पर इस समय क्या चल रहा है।
:'''''नये सदस्य:''' [[ विकिस्रोत:स्वागत|स्वागत है!]] अपनी यात्रा [[विकिस्रोत:स्वशिक्षा|यहाँ से शुरू करें]] और यहाँ [[विकिस्रोत:योगदान|योगदान]] करना सीखें।'' {{*}} '''''खाता नहीं है?''' तो तुरंत [[विशेष:UserLogin|एक खाता बनाएँ।]]।'' आप '''[[सहायता:अनुक्रम|सहायता]]''' संबंधी पृष्ठों को भी देख सकते हैं। '''[[विकिस्रोत:नीतियाँ और दिशानिर्देश|नीति]]''' पृष्ठ पर आप विकिस्रोत से संबंधित नीति-नियम देख सकते हैं। आप कुछ उपयोगी औजारों को '''[[विकिस्रोत:समाज/उपयोगी औज़ार|उपयोगी औज़ार]]''' पृष्ठ पर भी देख सकते हैं।
== शोधित करें ==
इन पुस्तकों की वर्तनी सुधारकर शोधित करने में मदद करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=अशोधित पुस्तकें}}
== प्रमाणित करें ==
:इन शोधित किए जा चुके पुस्तकों को प्रमाणित करने में सहयोग करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=शोधित पुस्तकें}}
== परापूर्ण करें ==
:ये पुस्तकें शोधित या प्रमाणित हो चुकी हैं। इन्हें परापूर्ण करने में सहयोग करें। इस सूची में शामिल करने के लिए पुस्तक के अनुक्रम पृष्ठ पर [[:श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]] श्रेणी लगा दें। पुस्तक परापूर्ण होने के बाद इस श्रेणी को बदलकर [[:श्रेणी:परापूर्ण अनुक्रम]] लगा दें।
{{Special:IndexPages|key=अपरापूर्ण अनुक्रम}}
== रख-रखाव ==
:ये रख-रखाव से संबंधित पृष्ठ हैं। आप इनसे जुड़े पृष्ठों पर निर्दिष्ट कार्य कर रख-रखाव में सहयोग कर सकते हैं।
* [[:श्रेणी:सन्दर्भ त्रुटि के साथ पृष्ठ|संदर्भ त्रुटियाँ ठीक करें]]
* [[:श्रेणी:अपूर्ण परापूर्ण|निर्माणाधीन पुस्तकों के पृष्ठ सुधारें]]
* [[:श्रेणी:अनुवाद करने योग्य पृष्ठ|विकिस्रोत पृष्ठों के अनुवाद करें]]
* [[:श्रेणी:हटाने योग्य श्रेणी|हटाने योग्य श्रेणी के पृष्ठों से श्रेणी हटाएं]]
== प्रबंधकीय कार्य ==
* [[विकिस्रोत:प्रबंधक सूचना|प्रबंधक सूचना देखें]]
* [[:श्रेणी:शीघ्र हटाने हेतु अनुरोध|शीघ्र हटाने के लिए नामांकित पृष्ठ देखें]]
== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023]]
* [[विकिस्रोत:मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव २०२३]]
* [[विकिस्रोत:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव/अगस्त २०२१]]
== नीति-नियम ==
:विकि समुदाय के पालन करने योग्य नीति-नियमों के पृष्ठ:
* [[विकिस्रोत:संपादन नीति]]
* [[विकिस्रोत:निर्वाचित पाठ]]
* [[विकिस्रोत:मुद्राधिकार स्थिति]]
* [[विकिस्रोत:सहकार्य]]
* [[विकिस्रोत:हटाने की नीति]]
[[श्रेणी:विकिस्रोत]]
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अनुभाग बदला
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<center><big>आपका स्वागत है।!</big></center>
समाज सदस्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए निर्मित पृष्ठ है। यहाँ आप --
अपनी रुचि अनुसार कार्य चुन सकते हैं * अन्य सदस्यों से अपने कार्य में सहायता माँग सकते हैं * दूसरे सदस्यों की सहायता करने के लिये कार्य चुन सकते हैं। * जान सकते हैं कि विकिस्रोत पर इस समय क्या चल रहा है।
:'''''नये सदस्य:''' [[ विकिस्रोत:स्वागत|स्वागत है!]] अपनी यात्रा [[विकिस्रोत:स्वशिक्षा|यहाँ से शुरू करें]] और यहाँ [[विकिस्रोत:योगदान|योगदान]] करना सीखें।'' {{*}} '''''खाता नहीं है?''' तो तुरंत [[विशेष:UserLogin|एक खाता बनाएँ।]]।'' आप '''[[सहायता:अनुक्रम|सहायता]]''' संबंधी पृष्ठों को भी देख सकते हैं। '''[[विकिस्रोत:नीतियाँ और दिशानिर्देश|नीति]]''' पृष्ठ पर आप विकिस्रोत से संबंधित नीति-नियम देख सकते हैं। आप कुछ उपयोगी औजारों को '''[[विकिस्रोत:समाज/उपयोगी औज़ार|उपयोगी औज़ार]]''' पृष्ठ पर भी देख सकते हैं।
== शोधित करें ==
इन पुस्तकों की वर्तनी सुधारकर शोधित करने में मदद करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=अशोधित पुस्तकें}}
== प्रमाणित करें ==
:इन शोधित किए जा चुके पुस्तकों को प्रमाणित करने में सहयोग करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=शोधित पुस्तकें}}
== परापूर्ण करें ==
:ये पुस्तकें शोधित या प्रमाणित हो चुकी हैं। इन्हें परापूर्ण करने में सहयोग करें। इस सूची में शामिल करने के लिए पुस्तक के अनुक्रम पृष्ठ पर [[:श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]] श्रेणी लगा दें। पुस्तक परापूर्ण होने के बाद इस श्रेणी को बदलकर [[:श्रेणी:परापूर्ण अनुक्रम]] लगा दें।
{{Special:IndexPages|key=अपरापूर्ण अनुक्रम}}
== प्रबंधकीय कार्य ==
* [[विकिस्रोत:प्रबंधक सूचना|प्रबंधक सूचना देखें]]
* [[:श्रेणी:शीघ्र हटाने हेतु अनुरोध|शीघ्र हटाने के लिए नामांकित पृष्ठ देखें]]
== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023]]
* [[विकिस्रोत:मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव २०२३]]
* [[विकिस्रोत:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव/अगस्त २०२१]]
== नीति-नियम ==
:विकि समुदाय के पालन करने योग्य नीति-नियमों के पृष्ठ:
* [[विकिस्रोत:संपादन नीति]]
* [[विकिस्रोत:निर्वाचित पाठ]]
* [[विकिस्रोत:मुद्राधिकार स्थिति]]
* [[विकिस्रोत:सहकार्य]]
* [[विकिस्रोत:हटाने की नीति]]
[[श्रेणी:विकिस्रोत]]
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/* नीति-नियम */
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text/x-wiki
<center><big>आपका स्वागत है।!</big></center>
समाज सदस्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए निर्मित पृष्ठ है। यहाँ आप --
अपनी रुचि अनुसार कार्य चुन सकते हैं * अन्य सदस्यों से अपने कार्य में सहायता माँग सकते हैं * दूसरे सदस्यों की सहायता करने के लिये कार्य चुन सकते हैं। * जान सकते हैं कि विकिस्रोत पर इस समय क्या चल रहा है।
:'''''नये सदस्य:''' [[ विकिस्रोत:स्वागत|स्वागत है!]] अपनी यात्रा [[विकिस्रोत:स्वशिक्षा|यहाँ से शुरू करें]] और यहाँ [[विकिस्रोत:योगदान|योगदान]] करना सीखें।'' {{*}} '''''खाता नहीं है?''' तो तुरंत [[विशेष:UserLogin|एक खाता बनाएँ।]]।'' आप '''[[सहायता:अनुक्रम|सहायता]]''' संबंधी पृष्ठों को भी देख सकते हैं। '''[[विकिस्रोत:नीतियाँ और दिशानिर्देश|नीति]]''' पृष्ठ पर आप विकिस्रोत से संबंधित नीति-नियम देख सकते हैं। आप कुछ उपयोगी औजारों को '''[[विकिस्रोत:समाज/उपयोगी औज़ार|उपयोगी औज़ार]]''' पृष्ठ पर भी देख सकते हैं।
== शोधित करें ==
इन पुस्तकों की वर्तनी सुधारकर शोधित करने में मदद करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=अशोधित पुस्तकें}}
== प्रमाणित करें ==
:इन शोधित किए जा चुके पुस्तकों को प्रमाणित करने में सहयोग करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
{{Special:IndexPages|key=शोधित पुस्तकें}}
== परापूर्ण करें ==
:ये पुस्तकें शोधित या प्रमाणित हो चुकी हैं। इन्हें परापूर्ण करने में सहयोग करें। इस सूची में शामिल करने के लिए पुस्तक के अनुक्रम पृष्ठ पर [[:श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]] श्रेणी लगा दें। पुस्तक परापूर्ण होने के बाद इस श्रेणी को बदलकर [[:श्रेणी:परापूर्ण अनुक्रम]] लगा दें।
{{Special:IndexPages|key=अपरापूर्ण अनुक्रम}}
== प्रबंधकीय कार्य ==
* [[विकिस्रोत:प्रबंधक सूचना|प्रबंधक सूचना देखें]]
* [[:श्रेणी:शीघ्र हटाने हेतु अनुरोध|शीघ्र हटाने के लिए नामांकित पृष्ठ देखें]]
== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023]]
* [[विकिस्रोत:मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव २०२३]]
* [[विकिस्रोत:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव/अगस्त २०२१]]
== नीति-नियम ==
:विकि समुदाय के पालन करने योग्य नीति-नियमों के पृष्ठ:
* [[विकिस्रोत:संपादन नीति]]
* [[विकिस्रोत:निर्वाचित पाठ]]
* [[विकिस्रोत:मुद्राधिकार स्थिति]]
* [[विकिस्रोत:सहकार्य]]
* [[विकिस्रोत:हटाने की नीति]]
== रख-रखाव ==
:ये रख-रखाव से संबंधित पृष्ठ हैं। आप इनसे जुड़े पृष्ठों पर निर्दिष्ट कार्य कर रख-रखाव में सहयोग कर सकते हैं।
* [[:श्रेणी:सन्दर्भ त्रुटि के साथ पृष्ठ|संदर्भ त्रुटियाँ ठीक करें]]
* [[:श्रेणी:अपूर्ण परापूर्ण|निर्माणाधीन पुस्तकों के पृष्ठ सुधारें]]
* [[:श्रेणी:अनुवाद करने योग्य पृष्ठ|विकिस्रोत पृष्ठों के अनुवाद करें]]
* [[:श्रेणी:हटाने योग्य श्रेणी|हटाने योग्य श्रेणी के पृष्ठों से श्रेणी हटाएं]]
[[श्रेणी:विकिस्रोत]]
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अनिरुद्ध कुमार
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/* प्रबंधकीय कार्य */
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wikitext
text/x-wiki
<center><big>आपका स्वागत है।!</big></center>
समाज सदस्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए निर्मित पृष्ठ है। यहाँ आप --
अपनी रुचि अनुसार कार्य चुन सकते हैं * अन्य सदस्यों से अपने कार्य में सहायता माँग सकते हैं * दूसरे सदस्यों की सहायता करने के लिये कार्य चुन सकते हैं। * जान सकते हैं कि विकिस्रोत पर इस समय क्या चल रहा है।
:'''''नये सदस्य:''' [[ विकिस्रोत:स्वागत|स्वागत है!]] अपनी यात्रा [[विकिस्रोत:स्वशिक्षा|यहाँ से शुरू करें]] और यहाँ [[विकिस्रोत:योगदान|योगदान]] करना सीखें।'' {{*}} '''''खाता नहीं है?''' तो तुरंत [[विशेष:UserLogin|एक खाता बनाएँ।]]।'' आप '''[[सहायता:अनुक्रम|सहायता]]''' संबंधी पृष्ठों को भी देख सकते हैं। '''[[विकिस्रोत:नीतियाँ और दिशानिर्देश|नीति]]''' पृष्ठ पर आप विकिस्रोत से संबंधित नीति-नियम देख सकते हैं। आप कुछ उपयोगी औजारों को '''[[विकिस्रोत:समाज/उपयोगी औज़ार|उपयोगी औज़ार]]''' पृष्ठ पर भी देख सकते हैं।
== शोधित करें ==
इन पुस्तकों की वर्तनी सुधारकर शोधित करने में मदद करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
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== प्रमाणित करें ==
:इन शोधित किए जा चुके पुस्तकों को प्रमाणित करने में सहयोग करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है।
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== परापूर्ण करें ==
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== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023]]
* [[विकिस्रोत:मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव २०२३]]
* [[विकिस्रोत:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव/अगस्त २०२१]]
== नीति-नियम ==
:विकि समुदाय के पालन करने योग्य नीति-नियमों के पृष्ठ:
* [[विकिस्रोत:संपादन नीति]]
* [[विकिस्रोत:निर्वाचित पाठ]]
* [[विकिस्रोत:मुद्राधिकार स्थिति]]
* [[विकिस्रोत:सहकार्य]]
* [[विकिस्रोत:हटाने की नीति]]
== रख-रखाव ==
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* [[:श्रेणी:सन्दर्भ त्रुटि के साथ पृष्ठ|संदर्भ त्रुटियाँ ठीक करें]]
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[[श्रेणी:विकिस्रोत]]
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अनिरुद्ध कुमार
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/* रख-रखाव */
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text/x-wiki
<center><big>आपका स्वागत है।!</big></center>
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== प्रमाणित करें ==
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== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023]]
* [[विकिस्रोत:मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव २०२३]]
* [[विकिस्रोत:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव/अगस्त २०२१]]
== नीति-नियम ==
:विकि समुदाय के पालन करने योग्य नीति-नियमों के पृष्ठ:
* [[विकिस्रोत:संपादन नीति]]
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== रख-रखाव ==
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* [[:श्रेणी:शीघ्र हटाने हेतु अनुरोध|शीघ्र हटाने के लिए नामांकित पृष्ठ देखें]]
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अनिरुद्ध कुमार
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== शोधित करें ==
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== आयोजन ==
* [[विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
* [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
* [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]]
* [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]]
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== नीति-नियम ==
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[[श्रेणी:विकिस्रोत]]
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८१
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अँजली चौधरी
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||मेरी भूल|५४९}}</noinclude>खादी तैयार कराने के काममें तत्परतापूर्वक लग जायें। वे शिक्षकोंकी माँग मुझसे न करें। शिक्षक मेरे पास ही बहुत कम हैं। परन्तु उन्हें मैं यह बताये देता हूँ कि कपड़ा बनानेके लिए गाँठकी रुईपर कौनसी क्रिया किस तरह करनी चाहिए। आज तो हमें आमतौर पर गाँठकी रुई ही मिलती है। सबसे पहले वह धुनी जानी चाहिए। हिन्दुस्तानका ऐसा कोई हिस्सा नहीं जहाँ धुनिये या पिंजारे न मिलते हों। ये रुई धुन दे सकते हैं और एक-दो दिन ध्यानसे देखने मात्रसे उस रीतिको समझा जा सकता है। छः घंटा रोजके हिसाब से एक हफ्ता अभ्यास करनेपर मामूली तौरपर अच्छा धुनना आ सकता है।
धुनी हुई रुईकी अब पूनियाँ बना लें। पूनी बनाना तो इतना सीधा और आसान काम है कि एकाएक कोई उसपर विश्वास भी नहीं करेगा।
अब रुई सूत कातने योग्य हो गई। सूत कातना किसी भी कातनेवाले से सीखा जा सकता है। वही सूत ‘सूत’ हो सकता है जिसमें गर्द न लगी हो, जो एकसार और अच्छा बटदार हो। यदि सूत एकसार और अच्छा बटदार न होगा तो वह बुना नहीं जा सकेगा।
इसके बाद माड़ी लगाई जाती है। इसका अभ्यास कुछ कठिन है। मुझे कोई वैज्ञानिक नियम नहीं मालूम जिससे यह बताया जा सके कि उसमें कौन-सी वस्तु कितनी होती है। यह काम किसी तजुर्बेकार जुलाहेसे जानना होगा।
सूत साँधनेकी क्रिया भी अलगसे सीखनी चाहिए। जिस तरह साइकिल चलाने में कुछ तरकीब से काम लेना पड़ता है उसी तरह इसमें भी है और वह आसानीसे आ सकता है।
अब रही बुनाई। यह केवल अभ्यासकी बात है। इसका तत्त्व तो एक ही दिनमें समझमें आ जाता है। मैं दावेसे कहता हूँ कि इसकी क्रिया बड़ी आसानीसे सीखी जा सकती है। पाठक इसपर आश्चर्य न करें। सारा आवश्यक और स्वाभाविक कार्य आसान होता है। बस, प्रवीणता प्राप्त करनेके लिए लगातार अभ्यास और कामके पीछे पड़नेकी जरूरत होती है। कामके पीछे पड़नेकी योग्यता ही स्वराज्य है। वही योग है। पाठकोंको एक ही काम लगातार करते रहनेसे उकताना भी नहीं चाहिए। कामकी ऐसी एकरूपता——अर्थात् किसी कामका एक ही तरहसे किया जाना——तो प्रकृतिका नियम है। सूर्यको देखिए, किस तरह वह बार-बार उदित होता है। यदि सूर्य मौजमें आकर कहीं मनोरंजन करने में अटक जाये तो खयाल कीजिए, दुनियापर आफतका कैसा पहाड़ टूट पड़ेगा। परन्तु एक प्रकारकी एकरूपतासे रक्षा होती है, और दूसरे प्रकारकी एकरूपतासे संहार होता है।आवश्यक कार्योंकी एकरूपतासे आह्लाद और जीवन मिलता है। कारीगर अपनी कारीगरीसे कभी नहीं उकताता। जो कातनेवाला सूत कातनेकी कलामें निपुण हो गया है वह निश्चय ही अथक लगातार काम करता रहेगा। सूत कातनेमें तकुवेसे जो संगीत निकलता है उससे अच्छा कातनेवाला तुरन्त ही आनन्द लाभ करने लगता है। और जब भारत सूत कातनेके बलपर स्वराज्य प्राप्त कर लेगा तब उसका यह कार्य एक सुन्दर कार्य होगा और वह सदा आनन्दका स्रोत होगा। परन्तु यह चरखे के<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८२
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अँजली चौधरी
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/* शोधित */
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बिना नहीं हो सकता। अतएव भारत के लिए सबसे श्रेष्ठ राष्ट्रीय शिक्षा यही है कि बुद्धिमत्तापूर्वक चरखा चलाया जाये।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७२. पत्र: देवदास गांधीको'''}}}}
{{right|असम<br>
बृहस्पतिवार [१८ अगस्त, १९२१]<ref>गांधीजी १७ अगस्तको कलकत्तामें तथा १९ को गोहाटीमें थे। सम्भवतः उन्होंने १८ अगस्तको जो कि बृहस्पतिवार था ब्रह्मपुत्र पार की थी।</ref>}}
{{left|चि॰ देवदास,}}
मैं तो चाहता हूँ कि तुम वहीं रहो। तुम्हें वहाँ बहुत सारे अनुभव प्राप्त करने हैं——‘यंग इंडिया’ में तथा ‘नवजीवन’ हिन्दी और गुजराती दोनोंमें। हिन्दी विभागमें तुम खूब काम कर सकते हो।और फिर बाको जो शान्ति दे सकते हो सो अलग। यदि तुम दिलचस्पी लो तो वहाँ कातना और पींजना भी है। छोटी-मोटी तकरारें हो जानेपर तुम वैद्यका काम कर सकते हो। इसलिए मेरा खयाल है कि इस महीने तो तुम्हारा वहीं रहना ठीक होगा। अब ब्रह्मपुत्रको पार करनेका समय आया है। डाक जानेसे पहले इस पत्रको पूरा करना होगा, इसलिए अधिक नहीं लिखता।हरिलालके साथ ठीक-ठीक बातचीत हुई है। उसने मुझे बताया कि उसने भी अगस्तसे खादीकी टोपी पहनना आरम्भ कर दिया है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
मूल गुजराती पत्र (एस॰ एन॰ ७६३१) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
dc479m7rbhzxbcjolztqmfgks7n76v8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८३
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2026-08-20T15:42:21Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672202
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२७३. ‘हिन्दी नवजीवन’'''}}}}
यद्यपि मुझे मालूम है कि ‘नवजीवन’ को हिन्दीमें प्रकाशित करना कठिन काम है तथापि मित्रोंके आग्रहवश होकर और साथियोंके उत्साहसे ‘नवजीवन’ का हिन्दी अनुवाद निकालनेकी धृष्टता मैं करता हूँ। मेरे विचारोंपर मेरा प्रेम है। मेरा विश्वास है कि उनके अनुकरणसे जनताको लाभ है। इसलिए उनको हिन्दीमें प्रकट करनेकी इच्छा मुझे बहुत समयसे थी। परन्तु आजतक परमात्माने उसे सफल नहीं किया था। हिन्दुस्तानीको भारतवर्षकी राष्ट्रीय भाषा बनानेका प्रयत्न मैं हमेशासे करता आया हूँ।हिन्दुस्तानी के सिवा दूसरी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती, इसमें कुछ भी शक नहीं। जिस भाषाको करोड़ों हिन्दू-मुस्लिम बोल सकते हैं, वही अखिल भारतवर्षकी सामान्य भाषा हो सकती है, और उसमें जबतक ‘नवजीवन’ न निकाला गया तबतक मुझे दुःख था।
हिन्दुस्तानी-भाषानुरागी ‘हिन्दी नवजीवन’ में उत्तम प्रकारकी हिन्दीकी आशा न रखें। ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ का अनुवाद ही उसमें देना सम्भवनीय है। मुझे न तो इतना समय है कि हमेशा हिन्दुस्तानीमें लेख आदि लिखकर दे सकूँ और न बहुत हिन्दुस्तानी लिखनेकी शक्ति ही मुझमें है।
‘हिन्दुस्तानी भाषाका प्रचार’ इस साहसका मुख्य हेतु नहीं है। ‘शान्तिमय असहयोगका प्रचार’ ही इसका उद्देश्य समझना चाहिए। हिन्दुस्तानी भाषा जाननेवाले जबतक असहयोग और शान्तिके सिद्धान्त भलीभाँति न समझ लेंगे, तबतक शान्तिमय
असहयोगकी सफलता असम्भव-सी है। इसलिए ‘हिन्दी नवजीवन’ की आवश्यकता थी। परमात्मासे प्रार्थना है कि जो लोग केवल हिन्दुस्तानी ही समझते हैं, उन्हें ‘हिन्दी नवजीवन’ मददगार हो।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १९-८-१९२१
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७४. मारवाड़ी भाइयों और बहनोंसे'''}}}}
{{left|प्रिय भाई-बहनो,}}
आपके प्रेमवश होकर मैंने ‘हिन्दी नवजीवन’ निकालनेका साहस किया है। जबसे मैं भारतवर्ष में आया हूँ, तबसे मेरा आपका सम्बन्ध निकट आता जा रहा है। आपने मेरी प्रवृत्तिको प्रेमभावसे देखा है और मुझे सहायता दी है। आपने हिन्दी-प्रचारमें खूब मदद की है। आपकी ही सहायतासे आज द्राविड़ प्रान्तोंमें हिन्दीका प्रचार अच्छी तरह हो रहा है। आप भाई और बहनें असहयोगी हैं। आप राष्ट्रीय जीवनमें रस लेते हैं। आपने देख लिया है कि धनी पुरुष और स्त्रियां राष्ट्रीय जीवनसे पराङ्मुख नहीं रह सकते।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८५
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2026-08-20T15:58:32Z
अँजली चौधरी
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/* शोधित */
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''परिशिष्ट'''}}}}
{{dhr}}
{{c|'''परिशिष्ट १'''}}
{{c|'''‘यंग इंडिया’ के सम्पादकको पत्र'''}}
{{right|बरेली<br>
१५ अप्रैल, [१९२१]}}
{{left|सम्पादक<br>
‘यंग इंडिया’<br>
महोदय,}}
आपको ज्ञात है कि मौलाना मुहम्मद अलीने मद्रास अहाते में होनेवाली एक सार्व-जनिक सभा में खुले आम कहा है कि अगर अफगानिस्तान के अमीरने उन लोगोंके विरुद्ध संग्राम करने के लिए, जिन्होंने इस्लामको पौरुषहीन बना डाला है और जो इस्लाम के पवित्र स्थानोंपर कब्जा किये बैठे हैं, भारतकी ओर कदम बढ़ाया तो मैं उनकी सहायता करूँगा। मेरा खयाल है कि भारत में इस प्रश्नके बारेमें भिन्न-भिन्न मत हैं। नरम दलवाले [नेतागण] इस प्रकारके किसी भी आन्दोलनको कुचल देने पर आमादा हैं। राष्ट्रीय दलवाले नेता भी, उदाहरणार्थ लाला लाजपतराय, श्री चित्तरंजन दास और पण्डित मालवीय चुप्पी साधे हुए हैं। इतना ही नहीं, आपने भी श्री मुहम्मद अलीके उक्त महत्त्वपूर्ण भाषण के सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा है। सम्राट्के दुश्मनके प्रति सहानुभूति दिखाना और खुले रूपमें उसकी सहायता करना बहुत बड़ी गद्दारी है, परन्तु आजकल जब सभा-मंचोंसे स्पष्ट बातें कहने और बेलाग होकर भाषण करनेका
रिवाज-सा पड़ गया है, लोगोंके मनमें नेताओंका फैसला सुननेकी उत्सुकता स्वाभाविक है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। समाचारपत्रों में सार्वजनिक विषयोंपर लेख भेजनेवालों की——सौभाग्य से मैं भी उनमें से एक हूँ——समझमें यह नहीं आ रहा है। कि [मौलाना मुहम्मद अलीके भाषण के बारेमें] क्या राय कायम की जाये।
दूसरी बात जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ वह यह है: क्या आपका खयाल यह है कि ईश्वरसे डरनेवाले लोग या केवल वही व्यक्ति जो ईश्वरमें विश्वास रखते हैं, असहयोगी हो सकते हैं? मेरा एक मित्र बुद्धिवादी——खुदाका शुक्र है कि मैं तो एक पक्का मुसलमान हूँ——और पक्का राष्ट्रवादी [भारतीय] है। मेरा वह मित्र अपनी मातृभूमिको वेदीपर तथा किसी अपेक्षाकृत निर्बल राष्ट्रको न्याय दिलानेकी खातिर अपना सब कुछ कुर्बान करने को तैयार है, परन्तु वह खुदाके नामपर कुछ भी करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उसका खयाल है कि खुदा है ही नहीं। मेरा यह मित्र खद्दर पहनने को तैयार है, और उसने खद्दर पहनना शुरू भी कर दिया है।<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''परिशिष्ट'''}}}}
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{{c|'''परिशिष्ट १'''}}
{{c|'''‘यंग इंडिया’ के सम्पादकको पत्र'''}}
{{right|बरेली<br>
१५ अप्रैल, [१९२१]}}
{{left|सम्पादक<br>‘यंग इंडिया’<br>महोदय,}}
आपको ज्ञात है कि मौलाना मुहम्मद अलीने मद्रास अहाते में होनेवाली एक सार्व-जनिक सभा में खुले आम कहा है कि अगर अफगानिस्तान के अमीरने उन लोगोंके विरुद्ध संग्राम करने के लिए, जिन्होंने इस्लामको पौरुषहीन बना डाला है और जो इस्लाम के पवित्र स्थानोंपर कब्जा किये बैठे हैं, भारतकी ओर कदम बढ़ाया तो मैं उनकी सहायता करूँगा। मेरा खयाल है कि भारत में इस प्रश्नके बारेमें भिन्न-भिन्न मत हैं। नरम दलवाले [नेतागण] इस प्रकारके किसी भी आन्दोलनको कुचल देने पर आमादा हैं। राष्ट्रीय दलवाले नेता भी, उदाहरणार्थ लाला लाजपतराय, श्री चित्तरंजन दास और पण्डित मालवीय चुप्पी साधे हुए हैं। इतना ही नहीं, आपने भी श्री मुहम्मद अलीके उक्त महत्त्वपूर्ण भाषण के सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा है। सम्राट्के दुश्मनके प्रति सहानुभूति दिखाना और खुले रूपमें उसकी सहायता करना बहुत बड़ी गद्दारी है, परन्तु आजकल जब सभा-मंचोंसे स्पष्ट बातें कहने और बेलाग होकर भाषण करनेका
रिवाज-सा पड़ गया है, लोगोंके मनमें नेताओंका फैसला सुननेकी उत्सुकता स्वाभाविक है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। समाचारपत्रों में सार्वजनिक विषयोंपर लेख भेजनेवालों की——सौभाग्य से मैं भी उनमें से एक हूँ——समझमें यह नहीं आ रहा है। कि [मौलाना मुहम्मद अलीके भाषण के बारेमें] क्या राय कायम की जाये।
दूसरी बात जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ वह यह है: क्या आपका खयाल यह है कि ईश्वरसे डरनेवाले लोग या केवल वही व्यक्ति जो ईश्वरमें विश्वास रखते हैं, असहयोगी हो सकते हैं? मेरा एक मित्र बुद्धिवादी——खुदाका शुक्र है कि मैं तो एक पक्का मुसलमान हूँ——और पक्का राष्ट्रवादी [भारतीय] है। मेरा वह मित्र अपनी मातृभूमिको वेदीपर तथा किसी अपेक्षाकृत निर्बल राष्ट्रको न्याय दिलानेकी खातिर अपना सब कुछ कुर्बान करने को तैयार है, परन्तु वह खुदाके नामपर कुछ भी करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उसका खयाल है कि खुदा है ही नहीं। मेरा यह मित्र खद्दर पहनने को तैयार है, और उसने खद्दर पहनना शुरू भी कर दिया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८४
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
आप धर्मप्रेमी हैं। धर्मके लिए आप लाखों रुपये देते हैं। आपमें साहस भी है। द्रव्योपार्जन आपका प्रधान क्षेत्र है। [तथापि] धनिकवर्गके अलग रहते हुए इस धर्म-युद्धमें, जो आज भारतवर्ष में छिड़ रहा है, सफलता मिलना मुझे बहुत ही कठिन दिखाई देता है।
अखिल भारतकी राष्ट्रीय समितिने स्वराज्य प्राप्ति के लिए अब जो कदम उठाया है, उसमें आप लोगोंकी ओरसे सहायता मिलनेपर ही सम्पूर्ण सफलता मिल सकती है। उक्त समितिने निश्चय कर लिया है कि आगामी ३० सितम्बरतक विदेशी कपड़ोंका पूरा बहिष्कार कर दिया जाये। मैंने आपके ही विश्वासपर सितम्बर मासकी अवधि रखने की सलाह दी। अतएव इस स्वदेशी आन्दोलनको प्रबल बनाने के समय ‘हिन्दी नवजीवन’ का प्रकाशित होना उचित ही है।
राष्ट्रीय जीवनमें आजकल दो ही वृत्तियाँ देखी जा रही हैं, व्यापार और नौकरी। ब्राह्मणवृत्ति और क्षात्रवृत्तिका अभाव मालूम होता है। अब हमारे व्यापारी-समाज तथा दास-वर्गको ज्ञान और शौर्य प्राप्त करनेकी आवश्यकता है। हमें इस बातका ज्ञान होना चाहिए कि विदेशी कपड़ेके व्यापारसे हमारा देश मटियामेट हो गया है। और उस व्यापारका त्याग करनेका शौर्य भी हममें होना चाहिए। यदि हममें इतना भी बलिदान करनेका शौर्य नहीं है जितना कि विदेशी कपड़ेके व्यापारके त्यागके लिए आवश्यक है, तो हम अपने धर्मका पालन नहीं कर सकते; अपने ही भाई-बहनोंको नुकसान पहुँचाकर हमने करोड़ों रुपये इकट्ठा किये और उसमें से लाखोंका दान किया, तो यह पुण्य नहीं है। इसलिए आप भाई और बह्नोंसे मेरी प्रार्थना है कि आप विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेमें और खादी तैयार करनेमें पूरा साहस दिखाकर अपनी पिछली देशसेवामें वृद्धि करें।
{{right|'''आपका,'''|3em}}
{{right|'''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}}
'''हिन्दी नवजीवन,''' १९-८-१९२१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३५९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें|३२९}}</noinclude>का पूर्ण बहिष्कार करके लोकमान्यकी पुण्यतिथि जितने अच्छे रूपमें मना सकते हैं, उससे अच्छे रूपकी कल्पना मैं नहीं कर सकता।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २-७-१९२१}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१५१. भाषण : बम्बईको सार्वजनिक सभामें'''<ref>यह सभा बम्बई कमीशन एजेन्ट्स एसोसिएशन और लिंगायत कमीशन एजेन्ट्स एसोसिएशनके संयुक्त तत्त्वावधानमें हुई थी। इनकी ओरसे तिलक स्वराज्य-कोषके लिए गांधीजीको ५,००१ रुपये भेंट
किये गये थे।</ref>}}}}
{{Right|शनिवार, २ जुलाई, १९२१}}
अब आप मुझसे पैसेकी बात नहीं सुनेंगे। अब तो इसीपर विचार करना है कि हमें आगे क्या करना है। पैसा आये तो कोई हर्ज नहीं। तिलक महाराजके नामपर एक करोड़ तो क्या दस करोड़ भी न्यौछावर करें तो यह कोई बड़ी बात न होगी। स्वराज्यके लिए आवश्यकता पड़े तो दस करोड़ भी खर्च करें, लेकिन दस करोड़की जरूरत पड़ेगी ही नहीं। आवश्यकतासे अधिक एक पाई भी खर्च न करनेवाले व्यक्तिको व्यवहारकुशल कहा जाता है। अब तो आप एक ही बातपर विचार करें। पहली अगस्तको तिलक महाराजकी पुण्यतिथि है, उस दिन हमें क्या करना चाहिए?
तिलक महाराजका जो मन्त्र<ref>"स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।"</ref> था उससे आपको मुग्ध होना चाहिए। उनकी विद्वत्ता अथवा मधुर वाणीसे नहीं बल्कि उनके कार्यसे, यज्ञसे, स्वार्थ-त्यागसे आपको मोहित होना चाहिए। उनकी जो हार्दिक इच्छा थी, जिसके लिए उन्होंने अपने प्राण उत्सर्ग किये, जिसके लिए उन्होंने कष्ट सहे, आपको वह कार्य पूरा करना चाहिए। उनका इससे बढ़कर और कोई अच्छा स्मारक हो ही नहीं सकता। आप अरबों रुपया केवल इकट्ठा करें, इसकी अपेक्षा आप एक भी पाई इकट्ठी किये बिना स्वराज्य प्राप्त करें तो वह बेहतर होगा। मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप अवश्य ऐसा करेंगे। लेकिन जबतक आप स्वराज्यका विचार नहीं करते तबतक कुछ नहीं हो सकता। आपको विदेशी कपड़ेका विचार करना ही होगा। इसपर कोई आपकी हत्या नहीं कर देगा, आपको सिर्फ अपने दिलको जरा समझाना पड़ेगा, जैसे बालकोंके गलेमें कड़वी दवाका घूँट उतारना पड़ता है उसी तरह बहनोंको भी अपने गलेमें यह घूँट उतारना चाहिए। आप पहली अगस्तकी राह न देखें; बल्कि कल ही अपने सन्दूक, शरीर और समझकी जाँच कर लें। विदेशी कपड़ा हमारी गुलामी है। आपको गुलामी छोड़ देनी चाहिए। व्यापारियोंको तो अवश्य ही छोड़ देनी चाहिए। तिलक महाराजको गाली देकर अगर कोई पैसा दे तो वह मैं कैसे लूँ, मैं अगर ले भी लूँ तो महाराष्ट्र तो मेरा सिर ही काट ले। हम तिलक महाराजका सच्चा स्मारक बनाना चाहते हैं तो सबको स्वदेशी<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अब आप मुझसे पैसेकी बात नहीं सुनेंगे। अब तो इसीपर विचार करना है कि हमें आगे क्या करना है। पैसा आये तो कोई हर्ज नहीं। तिलक महाराजके नामपर एक करोड़ तो क्या दस करोड़ भी न्यौछावर करें तो यह कोई बड़ी बात न होगी। स्वराज्यके लिए आवश्यकता पड़े तो दस करोड़ भी खर्च करें, लेकिन दस करोड़की जरूरत पड़ेगी ही नहीं। आवश्यकतासे अधिक एक पाई भी खर्च न करनेवाले व्यक्तिको व्यवहारकुशल कहा जाता है। अब तो आप एक ही बातपर विचार करें। पहली अगस्तको तिलक महाराजकी पुण्यतिथि है, उस दिन हमें क्या करना चाहिए?
तिलक महाराजका जो मन्त्र<ref>"स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।"</ref> था उससे आपको मुग्ध होना चाहिए। उनकी विद्वत्ता अथवा मधुर वाणीसे नहीं बल्कि उनके कार्यसे, यज्ञसे, स्वार्थ-त्यागसे आपको मोहित होना चाहिए। उनकी जो हार्दिक इच्छा थी, जिसके लिए उन्होंने अपने प्राण उत्सर्ग किये, जिसके लिए उन्होंने कष्ट सहे, आपको वह कार्य पूरा करना चाहिए। उनका इससे बढ़कर और कोई अच्छा स्मारक हो ही नहीं सकता। आप अरबों रुपया केवल इकट्ठा करें, इसकी अपेक्षा आप एक भी पाई इकट्ठी किये बिना स्वराज्य प्राप्त करें तो वह बेहतर होगा। मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप अवश्य ऐसा करेंगे। लेकिन जबतक आप स्वराज्यका विचार नहीं करते तबतक कुछ नहीं हो सकता। आपको विदेशी कपड़ेका विचार करना ही होगा। इसपर कोई आपकी हत्या नहीं कर देगा, आपको सिर्फ अपने दिलको जरा समझाना पड़ेगा, जैसे बालकोंके गलेमें कड़वी दवाका घूँट उतारना पड़ता है उसी तरह बहनोंको भी अपने गलेमें यह घूँट उतारना चाहिए। आप पहली अगस्तकी राह न देखें; बल्कि कल ही अपने सन्दूक, शरीर और समझकी जाँच कर लें। विदेशी कपड़ा हमारी गुलामी है। आपको गुलामी छोड़ देनी चाहिए। व्यापारियोंको तो अवश्य ही छोड़ देनी चाहिए। तिलक महाराजको गाली देकर अगर कोई पैसा दे तो वह मैं कैसे लूँ, मैं अगर ले भी लूँ तो महाराष्ट्र तो मेरा सिर ही काट ले। हम तिलक महाराजका सच्चा स्मारक बनाना चाहते हैं तो सबको स्वदेशी<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बनना ही चाहिए। अगर आप पैसा दें तो वह विदेशी कपड़ेका त्याग करनेके वचनके रूपमें ही दें। आप यह सोचकर कि विदेशी कपड़ेके व्यापारसे पैसा कमा लेंगे, स्वराज्य-कोषमें पैसा नहीं दे सकते।
आप विदेशी कपड़ेके व्यापारको गोमांस और शराब तुल्य समझें। आप आढ़तका धन्धा करते हैं और दलाल द्वारा माल भेजते हैं। उसमें आप विदेशी कपड़ा भी भेजते हैं। इसलिए आप प्रतिज्ञा करें कि आप अपने ग्राहकोंको ऐसा माल नहीं भेजेंगे। क्या कोई हिन्दू अपने ग्राहकको शराब भेज सकता है? जो वस्तु हम ग्राहकको भेज नहीं सकते तो उसका व्यापार कैसे कर सकते हैं? इसी तरह हम विदेशी कपड़ेका भी व्यापार नहीं कर सकते। आपके दिलोंमें अंग्रेज अथवा अंग्रेजी कपड़ा बनानेवाले के प्रति तिरस्कार न होकर, विदेशी कपड़ेके प्रति होना चाहिए। देश जिस धन्धेसे गुलामीके गर्तमें गिरता है उससे आप पैसा कमायें, यह कैसे सम्भव है? एक पारसी भाई शराबके बारेमें मुझसे पूछने आये। उनसे मैंने कहा कि अगर आप भिखारी भी बन जायें तो भी आपको शराबको हराम समझना चाहिए। जो चीज हिन्दके हिन्दुओं और मुसलमानोंको फूटी आँख नहीं सुहाती उससे आप कमाई कैसे कर सकते है? यही बात विदेशी कपड़ेपर भी लागू होती है।
शराबकी दुकानोंपर हम जैसे धरना देते है वैसे ही विदेशी कपड़ेकी दुकानोंपर भी क्यों न दें, यह बात मेरी समझमें नहीं आती। विदेशी कपड़ेका बहिष्कार तो अधिक महत्त्वका है। बहनो, आप विदेशी कपड़ा खरीदती हैं, सो अधर्म है। विदेशी कपड़ा खरीदना अर्थात् अपने बालकको छोड़कर पराये बालकको गोद लेना। विदेशी कपड़ोंमें आप सुन्दर लगती हैं, ऐसा आप समझती हैं। लेकिन सच्चा सौन्दर्य तो आपकी कर्त्तव्यपरायणतामें है। सीताने उद्धत रावण द्वारा भेजे गये कपड़ोंका तिरस्कार कर पत्तोंसे अपने शरीरको ढकना अधिक पसन्द किया था। आप बहनें भी सीताजी बनें। आप विदेशी कपड़ा न छोड़ें और स्वराज्य माँगें, यह कैसे हो सकता है? पहली अगस्तसे पहले-पहले आपको इतना तो करना ही होगा।
आपमें से जो साहसी हों वे विदेशी कपड़ेको जला डालें। कंगालोंको देना चाहें तो मुझे दें; क्योंकि आप असली कंगालोंको नहीं पहचानते। उन्हें तो मैं ही पहचानता हूँ। आपने उन्हें पहचाना होता तो आप विदेशी ठाठमें आनन्द न मनाते, मौजशौक न करते। आप विदेशीके मोहको त्याग दें, तभी हमारा काम हो सकता है। आपने जो रुपया दिया है उसके पीछे निहित वचनका आप पालन करें। अभी तो हमें सिर्फ उसीकी जरूरत है।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती''', १०-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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आप विदेशी कपड़ेके व्यापारको गोमांस और शराब तुल्य समझें। आप आढ़तका धन्धा करते हैं और दलाल द्वारा माल भेजते हैं। उसमें आप विदेशी कपड़ा भी भेजते हैं। इसलिए आप प्रतिज्ञा करें कि आप अपने ग्राहकोंको ऐसा माल नहीं भेजेंगे। क्या कोई हिन्दू अपने ग्राहकको शराब भेज सकता है? जो वस्तु हम ग्राहकको भेज नहीं सकते तो उसका व्यापार कैसे कर सकते हैं? इसी तरह हम विदेशी कपड़ेका भी व्यापार नहीं कर सकते। आपके दिलोंमें अंग्रेज अथवा अंग्रेजी कपड़ा बनानेवाले के प्रति तिरस्कार न होकर, विदेशी कपड़ेके प्रति होना चाहिए। देश जिस धन्धेसे गुलामीके गर्तमें गिरता है उससे आप पैसा कमायें, यह कैसे सम्भव है? एक पारसी भाई शराबके बारेमें मुझसे पूछने आये। उनसे मैंने कहा कि अगर आप भिखारी भी बन जायें तो भी आपको शराबको हराम समझना चाहिए। जो चीज हिन्दके हिन्दुओं और मुसलमानोंको फूटी आँख नहीं सुहाती उससे आप कमाई कैसे कर सकते है? यही बात विदेशी कपड़ेपर भी लागू होती है।
शराबकी दुकानोंपर हम जैसे धरना देते है वैसे ही विदेशी कपड़ेकी दुकानोंपर भी क्यों न दें, यह बात मेरी समझमें नहीं आती। विदेशी कपड़ेका बहिष्कार तो अधिक महत्त्वका है। बहनो, आप विदेशी कपड़ा खरीदती हैं, सो अधर्म है। विदेशी कपड़ा खरीदना अर्थात् अपने बालकको छोड़कर पराये बालकको गोद लेना। विदेशी कपड़ोंमें आप सुन्दर लगती हैं, ऐसा आप समझती हैं। लेकिन सच्चा सौन्दर्य तो आपकी कर्त्तव्यपरायणतामें है। सीताने उद्धत रावण द्वारा भेजे गये कपड़ोंका तिरस्कार कर पत्तोंसे अपने शरीरको ढकना अधिक पसन्द किया था। आप बहनें भी सीताजी बनें। आप विदेशी कपड़ा न छोड़ें और स्वराज्य माँगें, यह कैसे हो सकता है? पहली अगस्तसे पहले-पहले आपको इतना तो करना ही होगा।
आपमें से जो साहसी हों वे विदेशी कपड़ेको जला डालें। कंगालोंको देना चाहें तो मुझे दें; क्योंकि आप असली कंगालोंको नहीं पहचानते। उन्हें तो मैं ही पहचानता हूँ। आपने उन्हें पहचाना होता तो आप विदेशी ठाठमें आनन्द न मनाते, मौजशौक न करते। आप विदेशीके मोहको त्याग दें, तभी हमारा काम हो सकता है। आपने जो रुपया दिया है उसके पीछे निहित वचनका आप पालन करें। अभी तो हमें सिर्फ उसीकी जरूरत है।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१५२. वैष्णवोंसे'''}}}}
आपमें से अनेक मेरे सगे हैं, अनेक जातिभाई हैं, और कितने ही बचपनके मित्र है, [जिनके] बहुत-सारे पत्र मुझ मिलते रहते हैं। अन्त्यजों सम्बन्धी मेरे विचारोंके लिए आपमें से कोई मुझे बधाई देता है, अनेक इसे मेरी भूल मानकर विनयपूर्वक मुझे समझाते हैं, कोई गुस्सेमें आकर मुझे गालियाँ देते हैं और कोई-कोई तो मुझे धमकी भी देते हैं।
इस सबको मैं, उनके मनमें मेरे प्रति निहित प्रेमकी निशानी समझता हूँ। अन्त्यजोंके सम्बन्धमें मेरे जो विचार है वैसे ही विचार अन्य अनेक लोगोंके भी हैं और वे अन्त्यजोंको स्पर्श करनेमें कोई दोष नहीं देखते। लेकिन ज्यादातर लोगोंको मुझपर ही गुस्सा आता है और उसका कारण मैं यही समझता हूँ कि वे मुझे दूसरी तरहसे मर्यादा धर्मका पालन करनेवाला तथा एक अच्छा व्यक्ति मानते हैं। उनके अनुसार अन्त्यजों सम्बन्धी मेरे विचारोंमें जो भूल निहित है उसको वे सहन नहीं कर सकते। उनकी मान्यता है कि मेरे ये विचार स्वराज्य सम्बन्धी हमारी गतिको भी अवरुद्ध करते हैं। कोई-कोई तो यह भी मानते है कि मैने आपत्तिको अपने हाथों न्यौता दिया है और अपनी हठधर्मीसे स्वराज्यकी नावको तूफानमें डाल दिया है।
दूसरी ओर, मेरी नम्र मान्यता यह है कि अन्त्यजोंके प्रति मेरे भाव मेरे वैष्णव-धर्मको दीप्त करते हैं, उनमें मेरी शुद्ध दया निहित है, उनसे मेरी मर्यादाकी शुद्धता सिद्ध होती है।
कितने ही वैष्णव यह मानते हैं कि मैं वर्णाश्रम-धर्मका लोप कर रहा हूँ और मेरी मान्यता यह है कि मैं वर्णाश्रम-धर्मको मलिनतासे निकालकर उसके शुद्ध स्वरूपको प्रकट कर रहा हूँ। मैं अन्त्यजोंसे रोटी और बेटीके व्यवहारकी हिमायत नहीं कर रहा हूँ। मैं तो इतना ही कहता हूँ कि किसी भी मनुष्यको छूनेमें पाप होता है, ऐसा विचार करना ही पाप है।
रजस्वलाका उदाहरण देकर अन्त्यजोंकी अस्पृश्यताके विचारका जो बचाव किया जाता है, उसे मेरी मति तो अज्ञान मानती है। रजस्वला बहनसे अगर हम छू जाते हैं तो उसे हम पाप नहीं मानते। उसे तो हम शारीरिक शौच नियमको भंग हुआ जान, नहा-धोकर स्वच्छ हो जाते हैं। जिस अन्त्यज भाईने मैला उठाया हो और जबतक वह न नहाये अथवा दूसरी तरहसे स्वच्छ न हो तबतक स्पर्श न करना अथवा स्पर्श हो जानेपर नहा लेनेकी बात तो मैं समझ सकता हूँ लेकिन अन्त्यज कुलमें जन्मे लोगोंका सर्वथा त्याग करनेमें धर्म होनेकी बातको मेरी आत्मा कतई स्वीकार नहीं कर सकती।
वैष्णव धर्मका मूल दया है। अन्त्यजोंके प्रति हमारे व्यवहारमें दयाका लेशतक नहीं दिखता। हममें से अनेक व्यक्ति तो अन्त्यजोंको गालीके बिना बुलाते ही नहीं हैं। भूलचूकसे अगर वे हमारे डिब्बेमें बैठ जाते हैं तो उनपर गालियोंकी बौछार होने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३६२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लगती है। हम उन्हें वही जूठा भोजन देते हैं जो हम जानवरोंको देते हैं। उनके बीमार पड़ने अथवा साँपके काटनेपर हमारे वैद्य अथवा डाक्टर उनकी दवा करने नहीं जाते। यदि जाने लगें तो जहाँतक हमारा वश चलता है हम उन्हें जानेसे रोकते हैं। अन्त्यजोंके रहने के लिए खराबसे-खराब मुहल्ला और उसमें न रोशनीकी व्यवस्था और न सड़कोंका ही प्रबन्ध। उनके लिए कुएँ नहीं होते। सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं और विद्यालयोंका लाभ उन्हें नहीं मिलता। उनसे हम कठिनसे-कठिन सेवा लेकर कमसे-कम वेतन देते हैं। उनके लिए तो ऊपर आकाश और नीचे धरती है। यह क्या वैष्णव धर्मकी निशानी है? इसे दयाधर्म कहें कि क्रूरताधर्म कहें? अंग्रेज सरकार, जिसके साथ आपने भी असहयोग किया है, हमारा इस सीमातक तिरस्कार नहीं करती। हम तो अन्त्यजोंके प्रति अपनी डायरशाहीको धर्म मानकर पोषित करते हैं।
मैं तो मानता हूँ कि हमने जो बोया है वही काट रहे हैं। हम अन्त्यजोंका तिरस्कार करके जगत् के तिरस्कारका पात्र बनते हैं।
अस्पृश्यताको बुद्धि ग्रहण नहीं कर सकती। वह सत्य और अहिंसाका विरोधी धर्म है; इससे वह धर्म ही नहीं है। हम ऊँच हैं और दूसरे नीच हैं—यह विचार ही नीच है। जिस ब्राह्मणमें शूद्रका—सेवाका—गुण नहीं वह कोई ब्राह्मण नहीं है। ब्राह्मण तो वह है जिसमें क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके सब गुण हों। इसीके उपरान्त ज्ञान आता है। शूद्र कोई ज्ञानसे नितान्त विमुख नहीं है। उनमें सेवा प्रधान है। वर्णाश्रम धर्ममें ऊँच-नीचकी भावनाको अवकाश नहीं है। वैष्णव-सम्प्रदायमें तो भंगी, चांडाल आदि तर गये हैं। जो धर्म जगत्-मात्रको विष्णुमय जानता है वह अन्त्यजोंको विष्णुसे रहित कैसे मान सकता है?
लेकिन मैं आपसे शास्त्रार्थ नहीं करना चाहता। मैं विद्वान् होनेका दावा नहीं करता। शास्त्रार्थमें सारे शास्त्री मुझे भले ही हरा दें। लेकिन मुझे विश्वास है कि दया धर्मका मुझे ठीक-ठीक अनुभव है। दया धर्ममें अन्त्यज तिरस्कारको अवकाश हो ही नहीं सकता।
और फिर आप अन्त्यज किसे कहेंगे? बुनकरको अन्त्यज कहेंगे? चमड़ेके जो लखपति व्यापारी हैं उन्हें अन्त्यज कहेंगे? अथवा सोना सारी मलिनताको धो डालता है? जिसने चमारका धन्धा छोड़ दिया है, जो भंगी मोटर चलाता है, मिलमें काम करता है, हमेशा नहाता-धोता है, क्या उसे भी आप अस्पृश्य मानेंगे?
लेकिन मैं दलील किसलिए करूँ? जिसे अस्पृश्य मानो, उससे छू जानेपर पाप मानो और नहाना चाहो तो नहा लो; लेकिन मेरी प्रार्थना तो यह है कि जिस तरह मासिक धर्ममें पड़ी हुई माताका आप तिरस्कार नहीं करते बल्कि उसकी सेवा करते हैं उसी तरह अन्त्यजोंका भी तिरस्कार न कर उनकी सेवा करें। उनके लिए कुएँ खुदवाएँ, स्कूल बनवाएँ, उन्हें दवा दें, उनके लिए वैद्य भेजें, उनके दुःखमें भाग लें, उनकी आत्माकी दुआ लें, उनको अच्छी जगहमें रखें, अच्छा वेतन दें, सम्मान और शिक्षा दें तथा उन्हें अपना छोटा भाई समझें। उनसे मद्यपान, गो-मांसाहार आदि छुड़वाएँ, जो छोड़ें उन्हें प्रोत्साहन दें। ऐसा करके आप देख सकेंगे कि अस्पृश्यता समाजका एक अतिरिक्त अंग है। आपमें कुछ-एकने अन्त्यजों सम्बन्धी मेरे विचारोंके कारण<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३६३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो|३३३}}</noinclude>तिलक स्वराज्य-कोषमें चन्दा दिया ही नहीं है। मैं आप लोगोंसे प्रार्थना करता हूँ कि अगर आप अस्पृश्यताको नहीं छोड़ते तो भी आप सुधारोंके कामके लिए पैसेकी मदद तो दे ही सकते हैं। कितने ही वैष्णवोंने तो जो पैसा दिया है सो यह कहकर दिया है कि वह इसी कामके लिए खर्च किया जाये। इसके अतिरिक्त अन्त्यजों सम्बन्धी मेरे विचार आपको पसन्द न हों तो भी आप स्वदेशी आन्दोलनके लिए, अकालके लिए, स्कूलोंके लिए तो पैसा दे ही सकते हैं। लेकिन मेरी मान्यता तो ऐसी है कि अन्त्यजोंकी उन्नतिकी बातका विरोध आप करेंगे ही नहीं। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप दया धर्ममें अपने विश्वासके प्रतीक रूपमें पैसा इसी शर्तके साथ दें कि वह अन्त्यजोंकी उन्नतिके कार्योंके लिए खर्च किया जाये।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', ३-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१५३. विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो'''<ref>ऐसा प्रतीत होता है कि यह टिप्पणी जो ६-७-१९२१ के '''यंग इंडिया'''में छपी थी, अन्ध समाचारपत्रोंको भी भेजी गई थी।</ref>}}}}
इस समय जब कि काफी समय बीत गया है, यह बतानेकी आवश्यकता नहीं कि विदेशी वस्त्रोंका प्रस्तावित बहिष्कार प्रतिहिंसात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय जीवनके लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी कि जीवनके लिए साँस। इसलिए बहिष्कार जितनी जल्दी अमलमें लाया जायेगा, देशका उतना ही अधिक कल्याण होगा। इसके बिना न तो स्वराज्यकी स्थापना की जा सकती है और न स्थापनाके बाद उसे कायम ही रखा जा सकता है। इसलिए यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि अगस्तकी पहली तारीखसे भी पहले इसपर कैसे अमल किया जाये।
बहिष्कारको जल्दीसे-जल्दी अमली रूप देनेके लिए निम्नलिखित बातोंकी
आवश्यकता है : (१) मिल-मालिक अपने लाभोंको नियमित करें और प्रमुख रूपसे भारतीय बाजारके लिए माल तैयार करें, (२) आयात करनेवाले, विदेशी माल खरीदना छोड़ दें—तीन प्रमुख व्यापारी इसकी शुरुआत कर भी चुके हैं, (३) उपभोक्ता सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेको खरीदनेसे इनकार कर दें और जहाँतक सम्भव हो खादी खरीदें, (४) उपभोक्ता केवल खादी पहनें, मिलका कपड़ा उन गरीबोंके
लिए रहने दें जो कि स्वदेशी और विदेशीके भेदको नहीं जानते, (५) उपभोक्ता स्वराज्यकी स्थापना और खादीके निर्माणमें वृद्धि होने तक उतना ही कपड़ा उपयोगमें लायें जितना कि तन ढकनेके लिए आवश्यक हो, (६) उपभोक्ता विदेशी कपड़ोंको उसी प्रकार नष्ट कर दें जिस प्रकार कि मद्य-त्यागकी शपथ लेनेपर मादक पेयको नष्ट कर दिया जाता है; या उसे विदेशोंमें उपभोगके लिए बेच दें, या जिन कामोंको<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३६४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करनेमें कपड़े गन्दे होते हैं उन कामोंके समय अथवा सोने आदिके समय उन्हें पहनकर जीर्ण-शीर्ण कर डालें।
यह आशा की जाती है कि उपर्युक्त अनुच्छेदमें जिन लोगोंका उल्लेख किया गया है, वे सब एक साथ और इस सम्बन्धमें अच्छा काम करेंगे। किन्तु अन्तमें तो सफलता उपभोक्ता के दृढ़ निश्चयपर ही निर्भर करती है। उसका अपनी गुलामीका बिल्ला लगानेसे इनकार कर देना पर्याप्त है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ४-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : न॰ चि॰ केलकरको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>४ जुलाई [१९२१]}}
{{Left|प्रिय श्री केलकर,}}
मुझे अबतक जितनी बधाइयाँ मिली हैं उनमें से सबसे ज्यादा मूल्यवान बधाई मैं आपकी मानता हूँ। यदि आपने कामको उचित मानकर बधाई दी है तो इसमें मैं आपका हार्दिक सहयोग चाहता हूँ। मुझे कार्य-समितिके सम्बन्धमें आपका पत्र<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> मिला। भविष्यमें आपको जैसी आत्मिक प्रेरणा मिले आप वैसा ही करें। मेरे मनमें केवल यही खयाल आता है कि हमें कार्य-समितिको ऐसी संस्था बना देना चाहिए जो तेजीसे कार्य कर सके, जो शक्तिशालिनी हो और जिसमें मतैक्य हो। उसमें मतभेदकी गुंजाइश है, विश्वास भेदकी नहीं। मेरा तो विश्वास है कि हम कांग्रेसके संविधानको दक्षतापूर्वक कार्यान्वित करके जो-कुछ चाहते हैं वह सब पा सकते हैं। किन्तु मैं अपने विश्वासको भारतपर जबरन लाद नहीं सकता। यदि हमें इस सालके अन्दर स्वतन्त्रता मिलनी बदी है तो वह विश्वास आ ही जायेगा।
{{Right|हृदयसे आपका,|1em<br>{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
अंग्रेजी पत्र (सी॰ डब्ल्यू॰ ३१२२) की फोटो-नकलसे।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करनेमें कपड़े गन्दे होते हैं उन कामोंके समय अथवा सोने आदिके समय उन्हें पहनकर जीर्ण-शीर्ण कर डालें।
यह आशा की जाती है कि उपर्युक्त अनुच्छेदमें जिन लोगोंका उल्लेख किया गया है, वे सब एक साथ और इस सम्बन्धमें अच्छा काम करेंगे। किन्तु अन्तमें तो सफलता उपभोक्ता के दृढ़ निश्चयपर ही निर्भर करती है। उसका अपनी गुलामीका बिल्ला लगानेसे इनकार कर देना पर्याप्त है।
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मुझे अबतक जितनी बधाइयाँ मिली हैं उनमें से सबसे ज्यादा मूल्यवान बधाई मैं आपकी मानता हूँ। यदि आपने कामको उचित मानकर बधाई दी है तो इसमें मैं आपका हार्दिक सहयोग चाहता हूँ। मुझे कार्य-समितिके सम्बन्धमें आपका पत्र<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> मिला। भविष्यमें आपको जैसी आत्मिक प्रेरणा मिले आप वैसा ही करें। मेरे मनमें केवल यही खयाल आता है कि हमें कार्य-समितिको ऐसी संस्था बना देना चाहिए जो तेजीसे कार्य कर सके, जो शक्तिशालिनी हो और जिसमें मतैक्य हो। उसमें मतभेदकी गुंजाइश है, विश्वास भेदकी नहीं। मेरा तो विश्वास है कि हम कांग्रेसके संविधानको दक्षतापूर्वक कार्यान्वित करके जो-कुछ चाहते हैं वह सब पा सकते हैं। किन्तु मैं अपने विश्वासको भारतपर जबरन लाद नहीं सकता। यदि हमें इस सालके अन्दर स्वतन्त्रता मिलनी बदी है तो वह विश्वास आ ही जायेगा।
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अंग्रेजी पत्र (सी॰ डब्ल्यू॰ ३१२२) की फोटो-नकलसे।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करनेमें कपड़े गन्दे होते हैं उन कामोंके समय अथवा सोने आदिके समय उन्हें पहनकर जीर्ण-शीर्ण कर डालें।
यह आशा की जाती है कि उपर्युक्त अनुच्छेदमें जिन लोगोंका उल्लेख किया गया है, वे सब एक साथ और इस सम्बन्धमें अच्छा काम करेंगे। किन्तु अन्तमें तो सफलता उपभोक्ता के दृढ़ निश्चयपर ही निर्भर करती है। उसका अपनी गुलामीका बिल्ला लगानेसे इनकार कर देना पर्याप्त है।
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मुझे अबतक जितनी बधाइयाँ मिली हैं उनमें से सबसे ज्यादा मूल्यवान बधाई मैं आपकी मानता हूँ। यदि आपने कामको उचित मानकर बधाई दी है तो इसमें मैं आपका हार्दिक सहयोग चाहता हूँ। मुझे कार्य-समितिके सम्बन्धमें आपका पत्र<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> मिला। भविष्यमें आपको जैसी आत्मिक प्रेरणा मिले आप वैसा ही करें। मेरे मनमें केवल यही खयाल आता है कि हमें कार्य-समितिको ऐसी संस्था बना देना चाहिए जो तेजीसे कार्य कर सके, जो शक्तिशालिनी हो और जिसमें मतैक्य हो। उसमें मतभेदकी गुंजाइश है, विश्वास भेदकी नहीं। मेरा तो विश्वास है कि हम कांग्रेसके संविधानको दक्षतापूर्वक कार्यान्वित करके जो-कुछ चाहते हैं वह सब पा सकते हैं। किन्तु मैं अपने विश्वासको भारतपर जबरन लाद नहीं सकता। यदि हमें इस सालके अन्दर स्वतन्त्रता मिलनी बदी है तो वह विश्वास आ ही जायेगा।
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अंग्रेजी पत्र (सी॰ डब्ल्यू॰ ३१२२) की फोटो-नकलसे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९९
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||परिशिष्ट|५६७}}</noinclude>सजा दी गई। इन दो कार्यकर्ताओंमें से एकको पुलिसके एक सिपाही द्वारा ठोकरें लगाई गईं और पीटा गया।
किसानोंको कुचल देने के लिये सरकारने जो सैकड़ों तरीके अपनाये हैं उसका अन्दाज लगाना कठिन है। जमींदार और कुछ स्थानीय लोग जो अपनेको ‘माडरेट’ कहते हैं, सरकारसे मिल गये हैं और उन लोगोंने सामान्य किसानकी जिन्दगी भारी कर रखी है——इतनी भारी कि वह बेचारा पिसा जा रहा है।
संयुक्त प्रान्तके अन्य जिलोंमें भी किसान आन्दोलनको कुचलनेका ठीक ऐसा ही, यद्यपि छोटे पैमानेपर, ढंग अख्तियार किया गया है।
{{c|'''२. कार्यकर्ताओंको सजा'''}}
बहुतसे कांग्रेस व खिलाफत कार्यकर्ताओंपर मुकदमे चलाये गये हैं और उन्हें सजा दे दी गई है। आन्दोलनके किसी नेताको अभीतक नहीं पकड़ा गया है, परन्तु इन नेताओंके अनेक योग्य और कुशल सहायकोंको जेल भेज दिया गया है। अपेक्षाकृत प्रख्यात व्यक्तियोंमें, जिनके खिलाफ राजद्रोहका मुकदमा चलाया गया है, देहरादूनके पण्डित देवरत्न शर्माका नाम उल्लेखनीय है।
इलाहाबादके एक खिलाफत कार्यकर्ताको जिनका नाम हमीद अहमद है अभी-अभी धारा १२१ क के अन्तर्गत आजीवन काले पानीकी सजा मिली है और उनकी सब जायदाद जन्त कर ली गई है। उनपर यह अभियोग लगाया गया था कि उन्होंने अपने एक भाषणमें फिलहाल अहिंसाके पालनकी सलाह देते हुए कहा था कि यदि असहयोग आन्दोलन विफल हुआ तो मुसलमान लोग तलवार उठायेंगे।
जिलोंके अनेक कांग्रेस अधिकारियोंको धारा १०८ या १२४ क के अन्तर्गत सजा दी जा चुकी है।
कुछ स्वयंसेवकोंको नशाबन्दी आन्दोलनके सिलसिले में जेल भेज दिया गया।
{{c|'''३. सुरक्षा धाराएँ तथा धारा १४४'''}}
धाराओंका असाधारण रूपसे बड़े पैमानेपर प्रयोग किया गया है।ऐसा शायद ही कोई प्रख्यात कार्यकर्ता होगा जिसके नाम धारा १४४ का नोटिस न भेजा गया हो। मौलाना मुहम्मद अलीतक को ऐसा नोटिस भेजा गया है। जिन-जिनके नाम यह नोटिस भेजा गया है उनमें से सौसे ऊपरको नामावली मेरे पास है, परन्तु यह सूची बहुत अधूरी है।
धारा १४४ को पूरे-पूरे जिलोंपर लागू करके उन जिलोंमें सभाएँ करना निषिद्ध कर दिया गया है। इस धारा १४४ से राजद्रोहात्मक सभा अधिनियमका काम निकाला गया है।
एक मामला ऐसा भी है जिसमें धारा १४४के अन्तर्गत जारी किये गये नोटिसका लिखित आदेश यह था कि खिलाफतकी रसीदें न बेची जायें और सम्बन्धित व्यक्तिको इस प्रकारके किसी भी संगठनका सदस्य नहीं होना चाहिए।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६००
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
सुरक्षा कानूनके खण्ड प्रेस ऐक्टका काम दे रहे हैं। ‘प्रताप’ नामक समाचार-पत्रमें छापे गये कुछ लेखों के कारण उस पत्रके सम्पादक और मुद्रकसे ३० हजार रुपये-की जमानत तलब की गई है। जमानतें जमा कर दी गई हैं।
{{c|'''४. विविध'''}}
बन्दूकके अनेक लाइसेंस जब्त कर लिये गये है। सरकारी नौकरोंको बर्खास्तगीकी धमकी दी गई है क्योंकि उनके रिश्तेदार असहयोग आन्दोलनमें शरीक थे। गांधी टोपियाँ पहनना निषिद्ध करार दिया गया है। स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा माँगनेवालों तथा चन्दा देने वालों के लिए धमकी-भरा नोटिस जारी किया गया है।
कांग्रेस और किसान सभाके दफ्तरोंपर पुलिसने छापे मारे हैं।
बनारसमें कुछ विद्यार्थी तथा अन्य लोगोंको भी भिन्न-भिन्न अवधिके कारावासकी सजा सुनाई गई है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १८-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०१
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|'''सामग्रीके साधन-सूत्र'''}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली: गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५९।
साबरमती संग्रहालय: पुस्तकालय तथा आलेख संग्रह: जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफ्रिकी कालके और १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात सुरक्षित हैं, देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३६०।
‘‘अमृतबाजार पत्रिका’: कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
‘आज’: बनारससे प्रकाशित दैनिक।
‘गुजराती’: बम्बईसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
‘नवजीवन’ (१९१९-१९३२): गांधीजी द्वारा सम्पादित अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक जो कभी-कभी सप्ताहमें दो बार भी निकलता था; यह ‘नवजीवन अने सत्य’ (१९१५-१९१९) नामक गुजराती मासिकके रूपको बदलकर निकाला गया था, जिसका पहला अंक ७ सितम्बर, १९१९ को निकला था। १९ अगस्त, १९२१ से उसका हिन्दी संस्करण भी प्रारम्भ हो गया था।
‘बॉम्बे क्रॉनिकल’: बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
‘यंग इंडिया’ (१९१८-३२): अहमदाबादसे प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक। सम्पादक: मो॰ क॰ गांधी; प्रकाशक: मोहनलाल मगनलाल भट्ट।
‘लीडर’: इलाहाबादसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
‘सर्चलाइट’: पटनासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
‘हिन्दू’: मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स, १९२१।
महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी, स्वराज्य आश्रम, बारडोली।
‘नरसिंहरावनी रोजनिशी’ (गुजराती): नरसिंहराव भोलानाथ दिवेटिया; गुजरात विद्यासभा, अहमदाबाद।
‘बापुना पत्रो: मणिबहेन पटेलने’ (गुजराती): सम्पादक-मणिबहेन पटेल; नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
‘बापुना पत्रो: सरदार वल्लभभाईने’ (गुजराती): सम्पादक-मणिबहेन पटेल; नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
‘बापुनी प्रसादी’ (गुजराती): मथुरादास त्रिकमजी; नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९४८।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वह तिलक महाराजका प्रशंसक है और तिलक स्वराज्य-कोषमें अकसर मुक्तहस्तसे चन्दा दिया करता है। परन्तु क्या वह ‘असहयोगी’ है? क्या आपकी सूचीमें उसका नाम है? अगर उसमें और कोई कमी न हो तो क्या वह आपके आश्रममें भरती हो सकता है?
तीसरी कठिनाई यह है कि आपके कथनानुसार इस—शैतानियतसे भरी हुई सरकारका सदस्य बनना पापमय है, परन्तु फिर भी इस सरकारकी नौकरीमें अथवा सरकारी संस्थाओंमें अपने इतने अधिक देशवासियोंके बने रहनेको आप बरदाश्त करते हैं। आप उन्हें इस समय अपने दलमें शामिल होने का निमन्त्रण नहीं दे रहे हैं। क्या यह उचित है? यदि इस सरकारकी नौकरी करना सामाजिक अथवा धार्मिक दृष्टिसे अपराध है——मेरे खयालसे ऐसा ही है——तो आप उन्हें वहाँ क्यों रहने दे रहे हैं? क्या धर्म, आत्मशुद्धि और स्वावलम्बनके क्षेत्रमें सामयिक लाभ उठानेकी नीतिकी गुंजाइश हुआ करती है?
अन्तमें आपसे एक बात और पूछना चाहता हूँ: “एक सालके अन्दर ही स्वराज्य प्राप्त करने” से आपका क्या मतलब है? क्या उस वाक्यका मतलब यह है कि कांग्रेसके आगामी अधिवेशनके अवसरपर देश ब्रिटिश साम्राज्यसे मुक्त और अलग हो जानेकी घोषणा कर देगा? अगर ऐसा नहीं हो तो क्या फकत आजादीका अहसास, स्वदेशीको अपनाना और अदालतों तथा स्कूलोंका अधूरा बहिष्कार——इन तीन बातोंसे यही समझा जायेगा कि भारतमें स्वराज्य स्थापित हो गया? और अगर खुदा न खास्ता हमारा बहिष्कार आन्दोलन असफल रहा तो क्या उसका मतलब यह होगा कि जिनसे एक सालके वास्ते वकालत करना और स्कूलोंमें पढ़ना-लिखना छोड़ देनेको कहा गया है वे उन निषिद्ध मानी जानेवाली संस्थाओं में फिर जाने लगेंगे?
{{right|'''आपका,'''|1em}}
{{right|'''अहफद हुसैन'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ४-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{Rh||पत्र: एशियाई पंजीयकको|२८१}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही
डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न
होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि
कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो
अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ?
एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो
झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर
उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता
है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा
हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस
सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे ।
<br>{{gap|3em}}किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है ।
यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग
भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके
गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें
और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी
आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>१. यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने
लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते
हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}}
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:[सेवा में
:एशियाई पंजीयक
:प्रिटोरिया
:महोदय,]
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना
चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक
असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude></noinclude>
p347pvycu6dh36d9iqcg3vklx6mvx3k
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2026-08-20T19:17:24Z
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{Rh||पत्र: एशियाई पंजीयकको|२८१}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही
डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न
होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि
कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो
अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ?
एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो
झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर
उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता
है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा
हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस
सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे ।
<br>{{gap|3em}}किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है ।
यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग
भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके
गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें
और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी
आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने
लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते
हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}}
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:[सेवा में
:एशियाई पंजीयक
:प्रिटोरिया
:महोदय,]
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना
चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक
असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१६
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है।
<br>{{gap|3em}}परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के
सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center>
डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] वीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४६
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''३७७. पत्र : जमनादास गांधीको'''}}</center>
{{rh|||फाल्गुन वदी ७ [ मार्च २९, १९१३]<ref>पत्रसे स्पष्ट है कि यह जमनादास गांधीके १४ दिसम्बर, १९१२ को दक्षिण आफ्रिकाले भारतके लिए रवाना होनेके बाद ही लिखा गया होगा; और इस तारीखके बाद पड़नेवाली फाल्गुन वदी ७ को १९१३ के मार्च महीनेकी २९ तारीख थी । </ref>}}
चि० जमनादास,
तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
तुम वहाँ नीबू आदि नहीं खा पाते, यह बात मुझे कुछ रुची नहीं । तुम्हारे प्रयोगोंमें मुझे बहुत-सी खामियाँ दिखाई देती हैं। इसमें तुम्हारा दोष तिल-भर भी नहीं है। तुम अनजान होनेसे फेरफार नहीं कर पाये। इसके अतिरिक्त तुमसे स्वतन्त्र प्रयोग नहीं करते बनता। इसलिए यदि तुम अभीतक अलोना खाने आदिका प्रयोग कर रहे हो और वह तुम्हें अनुकूल न पड़ रहा हो तो उसे छोड़ ही देना ।
तुम मेरे पत्रोंको सँभालकर रख सको, इसके लिए तुम्हें पत्र लिखने में एक ही प्रकारके कागजका प्रयोग करनेका प्रयत्न करूँगा । कुछ पत्र अवश्य ही दुबारा पढ़ने योग्य होंगे। इसके अलावा तुम मेरे विचार जाननेके लिए बहुत उत्सुक जान पड़ते हो, इसलिए यदि तुम्हें मेरा पत्र हर हफ्ते न मिले, तो जो पत्र सबसे हाल में मिला हो उसे तो इस बीच दुबारा पढ़ ही सकोगे ।
मुझसे चाहे जो सवाल, चाहे जैसी भाषामें पूछने में न झिझकना ।
तुम मेरे मना करनेपर भी [भारत] चले गये हो, इसकी चिन्ता न करो। तुम अकेले रहकर अपने विचारोंको दृढ़ नहीं कर सकते। इसी कारण मैंने तुम्हें रोका था। परन्तु खुशालभाई<ref>और</ref> और देवभाभीकी<ref>जमनादासके माता-पिता ।</ref> सेवा करनेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा देखकर मुझे उसकी तुलना में तुम्हारे विचारोंको दृढ़ करनेकी अपनी इच्छा गौण लगी ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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चि० जमनादास,
तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
तुम वहाँ नीबू आदि नहीं खा पाते, यह बात मुझे कुछ रुची नहीं । तुम्हारे प्रयोगोंमें मुझे बहुत-सी खामियाँ दिखाई देती हैं। इसमें तुम्हारा दोष तिल-भर भी नहीं है। तुम अनजान होनेसे फेरफार नहीं कर पाये। इसके अतिरिक्त तुमसे स्वतन्त्र प्रयोग नहीं करते बनता। इसलिए यदि तुम अभीतक अलोना खाने आदिका प्रयोग कर रहे हो और वह तुम्हें अनुकूल न पड़ रहा हो तो उसे छोड़ ही देना ।
तुम मेरे पत्रोंको सँभालकर रख सको, इसके लिए तुम्हें पत्र लिखने में एक ही प्रकारके कागजका प्रयोग करनेका प्रयत्न करूँगा । कुछ पत्र अवश्य ही दुबारा पढ़ने योग्य होंगे। इसके अलावा तुम मेरे विचार जाननेके लिए बहुत उत्सुक जान पड़ते हो, इसलिए यदि तुम्हें मेरा पत्र हर हफ्ते न मिले, तो जो पत्र सबसे हाल में मिला हो उसे तो इस बीच दुबारा पढ़ ही सकोगे।
मुझसे चाहे जो सवाल, चाहे जैसी भाषामें पूछने में न झिझकना ।
<br> {{gap|3em}}तुम मेरे मना करनेपर भी [भारत] चले गये हो, इसकी चिन्ता न करो। तुम अकेले रहकर अपने विचारोंको दृढ़ नहीं कर सकते। इसी कारण मैंने तुम्हें रोका था। परन्तु खुशालभाई<ref>और</ref> और देवभाभीकी<ref>जमनादासके माता-पिता ।</ref> सेवा करनेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा देखकर मुझे उसकी तुलना में तुम्हारे विचारोंको दृढ़ करनेकी अपनी इच्छा गौण लगी ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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चि० जमनादास,
<br> {{gap|3em}}तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
<br> {{gap|3em}}छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
<br> {{gap|3em}}तुम वहाँ नीबू आदि नहीं खा पाते, यह बात मुझे कुछ रुची नहीं । तुम्हारे प्रयोगोंमें मुझे बहुत-सी खामियाँ दिखाई देती हैं। इसमें तुम्हारा दोष तिल-भर भी नहीं है। तुम अनजान होनेसे फेरफार नहीं कर पाये। इसके अतिरिक्त तुमसे स्वतन्त्र प्रयोग नहीं करते बनता। इसलिए यदि तुम अभीतक अलोना खाने आदिका प्रयोग कर रहे हो और वह तुम्हें अनुकूल न पड़ रहा हो तो उसे छोड़ ही देना ।
<br> {{gap|3em}}तुम मेरे पत्रोंको सँभालकर रख सको, इसके लिए तुम्हें पत्र लिखने में एक ही प्रकारके कागजका प्रयोग करनेका प्रयत्न करूँगा । कुछ पत्र अवश्य ही दुबारा पढ़ने योग्य होंगे। इसके अलावा तुम मेरे विचार जाननेके लिए बहुत उत्सुक जान पड़ते हो, इसलिए यदि तुम्हें मेरा पत्र हर हफ्ते न मिले, तो जो पत्र सबसे हाल में मिला हो उसे तो इस बीच दुबारा पढ़ ही सकोगे।
मुझसे चाहे जो सवाल, चाहे जैसी भाषामें पूछने में न झिझकना ।
<br> {{gap|3em}}तुम मेरे मना करनेपर भी [भारत] चले गये हो, इसकी चिन्ता न करो। तुम अकेले रहकर अपने विचारोंको दृढ़ नहीं कर सकते। इसी कारण मैंने तुम्हें रोका था। परन्तु खुशालभाई<ref>और</ref> और देवभाभीकी<ref>जमनादासके माता-पिता ।</ref> सेवा करनेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा देखकर मुझे उसकी तुलना में तुम्हारे विचारोंको दृढ़ करनेकी अपनी इच्छा गौण लगी ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<br> {{gap|3em}}तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
<br> {{gap|3em}}छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
<br> {{gap|3em}}तुम वहाँ नीबू आदि नहीं खा पाते, यह बात मुझे कुछ रुची नहीं । तुम्हारे प्रयोगोंमें मुझे बहुत-सी खामियाँ दिखाई देती हैं। इसमें तुम्हारा दोष तिल-भर भी नहीं है। तुम अनजान होनेसे फेरफार नहीं कर पाये। इसके अतिरिक्त तुमसे स्वतन्त्र प्रयोग नहीं करते बनता। इसलिए यदि तुम अभीतक अलोना खाने आदिका प्रयोग कर रहे हो और वह तुम्हें अनुकूल न पड़ रहा हो तो उसे छोड़ ही देना ।
<br> {{gap|3em}}तुम मेरे पत्रोंको सँभालकर रख सको, इसके लिए तुम्हें पत्र लिखने में एक ही प्रकारके कागजका प्रयोग करनेका प्रयत्न करूँगा । कुछ पत्र अवश्य ही दुबारा पढ़ने योग्य होंगे। इसके अलावा तुम मेरे विचार जाननेके लिए बहुत उत्सुक जान पड़ते हो, इसलिए यदि तुम्हें मेरा पत्र हर हफ्ते न मिले, तो जो पत्र सबसे हाल में मिला हो उसे तो इस बीच दुबारा पढ़ ही सकोगे।
<br>{{gap|3em}}मुझसे चाहे जो सवाल, चाहे जैसी भाषामें पूछने में न झिझकना ।
<br> {{gap|3em}}तुम मेरे मना करनेपर भी [भारत] चले गये हो, इसकी चिन्ता न करो। तुम अकेले रहकर अपने विचारोंको दृढ़ नहीं कर सकते। इसी कारण मैंने तुम्हें रोका था। परन्तु खुशालभाई<ref>और</ref> और देवभाभीकी<ref>जमनादासके माता-पिता ।</ref> सेवा करनेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा देखकर मुझे उसकी तुलना में तुम्हारे विचारोंको दृढ़ करनेकी अपनी इच्छा गौण लगी ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<br> {{gap|3em}}तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
<br> {{gap|3em}}छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>१. सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे।
<br>{{gap|3em}}यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center>
हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>२. गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>३. डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे।
<br>{{gap|3em}}यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center>
हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center>
हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१४
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई १७, १९१२<br>माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}<br>
{{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude>
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{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,
<br>{{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,
<br>{{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
<br>{{gap|3em}}मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं -- यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? -- वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude>
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माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,
<br>{{gap|3em}}प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
<br>{{gap|3em}}मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
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जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं -- यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? -- वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
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जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
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श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं -- यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? -- वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||नया मुल्ला|२७५}}</noinclude>पेश किया जायेगा ।<ref>“ अपनी पत्नियोंको प्रवेश दिलानेके इच्छुक प्रार्थियोंके नाम जारी किये गये " इस परिपत्र में यह भी कहा गया था कि प्रार्थीके लिए श्री कजिन्सको यह विश्वास दिलाना आवश्यक होगा कि स्वयं वह वैध निवासी है। इंडियन ओपिनियन, १३७-१९१२ ।
</ref> यदि उक्त प्रमाणपत्र प्रस्तुत न किया जाय तो श्री कज़िन्स यह चाहते हैं कि किसी उच्च यूरोपीय मजिस्ट्रेटका इस आशयका प्रमाणपत्र, उसपर पत्नीका अँगूठा लगवाकर पेश किया जाये कि यह स्त्री प्रार्थीकी ही पत्नी है और उक्त उच्च अधिकारीने स्वयं प्रार्थीको शपथके आधारपर इस विवाहकी तारीख आदि की जाँच कर ली है।<ref>परिपत्र में आगे कहा गया था कि मजिस्टेटको यह घोषणा भी करनी पड़ेगी कि (क) उसके द्वारा प्रमाणित तथ्य सही हैं और (ख) उसने पुलिस द्वारा जाँच करवा ली है। उसे कागजात के साथ पुलिस जाँचकी रिपोर्ट भी नत्थी कर देना जरूरी था और यह स्पष्ट कर देना भी कि प्रार्थनापत्र में प्रवेशार्थीके तथा वह जिस व्यक्तिके अधिकारके आधारपर प्रवेश करना चाहता है, उसके बीच बताया गया सम्बन्ध सही है ।</ref> फिर प्रार्थीको अपनी शिनाख्तका भी असन्दिग्ध प्रमाण देना चाहिए और उस यूरोपीय अधिकारीको अपने सामने दिये हुए बयानोंकी मूल प्रति, पति तथा पत्नी की शिनाख्त के प्रमाणोंके साथ भेजनी चाहिए। परिपत्र में इसी प्रकारकी और भी अनेक बातें हैं । इस प्रकार श्री कज़िन्सने इस एक परिपत्रके द्वारा भारतीय स्त्रियोंका अपमान और भारतीय मजिस्ट्रेटों -- और न्यायाधीशों तक -- की ईमानदारी-पर अविश्वास तो किया ही है (न्यायाधीशोंका नाम लेनेका हमारा कारण यह है कि हमारी समझमें यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भारतीय होंगे तो श्री कज़िन्स उनके प्रमाणपत्रोंको भी नहीं मानेंगे), उन्होंने उच्च यूरोपीय अधिकारियों तक का अपमान कर डाला है, क्योंकि वह चाहते हैं कि ये उच्च यूरोपीय अधिकारी अपने प्रमाणपत्रोंके साथ वे कागजात भी भेजें जिनके आधारपर उन्होंने ये प्रमाणपत्र दिये हों । हमें आशा है कि इस असाधारण परिपत्रके विषय में भारत सरकार अपना कुछ-न कुछ मत प्रकट करेगी; इसके द्वारा भारतीय जनताका जो अकारण अपमान किया गया है उसे वह चुपचाप नहीं सह लेगी; और नेटालके भारतीय इसकी वही गति करेंगे जिसके कि यह योग्य है और अपनी पत्नियोंके अँगूठेका या अन्य कोई निशान लगवानेसे साफ इनकार कर देंगे । भारतीय पुरुषोंपर यदि छद्म-परिचय देने या चोरी-छिपे प्रवेश करने<ref>सन् १९०६ से ही भारतीयोंपर बार-बार यह आरोप लगाया जा रहा था कि वे चोरी-छिपे उपनिवेशमें प्रवेश कर जाते हैं और अपना छदम-परिचय देते हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २३१-३२ और ४३४, खण्ड ६ पृष्ठ १, ५५-५६; खण्ड ७ पृष्ठ २८६-८७ और खण्ड ८, पृष्ठ ९-११, ११७-२० तथा १७४ |
</ref> आदिका कोई सन्देह हो तो उनसे अपनी शिनाख्त देनेको कहना एक बात है; परन्तु भारतीय स्त्रियोंका अपमान करने के लिए वैसी शर्त रखना और बात हो जाती है । आशा है कि संघकी सरकार इस परिपत्रको वापस करवाकर साधारण साक्षीको ही पर्याप्त मान लेनेकी प्रथा जारी रहने देगी। हम श्री कजिन्सको बतलाना चाहते हैं कि किसी सरकारी अधिकारीकी योग्यता उन लोगोंको डराने-धमकाने में अपना जोश दिखलाते रहने में नहीं है, जिनसे उसका वास्ता पड़ता है प्रत्युत इस बात में है कि उसे जिन कानूनों का पालन करानेके लिए नियुक्त किया जाये<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तक काफी रुकना पड़ता है । अनिश्चित समय तक बाहर सड़कपर खड़े रहना, और कुछ न सही, बहुत थका देनवाला तो होता ही है। वस्तुतः जिन लोगोंको वहाँ खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ी है, उन्होंने अक्सर ब्रिटिश भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन
होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>१. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको-- जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref>
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४१. पत्र : गृह-सचिवको'''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:गृह-सचिव
:प्रिटोरिया
:महोदय,
{{gap|1em}}१९ तारीखका आपका तार और पत्र प्राप्त हुए ।<ref>२. देखिए " पत्र : गृह-मन्त्रीको ", पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २७८ ।</ref> तदर्थ धन्यवाद !
इस वर्षके छ: शिक्षित भारतीय प्रवेशाथियोंके नामोंकी सूची में यथासमय भेजूंगा ।<ref>३. यदि गांधीजीने सूची भेजी हो तो वह उपलब्ध नहीं है ।</ref>
{{right|आपका<br>मो० क० गांधी}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६८) तथा २७-७-१९१२ के 'इंडियन ओपिनियन'से ।<noinclude></noinclude>
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होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>१. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको--जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref>
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होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>१. श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको--जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref>
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<center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>१. एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें । " - (एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
{{gap|3em}}जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा जीविकोपार्जनके लिए ट्रान्सवालमें कोई रोजगार करना चाहते हैं, परन्तु चूंकि खयाल यह था कि पिछले अधिवेशन में कानून बन ही जायेगा, इसलिए समाजने श्री सोढाके गुजारेकी व्यवस्था कर दी । परन्तु वे, स्वाभाविक है, बेकार नहीं बैठना चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो ।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो - नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center>
संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>२. जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>३. २० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>४. देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude></noinclude>
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<center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>१. एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें ।"--(एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
{{gap|2em}}जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा जीविकोपार्जनके लिए ट्रान्सवालमें कोई रोजगार करना चाहते हैं, परन्तु चूंकि खयाल यह था कि पिछले अधिवेशन में कानून बन ही जायेगा, इसलिए समाजने श्री सोढाके गुजारेकी व्यवस्था कर दी । परन्तु वे, स्वाभाविक है, बेकार नहीं बैठना चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो ।
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टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो-नकलसे ।
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संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>२. जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>३. २० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>४. देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude></noinclude>
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टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center>
संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>२० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२०
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap|3em}}परन्तु लॉर्ड ऍम्टहिलके, जो हमारे पक्षका समर्थन अनथक उत्साहसे करते रहे हैं, आक्षेपोंका उत्तर अबतक नहीं दिया गया है।<ref>लॉर्ड सभामें अस्थायी समझौतेके अमलके विषय में लॉर्ड ऍम्टहिलके १७ जुलाई, १९१२ को किये गये प्रश्नके लिए देखिए परिशिष्ट १८ ।</ref> उनका प्रधान आक्षेप यह है कि समझौते के शब्दोंका तो पालन किया जा रहा है, परन्तु उसकी भावनाको भंग कर दिया गया है। भावना यह है--और जनरल बोथाकी सार्वजनिक घोषणाएँ<ref>सन् १९०९ में बोथाने लॉर्ड कर्ज़नको आश्वासन दिया था कि वे ब्रिटिश भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार करेंगे; देखिए खण्ड ९, पृष्ठ १७४ । २३ मई १९११ को अस्थायी समझौतेपर अपने विचार प्रकट करते हुए जनरल बोयाने कहा था कि समझौता बहुत उपयुक्त समयपर हुआ। उन्होंने यह चेतावनी तो दी थी कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल उन्हीं भारतीयोंको प्रवेश करने दिया जायेगा, जिन्हें समझौते के अनुसार ऐसा करनेका अधिकार होगा; किन्तु साथ ही उन्होंने यह वचन भी दिया था कि भविष्य में भारतीय क जीवनकी परिस्थितियोंको दक्षिण आफ्रिकामें जितना सा बनाया जा सकता है, उतना सा बनानेकी पूरी कोशिश की जायेगी । सच तो यह है कि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनके मनमें भारतीयों के प्रति कोई दुर्भाव नहीं है । लन्दन में शादी परिषद् में भाग लेनेके बाद, २६ सितम्बर, १९१२ को रीट फॉटोनमें बोलते हुए उन्होंने कहा था कि एशियाई सवालको हल करनेकी कोशिश में जनरल स्मट्सने इतना परिश्रम किया कि वे सूख कर काँटा हो गये ।</ref> भी यही हैं -- कि जो भारतीय दक्षिण आफ्रिकामें बस चुके हैं उन्हें शान्तिपूर्वक रहने दिया जायेगा । परन्तु जबतक भारतके कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त पत्नियोंको यहाँ से लौटाया जाता रहेगा, जबतक स्वर्ण-अधिनियम<ref>देखिए “कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५ और परिशिष्ट २१ ।</ref> और कस्बा-कानूनका<ref>स्वर्ण- अधिनियम या करवा-कानूनके द्वारा उन भारतीयोंको बस्तियोंमें जाकर बसनेपर मजबूर किया जा रहा था, जो " घोषित क्षेत्रों " तथा अन्य ऐसे क्षेत्रोंमें रह रहे थे, जहाँ उन्होंने अपना खासा कारोबार बना लिया था । जो स्थान इससे प्रत्यक्ष रूपसे प्रभावित होते थे उनमें क्लार्क्सडॉर्प (“ कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५) क्रूगर्सडॉप (“ तूफान उमड़ रहा है ", पृ४ १३५ ) और रूडीपूर्ट तथा जस्टिन ( " जर्मिस्टनके भारतीय", पृष्ठ १५२-५३ और २४४ ) आदि शामिल थे ।</ref> प्रयोग इस प्रकार किया जाता रहेगा कि भारतीय व्यापारी लगभग तबाह हो जायें, जबतक पुराने निवासियोंके बसनेके लिए पहले जो वस्तियाँ निर्दिष्ट की गई थीं उन्हें उनसे निकलनेपर विवश किया जाता रहेगा, जबतक निवासके प्रमाणपत्रोंकी उपेक्षा की जाती रहेगी, जबतक विवाह अथवा अधिवास प्रमाणित करने के लिए असम्भव प्रमाणोंकी माँग की जाती रहेगी और जबतक परवाना कानूनोंके अत्याचारपूर्ण अमलके द्वारा व्यापार करना प्रायः असम्भव किया जाता रहेगा, तबतक शान्ति नहीं हो सकेगी ।<ref>भारतीयों के विरोध के परिणाम स्वरूप सन् १९११ और १९१२ के संघ प्रवासी विधेयक में जनरल स्मट्स द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनोंसे सहमत होते हुए गांधीजीने कहा था कि अपनी दूसरी शिकायतों (जिनका खासा ब्योरा इस लेख में मिल जाता है) को लेकर भारतीय भविष्य में संघर्ष कर सकते हैं; देखिए “तार : गृह-मन्त्रीको", पृष्ठ २२४-२५ और “ आखिरकार ! " पृष्ठ ९१-९२ ।</ref>
:[अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२१
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center>
{{gap|1em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
<br>{{gap|5em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
<br>{{gap|1em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center>
{{gap|2em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
<br>{{gap|4em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
<br>{{gap|2em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>१. आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>२. न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center>
<br>{{gap|3em}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
<br>{{gap|4em}}'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
<br>{{gap|2em}}परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref>सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन
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किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२३
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>१. गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा ।
{{gap|3em}}अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>२. यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है । मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br> ट्रान्सवाल<br>आषाढ शुक्ल १४, [ जुलाई २७, १९१२]}}<ref>३. पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref>
भाई श्री मनसुख,
{{gap|3em}}<br>आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>४. मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude></noinclude>
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2026-08-20T16:46:17Z
सीमा1
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>१. गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा ।
<br>{{gap|3em}} अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>२. यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है । मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br> ट्रान्सवाल}}
{{gap|20em}}आषाढ शुक्ल १४,[ जुलाई २७, १९१२]<ref>३. पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref>
<br>भाई श्री मनसुख,
<br>{{gap|3em}}आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>४. मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>१. गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा ।
<br>{{gap|3em}} अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
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<br>भाई श्री मनसुख,
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<br>{{gap|3em}} अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
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<br>भाई श्री मनसुख,
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२४
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{{gap|2em}}मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''१. स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>२. और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये।
<br>{{gap|3em}}सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना।
{{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>जुलाई २८, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
<br>{{gap|3em}}आपका तार<ref>३. जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं।
<br>{{gap|3em}}यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
<br>{{gap|3em}}यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
<br>{{gap|3em}}आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
[गो० कृ० गोखले<br>
इंग्लैंड ]
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
<br>{{gap|3em}}यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
<br>{{gap|3em}}आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
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[गो० कृ० गोखले<br>इंग्लैंड ]
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
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<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
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प्रिय श्री गोखले,
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४८. पत्र : एशियाई-पंजीयकको'''}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई २९, १९१२}}
[ महोदय, ]
{{gap|3em}}<br>आपका इसी २६ तारीखका कृपा-पत्र<ref>१. देखिए पृष्ठ २८२, पाद-टिप्पणी १ ।</ref> प्राप्त हुआ । मेरी नम्र रायमें, अगर किसी खास समुदाय के लोग सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता।
{{gap|3em}}<br>मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
{{right|मो० क० गांधी}}
[ अंग्रेजीसे ]<br>'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई - सभा में<ref>२. इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुत-से यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे। ११-१९</ref>'''}}</center>
{{right|अगस्त १, १९१२}}
'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४८. पत्र : एशियाई-पंजीयकको'''}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई २९, १९१२}}
[ महोदय, ]
{{gap|3em}}<br>आपका इसी २६ तारीखका कृपा-पत्र<ref>१. देखिए पृष्ठ २८२, पाद-टिप्पणी १ ।</ref> प्राप्त हुआ । मेरी नम्र रायमें, अगर किसी खास समुदाय के लोग सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता।
{{gap|3em}}<br>मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]<br>'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई - सभा में<ref>२. इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुत-से यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे। ११-१९</ref>'''}}</center>
{{right|अगस्त १, १९१२}}
'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude></noinclude>
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{{gap|3em}}<br>मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
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{{gap|3em}}<br>'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude></noinclude>
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{{gap|3em}}<br>मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
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:[ अंग्रेजीसे ]<br>'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
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<br>{{gap|3em}}'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
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<br>{{gap|3em}}मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''यह सब श्री वी० ए० चेट्टियारके सम्मान में दिये गये भोजके अवसरपर हुआ, . . . श्री चेट्टियार मद्रास वापस जानेवाले हैं।'''
'''श्री गांधीने, जिन्हें श्री हॉस्केनने सत्याग्रहका मन्त्र-दृष्टा और गुरु बताया, अपने श्रोताओं को चेतावनी दी कि दक्षिण अफ्रिकाका महान संघर्ष अभी हरगिज समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वह थम-भर गया है और हो सकता है कि समाजको फिर काफी कष्ट झेलना पड़े।'''
'''"अतिथियों" के लिए शुभकामना व्यक्त करते हुए श्री गांधीने श्री हॉस्केन तथा अन्य उपस्थित यूरोपीयोंकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप लोगोंकी बदौलत ही आज हम सब इस मेजपर बराबरीको हैसियतसे इकट्ठा हुए हैं। मेरी समझमें तो हर सभ्य देशमें, और विशेष रूपसे हर ईसाई समाजमें, समानताकी भावना एक साधारण-सी बात होनी चाहिए। किन्तु चूंकि हमें भयंकर कठिनाइयों और पूर्वग्रहोंसे गुजरना पड़ रहा है, इसलिए किसी भी प्रकारकी समानताका दर्जा प्राप्त कर सकना हमारे लिए सौभाग्य की बात बन जाती है।'''
:[ अंग्रेजीसे ]<br>'''ट्रान्सवाल लीडर,''' २-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५०. जर्मिस्टनकी बस्ती'''}}</center>
जस्टिन में जिस स्थानपर नया एशियाई बाजार खोलनेका विचार किया जा रहा है, हम उसके विषय में अन्यत्र संघ-सरकारके कार्यकारी स्वास्थ्य चिकित्साधिकारी (मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ) डॉ० एफ० आरनॉल्डका विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। हमारी सम्मतिम विवरण नगर परिषद द्वारा चुने हुए स्थानकी विशेष वकालत करता है। डॉ० मैकनैबने इस स्थानके विरुद्ध जो सख्त बातें कही थीं इसमें उनकी उपेक्षा कर दी गई है। यह ठीक है कि डॉ० मैकनैबने अपने कुछ एतराज वापस ले लिए हैं, परन्तु उनकी मुख्य आपत्ति--कि बस्तीका स्थान एक लम्बे-चौड़े घूरेके समीप रखा जानेवाला है और जहाँ घिनौने पशु-ज्वरसे बीमार होकर मरनेवाले जानवरोंको दफनाया जाता रहा है--अब भी कायम है। डॉ० आरनॉल्डने कुछ शर्तें लगा रखी हैं, जिनके पूरा होनेपर ही स्थानको एक चिकित्सा-सम्बन्धी दृष्टिसे उपयुक्त ठहराया जा सकेगा।
इससे भी यही सिद्ध होता है कि डॉ० मैकनैबकी कठोर आलोचना सर्वथा उचित थी । फिर यह भुला देना भी ठीक नहीं होगा कि जस्टिनकी नगरपालिका द्वारा चुनी हुई जगहमें वह खास टुकड़ा भी आ जाता है जहाँ नगरका मलमूत्र डाला जाता रहा है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसे यह बात अलबत्ता कुछ सन्तोषकी हो सकती है कि बस्तीका यह भाग कुछ समय तक इमारतें बनाने के काममें नहीं लाया जायेगा; परन्तु इस प्रकारके मामलोंमें केवल चिकित्साधिकारीकी अनुकूल सम्मतिको विभिन्न आपत्तियों का निर्णयात्मक उत्तर नहीं माना जा सकता। वैद्यकीय दृष्टिसे कोई पुराना<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}}
{{left|[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय,
{{gap|3em}}आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ।
मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}}
{{left|[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय,}}
{{gap|3em}}आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ।
<br>{{gap|3em}}मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
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{{gap|3em}}आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ।<br>
{{gap|3em}}मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
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<br>{{gap|3em}}आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>१. और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>१. और २. देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ।<br>
{{gap|3em}}मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
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{{gap|3em}}<br>मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude></noinclude>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो
कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center>
{{gap|23em}}[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref>
चि० बली और चंची,
{{gap|3em}}<br>तुम दोनोंके पत्र मिले ।
{{gap|3em}}<br>मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है।
{{gap|3em}}<br>चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude>
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2026-08-20T17:20:45Z
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कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
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{{left|चि० बली और चंची,}}<br>
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{{gap|3em}}मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है।
{{gap|3em}}<br>चि० वेणीने<ref>३. प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो
कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center>
{{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>२. मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref>}}
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टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
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{{gap|3em}}मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है।<br>
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कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>१. एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
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टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश|२९३}}</noinclude>जाने दिया था, और अब भी मेरा वही खयाल बना हुआ है कि वह अपनेको वहाँ ज्यादा सुखी महसूस करेगी; हरिलालकी भी यही इच्छा थी। इसीलिए उसे वहाँ जाने दिया। अभी यह कह सकना कठिन है कि मैं वहाँ कब जा पाऊँगा। मेरा खयाल है कि जबतक विधेयक पास नहीं हो जाता तबतक यहाँसे निकल सकना सम्भव नहीं है।
कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।
यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।
मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>१. डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>२. कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>३. बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस०एन० ९५३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश|२९३}}</noinclude>जाने दिया था, और अब भी मेरा वही खयाल बना हुआ है कि वह अपनेको वहाँ ज्यादा सुखी महसूस करेगी; हरिलालकी भी यही इच्छा थी। इसीलिए उसे वहाँ जाने दिया। अभी यह कह सकना कठिन है कि मैं वहाँ कब जा पाऊँगा। मेरा खयाल है कि जबतक विधेयक पास नहीं हो जाता तबतक यहाँसे निकल सकना सम्भव नहीं है।
कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।
यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।
मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>१. डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>२. कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>३. बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
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{{gap|3em}}कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।
{{gap|3em}}यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।
{{gap|3em}}मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>१. डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>२. कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>३. बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस०एन० ९५३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश|२९३}}</noinclude>जाने दिया था, और अब भी मेरा वही खयाल बना हुआ है कि वह अपनेको वहाँ ज्यादा सुखी महसूस करेगी; हरिलालकी भी यही इच्छा थी। इसीलिए उसे वहाँ जाने दिया। अभी यह कह सकना कठिन है कि मैं वहाँ कब जा पाऊँगा। मेरा खयाल है कि जबतक विधेयक पास नहीं हो जाता तबतक यहाँसे निकल सकना सम्भव नहीं है।<br>
{{gap|3em}}कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।<br>
{{gap|3em}}यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।<br>
{{gap|3em}}मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>१. डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>२. कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>३. बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस०एन० ९५३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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{{gap|3em}}कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।<br>
{{gap|3em}}यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।<br>
{{gap|3em}}मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
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{{gap|3em}}कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।<br>
{{gap|3em}}यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।<br>
{{gap|3em}}मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२५३. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>अगस्त ४, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
आपकी लम्बी चिट्ठीके<ref>१. जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।</ref> लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे<ref>२. अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर
लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।</ref> आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे' तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर
महोदय करेंगे। अपने प्रवासका अन्तिम सप्ताह आप फीनिक्स, डर्बनमें बितायेंगे। और
३. जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा '''इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास,''' अध्याय ५ और ३२ भी ।<noinclude></noinclude>
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प्रिय श्री गोखले,
आपकी लम्बी चिट्ठीके<ref>१. जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।</ref> लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे<ref>२. अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर
लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।</ref> आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे<ref>३. जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा '''इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास,''' अध्याय ५ और ३२ भी ।</ref> तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर
महोदय करेंगे। अपने प्रवासका अन्तिम सप्ताह आप फीनिक्स, डर्बनमें बितायेंगे। और<noinclude></noinclude>
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प्रिय श्री गोखले,
<br>{{gap|3em}}आपकी लम्बी चिट्ठीके<ref>१. जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।</ref> लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे<ref>२. अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर
लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।</ref> आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे<ref>३. जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा '''इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास,''' अध्याय ५ और ३२ भी ।</ref> तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर
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प्रिय श्री गोखले,
<br>{{gap|3em}}आपकी लम्बी चिट्ठीके<ref>जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।</ref> लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे<ref>अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर
लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।</ref> आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे<ref>जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा '''इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास,''' अध्याय ५ और ३२ भी ।</ref> तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर
महोदय करेंगे। अपने प्रवासका अन्तिम सप्ताह आप फीनिक्स, डर्बनमें बितायेंगे। और<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh||श्री टाटाकी उदारता|२९५}}</noinclude>फिर आप डर्बनसे जहाज द्वारा प्रस्थान करेंगे। आपका भारत जानेका टिकट आपके यहाँ आ जानेके बाद सुविधापूर्वक लिया जा सकता है।
<br>{{gap|3em}}मैंने कार्यक्रमकी रूपरेखा पहलेसे ही इसलिए तैयार कर ली है कि यदि आप उसमें कोई परिवर्तन करना चाहें तो तार और पत्रसे सूचित कर दें।
<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
बनाये और हमें तथा शाही सरकारको भी सीधा कह दे कि वह लाचार है। उस हालत में संघर्ष तीव्र और भयानक हो जायेगा; परन्तु वह तबतक जारी ही रहेगा जबतक हममें से दो-चार भी जीवित हैं।
<br>{{gap|3em}}श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
<br>{{gap|3em}}श्री टाटाने फिर २५,००० रुपये देकर कितनी बड़ी कृपा की है ? मैं जानता हूँ कि यह सब आपकी ही बदौलत है। हर बार दान ऐन मौकेपर पहुँचा है। फार्मको चलाना मुश्किल होता जा रहा था।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो - नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस
१. श्री टाटा द्वारा दिये गये अन्य अनुदानोंके लिए देखिए पाद-टिप्पणी १ पृष्ठ २४५ ।
२. यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}मैंने कार्यक्रमकी रूपरेखा पहलेसे ही इसलिए तैयार कर ली है कि यदि आप उसमें कोई परिवर्तन करना चाहें तो तार और पत्रसे सूचित कर दें।
<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
बनाये और हमें तथा शाही सरकारको भी सीधा कह दे कि वह लाचार है। उस हालत में संघर्ष तीव्र और भयानक हो जायेगा; परन्तु वह तबतक जारी ही रहेगा जबतक हममें से दो-चार भी जीवित हैं।
<br>{{gap|3em}}श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
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गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो - नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>२. यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस<noinclude></noinclude>
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<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
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<br>{{gap|3em}}श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
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गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
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श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>२. यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
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<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
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<br>{{gap|3em}}श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
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गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
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श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>२. यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
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<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
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{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
{{gap|1em}}श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>२. यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||श्री टाटाकी उदारता|२९५}}</noinclude>फिर आप डर्बनसे जहाज द्वारा प्रस्थान करेंगे। आपका भारत जानेका टिकट आपके यहाँ आ जानेके बाद सुविधापूर्वक लिया जा सकता है।
<br>{{gap|3em}}मैंने कार्यक्रमकी रूपरेखा पहलेसे ही इसलिए तैयार कर ली है कि यदि आप उसमें कोई परिवर्तन करना चाहें तो तार और पत्रसे सूचित कर दें।<br>{{gap|3em}}यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
बनाये और हमें तथा शाही सरकारको भी सीधा कह दे कि वह लाचार है। उस हालत में संघर्ष तीव्र और भयानक हो जायेगा; परन्तु वह तबतक जारी ही रहेगा जबतक हममें से दो-चार भी जीवित हैं।<br>
{{gap|3em}}श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।<br>{{gap|3em}}श्री टाटाने फिर २५,००० रुपये<ref>श्री टाटा द्वारा दिये गये अन्य अनुदानोंके लिए देखिए पाद-टिप्पणी १ पृष्ठ २४५ ।</ref> देकर कितनी बड़ी कृपा की है ? मैं जानता हूँ कि यह सब आपकी ही बदौलत है। हर बार दान ऐन मौकेपर पहुँचा है। फार्मको चलाना मुश्किल होता जा रहा था।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
{{gap|1em}}श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>संघर्षके कितने प्रशंसक हैं। श्री टाटाने सत्याग्रहियोंको ही नहीं, दक्षिण आफ्रिकाकी समस्त भारतीय जनताको अपना चिर ऋणी बना लिया है। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी परेशानियाँ कम कर दी हैं। जो लोग इस संघर्षमें संलग्न हैं, उनका उत्साह यह देखकर बढ़ जाता है कि ऐसे प्रतिष्ठित भारतीय भी हमारे पृष्ठपोषक हैं। और इससे उन्हें अपना लक्ष्य भी कुछ समीप आ गया जान पड़ता है। जो लोग पूर्वग्रहके कारण हमारे विरोधी बने हुए हैं, उनपर इस प्रकारकी सहायताका जो नैतिक प्रभाव पड़ता है, वह तो स्पष्ट ही है।
:[अंग्रेजीसे]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-८-१९१२
{{dhr}}
{{c|{{x-larger|'''२५५. शेरिफकी सभा'''}}}}
<br>{{gap|1em}}भारतमें किसी बड़े नगरके शेरिफ द्वारा बुलाई गई सभाकी वही वकत मानी जाती है जो यहाँ, समझ लीजिए, डर्बनके महापौर (मेयर) द्वारा बुलाई हुई सभाकी हो सकती है। भारतमें "शेरिफ" शब्दका अर्थ वही नहीं है जो हम यहाँ दक्षिण आफ्रिकामें समझते हैं। "शेरिफ" का पद अवैतनिक होता है और यह भारतके अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिकोंको प्रदान किया जाता है। हमारे जिन पाठकोंको भारतके विषयमें अधिक मालूम नहीं है वे भी अब जान जायेंगे कि हालमें बम्बईमें शेरिफके बुलाये जानेपर जो सार्वजनिक सभा हुई थी उसका क्या महत्व है। स्पष्ट है कि इस सभा में बम्बईकी जनताके सभी वर्गोका प्रतिनिधित्व था। और इसीलिए इसके प्रस्तावोंका असर पड़े बिना नहीं रह सकता। सभाने ब्रिटिश उपनिवेशोंमें बसे हुए अपने देशवालोंकी समग्र स्थितिपर विचार करके सर्वथा उचित ही किया। पूर्वी आफ्रिकाके यूरोपीय हमारे देशवालोंको उस ब्रिटिश-रक्षित प्रदेशसे खदेड़कर बाहर निकाल देना चाहते हैं। वे इतना तक नहीं समझते कि यदि भारतीय वहाँसे चले जायें तो वह देश शीघ्र ही भयंकर वीराने में परिवर्तित हो जायेगा। कैनेडा अपने यहाँ कानूनन बसे हुए भारतीयोंकी पत्नियों तक को प्रवेश नहीं देता कि वे अपने पतियोंके साथ रह सकें। इस प्रकार वह न्याय और शिष्टताके सभी नियमोंकी उपेक्षा कर रहा है। अपने सफल प्रतिस्पर्धियोंके प्रति द्वेष तो समझमें आ सकता है, परन्तु स्वार्थके वशीभूत होकर किये गये पागल-पनके कामोंको समझना असम्भव है। कहनेको कैनेडा ब्रिटिश उपनिवेशोंमें सबसे पुराना और सबसे अधिक सभ्य उपनिवेश है, परन्तु वहाँ इन दिनों यही सब हो रहा है।
<br>{{gap|3em}}पारसी बैरॉनेटके सभापतित्वमें की गई इस सभामें इन्हीं सब प्रश्नोंपर विचार किया गया था। दूर-दूरके देशोंमें बसे हुए हम लोगोंको अधिकार है कि हम अपनी मातृभूमि से सहायताकी आशा करें। ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है और भारतसे बाहर गये हुए लोगोंकी दशाके बारेमें देशको अधिक व्यापक जानकारी होती जाती है, त्यों-त्यों वहाँ सहानुभूति बढ़ती जाती है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>संघर्षके कितने प्रशंसक हैं। श्री टाटाने सत्याग्रहियोंको ही नहीं, दक्षिण आफ्रिकाकी समस्त भारतीय जनताको अपना चिर ऋणी बना लिया है। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी परेशानियाँ कम कर दी हैं। जो लोग इस संघर्षमें संलग्न हैं, उनका उत्साह यह देखकर बढ़ जाता है कि ऐसे प्रतिष्ठित भारतीय भी हमारे पृष्ठपोषक हैं। और इससे उन्हें अपना लक्ष्य भी कुछ समीप आ गया जान पड़ता है। जो लोग पूर्वग्रहके कारण हमारे विरोधी बने हुए हैं, उनपर इस प्रकारकी सहायताका जो नैतिक प्रभाव पड़ता है, वह तो स्पष्ट ही है।
:[अंग्रेजीसे]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-८-१९१२
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{{c|{{x-larger|'''२५५. शेरिफकी सभा'''}}}}
<br>{{gap|3em}}भारतमें किसी बड़े नगरके शेरिफ द्वारा बुलाई गई सभाकी वही वकत मानी जाती है जो यहाँ, समझ लीजिए, डर्बनके महापौर (मेयर) द्वारा बुलाई हुई सभाकी हो सकती है। भारतमें "शेरिफ" शब्दका अर्थ वही नहीं है जो हम यहाँ दक्षिण आफ्रिकामें समझते हैं। "शेरिफ" का पद अवैतनिक होता है और यह भारतके अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिकोंको प्रदान किया जाता है। हमारे जिन पाठकोंको भारतके विषयमें अधिक मालूम नहीं है वे भी अब जान जायेंगे कि हालमें बम्बईमें शेरिफके बुलाये जानेपर जो सार्वजनिक सभा हुई थी उसका क्या महत्व है। स्पष्ट है कि इस सभा में बम्बईकी जनताके सभी वर्गोका प्रतिनिधित्व था। और इसीलिए इसके प्रस्तावोंका असर पड़े बिना नहीं रह सकता। सभाने ब्रिटिश उपनिवेशोंमें बसे हुए अपने देशवालोंकी समग्र स्थितिपर विचार करके सर्वथा उचित ही किया। पूर्वी आफ्रिकाके यूरोपीय हमारे देशवालोंको उस ब्रिटिश-रक्षित प्रदेशसे खदेड़कर बाहर निकाल देना चाहते हैं। वे इतना तक नहीं समझते कि यदि भारतीय वहाँसे चले जायें तो वह देश शीघ्र ही भयंकर वीराने में परिवर्तित हो जायेगा। कैनेडा अपने यहाँ कानूनन बसे हुए भारतीयोंकी पत्नियों तक को प्रवेश नहीं देता कि वे अपने पतियोंके साथ रह सकें। इस प्रकार वह न्याय और शिष्टताके सभी नियमोंकी उपेक्षा कर रहा है। अपने सफल प्रतिस्पर्धियोंके प्रति द्वेष तो समझमें आ सकता है, परन्तु स्वार्थके वशीभूत होकर किये गये पागल-पनके कामोंको समझना असम्भव है। कहनेको कैनेडा ब्रिटिश उपनिवेशोंमें सबसे पुराना और सबसे अधिक सभ्य उपनिवेश है, परन्तु वहाँ इन दिनों यही सब हो रहा है।
<br>{{gap|3em}}पारसी बैरॉनेटके सभापतित्वमें की गई इस सभामें इन्हीं सब प्रश्नोंपर विचार किया गया था। दूर-दूरके देशोंमें बसे हुए हम लोगोंको अधिकार है कि हम अपनी मातृभूमि से सहायताकी आशा करें। ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है और भारतसे बाहर गये हुए लोगोंकी दशाके बारेमें देशको अधिक व्यापक जानकारी होती जाती है, त्यों-त्यों वहाँ सहानुभूति बढ़ती जाती है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/४५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले
श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया
और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका
कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके
ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश
रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त
सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल
है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त
सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल
है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{c|{{larger|'''३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले'''}}}}</noinclude>श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया
और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त
सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{c|{{larger|'''३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले'''}}}}</noinclude>श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया
और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{c|{{larger|'''३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले'''}}}}</noinclude>
श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया
और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{c|{{larger|'''३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले'''}}}}</noinclude>श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|{{larger|'''३१०. राष्ट्रीय कांग्रेस में श्री गोखले'''}}}}</noinclude>{{gap}}श्री गोखलेने इस उपमहाद्वीप [ के अपने दौरे ] में अत्यन्त कठिन परिश्रम किया और अब भारत लौटते ही बिना विश्राम लिये वहाँ भी काम शुरू कर दिया है।
कांग्रेसके बाँकीपुर अधिवेशनमें गिरमिट प्रथाको पूरे तौरपर बन्द करनेके समर्थन में
वे एक प्रस्ताव पास कराने में सफल हो गये हैं । हमारा विश्वास है कि शीघ्र ही
इस प्रथाका अन्त हो जायेगा । श्री गोखलेकी आदत किसी कामको अधूरा छोड़नेकी
नहीं है । वे जिस कामको हाथमें लेते हैं, उसे भली-भाँति सम्पन्न करते हैं। वे कोई
भी लड़ाई अन्ततक लड़ते हैं । वे पीछे हटनेवाले सेनापति नहीं हैं। इसलिए हमारा
निश्चित विश्वास है कि इन मूक गिरमिटिया मजदूरोंके हित उनके हाथोंमें सुरक्षित
हैं । कहते हैं, अपने प्रस्तावके समर्थन में बोलने के अलावा श्री गोखलेने अपने भाषण में अपने भारतीय आलोचकोंको भी जवाब दिया।<ref>रायटरके एक तारके अनुसार श्री गोखलेने गिरमिट प्रथाको पूरी तरह समाप्त कर देनेका आग्रह करते हुए बांकीपुर कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें भारत सरकारसे भविष्यमें गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती रोक देनेका आग्रह किया गया था। तार में आगे बताया गया था, “... श्री गोखलेने अपने आलोचकोंको लक्ष्य करके कहा कि न मैंने और न श्री गांधीने ही दक्षिण आफ्रिकामे [ भारतीय ] प्रवासको सीमित करनेका कोई आश्वासन दिया है, और न हमने भारतीयोंका रती-भर अधिकार ही छोड़ा है। मैं श्री गांधीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अपने प्रयासको दक्षिण आफ्रिकामें पहलेसे ही रहनेवाले भारतीयोंको वही दर्जा दिलाने तक सीमित रखना, जिसका उपभोग यूरोपीय कर रहे हैं, नीति और शिष्टताकी दृष्टिसे उचित है। भारतीयोंकी शिकायतें निम्न राहतें देकर दूर की जानी चाहिए : बिना किसी कठिनाईके दक्षिण आफ्रिका में प्रवेश तथा वहाँसे बाहर जाना; अबाध अन्तर्प्रान्तीय आवागमन; जहाँ चाहें वहाँ बसना; भूसम्पत्ति तथा अन्य सम्पत्तिपर भी अधिकार और स्वामित्व प्राप्त करना,. . . , राजनीतिक तथा नगरपालिका-सम्बन्धी मताधि-कारका उपभोग करना; तथा सरकारी नौकरी और सार्वजनिक जीवनमें स्थान पाना ... " । '''इंडियन ओपिनियन,''' ४-१-१९१३ ।</ref> मालूम होता है, इन आलोचकोंने
कुछ ऐसा खयाल बना रखा था कि श्री गोखलेने कुछ अधिकारोंका त्याग करके
घाटेका सौदा किया है । यहाँ मेजर सिल्बर्न-जैसे लोगोंने उनकी आलोचना की है तथा
उनपर दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंको धमकाने का आरोप लगाया है। यदि अपनी अन्तरात्माके ही निर्देशपर चलनेवाला कोई जनसेवक यह भी चाहे कि सभी लोग उससे खुश रहें तो यह बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । श्री गोखले यह मानते हैं कि
यदि जनता उनसे खुश रहती है तो बहुत अच्छा; किन्तु यदि अपनी अन्तरात्माके
निर्देशपर चलते हुए उन्हें जनता या उसके किसी वर्गको नाखुश भी करना पड़े, तो
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता ।
रायटरने [श्री] गोखले द्वारा आलोचकोंको दिये गये जवाबका जो संक्षिप्त सारांश भेजा है, उससे उनके भाषणके बारेमें कोई सही राय बना सकना मुश्किल है। किन्तु, रायटरने यह कहकर हमें एक अचूक कसौटी दे दी है कि हमने दक्षिण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/४५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम
४१९
आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेन उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन
किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे
खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे
फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम
४१९
आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेन उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन
किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे
खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे
फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम|४१९}}</noinclude>आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेन उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन
किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे
खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
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फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
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पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
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सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
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गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
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किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे
खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे
फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
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खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे
फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम|४१९}}</noinclude>आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेने उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन
किया । इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा । हमारे
खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी
समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और
न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में
नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं
करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम
वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं
करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी
तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं ।
(३) जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई
सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या
कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ
तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे
फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले
फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं ।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम|४१९}}</noinclude>आफ्रिकामें जितनी भी माँगें पेश की हैं, श्री गोखलेने उन सबका आग्रहपूर्वक समर्थन किया। इसलिए उन माँगोंको यहाँ चन्द वाक्योंमें बता देना अच्छा होगा। हमारे खयालसे वे इस प्रकार हैं : (१) सम्पूर्ण संघ में प्रवाससे सम्बन्धित पूरी-पूरी कानूनी समानता; परन्तु यद्यपि हमें प्रशासनिक भेदभावका समर्थन नहीं करना चाहिए और न हम उसका समर्थन कर ही सकते हैं, फिर भी यदि प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में नये भारतीयोंको संघमें आनेकी इजाजत दी जाती है तो हमें उसका विरोध नहीं करना है। (२) निश्चय ही हमारा लक्ष्य सभी बातोंमें पूर्ण समानता है, किन्तु हम वर्तमान राजनीतिक स्थितिमें किसी प्रकारका हेरफेर करानेके लिए आन्दोलन नहीं करते; हम आरेंज फ्री स्टेटको छोड़कर संघके दूसरे सभी भागोंमें अन्य सारी कानूनी तथा प्रशासनिक निर्योग्यताओंको दूर करानेके लिए अवश्य आन्दोलन करते हैं।(३)जहाँतक आरेंज फ्री स्टेटका सवाल है, हम इतना ही चाहते हैं कि यदि कोई सर्वसामान्य प्रवासी विधेयक पास किया जाता है तो प्रवासकी हद तक उसमें समाज या कौमके आधारपर कोई भेदभाव न हो। उक्त राज्यमें हमारी अन्य सब निर्योग्यताएँ तबतक बनी रहेंगी जबतक हमारे ठीक आचरण और समयके स्वाभाविक प्रभावसे फ्री स्टेटके उन यूरोपीयोंकी वर्तमान विद्वेष-भावना नरम नहीं हो जाती, जो पहले फ्री स्टेटके और बादमें दक्षिण आफ्रिकाके नागरिक प्रतीत होते हैं।
श्री गोखलेका पूरा भाषण मिल जानेपर निःसन्देह यही जान पड़ेगा कि उन्होंने
अपनी दलील इसी आधारपर तैयार की है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ४-१-१९१३
{{c|{{larger|'''३११. 'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम'''}}}}
पाठकोंको इस अंकमें कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ेंगे। हमारा तो विश्वास है कि
यह प्रगति ही है । हमने ऐसा इस विचारसे किया है कि अगर पत्रको दो कालमोंके
बजाय तीन कालमोंमें छापा जाये, तो अधिक अच्छा है। आसानी तो इसमें होती
कि इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता। हमारा उद्देश्य तो यह है कि समय-समय-
पर स्थायी महत्वके लेखादिका प्रकाशन होता रहे ताकि जो पाठक इन प्रतियोंको
सुरक्षित रखना चाहें, वे उन्हें एक जिल्दमें बँधवा सकें। हमारा तो मन्शा यह है कि
पहले ही के समान सुपाठ्य सामग्री इसमें दी जाती रहे, लेकिन जहाँतक हो सके
संक्षिप्त आकारमें उन्हें प्रकाशित किया जाये। ऐसा करनेसे उतने ही स्थानमें या उससे
कम स्थानमें ही अधिकसे-अधिक सामग्री दी जा सकेगी। इस बारके अंकसे ही हमने
गुजराती और अंग्रेजीके पृष्ठ कम कर दिये हैं। लेकिन हमारी चेष्टा यही रहेगी कि
यद्यपि शब्द कम हों मगर सूचनाएँ अधिक से अधिक उनमें समा सकें। इस तरह आशा
है कि कम्पोजिटरोंका कार्य तो कम हो जायेगा मगर लेखकोंका कार्य बढ़ जायेगा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|बाईस|}}
{|width=100%
|-
|२५१. || पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको (३-८-१९१२) ||२९२
|-
|२५२. || बली वोरा और चंचलबह्न गांधीको लिखे पत्रका अंश ( ३-८-१९१२के बाद)||२९२
|-
|२५३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (४-८-१९१२) ||२९४
|-
|२५४.|| श्री टाटाकी उदारता (१०-८-१९१२)||२९५
|-
|२५५.||शैरिफकी सभा ( १०-८ - १९१२)||२९६
|-
|२५६.||अवैध विनियम ( १०-८ - १९१२)||२९७
|-
|२५७.||माननीय श्री गोखले (१०-८-१९१२)||२९७
|-
|२५८.||पत्र : छगनलाल गांधीको (१६-८-१९१२)||२९८
|-
|२५९.|| जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३००
|-
|२६०.||जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३०१
|-
|२६१.|| पत्र : एशियाई-पंजीयकको (१९-८-१९१२)||३०२
|-
|२६२.||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२२-८-१९१२)||३०२
|-
|२६३.||एक उदात्त जीवनगाथा ( २४-८-१९१२ )||३०४
|-
|२६४.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभा (२५-८-१९१२)||३०७
|-
|२६५.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभामें ( २५-८-१९१२)||३०९
|-
|२६६.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२९-८-१९१२)||३०९
|-
|२६७.||श्री ह्यूमका देहान्त (३१-८-१९१२)||३१०
|-
|२६८.||ट्रान्सवालमें रेल यात्रा (३१-८-१९१२ )||३११
|-
|२६९.||स्पष्टतः कष्टदायक ( ३१-८-१९१२)||३१२
|-
|२७०.||पत्र : हरिलाल गांधीको (५-९-१९१२)||३१३
|-
|२७१.||श्री और श्रीमती पोलक ( ७-९ - १९१२)||३१४
|-
|२७२.||महाविभव आगाखाँ (७-९-१९१२)||३१५
|-
|२७३.. || तुमसे ऐसी आशा नहीं थी ! (९-७-१९१२)||३१६
|-
|२७४.|| फीनिक्सका न्यासपत्र (१४-९-१९१२)||३१८
|-
|२७५.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२२
|-
|२७६.|| जोहानिसबर्गका प्रस्तावित स्कूल (१४-९-१९१२)||३२३
|-
|२७७.|| अधिकारियों द्वारा कानूनकी अवज्ञामें वृद्धि (१४-९-१९१२)||३२४
|-
|२७८.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२५
|-
|२७९.|| मुसलमान पत्नियाँ (२१-९-१९१२)||३२७
|-
|२८०.|| प्रवासी अधिकारियोंके कान फिर खींचे गये (२८-९-१९१२)||३२८
|-
|२८१.|| माननीय श्री गोखलेका शुभागमन (५-१०-१९१२)||३२९
|-
|२८२.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१६-१०-१९१२ )||३३०
|-
|२८३.|| श्री गोखलेका आगमन ( १९-१०-१९१२ )||३३१
|-
|२८४.|| भेंट : 'केप आर्गस' को (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८५.|| भाषण : केप टाउनमें गो० कृ० गोखलेकी स्वागत-सभायें (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८६.|| भाषण : किम्बर्लेकी सभामें ( २५-१०-१९१२ )||३३४
|-
|२८७.|| भाषण : किम्बर्लेमें गोखलेको दिये गये भोजके अवसरपर (२६-१०-१९१२)||३३५
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|बाईस|}}
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|-
|२५१. || पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको (३-८-१९१२) ||२९२
|-
|२५२. || बली वोरा और चंचलबह्न गांधीको लिखे पत्रका अंश (३-८-१९१२के बाद)||२९२
|-
|२५३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (४-८-१९१२) ||२९४
|-
|२५४.|| श्री टाटाकी उदारता (१०-८-१९१२)||२९५
|-
|२५५.||शैरिफकी सभा ( १०-८ - १९१२)||२९६
|-
|२५६.||अवैध विनियम ( १०-८ - १९१२)||२९७
|-
|२५७.||माननीय श्री गोखले (१०-८-१९१२)||२९७
|-
|२५८.||पत्र : छगनलाल गांधीको (१६-८-१९१२)||२९८
|-
|२५९.|| जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३००
|-
|२६०.||जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३०१
|-
|२६१.|| पत्र : एशियाई-पंजीयकको (१९-८-१९१२)||३०२
|-
|२६२.||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२२-८-१९१२)||३०२
|-
|२६३.||एक उदात्त जीवनगाथा ( २४-८-१९१२ )||३०४
|-
|२६४.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभा (२५-८-१९१२)||३०७
|-
|२६५.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभामें ( २५-८-१९१२)||३०९
|-
|२६६.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२९-८-१९१२)||३०९
|-
|२६७.||श्री ह्यूमका देहान्त (३१-८-१९१२)||३१०
|-
|२६८.||ट्रान्सवालमें रेल यात्रा (३१-८-१९१२ )||३११
|-
|२६९.||स्पष्टतः कष्टदायक ( ३१-८-१९१२)||३१२
|-
|२७०.||पत्र : हरिलाल गांधीको (५-९-१९१२)||३१३
|-
|२७१.||श्री और श्रीमती पोलक ( ७-९ - १९१२)||३१४
|-
|२७२.||महाविभव आगाखाँ (७-९-१९१२)||३१५
|-
|२७३.. || तुमसे ऐसी आशा नहीं थी ! (९-७-१९१२)||३१६
|-
|२७४.|| फीनिक्सका न्यासपत्र (१४-९-१९१२)||३१८
|-
|२७५.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२२
|-
|२७६.|| जोहानिसबर्गका प्रस्तावित स्कूल (१४-९-१९१२)||३२३
|-
|२७७.|| अधिकारियों द्वारा कानूनकी अवज्ञामें वृद्धि (१४-९-१९१२)||३२४
|-
|२७८.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२५
|-
|२७९.|| मुसलमान पत्नियाँ (२१-९-१९१२)||३२७
|-
|२८०.|| प्रवासी अधिकारियोंके कान फिर खींचे गये (२८-९-१९१२)||३२८
|-
|२८१.|| माननीय श्री गोखलेका शुभागमन (५-१०-१९१२)||३२९
|-
|२८२.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१६-१०-१९१२ )||३३०
|-
|२८३.|| श्री गोखलेका आगमन ( १९-१०-१९१२ )||३३१
|-
|२८४.|| भेंट : 'केप आर्गस' को (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८५.|| भाषण : केप टाउनमें गो० कृ० गोखलेकी स्वागत-सभायें (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८६.|| भाषण : किम्बर्लेकी सभामें ( २५-१०-१९१२ )||३३४
|-
|२८७.|| भाषण : किम्बर्लेमें गोखलेको दिये गये भोजके अवसरपर (२६-१०-१९१२)||३३५
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|-
|२५१. || पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको (३-८-१९१२) ||२९२
|-
|२५२. || बली वोरा और चंचलबह्न गांधीको लिखे पत्रका अंश (३-८-१९१२के बाद)||२९२
|-
|२५३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (४-८-१९१२) ||२९४
|-
|२५४.|| श्री टाटाकी उदारता (१०-८-१९१२)||२९५
|-
|२५५.||शैरिफकी सभा ( १०-८ - १९१२)||२९६
|-
|२५६.||अवैध विनियम ( १०-८ - १९१२)||२९७
|-
|२५७.||माननीय श्री गोखले (१०-८-१९१२)||२९७
|-
|२५८.||पत्र : छगनलाल गांधीको (१६-८-१९१२)||२९८
|-
|२५९.|| जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३००
|-
|२६०.||जोहानिसबर्गमें चेचक ( १७-८-१९१२)||३०१
|-
|२६१.|| पत्र : एशियाई-पंजीयकको (१९-८-१९१२)||३०२
|-
|२६२.||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२२-८-१९१२)||३०२
|-
|२६३.||एक उदात्त जीवनगाथा ( २४-८-१९१२ )||३०४
|-
|२६४.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभा (२५-८-१९१२)||३०७
|-
|२६५.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभामें ( २५-८-१९१२)||३०९
|-
|२६६.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२९-८-१९१२)||३०९
|-
|२६७.||श्री ह्यूमका देहान्त (३१-८-१९१२)||३१०
|-
|२६८.||ट्रान्सवालमें रेल यात्रा (३१-८-१९१२ )||३११
|-
|२६९.||स्पष्टतः कष्टदायक ( ३१-८-१९१२)||३१२
|-
|२७०.||पत्र : हरिलाल गांधीको (५-९-१९१२)||३१३
|-
|२७१.||श्री और श्रीमती पोलक ( ७-९ - १९१२)||३१४
|-
|२७२.||महाविभव आगाखाँ (७-९-१९१२)||३१५
|-
|२७३.. || तुमसे ऐसी आशा नहीं थी ! (९-७-१९१२)||३१६
|-
|२७४.|| फीनिक्सका न्यासपत्र (१४-९-१९१२)||३१८
|-
|२७५.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२२
|-
|२७६.|| जोहानिसबर्गका प्रस्तावित स्कूल (१४-९-१९१२)||३२३
|-
|२७७.|| अधिकारियों द्वारा कानूनकी अवज्ञामें वृद्धि (१४-९-१९१२)||३२४
|-
|२७८.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२५
|-
|२७९.|| मुसलमान पत्नियाँ (२१-९-१९१२)||३२७
|-
|२८०.|| प्रवासी अधिकारियोंके कान फिर खींचे गये (२८-९-१९१२)||३२८
|-
|२८१.|| माननीय श्री गोखलेका शुभागमन (५-१०-१९१२)||३२९
|-
|२८२.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१६-१०-१९१२ )||३३०
|-
|२८३.|| श्री गोखलेका आगमन ( १९-१०-१९१२ )||३३१
|-
|२८४.|| भेंट : 'केप आर्गस' को (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८५.|| भाषण : केप टाउनमें गो० कृ० गोखलेकी स्वागत-सभायें (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८६.|| भाषण : किम्बर्लेकी सभामें ( २५-१०-१९१२ )||३३४
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|२८७.|| भाषण : किम्बर्लेमें गोखलेको दिये गये भोजके अवसरपर (२६-१०-१९१२)||३३५
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|-
|२८८.|| ब्रिटिश भारतीय संघकी ओरसे मा० श्रीगोखलेको मानपत्र (२९-१०-१९१२)||३३८
|-
|२८९.|| जोहानिसबर्गके हिन्दुओंकी ओरसे गो० कृ० गोखलेको मानपत्र(२९-१०-१९१२)||३३९
|-
|२९०.|| भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (३०-१०-१९१२)||३४०
|-
|२९१.|| भाषण : गोखलेके सम्मानार्थ जोहानिसबर्ग में आयोजित भोजके अवसरपर (३०-१०-१९१२)||३४२
|-
|२९२.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (३-११-१९१२)||३४३
|-
|२९३.|| भाषण : मैरित्सबर्ग में गोखलेके स्वागत समारोह के अवसरपर (७-११-१९१२)||३४४
|-
|२९४.||भाषण : गोखलेके सम्मानमें मैरित्सबर्गके जलपान-आयोजनमें (८-११-१९१२)||३४५
|-
|२९५.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके स्वागत समारोह में (८-११-१९१२)||३४६
|-
|२९६.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके सम्मान-भोजमें (११-११-१९१२)||३४७
|-
|२९७.|| भाषण : प्रिटोरियामें गोखलेके स्वागत समारोहमें (१४-१२-१९१२)||३४७
|-
|२९८.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-११-१९१२ के आसपास)||३४८
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (१७-११-१९१२)||३४९
|-
|३००.|| भाषण : लोरेंको माक्विसमें गोखलेके सम्मानमें आयोजित भोजके अवसरपर (१८-१२-१९१२) ||३४९
|-
|३०१.|| एक तार (१८-११-१९१२ या उसके बाद )||३५०
|-
|३०२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (५-१२-१९१२ )||३५०
|-
|३०३.||अपनी भाषाओंके माध्यमसे शिक्षण (७-१२-१९१२)||३५१
|-
|३०४.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-१२-१९१२ )||३५२
|-
|३०५.|| श्री गोखले स्वदेश पहुँचे (२१-१२-१९१२)||३५५
|-
|३०६. ||श्री गांधी " नजरकैद ” (२३-१२ - १९१२)||३५६
|-
|३०७.|| भयंकर अनर्थ ( २८-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०८.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२८-१२-१९१२)||३५९
|-
|३०९.|| डायरी : १९१२||३६०
|-
|३१०.|| राष्ट्रीय कांग्रेसमें श्री गोखले (४-१-१९१३)||४१८
|-
|३११. ||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम (४-१-१९१३)||४१९
|-
|३१२. ||सम्राट्की भारतीय नौसेना (४-१-१९१३)||४२०
|-
|३१३.|| भारतमें श्री गोखलेका भाषण (४-१-१९१३)||४२१
|-
|३१४. ||डेकके यात्री (४-१-१९१३)||४२३
|-
|३१५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१] (४-१-१९१३)||४२५
|-
|३१६.|| पत्र: मणिलाल इच्छाराम देसाईको (९-१-१९१३ या उसके बाद)||४२७
|-
|३१७. ||" अनुग्रह" का एक कार्य (११-१-१९१३)||४२८
|-
|३१८. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [ -२] (११-१-१९१३)||४३०
|-
|३१९. ||पत्र: मणिलाल गांधीको (१८-१ - १९१३ से पूर्व )||४३३
|-
|३२०. ||क्या फिर सत्याग्रह करना पड़ेगा ? (१८-१-१९१३)||४३३
|-
|३२१.|| गिरमिट प्रथा (१८-१-१९१३)||४३४
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|२८८.|| ब्रिटिश भारतीय संघकी ओरसे मा० श्रीगोखलेको मानपत्र (२९-१०-१९१२)||३३८
|-
|२८९.|| जोहानिसबर्गके हिन्दुओंकी ओरसे गो० कृ० गोखलेको मानपत्र(२९-१०-१९१२)||३३९
|-
|२९०.|| भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (३०-१०-१९१२)||३४०
|-
|२९१.|| भाषण : गोखलेके सम्मानार्थ जोहानिसबर्ग में आयोजित भोजके अवसरपर (३०-१०-१९१२)||३४२
|-
|२९२.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (३-११-१९१२)||३४३
|-
|२९३.|| भाषण : मैरित्सबर्ग में गोखलेके स्वागत समारोह के अवसरपर (७-११-१९१२)||३४४
|-
|२९४.||भाषण : गोखलेके सम्मानमें मैरित्सबर्गके जलपान-आयोजनमें (८-११-१९१२)||३४५
|-
|२९५.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके स्वागत समारोह में (८-११-१९१२)||३४६
|-
|२९६.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके सम्मान-भोजमें (११-११-१९१२)||३४७
|-
|२९७.|| भाषण : प्रिटोरियामें गोखलेके स्वागत समारोहमें (१४-१२-१९१२)||३४७
|-
|२९८.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-११-१९१२ के आसपास)||३४८
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (१७-११-१९१२)||३४९
|-
|३००.|| भाषण : लोरेंको माक्विसमें गोखलेके सम्मानमें आयोजित भोजके अवसरपर (१८-१२-१९१२) ||३४९
|-
|३०१.|| एक तार (१८-११-१९१२ या उसके बाद )||३५०
|-
|३०२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (५-१२-१९१२ )||३५०
|-
|३०३.||अपनी भाषाओंके माध्यमसे शिक्षण (७-१२-१९१२)||३५१
|-
|३०४.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-१२-१९१२ )||३५२
|-
|३०५.|| श्री गोखले स्वदेश पहुँचे (२१-१२-१९१२)||३५५
|-
|३०६. ||श्री गांधी " नजरकैद ” (२३-१२ - १९१२)||३५६
|-
|३०७.|| भयंकर अनर्थ ( २८-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०८.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२८-१२-१९१२)||३५९
|-
|३०९.|| डायरी : १९१२||३६०
|-
|३१०.|| राष्ट्रीय कांग्रेसमें श्री गोखले (४-१-१९१३)||४१८
|-
|३११. ||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम (४-१-१९१३)||४१९
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|३१२. ||सम्राट्की भारतीय नौसेना (४-१-१९१३)||४२०
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|३१३.|| भारतमें श्री गोखलेका भाषण (४-१-१९१३)||४२१
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|३१४. ||डेकके यात्री (४-१-१९१३)||४२३
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|३१५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१] (४-१-१९१३)||४२५
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|३१६.|| पत्र: मणिलाल इच्छाराम देसाईको (९-१-१९१३ या उसके बाद)||४२७
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|३१७. ||" अनुग्रह" का एक कार्य (११-१-१९१३)||४२८
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|३१८. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [ -२] (११-१-१९१३)||४३०
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|३१९. ||पत्र: मणिलाल गांधीको (१८-१ - १९१३ से पूर्व )||४३३
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: पड़ेगा, (कानून १९ (१९१०) के अन्तर्गत, १७३-७६, और नेटाल सरकारके अनुसार, १७६, १८१, २३२, क्योंकि ऐसा करना विश्वासघात है, १८१; - संबंधी कानून, १७३-७६; स्त्रियोंपरसे हटाया जाना चाहिये, १६५-६६; -की '''नेटाल ऐडवर्टाइज़र, नेटाल मर्क्युरी''' व '''रैंड डेली मेल''' द्वारा निंदा २०० '''पा॰ टि॰;''' -की समाप्ति, २०१; -का गोखलेको यकीन, ३५५, -के बारेमें '''टाइम्स ऑफ नेटाल'''में विवरण, ४३९, -के लिए (पी॰ एस॰) अय्यरका आन्दोलन, १५६ '''पा॰ टि॰,''' -के लिए नेटाल भारतीय काँग्रेसकी माँग ७१-७२, २३१ '''पा॰ टि॰,''' २३२; -के लिए भारतीयों द्वारा कदम उठानेकी आवश्यकता, १८३; -के लिए पोलकका कार्य, ३१४, '''पा॰ टि॰;''' -के संबंधमें मुडलेका मुकदमा, २३१-३२; -के बारेमें संघ मंत्रियोंका विचार, १९५ '''पा॰ टि॰;''' -से मुक्ति नहीं हुई तो सख्त विरोध, १६८
{{outdent|अधिनियम (१९१० का नेटाल अधिनियम १९), १८१, १९५ '''पा॰ टि॰;''' -के अन्तर्गत दुबारा गिरमिट स्वीकार करनेवाले भारतीयोंको कर देना पड़ेगा, २३१, - नहीं देना पड़ेगा, १७६}}
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: केपके रंगदार लोगोंको मतदानसे वंचित करनेके प्रयत्नका श्राइनर द्वारा निषेध, ३३४ पा॰ टि॰
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{{outdent|दवे, नर्मदाशंकर ९३}}
{{outdent|दांडेकर ३१८}}
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{{outdent|दाना ३६५, ३६७, ३७१, ३७७, ३७९, ३८२ से ३८३, ३८६ से ३८८, ३९१, ३९३ से ३९६, ४००, ४०३}}
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{{outdent|दादू १३८}}
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{{outdent|दाल, -के बिना गांधीजीकी भोजन-पसंदगी -डॉ॰ हेगका कथन कि, एक हानिकारक आहार, ४९९}}
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{{outdent|दीवान मोतीलाल, ३६४, ३७०, ३७२, ३७७, ३८१, ३८९, ३९४, ३९६, ३९९, ४०५}}
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{{outdent|देवी बहन, २९३, २९९, ३६८, ३७९, ३८३, ३८६, ३९०, ३९२, ३९९, ४०३, ४०४}}
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{{outdent|देसाई, श्रीमती अनी, ७७, २५४, २५७, २९३, २९८, ३१०, ३१३, ३६८, ३७०, ३७३, ३७७, ३७९, ३८३, ३९२, ३९३, ३९८, ४०२}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
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: केपके रंगदार लोगोंको मतदानसे वंचित करनेके प्रयत्नका श्राइनर द्वारा निषेध, ३३४ पा॰ टि॰
{{outdent|-ब्रिटिश भारतीय समिति, २ '''पा॰ टि॰,''' ४ '''पा॰ टि॰,''' ४६ '''पा॰ टि॰,''' ६१, १११, ११२ '''पा॰ टि॰,''' १५८, १९७, २३८, २६६ '''पा॰ टि॰;''' २६९, ३२७, ४४९, ४५७, ५०३; द्वारा उपनिवेश मंत्रालयको प्रार्थना -नाथलियाके मामलेमें, २३८ '''पा॰ टि॰,''' -तीन पौंडी करके विरोधमें, १९५ '''पा॰ टि॰;''' -के खर्चेके लिए निधिके बारेमें गोखलेका सुझाव, ४३६ -की आवश्यकता, ४९६ -ट्रान्सवाल बाह्य भारतीयोंको चंदा देनेकी प्रार्थना, २७०, ४३५-३७; -को बनाये रखनेकी गोखलेकी सूचना, ३५६}}
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{{outdent|दीवान मोतीलाल, ३६४, ३७०, ३७२, ३७७, ३८१, ३८९, ३९४, ३९६, ३९९, ४०५}}
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{{outdent|देसाई, श्रीमती अनी, ७७, २५४, २५७, २९३, २९८, ३१०, ३१३, ३६८, ३७०, ३७३, ३७७, ३७९, ३८३, ३९२, ३९३, ३९८, ४०२}}
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{{outdent|देसाई, प्रागजी खण्डुभाई, ४३, ४८, ११४, १५२, २४७, ३१३, ३६२, ३६६, ३६७, ३६९, ३७२-३७३, ३८४, ३९३, ३९६, ४०१, ४०२, ४०५, ४०७, ४१४, ४१६, -२४१}}
{{outdent|देसाई, पुरुषोत्तम दास, ६५, ६७, १००, १४८, २९८, ३६३, ३६६, ३६७, ३६९, ३७१, ३७२, ३७४, ३७९, ३८०, ३८३, ३८६, ३८७, ३८९, ३९२, ३९३, ३९५, ३९७, ३९९, ४००, ४०३, ४०४, ४०५, ४०६, ४१५, ४१६, ४४६}}
{{outdent|द्विदल धान्य; गांधीजी द्वारा, विहीन आहारकी पसंदगी ५०७; पचनेके लिए कठिन, ४९९; (डॉ॰) हेगके अनुसार, एक हानिकारक आहार, ४९९}}
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{{outdent|धना, रणछोड, ३८७}}
{{outdent|धर्म; और सत्यके पालनसे ही विजय प्राप्त, ९९; -का परदेशयात्रामें पूर्ण पालन नहीं किया जाता, २०; -का भारतीयों द्वारा त्याग, १२१}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६५
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{{outdent|नाताल; -में निवासी भारतीयोंके नाबालिगों व पत्नियोंके आव्रजनकी विधि, ४८८; -में भारतीय बालकोंकी शिक्षा, २६१-६२, ३७१, ४३४; -में भारतीय लोकसंख्या, ७०}}
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{{outdent|निसर्गोपचार; -की गांधीजी द्वारा जमनादास गांधीको सलाह, ३५२-५४; -के प्रयोगकी गोखलेको सलाह, ३५१}}
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{{outdent|नेटाल नगरपालिका संघ, ४४०}}
{{outdent|नेटाल प्रवासी प्रतिबंधक अधिनियम, ३२४-२५; -का कजिन्स् द्वारा मनमाना अमल, ३१२, ४२९; -को या तो सुधारा जाये अथवा नष्ट किया जाये, ३१२}}
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: ३१८ पा॰ टि॰, ३७२, ३९१; -द्वारा अस्थायी समझौतेका स्वागत, ६९; -द्वारा ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबंधक अधिनियमके सुधारका स्वागत, १४; -द्वारा ट्रान्सवाल भारतीयोंके रंगभेद विरोधी आंदोलनका समर्थन, ६९; -द्वारा तीन पौंडी करको रद करनेकी माँग, ७१, २३१ पा॰ टि॰, २३३; -द्वारा दो नाबालिगोंकी अनामत रकम जब्त करनेके विरोधमें निषेध १५३; -द्वारा निवासी भारतीयोंके नाबालिगों व पत्नियोंके हकोंकी रक्षाकी माँग, ६९; -द्वारा निवासी भारतीयोंके हकोंका निर्णय करनेकी सत्ता प्रवासी अधिकारियोंको देनेसे विरोध, २१५ पा॰ टि॰; -द्वारा नेटाल व्यापारी परवाना अधिनियममें परवानोंके हस्तान्तरणकी सुविधाके लिए सुधारकी माँग, ७१; -द्वारा प्रवासी कानूनका सुधार चालू संसदमें आनेसे पहले सत्याग्रहको स्थगित करनेका विरोध, ३७; -द्वारा भारतसे गिरमिटिया मजदूरोंकी निर्यातबन्दीका स्वागत, ७१-७२; -द्वारा संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) का विरोध, १४, ६९, २२५, २२६; और उसके अन्तर्गत शिक्षा-परीक्षाका भी विरोध, २१५ पा॰ टि॰; -द्वारा संघमें हर साल ५० भारतीयोंके आव्रजनकी माँग, ७१
{{outdent|नेटाल भारतीय व्यापारी मंडल (नेटाल इंडियन ट्रेडर्स लिमिटेड), ८१ पा॰ टि॰; ८२}}
{{outdent|'''नेटाल मर्क्युरी,''' १५६ पा॰ टि॰, १७६ पा॰ टि॰, ४२८ पा॰ टि॰; -की कजिन्स् द्वारा प्रवासी कानूनके अमलके बारेमें कड़ी टीका, ३२४, ४२९ पा॰ टि॰; -की तीन पौंडी करके विरोधमें टीका, ३१६ पा॰ टि॰; -को पोलकका दयालबंधु व गज्जरके संबंधमें पत्र, ४२९-३०}}
{{outdent|नेटाल विधान परिषद्, १७५}}
{{outdent|नेटाल व्यापारी परवाना अधिनियम; -भारतीय समाजके सिरपर एक उमड़ती घटा, ७९; -के अन्तर्गत परवानेके हस्तान्तरणका गोगाका मामला, ४७५; -के सुधारकी माँग, ७१, ४७५; -में सत्याग्रह द्वारा संशोधन, ९७}}
{{outdent|नेटाल संसद, १९६}}
{{outdent|नेटाल सरकार; -के परिपत्र (गश्ती चिट्ठी) द्वारा पुनः गिरमिटमें बंधनेवाले भारतीय तीन पौंडी करसे मुक्त, १८१}}
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{{outdent|नेटिव; और ब्रिटिश भारतीयोंको फुटपाथ व ट्राम-गाड़ियोंका उपयोग करनेसे मना, ५४-५५}}
{{outdent|नेटिव उद्योग प्रदर्शनी, ११९}}
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{{outdent|नेसर, १३५}}
{{outdent|नौरोजी, ३६४}}
{{outdent|न्यासपत्र; देखिए फीनिक्सका न्यासपत्र}}
{{outdent|न्यूकैसिल, ४१०}}
{{outdent|न्यूमन, ३४२ पा॰ टि॰}}
{{gap|7em}}{{larger|'''प'''}}
{{outdent|'''पंच,''' १०५}}
{{outdent|पंचीकरण, ९३, १५१}}
{{outdent|पंजीयन; अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत, -के हकदार भारतीयोंके प्रकार, ५८-६०, ८५, ४७४; युद्ध पूर्व निवासी सत्याग्रहियोंको, -का अधिकार, ३९, ४०, अस्थायी समझौतेमें स्वीकृत, ४७-४८, ५१, २०१; -के हकदार चीनियोंकी सूची, ८७; -से शिक्षित भारतीयोंको अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत छुटकारा, ४८}}
{{outdent|पॉचेफ्स्ट्रूम; -में गोखलेको मानपत्र, ४०९}}
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{{outdent|पटेल, डी॰ के॰, -का परवाना नेटाल इंडियन ट्रेडिंग लिमिटेडको हस्तान्तरित करनेसे इन्कार करनेपर डर्बनके परवाना अधिकारीके विरोधमें अपील, ८३ पा॰ टि॰}}
{{outdent|पटेल, मगनभाई, ४४५}}
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{{outdent|पण्डया, जीवराम, ३७२}}
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{{outdent|'''नेटाल मर्क्युरी,''' १५६ '''पा॰ टि॰,''' १७६ '''पा॰ टि॰,''' ४२८ '''पा॰ टि॰;''' -की कजिन्स् द्वारा प्रवासी कानूनके अमलके बारेमें कड़ी टीका, ३२४, ४२९ '''पा॰ टि॰;''' -की तीन पौंडी करके विरोधमें टीका, ३१६ '''पा॰ टि॰;''' -को पोलकका दयालबंधु व गज्जरके संबंधमें पत्र, ४२९-३०}}
{{outdent|नेटाल विधान परिषद्, १७५}}
{{outdent|नेटाल व्यापारी परवाना अधिनियम; -भारतीय समाजके सिरपर एक उमड़ती घटा, ७९; -के अन्तर्गत परवानेके हस्तान्तरणका गोगाका मामला, ४७५; -के सुधारकी माँग, ७१, ४७५; -में सत्याग्रह द्वारा संशोधन, ९७}}
{{outdent|नेटाल संसद, १९६}}
{{outdent|नेटाल सरकार; -के परिपत्र (गश्ती चिट्ठी) द्वारा पुनः गिरमिटमें बंधनेवाले भारतीय तीन पौंडी करसे मुक्त, १८१}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|नेटिव; और ब्रिटिश भारतीयोंको फुटपाथ व ट्राम-गाड़ियोंका उपयोग करनेसे मना, ५४-५५}}
{{outdent|नेटिव उद्योग प्रदर्शनी, ११९}}
{{outdent|नेपाल नरेश, ४२०}}
{{outdent|नेल्सन, ३७१}}
{{outdent|नेवी लीग, ४८५}}
{{outdent|नेसर, १३५}}
{{outdent|नौरोजी, ३६४}}
{{outdent|न्यासपत्र; देखिए फीनिक्सका न्यासपत्र}}
{{outdent|न्यूकैसिल, ४१०}}
{{outdent|न्यूमन, ३४२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{gap|7em}}{{larger|'''प'''}}
{{outdent|'''पंच,''' १०५}}
{{outdent|पंचीकरण, ९३, १५१}}
{{outdent|पंजीयन; अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत, -के हकदार भारतीयोंके प्रकार, ५८-६०, ८५, ४७४; युद्ध पूर्व निवासी सत्याग्रहियोंको, -का अधिकार, ३९, ४०, अस्थायी समझौतेमें स्वीकृत, ४७-४८, ५१, २०१; -के हकदार चीनियोंकी सूची, ८७; -से शिक्षित भारतीयोंको अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत छुटकारा, ४८}}
{{outdent|पॉचेफ्स्ट्रूम; -में गोखलेको मानपत्र, ४०९}}
{{outdent|पटेल, ३७१}}
{{outdent|पटेल, ई॰ एम॰, ३८७}}
{{outdent|पटेल, कालिदास, ३६६, ३८५, ३८७}}
{{outdent|पटेल, जी॰ पी॰, ३९७}}
{{outdent|पटेल, डी॰ के॰, -का परवाना नेटाल इंडियन ट्रेडिंग लिमिटेडको हस्तान्तरित करनेसे इन्कार करनेपर डर्बनके परवाना अधिकारीके विरोधमें अपील, ८३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|पटेल, मगनभाई, ४४५}}
{{outdent|पटेल, रावजीभाई, १८७, २२१}}
{{outdent|पटेल, सुलेमानजी, ३९३}}
{{outdent|पडियार, ३७६}}
{{outdent|पण्डया, जीवराम, ३७२}}
{{outdent|पत्तर, रत्नम्; -की समाजसेवा, २४३}}
{{outdent|परभुदयाल, २६९}}
{{outdent|पवाडे, ३७०}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६७
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६२९}}
{{Multicol}}
{{outdent|पाटीदार संघ, ३३१; -से गोखलेको मानपत्र, ३३८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|पाण्डेय, लछमन, ३७१, ३७७, ३७९, ३९८, ४०३, ४०६}}
{{outdent|पारसी, १२१}}
{{outdent|परेख, ३८३, ३९४}}
{{outdent|पायवेल, श्रीमती, २५४}}
{{outdent|पालनजी एदलजी ऐण्ड सन्स, ४१७}}
{{outdent|पॉल, एच॰ एल॰, १३३, ३४८, ३४९, ३९३ ४६८}}
{{outdent|पिल्ले, ११४}}
{{outdent|पिल्ले, वी॰ एस॰, ३६५}}
{{outdent|पिल्ले, सी॰ के॰ डी॰, ३४९}}
{{outdent|पीटर्सबर्ग; -के भारतीयों द्वारा गोखलेको मानपत्र, ३३८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|पूनाकी सार्वजनिक सभा, ३०५; -पूनामें गोखलेका भाषण, ४६३}}
{{outdent|पेटिट, जहाँगीर बोमनजी, १६८ '''पा॰ टि॰,''' १७१, २४५, २४६, २९५, ३६१; -से केबल द्वारा ४०० पौंड सत्याग्रह निधिमें, ४५८}}
{{outdent|पेटिट, श्रीमती जायाजी जहाँगीर, १६८}}
{{outdent|पैदल-पटरी; -का उपयोग करनेसे ब्रिटिश भारतीयोंको मना, ५४-५५}}
{{outdent|पोपट, २९९, ३९९}}
{{outdent|पोर्टर, डॉ॰ सी॰, २०७, २०८, ३७२; -के चेचक प्रतिबन्धक कार्यमें भारतीयों द्वारा सहायता देनेकी सलाह, २०५, ३००, ३०१; -के मतसे रोग-निवारणके लिए भारतीय व काले (coloured) लोगोंको बस्तियोंमें पृथक बसानेकी सलाह, ३०० '''पा॰ टि॰,''' -से गांधीजीकी मुलाकात, ३६३}}
{{outdent|पोलक, एच॰ एस॰ एल॰, १७, २२, २४, २६, ३५, ४३, ५७, ५८, ६१, ६८ '''पा॰ टि॰,''' ७८, ९५, १११, १३१, १४६, १४७, १५५, १६१ '''पा॰ टि॰,''' १७२, १९१, ३१४, ३४८, '''पा॰ टि॰,''' ३४१ '''पा॰ टि॰,''' ३६१, ६३९, ३७१, ३७२, ३७४, ३८३, ४०१, ४०३, ४०४, ४०७, ४२९, ४५८, ४७६, ४८४; -का इंग्लैंडमें कार्य १११, १६८; -का 'नेटाल मर्क्युरी' को दयालबन्धु व गज्जरके बारेमें पत्र, ४२८-२९; -का नेटालमें गिरमिटिया मजदूरोंको भेजनेके विरोधमें कार्य, २०३; -का भारतमें कार्य, ७९, ३१४-१५; -का भारतसे प्रत्यागमन ३१०; -की इंग्लैंड}}
{{Multicol-break}}
: यात्रा, ५७, ५८; -को गांधीजीके बाद द॰ आफ्रिकामें कार्य करना होगा, ४१०, ४४२; -को गोखले द्वारा सलाह, ३४८; -द्वारा गृहमन्त्रीको दयाल-बन्धुके बारेमें पत्र, ४२८-२९; -द्वारा द॰ आफ्रिकी भारतीयोंके प्रश्नका अध्यवसाय और चतुराईसे समर्थन, २९७
{{outdent|पोलक, मॉड, ४, ६, ३६, ६१, २८४ '''पा॰ टि॰,''' २८८, ३६३, ३६४, ३६६, ३७०, ३७२, ३७४ से ३७६, ३७८, ३७९, ३८३, ३८५, ३८६, ३८८ से ३९०, ३९०, ३९३, ३९४, ३९६, ३९७, ४०१, से ४०५, ४०७, ४१७}}
{{outdent|पोलक, श्रीमती मिली ग्रैहम, ५७, ५८, ६६, ९५ १६८, ३१४, ३१५, १६९, ४०५}}
{{outdent|पोलिंग्हॉर्न, जे॰ ए॰, २६६, २६७}}
{{outdent|प्रगतिवादी दल, ८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|प्रभा, ४०६; -का गांधीजी द्वारा केश वपन, ४०५}}
{{outdent|प्रभाशंकर, ३६५, ३९४}}
{{outdent|प्रभु, ३६६, ३६८ से ३७०, ३७७, ३८२, ३९०}}
{{outdent|प्रभु, डाह्या, ३७५}}
{{outdent|प्रह्लाद, १४७, २२०}}
{{outdent|प्रान्तीय परिषद; -को व्यापारी परवानोंके नियंत्रणका अधिकार, ७१, ४४०-४१}}
{{outdent|प्रिटोरियामें गोखलेका स्वागत, ३४७, ४१०; -में गोखलेको मानपत्र, ४१०}}
{{outdent|'''प्रिटोरिया न्यूज,''' १५६ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|प्रीवी कौन्सिल, १११ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|प्रेमा, देखिए प्रेमो}}
{{outdent|प्रेमो जीवन; -की गोखलेसे भेंट, ४१०}}
{{outdent|प्रेमो, ३६५, ३८५}}
{{outdent|'''प्रेसिडेंट''' एस॰ एस॰, ३४३ '''पा॰ टि॰,''' ४१२, ४१३}}
{{outdent|प्रेटले, टी॰, ३३५}}
{{outdent|प्लाउमन, कु॰, ३८२}}
{{outdent|प्लेग; -डर्बनमें, २०९, ४६२; -का दूषित पानी ही एक कारण, ४६५}}
{{gap|7em}}{{larger|'''फ'''}}
{{outdent|फकीर, केशव, ३६८, ३९६}}
{{outdent|फकीरा, देखिए फकीरा भाई}}
{{outdent|फकीरा भाई, ३६५, ३६७, ३७१, ३८१, ३८९, ३९०, ३९२, ३९४, ३९८}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८७
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|'''परिशिष्ट २'''}}
{{c|'''चरखा और अकाल-पीड़ितोंकी सहायता'''}}
अगस्त १९२० में जब अकाल तीव्र रूपमें था, उस समय ऐसा सोचा गया कि दुर्भिक्ष-पीड़ितों की सहायता के लिए सम्भ्रान्त मध्यम-वर्ग के लोगोंको चरखा चलाना चाहिए। इसकी शुरुआत के लिए कुमारी लेथमने कृपापूर्वक एक चरखा प्रदान किया। कोशिश इस बातकी की गई कि यह काम विशेषतया धाँगरों द्वारा, जो ऊन कातने के अभ्यस्त थे, कराया जाये परन्तु वह प्रयत्न असफल रहा। रुईकी कताईसे जो बिलकुल अनभिज्ञ हो ग्रामके ऐसे लोगोंसे बारीक सूत कतवाना असम्भव था। इसके सम्बन्धमें शंका उठाई गई कि आया इस कामसे——अगर यह शुरू किया गया——पैसे कमाये जा सकते हैं या नहीं अथवा थोड़ी-बहुत मदद मिल सकती है या नहीं। इस प्रकारकी भिन्न-भिन्न कठिनाइयों और आपत्तियोंके बीच लगभग तीन मासतक चरखा बिना चले ही पड़ा रहा और बड़ी कोशिशोंके बावजूद चरखा चलानेके लिए कोई भी व्यक्ति राजी न दीख पड़ा। दिसम्बर १९२० में कुमारी लेथमने श्रीमती जे० पेटिटकी मेहरबानी-के परिणामस्वरूप चार चरखे पुनः भेजे। थोड़ी रुई भी भेजी। ये दोनों चीजें कुछ व्यक्तियोंमें आजमाइश के तौरपर वितरित की गईं। अब कुछ आशा जागी। अन्ततोगत्वा एक रमोशी स्त्री यह काम लगनके साथ करने पर राजी कर ली गई। यह बात २० जनवरी, १९२१ के लगभग की है। उस दिनसे कताईके काममें कुछ और ही छटा दीख पड़ने लगी। इस स्त्रीका अनुकरण दो अन्य स्त्रियोंने किया, वे चरखा चलानेको राजी हो गईं। बड़े अध्यवसायके फलस्वरूप इन तीन महिलाओं द्वारा ४ पौंड सूत तैयार किया गया और उसे बिक्रीके वास्ते भेजा गया। इस बीच अनेक स्त्रियोंने पूछताछ शुरू की और यह इच्छा व्यक्त की कि अगर इस कामसे उन्हें थोड़ा-बहुत भी आर्थिक लाभ हो तो वे कताई करना चाहेंगी। इसलिए कताईकी दर ६ आना पौंड निर्धारित की गई। इससे अन्य कतैये भी इस काममें शामिल होने लगे।
अब दूसरी कठिनाई धनकी आ खड़ी हुई। पाँचों चरखे चलाये जा रहे थे। उसी गाँवमें जो पाँच चरखे बनवाये गये थे, वे भी चालू हो गये थे। उस केन्द्र में रुईका जो भण्डार था वह चुक गया था। ऐसा लगने लगा था कि चरखे बनवाने, रुई खरीदने और मजदूरी देनेके लिए आवश्यक धनके अभाव में काम रुका रहेगा। राव बहादुर चितलेने यह कठिनाई स्वयं आकर देखी-समझी और १००) प्रदान करके काममें सहायता की। कुमारी लेथमको जब इस कठिनाईका पता चला तो उन्होंने भी एक सौ रुपये भेजे। ये दोनों दान ऐन मौकेपर प्राप्त हुए और उनकी बदौलत काम चल निकला। स्थानीय लोगोंने अपने पाससे कपास देकर इस काममें सहायता दी।
चरखोंकी माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। वहाँके लोग इतने गरीब थे कि अपना-अपना चरखा भी नहीं खरीद सकते थे। इसलिए यह आवश्यक हो गया कि उसी गाँवमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८९
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||परिशिष्ट|५५७}}</noinclude>
फिलहाल २९ चरखे चल रहे हैं, फिर भी और चरखोंकी बहुत माँग है, परन्तु चूँकि कोष सीमित है इसलिए और ज्यादा चरखे बनवाकर नहीं बाँटे जा सके। सूत ऐसे लोग कात रहे हैं जिन्हें इससे पहले इसका जरा भी ज्ञान न था। इसलिए सूत घटिया किस्मका आ रहा है। दिन-ब-दिन उसमें सुधार तो हो रहा है परन्तु यदि किसी योग्य शिक्षककी सेवाएँ सुलभ की जा सकें तो सुधार बहुत जल्दी होने लगेगा। कातनेवालों में कुछ तो पूरा समय कातनेवाले हैं और कुछ फुरसतके समय ही कातते हैं।
आजकल लगभग २ पौंड सूत नित्य तैयार किया जाता है। ज्यों-ज्यों कातनेवालों को अभ्यास होता जायेगा त्यों-त्यों अधिक सूत काता जाने लगेगा। कताई ६ आने प्रति पौंडके हिसाब से दी जाती है। हाँ, यह जरूर है कि बहुतेरे कार्यकर्त्ता इस बातकी शिकायत करते हैं कि इतनी मजदूरी काफी नहीं है। चूँकि बिक्रीके लिए भेजे गये सूतसे १२ आने प्रति पौंड ही मिला इसलिए कातनेकी उजरत बढ़ाना मुमकिन न था, वरना नुकसान उठाना पड़ता। १ पौंड सूतपर सवा ग्यारह आने खर्चा आता है अर्थात् सवा पाँच आने रुईके लगे और छः आने कताईके हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि १ पौंड कपासके पीछे सिर्फ ९ पाईका मुनाफा रहता है। इसमें दफ्तर-खर्च तथा अन्य खर्चे शामिल नहीं हैं। ६ आने प्रति पौंड कताईकी वर्तमान दरसे हर कतैयेको प्रतिदिन २० से २४ तोले सूत कात लेनेपर मजदूरीके रूपमें ३ आने रोज मिल जाते हैं। ज्यादातर लोग १५ तोले सूत कातकर २ आने रोज और शेष लोग १० तोले कातकर १ १/२ आना कमा लेते हैं। नौसिखुओंको इसमें नहीं गिना गया है। ज्यों-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा त्यों-त्यों कमाई ज्यादा होने लगेगी।
[इस प्रकार] काते गये सूतसे कपड़ा बनवाया गया। एक बुनकरको साढ़े तीन पौंड सूत बुनने के लिए दिया गया। उसने बुनाई बहुत ऊँची दरसे ली। उस बुनकरने साढ़े नौ गज कपड़ा तैयार किया और तीन रुपये नौ आने मजदूरीके रूपमें लिये। ऐसा समझिए कि १ पौंडकी बुनवाई एक रुपया ली। उस कपड़े की लागत ६ रुपये ६ पाई बैठी और वह बिका ६ रुपये ३ आने में। फकत ढाई आने मुनाफे में आये। बुनवानेकी इस कठिनाईसे बचने के लिए यह निहायत जरूरी है कि एक करघा अलगसे लगाया जाये और बुनाई सिखाने के लिए एक शिक्षक रखा जाये जो स्थानीय लोगोंको बुनाई सिखाये। बहुतसे स्थानीय लोग बुनाई सीखना चाहते हैं। एक अलग करघा होनेसे उसपर बुने गये कपड़े का भाव मौजूदा बाजार भावसे कम होगा। अलग-अलग बुनकरोंको करीब ६ पौंड सूत इस उद्देश्यसे सौंपा गया है कि बुनाई ठीक-ठीक कितनी दी जानी चाहिए इसका पता चल जाये। परन्तु यह सब असुविधा तो तभी दूर हो सकती है जब हम अलगसे एक करघा बठा लें।
जब रुई कम उपलब्ध होती थी और काम करनेवाले काम माँगते थे तब ऊन चालू कर दिया जाता था और यह तबतक चालू रहता था जबतक रुई तैयार न हो। धाँगर लोग इस कामको बड़ी खुशीसे हाथमें ले लेते थे परन्तु उनसे कहा जाता था कि जितनी महीन ऊन अभीतक काती जा रही थी उससे अधिक महीन ऊन कातो।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९०
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इन लोगोंको कामपर हाथ बैठाने में कुछ समय लगा, और अब १० कर्तये हैं जो महीन ऊन कातते हैं। उनको भी फी पौंड ६ आने के हिसाबसे मजदूरी दी जाती है। २ रुपये प्रति २ पौंडके हिसाब से ३१ रुपयेकी ऊन खरीदी गयी। यद्यपि रुई तैयार हो गई थी तो भी ऊनकी कताई जारी रखी गई। इस कामके लिए एक अलग विभाग खोल दिया गया। क्योंकि धाँगर लोगोंने यह काम शीघ्र ही सीख लिया था। उनकी सफाईकी कुल कार्रवाई धाँगर जातिकी स्त्रियों द्वारा ही की जा रही है जिससे उन्हें फी पौंड १ आना और मिल जाया करता है।
ऊनके वर्गीकरणकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिया जाता है। उनकी कताई करनेवाले अधिकांश लोग अपने ही चरखे काममें लाते हैं। इनमें से कुछ कतैये महीन ऊन कातने के लिए वर्तमान चरखोंकी अपेक्षा अधिक अच्छे चरखे माँग रहे हैं।
धाँगर बुनकर यहीं के हैं। इसलिए यहाँके कते इस महीन उनसे पंढरपुर और दावनगिरि नमूने के कम्बल बनाये जा रहे हैं। बुनकरोंको बुनाईके और नमूने भी सुझाये गये हैं। धाँगर कुछ जिद्दी किस्मके लोग होते हैं इसलिए वे नये और उन्नत तरीकोंको शीघ्र नहीं अपनाते। परन्तु इस काम के चलते वे नये नमूने के कम्बल बनाने लगे हैं और यह उनके अपने पेशेमें भी स्थायी रूपसे सहायक सिद्ध होगा। अब उन्हें ज्यादा चौड़े तथा उन्नत ढंगके करघोंकी जरूरत है। वे ऊनको रँगने की विधि भी जानना चाहते हैं। पूरे दिन काम करनेवाले एक होशियार बुनकरको लगानेकी कोशिश की जा रही है। यह बुनकर बुनाईकी ज्यादा अच्छी विधि सिखायेगा। दो कम्बल तैयार किये गये और उनको लागत दामपर बेच दिया गया। उनमें से एकका दाम रु॰ ५- १३-६ था और दूसरेका रु॰ ६-६ था और अधिक कम्बलोंकी माँग आई है परन्तु इस कामको चालू रखनेके लिए कुछ रकमकी जरूरत पड़ेगी।
इतने लोगोंको कामपर लगाये रखना अकाल पीड़ितोंकी सहायताका एक आदर्श तरीका तो है ही, इसके अलावा ग्रामीण उद्योगोंको बढ़ावा देनेका साधन भी है। साथ ही बार-बार अकाल पड़नेसे जो पस्तहिम्मती आ गई है वह भी इससे दूर होगी।लगभग एक महीने में इतना काम हो पाया है। अब हमें एक उन्नत ढंगके करघेकी, एक अच्छे शिक्षककी, ऊनकी बुनाई करने के लिए एक अच्छे करघेकी और अधिक चरखोंकी (जिनकी माँग पड़ोसके गाँववाले कर रहे हैं) तथा अन्य बहुतसी चीजोंकी जरूरत है। काम तेजीसे चल रहा है और आशा की जाती है कि धनके अभाव के कारण काम रुके ऐसी नौबत न आने पायेगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ११-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९१
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|'''परिशिष्ट ३'''}}
{{c|'''भेंट तथा क्षमा-प्रार्थना'''}}
श्री शौकत अली तथा श्री मुहम्मद अलीके बारेमें वाइसराय महोदय और श्री गांधी के बीच जो वार्त्ताएँ हुई हैं, उनके सम्बन्धमें समाचारपत्रोंमें अनेक वक्तव्य तथा कुछ निष्कर्ष भी प्रकाशित हुए हैं। लोगों, विशेषतया श्री गांधी, ने वाइसराय महोदयका ध्यान उन वक्तव्यों तथा प्रकाशित निष्कर्षोकी ओर आकर्षित करते हुए कहा है कि उनमें इन वार्त्ताओंके बारेमें कुछ भ्रान्तियाँ दिखती हैं।
वाइसराय तथा श्री गांधीके बीच हुई मुलाकातोंकी जड़में वह वार्तालाप है जो भारतमें सामान्यतया फैली परिस्थितिके सम्बन्धमें वाइसराय और पण्डित मालवीयके बीच हो चुका था। वाइसरायने पण्डित मालवीयको बताया कि सरकारने फैसला किया है कि श्री शौकत अलीपर उनके द्वारा दिये गये हिंसाको प्रोत्साहन देनेवाले भाषणोंके कारण मुकदमा चलाया जाये। बातचीत तब सम्भावित उपद्रवोंके बारेमें होने लगी। पण्डित मालवीयने अपनी यह सम्मति व्यक्त की कि श्री गांधीसे मुलाकात करना वाइसराय महोदयके लिए उपयोगी होगा। वाइसराय महोदयने उत्तरमें कहा कि यदि श्री गांधी मुलाकात चाहें तो उन्हें श्री गांधीसे मिलने तथा उनके विचार सुननेमें प्रसन्नता होगी। दूसरे दिन श्री एन्ड्रयूज वाइसरायसे मिले और उन्हें श्री गांधीसे मिलनेका सुझाव दिया। यह कह देना उचित ही होगा कि इन वार्तालापोंमें बहुतसे महत्त्वपूर्ण विषयोंपर विचार-विनिमय हुआ और यह तय हुआ कि वाइसराय तथा श्री गांधीके बीच होनेवाली प्रस्तावित भेंटमें [भारतकी] परिस्थितिपर सामान्य रूपसे चर्चा की जायेगी। वाइसराय महोदय जानते हैं कि पण्डित मालवीयने श्री गांधीको शिमला बुलाते समय श्री शौकत अली तथा श्री मुहम्मद अलीके खिलाफ जो कानूनी कार्रवाई प्रारम्भ की जानेवाली है उसका अपने पत्रमें कोई जिक्र नहीं किया था।
पण्डित मालवीय तथा श्री एन्ड्रयूजके अनुरोधपर श्री गांधी यथासमय शिमला आये और उन्होंने वाइसरायसे मुलाकातका समय माँगा। मुलाकातकी व्यवस्था तुरन्त कर दी गई। पहले दिनकी वार्त्तामें प्रस्तावित मुकदमोंकी कोई भी बात नहीं उठाई गई। उस दिन तो भारत में फैले हुए असन्तोषके कारणोंपर ही बातचीत होती रही। दूसरी मुलाकात के अवसरपर वाइसराय महोदयने कहा कि सरकारी रिपोर्टोंसे प्रकट हुआ है कि जिम्मेदार असहयोगियोंने श्री गांधी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तोंके विरुद्ध हिंसा भड़कानेवाले व्याख्यान दिये हैं। श्री गांधीने किसी जिम्मेदार असहयोगी द्वारा हिंसा भड़काने के आरोपका खण्डन करते हुए कहा अगर मुझे यह यकीन हो जाये कि किसी भी जिम्मेदार असहयोगीने हिंसाको प्रोत्साहन दिया है और अगर वह अपने उन
भाषणोंपर जिनसे हिंसाको प्रोत्साहन देनेकी ध्वनि निकलती है, खेद प्रकट न करेगा, तो मैं उसकी तथा उसके भाषणोंकी सार्वजनिक रूपसे निन्दा करने को तैयार हूँ। वाइ-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९२
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>सरायने अली भाइयोंके नाम लिये, और कहा कि मैं आपको इन भाइयोंके भाषणोंमें से निकालकर वे वाक्य दिखाऊँगा जिनसे मेरे विचारमें हिंसाको प्रोत्साहन मिलता है। और जब वे वाक्य श्री गांधीको पढ़कर सुनाये गये तब उन्होंने स्वीकार किया कि सचमुच इनसे तो वही अर्थ निकल सकता है जो वाइसराय महोदयने निकाला है। परन्तु उन्होंने (श्री गांधीने) कहा कि मुझे विश्वास है कि श्री शौकत अली और श्री मुहम्मद अलीका इरादा श्रोताओंको हिंसाकी ओर प्रवृत्त करने का कदापि न था। श्री गांधीने कहा कि मैं शिमलासे लौटते ही उनसे मिलूँगा और उन्हें सलाह दूँगा कि वे अपने भाषणोंमें कहे गये हिंसाको प्रोत्साहन देनेवाले शब्दोंके लिए—यद्यपि उनका इरादा ऐसा न था——सार्वजनिक रूपसे खेद प्रकट करें। वाइसरायने इसपर श्री गांधीसे पूछा कि आप श्री शौकत अली और श्री मुहम्मद अलीको जैसा वक्तव्य प्रकाशित करने की सलाह देने का विचार कर रहे हैं, उसके महत्त्वको देखते हुए क्या आप मुझे उसका मसविदा दिखायेंगे?
इस जगह वाइसराय महोदयने श्री गांधीसे कहा कि उन वाक्योंके कारण सरकार श्री शौकत अली तथा श्री मुहम्मद अलीपर मुकदमा चलानेका विचार कर रही है। उन्होंने श्री गांधीसे कहा कि अगर आप मुझे उस वक्तव्यको दिखा देंगे और अगर अपनी सरकारके दृष्टिकोणसे मैं उसे सन्तोषजनक पाऊँगा तो मैं अली भाइयों-पर मुकदमा न चलाने के लिए अपना जोर लगाऊँगा क्योंकि अगर भविष्यमें हिंसात्मक कृत्योंको प्रोत्साहन देनेवाले भाषण देना बन्द कर दिया जायेगा तो सरकारका मतलब हल हो जायेगा। श्री गांधीने वक्तव्यको दिखाना खुशीसे स्वीकार कर लिया। वादेके अनुसार वक्तव्यका मसविदा वाइसराय के सामने प्रस्तुत किया गया। परमश्रेष्ठने [उसे पढ़कर] उनसे कहा कि इस वक्तव्य में कुछ अनुच्छेद ऐसे डाल दिये गये हैं जिनसे यह वक्तव्य विज्ञप्तिका रूप ले लेता है, जिसमें श्री शौकत अली और श्री मुहम्मद अलीके धार्मिक सिद्धान्तों का समावेश भी है। वाइसराय महोदयने कहा कि यह वक्तव्य इस हदतक अपूर्ण है कि इसमें भविष्य के लिए हिंसाको प्रोत्साहन देनेवाले भाषण न देनेका आश्वासन नहीं है। वाइसराय महोदय ने यह भी कहा कि वक्तव्य के प्रकाशित हो जाने के पश्चात् श्री शौकत अली और श्री मुहम्मद अली इस बातका ध्यान रखते हुए कि वे कानूनका उल्लंघन न करें, अपने भाषणों द्वारा जैसी चाहें वैसी सफाई पेश कर सकते हैं। जिन वाक्योंके सम्बन्ध में आपत्ति उठाई गई थी श्री गांधी उनको हटा देने को तथा भविष्यमें ऐसे भाषण न देनेके आश्वासनका अनुच्छेद जोड़ देनेको राजी हो गये। तदनन्तर वाइसरायने श्री गांधीको सूचित किया कि यदि श्री शौकत अली
और श्री मुहम्मद अली श्री गांधी द्वारा संशोधित वक्तव्यपर हस्ताक्षर कर देंगे और भविष्यमें इस प्रकारके भाषण न देनेका वचन भी दे देंगे, तो उनपर मुकदमा न चलाने के लिए जरूरी कदम उठाया जायेगा, और जबतक उस वक्तव्यमें दिये गये
वचनोंका पालन होता रहेगा तबतक उनपर मुकदमा न चलाया जायेगा। परन्तु पिछले भाषणोंके सम्बन्धमें उनपर मुकदमा चलाने के बारेमें सरकार मुक्त होगी। वाइसरायने यह भी लिखा कि यदि श्री शौकत अली तथा श्री मुहम्मद अलीका वक्तव्य प्रकाशित हो गया और उसके परिणामस्वरूप सरकारने उनपर मुकदमा न चलाया तो इस आशय-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||परिशिष्ट|५६१}}</noinclude>की एक विज्ञप्तिका प्रकाशित किया जाना आवश्यक हो जायेगा कि इस सम्बन्ध में सरकारने क्या रुख अख्तियार किया है। परन्तु इस सब कार्य में सौदेबाजीकी भावना नहीं है। श्री गांधीने यहाँतक कहा कि मुकदमा चलाया जाये चाहे न चलाया जाये, मेरा यह कर्त्तव्य हो जायेगा कि मैं [इस वक्तव्य] के कुछ अंश उन्हें दिखाऊँ और उसके उपरान्त उन्हींकी आबरू तथा उद्देश्यकी खातिर उन दोनोंसे यह कहूँ कि आप लोग सार्वजनिक रूपसे खेद प्रकट कीजिए।
वार्तालापके पूरे दौर में वाइसराय महोदय तथा श्री गांधी, दोनों ही के दिलोंमें यह इच्छा काम कर रही थी कि मुकदमा चलाये जानेपर गड़बड़ न मच पाये और उनकी यह भी ख्वाहिश थी कि भविष्य में हिंसाको प्रोत्साहन देनेवाले भाषण न दिये जायें। वाइसरायने श्री गांधीको सूचित किया कि अगर वह वक्तव्य यथाशीघ्र प्रकाशित नहीं कर दिया जायेगा तो मैं मुकदमा चलाया जाना रुकवा न सकूँगा। इन भाषणोंकी बहुत चर्चा भारतमें ही नहीं बल्कि इंग्लैंडमें भी हुई थी। श्री गांधीने वक्तव्यको अविलम्ब प्रकाशित करना स्वीकार कर लिया।
इसके बाद श्री गांधी शिमलासे रवाना हो गये, और उन्होंने कुछ दिनोंके अन्दर वाइसरायको इस आशयका तार भेजा कि श्री शौकत अली और श्री मुहम्मद अलीने वक्तव्यपर हस्ताक्षर कर दिये हैं, और उसमें बहुत मामूलीसा रद्दोबदल किया गया है। वह समाचारपत्रोंको प्रकाशनार्थ भेज दिया गया है। परिवर्तन निम्नलिखित था:
श्री गांधी द्वारा तैयार किये गये मसविदेमें जहाँ ये शब्द लिखे हैं “हम कहना चाहते हैं कि हमारा मंशा हिंसाको प्रोत्साहित करना कदापि न था, परन्तु हम मानहै हैं कि हमारे भाषणोंमें कुछ वाक्य ऐसे जरूर हैं जिनका वही अर्थ निकल सकता है जो लगाया गया है”, श्री शौकत अली तथा श्री मुहम्मद अलीने ये शब्द लिख दिये: “हम कहना चाहते हैं कि हमारा मंशा हिंसाको उकसानेका कदापि न था, और हमने कभी यह सोचा भी न था कि हमारे भाषणोंमें कोई वाक्य ऐसा भी हो सकता है जिनसे वह अर्थ निकलता हो जो किया गया है परन्तु हम अपने मित्रकी दलीलके जोरको और उनके द्वारा लगाये गये अर्थको तसलीम करते हैं।”
वक्तव्य के प्रकाशित हो जाने के पश्चात् सरकारी विज्ञप्ति प्रकाशित की गई। उस विज्ञप्ति में क्या-क्या शर्तें होंगी इसका निर्णय ठीक-ठीक तबतक न हो पाया जबतक वह प्रकाशनकी तिथिके समीप न पहुँच गई। श्री गांधी उसे नहीं देख पाये; हाँ, यह जरूर था कि उसका सार जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है श्री गांधीको बतला दिया गया था। वाइसराय और श्री गांधी के बीच हुई मुलाकातोंका मुख्य भाग उस वार्ता-लापमें बीता जो भारतमें फैले असन्तोषसे सम्बन्धित था और जिसमें पंजाबके उपद्रव, खिलाफत आन्दोलन, सेवरकी सन्धि तथा जनताकी आम हालत——ये चीजें शामिल थीं। श्री गांधीने वाइसराय के सम्मुख स्वराज्यकी कोई योजना पेश नहीं की थी और न उक्त मुलाकातों में ऐसी किसी योजनापर बातचीत ही हुई थी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ४-८-१९२१|}}<noinclude>{{left|२०-३६|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९४
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|'''परिशिष्ट ४'''<br>'''रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा असहयोगकी आलोचना'''}}
{{right|२ मार्च, १९२१}}
{{right|'''(१)'''}}
दुबले-पतले शरीरवाले तथा भौतिक साधनोंसे विहीन महात्मा गांधीने दीन-दुर्बल लोगों की महाशक्तिका——जो भारत के अपमानित तथा पद-दलित और निर्धन व्यक्तियोंके हृदयों में बैठी इन्तजार कर रही थी——आह्वान किया है। यह इस देशके लिए उपयुक्त ही है। भारतने अपने भाग्य के साथी के रूपमें नारायणी सेनाको नहीं बल्कि नारायणको...शरीर-बलको नहीं, आत्म-बलको चुना है। भारत मानव-समाज के इतिहासको शरीर-बलके युद्धरूपी दलदलसे ऊँचा उठाकर नैतिक स्तरपर लानेको कटिबद्ध हुआ है। स्वराज्य क्या है? वह माया है। वह उस कोहरे के समान है जो शाश्वत या अविनाशी के प्रखर तेजपर किसी प्रकारका धब्बा डाले बिना विलीन हो जायेगा। हम लोग पश्चिमसे सीखे हुए कुछ वाक्योंकी दुहाई देकर अपनेको कितना ही धोखा दे लें, लेकिन सचाई यह है कि स्वराज्य हमारा ध्येय नहीं है।हमारा संघर्ष आध्यात्मिक संघर्ष है। यह मानवता के लिए होनेवाला संघर्ष है। हमें मानवको राष्ट्र, देश, स्वतन्त्रता आदिके उस जटिल जालसे, जिसे उसके राष्ट्रीय अहमने अपने चारों ओर बुन लिया है, मुक्त करना है। तितलीको यह समझाना है कि रेशमके कोये में दबे पड़े रहनेकी अपेक्षा आकाशमें विचरनेकी स्वतन्त्रता अधिक मूल्यवान है। यदि हम, शक्तिशाली व्यक्ति या संस्थाको, शस्त्रसज्जित संगठन या धनाढ्य वर्गको ललकार सकते हैं या उसके आदेशोंका तिरस्कार करनेका साहस रखते हैं और इस प्रकार संसारके सामने अनश्वर आत्माकी शक्तिका परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं तो पशुबलका दिवाला ही निकल जायेगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न होनेपर मानव स्वराज्य पा जायेगा। पूर्वके रहनेवाले हम नंगे-भूखे और दरिद्र लोगोंको समस्त मानव समाज के लिए स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है। ‘राष्ट्र’ जैसा शब्द हमारी भाषामें है ही नहीं। जब हम इस शब्दको अन्य लोगोंसे उधार ले आते हैं तब हम देखते हैं कि वह हमारे लिए ठीक नहीं बैठता।
इसका कारण यह है कि हमें नारायणका पल्ला पकड़ना है।हमारी विजय हमें विजयके अतिरिक्त——ईश्वरीय जगत्की विजय——कुछ नहीं दे सकती। मैंने पश्चिमका अवलोकन किया है; मुझे अपावन भोजोंकी, जिनमें वह प्रतिक्षण मस्त रहता है, लालसा नहीं है। पश्चिम तो अपनी इस प्रवृत्तिके कारण दिनपर-दिन मोटा-ताजा, सुर्ख और भयावह रूपसे मदमस्त और वासना-प्रिय होता जा रहा है। मशालोंकी रोशनी में आधी राततक चालू रखी जानेवाली विलासितापूर्ण और विवेकहीन रंगरलियोंकी चहल-पहल हमें नहीं चाहिए। हमारे लिए तो उषाकालके मन्द और मनोहर प्रकाशकी सजगता ही ठीक है।<noinclude></noinclude>
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{{c|'''परिशिष्ट ४'''<br>'''रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा असहयोगकी आलोचना'''}}
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इसका कारण यह है कि हमें नारायणका पल्ला पकड़ना है।हमारी विजय हमें विजयके अतिरिक्त——ईश्वरीय जगत्की विजय——कुछ नहीं दे सकती। मैंने पश्चिमका अवलोकन किया है; मुझे अपावन भोजोंकी, जिनमें वह प्रतिक्षण मस्त रहता है, लालसा नहीं है। पश्चिम तो अपनी इस प्रवृत्तिके कारण दिनपर-दिन मोटा-ताजा, सुर्ख और भयावह रूपसे मदमस्त और वासना-प्रिय होता जा रहा है। मशालोंकी रोशनी में आधी राततक चालू रखी जानेवाली विलासितापूर्ण और विवेकहीन रंगरलियोंकी चहल-पहल हमें नहीं चाहिए। हमारे लिए तो उषाकालके मन्द और मनोहर प्रकाशकी सजगता ही ठीक है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९५
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''परिशिष्ट'''|५६३}}</noinclude>
{{c|'''(२)'''}}
{{right|'''५ मार्च, १९२१'''0}}
असहयोगकी कल्पना राजनैतिक कार्योंके लिए अपनाई हुई फकीरी है। हमारे विद्यार्थी अपने त्यागकी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उनका यह त्याग उन्हें कहाँ ले जा रहा है? पूर्णतर शिक्षाकी ओर नहीं, बल्कि अशिक्षाकी ओर। उस कल्पनाके पीछे विनाशका उत्कट सुख है और यह भावना अपने सबसे सुन्दर रूपमें फकीरी या संन्यास, तथा खराबसे-खराब रूपमें भयंकरताका वह ताण्डव है जिसके चलते मानव-प्रकृति सामान्य जीवनकी मौलिक वास्तविकतामें विश्वास खो बैठती है और निरर्थक विनाशमें उदासीनतापूर्ण आनन्दका अनुभव करती है——जैसा कि गत महायुद्धके अवसर-पर तथा हमारे ही जीवनमें घटित होनेवाले ऐसे ही अन्य अवसरोंपर प्रकट हो चुका है। यह भावना अपने अनाक्रामक नैतिक रूपमें संन्यास है, और सक्रिय नैतिक रूपमें हिंसा। मरुस्थल (उपेक्षा) भी उसी प्रकार हिंसाका रूप है जैसा कि तूफानके समय विक्षुब्ध सागर। ये दोनों ही जीवनके शत्रु हैं।
बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के जमानेका वह दिन मुझे याद है जब तरुण विद्यार्थियों-का एक समूह मुझसे मिलने आया। मैं उस समय अपने ‘विचित्रा’ निवासकी पहली मंजिल के बड़े कमरे में था। उन्होंने मुझसे कहा कि यदि आप हमें अपने स्कूल और कालेज छोड़ देनेका आदेश देंगे तो हम लोग तुरन्त ही उसका पालन करेंगे। मैंने ऐसा करनेसे दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया। वे क्रोधित हुए और इस भावके साथ लौट गये कि कदाचित् मुझमें देश-प्रेम है ही नहीं। परन्तु जनताके इस अदम्य उत्साह-के प्रदर्शनसे बहुत पहले मैंने, उस समय जब मेरे पास अपना कहनेको ५ रुपये तक न थे, एक स्वदेशी स्टोर खोलने के निमित्त एक हजार रुपये दिये थे और इस प्रकार मैं पैसे-पैसेको मुहताज हो गया था। उन विद्यार्थियोंको पढ़ाई छोड़नेकी सलाह देनेसे इनकार करनेका कारण यह था कि स्कूल छोड़ना एक नकारात्मक कदम है जिससे अराजकता फैलती है; और यह कदम अस्थायी रूपसे ही क्यों न उठाया गया हो, मुझे कभी पसन्द नहीं है। मुझे एक ऐसे काल्पनिक सिद्धान्तसे भय लगता है जो वास्तविकताकी ओरसे आँखें मूँदनेको तैयार है। ...आप जानते हैं कि मैं पाश्चात्य देशोंकी अर्थ-प्रधान सभ्यतामें उसी प्रकार विश्वास नहीं करता जिस प्रकार में मानवमें उसके शरीरको ही सबसे बड़ा सत्य मानने से इनकार करता हूँ। शरीरको नष्ट करने तथा जीवनकी भौतिक आवश्यकताओंकी उपेक्षा करनेमें तो मेरा और भी कम विश्वास है। जरूरत इस बातकी है कि मनुष्यकी शारीरिक और आध्यात्मिक प्रकृतिके बीच सामंजस्य स्थापित किया जाये, बुनियाद और उसपर खड़े भवनके बीच सन्तुलन बनाये रखा जाये। मैं पूर्व और पश्चिमके वास्तविक मिलनमें विश्वास करता हूँ। प्रेम आत्मा-का अन्तिम सत्य है। हमें उस सत्यपर आघात करनेका नहीं, वरन् सब प्रकारके विरोधोंके बीच भी उस सत्यकी ध्वजाको ऊँचा रखनेका भरसक प्रयत्न करना चाहिए। असहयोगका विचार उस सत्यको अनावश्यक रूपसे चोट पहुँचाता है। वह हमारे चूल्हों में जलनेवाली अग्नि नहीं है बल्कि वह आग है जो हमारे घरोंको भस्मीभूत कर देती है।<noinclude></noinclude>
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{{right|'''५ मार्च, १९२१'''}}
असहयोगकी कल्पना राजनैतिक कार्योंके लिए अपनाई हुई फकीरी है। हमारे विद्यार्थी अपने त्यागकी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उनका यह त्याग उन्हें कहाँ ले जा रहा है? पूर्णतर शिक्षाकी ओर नहीं, बल्कि अशिक्षाकी ओर। उस कल्पनाके पीछे विनाशका उत्कट सुख है और यह भावना अपने सबसे सुन्दर रूपमें फकीरी या संन्यास, तथा खराबसे-खराब रूपमें भयंकरताका वह ताण्डव है जिसके चलते मानव-प्रकृति सामान्य जीवनकी मौलिक वास्तविकतामें विश्वास खो बैठती है और निरर्थक विनाशमें उदासीनतापूर्ण आनन्दका अनुभव करती है——जैसा कि गत महायुद्धके अवसर-पर तथा हमारे ही जीवनमें घटित होनेवाले ऐसे ही अन्य अवसरोंपर प्रकट हो चुका है। यह भावना अपने अनाक्रामक नैतिक रूपमें संन्यास है, और सक्रिय नैतिक रूपमें हिंसा। मरुस्थल (उपेक्षा) भी उसी प्रकार हिंसाका रूप है जैसा कि तूफानके समय विक्षुब्ध सागर। ये दोनों ही जीवनके शत्रु हैं।
बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के जमानेका वह दिन मुझे याद है जब तरुण विद्यार्थियों-का एक समूह मुझसे मिलने आया। मैं उस समय अपने ‘विचित्रा’ निवासकी पहली मंजिल के बड़े कमरे में था। उन्होंने मुझसे कहा कि यदि आप हमें अपने स्कूल और कालेज छोड़ देनेका आदेश देंगे तो हम लोग तुरन्त ही उसका पालन करेंगे। मैंने ऐसा करनेसे दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया। वे क्रोधित हुए और इस भावके साथ लौट गये कि कदाचित् मुझमें देश-प्रेम है ही नहीं। परन्तु जनताके इस अदम्य उत्साह-के प्रदर्शनसे बहुत पहले मैंने, उस समय जब मेरे पास अपना कहनेको ५ रुपये तक न थे, एक स्वदेशी स्टोर खोलने के निमित्त एक हजार रुपये दिये थे और इस प्रकार मैं पैसे-पैसेको मुहताज हो गया था। उन विद्यार्थियोंको पढ़ाई छोड़नेकी सलाह देनेसे इनकार करनेका कारण यह था कि स्कूल छोड़ना एक नकारात्मक कदम है जिससे अराजकता फैलती है; और यह कदम अस्थायी रूपसे ही क्यों न उठाया गया हो, मुझे कभी पसन्द नहीं है। मुझे एक ऐसे काल्पनिक सिद्धान्तसे भय लगता है जो वास्तविकताकी ओरसे आँखें मूँदनेको तैयार है। ...आप जानते हैं कि मैं पाश्चात्य देशोंकी अर्थ-प्रधान सभ्यतामें उसी प्रकार विश्वास नहीं करता जिस प्रकार में मानवमें उसके शरीरको ही सबसे बड़ा सत्य मानने से इनकार करता हूँ। शरीरको नष्ट करने तथा जीवनकी भौतिक आवश्यकताओंकी उपेक्षा करनेमें तो मेरा और भी कम विश्वास है। जरूरत इस बातकी है कि मनुष्यकी शारीरिक और आध्यात्मिक प्रकृतिके बीच सामंजस्य स्थापित किया जाये, बुनियाद और उसपर खड़े भवनके बीच सन्तुलन बनाये रखा जाये। मैं पूर्व और पश्चिमके वास्तविक मिलनमें विश्वास करता हूँ। प्रेम आत्मा-का अन्तिम सत्य है। हमें उस सत्यपर आघात करनेका नहीं, वरन् सब प्रकारके विरोधोंके बीच भी उस सत्यकी ध्वजाको ऊँचा रखनेका भरसक प्रयत्न करना चाहिए। असहयोगका विचार उस सत्यको अनावश्यक रूपसे चोट पहुँचाता है। वह हमारे चूल्हों में जलनेवाली अग्नि नहीं है बल्कि वह आग है जो हमारे घरोंको भस्मीभूत कर देती है।<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
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{{right|'''१३ मार्च, १९२१'''}}
आज विश्व-इतिहासके इस नाजुक मौकेपर क्या भारत अपनी सीमाओंसे ऊपर उठकर संसार के सामने वह महान् आदर्श नहीं रखेगा जो पृथ्वीके भिन्न-भिन्न लोगोंके सहयोगसे सब देशोंमें समन्वय और प्रेम स्थापित करनेका प्रयास करे। विश्वासवादी लोग तो यही कहेंगे कि समस्त संसारकी खातिर अपनी आवाज बुलन्द कर सके, इससे पहले भारतको शक्तिशाली और समृद्ध बननेकी आवश्यकता है। परन्तु मैं इस बातमें विश्वास नहीं करता। यह धारणा कि मनुष्यके बड़प्पनका मापदण्ड उसके आर्थिक साधन हैं, एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है जो आजके संसारपर अपनी काली छाया डाल रही है——यह मानवका अपमान है। आर्थिक दृष्टिसे जो लोग निर्बल हैं उनका फर्ज है कि वे संसारको इस भ्रान्तिसे बचायें। और भारत अपनी निर्धनता और गिरी हुई हालत के बावजूद मानव-समाजके त्राणके लिए आगे बढ़नेकी क्षमता रखता
है।...
...भारतका आदर्श इसके पक्ष में नहीं है कि एक देशके लोग दूसरे देशके लोगोंसे अपनेको अलग मानें। यह भावना अन्ततः अनवरत संघर्षोंको जन्म देती है। इसलिए मेरा निवेदन यह है कि भारतको संसार-भरके राष्ट्रोंके बीच सहयोगका पक्ष लेना उचित है। इसकी अस्वीकृतिको भावनाको पार्थक्यकी अनुभूति द्वारा समर्थन प्राप्त होता है, एकताकी अनुभूतिसे स्वीकृतिकी भावनाको बल मिलता है। भारतने सदा यही कहा है कि ऐक्य ही सत्य है और पार्थक्य माया है। यह ऐक्य शून्य नहीं है। यह
वह शक्ति है जिसमें सबका समावेश हो जाता है; और इसीलिए अस्वीकृतिके मार्गसे उसतक पहुँचना कदापि सम्भव नहीं है। अपने हृदय और मस्तिष्कको पश्चिमके हृदय और मस्तिष्कसे पृथक करनेका हमारा वर्तमान संघर्ष आध्यात्मिक आत्मघातका एक प्रयत्न कहा जा सकता है। अगर हम मिथ्या राष्ट्रीय दर्पकी भावनासे प्रेरित होकर जोर-जोरसे यह कहते फिरें कि पश्चिमने मानवके असीम लाभकी कोई चीज उत्पन्न नहीं की है, तो पूर्वीय मस्तिष्कने कुछ महत्त्वपूर्ण चीज दी है, इसके बारेमें हम गहरी शंकाको ही जन्म देते हैं। क्योंकि पूर्व और पश्चिम दोनोंके ही मानव मस्तिष्क सत्यतक पहुँचने के लिए उसके विभिन्न पहलुओंको ध्यानमें रखते हुए अपने जुदा-जुदा दृष्टिकोणोंसे सतत प्रयत्न कर रहे हैं। और यदि यह सच हो सकता है कि पश्चिमकी शक्तिने उसे बिलकुल गलत रास्तेपर ला छोड़ा है तब हम पूर्वके दृष्टिकोणके बारेमें निश्चयात्मक रूपसे कुछ भी नहीं कह सकते। हमें चाहिए कि हम मिथ्याभिमानको त्यागें और संसारके किसी भी भागमें यदि कोई दीपक जलाया जा रहा हो तो इस भावनाके साथ खुशियाँ मनायें कि यह आलोक हमारे सभी घरोंके सामान्य प्रकाशका ही एक अंग है।...
पश्चिमने पूर्वको गलत समझा है और उन दोनोंके बीच फैले हुए अनैक्यका कारण यही है। परन्तु यदि पूर्व भी अपनी तरफसे पश्चिमको गलत समझनेकी कोशिश करे तो क्या इससे बात सुधर जायेगी? वर्तमान युगमें पश्चिमका व्यापक और प्रबल<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||परिशिष्ट|५६५}}</noinclude>प्रभाव रहा है। यह इसीलिए सम्भव हो पाया है क्योंकि नियतिने पश्चिमको मानवके लिए बहुत बड़ा काम सौंपा है। हम पूर्वके निवासियोंको पाश्चात्य देशोंमें उसके निकट वह सीखने के लिए जाना होगा जो उसके पास हमें सिखाने के लिए है। ऐसा करके
हम इस युगको शीघ्र सफल बनाने में सहायक होंगे। हम जानते हैं कि पूर्वके पास भी सिखाने के लिए कुछ जरूर है और उसका अपना भी यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रकाशको बुझने न दे। वह समय आनेवाला है जब पश्चिमको यह समझने का अवकाश मिलेगा कि पूर्व में उसके निवासके लिए स्थान है, भोजन है और अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी प्रस्तुत हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''लैटर्स टु ए फ्रैंड'''}}
{{dhr}}
{{c|'''परिशिष्ट ५'''<br>'''संयुक्त प्रान्त में दमनपर नेहरूकी टिप्पणी'''}}
संयुक्त प्रान्तमें सरकारी दमन——प्रमुख नेताओंकी गिरफ्तारी इत्यादि ——कुल मिलाकर दिखावटी ढंगका नहीं रहा है प्रत्युत वह दमन बहुत ही सुव्यवस्थित और जमकर किया गया है और थोड़े ही लोग होंगे जो उसकी चपेटमें न आये हों। इसपर तीन भिन्न शीर्षकोंके अन्तर्गत विचार किया जा सकता है:
१. किसान आन्दोलनसे सम्बन्धित दमन-कार्य।
२. नौजवान कार्यकर्त्ताओंपर अभियोग और दण्ड।
३. सुरक्षात्मक धाराओं तथा धारा १४४का प्रयोग।
{{c|'''१. किसान आन्दोलन'''}}
सरकारने इस आन्दोलनको कुचल देनेका अत्यन्त दृढ़ और अविरत प्रयत्न किया है। फरवरीके प्रारम्भ में रामचन्द्र, केदारनाथ और देवनारायण गिरफ्तार किये गये। कहीं किसी प्रकारका उपद्रव नहीं हुआ जिससे सरकारका हौसला बढ़ गया और उसने किसानोंको कुचलने के लिए बहुत जोरदार कदम उठाये।घुड़सवारोंके दस्ते, तोपें और पैदल सेनाके दस्ते मुख्य-मुख्य जिलोंमें घुमाये गये और सैनिकोंके लिए रसद इत्यादि मुहय्या करनेको लोग मजबूर किये गये। एक स्थानपर स्कूली छात्रोंसे गोरे सनिकोंको जबरदस्ती सलाम करवाया गया।
रायबरेली और फैजाबादमें बहुत बड़ी संख्यामें किसान गिरफ्तार किये गये। उनकी गिरफ्तारीका कारण यही बताया गया कि उन्होंने गत जनवरीमें की गई लूट-पाटमें भाग लिया था। इन गिरफ्तार किये गये किसानोंमें से अधिकांश निर्दोष थे; उनका अपराध केवल इतना ही था कि वे [गाँवोंके] पंच थे। सैकड़ोंको जेलमें डाल दिया गया और बादमें बिना मुकदमा चलाये उन्हें छोड़ दिया गया। सैकड़ों व्यक्ति
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||परिशिष्ट|५६५}}</noinclude>प्रभाव रहा है। यह इसीलिए सम्भव हो पाया है क्योंकि नियतिने पश्चिमको मानवके लिए बहुत बड़ा काम सौंपा है। हम पूर्वके निवासियोंको पाश्चात्य देशोंमें उसके निकट वह सीखने के लिए जाना होगा जो उसके पास हमें सिखाने के लिए है। ऐसा करके
हम इस युगको शीघ्र सफल बनाने में सहायक होंगे। हम जानते हैं कि पूर्वके पास भी सिखाने के लिए कुछ जरूर है और उसका अपना भी यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रकाशको बुझने न दे। वह समय आनेवाला है जब पश्चिमको यह समझने का अवकाश मिलेगा कि पूर्व में उसके निवासके लिए स्थान है, भोजन है और अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी प्रस्तुत हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''लैटर्स टु ए फ्रैंड'''|1em}}
{{dhr}}
{{c|'''परिशिष्ट ५'''<br>'''संयुक्त प्रान्त में दमनपर नेहरूकी टिप्पणी'''}}
संयुक्त प्रान्तमें सरकारी दमन——प्रमुख नेताओंकी गिरफ्तारी इत्यादि ——कुल मिलाकर दिखावटी ढंगका नहीं रहा है प्रत्युत वह दमन बहुत ही सुव्यवस्थित और जमकर किया गया है और थोड़े ही लोग होंगे जो उसकी चपेटमें न आये हों। इसपर तीन भिन्न शीर्षकोंके अन्तर्गत विचार किया जा सकता है:
१. किसान आन्दोलनसे सम्बन्धित दमन-कार्य।
२. नौजवान कार्यकर्त्ताओंपर अभियोग और दण्ड।
३. सुरक्षात्मक धाराओं तथा धारा १४४का प्रयोग।
{{c|'''१. किसान आन्दोलन'''}}
सरकारने इस आन्दोलनको कुचल देनेका अत्यन्त दृढ़ और अविरत प्रयत्न किया है। फरवरीके प्रारम्भ में रामचन्द्र, केदारनाथ और देवनारायण गिरफ्तार किये गये। कहीं किसी प्रकारका उपद्रव नहीं हुआ जिससे सरकारका हौसला बढ़ गया और उसने किसानोंको कुचलने के लिए बहुत जोरदार कदम उठाये।घुड़सवारोंके दस्ते, तोपें और पैदल सेनाके दस्ते मुख्य-मुख्य जिलोंमें घुमाये गये और सैनिकोंके लिए रसद इत्यादि मुहय्या करनेको लोग मजबूर किये गये। एक स्थानपर स्कूली छात्रोंसे गोरे सनिकोंको जबरदस्ती सलाम करवाया गया।
रायबरेली और फैजाबादमें बहुत बड़ी संख्यामें किसान गिरफ्तार किये गये। उनकी गिरफ्तारीका कारण यही बताया गया कि उन्होंने गत जनवरीमें की गई लूट-पाटमें भाग लिया था। इन गिरफ्तार किये गये किसानोंमें से अधिकांश निर्दोष थे; उनका अपराध केवल इतना ही था कि वे [गाँवोंके] पंच थे। सैकड़ोंको जेलमें डाल दिया गया और बादमें बिना मुकदमा चलाये उन्हें छोड़ दिया गया। सैकड़ों व्यक्ति
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९८
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अब भी जेलोंमें हैं और मुकदमेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले फैजाबाद जेलमें लगभग ७०० किसान थे। वे बिना किसी मुकदमे के पिछले तीन माहसे जेलमें थे। रिहा किये गये कैदियोंका कथन है कि जो लोग जेलोंमें हैं उनको इतने खराब किस्मका भोजन दिया जा रहा है कि उन जेलोंमें हैजा फैल गया है और इस प्रकार पीड़ित कैदी बड़ी संख्या में मौतके शिकार बन रहे हैं।
सुलतानपुर और प्रतापगढ़ जिलोंमें किसी किस्मका उपद्रव नहीं हुआ था; परन्तु इन जिलोंमें भी पंचों और सरपंचोंको या तो जेल भेज दिया गया है या मुचलका देने को विवश किया गया है। इन लोगोंके खिलाफ सामान्यतः यह आरोप लगाया जाता
है कि “तुम सभा के सरगना हो और लोगोंको सभामें शरीक होनेपर मजबूर करते हो। कभी-कभी यह भी कह दिया जाता है कि [तुम्हारे कहने से] “नाई, धोबी बन्द कर दिये गये हैं।” इन आरोपोंमें, जहाँतक गत दिसम्बर और जनवरीका सम्बन्ध है, बहुत कुछ सचाई है परन्तु उसके बाद इन जिलोंमें सामाजिक बहिष्कारका एक भी वाकया नहीं हुआ है। इन आरोपोंकी आड़में झूठे मुकदमे चलाये जाते हैं और सजा हुए बिना नहीं रहती। इस तरहके मामलोंमें से अधिकांश मामले स्थानीय पुलिस या जमींदार के उकसानेपर चलाये जाते हैं और इन मुकदमोंको दायर करनेवाले उसी हलकेके कुछ लोग हुआ करते हैं।
राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम फैजाबाद, प्रतापगढ़, सुलतानपुर और रायबरेली में लागू किया गया है। इस अधिनियमको लागू करने के पहले कुछ जिलोंमें १४४ धाराके अन्तर्गत सभी प्रकारकी सभाओंका बुलाया जाना निषिद्ध ठहरा दिया गया था।
इस हुक्मकी बाकायदा तामील की गई और कोई सभा नहीं की गई। तिसपर भी राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम लागू कर दिया गया।
इन जिलोंमें काम करनेवाले हमारे कार्यकर्त्ताओंको तरह-तरहसे परेशान किया जाता है। उनके पीछे खुफिया पुलिसके बहुतसे आदमी तथा वर्दीधारी पुलिसमै नोंका एक गिरोह चला करता है और जहाँ वे कार्यकर्त्ता जानेवाले होते हैं वहाँ वे पहलेसे ही जा डटते हैं। गाँववालोंको धमकाया जाता है ताकि वे कांग्रेस में शरीक न हों और हमारी कोई सहायता न करें। उनसे जबानी तौरपर यह भी कहा गया है कि चरखा चलाना गैर-कानूनी है और “महात्मा गांधी की जय” का नारा लगाना बहुत बड़ा अपराध है, कांग्रेसकी मेम्बरीके कागजपर दस्तखत करना अवैध है इत्यादि, इत्यादि। जिन लोगोंने [कांग्रेसके सदस्यता-पत्रपर] हस्ताक्षर कर दिये हैं उनको यह कहकर धमकाया जाता है कि तुमपर मुकदमा चलाया जायेगा, और मामलेको दबा देनेकी गरजसे रिश्वतें माँगी जाती है।
पर्चे बांटने के अपराधमें प्रतापगढ़ जिले के छः नवयुवक विद्यार्थी -कार्यकर्ता जेल भेज दिये गये। उनसे जमानत जमा करने को कहा गया, परन्तु उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।सुलतानपुर जिलेमें एक ऐसा ही मामला छः व्यक्तियोंके विरुद्ध चलाया गया था, परन्तु अब वह वापस ले लिया गया है।राजद्रोहात्मक सभा अधिनियमको भंग करनेके झूठे अपराधमें दो कार्यकर्त्ताओंको छः महीनेकी सख्त कैदकी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५७६
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Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५४०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
लोगोंके ध्यानमें लानेकी जरूरत है । हम मामूली लकड़ियोंके गट्ठोंको निकाल देते
हैं किसी द्वेषके कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि उनके रखनेसे देखनेवालोंका ध्यान
बिलकुल सादी लकड़ी जिसे प्रचार ओर संरक्षणकी आवश्यकता नहीं है तथा ऐसी
लकड़ीमें बँट जायेगा, जिसे लोगोंके सामने लाना चाहिए और संरक्षण देना चाहिए ।
इसलिए जब एक पत्र - प्रेषकने मेरा ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि असम कांग्रेस
कमेटीने ऐसी वस्तुएँ प्रदर्शनीमें शामिल कर ली हैं जो पुतलीघरोंके सूतसे बनी हैं
या मशीन-करघोंसे बुनी गई हैं, तब मुझे आश्चर्य हुआ । इस प्रकार गौहाटी कांग्रेसके
अवसरपर की गई प्रदर्शनीमें विलायती सूत या कपड़ेतकको भी स्थान दिया गया ।
मैंने वहाँकी स्वागतकारिणी कमेटीके नाम तार भेजा । पाठकोंको यह जानकर हर्ष
होगा कि कमेटीने फौरन जवाबमें यह लिखा कि मिलके सूतकी चीज इत्यादि भूलसे
लेली गई थीं और फौरन हटाई जा रही हैं। में उक्त कमेटीके सदस्योंको इस भूलको
कुबूल करने तथा सुधारनेमें तत्परता दिखानेपर बधाई देता हूँ। में यहाँ यह भी बता
देना चाहता हूँ कि अन्य वस्तुओंका वर्णन भी इतना सन्दिग्ध और अनिश्चित है कि
उसके अन्तर्गत करीब-करीब हरएक चीज शामिल की जा सकती है । यदि कांग्रेस
प्रदर्शनियोंका हेतु यह हो कि उनसे लोगोंकी जानकारी बढ़े, वे शिक्षा पायें और
झोंपड़ोंके धन्धोंको प्रोत्साहन दें तथा लोगोंको यह मालूम हो कि खद्दरके विकासकी
शक्यता कितनी है, तो गत प्रदर्शनियोंकी बाँधी हुई मर्यादाका पालन कड़ाईके साथ
करना चाहिए ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<br>यंग इंडिया, २१-१०-१९२६
{{C|''' ५५९. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}
{{Rh|||२१ अक्तूबर, १९२६}}
<Br>प्रिय सतीशबाबू,
{{Gap}}लगता है जैसे मुद्दतके बाद आपका पत्र मिला। मुझे शक तो था कि आपका
हाल, जैसा में चाहता हूँ, शायद उतना अच्छा नहीं है। मैं कोई मदद कर सकूं या
नहीं, लेकिन आपको मुझे अपने दुःख-दर्द से आगाह तो रखना ही चाहिये। अगर आप
मुझे अपना सुख बता देते हैं तो दुःख भी मुझे जानने चाहिए। इसलिए मेहरबानी
करके लिखिए कौन-सी अप्रत्याशित कठिनाइयाँ आ पड़ी हैं ?
{{Gap}}'इंगलिशमैन' से ली गई कतरन मैंने पढ़ी है । हम जानते हैं कि अभीतक
खादी लोकप्रिय नहीं हो पाई है। जब हो जायेगी तब हम जो चाहते हैं उसे पानेमें
देर नहीं लगेगी।
{{Gap}}खादी सेवाके बारेमें आपके विचार मैंने नोट कर लिये हैं ।
{{Gap}}१ व २. देखिए “पत्र : क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको ", १४-१०-१९२६ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८१
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~2026-45378-53
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="~2026-45378-53" /></noinclude>{{rh||'''क्या यह जीवदया है ? - ३'''|
५४५}}
प्रतिक्रियासे बच सका हूँ या नहीं। और अगर में उनके क्रोधका मूल खोजता हूँ तो
उसकी तहमें प्रेम ही पाता हूँ। उन्होंने मुझमें अपनी समझके अनुसार अहिंसाकी
कल्पना कर ली थी। अब उनको अपनी कल्पनासे उलटा दिखाई देता है । वे मुझे
महात्मा मानते थे इसीलिए वे मुझपर क्रोध करते हैं, वे लोगोंपर मेरा अपने अनुकूल
प्रभाव पड़ता देखकर प्रसन्न होते थे । अब मैं उनको अल्पात्मा लगता हूँ । वे मेरे
प्रभावको कुप्रभाव मानकर दुःखी होते हैं और चूंकि उन्होंने क्रोधको जीतना नहीं
सीखा इसीलिए उनका यह दुःख क्रोधमें परिणत हो जाता है ।
{{Gap}मैं उनके इस क्रोधका स्वागत करता हूँ; उसके पीछे जो भाव है, उसे मैं
समझता हूँ। मैं उन्हें धीरजसे समझानेका प्रयत्न करूँगा । उस प्रयत्नमें सहायता
करनेके लिए मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे अपने क्रोधको शान्त करें। मैं उनके
क्रोधको समझ गया हूँ। मैं सत्यका पुजारी तथा शोधक हूँ । यदि मुझसे भूल हुई होगी तो
मैं उसे देख लूँगा और चूंकि भूलको कबूल करना मुझे प्रिय है, इसलिए उसे तुरन्त
कबूल करके सुधार लूंगा । शास्त्रका वचन है कि सत्यवादी एवं सत्याचरककी भूलोंसे
भी जगतको क्षति नहीं पहुँचती ।
सत्यकी महिमा ऐसी ही है ।
{{Gap}}मित्रों और सुहृदोंके लिए बस इतना ही कहूँगा :
{{Gap}}मैंने आपके पत्र एक जगह रख लिये हैं । बहुतोंको तो मैं सामान्यतया व्यक्तिगत
रूपसे उत्तर दे रहा हूँ । लेकिन इस विषयमें इतने लोगोंके और इतने लम्बे-लम्बे पत्र
आये हैं कि उनका सविस्तार उत्तर देना अशक्य है । पत्रोंकी पहुँच दे सकनेका अवकाश
भी मेरे पास नहीं है ।
{{Gap}}कुछ लेखक तो अपने पत्रोंको 'नवजीवन' में प्रकाशित कराना चाहते हैं । वे मुझे
इस बोझसे मुक्त कर दें। मैं उनकी दी हुई दलीलोंका उत्तर यथाशक्ति और यथामति
देनेका प्रयत्न अवश्य करूँगा । वे लोग इतने ही से सन्तोष मान लें । मैं उनसे इतनी
ही प्रार्थना करता हूँ ।
प्रस्तावना लम्बी हो गई है; किन्तु पाठक इसे आवश्यक समझकर क्षमा करेंगे ।
अब हम मूल विषयपर आयें फिलहाल तो मैं प्राप्त पत्रोंके प्रश्नोंपर विचार करके
ही सन्तोष मानूंगा ।
{{Gap}}एक भाई लिखते है!
{{Gap}}आप कुत्तोंको खाना देनेके लिए मना करते हैं, लेकिन मैं उनको बुलाने
तो नहीं जाता - वे तो खुद बखुद आ जाते हैं और खड़े रहते हैं । उनको
कैसे मार भगायें ? जब बहुत-से कुत्ते आ जायेंगे, तब देखा जायेगा। कुत्तोंको
खाना देनेसे मनुष्यमें दयाभाव पनपता है और न देनेसे निष्ठुरता आती है ।
हम पापमें डूबे हैं, फिर हम जितना हो सके उतना धर्म क्यों न करें ?
{{Gap}}इस प्रकार दयापूर्ण दिखाई देनेवाले विचारोंके कारण ही हम लोग दया-धर्मके
नामपर हिंसाको अनजाने ही बढ़ावा दे रहे हैं । लेकिन जिस प्रकार लौकिक राजाके
कानूनके अज्ञानके कारण अपराधी दण्डसे बचता नहीं है, वही बात अलौकिक राजाके
नियमोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है ।
<Br>३१-३५<noinclude></noinclude>
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Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||'''क्या यह जीवदया है ? - ३'''|
५४५}}
प्रतिक्रियासे बच सका हूँ या नहीं। और अगर में उनके क्रोधका मूल खोजता हूँ तो
उसकी तहमें प्रेम ही पाता हूँ। उन्होंने मुझमें अपनी समझके अनुसार अहिंसाकी
कल्पना कर ली थी। अब उनको अपनी कल्पनासे उलटा दिखाई देता है । वे मुझे
महात्मा मानते थे इसीलिए वे मुझपर क्रोध करते हैं, वे लोगोंपर मेरा अपने अनुकूल
प्रभाव पड़ता देखकर प्रसन्न होते थे । अब मैं उनको अल्पात्मा लगता हूँ । वे मेरे
प्रभावको कुप्रभाव मानकर दुःखी होते हैं और चूंकि उन्होंने क्रोधको जीतना नहीं
सीखा इसीलिए उनका यह दुःख क्रोधमें परिणत हो जाता है ।
{{Gap}मैं उनके इस क्रोधका स्वागत करता हूँ; उसके पीछे जो भाव है, उसे मैं
समझता हूँ। मैं उन्हें धीरजसे समझानेका प्रयत्न करूँगा । उस प्रयत्नमें सहायता
करनेके लिए मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे अपने क्रोधको शान्त करें। मैं उनके
क्रोधको समझ गया हूँ। मैं सत्यका पुजारी तथा शोधक हूँ । यदि मुझसे भूल हुई होगी तो
मैं उसे देख लूँगा और चूंकि भूलको कबूल करना मुझे प्रिय है, इसलिए उसे तुरन्त
कबूल करके सुधार लूंगा । शास्त्रका वचन है कि सत्यवादी एवं सत्याचरककी भूलोंसे
भी जगतको क्षति नहीं पहुँचती ।
सत्यकी महिमा ऐसी ही है ।
{{Gap}}मित्रों और सुहृदोंके लिए बस इतना ही कहूँगा :
{{Gap}}मैंने आपके पत्र एक जगह रख लिये हैं । बहुतोंको तो मैं सामान्यतया व्यक्तिगत
रूपसे उत्तर दे रहा हूँ । लेकिन इस विषयमें इतने लोगोंके और इतने लम्बे-लम्बे पत्र
आये हैं कि उनका सविस्तार उत्तर देना अशक्य है । पत्रोंकी पहुँच दे सकनेका अवकाश
भी मेरे पास नहीं है ।
{{Gap}}कुछ लेखक तो अपने पत्रोंको 'नवजीवन' में प्रकाशित कराना चाहते हैं । वे मुझे
इस बोझसे मुक्त कर दें। मैं उनकी दी हुई दलीलोंका उत्तर यथाशक्ति और यथामति
देनेका प्रयत्न अवश्य करूँगा । वे लोग इतने ही से सन्तोष मान लें । मैं उनसे इतनी
ही प्रार्थना करता हूँ ।
प्रस्तावना लम्बी हो गई है; किन्तु पाठक इसे आवश्यक समझकर क्षमा करेंगे ।
अब हम मूल विषयपर आयें फिलहाल तो मैं प्राप्त पत्रोंके प्रश्नोंपर विचार करके
ही सन्तोष मानूंगा ।
{{Gap}}एक भाई लिखते है!
{{Gap}}आप कुत्तोंको खाना देनेके लिए मना करते हैं, लेकिन मैं उनको बुलाने
तो नहीं जाता - वे तो खुद बखुद आ जाते हैं और खड़े रहते हैं । उनको
कैसे मार भगायें ? जब बहुत-से कुत्ते आ जायेंगे, तब देखा जायेगा। कुत्तोंको
खाना देनेसे मनुष्यमें दयाभाव पनपता है और न देनेसे निष्ठुरता आती है ।
हम पापमें डूबे हैं, फिर हम जितना हो सके उतना धर्म क्यों न करें ?
{{Gap}}इस प्रकार दयापूर्ण दिखाई देनेवाले विचारोंके कारण ही हम लोग दया-धर्मके
नामपर हिंसाको अनजाने ही बढ़ावा दे रहे हैं । लेकिन जिस प्रकार लौकिक राजाके
कानूनके अज्ञानके कारण अपराधी दण्डसे बचता नहीं है, वही बात अलौकिक राजाके
नियमोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है ।
<Br>३१-३५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८२
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Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५४६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}हम जरा उक्त शंका करनेवालेके तर्कपर भी विचार करें। हम अपने घरपर
भिखारीके आनेपर उसे रोटी देते हैं और समझते हैं कि हमने पुण्य किया। हम इस
प्रकार बहुत हदतक भिखारियोंके सम्प्रदायको बढ़ाने, आलस्यको बढ़ावा देने और
इस कारण अधर्मकी वृद्धि करनेमें निमित्त बनते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सच्चे
भिखारियोंको मरने दिया जाये। जो अपंग या अपाहिज हैं, उनका पोषण करना
समाजका धर्म है। लेकिन हम व्यक्तिगत रूपमें इस कामका उत्तरदायित्व न लें
यह काम समाजके अधिकारी यानी प्रतिनिधि स्वराज्य हो तो राजा - को करना
चाहिए। इसके लिए संस्था हो और दयालु सज्जन ऐसी संस्थाको दान दें। यदि
प्रतिनिधि पवित्र तथा ज्ञानवान् होगा तो प्रत्येक भिखारीको उसके बारेमें प्रयत्नपूर्वक
पूछताछ करके, वह पात्र होगा तो, आश्रय देगा। ऐसा न होनेसे भिखारीके वेशमें चोर
और लम्पट पुरुष पैसा कमाते हैं और देशमें भुक्खड़पन घटनेके बदले बढ़ता है ।
{{Gap}}जिस प्रकार भिखारीको खाना देनेमें पाप है, उसी प्रकार आवारा कुत्तोंको
टुकड़ा डालनेमें भी पाप है उसमें कुत्तोंके प्रति झूठी दया है, क्षुधापीड़ित कुत्तेको
रोटीका टुकड़ा देने में उस कुत्तेका अपमान है । आवारा कुत्ते समाजकी सभ्यता या
दयाके चिह्न नहीं हैं; बल्कि समाजके अज्ञान तथा आलस्यके चिह्न हैं ।
{{Gap}}जानवर अपने भाई-बन्द हैं। में इनमें सिंह, बाघ और अन्य पशुओंको भी गिनता
हूँ । हम लोगोंको सिंह, सर्प आदिके साथ रहना नहीं आता इसका कारण हमारी
शिक्षाकी त्रुटि है । जब मनुष्य उनको अधिक अच्छी तरह पहचानेगा, तब वह इस
तथ्यको जान लेगा और ऐसे जीवोंतकको पालना सीखेगा। आज तो मनुष्यने विधर्मी
अथवा विदेशी मनुष्योंतकको अपनाना नहीं सीखा है ।
कुत्ता तो वफादार साथी है। कुत्तों और घोड़ोंकी स्वामिभक्तिके चाहे जितने
दृष्टान्त मिल सकते हैं। इसलिए हम जैसे अपने साथीको इधर-उधर भटकते फिरने
नहीं देते, बल्कि उसे आदरपूर्वक रखते हैं, हमें वैसा ही कुत्तोंके बारेमें करना चाहिए ।
{{Gap}}हम आवारा कुत्तोंके सम्प्रदायको बढ़ाकर कुत्तोंके प्रति हमारा जो दायित्व है, उससे
मुक्त नहीं होते ।
{{Gap}}दूसरी ओर, अगर हम आवारा कुत्तोंके अस्तित्वको पाप समझते हैं और इस-
लिए उनको खानेको नहीं देते, तो हम कुत्तोंकी सेवा करते हैं और उनको सुख देते हैं ।
{{Gap}}तब वह आदमी जो कुत्तोंके प्रति भी दयाधर्म पालना चाहता है क्या करे ?
उसे अपनी आमदनीमें से कुत्तोंका भाग निकालकर उसका उपयोग जानवरोंकी संस्थाओं-
को सौंप देना चाहिए। अगर ऐसी संस्था शक्य न हो -- और मेरा खयाल तो यह
है कि शक्य होते हुए भी ऐसी संस्था है बहुत मुश्किल -- तो व्यक्ति स्वयं एक या
अधिक कुत्तोंको पालनेका प्रयत्न करे । अगर वह यह भी न कर सके, तो उसे कुत्तोंका
प्रश्न छोड़कर अपने जीवदयाभावका अमल अन्य प्राणियोंके विषयमें करना चाहिए।
{{Gap}}" लेकिन आपने तो उन्हें मारने की बात कही है ? " इस प्रकारके प्रश्न
पत्रलेखक कोई आवेशमें और कोई प्रीतिसे पूछते हैं।
मैंने कुत्तोंके
मारनेको कोई स्वतन्त्र धर्मकी तरह प्रस्तुत नहीं किया है; मैंने तो उसे आपद्धर्म ही<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८३
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2026-08-20T12:25:44Z
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||'''क्या यह जीवदया है - ३'''|
५४७}}
{{Gap}}बताया है । मैंने परिस्थिति विशेषमें उसे धर्म कहा है । अगर कुत्तोंकी रक्षा राजा न
करे, पंच भी न करें, यदि लोग खुद भी उन्हें न पाल सकें और कुत्तोंसे दुःख पायें तथा
उनकी भेंट चढ़नेके लिए तैयार न हों, तो उन्हें तथा अपनेको पीड़ा और भयसे मुक्त
करनेके उपायकी तरह इसका अवलम्बन करें। यह कड़वा घूंट है, लेकिन मेरी अन्तरात्मा
कहती है कि उसमें शुद्ध प्रेम और दया है ।
{{Gap}}कुत्तोंकी आजकी स्थिति हिन्दुस्तानके दुबले पशुओं तथा मनुष्यों जैसी है।
मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इस शोचनीय परिणामका कारण हमारी अहिंसा धर्मकी
अनभिज्ञता अहिंसाका हममें अभाव होना है। धर्मका फल पामरता, भुखमरी,
दुष्काल इत्यादि हर्गिज नहीं है । अगर यह देश पुण्यभूमि हो तो आज हम जो
दारिद्र्य अपने चारों ओर व्याप्त देखते हैं, वह दिखाई नहीं दे सकता था । कई उतावले
और अधीर लोगोंने इससे यह सार निकाल लिया है कि अहिंसा धर्म ही झूठा है ।
{{Gap}}मैं जानता हूँ कि अहिंसा धर्म झूठा नहीं है, बल्कि उसके पुजारी झूठे हैं ।
अहिंसा क्षत्रियका धर्म है। महावीर क्षत्रिय थे । बुद्ध क्षत्रिय थे। राम, कृष्ण
आदि क्षत्रिय थे । वे सब, थोड़े या बहुत, अहिंसाके उपासक थे। हम उनके नामपर
भी अहिंसाका प्रवर्तन करना चाहते हैं । लेकिन इस समय तो अहिंसाका ठेका भीरु
वैश्यवर्गने ले रखा है; इसलिए वह धर्म निस्तेज हो गया है । अहिंसाका दूसरा
नाम है क्षमाकी परिसीमा । लेकिन क्षमा तो वीर पुरुषका भूषण है । अभयके बिना
अहिंसा सम्भव नहीं हो सकती; हम लोग तो जीवदयातक नहीं जानते ।
{{Gap}}हम गायोंको बचा नहीं सकते, कुत्तोंको लातों और लाठियोंसे मारते हैं, उनकी
एक-एक पसली दिखाई देती है । हमें इससे शर्म नहीं आती, लेकिन अगर आवारा
कुत्ता मरता है तो हमें दुःख होता है । पाँच हजार कुत्ते भूखे तरसते फिरते रहें, जूठन
और मैला खायें और मरें नहीं, यह सब अच्छा या उनमें से पचास मर जायें और शेष
सुरक्षित रहें सो अच्छा ? लाठी मारकर कुत्तेको बाहर कर देना तो पाप है ही ।
{{Gap}}लेकिन यह दुःख न देख सकनेवाला व्यक्ति एक या अधिक कुत्तोंको गोली मारकर
पुण्य करता है - यह बात समझी जा सकती है ।
हमेशा ही प्राण लेना हिंसा नहीं है । या यों कहें कि अनेक अवसरोंपर प्राण
न लेनेमें अधिक हिंसा है । मैं इसका विवेचन आगे चलकर करूँगा ।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, २४-१०-१९२६<noinclude></noinclude>
51f45ddanjmcgx3yv05ckxfib405j8q
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५८९
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Bikki97
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||सन्देश : ' फॉरवर्ड ' को|
५५३}}
{{Gap}}जो रुपया खर्च करेंगे वह आपको चक्रवृद्धि ब्याज सहित वापस मिल जायेगा । आप
मिल-मालिकोंसे लाभांशकी माँग करते हैं लेकिन उनका कहना है कि उनके पास
लाभांश देनेके लिए धन नहीं है । मैं आपसे कहता हूँ कि जबतक आप लोग मद्यपान
आदि दुर्गुणोंको न छोड़ेंगे तबतक आपकी माँगका आपके मालिकों या मैनेजरोंपर
कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अपने कष्टोंको दूर करनेका उपाय आप लोगोंके ही हाथमें
है । मिलोंमें स्वराज्य लानेके लिए आपको अपने सब दुर्गुणोंका त्याग करना पड़ेगा ।
आपको मिलोंमें यह समझकर पूर्ण उत्साहसे काम करना चाहिए, मानो आप स्वयं
मिलोंके मालिक हैं । आपको अपने संघको इस प्रकार संगठित करना चाहिए कि कोई
भी मजदूर उसका सदस्य बने बिना न रहे। आपका संघ देश-भर में प्रसिद्ध है;
परन्तु इससे आपको फूल नहीं जाना चाहिए। यह संघ देश भरमें उत्तम माना जाता
है क्योंकि यह इतना सुव्यवस्थित है । परन्तु जबतक अपनी जानकारीमें आई हुई
कमजोरियोंको आप दूर नहीं कर लेते तबतक आपको चैनसे नहीं बैठना चाहिए।
उन्नतिकी कोई सीमा नहीं होती ।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>गुजराती, ३१-१०-१९२६
{{C|'''५७४. सन्देश : फॉरवर्ड' को'''}}
{{Gap}}मैं 'फॉरवर्ड' को अपनी शुभ कामनाएँ भेजता हूँ । सुभाष बोस जैसे नौजवानोंको
बाकायदा मुकदमा चलाये बिना जितने दिनोंतक जेलमें बन्द रखा जायेगा, उतनी ही
तेजीसे हम अपने लक्ष्यकी ओर आगे बढ़ेंगे । स्वतन्त्रताका संघर्ष कोई खेल नहीं है ।
इस वास्तविक और कठोर संघर्षमें हमें अपने हजारों अच्छेसे अच्छे साथियोंकी बलि
देनी पड़ेगी । और हमें यह कीमत चुकाने में किसी प्रकारका आगा-पीछा नहीं करना
चाहिए ।
{{Rh|||मो० क० गांधी}}
<Br>[ अंग्रेजीसे]
<Br>फॉरवर्ड, २५-१०-१९२६<noinclude></noinclude>
7wyyup6fb0whgtk6wo080m005kkdd3o
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९०
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2026-08-20T12:43:16Z
Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५७५. पत्र : श्री और श्रीमती पोलकको'''}}
{{Rh|||साबरमती}}
{{Rh|||२६ अक्तूबर, १९२६}}
<Br>प्रिय हेनरी और मिली,
{{Gap}}तुम्हारे पहले तारको पढ़कर ही मेरा मन बुरीसे-बुरी खबर सुननेके लिए
तैयार हो चुका था; फिर भी इस समाचारसे मुझे बड़ा सदमा पहुँचा। दूसरा तार
जिस समय मिला बा मेरे पास थी । वह कुछ बातचीत करने आई थी। वह समझ
गई कि मुझे कितना गहरा सदमा पहुँचा है । उम्मीद है कि तुम्हें मेरे दोनों तार'
यथासमय मिल गये होंगे। मैं जानना चाहता हूँ कि वे तार तुम्हें मिले या नहीं;
क्योंकि मैं यह चाहता हूँ कि तुम यह समझ लो कि तुम्हारे इस दुःखमें मैं तुम्हारे
साथ हूँ !
तुम जानते हो कि उसने मुझे मेरे पत्रके उत्तरमें केवल एक ही स्नेहपत्र लिखा
था । उस पत्र में भी मुझे उसी अदम्य इच्छाशक्तिके दर्शन हुए जो मुझे जब वह मेरे
साथ सोया करता था, तब दिखाई दिया करती थी । आत्माकी अमरतामें मेरा विश्वास
पहलेसे ज्यादा दृढ़ हो गया है। इसलिए, मैं जानता हूँ कि उसका कुछ भी नष्ट
नहीं हुआ है । मृत्यु तो निद्रा और विस्मृतिकी एक स्थिति-भर है यह वाक्य
तुम्हारे और मेरे लिए एक काव्योक्ति-भर नहीं है । वाल्डोके लिए यह जीवन उच्चतर
जीवनकी अवस्थामें पहुँचनेकी एक सीढ़ी-जैसा ही था। ईश्वर तुमको यह दुःख सहन
करनेकी शक्ति दे। शायद इस विचारसे तुम्हें सान्त्वना मिलेगी कि हम सबको उसी
राह जाना है, जिसपर वाल्डो गया है ।
हम सबके स्नेह सहित,
{{Rh|||तुम्हारा,}}
{{Rh|||भाई}}
{{Gap}}अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १०८३४) की फोटो - नकलसे ।
१. ये उपलब्ध नहीं हैं।
२. वाल्डो; पोलकका ज्येष्ठ पुत्र ।
३. " डैथ इज बट ए स्लोप ऐंड ए फॉरगेटिंग " ।<noinclude></noinclude>
cbvdihv0p0karbi379hr66imfchggkb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९१
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2026-08-21T07:19:58Z
Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५७६. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजक '''}}
{{Rh|||आश्रम}}
{{Rh|||साबरमती}}
{{Rh|||२६ अक्तूबर, १९२६}}
<Br>प्रिय चार्ली,
{{Gap}}मैंने तुम्हारे तारका उत्तर दे दिया है । शास्त्री निश्चय ही आ रहे हैं।
आशा है कि तुम अच्छे हो। मैं तो बार-बार तुमसे यही कहूँगा कि 'किसी
बातकी चिन्ता मत करो।' शिष्टमण्डल काफी अच्छा बन पड़ा है और लोगोंको वह
प्रभावित कर सकेगा ।
तुम्हारे सारे आदेश पूरे कर दिये गये हैं। मुझे 'मेट्रोपोलिटन' से तो सुन्दर उत्तर
मिला है ।
बेचारा हेनरी । मुझे अभी वाल्डोकी मृत्युका तार मिला है। मिली बहुत ज्यादा
दुःखी होगी, लेकिन वह बहादुर है और जल्दी ही इस सदमेपर काबू पा लेगी ।
{{Rh|||तुम्हारा,}}
{{Rh|||मोहन}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Gap}}जब तुम जोहानिसबर्ग जाओ तब श्रीमती पी० के० नायडूका पता लगाना ।
और यह भी मालूम करना कि उनका निर्वाह किस प्रकार हो रहा है ? रामचन्द्रन
राष्ट्रीय मुस्लिम यूनिवर्सिटी दिल्लीमें चरखा सिखानेके लिए गये हैं । शान्ति आजी-
विकाकी खोजमें सिंगापुर जा रहा है, क्योंकि वह उस लड़कीका खर्च जुटाना चाहता
है जिसके साथ वह शादी करना चाहता है । देवदास अभीतक मसुरीमें, कृष्णदास
बंगालमें और प्यारेलाल फिन हाल मथुरादासके पास है । हमारे हिस्से मलेरिया काफी
मात्रामें आ जुटा है। लेकिन मरीज सुधारके मार्गपर हैं ।
{{Rh|||मो०}}
<Br>रेवरेंड सी० एफ० एन्ड्रयूज
<Br>डर्बन
{{Gap}}अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १२०२५ ए) की फोटो - नकलसे
{{Gap}}१. उपलब्ध नहीं है।
{{Gap}}२. देखिए " तार : सवेंटस ऑफ इंडिया सोसाइटीको ", २३-१०-१९२६ को या उसके पश्चात्की
पादटिप्पणी ।<noinclude></noinclude>
f9svdbzo6o2i18c8bbjxs5sndlplk3u
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९५
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2026-08-21T07:26:15Z
Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||टिप्पणियाँ|
५५९}}
जो पहलेसे ही इजाजत ले चुके थे और जो अपने ही खर्चपर रहना चाहते थे,
फिलहाल न आनेके लिए लिखना पड़ा है। नवयुवकोंके लिए यह अनुचित है कि वे
बिना इत्तिला दिये और बिना इजाजत लिए आयें। गत पन्द्रह दिनोंमें ऐसे चार
युवक आ चुके हैं। और इससे भी अधिक दुःखकी बात तो यह है कि वे वापसीका
खर्चतक अपने साथ नहीं लाये थे। सबसे अन्तमें एक एम० ए० महोदय पधारे,
जिन्होंने कहा कि मैं आश्रममें बसने आया हूँ, लेकिन उन्होंने मार्गमें अपना निश्चय
बदल दिया और सोचा कि यहाँ कुछ दिन रहेंगे और आश्रमके जीवनका अध्ययन
करेंगे। वे अपने साथ कोई परिचयपत्र नहीं लाये थे और उनकी गाँठमें इतना पैसा
भी न था कि वे वापसी टिकट ले सकते। मुझे अपने हृदयमें कड़ाई लाकर कहना
पड़ा कि वे आश्रम में पहलेसे आज्ञा पाये बिना ठहर नहीं सकते । में नहीं समझ सकता
कि सुशिक्षित नवयुवकोंको जिन्दगीका सामान्य शिष्टाचार और मेजबानीके कायदेतक
क्यों नहीं मालूम हैं । मैं जानता हूँ कि आश्रम के बारेमें कुछ गलतफहमी फैली है ।
बिना इत्तिला आनेवाले दर्शकोंने बताया कि वे तो यह समझते थे कि यह आश्रम ही
सारे हिन्दुस्तानमें एक ऐसी जगह है कि जहाँ लोग बिना इजाजत पहुँच सकते हैं और
जहाँ उनका हार्दिक स्वागत भी होता है। इस कारण नवयुवकोंको समझ लेना चाहिए
कि आश्रम उनकी ऐसी आशाएँ कभी पूरी नहीं कर सकता और यह आश्रम एक
साधारण मानव संस्था है जो कि अपने आदर्शोतक पहुँचनेकी चेष्टा कर रही है;
पर जो ऐसा करनेमें बार-बार असफल होती रही है । आश्रमवासियोंके बारेमें इतना
ही कहा जा सकता है कि उन्होंने उन आदर्शोंतक, जिन्हें अपने सामने रखा है,
पहुँचनेकी भरसक चेष्टा की है ।
{{C|'''उपवासके बारेमें '''}}
{{Gap}}बहुत नाप-तौलकर अपनी बात कहनेवाले, एक सज्जन लिखते हैं :
{{Gap}}मैं आपके पत्रको फाइल बड़ी श्रद्धा और सावधानीसे रखता हूँ । इस
नाते मैं आपका ध्यान आपके ३०-९-१९२६ के अंकमें छपी निम्न उक्तिकी
ओर आकर्षित करता हूँ -- ' इस शस्त्र [ उपवास ] का उपयोग केवल हितके
साथ ही और वह भी उसके हितके लिए ही किया जा सकता है ।"
{{Gap}}किन्तु आपके पिछले लेखोंसे लगता है कि इसका एक महत्त्वपूर्ण अपवाद
भी है । जेलमें अपमानजनक व्यवहार किये जानेपर उपवास या भूख हड़ताल
करना भी सच्चा सत्याग्रह है, उदाहरणार्थ ऐसे मामलेमें जैसे अपमानजनक तरीकेसे
खाना दिया जाना । में चाहता हूँ कि आप सत्याग्रह अथवा दुराग्रह " के
१. देखिए
सत्याग्रह अथवा दुराग्रह " १२-९-१९२६ । मूल गुजराती लेख नवजीवनमें प्रकाशित
हुआ था। ३०-९-१९२६ के यंग इंडियामें उसका महादेव देसाई द्वारा किया गया अनुवाद प्रकाशित हुआ
था। उक्त पंक्तियाँ इसी अनुवादसे दी गई हैं।<noinclude></noinclude>
driobzqkveiegfydb06nlqhpk4ylnqd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१५
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2026-08-20T14:09:27Z
Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||शुद्ध आचरणके लिए आग्रह|
५७९}}
ही चीजें लोगोंको बहुत अप्रिय लगने लगी हैं। चाहे जहाँसे लोग बटोर लिये
जाते हैं, उनके नामसे कांग्रेसकी सदस्यताका चन्दा जमा कर दिया जाता
और कांग्रेसकी शर्तको शाब्दिक रूपसे पूरा करनेके लिए उनको लपेटनेके
वास्ते खद्दरके अँगोछे दे दिये जाते हैं। आप कमसे कम इस नीचे गिरानेवाली
पद्धतिके खिलाफ तो अपनी आवाज उठा हो सकते हैं। क्या ऐसे लोग
अथवा इनके प्रतिनिधि हमें स्वराज्य लेने लायक बना सकते हैं ? आप कांग्रेससे
अवकाश लें, चाहे न लें हम लोग इतनी आशा तो करते ही हैं कि आप
इन हरकतोंके खिलाफ अपनी कलम जरूर उठायेंगे ?
तीसरे सज्जन लिखते हैं :
{{Gap}}}क्या आपको मालूम है कि कांग्रेसके सदस्य बनानेके लिए मेरे प्रान्तमें
शर्मनाक हरकतें की जा रही हैं ? एक चारित्र्यभ्रष्ट पुरुषने कुछ बदनाम औरतें
इकट्ठी कर ली हैं । कमसे कम एकके बारेमें तो मैं कह ही सकता हूँ और
वह उनसे या कहिए, उससे कांग्रेसके सदस्य बनवाने का काम ले रहा है। वह
घर-घर जाती है, लोगोंकी बुरीसे-बुरी प्रवृत्तियोंको उभारती है और सदस्य
बना लाती है। क्या यह नैतिकतापूर्ण है ? क्या यह विधिसंगत है ? यदि इन
तरीकोंसे सदस्य बनाये जायेंगे तो कांग्रेसका क्या मूल्य रहेगा ?
{{Gap}}क्या आप इस प्रकारकी स्त्रियों द्वारा कांग्रेसके सदस्य बनाये जानेको
उचित ठहराने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं तो क्या आप इस बातको सरे
आम कहेंगे ?
एक चौथे सज्जनने समाचारपत्रों में से कतरनें काट कर भेजी हैं जिनसे जाहिर
होता है कि उम्मीदवार लोग तथा उनके समर्थक साम्प्रदायिक भावोंको उभारते हैं ।
वे लिखते हैं :
{{Gap}}हिन्दू-मुसलमानोंमें फूट तो है ही - • लेकिन अब तो लोग प्रान्तीयता तथा
जातीयता को भी साधन बनाने लगे हैं; यानी वोट देनेवालोंसे यह कहा जाता
है कि अपने ही प्रान्त या अपने ही पेशेवालोंको उनकी योग्यता-अयोग्यताका
विचार किये बिना, वोट दो ।
{{Gap}}एक पाँचवें सज्जनने कुछ कतरनें भेजी हैं, जिनमें ऐसे भाषण छपे हुए हैं जो
मैं यहाँ उद्धृत नहीं कर सकता, क्योंकि वे प्रकाशनके सर्वथा अयोग्य हैं ।
{{Gap}}एक छठवें सज्जन लिखते हैं कि रुपये बाँटनेका यानी रिश्वतका बाजार गर्म
है । वे आदमी जिनकी कहीं कोई पूछ न थी, आज लम्बी-लम्बी तनख्वाहें फटकार
रहे हैं — सिर्फ इसलिए कि वे सभाओंमें बोल सकते हैं और इसलिए कि वे अपने
जिलेमें कुछ प्रभाव रखनेवाले माने जाते हैं। उनकी निजकी कोई राय नहीं है ।
{{Gap}उनमें से कुछ तो यहाँतक बेशर्म हैं कि कह देते हैं कि हम तो एजेंट हैं और हम किसी
भी नीतिका ढोल पीटनेको राजी हैं - उसी प्रकार जिस प्रकार कि वकील रुपयेके<noinclude></noinclude>
dt7kmcrfj5ib42bh6vk2q9sfuh3u0vv
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2026-08-20T14:10:06Z
Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||शुद्ध आचरणके लिए आग्रह|
५७९}}
ही चीजें लोगोंको बहुत अप्रिय लगने लगी हैं। चाहे जहाँसे लोग बटोर लिये
जाते हैं, उनके नामसे कांग्रेसकी सदस्यताका चन्दा जमा कर दिया जाता
और कांग्रेसकी शर्तको शाब्दिक रूपसे पूरा करनेके लिए उनको लपेटनेके
वास्ते खद्दरके अँगोछे दे दिये जाते हैं। आप कमसे कम इस नीचे गिरानेवाली
पद्धतिके खिलाफ तो अपनी आवाज उठा हो सकते हैं। क्या ऐसे लोग
अथवा इनके प्रतिनिधि हमें स्वराज्य लेने लायक बना सकते हैं ? आप कांग्रेससे
अवकाश लें, चाहे न लें हम लोग इतनी आशा तो करते ही हैं कि आप
इन हरकतोंके खिलाफ अपनी कलम जरूर उठायेंगे ?
तीसरे सज्जन लिखते हैं :
{{Gap}}क्या आपको मालूम है कि कांग्रेसके सदस्य बनानेके लिए मेरे प्रान्तमें
शर्मनाक हरकतें की जा रही हैं ? एक चारित्र्यभ्रष्ट पुरुषने कुछ बदनाम औरतें
इकट्ठी कर ली हैं । कमसे कम एकके बारेमें तो मैं कह ही सकता हूँ और
वह उनसे या कहिए, उससे कांग्रेसके सदस्य बनवाने का काम ले रहा है। वह
घर-घर जाती है, लोगोंकी बुरीसे-बुरी प्रवृत्तियोंको उभारती है और सदस्य
बना लाती है। क्या यह नैतिकतापूर्ण है ? क्या यह विधिसंगत है ? यदि इन
तरीकोंसे सदस्य बनाये जायेंगे तो कांग्रेसका क्या मूल्य रहेगा ?
{{Gap}}क्या आप इस प्रकारकी स्त्रियों द्वारा कांग्रेसके सदस्य बनाये जानेको
उचित ठहराने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं तो क्या आप इस बातको सरे
आम कहेंगे ?
एक चौथे सज्जनने समाचारपत्रों में से कतरनें काट कर भेजी हैं जिनसे जाहिर
होता है कि उम्मीदवार लोग तथा उनके समर्थक साम्प्रदायिक भावोंको उभारते हैं ।
वे लिखते हैं :
{{Gap}}हिन्दू-मुसलमानोंमें फूट तो है ही - • लेकिन अब तो लोग प्रान्तीयता तथा
जातीयता को भी साधन बनाने लगे हैं; यानी वोट देनेवालोंसे यह कहा जाता
है कि अपने ही प्रान्त या अपने ही पेशेवालोंको उनकी योग्यता-अयोग्यताका
विचार किये बिना, वोट दो ।
{{Gap}}एक पाँचवें सज्जनने कुछ कतरनें भेजी हैं, जिनमें ऐसे भाषण छपे हुए हैं जो
मैं यहाँ उद्धृत नहीं कर सकता, क्योंकि वे प्रकाशनके सर्वथा अयोग्य हैं ।
{{Gap}}एक छठवें सज्जन लिखते हैं कि रुपये बाँटनेका यानी रिश्वतका बाजार गर्म
है । वे आदमी जिनकी कहीं कोई पूछ न थी, आज लम्बी-लम्बी तनख्वाहें फटकार
रहे हैं — सिर्फ इसलिए कि वे सभाओंमें बोल सकते हैं और इसलिए कि वे अपने
जिलेमें कुछ प्रभाव रखनेवाले माने जाते हैं। उनकी निजकी कोई राय नहीं है ।
{{Gap}उनमें से कुछ तो यहाँतक बेशर्म हैं कि कह देते हैं कि हम तो एजेंट हैं और हम किसी
भी नीतिका ढोल पीटनेको राजी हैं - उसी प्रकार जिस प्रकार कि वकील रुपयेके<noinclude></noinclude>
foicvkyvmlkbwvgq2y5qwmyeoirbs91
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१७
250
186532
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2026-08-21T07:06:52Z
~2026-45587-34
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/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="2409:40E0:45:E6B6:A07A:AC2B:2519:BB74" /></noinclude>{{c|'''५९९. लकीरके फकीर'''}}
एक सज्जन भावावेशपूर्ण भाषामें लिखते हैं :
{{Gap}}मुझे लगता है कि आपके २३ सितम्बर के 'यंग इंडिया 'में ईश-प्रार्थना
और खासकर सामुदायिक प्रार्थनाके समर्थन में लिखे गये सुन्दर लेखमें कुछ त्रुटि
है । लेखके अन्तमें गिरजाघरों, मन्दिरों और मस्जिदोंका उल्लेख करते हुए
आप कहते हैं कि "ये प्रार्थनाके स्थान कोरे अन्धविश्वास के सूचक ऐसे स्थान
नहीं हैं जिन्हें जल्दीसे-जल्दी नेस्तनाबूद कर दिया जाना चाहिए। वे आघात
सहते रहकर भी अबतक मौजूद हैं और अनन्त कालतक बने रहेंगे।"
उक्त वाक्य पढ़नेपर मेरे मनमें सवाल उठा : आक्रमण किसके ? निस्स-
न्देह इतिहास बताता है कि आस्तिकोंके परस्पर विरोधी सम्प्रदायोंने एक-दूसरेके
आराधनालयोंपर जितने हमले किये हैं उतने नास्तिकों, ठट्ठेबाजों या धूर्तोने
नहीं । सच तो यह है कि आप जैसे हमलोंका उल्लेख करते हैं, यदि सभी
नहीं तो वैसे अधिकांश आक्रमण ईश्वरके नामपर ईश्वरभक्त धर्मान्ध व्यक्तियोंने
ही अपने ईश्वरकी महिमा बढ़ानेके लिए किये हैं। ऐसे उदाहरण गिनानेकी
धृष्टता करना आपके इतिहासके ज्ञानकी तौहीन करना होगा ।
मेरे मनमें दूसरा प्रश्न यह उठा : क्या यह सच, बिलकुल सच है कि ये
आराधना-स्थल सब आक्रमणोंको सह पाये हैं ? फिर वही उत्तर मिलता है,
कदापि नहीं । काशी (बनारस) का गंगा घाट देखिए - जहाँ सदियोंसे, यहाँ
तक बुद्धके भी पहलेसे, विश्वनाथजीका मन्दिर चला आता था; लेकिन अब
उसके स्थानपर उसी अपवित्र किये गये मन्दिरके खण्डहरपर बनी हुई एक
आलीशान मस्जिद उस 'पवित्र नगर' के बीचोंबीच खड़ी है; सो भी किसकी
आज्ञासे ? एक 'जिन्दा पीर', सुलतान औलिया' यानी बड़ी पवित्रताके
साथ रहनेवाले सम्राट् औरंगजेबके हुक्मसे और 'नास्तिक' अंग्रेजोंकी करतूतसे
नहीं, बल्कि इब्नसऊद तथा वहाबियों जैसे बड़े दिग्गज आस्तिकोंकी करतूतसे
हजाजमें (मुसलमानोंकी 'पवित्र भूमि' में) ईश्वराधनाके अनेक स्थान अभी-
अभी भ्रष्ट किये तथा धूलमें मिला दिये गये हैं और उनके ऊपर हिन्दुस्तानी
मुसलमान आज घड़ों आँसू बहा रहे हैं और जिनकी मरम्मत दुनियाके तमाम
मुसलमान बादशाहोंमें से केवल एक निजाम (हैदराबाद) ने ही अपने रुपयेके
बलसे करनेकी निष्फल चेष्टा की है।
{{Gap}}१. देखिए " प्रार्थनामें विश्वास नहीं ", २३-९-१९२६ ।<noinclude></noinclude>
izyx03d0riwxca7b0zycklv83ifdtzq
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2026-08-21T07:11:45Z
Bikki97
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/* शोधित */
672438
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५९९. लकीरके फकीर'''}}
एक सज्जन भावावेशपूर्ण भाषामें लिखते हैं :
{{Gap}}मुझे लगता है कि आपके २३ सितम्बर के 'यंग इंडिया 'में ईश-प्रार्थना
और खासकर सामुदायिक प्रार्थनाके समर्थन में लिखे गये सुन्दर लेखमें कुछ त्रुटि
है । लेखके अन्तमें गिरजाघरों, मन्दिरों और मस्जिदोंका उल्लेख करते हुए
आप कहते हैं कि "ये प्रार्थनाके स्थान कोरे अन्धविश्वास के सूचक ऐसे स्थान
नहीं हैं जिन्हें जल्दीसे-जल्दी नेस्तनाबूद कर दिया जाना चाहिए। वे आघात
सहते रहकर भी अबतक मौजूद हैं और अनन्त कालतक बने रहेंगे।"
उक्त वाक्य पढ़नेपर मेरे मनमें सवाल उठा : आक्रमण किसके ? निस्स-
न्देह इतिहास बताता है कि आस्तिकोंके परस्पर विरोधी सम्प्रदायोंने एक-दूसरेके
आराधनालयोंपर जितने हमले किये हैं उतने नास्तिकों, ठट्ठेबाजों या धूर्तोने
नहीं । सच तो यह है कि आप जैसे हमलोंका उल्लेख करते हैं, यदि सभी
नहीं तो वैसे अधिकांश आक्रमण ईश्वरके नामपर ईश्वरभक्त धर्मान्ध व्यक्तियोंने
ही अपने ईश्वरकी महिमा बढ़ानेके लिए किये हैं। ऐसे उदाहरण गिनानेकी
धृष्टता करना आपके इतिहासके ज्ञानकी तौहीन करना होगा ।
मेरे मनमें दूसरा प्रश्न यह उठा : क्या यह सच, बिलकुल सच है कि ये
आराधना-स्थल सब आक्रमणोंको सह पाये हैं ? फिर वही उत्तर मिलता है,
कदापि नहीं । काशी (बनारस) का गंगा घाट देखिए - जहाँ सदियोंसे, यहाँ
तक बुद्धके भी पहलेसे, विश्वनाथजीका मन्दिर चला आता था; लेकिन अब
उसके स्थानपर उसी अपवित्र किये गये मन्दिरके खण्डहरपर बनी हुई एक
आलीशान मस्जिद उस 'पवित्र नगर' के बीचोंबीच खड़ी है; सो भी किसकी
आज्ञासे ? एक 'जिन्दा पीर', सुलतान औलिया' यानी बड़ी पवित्रताके
साथ रहनेवाले सम्राट् औरंगजेबके हुक्मसे और 'नास्तिक' अंग्रेजोंकी करतूतसे
नहीं, बल्कि इब्नसऊद तथा वहाबियों जैसे बड़े दिग्गज आस्तिकोंकी करतूतसे
हजाजमें (मुसलमानोंकी 'पवित्र भूमि' में) ईश्वराधनाके अनेक स्थान अभी-
अभी भ्रष्ट किये तथा धूलमें मिला दिये गये हैं और उनके ऊपर हिन्दुस्तानी
मुसलमान आज घड़ों आँसू बहा रहे हैं और जिनकी मरम्मत दुनियाके तमाम
मुसलमान बादशाहोंमें से केवल एक निजाम (हैदराबाद) ने ही अपने रुपयेके
बलसे करनेकी निष्फल चेष्टा की है।
{{Gap}}१. देखिए " प्रार्थनामें विश्वास नहीं ", २३-९-१९२६ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६२
250
186888
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2026-08-21T03:49:51Z
अनुश्री साव
80
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{c|'''महत्वपूर्ण प्रस्ताव'''}}
कार्यवाहक मण्डलने नीचे लिखे महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किये हैं:
१. आश्रम में जिम्मेदारीका हरएक काम करनेवाले तथा आश्रममें सदाके लिए या थोड़े समय के लिए आकर रहनेवाले हरएक आदमीके लिए ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक रहेगा।
२. आश्रम में दाखिल होनेके लिए इच्छुक व्यक्तिको अपने स्थान पर ही रहकर १ वर्ष तक आश्रमके नियमों का पालन करना चाहिए।
अपवाद: खास परिस्थितियों में प्रमुखको इस विषय में अपवाद करनेका अधिकार होगा।
३. आश्रम में किसी अलग रसोईघरका जुड़ना इष्ट नहीं है, इसलिए आश्रम में नए दाखिल होनेवालोंके लिए––चाहे वे कुटुम्बी हों या एकाकी––खाने-पीने की व्यवस्था आश्रममें चलनेवाले संयुक्त रसोईघर में ही होगी।
{{c|'''मेहमानोंसे विनती'''}}
आश्रम देखने आनेवाले और रहनेवाले मेहमानोंकी संख्या बहुत बढ़ गई है।
देखने आनेवालेको आश्रमके काम दिखलानेका यथासाध्य प्रबन्ध किया जाता है।
किसी विशेष अवधिके लिए आनेवालोंसे प्रार्थना है कि वे मन्त्रीको लिखकर अनुमति मँगाये बिना न आयें, आनेवालोंसे नीचे लिखे नियमोंका पालन करनेकी प्रार्थना की जाती है:
१. उपासना के समय भरसक उसमें हाजिर रहना।
२. खाने-पीनेके समयोंका, जो कि दिनचर्या में बतलाये गये हैं भरसक पालन करना।
३. आश्रमके पास बर्तन और बिस्तरका संग्रह कम ही है। इसलिए हरएक मेहमानको अपना बिछौना, मसहरीकी आदत हो तो वह भी और तौलिया, थाली, कटोरा और लोटा साथ लाना चाहिए।
४. पश्चिमके (यूरोपीय) मेहमानोंके लिए खास सुविधा नहीं की गई है। फिर भी जिन्हें जमीन पर बैठकर खाना अनुकूल न आये, उनके लिए ऊँची बैठककी सुविधा कर देनेका प्रयत्न किया जाता है और उनके लिए हमेशा यूरोपीय ढंगके पाखानेकी सुविधा कर दी जाती है।
{{c|'''शाखा'''}}
आश्रमकी एक ही शाखा है और वह वर्षामें श्री विनोबाके अधीन है। वहाँ लगभग ऊपरके ही नियमोंका पालन किया जाता है। किन्तु उसकी व्यवस्था और खर्च मूल आश्रम से स्वतन्त्र है।
{{c|'''वार्षिक खर्च'''}}
साबरमती आश्रमका औसत मासिक खर्च ३,०००) रु॰ का है और वह मित्रवर्गकी ओरसे मिलता है।<noinclude></noinclude>
rudnbsm8kk5ch6iwup47za8l5lkf7lp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६४
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४७९. बारडोलीकी बलि'''}}}}
बारडोली स्वेच्छासे स्वीकार किये हुए कष्ट और बम्बई सरकारको निरंकुशतासे पीड़ित है। इन दोनों बातोंके उदाहरण महादेव देसाईको बारडोली सम्बन्धी टिप्पणियों में मिलेंगे। सरकार मानो मक्खी मारने जैसी बात के लिए एड़ी-चोटीका पसीना एक कर रही है। बढ़ाए गए लगान के १,००,००० रुपयेके लिए, जो सरकार के लिए छोटीसी रकम है, वह शक्ति, असत्य, खुशामद और घूसका सहारा ले रही है। ये शब्द कठोर हैं; किन्तु सरकारकी कार्रवाइयों को देखते हुए कदापि कठोर नहीं हैं। सरकार द्वारा किया जा रहा शक्ति-प्रयोग इतना प्रत्यक्ष है कि उसे कोई भी देख सकता है। यों तो जब सत्ता शक्तिका प्रयोग करनेमें असमर्थ होती है तब भी वह उसका दिखावा करती है; किन्तु इस मामले में तो वह अपर्याप्त शक्तिका प्रयोग कर रही है। शक्ति प्रयोग दिखाई दे रहा है इसलिए वह अन्य तरीकोंसे कम खतरनाक है। दूसरे तीन तरीके शरारत से भरे हुए हैं; क्योंकि वे अदृश्य हैं। आयुक्त का अशिष्ट पत्र और सरकारकी छल-पूर्ण विज्ञप्ति उस असत्यके उदाहरण हैं जिसका आचरण अकर्त्तव्योंके रूपमें और कर्तव्योंकी उपेक्षाके रूपमें किया गया है। जब यह काण्ड समाप्त हो चुकेगा, खुशामद और घूसके उदाहरणों का पता तो हमें तब चलेगा। हमें मालूम है कि पंजाबके मार्शल लॉके शासन में उन लोगोंको जो मनुष्यत्वसे गिर गये थे उपाधियाँ दी गई थीं और उनकी पदोन्नति की गई थी। यहाँ बारडोलीमें जो अभी छोटा पंजाब जैसा है, उन्हीं घटनाओंकी पुनरावृत्ति होगी। सरकार जब किसीसे अपने
लिए कोई आपत्तिजनक कार्य कराना चाहती है, तब वह लोभ आदिके जिन सूक्ष्म रूपोंका सहारा लेती है मैं उनका वर्णन यहाँ नहीं करूँगा। ज्यादातर सरकारें (साम, दाम, दण्ड, भेद) चारों तरीकों का सहारा लेती हैं, किन्तु सबसे ज्यादा दुख इस बात से है कि बम्बई सरकार इन सारी शक्तियोंका प्रयोग उन लोगोंकी गर्वीलो भावनाको कुचलनेके लिए खुलकर कर रही है, जो अपने सीधेपन और भोलेपन के लिए प्रसिद्ध हैं। यह कहना कि वे कानून तोड़नेवाले हैं, एक घृणित झूठा आरोप है। यदि कोई मनुष्य जिस दायित्वको स्वीकार नहीं करता, उसका कानून द्वारा प्रतिवाद कर सकता है, तो लोग जिस लगानको शासन द्वारा अपने ऊपर अन्यायपूर्वक थोपा गया मानते हैं, उसका कानून द्वारा प्रतिवाद क्यों न करें? और सरकार जिस लगानको वाजिब
समझती है उसकी वसूलीके लिए उन्हीं दीवानी कानूनोंको काममें लाकर सन्तुष्ट क्यों नहीं हो सकती, जो अन्य व्यक्तियोंके लिए खुले हैं?
किन्तु बारडोली के लोगोंको मनमाने तौर पर जो कष्ट दिये जा रहे हैं उससे वे ऊँचे उठे हैं, क्योंकि वे उसके लिए तैयार थे। सीधे सादे किसानोंने जो बहादुरीका रुख अपनाया है उससे सरकारकी वह इज्जत, जिसको बनाये रखनेके लिए सरकार जी-जान से कोशिशें कर रही है और जिनकी चर्चा इन पृष्ठोंमें सप्ताह प्रति सप्ताह की जाती है, अप्रत्यक्ष रूपसे ही सही, बहुत कम हो गई है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||बारडोलीका मामला क्या है?|४३३}}</noinclude>किन्तु एक पापी और क्रूर सत्ता द्वारा दिये गये कष्टसे अधिक आत्मशुद्धि करनेवाला कष्ट तो वह है जिसे वे स्वयं अपने ऊपर ले रहे हैं। मेरा संकेत बारडोली और वालोडके तिरेसठ पटेलों और ग्यारह तलाटियोंके त्यागपत्रोंकी ओर है। इन लोगोंके लिए अपने पदोंको छोड़ना कोई छोटी बात नहीं है। उन्होंने अब तक अकसर इन पदोंका उपयोग अपने साधारण वेतनोंमें गैरकानूनी वृद्धि करनेमें किया है। इन जैसे लोगोंके लिए अपनी नौकरियाँ छोड़ना बड़े सरकारी अधिकारियोंकी अपेक्षा अधिक कठिन है। किन्तु कष्ट सहन और वीरता तो विनीत लोगोंकी निशानी है। मैं इन पटेलों और तलाटियोंको सादर बधाई देता हूँ। उनको यह ज्ञात होना चाहिए कि समस्त भारतने उनके बलिदानकी सराहना की है। जैसा बलिदान उन्होंने किया है वैसा बलिदान करनेसे ही हमें स्वतन्त्रता मिलेगी। हम सरकारी पदोंका लालच नहीं छोड़ सकते। सरकार हमारी इस कमजोरीको जानती है और इसका उपयोग अपनी ताकतको मजबूत करनेके लिए करती है। किन्तु यदि हमें विश्वास हो कि जिसने हमें पैदा किया है वह हमारा पालन-पोषण भी अवश्य करेगा; यदि हम केवल उसकी इच्छाके अनुसार आचरण करें, अर्थात् ईमानदारीसे अपने हाथों और पैरोंसे काम करें तो हम कभी भूखे नहीं रहेंगे और सत्ताके सम्मुख कभी दीनता नहीं दिखायेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १४-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८०. बारडोलीका मामला क्या है?'''}}}}
बहुत से लोगों द्वारा यह माँग किये जाने पर कि व्यस्त पाठकके लिए मामलेका न्यूनतम संक्षेप दिया जाना चाहिए, निम्नांकित सारांश तैयार किया गया है।<ref>महादेव द्वारा लिखित लेखके लिए देखिए, परिशिष्ट ३।</ref> यद्यपि
इस मामलेका ब्यौरेवार उल्लेख इन पृष्ठोंमें किया जा चुका है, तो भी उन लोगोंके लिए जो सत्याग्रहियोंकी मदद करना चाहते हैं परन्तु जिन्हें यह मालूम न हो कि वास्तवमें मामला क्या है और जिनके पास कागजोंकी फाइलें पढ़नेका वक्त न हो; निम्नांकित संक्षेप सहायक सिद्ध होगा। संक्षेप इसलिए आवश्यक है क्योंकि बारडोलीके लोगोंने कष्टोंका जिस बहादुरीसे सामना किया है, उससे इस मामलेमें लोगोंकी रुचि
निरन्तर बढ़ती रही है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १४-६-१९२८}}
{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|३६–२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६६
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४८१. अ॰ भा॰ चरखा संघकी सदस्यता'''}}}}
अ॰ भा॰ चरखा संघके तकनीकी विभागके निदेशकने मुझे निम्नलिखित तुलनात्मक तालिका मेजी है।<ref>यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref>
इस तालिकाका अध्ययन करने पर बहुत-सी बातें मालूम होती हैं। जहाँ खादीका व्यावसायिक विभाग धीरे ही सही, मगर निश्चित रूपसे खादीकी किस्म, मिकदार और कीमतमें दिनों-दिन उन्नति करता जा रहा है, और वैतनिक कतैयोंकी संख्या भी बढ़ती जा रही है, वहाँ बिहार और अजमेरको छोड़कर और सब जगह यज्ञार्थ सूतका कातना बराबर घटता ही जा रहा है। इससे या तो यह पता चलता है कि हमें
यह पक्का विश्वास ही नहीं रहा कि हाथकताईमें हमारे करोड़ों लोगोंकी दशा सुधारने और मध्यम वर्गके लोगोंका सामान्य जनताके साथ लाभकारक सम्बन्ध जोड़नेकी शक्ति
है या फिर मध्यम श्रेणीके लोगोंमें यह विश्वास तो है, मगर वे इतने आलसी या लापरवाह हो गये हैं कि उनसे जिस स्वल्प, किन्तु सतत त्यागकी अपेक्षा है, वे उतना
त्याग नहीं कर सकते। ताज्जुब तो यह है कि राष्ट्रीय संस्थाओंसे भी, जैसे कि गुजरातमें, स्वेच्छासे कातनेवाले पूरी संख्यामें नहीं मिल रहे हैं। जो कार्यकर्ता खादी-सेवामें हैं वे भी इस यज्ञार्थ कताईका, जिससे उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता, कष्ट नहीं करना चाहते। तब अगर खादी राष्ट्रकी जरूरतके मुताबिक उन्नति नहीं कर रही है तो उसमें भला आश्चर्य ही क्या है। खादी-कार्यकर्त्ता और खादी-प्रेमी सज्जन इस बातको जान लें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १४-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८२. पत्र: रामदेवको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१५ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय रामदेवजी,}}
मैं बा को देहरादून जानेके लिए मना सकूँगा इस आशामें मैं आपके पत्रके उत्तरमें देरी करता रहा। परन्तु वे राजी नहीं हुई। ऐसा लगता है कि उनके आसपास क्या हो रहा है, इसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। मुझे आशंका है कि अभी हालमें आश्रममें जो महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं, उनका भी उनके दिमाग
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६७
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको|४३५}}</noinclude>पर अच्छा असर नहीं पड़ा है। उनका स्वास्थ्य भी आजकल बहुत अच्छा नहीं है। उनमें मानसिक और शारीरिक थकावट आ गई है। इस सबके बावजूद मैंने भरसक कोशिश की, परन्तु असफल रहा। खेद है कि मुझे आपको निराश करना पड़ रहा है। परन्तु आप यह स्वीकार करेंगे कि मैं कितना मजबूर हूँ। आखिरकार वे स्वतन्त्र हैं और उन्हें हमेशा स्वतन्त्रता दी गई है।
मुझे खुशी है कि अब आप बिलकुल ठीक हैं।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४१६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८३. पत्र: आर॰ बी॰ ग्रेगको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१५ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय गोविन्द,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी दलील ठीक है। और चूँकि तुम्हारी अन्तरात्मा भी यह कहती है कि हमारे समान उद्देश्यकी पूर्तिके लिए इस वक्त तुम्हारा स्थान भारतकी अपेक्षा अमेरिकामें है, इसलिए मुझे कुछ कहनेके लिए रह नहीं जाता। मैं तुम्हारे लिये अमेरिकामें हर तरहकी सफलताकी कामना करता हूँ। और चूँकि मुझे तुम्हारा निर्णय स्वीकार है, मुझे और कुछ कहनेकी जरूरत नहीं है।
आशा है कि मैं दिसम्बरको छोड़कर सारे साल आश्रममें रहूँगा। कुछ ऐसी सम्भावना है कि मैं अक्तूबर में बर्मा जाऊँ। परन्तु यदि ऐसा हुआ तो यह उस महीनेके अन्त तक ही होगा। ऐसा कार्यक्रम बना तो तुम्हें काफी पहले पता चल
जायेगा। तुम किसी भी हालतमें बिना मिले न चले जाना।
में तुम्हारा विज्ञान-प्रवेशिका देखनेकी प्रतीक्षामें हूँ।
काश, आश्रम में जो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं, मेरे पास उनका वर्णन करनेके लिए समय होता। यदि मुझे वक्त मिला तो मैं तुम्हें उन परिवर्तनोंका विवरण दूँगा, नहीं तो तुम स्वयं उन्हें पूरी तरह कार्यान्वित होते हुए देख लेना।
मुझे आशा है कि अब तुम पूरी तरह स्वस्थ और अच्छे होगे।
तुम सबको सस्नेह,
{{left|रिचर्ड बी॰ ग्रेग<br>
कोटगढ़<br>
शिमला हिल्स}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४१७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४८४. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|शुक्रवार [१५ जून, १९२८]<ref>डाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने गुरुकुलकी स्थिति के बारेमें पण्डित अभयजीको खत लिखा है। मुझे लगता है कि वहाँ किसी पुरुषके रहने पर ही यह सुधार हो सकते हैं। यहाँ चोरी हो गई थी। चोरोंने सुरेन्द्रको मारा और थोड़ी-सी मार शंकरभाईको भी पड़ी। भण्डारसे २०० रुपये चोरी गये। आश्रममें कई सुधार हो रहे हैं। अधिक लिखनेका समय नहीं है। सुरेन्द्रकी तबीयत अच्छी है। महादेव कुएँ परसे गिर पड़ा
था। काफी चोट लगी है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८५. पत्र: एस॰ रामनाथन्को'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१६ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय रामनाथन्,}}
मुझे आपका हृदय-स्पर्शी पत्र मिला। मैं आपसे जितना स्नेह करता हूँ यदि उससे भी ज्यादा स्नेह सम्भव है तो इस पत्रकी सचाईसे आप मेरे और भी प्रिय हो गये हैं।
आपने जिन विचारोंको प्रकट किया है, मैं उनमें से कुछ- एकके बारेमें सहमत नहीं हूँ। परन्तु इस वक्त यह सब प्रासंगिक नहीं है। महत्व इस बातका है कि आप जो-कुछ कहते हैं उसपर आपका निश्चित विश्वास है। जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मैं यह जरूर महसूस करता हूँ कि हमें अब आपको अपनी बात मनवानेके लिए और प्रयत्न नहीं करना चाहिए, बल्कि आपको पूरी सद्भावना सहित अलग हो जाने देना चाहिए। परन्तु मैं आपका पत्र राजगोपालाचारीको भेज रहा हूँ।<ref>देखिए "पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको", १७-६-१९२८।</ref> मुझे विश्वास है कि आप
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६९
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: जी॰ रामचन्द्रन्को|४३७}}</noinclude>इस बातको बुरा नहीं मानेंगे। मैं इस मामले पर राजगोपालाचारीसे विचार-विमर्श भी कर रहा हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२०) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८६. पत्र: जी॰ रामचन्द्रन्को'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१६ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय रामचन्द्रन्,}}
तिरुपुरसे आपका पत्र पाकर मुझे प्रसन्नता हुई।
हाँ, आपको हर चीजका यानी कि छोटेसे-छोटे ब्यौरेका भी पूर्ण ज्ञान अवश्य होना चाहिए। क्योंकि खादी-शिक्षणका अर्थ ही यह है कि छोटेसे छोटे रेशेका भी ध्यान रखा जाये। चाहे कताई हो या बुनाई या पूनियाँ बनानेका काम हो, हमारे
कामका आरम्भ रेशेसे ही होता है। यही बात खादीसे सम्बन्धित हिसाब-किताबके बारेमें भी है।
आप मुझे पत्र नियमित रूपसे अवश्य भेजिए, और इसलिए मैं चाहूँगा कि आप मुझे बता दें कि आप मुझे कितनी बार पत्र लिखेंगे––हफ्ते में एक बार या पखवाड़े में एक बार, जिससे कि मुझे पता चल जाये कि दक्षिण आफ्रिकाकी डाककी तरह आपका पत्र किसी विशेष दिन आना ही है।
आप आश्रमका संविधान<ref>देखिए, "सत्याग्रह आश्रम", १४-६-१९२८ ।</ref> ध्यानसे अवश्य पढ़िये और अपने सुझाव भेज दीजिए। जैसा कि आप जानते हैं संविधान 'यंग इंडिया' के इस सप्ताह के अंकमें छप रहा है।
महादेवको आश्रमके कुएँसे पानी लाते हुए भारी चोट लग गई। उसका पैर फिसल गया और वह पीठके बल गिर गया। अब वह पहलेसे बेहतर है।
आश्रममें बहुतसे महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं जिनमेंसे एक यह है कि अब आश्रममें मजदूरी करनेवाले मजदूर नहीं हैं। गोशाला, खेत और इस तरहकी हर चीजकी देखभाल आश्रमवासियोंको ही करनी होती है। संयुक्त रसोईघरकी संख्या बढ़कर ९४ हो गई है। हमारे यहाँ दो बार चोरीकी गम्भीर घटनाएँ हुई। एकमें ५० चोरोंने चर्मालयको घेर लिया और कुछ पानेकी आशामें प्रत्येक पुरुष आश्रमवासीको
{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
l2jekwjfht4hln68j7c5olthh9sick5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७०
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पीटा। परन्तु वहाँ मिलनेके लिए कुछ था ही नहीं। बेचारे सुरेन्द्रको बड़ी मार पड़ी। परन्तु अब वह ठीक है।
{{left|श्रीयुत रामचन्द्रन्<br>
अ॰ भा॰ च॰ संघ, तिरुपुर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२१) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८७. छुट्टियोंमें खादी-सेवा'''}}}}
बम्बई राष्ट्रीय विद्यालयके तकली-मण्डलके संचालकोंने आचार्य श्री गोकुलभाईकी साक्षीके साथ नीचेका लेख<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है। लेखमें तकली मण्डलके सर्व-सामान्य कार्यके अलावा चुने हुए चौदह विद्यार्थियों द्वारा गर्मीको छुट्टियों में घर-घर जाकर खादी बेचनेका विवरण और उसके आँकड़े दिए गये थे। उसी अवकाशमें दो खादी बाजार और खादी प्रदर्शनी खोलने का उत्साह-वर्धक अनुभव भी वर्णित था।</ref> भेजा है। उसमें जरा भी काटछाँट किए बिना मैं सारा दे रहा हूँ। मैं हरएक शालाके अध्यापकोंका ध्यान इस ओर खींचता हूँ। छुट्टीका ऐसा अच्छा उपयोग करनेके लिए मैं तकली-मण्डलको धन्यवाद देता हूँ। राष्ट्रीय शालामें पढ़नेवाले सभी विद्यार्थियोंको तकली-मण्डल में शामिल होना चाहिए। उसमें और अधिक दिलचस्पी लेनेसे अधिक काम होना सम्भव है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८८. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''लुटेरे पत्रकार'''}}
कितने ही समाचारपत्रोंके सम्पादक और मालिक लुटेरोंका ही व्यवसाय करते हुए जान पड़ते हैं। वे चाहे जो बहाना खोज कर, निर्दोष व्यक्तियोंकी झूठी आलोचना करके और उन्हें धमकियाँ देकर पैसा लूटते हैं। कई तो रुपये लेकर कालेको उजला साबित करनेका बीड़ा उठाते हैं और इस तरह भोली जनताको भ्रममें डालते हैं। ऐसा एक उदाहरण कलकत्तेसे एक मित्रने मेरे पास भेजा है। वहाँका एक समाचारपत्र
गोविन्द भवनके बारेमें प्रकाशित अनीतिका लाभ उठाकर, बहुतसे कुटुम्बोंकी निन्दा कर रहा है और मारवाड़ी जातिके सीधे-सादे लोगोंको दुःख पहुँचा रहा है। जो कभी घटित नहीं हुई, ऐसी ही अश्लील बातें खोज कर वह बहुतसे कुटुम्बोंके साथ जोड़ देता है। इस गन्दे अखबारको मेरे पास भेजनेवाले मित्रका अनुरोध है कि मैं ऐसे अखबारोंके बारेमें कुछ लिखूँ, जिससे वे अपना रवैया सुधारें। मुझे अपने लेखोंसे
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७४
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कि आपका फैसला आने तक हमें काम चलाना ही चाहिए। अगर हम लोगोंने यह भार नहीं उठाया होता तो यहाँका काम बन्द हो जाता और फिरसे काम शुरू करना ज्यादा मुश्किल होता। इसके अलावा कुछ भावनात्मक कारणों से भी उसे छोड़ देना मुश्किल था। कई सालोंसे यह केन्द्र प्रसिद्ध है और बहुत–से कतैयों और बुनकरोंका इससे गहरा सम्बन्ध है। इसे अचानक छोड़ देनेसे आसपासके सभी स्थानोंमें बहुत बुरा असर पड़ता और इसपर निर्भर बहुत–से गरीब आर्थिक कष्टमें पड़ जाते। हमें यह बताया गया था कि गांधी आश्रमके अपना काम बन्द करनेकी घोषणा करनेपर बहुत ही हृदय–द्रावक दृश्य देखनेमें आये थे। बहुतसी बूढ़ी औरतें जो अपना सुत दूर–दूर के केन्द्रोंमें बेचा करती थीं, उन्हें बन्द पाकर कई मील चलकर इस मुख्य केन्द्रमें आई और यह सुनकर कि उनका सूत नहीं लिया जायेगा, रोने लगीं। बहुत–से बुनकर अपने बाल–बच्चोंके साथ अकबरपुर कार्यालय दौड़े आये और कहने लगे, "वाह, सात साल तक हमने आश्रमके लिए काम किया, और अब आप हमें पेड़पर चढ़ाकर सीढ़ी लिये भागे जा रहे हैं। नहीं, यह नहीं
हो सकता। हम सत्याग्रह करेंगे।" अब आप समझ सकते हैं कि ऐसी परिस्थितिमें वहाँका काम अपने सिर ले लेने से इनकार करना हमारे लिए कितना मुश्किल था। मगर, आखिर केवल भावनाके वश होकर ही तो कुछ निर्णय किया नहीं जा सकता था। अकबरपुरमें कुछ खास सुविधाएँ हैं और साथ ही एक बहुत बड़ी असुविधा भी है। बुनाईके लिए यह केन्द्र विख्यात है और इसके पास हो, टाँडामें हिन्दुस्तानकी अच्छीसे–अच्छी बुनाई होती है। दुर्भाग्यवश यह महीन बुनाई जिसे जामदानी कहा जाता है विलायती सूतसे की जाती है। दूसरी ओर अकबरपुर के आसपास बहुत कम सूत काता जाता है और अगर इस केन्द्रको चलाना है तो कहीं न कहीं बाहरसे ही सूत मँगाना पड़ेगा। मेरा खयाल है कि गांधी आश्रमवाले, मुख्यतः अपने प्रदेशकी सीमाके उस ओर से, बिहारसे और मुजफ्फरनगरसे भी सूत मँगाते थे। हमारे लिए संयुक्त प्रान्तके उत्तरी जिलोंसे, जैसे कि मुरादाबाद, बिजनौर वगैरहसे सूत मँगाना सहज होगा। सूत भेजनेका खर्च कुछ अधिक नहीं है।
अगर खादी भी घी या अनाज जैसी प्रचलित हो जाये तो किसी केन्द्रसे हटने का विचार करने की भी कभी जरूरत न पड़े। अगर हमारे पास धन और कार्यकर्त्ता हों तो हमारे प्रतिनिधि सिर्फ १,६०० नहीं, बल्कि ७ लाख गाँवोंमें होंगे। यह कोई अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा नहीं है। आखिर, हरएक गाँवमें विदेशी सरकारके कमसे–कम दो प्रतिनिधि तो हैं ही। अगर अंग्रेजोंके आनेके पहले कोई ऐसी बात कहता तो उसकी बात हँसीमें ही उड़ा दी जाती। मगर विचार करने पर मालूम हो जाना चाहिए कि १७वीं शताब्दी में हिन्दुस्तानके पंचायती गाँवोंमें साम्राज्यवादी ब्रिटेनके दो–दो प्रतिनिधियोंके होनेकी सम्भावना जितनी हास्यास्पद होती हर गाँवमें चरखेकी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७५
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>
पुनः प्रतिष्ठाका खयाल उससे आधा भी हास्यास्पद नहीं है। अकबरपुरकी स्त्रियोंकी कही जो बात बताई जाती है, वह जाहिर करती है कि चरखा इस प्राचीन देशके हर गाँव में कितनी बड़ी जरूरत पूरी करता है, या कर सकता है। हमारी देशभक्तिके लिए यह कोई गौरवका विषय नहीं है कि अकबरपुरके चतुर बुनकरोंको दूर–दूर तक प्रख्यात जामदानीके लिए विलायती सूतका आश्रय लेना पड़े, जबकि सिर्फ पचास साल पहले वे अपनी ही पड़ोसिन बहनोंके पवित्र हाथोंके कते सूतसे उसे बनाते थे। हमें आशा है कि कुछ ही दिनोंमें हमारी कत्तिनें, आज बाजारमें भरे हुए किसी भी किस्मके विदेशी सूतसे कहीं ज्यादा महीन और मजबूत सूत कातने लगेंगी।
{{c|क्या यह सच हो सकता है?}}
नई दिल्ली आर्य–समाजके सभापति लिखते हैं।
शिमलाकी पहाड़ियोंमें बाघात रियासत है। इसके राजा जागरूक हिन्दू हैं। ...राज्यकी आबादी कोई दस हजारकी है। यहाँ मुख्यतः राजपूत, कानेत और ब्राह्मण ही बसते हैं। दूसरी जातियाँ कोली, चमार वगैरह हैं। जिन्हें नीच समझा जाता है। यद्यपि कोलियोंकी गुजर मुख्यतः खेती से होती है, मगर उन्हें बहुत–सी सामाजिक कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। ... उन्हें अपने हिन्दू भाइयोंके अमानुषिक व्यवहारसे पीड़ित देखकर शिमला आर्य समाजने, इनकी स्थिति ऊँची करने के लिए इन्हें अपनाया, और चूंकि ये वैश्यका धन्धा
करते हैं उन्हें जनेउ पहनाया। ...औपचारिक शुद्धीरकणके बाद से इन्होंने मांसाहार, शराबखोरी जैसी बुरी आदतें छोड़ दी हैं और अछूत कहनेपर बहुत बुरा मानते हैं। जान पड़ता है कि इससे ऊँची जातिके हिन्दुओंका पारा चढ़ गया और उन्होंने यज्ञोपवीत लेनके इनके अधिकारका विरोध किया। फलतः गत ६ जनवरी, १९२८ को इसपर स्वयं महाराजा साहबने उनके मामलेकी सरसरी तौरपर सुनवाई की और पुराने रीति–रिवाजोंके बहाने बेचारे १० कोलियोंको ६ महीने की कैद और ऊपरसे दो–दो सौ रुपये जुर्माने की सजा दे दी गई। न तो इन अभागोंको अपना बचाव करनेका मौका दिया गया और न वहाँपर उपस्थित आर्य समाजके पण्डितको ही इस मामलेमें आर्यसमाजका दृष्टिकोण समझाने का अवसर दिया गया। अब खबर है कि यज्ञोपवीत उतारनेके लिए जेलमें उनपर जुल्म किया जा रहा है।<ref>केवल कुछ उद्धरण हो यहाँ दिये गये हैं।</ref>
ऊपरके पत्रमें लिखी बातें मुझे तो अविश्वसनीय–सी जान पड़ती हैं। कोलियोंको किसी तरह अछूत या दलित या पिछड़ी हुई जातिका नहीं गिना जा सकता। अगर वे अपने खेत आप जोतते हैं, तो वर्णकी परिभाषाके अनुसार उनका जन्म वैश्य वर्ण में<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९०
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१३७. पुरातन बोध वचन'''}}}}
एक मित्रने, जिनका परिचय में पहले ही इन स्तम्भोंके पाठकोंसे करा चुका हूँ, बोध-वचन भेजे हैं:
वह जो अपूर्ण है, पूर्ण हो जाता है।
जो वक्र है, वह सरल हो जाता है।
जो खाली है, वह भर जाता है।
जो जर्जर है, वह नूतन हो जाता है।
जो संग्रही है, उसे न्यून प्राप्त होता है।
जो लुटाता है, उसे बहुत मिलता है।
इसीलिए आत्मसंयमी मनुष्य एकताका सूत्र पकड़ता है और मनुष्योंके सम्मुख उस एकताकी अभिव्यक्ति करता है।
वह स्वयं अपनेको नहीं निरखता, इसलिए उसे साफ दिखाई देता है।
वह अपना कोई आग्रह नहीं रखता, इसलिए दीप्तिमान बनता है।
वह डींगें नहीं हाँकता, इसलिए उसमें योग्यता होती है।
वह कीर्ति नहीं खोजता, इसलिए चिरस्थायी होता है।
सबका स्वामी स्वयं कोई प्रयत्न नहीं करता, फिर भी संसारमें कोई उससे होड़ नहीं कर सकता।
पूर्वजोंने निरर्थक वचन नहीं कहे।
"वह जो अपूर्ण है, पूर्ण हो जाता है।"
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>यंग इंडिया, ३-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१३८. सहकारसे खादीऋय'''}}}}
श्रीयुत के० ए० नैयर इस प्रकार लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्रलेखक अखिल भारतीय चरखा संघके सदस्य थे, उन्होंने पर्ची निकाल कर पुरस्कार देनेकी एक समिति गठित की थी जिसके १२ सदस्य थे। योजना यह थी कि वे साल भरतक प्रतिमास २ रुपये देंगे और जीतनेवालेको २४ रुपये नकद देनेके बजाय प्रत्येक मास खादी भण्डारसे इतने रुपयेकी उसकी मनपसन्द खादी दी जायेगी।</ref>
खादी प्रेमियोंसे में इस बुद्धिमत्तापूर्ण उपायको अपनाने की सिफारिश करता हूँ। इस उपायके द्वारा कोई भी व्यक्ति तुरन्त दाम चुकाये बिना खादी खरीद सकता है। मगर इस सहकारी संस्थाके, जैसा कि इसे कहा जा सकता है, उस बदनसीब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९४
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यदि मैं अपनी बात पूनाके विद्यार्थियोंको न समझा सकूं तो यह मेरा दुर्भाग्य है, मेरे देशका दुर्भाग्य है और आपका भी दुर्भाग्य है।
'''मगर उन्होंने छात्रोंके अंग्रेजीमें बोलनेके आग्रहको इतना ही माना कि सभामें देरसे आनेके लिए खेद अंग्रेजीमें व्यक्त किया। पीछे यह देखकर कि लोग उनका भाषण ध्यानसे सुनने लगे हैं, वे हिन्दीमें बोले। उन्होंने कहा:'''
सम्भव है अंग्रेजीमें अपनी बात कहनेसे मुझे आपसे कुछ अधिक मिल जाता और हो सकता है आप मेरी बात अधिक अच्छी तरह समझ पाते। मगर मैं अपने सन्देशको, स्वयं अपनेसे और अभिव्यक्तिके साधनसे भी कहीं अधिक ऊँचा मानता हूँ।इसकी खास अपनी एक निराली ताकत है और में आशा करता हूँ कि हिन्दुस्तानके नौजवानोंपर इसका असर पड़ेगा। मेरे जीते जी इसका असर पड़े या न पड़े --इसकी मुझे कोई परवाह नहीं। मगर मेरा विश्वास अटल है, और ज्यों-ज्यों दिन बीतते जायेंगे और जनताके कष्टोंकी अवधि बढ़ती जायेगी, यह सन्देश हरएक देशभक्त भारतीयके हृदयमें देदीप्यमान होता जायेगा। आपको समझ लेना होगा कि इस उम्रमें, जबकि मुझे जिन्दगी-भर मेहनत करनेके बाद आराम करना चाहिए था, मैं देशके एक छोरसे दूसरे छोरतक बिना मतलब यों ही चक्कर नहीं काट रहा हूँ। इसका कारण यह है कि मेरे मनमें यह विश्वास अधिकाधिक दृढ़ होता जा रहा है कि में मरते दमतक ज्यादासे ज्यादा, जितने लोगोंतक यह सन्देश पहुँचा सकूं, पहुँचानेका प्रयत्न करूँ।
'''इसके बाद उन्होंने चरखा आन्दोलनका संक्षिप्त विवरण दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने उसकी कल्पना काफी पहले १९०८ में जब उन्होंने वास्तवमें चरखा देखा भी नहीं था, तभी कर ली थी। गांधीजीने विद्यार्थियोंका ध्यान उन लोगोंके प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करनेकी ओर दिलाया जिनके नैतिक और आर्थिक विनाशके मूल्यपर वे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा:'''
आप चाहें तो यह शिक्षा प्राप्त करते रहें, मगर कमसे कम उन्हें इसका कोई उपयुक्त बदला तो दें। मैं जानता हूँ कि आपने खादीको नहीं अपनाया है। इसका कारण यह नहीं है कि आपकी मनोवृत्ति उलटी है, बल्कि आपको इसका यकीन नहीं कि गरीबी और बेकारी, जिसके औचित्यके बारेमें में पुकार-पुकार कर कह रहा
हूँ, कोई भयंकर समस्या है। श्याम देशके राजाको लॉर्ड कर्जनकी इस बातपर विश्वास नहीं हुआ था कि वे ऐसे देशसे आए हैं, जहाँ वर्षमें कुछ महीने नदियोंमें पानी जमा रहता है। में विश्वास दिलाता हूँ कि हमारे देशमें ३० करोड़ आदमियोंको दिनमें एक वक्तका भी खाना भर-पेट नहीं मिलता; यह स्थिति मैंने अपनी आँखोंसे देखी है।
'''भाषणका शेष अंश ब्रह्मचर्य से सम्बन्धित था। यह ऐसा विषय है कि जब भी गांधीजी विद्यार्थियोंके मध्य होते हैं उनकी जबानपर आ ही जाता है। उन्होंने ब्रह्मचर्यके
महत्त्वको समझाते हुए कहा:'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९५
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको|१५७}}</noinclude>ब्रह्मचर्यंका पालन जितना मुश्किल मालूम होता है, उतना ही सहज है। ब्रह्मचर्यं आत्माका सहज गुण है और आपकी आत्माएँ मरी नहीं हैं, बल्कि सुषुप्त हैं। उन्हें जगा-भर लेना है। उन्हें जगाना इसलिए कठिन मालूम होता है कि हम नास्तिक हो गये हैं। आपके मनमें ज्यों ही श्रद्धा आयेगी, यह बिलकुल सहज बन जायेगा, क्योंकि परमात्माकी कृपा श्रद्धासे ही मिलती है। तब ब्रह्मचर्य पालन प्रयत्न-साध्य एवं कष्ट साध्य नहीं रह जाता बल्कि उससे शान्ति एवं आनन्दकी प्राप्ति होती
है। यह सब कुछ इसलिए कह रहा हूँ कि मुझे इसके आनन्दका अनुभव हो चुका है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१४३. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{Right|रविवार [६ मार्च, १९२७]<ref>मणिलालके विवाहके उल्लेखसे।</ref>}}
{{Left|प्रिय सतीश बाबू,}}
किशोरलाल मशरूवालाकी भतीजीसे मणिलालका विवाह सम्पन्न करने में एक दिनके लिए अकोला आया हूँ। मैं आज रातको आश्रमके लिए रवाना हो जाऊँगा। आशा है आपका स्वास्थ्य बराबर सुधर रहा होगा।
आपने जो ५०,००० रुपये मांगे हैं उसमें से जितने भेजे जा सकते हैं, भेजनेका प्रबन्ध किया जा रहा है। फेरीवालोंको कमीशन देना सम्भव नहीं है। नियमोंके
अनुसार कमीशन लोगोंको मात्र निर्वाहके लिए दिया जाता है। पेशेवर फेरीवालोंके लिए इस नियममें यदि हम थोड़ीसी भी ढिलाई करते हैं तो हमारी नाकमें दम हो
जायेगा। नियम बनाये ही इस प्रकार गये हैं कि लोगोंको फेरीका धन्धा आजीविकाके रूपमें अपनानेके लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
मुझे आशा है कि अब आप सब लोग खतरेसे बाहर निकल आये होंगे। तारिणीका क्या हाल है?
में ८ से १४ मार्च तक आश्रममें और उसके बाद १५ से १७ तक बारडोली,१९ से २१ तक गुरुकुल काँगड़ी, जिला बिजनौरमें रहूँगा। फिर वहाँसे कर्नाटक जाऊँगा। कर्नाटक में पता बेलगाँवका ही ठीक रहेगा, हालांकि मैं वहाँ इधर-उधर दौरे पर ही रहूँगा।
आप सबको स्नेह,
{{Right|'''बापू'''}}
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० १६३१) की फोटो-नकलसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९६
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४४. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|७ मार्च, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले।
अभी सुबह-सवेरा ही समझो। मैं, बा, मणिलालकी पत्नी सुशीला, मणिलाल, रामदास, महादेव और पंडितजीके साथ भुसावलमें एक तीसरे दर्जे के डिब्बेमें बैठा हूँ। ये सब लोग विवाह-संस्कार कराने आये थे विवाह बहुत ही सादगीसे किया गया। उसमें कोई भेंट नहीं ली गई और कोई खर्च नहीं किया गया।
एक दिन और मिल जाये, इस खयालसे मैंने अपने मौनवारको यात्रा करनेका निश्चय किया है। में तीसरे दर्जे में यात्रा इसलिए कर रहा हूँ कि मणिलाल और उसकी बहू के लिए दूसरे दर्जेका किराया खर्च नहीं किया जाना चाहिए, और में नहीं चाहता कि परिवारके नये सदस्यसे परिवारमें शरीक होनेके पहले ही दिन जुदा हो जाऊँ चूंकि मैं आगे आश्रममें आरामसे लगभग छः दिन रह सकता हूँ और तीसरे दर्जे का यह सफर बड़े आरामका है, मुझे कोई परेशानी नहीं लग रही है; बल्कि इसमें मुझे आनन्द आ रहा है।
आश्रम पहुँचनेपर में 'आत्मकथा' में तुमने जो संशोधन किए हैं उन्हें पढ़ेगा। मैंने पहले ही समझ लिया था कि जिन अध्यायोंको तुमने पहले नहीं देखा है, उनमें तुम बहुत संशोधन करोगी।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२०८) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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अभी सुबह-सवेरा ही समझो। मैं, बा, मणिलालकी पत्नी सुशीला, मणिलाल, रामदास, महादेव और पंडितजीके साथ भुसावलमें एक तीसरे दर्जे के डिब्बेमें बैठा हूँ। ये सब लोग विवाह-संस्कार कराने आये थे विवाह बहुत ही सादगीसे किया गया। उसमें कोई भेंट नहीं ली गई और कोई खर्च नहीं किया गया।
एक दिन और मिल जाये, इस खयालसे मैंने अपने मौनवारको यात्रा करनेका निश्चय किया है। में तीसरे दर्जे में यात्रा इसलिए कर रहा हूँ कि मणिलाल और उसकी बहू के लिए दूसरे दर्जेका किराया खर्च नहीं किया जाना चाहिए, और में नहीं चाहता कि परिवारके नये सदस्यसे परिवारमें शरीक होनेके पहले ही दिन जुदा हो जाऊँ चूंकि मैं आगे आश्रममें आरामसे लगभग छः दिन रह सकता हूँ और तीसरे दर्जे का यह सफर बड़े आरामका है, मुझे कोई परेशानी नहीं लग रही है; बल्कि इसमें मुझे आनन्द आ रहा है।
आश्रम पहुँचनेपर में 'आत्मकथा' में तुमने जो संशोधन किए हैं उन्हें पढ़ेगा। मैंने पहले ही समझ लिया था कि जिन अध्यायोंको तुमने पहले नहीं देखा है, उनमें तुम बहुत संशोधन करोगी।
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रितु कुमारी साव
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अभी सुबह-सवेरा ही समझो। मैं, बा, मणिलालकी पत्नी सुशीला, मणिलाल, रामदास, महादेव और पंडितजीके साथ भुसावलमें एक तीसरे दर्जे के डिब्बेमें बैठा हूँ। ये सब लोग विवाह-संस्कार कराने आये थे विवाह बहुत ही सादगीसे किया गया। उसमें कोई भेंट नहीं ली गई और कोई खर्च नहीं किया गया।
एक दिन और मिल जाये, इस खयालसे मैंने अपने मौनवारको यात्रा करनेका निश्चय किया है। में तीसरे दर्जे में यात्रा इसलिए कर रहा हूँ कि मणिलाल और उसकी बहू के लिए दूसरे दर्जेका किराया खर्च नहीं किया जाना चाहिए, और में नहीं चाहता कि परिवारके नये सदस्यसे परिवारमें शरीक होनेके पहले ही दिन जुदा हो जाऊँ चूंकि मैं आगे आश्रममें आरामसे लगभग छः दिन रह सकता हूँ और तीसरे दर्जे का यह सफर बड़े आरामका है, मुझे कोई परेशानी नहीं लग रही है; बल्कि इसमें मुझे आनन्द आ रहा है।
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रितु कुमारी साव
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रितु कुमारी साव
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एक दिन और मिल जाये, इस खयालसे मैंने अपने मौनवारको यात्रा करनेका निश्चय किया है। में तीसरे दर्जे में यात्रा इसलिए कर रहा हूँ कि मणिलाल और उसकी बहू के लिए दूसरे दर्जेका किराया खर्च नहीं किया जाना चाहिए, और में नहीं चाहता कि परिवारके नये सदस्यसे परिवारमें शरीक होनेके पहले ही दिन जुदा हो जाऊँ चूंकि मैं आगे आश्रममें आरामसे लगभग छः दिन रह सकता हूँ और तीसरे दर्जे का यह सफर बड़े आरामका है, मुझे कोई परेशानी नहीं लग रही है; बल्कि इसमें मुझे आनन्द आ रहा है।
आश्रम पहुँचनेपर में 'आत्मकथा' में तुमने जो संशोधन किए हैं उन्हें पढ़ेगा। मैंने पहले ही समझ लिया था कि जिन अध्यायोंको तुमने पहले नहीं देखा है, उनमें तुम बहुत संशोधन करोगी।
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४५. पत्र: हरिइच्छा तथा अन्य लोगोंको'''}}}}
{{Right|सोमवार [७ मार्च, १९२७]<ref>गांधीजी ७ मार्च, १९२७ को अकोलासे अहमदाबाद गये थे; देखिए पिछला शीर्षक भी।</ref>}}
{{Left|चि० हरिइच्छा, चन्दन, तारा, वसन्त,}}
तुम्हारे पत्र मिले। तुम लोगोंको रोज लिखनेका विचार करता हूँ, लेकिन समय कहाँ से लाऊँ? किन्तु'नवजीवन' तो मेरी ओरसे तुम सबको लिखा एक पत्र ही है। तुम्हें इससे ही सन्तोष करना होगा। यह पत्र भी आश्रम जाते हुए ट्रेनमें लिख रहा हूँ।
तुम्हें राजकोट जाना तो था ही; लेकिन तुम्हारा जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। तुम यदि आश्रममें रह सकतीं तो बहुत अच्छा होता। अब वहाँ पढ़ने आदिके बारेमें क्या करती हो सो लिखना।
मणिबहनने मुझे लिखा था कि चि० प्रभाने कातना शुरू किया है। यदि वह नियमपूर्वक काते-पींजे और खादी पहने तो बहुत अच्छा है। वापस आना कब होगा? मैं आश्रममें १४ तारीखतक रहूँगा। मुझे तुम सभी बहनें पत्र लिखना। अक्षर साफ और बड़े, और स्याहीसे लिखना।
कब उठती हो, क्या पढ़ती हो, घूमनेके लिए जाती हो या नहीं आदि सब लिखना। वसन्त क्या अब भी थक जाती है? आश्रमकी अपेक्षा तो वहाँ उसकी तबीयत ज्यादा अच्छी रहती होगी।
आश्रममें तुमने जो कुछ अच्छी बात सीखी है उसे कभी न भूलना।
{{Right|'''बापूके''' आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४९०५) से।<br>सौजन्य : हरिइच्छा देसाई|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४५. पत्र: हरिइच्छा तथा अन्य लोगोंको'''}}}}
{{Right|सोमवार [७ मार्च, १९२७]<ref>गांधीजी ७ मार्च, १९२७ को अकोलासे अहमदाबाद गये थे; देखिए पिछला शीर्षक भी।</ref>}}
{{Left|चि० हरिइच्छा, चन्दन, तारा, वसन्त,}}
तुम्हारे पत्र मिले। तुम लोगोंको रोज लिखनेका विचार करता हूँ, लेकिन समय कहाँ से लाऊँ? किन्तु'नवजीवन' तो मेरी ओरसे तुम सबको लिखा एक पत्र ही है। तुम्हें इससे ही सन्तोष करना होगा। यह पत्र भी आश्रम जाते हुए ट्रेनमें लिख रहा हूँ।
तुम्हें राजकोट जाना तो था ही; लेकिन तुम्हारा जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। तुम यदि आश्रममें रह सकतीं तो बहुत अच्छा होता। अब वहाँ पढ़ने आदिके बारेमें क्या करती हो सो लिखना।
मणिबहनने मुझे लिखा था कि चि० प्रभाने कातना शुरू किया है। यदि वह नियमपूर्वक काते-पींजे और खादी पहने तो बहुत अच्छा है। वापस आना कब होगा? मैं आश्रममें १४ तारीखतक रहूँगा। मुझे तुम सभी बहनें पत्र लिखना। अक्षर साफ और बड़े, और स्याहीसे लिखना।
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आश्रममें तुमने जो कुछ अच्छी बात सीखी है उसे कभी न भूलना।
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४५. पत्र: हरिइच्छा तथा अन्य लोगोंको'''}}}}
{{Right|सोमवार [७ मार्च, १९२७]<ref>गांधीजी ७ मार्च, १९२७ को अकोलासे अहमदाबाद गये थे; देखिए पिछला शीर्षक भी।</ref>}}
चि० हरिइच्छा, चन्दन, तारा, वसन्त,
तुम्हारे पत्र मिले। तुम लोगोंको रोज लिखनेका विचार करता हूँ, लेकिन समय कहाँ से लाऊँ? किन्तु'नवजीवन' तो मेरी ओरसे तुम सबको लिखा एक पत्र ही है। तुम्हें इससे ही सन्तोष करना होगा। यह पत्र भी आश्रम जाते हुए ट्रेनमें लिख रहा हूँ।
तुम्हें राजकोट जाना तो था ही; लेकिन तुम्हारा जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। तुम यदि आश्रममें रह सकतीं तो बहुत अच्छा होता। अब वहाँ पढ़ने आदिके बारेमें क्या करती हो सो लिखना।
मणिबहनने मुझे लिखा था कि चि० प्रभाने कातना शुरू किया है। यदि वह नियमपूर्वक काते-पींजे और खादी पहने तो बहुत अच्छा है। वापस आना कब होगा? मैं आश्रममें १४ तारीखतक रहूँगा। मुझे तुम सभी बहनें पत्र लिखना। अक्षर साफ और बड़े, और स्याहीसे लिखना।
कब उठती हो, क्या पढ़ती हो, घूमनेके लिए जाती हो या नहीं आदि सब लिखना। वसन्त क्या अब भी थक जाती है? आश्रमकी अपेक्षा तो वहाँ उसकी तबीयत ज्यादा अच्छी रहती होगी।
आश्रममें तुमने जो कुछ अच्छी बात सीखी है उसे कभी न भूलना।
{{Right|'''बापूके''' आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४९०५) से।<br>सौजन्य : हरिइच्छा देसाई|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९८
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४६. पर्ची: मणिलाल गांधीको'''<ref>गांधीजीने इसे मौनवारको लिखा था।</ref>}}}}
{{Right|[७ मार्च, १९२७]<ref>लगता है कि यह पर्ची मणिलालके विवाहके दूसरे दिन ७ मार्च, १९२७ को लिखी गई होगी।</ref>}} अब तुम्हारा विवाह करा दिया; तुम दोनोंकी जान-पहचान भी करवा दी है। अब अपना घर तो तुम्हें ही चलाना पड़ेगा। सुशीलाके पास जाकर बैठो। उसके पास क्या क्या कपड़े हैं इसकी जानकारी करो, उसकी इच्छाको जानो और बादमें जो चीजें बनवानी हों उन्हें नोट कर लो। इस तरह झिझक निकल जायेगी और एक काम भी हो जायेगा। या चाहो तो कुछ और बात कर सकते हो। या जहाँ तुम हो वहाँ सुशीलाको बुलवाकर अन्य लोगोंको वहाँसे...<ref>साधन-सूत्र के अनुसार।</ref>विदा करा दूँ।
{{Left|गुजराती (जी० एन० ४७१८) से।|2em}}
{{C|{{larger|'''१४७. अस्पृश्यता, स्त्रियाँ और स्वराज्य'''}}}}
श्रीमती सुहासिनी देवीका पत्र<ref>इस पत्रमें लेखिकाने इस बातकी शिकायत की थी कि अस्पृश्यता निवारणके विषयमें कोई ठोस कदम उस हदतक नहीं उठाया जा रहा है जिस हदतक कांग्रेसके प्रस्ताव तलब कर रहे हैं।</ref> में खुशीसे छाप रहा हूँ पाठक उसे किसी अन्य स्तम्भमें प्रकाशित पायेंगे। यद्यपि कांग्रेसके प्रतिभावान सभापति <ref>एस० श्रीनिवास आयंगार।</ref>अपना बचाव करनेमें स्वयं समर्थ हैं, परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि मुझे पत्र लिखनेवाली इस बनने अपने थोड़ेसे अनुभवके ही आधारपर जरूरतसे ज्यादा सामान्यानुमान निकाल लिये हैं। अस्पृश्यता निवारणके आन्दोलनकी महान प्रगति सिद्ध करनेके लिए किन्हीं आँकड़ोंकी जरूरत नहीं है। अस्पृश्यताकी दीवार हर जगह ढह रही है। हर सूबेमें ऊँचे वर्गोंके लोग दलित जातिके बच्चोंके लिए स्कूल छात्रावास आदि चलाकर उस रूपमें दलित जातिके लोगोंकी आवश्यकताएँ पूरी करते हुए मिल सकते हैं। लगता है कि यही चीज सभापति महोदयके मनमें थी, जब अपने भाषण में उन्होंने इसका जिक्र किया था। खैर जो कुछ अभीतक हो सका है, उससे असंख्य गुना ज्यादा करना अभी बाकी है। स्त्रियोंके पूर्वाग्रहको दूर करनेका सवाल सबसे कठिन काम है। वस्तुतः यह स्त्री-शिक्षाका सवाल है। और इस विषयमें यह सवाल केवल लड़कियोंकी ही शिक्षाका नहीं है बल्कि विवाहित स्त्रियोंकी शिक्षाका भी है। इसलिए मैंने बार-बार यह बात<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९९
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||अस्पृश्यता, स्त्रियाँ और स्वराज्य|१६१}}</noinclude>सुझाई है कि हरएक देशभक्त पतिको अपनी पत्नीका शिक्षक खुद बन जाना चाहिए और उसे अपने समाजकी कम खुशनसीब बहनोंमें काम करने योग्य बनाना चाहिए।
मैंने लोगोंका ध्यान अपनी इस सलाहके फलितार्थोकी ओर खींचा है। उनमें से एक तो यह कि पति पत्नीको केवल भोगविलासकी सामग्री समझना छोड़ दें और राष्ट्र-
निर्माणके काममें उनको अपना साझेदार समझें। सीताके बिना हमें राम नहीं मिल सकते। और सीताने बनवासमें, कठिन परीक्षाके वर्षोंमें, रामकी स्नेहमयी देखभालमें सच्ची शिक्षा पाई। तो हम सब लोग अपने ही देशमें निर्वासितसे है और हमें अपनी शक्ति-भर अवसर अनुसार राम और सीताका ही अनुकरण करना चाहिए। इस विषयमें मैं श्रीमती सुहासिनी देवीका ध्यान इस सच्चाईकी ओर दिलाये बिना नहीं रह सकता कि श्रीयुत आयंगारने अस्पृश्यताका बन्धन न केवल खुद ही तोड़ा है बल्कि अपने इस कार्यमें, जिसे दस वर्ष पूर्व, शायद वे खुद असम्भव समझते थे, अपने साथ अपनी पत्नी और परिवारवालोंको भी लेकर चले हैं।
सहभोजको अस्पृश्यताके सवालसे बिलकुल अलग ही रखना होगा। खानपानके मामलेमें परहेज बरतने की बात सारे हिन्दू समाजमें घर किये है। अस्पृश्यताके सवालसे
इसे मिलाने का अर्थ होगा अछूतोद्धारके आन्दोलनकी गति रोकना। और इस आन्दोलनका उद्देश्य तथाकथित अछूतोंके लिए उन सामाजिक सेवाओंको दूसरोंके समान ही और उन्हीं की शर्तोंपर पानेके अधिकारमें लगाई पाबन्दियाँ हटाना है।
स्वराज्यके विषयमें भी कुछ भ्रान्ति फैली हुई हैं। स्वराज शब्दके अनेक अर्थ हैं। जब श्रीयुत आयंगार कहते हैं कि अस्पृश्यता निवारणसे स्वराज्यका कोई सम्बन्ध नहीं है तो मैं समझता हूँ कि इससे उनका मतलब यह है कि अस्पृश्यताका बना रहना संवैधानिक स्थिति बेहतर बनाने में बाधक नहीं हो सकता। दुहरे शासनसे अथवा
विधानसभाओंको अधिक तथा प्रभावशाली अधिकार देने जैसी संवैधानिक बातोंसे तो निश्चय ही अस्पृश्यता निवारणका कुछ वास्ता नहीं है। अस्पृश्यता एवं सामाजिक प्रश्न है, जिसे हिन्दुओंको ही हल करना है। यह प्रश्न हिन्दुओं और उनके साथ-साथ, मुसलमानों और पारसियोंको सैनिक खर्चपर नियन्त्रण रखने, या विनिमयकी दर ठीक करने या पूर्ण मद्यनिषेध करने, या स्वदेशी उद्योगोंकी रक्षाके सम्बन्धमें विदेशी मालपर रोक लगानेवाली महसूल निर्धारित करनेकी शक्तिपर क्यों अंकुश लगायेगा? सच्चा व संगठित स्वराज्य तो एक अलग ही प्रश्न है। आम तौरपर लोगोंके दिलोंमें स्वराज्यके साथ जैसी स्वतन्त्रताकी बात है, न वह केवल अछूतोद्धार और भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें हृदयोंकी एकताको बढ़ावा दिये बिना ही अप्राप्य है बल्कि और भी उन अनेक सामाजिक दोषोंको दूर किये बिना अप्राप्य है, जिनको आसानीसे गिनाया जा सकता है। इस व्यापक शब्द स्वराज्यसे हमारा मतलब आन्तरिक विकासकी यही प्रक्रिया है जो निरन्तर चलती रहनी चाहिए। और जबतक पूर्वग्रह, मनोविकार और अन्धविश्वासकी दीवारें इस विकासके भव्य वृक्षको घेरे रहती हैं, उसे बढ़ने नहीं देतीं, तबतक वह स्वराज्य नहीं मिल सकता।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१०-३-१९२७|2em}}
३३-११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२००
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४८. प्रवर्तक तरुण बंगाल संघ और खादी'''}}}}
फिलहाल इस समय बंगालके जैसा पीड़ित दूसरा प्रान्त नहीं है। इसके कुछ अच्छेसे अच्छे नवयुवक जेलोंमें पड़े सड़ रहे हैं और उन्हें इसका कारण भी मालूम नहीं। कांग्रेसियोंमें भी फूट है। देशबन्धुके बाद बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी किसीको अपना एकमात्र नेता स्वीकार नहीं कर पाई है। इसमें ताज्जुबकी कोई बात नहीं है। देशबन्धु जैसे तो केवल वे ही हो सकते थे।
मगर इस सबके होते हुए भी बंगालमें रचनात्मक कार्य लगभग निरन्तर चल रहा है। इस काममें लगे हुए निःस्वार्थ भावसे सेवा करनेवाले नवयुवकोंकी संख्या
दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है। श्रीयुत मोतीलाल रायके नेतृत्वमें बंगालका प्रवर्तक संघ, जिसका प्रधान कार्यालय चन्द्रनगरमें है, खादी तैयार करने और बेचनेका अपना
काम बराबर बढ़ाता जा रहा है। मगर अबतक संघमें खादीका काम एक पूरक काम ही रहा है–-उसके कई बड़े-बड़े कामोंमें से यह भी एक छोटासा काम है। मगर
अब मोतीबाबूने खादीके कामको अपने संघका मुख्य कार्य बनानेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। उनसे मैंने खुद इसके बारेमें बहुत देरतक बात की थी और उन्होंने कहा
था कि उनके दिलमें यह धारणा बलात् घर करती जा रही है कि चरखेको केन्द्र बिन्दु बनाये बिना जनसमूहकी सच्ची सेवा कर पाना असम्भव है। सर्वश्री बैंकर और
लक्ष्मीदास मेरे बाद चन्द्रनगर गये। और उन्होंने मुझे कुतुबदियामें चरखेके प्रति संघके उत्साहका और उसके [खादी] कार्यका बहुत ही रोचक वर्णन भेजा है। उन्होंने मुझे यह भी बतलाया कि कताई और धुनाईके काममें हो रहे नए-नए सुधारोंको सीखनेके लिए मोतीबाबू कितने उत्कंठित हैं। यह संघ अपेक्षाकृत एक पुरानी संस्था है। इसकी मूल प्रेरणा पांडिचेरीके तपस्वीसे मिली है और बंगालमें इसके कितने ही निःस्वार्थ और श्रद्धालु कार्यकर्त्ता हैं।
मेरे सामने उनके जनवरी मासकी खादीके जो आंकड़े हैं उन्हें देखनेसे पता चलता है कि इस महीनेमें उन्होंने ७०० रु० से ऊपरकी खादी बनाई और ३४०० रु० से अधिककी बिक्री की। अगर यह संघ खादीका उत्पादन करनेमें अपनी शक्ति केन्द्रित कर सके तो वह बहुत जल्दी ही खादी प्रतिष्ठान और अभय आश्रमकी, उनके
कार्यमें बाधा डाले बिना, बराबरी करने लगेगा। क्योंकि अगर हरएक नया संघ अपने लिए नया क्षेत्र ढूंढ ले और उसीमें काम करता रहे तो फिर खादीके उत्पादन
और विक्री दोनों हीके लिए प्रायः असीम क्षेत्र है। बंगाल जैसे विशाल प्रान्तकी माँगें पूरी करना किसी एक संस्थाके लिए असम्भव है।
{{[अंग्रेजीसे]<br>यंग इंडिया, १०-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४८. प्रवर्तक तरुण बंगाल संघ और खादी'''}}}}
फिलहाल इस समय बंगालके जैसा पीड़ित दूसरा प्रान्त नहीं है। इसके कुछ अच्छेसे अच्छे नवयुवक जेलोंमें पड़े सड़ रहे हैं और उन्हें इसका कारण भी मालूम नहीं। कांग्रेसियोंमें भी फूट है। देशबन्धुके बाद बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी किसीको अपना एकमात्र नेता स्वीकार नहीं कर पाई है। इसमें ताज्जुबकी कोई बात नहीं है। देशबन्धु जैसे तो केवल वे ही हो सकते थे।
मगर इस सबके होते हुए भी बंगालमें रचनात्मक कार्य लगभग निरन्तर चल रहा है। इस काममें लगे हुए निःस्वार्थ भावसे सेवा करनेवाले नवयुवकोंकी संख्या
दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है। श्रीयुत मोतीलाल रायके नेतृत्वमें बंगालका प्रवर्तक संघ, जिसका प्रधान कार्यालय चन्द्रनगरमें है, खादी तैयार करने और बेचनेका अपना
काम बराबर बढ़ाता जा रहा है। मगर अबतक संघमें खादीका काम एक पूरक काम ही रहा है–-उसके कई बड़े-बड़े कामोंमें से यह भी एक छोटासा काम है। मगर
अब मोतीबाबूने खादीके कामको अपने संघका मुख्य कार्य बनानेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। उनसे मैंने खुद इसके बारेमें बहुत देरतक बात की थी और उन्होंने कहा
था कि उनके दिलमें यह धारणा बलात् घर करती जा रही है कि चरखेको केन्द्र बिन्दु बनाये बिना जनसमूहकी सच्ची सेवा कर पाना असम्भव है। सर्वश्री बैंकर और
लक्ष्मीदास मेरे बाद चन्द्रनगर गये। और उन्होंने मुझे कुतुबदियामें चरखेके प्रति संघके उत्साहका और उसके [खादी] कार्यका बहुत ही रोचक वर्णन भेजा है। उन्होंने मुझे यह भी बतलाया कि कताई और धुनाईके काममें हो रहे नए-नए सुधारोंको सीखनेके लिए मोतीबाबू कितने उत्कंठित हैं। यह संघ अपेक्षाकृत एक पुरानी संस्था है। इसकी मूल प्रेरणा पांडिचेरीके तपस्वीसे मिली है और बंगालमें इसके कितने ही निःस्वार्थ और श्रद्धालु कार्यकर्त्ता हैं।
मेरे सामने उनके जनवरी मासकी खादीके जो आंकड़े हैं उन्हें देखनेसे पता चलता है कि इस महीनेमें उन्होंने ७०० रु० से ऊपरकी खादी बनाई और ३४०० रु० से अधिककी बिक्री की। अगर यह संघ खादीका उत्पादन करनेमें अपनी शक्ति केन्द्रित कर सके तो वह बहुत जल्दी ही खादी प्रतिष्ठान और अभय आश्रमकी, उनके
कार्यमें बाधा डाले बिना, बराबरी करने लगेगा। क्योंकि अगर हरएक नया संघ अपने लिए नया क्षेत्र ढूंढ ले और उसीमें काम करता रहे तो फिर खादीके उत्पादन
और विक्री दोनों हीके लिए प्रायः असीम क्षेत्र है। बंगाल जैसे विशाल प्रान्तकी माँगें पूरी करना किसी एक संस्थाके लिए असम्भव है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>यंग इंडिया, १०-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०१
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१४९. कार्यकर्त्ता चाहिए'''}}}}
ग्राम संगठन तथा ग्रामोंमें किये जानेवाले कामके सम्बन्धमें गैर-जिम्मेदाराना बात-चीत सुनाई देती है। ग्राम संगठनकी कागजी योजनाएँ भी देशके समक्ष जब-तब पेशकी जाती हैं। वे योजनाएँ कभी-कभी तो खूब सुन्दर ढंगसे छपी हुई होती हैं, परन्तु लिखी प्रायः लापरवाहीसे होती हैं। पूछनेपर उनके लेखक साफ-साफ स्वीकार कर लेते हैं कि उन्होंने अपनी योजनाओंका प्रयोग नहीं किया है, उनके पास यथेष्ट साधन और समय नहीं है अथवा उसकी तरफ उनका रुझान ही नहीं है। मगर वे समझते
हैं कि उनके मनमें जो भी बात सूझे उसे देशके सामने रखना उनका कर्त्तव्य है, चाहे वह कितनी ही अधकचरी या अव्यावहारिक क्यों न हो। जब उनकी योजनाएँ शुरू
नहीं की जाती तो कुछ लेखक तो बिगड़ भी उठते हैं। मगर एक ऐसी योजना है, जो देशके सामने कई सालसे प्रस्तुत है, उसके प्रणेताओंने पहले ही एक-एक करके उस पर अमल स्वयं कर लिया और बादमें सबने मिलकर उसे किया, और अब वह योजना बराबर उन्नति करते चली जानेवाली संस्था अ० भा० चरखा संघके जरिये काममें लाई जा रही है। अगर ठीक ढंगके कार्यकर्त्ता मिलें तो चरखेका कार्यक्रम जो अन्य कार्यक्रमोंकी अपेक्षा अधिक सफल हुआ है, बेहद आगे बढ़ाया जा सकता है।
महाराष्ट्र के दौरेमें मुझे ऐसे गाँवोंमें ले जाया गया जहाँ प्रायः बराबर अकालकी स्थिति ही बनी रहती है और जहाँ लोगोंके पास न तो काफी काम है और न खानेको पर्याप्त अन्न । कुछ गाँवोंके निवासी तो सालमें ६ या ८ महीनोंतक अपने-अपने गाँव छोड़कर चले ही जाते हैं। ये लोग बम्बई जा पहुँचते हैं और अस्वास्थ्य-कर, एवं कभी-कभी अनैतिक परिस्थितियोंमें काम करते हैं। फिर बरसातमें वे अपने साथ भ्रष्टाचार, शराबखोरी और रोग लेकर गाँव लौटते हैं। अगर ठीक ढंगसे ऐसे कार्यकर्त्ता, जिनके दिलोंमें अटूट धैर्य और अटल श्रद्धा हो, चरखेका सन्देश लेकर इन गाँवों में जायें तो इन गाँववालोंमें से एकको भी कहीं बाहर जाने की जरूरत न पड़े। क्योंकि चरखेके इस कार्यक्रम में हमें सिर्फ कतैयोंको मिलनेवाली मजदूरी नहीं, बल्कि चरखेके कार्यक्रमके साथ-साथ जो एक पुनर्निर्माण कार्य होगा उस सबको ही ध्यानमें रखना होगा। गाँवके जुलाहे, रंगरेज, धोबी, लोहार, बढ़ई तथा अन्य बहुतसे लोग भी फिर अपने प्राचीन गौरवपूर्ण धन्धोंमें जुट जायेंगे, जैसा कि हमने जहाँ-कहीं भी चरखेकी जड़ जम गई है, होते देखा है।
तब फिर ग्रामीण कार्यकर्त्ता कौन बन सकता है? अपने कामके लिए हर कार्य-कर्त्ताको चरखा शास्त्रका शास्त्रीय और व्यावहारिक दोनों प्रकारका पूरा ज्ञान होना चाहिए। इसलिए उसे कपासकी किस्मोंकी जानकारी होनी चाहिए; उसे हाथ-कताईके योग्य कपास चुननेका तरीका मालूम होना चाहिए, क्योंकि मिलोंके लिए तो कपास किसी तरह भी चुन ली जा सकती है परन्तु हाथ कताईके लिए यह ठीक नहीं है। अगर हाथ कताईके लिए कपास उचित रीतिसे चुनी जाये तो बहुत ज्यादा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०२
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मेहनत बच जायेगी और सूत भी मजबूत निकलेगा कार्यकर्ताको ओटनेकी क्रिया भी जान लेनी चाहिए और भारतके गाँवोंमें प्रयुक्त होनेवाली भिन्न-भिन्न प्रकारकी
ओटाई चर्खियोंकी भी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उसे धुननेका काम जानना चाहिए और आजकल काममें आनेवाली भिन्न-भिन्न प्रकारकी धुनकियोंसे परिचित हो
जाना चाहिए। उसे कपासके अलग-अलग जातिके रेशे पहचानने और निर्दिष्ट अंकका सूत कातनेका अभ्यास होना चाहिए। सूतकी मजबूती, उसकी एकसारता और अंक बता सकनेकी योग्यता होनी चाहिए। उसे खराब और अच्छे चरखेकी परख होनी चाहिए और टूटे-फूटे चरखोंकी मरम्मत करनी आनी चाहिए। उसे टेढ़े तकुएको सीधा करना आना चाहिए। अगर उसे अपने गाँवमें आदर्श जीवन बिताना है तो उसे नागरिक स्वच्छताके नियम जानने होंगे और गाँवके लोगोंके सामने सफाईका पदार्थ-पाठ रखना होगा। रोजमर्राकी बीमारियोंका घरेलू इलाज भी उसे आना चाहिए। साधारण बहीखाता अथवा हिसाब रखनेकी विधिका सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लेना
होगा। यदि गाँववालोंकी निगाह में उसे ऊँचा रहना है और उनका विश्वास प्राप्त करना है, तो सबसे प्रमुख बात यह है कि उसे शुद्ध और पवित्र जीवन बिताना होगा। गाँव के कार्यकर्ताको स्वभावतः सादे और मितव्ययितापूर्ण जीवन में आनन्द मिलेगा। कोई यह न समझे कि मैंने गाँवके कार्यकर्ताका जैसा चित्रण किया है वैसी सभी अपेक्षाओंको पूरा कर पाना असम्भव है। मैंने असम्भाव्य अपेक्षाएँ नहीं की हैं। व्याव-हारिक शिक्षा, जो जाहिरा इतनी कठिन मालूम होती है, धैर्यवान विद्यार्थीके लिए जरा भी कठिन नहीं है। उपरोक्त कामोंमें से हरएक काममें चरित्र की शुद्धताका होना तो मानी हुई बात है ही। और कोई भी गाँवका कार्यकर्त्ता यदि स्वच्छताके साधारण नियमोंको नहीं जानता और अपनी हदतक स्वयं उन नियमोंका पालन नहीं करता है तथा मामूली रोगोंका घरेलू इलाज करना नहीं जानता, तो वह किसी-न-किसी रोगके चंगुल में फँसे बिना नहीं रह सकता। ऊपर दी हुई इस सादी-सी कसौटीमें खरे उतरनेवाले चाहे जितने कार्यकर्त्ताओंके लिए चरखा खादी संगठनमें जगह है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १०-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१५०. दक्षिण आफ्रिकी समझौता'''}}}}
में यह अंश उनकी सहज विशिष्टताके कारण नहीं, बल्कि यह दिखानेके लिए छाप रहा हूँ कि दक्षिण आफ्रिकाका विचारशील निवासी समझौते के बारेमें क्या विचार<ref>उक्त विचार यहाँ उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं।</ref>रखता है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>यंग इंडिया, १०-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
f56np03jsisu6opv9syz7xs7idislmf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५१. बर्मा और श्रीलंका'''}}}}
एक पत्रलेखक जिनकी अध्ययनशीलता उनके पत्र से ही टपकती है इस प्रकार लिखते हैं:
नीचेके कुछ सवालात आपको शायद केवल बहसकी खातिर ही किये गये
मालूम होंगे मगर 'यंग इंडिया', १०-२-१९२७ के अंकमें आपके उत्तर सहित
प्रकाशित आपके संवाददाताके पत्र में जो भारत और बर्माका नाम लिया गया
है, और उस पत्र में जो हिन्दुस्तानी भाषाको हमारी अन्तःप्रान्तीय भाषा माननेपर
एतराज किया है (अपने उत्तरमें आपने तो फिर भी वर्माका नाम नहीं दिया
है) उसके प्रकाशनसे मुझे आपसे ये सवाल पूछनेका मौका मिल जाता है,
जिन्हें में बहुत दिनोंसे पूछना चाह रहा था ।
१. क्या आप विश्वास करते हैं कि भावी स्वराज्यमें बर्मा हिन्दुस्तानका
साथी समुचित रूपसे बन सकता है या आप समझते हैं कि बर्माको एक
अलग ही राष्ट्र होना चाहिए? ( चूँकि इस सवालपर खुद बर्मा निवासियोंमें
ही मतभेद है, इसलिए शायद आपका विचार उनका और हिन्दुस्तानियों दोनोंका
ही मार्गदर्शन कर सके । )
२. क्या देशके पिछले कई दौरोंमें आप कभी बर्मा गये हैं? अगर
नहीं गये तो क्या भविष्यमें वर्मा जानेका इरादा रखते हैं और कब जानका
विचार है ?
३. क्या आप इसे ठीक नहीं मानते कि लंकाको हमारे भावी स्वराज्यमें
भारतीय संघ सरकारके साथ रहना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान और बर्माके
सम्बन्धों की बनिस्बत हिन्दुस्तान और लंकाके जातीय, भावा-सम्बन्धी और धार्मिक
सम्बन्ध अधिक करीबी हैं -- लेकिन यह ध्यान जरूर रहे कि लंकानिवासी संघमें
रहने को राजी हों (और उनका राजी होना बहुत सम्भव जान पड़ता है ) ।
४. क्या आप समझते हैं कि बर्मामें हिन्दुस्तानी भाषाका कोई अच्छा
खासा प्रचार है हालांकि कई सालसे (१९०८से) बर्मा एक कांग्रेसी प्रान्त रहा
है । या यह कि बर्मा-निवासियोंको हिन्दुस्तानी स्वीकार्य होगी ?
५ लंका और लंका-निवासियोंके विषयमें आपका इसी प्रश्नपर क्या
विचार है?
शायद मेरे जैसे आदमीके लिए, जो न तो खुद कभी बर्मा या लंका गया
है, और न ही जो वहाँसे कोई निजी सम्बन्ध रखनेका दावा कर सकता है, ऐसे
१. देखिए " राष्ट्रभाषा ", १०-२-१९२७ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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2026-08-20T17:00:37Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५१. बर्मा और श्रीलंका'''}}}}
एक पत्रलेखक जिनकी अध्ययनशीलता उनके पत्र से ही टपकती है इस प्रकार लिखते हैं:
नीचेके कुछ सवालात आपको शायद केवल बहसकी खातिर ही किये गये मालूम होंगे मगर 'यंग इंडिया', १०-२-१९२७ के अंकमें आपके उत्तर<ref>देखिए " राष्ट्रभाषा", १०-२-१९२७।</ref सहित प्रकाशित आपके संवाददाताके पत्र में जो भारत और बर्माका नाम लिया गया है, और उस पत्र में जो हिन्दुस्तानी भाषाको हमारी अन्तःप्रान्तीय भाषा माननेपर एतराज किया है (अपने उत्तरमें आपने तो फिर भी वर्माका नाम नहीं दिया है) उसके प्रकाशनसे मुझे आपसे ये सवाल पूछनेका मौका मिल जाता है, जिन्हें में बहुत दिनोंसे पूछना चाह रहा था।
१. क्या आप विश्वास करते हैं कि भावी स्वराज्यमें बर्मा हिन्दुस्तानका साथी समुचित रूपसे बन सकता है या आप समझते हैं कि बर्माको एक अलग ही राष्ट्र होना चाहिए? (चूँकि इस सवालपर खुद बर्मा निवासियोंमें ही मतभेद है, इसलिए शायद आपका विचार उनका और हिन्दुस्तानियों दोनोंका ही मार्गदर्शन कर सके।)
२. क्या देशके पिछले कई दौरोंमें आप कभी बर्मा गये हैं? अगर नहीं गये तो क्या भविष्यमें वर्मा जानेका इरादा रखते हैं और कब जानका विचार है?
३. क्या आप इसे ठीक नहीं मानते कि लंकाको हमारे भावी स्वराज्यमें भारतीय संघ सरकारके साथ रहना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान और बर्माके सम्बन्धोंकी बनिस्बत हिन्दुस्तान और लंकाके जातीय, भावा-सम्बन्धी और धार्मिक सम्बन्ध अधिक करीबी हैं--लेकिन यह ध्यान जरूर रहे कि लंकानिवासी संघमें रहने को राजी हों (और उनका राजी होना बहुत सम्भव जान पड़ता है)।
४. क्या आप समझते हैं कि बर्मामें हिन्दुस्तानी भाषाका कोई अच्छा खासा प्रचार है हालांकि कई सालसे (१९०८से) बर्मा एक कांग्रेसी प्रान्त रहा है। या यह कि बर्मा-निवासियोंको हिन्दुस्तानी स्वीकार्य होगी?
५ लंका और लंका-निवासियोंके विषयमें आपका इसी प्रश्नपर क्या विचार है?
शायद मेरे जैसे आदमीके लिए, जो न तो खुद कभी बर्मा या लंका गया है, और न ही जो वहाँसे कोई निजी सम्बन्ध रखनेका दावा कर सकता है, ऐसे
१.<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५१. बर्मा और श्रीलंका'''}}}}
एक पत्रलेखक जिनकी अध्ययनशीलता उनके पत्र से ही टपकती है इस प्रकार लिखते हैं:
नीचेके कुछ सवालात आपको शायद केवल बहसकी खातिर ही किये गये मालूम होंगे मगर 'यंग इंडिया', १०-२-१९२७ के अंकमें आपके उत्तर<ref>देखिए " राष्ट्रभाषा", १०-२-१९२७।</>ref सहित प्रकाशित आपके संवाददाताके पत्र में जो भारत और बर्माका नाम लिया गया है, और उस पत्र में जो हिन्दुस्तानी भाषाको हमारी अन्तःप्रान्तीय भाषा माननेपर एतराज किया है (अपने उत्तरमें आपने तो फिर भी वर्माका नाम नहीं दिया है) उसके प्रकाशनसे मुझे आपसे ये सवाल पूछनेका मौका मिल जाता है, जिन्हें में बहुत दिनोंसे पूछना चाह रहा था।
१. क्या आप विश्वास करते हैं कि भावी स्वराज्यमें बर्मा हिन्दुस्तानका साथी समुचित रूपसे बन सकता है या आप समझते हैं कि बर्माको एक अलग ही राष्ट्र होना चाहिए? (चूँकि इस सवालपर खुद बर्मा निवासियोंमें ही मतभेद है, इसलिए शायद आपका विचार उनका और हिन्दुस्तानियों दोनोंका ही मार्गदर्शन कर सके।)
२. क्या देशके पिछले कई दौरोंमें आप कभी बर्मा गये हैं? अगर नहीं गये तो क्या भविष्यमें वर्मा जानेका इरादा रखते हैं और कब जानका विचार है?
३. क्या आप इसे ठीक नहीं मानते कि लंकाको हमारे भावी स्वराज्यमें भारतीय संघ सरकारके साथ रहना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान और बर्माके सम्बन्धोंकी बनिस्बत हिन्दुस्तान और लंकाके जातीय, भावा-सम्बन्धी और धार्मिक सम्बन्ध अधिक करीबी हैं--लेकिन यह ध्यान जरूर रहे कि लंकानिवासी संघमें रहने को राजी हों (और उनका राजी होना बहुत सम्भव जान पड़ता है)।
४. क्या आप समझते हैं कि बर्मामें हिन्दुस्तानी भाषाका कोई अच्छा खासा प्रचार है हालांकि कई सालसे (१९०८से) बर्मा एक कांग्रेसी प्रान्त रहा है। या यह कि बर्मा-निवासियोंको हिन्दुस्तानी स्वीकार्य होगी?
५ लंका और लंका-निवासियोंके विषयमें आपका इसी प्रश्नपर क्या विचार है?
शायद मेरे जैसे आदमीके लिए, जो न तो खुद कभी बर्मा या लंका गया है, और न ही जो वहाँसे कोई निजी सम्बन्ध रखनेका दावा कर सकता है, ऐसे<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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एक पत्रलेखक जिनकी अध्ययनशीलता उनके पत्र से ही टपकती है इस प्रकार लिखते हैं:
नीचेके कुछ सवालात आपको शायद केवल बहसकी खातिर ही किये गये मालूम होंगे मगर 'यंग इंडिया', १०-२-१९२७ के अंकमें आपके उत्तर<ref>देखिए " राष्ट्रभाषा", १०-२-१९२७।</ref> सहित प्रकाशित आपके संवाददाताके पत्र में जो भारत और बर्माका नाम लिया गया है, और उस पत्र में जो हिन्दुस्तानी भाषाको हमारी अन्तःप्रान्तीय भाषा माननेपर एतराज किया है (अपने उत्तरमें आपने तो फिर भी वर्माका नाम नहीं दिया है) उसके प्रकाशनसे मुझे आपसे ये सवाल पूछनेका मौका मिल जाता है, जिन्हें में बहुत दिनोंसे पूछना चाह रहा था।
१. क्या आप विश्वास करते हैं कि भावी स्वराज्यमें बर्मा हिन्दुस्तानका साथी समुचित रूपसे बन सकता है या आप समझते हैं कि बर्माको एक अलग ही राष्ट्र होना चाहिए? (चूँकि इस सवालपर खुद बर्मा निवासियोंमें ही मतभेद है, इसलिए शायद आपका विचार उनका और हिन्दुस्तानियों दोनोंका ही मार्गदर्शन कर सके।)
२. क्या देशके पिछले कई दौरोंमें आप कभी बर्मा गये हैं? अगर नहीं गये तो क्या भविष्यमें वर्मा जानेका इरादा रखते हैं और कब जानका विचार है?
३. क्या आप इसे ठीक नहीं मानते कि लंकाको हमारे भावी स्वराज्यमें भारतीय संघ सरकारके साथ रहना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान और बर्माके सम्बन्धोंकी बनिस्बत हिन्दुस्तान और लंकाके जातीय, भावा-सम्बन्धी और धार्मिक सम्बन्ध अधिक करीबी हैं--लेकिन यह ध्यान जरूर रहे कि लंकानिवासी संघमें रहने को राजी हों (और उनका राजी होना बहुत सम्भव जान पड़ता है)।
४. क्या आप समझते हैं कि बर्मामें हिन्दुस्तानी भाषाका कोई अच्छा खासा प्रचार है हालांकि कई सालसे (१९०८से) बर्मा एक कांग्रेसी प्रान्त रहा है। या यह कि बर्मा-निवासियोंको हिन्दुस्तानी स्वीकार्य होगी?
५ लंका और लंका-निवासियोंके विषयमें आपका इसी प्रश्नपर क्या विचार है?
शायद मेरे जैसे आदमीके लिए, जो न तो खुद कभी बर्मा या लंका गया है, और न ही जो वहाँसे कोई निजी सम्बन्ध रखनेका दावा कर सकता है, ऐसे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०४
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''सवाल पूछनेसे, आपको आश्चर्य हो सकता है, मगर इन सवालोंमें मेरी रुचि बतौर एक विश्वप्रेमीके है। में आपको भी वैसा ही विश्वप्रेमी मानता हूँ। पर मैं आशा करता हूँ कि अपनी सुविधाके अनुसार आप शीघ्रसे-शीघ्र इन सवालोंका जवाब देंगे, खासतौरपर इसलिए कि मैं जानता हूँ बहुतसे बर्मी या लंकावासी और उसी प्रकार हिन्दुस्तानी भी इस प्रश्नमें बहुत दिलचस्पी रखते हैं और आपकी राय जाननेको उत्सुक हैं।'''
मैं बर्मा गया हूँ और इस देशको काफी अच्छी तरह जानता हूँ और पत्रलेखकके प्रश्नोंका उत्तर भरोसेके साथ दे सकता हूँ। लंकाके विषयमें मैं वही बात नहीं कह
सकता। इच्छा होते हुए भी अभी में वहाँ नहीं जा सका हूँ। मेरे मनमें इस बात पर कोई शक नहीं है कि बर्मा स्वराज्यमें हिन्दुस्तानका एक हिस्सा नहीं बन सकता ब्रिटिश भारत एक कृत्रिम शब्दावली है, जो हमें अपने ऊपर विदेशी यानी ब्रिटिश आधिपत्यकी याद दिलाती रहती है और हमें गुलाम बनाये रखनेवालोंकी इच्छापर
ही हमारी सरहदोंका विस्तार अथवा संकोचन किया जाता है। भारत तो एक पूर्ण सुसंगठित इकाई होगा, जिसमें वे ही रहेंगे जो उसके स्वतन्त्र नागरिक बनकर रहना
चाहेंगे। इसलिए स्वतंत्र भारतकी अपनी भौगोलिक, जातीय और सांस्कृतिक सीमाएँ होंगी। अतएव स्वतन्त्र भारत जाति और संस्कृतिमें भिन्नता स्वीकार करेगा और वह जहाँ वर्मियोंकी ओर मित्रता और सहायताका हाथ बढ़ायेगा, वहाँ उनके पूर्ण स्वातन्त्र्यके अधिकारको मान्यता भी देगा तथा स्वतन्त्रता प्राप्त करने और बनाये रखनेमें अपनी शक्ति-भर उसे सहायता भी देगा। इसलिए अब यह कहना बेकार ही है कि मेरी योजनामें बर्मियोंको हिन्दी या हिन्दुस्तानी सीखनेका कोई आह्वान नहीं है। जो लोग हिन्दुस्तानकी सच्ची सरहदके भीतर हैं, उनसे मैं आशा करता हूँ कि वे हिन्दुस्तानी सीख लें, क्योंकि वे एक ही देशके बच्चे हैं, एक समान संस्कृतिके उत्तराधिकारी हैं, कई और हितों और समान विचारों द्वारा आपसमें बंधे हैं और उनकी प्रान्तीय भाषाओं
में बहुत-से शब्द एक दूसरेसे मिलते-जुलते हैं।
श्रीलंकाके विषयमेंमें इतने ही विश्वाससे नहीं बोल सकता। यद्यपि लंकाकी और हमारी संस्कृति एक है, और वहाँके अधिकांश निवासी दक्षिण भारतके हैं, तो भी लंकाका अपना एक अलग ही अस्तित्व है और चूंकि मेरी कल्पनाके हिन्दुस्तानको साम्राज्यकी अभिलाषा नहीं है, में उसे बिलकुल अलग एक स्वतन्त्र देश देखकर ही सन्तुष्ट रहूँगा, लेकिन अगर खुद लंकानिवासी ही बिलकुल स्पष्ट शब्दोंमें हिन्दुस्तानमें मिलने की इच्छा प्रकट करें, तो मुझे लंकाको स्वतन्त्र भारतका एक अंग बना लेनेमें
संकोच नहीं होगा।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १०-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०५
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५२. पत्र: ममा डी० सरैयाको'''}}}}
{{Right|शनिवार, फाल्गुन सुदी ९ [१२ मार्च, १९२७]<ref>ममाको मृत्यु १९२७ में हुई थी।</ref>}}
{{Left|चि० ममा,<ref>गंगाबहन वैद्यकी पुत्री।</ref>}}
तुम्हारी तबीयतके कुछ खराब होनेका समाचार सुनकर दुःख हुआ। लेकिन तुम्हें अब पूज्य गंगा बह्नकी सेवाकी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। उनका चित्त परमार्थमें लगा हुआ है; उन्हें अपनेको उसीमें अर्पित करनेकी सुविधा देना तुम्हारा धर्म है। मैं चाहता हूँ कि तुम उन्हें ज्ञानपूर्वक और प्रसन्न मनसे मुक्त कर दो।
{{Right|'''मोहनदासके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २८१८) से।<br>सौजन्य : पुरुषोत्तम डी० सरैया|2em}}
{{C|{{larger|'''१५३. एक सन्देश'''}}}}
{{Right|साबरमती<br>१३ मार्च, १९२७}}
सत्य ही ईश्वर है। और सत्यको पानेका मार्ग अहिंसा है।
{{Right|मो० क० गांधी}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>इम्मोर्टल महात्मा|2em}}
{{C|{{larger|'''१५४. बाँचो, विचारो और रोओ'''}}}}
निम्न लेखका<ref>लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यह 'ढेढ़ोंका गुरु' इस उपनामसे लिखा गया था और इसमें गुजरातके गाँवोंके अस्पृश्योंकी समस्याओंकी चर्चा की गई थी।</ref> यह शीर्षक मैंने जान-बूझकर दिया है। लेखपर लेखकका नाम नहीं है, लेकिन 'ढेढ़का गुरु' गली-गली में तो नहीं मिल सकता। इस कारण 'ढेढ़ोंके' इस अभिमानी 'गुरु' ने अपना नाम गुप्त रखनेका ढोंग करके हमसे मानो व्यंजना-पूर्वक यही कहा है कि ढेढ़ोंके सेवक भले कई हों; लेकिन 'ढेढ़का गुरु' तो एक ठक्कर बापा ही है। लेख लम्बा जरूर है; परन्तु इस कारण पाठक ऊबें नहीं।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५२. पत्र: ममा डी० सरैयाको'''}}}}
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{{Left|चि० ममा,<ref>गंगाबहन वैद्यकी पुत्री।</ref>}}
तुम्हारी तबीयतके कुछ खराब होनेका समाचार सुनकर दुःख हुआ। लेकिन तुम्हें अब पूज्य गंगा बह्नकी सेवाकी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। उनका चित्त परमार्थमें लगा हुआ है; उन्हें अपनेको उसीमें अर्पित करनेकी सुविधा देना तुम्हारा धर्म है। मैं चाहता हूँ कि तुम उन्हें ज्ञानपूर्वक और प्रसन्न मनसे मुक्त कर दो।
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{{C|{{larger|'''१५३. एक सन्देश'''}}}}
{{Right|साबरमती<br>१३ मार्च, १९२७}}
सत्य ही ईश्वर है। और सत्यको पानेका मार्ग अहिंसा है।
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निम्न लेखका<ref>लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यह 'ढेढ़ोंका गुरु' इस उपनामसे लिखा गया था और इसमें गुजरातके गाँवोंके अस्पृश्योंकी समस्याओंकी चर्चा की गई थी।</ref> यह शीर्षक मैंने जान-बूझकर दिया है। लेखपर लेखकका नाम नहीं है, लेकिन 'ढेढ़का गुरु' गली-गली में तो नहीं मिल सकता। इस कारण 'ढेढ़ोंके' इस अभिमानी 'गुरु' ने अपना नाम गुप्त रखनेका ढोंग करके हमसे मानो व्यंजना-पूर्वक यही कहा है कि ढेढ़ोंके सेवक भले कई हों; लेकिन 'ढेढ़का गुरु' तो एक ठक्कर बापा ही है। लेख लम्बा जरूर है; परन्तु इस कारण पाठक ऊबें नहीं।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यदि पाठकोंको हरिजनोंसे जरा भी सहानुभूति होगी तो वे इसे पढ़ना आरम्भ करनेके बाद समाप्त किये बिना छोड़ ही न सकेंगे। इस लेखकी प्रत्येक पंक्तिसे दलितोंके
प्रति लेखकका प्रेम टपकता है। यदि हम उनके इस प्रेमकी कुछ बूंदे भी ग्रहण करके अपने हृदयको आर्द्र होने देंगे तो दलितोंका तथा हमारा दोनोंका ही दुःख दूर हो जायेगा।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १३-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[१४ मार्च, १९२७]<ref>बापूज लैटर्स टु मीरासे।</ref>}}
{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे तुम्हारे सब पत्र मिल गये हैं। आश्रमवासकी मेरी थोड़ी-सी अवधिका यह अन्तिम दिन है। हम जल्दी ही मिलेंगे, इसलिए तुम्हें लम्बा स्नेह-पत्र लिखनेकी कोई
जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी खोई हुई सेहत फिर हासिल कर लेनी चाहिए। तुम्हें वहाँ बहुत कटु अनुभव हुए हैं और तुम हिन्दी में बहुत कम प्रगति कर सकी हो, इसके बावजूद मुझे तुम्हारे वहाँ जानेका दुःख नहीं है।
मेरा १९ तारीखसे पहले वहाँ<ref>गुरुकुल कांगड़ी।</ref> पहुँचना असम्भव है, क्योंकि मैं एक दलित वर्ग सम्मेलनसे १७ तारीखको ही निवृत्त हो सकूंगा। अगर में सम्मेलनकी तारीखें बदल
सकता, तो आश्रम में खुशीसे एक दिन कम ठहरता। मगर उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। अब मैंने सुझाया है कि अगर हरिद्वारके लोगोंको खादी प्रदर्शनीका उद्घाटन करानेके लिये कोई दूसरा व्यक्ति न मिले तो वे उसका उद्घाटन वा या महादेवसे करा लें।
मुझे पूरी उम्मीद है कि कलकत्तेसे चरखा आ गया होगा।
क्या मैंने तुम्हें बताया कि मेरा वजन ५ पौंड और बढ़ गया है? जिस दिन मैं यहाँ पहुँचा, उस दिन मेरा वजन लगभग १०८ पौंड था। यह बहुत अच्छी बात है। आज शामको मेरा वजन फिर लिया जायेगा।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|बापू}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२०९) से।<br>सौजन्य : मीराबहन|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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प्रति लेखकका प्रेम टपकता है। यदि हम उनके इस प्रेमकी कुछ बूंदे भी ग्रहण करके अपने हृदयको आर्द्र होने देंगे तो दलितोंका तथा हमारा दोनोंका ही दुःख दूर हो जायेगा।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १३-३-१९२७|2em}}
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{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे तुम्हारे सब पत्र मिल गये हैं। आश्रमवासकी मेरी थोड़ी-सी अवधिका यह अन्तिम दिन है। हम जल्दी ही मिलेंगे, इसलिए तुम्हें लम्बा स्नेह-पत्र लिखनेकी कोई
जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी खोई हुई सेहत फिर हासिल कर लेनी चाहिए। तुम्हें वहाँ बहुत कटु अनुभव हुए हैं और तुम हिन्दी में बहुत कम प्रगति कर सकी हो, इसके बावजूद मुझे तुम्हारे वहाँ जानेका दुःख नहीं है।
मेरा १९ तारीखसे पहले वहाँ<ref>गुरुकुल कांगड़ी।</ref> पहुँचना असम्भव है, क्योंकि मैं एक दलित वर्ग सम्मेलनसे १७ तारीखको ही निवृत्त हो सकूंगा। अगर में सम्मेलनकी तारीखें बदल
सकता, तो आश्रम में खुशीसे एक दिन कम ठहरता। मगर उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। अब मैंने सुझाया है कि अगर हरिद्वारके लोगोंको खादी प्रदर्शनीका उद्घाटन करानेके लिये कोई दूसरा व्यक्ति न मिले तो वे उसका उद्घाटन वा या महादेवसे करा लें।
मुझे पूरी उम्मीद है कि कलकत्तेसे चरखा आ गया होगा।
क्या मैंने तुम्हें बताया कि मेरा वजन ५ पौंड और बढ़ गया है? जिस दिन मैं यहाँ पहुँचा, उस दिन मेरा वजन लगभग १०८ पौंड था। यह बहुत अच्छी बात है। आज शामको मेरा वजन फिर लिया जायेगा।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०७
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2026-08-20T17:11:43Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५६. पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{Left|दुवारा नहीं पढ़ा}}
{{Right|१४ मार्च, १९२७}}
{{Left|प्रिय क्षितीश बाबू,}}
मुझे कितनी खुशी हुई है। आपके निर्णयका हार्दिक अनुमोदन करते हुए आपको आज तार भेजा है। परन्तु आपको अपने स्वास्थ्यका ध्यान अवश्य रखना है और सोदपुरमें नालियों आदिका ठीक-ठीक प्रबन्ध करके उसे स्वास्थ्यप्रद जगह बनाना है। कृपया मुझे पत्र लिखते रहियेगा। क्या आपने मीराबाईको गुरुकुल काँगड़ी, बिजनौरके पते पर एक सफरी चरखा भेज दिया है? मैंने बहुत दिन हुए उसके लिए लिखा था। यदि अभीतक न भेजा हो तो अब वी० पी० पी० द्वारा तुरन्त भेज दीजिये।
मेरा कार्यक्रम इस प्रकार है:
१९-२१ तक गुरुकुल काँगड़ी, जिला बिजनौर
२३ लेबर्नम रोड, गामदेवी, बम्बई
२५-२६ कोल्हापुर
२७-४ अप्रैल कर्नाटक, मुख्य मुकाम बेलगाँव
५-१२ मद्रास
१२-२७ मैसूर राज्य
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० ८०३१) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१५७. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{Right|[१४ मार्च, १९२७ या उसके पश्चात्]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|प्रिय सतीश बाबू,}}
क्षितीश बाबूके निर्णयसे कितनी खुशी हुई है। मैंने उन्हें अपने अनुमोदनका तार भेज दिया है और सोदपुरमें बीमार न पड़नेकी चेतावनी भी दे दी है। मुझे खुशी है कि तारिणीकी तबीयत सुधर रही है। हेमप्रभादेवी और बच्चेकी तबीयत कैसी है? मुझे चैन उसी दिन आयेगा जिस दिन आप सचमुच यह लिख सकेंगे कि अब आप सब ठीक हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०८
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>में कमीशनके बारेमें पता लगाऊँगा।
आप सबको सस्नेह,
{{Right|हृदयसे आपका,<br>बापू}}
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।
</ref><br>अंग्रेजी (जी० एन० १६३२) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१५८. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|१५ मार्च, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। शायद कल एक और मिले। देखता हूँ कि सेठी भी तुम्हें निराश करता रहा है। पत्र यह सूचित करनेके लिए लिख रहा हूँ कि श्रीमती राय जो पत्र चाहती हैं, सो तुम उन्हें भेज दो। उनका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ । तुम उन्हें जानती हो। वे एक दिनके लिए आश्रम आई थीं। वे सुप्रसिद्ध डा० रायकी पत्नी तथा एक विख्यात संस्कृत विद्वानकी पुत्री हैं। वे स्वयं भी संस्कृतकी विदुषी हैं। बाकी सब तुम्हें उनके पत्रसे पता चल ही जायेगा। सीधे उन्हें ही पत्र लिख देना। यदि चाहो तो जबतक हम मिल नहीं लेते, तबतक रुक भी सकती हो।
{{Right|बापू}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२१०) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{C|{{larger|'''१५९. पत्र: जी० ए० नटेसनको'''}}}}
{{Right|१५ मार्च, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
मद्रास में रहते हुए यात्राके दौरान आपका अतिथि बननेमें मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी। परन्तु मैंने अपने आपको राजगोपालाचारीके हाथों सौंप दिया है। आप उनसे बात करके जो प्रबन्ध करना चाहें, कर सकते हैं।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी|2em}}
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० २२३५) की फोटो नकलसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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2026-08-20T17:30:10Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{left|में कमीशनके बारेमें पता लगाऊँगा।}}
आप सबको सस्नेह,
{{Right|हृदयसे आपका,<br>बापू}}
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।
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{{Right|१५ मार्च, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। शायद कल एक और मिले। देखता हूँ कि सेठी भी तुम्हें निराश करता रहा है। पत्र यह सूचित करनेके लिए लिख रहा हूँ कि श्रीमती राय जो पत्र चाहती हैं, सो तुम उन्हें भेज दो। उनका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ । तुम उन्हें जानती हो। वे एक दिनके लिए आश्रम आई थीं। वे सुप्रसिद्ध डा० रायकी पत्नी तथा एक विख्यात संस्कृत विद्वानकी पुत्री हैं। वे स्वयं भी संस्कृतकी विदुषी हैं। बाकी सब तुम्हें उनके पत्रसे पता चल ही जायेगा। सीधे उन्हें ही पत्र लिख देना। यदि चाहो तो जबतक हम मिल नहीं लेते, तबतक रुक भी सकती हो।
{{Right|बापू}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२१०) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{C|{{larger|'''१५९. पत्र: जी० ए० नटेसनको'''}}}}
{{Right|१५ मार्च, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
मद्रास में रहते हुए यात्राके दौरान आपका अतिथि बननेमें मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी। परन्तु मैंने अपने आपको राजगोपालाचारीके हाथों सौंप दिया है। आप उनसे बात करके जो प्रबन्ध करना चाहें, कर सकते हैं।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी|2em}}
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० २२३५) की फोटो नकलसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{left|में कमीशनके बारेमें पता लगाऊँगा।|2em}}
आप सबको सस्नेह,
{{Right|हृदयसे आपका,<br>बापू}}
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।
</ref><br>अंग्रेजी (जी० एन० १६३२) की फोटो नकलसे।|2em}}
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रितु कुमारी साव
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तुम्हारे दो पत्र मिले। शायद कल एक और मिले। देखता हूँ कि सेठी भी तुम्हें निराश करता रहा है। पत्र यह सूचित करनेके लिए लिख रहा हूँ कि श्रीमती राय जो पत्र चाहती हैं, सो तुम उन्हें भेज दो। उनका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ । तुम उन्हें जानती हो। वे एक दिनके लिए आश्रम आई थीं। वे सुप्रसिद्ध डा० रायकी पत्नी तथा एक विख्यात संस्कृत विद्वानकी पुत्री हैं। वे स्वयं भी संस्कृतकी विदुषी हैं। बाकी सब तुम्हें उनके पत्रसे पता चल ही जायेगा। सीधे उन्हें ही पत्र लिख देना। यदि चाहो तो जबतक हम मिल नहीं लेते, तबतक रुक भी सकती हो।
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६०. पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}}
{{Right|मंगलवार [१५ मार्च, १९२७]<ref>यह पत्र मगनलाल गांधीको १६-३-१९२७ को प्राप्त हुआ था।</ref>}}
{{Left|चि॰ मगनलाल,}}
यह मैं जंगलसे लिख रहा हूँ। मुझे तीन घंटोंकी जरूरत थी; इसलिए उतनी देरके लिए मौन रखा है। इसके साथका पत्र पढ़ना तथा तकलीके बदले में उसे कताई-
वाला निबन्ध तो भेज ही देना। तकुआ वहाँ आ गया है; कृष्णदास जानता है। उस विषयमें उसे विवरण भेजना। यदि तकुआ अच्छा हो तो हम ले लें और उसे उसकी उचित कीमत दें। यदि अच्छा न हो तो हमें उसे खरीदना नहीं चाहिए, लेकिन उसके दोष बताने चाहिए और मार्गदर्शन करना चाहिए। वह आदमी अच्छा है। यदि
तुम्हें ऐसे पत्र भेजना उचित न हो तो मुझे लिखना तुम्हारे ऊपर कामका जो बोझ है उसे देखकर मुझे डर लगता है। इसलिए जिस कामसे तुम्हें बचाया जा सकता
हो, उस कामसे मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ७७६०) से।<br>सौजन्य: राधाबहन चौधरी|2em}}
{{c|{{larger|'''१६१. पत्र: हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}}
{{Left|मढ़ी<br>[१५ मार्च, १९२७]<ref>गांधीजी इस तारीखको मदी, माण्डवी ताल्लुका, जिला सूरतमें थे। देखिए भगला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|भाई हरिभाउ,}}
तुमारा खत मीला है। तुमारी शारीरिक स्थितिके हालतो मुझको मीलते हि रहते हैं। अब छूट गये। अच्छा हुआ यदि शक्ति पूरी न आ जाय तो भरतपुर जाना मोकुफ करना वही अच्छा है।
घनश्यामदासजीका खत उनकी निखालसताका सूचक है। इसके साथ रखता जानकीबहनकी तबियत अब कैसी है?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|मूल (सी० डब्ल्यू० ६१४२) से।<br>सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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यह मैं जंगलसे लिख रहा हूँ। मुझे तीन घंटोंकी जरूरत थी; इसलिए उतनी देरके लिए मौन रखा है। इसके साथका पत्र पढ़ना तथा तकलीके बदले में उसे कताई-
वाला निबन्ध तो भेज ही देना। तकुआ वहाँ आ गया है; कृष्णदास जानता है। उस विषयमें उसे विवरण भेजना। यदि तकुआ अच्छा हो तो हम ले लें और उसे उसकी उचित कीमत दें। यदि अच्छा न हो तो हमें उसे खरीदना नहीं चाहिए, लेकिन उसके दोष बताने चाहिए और मार्गदर्शन करना चाहिए। वह आदमी अच्छा है। यदि
तुम्हें ऐसे पत्र भेजना उचित न हो तो मुझे लिखना तुम्हारे ऊपर कामका जो बोझ है उसे देखकर मुझे डर लगता है। इसलिए जिस कामसे तुम्हें बचाया जा सकता
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तुमारा खत मीला है। तुमारी शारीरिक स्थितिके हालतो मुझको मीलते हि रहते हैं। अब छूट गये। अच्छा हुआ यदि शक्ति पूरी न आ जाय तो भरतपुर जाना मोकुफ करना वही अच्छा है।
घनश्यामदासजीका खत उनकी निखालसताका सूचक है। इसके साथ रखता जानकीबहनकी तबियत अब कैसी है?
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६२. भाषण: माण्डवी ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|१५ मार्च, १९२७}}
जबसे मैंने इस ताल्लुकेमें प्रवेश किया है तभीसे मेरे मनमें तरह-तरह के विचार उठते रहे हैं। आपसे परिहास करके मैं अपने दुःखको भूल जाता हूँ किन्तु इस तरह
परिहासका सहारा लेना भी तो मेरे दुःखकी ही निशानी है। एक दिन था जबकि सूरत जिलेपर न केवल पूरे गुजरातको बल्कि हिन्दुस्तान-भरको अभिमान था, तथा
स्वराज्यके आन्दोलनमें आर्थिक सहायता, सिपाहगरी, शिक्षा और हरिजन सेवाकी दृष्टिसे सूरत जिलेका हिस्सा सबसे अधिक माना जाता था। दोनों जिलोंके बीच आपसमें मधुर स्पर्द्धा चला करती थी, जिसमें बारडोलीने तो गजब ही ढा दिया था। उस मधुर प्रतिस्पर्द्धाकी याद आती ही रहती है। बारडोली दुनिया-भरमें प्रसिद्ध हो गया था। कहाँ तो वे दिन थे और कहाँ आजका दिन? यदि हम आज बारडोली जायें तो इनीगिनी सफेद टोपियाँ और [उनमें भी] अन्त्यज इने गिने नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में सरभणकी करुण कहानी याद आती है और ऐसा लगने लगता है कि स्वराज्य कैसे मिलेगा? उस वृक्षके नीचे हमने प्रतिज्ञा ली थी, अड़तालीस व्यक्तियोंने
ईश्वरको साक्षी मानकर वचन दिया था तथा उनके वचनपर विश्वासकर मैंने बाइसरायको नोटिस दिया था -- इन सब बातोंको कहीं भुलाया जा सकता है? और अब मुझे यहाँ इस आश्रम के उद्घाटनके लिए आना पड़ा है। इससे हमें यही सीखना है कि हमें हार नहीं माननी है, मृत्यु पर्यन्त अपनी श्रद्धा नहीं खोनी है और अपना कदम पीछे नहीं हटाना है। इसीमें इस आश्रमकी स्थापनाका रहस्य छिपा हुआ है। गुजरात प्रान्तीय कमेटीसे पैसा लेकर हमने यह आश्रम खड़ा किया, यह
कोई गर्वकी बात नहीं है। यदि आप चाहते हैं कि यहाँ आश्रमकी स्थापना हो तो आपको पैसे देने में हिचक होनी ही नहीं चाहिए। आप तो पैसोंकी व्यवस्था करके
मुझसे कार्यकर्त्ताओंकी माँग करें। प्रान्तीय कमेटीसे पैसे लेकर काम करना, यह तो दुर्व्यवस्था अथवा कुव्यवस्था है। मनुष्य यदि मस्तिष्क रक्तके बलपर ही अपना काम चलाना चाहे तो उसका काम नहीं चलेगा उसे तो अपने पूरे शरीरके रक्तपर निर्भर रहना चाहिए। प्रान्तीय कमेटी हमारा मस्तिष्क होनेके बजाय हमारे पैर बन गई है और हम अब उसके बलपर घिसट रहे हैं। यह तो शोचनीय
अवस्था है।
अन्य स्थानोंपर जब में राष्ट्रीय शालाओं तथा हरिजनोंको देखता हूँ तो मुझे गुजरातकी याद आ जाती है। ऐसा लगता है कि कहीं गुजरात इस स्पर्द्धासे हट तो नहीं गया। परन्तु में ठहरा आशावादी, घोर निराशामें भी आशाकी अमर किरणोंका दर्शन करनेवाला। ऐसी ही आशाकी एक किरण यह लूला-लंगड़ा आश्रम है, क्योंकि इसको चलानेवाले श्रद्धावान कार्यकर्त्ता मौजूद है। मेरी कामना है कि दिनोंदिन यह<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२११
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण:वेड़छीकी रानीपरज परिषदम|१७३}}</noinclude>आश्रम उन्नति करे तथा बारडोली और सूरत जो आज हतोत्साह और बेहाल हैं पुनः तेजस्वी बनें तथा गुजरात और देशको तेजस्वी बनायें।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २०-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१६३. पत्र : मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|[१६ मार्च, १९२७ से पूर्व]<ref>मगनलाल द्वारा दी गई प्राप्तिको तारीखके आधारपर।</ref>}}
{{Left|चि० मगनलाल,}}
काकासाहबने एक प्रश्न उठाया है। [उनका कहना है,] कामकाज सम्बन्धी कागजात कार्य समितिको देखनेको मिलने चाहिए, जिससे कि वह मेरे विचारोंसे अवगत
हो सके। यह उचित है। इसलिए मैं अबसे कामकाज सम्बन्धी पत्र अलगसे लिखा करूँगा, जिससे सब कोई उन्हें पढ़ सकें। इस बार भी मैंने तुममें पहले जैसी ही
अनुदारता देखी है। चूंकि तुम स्वयं इससे अवगत नहीं हो इसलिए यह अनिवार्य है, यह में मानता हूँ। उसे दूर करना; प्रयत्न करनेसे वह दूर होगी। शालाकी समितिमें
तुम्हें भाग लेना ही चाहिए। यदि तुम शिक्षण समितिमें शामिल होना चाहते हो तो वैसा कर सकते हो मानापमानका खयाल न करना । विशेष तुम्हारा पत्र आनेपर। रामचन्द्र के क्रोधका निराकरण करना। लिफ्ट सम्बन्धी कठिनाइयोंको ज्यादा अच्छी तरहसे समझना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७७६१) से।<br>सौजन्य : राधाबहन चौधरी|2em}}
{{C|{{larger|'''१६४. भाषण : वेड़छीको रानीपरज परिषदमें'''<ref>भाषण प्रारम्भ करनेके पहले गांधीजीने कहा था, जिन्होंने खादी पहनने की प्रतिशा की है, अपने हाथ उठायें। सबने हाथ उठा दिये। फिर कहा, जिन्होंने शराब न छूनेकी प्रतिज्ञा को है, अपने हाथ उठायें। सबने हाथ उठा दिये। उन्होंने फिर कहा कि जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञाएँ निभाई हैं, अपने हाथ उठायें; इसपर भी सबने हाथ उठाये और अन्तमें उन्होंने कहा कि अब वे अपने हाथ उठायें जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञाएँ तोड़ी है -- इसपर एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा।</ref>}}}}
{{Right|१६ मार्च, १९२७}}
आभार प्रदर्शनकी, विनयकी भाषाका क्या उपयोग है? यदि मैं अपना सारा समय दलित जातियोंके बीचमें ही बिताऊँ। जन्मसे में वैश्य हूँ और जबसे मैंने आपको जाना है तबसे सुनता आ रहा हूँ कि 'कालीपरज' काली<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१२
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2026-08-21T09:54:03Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है। बनियों और पारसियोंके कारण ही तो उन्हें यह [तिरस्कार सूचक] नाम मिला है। लेकिन व्यवसायकी दृष्टिसे पारसी भी बनिये ही हैं। उन्होंने अपनी वणिक्-बुद्धि और व्यापारके बलपर ही संसार भरमें नाम कमाया है। मैं जानता हूँ कि वणिक्के बिना संसार नहीं चल सकता, पर यह तो शामल भट्ट द्वारा वर्णित सच्चे वणिक्के बिना। लेकिन आज तो ऐसे अनेक वणिक् हैं जो सदा एक रुपयेके दो बनानेके विचारमें लीन रहते हैं और पैसेके लिए स्त्री, माता, पिता और आत्माको बेचनेके लिए भी तैयार हो जाते हैं। मेरा मन चाहता है कि उनसे दूर भागकर मैं आपके बीच आकर रहने लगूं। नहीं रहता तो केवल इस मोहके कारण कि शायद बाहर रहकर में थोड़ी बहुत सेवा कर सकता हूँ, अपनी शक्तिका उपयोग कर सकता हूँ। परन्तु में नहीं रहता तो
भी मुझे इतना आश्वासन तो है ही कि मेरे साथी आपके बीच रहते हैं।
कौन काला है, कौन गोरा है? हम सभी एक ही स्याहीके बने चित्र हैं। परमात्माकी एक ही कलम है। ईश्वर अलग-अलग कलम लेकर नहीं लिखता।
जंगलमें सिंह और सिंहनी रहते हैं। आप भाई-बहन भी उनकी तरह बनें, जिससे कोई आपको लूट न सके, कोई सता न सके, कोई अपवित्र न कर सके? 'रानीपरज' यानी जंगलवासी। जंगलमें वही घूम सकता है जो ऋषि हो या लुटेरा हो; या फिर सिंहादि हिंसक पशु घूम सकते हैं। आप न हिंसक पशु हैं न लुटेरे। तो आपको ऋषि बनना है। शहरोंकी दुर्गन्धपूर्ण नालियों, शराबकी दुकानों, सूरतके भोजन-प्रिय निवासियोंकी तीव्र गन्धवाली साग-सब्जियों और सेव भजियासे आप दूर हैं और दूर ही रहें। आप सचमुच जंगलवासी बनें तो मेरे जैसे दुबले, निर्बल आपके पास रक्षण माँगने आयेंगे। आज हम शहरवासी खानेके लिए ही जी रहे हैं। इसलिए आप हमें जीनेके लिए खानेकी कला सिखाइये। आप जंगलों में वेदोच्चार कीजिए, जंगलोंको पवित्र बनाइये, हिंसक पशुओंको वहाँसे बाहर निकालिए या उन्हें वासुदेवमय जगतका साक्षात्कार कराके रामनामके मन्त्रसे वशमें कर डालिये।
अंतमें मैं बहनोंसे इतना ही कहूँगा कि आपने खादी पहनना शुरू कर दिया है, यह बहुत अच्छा किया। अब आप इन भद्दे गहनोंको भी छोड़ दें जो आपके नाक-कान आदिको कुरूप बना देते हैं, जिनमें मैल जमा होता रहता है और जो गुलामीके तमगे हैं।<ref>अंतिम अनुच्छेद यंग इंडिया, २४-३-१९२७ से लिया गया है।</ref>
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २०-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६५. अध्यक्ष महोदयका दान'''}}}}
श्रीयुत विट्ठलभाई पटेल और मेरे बीच हुए निम्नलिखित पत्र-व्यवहारमें जो समाचार है उसके आनन्दसे पाठकोंको अबतक वंचित रखनेका मुझे खेद है।
{{C|'''पत्र चौथा'''<ref>यह चौथा पत्र है। पहले तीन पत्र यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। तीसरे पत्रके लिए देखिए खण्ड ३१, पृष्ठ २०२-०४।</ref>}}
{{Right|२० अकबर रोड, नई दिल्ली<br>९ मार्च, १९२७}}
{{Left|प्रिय महात्माजी,}}
जैसा कि आपको पहलेसे ही विदित है, मैंने पहले की ही तरह आपको अपने वेतनमें से प्रतिमास, गत अप्रैलमें<ref>वास्तव में मई १। यह इस पत्र-व्यवहारका पहला पत्र है; देखिए खण्ड ३०, परिशिष्ट १।</ref> आपको लिखे अपने पत्रमें उल्लिखित उद्देश्यकी पूर्तिके लिए, उतनी रकम भेजनेका निश्चय किया है जितनीमें
समझता हूँ कि प्रति मासमें सुविधाके साथ बचा सकूंगा। विधानसभाके अध्यक्षके अपने पूरे कार्यकालमें बराबर मेरा इरादा यथासम्भव यही क्रम जारी रखनेका है।
फरवरीके अन्ततक ऐसी जो भी बचत हो सकी है, वह अर्थात् २०००) चैक द्वारा साथमें भेज रहा हूँ।
{{Left|हृदयसे आपका,<br>वि० झ० पटेल}}
इस समाचारका प्रकाशन [ कुछ देरके लिए] रोक रखनेकी इच्छा श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने व्यक्त की थी, इसीलिए रोक रखा था। चुनावोंके बाकी रहते इसे प्रकाशित करनेमें उन्हें कुछ संकोच-सा मालूम हुआ। चुनावोंके समाप्त हो जानेके बाद भी उनकी रजामन्दी पिछले हफ्ते तक नहीं पा सका। अगर इसका प्रकाशन सार्व-जनिक हितकी दृष्टिसे जरूरी न होता तो में स्वयं उनके इस संकोचको बढ़ावा ही देता। मैं जानता हूँ कि विट्ठलभाई चाहते हैं कि लोग उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरणोंकी नकल करें। अगर किसी-न-किसी कारणसे, हिन्दुस्तानकी स्थितिको देखते हुए अपेक्षाकृत बेहिसाब ऊँची-ऊँची तनख्वाह लेते रहनेका लोग आग्रह करें, तो उन तनख्वाहोंमेंसे समुचित पर्याप्त अंश किसी सार्वजनिक हितके लिए निकाल कर अलग रख दिया जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि ऐसे कितने बड़ी तनख्वाहें पानेवाले व्यक्ति हैं जो अपनी आमदनी निजी ऐशोआराममें नहीं खर्च करते, बल्कि सार्वजनिक हितोंके कार्यमें<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६५. अध्यक्ष महोदयका दान'''}}}}
श्रीयुत विट्ठलभाई पटेल और मेरे बीच हुए निम्नलिखित पत्र-व्यवहारमें जो समाचार है उसके आनन्दसे पाठकोंको अबतक वंचित रखनेका मुझे खेद है।
{{C|'''पत्र चौथा'''<ref>यह चौथा पत्र है। पहले तीन पत्र यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। तीसरे पत्रके लिए देखिए खण्ड ३१, पृष्ठ २०२-०४।</ref>}}
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{{Left|प्रिय महात्माजी,}}
जैसा कि आपको पहलेसे ही विदित है, मैंने पहले की ही तरह आपको अपने वेतनमें से प्रतिमास, गत अप्रैलमें<ref>वास्तव में मई १। यह इस पत्र-व्यवहारका पहला पत्र है; देखिए खण्ड ३०, परिशिष्ट १।</ref> आपको लिखे अपने पत्रमें उल्लिखित उद्देश्यकी पूर्तिके लिए, उतनी रकम भेजनेका निश्चय किया है जितनीमें
समझता हूँ कि प्रति मासमें सुविधाके साथ बचा सकूंगा। विधानसभाके अध्यक्षके अपने पूरे कार्यकालमें बराबर मेरा इरादा यथासम्भव यही क्रम जारी रखनेका है।
फरवरीके अन्ततक ऐसी जो भी बचत हो सकी है, वह अर्थात् २०००) चैक द्वारा साथमें भेज रहा हूँ।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>वि० झ० पटेल}}
इस समाचारका प्रकाशन [ कुछ देरके लिए] रोक रखनेकी इच्छा श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने व्यक्त की थी, इसीलिए रोक रखा था। चुनावोंके बाकी रहते इसे प्रकाशित करनेमें उन्हें कुछ संकोच-सा मालूम हुआ। चुनावोंके समाप्त हो जानेके बाद भी उनकी रजामन्दी पिछले हफ्ते तक नहीं पा सका। अगर इसका प्रकाशन सार्व-जनिक हितकी दृष्टिसे जरूरी न होता तो में स्वयं उनके इस संकोचको बढ़ावा ही देता। मैं जानता हूँ कि विट्ठलभाई चाहते हैं कि लोग उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरणोंकी नकल करें। अगर किसी-न-किसी कारणसे, हिन्दुस्तानकी स्थितिको देखते हुए अपेक्षाकृत बेहिसाब ऊँची-ऊँची तनख्वाह लेते रहनेका लोग आग्रह करें, तो उन तनख्वाहोंमेंसे समुचित पर्याप्त अंश किसी सार्वजनिक हितके लिए निकाल कर अलग रख दिया जाना चाहिए। मैं जानता हूँ कि ऐसे कितने बड़ी तनख्वाहें पानेवाले व्यक्ति हैं जो अपनी आमदनी निजी ऐशोआराममें नहीं खर्च करते, बल्कि सार्वजनिक हितोंके कार्यमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७२
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२३४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
(४) आपकी सूर्य-भेदन व्यायाम पुस्तक भी मैंने पढ़ ली है। क्या आप ऐसा
मानते हैं कि यह व्यायाम मेरे जैसा मनुष्य भी केवल पुस्तक की मदद से कर ले तो
भी कोई हानि नहीं हो सकती है?
(५) वेद के मंत्रों के अर्थ करने में 'ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका' में जो नियम दिये
हैं, उसमें और आपकी प्रणाली में कुछ भेद-सा मुझको प्रतीत होता है। यह मेरा मन्तव्य
ठीक है क्या?
अम्बोली में मैं इस मास की अठारह तारीख तक हूँ।
{{Right|आपका,<br>
'''मोहनदास गांधी'''}}
मूल (एस० एन० १२७७१) की फोटो-नकल से।
{{c|{{larger|'''२२६. पत्र : फूलचन्द शाह को}}}}
{{Right|अम्बोली [बरास्ता] बेलगाँव<br>
सत्याग्रह दिवस [६ अप्रैल, १९२७]}}
भाईश्री ५ फूलचन्द,
मैंने आपको पत्र लिखा था उसका जवाब नहीं मिला।
तबीयत बिगड़ने से पैसा इकट्ठा करने की मेरी शक्ति काफी कम रह गई है।
मैंने एक जगह कोशिश की भी, किन्तु वहाँ से अभी मिलने की सम्भावना नहीं है।
यदि मैं बीमार न हुआ होता तो जैसे-तैसे प्रबन्ध कर देता।
भाई अमृतलाल 'बापा' के भाषण के विषय में देवचन्द भाई को लिखने के लिए मैंने
महादेव से कहा था। उसके विषय में पूरी तरह विचार कर लेना चाहिए। मुझे लगता
है कि राजकीय परिषद् और चरखा कार्य, ये दोनों प्रवृत्तियाँ अलग-अलग होनी चाहिए।
ऐसा हो तो अच्छा रहे। खर्च की तीन मदें हैं। उनकी व्यवस्था इस प्रकार की जाये:
(१) खादी प्रवृत्ति चरखा संघ को सौंप दें, क्योंकि यह मण्डल मेरे बाद भी
बना रहेगा और यथाशक्ति अपना काम चलायेगा।
(२) विद्यालयों का और अन्त्यजों की सेवा का कार्य विद्यापीठ को सौंप दें। वह भी
मेरे जाने के बाद बना रहेगा।
और (३) काठियावाड़ की अलग प्रवृत्ति। इन तीनों विषयों के सम्बन्ध में हम
ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर पाये हैं जो स्वतन्त्र रूप से चल सके। इसलिए मुझे तो
ऊपर सुझाई गई व्यवस्था ही ठीक लगती है। खादी का कार्य गुजरात खादी मण्डल को
भी सौंपा जा सकता है—इस विषय में भाई लक्ष्मीदास के साथ बातचीत करने के
बाद। इन तीन कार्यों के सिवा चौथी किसी चीज़ में मेरा मन अभी नहीं लग सकता।
१. लक्ष्मीदास आसर।<noinclude></noinclude>
rfwytmk48s6w28179r86w1pad6qers1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७३
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||पत्र : वा० गो० देसाईको|
२३५}}
पर मैं देखता हूँ कि जो लोग इससे भिन्न कुछ करना चाहते हैं उनके लिए अलग
संस्था होनी चाहिए। राजकीय परिषद इस प्रयोजनके काम आ सकती है । पर ये
तो एक बीमार आदमीके विचार हैं ।
आप देवचन्दभाई आदिसे मिलें और शान्तिसे कोई हल ढूंढ़े । मेरे पास आना
हो तो सभी अपने-अपने खर्चसे आयें, वह भी पन्द्रह दिनके बाद। मुझे लगता है कि
अभी मुझमें लम्बी बातचीत करनेकी शक्ति नहीं है ।
प्रभुकी इच्छा हुई तो जून मासकी तारीख निभानेकी आशा रखता हूँ । पर
अभी निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता ।
जो कुछ करना हो, स्वयं-नियुक्त न्यासियोंकी तरह तटस्थ भाव से घबराये बिना करना|
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]
सम्भवतः मुझे १९ तारीखको बेलगाँवसे नन्दी हिल्स ले जायेंगे । नन्दी हिल्स
बंगलोरके पास है । वहाँ हम २० तारीखको पहुँचेंगे ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २८५६ ) से ।
सौजन्य : शारदाबहन शाह
भाईश्री ५ वालजी,
{{c|{{larger|'''२२७. पत्र : वा० गो० देसाईको}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
चैत्र सुदी ५ [ ६ अप्रैल, १९२७]}}
आदरणीय रेवाशंकरभाईका पत्र पढ़ा, उनका कहना ठीक तो है। सभा तथा
संस्थाके नियमोंको तो तुम्हें जान ही लेना चाहिए। जो प्रस्ताव पास हों उनकी
नकल कोषाध्यक्षको तुरन्त ही भेज देनी चाहिए। उसपर तुम्हारे हस्ताक्षर. .' हैं ?
अन्य सदस्योंको भी. प्रस्ताव ही अब रेवाशंकरभाईको
.* वर्षामें पास
किये गये प्रस्ताव और उसके बाद साधारण बैठकमें पास किये गये प्रस्तावोंकी नकलें
भी अपने हस्ताक्षर सहित भिजवा दें ।
उचित तो यही जान पड़ता है कि ये नकलें समितिके सदस्योंको भी भेजी
जायें ।
जिन नये सदस्योंका चुनाव हुआ है उन्हें उनके चुनावके सम्बन्धमें लिख दें
तथा उनसे अपनी स्वीकृति देनेका अनुरोध करें ।
१, २, ३ व ४. मूलमें अस्पष्ट है।<noinclude></noinclude>
5q5m2acrmhg1zylnki5ar80koj8bo3b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७५
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२९. मैं क्या करूँ?}}}}
सत्याग्रह-सप्ताह फिर आ गया है। इसके छपते-छपते भी अमूल्य सप्ताह में से
एक दिन बीत जायेगा। पाठकों से मैं जोर देकर कहूँगा कि वे सप्ताह को यों ही यह
सवाल पूछकर न गँवा दें कि 'हम क्या करें?' बल्कि यह सवाल पूछकर कि 'मैं
क्या करूँ?' सप्ताह का अधिक-से-अधिक लाभ उठायें। एक समय था जब यह सवाल
पूछने में भी लाभ था, और हम पूछते भी थे। अगर हर शख्स अपने कर्त्तव्य का पूरा-
पूरा पालन करे तो हम शीघ्र ही यह पूछने लायक भी हो जायेंगे कि 'अब हम
आगे क्या करें?'
निःसन्देह सत्याग्रह की नींव भी राष्ट्र-निर्माण की ही नींव के समान आत्मशुद्धि,
आत्मसमर्पण और आत्मत्याग है। हर कोई अपने-आपसे पूछे कि 'राष्ट्रीय दृष्टि से मैं
कैसे आत्मशुद्धि कर सकता हूँ?' खानगी जीवन की पवित्रता निश्चय ही आत्मशुद्धि की
नींव है। अगर मेरा खानगी जीवन गंदला है तो मैं पोले ढोल के समान हूँ। तब
अगर मेरा अन्तर ठीक नहीं है, तो मुझे जरूर इसी क्षण अपने को सुधारना होगा,
बलिदान के योग्य पात्र बनना होगा। इसमें सरकार मेरी सहायता नहीं कर सकती
और उसमें आड़े भी नहीं आ सकती। मेरा बनना-बिगड़ना बिलकुल मेरे ही हाथों की
बात है।
अपना खानगी जीवन शुद्ध कर लेने के बाद मैं अपने-आपसे दूसरा सवाल पूछूँगा
कि राष्ट्र का सेवक बनकर मैं क्या करूँ? अगर मैं हिन्दू होकर मुसलमान से या किसी
दूसरे धर्मावलम्बी व्यक्ति से घृणा करता हूँ तो मुझे उससे तुरन्त सम्माननीय समझौता
जरूर करना पड़ेगा। अगर मैं घमण्ड से या अज्ञान से एक भी आदमी को अछूत मानता
हूँ, तो अब मुझे अपने मन से यह कलुष मिटा देना पड़ेगा, और उसे गले से लगा लेना
होगा और इस बात की निशानी के तौर पर उसकी कुछ निजी सेवा करनी होगी;
चाहे वह इतनी ही हो कि उसके यहाँ जाकर उसके लड़कों को इकट्ठा कर उनके साथ
खेल भर लूँ। इन बातों में भी मुझे सरकार की किसी भी मदद की जरूरत नहीं है और
फिर भी पूरे मनोयोग से ये काम करके मैं निश्चय ही स्वराज्य को अधिक निकट ले
आता हूँ, और जब कभी मौका आयेगा उस वक्त के लिए अपने-आपको संगठित सेवा के
अधिक योग्य बना लेता हूँ।
क्या मेरे पड़ोस में शराब की कोई दुकान है? एक भूले-भटके भाई को अपने
विनाश-स्थल पर जाने से मुझे विमुख करना ही होगा। १९२१ में हमने यह काम
बड़े अच्छे ढंग से शुरू किया था। हमारी हिंसा-वृत्ति से यह काम उतने ही भद्दे ढंग से
खत्म हुआ। यद्यपि अभी फिलहाल सार्वजनिक रूप से इस मामले में प्रयत्न करने योग्य
वातावरण नहीं है, फिर भी व्यक्तिगत रूप से कोशिश की जा सकती है।
अन्त में मैं यह कहूँगा, मगर यह किसी से कम महत्त्व की बात नहीं है कि यदि
मेरा ऐसा विश्वास है कि चरखे में गरीब-से-गरीब व्यक्ति का भी दुःख दूर करने की|<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७६
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२३८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
क्षमता है, जिसका इतना विशद वर्णन मरखाम के उन शब्दों में किया गया जिन्हें पिछले
सप्ताह के 'यंग इंडिया'¹ में उद्धृत किया गया था, तो मुझे अपने हिस्से का सूत जरूर
कातना होगा। खादी की फेरी लगानी पड़ेगी। अगर मेरे पास प्रोत्साहन देने की ताकत
हो तो अपने पड़ोसी को भी दरिद्रनारायण के लिए कातने को प्रोत्साहित करना होगा,
और अगर वह विलायती कपड़ा पहनता हो तो उसे उसका त्याग करने को समझाना
होगा।
इस राष्ट्रीय सप्ताह के दौरान श्री वल्लभभाई ने काठियावाड़, गुजरात और
विदेशों में रहने वाले गुजरातियों से गुजरात के दलित वर्गों के हित के लिए चन्दा इकट्ठा
करने का प्रस्ताव किया है। फिलहाल गुजरात के दलित वर्गों के उद्धार के लिए जो प्रयत्न
किये जा रहे हैं, उन्हें सहायता पहुँचाने के लिए एक लाख रुपये की अपील की है। मैं
अपना नाम वल्लभभाई के स्वयंसेवक के रूप में लिखवाना चाहूँगा और भिक्षा-पात्र हाथ में
लिये घर-घर घूमूँगा। मैं अपने प्रिय मित्रों से इस भिक्षा-पात्र को भरने की प्रार्थना करूँगा
और उनसे भी अनुरोध करूँगा कि वे धन-संग्रह के लिए अपना नाम स्वयंसेवक के रूप में
लिखायें। स्कूल जाने वाली लड़कियों एवं युवा स्त्रियों से भी, अपने माता-पिता की आज्ञा
लेकर ऐसा करने के लिए एवं वल्लभभाई की थैली भरने में सहयोग देने के लिए अनुरोध
करूँगा।²
निश्चय ही यह सूची बड़ी नहीं है। मैंने तो व्यक्तिगत प्रयत्नों की बड़ी सम्भावना की
तरफ इशारा भर कर दिया है। इस सप्ताह में हर कोई अपने लिए सेवा करने का
अच्छे-से-अच्छा रास्ता खोज निकाले। खोजी व्यक्तिगत प्रयत्न करने पर शान्ति और
मर्यादित ढंग से सफल सामूहिक कार्यवाही की जबरदस्त सम्भावनाएँ देखकर चकित हो
जायेगा। सामूहिक कामों की बहुतायत से ही हमारे हाथ-पाँव सुन्न न हो जायें या
आँखें न चौंधिया जायें। आज जो दो-एक व्यक्तियों के बारे में सच साबित होगा,
कल वही सारे देश के बारे में भी सच होगा, बशर्ते कि वे आशा न छोड़ें, हिम्मत न
हार बैठें।
{{Left|[अंग्रेजी से]}}
यंग इंडिया, ७-४-१९२७
१. "हूम खादी स्टैन्ड्स फॉर", शीर्षक के अन्तर्गत। देखिए परिशिष्ट ४।
२. यह अनुच्छेद नवजीवन, १०-४-१९२७ से लिया गया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७७
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३० पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
प्रिय सतीश बाबू,
{{Right|७ अप्रैल, १९२७}}
आपका प्यारा पत्र मिला। आप देखेंगे कि फिलहाल दौरा रद्द कर दिया गया
है। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मैं कोई काम उतावली में नहीं करूँगा और
अपने शरीर को आराम देने का अपनी हद तक पूरा प्रयत्न करूँगा। कृपया मेरे बारे में
चिन्ता न कीजिएगा। क्या आप, हेमप्रभादेवी, बच्चा और तारिणी बाबू सकुशल हैं?
{{Right|आपका,<br>
बापू}}
[पुनश्च :]
१८ तारीख तक अम्बोली और उसके बाद मैसूर।
{{Left|श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्त<br>
होम विल्ला<br>
गिरीडीह}}
अंग्रेजी (जी० एन० १५६६) की फोटो-नकल से।
{{c|{{larger|'''२३१. पत्र : नानालाल कवि को'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९२७}}
कवि कहता है कि दमयन्ती के निर्दोष होते हुए भी उस पर चोरी करने का दोष
लगा। इसमें उसका नसीब ही टेढ़ा था; वैसा ही मेरे साथ भी हुआ है। शुद्ध भाव से,
और उसके लिए यत्किंचित् परिश्रम करके मैंने प्रेमपूर्वक, मुझसे जैसा बना वैसा एक
स्तुति-पत्र लिखकर भेजा था। वह आपको नहीं रुचा। मुझसे अनजाने में जो दोष हो
जाते हैं उनके लिए मैं प्रतिदिन प्रातःकाल प्रभु से क्षमा-याचना करता हूँ। अनजाने
ही इस दोष के लिए मैं आपसे भी क्षमा माँगता हूँ; क्या आप क्षमा नहीं करेंगे?
जब तक आप क्षमा नहीं करेंगे तब तक मैं याचना तो करता ही रहूँगा।
{{Right|मोहनदास के वन्देमातरम्}}
{{Left|[गुजराती से]}}
:महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
:सौजन्य : नारायण देसाई<noinclude></noinclude>
3acc2i8kqyxzjdw57lpllzrvgr9dc30
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७८
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३२. पत्र : गोकलभाईको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९२७}}
आपका पत्र मिला। आपने सन्देश¹ पढ़कर नहीं सुनाया, यह ठीक ही किया।
जिसकी स्तुति की जाती है उसे भेजा हुआ सन्देश यदि उसे न रुचे तो वह पढ़ा ही
नहीं जाना चाहिए। यदि आपने उसे अन्य पत्रों में भी प्रकाशित न कराया होता तो
अच्छा होता। मेरे सन्देश के बिना कौन-सी कमी रह जाती? मेरे विचार से तो कवि का
क्रोध भी उन्हें दुधारू गाय ही सिद्ध करता है। वे कितना ही क्रोध क्यों न करें मैं
उसे सहन कर लूँगा किन्तु दूर बैठे हुए भी मैं उनकी शक्ति का उपयोग तो जरूर
करूँगा। आप निश्चिन्त रहें। साथ का पत्र आप उन्हें पहुँचा दें।²
{{Right|[गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
{{c|{{larger|'''२३३. पत्र : नानाभाई को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
प्राणायाम और आसनादि पर मेरी सदा श्रद्धा रही है, किन्तु कोई गुरु न
मिलने के कारण मैं उनके प्रयोग नहीं कर सका। सौभाग्य से मैं इन दिनों खटिया पर
पड़ा हुआ हूँ, इसलिए कुछ पढ़ने और सोचने-विचारने को मिल जाता है। सातवलेकर के
आसन सम्बन्धी लेख पढ़ने से उस ओर विशेष रूप से ध्यान गया है। आप तो नाथूराम
शर्मा के शिष्य हैं इसलिए आपको इसका अनुभव होना चाहिए। मेरा भी उनसे सम्पर्क
रहा, किन्तु वे मुझे प्रभावित नहीं कर सके। हमारे कुटुम्ब के चार-पाँच लोगों पर
उनका प्रभाव था। किन्तु अपने अनिश्चय के कारण मैं उनसे आसनादि न सीख सका।
अब आसनादि के सम्बन्ध में आपके अनुभव जानना चाहता हूँ। क्या आपने उनका
अभ्यास किया है? यदि किया है तो क्या वह अभ्यास अब तक चल रहा है? आप
इस सम्बन्ध में जो कुछ भी जानते हों और उसे मुझे भी बता सकें तो बतायें।
{{Left|[गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
१. नानालाल कवि के जन्म-दिवस पर।
२. देखिए पिछला शीर्षक।<noinclude></noinclude>
b3w0viacz6e0lvedzn3qmym6myf21si
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Sweta rani Gupta
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३२. पत्र : गोकलभाईको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९२७}}
आपका पत्र मिला। आपने सन्देश¹ पढ़कर नहीं सुनाया, यह ठीक ही किया।
जिसकी स्तुति की जाती है उसे भेजा हुआ सन्देश यदि उसे न रुचे तो वह पढ़ा ही
नहीं जाना चाहिए। यदि आपने उसे अन्य पत्रों में भी प्रकाशित न कराया होता तो
अच्छा होता। मेरे सन्देश के बिना कौन-सी कमी रह जाती? मेरे विचार से तो कवि का
क्रोध भी उन्हें दुधारू गाय ही सिद्ध करता है। वे कितना ही क्रोध क्यों न करें मैं
उसे सहन कर लूँगा किन्तु दूर बैठे हुए भी मैं उनकी शक्ति का उपयोग तो जरूर
करूँगा। आप निश्चिन्त रहें। साथ का पत्र आप उन्हें पहुँचा दें।²
{{Right|[गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
{{c|{{larger|'''२३३. पत्र : नानाभाई को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
प्राणायाम और आसनादि पर मेरी सदा श्रद्धा रही है, किन्तु कोई गुरु न
मिलने के कारण मैं उनके प्रयोग नहीं कर सका। सौभाग्य से मैं इन दिनों खटिया पर
पड़ा हुआ हूँ, इसलिए कुछ पढ़ने और सोचने-विचारने को मिल जाता है। सातवलेकर के
आसन सम्बन्धी लेख पढ़ने से उस ओर विशेष रूप से ध्यान गया है। आप तो नाथूराम
शर्मा के शिष्य हैं इसलिए आपको इसका अनुभव होना चाहिए। मेरा भी उनसे सम्पर्क
रहा, किन्तु वे मुझे प्रभावित नहीं कर सके। हमारे कुटुम्ब के चार-पाँच लोगों पर
उनका प्रभाव था। किन्तु अपने अनिश्चय के कारण मैं उनसे आसनादि न सीख सका।
अब आसनादि के सम्बन्ध में आपके अनुभव जानना चाहता हूँ। क्या आपने उनका
अभ्यास किया है? यदि किया है तो क्या वह अभ्यास अब तक चल रहा है? आप
इस सम्बन्ध में जो कुछ भी जानते हों और उसे मुझे भी बता सकें तो बतायें।
{{Left|[गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
१. नानालाल कवि के जन्म-दिवस पर।
२. देखिए पिछला शीर्षक।<noinclude></noinclude>
1va3626usscjfnjq1ysmgh52w3k7m4r
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२७९
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३४. पत्र : अमृतलाल को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|भाईश्री अमृतलाल,}}
अमृतलाल बापा के नाम लिखा मेरा पत्र तो तुमने देखा ही होगा। मेरी
इच्छा है कि तुम उसे देखो। आखिर उनका भाषण तुम्हारी ही कृति तो है। मैं
चाहता हूँ कि इस बात का निर्णय शुद्ध तात्त्विक दृष्टि से किया जाये। इसमें मेरी
भावनाओं को आड़े नहीं आने देना चाहिए। और यदि मेरी भावनाओं का ही प्रश्न हो
तो मेरी भावना यही होगी कि जो काठियावाड़ के वातावरण के अनुकूल हो और वहाँ के
लोगों के लिए श्रेयस्कर हो वही होना चाहिए। मैं जो खादी का पक्षपाती हूँ उसका
कारण यह है कि मैं उसे श्रेयस्कर मानता हूँ, किन्तु यदि वह वहाँ के वातावरण के
अनुकूल न हो तो वह श्रेयस्कर क्योंकर होगी? ऑक्सीजन हमारे लिये प्राणवायु है,
किन्तु वृक्षों के लिए? काठियावाड़ का वातावरण तो आप सब लोग ही हैं। यदि कोई
बात तुम सबको मैं न समझा सकूँ तो मुझे किसी दूसरे उपाय का सहारा लेना चाहिए
अथवा उसे छोड़ देना चाहिए।
तुम्हारी योग्यता से मैं परिचित हूँ। तुम्हारे कुछ काम तो मुझे बहुत ही पसन्द
आते हैं। मैं तुम्हारी गिनती देशसेवकों में करता हूँ। तुममें हिम्मत है। उसका उपयोग
करते हुए दूसरों को भी हिम्मत बँधाओ और यदि मेरा विरोध करने का मौका आये
तो ज़रा भी न डरते हुए विरोध करो। मैं जो चाहता हूँ सो नहीं, बल्कि तुम जो
चाहते हो वही करना, क्योंकि यही उचित है। माँगे हुए कपड़ों में हम कहीं फब
सकते हैं!
आजकल मेरा मन खादी आदि रचनात्मक कामों के सिवाय अन्य कामों में नहीं
लगता। रचनात्मक काम करते हुए यदि मेरी ज़िन्दगी बाकी होगी तो सत्याग्रह की
मर्यादा के भीतर रहकर मुझे किसी दिन लड़ाई ठान देने की बात भी सूझ सकती है
और यदि मेरी ज़िन्दगी में यह लड़ाई न हो सकी तो मेरे बाद जिन्हें उसकी जानकारी
होगी, वे लड़ेंगे।
हिंसात्मक क्रान्ति की बात तो मुझे रुचती ही नहीं। जब ज़हरीले साँप को ही
मारने की मुझे इच्छा नहीं होती तो फिर ज़हरीले मनुष्य की तो बात ही क्या? मैं
जानता हूँ कि दुनिया ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने का एक मार्ग हिंसात्मक क्रान्ति को भी
माना है। किन्तु हिंसात्मक क्रान्ति निरर्थक है, यह बताने में मैं अपना जीवन लगा
देना चाहता हूँ। इसी में मुझे आनन्द आता है, इसलिए मेरा धीरज कभी चुकता नहीं।
मुझे जितने रास्ते सूझते हैं वे सब शान्ति के ही रास्ते हैं। मेरे लिए तो वही सबसे
१. देखिए "पत्र : अमृतलाल वि० ठक्कर को", १-४-१९२७।
३३-१६<noinclude></noinclude>
0d1jixg8om5vidrps1lh42dxxk775l0
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2026-08-20T13:10:47Z
Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३४. पत्र : अमृतलाल को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|भाईश्री अमृतलाल,}}
अमृतलाल बापा के नाम लिखा मेरा पत्र तो तुमने देखा ही होगा। मेरी
इच्छा है कि तुम उसे देखो। आखिर उनका भाषण तुम्हारी ही कृति तो है। मैं
चाहता हूँ कि इस बात का निर्णय शुद्ध तात्त्विक दृष्टि से किया जाये। इसमें मेरी
भावनाओं को आड़े नहीं आने देना चाहिए। और यदि मेरी भावनाओं का ही प्रश्न हो
तो मेरी भावना यही होगी कि जो काठियावाड़ के वातावरण के अनुकूल हो और वहाँ के
लोगों के लिए श्रेयस्कर हो वही होना चाहिए। मैं जो खादी का पक्षपाती हूँ उसका
कारण यह है कि मैं उसे श्रेयस्कर मानता हूँ, किन्तु यदि वह वहाँ के वातावरण के
अनुकूल न हो तो वह श्रेयस्कर क्योंकर होगी? ऑक्सीजन हमारे लिये प्राणवायु है,
किन्तु वृक्षों के लिए? काठियावाड़ का वातावरण तो आप सब लोग ही हैं। यदि कोई
बात तुम सबको मैं न समझा सकूँ तो मुझे किसी दूसरे उपाय का सहारा लेना चाहिए
अथवा उसे छोड़ देना चाहिए।
तुम्हारी योग्यता से मैं परिचित हूँ। तुम्हारे कुछ काम तो मुझे बहुत ही पसन्द
आते हैं। मैं तुम्हारी गिनती देशसेवकों में करता हूँ। तुममें हिम्मत है। उसका उपयोग
करते हुए दूसरों को भी हिम्मत बँधाओ और यदि मेरा विरोध करने का मौका आये
तो ज़रा भी न डरते हुए विरोध करो। मैं जो चाहता हूँ सो नहीं, बल्कि तुम जो
चाहते हो वही करना, क्योंकि यही उचित है। माँगे हुए कपड़ों में हम कहीं फब
सकते हैं!
आजकल मेरा मन खादी आदि रचनात्मक कामों के सिवाय अन्य कामों में नहीं
लगता। रचनात्मक काम करते हुए यदि मेरी ज़िन्दगी बाकी होगी तो सत्याग्रह की
मर्यादा के भीतर रहकर मुझे किसी दिन लड़ाई ठान देने की बात भी सूझ सकती है
और यदि मेरी ज़िन्दगी में यह लड़ाई न हो सकी तो मेरे बाद जिन्हें उसकी जानकारी
होगी, वे लड़ेंगे।
हिंसात्मक क्रान्ति की बात तो मुझे रुचती ही नहीं। जब ज़हरीले साँप को ही
मारने की मुझे इच्छा नहीं होती तो फिर ज़हरीले मनुष्य की तो बात ही क्या? मैं
जानता हूँ कि दुनिया ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने का एक मार्ग हिंसात्मक क्रान्ति को भी
माना है। किन्तु हिंसात्मक क्रान्ति निरर्थक है, यह बताने में मैं अपना जीवन लगा
देना चाहता हूँ। इसी में मुझे आनन्द आता है, इसलिए मेरा धीरज कभी चुकता नहीं।
मुझे जितने रास्ते सूझते हैं वे सब शान्ति के ही रास्ते हैं। मेरे लिए तो वही सबसे
१. देखिए "पत्र : अमृतलाल वि० ठक्कर को", १-४-१९२७।
३३-१६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८०
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२४२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
सीधा और इसलिए सबसे छोटा रास्ता है। अगर तुम्हें और तुम्हारे अनुयायियों को
भी वही रास्ता सूझता हो, तभी तुम मेरा साथ देना, अन्यथा मेरा साथ छोड़ देने में
ही श्रेय है। क्योंकि कहा गया है: "श्रेयान् स्वधर्मो।"¹ रोग-शय्या में पड़े होने के
कारण मुझे अधिक सोचने-विचारने को मिलता है, इसलिए मैं इस बात को और अधिक
स्पष्ट करने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि मेरा और हम सबका मार्ग क्या है।
{{Right|बापू}}
{{Left|[गुजराती से]}}
:महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
:सौजन्य : नारायण देसाई
{{c|{{larger|'''२३५. पत्र : हीरालाल अमृतलाल को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
मैं सान्ताक्रूज़ में तो सिर्फ धन एकत्र करने के लिए ही आया था। वहाँ खादी का
उत्पादन नहीं हो सकता। वहाँ तो वह केवल बेची जा सकती है। नीलामी के विषय में
मतभेद हो सकता है। मुझे उसमें कोई दोष नहीं दिखाई देता। उस क्रिया में अपने
आप में तो कोई दोष है ही नहीं। जिस कार्य के लिए वह की जाती है उसमें भी
नहीं है। फिर उसका विरोध किसलिए?
मेरी सलाह तो यही है कि तुम्हारे जैसे विचारशील व्यक्ति को छोटी-सी बात
पर से कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। और खादी जैसी निर्मल प्रवृत्ति का सूक्ष्मता से
निरीक्षण करना चाहिए।
आश्रम में जाओ और देखो। नारणदास, मगनलाल और शंकरलाल से मिलो।
लक्ष्मीदास क्या कर रहे हैं, यह देखो और फिर अपने सुझाव मुझे लिखो।
{{Right|'''मोहनदास के वन्देमातरम्'''}}
{{Left|[गुजराती से]}}
:महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
:सौजन्य : नारायण देसाई
१. भगवद्गीता, अध्याय ३-३५।
२. देखिए "भाषण: सान्ताक्रूज़ में", २३-३-१९२७।<noinclude></noinclude>
21njych3229a43nirzfcdx6nr4xj87b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८१
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३६. पत्र : शम्भूलाल को}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
मैं देखता हूँ कि आजकल मेरा मन खादी के सिवाय अन्य किसी काम में नहीं
लगता। हो सकता है मैं गलती पर होऊँ।
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानुकर बारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोई भ्रम न सकई कोउ टारि।१
{{Left|[गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
{{c|{{larger|'''२३७. पत्र : नारणदास गांधी को}}}}
{{Right|शुक्रवार [८ अप्रैल, १९२७]२}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
मैं तुम्हें पत्र नहीं लिखता किन्तु तुम्हारे कार्य के सम्बन्ध में तो मुझे जानकारी
रहती ही है।
१. मैंने तुम्हारा एक पत्र जो गुजरात में खादी के कार्य पर होने वाले खर्च की ओर
मेरा ध्यान आकर्षित करता है, सँभालकर रख लिया था। उद्देश्य यह था कि इस
सम्बन्ध में तुमसे और लक्ष्मीदास से बातचीत करना चाहता था। किन्तु ऐसा मौका ही
नहीं आया। अब जब मौका मिलेगा देखा जायेगा। मेरी समझ में उसका आशय यह
है कि मजदूरी तो हमने २९,००० रु० दी है; लेकिन हमारा २९,००० रु० से भी
अधिक खर्च हुआ है; और यह बहुत अधिक कहा जायेगा। इसमें रानीपरज लोगों के
बीच किये गये काम पर होने वाला खर्च भी शामिल है न? इसका उत्तर तो यही
होना चाहिए कि फिलहाल खादी-कार्य के साथ-साथ लोक-जागृति तथा लोक-शिक्षा की
प्रवृत्तियाँ भी चल रही हैं। यदि ऐसा हो तो यह हमारी नीति का एक अंग है और
जब तक प्रामाणिक रूप से उस नीति का पालन किया जा रहा हो तब तक एक प्रयोग के
रूप में हमारा उसे सहन करना ठीक है। किन्तु यह तो मेरा अनुमान है। यदि तुम
इस पर अधिक प्रकाश डाल सको तो मैं उसकी चर्चा, अगर लक्ष्मीदास जल्दी मिल
गया तो, उससे करूँगा अथवा जब हम तीनों मिलेंगे तब इस बारे में विचार करेंगे।
१. रामचरितमानस, बालकाण्ड, ११७
२. देखिए "पत्र : फूलचन्द शाह को", ६-४-१९२७।<noinclude></noinclude>
bjyknjmj2qs86nyxmhwym76rrzy1da8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८२
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
२. फिलहाल मुझे जितना समय मिलता है अथवा मुझमें जितनी सामर्थ्य है
उसको देखते हुए मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं काठियावाड़ में चल रहे खादी के काम के
लिए अलग से चन्दा उगाह सकूँगा। इसलिए मैं तो ऐसा सोचता हूँ कि हम यह कार्य
चरखा संघ को सौंप दें और उसके नियमों के अनुसार जितना काम हो सके उतना ही
करें। इस सम्बन्ध में मैंने भाई फूलचन्द को लिखा¹ है। तुम भी इस बारे में विचार
करना। शायद अधिक अच्छा तो यह होगा कि इसे गुजरात के काम के साथ मिला
दिया जाये। फिलहाल मैं इतनी बात स्पष्ट देख रहा हूँ कि उसे स्वतन्त्र रूप से नहीं
चलाया जा सकता। इस सम्बन्ध में आवश्यक समझो तो लक्ष्मीदास वहाँ हो तो उससे
और शंकरलाल से विचार-विमर्श करना। इस बीच आश्रम में जितनी सुविधा मिल सके
उसके अनुसार काठियावाड़ के काम को देखते और बढ़ाते रहो तथा उसकी सूचना
मुझे देते रहो। इतना ध्यान रखना कि जो काम हो चुका है अथवा जो करना है
वह अस्त-व्यस्त न हो।
३. आजकल तुम 'यंग इंडिया' में [खादी के कार्य से सम्बन्धित] आँकड़े और
विवरण प्रकाशित नहीं करते। उत्पादन के आँकड़े तो प्रकाशित होने ही चाहिए तथा
सदस्यों से जो सूत प्राप्त होता है, उस सम्बन्ध में भी आवश्यक जानकारी भेजते
रहा करो।
मैं अब धीरे-धीरे काम करने लायक हो गया हूँ इसलिए अब मुझे बख्शना
मत। जो कुछ लिखने योग्य हो सो सब लिखना और जो कुछ पूछना चाहो वह
पूछना।
चि० पुरुषोत्तम से मैंने बातचीत की थी और अब उसके साथ मेरा पत्र-व्यवहार
भी चल रहा है। मैं इस बारे में तुम्हें बता नहीं सका था। मुझे ऐसा लगा कि
वह निर्मल हृदय का युवक है। आशा है भगवान उसका मंगल ही करेंगे।
कनु का क्या हाल चाल है?
{{Right|बापूजी आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९१४१) से।
सौजन्य : जमनादास गांधी
१. देखिए "पत्र : फूलचन्द शाह को", ६-४-१९२७।<noinclude></noinclude>
4sfmx57kwhokwjj8s1jlfhc4cun8d38
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८३
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३८. एक पत्र}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९२७}}
निश्चय ही मेरी तो यह प्रबल इच्छा है कि हमें जात-बिरादरी के इन छोटे-
छोटे घेरों से बाहर निकलना चाहिए। धर्म का रहस्य जात-बिरादरी के बन्धनों को निभाने में
नहीं है; वह तो वर्णाश्रम तक ही सीमित है। सैकड़ों वर्णों की बात तो कहीं जानने
सुनने को नहीं मिलती। किन्तु इस बारे में मेरा कोई आग्रह नहीं है।
{{Left|गुजराती से]}}
महादेव देसाई की हस्तलिखित डायरी से।
सौजन्य : नारायण देसाई
{{c|{{larger|'''२३९. पत्र : दामोदर लक्ष्मीदास को}}}}
{{Right|अम्बोली, बरास्ता बेलगाँव<br>
चैत्र सुदी ९ [१० अप्रैल, १९२७]}}
{{Left|भाई दामोदर लक्ष्मीदास,}}
चि० ममाबाई के स्वर्गवास का समाचार भाई किशोरलाल ने दिया। दैहिक सम्बन्धों के
कारण हमें शोक तो होता ही है, किन्तु जब मैं ममाबाई के बारे में विचार करता हूँ
तो मुझे ऐसा ही लगता है कि वह दुःखों से मुक्ति पा गई।
तुम्हारे साथ मेरा कोई घनिष्ठ परिचय नहीं है, किन्तु यदि मुझे सलाह देने का
अधिकार हो तो मैं इतना ही कहूँगा कि ममाबाई को याद रखते हुए अब दोबारा
सम्बन्ध न करके पवित्र जीवन व्यतीत करना।
तुम पर बाल-बच्चों की काफी जिम्मेदारी है। पू० गंगाबहन से सलाह-मशविरा करके
उनके लिए उचित व्यवस्था करना और ऐसी योजना करना जिससे उनका जीवन
सुधरे। यदि मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो बताना। यह कहने की आवश्यकता
नहीं कि जो कुछ मुझसे बन पड़ेगा वह मैं करूँगा।
{{Right|मोहनदास के आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८१७) से।
सौजन्य : पुरुषोत्तम डी० सर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८४
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४०. पत्र : गंगाबहन वैद्य को}}}}
{{Right|रविवार [१० अप्रैल, १९२७]}}
{{Left|चि० गंगाबहन,}}
चि० ममा चल बसी यह मुझे तो ठीक ही लगा है। बेचारी बहुत कष्ट में
थी। अन्तिम समय तुम पास में थीं यह भी ठीक हुआ। मैंने जमाई² को पत्र लिखा
है। अब सवाल यह है कि चि० ममा के बच्चों का क्या करना है; वह बच्चों को तुम्हें
सौंप दे और उनके खर्च का भार उठाये तो उनका दायित्व तुम्हें लेना चाहिए या
नहीं यह सवाल उठता है। इस पर विचार करना। मुझे आशा है कि तुम जरा भी
उद्विग्न नहीं हुई होगी।
तुम्हारे पत्र मुझे मिलते रहते हैं। मेरी तबीयत अच्छी ही मानी जायेगी। दो
दिन से थोड़ा चलने लगा हूँ।
{{Right|बापू के आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८८२७) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्
{{c|{{larger|'''२४१. पत्र : मीराबहनको}}}}
{{Right|११ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुम्हारे पत्र मिले। तुमने मेरे सामने अपनी सारी आत्मा उँडेलकर निश्चय ही
बिलकुल ठीक किया। मैं तुमसे सर्वथा सहमत हूँ कि हमें एक संगठन खड़ा करना
है, और इसलिए काम का कोई तरीका होना ही चाहिए। लेकिन शायद मेरे प्रति
तुम्हारे स्नेह के कारण उन लोगों के प्रति, जिन्होंने दौरों का प्रबन्ध किया, अधीरता का
आभास है। किन्तु जो चेतावनी मिली है, उससे सभी लाभ उठायेंगे। इस अत्यन्त
रमणीय वातावरण में जितने भी आराम की जरूरत है, मुझे मिल रहा है और जब
मुझे मैसूर ले जाया जायेगा तब और भी अधिक आराम मिलेगा। आराम आश्रम में
नहीं किया जा सकता। डा० मेहता का आग्रह था कि कोई ठंडी जगह चुनी जाये।
और इस तरह मुझे वहीं रहना है जहाँ मुझे अप्रैल में दौरा करना था।
१. ममा की मृत्यु के उल्लेख से; देखिए पिछला शीर्षक|
२. दामोदर लक्ष्मीदास।
३. नन्दी हिल्स, बंगलोर के पास; देखिए "डा० जीवराज मेहता के साथ हुई बातचीत", ३-४-१९२७।<noinclude></noinclude>
l3rdi94f9y0rqmtk1li3p0mx5sezsak
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३०
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शिखर तिवारी
633
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|बाईस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|२४०.|| पत्र: रामदास गांधीको (१-८-१९२७)||२९१
|-
|२४१.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१-८-१९२७)||२९२
|-
|२४२.|| भाषण: आरसीकेरे जंकशनपर लम्बानियोंके समक्ष (२-८-१९२७)||२९३
|-
|२४३.|| पत्र: सी० वी० वैद्यको (३-८-१९२७)||२९४
|-
|२४४.|| पत्र: डा० गुरुदास रायको (३-८-१९२७)||२९४
|-
|२४५.|| पत्र: वी० वी० दास्तानेको (३-८-१९२७)||२९५
|-
|२४६.|| पत्र: ए० रंगस्वामी अय्यंगारको (३-८-१९२७)||२९६
|-
|२४७.|| पत्र: आर० बी० ग्रेगको (३-८-१९२७)||२९७
|-
|२४८.|| पत्र: कृष्णदासको (३-८-१९२७)||२९७
|-
|२४९.|| पत्र: शंकरको (३-८-१९२७)||२९८
|-
|२५०.|| पत्र: जयन्ती-समारोह समितिके मन्त्रीको (३-८-१९२७)||२९९
|-
|२५१.|| भाषण: हासनके टाउन हॉलमें (३-८-१९२७)||२९९
|-
|२५२.|| प्रदर्शनी में बिक्री (४-८-१९२७)||३००
|-
|२५३.|| भारतीय जहाजरानी (४-८-१९२७)||३०१
|-
|२५४.|| सांस्कृतिक कताई (४-८-१९२७)||३०२
|-
|२५५.|| गाँवोंमें मवेशियोंकी दशाका सुधार (४-८-१९२७)||३०३
|-
|२५६.|| गुजरातकी सहायता करें (४-८-१९२७)||३०४
|-
|२५७.|| पत्र: एच० हारकोर्टको (४-८-१९२७)||३०६
|-
|२५८.|| पत्र: जी० ए० पाटकरको (४-८-१९२७)||३०७
|-
|२५९.|| पत्र: स्वामीको (४-८-१९२७के पश्चात्)||३१०
|-
|२६०.|| पत्र: मीराबहनको (५-८-१९२७)||३११
|-
|२६१.|| तार: मीराबहनको (५-८-१९२७)||३१२
|-
|२६२.|| पत्र: मैसूरके महाराजाको (५-८-१९२७)||३१३
|-
|२६३.|| सन्देश: रजत जयन्तीके लिए (५-८-१९२७)||३१३
|-
|२६४.|| मूलचन्द अग्रवालके प्रश्नोंके उत्तर (५-८-१९२७)||३१३
|-
|२६५.|| पत्र: मूलचन्द अग्रवालको (५-८-१९२७)||३१५
|-
|२६६.|| पत्र: डब्ल्यू० ल्यूतॉस्तॉवस्कीको (६-८-१९२७)||३१६
|-
|२६७.|| तार: जमनालाल बजाजको (६-८-१९२७ को अथवा उसके पश्चात्)||३१७
|-
|२६८.|| तार: सरोजिनी नायडूको (६-८-१९२७को अथवा उसके पश्चात्) ||३१८
|-
|२६९.|| तार: वल्लभभाई पटेलको (६-८-१९२७को अथवा उसके पश्चात्) ||३१८
|-
|२७०.|| एक सत्याग्रहीका देहान्त (७-८-१९२७)||३१९
|-
|२७१.|| पत्र: मीराबहनको (७-८-१९२७)||३२०
|-
|२७२.|| पत्र: गुलजार मुहम्मद अकील' को (७-८-१९२७)||३२१
|-
|२७३.|| पत्र: विलियम स्मिथको (७-८-१९२७)||३२२
|-
|२७४.|| पत्र: य० म० पारनेरकरको (७-८-१९२७)||३२३
|-
|२७५.|| पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको (७-८-१९२७)||३२३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३१
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शिखर तिवारी
633
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|तेईस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|२७६.|| पत्र: आश्रमकी बह्नोंको (८-८-१९२७)||३२५
|-
|२७७.|| पत्र: जे० बी० पेटिटको (९-८-१९२७)||३२५
|-
|२७८.|| पत्र: के० एस० नटराजन्को (९-८-१९२७)||३२६
|-
|२७९.|| पत्र: कोण्डा वेंकटप्पैयाको (९-८-१९२७)||३२७
|-
|२८०.|| पत्र: ई० एस० पटवर्धनको (९-८-१९२७)||३२७
|-
|२८१.|| पत्र: जामिनीभूषण मित्रको (९-८-१९२७)||३२८
|-
|२८२.|| पत्र: स्वामीको (९-८-१९२७)||३२९
|-
|२८३.|| एक अपील (१०-८-१९२७)||३३०
|-
|२८४.|| पत्र: डॉ० मु० अ० अन्सारीको (१०-८-१९२७)||३३१
|-
|२८६.|| पत्र: एस० श्रीनिवास अय्यंगारको (१०-८-१९२७)||३३४
|-
|२८७.|| पत्र: वालजी गो० देसाईको (१०-८-१९२७)||३३५
|-
|२८५.|| पत्र: टी० आर० महादेव अय्यरको (१०-८-१९२७)||३३६
|-
|२८८.|| पत्र: छगनलाल जोशीको (१०-८-१९२७)||३३७
|-
|२८९.|| एक और खादी भण्डार (११-८-१९२७)||३३८
|-
|२९०.|| दक्षिण आफ्रिकावासी भारतीय (११-८-१९२७)||३३८
|-
|२९१.|| गुजरातकी तबाही (११-८-१९२७)||३४०
|-
|२९२.|| इस परमार्थ-साधकका स्वागत करें (११-८-१९२७)||३४१
|-
|२९३.|| अनेकतामें एकता (११-८-१९२७)||३४२
|-
|२९४.|| मानवोचित गुणोंका विकास करनेवाला युद्ध (११-८-१९२७)||३४५
|-
|२९५.|| सच्चा विज्ञान और सच्ची कला (११-८-१९२७)||३४७
|-
|२९६.|| दृढ़ताकी कसौटी (११-८-१९२७)||३४९
|-
|२९७.|| टिप्पणियाँ: सच्चा त्याग; कताईमें थकावटकी आजमाइश; सूतकी जाँचका लाभ; मिल-खद्दर; अल्मोड़ामें हाथ कताई (११-८-१९२७)||३५०
|-
|२९८.|| अनुकरणीय (११-८-१९२७)||३५५
|-
|२९९.|| पत्र: एम० अब्दुल गनीको (११-८-१९२७)||३५५
|-
|३००.|| पत्र: ए० बकीको (११-८-१९२७)||३५६
|-
|३०१.|| पत्र: हेलेन हॉसडिंगको (११-८-१९२७)||३५७
|-
|३०२.|| पत्र: टी० परमेश्वर अय्यरको (११-८-१९२७)||३५८
|-
|३०३.|| पत्र: कृष्णदासको (११-८-१९२७)||३५९
|-
|३०४.|| पत्र: जयन्तीको (११-८-१९२७)||३६०
|-
|३०५.|| पत्र: रामदास गांधीको (११-८-१९२७)||३६१
|-
|३०७.|| पत्र: वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (१२-८-१९२७)||३६२
|-
|३०६.|| पत्र: वसुमती पण्डितको (११-८-१९२७)||३६३
|-
|३०८.|| पत्र: बाल कालेलकरको (१२-८-१९२७)||३६४
|-
|३०९.|| भाषण: दावनगिरिकी सार्वजनिक सभामें (१२-८-१९२७)||३६६
|-
|३१०.|| भाषण: दावनगिरिके आदि कर्नाटकोंके समक्ष (१२-८-१९२७)||३६७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३२
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शिखर तिवारी
633
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<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|चौबीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|३११.|| पत्र: ज० प्र० भणसालीको (१३-८-१९२७)|| ३६९
|-
|३१२.|| भाषण: हरिहरमें (१३-८-१९२७)|| ३७०
|-
|३१३.|| स्वयंसेवकोंसे (१४-८-१९२७)|| ३७०
|-
|३१४.|| पत्र: मीराबहनको (१४-८-१९२७)|| ३७२
|-
|३१५.|| पत्र: सी० एफ० एन्ड्रयूजको (१४-८-१९२७) ||३७४
|-
|३१६.|| पत्र: ए० आई० काजीको (१४-८-१९२७) ||३७५
|-
|३१७.|| पत्र: सोंजा इलेसिनको (१४-८-१९२७)|| ३७६
|-
|३१८.|| पत्र: एस० गणेशन्को (१४-८-१९२७)|| ३७७
|-
|३१९.|| पत्र: कृष्णदासको (१४-८-१९२७)|| ३७८
|-
|३२०.|| पत्र: ए० ए० पॉलको (१४-८-१९२७)|| ३७९
|-
|३२१.|| पत्र: एम० एफ० खानको (१४-८-१९२७)|| ३७९
|-
|३२२.|| पत्र: देवचन्द पारेखको (१४-८-१९२७)|| ३८०
|-
|३२३.|| पत्र: मणिलाल और सुशीला गांधीको (१४-८-१९२७)|| ३८१
|-
|३२४.|| भाषण: शिमोगामें (१४-८-१९२७)|| ३८३
|-
|३२५.|| पत्र: मीराबहनको (१५-८-१९२७)|| ३८३
|-
|३२६.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१५-८-१९२७)|| ३८४
|-
|३२७.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (१९२७)|| ३८५
|-
|३२८.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (१९२७)|| ३८५
|-
|३२९.|| पत्र: छगनलाल जोशीको (१५-८-१९२७)|| ३८६
|-
|३३०.|| पत्र: बालकृष्णको (१५-८-१९२७)|| ३८८
|-
|३३१.|| पत्र: रामदास गांधीको (१५-८-१९२७)|| ३८९
|-
|३३२.|| पत्र: देवेश्वर सिद्धान्तालंकारको (१६-८-१९२७)|| ३९०
|-
|३३३.|| बाढ़से शिक्षा (१८-८-१९२७)|| ३९१
|-
|३३४.|| पिछड़े वर्ग (१८-८-१९२७)|| ३९७
|-
|३३५.|| पत्र: एन० आर० मलकानीको (१८-८-१९२७)|| ३९८
|-
|३३६.|| भाषण: भद्रावतीमें (१८-८-१९२७)|| ३९९
|-
|३३७.|| अपील: तमिलनाडसे (१९-८-१९२७)|| ४००
|-
|३३८.|| पत्र: एस० डी० नाडकर्णीको (१९-८-१९२७)|| ४०१
|-
|३३९.|| पत्र: के० पी० पद्मनाभ अय्यरको (१९-८-१९२७)|| ४०२
|-
|३४०.|| पत्र: टी० डब्ल्यू० कलानीको (१९-८-१९२७)|| ४०३
|-
|३४१.|| पत्र: एन० सेतुरमणको (१९-८-१९२७)|| ४०४
|-
|३४२.|| एक पत्र ( १९-८-१९२७) ||४०५
|-
|३४३.|| पत्र: बी० गोपालाचारको (१९-८-१९२७) ||४०७
|-
|३४४.|| पत्र: वसुमती पण्डितको (२०-८-१९२७)|| ४०९
|-
|३४५.|| टिप्पणी: बेलूर मन्दिरकी दर्शक - पुस्तिका (२०-८-१९२७)|| ४०९
|-
|३४६.|| भाषण: बेलूर मठमें (२०-८-१९२७)||४१०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४९
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''१०. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|१७ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ छगनलाल,
तुम्हारे दोनों पत्र मिले।
तुम्हारे स्वास्थ्य के बारेमें मुझे चिन्ता बनी रहती है। तुम्हारा शरीर वज्र-जैसा होना चाहिए। ऐसा तो कोई नियम नहीं है कि भाई जगजीवनदासको अब कुछ दिया ही न जाये। हम उन्हें कर्जदार बना रहने दें, यह तो हो ही नहीं सकता। किन्तु काठियावाड़ अन्त्यज समितिको बाकी ४०० रुपये चुका देने चाहिए। मैंने जगजीवनदाससे समितिको पुनः लिखने को कहा है।
उमियाके विवाहकी तारीख ४ दिसम्बर ठीक ही तय हुई है, उस तारीखको तो मैं वहाँ रहूँगा ही। अयोध्याप्रसाद माथुरका मामला समझा। वह वहाँ रहा ही क्यों?
हुंडियोंपर हस्ताक्षर करनेका अधिकार पण्डितजी तथा रमणीकलालको देना। उक्त अधिकार इमाम साहबको क्यों न दिया जाये, इसपर भी विचार करना। क्या पण्डितजी और रमणीकलाल दोनोंको एक-साथ यह अधिकार देना चाहते हो? यदि ऐसा है तो क्यों? संयुक्त रूपसे अधिकार देनेकी आवश्यकता मुझे नहीं जान पड़ती। इस बातपर भी विचार करना कि यह अधिकार नारणदासको क्यों न दिया जाये। मेरा तात्पर्य यह है कि यह अधिकार कार्यालयका काम करनेवाले प्रबन्ध समितिके किसी सदस्यको दिया जाना चाहिए। यदि नारणदास सदस्य न हो तो यह एक अलग बात है। इन सब बातोंपर तुम्हें विचार करना है। मुझे लगता है कि संयुक्त रूपसे हस्ताक्षर करना अच्छा नहीं लगेगा।
[पुनश्च :]
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
कान्तिकी<ref>हरिलाल गांधीका पुत्र।</ref> मसूरीतक आनेकी बहुत इच्छा थी, अतः उसे आनेकी अनुमति दे दी है। वह कल या परसों रवाना होगा।
{{right|{{larger|बापू}}}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६१) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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{{right|१७ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ छगनलाल,
तुम्हारे दोनों पत्र मिले।
तुम्हारे स्वास्थ्य के बारेमें मुझे चिन्ता बनी रहती है। तुम्हारा शरीर वज्र-जैसा होना चाहिए।
ऐसा तो कोई नियम नहीं है कि भाई जगजीवनदासको अब कुछ दिया ही न जाये। हम उन्हें कर्जदार बना रहने दें, यह तो हो ही नहीं सकता। किन्तु काठियावाड़ अन्त्यज समितिको बाकी ४०० रुपये चुका देने चाहिए। मैंने जगजीवनदाससे समितिको पुनः लिखने को कहा है।
उमियाके विवाहकी तारीख ४ दिसम्बर ठीक ही तय हुई है, उस तारीखको तो मैं वहाँ रहूँगा ही। अयोध्याप्रसाद माथुरका मामला समझा। वह वहाँ रहा ही क्यों?
हुंडियोंपर हस्ताक्षर करनेका अधिकार पण्डितजी तथा रमणीकलालको देना। उक्त अधिकार इमाम साहबको क्यों न दिया जाये, इसपर भी विचार करना। क्या पण्डितजी और रमणीकलाल दोनोंको एक-साथ यह अधिकार देना चाहते हो? यदि ऐसा है तो क्यों? संयुक्त रूपसे अधिकार देनेकी आवश्यकता मुझे नहीं जान पड़ती। इस बातपर भी विचार करना कि यह अधिकार नारणदासको क्यों न दिया जाये। मेरा तात्पर्य यह है कि यह अधिकार कार्यालयका काम करनेवाले प्रबन्ध समितिके किसी सदस्यको दिया जाना चाहिए। यदि नारणदास सदस्य न हो तो यह एक अलग बात है। इन सब बातोंपर तुम्हें विचार करना है। मुझे लगता है कि संयुक्त रूपसे हस्ताक्षर करना अच्छा नहीं लगेगा।
[पुनश्च :]
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कान्तिकी<ref>हरिलाल गांधीका पुत्र।</ref> मसूरीतक आनेकी बहुत इच्छा थी, अतः उसे आनेकी अनुमति दे दी है। वह कल या परसों रवाना होगा।
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ऋतु मिश्रा
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{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
प्रिय राघवन्,
आपका पत्र मिला। मेरा सन्देश यह है :
"मजदूरोंको खुद अपनी मदद करना और आत्मनिर्भर बनना सीखना ही चाहिए।"
{{right|हृदयसे आपका,}}<br>
श्रीयुत जी॰ विजयराघवन्<br>
प्रबन्धक, 'द इंडियन लेबर जर्नल'<br>
सीताबर्ड़ी, नागपुर
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५२०५) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''१२. पत्र : बी॰ एस॰ गोपाल रावको'''}}}}
प्रिय गोपाल राव,<ref>एक एडवोकेट जिन्होंने राजमुन्द्री में हाइड्रो-क्रोमोपैथिक और प्राकृतिक चिकित्साकी अकादमी खोली थी।</ref>
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
आपका पत्र मिला। मैं आपके उत्साह और आत्मविश्वासकी सराहना करता हूँ लेकिन मैं उसमें उस वैज्ञानिक चर्चाकी कमी महसूस करता हूँ जो उत्साह तथा आत्मविश्वासको सफल बनानेके लिए उसके साथ-साथ होनी चाहिए। क्या आप ऐसा नहीं समझते कि मेरे निकट चाहे जितने प्रमाणपत्र<ref>श्री गोपाल रावने अपने अच्छे किये हुए नौ आदमियोंकी सूची पत्रके साथ भेजी थी।</ref> क्यों न पड़े हों, यदि तत्सम्बन्धी मेरा अनुभव उससे विपरीत पड़ता हो तो वे बिलकुल बेकार हैं? मान लीजिए कि एक व्यक्ति है जो अपने सामने धधकती आगकी रोशनी नहीं महसूस करता है, तो क्या आपका खयाल है कि उन हजारों आदमियोंके साक्ष्यपर, जिनको वह रोशनी दिखाई देती हो, वह व्यक्ति अपने निजी अनुभवके विपरीत इस बातपर भरोसा कर लेगा? और आप शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि उन सब लोगोंने, जिनका नाम आपने दिया है, अपने आहारका वैसा ठीक वर्णन नहीं किया है, जितना कि आप<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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आपका पत्र मिला। मेरा सन्देश यह है :
"मजदूरोंको खुद अपनी मदद करना और आत्मनिर्भर बनना सीखना ही चाहिए।"
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ऋतु मिश्रा
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१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय राघवन्,
आपका पत्र मिला। मेरा सन्देश यह है :
"मजदूरोंको खुद अपनी मदद करना और आत्मनिर्भर बनना सीखना ही चाहिए।"
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<br>श्रीयुत जी॰ विजयराघवन्<br>
प्रबन्धक, 'द इंडियन लेबर जर्नल'<br>
सीताबर्ड़ी, नागपुर
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : सी॰ सी॰ दासको|}}</noinclude>सोचते हैं। अर्थात् अगर उन्होंने कच्चे खाद्य पदार्थों या पकी हुई चपाती के साथ दूधका भी इस्तेमाल किया है तो उससे पूरे प्रयोगका स्वरूप ही बदल जाता है और उससे वह निष्फल हो जाता है। बहुतसे लेखकोंने मुझे बताया है कि वे बगैर आगसे पकाया खाना खाते हैं और फिर साथ-साथ वे यह भी बताते हैं कि वे कभी-कभी पकाया हुआ चावल, सब्जी और चपाती खाते हैं और दही या दूध तो लेते ही हैं। मैंने जो प्रयोग ४४ आदमियोंपर किया, वह बिना दूध और बिना पकाये भोजनपर रहनेका था और उनमें से बहुत बड़ी संख्या में लोग बुरी तरहसे नाकामयाब रहे। बाधाओंके बावजूद तीन या चार लोग अभी डटे हुए हैं। मैं नहीं कह सकता कि अन्तमें उनका क्या हाल होगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>श्रीयुत बी० एस० गोपालराव
<br>एडवोकेट, राजमुन्द्री
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६३९ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
१३. पत्र : सी० सी० दासको
मुकाम मसूरी
१८ अक्टूबर, १९२९
प्रिय मित्र,
आपके छोटे-से पत्रके लिए धन्यवाद । आपके आतिथ्य में आपके घर मेरा समय : बड़े आनन्दसे बीता । मैं आशा करता हूँ कि उन दिनोंकी थकानका आपके स्वास्थ्य पर अब कोई असर बाकी नहीं बचा होगा और मैं यह भी आशा करता हूँ कि अब गृहस्थी शान्तिसे चल रही होगी । कृपया श्रीमती दाससे कहिएगा कि मुझे पत्र लिखें। वह चाहें तो अंग्रेजीमें या हिन्दीमें, जिसमें भी उन्हें अच्छा लगे, पत्र लिख सकती हैं ।
श्री सी० सी० दास विल्लामाया
गोरखपुर
अंग्रेजी (एस० एन० १५६४३ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
हृदयसे आपका,
१. ४ अक्तूबरसे ७ अक्तूबर तक ।
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ऋतु मिश्रा
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<br>एडवोकेट, राजमुन्द्री
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६३९) की माइक्रोफिल्मसे।
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१८ अक्टूबर, १९२९}}<br>
प्रिय मित्र,
आपके छोटे-से पत्रके लिए धन्यवाद। आपके आतिथ्य में आपके घर मेरा समय<ref>४ अक्तूबरसे ७ अक्तूबर तक।</ref> बड़े आनन्दसे बीता। मैं आशा करता हूँ कि उन दिनोंकी थकानका आपके स्वास्थ्य पर अब कोई असर बाकी नहीं बचा होगा और मैं यह भी आशा करता हूँ कि अब गृहस्थी शान्तिसे चल रही होगी। कृपया श्रीमती दाससे कहिएगा कि मुझे पत्र लिखें। वह चाहें तो अंग्रेजीमें या हिन्दीमें, जिसमें भी उन्हें अच्छा लगे, पत्र लिख सकती हैं।
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<br>श्री सी॰ सी॰ दास<br>
विल्लामाया<br>
गोरखपुर
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विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
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सीमा1
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wikitext
text/x-wiki
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
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# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
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== पुस्तक सूची ==
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ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
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# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
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#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Rajneeesh555" /></noinclude>५००
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
तरफसे क्यों न उभारा गया हो। अपनी जान देनेसे बढ़कर और कोई कुरबानी मनुष्य
नहीं कर सकता, और अब इससे कम कुछ करना अहिंसामें अविश्वास प्रकट करनेके
समान होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २०-२-१९३०
'''बोल्ड टेक्स्ट'''४५९. कुछ सवाल
जो सविनय अवज्ञा होने जा रही है, उसके सिलसिले में कुछ मित्रों और
आलोचकोंने कुछ समुचित प्रश्न पूछे हैं, जिनका जवाब देना आवश्यक है।
प्रo - निश्चय ही आप इतने अधीर तो नहीं हो गये होंगे कि सरकारको अपने
इरादों और योजनाओंको सूचना दिये बिना, और उसे आपको सन्तुष्ट करने या
गिरफ्तार करनेका मौका दिये बिना ही आप आन्दोलन शुरू कर वें ?
जो लोग मेरे पिछले कामोंसे वाकिफ हैं, उन्हें जानना चाहिए कि चोरीसे या
अधीर होकर कोई काम करना में सत्याग्रहके विरुद्ध मानता हूँ। एक भी सच्चा
कदम आगे बढ़ानेसे पहले मैं वाइसरायको अपने इरादोंकी सूचना जरूर दूंगा। अपने
विरोधी या तथाकथित दुश्मनसे सत्याग्रहीको कोई बात छिपानी नहीं होती है।
क्या लाहौर में आपने यह नहीं कहा था कि सविनय अवज्ञाके लिए- खासकर
बड़े पैमानेपर कर बन्दी अभियानके लिए देश तैयार नहीं है ?
-
मुझे यह तो आज भी विश्वास नहीं है कि देश तैयार है। लेकिन यह बात
अब मैं इतने साफ तौरसे देख पाता हूँ जितना कि पहले कभी नहीं देख पाता था
कि इस अर्थ में कि अहिंसाका वातावरण नहीं है, तैयार न होनेकी बात कहने से वह
स्थिति और भी बढ़ेगी; यह बात हम इन वर्षोंमें बराबर देखते आ रहे हैं। देशके
नौजवान अधीर हो उठे हैं। मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि चूंकि सन १९२१ में
कांग्रेसने सत्याग्रह करनेका निश्चय किया था, इसीलिए इनमें से बहुतेरे लोगोंने अपने
हिंसात्मक कार्यक्रमको मुल्तवी कर दिया था। जैसे-जैसे मैं यह कहता गया हूँ कि
देश सविनय अवज्ञाके लिए तैयार नहीं है, वैसे ही वैसे हिंसक विचारके नौजवान अधिक
सक्रिय बनते गये हैं। फिर में यह महसूस करता हूँ कि अगर अहिंसामें [ हिंसाको
दवा देनेकी ] सक्रिय शक्ति है जिसके होनेका मुझे विश्वास है तो हिंसाके आगे
भी अहिंसाको कारगर होना चाहिए। लेकिन इस सम्बन्धमें एक कठिनाई यह थी कि
चूंकि कांग्रेस सारे हिन्दुस्तानकी प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करती है, इसलिए,
हरएक हिसाकाण्डकी खासकर कांग्रेसियोंके हिंसाकाण्डकी जिम्मेदारी अपने सिर लिये
विना कांग्रेस सविनय अवज्ञा नहीं कर सकती। अब इस सविनय अवज्ञाकी जिम्मेदारी
अपने सिर लेकर मैने इस मर्यादाके बन्धनको तोड़नेका तरीका खोज निकाला है।
क्योंकि मैं तो किसीका प्रतिनिधि नहीं हूँ, अतएव जिन्हें में स्वयं अपने साथ आन्दोलन में
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Rajneeesh555" /></noinclude>५००
'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''
तरफसे क्यों न उभारा गया हो। अपनी जान देनेसे बढ़कर और कोई कुरबानी मनुष्य
नहीं कर सकता, और अब इससे कम कुछ करना अहिंसामें अविश्वास प्रकट करनेके
समान होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
'''४५९. कुछ सवाल'''<math display="inline"></math>
जो सविनय अवज्ञा होने जा रही है, उसके सिलसिले में कुछ मित्रों और
आलोचकोंने कुछ समुचित प्रश्न पूछे हैं, जिनका जवाब देना आवश्यक है।
'''प्रo - निश्चय ही आप इतने अधीर तो नहीं हो गये होंगे कि सरकारको अपने इरादों और योजनाओंको सूचना दिये बिना, और उसे आपको सन्तुष्ट करने या गिरफ्तार करनेका मौका दिये बिना ही आप आन्दोलन शुरू कर दें ?
'''
जो लोग मेरे पिछले कामोंसे वाकिफ हैं, उन्हें जानना चाहिए कि चोरीसे या
अधीर होकर कोई काम करना में सत्याग्रहके विरुद्ध मानता हूँ। एक भी सच्चा
कदम आगे बढ़ानेसे पहले मैं वाइसरायको अपने इरादोंकी सूचना जरूर दूंगा। अपने
विरोधी या तथाकथित दुश्मनसे सत्याग्रहीको कोई बात छिपानी नहीं होती है।
क्या लाहौर में आपने यह नहीं कहा था कि सविनय अवज्ञाके लिए- खासकर
बड़े पैमानेपर कर बन्दी अभियानके लिए देश तैयार नहीं है ?
-
मुझे यह तो आज भी विश्वास नहीं है कि देश तैयार है। लेकिन यह बात
अब मैं इतने साफ तौरसे देख पाता हूँ जितना कि पहले कभी नहीं देख पाता था
कि इस अर्थ में कि अहिंसाका वातावरण नहीं है, तैयार न होनेकी बात कहने से वह
स्थिति और भी बढ़ेगी; यह बात हम इन वर्षोंमें बराबर देखते आ रहे हैं। देशके
नौजवान अधीर हो उठे हैं। मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि चूंकि सन १९२१ में
कांग्रेसने सत्याग्रह करनेका निश्चय किया था, इसीलिए इनमें से बहुतेरे लोगोंने अपने
हिंसात्मक कार्यक्रमको मुल्तवी कर दिया था। जैसे-जैसे मैं यह कहता गया हूँ कि
देश सविनय अवज्ञाके लिए तैयार नहीं है, वैसे ही वैसे हिंसक विचारके नौजवान अधिक
सक्रिय बनते गये हैं। फिर में यह महसूस करता हूँ कि अगर अहिंसामें [ हिंसाको
दवा देनेकी ] सक्रिय शक्ति है जिसके होनेका मुझे विश्वास है तो हिंसाके आगे
भी अहिंसाको कारगर होना चाहिए। लेकिन इस सम्बन्धमें एक कठिनाई यह थी कि
चूंकि कांग्रेस सारे हिन्दुस्तानकी प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करती है, इसलिए,
हरएक हिसाकाण्डकी खासकर कांग्रेसियोंके हिंसाकाण्डकी जिम्मेदारी अपने सिर लिये
विना कांग्रेस सविनय अवज्ञा नहीं कर सकती। अब इस सविनय अवज्ञाकी जिम्मेदारी
अपने सिर लेकर मैने इस मर्यादाके बन्धनको तोड़नेका तरीका खोज निकाला है।
क्योंकि मैं तो किसीका प्रतिनिधि नहीं हूँ, अतएव जिन्हें में स्वयं अपने साथ आन्दोलन में
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Rajneeesh555" /></noinclude>५००
'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''
तरफसे क्यों न उभारा गया हो। अपनी जान देनेसे बढ़कर और कोई कुरबानी मनुष्य नहीं कर सकता, और अब इससे कम कुछ करना अहिंसामें अविश्वास प्रकट करनेके समान होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
'''४५९. कुछ सवाल'''<math display="inline"></math>
जो सविनय अवज्ञा होने जा रही है, उसके सिलसिले में कुछ मित्रों और
आलोचकोंने कुछ समुचित प्रश्न पूछे हैं, जिनका जवाब देना आवश्यक है।
'''प्रo - निश्चय ही आप इतने अधीर तो नहीं हो गये होंगे कि सरकारको अपने इरादों और योजनाओंको सूचना दिये बिना, और उसे आपको सन्तुष्ट करने या गिरफ्तार करनेका मौका दिये बिना ही आप आन्दोलन शुरू कर दें ?
'''
जो लोग मेरे पिछले कामोंसे वाकिफ हैं, उन्हें जानना चाहिए कि चोरीसे या
अधीर होकर कोई काम करना में सत्याग्रहके विरुद्ध मानता हूँ। एक भी सच्चा
कदम आगे बढ़ानेसे पहले मैं वाइसरायको अपने इरादोंकी सूचना जरूर दूंगा। अपने विरोधी या तथाकथित दुश्मनसे सत्याग्रहीको कोई बात छिपानी नहीं होती है।
'''क्या लाहौर में आपने यह नहीं कहा था कि सविनय अवज्ञाके लिए- खासकर
बड़े पैमानेपर कर बन्दी अभियानके लिए - देश तैयार नहीं है ?
'''
मुझे यह तो आज भी विश्वास नहीं है कि देश तैयार है। लेकिन यह बात
अब मैं इतने साफ तौरसे देख पाता हूँ जितना कि पहले कभी नहीं देख पाता था कि इस अर्थमें कि अहिंसाका वातावरण नहीं है, तैयार न होनेकी बात कहने से वह स्थिति और भी बढ़ेगी; यह बात हम इन वर्षोंमें बराबर देखते आ रहे हैं। देशके नौजवान अधीर हो उठे हैं। मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि चूँकि सन १९२१ में कांग्रेसने सत्याग्रह करनेका निश्चय किया था, इसीलिए इनमें से बहुतेरे लोगोंने अपने हिंसात्मक कार्यक्रमको मुल्तवी कर दिया था। जैसे-जैसे मैं यह कहता गया हूँ कि देश सविनय अवज्ञाके लिए तैयार नहीं है, वैसे ही वैसे हिंसक विचारके नौजवान अधिक सक्रिय बनते गये हैं। फिर में यह महसूस करता हूँ कि अगर अहिंसामें [ हिंसाको दवा देनेकी ] सक्रिय शक्ति है - जिसके होनेका मुझे विश्वास है तो हिंसाके आगे भी अहिंसाको कारगर होना चाहिए। लेकिन इस सम्बन्धमें एक कठिनाई यह थी कि चूँकि कांग्रेस सारे हिन्दुस्तानकी प्रतिनिधि संस्था होनेका दावा करती है, इसलिए, हरएक हिसाकाण्डकी खासकर कांग्रेसियोंके हिंसाकाण्डकी जिम्मेदारी अपने सिर लिये बिना कांग्रेस सविनय अवज्ञा नहीं कर सकती। अब इस सविनय अवज्ञाकी जिम्मेदारी अपने सिर लेकर मैने इस मर्यादाके बन्धनको तोड़नेका तरीका खोज निकाला है। क्योंकि मैं तो किसीका प्रतिनिधि नहीं हूँ, अतएव जिन्हें में स्वयं अपने साथ आन्दोलनमें
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Rajneeesh555" /></noinclude>५००
'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''
तरफसे क्यों न उभारा गया हो। अपनी जान देनेसे बढ़कर और कोई कुरबानी मनुष्य नहीं कर सकता, और अब इससे कम कुछ करना अहिंसामें अविश्वास प्रकट करनेके समान होगा।
[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
center'''४५९. कुछ सवाल'''<math display="inline"></math>
जो सविनय अवज्ञा होने जा रही है, उसके सिलसिले में कुछ मित्रों और
आलोचकोंने कुछ समुचित प्रश्न पूछे हैं, जिनका जवाब देना आवश्यक है।
'''प्रo - निश्चय ही आप इतने अधीर तो नहीं हो गये होंगे कि सरकारको अपने इरादों और योजनाओंको सूचना दिये बिना, और उसे आपको सन्तुष्ट करने या गिरफ्तार करनेका मौका दिये बिना ही आप आन्दोलन शुरू कर दें ?
'''
जो लोग मेरे पिछले कामोंसे वाकिफ हैं, उन्हें जानना चाहिए कि चोरीसे या
अधीर होकर कोई काम करना में सत्याग्रहके विरुद्ध मानता हूँ। एक भी सच्चा
कदम आगे बढ़ानेसे पहले मैं वाइसरायको अपने इरादोंकी सूचना जरूर दूंगा। अपने विरोधी या तथाकथित दुश्मनसे सत्याग्रहीको कोई बात छिपानी नहीं होती है।
'''क्या लाहौर में आपने यह नहीं कहा था कि सविनय अवज्ञाके लिए- खासकर
बड़े पैमानेपर कर बन्दी अभियानके लिए - देश तैयार नहीं है ?
'''
मुझे यह तो आज भी विश्वास नहीं है कि देश तैयार है। लेकिन यह बात
अब मैं इतने साफ तौरसे देख पाता हूँ जितना कि पहले कभी नहीं देख पाता था कि इस अर्थमें कि अहिंसाका वातावरण नहीं है, तैयार न होनेकी बात कहने से वह स्थिति और भी बढ़ेगी; यह बात हम इन वर्षोंमें बराबर देखते आ रहे हैं। देशके नौजवान अधीर हो उठे हैं। मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि चूँकि सन १९२१ में कांग्रेसने सत्याग्रह करनेका निश्चय किया था, इसीलिए इनमें से बहुतेरे लोगोंने अपने हिंसात्मक कार्यक्रमको मुल्तवी कर दिया था। जैसे-जैसे मैं यह कहता गया हूँ कि देश सविनय अवज्ञाके लिए तैयार नहीं है, वैसे ही वैसे हिंसक विचारके नौजवान अधिक सक्रिय बनते गये हैं। फिर में यह महसूस करता हूँ कि अगर अहिंसामें [ हिंसाको दवा देनेकी ] सक्रिय शक्ति है - जिसके होनेका मुझे विश्वास है तो हिंसाके आगे भी अहिंसाको कारगर होना चाहिए। लेकिन इस सम्बन्धमें एक कठिनाई यह थी कि चूँकि कांग्रेस सारे हिन्दुस्तानकी प्रतिनिधि संस्था होनेका दावा करती है, इसलिए, हरएक हिसाकाण्डकी खासकर कांग्रेसियोंके हिंसाकाण्डकी जिम्मेदारी अपने सिर लिये बिना कांग्रेस सविनय अवज्ञा नहीं कर सकती। अब इस सविनय अवज्ञाकी जिम्मेदारी अपने सिर लेकर मैने इस मर्यादाके बन्धनको तोड़नेका तरीका खोज निकाला है। क्योंकि मैं तो किसीका प्रतिनिधि नहीं हूँ, अतएव जिन्हें में स्वयं अपने साथ आन्दोलनमें
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'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''
तरफसे क्यों न उभारा गया हो। अपनी जान देनेसे बढ़कर और कोई कुरबानी मनुष्य नहीं कर सकता, और अब इससे कम कुछ करना अहिंसामें अविश्वास प्रकट करनेके समान होगा।
[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
'''४५९. कुछ सवाल'''<math display="inline"></math>
जो सविनय अवज्ञा होने जा रही है, उसके सिलसिले में कुछ मित्रों और
आलोचकोंने कुछ समुचित प्रश्न पूछे हैं, जिनका जवाब देना आवश्यक है।
'''प्रo - निश्चय ही आप इतने अधीर तो नहीं हो गये होंगे कि सरकारको अपने इरादों और योजनाओंको सूचना दिये बिना, और उसे आपको सन्तुष्ट करने या गिरफ्तार करनेका मौका दिये बिना ही आप आन्दोलन शुरू कर दें ?
'''
जो लोग मेरे पिछले कामोंसे वाकिफ हैं, उन्हें जानना चाहिए कि चोरीसे या
अधीर होकर कोई काम करना में सत्याग्रहके विरुद्ध मानता हूँ। एक भी सच्चा
कदम आगे बढ़ानेसे पहले मैं वाइसरायको अपने इरादोंकी सूचना जरूर दूंगा। अपने विरोधी या तथाकथित दुश्मनसे सत्याग्रहीको कोई बात छिपानी नहीं होती है।
'''क्या लाहौर में आपने यह नहीं कहा था कि सविनय अवज्ञाके लिए- खासकर
बड़े पैमानेपर कर बन्दी अभियानके लिए - देश तैयार नहीं है ?
'''
मुझे यह तो आज भी विश्वास नहीं है कि देश तैयार है। लेकिन यह बात
अब मैं इतने साफ तौरसे देख पाता हूँ जितना कि पहले कभी नहीं देख पाता था कि इस अर्थमें कि अहिंसाका वातावरण नहीं है, तैयार न होनेकी बात कहने से वह स्थिति और भी बढ़ेगी; यह बात हम इन वर्षोंमें बराबर देखते आ रहे हैं। देशके नौजवान अधीर हो उठे हैं। मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि चूँकि सन १९२१ में कांग्रेसने सत्याग्रह करनेका निश्चय किया था, इसीलिए इनमें से बहुतेरे लोगोंने अपने हिंसात्मक कार्यक्रमको मुल्तवी कर दिया था। जैसे-जैसे मैं यह कहता गया हूँ कि देश सविनय अवज्ञाके लिए तैयार नहीं है, वैसे ही वैसे हिंसक विचारके नौजवान अधिक सक्रिय बनते गये हैं। फिर में यह महसूस करता हूँ कि अगर अहिंसामें [ हिंसाको दवा देनेकी ] सक्रिय शक्ति है - जिसके होनेका मुझे विश्वास है तो हिंसाके आगे भी अहिंसाको कारगर होना चाहिए। लेकिन इस सम्बन्धमें एक कठिनाई यह थी कि चूँकि कांग्रेस सारे हिन्दुस्तानकी प्रतिनिधि संस्था होनेका दावा करती है, इसलिए, हरएक हिसाकाण्डकी खासकर कांग्रेसियोंके हिंसाकाण्डकी जिम्मेदारी अपने सिर लिये बिना कांग्रेस सविनय अवज्ञा नहीं कर सकती। अब इस सविनय अवज्ञाकी जिम्मेदारी अपने सिर लेकर मैने इस मर्यादाके बन्धनको तोड़नेका तरीका खोज निकाला है। क्योंकि मैं तो किसीका प्रतिनिधि नहीं हूँ, अतएव जिन्हें में स्वयं अपने साथ आन्दोलनमें
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५४३
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<noinclude><pagequality level="1" user="Rajneeesh555" /></noinclude>टिप्पणियाँ ५०५
अथवा गलत ढंगसे लिए गये वर्तमान ऋणको अदाकर देनेपर बाध्य करता है। लाहौर प्रस्तावमें इस गलती को सुधारा गया है तथा उसमें समय आनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यका सारा हिसाब-किताब एक निष्पक्ष न्यायाधिकरणके सम्मुख पेश करनेका सम्माननीय और सामान्य ढंग अपनाया गया है। जब एक संस्था अथवा व्यापार एक प्रबन्धकके हाथसे दूसरेके हाथमें जाता है तब क्या होता है ? क्या जानेवाला प्रबन्धक आनेवाले प्रबन्धकको सब हिसाब-किताब नहीं देता ? क्या उस हिसाब किताबकी जाँच-पड़ताल नहीं की जाती ? भविष्यकी राष्ट्रीय सरकार यदि अपने ऊपर पड़नेवाले ऋणके भारकी सख्त जांच-पड़ताल करनेके अपने कर्तव्यमें असफल रहे तो वह अपने अस्तित्वके आरम्भ में ही लोगोंके विश्वासका हनन करेगी। यदि उस समय ब्रिटेन और भारत ऋण चुकाने में समर्थ हुए तो किसी भी रुपये लगानेवालेको एक भी पैनी अथवा पाईकी हानि होनेका भय नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो कुछ भी भारतके हिस्से में आयेगा उसका भुगतान उसे करना पड़ेगा। जो कुछ उचित रूपसे उसके हिस्सेमें नहीं डाला जा सकता, वह निश्चय ही ब्रिटेनको लेना पड़ेगा। वर्तमान असहाय मुक भारतको तो अपनी इच्छा विरुद्ध उस सबका भी भुगतान करना पड़ता है जिसका उचित रूपमें उसे भुगतान नहीं करना चाहिए। जब भुगतान किसे करना चाहिए यह तय करनेका दिन आयेगा तब भारतके करोड़ों लोगोंके प्रति यह कर्तव्य होगा कि हर उस मदको अस्वीकार किया जाये जो अनुचित साबित होता है। लेकिन उसका अर्थ केवल एक अनिवार्य और उचित अदला-बदली होगा। इसे रुपये लगानेवाले पावती पत्रधारी और इन्हीं जैसे लोगोंकी चिन्ताका विषय नहीं होना चाहिए।<br>
[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
'''४६१. टिप्पणियाँ'''
''''नहीं छोड़ेंगे''' '
नार्थक्लिफ हाउससे अभी हाल मुझे ये नीचे लिखे महत्वपूर्ण चुनिंदा उद्धरण
मिले हैं :<br>
...[ इंग्लिशस्तान के ] राजनीतिज्ञोंको चाहिए कि वे पूर्वी साम्राज्य
याने हिन्दुस्तानको औपनिवेशिक स्वराज्य देनेकी गोलमोल बातें करना हमेशा के
लिए छोड़ दें। जो लोग इस तरह की घातक कार्यनीति के साथ खिलवाड़ करने
पर तुले हुए हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवनसे फौरन ही दूर हटा दिया जाना
चाहिए।
ब्रिटेन के भले के लिए आयात-निर्यातपर करकी या दूसरी राजनैतिक
समस्याओं को अपेक्षा हिन्दुस्तानको अधीन बनाये रखना बहुत ही महत्व रखता
। अगर भारतको ब्रिटिश साम्राज्यका आधार स्तम्भ कहें तो अनुचित न
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<noinclude><pagequality level="3" user="Rajneeesh555" /></noinclude>टिप्पणियाँ ५०५
अथवा गलत ढंगसे लिए गये वर्तमान ऋणको अदाकर देनेपर बाध्य करता है। लाहौर प्रस्तावमें इस गलती को सुधारा गया है तथा उसमें समय आनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यका सारा हिसाब-किताब एक निष्पक्ष न्यायाधिकरणके सम्मुख पेश करनेका सम्माननीय और सामान्य ढंग अपनाया गया है। जब एक संस्था अथवा व्यापार एक प्रबन्धकके हाथसे दूसरेके हाथमें जाता है तब क्या होता है ? क्या जानेवाला प्रबन्धक आनेवाले प्रबन्धकको सब हिसाब-किताब नहीं देता ? क्या उस हिसाब किताबकी जाँच-पड़ताल नहीं की जाती ? भविष्यकी राष्ट्रीय सरकार यदि अपने ऊपर पड़नेवाले ऋणके भारकी सख्त जांच-पड़ताल करनेके अपने कर्तव्यमें असफल रहे तो वह अपने अस्तित्वके आरम्भ में ही लोगोंके विश्वासका हनन करेगी। यदि उस समय ब्रिटेन और भारत ऋण चुकाने में समर्थ हुए तो किसी भी रुपये लगानेवालेको एक भी पैनी अथवा पाईकी हानि होनेका भय नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो कुछ भी भारतके हिस्से में आयेगा उसका भुगतान उसे करना पड़ेगा। जो कुछ उचित रूपसे उसके हिस्सेमें नहीं डाला जा सकता, वह निश्चय ही ब्रिटेनको लेना पड़ेगा। वर्तमान असहाय मुक भारतको तो अपनी इच्छा विरुद्ध उस सबका भी भुगतान करना पड़ता है जिसका उचित रूपमें उसे भुगतान नहीं करना चाहिए। जब भुगतान किसे करना चाहिए यह तय करनेका दिन आयेगा तब भारतके करोड़ों लोगोंके प्रति यह कर्तव्य होगा कि हर उस मदको अस्वीकार किया जाये जो अनुचित साबित होता है। लेकिन उसका अर्थ केवल एक अनिवार्य और उचित अदला-बदली होगा। इसे रुपये लगानेवाले पावती पत्रधारी और इन्हीं जैसे लोगोंकी चिन्ताका विषय नहीं होना चाहिए।<br>
[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०
'''४६१. टिप्पणियाँ'''
''''नहीं छोड़ेंगे''' '
नार्थक्लिफ हाउससे अभी हाल मुझे ये नीचे लिखे महत्वपूर्ण चुनिंदा उद्धरण
मिले हैं :<br>
...[ इंग्लिशस्तान के ] राजनीतिज्ञोंको चाहिए कि वे पूर्वी साम्राज्य
याने हिन्दुस्तानको औपनिवेशिक स्वराज्य देनेकी गोलमोल बातें करना हमेशा के
लिए छोड़ दें। जो लोग इस तरह की घातक कार्यनीति के साथ खिलवाड़ करने
पर तुले हुए हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवनसे फौरन ही दूर हटा दिया जाना
चाहिए।
ब्रिटेन के भले के लिए आयात-निर्यातपर करकी या दूसरी राजनैतिक
समस्याओं को अपेक्षा हिन्दुस्तानको अधीन बनाये रखना बहुत ही महत्व रखता
। अगर भारतको ब्रिटिश साम्राज्यका आधार स्तम्भ कहें तो अनुचित न
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[[सदस्य:Rajneeesh555|Rajneeesh555]] ([[सदस्य वार्ता:Rajneeesh555|वार्ता]]) १०:०५, २१ अगस्त २०२६ (UTC)''Rajneeesh'''''बोल्ड टेक्स्ट'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||सांकेतिका|५५७}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|अस्पृश्यता निवारण समिति, ८१, ३३०,
३४७, ३४८, ४८९}}
{{Outdent|अहमदाबाद कपड़ा मजदूर-संघ, १ पा० टि०,
२७२-३}}
{{Outdent|अहमदाबाद कपड़ा मिल मजदूर-साम्राज्यीय
पुरस्कार, २५७, २७२-३, २८६-७}}
{{Outdent|अहमदाबाद मिल मालिक संघ, २७२
अहिंसा, ६१, २०४, ३४२, ३४४, ३५४,
३६६, ३७१, ३७३, २७४, ३८९,
४००, ४३४, ४९५, ४९६, ४९८-५००,
५०६, ५११, ५१६३; -और कायरता,
७९; -और हिंसा, ४५१; -और
हिंसाहीनता, ४५०; -का तात्पर्य शत्रुके
प्रति सौजन्य, ३५३, ३६४; -की
राजनीतिक संघर्षमें प्रभावशीलता,
३७२; -की श्रेष्ठतापर अटल विश्वास,
४०१; -को लाहौर-कांग्रेसकी स्वीकृति,
३८१-२; -के मार्ग में एक बड़ी बाधा,
४६९; -को कभी छोड़ा नहीं जा
सकता, ४४३; -मुझे सर्वाधिक प्रिय,
५०२; -सिद्धान्त केवल नीति नहीं,
४०८}}
{{c|{{larger|'''आ'''}}}}
{{Outdent|आंग्ल भारतीय, -और भारतीय ९४}}
{{Outdent|आत्म-बल ४९०, ५१०}}
{{Outdent|आत्मशुद्धि, ९१, ४०७; -भक्ति द्वारा ही
प्राप्त, १४०}}
{{Outdent|आत्मसंयम, -और विवाह, २४७; -का
पालन विद्यार्थियोंका कर्तव्य, ६९; -की
श्रेष्ठता, १२०; -भक्तिके माध्यमसे,
१४०; देखिए ब्रह्मचर्य भी}}
{{Outdent|आत्मा, २३८, २४६}}
{{Outdent|आदम, ४७९}}
{{Outdent|आदमी, -ईश्वरकी शेष सृष्टिसे भिन्न है, ४९०}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|आनन्द, स्वामी, २२२, २३३, २३७, ४४६}}
{{Outdent|आप्टे, २६३}}
{{Outdent|'''आफ्टर मदर इंडिया,''' २०}}
{{Outdent|आयंगार, ए० रंगास्वामी, ८६ पा० टि०}}
{{Outdent|आर्य प्रतिनिधि सेवा-समिति, ४४}}
{{Outdent|आलम, डा०, ३५४}}
{{Outdent|आवारी, आवागढ़के राजासाहेब, ४८८}}
{{Outdent|'''आश्रम-समाचार,''' १०९, २९२, ३१२}}
{{Outdent|आश्रम, साबरमती -में विवाह, २४७}}
{{Outdent|आसर, लक्ष्मीदास, ३०२}}
{{Outdent|आहार, अनपकेके प्रयोग, १२-१३}}
{{c|{{larger|'''इ'''}}}}
{{Outdent|'''इंडिपेंडेंट,''' २९९}}
{{Outdent|'''इंडियन ओपिनियन,''' ४०४, ४६०}}
{{Outdent|इंडियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस, २१८
पा० टि०}}
{{Outdent|'''इंडियन लेबर जर्नल,''' १२}}
{{Outdent|इंडियन सैंडहर्स्ट स्कूल, देहरादून, ७४}}
{{Outdent|इन्द्रजी, जयकृष्ण, ३१६}}
{{Outdent|इन्द्रप्रस्थ गुरुकुल, १६२}}
{{Outdent|'''इन्सीडेंट्स ऑफ़ गांधीजीत लाइफ़,''' २४४
पा० टिο}}
{{Outdent|इमर्सन, -का वचन संगतिपर, ४८५}}
{{Outdent|इविन, लॉर्ड, ३, ८६, ९३ पा० टि०, ११९,
१३१, १९१, १९८, २१५, २३५,
२५४ पा० टि०, २५९, २६०, २६१,
२६३ पा० टि०, ३०८, ३१०, ३२२,
३३३, ३४२, ३४३-४४, ३४६, ३५२,
३५७, ३६४, ३८२, ४३५, ४३८,
४४९, ४६५, ४६६, ४८६, ४९६,
५००, ५१४, ५२८ -के विचारोंकी
उलझन, ४७२-३; -पर बम फेंकनेकी
निन्दा, ३२९, ३५२, ३७२-३}}
{{Outdent|इविन, लेडी ३२९, ३५३}}
{{Outdent|इलाहाबाद विश्वविद्यालय, १८७}}
{{Outdent|'''इस्लाम, १०७, १६३'''}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९६
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{{Multicol}}
{{c|'''ई'''}}
{{outdent|ईश्वर, २०, ४४, ५२, ८२, ८९, ९०, १०६, १०७, १२४, १३८, १४०, १४५, १६७, १७८, २१९, २३०, २३७, २४८, २८२, २८९, ३००, ३०४, ३२२, ३५५, ३६२, ४२९, ४५७, ४९०-१, ४९२, ४९५, ५१२; -की कृपा के लिए प्रार्थना ही उपाय, २५; -को ही पुरस्कार या दण्डका}}
{{outdent|अधिकार, ३७७; ईसाई, ३९०, ४११, ५०२}}
{{outdent|ईसाइयत, २०८, ५०७}}
{{outdent|ईसा-मसीह, २९०; -और बालक, २१९; -और शारीरिक श्रम, ५०८}}
{{outdent|ईस्ट इंडिया कम्पनी, २०७}}
{{c|'''उ'''}}
{{outdent|उत्तमचन्द, ४०६}}
{{outdent|उदयप्रताप क्षत्रिय कालेज, ८०}}
{{outdent|'''उपनिषद्''', १९, ८३}}
{{outdent|उपले या खाद, १८१-२}}
{{outdent|उपवास, ३७१; -और अभिमान, ९९; -के बाद खुराक, २६}}
{{outdent|उपाध्याय, हरिभाऊ, १०९, १५०, ३७८, ४२८}}
{{outdent|उमर, खलीफा, १६३}}
{{outdent|उमर, हजरत, २४}}
{{outdent|उमिया, ३, ११, २४७ पा॰ टि॰, २४८, २६५, २९३}}
{{c|'''ए'''}}
{{outdent|एडी, श्रीमती शेरवुड, २४३}}
{{outdent|एन्ड्रयूज, सी० एफ०, १९७, ४२७, ४५९}}
{{outdent|एलेक्जेंडर, हौरेस जी०, १९७, ४६५, ४६६}}
{{outdent|एल्विन, वैरियर, १३० पा० टि०}}
{{outdent|एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स, ५२०}}
{{outdent|ऐंग्लो वैदिक कालेज, देहरादून, ७४, ७५}}
{{Multicol-break}}
{{c|'''औ'''}}
{{outdent|औपनिवेशिक स्वराज्य, ६०, ६१, ६८, ८७, ११३, ११९, १६०, १६९ पा० टि०, १७१, २२०, २१५, २३३, ३२९, ३३४, ३४४, ३८२, ३८५, ३८६, ३९९, ४००, ४३३, ४३५, ४३८-९, ४४८, ४५१, ४६५-६; -का अर्थ, २५९}}
{{c|'''क'''}}
{{outdent|कंटक, प्रेमाबहन, १४७, ३०७}}
{{outdent|कच्चे खाद्य पदार्थ, १३}}
{{outdent|कटि-स्नान, ५९}}
{{outdent|कताई, ७८ पा० टि०, ११, १८०, १८८, १९८, २०६, २०९, २२९, २४५, २९७, ४११, ४३२, ४४१; -का ब्रिटिश हुकूमतमें नाश, ३९६; -त्यागकी भावनासे, १७७; -यज्ञ, ५६; -रद्दी मालसे धन कमाना, ३०२-३; -सूत्र-यज्ञ, २५६}}
{{outdent|'''कथाकुसुमांजलि''' ४४७}}
{{outdent|कन्नूमल, ३५}}
{{outdent|कन्या गुरुकुल, २१, ७४-६}}
{{outdent|कबीर, -और श्रमधर्म, ५०८}}
{{outdent|कमला, १७६, ३७९, ४४५}}
{{outdent|कराची कांग्रेस, के कार्यकर्त्ताओंको सलाह, ४१४-५}}
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{{outdent|कलकत्ता-कांग्रेस, ३४८, ३८२}}
{{outdent|'''कलकत्ता म्युनिसिपल ग़जट''', २३३}}
{{outdent|कसुम्बा, देखिए गांधी, कसुम्बा}}
{{outdent|कांगड़ी, गुरुकुल, ४४, ७४, ७६, ८३}}
{{outdent|कांग्रेसी, १९२, २१२, ३०४, ३२१, ३४०, ३५६, ३८२, ३८७, ३८८, ४१२,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९७
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{{outdent|{{gap}}४३५, ४३६, ४५१, ४६६, ४७०, ५००, ५१७, ५२२; -और खादी मताधिकार, ५२६-७; -लोगोंको झूठी आशाएँ न बँधायें, ५२४}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लिए तो यह धर्म-युद्ध है और ठीक इस आखिरी फैसलेके मौकेपर इस पुस्तकका प्रकाशित होना मेरे लिए शुभ शकुन है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''८२. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}}
{{right|१६ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय भर् र् र्<ref>गांधीजी और तैपनी एक-दूसरेका अभिवादन इसी तरह करते थे।</ref>}}
कितनी खुशी हुई आपका पत्र पाकर! कहने की जरूरत नहीं कि आपको आराम तो करना ही है। सरदारने मुझे आपके जीवनकी खूब सारी झलकियाँ सुनाई और अब ताजा झलकियां सुनानेको महादेव आ पहुँचा है। यह जानकर खुशी हुई कि इस बार आप कोई बीमारी साथ लेकर नहीं लौटे हैं। आपकी घनी, सफेद दाढ़ीके बावजूद मेरे मनको तो आपको बूढ़ा मानना गवारा नहीं होता। महादेव कहता है
कि आपमें तो अभी नाचने तकका उत्साह है। मन होता है कि कुछ दिनोंके लिए फुरसत निकालकर आपको नाचते-गाते देखनेके लिए वहाँ आ जाऊँ। मगर ऐसा हो कहाँ सकता है। इसलिए यहीं बैठ-बैठे मनकी आंखोंसे ही आपकी तरह-तरहकी भाव-भंगिमाएँ देख रहा हूँ। आपको तो कविवरके साथ रख देना चाहिए ! ! !
हम सबका स्नेहबन्दन स्वीकार करें।
{{right|सदा आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९५६९) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''८३. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|१६ मार्च, १९३०}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारा पत्र मिला। आनेकी इच्छाको रोकना। लेकिन यदि ऐसा न कर सको तो आ जाने में कोई हर्ज नहीं। शरीरको सँभालते हुए काम करनेकी शर्त याद रखना। ऐसा अवसर फिर नहीं आयेगा; इसलिए शरीरको बिगड़ने न देना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२८२ ) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''८४. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|दांडी कूचके दौरान<br>रविवार [१६ मार्च, १९३०]<ref>पुरषोत्तमके स्वास्थ्य तथा 'गीता' पाठ और भजन आदि गानेकी व्यवस्थाके बारेमें पूछताछ करनेके उल्लेख लगता है कि प पत्र दांडी-कूचके दौरान पड़नेवाले तीन रविवारों से पहले रविवारको लिखा गया होगा।</ref>}}
{{left|चि॰ नारणदास,}}
तुम्हारे पत्र आते रहते हैं। बैंकके नाम मैने एक पत्र भेजा है। यदि इससे तुम्हारा काम न चले तो लिखना।
तीन मद्रासियों और दो बंगालियोंको मैंने वापस जानेके लिए कहा तो है। उन्हें पश्चात्ताप भी हुआ है। यदि वहाँ भी तुम्हें उनमें पश्चात्तापकी भावना दिखाई दे और वे वापस आश्रममें आना चाहें तो रख लेना। यदि वे सचमुच में काम करने-वाले हों तो उन्हें रख लेनेमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन मैं तुम्हारी प्रबन्ध-व्यवस्थामें हस्तक्षेप नहीं करूँगा। इसीलिए मैंने उन्हें कोई पत्र देनेसे इनकार कर दिया।
पुरुषोत्तम कैसा रहता है? क्या केशु भी 'गीता' पाठका नेतृत्व नहीं कर सकता? वह भजन भी गाता है। अन्यथा प्रेमावहन तो है ही।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
इसके साथ जमनाका लिखा हुआ पत्र है जो भूलसे आ गया जान पड़ता है।
{{right|'''बापू'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ७८०९२) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''८५. भाषण : बोरीयावीमें'''}}}}
{{right|१६ मार्च, १९३०}}
इस शान्तिपूर्ण लड़ाई में जोर-जबरदस्तीकी कोई गुंजाइश नहीं है। अंग्रेजों या अपने भाइयोंसे हम जोर-जबरदस्ती नहीं करेंगे। मैं यह नहीं चाहता कि जोर-जबरदस्तीसे इस्तीफे दिलवाये जायें। जोर-जबरदस्ती या शर्मकी वजहसे दिये गये इस्तीफे वापस ले लिये जाने चाहिए। आपके सरदारको उन्होंने जेलमें डाल दिया, इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने आपसे पूर्ण स्वराज्य छीन लिया। आपको उन्हें छुड़ाना चाहिए।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
यदि आप उन्हें तीन महीनेकी बजाय एक महीनेमें ही छुड़ा लेंगे तो यह माना जायेगा कि आपकी शक्तिका ठीक उपयोग हुआ। वल्लभभाईके छूट जानेके बाद भी आप माफी मांगकर अपने इस्तीफे वापस नहीं लेंगे। ये इस्तीफे तो तभी वापस लिये जा सकते हैं जब कि इस सरकारका शासन-तन्त्र आपके हाथमें आ जाये और आप मुखिया बन जायें।
यदि आप शराब और चाय पीते रहें और यह मानते रहें कि गांधी सेना लेकर गये हैं और वे हमें स्वराज्य लाकर दे देंगे तो आप भूल करेंगे। गांधी तो चला ही जायेगा और उसके साथी समुद्रमें डूब मरेंगे; किन्तु स्वराज्य तभी मिलेगा जब आप सब मिलकर काम करेंगे। आप यदि सैनिक नहीं बन सकते तो कमसे कम खादी तो पहनें ही।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' २३-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''८६. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{right|१७ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° मीरा,}}
तुम्हारा पत्र मिला और वे फूल भी, जो मुझे ढूंढ निकालनेकी कोशिश कर रहे थे। अबतक तो मेरी थकान स्वास्थ्यप्रद ही दिखाई दे रही है। इससे मैं एक बारके बजाय दो बार दूध और खूब फल ले सकता हूँ। पिछले पांच दिनकी थकान के कारण आज में दिनमें पांच बार सोया। मुझे आशा है कि मैं अगले सप्ताहके कूचके लिए या मेरे भाग्यमें जो भी हो उसके लिए पूरी तरह दुरुस्त रहूंगा। इसलिए तुम मेरी चिन्ता न करना।
मैं देख रहा हूँ कि अब तुम्हें वहाँ अपनी क्षमताका भान हो रहा है। यह संग्राम हम सबके लिए सचमुच ईश्वरकी देन साबित हुआ है। यह शुद्धिकी क्रिया है और ऐसा ही होना भी चाहिए। हममें ढिलाई हरगिज न आये।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी° डब्ल्यू° ५४२७) से; सौजन्य : मीराबहन जी° एन° ९६६१से भी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''८७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|आनन्द<br>१७ मार्च, १९३०}}
{{left|भाई सतीशबाबु,}}
मैंने अखबार में देखा है कि तुमको बंगालने डिक्टेटर बनाये है। क्या यह सच्च है? यदि सच्च है तो देखो दोनों दलने बनाये हैं कि केवल एक ही दलने? कैसे भी हो मैं जानता हूं कि तुमारा प्रेम सब ठीक कर देगा। कल हि एक भजन सभा में पंडितजीने<ref>नारायण मोरेश्वर खरे।</ref> गाया था जिसका अनुवाद यह है 'प्रेमपंथ पावककी ज्वाला'। जब शुद्ध प्रेम पैदा होता है तब सब मलीनताका नाश करता है। तुमारा कार्य सबसे कठिन है ऐसा मैं जानता हूं। तुमारी आठ वर्षकी तपश्चर्या तुमको ज्ञान और बल देगी। तुमको और हेमप्रभादेवीको ईश्वर चिरायु करे।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी° एन° १६१६ की फोटो-नकलसे।
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''८८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}}
{{right|आनन्द<br>मौनवार [१७ मार्च, १९३०]<ref>विषयवस्तुके आधारपर यह पत्र १९३० में लिखा गया जान पड़ता है। १९३० में इस तारीख को गांधीजी आनन्दमें थे।</ref>}}
{{left|अरी ओ पारसन!}}
तेरी चालाकीकी कोई हद नहीं। लगता है कि तू पहलेसे ही भूमिका बाँध रही है। यदि माँ-बाप बच्चोंकी तारीफ करते हैं तो उन्हें उनके दोष बतानेका हक भी तो होता है न? और फिर तू यह क्यों माने बैठी है कि मैंने तुझे नीचे लानेके लिए ही ऊपर चढ़ाया है? और विवाह के दिन तुझे १२ वाँ अध्याय जो पढ़ाया था सो किसलिए? मैंने तुझमें जिन गुणोंका होना माना है, अगर तू ऐसा मानती है कि वे तुझमें नहीं हैं तो उन्हें प्राप्त करनेके लिए ईश्वरकी आराधना करना। लेकिन तेरे चाचा जो तुझे 'धैर्य माता' कहते हैं, उसका क्या होगा?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° ४७६६) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''८९. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}}
{{right|आनन्द<br>मौनवार [१७ मार्च, १९३०]<ref>पत्र कुसुमवहनके आश्रमके छात्रावास में चले जानेका जो कि है उससे मालूम होता है कि यह पत्र १९३० में लिखा गया था।</ref>}}
{{left|चि° कुसुम,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मकानके बारेमें तुमने जो लिखा है वह सच है लेकिन [तुम्हारा] धर्म तो छात्रावासमें ही जानेका था। इसलिए तुम वहाँ गई सो ठीक ही हुआ। जो श्रेय है, हमें उसे प्रेय बनाना चाहिए अर्थात् हमारे लिए जो चीज श्रेयस्कर है हमें उसे ग्रहण करना चाहिए। अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखते हुए जितना काम करना जरूरी हो उतना करना। मुझे लिखती ही रहना।
तुम्हारा मन्त्रिपद तो बना ही है। समय मिलनेपर सब कुछ साफ कर डालना। मेरी चिन्ता न करना। तुम्हें मैंने दुःख तो अवश्य दिया है लेकिन इस बातका मुझे कोई गम नहीं है। मैं दुःख न दूंगा तो और कौन देगा?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° १७९४ ) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''९०. पत्र प्रभावतीको'''}}}}
{{right|मौनवार [१७ मार्च, १९३०]}}
{{left|चि° प्रभावती,}}
तेरा पत्र अभीतक नहीं आया। ऐसी आशंका थी कि मैं १२ तारीखतक गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा। अब तो छः दिन बीत गये और आज सोमवार है, इसलिए मैं यह पत्र लिख रहा हूँ। बहुत अधिक चलनेके बावजूद मेरी तबीयत अभी तक अच्छी हो रही है। [दांडी-कूचके बारेमें] पूरा वर्णन तो तू अखबारोंमें पढ़ ही लेती होगी इसलिए इस सम्बन्धमें कुछ नहीं लिखता लिखनेका समय भी नहीं है। साथका पत्र जयप्रकाशको देना चाहे तो देना और यदि वे अनुमति दें तो पिताजी से कहकर आश्रम जाना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
अभी-अभी महादेव आकर मुझे तेरा पत्र पढ़कर सुना गये। पत्र सुनकर मुझे खुशी हुई। यदि आ सके तो आ जाना।
गुजराती (जी° एन° ३३६१) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''९१. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|मौनवार [१७ मार्च, १९३०]<ref>१७ मर्च, १९३०को गांधीजी आनन्दमें थे जहाँ उन्होंने सुमंगलप्रकाशको छोड़ दिया था।</ref>}}
{{Left|चि° नारणदास,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
लोग अब भी आते रहते हैं, यह समस्या बड़ी कठिन है। जो लोग काम करें उन्हें रखना। जो काम नहीं करते, उन्हें एकदम चले जाना चाहिए।
तुम संयुक्त भोजनालय में भोजन करने जाते हो, यह बात मुझे अच्छी तो लगती है लेकिन तुम्हारा शरीर जो माँगे, उसे वही देकर अपना शरीर सँभालना। मुझे तुम 'गीता' के अनुयायी जान पड़े हो इसलिए मेरा विश्वास है कि तुम्हारे कुशल-क्षेमका भार ईश्वर अपने ऊपर ले लेंगे।
केवलरामकी बहू आना चाहे तो आ सकती है। बीमारी यहाँ भी हमारे पीछे पड़ी है। तीन व्यक्ति बीमार हैं। सुमंगलप्रकाशको शीतला निकली है। उसे यहीं छोड़कर जानेवाला हूँ।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
क्या पुरुषोत्तम चला गया? उसके जानेपर प्रार्थना कौन चला रहा है? तुम्हें तो आती ही है न? केशु भी उस्ताद है, यह न भूलना। प्रभुदासके ऊपर कोई बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
गुजराती (सी° डब्ल्यू° ८०९४ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude>{{dhr|12em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''९२. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|मौनवार [१७ मार्च, १९३०]<ref>साधन-सूत्रपर २० मार्च, १९३०की तारीख दी हुई है जो गंगाबहन वैद्यकी लिखावटमें है। यह सम्भवतः पत्र प्राप्तिकी तारीख होगी। २० मार्चसे पहलेवाला सोमवार १७ मार्चको पड़ा था।</ref>}}
{{left|चि° गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारे हाथों तो हमेशा अच्छा कार्य ही होगा, हमेशा सेवा ही होगी। लक्ष्मीबहन आकर मुझे कुछ बता गई हैं। ज्यादा पूछनेका तो मुझे समय ही कहाँ मिलता है? अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी° डब्ल्यू° ८७४३) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''९३. पत्र : जयप्रकाश नारायणको'''}}}}
{{right|आनन्द<br>१७ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° जयप्रकाश,}}
जो उत्साह बलीदान देनेका मैंने आश्रमकी बहनोंमें देखा ऐसा कहीं नहिं देखा है। आजकल आश्रमकी अंतर व्यवस्था बहोत कर केवल स्त्री लोग ही कर रही है। जिस प्रकारसे अनुभव ले रही है ऐसा दुबारा कभी मीलनेका नहि है। इसलीये मेरी सलाह है कि प्रभावतीको आश्रममें भेजो। मेरे जेल जानेके बाद आश्रमकी स्त्रीयाँ जेल जायगी। इसमें प्रभावती होनी चाहीये ऐसा मेरा अभिप्राय है। प्रभावती सब प्रकार योग्य है। तुमारा काम अच्छा चलता होगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
जी° एन° ३३६२ की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|6em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''९४. भाषण : आनन्दमें'''}}}}
{{right|१७ मार्च, १९३०}}
आपने अभी-अभी पण्डितजी के भजनमें सुना कि प्रेमका मार्ग एक पवित्र ज्वाला है। यह वैर-भावका पंथ नहीं। सत्याग्रहीका मार्ग प्रेमका मार्ग है। सत्याग्रहीमें कठोरसे-कठोर हृदयवाले शत्रुको भी प्रेमभावसे जीत लेनेकी महत्त्वाकांक्षा होनी चाहिए।
कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेमें प्रेमभाव ही निहित है, इस बातकी प्रतीति लोगोंको कैसे कराई जा सकती है? प्रीतमको स्वयं इसका अनुभव हुआ होगा। इसीसे यह भजन उसके हृदयसे फूट निकला और उसने गाया।
वैरभावकी उपमा उस अग्निसे दी जा सकती है जो सब कुछ जलाकर राख कर देती है। प्रेम ऐसा कैसे हो सकता है? वैरभाव दूसरोंको जलाता है, प्रेम स्वयंको जलाता है और दूसरोंको शुद्ध करता है। जब प्रेम ऐसा उग्र स्वरूप धारण करता है तब किसीको वह भले ही भयानक ज्वाला-जैसा प्रतीत हो, लेकिन इतना निश्चित जानिए कि बादमें उसकी शीतलताकी अनुभूति हुए बिना नहीं रहती। इस समय जो यह काफिला निकल पड़ा है सो कोई नाटक नहीं कर रहा है, यह कोई थोड़े दिनोंका खेल नहीं है। यदि मरना आवश्यक हुआ तो यह मरकर भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा। अन्ततः सरकारको स्वीकार करना पड़ेगा कि ये सत्याग्रही सत्य और अहिंसाके पुजारी थे और यदि [सत्य और अहिंसाका पालन करते हुए] सत्याग्रहियोंके प्राण निकल जायें तब तो कहना ही क्या? यदि ऐसा हो तब तो उनके दावेपर मुहर
लग जायेगी। हममें सत्याग्रहीके समान मरनेकी शक्ति है या नहीं, यह बात आज हममें से कोई भी निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता। क्रोधके आवेशमें दूसरेके पेटमें कटार भोंकना अथवा मनमें क्रोध रखते हुए लाजके मारे ऊपरसे अहिंसक बने रहकर मरनेकी बातको सत्याग्रहीकी मृत्यु नहीं कहा जा सकता।
इतना ही नहीं मरते समय मनके भीतर क्रोध नहीं रहना चाहिए, बल्कि मनमें ऐसा भाव होना चाहिए, ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए, ईश्वर! तू इस मारनेवालेका भला करना।' जब कोई इस तरहसे मृत्युका आलिंगन करता है तब वह सत्याग्रहीकी मौत मरता है और इस तरह मरनेवाला व्यक्ति अपनी प्रतिज्ञाका पालन करता है। मैं खुद अपने बारेमें भी आज कोई आश्वासन नहीं दे सकता। इसकी परीक्षा तो मृत्युके
बाद अन्य लोग ही कर सकते हैं।
यहाँ, आनन्दमें, नरसिंहभाईकी कुटिया है। आनन्द पाटीदारोंकी शिक्षाका केन्द्र है। खेड़ा जिला अर्थात् पाटीदारोंका, वल्लभभाईका, मोतीभाई अमीनका तथा चरोतर शिक्षा-मण्डलके स्वयंसेवकोंका स्थान। यदि इनके आगे मैं अपने हृदयके उद्गारोंको न रखूं तो और किसके सामने रखूं। मैं आपके पास बहुत बड़ी आशाएँ लेकर आया हूँ।
मैंने अनेक स्थानोंपर कहा है कि मैं इस बार पैसेकी भिक्षा माँगनेके लिए नहीं निकला हूँ। पैसेकी भिक्षा माँगना तो मुझे खूब आता है। यह आन्दोलन पैसेका<noinclude>{{left|४३–७|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आन्दोलन नहीं है। इस आन्दोलनको पैसेके बिना चलाया जायेगा। आज सवेरे मेरे देखते-देखते बम्बईके सूतके व्यापारी २,५०१ रुपये दे गये। डायमंड एसोसिएशनने २,००० रुपये भिजवाये हैं और पैसेकी मैं यदि तनिक भी माँग करूँ तो गुजरात और हिन्दुस्तान पैसेकी बौछार कर दे, मैं इस पैसेके भार तले दबकर मर जाऊँ और फिर जलालपुर भी न पहुँच सकूँ।
मैं तो आपसे बहुत बड़ी भीख माँगने आया हूँ। आप तो ठहरे पाटीदारोंकी, चरोतरकी नाक। आप पाटीदारोंके समुद्रमें नमकके समान हैं। यदि नमक अपना स्वभाव छोड़ बैठे तो फिर उसका खारा स्वाद उसमें कैसे पैदा किया जा सकता है? नमकमें चीनी अथवा गुड़की अपेक्षा अधिक स्वाद है। गुड़ तो कभी-कभी पीलिया तकका कारण बन जाता है। लेकिन भोजनमें थोड़ा नमक डालिए, फिर देखिए भोजन कितना सुस्वादु हो जाता है। यदि आनन्द अपना गुण छोड़ दे, पाटीदारोंमें वीरता आदिके जिन गुणोंका आरोपण किया गया है यदि उन सबका आनन्दमें इस समय दर्शन न हो तो फिर वह और कहाँ हो सकता है?
मेरी इस भूमिकाका कारण आप समझ गये होंगे। आनन्दके, खेड़ा जिलेके विद्यार्थी आज अपनी पुस्तकोंको बगलमें दबाये बैठे रहेंगे अथवा विद्यापीठने जो मार्ग ग्रहण किया है उसका अनुसरण करेंगे? डॉ° मेहताने विद्यापीठ पर जो ढाई लाख रुपये खर्च किये हैं और अन्य शुभचिन्तकोंने भी इस पर जो रुपये लगाये हैं वे सब आज ब्याज समेत वसूल हो गये हैं। विद्यापीठने आज किताबी ज्ञानको ताकपर रखकर 'सा विद्या या विमुक्तये' अपने इस सिद्धान्तको सिद्ध करके दिखा दिया है।
जहाँ सोलहवें वर्षमें पदार्पण करनेवाले समस्त विद्यार्थियोंने सर्वसम्मति से अक्षर-ज्ञानको पूर्णतः त्याग दिया है और उनके कार्यमें शिक्षक भी शामिल हो गये हैं, जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करते हैं, वहाँ इससे अधिक और किस बातकी अपेक्षा की जा सकती है? क्या आप लोग भी इस मार्गको ग्रहण नहीं करेंगे?
मुझे उम्मीद है कि गुजरात हिन्दुस्तानके सामने पदार्थपाठ रखेगा। यह लड़ाई लम्बी चलेगी अथवा जल्दी ही समाप्त हो जायेगी, इस बारेमें निश्चित रूपसे अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि इस लड़ाईमें हम अपने सर्वस्वकी आहुति दे देंगे तो फिर यह लड़ाई लम्बी चले अथवा बहुत थोड़ी देर चले, इसकी हमें चिन्ता न होगी।
खेड़ा जिलेके पाटीदारोंसे ऐसी आशा रखनेका मुझे अधिकार है। मैं जब दक्षिण आफ्रिकामें था तभीसे वे मुझे आशा बँधाते आये हैं। खेड़ा जिलेकी आबादी सात लाख है, उसमें ठाकुर भाई भी हैं। यदि पाटीदार पहल करें तो ये गरासिया लोग अवश्य ही उनका अनुकरण करेंगे। तुलसीदासने कहा है कि "पारस परसि कुधातु सुहाई।"
विद्यार्थियो! जबतक यह आन्दोलन जारी है, तबतक आप लोग अपने विद्याभ्यासको एक ओर रख दें। इस समय मुझे स्वर्गीय देशबन्धुके शब्द याद हो आते हैं। पाठशालाओंमें असहयोगकी बात उन्हें अखरती थी। वे कहा करते थे कि जब अन्तिम लड़ाईका समय आयेगा तब हम उन्हें पुकारेंगे, अभी रहने दो। लेकिन मैं न<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : आनन्दमें|९९}}</noinclude>माना और वे भी विद्यालयोंके बहिष्कारमें जुट गये। लेकिन उन्होंने ये शब्द १९२० में कहे थे। तबसे अबतक पाँच नहीं दस वर्ष बीत गये हैं। आज अन्तिम युद्धका वह समय आ पहुँचा है। इसलिए अब तो विद्यार्थियोंके स्कूलोंमें बने रहनेका कोई कारण ही नहीं है।
आज मैं युद्धके लिए एक विशेष क्षेत्र तैयार करनेकी बात नहीं कहता। आज तो कन्याकुमारीसे कश्मीर और कराचीसे डिब्रूगढ़ तक व्यक्तिगत अथवा व्यापक रूपसे सब लोग सविनय अवज्ञा कर सकेंगे।
सविनय अवज्ञा करनेके लिए मुझे सात दिसम्बर तक वातावरण अनुकूल नहीं जान पड़ा और जैसा मुझे सूझा वैसा मैंने कहा। अब कहता हूँ कि आज ही सबसे उपयुक्त वातावरण है। वह शुभ घड़ी आज ही है। इस घड़ी यदि हममें सविनय अवज्ञाकी शक्ति नहीं आई तो फिर किसी दिन नहीं आयेगी।
ऐसे समय ऐसा कौन-सा विद्यार्थी है जो पढ़ता रहेगा? पहले मैं कहा करता था कि सरकारी स्कूलोंको छोड़ो और राष्ट्रीय स्कूलोंका निर्माण करो। आज कहता हूँ कि पढ़ाई छोड़ो और मैदानमें आओ। देशकी खातिर फकीरी लो, अपना सर्वस्व समर्पित कर दो। आज यदि व्यापारी बैठा-बैठा व्यापार करता रहेगा तो यह उसके लिए कोई शोभाकी बात न होगी। हिन्दुस्तान यदि व्यापक सत्याग्रह करना चाहता है तो उसके लिए यही उचित अवसर है।
खाने-पीनेकी व्यवस्था तो भगवान् करेगा—असंख्य जनता करेगी। यदि यह ज्वाला समस्त हिन्दुस्तान में धधक उठे और सारा हिन्दुस्तान सविनय अवज्ञामें शामिल हो जाये तो ३० करोड़ व्यक्तियोंको एक लाख अंग्रेजोंके पंजेसे निकलनेमें कितना समय लगेगा? इस प्रश्नका हिसाब स्कूलोंके विद्यार्थी करेंगे।
सेनामें ७० हजार गोरे हैं और अन्य सिख, पठान, गुरखा, मराठा हैं। हमारे दोनों कन्धों पर यह सेना चढ़ बैठी है; फिर भले ही यह सेना यहाँ हो या मेरठ आदिमें तैनात हो। हम जो इन कानूनोंके तले पिसे जा रहे हैं उनके पीछे हमें सेनाके अतिरिक्त और कुछ नज़र नहीं आता। सेनाके बलपर अंग्रेज नट हमें नचा रहे हैं।
याद रखिए, मैं यह नहीं कहता कि आप लोग हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ दें। मेरा तो यह कहना है कि आप फिलहाल संघर्षके दौरान अक्षरज्ञान-सम्बन्धी विद्याभ्यासको समेट लें। इस संझर्षको लम्बा खींचने अथवा न खींचनेका आधार आप लोगोंपर है। युवक संघ अर्थात् विद्यार्थीगण घोषणाएँ तो बड़ी-बड़ी करते हैं। इस वर्ष एक घुड़सवार नवयुवक कांग्रेसका अध्यक्ष है। इसीसे इस संघर्षका अधिक भार आप विद्यार्थियों पर है।
भगवान् आपको आन्तरिक बल दे। यह बुद्धिका प्रयोग नहीं है। यदि कोई बात किसीको बुद्धिसे समझानी हो तब तो भूमितिके पदोंके समान एकके-बाद-एक पदका उदाहरण देते हुए अन्तमें कहा जा सकता है "इति सिद्धम्"। लेकिन यदि आन्तरिक बल–हृदलबल–न हो तो बुद्धि लाचार हो जाती है। बुद्धि तो हृदयकी दासी है।
फिर भी यदि आपको ऐसा लगता हो कि इस व्यक्तिने बेकार ही उपद्रव खड़ा कर दिया है और एक महीने बाद यह इसे छोड़ देगा तथा अपने इस कार्यको<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हिमालय जैसी एक भूल कहकर साबरमतीके किनारे मुँह नीचा करके बैठ जायेगा तो मैं लाचार हूँ; इस विषयमें मैं कुछ नहीं कर सकता। लेकिन यदि आप ऐसा नहीं मानते तो इतना निश्चित जानिए कि यह आपके और मेरे लिए अन्तिम फैसला है और हमारा मार्ग शान्तिपूर्ण ढंगसे कानून आदिकी अवज्ञा करनेका ही है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २३-३-१९३०|1em}}
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''९५. स्वयंसेवकोंसे बातचीत'''<ref>महादेव देसाई द्वारा प्रस्तुत विवरणका अंश।</ref>}}}}
{{right|१७ मार्च, १९३०}}
हम तीर्थयात्रा पर हैं। हमें अपने समयके प्रत्येक क्षणका हिसाब दे सकना चाहिए। जो लोग अपना काम पूरा नहीं कर पाते, अथवा जिनके पास कताईके लिए समय नहीं बचता या जो डायरी नहीं लिख पाते वे मुझसे मिलें। इस बारेमें उनसे मैं विचार-विमर्श करूँगा। लगता है उनके समय पत्रकमें कहीं कोई गड़बड़ी है; मैं इस गड़बड़ीको दूर करनेमें उनकी सहायता करना चाहूँगा। कूचको जारी रखते हुए भी हम अपने दैनिक कार्य पूरे करते रहें, इतनी सूझ-बूझ तो हममें होनी ही चाहिए। मैं यह कहनेकी धृष्टता करता हूँ कि हममें लगातार इस श्रमसाध्य यात्रामें जुटे रहनेकी शक्ति नहीं है, और इसीलिए मैंने सप्ताह में एक दिन आरामके लिए अलग कर दिया है। लेकिन आश्रमके सामान्य नियमोंमें छूट देनेकी कोई बात मैं नहीं सुनना चाहता। मैं यह बात पुनः दोहराता हूँ कि हम तीर्थयात्रा पर हैं और आत्म-निरीक्षण तथा आत्मशुद्धि इसकी अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं। इस मामलेमें डायरी-लेखन बहुत उपयोगी है। नियमपूर्वक सूत कातना, कितने गज काता, इसका हिसाब करना और रोज डायरी लिखना, इन तमाम नियमोंके निर्वाहका विचार मेरे मनमें यरवडा जेलमें आया; और चूंकि स्वराज्यकी इमारतकी नींव रखनेकी आकांक्षावाले हम लोगोंका बलिदान स्वराज्यकी बलिवेदी पर अर्पित पहला बलिदान होगा, इसलिए उसे यथासम्भव शुद्ध होना चाहिए। हमारे पीछे आनेवाले उस कठोर संयमको छोड़ सकते हैं जिसका पालन हम करते आये हैं लेकिन हम इससे नहीं बच सकते। इस प्रकारके कठोर आत्म-संयमको अपनाकर ही हम वह शक्ति प्राप्त कर सकेंगे जिसके द्वारा अपनी अबतक की उपलब्धियोंको कायम रख सकते हैं। सक्रिय अहिंसाका यह स्वाभाविक परिणाम है, और स्वराज्य-प्राप्तिके बाद यह गुण सदा हमारी सहायता करेगा। इसकी सम्भावनाएँ बहुत कम हैं कि जेलमें हमें एक साथ रखा जाये। इसलिए यदि हमारा जीवन अभीसे नियमित रहता है तो आगे चलकर अपने दैनिक कार्य नियमपूर्वक करते रहने में हमें कोई कठिनाई नहीं होगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''९६. भाषण: सत्याग्रहियोंके समक्ष'''<ref>"धर्म यात्रा" से उद्धृत।</ref>}}}}
{{Right|[१७ मार्च, १९३० पश्चात्]<ref>आनन्दमें एक सत्याग्रहको चेक निकल आई थी इसीलिए उसे वहीं छोड़कर सत्याग्रहियोंको आगे बढ़ना पड़ा था। यह भाव इस प्रसंगके बाद दिया गया था। गांधीजी २६ और १७ मार्चको आनन्दमें थे।</ref>}}
आप जो बात कहते हैं वह कदाचित ठीक हो।<ref>सत्याग्रहियोंमें कुछ लोग बीमार पड़ गये थे, जिसपर कुछ लोगोंने यह कहा था कि इसका कारण एक हद तक नियमोंकी कठोरता है।</ref> यदि आप इन नियमोंको भार मानते हैं तब तो वे सचमुच भारस्वरूप ही हैं। लेकिन इस सम्बन्धमें तो रवाना होनेसे पहले ही यह बात निश्चित हो गई थी कि जो लोग इस भारको वहन कर सकते हैं केवल वे ही कूचमें आयें, अन्य लोग नहीं। इसलिए इन नियमोंको तनिक भी शिथिल नहीं किया जा सकता। इन नियमोंका सम्पूर्णतया पालन करनेसे ही व्यापक शक्ति उत्पन्न होगी। बाह्य और स्थूल कारणोंसे जो प्रभाव होता है उसकी अपेक्षा अदृश्य, आध्यात्मिक नियमोंका प्रभाव अधिक तीव्र होता है। कूत्रके पीछे यही कल्पना निहित है। इस युद्धमें व्यापक हिंसाको अहिंसा द्वारा नष्ट करनेका हमारा प्रयत्न है और इसीलिए हमें जिस तक वृढ़ता और उग्रताकी आवश्यकता है उस हदतक नम्रताकी भी है। जबतक हममें अभिमान है, जबतक हम अपने बलके भरोसे आगे बढ़ने की कोशिश करते रहेंगे तबतक हम असफल ही रहेंगे। 'जब लग गज बल अपनो वरत्यो नेक सरचो नहि काम', यह एक बहुत बड़ी सैद्धान्तिक बात है।
क्या हम यह नहीं देखते कि हममें जो लोग दुर्बल प्रतीत होते थे, वे आज शरीरसे समर्थ हैं और मजबूत दिखाई देनेवाले लोग बीमार हो गये हैं। जब मनुष्य अहंभावको छोड़ रजवत् होकर नियम पालनमें लीन हो जाता है तब उसमें अहिंसाकी शक्ति जाग्रत होती है और ईश्वरीय बल उसका बल होता है। इसलिए हम सबको सम्पूर्ण रूपसे कर्तव्यपरायण बनना होगा, और नम्र भी बनना होगा। हम ईश्वरके आगे प्रार्थना करें कि 'सब-कुछ तू ही करता है, और इस तरह जो अस्सी व्यक्ति निकल पड़े हैं वे यदि शून्यवत् हो जायें तो हमारा काम अवश्य सिद्ध हो जायेगा।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १३-४-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|6em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''९७. महान् तत्त्वदर्शी'''}}}}
{{right|नापा<br>१८ मार्च, १९३०}}
कवि राजचन्द्रका जन्म काठियावाड़के वावनिया नामक स्थानमें हुआ था। उनसे मेरा पहला सम्पर्क जिस दिन मैं १८९१ में लन्दनसे लौटकर आया तब बम्बई में डॉ० प्राणजीवन मेहताके घर हुआ था। कवि–उन्हें मैं कवि ही कहा करता था–डॉ० मेहताके निकट सम्बन्धी थे। मुझे उनका परिचय शतावधानी–अर्थात् ऐसा
व्यक्ति जो एक ही साथ सौ चीजोंको याद रख सकता है–कहकर दिया गया। कवि तब बिलकुल युवा थे। उनकी उम्र मेरी उम्र–अर्थात् २१ वर्ष–से ज्यादा नहीं थी। फिर भी, उन्होंने अपनी शक्तियोंका सार्वजनिक प्रदर्शन बिलकुल बन्द कर दिया था और अब वे विशुद्ध धर्म-साधनामें लगे हुए थे। उनकी सादगी और स्वतन्त्र निर्णय-बुद्धिसे मैं बहुत प्रभावित हुआ। अन्ध रूढ़िवादिता तो उन्हें छू भी नहीं गई थी। मगर उनकी जिस खूबीने मुझे शायद ज्यादा प्रभावित किया वह यह थी कि अपने व्यावहारिक जीवनमें धर्मका पालन करनेके साथ-साथ वे अपना व्यवसाय भी अच्छी तरह चलाते थे। धर्मतत्त्वके अध्येताके रूपमें उन्होंने अपनी मान्यताओंके अनुसार आचरण करनेका भी प्रयत्न किया। खुद जैन थे, लेकिन अन्य धर्मोके प्रति बड़ा उदार दृष्टिकोण रखते थे। उनको अध्ययनके लिए इंग्लैंड जानेका भी मौका मिला, किन्तु वे जानेको तैयार नहीं हुए। उन्हें अंग्रेजी सीखना मंजूर नहीं था। स्कूलमें उन्होंने बस प्रारम्भिक शिक्षा ही पाई थी। लेकिन, वे प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे संस्कृत, मागधी और मेरा खयाल है, शायद पाली भी जानते थे। धार्मिक साहित्यका वे बहुत अध्ययन करते थे और उन्होंने गुजराती पुस्तकोंसे इस्लाम, ईसाई धर्म और जरथुस्त्री धर्मका अपनी जरूरतके लायक काफी ज्ञान अर्जित कर लिया था। ऐसा था वह व्यक्ति जिसने धार्मिक विषयोंमें मेरे हृदयको इतना प्रभावित किया जितना अन्य किसीने नहीं किया। अन्यत्र मैंने कहा है कि मेरे आन्तरिक जीवनके नियामकोंके रूपमें टॉल्स्टॉय और रस्किन, कवि राजचन्द्रसे होड़ लेते हैं। मगर, निस्सन्देह, कविका प्रभाव अधिक गहरा था और किसी कारण नहीं तो इस कारणसे कि उनसे मेरा सबसे अधिक व्यक्तिगत सम्पर्क रहा। अधिकांश प्रसंगों पर उनके निष्कर्ष मेरी नैतिक भावनाके अनुकूल पड़ते थे। उनके विश्वासका आधार निर्विवाद रूपसे अहिंसा थी। उनकी अहिंसा वह भौंडे किस्मकी अहिंसा नहीं थी जिसका आचरण हम आजकल अहिंसाके उन तथाकथित अनुयायियोंको करते देखते हैं जिनकी अहिंसा कुछ बूढ़े ढोरों और कीट-पतंगोंकी रक्षातक ही सीमित है। उनकी अहिंसामें यदि छोटेसे-छोटा कीटाणु शामिल था तो उसी तरह सम्पूर्ण मानवता भी शामिल थी।
फिर भी मैं कविको सर्वथा पूर्ण, सर्वथा निर्दोष मनुष्य नहीं मान सका। लेकिन मैं जितने लोगोंको जानता था, पूर्णताके सबसे अधिक निकट मुझे वही लगते थे। मगर<noinclude></noinclude>
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{{right|नापा<br>१८ मार्च, १९३०}}
कवि राजचन्द्रका जन्म काठियावाड़के वावनिया नामक स्थानमें हुआ था। उनसे मेरा पहला सम्पर्क जिस दिन मैं १८९१ में लन्दनसे लौटकर आया तब बम्बई में डॉ॰ प्राणजीवन मेहताके घर हुआ था। कवि–उन्हें मैं कवि ही कहा करता था–डॉ॰ मेहताके निकट सम्बन्धी थे। मुझे उनका परिचय शतावधानी–अर्थात् ऐसा
व्यक्ति जो एक ही साथ सौ चीजोंको याद रख सकता है–कहकर दिया गया। कवि तब बिलकुल युवा थे। उनकी उम्र मेरी उम्र–अर्थात् २१ वर्ष–से ज्यादा नहीं थी। फिर भी, उन्होंने अपनी शक्तियोंका सार्वजनिक प्रदर्शन बिलकुल बन्द कर दिया था और अब वे विशुद्ध धर्म-साधनामें लगे हुए थे। उनकी सादगी और स्वतन्त्र निर्णय-बुद्धिसे मैं बहुत प्रभावित हुआ। अन्ध रूढ़िवादिता तो उन्हें छू भी नहीं गई थी। मगर उनकी जिस खूबीने मुझे शायद ज्यादा प्रभावित किया वह यह थी कि अपने व्यावहारिक जीवनमें धर्मका पालन करनेके साथ-साथ वे अपना व्यवसाय भी अच्छी तरह चलाते थे। धर्मतत्त्वके अध्येताके रूपमें उन्होंने अपनी मान्यताओंके अनुसार आचरण करनेका भी प्रयत्न किया। खुद जैन थे, लेकिन अन्य धर्मोके प्रति बड़ा उदार दृष्टिकोण रखते थे। उनको अध्ययनके लिए इंग्लैंड जानेका भी मौका मिला, किन्तु वे जानेको तैयार नहीं हुए। उन्हें अंग्रेजी सीखना मंजूर नहीं था। स्कूलमें उन्होंने बस प्रारम्भिक शिक्षा ही पाई थी। लेकिन, वे प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे संस्कृत, मागधी और मेरा खयाल है, शायद पाली भी जानते थे। धार्मिक साहित्यका वे बहुत अध्ययन करते थे और उन्होंने गुजराती पुस्तकोंसे इस्लाम, ईसाई धर्म और जरथुस्त्री धर्मका अपनी जरूरतके लायक काफी ज्ञान अर्जित कर लिया था। ऐसा था वह व्यक्ति जिसने धार्मिक विषयोंमें मेरे हृदयको इतना प्रभावित किया जितना अन्य किसीने नहीं किया। अन्यत्र मैंने कहा है कि मेरे आन्तरिक जीवनके नियामकोंके रूपमें टॉल्स्टॉय और रस्किन, कवि राजचन्द्रसे होड़ लेते हैं। मगर, निस्सन्देह, कविका प्रभाव अधिक गहरा था और किसी कारण नहीं तो इस कारणसे कि उनसे मेरा सबसे अधिक व्यक्तिगत सम्पर्क रहा। अधिकांश प्रसंगों पर उनके निष्कर्ष मेरी नैतिक भावनाके अनुकूल पड़ते थे। उनके विश्वासका आधार निर्विवाद रूपसे अहिंसा थी। उनकी अहिंसा वह भौंडे किस्मकी अहिंसा नहीं थी जिसका आचरण हम आजकल अहिंसाके उन तथाकथित अनुयायियोंको करते देखते हैं जिनकी अहिंसा कुछ बूढ़े ढोरों और कीट-पतंगोंकी रक्षातक ही सीमित है। उनकी अहिंसामें यदि छोटेसे-छोटा कीटाणु शामिल था तो उसी तरह सम्पूर्ण मानवता भी शामिल थी।
फिर भी मैं कविको सर्वथा पूर्ण, सर्वथा निर्दोष मनुष्य नहीं मान सका। लेकिन मैं जितने लोगोंको जानता था, पूर्णताके सबसे अधिक निकट मुझे वही लगते थे। मगर<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : बोरसदमें १०३}}</noinclude>अफसोस! वे बहुत छोटी (केवल तैंतीस वर्षकी) अवस्थामें ही, जब कि उन्हें लग रहा था कि वे सत्यका साक्षात्कार करने जा रहे हैं, परलोक सिधार गये। वे अपने पीछे अपने पुजारी तो बहुत छोड़ गये हैं, लेकिन उनके अनुगामियोंकी संख्या बहुत नहीं है। उनकी लिखी चीजोंको, जिनमें अधिकाशत: जिज्ञासुओंको लिखे पत्र ही हैं–ऐसे पत्र जिनमें उन्होंने अपनी आत्मा उँडेल दी है–संग्रह करके छापा गया है। उनका हिन्दी अनुवाद तैयार कराने की भी कोशिश की जा रही है। मैं जानता हूँ कि उनका अंग्रेजी अनुवाद करना भी अपेक्षित होगा। उनमें से अधिकांशका आधार आत्मानुभूति है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''मॉडर्न रिव्यू,''' जून, १९३०|1em}}
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{{larger|{{c|'''९८. पत्र : रामानन्द चटर्जीको'''}}}}
{{right|बोरसद<br>१८ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय रामानन्द बाबू,}}
कामकी भीड़के बीच मैं आज जैसे-तैसे साथका लेख<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> लिख पाया हूँ। अब आप इसका जैसे चाहें वैसे उपयोग कीजिए। मैं आशा करता हूँ कि आप इस आन्दोलनका दिल खोलकर समर्थन कर रहे हैं और इसे आपका पूरा आशीर्वाद प्राप्त है।
{{right|हृदयसे आपका,<br>'''मो° क° गांधी'''}}
अंग्रेजी (सी° डब्ल्यू° ९२८७ ) से।
सौजन्य : श्रीमती सीतादेवी
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''९९. भाषण : बोरसदमें'''}}}}
{{right|१८ मार्च, १९३०}}
एक समय ऐसा था जब मैं साम्राज्यके प्रति पूर्ण रूपसे वफादार था और अन्य लोगों को भी वफादारीका पाठ पढ़ाता था। मैं पूरे मनसे 'गॉड सेव द किंग' गाया करता था और अपने अन्य सगे-सम्बन्धियोंको भी सिखाता था। लेकिन अन्तमें मेरी आँखोंके आगे पड़ा वह पर्दा हट गया, भ्रम टूट गया और मैं समझ गया कि यह साम्राज्य वफादारीके लायक नहीं है। यह साम्राज्य मुझे राजद्रोहके लायक लगा और इसीसे राजद्रोहको मैं अपना धर्म माने बैठा हूँ। मैं अन्य लोगोंको भी समझाता हूँ कि राजद्रोह धर्म है और वफादार बने रहना पाप है। इस राज्य के प्रति वफादार रहने का अर्थ<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हुआ इसके हितकी कामना करना, और इसके हितकी कामना करना भारतके करोड़ों लोगोंका अहित करनेके समान है। हमारे करोड़ों रुपये बाहर चले जाते हैं, उसके बदलेमें कुछ हमें मिलता नहीं अथवा कुछ मिलता है तो लंकाशायरके चीथड़े। इस राजनीतिको स्वीकार करना गरीबों के प्रति द्रोह है, आप इस द्रोहसे मुक्त हों। मैं मानता हूँ कि मैं इससे मुक्त हो गया हूँ, इसीसे इस सरकारके विरुद्ध शान्तिपूर्ण ढंग से युद्ध करनेके लिए तत्पर हूँ। इसका आरम्भ में नमक कानूनको तोड़कर करने जा रहा हूँ। इसीके लिए मैं यह कूच कर रहा हूँ। इसीके लिए प्रत्येक स्थानसे हजारों स्त्री-पुरुषोंने आशीर्वाद दिया है। यह आशीर्वाद उन्होंने मुझे नहीं दिया, इस युद्धको दिया है।
अब हमारा धैर्य खत्म हो गया है। हमें इस राज्यके जुए में से निकल जाना चाहिए और स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए जो कष्ट उठाने पड़ें, उन्हें उठानेके लिए हम तैयार हैं। इस स्वराज्यको प्राप्त करना हमारा धर्म है—अधिकार है।
राजद्रोह धर्म बन जानेके कारण मैं इस युद्धको धर्मयुद्ध मानता हूँ। इस शासन-तन्त्रके नाशकी प्रतिक्षण कामना करता हूँ। लेकिन शासकोंका बाल भी बांका करनेकी मनमें इच्छा नहीं होती। लेकिन उन्हें सलाम तो नहीं ही करेंगे। कृपा करके अब आप लोग अपने कर्तव्यको पहचानें और हिन्दके प्रति आपने जो पाप किये हैं उन्हें धो डालें। आज तो हम नमक कानून भंग करते हैं, लेकिन कल अन्य कानूनोंके प्रति भी हमें ऐसा ही रुख अपनाना होगा; उन्हें कूड़ा समझकर उनका निरादर करना होगा। ऐसा करके हम असहयोगको इतना सशक्त बना डालेंगे कि फिर ब्रिटिश सरकारके लिए राज्य चलाना ही असम्भव हो जायेगा। राज्य चलानेके लिए वह भले ही गोलाबारी करे, जेल भेजे हमें फाँसी पर लटकाये, लेकिन ऐसा वह कितनोंके साथ कर सकेगी? तीस करोड़ व्यक्तियोंको फाँसी देनेके लिए एक लाख गोरोंको कितना समय लगेगा, इसका हिसाब आप लोग ही करें।
लेकिन गोरे ऐसे क्रूर नहीं हैं। वे भी हम जैसे लोग ही हैं; और जैसा ये लोग कर रहे हैं यदि हम लोग भी इनकी स्थितिमें होते तो सम्भवतः ऐसा ही करते। मनुष्यमें परिस्थितिके विरुद्ध जानेकी शक्ति नहीं होती; परिस्थिति ही उसके आचरण उसके व्यवहारको अपने अनुरूप ढाल लेती है। इसलिए मैं उन्हें दोषी नहीं मानता। लेकिन उनकी राजनीति मुझे इतनी कड़वी लगती है कि यदि उसका नाश आज हो
सकता हो तो मैं आज ही वैसा कर डालूं। यदि वे लोग मुझे जेलसे बाहर रखेंगे तो भी इस राजनीतिका नाश होगा और यदि वे मुझे गिरफ्तार कर जेलमें डाल देंगे तो भी इस राजनीतिका नाश होगा। मैं आपके सामने श्वास ले रहा हूँ और श्वास-प्रश्वासमें इसी एक वस्तुकी कामना कर रहा हूँ। मुझे इस बातका पूरा विश्वास है कि इस कामनामें तनिक सी भी मलिनता नहीं है। मैं जैसा मानता हूँ वैसा ही
व्यवहार करता हूँ।
मैंने जिन-जिन शिकायतोंको ईश्वरके सम्मुख रखा है और जिनकी मैंने वाइसरायको लिखे अपने पत्रमें चर्चा की है उनका वे कोई भी उत्तर नहीं दे सके हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : बोरसदमें|१०५}}</noinclude>कोई भी यह नहीं कहता कि नमक कानून औचित्यपूर्ण है न कोई यह कहता है कि सेना और प्रशासनपर होनेवाला खर्च सही है। महसूल वसूल करनेकी नीतिको भी कोई उचित नहीं बताता। लोगोंको शराबी और अफीमची बनाकर उनके घरोंको तबाह कर उनसे बीस-पच्चीस करोड़ रुपया इकट्ठा करनेको समुचित कोई नहीं कहता। विदेशी लोग और स्वयं अंग्रेज अधिकारी इस बातको स्वीकार करते हैं कि ये बातें सच हैं। लेकिन करें तो क्या करें? पैसा चाहिए। किसलिए चाहिए? जनताको दबाने के लिए।
अभी हाल में सरकारने सिपाहीके पदसे ऊपरके सब पुलिस अधिकारियोंको नमक कानूनसे सम्बन्धित अधिकारी बना दिया है। यह अधिकार पा जानेके कारण पुलिसका कोई भी व्यक्ति मुझे पकड़ सकता है और मुझपर मनमाना अत्याचार कर सकता है और यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह कायरताका अपराध करता है। सरकारके किसी अन्य कानूनमें कायरता नामक कोई अपराध नहीं है; यहाँ वह है।
जो सिपाही हमें नमक बनाते देखे, खारे पानीका लोटा गरम करते देखे वह हमें पकड़ सकता है, लोटा छीन सकता है और पानी गिरा सकता है। नमक फेंकनेसे उसका क्या जाता है? कपड़वंजके पास लसूंद्रामें नमककी एक खान है; उसे मिट्टी से पूर दिया गया है। यह सब क्या है? यह कैसा अन्याय है? इस अत्याचार और राक्षसी नीतिके विरुद्ध खड़ा होना धर्म है।
आपने जो थैली दी है उसके लिए यदि मुझे आपका एहसान मानना चाहिए तो समझ लीजिए कि मैं एहसान मान रहा हूँ। लेकिन पैसेसे मेरा पेट भरनेवाला नहीं है। मेरी इच्छा है कि आप सब बहन-भाई इस यज्ञ में अपना नाम लिखा लें। इस हाईस्कूलमें १५ वर्षसे ऊपरके विद्यार्थी और शिक्षक अपना नाम लिखायेंगे, ऐसी मुझे आशा है। जहाँ-जहाँ विप्लव हुआ है वहाँ-वहाँ अर्थात् जापान, चीन, मिस्र, इटली,
आयरलैंड और इंग्लैंडमें विद्यार्थियों और शिक्षकोंने मुख्य रूपसे भाग लिया है। यूरोप में १९१४ में ४ अगस्तसे महायुद्ध आरम्भ हुआ था और मैं छः तारीखको वहाँ पहुँचा था। वहाँ मैंने देखा कि विद्यार्थी कालेजोंका त्याग करके हथियार लेकर निकल पड़े हैं।
यहाँके धर्मयुद्धमें तो अहिंसा, सत्य और क्षमा हथियार हैं। ऐसे हथियारोंका उपयोग करना तो अच्छा ही होगा और ऐसे युद्ध में भाग लेना प्रत्येक विद्यार्थी और शिक्षकका धर्म है। परतन्त्रतासे मुक्त होनेके लिए जिस समय अन्तिम युद्ध छिड़ा हुआ हो उस समय जो विद्यार्थी अथवा शिक्षक घरोंमें अथवा स्कूलोंमें बैठे रहेंगे उनके बारेमें यह माना जायेगा कि वे देशके प्रति द्रोह कर रहे हैं। जिस समय सरदार-जैसे लोग जेलमें हों उस समय क्या आप लोग कविता रटने अथवा हिसाब निकालने में लगे रहेंगे। जिस तरह जब घरमें आग लग जाती है तो और सारे लोग उसे बुझाने दौड़ पड़ते हैं उसी तरह हिन्दके दुःखोंको, उसकी ज्वालाको शमन करनेके लिए आप सब लोग भी निकल पड़ें।
जो लोग कहते हैं, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जातियाँ एक नहीं हुई हैं, वे झूठ बोलते हैं। यह नमक कर तो सबपर समान रूपसे लागू है।<noinclude></noinclude>
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हिन्दुओंसे कर लिया जाता रहे और मुसलमान यदि अपनेको इस करसे मुक्त करवा सकते हों तो वे ऐसा जरूर करें। यदि कोई अपने को इस तरह बचा सकता है तो मुझे अपना धर्म बदलना पड़ेगा। मैं तो साष्टांग प्रणाम करके भी यदि यह नमक-कर खत्म करवा सकता होऊँ तो वैसा करनेके लिए तैयार हूँ। जिस करसे भैंस और गाय भी नहीं छूट सकती उस करको खत्म करवानेके लिए सब लोग कैसे एक नहीं होंगे?
करोड़ोंके दुःखों को दूर करनेके लिए मेरा साष्टांग नमस्कार काम नहीं आया। प्रार्थनापत्र लिखने में मैंने कोई कसर उठा न रखी। मुझे विनयपूर्ण भाषाका प्रयोग करना आता है, ऐसा सब कोई जानते हैं। लेकिन जब विनय और परामर्शसे कोई काम न बना तब मुझे विद्रोह करना पड़ गया। मैं लोगोंके समक्ष अपने-आपको विद्रोही कहलाकर शान्ति प्राप्त करता हूँ और ऐसा करके मैं कुछ सीमातक धर्मका पालन करता हूँ। शान्त, सौम्य और सत्यरूप इस विद्रोहमें आप सब लोग, चाहे आप किसी जाति अथवा धर्मके क्यों न हों, मेरे साथ नाम लिखवायें। यदि आप सच्चे हृदयसे इसमें शामिल होंगे और साहसपूर्वक इसमें बने रहेंगे तो समझिए कि यह नमक-कर गया, यह राजनीति गई और वाइसरायको लिखे पत्र में लिखित और
अलिखित सब दुःख दूर हो गये; बादमें जब नई राजनीतिकी रचना की जायेगी उस समय साम्प्रदायिक झगड़ोंको निबटाने तथा सबको सन्तोष प्रदान करनेका समय आयेगा।
मैं ईश्वर के नामपर आप सबका आह्वान करता हूँ। इस युद्धमें तो अंग्रेज लोग भी भाग लेंगे। एक अन्यायको छिपानेके लिए क्या वे अनेक अन्याय करेंगे? और निर्दोष व्यक्तियोंको जेलमें डालेंगे, चाबुक मारेंगे, अथवा फाँसी पर चढ़ायेंगे?
ईश्वर कभी भी असत्यरूप, अन्यायरूप नहीं हो सकता। यह उतना ही सच है जितना कि मेरा इस समय आपके सम्मुख बोलना और यह जितना सच है उतना ही मुझे स्पष्ट रूपसे दिखाई देता है कि इस राजनीतिका अन्तिम समय आ गया है। पूर्ण स्वतन्त्रताकी झाँकी दिखाई दे रही है, स्वतन्त्रता देवी आह्वान कर रही है और हमें वरमाला पहनाना चाहती है। ऐसे समय में यदि हम उससे मुँह चुराते फिरें तो हम जैसा अपात्र और कौन होगा?
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २३-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१४९
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१००. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|रास<br>१९ मार्च, १९३०}}
{{Left|प्रिय जवाहरलाल,}}
तुमको पूरी एक रातका जागरण करना पड़ेगा, लेकिन यदि कल रातसे पहले वापस लौटना चाहते हो तो इससे बचा भी नहीं जा सकता। मैं उस समय जहाँ भी रहूँगा सन्देशवाहक तुमको वहाँ तक ले आयेगा। इस प्रयाणकी कठिनतम घड़ीमें तुम मुझसे मिल रहो हो। तुमको रातके लगभग दो बजे जाने परखे मछुओंके कंधों पर बैठकर एक धारा पार करनी पड़ेगी। मैं राष्ट्र के प्रमुख सेवकके लिए भी प्रयाणमें किंचिन्मात्र विराम नहीं दे सकता।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
यह वही स्थान है जहाँ वल्लभभाई गिरफ्तार किये गये थे। इस गाँवके सभी पुराने पुश्तैनी मुखिया, पटेल आदि अपने त्याग-पत्र मुझे सौंपकर अभी-अभी गये हैं।
{{left|पण्डित जवाहरलाल नेहरू}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
गांधी-नेहरू कागजात, १९३०।
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१०१. भाषण : रासमें'''}}}}
{{right|१९ मार्च, १९३०}}
आज हमने उस ताल्लुकेमें प्रवेश किया है जिसमें वल्लभभाईको पकड़ा गया था, जिसमें उन्हें कैदकी सजा हुई थी और जिस ताल्लुकेमें १९२४ में सरदारने ऐसा भीषण युद्ध चलाया था कि अन्तमें सरकारको अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ी थी। इस तरह जो न्याय बिना किसी लड़ाई अथवा युद्धके मिलना चाहिए था वह न्याय प्राप्त हुआ। कौन जानता है, सरदारने आपकी जो सेवा की थी, यह सजा उन्हें उसके
पुरस्कारस्वरूप ही न मिली हो।
अब प्रश्न यह है कि जिस बात के लिए उन्हें सजा दी गई उसके लिए आप क्या करेंगे तथा मुझे क्या करना चाहिए?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५०
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
कुछ मुखियाओं और मतादारोंने त्यागपत्र दिये हैं, उसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। लेकिन अभी ऐसे कितने ही लोग पड़े हैं जो अपने इस कामको नहीं छोड़ पाते। वेतनके लिए मुखिया बना हुआ हो, ऐसा एक भी व्यक्ति मेरे देखनेमें नहीं आया। लोगों पर अत्याचार करने अथवा यों कहिए, सरकार लोगों पर जो अत्याचार करती है उसमें भाग लेनेका मुखियाको अधिकार मिलता है। इस अधिकारसे उनके तुच्छ स्वार्थका परितोष होता है अथवा इससे उन्हें अपने काममें आसानी होती है और इन्हीं अनुचित कारणोंके लोभसे ये लोग अपने पदोंसे चिपके रहते हैं। लेकिन अब आप लोग कबतक गाँवोंको चूसनेमें अपना योगदान देते रहेंगे?
सरकारने जो लूट मचा रखी है उसकी ओरसे क्या अभीतक आपकी आँखें खुली नहीं हैं?
गाँवोंमें सरकारके प्रतिनिधि मुखिया, तलाटी और रावणिया लोग हैं और इनके द्वारा सरकार अपना राज्य चलाती है। किसी गाँवका मुट्ठी भर लोगोंसे डर जाना और पसन्द न होते हुए भी कुछ काम करते चले जाना न तो उसके लिए शोभनीय है और न तलाटी, रावणिया और मुखिया लोगोंके लिए ही। इस अत्याचारको बन्द करवानेके लिए सरदार जी-जानसे लगे हुए थे।
सरदारने न तो कोई भाषण दिया था और न वे यहाँ किसी किस्मका उत्पात ही करने आये थे। ऐसा कोई उत्पात होगा, यह बात न तो मजिस्ट्रेट के मनमें थी और न आप लोगों के मनमें। जिस कार्यके लिए सरदार आपके पास आये थे वह किसीसे छिपा नहीं था। सत्याग्रहीके पास छिपाने योग्य कोई बात होती ही नहीं है। सत्याग्रही कैसे उठता, बैठता, खाता, पीता और विचार करता है, यह सब एक बालक भी देख सकता है। एक बालकतक सत्याग्रहीके हिसाबकी जाँच भी कर सकता है। ऐसे सरदारके पास छिपा हुआ क्या हो सकता था? सरदार मेरा रास्ता साफ करने आये थे। वे नमकका सन्देश देने नहीं आये थे। हम दोनोंने परस्पर यह योजना बनाई थी कि नमक कानूनका भंग मेरे द्वारा और मैं जिन लोगोंको साथ ले जाऊँ उन लोगों द्वारा किया जाये। मेरे साथ आये हुए लोगों में से बहुतों को आप जानते नहीं। ये सब सरदारके सेवक हैं। सरदारने क्या अपराध किया है, सो मैं समझ नहीं सका। मजिस्ट्रेटको भी मालूम नहीं था। सरदार-जैसे व्यक्तिको तीन मासकी सजा दी जाये, यह सरदार और सरकार दोनोंके लिए लज्जाकी बात है। उन जैसे व्यक्तिको तो सात वर्षकी सजा अथवा देशनिकाला दिया जाना चाहिए। सरकार मुझे तीन मासकी सजा दे तो यह उसे शोभा नहीं देगा। मुझ जैसोंको तो आजीवन कैद अथवा फाँसीकी सजा ही हो सकती है। मेरा अपराध राजद्रोह है। इस राज्यसे द्रोह करना मेरा धर्म है और मैं इस धर्मकी शिक्षा जनताको दे रहा हूँ। जिस राज्यमें अत्याचारकी परम्परा हो, जिस राज्यमें गरीब और अमीर दोनोंसे समान रूपसे नमक कर लिया जाता हो, जिस राज्यमें दरबान, पुलिस और सेनाके पीछे लाखों रुपया नष्ट किया जाता हो, जिस राज्यमें सबसे बड़ा अधिकारी जनताकी आयसे पाँच हजार गुनी तनख्वाह लेता हो, जिस राज्यमें शराब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२००
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४६. मुखियों और मतादारोंके बारेमें'''}}}}
मुखियों और मतादारोंके इतने अधिक इस्तीफे आये हैं कि उनके बारेमें कुछ लिखना आवश्यक हो गया है। इन इस्तीफोंके बारेमें इतनी ज्यादा अफवाहें सुनने में आई हैं कि उनकी सचाईके सम्बन्धमें खुद मुझे ही शक है। यदि ये इस्तीफे बिना किसी दबावके खुशीसे दिये गये हों, तो निश्चय ही इनका बहुत महत्व है। फिर भी जिन सरदारकी सजाके कारण ये दिये गये हैं, उनकी सेवाके मूल्यकी तुलना में इन इस्तीफोकी कीमत कुछ भी नहीं। जिस गुजरात के लिए वल्लभभाईने अपना सब कुछ अर्पित कर दिया वह गुजरात चाहे जितना त्याग करे, कम ही हैं। यह सच
है। इसलिए गुजरातको स्वराज्यके लिए वे सब प्रयत्न करने चाहिए, जिनका किया
जाना उचित है।
अब इस दृष्टिसे हम मुखियागिरीकी जाँच करें। मुखियागिरीको जितनी स्पष्टतापूर्वक आज मैं समझता हूँ, उतना पहले नहीं समझता था। मुखियाकी स्थिति पुलिस या पटेलकी है। मुखियाके द्वारा सरकार लगान वसूल करती है और अपने हुक्मोंकी तामील करवाती है। मुखियाके अभाव में मामलतदार वगैरा अधिकारी अपंग हो जाते हैं। चाहे जिस आदमीको मुखिया नहीं बनाया जाता, बल्कि जिसका गाँवमें कुछ प्रभा हो वही मुखिया नियुक्त किया जाता है। सरकारके दफ्तर में ऐसे आदमियोंकी सची रखी जाती है और वे मतादार कहलाते हैं। इन्हीं में से बारी-बारीसे मुखिया मुकर्रर किया जाता है, और हर पांचवें साल नया मुखिया उसका स्थान ग्रहण करता है। इन मतादारोंको सरकार हरसाल कुछ नजराना देती है और यह रकम चार-पांच रुपये से ज्यादा नहीं होती। मुखियाको हर साल तीससे लेकर पचास रुपये तक नजराना मिलता है।'नजराना' शब्दका में जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ। इस रकमको वेतन कोई नहीं समझता। मुखियाको मिलनेवाली रकमका उसकी नजरमें कोई मूल्य नहीं होता। क्योंकि आम तौर पर रुपये-पैसेके लिहाजसे मुखिया एक खुशहाल आदमी होता है। अतः इस तरह मिलनेवाली रकमको क्या कहा जाये, इसका विचार करते हुए मैंने इसे 'नजराना' कहा है। अफगानिस्तानके अमीरको इसी तरह 'नजराना' देकर बन्धनमें बाँध लिया जाता था। मैं जानता हूँ कि अमीरके नजराने और मुखियाके नजरानेमें बहुत फर्क है। अमीरके नजरानेकी रकम बड़ी होती है और यह बहुत छोटी है। इन दोनोंमें कुछ और फर्क भी है। फिर भी दोनोंका उद्देश्य एक ही है और वह है प्रतिपक्षीको बाँध लेना।
मुखिया और मतादार क्यों इस बन्धनमें पड़ते हैं? अधिकारका रौब गालिब करनेके लिए ही नहीं, बल्कि इसलिए कि ऐसे अधिकारसे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उस प्रतिष्ठाका उपयोग करके उसके द्वारा वे पैसे पैदा करते हैं। ईमानदारीसे यह काम नहीं किया जा सकता। बेईमानी तो इसके मूलमें ही होती है। अतएव मुखियागिरीको मंजूर करके गाँवके महाजन और उसके रक्षक बननेके बदले भक्षक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४६. मुखियों और मतादारोंके बारेमें'''}}}}
मुखियों और मतादारोंके इतने अधिक इस्तीफे आये हैं कि उनके बारेमें कुछ लिखना आवश्यक हो गया है। इन इस्तीफोंके बारेमें इतनी ज्यादा अफवाहें सुनने में आई हैं कि उनकी सचाईके सम्बन्धमें खुद मुझे ही शक है। यदि ये इस्तीफे बिना किसी दबावके खुशीसे दिये गये हों, तो निश्चय ही इनका बहुत महत्व है। फिर भी जिन सरदारकी सजाके कारण ये दिये गये हैं, उनकी सेवाके मूल्यकी तुलना में इन इस्तीफोकी कीमत कुछ भी नहीं। जिस गुजरात के लिए वल्लभभाईने अपना सब कुछ अर्पित कर दिया वह गुजरात चाहे जितना त्याग करे, कम ही हैं। यह सच है। इसलिए गुजरातको स्वराज्यके लिए वे सब प्रयत्न करने चाहिए, जिनका किया जाना उचित है।
अब इस दृष्टिसे हम मुखियागिरीकी जाँच करें। मुखियागिरीको जितनी स्पष्टतापूर्वक आज मैं समझता हूँ, उतना पहले नहीं समझता था। मुखियाकी स्थिति पुलिस या पटेलकी है। मुखियाके द्वारा सरकार लगान वसूल करती है और अपने हुक्मोंकी तामील करवाती है। मुखियाके अभाव में मामलतदार वगैरा अधिकारी अपंग हो जाते हैं। चाहे जिस आदमीको मुखिया नहीं बनाया जाता, बल्कि जिसका गाँवमें कुछ प्रभा हो वही मुखिया नियुक्त किया जाता है। सरकारके दफ्तर में ऐसे आदमियोंकी सची रखी जाती है और वे मतादार कहलाते हैं। इन्हीं में से बारी-बारीसे मुखिया मुकर्रर किया जाता है, और हर पांचवें साल नया मुखिया उसका स्थान ग्रहण करता है। इन मतादारोंको सरकार हरसाल कुछ नजराना देती है और यह रकम चार-पांच रुपये से ज्यादा नहीं होती। मुखियाको हर साल तीससे लेकर पचास रुपये तक नजराना मिलता है।'नजराना' शब्दका में जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ। इस रकमको वेतन कोई नहीं समझता। मुखियाको मिलनेवाली रकमका उसकी नजरमें कोई मूल्य नहीं होता। क्योंकि आम तौर पर रुपये-पैसेके लिहाजसे मुखिया एक खुशहाल आदमी होता है। अतः इस तरह मिलनेवाली रकमको क्या कहा जाये, इसका विचार करते हुए मैंने इसे 'नजराना' कहा है। अफगानिस्तानके अमीरको इसी तरह 'नजराना' देकर बन्धनमें बाँध लिया जाता था। मैं जानता हूँ कि अमीरके नजराने और मुखियाके नजरानेमें बहुत फर्क है। अमीरके नजरानेकी रकम बड़ी होती है और यह बहुत छोटी है। इन दोनोंमें कुछ और फर्क भी है। फिर भी दोनोंका उद्देश्य एक ही है और वह है प्रतिपक्षीको बाँध लेना।
मुखिया और मतादार क्यों इस बन्धनमें पड़ते हैं? अधिकारका रौब गालिब करनेके लिए ही नहीं, बल्कि इसलिए कि ऐसे अधिकारसे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उस प्रतिष्ठाका उपयोग करके उसके द्वारा वे पैसे पैदा करते हैं। ईमानदारीसे यह काम नहीं किया जा सकता। बेईमानी तो इसके मूलमें ही होती है। अतएव मुखियागिरीको मंजूर करके गाँवके महाजन और उसके रक्षक बननेके बदले भक्षक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१४६. मुखियों और मतादारोंके बारेमें'''}}}}
मुखियों और मतादारोंके इतने अधिक इस्तीफे आये हैं कि उनके बारेमें कुछ लिखना आवश्यक हो गया है। इन इस्तीफोंके बारेमें इतनी ज्यादा अफवाहें सुनने में आई हैं कि उनकी सचाईके सम्बन्धमें खुद मुझे ही शक है। यदि ये इस्तीफे बिना किसी दबावके खुशीसे दिये गये हों, तो निश्चय ही इनका बहुत महत्व है। फिर भी जिन सरदारकी सजाके कारण ये दिये गये हैं, उनकी सेवाके मूल्यकी तुलना में इन इस्तीफोंकी कीमत कुछ भी नहीं। जिस गुजरात के लिए वल्लभभाईने अपना सब कुछ अर्पित कर दिया वह गुजरात चाहे जितना त्याग करे, कम ही हैं। यह सच है। इसलिए गुजरातको स्वराज्यके लिए वे सब प्रयत्न करने चाहिए, जिनका किया जाना उचित है।
अब इस दृष्टिसे हम मुखियागिरीकी जाँच करें। मुखियागिरीको जितनी स्पष्टतापूर्वक आज मैं समझता हूँ, उतना पहले नहीं समझता था। मुखियाकी स्थिति पुलिस या पटेलकी है। मुखियाके द्वारा सरकार लगान वसूल करती है और अपने हुक्मोंकी तामील करवाती है। मुखियाके अभाव में मामलतदार वगैरा अधिकारी अपंग हो जाते हैं। चाहे जिस आदमीको मुखिया नहीं बनाया जाता, बल्कि जिसका गाँवमें कुछ प्रभा हो वही मुखिया नियुक्त किया जाता है। सरकारके दफ्तर में ऐसे आदमियोंकी सूची रखी जाती है और वे मतादार कहलाते हैं। इन्हीं में से बारी-बारीसे मुखिया मुकर्रर किया जाता है, और हर पांचवें साल नया मुखिया उसका स्थान ग्रहण करता है। इन मतादारोंको सरकार हरसाल कुछ नजराना देती है और यह रकम चार-पांच रुपये से ज्यादा नहीं होती। मुखियाको हर साल तीससे लेकर पचास रुपये तक नजराना मिलता है।'नजराना' शब्दका मैं जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ। इस रकमको वेतन कोई नहीं समझता। मुखियाको मिलनेवाली रकमका उसकी नजरमें कोई मूल्य नहीं होता। क्योंकि आम तौर पर रुपये-पैसेके लिहाजसे मुखिया एक खुशहाल आदमी होता है। अतः इस तरह मिलनेवाली रकमको क्या कहा जाये, इसका विचार करते हुए मैंने इसे 'नजराना' कहा है। अफगानिस्तानके अमीरको इसी तरह 'नजराना' देकर बन्धनमें बाँध लिया जाता था। मैं जानता हूँ कि अमीरके नजराने और मुखियाके नजरानेमें बहुत फर्क है। अमीरके नजरानेकी रकम बड़ी होती है और यह बहुत छोटी है। इन दोनोंमें कुछ और फर्क भी है। फिर भी दोनोंका उद्देश्य एक ही है और वह है प्रतिपक्षीको बाँध लेना।
मुखिया और मतादार क्यों इस बन्धनमें पड़ते हैं? अधिकारका रौब गालिब करनेके लिए ही नहीं, बल्कि इसलिए कि ऐसे अधिकारसे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उस प्रतिष्ठाका उपयोग करके उसके द्वारा वे पैसे पैदा करते हैं। ईमानदारीसे यह काम नहीं किया जा सकता। बेईमानी तो इसके मूलमें ही होती है। अतएव मुखियागिरीको मंजूर करके गाँवके महाजन और उसके रक्षक बननेके बदले भक्षक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>भाषण : ओलपाड ताल्लुके में
१५९
बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है
कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है,
यह उसका निचोड़ है।
न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी
खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय
देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह
हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और
मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़
देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह
कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो!
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' २०३-१९३०
{{C|{{larger'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]}}
मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-
दान अधिक होगा। आज भी चरला संपमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है ।
पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती
हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे
कहता हूँ कि सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका
लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना
हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके
लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली
पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान
था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप
चरखेका स्पर्श न करें।
मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीटूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें
तो आप इस ओपाङको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके
पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके
पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं,
शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा;
१. " स्वराज-गीता " से उद्धृत |
२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये
ये पर ३१ तारीखको उनका मनवार था।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>भाषण : ओलपाड ताल्लुके में
१५९
बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है
कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है,
यह उसका निचोड़ है।
न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी
खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय
देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह
हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और
मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़
देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह
कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो!
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' २०३-१९३०
{{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]}}
मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-
दान अधिक होगा। आज भी चरला संपमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है ।
पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती
हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे
कहता हूँ कि सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका
लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना
हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके
लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली
पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान
था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप
चरखेका स्पर्श न करें।
मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीटूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें
तो आप इस ओपाङको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके
पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके
पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं,
शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा;
१. " स्वराज-गीता " से उद्धृत |
२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये
ये पर ३१ तारीखको उनका मनवार था।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : ओलपाड ताल्लुके में|१५९}}</noinclude>बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है
कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है,
यह उसका निचोड़ है।
न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी
खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय
देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह
हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और
मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़
देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह
कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो!
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' २०३-१९३०
{{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]}}
मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-
दान अधिक होगा। आज भी चरला संपमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है ।
पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती
हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे
कहता हूँ कि सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका
लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना
हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके
लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली
पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान
था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप
चरखेका स्पर्श न करें।
मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीटूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें
तो आप इस ओपाङको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके
पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके
पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं,
शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा;
१. " स्वराज-गीता " से उद्धृत।
२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये थे। पर ३१ तारीखको उनका मौनवार था।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : ओलपाड ताल्लुके में|१५९}}</noinclude>बननेका धन्धा करनेका नाम ही मुखियागिरी है। मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है
कि सभी मुखिया ऐसे ही होंगे, लेकिन बहुत-से मुखियोंसे मेरी जो बातचीत हुई है,
यह उसका निचोड़ है।
न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी
खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय
देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह
हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और
मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़
देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह
कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो!
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' २०३-१९३०
{{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]}}
मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-
दान अधिक होगा। आज भी चरला संपमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है ।
पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती
हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे
कहता हूँ कि सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका
लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना
हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके
लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली
पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान
था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप
चरखेका स्पर्श न करें।
मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीटूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें
तो आप इस ओपाङको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके
पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके
पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं,
शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा;
१. "स्वराज-गीता" से उद्धृत।
२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये थे। पर ३१ तारीखको उनका मौनवार था।<noinclude></noinclude>
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यह उसका निचोड़ है।
न तो सरदारकी खातिर और न स्वराज्यकी खातिर, बल्कि धर्म और नीतिकी खातिर ऐसी मुखियागिरी और महादारीको तिलांजलि दे देनी चाहिए। इस समय देश में आत्मशुद्धिका जो यज्ञ हो रहा है, उसमें मुखिया और मतादार अच्छी तरह हाथ बँटा सकते हैं। दूसरे लोग तो पेटका बहाना कर सकते हैं; पर मुखियों और मतादारोंके सामने वैसी कोई बात नहीं है। उनके लिए तो यह एक खिताब छोड़ देने जैसी बात है। इसीलिए मैंने इस स्थितिको जूठनका ढेर कहा है, और मेरा यह कथन बिलकुल ठीक है। ईश्वर करे, मुखिया और मतादार इस जूठनसे मुक्त हो!
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' २०३-१९३०
{{C|{{larger|'''१४७. भाषण : ओलपाड ताल्लुकेमें'''}}}}
{{Right|[३० मार्च, १९३० को या उसके पूर्व]}}
मुझे तो लगता है कि स्वराज्यकी इस लड़ाईमें पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका योग-दान अधिक होगा। आज भी चरखा संघमें स्त्रियोंका योगदान बहुत अधिक है । पन्द्रह सौ गाँवोंमें जो लाख-डेढ़ लाख चरखे चल रहे हैं उन्हें स्त्रियाँ ही चलाती हैं। आन्ध्रकी महीन खादी भी हमें स्त्रियोंके प्रतापसे ही मिल पाती है। मैं आपसे कहता हूँ कि 'सूतका तार अर्थात् स्वराज्य' वाली बात बिलकुल सही है। यह ब्रह्माका लेख है। मतलब यह कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार चाहे खादीके बल पर करना हो या मिलके कपड़े बल पर कातनेवाली तो स्त्रियां ही है। इसलिए स्वराज्यके लिए चल रही अहिंसक लड़ाईमें स्त्रियोंका हिस्सा ही बड़ा रहेगा, और आनेवाली पीढ़ी कहेगी कि इस लड़ाई में हमारी माताओं, हमारी बहनोंका ही अधिक योगदान था। आप यह करने में समर्थ हैं। लेकिन अगर आपमें दयाका भाव न हो तो आप चरखेका स्पर्श न करें।
मद्यनिषेधके काम में भी अगर मीठूबहनकी तरह बहुत-सी युवतियाँ निकल पड़ें तो आप इस ओलपाडको तो इस बुराईसे मुक्त करके ही छोड़ेंगी। यदि शराबीके पास पुरुष जायेंगे तो वह उन्हें गालियां देने लगेगा, लेकिन अगर लड़कियां उसके पास चली जायें और कहें कि आप शराब क्यों पीते हैं, यह आप क्या करते हैं,
शराब पीकर आप माँ और बेटीका भेद भूल जायें, यह क्या आपको शोभा देगा;
१. "स्वराज-गीता" से उद्धृत।
२. गांधीजी ने ओल्ड तालुके २८ मार्चको प्रवेश किया था और ३१ मार्चको वे वहाँ से चले गये थे। पर ३१ तारीखको उनका मौनवार था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०२
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो ऐसे प्रेम-पगे शब्द सुनते ही वह चाहे जितना बड़ा शराबी हो, उसका सिर झुक
जायेगा और अगर वह भला आदमी होगा तो शायद से भी पड़ेगा और रामका
नाम लेकर शराब छोड़नेकी प्रतिज्ञा करेगा। किन्तु हिन्दुस्तानकी स्त्रियों में ऐसा जोश,
हिम्मत और परोपकार-वृत्ति कहाँ है ? लेकिन यह हिम्मत में दे सकता हूँ। आप
ईश्वरका नाम लेकर सीधे चली चलें तो आपको कुदृष्टिसे देखनेवाला कौन है ? मनमें
ऐसा विश्वास रखें कि पवित्रता ही आपकी ढाल है।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४८. भाषण: साँधियेरमें'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
एक और तलाटी भाईने इस्तीफा दे दिया, इसके लिए उन्हें मेरा धन्यवाद !
आज आपका विशेष कर्तव्य यह है कि आप सरकारी नौकरियोंको कूड़ा-कर्कट या
जूठन समझकर फेंक दें। आपको चाहे
भूखों मरना पड़े, फिर भी आप अपने
बफादारी में सबसे दो कदम आगे हैं, वे
मैं तो उनसे भी इस्तीफा देनेकी नम्रतापूर्वक विनती करनेवाला हूँ । अतः इस सम्बन्धमें
'नवजीवन' में प्रकाशित 'बहिष्कारको मर्यादा' शीर्षक लेख सावधानीसे पढ़कर और
भली-भाँति समझकर तदनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए। हम सरकार से असहयोग
कर रहे हैं; अतः हमें उस हदतक सरकारका बहिष्कार करना चाहिए।
कैद हो, चाहे फाँसी पर लटकाया जाये या
विशेष कर्तव्यका पालन करें। यहाँके पटेल
दूसरोंको भी इस्तीफा देनेसे मना करते हैं।
नमक के सम्बन्धमें मैं फिलहाल कुछ नहीं कहना चाहता। यह कर अन्यायपूर्ण
और बुरा है, तथा इसके पीछे एक लम्बा इतिहास है। यह कर लगाना नीतिपूर्ण है
या अनीतिपूर्ण, सरकार यह नहीं कह सकती। किन्तु आप नमक- करको खत्म हुआ ही
समझें। मैं यह बात जूझनेकी आपकी शक्तिके आधारपर कह रहा हूँ । उक्त
कर उठ जानेका यह अर्थ नहीं कि हमें स्वराज्य मिल जायेगा। इसके बाद हमें और
भी काम करते हैं।
आज यहाँ बम्बईके कपड़ा व्यापारी आये हुए हैं। १९२१ में विदेशी वस्त्रोंके
बहिष्कारका वे जितना महत्व समझते थे, आज उसकी अपेक्षा कहीं अधिक समझने
लगे हैं। मैं तो हिन्दुस्तानके व्यापारियों और ग्रामोंके विकासकी दृष्टिसे ही सोचता
हूँ । अब ये सब लोग इस बात को समझने लगे हैं कि जिस प्रकार यह लड़ाई
दरिद्रनारायणके लिए है उसी प्रकार व्यापारियोंके लिए भी है। स्वतन्त्र भारतमें तो
यही लोग कपड़े व्यापारी होंगे। आज जो आसुरी धन्धा है, स्वराज्य मिल जानेपर
१. देखिए पृ४ १५५-७<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो ऐसे प्रेम-पगे शब्द सुनते ही वह चाहे जितना बड़ा शराबी हो, उसका सिर झुक
जायेगा और अगर वह भला आदमी होगा तो शायद से भी पड़ेगा और रामका
नाम लेकर शराब छोड़नेकी प्रतिज्ञा करेगा। किन्तु हिन्दुस्तानकी स्त्रियों में ऐसा जोश,
हिम्मत और परोपकार-वृत्ति कहाँ है? लेकिन यह हिम्मत में दे सकता हूँ। आप
ईश्वरका नाम लेकर सीधे चली चलें तो आपको कुदृष्टिसे देखनेवाला कौन है? मनमें
ऐसा विश्वास रखें कि पवित्रता ही आपकी ढाल है।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४८. भाषण: साँधियेरमें'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
एक और तलाटी भाईने इस्तीफा दे दिया, इसके लिए उन्हें मेरा धन्यवाद! आज आपका विशेष कर्तव्य यह है कि आप सरकारी नौकरियोंको कूड़ा-कर्कट या जूठन समझकर फेंक दें। आपको चाहे कैद हो, चाहे फाँसीपर लटकाया जाये या भूखों मरना पड़े, फिर भी आप अपने विशेष कर्तव्यका पालन करें। यहाँ के पटेल बफादारी में सबसे दो कदम आगे हैं, वे दूसरोंको भी इस्तीफ देनेसे मना करते है। मैं तो उनसे भी इस्तीफा देनेकी नम्रतापूर्वक विनती करनेवाला हूँ। अतः इस सम्बन्धमें 'नवजीवन' में प्रकाशित 'बहिष्कारको मर्यादा' शीर्षक लेख सावधानीसे पढ़कर और भली-भाँति समझकर तदनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए। हम सरकार से असहयोग कर रहे हैं; अतः हमें उस हदतक सरकारका बहिष्कार करना चाहिए।
नमक के सम्बन्धमें मैं फिलहाल कुछ नहीं कहना चाहता। यह कर अन्यायपूर्ण और बुरा है, तथा इसके पीछे एक लम्बा इतिहास है। यह कर लगाना नीतिपूर्ण है या अनीतिपूर्ण, सरकार यह नहीं कह सकती। किन्तु आप नमक-करको खत्म हुआ ही
समझें। मैं यह बात जूझनेकी आपकी शक्तिके आधारपर कह रहा हूँ। उक्तकर उठ जानेका यह अर्थ नहीं कि हमें स्वराज्य मिल जायेगा। इसके बाद हमें औरभी काम करने हैं।
आज यहाँ बम्बईके कपड़ा व्यापारी आये हुए हैं। १९२१ में विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका वे जितना महत्व समझते थे, आज उसकी अपेक्षा कहीं अधिक समझने लगे हैं। मैं तो हिन्दुस्तानके व्यापारियों और ग्रामोंके विकासकी दृष्टिसे ही सोचता हूँ । अब ये सब लोग इस बात को समझने लगे हैं कि जिस प्रकार यह लड़ाई दरिद्रनारायणके लिए है उसी प्रकार व्यापारियोंके लिए भी है। स्वतन्त्र भारतमें तो यही लोग कपड़े व्यापारी होंगे। आज जो आसुरी धन्धा है, स्वराज्य मिल जानेपर
१. देखिए पृ४ १५५-७<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो ऐसे प्रेम-पगे शब्द सुनते ही वह चाहे जितना बड़ा शराबी हो, उसका सिर झुक
जायेगा और अगर वह भला आदमी होगा तो शायद से भी पड़ेगा और रामका
नाम लेकर शराब छोड़नेकी प्रतिज्ञा करेगा। किन्तु हिन्दुस्तानकी स्त्रियों में ऐसा जोश,
हिम्मत और परोपकार-वृत्ति कहाँ है? लेकिन यह हिम्मत में दे सकता हूँ। आप
ईश्वरका नाम लेकर सीधे चली चलें तो आपको कुदृष्टिसे देखनेवाला कौन है? मनमें
ऐसा विश्वास रखें कि पवित्रता ही आपकी ढाल है।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४८. भाषण: साँधियेरमें'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
एक और तलाटी भाईने इस्तीफा दे दिया, इसके लिए उन्हें मेरा धन्यवाद! आज आपका विशेष कर्तव्य यह है कि आप सरकारी नौकरियोंको कूड़ा-कर्कट या जूठन समझकर फेंक दें। आपको चाहे कैद हो, चाहे फाँसीपर लटकाया जाये या भूखों मरना पड़े, फिर भी आप अपने विशेष कर्तव्यका पालन करें। यहाँ के पटेल बफादारी में सबसे दो कदम आगे हैं, वे दूसरोंको भी इस्तीफ देनेसे मना करते है। मैं तो उनसे भी इस्तीफा देनेकी नम्रतापूर्वक विनती करनेवाला हूँ। अतः इस सम्बन्धमें 'नवजीवन' में प्रकाशित 'बहिष्कारको मर्यादा' शीर्षक लेख सावधानीसे पढ़कर और भली-भाँति समझकर तदनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए। हम सरकार से असहयोग कर रहे हैं; अतः हमें उस हदतक सरकारका बहिष्कार करना चाहिए।
नमक के सम्बन्धमें मैं फिलहाल कुछ नहीं कहना चाहता। यह कर अन्यायपूर्ण और बुरा है, तथा इसके पीछे एक लम्बा इतिहास है। यह कर लगाना नीतिपूर्ण है या अनीतिपूर्ण, सरकार यह नहीं कह सकती। किन्तु आप नमक-करको खत्म हुआ ही
समझें। मैं यह बात जूझनेकी आपकी शक्तिके आधारपर कह रहा हूँ। उक्तकर उठ जानेका यह अर्थ नहीं कि हमें स्वराज्य मिल जायेगा। इसके बाद हमें औरभी काम करने हैं।
आज यहाँ बम्बईके कपड़ा व्यापारी आये हुए हैं। १९२१ में विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका वे जितना महत्व समझते थे, आज उसकी अपेक्षा कहीं अधिक समझने लगे हैं। मैं तो हिन्दुस्तानके व्यापारियों और ग्रामोंके विकासकी दृष्टिसे ही सोचता हूँ । अब ये सब लोग इस बात को समझने लगे हैं कि जिस प्रकार यह लड़ाई दरिद्रनारायणके लिए है उसी प्रकार व्यापारियोंके लिए भी है। स्वतन्त्र भारतमें तो यही लोग कपड़े व्यापारी होंगे। आज जो आसुरी धन्धा है, स्वराज्य मिल जानेपर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण: सांधियेरमें|१६९}}</noinclude>वही दैवी धन्धा हो जायेगा। तो प्रश्न है कि इस लड़ाईमें व्यापारी कहाँतक हाथ बँटा सकते हैं? व्यापारी कहते हैं कि वे जापानका माल मँगायेंगे, इंग्लैंडका नहीं। किन्तु ऐसा करनेमें दो बड़े दोष हैं। एक तो इसका यह अर्थ हुआ कि अंग्रेजोंसे हमारी दुश्मनी है और इस कारण हम उनसे कपड़ा नहीं लेते; जबकि बात ऐसी नही है; बल्कि व्यापारके द्वारा वे हिन्दुस्तानके गरीबोंका धन हड़प लेना चाहते हैं, इस कारण हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हैं। यह बात हमें स्वप्नमें भी नहीं सोचनी चाहिए कि विदेशी कपड़ेका मतलब इंग्लैंडका बना कपड़ा है। हालांक आप इतने दिनोंसे उनके साथ व्यापार कर रहे हैं, किन्तु आप उनकी व्यापारिक चतुराईको समझ ही नहीं सके हैं। आप तो यह नहीं जानते कि उन्होंने दिल्लीको कैसे जीता था। यदि ये लोग कुछ पाना चाहते हैं तो उसे जरा-सी गुंजाइश मिलते ही ले डालने में समर्थ हैं। इस प्रकार उन्होंने कश्मीरी [गेट का] मोर्चा मार लिया और दिल्लीको जीत लिया। कम्पनी सरकार इसीके बाद जीती थी। वह पूरी कहानी अत्यन्त करुणाजनक है। हमें विदेशी कपड़े बहिष्कारमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए जिसके बलपर वे प्रवेश पा सकें। दगा देनेमें ये कभी नहीं चूकते। यदि आप जापानी मालके आयातकी छूट देंगे तो इंग्लैंडवाले अपना माल बरास्ता जापान यहाँ भेजेंगे। ये लोग तो कमीशन देकर भी जापानके द्वारा अपना माल यहाँ भिजवा सकते हैं। अतः यदि आप विदेश से एक गज कपड़ा भी लाने देंगे तो कपड़ेकी कितनी ही गाँठे यहाँ पहुँच जायेंगी। हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रता व्यापारियोंने गंवाई है और व्यापारियोंकी शक्तिके बलपर ही हमें उसे प्राप्त करना है। अतः जिन लोगोंने आर्डर दिये हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका कपड़ा निकम्मे मालकी तरह पड़ा रह जायेगा। और यदि आप त्याग करेंगे तो हम इन लोगों को भी उस व्यापारस बाहर खींच लेंगे।
अब हम शराबबन्दीकी बातको लें। मीठूबहनने इसके लिए कितना त्याग किया है। हम सभीको इस काममें हाथ बँटाना चाहिए। यदि इतना सब हो सके तो हम ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़े, २५ करोड़ शराब और अफीमके तथा ६ करोड़ रुपये नमक के बचा सकते हैं। किन्तु ऐसा करनेके लिए हममें त्यागशक्ति, संघशक्ति, बुद्धि-शक्ति तथा विचारशक्तिका होना आवश्यक है। यदि यह सब हो जाये तो स्वराज्य हमारे हाथमें ही होगा ।
मेरे सहयोगियों में भंगियोंकी खूबियाँ हैं सो तो आप जानते ही हैं। किन्तु
फिलहाल में महिला स्वयंसेविकाओंके बारेंमें कुछ कहना चाहता हूँ। इन स्वयंसेविकाओं-
में से एक, दादाभाईकी पौनी, आज यहाँ पहुँची हैं। उन्होंने सायण ग्राम में पहुँचकर
शाडू मांगी क्योंकि उन्हें गाँव बहुत गंदा नजर आया। दादाभाईकी पौत्री गन्दगीको
बरदाश्त नहीं कर सकतीं इसलिए ये गाँवकी सफाई करनेमें जुट गई। जो लोग उन्हें
पहले नहीं पहचान पाये थे, उन्हें ऐसा करते देख उन्होंने पता लगाया और तुरन्त
पता चल गया और लोगोंने उनका बड़ा स्वागत किया। इस उदाहरणका उल्लेख मैंने
ढिढोरा पीटनेके खयालसे नहीं, बल्कि इसलिए किया है कि सभी स्वयंसेवकों के लिए यह
४३-११<noinclude></noinclude>
44v0jnqsv1pr5jw5y1ltggvfaj31sal
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण: सांधियेरमें|१६९}}</noinclude>वही दैवी धन्धा हो जायेगा। तो प्रश्न है कि इस लड़ाईमें व्यापारी कहाँतक हाथ बँटा सकते हैं? व्यापारी कहते हैं कि वे जापानका माल मँगायेंगे, इंग्लैंडका नहीं। किन्तु ऐसा करनेमें दो बड़े दोष हैं। एक तो इसका यह अर्थ हुआ कि अंग्रेजोंसे हमारी दुश्मनी है और इस कारण हम उनसे कपड़ा नहीं लेते; जबकि बात ऐसी नही है; बल्कि व्यापारके द्वारा वे हिन्दुस्तानके गरीबोंका धन हड़प लेना चाहते हैं, इस कारण हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हैं। यह बात हमें स्वप्नमें भी नहीं सोचनी चाहिए कि विदेशी कपड़ेका मतलब इंग्लैंडका बना कपड़ा है। हालांक आप इतने दिनोंसे उनके साथ व्यापार कर रहे हैं, किन्तु आप उनकी व्यापारिक चतुराईको समझ ही नहीं सके हैं। आप तो यह नहीं जानते कि उन्होंने दिल्लीको कैसे जीता था। यदि ये लोग कुछ पाना चाहते हैं तो उसे जरा-सी गुंजाइश मिलते ही ले डालने में समर्थ हैं। इस प्रकार उन्होंने कश्मीरी [गेट का] मोर्चा मार लिया और दिल्लीको जीत लिया। कम्पनी सरकार इसीके बाद जीती थी। वह पूरी कहानी अत्यन्त करुणाजनक है। हमें विदेशी कपड़े बहिष्कारमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए जिसके बलपर वे प्रवेश पा सकें। दगा देनेमें ये कभी नहीं चूकते। यदि आप जापानी मालके आयातकी छूट देंगे तो इंग्लैंडवाले अपना माल बरास्ता जापान यहाँ भेजेंगे। ये लोग तो कमीशन देकर भी जापानके द्वारा अपना माल यहाँ भिजवा सकते हैं। अतः यदि आप विदेश से एक गज कपड़ा भी लाने देंगे तो कपड़ेकी कितनी ही गाँठे यहाँ पहुँच जायेंगी। हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रता व्यापारियोंने गंवाई है और व्यापारियोंकी शक्तिके बलपर ही हमें उसे प्राप्त करना है। अतः जिन लोगोंने आर्डर दिये हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका कपड़ा निकम्मे मालकी तरह पड़ा रह जायेगा। और यदि आप त्याग करेंगे तो हम इन लोगों को भी उस व्यापार से बाहर खींच लेंगे।
अब हम शराबबन्दीकी बातको लें। मीठूबहनने इसके लिए कितना त्याग किया है। हम सभीको इस काममें हाथ बंटाना चाहिए। यदि इतना सब हो सके तो हम ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़े, २५ करोड़ शराब और अफीमके तथा ६ करोड़ रुपये नमक के बचा सकते हैं। किन्तु ऐसा करनेके लिए हममें त्यागशक्ति, संघशक्ति, बुद्धि-शक्ति तथा विचारशक्तिका होना आवश्यक है। यदि यह सब हो जाये तो स्वराज्य हमारे हाथमें ही होगा ।
मेरे सहयोगियों में भंगियोंकी खूबियाँ हैं सो तो आप जानते ही हैं। किन्तु फिलहाल मैं महिला स्वयंसेविकाओंके बारेंमें कुछ कहना चाहता हूँ। इन स्वयंसेविकाओंमें से एक, दादाभाईकी पौनी, आज यहाँ पहुँची हैं। उन्होंने सायण ग्राम में पहुँचकर झाडू मांगी क्योंकि उन्हें गाँव बहुत गंदा नजर आया। दादाभाईकी पौत्री गन्दगीको बरदाश्त नहीं कर सकतीं इसलिए ये गाँवकी सफाई करनेमें जुट गई। जो लोग उन्हें पहले नहीं पहचान पाये थे, उन्हें ऐसा करते देख उन्होंने पता लगाया और तुरन्त पता चल गया और लोगोंने उनका बड़ा स्वागत किया। इस उदाहरणका उल्लेख मैंने ढिढोरा पीटनेके खयालसे नहीं, बल्कि इसलिए किया है कि सभी स्वयंसेवकों के लिए यह
४३-११<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: सांधियेरमें|१६९}}</noinclude>वही दैवी धन्धा हो जायेगा। तो प्रश्न है कि इस लड़ाईमें व्यापारी कहाँतक हाथ बँटा सकते हैं? व्यापारी कहते हैं कि वे जापानका माल मँगायेंगे, इंग्लैंडका नहीं। किन्तु ऐसा करनेमें दो बड़े दोष हैं। एक तो इसका यह अर्थ हुआ कि अंग्रेजोंसे हमारी दुश्मनी है और इस कारण हम उनसे कपड़ा नहीं लेते; जबकि बात ऐसी नही है; बल्कि व्यापारके द्वारा वे हिन्दुस्तानके गरीबोंका धन हड़प लेना चाहते हैं, इस कारण हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हैं। यह बात हमें स्वप्नमें भी नहीं सोचनी चाहिए कि विदेशी कपड़ेका मतलब इंग्लैंडका बना कपड़ा है। हालांक आप इतने दिनोंसे उनके साथ व्यापार कर रहे हैं, किन्तु आप उनकी व्यापारिक चतुराईको समझ ही नहीं सके हैं। आप तो यह नहीं जानते कि उन्होंने दिल्लीको कैसे जीता था। यदि ये लोग कुछ पाना चाहते हैं तो उसे जरा-सी गुंजाइश मिलते ही ले डालने में समर्थ हैं। इस प्रकार उन्होंने कश्मीरी [गेट का] मोर्चा मार लिया और दिल्लीको जीत लिया। कम्पनी सरकार इसीके बाद जीती थी। वह पूरी कहानी अत्यन्त करुणाजनक है। हमें विदेशी कपड़े बहिष्कारमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए जिसके बलपर वे प्रवेश पा सकें। दगा देनेमें ये कभी नहीं चूकते। यदि आप जापानी मालके आयातकी छूट देंगे तो इंग्लैंडवाले अपना माल बरास्ता जापान यहाँ भेजेंगे। ये लोग तो कमीशन देकर भी जापानके द्वारा अपना माल यहाँ भिजवा सकते हैं। अतः यदि आप विदेश से एक गज कपड़ा भी लाने देंगे तो कपड़ेकी कितनी ही गाँठे यहाँ पहुँच जायेंगी। हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रता व्यापारियोंने गंवाई है और व्यापारियोंकी शक्तिके बलपर ही हमें उसे प्राप्त करना है। अतः जिन लोगोंने आर्डर दिये हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका कपड़ा निकम्मे मालकी तरह पड़ा रह जायेगा। और यदि आप त्याग करेंगे तो हम इन लोगों को भी उस व्यापार से बाहर खींच लेंगे।
अब हम शराबबन्दीकी बातको लें। मीठूबहनने इसके लिए कितना त्याग किया है। हम सभीको इस काममें हाथ बंटाना चाहिए। यदि इतना सब हो सके तो हम ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़े, २५ करोड़ शराब और अफीमके तथा ६ करोड़ रुपये नमक के बचा सकते हैं। किन्तु ऐसा करनेके लिए हममें त्यागशक्ति, संघशक्ति, बुद्धि-शक्ति तथा विचारशक्तिका होना आवश्यक है। यदि यह सब हो जाये तो स्वराज्य हमारे हाथमें ही होगा ।
मेरे सहयोगियों में भंगियोंकी खूबियाँ हैं सो तो आप जानते ही हैं। किन्तु फिलहाल मैं महिला स्वयंसेविकाओंके बारेंमें कुछ कहना चाहता हूँ। इन स्वयंसेविकाओंमें से एक, दादाभाईकी पौनी, आज यहाँ पहुँची हैं। उन्होंने सायण ग्राम में पहुँचकर झाडू मांगी क्योंकि उन्हें गाँव बहुत गंदा नजर आया। दादाभाईकी पौत्री गन्दगीको बरदाश्त नहीं कर सकतीं इसलिए ये गाँवकी सफाई करनेमें जुट गई। जो लोग उन्हें पहले नहीं पहचान पाये थे, उन्हें ऐसा करते देख उन्होंने पता लगाया और तुरन्त पता चल गया और लोगोंने उनका बड़ा स्वागत किया। इस उदाहरणका उल्लेख मैंने ढिढोरा पीटनेके खयालसे नहीं, बल्कि इसलिए किया है कि सभी स्वयंसेवकों के लिए यह
४३-११<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: सांधियेरमें|१६९}}</noinclude>वही दैवी धन्धा हो जायेगा। तो प्रश्न है कि इस लड़ाईमें व्यापारी कहाँतक हाथ बँटा सकते हैं? व्यापारी कहते हैं कि वे जापानका माल मँगायेंगे, इंग्लैंडका नहीं। किन्तु ऐसा करनेमें दो बड़े दोष हैं। एक तो इसका यह अर्थ हुआ कि अंग्रेजोंसे हमारी दुश्मनी है और इस कारण हम उनसे कपड़ा नहीं लेते; जबकि बात ऐसी नही है; बल्कि व्यापारके द्वारा वे हिन्दुस्तानके गरीबोंका धन हड़प लेना चाहते हैं, इस कारण हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हैं। यह बात हमें स्वप्नमें भी नहीं सोचनी चाहिए कि विदेशी कपड़ेका मतलब इंग्लैंडका बना कपड़ा है। हालांक आप इतने दिनोंसे उनके साथ व्यापार कर रहे हैं, किन्तु आप उनकी व्यापारिक चतुराईको समझ ही नहीं सके हैं। आप तो यह नहीं जानते कि उन्होंने दिल्लीको कैसे जीता था। यदि ये लोग कुछ पाना चाहते हैं तो उसे जरा-सी गुंजाइश मिलते ही ले डालने में समर्थ हैं। इस प्रकार उन्होंने कश्मीरी [गेट का] मोर्चा मार लिया और दिल्लीको जीत लिया। कम्पनी सरकार इसीके बाद जीती थी। वह पूरी कहानी अत्यन्त करुणाजनक है। हमें विदेशी कपड़े बहिष्कारमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए जिसके बलपर वे प्रवेश पा सकें। दगा देनेमें ये कभी नहीं चूकते। यदि आप जापानी मालके आयातकी छूट देंगे तो इंग्लैंडवाले अपना माल बरास्ता जापान यहाँ भेजेंगे। ये लोग तो कमीशन देकर भी जापानके द्वारा अपना माल यहाँ भिजवा सकते हैं। अतः यदि आप विदेश से एक गज कपड़ा भी लाने देंगे तो कपड़ेकी कितनी ही गाँठे यहाँ पहुँच जायेंगी। हिन्दुस्तानकी स्वतन्त्रता व्यापारियोंने गंवाई है और व्यापारियोंकी शक्तिके बलपर ही हमें उसे प्राप्त करना है। अतः जिन लोगोंने आर्डर दिये हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका कपड़ा निकम्मे मालकी तरह पड़ा रह जायेगा। और यदि आप त्याग करेंगे तो हम इन लोगों को भी उस व्यापार से बाहर खींच लेंगे।
अब हम शराबबन्दीकी बातको लें। मीठूबहनने इसके लिए कितना त्याग किया है। हम सभीको इस काममें हाथ बंटाना चाहिए। यदि इतना सब हो सके तो हम ६० करोड़ रुपये विदेशी कपड़े, २५ करोड़ शराब और अफीमके तथा ६ करोड़ रुपये नमक के बचा सकते हैं। किन्तु ऐसा करनेके लिए हममें त्यागशक्ति, संघशक्ति, बुद्धि-शक्ति तथा विचारशक्तिका होना आवश्यक है। यदि यह सब हो जाये तो स्वराज्य हमारे हाथमें ही होगा।
मेरे सहयोगियों में भंगियोंकी खूबियाँ हैं सो तो आप जानते ही हैं। किन्तु फिलहाल मैं महिला स्वयंसेविकाओंके बारेंमें कुछ कहना चाहता हूँ। इन स्वयंसेविकाओंमें से एक, दादाभाईकी पौनी, आज यहाँ पहुँची हैं। उन्होंने सायण ग्राम में पहुँचकर झाडू मांगी क्योंकि उन्हें गाँव बहुत गंदा नजर आया। दादाभाईकी पौत्री गन्दगीको बरदाश्त नहीं कर सकतीं इसलिए ये गाँवकी सफाई करनेमें जुट गई। जो लोग उन्हें पहले नहीं पहचान पाये थे, उन्हें ऐसा करते देख उन्होंने पता लगाया और तुरन्त पता चल गया और लोगोंने उनका बड़ा स्वागत किया। इस उदाहरणका उल्लेख मैंने ढिढोरा पीटनेके खयालसे नहीं, बल्कि इसलिए किया है कि सभी स्वयंसेवकों के लिए यह
४३-११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए
हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि
वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ।
मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है।
एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे।
आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें १'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु
जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल
हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति
गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे
उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के
बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ।
आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह
कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी।
आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके
सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी
पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु
ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं,
किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल,
बिहार और संयुक्त प्रान्तको तुलनामें गुजरात है क्या ? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान
मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका
भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते
हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम !
हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें
गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते
हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी ?
इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और में उन बत्तियोको लेकर वहाँ
जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोके
१. “धर्म-पात्रा" से उद्धृत<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए
हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि
वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ।
मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है।
एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे।
आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें १'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु
जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल
हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति
गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे
उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के
बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ।
आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह
कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी।
आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके
सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी
पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु
ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं,
किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल,
बिहार और संयुक्त प्रान्तको तुलनामें गुजरात है क्या ? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान
मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका
भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते
हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम !
हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें
गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते
हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी ?
इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और में उन बत्तियोको लेकर वहाँ
जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोके
१. “धर्म-पात्रा" से उद्धृत<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए
हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि
वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ।
मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है।
एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे।
आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें१'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु
जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल
हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति
गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे
उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के
बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ।
आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह
कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी।
आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके
सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी
पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु
ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं,
किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल,
बिहार और संयुक्त प्रान्तको तुलनामें गुजरात है क्या ? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान
मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका
भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते
हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम !
हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें
गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते
हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी ?
इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और में उन बत्तियोको लेकर वहाँ
जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोके
१. “धर्म-पात्रा" से उद्धृत<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए
हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि
वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ।
मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है।
एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे।
आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें१'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल
हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति
गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे
उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के
बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ।
आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी। आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं, किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रान्तकी तुलनामें गुजरात है क्या? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम! हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी? इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और मैं उन बत्तियोको लेकर वहाँ जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोके
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक अनुकरणीय उदाहरण है। आज तो गांवोंकी सफाई बहुत ही जरूरी है। इसलिए
हम गन्दे गाँवोंको साफ करने जा रहे हैं। इस पाठसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि
वे स्वराज्यको निकट ले आई हैं। मैं तो बहनोंको भी बलिदान कर देना चाहता हूँ।
मैं आपको इस बातकी याद दिला देना चाहता हूँ कि हमें आत्मशुद्धि करनी है।
एक ओर हम सविनय अवज्ञा करते रहेंगे तो दूसरी ओर हम शुद्ध होते जायेंगे।
आपको भगवान् इन सब बातोंको समझने की सामर्थ्य दे।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१४९. भाषण : देलाडमें१'''}}}}
{{Right|३० मार्च, १९३०}}
जैसा कि 'गीता' में कहा गया है, जो वस्तु आरम्भमें कड़वी लगती हो किन्तु जिसका परिणाम मधुर हो वह सात्त्विक है। इसलिए हालांकि कल मेरा चित्त व्याकुल
हो उठा था और वह व्याकुलता अभीतक मिटी नहीं है, किन्तु मैने अपनी शान्ति
गँवाई नहीं है; मित्रों, साथियों और सभाके सामने मैंने जो प्रेमके अंगारे उगले थे
उन्होंने मेरे शब्दोंको उस रूपमें नहीं लिया। कलकी उस चौंधिया देनेवाली रोशनी के
बदले में आज दीपकका मन्द मन्द टिमटिमाता हुआ प्रकाश देख पा रहा हूँ।
आजकी सभा में मुझे जो आन्तरिक और बाह्य शान्ति दिखाई पड़ रही है वह कल दिखाई नहीं देती थी। कलकी उन वत्तियोंमें मुझे कृत्रिमता नजर आती थी। आपके ग्राम्य जीवन और उन बत्तियोंमें मुझे कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ा। शहरोंके सम्पर्क में आने से ऐसी बत्तियाँ जल सकती है किन्तु असंख्य गाँव, शहरों और रेलकी पटरीसे सैकड़ों मील दूर पड़े हैं। हमारा विचार ऐसे गांवोंकी सेवा करनेका है किन्तु ऐसे गांवोंको तो आप जानते भी नहीं हैं। शायद ऐसे गाँव गुजरातमें तो होंगे नहीं, किन्तु गुजरात ही क्या हिन्दुस्तान है? वह तो हिन्दुस्तानका एक अंश मात्र है। बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रान्तकी तुलनामें गुजरात है क्या? संयुक्त प्रान्तकी यात्राके दौरान मैं ऐसे गांवोंसे गुजरा हूँ जहाँ रातको एक दीपक तक नजर नहीं आया, सिर्फ कुत्तोंका भौंकना ही सुनाई पड़ता था। गुजरातके घरोंकी तुलना में ये घर खण्डहर-जैसे लगते हैं और उन्हें देखकर रोना आता है, तथा मुंहसे ये शब्द निकल पड़ते हैं: "हे राम! हिन्दुस्तान में ऐसे घर!" यहाँके लोग कंकालोंकी तरह हैं। कड़कड़ाती सरदीमें उन्हें गुदड़ी तक नसीब नहीं होती। दरवाजा बन्द कर चिथड़े लपेटे जैसे-तैसे पड़े रहते हैं। उन गांवोंकी मुझे याद आती है। क्या ऐसे गाँवोंमें वे बत्तियां हमें शोभा देंगी? इन गाँवोंके लिए कोई सेठ मुझे पाँच बत्तियां दे और मैं उन बत्तियोको लेकर वहाँ जाऊँ तो मैं पाप करूंगा और उस हद तक पापका भागी बनूंगा। जहाँ घर घूरोंके
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०५
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : देलाडमें|१६३|}}</noinclude>ढेर-से नजर आते हों और जहाँ लोग पानी और अन्नके बिना तरसते हों, यदि कोई
मुझे पैसे दे, तो पहले मैं कुँएँ खुदवाऊँगा और उनके घरोंकी मरम्मत करवाऊँगा, मैं
उन्हें गायें और चरखे दूंगा और यदि सम्भव हुआ तो बगीचे भी लगवा दूंगा। किन्तु
बत्तियोंके लिए मैं कदापि पैसे इकट्ठे नहीं करूँगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि बत्तियां
न होने की वजहसे सरकारी आंकड़ोंके अनुसार ऐसे गांवोंमें लगभग २० लाख लोग
सांपोंके काटने से मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त न जाने ऐसे कितने लोग मरते होंगे
जो इस संख्या में शामिल नहीं हैं। इन लोगोंके प्राण बचानेके लिए न तो वहाँ दवा-
इयाँ हैं और न ऐसी बत्तियाँ ही, किन्तु फिर भी मैं चौंधिया देनेवाली ऐसी बत्तियाँ
वहाँ ले जानेकी हिम्मत नहीं करूँगा। यह उन लोगोंकी आवश्यकताओंको बढ़ानेकी बात
हो जायेगी। यह तो उपवास करनेवालेको चूरमा देने जैसा है। यदि एक बार
आवश्यकताएँ बढ़ गई तो उन्हें पूरा करनेके लिए वह किसी भी सीमा तक जा
सकता है। जब कि करोड़ों लोगोंको खानेको रोटीका एक टुकड़ा और खराब नमक
भी पूरी तरह न मिलता हो तो खाते समय मेरे मनमें यह विचार आता है कि तुझे
इतना खाने क्या अधिकार है। किन्तु मोहवश और सेवा करनेकी आशासे में दूध
पीता रहता हूँ।
हमें तो अपने कर्त्तव्यका विचार करना है। हम राक्षसी साम्राज्यसे टक्कर लेना
चाहते हैं, किन्तु दुत्कारकर या हल्ला-गुल्ला मचाकर हम ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि
अहिंसात्मक मार्गको अपनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। अहिंसा भले अंधी, लूली-लंगड़ी या फटेहाल दिखाई देती हो, किन्तु जब उसमें ईश्वरप्रदत्त शक्ति आकर मिल जाती है तो प्रतिपक्षी उसके सामने हतप्रभ हो जाता है, उसे लकवा मार जाता
है। इसी शक्तिके भरोसे हमें काम करना है और यह बत्तियोंके द्वारा नहीं हो
सकता। इन बत्तियों को हटाकर मैने अपने सहयोगियोंको आघात पहुंचाया है। उन्हें
ऐसा लगता था कि इन बत्तियोंके बिना लोग परेशान होंगे; किन्तु मेरे विचारसे
तो ऐसे सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं थी। अब जो सन्देश में दे रहा हूँ यह आपको
कठोर नहीं जान पड़ता। बत्तियोंके कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : देलाडमें|१६३|}}</noinclude>ढेर-से नजर आते हों और जहाँ लोग पानी और अन्नके बिना तरसते हों, यदि कोई
मुझे पैसे दे, तो पहले मैं कुँएँ खुदवाऊँगा और उनके घरोंकी मरम्मत करवाऊँगा, मैं
उन्हें गायें और चरखे दूंगा और यदि सम्भव हुआ तो बगीचे भी लगवा दूंगा। किन्तु
बत्तियोंके लिए मैं कदापि पैसे इकट्ठे नहीं करूँगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि बत्तियां
न होने की वजहसे सरकारी आंकड़ोंके अनुसार ऐसे गांवोंमें लगभग २० लाख लोग
सांपोंके काटने से मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त न जाने ऐसे कितने लोग मरते होंगे
जो इस संख्या में शामिल नहीं हैं। इन लोगोंके प्राण बचानेके लिए न तो वहाँ दवा-
इयाँ हैं और न ऐसी बत्तियाँ ही, किन्तु फिर भी मैं चौंधिया देनेवाली ऐसी बत्तियाँ
वहाँ ले जानेकी हिम्मत नहीं करूँगा। यह उन लोगोंकी आवश्यकताओंको बढ़ानेकी बात
हो जायेगी। यह तो उपवास करनेवालेको चूरमा देने जैसा है। यदि एक बार
आवश्यकताएँ बढ़ गई तो उन्हें पूरा करनेके लिए वह किसी भी सीमा तक जा
सकता है। जब कि करोड़ों लोगोंको खानेको रोटीका एक टुकड़ा और खराब नमक
भी पूरी तरह न मिलता हो तो खाते समय मेरे मनमें यह विचार आता है कि तुझे
इतना खाने क्या अधिकार है। किन्तु मोहवश और सेवा करनेकी आशासे में दूध
पीता रहता हूँ।
हमें तो अपने कर्त्तव्यका विचार करना है। हम राक्षसी साम्राज्यसे टक्कर लेना चाहते हैं, किन्तु दुत्कारकर या हल्ला-गुल्ला मचाकर हम ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि
अहिंसात्मक मार्गको अपनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। अहिंसा भले अंधी, लूली-लंगड़ी या फटेहाल दिखाई देती हो, किन्तु जब उसमें ईश्वरप्रदत्त शक्ति आकर मिल जाती है तो प्रतिपक्षी उसके सामने हतप्रभ हो जाता है, उसे लकवा मार जाता
है। इसी शक्तिके भरोसे हमें काम करना है और यह बत्तियोंके द्वारा नहीं हो सकता। इन बत्तियों को हटाकर मैने अपने सहयोगियोंको आघात पहुंचाया है। उन्हें ऐसा लगता था कि इन बत्तियोंके बिना लोग परेशान होंगे; किन्तु मेरे विचारसे तो ऐसे सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं थी। अब जो सन्देश में दे रहा हूँ यह आपको कठोर नहीं जान पड़ता। बत्तियोंके कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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मुझे पैसे दे, तो पहले मैं कुँएँ खुदवाऊँगा और उनके घरोंकी मरम्मत करवाऊँगा, मैं
उन्हें गायें और चरखे दूंगा और यदि सम्भव हुआ तो बगीचे भी लगवा दूंगा। किन्तु
बत्तियोंके लिए मैं कदापि पैसे इकट्ठे नहीं करूँगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि बत्तियां
न होने की वजहसे सरकारी आंकड़ोंके अनुसार ऐसे गांवोंमें लगभग २० लाख लोग
सांपोंके काटने से मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त न जाने ऐसे कितने लोग मरते होंगे
जो इस संख्या में शामिल नहीं हैं। इन लोगोंके प्राण बचानेके लिए न तो वहाँ दवा-
इयाँ हैं और न ऐसी बत्तियाँ ही, किन्तु फिर भी मैं चौंधिया देनेवाली ऐसी बत्तियाँ
वहाँ ले जानेकी हिम्मत नहीं करूँगा। यह उन लोगोंकी आवश्यकताओंको बढ़ानेकी बात
हो जायेगी। यह तो उपवास करनेवालेको चूरमा देने जैसा है। यदि एक बार
आवश्यकताएँ बढ़ गई तो उन्हें पूरा करनेके लिए वह किसी भी सीमा तक जा
सकता है। जब कि करोड़ों लोगोंको खानेको रोटीका एक टुकड़ा और खराब नमक
भी पूरी तरह न मिलता हो तो खाते समय मेरे मनमें यह विचार आता है कि तुझे
इतना खाने क्या अधिकार है। किन्तु मोहवश और सेवा करनेकी आशासे में दूध
पीता रहता हूँ।
हमें तो अपने कर्त्तव्यका विचार करना है। हम राक्षसी साम्राज्यसे टक्कर लेना चाहते हैं, किन्तु दुत्कारकर या हल्ला-गुल्ला मचाकर हम ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि
अहिंसात्मक मार्गको अपनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। अहिंसा भले अंधी, लूली-लंगड़ी या फटेहाल दिखाई देती हो, किन्तु जब उसमें ईश्वरप्रदत्त शक्ति आकर मिल जाती है तो प्रतिपक्षी उसके सामने हतप्रभ हो जाता है, उसे लकवा मार जाता
है। इसी शक्तिके भरोसे हमें काम करना है और यह बत्तियोंके द्वारा नहीं हो सकता। इन बत्तियों को हटाकर मैने अपने सहयोगियोंको आघात पहुंचाया है। उन्हें ऐसा लगता था कि इन बत्तियोंके बिना लोग परेशान होंगे; किन्तु मेरे विचारसे तो ऐसे सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं थी। अब जो सन्देश में दे रहा हूँ यह आपको कठोर नहीं जान पड़ता। बत्तियोंके कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था।
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'''नवजीवन''', १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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मुझे पैसे दे, तो पहले मैं कुँएँ खुदवाऊँगा और उनके घरोंकी मरम्मत करवाऊँगा, मैं
उन्हें गायें और चरखे दूंंगा और यदि सम्भव हुआ तो बगीचे भी लगवा दूंगा। किन्तु
बत्तियोंके लिए मैं कदापि पैसे इकट्ठे नहीं करूँगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि बत्तियां
न होने की वजहसे सरकारी आंकड़ोंके अनुसार ऐसे गांवोंमें लगभग २० लाख लोग
सांपोंके काटने से मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त न जाने ऐसे कितने लोग मरते होंगे
जो इस संख्या में शामिल नहीं हैं। इन लोगोंके प्राण बचानेके लिए न तो वहाँ दवा-
इयाँ हैं और न ऐसी बत्तियाँ ही, किन्तु फिर भी मैं चौंधिया देनेवाली ऐसी बत्तियाँ
वहाँ ले जानेकी हिम्मत नहीं करूँगा। यह उन लोगोंकी आवश्यकताओंको बढ़ानेकी बात
हो जायेगी। यह तो उपवास करनेवालेको चूरमा देने जैसा है। यदि एक बार आवश्यकताएँ बढ़ गई तो उन्हें पूरा करनेके लिए वह किसी भी सीमा तक जा
सकता है। जब कि करोड़ों लोगोंको खानेको रोटीका एक टुकड़ा और खराब नमक
भी पूरी तरह न मिलता हो तो खाते समय मेरे मनमें यह विचार आता है कि तुझे
इतना खाने क्या अधिकार है। किन्तु मोहवश और सेवा करनेकी आशासे में दूध
पीता रहता हूँ।
हमें तो अपने कर्त्तव्यका विचार करना है। हम राक्षसी साम्राज्यसे टक्कर लेना चाहते हैं, किन्तु दुत्कारकर या हल्ला-गुल्ला मचाकर हम ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि
अहिंसात्मक मार्गको अपनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। अहिंसा भले अंधी, लूली-लंगड़ी या फटेहाल दिखाई देती हो, किन्तु जब उसमें ईश्वरप्रदत्त शक्ति आकर मिल जाती है तो प्रतिपक्षी उसके सामने हतप्रभ हो जाता है, उसे लकवा मार जाता
है। इसी शक्तिके भरोसे हमें काम करना है और यह बत्तियोंके द्वारा नहीं हो सकता। इन बत्तियों को हटाकर मैने अपने सहयोगियोंको आघात पहुंचाया है। उन्हें ऐसा लगता था कि इन बत्तियोंके बिना लोग परेशान होंगे; किन्तु मेरे विचारसे तो ऐसे सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं थी। अब जो सन्देश में दे रहा हूँ यह आपको कठोर नहीं जान पड़ता। बत्तियोंके कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger'''१५०. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन
लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सुबहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे
ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है।
'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था ।
अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दों-
का प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और
जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या
आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध
बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो : "यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया में ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था । अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C{{larger|'''१५०. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सु|बहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे
ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है।
'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था ।
अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दों-
का प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और
जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या
आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो : "यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया में ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था । अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सु|बहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे
ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है।
'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था ।
अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दों-
का प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और
जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या
आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो : "यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया में ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था । अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सु|बहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे
ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है।
'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था ।
अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दों-
का प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और
जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या
आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो:"यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया में ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था । अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सु|बहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे
ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है।
'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था ।
अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दों-
का प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और
जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या
आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो:"यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया में ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था । अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर' उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०७
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल में सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है। मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल में सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है। मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
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{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल में सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है। मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
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यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल में सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है।
मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०८
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/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||१६६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठीक कर रहे हो। अगले पखवाड़ेमें हमें पता चल जायेगा कि हम और क्या कर
सकते हैं या हमें और क्या करना चाहिए।
मेरी तरफसे और कोई समाचार न मिले तो एक साथ सब जगह आन्दोलन
शुरू कर देनेके लिए ६ अप्रैलका दिन समझ लो।
अब रातके दस वजनेवाले हैं, इसलिए राम-राम।
{{Right|बापू}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स'''
{{C|{{larger|'''१५२. भाषण: छापरभाठामें'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
मुझसे रोज सब लोग कहते हैं कि आज तो आपको अवश्य पकड़ लिया जायेगा। किन्तु बाघ आता ही नहीं है। समाचारपत्रोंका कहना है कि सरकार मुझे पकड़ नहीं रही है; अतः मैं अधीर हो उठा हूँ। यह बात आंशिक रूपसे ही सत्य है। क्योंकि यह तय हुआ था कि मैं जेलमें रहूँगा और सरदार बाहर रहेंगे। किन्तु अब तो सरदार जेलमें हैं; इसलिए मैं बाहर रहूँगा। यदि हम वल्लभभाईको कैदसे मुक्त कराना चाहते हों तो इस लड़ाईको जारी रखकर ही हम उन्हें छुड़ा सकते हैं।
चोर्यासीने सरदारकी पिछली लड़ाईका पूरा फायदा उठाया है, अतः [चोर्यासीके]
आप लोगोंको इस संघर्षमें पूरा योग देना चाहिए। स्वराज्यकी वर्षा तो सभी जगह
एक-सी ही होगी। ऐसा ही प्रबन्ध सरकारने भी आपके लिए कर दिया है। सरदारको
छुड़ा लेनेकी शक्ति तो हममें है ही। यदि हम निश्चय कर लें और सभी गांवों पर
एक उड़ती-सी नजर डालें तो यह कहा जा सकता है कि स्वराज्य आने ही वाला
है। किन्तु मैं अपनेको ही धोखा देनेवाले व्यक्तियोंमें से नहीं हूँ। आजकल तो मैं
पूरे वातावरणको परखता रहता हूँ।
यहाँ चरखेके बारेमें पूछताछ करनेपर पता चला कि गांवमें तो कुल जमा एक ही चरखा है। यदि बात ऐसी हो तब तो हम सरदारको नहीं छुड़ा सकेंगे। हमें हर दिशामें आगे बढ़ना है। आजकल तो हम नमक-कानून रद करवाने निकले हैं। हम लोग जगह-जगह नमक बनायेंगे और इस प्रकार सरकारको थका देंगे। किन्तु यह सब तो तभी हो सकता है जब कि आप इस सूत्रको कि 'सूतके धागे में स्वराज्य है' अपने व्यवहारमें परिणत कर दिखायें। जब ३० करोड़ लोग खादी पहनने लगेंगे और गांवोंकी समस्याओंको ध्यान में रखते हुए स्वराज्यके सभी अंगोंको विकसित करेंगे तभी यह बात सही सिद्ध होगी कि स्वराज्य लेना सहज है। यदि हम इस सहज-सरल धर्मका पालन करने लगें तो स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें ही रखा हुआ है।
आप इस बातपर विचार करें कि कीम नदीपर रातों-रात पुल कैसे बन गया था?<noinclude></noinclude>
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सकते हैं या हमें और क्या करना चाहिए।
मेरी तरफसे और कोई समाचार न मिले तो एक साथ सब जगह आन्दोलन
शुरू कर देनेके लिए ६ अप्रैलका दिन समझ लो।
अब रातके दस वजनेवाले हैं, इसलिए राम-राम।
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[ अंग्रेजीसे ]
'''ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स'''
{{C|{{larger|'''१५२. भाषण: छापरभाठामें'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
मुझसे रोज सब लोग कहते हैं कि आज तो आपको अवश्य पकड़ लिया जायेगा। किन्तु बाघ आता ही नहीं है। समाचारपत्रोंका कहना है कि सरकार मुझे पकड़ नहीं रही है; अतः मैं अधीर हो उठा हूँ। यह बात आंशिक रूपसे ही सत्य है। क्योंकि यह तय हुआ था कि मैं जेलमें रहूँगा और सरदार बाहर रहेंगे। किन्तु अब तो सरदार जेलमें हैं; इसलिए मैं बाहर रहूँगा। यदि हम वल्लभभाईको कैदसे मुक्त कराना चाहते हों तो इस लड़ाईको जारी रखकर ही हम उन्हें छुड़ा सकते हैं।
चोर्यासीने सरदारकी पिछली लड़ाईका पूरा फायदा उठाया है, अतः [चोर्यासीके]
आप लोगोंको इस संघर्षमें पूरा योग देना चाहिए। स्वराज्यकी वर्षा तो सभी जगह
एक-सी ही होगी। ऐसा ही प्रबन्ध सरकारने भी आपके लिए कर दिया है। सरदारको
छुड़ा लेनेकी शक्ति तो हममें है ही। यदि हम निश्चय कर लें और सभी गांवों पर
एक उड़ती-सी नजर डालें तो यह कहा जा सकता है कि स्वराज्य आने ही वाला
है। किन्तु मैं अपनेको ही धोखा देनेवाले व्यक्तियोंमें से नहीं हूँ। आजकल तो मैं
पूरे वातावरणको परखता रहता हूँ।
यहाँ चरखेके बारेमें पूछताछ करनेपर पता चला कि गांवमें तो कुल जमा एक ही चरखा है। यदि बात ऐसी हो तब तो हम सरदारको नहीं छुड़ा सकेंगे। हमें हर दिशामें आगे बढ़ना है। आजकल तो हम नमक-कानून रद करवाने निकले हैं। हम लोग जगह-जगह नमक बनायेंगे और इस प्रकार सरकारको थका देंगे। किन्तु यह सब तो तभी हो सकता है जब कि आप इस सूत्रको कि 'सूतके धागे में स्वराज्य है' अपने व्यवहारमें परिणत कर दिखायें। जब ३० करोड़ लोग खादी पहनने लगेंगे और गांवोंकी समस्याओंको ध्यान में रखते हुए स्वराज्यके सभी अंगोंको विकसित करेंगे तभी यह बात सही सिद्ध होगी कि स्वराज्य लेना सहज है। यदि हम इस सहज-सरल धर्मका पालन करने लगें तो स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें ही रखा हुआ है।
आप इस बातपर विचार करें कि कीम नदीपर रातों-रात पुल कैसे बन गया था?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०९
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : सूरत में|१६७}}</noinclude>इस प्रकार यदि लोग अपनी सामर्थ्य-भर काम करने लगें तो स्वराज्य प्राप्त करना
सहज है। अहमदाबाद और बम्बईके सेठ भी यहाँ आये हुए हैं और ये खुले हाथों
पैसा दे रहे हैं, इसके लिए मैं उन सबका आभारी हूँ। इस कार्यमें सभी लोगोंसे
सहायता मिल रही है, इससे मुझे लगता है कि इसमें ईश्वरका हाथ है।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१५३. भाषण: सूरत में'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
कुछ-न-कुछ दुःख, कोई-न-कोई कष्ट सहना तो हमारे लिए अनिवार्य ही है। और
इसके लिए हमने नमक-कानूनको ढूंढ निकाला है या फिर आप यह कह सकते हैं कि ईश्वरने हमारे लिए नमक कानून भिजवाया है। उक्त कर बिलकुल ही वर्वर और
दानवी है; नमककी मारफत सरकार बच्चों और बूढ़ोंसे भी यह कर उगाहती है। इस साम्राज्यके ऐसे दस्तावेज मैंने पढ़े हैं जिनमें इस बातपर जोर दिया गया है। कि शासनका प्रबन्ध चलानेवाले लोगोंको ऐसे उपाय अवश्य ही खोज निकालने चाहिए जिनके द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्तिसे कर वसूल किया जा सके। मैंने इस्लाम और
हिन्दू धर्मके ग्रन्थ उलटाये हैं; ईसाइयोंके धर्म ग्रन्थ भी मैंने देखे हैं और जरथुस्त्र के
धर्म-ग्रन्थ भी मैं पड़ गया हूँ। इन सभीमें यह बताया गया है कि स्त्रियों और निर्धनोंपर
कभी कर नहीं लगाना चाहिए। यदि हम युद्धके नियमों को पढ़ें तो उनमें कहा गया
है कि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों, इन सबको लड़ाईके पंजेसे अलग रखना चाहिए।
यही बात इस करके बारेमें लागू होती है। मुसलमान हिन्दू, पारसी सभी नमक तो
समान अनुपात में ही खाते हैं सरकारने सबको एक ही इंडेसे हाँकनेकी युक्ति खोज
निकाली है। यह शैतानी इन्साफ है, राक्षसी न्याय है।
मैंने दुनियामें और कहीं ऐसे न्यायकी बात नहीं सुनी। न्यायके ऐसे स्वरूपको मैं राक्षसी न्याय, शैतानी इन्साफ कहूँगा। जो साम्राज्य ऐसा न्याय करता है उसे सलामी देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। जो व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्तमें भगवान्की आराधना करता है वह ऐसे साम्राज्यकी कल्याण-कामनाके लिए न तो भगवान्से प्रार्थना कर सकता है, न उसे करनी ही चाहिए। बल्कि प्रार्थना या नमाजके वक्त भगवान् या खुदासे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान्, ऐसे राक्षसी साम्राज्य, ऐसी शैतानी सल्तनतका नाश हो। इस प्रकार नाशकी कामना करना धर्म है। हालांकि पिछले बीस दिनोंसे में यह बात खुलेआम कहता रहा हूँ, किन्तु सरकारने मुझे और मेरे साथियोंको खुला छोड़ रखा है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सरकारकी यह एक अपनी खूबी है । मैं आजतक इसे राक्षसी साम्राज्य तो कहता आया हूँ किन्तु इसके बावजूद मैंने इससे भी इनकार नहीं किया कि सरकारके पास शक्ति है; मैंने एक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६७}}</noinclude>इस प्रकार यदि लोग अपनी सामर्थ्य-भर काम करने लगें तो स्वराज्य प्राप्त करना
सहज है। अहमदाबाद और बम्बईके सेठ भी यहाँ आये हुए हैं और ये खुले हाथों
पैसा दे रहे हैं, इसके लिए मैं उन सबका आभारी हूँ। इस कार्यमें सभी लोगोंसे
सहायता मिल रही है, इससे मुझे लगता है कि इसमें ईश्वरका हाथ है।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१५३. भाषण: सूरत में'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
कुछ-न-कुछ दुःख, कोई-न-कोई कष्ट सहना तो हमारे लिए अनिवार्य ही है। और
इसके लिए हमने नमक-कानूनको ढूंढ निकाला है या फिर आप यह कह सकते हैं कि ईश्वरने हमारे लिए नमक कानून भिजवाया है। उक्त कर बिलकुल ही वर्वर और दानवी है; नमककी मारफत सरकार बच्चों और बूढ़ोंसे भी यह कर उगाहती है। इस साम्राज्यके ऐसे दस्तावेज मैंने पढ़े हैं जिनमें इस बातपर जोर दिया गया है। कि शासनका प्रबन्ध चलानेवाले लोगोंको ऐसे उपाय अवश्य ही खोज निकालने चाहिए जिनके द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्तिसे कर वसूल किया जा सके। मैंने इस्लाम और
हिन्दू धर्मके ग्रन्थ उलटाये हैं; ईसाइयोंके धर्म ग्रन्थ भी मैंने देखे हैं और जरथुस्त्र के
धर्म-ग्रन्थ भी मैं पड़ गया हूँ। इन सभीमें यह बताया गया है कि स्त्रियों और निर्धनोंपर
कभी कर नहीं लगाना चाहिए। यदि हम युद्धके नियमों को पढ़ें तो उनमें कहा गया
है कि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों, इन सबको लड़ाईके पंजेसे अलग रखना चाहिए।
यही बात इस करके बारेमें लागू होती है। मुसलमान हिन्दू, पारसी सभी नमक तो
समान अनुपात में ही खाते हैं सरकारने सबको एक ही इंडेसे हाँकनेकी युक्ति खोज
निकाली है। यह शैतानी इन्साफ है, राक्षसी न्याय है।
मैंने दुनियामें और कहीं ऐसे न्यायकी बात नहीं सुनी। न्यायके ऐसे स्वरूपको मैं राक्षसी न्याय, शैतानी इन्साफ कहूँगा। जो साम्राज्य ऐसा न्याय करता है उसे सलामी देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। जो व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्तमें भगवान्की आराधना करता है वह ऐसे साम्राज्यकी कल्याण-कामनाके लिए न तो भगवान्से प्रार्थना कर सकता है, न उसे करनी ही चाहिए। बल्कि प्रार्थना या नमाजके वक्त भगवान् या खुदासे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान्, ऐसे राक्षसी साम्राज्य, ऐसी शैतानी सल्तनतका नाश हो। इस प्रकार नाशकी कामना करना धर्म है। हालांकि पिछले बीस दिनोंसे में यह बात खुलेआम कहता रहा हूँ, किन्तु सरकारने मुझे और मेरे साथियोंको खुला छोड़ रखा है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सरकारकी यह एक अपनी खूबी है । मैं आजतक इसे राक्षसी साम्राज्य तो कहता आया हूँ किन्तु इसके बावजूद मैंने इससे भी इनकार नहीं किया कि सरकारके पास शक्ति है; मैंने एक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६७}}</noinclude>इस प्रकार यदि लोग अपनी सामर्थ्य-भर काम करने लगें तो स्वराज्य प्राप्त करना
सहज है। अहमदाबाद और बम्बईके सेठ भी यहाँ आये हुए हैं और ये खुले हाथों
पैसा दे रहे हैं, इसके लिए मैं उन सबका आभारी हूँ। इस कार्यमें सभी लोगोंसे
सहायता मिल रही है, इससे मुझे लगता है कि इसमें ईश्वरका हाथ है।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु,''' ६-४-१९३०
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कुछ-न-कुछ दुःख, कोई-न-कोई कष्ट सहना तो हमारे लिए अनिवार्य ही है। और
इसके लिए हमने नमक-कानूनको ढूंढ निकाला है या फिर आप यह कह सकते हैं कि ईश्वरने हमारे लिए नमक कानून भिजवाया है। उक्त कर बिलकुल ही वर्वर और दानवी है; नमककी मारफत सरकार बच्चों और बूढ़ोंसे भी यह कर उगाहती है। इस साम्राज्यके ऐसे दस्तावेज मैंने पढ़े हैं जिनमें इस बातपर जोर दिया गया है। कि शासनका प्रबन्ध चलानेवाले लोगोंको ऐसे उपाय अवश्य ही खोज निकालने चाहिए जिनके द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्तिसे कर वसूल किया जा सके। मैंने इस्लाम और
हिन्दू धर्मके ग्रन्थ उलटाये हैं; ईसाइयोंके धर्म ग्रन्थ भी मैंने देखे हैं और जरथुस्त्र के
धर्म-ग्रन्थ भी मैं पड़ गया हूँ। इन सभीमें यह बताया गया है कि स्त्रियों और निर्धनोंपर
कभी कर नहीं लगाना चाहिए। यदि हम युद्धके नियमों को पढ़ें तो उनमें कहा गया
है कि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों, इन सबको लड़ाईके पंजेसे अलग रखना चाहिए।
यही बात इस करके बारेमें लागू होती है। मुसलमान हिन्दू, पारसी सभी नमक तो
समान अनुपात में ही खाते हैं सरकारने सबको एक ही इंडेसे हाँकनेकी युक्ति खोज
निकाली है। यह शैतानी इन्साफ है, राक्षसी न्याय है।
मैंने दुनियामें और कहीं ऐसे न्यायकी बात नहीं सुनी। न्यायके ऐसे स्वरूपको मैं राक्षसी न्याय, शैतानी इन्साफ कहूँगा। जो साम्राज्य ऐसा न्याय करता है उसे सलामी देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। जो व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्तमें भगवान्की आराधना करता है वह ऐसे साम्राज्यकी कल्याण-कामनाके लिए न तो भगवान्से प्रार्थना कर सकता है, न उसे करनी ही चाहिए। बल्कि प्रार्थना या नमाजके वक्त भगवान् या खुदासे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान्, ऐसे राक्षसी साम्राज्य, ऐसी शैतानी सल्तनतका नाश हो। इस प्रकार नाशकी कामना करना धर्म है। हालांकि पिछले बीस दिनोंसे में यह बात खुलेआम कहता रहा हूँ, किन्तु सरकारने मुझे और मेरे साथियोंको खुला छोड़ रखा है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सरकारकी यह एक अपनी खूबी है। मैं आजतक इसे राक्षसी साम्राज्य तो कहता आया हूँ किन्तु इसके बावजूद मैंने इससे भी इनकार नहीं किया कि सरकारके पास शक्ति है; मैंने एक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्षणके लिए भी यह नहीं माना कि इस सरकार के पास सत्ता या शक्ति नहीं हैं। इस
सरकारके पास फौज है, गोला-बारूद है और वह मुझ जैसोंको चुटकी में मसल सकती है। किन्तु यह सरकार एकाएक अपनी मर्यादाका उल्लंघन नहीं कर सकती। क्योंकि फिर वह दुनियाको अपना मुँह कैसे दिखायेगी! इस सरकारको जालिम कहनेके सिवा मैने या मेरे साथियों अथवा मेरे सम्पर्क में आनेवाले हजारों लोगों में से किसीने स्वप्न में भी ऐसी कामना नहीं की कि इसके सम्राट् अथवा किसी अधिकारीका नाश हो। हमारा यह रुख इस सरकारको एक सर्वथा नई चीज जान पड़ती है और वह आगे
कदम नहीं बढ़ा सकती।
ठीक रवाना होनेके दिन साबरमतीके तटपर जो बात मैंने कही थी वही बात मैं आज ताप्तीके तीर पर आपसे कहना चाहता हूँ । यदि हमने यह कहा होता कि हम एक कोई छोटी कंकड़ी भी अधिकारियों पर फेंकेंगे तो क्या यह सरकार हममें से किसीको बाहर छोड़नेवाली थी ? कुछ लोग कहते हैं कि मुझे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। गिरफ्तार हो जानेको मैं अपना धर्म नहीं मानता, किन्तु मैं गिरफ्तार होनेसे डरता भी नहीं हूँ और आप सब भी न डरें, यह मन्त्र में आपको दे रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए चाहे आपको गिरफ्तार किया जाये या फॉसीपर लटकाया जाये तो भी आप न डरें में जेलको महल बना देना चाहता हूँ। यदि मुझे केवल जेल जाना होता तो मैं चोरी करता, बदमाशी करता, मारपीट और गाली-गलौज करता। उस हालत में मुझे अवश्य पकड़ लिया जाता, कोई नहीं छोड़ता। उस समय सरकार यह नहीं कहती कि अब यह आदमी महात्मा नहीं रहा, महात्मा तो मर चुका है इसलिए हम इसे नहीं पकड़ेंगे और आज यदि सरकार मुझे पकड़ ले तो मैं जेलमें पड़े हुए भी प्रार्थना करूंगा कि हे भगवान्, तू इस सरकारका हृदय परिवर्तन कर और मनुष्यको शोभा न देनेवाली जो भावनाएँ इसके हृदयमें आ गई हैं उन्हें निकाल दे! किसी-न-किसी दिन मुझे पकड़ लेनेके अतिरिक्त सरकारके सामने और कोई चारा नहीं है; और यदि यह मुझे नहीं पकड़ती तो कुछ ही समय में सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मुझे बाहर रहने देना या जेल में बन्द करना दोनों ही बातें इसके लिए कठिन है। हिन्दू, मुसलमान, पारसी सभीको अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। यदि हम सब ऐसा करने लगें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सरकारके बसकी बात नहीं होगी।
फिर गिरफ्तारियां एक मामूली बात रह जायेगी। कानून कायदे टूटते ही चले
जायेंगे आज एक, कल दूसरा और कायदे-कानून टूटे नहीं कि फिर सल्तनत कहाँ
रही ? पटेल और तलाटियोंको इस्तीफे दे देने चाहिए। उन्हें यह बात समझ लेनी
चाहिए कि रोटी-रिश्क देनेवाला तो ईश्वर है। तलाटीगिरीमें ३७ रु० मिलें या न
मिलें, उससे क्या होता है? मिलके मजदूर जिनमें से मैं भी एक है--- ५० रुपये कमाते हैं और इतनेपर भी वे मिल मालिकोंको डरा सकते हैं, हड़ताल करते हैं और मिल-मालिकोंको उन्हें सन्तुष्ट करना पड़ता है। क्योंकि मजदूरोंके बिना वे काम नहीं चला सकते। यदि कोई तलाटी मिलमें जाकर वफादारीसे नौकरी करे तो वह ५० रुपये<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्षणके लिए भी यह नहीं माना कि इस सरकार के पास सत्ता या शक्ति नहीं हैं। इस
सरकारके पास फौज है, गोला-बारूद है और वह मुझ जैसोंको चुटकी में मसल सकती है। किन्तु यह सरकार एकाएक अपनी मर्यादाका उल्लंघन नहीं कर सकती। क्योंकि फिर वह दुनियाको अपना मुँह कैसे दिखायेगी! इस सरकारको जालिम कहनेके सिवा मैने या मेरे साथियों अथवा मेरे सम्पर्क में आनेवाले हजारों लोगों में से किसीने स्वप्न में भी ऐसी कामना नहीं की कि इसके सम्राट् अथवा किसी अधिकारीका नाश हो। हमारा यह रुख इस सरकारको एक सर्वथा नई चीज जान पड़ती है और वह आगे
कदम नहीं बढ़ा सकती।
ठीक रवाना होनेके दिन साबरमतीके तटपर जो बात मैंने कही थी वही बात मैं आज ताप्तीके तीर पर आपसे कहना चाहता हूँ । यदि हमने यह कहा होता कि हम एक कोई छोटी कंकड़ी भी अधिकारियों पर फेंकेंगे तो क्या यह सरकार हममें से किसीको बाहर छोड़नेवाली थी? कुछ लोग कहते हैं कि मुझे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। गिरफ्तार हो जानेको मैं अपना धर्म नहीं मानता, किन्तु मैं गिरफ्तार होनेसे डरता भी नहीं हूँ और आप सब भी न डरें, यह मन्त्र में आपको दे रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए चाहे आपको गिरफ्तार किया जाये या फॉसीपर लटकाया जाये तो भी आप न डरें में जेलको महल बना देना चाहता हूँ। यदि मुझे केवल जेल जाना होता तो मैं चोरी करता, बदमाशी करता, मारपीट और गाली-गलौज करता। उस हालत में मुझे अवश्य पकड़ लिया जाता, कोई नहीं छोड़ता। उस समय सरकार यह नहीं कहती कि अब यह आदमी महात्मा नहीं रहा, महात्मा तो मर चुका है इसलिए हम इसे नहीं पकड़ेंगे और आज यदि सरकार मुझे पकड़ ले तो मैं जेलमें पड़े हुए भी प्रार्थना करूंगा कि हे भगवान्, तू इस सरकारका हृदय परिवर्तन कर और मनुष्यको शोभा न देनेवाली जो भावनाएँ इसके हृदयमें आ गई हैं उन्हें निकाल दे! किसी-न-किसी दिन मुझे पकड़ लेनेके अतिरिक्त सरकारके सामने और कोई चारा नहीं है; और यदि यह मुझे नहीं पकड़ती तो कुछ ही समय में सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मुझे बाहर रहने देना या जेल में बन्द करना दोनों ही बातें इसके लिए कठिन है। हिन्दू, मुसलमान, पारसी सभीको अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। यदि हम सब ऐसा करने लगें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सरकारके बसकी बात नहीं होगी।
फिर गिरफ्तारियां एक मामूली बात रह जायेगी। कानून कायदे टूटते ही चले
जायेंगे आज एक, कल दूसरा और कायदे-कानून टूटे नहीं कि फिर सल्तनत कहाँ
रही ? पटेल और तलाटियोंको इस्तीफे दे देने चाहिए। उन्हें यह बात समझ लेनी
चाहिए कि रोटी-रिश्क देनेवाला तो ईश्वर है। तलाटीगिरीमें ३७ रु० मिलें या न
मिलें, उससे क्या होता है? मिलके मजदूर जिनमें से मैं भी एक है--- ५० रुपये कमाते हैं और इतनेपर भी वे मिल मालिकोंको डरा सकते हैं, हड़ताल करते हैं और मिल-मालिकोंको उन्हें सन्तुष्ट करना पड़ता है। क्योंकि मजदूरोंके बिना वे काम नहीं चला सकते। यदि कोई तलाटी मिलमें जाकर वफादारीसे नौकरी करे तो वह ५० रुपये<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्षणके लिए भी यह नहीं माना कि इस सरकार के पास सत्ता या शक्ति नहीं हैं। इस
सरकारके पास फौज है, गोला-बारूद है और वह मुझ जैसोंको चुटकी में मसल सकती है। किन्तु यह सरकार एकाएक अपनी मर्यादाका उल्लंघन नहीं कर सकती। क्योंकि फिर वह दुनियाको अपना मुँह कैसे दिखायेगी! इस सरकारको जालिम कहनेके सिवा मैने या मेरे साथियों अथवा मेरे सम्पर्क में आनेवाले हजारों लोगों में से किसीने स्वप्न में भी ऐसी कामना नहीं की कि इसके सम्राट् अथवा किसी अधिकारीका नाश हो। हमारा यह रुख इस सरकारको एक सर्वथा नई चीज जान पड़ती है और वह आगे
कदम नहीं बढ़ा सकती।
ठीक रवाना होनेके दिन साबरमतीके तटपर जो बात मैंने कही थी वही बात मैं आज ताप्तीके तीर पर आपसे कहना चाहता हूँ । यदि हमने यह कहा होता कि हम एक कोई छोटी कंकड़ी भी अधिकारियों पर फेंकेंगे तो क्या यह सरकार हममें से किसीको बाहर छोड़नेवाली थी? कुछ लोग कहते हैं कि मुझे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। गिरफ्तार हो जानेको मैं अपना धर्म नहीं मानता, किन्तु मैं गिरफ्तार होनेसे डरता भी नहीं हूँ और आप सब भी न डरें, यह मन्त्र में आपको दे रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए चाहे आपको गिरफ्तार किया जाये या फॉसीपर लटकाया जाये तो भी आप न डरें में जेलको महल बना देना चाहता हूँ। यदि मुझे केवल जेल जाना होता तो मैं चोरी करता, बदमाशी करता, मारपीट और गाली-गलौज करता। उस हालत में मुझे अवश्य पकड़ लिया जाता, कोई नहीं छोड़ता। उस समय सरकार यह नहीं कहती कि अब यह आदमी महात्मा नहीं रहा, महात्मा तो मर चुका है इसलिए हम इसे नहीं पकड़ेंगे और आज यदि सरकार मुझे पकड़ ले तो मैं जेलमें पड़े हुए भी प्रार्थना करूंगा कि हे भगवान्, तू इस सरकारका हृदय परिवर्तन कर और मनुष्यको शोभा न देनेवाली जो भावनाएँ इसके हृदयमें आ गई हैं उन्हें निकाल दे! किसी-न-किसी दिन मुझे पकड़ लेनेके अतिरिक्त सरकारके सामने और कोई चारा नहीं है; और यदि यह मुझे नहीं पकड़ती तो कुछ ही समय में सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मुझे बाहर रहने देना या जेल में बन्द करना दोनों ही बातें इसके लिए कठिन है। हिन्दू, मुसलमान, पारसी सभीको अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। यदि हम सब ऐसा करने लगें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सरकारके बसकी बात नहीं होगी।
फिर गिरफ्तारियां एक मामूली बात रह जायेगी। कानून कायदे टूटते ही चले जायेंगे आज एक, कल दूसरा और कायदे-कानून टूटे नहीं कि फिर सल्तनत कहाँ। रही? पटेल और तलाटियोंको इस्तीफे दे देने चाहिए। उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए कि रोटी-रिश्क देनेवाला तो ईश्वर है। तलाटीगिरीमें ३७ रु० मिलें या न मिलें, उससे क्या होता है? मिलके मजदूर जिनमें से मैं भी एक है--- ५० रुपये कमाते हैं और इतनेपर भी वे मिल मालिकोंको डरा सकते हैं, हड़ताल करते हैं और मिल-मालिकोंको उन्हें सन्तुष्ट करना पड़ता है। क्योंकि मजदूरोंके बिना वे काम नहीं चला सकते। यदि कोई तलाटी मिलमें जाकर वफादारीसे नौकरी करे तो वह ५० रुपये<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२११
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण : सूरत में|१६९}}</noinclude>कमा सकता है और यदि अच्छा काम करके दिखाये तो इससे ज्यादा भी पा सकता
है। ३७ रुपये तो वह बहुत आसानीसे कमा ले सकता है। वह अपंग हो और सिर्फ
सूत काते तो भी उसे कुछ पैसे मिलेंगे। जो आदमी मजूरी करने को तैयार हो उसे रोजी कमानेमें कितनी देर लगती है? इस प्रकार जब तलाटी और सरकारी कर्मचारी
भय मुक्त हो जायेंगे तो फिर सरकार क्या करेगी? क्या इंग्लंडसे फौज लाकर सिपा-
हियोंको पटेलों और तलाटियोंका काम सौंपेगी? जब हिन्दू, मुसलमान, पारसी आदि
सभी लोग इनकार कर देंगे तो सरकार क्या करेगी? वह कुछ नहीं कर सकेगी। इसकी
एक-एक नस ढीली पड़ जायेगी। इस प्रकार बिना मेहनत और किसी भी व्यक्तिके
जेल गये बिना स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें होगा। किन्तु यह सब में किसे सिखाऊँ?
आपको खादी मोटी और महँगी जान पड़ती है। आप अपने अंगों का प्रदर्शन करना चाहते हैं, जब कि मैं उनको ढकना चाहता हूँ। कपड़े पहननेके बावजूद स्वयंको नंगा दिखाना आज हम लोगों में रूढ़ हो गया है। यह अमानवीय चलन है; नंगे दिखते रहना इसी सल्तनतमें उचित माना जाता है। कपड़े शरीरको कनेके लिए पहने जाते हैं, यदि आपको नंगे ही रहना है तो कपड़े क्यों पहनते हैं? इस सल्तनत-में नंगा दिखना गुनाह नहीं माना जाता। आप उस तरह घूम-फिर सकते हैं। यदि शरीरको बैंकनेके लिए ही कपड़े पहने जाते हों तो फिर खादीसे अच्छी और कौन-सी चीज मैं आपको दे सकता हूँ? आप कोई और चीज क्यों चाहते हैं? आपकी जिन मां-बहनोंको खानेको नहीं मिलता और जो सूत वे घर बैठकर कातती हैं, उससे बुना हुआ कपड़ा पहनते आपको शर्म आती है।
आज आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके अपने कर्त्तव्यको समझ लें। क्योंकि जब
तक हम जापानी कपड़ेका व्यवहार करते रहेंगे तबतक इंग्लैंडमें बने कपड़ेका बहिष्कार करना असम्भव है। यदि हम ऐसा करेंगे तो दोनों बातें नहीं सधेगी -- हम
अंग्रेजी मालका बहिष्कार नहीं कर पायेंगे और इंग्लैंडके बदले जापान हमपर शासन
करने लगेगा। इतने पर भी आप कह सकते हैं कि मिलके बने कपड़ोंका व्यवहार
करके इन दोनों देशोंके कपड़ेका बहिष्कार किया जा सकता है। मिलें तो आज ५० वर्षसे चल रही हैं, फिर बहिष्कार क्यों नहीं हो सका? मैं चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा
हूँ कि खादी विना बहिष्कार करना असम्भव है। खादी और कपड़ेकी मिलोंके सहयोगसे आप बहिष्कार कर सकते हैं। किन्तु आज इस युगमें मिलोंके भरोसे बहिष्कार कर पाना असम्भव । सौ-पचास वर्ष बाद कर सकें तो अलग बात है। यदि आप लड़कर
या खून-खराबी करके ऐसा करना चाहते हों तो उस सम्बन्धमें में कुछ नहीं जानता,
यह बात मेरी समझ से परे है, उसे में त्याग चुका । सूरतकी बहनें यदि मीठूबहनकी
मदद करें तो देखते-देखते जिलेमें शराबबन्दी हो जाये। और फिर इस धन्धे में क्या
सार है? ठेकेदार लोग शरावके धन्येके बदले कोई और काम करके पैसा पैदा कर
सकते हैं।
हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, किन्तु मैने निश्चय कर लिया है कि या तो मैं सविनय अवज्ञा करते हुए मर जाऊँगा या स्वराज्य प्राप्त करूँगा। इसलिए मैंने इन<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६९}}</noinclude>कमा सकता है और यदि अच्छा काम करके दिखाये तो इससे ज्यादा भी पा सकता
है। ३७ रुपये तो वह बहुत आसानीसे कमा ले सकता है। वह अपंग हो और सिर्फ
सूत काते तो भी उसे कुछ पैसे मिलेंगे। जो आदमी मजूरी करने को तैयार हो उसे रोजी कमानेमें कितनी देर लगती है? इस प्रकार जब तलाटी और सरकारी कर्मचारी
भय मुक्त हो जायेंगे तो फिर सरकार क्या करेगी? क्या इंग्लंडसे फौज लाकर सिपा-
हियोंको पटेलों और तलाटियोंका काम सौंपेगी? जब हिन्दू, मुसलमान, पारसी आदि
सभी लोग इनकार कर देंगे तो सरकार क्या करेगी? वह कुछ नहीं कर सकेगी। इसकी
एक-एक नस ढीली पड़ जायेगी। इस प्रकार बिना मेहनत और किसी भी व्यक्तिके
जेल गये बिना स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें होगा। किन्तु यह सब में किसे सिखाऊँ?
आपको खादी मोटी और महँगी जान पड़ती है। आप अपने अंगों का प्रदर्शन करना चाहते हैं, जब कि मैं उनको ढकना चाहता हूँ। कपड़े पहननेके बावजूद स्वयंको नंगा दिखाना आज हम लोगों में रूढ़ हो गया है। यह अमानवीय चलन है; नंगे दिखते रहना इसी सल्तनतमें उचित माना जाता है। कपड़े शरीरको कनेके लिए पहने जाते हैं, यदि आपको नंगे ही रहना है तो कपड़े क्यों पहनते हैं? इस सल्तनत-में नंगा दिखना गुनाह नहीं माना जाता। आप उस तरह घूम-फिर सकते हैं। यदि शरीरको बैंकनेके लिए ही कपड़े पहने जाते हों तो फिर खादीसे अच्छी और कौन-सी चीज मैं आपको दे सकता हूँ? आप कोई और चीज क्यों चाहते हैं? आपकी जिन मां-बहनोंको खानेको नहीं मिलता और जो सूत वे घर बैठकर कातती हैं, उससे बुना हुआ कपड़ा पहनते आपको शर्म आती है।
आज आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके अपने कर्त्तव्यको समझ लें। क्योंकि जब
तक हम जापानी कपड़ेका व्यवहार करते रहेंगे तबतक इंग्लैंडमें बने कपड़ेका बहिष्कार करना असम्भव है। यदि हम ऐसा करेंगे तो दोनों बातें नहीं सधेगी -- हम
अंग्रेजी मालका बहिष्कार नहीं कर पायेंगे और इंग्लैंडके बदले जापान हमपर शासन
करने लगेगा। इतने पर भी आप कह सकते हैं कि मिलके बने कपड़ोंका व्यवहार
करके इन दोनों देशोंके कपड़ेका बहिष्कार किया जा सकता है। मिलें तो आज ५० वर्षसे चल रही हैं, फिर बहिष्कार क्यों नहीं हो सका? मैं चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा
हूँ कि खादी विना बहिष्कार करना असम्भव है। खादी और कपड़ेकी मिलोंके सहयोगसे आप बहिष्कार कर सकते हैं। किन्तु आज इस युगमें मिलोंके भरोसे बहिष्कार कर पाना असम्भव । सौ-पचास वर्ष बाद कर सकें तो अलग बात है। यदि आप लड़कर
या खून-खराबी करके ऐसा करना चाहते हों तो उस सम्बन्धमें में कुछ नहीं जानता,
यह बात मेरी समझ से परे है, उसे में त्याग चुका । सूरतकी बहनें यदि मीठूबहनकी
मदद करें तो देखते-देखते जिलेमें शराबबन्दी हो जाये। और फिर इस धन्धे में क्या
सार है? ठेकेदार लोग शरावके धन्येके बदले कोई और काम करके पैसा पैदा कर
सकते हैं।
हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, किन्तु मैने निश्चय कर लिया है कि या तो मैं सविनय अवज्ञा करते हुए मर जाऊँगा या स्वराज्य प्राप्त करूँगा। इसलिए मैंने इन<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सब लोगोंको बुलाया और चल पड़ा। यदि मैं कलतक जीवित रहा तो यहाँसे
आपका आशीर्वाद लेकर रवाना होऊँगा। जो मेरे साथ चलने को तैयार हों उन्हें मैं
निमन्त्रित करता हूँ।
ईश्वरका अनुग्रह है कि फिलहाल यहाँ हिन्दू-मुसलमानोंमें मेल है और ये लड़ नहीं रहे हैं। मुझे यह डर था कि मैं लड़ाईसे ऊब गया हूँ, इसलिए जहाँ ये दोनों कौमें लड़ती हों यहां में नहीं जाऊँगा और यदि जाऊँगा तो मर जाऊँगा। अतः मैंने कार्यकर्त्ताओंको लिखा कि वे मुझे इस शहरमें ले जाकर मारें नहीं; बल्कि मुझे दांडी पहुँच जाने दें। किन्तु मुझे यह बताया गया कि फिलहाल दोनोंमें मेल-मिलाप-सा हो गया है और आपस में लड़ाई-झगड़ा नहीं है। किन्तु मैं यह नहीं मानता कि यहाँके हिन्दू-मुसलमान एक हो गये हैं। एक क्षणके लिए भी हमारे हृदयोंमें एक-दूसरेके प्रति दुर्भावना, अविश्वास या डर क्यों होना चाहिए? क्या वर्तमान सरकार-से भी ज्यादा बुरी कोई सरकार आनेवाली है ? इस देशमें तो लगभग १ लाख अधिकारी होंगे। बाकी २९ करोड ९९ लाखका आप क्या करेंगे? आप उनके बारेमें किस तरह सोचेंगे? आप किसलिए आपसमें लड़-मर रहे हैं? विधानसभा में मुसलमानों,पारसियों, ईसाइयों आदि सबको स्थान देनेके बाद यदि कोई स्थान बचे तो मुझे दे देना। यदि हम नमकहराम न होकर नमकहलाल बन जायें तो इस नमक- करको आप रद हुआ ही मानें गरीब, दीन मुसलमान भी तो इसके शिकार हैं। इसके रद हो जानेके बाद हम आपस में लड़ लेंगे। हिन्दू-मुसलमानोंके धर्मग्रन्थोंमें शराबको हराम माना गया है। जरथुस्त्र के अनुयायी अपने धर्मके फरमानोंको भली-भांति नहीं पढ़ते। उनमें शराबके बारेमें क्या कहा गया है, उसे वे पढ़ लें।
आप मुझे आशीर्वाद दें और खुदासे यह माँगें कि यह व्यक्ति जो कुछ लेने
जा रहा है वह उसे मिल जाये। नमक-फानून रद हो जानेके बाद अपने झगड़ोंका
फैसला करनेकी बात तय कीजिए। यदि आप इतना भी कर लें तो हममें कितनी शक्ति
आ जायेगी! इस कर के रद होनेपर हमें ६ करोड़ रुपयेकी बचत होगी। और
फिर शराबके २५ करोड़ तथा विदेशी कपड़े ६० करोड़, इस प्रकार कुल मिलाकर
९१ करोड़ रुपये होते हैं; इनकी भेंट यदि आप लेना चाहें तो ले लें। और यदि न लेना चाहें तो मैं आपसे पूछताछ नहीं करूँगा; किन्तु खुदा आपसे जरूर पूछेगा।
भगवान् आपको यह समझने और तदनुसार काम करनेकी ताकत दे!
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सब लोगोंको बुलाया और चल पड़ा। यदि मैं कलतक जीवित रहा तो यहाँसे
आपका आशीर्वाद लेकर रवाना होऊँगा। जो मेरे साथ चलने को तैयार हों उन्हें मैं
निमन्त्रित करता हूँ।
ईश्वरका अनुग्रह है कि फिलहाल यहाँ हिन्दू-मुसलमानोंमें मेल है और ये लड़ नहीं रहे हैं। मुझे यह डर था कि मैं लड़ाईसे ऊब गया हूँ, इसलिए जहाँ ये दोनों कौमें लड़ती हों यहां में नहीं जाऊँगा और यदि जाऊँगा तो मर जाऊँगा। अतः मैंने कार्यकर्त्ताओंको लिखा कि वे मुझे इस शहरमें ले जाकर मारें नहीं; बल्कि मुझे दांडी पहुँच जाने दें। किन्तु मुझे यह बताया गया कि फिलहाल दोनोंमें मेल-मिलाप-सा हो गया है और आपस में लड़ाई-झगड़ा नहीं है। किन्तु मैं यह नहीं मानता कि यहाँके हिन्दू-मुसलमान एक हो गये हैं। एक क्षणके लिए भी हमारे हृदयोंमें एक-दूसरेके प्रति दुर्भावना, अविश्वास या डर क्यों होना चाहिए? क्या वर्तमान सरकार-से भी ज्यादा बुरी कोई सरकार आनेवाली है ? इस देशमें तो लगभग १ लाख अधिकारी होंगे। बाकी २९ करोड ९९ लाखका आप क्या करेंगे? आप उनके बारेमें किस तरह सोचेंगे? आप किसलिए आपसमें लड़-मर रहे हैं? विधानसभा में मुसलमानों,पारसियों, ईसाइयों आदि सबको स्थान देनेके बाद यदि कोई स्थान बचे तो मुझे दे देना। यदि हम नमकहराम न होकर नमकहलाल बन जायें तो इस नमक- करको आप रद हुआ ही मानें गरीब, दीन मुसलमान भी तो इसके शिकार हैं। इसके रद हो जानेके बाद हम आपस में लड़ लेंगे। हिन्दू-मुसलमानोंके धर्मग्रन्थोंमें शराबको हराम माना गया है। जरथुस्त्र के अनुयायी अपने धर्मके फरमानोंको भली-भांति नहीं पढ़ते। उनमें शराबके बारेमें क्या कहा गया है, उसे वे पढ़ लें।
आप मुझे आशीर्वाद दें और खुदासे यह माँगें कि यह व्यक्ति जो कुछ लेने
जा रहा है वह उसे मिल जाये। नमक-फानून रद हो जानेके बाद अपने झगड़ोंका
फैसला करनेकी बात तय कीजिए। यदि आप इतना भी कर लें तो हममें कितनी शक्ति
आ जायेगी! इस कर के रद होनेपर हमें ६ करोड़ रुपयेकी बचत होगी। और
फिर शराबके २५ करोड़ तथा विदेशी कपड़े ६० करोड़, इस प्रकार कुल मिलाकर
९१ करोड़ रुपये होते हैं; इनकी भेंट यदि आप लेना चाहें तो ले लें। और यदि न लेना चाहें तो मैं आपसे पूछताछ नहीं करूँगा; किन्तु खुदा आपसे जरूर पूछेगा।
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[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर
तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना
चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं
रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब
नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें
तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे
पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right२ अप्रैल, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पैंजीका फूल मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल
गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें
देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन
मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर
तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना
चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं
रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब
नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें
तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे
पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right२ अप्रैल, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पैंजीका फूल मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल
गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें
देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन
मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर
तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना
चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं
रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब
नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें
तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे
पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right२ अप्रैल, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पैंजीका फूल मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल
गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें
देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन
मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right२ अप्रैल, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पैंजीका फूल मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल
गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें
देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन
मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right२ अप्रैल, १९३०}}
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पैंजीका फूल मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें
देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
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तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right|२ अप्रैल, १९३०}}
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन में मान
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देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१४
250
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Kumari Arpana Sinha
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/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>क्या तू बच्चोंको पीटती है? मीराबहनका मीठा उलाहना है।
आशा है तू अपनी तबीयतका ध्यान रखती होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६६७) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : प्रेमावहन कंटक
{{C|{{larger|'''१५६. भाषण : डिंडोलीमें'''}}}}
{{Right|२ अप्रैल, १९३०}}
खबर मिली थी कि कांग्रेसके कार्यकर्त्ताओंको यहां ठहरने भी देंगे या नहीं,
इसमें सन्देह है। किन्तु मैं बताना चाहता हूँ कि अब तक सभी स्थानों पर हमारा
उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है। इस गाँवके दोनों दलोंने मिलकर हमारी बहुत
अच्छी व्यवस्था की और वैसा ही भावभीना स्वागत भी किया।
इस लड़ाईके पीछे तो ईश्वरका हाथ है। अतः ऐसा दिखाई देता है कि आपसी
दुश्मनी सत्म हो गई है और सभी आपस में मित्र बन गये हैं। यह ईश्वर या खुदाकी
मेहरबानी है। प्रिवी काउंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) में तो पुश्तों तक झगड़ोंका फैसला नहीं हो पाता। आप इस फन्देसे निकल आयें। हम यह लड़ाई उन लोगोंके विरुद्ध लड़ रहे हैं जो दूसरोंके कन्थोंपर सवार हैं। गोरे लोगोंने हमारे करोड़ों कन्धोंपर बोझ लाद रखा है; हमें उससे मुक्त होना है। किन्तु उससे भी पहले हमें गरीबोंके कन्धों परसे उतर जाना है। यदि कोई यह कहे कि नमक कर उठ जानेपर सरकार नहीं चलेगी तो उन लोगोंसे मैं कहूंगा कि वे नमकहराम हैं। कर घट जानेपर नमककी खपत बढ़ जायेगी। इस बातको ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि इस कर के कारण गरीबोंपर अधिकतम भार पड़ता है। पुराने जमाने में तो गरीबोंको कपड़ा भी मिला करता था। और असलमें गाँवके मजदूरोंको मजदूरीके बदले-में सब कुछ मिलता था। फिर भी सरकार चाहे जितनी कोशिश करे लेकिन क्या वह सचमुच खादीकी अपेक्षा विदेशी गायोंको' सस्ता बना सकती?
मुझे जो दूसरी खबर मिली है, उसके लिए मैं यहाँके पटेलको धन्यवाद देता हूँ। और उस गाँवको भी धन्यवाद देता हूँ जिस गाँवमें ऐसे बहादुर पटेल हैं। अबतक जिन लोगोंने इस्तीफे नहीं दिये हैं, उन्हें भी दे देने चाहिए और अपने मनसे सरकारका भय निकाल देना चाहिए। मुझे तो इस बातका आश्चर्य है कि मुझ जैसा व्यक्ति जो एक छोटी-सी लाठी भी नहीं तान सकता, इतने बड़े साम्राज्यको कैसे हिला पायेगा। किन्तु यदि आपके हृदयमें राम बसता हो तो इस एक साम्राज्यकी तो बात ही क्या इससे भी बड़े बीस साम्राज्योंको हिला देना
१. पींजी हुई रुई भरकर या उसको जमाकर बनाये गये रजाई,गद्दे, नमदे-जैसे वस्त्र।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>क्या तू बच्चोंको पीटती है? मीराबहनका मीठा उलाहना है।
आशा है तू अपनी तबीयतका ध्यान रखती होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६६७) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : प्रेमावहन कंटक
{{C|{{larger|'''१५६. भाषण : डिंडोलीमें'''}}}}
{{Right|२ अप्रैल, १९३०}}
खबर मिली थी कि कांग्रेसके कार्यकर्त्ताओंको यहां ठहरने भी देंगे या नहीं,
इसमें सन्देह है। किन्तु मैं बताना चाहता हूँ कि अब तक सभी स्थानों पर हमारा
उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है। इस गाँवके दोनों दलोंने मिलकर हमारी बहुत
अच्छी व्यवस्था की और वैसा ही भावभीना स्वागत भी किया।
इस लड़ाईके पीछे तो ईश्वरका हाथ है। अतः ऐसा दिखाई देता है कि आपसी
दुश्मनी सत्म हो गई है और सभी आपस में मित्र बन गये हैं। यह ईश्वर या खुदाकी
मेहरबानी है। प्रिवी काउंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) में तो पुश्तों तक झगड़ोंका फैसला नहीं हो पाता। आप इस फन्देसे निकल आयें। हम यह लड़ाई उन लोगोंके विरुद्ध लड़ रहे हैं जो दूसरोंके कन्थोंपर सवार हैं। गोरे लोगोंने हमारे करोड़ों कन्धोंपर बोझ लाद रखा है; हमें उससे मुक्त होना है। किन्तु उससे भी पहले हमें गरीबोंके कन्धों परसे उतर जाना है। यदि कोई यह कहे कि नमक कर उठ जानेपर सरकार नहीं चलेगी तो उन लोगोंसे मैं कहूंगा कि वे नमकहराम हैं। कर घट जानेपर नमककी खपत बढ़ जायेगी। इस बातको ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि इस कर के कारण गरीबोंपर अधिकतम भार पड़ता है। पुराने जमाने में तो गरीबोंको कपड़ा भी मिला करता था। और असलमें गाँवके मजदूरोंको मजदूरीके बदले-में सब कुछ मिलता था। फिर भी सरकार चाहे जितनी कोशिश करे लेकिन क्या वह सचमुच खादीकी अपेक्षा विदेशी गायोंको' सस्ता बना सकती?
मुझे जो दूसरी खबर मिली है, उसके लिए मैं यहाँके पटेलको धन्यवाद देता हूँ। और उस गाँवको भी धन्यवाद देता हूँ जिस गाँवमें ऐसे बहादुर पटेल हैं। अबतक जिन लोगोंने इस्तीफे नहीं दिये हैं, उन्हें भी दे देने चाहिए और अपने मनसे सरकारका भय निकाल देना चाहिए। मुझे तो इस बातका आश्चर्य है कि मुझ जैसा व्यक्ति जो एक छोटी-सी लाठी भी नहीं तान सकता, इतने बड़े साम्राज्यको कैसे हिला पायेगा। किन्तु यदि आपके हृदयमें राम बसता हो तो इस एक साम्राज्यकी तो बात ही क्या इससे भी बड़े बीस साम्राज्योंको हिला देना
१. पींजी हुई रुई भरकर या उसको जमाकर बनाये गये रजाई,गद्दे, नमदे-जैसे वस्त्र।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७३}}</noinclude>सहज होगा। जैसे बुढ़िया चरखा चलाकर पवित्र पैसे कमाती है वैसे ही आप भी
पवित्र पैसे कमायें।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|larger|'''१५७. टिप्पणियाँ'''}}
{{C|''''मुझे नहीं मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा''''}}
रोज-रोज जो बहुत सारी जानकारी मिल रही हैं, उससे प्रकट होता है कि नमक-
कर की योजना कितनी दुष्टतापूर्वक बनाई गई है। जिस नमकसे कर -- जो कभी-कभी नमककी कीमतसे चौदह गुना अधिक होता है- नहीं मिलता उसका उपयोग किसीको न करने देनेके इस उद्देश्यसे सरकार जितना नमक लाभपूर्वक नहीं बेच सकती उतनेको नष्ट कर देती है। इस प्रकार, यह राष्ट्रके लिए इस अत्यन्त आवश्यक वस्तुपर कर लगाती है, लोगोंको इसे तैयार करनेसे रोकती है और मानव श्रमके बिना प्राकृतिक
ढंगसे जो नमक तैयार हो जाता है उसे नष्ट कर देती है । "मुझे न मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा' वाली इस नीतिका वर्णन करनेके लिए चाहे जिस विशेषणका
प्रयोग किया जाये, वह कम ही कड़ा पड़ेगा। विभिन्न सूत्रोंसे मुझे भारतके सभी हिस्सों में इस प्रकार मनमाने ढंगसे राष्ट्रीय सम्पत्तिके नष्ट किये जानेके किस्से सुननेको मिल
रहे है। कोंकण तट पर टनों नहीं तो कमसे कम मनों नमक बरबाद किये जानेकी
खबर मिली है। ऐसी ही खबर दांडीसे भी मिली है। जहां कहीं ऐसी सम्भावना
है कि ऐसे क्षेत्रोंके आसपास रहनेवाले लोग प्रकृति प्रदत्त नमक अपने निजी उपयोगके
लिए उठा ले जा सकते हैं, वहाँ सिर्फ नमकको बरबाद करनेके कामके लिए ही नमक-अधिकारी तैनात कर दिये गये हैं। इस प्रकार राष्ट्र के खर्चपर मूल्यवान राष्ट्रीय
सम्पतिको नष्ट किया जाता है और लोगोंके मुँहसे नमक छीना जाता है।
और सारा किस्सा इतना ही नहीं है। ओलपाड ताल्लुकेमें प्रवेश करनेपर मुझे बताया गया कि गरीब लोगोंको प्रकृति द्वारा तैयार किया गया नमक इकट्ठा करने या खुद ही नमक बनानेसे रोककर उनके पास चरखेके अलावा जो एक और सहायक धन्धा है, उससे उन्हें वंचित किया जा रहा है।
इस प्रकार नमक एकाधिकार एक चौमुखी अभिशाप है। यह जनताको एक महत्त्वपूर्ण और सुगम ग्रामीण उद्योगसे वंचित करता है प्रकृति द्वारा प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत की गई संपदाको मनमाने ढंगसे नष्ट करता है, इसे नष्ट करनेमें भी राष्ट्रका धन बरबाद होता है और फिर इन तमाम बुराइयोंके ऊपरसे क्षुधातं जनसाधारणसे हजार प्रतिशतसे भी अधिकके हिसाब से एक ऐसा कर वसूल किया जाता है, जिसकी अन्यत्र कोई मिसाल नहीं मिलती।
इस सन्दर्भ में मुझे सहज ही उस चीख-पुकारका स्मरण हो आता है जो उस समय मचाई गई थी जब मैंने पहले-पहल विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाने का सुझाव<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७३}}</noinclude>सहज होगा। जैसे बुढ़िया चरखा चलाकर पवित्र पैसे कमाती है वैसे ही आप भी
पवित्र पैसे कमायें।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|'''१५७. टिप्पणियाँ'''}}
{{C|''''मुझे नहीं मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा''''}}
रोज-रोज जो बहुत सारी जानकारी मिल रही हैं, उससे प्रकट होता है कि नमक-
कर की योजना कितनी दुष्टतापूर्वक बनाई गई है। जिस नमकसे कर -- जो कभी-कभी नमककी कीमतसे चौदह गुना अधिक होता है- नहीं मिलता उसका उपयोग किसीको न करने देनेके इस उद्देश्यसे सरकार जितना नमक लाभपूर्वक नहीं बेच सकती उतनेको नष्ट कर देती है। इस प्रकार, यह राष्ट्रके लिए इस अत्यन्त आवश्यक वस्तुपर कर लगाती है, लोगोंको इसे तैयार करनेसे रोकती है और मानव श्रमके बिना प्राकृतिक
ढंगसे जो नमक तैयार हो जाता है उसे नष्ट कर देती है । "मुझे न मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा' वाली इस नीतिका वर्णन करनेके लिए चाहे जिस विशेषणका
प्रयोग किया जाये, वह कम ही कड़ा पड़ेगा। विभिन्न सूत्रोंसे मुझे भारतके सभी हिस्सों में इस प्रकार मनमाने ढंगसे राष्ट्रीय सम्पत्तिके नष्ट किये जानेके किस्से सुननेको मिल
रहे है। कोंकण तट पर टनों नहीं तो कमसे कम मनों नमक बरबाद किये जानेकी
खबर मिली है। ऐसी ही खबर दांडीसे भी मिली है। जहां कहीं ऐसी सम्भावना
है कि ऐसे क्षेत्रोंके आसपास रहनेवाले लोग प्रकृति प्रदत्त नमक अपने निजी उपयोगके
लिए उठा ले जा सकते हैं, वहाँ सिर्फ नमकको बरबाद करनेके कामके लिए ही नमक-अधिकारी तैनात कर दिये गये हैं। इस प्रकार राष्ट्र के खर्चपर मूल्यवान राष्ट्रीय
सम्पतिको नष्ट किया जाता है और लोगोंके मुँहसे नमक छीना जाता है।
और सारा किस्सा इतना ही नहीं है। ओलपाड ताल्लुकेमें प्रवेश करनेपर मुझे बताया गया कि गरीब लोगोंको प्रकृति द्वारा तैयार किया गया नमक इकट्ठा करने या खुद ही नमक बनानेसे रोककर उनके पास चरखेके अलावा जो एक और सहायक धन्धा है, उससे उन्हें वंचित किया जा रहा है।
इस प्रकार नमक एकाधिकार एक चौमुखी अभिशाप है। यह जनताको एक महत्त्वपूर्ण और सुगम ग्रामीण उद्योगसे वंचित करता है प्रकृति द्वारा प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत की गई संपदाको मनमाने ढंगसे नष्ट करता है, इसे नष्ट करनेमें भी राष्ट्रका धन बरबाद होता है और फिर इन तमाम बुराइयोंके ऊपरसे क्षुधातं जनसाधारणसे हजार प्रतिशतसे भी अधिकके हिसाब से एक ऐसा कर वसूल किया जाता है, जिसकी अन्यत्र कोई मिसाल नहीं मिलती।
इस सन्दर्भ में मुझे सहज ही उस चीख-पुकारका स्मरण हो आता है जो उस समय मचाई गई थी जब मैंने पहले-पहल विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाने का सुझाव<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१६
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>रखा था। इसे एक अमानवीय और बरबादीका सुझाव माना गया था। यह बात आमतौर पर सभी मानते हैं कि विदेशी वस्त्रोंसे जनताका अहित होता है। इसके विपरीत नमक एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी, एक दुष्टतापूर्ण कर वसूल करनेके लिए इसे नष्ट किया गया है और प्रति दिन किया जा रहा है।
इतने दिनोंसे यह कर इसीलिए कायम रहा है कि आम जनताने इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अब जब कि वह काफी जाग चुकी है, इस कर को समाप्त होना है। यह कितनी जल्दी समाप्त होता है, यह तो इस बातपर निर्भर है कि लोग कितनी शक्तिका परिचय देते हैं। प्रसन्नताकी बात यह है कि अब उस कसौटीमें बहुत विलम्ब नहीं है।
{{C|{{larger|'''अतिरंजित कथन'''}}}}
अखबारोंमें इस आशयके समाचार छपे हैं कि मेरे साथियोंमें से १८ बीमार और असमर्थ हो गये हैं। यह घोर अतिरंजना है। यह सही है कि १८ व्यक्तियोंको भड़ौंच सेवाश्रममें दो दिन विश्राम करना पड़ा। लेकिन इसका कारण यह था कि वे थक गये थे और उनके पैरोंमें छाले पड़ गये थे। एक को बेचक हो गई थी - - वह भी बहुत मामूली ढंगकी ही साबित हुई। इसके अलावा और कोई इतना बीमार नहीं हुआ जिसका उल्लेख किया जा सकता हो। एक साथीको सचमुच बहुत तेज बुखार चढ़ गया था। लेकिन, उसका कारण भी कूचमें अत्युत्साह दिखाना ही साबित हुआ। वे शरीरसे बहुत मजबूत हैं। इसलिए उनको बहुत ज्यादा जरूरत से ज्यादा-विश्वास था कि वे आराम किये बिना कूच जारी रख सकेंगे। अतः उन्होंने तबतक आराम नहीं किया जबतक प्रकृतिने उन्हें इसके लिए बिलकुल विवश नहीं कर दिया। लेकिन अब दोनों काफी ठीक हैं, हालांकि कमजोर होनेके कारण उन्हें अभी कुछ दिन और आराम करने को कहा गया है। ये सूरतमें हमारे साथ हो लेनेकी उम्मीद रखते हैं। एक तीसरे साथीने पैरोंमें छाले पड़ जानेके बावजूद कूच जारी रखनेका आग्रह किया, लेकिन उसे अंकलेश्वरमें आराम करना पड़ा। शेष सब बिलकुल ठीक है और रोज कूच कर रहे हैं। यह सब बताना इसलिए आवश्यक हो गया है कि उन लोगोंके अभिभावक और मित्र चिन्तित न हों। ग्रामवासियोंने सत्याग्रहियोंकी जो खातिरदारी. की, आनन्दमें चरोतर शिक्षा मण्डलने चेचकके मरीजकी जो असाधारण शुश्रूषा की और सेवाश्रममें डॉ० चन्दूलालके कर्मचारियोंने पैरोके छालोंसे परेशान हमारे साथीकी जो सेवा की, उसका उल्लेख यदि मैं यहाँ न करूँ तो यह कृतघ्नता होगी।
इन घटनाओंसे एक सबक भी लिया जा सकता है। वर्तमान पीढ़ीके लोग
कमजोर और सुकुमार हैं और उनके शरीरको बड़ा लाड़-प्यार मिला है। यदि वे
राष्ट्रीय कार्य में हाथ बँटाना चाहते हैं तो उन्हें काफी व्यायाम करके अपने शरीरको
हट्टा-कट्टा बनाना चाहिए और व्यायाम उतना ही अच्छा और प्रभावकारी होता है
जितना कि तेजीसे दूरतक टहलना। मांसपेशियोंको विकसित करनेवाले व्यायाम आदि
भी अच्छे हैं और टहलने के साथ-साथ उन्हें भी करना चाहिए। मगर ये व्यायाम
टहलनेका स्थान नहीं ले सकते। टहलने को जो व्यायामोंका सरताज कहा गया है,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रति दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा । यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई
थीं, जो कूल करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल
साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती
बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए
सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती
थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा
साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ माँगे । ज्यों ही गाँववालोंको
स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परि-
वारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा
जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी
नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं
उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र
करानेके लिए आकुल हैं । स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक
ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय
प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके
इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं ।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रति दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा । यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई
थीं, जो कूल करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल
साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती
बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए
सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती
थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा
साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको
स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा
जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी
नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं
उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र
करानेके लिए आकुल हैं । स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक
ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय
प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके
इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रति दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा । यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई
थीं, जो कूल करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल
साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती
बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए
सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती
थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा
साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको
स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा
जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी
नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं
उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र
करानेके लिए आकुल हैं । स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक
ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय
प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके
इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रति दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा । यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई
थीं, जो कूल करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल
साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती
बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए
सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती
थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा
साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको
स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा
जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी
नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं
उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र
करानेके लिए आकुल हैं । स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक
ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय
प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके
इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रति दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा । यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई
थीं, जो कूल करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल
साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती
बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए
सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती
थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा
साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको
स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा
जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी
नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं
उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र
करानेके लिए आकुल हैं । स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक
ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय
प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके
इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५८. ६ अप्रैलको याद रखें'''}}}}
गुरुवार, ३ तारीखको यह लेख पाठकोंके सामने होगा। यदि ६ अप्रैल से पहले
कार्यक्रमको स्थगित करनेके सम्बन्धमें कोई सूचना नहीं जारी की जाती तो पाठक
समझ लें कि मैंने सभीको ६ अप्रैल से नमक- कानूनोंके खिलाफ सामूहिक सविनय अवज्ञा करनेकी छूट दे दी है और जो लोग उसके लिए तैयार हैं उनसे मैं उस दिन अवज्ञा प्रारम्भ कर देनेकी अपेक्षा रखता हूँ।
इस विषय में इन पृष्ठों में समय-समयपर मैंने जो कुछ कहा है, उसे संक्षेपमें
एक बार दोहरा जाता हूँ।
सविनय अवज्ञाके लिए केवल एक ही शर्त है। अर्थात् सच्चे अर्थों में अहिंसाका
पूर्ण पालन।
सामुदायिक सविनय अवज्ञाका मतलब है बिना किसीकी प्रेरणाके सहज रीतिसे
स्वयं क्रियाशील हो जाना। कार्यकर्त्ता केवल प्रारम्भिक अवस्थाओं में जनताका मार्ग-
दर्शन करेंगे। आगे चलकर जनता इस आन्दोलनका नियमन खुद करेगी।
कांग्रेसके स्वयंसेवक घटनाक्रम पर नजर रखेंगे और जहां कहीं जरूरत होगी,
यहाँ मदद करेंगे। उनसे सबसे आगे रहनेकी अपेक्षा की जायेगी।
स्वयंसेवकोंको किसी भी साम्प्रदायिक झगडेमें किसीका पक्ष नहीं लेना चाहिए।
जहाँ कहीं हिंसाका विस्फोट हो, स्वयंसेवकोंसे उसे शान्त करनेके लिए प्राण तक
दे देनेकी अपेक्षा की जाती है।
पूर्ण अनुशासन और विभिन्न एकांशोंके बीच पूरा सहयोग सफलताकी अनिवार्य
दशर्त है।
यदि सच्ची जन-जागृति हो तो जो लोग सविनय अवज्ञा न कर रहे हों उनसे यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे किसी-न-किसी राष्ट्रीय कार्यमें लग जायेंगे और दूसरोंको भी उसमें प्रवृत्त करेंगे। इन राष्ट्रीय कार्यों में खादी कार्य, शराब तथा अफीमकी दुकानोंपर धरना देना, विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना, गाँवोंकी सफाई करना, सविनय प्रतिरोधी कैदियोंके परिवारोंकी हर तरहसे सहायता करना आदि शामिल हैं।
वास्तवमें नमक कर के सम्बन्धमें किये जानेवाले सविनय प्रतिरोधके प्रति यदि
लोग सच्चा उत्साह दिखायें तो हमें खादीके बलपर ठीक ढंगके संगठनके द्वारा
विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सम्पन्न करा सकना चाहिए और पूर्ण मद्यनिषेध भी करवा
सकना चाहिए। यदि ऐसा हो जाये तो उससे प्रतिवर्ष ९१ करोड़ रुपयेकी बचत होगी
और करोड़ों बेकार लोगोंको सहायक धन्धा मिलेगा। और यदि हम यह सब कर दिखायें
तो स्वराज्य मिलने में भी देर नहीं लगेगी। इनमें से एक भी काम हमारी शक्तिसे
बाहर नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इन्डिया,''' ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२०
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2026-08-21T05:45:12Z
अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३६३. पत्र : अमीना कुरैशीको'''}}}}
{{Right|१०-३० बजे रात, बृहस्पतिवार<br>
[१ मई, १९३० अथवा उसके पश्चात् ]<ref>१. ५ को गांधीजीकी गिरफ्तारीके पहलेका पद अन्तिम बृहस्पतिवार था।</ref>}}
{{Left|चि० अमीना,}}
मैंने तुझे बाहर आनेको नहीं कहा, इसका कारण तो तू जानती है न ? चिन्ता मत करना। वहां बैठे-बैठे जो भी किया जा सकता हो, सो करना। मुझे दिल खोल-कर जो लिखना हो सो लिखा जा सकता है। अब इमाम साहब जल्दी ही जेल जाने-वाले हैं। वे कदाचित् मुझसे भी जल्दी पहुंचेंगे। ये जेल जायें तो चिन्ता मत करना ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९४ ) की फोटो नकलसे; सौजन्य : हमीद कुरैशी; जी० एन० ६६४९ से भी ।
{{C|{{larger|'''३६४. महादेव देसाई और उनके उत्तराधिकारी'''}}}}
मेरे पास जाने-माने भारतीयोंकी गिरफ्तारी और कैदकी ओर भी ध्यान देनेका समय नहीं रहता । यहाँतक कि गिरफ्तारी और कैदके समाचार मुझे जल्दी नहीं मिल पाते मैं बराबर यहां-वहाँ आता जाता ही रहता हूँ और मेरा रहना भी आजकल एक गाँवमें ही होता है। इसलिए कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओंकी जानकारी मुझे अकसर चौबीस चौबीस घंटे बाद मिल पाती है। जब बहुत-से महत्वशाली व्यक्ति मिलकर एक आदमीकी तरह काम करते और कष्ट सहन करते हैं और जब बहुत-सी अहम घटनाएँ एक ही साथ घटित होती हैं तो वे सामान्य चीजें बन जाती हैं और यह एक शुभ लक्षण है। हम सूर्यकी किरणोंकी ओर ध्यान नहीं देते, हालांकि प्रत्येक किरण उतनी ही महत्त्वपूर्ण होती है जितना कि स्वयं सूर्य जब हम सूर्यकी पूजा करते हैं तो वास्तव में प्रत्येक किरणको अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, क्योंकि समस्त किरणें एक साथ जो कुछ करती हैं, उस सबका कारणरूप वही है जो कुछ सूर्य करता है। इसी प्रकार हम भारत-स्वातन्त्र्य-रूपी सतत् वर्धमान सूर्यकी प्रतिदिन आराधना करते हैं, उस सूर्यकी जो धीरे-धीरे भारतके आकाशमें उदित हो रहा है।
लेकिन महादेवको सजा दी जानेकी घटनाके बारेमें तो मुझे लिखना ही पड़ेगा । आज देशमें सरकारके नामपर जो कुछ चल रहा है वह अराजकता और अव्यवस्था ही तो है। लेकिन अराजकता और अव्यवस्थाके बीच महादेवको गिरफ्तार करनेमें
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२१
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||महादेव देसाई और उनके उत्तराधिकारी|३७७}}</noinclude>अधिकारियोंने शिष्टताका परिचय दिया और उन्होंने उनको काफी हिचकते हुए गिर-पतार किया। यद्यपि उन्होंने वीरमगांव और धोलेरासे लेकर अहमदाबाद तक सारे गुजरात में उथल-पुथल मचा दी थी, लेकिन अधिकारी यह मानते थे कि यह जीवन-दायिनी उथल-पुथल है, वे महादेवके शासनमें खुद अपने शासनकी अपेक्षा कहीं अधिक निरापद हैं और जिन शक्तियोंको महादेवने जन्म दिया है, उन्हें नियन्त्रणमें रखनेकी भी उनमें पूरी सामर्थ्य है।
लेकिन महादेवने अधिकारियोंके लिए यह असम्भव बना दिया कि वे उन्हें स्वतन्त्र रहने दें। उन्होंने धोलेरासे लारी-भर नमक 'तस्करी से लाने की व्यवस्था की थी। अधिकारी पूरी तरह चौकस थे। उन्होंने लारीको रास्तेमें रोक लिया । उनको आशा थी कि महादेव उसमें नहीं होंगे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि बहु- मूल्य नमक- सहित लारी पकड़ी जानेवाली है तो वे पीछे-पीछे जिस मोटरगाड़ीसे चल रहे थे उसमें से कूदकर लारीमें जा चढ़े। तो अब स्थिति यह हो गई कि अगर वे लारीको पकड़ते हैं तो महादेवको भी गिरफ्तार करना ही पड़ेगा और उन परि-स्थितियोंमें महादेवके सामने लारीमें जा चढ़नेके अलावा और कोई सूरत भी नहीं थी। उनके साथ एक ऐसा नौजवान था जिसे अगले ही दिन एल० एल० बी० की अन्तिम परीक्षा में बैठना था। इसके अलावा दो युवक गुजरात कालेजके थे और दो किन्हीं धनाढ्य लोगोंके लड़के थे। लारी श्रीयुत रणछोड़लालने दी थी। वे एक मिल- मालिक हैं। उन्हें जब चेतावनी दी गई थी कि उनकी लारीका क्या हश्र हो सकता है तो उन्होंने कहा था: "मैं तो स्वराज्यकी खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने को तैयार हूँ, फिर यह लारी गँवा देनेकी परवाह क्यों करूँ ?"
महादेवको आरामकी सख्त जरूरत थी। उसे वह मिल गया है। सैकड़ों कर्मठ कार्यकर्ताओंके लिए जेल आरामगाह ही तो बन गया है। जैसा कि महादेव खुद ही कहते हैं, ये तो इससे भी अच्छे सुयोगके लिए लालायित थे, "किन्तु स्पष्ट ही अभी वे उसके सुयोग्य पात्र नहीं बन पाये थे।"
उन्होंने इमाम साहब अब्दुल कादिर बावजीरको अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है। इमाम साहब दक्षिण आफ्रिकासे ही मेरे साथी रहे हैं। आजकल वे आश्रम- समितिके उपाध्यक्ष और उसके न्यासियों में से एक हैं। इमाम साहब एक वयोवृद्ध व्यक्ति हैं और कड़ी मेहनत करना उनके बसकी बात नहीं है। कहा जा सकता है कि वे अनपढ़ हैं। लेकिन वे एक तपे परखे सिपाही और एक सच्चे मुसलमानके सपूत हैं। उनके पिता अपनी मृत्युके समयतक बम्बईकी जुमा मसजिदके मुअज्जिम रहे थे। खुद उनको इमाम इसलिए कहा जाता है कि उन्होंने दक्षिण आफ्रिकाकी कई मस-जिदोंमें एवजी इमामकी तरह काम किया है। वे कट्टर मुसलमान हैं -कट्टर इस अर्थमें कि वे नमाज और रोजोंमें कभी चूक नहीं करते। लेकिन साथ ही वे मनसे बड़े उदार भी हैं, अन्यथा तरह-तरहके लोगोंके बीच लगातार लगभग बीस वर्षों तक वे मेरे निकटतम सम्पर्क में नहीं रह पाते।
लेकिन मेरे - बल्कि कहिए, हमारे सपनेका स्वराज्य जाति अथवा धर्मके नाम पर कोई भेद-भाव स्वीकार नहीं करता। इसी प्रकार इसपर न तो पढ़े-लिखे लोगोंकी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इजारेदारी होती है और न पैसेवाले लोगोंका एकाधिकार स्वराज्य सबके लिए होना है। इसमें उक्त वर्गों के लोग भी शामिल होंगे, लेकिन यह मुख्यतः अन्धों और अपंगों लिए होगा, करोड़ों मेहनतकश क्षुधार्त्त मानवोंके लिए होगा। जिस प्रकार इमाम साहब गुजरातके और अब्दुल्लाभाई नामक एक दूसरे सज्जन, जिनको और भी कम लोग जानते है, विलेपार्लेके प्रथम सेवक बन गये है उसी प्रकार ऐसा कोई भी अनपढ़ आदमी, जिसमें दिलेरी, ईमानदारी और समझदारी हो, सारे राष्ट्रका प्रथम सेवक बन सकता है। अब्दुल्लाभाई स्वामी आनन्दके उत्तराधिकारी हैं उन्हीं स्वामी आनन्दके उत्तराधिकारी, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और आश्चर्यजनक आत्मत्यागके बलपर जनकल्याणकी भावनासे चलाये जा रहे नवजीवन कार्यालयको एक ठोस कारोबारी संस्थाका भी रूप दे दिया। यह संस्था गुजरातियोंके घरोंमें गुजराती साहित्यका यह नवनीत पहुँचाती रही है, जिसे जनसाधारणकी बुद्धि ग्रहण कर सकती है। लेकिन ऐसे उदाहरणोंकी कोई कमी नहीं है। ये उदाहरण तो, यह संघर्ष पूरे भारत में कैसा रंग ले आया है, उसके कुछ नमूने-भर हैं। सरकार सुदूर द्वीपोंमें रहनेवाले गोरोंकी दुधारू गायके रूपमें भारतपर अपना अधिकार बनाये रखनेके लिए प्राणपणसे यह अन्तिम प्रयास कर रही है। लेकिन राष्ट्रके त्यागवीर सेवक अब यह बरदाश्त नहीं कर सकते कि गोरे इस गायके साथ बलात्कार करें, इसका मनमाना दोहन करें और इसकी तीस करोड़ सन्तान दुःख और यातनाका जीवन जिये।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३६५. पत्र लेखकोंसे'''}}}}
मेरे पास रोज-रोज ढेर के ढेर पत्र जमा होते जा रहे हैं। मैंने इन्हें निबटाने के लिए जान-बूझकर दूसरोंकी ज्यादा मदद नहीं ली। तपे परखे कार्यकर्ता इस पत्रोत्तर देने-जैसे कामसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं। इसलिए रोज-रोज आने-वाले इतने सारे पत्रोंके उत्तर देना मेरे लिए असम्भव है। मैंने अपने साथी कार्य-कर्त्ताओंको इस आन्दोलनमें सहायता देनेके लिए आमन्त्रित किया और उन्हें देशके विभिन्न हिस्सों में भेज दिया ताकि वे मुझे इस बातकी खबर देते रहें कि उन क्षेत्रों में क्या-कुछ हो रहा है। स्वभावतः वे यह अपेक्षा तो रखते ही है कि में कमसे कम उनके पत्रोंकी प्राप्ति सूचित करता रहूँ। लेकिन देखता हूँ, इतना करना भी मेरे बसका नहीं है। वास्तव में मुझे एक ऐसा आधा कंदी मान लेना चाहिए जिसे पत्र प्राप्त करनेकी तो छूट है, लेकिन उत्तर देनेकी सुविधा कभी-कभी ही दी जाती है और अब तो जल्दी ही मैं ज्यादा नहीं तो कमसे कम पूरा कैदी बन जानेवाला है। इसलिए जब साथी कार्यकर्ता तथा दूसरे लोगोंको मेरे पत्र न मिलें तो वे यह मान लें कि मुझे उनको दिखनेका समय नहीं मिल पाया।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-५-१९३०}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३६६. गुण्डा - राज'''}}}}
इन दिनों गुजरात में जो कुछ हो रहा है वह यदि देशके सभी हिस्सों में वर्तमान स्थितिका सूचक है तो उसके सामने डायरशाही भी फीकी पड़ जाती है। पाठकोंको यह बात शायद अतिरंजित लगे, किन्तु में इसे अक्षरशः सत्य मानकर ही लिख रहा हूँ । जलियांवाला बाग हत्याकाण्डमें जो कुछ होना था, सो घड़ी दो घड़ी में ही तुफानी वेगसे हो गया। इसका लोगोंके मनपर एक असर हुआ उस दिशामें भी जिस दिशा में इसके प्रणेता असर डालना चाहते थे, और उस दिशा में भी जिस दिशामें असर डालनेका उनका कोई मंशा नहीं था।
लेकिन गुजरात में लोगोंको जिस तरह तिल-तिल कर मारा जा रहा है, उसका न तो इस दिशा में कोई असर पड़नेवाला है और न उस दिशा में, और यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हो सकता है कि यह मानवीय गुणोंके लिए सर्वथा घातक सिद्ध हो। इससे मजलूम लोग कमजोर हो सकते हैं; जुल्मी लोगोंका तो अधःपतन हो ही रहा है।
अगर मुझे समय मिल पाया तो मैं गत सप्ताहकी घटनाओंका संक्षिप्त विवरण इन पृष्ठों में दूंगा। जो भी हो, पाठकोंको दैनिक पत्रोंमें तो सारे सबूत देखनेको मिल ही जायेंगे।
महादेव देसाई ऐसा मान बैठे थे कि उन्होंने खुद बीरमगाँव जाकर जो कोशिशें कीं और फिर जो वकील मित्रोंको वहां भेजा, उसके परिणामस्वरूप अब यहाँ सरकारी अमलोंका वर्यरतापूर्ण अत्याचार समाप्त हो गया है। लेकिन यह नहीं होना था, सो नहीं हुआ। एक स्वयंसेवक कुछ क्षणोंके लिए अपने साथियोंसे अलग पड़ गया और इस तरह अमन और कानूनके पहरेदारोंको अपने उस शिकारपर झपट पड़नेका मौका मिल गया। उन्होंने उसके साथ वैसा ही अमानवीय व्यवहार किया जैसा कि वीरमगांवमें उसके पूर्ववर्ती स्वयंसेवकों के साथ किया गया था।
और अब देखिए कि डॉ० नरसिंहभाई मेहता क्या कहते हैं। वे जूनागढ़के अब काश प्राप्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी है और उनकी उम्र ६६ वर्ष है, लेकिन इस उम्र में भी सत्याग्रहको भावना उनके मनमें हिलोरें मारने लगी और वे सत्याग्रही बन गये। उन्होंने अपनी आंखों देखी घटनाका वर्णन इन शब्दोंमें किया है:
{{Rh||'''आज शामको में १२० सत्याग्रहियोंके दलको लेकर बढ़वान कैम्पसे यहाँ आया । प्रत्येक सत्याग्रहीके पास १०-१० पौंड अवैध नमकका एक-एक थैला था। जब में दलको लेकर उसके आगे-आगे आ रहा था तब एक निरीक्षक-दलसे सबसे पहले मेरा ही सामना हुआ। उस दलमें एक यूरोपीय अधिकारी, दो भारतीय अधिकारी और ४-५ पुलिसके सिपाही थे। इन सबके अलावा कोई पचास सिपाही जीनके दरवाजेपर निगाह रखते हुए इधर-उधर खड़े थे ।'''}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२४
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''मुझसे पूछा गया कि आपकी बगलमें दबे थैलेमें क्या है। मंने जवाब दिया, "१० पौंड अवैध नमक । इसपर उन्होंने कहा, "ठीक है वृद्ध डाक्टर, आप जा सकते हैं।" लेकिन मैंने कहा कि "मेरे साथ १२० सत्याग्रहियोंका एक दल है और उनमें से प्रत्येकके लेमें इसी तरहका अबंध नमक है। इसलिए में खुद देखना चाहता हूँ कि आप लोग उनसे कैसे निबटते हैं, या कि उन्हें भी अन्य मुसाफिरोंकी ही तरह बेरोक-टोक जाने देते हैं।" उसने कहा, “ठीक है, आप बगलमें खड़े होकर देखिए।" सत्याग्रहियों को एक-एक करके निरीक्षक-दलके बीच से गुजरने को कहा गया। ज्यों ही कोई सत्याग्रही उनके बीच प्रवेश करता त्यों ही उस यूरोपीय अधिकारी-सहित वे सातों आठों उसे पकड़कर उससे नमकका थैला छीन लेते थे और इस प्रयत्न में उसके साथ अत्यन्त असभ्य व्यव हार करते थे। लगभग प्रत्येक सत्याग्रही पर ऐसी ही गुजरी। यह बहुत ही अपमानजनक कार्रवाई थी। सारी उम्र अंग्रेजोंके बारेमें मेरे मनमें बहुत अच्छी धारणा रही थी। अपनी ६६ सालकी उम्र में मुझे पहले-पहल ही ऐसा अनुभव हुआ था।'''
'''जब में उनका यह दुर्व्यवहार बरदाश्त न कर सका तो मैंने विरोध किया। इसपर उस अधिकारीने कहा: "हो, हाँ, बाहर जाकर लोगोंको यह सब बताओ और अखबारोंमें इसके बारेमें लिखो।" और सारी कार्रवाई पूर्ववत् चलती रही।'''
गौर कीजिए कि डॉ० मेहताके अनुरोधको उन्होंने किस निर्ममताके साथ ठुकरा दिया। नौजवानोंसे उनका कीमती नमक छीनना तो उस ब्रिटिश अधिकारी और उसके वफादार पिट्टुओंके लिए एक मजेदार खेल था। उनसे यह सब कहना बेमानी था कि ये लोग भागे नहीं जा रहे हैं, और न कोई चीज छिपा रहे हैं। उन्हें तो तत्काल कानूनका सम्मान करना था। फिर भला कानूनके ये पहरेदार उतना विलम्ब भी कैसे कर सकते थे जितने विलम्बकी अपेक्षा स्वयं कानून रखता है ?
लेकिन, जो दृश्य खेड़ा जिलेमें दिखाई पड़े उनके आगे तो यह घटना कुछ भी नहीं है। मैं स्वीकार करता हूँ कि खेड़ाके बहादुर बेटे-बेटियाँ सरकारी अमलोंके उचित बहिष्कारमें काफी हदतक सफल रहे हैं। अब वे जनतासे अपनी मनचाही नहीं करवा सकते। उन्होंने गुजरात विद्यापीठके एक स्नातक और एक प्राध्यापकको बड़ी बेरहमी से मारा-पीटा। उन दोनोंका अपराध इतना ही था कि जब उन्होंने मार-पीटकी खबर सुनी तो यह देखनेके लिए कि क्या हो रहा है, वे मौकेपर आ गये। इसी जिलेमें बोरसदके पास कुछ पुलिसवालों ने उसी क्षेत्रके एक ठाकुर और बड़ी-बड़ी लकड़ियोंमें लगी हॅसियोंसे लैस उसके कुछ चाटुकारोंकी सहायतासे बिना कोई पूर्व सूचना दिये एक सभाकी बत्तियां बुझा दीं और वे सब उपस्थित लोगोंपर बड़ी बेरहमीसे टूट पड़े। श्रोताओंमें पाटीदार और राजपूत लोग थे, जिनमें अपना बचाव करनेकी पूरी क्षमता थी। लेकिन किसीने एक पत्थर तक नहीं फेंका, एक
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||गुण्डा-राज|३८१}}</noinclude>शब्द भी नहीं कहा। अनुशासनकी खातिर उन्होंने सब कुछ सह लिया । एक व्यक्ति तो मरते-मरते बचा। सात आदमी अब भी अस्पतालमें पड़े हुए हैं। कुल मिलाकर पैंतीस लोगोंके जख्मी होनेका पता लगा है। यह जलियाँवाला बागका एक दूसरा संस्करण था लेकिन कायरतापूर्ण ।
अब अहमदाबादको लीजिए। एक शराब विक्रेता अपनी गोलकको रोज-रोज खाली जाते देखकर इतना उतावला हो उठा कि उसने धरना देनेवालोंपर बड़ी निष्ठुरतासे प्रहार कर दिया और धरना देनेवाला एक व्यक्ति चोट खाकर बेहोश होकर गिर गया। सभी यह स्वीकार करते हैं कि धरना अत्यन्त शान्तिपूर्वक दिया जा रहा था । किसी तरहका प्रदर्शन भी नहीं किया गया था। वे लोग केवल दुकानमें आनेवाले जाने-पहचाने ग्राहकों के नाम-भर लिख लेते थे। यहां धरना देनेके कामकी सफलताका रहस्य यह है कि जातीय संगठनका सहारा लिया गया है और मजदूरोंके बीच जातीय संगठनका अब भी काफी हदतक असर है ।
क्या अमन और कानूनके पहरेदारोंने इस जंगलीपनको रोकनेके लिए कोई इन्तजाम किया है ? नहीं। उन्होंने तो मन-ही-मन इसपर मोद मनाया है। वे मोद मनाते हैं तो शौकसे मनायें लेकिन इतना करें कि इसे 'अमन और कानून' न कहकर, गुण्डा राज कहें।
जनताका कर्त्तव्य तो स्पष्ट ही है। इस संगठित गुण्डागर्दीका वह अधिक कष्ट सहकर जवाब दे यदि लोगों में इच्छा और शक्ति है तो स्वतन्त्रता निश्चय ही प्राप्त होगी । कष्ट सहनका फल स्वतन्त्रता होता है, हिंसाका स्वच्छन्दता। हम लोग जिस चीजके लिए आकुल हैं, वह है-- स्वतन्त्रता, जो समाजकी खातिर अपने ऊपर अंकुश लगाये रहती है। स्वच्छन्दता समाजको कष्ट देती है ताकि वह स्वयं ऐसी सुख-सुविधाओंका उपभोग कर सके जो अन्य लोगोंके लिए दुर्लभ है। यह सरकार सर्वथा स्वच्छन्द -- स्वेच्छाचारी है, क्योंकि यह ऐसी सरकार है जिसका एकमात्र नहीं तो मुख्य लक्ष्य भारतीय समाजका शोषण ही है।
{{Left|[ पुनश्च : ]}}
उपर्युक्त लेख लिखनेके बाद मुझे बालासोर और मथुरासे भी ऐसे ही विवरण मिले हैं। उन्हें मैं अविकल रूपमें प्रकाशित कर रहा हूँ। स्पष्ट ही है कि सत्ता समर्थित गुण्डागर्दी पूरे भारत में फैल गई है या तेजीसे फैलती जा रही है।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-५-१९३०}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{c|{{larger|'''३६७. टिप्पणियाँ'''}}</noinclude>{{rh||'''अध्यक्षका इस्तीफा'''}}
विट्ठलभाई पटेलके इस्तीफेसे हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यदि वे इस्तीफा न देते तभी आश्चर्य होता । अपने धैर्य और निष्पक्ष व्यवहारके कारण वे कांग्रेसियोंके प्रेमपात्र बने और विरोधियोंके प्रशंसा पात्र । मुझे यह देखकर खुशी होती है कि अब विट्ठलभाई भी यह मानने लगे हैं कि विधानसभा द्वारा देशकी सेवा नहीं हो सकती । रक्तशोषण और लूट खसोटके खेलमें भारतकी वर्तमान विधायक संस्थाएँ पासेका काम करती हैं। शुतुरमुर्ग की तरह हम अपना सर बालूमें छिपा लेते हैं और बाहरवालोंको जो बात बिलकुल साफ-साफ नजर आती है, हम उसे देखनेसे इनकार कर देते हैं। विट्ठलभाई पटेलके इस्तीफेसे सरकारकी प्रतिष्ठाको गहरा धक्का पहुँचा है। अध्यक्षकी हैसियत से उनकी दृढ़ता निःसन्देह सरकारके लिए परेशानीका कारण थी; अब जिस तरह उन्होंने इस्तीफा दिया है, वह सरकारको और भी अधिक परेशान करनेवाला है।
{{Rh||'''सीमा- प्रान्त'''}}
जब मैं दांडीके लिए चला, तभी सीमा प्रान्तके कुछ मित्रोंने मेरी सहायताके लिए थोड़े-से स्वयंसेवक भेजने की इच्छा प्रकट की थी। मैंने उनकी इस कृपाके लिए उन्हें धन्यवाद लिख भेजा, लेकिन उनसे कोई सहायता नहीं ली। यदि उन्होंने इस आन्दोलन में सक्रिय भाग न लिया होता तो क्या ही अच्छा होता ? जिन्हें अहिंसाके पूरी तरह से पालन किये जानेका विश्वास नहीं है, वे यदि इस लड़ाईमें सक्रिय भाग नहीं लेते तो निश्चय ही इस तरह वे इसमें सहायता करते हैं। जो मदद करनेकी इच्छासे हाथ बँटाते हैं परन्तु परिणाममें हिंसा होती है, जैसे कि पेशावरमें हुई, ये निस्सन्देह इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाते हैं। इसमें तो मुझे जरा भी शक नहीं है कि पेशावरवासियोंका इरादा नेक था। वे स्वराज्य हासिल करनेके लिए शायद मुझसे भी ज्यादा अधीर हों लेकिन आज इस देशमें सिवा अहिंसा और किसी भी तरीके से कोई स्वराज्य नहीं पा सकता। हम मार-काटका तरीका अख्तियार करके अपने मुल्कको आजाद नहीं करा सकते। पर यदि हम आखिरतक अहिंसक बने रहें तो स्वराज नजदीक ही है। स्वराज्य वस्तरबन्द गाड़ियोंको जलाने और सरकारी तन्त्रको चलाने-वाले अफसरोंको मारनेसे नहीं मिलेगा। इसे प्राप्त करनेका तरीका अनुशासित और संगठित ढंगसे कष्ट सहन करना है। मुझे पेशावरकी घटनाओंके लिए बड़ा दुःख है। जो काम करना चाहते थे यह तो कुछ हुआ नहीं, उलटे कई बहादुर अपनी जानसे हाथ धो बैठे।
{{Rh||'''वादा पूरा करने की जरूरत'''}}
हममें बनियापनके भाव बहुत प्रबल है। विदेशी वस्त्रके व्यापारियोंने जो रुख अख्तियार किया है, यह इसी भावका सूचक है। वे विदेशी वस्त्रके व्यापारको इसी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{c|{{larger|'''३६७. टिप्पणियाँ'''}}}}</noinclude>{{rh||'''अध्यक्षका इस्तीफा'''}}
विट्ठलभाई पटेलके इस्तीफेसे हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यदि वे इस्तीफा न देते तभी आश्चर्य होता । अपने धैर्य और निष्पक्ष व्यवहारके कारण वे कांग्रेसियोंके प्रेमपात्र बने और विरोधियोंके प्रशंसा पात्र । मुझे यह देखकर खुशी होती है कि अब विट्ठलभाई भी यह मानने लगे हैं कि विधानसभा द्वारा देशकी सेवा नहीं हो सकती । रक्तशोषण और लूट खसोटके खेलमें भारतकी वर्तमान विधायक संस्थाएँ पासेका काम करती हैं। शुतुरमुर्ग की तरह हम अपना सर बालूमें छिपा लेते हैं और बाहरवालोंको जो बात बिलकुल साफ-साफ नजर आती है, हम उसे देखनेसे इनकार कर देते हैं। विट्ठलभाई पटेलके इस्तीफेसे सरकारकी प्रतिष्ठाको गहरा धक्का पहुँचा है। अध्यक्षकी हैसियत से उनकी दृढ़ता निःसन्देह सरकारके लिए परेशानीका कारण थी; अब जिस तरह उन्होंने इस्तीफा दिया है, वह सरकारको और भी अधिक परेशान करनेवाला है।
{{Rh||'''सीमा- प्रान्त'''}}
जब मैं दांडीके लिए चला, तभी सीमा प्रान्तके कुछ मित्रोंने मेरी सहायताके लिए थोड़े-से स्वयंसेवक भेजने की इच्छा प्रकट की थी। मैंने उनकी इस कृपाके लिए उन्हें धन्यवाद लिख भेजा, लेकिन उनसे कोई सहायता नहीं ली। यदि उन्होंने इस आन्दोलन में सक्रिय भाग न लिया होता तो क्या ही अच्छा होता ? जिन्हें अहिंसाके पूरी तरह से पालन किये जानेका विश्वास नहीं है, वे यदि इस लड़ाईमें सक्रिय भाग नहीं लेते तो निश्चय ही इस तरह वे इसमें सहायता करते हैं। जो मदद करनेकी इच्छासे हाथ बँटाते हैं परन्तु परिणाममें हिंसा होती है, जैसे कि पेशावरमें हुई, ये निस्सन्देह इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाते हैं। इसमें तो मुझे जरा भी शक नहीं है कि पेशावरवासियोंका इरादा नेक था। वे स्वराज्य हासिल करनेके लिए शायद मुझसे भी ज्यादा अधीर हों लेकिन आज इस देशमें सिवा अहिंसा और किसी भी तरीके से कोई स्वराज्य नहीं पा सकता। हम मार-काटका तरीका अख्तियार करके अपने मुल्कको आजाद नहीं करा सकते। पर यदि हम आखिरतक अहिंसक बने रहें तो स्वराज नजदीक ही है। स्वराज्य वस्तरबन्द गाड़ियोंको जलाने और सरकारी तन्त्रको चलाने-वाले अफसरोंको मारनेसे नहीं मिलेगा। इसे प्राप्त करनेका तरीका अनुशासित और संगठित ढंगसे कष्ट सहन करना है। मुझे पेशावरकी घटनाओंके लिए बड़ा दुःख है। जो काम करना चाहते थे यह तो कुछ हुआ नहीं, उलटे कई बहादुर अपनी जानसे हाथ धो बैठे।
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हममें बनियापनके भाव बहुत प्रबल है। विदेशी वस्त्रके व्यापारियोंने जो रुख अख्तियार किया है, यह इसी भावका सूचक है। वे विदेशी वस्त्रके व्यापारको इसी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||टिप्पणियाँ|३८३}}</noinclude>पर छोड़ना चाहते हैं कि उन्हें कोई नुकसान न हो। लेकिन देशभक्ति और बनियापनकी कभी पटी नहीं। हिन्दुस्तानके भाइयों और बहनोंसे इस समय तो यह आशा की जाती है कि वे स्व० दत्तात्रेयकी तरह मौतका मुकाबला करें, दक्षिण आफ्रिका-वाले श्री काछलियाकी तरह अनिवार्य दिवालियापनकी स्थितिको झेलें, स्व० गोपबन्धु- दास और अन्य अनेक गुदड़ीके लालोंकी तरह गरीबीको गले लगायें और अंभेटीके विट्ठलभाईकी विधवा पत्नीकी तरह अपने प्रियसे प्रिय सम्बन्धियोंके वियोगका स्वागत करें। अतएव मेरे विचारसे विदेशी वस्त्रके व्यापारियोंकी नुकसान से बचने की यह वृत्ति उनमें देशभक्ति अभावकी सूचक है।
लेकिन दिल्ली के व्यापारियोंका कहना है कि वहाँकी कांग्रेस कमेटीने कुछ शर्तोपर धरना न देने का वादा किया है। अगर यह सच है तो किसी भी तरह क्यों न हो, वादा पूरा किया हो जाना चाहिए। अगर किसी कांग्रेसी आदमी या संस्थाकी बातपर विश्वास न किया जा सके, तो आखिरकार इस लड़ाई में हमारी हार होगी। सत्याग्रहका अर्थ सत्यका आग्रह है । वचन भंग सत्यका अधम कोटिका त्याग है। अतः मैंने सम्बन्धित पक्षोंको यह सलाह दी है कि अगर वे किसी तरहके वादेके मसविदेपर सहमत न हो सकें तो किसीको पंच बनाकर उसके द्वारा मामलेको सुलझा लें।
मुझे पता चला है कि दिल्लीमें स्त्री-पुरुष दोनों धरना देनेका काम करते हैं। मैं लिख चुका हूँ कि धरना देनेका काम औरतें ही करें। यदि स्त्री स्वयंसेविकाओंकी कमीके कारण धरना देनेका काम स्थगित करना पड़े तो चिन्ता नहीं। हिंसाकी हर सम्भावनासे बचना चाहिए। होशियारीके साथ प्रचार करके और खादीका उत्पादन बढ़ाकर पुरुष बहिष्कारके लिए अत्यन्त अनुकूल वातावरण तैयार कर सकते हैं। परन्तु धरना देनेका काम जहाँ कहीं भी हो, स्त्रियों द्वारा ही हो।
{{Rh||'''राष्ट्रीय स्त्री-सभा'''}}
इस संस्थाने अब एक उपसंघकी स्थापना की है, जिसका एकमात्र उद्देश्य शराब और विदेशी कपड़ोंका बहिष्कार है। इसने पैसेके लिए जनतासे अपील की है। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि जनताने अबतक इसे जितना सहयोग दिया है, उसकी अपेक्षा अब अधिक देगी। लोगोंको मालूम होना चाहिए कि इस संघके लिए निरन्तर लगनसे जुटकर काम करते रहनेका श्रेय भारत के पितामह दादाभाई नौरोजीकी पौत्रियोंको प्राप्त है। दादाभाईकी आत्मा उनकी आस्था और देशसेवाको बड़े गर्व और सन्तोषसे निहार रही होगी।
{{Rh||'''समुद्र-पार से'''}}
सत्याग्रह-युद्धकी सफलताकी कामना करते हुए मुझे मैक्सिको, फिलिपाइन, दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका आदि देशोंसे कई तार मिले हैं। मैंने उन्हें जान-बूझकर प्रकाशित नहीं किया - इसलिए नहीं कि मैं तार भेजनेवालोंका कृतज्ञ नहीं हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं जानता हूँ कि यद्यपि दूसरे देशवालों की शुभकामनाएँ हमारे लिए बहुमूल्य हैं, परन्तु हमारे कार्यकी सिद्धिका आधार तो हमारी अपनी इच्छाओं और तदनुसार हमारे
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२८
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३८४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>काम करनेपर ही है। अगर हमारे कार्य सीधे और सच्चे रहे तो सारी दुनियाकी शुभकामनाएँ हमारे साथ होंगी, और जो आज हमें आशिष नहीं देते, कल वे भी देने लगेंगे। तथापि नीचेके दो सन्देश यहाँ देना में जरूरी समझता हूँ; क्योंकि ये अंग्रेज मित्रोंके भेजे हुए हैं। इस देशके सत्याग्रहियोंका ध्येय अंग्रेजोंका हृदय परिवर्तन करना है। इंग्लैंड टीकाएँ भी काफी मिलती रहती हैं, जिनमें से कुछको मैंने इन पृष्ठों में छापा भी है। अतएव यहाँ कुछ अंग्रेज मित्रोंकी शुभकामनाओं को प्रकाशित करते हुए मुझे हर्ष होता है।
{{Left|'''प्रिय महात्मा गांधी,'''}}
'''अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध प्रतिरोधक संस्थाकी कार्यकारिणीके हम नीचे हस्ताक्षर करनेवाले सदस्य भारतमें आपके संघर्षको प्रगतिको अत्यन्त दिलचस्पीके साथ देखते रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध-प्रतिरोधक संस्थाके सिद्धान्तोंके अनुसार हम मानते हैं कि शान्तिमय साधनों द्वारा साम्राज्यवादका नाश किया जा सकता है, इसलिए हमें यह देखकर बड़ा आनन्द होता है कि आप अहिंसात्मक साधनों द्वारा अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।'''
'''यह मानी हुई बात है कि इस प्रयत्नमें आपको अनेक कष्ट और फठि-नाइयोंका सामना करना पड़ेगा। इन कष्टों और कठिनाइयोंमें हमारी सहानु भूति और हमारा प्रेम आपके साथ रहेगा और हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि हमसे जहाँतक बन पड़ेगा, सभी सम्भावित क्षेत्रोंमें प्रचार कार्य करके, हम सत्य तथा न्यायको खातिर चल रही आपकी इस लड़ाईमें पूरी मदद करेंगे।'''
{{Right|'''हृदयसे आपके,'''<br>
'''ए० फेनर ब्रॉकवे'''<br>
'''हेरॉल्ड एफ० बिंग'''<br>
'''माथ स्टोनिज'''<br>
'''स्टीफन जे० थॉनं'''<br>
'''एच० रनहम ब्राउन'''}}
{{Left|'''अहिंसा विजयी हो !'''<br>
'''अन्तर्राष्ट्रीय महिला शान्ति स्वतन्त्रता संघ'''}}
{{Rh||'''वाइसराय से महिलाओंकी अपील'''}}
इसी अंक अन्यत्र प्रकाशित की जा रही वाइसरायके नाम गुजरातकी महिलाओं- की अपील<ref>१. देखिए " वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा", २७-४-१९३० अथवा उसके पूर्व</ref> सबके ध्यान देने योग्य है। यह अपील गुजराती महिलाओंकी ओरसे ही की जा रही है। अखिल भारतीय स्तरकी अपील तैयार करनेके लिए बहुत समयकी जरूरत होती है। लेकिन हमें आशा है कि गुजराती बहनोंके इस कार्यका अनुकरण शेष प्रान्तकी बहनें भी करेंगी। कहने की जरूरत नहीं कि वे अपनी अपीलोंमें इस अपील-
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२९
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||प्रश्नोत्तर|३८५}}</noinclude>से जितना फर्क करना जरूरी समझें, कर सकती हैं। संगठनका विकास तो सहज रीतिसे ही होना है। इसलिए विविधताका भी स्वागत किया जा सकता है। जबतक मुख्य बातोंमें कोई हेर-फेर नहीं किया जाता तबतक ऐसी विविधतासे कोई हर्ज होनेवाला नहीं है और वे मुख्य बातें हैं: (१) धरना सिर्फ औरतें ही दें, (२) केवल ब्रिटिश वस्त्रोंका नहीं, बल्कि सभी तरहके विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार किया जाये और बहिष्कारका साधन हो सदर
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३६८. प्रश्नोत्तर'''}}}}
मैं जब पिछली बार बलसाड़ गया था<ref>१. २६ अप्रैल, १९३० को ।</ref> तो वहां प्रोफेसर सैयद रऊफ पाशाने मुझसे मिलकर हिन्दू-मुस्लिम एकताके बारेमें कुछ उपयुक्त सवाल पूछे थे। मेरी प्रार्थनापर उन्होंने उन सवालोंको लिख डाला, जिससे मैं उनका ठीक-ठीक जवाब दे सका है। नीचे सवाल और उनके जवाब दिये जा रहे हैं :
'''प्रश्न १. आप कहते हैं कि इस लड़ाईका उद्देश्य पूर्ण स्वराज्यको स्थापना करना नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए जनतामें आवश्यक शक्ति पैदा करना है। अगर आपको ऐसा लगे कि नेहरू रिपोर्टके आधारपर दिये गये औपनिवेशिक स्वराज्यसे वह ताकत पैदा हो सकेगी और दूसरी ओर यदि मुसलमान यह मानें कि उससे सारे देशकी नहीं, बल्कि हिन्दुओंकी हो ताकत बढ़ेगी, तो उस हालतमें क्या आप वैसा स्वराज्य मंजूर करेंगे ?'''
उत्तर : मैं यह तो कभी मान ही नहीं सकता कि किसी भी तरहके दानसे हममें ऐसी ताकत आ सकेगी। नेहरू योजनाको तो अब किसी भी दशामें पुनरुज्जीवित किया ही नहीं जा सकता। इसका और कोई कारण न भी हो तो यह तो है ही कि इस योजनामें कौमी सवालका जो हल सुझाया गया है, उससे सभी सम्बन्धित कौमोंको सन्तोष नहीं हुआ। इसके अलावा, उसमें पूर्ण स्वराज्यकी शर्त-जैसी भी कोई चीज नहीं है, क्योंकि जाहिर है कि उस समय ऐसी कोई शर्त नहीं रखी जा सकती थी।
'''प्रश्न २. क्या आप यह मानते हैं कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेके समय और गोलमेज परिषद् में भाग लेनेके सवालपर अली भाइयोंका आपके साथ जो मत-भेद हुआ, वह उनकी सच्ची मान्यताओंपर आधारित था ? क्या आप ऐसा समझते हैं कि अपने इसमें वे ब्रिटिश सरकारसे जरा भी प्रभावित नहीं थे ?'''
४३-२५
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३०
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३८६|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>उत्तर : निश्चय ही मैं ऐसा मानता हूँ कि अली भाई जो भी कहते हैं, वे अपने हार्दिक विश्वासकी प्रेरणापर ही कहते हैं। यदि मैं ऐसा नहीं मानता या यह समझता कि वे ब्रिटिश सरकारसे प्रभावित हो सकते हैं तो ऐसी आशा कदापि नहीं रखता कि आज वे जो भारी भूल उनकी कार्रवाईको में भारी भूल ही मानता हूँ, जैसा कि वे मेरे कार्योंको मानते हैं। - कर रहे हैं, उसे एक दिन समझ जायेंगे और सच्चा रास्ता पकड़ लेंगे।
'''प्रश्न ३. आप यह महसूस करते हैं या नहीं कि देशके एक छोरसे दूसरे छोरतक मुसलमानोंके बीच आज भी अली- भाइयोंके अनुयायियोंकी संख्या बहुत बड़ी है और यदि अली भाई उन्हें विश्वास दिला दें कि आपके साथ शामिल होनेसे उनके हितको हानि नहीं होगी तो कल ही आपकी सेनामें बहुत वृद्धि हो जाये ?'''
'''और क्या आप यह नहीं मानते कि जिस तरह अन्य मामलोंमें आपके नेतृत्व पर कोई शंका नहीं को जातो, लेकिन कौमो सवालके बारेमें आप हिन्दू जातिके मतको अपने अनुकूल नहीं कर सके हैं, उसी तरह, अली भाई अपने सारे प्रभावके यावजूद मुसलमानोंको महासभावाले हिन्दुओंके प्रति जो अविश्वास है, उसे दूर करनेमें पहले भी असमर्थ थे और आज भी है ?'''
उत्तर: उनके अनुयायियोंकी बड़ी संख्या होना तो स्वाभाविक है। अली-भाइयोंकी सेवा इतनी अधिक है कि मुसलमानों में उनके अनुयायी हमेशा रहेंगे । अतएव इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि उनके आनेसे हमारे पक्षको और भी बल मिलेगा।
नेताओंका प्रभाव चाहे जितना हो, गहरे जमे हुए अविश्वासको वे दूर नहीं कर सकते ।
'''प्रश्न ४. क्या आप यह मानते हैं कि हिन्दू -- खासकर गुजरातके हिन्दू-- अहिंसात्मक लड़ाईके लिए जितने प्रशिक्षित है उतने ही प्रशिक्षित मुसलमान -- खास- कर उत्तर-पश्चिमी सोमा प्रान्त और महावारके मुसलमान -- भी है ? और इन प्रान्तों में हालमें जो घटनाएँ घट चुकी हैं, उनको नजरमें रखते हुए क्या आप यह नहीं मानते कि जबतक ऐसे अप्रशिक्षित प्रान्तोंका पूरा-पूरा संगठन न हो जाये तबतक उन्हें लड़ाईमें शामिल होनेसे रोक दिया जाये, अन्यथा व्यर्थ ही मुसलमानोंकी जानें जायेंगी ?'''
उत्तर: जो प्रान्त विशुद्ध अहिंसाका पालन करनेको तैयार नहीं हैं, उन्हें इस लड़ाई में शामिल न होनेके लिए मैं बार-बार चेतावनी दे चुका हूँ। उनकी सहानुभूति ही हमारे लिए काफी है।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
''यंग इंडिया''' १५-१९३०}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३८६|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>उत्तर : निश्चय ही मैं ऐसा मानता हूँ कि अली भाई जो भी कहते हैं, वे अपने हार्दिक विश्वासकी प्रेरणापर ही कहते हैं। यदि मैं ऐसा नहीं मानता या यह समझता कि वे ब्रिटिश सरकारसे प्रभावित हो सकते हैं तो ऐसी आशा कदापि नहीं रखता कि आज वे जो भारी भूल उनकी कार्रवाईको में भारी भूल ही मानता हूँ, जैसा कि वे मेरे कार्योंको मानते हैं। - कर रहे हैं, उसे एक दिन समझ जायेंगे और सच्चा रास्ता पकड़ लेंगे।
'''प्रश्न ३. आप यह महसूस करते हैं या नहीं कि देशके एक छोरसे दूसरे छोरतक मुसलमानोंके बीच आज भी अली- भाइयोंके अनुयायियोंकी संख्या बहुत बड़ी है और यदि अली भाई उन्हें विश्वास दिला दें कि आपके साथ शामिल होनेसे उनके हितको हानि नहीं होगी तो कल ही आपकी सेनामें बहुत वृद्धि हो जाये ?'''
'''और क्या आप यह नहीं मानते कि जिस तरह अन्य मामलोंमें आपके नेतृत्व पर कोई शंका नहीं को जातो, लेकिन कौमो सवालके बारेमें आप हिन्दू जातिके मतको अपने अनुकूल नहीं कर सके हैं, उसी तरह, अली भाई अपने सारे प्रभावके यावजूद मुसलमानोंको महासभावाले हिन्दुओंके प्रति जो अविश्वास है, उसे दूर करनेमें पहले भी असमर्थ थे और आज भी है ?'''
उत्तर: उनके अनुयायियोंकी बड़ी संख्या होना तो स्वाभाविक है। अली-भाइयोंकी सेवा इतनी अधिक है कि मुसलमानों में उनके अनुयायी हमेशा रहेंगे । अतएव इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि उनके आनेसे हमारे पक्षको और भी बल मिलेगा।
नेताओंका प्रभाव चाहे जितना हो, गहरे जमे हुए अविश्वासको वे दूर नहीं कर सकते ।
'''प्रश्न ४. क्या आप यह मानते हैं कि हिन्दू -- खासकर गुजरातके हिन्दू-- अहिंसात्मक लड़ाईके लिए जितने प्रशिक्षित है उतने ही प्रशिक्षित मुसलमान -- खास- कर उत्तर-पश्चिमी सोमा प्रान्त और महावारके मुसलमान -- भी है ? और इन प्रान्तों में हालमें जो घटनाएँ घट चुकी हैं, उनको नजरमें रखते हुए क्या आप यह नहीं मानते कि जबतक ऐसे अप्रशिक्षित प्रान्तोंका पूरा-पूरा संगठन न हो जाये तबतक उन्हें लड़ाईमें शामिल होनेसे रोक दिया जाये, अन्यथा व्यर्थ ही मुसलमानोंकी जानें जायेंगी ?'''
उत्तर: जो प्रान्त विशुद्ध अहिंसाका पालन करनेको तैयार नहीं हैं, उन्हें इस लड़ाई में शामिल न होनेके लिए मैं बार-बार चेतावनी दे चुका हूँ। उनकी सहानुभूति ही हमारे लिए काफी है।
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'''यंग इंडिया''' १५-१९३०}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३६९. शराब और पारसी'''}}}}
बहुत-से पारसी भाइयोंके मन में ऐसी आशंका दिखाई देती है कि शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका कार्यक्रम केवल पारसी शराब विक्रेताओंकी दुकानों तक ही सीमित रहना है। यह बिलकुल गलत धारणा है। अब तो सारे भारतमें कमोबेश संगठित तरीके से धरना दिया जा रहा है। और गुजरातको छोड़कर देशके अन्य हिस्सों में पारसियोंकी अपेक्षा हिन्दू-विक्रेताओंकी संख्या कहीं अधिक है। और खुद गुजरातमें भी जो ताड़के हजारों पेड़ गिराये जा रहे हैं, वे मुख्यतः हिन्दुओंकी ही सम्पत्ति हैं। हिन्दू मालिकोंके ताड़ीखानों पर तो निश्चय ही बहुत बड़े पैमानेपर धरना दिया जाना है। स्मरण रहे कि संगठित रूपसे धरना देना अभी शुरू ही हुआ है। अपने भाषणों में मैने जो स्पष्ट रूपसे पारसी भाइयोंसे ही अनुरोध किया है, उसका एक कारण तो यह है कि उनके साथ मेरा अविच्छेद्य सम्बन्ध है और दूसरा यह कि उनका समाज भारतमें सबसे अधिक प्रगतिशील और संगठित है और इसलिए उन्हें कोई बात ज्यादा आसानीसे समझाई जा सकती है। वे अखबार पढ़ते हैं। पारसी शराब विक्रेता मेरी सभाओंमें आते हैं, जब कि हिन्दू-विक्रेता इतने अज्ञानी हैं
कि उन्हें सभाओंमें आनेकी बात कभी सूझती ही नहीं; उनसे अपनी बात कहनेका एक ही उपाय है कि हम घरों या दुकानों में जाकर उनसे व्यक्तिशः मिलें और
सच तो यह है कि पारसी भाइयोंने हमारे अनुरोधपर जो कुछ किया है, वह काफी उत्साहवर्धक है, यद्यपि इतना करना पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। सूरत जिलेमें एक पारसी बहन ही धरनेकी व्यवस्था कर रही हैं। वे हैं मीठूबाई पेटिट उनके जो मददगार हैं, उनमें भी एक पारसी वकील शामिल हैं। बहराम मेहता और धनजीशा दरबारी इसी उद्देश्यकी खातिर जेल गये हैं। कहने को तो उन्हें नमक-कानूनोंको भंग करने के लिए गिरफ्तार किया गया, लेकिन मुझे कुछ ऐसा सन्देह है कि उन्हें इस सम्भावनाको ध्यान में रखकर गिरफ्तार किया गया कि शराब विक्रेताओंके बीच तो उनका प्रभाव निश्चय ही फैलेगा। जो भी हो, इतना तो है ही कि वे मय-निषेध- का कार्य भी उसी तत्परतासे कर रहे थे जिस लगनसे नमक सत्याग्रह कर रहे थे । मुझे इस बातपर भी बड़ा हर्ष हुआ कि अभी पिछले दिनों जो पारसी शराब विक्रेता मुझसे मिलने आये थे, वे मेरे इस आश्वासनसे सन्तुष्ट होकर लौटे कि शराबकी दुकानोंकी तरह ताड़ीखानोंपर भी धरना देनेका मेरा पूरा इरादा है। एक शिकायत यह थी कि पासके बड़ौदा राज्यकी शराबकी दुकानोंके बारेमें हम कुछ नहीं कर रहे हैं। आरोप उचित था। लेकिन मैं यह आशा करता हूँ कि बड़ौदा राज्यके लोग बड़ौदाके मद्यगृहोंपर धरना देनेकी व्यवस्था अवश्य करेंगे। मद्य निषेध सबसे पहले और सबसे बढ़कर एक नैतिक सुधारका कार्य है। देशी राज्योंकी भी इसमें उतनी ही रुचि है जितनी कि शेष भारतकी । देशी राज्योंके लोग इस सुधारके लिए प्रयत्न कर सकते हैं, बल्कि उन्हें करना चाहिए।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मुझसे मिलनेवाले भाइयोंने अपनी जीविकाका सवाल भी उठाया था। यहीं वह समस्या है जिसके समाधानके लिए पारसियोंको एक समाजके रूपमें आगे आना है। जिन पारसियोंको अपनी आयका एकमात्र साधन समाप्त हो जानेपर -- और इसे समाप्त तो कब का हो जाना चाहिए था -- राहतकी जरूरत होगी, उन्हें कोई रोजगार देनेके लिए पारसियोंके संगठनोंको जरूरी आंकड़े तैयार करने चाहिए और 'ब्यूरो' खोलने चाहिए। यह कोई गौरवकी बात नहीं है कि इस महान् समाजके इतने सारे सदस्य जीविकाके लिए एक अनैतिक व्यापारपर निर्भर हैं।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३७०. ' अहिंसाकी विजय ' '''}}}}
श्री राजेन्द्र प्रसाद को कौन नहीं जानता ? वे पटनासे लिखते हैं :<ref>१. पहा नहीं दिया जा रहा है। राजेन्द्र मावूने पटना में हुई घटनाका विवरण देते हुए लिखा था कि २३ अप्रैको पन्द्रह हजार लोगोंका एक जलूस निकला और पुलिस की ज्यादतीके बावजूद वहाँ उपस्थित लोग पूरी तरह शान्त और अनुशासनमें रहे। इसे उन्होंने अहिंसाकी पूर्ण विजय कहा था।</ref>
हिन्दुस्तानमें आजकल जो हवा बह रही है, उसका जितना अनुभव करता हूँ उतना ही मुझे यह प्रतीत होता जाता है कि जनताने शान्तिका सबक ठीक-ठीक सीख लिया है। इसमें अभी कुछ कमी तो है । परन्तु यदि लोग आखिरतक निर्भय और शान्त बने रहे तो स्वराज्य दूर नहीं है।
स्वराज्यके लिए तीन गुण बहुत ही जरूरी हैं शुद्धि, निर्भयता और उद्यम । शराब आदि नशीली चीजोंका त्याग शुद्धिकी निशानी है। नमक-कानून जैसे कानूनोंकी सविनय अवज्ञासे जनता निर्भयताका पाठ पढ़ और पढ़ा रही है, और चरखे या तकलीके सर्वव्यापक होनेपर जनता उद्यमी बन सकती है। इन तीनोंकी सफलतासे जो आर्थिक लाभ होता है सो तो है ही। शराब वगैरा नशीली चीजोंके त्यागसे २५ करोड़ रुपये बचेंगे। नमक-करके रद होनेसे कमसे कम ६ करोड़ और तकलीके उद्यमसे अर्थात् खादीके द्वारा ६० करोड़की बचत होगी ।
भगवान् इस देशकी जनताको बल दे कि वह इन कार्योंको कर सके।
{{Left|'''हिन्दी नवजीवन,''' १-५-१९३०}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७१. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}}
{{Right|१ मई, १९३०}}
{{Left|प्रिय सफेद दाढ़ीवाले,}}
आपका पत्र मिला। खेड़ा तो तूफानका केन्द्र बन गया है। असली खतरा वहीं है। आप बहिष्कारको नितान्त शुद्ध रखें और यह कोशिश करें कि उसमें किसी तरहकी जोर-जबरदस्ती न की जाये। बाल स्वयंसेवकोंके साथ किसी भी तरहका दुव्यवहार नहीं होना चाहिए। और मैं समझता हूँ, आपको जहाँ देहवणके ठाकुर रहते हैं, वहाँ चले जाना चाहिए। यदि आपको पूरा विश्वास हो जाये कि वहाँ बर्बरता की गई है तो आप मुझे प्रकाशनके लिए एक संक्षिप्त विवरण लिख भेजें। यदि सम्भव हो तो ठाकुरसे मिलनेका प्रयत्न करें। यह फौजदार मुन्शी कौन है ?
मैं यह पत्र चलती हुई गाड़ीमें लिख रहा हूँ। मैं हमीदाके कार्य क्षेत्र में जा रहा हूँ और वहाँ उससे मिलनेकी आशा कर रहा हूँ।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|आपका,<br>
मो० क० गां०}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९५७२) की फोटो-नकलसे ।
{{C|{{larger|'''३७२. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}}
{{Right|१ मई, १९३०}}
{{Left|चि० नरहरि,}}
चि० लिखनेका अभ्यास होनेमें अभी मुझे कुछ समय लगेगा ।<ref>१. गांधीजी ने पहले "भाईश्री ५" लिखा और फिर उसे काट दिया।</ref>
१. छोटे-छोटे पुलिस अधिकारियोंका बहिष्कार नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें सीधा आदि अवश्य मिलते रहना चाहिए।
२. लेकिन जब वे पुलिसके अधिकारीको हैसियतसे आयें तब उनकी अवज्ञा की जानी जाहिए। पुलिसके रूपमें यदि वे हमसे कोई सेवा करवाना चाहें तो वह सेवा हमें नहीं करनी चाहिए।
३. बड़े अधिकारियोंको उन घरोंसे निकलने के लिए नहीं कहना चाहिए जिन घरोंमें वे रह रहे हों।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>४. बहिष्कारके बावजूद बहिष्कृत व्यक्तिके साथ हमारा सम्बन्ध मधुर होना चाहिए। यदि सम्बन्ध कड़वा हो तो समझो कि बहिष्कार विषमय है।
बहिष्कार तो अमलदारका नहीं, अमलदारीका है। हमें डायरका नहीं, डायरशाही- का बहिष्कार करना चाहिए। इसका विचार हमें इस तरह करना चाहिए कि मान लो अमलदार सगा भाई हो तो हम उसके प्रति कैसा व्यवहार करेंगे ? हरिलालके साथ में कैसा व्यवहार करता हूँ ? इससे बातको कुछ अधिक स्पष्ट रूपसे समझ सकोगे ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|[ पुनश्च : ]}}
मैंने पत्र फिरसे नहीं पड़ा है।
गुजराती (एस० एन० ९०५१ ) की फोटो - नकलसे ।
{{C|{{larger|'''३७३. ओलपाडमें दिये गये भाषणके अंश'''}}}}
{{Right|१ मई, १९३०}}
नेताओंको गिरफ्तार कर-करके सरकार हमारी अच्छी परीक्षा ले रही है। सरकार यह मानती है कि नेताओंको गिरफ्तार कर लेनेपर या तो हम घरके कोनोंमें जा दुबकेंगे या फिर हिंसापर उतर आयेंगे। यदि हम कोनोंमें जा छिपते हैं तो उसके लिए इससे अच्छा और क्या हो सकता है ? सरकारको इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए कि हम सिर न उठा सकें, बरस-पर-वरस कर चुकाते रहें, शराब पीते रहें, सवा रुपये मनका नमक खाते रहें और विदेशी कपड़े पहनते रहें। दूसरी ओर यदि हम हिंसा करेंगे तो यह बात भी उनके पक्षमें जायेगी, क्योंकि उस स्थितिमें इनके गोला-बारूदकी विक्री बढ़ जायेगी, इनके देशके व्यापारको लाभ पहुँ-चेगा और इनके जनरलों, कैप्टनों और सिपाहियों, सबको इनाम इकराम भेंटमें मिलेंगे। एक ही बात सरकारके पक्षमें नहीं जाती और वह यह कि न तो हम उसके कानूनों-को मानें और न उसके सामने झुकें।
हम नमकहराम थे, इसीलिए तो हमने अपने पवित्र और गरीब भाई-बहनोंके हाथके बुने कपड़ोंको छोड़कर बाहरसे कपड़ा मँगाया। इस्लाम में एक महान् खलीफा हो चुके हैं। बगदादसे रेशमी अंगरखे पहनकर आये बड़े-बड़े सूबेदारोंसे उन्होंने क्या कहा था ? आपके पैगम्बर साहब तो खादी पहनते थे, आप इतने मुलायम कपड़े कैसे पहनने लगे ? तत्कालीन धर्मात्माओंका ऐसा प्रताप था कि लोग यों ही परथर कांपने लगते थे। अर्थात् वे उनकी तलवारसे कांपते थे, ऐसा नहीं, बल्कि उनके तेजसे कांपते थे। आज क्या हिन्दू और क्या मुसलमान, वे मुझसे कहते हैं कि खादी मोटी और खुरदरी होती है। यह सुनकर में मन-ही-मन हँसता हूँ, हालांकि यह है तो रोनेकी बात ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८९
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>समा जाता है। अगर कुदरतके कानूनका भंग न किया जाये, तो बूढ़े अपंग नहीं बनेंगे और उन्हें बीमारी तो होगी ही क्यों?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
खुरर्शेदबहनसे कहना उसे पैसेकी जरूरत हो तो निःसंकोच आश्रमसे माँग ले। और कहीसे मँगायेगी तो मुझे दुख होगा, ऐसा कहना।
५५ पत्र हैं।
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/ १) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१४. पत्र: पैट्रिक क्विनको'''}}}}
{{right|१८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय श्री क्विन,}}
आपने जो सन्देश भेजा था उसके अनुसार हम दोनों कल शाम आपकी प्रतीक्षा करते रहे।
(१) कृपया कलका 'क्रॉनिकल' भेज दें।
(२) क्या आप उसे नियमित समयपर भिजवानेकी व्यवस्था नहीं कर सकेंगे?
(३) कृपया आश्रमवाली डाक भी भिजवायें। वह कल आनेवाली थी।
(४) मैं आश्रमसे एक पार्सल पानेकी आशा कर रहा हूँ जिसमें सैंडिलें और रुई होगी।
(५) किताबों और पत्रिकाओंका अन्य कोई पार्सल हो तो वह भी। मुझे...<ref>साधन-सूत्रमें कुछ शब्द स्पष्ट नहीं है।</ref> 'सीज़र और क्राइस्ट' नामक पुस्तिका और मद्रासका 'हिन्दू' भी होना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]}}
'''महात्मा गांधी: सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८७।
{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९०
250
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672291
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रेखा साव
5914
/* शोधित */
672291
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१५. पत्र: गुलाम रसूल कुरेशीको'''}}}}
{{right|१८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कुरेशी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम बम्बई हो आये, यह अच्छा किया। जब मैं वहाँ था तो सुलताना मेरे पास आती ही नहीं थी, भला अब वह मुझे याद क्यों न करेगी। फिर भी यदि वह मुझे देखेगी तो भाग ही जायेगी। मणिलाल इमामसाहब की
सेवामें है, इससे मुझे बहुत शान्ति मिलती है। अमीनाके साहसका तो कोई पार नहीं है, उसने स्वयंसेविकाओंमें अपना नाम लिखवा कर ठीक किया। किन्तु यदि वह सचमुच जेल चली जाये तो वहाँ बच्चेकी देखभाल कैसे कर पायेगी? इसलिए वह अगर घर रहकर जो कुछ कर सके, सो करे, तो पर्याप्त होगा। मौका आने पर वह जेल जानेको तैयार तो है ही।
{{right|बापूकी दुआ और आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६६५२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१६. पत्र: कमला नेवटियाको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कमला (रामेश्वरदास),}}
आखिरकार तेरा पत्र मिला। मेरे पत्रका तकाजा तू ठीक समझ गई। अब आलस्य मत करना। तेरा स्वास्थ्य कैसा रहता है? मुझे लिखती रहना। मुझे पत्र लिखनेकी वजहसे भी तू अपने आलस्यको भगा सकेगी। कराचीमें कीकीबहन<ref>जे॰ बी॰ कृपालानीकी बहन।</ref>, गंगाबहन<ref>ए॰ टी॰ गिडवानीकी पत्नी।</ref> आदिसे मिली थी क्या?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३०४२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९१
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१७. पत्र: रलियातबहन वृन्दावनलालको'''}}}}
{{right|१८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय बहन,}}
मणि अपने पत्र में लिखती है कि तुम मुझे याद करती हो। क्यों न करोगी? मैं तो प्रायः तुम्हारे बारेमें सोचता हूँ और तुम्हारे चेहरेको याद करके नरोत्तमदासकी याद हो आती है; क्योंकि तुम्हारा चेहरा उनसे मिलता-जुलता है। प्रभु तुम्हें और
माँजी को मानसिक शान्ति दे।
{{right|मोहनदासके जय श्रीकृष्ण}}
{{left|श्रीमती गोकीबहन<br>
बम्बई}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९८१०) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१८. पत्र: रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}}}
{{right|१८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|भाई रामेश्वरदास (धुलीया),}}
तुमारा पत्र मिला। सांपके डसते हुए बच गये तो ईश्वर अवश्य तुमारे पाससे अधिक सेवा लेगा। उपचार क्या किया था? सांप जहरी था? ईश्वर तुमको शांति देगा। राम नाम हमारे लिये कल्पद्रुम है ऐसा निश्चय जानो।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ १७५ की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९२
250
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१९. पत्र: शारदा सी॰ शाहको'''}}}}
{{right|२० सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ शारदा (बबु),}}
तू तो बहुत सयानी हो गई लगती है। अबसे जबतक तेरे पत्र आते रहेंगे तबतक मेरे पत्र भी तुझे मिलते ही रहेंगे। अब तो तू कोठारिन हो गई है न? तुझे अपना शरीर खूब मजबूत बना लेना चाहिए। पूँजाभाई बड़े होने के बावजूद मुझे अपने से बड़ा मानते हैं, यह कैसे होता है? यदि काका की अपेक्षा भतीजा उम्र में बढ़ा हो तो भी भतीजेको काका ही आशीर्वाद देता है न? क्या तू अब समझी?
यदि आनन्दीको मेरे बिना अच्छा न लगता हो तो तुम सब मिलकर उसे प्रसन्न रखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९८९०) से सौजन्य: शारदावहन जी॰ चोखावाला
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२०. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
{{right|२० सितम्बर १९३०}}
तेरा लम्बा पत्र मिला।
तेरी तबीयत ठीक रहती है, इसलिए मुझे कोई सुझाव देनेकी जरूरत नहीं है।
पश्चिमकी उन दो बहनोंके सम्पर्क में तू आती है या नहीं? न आती हो तो आना।
अभी तो ईश्वरने तेरा समस्त जीवन मुझे सौंप दिया जान पड़ता है।<ref>गांधीजीके जन्म दिवसके उपलक्ष में प्रेमाबहन कंटकने अपना सारा जीवन उन्हें समर्पित कर दिया था।</ref> अन्त तक ऐसा ही चलेगा।
सुशीला, जो मुझे अंग्रेजीमें शुभकामनाएँ भेजती है, किस प्रान्तकी है? नाम तो गुजराती या मराठी-जैसा है। तमिल तो नहीं है। यदि वह तमिल हो तो उसे माफ किया जा सकता है; नहीं तो शुभेच्छाएँ मातृभाषामें भेजे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६६८३) से। सौजन्य: प्रेमावहन कंटक जी॰ एन॰ १०२३५ की फोटो-नकलसे भी।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९३
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२१. पत्र: लक्ष्मीबहन खरेको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२० सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ लक्ष्मीबहन (खरे),}}
तुम्हारा धरनेके लिए जाना दूसरी बहनों के लिए ढालरूप सिद्ध होगा। यह सब नये अनुभव हैं। इनमें किसीको चोट भी लग सकती है; तो भी उससे हम पीछे न हटें। तुममें अटूट बल है। इसका उपयोग करके तुम शोभा पाओ और आश्रमकी शोभा भी बढ़ाओ।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २७६) से सौजन्य: लक्ष्मीबहन खरे
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२२. पत्र: आर॰ वी॰ मार्टिनको'''}}}}
{{right|परवडा सेंट्रल जेल<br>
२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय मेजर मार्टिन,}}
अब मुझे अपनी दूसरी कठिनाई कह डालनी चाहिए। इस जेलमें तथाकथित दुर्व्यवहारके आरोपोंके विषय में आपने मुझे जो बताया है, मैं उसके एक भी शब्द पर अविश्वास नहीं करता। फिर भी, अखबारोंमें जो रिपोर्टे छपी है उन सभीको
मैं अपने दिमाग से निकाल नहीं सकता। लिखनेवालोंने हर चीजके बारेमें जानबूझ कर झूठ नहीं कहा होगा। मुझे विश्वास है कि कुछ वक्तव्य तो सर्वथा अतिरंजित हैं। मैं आशा करता हूँ कि अधिकांश बातें झूठ हैं और मैं ऐसा मानना चाहूँगा कि सभी बातें झूठी हैं। लेकिन मेरा मन उद्विग्न है। कुछ ऐसी बातें हो सकती हैं जो आप न जानते हों; कुछ ऐसी बातें भी होंगी जिन्हें आप एक दृष्टिकोण से देखते हैं और सम्बन्धित कैदी दूसरे दृष्टिकोणसे।
ऐसी स्थिति में मेरा कर्तव्य मुझे स्पष्ट प्रतीत होता है। अगर मुझे उन कैदियोंके साथ रहनकी अनुमति नहीं दी जाती तो भी मैं यह अनुमति माँगना चाहूँगा कि मुझ यदाकदा इनसे मिलने दिया जाये। मैं आपको बता चुका हूँ कि मैं कोई विशेष सुविधाएँ नहीं चाहता। मुझे जो सुविधाएँ प्रदान की गई हैं वे मुझसे छीनी जा सकती हैं। यदि मुझे सुविधाओंकी खातिर अलग रखा गया है तो उनका मेरे लिए कोई<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९४
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>महत्त्व नहीं है, जबकि अलग रखा जाना मेरे लिए बहुत महत्त्व रखता है। जिन शारीरिक निर्योग्यताओंसे में पीड़ित है उन्हींसे पीड़ित अन्य कैदियोंको जो सुविधाएँ नहीं दी जा सकतीं उनको मैं भी नहीं चाहता। मैं वर्गीकरण में विश्वास नहीं करता क्योंकि वह मेरी रायमें अपमानजनक है। यदि मैं उन सुविधाओं का लाभ उठाता हूँ जो मेरे ही जैसे अन्य कैदियोंको प्राप्त नहीं है, तो ऐसा मैं अपनी शारीरिक
आवश्यकताओं<ref>एस॰ एन॰ १९९८० में प्राप्त मसविदेसे साधन-सूत्रमें यह शब्द मिट गया है।</ref> के कारण करता हूँ। किन्तु यदि मुझे अपने स्वास्थ्यको अपने उन
साथियोंकी सेवा करनेके सौभाग्यकी कीमत चुका कर खरीदना पड़े जिनमें से कइयोंको मैं जानता हूँ और जिनमें से एकको भी मैं अपने से किसी प्रकार कम नहीं मानता,
तो मैं खुशीसे अपने स्वास्थ्यकी बलि चढ़ा दूँगा।
मैं यह अलगाव तबतक सहन कर सका जबतक में ऐसा समझता रहा कि सब ठीक-ठाक है। लेकिन इस जानकारीने कि तरुण रतिलाल अब नहीं रहा, और प्यारेलाल, जो मेरे लिए पुत्रवत है, तकलीफमें है, तथा वृद्ध नरसिंहभाई मौत के दरवाजे तक पहुँच गये थे, और अलवारोंमें छपनेवाली लगातार शिकायतोंने मुझे अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरुक कर दिया है, अर्थात् अब मुझे उनके साथ सम्पर्क स्थापित करनेके लिए अपनी भरसक कोशिश करनी चाहिए।
मैं जानता हूँ कि मैंने जिस अनुमतिकी प्रार्थना की है उसे प्रदान करना आपके या जेलोंके इन्स्पेक्टर जनरलके हाथमें नहीं है। अतः मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि आप कृपया इस पत्रको सरकारके सामने पेश करके इसका उत्तर शीघ्र ही प्राप्त करें। मैं इस बातसे अवगत हूँ कि एक बन्दीके नाते मुझे अपने शरीरकी व्यवस्था करनेके मामलेमें कोई अधिकार नहीं है। लेकिन में यह भी जानता हूँ कि मेरे शरीर के
रख-रखाव में मेरे सहयोगकी भी आवश्यकता होती है। इस शरीर के अन्दर रहनेवाली आत्मा जो सेवा करनेको उत्कंठित है, यदि उसके लिए इस शरीरका उपयोग नहीं किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षणमें कोई दिलचस्पी नहीं रह सकती। मैं मनुष्य हूँ। बन्दी होकर भी मैं अपने अन्दरके इन्सानको अलग नहीं कर सकता।
मुझे यह आश्वासन देनेकी जरूरत नहीं है, लेकिन आवश्यक हुआ तो शायद आप स्वयं यह आश्वासन दे सकेंगे कि अपने साथियोंके बीच मेरी उपस्थितिका उपयोग अनुशासनका उल्लंघन करनेके लिए नहीं किया जायेगा, बल्कि इसके विपरीत उससे अनुशासन और बढ़ने की ही सम्भावना है। एक सविनय अवज्ञाकारीकी नैतिक संहिता उससे इस बातकी अपेक्षा करती है कि जेलके जो नियम आत्म सम्मानके विरुद्ध न हों, उनको वह खुशीसे माने और उनका पालन करे।
अन्तमें मैं सरकारका ध्यान इस तथ्यकी ओर दिलाना चाहता हूँ कि १९२३ में इसी जेलमें जब लगभग एक ऐसी ही घटना हुई थी तब मुझे दो कैदियोंसे मिलने दिया गया था, और जिसका परिणाम यह हुआ कि एक बड़ी गम्भीर दुर्घटना होनेसे
{{dhr|2em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९५
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2026-08-20T18:20:44Z
रेखा साव
5914
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: अमीना कुरेशीको|१५७}}</noinclude>बच गई थी।<ref>देखिए खण्ड २३, पृ४ १७०।</ref> पुलिसके वर्तमान इन्स्पेक्टर जनरल महोदय उस मामले के तथ्योंसे अवगत हैं।
{{right|हृदयसे आपका<br>
{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ३८५२) की फोटो-नकलसे; बॉम्बे सीक्रेट ऐक्सट्रैक्ट्स ७५०
(५) / ए॰, पृष्ठ २०७ से भी।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२३. पत्र: लीलावती आसरको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ लीलावती,}}
तेरा पत्र मिला। यदि तू अधीर न हो तो अपने आदर्शो पर आचरण करनेकी शक्ति आ ही जायेगी। जैसे एकबारगी बहुत खानेसे अजीर्ण हो जाता है उसी प्रकार अपनी सामर्थ्यका अनुमान किये बिना किसी बात पर अमल करनेसे हम असफल हो जाते हैं जिससे बादमें निराशा उत्पन्न होती है। यदि हम अपनी सामर्थ्यका अनुमान न कर सकें तो जिस पर हमारी आस्था हो, वह हमारी सामर्थ्यको ध्यानमें रखकर जैसा करने को कहे, हम वैसा करें। गंगाबहन से दिल खोलकर अपनी बात करना। वे जैसा कहें वैसा करेगी तो वही काफी होगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ९५६६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२४. पत्र: अमीना कुरेशीको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ अमीना,}}
तेरा पत्र मिला मियाँ अब्दुल मजीदको मेरी तरफसे बहुत-बहुत प्यार। सुलताना तो मुझे भला अपनेको छूने ही क्यों देगी? तेरी तबीयत अब कैसी रहती है? खाने-पीनेमें सावधानी बरतना।
तेरी उर्दूकी पढ़ाई-लिखाई चल रही है न?
{{right|बापूकी दुआ और आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६६५८) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७८
250
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2026-08-21T04:53:45Z
Sonu kumar 07
6479
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८२. पत्र : अमीना कुरेशीको'''}}
{{Rh|||२८ नवम्बर १९३०}}
<Br>चि० अमीना,
{{Gap}}तेरा पत्र मिला। इमामसाहब लिखते हैं कि तू जेल जानेके लिए अधीर हो
रही है, लेकिन यह ठीक नहीं है। जब खुदाकी मरजी तुझे वहाँ भेजनेकी होगी तो
समय अपने-आप उपस्थित हो जायेगा । तू तैयार है, इतना ही पर्याप्त है। इस
बीच बच्चोंको सँभाल, अपने स्वास्थ्यको ठीक रख और घर बैठे-बैठे जो सेवा हो
सके, सो कर। यह आन्दोलन ही कुछ ऐसा है कि घर बैठे रहकर भी सेवा हो
सकती है। तेरा भय दूर हो गया, इतना ही काफी है।
{{Rh|||बापूकी दुआ और आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनदच ]
{{Gap}}उर्दूका क्या हुआ ?
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ६६५९ ) की फोटो नकलसे।
{{C|'''४८३. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||२८ नवम्बर, १९३०}}
<Br>चिरंजी हेमप्रभा,
{{Gap}}तुमारा खत मिला। मेरे विचारोंका कम प्रचारके कारण बंगला में हिंसाका
वायु है यह ठीक नहि लगता। यह वायु हमेशा ज्यादा रहा है इसलिये मेरे विचारों
का प्रचार कम हो सका है। परंतु हम सच्चे रहेंगे तो बंगालका वायुका भी परि-
वर्तन अवश्य होगा । इसका अर्थ यह नहि है कि तुमने जो विचार किया है उसे
छोड़ दो। यथाशक्ति प्रचार अवश्य करो उसमें से ज्यादा परिणामकी शीघ्र आशा
मत रखो।
{{Gap}}आश्रमवासी भाई बहनोंको आशीर्वाद ।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{Gap}}जी० एन० १६७८ की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
k1vmbpad82a5qn99oy0uidcupgxte3f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७९
250
197978
672385
670710
2026-08-21T04:56:02Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672385
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८४. सत्याग्रही बन्दियोंका कर्त्तव्य''''}}
{{Rh|||[२९ नवम्बर, १९३० से पूर्व ]}}
{{Gap}}जब हम कैद होनेका प्रयत्न करते हैं तो उसके साथ ही हमारी सविनय अवज्ञा
परिपूर्ण हो जाती है। यदि हम जेलके वैध अनुशासनकी अवहेलना करेंगे तो अवज्ञा
सविनय नहीं रह जायेगी। इसलिए हमें जेलमें नारे लगाना या झगड़ा खड़ा करना
नहीं चाहिए। नियमानुसार यदि हमसे काम करने को कहा जाये तो हम काम करनेसे
इनकार नहीं कर सकते, बल्कि जितना काम हम कर सकें उतना काम करनेके लिए
हमें उत्सुक रहना चाहिए, और सो भी जितनी अच्छी तरह हो सके उतनी अच्छी
तरह करें। यह अच्छी चीज होगी कि "साधारण कैदी" भी स्वेच्छासे कुछ उपयोगी
काम करें, जिसके पीछे यह मंशा होना जरूरी नहीं है कि उससे उनकी कदकी अवधि
में कुछ माफी मिल जायेगी। साधारण कैद भोगनेवाले कैदियोंने महज मशक्कतका
काम करनेका प्रस्ताव करके तनावपूर्ण स्थितियोंको सामान्य बनाने में बड़ी मदद की है।
हम जितना कुछ भी काम करते हैं उससे राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि ही होती है।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १-१-१९३१
{{Gap}}१. बॉम्बे कॉनिक सम्वाददाताले बात करते हुए ६० वा० कालेलकरने के इस कथनको
उद्धृत किया था। २९ नवम्बर १९३० को जेलले रिहा होनेसे पूर्व गांधीजी के साथ हुई अपनी चर्चाओं के
आधारपर उन्होंने कहा वह (गांधीजी ) अपनी मौजूदा हालत में अपनेको राजनीतिक संघर्षका मार्ग-दर्शन
करनेके योग्य नहीं समझते क्योंकि वह फर्मक्षेत्रसे दूर हैं। सत्याग्रहीको जेलने पहुँचने के बाद ऐसा समझना
चाहिए कि बाहरी दुनिया के लिए वह मर गया है। किन्तु एक कैदीके नाते वह (गांधीजी) भावी सत्याग्रही
कैदियोंके लिए आधिकारिक निर्देश दे सकते हैं। परवडा जेल में उनके साथ रहनेके दौरान मैंने उनके
साथ जेलजीवन विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और कुछ उपयोगी निर्देश प्राप्त किये। मैं उनके उन
विचारोंको की लड़ाई लड़नेवाले कार्यकर्ताओंको बताऊँ, इसमें उन्हें कोई आपति नहीं थी। ऐसा
मुझे याद आता है मैं उन बातोंको उसी प्रकार नीचे लिखता हूँ।
{{Gap}}सत्याग्रहको यह बात समझनी चाहिए कि अदालत द्वारा अपराधी करार दिये जाते ही उसका विरोधभाव
या भवभाव समाप्त हो जाता है। उसका उद्देश्य जेलके अनुशासनको समाप्त करना नहीं है। युद्ध में पकड़
लिये जानेपर सिपाही अपने शख रख देता है और आत्म समर्पण कर देता है। एक सच्चे "सैनिक कैदी " के
शब्दोंपर शत्रु
सदैव भरोसा कर सकता है। अपने वचन के बलपर यदि युद्धबन्दीको थोड़ी-बहुत स्वतन्त्रता
प्रदान की जाती है तो वह भाग निकलनेकी या धोखा देनेकी कोशिश नहीं करेगा। हमें सत्याग्रही कैदियों के
नाते कि अन्दर आदर्श कैदी बनने की कोशिश करनी चाहिए। जबतक जेके नियम मानवताके साधारण
नियमों और आत्मसम्मानके विरुद्ध न हों तबतक हमें जेल अनुशासन सम्बन्धी नियमोंका पालन करनेके
लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। मैंने अक्सर कुछ युवक सत्याग्रहियोंको जेल्के अनुशासनको स्वीकार करने के
विरुद्ध बहस करते सुना है वे कहते हैं 'हम जेल इसलिए आये है क्योंकि हम सरकारके कानूनोंकी
अ] करना चाहते थे। आप इमसे जेलके अन्दर नियमोंका पालन करने को कैसे कहते है ? हमने केवल
साकी शपथ की है, लेकिन हम जेलोंमें भी सरकारको अवज्ञा अवश्य करेंगे।"<noinclude></noinclude>
1r06z0wkhi3xdaffmd4t9bk3pnjvejt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८४
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2026-08-21T05:02:19Z
Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Rh|||रात्रि ८४५ बजे, १-१२ -३०}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Gap}}प्यारेलालने बिहारी चरखेपर अच्छी शुरुआत की थी। परन्तु उसमें सफलता
नहीं मिली। मैंने दूसरा गाण्डीव ठीक कर दिया और वह बिना किसी बाधाके मजेसे
चलने लगा। सुपरिटेंडेंटकी मेहरबानीसे मैंने गाण्डीवमें अपने सुधार करवा लिये है।
आशा है वह अच्छी तरह काम देगा। मैंने उसे अभी १-१२-१९३० को रातके पौने
नौ बजे चलाकर देख लिया है। भोजनका प्रयोग जारी है।
{{Rh|||बापू}}
{{Gap}}अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२२ ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५६
से भी ।
{{C|'''४८८. पत्र : कुसुम बेसाईको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||२९ नवम्बर / १ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० कुसुम (देसाई),
{{Gap}}तेरे हर सप्ताह लिखनेकी प्रतिज्ञा करने पर भी इस हफ्ते कोई पत्र नहीं आया ।
इसे मैं एक गम्भीर भूल मानता हूँ। एक बार ली हुई प्रतिज्ञाको भंग करने जैसी
भयंकर बात और कोई नहीं हो सकती। हमारी यह बुरी आदत इतनी सामान्य बन
गई है कि आम तौर पर हमें उसकी भयंकरताका पता नहीं चलता। परन्तु यह एक
भयंकर भूल है, इतना निश्चित जान और सावधान हो जा । तेरे पास लिखनेको
कुछ न हो, तब तु छोटेलाल की तरह कोरे कागज पर हस्ताक्षर कर दिया कर ।
लेकिन माता-पिता के आगे बच्चोंको कुछ कहना ही न हो, यह सम्भव नहीं ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Rh|||१ दिसम्बर, १९३०}}
{{Gap}}काकासाहब की जगह २९ तारीखको प्यारेलाल आ गया।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० १८११ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
oqfpu2mrcod0zg0rtq5fslk97ujeovq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८५
250
197984
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2026-08-21T05:06:25Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672389
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||१ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० मनु ( त्रिवेदी),
{{Gap}}जैसा कि प्यारेलाल तुम्हारे बारेमें बताते हैं, उसपर से अनुमान होता है कि
अब तुम सशक्त हो गये हो। उम्मीद है, तुमने काकासाहब के साथ जी भरकर बातें
की होंगी। फिरसे बीमार न पड़ना काम करने में अधीरता न दिखलाना। जिनका
हेतु शुभ है, जो हमेशा सेवा करनेकी इच्छा रखते हैं, उनके
अकर्म में भी कर्म है।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ७७७२ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''४९०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Rh|||२७ नवम्बर / ३ दिसम्बर, १९३०}}
{{Rh|||गुरुवार सुबह}}
<Br>चि० नारणदास,
{{Gap}}इस बार तुम्हारा पुलिंदा मुझे कल शामको ही दे दिया गया था। 'व्रतविचार'
नामक पुस्तक मिल गई है।
{{Gap}}चि० कुसुम यदि अपने निश्चय पर दृढ़ हो तो मुझे उसकी बात पसन्द है ।
जब स्वराज्य प्राप्ति के बाद ही शादी करनी है तब अभीसे क्यों बन्धन डाल लें।
उस समय जो विचार होगा उसके अनुसार चलना ही ठीक है। इसलिए देवचन्दभाई
और जमनालालजी दोनोंको मेरा यह विचार बताना। कुसुमके विचार तुम अच्छी
तरह जान लेना। कहीं मन ही मन और बात हो और यह केवल बहाना न हो।
उसे जो करना हो, उसके लिए वह पूर्णतया स्वतन्त्र है। मैं तो इन दोनों नवयुवकोंके
बारेमें भी यही कहूँगा कि यदि वे स्वराज्य तक राह देखने को तैयार हैं तो आजसे
ही किस लिए बँध जाना चाहते हैं या क्यों किसी लड़कीको आजसे बांधना चाहते
हैं? यह शूरवीर या भक्तका लक्षण नहीं है, और यदि कुसुम वीर बालिका है और
उसकी शादी करनी ही हो तो वह वीरका ही वरण करे। घनश्यामदासको पत्र
लिखूंगा ।
{{Gap}}मणिलाल क्यों दूध लेनेसे इनकार करता है? ऐसा होने पर भी उसमें ताकत
ठीक बनी रहती हो तो मुझे कोई आग्रह नहीं। किन्तु हठपूर्वक दूध न ले, ऐसा भी
नहीं होना चाहिए। वजन कम ही हो रहा हो तो दूध लेना चाहिए। देवदास पत्र
क्यों नहीं लिखता ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४४
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४०६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{C|६३}}
द्वादश-पंजरिकास्तोत्रसे
मूढ ! जहीहि धनागम तृष्णाम् कुरु सद्बुद्धि मनसि
वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निज कर्मोपात्तम् वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।।
{{C|६४}}
{{Rh|||६-७-१९३०}}
अर्थम् अनर्थं भावय नित्यम् नास्ति ततः सुख-लेशः सत्यम् ।
पुत्राद् अपि धन-भाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ।।
{{Rh|||७-७-१९३०}}
{{C|६५}}
काम क्रोध लोभं मोहम् त्यक्त्वाऽऽत्मानं भावय कोऽहम् ।
आत्म-ज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरक-निगूढाः ।।
{{C|६६}}
{{Rh|||८-७-१९३०}}
त्वयि मयि चान्यत्रको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्व-सहिष्णुः ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानम् सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ।।
{{C|६७}}
{{Rh|||९-७-१९३०}}
नलिनी-दल-गत सलिलं तरलम् तद्वज्-जीवितम् अतिशय-
चपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमान प्रस्तम् लोकं शोक हतं च समस्तम्
{{Rh|||१०-७-१९३०}}
{{C|६८}}
{{C|पाण्डव गीतासे}}
पाण्डव : प्रह्लाद-नारद-पराशर- पुण्डरीक-
व्यासाम्बरीष शुक- शौनक भीष्म-दाभ्यान् ।
रुक्मांगदार्जुन वसिष्ठ-विभीषणादीन्
पुण्यान् इमान् परमभागवतान् स्मरामि ।।
{{Rh|||११-७-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४९
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४११}}
ब्रह्म तू हीं जीव, तू ठाकुर, हौं बेरो
तात, मात, गुरु, सखा तू, सब विधि हितु मेरो ||
{{C|३ ||}}
तोहि मोहि नाते अनेक मानिय जो भाव ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु चरन सरन
पावे ॥४॥
{{C|८०}}
(राग हिंडोल-
-तीन ताल)
कबहुँक हीं रहनि रहौंगो ।
{{Rh|||२१-७-१९३०}}
जया लाभ
हींगो ||
श्री रघुनाथ कृपालु कृपा तें संत सुभाव
संतोष सदा, काहू सों कछु न चहाँगो ।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निवहाँगो ।।
परुष बचन अति दुसह सवन सुनि तेहि पावक न दहाँगो ।
विगत मान, सम सीतल मन पर गुन, अवगुन न कहींगो ।।
परिहरि देह जनित चिंता, दुख सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अविचल हरिभक्ति लहौंगो ।।
{{C|८१}}
( राग सोहनी- पंजाबी ठेका वि० तीन ताल )
ऐसी मूढ़ता या मनकी ।
{{Rh|||२२-७-१९३०}}
परिहरि रामभक्ति-सुरसरिता आस करत ओस-कनकी ।।
धूम-समूह निरखि चातक ज्यों तृषित जानि मति धनकी
नहि त सीतलता, न वारि, पुनि हानि होति लोचनकी ॥
ज्यों गच कांच विलोकि स्येन जड़ छाँह आपने तनकी ।
टूटत अति आतुर अहारबस, छति बिसारि आननकी ।।
कह लो कहीं कुचाल कृपानिधि, जानत हो गति जनकी ।
तुलसिदास प्रभु ! हरहु दुसह दुख करहु लाज निजपनकी ।।
{{Rh|||२३-७-१९३०}}
{{C|८२}}
{{Gap}}( राग परज- तीन ताल)
यह विनती रघुवीर गुसांई ।
और आस बिस्वास भरोसो, हरु जियकी जड़ताई ।।
वहीं न सुगति, सुमति, संपति कछु, रिधिसिधि विपुल बड़ाई ।
हेतु-रहित अनुराग रामपद बढ़ें अनुदिन अधिकाई ॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५६
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|४१८}}
सर-पावक-तेज प्रचंड
रजनी-पर-वृन्द-पतंग
महि-मंडल-मंडन
मद-मोह-महाममता-रजनी ।
तमपुंज
दहे ॥
चारतरं ।
घृत-सायक चाप निषंग-वरं ।।
दिवाकर तेज अनी ॥
मनजात किरात निपात किये।
मृग लोभ कुभोग सरे न हिये ॥
इति नाथ अनाथन्हि पाहि हरे ।
विषयायन पॉवर भूलि परे ॥
बहु रोग वियोगन्हि लोग हये ।
भवद् अंधि-निरादर के फल ये ॥
भव-सिन्धु अगाध परे नर तें ।
पद-पंकज-प्रेम न
जे करते !
अति दीन मलीन दुखी नित हो ।
अवलंब
प्रीति नहीं ॥
जिन्हके पद पंकज
भवंत-कथा जिन्हके ।
प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके ।।
नहि राग न लोभ न मान मदा ।
तिन्हके सम वैभव वा विपदा ।।
एहि ते तय सेवक होत मुदा ।
करि प्रेम
मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ।।
निरंतर नेम लिये ।
पद पंकज सेवित सुद्ध हिये ॥
हो ।
सम मानि निरादर आदर
सव संत सुखी
विचरंति मही ॥
मुनि-मानस -पंकज-भृंग
भजे ।
रघुवीर
महा-रन-धीर
अजे ।।
गुनसील
तव नाम जपामि नमामि हरी ।
भव-रोग-महा-मद-मान-अरी ।।
कृपा- परमायतनं ।
प्रनमामि
निरंतर
श्रीरमनं ॥
रघुनंद !
निकंदय
इंद्रधनं ।
महिपाल ! विलोकय दीनजनं ॥
{{Rh|||६-८-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३९
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|५०१}}
{{Multicol}}
{{outdent|विदेशी वस्त्र; –का निषेध, ८४; –के खिलाफ धरना, ४३}}
{{outdent|विद्यावती, ५४}}
{{outdent|विनोदबाला, १७१}}
{{outdent|विनोबा, देखिए भावे, विनोबा}}
{{outdent|विमला, ३३५}}
{{outdent|विशू, १८७, २२४, २३२}}
{{outdent|विवाह, –एक धार्मिक किया, ३६६; –और वर्णाश्रम, ३२३; –का प्रयोजन, ३२३}}
{{outdent|विश्वनाथ, ४१}}
{{outdent|विश्वामित्र, २०४}}
{{outdent|वीमावाला, ईश्वरलाल, २०३, २३९}}
{{outdent|वेद, २४०}}
{{outdent|बेलोक, बिल्केड, १५}}
{{outdent|वैद्य, गंगाबहन, ११, १४, ३०, ५४, ६५, ९२, १०६, १०७, १४९, १३१, १४, १५८, १५७, १५९, १६३, १६५, १७४, १९३, २०३, २१९, २५४, २७४, २८८, २९०, २९१, ३०४, ३२६, ३३७, ३५३, ३६१}}
{{outdent|वैयक्तिक सत्ता, १३१}}
{{outdent|वोरा, कुमीबहन, ४६}}
{{outdent|वोरा, बलीबहन, ३, ४६, ७२, २८०}}
{{outdent|व्रत, ३४८; –का अर्थ, २५२; –की आवश्यकता, २१८-९, २०४; –जो आत्माके लिए हानिकारक न हो, ३४८}}
{{outdent|'''व्रतविचार''', ३४७}}
{{c|'''श'''}}
{{outdent|शंकर, ६५, १८८}}
{{outdent|शंकरभाई, १०}}
{{outdent|शंकरलाल, ३०, १९६, २९०}}
{{multicol-break}}
{{outdent|शकरीबहन, २४३}}
{{outdent|शम्भु, ८, १२}}
{{outdent|शरीर-श्रम, १४९-५०}}
{{outdent|शर्मा, हरिहर, ११}}
{{outdent|शान्ता, १२, ४९, ५०, १००, २५१, २६५, २९०, ३७९; देखिए पटेल, शान्ता शंकरभाई भी}}
{{outdent|शान्तिकुमार नरोत्तमदास, १३}}
{{outdent|शान्तु, १३७}}
{{outdent|शारदाबहन, ९, १२, २४}}
{{outdent|शास्त्री, वी० एस० श्रीनिवास, ३८, ३९}}
{{outdent|शाह, चिमनलाल, १३, ६३, १२३, २२५}}
{{outdent|शाह, जेठाबहन, १२}}
{{outdent|शाह, नन्दलाल, १२}}
{{outdent|शाह, पूँजाभाई, १५४; देखिए पूँजाभाई भी}}
{{outdent|शाह, रतिलाल, ३५}}
{{outdent|शाह, सारदा सी०, १५, ६३, ७४, १०८, १२३, १५४, १९१, २०६, २२५, २४२, २६७, ३७३}}
{{outdent|शिक्षा, –बच्चोंकी, २७४}}
{{outdent|शिबली, मौलाना, १७५}}
{{outdent|शीला, ५३, ७३}}
{{outdent|शुक्ल, चन्द्रशेखर, १२}}
{{outdent|सूरजी वल्लभदास, ५६}}
{{outdent|सेठना, बापूभाई, १३}}
{{outdent|श्रद्धा, १६९; –प्रार्थनामें, ३२८}}
{{c|'''स'''}}
{{outdent|सच्चिदानन्द, –के रूपमें ईश्वर, ४१}}
{{outdent|सट्टा, –और व्यापार, ३५०}}
{{outdent|सत्य, ६१, ६९, ९०-१, ११६, १६२, १६६, १८९, १९६, २१९, २४०,}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५४०
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|५०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्ममय}}
{{Multicol}}
{{outdent|२४५, २५१, २७९, ३३९, ३६१, ३७१, ३७४; –और अहिंसा, ५८-६०; –और शरीर-श्रम, १५०; –का अभ्यास किया जा सकता है, २०४; –का अर्थ, ४१-२; –रूपी परमात्मा, ३३३}}
{{outdent|सत्यनारायण, ११६}}
{{outdent|सत्यवती, १२}}
{{outdent|सत्याग्रह बुलेटिन, १ पा० टि०}}
{{outdent|सत्याग्रही, ४४, ८४}}
{{outdent|सत्याग्रही कैदी, –और जेलका अनुशासन, ३४१}}
{{outdent|सनाढ्य, गंगादेवी, २९७, ३०१, ३६३}}
{{outdent|सनाढ्य, तोताराम, १८०, २२२, ३०१, ३६३}}
{{outdent|सन्तानम, कृष्णाबाई, १२}}
{{outdent|सप्रू, तेजबहादुर, १८ पा० टि०, ४३ पा० टि०, ४४, ४६ पा० टि०, ८२, ८४ पा० टि०, ११७}}
{{outdent|समाधि, १९२}}
{{outdent|सरजूप्रसादजी, डा०, ३७७}}
{{outdent|सरैया, पुरुषोत्तम डी०, ३६, २४२}}
{{outdent|सविनय अवज्ञा, ४४, १२१, २४१; –अभियान, ८२; –की समाप्ति, ४२-३, ८४}}
{{outdent|शामलभाई, १३}}
{{outdent|साराभाई, अनसूयाबाई, ११}}
{{outdent|साराभाई, अम्बालाल, ११}}
{{outdent|सिकलेपर, अपटन, २६१}}
{{outdent|सीजर ओर का काइश्क, १५१}}
{{outdent|शीतलासहाय, २४३ पा० टि०, २४८}}
{{outdent|सीता, ३०५}}
{{multicol-break}}
{{outdent|सीता (धैर्यवाला), १०१, १२८, २७८, २८१, ३६२}}
{{outdent|शीताबदियारा, ३३८}}
{{outdent|सुकरात, ३३३}}
{{outdent|सुखलाल, पंडित, १२}}
{{outdent|सुदर्शन, २५३}}
{{outdent|सुन्दरम, वी० ए०, १३, २५२, २६१}}
{{outdent|सुन्दरम्, सावित्री, २५२}}
{{outdent|सुब्बैया, २४, १८५, २३९}}
{{outdent|सुमंगल, २७२}}
{{outdent|सुमित्रा, २१७}}
{{outdent|सुरेन्द्र, १०२, ११४, १२६, ११६}}
{{outdent|सुलताना, १५२, १५७}}
{{outdent|सुशीला, ६३, ९८, १५४, १९२}}
{{outdent|सूरजबहन मणिलाल, १२}}
{{outdent|सेवा, २४१, २५८, ३१२, ३२२, ३३३, ३५३, ३६१, ३७९; –अनासक्त भावसे, ३०३, ३२२; –और आत्माका विकास, ५३; –के लिए विश्राम आवश्यक, १७८; –सामाजिक, ३५७}}
{{outdent|सोमाभाई, १२, २९२}}
{{outdent|सोराबजी, ३४८}}
{{outdent|'''सोशल रिफॉर्मर''', २२४}}
{{outdent|स्टुअर्ट, ३६२}}
{{outdent|स्त्री, –के साथ पुरुषका दुर्व्यवहार, ३०५; –हिंदू, ३२३}}
{{outdent|स्थितप्रज्ञ, १७३}}
{{outdent|(व) '''स्पिरिट्स पिलग्रिमेज,''' १६२ पा० टि०}}
{{outdent|स्लोकोम्ब, जॉर्ज, ११८}}
{{outdent|स्वदेशी, १८६, २१८, २६१}}
{{outdent|स्वराज्य, २५, ४४; –की प्राप्ति केवल बलिदानोंसे ही सम्भव, २८२}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५४१
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|५०३}}
{{Multicol}}
{{c|'''ह'''}}
{{outdent|हमीदाबहन, ८७, १३८, १७५, २१०, २१३}}
{{outdent|हरिदास, १६५}}
{{outdent|हरिप्रसाद, २२, ३४}}
{{outdent|हरिभाई, डा०, देखिए देसाई, डा० हरिभाई}}
{{outdent|हरिलाल, २९१}}
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{{outdent|हसमुखराय, १२, १०२}}
{{outdent|हारकर, एम्मा, १३}}
{{multicol-break}}
{{outdent|'''हिन्दू''', १५१}}
{{outdent|हिन्दू, १३५, १८८, २६२}}
{{outdent|हिन्दू-धर्म, १८९, २०५; –और अस्पृश्यता, १३५}}
{{outdent|हिन्दू-धर्मग्रन्थ, १८९}}
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{{outdent|हुसैन, १८९}}
{{outdent|हुसैन, इमाम, ४२}}
{{outdent|होम्स, रेवरेण्ड, २५७}}
{{outdent|होरमज्ड, १८९; देखिए अहुरमज्ड भी}}
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विकिस्रोत:स्वागत
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सौरभ तिवारी 05
49
स्वागत संदेश।
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wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
{{स्वागत}}
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