विकिस्रोत
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https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.16
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विकिस्रोत:चौपाल
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2026-08-22T00:12:54Z
अनिरुद्ध कुमार
25
/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */
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wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
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== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[s:en:Wikisource:Copyright policy | Wikisource:Copyright policy]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# {{समर्थन}} विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड की सुविधा होनी चाहिए। कई ऐसी पुस्तकें हैं जिनके djvu फ़ाइल का आकार ज्यादा होने के कारण कॉमन्स पर अपलोड करने में असुविधा होती है। इसके साथ ही कई ऐसी फ़ाइलें हैं जो कॉमन्स पर गलत नाम से मौजूद हैं। ऐसी फ़ाइलों का नाम बदलवाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार नाम बदल भी नहीं पाता है। स्थानीय अपलोड की सुविधा होने से चित्र वाले पृष्ठों का शोधन कार्य भी आसान होगा। —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०३:५८, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
== संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 अक्तूबर के प्रस्तावित नियम पर मत दें ==
[[w:hi: विकिपीडिया:संपर्क सूत्र|विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर आगामी अक्तूबर में होने वाले संपर्क सूत्र के निर्वाचन के नियम प्रस्तावित किए गए हैं। पिछले वर्ष के निर्वाचन के दौरान हुई चर्चाओं के आधार पर प्रबंधक बैठक में चर्चा के उपरांत संशोधित नियम प्रस्तावित किए गए हैं। इनपर सदस्यों के मत का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ००:१२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
td68bty6v5wpcoor0cw0swpb5q038e9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१०
250
159519
672707
508701
2026-08-22T01:04:10Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672707
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''सांकेतिका'''}}}}
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अँजली चौधरी
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अँजली चौधरी
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो जायेंगे। इसलिए सारे भारतने १४ दिनोंमें अथक प्रयत्न करके प्रतिदिन ५ लाख रुपयेके हिसाबसे धन दिया। बम्बईके बाहरके प्रान्तोंने ३० जूनतक बम्बईके जितने ही समयमें ३८ लाख रुपये जमा कर लिए थे। रिकार्ड बुरा नहीं रहा। इस विश्वासको हम किस प्रकार बनाये रख सकते हैं? हमें हिसाब इस तरह बिलकुल ठीक-ठीक रखना चाहिए कि एक बच्चा भी उसे देख और समझ सके। असहयोगके अतिरिक्त और किसी भी उद्देश्यके लिए इस धनका उपयोग नहीं होना चाहिए और सामान्यतः नीचे लिखे उद्देश्योंके अतिरिक्त और किसी उद्देश्यके लिए नहीं : (१) चरखे और खादीके प्रचारके लिए, (२) अस्पृश्यता निवारण, और इस प्रकार दलित जातियोंके उत्थानके लिए, (३) राष्ट्रीय पाठशालाओं—जहाँ कताई और बुनाई भी शिक्षणके विषय हों—के संचालनके लिए और (४) नशाबन्दी आन्दोलनको आगे बढ़ाने के लिए।
इन उद्देश्योंमें राष्ट्रीय सेवाको जारी रखना भी शामिल है। इस सेवाके द्वारा ही हम ऊपर लिखे उद्देश्योंको प्राप्त कर सकेंगे और ऊपर लिखे उद्देश्योंको प्राप्त करना यह दिखाना है कि हम स्वराज्यके योग्य हैं और उसके उचित पात्र हैं।
मैं सभी प्रकारकी समितियोंको सतर्क कर दूँ कि वे इस कोषसे मिलनेवाले सूदपर निर्वाह करनेकी बात न सोचें। रुपया सूदपर लगाना और फिर सूदसे ही काम चलाना राष्ट्रपर और अपने-आपपर अविश्वास जाहिर करता है। राष्ट्रका विश्वास ही हमारी पूँजी होनी चाहिए और समय-समयपर उससे मिलनेवाला सहयोग ही हमारा सूद। यदि हम राष्ट्रके प्रतिनिधि होनेका दावा करते हैं तो हमें उसकी सेवाके लिए बनाई गई संस्थाओंका वार्षिक व्यय चलानेके लिए उसपर भरोसा करना चाहिए। सूदपर निर्वाह करनेकी प्रवृत्ति हमें गैर-जिम्मेदार बनाती है। भारतके विभिन्न भागोंमें धर्मके नामपर जो अपार धनराशि पड़ी-पड़ी सड़ रही है, उसके कारण ऐसी तमाम धार्मिक संस्थाएँ यदि बाकायदा भ्रष्टाचारके अड्डे नहीं बन गई हैं तो ढोंग-मात्र बनकर तो रह ही गई हैं। इसलिए यदि हम पिछले अनुभवसे लाभ उठाना चाहते हैं, तो हमें प्राप्त हुआ सारा धन अगले छः महीनोंमें खर्च कर देना चाहिए। मैंने बेजवाड़ामें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके सामने वित्तीय कार्यक्रम पेश किया था। वह मैंने इसलिए किया था कि मुझे मालूम था कि हमारे पास ईमानदार और योग्य कार्यकर्त्ता हैं जो राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तरपर उचित रूपसे धनका उपयोग कर सकते हैं और फिर हमें इस वर्षके लिए उस धनराशिकी आवश्यकता भी थी। विदेशी कपड़ेके बहिष्कारमें हम तबतक सफल नहीं हो सकते, जबतक हम चरखे, हाथकता सूत और खादी खरीदनेमें खुले हाथों खर्च न करें। स्वदेशीका प्रचार हमें बराबर तबतक करते रहना चाहिए जबतक चरखा व्यावसायिक रूपसे लाभदायक बनकर घर-घरमें न पहुँच जाये। वर्ष-भरमें खर्च कर सकनेकी दृष्टिसे एक करोड़ रुपये बहुत बड़ी रकम नहीं है, क्योंकि उसका वितरण एक बड़े भू-भागमें करना है। मेरा सुझाव है कि इस मासके अन्ततक प्रत्येक प्रान्त अपना एक बजट बनाये और ठीक उतना ही खर्च करे—न ज्यादा, न कम। मैंने एक महीनेका सुझाव इसलिए दिया है कि उससे पहले विभिन्न प्रान्त शायद ही अपना हिसाब-किताब ठीक कर पायें और शायद ही चन्देके वायदोंकी रकम वसूल कर पायें। और फिर हमें देखना चाहिए कि अखिल भारतीय<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : के॰ राजगोपालाचार्यको'''}}}}
{{Right|गामदेवी<br>बम्बई<br>५ जुलाई, १९२१}}
{{Left|प्रिय महोदय,}}
आपका इसी २८ तारीखका पत्र मिला। आपने अपने पत्रमें जिस मामलेका उल्लेख किया है उसकी चर्चा मैं 'यंग इंडिया'में जल्दी ही कर रहा हूँ। आपने जो सुझाव दिया है उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।
{{Right|आपका सच्चा,<br>{{larger|'''मो॰ क॰ गांधी'''}}}}
{{Left|श्री के॰ राजगोपालाचार्य<br>तिरुपति<br>मद्रास राज्य}}
अंग्रेजी पत्र (जी॰ एन॰ ५६६८) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१५६. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''उत्तरदायित्वका आरम्भ'''}}
'तिलक स्वराज्य-कोष'को भारतने जो अभूतपूर्व समर्थन दिया, उससे प्रकट हो जाता है कि भारतको असहयोगके अपने नेताओंपर भरोसा है। क्या नेता अपने-आपको इस भरोसेके योग्य सिद्ध करेंगे? अनेक लोगोंने बड़ी उदारतासे दान दिया है, और सभीने यह सवाल पूछा है कि इस निधिका उपयोग किस प्रकार किया जायेगा। मैंने निस्संकोच यही उत्तर दिया है कि प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियोंके नेता जिम्मेदार और परखे हुए व्यक्ति हैं। यदि हम इस कोषमें मिली पाई-पाईका लेखा-जोखा नहीं रखते और धनका उपयोग बुद्धिमानीसे नहीं करते तो हमें सार्वजनिक जीवनसे बाहर कर दिया जाना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि गरीबसे-गरीब आदमियोंने अपनी शक्तिभर दिया है। कई लोगोंने तो अपना सब-कुछ दे दिया है। धोबी, बढ़ई, लुहार, ईसाई, यहूदी, पारसी, सिख, जैन, मुसलमान और हिन्दू—सभीने यथाशक्ति दिया है। १६ जूनतक, जब बम्बईमें संग्रहका काम आरम्भ हुआ, सारे भारतमें प्राप्त हुई धन राशि ३० लाख रुपये थी—और शायद इतनी भी नहीं थी। मुझे विश्वास था
जूनके अन्ततक बम्बईके अतिरिक्त दूसरे प्रान्तोंमें ही चालीस लाख रुपये इकट्ठे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३६९
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2026-08-22T04:58:54Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३३७}}</noinclude>कांग्रेस कमेटी आनेवाले महीनोंके बारेमें क्या निर्णय करती है। यदि हम सुव्यवस्थित रूपसे यह कार्यक्रम पूरा कर लें तो हम सितम्बरके अन्ततक नहीं तो दिसम्बरसे पहले ही स्वराज्य अवश्य प्राप्त कर लेंगे।
{{C|'''बम्बईका फैसला'''}}
बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने वहाँ जमा चन्देकी रकमके इन्तजामके बारेमें एक बहुत व्यावहारिक और शोभनीय निर्णय किया है। उस प्रस्तावका महत्त्वपूर्ण भाग, जहाँतक मुझे याद है, कुछ इस प्रकार है :
:{{gap}}'''चूँकि जूनमें अखिल भारतीय तिलक स्मारक-कोषके लिए जो चन्दा जमा किया गया था वह केवल प्रान्तीय आवश्यकताओंको पूरा करनेके लिए नहीं बल्कि बेजवाड़ामें अपने ऊपर लिये गये उत्तरदायित्वको निभानेके लिए और उन प्रान्तोंकी सहायताके लिए था जिन्हें सहायताकी जरूरत है, इस कमेटीकी राय है कि इस निधिके व्ययके प्रबन्धके लिए एक विशेष समिति नियुक्त करना वांछनीय होगा। सर्वश्री राघवजी पुरुषोत्तम, वेलजी लखमसी नापू, रेवाशंकर जगजीवन झवेरी, उमर सोबानी, जमनालाल बजाज, अर्देशर बरजोरजी गोदरेज, शंकरलाल बैंकर और लक्ष्मीदास तैरसीको उस समितिमें नियुक्त किया जाये, जो उक्त कोषकी रकमके खर्चका नीचे लिखी शर्तोंके साथ प्रबन्ध करे और उसपर नियन्त्रण रखे :'''
:{{gap}}'''(१) निधिका पहला दायित्व प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीका असहयोग सम्बन्धी व्यय होगा।'''
:{{Gap}}'''(२) अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी सिफारिशपर चरखे और खादिके प्रसार, दलित जातियोंके उत्थान, राष्ट्रीय पाठशालाओं, अकाल पीड़ितोंकी सहायता और मद्य-निषेधके लिए दूसरे प्रान्तोंको सहायता दी जायेगी।'''
यह कार्य आत्म-त्यागका है, जिसके लिए बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी सारे देशकी बधाईकी पात्र है। प्रस्तावमें जो उद्देश्य साफ-साफ दिखाई देता है वह है इस विशाल धनराशिका इस प्रकार प्रबन्ध करना जिसमें सन्देहके लिए कोई गुंजाइश न रह जाये।
{{C|'''एक मुसलमान भाईके लिए त्यागपत्र'''}}
बम्बईने आत्म-त्यागका एक दूसरा उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। मुसलमानोंके प्रतिनिधित्वके बारेमें कार्य-समितिने अपनी राय तब दी जब मतदान पत्र जारी किये जा चुके थे। मतदानके फलस्वरूप केवल एक मुसलमानका निर्वाचन हो सका, वह थे श्री उमर सोबानी और उनके बारेमें शायद ही यह दावा किया जा सके कि वे मुसलमानोंके हितोंका विशेष प्रतिनिधित्व करते हैं। सार्वजनिक कार्यकर्त्ताके रूपमें उनकी इतनी ख्याति है कि उन्हें केवल मुसलमानोंका प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। और<noinclude>{{Left|२०–२२|1em}}</noinclude>
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2026-08-22T05:07:05Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यह आवश्यक था कि बम्बईसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके लिए कमसे-कम दो मुसलमान सदस्य चुने जायें। इसलिए श्री विट्ठलदास जेराजाणीने एक मुसलमान प्रतिनिधिके लिए अपनी सदस्यता त्याग दी। भ्रातृभाव और सार्वजनिक भावनाके ये उदाहरण ही मुझे यह माननेको प्रेरित करते हैं कि स्वराज्य तेजीसे हमारे निकट आ रहा है। खतरा सिर्फ यह है कि कहीं हम स्वयं उससे दूर न भागने लगें। मेरी रायमें यह घटना कार्य-समितिकी बुद्धिमानीकी परिचायक है। हमें सतर्क बनाने और ईमानपर दृढ़ रखनेके लिए उसने ठीक मौकेपर अपनी राय दी। कार्य-समितिने हमें सतर्क किया है कि हम विशेष और नाजुक हितोंकी अवहेलना न कर दें और जहाँ-कहीं भी मुसलमानोंमें जोशका जरा भी अभाव दिखाई दे हिन्दू यह ध्यान रखें कि उनकी ओरसे मुसलमानोंमें संकोच, उदासीनता और सन्देहके लिए कोई कारण न रह जाये। और
जो बात हिन्दू और मुसलमानोंके विषयमें है, वही दूसरी जातियोंके आपसी सम्बन्धोंपर भी लागू होती है। हित जितना ही दुर्बल हो उसका उतना ही अधिक ध्यान शक्तिशाली दलको रखना चाहिए। तब फिर जातीय भेदभावके लिए हमारे बीच कोई स्थान नहीं रह जायेगा।
{{C|'''क्या यह उल्लंघन है?'''}}
नरमदलीय लोगोंसे यह निवेदन<ref>देखिए "पत्र : नरमदलीय भाइयोंको", ८-६-१९२१।</ref> करके कि वे मद्य-निषेध आन्दोलनमें हमारे साथ सहयोग करें, मित्रोंको यह सन्देह है कि मैंने कांग्रेसके प्रस्तावका उल्लंघन किया है। और मेरा उनको मद्य-निषेधके बारेमें कानून बनानेके लिए आमन्त्रित करना तो विशेष रूपसे प्रस्तावका उल्लंघन माना गया है। एक मित्र पूछते हैं: "जिन परिषदोंका हमने बहिष्कार किया है, हम उनकी सहायता क्यों लें? क्या इसका यह अर्थ नहीं कि आपने अपने रुखमें कुछ परिवर्तन कर लिया है?" मैं कहूँगा कि इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है। चुनौती और प्रार्थनामें काफी बड़ा अन्तर है। यदि मैं लाचारी महसूस करके कोई प्रार्थना करता तो उसका अर्थ कांग्रेसके प्रस्तावका उल्लंघन और मेरे पुराने रुखमें परिवर्तन होता; किन्तु विनम्र भाषामें नरम दलवालों को अपना कर्त्तव्य पूरा करने और जनताके प्रतिनिधि होनेके अपने दावेको सिद्ध करनेके लिए कहनेसे तो मेरी रायमें हमारी स्थिति और मजबूत होती है। जो-कुछ हम कर रहे हैं उसमें सहयोग देनेके लिए सरकार और नरम दलवालों को आमन्त्रित करनेमें मैं कोई बुराई नहीं देखता। नरम दलवालों से और यहाँतक कि सरकारी अधिकारियों और अधिकृत सरकारी संस्थाओंके जरिए सरकारसे भी यह प्रार्थना करनेमें कोई हानि नहीं कि वे खिलाफत और पंजाबके मामलेमें सहायता दें, या शराबकी सभी दूकानें बन्द करा दें, या हर स्कूलमें चरखा चालू करा दें, या जनमतका खयाल करते हुए विदेशी कपड़े आयातपर कानूनन रोक लगा दें। क्योंकि यदि वे यह-सब कर सकते हैं तो जिस प्रणालीसे उन्हें प्रेम है या जिसका वे संचालन करते हैं मैं उसे बुरा समझना छोड़ दूँगा। यह अपील करके मैंने उन्हें आंशिक रूपसे जनताका आदर फिर प्राप्त करनेका मार्ग बताया है और इस अपीलका असर न होनेपर अपने और देशके लिए<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३३९}}</noinclude>इस तन्त्रकी जड़ता प्रदर्शित करनेके लिए एक और कारण प्रस्तुत किया है। मैंने स्वयं इस तन्त्रका भाग होनेके नाते अपील नहीं की है बल्कि एक बाहरके आदमीके नाते अपील की है।
{{C|'''धरनेके बारेमें'''}}
'इंडियन सोशल रिफॉर्मर'ने अपनी प्रभावपूर्ण शैलीमें धरनेकी उपयोगिताको अस्वीकार किया है। यदि मैं उसके द्वारा प्रस्तुत तर्ककी जाँचमें न पड़कर इस सम्बन्धमें सिर्फ अपना अनुभव और अपने विचार सामने रखूँ तो थोड़ेमें ही काम चल जायेगा। यह तो स्पष्ट ही है कि धरना देना थोड़े दिनोंका ही कार्यक्रम हो सकता है; किन्तु यह किसी दवामें कोई अतिरिक्त उत्तेजक तत्त्व मिला देने जैसा है। शराब पीना
व्यसन ही नहीं, एक व्याधि है । मैं बीसियों ऐसे आदमियोंको जानता हूँ जो खुशी-
खुशी शराब पीना छोड़ दें, यदि यह उनके लिए सम्भव हो। मैं ऐसे भी लोगोंको
जानता हूँ जिन्होंने प्रार्थना की है कि शराब उनकी पहुँचसे बाहर रखी जाये ताकि
उन्हें उसका लालच न हो और ऐसा कर दिये जानेपर भी मैंने उन्हें चोरीसे शराब पीते
हुए देखा है। लेकिन इसलिए मैं यह नहीं समझता कि उन्हें उस प्रलोभनसे बचानेका
प्रयत्न गलत था । व्याधिग्रस्त लोगोंको उनकी अपनी गलतियोंसे बचाना आवश्यक है ।
यदि मेरे किसी पुत्रको जुआ खेलनेकी लत हो और यदि जुआरियोंकी कोई कम्पनी
मेरे पुत्रको प्रलोभन देनेके लिए मेरे घरके पास ही आकर जम जाये तो मेरा कर्तव्य
हो जाता है कि या तो उस कम्पनीको मिटाकर धर दूं या उसके अड्डेके सामने
निगरानी के लिए आदमी बिठा दूँ, ताकि मेरे पुत्रको लज्जा आये और वह वहाँ जाना
छोड़ दे। यह सच है कि मेरे घरसे दूर जुआरियोंकी दूसरी कम्पनियाँ हैं, तो भी
मैं समझता हूँ इस कम्पनीपर निगरानी रखनेका मेरा काम उचित समझा जायेगा ।
अपने लड़केका जुआ खेलना कठिन बना देना मेरे लिए आवश्यक है। यदि 'रिफॉर्मर '
राज्य द्वारा मद्य-निषेध के सिद्धान्तको स्वीकार करता है, तो उसे तबतक धरना देनेके
सिद्धान्तको भी मानना चाहिए जबतक राज्य जनमतकी परवाह न करनेवाला बर्बर
तन्त्र बना हुआ है । मान लीजिये कि राज्य हर गलीमें देहका व्यापार करनेवाली स्त्रियों-
के लिए आलीशान इमारतें खड़ी करवा देता है और उन्हें अपना व्यापार चलानेके लिए
अनुमति-पत्र देता है, तो जनताको क्या करना चाहिए ? क्या उसका यह कर्त्तव्य नहीं
होगा कि यदि वह इन इमारतोंको, जो भ्रष्टाचारके अड्डे हैं, नष्ट नहीं करती तो उनका
बहिष्कार कर दे और लोगोंको सावधान कर दे कि वे इस भ्रष्टाचारसे, जो उनके
ऊपर थोपा गया है, अलग रहें? मैं इस बातकी आवश्यकताको मानता हूँ कि धरना
देनेके लिए केवल चरित्रवान स्त्री-पुरुष चुने जायें और यह सावधानी बरती जाये कि
जो लोग जनमतकी परवाह न करके शराब पीनेपर तुले हों उनके प्रति हिंसाका प्रयोग
न होने पाये। धरना देना तो एक ऐसा कर्त्तव्य है कि यदि शराबबन्दीमें राज्यकी
सहायता नहीं मिलती तो प्रत्येक नागरिकको इसे निभाना चाहिए। आखिर पुलिसका
गश्तीदल चोरोंके विरुद्ध धरना नहीं देता तो और क्या करता है? जब चोर किसीके
घरमें घुसनेका इरादा जाहिर करता है तो पुलिस बन्दुकका इस्तेमाल करती है ।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३३९}}</noinclude>इस तन्त्रकी जड़ता प्रदर्शित करनेके लिए एक और कारण प्रस्तुत किया है। मैंने स्वयं इस तन्त्रका भाग होनेके नाते अपील नहीं की है बल्कि एक बाहरके आदमीके नाते अपील की है।
{{C|'''धरनेके बारेमें'''}}
'इंडियन सोशल रिफॉर्मर'ने अपनी प्रभावपूर्ण शैलीमें धरनेकी उपयोगिताको अस्वीकार किया है। यदि मैं उसके द्वारा प्रस्तुत तर्ककी जाँचमें न पड़कर इस सम्बन्धमें सिर्फ अपना अनुभव और अपने विचार सामने रखूँ तो थोड़ेमें ही काम चल जायेगा। यह तो स्पष्ट ही है कि धरना देना थोड़े दिनोंका ही कार्यक्रम हो सकता है; किन्तु यह किसी दवामें कोई अतिरिक्त उत्तेजक तत्त्व मिला देने जैसा है। शराब पीना व्यसन ही नहीं, एक व्याधि है। मैं बीसियों ऐसे आदमियोंको जानता हूँ जो खुशी-खुशी शराब पीना छोड़ दें, यदि यह उनके लिए सम्भव हो। मैं ऐसे भी लोगोंको जानता हूँ जिन्होंने प्रार्थना की है कि शराब उनकी पहुँचसे बाहर रखी जाये ताकि उन्हें उसका लालच न हो और ऐसा कर दिये जानेपर भी मैंने उन्हें चोरीसे शराब पीते हुए देखा है। लेकिन इसलिए मैं यह नहीं समझता कि उन्हें उस प्रलोभनसे बचानेका प्रयत्न गलत था। व्याधिग्रस्त लोगोंको उनकी अपनी गलतियोंसे बचाना आवश्यक है। यदि मेरे किसी पुत्रको जुआ खेलनेकी लत हो और यदि जुआरियोंकी कोई कम्पनी मेरे पुत्रको प्रलोभन देनेके लिए मेरे घरके पास ही आकर जम जाये तो मेरा कर्त्तव्य हो जाता है कि या तो उस कम्पनीको मिटाकर धर दूँ या उसके अड्डेके सामने निगरानीके लिए आदमी बिठा दूँ, ताकि मेरे पुत्रको लज्जा आये और वह वहाँ जाना छोड़ दे। यह सच है कि मेरे घरसे दूर जुआरियोंकी दूसरी कम्पनियाँ हैं, तो भी मैं समझता हूँ इस कम्पनीपर निगरानी रखनेका मेरा काम उचित समझा जायेगा। अपने लड़केका जुआ खेलना कठिन बना देना मेरे लिए आवश्यक है। यदि 'रिफॉर्मर ' राज्य द्वारा मद्य-निषेधके सिद्धान्तको स्वीकार करता है, तो उसे तबतक धरना देनेके सिद्धान्तको भी मानना चाहिए जबतक राज्य जनमतकी परवाह न करनेवाला बर्बर तन्त्र बना हुआ है। मान लीजिये कि राज्य हर गलीमें देहका व्यापार करनेवाली स्त्रियोंके लिए आलीशान इमारतें खड़ी करवा देता है और उन्हें अपना व्यापार चलानेके लिए अनुमति-पत्र देता है, तो जनताको क्या करना चाहिए? क्या उसका यह कर्त्तव्य नहीं होगा कि यदि वह इन इमारतोंको, जो भ्रष्टाचारके अड्डे हैं, नष्ट नहीं करती तो उनका बहिष्कार कर दे और लोगोंको सावधान कर दे कि वे इस भ्रष्टाचारसे, जो उनके ऊपर थोपा गया है, अलग रहें? मैं इस बातकी आवश्यकताको मानता हूँ कि धरना देनेके लिए केवल चरित्रवान स्त्री-पुरुष चुने जायें और यह सावधानी बरती जाये कि जो लोग जनमतकी परवाह न करके शराब पीनेपर तुले हों उनके प्रति हिंसाका प्रयोग न होने पाये। धरना देना तो एक ऐसा कर्त्तव्य है कि यदि शराबबन्दीमें राज्यकी सहायता नहीं मिलती तो प्रत्येक नागरिकको इसे निभाना चाहिए। आखिर पुलिसका गश्तीदल चोरोंके विरुद्ध धरना नहीं देता तो और क्या करता है? जब चोर किसीके घरमें घुसनेका इरादा जाहिर करता है तो पुलिस बन्दुकका इस्तेमाल करती है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{c|(१५ अप्रैलसे १९ अगस्त, १९२१ तक)}}
:{{outdent|अप्रैल १५: गांधीजीने रास और बोरसदको सार्वजनिक सभाओं में भाषण दिये। दोपहरको गोधरा पहुँचे।}}
:{{outdent|अप्रैल १६: हालोलकी ताल्लुका परिषद्की अध्यक्षता की, गांधीजीको थैली भेंट की गई। सन्ध्याके समय किसानोंकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|अप्रैल १७: कालोलके हरिजनोंकी सभामें भाषण।<br>गोधराके लिए रवाना हुए।}}
:{{outdent|अप्रैल १९: सुबह सूरत पहुँचे।<br>सूरत नगरपालिका द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका उत्तर देते हुए अधिक चरखे चालू करवाने और अस्पृश्यता दूर करने की आवश्यकतापर जोर दिया। पाटीदार विद्यार्थी आश्रममें भाषण दिया। दोपहरको महिलाओंकी एक सभामें भाषण दिया, जिसमें तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा प्राप्त हुआ।<br>ओरपाडके लिए रवाना हुए}}
:{{outdent|अप्रैल २०: सन्ध्याके समय सूरतकी सार्वजनिक सभामें भाषण।<bro बलसाड़की सभामें भाषण।}}
:{{outdent|अप्रैल २१: वल्लभभाई पटेल और अन्य साथियोंके साथ सुबहके समय चिखली पहुँचे।<br> सीसोदराकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|अप्रैल २२: सिन्धके दौरेके लिए रवाना हुए।}}
:{{outdent|अप्रैल २४: हैदराबाद (सिन्ध) पहुँचे।}}
:{{outdent|अप्रैल २६: सुबह कराची पहुँचे। सार्वजनिक सभामें भाषण दिया। २५,००० रुपयेकी थैली भेंट की गई। कराची नगरपालिकाके सदस्योंसे अनुरोध किया कि शिक्षाका राष्ट्रीयकरण करें। यदि सरकारकी आर्थिक सहायताके बिना काम न चला सकें तो त्यागपत्र दे दें। कराचीके वकीलोंसे की गई एक भेंटके दौरान उन्हें सलाह दी कि वे पर्ची डालकर इस बातका निर्णय कर लें कि किन लोगोंको असहयोग आन्दोलनमें भाग लेना है और किन लोगोंको वकालत जारी रखनी है। वकालत करनेवाले वकील असह्योगी वकीलों और उनके परिवारोंकी धन आदिसे सहायता करते रहें।<br> मालेगाँव, नासिक जिले में दंगे।}}
:{{outdent|मई १: रातके समय अहमदाबाद पहुँचे।}}
:{{outdent|मई ४: सुबह कपड़वंज पहुँचे और वहाँ आयोजित एक सार्वजनिक सभामें भाषण दिया। कठलालमें महिलाओंकी सभामें भाषण दिया। रातको नडियादके लिए
रवाना हुए।}}<noinclude></noinclude>
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{{c|(१५ अप्रैलसे १९ अगस्त, १९२१ तक)}}
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{{c|(१५ अप्रैलसे १९ अगस्त, १९२१ तक)}}
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:{{outdent|अप्रैल १६: हालोलकी ताल्लुका परिषद्की अध्यक्षता की, गांधीजीको थैली भेंट की गई। सन्ध्याके समय किसानोंकी सभामें भाषण।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|५७१}}</noinclude>:{{outdent|मई ७: सुबह बम्बई पहुँचे और महाराष्ट्र प्रान्तीय सम्मेलनमें भाषण दिया।}}
:{{outdent|मई ८: इलाहाबादमें सरूपकुमारी नेहरू (श्रीमती विजयलक्ष्मी) के विवाहोत्सवमें शामिल हुए।}}
:{{outdent|मई १०: इलाहाबाद जिला सम्मेलनमें भाषण दिया। सभामें पण्डित मोतीलाल नेहरूने नागरिकोंकी ओरसे एक मानपत्र भेंट किया।}}
:{{outdent|मई ११: इलाहाबादसे रवाना हुए।}}
:{{outdent|मई १२: शिमला पहुंचे।}}
:{{outdent|मई १३: दोपहरके समय वाइसरायसे भेंट की।}}
:{{outdent|मई १४: प्रातःकाल वाइसरायसे पुनः भेंट।गांधीजीके सम्मानमें जुलूस निकाला गया और स्वागत-समारोहका आयोजन किया गया।<br>सार्वजनिक सभामें भाषण।<br>महिलाओंको सभामें स्वदेशी अपनाने और तिलक स्वराज्य-कोषके लिए खुले दिलसे चन्दा देने का अनुरोध किया। सभामें उन्हें धन और आभूषण भेंट किये गये।}}
:{{outdent|मई १५: ईदगाह मैदान, शिमलाकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|मई २१: भुसावल जाते समय रास्तेमें रेलवे स्टेशनपर भाषण।<br>भुसावलकी सार्वजनिक सभामें भाषण।}}
:{{outdent|मई २२: संगमनेरकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|मई २३: रात्रिके समय येवला पहुंचे।}}
:{{outdent|मई २४: बरसीको सभामें जनतासे तिलक स्वराज्य-कोषके लिए खुले दिलसे चन्दा देने और स्वदेशी अपनाने का अनुरोध किया।}}
:{{outdent|मई २६: सुबह शोलापुर पहुंचे और रिपन हॉलमें नगरपालिका द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका उत्तर दिया।}}
:{{outdent|मई २७: शामके समय बागलकोटसे बीजापुर पहुँचे। महिलाओंकी सभामें भाषण दिया। नगरपालिका तथा स्थानीय व्यापारी संघ द्वारा आयोजित सभाओंमें दिये गये अभिनन्दनपत्रोंके उत्तरमें भाषण दिये।}}
:{{outdent|मई २८: बीजापुरसे रवाना हुए।}}
:{{outdent|मई २९: बम्बईकी सार्वजनिक सभामें लोगोंसे तिलक स्वराज्य-कोषके लिए खुले दिलसे चन्दा देनेका अनुरोध किया।}}
:{{outdent|मई ३०: बम्बईसे भड़ौंचके लिए रवाना हुए।}}
:{{outdent|जून १: भड़ौंचमें गुजरात राजनीतिक परिषद्में भाषण।<br>वेजलपुरकी अन्त्यज परिषद् द्वारा भेंट किये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।}}
:{{outdent|जून २: भड़ौंचकी खिलाफत सभामें भाषण।}}
:{{outdent|जून ५: गुजरात राजनीतिक परिषद्में भाषण।}}
:{{outdent|जून ८: सरखेज और सामोदकी सभाओंमें भाषण। तिलक स्वराज्य-कोष के लिए चन्दा किया। अहमदाबादके वकीलोंके साथ बातचीत।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०४
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>:{{outdent|जून ९: अहमदाबादसे बढवान पहुंचे।<br> लिम्बडीके महाराजके निवास स्थानपर आयोजित सार्वजनिक सभामें भाषण।}}
:{{outdent|जून १३: अहमदाबादकी सार्वजनिक सभामें अध्यक्ष-पदसे भाषण।}}
:{{outdent|जून १५: घाटकोपर, बम्बईमें नागरिकोंकी सभामें भाषण। व्यापारी समुदायकी ओरसे तिलक स्वराज्य-कोषके लिए ४०,००० रु० की थैली भेंट की गई।}}
:{{outdent|जून १८: केन्द्रीय पारसी संघकी परिषद्म असहयोगपर भाषण। मिलीटरी रिक्वायरमेंट कमेटीके सामने उपस्थित होने से इनकार किया।}}
:{{outdent|जून १९: विले पार्ले बम्बईकी सार्वजनिक सभामें भाषण। तिलक स्वराज्य-कोषके लिए थैली भेंट की गई।}}
:{{outdent|जून २२: बम्बईके प्रथम राष्ट्रीय कन्या विद्यालय——लोकमान्य राष्ट्रीय कन्या शाला का उद्घाटन।गांधीजीका सन्देश महिलाओंकी सभामें पढ़कर सुनाया गया।}}
:{{outdent|जून २५: मांडवी, बम्बईकी प्राथमिक शालाओंके विद्यार्थियों व शिक्षकोंके समक्ष भाषण। तिलक स्वराज्य-कोषके लिए थैली प्राप्त।}}
:{{outdent|जून २६: सान्ता क्रूजकी सार्वजनिक सभामें भाषण।<br>तिलक स्वराज्य-कोषके लिए थैली प्राप्त हुई।}}
:{{outdent|जून ३०: विभिन्न संघों द्वारा आयोजित सभाओं में भाषण।<br>तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा प्राप्त हुआ।<br>सूती कपड़ा व्यापारी संघ और पारसी संघ द्वारा थैलियाँ भेंट की गई।<br>बेजवाड़ा कांग्रेसमें तिलक स्वराज्य-कोषके लिए १ करोड़ रुपये एकत्र करनेका लक्ष्य पूरा हुआ।}}
:{{outdent|जुलाई १: बाँदरा, बम्बईकी सभामें स्वदेशीपर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई २: बम्बई कमीशन एजेंट्स एसोसिएशन और लिंगायत कमीशन एजेंट्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित सभाओंमें भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई ६: अलीगढ़में साम्प्रदायिक दंगे।<br>कपड़े के व्यापारियोंसे व्यापारको शुद्ध स्वार्थ के बजाय राष्ट्रीय आधारपर चलाने तथा कीमतें न बढ़ानेका अनुरोध किया।}}
:{{outdent|जुलाई ७: कपड़े के व्यापारियोंसे विदेशी कपड़ेका आयात बन्द करनेका अनुरोध किया।}}
:{{outdent|जुलाई १०: बम्बईके दवा-विक्रेताओंकी सभामें स्वदेशीपर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई १२: बम्बईमें पारसी राजकीय सभा द्वारा आयोजित सभामें शराबके विक्रेताओं के समक्ष शराबबन्दीपर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई १६: परेल, बम्बईकी सभामें स्वदेशीपर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई १७: केन्द्रीय खिलाफत समितिकी असहयोग सम्बन्धी रिपोर्ट प्रकाशित। बम्बईमें बुनकरोंकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई १९: दोपहरके समय बम्बईकी मुस्लिम महिलाओंकी सभामें भाषण। पारसी राजकीय सभा द्वारा आयोजित शराबके ठेकेदारोंकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई २०: पूना नगरपालिका द्वारा मानपत्र भेंट। तिलक महाविद्यालयके उद्घाटन-समारोहमें भाषण।तिलककी प्रतिमाका अनावरण। बादमें सार्वजनिक सभामें}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|५७३}}</noinclude>:भाषण दिया जिसमें एकमतसे विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करने और स्वदेशी अपनानेका प्रस्ताव पास किया गया।
:{{outdent|जुलाई २२: बम्बईकी दो सार्वजनिक सभाओंमें स्वदेशीपर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई २३: बम्बईको पारसी राजकीय सभाके तत्त्वावधानमें आयोजित सार्वजनिक सभामें भाषण।}}
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:{{outdent|जुलाई ३०: पारसी राजकीय सभा द्वारा आयोजित पारसियोंकी बृहत् सभामें स्वदेशी-पर भाषण।}}
:{{outdent|जुलाई ३१: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी बैठकमें चुनाव सम्बन्धी प्रस्ताव प्रस्तुत किया।<br>
बम्बईमें एलफिंस्टन मिलके समीप परेलकी ऐतिहासिक सभामें भाषण, जिसका आयोजन विदेशी कपड़े जलाकर स्वदेशी आन्दोलनका श्रीगणेश करने के उद्देश्यसे किया गया था।<br>बम्बईकी राष्ट्रीय स्त्री-सभा द्वारा आयोजित खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनके अवसर-पर भाषण।<br>बम्बईकी अदालतमें बचाव पक्षकी ओरसे गवाही दी।}}
:{{outdent|अगस्त १: लोकमान्य तिलककी बरसीके उपलक्ष्यमें आयोजित चौपाटी, बम्बईकी सार्वजनिक सभामें भाषण।}}
:{{outdent|अगस्त ३: बम्बईमें खिलाफत भण्डारका उद्घाटन किया और यह आशा व्यक्त की कि बम्बईके धनी व्यापारी ऐसे भण्डारोंकी स्थापना कर स्वदेशी आन्दोलनको
प्रोत्साहन देंगे।}}
:{{outdent|अगस्त ५: अलीगढ़ पहुँचे।}}
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अँजली चौधरी
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प्रोत्साहन देंगे।}}
:{{outdent|अगस्त ५: अलीगढ़ पहुँचे।}}
:{{outdent|अगस्त ६: मुरादाबाद पहुँचे। महिलाओंकी सभा तथा एक सार्वजनिक सभामें भाषण।}}
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>धरना देनेवाला कमजोर इच्छा-शक्तिवाले अपने किसी भाईको शराब पीनेकी लतसे सावधान करते हुए लज्जा, यानी प्रेमका दबाव डालता है। 'रिफॉर्मर'ने धरनेके सिर ऐसे अनेक दावे मढ़े हैं जो कभी किये ही नहीं गये।
{{C|'''धारवाड़में हिंसा'''}}
यदि 'क्रॉनिकल'में छपे कांग्रेस कमेटीके तारको सच मानें, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि पुलिसका कोई अफसर, जिसको गोली चलानेका हुक्म देनेका अधिकार नहीं था, घबड़ा गया और उसने निहत्थी भीड़पर गोली चलानेका हुक्म दे दिया। शराबकी दूकानोंको कुछ ऐसी हठके साथ खुला रखा जा रहा है मानो जनताको शराब मुहैया करना सरकारका एक कर्त्तव्य है। वास्तवमें यह जनमतकी खुली और अनीतिपूर्ण अवज्ञा है। जो लोग मरे है, मैं बेशक उनके कुटुम्बियोंको बधाई दूँगा और यदि भीड़ने थोड़ा-बहुत भी शक्ति-प्रदर्शन किया हो, तो मैं उसपर दुःख प्रकट करूँगा। साथ ही मैंने उन भारतीय मन्त्रियोंको, जिन्हें ये हस्तान्तरित विभाग सुपुर्द किये गये हैं, आदरपूर्वक सावधान कर देना चाहता हूँ कि यदि वे साहसके साथ उस संकटका सामना नहीं करते जो देशके सामने है और तुरन्त शराबकी दूकानें बन्द करके उस धनको नहीं लौटाते जो गरीब ठेकेदारोंसे पेशगी लिया गया था, तो वे अपने महान् दलकी परम्पराके विरुद्ध आचरण करेंगे। इस जघन्य व्यापारसे दुराचारपूर्वक जो राजस्व प्राप्त होता है उसे खो देनेकी चिन्ता उन्हें नहीं होनी चाहिए। एक जाग्रत और क्रुद्ध जन-चेतनाके सामने यह धन्धा टिका नहीं रह सकता। एक भ्रष्ट साधनसे प्राप्त धनसे चलनेवाली शिक्षा वैसे काफी बुरी चीज है। अब निर्दोष व्यक्तियोंके खूनका दाग लग जानेके बाद वह दुर्गन्धित हो उठेगी। मैं मन्त्रियोंसे प्रार्थना करता हूँ कि समय रहते चेत जायें। यह न हो कि उनपर कभी राजस्वके लोभमें अंधे होकर समयको न पहचान पानेका दोष लगाया जाये। इस ओरसे कुछ सप्ताह तो क्या कुछ घंटे भी उदासीन रहना, उनके लिए हानिकारक होगा। शराबसे प्राप्त राजस्वको छोड़ देनेसे पहले, राजस्वके दूसरे साधनोंको ढूँढ़नेके लिए रुके रहना गलत होगा। यह तो वैसा ही होगा जैसे किसी प्लेगवाले घरको दूसरा घर मिलने तक न छोड़ना। ऐसी स्थितिमें अधिकतर तो वह घर तत्काल खाली करके दूसरा घर तलाश किया जाता है।
{{C|'''एक बहादुर सिख'''}}
सरदार शार्दूलसिंह मुझे हमेशा बड़े ही बहादुर असहयोगी लगे हैं। वे बहुत सुसंस्कृत और सम्मानशील व्यक्ति है। अहिंसात्मक असहयोगपर उनकी बौद्धिक आस्था है। वे एक कट्टर राष्ट्रवादी हैं। सिख धर्मके सिद्धान्त उनको प्राणोंके समान प्यारे हैं, किन्तु राष्ट्रवादसे भी उन्हें उतना ही प्यार है। अहिंसा सभी बातोंमें उनका सर्वोपरि सिद्धान्त नहीं है। इसमें उनकी स्थिति अली बन्धुओं-जैसी ही है, और यह एक बड़ी बात है। वे अहिंसाके सिद्धान्तका उतनी ही ईमानदारीसे पालन करते हैं जितना कि अली बन्धु, और इतना कहना काफी कह देना है। किन्तु यह सरकार उनको केवल देश-निकाला देनेके योग्य व्यक्ति मानती है। उन्हें पाँच वर्षका देश-निकाला दिया गया है। वे आवश्यकतासे अधिक बहादुर, ईमानदार और इसलिए आवश्यकतासे अधिक<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>:{{outdent|अगस्त १३: बिहार शरीफके बुनकरों द्वारा स्वागत-समारोहका आयोजन। सार्वजनिक सभामें भाषण, जिसमें नगरपालिका द्वारा अभिनन्दनपत्र भेंट किया गया था। रातको महिलाओंकी सभामें भाषण।}}
:{{outdent|अगस्त १५: शिमला क्षेत्रके निवासियोंसे अनुरोध किया कि ब्रिटिश सरकारके लिए बेगार न करें।}}
:{{outdent|अगस्त १६: पटनामें।}}
:{{outdent|अगस्त १७: शामको मिर्जापुर पार्क, कलकत्ताकी सभामें भाषण।<br>सियालदह स्टेशनपर सेवा समिति द्वारा मानपत्र भेंट।<br> असमके लिए रवाना।}}
:{{outdent|अगस्त १९: शामको असम प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके मन्त्री गोपीनाथ बारदोलाईके निवासपर कांग्रेस कार्यकर्ताओंसे भेंट।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०७
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अँजली चौधरी
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१११; —जितेन्द्रलाल बनर्जीको, २५१; —बेलगाँवके धरनेदारोंको, ४१६; —मदन-मोहन मालवीयको, २९०; —महादेव देसाईको, १४३; —मोतीलाल नेहरूको, ३५२; —सिलहट कांग्रेस कमेटीके मन्त्री-को, १०१; —सी॰ विजयराघवाचार्यको, ३६०; —हकीम अजमल खाँको, ४४७;
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}
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:—हैदराबादके एक असहयोगीको, ४६१
{{outdent|पत्र, —एक संवाददाताको, ३८७; —एस॰ आर॰ हिगनेलको, २७३; —ओंकार-नाथ पुरोहितको, ५३४; —कुँवरजी आनन्दजीको, २५२; —कुँवरजी मेहताको, ३५३; —के॰ पी॰ जगासिया ब्रदर्सको, —के॰ राजगोपालाचार्यको, ३३५, —ख्वाजाको, ५३८; —ज॰ बो॰ पेटिटको, ३५१, ४७६; —देवचन्द पारेख-को, ६६, ३६२; —देवदास गांधीको, ५५०; —न॰ चि॰ केलकरको, १२२, ३३४; —नरमदलीय भाइयोंको, १९०-९३; —नरसिंहराव दिवेटियाको, ६-७; —प्रभाशंकर पट्टणीको, २१४; —भारतके अंग्रेजों के नाम, ३७९-८२; —मंगलदास पारेखको, २५३; —मथुरादास त्रिकमजी-को, ५२२-२३; —मणिबेन पटेलको, २४०, ३६१, ३८८; —मणिलाल कोठारी और फूलचन्द शाहको, ५०२; —महादेव देसाईको, ३४६-४८, ४८८, ४९५, ५२०-२२, ५३५-३६; —रणछोड़दास पटवारीको, २१३; ——लाला लाजपतराय-को, ३१४; —वल्लभभाई पटेलको, ३५२, ३८८-८९ —सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको, ४१, ४१०-११, ५१९-२०; —सी विजयराघवाचार्यको, २४९-५०; —हसन इमामको, १४६}}
{{outdent|पत्रका अंश, —एक महिलाको लिखे, ३२४ प्रस्ताव, १७२-७३; —चुनावके सम्बन्धमें, ४७१}}
{{outdent|भाषण, —अन्त्यज परिषद्, वेजलपुरमें, १७३-७४; —अहमदाबादकी सार्वजनिक सभामें, २१०-१३; —इलाहाबादकी}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६०८
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}}
सभामें, ५०२-४; —कपड़वंजकी सार्व-जनिक सभामें, ६२-६३; —कलकत्तेके मिर्जापुर पार्कमें, ५३७; -कानपुरमें,
५००-१; —गयामें, ५१७-१८, -गुजरात राजनीतिक परिषद्, भड़ौंचमें, १६७-७०; —गोधराकी सभामें, ७-८; —घाट-
कोपरमें, २३५-३९; —चौपाटीकी सभा, बम्बईमें, ४७९-८१; —ताल्लुका परिषद्, हालोलमें, २-४; —तिलक महा-विद्यालय के उद्घाटनपर, ४१८; —दवा-विक्रेताओंकी सभा, बम्बईमें, ३५९-६०; —नवसारीमें, २४-२९; —पार-
सियोंकी सभामें, ३१८-२२; —पूनाकी सार्वजनिक सभामें, ४१७-१८; —बम्बई-की मुसलमान महिलाओंके समक्ष, ४११-
१३; —बम्बईकी सभामें, २८६-८९, ३२३-२४; —बम्बईकी सार्वजनिक सभामें, १५१-५४, ३२९-३०, ४७५; —बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें, ३२२-२३; —बम्बईके स्वागत-समारोहमें, २७७-७८, —बम्बईमें, ४३८-४०; —बम्बईमें असहयोगपर, २४१-४९; —बम्बईमें खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर, ४७२-७३; —बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष, ४१३-१६; —बम्बईमें शराब-बन्दीपर, ३६२-६६; —बम्बईमें स्कूल के उद्घाटनपर, २६९-७१; —बम्बईमें स्वदेशीपर, ३९२-९४, ४०९-१०, ४३५-३६, ४३६-३८, ४४५-४६, ४६७-७०, ४७४-७५,४७७; —बम्बईमें स्वराज्यपर, २५०-५१; —बरसीमें, १२३-२४; —बलसाड़की सभामें, २३; —बाँदराकी सभामें, ३२४-२६; —बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें, ५२३, ——बैंकके उद्घाटनपर, ४३३-३४; —बोरसद-की सभामें,२; -बोरीवलीकी सभामें, ३१५-१८; —भड़ौंचकी खिलाफत
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::सभामें, १७४-७५; —भड़ौंचमें अहिंसा-प्रस्तावपर, १७१-७२; —भुसावलमें, ११२-१३; —महाराष्ट्र प्रान्तीय सम्मे-लन, वसईमें, ६६-६९; —महिलाओंकी सभा, कठलालमें, ६३; —मानपत्रके उत्तरमें,८-९,८१-८४; —मारवाड़ी विद्या-लयमें,४४४-४५; —मुरादाबादकी सार्व-जनिक सभामें, ४८८-८९; —रासकी सभामें, १; —रेलवे स्टेशनपर, ११२; —लखनऊमें, ४९५-९६; —शिक्षकोंके कर्तव्यपर, २७३-७७;—शिमलाकी सार्व-जनिक सभामें, ९९-१०१; —संगमनेरकी सभा-में, ११४; —सान्ता क्रूज, बम्बईमें, ४४२-४४; —सार्वजनिक सभा, बढवानमें, २००-१; —सीसोदरामें, २३-२४; —सूरतकी सभामें, २१-२२; —सूरत जिलेमें, २९-३०; —हालोलकी किसान सभामें, ४-५
:{{outdent|भेंट, —‘आज’ के प्रतिनिधिसे, ५०१}}
:{{outdent|सन्देश, —अलीगढ़की जनताको, ३९१; -खेड़ा जिलेकी जनताको, ४७६; -गयाकी जनताके नाम, १४६; -जनताके नाम, ३८९; —जनताको, ४३४; —धारवाड़-की जनताको, ३८६-८७, बम्बईमें आयोजित स्त्रियोंकी सभाको, २७२; —‘‘बॉम्बे क्रॉनिकल’को, ४२; —शिमला-पहाड़ियोंकी जनताके नाम, ५३५}}
{{c|'''विविध'''}}
::अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठकमें बहि-ष्कारपर बहस, ४६२-६६; अकाल-सहायताके लिए कताई, ८९; अफगानी हमलेका हौआ, ५८-६०; अली भाइयों-की क्षमा-याचनाका मसविदा, ९२; असमका सबक, २२७-३०; असहयोग समितिका प्रतिवेदन, ३९४-९६, अस्पृ-श्यता और राष्ट्रीयता, ५२८-३०; अहिंसा, ४५८-६०; इन चार दिनोंमें<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}}
सभामें, ५०२-४; —कपड़वंजकी सार्व-जनिक सभामें, ६२-६३; —कलकत्तेके मिर्जापुर पार्कमें, ५३७; -कानपुरमें,
५००-१; —गयामें, ५१७-१८, -गुजरात राजनीतिक परिषद्, भड़ौंचमें, १६७-७०; —गोधराकी सभामें, ७-८; —घाट-
कोपरमें, २३५-३९; —चौपाटीकी सभा, बम्बईमें, ४७९-८१; —ताल्लुका परिषद्, हालोलमें, २-४; —तिलक महा-विद्यालय के उद्घाटनपर, ४१८; —दवा-विक्रेताओंकी सभा, बम्बईमें, ३५९-६०; —नवसारीमें, २४-२९; —पार-
सियोंकी सभामें, ३१८-२२; —पूनाकी सार्वजनिक सभामें, ४१७-१८; —बम्बई-की मुसलमान महिलाओंके समक्ष, ४११-
१३; —बम्बईकी सभामें, २८६-८९, ३२३-२४; —बम्बईकी सार्वजनिक सभामें, १५१-५४, ३२९-३०, ४७५; —बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें, ३२२-२३; —बम्बईके स्वागत-समारोहमें, २७७-७८, —बम्बईमें, ४३८-४०; —बम्बईमें असहयोगपर, २४१-४९; —बम्बईमें खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर, ४७२-७३; —बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष, ४१३-१६; —बम्बईमें शराब-बन्दीपर, ३६२-६६; —बम्बईमें स्कूल के उद्घाटनपर, २६९-७१; —बम्बईमें स्वदेशीपर, ३९२-९४, ४०९-१०, ४३५-३६, ४३६-३८, ४४५-४६, ४६७-७०, ४७४-७५,४७७; —बम्बईमें स्वराज्यपर, २५०-५१; —बरसीमें, १२३-२४; —बलसाड़की सभामें, २३; —बाँदराकी सभामें, ३२४-२६; —बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें, ५२३, ——बैंकके उद्घाटनपर, ४३३-३४; —बोरसद-की सभामें,२; -बोरीवलीकी सभामें, ३१५-१८; —भड़ौंचकी खिलाफत
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::सभामें, १७४-७५; —भड़ौंचमें अहिंसा-प्रस्तावपर, १७१-७२; —भुसावलमें, ११२-१३; —महाराष्ट्र प्रान्तीय सम्मे-लन, वसईमें, ६६-६९; —महिलाओंकी सभा, कठलालमें, ६३; —मानपत्रके उत्तरमें,८-९,८१-८४; —मारवाड़ी विद्या-लयमें,४४४-४५; —मुरादाबादकी सार्व-जनिक सभामें, ४८८-८९; —रासकी सभामें, १; —रेलवे स्टेशनपर, ११२; —लखनऊमें, ४९५-९६; —शिक्षकोंके कर्तव्यपर, २७३-७७;—शिमलाकी सार्व-जनिक सभामें, ९९-१०१; —संगमनेरकी सभा-में, ११४; —सान्ता क्रूज, बम्बईमें, ४४२-४४; —सार्वजनिक सभा, बढवानमें, २००-१; —सीसोदरामें, २३-२४; —सूरतकी सभामें, २१-२२; —सूरत जिलेमें, २९-३०; —हालोलकी किसान सभामें, ४-५
:{{outdent|भेंट, —‘आज’ के प्रतिनिधिसे, ५०१}}
:{{outdent|सन्देश, —अलीगढ़की जनताको, ३९१; -खेड़ा जिलेकी जनताको, ४७६; -गयाकी जनताके नाम, १४६; -जनताके नाम, ३८९; —जनताको, ४३४; —धारवाड़-की जनताको, ३८६-८७, बम्बईमें आयोजित स्त्रियोंकी सभाको, २७२; —‘‘बॉम्बे क्रॉनिकल’को, ४२; —शिमला-पहाड़ियोंकी जनताके नाम, ५३५}}
{{c|'''विविध'''}}
::अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठकमें बहि-ष्कारपर बहस, ४६२-६६; अकाल-सहायताके लिए कताई, ८९; अफगानी हमलेका हौआ, ५८-६०; अली भाइयों-की क्षमा-याचनाका मसविदा, ९२; असमका सबक, २२७-३०; असहयोग समितिका प्रतिवेदन, ३९४-९६, अस्पृ-श्यता और राष्ट्रीयता, ५२८-३०; अहिंसा, ४५८-६०; इन चार दिनोंमें
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}}
सभामें, ५०२-४; —कपड़वंजकी सार्व-जनिक सभामें, ६२-६३; —कलकत्तेके मिर्जापुर पार्कमें, ५३७; -कानपुरमें,
५००-१; —गयामें, ५१७-१८, -गुजरात राजनीतिक परिषद्, भड़ौंचमें, १६७-७०; —गोधराकी सभामें, ७-८; —घाट-
कोपरमें, २३५-३९; —चौपाटीकी सभा, बम्बईमें, ४७९-८१; —ताल्लुका परिषद्, हालोलमें, २-४; —तिलक महा-विद्यालय के उद्घाटनपर, ४१८; —दवा-विक्रेताओंकी सभा, बम्बईमें, ३५९-६०; —नवसारीमें, २४-२९; —पार-
सियोंकी सभामें, ३१८-२२; —पूनाकी सार्वजनिक सभामें, ४१७-१८; —बम्बई-की मुसलमान महिलाओंके समक्ष, ४११-
१३; —बम्बईकी सभामें, २८६-८९, ३२३-२४; —बम्बईकी सार्वजनिक सभामें, १५१-५४, ३२९-३०, ४७५; —बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें, ३२२-२३; —बम्बईके स्वागत-समारोहमें, २७७-७८, —बम्बईमें, ४३८-४०; —बम्बईमें असहयोगपर, २४१-४९; —बम्बईमें खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर, ४७२-७३; —बम्बईमें शराबके ठेकेदारोंके समक्ष, ४१३-१६; —बम्बईमें शराब-बन्दीपर, ३६२-६६; —बम्बईमें स्कूल के उद्घाटनपर, २६९-७१; —बम्बईमें स्वदेशीपर, ३९२-९४, ४०९-१०, ४३५-३६, ४३६-३८, ४४५-४६, ४६७-७०, ४७४-७५,४७७; —बम्बईमें स्वराज्यपर, २५०-५१; —बरसीमें, १२३-२४; —बलसाड़की सभामें, २३; —बाँदराकी सभामें, ३२४-२६; —बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें, ५२३, ——बैंकके उद्घाटनपर, ४३३-३४; —बोरसद-की सभामें,२; -बोरीवलीकी सभामें, ३१५-१८; —भड़ौंचकी खिलाफत
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:सभामें, १७४-७५; —भड़ौंचमें अहिंसा-प्रस्तावपर, १७१-७२; —भुसावलमें, ११२-१३; —महाराष्ट्र प्रान्तीय सम्मे-लन, वसईमें, ६६-६९; —महिलाओंकी सभा, कठलालमें, ६३; —मानपत्रके उत्तरमें,८-९,८१-८४; —मारवाड़ी विद्या-लयमें,४४४-४५; —मुरादाबादकी सार्व-जनिक सभामें, ४८८-८९; —रासकी सभामें, १; —रेलवे स्टेशनपर, ११२; —लखनऊमें, ४९५-९६; —शिक्षकोंके कर्तव्यपर, २७३-७७;—शिमलाकी सार्व-जनिक सभामें, ९९-१०१; —संगमनेरकी सभा-में, ११४; —सान्ता क्रूज, बम्बईमें, ४४२-४४; —सार्वजनिक सभा, बढवानमें, २००-१; —सीसोदरामें, २३-२४; —सूरतकी सभामें, २१-२२; —सूरत जिलेमें, २९-३०; —हालोलकी किसान सभामें, ४-५
{{outdent|भेंट, —‘आज’ के प्रतिनिधिसे, ५०१}}
{{outdent|सन्देश, —अलीगढ़की जनताको, ३९१; -खेड़ा जिलेकी जनताको, ४७६; -गयाकी जनताके नाम, १४६; -जनताके नाम, ३८९; —जनताको, ४३४; —धारवाड़-की जनताको, ३८६-८७, बम्बईमें आयोजित स्त्रियोंकी सभाको, २७२; —‘‘बॉम्बे क्रॉनिकल’को, ४२; —शिमला-पहाड़ियोंकी जनताके नाम, ५३५}}
{{c|'''विविध'''}}
:अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठकमें बहि-ष्कारपर बहस, ४६२-६६; अकाल-सहायताके लिए कताई, ८९; अफगानी हमलेका हौआ, ५८-६०; अली भाइयों-की क्षमा-याचनाका मसविदा, ९२; असमका सबक, २२७-३०; असहयोग समितिका प्रतिवेदन, ३९४-९६, अस्पृ-श्यता और राष्ट्रीयता, ५२८-३०; अहिंसा, ४५८-६०; इन चार दिनोंमें
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''शीर्षक-सांकेतिका'''|'''५७७'''}}</noinclude>{{Multicol}}
हमारा कर्तव्य, २८४; इश्तिहार, ११०; उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा, ४५३-५४; एक अब्राह्मणकी शिकायत, ५०; एक परिपत्र, ११०-११; एक पारसी बहनका पुरस्कार, ६५; कताई बनाम बुनाई, १९६-९७; कपड़ेके व्यापारियोंको खुला पत्र, ३४८-५०; करघेका अधिक प्रयोग, ९०-९२; कराचीसे प्रतिवाद, १३९-४१; कविवर-की चिन्ता, १६१-६४; काठियावाड़-के राजा-महाराजाओंसे, ४९६-९९;
काठियावाड़ियोंसे, २८५-८६, कार्य-समिति और उसका काम, ३०२-३; कुछ शंकाएँ, ३०-३४, कुहरा, १३-१६ खिलाफत और अहिंसा, १६४-६६; गांधी-तब और अब, ६०-६२; गुजरातियोंसे, ३८-४०; गौओं-को बचाओ, १९४-९५, चरखेका सन्देश, ३०४-६, चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र, ३०६-१०; जलायें किसलिए, ३९६-९७; जुएका अभिशाप, २५७-५८; टर्कीका प्रश्न, ३००-१;
तिलक स्मारक-कोष, २५८-६०; त्याग और उत्पादन, ४३१-३३; द्वेषपूर्ण अभियोग, ५४५-४७; नई प्रतिज्ञा, ४८९-९१; ‘नवजीवन’ को तार, ३२७; पंच महायज्ञ, ३५६-५७; पत्र-लेखकोसे, १९८, २६८, ३८६, ४२९-३०; पाँच सौवीं मंजिल, ११५-१७; पारसियोंके प्रति मैं क्यों आशावान हूँ, ६३-६४; पूजाका अधिकार, ४७७-७८; पेचीदा मामला, ९३-९५; फिर श्री पालके बारेमें, २३३-३५; फूटके बलपर शासन, १७-२०; बम्बईकी
{{Multicol-break}}
सुन्दरता, ३४२-४३; बहनोंसे, २१४-१६; बहिष्कारके उपाय, ३९०-९१; बाजी लगानेकी लत, ४८-४९, १३१; भारतीय महिलाओंसे, ५१५-१७; मजिस्ट्रेटकी धाँधली, २३१-३२; माधुरी और पुष्पा, २८०-८३; मध्य-प्रान्तमें दमन, १३८-३९, मारवाड़ी भाइयों और बहनोंसे, ५५१-५२; माले-गाँवका अपराध, ६९-७१, मुसल-मानोंकी बेचैनी, ५४२-४४; मृत्युका भय, ५२४-२६, मेरी भूल, ५४७-५०, युद्धोन्मुख डा॰ पॉलेन, २६०-६३; रिसता हुआ घाव, ३७७-७९, वाइस-रायका भाषण, १७५-७६, १८८-९०; विदेशी कपड़ेका बहिष्कार, ३२८-२९; विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो, ३३३-३४; वैष्णवोंसे, ३३१-३३; व्यापारी क्या करें, ३९८-९९; शिम-लाकी छाया, ४२५-२६; शिमला-यात्रा, १३२-३५; शुभ घड़ी, ३५३-५५; श्रद्धाका स्वरूप, ३८२-८६; संयुक्त-प्रान्तमें दमन, ५३८; सफलताकी शर्ते, ५१३-१४; सभ्यताका उपहास, ४३०; समझौता, ५३०; सवालोंका सिलसिला, ५७-५८; सविनय अवज्ञा, ४८५-८७; सीमा-प्रान्तके साथी, १३६-३७, स्त्रियोंकी स्थिति, ४२६-२८; स्वदेशी व्रत, ३९०; स्वराज्यकी व्याख्या, ५२६-२७; हमारी कसौटी, १९८-२००, हमारी खामियाँ, २६३-६७, हमारे पड़ोसी, १०६-८; ‘हिन्दी नवजीवन’, ५५१; हिन्दुओ सावधान, १०८-९; हिन्दू-मुस्लिम एकता, ८८-८९, ४५५-५७
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''शीर्षक-सांकेतिका'''|'''५७७'''}}</noinclude>{{Multicol}}
हमारा कर्तव्य, २८४; इश्तिहार, ११०; उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा, ४५३-५४; एक अब्राह्मणकी शिकायत, ५०; एक परिपत्र, ११०-११; एक पारसी बहनका पुरस्कार, ६५; कताई बनाम बुनाई, १९६-९७; कपड़ेके व्यापारियोंको खुला पत्र, ३४८-५०; करघेका अधिक प्रयोग, ९०-९२; कराचीसे प्रतिवाद, १३९-४१; कविवर-की चिन्ता, १६१-६४; काठियावाड़-के राजा-महाराजाओंसे, ४९६-९९;
काठियावाड़ियोंसे, २८५-८६, कार्य-समिति और उसका काम, ३०२-३; कुछ शंकाएँ, ३०-३४, कुहरा, १३-१६ खिलाफत और अहिंसा, १६४-६६; गांधी-तब और अब, ६०-६२; गुजरातियोंसे, ३८-४०; गौओं-को बचाओ, १९४-९५, चरखेका सन्देश, ३०४-६, चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र, ३०६-१०; जलायें किसलिए, ३९६-९७; जुएका अभिशाप, २५७-५८; टर्कीका प्रश्न, ३००-१;
तिलक स्मारक-कोष, २५८-६०; त्याग और उत्पादन, ४३१-३३; द्वेषपूर्ण अभियोग, ५४५-४७; नई प्रतिज्ञा, ४८९-९१; ‘नवजीवन’ को तार, ३२७; पंच महायज्ञ, ३५६-५७; पत्र-लेखकोसे, १९८, २६८, ३८६, ४२९-३०; पाँच सौवीं मंजिल, ११५-१७; पारसियोंके प्रति मैं क्यों आशावान हूँ, ६३-६४; पूजाका अधिकार, ४७७-७८; पेचीदा मामला, ९३-९५; फिर श्री पालके बारेमें, २३३-३५; फूटके बलपर शासन, १७-२०; बम्बईकी
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सुन्दरता, ३४२-४३; बहनोंसे, २१४-१६; बहिष्कारके उपाय, ३९०-९१; बाजी लगानेकी लत, ४८-४९, १३१; भारतीय महिलाओंसे, ५१५-१७; मजिस्ट्रेटकी धाँधली, २३१-३२; माधुरी और पुष्पा, २८०-८३; मध्य-प्रान्तमें दमन, १३८-३९, मारवाड़ी भाइयों और बहनोंसे, ५५१-५२; माले-गाँवका अपराध, ६९-७१, मुसल-मानोंकी बेचैनी, ५४२-४४; मृत्युका भय, ५२४-२६, मेरी भूल, ५४७-५०, युद्धोन्मुख डा॰ पॉलेन, २६०-६३; रिसता हुआ घाव, ३७७-७९, वाइस-रायका भाषण, १७५-७६, १८८-९०; विदेशी कपड़ेका बहिष्कार, ३२८-२९; विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो, ३३३-३४; वैष्णवोंसे, ३३१-३३; व्यापारी क्या करें, ३९८-९९; शिम-लाकी छाया, ४२५-२६; शिमला-यात्रा, १३२-३५; शुभ घड़ी, ३५३-५५; श्रद्धाका स्वरूप, ३८२-८६; संयुक्त-प्रान्तमें दमन, ५३८; सफलताकी शर्ते, ५१३-१४; सभ्यताका उपहास, ४३०; समझौता, ५३०; सवालोंका सिलसिला, ५७-५८; सविनय अवज्ञा, ४८५-८७; सीमा-प्रान्तके साथी, १३६-३७, स्त्रियोंकी स्थिति, ४२६-२८; स्वदेशी व्रत, ३९०; स्वराज्यकी व्याख्या, ५२६-२७; हमारी कसौटी, १९८-२००, हमारी खामियाँ, २६३-६७, हमारे पड़ोसी, १०६-८; ‘हिन्दी नवजीवन’, ५५१; हिन्दुओ सावधान, १०८-९; हिन्दू-मुस्लिम एकता, ८८-८९, ४५५-५७
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{{left|२०-३७}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''टिप्पणियाँ'''|'''३४१'''}}</noinclude>प्रभावशाली हैं; इसीलिए पंजाब सरकार खौफ खा गई और इसी कारण उन्हें जनताके बीचसे हटा दिया गया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनके जेल भेज दिये जानेसे देशके लिए उनकी सेवाओंका महत्त्व और भी बढ़ गया है। सारे भारतमें बहादुरी और आत्म-संयमका यह प्रदर्शन अद्भुत है कि इतने अधिक लोग प्रसन्नतापूर्वक जेल जाना स्वीकार करते हैं और लोग बिना झुके धीर, गम्भीर और शान्त बने रहते हैं। मुझे आशा है कि सरदार शार्दूलसिंहके जेल भेजे जानेके फलस्वरूप सिख और दूसरे पंजाबी और अधिक उत्साहसे असहयोगके लिए काम करेंगे। मैं सरदार शार्दूलसिंह और उन सब लोगोंको बधाई देता हूँ जो मातृभूमिके लिए यातनाएँ सह रहे हैं।
{{C|'''युवराजका प्रस्तावित आगमन'''}}
दुखकी बात है कि युवराजके आगमनकी बात फिरसे उठाई गई है और अस्थायी रूपसे उसकी तिथि भी निश्चित कर दी गई है। भारत जिस तन्त्रसे बिलकुल आजिज आ गया है, उसके प्रतिनिधिके स्वागतको वह कभी तैयार नहीं होगा। यदि भारतकी अनिच्छुक जनतापर यह यात्रा थोपी गई, तो युवराजके आगमनके दिन उसी तरहकी हड़ताल होनी चाहिए जैसी ड्यूकके आगमनपर हुई थी। मैं फिर स्पष्ट कर दूँ कि व्यक्तिगतरूपसे युवराजके विरुद्ध असहयोगियोंको कुछ नहीं कहना है। किन्तु जिस पदपर वे हैं उसे उनसे अलग नहीं किया जा सकता। यद्यपि यह सच है कि सम्राट् या उनके उत्तराधिकारी सक्रिय रूपसे राजकीय मामलोंमें हस्तक्षेप नहीं करते (जो कि राज्यके लिए सुविधाजनक है) तथापि वे मौजूदा तन्त्रके उतने ही पुरअसर प्रतिनिधि हैं जितना कि बहुत हस्तक्षेप करनेवाला कोई प्रधान मन्त्री या वाइसराय हो सकता है। मेरा तो विचार है कि अपनी अलग-थलग स्थितिके कारण तन्त्रके समर्थकके रूपमें उनका प्रभाव और भी अधिक हो जाता है। यदि युवराज आते हैं तो वे असहयोगियोंको या हमारे लक्ष्यको आशीर्वाद देने नहीं आयेंगे, बल्कि इस सरकारकी प्रशंसाके गीत गाने आयेंगे जो पंजाबके अपमान, मुसलमानोंके प्रति वचन-भंग, भारतपर शराबका कुत्सित व्यापार थोपने और देशको गरीब और इतना दुर्बल बनानेके लिए जिम्मेदार है कि भारत समझने लगा है कि उसे अनिश्चित कालतक दासतामें बँधे रहना पड़ेगा। मेरी विनम्र रायमें युवराजका प्रस्तावित आगमन जलेपर नमक छिड़कने-जैसा होगा और प्रत्येक असहयोगीका यह कर्त्तव्य होगा कि वह आदर किन्तु दृढ़ता के साथ साफ-साफ शब्दोंमें इस तरहके उन सब प्रयत्नोंका विरोध करे जो एक गिरते हुए तन्त्रको सहारा देनेके लिए किये जा रहे हैं।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', ६-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{Rh||पत्र: एशियाई पंजीयकको|२८१}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही
डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न
होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि
कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो
अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ?
एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो
झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर
उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता
है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा
हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस
सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे ।
किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है ।यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने
लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते
हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}}
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:[सेवा में
:एशियाई पंजीयक
:प्रिटोरिया
:महोदय,]
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना
चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक
असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न
होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि
कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो
अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ?
एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो
झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर
उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता
है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा
हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस
सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे ।
किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है ।यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने
लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}}
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:[सेवा में
:एशियाई पंजीयक
:प्रिटोरिया
:महोदय,]
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है।
परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के
सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center>
डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] वीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है।
परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के
सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center>
डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [ संक्रामक ] बीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,.हमें ऐसा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [१३]|५०७}}</noinclude>पीड़ित होते हैं । वैसे बहुतेरे नीरोग भी नजर आते हैं। हम मांस खाने के लिए पैदा नहीं हुए, यह बात तो हमारे शरीरके सारे अवयवों और अपनी काठीसे ही साफ जाहिर होती है। डॉक्टर किंग्सफोर्ड और डॉक्टर हेगने मांस सेवनसे होनेवाले दुष्परिणामोंका बड़ा सजीव वर्णन किया है । जो अम्लत्व द्विदल धान्योंसे पैदा होता है, वही मांस भक्षणसे भी होता है । यह उन्होंने साबित कर बताया है। मांस खानेसे दाँतोंको हानि पहुंचती है। गठियाका दर्द होता है। मांस खानेवाला क्रोधी अधिक होता है और क्रोधी मनुष्य भी एक प्रकारसे रोगी ही कहलाया । क्रोधकी हमारी परिभाषाके अनुसार तो क्रोधी मनुष्य नीरोग नहीं माना जा सकता।
चौथी या अन्तिम श्रेणीकी खुराक यानी केवल मांस भक्षणका विचार करनेकी जरूरत ही नहीं है। वह स्थिति तो इतनी अधम है कि उसका स्मरणमात्र मांस भक्षणसे अरुचि पैदा करनेके लिए पर्याप्त है। केवल मांस-भक्षी तो किसी भी प्रकार से नीरोग नहीं हैं। जो लोग थोड़े भी उन्नत हो जाते हैं या तनिक भी ज्ञानार्जन कर पाते हैं कि उनका मन तुरन्त वनस्पति आहारकी ओर दौड़ने लगता है।
इस सबका सार यही निकला कि केवल फलाहार करनेवाले थोड़े ही निकलेंगे । परन्तु सूखे और ताजे फल तथा गेहूँ और जैतूनके तेलका प्रयोग करने लायक है । और इनके आधारपर मनुष्य अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। फलोंमें प्रधान पदका श्रेय केलेको जाता है। इसके अलावा खजूर, आलू-बुखारा, अंजीर आदि भी शक्ति प्रदान करनेवाले फल हैं। ताजे अंगूर रक्तशोधक हैं। नारंगी, संतरा, सेब आदिको केलोंके साथ मिलाकर रोटीके साथ खाया जा सकता है। रोटीमें जैतूनका तेल डालने से उसका स्वाद बिगड़ता नहीं है । इस प्रकारकी खुराकमें झंझट भी ज्यादा नहीं है और खर्च भी कम पड़ता है। इसके सिवा इस खुराकको लेनेसे नमक, मिर्च या दूध और चीनी आदिकी आवश्यकता भी नहीं होती। कोरी चीनी तो एकदम बेकाम चीज है। बहुत अधिक मीठा खानेवालेके दाँत बहुत जल्दी गिर जाते हैं और उतना अधिक मीठा खानेसे कोई लाभ भी नहीं होता। गेहूँ, बादाम, मूंगफली, अखरोट, ताजा मेवा इन सबसे खाने योग्य अनेक पदार्थ बनाये जा सकते हैं।
खुराकके सम्बन्धमें अब यही देखना बाकी रह गया कि खुराक कितनी और कब ली जाये। यह हम अगले प्रकरणमें देखेंगे ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २९-३-१९१३<noinclude></noinclude>
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चौथी या अन्तिम श्रेणीकी खुराक यानी केवल मांस भक्षणका विचार करनेकी जरूरत ही नहीं है। वह स्थिति तो इतनी अधम है कि उसका स्मरणमात्र मांस भक्षणसे अरुचि पैदा करनेके लिए पर्याप्त है। केवल मांस-भक्षी तो किसी भी प्रकार से नीरोग नहीं हैं। जो लोग थोड़े भी उन्नत हो जाते हैं या तनिक भी ज्ञानार्जन कर पाते हैं कि उनका मन तुरन्त वनस्पति आहारकी ओर दौड़ने लगता है।
इस सबका सार यही निकला कि केवल फलाहार करनेवाले थोड़े ही निकलेंगे । परन्तु सूखे और ताजे फल तथा गेहूँ और जैतूनके तेलका प्रयोग करने लायक है । और इनके आधारपर मनुष्य अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। फलोंमें प्रधान पदका श्रेय केलेको जाता है। इसके अलावा खजूर, आलू-बुखारा, अंजीर आदि भी शक्ति प्रदान करनेवाले फल हैं। ताजे अंगूर रक्तशोधक हैं। नारंगी, संतरा, सेब आदिको केलोंके साथ मिलाकर रोटीके साथ खाया जा सकता है। रोटीमें जैतूनका तेल डालने से उसका स्वाद बिगड़ता नहीं है । इस प्रकारकी खुराकमें झंझट भी ज्यादा नहीं है और खर्च भी कम पड़ता है। इसके सिवा इस खुराकको लेनेसे नमक, मिर्च या दूध और चीनी आदिकी आवश्यकता भी नहीं होती। कोरी चीनी तो एकदम बेकाम चीज है। बहुत अधिक मीठा खानेवालेके दाँत बहुत जल्दी गिर जाते हैं और उतना अधिक मीठा खानेसे कोई लाभ भी नहीं होता। गेहूँ, बादाम, मूंगफली, अखरोट, ताजा मेवा इन सबसे खाने योग्य अनेक पदार्थ बनाये जा सकते हैं।
खुराकके सम्बन्धमें अब यही देखना बाकी रह गया कि खुराक कितनी और कब ली जाये। यह हम अगले प्रकरणमें देखेंगे ।
:[ गुजरातीसे ]
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-१३]|५०७}}</noinclude>पीड़ित होते हैं । वैसे बहुतेरे नीरोग भी नजर आते हैं। हम मांस खाने के लिए पैदा नहीं हुए, यह बात तो हमारे शरीरके सारे अवयवों और अपनी काठीसे ही साफ जाहिर होती है। डॉक्टर किंग्सफोर्ड और डॉक्टर हेगने मांस सेवनसे होनेवाले दुष्परिणामोंका बड़ा सजीव वर्णन किया है । जो अम्लत्व द्विदल धान्योंसे पैदा होता है, वही मांस भक्षणसे भी होता है । यह उन्होंने साबित कर बताया है। मांस खानेसे दाँतोंको हानि पहुंचती है। गठियाका दर्द होता है। मांस खानेवाला क्रोधी अधिक होता है और क्रोधी मनुष्य भी एक प्रकारसे रोगी ही कहलाया । क्रोधकी हमारी परिभाषाके अनुसार तो क्रोधी मनुष्य नीरोग नहीं माना जा सकता।
चौथी या अन्तिम श्रेणीकी खुराक यानी केवल मांस भक्षणका विचार करनेकी जरूरत ही नहीं है। वह स्थिति तो इतनी अधम है कि उसका स्मरणमात्र मांस भक्षणसे अरुचि पैदा करनेके लिए पर्याप्त है। केवल मांस-भक्षी तो किसी भी प्रकार से नीरोग नहीं हैं। जो लोग थोड़े भी उन्नत हो जाते हैं या तनिक भी ज्ञानार्जन कर पाते हैं कि उनका मन तुरन्त वनस्पति आहारकी ओर दौड़ने लगता है।
इस सबका सार यही निकला कि केवल फलाहार करनेवाले थोड़े ही निकलेंगे । परन्तु सूखे और ताजे फल तथा गेहूँ और जैतूनके तेलका प्रयोग करने लायक है । और इनके आधारपर मनुष्य अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। फलोंमें प्रधान पदका श्रेय केलेको जाता है। इसके अलावा खजूर, आलू-बुखारा, अंजीर आदि भी शक्ति प्रदान करनेवाले फल हैं। ताजे अंगूर रक्तशोधक हैं। नारंगी, संतरा, सेब आदिको केलोंके साथ मिलाकर रोटीके साथ खाया जा सकता है। रोटीमें जैतूनका तेल डालने से उसका स्वाद बिगड़ता नहीं है । इस प्रकारकी खुराकमें झंझट भी ज्यादा नहीं है और खर्च भी कम पड़ता है। इसके सिवा इस खुराकको लेनेसे नमक, मिर्च या दूध और चीनी आदिकी आवश्यकता भी नहीं होती। कोरी चीनी तो एकदम बेकाम चीज है। बहुत अधिक मीठा खानेवालेके दाँत बहुत जल्दी गिर जाते हैं और उतना अधिक मीठा खानेसे कोई लाभ भी नहीं होता। गेहूँ, बादाम, मूंगफली, अखरोट, ताजा मेवा इन सबसे खाने योग्य अनेक पदार्थ बनाये जा सकते हैं।
खुराकके सम्बन्धमें अब यही देखना बाकी रह गया कि खुराक कितनी और कब ली जाये। यह हम अगले प्रकरणमें देखेंगे ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २९-३-१९१३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-१३]|५०७}}</noinclude>पीड़ित होते हैं । वैसे बहुतेरे नीरोग भी नजर आते हैं। हम मांस खाने के लिए पैदा नहीं हुए, यह बात तो हमारे शरीरके सारे अवयवों और अपनी काठीसे ही साफ जाहिर होती है। डॉक्टर किंग्सफोर्ड और डॉक्टर हेगने मांस सेवनसे होनेवाले दुष्परिणामोंका बड़ा सजीव वर्णन किया है । जो अम्लत्व द्विदल धान्योंसे पैदा होता है, वही मांस-भक्षणसे भी होता है । यह उन्होंने साबित कर बताया है। मांस खानेसे दाँतोंको हानि पहुंचती है। गठियाका दर्द होता है। मांस खानेवाला क्रोधी अधिक होता है और क्रोधी मनुष्य भी एक प्रकारसे रोगी ही कहलाया । क्रोधकी हमारी परिभाषाके अनुसार तो क्रोधी मनुष्य नीरोग नहीं माना जा सकता।
चौथी या अन्तिम श्रेणीकी खुराक यानी केवल मांस-भक्षणका विचार करनेकी जरूरत ही नहीं है। वह स्थिति तो इतनी अघम है कि उसका स्मरणमात्र मांस-भक्षणसे अरुचि पैदा करनेके लिए पर्याप्त है। केवल मांस-भक्षी तो किसी भी प्रकार से नीरोग नहीं हैं। जो लोग थोड़े भी उन्नत हो जाते हैं या तनिक भी ज्ञानार्जन कर पाते हैं कि उनका मन तुरन्त वनस्पति आहारकी ओर दौड़ने लगता है।
इस सबका सार यही निकला कि केवल फलाहार करनेवाले थोड़े ही निकलेंगे । परन्तु सूखे और ताजे फल तथा गेहूँ और जैतूनके तेलका प्रयोग करने लायक है । और इनके आधारपर मनुष्य अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। फलोंमें प्रधान पदका श्रेय केलेको जाता है। इसके अलावा खजूर, आलू-बुखारा, अंजीर आदि भी शक्ति प्रदान करनेवाले फल हैं। ताजे अंगूर रक्तशोधक हैं। नारंगी, संतरा, सेब आदिको केलोंके साथ मिलाकर रोटीके साथ खाया जा सकता है। रोटीमें जैतूनका तेल डालने से उसका स्वाद बिगड़ता नहीं है । इस प्रकारकी खुराकमें झंझट भी ज्यादा नहीं है और खर्च भी कम पड़ता है। इसके सिवा इस खुराकको लेनेसे नमक, मिर्च या दूध और चीनी आदिकी आवश्यकता भी नहीं होती। कोरी चीनी तो एकदम बेकाम चीज है। बहुत अधिक मीठा खानेवालेके दाँत बहुत जल्दी गिर जाते हैं और उतना अधिक मीठा खानेसे कोई लाभ भी नहीं होता। गेहूँ, बादाम, मूंगफली, अखरोट, ताजा मेवा इन सबसे खाने योग्य अनेक पदार्थ बनाये जा सकते हैं।
खुराकके सम्बन्धमें अब यही देखना बाकी रह गया कि खुराक कितनी और कब ली जाये। यह हम अगले प्रकरणमें देखेंगे ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २९-३-१९१३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४६
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''३७७. पत्र : जमनादास गांधीको'''}}</center>
{{rh|||फाल्गुन वदी ७ [ मार्च २९, १९१३]<ref>पत्रसे स्पष्ट है कि यह जमनादास गांधीके १४ दिसम्बर, १९१२ को दक्षिण आफ्रिकाले भारतके लिए रवाना होनेके बाद ही लिखा गया होगा; और इस तारीखके बाद पड़नेवाली फाल्गुन वदी ७ को १९१३ के मार्च महीनेकी २९ तारीख थी । </ref>}}
चि० जमनादास,
तुम्हारे तीन पत्र साथ मिले हैं। तुम हर हफ्ते पत्र चाहते हो; किन्तु हर हफ्ते मुझे तुम्हारा पत्र मिलता नहीं। इसलिए ऐसा कैसे करूँ, यह समझमें नहीं आता । फिर भी अधिक बार लिखनेका प्रयत्न करूँगा ।
छः मासकी अवधि पूरी होनेके बाद तुम्हें बिना नमकका खाना जारी रखनेकी जरूरत नहीं है । उद्देश्य यह नहीं है कि बिना नमकके खाने [ का नियम निबाहने] के लिए शरीरकी आहुति दे दी जाये । बिना नमक और चीनीका खाना खाकर हम अधिक नीरोग रह सकेंगे, ऐसा मानकर हमने यह व्रत लिया है। यदि ऐसा न हो तो हम नमक या चीनी त्यागने के लिए बंधे नहीं हैं। बिना नमकका खाना निरामिष आहारकी तरह कोई धर्म-विहित बात नहीं है । जब हम ऐसा मानेंगे कि वह है, तब उसे न खायेंगे । दूधके सम्बन्धमें अवश्य मेरा मन वैसा होता है । परन्तु मुझे तो बिना नमक, चीनी, शाक और दालका खाना, ये सब मुआफिक आ गये जान पड़ते हैं।
तुम वहाँ नीबू आदि नहीं खा पाते, यह बात मुझे कुछ रुची नहीं । तुम्हारे प्रयोगोंमें मुझे बहुत-सी खामियाँ दिखाई देती हैं। इसमें तुम्हारा दोष तिल-भर भी नहीं है। तुम अनजान होनेसे फेरफार नहीं कर पाये। इसके अतिरिक्त तुमसे स्वतन्त्र प्रयोग नहीं करते बनता। इसलिए यदि तुम अभीतक अलोना खाने आदिका प्रयोग कर रहे हो और वह तुम्हें अनुकूल न पड़ रहा हो तो उसे छोड़ ही देना ।
तुम मेरे पत्रोंको सँभालकर रख सको, इसके लिए तुम्हें पत्र लिखने में एक ही प्रकारके कागजका प्रयोग करनेका प्रयत्न करूँगा । कुछ पत्र अवश्य ही दुबारा पढ़ने योग्य होंगे। इसके अलावा तुम मेरे विचार जाननेके लिए बहुत उत्सुक जान पड़ते हो, इसलिए यदि तुम्हें मेरा पत्र हर हफ्ते न मिले, तो जो पत्र सबसे हाल में मिला हो उसे तो इस बीच दुबारा पढ़ ही सकोगे।
मुझसे चाहे जो सवाल, चाहे जैसी भाषामें पूछने में न झिझकना ।
तुम मेरे मना करनेपर भी [भारत] चले गये हो, इसकी चिन्ता न करो। तुम अकेले रहकर अपने विचारोंको दृढ़ नहीं कर सकते। इसी कारण मैंने तुम्हें रोका था। परन्तु खुशालभाई<ref>और</ref> और देवभाभीकी<ref>जमनादासके माता-पिता ।</ref> सेवा करनेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा देखकर मुझे उसकी तुलना में तुम्हारे विचारोंको दृढ़ करनेकी अपनी इच्छा गौण लगी ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : जमनादास गांधीको|५०९}}</noinclude>इसलिए तुम्हारा जाना ठीक ही हुआ। इसके अतिरिक्त तुम्हें जो कुछ कड़वा अनुभव होता है, उससे तुम्हारे चरित्रका निर्माण होता है, क्योंकि तुम्हारे सब विचार अच्छे हैं और तुम ऊँचा उठना चाहते हो ।
भाषामें " मादरी जबान" आदि उर्दू शब्दोंका प्रयोग करना बिलकुल ठीक है। गुजराती भाषाको संस्कृत भाषाकी ही शाखा रखनेका प्रयत्न करें, तो पारसियों और मुसलमानोंको गुजराती न गिनना चाहिए। ऐसा करना भी चाहें तो सम्भव नहीं है। गुजराती भाषामें उर्दू और फारसी शब्द बहुत प्रयुक्त होते हैं और होंगे । 'ओपिनियन' की भाषा हिन्दुओं और मुसलमानोंको रुचिकर होनी चाहिए। वैसी भाषा बनाने के लिए हम प्रसंगानुकूल अल्लाह और परमेश्वर दोनों शब्दोंका प्रयोग कर सकते हैं । यदि अंग्रेज गुजरातके वतनी बन जायें, तो हम अंग्रेजी शब्दोंको भी जरूरत होनेपर अपनी भाषामें ले लेंगे। इस समय जो अंग्रेजी शब्द लिये जाते हैं उसमें तो दम्भ, अज्ञान या खुशामद रहती है। उसके पीछे भाषाकी उन्नतिका खयाल नहीं है ।
यदि हिन्दू भी तुर्कीकी लड़ाई जैसी किसी स्थितिमें फँस जायें तो उन्हें भी सक्रिय हो उठना चाहिए। इटली और बाल्कन राज्य, दोनों इस लड़ाईमें दोषी हैं; इसलिए हम उनका दोष बताते हैं तो कोई अनाचार नहीं करते। इसमें इटली के प्रति द्वेष नहीं है। अखबारके बहुत से पाठक मुसलमान हैं; इसलिए उन्हें यथासम्भव लड़ाईकी खबरें देते रहना हमारा फर्ज है। 'ओपिनियन'को हम नीतिकी शिक्षा देनेका साधन कहते हैं, परन्तु पाठक न हों तो वह इसका साधन कैसे बन सकता है? लड़ाईकी खबरें देकर हम पाठकोंका मनोरंजन निर्दोष रीतिसे करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें लड़ाईकी खबरें जाननी चाहिए, इसलिए इस हद तक यह नीतिका विषय हुआ। और अन्तमें, नीति-नियम बताना और अपने कष्टोंका वर्णन करना यद्यपि उसके प्रधान विषय हैं, परन्तु हम उसमें खबरें ही न दें, ऐसा इरादा कदापि नहीं है। सम्भव है, हमारे वहाँ अधिक जातीय भेदभाव हो, किन्तु उसका असर आम लोगों-पर नहीं होता। यहाँ तो उसका असर आम लोगोंपर ही होता है ।
पवित्र गिने जानेवाले तीर्थोंमें तेलको त्याज्य मानकर घीको पवित्र मानते हैं। इसका कारण मैंने जो अनुमानसे बताया है, वही है । भारतमें जब मांसाहारी लोग थे, तब किसीने बहुत-से लोगोंको शाकाहारी बनाया और घीको अति पवित्र बना दिया । इसीलिए हम अपने भोजन में घी असीमित मात्रामें काममें लेते हैं। जितना अधिक घी हो, हम भोजनको उतना ही अच्छा मानते हैं। इससे अधिक अज्ञानकी बात क्या होगी ? फिर भी माना यही जाता है । इस प्रकार पवित्र स्थानों में भी घीको ऊँचा स्थान मिला। परिवर्तन करनेवालेने समझ लिया कि यदि लोग घी खूब खायेंगे तो उन्हें मांसकी जरूरत ज्यादा न होगी । ऐसे ही कारणसे इंग्लैंडमें निरामिष-भोजी लोग मांसके बदले बेहद अंडे खाकर बीमार तक हो जाते हैं। उनके बहुत कम भोज्य पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनमें अंडा नहीं होता। उन्होंने अंडेको लगभग पवित्र [ खाद्य ] मान लिया है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : जमनादास गांधीको|५०९}}</noinclude>इसलिए तुम्हारा जाना ठीक ही हुआ। इसके अतिरिक्त तुम्हें जो कुछ कड़वा अनुभव होता है, उससे तुम्हारे चरित्रका निर्माण होता है, क्योंकि तुम्हारे सब विचार अच्छे हैं और तुम ऊँचा उठना चाहते हो ।
भाषामें " मादरी जबान" आदि उर्दू शब्दोंका प्रयोग करना बिलकुल ठीक है। गुजराती भाषाको संस्कृत भाषाकी ही शाखा रखनेका प्रयत्न करें, तो पारसियों और मुसलमानोंको गुजराती न गिनना चाहिए। ऐसा करना भी चाहें तो सम्भव नहीं है। गुजराती भाषामें उर्दू और फारसी शब्द बहुत प्रयुक्त होते हैं और होंगे । 'ओपिनियन' की भाषा हिन्दुओं और मुसलमानोंको रुचिकर होनी चाहिए। वैसी भाषा बनाने के लिए हम प्रसंगानुकूल अल्लाह और परमेश्वर दोनों शब्दोंका प्रयोग कर सकते हैं । यदि अंग्रेज गुजरातके वतनी बन जायें, तो हम अंग्रेजी शब्दोंको भी जरूरत होनेपर अपनी भाषामें ले लेंगे। इस समय जो अंग्रेजी शब्द लिये जाते हैं उसमें तो दम्भ, अज्ञान या खुशामद रहती है। उसके पीछे भाषाकी उन्नतिका खयाल नहीं है ।
यदि हिन्दू भी तुर्कीकी लड़ाई जैसी किसी स्थितिमें फँस जायें तो उन्हें भी सक्रिय हो उठना चाहिए। इटली और बाल्कन राज्य, दोनों इस लड़ाईमें दोषी हैं; इसलिए हम उनका दोष बताते हैं तो कोई अनाचार नहीं करते। इसमें इटली के प्रति द्वेष नहीं है। अखबारके बहुत से पाठक मुसलमान हैं; इसलिए उन्हें यथासम्भव लड़ाईकी खबरें देते रहना हमारा फर्ज है। 'ओपिनियन'को हम नीतिकी शिक्षा देनेका साधन कहते हैं, परन्तु पाठक न हों तो वह इसका साधन कैसे बन सकता है? लड़ाईकी खबरें देकर हम पाठकोंका मनोरंजन निर्दोष रीतिसे करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें लड़ाईकी खबरें जाननी चाहिए, इसलिए इस हद तक यह नीतिका विषय हुआ। और अन्तमें, नीति-नियम बताना और अपने कष्टोंका वर्णन करना यद्यपि उसके प्रधान विषय हैं, परन्तु हम उसमें खबरें ही न दें, ऐसा इरादा कदापि नहीं है। सम्भव है, हमारे वहाँ अधिक जातीय भेदभाव हो, किन्तु उसका असर आम लोगों-पर नहीं होता। यहाँ तो उसका असर आम लोगोंपर ही होता है ।
पवित्र गिने जानेवाले तीर्थोंमें तेलको त्याज्य मानकर घीको पवित्र मानते हैं। इसका कारण मैंने जो अनुमानसे बताया है, वही है । भारतमें जब मांसाहारी लोग थे, तब किसीने बहुत-से लोगोंको शाकाहारी बनाया और घीको अति पवित्र बना दिया । इसीलिए हम अपने भोजन में घी असीमित मात्रामें काममें लेते हैं। जितना अधिक घी हो, हम भोजनको उतना ही अच्छा मानते हैं। इससे अधिक अज्ञानकी बात क्या होगी ? फिर भी माना यही जाता है । इस प्रकार पवित्र स्थानों में भी घीको ऊँचा स्थान मिला। परिवर्तन करनेवालेने समझ लिया कि यदि लोग घी खूब खायेंगे तो उन्हें मांसकी जरूरत ज्यादा न होगी । ऐसे ही कारणसे इंग्लैंडमें निरामिष-भोजी लोग मांसके बदले बेहद अंडे खाकर बीमार तक हो जाते हैं। उनके बहुत कम भोज्य पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनमें अंडा नहीं होता। उन्होंने अंडेको लगभग पवित्र [ खाद्य ] मान लिया है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : जमनादास गांधीको|५०९}}</noinclude>इसलिए तुम्हारा जाना ठीक ही हुआ। इसके अतिरिक्त तुम्हें जो कुछ कड़वा अनुभव होता है, उससे तुम्हारे चरित्रका निर्माण होता है, क्योंकि तुम्हारे सब विचार अच्छे हैं और तुम ऊँचा उठना चाहते हो ।
भाषामें "मादरी जबान" आदि उर्दू शब्दोंका प्रयोग करना बिलकुल ठीक है। गुजराती भाषाको संस्कृत भाषाकी ही शाखा रखनेका प्रयत्न करें, तो पारसियों और मुसलमानोंको गुजराती न गिनना चाहिए। ऐसा करना भी चाहें तो सम्भव नहीं है। गुजराती भाषामें उर्दू और फारसी शब्द बहुत प्रयुक्त होते हैं और होंगे । 'ओपिनियन' की भाषा हिन्दुओं और मुसलमानोंको रुचिकर होनी चाहिए। वैसी भाषा बनाने के लिए हम प्रसंगानुकूल अल्लाह और परमेश्वर दोनों शब्दोंका प्रयोग कर सकते हैं । यदि अंग्रेज गुजरातके वतनी बन जायें, तो हम अंग्रेजी शब्दोंको भी जरूरत होनेपर अपनी भाषामें ले लेंगे। इस समय जो अंग्रेजी शब्द लिये जाते हैं उसमें तो दम्भ, अज्ञान या खुशामद रहती है। उसके पीछे भाषाकी उन्नतिका खयाल नहीं है ।
यदि हिन्दू भी तुर्कीकी लड़ाई जैसी किसी स्थितिमें फँस जायें तो उन्हें भी सक्रिय हो उठना चाहिए। इटली और बाल्कन राज्य, दोनों इस लड़ाईमें दोषी हैं; इसलिए हम उनका दोष बताते हैं तो कोई अनाचार नहीं करते। इसमें इटली के प्रति द्वेष नहीं है। अखबारके बहुत से पाठक मुसलमान हैं; इसलिए उन्हें यथासम्भव लड़ाईकी खबरें देते रहना हमारा फर्ज है। 'ओपिनियन'को हम नीतिकी शिक्षा देनेका साधन कहते हैं, परन्तु पाठक न हों तो वह इसका साधन कैसे बन सकता है? लड़ाईकी खबरें देकर हम पाठकोंका मनोरंजन निर्दोष रीतिसे करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें लड़ाईकी खबरें जाननी चाहिए, इसलिए इस हद तक यह नीतिका विषय हुआ। और अन्तमें, नीति-नियम बताना और अपने कष्टोंका वर्णन करना यद्यपि उसके प्रधान विषय हैं, परन्तु हम उसमें खबरें ही न दें, ऐसा इरादा कदापि नहीं है। सम्भव है, हमारे वहाँ अधिक जातीय भेदभाव हो, किन्तु उसका असर आम लोगों-पर नहीं होता। यहाँ तो उसका असर आम लोगोंपर ही होता है ।
पवित्र गिने जानेवाले तीर्थोंमें तेलको त्याज्य मानकर घीको पवित्र मानते हैं। इसका कारण मैंने जो अनुमानसे बताया है, वही है । भारतमें जब मांसाहारी लोग थे, तब किसीने बहुत-से लोगोंको शाकाहारी बनाया और घीको अति पवित्र बना दिया । इसीलिए हम अपने भोजन में घी असीमित मात्रामें काममें लेते हैं। जितना अधिक घी हो, हम भोजनको उतना ही अच्छा मानते हैं। इससे अधिक अज्ञानकी बात क्या होगी ? फिर भी माना यही जाता है । इस प्रकार पवित्र स्थानों में भी घीको ऊँचा स्थान मिला। परिवर्तन करनेवालेने समझ लिया कि यदि लोग घी खूब खायेंगे तो उन्हें मांसकी जरूरत ज्यादा न होगी । ऐसे ही कारणसे इंग्लैंडमें निरामिष-भोजी लोग मांसके बदले बेहद अंडे खाकर बीमार तक हो जाते हैं। उनके बहुत कम भोज्य पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनमें अंडा नहीं होता। उन्होंने अंडेको लगभग पवित्र [ खाद्य ] मान लिया है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तुमने बनियेको सिखानेका काम अपने ऊपर लिया होता तो ठीक ही होता । उससे तुम्हारी मानसिक अस्वस्थता कुछ दूर होती और उस कमाईसे एक तरहका सहारा मिलता ।
मेरे आनेकी बातको तनिक भी निश्चित मत समझना । स्त्रियों और बच्चोंके बारेमें सत्याग्रह छिड़ सकता है। मुझे लगता है कि उस हालतमें मुझे रुकना पड़ेगा । यदि सत्याग्रह हुआ तो तुम उसमें कैसे भाग ले सकोगे ? मुझे तुम्हारा वहाँसे आना ठीक नहीं जान पड़ता । तुम्हारे जानेका उद्देश्य माता-पिताकी सेवा करना है । उसे मुख्य मानकर जो उचित हो वह करना । इसी कारण तुम बड़ौदा या दूसरी जगह बुनाई सीखने के लिए नहीं जा सकते ।
स्वादको जीतने के सम्बन्धमें तुमने जो श्लोक उद्धृत किया है, वह मैंने देखा था। फिर भी मेरी टीका उपयुक्त ठहरती है। एक श्लोकसे कोई असर नहीं पड़ता । उन्होंने इस विषयको महत्व नहीं दिया है। यदि दिया होता तो हवेली<ref>वल्लभ सम्प्रदायका वैष्णव मन्दिर ।</ref> आदिमें हर किसी बहाने मिष्ठान्नके भोजन न होते, हर त्योहारके दिन घी और गुड़के सीधे न दिये जाते और ब्रह्म-भोज भी न होते । आधुनिक ऋषि या साधु स्वादेन्द्रियको नहीं जीतते, बल्कि वे उसके वशीभूत दिखाई देते हैं। यह विषय बहुत बड़ा है। यदि हम दोष निकालने की दृष्टिसे ऐसा कहें तो पापके भागी होंगे। परन्तु जब हमारा मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरोंका कल्याण करना होता है तब चाहे कोई कितना ही मान्य पुरुष क्यों न हो, उसमें भी अपूर्णता देखें तो उसपर विचार करना हमारा फर्ज है।
अब तुम्हारे एक पत्रका उत्तर समाप्त होता है। दूसरे पत्रोंका उत्तर फिर अर्थात् अगले हफ्ते लिखनेका प्रयत्न करूँगा । इस प्रकार तुम्हें हर हफ्ते लिख सकूंगा ।
यहाँ तो बहुत-कुछ होता है। उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उतना वक्त नहीं है । किन्तु तुम्हारे पूछे हुए सवालोंके उत्तरके सिलसिले में कुछ आ जायेगा ।
मणिलाल अपनी पढ़ाईमें व्यस्त रहता है। मैं उसे एक घड़ीकी भी फुरसत नहीं लेने देता । वह तुम्हें पत्र लिखेगा, यह आशा व्यर्थ है। तुम उसे पत्र लिखो तो सम्भव है, वह उत्तर दे दे। जेकी भी व्यस्त तो रहती ही है; फिर, वह पत्र लिखने में ढीली है और उसे पत्र लिखना आता भी नहीं, इसलिए उससे भी आशा कम ही रखना ।
{{rh|||मोहनदासके आशीर्वाद}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५६४३) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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मेरे आनेकी बातको तनिक भी निश्चित मत समझना । स्त्रियों और बच्चोंके बारेमें सत्याग्रह छिड़ सकता है। मुझे लगता है कि उस हालतमें मुझे रुकना पड़ेगा । यदि सत्याग्रह हुआ तो तुम उसमें कैसे भाग ले सकोगे ? मुझे तुम्हारा वहाँसे आना ठीक नहीं जान पड़ता । तुम्हारे जानेका उद्देश्य माता-पिताकी सेवा करना है । उसे मुख्य मानकर जो उचित हो वह करना । इसी कारण तुम बड़ौदा या दूसरी जगह बुनाई सीखने के लिए नहीं जा सकते ।
स्वादको जीतने के सम्बन्धमें तुमने जो श्लोक उद्धृत किया है, वह मैंने देखा था। फिर भी मेरी टीका उपयुक्त ठहरती है। एक श्लोकसे कोई असर नहीं पड़ता । उन्होंने इस विषयको महत्व नहीं दिया है। यदि दिया होता तो हवेली<ref>वल्लभ सम्प्रदायका वैष्णव मन्दिर ।</ref> आदिमें हर किसी बहाने मिष्ठान्नके भोजन न होते, हर त्योहारके दिन घी और गुड़के सीधे न दिये जाते और ब्रह्म-भोज भी न होते । आधुनिक ऋषि या साधु स्वादेन्द्रियको नहीं जीतते, बल्कि वे उसके वशीभूत दिखाई देते हैं। यह विषय बहुत बड़ा है। यदि हम दोष निकालने की दृष्टिसे ऐसा कहें तो पापके भागी होंगे। परन्तु जब हमारा मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरोंका कल्याण करना होता है तब चाहे कोई कितना ही मान्य पुरुष क्यों न हो, उसमें भी अपूर्णता देखें तो उसपर विचार करना हमारा फर्ज है।
अब तुम्हारे एक पत्रका उत्तर समाप्त होता है। दूसरे पत्रोंका उत्तर फिर अर्थात् अगले हफ्ते लिखनेका प्रयत्न करूँगा । इस प्रकार तुम्हें हर हफ्ते लिख सकूंगा ।
यहाँ तो बहुत-कुछ होता है। उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उतना वक्त नहीं है । किन्तु तुम्हारे पूछे हुए सवालोंके उत्तरके सिलसिले में कुछ आ जायेगा ।
मणिलाल अपनी पढ़ाईमें व्यस्त रहता है। मैं उसे एक घड़ीकी भी फुरसत नहीं लेने देता । वह तुम्हें पत्र लिखेगा, यह आशा व्यर्थ है। तुम उसे पत्र लिखो तो सम्भव है, वह उत्तर दे दे। जेकी भी व्यस्त तो रहती ही है; फिर, वह पत्र लिखने में ढीली है और उसे पत्र लिखना आता भी नहीं, इसलिए उससे भी आशा कम ही रखना ।
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:गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५६४३) से ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४९
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सीमा1
430
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट'''}}</center></noinclude><center>{{larger|'''परिशिष्ट १'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{rh|||केप टाउन}}
{{rh|||अप्रैल ११, १९११}}
प्रिय श्री गांधी,
प्रवासी विधेयक सम्बन्धमें आज तीसरे पहर आप यहाँ आये थे । उसीके विषय में वेदपूर्वक सूचित कर रहा हूँ कि इस समय जनरल स्मट्स आपको विधेयक या उसमें होनेवाले किसी संशोधनके बारेमें इससे
पहले कि वह फिर संसद में लाया जाये कोई सूचना देनेकी स्थिति में नहीं हैं। पूरे मामलेपर अभी भी विचार किया जा रहा है और सम्भव है उसपर सप्ताह के अन्ततक विचार चलता रहे । इन परिस्थितियोंमें मुझे खेद है, हम आपको ऐसी कोई रूपरेखा नहीं दे सकते जिसका उपयोग आप अपने तार में कर सकें; मै तो केवल इतना ही सुझाव दे सकता हूँ कि आप तार दें कि आप विभाग से सम्पर्क बनाये हैं और जब वहाँसे कुछ निश्चित रूपसे पता लगेगा तो फिर भारत तार भेजेंगे ।
{{rh|||आपका विश्वस्त}}
{{rh|||अनॅस्ट एफ० सी० लेन}}
श्री मो० क० गांधी
केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४५१ ) की फोटो नकलसे।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{rh|||केप टाउन}}
{{rh|||अप्रैल २१, १९११}}
प्रिय श्री गांधी,
प्रवासी विधेयक मसविदेके सम्बन्धमें आपके १९ और २० अप्रैलके लिखे पत्र मुझे मिल गये हैं और मैंने दोनों पत्र मन्त्रीके सामने पेश कर दिये हैं ।
जनरल स्मटसने मुझसे आपको यह सूचित करने को कहा है कि अगले सप्ताहके प्रारम्भमें संसदके सत्रावसानकी सम्भावनाको देखते हुए, सरकारके लिए इस अधिवेशनमें प्रवासी कानूनको किसी रूपमें आगे बढ़ा सकना सम्भव नहीं होगा ।
सरकारकी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पेचीदा प्रश्नका कोई हल निकाला जा सके; वह इस बीच फिर इस मामलेका अध्ययन करेगी और देखेगी कि समझौता कर सकनेकी दिशामें क्या किया जा सकता है ।<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मटसने मुझसे आपको यह सूचित करने को कहा है कि अगले सप्ताहके प्रारम्भमें संसदके सत्रावसानकी सम्भावनाको देखते हुए, सरकारके लिए इस अधिवेशनमें प्रवासी कानूनको किसी रूपमें आगे बढ़ा सकना सम्भव नहीं होगा ।
सरकारकी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पेचीदा प्रश्नका कोई हल निकाला जा सके; वह इस बीच फिर इस मामलेका अध्ययन करेगी और देखेगी कि समझौता कर सकनेकी दिशामें क्या किया जा सकता है ।<noinclude></noinclude>
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प्रवासी विधेयक सम्बन्धमें आज तीसरे पहर आप यहाँ आये थे। उसीके विषय में खेदपूर्वक सूचित कर रहा हूँ कि इस समय जनरल स्मट्स आपको विधेयक या उसमें होनेवाले किसी संशोधनके बारेमें इससे
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प्रवासी विधेयक मसविदेके सम्बन्धमें आपके १९ और २० अप्रैलके लिखे पत्र मुझे मिल गये हैं और मैंने दोनों पत्र मन्त्रीके सामने पेश कर दिये हैं ।
जनरल स्मटसने मुझसे आपको यह सूचित करने को कहा है कि अगले सप्ताहके प्रारम्भमें संसदके सत्रावसानकी सम्भावनाको देखते हुए, सरकारके लिए इस अधिवेशनमें प्रवासी कानूनको किसी रूपमें आगे बढ़ा सकना सम्भव नहीं होगा ।
सरकारकी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पेचीदा प्रश्नका कोई हल निकाला जा सके; वह इस बीच फिर इस मामलेका अध्ययन करेगी और देखेगी कि समझौता कर सकनेकी दिशामें क्या किया जा सकता है ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|५१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इस बीच जनरल स्मट्स महसूस करते हैं कि सत्याग्रह आन्दोलन के कारण लोगोंने काफी कष्ट सहे और अभी तक सह रहे हैं; उसे अब समाप्त कर देना ही अच्छा होगा । उसके जारी रहनेसे स्थिति निरर्थक ही अधिक उलझती है, और जब सरकार भारतीय प्रवासके प्रश्नका सन्तोषजनक हल निकालनेकी कोशिश कर रही है तब भारतीय समाजको अपना आन्दोलन जारी रखकर मामलोंको पेचीदा नहीं बनाना चाहिए ।
जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफोटोनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्र पर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृह मन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
<center>{{larger|'''संघ- सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११)<br>वापस लेनेके कारण<br>क'''}}</center>
<center>{{larger|'''ग्लैड्स्टन द्वारा हरकोर्टको भेजे तारका सारांश'''}}</center>
'''प्राइवेट और व्यक्तिगत<br>फौरी''' {{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफोटोनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्र पर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
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:श्री मो० क० गांधी
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<center>{{larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
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<center>{{larger|'''ग्लैड्स्टन द्वारा हरकोर्टको भेजे तारका सारांश'''}}</center>
:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत<br>फौरी''' {{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इस बीच जनरल स्मट्स महसूस करते हैं कि सत्याग्रह आन्दोलन के कारण लोगोंने काफी कष्ट सहे और अभी तक सह रहे हैं; उसे अब समाप्त कर देना ही अच्छा होगा । उसके जारी रहनेसे स्थिति निरर्थक ही अधिक उलझती है, और जब सरकार भारतीय प्रवासके प्रश्नका सन्तोषजनक हल निकालनेकी कोशिश कर रही है तब भारतीय समाजको अपना आन्दोलन जारी रखकर मामलोंको पेचीदा नहीं बनाना चाहिए ।
जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृह मन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
<center>{{larger|'''संघ- सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११)<br>वापस लेनेके कारण<br>क'''}}</center>
<center>{{larger|'''ग्लैड्स्टन द्वारा हरकोर्टको भेजे तारका सारांश'''}}</center>
:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत<br>फौरी''' {{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
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:श्री मो० क० गांधी
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मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
<center>{{x-larger|'''संघ- सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११)<br>वापस लेनेके कारण<br>क'''}}</center>
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:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत<br>फौरी''' {{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
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<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
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प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
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:श्री मो० क० गांधी
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मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
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:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत''' {{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
:'''फौरी'''
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
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मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
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:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत'''
:'''फौरी'''
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५१
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१३}}</noinclude>है, और नया विधेयक पेश किया जाये, तबतक के लिए वे गांधीसे अस्थायी सुलह कर सकते हैं । साथ ही, यदि आप आग्रह करें तो वे अवश्य ही विधेयकका काम आगे बढ़ायेंगे, लेकिन उनके विचार से भारत सरकार वर्तमान विधेयकको इतना ज्यादा नापसन्द करती है कि उनके सुझाये कदमपर वह आपत्ति नहीं करेगी । लेकिन वे आपके विचार जानना चाहेंगे ।
इसमें जो विलम्ब होगा उसका मुझे खेद है, लेकिन इससे कम आपत्तिजनक कोई रास्ता मैं नहीं देख पाता ।
{{rh|||ग्लैड्स्टन}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१०
<center>{{larger|'''ख<br>हरकोर्टके उत्तरका सारांश'''}}</center>
आपके अप्रैल १२ के प्राइवेट और व्यक्तिगत तारके संदर्भ में भारत सरकारकी राय ली जा रही है, और अपनी राय व्यक्त करनेसे पहले मैं उसकी राय जाननेको उत्सुक हूँ ।
मैं ऐसा मान रहा हूँ कि जे० सी० स्मट्सको इत्मीनान है कि वे गांधी द्वारा आन्दोलनका पुनरारम्भ रोक सकते हैं, और गांधी विरोधका आदर करते हुए यदि वे विधेयकको वापस लेते हैं तो उनके ऐसा करनेसे वे इस बातकी कोई सम्भावना नहीं मानते कि गांधीकी प्रतिष्ठा बढ़ने और उनके विश्वासको बल मिलनेसे कि वे संघ-सरकारको भी अपनी शर्तें माननेपर मजबूर कर सकते हैं - भविष्य में और अधिक
उत्पात खड़ा होगा | क्या जे० सी० स्मटस ऐसी स्थिति में है कि वे मान सके कि अगले वर्ष वे एक ऐसा विधेयक पेश कर सकेंगे जो गांधीको, जहाँतक दो-दो आपत्तिजनक मुद्दोंका सवाल है, वर्तमान
विधेयककी अपेक्षा अधिक मान्य हो ? कृपया सूचित करें कि किस तारीख तक आपको मेरे विचार मालूम हो जाने चाहिए ।
{{rh|||हरकोर्ट}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१० ।
{{rh|||}}
<center>{{larger|'''ग<br>साम्राज्य सरकारको बोयाकी टिप्पणी'''}}</center>
....<ref>इस टिप्पणीके इससे पहलेवाले अनुच्छेद उपलब्ध नहीं हैं ।</ref>मन्त्रियोंने एक ऐसे कानूनकी रचना की थी, जिसमें सभी प्रवासियोंके लिए संविधि द्वारा अनुमोदित एक समान परीक्षा अनिवार्य करनेके साथ-साथ प्रवासी अधिकारियोंको वैसे ही व्यापक अधिकार
प्रदान किये गये थे, जैसे कि इस समय आस्ट्रेलिया में प्राप्त हैं, और जिनके अधीन कुछ चन्द चुने हुए एशियाइयों - मुख्यत: शिक्षा-साध्य पेशोंके लोगों को छोड़कर सारे एशियाइयोंको संवमें प्रवेशसे वर्जित किया जा सकता था । तब एक कठिनाई उत्पन्न हुई कि ऐसे एशियाइयोंके संवमें आनेके बाद उन्हें औरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशका अधिकार हो या नहीं| ऑरेंज फ्री स्टेटके क्षेत्रोंसे निर्वाचित सभी संसद सदस्योंने किसी
भी शिक्षित भारतीयको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशको अनुमति दिये जानेका एकमत होकर विरोध किया ।
________________________________________<noinclude>{{left|११-३३}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१३}}</noinclude>है, और नया विधेयक पेश किया जाये, तबतक के लिए वे गांधीसे अस्थायी सुलह कर सकते हैं । साथ ही, यदि आप आग्रह करें तो वे अवश्य ही विधेयकका काम आगे बढ़ायेंगे, लेकिन उनके विचार से भारत सरकार वर्तमान विधेयकको इतना ज्यादा नापसन्द करती है कि उनके सुझाये कदमपर वह आपत्ति नहीं करेगी । लेकिन वे आपके विचार जानना चाहेंगे ।
इसमें जो विलम्ब होगा उसका मुझे खेद है, लेकिन इससे कम आपत्तिजनक कोई रास्ता मैं नहीं देख पाता ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१०
<center>{{larger|'''ख<br>हरकोर्टके उत्तरका सारांश'''}}</center>
आपके अप्रैल १२ के प्राइवेट और व्यक्तिगत तारके संदर्भ में भारत सरकारकी राय ली जा रही है, और अपनी राय व्यक्त करनेसे पहले मैं उसकी राय जाननेको उत्सुक हूँ ।
मैं ऐसा मान रहा हूँ कि जे० सी० स्मट्सको इत्मीनान है कि वे गांधी द्वारा आन्दोलनका पुनरारम्भ रोक सकते हैं, और गांधीके विरोधका आदर करते हुए यदि वे विधेयकको वापस लेते हैं तो उनके ऐसा करनेसे वे इस बातकी कोई सम्भावना नहीं मानते कि गांधीकी प्रतिष्ठा बढ़ने और उनके विश्वासको बल मिलनेसे कि वे संघ-सरकारको भी अपनी शर्तें माननेपर मजबूर कर सकते हैं--- भविष्य में और अधिक उत्पात खड़ा होगा। क्या जे० सी० स्मटस ऐसी स्थिति में है कि वे मान सके कि अगले वर्ष वे एक ऐसा विधेयक पेश कर सकेंगे जो गांधीको, जहाँतक दो-दो आपत्तिजनक मुद्दोंका सवाल है, वर्तमान विधेयककी अपेक्षा अधिक मान्य हो ? कृपया सूचित करें कि किस तारीख तक आपको मेरे विचार मालूम हो जाने चाहिए ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१० ।
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<center>{{larger|'''ग<br>साम्राज्य सरकारको बोयाकी टिप्पणी'''}}</center>
....<ref>इस टिप्पणीके इससे पहलेवाले अनुच्छेद उपलब्ध नहीं हैं ।</ref>मन्त्रियोंने एक ऐसे कानूनकी रचना की थी, जिसमें सभी प्रवासियोंके लिए संविधि द्वारा अनुमोदित एक समान परीक्षा अनिवार्य करनेके साथ-साथ प्रवासी अधिकारियोंको वैसे ही व्यापक अधिकार
प्रदान किये गये थे, जैसे कि इस समय आस्ट्रेलिया में प्राप्त हैं, और जिनके अधीन कुछ चन्द चुने हुए एशियाइयों---मुख्यत: शिक्षा-साध्य पेशोंके लोगों---को छोड़कर सारे एशियाइयोंको संघमें प्रवेशसे वर्जित किया जा सकता था । तब एक कठिनाई उत्पन्न हुई कि ऐसे एशियाइयोंके संघमें आनेके बाद उन्हें औरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशका अधिकार हो या नहीं। ऑरेंज फ्री स्टेटके क्षेत्रोंसे निर्वाचित सभी संसद सदस्योंने किसी भी शिक्षित भारतीयको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशकी अनुमति दिये जानेका एकमत होकर विरोध किया।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१३}}</noinclude>है, और नया विधेयक पेश किया जाये, तबतक के लिए वे गांधीसे अस्थायी सुलह कर सकते हैं । साथ ही, यदि आप आग्रह करें तो वे अवश्य ही विधेयकका काम आगे बढ़ायेंगे, लेकिन उनके विचार से भारत सरकार वर्तमान विधेयकको इतना ज्यादा नापसन्द करती है कि उनके सुझाये कदमपर वह आपत्ति नहीं करेगी । लेकिन वे आपके विचार जानना चाहेंगे ।
इसमें जो विलम्ब होगा उसका मुझे खेद है, लेकिन इससे कम आपत्तिजनक कोई रास्ता मैं नहीं देख पाता ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१०
<center>{{larger|'''ख<br>हरकोर्टके उत्तरका सारांश'''}}</center>
आपके अप्रैल १२ के प्राइवेट और व्यक्तिगत तारके संदर्भ में भारत सरकारकी राय ली जा रही है, और अपनी राय व्यक्त करनेसे पहले मैं उसकी राय जाननेको उत्सुक हूँ ।
मैं ऐसा मान रहा हूँ कि जे० सी० स्मट्सको इत्मीनान है कि वे गांधी द्वारा आन्दोलनका पुनरारम्भ रोक सकते हैं, और गांधीके विरोधका आदर करते हुए यदि वे विधेयकको वापस लेते हैं तो उनके ऐसा करनेसे वे इस बातकी कोई सम्भावना नहीं मानते कि गांधीकी प्रतिष्ठा बढ़ने और उनके विश्वासको बल मिलनेसे कि वे संघ-सरकारको भी अपनी शर्तें माननेपर मजबूर कर सकते हैं--- भविष्य में और अधिक उत्पात खड़ा होगा। क्या जे० सी० स्मटस ऐसी स्थिति में है कि वे मान सके कि अगले वर्ष वे एक ऐसा विधेयक पेश कर सकेंगे जो गांधीको, जहाँतक दो-दो आपत्तिजनक मुद्दोंका सवाल है, वर्तमान विधेयककी अपेक्षा अधिक मान्य हो ? कृपया सूचित करें कि किस तारीख तक आपको मेरे विचार मालूम हो जाने चाहिए।
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:कलोनियल रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१० ।
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प्रदान किये गये थे, जैसे कि इस समय आस्ट्रेलिया में प्राप्त हैं, और जिनके अधीन कुछ चन्द चुने हुए एशियाइयों --- मुख्यत: शिक्षा-साध्य पेशोंके लोगों --- को छोड़कर सारे एशियाइयोंको संघमें प्रवेशसे वर्जित किया जा सकता था। तब एक कठिनाई उत्पन्न हुई कि ऐसे एशियाइयोंके संघमें आनेके बाद उन्हें औरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशका अधिकार हो या नहीं। ऑरेंज फ्री स्टेटके क्षेत्रोंसे निर्वाचित सभी संसद सदस्योंने किसी भी शिक्षित भारतीयको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशकी अनुमति दिये जानेका एकमत होकर विरोध किया।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५२
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>एशियाइयोंसे सम्बन्धित ऑरेंज फ्री स्टेटके कानूनोंमें किसी प्रकारके परिवर्तनका जोरदार विरोध प्रकट करते हुए ऑरेंज फ्री स्टेटकी प्रान्तीय परिषदने एक प्रस्ताव भी पास किया ।
दूसरी ओर, भारतीय समाजने कहा कि विधेयकके मसविदेको उसी रूपमें वह स्वीकार करता है, किन्तु अपनी यह माँग पूरी करानेके लिए वह आन्दोलन जारी रखनेको विवश होगा कि विधेयककी शर्तोंक अनुसार प्रवेश पानेवाले शिक्षित एशियाइयोंको संघके अन्य प्रान्तों में जैसी स्वतन्त्रता प्रदान करनेका निश्चय किया गया है, वैसी ही स्वतन्त्रता ऑरेंज फ्री स्टेटमें भी प्राप्त हो । मन्त्रियोंने अनुभव किया कि विकल्पके रूपमें एक ऐसा विधेयक पास किया जा सकता है जो सिर्फ ट्रान्सवालमें ही लागू हो, लेकिन इसमें संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए, और फिर जब यह देखा गया कि विधेयकका मुख्य उद्देश्य - अर्थात् भारतीयों के प्रवासका प्रश्न निपटानेका उद्देश्य पूरा नहीं होगा तब मन्त्रियोंने विचार किया कि एक ही रास्ता है, और वह यह कि फिलहाल मामलेको जहाँका तहाँ छोड़ दिया जाये, और सत्र समाप्त होनेपर अवकाशकी अवधि में कोई ऐसा हल निकालनेकी कोशिश की जाये जो स्थायी साबित हो ।
तदनुसार मन्त्रियोंने भारतीय समाजके नेताओंको वस्तुस्थितिकी सूचना दे दी, और उनके पास यह आशा करनेके कुछ कारण हैं कि संसदके अगले सत्र में प्रवासी अधिनियम पेश होने तक के लिए सत्याग्रह आन्दोलन अस्थायी रूपसे स्थगित रखा जायेगा ।
अन्त में मन्त्रिगण महाविभवको यह सूचित करना चाहते हैं कि उन्हें बड़े खेदके साथ सारे मामलेको कुछ समयके लिए स्थगित करना पड़ा है; लेकिन सरकार के पास विभिन्न क्षेत्रोंसे प्रस्तावित कानूनके खिलाफ जो आपत्तियाँ आई हैं, उन्हें देखते मन्त्रियोंने अनुभव किया कि मामलेपर और विचार करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा समझौता हो सके जो सभी पक्षोंको स्वीकार हो ।
{{rh|||लुई बोथा}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:सी० डी० ६२८३
<center>{{larger|'''घ<br>संघ-संसद् में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
जनरल स्मट्सने कहा कि इससे पहले कि अध्यक्ष महोदय अपनी कुर्सी छोड़ें, मैं चन्द शब्द कहना चाहूँगा । मुझे दुःख है कि यह विधेयक, जो इस सत्र में सदनमें पेश किये जानेवाले अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान विधेयकोंमें से है, विधि-पुस्तिकामें सम्मिलित नहीं किया जायेगा । किन्तु माननीय सदस्यगण देखेंगे कि अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आवश्यक कानूनोंको बनानेमें बहुत ज्यादा समय लग जानेके कारण उनके लिए सम्भव नहीं होगा कि इस विधेयकके बारेमें आगे कार्रवाई की जा सके, और प्रवासके प्रश्नको अगले वर्षे कानून बनाकर निपटाने तक ज्योंका-त्यों छोड़ना पड़ेगा । विधेयकको द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत करते समय मैंने कहा था कि सरकारके सामने दो उद्देश्य हैं। पहला है, दक्षिण आफ्रिका के प्रवासी कानूनोंमें एकरूपता स्थापित करना; और दूसरा है, भारतीय प्रश्नका, जो पिछले कुछ वर्षोंसे काफी परेशानी और चिन्ताका कारण बन रहा है, कोई हल निकालना । मैंने उन कठिनाइयोंके शीघ्र हल हो सकनेकी सम्भावना के सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकार और संघ-सरकार के बीच हुए पत्र-व्यवहारको संसदकी मेजपर रखा है। हालाँकि इस विधेयकको चालू सत्र में पास करके उसे कानूनका रूप देना और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार तथा संघ सरकार द्वारा लगभग स्वीकृत हलको कार्यान्वित कर सकना सम्भव नहीं है, फिर भी मुझे इस बातकी काफी आशा है कि मैं इस विधेयकके बिना भी अगले बारह महीने तक सत्याग्रह आन्दोलनको रोक सकूँगा, और अगले सत्र में संसद इस मसलेपर कोई कानून बनायेगी, इस बीच उसके बारेमें दक्षिण<noinclude></noinclude>
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एशियाइयोंसे सम्बन्धित ऑरेंज फ्री स्टेटके कानूनोंमें किसी प्रकारके परिवर्तनका जोरदार विरोध प्रकट करते हुए ऑरेंज फ्री स्टेटकी प्रान्तीय परिषदने एक प्रस्ताव भी पास किया ।
दूसरी ओर, भारतीय समाजने कहा कि विधेयकके मसविदेको उसी रूपमें वह स्वीकार करता है, किन्तु अपनी यह माँग पूरी करानेके लिए वह आन्दोलन जारी रखनेको विवश होगा कि विधेयककी शर्तोंक अनुसार प्रवेश पानेवाले शिक्षित एशियाइयोंको संघके अन्य प्रान्तों में जैसी स्वतन्त्रता प्रदान करनेका निश्चय किया गया है, वैसी ही स्वतन्त्रता ऑरेंज फ्री स्टेटमें भी प्राप्त हो।
मन्त्रियोंने अनुभव किया कि विकल्पके रूपमें एक ऐसा विधेयक पास किया जा सकता है जो सिर्फ ट्रान्सवालमें ही लागू हो, लेकिन इसमें संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए, और फिर जब यह देखा गया कि विधेयकका मुख्य उद्देश्य - अर्थात् भारतीयों के प्रवासका प्रश्न निपटानेका उद्देश्य पूरा नहीं होगा तब मन्त्रियोंने विचार किया कि एक ही रास्ता है, और वह यह कि फिलहाल मामलेको जहाँका तहाँ छोड़ दिया जाये, और सत्र समाप्त होनेपर अवकाशकी अवधि में कोई ऐसा हल निकालनेकी कोशिश की जाये जो स्थायी साबित हो ।
तदनुसार मन्त्रियोंने भारतीय समाजके नेताओंको वस्तुस्थितिकी सूचना दे दी, और उनके पास यह आशा करनेके कुछ कारण हैं कि संसदके अगले सत्र में प्रवासी अधिनियम पेश होने तक के लिए सत्याग्रह आन्दोलन अस्थायी रूपसे स्थगित रखा जायेगा ।
अन्त में मन्त्रिगण महाविभवको यह सूचित करना चाहते हैं कि उन्हें बड़े खेदके साथ सारे मामलेको कुछ समयके लिए स्थगित करना पड़ा है; लेकिन सरकार के पास विभिन्न क्षेत्रोंसे प्रस्तावित कानूनके खिलाफ जो आपत्तियाँ आई हैं, उन्हें देखते मन्त्रियोंने अनुभव किया कि मामलेपर और विचार करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा समझौता हो सके जो सभी पक्षोंको स्वीकार हो ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:सी० डी० ६२८३
<center>{{larger|'''घ<br>संघ-संसद् में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
जनरल स्मट्सने कहा कि इससे पहले कि अध्यक्ष महोदय अपनी कुर्सी छोड़ें, मैं चन्द शब्द कहना चाहूँगा । मुझे दुःख है कि यह विधेयक, जो इस सत्र में सदनमें पेश किये जानेवाले अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान विधेयकोंमें से है, विधि-पुस्तिकामें सम्मिलित नहीं किया जायेगा । किन्तु माननीय सदस्यगण देखेंगे कि अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आवश्यक कानूनोंको बनानेमें बहुत ज्यादा समय लग जानेके कारण उनके लिए सम्भव नहीं होगा कि इस विधेयकके बारेमें आगे कार्रवाई की जा सके, और प्रवासके प्रश्नको अगले वर्षे कानून बनाकर निपटाने तक ज्योंका-त्यों छोड़ना पड़ेगा । विधेयकको द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत करते समय मैंने कहा था कि सरकारके सामने दो उद्देश्य हैं। पहला है, दक्षिण आफ्रिका के प्रवासी कानूनोंमें एकरूपता स्थापित करना; और दूसरा है, भारतीय प्रश्नका, जो पिछले कुछ वर्षोंसे काफी परेशानी और चिन्ताका कारण बन रहा है, कोई हल निकालना । मैंने उन कठिनाइयोंके शीघ्र हल हो सकनेकी सम्भावना के सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकार और संघ-सरकार के बीच हुए पत्र-व्यवहारको संसदकी मेजपर रखा है। हालाँकि इस विधेयकको चालू सत्र में पास करके उसे कानूनका रूप देना और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार तथा संघ सरकार द्वारा लगभग स्वीकृत हलको कार्यान्वित कर सकना सम्भव नहीं है, फिर भी मुझे इस बातकी काफी आशा है कि मैं इस विधेयकके बिना भी अगले बारह महीने तक सत्याग्रह आन्दोलनको रोक सकूँगा, और अगले सत्र में संसद इस मसलेपर कोई कानून बनायेगी, इस बीच उसके बारेमें दक्षिण<noinclude></noinclude>
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दूसरी ओर, भारतीय समाजने कहा कि विधेयकके मसविदेको उसी रूपमें वह स्वीकार करता है, किन्तु अपनी यह माँग पूरी करानेके लिए वह आन्दोलन जारी रखनेको विवश होगा कि विधेयककी शर्तोंक अनुसार प्रवेश पानेवाले शिक्षित एशियाइयोंको संघके अन्य प्रान्तों में जैसी स्वतन्त्रता प्रदान करनेका निश्चय किया गया है, वैसी ही स्वतन्त्रता ऑरेंज फ्री स्टेटमें भी प्राप्त हो।
मन्त्रियोंने अनुभव किया कि विकल्पके रूपमें एक ऐसा विधेयक पास किया जा सकता है जो सिर्फ ट्रान्सवालमें ही लागू हो, लेकिन इसमें संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए, और फिर जब यह देखा गया कि विधेयकका मुख्य उद्देश्य - अर्थात् भारतीयों के प्रवासका प्रश्न निपटानेका उद्देश्य पूरा नहीं होगा तब मन्त्रियोंने विचार किया कि एक ही रास्ता है, और वह यह कि फिलहाल मामलेको जहाँका तहाँ छोड़ दिया जाये, और सत्र समाप्त होनेपर अवकाशकी अवधि में कोई ऐसा हल निकालनेकी कोशिश की जाये जो स्थायी साबित हो ।
तदनुसार मन्त्रियोंने भारतीय समाजके नेताओंको वस्तुस्थितिकी सूचना दे दी, और उनके पास यह आशा करनेके कुछ कारण हैं कि संसदके अगले सत्र में प्रवासी अधिनियम पेश होने तक के लिए सत्याग्रह आन्दोलन अस्थायी रूपसे स्थगित रखा जायेगा ।
अन्त में मन्त्रिगण महाविभवको यह सूचित करना चाहते हैं कि उन्हें बड़े खेदके साथ सारे मामलेको कुछ समयके लिए स्थगित करना पड़ा है; लेकिन सरकार के पास विभिन्न क्षेत्रोंसे प्रस्तावित कानूनके खिलाफ जो आपत्तियाँ आई हैं, उन्हें देखते मन्त्रियोंने अनुभव किया कि मामलेपर और विचार करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा समझौता हो सके जो सभी पक्षोंको स्वीकार हो ।
{{rh|||लुई बोथा}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:सी० डी० ६२८३
<center>{{larger|'''घ<br>संघ-संसद् में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
जनरल स्मट्सने कहा कि इससे पहले कि अध्यक्ष महोदय अपनी कुर्सी छोड़ें, मैं चन्द शब्द कहना चाहूँगा । मुझे दुःख है कि यह विधेयक, जो इस सत्र में सदनमें पेश किये जानेवाले अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान विधेयकोंमें से है, विधि-पुस्तिकामें सम्मिलित नहीं किया जायेगा । किन्तु माननीय सदस्यगण देखेंगे कि अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आवश्यक कानूनोंको बनानेमें बहुत ज्यादा समय लग जानेके कारण उनके लिए सम्भव नहीं होगा कि इस विधेयकके बारेमें आगे कार्रवाई की जा सके, और प्रवासके प्रश्नको अगले वर्षे कानून बनाकर निपटाने तक ज्योंका-त्यों छोड़ना पड़ेगा । विधेयकको द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत करते समय मैंने कहा था कि सरकारके सामने दो उद्देश्य हैं। पहला है, दक्षिण आफ्रिका के प्रवासी कानूनोंमें एकरूपता स्थापित करना; और दूसरा है, भारतीय प्रश्नका, जो पिछले कुछ वर्षोंसे काफी परेशानी और चिन्ताका कारण बन रहा है, कोई हल निकालना । मैंने उन कठिनाइयोंके शीघ्र हल हो सकनेकी सम्भावना के सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकार और संघ-सरकार के बीच हुए पत्र-व्यवहारको संसदकी मेजपर रखा है। हालाँकि इस विधेयकको चालू सत्र में पास करके उसे कानूनका रूप देना और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार तथा संघ सरकार द्वारा लगभग स्वीकृत हलको कार्यान्वित कर सकना सम्भव नहीं है, फिर भी मुझे इस बातकी काफी आशा है कि मैं इस विधेयकके बिना भी अगले बारह महीने तक सत्याग्रह आन्दोलनको रोक सकूँगा, और अगले सत्र में संसद इस मसलेपर कोई कानून बनायेगी, इस बीच उसके बारेमें दक्षिण<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१५}}</noinclude>आफ्रिकामें कुछ शान्ति बनाये रखूंगा । ऐसी स्थितिमें इस प्रश्नसे निपटने की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है, और इसपर और अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार करनेकी दृष्टिसे तथा सामान्य तौरपर सम्पूर्ण दक्षिण आफ्रिकामें इसपर अधिक सावधानीसे सोचा-समझा जाये, इसलिए फिलहाल वह स्थगित रखा जा सकता है । यह विषय अत्यन्त महत्वपूर्ण है । यह केवल भारतीय प्रवाससे ही नहीं, बल्कि समस्त गोरों के प्रवाससे सम्बन्धित है, और इस विधेयकपर आगेकी कार्रवाई में विलम्व होनेसे चूँकि उसपर और अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार करनेका अवसर मिलेगा, इसलिए उसे संसद में शायद ज्यादा आसानीसे पास किया जा सकेगा । अत: मैं प्रस्ताव करता हूँ कि कार्य-सूचीसे इस विषयको रद कर दिया जाये और विधेयक वापस ले लिया जाये ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''केप टाइम्स,'''२६-४-१९११
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ४'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{rh|||केप टाउन}}
{{rh|||अप्रैल २२, १९११}}
प्रिय श्री गांधी,
इसी २१ तारीखके मेरे पत्रके उत्तर में आपका २२ अप्रैलका पत्र मिला ।
मैंने आपका पत्र जनरल स्मट्सको दिखाया है। उन्होंने मुझे यह कहनेको कहा है कि आप जिस भावनासे लिखते हैं उसकी वे कद्र करते हैं और उन्हें पूरी आशा है कि प्रश्नपर समझौतापूर्ण रुख रखकर सोचनेसे एक ऐसा अल्पकालिक हल निकल सकता है जिससे सभी सम्बद्ध लोगोंको एक अधिक स्थायी हल पानेकी दिशामें अपनी शक्तियाँ लगाने की सुविधा मिल जायेगी ।
मुझे यह कहनेका अधिकार है कि मन्त्रीका इरादा संसदके आगामी अधिवेशनमें १९०७ के अधिनियम २ को रद करनेवाला एक ऐसा कानून पेश करनेका है जिसमें नाबालिग बच्चोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखा जा सके । उक्त कानून बनाने में मन्त्रीका अभिप्राय ऐसी व्यवस्थाएँ करना है जो कानूनकी दृष्टिसे सभी प्रवासियोंको समानता प्रदान करेंगी; फिर चाहे उनके अमलमें कितना ही भेदभाव क्यों न बरता जाये ।
जो दूसरा मुद्दा आपने उठाया है उनके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि उक्त प्रस्तावित कानून में उन सभी सत्याग्रहियों को पंजीकृत करनेका अधिकार प्राप्त कर लिया जायगा जो यदि वर्तमान प्रतिरोध न होता तो १९०८ के अधिनियम संख्या ३६ के बावजूद उचित समयपर पंजीयन करा लेनेके कारण [ इस समय भी ] पंजीयन के अधिकारी होते ।
मौजूदा अल्पकालिक प्रमाणपत्रोंको नियमित कर सकनेका अधिकार भी प्राप्त कर लिया जायेगा । मन्त्री महोदय उन शिक्षित सत्याग्रहियोंको, ये अल्पकालिक प्रमाणपत्र देने को तैयार हैं, जो इस समय ट्रान्सवालमें हैं परन्तु वर्तमान एशियाई कानूनों के अन्तर्गत जिनका पंजीयन नहीं किया जा सकता । मैं समझता हूँ ऐसे लोगों की संख्या अधिक से अधिक पाँच या छः है । जिनके पास ये प्रमाणपत्र होंगे वे, जो कानून बनने जा रहा है उसका ध्यान रखते हुए, ट्रान्सवालमें रहनेके अधिकारी होंगे ।
अन्तमें में यह कह दूँ कि यदि आप इस प्रकारका आश्वासन दे दें कि समाज अपना सत्याग्रह आन्दोलन स्थगित कर देगा तो मन्त्री महोदय महाविभव गवर्नर जनरलते उन सत्याग्रही कैदियोंकी रिहाईके<noinclude></noinclude>
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''केप टाइम्स,'''२६-४-१९११
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प्रिय श्री गांधी,
इसी २१ तारीखके मेरे पत्रके उत्तर में आपका २२ अप्रैलका पत्र मिला।
मैंने आपका पत्र जनरल स्मट्सको दिखाया है। उन्होंने मुझे यह कहनेको कहा है कि आप जिस भावनासे लिखते हैं उसकी वे कद्र करते हैं और उन्हें पूरी आशा है कि प्रश्नपर समझौतापूर्ण रुख रखकर सोचनेसे एक ऐसा अल्पकालिक हल निकल सकता है जिससे सभी सम्बद्ध लोगोंको एक अधिक स्थायी हल पानेकी दिशामें अपनी शक्तियाँ लगाने की सुविधा मिल जायेगी ।
मुझे यह कहनेका अधिकार है कि मन्त्रीका इरादा संसदके आगामी अधिवेशनमें १९०७ के अधिनियम २ को रद करनेवाला एक ऐसा कानून पेश करनेका है जिसमें नाबालिग बच्चोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखा जा सके । उक्त कानून बनाने में मन्त्रीका अभिप्राय ऐसी व्यवस्थाएँ करना है जो कानूनकी दृष्टिसे सभी प्रवासियोंको समानता प्रदान करेंगी; फिर चाहे उनके अमलमें कितना ही भेदभाव क्यों न बरता जाये ।
जो दूसरा मुद्दा आपने उठाया है उनके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि उक्त प्रस्तावित कानून में उन सभी सत्याग्रहियों को पंजीकृत करनेका अधिकार प्राप्त कर लिया जायगा जो यदि वर्तमान प्रतिरोध न होता तो १९०८ के अधिनियम संख्या ३६ के बावजूद उचित समयपर पंजीयन करा लेनेके कारण [ इस समय भी ] पंजीयन के अधिकारी होते ।
मौजूदा अल्पकालिक प्रमाणपत्रोंको नियमित कर सकनेका अधिकार भी प्राप्त कर लिया जायेगा । मन्त्री महोदय उन शिक्षित सत्याग्रहियोंको, ये अल्पकालिक प्रमाणपत्र देने को तैयार हैं, जो इस समय ट्रान्सवालमें हैं परन्तु वर्तमान एशियाई कानूनों के अन्तर्गत जिनका पंजीयन नहीं किया जा सकता । मैं समझता हूँ ऐसे लोगों की संख्या अधिक से अधिक पाँच या छः है । जिनके पास ये प्रमाणपत्र होंगे वे, जो कानून बनने जा रहा है उसका ध्यान रखते हुए, ट्रान्सवालमें रहनेके अधिकारी होंगे ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''केप टाइम्स,'''२६-४-१९११
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ४'''}}</center>
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प्रिय श्री गांधी,
इसी २१ तारीखके मेरे पत्रके उत्तर में आपका २२ अप्रैलका पत्र मिला।
मैंने आपका पत्र जनरल स्मट्सको दिखाया है। उन्होंने मुझे यह कहनेको कहा है कि आप जिस भावनासे लिखते हैं उसकी वे कद्र करते हैं और उन्हें पूरी आशा है कि प्रश्नपर समझौतापूर्ण रुख रखकर सोचनेसे एक ऐसा अल्पकालिक हल निकल सकता है जिससे सभी सम्बद्ध लोगोंको एक अधिक स्थायी हल पानेकी दिशामें अपनी शक्तियाँ लगाने की सुविधा मिल जायेगी ।
मुझे यह कहनेका अधिकार है कि मन्त्रीका इरादा संसदके आगामी अधिवेशनमें १९०७ के अधिनियम २ को रद करनेवाला एक ऐसा कानून पेश करनेका है जिसमें नाबालिग बच्चोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखा जा सके । उक्त कानून बनाने में मन्त्रीका अभिप्राय ऐसी व्यवस्थाएँ करना है जो कानूनकी दृष्टिसे सभी प्रवासियोंको समानता प्रदान करेंगी; फिर चाहे उनके अमलमें कितना ही भेदभाव क्यों न बरता जाये ।
जो दूसरा मुद्दा आपने उठाया है उनके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि उक्त प्रस्तावित कानून में उन सभी सत्याग्रहियों को पंजीकृत करनेका अधिकार प्राप्त कर लिया जायगा जो यदि वर्तमान प्रतिरोध न होता तो १९०८ के अधिनियम संख्या ३६ के बावजूद उचित समयपर पंजीयन करा लेनेके कारण [ इस समय भी ] पंजीयन के अधिकारी होते ।
मौजूदा अल्पकालिक प्रमाणपत्रोंको नियमित कर सकनेका अधिकार भी प्राप्त कर लिया जायेगा । मन्त्री महोदय उन शिक्षित सत्याग्रहियोंको, ये अल्पकालिक प्रमाणपत्र देने को तैयार हैं, जो इस समय ट्रान्सवालमें हैं परन्तु वर्तमान एशियाई कानूनों के अन्तर्गत जिनका पंजीयन नहीं किया जा सकता । मैं समझता हूँ ऐसे लोगों की संख्या अधिक से अधिक पाँच या छः है । जिनके पास ये प्रमाणपत्र होंगे वे, जो कानून बनने जा रहा है उसका ध्यान रखते हुए, ट्रान्सवालमें रहनेके अधिकारी होंगे ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१५}}</noinclude>आफ्रिकामें कुछ शान्ति बनाये रखूंगा। ऐसी स्थितिमें इस प्रश्नसे निपटने की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है, और इसपर और अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार करनेकी दृष्टिसे तथा सामान्य तौरपर सम्पूर्ण दक्षिण आफ्रिकामें इसपर अधिक सावधानीसे सोचा-समझा जाये, इसलिए फिलहाल वह स्थगित रखा जा सकता है। यह विषय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह केवल भारतीय प्रवाससे ही नहीं, बल्कि समस्त गोरों के प्रवाससे सम्बन्धित है, और इस विधेयकपर आगेकी कार्रवाई में विलम्व होनेसे चूँकि उसपर और अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार करनेका अवसर मिलेगा, इसलिए उसे संसद में शायद ज्यादा आसानीसे पास किया जा सकेगा। अत: मैं प्रस्ताव करता हूँ कि कार्य-सूचीसे इस विषयको रद कर दिया जाये और विधेयक वापस ले लिया जाये।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''केप टाइम्स,'''२६-४-१९११
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<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
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प्रिय श्री गांधी,
इसी २१ तारीखके मेरे पत्रके उत्तर में आपका २२ अप्रैलका पत्र मिला।
मैंने आपका पत्र जनरल स्मट्सको दिखाया है। उन्होंने मुझे यह कहनेको कहा है कि आप जिस भावनासे लिखते हैं उसकी वे कद्र करते हैं और उन्हें पूरी आशा है कि प्रश्नपर समझौतापूर्ण रुख रखकर सोचनेसे एक ऐसा अल्पकालिक हल निकल सकता है जिससे सभी सम्बद्ध लोगोंको एक अधिक स्थायी हल पानेकी दिशामें अपनी शक्तियाँ लगाने की सुविधा मिल जायेगी ।
मुझे यह कहनेका अधिकार है कि मन्त्रीका इरादा संसदके आगामी अधिवेशनमें १९०७ के अधिनियम २ को रद करनेवाला एक ऐसा कानून पेश करनेका है जिसमें नाबालिग बच्चोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखा जा सके । उक्त कानून बनाने में मन्त्रीका अभिप्राय ऐसी व्यवस्थाएँ करना है जो कानूनकी दृष्टिसे सभी प्रवासियोंको समानता प्रदान करेंगी; फिर चाहे उनके अमलमें कितना ही भेदभाव क्यों न बरता जाये ।
जो दूसरा मुद्दा आपने उठाया है उनके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि उक्त प्रस्तावित कानून में उन सभी सत्याग्रहियों को पंजीकृत करनेका अधिकार प्राप्त कर लिया जायगा जो यदि वर्तमान प्रतिरोध न होता तो १९०८ के अधिनियम संख्या ३६ के बावजूद उचित समयपर पंजीयन करा लेनेके कारण [ इस समय भी ] पंजीयन के अधिकारी होते ।
मौजूदा अल्पकालिक प्रमाणपत्रोंको नियमित कर सकनेका अधिकार भी प्राप्त कर लिया जायेगा । मन्त्री महोदय उन शिक्षित सत्याग्रहियोंको, ये अल्पकालिक प्रमाणपत्र देने को तैयार हैं, जो इस समय ट्रान्सवालमें हैं परन्तु वर्तमान एशियाई कानूनों के अन्तर्गत जिनका पंजीयन नहीं किया जा सकता । मैं समझता हूँ ऐसे लोगों की संख्या अधिक से अधिक पाँच या छः है । जिनके पास ये प्रमाणपत्र होंगे वे, जो कानून बनने जा रहा है उसका ध्यान रखते हुए, ट्रान्सवालमें रहनेके अधिकारी होंगे ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वांग्मय}}</noinclude>प्रश्नपर उदारतापूर्वक विचार करनेको कहेंगे जो वर्तमान एशियाई कानून तोड़नेके अपराध में कैद भुगत रहे हैं ।
मैं आशा करता हूँ कि भारतीय समाजसे सलाह करनेके बाद आप जनरल स्मट्सको उनके प्रिटोरिया वापस आनेपर सत्याग्रह समाप्त कर दिये जानेकी सूचना दे सकेंगे, ताकि वे सम्राटको सरकारको ऐसा आश्वासन दे सकें कि भारतीय समाजके नेता समस्या के निश्चित हल्की दृष्टिसे सरकारसे सहयोग करना चाहते है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृहमन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५००) की फोटो नकल तथा २९-४-१९११ के से भी ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम ई० एम० गॉर्जेसका पत्र'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया<br>मई १९, १९११}}
महोदय,
आपके ४ तारीखके पत्रके ही सिलसिले में माननीय मन्त्रीने मुझे आपको यह और सूचित करनेका आदेश दिया है कि -
(क) {{Block center|उन एशियाइयोंको जिनको अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अन्तर्गत १ जनवरी, १९०८ के बाद निर्वासित किया गया था और जिनको इन अधिनियमों के अन्तर्गत पंजीयन करानेका वैध अधिकार है किन्तु जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण अभी तक प्रार्थनापत्र नहीं दे सके हैं, उनको अगले ३१ दिसम्बर तक, अधिनियमों और विनियमोंकी व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए, प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति दी जायेगी । }}
(ख){{Block center| अधिनियम २/०७ या अधिनियम ३६/०८ और इनके अन्तर्गत बनाये गये विनियमों के अनुसार अगले ३१ दिसम्बर को या उससे पहले पंजीयन के लिए प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति उन एशियाइयोंको भी दी जायगी जिनका निर्वासन तो नहीं हुआ था लेकिन जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण पंजीयन के लिए प्रार्थना पत्र दिये बिना ही दक्षिण आफ्रिकासे चले गये थे और जो साबित कर सकते हैं कि उनको पंजीयन करानेका वैध अधिकार है; वशर्ते कि (क) और (ख) के अंतर्गत प्राप्त प्रार्थना-पत्रोंकी संख्या तीससे अधिक न हो ।}}
(ग){{Block center|आपके पत्रके पाँचवे अनुच्छेदके संदर्भ में हमारी जानकारी यह है कि दक्षिण आफ्रिकामें ऐसे १८० भारतीय और चीनी हैं जिनका पंजीयन स्वेच्छिक प्रणालीके अंतर्गत नामंजूर कर दिया गया था और जिन्होंने अभीतक अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अंतर्गत अपने प्रार्थनापत्र पेश नहीं किये हैं। मुझे उनके सम्बन्ध में आपको सूचित करना है कि यदि कोई अनुसूचित विलम्ब किये बिना उनके नामोंकी एक सूची पेश कर दी जाये तो उनको उल्लिखित}}<noinclude></noinclude>
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मैं आशा करता हूँ कि भारतीय समाजसे सलाह करनेके बाद आप जनरल स्मट्सको उनके प्रिटोरिया वापस आनेपर सत्याग्रह समाप्त कर दिये जानेकी सूचना दे सकेंगे, ताकि वे सम्राटको सरकारको ऐसा आश्वासन दे सकें कि भारतीय समाजके नेता समस्या के निश्चित हल्की दृष्टिसे सरकारसे सहयोग करना चाहते है ।
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आपके ४ तारीखके पत्रके ही सिलसिले में माननीय मन्त्रीने मुझे आपको यह और सूचित करनेका आदेश दिया है कि -
(क) {{Block center|उन एशियाइयोंको जिनको अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अन्तर्गत १ जनवरी, १९०८ के बाद निर्वासित किया गया था और जिनको इन अधिनियमों के अन्तर्गत पंजीयन करानेका वैध अधिकार है किन्तु जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण अभी तक प्रार्थनापत्र नहीं दे सके हैं, उनको अगले ३१ दिसम्बर तक, अधिनियमों और विनियमोंकी व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए, प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति दी जायेगी । }}
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(ग) {{Block center|आपके पत्रके पाँचवे अनुच्छेदके संदर्भ में हमारी जानकारी यह है कि दक्षिण आफ्रिकामें ऐसे १८० भारतीय और चीनी हैं जिनका पंजीयन स्वेच्छिक प्रणालीके अंतर्गत नामंजूर कर दिया गया था और जिन्होंने अभीतक अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अंतर्गत अपने प्रार्थनापत्र पेश नहीं किये हैं। मुझे उनके सम्बन्ध में आपको सूचित करना है कि यदि कोई अनुसूचित विलम्ब किये बिना उनके नामोंकी एक सूची पेश कर दी जाये तो उनको उल्लिखित}}<noinclude></noinclude>
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मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५००) की फोटो नकल तथा २९-४-१९११ के से भी ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम ई० एम० गॉर्जेसका पत्र'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया<br>मई १९, १९११}}
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आपके ४ तारीखके पत्रके ही सिलसिले में माननीय मन्त्रीने मुझे आपको यह और सूचित करनेका आदेश दिया है कि---
(क) {{Block center|उन एशियाइयोंको जिनको अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अन्तर्गत १ जनवरी, १९०८ के बाद निर्वासित किया गया था और जिनको इन अधिनियमों के अन्तर्गत पंजीयन करानेका वैध अधिकार है किन्तु जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण अभी तक प्रार्थनापत्र नहीं दे सके हैं, उनको अगले ३१ दिसम्बर तक, अधिनियमों और विनियमोंकी व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए, प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति दी जायेगी। }}
(ख) {{Block center|अधिनियम २/०७ या अधिनियम ३६/०८ और इनके अन्तर्गत बनाये गये विनियमों के अनुसार अगले ३१ दिसम्बर को या उससे पहले पंजीयन के लिए प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति उन एशियाइयोंको भी दी जायगी जिनका निर्वासन तो नहीं हुआ था लेकिन जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण पंजीयन के लिए प्रार्थना पत्र दिये बिना ही दक्षिण आफ्रिकासे चले गये थे और जो साबित कर सकते हैं कि उनको पंजीयन करानेका वैध अधिकार है; वशर्ते कि (क) और (ख) के अंतर्गत प्राप्त प्रार्थना-पत्रोंकी संख्या तीससे अधिक न हो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वांग्मय}}</noinclude>प्रश्नपर उदारतापूर्वक विचार करनेको कहेंगे जो वर्तमान एशियाई कानून तोड़नेके अपराध में कैद भुगत रहे हैं ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१७}}</noinclude>{{Block center|अधिनियमोंको व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए अगले ३१ दिसम्बर तक अपने प्रार्थनापत्र भेजनेका अवसर दिया जायेगा ।}}
(घ){{Block center|जो सात शिक्षित भारतीय अभी ट्रान्सवालमें हैं और जिनके नाम आपने बतलाये हैं उनको कानूनके रद्दोबदल होने तक यहाँ निवास करनेके लिए अस्थायी अधिकारपत्र दे दिये जायेंगे । और कानूनमें रद्दोबदल हो जानेपर ट्रान्सवालमें उनके निवासको प्राधिकृत करनेके लिए स्थायी अधिकार-पत्र दे दिये जायेंगे । तीन शिक्षित मुसलमानोंके निवासको भी एक विशेष रियायत के तौरपर, इसी प्रकार प्राधिकृत कर दिया जायेगा। भविष्य में प्रतिवर्षं आनेवाले
शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी । चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है । इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||ई० एम० गॉर्जेस}}
{{rh|||कार्यवाहक गृह सचिव}}
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन से भी ।'''
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया}}
{{rh|||मई २०, १९११}}
आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में : व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [ भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे
कलके पत्रके अनुच्छेद घ में लिया जा चुका है । छठवाँ प्रश्न :शिक्षाका कोई निर्धारित<noinclude></noinclude>
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शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी । चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है । इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||ई० एम० गॉर्जेस}}
{{rh|||कार्यवाहक गृह सचिव}}
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन''' से भी ।
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<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
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आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में : व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [ भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे
कलके पत्रके अनुच्छेद घ में लिया जा चुका है । छठवाँ प्रश्न :शिक्षाका कोई निर्धारित<noinclude></noinclude>
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2026-08-21T18:04:38Z
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१७}}</noinclude>{{Block center|अधिनियमोंको व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए अगले ३१ दिसम्बर तक अपने प्रार्थनापत्र भेजनेका अवसर दिया जायेगा ।}}
(घ){{Block center|जो सात शिक्षित भारतीय अभी ट्रान्सवालमें हैं और जिनके नाम आपने बतलाये हैं उनको कानूनके रद्दोबदल होने तक यहाँ निवास करनेके लिए अस्थायी अधिकारपत्र दे दिये जायेंगे । और कानूनमें रद्दोबदल हो जानेपर ट्रान्सवालमें उनके निवासको प्राधिकृत करनेके लिए स्थायी अधिकार-पत्र दे दिये जायेंगे । तीन शिक्षित मुसलमानोंके निवासको भी एक विशेष रियायत के तौरपर, इसी प्रकार प्राधिकृत कर दिया जायेगा। भविष्य में प्रतिवर्षं आनेवाले
शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी । चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है । इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
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मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन''' से भी ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
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आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में: व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१७}}</noinclude>{{Block center|अधिनियमोंको व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए अगले ३१ दिसम्बर तक अपने प्रार्थनापत्र भेजनेका अवसर दिया जायेगा ।}}
(घ){{Block center|जो सात शिक्षित भारतीय अभी ट्रान्सवालमें हैं और जिनके नाम आपने बतलाये हैं उनको कानूनके रद्दोबदल होने तक यहाँ निवास करनेके लिए अस्थायी अधिकारपत्र दे दिये जायेंगे । और कानूनमें रद्दोबदल हो जानेपर ट्रान्सवालमें उनके निवासको प्राधिकृत करनेके लिए स्थायी अधिकार-पत्र दे दिये जायेंगे । तीन शिक्षित मुसलमानोंके निवासको भी एक विशेष रियायत के तौरपर, इसी प्रकार प्राधिकृत कर दिया जायेगा। भविष्य में प्रतिवर्षं आनेवाले
शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी । चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है । इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||ई० एम० गॉर्जेस}}
{{rh|||कार्यवाहक गृह सचिव}}
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन''' से भी ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया}}
{{rh|||मई २०, १९११}}
आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में: व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे
कलके पत्रके अनुच्छेद घ में लिया जा चुका है । छठवाँ प्रश्न :शिक्षाका कोई निर्धारित<noinclude></noinclude>
t1p8bipwid8mvs80gud28ojfxnnpzey
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" />{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>मानदण्ड नहीं । सातवाँ प्रश्न:पर्याप्त रूपसे शिक्षित पंजीकृत भारतीयोंको परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं। आठवाँ प्रश्न : जाने-माने एशियाइयोंको यदि वे अंग्रेजीमें हस्ताक्षर कर सकें तो परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं ।
मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ७<br>क'''}}</center>
{{c|'''ट्रान्सवाल स्थानीय शासन अध्यादेश, १९११ का प्रारूप'''}}
{{c|'''एशियाइयोंसे सम्बधित अंश'''}}
{{c|'''एशियाई बाजार'''<ref>क्रूगरकी सरकारने एशियाइयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में सीमित करनेका निर्णय सबसे पहले अप्रैल १८९९ में किया था और इनको विनियमित करनेकी सत्ता नगर परिषदोंको सौंपी गई थी; देखिए खण्ड
३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६ (१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगा ।
(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित
परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी ।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये
किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७. (१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
(२) ऐसा प्रत्येक पट्टा वैध होगा, चाहे उसकी लिखा-पढ़ी नाजिर - रजिस्ट्री के सामने न हुई हो और ऐसा
__________________________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
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३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६ (१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगा ।
(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित
परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी ।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये
किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७. (१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
(२) ऐसा प्रत्येक पट्टा वैध होगा, चाहे उसकी लिखा-पढ़ी नाजिर - रजिस्ट्री के सामने न हुई हो और ऐसा
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३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६ (१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगा ।
(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित
परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी ।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये
किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७. (१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६ (१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगा ।
(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित
परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी ।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये
किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७. (१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
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३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
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(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित
परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी ।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये
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(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी।}}
{{blockcenter|(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।}}
{{blockcenter|६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
(२) ऐसा प्रत्येक पट्टा वैध होगा, चाहे उसकी लिखा-पढ़ी नाजिर-रजिस्ट्री के सामने न हुई हो और ऐसा}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>मानदण्ड नहीं । सातवाँ प्रश्न:पर्याप्त रूपसे शिक्षित पंजीकृत भारतीयोंको परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं। आठवाँ प्रश्न : जाने-माने एशियाइयोंको यदि वे अंग्रेजीमें हस्ताक्षर कर सकें तो परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं ।
मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
<center>{{larger|'''परिशिष्ट ७'''}}</center>
{{c|'''क'''}}
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल स्थानीय शासन अध्यादेश, १९११ का प्रारूप ७'''}}</center>
{{c|'''एशियाइयोंसे सम्बधित अंश'''}}
{{c|'''एशियाई बाजार'''<ref>क्रूगरकी सरकारने एशियाइयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में सीमित करनेका निर्णय सबसे पहले अप्रैल १८९९ में किया था और इनको विनियमित करनेकी सत्ता नगर परिषदोंको सौंपी गई थी; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी ।
(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी।
(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
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६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी ।
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(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।}}
६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
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६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी ।
<br>(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी।}}
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६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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<br>(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
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मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
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६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> " वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे।
यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center>
हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,
प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र <ref>देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने-पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं -- यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? -- वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||नेटालमें अधिवास प्रमाणपत्रोंका सवाल|२७७}}</noinclude>
सारा सवाल सरकारकी कंजूसीका ही है। एक ओर अधिकारीगण अदालतों में पर्याप्त संख्या में योग्य दुभाषिये रखनेकी बातपर कुछ सौ पौंड सालाना खर्च करते हुए पाई-पाईका विचार करते हैं, परन्तु दूसरी ओर सरकारी इमारतोंके लिए लाखों पौंड खर्चते हुए उन्हें कोई कलक नहीं होता । इस अपव्ययकी श्री मेरीमैन आदि संसद सदस्योंने बड़ी कठोर आलोचना की है। जबतक सभी भारतीय भाषाओंके योग्य दुभाषिये नियुक्त नहीं किये जाते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीयोंके साथ पर्याप्त न्याय किया जाता है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२३५. नेटालमें अधिवासके प्रमाणपत्रोंका सवाल'''}}}}
नेटालमें भारतीयोंको अब अधिवासके नये प्रमाणपत्र नहीं मिलते। इतना ही नहीं, जिनके पास पुराने प्रमाणपत्र हैं उनसे वे ले लिये जाते हैं और नया हलफनामा पेश करनेपर ही उनके बदले नये प्रमाणपत्र दिये जाते हैं। इससे गरीब भारतीयोंको बड़ी तकलीफ होती है। हमें लगता है कि अधिवासपत्रोंके इस सवालको लेकर कांग्रेस जो मुकदमा लड़ना चाहती थी वह उसे अवश्य लड़ना चाहिए। इस बीच जिनके पास पुराने प्रमाणपत्र हैं उनको, उन्हें लौटाकर नये लेनेकी कोई जरूरत नहीं है । जिसे नया प्रमाणपत्र लेना ही हो उसे भी अधिकारीको दुबारा प्रमाण देनेकी जरूरत नहीं है। जिसके पास कुछ न हो वह हलफनामा देकर और अपने निवासके प्रमाणोंको जितना बने उतना मजबूत बनाकर अधिवासपत्रके बिना ही यह देश छोड़ सकता है। कोई भी व्यक्ति अधिवासका प्रमाणपत्र रखनेके लिए बाध्य नहीं है । इसलिए प्रमाण इकट्ठे कर लेनके बाद देश छोड़ने में कोई परेशानीकी बात नहीं है ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||नेटालमें अधिवास प्रमाणपत्रोंका सवाल|२७७}}</noinclude>{{gap}}सारा सवाल सरकारकी कंजूसीका ही है। एक ओर अधिकारीगण अदालतों में पर्याप्त संख्या में योग्य दुभाषिये रखनेकी बातपर कुछ सौ पौंड सालाना खर्च करते हुए पाई-पाईका विचार करते हैं, परन्तु दूसरी ओर सरकारी इमारतोंके लिए लाखों पौंड खर्चते हुए उन्हें कोई कलक नहीं होता । इस अपव्ययकी श्री मेरीमैन आदि संसद सदस्योंने बड़ी कठोर आलोचना की है। जबतक सभी भारतीय भाषाओंके योग्य दुभाषिये नियुक्त नहीं किये जाते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीयोंके साथ पर्याप्त न्याय किया जाता है।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२३५. नेटालमें अधिवासके प्रमाणपत्रोंका सवाल'''}}}}
नेटालमें भारतीयोंको अब अधिवासके नये प्रमाणपत्र नहीं मिलते। इतना ही नहीं, जिनके पास पुराने प्रमाणपत्र हैं उनसे वे ले लिये जाते हैं और नया हलफनामा पेश करनेपर ही उनके बदले नये प्रमाणपत्र दिये जाते हैं। इससे गरीब भारतीयोंको बड़ी तकलीफ होती है। हमें लगता है कि अधिवासपत्रोंके इस सवालको लेकर कांग्रेस जो मुकदमा लड़ना चाहती थी वह उसे अवश्य लड़ना चाहिए। इस बीच जिनके पास पुराने प्रमाणपत्र हैं उनको, उन्हें लौटाकर नये लेनेकी कोई जरूरत नहीं है । जिसे नया प्रमाणपत्र लेना ही हो उसे भी अधिकारीको दुबारा प्रमाण देनेकी जरूरत नहीं है। जिसके पास कुछ न हो वह हलफनामा देकर और अपने निवासके प्रमाणोंको जितना बने उतना मजबूत बनाकर अधिवासपत्रके बिना ही यह देश छोड़ सकता है। कोई भी व्यक्ति अधिवासका प्रमाणपत्र रखनेके लिए बाध्य नहीं है । इसलिए प्रमाण इकट्ठे कर लेनके बाद देश छोड़ने में कोई परेशानीकी बात नहीं है ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तक काफी रुकना पड़ता है । अनिश्चित समय तक बाहर सड़कपर खड़े रहना, और कुछ न सही, बहुत थका देनवाला तो होता ही है। वस्तुतः जिन लोगोंको वहाँ खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ी है, उन्होंने अक्सर ब्रिटिश भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन
होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्या- लयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको--जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref>
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४१. पत्र : गृह-सचिवको'''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
१९ तारीखका आपका तार और पत्र प्राप्त हुए ।<ref>देखिए " पत्र : गृह-मन्त्रीको ", पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २७८ ।</ref> तदर्थ धन्यवाद !
इस वर्षके छ: शिक्षित भारतीय प्रवेशाथियोंके नामोंकी सूची में यथासमय भेजूंगा ।<ref>यदि गांधीजीने सूची भेजी हो तो वह उपलब्ध नहीं है ।</ref>
{{right|आपका<br>मो० क० गांधी}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६८) तथा २७-७-१९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' से ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१९
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>
<center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें ।"--(एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा जीविकोपार्जनके लिए ट्रान्सवालमें कोई रोजगार करना चाहते हैं, परन्तु चूंकि खयाल यह था कि पिछले अधिवेशन में कानून बन ही जायेगा, इसलिए समाजने श्री सोढाके गुजारेकी व्यवस्था कर दी । परन्तु वे, स्वाभाविक है, बेकार नहीं बैठना चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो ।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center>
संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>२० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें ।"--(एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
{{gap}}जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा जीविकोपार्जनके लिए ट्रान्सवालमें कोई रोजगार करना चाहते हैं, परन्तु चूंकि खयाल यह था कि पिछले अधिवेशन में कानून बन ही जायेगा, इसलिए समाजने श्री सोढाके गुजारेकी व्यवस्था कर दी । परन्तु वे, स्वाभाविक है, बेकार नहीं बैठना चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो ।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center>
संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>२० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}परन्तु लॉर्ड ऍम्टहिलके, जो हमारे पक्षका समर्थन अनथक उत्साहसे करते रहे हैं, आक्षेपोंका उत्तर अबतक नहीं दिया गया है।<ref>लॉर्ड सभामें अस्थायी समझौतेके अमलके विषय में लॉर्ड ऍम्टहिलके १७ जुलाई, १९१२ को किये गये प्रश्नके लिए देखिए परिशिष्ट १८ ।</ref> उनका प्रधान आक्षेप यह है कि समझौते के शब्दोंका तो पालन किया जा रहा है, परन्तु उसकी भावनाको भंग कर दिया गया है। भावना यह है--और जनरल बोथाकी सार्वजनिक घोषणाएँ<ref>सन् १९०९ में बोथाने लॉर्ड कर्ज़नको आश्वासन दिया था कि वे ब्रिटिश भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार करेंगे; देखिए खण्ड ९, पृष्ठ १७४ । २३ मई १९११ को अस्थायी समझौतेपर अपने विचार प्रकट करते हुए जनरल बोयाने कहा था कि समझौता बहुत उपयुक्त समयपर हुआ। उन्होंने यह चेतावनी तो दी थी कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल उन्हीं भारतीयोंको प्रवेश करने दिया जायेगा, जिन्हें समझौते के अनुसार ऐसा करनेका अधिकार होगा; किन्तु साथ ही उन्होंने यह वचन भी दिया था कि भविष्य में भारतीय क जीवनकी परिस्थितियोंको दक्षिण आफ्रिकामें जितना सा बनाया जा सकता है, उतना सा बनानेकी पूरी कोशिश की जायेगी । सच तो यह है कि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनके मनमें भारतीयों के प्रति कोई दुर्भाव नहीं है । लन्दन में शादी परिषद् में भाग लेनेके बाद, २६ सितम्बर, १९१२ को रीट फॉटोनमें बोलते हुए उन्होंने कहा था कि एशियाई सवालको हल करनेकी कोशिश में जनरल स्मट्सने इतना परिश्रम किया कि वे सूख कर काँटा हो गये ।</ref> भी यही हैं -- कि जो भारतीय दक्षिण आफ्रिकामें बस चुके हैं उन्हें शान्तिपूर्वक रहने दिया जायेगा । परन्तु जबतक भारतके कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त पत्नियोंको यहाँ से लौटाया जाता रहेगा, जबतक स्वर्ण-अधिनियम<ref>देखिए “कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५ और परिशिष्ट २१ ।</ref> और कस्बा-कानूनका<ref>स्वर्ण- अधिनियम या करवा-कानूनके द्वारा उन भारतीयोंको बस्तियोंमें जाकर बसनेपर मजबूर किया जा रहा था, जो " घोषित क्षेत्रों " तथा अन्य ऐसे क्षेत्रोंमें रह रहे थे, जहाँ उन्होंने अपना खासा कारोबार बना लिया था । जो स्थान इससे प्रत्यक्ष रूपसे प्रभावित होते थे उनमें क्लार्क्सडॉर्प (“ कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५) क्रूगर्सडॉप (“ तूफान उमड़ रहा है ", पृ४ १३५ ) और रूडीपूर्ट तथा जस्टिन ( " जर्मिस्टनके भारतीय", पृष्ठ १५२-५३ और २४४ ) आदि शामिल थे ।</ref> प्रयोग इस प्रकार किया जाता रहेगा कि भारतीय व्यापारी लगभग तबाह हो जायें, जबतक पुराने निवासियोंके बसनेके लिए पहले जो वस्तियाँ निर्दिष्ट की गई थीं उन्हें उनसे निकलनेपर विवश किया जाता रहेगा, जबतक निवासके प्रमाणपत्रोंकी उपेक्षा की जाती रहेगी, जबतक विवाह अथवा अधिवास प्रमाणित करने के लिए असम्भव प्रमाणोंकी माँग की जाती रहेगी और जबतक परवाना कानूनोंके अत्याचारपूर्ण अमलके द्वारा व्यापार करना प्रायः असम्भव किया जाता रहेगा, तबतक शान्ति नहीं हो सकेगी ।<ref>भारतीयों के विरोध के परिणाम स्वरूप सन् १९११ और १९१२ के संघ प्रवासी विधेयक में जनरल स्मट्स द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनोंसे सहमत होते हुए गांधीजीने कहा था कि अपनी दूसरी शिकायतों (जिनका खासा ब्योरा इस लेख में मिल जाता है) को लेकर भारतीय भविष्य में संघर्ष कर सकते हैं; देखिए “तार : गृह-मन्त्रीको", पृष्ठ २२४-२५ और “ आखिरकार ! " पृष्ठ ९१-९२ ।</ref>
:[अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center>
प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ghuqui8ejk53v6kkfaxcmqwmemj7bua
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2026-08-22T01:11:54Z
सीमा1
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center></noinclude>{{gap}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर''' - जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण- अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२२
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्ग- की नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रों- में ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्याय- पीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण- अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref>सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व ( इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके " न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन
_______________________
किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त ( लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२३
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा ।
अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सब- पर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है । मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br> ट्रान्सवाल<br>आषाढ शुक्ल १४,[ जुलाई २७, १९१२]<ref>पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref>}}
<br>भाई श्री मनसुख,
आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२४
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह् बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये।
सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना।
{{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>जुलाई २८, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
आपका तार<ref>जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं।
यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
[गो० कृ० गोखले<br>{{gap|2em}}इंग्लैंड ]
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना।
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गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>जुलाई २८, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
आपका तार<ref>जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं।
यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
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:[गो० कृ० गोखले
:इंग्लैंड ]
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना।
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गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
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प्रिय श्री गोखले,
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यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४८. पत्र : एशियाई-पंजीयकको'''}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई २९, १९१२}}
[ महोदय,]
आपका इसी २६ तारीखका कृपा-पत्र<ref>देखिए पृष्ठ २८२, पाद-टिप्पणी १ ।</ref> प्राप्त हुआ । मेरी नम्र रायमें, अगर किसी खास समुदाय के लोग सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता।
मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई - सभा में<ref>इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुत-से यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे।११-१९</ref>'''}}</center>
{{right|अगस्त १, १९१२}}
'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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[ महोदय,]
आपका इसी २६ तारीखका कृपा-पत्र<ref>देखिए पृष्ठ २८२, पाद-टिप्पणी १ ।</ref> प्राप्त हुआ । मेरी नम्र रायमें, अगर किसी खास समुदाय के लोग सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता।
मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
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:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई - सभा में<ref>इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुत-से यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे।</ref>'''}}</center>
{{right|अगस्त १, १९१२}}
'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude>{{smallrefs}}
११-१९</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}'''यह सब श्री वी० ए० चेट्टियारके सम्मान में दिये गये भोजके अवसरपर हुआ, . . . श्री चेट्टियार मद्रास वापस जानेवाले हैं।'''
'''श्री गांधीने, जिन्हें श्री हॉस्केनने सत्याग्रहका मन्त्र-दृष्टा और गुरु बताया, अपने श्रोताओं को चेतावनी दी कि दक्षिण अफ्रिकाका महान संघर्ष अभी हरगिज समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि वह थम-भर गया है और हो सकता है कि समाजको फिर काफी कष्ट झेलना पड़े।'''
'''"अतिथियों" के लिए शुभकामना व्यक्त करते हुए श्री गांधीने श्री हॉस्केन तथा अन्य उपस्थित यूरोपीयोंकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आप लोगोंकी बदौलत ही आज हम सब इस मेजपर बराबरीको हैसियतसे इकट्ठा हुए हैं। मेरी समझमें तो हर सभ्य देशमें, और विशेष रूपसे हर ईसाई समाजमें, समानताकी भावना एक साधारण-सी बात होनी चाहिए। किन्तु चूंकि हमें भयंकर कठिनाइयों और पूर्वग्रहोंसे गुजरना पड़ रहा है, इसलिए किसी भी प्रकारकी समानताका दर्जा प्राप्त कर सकना हमारे लिए सौभाग्य की बात बन जाती है।'''
:[ अंग्रेजीसे ]<br>'''ट्रान्सवाल लीडर,''' २-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५०. जर्मिस्टनकी बस्ती'''}}</center>
जस्टिन में जिस स्थानपर नया एशियाई बाजार खोलनेका विचार किया जा रहा है, हम उसके विषय में अन्यत्र संघ-सरकारके कार्यकारी स्वास्थ्य चिकित्साधिकारी (मेडिकल ऑफिसर ऑफ हेल्थ) डॉ० एफ० आरनॉल्डका विवरण प्रकाशित कर रहे हैं। हमारी सम्मतिम विवरण नगर परिषद द्वारा चुने हुए स्थानकी विशेष वकालत करता है। डॉ० मैकनैबने इस स्थानके विरुद्ध जो सख्त बातें कही थीं इसमें उनकी उपेक्षा कर दी गई है। यह ठीक है कि डॉ० मैकनैबने अपने कुछ एतराज वापस ले लिए हैं, परन्तु उनकी मुख्य आपत्ति--कि बस्तीका स्थान एक लम्बे-चौड़े घूरेके समीप रखा जानेवाला है और जहाँ घिनौने पशु-ज्वरसे बीमार होकर मरनेवाले जानवरोंको दफनाया जाता रहा है--अब भी कायम है। डॉ० आरनॉल्डने कुछ शर्तें लगा रखी हैं, जिनके पूरा होनेपर ही स्थानको एक चिकित्सा-सम्बन्धी दृष्टिसे उपयुक्त ठहराया जा सकेगा।
इससे भी यही सिद्ध होता है कि डॉ० मैकनैबकी कठोर आलोचना सर्वथा उचित थी । फिर यह भुला देना भी ठीक नहीं होगा कि जस्टिनकी नगरपालिका द्वारा चुनी हुई जगहमें वह खास टुकड़ा भी आ जाता है जहाँ नगरका मलमूत्र डाला जाता रहा है। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिसे यह बात अलबत्ता कुछ सन्तोषकी हो सकती है कि बस्तीका यह भाग कुछ समय तक इमारतें बनाने के काममें नहीं लाया जायेगा; परन्तु इस प्रकारके मामलोंमें केवल चिकित्साधिकारीकी अनुकूल सम्मतिको विभिन्न आपत्तियों का निर्णयात्मक उत्तर नहीं माना जा सकता। वैद्यकीय दृष्टिसे कोई पुराना<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको|२९१}}</noinclude>कब्रिस्तान बस्ती बसाने के लिए खासा अच्छा स्थान हो सकता है, परन्तु अन्य अनेक सर्वथा उचित दृष्टियों से वही स्थान बिलकुल अनुपयुक्त ठहर सकता है। जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं, यह एक विचित्र संयोग है कि नगरपालिकाओंको एशियाई बाजारों और वर्तनियोंको बस्तियां बसाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र घूरा जमा करनेके स्थानोंके समीप ही मिलता है। अब तो हम इतना ही कह सकते हैं कि डॉ० आरनॉल्डकी अनुकूल रिपोर्टके बावजूद जर्मिस्टन के भारतीयों को इस सड़ियल जगहपर जानेसे इनकार कर देना चाहिए। हम जानते हैं कि उन्हें इस जगह जानेसे इनकार करनेके लिए असाधारण साहसकी आवश्यकता पड़ेगी । पुरानी बस्तीके सारे कारोबारको ठप्प करके नगरपालिकाने वहाँ रहना प्रायः असम्भव कर दिया है। वह कई इमारतें गिरा चुकी है और अन्य इमारतों के मालिकोंको यह धमकी दे रही है कि यदि वे बस्ती में व्यापार करते पकड़े गये तो उनका भी यही हाल किया जायेगा । हमें आशा है कि जस्टिनके भारतीयों को कितनी ही कठिनाइयोंका सामना क्यों न करना पड़े, वे दृढ़ रहेंगे और नगरपालिका द्वारा बिछाये हुए जालमें फँसनेसे इनकार कर देंगे ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२५१. पत्र : गृह-मन्त्री के सचिवको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>अगस्त ३, १९१२}}
{{left|[ सेवामें ]<br>गृह मन्त्रीके सचिव<br>केप टाउन<br>महोदय,}}
आपका इसी १ तारीखका कृपा-पत्र,<ref>और </ref> संख्या ३४ / ई / १५३३०, प्राप्त हुआ । आपने २२ तारीखके जिस पत्रका उल्लेख किया है वह मेरे सामने नहीं है, परन्तु मेरा खयाल है कि यह वही पत्र<ref>देखिए “पत्र : गृह-सचिवको”, पृष्ठ २८३ ।</ref> है जो श्री सोढाके बारेमें मैंने मन्त्रालय के सचिवको लिखा था। चूँकि मामला बहुत जरूरी है, इसलिए मैं फार्मपर से ही जवाब दे रहा हूँ।
मेरी नम्र रायमें शिक्षित भारतीयोंके प्रवेशके प्रश्नसे इसका कोई सरोकार नहीं है कि वे व्यक्तिगत लाभके लिए आते हैं अथवा समाजकी जरूरत की पूर्तिके लिए। मेरा अनुमान है कि कानून बन जानेके बाद शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यताके बलपर ही निर्धारित संख्या में प्रवेश पायेंगे। जिन लोगोंने कानूनी समानताके सिद्धान्तके लिए संघर्ष किया है, उनकी यह मान्यता रही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय अपना-अपना<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्ध-में मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो
कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center>
{{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref>}}
{{left|चि० बली और चंची,}}
तुम दोनोंके पत्र मिले ।
मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है।
चि० वेणीने<ref>प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२९
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश|२९३}}</noinclude>जाने दिया था, और अब भी मेरा वही खयाल बना हुआ है कि वह अपनेको वहाँ ज्यादा सुखी महसूस करेगी; हरिलालकी भी यही इच्छा थी। इसीलिए उसे वहाँ जाने दिया। अभी यह कह सकना कठिन है कि मैं वहाँ कब जा पाऊँगा। मेरा खयाल है कि जबतक विधेयक पास नहीं हो जाता तबतक यहाँसे निकल सकना सम्भव नहीं है।
कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।<br>
{{gap|3em}}यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।
मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस०एन० ९५३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश|२९३}}</noinclude>जाने दिया था, और अब भी मेरा वही खयाल बना हुआ है कि वह अपनेको वहाँ ज्यादा सुखी महसूस करेगी; हरिलालकी भी यही इच्छा थी। इसीलिए उसे वहाँ जाने दिया। अभी यह कह सकना कठिन है कि मैं वहाँ कब जा पाऊँगा। मेरा खयाल है कि जबतक विधेयक पास नहीं हो जाता तबतक यहाँसे निकल सकना सम्भव नहीं है।
कान्ति कनकना होता जा रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी सलाह यह है कि घरमें विदेशी खान-पान कतई दाखिल न किया जाये, इसके बारेमें मेरा अनुभव बहुत बुरा रहा है। दिनपर-दिन मेरा यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि लगभग ये सभी खाद्य-पदार्थ दोषयुक्त होते हैं।
यह बहुत अच्छी बात है कि बलीने संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ कर दिया है। मुझे ज़ब कभी भारत पहुँचने और वहाँ काम शुरू करनेका अवसर मिलेगा तब बलीसे पूरा-पूरा काम लेनेका इरादा है।
मणिलाल, रामदास और देवदास फार्मपर हैं। डॉ० मेहताकी पुत्री जयाकुंवर वेन भी यहीं मेरे साथ है। बच्चोंको पढ़ाने लिखाने में वह मेरा बहुत हाथ बँटा रही है। तुमने 'इंडियन ओपिनियन' में पढ़ा होगा कि उसके पति फीजी गये हुए हैं।<ref>डॉ० प्राणजीवन मेहताको लिखे अपने २२ अक्तूबर, १९११ के पत्र (देखिए पृष्ठ १६३-६६ ) में गांधीजीने मणिलाल डॉक्टरकी भावी योजना - अर्थात् उन्हें पुनः मॉरिशस लौटकर सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करना चाहिए अथवा ट्रान्सवालमें ही रहना चाहिए के सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये थे। अप्रैल २९ को उन्होंने ई० एफ० सी० लेनको एक पत्र लिखकर, शायद, यह जिज्ञासा की थी कि क्या मणिलाल डॉक्टर को उन भारतीयों में शामिल किया जा सकता है जो अस्थायी समझौतेकी इस व्यवस्थाके अन्तर्गत उपनिवेशमें प्रवेश करनेवाले हैं कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीयोंको प्रवेश दिया जायेगा। लेकिन यह पत्र उपलब्ध नहीं है। मई ३ को उनके पत्रका उत्तर (एस० एन० ५६४९) देते हुए श्री लेनने लिखा था कि समझौतेको कानूनी रूप देने तक तो वे मणिलाल डॉक्टरको अस्थायी अनुमतिपत्र ही दे सकते हैं। जुलाई ८ को गांधीजीने अपनी डायरीमें लिखा है कि मणिलाल डॉक्टर वास्तवमें फीजी जाना नहीं चाहते, किन्तु कुछ दिन बाद उन्होंने फिर अपनी डायरीमें लिखा है कि वे २६ जुलाईको जहाजसे फीजीके लिए रवाना हो गये हैं।</ref> चि० जमनादास भी मेरे साथ हैं । अनी भी फार्मपर है। देवी बहन<ref>कुमारी एडा वेस्ट ।</ref> . . . .<ref>बाकी हिस्सा उपलब्ध नहीं है ।</ref>
गांधीजी के स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (एस०एन० ९५३०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३०
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२५३. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>अगस्त ४, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
आपकी लम्बी चिट्ठीके<ref>जुलाई २७, १९१२ का पत्र देखिए परिशिष्ट २० ।</ref> लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! अभी आप बीमारीसे उठे ही हैं, इसलिए मैं सपने में भी यह नहीं चाहूँगा कि आपको जिस परहेज और आरामकी जरूरत है उसकी उपेक्षा करके आप यहाँ आयें। वैसे मेरा खयाल यह है कि आप दक्षिण आफ्रिकाके लिए रवाना होनेसे पहले बिलकुल अच्छे हो जायेंगे। यदि आपकी सहमति हो तो मोटे तौरपर कार्यक्रम इस प्रकार रख लिया जाये : २२ और २३ अक्तूबर केप टाउन, २५ और २६ किम्बर्ले, २७ जोहानिसबर्ग। ज्यादातर वक्त तो जोहानिसबर्ग में ही बीतेगा। दो दिन प्रिटोरियाको दिये जा सकते हैं। मैं सोचता हूँ, यदि आप तार द्वारा अन्यथा आदेश न दें तो जनरल बोथा और श्री फिशरसे<ref>अब्राहम फिशर; दिसम्बर १९०७ से मई १९१० तक ऑरेंज रिवर कॉलोनी के प्रधान मन्त्री; सन् १९१० में दक्षिण आफ्रिका संघके निर्माणके बाद संघ सरकारके भूमि-मन्त्री ( यूनियन मिनिस्टर फॉर
लैंड्स )। सन् १९१२ में प्रतिरक्षा विधेयकके पास होनेपर जनरल स्मटसने गृह मन्त्रालय छोड़ दिया और वित-मन्त्रालयका दायित्व सँभाला, हालाँकि प्रतिरक्षा और खनिज मामलोंकी जिम्मेवारी तब भी उन्होंने अपने ही हाथमें रखी। नई व्यवस्थामें जनरल बोधाने गृह मन्त्रालयका दायित्व स्मट्ससे लेकर श्री फिशरको दिया। संघ-संसद में १९१३ का प्रवासी विधेयक फिशरने ही पेश किया।</ref> आपकी अगवानी करनेका अनुरोध करूँ। यदि उस समय तक लॉर्ड ग्लैडस्टन वापस आ जाते हैं, तो मैं उनसे भी कहने की बात सोचता हूँ। श्री मेरीमैनसे<ref>जॉन जैवियर मेरीमैन; इनका जन्म इंग्लैंडमें हुआ था, किन्तु इन्होंने दक्षिण आफ्रिकाको ही अपना देश बना लिया था। प्रतिष्ठित और सफल संसद सदस्य; रोडसके पहले मन्त्रिमण्डलमें राजकोष मन्त्री(ट्रेजरर ); सन् १९०८-१० में केप कालोनीके प्रधान मन्त्री; संघके निर्माणके बाद प्रधानमन्त्री पदके लिए जनरल बोथाके प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी १९०९ में गांधीजी शिष्टमण्डल लेकर जिस जहाजसे इंग्लैंड जा रहे थे, उसी जहाजसे ये भी इंग्लैंड जा रहे थे। गांधीजीको इनका रुख भारतीयोंके प्रति बड़ा सहानुभूतिपूर्ण जान पड़ा था। और इन्होंने भारतीयोंको सहायता देनेका भी वचन दिया था; परन्तु बादमें वे उसे निभा नहीं सके। देखिए खण्ड ९ पृष्ठ २७२, २७७ और ३०५ तथा '''इंडियन ओपिनियन, स्वर्ण-अंक; दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास,''' अध्याय ५ और ३२ भी ।</ref> तो मैं आपका स्वागत करनेको कहूँगा ही। वे दक्षिण आफ्रिका के सबसे बड़े राजनयिक हैं। मैंने ऊपर जिन स्थानोंके नाम दिये हैं, उन सभी स्थानोंमें आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किये जायेंगे। जोहानिसबर्ग में एक मिले-जुले प्रीतिभोजका आयोजन करनेका भी विचार है। अध्यक्षता शायद महापौर
महोदय करेंगे। अपने प्रवासका अन्तिम सप्ताह आप फीनिक्स, डर्बनमें बितायेंगे। और<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३१
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||श्री टाटाकी उदारता|२९५}}</noinclude>फिर आप डर्बनसे जहाज द्वारा प्रस्थान करेंगे। आपका भारत जानेका टिकट आपके यहाँ आ जानेके बाद सुविधापूर्वक लिया जा सकता है।
मैंने कार्यक्रमकी रूपरेखा पहलेसे ही इसलिए तैयार कर ली है कि यदि आप उसमें कोई परिवर्तन करना चाहें तो तार और पत्रसे सूचित कर दें।
यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न
बनाये और हमें तथा शाही सरकारको भी सीधा कह दे कि वह लाचार है। उस हालत में संघर्ष तीव्र और भयानक हो जायेगा; परन्तु वह तबतक जारी ही रहेगा जबतक हममें से दो-चार भी जीवित हैं।
श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
श्री टाटाने फिर २५,००० रुपये<ref>श्री टाटा द्वारा दिये गये अन्य अनुदानोंके लिए देखिए पाद-टिप्पणी १ पृष्ठ २४५ ।</ref> देकर कितनी बड़ी कृपा की है ? मैं जानता हूँ कि यह सब आपकी ही बदौलत है। हर बार दान ऐन मौकेपर पहुँचा है। फार्मको चलाना मुश्किल होता जा रहा था।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
{{gap|1em}}श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>संघर्षके कितने प्रशंसक हैं। श्री टाटाने सत्याग्रहियोंको ही नहीं, दक्षिण आफ्रिकाकी समस्त भारतीय जनताको अपना चिर ऋणी बना लिया है। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी परेशानियाँ कम कर दी हैं। जो लोग इस संघर्षमें संलग्न हैं, उनका उत्साह यह देखकर बढ़ जाता है कि ऐसे प्रतिष्ठित भारतीय भी हमारे पृष्ठपोषक हैं। और इससे उन्हें अपना लक्ष्य भी कुछ समीप आ गया जान पड़ता है। जो लोग पूर्वग्रहके कारण हमारे विरोधी बने हुए हैं, उनपर इस प्रकारकी सहायताका जो नैतिक प्रभाव पड़ता है, वह तो स्पष्ट ही है।
:[अंग्रेजीसे]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-८-१९१२
{{dhr}}
{{c|{{x-larger|'''२५५. शेरिफकी सभा'''}}}}
भारतमें किसी बड़े नगरके शेरिफ द्वारा बुलाई गई सभाकी वही वकत मानी जाती है जो यहाँ, समझ लीजिए, डर्बनके महापौर (मेयर) द्वारा बुलाई हुई सभाकी हो सकती है। भारतमें "शेरिफ" शब्दका अर्थ वही नहीं है जो हम यहाँ दक्षिण आफ्रिकामें समझते हैं। "शेरिफ" का पद अवैतनिक होता है और यह भारतके अत्यन्त प्रतिष्ठित नागरिकोंको प्रदान किया जाता है। हमारे जिन पाठकोंको भारतके विषयमें अधिक मालूम नहीं है वे भी अब जान जायेंगे कि हालमें बम्बईमें शेरिफके बुलाये जानेपर जो सार्वजनिक सभा हुई थी उसका क्या महत्व है। स्पष्ट है कि इस सभा में बम्बईकी जनताके सभी वर्गोका प्रतिनिधित्व था। और इसीलिए इसके प्रस्तावोंका असर पड़े बिना नहीं रह सकता। सभाने ब्रिटिश उपनिवेशोंमें बसे हुए अपने देशवालोंकी समग्र स्थितिपर विचार करके सर्वथा उचित ही किया। पूर्वी आफ्रिकाके यूरोपीय हमारे देशवालोंको उस ब्रिटिश-रक्षित प्रदेशसे खदेड़कर बाहर निकाल देना चाहते हैं। वे इतना तक नहीं समझते कि यदि भारतीय वहाँसे चले जायें तो वह देश शीघ्र ही भयंकर वीराने में परिवर्तित हो जायेगा। कैनेडा अपने यहाँ कानूनन बसे हुए भारतीयोंकी पत्नियों तक को प्रवेश नहीं देता कि वे अपने पतियोंके साथ रह सकें। इस प्रकार वह न्याय और शिष्टताके सभी नियमोंकी उपेक्षा कर रहा है। अपने सफल प्रतिस्पर्धियोंके प्रति द्वेष तो समझमें आ सकता है, परन्तु स्वार्थके वशीभूत होकर किये गये पागल-पनके कामोंको समझना असम्भव है। कहनेको कैनेडा ब्रिटिश उपनिवेशोंमें सबसे पुराना और सबसे अधिक सभ्य उपनिवेश है, परन्तु वहाँ इन दिनों यही सब हो रहा है।
पारसी बैरॉनेटके सभापतित्वमें की गई इस सभामें इन्हीं सब प्रश्नोंपर विचार किया गया था। दूर-दूरके देशोंमें बसे हुए हम लोगोंको अधिकार है कि हम अपनी मातृभूमि से सहायताकी आशा करें। ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है और भारतसे बाहर गये हुए लोगोंकी दशाके बारेमें देशको अधिक व्यापक जानकारी होती जाती है, त्यों-त्यों वहाँ सहानुभूति बढ़ती जाती है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१५७. बम्बईकी सुन्दरता'''}}}}
बम्बई सुन्दर है। इसलिए नहीं कि वहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें हैं; क्यों कि ये इमारतें अधिकतर तो भयंकर गरीबी और गन्दगीका आवरण-भर हैं। इसलिए भी नहीं कि वह सम्पन्न है; क्यों कि अधिकांशतः यह धन जनताके शोषणसे कमाया जाता है। उसकी सुन्दरताका मूल कारण उसकी उदारता है जिससे सारा संसार परिचित है। दानवीरता सबसे पहले पारसियोंने दिखाई और फिर बम्बईने हमेशा उसे निबाहा। बम्बईकी उदारताके कारण उसके अनेक पापोंपर पर्दा पड़ गया है। तिलक स्वराज्य-कोषके मामलेमें बम्बईने अपने सब पुराने रिकार्ड तोड़ दिये हैं। १६ जून और ३० जूनके बीच बम्बईने इस कोषमें २॥ लाख रुपये प्रतिदिनके हिसाबसे चन्दा दिया। बम्बईके कारण भारत अपने वायदेपर कायम रह सका। मुझे सन्देह नहीं कि चित्तरंजन दास बम्बईके इस दावेको स्वीकार करेंगे कि बंगालको उसीके उत्साहकी छूत लगी और उसे त्राता बननेका अवसर दिया और बंगाल ३ लाखसे छलाँग लगाकर एकदम २५ लाखपर पहुँच गया। यदि ऐसा न हुआ होता तो बम्बईके अच्छे-अच्छे कार्य-कर्त्ताओंके भगीरथ प्रयत्नोंके बावजूद भारत एक करोड़ रुपया जमा न कर पाता। इसीलिए मैंने कहा कि बम्बईकी सुन्दरता उसकी उदारताके कारण है।
कितने सदस्य बनाये गये कितने चरखे दाखिल किये गये इसके आँकड़ें तो उपलब्ध नहीं हैं; किन्तु यह चन्दा भारतके दृढ़ संकल्पका सबसे ज्वलन्त प्रमाण है।
भारतने जैसा मान स्वर्गीय लोकमान्यको दिया है वैसा आजतक और किसीको नहीं दिया। किन्तु यह एक करोड़ तो उस स्मारककी पहली सीढ़ी ही समझिए जिसे हम लोकमान्यकी स्मृतिमें खड़ा कर रहे हैं; उसका कलश तो स्वराज्य ही है। ऐसे महान् पुरुषकी स्मृतिके प्रति श्रद्धा प्रकट करने योग्य स्मारक तो स्वराज्य ही हो सकता है, इससे कम और कोई चीज नहीं।
तो भी हमें आत्मवंचना नहीं करनी है। स्मारक सम्बन्धी प्रस्तावमें निहित
भावनाके प्रति सचाई बरतनेके लिए प्रत्येक प्रान्त और प्रत्येक जिलेको अपनी जनसंख्याके अनुपातमें चन्दा देना चाहिए था। दो पैसे प्रति व्यक्तिके हिसाबसे देना साधारण स्त्री या पुरुषकी सामर्थ्यसे बाहर नहीं था। मुझे आशा है कि प्रत्येक प्रान्त शीघ्रसे-शीघ्र अपना निर्धारित अंश पूरा कर देगा।
यह चन्दा हमारी लम्बी यात्राका प्रथम चरण है। इस एक करोड़ रुपयेसे स्वराज्य नहीं मिलनेवाला। सारे संसारका धन भी हमें स्वराज्य नहीं दे सकता। पूरी तरह स्वतन्त्र होनेके लिए पहले हमारा आर्थिक रूपसे स्वतन्त्र होना आवश्यक है। भूखों मरते हुए व्यक्तिसे भजनकी आशा करना व्यर्थ है। भूखसे विकल आदमी तो अपनी आत्मा भी बेच देगा। उस बेचारेके पास आत्मा कहाँसे आई। इसलिए स्वतन्त्रताकी बात सोचनेके पहले उसे यह अनुभूति जरूर होनी चाहिए कि वह आर्थिक रूपसे किसीका मोहताज नहीं है। और यह तबतक नहीं हो सकता जबतक भारत कपड़ेके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३०
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|-
|३२२.|| भारतीय बच्चोंकी शिक्षा (१८-१-१९१३)||४३५
|-
|३२३.|| इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक ( १८-१-१९१३)||४३६
|-
|३२४.|| लॉर्ड ऍम्टहिलकी समिति (१८-१-१९१३)||४३६
|-
|३२५.|| माँ-बापका फर्ज (१८-१-१९१३)||४३७
|-
|३२६.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-३] (१८-१-१९१३)||४३७
|-
|३२७.|| काफी देरसे (२५-१-१९१३)||४३९
|-
|३२८.|| परवानेसे सम्बन्धित प्रश्न ( २५-१-१९१३)||४४०
|-
|३२९.|| भारतीय महिलाओं द्वारा आयोजित बाजार ( २५-१-१९१३)||४४१
|-
|३३०.|| हमारी लापरवाही ( २५- १ - १९१३)||४४१
|-
|३३१.|| “शुं देशनो उदय एम करी शकाये ? " (२५-१-१९१३)||४४२
|-
|३३२.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-४] ( २५-१-१९१३)||४४३
|-
|३३३.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (२५-१-१९१३)||४४५
|-
|३३४.|| एक संशोधन (१-२-१९१३)||४४६
|-
|३३५.|| हेट सॉंगवाद (१-२-१९१३)||४४७
|-
|३३६.|| जर्मिस्टनके भारतीय (१-२-१९१३)||४४९
|-
|३३७.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-५] (१-२-१९१३)||४४९
|-
|३३८.|| प्रवासके दो मामले (८-२-१९१३)||४५१
|-
|३३९.|| कांग्रेसमें हमारे सवालपर विचार (८-२-१९१३)||४५२
|-
|३४०.|| श्री गोखलेके प्रयत्नका फल ( ८-२-१९१३)||४५४
|-
|३४१.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-६] (८-२-१९१३)||४५४
|-
|३४२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१४-३-१९१३)||४५७
|-
|३४३.|| श्री गोखलेके भारतीय भाषण (१५-२-१९१३)||४५८
|-
|३४४.||बढ़िया सुझाव (१५-२-१९१३)||४६०
|-
|३४५.||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-७] (१५-२-१९१३)||४६०
|-
|३४६.||श्री गोखले देशमें (२२-२-१९१३)||४६३
|-
|३४७. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-८] (२२-२-१९१३)||४६४
|-
|३४८.|| पत्र : एच० एल० पॉलको ( २५-२-१९१३)||४६८
|-
|३४९. ||जोहानिसबर्गकी पाठशाला (१-३-१९१३)||४६८
|-
|३५०.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-९] (१४-३-१९१३)||४६९
|-
|३५१.|| पत्र : गृह-सचिवको (४-३-१९१३)||४७३
|-
|३५२. ||स्वागत (८-३-१९१३)||४७४
|-
|३५३.|| गोगाका मामला (८-३-१९१३)||४७५
|-
|३५४.|| भवानीदयालका मामला (८-३-१९१३)||४७५
|-
|३५५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [१०] (८-३-१९१३)||४७६
|-
|३५६.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१४-३-१९१३)||४८१
|-
|३५७. ||पत्र : जमनादास गांधीको (१४-३ - १९१३)||४८२
|-
|३५८.||एक सार्वजनिक उदाहरण (१५-३-१९१३)||४८५
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|पच्चीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३५९.|| ब्रिटिश नौसेना (१५-३-१९१३)||४८५
|-
|३६०.|| जनरल बोथाका सुझाव (१५-३-१९१३)||४८६
|-
|३६१.|| ट्रान्सवालमें प्रवेशका अधिकार किसे है ? (१५-३-१९१३)||४८७
|-
|३६२.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-११] (१५-३-१९१३)||४८९
|-
|३६३.|| लॉर्ड ऍम्टहिल द्वारा हमारा पक्ष-पोषण ( २२-३-१९१३)||४९२
|-
|३६४.|| हिन्दू और मुसलमान सावधान हो जायें (२२-३-१९१३)||४९३
|-
|३६५.|| भारतीय धर्मोपर हमला (२२-३ - १९१३ )||४९४
|-
|३६६. ||सरकारका रुख (२२ -३ - १९१३)||४९५
|-
|३६७.|| लॉर्ड सभामें हमारा सवाल ( २२-३-१९१३)||४९५
|-
|३६८. ||मलय बस्तीका झगड़ा (२२-३-१९१३)||४९६
|-
|३६९. ||फ्रीडडॉर्पका मुकदमा (२२-३-१९१३)||४९७
|-
|३७०. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१२] (२२-३-१९१३)||४९७
|-
|३७१. ||पत्र : गृहमंत्रीके निजी सचिवको (२४-३ - १९१३)||५००
|-
|३७२. || विवाहका सवाल (२९-३-१९१३)||५०१
|-
|३७३. || भारतीय विवाह (२९-३-१९१३)||५०२
|-
|३७४. ||एस्टकोर्ट में परवाना-सम्बन्धी मुकदमा (२९-३-१९१३)||५०३
|-
|३७५. ||क्या सीरियाई एशियाई हैं? (२९-३-१९१३)||५०३
|-
|३७६. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१३] (२९-३-१९१३)||५०४
|-
|३७७. ||पत्र : जमनादास गांधीको (२९-३ - १९१३)||५०८
|-
|परिशिष्ट
|||१.||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५११
|-
|||२.||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५११
|-
|||३.|| संघ सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११) वापस लेनेके कारण||५१२
|-
|||४. ||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५१५
|-
|||५.||गांधीजीके नाम ई० एम० गॉर्जेसका पत्र||५१६
|-
|||६.||गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार||५१७
|-
|||७.||(क) ट्रान्सवाल स्थानीय शासन अध्यादेश, १९११ का प्रारूप||५१८
|-
||| ||(ख) प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषदको||५२१
|-
|||८.||उपनिवेश कार्यालयको द० आ० क्रि० भारतीय समितिका पत्र||५२३
|-
|||९.||संरक्षककी रिपोर्टका सारांश||५२७
|-
|||१०.||गांधीजीके नाम कोंडिजका पत्र||५३०
|-
|||११.||(क) साम्राज्य सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रूका भाषण||५३४
|-
||| ||(ख) साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन||५३१
|-
|||१२.||प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) पर संवीय मन्त्रियोंकी टिप्पणियों||५४०
|-
|||१३. ||प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) और ऑरेंज फ्री स्टेट संविधानके अंश||५४५
|-
|||१४. ||गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार||५४९
|-
|||१५. ||गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार||५५०
|-
|||१६. ||गांधीजीके नाम छेनका पत्र||५५०
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|-
|३५९. ||ब्रिटिश नौसेना (१५-३-१९१३)||४८५
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|३६०. ||जनरल बोथाका सुझाव (१५-३-१९१३)||४८६
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|३६८. ||मलय बस्तीका झगड़ा (२२-३-१९१३)||४९६
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|३६९. ||फ्रीडडॉर्पका मुकदमा (२२-३-१९१३)||४९७
|-
|३७०. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१२] (२२-३-१९१३)||४९७
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|३७१. ||पत्र : गृहमंत्रीके निजी सचिवको (२४-३-१९१३)||५००
|-
|३७२. ||विवाहका सवाल (२९-३-१९१३)||५०१
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|-
|३७५. ||क्या सीरियाई एशियाई हैं? (२९-३-१९१३)||५०३
|-
|३७६. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१३] (२९-३-१९१३)||५०४
|-
|३७७. ||पत्र : जमनादास गांधीको (२९-३-१९१३)||५०८
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|||परिशिष्ट
|-
|||१.||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५११
|-
|||२.||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५११
|-
|||३.|| संघ सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११) वापस लेनेके कारण||५१२
|-
|||४. ||गांधीजीके नाम लेनका पत्र||५१५
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||| ||(ख) प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषदको||५२१
|-
|||८.||उपनिवेश कार्यालयको द० आ० क्रि० भारतीय समितिका पत्र||५२३
|-
|||९.||संरक्षककी रिपोर्टका सारांश||५२७
|-
|||१०.||गांधीजीके नाम कोंडिजका पत्र||५३०
|-
|||११.||(क) साम्राज्य सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रूका भाषण||५३४
|-
||| ||(ख) साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन||५३१
|-
|||१२.||प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) पर संवीय मन्त्रियोंकी टिप्पणियों||५४०
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|-
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|स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप-----गांधीजीके स्वाक्षरोंमें||||{{Gap}}मुखचित्र
|-
|“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है !"||(व्यंग्य चित्र)||१०४ के सामने
|-
|बिलजी ऑस्केन्धी|| ({{ditto}})|| १०४ {{ditto}}
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|“पच्चर ठोकी जा रही है”||(व्यंग्य चित्र)|| १०५ {{ditto}}
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|“डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ)|| || ४१६ {{ditto}}
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|श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति|| || ४१७ {{ditto}}
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AMAN KUMAR
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{{outdent|बॉक्सबर्ग, -में दूकान खोलनेके कारण भायातकी ट्रान्सवाल लीडर द्वारा कड़ी टीका, १८८; -में बाड़ोंको लेकर भायातके विरुद्ध मामला, २८५-८६ पा॰ टि॰; -में गांधीजी और गोखले द्वारा 'बस्तियों' का निरीक्षण, ४०९}}
{{outdent|'बाजार' (रों) -में खदेड़े जानेके विरुद्ध भारतीयोंका विरोध, २०७; -में भारतीयोंको खदेड़ देना स्वच्छ-ताका हल नहीं, ३०३; -भारतीयोंके पृथक्करणसे रोगोंके फैलनेकी अधिक सम्भावना, ३०३}}
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AMAN KUMAR
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{{outdent|बंबई विधान परिषद्, -के गोखले सदस्य; -के गैर-सरकारी सदस्योंके प्रतिनिधिकी हैसियतसे वाइस-रॉयकी कौंसिलमें गोखलेका चुनाव, ४८५}}
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{{outdent|बकूल, -द्वारा फ्रीडडॉर्प नगरपालिकाकी एक चीनीको बाड़ा खाली करनेकी नालिशके सम्बन्धमें फैसला, ४९७}}
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{{outdent|बर्गर्स राइट्स (नागरिक अधिकारों) से १८८५ के कानून ३ के अन्तर्गत ब्रिटिश भारतीय वंचित, ५२}}
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{{outdent|बॉक्सबर्ग, -में दूकान खोलनेके कारण भायातकी '''ट्रान्सवाल लीडर''' द्वारा कड़ी टीका, १८८; -में बाड़ोंको लेकर भायातके विरुद्ध मामला, २८५-८६ '''पा॰ टि॰;''' -में गांधीजी और गोखले द्वारा 'बस्तियों' का निरीक्षण, ४०९}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६९
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{{outdent|बायड़, ३८५}}
{{outdent|बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर, ५६, ५८, १०१, १३०, २०९, २३९ पा॰ टि॰, २७१, ३०८, ३०९, ३८२, ४०८; -के साहसकी सराहना, २७१; -की गोखलेसे भेंट, ४१०}}
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: ३५० पा॰ टि॰, ३५१ पा॰ टि॰, ३९७ पा॰ टि॰, ४००, ४७५, ५००; -द्वारा अस्थायी समझौता स्वीकार, १४ ५७, ८३; -द्वारा कैलेनबैकको मानपत्र, १२७, १२९-३१; -द्वारा क्रूगर्स डॉर्पके भारतीयोंके विरुद्ध सरकारी कार्रवाईका प्रतिकार करने व रिचको सहायता देनेका निर्णय, १३७-३९; -द्वारा गोखलेको मानपत्र, ३३८-३९, ३३९ पा॰ टि॰; -द्वारा गोखलेको भोज, ३४२-४३; -द्वारा पंजीयनके लिए नाम भेजनेकी सत्याग्रहियोंको चेतावनी, ८५-८६, ८८, ९२; -द्वारा पार्लियामेंटके चालू सत्रमें आप्रजनके कानूनमें संशोधन न किये जानेकी हालतमें सत्याग्रह जारी रखनेका निश्चय, ३७; -द्वारा प्रार्थनापत्र: १८८५ के कानून ३, स्वर्ण-कानून और नगरनिगम अधिनियमके बारेमें, ५८; -ट्रान्सवाल नगरपरिषद् अध्यादेशके मसविदेके बारेमें, १९७; -की बैठक, ३०७-०८, ३०९, ४७३-७४; -को जसातके मामलेमें आन्दोलन द्वारा न्याय प्राप्त करनेकी सलाह, २४०; द्वारा भारतसे वापिस लौटनेपर अधिवासी भारतीयोंके लिए बन्दरगाहोंपर सुरक्षाकी माँग, ४७३-७६ -द्वारा भारतीयोंको एकसे अधिक पत्नियाँ न लानेके सम्बन्धमें जस्टिस वेसेल्सके निर्णयका निषेध, ११६, ११८
{{outdent|ब्रिटिश संविधान, -के अन्तर्गत प्रत्येक मनुष्यको समान अधिकार, १०८, १०९-१०}}
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AMAN KUMAR
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Bold
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2026-08-21T16:27:30Z
AMAN KUMAR
6475
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
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{{outdent|मुहम्मद, दाउद, ४७, ६८, ७२, १०४, १७४, १७५, २७०, ३७९, ३८३, ३८४, ३९१; -का मक्कासे वापसीपर स्वागत, ४७४; -की समाज-सेवा, २७१}}
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{{outdent|मूसा, इस्माइल हाफीजी, ३७४, ३९१, ४१५}}
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{{outdent|मेघजीभाई, २३६, ३७० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|मेढ, बापुभाई दौलतराय, ४१६}}
{{outdent|मेढ, सुरेन्द्रराय बापुभाई, ४३, ४८, ५८, ११४, १५२, २४७, ३३०, ३६२, ३६८, ३७०, -से ३७४, ३७७, ३८६, ३९३, ४०४, ४०६, ४१५; -की समाजसेवा, २४१}}
{{outdent|मेमन, ३७१}}
{{outdent|मेयो, ३६८, ३७४}}
{{outdent|मेयो, श्रीमती, ३८८}}
{{outdent|मेरिमैन, जॉन जेवियर, २७७, ३४४, ४४७; -और ब्रिटनकी नौसेना; ४८४-८६; -द॰ आफ्रिकाके सर्वोत्तम राजनयिक, २९४}}
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{{outdent|मेहता, श्रीमती माणेकबाई अर्देशिर जमशेदजी, ४१७}}
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{{outdent|मेहता, छबीलदास, २५४, ३९५ -से ३९७, ४०५}}
{{outdent|मेहता, जगाभाई छबीलदास, ३९७}}
{{outdent|मेहता, नरसिंह, ६४, १४५, १५१}}
{{outdent|मेहता, डॉ॰ प्राणजीवन, १, ६, २०, ३०, ६३, ७६, १०० '''पा॰ टि॰,''' ११२, १३३, १४१, १४४, १४६, १४७ '''पा॰ टि॰,''' १५४, १६०, १६३, १७८, १८०, २४१, २९३, ३३० '''पा॰ टि॰,''' ३६२, ३६३, ३६८, ३६९, ३७१, ३७४, ३७८, ३८१, ३८४, ३८६, ३८८ -से ३९०, ३९३, ३९४, ४००, ४०९, ४१६, ४८१, ४८४; -और अकाल निधि, २२६; -फीनिक्सके न्यासपत्रके एक न्यासी, ३१८; -से फीनिक्सके खर्चेके लिए १००० पौंड देनेका अनुरोध, ११३}}
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{{outdent|मेहता, सर फीरोजशाह; -के मतसे गोखले द्वारा द॰ आफ्रिकी भारतीयोंके हकोंको तिलांजलि, ४६३-६४}}
{{outdent|मेहता, रायचंदभाई रावजीभाई, ९३}}
{{outdent|मैकिण्टायर, डब्ल्यू॰ जे॰, २७}}
{{outdent|मैक्डोनल्ड, ३७६}}
{{outdent|मैक्डोनल्ड, श्रीमती, ४१६}}
{{outdent|मैक्डोनेल, ऍरोल, ३४९}}
{{outdent|मैक्नैब, डॉ॰, २९०, २९१}}
{{outdent|मैक्लैरेन, ४०९}}
{{outdent|मैजेन्दी, डॉ॰; के मतसे दवाएँ "एक बड़ा पाखण्ड", ४३१}}
{{outdent|मैसन, जस्टिस, ३९ '''पा॰ टि॰,''' २८८, '''पा॰ टि॰,''' २८५ '''पा॰ टि॰'''}}
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{{outdent|मोटन, हबीब, ३२३, ३५१ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|मोरारजी, १३०, ३६३, ३७१, ३९४, ४०७}}
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{{outdent|मोहनलाल, ३७६, ३९०, ४०७}}
{{outdent|मोक्ष; इस जीवनमें भी शक्य, १८७}}
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{{gap|7em}}{{larger|'''य'''}}
{{outdent|यम-नियम, आत्माके आवरणको हटानेकी कुंजी, ४३३}}
{{outdent|यक्ष, -के प्रश्न और पाण्डव, १२८}}
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||बम्बईकी सुन्दरता|३४३}}</noinclude>लिए विदेशी बाजारपर आश्रित है। ऐसा व्यक्ति जो प्राणवायुके लिए यन्त्रपर आश्रित है, मरणोन्मुख व्यक्ति है। तब फिर भारतको मरणोन्मुख कहनेमें क्या बुराई है? और यदि हम इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं तो वह केवल तभी सम्भव है जब हम आत्म-त्यागका सहारा लेकर विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण बहिष्कार कर दिखायें। इसलिए इस रकमका उपयोग चरखे और हथकरघेसे यथासम्भव अधिकसे-अधिक खादी तैयार करनेमें किया जाना चाहिए। हर प्रान्तका मुख्य काम यही होना चाहिए। हमें अपनी मिलोंके उत्पादनकी जाँच करनी चाहिए और मिल-मालिकोंको इसके लिए राजी करना चाहिए कि वे अपना उत्पादन और मुनाफा राष्ट्रकी आवश्यकताओंको देखते हुए निर्धारित करें। मिलका कपड़ा तो गरीबसे-गरीब लोगोंके लिए ही रहना चाहिए; क्योंकि हम फिलहाल उनतक इसे पहुँचा नहीं सकते।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी आगामी बैठकको इसपर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और इस बहिष्कारका काम पूरा करनेके लिए कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिए।
मुख्य रूपसे बहिष्कारका भार आखिरकार बम्बईको ही उठाना है, जैसा कि उसने चन्देकी उगाहीके समय किया था। बम्बई भारतके कपड़ा बाजारको नियन्त्रित करता है। और वह कपड़ा लंकाशायर और जापानसे मँगाया जाता है। इस प्रकार बम्बईके सूत और कपड़ा आयात करनेवालों के ऊपर एक बड़ा उत्तरदायित्व है। यदि हम बहिष्कारको सफल बनाना चाहते हैं तो उन्हें देशके लिए बड़ा त्याग करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। मिल-मालिकोंका भी कोई कर्त्तव्य है। उन्होंने भारी मुनाफा कमाया है। उनके लिए बहिष्कार आन्दोलनकी भली प्रकार सहायता करना बहुत आसान है। इसके लिए राष्ट्रीय जीवनके प्रति उन्हें अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए। मिल-मजदूरोंका भी देशके प्रति कर्त्तव्य है। अबतक उनकी दिलचस्पी केवल अपनी मजदूरीमें रही। अब उन्हें जनहितका भी विचार करना पड़ेगा। अन्तमें आती है अभागी जनता जिसका मूल्य निर्धारित करनेमें कोई हाथ नहीं और जिसे मिल-मालिकों और आढ़तियोंकी इच्छानुसार दाम देने पड़ते हैं। बहिष्कारका सवाल छोड़ दें तो भी यह एक बड़ी असन्तोषजनक स्थिति तो है ही। अकाल सामने खड़ा है। अब समय आ गया है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति, देशहितकी बात भुलाकर अपना उल्लू सीधा करनेकी बजाय समस्त जनताके हितके बारेमें सोचे। सुन्दर बम्बईके सामने एक स्वर्णिम अवसर है। या तो वह अपने इस सौन्दर्यको निखारे या जो यश मिला है उससे भी हाथ धोये।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', ६-७-१९२१|1em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१५८. अपील : मिल-मालिकोंसे'''}}}}
{{Right|६ जुलाई, १९२१}}
{{Left|मिल-मालिकोंकी सेवामें<br>'''सज्जनो,'''}}
शायद आप असहयोग आन्दोलनमें विश्वास नहीं रखते। मैं जानता हूँ कि आपमें से कुछ लोगोंका खयाल यह है कि अन्तमें इसका परिणाम हिंसा ही होगा। यदि इससे आपका यह आशय है कि हिंसा उस सरकारकी ओरसे होगी जो सत्ता नहीं छोड़ना चाहती तो आपका कहना सही है। यदि धारवाड़ कांग्रेसके मन्त्रीकी रिपोर्टपर विश्वास किया जाये तो वहाँकी घटना इसका एक ताजा उदाहरण मालूम होती है। आपमें से कुछ लोग यह समझते हैं कि आन्दोलनसे, चाहे वह सफल हो चाहे अस-फल, देशको हानि ही पहुँचेगी। मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि फिलहाल अहिंसाकी बातपर न सोचें और इस समय विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका जो आन्दोलन तीव्र किया जा रहा है, आप उसका अध्ययन करें। मैं जब बंगाल जाता हूँ तभी बंगाली लोग मुझसे यह कहनेमें नहीं चूकते कि जब बंगभंग विरोधी आन्दोलन चल रहा<ref>१९०५ में और उसके बाद।</ref> था तब मिल-मालिकोंने सहायता नहीं दी थी; इतना ही नहीं उन्होंने कीमतें बढ़ा दीं, कपड़ोंमें ज्यादा माँड़ी देकर उन्हें कुछ-का-कुछ दिखाया, यहाँतक कि स्वदेशीके नामपर हमारे सिर विदेशी कपड़ा मढ़कर हमें धोखा दिया। मैं नहीं जानता कि इन आरोपोंमें सचाई कितनी है। लेकिन आप इस बातमें मुझसे सहमत होंगे कि यदि उनके आरोप सच हैं तो वे मिल-मालिकोंके लिए किसी श्रेयके द्योतक नहीं हैं।
इस समय देशपर जो उस बारसे भी बड़ा संकट आया हुआ है उसमें आप लोग कौन-सा मार्ग ग्रहण करेंगे, यदि इसके सम्बन्धमें मुझे सन्देह न होता तो मुझे ये आरोप याद न आते। मुझसे कई मित्रोंने कहा है कि राष्ट्रको आप लोगोंसे किसी बातकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वे कहते हैं कि अपवादस्वरूप एक या दो सच्चे लोगोंको छोड़कर आपने तिलक स्वराज्य-कोषमें कुछ नहीं दिया है। मैंने आपके चन्दा न देनेका
बचाव इस आधारपर किया है कि आपमें से जिनको इसमें कोई वैचारिक आपत्ति नहीं उन्होंने संकोच या भयके कारण ऐसा किया है। मैं अपने मनमें यह बात तो नहीं आने देना चाहता कि जब आपकी सहायताकी अत्यन्त आवश्यकता है तब आप व्यवसायियोंकी हैसियतसे देशकी मदद नहीं करेंगे। लेकिन जो व्यापारी विदेशी कपड़ेका व्यापार करते हैं और जिन्हें मैं यह समझा रहा हूँ कि उन्हें देशकी भावना पहचाननी चाहिए और विदेशी कपड़ेका व्यापार बन्द कर देना चाहिए, वे मुझे यह कहकर डराते हैं कि इस आन्दोलनमें उनकी मददका परिणाम केवल यह होगा कि आप, मिलोंके मालिक-गण, तुरन्त कीमतें बढ़ा देंगे और कीमतें बढ़ानेके समर्थनमें राष्ट्रके सामने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||अपील : मिल-मालिकोंसे|३४५}}</noinclude>उपलब्धि और माँगके नियमको प्रस्तुत करेंगे एवं इस प्रकार हालत जितनी खराब अब है उससे भी ज्यादा खराब हो जायेगी। वे मुझसे कहते हैं कि वे विदेशी कपड़ेका व्यापार खुशीसे छोड़ देंगे परन्तु इस शर्तपर कि उन्हें इस बातका विश्वास दिला दिया जाये कि आप लोग उपलब्धि और माँगके नियमकी बात नहीं उठायेंगे और कीमतें न बढ़ाना अपना कर्त्तव्य समझेंगे। सन् १९१९ में आपमें से कुछ लोगोंने मुझसे यह कहा था कि यदि आप कीमतें न भी चढ़ायें तो भी फायदा उपभोक्ताको नहीं बल्कि बीचके लोगोंको होगा और वे लूट मचायेंगे। मेरा खयाल है कि आप जैसे बुद्धिमान व्यवसायियोंके लिए यह तर्क देना अशोभनीय है। आप अपने बनाये हुए मालके व्यापारको, जबतक वह उपभोक्ताओं तक न पहुँचे, भलीभाँति नियन्त्रित कर सकते हैं। आपको तो इतना ही करना है कि आप अपने व्यापारमें थोड़ी-सी राष्ट्रीय भावनाका समावेश करें।
मैं यह नहीं कहता कि आप परोपकार करें, यद्यपि आप व्यापार करते हुए परोपकारकी भावना भी रखें तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं होगा। लेकिन मैं यह प्रार्थना अवश्य करता हूँ कि आप अपने व्यापारको विशुद्ध स्वार्थके बजाय राष्ट्रीय आधारपर चलायें। कोई आदमी महज इसलिए कि वह अपने और अपने हिस्सेदारोंका खयाल रखनेके साथ-साथ राष्ट्रका भी खयाल रखता है कम व्यवसायकुशल नहीं हो जाता। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध कि असहयोग के सम्बन्धमें अपने विचारोंको कोई क्षति पहुँचाये बिना यह आश्वासन अवश्य दें कि यदि विदेशी मालके प्रस्तावित बहिष्कारके कारण माँग बढ़ गई तो आप केवल उसी बातको लेकर अपने कपड़ेके भाव नहीं बढ़ायेंगे और इस सम्बन्धमें व्यापारियों और उपभोक्ताओंको डरनेकी कोई जरूरत नहीं है। देशको आपसे कमसे-कम इतनी अपेक्षा रखनेका अधिकार तो है ही।
{{Right|आपका विश्वस्त मित्र,<br>{{larger'''मो॰ क॰ गांधी'''}}}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ६-७-१९२१|1em}}
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||अपील : मिल-मालिकोंसे|३४५}}</noinclude>उपलब्धि और माँगके नियमको प्रस्तुत करेंगे एवं इस प्रकार हालत जितनी खराब अब है उससे भी ज्यादा खराब हो जायेगी। वे मुझसे कहते हैं कि वे विदेशी कपड़ेका व्यापार खुशीसे छोड़ देंगे परन्तु इस शर्तपर कि उन्हें इस बातका विश्वास दिला दिया जाये कि आप लोग उपलब्धि और माँगके नियमकी बात नहीं उठायेंगे और कीमतें न बढ़ाना अपना कर्त्तव्य समझेंगे। सन् १९१९ में आपमें से कुछ लोगोंने मुझसे यह कहा था कि यदि आप कीमतें न भी चढ़ायें तो भी फायदा उपभोक्ताको नहीं बल्कि बीचके लोगोंको होगा और वे लूट मचायेंगे। मेरा खयाल है कि आप जैसे बुद्धिमान व्यवसायियोंके लिए यह तर्क देना अशोभनीय है। आप अपने बनाये हुए मालके व्यापारको, जबतक वह उपभोक्ताओं तक न पहुँचे, भलीभाँति नियन्त्रित कर सकते हैं। आपको तो इतना ही करना है कि आप अपने व्यापारमें थोड़ी-सी राष्ट्रीय भावनाका समावेश करें।
मैं यह नहीं कहता कि आप परोपकार करें, यद्यपि आप व्यापार करते हुए परोपकारकी भावना भी रखें तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं होगा। लेकिन मैं यह प्रार्थना अवश्य करता हूँ कि आप अपने व्यापारको विशुद्ध स्वार्थके बजाय राष्ट्रीय आधारपर चलायें। कोई आदमी महज इसलिए कि वह अपने और अपने हिस्सेदारोंका खयाल रखनेके साथ-साथ राष्ट्रका भी खयाल रखता है कम व्यवसायकुशल नहीं हो जाता। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध कि असहयोग के सम्बन्धमें अपने विचारोंको कोई क्षति पहुँचाये बिना यह आश्वासन अवश्य दें कि यदि विदेशी मालके प्रस्तावित बहिष्कारके कारण माँग बढ़ गई तो आप केवल उसी बातको लेकर अपने कपड़ेके भाव नहीं बढ़ायेंगे और इस सम्बन्धमें व्यापारियों और उपभोक्ताओंको डरनेकी कोई जरूरत नहीं है। देशको आपसे कमसे-कम इतनी अपेक्षा रखनेका अधिकार तो है ही।
{{Right|आपका विश्वस्त मित्र,<br>{{larger|'''मो॰ क॰ गांधी'''}}}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ६-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|7em}}<noinclude></noinclude>
5axh4rcfik2u7mci6i085x5x5cc5ah4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९६
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Bikki97
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<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५६०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
नीति-नियमोंके सम्बन्धमें एक प्रश्नकर्त्ताको उत्तर देते हुए इस बातको नजर-
अन्दाज न करते ।
यदि नापतौल कर बात कहनेवाले इन पत्र - लेखक द्वारा उद्धृत किया गया उदा-
हरण एक अपवाद है तो मैं ऐसे दूसरे कई उदाहरण उद्धृत कर सकता हूँ । मनुष्य
प्रायश्चित्तके रूपमें आत्मशुद्धिके लिए और स्वास्थ्य-सुधारके विचारसे उपवास कर
सकता है । कदाचित् ऐसे और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं । किन्तु पहले लेखमें मैंने
सत्याग्रह सम्बन्धी उपवासकी मर्यादाएँ बताई हैं, अर्थात् मैंने यह बताया है कि जब
आप, लोगोंपर प्रभाव डालनेके लिए उपवास करें तब आपको क्या करना चाहिए।
कथित अपवाद इस मामलेसे भिन्न है । वहाँ अपमान अनुभव किया गया था और
उसके विरुद्ध आपत्ति की गई थी । " सत्याग्रह अथवा दुराग्रह" शीर्षक लेखमें ऐसे
उपवासकी बुराईपर जोर दिया गया था कि जिसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्तिको
उचित अधिकार द्वारा प्राप्त अपनी वस्तु या राशि देनेपर विवश करने की दृष्टिसे
इसका प्रयोग करे और जबकि वह दूसरा उस वस्तु या राशिपर उपवास करनेवालेका
अधिकार स्वीकार न करता हो ।
{{C|'''हिन्दू और हिन्दुत्व'''}}
एक पत्रलेखक जो 'यंग इंडिया' को बहुत धैर्य और लगनसे पढ़ता है, लिखता है :
एक सहायक एक्जीक्यूटिव इंजीनियरके धर्म-सम्बन्धी प्रश्नके उत्तरमें आपने
अपने १४-१०-१९२६ के अंकमें लिखा है: 'स्थूल रूपसे हिन्दू वह है जो
ईश्वरमें विश्वास करता है, आत्माकी अनश्वरता मानता है, आदि ।
इसे पढ़कर मुझे यह लोभ हो गया है कि मैं आपके लगभग दो वर्ष
पहलेके लिखे लेखको आपके सामने रखूं। आपने २४ अप्रैल, १९२४के 'यंग
इंडिया 'के पृष्ठ १३६ पर' लिखा था : 'यदि मुझसे हिन्दू धर्मको व्याख्या करनेके
लिए कहा जाये तो में इतना ही कहूँगा अहिंसात्मक साधनों द्वारा सत्यकी
खोज । कोई मनुष्य ईश्वरमें विश्वास न करते हुए भी अपने-आपको हिन्दू कह
सकता है। सत्यकी अथक खोजका ही दूसरा नाम हिन्दू धर्म है ।
इन दोनों उद्धरणोंमें अंशोंको रेखांकित मैंने किया है ।
मुझे आश्चर्य है कि पत्र लेखकको इन दोनों कथनोंमें भेद दिखाई नहीं देता ।
एकमें प्रत्यक्ष हिन्दूका उल्लेख है । ईश्वरके अस्तित्वको न मानना हिन्दुत्वका लक्षण
नहीं है। करोड़ों हिन्दू ईश्वरमें विश्वास करते हैं। इसलिए यही कहा जा सकता है
कि ' हिन्दू ईश्वरमें विश्वास करते हैं।' किन्तु एक मनुष्य ईश्वरमें विश्वास न करते
हुए भी अपनेको हिन्दू कह सकता है । इस दूसरे लेखमें मैंने इसकी विस्तृत व्याख्या
देनेका प्रयत्न किया है। पहले लेखमें मैंने बहुत हदतक सामान्य उदाहरण दिया है ।
इसलिए मुझे दोनों स्थितियोंमें कोई विरोध दिखाई नहीं देता ।
१. देखिए “ प्रश्नोत्तर ", १४-१०-१९२६ ।
२. देखिए खण्ड २३, पृष्ठ ५१७<noinclude></noinclude>
muawq3pwe35va1es0us3a7g3ul1h5og
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९७
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Bikki97
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||किसानोंके लिए एक नियामत}}
{{Rh||चुंगीमें अवैध वसूली|
५६१}}
एक यात्री अभी हालमें दक्षिण आफ्रिकासे लौटा है। उसने मुझसे पूछा कि
चुंगीके महकमे में अवैध रूपसे रुपया ऐंठनेकी जो बुराई है और जो एक नियम जैसी
बन गई है, क्या उसको समाप्त करना सम्भव नहीं है । यद्यपि उनके सामानमें चुंगीकी
कोई चीज नहीं थी, फिर भी समयपर पीछा छुड़ानेके लिए उनको रिश्वत देनी पड़ी।
मैंने उससे पूछा,
क्या आप इस मामलेमें काफी समय देंगे और कष्ट सहेंगे एवं जाँच
करवायेंगे ।" उसने कहा : " मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगा ।" सबकी सहज वृत्ति यही है
और यही उस रिश्वतखोरीका कारण है जो चुंगी विभागमें ही नहीं, रेल विभाग में
भी चल रही है । यह तो सच है कि यदि लोग अपनी शिकायतें दूर करवाना चाहते
हैं तो उन्हें कुछ समयतक असुविधा भी उठानी चाहिए, फिर भी अधिकारियोंका
कर्तव्य है कि वे जितना बने इस तरह जबर्दस्ती रुपया ऐंठनेकी इस रूढ़ प्रक्रियाको
रोकें, जिसके कारण इन बेचारोंको कष्ट उठाने पड़ते हैं । यदि कुछ लोक-सेवी युवक
जबर्दस्ती रुपया वसूली करनेकी इन घटनाओंके स्वयं शिकार बनें और इनकी सूचना
उचित अधिकारियोंको दें, तो यह कोई बुरी बात न होगी । ऐसी कुछ घटनाएँ होंगी तो
यह बुराई कम हो जायेगी। इसमें सन्देह नहीं कि इस बुराईको दूर करनेका एकमात्र
उपाय यही है कि लोग रिश्वत न दें । जबतक ऐसे लोग हैं जो वाजिब चुंगीसे बचना
चाहते हैं तबतक ऐसे चुंगी अधिकारी भी रहेंगे जो अपना मेहनताना माँगेंगे ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २८-१०-१९२६
{{C|'''५८२. किसानों के लिए एक नियामत'''}}
कुछ मास हुए मद्रासके श्रीयुत रामचन्द्रनने जो कि कृषि शिक्षामें स्नातक हैं,
मुझे लिखा है कि आश्रमके लाभके लिए कूप-कोस (वैल लिफ्ट) का उपयोग कीजिए ।
उन्होंने विश्वासके साथ कहा कि इससे पैसे और मोट आदि खींचनेवाले पशुओंके
श्रममें, खासी बचत हो जायेगी । इस ईजादसे में आकर्षित हुआ और मैंने श्री राम-
चन्द्रनको लिखा कि अगर आप स्वयं आ सकें और अपने तरीकेको कामयाबीसे जमा
जायें तो हम एक कोस खरीद लेंगे। उन्होंने बड़ी तत्परता दिखाई और उसके फल-
स्वरूप, एक माससे अधिक हुआ, आश्रममें इस नई विधिसे काम लिया जा रहा है ।
आश्रममें, जिस किसीको कृषि विद्याका जरा भी ज्ञान है, वह इस विधिसे पूर्णरूपेण
सन्तुष्ट है । बात और पक्की करनेके लिए, मैंने उसे एक इंजीनियरको दिखाया ।
उसने भी यही कहा कि मेरी रायमें यह ईजाद निहायत मुकम्मिल और बहुत ही
सूझ-बूझकी है। आविष्कर्त्ताने अपने आविष्कारके बारेमें यह कहा है :
योग्य भूमिकी ८० फी सैकड़ा भूमि ऐसी है जिसमें आबपाशी
नहीं होती है; मुझे यकीन है कि कुओंसे पानी खींचकर आबपाशी की पद्धतिका
३१-३६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५६२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मयh}}
तेजी से प्रसार करना ही हमारी कृषि सम्बन्धी समस्याका सच्चा हल है। सूखी
धरतीसे ३० रुपये फी एकड़से अधिक आमदनी नहीं होती, लेकिन कुऍसे आबपाशी
करनेपर आमदनी फी एकड़ २०० रुपये से लेकर १,००० रुपयेतक होती है और
साथ ही बहुतसे परिवारोंको बारहों महीने काफी काम भी मिलता रहता है।
इसमें खास अड़चन यही है कि इसके लिए कीमती बैलोंकी एक जोड़ीकी जरूरत
पड़ती है । बहुधा लगातार जुआ रखे जानसे उनके कांधोंमें कोई तकलीफ हो
जाया करती है, उनकी तन्दुरुस्ती बिलकुल बिगड़ जाती है और वे उतने उपयोगी
नहीं रह पाते। इस कठिनाईको दूर करनेकी गरजसे, लगभग १४ वर्ष हुए,
मैंने अपने प्रयोग प्रारम्भ किये थे, और अब अपनी इस छोटी-सी चीजको,
जो कि सत्याग्रह आश्रममें अच्छी तरह चल रही है, जनताके सामने रखा है।
यह एक मामूली कोस है जिसे चरस या मोट कवलाई भी कहते हैं। इसमें
खासियत यह है कि ढालू सतहपर लोहेकी पटरियोंपर चलनेवाली एक गाड़ी
है । यह गाड़ी जानवरके महज बोझसे ही चल पड़ती है। जिस प्रकार कोई
मनुष्य १ घंटे में पैदल केवल तीन मील ही चल सकता है, लेकिन पैरगाड़ीपर
१२ मील फो घंटे की रफ्तारसे जा सकता है, उसी प्रकार इस ट्रॉलीके कारण,
मामूली तौरसे किये जानेवाले कामका चौगुना काम हो जाता है । रगड़में
बचतकी वजहसे दोके बजाय एक ही जानवरसे साधारणतया उतना ही काम
निकल आता है । और खींचने में जो शक्ति व्यर्थ जाती है, सो भी बच जाती
है । यही एक जानवर, खींचने की मेहनत से बच जानेके कारण की घंटा दुगुना
पानी खींचता है। इस प्रकार पानीकी मिकदार डोलकी शकल या माप हो से
निश्चित नहीं होती, और न लगाये हुए जानवरोंकी संख्या या श्रमसे, बल्कि
डोलके भीतरी घनफल और फी घंटे खींचे जानेवाले डोलोंकी संख्याके गुणन-
फलसे होती है।
विशेषज्ञों द्वारा सारे हिन्दुस्तान में यह बात जाँची और लेखी जा चुकी है कि
अच्छे बैलोंकी एक जोड़ी, जिनका मूल्य ३०० रुपयेसे ४०० रुपये है, २० फीटकी
गहराई से केवल १,६०० गैलन पानी फी घंटा खींचते हैं। अन्य स्थानोंकी भाँति
आश्रममें भी में यह दिखा रहा हूँ कि किस प्रकार एक भैंसा (जिसे आश्रमने
३१ रुपये में खरीदा था) २,००० गैलन पानी की घंटा खींचता है (प्रत्येक
३२ गॅलनके [ लगभग ] ६० डोल) । कुऍकी गहराई ३४ फीट है। और पुराने
तरीकेसे दो कीमतो बैल १,००० गॅलनसे कुछ ही ज्यादा पानी फी घंटे खींच
सकते हैं (३० डोल प्रत्येक ३५,३५ गॅलनके) । मैंने मद्रास कृषि और उद्योग
विभागोंके २० से अधिक अफसरोंको गत ११ वर्षोंमें अपना बहुत-सा रुपया खर्च
करके यह दिखाया है, और वे मान भी गये; लेकिन सब व्यर्थ ही हुआ ।
नागपुर में जब में इस कोसका प्रयोग दिखा रहा था, तब डाक्टर क्लाउस्टनने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||किसानोंके लिए एक नियामत|
५६३}}
इस यन्त्रकी सादगी, परम उपयोगिता और पशुके प्रति दयाभाव -- इन सब
गुणोंको माना और बहुत पसन्द किया था ।
५० फीटके ढ़ालके योग्य सामग्रीकी लागत २७५ रुपये होती है। लेकिन श्रीयुत
रामचन्द्रन कहते हैं कि यदि यह कोस लोकप्रिय हो जाये तो मूल्य और कम किया
जा सकता है । गहराईके खयालसे श्रीयुत रामचन्द्रन कहते हैं कि ३० फीटकी गहराईके
लिए उसकी लागत २३० रुपये ही होगी और समुचित संगठन द्वारा यह कोस हिन्दुस्तानी
किसानोंके लिए १५० रुपये में भी तैयार हो सकता है। मैंने उन्हें यह भी सुझाया है
कि यदि पेटेंट-स्वत्व छोड़ दिया जाये या उसके जो पुर्जे अमुक स्थानपर अपने ही
यहाँ तैयार किये जा सकते हैं, वे या तो बना या खरीद लिये जायें तो मूल्यमें और
भी कटौती की जा सकती है। कोसके इस वर्तमान मूल्यमें एक भैंसेका मूल्य फर्ज
कर लें, ३० रु० और जोड़ दें। तब भी कोसकी पूरी लागत ३०५ रुपये से अधिक न
होगी। दो बैल ३०० रुपये से लेकर ४०० रुपये तकमें मिलेंगे। उनपर होनेवाला माहवारी
खर्च तो आधा ही हो जायेगा। दो बैलोंको पालनेमें ५० से ६० रु० लगेंगे। लेकिन एक
भैंसा २० से २५ रुपयेतक में पाला जा सकता है। इस आविष्कारसे सबसे बड़ा लाभ
यह है कि पशुओंकी मेहनतमें बहुत बचत हो जाती है । और उससे भी बड़ा फायदा
तो यह है कि भैंसे काममें लाये जा सकते हैं -- वे अधिकांशतः अपनी अनुपयोगिताके
कारण (अगर वे बूचड़खानोंसे बच जाते हैं तो ) यों ही भूखों मर जाते हैं ।
इसलिए आश्चर्यकी बात तो यह है कि यह आविष्कार सरकारका ध्यान अपनी
ओर क्यों नहीं खींच पाया। श्रीयुत रामचन्द्रनको उन अधिकारियोंकी उदासीनतासे
सख्त शिकायत है, जिन-जिनके पास उन्होंने अपनी फरियाद पेश की है। लेकिन मैंने
उनकी इन शिकायतोंका खास जिक्र न करना ही अच्छा समझा । जो लोग चाहें आश्रम
आकर इस कोसको सुबहके वक्त चालू हालतमें देख सकते हैं। चूंकि आजकल आश्रमको
बहुत ज्यादा पानीकी जरूरत नहीं है, इसलिए कोस दिनभर चालू नहीं रखा जाता ।
लेकिन ८ बजेसे १० बजेतक तो हमेशा ही चला करेगा और स्वयं आविष्कर्त्ताकी
देखरेखमें रहेगा, जो कि उसके विषयमें सारी बातें स्वयं समझाया करेंगे ।
एक मित्रने पूना कृषि-प्रदर्शनीके सिलसिलेमें मुझे लिखा है :
मैं यहाँ राशि राशि कलों और औजारोंको देखता हूँ; इनमें से अधिकांश
हम कभी इस्तेमाल ही नहीं कर सकते। मुझे वह चीज तो यहाँ दिखाई ही
नहीं देती जो कि भारतवर्षमें मनुष्य एवं पशुके लिए महा उपयोगी है -- यानी
रामचन्द्रन् कोस' ।
मैं कृषि विद्याके बारेमें इतना अधिक तो नहीं जानता जितना कि उक्त मित्र
अपने जोशको प्रमाणित करते हुए कहते हैं; लेकिन इतना कह सकनेके योग्य जरूर
जानता कि इस कोसकी परीक्षा ऐसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की जानी जरूरी है, जो
भारतवर्षकी कृषि सम्बन्धी समस्याओंमें दिलचस्पी रखता हो ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २८-१०-१९२६<noinclude></noinclude>
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Bikki97
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<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||किसानोंके लिए एक नियामत|
५६३}}
इस यन्त्रकी सादगी, परम उपयोगिता और पशुके प्रति दयाभाव -- इन सब
गुणोंको माना और बहुत पसन्द किया था ।
५० फीटके ढ़ालके योग्य सामग्रीकी लागत २७५ रुपये होती है। लेकिन श्रीयुत
रामचन्द्रन कहते हैं कि यदि यह कोस लोकप्रिय हो जाये तो मूल्य और कम किया
जा सकता है । गहराईके खयालसे श्रीयुत रामचन्द्रन कहते हैं कि ३० फीटकी गहराईके
लिए उसकी लागत २३० रुपये ही होगी और समुचित संगठन द्वारा यह कोस हिन्दुस्तानी
किसानोंके लिए १५० रुपये में भी तैयार हो सकता है। मैंने उन्हें यह भी सुझाया है
कि यदि पेटेंट-स्वत्व छोड़ दिया जाये या उसके जो पुर्जे अमुक स्थानपर अपने ही
यहाँ तैयार किये जा सकते हैं, वे या तो बना या खरीद लिये जायें तो मूल्यमें और
भी कटौती की जा सकती है। कोसके इस वर्तमान मूल्यमें एक भैंसेका मूल्य फर्ज
कर लें, ३० रु० और जोड़ दें। तब भी कोसकी पूरी लागत ३०५ रुपये से अधिक न
होगी। दो बैल ३०० रुपये से लेकर ४०० रुपये तकमें मिलेंगे। उनपर होनेवाला माहवारी
खर्च तो आधा ही हो जायेगा। दो बैलोंको पालनेमें ५० से ६० रु० लगेंगे। लेकिन एक
भैंसा २० से २५ रुपयेतक में पाला जा सकता है। इस आविष्कारसे सबसे बड़ा लाभ
यह है कि पशुओंकी मेहनतमें बहुत बचत हो जाती है । और उससे भी बड़ा फायदा
तो यह है कि भैंसे काममें लाये जा सकते हैं -- वे अधिकांशतः अपनी अनुपयोगिताके
कारण (अगर वे बूचड़खानोंसे बच जाते हैं तो ) यों ही भूखों मर जाते हैं ।
इसलिए आश्चर्यकी बात तो यह है कि यह आविष्कार सरकारका ध्यान अपनी
ओर क्यों नहीं खींच पाया। श्रीयुत रामचन्द्रनको उन अधिकारियोंकी उदासीनतासे
सख्त शिकायत है, जिन-जिनके पास उन्होंने अपनी फरियाद पेश की है। लेकिन मैंने
उनकी इन शिकायतोंका खास जिक्र न करना ही अच्छा समझा । जो लोग चाहें आश्रम
आकर इस कोसको सुबहके वक्त चालू हालतमें देख सकते हैं। चूंकि आजकल आश्रमको
बहुत ज्यादा पानीकी जरूरत नहीं है, इसलिए कोस दिनभर चालू नहीं रखा जाता ।
लेकिन ८ बजेसे १० बजेतक तो हमेशा ही चला करेगा और स्वयं आविष्कर्त्ताकी
देखरेखमें रहेगा, जो कि उसके विषयमें सारी बातें स्वयं समझाया करेंगे ।
एक मित्रने पूना कृषि-प्रदर्शनीके सिलसिलेमें मुझे लिखा है :
मैं यहाँ राशि राशि कलों और औजारोंको देखता हूँ; इनमें से अधिकांश
हम कभी इस्तेमाल ही नहीं कर सकते। मुझे वह चीज तो यहाँ दिखाई ही
नहीं देती जो कि भारतवर्षमें मनुष्य एवं पशुके लिए महा उपयोगी है -- यानी
रामचन्द्रन् कोस' ।
मैं कृषि विद्याके बारेमें इतना अधिक तो नहीं जानता जितना कि उक्त मित्र
अपने जोशको प्रमाणित करते हुए कहते हैं; लेकिन इतना कह सकनेके योग्य जरूर
जानता कि इस कोसकी परीक्षा ऐसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की जानी जरूरी है, जो
भारतवर्षकी कृषि सम्बन्धी समस्याओंमें दिलचस्पी रखता हो ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २८-१०-१९२६<noinclude></noinclude>
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|६१८|सम्पूर्ण गांधी वाड़मय्}}
{{Multicol}}
{{outdent|जैन-धर्म, १२९, ५२७}}
{{outdent|जैनी, ५२७, ५३५}}
{{outdent|जैनी स्वयंसेवक परिषद, २५८}}
{{outdent|जोन्स, ई० स्टेवली, ११३, १९८}}
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{{outdent|जोशी, छगनलाल, ८८}}
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{{outdent|झवेरी, रेवाशंकर ज०, १८६, २००, २२६, ३७७, ५११}}
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{{outdent|टाटा, रतन, ३५७}}
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{{c|'''ठ'''}}
{{outdent|ठक्कर, गोकुलदास हीरजी, ६०}}
{{outdent|ठाकुर, रवीन्द्रनाथ, ५६५}}
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{{outdent|तुलसीदास, गोस्वामी, १६६, ३०५, ३६३}}
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{{outdent|तेरसी, लखमसीदास आर०, ४६७}}
{{outdent|तैयबजी, अब्बास, १२०}}
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{{outdent|दक्षिण आफ्रिकी कांग्रेस, ५७६}}
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{{outdent|दासगुप्त, हेमप्रभादेवी, ३४, २१५, २१८, ३१६, ३५२, ४०५, ५२३}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६५५
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Koyal Singh
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<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१९}}
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{{outdent|देव, एस० डी०, ४०१}}
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{{outdent|देसाई, महादेव, ४०, ५९, ८८, ९६, १३०, १७२, २६५, ३१०, ४४२, ५११, ५७२}}
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{{outdent|धर्म, २५, १२८, १३२, १६६, २४४, २४५, २५१, २५४, ३८६, ४१५, ४२३, ५१८, ५४२, ५८१; –और अहिंसा, ५२७-२८; –और आर्थिक कार्य, २८६}}
{{outdent|ध्रुव, आनन्दशंकर, –और राष्ट्रीय शिक्षा, २८९}}
{{c|'''न'''}}
{{outdent|नटराजन, क०, २६२}}
{{outdent|नन्दा, गुलजारीलाल, १३७}}
{{outdent|नम्बूद्रिपाद, कुरूर नीलकण्ठन, १५१}}
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{{outdent|नरम दल (लिबरल पार्टी), १९६}}
{{outdent|नृसिंहराव, ५७२}}
{{outdent|नवजीवन, ५४, ६४-६५, ६८, १२७, १६४, २००, २०४, २१२, २१९, २२२, २४६, २५१, २५२, २५८, २८६, ३२७, ३३३, ३५९, ४४६, ४५२, ४७१, ४९०, ५०२, ५०७, ५४५, ५५२, ५५८, ५७३, ५८४}}
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{{outdent|नाभा महारानी, ३१०}}
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{{outdent|पटनायक, निरंजन, ५०५}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६५६
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{{outdent|पट्टणी, श्रीमती प्रभाशंकर, ४२४}}
{{outdent|पण्ड्या, मोहनलाल, ६५, १६०, २४५, २६१}}
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{{outdent|पोलक, एच० एस० वाल्डो, २३६, ५५५, ५६४}}
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{{outdent|फड़के, वामन लक्ष्मण, ८८, १७३}}
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{{outdent|बजाज, ओम, २११}}
{{outdent|बजाज, जमनालाल, १, १८, २९, ३७, ५९, ७३, ७५, ९०, ११२, १२२, १३६, १५९, १७०, २१०, २१९, २४४, २६२, २९१, ३१९, ३२७, ३५७, ४०१, ४४९, ४९३, ५११}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६५७
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{{outdent|बजाज, राधाकृष्ण, २६७}}
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{{outdent|बानपारी, अब्बास अब्दुल्लाभाई, ३१८}}
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{{outdent|बाल-विवाह, १२९, ३४२, ३४४-४५, ३९२-९६}}
{{outdent|बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर, ५११}}
{{outdent|बिड़ला, घनश्यामदास, २४, ११२, १५९, १८४, २००, २४५, २५९, २९२, ३११, ३२९, ३३१, ३५२, ३५४, ३५७, ३७२, ५४१}}
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{{outdent|बैंकर, शंकरलाल, ३२, ३७, ५६, १२१, १३३, १३७, १६३, २७८}}
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{{outdent|बैप्टिस्टा, जोसेफ, ४०१}}
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{{outdent|बोस, डा० सुधीन्द्र, १८५}}
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{{outdent|बोस, सुभाषचन्द्र, ५५३}}
{{outdent|ब्यूरो, पॉल, ८०-८२, १०९-११, १४१-४६, १९०, २२६-२९, २६९-७२, २९६-९८, ३२०, ३२४, ३६६}}
{{outdent|ब्रह्मचर्य, १५५, १५४, १८७, ३५४, ४३९, ४७३, ५६८; –और प्राणायाम, ७०}}
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{{outdent|'''भगवद्गगीता''', ४३, ७०, २१४, २१८, ३६३, ४१२, ४८५, ५८२; –और '''रामायण''' की कक्षाएं, २३४}}
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{{outdent|भट्ट, गोकुलभाई, डी०, ३०९}}
{{outdent|भट्ट, नानाभाई, ४५, १२१, १७२, २१२, २४५, २५४, २८२, ३३७, ३५०, ३७८, ३८०, ४१३, ४४५}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६५८
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{{outdent|भावे, विनोबा, ३६८}}
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{{outdent|मालवीय, मदनमोहन, २९२, २९९, ३११, ४९२, ४०३; –और बंगाल सरकार, ३४२-४३}}
{{outdent|माल्थस, ३२०}}
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{{outdent|मेहता, डा० प्राणजीवन, २९, ३९, ३७८, ४३५, ५३५}}
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{{c|'''य'''}}
{{outdent|'''यंग इंडिया''', १५, २४, ३२, ४१, ६३, ६५, ८५, ८६, १००, १०५, १४४, १७८, १७९, १९६, २०८-१०, २२२, २३२, २४३, २६३, २७१, २७७-७८, २८३, २९५, ३०६, ३४५, ३६६, ३७५, ३८९, ३९२, ३९४, ४१७, ४२७, ४३७, ४३९, ४४३, ४५२, ४७१, ५०१, ५०२, ५०५, ५१५, ५२६, ५३५, ५३८, ५५८, ५६०, ५८१, ५८२}}
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{{outdent|रंगनचेट्टी, सी० बी०, १७४}}
{{outdent|रंगभेद विधेयक, ७७, ७८, ३४४; –[ ] का पास होना, १०}}
{{outdent|रजब अली, डा०, ५३२}}
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{{outdent|राजगोपालाचारी, च०, २०, २२, ३२, ७४, १०४, १३३, १३६, १३७, ४०१, ५०५, ५०६, ५७२}}
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{{outdent|'''रामायण''', १६६, २१४, २४९, ३०५, ३६३, ३९३, ४२५; –और '''भगवद्-गीता'''की कक्षाएँ, २३}}
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{{outdent|राव, सी० बालाजी, ४६, ४६२}}
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{{outdent|राष्ट्र-संघ, ४३०-३१}}
{{outdent|राष्ट्रीय विनय मंदिर बम्बई, ३३३-३४}}
{{outdent|राष्ट्रीय शालाएँ, ८, २६१, २८७, ३३३-३४, ३५९-६१, ३८२}}
{{outdent|राष्ट्रीय शिक्षा, ३०१, ४७९-८०; –और आनन्दशंकर ध्रुव, २८९}}
{{outdent|राष्ट्रीय स्त्री-मण्डल, २१६, ३१५}}
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{{outdent|रुडसन, १०९}}
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{{outdent|रोमां रोलाँ, ५२६, ५६५}}
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{{outdent|रोसिश्रोता, १४३}}
{{c|'''ल'''}}
{{outdent|ल इनडिसिप्लिन बेस मॉरस, ८०}}
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{{outdent|लक्ष्मीदास, २९, ५६९}}
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{{outdent|लाजपतराय, लाला, ६, ३८२, ४१२, ५०३}}
{{outdent|लारेंस, हेनरी, ३३२, ३५३, ३७७, ४४२}}
{{outdent|लालजी नारणजी, सेठ, १९, २९, ७५, ३७६, ३७७, ३८१}}
{{outdent|लालन, पण्डित, ५५७}}
{{outdent|लाहिड़ी, बीरेन्द्रचन्द्र, २७६}}
{{outdent|लिडसे, सर डेरे, ५३१}}
{{outdent|लीज, नॉर्मन, १९६, ३७०, ५२३}}
{{outdent|लेले, पुरुषोत्तम रामचन्द्र, १११}}
{{outdent|लेले, श्रीमती पुरुषोत्तम रामचन्द्र, ११२}}
{{c|'''व'''}}
{{outdent|'''व'''जे, ५६६}}
{{outdent|वधूगल मघीरमल, ५५०}}
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{{outdent|वरदराजुलु, डा०, ५३२}}
{{outdent|वरदाचारी, एस० एन०, ३१}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६६१
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{{outdent|शंभूशंकर, ४४, ९१-९२, १२०, २४०, ३५३}}
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{{outdent|'''षड्दर्शन समुच्चय ग्रंथ बोध''', ५४१}}
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{{outdent|संघ समझौता अधिनियम, १९२१, ११}}
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{{outdent|सत्याग्रह, ३६, १३८, १६०, ४१३-१४, ४७३, ५५९, ५६०; –दक्षिण अफ्रीकामें, ५०४}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६६२
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{{outdent|साठे, डा०, ५२०}}
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{{outdent|सोबानी, उमर, १४७-४८, १६२, १६३}}
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{{outdent|स्वदेशी, १२, १३, १४९, ४१५; –और खादी, ७८; –और रंगभेद, ७७-८०}}
{{outdent|स्वराज्य, ४९, ६३, १३२, १३५, २०७, २५२, २८९, ३०१, ३०४, ३१३, ३४२, ३६१, ३८२, ४२६, ५१२, ५७९, ५८०; –मिलोंमें, ५५३}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६६३
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Koyal Singh
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<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६२७}}
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{{outdent|हॉल्ट, कु० नेली ली, २३७}}
{{outdent|हॉवर्ड, श्रीमती पी० आर०, ११७}}
{{outdent|हॉसडिंग, कु० हेलेन, ३५, ५९, ७०, ७३, ७६, ९८-९९, ११३, ३३५, ३५५, ४३७}}
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{{outdent|३००, ३०६, ५७९; –'''विधवाएँ''', ३६१; –समाज, ३९५, ४४०, ५१४-१५}}
{{outdent|हिन्दू-धर्म, २५, ७८, १५४, १६५, २३८, २७४, ३२५, ३६२, ३९२, ४२०, ४५९, ५०६-८, ५३३-३४, ५६०}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||टिप्पणियाँ|४३९}}</noinclude>यह आशा तो नहीं है, इसलिए उक्त समाचारपत्रोंके प्रति न लिखकर उन कुटुम्बोंके प्रति लिख रहा हूँ, जिनकी झूठी निन्दा करके ये अखबार लूटनेका धन्धा करते हैं।
अंग्रेजीमें कहावत है कि, 'जहाँ भोले आदमी रहते हैं, वहाँ लुच्चोंकी बन आती है।' यह कहावत अनुभव के आधार पर बनी है। लाख निन्दा करने पर भी जो घबराते नहीं, अन्तमें थककर निन्दक उनकी निन्दा करना बन्द कर देता है। हममें
झूठी शर्म, झूठी लोक लज्जाने गहरा घर कर लिया है। इसलिए जो चाहे वही हमें डरा और लूट सकता है। अगर कोई हमारी झूठी निन्दा करता है या हम पर झूठा इल्जाम लगाता है तो हम इस तरह डर जाते हैं कि मानो सचमुच ही हम उस निन्दा और इल्जामके पात्र हों। जब कि योग्य व्यवहार तो यह है कि चाहे जितनी टीका होती रहे, मगर जबतक वह सच्ची न हो, हम बिलकुल न दवें और ऐसी
टीकाकी फिक्र न करें।
{{c|'''सत्यादि व्रतोंके बारेमें'''}}
आश्रम नियमावलीमें जिन नियमोंका पालन आवश्यक माना गया है, उनके बारेमें एक आश्रमवासीने कुछ सहायक सूत्र सुझाये हैं। वे रहस्यवाले और उन व्रतोंके पालनमें मदद देनेवाले हैं। इसलिए उनका सार नीचे देता हूँ।
प्रत्येक व्रतके अन्त में हिन्दू शास्त्रमेंसे आधार दिये गये हैं। ये आधार नियमावलीमेंसे जानबूझकर छोड़ दिये गये हैं। क्योंकि आश्रमकी मान्यता है कि ये व्रत केवल हिन्दूधर्मके इजारे नहीं हैं बल्कि सब धर्मो में समान हैं। किन्तु जो आधार यहाँ दिये
गये हैं वे सुन्दर हैं, और इसलिए उन्हें पाठकोंकी जानकारीके लिए देता हूँ।
{{left|'''सत्य'''}}
'मितभाषण सत्यका कवच है और इसलिए सत्यमें ही उसका समावेश होता है।' सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्यकी ही जय होती है, असत्यकी नहीं।
{{left|'''अहिंसा'''}}
'अहिंसा सभी धर्मोकी मर्यादा है।' न पापे प्रति पापः स्यात्। पापका जवाब पापसे नहीं हो सकता।
{{left|'''ब्रह्मचर्य व्रत'''}}
'सभी इन्द्रियोंका सम्पूर्ण संयम इस व्रतमें गृहीत है।' यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति। परमात्माको पानेकी इच्छा करनेवाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
{{left|'''अस्तेय'''}}
तैर्दत्तानप्रदायैम्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः। जो ईश्वरका दिया ईश्वरको अर्पण किये बिना भोगता है, वह चोर है।
{{left|'''अपरिग्रह'''}}
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। परिग्रहका त्याग करके विचरण करना।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{left|'''अभय व्रत'''}}
'भीति और नीति परस्पर विरोधी कल्पनाएँ हैं।' अभयवृत्ति दैवी सम्पत्तिका आधार है। अभयं सर्वभूतेभ्यः। जो सबको अभय-दान देगा, वही निर्भय बन सकता है।
{{left|'''अस्वाद'''}}
'आहारका स्वादपूर्वक सेवन करना अहिंसा है।' आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्ध ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थानां विप्रमोक्षः। आहार शुद्धिसे अन्तःकरण शुद्ध होता है और अंतःकरण शुद्ध होनेसे आत्मस्मरण दृढ़ होता है तथा स्मरण-
प्राप्ति से सभी बन्धनोंका या ग्रन्थियोंका नाश होता है।
{{left|'''स्वदेशी'''}}
'अहिंसा जिस प्रकार धर्मकी मर्यादा है, उसी प्रकार स्वदेशी व्यवहारकी मर्यादा है।' स्वधर्मे निधनं श्रेयः। स्वधर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है।
{{left|'''शारीरिक श्रम'''}}
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्। केवल शारीरिक काम निष्काम भावसे करनेसे पाप नहीं होता है।
{{left|'''अस्पृश्यता-निवारण'''}}
नमः पूर्वजाय च अपरजाय च। ऊँच-नीच सबको नमस्कार।
{{left|'''सहिष्णुता'''}}
सहनं सर्वधर्माणां तितिक्षा सा शुभा मता। सभी धर्मोको सहन करनेमें ही तितिक्षा है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४८९. गवर्नर और बारडोली'''}}}}
माननीय गवर्नर साहबका श्री मुन्शीसे जो पत्र-व्यवहार हुआ है उससे वर्तमान राज्यतन्त्रका यथार्थ चित्र प्राप्त होता है। एक तरफ सरकार, श्री मुन्शी लोकमतकी तरफ न ढल जायें, इस हेतुसे उन्हें प्रसन्न करनेके लिए लम्बे-लम्बे तर्कोंसे भरे पत्र लिखती है और दूसरी ओर ऐसे असत्यको, जो कागजोंमें सिद्ध हो सके, चित्रित करती है और लोगोंको झूठा सिद्ध करनेका प्रयत्न करती है। वह अभी तक उन बातोंका खण्डन करती है जिन्हें जनताने अनेक बार स्पष्ट रूपसे प्रमाणित कर दिया है। मानो असत्य बार-बार कहनेसे सत्य बन जाता हो।
इस समूचे पत्र में एक बात ही निथर कर स्पष्ट होती है। सरकार अपनी लगान-सम्बन्धी नीति बदलनेके लिए तैयार नहीं है। यदि उसकी लगान-सम्बन्धी नीति<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७३
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||गवर्नर और बारडोली|४४१}}</noinclude>बदल जाय तो संसारकी यह सबसे अधिक खर्चीली राज्य-व्यवस्था ठप हो जाये अथवा उसका खर्च लोगोंके सामर्थ्यके अनुसार सीमित हो जाये।
गवर्नर साहबका कहना है राज्य और प्रजाके बीच स्वतन्त्र जाँच की ही नहीं जा सकती। ये महानुभाव ऐसा कहकर लोगोंकी आँखोंमें धूल झोंकते हैं। स्वतन्त्र जाँच भी सरकारी जाँच ही होगी। न्याय-विभाग शासन-विभागसे स्वतन्त्र होने पर भी एक सरकारी विभाग ही है। समितिकी नियुक्ति लोग करें, यह माँग किसीने नहीं की है। किन्तु लोगोंकी माँग यह है कि बारडोलीके लगानके मामलेकी छानबीनके लिए तटस्थ लोगोंकी नियुक्ति की जाये और जैसी जाँच अदालतमें की जाती है वैसी की जाये। इसमें सरकार राज्यकी बागडोर छोड़ दे, यह बात नहीं आती, किन्तु वह अपनी निरंकुश नादिरशाहीको छोड़ दे यह बात अवश्य आती है, और यदि लोगोंको स्वराज्य मिलना है और उनको वह प्राप्त करना है तो इस नादिरशाहीका सर्वथा नाश होना ही है।
इस दृष्टिसे बारडोलीकी लड़ाईने अब व्यापक रूप ले लिया है। अथवा यह कहना चाहिए, हमारे सौभाग्यसे सरकारने उसको व्यापक रूप दे दिया है।
सत्याग्रहका शस्त्र गैरकानूनी है, श्री मुन्शीकी यह युक्ति अथवा मान्यता दुःखद है। अब तो शस्त्र प्रतिष्ठित हो चुका है। जब इसका प्रयोग दक्षिण आफ्रिकामें किया गया था तब लॉर्ड हॉर्डिगने इसका समर्थन किया था। चम्पारनमें बिहार सरकारने उसको स्वीकार करके जाँच समिति नियुक्त की थी। श्री वल्लभभाईने बोरसदमें इसी शस्त्रका प्रयोग किया था और हाल ही में गवर्नर साहबने उसको मान्यता देकर लोगोंके साथ न्याय किया था। अब इस शस्त्रको क्यों गैरकानूनी माना जाये यह बात समझ में नहीं आ सकती।
किन्तु प्रस्तुत प्रश्न यह नहीं है कि सत्याग्रह गैरकानूनी है या कानूनी। यदि लोगोंकी माँग उचित हो तो, उनकी माँग करनेकी रीति चाहे कुछ भी हो, उससे उस माँगका औचित्य कम नहीं हो सकता है।
इस प्रश्नका निर्णय करना केवल बारडोलीके सत्याग्रहियोंके हाथमें है। यदि उनका त्याग और साहस सच्चा होगा, तो इसका निर्णय एक ही रूपमें होगा। यदि लोग लगान नहीं देंगे तो सरकारको या तो वह माफ कर देना पड़ेगा या जाँच
समिति नियुक्त करनी पड़ेगी। लोगोंका मान उनके अपने हाथमें ही है। यह बात इस पत्र-व्यवहार से स्पष्ट झलकती जाती है।
इस १२ तारीखको देशमें स्थान-स्थान पर बारडोलीके लोगोंकी प्रशंसा की गई है। बारडोलीसे बाहरके लोग फिलहाल एक ही काम कर सकते हैं, वह है रुपयेकी
सहायता और सहानुभूति-प्रदर्शन। रुपयेकी सहायता सभी जगह से खुल कर मिल रही है। अब तक यहाँ एक लाख रुपये प्राप्त हो चुके हैं। सारे हिन्दुस्तान में बारडोलीकी
माँग का एक मतसे स्वागत किया गया है। किन्तु निरंकुश सरकार तो [पशु] बलसे ही डरती है। लोगोंने पशुबलका त्याग सोच-समझकर किया है। बारडोली सत्याग्रहरूपी आत्मबलका प्रयोग कर रहा है। इसके मुकाबले में सरकारका बल तुच्छ है। क्या बारडोली अपनी प्रतिज्ञाका पालन करेगा?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७४
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सरकारी पत्रमें और प्रचार विभागकी विज्ञप्तियोंमें जो गन्ध आती है, हमें उसको परख लेनेकी जरूरत है। माननीय गवर्नरने अपने पत्रमें बारडोलीसे पठानोंको हटानेका कारण लोकमतका सम्मान बताया है, किन्तु सरकारी प्रचार-विभाग कहता है कि अब बरसात का मौसम शुरू होनेसे पठानोंकी जरूरत कदाचित ही रहेगी। दो तरहके कारण बतानेके पीछे बात क्या है, यह गवर्नर साहब ही जानें। किन्तु हम तो प्रचार विभागके कारणका भेद ही समझ लें। बरसात के मौसम में जब्तियाँ आदि करनेके बजाय अर्थात् खुली दमन-नीतिका प्रयोग करनेके बजाय सरकार साम-नीतिका प्रयोग करेगी, ऐसी सम्भावना और शंका है। सम्भव है कि वह लोगोंको बुलाकर, गुप्त रूपसे गुप्तचर भेजकर, प्रलोभन देकर और धमकियाँ देकर उन्हें फोड़नेका उपाय करे। मैं आशा करता हूँ कि लोग इस छल प्रपंचसे चेत जायेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन''' १७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४९०. शिक्षा विषयक प्रश्न–३'''}}}}
प्रश्न: जैसे कि हरएक विद्यार्थीके लिए तीन-चार भाषाओंका ज्ञान आवश्यक गिना जाता है, उसी प्रकार क्या प्रचलित धर्मोके सिद्धान्तों, विधियों, आग्रहों और वहमोंका भी ज्ञान देना आवश्यक नहीं है?
उत्तर: अगर हरएक धर्मके प्रति, जो धर्म है, अधर्म नहीं, हम विद्यार्थियोंके मनमें आदर, उदारता और प्रेम उत्पन्न कराना चाहते हैं तो उसके सिद्धान्तोंका ज्ञान अवश्य देना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि उनमें प्रचलित अंधविश्वासों और कर्मकाण्डकी विधियोंको जाननेकी आवश्यकता है। हिन्दुस्तान जैसे देशमें तो अपनी आँखें और कान खुले रखकर चलनेवाला वह्नों और विधियोंको समझ ही सकता है। अगर हम गुण-ग्राही बनना चाहते हैं तो हरएक धर्मकी विधियों और वहमोंको जाननेका आग्रह ही न रखें। अपने ही धर्म में अगर कोई वहम और विधियाँ हों तो उन्हें सूक्ष्मतासे जानकर
उनमें जो सुधार आवश्यक हों, उन्हें करनेका आग्रह विद्यार्थियोंसे करें। सम्भव है उनका उसीमें पूरा समय लग जाये।
प्रश्न: आप वर्ण-व्यवस्था मानते हैं तो आप यह भी स्वीकार करते हैं या कि भिन्न-भिन्न वर्णोंकी शिक्षा भिन्न-भिन्न होनी चाहिए?
उत्तर: मुझे ऐसा नहीं लगता है कि हरएक वर्णके लिए अलग शिक्षा होनी चाहिए। सभी वर्णो में काफी समानता है, और हमारी शिक्षा सामान्य होनी चाहिए और अभी है ही। शिक्षाका एक उद्देश्य है, विद्यार्थीको मनुष्य बनाना और जो मनुष्य बनेगा वह मनुष्य पर लागू और उसके लिए शोभायमान नियम सहज ही जान लेगा। वर्णकी मेरी कल्पनामें तो यह है कि उसके धन्धे पर आधारित होनेके कारण, और चारों<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७५
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||शिक्षा विषयक प्रश्न–३|४४३}}</noinclude>वर्णोंको अपने-अपने धन्धेके जरिए ही आजीविका पैदा करनी है इसलिए, वर्णोंकी विशेषता तो वंश-परम्परामें उतरनी चाहिए। किन्तु वर्ण-धर्मका यह अर्थ मैं कभी नहीं करता कि एकमें दूसरे तीन वर्णोंके गुण कभी होंगे ही नहीं। शूद्रके समान परिचर्या करके ब्राह्मण पेट न मरे, किन्तु उसे अगर परिचर्या करनी ही न आये या करनेमें उसे शर्म आये तो वह ब्राह्मण ही नहीं है। निःस्वार्थ सेवाके बिना शुद्ध ज्ञान सम्भव ही नहीं है। और चाहे शूद्र वेदादि पढ़कर भिक्षापात्रमें मिले अन्न पर उदर-निर्वाह न करे, मगर तो भी सुव्यवस्थित समाज में तो उसे वेदादिका ज्ञान पाना ही होगा।
प्रश्न: क्या यह बात सच है, जैसा कि आप कहते हैं कि उद्योगकी शिक्षामें ही सारी शिक्षा आ जाती है और बौद्धिक शिक्षा तो केवल शिक्षाकी श्रृंगार-भर है। अगर यह सच हैं तो आप महाविद्यालयकी शिक्षाको किस लिए पसन्द करते हैं?
उत्तर: यह बात जितनी सच है, उतनी ही झूठ भी है। जहाँ बौद्धिक शिक्षाकी मूर्तिपूजा की जाती है, वहाँ मैं जरूर कहूँगा कि उद्योगकी शिक्षामें सभी कुछ आ जाता है। शिक्षाकी मेरी व्याख्यामें बुद्धि और उद्योगके बीच ईट-पत्थर की कोई दीवार नहीं है; यानी मेरे लेखें दोनों बिलकुल भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। उद्योगकी शिक्षामें बुद्धिकी शिक्षा यानी बुद्धिका विकास छिपा ही हुआ है। मैं तो यह भी कहनेकी
घृष्टता करूँगा कि उद्योगकी शिक्षाके बिना बुद्धिका सच्चा विकास सम्भव ही नहीं है। दीवार चिननेवाले राजको केवल आजीविका पैदा कर लेने लायक जो ज्ञान होता है, मेरी दृष्टिमें वह शिक्षा नहीं है। समाज में इस उद्योगका क्या स्थान है, ईट क्या है, घरकी क्या आवश्यकता है, घर कैसे होने चाहिए, घरका सभ्यताके साथ कैसा निकट सम्बन्ध है, इत्यादि सभी विषय राजकी शिक्षाके अन्तर्गत आ जाते हैं। कितनी ही बार हम बौद्धिक शिक्षाका यह गलत अर्थ मान लिया करते हैं कि वह समाचारों और तथ्योंके सामान्य ज्ञानका नाम है। ऐसा सामान्य ज्ञान न पाने पर भी बुद्धिका सम्पूर्ण विकास होना सम्भव है। जो शिक्षक विद्यार्थियोंके दिमागको अनगिनत तथ्योंसे भर देनेकी संदूकची बना डालता है, उसने स्वयं शिक्षाका पहला पाठ भी नहीं सीखा है। अब समझ में आ गया होगा कि प्रश्नमें पूछी हुई बात किस तरह जितनी सच है, उतनी ही झूठ भी है। उद्योगकी और बौद्धिक शिक्षाकी मेरी कल्पना स्वीकार करें
तो यह बात गलत है। इन दोनों शिक्षाओंको अलग रख कर, इनके बारेमें जो भ्रम रहा है, उस भ्रमपूर्ण शिक्षाको ध्यान में रखकर प्रश्न पूछा गया हो तो बात सच है। और अब यह समझ में आ गया होगा कि मैं महाविद्यालयकी शिक्षाको क्यों और किस शर्त पर पसन्द करता हूँ। मेरी कल्पनाके महाविद्यालयमें राज, बढ़ई, बुनकर सच्चे बुद्धिमान समाजसेवक होंगे; वे महज आजीविका पैदा करने लायक ज्ञान पाये हुए राज, बढ़ई या बुनकर नहीं होंगे। महाविद्यालयके बुनकरोंमें से मैं कबीरकी, मोचियों में से भोजा भगतकी, सुनारोंमें से अखाकी, किसानोंमें से गुरु गोविन्दकी आशा रखता हूँ। इन चारोंको मैं बौद्धिक शिक्षा पाया हुआ गिनता हूँ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७६
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>प्रश्न: औद्योगिक शिक्षा ही अगर शिक्षाका सर्वस्व हो तो बढ़ई, लुहार, बुनकरकी समितिको आप विद्यापीठ क्यों नहीं सौंप देते? पीछे वे भले ही बौद्धिक शिक्षाके अध्यापकोंको नौकरके रूपमें रखें।
उत्तर: इस प्रश्नका जवाब इससे पहले प्रश्नके उत्तरमें आ गया है, तो भी अपना अर्थ और अधिक स्पष्ट करनेके लिए मैं जवाब दे रहा हूँ। अगर मेरे पास कबीर जैसे जुलाहे हों तो मैं अवश्य विद्यापीठकी लगाम उनके हाथों सौंप दूँ और उनके नीचे "बौद्धिक शिक्षाके अध्यापक" नौकरके रूपमें काम करनेमें लज्जा नहीं किन्तु मान समझेंगे। हमने उद्योगोंको शिक्षाका विषय नहीं माना और इसीसे आज उद्योग करनेवालेका स्थान हलका गिना गया है, और उद्योग करनेवालोंकी मदद समाज-सेवाके लिए जरूरी प्रमाण में अथवा किसी प्रमाण में नहीं मिल रही है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४९१. पत्र: रामानन्द चटर्जीको'''}}}}
{{right|१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय रामानन्द बाबू,}}
रजिस्टरी की हुई पुस्तके<ref>डा॰ जे॰ टी॰ संडरलैंड कृत '''इंडिया इन बांडेज हर राइट टु फ्रीडम'''को पाण्डुलिपि
गांधीजीको मत प्रकट करनेके लिए भेजी गई थी।</ref> सहित आपके पत्रकी प्राप्ति की स्वीकृति न देनेका एकमात्र बहाना यह है कि कामकी वजहसे मेरी नाक में दम आ गया है और मेरा बहुत-सा पत्र-व्यवहार निबटानेको बकाया है। महादेव देसाई, जो पत्र-व्यवहारका कुछ हिस्सा निबटाने में आम तौर पर मेरा साथ देते हैं, बारडोली और अहमदाबादके बीच आते-जाते रहते हैं और इसलिए इसपर नजर तक नहीं डाल सकते। कामकी भरमारके सिवा और भी कई कारण हैं। जिनसे मैं ऐसा पिछड़ गया हूँ।
इस आशामें कि पहला मौका मिलते ही इसे पढ़ सकूँगा, मैं पाण्डुलिपिको अपने सामने रखे हुए हूँ। परन्तु वह मौका कब आयेगा, यह मैं नहीं कह सकता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत रामानन्द चटर्जी<br>
प्रवासी प्रेस<br>
९१, अपर सर्कुलर रोड<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४१९) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७६
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गिना जायेगा और उन्हें यज्ञोपवीत पहननेके सभी अधिकार प्राप्त हैं। मगर मान भी लें कि उन्हें यज्ञोपवीत पहननेका धार्मिक अधिकार प्राप्त नहीं है, तो भी मैं यह सुनने को कभी तैयार नहीं था कि किसी रियासत में कानूनकी दृष्टिसे जनेऊ पहनना दण्डनीय अपराध माना जायेगा। और उतनी ही अकल्पनीय बात यह है कि जिन अभागे आदमियोंने सोचा था कि हमारा कोई ऐसा धार्मिक संस्कार हो रहा है, जो वांछनीय होगा या उनके लिए पुण्यप्रद होगा, उन्हें अपना बचाव करने, अपने गवाह तक पेश करनेका अधिकार नहीं दिया गया। अगर सजा और न्यायके इस ढकोसलेके बारेमें जो कुछ कहा गया है वह सच हो, तो मुझे यह जानकर कोई ताज्जुब नहीं होगा कि उनके शरीर परसे जनेऊ जबरन उतार लिये गये हैं। मैं आर्य समाज के सभापतिको आमन्त्रण देता हूँ कि वे बाघात रियासतके विरुद्ध अपने लगाये इल्जामोंके समर्थनमें और भी व्यौरेसे लिखें और अगर रियासत के अधिकारी चाहें तो उन्हें भी आमन्त्रण देता हूँ कि वे इस मामलेका अपना बयान भी भेजें जिसे मैं खुशी से छापूँगा।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१५६. विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न'''}}}}
एक मित्र, जिनका मिलोंसे गहरा सम्बन्ध है और जो विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन में हमारी मिलोंको पूरा हिस्सा लेते देखना चाहते हैं, पूछते हैं :—
'''१. आप किस आधार पर मालकी एक जैसी कीमत रखना चाहते हैं? क्योंकि याद रखिये कि सभी मिलें एक सरीखी नहीं हैं; कुछ अच्छी हैं और कुछ बुरी, कुछ अन्य मिलोंकी अपेक्षा माँड़ आदि लगाकर अपने कपड़ेको ज्यादा सँवारती हैं; कुछका संचित कोष बड़ा है, कुछका कम; बम्बईकी मिलोंको और जगहोंकी मिलोंसे कम नफा होता है। ऐसे और भी बहुतसे अन्तर दिखलाये जा सकते हैं। ये तो केवल नमूने भर हैं।'''
इसका एक सामान्य जवाब यह दिया जा सकता है कि 'जहाँ चाह है वहाँ राह भी है।' मिलें अपने हिस्सेका काम तभी पूरा कर सकेंगी, जब वे निष्कर्मण्यता छोड़ देंगी, खूब ध्यानसे सोचेंगी, और वह भी राष्ट्रके हानि–लाभकी दृष्टिसे, महज हिस्सेदारों, डाइरेक्टरों या एजेन्टोंकी ही जेबें भरनेकी दृष्टिसे नहीं। मगर इस बारे में अपना मत स्पष्ट करनेके लिए मैं कह सकता हूँ कि उन सभी मिलोंको, जो बहिष्कार आन्दोलन में शामिल हों, सारा फर्क मिटाकर, एक समान कीमत निर्धारित करनी होगी, जिसका परिणाम यह होगा कि उनके मौजूदा नफेका एक बहुत बड़ा हिस्सा जाता रहेगा — कमसे–कम कुछ मिलोंका तो जरूर ही। अगर उनकी देशभक्ति सच्ची और प्रगतिशील हो तो मुनाफेमें चलनेवाली मिलें, नुकसान उठानेवाली मिलोंको सँभाल<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७७
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न|१४५}}</noinclude>लेंगी और जो फर्क मिटाने योग्य होंगे, उन्हें मिटा दिया जायेगा। मेरी दृष्टिमें जो योजना है, उसके अनुसार तो अन्तमें मिलोंको कुल मिलाकर हानि होनी ही नहीं चाहिए और न ही ग्राहकोंके मत्थे उन्हें नफा उठाना चाहिए।
'''२. खादी न बनाने का निश्चय तो इनी–गिनी ही मिलें करेंगी मगर उनका क्या होगा जो केवल मोटा सूत ही कातती हैं? खादीकी जाँचकी आपकी कसौटी क्या है?'''
यह तो खादी संस्थाओं और मिलोंके बीच सामान्य ईमानदारी और व्यवस्थाका सवाल है। हालमें तो, मुझे कहते खेद होता है कि गाँवों में खादीके प्रति बढ़ रहे अनुकूल वातावरणका नाजायज लाभ उठाने के लिए कुछ अच्छी मिलें भी अपने कपड़ों पर खादीकी छाप मारनेमें शर्माती नहीं हैं। अगर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बन सकी तो मुझे आशा है कि कमसे–कम फिलहाल तो यह स्पष्ट निश्चित हो जायेगा कि कौनसे कपड़े मिलें बनाएंगी और कौनसे खादीवाले केन्द्र। अकसर लड़ाईके
जमाने में कपड़े के उत्पादन पर जैसा अंकुश रहता है, वैसा ही इस समय रखा जायेगा। हिंसाके आधारपर होनेवाली लड़ाईमें जो कुछ जबरन कराया जाता है, वह अहिंसा पर आधारित इस लड़ाईमें हम स्वेच्छासे करेंगे। हममें अगर कुछ अहिंसा हो तो, स्वेच्छापूर्वक यानी महज लोकमतके दबावसे बहिष्कार इत्यादि कर सकनेकी हमारी योग्यता, उसकी बाहरी किन्तु लाजिमी कसौटी होगी।
'''३. नफेपर किस तरह अंकुश रखा जायेगा? आप भी तो हमारी तरह बखूबी जानते हैं कि रुईकी कीमतोंमें बहुत ही खिझा डालनेवाले अनियमित ढंगसे घटी–बढ़ी होती रहती है।'''
इसमें यह मान लिया गया हैं कि हम रुईके बाजारका नियन्त्रण नहीं कर सकेंगे। निश्चय ही, अगर देशके बड़ेसे–बड़े मिल–मालिक इस राष्ट्रीय कार्यमें एक हो जायें तो वे रुईके बाजारका नियन्त्रण कर सकेंगे। अमेरिका हमारी रुईके बाजार पर हावी है, क्योंकि हम मूर्खतासे बिना विचारे और स्वार्थान्ध होकर अपनी रुई बाहर भेज देते हैं। किन्तु बहिष्कारका तो अर्थ ही यह है कि जैसे हम और बहुतसी चीजोंका नियन्त्रण करेंगे, वैसे ही रुईके आवागमनका भी। तभी तो बहिष्कारको पूरा सफल बना सकेंगे। और अगर हमने सच्ची राष्ट्रीय भावना पैदा कर ली है। और हमें अपने आपमें और राष्ट्रमें विश्वास है, तो वह नियन्त्रण हमें करना ही होगा।
'''४. अगर आप ईमानदारी, सतत प्रयत्न, पारस्परिक विश्वास आदिपर बहुत जोर देंगे तो आपकी असफलता निश्चित है।'''
चूँकि मेरे पास तलवार नहीं है और मिल भी सके तो मैं उसे नहीं लूँगा, इसलिए, मुझे इन्हीं गुणों पर जोर देना पड़ेगा, जिनकी कीमत के बारेमें इस मित्रको शंका है। मगर मुझे ऐसी कोई शंका नहीं है। वल्कि मुझे तो इतना काफी धैर्य है कि अगर वे गुण आज यथेष्ट मात्रा में मिलते हों तो उनके विकसित होने तक मैं<noinclude>
३६-१०</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७८
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठहरने को भी तैयार हूँ। क्योंकि यह राष्ट्र तबतक स्वतन्त्र नहीं होगा, जबतक कि हमारे सारे राष्ट्रमें ये गुण नहीं आ जाते। मैं यह भी जानता हूँ कि पशुबल, धोखेबाजी इत्यादि सीखने में सत्य, अहिंसा और उनमें समाविष्ट अन्य सारे गुणोंका अभ्यास करनेकी अपेक्षा कहीं अधिक समय लगेगा।
इसके बाद ये मित्र इस बातपर मेरा ध्यान दिलाते हैं कि मेरे पिछले लेखमें<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं?", १५-३-१९२८।</ref> निम्नलिखित बातें छूट गई हैं :
(क) जो मिलें इस योजनामें शामिल हों उन्हें विदेशी सूत या विलायती नकली रेशमका प्रयोग त्यागना होगा जैसा कि आज बहुत–सी मिलें कर रही हैं।
(ख) वे विदेशी कम्पनियोंके यहाँ बीमा न करायेंगी।
(ग) वे विदेशी कपड़ा मँगाकर उसपर स्वदेशीका छापा नहीं लगायेंगी।
मैंने तो मान लिया था कि (क) और (ग) पहलेसे ही निश्चित हैं। अगर (ख) पर जोर देनेसे प्रस्तावित संयुक्त योजनाको पूरा करनेमें कठिनाई हो तो मैं उसपर जोर नहीं दूंगा। मैं चाहूँगा तो कि बीमेका काम करनेके लिए स्वदेशी बीमा कम्पनियाँ हों किन्तु मुझे विश्वास है कि जिस तरह विलायती कपड़ा हमारा रास्ता रोके हुए हैं, उस तरह और कोई चीज नहीं रोकती। अगर यह बहुत बड़ी बाधा दूर हो गई तो छोटी–मोटी बाधाएँ हम चुटकी बजाते दूर कर लेंगे।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २२-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१५७. मतभेद'''}}}}
मैं उपर्युक्त पत्र<ref>कैम्ब्रिज मिशनके श्री डब्ल्यू॰ एफ॰ आयरलैंडका पत्र यहाँ नहीं दिया गया है।</ref> सहर्ष प्रकाशित कर रहा हूँ। अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुत्व संघ (इन्टरनेशनल फेलोशिप) की बैठकोंमें मैने स्पष्ट कर दिया<ref>देखिए "बंधुत्व विषयक चर्चा”, १५-१-१९२८ से पूर्व।</ref> था कि मेरा आशय जगतके मुख्य धर्मोसे था। और मैंने कहा था कि इन सभी मुख्य धर्मोमें कम या ज्यादा सच्चाई है, किन्तु अपूर्ण तो सभी हैं ही। इसलिए इस बात में मेरी श्री आयरलैंडसे सहमति है। किन्तु श्री आयरलैंडके पत्रसे मनपर यह असर पड़ता है कि धर्म–परिवर्तनके बारेमें, भले ही उसे किसी नामसे पुकारा जाये उनके और मेरे विचारोंमें तात्विक भेद है। उपमानें त्रुटि तो होती ही है, किन्तु मैं सुगंधकी उपमाको थोड़ा समझाकर बताता हूँ। गुलाब अपनी सुगन्ध अनेक तरहसे नहीं, किन्तु एक ही तरहसे फैलाता है। जिन लोगों में घ्राण–शक्ति ही न हो, उन्हें यह सुगन्ध मिलनेसे रही। इस सुगन्धको आप जीभ, कान या त्वचासे तो नहीं महसूस कर सकते। इसी तरह आध्यात्मिकताकी अनुभूति भी आप आध्यात्मिक अनुभवकी शक्ति द्वारा ही कर सकते<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७९
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||मतभेद|१४७}}</noinclude>हैं, किसी अन्य शक्तिके द्वारा नहीं। इसीलिए सभी धर्मोने इस शक्तिको जाग्रत करनेकी आवश्यकता स्वीकार की है। यह जागृति एक तरहका पुनर्जन्म है। अतिशय आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति बिना हिले–डुले और बिना एक भी शब्द कहे, ऐसे लाखों आदमियोंके मी हृदयको प्रभावित कर सकता है, जिन्हें न उसने कभी देखा हो और जिसे न उन्होंने भी कभी देखा हो। यदि उसमें आध्यात्मिक शक्ति नहीं है तो अत्यन्त वाक्पटु प्रचारक भी अपने श्रोताओंके हृदयको स्पर्श नहीं कर सकेगा, इसलिए मेरा खयाल है कि आजकलके बहुत–से मिशनोंका प्रयत्न व्यर्थ ही नहीं,
बल्कि बहुत बार तो वह हानिकारक भी होता है। इसके अलावा इन मिशनरी प्रयत्नोंके पीछे एक चीज और भी है, जिसे मानकर चला जाता और वह यह कि मेरी मान्यता महज मेरे ही लिये नहीं बल्कि सारे संसार के लिए सच्ची है। जबकि सचाई यह है कि परमात्मा अपना परिचय हमें ऐसे लाखों तरीकोंसे देता है, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। इसलिए मिशनरियोंके प्रयत्नमें उस सच्ची विनयका अभाव है, जो सहज रूपसे मानवकी सीमाओं और ईश्वरकी असीम शक्तियोंको मानकर चलती है। मेरे मनमें यह भाव कभी नहीं आता कि मैं जंगली कहे जानेवाले लोगोंसे आध्यात्मिकतामें जरूर ही बढ़ा–चढ़ा हूँ। और ऐसा महसूस करना खतरनाक भी होता है। आध्यात्मिकता उन अन्य अनेक चीजों जैसी नहीं है, ' जिन्हें हम अपनी इन्द्रियोंसे ग्रहण कर सकते हैं, जिनका हम विश्लेषण कर सकते
और जिनका अस्तित्व हम सिद्ध कर सकते हैं। अगर मुझमें वह है तो दुनियामें
ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो उसे मुझसे छीन सके और उसका असर यथासमय जरूर
होगा । लेकिन अगर मुझे ऐसा लगे कि चिकित्सा-विज्ञान और अन्य प्राकृतिक विज्ञानोंमें
मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर हूँ और यह ऐसी चीज है जिसका भान होना गलत नहीं कहा
जा सकता और मुझे अगर अपने साथी भाइयोंसे प्रेम हो तो मैं स्वभावतः उन्हें
अपने ज्ञानका लाभ दे दूंगा । किन्तु आध्यात्मिक बातें तो ईश्वर पर ही छोडूंगा और
ऐसा करके ही अपने साथी बन्धुओं तथा अपने बीचका सम्बन्ध पवित्र, सही और
मर्यादित रखूंगा । किन्तु इस दलीलको और आगे बढ़ाना बेकार है।
श्री आयरलैंडके पत्रपर मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मैं उसे प्रकाशित
न करूँ, बल्कि निजी तौरपर उन्हें एक संक्षिप्त उत्तर भेज दूं। लेकिन उनके प्रति
मेरे मनके आदर-भावने मुझे उनकी यह इच्छा पूरी करनेके लिए प्रेरित किया और इस
बातकी प्रतीति होने के कारण कि यह ऐसा विषय नहीं है, जिसके बारेमें खासकर
मेरी ओरसे, कोई निर्णयात्मक तर्क दिया जा सकता हो, और ऊपर मैंने जिस
स्थितिका वर्णन किया है उसके कारण उनकी इच्छा पूरी करनेमें मुझे कोई कठिनाई
भी नहीं हुई ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८
१ और २. देखिए "दो संशोधन", २२-३-१९२८ ।<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||मतभेद|१४७}}</noinclude>हैं, किसी अन्य शक्तिके द्वारा नहीं। इसीलिए सभी धर्मोने इस शक्तिको जाग्रत करनेकी आवश्यकता स्वीकार की है। यह जागृति एक तरहका पुनर्जन्म है। अतिशय आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति बिना हिले–डुले और बिना एक भी शब्द कहे, ऐसे लाखों आदमियोंके मी हृदयको प्रभावित कर सकता है, जिन्हें न उसने कभी देखा हो और जिसे न उन्होंने भी कभी देखा हो। यदि उसमें आध्यात्मिक शक्ति नहीं है तो अत्यन्त वाक्पटु प्रचारक भी अपने श्रोताओंके हृदयको स्पर्श नहीं कर सकेगा, इसलिए मेरा खयाल है कि आजकलके बहुत–से मिशनोंका प्रयत्न व्यर्थ ही नहीं,
बल्कि बहुत बार तो वह हानिकारक भी होता है। इसके अलावा इन मिशनरी प्रयत्नोंके पीछे एक चीज और भी है, जिसे मानकर चला जाता और वह यह कि मेरी मान्यता महज मेरे ही लिये नहीं बल्कि सारे संसार के लिए सच्ची है। जबकि सचाई यह है कि परमात्मा अपना परिचय<ref>देखिए "दो संशोधन", २२-३-१९२८।</ref> हमें ऐसे लाखों तरीकोंसे देता है, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। इसलिए मिशनरियोंके प्रयत्नमें उस सच्ची विनयका अभाव है, जो सहज रूपसे मानवकी सीमाओं और ईश्वरकी असीम शक्तियोंको मानकर चलती है। मेरे मनमें यह भाव कभी नहीं आता कि मैं जंगली कहे जानेवाले लोगोंसे आध्यात्मिकतामें जरूर ही बढ़ा–चढ़ा हूँ। और ऐसा महसूस करना खतरनाक भी होता है। आध्यात्मिकता उन अन्य अनेक चीजों जैसी नहीं है, ' जिन्हें हम अपनी इन्द्रियोंसे ग्रहण कर सकते हैं, जिनका हम विश्लेषण कर सकते
और जिनका अस्तित्व हम सिद्ध कर सकते हैं। अगर मुझमें वह है तो दुनियामें
ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो उसे मुझसे छीन सके और उसका असर यथासमय जरूर
होगा । लेकिन अगर मुझे ऐसा लगे कि चिकित्सा-विज्ञान और अन्य प्राकृतिक विज्ञानोंमें
मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर हूँ और यह ऐसी चीज है जिसका भान होना गलत नहीं कहा
जा सकता और मुझे अगर अपने साथी भाइयोंसे प्रेम हो तो मैं स्वभावतः उन्हें
अपने ज्ञानका लाभ दे दूंगा । किन्तु आध्यात्मिक बातें तो ईश्वर पर ही छोडूंगा और
ऐसा करके ही अपने साथी बन्धुओं तथा अपने बीचका सम्बन्ध पवित्र, सही और
मर्यादित रखूंगा । किन्तु इस दलीलको और आगे बढ़ाना बेकार है।
श्री आयरलैंडके पत्रपर मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मैं उसे प्रकाशित
न करूँ, बल्कि निजी तौरपर उन्हें एक संक्षिप्त उत्तर भेज दूं। लेकिन उनके प्रति
मेरे मनके आदर-भावने मुझे उनकी यह इच्छा पूरी करनेके लिए प्रेरित किया और इस
बातकी प्रतीति होने के कारण कि यह ऐसा विषय नहीं है, जिसके बारेमें खासकर
मेरी ओरसे, कोई निर्णयात्मक तर्क दिया जा सकता हो, और ऊपर मैंने जिस
स्थितिका वर्णन किया है उसके कारण उनकी इच्छा पूरी करनेमें मुझे कोई कठिनाई
भी नहीं हुई ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८
१ और २.<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||मतभेद|१४७}}</noinclude>हैं, किसी अन्य शक्तिके द्वारा नहीं। इसीलिए सभी धर्मोने इस शक्तिको जाग्रत करनेकी आवश्यकता स्वीकार की है। यह जागृति एक तरहका पुनर्जन्म है। अतिशय आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति बिना हिले–डुले और बिना एक भी शब्द कहे, ऐसे लाखों आदमियोंके मी हृदयको प्रभावित कर सकता है, जिन्हें न उसने कभी देखा हो और जिसे न उन्होंने भी कभी देखा हो। यदि उसमें आध्यात्मिक शक्ति नहीं है तो अत्यन्त वाक्पटु प्रचारक भी अपने श्रोताओंके हृदयको स्पर्श नहीं कर सकेगा, इसलिए मेरा खयाल है कि आजकलके बहुत–से मिशनोंका प्रयत्न व्यर्थ ही नहीं, बल्कि बहुत बार तो वह हानिकारक भी होता है। इसके अलावा इन मिशनरी प्रयत्नोंके पीछे एक चीज और भी है, जिसे मानकर चला जाता और वह यह कि मेरी मान्यता महज मेरे ही लिये नहीं बल्कि सारे संसार के लिए सच्ची है। जबकि सचाई यह है कि परमात्मा अपना परिचय<ref>देखिए "दो संशोधन", २२-३-१९२८।</ref> हमें ऐसे लाखों तरीकोंसे देता है, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। इसलिए मिशनरियोंके प्रयत्नमें उस सच्ची विनयका अभाव है, जो सहज रूपसे मानवकी सीमाओं और ईश्वरकी असीम शक्तियोंको मानकर चलती है। मेरे मनमें यह भाव कभी नहीं आता कि मैं जंगली कहे जानेवाले लोगोंसे आध्यात्मिकतामें जरूर ही बढ़ा–चढ़ा हूँ। और ऐसा महसूस करना खतरनाक भी होता है। आध्यात्मिकता उन अन्य अनेक चीजों जैसी नहीं है,<ref>देखिए "दो संशोधन", २२-३-१९२८।</ref> जिन्हें हम अपनी इन्द्रियोंसे ग्रहण कर सकते हैं, जिनका हम विश्लेषण कर सकते और जिनका अस्तित्व हम सिद्ध कर सकते हैं। अगर मुझमें वह है तो दुनियामें ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो उसे मुझसे छीन सके और उसका असर यथासमय जरूर होगा। लेकिन अगर मुझे ऐसा लगे कि चिकित्सा–विज्ञान और अन्य प्राकृतिक विज्ञानोंमें मैं दूसरोंसे बढ़–चढ़कर हूँ और यह ऐसी चीज है जिसका भान होना गलत नहीं कहा जा सकता और मुझे अगर अपने साथी भाइयोंसे प्रेम हो तो मैं स्वभावतः उन्हें अपने ज्ञानका लाभ दे दूंगा। किन्तु आध्यात्मिक बातें तो ईश्वर पर ही छोडूंगा और ऐसा करके ही अपने साथी बन्धुओं तथा अपने बीचका सम्बन्ध पवित्र, सही और मर्यादित रखूंगा। किन्तु इस दलीलको और आगे बढ़ाना बेकार है।
श्री आयरलैंडके पत्रपर मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मैं उसे प्रकाशित न करूँ, बल्कि निजी तौरपर उन्हें एक संक्षिप्त उत्तर भेज दूं। लेकिन उनके प्रति मेरे मनके आदर–भावने मुझे उनकी यह इच्छा पूरी करनेके लिए प्रेरित किया और इस बातकी प्रतीति होने के कारण कि यह ऐसा विषय नहीं है, जिसके बारेमें खासकर मेरी ओरसे, कोई निर्णयात्मक तर्क दिया जा सकता हो, और ऊपर मैंने जिस स्थितिका वर्णन किया है उसके कारण उनकी इच्छा पूरी करनेमें मुझे कोई कठिनाई भी नहीं हुई।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८०
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>'''१५८. फोजी फीजीवालोंके लिए'''
यद्यपि दीनबन्धुने जो कुछ कहा है वह सत्य और मात्र सत्य है; किन्तु मुझे
आशंका है कि यदि अंग्रेज साम्राज्यवादी शासक भारतीय प्रवासियोंको संसारके
किसी भी भाग में आनेके लिए पर्याप्त प्रलोभन दें, तो भारतीय प्रवासी उसमें फँस
जायेंगे और यह मान बैठेंगे कि वे 'समान भागीदार' हैं। उनकी समझमें यह नहीं
आयेगा कि उनकी स्थिति मात्र ' शृगाल 'की है। किन्तु हम तो यही आशा करते
हैं कि साम्राज्यवादी इतना प्रलोभन कभी न देंगे और भारतीय प्रवासी अपनी सहज
बुद्धि द्वारा साम्राज्यवादियोंकी इस माया के झीने आवरणके उस पार जो वास्तविकता
है उसे साफ देख लेंगे।
:[अंग्रेजीसे]
:यंग इंडिया २२-३-१९२८
१५९. पत्र : पी० के० मैथ्यूको
आश्रम
प्रिय मित्र,
साबरमती
२२ मार्च, १९२८
मुझे खेद है कि मैं अबतक आपके पत्रका जवाब नहीं दे पाया। मैं चाहूँगा
कि स्कूलोंके लिए चरखे उपयोगी नहीं हैं, इस चीजको समझने के लिए आप 'यंग
इंडिया' के पिछले अंक पढ़ें। स्कूलोंमें तकलियोंका प्रचलन शुरू किया जाना चाहिए।
अनुभवसे यह जाहिर हो गया है कि चरखेकी अपेक्षा तकलियाँ कुछ कारणोंसे, जो
'यंग इंडिया' ' में बताय गये हैं, हर दृष्टिसे ज्यादा अच्छा काम करती हैं उनके लिए
आपको किन्हीं खास इमारतोंकी या कहने लायक जैसे खर्चकी जरूरत नहीं होती ।
हृदयसे आपका,
श्री पी० के० मैथ्यू, बी० ए०, बी० एल०
क्रिस्टावा महिलायम्
अलवाई ( त्रावणकोर )
अंग्रेजी (एस० एन० १३१२४ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
१. सी० एक० एन्ड्रयूजका इस शीर्षकका लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है
२. देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ २७।<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
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यद्यपि दीनबन्धुने जो कुछ कहा है वह सत्य और मात्र सत्य है; किन्तु मुझे आशंका है कि यदि अंग्रेज साम्राज्यवादी शासक भारतीय प्रवासियोंको संसारके किसी भी भाग में आनेके लिए पर्याप्त प्रलोभन दें, तो भारतीय प्रवासी उसमें फँस जायेंगे और यह मान बैठेंगे कि वे 'समान भागीदार' हैं। उनकी समझमें यह नहीं आयेगा कि उनकी स्थिति मात्र 'श्रृगाल'की है। किन्तु हम तो यही आशा करते हैं कि साम्राज्यवादी इतना प्रलोभन कभी न देंगे और भारतीय प्रवासी अपनी सहज
बुद्धि द्वारा साम्राज्यवादियोंकी इस मायाके झीने आवरणके उस पार जो वास्तविकता है उसे साफ देख लेंगे।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २२-३-१९२८
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साबरमती<br>
२२ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मुझे खेद है कि मैं अबतक आपके पत्रका जवाब नहीं दे पाया। मैं चाहूँगा कि स्कूलोंके लिए चरखे उपयोगी नहीं हैं, इस चीजको समझने के लिए आप 'यंग इंडिया' के पिछले अंक पढ़ें। स्कूलोंमें तकलियोंका प्रचलन शुरू किया जाना चाहिए। अनुभवसे यह जाहिर हो गया है कि चरखेकी अपेक्षा तकलियाँ कुछ कारणोंसे, जो 'यंग इंडिया'<ref>देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ २७।</ref> में बताय गये हैं, हर दृष्टिसे ज्यादा अच्छा काम करती हैं उनके लिए आपको किन्हीं खास इमारतोंकी या कहने लायक जैसे खर्चकी जरूरत नहीं होती।
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लगाते हैं। मगर वे अपनी इस रकमको अपनी ही मर्जीके मुताबिक ढंगसे [सार्वजनिक हितमें] लगाते हैं। विट्ठलभाई ऐसी रकमोंका एक विशेष कोष खोलना चाहते
हैं, जिसकी व्यवस्था जाने माने प्रतिष्ठित लोगोंके हाथमें हो। अगर इस उद्देश्यको हासिल करना है तो न्यासियोंका निकाय पूरी तरहसे राष्ट्रीय होना चाहिए और उसमें
यथासम्भव उतने दलोंके प्रतिनिधि होने चाहिए जितने कि एक सामान्य निकायमें हो सकते हों। इसलिए जिन लोगोंको यह योजना पसन्द हो, उनसे मेरा निवेदन है कि इसपर अपनी आलोचनाएँ और सुझाव भेजें। कोषकी सारी जिम्मेदारी लेनेकी या केवल उन्हीं कामोंमें जिनके लिए मैंने जीवन समर्पित किया हुआ है, कोषका उपयोग करनेकी मेरी कतई इच्छा नहीं है। मैं जानता हूँ कि विट्ठलभाईके इस महान उपहारका उद्देश्य अच्छी तरह पूरा करनेका उपाय यही होगा कि में अधिकसे-अधिक ऐसे लोगोंका सहयोग माँगूँ जो सहायता करने को तैयार हों।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१७-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१६६. नहीं और हाँ'''}}}}
कामरेड सकलातवालामें गजबकी तत्परता है। उनकी दिली ईमानदारी साफ झलकती है। उन्होंने बहुत बड़े-बड़े त्याग किये हैं। गरीबोंके प्रति उनके प्रेमके सभी कायल हैं। इसलिए मेरे नाम उनकी उत्साहपूर्ण खुली चिट्ठीपर<ref>सकलातवालाकी " महात्मा गांधीके नाम खुली चिट्टी" बम्बई में ८ मार्च, १९२७ को प्रकाशित
हुई थी। यही चिट्टी हिन्दुस्तान टाइम्समें १७-३-१९२७ को छपी थी। उसमें से उद्धृत किये अंशके लिए देखिए परिशिष्ट १।</ref> मैंने उतनी ही गम्भीरता से विचार किया है जितनी गम्भीरतासे ऐसे सच्चे देशभक्त और विश्वप्रेमीके पत्रपर करना उचित है। अगर मुझे दिली ईमानदारीके जवाबमें ईमानदारीका
व्यवहार करना है, या आचरणमें अपने सिद्धान्तके अनुरूप आचरण करना है तो उनकी चिट्ठीके जवाबमें 'हाँ', कहनेकी लाख ख्वाहिश होते हुए भी मुझे 'नहीं' ही कहना होगा। लेकिन मैं जवाबमें 'हाँ' भी कह सकता हूँ। परन्तु अपने ढंगसे ही कह सकता हूँ। उनकी शर्तोंपर में उनसे सहयोग करूँ--उनकी इस अत्यन्त बलवती इच्छाके पीछे यह भी शर्त निहित है कि में 'हाँ' तो तभी कहूँ जब उनकी दलील मेरे मन और बुद्धिको पूरी तरह से सन्तोष दे सके। सच्चे विश्वासके फलस्वरूप 'नहीं' कहना, उस 'हाँ' से लाख दर्जे अच्छा और बड़ी बात है, जो किसीको महज खुश करनेके लिए कहा जाये और जो केवल झंझटोंसे बचनेके लिए कहा जाये, वह तो और भी बुरी बात है।
उनके साथ हार्दिक सहयोग करनेकी पूरी ख्वाहिश रखते हुए भी में इस दिशा अपना रास्ता बन्द देखता हूँ। उन्होंने जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं, वे कपोल-कल्पित<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||नहीं और हाँ|१७७}}</noinclude>हैं और इन तथ्योंके आधारपर निकाले गये निष्कर्ष निश्चय ही निराधार हैं। और जहाँ वे तथ्य सच हैं, वहाँ मेरी सारी शक्ति (मेरी दृष्टिमें) उनके जहरीले असरको
दूर करनेमें केन्द्रित है। मुझे खेद है, परन्तु हम दोनोंकी स्थितिमें जमीन आसमानका अन्तर है। फिर भी हम दोनोंमें एक बड़ी चीज समान रूपसे विद्यमान है। हम
दोनों ही देश और विश्वका हित ही अपना एकमात्र उद्देश्य होनेका दावा रखते हैं। इसलिए इस समय हम लोग भले ही विपरीत दिशाओंमें जाते हुए मालूम पड़ते हैं, मुझे आशा है कि एक दिन हम मिलेंगे जरूर। में वचन देता हूँ कि अपनी भूल सूझते ही मैं काफी क्षतिपूर्ति करूंगा। इस बीचमें मेरी भूल ही, चूंकि मैं उसे भूल नहीं मानता, मेरी ढालका काम देगी और मेरे लिए सान्त्वनाप्रद होगी।
कामरेड सकलातवालाके विचारोंसे ठीक विपरीत, मेरी यह धारणा नहीं है कि आवश्यकताओं और उनकी पूर्तिके लिए यन्त्र बढ़ाते जानेसे दुनिया अपने ध्येयकी ओर एक पग भी बढ़ रही है। सकलातवाला महोदय आजकलकी आपाधापीपर लट्टू हैं। काल और देशकी दूरी मिटा देने और पाशविक वृत्तियोंको बढ़ाने और उनकी तृप्तिकी खातिर जमीन आसमानके कुलाबे एक कर देनेकी इस विवेकहीन आकांक्षाको मैं पूरी तरहसे नापसन्द करता हूँ। आधुनिक सभ्यता यदि इन्हीं सब बातोंके समर्थनको अपना लक्ष्य मानती है, और मैं तो समझता हूँ कि मानती है, तो में उसे 'हैवानियत
कहता हूँ और साथ ही वर्तमान शासन प्रणालीको उसका सबसे बड़ा प्रतिरूप कहता हूँ। गरीबोंकी दशा सुधारनेकी उसकी योजनाको में अविश्वास की दृष्टिसे देखता हूँ, उसके मुद्रा-सुधारमें मुझे धोखा ही नजर आता है, उसकी जल और स्थल सेनापर भी मैं यकीन नहीं करता। इस सरकारने सभ्यताके नामपर और खुद अपनी हिफाजतके नामपर जनताका खून बराबर चूसा है, लोगोंको गुलाम बनाया है, शक्तिशाली व्यक्तियोंको दौलत और पदकी रिश्वतें दी हैं और अपने निरंकुश कायदे कानूनोंके नीचे उन स्वतन्त्रता प्रेमी देशभक्तोंको कुचल डालनेकी कोशिश की है, जिन्हें खुशामदसे या धनसे खरीदा नहीं जा सकता था। अगर मेरे हाथमें सत्ता
होती तो इस शासन-पद्धतिको में आज ही नष्ट कर देता। अगर मुझे विश्वास हो जाता कि अत्यन्त भीषण अस्त्रों द्वारा इस शासन प्रणालीको समाप्त किया जा सकता है, तो भीषण अस्त्रोंको भी इस्तेमाल करता। में उन अस्त्रोंका प्रयोग केवल इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि यद्यपि उनके प्रयोगोंसे वर्तमान प्रशासकोंका अन्त तो जरूर हो जायेगा, लेकिन शासनकी वही पद्धति चिरस्थायी बन जायेगी। जो लोग बुराइयोंके बदले बुरी बातोंके करनेवाले लोगोंका नाश करना चाहते हैं, वे खुद उन बुरी बातोंके शिकार बन जाते हैं। और उन लोगोंसे भी खराब बन जाते हैं, जिन्हें उन्होंने इस गलत विश्वासमें मारा था कि आदमियोंके साथ-साथ उनकी बुरी नीतिका भी अन्त हो जाता है। वे पापके मूल कारणको नहीं पहचानते।
१९२० के आन्दोलनकी रूपरेखा वैसी बनाई गई थी कि यह सिद्ध किया जाये कि हम आत्मा-विहीन शासन पद्धतिका सुधार हिंसाके जरिये और इस तरह खुद
आत्मा-विहीन बनकर नहीं कर सकते। उसे सुधारनेका केवल एक ही रास्ता था,
३३-१२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१६
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वह यह कि हम खुद उसके शिकार न बनें अर्थात्उ सके साथ असहयोग करें, और शैतान द्वारा फैलाये गये जालमें हमें फँसानेके लिए की जानेवाली उस हर कोशिशके जवाबमें हम जोरसे 'नहीं' कहते रहें।
उस आन्दोलनको धक्का जरूर लगा है, लेकिन वह मरा नहीं है। मैंने जो वायदा किया था वह शर्तके साथ किया था। शर्ते मामूली और आसान थीं। मगर उस आन्दोलनके प्रमुख कार्यकर्त्ताओंके लिए वे बहुत ही सख्त साबित हुईं। जिसे कामरेड सकलातवाला, मेरी भूल और असफलता मानते हैं उसे मैं अपनी शक्ति और दृढ़ विश्वासकी अभिव्यक्ति मानता हूँ। हो सकता है कि वह मेरी भूल हो; लेकिन जबतक इसके सच होनेमें मेरा विश्वास है तबतक मेरी भूल ही मुझे अडिग बनाये रहेगी, जैसे कि अभी बनाये हुए है। बारडोलीमें अपने कदम वापस लेना में बहुत ही बुद्धिमानीका काम और देशकी परम सेवा समझता हूँ। उस फैसलेकी वजहसे
सरकारकी ताकत घटी ही है। अगर मैं चौरीचौराके बाद भी उसकी शर्तोंको, जिन्हें वाइसरायके नाम मेरी अन्तिम चेतावनी<ref>देखिए खण्ड २२, पृष्ठ ३१७-२०।</ref> माना गया था, पालन करनेपर ही जोर देता
रहता तो सरकार फिर अपने खोये हुए मोर्चे वापस हथिया लेती।
मेरे 'बन्धु' यह कहनेमें भूल करते हैं कि दक्षिण आफ्रिकाका आन्दोलन असफल रहा। यदि वह असफल रहा है तो निश्चय ही मेरा सारा जीवन असफल ही माना जाना चाहिए। और उनका मुझे अपने दलमें शरीक होनेके लिए आमन्त्रित करना भी बेमतलब की बात समझना चाहिए। मेरे जीवनके मिशनका श्रीगणेश दक्षिण आफ्रिकाने ही कराया था। गत महायुद्धके दिनोंमें अपने तत्कालीन विश्वासोंके अनुसार मैंने अपने आपको तथा अपने साथियोंको घायलोंकी सेवा करनेवालोंकी हैसियतसे जो सरकारके हवाले कर दिया था, अपने उस कामको भी में भूल नहीं मानता।
ये प्रख्यात संसद सदस्य महोदय उतावलीमें हैं। ये महाशय तथ्योंका अध्ययन करना हेय समझते हैं। मैं उन्हें बतला दूं कि खादी आन्दोलन उतारपर नहीं है। गत वर्ष १९२० के कामकी अपेक्षा कमसे कम बीस गुना काम जरूर हुआ। आज खादी-कार्यसे १५०० गाँवोंमें कमसे कम ५० हजार कतैयोंको लाभ हो रहा है और इसके
अलावा बुनकरों, रंगरेजों, छीपियों, घोबियों और दर्जियों को भी काम मिल रहा है।
श्री सकलातवाला पूछते हैं कि खद्दरका उद्देश्य क्या है। इसका उद्देश्य है सादगी, आडम्बर नहीं। गरीबोंके शरीरोंपर यह खूब खिलता है, बड़ेसे-बड़े धनी और
कला-प्रेमी स्त्री-पुरुषोंके शरीरोंको सुशोभित करने लायक भी बन सकता है, जैसा कि वह पहले बना ही करता था। खद्दर पुरातन कलाकौशलको पुनरुज्जीवित करता है।
यह सभी प्रकारके यन्त्रोंको नष्ट नहीं करना चाहता मगर उनके प्रयोगपर नियन्त्रण और उनकी बेहिसाब बढ़ोतरीकी रोकथाम जरूर चाहता है। यह यन्त्रोंको इस्तेमाल करता है, गरीवसे गरीबको उसीके झोंपड़े में बैठे-बैठे राहत पहुँचानेके लिए। चरखा खुद एक बहुत ही सुन्दर यन्त्र है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१७
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||'''नहीं और हाँ'''|१७९}}</noinclude>खद्दर गरीबोंको धनिकोंके बन्धनसे मुक्त करता है, वह वर्गों और आम लोगोंके बीच एक नैतिक और आध्यात्मिक सम्बन्ध स्थापित करता है। वह अमीरों द्वारा
गरीबोंसे लिये गये धनका कुछ अंश उन्हें वापस दिलाता है।
खद्दर किसी भी गृह उद्योगकी जगह नहीं हड़पता; वरन् इसके विपरीत दिन-ब-दिन ऐसा माना जा रहा है कि खद्दर दूसरे गृह उद्योगोंका केन्द्र बनता जा रहा है विधवाओंके उजड़े घरोंमें खद्दर आशाकी एक किरण पहुँचाता है।
परन्तु वह विधवा यदि और अधिक कमा सकती है तो यह उसे वैसा करनेसे रोकता नहीं है। खद्दर किसीको कोई बेहतर धन्धा अपनानेसे नहीं रोकता। जिन लोगोंको किसी धन्धेकी जरूरत हैं उन्हें यह सम्मान्य धन्धा देता है। यह राष्ट्रके खाली समय का सदुपयोग करता है। हमारे मान्य कामरेड साहब उन लोगोंके कामका गर्वके साथ जिक्र करते हैं, जो अधिक आमदनीके धन्धोंको सुलभ करते हैं। उनको यह जान लेना चाहिए कि अपने आप खद्दरसे यही काम हो जाता है। यदि इससे गरीबों
को कुछ आने मिलेंगे, तो कुछ अन्य लोगोंको भी रुपये मिले बिना रह नहीं सकते। जो लोग शहरोंमें अपना काम शुरू करते हैं, वे काम तो अच्छा करते हैं किन्तु इस मसलेको किसी बड़े पैमानेपर हल नहीं कर पाते। खद्दर तो इस मसलेकी तहतक पहुँचता है और इसलिए इसमें अन्य बातोंका समावेश लाजिमी तौरसे हो ही जाता है।
मगर इस अधीर साम्यवादीके समूचे पत्रमें शहरोंका ही जिक्र है और इसलिए उनका पत्र उस भारतकी और उन भारतीय परिस्थितियोंकी उपेक्षा करता है, जो भारतके ७ लाख गाँवोंमें देखनेको मिल सकती हैं। आजके मुट्ठी भर शहर, बिला-जरूरतकी बढ़ती हैं और इस समय तो वे देहातोंका जीवन-रक्त चूस लेनेके निद्य उद्देश्यकी पूर्ति ही कर रहे हैं। खद्दरका काम तो शोषणकी इस प्रक्रियाको सुधारने और वर्तमान शोषण व्यवस्थाको पलट देनेका एक प्रयास है। शहर और उनके उद्धत दलाल ग्राम्यजीवन और ग्रामीणोंकी स्वतन्त्रताके लिए एक निरन्तर खतरा हैं।
खद्दरमें संगठन करनेकी शक्ति सबसे अधिक है, क्योंकि पहले इसके कामका संगठन करना होता है और उसका समूचे हिन्दुस्तानपर असर पड़ता है। खद्दर अगर आकाशसे बरसता तो यह बड़ी भारी विपत्ति होती। लेकिन, चूंकि खादी लाखों भूखे मरनेवाले लोगों और हजारों मध्यवर्गीय स्त्री-पुरुषोंके स्वेच्छापूर्वक किए गये सहयोगसे ही तैयार की जा सकती है, इसलिए इसकी सफलताका अर्थ है शान्तिमय ढंगसे ऐसा एक सर्वोत्तम संगठन, जितने सर्वोत्तम संगठनकी कल्पना की जा सकती है। अगर खाना पकानेकी क्रियाका भी पुनरुद्धार करना होता और उसमें भी इसी तरहके संगठनकी जरूरत होती, तो मैं उसके लिए भी उसी खूबीका दावा करता, जो खद्दरके लिए कर रहा हूँ।
मेरे साम्यवादी कामरेड महोदय जमशेदपुरके मजदूरोंके बीच किये मेरे काममें इसलिए दोष निकालते हैं कि जमशेदपुरमें मैंने टाटाकी ओरसे नहीं किन्तु मजदूरोंकी
ओरसे मानपत्र स्वीकार किया था। मुझे लगता है कि उनके मनमें मेरे कामको नापसन्द करनेका कारण स्व० श्री रतन टाटाका अध्यक्षपदपर आसीन होना था; जो<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१८
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भी हो इस सम्मानसे मैं अपना सिर नीचा हुआ कदापि नहीं मानता। मुझे श्री टाटा दयालु और सौजन्यपूर्ण मालिक मालूम हुए। में समझता हूँ कि कर्मचारियोंकी सभी प्रार्थनाएँ उन्होंने सहज ही स्वीकार कर लीं और मुझे बादमें यह मालूम हुआ कि उस समझौतेका पालन भी ठीकसे किया जा रहा है। मैं अपने कामके लिए धनिकों और गरीबोंसे भी दान माँगता और लेता रहता हूँ। धनी लोग खुशीसे मुझे दान देते हैं। यह कोई व्यक्तिगत विजयकी बात नहीं है। यह अहिसाकी विजय है, जिसका मैं ही, अपूर्ण रीतिसे ही क्यों न हो, प्रतिनिधित्व करनेकी कोशिश करता हूँ, फिर यह प्रतिनिधित्वमें कितने ही अपर्याप्तरूपसे क्यों न करता होऊँ। मेरे लिए यह स्थायी रूपसे व्यक्तिगत सन्तोषकी बात है कि सामान्यतया मुझपर उन लोगोंका भी प्रेम और विश्वास कायम रहता है, जिनके सिद्धान्तों और नीतियोंका में विरोध करता हूँ। दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंने खुद मुझपर विश्वास किया और मेरे प्रति मंत्री वरती।
ब्रिटिश नीति और ब्रिटिश सरकारकी निन्दा करते रहनेके बावजूद भी हजारों अंग्रेज स्त्री-पुरुषों का स्नेह मुझे मिल रहा है और में आधुनिक भौतिक सभ्यताकी बेहिसाब फिर भी मेरे यूरोपीय और अमेरिकी मित्रोंका दायरा बराबर यह भी अहिंसाकी ही विजय है। निन्दा करता रहता हूँ, बढ़ता ही जा रहा है।
अन्तमें, शहरोंमें काम करनेवाले मजदूरवर्गकी बात ले लें। इसके विषयमें कोई गलतफहमी नहीं रह जानी चाहिए। मैं संगठनका विरोधी नहीं, मैं मजदूरोंके संगठनके विरुद्ध नहीं हूँ, मगर में इसे भी हर कामकी तरह हिन्दुस्तानी ढंगपर, या आप चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि अपने ढंगपर करना चाहता हूँ। और में ऐसा कर भी रहा हूँ। हिन्दुस्तानी मजदूर इसे स्वभावसे ही जानता है। में पूँजीपतियोंको मजदूरोंका शत्रु नहीं मानता। मेरा विचार है कि वे मजदूरोंके साथ हिल-मिलकर चल जरूर सकते हैं। दक्षिण आफ्रिका, चम्पारन या अहमदाबादमें मैंने मजदूरोंका जो संगठन किया था, वह पूँजीपतियोंके प्रति किसी वैरभावसे नहीं किया था। हर मामलेमें जहाँ और जितना विरोध करना जरूरी समझा गया, पूरी सफलतासे किया गया। मेरा आदर्श है धनका बराबर बँटवारा, परन्तु जहाँतक में समझ सकता हूँ यह होनेवाली बात नहीं है। इसलिए मैं घनके न्यायपूर्ण समुचित बँटवारेका प्रयत्न करता हूँ। इस आदर्श
स्थितिको मैं खद्दरके जरिये प्राप्त करनेकी कोशिश करता हूँ। और चूंकि इस उद्देश्यकी पूर्तिसे अवश्य ही इंग्लैंड द्वारा हिन्दुस्तानकी शोषण-नीति निष्प्राण हो जायेगी, इसलिए खद्दरके प्रचारका यह भी प्रयोजन है कि हिन्दुस्तान और इंग्लैंडके सम्बन्ध निस्वार्थ हो जायें इसलिए, इस अर्थ में खद्दर स्वराज्यकी प्राप्तिमें सहायक माना जा सकता है।
महात्मा' सम्बोधनको तो मुझे उसके हालपर ही छोड़ देना होगा। असहयोगी होते हुए भी में खुशीसे किसी ऐसे कानूनका समर्थन करूँगा, जिससे मुझे महात्मा
कहना, या मेरे पैर छूना जुर्म करार दिया जा सके। जहाँ में आप ही वह कानून चला सकता हूँ, यानी आश्रम में वहाँ यह जुर्म ही है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''१७-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१९
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६७. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको'''}}}}
{{Right|(दौरेपर)<Br>सत्याग्रहाश्रम, साबरमती<ref>स्थायी पता।</ref><br>१७ मार्च, १९२७}}
{{Left|प्रिय बहन,}}
मुझे आपके पत्र नियमित रूपसे मिलते रहते हैं। आपने मुझसे पूछा है कि भारतपर पूर्ण मद्यनिषेधके विषयमें उदासीन होनेका जो आरोप लगाया जाता है, उसके विषयमें आप अपने सहयोगियोंके कठोर प्रश्नोंका उत्तर कैसे दें? क्योंकि अपनी यात्राके दौरान मेरे पास आपका पता नहीं था, इसलिए मैं आपको पत्र नहीं लिख सका। परन्तु मैंने 'यंग इंडिया'में आपके पत्रपर आधारित एक अग्रलेख<ref>देखिए " क्या भारत मथनिषेधवादी है?", ३-३-१९२७।</ref> लिखा था। आशा है आपने उसे देखा होगा, उसमें आपका अपेक्षित जवाब दिया था। यदि आप कुछ और जानना चाहें तो कृपया मुझे लिखें।
मुझे प्रसन्नता है कि तारिणी सिन्हा आपकी सहायता कर रहे हैं।
मुझे आपके उस पत्रकी प्रतीक्षा है जिसमें आप इंडिया ऑफिसमें हुए अपने अनुभवोंका ब्यौरा देनेवाली हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि अपने आपको इस कार्यके लिए तैयार करनेकी दृष्टिसे आप जो कदम उठा रही हैं, वे उपयुक्त और जरूरी हैं। वे ही कदम आपको अपने सामने प्रस्तुत संघर्षका सामना करने योग्य ज्ञान, अनुभव और आत्मविश्वास प्रदान कर सकते हैं।
'ऑब्जर्वर' के संवाददाताके साथ हुई आपकी भेंटका विवरण मैंने पढ़ा है। वह एक भारतीय दैनिक पत्रमें उद्धृत किया गया था। निश्चय ही यदि वह भेंट आपने न दी होती तो ज्यादा अच्छा होता; इस विषयमें मैं आपसे सहमत हूँ। परन्तु यदि संवाददाताने आपके कथनको ठीकसे उद्धृत किया है, लेकिन उसने साथ ही अपने
भ्रमपूर्ण अनुमान भी दे दिये हैं, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? यदि हम दूसरों द्वारा गलत समझे जानेकी सम्भावनासे हर कदमपर डरते ही रहें तो यह एक
दारुण स्थिति न होगी!
{{Right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० ६५६५) की फोटो-नकलसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२०
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६८. भाषण : गुरुकुल काँगड़ीके दीक्षान्त समारोहमें'''}}}}
{{Right|१९ मार्च, १९२७}}
आज तो जी चाहता है कि साधु वास्वाणीकी तरह में भी आपको प्रणाम करके बैठ जाऊँ। पर मनुष्य दूसरेकी हर बातका अनुकरण नहीं कर सकता। फिर अनुकरण
भी स्वाभाविक होना चाहिए। इसीलिए मुझे आपसे जो कहना है वह कहता हूँ।
स्वामीजीकी<ref>स्वामी श्रद्धानन्द।</ref> मृत्यु हुई ही नहीं है। वह तो तब होगी जब हम उनकी सच्ची देहको नष्ट कर डालें। सच तो यह है कि हमारे प्रयत्नोंसे भी उनकी देहका नाश नहीं हो सकता। जबतक गुरुकुल कायम है, जबतक एक भी स्नातक गुरुकुलकी सेवा कर रहा है, तबतक स्वामीजी जीवित ही हैं। स्वामीजीके शरीरका अन्त तो किसी दिन होता ही। पर गुरुकुल स्वामीजीकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। उन्होंने अपनी सारी शक्ति इस काममें लगा दी थी। इस गुरुकुलकी स्थापनाके लिए उन्होंने सर्वाधिक तपश्चर्या की। आपने सत्यकी प्रतिज्ञा ली है। यदि आप इस प्रतिज्ञाका पालन करें तो संसारमें कोई शक्ति ऐसी नहीं है जो गुरुकुलको मिटा सके।
यदि हम इस गुरुकुलको चिरस्थायी बनाना चाहते हैं तो आवश्यकता इस बातकी है कि हमने स्वामीजीके जीवनमें जिस वीरता, जिस ब्रह्मचर्य, जिस संकल्प और जिस
क्षमाशीलताके दर्शन किये उनका विकास हम अपने जीवनमें भी करें। ब्रह्मचर्यका पालन तथा वीर्यका संचय यही वीरताके लक्षण हैं। इनके द्वारा आप धर्म और देशकी पूरी-पूरी रक्षा कर सकते हैं। मैं जानता हूँ कि यह कार्य कठिन है। मेरे पास आपके यहाँसे बहुतसे विद्यार्थियोंके पत्र आते हैं। कोई मेरी स्तुति करता है; कोई गाली देता है। स्तुतिका तो कुछ उपयोग ही नहीं है। उसका मुझपर कोई असर नहीं होता। परन्तु जब विद्यार्थी चिढ़कर गाली देते हैं तब मुझे उनके विषयमें चिन्ता होती है। क्योंकि क्रोधसे वीर्यका नाश होता है। स्वामीजीके सामने मैंने ब्रह्मचर्यकी अपनी व्याख्या रखी थी और वे मुझसे सहमत थे। किसी स्त्रीका वासनायुक्त स्पर्श न करें, ब्रह्मचर्यका अर्थ इतना ही नहीं है; यह तो ब्रह्मचर्यका केवल आरम्भ है। परन्तु क्षमाकी पराकाष्ठा ब्रह्मचर्यका लक्षण है। पिछले वर्ष जब स्वामीजी टंकारासे
लौटते हुए मुझे मिलने आये थे उस समय उन्होंने मुझसे कहा था कि हिन्दू धर्मकी रक्षा नीतिसे ही शक्य है। यदि आप वैदिक आचार और विचारकी रक्षा करना चाहते हैं तो आपको यह बात याद रखनी चाहिए कि आपको ढेरों रुपया मिल सकता है, पर यदि यहाँ नीति और ब्रह्मचर्यका आधार न रहा तो आपका यह गुरुकुल
मिट्टीमें मिल जायेगा। यह भूमि तो जड़ है-- इसकी आत्मा आप लोग हैं। यदि<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२१
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : हरिद्वारमें|१८३}}</noinclude>आप अपना आत्मबल खो बैठेंगे और “उदर निमित्तं बहुकृत वेशः"<ref>शंकराचार्य कृत चर्पटमंजरीसे।</ref>जैसे बनेंगे तो आपकी सारी शिक्षा निरर्थक होगी।
आज मैं आपके सामने चरखे और खादीकी बात करने नहीं आया हूँ। ब्रह्मचर्य, वीरता और क्षमापालन आपका पहला काम है। इसे भूलेंगे तो स्वामीजीका कार्य कायम नहीं रहेगा। रशीदकी गोली स्वामीजीका क्या बिगाड़ सकी? वे तो इस गोलीसे अमर हो गये।
स्वामीजीका दूसरा कार्य अछूतोद्धार था। खादीकी वकालत मालवीयजीने जिन शब्दोंमें की थी उस तरह में नहीं कर सकता, पर इतना जरूर कहूँगा कि यदि हमारे मनमें सदा गरीबों और अछूतोंका विचार हो तो आप खादीसे अलग नहीं रह सकते। वीर्यकी रक्षाके लिए कोई अमली काम करना हो तो इसके लिए खादीसे बढ़कर कोई दूसरा काम नहीं है। खादीके कार्यके साथ में स्वामीजीका नाम नहीं जोड़ना चाहता, क्योंकि वह स्वामीजीका प्रधान कार्य नहीं था। पर इतना अवश्य कहूँगा कि आप स्नातक विदेशी वस्त्रोंसे अपने आपको सुशोभित करनेका विचार न करें। गरीबों और अछूतोंकी रक्षाके लिए सिर्फ खादी ही धारण करें। ईश्वर आप सबके ब्रह्मचर्यकी, सत्यकी और प्रतिज्ञाओंकी रक्षा करे, गुरुकुलका कल्याण करे, और स्वामीजीकी प्रत्येक शुभ प्रवृत्तिको चालू रखे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २७-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१६९. भाषण : हरिद्वारमें'''<ref>गांधीजीने यह भाषण श्रद्धानन्द स्मारक कोषके लिए की गई अपीलके समर्थनमें दिया था।</ref>}}}}
{{Right|१९ मार्च, १९२७}}
यदि मैं आर्यसमाजकी आलोचना करता हूँ तो उसकी प्रशंसा भी करता हूँ। जो हार्दिक प्रशंसा करता है उसे आलोचना करनेका अधिकार भी है। ब्रिटिश साम्राज्यकी
स्थापनाके बाद शिक्षित वर्गका जनताके साथ कोई आध्यात्मिक सम्बन्ध नहीं रहा। आर्यसमाजने इस सम्बन्धको पुनःस्थापित किया है; ऐसी मेरी मान्यता है।
आज यहाँ जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह शायद ही कहीं और देखनेको मिलेगा। मैं आपका थोड़ा-बहुत अनुकरण करता हूँ। पर मुझे बाल्टियों में पैसा नहीं
मिलता। मैं तो रूमालोंमें पैसा इकट्ठा करता हूँ। मुझे तो पैसे मिलते हैं और आपको रुपये मिलते हैं। सभी पंजाबी धनी नहीं हैं; कुछ गरीब भी हैं। पर आपका दिल उदार है। मैं आर्यसमाजकी आलोचना करता हूँ। आपसे कहता हूँ कि आप झगड़ा करनेवाले लोग हैं। पर आज मैं आपका ही काम करने यहाँ आया हूँ। क्योंकि मैं मानता हूँ कि गुरुकुलकी मार्फत हिन्दुस्तानकी सेवा हो रही है। आपकी आलोचना<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२२
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2026-08-21T16:46:02Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|१८४}}</noinclude>करते हुए भी मैं आपके त्यागको नहीं समझता, सो बात नहीं है। आपमें त्यागका गुण तो अवश्य है, पर इतने ही त्यागसे आप सन्तुष्ट न हों। आपको जितना त्याग करना चाहिए उसके मुकाबलेमें आजका त्याग कुछ भी नहीं। फिर भी मैं आपके त्यागकी प्रशंसा करता हूँ, क्योंकि दूसरोंमें तो आपके जितनी त्याग शक्ति भी नहीं है।
मैं आपकी जो प्रशंसा कर रहा हूँ, उससे आप फूल न जायें। आपने जो दिया है उससे आप यह न मान लें कि आपने जितना दे सकते थे उतना दे दिया। दानका
अर्थ ही है ज्यादासे ज्यादा देना। जिस संस्थाके लिए श्रद्धानन्दजीने अपने सर्वस्वका त्याग कर दिया उस संस्थाके लिए आप जितना दे सकें उतना धन दें। गुरुकुलकी शिक्षाका दूसरा कोई फल न भी मिले तो भी उसने संस्कृतके अध्ययनको शिक्षामें स्थायी स्थान तो प्रदान किया ही है। यह क्या कोई मामूली बात है। जब भी मैं देखता हूँ कि कोई पंजाबी देवनागरी लिपि पढ़ रहा है, मैं उससे तुरन्त यह अनुमान लगा लेता हूँ कि उसने गुरुकुलमें शिक्षा पाई होगी। दोष किस संस्थामें नहीं हैं? परन्तु इन दोषोंके बावजूद गुरुकुलने काफी सेवा की है। आप इस गुरुकुलकी सेवा करें, इसे जीवित रखें। श्रद्धानन्दजी कहते थे कि इस संस्थाके लिए तपश्चर्या और ब्रह्मचर्य ही मेरा दान है। आप यही आश्वासन दें कि श्रद्धानन्दजीकी संस्थाको जीवन्त रखनेके लिए आप जितना दान दे सकेंगे उतना देंगे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २७-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१७०. सत्याग्रह सप्ताह'''}}}}
६ अप्रैल अब नजदीक आ रही है। मैं मानता हूँ कि उस समय प्रत्येक स्थानपर खादी बेचने के प्रयत्न किये जायेंगे। अहमदाबादके रोची रोडपर स्थित खादी भण्डारने
उस अवधि में भाव कम करनेकी सूचना<ref>यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref> भेजी है। में उसकी ओर अहमदाबादके नागरिकोंका ध्यान आकर्षित करता हूँ:
में उम्मीद रखता हूँ कि बहुतसे नागरिक खादी खरीदेंगे। स्मरणीय है कि यह रियायत केवल ६ अपैलसे १३ अप्रैलतक दी जायेगी।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २० ३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७१. भाषण : हरिद्वारकी राष्ट्रीय शिक्षा परिषद में'''<ref>गांधीजीने यह भाषण गुरुकुल कांगड़ीके तत्वावधानमें हुई परिषद के अध्यक्षपदसे किया था।</ref>}}}}
{{Right|२० मार्च, १९२७}}
संस्कृतका अध्ययन करना प्रत्येक भारतीय विद्यार्थीका कर्त्तव्य है। हिन्दुओंका तो है ही, मुसलमानोंका भी है। क्योंकि आखिर उनके पूर्वज भी राम और कृष्ण ही थे। और अपने इन पूर्वजोंको जाननेके लिए उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए। किन्तु मुसलमानोंके साथ सम्बन्ध बनाये रखनेके लिए उनकी भाषा जानना हिन्दुओंका भी कर्त्तव्य है। आज हम एक-दूसरेकी भाषासे दूर भागते हैं, क्योंकि हमारी बुद्धि नष्ट हो गई है। जो संस्था एक-दूसरेके प्रति मनमें द्वेष और भय रखनेकी शिक्षा दे,
निश्चित मानिये कि वह राष्ट्रीय संस्था कदापि नहीं है।
'''गांधीजीने कहा कि राष्ट्रीय संस्थाओंको हिन्दू-मुस्लिम एकताके संदेशवाहक तैयार करने चाहिए। जो संस्थाएँ धर्मान्ध, कट्टर हिन्दू या मुसलमान तैयार करती वे नष्ट कर देने योग्य हैं। शैक्षणिक संस्थाओंका उद्देश्य व्यक्तियोंको धर्मान्ध बनाना नहीं है। मुझे विश्वास है कि निराशाका कोई कारण नहीं है और अब भी यदि आत्मावलम्बी और आत्मत्यागी शिक्षक मिल सकें तो हमारा उद्देश्य सफल हो सकता है।'''<ref>यह अमुच्छेद लीडर, २३-३-१९२७ से लिया गया है।</ref>
{{Left|[गुजरातीसे]<br>नवजीवन, २७-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१७२. पर्ची : चन्द त्यागीको'''}}}}
{{Right|मौनवार, २१ मार्च, १९२७}}
{{Left|श्री चन्द त्यागी,}}
आपके साथ में रात्रीको बातें करना चाहता था परंतु आप नहीं थे। दस बजने पर मैंने मौन ले लिया।
आपको क्या इच्छा है? यदि आप यहां निश्चित है और शांत है तो जिन चींजोको आप मानते है उसका प्रचार करे और उस द्वारा देशकी सेवा करे।
... ... ...<ref>साधन-सूत्रके अनुसार।</ref>
आप जब दिल चाहे आश्रममें जा सकते हो इस समय मेरा तो वहाँ रहना नहीं होता है। इसलिये में नहि जानता आप वहां जाना चाहिगें या नहि।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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निश्चित मानिये कि वह राष्ट्रीय संस्था कदापि नहीं है।
'''गांधीजीने कहा कि राष्ट्रीय संस्थाओंको हिन्दू-मुस्लिम एकताके संदेशवाहक तैयार करने चाहिए। जो संस्थाएँ धर्मान्ध, कट्टर हिन्दू या मुसलमान तैयार करती वे नष्ट कर देने योग्य हैं। शैक्षणिक संस्थाओंका उद्देश्य व्यक्तियोंको धर्मान्ध बनाना नहीं है। मुझे विश्वास है कि निराशाका कोई कारण नहीं है और अब भी यदि आत्मावलम्बी और आत्मत्यागी शिक्षक मिल सकें तो हमारा उद्देश्य सफल हो सकता है।'''<ref>यह अमुच्छेद लीडर, २३-३-१९२७ से लिया गया है।</ref>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७१. भाषण : हरिद्वारकी राष्ट्रीय शिक्षा परिषद में'''<ref>गांधीजीने यह भाषण गुरुकुल कांगड़ीके तत्वावधानमें हुई परिषद के अध्यक्षपदसे किया था।</ref>}}}}
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संस्कृतका अध्ययन करना प्रत्येक भारतीय विद्यार्थीका कर्त्तव्य है। हिन्दुओंका तो है ही, मुसलमानोंका भी है। क्योंकि आखिर उनके पूर्वज भी राम और कृष्ण ही थे। और अपने इन पूर्वजोंको जाननेके लिए उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए। किन्तु मुसलमानोंके साथ सम्बन्ध बनाये रखनेके लिए उनकी भाषा जानना हिन्दुओंका भी कर्त्तव्य है। आज हम एक-दूसरेकी भाषासे दूर भागते हैं, क्योंकि हमारी बुद्धि नष्ट हो गई है। जो संस्था एक-दूसरेके प्रति मनमें द्वेष और भय रखनेकी शिक्षा दे,
निश्चित मानिये कि वह राष्ट्रीय संस्था कदापि नहीं है।
'''गांधीजीने कहा कि राष्ट्रीय संस्थाओंको हिन्दू-मुस्लिम एकताके संदेशवाहक तैयार करने चाहिए। जो संस्थाएँ धर्मान्ध, कट्टर हिन्दू या मुसलमान तैयार करती वे नष्ट कर देने योग्य हैं। शैक्षणिक संस्थाओंका उद्देश्य व्यक्तियोंको धर्मान्ध बनाना नहीं है। मुझे विश्वास है कि निराशाका कोई कारण नहीं है और अब भी यदि आत्मावलम्बी और आत्मत्यागी शिक्षक मिल सकें तो हमारा उद्देश्य सफल हो सकता है।'''<ref>यह अमुच्छेद लीडर, २३-३-१९२७ से लिया गया है।</ref>
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{{Left|श्री चन्द त्यागी,}}
आपके साथ में रात्रीको बातें करना चाहता था परंतु आप नहीं थे। दस बजने पर मैंने मौन ले लिया।
आपको क्या इच्छा है? यदि आप यहां निश्चित है और शांत है तो जिन चींजोको आप मानते है उसका प्रचार करे और उस द्वारा देशकी सेवा करे।
... ... ...<ref>साधन-सूत्रके अनुसार।</ref>
आप जब दिल चाहे आश्रममें जा सकते हो इस समय मेरा तो वहाँ रहना नहीं होता है। इसलिये में नहि जानता आप वहां जाना चाहिगें या नहि।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२४
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मुझको भी जब चाहे लीख सकते है।
{{Left|मूल (सी० डब्ल्यू० ४२७६ ) से।<br>सौजन्य : चन्द त्यागी|2em}}
{{C|{{larger|'''१७३. पत्र : ममा डी० सरैयाको'''}}}}
{{Right|हरिद्वार<br>फाल्गुन बदी ३, १९८३ [२१ मार्च, १९२७]}}
{{Left|चि० ममा,}}
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई। तुमने यदि क्रोध किये बिना और धर्म जानकर गंगाबहनको मुक्ति दी है तब तो तुम्हारा यह कदम निस्सन्देह बहुत अच्छा है और इसीसे तुम्हें शान्ति मिलेगी, क्योंकि तुम्हारा मन सुस्थिर हो गया होगा। यदि हमारा कोई प्रियजन अपना मन ईश्वरमें लगाये और समस्त जगतको अपना कुटुम्ब मानकर व्यवहार करे तो इससे हमें आनन्दित होना चाहिए।
मुझे उम्मीद है कि तुम्हें अब आराम होगा। मुझे फिर पत्र लिखना। स्याहीसे साफ-साफ अक्षर लिखनेका अभ्यास करना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८१९) से।<br>सौजन्य : पुरुषोत्तम डी० सरैया|2em}}
{{C|{{larger|'''१७४. पत्र : फूलचन्द शाहको'''}}}}
दुबार नहीं पढ़ा
{{Right|हरिद्वार<br>फाल्गुन वदी ३, १९८३ [२१ मार्च, १९२७ ]}}
भाईश्री ५ फूलचन्द,
२,००० रुपयों सम्बन्धी आपका पत्र मुझे भेजा गया है। अब मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं रही। सारी बचत खत्म हो गयी है और इसलिए मुझे फिरसे भिक्षा माँगनी होगी।
इस बार तो मैंने उन्हें लिखा है कि जिस तरह हो सके उस तरह आपको रुपया भेज दें। लेकिन इसके बाद काम कैसे चलेगा?
अब आपको मुझसे बजट पास करवाना होगा। परिषदके चालू खर्चके लिए जरूरी पैसे उगाहनेकी शक्ति आपमें अर्थात् देवचन्दभाई और आपमें होनी चाहिए। यदि ऐसा
नहीं होता तो हम कबतक चला सकेंगे?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२५
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2026-08-22T05:15:13Z
रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: गंगाबहन वैद्यको|१८७}}</noinclude>अन्य सब कार्यालयोंका बजट पहलेसे ही पास होना चाहिए। खासकर अपनी शालाका बजट आप नानाभाईको दिखा लिया करें। वे शालाका निरीक्षण करके जितना पैसा पास करें में उतना पैसा इकट्ठा करनेका प्रयत्न करूँगा। सब राष्ट्रीय शालाओंको में विद्यापीठके साथ मिला देनेका विचार किया करता हूँ, क्योंकि उनके लिए अलगसे पैसा माँगनेमें अब दिक्कत होती है। अनेक दान देनेवालोंसे खादीके लिए तो पैसा ले ही लिया जाता है। मैंने परिषदकी बैठकमें कुछ पैसे इकट्ठा करनेकी उम्मीद की थी लेकिन बैठक हुई नहीं। अब चूंकि परिषदकी बैठक अगस्त तकके लिए स्थगित हो गई है इसलिए हमें इस सवालपर फिरसे विचार करना इसलिए अब इसके बाद आप जो भी माँग करेंगे उसका बजट मुझसे पहलेसे पास करवा लेना। अन्ततः तो [गुजरातकी] सब संस्थाओंको अपने पैरोंपर खड़ा होना पड़ेगा, ठीक वैसे ही जिस तरह सारे भारतवर्ष में है। अथवा हमें शिक्षाके सम्बन्धमें महागुजरात के लिए कोई खास योजना बनानी होगी। आप नानाभाईसे मिलकर इन सब बातोंपर विचार करें। हमारे पास तीन काम कहे जा सकते हैं, खादी, अन्त्यज [-सेवा] और सामान्य राष्ट्रीय शिक्षा।
मेरे विचारसे तो यह तीनों खादीमें समाहित हैं; शिक्षा तो अवश्य समाहित है। अन्त्यजोंकी समस्याका अभी पूर्ण समाधान नहीं हो सका है। यह सब साथियोंके विचारके लिए लिख रहा हूँ। मेरे साथ पत्र-व्यवहार करके जहाँ आवश्यक लगे स्पष्टीकरण करा लें। उससे अनेक समस्याएँ सुलझ जायेंगी।
यह पत्र चि० छगनलाल आपको पढ़कर भेजेगा, जिससे कि वे सब यह समझ सकें कि में इस समय कहाँ हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च:]<ref>दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए "पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको", १४-३-१९२७।</ref>
{{Left| गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २८३३) से।<br>सौजन्य : शारदाबहन शाह|2em}}
{{C|{{larger|'''१७५. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|हरिद्वार<br>मौनवार [२१ मार्च, १९२७]}}
{{Left|चि० गंगाबहन,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैं उसे चि० किशोरलालको भेज रहा हूँ। किशोरलाल सत्यनिष्ठ और मुमुक्षु है। उसे जिस विषयमें सन्देह हो उसपर तुम्हें और मुझे पुनर्विचार करना होगा। अतः तुम्हें और मुझे उसे अपनी बात समझानेका प्रयत्न करना होगा, जिससे तुम्हारा कदम उसे धर्म विरुद्ध न जान पड़े। यदि चि० ममाका पत्र<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: गंगाबहन वैद्यको|१८७}}</noinclude>अन्य सब कार्यालयोंका बजट पहलेसे ही पास होना चाहिए। खासकर अपनी शालाका बजट आप नानाभाईको दिखा लिया करें। वे शालाका निरीक्षण करके जितना पैसा पास करें में उतना पैसा इकट्ठा करनेका प्रयत्न करूँगा। सब राष्ट्रीय शालाओंको में विद्यापीठके साथ मिला देनेका विचार किया करता हूँ, क्योंकि उनके लिए अलगसे पैसा माँगनेमें अब दिक्कत होती है। अनेक दान देनेवालोंसे खादीके लिए तो पैसा ले ही लिया जाता है। मैंने परिषदकी बैठकमें कुछ पैसे इकट्ठा करनेकी उम्मीद की थी लेकिन बैठक हुई नहीं। अब चूंकि परिषदकी बैठक अगस्त तकके लिए स्थगित हो गई है इसलिए हमें इस सवालपर फिरसे विचार करना इसलिए अब इसके बाद आप जो भी माँग करेंगे उसका बजट मुझसे पहलेसे पास करवा लेना। अन्ततः तो [गुजरातकी] सब संस्थाओंको अपने पैरोंपर खड़ा होना पड़ेगा, ठीक वैसे ही जिस तरह सारे भारतवर्ष में है। अथवा हमें शिक्षाके सम्बन्धमें महागुजरात के लिए कोई खास योजना बनानी होगी। आप नानाभाईसे मिलकर इन सब बातोंपर विचार करें। हमारे पास तीन काम कहे जा सकते हैं, खादी, अन्त्यज [-सेवा] और सामान्य राष्ट्रीय शिक्षा।
मेरे विचारसे तो यह तीनों खादीमें समाहित हैं; शिक्षा तो अवश्य समाहित है। अन्त्यजोंकी समस्याका अभी पूर्ण समाधान नहीं हो सका है। यह सब साथियोंके विचारके लिए लिख रहा हूँ। मेरे साथ पत्र-व्यवहार करके जहाँ आवश्यक लगे स्पष्टीकरण करा लें। उससे अनेक समस्याएँ सुलझ जायेंगी।
यह पत्र चि० छगनलाल आपको पढ़कर भेजेगा, जिससे कि वे सब यह समझ सकें कि में इस समय कहाँ हूँ।
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{{Left|[पुनश्च:]<ref>दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए "पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको", १४-३-१९२७।</ref>}}
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{{C|{{larger|'''१७५. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|हरिद्वार<br>मौनवार [२१ मार्च, १९२७]}}
{{Left|चि० गंगाबहन,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैं उसे चि० किशोरलालको भेज रहा हूँ। किशोरलाल सत्यनिष्ठ और मुमुक्षु है। उसे जिस विषयमें सन्देह हो उसपर तुम्हें और मुझे पुनर्विचार करना होगा। अतः तुम्हें और मुझे उसे अपनी बात समझानेका प्रयत्न करना होगा, जिससे तुम्हारा कदम उसे धर्म विरुद्ध न जान पड़े। यदि चि० ममाका पत्र<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२६
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्रोधमें न लिखा गया हो तो उसे अच्छा ही माना जायेगा और यदि तुमने भी अपना कदम काफी सोच-समझकर उठाया हो भी शान्ति ही मिलेगी। यदि उसे शान्ति न कि उस कदममें कहीं कोई भूल है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८८२४) से।<br>सौजन्य : गंगाबहन वैद्य|2em}}
{{C|{{larger|'''१७६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ मार्च, १९२७]<ref>यात्राके कार्यक्रमके आधारपर।</ref>}}
{{Left|भाई घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मिल गया है।
पैसे मील जाने पर चर्खा कार्यकी मदद होगी। पू० मालवीजी चर्खाकी ओर ज्यादाह आ रहे हैं इससे मुझको बड़ा आनन्द होता है। चखके लीये मुझको बहौत रूपये चाहींयेगें? उनकी मदद मोलने पर अधिक धन इकट्ठा हो सकता है।
भाईजीने और रामेश्वरजीने अंत्यजोके लीये जलाशयोंके निमित्त रूपये देनेका निश्चय किया है उसका व्यय उनके लिखनेके अनुसार होगा।
परसराम फटे हुए कागजोंको इकट्ठा करता था उसका मुझे कुछ पता नहीं था। उसको मैंने इस दोषका दर्शन कराया है। वह आपको लीखेगा। उसका हेतु मलीन न था। वह पागलसा है। मुझको काम दे सकता है। पू० मालवीजी और रविंद्रनाथके साथ कुछ दिनों तक रहना चाहता है। मैंने कह दीया है वह स्वतंत्र चेष्टा उनकी सेवामें रहनेकी करे।
यूरोपमें आरोग्य अच्छा रखनेके लीये इतने नियमोंका पालन आवश्यक समझता हूं।
१) अपरिचित खोराक न लेना।
३) वे लोग छ सात बार खाते हैं। हम तीन वारेसे ज्यादा न खाय। बीचमें चौकोलैट इ० खानेकी बुरी टेव न रखे।
३) रात्रीको १ बजे तक भी खा लेते हैं। हम रात्रीको ८ बजेके बाद न खाय। किसी जगह पर जाने पर चाह इ० लेनेके लीये हम मजबूर होते हैं ऐसा माना जाता है। ऐसा कुछ नहि है।
४) नित्य कमसे कम ६ मईल पैदल घूमनेका अभ्यास रखना अत्यावश्यक है। प्रातःकालमें और रात्रिको दोनों समय घूमना चाहीये।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२७
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको|१८९}}</noinclude>५) हृदके बाहर कपड़े पहननेकी आवश्यकता न मानी जाय। रहस्य यही है की शरीरको ठंडी न लगे। घूमनेसे ठंडी चली जाती है।
६) इंग्रेजी कपड़े पहननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।
७) यूरोपके गरीब लोगोंका परीचय करनेकी कोशीश की जाय। इस परीचयके लीये बहौत काम पैदल करना आवश्यक है। जब समय है तब पैदल ही जाना अच्छा है।
८) यूरोपमें गये तो कुछ न कुछ करना ही है ऐसा कभी न सोचा जाय। स्वच्छ प्रयत्नोंसे और निश्चिन्ततासे जो बन पड़े वह कीया जाये।
९) मेरे ख्यालसे तो आपके जानेका एक परिणाम अवश्य आ सकता है। शरीर वज्रसम बनाया जाये। यह बात बन सकती है।
१०) ईश्वर आपको मानसिक व्यभिचारसे बचा ले। बहोत कम हिंदी इस दोष से बचते हैं। वहांका रहनसहन यद्यपि उन लोगोंके लीये स्वाभाविक है हमारे लीये
मद्यपानसा बन जाता है।
११) 'गीताजी' और 'रामायणका' अभ्यास हो तो हरगीज न छोड़ा जाय। यदि नहीं है तो अब रखा जाये।
आपने इतनी सूक्ष्म सूचनाकी तो आशा नहिं रखी होगी। मैंने दी है क्योंकी आप सब भाइयोंकी सज्जनता पर मेरा विश्वास है। आप जैसे जो थोड़े धनिकोंमें धनके साथ नम्रता और सज्जनता है उनकी नम्रता और सज्जनतामें में बहोत वृद्धि चाहता हूं। और उस वस्तुका देश कार्यके लीये उपयोग करना चाहता हूं। शठं प्रति
शाठ्यंका सिद्धान्तको मैं मानता नहि हुं। इसलीये जिस जगह मृदुता, सत्य, अहिंसा ई० का थोड़ा-सा भी दर्शन कराता हूं तो सूम जैसे धनका संग्रह करता है ठीक इसी
तरह मैं ऐसे गुणोंका संग्रह करनेकी चेष्टा कर आनंदित होता हूं। और पूछना है तो पूछोगे।
२३-२४ मुंबई
२५-२६ कोलापुर
२७-४ अप्रैल बेलगांव
५- १२ मद्रास
{{Right|आपका,<br>'''मोहनदास'''}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
इस पत्रकी पहोंच भेजीयो।
{{Left|मूल (सी० डब्ल्यू ० ६१४६) से।<br>सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२८
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७७. प्रश्नोंके उत्तर'''}}}}
{{Right|[२१ मार्च, १९२७]<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
'''[ प्रश्न :] क्या आपको वर्तमान राजनैतिक गुलामीका वातावरण असह्य नहीं लगता है?'''
[उत्तर :] लगता है।
'''२. यदि ऐसा है तो क्या आप स्वयं व्यक्तिगत रूपसे उससे छुटकारा पाने और राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिए तैयार हैं या नहीं? '''
तैयार हूँ।
'''३. "आपके तैयार होने" का अर्थ यदि यह लगाया जाये कि आपने दो आध्यात्मिक गुणों, आत्मबल और स्वातन्त्र्य प्रेमकी अवाप्ति की है, तो क्या आपको
कोई ऐतराज होगा?'''
आप ऐसा मान सकते हैं।
'''४. क्या "स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी तैयारी" का यही अर्थ नहीं है कि भारतीयों द्वारा भी उसकी प्राप्तिके लिए उन्हीं सब गुणों और शक्तिको अवाप्ति की जाये जो आपने क्रमशः प्राप्त कर ली हैं।'''
इसका यही अर्थ है।
'''५. क्या ऐसे गुणों को प्राप्त करनेके लिए बौद्धिक और नैतिक प्रशिक्षण आवश्यक नहीं है?'''
है।
'''६. यदि ऐसा है, तो सारे राष्ट्रको प्रशिक्षित करनेके कौनसे साधन हैं? और इसके लिए कितना समय लगेगा।'''
कताई।
'''७. क्या जनताके मनमें राजनैतिक गुलामीके प्रति पूरी-पूरी अरुचि उत्पन्न कर देना परमावश्यक नहीं है?'''
है।
'''८. यदि ऐसा है तो आपकी रायमें ३० करोड़ भारतीयोंमेंसे आज कितने प्रतिशत लोगोंके मनमें यह भावना विद्यमान है?'''
अनुमान लगाना कठिन है।
'''९. जनताको गुलामीका एहसास हो, क्या इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि उसे मातृभूमिके बीते हुए सुनहरे दिनोंका ज्ञान हो और वह वर्तमान दुःखपूर्ण परिस्थितियोंके प्रति सच्ची बेचैनीका अनुभव करें?'''
है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२९
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||प्रश्नोंके उत्तरे|१९१}}</noinclude>'''१०. क्या इस ज्ञानके बिना या इस बेचैनीका अनुभव हुए बिना जनतामें आत्मबलका विकास किया जा सकता है?'''
कठिन है।
११. क्या आत्मबलको तथा हर प्रकारकी पीड़ाको शान्ति और निर्भयताके साथ सहन करनेकी शक्तिको अपनेमें सन्निविष्ट करना ही आपके आध्यात्मिक कार्य-कलापका मुख्य आधारस्तम्भ है या नहीं?
हाँ, कुछ हदतक।
'''१२. जनताको शासकोंसे सत्ता छीननेके लिए अपने आत्मबलका उपयोग कहाँ, किन परिस्थितियोंमें और किस प्रकार करना है?'''
सारे देश में अहिंसापूर्ण असहयोगके द्वारा।
'''१३. सविनय अवज्ञा और सरकारको कर देनेसे इनकार करना, इन दो उद्देश्योंको पूरा करनेके लिए लोगोंमें किस प्रकारकी बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक तैयारीकी जरूरत है?'''
हाथ कताई उन्हें अहिंसा और आत्मनिर्भरता दोनोंकी शिक्षा देती है।
'''१४. यदि हम अपनी तैयारीको पूर्ण अर्थाति सोलह आने मानना चाहें, तो आपकी रायमें आपके अनुयायियों या सामान्य जनतामें स्वतन्त्रता प्राप्तिके लिए कितने आने तैयारीका होना जरूरी है।'''
आठ आने एक पाई।
'''१५. क्या आज जनता इस प्रकार तैयार है? यदि नहीं तो आपकी रायमें उसे तैयार करनेमें कितना समय लगेगा?'''
अभी तैयार नहीं है। भविष्यवाणी नहीं कर सकता।
'''१६. इस देशके कितने प्रतिशत लोग जानते हैं कि भारतमें महात्मा गांधी सरीखा एक अनोखा व्यक्तित्व भी है?'''
मुझे इसका कुछ अन्दाज नहीं है।
'''१७. यदि यह मान लिया जाये कि हजारमें से १ व्यक्ति इसे जानता है तो आपकी रायमें एक लाखमें से कितने लोग महात्माजीके स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों और कार्यवाहियोंके विषयमें जानते होंगे?'''
मुझे जाननेवाले १,००० लोगों में से एक ऐसा जाननेवाला होगा।
'''१८. ऐसा लगता है कि विचारों और कार्यवाहियोंके सम्बन्धमें इस प्रकारकी जानकारी कतई नहीं है। यदि इस अज्ञानको दूर करना है, तो कितनी देरतक ऐसा
करते रहना होगा?'''
जितनी देरतक जरूरी हो।
'''१९. क्या आप कह सकते हैं कि यदि हिन्दुओं और मुसलमानोंमें एकता न भी हो, लेकिन यदि दोनों जातियोंके लोगोंको राजनैतिक गुलामीके कष्ट असह्य लगें और वे उनसे मुक्त होनेके लिए संघर्ष करें अथवा दोनों जातियोंके मनमें यह बात भी'''<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||प्रश्नोंके उत्तरे|१९१}}</noinclude>'''१०. क्या इस ज्ञानके बिना या इस बेचैनीका अनुभव हुए बिना जनतामें आत्मबलका विकास किया जा सकता है?'''
कठिन है।
'''११. क्या आत्मबलको तथा हर प्रकारकी पीड़ाको शान्ति और निर्भयताके साथ सहन करनेकी शक्तिको अपनेमें सन्निविष्ट करना ही आपके आध्यात्मिक कार्य-कलापका मुख्य आधारस्तम्भ है या नहीं?'''
हाँ, कुछ हदतक।
'''१२. जनताको शासकोंसे सत्ता छीननेके लिए अपने आत्मबलका उपयोग कहाँ, किन परिस्थितियोंमें और किस प्रकार करना है?'''
सारे देश में अहिंसापूर्ण असहयोगके द्वारा।
'''१३. सविनय अवज्ञा और सरकारको कर देनेसे इनकार करना, इन दो उद्देश्योंको पूरा करनेके लिए लोगोंमें किस प्रकारकी बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक तैयारीकी जरूरत है?'''
हाथ कताई उन्हें अहिंसा और आत्मनिर्भरता दोनोंकी शिक्षा देती है।
'''१४. यदि हम अपनी तैयारीको पूर्ण अर्थाति सोलह आने मानना चाहें, तो आपकी रायमें आपके अनुयायियों या सामान्य जनतामें स्वतन्त्रता प्राप्तिके लिए कितने आने तैयारीका होना जरूरी है।'''
आठ आने एक पाई।
'''१५. क्या आज जनता इस प्रकार तैयार है? यदि नहीं तो आपकी रायमें उसे तैयार करनेमें कितना समय लगेगा?'''
अभी तैयार नहीं है। भविष्यवाणी नहीं कर सकता।
'''१६. इस देशके कितने प्रतिशत लोग जानते हैं कि भारतमें महात्मा गांधी सरीखा एक अनोखा व्यक्तित्व भी है?'''
मुझे इसका कुछ अन्दाज नहीं है।
'''१७. यदि यह मान लिया जाये कि हजारमें से १ व्यक्ति इसे जानता है तो आपकी रायमें एक लाखमें से कितने लोग महात्माजीके स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों और कार्यवाहियोंके विषयमें जानते होंगे?'''
मुझे जाननेवाले १,००० लोगों में से एक ऐसा जाननेवाला होगा।
'''१८. ऐसा लगता है कि विचारों और कार्यवाहियोंके सम्बन्धमें इस प्रकारकी जानकारी कतई नहीं है। यदि इस अज्ञानको दूर करना है, तो कितनी देरतक ऐसा
करते रहना होगा?'''
जितनी देरतक जरूरी हो।
'''१९. क्या आप कह सकते हैं कि यदि हिन्दुओं और मुसलमानोंमें एकता न भी हो, लेकिन यदि दोनों जातियोंके लोगोंको राजनैतिक गुलामीके कष्ट असह्य लगें और वे उनसे मुक्त होनेके लिए संघर्ष करें अथवा दोनों जातियोंके मनमें यह बात भी'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३०
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''आ जाये कि स्वतन्त्रताके बिना जीवन मृत्युसे बदतर है तो भी स्वराज्य पा सकना असम्भव है?'''
यदि दोनों जातियोंको ऐसा लगे, जैसा कि आप कहते हैं, तो मैं इसे असम्भव नहीं मानता।
'''२०. क्या आप यह कहेंगे कि असह्य राजनैतिक परिस्थितियोंकी दुःखपूर्ण प्रतीतिमें दो विभिन्न संस्कृतिके लोगोंको एकताके सूत्रमें बाँध सकनेकी सामर्थ्य नहीं है।'''
उसमें यह सामर्थ्य है।
'''२१. मुसलमानोंने हिन्दुओंवर जो धार्मिक अत्याचार किये थे, वे ही शिवाजीके जमाने में स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका मुख्य कारण बने। विभिन्न जातियोंके लोग इन धार्मिक अत्याचारोंसे अपने-आपको मुक्त करानेके लिए एक हुए। इतिहासके विद्यार्थी इस बातको जानते हैं कि समर्थ गुरु रामदास द्वारा मठोंकी स्थापनासे इस कार्यमें बहुत सहायता मिली थी। क्या वह सच नहीं है कि आज भी लोग अपने आपको राजनैतिक, औद्योगिक और व्यावसायिक उत्पीड़नसे बचाने के लिए ही स्वतन्त्रता
चाहते हैं?'''
हाँ, वस्तुतः ऐसा ही है।
'''२२. चाहे अस्पृश्यता दूर हो या न हो, चाहे हिन्दुओं और मुसलमानोंकी आपसी फूट दूर हो या न हो, किन्तु यदि इन दोनों बातोंके रहते हुए भी हमारे पास दो हजार व्यक्ति ऐसे हों, जिनमें आत्मबल हो और जो आजादी के दीवाने हों, तो क्या आपको लगता है कि ऐसे ये आदमी देशकी आजादी हासिल नहीं कर सकते?'''
ऐसे दो हजार व्यक्ति फूट और अस्पृश्यताको उखाड़ फेकेंगे और स्वराज्यकी स्थापना कर सकेंगे।
'''२३. यदि १,४०० असैनिक अधिकारी भारत जैसे विशाल देशको गुलामीके पाशमें बाँधकर रख सकते हैं, तो क्या आप सोचते हैं कि इन उपर्युक्त गुणोंसे लैस दो हजार व्यक्ति भारतको पुनः आजाद नहीं कर सकते?'''
बाईसवें प्रश्नका उत्तर ही इसका उत्तर है
'''२४. संक्षेपमें क्या आपका यह कहना है कि स्वतन्त्रताके बिना जीवनको असह्य मानते हुए गुलामीके प्रति पूरे देशमें केवल तीव्र अरुचिकी भावना व्याप्त हो जानेसे ही स्वराज्य पा सकना सम्भव नहीं है?'''
कोरी भावनासे स्वराज्य कभी नहीं मिल सकता।
२५. यदि ऐसा लगे कि उल्लिखित भावनाके बिना कतई काम नहीं चल सकता और उसके द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति हो सकती है तो क्या खट्टर सम्बन्धी आपके मौजूदा भाषणोंसे लोगोंके मनमें यह भावना जगाई जा सकती है?
खद्दर सम्बन्धी मेरे भाषण इस भावनाको शक्ति एवं स्फूर्तिमें बदल रहे हैं।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>हिन्दुस्तान टाइम्स, ३०-४-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''आ जाये कि स्वतन्त्रताके बिना जीवन मृत्युसे बदतर है तो भी स्वराज्य पा सकना असम्भव है?'''
यदि दोनों जातियोंको ऐसा लगे, जैसा कि आप कहते हैं, तो मैं इसे असम्भव नहीं मानता।
'''२०. क्या आप यह कहेंगे कि असह्य राजनैतिक परिस्थितियोंकी दुःखपूर्ण प्रतीतिमें दो विभिन्न संस्कृतिके लोगोंको एकताके सूत्रमें बाँध सकनेकी सामर्थ्य नहीं है।'''
उसमें यह सामर्थ्य है।
'''२१. मुसलमानोंने हिन्दुओंवर जो धार्मिक अत्याचार किये थे, वे ही शिवाजीके जमाने में स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका मुख्य कारण बने। विभिन्न जातियोंके लोग इन धार्मिक अत्याचारोंसे अपने-आपको मुक्त करानेके लिए एक हुए। इतिहासके विद्यार्थी इस बातको जानते हैं कि समर्थ गुरु रामदास द्वारा मठोंकी स्थापनासे इस कार्यमें बहुत सहायता मिली थी। क्या वह सच नहीं है कि आज भी लोग अपने आपको राजनैतिक, औद्योगिक और व्यावसायिक उत्पीड़नसे बचाने के लिए ही स्वतन्त्रता
चाहते हैं?'''
हाँ, वस्तुतः ऐसा ही है।
'''२२. चाहे अस्पृश्यता दूर हो या न हो, चाहे हिन्दुओं और मुसलमानोंकी आपसी फूट दूर हो या न हो, किन्तु यदि इन दोनों बातोंके रहते हुए भी हमारे पास दो हजार व्यक्ति ऐसे हों, जिनमें आत्मबल हो और जो आजादी के दीवाने हों, तो क्या आपको लगता है कि ऐसे ये आदमी देशकी आजादी हासिल नहीं कर सकते?'''
ऐसे दो हजार व्यक्ति फूट और अस्पृश्यताको उखाड़ फेकेंगे और स्वराज्यकी स्थापना कर सकेंगे।
'''२३. यदि १,४०० असैनिक अधिकारी भारत जैसे विशाल देशको गुलामीके पाशमें बाँधकर रख सकते हैं, तो क्या आप सोचते हैं कि इन उपर्युक्त गुणोंसे लैस दो हजार व्यक्ति भारतको पुनः आजाद नहीं कर सकते?'''
बाईसवें प्रश्नका उत्तर ही इसका उत्तर है
'''२४. संक्षेपमें क्या आपका यह कहना है कि स्वतन्त्रताके बिना जीवनको असह्य मानते हुए गुलामीके प्रति पूरे देशमें केवल तीव्र अरुचिकी भावना व्याप्त हो जानेसे ही स्वराज्य पा सकना सम्भव नहीं है?'''
कोरी भावनासे स्वराज्य कभी नहीं मिल सकता।
'''२५. यदि ऐसा लगे कि उल्लिखित भावनाके बिना कतई काम नहीं चल सकता और उसके द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति हो सकती है तो क्या खट्टर सम्बन्धी आपके मौजूदा भाषणोंसे लोगोंके मनमें यह भावना जगाई जा सकती है?'''
खद्दर सम्बन्धी मेरे भाषण इस भावनाको शक्ति एवं स्फूर्तिमें बदल रहे हैं।
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७८. पत्र : जी० के० तिलकको'''<ref>वारसीके एक वकील।</ref>}}}}
{{Right|चलती गाड़ीमें<br>२१ मार्च, १९२७|2em}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र इस बीच मेरे पीछे-पीछे घूमता रहा है। चूंकि आपने अपने प्रश्नों पर काफी मेहनत की है और चूंकि मैं उनको 'यंग इंडिया में ले ही नहीं सकता, मैं आपको उनके जवाब<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। आप चाहें तो उन्हें प्रकाशित कर सकते हैं।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दुस्तान टाइम्स,''' ३०-४-१९२७}}
{{c|{{larger|'''१७९. पत्र : आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{Right|मौनवार [२२ मार्च, १९२७]<ref>मीराबहन के रिवाड़ी आश्रम जानेके उल्लेख से, देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|बहनो,}}
इस वारकी जुदाई ज्यादा भारी पड़ी, क्योंकि मुझे बहुत-सी बातें करने और विचारोंका आदान-प्रदान करनेकी इच्छा थी। मगर हम स्वतन्त्र कहाँ हैं? ईश्वरके
हाथोंमें हैं, वह जैसे नचाता है, नाचते हैं। स्वेच्छासे नाचें तो सुख पाते हैं। अनिच्छासे, जबर्दस्ती नाचें तो दुःख पाते हैं। इसलिए यद्यपि मेरे लोभकी तुष्टि नहीं हो पाई तथापि मैं निश्चिन्त हूँ। उसे जब मिलाना मंजूर होगा तब हमें मिलायेगा। तबतक हम पत्रों द्वारा बातचीत करेंगे।
तुमसे अभी इतनी आशा रखता हूँ, उसे पूरी करना:
१. तुम सब ओटने, धुनने और कातनेका काम बाकायदा और अच्छी तरह सीख लो। इतनी अच्छी तरह सीखो कि औरोंको भी सिखा सको।
२. संयुक्त भोजनालयकी देखरेख करो और उसे आदर्श भोजनालय बनाओ। इस काममें तुममें से कोई बहन सदाके लिए लग जाये, यह मैं फिलहाल नहीं
{{Left|३३-१३}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७८. पत्र : जी० के० तिलकको'''<ref>वारसीके एक वकील।</ref>}}}}
{{Right|चलती गाड़ीमें<br>२१ मार्च, १९२७|2em}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र इस बीच मेरे पीछे-पीछे घूमता रहा है। चूंकि आपने अपने प्रश्नों पर काफी मेहनत की है और चूंकि मैं उनको 'यंग इंडिया में ले ही नहीं सकता, मैं आपको उनके जवाब<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। आप चाहें तो उन्हें प्रकाशित कर सकते हैं।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दुस्तान टाइम्स,''' ३०-४-१९२७}}
{{c|{{larger|'''१७९. पत्र : आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{Right|मौनवार [२२ मार्च, १९२७]<ref>मीराबहन के रिवाड़ी आश्रम जानेके उल्लेख से, देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|बहनो,}}
इस वारकी जुदाई ज्यादा भारी पड़ी, क्योंकि मुझे बहुत-सी बातें करने और विचारोंका आदान-प्रदान करनेकी इच्छा थी। मगर हम स्वतन्त्र कहाँ हैं? ईश्वरके
हाथोंमें हैं, वह जैसे नचाता है, नाचते हैं। स्वेच्छासे नाचें तो सुख पाते हैं। अनिच्छासे, जबर्दस्ती नाचें तो दुःख पाते हैं। इसलिए यद्यपि मेरे लोभकी तुष्टि नहीं हो पाई तथापि मैं निश्चिन्त हूँ। उसे जब मिलाना मंजूर होगा तब हमें मिलायेगा। तबतक हम पत्रों द्वारा बातचीत करेंगे।
तुमसे अभी इतनी आशा रखता हूँ, उसे पूरी करना:
१. तुम सब ओटने, धुनने और कातनेका काम बाकायदा और अच्छी तरह सीख लो। इतनी अच्छी तरह सीखो कि औरोंको भी सिखा सको।
२. संयुक्त भोजनालयकी देखरेख करो और उसे आदर्श भोजनालय बनाओ। इस काममें तुममें से कोई बहन सदाके लिए लग जाये, यह मैं फिलहाल नहीं
{{Left|३३-१३}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८५
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh||पत्र : मीराबहनको|२४७ }}
मेरी लिखावट से तुम समझ सकती हो कि मैं दिनोंदिन सशक्त होता जा रहा
हूँ। कल मैं काफी घूमा। यह तो हुई अपनी बात।
तुम्हारा घोड़े की सवारी करना सीखने का विचार मुझे पसन्द है। इससे तुम में
चैतन्य आयेगा और तुम गाँवों में जाकर थोड़ा-बहुत ग्रामीण जीवन देख सकोगी।
क्या तुम्हारे लिए उन्होंने ठीक जीन का प्रबन्ध कर दिया है? तुम्हें हर प्रकार की
ग्राम्य हिन्दी समझने का प्रयत्न करना चाहिए। मुझे तब तक सन्तोष नहीं होगा, जब तक
तुम हिन्दी में इतनी पारंगत न हो जाओ कि देहातियों की हिन्दी समझ और बोल
सको। तुम भयभीत न होना। तुम्हें अपने काम से प्रेम है, इसलिए तुम्हें उनकी हिन्दी
समझना और बोलना आ जायेगा। मैं अधीर नहीं होऊँगा। परन्तु तुम्हारे काम के
लिए हिन्दी का पूरा ज्ञान आवश्यक है। इसलिए तुम उसे जानने और बोलने का
मौका ढूँढ़ती ही रहना। तुम्हारे आसपास जो-कुछ हो रहा हो, उस सबको समझने का
आग्रह रखना।
उस मोटी और सुन्दर महिला नूरबानू को तो तुम अवश्य ही जानती होगी।
उसका तुम्हारे नाम एक पत्र है। उसने अभी हाल में आश्रम को अपने कई हजार के
जेवर दिये हैं। वह अपने पति के साथ इस समय महाबलेश्वर में रहती है। दोनों
मुझसे मिलने अभी यहाँ आये हैं। उन्हें उत्तर लिख देना। उसका पता महाबलेश्वर
कालेज, महाबलेश्वर है। श्रीमती नूरबानू प्यारेअली उसका पूरा नाम है।
मैं यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि नया चरखा कैसा चल रहा है। क्या
तुमने वहाँ चरखे देखे हैं?
क्या तुम्हें अपने लिए अच्छे फल मिल जाते हैं?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
महादेव और देवदास खादी की फेरी लगाने गये हैं।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२१५) से।
सौजन्य : मीराबहन<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८६
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2026-08-21T15:33:41Z
Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''२४२. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको'''}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
सोमवार [११ अप्रैल, १९२७]}}
{{Left|भाई सातवलेकर,}}
आपके दो पत्रो और पुस्तकें मोल गये है ।<br>
मैं आभार मानता हूँ ।<br>
वैदिक धर्म' मुझे भेजते रहियेगा ।
मेरा साथ बहोत नवयुवक है, और युवती भी है।
ब्रह्मचर्य पालनके साथ
स्वास्थ्य अच्छा रखनेके लिये उनके वास्ते मैंने बहोत कोशिश तो की है। आसनादिका
प्रयोग ही केवल बाकी रहा है। क्या आप इस बारेमें मुझको कुछ मार्ग बता सकते
है, मेरा अभिप्राय है कि केवल चित्रोंसे और पुस्तकोंसे यह कार्य अच्छी तरह नहीं
बन सकता सूर्यभेदन व्यायाम और.
'ब्रह्मचर्य' नामक पुस्तककी दो प्रतियाँ आप आश्रम भेजनेकी कृपा करे । उसका
मुल्य आपको आश्रमसे भेजा जायेगा। दोनों पुस्तकोको मीलाकर उसका सह परिवर्तन
अनुवाद गुजरातीमें छपवानेकी इच्छा है यदि आपका सम्मति हो तो ।
{{Right|{{larger|''' मोहनदास'''}}}}
मूल (एस० एन० १२७७१) की फोटो नकलसे ।
{{C|{{larger|'''२४३. पत्र : आश्रमकी बहनों कों'''}}}}
{{Right|[११ अप्रैल, १९२७]}}
{{Left|बहनो,}}
तुमने मुझे मुक्ति दे दी मगर में उसका उपयोग बिना कारण कैसे कर सकता
हूँ ? अब मेरी तबीयत ऐसी नहीं है कि में तुम्हें पत्र लिख ही न सकूं। कल तो
काफी घूमा भी था। तुम्हें पत्र लिखना मेरे लिए कोई श्रमकी बात नहीं है ।
क्या तुममें से कुछने संयुक्त भोजनालय में बारी-बारीसे जानेका निश्चय किया है ?
लक्ष्मीबहनने तो जानेकी इच्छा दिखाई ही थी। अगर अभीतक कोई न गया हो,
१. इस पत्रके उत्तरमें लिखे सातवळेकरके पत्रके अनुसार ।
२. पत्रका दूसरा पृष्ठ उपलब्ध नहीं है ।
३. संयुक्त भोजनालयकी देख-रेख और गांधीजीके काफी दूर घूमनेके उल्लेखसे । देखिए " पत्र :
मीराबहनको ", ११-४-१९२७ ।
४. संगीतशास्त्री खरेकी पत्नी। उन्हें गांधर्व महाविद्यालय, बम्बई में संयुक्त भोजनालय चलानेका अनुभव था।<noinclude></noinclude>
ta3ne41n56okwtava1ur115cosp90gb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८७
250
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2026-08-21T15:43:23Z
Sweta rani Gupta
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh||पत्र : मीराबहन को|२४९}}
तो वे तो चली ही जायें। अगर भोजनालय में कुछ भी कमी रही तो उसका दोष
मैं सभी बहनों को दे सकता हूँ न? पुरुष यह काम तुम्हारे जितना सीख लें, फिर
भले तुम मुक्त हो जाना। मगर तब तक तो मुक्त नहीं हो सकतीं।
इसके साथ मीराबाई का पत्र है, उसे चि० मगनलाल को दे देना। वह पड़ने
लायक है इसलिए भेजा है।
{{Right|'''बापू के आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी० एन० ३६४४) की फोटो-नकल से।
{{C|{{larger|'''२४४. पत्र : मीराबहन को'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
आज उपवास के दिन मुझे तुम्हारे उस पत्र की, जिसमें बीथोवन के उद्धरण¹ दिये
गये हैं, प्राप्ति-स्वीकृति लिख ही देनी चाहिए। ये उद्धरण अच्छी आध्यात्मिक खुराक
हैं। मैं नहीं चाहता कि तुम अपना संगीत या उसकी रुचि भूल जाओ। जिस चीज की
तुम इतनी ऋणी हो, और जो चीज वास्तव में तुम्हें मेरे पास लाई, उसे भूल जाना
निर्दयता होगी।²
महाराज जी और सब मित्रों को उनके कृपापूर्ण निमन्त्रण के लिए धन्यवाद देना।
लेकिन अभी तो मुझे मैसूर में नन्दी हिल्स पर ही जाना होगा। मैं जानता हूँ कि
यदि मैं वहाँ आ सकूँ तो मुझे पूरा सुख मिलेगा।
हमने यहाँ राजसी ठाठ से सप्ताह³ मनाया। एक चरखा रोज १६ घंटे चालू
रखा गया। उस पर ४ फुट के ३,००० से ज्यादा तार प्रतिदिन काते गये। लगभग
सभी ने ६ और १३ तारीख को उपवास रखा।
मुझे आशा है कि यहाँ तुम्हारे और भी अधिक पत्र आयेंगे।
काका ने⁴ तुम्हारे द्वारा किये गये रोलाँ के पत्र के अनुवाद की एक प्रति भेजी
है। अनुवाद सचमुच बहुत अच्छा है। मूल इससे अच्छा नहीं हो सकता।
तुम कमिश्नर आदि से मिल लीं, इसकी मुझे खुशी है। तुम्हें अपने किये का—
एक भंगी द्वारा गोद लिये जाने का—पुरस्कार मिल रहा है। तुम्हें भूल जाना चाहिए
कि तुम क्या थीं। तुम्हें यही समझना चाहिए कि तुम क्या हो। ये बेचारे सरकारी
१. मीराबहन ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि "जहाँ तक मुझे याद है, मैंने रोमां रोलां रचित लाइफ ऑफ बीथोवन के उद्धरण दिये थे; और एक चीज जो मैंने दी थी वह थी बीथोवन का आदर्श वाक्य : 'कष्ट द्वारा आनन्द'।"
२. इसके विवरण के लिए देखिए परिशिष्ट ५।
३. राष्ट्रीय सप्ताह।
४. काका साहेब कालेलकर।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८८
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2026-08-21T15:58:20Z
Sweta rani Gupta
6713
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh|२५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
अधिकारी सचमुच नहीं जानते कि जब वे तुमसे मिलते हैं तब उनकी हैसियत क्या होती
है। वे तुम्हारे जीवन की विगत बातों को भूल नहीं सकते और स्वाभाविक है कि घबरा
जाते हैं। तुम्हें उन्हें निश्चिन्त कर देना पड़ेगा। कहते हैं कि जब ब्रिटेन के मौजूदा
राजा नाविक रूप में भरती हुए थे तो उनके साथ नाविकों जैसा बर्ताव ही किया जाता
था और दूसरे नाविकों की तरह उन्हें भी नाश्ते में कॉफी और काली रोटी दी जाती
थी। यह तो उससे सम्बन्धित सबसे छोटी बात थी। उन्हें साधारण नाविक ही
समझा जाता था। इसी तरह एक दिन तुम भी मामूली देहाती लड़की ही समझी
जाओगी। वह तुम्हारे और मेरे दोनों के लिए गर्व की बात होगी।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२१६) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|{{larger|'''२४५. पत्र : सुरेन्द्र को'''}}}}
{{Right|बुधवार [१३ अप्रैल, १९२७]¹}}
{{Left|चि० सुरेन्द्र,}}
तुम्हारा पत्र मिला। यदि वहाँ से छुट्टी मिल सके तो तुम नाथजी के पास तथा
वर्धा अवश्य जाना। इसमें सन्देह नहीं कि आरोग्यशास्त्र का अध्ययन करना अत्यन्त
आवश्यक है, जिसमें आसन और प्राणायाम भी शामिल हैं। मैं यह मानता हूँ कि
कोई सिखाने वाला होना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि तुम इसका अभ्यास करो। नाथजी को
तो आसनादि का कुछ अनुभव है, किन्तु ऐसा नहीं जान पड़ता कि उस पर उनकी
कुछ बहुत श्रद्धा है। इस बारे में मेरे कुछ लोगों से बातचीत करने पर यह परिणाम
निकला कि बीमारी से छुटकारा पाने में आसनादि से कोई बहुत मदद नहीं मिलती।
किन्तु मैं स्वयं इस मत का समर्थक नहीं हूँ। यदि तुम्हारी इच्छा सीखने की हो तो
मैं तुम्हें पं० सातवलेकर के पास भेज दूंगा। हरिद्वार में एक स्वामीजी हैं। उनका कहना
है कि यदि कोई आश्रमवासी उनके पास आसनादि सीखने के लिए आयेगा तो वे उसे
सिखा देंगे। मैं उनसे कभी नहीं मिला, किन्तु महादेव मिला है। जिस शुद्धता की मैं
आशा करता हूँ वह मुझे कहीं नहीं मिली, किन्तु हमें तो आसनादि सीखने-भर का
सम्बन्ध चाहिए। नाथजी की राय जानकर उन्हें पत्र लिखना।
{{Right|'''बापू के आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस० एन० ९४१४) की फोटो-नकल से।
१. सुरेन्द्र को पं० सातवलेकरजी के पास भेजने के उल्लेख से; देखिए "पत्र : श्री० दा० सातवलेकर को",
१४-४-१९२७, जिसमें गांधीजी ने लिखा था "एक अच्छे विद्यार्थी को आपके पास भेजने का प्रयत्न कर लूँगा।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२८९
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2026-08-21T16:06:01Z
Sweta rani Gupta
6713
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२४६. बुद्धि बनाम श्रद्धा}}}}
मण्डाले के एक एम० बी० बी० एस० डाक्टर ने एक प्रश्नावली भेजी है।
प्रश्नावली का पहला सवाल यह है :
एक बार 'यंग इंडिया' में आपने लिखा था कि जहाँ बुद्धि की सीमा समाप्त
होती है वहाँ से श्रद्धा का आरम्भ होता है। तब मैं आपसे यह आशा करता हूँ
कि अगर कोई आदमी अपने विश्वास के कारण न बतला सके तो आप उसके उस
विश्वास को श्रद्धा कहेंगे। क्या इससे यह बात साफ नहीं हो जाती कि अकारण
विश्वास करना श्रद्धा है? अगर कोई आदमी किसी अयुक्तियुक्त बात पर विश्वास करे
तो क्या इसे आप सही अथवा उचित मानेंगे? इस प्रकार विश्वास करने को मैं मूर्खता
मानता हूँ। मैं नहीं जानता कि आपका 'बैरिस्टरी दिमाग' इसे क्या कहेगा। अगर
आप भी मेरी ही तरह सोचें तो मुझे विश्वास है कि आप श्रद्धा को और कुछ न
कहकर मूर्खता ही कहेंगे।
अगर विद्वान डाक्टर साहब मुझे ऐसा कहने के लिए क्षमा कर दें तो मैं कहूँगा
कि उनके सवाल से ही यह बात साफ दिखती है कि उन्होंने मेरा मतलब ही नहीं
समझा है। युक्ति से जो कुछ परे है, वह निश्चय ही अयुक्तियुक्त नहीं है। अयुक्ति-
युक्त विश्वास का नाम तर्कहीन विश्वास है और वह प्रायः अन्धविश्वास होता है।
किसी को ऐसी बात में बिना प्रमाण विश्वास करने के लिए कहना जरूर अयुक्तियुक्त
होगा, जिसके प्रमाण दिये जा सकते हैं, जैसे कि किसी बुद्धिमान मनुष्य को बिना
प्रमाण के यह विश्वास करने के लिए कहना कि त्रिभुज के तीनों कोणों का योगफल दो
समकोण के बराबर होता है। किन्तु यदि कोई अनुभवी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से
प्रमाणित न कर सकने पर भी यह विश्वास करने को कहता है कि "ईश्वर है"
तो इसका अर्थ यह है कि वह उस विषय में नम्रतापूर्वक अपनी सीमा स्वीकार करता
है और दूसरे को केवल श्रद्धा करके अपने अनुभव की बात मान लेने के लिए कहता
है। यह तो सिर्फ उस आदमी की विश्वसनीयता का प्रश्न है। जीवन की साधारण-सी
बातों में भी हम जिन लोगों पर भरोसा करते हैं, उनकी बात पर विश्वास करते हैं,
यद्यपि इसमें प्रायः धोखा भी खाते हैं। तब फिर हम जीवन-मरण के सम्बन्ध में सारी
दुनिया के सन्तों की इस बात को प्रामाण्य क्यों न मान लें कि ईश्वर का सत्य और निर्मल
जीवन (अहिंसा) के द्वारा ही साक्षात्कार किया जा सकता है। उसी प्रकार पत्रलेखक से
इस सार्वभौम प्रामाण्य को श्रद्धापूर्वक मानने के लिए मेरा कहना कम से कम उतना ही
उचित है जितना कि उनका मुझसे कई डाक्टरों के इलाज से कोई फायदा न होने पर
भी अपनी दवा को आँख मूंद कर श्रद्धा करके खाने के लिए कहना। मैं तो यहाँ तक
कहता हूँ कि श्रद्धा न रहे तो यह संसार क्षणभर भी न रहे। सच्ची श्रद्धा के मानी
हैं, उन लोगों के युक्तियुक्त अनुभवों को अपनाना जिनके बारे में हमारा ऐसा विश्वास<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९०
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
है कि उन्होंने तपस्या और प्रार्थना से युक्त पवित्र जीवन बिताया है। इसलिए प्राचीन
काल में हुए अवतारों या नबियों में विश्वास करना एक बेमतलब का अन्धविश्वास नहीं
है, बल्कि आत्मा की आध्यात्मिक भूख की तृप्ति है। इसलिए मार्गदर्शन के लिए जो
सूत्र मैंने नम्रतापूर्वक प्रस्तुत किया है, वह यह है कि प्रत्येक ऐसी बात, जो प्रत्यक्षतः
प्रमाणित की जा सकती है, श्रद्धा के आधार पर न मानी जाये और जिसके सम्बन्ध में
निजी अनुभव के अतिरिक्त कोई प्रमाण न दिया जा सके उसे बिना हिचक श्रद्धा से
मान लिया जाये।
इसी लेखक का दूसरा सवाल यह है :¹
९ दिसम्बर, १९२६ के 'यंग इंडिया' में किसी अखबार की यह खबर उद्धृत की गई
थी : हैरॉल्ड ब्लेजर नाम के किसी डाक्टर ने अपनी लड़की को क्लोरोफार्म देकर मार
दिया था, क्योंकि उसे ऐसा लगा कि उसकी मृत्यु समीप आ गई है और उसके बाद
उसकी लड़की की देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। इस डाक्टर को अदालत ने सर्वथा
निरपराध घोषित कर दिया। डाक्टर ब्लेजर के वकील श्री हाउरी ने कहा था, "डाक्टर
ब्लेजर ने समाज के ऊपर उस बेचारी लड़की का भार न डालकर, नीतियुक्त और उचित
काम किया है।" इस पर आपने अपना यह विचार प्रकट किया कि डाक्टर ब्लेजर ने
अपनी लड़की की जान लेकर भूल की, क्योंकि इससे प्रकट होता है कि उसे अपने
आस-पास रहने वालों के मन में दयाभाव होने का भरोसा नहीं था और उसके पास यह मान
लेने का कोई कारण न था कि दूसरे उस लड़की की देखभाल न करते... मैं आपसे
प्रार्थना करता हूँ कि आप इस पर फिर से विचार करें, क्योंकि मेरी समझ में यह कोई
मामूली विषय नहीं है। चूंकि यह स्पष्ट है कि आपको समाज पर एक बेकार मनुष्य का
बोझ लादने में कोई झिझक नहीं है और यह केवल इसलिए कि आपको पूरा विश्वास
है कि समाज उस भार को अवश्य उठायेगा। आप ईश्वर के लिए हमें तो उस बेकार,
बल्कि अत्यन्त हानिकर सिद्धान्त में विश्वास करने के लिए न कहें। मेरी ईमानदारी से
ऐसी राय है कि आपका यह विश्वास भारत के प्रमुख हितों की दृष्टि से बहुत ही
हानिकारक है।...
मान लीजिए कुछ साल बाद आप समाज के लिए बिलकुल बेकार
हो जायें, तब क्या उस दशा में भी आप चाहेंगे कि समाज आपको इसलिए खिलाए-
पिलाए कि आपके जीवन के दिन अभी बाकी हैं या इसलिए कि आपने उनकी इतनी
सेवा की है?
मैं ऐसा जरूर मानता हूँ कि अगरचे जूरी ने डाक्टर ब्लेजर को छोड़कर ठीक
ही किया है, किन्तु विशुद्ध नैतिक दृष्टि से विचार करके देखें तो डाक्टर ब्लेजर का यह
कार्य अनुचित था। मेरे पत्रलेखक ने अपने उपयोगितावादी जोश में, जिस सिद्धान्त का
प्रतिपादन किया है उन्होंने उसके भयंकर परिणामों और फलितार्थों पर बिलकुल ही
१. अंशतः उद्धृत।
२. देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ ३९४-९६।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९१
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2026-08-22T03:40:23Z
Sweta rani Gupta
6713
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>
{{Rh||बुद्धि बनाम श्रद्धा|}}
{{Right|२५३}}
ध्यान नहीं दिया है। सच पूछो तो उनका यह सिद्धान्त उनके अपने डाक्टरी धन्धे को
ही झुठलाकर कलंकित करने वाला बनेगा। यदि कोई नया डाक्टर किसी रोगी को
ऐसा मानकर कि वह असाध्य है, और इसलिए वह समाज के लिए भार है, बेहोशी की
दवा सुंघाकर मार दे जबकि एक पुराना डाक्टर मरने के बाद रोगी को साध्य बताये
तो आप उस नये डाक्टर के बारे में क्या कहेंगे? क्या किसी भी रोगी को बिलकुल
असाध्य नहीं मानना चिकित्सा-विज्ञान की एक गर्वोक्ति ही नहीं है? जहाँ तक मेरी
अपनी बात है मैं जरूर आशा रखता हूँ कि जब मैं बिलकुल बेकार हो जाऊँ
और समाज के ऊपर बोझ बन जाऊँ और मान लें कि मैं तब भी जीना चाहूँ तो
मेरे देशवासी मेरा पालन-पोषण करेंगे। इतना ही नहीं, मेरा पक्का विश्वास है कि
अगर ऐसा अवसर आ गया तो मेरे देशवासी अवश्य ही मेरा पालन-पोषण करेंगे।
मुझे नहीं मालूम कि पत्रलेखक का क्या ऐसा ख्याल है कि जितने कोढ़ी, अन्धे, बहरे
लोग हैं उन सबको एक रात बेहोशी की दवा सुँघाकर मीठी मौत की नींद सुला देना
चाहिए। किन्तु डेमियन कोढ़ी था और कवि मिल्टन अन्धा। आदमी केवल शरीर
ही नहीं है; बल्कि उससे कई गुना ऊँची चीज है।
लेखक का तीसरा सवाल है :¹
आप उसी "सर्वभूतहिताय" शीर्षक लेख में लिखते हैं कि अहिंसावादी उपयो-
गितावाद का समर्थन नहीं कर सकता। वह तो सर्वभूतहिताय यानी सबके अधिकतम
लाभ के लिए प्रयत्न करेगा और इस आदर्श की प्राप्ति में मर जायेगा। तब क्या मैं
यह निष्कर्ष निकालूँ कि आप साँप को मारकर अपनी जान बचाने के बजाय सर्प-दंश से
मर जाना पसन्द करेंगे; अगर मेरा यह निष्कर्ष ठीक है तो कि इस तरह आप
एक हानिकारक जीव को बचाने का प्रयत्न करके और अपने उस तथाकथित सर्वभूत-
हिताय के आदर्श की प्राप्ति में खुशी से खुद मर कर, हिन्दुस्तान का बड़े से बड़ा अहित करेंगे।
...आप स्वीकार करते हैं कि आप अपूर्ण मनुष्य हैं और इसलिए सारे संसार का
हित करना आपके लिए असम्भव है। इतना ही नहीं सभी सम्भव तरीकों से सारे
हिन्दुस्तान का भी हित कर सकना आपके लिए असम्भव है। इसलिए बिना अपवाद के
भले और बुरे, उपयोगी और अनुपयोगी, मनुष्य और पशु सब भूतों का हित करने का
ढोंग करने की अपेक्षा अधिक-से-अधिक लोगों का अधिकतम हित करने का प्रयत्न करना
अच्छा है।
यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देने से मैं बचना चाहूँगा। इसका कारण
मेरी श्रद्धा की कमी नहीं, बल्कि मेरी हिम्मत की कमी है। मगर मुझे अपने विश्वास को
छुपाना नहीं चाहिए, भले ही परीक्षा का अवसर आने पर उसके अनुसार चलने का साहस
मुझमें न हो। अतः मेरा जवाब यह है। मैं नहीं चाहता कि मैं अपनी जान बचाने के
लिए एक सांप की भी जान लूँ। मैं उसे मारने के बजाय उसके दंश से स्वयं मर जाना
१. अंशतः उद्धृत।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९२
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
ठीक मानूँगा। लेकिन ऐसा हो सकता है कि अगर ईश्वर मेरी ऐसी कठोर परीक्षा
लेने के उद्देश्य से एक साँप को मुझ पर दंश-प्रहार करने दे तो मुझमें मरने का साहस
न हो, बल्कि मेरी पाशविक प्रवृत्ति जाग उठे तथा मैं इस नाशवान शरीर की रक्षा के
निमित्त साँप को मार डालने की कोशिश करूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि अहिंसा में मेरा
विश्वास इतना दृढ़ नहीं हुआ कि मैं यह बात जोर से कह सकूँ कि सांपों से मेरा डर
बिलकुल जाता रहा है और उनसे मेरा मैत्री-भाव उतना पक्का हो गया है जितना
कि मैं चाहता हूँ। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर ने साँप, बाघ वगैरह जानवर,
हमारे बुरे विचारों के जवाब में बनाये हैं। अन्ना किंग्सफोर्ड ने तो पेरिस की गलियों में
मनुष्यों में बाघ-वृत्ति विकसित होती देखी थी। मेरा विश्वास है कि सभी जीव एक-से
ही हैं। विचार निश्चित रूप ग्रहण करते हैं। बाघों और सांपों का भी हमारे साथ
निकट का सम्बन्ध है। वे हमारे लिए चेतावनी हैं कि हम बुरे, दुष्ट और विकारयुक्त
विचार अपने मन में न रखें। और यदि मैं दुनिया से सभी जहरीले जानवरों और
साँपों को मार भगाना चाहता हूँ तो पहले मुझे अपने सब बुरे विचार दूर करने होंगे।
यदि अपने इस उतावलीयुक्त अज्ञान और शरीर को बनाये रखने की उत्कट इच्छा के
कारण, मैं सभी कथित विषधर जानवरों और साँपों को मारने की कोशिश करूँगा तो
मन के बुरे विचार दूर नहीं कर पाऊँगा। अगर मैं इन जानवरों से अपना बचाव न
करूँ और मर जाऊँ तो मैं फिर पहले से अच्छा और अधिक पूर्ण आदमी बनकर
पैदा होऊँगा। ऐसा विश्वास रखते हुए मैं साँप के चोले में अपने समान किसी दूसरे
जीव को किस प्रकार मारना चाहूँगा? मगर यह तो कोरा दर्शन है। मैं भगवान से
प्रार्थना करता हूँ, और मेरे पाठक भी प्रार्थना करें कि वह मुझे अपने इस दर्शन को
जीवन में उतारने की शक्ति दे, क्योंकि यदि दर्शन जीवन में न उतारा जाये तो वह ऐसा
ही है जैसे प्राणहीन देह।
मैं जानता हूँ कि हमारे इस देश में दर्शन बहुत है, मगर उसके अनुरूप जीवन
कम है। किन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि मनुष्य के आचरण पर नियंत्रण रखने वाले
नियम अभी खोजने हैं और उस खोज की शर्तें अनिवार्य और अटल हैं। उनको हम
मर कर ही खोज सकते हैं, मारकर नहीं। हमें सत्य और प्रेम का जीता-जागता स्वरूप
बनना होगा, क्योंकि परमात्मा सत्य और प्रेम ही है।
[अंग्रेजी से]
यंग इंडिया, १४-४-१९२७<noinclude></noinclude>
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२४७. सभ्यता और संस्कृति}}}}
ज्यूरिख के संस्कृत विद्वान डाक्टर मार्टिन हर्लीमैन ने मेरे पास हाइनरिख पैस्टा-
लोजी के लेखों में से कुछ चुने हुए अंशों का निम्न ज्ञानवर्द्धक अनुवाद¹ भेजा है। लेखक को
मरे अभी १०० साल ही हुए हैं। डा० हर्लीमैन की दृष्टि में वे यूरोप के एक महानतम
शिक्षा-शास्त्री थे और मानव जाति और मानव की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करने वाले
एक महानतम योद्धा थे। किन्तु यूरोप के लोग भी उनको ठीक-ठीक नहीं समझ सके
और संसार के अन्य देशों के लोग भी उनको लगभग जानते ही नहीं हैं।
[अंग्रेजी से]
यंग इंडिया, १४-४-१९२७
{{c|{{larger|'''२४८. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
१४ अप्रैल, १९२७}}
प्रिय भाई
आपके पत्र से मुझे अपार हर्ष हुआ। यह खबर पाकर हमारे अपने लोग और
एन्ड्रयूज खुश हो उठेंगे। और यूरोपीय भी ऐसे व्यक्ति को पाकर खुश होंगे, जिसे
वे जानते हैं और जिसका वे आदर करते हैं। मुझे आपके पत्र से बड़ी राहत मिली
और रही आपके स्वास्थ्य की बात। ईश्वर उसकी रक्षा करेगा। हमारे देश में इस समय
जो उथल-पुथल मची हुई है उससे दूर जाकर आपके थके हुए दिमाग को भी चैन
मिलेगा; इसके साथ ही देश की अमूल्य सेवा भी होगी। आज की उलझी हुई स्थिति
न तो जल्दबाजी से सुलझ सकती है और न बहुत सोच-समझकर किये जाने वाले
हस्तक्षेप से ही। समय आने पर वह अपने आप सुलझ जायेगी।
श्रीमती शास्त्री से दक्षिण आफ्रिका में आपको बड़ी सहायता मिलेगी और उनकी
उपस्थिति का वहाँ की हमारी मूक बहनों के लिए भी बहुत अर्थ होगा।
आशा है कि मैं आगामी बुधवार को नन्दी हिल्स पहुँच जाऊँगा। आप जब
भी आ सकें और आना चाहें कृपया आयें।
{{Right|हृदय से आपका,<br>
मो० क० गांधी}}
वी० एस० श्रीनिवास शास्त्री के कागजात (पत्र व्यवहार सं० ४७०)।
सौजन्य : नेशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इंडिया
१. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude>
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२४९. पत्र : श्री० दा० सातवलेकरको}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
१४ अप्रैल, १९२७}}
भाई सातवलेकर,
आपका प्रत्युत्तर शीघ्रता से आने के लिये आभार मानता हूँ। एक अच्छे विद्यार्थी को
आपके पास भेजने का प्रयत्न कर लूँगा। आप जो कुछ कृपा कर रहे हैं इस पर से मैं
समझता हूँ कि आप मुझको सहाध्यायी का पद दे रहे हैं। मैं ऐसा ही बनने की कोशिश
करूँगा। आपका 'ईशोपनिषद्' ग्रन्थ पढ़ लिया। चित्त बहुत प्रसन्न हुआ।
"ब्रह्मचर्य और सूर्यभेदन व्यायाम" के बारे में मैं भाई बापूलाल से¹ पत्र-व्यवहार
कर लूँगा। उनको कुछ आर्थिक हानि नहीं पहुँचनी चाहिये।
कुवलयानन्द जी से मेरा परिचय है। मैंने उनके पास एक युवक को भेजा था
परन्तु वह दुर्बल होने के कारण उनको प्राणायामादि के प्रयोग नहीं बताये, परन्तु दवाईयों से
काम लिया
ब्रह्मचर्य-पालन इ० के बारे में आजकल की वायु से मुझे निराशा नहीं है। यदि
हम में से कोई भी सच्चा तपस्वी निकलेगा तो उस वायु को हर लेगा। अब तक मैं
ऐसे किसी तपस्वी से नहीं मिला हूँ। मेरी निज की तपश्चर्या बहुत अपूर्ण है। मेरा
स्थूलकायिक ब्रह्मचर्य करीब ३० वर्षों से चल रहा है। परन्तु मैं विकारशून्य नहीं हूँ।
होने का प्रयत्न कर रहा हूँ। मेरा मन्तव्य है कि सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य के पालन के लिये पाँचों
इन्द्रियों का सम्पूर्ण निग्रह होना चाहिये। क्रोधादि को वश में रखना काफी नहीं है, परन्तु
क्रोधादि की जड़ का नाश होना चाहिये। 'रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते'² मैं अक्षरशः
ऐसा मानता हूँ। अगर मूर्तिपूजक है। जब कोई ऐसा व्यक्ति तैयार होगा तब जो जहरी
वायु फैल रही है वह शीघ्र शान्त हो जायेगी। ऐसा व्यक्ति तैयार होने के लिये हम
सम्पूर्ण आशा के साथ प्रयत्न करें। आप ही ने तो लिखा है न कि यदि उपनिषदादि का
शिक्षण सत्य और सनातन है और है ही तो आज भी हम हैमवती उमा का और
यक्ष का भी दर्शन कर सकते हैं -- ईश्वर कृपा होगी तो करेंगे। वीर्यसेवन और
वीर्यभक्षण के बारे में मैंने भी पढ़ा है। मैं इसको आसुरी शिक्षा मानता हूँ। उसमें
सत्यांश होने की सम्भावना है परन्तु प्रयोग त्याज्य है। क्योंकि हम ब्रह्मचारी को इन्द्रजीत
बनाना चाहते हैं। वीर्य-रक्षा और वीर्य-संग्रह साध्य नहीं है परन्तु साधन है। वीर्य-
भक्षण से विकार-रहितता नहीं आती है उससे तो वीर्य-स्खलन से होने वाली दुर्बलता का
निवारण यत्किंचित् हो सकता है। यही वस्तु पाश्चात्य क्रिया से बनती है। वीर्य-
स्खलन की उत्पत्ति विकारोत्पत्ति में है। हमारा उद्देश्य विकारों का नाश है।
१. आनन्द, जिला खेड़ा के आर्यसमाज के कूबड़दास पटेल। सातवलेकर की पुस्तकों के प्रकाशक।
२. भगवद्गीता, अध्याय २, ५९।<noinclude></noinclude>
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||पत्र : प्रभावती को}}
{{Right|२५७}}
इसी कारण मैंने आसनादि के बारे में पूछा था। अब मैं समझ गया हूँ कि आसनादि
उस मार्ग में एक श्रेणी है और उसका प्रयोग साधक के लिये आवश्यक समझा जाय।
क्या मेरा कहना मैं स्पष्टतया समझा सका हूँ?
वीर्यरक्षक आसनों के बारे में आपने पुस्तक में लिखा है वह मैं समझ गया था।
सूचना सावधान करती है। सिद्धासनादि से गृहस्थ के लिये भी कोई हानि नहीं देखता
हूँ। सिद्धासन से यदि सम्भव है तो गृहस्थ स्थिरवीर्य बनेगा न तो निर्वीर्य। केवल
सन्तति के लिये ही स्त्री-संग करने वाले गृहस्थ आज कितने मिलेंगे? यदि विकार के
लिये शान्त शब्द का प्रयोग हो सकता है तो सिद्धासनादि से गृहस्थ शान्तविकार होगा।
हाँ! यदि उसका लक्ष्य निर्विकारता है तो दूसरी बात है।
आप पुराणों का त्याग नहीं करते हैं। यह देखकर मुझको शान्ति हुई है। मुझे
डर था कि आप पुराणों का निरादर करते होंगे। मेरा तो यह निश्चय है कि लोग
जब नास्तिक बन रहे थे तब पुराणियों ने आलंकारिक और काव्यमयी वाणी से धर्म-
जागृति की। हमारे शास्त्रों का हमारे आधुनिक युवकों के लिये और आधुनिक ज्ञान की
दृष्टि से नया अनुवाद करना है जैसा आप कर रहे हैं।
मेरे स्थिर होने से यदि हो सकता है तो आपको मेरे पास आने का कष्ट देना
चाहता हूँ जिससे हम विचारों का लेन-देन करें।
अब तो मैं 'केनोपनिषद्' पढ़ रहा हूँ। उसके बाद 'महाभारत' की समालोचना
लूँगा।
{{Right|आपका,
मोहनदास}}
मूल (एस० एन० १२७७१) की फोटो-नकल से।
{{c|{{larger|'''२५०. पत्र : प्रभावती को}}}}
{{Right |नन्दी हिल्स, मैसूर¹<br>
चैत्र सुदी १३ [१४ अप्रैल, १९२७]}}
चि० प्रभावती,
तुम्हारा ख्याल तो मैं बहुत ही करता हूँ! अब कैसे चलता है? तुम्हारा आश्रम
जाना कब होगा? विद्यावती का स्वास्थ्य कैसा है? मैं लिखूँ या न लिखूँ तुम्हें तो
लिखते ही रहना। मेरा स्वास्थ्य अब तो कुछ ठीक है।
{{Right|बापू के आशीर्वाद}}
मूल (जी० एन० ३३२९) की फोटो-नकल से।
१. गांधीजी अम्बोली से नन्दी हिल्स १८-४-१९२७ को रवाना हुए थे; देखिए "पत्र : मीराबहन को",
१८-४-१९२७। नन्दी हिल्स का पता निश्चय ही इस कारण दिया गया है कि प्रभावती उन्हें इस पते पर
उत्तर दें।
३३-१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६६४
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|६२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{c|श}}
{{outdent|शंकर, ७३}}
{{outdent|शंकराचार्य (आदि), ९६, ९९, ४४२, ४७५}}
{{outdent|शरीर; -और आत्माका विकास, ४४६-७; -और जीवन, ११०; -और पशु-क्रीड़ा, ११९; -और मन, १६५}}
{{outdent|शर्मा, टी० टी०, २७५}}
{{outdent|शर्मा, पण्डित हरिहर, १२६, २९१}}
{{outdent|शस्त्रास्त्र अधिनियम; -के विरुद्ध सत्याग्रह, ९३, १८२}}
{{outdent|शान्ति, २२३}}
{{outdent|शान्तिनिकेतन, ५८६}}
{{outdent|शारदा, ४१८}}
{{outdent|शास्त्री, पी० आर० सुब्रह्मण्य, ८९}}
{{outdent|शास्त्री, वी० एस० श्रीनिवास, ९, ३१, ८५, ११५, १९५, २०५, २१०, ३२६, ३३९, ३४१, ३५८, ३६२, ३७१, ३७७, ३८१, ४६५-६, ५९४}}
{{outdent|शाह, चमनलाल डुंगरशी, ६२}}
{{outdent|शाह, फूलचन्द, ८०, २०५, ३८१}}
{{outdent|शिक्षक; -और उद्योगकी शिक्षा, १०५}}
{{outdent|शिक्षा; -आत्मज्ञान है, ५५९; -और शारीरिक श्रम, १०४; -और समाज-सेवा, ५५७; -का आधार, ४५८; -किताबी, बनाम चरखा, १०-११, २५९; -के साथ उद्योग सिखाना, १०३-५; -धार्मिक, ४२७-९; -साबरमती आश्रममें, ९१, ४१४; -स्त्रियोंकी, ३७७, ४१७}}
{{outdent|शिव, २२६, ३७०, ५६०}}
{{outdent|शिवलिंग, -का महत्त्व, ५९३}}
{{outdent|शील, सर ब्रजेन्द्रनाथ, ५४७}}
{{outdent|शेक्सपियर, १०५}}
{{outdent|श्रम (मेहनत); -और शिक्षा, १०३-५}}
{{outdent|श्रमिक (मजदूर); -[रों] का कर्त्तव्य, ४४८; -की एकता आवश्यक, ५७४; -को सलाह, ४८०-१, ५२७}}
{{multicol-break}}
{{outdent|श्राद्ध, संस्कार, ४६७}}
{{outdent|श्रीनिवासअयंगर, ५०८}}
{{outdent|श्रीप्रकाश, २०६}}
{{outdent|श्लेसिन, सोंजा, ९, ३६३, ३७६}}
{{c|स}}
{{outdent|संस्कृत, १७९-८०, ४१७, ४२९, ५२५; -और अंधविश्वास, ५८१; -का ज्ञान आवश्यक, २८७, ५६२}}
{{outdent|संस्कृति; -और सत्य, ५५९-६०}}
{{outdent|सकळातवाला, शापुरजी, १७०, १७२, २६७}}
{{outdent|सतीश बाबू, देखिए दासगुप्त, सतीशचन्द्र}}
{{outdent|सत्य, ८७, १३८, १३९, २३६, ५६०; -और अहिंसा, ७४, ३९५; -और ईश्वर, ९७; -और संस्कृति, ५६०}}
{{outdent|सत्यपाल, डॉ०, ४२३}}
{{outdent|सत्यमूर्ति, एस०, ३२५, ५०९, ५१२, ५१५, ५१९, ५४०}}
{{outdent|सत्याग्रह, ३६, २०१, ३१९, ३८१, ३९२, ५०७-९, ५१०-१, ५१४-५, ५१६, ५१९; -और सविनय अवज्ञा में अन्तर, १८२-३; -एक हथियार, १४२-३, ५२८; -का अर्थ, १९४; -की सीमाएँ, १८१-५; -चेड़ा में, ३९४; -नन्दनारका, ५६०, ५६३; -नागपुर में, १८१-४; -मदुरा में, ५०७-८; -मद्रासमें नीलकी मूर्तिको हटानेके लिए, ५०७-१९, ५२८-९; -शस्त्रास्त्र अधिनियमके विरुद्ध, ९३, १८२, ५०८; -सम्बन्धी प्रश्नोंके उत्तर, १४०-३; देखिए असहयोग भी}}
{{outdent|सन्तोजी महाराज, ९५}}
{{outdent|समाज; -और व्यक्ति, ५५२; -की सेवा, ३८१}}
{{outdent|समाजसेवा; -की व्याख्या, १८१-२}}
{{outdent|समानता, ३४२-३}}
{{outdent|सरकार; -की भूमिका, ५}}
{{outdent|सरस्वतीचन्द्र, ४१६ पा० टि०}}
{{outdent|सरूप (विजयलक्ष्मी पण्डित), ९४ पा० टि०}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />सांकेतिका</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|'''सचलाइट,'''१६८}}
{{outdent|,'''सर्वेंट ऑफ इंडिया,''' ४०२}}
{{outdent|सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी, ४८, ८१, ४५५}}
{{outdent|सविनय अवज्ञा, ५०९, ५११; -और सत्याग्रहमें अन्तर, १८२-३; -का मतलब, ९२; देखिए सत्याग्रह भी}}
{{outdent|सहकारी समितियाँ; -मवेशियोंकी दशायें सुधारनेके लिए, ३०३-४}}
{{outdent|सहगल, प्रोफेसर, ३६१}}
{{outdent|सहजानन्द, स्वामी, ५६५}}
{{outdent|साइंस ऑफ ए न्यू लाइफ, ४३२}}
{{outdent|साइड्स लाइट्स आन द क्राइसिस इन इंडिया, ४६ पा० टि०}}
{{outdent|साक्षरता, देखिए शिक्षा}}
{{outdent|सावरकर, ४५, २१२, २४८, ४०१}}
{{outdent|साबरमती आश्रम, १५-६; -व्यवस्था करनेवालोंकी जगह, १८४; -में काम, ४१८}}
{{outdent|साम्राज्यीय नागरिक संघ, देखिए इम्पीरियल सिटिजनशिप एसोसिएशन}}
{{outdent|सार्वित्री, ११८}}
{{outdent|सिल, १०९}}
{{outdent|सिगरेट, -पीनेसे बचना चाहिए, ५२५}}
{{outdent|सिन्धिया जहाजरानी कम्पनी (सिन्धिया स्टीम नेविगेशन कम्पनी), ३०१-२}}
{{outdent|सिन्हा, तारिणीप्रसाद, २६६}}
{{outdent|सीता, १५१, ४६२}}
{{outdent|सीताराम, शास्त्री, ३००}}
{{outdent|सुब्बाराव, डॉ०, ५३, ४००}}
{{outdent|सुब्बैया, २१७, ५७७}}
{{outdent|सुरेन्द्र, ७४}}
{{outdent|सुरेश बाबू, १५९}}
{{outdent|सूरदास, ७४}}
{{outdent|सुहेला, २०, ३७}}
{{outdent|सेठ, अमृतलाल, ६७-८}}
{{outdent|सेतुरमण, एन०, ४०४}}
{{outdent|सेवा; -का नियम, ४४५; -के लिए अपनेको सँभालना, ५४९; -समाजकी, १०३-४}}
{{multicol-break}}
{{outdent|सैलिसबरी, लॉर्ड, २५८}}
{{outdent|'''सैंल्फ-रिस्टे्ट वर्विस सैल्फइनडलजेन्स,''' ४०६}}
{{outdent|सोंमयाजुलु, १००}}
{{outdent|'''स्कॉट्समैन,''' ३०२}}
{{outdent|स्कीज, सर एंड्रयूज, २९४ पा० टि०}}
{{outdent|स्ट्रेक, ५८}}
{{outdent|स्ट्रैंडेनेव, श्रीनिवास, २६५}}
{{outdent|'''स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ,''' देखिए आत्मकथा}}
{{outdent|स्टोवर, डब्ल्यू, बी०, १०-१}}
{{outdent|स्त्रियाँ; -अपने आभूषण दानमें दे सकती हैं, १७३, २५४, ४०४; -और आत्मघात, ४७८; -और खादी, ५३९-४०; -और खादी-प्रदर्शनी, १६३; -और पर्दा, ३७; -और मासिक धर्म की अवधिमें अलगाव बरतनेकी प्रथा, २५१, ३७२-३, ४३४-५; -और सादगी, ४५१; -और सूतकी चूड़ियाँ, ४२; -दुग्धालयका काम ले सकती हैं, ४२; -शान्तिनिकेतनकी, ५८६; -सिर्फ रसोई बनानेके लिए नहीं सिरजी गई हैं, ३४; -[यों] का गुण, ५५९; -की पुरुषोंसे समानता, ५३९-४०; -की विवाह योग्य आयु, २९०, ५२४; -की शिक्षा, ३७७, ४१७; -को गीता पढ़ना जानना चाहिए, ११४, २१४-५, ४६७}}
{{outdent|स्मिथ, विलियम, ६४, १०६, १३६, १७५, १७८, ३०३, ३२२}}
{{outdent|स्वच्छता (सफाई); -की आवश्यकता नागरिक जीवनमें, ५०३-३, ५८०}}
{{outdent|स्वतन्त्रता; १०२; -पर प्रतिबन्ध, १६१; देखिए स्वराज्य}}
{{outdent|स्वदेशी, ५८०; -एक धर्म, २६; -और खादी, २७; -का अर्थ, २७-८}}
{{outdent|स्वराज्य, २७७}}
{{outdent|स्वराज्य, १४२, १५०, १५८, १८५, १८६-७, १९९, २२६, ३३२, ३९९, ५२१, ५३३, ५३७; -और अस्पृश्यता, ८१; -के लिए शर्तें, २-४}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|६३०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|स्वास्थ्य; –सम्बन्धी सुझाव, ४०५-६, ४६८-९}}
{{outdent|स्विनटन, जनरल, ३४६}}
{{c|ह}}
{{outdent|हंटर, विलियम, ४९०}}
{{outdent|हथियार (शस्त्र); –सत्याग्रहीके लिए नहीं हैं, ९३, १४१-२, १८२}}
{{outdent|हबशी, ४४१}}
{{outdent|हबीबुल्ला, एम०, २०५ पा० टि०}}
{{outdent|हरजीवन, २९}}
{{outdent|हरिभाई, २३७, २५३, २७९, ३८४, ४०९}}
{{outdent|'''हरी पुस्तिका''' ५२०}}
{{outdent|हस्तमैथुन, ४०५-६}}
{{outdent|हॉज, जे० जे०, १६९}}
{{outdent|हॉज, श्रीमती, १६९}}
{{outdent|हॉसडिंग, हेलेन, ५६, २१९, ३५७}}
{{outdent|हाथ-कताई, देखिए कताई}}
{{outdent|हारकोर्ट, एच०, ४६-७, ३०६}}
{{outdent|हिंसा; –विषैले जीवोंके प्रति, १३७-४०; –व्यावहारिक जीवनमें, ५५८}}
{{outdent|हिगिनबाटम, सैम, ४८९}}
{{outdent|'''हिन्द स्वराज्य,''' ३४३}}
{{outdent|हिन्दी, ११२, ३१०, ४१७; –उत्तर और दक्षिणके बीच अधिक निकट सम्बन्धके लिए, ५७९, ५९८; –के प्रसारकी आवश्यकता, २२४; –को प्रान्तीय भाषाओंके स्थानपर प्रतिष्ठित करनेकी बात नहीं है, १८०, ५९८; –दक्षिणमें, १०६-७; –की सभी प्रान्तीय भाषाएँ बहनें, १९०; –राष्ट्रीय भाषा, १८०; –सीखना जरूरी, १५५-६, २१६, ५६२; –सीखनेमें मनको परेशान नहीं करना है, ४१२}}
{{outdent|हिन्दी नवजीवन, ६६}}
{{outdent|हिन्दुस्तानी, १८०; देखिए हिन्दी भी}}
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५२
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
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{{c|{{x-larger|'''१४. पत्र : पी॰ रंगनाथन् को'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
मुझे आपके मामलेको काफी पहले निपटा देनेकी आशा थी परन्तु आपने मुझे जो कागजात दिये थे, वे एक बेतरतीब अम्बारमें दबे पड़े रहे। अब उन कागजातको मैंने देखा है और 'यंग इंडिया'<ref>देखिए "बोर्डोंका कर्तव्य", २४-१०-१९२९। इसमें पत्र प्राप्तकर्ताका सही नाम पी॰ रंगनाथ अय्यर दिया है।</ref> के आगामी अंक में आप उनका उल्लेख पायेंगे। यह पत्र में केवल यह जाननेके विचारसे लिख रहा हूँ कि आप अब क्या कर रहे हैं और क्या बोर्डने आगे कोई और कदम उठाया है?
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>श्रीयुत पी॰ रंगनाथन्
<br>श्री रमण भवनम्
<br>अर्नी (जिला उत्तरी आर्काट)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६७८) की माइक्रोफिल्मसे
{{c|{{x-larger|'''१५. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय च॰ रा॰,
मैं आपको पत्र लिखते समय एक सवालके सम्बन्धमें लिखना भूल गया था। वह बात स्वर्गीय रेव॰ विजियाके<ref>बर्माके एक बौद्ध साधु, जिन्हें बगावत करनेके अपराधमें कैद किया गया था और तब उन्होंने बेहतर व्यवहार और विशेष दिनोंपर पीले वस्त्र पहननेकी माँग करते हुए भूख हड़तालकी थी। और १९ सितम्बर, १९२९ को उनका देहावसान हो गया था।</ref> बारेमें थी। मैं उस मामले पर सन्तोषजनक ढंगसे कुछ नहीं कह सकता हूँ क्योंकि जिस तरहकी बातोंके लिए विजिया और यतीनने अपने प्राण दिये हैं, वैसी बातोंके लिए भूख हड़ताल करनेके मैं बिलकुल खिलाफ हूँ। ऐसी कोई राय व्यक्त करनेपर सरकार उसे तोड़ मरोड़कर उसका अनुचित लाभ उठायेगी। इसलिए मुझे लगता है कि आलोचना करनेके बजाय मेरा चुप<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५३
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र : ए॰ सुब्बैयाको|१५}}</noinclude>रहना ज्यादा लाभप्रद है। क्या आप भूख हड़तालके सम्बन्धमें मेरे इस निष्कर्ष और फलस्वरूप मेरे मौनसे सहमत नहीं हैं?
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>श्रीयुत च॰ राजगोपालाचारी
<br>राजपालयम् (द॰ भारत)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८३) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''१६. पत्र : ए॰ सुब्बैयाको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय सुब्बैया,
तुम्हारा पत्र मिला। मैं सोच रहा था कि तुमने इतने लम्बे अरसे से पत्र क्यों नहीं लिखा। मैं पत्रका जवाब तुरन्त दूँ या न दूँ, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए। मैं चाहूँगा कि तुम हफ्तेवार आय-व्ययका ब्योरा मुझे भेजते रहो। मद्यनिषेधका काम जिस गति से चल रहा है उससे ज्यादा गति से चलनेकी आशा मैंने नहीं की थी। फिर भी, नियमित रूपसे इस दिशामें प्रयत्न करते रहनेका फल अवश्य निकलेग । मुझे खुशी है कि 'विमोचनम्'<ref>एक तमिल पत्रिका।</ref> इतनी अच्छी तरह से चल रही है। तुम उसकी एक प्रति मुझे जरूर भेजो। मुझे इस बातकी भी खुशी है कि तुम और ललिता एक साथ हो और फल-फूल रहे हो। एक सालके बच्चे कृष्णमूर्तिको जन्मदिनकी अनेकानेक शुभकामनाएँ। बा और मैं दोनों मिलकर उसे अपने आशीर्वाद भेज रहे। आशा है कि शेषन तुम्हारे लिए जरूरत से ज्यादा चिन्ताका कारण नहीं बन रहा होगा।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
<br>श्रीयुत सुब्बैया
<br>द्वारा श्रीयुत च॰ राजगोपालाचारी
<br>राजपालयम् (द॰ भारत)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८४) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५४
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|१७. पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
मैं आपको इस पत्रके साथ मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासीका पत्र भेज रहा हूँ। कृपया आप [इसके जवाब में] जो-कुछ कह सकें उसके साथ यह पत्र भी वापस भेज दें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>सह-पत्र : १
<br>पं॰ कटेश्वर प्रसाद
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८५) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''१८. पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
आपका पत्र<ref>पत्र में मौलवी साहबने शिकायत की थी कि गांधीजीने जब बस्तीका दौरा किया था, तब उर्दू अभिनन्दन हिन्दी अभिनन्दनके एक दिन बाद छापा गया था।</ref> मिला। यदि तथ्य सचमुच वैसे ही हैं जैसा कि आपने बयान किया है तो मुझे खेद होगा। मैं आशा करता हूँ कि कुछ गहतफहमी है। मैं आपका पत्र जवाबके लिए पं॰ कटेश्वर प्रसादके पास भेज रहा हूँ। मैं आपसे इस बात में काफी हदतक समहत हूँ कि जब दोनों ही जातियोंकी भावनाएँ नाजुक हैं और छोटेसे-छोटे कारणसे भी उन्हें ठेस पहुँच सकती है, तो हर छोटेसे-छोटे मामले में भी अधिकसे-अधिक सावधानी बरतना जरूरी है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासी
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८६) की माइक्रोफिल्मसे।
२. देखिए पिछला शीर्षक ।
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''१७. पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
मैं आपको इस पत्रके साथ मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासीका पत्र भेज रहा हूँ। कृपया आप [इसके जवाब में] जो-कुछ कह सकें उसके साथ यह पत्र भी वापस भेज दें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>सह-पत्र : १
<br>पं॰ कटेश्वर प्रसाद
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८५) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''१८. पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
आपका पत्र<ref>पत्र में मौलवी साहबने शिकायत की थी कि गांधीजीने जब बस्तीका दौरा किया था, तब उर्दू अभिनन्दन हिन्दी अभिनन्दनके एक दिन बाद छापा गया था।</ref> मिला। यदि तथ्य सचमुच वैसे ही हैं जैसा कि आपने बयान किया है तो मुझे खेद होगा। मैं आशा करता हूँ कि कुछ गहतफहमी है। मैं आपका पत्र जवाबके लिए पं॰ कटेश्वर प्रसादके पास भेज रहा हूँ। मैं आपसे इस बात में काफी हदतक समहत हूँ कि जब दोनों ही जातियोंकी भावनाएँ नाजुक हैं और छोटेसे-छोटे कारणसे भी उन्हें ठेस पहुँच सकती है, तो हर छोटेसे-छोटे मामले में भी अधिकसे-अधिक सावधानी बरतना जरूरी है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासी
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८६) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''१७. पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
मैं आपको इस पत्रके साथ मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासीका पत्र भेज रहा हूँ। कृपया आप [इसके जवाब में] जो-कुछ कह सकें उसके साथ यह पत्र भी वापस भेज दें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>सह-पत्र : १
<br>पं॰ कटेश्वर प्रसाद
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८५) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''१८. पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मित्र,
आपका पत्र<ref>पत्र में मौलवी साहबने शिकायत की थी कि गांधीजीने जब बस्तीका दौरा किया था, तब उर्दू अभिनन्दन हिन्दी अभिनन्दनके एक दिन बाद छापा गया था।</ref> मिला। यदि तथ्य सचमुच वैसे ही हैं जैसा कि आपने बयान किया है तो मुझे खेद होगा। मैं आशा करता हूँ कि कुछ गहतफहमी है। मैं आपका पत्र जवाबके लिए पं॰ कटेश्वर प्रसादके पास भेज रहा हूँ।<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> मैं आपसे इस बात में काफी हदतक समहत हूँ कि जब दोनों ही जातियोंकी भावनाएँ नाजुक हैं और छोटेसे-छोटे कारणसे भी उन्हें ठेस पहुँच सकती है, तो हर छोटेसे-छोटे मामले में भी अधिकसे-अधिक सावधानी बरतना जरूरी है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>मौलवी मुहम्मद आदिल अब्बासी
<br>बस्ती (सं॰ प्रा॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८६) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२७५
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2026-08-22T11:55:10Z
Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||नवजीवन ट्रस्ट
२३७}}
रहे हों और जबलपुर, बम्बई आदि स्थानोंमें निकले शुभ परिणाम हम प्रत्यक्ष देख
रहे हों, तब धीरज तो निस्संदेह रखा ही जा सकता है।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>नवजीवन, १-१२-१९२९
{{C||'''२४६. नवजीवन ट्रस्ट'''}}
{{Gap}}पाठकों को याद होगा कि सन् १९१९ में जब रौलट ऐक्टके खिलाफ प्रचण्ड
आन्दोलन चल रहा था तब भाई शंकरलाल बैंकर, उमर सोबानी, जमनादास
द्वारकादास और इन्दुलाल याज्ञिककी इच्छानुसार मैंने 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' का
सम्पादन अपने हाथ में ले लिया था । समीने यह अनुभव किया कि इन पत्रोंका अपना
निजी छापाखाना होना ही चाहिए। फलस्वरूप मुद्रणालय कायम हुआ। इस मुद्रणालयके
संचालनके लिए तुरन्त ही एक मुस्तैद और होशियार संचालककी आवश्यकता जान
पड़ी । सत्याग्रह आश्रमसे कुछ लोग उधर भेजे गये। लेकिन मुद्रणालयको गौरवशाली
और स्वावलम्बी बनानेके लिए तो एक ऐसे एकनिष्ठ सेवककी जरूरत थी जो चौबीसों
घंटे प्रेसके ही हितकी बातोंका चिन्तन करता रहे। इस पदको सुशोभित करनेके लिए
आश्रमके ही किसी व्यक्तिको देना असम्भव था। आखिर स्वामी आनन्दकी ओर मेरा
ध्यान गया। उन्होंने एक सिपाहीके नाते मेरी इच्छाको स्वीकार किया । फलस्वरूप
मुद्रणालय स्वावलम्बी बना, और 'नवजीवन' संस्थाने सार्वजनिक सेवाके लिए
सरदार वल्लभभाईको ५० हजारकी मोटी रकम सौंपी। यह मुनाफा नहीं था बल्कि
'नवजीवन' में काम करनेवाले सेवकोंके बलिदानका फल था । इनमें से न तो स्वामीने
ही कोई वेतन लिया और न दूसरे मुख्य कार्यकर्त्ताओंने ही कुछ स्वीकारा। पूरी संस्था
अबतक मात्र देशसेवाके लिए काम करती आ रही है। लेकिन उसका नियमानुसार
संचालन पहले तो मेरी ओरसे स्वामी आनन्दने किया और अब उन्हींके हाथों गढ़े
हुए, उनके दाहिने हाथ, भाई मोहनलाल उसे चला रहे हैं। हम सबने बहुत पहले
ही यह मान लिया था कि निरपवाद होते हुए भी यह स्थिति निश्चयात्मक नहीं
कही जा सकती। मैने मनमें न्यास बनानेकी कल्पना कर रखी थी। लेकिन कुछ
तो आलस्य और उससे भी अधिक अन्य अनेक कार्यों में व्यस्त रहनेके कारण इस
कामको कानूनी रूप देने और पंजीयन होने में हो गई। ईश्वरकी कृपा और
मुफ्तके वकील मित्रकी मेहरवानीसे हम -- • भाई मोहनलाल और में-
दस्तखत करके भार-मुक्त और निश्चिन्त हुए। जो बात हृदयमें थी वही प्रकट रूपसे
दस्तावेजके पन्नों में दर्ज हो गई। उक्त दस्तावेज इस अंकके साथ पाठकोंको मिलेगा ।
यह संस्था पाठकोंकी थी, अब अगर वे इसे खास तौरपर अपनी मानना चाहें तो
जरूर मानें और जितनी चाहें उतनी इसकी सेवा करें। अबतक 'नवजीवन' के छोटे
{{Gap}}१. देखिए "न्यासका घोषणा पत्र २६-११-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
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विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
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सौरभ तिवारी 05
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/* पुस्तक सूची */ परिधि बढ़ाना।
672542
wikitext
text/x-wiki
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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Koyal Singh
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672577
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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2026-08-21T17:00:29Z
Avantika Shaw
4732
/* पुस्तक सूची */
672646
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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wikitext
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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MuskanChaudhary121
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/* पुस्तक सूची */
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wikitext
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__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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672825
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2026-08-22T11:52:35Z
Lado Shaw
6039
/* पुस्तक सूची */
672825
wikitext
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__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>होगा, लेकिन यह एहसास हम अवश्य करते हैं कि इसके लिए अभी अनुकूल वातावरण तैयार नहीं हुआ है।
दूसरे भी अमेंडमेंट (संशोधन) हैं; उनपर मैं बहस नहीं करना चाहता। एक बात जरूर है सिविल डिसोबिडिएन्स (सविनय अवज्ञा) को सब चाहते हैं, मैं भी चाहता हूँ, उसपर कुछ कहना चाहता हूँ। लोग कहते हैं कि उसका ऐलान सारे हिन्दुस्तान में कर देना चाहिए। मैं भी चाहता हूँ कि ऐसा कर सकता। मगर मैं इसके लिए अभी वायुमण्डल नहीं देखता।आल इंडिया (अखिल भारतीय) कांग्रेस कमेटीपर यह काम छोड़ा है, लेकिन अभी मैं वह आबोहवा नहीं देखता कि आल इंडिया (अखिल भारतीय) कांग्रेस कमेटी भी कुछ कर सकेगी। आप लोग जो यहाँ आये हैं उनमें अमन होना चाहिए, कांग्रेस-क्रीड (सिद्धान्त) पर विश्वास होना चाहिए। कहा जाता है कि यह लोग गुनहगार हैं, जो कानून तोड़ते हैं; तो मैं कहता हूँ कि कानूनको तोड़नेसे गुनहगार नहीं बन जाता। उसमें दोष नहीं, उसमें कुछ अच्छाई है। लेकिन उसको तो वह तोड़ सकता है, जिसमें अमन अच्छी तरह पैदा हो चुका है। जो कांग्रेसके ऐलान पर यकीन रखता है, उसकी ताईद करता है, उसपर अमल करता है। आज तो यह देखता हूँ कि हर मनुष्यको डिवीजन (मतभेद) चाहिए। हमारे सामने ऐसी चीज नहीं देख पड़ती कि जिससे सिविल डिसोविडिएन्स (सविनय अवज्ञा) के लिए वायुमण्डल पाया जाता हो। ऐसा वायुमण्डल नहीं देखता कि १-२ मासमें सल्तनतका मुकाबला कर सकें। परमात्मा चाहे तो कर सकते हैं। उसकी बड़ी शक्ति है। वह अब भी देखता है कि हम भूल करते हैं।
जो नौजवान लाल कागजके पुरजे हिलाकर झण्डा दिखलाकर सल्तनतको हटाना चाहते हैं उनसे तो हमारा काम नहीं चलेगा। आजादी पानेके लिए तो हाथमें शक्ति आनी चाहिए। कुछ लोग समझते हैं बाजमन रहनेसे शक्ति नहीं आती, तलवार निकालने से शक्ति आती है। मैं कहता हूँ कि दुश्मनकी मारपीट बर्दाश्त करनी चाहिए। सिख भाई १९२१-२२में कल हो गये――बहादुर थे। मैं कबूल करता हूँ कि ठण्डी ताकत तलवारको निकालने से बड़ी चीज है। इससे सिविल डिसोबिडिएन्स (सविनय अवज्ञा) का काम अच्छी तरह हो सकता है। अगर कोई भाई यह समझता है कि बाअमन तरीकेसे सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं आती तो वह ठण्डी ताकतमें विश्वास नहीं रखता। ठण्डी ताकत हमारे पासमें आ जाये तो हम स्वतन्त्रता हासिल कर
सकते हैं।
इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) के मानी क्या है? इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) का मतलब है वह आजादी जो ७ लाख देहातोंको मिलनी चाहिए। इसलिए आप अमेंडमेंट्स (संशोधन) को न मानें और प्रस्तावको पास करें। एक प्रकारका अमेंडमेंट (संशोधन) यह है कि फरवरी तक चलने दिया जाये कोई फैसला न किया जाये। ऑल पार्टीज कान्फेस (सर्वदलीय परिषद) करें। यह बात मुझे पसन्द नहीं है। न इसका कुछ नतीजा होगा। दूसरी बात है यह कि पैरेलल गवर्नमेंट (समानान्तर सरकार) कायम की जाये साथ-साथ गवर्नमेन्ट कायम हो। यह सुभाषचन्द्र बोसका अमेंडमेंट (संशोधन) है। कलकत्ते में भी यह कहा गया था। मेरे दिलमें सुभाषचन्द्र बोसके लिए बड़ा मान<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें―२|३६३}}</noinclude>है। मुझको उन्होंने समझ लिया है; यह यह समझते हैं कि मैं ६० वर्षका हो गया हूँ। मेरी ताकत तो गिर गई है, वह मुझे चाहें तो गोदमें उठा सकते हैं। मगर मेरा दिल नौजवानका है (हास्य ध्वनि)। नौजवान से भी बढ़ सकता हूँ। इसलिए मैं ऐसा कबूल करता हूँ कि अगर मैं बूढ़ा हो गया हूँ तो काम नहीं दे सकता। ६० वर्षके बाद दिमाग नहीं रह जाता यह कहा जाता है, वह मैं महसूस नहीं करता। मैं आज भी नौजवानोंका उपयोग कर सकता हूँ। मुझे ऐसा लगता है―मुझमें ऐसी शक्ति है, ऐसा मैं समझता हूँ। आज घोड़े की सवारी भी मिल जाये तो अच्छी बात है। मैं उसकी बागडोर ले लूँगा। घोड़ेपर सवारी नहीं करूँगा (हास्य ध्वनि) घोड़ा मैं ले जा सकता हूँ। बागडोरके लिए जवाहरलाल नेहरू हैं। (हास्य ध्वनि) आज तो बागडोर नौजवानोंके हाथमें है। उनको मौका है कि हिन्दुस्तानको आजाद बनानेके लिए इकट्ठे होकर काम करें। उन्हें यह कहनेको न रह जाये कि मौका नहीं मिला। कहा जाता है कि मैं जवाहरलालको मानता हूँ। हो मैं मानता हूँ। मैं देखता हूँ, कि वह कामकी बात करते हैं। अगर आप लोग इकट्ठे होकर काम नहीं करेंगे तो बहुत नुकसान होगा। पैरेलल गवर्नमेन्ट (समानान्तर सरकार) का प्रोग्राम फायदा नहीं देगा। यह फायदेकी चीज नहीं है। पैरेलल गवर्नमेन्ट (समानान्तर सरकार) के लिए हम तैयार नहीं हैं। जितना काम कर सकते हैं उतना ही उठाना चाहिए।
आपको सात लाख गाँवोंमें प्रचार करना है। गाँवमें कोई काम नहीं हुआ है। ७ लाख गाँवमें ७ लाख कांग्रेसके मेम्बर भी नहीं है। हमारे देहातोंमें कांग्रेसका नाम भी लोग नहीं जानते। इस हालत में पैरेलल गवर्नमेन्ट (समानान्तर सरकार) की जगह देहातों में काम करना चाहिए। तालीम पहुँचानी चाहिए। यह सब हो जाये तो पैरेलल गवर्नमेन्ट (समानान्तर सरकार) कर सकते हैं। लेकिन अभी मौका नहीं है।
भाइयो, जो-कुछ अमेंडमेंट के बारेमें कहना था कह दिया और यह जो मेरा प्रस्ताव है उसका भी पृथक्करण करके बतला दिया कि क्या रखना चाहिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि सचमुच इस प्रस्तावको आप चाहें तो फेंक दें। मगर ऐसा न करें कि उसको एक-एक टुकड़ा करके काटें। एक सुन्दर मनुष्यकी नाक काटें या आँख काटें इससे अच्छा है इसे फेंक दें।नाक-कान काटना ठीक नहीं (हास्य ध्वनि)। ऐसा करना गलत होगा। ऐसा करनेकी कोशिश न करें। एक चीज रखी गई है, वह पसन्द हो रखें, पसन्द न हो न रखें।<ref>इसके बाद गांधीजी अंग्रेजीमें बोले।</ref>
अब कुछ शब्द दक्षिण और बंगालके मित्रोंके लिए कहता हूँ। यहाँ आते हुए मुझे एक प्रतिनिधिने दो बार यह बताया कि अब वह समय आ गया है जबकि कमसे-कम कांग्रेस में राष्ट्रभाषा हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानी ही बोली और सुनी जानी चाहिए। वास्तव में यह बहुत ही उचित और ठीक राय है। इतने वर्ष बीतने पर प्रतिनिधितक भी राष्ट्रभाषा में सारी कार्यवाही करनेके योग्य अपने आपको नहीं बना पाये। मैं आशा करता हूँ कि अगली बार जब हम मिलेंगे तो हम सब जो कुछ भी यहाँ हिन्दुस्तानी में कहा जायेगा उसे समझनेके लिए तैयार होकर आयेंगे। परन्तु अब<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|'''३६४'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>हमें जो तथ्य है उसे उसी रूपमें लेना चाहिए और हमें समझना चाहिए कि कुछ ऐसे लोग हैं जो हिन्दुस्तानी नहीं समझते। उनके लिए मैं कुछ शब्द कहूँगा।
इस प्रस्तावके सम्बन्धमें जो संशोधन पेश किये गये हैं उनके सन्दर्भ में मैं वही उपमा देना चाहता हूँ जो मैंने हिन्दुस्तानीमें दी है कि इस प्रस्तावको पूर्ण रूपमें एक मकान अथवा एक पूरी तस्वीरके रूपमें लिया जाये। जो व्यक्ति तस्वीरके अथवा मकानके एक हिस्सेको नष्ट करता है वह उसे पूरा ही नष्ट करता है। आप कुछ ईंटें अथवा एक दीवारको निकाल देंगे तो इससे सारा मकान ही गिर जायेगा; उसकी नींव हिल जायेगी, तब वह मकान नहीं होगा जिसका नक्शा शिल्पी ने बनाया था। ऐसा ही तस्वीरका हाल होगा। आप एक तस्वीर बनायें और उसके किसी एक भाग में कोई रद्दोबदल कर दें तो इससे सारी तस्वीर ही नष्ट हो जायेगी। कार्यसमितिने उसमें जितनी योग्यता थी, उससे इस प्रस्तावको गढ़ा। इसके बाद यह विषय समितिके सामने पेश हुआ, वहाँ इसमें सभी प्रकारके रद्दोबदल किये गये और अब यह आपके सामने आया है। अब यह आपपर निर्भर है कि आप इसे पूर्ण रूपसे अस्वीकार कर दें या पूर्ण रूपसे स्वीकार कर लें, पर इसमें किसी प्रकारका रद्दोबदल न करें। उदाहरणार्थं एक संशोधन है कि ‘वर्तमान परिस्थितियों’ आदि शब्दोंको निकाल दिया जाये। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसका वहाँ होना आवश्यक है। अब यह समय आ गया है कि हम यह समझ लें कि किसी-न-किसी दिन हमें दुश्मनके साथ
स्वराज्यकी स्थापनाके लिए बातचीत करनेको मिलना होगा। ये शब्द आवश्यक हैं। पर साथ ही यह भी उतना ही सच है कि ये शब्द कांग्रेसको इसके लिए बाध्य करते हैं कि जिस किसी परिषद में स्वराज्यकी चर्चा नहीं होगी, उसमें वह भाग नहीं लेगी।
इसी प्रकार इसमें स्वराज्य सम्बन्धी समझौतेके लिए वाइसराय द्वारा किये गये प्रयत्नोंकी सराहना की गई है। या तो आप अपने दो चुने हुए प्रतिनिधियोंके कथनको मानिए अथवा उसे अस्वीकार कर दीजिए। यदि आप-अपने प्रतिनिधियोंका यह कथन कि “हमें ऐसा लगा कि वाइसराय सदाशय हैं; सारे समय उनका व्यवहार बड़ा सौजन्यतापूर्ण रहा; उन्होंने सारे मामलेपर, जैसे दो मित्र मिलकर विचार करते हैं, उस प्रकार विचार किया” सत्य, पूर्णरूपेण सत्य तथा सत्यके अलावा और कुछ नहीं मानते और यदि जैसा कि मैं कहता हूँ, आप इस सबपर विश्वास करते हैं तो क्या आपके लिए यह उचित नहीं है, क्या यह सामान्य सौजन्यता नहीं है और क्या आपका यह निश्चित कर्त्तव्य नहीं है कि आप उस प्रयत्नकी सराहना करें? दूसरी ओर यदि आप उनके कथनका विश्वास नहीं करते तो आपको उन्हें कांग्रेससे निकाल भगाना चाहिए। जो कुछ कोई अनुभव करता है, उसे कहने में शर्म करना साहसका सूचक नहीं है, परन्तु अपने शत्रुकी भी अच्छी बातको स्पष्टतः मानना तो निश्चय ही साहस-सूचक बात है। सच तो यह है कि जो लोग अहिंसाके सिद्धान्तके लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं, वे हमेशा सीमासे बाहर जाकर भी शत्रुके प्रति सौजन्यता बरतेंगे, उसका भला सोचेंगे और अंधकार में भी आशाकी किरण देखेंगे, क्योंकि सत्य और अहिंसाके सिद्धान्तको माननेवाला मनुष्य सदैव आशावान बना रहता है। आशा रखनेसे आशाकी पूर्ति होती है तथा आशासे साहसका संचार होता है तथा इसलिए<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें―२|३६५}}</noinclude>आशासे निर्णायक कर्मको निष्पत्ति प्राप्त होती है। इसलिए उन मनुष्योंकी तरह जो इस सिद्धान्तके प्रति प्रतिज्ञाबद्ध हैं आपका यह दोहरा कर्तव्य है कि आप मूल प्रस्तावमें इस कथनको मानें और पेश किये गये संशोधनोंको एकदम रद कर दें।
और फिर विधान सभाओंके बहिष्कारका प्रश्न है। इस सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि इसका समर्थन उनमें से भी कुछ लोगोंने किया है जो बड़ी-बड़ी आशाएँ लेकर विधानसभाओंमें गये थे; तथा इन सबमें भी सबसे ऊपर हैं पण्डित मोतीलाल नेहरू। वह आदमी जिसने केन्द्रीय विधान सभामें बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य किये और जिसे अपने विपक्षियोंका भी आदर मिला, जब यह कहता है कि विधानसभाओं में रहकर हम और आगे नहीं बढ़ सकते तो उसका यह कथन मेरे लिये अन्तिम बात है और आपके लिए भी वह अन्तिम ही होना चाहिए। इन विधानसभाओंका मेरा कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, पर विधानसभाओं तथा अन्य [संस्थाओं] के सम्बन्धमें जो कुछ मैं १९२९ में कहता था उसपर मेरा अटल विश्वास आज भी बना हुआ है। यदि कह सकूँ तो वही विश्वास और भी अधिक दृढ़ हो गया है।
यह कहा जाता है कि यदि आप विधानसभाओंका बहिष्कार करते हैं तो स्कूलों और अदालतोंका बहिष्कार क्यों नहीं करते? यह पूरी तरहसे एक संगत और तर्कसम्मत बात है, पर मनुष्य सदैव संगत और तर्कसम्मत बातें ही नहीं करता। कभी-कभी वह तर्कहीन बातें भी करता है; प्रत्यक्षतः और जंगली ढंगसे वह अपनी कमजोरी और दशक्तिका प्रतिपादन करता है। स्कूलों, अदालतों, डाकखानों, रेलों आदिका बहिष्कार न करके विधानसभाओंका बहिष्कार करके हम निश्चय ही असंगत कार्य कर रहे हैं। पर हमें अपनी सामर्थ्यंको समझना चाहिए और कार्यसमितिने हमारी सामर्थ्यको समझा है, यद्यपि विषय-समितिमें विधानसभाओं में न जानेका विरोध किया गया, पर विषय-समितिका बहुमत इस निर्णयपर पहुँच गया है कि अब हमें विधान सभाओं में नहीं जाना चाहिए तथा विधानसभाओंसे बाहर रहने लायक ताकत अब हममें आ गई है। मैं जानता हूँ कि एक बड़ा घिसा-पिटा तर्क यह दिया जाता है कि आप कुछ भी करें पर [विधानसभाओं] की आपकी जगहें खाली नहीं रहेंगी; परन्तु ऐसा कोई विचार नहीं है कि जगहें खाली रहनी चाहिए। एक चेंडूखाना है; मान लीजिए कि उसमें आप समेत वहाँ पचास हजार लोग जाते हैं तो क्या हम वहाँसे इस खयाल से बाहर आनेमें हिचकेंगे कि कोई और जाकर हमारी जगह ले लेगा? मुझे पूरा विश्वास है कि हम बिलकुल नहीं हिचकेंगे। यदि हम यह मानते हैं कि विधान सभाएँ राष्ट्रके और कांग्रेसके लिए धोखेकी चीजें हैं तो उनसे बाहर रहना बुद्धिमानी होगी। दूसरे हमारी जगह ले लेंगे, इसमें कोई तुक नहीं है। तुक तो यह सोचने में है क्या हम इन विधानसभाओं में एक पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्तिके रूपमें जा सकते हैं या नहीं अथवा क्या इन सभाओं में जाकर या रहकर हम अपने ध्येयकी
ओर आगे बढ़ सकते हैं? यदि आप यह सोचते हैं कि इन विधानसभाओं में जाकर आप स्वतन्त्रताके अपने ध्येयकी ओर आगे बढ़ सकते हैं तो आप वहाँ बड़ी खुशीसे<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जा सकते हैं। मैं अब आपसे विधानसभाओं में ली जानेवाली शपथके सम्बन्ध में कुछ नहीं कहूँगा, जबकि मेरे जैसे आदमीके लिए यह भी एक निर्णायक तर्क है।
जहाँतक स्कूलों और अदालतोंके बहिष्कारका सम्बन्ध है, जैसा कि मैंने आपसे कहा है, मैं आज ऐसे बहिष्कारके लिए आवश्यक वातावरण नहीं पाता हूँ। जबकि ऐसा वातावरण ही नहीं है तब ऐसी किसी धाराको रखनेका क्या लाभ जो प्रयोगमें नहीं लाई जा सकती और जिसपर वे ही लोग अमल नहीं करेंगे जिनको लक्ष्य करके वह कही गई है?
अब सवाल आता है सविनय अवज्ञाका। सविनय अवज्ञाकी मैंने शपथ ली है; क्योंकि सम्भवतः मैं भारतकी स्वतन्त्रता पाने की बात अविनय अवज्ञाके द्वारा नहीं सोच सकता; अविनय अवज्ञाका अर्थ है बम और तलवार। मैं भारतके एक छोरसे दूसरे छोरतक फैले सात लाख गाँवोंमें बिखरे करोड़ों भूखे लोगोंके लिए स्वतन्त्रता और आजादी पाने की बात वैध और शान्तिपूर्ण तरीकोंसे ही सोच सकता हूँ। अवज्ञाको पूर्ण रूपसे प्रभावकारी बनानेके लिए उसका सविनय याने हमेशा अहिंसक होना आवश्यक है। और यदि आप निकट भविष्यमें सविनय अवज्ञा करना चाहते हैं, तो आपको स्वयं अपनेको पूरी तरह बदलना होगा। तब आपके मनमें विभिन्न विचारोंकी उथल-पुथल नहीं होगी; तब आप अपने आपको धोखा नहीं देंगे और अवचेतन मनसे ही सही, आप देशको ऐसा विश्वास दिलाने का धोखा भी नहीं देंगे कि बम और अहिंसा साथ-साथ चल सकते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ सर्वशक्तिमान संस्था अहिंसाके लिए प्रतिज्ञाबद्ध है, यदि आप अपने स्वयंके सिद्धान्त में विश्वास करते हैं, अर्थात् यदि आप स्वयंमें विश्वास करते हैं, यदि आप अपने राष्ट्रमें विश्वास करते हैं तब जिस चीजकी आवश्यकता है वह है सविनय अवज्ञा और यदि वह आवश्यक चीज सविनय अवज्ञा है तो आपको कठोर अनुशासनका पालन करना चाहिए, आपको यह देखना चाहिए कि कमसे कम आपस में किसी प्रकारकी उत्तेजना न पैदा हो, जैसे हमने यहाँ और विषय समिति में घृणास्पद प्रदर्शन देखे, वैसे नहीं हम शान्त, ठंडे, स्थिर, साहसी और वीर हों; तथा हम हमेशा विषयसंगत ही बोलें, विषय में बाधा डालने के लिए कभी न बोलें। यदि मेरा प्रत्येक सुझाव रद हो जाता है तो भी कोई
फर्क नहीं पड़ता; मुझमें इन संशोधनोंको पेश करनेवालों और उनका समर्थन करने वालोंको सहन करने की शक्ति होनी चाहिए। तभी मैं अहिसात्मक संस्थाओंके सम्मुख अपने विश्वासका प्रतिपादन कर सकूँगा। और इसलिए यदि आप वास्तवमें निकट भविष्य में सविनय अवज्ञा करना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप कांग्रेस और विषय-समिति के कार्यक्रमको एक शान्तिप्रिय व्यक्ति के योग्य ढंगसे चलायें। यदि आपके मनमें स्वतन्त्रताके प्रति वास्तविक प्रेम है तब चिड़चिड़ाहट, आपसी वैमनस्य, झगड़ेके लिए कोई स्थान नहीं है; स्थान है तो वह है केवल एक संगठित साहसपूर्ण, शान्त तथा स्थिर प्रयत्नके लिए इसलिए मैं जितना जोर देकर कह सकता हूँ कहता हूँ कि आप इस प्रस्तावको पूर्ण समर्थन के साथ पास कर दें, क्योंकि इस अधिवेशनका यही मुख्य प्रस्ताव है। संसारमें लोग यह न कहें कि हम जो आज स्वतन्त्रताके लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं, विभिन्न विचारधाराओं में बँटे हैं अर्थात् हमारे स्वयंके घरमें ही फूट<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―२|३६७}}</noinclude>पड़ी हुई है और इसलिए निश्चय ही हमारा पतन होगा। हम समस्त संसारको यह बतायें कि हम सब मिलकर एक साथ स्वतन्त्रता पानेके लिए उठ खड़े हुए हैं और हमने उस स्वतन्त्रताको कमसे कम समय में पानेके लिए प्रतिज्ञा की है। अतः मैं आपसे श्री सुभाषचन्द्र बोसके संशोधनको भी एकदम रद करनेकी प्रार्थना करता हूँ। मैं जानता हूँ कि वे बंगालके एक कर्मठ कार्यकर्त्ता हैं; बहुत-से क्षेत्रोंमें वे चमके हैं; बंगालमें हमारे कार्यकर्ताओंके थे सेनापति थे। उन्होंने एक बात रखी है जो संशोधन नहीं है, वह वास्तव में मूल प्रस्तावके बदले में रखा गया एक प्रस्ताव ही है। मैं इस बातसे नहीं मुकरता कि यह एक अच्छा सुझाव है पर यह मेरे प्रस्तावसे कहीं आगे जाता है। इसमें समानान्तर सरकारका सुझाव दिया गया है। यदि आप यह सोचते हैं कि आज आप समानान्तर सरकारकी स्थापना कर सकते हैं तब मैं आपसे यह कह दूँ कि इस समय एक हजार गांवों में भी कांग्रेसी झण्डा नहीं फहराता। जो लोग इस संशोधनका समर्थन करते हैं उनके प्रति मेरा पूरा आदरभाव है, पर यह वीरता नहीं है; यह दूरदर्शिता नहीं है; यह बुद्धिमानी नहीं है। आप मात्र प्रस्ताव पास
करके स्वराज्यकी स्थापना नहीं कर सकते। आप स्वराज्यकी स्थापना शब्दोंसे नहीं वरन् अपने कार्योंसे करेंगे। इसलिए यह सोचिए कि क्या आज आप समानान्तर सरकारकी स्थापना कर सकते हैं, क्या आप प्रस्तावमें उल्लिखित सभी बहिष्कारोंक लागू कर सकते हैं। इस बातका ध्यान रखें कि हम स्वराज्यकी घोषणा नहीं कर रहे हैं। मद्रास में स्वराज्यकी हमने अपने ध्येयके रूपमें घोषणा की थी। यहाँ हम एक कदम और आगे बढ़कर यह घोषणा करते हैं कि स्वराज्य हमारा दूरस्य ध्येय नहीं है वरन् हम उसे इसी समय तुरन्त पाना चाहते हैं। परन्तु सुभाषचन्द्र बोस चाहते
हैं कि आप उससे भी एक कदम और आगे जायें। यदि मैं यह समझता कि समानान्तर सरकार वर्तमान स्थितियोंमें सम्भव है तो मैं उनके इस प्रस्तावका पूर्णत:अनुकरण करता। समानान्तर सरकारका अर्थ है अपनी अदालतें, अपने स्कूल और कालेज आदि। यदि आप यह सोचते हैं कि सुभाष बोसके प्रस्ताव में आई सभी बातोंको कार्यरूप देनेकी योग्यता आप लोगोंमें है तो आप उसे पास कर दें और मेरे प्रस्तावको रद कर दें। पर मैं आपसे यह कह दूं कि आज हममें वह योग्यता नहीं है और मैं आपसे अपने जैसा ही सोचनेको कहता हूँ कि कार्यसमिति द्वारा सुझाया गया कार्यक्रम ही वह बड़े से-बड़ा कदम है, जो हम आज उठा सकते हैं; इससे आगे एक भी कदम हमें गड्ढे में डाल देगा। यह मेरा निश्चित विश्वास है; अतः मैं आपसे अपनी पूरी शक्ति-भर प्रार्थना करता हूँ कि आप एक अर्धविराम भी बदले बिना इस प्रस्तावको पास कर दें।<ref>प्रस्तावपर मतदान हुआ और वह पारित हो गया।</ref>
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके ४४ वें अधिवेशनकी रिपोर्ट।|1em}}<noinclude>{{dhr|1em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh|५६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|चाँदीवाला, ब्रजकृष्ण, ३०, ३८१, ४०६,
४४५, ४५६}}
{{outdent|चारु, १८५}}
{{outdent|चिन्तामणि, सी॰ वाई॰, ४६४}}
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{{outdent|छात्र, -और छात्रावास, ४२०-२३; -और पश्चिमी सभ्यता, ६९ - [ों] के लिए निश्चित कार्यक्रम, ३२४-२५; द्वारा पाठशालाओं तथा कालेजोंका बहिष्कार, २१३}}
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{{outdent|जामिया मिलिया, ५७, १२३, १२५, १६२}}
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{{outdent|जुगतराम, देखिए दवे, जुगतराम}}
{{outdent|जुगलकिशोर, आचार्य, १६६}}
{{outdent|जेठालाल, २७८}}
{{outdent|जेराजाणी, विट्ठलदास, १८६, २०९, २८४}}
{{outdent|जोजेफ, जॉर्ज, -द्वारा खादीकी आलोचना, २९९}}
{{outdent|जोशी, ईश्वरलाल, ३३, ३७, ३८, १३७, १५०, १७८}}
{{outdent|जोशी, एस॰ एम॰, ९७}}
{{outdent|जोशी, छगनलाल, ३, ११, १८, २२, २९, ३३, ३८, ४७, ७१-२, ८५, १००, १०१, १०८, १११, १३२, १३५, १९९, २१७, २३८, २४५, २५६, २६६}}
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{{outdent|झवेरी, कृष्णलाल मोहनलाल, १ पा॰ टि॰, २५७, २८५-७; -का अहमदाबाद कपड़ा मजदूर-विवादके सरपंचकी हैसियतसे निर्णय, २७२-७३}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०१
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{{outdent|झवेरी, पन्नालाल, १०४}}
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{{outdent|टंडन, पुरुषोत्तमदास, ७५, २३०, २३९, २६९, ३२०, ३५४ पा॰ टि॰}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०२
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{{outdent|दवे, जुगतराम, २५५}}
{{outdent|दास, चित्तरंजन, ३६१}}
{{outdent|दास, जतीन्द्रनाथ, ९१, ११३, १४७; -का आत्मबलिदान, भूख हड़ताल द्वारा ७-८}}
{{outdent|दास, सी॰ सी॰, १३}}
{{outdent|दासगुप्त, सतीशचन्द्र २१, ७२, १२४, १३३, १८५, १८६, १८९, २४०, ३०२, ४२८, ४९६
{{outdent|दासगुप्त, हेमप्रभा, २१, १३४, १८५, १९८, २७६, ४९६}}
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{{outdent|दुनीचन्द, ८६ पा॰ टि॰, ३९८}}
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{{outdent|देशराज, लाला, ३, १५२, १५३, १५९}}
{{outdent|देशी राज्य (रियासत), और सत्याग्रह २५; -का गोलमेज-परिषदमें भाग लेना २५९-६२; -की दूसरी रियासतमें जाकर आलोचना ५८; -[ों]की अनैतिकता और राष्ट्रीय सरकार, २३५,}}
{{outdent|देसाई, कुसुम, १९९, २००, ४४४}}
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{{outdent|देसाई, महादेव, २, २१, २७, ३८, ६६, ९१ पा॰ टि॰, १७७, १७९, १९४, २२३, २४३, २५२, २७५, २९२, ३०२, ३१९, ३२४, ३३२, ४६०, ४६३, ४७०, ४७१, ५२७ पा॰ टि॰}}
{{outdent|देसाई, वालजी गोविन्दजी, ९०, पा० टि० १९३, १९४, २४४,२६५, ३३१, ४४७}}
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{{outdent|धर्म, ६६, १८४, १९५, २३६, २४०, २६२, २६८, २८१, २८६, २८७, २९०, ३१७, ४२२, ४५७: -और अस्पृश्यता, २५३; -और देशभक्ति समानार्थी ३९०; -और स्वराज्य, २४; -की आत्मा, ४२४-२६; -के नामपर पशुबलि, २०८; -के नियमोंका उल्लंघन, ८२}}
{{outdent|धर्मक्षेत्र, देखिए तीर्थस्थान}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : रासमें|१०९}}</noinclude>और अफीमसे २५ करोड़ रुपये प्राप्त किये जाते हों और ६० करोड़ रुपयेका कपड़ा विदेशसे आता हो और जहाँ करोड़ों व्यक्ति बेकार रहते हों ऐसे राज्यका नाश करना, उससे द्रोह करना और प्रतिक्षण इस भावसे प्रार्थना करना कि यह राजनीति जल जाये, नष्ट हो जाये–धर्म है।
एक बार ऐसे राजद्रोह के अपराधमें मुझे ६ वर्षकी सजा हुई थी, लेकिन मेरे और सरकारके दुर्भाग्यसे मुझे रोग हो गया और अब मुझे बन्द नहीं रखा जा सकता, ऐसा महसूस होनेपर मुझे रिहाई देनी पड़ी। अब फिर बादल घिर आये हैं, अथवा चाहो तो कहो उचित अवसर प्रस्तुत हो गया है। यदि सरकार मुझे गिरफ्तार करती है तो यह एक अच्छी बात है। मुझे तीन माहकी जेल होगी तो सरकारको लज्जा
आयेगी। राजद्रोहीको तो कालेपानी, देशनिकाले अथवा फाँसीकी सजा हो सकती है। मुझ जैसे लोग यदि राजद्रोही होना अपना धर्म मानें तो उन्हें क्या सजा मिलनी चाहिए?
सरकारने सोचा होगा कि सरदारको तीन माह की सजा देनेसे लोग डर जायेंगे। लेकिन आप जो हजारोंकी संख्या में यहाँ उपस्थित हुए हैं सो ऐसा लगता है मानों आप किसी उत्सवमें आये हुए हैं। मुझे और मेरे साथियोंको यदि सरकार पकड़ ले जाये तो आप उत्सव ही मनायें। लेकिन क्या इतना करके ही आप बैठ जायेंगे? मुखिया और मतादार क्या वैसे ही अपने पदोंसे चिपके रहेंगे जैसे मक्खी मैलेपर बैठती है? यदि हाँ, तो यह दुःख और शर्मकी बात है।
दरवार इस ताल्लुकेमें वर्षोंसे आकर बस गये हैं। दरबार कौन है? ये अपना राजपाट–भले ही यह एक छोटे से गाँवका हो छोड़कर आये हैं। इन्हें साहबीकी, ऐशो-आरामको जिन्दगी नहीं चाहिए, इन्हें तो सेवाकी जरूरत है। इनसे आप त्याग और हिम्मत सीखें। ऐसे ताल्लुकेके मुखिया यदि अपना पद नहीं त्यागते तो कैसे काम चलेगा? आपने आज मुझे जो रकम दी है उसकी मेरे लिए कोई कीमत नहीं है पिछली बार जब एक करोड़ रुपया इकट्ठा किया गया था तब उसकी जरूरत थी। वह करोड़ रुपया अपनी कीमतसे करोड़ गुना अधिक काममें आया। लेकिन आज पैसोंकी नहीं, आपकी जरूरत है। यहाँ उपस्थित प्रत्येक भाई-बहन अपना नाम लिखवाय आप मुझे यह आश्वासन दें कि जब नमक कानून भंग करनेका समय आयेगा तब हम तैयार रहेंगे। इस धर्मयुद्ध में स्त्रियाँ भी भाग ले सकती हैं; और अनेक
स्त्रियोंने अपने नाम दर्ज भी कराये हैं।
इस धर्मयुद्धसे किसीका बाल भी बांका नहीं होनेवाला है। हम स्वयं कष्ट सहन कर सरकारको पदार्थ पाठ पढ़ायेंगे और अपने प्रति संसारके लोगों में सहानुभूतिका भाव जगायेंगे और अन्ततः शासकोंका हृदय परिवर्तन करवायेंगे। लेकिन आज तो सरकार न्याय करनेके बदले अत्याचार करनेको तत्पर हो गई है।
कलकत्ता महापौर श्री सेन गुप्त-जैसे व्यक्तिको, जिन्हें सारा बंगाल जानता है, वर्माकी जेल में ले जाया गया है। सरकारने उन लोगोंको गिरफ्तार करनेकी नीति ग्रहण की है जो गुनहगार नहीं हैं। ऐसे समय में जब जनता बिलख उठी हो और स्थान-स्थानपर हजारों व्यक्तियोंके हृदयसे हाय निकल रही हो उस समय सरकारको<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|११०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>नमक कर-जैसा कर दूर कर देना चाहिए और जनताके अन्य कष्टोंका निवारण भी कर देना चाहिए। लेकिन यह बात सरकारके मनको नहीं जँचेगी। जनताका करोड़ों रुपया जनताके पास रहे, यह सरकारको अच्छा नहीं लगता। इस रुपयेको इंग्लैंड ले जानेके लिए ही सरकार इतना आतंक फैलाये हुए है। इस आतंकसे छुटकारा पानेके लिए प्रथम उपायके रूपमें हमें नमक करको दूर करवाना है। नमक कर सम्बन्धी कानूनको हम यहाँतक भंग करेंगे कि इसके लिए सरकार हमें चाहे जेलमें डाल दे, चाहे चाबुक मारे अथवा और जो कुछ करना चाहे करे, हम सब कुछ सहन करनेको तैयार रहेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २३-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१०२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|दांडी कूचके दौरान<br>बुधवार १०-३० बजे [१९ मार्च, १९३०]<ref>देखिए "पत्र : नारणदास गांधीको", १६-३-१९३०।</ref>}}
{{left|चि° नारणदास,}}
तुम्हारा पत्र मिला। यदि ये नवयुवक इतना आग्रह करते हैं तो मेरा खयाल है, उन्हें ले लेना चाहिए। मेरे सामने तो उन्होंने पश्चात्ताप प्रकट किया था। मैंने उन्हें सिफारिशी चिट्ठी देनेसे इसलिए इनकार कर दिया था ताकि तुम्हें वहाँ जो ठीक लगे वैसा निर्णय ले सको। अब भी ऐसा ही समझना। तुम्हें जो उचित लगे वही करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी° डब्ल्यू° ८०९३) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१०३. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''नमक-कर'''}}
चौबीस परगना जिलेमें गैरकानूनी तौर पर नमक बनानेके अपराधमें अलीपुर के सब डिविजनल अफसरने भांगोर और मातला गाँवोंके १५ आदमियों को आठ-आठ आने जुर्मानेकी सजा दी है। उन लोगोंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और अपने-आपको अदालतकी दया पर छोड़ते हुए निवेदन किया कि हम इतने गरीब हैं कि नमक मोल नहीं ले सकते और अपने खानेके लिए ही नमक बना रहे थे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||टिप्पणियाँ|१११}}</noinclude>
यह समयोचित खबर समाचारपत्रोंसे ली गई है। गरीबोंके लिए आठ आनेका जुर्माना कोई दिल्लगी नहीं है। मजिस्ट्रेट इन आदमियोंको चेतावनी देकर भी छोड़ सकता था, अथवा जैसा पहले कई मजिस्ट्रेटोंने किया है, अगर वह समझता कि सजा तो देनी ही है तो जुर्माना अपनी जेबसे चुका सकता था। हाँ, यह सम्भव है कि उस दशा में नमक अधिनियमके अनुसार उस पर कायरताका अभियोग लगाया जाता। कुछ भी हो, तीन बातें स्पष्ट हैं। पहली यह कि इन लोगोंने 'अपने-आपको अदालतकी दया पर छोड़ दिया', दूसरी यह कि उनका कहना था कि 'हम इतने गरीब हैं कि नमक मोल नहीं ले सकते' और तीसरी यह कि मजिस्ट्रेटने उनकी दलीलको नहीं माना। ये तीनों बातें सविनय अवज्ञाकी लड़ाई छेड़नेके पक्ष में प्रबल प्रमाण हैं। इससे नरम आन्दोलनसे काम चल ही नहीं सकता था। इसके अलावा नमक-कर तो जनता के दुःखोंके अम्बारमें से एक बानगी मात्र है। भारतको इन दुःखोंसे मुक्त करने के लिए एड़ी-चोटीकी ताकत लगा देना ऐसे प्रत्येक भारतीयका कर्त्तव्य है, जो जानता है कि देश पर कैसे अन्याय हो रहे हैं।
{{c|'''इसे कैसे तोड़ें'''}}
एक भाई लिखते हैं कि पुर्तगाल अधिकृत भारतमें नमक-कर नहीं लिया जाता; दमण पार्डी के पास ही है; दमणमें नमक दो आने मनके हिसाबसे बिकता है; और दमणसे चाहे जितना नमक ले आ सकते हैं और ब्रिटिश भारतकी सीमामें आने पर महसूल देनेसे इनकार कर सकते हैं। इसी तरहका सुझाव काठियावाड़से भी आया है। वहाँ भी कर नहीं लगता। राज्यका ठेका जरूर है, जिसके कारण नमक लागत दामसे महँगा पड़ता है। फिर भी, अंग्रेजी इलाकेसे बहुत सस्ता है। उदाहरणार्थ, मुझे मालूम हुआ है कि रणपुरमें एक कच्चा मन नमकका दाम १ रुपया ४ आने है, जबकि रणपुरके बाहर इतने ही नमकका शायद १० आनेसे अधिक नहीं लगता। जो हो, जब सर्वसाधारणको सविनय अवज्ञा करनेकी हिदायत दी जायेगी, उस समय नमक-कानूनको तोड़ना बेशक सबसे आसान होगा।
स्वभावतः सरकार भी अपने जाने-माने तरीकेसे सविनय अवज्ञा करनेवालोंका मुकाबला करनेकी तैयारी कर रही है। सिन्ध और अदनके सिवा पूरे बम्बई प्रान्तमें सिपाहीसे ऊपरका प्रत्येक पुलिस कर्मचारी नमकके महकमेका अफसर बना दिया गय है। और यह आशा तो की ही जा सकती है कि नये अधिकार पाकर ये सज्जन अपनी पूरी कारगुजारी दिखायेंगे। जब निरपराधोंके खूनसे इनके हाथ रँग जायेंगे, तब जरूर सदाकी भाँति जाँच होगी और उसके बाद नमक कानून रद्द कर दिया जायेगा। लेकिन इस बार सविनय अवज्ञाका दोहरा उद्देश्य है–एक तो नमक कर रद्द करवाना और दूसरे, अंग्रेजोंकी गुलामी मिटाना, क्योंकि नमक कर तो उसीका एक परिणाम है। नमक कानूनकी जाँच करके उसे रद्द कर देनेसे सविनय अवज्ञा बन्द नहीं हो सकती। इसलिए जो लोग नमक-करको रद्द कराना चाहते हैं, उन सबका कर्त्तव्य है कि वे कमसे कम उस हद तक तो इस आन्दोलनमें अवश्य शामिल हो जायें। हाँ, यदि वे कष्ट-विशेषको मिटानेके लिए सविनय अवज्ञाको सफल बनानेके बजाय इस करको रखनेके पक्षमें हों तो बात दूसरी है।<noinclude></noinclude>
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|११२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
{{c|'''घटाया नहीं, बढ़ाया है'''}}
कहा गया है कि अब मैं अपनी पहली प्रिय चीजको छोड़ चुका हूँ और हिन्दू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता निवारण और खद्दरको स्वराज्य-प्राप्तिकी शर्तोंके रूपमें त्याग चुका हूँ। यह एक दुष्टतापूर्ण बात है। सचाई यह है कि मैंने छोड़ा कुछ भी नहीं है; उलटे कई नई बातें जोड़ी हैं। इसीलिए मैंने हालमें भारतीय पक्षको जिस प्रकार प्रस्तुत किया है उसे 'नई दिशा' कहा है। पुरानी शर्तोंको पूरा किये बिना स्वराज्य असम्भव है। इसी प्रकार कुछ और शर्तें भी पूरी न होंगी तो स्वराज्य न मिलेगा। सम्भव था, संविधान बनाने के समय इन शर्तों को लोग बिलकुल ही भूल जाते। परन्तु यदि स्वराज्यकी कल्पनामें सर्वसाधारणके हितोंका समावेश होता है, तो अब ये शर्ते उसकी किसी भी योजनाका अविभाज्य अंग बन गई हैं। साथ ही, ये विविध शर्तें भले ही सम्पूर्णतः पूरी हो जायें, तो भी सविनय अवज्ञा तो की ही
जा रही है, क्योंकि सशस्त्र विद्रोहका स्थानापन्न होनेके कारण सविनय अवज्ञा बृहत् रचनात्मक कार्यक्रमके साथ-साथ उसी प्रकार जारी रह सकती है जिस प्रकार कोई सशस्त्र आदमी लड़ता रहे और साथ-साथ साधारण प्रजाजन अपने दूसरे राष्ट्रीय कामों में लगे रहें। अलबत्ता, उस योद्धाके कार्यको बल प्रदान करनेके लिए जिन कामोंको बन्द करना आवश्यक हो सकता है, उन्हें वे कुछ समय बन्द रखेंगे। स्वराज्यकी शर्तों में से एककी भी उपेक्षा होने या किसी शर्तके त्याग दिये जानेका कोई खतरा नहीं है, क्योंकि जो लोग सविनय अवज्ञा कर रहे हैं वे तो इन शर्तोंसे हर हालत में बँधे ही हुए हैं। इसलिए प्रश्न यह है कि सविनय अवज्ञाका मार्गदर्शन किन लोगोंके हाथोंमें है? अगर वे ऐसे शुद्ध राष्ट्रवादी लोग हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किसी भी रूपमें, साम्प्रदायिकताको नहीं बढ़ा रहे हैं, तब तो सब कुछ ठीक ही समझना चाहिए। सविनय अवज्ञा वह साधन है, जिससे देशमें अपने निश्चित ध्येयतक पहुँचनेकी शक्ति पैदा होगी।
{{c|'''दीनबन्धु एन्ड्रयूज'''}}
पाठक जानते कि सी° एफ° एन्ड्रयूज मुझसे पहलेके स्वाधीनतावादी हैं। मैं तो इसी विश्वाससे चिपटा हुआ था कि औपनिवेशिक स्वराज्य स्वाधीनतासे बढ़िया चीज है। परन्तु दीनबन्धु अपने इंग्लैंडको मुझसे अधिक अच्छी तरह जानते थे। अपनी साल-गिरहपर हालमें ही उन्होंने मुझे जो पत्र भेजा है, उसमें वे लिखते हैं:
{{Outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''मैं कैसे बताऊँ कि मुझे आपकी कितनी याद आती रहती है। ऐसे अवसरों पर मुझे यही अनुभव हुआ है कि विचार प्रार्थनाका काम देते हैं। सबसे महान् संग्राम शुरू हो गया है और जैसा मेरा सदासे विश्वास रहा है, भारतने अपना दावा स्वाधीनतासे कम न रखकर उचित काम किया है। वह किसी साम्राज्यका अंग बनकर रह ही नहीं सकता। यह कल्पनातीत बात है।'''}}
स्पष्ट ही, इस पत्रका भाव यह है कि औपनिवेशिक स्वराज्यभोगी भारत साम्राज्यका अंग होकर ही रह सकता है; उस स्थितिमें वह राष्ट्रोंके संघमें बराबरीका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५५
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||विद्यार्थी क्या पसंद करेंगे?|११३}}</noinclude>सदस्य होकर नहीं रह सकेगा। यह बात जरूर है कि जब मैं औपनिवेशिक स्वराज्यकी बात कहता था तब मेरी कल्पना तो बराबरीके हिस्सेदारकी ही थी। इसलिए कलकत्ताके निश्चयकी बात अलग रखें तो भी जब सन् १९२९ के अनुभवने यह सिद्ध कर दिया कि बराबरकी हिस्सेदारीकी बात ही नहीं हो सकती तब मैं दिलसे पूर्ण स्वाधीनतावादी बन गया।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}
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{{larger|{{c|'''१०४. विद्यार्थी क्या पसन्द करेंगे?'''}}}}
कई बार कहा गया है कि साधारणतः राष्ट्रीय शिक्षा और खासकर गुजरात विद्यापीठपर जो रुपया खर्च किया गया वह व्यर्थ गया है। मेरी रायमें गुजरात विद्यापीठके विषय में कमसे कम कहा जाये तो कहना होगा कि उसने अपने महान् त्यागसे अपने अस्तित्वको सफल सिद्ध किया है और अपने संस्थापकों तथा अनुदान-दाताओंकी आशाएँ पूरी कर दी हैं। कारण, १६ वर्षसे कम उम्रके जो लड़के पहलेसे विद्यापीठमें तालीम पा रहे हैं, उनकी शिक्षाके सिवा बाकी लिखाई-पढ़ाईका सब काम फिलहाल बन्द कर दिया गया है। शिक्षकों और १५ सालसे अधिक आयुके विद्यार्थियोंने यह प्रस्ताव रखा है कि वे सब स्वयंसेवक बननेके लिए तैयार हैं। लगभग ४० छात्र और उनके शिक्षक तो कार्यक्षेत्रमें आ भी गये हैं। जिन्हें ऐसी शिक्षाकी जरूरत है, उनके लिए १५ दिनकी सत्याग्रह-सम्बन्धी शिक्षा देनेके लिए एक कक्षा खोल दी गई है। जिस स्फूर्तिके साथ इन विद्यार्थियों और शिक्षकोंने यह काम किया है, उसपर मैं उन्हें बधाई देता हूँ। मैं यह भी बता दूं कि इन लोगोंमें से बीस तो मेरे साथ कूचपर हैं। इनकी दो टुकड़ियाँ हैं, जो ८० यात्रियोंके आगे-आगे चलती हैं और पहलेसे सब तैयारी रखने और गाँववालोंको मदद देनेका काम करती हैं। उन्हें आज्ञा यह है कि जबतक ये अस्सी पकड़े न जायें तबतक वे सविनय अवज्ञा न करें, किन्तु इनके गिरफ्तार होते ही तुरन्त इनका स्थान ले लें।
मुझे विश्वास है कि प्रत्येक राष्ट्रीय शिक्षण-संस्था गुजरात विद्यापीठके इस भव्य कार्यका अनुकरण करेगी। १९२० में असहयोगके आह्वानपर सबसे पहले जन्म भी तो इसी विद्यापीठका हुआ था। मुझे आशा तो यह भी है कि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल भी विद्यापीठकी नकल करेंगे। आधुनिक समयकी प्रत्येक क्रान्तिमें छात्रोंने आगे बढ़कर हिस्सा लिया है। हमारी इस क्रान्तिके प्रति, केवल इसके शान्ति-मय होनेके कारण, विद्यार्थियोंका आकर्षण कम नहीं होना चाहिए।
गुजरात विद्यापीठका ध्येय वाक्य 'सा विद्या या विमुक्तये' है। इसका अर्थ यह है कि सच्ची विद्या वही है जो मुक्तिकी ओर ले जाती हो। और अगर यह उसूल ठीक है कि बड़ेमें छोटा शामिल होता है, तो आध्यात्मिक मुक्तिमें राष्ट्रीय स्वाधीनता या भौतिक मुक्तिका भी समावेश होता है। इस कारण शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थी<noinclude>{{Dhr}}
{{left|४३–८|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|११४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जो विद्या प्राप्त करते ह, उसे कमसे कम उन्हें स्वतन्त्रता प्राप्तिका मार्ग तो दिखाना ही चाहिए और उस ओर ले भी जाना चाहिए।
सिर्फ ऊपरी तौरपर बातें देखनेवालेकी नजर में भी यह बात आये बिना न रहेगी कि सत्याग्रही यात्रियोंका नित्यका कार्यक्रम ही एक सम्पूर्ण शिक्षा है। यह कोई मारकाट करनेवाले विद्रोहियों का ऐसा दल नहीं है, जो जहाँ जाये वहीं बरबादी मचाये और क्रोधादि निम्न वृत्तियोंको खुल खेलने की छूट दे; यह टुकड़ी तो ऐसे संयमी पुरुषोंकी है, जिन्होंने संगठित जुल्म के खिलाफ अहिंसात्मक विद्रोह किया है। ये खुद घोर कष्ट सहकर उस जुल्मसे छुटकारा पाने निकले हैं, और जहाँ जाते हैं, वहाँ सत्य तथा अहिंसा द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करनेका सन्देश छोड़ते जाते हैं। देशकी मौजूदा हालतमें आखिर जिस सच्ची तालीमकी कल्पना की जा सकती है, उसके लिए अपने लड़के या लड़कीको न्योछावर कर देनेमें किसी पिताको जरा भी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है।
१९२० के आह्वान और इस बारके आह्वानका भेद भी बता दूं। १९२० का आह्वान सरकारी संस्थाओंको खाली कराकर राष्ट्रीय संस्थाएँ स्थापित करनेके लिए था। वह पुकार लड़ाईकी तैयारी के लिए थी। आजकी पुकार अन्तिम संघर्ष में शामिल होने, अर्थात् जनता द्वारा सविनय अवज्ञा करनेके लिए है। यह अवज्ञा हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती। यह उस हालत में नहीं होगी जबकि आजतक आजादी के लिए खूब जोरसे चिल्लाते रहनेवाले लोगोंमें कर्मशीलता न होगी। अगर नमक ही अपना खारापन खो दे तो उसे और कौन-सी चीज नमकीन बना सकती है? विद्यार्थियोंसे आशा की जाती है कि वे आखिरी हालत जल्दीसे-जल्दी पैदा करें। परन्तु यह थोथे और बेमानी नारोंसे न आयेगी, बल्कि विद्यार्थियोंके लिए शोभनीय मुक भावसे और गरिमापूर्ण ढंगसे किये गये ऐसे कार्योंसे आयेगी जिनके औचित्य पर कोई अँगुली न उठा सके। इसपर यह कहा जा सकता है कि विद्यार्थियोंका आत्मत्यागमें विश्वास नहीं है और अहिंसामें तो और भी नहीं। यदि बात ऐसी हो तब तो स्वभावतः वे मैदानमें न आयेंगे और न उनके आनेकी जरूरत ही है। उस हालत में उनके लिए भी यही योग्य होगा कि वे उन क्रान्तिकारियोंकी तरह, जिनका पत्र अन्यत्र उद्धृत किया जा रहा है, प्रतीक्षा करें और देखें कि सक्रिय अहिंसा क्या-कुछ कर सकती है। उनके लिए वीरोचित बात तो यह होगी कि वे जी-जानसे इस अहिंसात्मक विद्रोह में शामिल हो जायें या तटस्थ रहें। या यदि वे चाहें तो घटना-चत्रको समालोचककी दृष्टिसे देखते रहें। यदि वे अपनी मनमानी करेंगे अथवा इस आन्दोलन के सूत्रधारोंकी योजनाके साँचे में ढले बिना या उस योजनाके विरुद्ध कोई काम करेंगे तो उससे इसके मार्ग में बाधा पड़ेगी और वे इसे नुकसान पहुँचायेंगे। हाँ, इतना मैं जानता हूँ कि अगर सविनय अवज्ञाको इस समय पूरी तरह काममें न लाया गया तो फिर आगे एक पीढ़ी तक उसे काममें नहीं लाया जा सकेगा। विद्यार्थियोंके सामने रास्ते साफ हैं। वे जिसे चाहें पसन्द कर लें। पिछले दस वर्षोंकी जागृतिसे वे अछूते नहीं रहे हैं। उन्हें चाहिए कि वे आखिरी गोता लगा कर देखें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५७
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{{larger|{{c|'''१०५. सरकारकी क्षुद्रता'''}}}}
बर्मा सरकारको यह मालूम था कि कलकत्ता नगरनिगमके महापौर श्रीयुत सेनगुप्त पिछले दिनों बिना किसी खास उद्देश्यके बस कुछ समयके लिए रंगून गये थे। फिर भी उनपर वारंट जारी करके मुकदमा चलाने के लिए उन्हें रंगून ले जाया गया है। अगर पिछले अनुभवोंके आधारपर देखें तो इस तरह बदलेकी भावनासे प्रेरित होकर चलाये गये मुकदमेका परिणाम उनको सजा दिया जाना ही होगा। इससे तो अनिवार्यतः यही निष्कर्ष निकलता है कि सरकारके उच्च अधिकारियोंके बीच बड़े-बड़े लोगोंको मैदानसे हटा देनेका अलिखित किन्तु सोचा-समझा षड्यन्त्र चल रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले सरदार पटेलपर हाथ डाला गया और अब श्रीयुत सेनगुप्तपर। कलको दूसरे नेताओंपर डाला जायेगा। सरकार के सामने दमन करने या राहत देनेके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। राहत देनेका तो सरकारका कोई इरादा है नहीं; सो दमन अवश्यम्भावी है। मगर दमन चक्र जितनी तेजीसे और जितनी सख्ती से चलाया जायेगा, आन्दोलनका उतना ही ज्यादा फायदा होगा; क्योंकि अगर इसमें सहज जीवनी-शक्ति है तो दमनके हर दौरके साथ यह बढ़ता ही जायेगा। इसलिए मैं श्रीयुत सेनगुप्तको उनकी गिरफ्तारीपर बधाई देता हूँ।
देखता हूँ, देशमें अहिंसा-धर्म में दृढ़ विश्वास रखनेवालोंको विभिन्न प्रान्तोंके अधिनायक नियुक्त करनेकी एक सहज प्रवृत्ति चल पड़ी है। श्रीयुत च० राजगोपालाचारीको नियुक्त करके तमिलनाडने सबको रास्ता दिखाया है। उसका अनुगमन आन्ध्र देशने देशभक्त कोण्डा वेंकटप्पैयाको नियुक्त करके किया है। अब खबर आई है कि श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्तको बंगालका अधिनायक नियुक्त किया गया है। बंगालके बारेमें मैं कुछ चिन्तित हूँ; क्योंकि अखबारोंमें छपी खबरोंसे यह बात साफ नहीं होती कि वे दोनों गुटोंकी ओरसे नियुक्त किये गये हैं अथवा एक ही गुटकी ओरसे। आशा करता हूँ कि वे दोनों गुटोंकी ओरसे नियुक्त किये गये होंगे। आपसमें उनका कोई महत्त्वपूर्ण मतभेद हो तो हो। लेकिन, हमारे लक्ष्य और सविनय अवज्ञा-रूपी साधनके सम्बन्धमें तो उनमें कोई मतभेद नहीं हो सकता और चूंकि श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्तको न कौंसिलमें जानेकी चाह है और न निगममें प्रवेश करनेकी इच्छा, इसलिए उन्हें दोनोंको आपस में जोड़ सकना चाहिए। दो महान् नेताओंकी गिरफ्तारीके बाद निश्चय ही बंगालके इन परस्पर विरोधी गुटोंका कर्त्तव्य है कि वे साथ मिलकर सतीश बाबूकी मदद करें।
जो भी हो, अधिनायकका स्थान कोई फूलोंकी सेज तो है नहीं। खुद उसे भी किसी क्षण गिरफ्तार किया जा सकता है। वह इस पदको ग्रहण ही इसलिए करता है। लेकिन, उसे जनताका पूर्ण और सर्वसम्मत सहयोग तो मिलना ही चाहिए। एक बार जब किसीको इस पदपर प्रतिष्ठित कर दिया जाये तो फिर सबको उसके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|११६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>प्रति वफादार होना चाहिए। लड़ाईके समय सभी विवादोंको समाप्त कर देना चाहिए। विवादका समय तो तब था जब नियुक्ति की जा रही थी।
मेरे खयालसे 'अधिनायक' शब्द कोई अच्छा चुनाव नहीं है और इससे कुछ ऐसी बू आती है जो ठीक नहीं है। मैं तो इसके स्थानपर 'प्रथम सेवक' शब्द रखना चाहूँगा। कर्त्तव्यकी ठीक परिभाषा इस पदको सही अर्थ देगी। चालू और देखनेमें इसी आन्दोलनके समान लगनेवाले अन्य आन्दोलनोंके कतिपय शब्दोंका प्रयोग तो अवश्यम्भावी है। फिर भी हमें, जिस आन्दोलनमें अधिनायकत्वका कोई स्थान ही नहीं है और वह असम्भव है, उस आन्दोलनमें ऐसे शब्दके प्रयोगसे बचना चाहिए जिससे उस अर्थ और शक्तिका बोध होता हो जिसका बोध 'अधिनायक' शब्दसे होता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}
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{{larger|{{c|'''१०६. यदि सच है तो अच्छा'''}}}}
उक्त पत्रको<ref>"आर° एल° आर° की कार्यकारिणीके सदस्योंकी ओरसे समितिके मन्त्री कर्नल बेदी" द्वारा प्रेषित यह पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसमें कहा गया था कि क्रान्तिकारियोंने 'गांधीवादी' तरीकेसे स्वतन्त्रताकी प्राप्ति के लिए ३ वर्षका समय देना तथ किया है। इसके बाद वे स्वतन्त्रताके लिए युद्धकी घोषणा करेंगे।</ref> मैं अविकल रूपमें छाप रहा हूँ। मैं 'कर्नल बेदी' को नहीं जानता। यदि वास्तवमें ऐसा कोई आदमी है और यह पत्र जाली नहीं है और यदि इस पत्रका आशय वही है जो इसमें कहा गया है तो मैं क्रान्तिकारी दलको उसके निश्चयपर बधाई देता हूँ। मुझे जो तीन सालका समय दिया गया है, वह काफी है। इस दलने जैसी परिस्थिति बनाये रखनेका वचन दिया है, यदि वैसी परिस्थितिमें तीन सालकी सक्रिय अहिंसाके बाद भी मैं लोगोंको अहिंसाकी क्षमतामें विश्वास करनेकी प्रेरणा न दे सका तो मैं अपने-आपको अहिंसाका अयोग्य प्रतिनिधि मानूंगा। इसलिए मुझे आशा है कि क्रान्तिकारी दल केवल अपनी गति-विधियोंको ही स्थगित नहीं रखेगा, बल्कि जहाँतक सम्भव हो वहाँतक छिट-पुट तौर पर होनेवाली हिंसात्मक घटनाओंको भी रोकेगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|8em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१०७. स्वराज्य और रामराज्य'''}}}}
स्वराज्यके कितने ही अर्थ क्यों न किये जायें, मैं भी उसके कितने ही अर्थ क्यों न बताता रहा हूँ, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल-सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसीको रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूँगा। रामराज्य शब्दका भावार्थ यह है कि उसमें गरीबोंकी सम्पूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किये जायेंगे और लोकमतका हमेशा आदर किया जायेगा। पर रामराज्यकी प्राप्तिके लिए सब लोगोंको हाथ बँटाना चाहिए। इस कामके लिए हमारे पास खादी ही एक सर्वव्यापक और रचनात्मक साधन है। लेकिन लोगोंकी शक्तिको बढ़ानेके लिए किसी दूसरी व्यापक वस्तुकी भी आवश्यकता थी। नमक-कर वह वस्तु है, और हम उसे पा चुके हैं। नमकका उपयोग तो गरीब और अमीर, दोनों, समान रूपसे करते हैं, और चूंकि इस सर्वोपयोगी, सबके लिए आवश्यक वस्तुपर कर लगाया गया है, हरएक मनुष्य नमक-कर के इस कानूनको सविनय भंग कर सकता है और यों अपनी शक्ति बढ़ा सकता है। इस तरहके सविनय भंगसे जो शक्ति बढ़ेगी उसके शान्तिमय और शान्तिप्रद होनेके कारण, रामराज्य स्थापित करनेमें उससे हमें बड़ी मदद मिलेगी। नमक कर के समान और भी अनेक कर हैं, जो जनताके लिए भार-रूप हैं और जिन्हें मिटानेका प्रयत्न करनेसे लोगोंको सच्ची शिक्षा मिल सकती है, उनकी शक्ति बढ़ सकती है। ऐसे साधनोंसे रामराज्यकी स्थापना आसान हो जायेगी। पूर्ण रामराज्य हमें कब मिलेगा, सो तो कोई नहीं कह सकता। परन्तु रात-दिन उसीकी रट लगाये रहना हम सबका धर्म है। और सच्चा चिन्तन तो वही है, जिसमें रामराज्यके लिए योग्य साधनका भी उपयोग किया गया हो। यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करनेके लिए हमें पाण्डित्यकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस गुणकी आवश्यकता है, वह तो सब वर्गोंके लोगों—स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों—तथा सब धर्मोके लोगोंमें आज भी मौजूद है। दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उसकी हस्तीको पहचानते नहीं हैं। क्या सत्य, अहिंसा, अनुशासन या मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणोंका हममें से हरएक व्यक्ति यदि वह चाहे तो आज ही परिचय नहीं दे सकता? बात यह है कि हम लोग मायाजालमें फँसे हुए हैं, और इसी कारण अपने पासकी चीजको पहचान नहीं रहे हैं, उलटे दूरकी चीजोंको पहचाननेका दावा करते हैं। निःसन्देह यह बड़े शोककी बात है।
पर तो भी 'हिन्दी नवजीवन' के पाठकोंसे मैं प्रार्थना करूँगा कि आज देशमें जो महायज्ञ आरम्भ हो चुका है, उसमें वे पूरी तरह हाथ बँटानेको तैयार रहें।
{{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' २०-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१०८. भाषण : कारेली में'''}}}}
{{right|२० मार्च, १९३०}}
२,७५,००० की आबादी में से ५,००० स्वयंसेवक प्राप्त करना कठिन नहीं होना चाहिए। यदि ४०० गाँवोंके समस्त सरकारी अधिकारी अपने पदोंसे त्यागपत्र दे देते हैं तो हमें अपने उद्देश्यकी प्राप्तिके लिए जेल जानेकी जरूरत नहीं होगी। लेकिन इसके लिए अभी परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं। हम मही नदीके मुहानेपर नमक बना सकते हैं। लेकिन नमक बनानेके लिए सरदार वल्लभभाईने मुझे जलालपुर जाने को कहा है। यदि मैं और मेरे स्वयंसेवकोंका दल पकड़ा जाता है तो प्रत्येक स्वयंसेवक नमक बनाना शुरू कर दे। बड़ौदा राज्यके लोग भी ब्रिटिश- शासित प्रदेश में आकर नमक बना सकते हैं। इस बीच, सब लोगोंको खादीका उत्पादन बढ़ाने के कार्य में और शराबबन्दीमें जुट जाना चाहिए।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती,''' २३-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१०९. पत्र : गंगादेवी सनाढ्यको'''}}}}
{{right|कारेली<br>गुरुवार [२० मार्च, १९३०]<ref>तिथि कारेलीमें गांधीजीकी उपस्थितिके आधारपर निर्धारित की गई है।</ref>}}
{{left|चि° गंगादेवी,}}
तुमारा खत मुझे मील गया था। शरीरकी रक्षा करो और जो कुछ सेवा हो सके वह करो। दूध और फलको छोड़कर और कोई खोराक खानेका इरादा तक न कीया जाय भले डाक्टर लोग कुछ भी कहें।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी° एन° २५३३ की फोटो नकलसे।<noinclude>{{Dhr|8em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''११०. पत्र : अब्दुलकादिर बावजीरको'''}}}}
{{right|गजेरा<br>२१ मार्च, १९३०}}
{{left|भाई इमाम साहब,}}
मैं आपको रोज याद तो करता हूँ। आपके प्रेमका कैसे वर्णन करूँ? आपने बहुत तरक्की की है, यह देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। आश्रम तो आपका है, उसके लिए मैं आपको क्या सलाह दूँ? अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखें। कुरैशी अच्छा काम कर रहा है। मैं देखता हूँ, सब उससे खुश रहते हैं।
{{right|'''बापूकी दुआ'''}}
गुजराती (जी° एन° ६६४५) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१११. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}}
{{right|२१ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° कुसुम,}}
जो पत्र न लिखे वह मंत्राणी कैसी? मैं महादेवसे इस समय कोई आशा नहीं करता। उन्हें समय नहीं मिलता। वे मन्त्री होते हुए भी आजकल मन्त्रीका काम नहीं करते। तो भी जो करते हैं वह मन्त्रीके कामसे बड़ा है। तूने तो मंत्राणी होने की हद [भी] पार नहीं की। मुझे बीमारोंके समाचारोंकी आशा रहती है। वहाँके कार्योंका हाल भी जानना चाहता हूँ; और जो तुझे सूझे वह। बा के क्या हालचाल हैं? तेरी तबीयत कैसी रहती है? तू बराबर पढ़ती है? पींजती है? कातती है? अपनी डायरी लिखती है? जीवन-वृत्तान्त लिख रही है?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° १७९५) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|10em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''११२. भाषण : गजेरामें'''<ref>स्वराज-गीता से उद्धृत।</ref>}}}}
{{right|[२१ मार्च, १९३०]<ref>गांधीजी इस तारीखको गजेरामें थे।</ref>}}
आप यह निश्चित मानना कि अन्त्यजोंको अपने साथ बैठाकर आपने पुण्यका काम किया है और स्वराज्यकी दिशामें एक कदम आगे बढ़ाया है। जिन दो ब्राह्मणोंने आपके समक्ष "रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम" गाया है, उनके वेश और कर्मसे आप देख सकेंगे कि ये कोई आधुनिक ब्राह्मण नहीं हैं; वे जुआ खेलने, मांसाहार अथवा व्यभिचार करनेवाले ब्राह्मण भी नहीं हैं। 'गीता' और संस्कृत जाननेवाले ये ब्राह्मण शिक्षक हैं तथा वे अपने दायित्वोंसे भली-भाँति परिचित हैं। ये अन्त्यजों अथवा दूसरे धर्मावलम्बियोंके साथ रहने में पाप नहीं मानते, बल्कि इनकी दृष्टिमें ऐसे लोगों के साथ न रहना पाप है। इसलिए आप निश्चित रूपसे समझ जायें कि आपने कोई अधर्म नहीं किया है।
जब राजचन्द्रजी अयोध्या छोड़ गंगाके किनारे आये तब उन्हें पार उतारनेवाले निषादराज थे और उनके द्वारा दिये गये फल आदि रामचन्द्रजीने ग्रहण किये थे। ये निषादराज कौन थे? ये भी अन्त्यज कहे जाते थे। भरत जब निषादराजसे मिले तब उन्होंने निषादराजको आलिंगन करके भेंटा और जरूरतके समय निषादराजने रामचन्द्रजीकी जो सेवा की, उसके लिए उन्होंने उन्हें बधाई दी। हमारे दलमें एक अन्त्यज-परिवार है।
इस देशसे प्रति वर्ष न केवल ६० करोड़ रुपये बल्कि अरबों रुपये विदेश चले जाते हैं। गजनी, गौरी अथवा मुगल साम्राज्यमें पैसा यहीं रहा करता था। लेकिन इस राज्यमें सब सरकारी कर्मचारियोंकी पेंशनें विदेश चली जाती हैं। जिस समय देश इस तरहसे लुट रहा हो उस समय भला कौन ऐसा व्यक्ति है जो शान्त होकर बैठा रह सकता है!
हिन्दुस्तान में ३०० जिले हैं और इन तीन सौ जिलोंमें कलक्टरका डंका बजता है। हम ३० करोड़ लोगोंपर ये ३०० व्यक्ति कैसे शासन कर सकते हैं, यह उनके तथा हमारे लिए शर्मकी बात है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ३०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|5em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''११३. भाषण : अंखी में'''<ref>यह स्वराज-गीता से लिया गया है।</ref>}}}}
{{right|[२१ मार्च, १९३०]<ref>यह तारीख २३-३-१९३० के प्रजाबन्धुसे ली गई है।</ref>}}
मेरे पास शिकायत आई है कि यहाँ जो पुलिस अथवा सरकारी अधिकारी आते हैं उन्हें गाँव खाना-पानी नहीं देता। इसमें हम कोई हिंसा नहीं करते। लेकिन अधिकारी देसी हों अथवा गोरे, यदि वे सचमुच भूखसे मर रहे हों अथवा पानीको तरस रहे हों तो भूख और प्याससे मारने का हमारा धर्म नहीं है। जिस धर्मके वशी-भूत हो मैं बगावत करने निकला हूँ वह धर्म सिखाता है कि जिस डायर और ओडायरके कृत्योंको, अत्याचारकी साक्षात् मूर्तियोंको मैंने डायरशाहीका नाम दिया था यदि वह डायर मुझे गोली मारे तथा यदि मैं होशमें होऊँ और मुझे पता चले कि उसे साँपने काटा है तो मैं उसका विष चूसनेके लिए भागता हुआ चला जाऊँगा। ऐसा काम मैंने किया है। दक्षिण आफ्रिकामें जिस व्यक्तिने<ref>मीर आलम; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ ७४।</ref> मुझपर प्रहार किया था, मैंने होशमें आने पर उसी व्यक्तिको छोड़ देनेके लिए सरकारसे अनुरोध किया था। लेकिन सरकारी अधिकारीकी हैसियतसे यदि हमारे पास कोई कुछ माँगने आता है तो उसे न तो खाना-पानी मिलेगा, न बिस्तर, न दियासलाई और न घोड़ेको खिलानेके लिए चारा।
कुम्हार कोई पानी भरनेके लिए पैदा नहीं हुआ है। यदि हमारे हाथ चले जायें तो भी हम सरकारी अधिकारीको सलाम नहीं करेंगे। जब हमारा झगड़ा खत्म हो जायेगा, नया युग शुरू होगा तब फिरसे धोबी-नाई तथा अन्य कारीगर लोग जनताके सेवकोंकी सेवा करनेके लिए तैयार होंगे। लेकिन लोकतन्त्रीय शासनमें ऊँच-नीच का भेद नहीं होना चाहिए। ब्राह्मण भी भंगीके समान जनताका सेवक होगा।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ३०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|10em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६४
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''११४. सन्देश : महाराष्ट्रको'''}}}}
{{right|आमोद<br>२२ मार्च, १९३०}}
महाराष्ट्रमें दोनों पक्षने इकट्ठे होकर स्वराज्यकी लड़ाईमें हिस्सा लेनेका निश्चय किया है, इससे मुझे बहोत हि आनंद हुआ है। मैं आशा रखता हूं कि इस धर्म-युद्ध में महाराष्ट्र प्रथम स्थान लेगा।
{{Right|'''मोहनदास गांधी'''}}
जी° एन° ९८ की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११५. भेंट : यूसुफ मेहरअलीको'''}}}}
{{right|[आमोद<br>२२ मार्च, १९३०]<ref>• साधन-सूत्रके • अनुसार भेंटकी रिपोर्ट बैंगार्डके २२-३-१९३० के अंक में प्रकाशित हुई थी। गांधीजी २२ मार्चकी • सांझको • आमोद पहुँचे थे।</ref>}}
'''प्रश्न : वर्तमान संघर्षमें आप युवक आन्दोलनसे किस भूमिकाको अपेक्षा रखते हैं?'''
उत्तर : युवक संगठन तो इसमें बहुत कुछ कर सकते हैं। वे सविनय अवज्ञा
अभियानके लिए काफी बड़ी संख्यामें स्वयंसेवक दे सकते हैं। इसके अलावा, वे
स्वतन्त्रताके सन्देशको देशके कोने-कोने में फैलाने में सहायक हो सकते हैं। वे विदेशी
वस्त्रों और शराबकी दुकानोंपर धरना देकर उपयोगी काम कर सकते हैं।
जो युवक इस संघर्षमें सक्रिय रूपसे शामिल होनेमें असमर्थ हैं वे समाज-सुधारके क्षेत्र में, खादी तथा स्वदेशी वस्तुओंको लोकप्रिय बनाने में, मद्य-निषेधका प्रचार करने
आदिमें बहुत अच्छा काम कर सकते हैं।
वास्तवमें इस समय देशके युवकोंसे बड़ी-बड़ी चीजोंकी आशा की जाती है और मुझे इस बात में कोई सन्देह नहीं कि वे अपने-आपको अवसरके सर्वथा योग्य साबित करेंगे।
'''प्रश्न: क्या आप विद्यार्थियोंको स्कूल और कालेज तत्काल छोड़ देनेकी सलाह
देना चाहेंगे?'''
उत्तर : हाँ, मैं तो देना चाहूँगा। मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस बार विद्यार्थियोंसे जो अपेक्षा की जाती है वह १९२१ में की गई अपेक्षासे भिन्न है। उस समय तो विद्यार्थियोंसे सरकारी नियन्त्रणमें चलनेवाली शिक्षण-संस्थाओंको छोड़कर<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : देलाडमें|१६३}}</noinclude>ढेर-से नजर आते हों और जहाँ लोग पानी और अन्नके बिना तरसते हों, यदि कोई
मुझे पैसे दे, तो पहले मैं कुँएँ खुदवाऊँगा और उनके घरोंकी मरम्मत करवाऊँगा, मैं
उन्हें गायें और चरखे दूंंगा और यदि सम्भव हुआ तो बगीचे भी लगवा दूंगा। किन्तु
बत्तियोंके लिए मैं कदापि पैसे इकट्ठे नहीं करूँगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि बत्तियां
न होने की वजहसे सरकारी आंकड़ोंके अनुसार ऐसे गांवोंमें लगभग २० लाख लोग
सांपोंके काटने से मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त न जाने ऐसे कितने लोग मरते होंगे
जो इस संख्या में शामिल नहीं हैं। इन लोगोंके प्राण बचानेके लिए न तो वहाँ दवाइयाँ हैं और न ऐसी बत्तियाँ ही, किन्तु फिर भी मैं चौंधिया देनेवाली ऐसी बत्तियाँ
वहाँ ले जानेकी हिम्मत नहीं करूँगा। यह उन लोगोंकी आवश्यकताओंको बढ़ानेकी बात
हो जायेगी। यह तो उपवास करनेवालेको चूरमा देने जैसा है। यदि एक बार आवश्यकताएँ बढ़ गई तो उन्हें पूरा करनेके लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकता है। जब कि करोड़ों लोगोंको खानेको रोटीका एक टुकड़ा और खराब नमक भी पूरी तरह न मिलता हो तो खाते समय मेरे मनमें यह विचार आता है कि तुझे इतना खाने का क्या अधिकार है। किन्तु मोहवश और सेवा करनेकी आशासे में दूध पीता रहता हूँ।
हमें तो अपने कर्त्तव्यका विचार करना है। हम राक्षसी साम्राज्यसे टक्कर लेना चाहते हैं, किन्तु दुत्कारकर या हल्ला-गुल्ला मचाकर हम ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि
अहिंसात्मक मार्गको अपनाकर ही ऐसा किया जा सकता है। अहिंसा भले अंधी, लूली-लंगड़ी या फटेहाल दिखाई देती हो, किन्तु जब उसमें ईश्वरप्रदत्त शक्ति आकर मिल जाती है तो प्रतिपक्षी उसके सामने हतप्रभ हो जाता है, उसे लकवा मार जाता
है। इसी शक्तिके भरोसे हमें काम करना है और यह बत्तियोंके द्वारा नहीं हो सकता। इन बत्तियों को हटाकर मैने अपने सहयोगियोंको आघात पहुंचाया है। उन्हें ऐसा लगता था कि इन बत्तियोंके बिना लोग परेशान होंगे; किन्तु मेरे विचारसे तो ऐसे सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं थी। अब जो सन्देश मैं दे रहा हूँ यह आपको कठोर नहीं जान पड़ता। बत्तियोंके कारण ऐसा प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता था।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५०. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सुबहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है। 'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था। अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दोंका प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो:"यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया। मैं ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था। अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर' उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५०. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
{{Left|'''दोबारा नहीं पढ़ा'''}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
मैं हर रोज तुम्हारे बारेमें और तुम्हें पत्र लिखनेकी भी सोचता रहा हूँ। लेकिन लिखनेका समय ही नहीं मिल पाता। आज तो सुबहकी प्रार्थनाके बाद तुम्हें लिखनेसे ही दिनका आरम्भ करनेका निश्चय करके बैठा हूँ।
'क्रॉनिकल' में तुम्हारा लेख मुझे अच्छा नहीं लगा। यह अहिंसा नहीं है। 'इंडियन डेली मेल' को तुमने जितना महत्त्व दे दिया, वह उसके योग्य नहीं था। अगर वैसा करना जरूरी था तो तुमने जो तरीका अपनाया वह बुरा था बुरे शब्दोंका प्रयोग करके एक सही मामलेको इस तरह बिगाड़ क्यों देना चाहिए था? और जब किसी अच्छे उद्देश्यको लेकर चल रहे होओ तो उसमें व्यक्तियोंके बचाव या आलोचनाके धरातल पर कभी न उतरो। तुम्हारे मामलेमें बुराईका प्रतिरोध न करो' वाला सिद्धान्त लागू होता है। यहां इसका मतलब है 'बुराईका प्रतिरोध बुराईसे मत करो।' 'इंडियन डेली मेल' के अभद्र लेखके जवाब में अभद्र लेख लिख-कर तुम उसके हलके पलड़ेको बराबरी पर ले आये। तुम्हारा पक्ष सही था, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। 'इंडियन डेली मेल' का लेख एक प्रकारकी हिंसा था। तुमने अपने सही पक्षका समर्थन जवाबी हिंसा द्वारा किया। मैं जिस चीजपर जोर दे रहा हूँ वह मात्र बुरा तौर-तरीका नहीं है। मुझे उसमें समाई हुई हिंसासे परेशानी होती है। बात बिलकुल साफ हुई या नहीं? अगर साफ हो गई हो तो मैं चाहूँगा कि तुम अपने मनमें निश्चय कर लो कि भविष्यमें किसी ऐसे व्यक्तिको दिखाये बिना, जिसकी अहिंसावृत्ति में तुम्हें पूरा विश्वास हो, तुम कहीं भी इस तरहकी कोई चीज नहीं लिखोगे। मैंने जो कुछ कहा है, यदि तुम्हें उसके तात्त्विक सत्यकी प्रतीति हो गई हो तो तुम विलसनसे क्षमा माँगकर इस भूलका कमसे कम आंशिक सुधार अवश्य कर लोगे। इसके लिए तुम निम्न प्रकारका व्यक्तिगत पत्र लिख सकते हो:"यद्यपि मैं आपके आरोपों और व्यंग्गोक्तियोंको गलत मानता हूँ, फिर भी मुझे लगता है कि मुझे आपके लिए वैसे शब्दोंका प्रयोग नहीं करना चाहिए था जैसे शब्दोंका प्रयोग मैने किया। मैं ईसा मसीहके रास्तेपर चलना चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा वह व्यवहार उनके अनुगामीक योग्य व्यवहार नहीं था। मुझे आपके बारेमें फतवा देनेका कोई अधिकार नहीं था। अगर आप इस आशयकी एक पंक्ति
१. रेजिर्नोल्ड रेनाने गांधीजी पर किये गये बहुत ही धृष्टतापूर्ण आक्षेपोंसे 'क्षुब्ध होकर' उसका उत्तर लिखा था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल में सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है।
मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल मैं सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है।
मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|१६५}}</noinclude>लिख भेजें कि आपने मेरी क्षमा-याचना स्वीकार कर ली है तो मेरे मनका बोझ
कुछ हलका हो जायेगा।"१
तुमने कर्त्तव्यकी पुकारपर अपने सिर एक बहुत बड़ा काम लिया है। मैं
नहीं चाहता कि अपने इस नये जीवनकी दहलीज पर ही तुम इस कामको हानि
पहुँचाओ।
'यंग इंडिया' में लिखे तुम्हारे लेखमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं थी।
अगर मेरी दलील तुम्हें कायल नहीं कर पाती तब तो कहने की जरूरत नहीं
कि तुम उसी रास्तेपर चलो जिसपर चलना तुमने अभी शुरू किया है। मैं जानता
हूँ कि तुम अपना भला-बुरा सोचने में स्वयं ही पूरी तरह समर्थ हो। मुझे तो बस
उस सिद्धान्तको साफ कर देनेकी चिन्ता थी जिसके हम दोनों कायल हैं।
कैसा चल रहा है तुम्हारा? तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक तो है? और तुमको जिन
चीजोंकी जरूरत है उन्हें लेते रहनेका आग्रह रखते हो न?
यह जो तुम्हारी सगाई वगैरह के बारेमें खबर है सो क्या है? क्या यह सब
सच है? तुम्हारी माँ की कही बात उसमें ठीक आ जाती है क्या?
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३२ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|'''१५१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{Right|देलाड}}
{{Right|३१ मार्च, १९३०}}
प्रिय जवाहरलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने तार नहीं दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि दांडीमें कोई पठान हैं, और होंगे तो हम उनसे निबट लेंगे। सरहदसे अच्छे और सच्चे मित्रोंके आनेसे भी उलझनें पैदा होंगी। मुझे दाँडी पहुँचने दिया गया तो वहाँ जिन उलझनोंसे बचा जा सकता है उनसे बचते हुए सिर्फ एक ही सवाल मैं सामने रखना चाहता हूँ। सचमुच गुजरातमें घटनाक्रम बहुत ठीक रास्तेसे चलता जान पड़ रहा है।
मुझे आश्चर्य है कि रायबरेलीमें इन लोगोंने अभीसे इतनी गिरफ्तारियां कर ली हैं। मेरे खयालसे फिलहाल नमक कर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखकर तुम
१. रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सने विलसनको एक क्षमा-याचनाका पत्र भेज कर गांधीजी को इसकी सूचना दे दी थी; देखिए पत्र रेजिनाल्ड रेनल्ड्सको, ४-४-१९३० भी।
२. २७ मार्च, १९३० के अंक प्रकाशित " मॉडर्न इंग्लिश माइयॉजी " शीर्षक लेख।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०८
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठीक कर रहे हो। अगले पखवाड़ेमें हमें पता चल जायेगा कि हम और क्या कर
सकते हैं या हमें और क्या करना चाहिए।
मेरी तरफसे और कोई समाचार न मिले तो एक साथ सब जगह आन्दोलन
शुरू कर देनेके लिए ६ अप्रैलका दिन समझ लो।
अब रातके दस वजनेवाले हैं, इसलिए राम-राम।
{{Right|बापू}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स'''
{{C|{{larger|'''१५२. भाषण: छापरभाठामें'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
मुझसे रोज सब लोग कहते हैं कि आज तो आपको अवश्य पकड़ लिया जायेगा। किन्तु बाघ आता ही नहीं है। समाचारपत्रोंका कहना है कि सरकार मुझे पकड़ नहीं रही है; अतः मैं अधीर हो उठा हूँ। यह बात आंशिक रूपसे ही सत्य है। क्योंकि यह तय हुआ था कि मैं जेलमें रहूँगा और सरदार बाहर रहेंगे। किन्तु अब तो सरदार जेलमें हैं; इसलिए मैं बाहर रहूँगा। यदि हम वल्लभभाईको कैदसे मुक्त कराना चाहते हों तो इस लड़ाईको जारी रखकर ही हम उन्हें छुड़ा सकते हैं।
चोर्यासीने सरदारकी पिछली लड़ाईका पूरा फायदा उठाया है, अतः [चोर्यासीके]
आप लोगोंको इस संघर्षमें पूरा योग देना चाहिए। स्वराज्यकी वर्षा तो सभी जगह
एक-सी ही होगी। ऐसा ही प्रबन्ध सरकारने भी आपके लिए कर दिया है। सरदारको
छुड़ा लेनेकी शक्ति तो हममें है ही। यदि हम निश्चय कर लें और सभी गांवों पर
एक उड़ती-सी नजर डालें तो यह कहा जा सकता है कि स्वराज्य आने ही वाला
है। किन्तु मैं अपनेको ही धोखा देनेवाले व्यक्तियोंमें से नहीं हूँ। आजकल तो मैं
पूरे वातावरणको परखता रहता हूँ।
यहाँ चरखेके बारेमें पूछताछ करनेपर पता चला कि गांवमें तो कुल जमा एक ही चरखा है। यदि बात ऐसी हो तब तो हम सरदारको नहीं छुड़ा सकेंगे। हमें हर दिशामें आगे बढ़ना है। आजकल तो हम नमक-कानून रद करवाने निकले हैं। हम लोग जगह-जगह नमक बनायेंगे और इस प्रकार सरकारको थका देंगे। किन्तु यह सब तो तभी हो सकता है जब कि आप इस सूत्रको कि 'सूतके धागे में स्वराज्य है' अपने व्यवहारमें परिणत कर दिखायें। जब ३० करोड़ लोग खादी पहनने लगेंगे और गांवोंकी समस्याओंको ध्यान में रखते हुए स्वराज्यके सभी अंगोंको विकसित करेंगे तभी यह बात सही सिद्ध होगी कि स्वराज्य लेना सहज है। यदि हम इस सहज-सरल धर्मका पालन करने लगें तो स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें ही रखा हुआ है।
आप इस बातपर विचार करें कि कीम नदीपर रातों-रात पुल कैसे बन गया था?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२०९
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६७}}</noinclude>इस प्रकार यदि लोग अपनी सामर्थ्य-भर काम करने लगें तो स्वराज्य प्राप्त करना
सहज है। अहमदाबाद और बम्बईके सेठ भी यहाँ आये हुए हैं और ये खुले हाथों
पैसा दे रहे हैं, इसके लिए मैं उन सबका आभारी हूँ। इस कार्यमें सभी लोगोंसे
सहायता मिल रही है, इससे मुझे लगता है कि इसमें ईश्वरका हाथ है।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१५३. भाषण: सूरत में'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
कुछ-न-कुछ दुःख, कोई-न-कोई कष्ट सहना तो हमारे लिए अनिवार्य ही है। और
इसके लिए हमने नमक-कानूनको ढूंढ निकाला है या फिर आप यह कह सकते हैं कि ईश्वरने हमारे लिए नमक कानून भिजवाया है। उक्त कर बिलकुल ही वर्वर और दानवी है; नमककी मारफत सरकार बच्चों और बूढ़ोंसे भी यह कर उगाहती है। इस साम्राज्यके ऐसे दस्तावेज मैंने पढ़े हैं जिनमें इस बातपर जोर दिया गया है। कि शासनका प्रबन्ध चलानेवाले लोगोंको ऐसे उपाय अवश्य ही खोज निकालने चाहिए जिनके द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्तिसे कर वसूल किया जा सके। मैंने इस्लाम और
हिन्दू धर्मके ग्रन्थ उलटाये हैं; ईसाइयोंके धर्म ग्रन्थ भी मैंने देखे हैं और जरथुस्त्र के
धर्म-ग्रन्थ भी मैं पढ़ गया हूँ। इन सभीमें यह बताया गया है कि स्त्रियों और निर्धनोंपर
कभी कर नहीं लगाना चाहिए। यदि हम युद्धके नियमों को पढ़ें तो उनमें कहा गया
है कि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों, इन सबको लड़ाईके पंजेसे अलग रखना चाहिए।
यही बात इस करके बारेमें लागू होती है। मुसलमान हिन्दू, पारसी सभी नमक तो
समान अनुपात में ही खाते हैं सरकारने सबको एक ही इंडेसे हाँकनेकी युक्ति खोज
निकाली है। यह शैतानी इन्साफ है, राक्षसी न्याय है।
मैंने दुनियामें और कहीं ऐसे न्यायकी बात नहीं सुनी। न्यायके ऐसे स्वरूपको मैं राक्षसी न्याय, शैतानी इन्साफ कहूँगा। जो साम्राज्य ऐसा न्याय करता है उसे सलामी देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। जो व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्तमें भगवान्की आराधना करता है वह ऐसे साम्राज्यकी कल्याण-कामनाके लिए न तो भगवान्से प्रार्थना कर सकता है, न उसे करनी ही चाहिए। बल्कि प्रार्थना या नमाजके वक्त भगवान् या खुदासे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान्, ऐसे राक्षसी साम्राज्य, ऐसी शैतानी सल्तनतका नाश हो। इस प्रकार नाशकी कामना करना धर्म है। हालांकि पिछले बीस दिनोंसे मैं यह बात खुलेआम कहता रहा हूँ, किन्तु सरकारने मुझे और मेरे साथियोंको खुला छोड़ रखा है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सरकारकी यह एक अपनी खूबी है। मैं आजतक इसे राक्षसी साम्राज्य तो कहता आया हूँ किन्तु इसके बावजूद मैंने इससे भी इनकार नहीं किया कि सरकारके पास शक्ति है; मैंने एक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६७}}</noinclude>इस प्रकार यदि लोग अपनी सामर्थ्य-भर काम करने लगें तो स्वराज्य प्राप्त करना
सहज है। अहमदाबाद और बम्बईके सेठ भी यहाँ आये हुए हैं और ये खुले हाथों
पैसा दे रहे हैं, इसके लिए मैं उन सबका आभारी हूँ। इस कार्यमें सभी लोगोंसे
सहायता मिल रही है, इससे मुझे लगता है कि इसमें ईश्वरका हाथ है।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१५३. भाषण: सूरत में'''}}}}
{{Right|१ अप्रैल, १९३०}}
कुछ-न-कुछ दुःख, कोई-न-कोई कष्ट सहना तो हमारे लिए अनिवार्य ही है। और
इसके लिए हमने नमक-कानूनको ढूंढ निकाला है या फिर आप यह कह सकते हैं कि ईश्वरने हमारे लिए नमक कानून भिजवाया है। उक्त कर बिलकुल ही वर्वर और दानवी है; नमककी मारफत सरकार बच्चों और बूढ़ोंसे भी यह कर उगाहती है। इस साम्राज्यके ऐसे दस्तावेज मैंने पढ़े हैं जिनमें इस बातपर जोर दिया गया है। कि शासनका प्रबन्ध चलानेवाले लोगोंको ऐसे उपाय अवश्य ही खोज निकालने चाहिए जिनके द्वारा समाजके प्रत्येक व्यक्तिसे कर वसूल किया जा सके। मैंने इस्लाम और
हिन्दू धर्मके ग्रन्थ उलटाये हैं; ईसाइयोंके धर्म ग्रन्थ भी मैंने देखे हैं और जरथुस्त्र के
धर्म-ग्रन्थ भी मैं पढ़ गया हूँ। इन सभीमें यह बताया गया है कि स्त्रियों और निर्धनोंपर
कभी कर नहीं लगाना चाहिए। यदि हम युद्धके नियमों को पढ़ें तो उनमें कहा गया
है कि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों, इन सबको लड़ाईके पंजेसे अलग रखना चाहिए।
यही बात इस करके बारेमें लागू होती है। मुसलमान हिन्दू, पारसी सभी नमक तो
समान अनुपात में ही खाते हैं सरकारने सबको एक ही इंडेसे हाँकनेकी युक्ति खोज
निकाली है। यह शैतानी इन्साफ है, राक्षसी न्याय है।
मैंने दुनियामें और कहीं ऐसे न्यायकी बात नहीं सुनी। न्यायके ऐसे स्वरूपको मैं राक्षसी न्याय, शैतानी इन्साफ कहूँगा। जो साम्राज्य ऐसा न्याय करता है उसे सलामी देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। जो व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्तमें भगवान्की आराधना करता है वह ऐसे साम्राज्यकी कल्याण-कामनाके लिए न तो भगवान्से प्रार्थना कर सकता है, न उसे करनी ही चाहिए। बल्कि प्रार्थना या नमाजके वक्त भगवान् या खुदासे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान्, ऐसे राक्षसी साम्राज्य, ऐसी शैतानी सल्तनतका नाश हो। इस प्रकार नाशकी कामना करना धर्म है। हालांकि पिछले बीस दिनोंसे मैं यह बात खुलेआम कहता रहा हूँ, किन्तु सरकारने मुझे और मेरे साथियोंको खुला छोड़ रखा है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सरकारकी यह एक अपनी खूबी है। मैं आजतक इसे राक्षसी साम्राज्य तो कहता आया हूँ किन्तु इसके बावजूद मैंने इससे भी इनकार नहीं किया कि सरकारके पास शक्ति है; मैंने एक<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१०
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्षणके लिए भी यह नहीं माना कि इस सरकार के पास सत्ता या शक्ति नहीं हैं। इस
सरकारके पास फौज है, गोला-बारूद है और वह मुझ जैसोंको चुटकी में मसल सकती है। किन्तु यह सरकार एकाएक अपनी मर्यादाका उल्लंघन नहीं कर सकती। क्योंकि फिर वह दुनियाको अपना मुँह कैसे दिखायेगी! इस सरकारको जालिम कहनेके सिवा मैने या मेरे साथियों अथवा मेरे सम्पर्क में आनेवाले हजारों लोगों में से किसीने स्वप्न में भी ऐसी कामना नहीं की कि इसके सम्राट् अथवा किसी अधिकारीका नाश हो। हमारा यह रुख इस सरकारको एक सर्वथा नई चीज जान पड़ती है और वह आगे
कदम नहीं बढ़ा सकती।
ठीक रवाना होनेके दिन साबरमतीके तटपर जो बात मैंने कही थी वही बात मैं आज ताप्तीके तीर पर आपसे कहना चाहता हूँ । यदि हमने यह कहा होता कि हम एक कोई छोटी कंकड़ी भी अधिकारियों पर फेंकेंगे तो क्या यह सरकार हममें से किसीको बाहर छोड़नेवाली थी? कुछ लोग कहते हैं कि मुझे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। गिरफ्तार हो जानेको मैं अपना धर्म नहीं मानता, किन्तु मैं गिरफ्तार होनेसे डरता भी नहीं हूँ और आप सब भी न डरें, यह मन्त्र मैं आपको दे रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए चाहे आपको गिरफ्तार किया जाये या फॉसीपर लटकाया जाये तो भी आप न डरें मैं जेलको महल बना देना चाहता हूँ। यदि मुझे केवल जेल जाना होता तो मैं चोरी करता, बदमाशी करता, मारपीट और गाली-गलौज करता। उस हालत में मुझे अवश्य पकड़ लिया जाता, कोई नहीं छोड़ता। उस समय सरकार यह नहीं कहती कि अब यह आदमी महात्मा नहीं रहा, महात्मा तो मर चुका है इसलिए हम इसे नहीं पकड़ेंगे और आज यदि सरकार मुझे पकड़ ले तो मैं जेलमें पड़े हुए भी प्रार्थना करूंगा कि हे भगवान्, तू इस सरकारका हृदय परिवर्तन कर और मनुष्यको शोभा न देनेवाली जो भावनाएँ इसके हृदयमें आ गई हैं उन्हें निकाल दे! किसी-न-किसी दिन मुझे पकड़ लेनेके अतिरिक्त सरकारके सामने और कोई चारा नहीं है; और यदि यह मुझे नहीं पकड़ती तो कुछ ही समय में सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मुझे बाहर रहने देना या जेल में बन्द करना दोनों ही बातें इसके लिए कठिन है। हिन्दू, मुसलमान, पारसी सभीको अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। यदि हम सब ऐसा करने लगें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सरकारके बसकी बात नहीं होगी।
फिर गिरफ्तारियां एक मामूली बात रह जायेगी। कानून कायदे टूटते ही चले जायेंगे आज एक, कल दूसरा और कायदे-कानून टूटे नहीं कि फिर सल्तनत कहाँ रही? पटेल और तलाटियोंको इस्तीफे दे देने चाहिए। उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए कि रोटी-रिज़्क देनेवाला तो ईश्वर है। तलाटीगिरीमें ३७ रु० मिलें या न मिलें, उससे क्या होता है? मिलके मजदूर जिनमें से मैं भी एक हूं--- ५० रुपये कमाते हैं और इतनेपर भी वे मिल मालिकोंको डरा सकते हैं, हड़ताल करते हैं और मिलमालिकोंको उन्हें सन्तुष्ट करना पड़ता है। क्योंकि मजदूरोंके बिना वे काम नहीं चला सकते। यदि कोई तलाटी मिलमें जाकर वफादारीसे नौकरी करे तो वह ५० रुपये<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२११
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६९}}</noinclude>कमा सकता है और यदि अच्छा काम करके दिखाये तो इससे ज्यादा भी पा सकता
है। ३७ रुपये तो वह बहुत आसानीसे कमा ले सकता है। वह अपंग हो और सिर्फ
सूत काते तो भी उसे कुछ पैसे मिलेंगे। जो आदमी मजूरी करने को तैयार हो उसे रोजी कमानेमें कितनी देर लगती है? इस प्रकार जब तलाटी और सरकारी कर्मचारी
भय मुक्त हो जायेंगे तो फिर सरकार क्या करेगी? क्या इंग्लंडसे फौज लाकर सिपाहियोंको पटेलों और तलाटियोंका काम सौंपेगी? जब हिन्दू, मुसलमान, पारसी आदि सभी लोग इनकार कर देंगे तो सरकार क्या करेगी? वह कुछ नहीं कर सकेगी। इसकी एक-एक नस ढीली पड़ जायेगी। इस प्रकार बिना मेहनत और किसी भी व्यक्तिके जेल गये बिना स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें होगा। किन्तु यह सब मैं किसे सिखाऊँ?
आपको खादी मोटी और महँगी जान पड़ती है। आप अपने अंगों का प्रदर्शन करना चाहते हैं, जब कि मैं उनको ढकना चाहता हूँ। कपड़े पहननेके बावजूद स्वयंको नंगा दिखाना आज हम लोगों में रूढ़ हो गया है। यह अमानवीय चलन है; नंगे दिखते रहना इसी सल्तनतमें उचित माना जाता है। कपड़े शरीरको कनेके लिए पहने जाते हैं, यदि आपको नंगे ही रहना है तो कपड़े क्यों पहनते हैं? इस सल्तनत-में नंगा दिखना गुनाह नहीं माना जाता। आप उस तरह घूम-फिर सकते हैं। यदि शरीरको बैंकनेके लिए ही कपड़े पहने जाते हों तो फिर खादीसे अच्छी और कौन-सी चीज मैं आपको दे सकता हूँ? आप कोई और चीज क्यों चाहते हैं? आपकी जिन मां-बहनोंको खानेको नहीं मिलता और जो सूत वे घर बैठकर कातती हैं, उससे बुना हुआ कपड़ा पहनते आपको शर्म आती है।
आज आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके अपने कर्त्तव्यको समझ लें। क्योंकि जब
तक हम जापानी कपड़ेका व्यवहार करते रहेंगे तबतक इंग्लैंडमें बने कपड़ेका बहिष्कार करना असम्भव है। यदि हम ऐसा करेंगे तो दोनों बातें नहीं सधेगी -- हम
अंग्रेजी मालका बहिष्कार नहीं कर पायेंगे और इंग्लैंडके बदले जापान हमपर शासन
करने लगेगा। इतने पर भी आप कह सकते हैं कि मिलके बने कपड़ोंका व्यवहार
करके इन दोनों देशोंके कपड़ेका बहिष्कार किया जा सकता है। मिलें तो आज ५० वर्षसे चल रही हैं, फिर बहिष्कार क्यों नहीं हो सका? मैं चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा
हूँ कि खादी विना बहिष्कार करना असम्भव है। खादी और कपड़ेकी मिलोंके सहयोगसे आप बहिष्कार कर सकते हैं। किन्तु आज इस युगमें मिलोंके भरोसे बहिष्कार कर पाना असम्भव । सौ-पचास वर्ष बाद कर सकें तो अलग बात है। यदि आप लड़कर
या खून-खराबी करके ऐसा करना चाहते हों तो उस सम्बन्धमें में कुछ नहीं जानता,
यह बात मेरी समझ से परे है, उसे में त्याग चुका । सूरतकी बहनें यदि मीठूबहनकी
मदद करें तो देखते-देखते जिलेमें शराबबन्दी हो जाये। और फिर इस धन्धे में क्या
सार है? ठेकेदार लोग शरावके धन्येके बदले कोई और काम करके पैसा पैदा कर
सकते हैं।
हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, किन्तु मैने निश्चय कर लिया है कि या तो मैं सविनय अवज्ञा करते हुए मर जाऊँगा या स्वराज्य प्राप्त करूँगा। इसलिए मैंने इन<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : सूरत में|१६९}}</noinclude>कमा सकता है और यदि अच्छा काम करके दिखाये तो इससे ज्यादा भी पा सकता
है। ३७ रुपये तो वह बहुत आसानीसे कमा ले सकता है। वह अपंग हो और सिर्फ
सूत काते तो भी उसे कुछ पैसे मिलेंगे। जो आदमी मजूरी करने को तैयार हो उसे रोजी कमानेमें कितनी देर लगती है? इस प्रकार जब तलाटी और सरकारी कर्मचारी
भय मुक्त हो जायेंगे तो फिर सरकार क्या करेगी? क्या इंग्लंडसे फौज लाकर सिपाहियोंको पटेलों और तलाटियोंका काम सौंपेगी? जब हिन्दू, मुसलमान, पारसी आदि सभी लोग इनकार कर देंगे तो सरकार क्या करेगी? वह कुछ नहीं कर सकेगी। इसकी एक-एक नस ढीली पड़ जायेगी। इस प्रकार बिना मेहनत और किसी भी व्यक्तिके जेल गये बिना स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें होगा। किन्तु यह सब मैं किसे सिखाऊँ?
आपको खादी मोटी और महँगी जान पड़ती है। आप अपने अंगों का प्रदर्शन करना चाहते हैं, जब कि मैं उनको ढकना चाहता हूँ। कपड़े पहननेके बावजूद स्वयंको नंगा दिखाना आज हम लोगों में रूढ़ हो गया है। यह अमानवीय चलन है; नंगे दिखते रहना इसी सल्तनतमें उचित माना जाता है। कपड़े शरीरको ढंकनेके लिए पहने जाते हैं, यदि आपको नंगे ही रहना है तो कपड़े क्यों पहनते हैं? इस सल्तनत-में नंगा दिखना गुनाह नहीं माना जाता। आप उस तरह घूम-फिर सकते हैं। यदि शरीरको ढंकनेके लिए ही कपड़े पहने जाते हों तो फिर खादीसे अच्छी और कौन-सी चीज मैं आपको दे सकता हूँ? आप कोई और चीज क्यों चाहते हैं? आपकी जिन मां-बहनोंको खानेको नहीं मिलता और जो सूत वे घर बैठकर कातती हैं, उससे बुना हुआ कपड़ा पहनते आपको शर्म आती है।
आज आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके अपने कर्त्तव्यको समझ लें। क्योंकि जब तक हम जापानी कपड़ेका व्यवहार करते रहेंगे तबतक इंग्लैंडमें बने कपड़ेका बहिष्कार करना असम्भव है। यदि हम ऐसा करेंगे तो दोनों बातें नहीं सधेगी -- हम अंग्रेजी मालका बहिष्कार नहीं कर पायेंगे और इंग्लैंडके बदले जापान हमपर शासन करने लगेगा। इतने पर भी आप कह सकते हैं कि मिलके बने कपड़ोंका व्यवहार करके इन दोनों देशोंके कपड़ेका बहिष्कार किया जा सकता है। मिलें तो आज ५० वर्षसे चल रही हैं, फिर बहिष्कार क्यों नहीं हो सका? मैं चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा हूँ कि खादी बिना बहिष्कार करना असम्भव है। खादी और कपड़ेकी मिलोंके सहयोगसे आप बहिष्कार कर सकते हैं। किन्तु आज इस युगमें मिलोंके भरोसे बहिष्कार कर पाना असम्भव हैं। सौ-पचास वर्ष बाद कर सकें तो अलग बात है। यदि आप लड़कर या खून-खराबी करके ऐसा करना चाहते हों तो उस सम्बन्धमें में कुछ नहीं जानता, यह बात मेरी समझ से परे है, उसे मैं त्याग चुका । सूरतकी बहनें यदि मीठूबहनकी मदद करें तो देखते-देखते जिलेमें शराबबन्दी हो जाये। और फिर इस धन्धे में क्या सार है? ठेकेदार लोग शरावके धन्धेके बदले कोई और काम करके पैसा पैदा कर सकते हैं।
हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, किन्तु मैने निश्चय कर लिया है कि या तो मैं सविनय अवज्ञा करते हुए मर जाऊँगा या स्वराज्य प्राप्त करूँगा। इसलिए मैंने इन<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सब लोगोंको बुलाया और चल पड़ा। यदि मैं कलतक जीवित रहा तो यहाँसे
आपका आशीर्वाद लेकर रवाना होऊँगा। जो मेरे साथ चलने को तैयार हों उन्हें मैं
निमन्त्रित करता हूँ।
ईश्वरका अनुग्रह है कि फिलहाल यहाँ हिन्दू-मुसलमानोंमें मेल है और ये लड़ नहीं रहे हैं। मुझे यह डर था कि मैं लड़ाईसे ऊब गया हूँ, इसलिए जहाँ ये दोनों कौमें लड़ती हों यहां मैं नहीं जाऊँगा और यदि जाऊँगा तो मर जाऊँगा। अतः मैंने कार्यकर्त्ताओंको लिखा कि वे मुझे इस शहरमें ले जाकर मारें नहीं; बल्कि मुझे दांडी पहुँच जाने दें। किन्तु मुझे यह बताया गया कि फिलहाल दोनोंमें मेल-मिलाप-सा हो गया है और आपस में लड़ाई-झगड़ा नहीं है। किन्तु मैं यह नहीं मानता कि यहाँके हिन्दू-मुसलमान एक हो गये हैं। एक क्षणके लिए भी हमारे हृदयोंमें एक-दूसरेके प्रति दुर्भावना, अविश्वास या डर क्यों होना चाहिए? क्या वर्तमान सरकार-से भी ज्यादा बुरी कोई सरकार आनेवाली है ? इस देशमें तो लगभग १ लाख अधिकारी होंगे। बाकी २९ करोड ९९ लाखका आप क्या करेंगे? आप उनके बारेमें किस तरह सोचेंगे? आप किसलिए आपसमें लड़-मर रहे हैं? विधानसभा में मुसलमानों,पारसियों, ईसाइयों आदि सबको स्थान देनेके बाद यदि कोई स्थान बचे तो मुझे दे देना। यदि हम नमकहराम न होकर नमकहलाल बन जायें तो इस नमक-करको आप रद हुआ ही मानें गरीब, दीन मुसलमान भी तो इसके शिकार हैं। इसके रद हो जानेके बाद हम आपस में लड़ लेंगे। हिन्दू-मुसलमानोंके धर्मग्रन्थोंमें शराबको हराम माना गया है। जरथुस्त्र के अनुयायी अपने धर्मके फरमानोंको भली-भांति नहीं पढ़ते। उनमें शराबके बारेमें क्या कहा गया है, उसे वे पढ़ लें।
आप मुझे आशीर्वाद दें और खुदासे यह माँगें कि यह व्यक्ति जो कुछ लेने जा रहा है वह उसे मिल जाये। नमक-फानून रद हो जानेके बाद अपने झगड़ोंक फैसला करनेकी बात तय कीजिए। यदि आप इतना भी कर लें तो हममें कितनी शक्ति आ जायेगी! इस कर के रद होनेपर हमें ६ करोड़ रुपयेकी बचत होगी। और फिर शराबके २५ करोड़ तथा विदेशी कपड़े ६० करोड़, इस प्रकार कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये होते हैं; इनकी भेंट यदि आप लेना चाहें तो ले लें। और यदि न लेना चाहें तो मैं आपसे पूछताछ नहीं करूँगा; किन्तु खुदा आपसे जरूर पूछेगा। भगवान् आपको यह समझने और तदनुसार काम करनेकी ताकत दे!
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१३
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{Right|बुधवार [२ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० गंगाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम अच्छा काम कर रही हो। अपनी बहनकी खातिर तुम्हें बम्बई जाना ही पड़े, तो चली जाना। किन्तु जानेकी बातके बारेमें यह सोचना चाहिए कि ऐसे प्रसंग तो आते ही रहेंगे। तुम और मैं ऐसे कामोंके योग्य नहीं रह गये हैं। हम दो काम एक साथ नहीं कर सकते। जब ऐसा संकट आ पड़े तब नाथजी से पूछ लेना। मैं तो आज हूँ और कल नहीं।
मैं कब गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा, सो नहीं कहा जा सकता। अफवाहें तो यहाँ भी उड़ती ही रहती हैं। अहिंसाका प्रभाव ही इतना है कि सरकारकी मुझे पकड़ने की हिम्मत ही नहीं होती।
तुम्हारी तबीयत ठीक रहे तो मैं आग्रह नहीं करूँगा कि तुम्हें फल लेने ही चाहिए।
मैं यह पत्र तुम्हें सवेरेकी प्रार्थनाके पूर्व लिख रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४४ ) से।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|{{larger|'''१५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{Right|२ अप्रैल, १९३०}}
चि० प्रेमा,
तेरा पूर्ण पत्र मिला है। उसमें मेरे पत्रको पहुँच नहीं है। लेकिन मैं मान लेता हूँ कि वह तुझे मिल गया है।
मुझे पेंजीका फूल२ मिला तो नहीं, लेकिन ऐसा ही मानता हूँ कि मिल गया। प्रेमसे फूलके पौधे लगाने में उनका देना भी शामिल है। फूलको भौतिक रूपमें देना तो कृत्रिमता है।
'''१. बापुना पत्री - ६ : गं० स्व० गंगावहेननेमें''' १ अप्रैल तारीख दी गई है उस दिन मंगलवार था।
२. आश्रम में गांधीजी जिस स्थानपर सोते थे वहाँ प्रेमावहन कंटकने पंजीके कुछ पौधे लगाये थे। गांधीजी दांडी कूच आरम्भ करनेके बाद उनमें फूल आये।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१४
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>क्या तू बच्चोंको पीटती है? मीराबहनका मीठा उलाहना है।
आशा है तू अपनी तबीयतका ध्यान रखती होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६६७) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : प्रेमावहन कंटक
{{C|{{larger|'''१५६. भाषण : डिंडोलीमें'''}}}}
{{Right|२ अप्रैल, १९३०}}
खबर मिली थी कि कांग्रेसके कार्यकर्त्ताओंको यहां ठहरने भी देंगे या नहीं,
इसमें सन्देह है। किन्तु मैं बताना चाहता हूँ कि अब तक सभी स्थानों पर हमारा
उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है। इस गाँवके दोनों दलोंने मिलकर हमारी बहुत
अच्छी व्यवस्था की और वैसा ही भावभीना स्वागत भी किया।
इस लड़ाईके पीछे तो ईश्वरका हाथ है। अतः ऐसा दिखाई देता है कि आपसी
दुश्मनी खत्म हो गई है और सभी आपस में मित्र बन गये हैं। यह ईश्वर या खुदाकी
मेहरबानी है। प्रिवी काउंसिल (सर्वोच्च न्यायालय) में तो पुश्तों तक झगड़ोंका फैसला नहीं हो पाता। आप इस फन्देसे निकल आयें। हम यह लड़ाई उन लोगोंके विरुद्ध लड़ रहे हैं जो दूसरोंके कन्थोंपर सवार हैं। गोरे लोगोंने हमारे करोड़ों कन्धोंपर बोझ लाद रखा है; हमें उससे मुक्त होना है। किन्तु उससे भी पहले हमें गरीबोंके कन्धों परसे उतर जाना है। यदि कोई यह कहे कि नमक कर उठ जानेपर सरकार नहीं चलेगी तो उन लोगोंसे मैं कहूंगा कि वे नमकहराम हैं। कर घट जानेपर नमककी खपत बढ़ जायेगी। इस बातको ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि इस कर के कारण गरीबोंपर अधिकतम भार पड़ता है। पुराने जमाने में तो गरीबोंको कपड़ा भी मिला करता था। और असलमें गाँवके मजदूरोंको मजदूरीके बदलेमें सब कुछ मिलता था। फिर भी सरकार चाहे जितनी कोशिश करे लेकिन क्या वह सचमुच खादीकी अपेक्षा विदेशी गायोंको' सस्ता बना सकती?
मुझे जो दूसरी खबर मिली है, उसके लिए मैं यहाँके पटेलको धन्यवाद देता हूँ। और उस गाँवको भी धन्यवाद देता हूँ जिस गाँवमें ऐसे बहादुर पटेल हैं। अबतक जिन लोगोंने इस्तीफे नहीं दिये हैं, उन्हें भी दे देने चाहिए और अपने मनसे सरकारका भय निकाल देना चाहिए। मुझे तो इस बातका आश्चर्य है कि मुझ जैसा व्यक्ति जो एक छोटी-सी लाठी भी नहीं तान सकता, इतने बड़े साम्राज्यको कैसे हिला पायेगा। किन्तु यदि आपके हृदयमें राम बसता हो तो इस एक साम्राज्यकी तो बात ही क्या इससे भी बड़े बीस साम्राज्योंको हिला देना
१. पींजी हुई रुई भरकर या उसको जमाकर बनाये गये रजाई,गद्दे, नमदे-जैसे वस्त्र।<noinclude></noinclude>
d92v1ucicvk3zhvho80gx498803hr31
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१५
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७३}}</noinclude>सहज होगा। जैसे बुढ़िया चरखा चलाकर पवित्र पैसे कमाती है वैसे ही आप भी
पवित्र पैसे कमायें।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|'''१५७. टिप्पणियाँ'''}}
{{C|''''मुझे नहीं मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा''''}}
रोज-रोज जो बहुत सारी जानकारी मिल रही हैं, उससे प्रकट होता है कि नमक-
कर की योजना कितनी दुष्टतापूर्वक बनाई गई है। जिस नमकसे कर -- जो कभी-कभी नमककी कीमतसे चौदह गुना अधिक होता है- नहीं मिलता उसका उपयोग किसीको न करने देनेके इस उद्देश्यसे सरकार जितना नमक लाभपूर्वक नहीं बेच सकती उतनेको नष्ट कर देती है। इस प्रकार, यह राष्ट्रके लिए इस अत्यन्त आवश्यक वस्तुपर कर लगाती है, लोगोंको इसे तैयार करनेसे रोकती है और मानव श्रमके बिना प्राकृतिक
ढंगसे जो नमक तैयार हो जाता है उसे नष्ट कर देती है । "मुझे न मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा' वाली इस नीतिका वर्णन करनेके लिए चाहे जिस विशेषणका
प्रयोग किया जाये, वह कम ही कड़ा पड़ेगा। विभिन्न सूत्रोंसे मुझे भारतके सभी हिस्सों में इस प्रकार मनमाने ढंगसे राष्ट्रीय सम्पत्तिके नष्ट किये जानेके किस्से सुननेको मिल
रहे है। कोंकण तट पर टनों नहीं तो कमसे कम मनों नमक बरबाद किये जानेकी
खबर मिली है। ऐसी ही खबर दांडीसे भी मिली है। जहां कहीं ऐसी सम्भावना
है कि ऐसे क्षेत्रोंके आसपास रहनेवाले लोग प्रकृति प्रदत्त नमक अपने निजी उपयोगके
लिए उठा ले जा सकते हैं, वहाँ सिर्फ नमकको बरबाद करनेके कामके लिए ही नमक-अधिकारी तैनात कर दिये गये हैं। इस प्रकार राष्ट्र के खर्चपर मूल्यवान राष्ट्रीय
सम्पतिको नष्ट किया जाता है और लोगोंके मुँहसे नमक छीना जाता है।
और सारा किस्सा इतना ही नहीं है। ओलपाड ताल्लुकेमें प्रवेश करनेपर मुझे बताया गया कि गरीब लोगोंको प्रकृति द्वारा तैयार किया गया नमक इकट्ठा करने या खुद ही नमक बनानेसे रोककर उनके पास चरखेके अलावा जो एक और सहायक धन्धा है, उससे उन्हें वंचित किया जा रहा है।
इस प्रकार नमक एकाधिकार एक चौमुखी अभिशाप है। यह जनताको एक महत्त्वपूर्ण और सुगम ग्रामीण उद्योगसे वंचित करता है प्रकृति द्वारा प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत की गई संपदाको मनमाने ढंगसे नष्ट करता है, इसे नष्ट करनेमें भी राष्ट्रका धन बरबाद होता है और फिर इन तमाम बुराइयोंके ऊपरसे क्षुधातं जनसाधारणसे हजार प्रतिशतसे भी अधिकके हिसाब से एक ऐसा कर वसूल किया जाता है, जिसकी अन्यत्र कोई मिसाल नहीं मिलती।
इस सन्दर्भ में मुझे सहज ही उस चीख-पुकारका स्मरण हो आता है जो उस समय मचाई गई थी जब मैंने पहले-पहल विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाने का सुझाव<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१६
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>रखा था। इसे एक अमानवीय और बरबादीका सुझाव माना गया था। यह बात आमतौर पर सभी मानते हैं कि विदेशी वस्त्रोंसे जनताका अहित होता है। इसके विपरीत नमक एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। फिर भी, एक दुष्टतापूर्ण कर वसूल करनेके लिए इसे नष्ट किया गया है और प्रति दिन किया जा रहा है।
इतने दिनोंसे यह कर इसीलिए कायम रहा है कि आम जनताने इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अब जब कि वह काफी जाग चुकी है, इस कर को समाप्त होना है। यह कितनी जल्दी समाप्त होता है, यह तो इस बातपर निर्भर है कि लोग कितनी शक्तिका परिचय देते हैं। प्रसन्नताकी बात यह है कि अब उस कसौटीमें बहुत विलम्ब नहीं है।
{{C|{{larger|'''अतिरंजित कथन'''}}}}
अखबारोंमें इस आशयके समाचार छपे हैं कि मेरे साथियोंमें से १८ बीमार और असमर्थ हो गये हैं। यह घोर अतिरंजना है। यह सही है कि १८ व्यक्तियोंको भड़ौंच सेवाश्रममें दो दिन विश्राम करना पड़ा। लेकिन इसका कारण यह था कि वे थक गये थे और उनके पैरोंमें छाले पड़ गये थे। एक को चेचक हो गई थी - - वह भी बहुत मामूली ढंगकी ही साबित हुई। इसके अलावा और कोई इतना बीमार नहीं हुआ जिसका उल्लेख किया जा सकता हो। एक साथीको सचमुच बहुत तेज बुखार चढ़ गया था। लेकिन, उसका कारण भी कूचमें अत्युत्साह दिखाना ही साबित हुआ। वे शरीरसे बहुत मजबूत हैं। इसलिए उनको बहुत ज्यादा जरूरत से ज्यादा-विश्वास था कि वे आराम किये बिना कूच जारी रख सकेंगे। अतः उन्होंने तबतक आराम नहीं किया जबतक प्रकृतिने उन्हें इसके लिए बिलकुल विवश नहीं कर दिया। लेकिन अब दोनों काफी ठीक हैं, हालांकि कमजोर होनेके कारण उन्हें अभी कुछ दिन और आराम करने को कहा गया है। ये सूरतमें हमारे साथ हो लेनेकी उम्मीद रखते हैं। एक तीसरे साथीने पैरोंमें छाले पड़ जानेके बावजूद कूच जारी रखनेका आग्रह किया, लेकिन उसे अंकलेश्वरमें आराम करना पड़ा। शेष सब बिलकुल ठीक है और रोज कूच कर रहे हैं। यह सब बताना इसलिए आवश्यक हो गया है कि उन लोगोंके अभिभावक और मित्र चिन्तित न हों। ग्रामवासियोंने सत्याग्रहियोंकी जो खातिरदार की, आनन्दमें चरोतर शिक्षा मण्डलने चेचकके मरीजकी जो असाधारण शुश्रूषा की और सेवाश्रममें डॉ० चन्दूलालके कर्मचारियोंने पैरोके छालोंसे परेशान हमारे साथीकी जो सेवा की, उसका उल्लेख यदि मैं यहाँ न करूँ तो यह कृतघ्नता होगी।
इन घटनाओंसे एक सबक भी लिया जा सकता है। वर्तमान पीढ़ीके लोग कमजोर और सुकुमार हैं और उनके शरीरको बड़ा लाड़-प्यार मिला है। यदि वे राष्ट्रीय कार्य में हाथ बँटाना चाहते हैं तो उन्हें काफी व्यायाम करके अपने शरीरको हट्टा-कट्टा बनाना चाहिए और व्यायाम उतना ही अच्छा और प्रभावकारी होता है जितना कि तेजीसे दूरतक टहलना। मांसपेशियोंको विकसित करनेवाले व्यायाम आदि भी अच्छे हैं और टहलने के साथ-साथ उन्हें भी करना चाहिए। मगर ये व्यायाम टहलनेका स्थान नहीं ले सकते। टहलने को जो व्यायामोंका सरताज कहा गया है,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१७
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रत-दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा। यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई थीं, जो कूच करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ू माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र करानेके लिए आकुल हैं। स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}}}
नेहरू परिवारका गौरव भव्य आनन्द भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात्
राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत
बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट
है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं
थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक
सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें
मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब
यह काम हमारा है कि हम अपने आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य
सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१७५}}</noinclude>वह ठीक ही है। हमारा कूप तो वास्तव में बच्चों के खेलके समान है। प्रत-दिन दो
चरणोंमें बारह मीलसे भी कम फासला तय करना पड़ता है सो भी बिना कोई ज्यादा सामान लिये। इससे शरीरपर कोई खास जोर नहीं पड़ना चाहिए। जिन लोगोंके पैरोंमें छाले नहीं पड़े हैं, उनका वजन बढ़ा। यहाँ मैं यह भी बता दूं कि सोडियम परमँगनेटका गरम घोल, स्नान और भीगी चादरोंका प्रयोग चेचकका अत्यन्त
कारगर इलाज साबित हो रहा है।
{{C|{{larger|'''सच्ची लगन'''}}}}
अभी पिछले दिनोंकी बात है कि श्रीमती खुर्शेदबाई नौरोजी सांधियेर आई थीं, जो कूच करनेवालोंका एक विश्राम स्थल था। उनके साथ श्रीयुत अम्बालाल साराभाईकी पुत्री मदुलाबहन, जमनालालजी की छोटी बच्ची मदालसा, श्रीमती वसुमती बहन और राधाबहन भी आश्रमसे आई थी। उन्हें साधियेर तक ले जानेके लिए सवारीका इन्तजार था। उनके पास जो समय था, उसे वे राष्ट्र हित में लगाना चाहती थीं। उन्होंने देखा कि आसपासका क्षेत्र बहुत साफ नहीं था इसलिए उन्होंने कूड़ा साफ करनेका निश्चय किया और चकित ग्रामवासियोंसे झाड़ू माँगे। ज्यों ही गाँववालोंको स्थितिका भान हुआ, वे भी इन राष्ट्रीय भंगियों के साथ, जिनमें से कई अभिजात परिवारोंकी थीं, हाथ बँटाने लगे। फलस्वरूप सायण गांव ऐसा साफ-सुथरा दिखने लगा जैसा इन बहनों द्वारा फुरसतके समय सफाईका यह काम करनेसे पहले शायद कभी नहीं दिखाई दिया था। इन बहनोंकी इस सच्ची सेवा, इस मूक सन्देशकी ओर मैं उन असंख्य युवकोंका ध्यान आकृष्ट करता हूँ जो देशकी सेवा करने और उसे स्वतन्त्र करानेके लिए आकुल हैं। स्वतन्त्रता तभी मिलेगी जब हम अपने सभी दोषोंपर एक ही साथ प्रहार करेंगे। पाठकोंको जान लेना चाहिए कि इन सभी बहनोंने सविनय प्रतिरोधियोंकी सूची में अपने नाम दर्ज कराये हैं और बड़ी उत्सुकता, बल्कि अधीरता से आगे बढ़नेके संकेतकी प्रतीक्षा कर रही हैं। आत्मशुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेके इस अभियान में यदि स्त्रियों पुरुषोंको मात दे दें तो कोई आश्चर्य नहीं।
{{C|{{larger|'''मोतीलालजी की दानशीलता'''}}}}
नेहरू-परिवारका गौरव भव्य आनन्द-भवन इसी महीनेकी ६ तारीख, अर्थात् राष्ट्रीय सत्याग्रह-दिवससे राष्ट्रकी सम्पति बन जायेगा। मोतीलालजी को राष्ट्रकी बहुत बहुत सेवा करनेका श्रेय प्राप्त है। जवाहरलाल राष्ट्रको उनकी एक सजीव भेंट है। दानकी इस सूची में ईंट और गारेकी इस इमारतको जोड़नेकी कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन मैं जानता हूँ कि इस विशाल भवनको, जिसके साथ जुड़े ऐतिहासिक सन्दर्भासे अब जनता अवगत हो चुकी है, भेंट कर देनेके लिए वे आकुल थे। वास्तवमें मोतीलालजी ने जिस शानके साथ कमाया उसी शानके साथ खर्च भी किया है। अब यह काम हमारा है कि हम अपने-आपको उनकी सेवाओं और दान-दाक्षिण्यके योग्य सिद्ध करें।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५८. ६ अप्रैलको याद रखें'''}}}}
गुरुवार, ३ तारीखको यह लेख पाठकोंके सामने होगा। यदि ६ अप्रैल से पहले
कार्यक्रमको स्थगित करनेके सम्बन्धमें कोई सूचना नहीं जारी की जाती तो पाठक
समझ लें कि मैंने सभीको ६ अप्रैल से नमक- कानूनोंके खिलाफ सामूहिक सविनय अवज्ञा करनेकी छूट दे दी है और जो लोग उसके लिए तैयार हैं उनसे मैं उस दिन अवज्ञा प्रारम्भ कर देनेकी अपेक्षा रखता हूँ।
इस विषय में इन पृष्ठों में समय-समयपर मैंने जो कुछ कहा है, उसे संक्षेपमें
एक बार दोहरा जाता हूँ।
सविनय अवज्ञाके लिए केवल एक ही शर्त है। अर्थात् सच्चे अर्थों में अहिंसाका
पूर्ण पालन।
सामुदायिक सविनय अवज्ञाका मतलब है बिना किसीकी प्रेरणाके सहज रीतिसे
स्वयं क्रियाशील हो जाना। कार्यकर्त्ता केवल प्रारम्भिक अवस्थाओं में जनताका मार्ग-
दर्शन करेंगे। आगे चलकर जनता इस आन्दोलनका नियमन खुद करेगी।
कांग्रेसके स्वयंसेवक घटनाक्रम पर नजर रखेंगे और जहां कहीं जरूरत होगी,
यहाँ मदद करेंगे। उनसे सबसे आगे रहनेकी अपेक्षा की जायेगी।
स्वयंसेवकोंको किसी भी साम्प्रदायिक झगडेमें किसीका पक्ष नहीं लेना चाहिए।
जहाँ कहीं हिंसाका विस्फोट हो, स्वयंसेवकोंसे उसे शान्त करनेके लिए प्राण तक
दे देनेकी अपेक्षा की जाती है।
पूर्ण अनुशासन और विभिन्न एकांशोंके बीच पूरा सहयोग सफलताकी अनिवार्य
शर्त है।
यदि सच्ची जन-जागृति हो तो जो लोग सविनय अवज्ञा न कर रहे हों उनसे यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे किसी-न-किसी राष्ट्रीय कार्यमें लग जायेंगे और दूसरोंको भी उसमें प्रवृत्त करेंगे। इन राष्ट्रीय कार्यों में खादी कार्य, शराब तथा अफीमकी दुकानोंपर धरना देना, विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करना, गाँवोंकी सफाई करना, सविनय प्रतिरोधी कैदियोंके परिवारोंकी हर तरहसे सहायता करना आदि शामिल हैं।
वास्तवमें नमक कर के सम्बन्धमें किये जानेवाले सविनय प्रतिरोधके प्रति यदि लोग सच्चा उत्साह दिखायें तो हमें खादीके बलपर ठीक ढंगके संगठनके द्वारा विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सम्पन्न करा सकना चाहिए और पूर्ण मद्यनिषेध भी करवा सकना चाहिए। यदि ऐसा हो जाये तो उससे प्रतिवर्ष ९१ करोड़ रुपयेकी बचत होगी
और करोड़ों बेकार लोगोंको सहायक धन्धा मिलेगा। और यदि हम यह सब कर दिखायें
तो स्वराज्य मिलने में भी देर नहीं लगेगी। इनमें से एक भी काम हमारी शक्तिसे
बाहर नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इन्डिया,''' ३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२१९
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{large|'''१५९. मद्यपान निषेध'''}}}}
पंडित देवशर्मा 'अभय' हरिद्वारके इर्दगिर्द मद्यपान निषेधके लिए कुछ आन्दोलन करना चाहते हैं। मैने उन्हें यह कहकर अपनी सहमति दे दी है कि यदि उनमें आत्मविश्वास हो तो वे अवश्य ही इस कामको उठा लें। असहयोगकी कल्पनाकी उत्पत्ति आत्मशुद्धिकी भावनासे हुई है। इसीलिए सन १९२१ में मद्यपान निषेधका प्रचण्ड आन्दोलन शुरू हुआ था और उसमें सफलता भी ठीक-ठीक मिली थी। बादमें यह आन्दोलन बन्द करना पड़ा या अपने आप ही बन्द हो गया, क्योंकि उसमें अशुद्धि
यानी जबरदस्ती घुस गई थी।
इस बार लोग जान गये है कि जबरदस्ती से कभी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं
होगी। इसलिए जहां अशान्तिका कुछ भी भय नहीं है और काफी स्वयंसेवक मिल
सकते हैं, वहाँ मद्यपान निषेधका आन्दोलन शुरू किया जा सकता है और किया
जाना चाहिए।
यह आन्दोलन तीन प्रकारसे किया जा सकता है:
१. शराब पीनेवालोंके घर जाकर उन्हें समझानेसे;
२. शराबखानोंके मालिकोंको अपनी दुकानें बन्द करनेको समझा-बुझाकर और
३. शरावकी दुकानोंके आसपास धरना देकर।
ये तीनों कार्य साथ-साथ भी किये जा सकते हैं। पहले दो में तो किसी प्रकारका खतरा ही नहीं है। तीसरेमें जबरदस्तीका भय जरूर है। सम्भव है कि इस बारेमें
सरकार मुमानियतका हुकम निकाले। यदि ऐसा कोई हुक्म निकला भी तो उसमें
डरकी कोई बात नहीं है। ऐसे हुक्मका अनादर करनेसे सहज ही सविनय अवज्ञा हो
सकती है।
जाहिर है कि इस तरह धरना देनेका काम हरएक आदमी नहीं कर सकता,
और न हरएक जगह ही यह काम हो सकता है। इसलिए यह आन्दोलन बहुत ही
मर्यादित होगा। परन्तु मर्यादित होते हुए भी यह काम निहायत अच्छा है और
इसका नतीजा भी अच्छा हो सकता है। अतएव यदि कोई व्यक्ति आत्मविश्वास-
पूर्वक इस आन्दोलनका संचालन करेगा, तो उससे मुझे हर्ष ही होगा।
'''हिन्दी नवजीवन''' ३-४-१९३०
४३-१२<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{large|'''१५९. मद्यपान निषेध'''}}}}
पंडित देवशर्मा 'अभय' हरिद्वारके इर्दगिर्द मद्यपान निषेधके लिए कुछ आन्दोलन करना चाहते हैं। मैने उन्हें यह कहकर अपनी सहमति दे दी है कि यदि उनमें आत्मविश्वास हो तो वे अवश्य ही इस कामको उठा लें। असहयोगकी कल्पनाकी उत्पत्ति आत्मशुद्धिकी भावनासे हुई है। इसीलिए सन १९२१ में मद्यपान निषेधका प्रचण्ड आन्दोलन शुरू हुआ था और उसमें सफलता भी ठीक-ठीक मिली थी। बादमें यह आन्दोलन बन्द करना पड़ा या अपने आप ही बन्द हो गया, क्योंकि उसमें अशुद्धि
यानी जबरदस्ती घुस गई थी।
इस बार लोग जान गये है कि जबरदस्ती से कभी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं
होगी। इसलिए जहां अशान्तिका कुछ भी भय नहीं है और काफी स्वयंसेवक मिल
सकते हैं, वहाँ मद्यपान निषेधका आन्दोलन शुरू किया जा सकता है और किया
जाना चाहिए।
यह आन्दोलन तीन प्रकारसे किया जा सकता है:
१. शराब पीनेवालोंके घर जाकर उन्हें समझानेसे;
२. शराबखानोंके मालिकोंको अपनी दुकानें बन्द करनेको समझा-बुझाकर और
३. शरावकी दुकानोंके आसपास धरना देकर।
ये तीनों कार्य साथ-साथ भी किये जा सकते हैं। पहले दो में तो किसी प्रकारका खतरा ही नहीं है। तीसरेमें जबरदस्तीका भय जरूर है। सम्भव है कि इस बारेमें
सरकार मुमानियतका हुकम निकाले। यदि ऐसा कोई हुक्म निकला भी तो उसमें
डरकी कोई बात नहीं है। ऐसे हुक्मका अनादर करनेसे सहज ही सविनय अवज्ञा हो
सकती है।
जाहिर है कि इस तरह धरना देनेका काम हरएक आदमी नहीं कर सकता,
और न हरएक जगह ही यह काम हो सकता है। इसलिए यह आन्दोलन बहुत ही
मर्यादित होगा। परन्तु मर्यादित होते हुए भी यह काम निहायत अच्छा है और
इसका नतीजा भी अच्छा हो सकता है। अतएव यदि कोई व्यक्ति आत्मविश्वास-
पूर्वक इस आन्दोलनका संचालन करेगा, तो उससे मुझे हर्ष ही होगा।
'''हिन्दी नवजीवन''' ३-४-१९३०
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|larger{{'''१५९. मद्यपान निषेध'''}}}}
पंडित देवशर्मा 'अभय' हरिद्वारके इर्दगिर्द मद्यपान निषेधके लिए कुछ आन्दोलन करना चाहते हैं। मैने उन्हें यह कहकर अपनी सहमति दे दी है कि यदि उनमें आत्मविश्वास हो तो वे अवश्य ही इस कामको उठा लें। असहयोगकी कल्पनाकी उत्पत्ति आत्मशुद्धिकी भावनासे हुई है। इसीलिए सन १९२१ में मद्यपान निषेधका प्रचण्ड आन्दोलन शुरू हुआ था और उसमें सफलता भी ठीक-ठीक मिली थी। बादमें यह आन्दोलन बन्द करना पड़ा या अपने आप ही बन्द हो गया, क्योंकि उसमें अशुद्धि
यानी जबरदस्ती घुस गई थी।
इस बार लोग जान गये है कि जबरदस्ती से कभी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं
होगी। इसलिए जहां अशान्तिका कुछ भी भय नहीं है और काफी स्वयंसेवक मिल
सकते हैं, वहाँ मद्यपान निषेधका आन्दोलन शुरू किया जा सकता है और किया
जाना चाहिए।
यह आन्दोलन तीन प्रकारसे किया जा सकता है:
१. शराब पीनेवालोंके घर जाकर उन्हें समझानेसे;
२. शराबखानोंके मालिकोंको अपनी दुकानें बन्द करनेको समझा-बुझाकर और
३. शरावकी दुकानोंके आसपास धरना देकर।
ये तीनों कार्य साथ-साथ भी किये जा सकते हैं। पहले दो में तो किसी प्रकारका खतरा ही नहीं है। तीसरेमें जबरदस्तीका भय जरूर है। सम्भव है कि इस बारेमें
सरकार मुमानियतका हुकम निकाले। यदि ऐसा कोई हुक्म निकला भी तो उसमें
डरकी कोई बात नहीं है। ऐसे हुक्मका अनादर करनेसे सहज ही सविनय अवज्ञा हो
सकती है।
जाहिर है कि इस तरह धरना देनेका काम हरएक आदमी नहीं कर सकता,
और न हरएक जगह ही यह काम हो सकता है। इसलिए यह आन्दोलन बहुत ही
मर्यादित होगा। परन्तु मर्यादित होते हुए भी यह काम निहायत अच्छा है और
इसका नतीजा भी अच्छा हो सकता है। अतएव यदि कोई व्यक्ति आत्मविश्वास-
पूर्वक इस आन्दोलनका संचालन करेगा, तो उससे मुझे हर्ष ही होगा।
'''हिन्दी नवजीवन''' ३-४-१९३०
४३-१२<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५९. मद्यपान निषेध'''}}}}
पंडित देवशर्मा 'अभय' हरिद्वारके इर्दगिर्द मद्यपान निषेधके लिए कुछ आन्दोलन करना चाहते हैं। मैने उन्हें यह कहकर अपनी सहमति दे दी है कि यदि उनमें आत्मविश्वास हो तो वे अवश्य ही इस कामको उठा लें। असहयोगकी कल्पनाकी उत्पत्ति आत्मशुद्धिकी भावनासे हुई है। इसीलिए सन १९२१ में मद्यपान निषेधका प्रचण्ड आन्दोलन शुरू हुआ था और उसमें सफलता भी ठीक-ठीक मिली थी। बादमें यह आन्दोलन बन्द करना पड़ा या अपने आप ही बन्द हो गया, क्योंकि उसमें अशुद्धि
यानी जबरदस्ती घुस गई थी।
इस बार लोग जान गये है कि जबरदस्ती से कभी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं
होगी। इसलिए जहां अशान्तिका कुछ भी भय नहीं है और काफी स्वयंसेवक मिल
सकते हैं, वहाँ मद्यपान निषेधका आन्दोलन शुरू किया जा सकता है और किया
जाना चाहिए।
यह आन्दोलन तीन प्रकारसे किया जा सकता है:
१. शराब पीनेवालोंके घर जाकर उन्हें समझानेसे;
२. शराबखानोंके मालिकोंको अपनी दुकानें बन्द करनेको समझा-बुझाकर और
३. शरावकी दुकानोंके आसपास धरना देकर।
ये तीनों कार्य साथ-साथ भी किये जा सकते हैं। पहले दो में तो किसी प्रकारका खतरा ही नहीं है। तीसरेमें जबरदस्तीका भय जरूर है। सम्भव है कि इस बारेमें
सरकार मुमानियतका हुकम निकाले। यदि ऐसा कोई हुक्म निकला भी तो उसमें
डरकी कोई बात नहीं है। ऐसे हुक्मका अनादर करनेसे सहज ही सविनय अवज्ञा हो
सकती है।
जाहिर है कि इस तरह धरना देनेका काम हरएक आदमी नहीं कर सकता,
और न हरएक जगह ही यह काम हो सकता है। इसलिए यह आन्दोलन बहुत ही
मर्यादित होगा। परन्तु मर्यादित होते हुए भी यह काम निहायत अच्छा है और
इसका नतीजा भी अच्छा हो सकता है। अतएव यदि कोई व्यक्ति आत्मविश्वास-
पूर्वक इस आन्दोलनका संचालन करेगा, तो उससे मुझे हर्ष ही होगा।
'''हिन्दी नवजीवन''' ३-४-१९३०
४३-१२<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१५९. मद्यपान निषेध'''}}}}
पंडित देवशर्मा 'अभय' हरिद्वारके इर्दगिर्द मद्यपान निषेधके लिए कुछ आन्दोलन करना चाहते हैं। मैने उन्हें यह कहकर अपनी सहमति दे दी है कि यदि उनमें आत्मविश्वास हो तो वे अवश्य ही इस कामको उठा लें। असहयोगकी कल्पनाकी उत्पत्ति आत्मशुद्धिकी भावनासे हुई है। इसीलिए सन १९२१ में मद्यपान निषेधका प्रचण्ड आन्दोलन शुरू हुआ था और उसमें सफलता भी ठीक-ठीक मिली थी। बादमें यह आन्दोलन बन्द करना पड़ा या अपने आप ही बन्द हो गया, क्योंकि उसमें अशुद्धि
यानी जबरदस्ती घुस गई थी।
इस बार लोग जान गये है कि जबरदस्ती से कभी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं
होगी। इसलिए जहां अशान्तिका कुछ भी भय नहीं है और काफी स्वयंसेवक मिल
सकते हैं, वहाँ मद्यपान निषेधका आन्दोलन शुरू किया जा सकता है और किया
जाना चाहिए।
यह आन्दोलन तीन प्रकारसे किया जा सकता है:
१. शराब पीनेवालोंके घर जाकर उन्हें समझानेसे;
२. शराबखानोंके मालिकोंको अपनी दुकानें बन्द करनेको समझा-बुझाकर और
३. शरावकी दुकानोंके आसपास धरना देकर।
ये तीनों कार्य साथ-साथ भी किये जा सकते हैं। पहले दो में तो किसी प्रकारका खतरा ही नहीं है। तीसरेमें जबरदस्तीका भय जरूर है। सम्भव है कि इस बारेमें
सरकार मुमानियतका हुकम निकाले। यदि ऐसा कोई हुक्म निकला भी तो उसमें
डरकी कोई बात नहीं है। ऐसे हुक्मका अनादर करनेसे सहज ही सविनय अवज्ञा हो
सकती है।
जाहिर है कि इस तरह धरना देनेका काम हरएक आदमी नहीं कर सकता,
और न हरएक जगह ही यह काम हो सकता है। इसलिए यह आन्दोलन बहुत ही
मर्यादित होगा। परन्तु मर्यादित होते हुए भी यह काम निहायत अच्छा है और
इसका नतीजा भी अच्छा हो सकता है। अतएव यदि कोई व्यक्ति आत्मविश्वासपूर्वक इस आन्दोलनका संचालन करेगा, तो उससे मुझे हर्ष ही होगा।
'''हिन्दी नवजीवन''' ३-४-१९३०
४३-१२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२०
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{large|'''१६०. पत्र : कपिलराय मेहताको'''}}}}
{{Right|मध्य रात्रि [३ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० कपिलराय,
तुम्हारे बारेमें मुझे खबर मिली है। उतावली न करना। शनिवारको यदि बुखार न हो तो आना। नवसारीसे वे तुम्हें भेज देंगे। अब पूरे शरीरकी गीली पट्टी न लेना दूध अवश्य लेना गरम पानीसे स्नान करनेमें कोई दिक्कत नहीं है। खाँसीके लिए डाक्टरको बताना। डाक्टर तो दस दिन तक सुरतमें ही रहनेके लिए कहते हैं। मैं भी यदि बुखार न हो तो शनिवारको आने में कोई हर्ज नहीं समझता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च:]
यह पत्र डाक्टर साहबको दिखलाना।
चि० कपिलशय सैनिक
अनाविल आश्रम, सूरत
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५९४ ) से: सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन०
३९७२ से भी
{{C|{{large|'''१६१. भाषण: वाँकी प्रार्थना सभामें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
अब तो हमारा दो दिनका ही रास्ता बाकी रह गया है। उसके बाद हम काममें जुट जायेंगे। उस समय लोग भी बहुत अधिक होंगे। दांडीमें पानीकी कमीके बारेमें तो मैं आपको सूचना दे ही चुका हूँ। हमें तो जंगलमें रहनेवाले जैन साधुकी तरह पानीको दूध मानकर व्यवहारमें लाना होगा। अब मैं एक दूसरी बात और कह दूं कि वहाँके लोगोंको हमारे भोजनकी व्यवस्था करनेमें बहुत मुश्किलका सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वहाँ पहुँचनेके बाद दिनमें तीन बार आधा सेर चने, आधा सेर, मुरमुरे और एक तोला घी तथा गुड़का गरम पानी, इतना ही आपको मिलेगा। अब तो हमें अपने जीवनको और कठोर बनाना है, अतः सब लोग इसके अभ्यस्त हो जायें।
१. डाककी मुहरसे।
२. प्रार्थना सभा प्रातः चार बजे हुई थी।
३. भाषा सेरसे तात्पर्य को बाधा सेर अर्थात् एक पावसे है।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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चि० कपिलराय,
तुम्हारे बारेमें मुझे खबर मिली है। उतावली न करना। शनिवारको यदि बुखार न हो तो आना। नवसारीसे वे तुम्हें भेज देंगे। अब पूरे शरीरकी गीली पट्टी न लेना दूध अवश्य लेना गरम पानीसे स्नान करनेमें कोई दिक्कत नहीं है। खाँसीके लिए डाक्टरको बताना। डाक्टर तो दस दिन तक सुरतमें ही रहनेके लिए कहते हैं। मैं भी यदि बुखार न हो तो शनिवारको आने में कोई हर्ज नहीं समझता।
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[पुनश्च:]
यह पत्र डाक्टर साहबको दिखलाना।
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गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५९४ ) से: सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन०
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अब तो हमारा दो दिनका ही रास्ता बाकी रह गया है। उसके बाद हम काममें जुट जायेंगे। उस समय लोग भी बहुत अधिक होंगे। दांडीमें पानीकी कमीके बारेमें तो मैं आपको सूचना दे ही चुका हूँ। हमें तो जंगलमें रहनेवाले जैन साधुकी तरह पानीको दूध मानकर व्यवहारमें लाना होगा। अब मैं एक दूसरी बात और कह दूं कि वहाँके लोगोंको हमारे भोजनकी व्यवस्था करनेमें बहुत मुश्किलका सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वहाँ पहुँचनेके बाद दिनमें तीन बार आधा सेर चने, आधा सेर, मुरमुरे और एक तोला घी तथा गुड़का गरम पानी, इतना ही आपको मिलेगा। अब तो हमें अपने जीवनको और कठोर बनाना है, अतः सब लोग इसके अभ्यस्त हो जायें।
१. डाककी मुहरसे।
२. प्रार्थना सभा प्रातः चार बजे हुई थी।
३. भाषा सेरसे तात्पर्य को बाधा सेर अर्थात् एक पावसे है।<noinclude></noinclude>
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चि० कपिलराय,
तुम्हारे बारेमें मुझे खबर मिली है। उतावली न करना। शनिवारको यदि बुखार न हो तो आना। नवसारीसे वे तुम्हें भेज देंगे। अब पूरे शरीरकी गीली पट्टी न लेना दूध अवश्य लेना गरम पानीसे स्नान करनेमें कोई दिक्कत नहीं है। खाँसीके लिए डाक्टरको बताना। डाक्टर तो दस दिन तक सुरतमें ही रहनेके लिए कहते हैं। मैं भी यदि बुखार न हो तो शनिवारको आने में कोई हर्ज नहीं समझता।
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[पुनश्च:]
यह पत्र डाक्टर साहबको दिखलाना।
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गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५९४ ) से: सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन०
३९७२ से भी
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अब तो हमारा दो दिनका ही रास्ता बाकी रह गया है। उसके बाद हम काममें जुट जायेंगे। उस समय लोग भी बहुत अधिक होंगे। दांडीमें पानीकी कमीके बारेमें तो मैं आपको सूचना दे ही चुका हूँ। हमें तो जंगलमें रहनेवाले जैन साधुकी तरह पानीको दूध मानकर व्यवहारमें लाना होगा। अब मैं एक दूसरी बात और कह दूं कि वहाँके लोगोंको हमारे भोजनकी व्यवस्था करनेमें बहुत मुश्किलका सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वहाँ पहुँचनेके बाद दिनमें तीन बार आधा सेर चने, आधा सेर, मुरमुरे और एक तोला घी तथा गुड़का गरम पानी, इतना ही आपको मिलेगा। अब तो हमें अपने जीवनको और कठोर बनाना है, अतः सब लोग इसके अभ्यस्त हो जायें।
१. डाककी मुहरसे।
२. प्रार्थना सभा प्रातः चार बजे हुई थी।
३. भाषा सेरसे तात्पर्य को बाधा सेर अर्थात् एक पावसे है।<noinclude></noinclude>
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{{Right|मध्य रात्रि [३ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० कपिलराय,
तुम्हारे बारेमें मुझे खबर मिली है। उतावली न करना। शनिवारको यदि बुखार न हो तो आना। नवसारीसे वे तुम्हें भेज देंगे। अब पूरे शरीरकी गीली पट्टी न लेना दूध अवश्य लेना गरम पानीसे स्नान करनेमें कोई दिक्कत नहीं है। खाँसीके लिए डाक्टरको बताना। डाक्टर तो दस दिन तक सुरतमें ही रहनेके लिए कहते हैं। मैं भी यदि बुखार न हो तो शनिवारको आने में कोई हर्ज नहीं समझता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च:]
यह पत्र डाक्टर साहबको दिखलाना।
चि० कपिलशय सैनिक
अनाविल आश्रम, सूरत
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५९४ ) से: सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन०
३९७२ से भी
{{C|{{larger|'''१६१. भाषण: वाँकी प्रार्थना सभामें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
अब तो हमारा दो दिनका ही रास्ता बाकी रह गया है। उसके बाद हम काममें जुट जायेंगे। उस समय लोग भी बहुत अधिक होंगे। दांडीमें पानीकी कमीके बारेमें तो मैं आपको सूचना दे ही चुका हूँ। हमें तो जंगलमें रहनेवाले जैन साधुकी तरह पानीको दूध मानकर व्यवहारमें लाना होगा। अब मैं एक दूसरी बात और कह दूं कि वहाँके लोगोंको हमारे भोजनकी व्यवस्था करनेमें बहुत मुश्किलका सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वहाँ पहुँचनेके बाद दिनमें तीन बार आधा सेर चने, आधा सेर, मुरमुरे और एक तोला घी तथा गुड़का गरम पानी, इतना ही आपको मिलेगा। अब तो हमें अपने जीवनको और कठोर बनाना है, अतः सब लोग इसके अभ्यस्त हो जायें।
१. डाककी मुहरसे।
२. प्रार्थना सभा प्रातः चार बजे हुई थी।
३. भाषा सेरसे तात्पर्य को बाधा सेर अर्थात् एक पावसे है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१७९}}</noinclude>दूसरी बात यह सुननेमें आई है कि सरकार हमें रोकने के लिए दमकलोंका प्रयोग करेगी। हम लोगोंने तो तोप और बन्दूककी गोली खाकर मरनेकी तैयारी की है, उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है। हालांकि पानीकी धारसे बेचैन करके भी वे हमें मार डाल सकते हैं और इसको सहन कर पाना तो मुश्किल है ही। किन्तु आप यह याद रखें कि हममें कोई भी पीछे कदम न हटाये। मैं सरकारको इतना क्रूर नहीं मानता किन्तु फिर भी हमें तैयार तो रहना ही चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१६२. भाषण : नवसारीमें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
नवसारी पारसी भाइयोंका मुख्य नगर है। पारसियोंकी जनसंख्या सारी दुनियामें एक लाखसे कुछ कम ही है। और उसका भी अधिकांश बम्बई प्रान्तमें, खासकर बम्बई और नवसारीके बीचमें रहता है।
भारत में भ्रमण करते हुए मुझे जगह-जगह पारसी भाइयोंसे मिलने का अवसर
आता है। और मैं देखता हूँ कि मैं उन्हें सदा पहचान लेता हूँ।
लेंग नामक एक गोरे लेखकने दुनियाकी सारी जातियोंकी दानशीलताकी तुलना करके यह सिद्ध किया है कि जनसंख्याकी दृष्टिसे तो इस गुणमें पहला स्थान पारसियोंका ही है। पारसियोंकी संख्या दुनियाके समुद्र में बूंद जितनी है, किन्तु उनकी उदारता
ऐसी है कि उसकी ख्याति दुनियामें सर्वत्र पहुँच चुकी है। निष्पक्ष उदारता किसी दूसरी जातिमें कभी नहीं दिखाई दी। मैंने हाथ बढ़ाया है तब-तब मुझे कभी खाली हाथ लौटनेका पृथ्वीके इतिहास में ऐसी पारसियोंके आगे जब-जब मौका नहीं आया।
दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहको लड़ाईमें भी मुझे मदद करनेमें पारसी भाई ही
सबसे आगे थे। सेठ रुस्तमजीने तो उसमें अपना सर्वस्व लुटा दिया था और इसी
लिए जब भी प्रसंग आया है मैंने भाटकी तरह उनकी प्रशंसा की है।
पारसियोंका यह ऋण में कैसे चुका सकता हूँ! मैं तो भिखारी हूँ, इसलिए मैं
यह ऋण पैसेसे तो नहीं चुका सकता। मैं कोई बड़ा अधिकारी नहीं हूँ न वाइसराय
हूँ कि उन्हें बड़ी-बड़ी नौकरियां या उपाधियाँ दे सकूं। इसीलिए आज यहाँ नवसारीमें
मैं उनकी इस प्रकार स्तुति कर रहा हूँ और साथ ही उनसे कुछ ले लेना चाहता
हूँ। इस लड़ाई में पारसी भाई तो मेरे साथ हैं ही एक पारसी भाई, जो मेरे सगे
भाईके समान हैं और जिन्हें कैंसर की बीमारी होने की आशंका है, इस लड़ाई में शामिल होनेके लिए बहुत ही अधीर हैं।
दादाभाईकी पौत्रियोंका ही उदाहरण लीजिए। ये सब बहनें इस लड़ाई में
अपना योग देने के लिए बेचैन, लगभग पागल हो रही हैं। मतलब यह कि पारसी<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१७९}}</noinclude>दूसरी बात यह सुननेमें आई है कि सरकार हमें रोकने के लिए दमकलोंका प्रयोग करेगी। हम लोगोंने तो तोप और बन्दूककी गोली खाकर मरनेकी तैयारी की है, उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है। हालांकि पानीकी धारसे बेचैन करके भी वे हमें मार डाल सकते हैं और इसको सहन कर पाना तो मुश्किल है ही। किन्तु आप यह याद रखें कि हममें कोई भी पीछे कदम न हटाये। मैं सरकारको इतना क्रूर नहीं मानता किन्तु फिर भी हमें तैयार तो रहना ही चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१६२. भाषण : नवसारीमें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
नवसारी पारसी भाइयोंका मुख्य नगर है। पारसियोंकी जनसंख्या सारी दुनियामें एक लाखसे कुछ कम ही है। और उसका भी अधिकांश बम्बई प्रान्तमें, खासकर बम्बई और नवसारीके बीचमें रहता है।
भारत में भ्रमण करते हुए मुझे जगह-जगह पारसी भाइयोंसे मिलने का अवसर
आता है। और मैं देखता हूँ कि मैं उन्हें सदा पहचान लेता हूँ।
लेंग नामक एक गोरे लेखकने दुनियाकी सारी जातियोंकी दानशीलताकी तुलना करके यह सिद्ध किया है कि जनसंख्याकी दृष्टिसे तो इस गुणमें पहला स्थान पारसियोंका ही है। पारसियोंकी संख्या दुनियाके समुद्र में बूंद जितनी है, किन्तु उनकी उदारता
ऐसी है कि उसकी ख्याति दुनियामें सर्वत्र पहुँच चुकी है। निष्पक्ष उदारता किसी दूसरी जातिमें कभी नहीं दिखाई दी। मैंने हाथ बढ़ाया है तब-तब मुझे कभी खाली हाथ लौटनेका पृथ्वीके इतिहास में ऐसी पारसियोंके आगे जब-जब मौका नहीं आया।
दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहको लड़ाईमें भी मुझे मदद करनेमें पारसी भाई ही
सबसे आगे थे। सेठ रुस्तमजीने तो उसमें अपना सर्वस्व लुटा दिया था और इसी
लिए जब भी प्रसंग आया है मैंने भाटकी तरह उनकी प्रशंसा की है।
पारसियोंका यह ऋण मैं कैसे चुका सकता हूँ! मैं तो भिखारी हूँ, इसलिए मैं
यह ऋण पैसेसे तो नहीं चुका सकता। मैं कोई बड़ा अधिकारी नहीं हूँ न वाइसराय
हूँ कि उन्हें बड़ी-बड़ी नौकरियां या उपाधियाँ दे सकूं। इसीलिए आज यहाँ नवसारीमें
मैं उनकी इस प्रकार स्तुति कर रहा हूँ और साथ ही उनसे कुछ ले लेना चाहता
हूँ। इस लड़ाई में पारसी भाई तो मेरे साथ हैं ही एक पारसी भाई, जो मेरे सगे
भाईके समान हैं और जिन्हें कैंसर की बीमारी होने की आशंका है, इस लड़ाई में शामिल होनेके लिए बहुत ही अधीर हैं।
दादाभाईकी पौत्रियोंका ही उदाहरण लीजिए। ये सब बहनें इस लड़ाई में
अपना योग देने के लिए बेचैन, लगभग पागल हो रही हैं। मतलब यह कि पारसी<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१७९}}</noinclude>दूसरी बात यह सुननेमें आई है कि सरकार हमें रोकने के लिए दमकलोंका प्रयोग करेगी। हम लोगोंने तो तोप और बन्दूककी गोली खाकर मरनेकी तैयारी की है, उसके सामने तो यह कुछ भी नहीं है। हालांकि पानीकी धारसे बेचैन करके भी वे हमें मार डाल सकते हैं और इसको सहन कर पाना तो मुश्किल है ही। किन्तु आप यह याद रखें कि हममें कोई भी पीछे कदम न हटाये। मैं सरकारको इतना क्रूर नहीं मानता किन्तु फिर भी हमें तैयार तो रहना ही चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१६२. भाषण : नवसारीमें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
नवसारी पारसी भाइयोंका मुख्य नगर है। पारसियोंकी जनसंख्या सारी दुनियामें एक लाखसे कुछ कम ही है। और उसका भी अधिकांश बम्बई प्रान्तमें, खासकर बम्बई और नवसारीके बीचमें रहता है।
भारत में भ्रमण करते हुए मुझे जगह-जगह पारसी भाइयोंसे मिलने का अवसर आता है। और मैं देखता हूँ कि मैं उन्हें सदा पहचान लेता हूँ।
लेंग नामक एक गोरे लेखकने दुनियाकी सारी जातियोंकी दानशीलताकी तुलना करके यह सिद्ध किया है कि जनसंख्याकी दृष्टिसे तो इस गुणमें पहला स्थान पारसियोंका ही है। पारसियोंकी संख्या दुनियाके समुद्र में बूंद जितनी है, किन्तु उनकी उदारता ऐसी है कि उसकी ख्याति दुनियामें सर्वत्र पहुँच चुकी है। निष्पक्ष उदारता किसी दूसरी जातिमें कभी नहीं दिखाई दी। पारसियोंके आगे जब-जब मैंने हाथ बढ़ाया है तब-तब मुझे कभी खाली हाथ लौटनेका पृथ्वीके इतिहास में ऐसी मौका नहीं आया।
दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहकी लड़ाईमें भी मुझे मदद करनेमें पारसी भाई ही सबसे आगे थे। सेठ रुस्तमजीने तो उसमें अपना सर्वस्व लुटा दिया था और इसी लिए जब भी प्रसंग आया है मैंने भाटकी तरह उनकी प्रशंसा की है।
पारसियोंका यह ऋण मैं कैसे चुका सकता हूँ! मैं तो भिखारी हूँ, इसलिए मैं
यह ऋण पैसेसे तो नहीं चुका सकता। मैं कोई बड़ा अधिकारी नहीं हूँ न वाइसराय
हूँ कि उन्हें बड़ी-बड़ी नौकरियां या उपाधियाँ दे सकूं। इसीलिए आज यहाँ नवसारीमें
मैं उनकी इस प्रकार स्तुति कर रहा हूँ और साथ ही उनसे कुछ ले लेना चाहता
हूँ। इस लड़ाई में पारसी भाई तो मेरे साथ हैं ही। एक पारसी भाई, जो मेरे सगे
भाईके समान हैं और जिन्हें कैंसर की बीमारी होने की आशंका है, इस लड़ाई में शामिल होनेके लिए बहुत ही अधीर हैं।
दादाभाईकी पौत्रियोंका ही उदाहरण लीजिए। ये सब बहनें इस लड़ाई में अपना योग देने के लिए बेचैन, लगभग पागल हो रही हैं। मतलब यह कि पारसी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२२
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरी सहायता कर रहे हैं, इस सम्बन्धमें कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं, किन्तु मुझे तो इससे भी ज्यादा चाहिए।
नमक-कर तो अब रह नहीं सकता, यह तो आप समझ ही लें। मैं आश्रमसे निकला, तभीसे जगह-जगह पारसियोंने मेरे ऊपर आशीर्वादकी वर्षा की है और कहा है: “तुम्हारी जय हो। ईश्वर तुम्हारे साथ है। स्वराज्य लेकर जल्दी ही लौटना।" और यदि मैं जीवित रहा तो स्वराज्य लेकर ही वापस आऊँगा। यदि आप लोग नमक कर के खिलाफ लड़ी जा रही इस लड़ाई में शामिल न होकर मध-निषेधके आन्दोलन में अपना योग दें तो आप हमारी बहुत बड़ी सहायता कर सकते हैं।
शरावर २५ करोड़ रुपया नष्ट करके हम अपनी बरबादी कर रहे हैं। इस बुराईके परिणामस्वरूप हमारे कितने ही सुखी परिवार नष्ट-भ्रष्ट हो रहे हैं। मैं दक्षिण आफ्रिका में वकालतका धन्धा करता था। किन्तु तब भी वहाँके मजदूर भाइयोंसे मैं मिलता रहता था । ये मजदूर भाई अपने काम के सिलसिले में मुझसे मिलनेके लिए आते थे, और चूंकि मैं उनके जीवन में घुलमिल गया था इसलिए वे मुझसे अपने सुख-दुःखकी चर्चा करते थे और मुझे अपने जीवनकी करुण कहानी सुनाते थे । मद्यपानकी इस बुराईके कारण उनकी कैसी दुर्गति हुई है, इसकी चर्चा करते हुए उनकी आंखोंसे आंसुओंकी धारा बह निकलती थी। अहमदाबादके अधिकांश मजदूर भाइयोंका भी यही हाल है, यह मैं अपने अनुभवसे जानता हूँ । शराब पीनेवाला अपनी पत्नी, मां और कन्या बीचका भेद भी भूल जाता है, यह मनुष्य नहीं रह जाता, पशु हो जाता है। शराबकी इस कुठेबके फन्देमें जो भी फँसता है, वह राक्षस हो जाता है। मैने अपनी आँखों एक स्टीमरके कप्तानको शराब पीकर अपनी ही की हुई उलटीमें लोटते हुए देखा है। ऐसी कुठेवसे शराब पीनेवालोंको मुक्त करानेमें में पारसी भाइयोंकी मदद मांग रहा हूँ।
मीबहनने शराब पीनेवालोंकी यह दुर्दशा देखी है उसे देखकर उनका हृदय पिघला, उन्होंने अपना घर-बार छोड़ा, मांका स्नेह छोड़ा और वे मद्य निषेधके इ काममें जुट गई। किन्तु एक अकेली पारसी बहनके त्यागसे यह काम पूरा नहीं हो सकता। उसके लिए तो हमें हरएक पारसी स्त्री-पुरुषका हृदय छूना पड़ेगा। और यदि। आवश्यकता हुई तो मुझ जैसोंको सम्भवतः सत्याग्रह ही करना पड़ेगा। पारसियोंके पास बुद्धि-शक्ति है। वे करोड़ों रुपया पैदा करते हैं, ईश्वरसे डरते हैं। शराबका व्यापार करना पाप है, ऐसा मानकर यदि पारसी भाई आजसे इस धन्धेको छोड़ दें तो शराबका व्यापार करनेवाले अन्य लोग भी उनका अनुकरण अवश्य करेंगे।
मद्य निषेधकी सफलताके द्वारा जब हम इस बुराईपर खर्च होनेवाला २५
करोड़ रुपया बचा लेंगे, तब हम देखेंगे कि हमने लाखों गरीबोंके घरोंका कल्याण
किया है। उस समय हमारे इस पुण्य कार्यसे प्रसन्न होकर देवता हमारे ऊपर फूलोंकी
वर्षा करेंगे।
लोगोंके हृदयमें प्रवेश करके जिस समय आप उनकी शराबकी यह आदत छुड़ा देंगे,
उस समय एक ऐसी शक्ति पैदा होगी जिसके द्वारा हम जो चाहेंगे सो पा सकेंगे।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरी सहायता कर रहे हैं, इस सम्बन्धमें कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं, किन्तु मुझे तो इससे भी ज्यादा चाहिए।
नमक-कर तो अब रह नहीं सकता, यह तो आप समझ ही लें। मैं आश्रमसे निकला, तभीसे जगह-जगह पारसियोंने मेरे ऊपर आशीर्वादकी वर्षा की है और कहा है: “तुम्हारी जय हो। ईश्वर तुम्हारे साथ है। स्वराज्य लेकर जल्दी ही लौटना।" और यदि मैं जीवित रहा तो स्वराज्य लेकर ही वापस आऊँगा। यदि आप लोग नमक कर के खिलाफ लड़ी जा रही इस लड़ाई में शामिल न होकर मध-निषेधके आन्दोलन में अपना योग दें तो आप हमारी बहुत बड़ी सहायता कर सकते हैं।
शरावर २५ करोड़ रुपया नष्ट करके हम अपनी बरबादी कर रहे हैं। इस बुराईके परिणामस्वरूप हमारे कितने ही सुखी परिवार नष्ट-भ्रष्ट हो रहे हैं। मैं दक्षिण आफ्रिका में वकालतका धन्धा करता था। किन्तु तब भी वहाँके मजदूर भाइयोंसे मैं मिलता रहता था । ये मजदूर भाई अपने काम के सिलसिले में मुझसे मिलनेके लिए आते थे, और चूंकि मैं उनके जीवन में घुलमिल गया था इसलिए वे मुझसे अपने सुख-दुःखकी चर्चा करते थे और मुझे अपने जीवनकी करुण कहानी सुनाते थे। मद्यपानकी इस बुराईके कारण उनकी कैसी दुर्गति हुई है, इसकी चर्चा करते हुए उनकी आंखोंसे आंसुओंकी धारा बह निकलती थी। अहमदाबादके अधिकांश मजदूर भाइयोंका भी यही हाल है, यह मैं अपने अनुभवसे जानता हूँ। शराब पीनेवाला अपनी पत्नी, मां और कन्याके बीचका भेद भी भूल जाता है, यह मनुष्य नहीं रह जाता, पशु हो जाता है। शराबकी इस कुटेबके फन्देमें जो भी फँसता है, वह राक्षस हो जाता है। मैने अपनी आँखों एक स्टीमरके कप्तानको शराब पीकर अपनी ही की हुई उलटीमें लोटते हुए देखा है। ऐसी कुटेवसे शराब पीनेवालोंको मुक्त करानेमें मैं पारसी भाइयोंकी मदद मांग रहा हूँ।
मीठूबहनने शराब पीनेवालोंकी यह दुर्दशा देखी है उसे देखकर उनका हृदय पिघला, उन्होंने अपना घर-बार छोड़ा, मांका स्नेह छोड़ा और वे मद्य निषेधके इस काममें जुट गई। किन्तु एक अकेली पारसी बहनके त्यागसे यह काम पूरा नहीं हो सकता। उसके लिए तो हमें हरएक पारसी स्त्री-पुरुषका हृदय छूना पड़ेगा। और यदि आवश्यकता हुई तो मुझ जैसोंको सम्भवतः सत्याग्रह ही करना पड़ेगा। पारसियोंके पास बुद्धि-शक्ति है। वे करोड़ों रुपया पैदा करते हैं, ईश्वरसे डरते हैं। शराबका व्यापार करना पाप है, ऐसा मानकर यदि पारसी भाई आजसे इस धन्धेको छोड़ दें तो शराबका व्यापार करनेवाले अन्य लोग भी उनका अनुकरण अवश्य करेंगे।
मद्य निषेधकी सफलताके द्वारा जब हम इस बुराईपर खर्च होनेवाला २५ करोड़ रुपया बचा लेंगे, तब हम देखेंगे कि हमने लाखों गरीबोंके घरोंका कल्याण किया है। उस समय हमारे इस पुण्य कार्यसे प्रसन्न होकर देवता हमारे ऊपर फूलोंकी वर्षा करेंगे।
लोगोंके हृदयमें प्रवेश करके जिस समय आप उनकी शराबकी यह आदत छुड़ा देंगे,
उस समय एक ऐसी शक्ति पैदा होगी जिसके द्वारा हम जो चाहेंगे सो पा सकेंगे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२३
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१८१}}</noinclude>मैं इस काम में विशेषकर आप बहनोंकी सहायता मांगता हूँ। मैं चाहता हूँ कि बहनें शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और उनसे शराब छोड़नेकी प्रार्थना करें। मैंने मुक्तिसेना ( सालवेशन आर्मी) की बहनोंको ऐसे काम करते हुए देखा है। यदि वे यह काम कर सकती हैं तो भारतीय बहनें क्यों नहीं कर सकती? क्या भारतकी हिन्दू, मुसलमान या पारसी बहनें उनकी तुलनामें किसी प्रकार कम है? क्या जो लोग शरावकी कुठेयमें जकड़े हुए हैं वे उनके भाई नहीं हैं? यदि मैं शराब पीनेवालोंको समझाने जाऊँ तो वे मुझसे, या मेरी जगह कुछ अन्य लोग हों तो वे उनसे झगड़ा करेंगे। किन्तु किसी स्त्रीका अपमान या अनादर वे नहीं कर सकते। वे इतने जड़ नहीं हैं कि आपकी बात न समझें। आपके सम्पर्क में आते ही वे होशमें आ जायेंगे, अपना कदम पीछे हटायेंगे और यह देखकर कि आपकी आँखोंसे प्रेमात झर रहा है, उन्हें ऐसा लगेगा कि यह तो कोई सती या योगिनी ही हमारे पास आई है; और ये लज्जित होकर शराबका त्याग कर देंगे। जिस समय आप बहनें इन शराब पीनेवालोंकी स्त्रियों, उनके बालकों आदिको जानेंगी उनके यहाँ यहाँ मारे-मारे फिरनेवाले अशिक्षित बालकोंसे स्नेह करेंगी और यह देखेंगी कि उनके ऊपर आकाश और नीचे धरती के सिवा और कुछ नहीं है, किन्तु फिर भी वे शराब पीते हैं, तब आप इस पवित्र कार्यको करनेके लिए प्रेरित हुए बिना न रहेंगी।
यदि सरकार मुझे जेल भेज दे तो बहनोंके लिए मैं यह सन्देश छोड़े जा रहा हूँ। गुजरातकी बहनोंको ऐसे कार्योंकी काफी तालीम है। भारतके किसी भी अन्य प्रदेशकी बहनों को ऐसे कार्य करनेका उतना अभ्यास नहीं है जितना यहाँको बहनोंको है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मीट्वनने अपने लिए जो कार्य क्षेत्र चुना है उसमें आप सब बहनें उनके साथ शरीक हों।
इस अहिंसक युद्धमें स्त्रियां पुरुषोंसे भी ज्यादा भाग ले सकती हैं क्योंकि स्त्रियाँ तो त्याग और दयाकी और इसलिए अहिंसाकी मूर्ति हैं। जहाँ पुरुष अहिंसाधर्मको केवल बुद्धिसे ही समझते हैं वहाँ स्त्रियोंके लिए वह एक ऐसी वस्तु है जिसे ये जन्मसे ही जानती है। पुरुष तो बहुत थोड़ी जिम्मेदारी उठाकर ही अपनेको कृतकार्य मान लेता है, किन्तु बहनोंको तो पतिकी, बालकोंकी तथा परिवारके अन्य सभी सदस्योंकी सेवा करनी पड़ती है।
पारसियोंने मुझे इतना दिया है कि मैं उसके बोझ से दबा जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे अपने प्रेमपाश में बाँधकर अपना दास बना दिया है। और दासको तो अपने स्वामीसे अधिकाधिक मांगनेका अधिकार मिल जाता है। इस आत्मशुद्धि के यज्ञमें आप मुझपर धनकी वर्षा करें या स्वयंसेवक दें तो मुझे केवल इतने से सन्तोष होनेवाला नहीं है। सन्तोष तो मुझे तभी होगा जब समस्त पारसी जाति मेरी यह प्रार्थना सुनेगी। और मीट्वहन जो काम कर रही हैं उसे सारे पारसी भाई-बहन अपना लेंगे।
[गुजरातीसे]
नवजीवन, १३-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१८१}}</noinclude>मैं इस काम में विशेषकर आप बहनोंकी सहायता मांगता हूँ। मैं चाहता हूँ कि बहनें शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और उनसे शराब छोड़नेकी प्रार्थना करें। मैंने मुक्तिसेना ( सालवेशन आर्मी) की बहनोंको ऐसे काम करते हुए देखा है। यदि वे यह काम कर सकती हैं तो भारतीय बहनें क्यों नहीं कर सकती? क्या भारतकी हिन्दू, मुसलमान या पारसी बहनें उनकी तुलनामें किसी प्रकार कम है? क्या जो लोग शरावकी कुठेयमें जकड़े हुए हैं वे उनके भाई नहीं हैं? यदि मैं शराब पीनेवालोंको समझाने जाऊँ तो वे मुझसे, या मेरी जगह कुछ अन्य लोग हों तो वे उनसे झगड़ा करेंगे। किन्तु किसी स्त्रीका अपमान या अनादर वे नहीं कर सकते। वे इतने जड़ नहीं हैं कि आपकी बात न समझें। आपके सम्पर्क में आते ही वे होशमें आ जायेंगे, अपना कदम पीछे हटायेंगे और यह देखकर कि आपकी आँखोंसे प्रेमात झर रहा है, उन्हें ऐसा लगेगा कि यह तो कोई सती या योगिनी ही हमारे पास आई है; और ये लज्जित होकर शराबका त्याग कर देंगे। जिस समय आप बहनें इन शराब पीनेवालोंकी स्त्रियों, उनके बालकों आदिको जानेंगी उनके यहाँ यहाँ मारे-मारे फिरनेवाले अशिक्षित बालकोंसे स्नेह करेंगी और यह देखेंगी कि उनके ऊपर आकाश और नीचे धरती के सिवा और कुछ नहीं है, किन्तु फिर भी वे शराब पीते हैं, तब आप इस पवित्र कार्यको करनेके लिए प्रेरित हुए बिना न रहेंगी।
यदि सरकार मुझे जेल भेज दे तो बहनोंके लिए मैं यह सन्देश छोड़े जा रहा हूँ। गुजरातकी बहनोंको ऐसे कार्योंकी काफी तालीम है। भारतके किसी भी अन्य प्रदेशकी बहनों को ऐसे कार्य करनेका उतना अभ्यास नहीं है जितना यहाँको बहनोंको है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मीट्वनने अपने लिए जो कार्य क्षेत्र चुना है उसमें आप सब बहनें उनके साथ शरीक हों।
इस अहिंसक युद्धमें स्त्रियां पुरुषोंसे भी ज्यादा भाग ले सकती हैं क्योंकि स्त्रियाँ तो त्याग और दयाकी और इसलिए अहिंसाकी मूर्ति हैं। जहाँ पुरुष अहिंसाधर्मको केवल बुद्धिसे ही समझते हैं वहाँ स्त्रियोंके लिए वह एक ऐसी वस्तु है जिसे ये जन्मसे ही जानती है। पुरुष तो बहुत थोड़ी जिम्मेदारी उठाकर ही अपनेको कृतकार्य मान लेता है, किन्तु बहनोंको तो पतिकी, बालकोंकी तथा परिवारके अन्य सभी सदस्योंकी सेवा करनी पड़ती है।
पारसियोंने मुझे इतना दिया है कि मैं उसके बोझ से दबा जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे अपने प्रेमपाश में बाँधकर अपना दास बना दिया है। और दासको तो अपने स्वामीसे अधिकाधिक मांगनेका अधिकार मिल जाता है। इस आत्मशुद्धि के यज्ञमें आप मुझपर धनकी वर्षा करें या स्वयंसेवक दें तो मुझे केवल इतने से सन्तोष होनेवाला नहीं है। सन्तोष तो मुझे तभी होगा जब समस्त पारसी जाति मेरी यह प्रार्थना सुनेगी। और मीट्वहन जो काम कर रही हैं उसे सारे पारसी भाई-बहन अपना लेंगे।
[गुजरातीसे]
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१८१}}</noinclude>मैं इस काम में विशेषकर आप बहनोंकी सहायता मांगता हूँ। मैं चाहता हूँ कि बहनें शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और उनसे शराब छोड़नेकी प्रार्थना करें। मैंने मुक्तिसेना ( सालवेशन आर्मी) की बहनोंको ऐसे काम करते हुए देखा है। यदि वे यह काम कर सकती हैं तो भारतीय बहनें क्यों नहीं कर सकती? क्या भारतकी हिन्दू, मुसलमान या पारसी बहनें उनकी तुलनामें किसी प्रकार कम है? क्या जो लोग शरावकी कुठेयमें जकड़े हुए हैं वे उनके भाई नहीं हैं? यदि मैं शराब पीनेवालोंको समझाने जाऊँ तो वे मुझसे, या मेरी जगह कुछ अन्य लोग हों तो वे उनसे झगड़ा करेंगे। किन्तु किसी स्त्रीका अपमान या अनादर वे नहीं कर सकते। वे इतने जड़ नहीं हैं कि आपकी बात न समझें। आपके सम्पर्क में आते ही वे होशमें आ जायेंगे, अपना कदम पीछे हटायेंगे और यह देखकर कि आपकी आँखोंसे प्रेमात झर रहा है, उन्हें ऐसा लगेगा कि यह तो कोई सती या योगिनी ही हमारे पास आई है; और ये लज्जित होकर शराबका त्याग कर देंगे। जिस समय आप बहनें इन शराब पीनेवालोंकी स्त्रियों, उनके बालकों आदिको जानेंगी उनके यहाँ यहाँ मारे-मारे फिरनेवाले अशिक्षित बालकोंसे स्नेह करेंगी और यह देखेंगी कि उनके ऊपर आकाश और नीचे धरती के सिवा और कुछ नहीं है, किन्तु फिर भी वे शराब पीते हैं, तब आप इस पवित्र कार्यको करनेके लिए प्रेरित हुए बिना न रहेंगी।
यदि सरकार मुझे जेल भेज दे तो बहनोंके लिए मैं यह सन्देश छोड़े जा रहा हूँ। गुजरातकी बहनोंको ऐसे कार्योंकी काफी तालीम है। भारतके किसी भी अन्य प्रदेशकी बहनों को ऐसे कार्य करनेका उतना अभ्यास नहीं है जितना यहाँको बहनोंको है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मीट्वनने अपने लिए जो कार्य क्षेत्र चुना है उसमें आप सब बहनें उनके साथ शरीक हों।
इस अहिंसक युद्धमें स्त्रियां पुरुषोंसे भी ज्यादा भाग ले सकती हैं क्योंकि स्त्रियाँ तो त्याग और दयाकी और इसलिए अहिंसाकी मूर्ति हैं। जहाँ पुरुष अहिंसाधर्मको केवल बुद्धिसे ही समझते हैं वहाँ स्त्रियोंके लिए वह एक ऐसी वस्तु है जिसे ये जन्मसे ही जानती है। पुरुष तो बहुत थोड़ी जिम्मेदारी उठाकर ही अपनेको कृतकार्य मान लेता है, किन्तु बहनोंको तो पतिकी, बालकोंकी तथा परिवारके अन्य सभी सदस्योंकी सेवा करनी पड़ती है।
पारसियोंने मुझे इतना दिया है कि मैं उसके बोझ से दबा जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे अपने प्रेमपाश में बाँधकर अपना दास बना दिया है। और दासको तो अपने स्वामीसे अधिकाधिक मांगनेका अधिकार मिल जाता है। इस आत्मशुद्धि के यज्ञमें आप मुझपर धनकी वर्षा करें या स्वयंसेवक दें तो मुझे केवल इतने से सन्तोष होनेवाला नहीं है। सन्तोष तो मुझे तभी होगा जब समस्त पारसी जाति मेरी यह प्रार्थना सुनेगी। और मीट्वहन जो काम कर रही हैं उसे सारे पारसी भाई-बहन अपना लेंगे।
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण: नवसारीमें|१८१}}</noinclude>मैं इस काम में विशेषकर आप बहनोंकी सहायता मांगता हूँ। मैं चाहता हूँ कि बहनें शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और उनसे शराब छोड़नेकी प्रार्थना करें। मैंने मुक्तिसेना ( सालवेशन आर्मी) की बहनोंको ऐसे काम करते हुए देखा है। यदि वे यह काम कर सकती हैं तो भारतीय बहनें क्यों नहीं कर सकती? क्या भारतकी हिन्दू, मुसलमान या पारसी बहनें उनकी तुलनामें किसी प्रकार कम है? क्या जो लोग शरावकी कुठेयमें जकड़े हुए हैं वे उनके भाई नहीं हैं? यदि मैं शराब पीनेवालोंको समझाने जाऊँ तो वे मुझसे, या मेरी जगह कुछ अन्य लोग हों तो वे उनसे झगड़ा करेंगे। किन्तु किसी स्त्रीका अपमान या अनादर वे नहीं कर सकते। वे इतने जड़ नहीं हैं कि आपकी बात न समझें। आपके सम्पर्क में आते ही वे होशमें आ जायेंगे, अपना कदम पीछे हटायेंगे और यह देखकर कि आपकी आँखोंसे प्रेमात झर रहा है, उन्हें ऐसा लगेगा कि यह तो कोई सती या योगिनी ही हमारे पास आई है; और ये लज्जित होकर शराबका त्याग कर देंगे। जिस समय आप बहनें इन शराब पीनेवालोंकी स्त्रियों, उनके बालकों आदिको जानेंगी उनके यहाँ यहाँ मारे-मारे फिरनेवाले अशिक्षित बालकोंसे स्नेह करेंगी और यह देखेंगी कि उनके ऊपर आकाश और नीचे धरती के सिवा और कुछ नहीं है, किन्तु फिर भी वे शराब पीते हैं, तब आप इस पवित्र कार्यको करनेके लिए प्रेरित हुए बिना न रहेंगी।
यदि सरकार मुझे जेल भेज दे तो बहनोंके लिए मैं यह सन्देश छोड़े जा रहा हूँ। गुजरातकी बहनोंको ऐसे कार्योंकी काफी तालीम है। भारतके किसी भी अन्य प्रदेशकी बहनों को ऐसे कार्य करनेका उतना अभ्यास नहीं है जितना यहाँको बहनोंको है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मीट्वनने अपने लिए जो कार्य क्षेत्र चुना है उसमें आप सब बहनें उनके साथ शरीक हों।
इस अहिंसक युद्धमें स्त्रियां पुरुषोंसे भी ज्यादा भाग ले सकती हैं क्योंकि स्त्रियाँ तो त्याग और दयाकी और इसलिए अहिंसाकी मूर्ति हैं। जहाँ पुरुष अहिंसाधर्मको केवल बुद्धिसे ही समझते हैं वहाँ स्त्रियोंके लिए वह एक ऐसी वस्तु है जिसे ये जन्मसे ही जानती है। पुरुष तो बहुत थोड़ी जिम्मेदारी उठाकर ही अपनेको कृतकार्य मान लेता है, किन्तु बहनोंको तो पतिकी, बालकोंकी तथा परिवारके अन्य सभी सदस्योंकी सेवा करनी पड़ती है।
पारसियोंने मुझे इतना दिया है कि मैं उसके बोझ से दबा जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे अपने प्रेमपाश में बाँधकर अपना दास बना दिया है। और दासको तो अपने स्वामीसे अधिकाधिक मांगनेका अधिकार मिल जाता है। इस आत्मशुद्धि के यज्ञमें आप मुझपर धनकी वर्षा करें या स्वयंसेवक दें तो मुझे केवल इतने से सन्तोष होनेवाला नहीं है। सन्तोष तो मुझे तभी होगा जब समस्त पारसी जाति मेरी यह प्रार्थना सुनेगी। और मीट्वहन जो काम कर रही हैं उसे सारे पारसी भाई-बहन अपना लेंगे।
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६३. भाषण : धामणमें'''}}}}
{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
इस ताल्लुकेमें रहनेवाले बहुत से लोग दक्षिण आफ्रिकामें मेरे असामी रहे हैं। इसके आसपासके गाँवोंके लोगोंने भी दक्षिण आफ्रिका [के आन्दोलनों] में अच्छा योगदान
दिया था। हमारे ८० लोगोंके दलमें तो बड़ौदा रियासत के बहुत से लोग हैं ही, क्योंकि गुजरात में यह रियासत काफी दूरतक फैली हुई है। इसलिए हम उन दोनोंमें कोई भेद नहीं कर सकते। यहांके रहनेवालोंने दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रह में मेरी बहुत
मदद की थी, हालांकि उनके अगुआ मुसलमान थे। कांग्रेसने अब तक वर्ग-विशेष के
लोगोंको ऊँचे पद दिये जानेकी नीतिका पालन किया है। किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें
यह प्रथा बिलकुल नहीं थी। इन मुसलमानोंमें भी सिंहकी तरह गरजनेवाले अहमद
काछलिया थे। वे अपने वचनका पालन करनेवाले सिद्ध हुए, इसलिए बतौर एक सत्याग्रहीके मैं कह सकता हूँ कि उनसे बहादुर और नेकी करनेमें बढ़ा-चढ़ा एक भी हिन्दू या मुसलमान हिन्दुस्तानमें अबतक मेरे देखनेमें नहीं आया है। कठिन परिस्थितियों में भी काछलियाने स्वयंको सच्चा सत्याग्रही सिद्ध किया था। उन्होंने सब-कुछ झेला, किन्तु अपने वचनका पालन किया। उनका पुत्र अली भी दक्षिण आफ्रिकामें मेरी देख-रेख में लिखता -पढ़ता था। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता था।
धामणसे तो मुझे बहुत आशा है, क्योंकि इसी गाँवमें मुझे ३० चरखे चलते मिले हैं। मुझे प्रसन्नता है कि इस गांवमें इतने चरखे हैं। सच बात तो यह है कि देशी रियासतोंकी जनता हालांकि इस लड़ाई में भाग नहीं ले सकती, किन्तु खादी और मद्य निषेधका काम तो उटकर कर सकती है। दूसरे, इस बात को समझे बिना कि शारदा ऐक्ट क्या है, बहुत से माता-पिताओंने अपने बच्चोंका विवाह करके जैसा क्रूरता और कलंकपूर्ण कार्य किया है वैसा इस गाँवमें मुझे देखनेको नहीं मिला; इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। यहाँके अन्त्यजोंमें से ९ भाइयों और १० बहनोंने शराब न पीने और मुर्दा मांस न खानेकी प्रतिज्ञा ली है। ऐसे कामोंमें तो स्त्रियोंको भी पुरुषोंके साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
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{{Right|३ अप्रैल, १९३०}}
इस ताल्लुकेमें रहनेवाले बहुत से लोग दक्षिण आफ्रिकामें मेरे असामी रहे हैं। इसके आसपासके गाँवोंके लोगोंने भी दक्षिण आफ्रिका [के आन्दोलनों] में अच्छा योगदान
दिया था। हमारे ८० लोगोंके दलमें तो बड़ौदा रियासत के बहुत से लोग हैं ही, क्योंकि गुजरात में यह रियासत काफी दूरतक फैली हुई है। इसलिए हम उन दोनोंमें कोई भेद नहीं कर सकते। यहांके रहनेवालोंने दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रह में मेरी बहुत
मदद की थी, हालांकि उनके अगुआ मुसलमान थे। कांग्रेसने अब तक वर्ग-विशेष के
लोगोंको ऊँचे पद दिये जानेकी नीतिका पालन किया है। किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें
यह प्रथा बिलकुल नहीं थी। इन मुसलमानोंमें भी सिंहकी तरह गरजनेवाले अहमद
काछलिया थे। वे अपने वचनका पालन करनेवाले सिद्ध हुए, इसलिए बतौर एक सत्याग्रहीके मैं कह सकता हूँ कि उनसे बहादुर और नेकी करनेमें बढ़ा-चढ़ा एक भी हिन्दू या मुसलमान हिन्दुस्तानमें अबतक मेरे देखनेमें नहीं आया है। कठिन परिस्थितियों में भी काछलियाने स्वयंको सच्चा सत्याग्रही सिद्ध किया था। उन्होंने सब-कुछ झेला, किन्तु अपने वचनका पालन किया। उनका पुत्र अली भी दक्षिण आफ्रिकामें मेरी देख-रेख में लिखता -पढ़ता था। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता था।
धामणसे तो मुझे बहुत आशा है, क्योंकि इसी गाँवमें मुझे ३० चरखे चलते मिले हैं। मुझे प्रसन्नता है कि इस गांवमें इतने चरखे हैं। सच बात तो यह है कि देशी रियासतोंकी जनता हालांकि इस लड़ाई में भाग नहीं ले सकती, किन्तु खादी और मद्य निषेधका काम तो उटकर कर सकती है। दूसरे, इस बात को समझे बिना कि शारदा ऐक्ट क्या है, बहुत से माता-पिताओंने अपने बच्चोंका विवाह करके जैसा क्रूरता और कलंकपूर्ण कार्य किया है वैसा इस गाँवमें मुझे देखनेको नहीं मिला; इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। यहाँके अन्त्यजोंमें से ९ भाइयों और १० बहनोंने शराब न पीने और मुर्दा मांस न खानेकी प्रतिज्ञा ली है। ऐसे कामोंमें तो स्त्रियोंको भी पुरुषोंके साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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2026-08-21T13:45:30Z
Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>'''१६४. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''
{{Right|वेजलपुर}}
{{Right|४ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेजिनाल्ड,
तुम्हारा पत्र पाकर बड़ी खुशी हुई। पुनः विश्वास प्राप्त करनेकी तो कोई बात ही नहीं है, क्योंकि तुमने कभी मेरा विश्वास खोया ही नहीं सच्ची अहिंसाको आत्मसात् करनेकी प्रक्रिया बहुत धीमी चलती हैं और कभी-कभी वह कष्टकर भी होती है और बहुत कम लोग इस चीजको समझते हैं कि मानसिक हिंसा जैसी भी कोई वस्तु है और उसे मनसे निकालने की जरूरत होती है। तुम बात तो तुरन्त समझ गये, यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नताका विषय है। तुम्हारे लिखे अन्य पत्रोंकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर तुम अपने मनमें एक और भी निश्चय कर लो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। मेरा मतलब इस निश्चयसे है कि फिलहाल तुम अखवारोंको कोई पत्र नहीं लिखोगे। अभी तुम 'यंग इंडिया' को ही अपना एकमात्र विचारोद्वाहक होने दो।
'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१
अपनी सगाईके विषयमें तुमने जो कुछ कहा है, उसे मैं समझता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३३) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|{{larger|'''१६५. भाषण : वेजलपुरमें'''}}}}
{{Right|४ अप्रैल, १९३०}}
इस सभा के बाद अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचने के पहले मुझे दो भाषण और
देने हैं। दांडीमें यदि भाषण देने जैसी स्थिति हुई तो में भाषण दूंगा। ४१ पटेलोने
इस्तीफे दिये हैं और ताल्लुका कमेटीके प्रधानने उनका अभिनन्दन किया है। इन
४१ इस्तीफों के अतिरिक्त मुझे आज सात इस्तीफे और दिये जानेकी खबर मिली है।
भारत-भूषण पण्डित मदनमोहन मालवीय और उनके बाद अन्य छः व्यक्तियोंने
विधान सभासे इस्तीफा दे दिया है। ये छ: भी जाने-माने व्यक्ति हैं। एक तरफ
२. यंग इंडिया में ऐसी कोई टिप्पणी प्रकाशित नहीं हुई।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६४. पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}[[:en:]]
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प्रिय रेजिनाल्ड,
तुम्हारा पत्र पाकर बड़ी खुशी हुई। पुनः विश्वास प्राप्त करनेकी तो कोई बात ही नहीं है, क्योंकि तुमने कभी मेरा विश्वास खोया ही नहीं सच्ची अहिंसाको आत्मसात् करनेकी प्रक्रिया बहुत धीमी चलती हैं और कभी-कभी वह कष्टकर भी होती है और बहुत कम लोग इस चीजको समझते हैं कि मानसिक हिंसा जैसी भी कोई वस्तु है और उसे मनसे निकालने की जरूरत होती है। तुम बात तो तुरन्त समझ गये, यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नताका विषय है। तुम्हारे लिखे अन्य पत्रोंकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर तुम अपने मनमें एक और भी निश्चय कर लो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। मेरा मतलब इस निश्चयसे है कि फिलहाल तुम अखवारोंको कोई पत्र नहीं लिखोगे। अभी तुम 'यंग इंडिया' को ही अपना एकमात्र विचारोद्वाहक होने दो।
'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१
अपनी सगाईके विषयमें तुमने जो कुछ कहा है, उसे मैं समझता हूँ।
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इस्तीफे दिये हैं और ताल्लुका कमेटीके प्रधानने उनका अभिनन्दन किया है। इन
४१ इस्तीफों के अतिरिक्त मुझे आज सात इस्तीफे और दिये जानेकी खबर मिली है।
भारत-भूषण पण्डित मदनमोहन मालवीय और उनके बाद अन्य छः व्यक्तियोंने
विधान सभासे इस्तीफा दे दिया है। ये छ: भी जाने-माने व्यक्ति हैं। एक तरफ
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प्रिय रेजिनाल्ड,
तुम्हारा पत्र पाकर बड़ी खुशी हुई। पुनः विश्वास प्राप्त करनेकी तो कोई बात ही नहीं है, क्योंकि तुमने कभी मेरा विश्वास खोया ही नहीं सच्ची अहिंसाको आत्मसात् करनेकी प्रक्रिया बहुत धीमी चलती हैं और कभी-कभी वह कष्टकर भी होती है और बहुत कम लोग इस चीजको समझते हैं कि मानसिक हिंसा जैसी भी कोई वस्तु है और उसे मनसे निकालने की जरूरत होती है। तुम बात तो तुरन्त समझ गये, यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नताका विषय है। तुम्हारे लिखे अन्य पत्रोंकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर तुम अपने मनमें एक और भी निश्चय कर लो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। मेरा मतलब इस निश्चयसे है कि फिलहाल तुम अखवारोंको कोई पत्र नहीं लिखोगे। अभी तुम 'यंग इंडिया' को ही अपना एकमात्र विचारोद्वाहक होने दो।
'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१
अपनी सगाईके विषयमें तुमने जो कुछ कहा है, उसे मैं समझता हूँ।
सस्नेह,
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३३) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
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इस सभा के बाद अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचने के पहले मुझे दो भाषण और
देने हैं। दांडीमें यदि भाषण देने जैसी स्थिति हुई तो में भाषण दूंगा। ४१ पटेलोने
इस्तीफे दिये हैं और ताल्लुका कमेटीके प्रधानने उनका अभिनन्दन किया है। इन
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भारत-भूषण पण्डित मदनमोहन मालवीय और उनके बाद अन्य छः व्यक्तियोंने
विधान सभासे इस्तीफा दे दिया है। ये छ: भी जाने-माने व्यक्ति हैं। एक तरफ
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तुम्हारा पत्र पाकर बड़ी खुशी हुई। पुनः विश्वास प्राप्त करनेकी तो कोई बात ही नहीं है, क्योंकि तुमने कभी मेरा विश्वास खोया ही नहीं सच्ची अहिंसाको आत्मसात् करनेकी प्रक्रिया बहुत धीमी चलती हैं और कभी-कभी वह कष्टकर भी होती है और बहुत कम लोग इस चीजको समझते हैं कि मानसिक हिंसा जैसी भी कोई वस्तु है और उसे मनसे निकालने की जरूरत होती है। तुम बात तो तुरन्त समझ गये, यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नताका विषय है। तुम्हारे लिखे अन्य पत्रोंकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अगर तुम अपने मनमें एक और भी निश्चय कर लो तो मुझे बड़ी खुशी होगी। मेरा मतलब इस निश्चयसे है कि फिलहाल तुम अखवारोंको कोई पत्र नहीं लिखोगे। अभी तुम 'यंग इंडिया' को ही अपना एकमात्र विचारोद्वाहक होने दो।
'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१
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'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
पंक्तियाँ लिखनेके बारेमें तुम्हारा क्या खयाल है?१
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भारत-भूषण पण्डित मदनमोहन मालवीय और उनके बाद अन्य छः व्यक्तियोंने
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'यंग इंडिया' में अनजानमें हुई अपनी भूलके विषयमें पश्चात्ताप करते हुए चंद
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>तो भारत भूषण मालवीयजी ने इस्तीफा दिया और दूसरी तरफ पटेलोंने इस्तीफे दिये,
किन्तु पटेलोंके इस्तीफोंकी कीमत ज्यादा है। मालवीयजी तो सरकारके नौकर नहीं थे। यदि सम्भव हो तो देशसेवा करनेके विचारसे ये विधान सभामें गये थे। मैं नहीं जानता कि मालवीयजीने जिस तरह अनन्य भक्तिसे देशकी सेवा की है उस तरह किसी औरने की हो किन्तु इसके बावजूद में पण्डितजी के इस्तीफेकी अपेक्षा पटेलोंके इस्तीफोंकी कीमत ज्यादा आंकता है। इसका कारण यह है कि मालवीयजी इस सरकारके शासनको चलाने में योग नहीं देते थे। उसका शासन तो ये पटेल चलाते हैं और जिस शासनसे हम डरते हैं उसे तो मालवीयजी चमकाते-भर हैं। इस चमकको वर्तनसे अलग किया जा सकता है, किन्तु पटेल ऐसी चमक नहीं है जिसे अलग किया जा सके। पटेल और तलाटी तो इस सरकारके दो पैर है। यदि हम इस देशके ७ लाख गाँवोंके पटेलों और तलाटियोंकी गिनती करें तो इस सरकार के १४ लाख पैर है और इस प्रकार एक-एक पटेल के इस्तीफा देनेका मतलब होगा उसका एक-एक पैर टूटना। इस कारण इन इस्तीफों की कीमत है, बशर्ते कि वे इस्तीफे ईमानदारी से दिये गये हों। जहाँ एक समय सरदारकी मासिक आय १,००० २,००० रुपये थी, वहाँ उन्हें आज भीखका अन्न खाना पड़ता है। उनके लिए इस्तीफा देना मुश्किल था। किन्तु बेचारे पटेलको तो ५०) या ५१|| ) रुपये नजराना मिलता है। तो फिर पटेल ऐसे कौन-से सजानेसे चिपके हुए हैं कि जिसे वे छोड़ नहीं पाते? अतः यदि पटेल सरदारके प्रति बफादारी निभाना चाहते हों तो उन्हें सरकार से बेवफाई करनी चाहिए।
मैं दौड़ी जा रहा हूँ। किन्तु मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप दांडी आयें और यदि आना ही चाहें तो सैनिकोंकी भांति अपने एक कन्थेपर पानी और दूसरेपर खाना लेकर आयें और कुछ काम करनेके विवारसे आयें। वन भोजन के खयालसे न आयें। खादीका भण्डार खत्म होता आ रहा है। आपको उसका व्यवहार घी की भाँति करना चाहिए। यदि खादी न मिल सके तो आप सबको यह अधिकार है कि आप खादीकी लँगोटी-भर लगाकर आयें किन्तु विदेशी कपड़े पहनकर कदापि न आयें। मद्यपान करनेवालोंको तो दांडी आना ही नहीं चाहिए और यदि आयें तो शराब छोड़नेकी प्रतिज्ञा लेनेके लिए।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु,''' ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु,''' ६-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२७
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text/x-wiki
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{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
कहा जा सकता है कि ईश्वरी कृपासे स्वाधीनताके इस अन्तिम -- कमसे कम मैं तो इसे अन्तिम ही मानता हूँ। --संग्रामका पहला पर्व सकुशल समाप्त हो गया है। मेरे पूरे कूलके दौरान सरकारने कोई हस्तक्षेप न करनेकी जिस नीतिका पालन किया उसके लिए मैं उसकी भी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता सरकारने बहुत ही अशोभन और बचकाने ढंगसे श्री वल्लभभाईको गिरफ्तार करके सजा दे दी और फिर श्री सेनगुप्तको भी उसी तरह बिना किसी कारणके गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। इन दोनों घटनाओंको देखते हुए मुझे यह आशा नहीं थी कि सरकार हस्तक्षेप करनेकी नीतिका ऐसा अच्छा नमूना पेश करेगी। मैं ऐसा नासमझ नहीं हूँ कि यह मान बैठूं कि जनता के क्रोधको भड़काकर फिर उसे भयंकर सजा देनेकी सरकारकी देख-परखी क्षमता सहसा समाप्त हो गई है। काश में ऐसा मान सकता कि सरकार के इस अहस्तक्षेपका कारण उसकी नीति या उसके हृदयमें हुआ किसी प्रकारका सच्चा परिवर्तन है! विधान सभामें उसने जन भावनाका जो घोर निरादर किया है और उसने जो अन्यायपूर्ण कार्य किये हैं उनके बाद इस वातमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि भारतके हृदयहीन शोषणकी नीतको हर कीमत पर कायम रखना है। इसलिए सरकारकी हस्तक्षेप न करनेकी नीतिका में एक ही अर्थ लगा सकता हूँ। वह यह है कि यद्यपि ब्रिटिश सरकार बहुत शक्तिशाली है, फिर भी इसे दुनिया के लोकमत की बड़ी चिन्ता है और दुनियाका लोकमत राजनीतिक आन्दोलनका दमन करनेकी कार्रवाईको और निःसन्देह सविनय अवज्ञा एक राजनीतिक आन्दोलन हैं तबतक बरदाश्त नहीं करेगा जबतक अवशामें विनय है और इसलिए जबतक वह लाजिमी तौरपर अहिंसक है।
अब यह देखना है कि जब कल असंख्य लोग सचमुच नमक -कानूनों को भंग
करेंगे तब वह उसे उसी प्रकार वरदाश्त करती है या नहीं, जिस प्रकार उसने कूचको
वरदास्त किया। मुझे आशा है कि कार्य समितिके प्रस्तावके प्रति जनता व्यापक
उत्साहका परिचय देगी। मैं यह सूचना पहले ही जारी कर चुका हूँ कि देशकी सभी
समितियाँ और संगठन, यदि वे तैयार हों तो, कलसे नमक-कानूनों के खिलाफ सविनय अवज्ञा शुरू करनेके लिए स्वतन्त्र हैं, और इस सूचनाको स्थगित करनेका कोई कारण मुझे दिखाई नहीं देता। ईश्वरने चाहा तो मैं अपने साथियों (स्वयंसेवकों) के साथ कल साढ़े छः बजे सुबहसे वास्तव में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ कर देनेकी आशा रखता हूँ। जलियाँवाला बागके काण्डके दिनसे ही ६ अप्रैल हमारे लिए प्रायश्चित्त और
आत्मशुद्धिका दिन रहा है। इसलिए हम इसका समारम्भ प्रार्थना और उपवाससे<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६६. वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
कहा जा सकता है कि ईश्वरी कृपासे स्वाधीनताके इस अन्तिम -- कमसे कम मैं तो इसे अन्तिम ही मानता हूँ। --संग्रामका पहला पर्व सकुशल समाप्त हो गया है। मेरे पूरे कूचके दौरान सरकारने कोई हस्तक्षेप न करनेकी जिस नीतिका पालन किया उसके लिए मैं उसकी भी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। सरकारने बहुत ही अशोभन और बचकाने ढंगसे श्री वल्लभभाईको गिरफ्तार करके सजा दे दी और फिर श्री सेनगुप्तको भी उसी तरह बिना किसी कारणके गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। इन दोनों घटनाओंको देखते हुए मुझे यह आशा नहीं थी कि सरकार हस्तक्षेप करनेकी नीतिका ऐसा अच्छा नमूना पेश करेगी। मैं ऐसा नासमझ नहीं हूँ कि यह मान बैठूं कि जनता के क्रोधको भड़काकर फिर उसे भयंकर सजा देनेकी सरकारकी देख-परखी क्षमता सहसा समाप्त हो गई है। काश मैं ऐसा मान सकता कि सरकार के इस अहस्तक्षेपका कारण उसकी नीति या उसके हृदयमें हुआ किसी प्रकारका सच्चा परिवर्तन है! विधान सभामें उसने जन भावनाका जो घोर निरादर किया है और उसने जो अन्यायपूर्ण कार्य किये हैं उनके बाद इस बातमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि भारतके हृदयहीन शोषणकी नीतको हर कीमत पर कायम रखना है। इसलिए सरकारकी हस्तक्षेप न करनेकी नीतिका मैं एक ही अर्थ लगा सकता हूँ। वह यह है कि यद्यपि ब्रिटिश सरकार बहुत शक्तिशाली है, फिर भी इसे दुनिया के लोकमत की बड़ी चिन्ता है और दुनियाका लोकमत राजनीतिक आन्दोलनका दमन करनेकी कार्रवाईको और निःसन्देह सविनय अवज्ञा एक राजनीतिक आन्दोलन हैं - तबतक बरदाश्त नहीं करेगा जबतक अवशामें विनय है और इसलिए जबतक वह लाजिमी तौरपर अहिंसक है।
अब यह देखना है कि जब कल असंख्य लोग सचमुच नमक-कानूनों को भंग करेंगे तब वह उसे उसी प्रकार वरदाश्त करती है या नहीं, जिस प्रकार उसने कूचको
वरदास्त किया। मुझे आशा है कि कार्य समितिके प्रस्तावके प्रति जनता व्यापक
उत्साहका परिचय देगी। मैं यह सूचना पहले ही जारी कर चुका हूँ कि देशकी सभी
समितियाँ और संगठन, यदि वे तैयार हों तो, कलसे नमक-कानूनों के खिलाफ सविनय अवज्ञा शुरू करनेके लिए स्वतन्त्र हैं, और इस सूचनाको स्थगित करनेका कोई कारण मुझे दिखाई नहीं देता। ईश्वरने चाहा तो मैं अपने साथियों (स्वयंसेवकों) के साथ कल साढ़े छः बजे सुबहसे वास्तव में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ कर देनेकी आशा रखता हूँ। जलियाँवाला बागके काण्डके दिनसे ही ६ अप्रैल हमारे लिए प्रायश्चित्त और
आत्मशुद्धिका दिन रहा है। इसलिए हम इसका समारम्भ प्रार्थना और उपवाससे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करेंगे। मुझे उम्मीद है कि सारा देश कल राष्ट्रीय सप्ताहको उसी भावनासे मनायेगा
जिस भावनासे इसकी कल्पना की गई थी। मेरा निश्चत मत है कि देश कार्यके लिए
हममें जितना ज्यादा उत्सर्गका भाव होगा और हमारी आत्मशुद्धि जितनी अधिक हुई
होगी, हम अपने उस शानदार लक्ष्यको उतनी ही जल्दी प्राप्त करेंगे जिसके लिए
भारतके करोड़ों लोग जाने-अनजाने प्रयत्नशील हैं।
[अंग्रेजीसे]
'''स्पीवेज एंड राइटिंग्ज ऑफ महात्मा गांधी'''
{{C|{{larger|'''१६७. एक सन्देश'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
शक्तिके विरुद्ध न्यायकी इस लड़ाई में सारी दुनियाको सहानुभूति चाहता हैं।
{{Right|मो० क० गांधी}}
'''महात्मा गांधी''' (अलबम) में उपलब्ध अंग्रेजीकी फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१६८. सन्देश : अमेरिकाको१'''}}}}
{{Right|दांडी,}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
मैं जानता ह कि अमेरिकामें मेरे असंख्य मित्र हैं, जिनकी इस संघर्षमें गहरी
सहानुभूति है, लेकिन मात्र सहानुभूति मेरे किसी कामकी न होगी। जरूरत इस बातकी
है कि भारत के स्वतन्त्रताके सहज अधिकारके पक्ष में जनमतकी ठोस अभिव्यक्ति हो
और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाये गये पूर्ण अहिंसात्मक उपायसे पूरी सहमति
व्यक्तकी जाये। मैं पूरी नम्रताके साथ किन्तु साथ ही पूरी सचाईसे दावा करता
हूँ कि यदि हम अहिंसात्मक तरीकेसे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो यह भारत
द्वारा विश्वको दिया गया एक सन्देश होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, ७-४-१९३०
१. पढ सन्देश न्यूयार्ककी ईस्टने न्यूज एंड प्रेस एजेंसीके संवाददाता एस० ए० को दिया गया था।<noinclude></noinclude>
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जिस भावनासे इसकी कल्पना की गई थी। मेरा निश्चत मत है कि देश कार्यके लिए
हममें जितना ज्यादा उत्सर्गका भाव होगा और हमारी आत्मशुद्धि जितनी अधिक हुई
होगी, हम अपने उस शानदार लक्ष्यको उतनी ही जल्दी प्राप्त करेंगे जिसके लिए
भारतके करोड़ों लोग जाने-अनजाने प्रयत्नशील हैं।
[अंग्रेजीसे]
'''स्पीवेज एंड राइटिंग्ज ऑफ महात्मा गांधी'''
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शक्तिके विरुद्ध न्यायकी इस लड़ाई में सारी दुनियाको सहानुभूति चाहता हैं।
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'''महात्मा गांधी''' (अलबम) में उपलब्ध अंग्रेजीकी फोटो नकलसे।
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{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
मैं जानता ह कि अमेरिकामें मेरे असंख्य मित्र हैं, जिनकी इस संघर्षमें गहरी
सहानुभूति है, लेकिन मात्र सहानुभूति मेरे किसी कामकी न होगी। जरूरत इस बातकी
है कि भारत के स्वतन्त्रताके सहज अधिकारके पक्ष में जनमतकी ठोस अभिव्यक्ति हो
और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाये गये पूर्ण अहिंसात्मक उपायसे पूरी सहमति
व्यक्तकी जाये। मैं पूरी नम्रताके साथ किन्तु साथ ही पूरी सचाईसे दावा करता
हूँ कि यदि हम अहिंसात्मक तरीकेसे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो यह भारत
द्वारा विश्वको दिया गया एक सन्देश होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, ७-४-१९३०
१. पढ सन्देश न्यूयार्ककी ईस्टने न्यूज एंड प्रेस एजेंसीके संवाददाता एस० ए० को दिया गया था।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करेंगे। मुझे उम्मीद है कि सारा देश कल राष्ट्रीय सप्ताहको उसी भावनासे मनायेगा
जिस भावनासे इसकी कल्पना की गई थी। मेरा निश्चत मत है कि देश कार्यके लिए
हममें जितना ज्यादा उत्सर्गका भाव होगा और हमारी आत्मशुद्धि जितनी अधिक हुई
होगी, हम अपने उस शानदार लक्ष्यको उतनी ही जल्दी प्राप्त करेंगे जिसके लिए
भारतके करोड़ों लोग जाने-अनजाने प्रयत्नशील हैं।
[अंग्रेजीसे]
'''स्पीवेज एंड राइटिंग्ज ऑफ महात्मा गांधी'''
{{C|{{larger|'''१६७. एक सन्देश'''}}}}
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{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
शक्तिके विरुद्ध न्यायकी इस लड़ाई में सारी दुनियाको सहानुभूति चाहता हैं।
{{Right|मो० क० गांधी}}
'''महात्मा गांधी''' (अलबम) में उपलब्ध अंग्रेजीकी फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१६८. सन्देश : अमेरिकाको१'''}}}}
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{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
मैं जानता हूं कि अमेरिकामें मेरे असंख्य मित्र हैं, जिनकी इस संघर्षमें गहरी सहानुभूति है, लेकिन मात्र सहानुभूति मेरे किसी कामकी न होगी। जरूरत इस बातकी है कि भारत के स्वतन्त्रताके सहज अधिकारके पक्ष में जनमतकी ठोस अभिव्यक्ति हो और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाये गये पूर्ण अहिंसात्मक उपायसे पूरी सहमति व्यक्तकी जाये। मैं पूरी नम्रताके साथ किन्तु साथ ही पूरी सचाईसे दावा करता हूँ कि यदि हम अहिंसात्मक तरीकेसे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो यह भारत द्वारा विश्वको दिया गया एक सन्देश होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, ७-४-१९३०
१. पढ सन्देश न्यूयार्ककी ईस्टने न्यूज एंड प्रेस एजेंसीके संवाददाता एस० ए० को दिया गया था।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करेंगे। मुझे उम्मीद है कि सारा देश कल राष्ट्रीय सप्ताहको उसी भावनासे मनायेगा
जिस भावनासे इसकी कल्पना की गई थी। मेरा निश्चत मत है कि देश कार्यके लिए
हममें जितना ज्यादा उत्सर्गका भाव होगा और हमारी आत्मशुद्धि जितनी अधिक हुई
होगी, हम अपने उस शानदार लक्ष्यको उतनी ही जल्दी प्राप्त करेंगे जिसके लिए
भारतके करोड़ों लोग जाने-अनजाने प्रयत्नशील हैं।
[अंग्रेजीसे]
'''स्पीवेज एंड राइटिंग्ज ऑफ महात्मा गांधी'''
{{C|{{larger|'''१६७. एक सन्देश'''}}}}
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{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
शक्तिके विरुद्ध न्यायकी इस लड़ाई में सारी दुनियाकी सहानुभूति चाहता हूं।
{{Right|मो० क० गांधी}}
'''महात्मा गांधी''' (अलबम) में उपलब्ध अंग्रेजीकी फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१६८. सन्देश : अमेरिकाको१'''}}}}
{{Right|दांडी,}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
मैं जानता हूं कि अमेरिकामें मेरे असंख्य मित्र हैं, जिनकी इस संघर्षमें गहरी सहानुभूति है, लेकिन मात्र सहानुभूति मेरे किसी कामकी न होगी। जरूरत इस बातकी है कि भारत के स्वतन्त्रताके सहज अधिकारके पक्ष में जनमतकी ठोस अभिव्यक्ति हो और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाये गये पूर्ण अहिंसात्मक उपायसे पूरी सहमति व्यक्तकी जाये। मैं पूरी नम्रताके साथ किन्तु साथ ही पूरी सचाईसे दावा करता हूँ कि यदि हम अहिंसात्मक तरीकेसे अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो यह भारत द्वारा विश्वको दिया गया एक सन्देश होगा।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, ७-४-१९३०
१. यह सन्देश न्यूयार्ककी ईस्टर्न न्यूज एंड प्रेस एजेंसीके संवाददाता एस० ए० को दिया गया था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{||भाषण दांडीमें|१८९}}</noinclude>पहनकर आयेगा तो मुझे दांडीकी सीमापर स्वयंसेवक नियुक्त करने पड़ेंगे और वे
लोग उनके पांवोंमें गिरकर उनसे खादी पहननेका अनुरोध करेंगे और उनके ऐसा
करनेसे यदि आपको दुःख हो और आप उन्हें थप्पड़ मारें तो भी ये सत्याग्रही आपके
प्रहारोको सहन करेंगे।
इस कार्यके लिए दीका चुनाव मनुष्यका नहीं, ईश्वरका किया हुआ है। जहाँ
अनाज न मिलता हो, जहाँ पानीके अभावका डर हो, जहां हजारों लोग बहुत असु
विधा सहकर ही पहुँच सकते हों, जहाँ पहुँचने के लिए स्टेशनसे दस मील चलना पड़ता हो, पैदल चलनेवालेको कीचड़ भरी खाड़ी लाँघनी पड़ती हो, ऐसी एक दूरवर्ती
जगहको सत्याग्रहके लिए चुना गया, इसका भला इसके सिवा और क्या कारण हो
सकता है? सच तो यह है कि हमारी यह लड़ाई कष्ट सहनेकी ही लड़ाई है।
आप लोगोंने नवसारीसे दांडी तक सारे रास्तेमें जगह-जगह प्याऊकी व्यवस्था
करके इस रास्तेको सारी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया है। यदि इस लड़ाईमें आपकी
सम्मति न होती, आपकी शुभेच्छा न होती तो आप यह सब क्यों करते?
दांडीमें जो भी आये उसे इस भावनासे आना चाहिए कि दांडी एक पवित्र
स्थान है, यहाँ झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी तरहका पाप नहीं करना चाहिए।
यदि आप यहाँ सच्चे सेवकोंकी भावनासे आयेंगे और सरकार कितना भी डर दिखाये
उसका डर माने बिना नमक- कानूनकी सविनय अवज्ञा करेंगे तथा जो भी दूसरे काम
आपसे करने को कहा जाये उन्हें उठा लेंगे तो आप देखेंगे कि इसी एक सप्ताह में
स्वराज्यका कानून बनने लगेगा। ईश्वरकी शक्ति ऐसी महान् है कि अपना यह
जन्मसिद्ध अधिकार हम एक ही दिनमें पा सकते हैं।
ब्रिटिश कानून कहता है कि हरएक व्यक्तिका शरीर पवित्र है। उसकी इसी
सीखने आकृष्ट होकर में ब्रिटिश राज्यपर मुग्ध हुआ था। इस कानूनके अनुसार,
मनुष्य भयंकर हत्याका अपराधी हो तो भी सिपाही उसे मार नहीं सकता; सिपाही-
को उसे जीवित पकड़कर ही न्यायालय में हाजिर करना चाहिए। जेलके बाहर सिपाही-
को किसी आदमीसे चोरीका माल छीनने का भी अधिकार नहीं है। किन्तु आज तो
उलटा न्याय चल रहा है। मेरी बंद मुट्ठीमें नमक है या कंकड़, इसका निर्णय पुलिस
कैसे कर सकती है?
प्रत्येक मनुष्यका घर उसका किला है। हमारा शरीर भी एक प्रकारका किला
ही है। और यदि नमक एक बार इस किले के भीतर आ जाये तो फिर वह बाहर नहीं जाना चाहिए, चाहे हमारे सिरोपर घोड़े ही क्यों न दौड़ा दिये जायें। हमें आजसे
ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा मनोबल इतना दृढ़ हो कि चाहे हाथ कट
जाये, पर नमककी मुट्ठी न खुले।
किसीके घरमें जबरदस्ती घुसना जंगलीपन है मेरे हाथमें धूल है या नमक, इसका निर्णय तो न्यायाधीश करता है । अंग्रेजोंका कानून तो शरीरको पवित्र मानता है। हरएक सरकारी अधिकारी न्यायाधीश बनकर लोगोंके घरोंमें प्रवेश करने लगे तो उसके इस कार्यको डाकुओंका धंधा ही कहा जा सकता है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{||भाषण:दांडीमें|१८९}}</noinclude>पहनकर आयेगा तो मुझे दांडीकी सीमापर स्वयंसेवक नियुक्त करने पड़ेंगे और वे
लोग उनके पांवोंमें गिरकर उनसे खादी पहननेका अनुरोध करेंगे और उनके ऐसा
करनेसे यदि आपको दुःख हो और आप उन्हें थप्पड़ मारें तो भी ये सत्याग्रही आपके
प्रहारोको सहन करेंगे।
इस कार्यके लिए दीका चुनाव मनुष्यका नहीं, ईश्वरका किया हुआ है। जहाँ
अनाज न मिलता हो, जहाँ पानीके अभावका डर हो, जहां हजारों लोग बहुत असु
विधा सहकर ही पहुँच सकते हों, जहाँ पहुँचने के लिए स्टेशनसे दस मील चलना पड़ता हो, पैदल चलनेवालेको कीचड़ भरी खाड़ी लाँघनी पड़ती हो, ऐसी एक दूरवर्ती
जगहको सत्याग्रहके लिए चुना गया, इसका भला इसके सिवा और क्या कारण हो
सकता है? सच तो यह है कि हमारी यह लड़ाई कष्ट सहनेकी ही लड़ाई है।
आप लोगोंने नवसारीसे दांडी तक सारे रास्तेमें जगह-जगह प्याऊकी व्यवस्था
करके इस रास्तेको सारी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया है। यदि इस लड़ाईमें आपकी
सम्मति न होती, आपकी शुभेच्छा न होती तो आप यह सब क्यों करते?
दांडीमें जो भी आये उसे इस भावनासे आना चाहिए कि दांडी एक पवित्र
स्थान है, यहाँ झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी तरहका पाप नहीं करना चाहिए।
यदि आप यहाँ सच्चे सेवकोंकी भावनासे आयेंगे और सरकार कितना भी डर दिखाये
उसका डर माने बिना नमक- कानूनकी सविनय अवज्ञा करेंगे तथा जो भी दूसरे काम
आपसे करने को कहा जाये उन्हें उठा लेंगे तो आप देखेंगे कि इसी एक सप्ताह में
स्वराज्यका कानून बनने लगेगा। ईश्वरकी शक्ति ऐसी महान् है कि अपना यह
जन्मसिद्ध अधिकार हम एक ही दिनमें पा सकते हैं।
ब्रिटिश कानून कहता है कि हरएक व्यक्तिका शरीर पवित्र है। उसकी इसी
सीखने आकृष्ट होकर में ब्रिटिश राज्यपर मुग्ध हुआ था। इस कानूनके अनुसार,
मनुष्य भयंकर हत्याका अपराधी हो तो भी सिपाही उसे मार नहीं सकता; सिपाही-
को उसे जीवित पकड़कर ही न्यायालय में हाजिर करना चाहिए। जेलके बाहर सिपाही-
को किसी आदमीसे चोरीका माल छीनने का भी अधिकार नहीं है। किन्तु आज तो
उलटा न्याय चल रहा है। मेरी बंद मुट्ठीमें नमक है या कंकड़, इसका निर्णय पुलिस
कैसे कर सकती है?
प्रत्येक मनुष्यका घर उसका किला है। हमारा शरीर भी एक प्रकारका किला
ही है। और यदि नमक एक बार इस किले के भीतर आ जाये तो फिर वह बाहर नहीं जाना चाहिए, चाहे हमारे सिरोपर घोड़े ही क्यों न दौड़ा दिये जायें। हमें आजसे
ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा मनोबल इतना दृढ़ हो कि चाहे हाथ कट
जाये, पर नमककी मुट्ठी न खुले।
किसीके घरमें जबरदस्ती घुसना जंगलीपन है मेरे हाथमें धूल है या नमक, इसका निर्णय तो न्यायाधीश करता है । अंग्रेजोंका कानून तो शरीरको पवित्र मानता है। हरएक सरकारी अधिकारी न्यायाधीश बनकर लोगोंके घरोंमें प्रवेश करने लगे तो उसके इस कार्यको डाकुओंका धंधा ही कहा जा सकता है।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
2191
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण:दांडीमें|१८९}}</noinclude>पहनकर आयेगा तो मुझे दांडीकी सीमापर स्वयंसेवक नियुक्त करने पड़ेंगे और वे
लोग उनके पांवोंमें गिरकर उनसे खादी पहननेका अनुरोध करेंगे और उनके ऐसा
करनेसे यदि आपको दुःख हो और आप उन्हें थप्पड़ मारें तो भी ये सत्याग्रही आपके
प्रहारोको सहन करेंगे।
इस कार्यके लिए दीका चुनाव मनुष्यका नहीं, ईश्वरका किया हुआ है। जहाँ
अनाज न मिलता हो, जहाँ पानीके अभावका डर हो, जहां हजारों लोग बहुत असु
विधा सहकर ही पहुँच सकते हों, जहाँ पहुँचने के लिए स्टेशनसे दस मील चलना पड़ता हो, पैदल चलनेवालेको कीचड़ भरी खाड़ी लाँघनी पड़ती हो, ऐसी एक दूरवर्ती
जगहको सत्याग्रहके लिए चुना गया, इसका भला इसके सिवा और क्या कारण हो
सकता है? सच तो यह है कि हमारी यह लड़ाई कष्ट सहनेकी ही लड़ाई है।
आप लोगोंने नवसारीसे दांडी तक सारे रास्तेमें जगह-जगह प्याऊकी व्यवस्था
करके इस रास्तेको सारी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया है। यदि इस लड़ाईमें आपकी
सम्मति न होती, आपकी शुभेच्छा न होती तो आप यह सब क्यों करते?
दांडीमें जो भी आये उसे इस भावनासे आना चाहिए कि दांडी एक पवित्र
स्थान है, यहाँ झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी तरहका पाप नहीं करना चाहिए।
यदि आप यहाँ सच्चे सेवकोंकी भावनासे आयेंगे और सरकार कितना भी डर दिखाये
उसका डर माने बिना नमक- कानूनकी सविनय अवज्ञा करेंगे तथा जो भी दूसरे काम
आपसे करने को कहा जाये उन्हें उठा लेंगे तो आप देखेंगे कि इसी एक सप्ताह में
स्वराज्यका कानून बनने लगेगा। ईश्वरकी शक्ति ऐसी महान् है कि अपना यह
जन्मसिद्ध अधिकार हम एक ही दिनमें पा सकते हैं।
ब्रिटिश कानून कहता है कि हरएक व्यक्तिका शरीर पवित्र है। उसकी इसी
सीखने आकृष्ट होकर में ब्रिटिश राज्यपर मुग्ध हुआ था। इस कानूनके अनुसार,
मनुष्य भयंकर हत्याका अपराधी हो तो भी सिपाही उसे मार नहीं सकता; सिपाही-
को उसे जीवित पकड़कर ही न्यायालय में हाजिर करना चाहिए। जेलके बाहर सिपाही-
को किसी आदमीसे चोरीका माल छीनने का भी अधिकार नहीं है। किन्तु आज तो
उलटा न्याय चल रहा है। मेरी बंद मुट्ठीमें नमक है या कंकड़, इसका निर्णय पुलिस
कैसे कर सकती है?
प्रत्येक मनुष्यका घर उसका किला है। हमारा शरीर भी एक प्रकारका किला
ही है। और यदि नमक एक बार इस किले के भीतर आ जाये तो फिर वह बाहर नहीं जाना चाहिए, चाहे हमारे सिरोपर घोड़े ही क्यों न दौड़ा दिये जायें। हमें आजसे
ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा मनोबल इतना दृढ़ हो कि चाहे हाथ कट
जाये, पर नमककी मुट्ठी न खुले।
किसीके घरमें जबरदस्ती घुसना जंगलीपन है मेरे हाथमें धूल है या नमक, इसका निर्णय तो न्यायाधीश करता है । अंग्रेजोंका कानून तो शरीरको पवित्र मानता है। हरएक सरकारी अधिकारी न्यायाधीश बनकर लोगोंके घरोंमें प्रवेश करने लगे तो उसके इस कार्यको डाकुओंका धंधा ही कहा जा सकता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३२
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Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
672692
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>किन्तु भारतके अधिकारी तो जरूरत पड़नेपर इन सारे कानूनोंको ताक पर रख देते हैं और १८१८ के कानूनका सहारा लेकर उनकी सम्पूर्ण उपेक्षा कर देते हैं।
इस समय एकके-बाद-एक सारे नेता पकड़े जा रहे हैं। लेकिन इस लड़ाई में तो ऐसा कोई भी आदमी, जो सबसे ज्यादा कष्ट सहनेके लिए तैयार हो, नेता बन सकता है। इस नियमके अनुसार जो लोग बाहर हैं, उनमें से कोई भी नेताका पद सँभाल सकता है और लड़ाईको जारी रख सकता है।
यह लड़ाई किसी एक मनुष्यकी नहीं, करोड़ोंकी है। यदि तीन-चार आदमी ही लड़कर स्वराज्य प्राप्त कर सकते हों तब तो देशकी शासन सत्ता भी उन तीन-चार आदमियोंके हाथ में ही चली जायेगी। अतः स्वराज्यकी इस लड़ाई में तो करोड़ों आदमियोंको अपना बलिदान देकर ऐसा स्वराज्य हासिल करना है जो करोड़ोंके लिए लाभदायी हो।
सरकार देशके बड़े नेताओंको एक-एक करके गिरफ्तार करती जा रही है। यदि
हम उनके बताये रास्तेपर चलनेके लिए तैयार हों और उनके बताये धर्मका पालन
कर सकते हों तब तो हम हँस सकते हैं, अन्यथा हमें लज्जित होना चाहिए। नेता
लोग तो चले गये; अब हमें यही मानना चाहिए कि हमारी बारी आ गयी है।
गुजरात और अन्यान्य प्रदेशोंके इतने सारे नेता जेल गये हैं और कितने ही
स्वयंसेवक अपने नमककी रक्षाके प्रयत्नमें घायल हो चुके हैं तथा कहीं-कहीं कुछ स्वयं-सेवकों पर तो इतनी मार पड़ी है कि वे बेहोश तक हो गये। किन्तु मेरे मन पर
इसका कोई असर नहीं हुआ है। मेरा हृदय आज पत्थर जैसा कठोर हो गया है।
यदि इस लड़ाई में हजारों नहीं, लाखों मनुष्योंकी बलि देनी पड़े तो मैं उसके लिए भी
तैयार हूँ। हमने हजारों आदमियोंको जेल भेजनेका आन्दोलन ही छेड़ा है, इसलिए
यदि कोई उन्हें गिरफ्तार करता है और जेल ले जाता है तो इसमें रोनेका कोई
कारण नहीं है। यह तो चौपड़का एक ऐसा खेल है जिसमें हमारा मनचाहा पासा
पड़ रहा है। तब इसमें हँसने या रोनेकी क्या बात है ? यह तो ईश्वरकी कृपा
है; जो चमत्कार हो रहे हैं, हम उनका तटस्थतापूर्वक निरीक्षण करें।
हमारे नमक-कानूनकी विविध धाराओंको तोड़नेके बावजूद यदि सरकार हमारे ऊपर हाथ नहीं डालती तो तेरह तारीखके बाद में इस शिविरको तोड़ दूंगा और हम कहीं अन्यत्र चले जायेंगे। लेकिन यह योजना इस बात पर निर्भर है कि सरकार क्या करती है। अभी तो हमें सरकारके रंग-ढंगको देखकर ही अपने व्यवहारका निश्चय करना है।
आप लोग अभी तक नमक लानेके लिए न गये हों तो सारे गाँव के लोग
मिलकर एक साथ जायें। अपनी मुट्ठीमें नमक भर लें और ऐसा समझें कि आपके
हाथमें ६ करोड़ रुपयेका नमक है। सरकार इस नमक कर के द्वारा हर वर्ष हमारे
पाससे ६ करोड़ रुपया ले जाती है।
आप लोग आजसे सरकारी नमक न खानेकी प्रतिज्ञा कर सकते हैं। आपके
घरके आंगन में तो नमककी खान पड़ी है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३५
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||ओलपाडमें दिये गये भाषण के अंश|३९१}}</noinclude>मैंने सुना है कि सूरतमें जब कुछ बहनें शराबके विरोध में चक्कर लगाने निकली तो ठेकेके मालिकोंने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। किसीने उनपर ढेला फेंका था; यह सुनकर मुझे शर्म आई। जो व्यक्ति इन बहनोंसे गुस्ताखी करे या उन्हें भला-बुरा कहे या उनपर ठेला चलाये, उसे तो इसके पहले ही डूब मरना चाहिए। वह शराबी हो तो भी क्या हुआ ? क्या शराबियोंके माँ-बहनें नहीं होतीं? ये बहनें आकर किसीसे दुर्वचन नहीं कहती। ये तो दीनतापूर्वक विनय करती हैं। तो क्या वह उनका अपराध हो गया? इतना ओज तो इस देशके हर व्यक्तिमें होना चाहिए कि बहनोंको ऐसा अपमान न सहना पड़े। किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि गाली देनेवाले पर गुस्सा किया जाये। बल्कि किसी पुरुषकी यह हिम्मत ही कैसे होती है कि वह किसी बहनको गालियाँ दे या हेला मारे ? बल्कि उसे तो यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु, मैं ऐसा अत्याचार करूँ, उसके पहले तू मेरा हाथ तोड़ देना ।
हाथ किसपर उठाया जा सकता है? यदि कोई आपसे लड़ता हो तो उसपर हाथ उठाया जा सकता है, हालांकि इसकी भी आज मनाही है। बहनोंपर हाथ उठाना तो चींटीके विरुद्ध सेना लेकर चढ़ाई करने जैसी बात हुई। यह एक अनहोनी-सी बात है। मैं मानता हूँ कि इसमें किसी हिन्दुस्तानीका हाथ नहीं होगा और जो ला आया वह आकस्मिक घटना ही हो। मैंने यह मान लिया है कि राक्षसीसे राक्षसी स्वभावका हिन्दुस्तानी होगा तो भी वह इतनी मर्यादाका पालन तो करेगा ही। किन्तु इसके बावजूद कुछ भाइयोंकी खोपड़ियाँ टूटी हैं और यदि दो-चार बहनोंकी खोपड़ियाँ भी टूटनेवाली होंगी तो टूटेंगी, किन्तु ईश्वरका नाम लेकर हमने जो काम आरम्भ किया है वह कदापि बन्द नहीं होगा। बहनोंके भाग्य में यदि मार खाना बदा होगा तो वे मार खायेंगी, किन्तु पीनेवाले और ठेकेवाले भी शराबको अब गया ही समझें ।
{{Center|<poem>'''रघुकुल रीति सदा चलि आई,'''
'''प्राण जाहिं पर वचन न आई।'''</poem>}}
यह चौपाई अब हम सब बहन-भाई गाने लगे हैं। हम कोई अभिनेता नहीं हैं कि जो गायें उसे कार्यरूपमें परिणत न करें। जिस तरह हमें इस बातका विश्वास हो गया है कि नमक-कानून टूट चुका है, उसी प्रकार हमें इसका विश्वास हो जाना चाहिए कि शराब भी अब चली ही गई।
मेरी इस विनम्र प्रार्थनाको याद रखें। मैं चाहता हूँ कि आपकी मारफत मेरा यह सन्देश --इस बूढ़ेकी विनय -- सम्बन्धित लोगों और सूरतके ठेकेवालों तक भी पहुँच जाये ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ११-५-१९३.}}
Gandhi Heritage
Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३६
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७४. भाषण : रांदेरमें'''}}}}
{{Right|१ मई, १९३०}}
मुसलमान भाइयोंसे मेरी प्रार्थना है कि आजकल हम आत्मशुद्धिकी लड़ाई हाथमें ले बैठे हैं और अभी बँटवारा करनेका समय नहीं आया है। जब वह समय आयेगा तो हम आपसमें निबट लेंगे और यदि लड़ना ही हमारे भाग्य में होगा तो हम लड़ लेंगे। किन्तु मुझे तो यह विश्वास है कि जब वह दिन आयेगा तो हिन्दुस्तानमें हमें लड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, आपसमें अविश्वास करने या एक-दूसरेसे लड़नेका कोई कारण नहीं होगा। आजकल हमारी सीधी लड़ाई नमक कानूनके खिलाफ है। इस्लाम में भी नमक कर हराम माना गया है। सभीको नमककी आवश्यकता होती है। हिन्दू-मुसलमानोंमें अधिकतर लोग गरीब हैं और इस कर का बोझ उनके सिरपर पड़ता है। किन्तु रांदेरमें तो करोड़पति और लखपति रहते हैं। वे मेरे साथ गाँवोंमें चलें तभी यह सब देख पायेंगे ।
इसी प्रकार हमारा दूसरा काम विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका है। चरखा संघके आँकड़ोंसे कोई भी यह बात जान सकता है कि इसके परिणामस्वरूप हम हजारों रुपये मुसलमान बहनों और बुनकरोंको दे पाते हैं। वीजापुरकी बहुत-सी बहनें रोजी पाकर मुझे दुआएँ देती हैं; वे सभी मुसलमान हैं। मेरे कार्यकर्ता जब उनकी पूनियोंकी माँगको पूरा नहीं कर पाते तो वे बेचारी रो पड़ती हैं।
तीसरा काम शराबबन्दीका है। यह किस धर्ममें हराम नहीं है? मैं तो अपनी जिन्दगी में मुसलमानोंसे बहुत मिला-जुला हूँ और उनकी बहुत-सी दावतोंमें भी गया हूँ। हिन्दुस्तान में शराबको हराम माननेकी लड़ाई चल रही हो और उसमें मुसलमान शामिल न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। अहमदाबाद में शरावके ठेकोंपर धरना देने-वाले, मार और गालियाँ शान्तिपूर्वक सहन करके ठेकेवालों और पियक्कड़ों को समझाने-वाले भी मुसलमान ही तो हैं न ?
यह तो खुदाका काम है। इसे वही कर सकता है जो अपनी जानकी बाजी लगा सके। जो समुद्र में कूदेगा वही मोती निकाल सकेगा। अपने मुसलमान भाइयों तथा अन्य लोगोंसे मैं इतना चाहता हूँ कि इस आत्मशुद्धिकी लड़ाईपर किसी वर्गकी इजारेदारी नहीं है, इसलिए आप सब उसमें जी-जानसे हिस्सा लें। बादमें जब सरकार हमसे यह पूछने आयेगी कि हमें क्या चाहिए तो हम आपसमें तय कर लेंगे। किन्तु उस दिनके बारेमें मेरी भविष्यवाणी तो यह है कि तब हम आपसमें लड़ेंगे नहीं, बल्कि एक भाई दूसरेसे यह कहेगा कि तुझे जो चाहिए सो मांग ले। तबतक हममें शराफत आ जायेगी और हमारी वणिक-वृत्ति निकल चुकी होगी। हमें तो यह काम खुदाके नामपर गरीबोंके नामपर करना है। इस काममें सभी कौमें मदद करें और रदिर कस्बेके लोग उसमें जी-जानसे मदद करके अपनी कीर्ति बढ़ायें !
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ११-५-१९३०}}
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३७
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७५. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}}
{{Right|[१ मई, १९३० के पश्चात् ]<ref>१. ११-५-१९३० के नवजीवनके अनुसार अहमदाबादमें रूिपोंने इसी तारीख शराबकी दुकानोंपर धरना देना शुरू किया था।</ref>}}
{{Left|चि० सुशीला,}}
तेरा पत्र मिला। जो बहन मुझसे नाराज है उसका नाम क्या है? उसे यहीं भेज देना। तुम सबको कामसे मतलब है या बाहरी तड़क-भड़कसे ? मेरा वजन ठीक रहे, मनमें उत्साह बना रहे तो मैं फल खाऊँ अथवा न खाऊँ उससे क्या ? यदि स्वास्थ्यके लिए आवश्यक जान पड़ा तो फल लूंगा, ऐसा मार्ग मैने अपने लिए खुला रखा है। व्रत नहीं लिया है। लेकिन जरूरत न हो तो क्यों खाये जायें ? तू शराबकी दुकानों पर धरना देनेके लिए जाती है, यह बात मैंने समाचार-पत्र में पड़ी थी। 1
{{Left|तुम सबको,}}
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११८४) की फोटो नकलसे; सौजन्य : सुशीला गांधी; जी० एन० ४७७२ से भी ।
{{C|{{larger|'''३७६. पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|चि० पुरुषोत्तम,}}
मैं तेरे पत्र की राह ही देख रहा था। यदि आश्रम में तेरा स्वास्थ्य अच्छा रहे तो तेरा वहां अथवा बीजापुरमें रहना ही ठीक होगा। यदि मनसे मृत्युका भय दूर हो गया हो तो चाहे कैसी भी स्थिति क्यों न हो, उसे एक समान समझकर तुझे निरन्तर अबाध गति से काम करते चले जाना चाहिए। जो लोग रह गये हैं उन्हें बुला लेनेकी अभी मेरी कोई इच्छा नहीं है। तथापि यदि तेरे मनमें कोई और इच्छा उठती हो तो मुझे बताना ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८९८ ) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३८
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३७७. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|भाईश्री ५ विठ्ठलदास,}}
आपका पत्र मिला। आपने मददके लिए एक व्यक्ति मांगा है। भाई मगनभाई आ रहे हैं। ये हर तरहसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। आप उनसे बहुत काम ले सकेंगे। आप विजयश्री प्राप्त करें।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९७७३) की फोटो नकल से ।
{{C|{{larger|'''३७८. पत्र : राधा गांधीको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|चि० राधा,}}
मीठ्बहन कह रही थीं कि तू उनके साथ काम करनेको तैयार है। मीट्वहन तुझे उत्तरदायित्वपूर्ण काम सौंपना चाहती हैं। यदि तू सचमुच ऐसा चाहती हो तो मैं तुझे नहीं रोकूंगा। लेकिन खुर्शीदबहन भी यही कहती थीं। तू यदि पहले ही उनके साथ बंध गई है तो तुझे उन्हीं की देखरेख में काम करना चाहिए।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८६८२ ) से ।
सौजन्य : राधाबहन चौधरी
{{C|{{larger|'''३७९. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|चि. कुसुम,}}
अपने पिछले अधूरे पत्र में तूने जो पत्र लिखने की बात कही थी वह अभीतक नहीं मिला ।
इसके साथ तुझसे प्राप्त दो पत्र रखकर भेज रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० १७९८ ) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९
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Juhi1986
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||तेरह|}}</noinclude>द्वारा मोक्ष प्राप्त करनेकी अर्थात् आत्मानुशासन द्वारा मुक्ति प्राप्त करनेकी सापेक्षिक धारणाको भी स्पष्ट किया। उन्होंने पी॰ जी॰ मैथ्यूको लिखा : "मनुष्य तो एक व्यक्ति होता है। ईश्वर उस अर्थमें व्यक्ति नहीं है। ...हम अपने तुच्छ पैमानोंसे
ईश्वरको नापनेकी कोशिश करते हैं, यही हमारी कठिनाइयोंका कारण है। वह तो सभी पैमानोंसे परे है" (पृष्ठ १६९)।
जे॰ सी॰ कुमारप्पा तथा अन्य लोगों के साथ हुए अपने पत्र-व्यवहारमें गांधीजीने व्रतोंकी आवश्यकता पर बल दिया। नारणदास गांधीको उन्होंने लिखा : "व्रतका अर्थ है अटल निश्चय। अड़चनोंको पार कर जानेके लिए ही तो व्रतकी आवश्यकता है। ...शरीर-रक्षाके लिए भी शराब न पीनेके दृष्टान्तका चमत्कारिक प्रभाव शराबकी लतमें फँसे हुए लोगों पर पड़े तो संसारका कितना लाभ है। ...व्रत लेना
निर्बलतासूचक नहीं, वरन बलका सूचक है। व्रतकी आवश्यकताके विषयमें हमारे मनमें कभी शंका उठनी ही नहीं चाहिए" (पृष्ठ २१९-२०)। व्रत लेनेका अर्थ पहले ही से "संकटके क्षणोंमें ईश्वरसे हमें शक्ति प्रदान करने" की प्रार्थनाके समान है (पृष्ट ३०८)। जे॰ सी॰ कुमारप्पाको लिखे एक अन्य पत्रमें यही बात उन्होंने रोचक ढंगसे समझाई है, "हमें अपने अन्तरमें निवास करनेवाले दो तत्वोंसे निपटना है : राम और रावण, अल्लाह और शैतान, अहुरमज्द और ऑरिमान। पहला तत्व हमें वास्तव में मुक्त करनेके लिए बाँधता है, जबकि दूसरा अपने चँगुलमें और अधिक कसकर जकड़नेके लिए हमें मुक्त करता प्रतीत होता है। 'वाउ' ...एक प्रतिज्ञा है जो हम रामसे करते हैं ...जिसे जबतक हम बँधे नहीं ..."तब तक निवाह नहीं सकते। हम सूरजसे ऊँचे भले न हों लेकिन "कमसे-कम सच्चे और आस्थावान हों। ...व्रतबद्ध जीवन विवाहकी भाँति है, वह एक परम पवित्र संस्कार है। व्रत धारण करना ईश्वरके साथ अविच्छेद्य विवाह-सम्बन्ध स्थापित
करना है। आओ, हम उससे विवाह कर लें" (पृष्ठ २६२-३)। उत्तमोत्तम बननेकी स्वतन्त्रता असीमित है, किन्तु आत्म-भोगकी प्रवृत्तिको प्रकृतिके नियमों जैसे अनुल्लंघनीय व्रतों द्वारा नियंत्रित करना चाहिए। "ईश्वर स्वयं निश्चयकी, व्रतकी सम्पूर्ण मूर्ति है। उसके नियमोंका एक अणु भी इधर-उधर हो जाये तो वह ईश्वर न रह जाये। सूर्य महाव्रतधारी है;..." (पृष्ठ २२०)। इससे देखा जा सकता है कि गांधीजीका धर्म प्रकाशका धर्म था, सामान्य बुद्धि पर आधारित धर्म था। वह विज्ञानके विपरीत नहीं, बल्कि स्वयं वैज्ञानिक धर्म था जो ज्यादासे-ज्यादा लोगोंमें आनन्द और शान्तिका प्रसार कर सकता है।
जेलमें ही गांधीजीने मीराबहनकी खातिर 'आश्रम-भजनावलि' के भजनों और गीतोंका अंग्रेजीमें अनुवाद भी किया। (हिन्दी खण्डमें 'आश्रम-भजनावलि' को परि-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||चौदह|}}</noinclude>शिष्टमें ज्यों-का त्यों दिया गया है। गांधीजी द्वारा किये गये अंग्रेजी अनुवादके लिए अंग्रेजीका खण्ड ४४ देखा जा सकता है)। यह स्मरण रखना चाहिए कि 'भजनावलि' में केवल संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओंसे ही अनुवाद किये गये हैं, जबकि वास्तवमें आश्रमकी प्रार्थनाओंमें 'कुरान,' 'बाइबिल,' 'जंद अवेस्ता' तथा अनेक विदेशी प्रार्थनाओंके भी अंश होते थे। खुले आकाशके नीचे आयोजित होनेवाली गांधीजीकी प्रार्थना-सभाएँ सचमुच सार्वदेशिक होती थीं और इनसे "जाति, वर्ग और बँधे हुए विश्वासोंके बन्धनोंको" तोड़ने में सहायता मिलती थी (पृष्ठ
२१)। प्रार्थनाके दौरान गाये जानेवाले भजनोंमें 'राम' के स्थान पर 'होरमज्द' अथवा 'वैष्णव'के स्थान पर 'क्रिश्चियन' लगा देनेमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता था (पृष्ठ १८९)। मीराबहनके लाभार्थ किये गये इन अनुवादोंके बारेमें गांधीजीने लिखा : "सिवाय इसके कि यह प्रेमका काम है, उसमें और कोई गुण नहीं है—साहित्यिक गुण तो है ही नहीं" (पृष्ठ ३६४)। भजनों और लोक-गीतोंके जरिये प्रह्लाद, द्रौपदी और हरिश्चन्द्र आदिके चरित्र जन-मानसमें अमिट रूपसे बस गये हैं। गांधीजीकी दृष्टिमें प्रह्लाद, द्रौपदी और हरिश्चन्द्र जिन चरमोत्कृष्ट अनुभवों और अनुभूतियोंके प्रतीक हैं उन्हें इन चरित्रोंके माध्यमसे ही व्यक्त किया जा सकता है, और किसी भी प्रकार नहीं। इसीलिए गांधीजीको इनसे सम्बन्धित गीत और भजन प्रिय थे। "हरिश्चन्द्रकी कथा भले ही मनगढ़न्त हो, लेकिन उसमें सब आत्मार्थियों (आत्माका कल्याण चाहनेवालों) का अनुभव भरा हुआ है; इसलिए उस कथाकी कीमत किसी ऐतिहासिक कथासे अनन्त गुनी है और हम सबको उसे अपने मनमें रखना चाहिए और उसपर गौर करना चाहिए" (पृष्ठ ११५)। ये भजन वास्तविकतासे पलायनका पाठ नहीं पढ़ाते बल्कि पुरुषार्थको प्रेरित करते हैं। गांधीजीकी दृष्टिमें पुरुषार्थका अर्थ था एक आदर्शकी संकल्पना करना और "वह चाहे कितना कठिन क्यों न हो तो भी उसमें सफल होनेका जी-जानसे प्रयत्न करना... आदर्शको अपनी सुविधाके अनुसार ढालनेमें असत्य है; हमारा पतन है" (पृष्ठ ८१)। भजनोंका
उपयोग और उनका अनुवाद इस बातका एक और उदाहरण है कि गांधीजी एक विनम्र और परम्परानिष्ठ हिन्दू थे और उनका विश्वास था कि धर्म का उद्देश्य मनुष्यको सद्विचार और पुरुषार्थके लिए प्रेरित करना है और मनुष्य धर्मसे शक्ति
प्राप्त करता है । केवल कर्मकाण्ड और विधि-विधानोंका उनकी दृष्टिमें कोई मूल्य नहीं था। प्रार्थनाओंमें सम्मिलित न होना किन्तु कहीं आग लगे तो उसे बुझानेमें मदद करना उनकी दृष्टिमें "सच्चा भजन" था और "कर्ममें अकर्मका उदाहरण" था (पृष्ठ ३६१)।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''आभार'''}}}}
इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम निम्नलिखित संस्थाओं, व्यक्तियों, पुस्तकोंके प्रकाशकों तथा पत्र-पत्रिकाओंके आभारी हैं:
संस्थाएँ : साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास और संग्रहालय, नव-जीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रंथालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि व संग्रहालय, नई दिल्ली तथा आफ्रिकन म्यूजियम, जोहानिसबर्ग।
व्यक्ति : श्रीमती मनुबहन मशरूवाला, श्री सुरेन्द्र मशरूवाला, अकोला; श्रीमती लक्ष्मीबहन खरे, श्री कपिलराय मेहता, श्रीमती शारदाबहन जी॰ चोखावाला, अहमदाबाद; श्रीमती प्रेमाबहन कंटक, सासवड; श्रीमती मीराबहन, गाडेन, आस्ट्रिया; श्री भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या, सेवाग्राम; श्री ईश्वरलाल जोशी, श्री पी॰ डी॰ सरैया, श्री शान्तिकुमार मोरारजी, श्रीमती प्रेमलीला ठाकरसी, बम्बई; श्रीमती गंगाबहन
वैद्य, बोचासण; वालजी गो॰ देसाई, पूना; श्री नारणदास गांधी, राजकोट; श्री प्रकाशनारायण सप्रू; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्री बनारसीलाल बजाज, बनारस; श्रीमती राधाबहन चौधरी, श्री परशुराम मेहरोत्रा; श्री द॰ बा॰ कालेलकर, नई दिल्ली; श्रीमती वसुमती पण्डित, सूरत; श्री वेणीलाल गांधी, नासिक; तथा प्रो॰ जे॰ बी॰ गैलविन, किंगस्टन, कनाडा।
पुस्तकें : 'बापूकी विराट वत्सलता', 'बापुना पत्रो-७ : श्री छगनलाल जोशीने', 'बापुना पत्रो-६ : गं॰ स्व॰ गंगाबहनने', 'बापुना पत्रो-४ : मणिबहेन पटेलने', 'बापुना पत्रो-९ : श्री नारणदास गांधीने', भाग १, 'बापुनी प्रसादी', 'कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रन्थ', 'महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खण्ड ३, भाग ३, 'पाँचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद', तथा 'गीताबोध'।
पत्र-पत्रिकाएँ: 'बॉम्बे क्रॉनिकल' और 'हिन्दू'।
अनुसन्धान और संदर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालयका अनुसंधान और संदर्भ विभाग, नई दिल्ली, राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया), नई दिल्ली तथा श्री प्यारेलाल नैयर, नई दिल्ली, हमारे धन्यवादके पात्र हैं। कागज-पत्रोंकी फोटो नकल तैयार करने में सहायता देनेके लिए हम सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्लीके फोटो-विभागके आभारी हैं।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: अमीना कुरेशीको|१५७}}</noinclude>बच गई थी।<ref>देखिए खण्ड २३, पृ४ १७०।</ref> पुलिसके वर्तमान इन्स्पेक्टर जनरल महोदय उस मामले के तथ्योंसे अवगत हैं।
{{right|हृदयसे आपका<br>
{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ३८५२) की फोटो-नकलसे; बॉम्बे सीक्रेट ऐक्सट्रैक्ट्स ७५०
(५) / ए॰, पृष्ठ २०७ से भी।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२३. पत्र: लीलावती आसरको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ लीलावती,}}
तेरा पत्र मिला। यदि तू अधीर न हो तो अपने आदर्शो पर आचरण करनेकी शक्ति आ ही जायेगी। जैसे एकबारगी बहुत खानेसे अजीर्ण हो जाता है उसी प्रकार अपनी सामर्थ्यका अनुमान किये बिना किसी बात पर अमल करनेसे हम असफल हो जाते हैं जिससे बादमें निराशा उत्पन्न होती है। यदि हम अपनी सामर्थ्यका अनुमान न कर सकें तो जिस पर हमारी आस्था हो, वह हमारी सामर्थ्यको ध्यानमें रखकर जैसा करने को कहे, हम वैसा करें। गंगाबहन से दिल खोलकर अपनी बात करना। वे जैसा कहें वैसा करेगी तो वही काफी होगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ९५६६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२४. पत्र: अमीना कुरेशीको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ अमीना,}}
तेरा पत्र मिला मियाँ अब्दुल मजीदको मेरी तरफसे बहुत-बहुत प्यार। सुलताना तो मुझे भला अपनेको छूने ही क्यों देगी? तेरी तबीयत अब कैसी रहती है? खाने-पीनेमें सावधानी बरतना।
तेरी उर्दूकी पढ़ाई-लिखाई चल रही है न?
{{right|बापूकी दुआ और आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६६५८) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९६
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रेखा साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२५. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तेरा पत्र मिला। भगवानने हमें पंख तो दिये हैं किन्तु हम उन्हें काममें नहीं लाते। यदि हम शरीरको भूल जायें तो भी पंख हैं ही न? जहाँ हमारा मन होता है वहीं हम होते हैं। क्या कभी-कभी हमें ऐसा नहीं लगता कि हमारा शरीर एक
स्थान पर है और मन दूसरे स्थान पर? सुर्वेका मन किस जगह होता है? यह कहना तो सहज है किन्तु उसपर आचरण करना कठिन है। किन्तु तूने पंखोंकी बात लिखी थी इसलिए मैने यह ज्ञान उँड़ेला है। इसमें से जिस पर अमल कर सके उस पर करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२८८) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२६. पत्र: प्रभावतीको'''}}}}
{{left|चि॰ प्रभावती,}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ सितम्बर, १९३०}}
तुझे मेरे पत्र नहीं मिलते, यह आश्चर्यजनक है। मैं नारणदासको लिखता हूँ। मैंने तो एक भी सप्ताह खाली नहीं जाने दिया। मेरी तबीयत अच्छी है। मेरा वजन १०३ है। मुनक्केके बदले घिया आदि हरी सब्जियाँ लेता हूँ। दूध-दही तो है ही। काकासाहब भी अच्छे हैं। इनका वजन प्रति सप्ताह लगभग एक सेर बढ़ जाता है। कोई चिन्ता न करना। मृत्युंजय कैसा है?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
तू वहाँ घूमने जाती है?
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३७१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९७
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२७. पत्र: कुसुम देसाईको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कुसुम (देसाई),}}
तेरा पत्र मिला है। तू स्वयं बीमार पड़ी है, ऐसा सुनता हूँ। ऐसा क्यों? यदि वहाँ मच्छर हों तो तुझे निःसंकोच होकर मच्छरदानीका उपयोग करना चाहिए। उसका प्रबन्ध न हो सके तो मिट्टीका तेल चुपड़ना। मैं इस तरह प्यारेलालको
अपने साथ रखने की मांग नहीं कर सकता। काका की माँग भी मैंने नहीं की थी। अधिकारियोंने ही उन्हें भेज दिया था, लेकिन प्यारेलालसे मिलनेकी तजवीज कर रहा हूँ। उसे दस्त लग रहे हैं, यह सुनते ही मैंने मिलने की माँग की है। अब उसे आराम है। तुझे ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ कौन-कौन कैदी हैं, इसका मुझे पता नहीं चलता। तू यह समझ ले कि मैं पिंजड़े में हूँ। तुझे जब मालूम हुआ था, उसी समय मुझको लिखना चाहिए था।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ १८०४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२८. पत्र: भगवानजी पण्डयाको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ भगवानजी,}}
तुम्हारा पत्र पढ़ा। मणिबहनके प्रति तुम्हारे मनमें जो रोष है उसे निकाल दो। वह तुम्हारी पत्नी है, यह बात भूल जाओ। असंख्य बहनोंमें वह भी एक बहन है, ऐसा समझो। उसके पास जो बच्चे हैं उन्हें भी बिसार दो। वे तुम्हारे नहीं
हैं, ऐसा समझो। तुम विकारवश हो सकते हो इसलिए वहनके रूपमें भी उससे तुम्हें सेवाका अधिकार नहीं है; ऐसा जानो। और जिसे भुला दिया उसका स्मरण भी नहीं करना चाहिए। इसलिए तुम किसी प्रकारकी चिन्ता करना भी छोड़ देना और मनके बोझको उतार डालना। यह पत्र गंगाबहनको पढ़ाना जिससे वह इसपर अमल करनेमें तुम्हारी मदद करेगी। गुड़का त्याग कर दो पर दूध पिया करो; यह मेरी तुमको सलाह है। भले आधा सेर ही लिया जा सके।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ३२४) से सौजन्य: भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९८
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२९. पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मनु,}}
तेरा मन शान्त हो गया यह जानकर हम दोनोंने चैनकी साँस ली। जो विद्यार्थी सयाने हो चुके हैं वे जो-कुछ समझ-बूझकर ग्रहण करेंगे वही फलप्रद होगा। तुझे १००० तार सूत कातनेमें कितना समय लगा, वह कितने नम्बरका था और उसकी मजबूती तथा समानता कितने प्रतिशत थी, लिखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७७६४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३०. पत्र: जानकीदेवी बजाजको'''}}}}
{{right|२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ जानकीबहन,}}
तुम बहुत चंट मालूम होती हो। जैसे-तैसे पत्र लिखनेसे भी बच निकलना चाहती हो? और यदि भाषण करते-करते हाकिम 'डिक्टेटर' बन जाओगी तो फिर मुझ-जैसेके तो बारह ही बज जायेंगे न? मालूम होता है जमनालालने नासिकमें अपना धन्धा ठीक जमा लिया है। यह तो मैं जानता ही था। उनके पंजेसे कोई छूट ही नहीं सकता। मदू पहले तो पत्र लिखती थी, अब तुम्हारी तरह ही आलसी
हो गई है। ऐसी ही आलसी बनी रही तो तुम्हारे पाससे उसे हटा लेनेका हुक्म जारी करना पड़ेगा। अब शरीर कैसा है? ओम उपद्रव करती है या नहीं?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''पांचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद'''}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३१. पत्र: सत्यादेवी गिरिको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
२१ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ सत्यदेवी,}}
तेरा पत्र मिला। तुझे अपनी गुजराती किसीसे सुधरवा लेनी चाहिए। चित्र [बनाने] का मुहावरा<ref>अर्थात् अभ्यास।</ref> [जारी] रखा है? समय-समयपर उसमें सुधार नहीं दीखता। क्या धर्मकुमार<ref>सत्यादेवी गिरिके छोटे भाई।</ref> ऊधम मचाता है?<ref>मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref>
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|'''बापूकी विराट् वत्सलता'''}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३२. पत्र: जे॰ सी॰ कुमारप्पाको'''}}}}
{{right|२२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय कुमारप्पा,}}
मैं तुम्हारे हिसाबमें एक गलती दिखाना चाहता हूँ। अगर तुम जितना मैं कर रहा हूँ उसी प्रमाणमें मेरा 'प्रति-अभिनन्दन करना' चाहते हो तब तो तुम्हें पता चलाना चाहिए कि मैं प्रति सप्ताह कितने प्रेम-पत्र भेजता हूँ। अतः यदि प्रेमको
गणितकी पद्धतिसे नापना सम्भव हो, तब तो तुम्हारे पत्र उतने गुने ज्यादा लम्बे होने चाहिए जितने कि मेरे सब पत्रोंका कुल जोड़ है। लेकिन ईश्वरका धन्यवाद है! प्रेम
गणित और ज्यामिति दोनोंकी उपेक्षा करता है और उन्हें मिथ्या सिद्ध करता है। हाँ, कमलाबहन वास्तवमें बहुत ठीक-ठाक हैं।
सप्रेम,
{{right|बापू}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १००९१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}
{{left|४४–११}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३३. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मीरा,}}
मुझे कलकत्तेसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें विविध प्रकारके अनुभव हो रहे हैं।<ref>हावड़ा पहुँचनेपर मीराबहनको महिलाओंके उस जुलूसमें शामिल होनेसे मना कर दिया गया था जो उन्हें लेकर शहरमें घूमनेवाला था। इस निषेधाज्ञाके बावजूद यह जुलूसमें शामिल हुई और पुलिसने उनपर लाठीचार्ज किया। मीराबदनको पुलिस थाने ले जाया गया और बादमें उन्हें छोड़ दिया गया। औरतोंके साथ कठोर व्यवहार किये जानेके विरोध में विश्वविद्यालयके कुछ छात्रने पुलिसके विरुद्ध नारे लगाये, इसपर उन्हें बुरी तरह पीटा गया। अगले दिन शहरमें हड़ताल हो गई। मीराबद्दनने अपनी आत्मकथा '''द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज, पृष्ठ ११५-७''' में इन घटनाओंका काफी विस्तारसे उल्लेख किया है।</ref> सत्यान्वेषी लोग इन सभीका लाभ उठाते हैं। मैं आशा करता हूँ कि जो थोड़ी-सी बीमारी तुम्हें हुई थी वह अल्पकालिक थी और तुम शीघ्र ही पुनः स्वस्थ
हो गई थीं। मुझे आशा है कि जो विश्राम तुम चाहती थीं वह तुम्हें मिला होगा। मैं सफरी चरखेमें रोजाना कुछ मामूली सुधार करता जा रहा हूँ और अब वह मुझे दिनोंदिन कम तकलीफ दे रहा है। जब किसीके पास एक पूर्ण यन्त्रकी जगह हाथोंके कौशलकी मदद करनेवाला एक साधनमात्र हो, उस समय कितनी सारी बारीकियोंका ध्यान रखना पड़ता है, यह बात आश्चर्यजनक है। लेकिन चरखेके प्रयोगमें जितनी
निपुणता हासिल होगी, कताईमें उतना ही आनन्द और कम थकान होगी। काका अभी भी तुम्हारे चरखेको चलाने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने बहुत उपेक्षा बरती थी और अब उसकी कसर उन्हें पूरी करनी है। जैसाकि उनका कहना है, ठीक कातनेवाले तो वह यहीं बने हैं। इससे पहले वह कताई तो करते थे, लेकिन कतैया नहीं थे। मेरा अभिप्राय क्या है सो तुम समझती हो। मेज बनानेके लिए
किसी व्यक्तिको आलमारी बनानेका ज्ञान होना जरूरी नहीं है। सब्जियाँ लेना जारी है। न कोई नुकसान हुआ है और न ही कोई प्रत्यक्ष फायदा हुआ है। मैं इस प्रयोगकी पूरी आजमाइश करना चाहता हूँ। डा॰ मेहताने कहला भेजा था कि शकरकन्दसे शायद कब्जियत हो। इसलिए आज मैंने उन्हें नहीं लिया है। भोजनके साथ टमाटर और एक हरी सब्जी रोजाना लेता हूँ।
तुम जहाँ कहीं भी हो, मित्रोंको मेरा प्यार कहना।
सप्रेम,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४१२) से सौजन्य: मीराबहन जी॰ एन॰ ९६४६ से भी।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०१
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३४. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|२२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र न मिले तो मुझे लगता है कि कुछ-न-कुछ हुआ है। उदासी क्यों लगती है? लगे तो उसे फौरन मेरी तरफ भेज ही देना चाहिए। तुम उम्रमें चाहे जितनी बड़ी हो, तो भी मैं जबसे तुमसे मिला हूँ तबसे तुम्हें अपनी प्यारी बेटीकी तरह मानता आया हूँ। जिस तरह मुझमें बाप बननेकी शक्ति है, उस तरह माँ बनने की भी है। इसलिए तुम मुझे तुरन्त अपनी उदासी में भागीदार बनाकर निश्चिन्त
हो जाया करो।
काकासे मिलने की इच्छा हो, तो कभी डुबकी लगा जाओ।
...बहनमें<ref>नाम यहाँ नहीं दिया गया है।</ref> एक दोष तो है ही कि वह भगवानजीकी परीक्षा करने गई।
ऐसा होते हुए भी जबतक वह आश्रममें रहनेकी और सुधरनेकी इच्छुक है, तबतक उसे बना रहने दें। हमारे प्रयोग भयंकर तो है ही। ईश्वरपर श्रद्धा रखें तो इन सबसे पार हो जायेंगे।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[गुजरातीसे]}}
'''बापुना पत्रो ६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने;''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७५८ से भी।
{{left|सौजन्य: गंगाबहन वैद्य}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३५. पत्र: कमलनयन बजाजको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कमलनयन,}}
तेरा पत्र मिला। तुझे साफ-साफ अक्षर लिखने चाहिए। अक्षर गढ़े हुए तो हैं, किन्तु स्पष्ट नहीं हैं। अभीसे न सुधारे, तो बादमें नहीं सुधरेंगे। तू खुशीसे अजमेर जा वहाँसे भी पत्र लिखते रहना। स्वास्थ्यको न बिगड़ने देना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद'''}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०२
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३६. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको'''}}}}
{{right|२२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ पण्डितजी,}}
कुछ प्रयत्न करके ही मैं तुम्हारे नामके आगे 'चि॰' लगा पाता हूँ। मेरे हृदयमें प्रेम तो वही है [जो 'चिरंजीव' से ध्वनित होता है] किन्तु शायद व्यवहारमें उसे व्यक्त नहीं कर पाया हूँ। पिंजाई तुरन्त सीख लेना और यदि हो सके तो
कताईके लिए कोई एक ही समय निश्चित कर लेना। खादीके प्रति प्रेमकी जो कमी तुम्हें अपने आसपास नजर आती है वह हमारी ही कमजोरीका प्रतिविम्व है। खादी आन्दोलनका मध्य-बिन्दु, केन्द्र, हम स्वयं है। जिस प्रकार सूर्यके कम तपनेसे वातावरण में गर्मी कम हो जाती है उसी प्रकार यदि हम कम 'तपें' अर्थात् हम स्वयं खादी के प्रति ढिलाई बरतें तो क्या बाहर ढिलाई नजर नहीं आयेगी? किन्तु प्रेम
बाहरसे नहीं आता, वह तो अन्तरमें स्फुरित होना चाहिए। यदि हम उस प्रेमको स्फुरित करनेके लिए परिश्रम करेंगे तो निश्चय ही उसका अच्छा परिणाम निकलेगा। रामभाऊ<ref>ना॰ मो॰ खरेका पुत्र रामचन्द्र।</ref> अलमोड़ा गया, यह बहुत ही अच्छा हुआ।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २१३) की फोटो-नकलसे। सौजन्य:
लक्ष्मीबाई खरे
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३७. पत्र: अब्बासको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
२२ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ अब्बास,}}
तेरा पत्र मिला। मालके विषयमें तूने जो-कुछ कहा है यह सब स्पष्ट तो है किन्तु लगता है कि दुबारा पढ़ने पर ही उसे मैं पूरी तरह समझ पाऊँगा। मैंने यह पत्र सँभालकर रख लिया है। अपने जेलके अनुभव लिखना तूने क्या पढ़ा और कितनी कताई-पिंजाई की; जेलके नियमोंका पालन किस तरह किया? तेरा स्वास्थ्य कैसा रहा? मथुरादासभाई ने पिजाईकी जो पद्धति चलाई है उसके बारेमें भी यदि कुछ लिखना चाहे तो लिखना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६३०३) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०३
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३८. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
मौनवार, २२ [सितम्बर,]<ref>साधन-सूत्र में तारीख "२२ सोमवार, १९३०" दी गई है। १९३० में वाईस तारीखको सोमवार सितम्बर और दिसम्बर में पड़ता है। अन्य पत्रोंको देखनेसे लगता है कि यह पत्र सितम्बरमें ही लिखा गया होगा; देखिए "पत्र: गंगाबद्दन वैद्यको", २२-९-१९३० और २७-९-१९३० तथा खण्ड ४५, २२-१२-१९३०।</ref> १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र मिला। जमाई [भव-बाधासे] छूट गया। हमने तो मौतको मित्र मानना सीखा है। यदि संसारमें मौत न होती तो हम क्या करते?
तुम जितने बच्चोंको आश्रममें लाना चाहो, ला सकती हो।
काकू के बारेमें समझ गया। सबको अवसर मिल ही जायेगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[गुजरातीसे]}}
'''बापुना पत्रो–६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने;''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७५० से भी।
{{left|सौजन्य: गंगाबहन वैद्य}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३९. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|२१/२३ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ नारणदास,}}
कमला गांधी आजकल कहाँ है? बहुत दिनोंसे उसका पत्र नहीं आया, इसलिए चिन्ता हो रही है। हरिदास कहाँ है? वह क्या कर रहा है? दो सप्ताहसे प्रभावती के पत्रोंमें यह शिकायत आ रही है कि उसे मेरे पत्र नहीं मिले। यहाँसे तो मैंने नियमित रूपसे लिखा है। उसने तुम्हें अपना ठीक पता दिया है न? वह सीतल-दिपारा है। हरिदासभाईको लिखा पत्र पढ़ लेनेसे उनके बारेमें जान जाओगे। वे रखने लायक हैं। उनके कुटुम्बके लिए ६० से ६५ रुपये तक दे देना और उनके अपने खर्चके लिए ४० रुपये तक कुल मिलाकर हर मास १०० रुपये होंगे। शिक्षणके बारेमें मैंने जैसा लिखा, उसी तरह होना इष्ट है। मुझे लगता है कि जब आश्रम में रहेंगे, तब उनका अपना खर्च कम ही होगा। अध्ययनके लिए बाहर जायें तो वहीं सर्व ४०
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१६६|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>तक हो जायेगा, ऐसा मैं समझता हूँ। ज्यादा स्पष्ट रूपसे बात करनेकी जरूरत हो तो कर लेना। यह ठीक है न? बालजीभाई तो यह सब जानते ही होंगे।
यदि गिरिराजका मन वहाँ शान्त न रहता हो तो मुझे लगता है उसके वर्धा चले जाने में ही भलाई है। फिर भी जैसा तुम्हें ठीक लगे वही करना।
नानीबहन (बुधाभाईवाली) को लिखा पत्र पढ़ लेना। बुधाभाईको लिखा पत्र भी पढ़ लेना और यदि नानीबहन सहमत हो तो बुधाभाईकी इच्छानुसार व्यवस्था कर
देना। नानीबहन दुखी हो तो हस्तक्षेप न करना। मणिबहनको लिखा पत्र पढ़ लेना और उसे भी पढ़वा देना। गंगाबहन भी पढ़ ले। जैनुको लिखा पत्र भी पढ़ लेना। इतना समझाने पर भी वह न समझे तो मेहमान मानकर उसकी गैरहाजिरी सहन
कर लेना। भगवानजीको लिखा पत्र भी पड़ना। मुझे लगता है कि उन्हें वही दवा लेनी चाहिए जिसका मैंने सुझाव दिया है। बालकृष्णको विनोबाके पास भेजकर बिलकुल ठीक किया है। दूसरोंको भेजने के लिए भी लिखा, यह ठीक किया।
प्रार्थनाका काम बालक-बालिकाओंने सँभाल लिया है, इससे तो मैं बहुत ही खुश हुआ हूँ और फिर बत्तीकी जरूरत नहीं पड़ती। फिलहाल तो ['गीता' के] श्लोक कण्ठस्थ करनेका काम बन्द हो गया है। समय ही नहीं निकाल पाता। जेलमें
पड़े कैदीको ऐसा क्या काम हो सकता है, किन्तु है ऐसा ही। हर पलका हिसाब है। कुछ क्षण बचाकर थोड़ा-बहुत पढ़ लेता हूँ। मिश्रित धरनेके बारेमें तुम्हारी राय ठीक है। जोशीका पत्र पढ़ लेना। रुई मिली, चमड़ा मिला, काकासाहब की चप्पल मिल गई। अपनीवाली की मरम्मत करा ली है, इसलिए मेरी गाड़ी तो अब दो-तीन महीने तक चलनी ही चाहिए। तुम्हारा वर्षगाँठका नमस्कार पहुँच गया। ईश्वर तुम्हारे आत्मबलमें वृद्धि करे और तुम दीर्घायु हो।
{{right|मंगल प्रभात, २३ सितम्बर, १९३०}}
सर्वधर्म-समभावः हमारे व्रतोंमें सहिष्णुताके नामसे परिचित व्रतको यह नया नाम दिया गया है। सहिष्णुता अंग्रेजी शब्द 'टॉलरेशन' का अनुवाद है। मुझे यह पसन्द नहीं था, पर उस समय दूसरा शब्द सूझता नहीं था। काकासाहब को भी यह नहीं रुचा था। उन्होंने 'सर्वधर्म-आदर' शब्द सुझाया। मुझे वह भी नहीं जँचा। दूसरे धर्मोको सहनेकी भावनामें उनमें न्यूनताका विचार आ जाता है। आदरमें कृपाकी
भावना झलकती है। अहिंसा हमें दूसरे धर्मो के प्रति समभाव सिखाती है। आदर और सहिष्णुता अहिंसाकी दृष्टिसे पर्याप्त नहीं हैं। दूसरे धर्मोके प्रति समभाव रखनेके मूलमें अपने धर्मकी अपूर्णताका स्वीकार भी आ ही जाता है। सत्यकी आराधना, अहिंसाकी कसौटी यही सिखाती है। सम्पूर्ण सत्यको यदि हम देख पाये होते तो फिर सत्यके आग्रहकी क्या बात थी? तब तो हम परमेश्वर हो गये होते; क्योंकि हमारी भावना है कि सत्य ही परमेश्वर है। हम पूर्ण सत्यको पहचानते नहीं हैं, इसलिए उसका आग्रह करते हैं। इसीसे पुरुषार्थकी गुंजाइश है। इसमें अपनी अपूर्णताकी स्वीकृति आ
गई। यदि हम अपूर्ण हैं तो हमारे द्वारा कल्पित धर्म भी अपूर्ण है; स्वतन्त्र धर्म तो सम्पूर्ण है। हमने उसे देखा नहीं है, वैसे ही जैसे ईश्वरको नहीं देखा है। हमारा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०५
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१६७}}</noinclude>माना हुआ धर्म अपूर्ण है और उसमें सदा परिवर्तन होते रहते हैं, होते रहेंगे। यह होनेसे ही हम उत्तरोत्तर ऊपर उठ सकते हैं, सत्यकी ओर, ईश्वरकी ओर दिन-प्रति दिन आगे बढ़ सकते हैं। जब हम मनुष्य-कल्पित सब धर्मोको अपूर्ण मान लेते हैं तो फिर किसीको ऊँचा या नीचा माननेकी बात नहीं रह जाती। सभी सच्चे हैं, पर सभी अपूर्ण हैं, इसलिए दोषपात्र हैं। समभाव होनेपर भी हम उनमें दोष देख सकते
हैं। हमें अपने में भी दोष देखना चाहिए। उस दोषके कारण उसका त्याग न करें; बल्कि दोषको दूर करें। इस प्रकार समभाव रखनेसे दूसरे धर्मोक ग्राह्य अंशको अपने धर्ममें लेते संकोच न होगा। इतना ही नहीं, बल्कि वैसा करना धर्म हो जायेगा।
तब प्रश्न यह होता है कि बहुतसे धर्मोकी आवश्यकता क्या है? हम जानते हैं कि धर्म अनेक हैं। आत्मा एक है, पर मनुष्य देह अगणित हैं। देहकी असंख्यता टाले नहीं टल सकती, तथापि आत्माकी एकताको हम पहचान सकते हैं। धर्मका मूल एक है, जैसे वृक्षका पर उसके पत्ते असंख्य हैं।
सब धर्म ईश्वरदत्त हैं, पर वे मनुष्य-कल्पित होनेके कारण, मनुष्य द्वारा प्रचारित होनेके कारण अपूर्ण हैं। ईश्वरदत्त धर्म अगम्य है। उसे भाषामें मनुष्य प्रकट करता है, उसका अर्थ भी मनुष्य लगाता है। किसका अर्थ सच्चा माना जाये? सब अपनी-अपनी दृष्टिसे, जबतक वह दृष्टि बनी है तबतक सच्चे हैं। पर झूठा होना भी असम्भव नहीं है। इसीलिए हमें सब धर्म के प्रति समभाव रखना चाहिए। इससे अपने धर्मके प्रति उदासीनता नहीं आती, बल्कि स्वधर्म-विषयक प्रेम अन्धा न रहकर ज्ञानमय हो जाता है, अधिक सात्विक, निर्मल बनता है। सब धर्मोके प्रति समभाव आने पर ही हमारे दिव्यचक्षु खुल सकते हैं। धर्मान्धता और दिव्यदर्शनमें उत्तर-दक्षिण जितना अन्तर है। धर्मज्ञान होने पर अन्तराय मिट जाते हैं और समभाव उत्पन्न हो जाता है। इस समभाव के विकाससे हम अपने धर्मको अधिक पहचान सकते हैं।
यहाँ धर्म-अधर्मका भेद नहीं मिटता। यहाँ तो उन धर्मोकी बात है जिन्हें हम निर्धारित धर्म के रूपमें जानते हैं। इन सभी धर्मोके मूल सिद्धान्त एक ही हैं। सभीमें सन्त स्त्री-पुरुष हो गये हैं, आज भी मौजूद हैं। इसलिए धर्मोके प्रति समभाव में, और धर्मियों––मनुष्यों––के प्रति जिस समभावकी बात है उसमें कुछ अन्तर है। मनुष्य मात्र के प्रति, दुष्ट और श्रेष्ठके प्रति, धर्मी और अधर्मीके प्रति समभावकी अपेक्षा है, पर अधर्मके प्रति वह कदापि नहीं है।
इस विचार पर शायद और लिखना चाहिए। सहज ही समझ न आया हो तो मुझसे पूछना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
यदि लेख ठीक समझमें न आया हो तो उसका अनुवाद करना ठीक नहीं। यहींसे करनेका प्रयत्न तो मैं करूँगा ही।
आज ८६ पत्र है।
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/१) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''४९६. पत्र : कलावती त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० कलावती,
{{Gap}}तुमारे खत मिले। अक्षर सुधारना चाहिये। सावधानीसे लिखनेसे अच्छे हो सकते
हैं। माताजी इ० आ गये अच्छा हुआ खेड़ामें जाओ तो खूब सावधानीसे रहो
और सेवामें तन्मय बन जाना। गंगाबहनकी आशाका पालन करना ।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Gap}}मीलकी पुणीके बारेमें में समजा । अबी कुछ कहने की आवश्यकता नहि है ।
{{Rh|||बापु}}
{{Gap}}जी० एन० ५२६४ की फोटो नकलसे ।
{{C|'''४९७. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको'''}}
{{Rh|||५ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० रोहिणी,
{{Gap}}तुमने जो लिखा है सो ठीक है। सरकार जितना चाहे उतना सामान ले जा
सकती है और उसे कौड़ीके भाव बेच सकती है। सच बात तो यही है कि अन्यायी
शासन के अन्तर्गत सत्य पर चलनेवाले लोगोंके पास सम्पत्ति रह ही नहीं सकती ।
यदि रहे भी तो समझ लो कि जब यह चाहे तब उस सम्पत्तिको छीन ले सकती
है । हमारे इस आन्दोलनका आधार तो धनपर है ही नहीं ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० २६५५ ) की फोटो नकलसे।
{{Gap}}१. कलावती त्रिवेदीकी सास ।
<Br>४४-२३<noinclude></noinclude>
1bdn2p9mh2dd50ektyfho2wdkbh6wvy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९३
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||'''पत्र चंद त्यागीको'''|३५५}}
सुशीलाको वर्षगाँठके उपलक्ष्य में मेरा आशीर्वाद कहना ।
राजकोट जाने पर तू जमनादाससे मिली होगी। मनुसे मिली थी ? पुरुषोत्तमकी
तबीयत कैसी है ?
जमनादासकी पाठशालामें कुछ होता है या नहीं ?
राजकोटमें आन्दोलन के सिल-
सिले में कुछ हलचल दिखाई दी या नहीं ? इन सब खबरोंकी मैं तुझसे आशा रखता हूँ ।
धर्मकुमारकी बुरी आदतोंका बराबर ध्यान रखना दुर्गाको समझाना | दुर्गा
ध्यान दे तो बहुत काम कर सकती है।
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
'भजनावलि' में १३९ वें भजनकी दूसरी पंक्ति में 'निजनामग्राही प्रयोग है।
इसका अर्थ नारणदाससे या किसी गुजराती जाननेवाले व्यक्तिसे समझकर भेजना।
तू ही समझती हो, तो और क्या चाहिए ?
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९३) से । सीजन्य प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२४५ की फोटो नकलसे भी।
भाई त्यागीजी,
{{C|'''५००. पत्र : चंद त्यागीको'''}}
{{Rh|||५ दिसम्बर १९३०}}
तुमारा खत पा कर मुझको बहोत आनंद हुआ। यदि नियम पालनसे भी
अशक्ति न हटे तो दूध लेना। उसके पहले पका हुआ अन्न ला कर देख लेना । हठ
नहि करना । गुरुकुलके हाल सुन कर मुझे खेद होता है। अभयजी जानते है क्या ?
रामदेवजीने क्या उत्तर दिया था ? बलदेव सुधारी काम भले सीखे। उसे लिखो चरखा,
करा, तकली इ० बनानेका सीख लेवे वृ० गु० ' में आजकल कौन मुख्य अध्यापक
है ? प्रेमराजजीसे कहो मुझे सब हाल लिखे। वहां क्या चल रहा है ?
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
<Br>भारतीय पाठशाला
<Br>फरुखाबाद
<Br>[ पुनश्च ]
मुझे कभी पता नहि था कि तुमारे उर्दू हरफ छपे हुए जैसे है। बहोत ह
अच्छे है।
{{Gap}}जी० एन० ३२६६ की फोटो नकलसे ।
<Br>१. वृन्दायन गुरुकुल |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५०१. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
चि० कुसुम (देसाई),
तेरे पत्रके तीन पन्ने थे। बीचका पन्ना इन लोगोंने खो दिया मालूम होता
है। मुझे नहीं मिला । तुझे याद हो तो फिर लिखना । प्यारेलालकी तबीयत बहुत
ही अच्छी हो गई है। उसका वजन १२२ पौंड है। उसे भोजनमें डेढ़ सेर दूध, आध
सेर रोटी और शाक-सब्जी आदि मिलते हैं।
आजकल तो हम दोनों चरखेके पीछे पागल हो गये हैं।
गुजराती (जी० एन० १८१२ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वा}}
{{C|'''५०२. पत्र : बुलाखीदासको'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
भाई बुलसीदास,
ईश्वर तो निस्सन्देह हजारों ढंगसे हमारी परीक्षा लेगा । उससे निराश न
होना। आप दोनों अन्तिम क्षण तक अपने कर्त्तव्यका पालन करना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३१३९ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५०३. पत्र: महेन्द्र देसाईको'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
चि० मनु ( मानसिंह),
तेरा पत्र मिला तेरी लिखावट सुन्दर होनी चाहिए। रोज कितना सूत कातता
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४११) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५०९. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
चि० वसुमती,
तेरे दोनों पत्र मिले हैं। तू अभी तक तो पकड़ी नहीं गई है। लेकिन यदि पकड़ी
जाये तो अच्छा ही है। इस विषयमें तटस्थ रहना सब कुछ धीरजके साथ करना ।
देखता हूँ, वहां तो तुझे अच्छा अनुभव मिल रहा है। अब मेरे पास प्यारेलाल है ।
गुजराती (एस० एन० ९२९५ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५१०. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
चि० गंगाबहन (बड़ी),
तुम्हारा पत्र मिला। आग बुझानेके लिए प्रार्थना छोड़ी, इसका अर्थ है प्रार्थना
की। यह कर्ममें अकर्मका उदाहरण है। तुमने प्रार्थनाके हेतुको निभाया। फिर आग
बुझानेके लिए भागते हुए भी मनमें रामनामका जप हो ही सकता है।
और आखिरकार जिसका जीवन सेवामय है और जिसने अहंकारको मनसे
निकाल दिया है, वह प्रार्थनामय ही है। ऐसा बननेके लिए ही सुबह-शाम प्रार्थना
करते हैं । किन्तु आग आदि जैसी घटना होनेपर प्रार्थना छोड़ी भी जा सकती है।
ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं।
तुम्हारे पत्र में जिस जहरका वर्णन है, वहां तुम अमृत उँडेल दो। हिंसाका
अहिंसासे, असत्यका सत्यसे, कामका संयमसे, क्रोधका अक्रोधसे और लोभका उदारतासे
ही सामना किया जा सकता है।
[ गुजरातीसे ]
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
बापुना पत्रो - ६: गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६७ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|''''५११. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
चि० सुशीला,
'स्टुअर्ट' नामके में दो-तीन व्यक्तियोंको जानता हूँ। एक मजिस्ट्रेट था जो बादमें
जुलू विद्रोहके समय सैनिक अधिकारी बन गया था। एक अन्य स्टुअर्ट वकालत
किया करता था। पहले के साथ तो मेरे सम्बन्ध काफी घनिष्ठ हो गये थे। क्या यही
व्यक्ति वहाँ है? क्या तू भी मणिलालके स्थान पर जाना चाहती है? सीताको उर्फ
धैर्यालाको अथवा उसका और कोई नाम रखा हो, क्या साथ ले जाना चाहती है
अथवा पीछे छोड़ जाना चाहती है ?
यहाँ कितनी बहनें काम करती है ?
तुम सबको
गुजराती (जी० एन० ४७७८) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''५१२. पत्र: पद्माको'''}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
चि० पद्मा,
तेरा पत्र मिला। गुजराती तेरी मातृभाषा नहीं है, इसलिए लिखावट क्यों
खराब होनी चाहिए? लिखावटका भाषाके साथ क्या सम्बन्ध है? अच्छा तो तू
देवनागरी लिपिमें मुझे पत्र लिख और उसमें अपनी सुघड़ताका परिचय दे । अक्षर
तो चित्रके समान हैं। जिसे चित्रकला आती है वह चाहे जिस भाषा में अक्षर चित्रित
कर सकता है।
यदि कोई व्यक्ति हमसे ऐसे भोजनको खानेका आग्रह करता है जो हमने कभी
न खाया हो और यदि हम विनम्रतापूर्वक उसे खाने से इनकार कर दें, तो वह अन्ततः
हमारी बातको मान जायेगा ।
यदि हमसे कोई अंग्रेज अधिकारी मिलने आये तो हमें उसके साथ अभद्र
व्यवहार नहीं करना चाहिए।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ६११६) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५१३. पत्र : तोताराम सनाढ्यको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||७ दिसम्बर १९३०}}
भाई तोतारामजी,
मट्टी रखकर
सरके लिये मट्टीका प्रयोग किया जाय। धूपमें काम करनेके समय मट्टीकी टोपी
सरपे रख सकते हैं। कुचमें ' मैंने बहोत दफा ऐसा किया था। दुवाल
सरपे बांधनेसे टोपी बन जाती है और रक्षा होती है।
गंगा देवीका शरीर अब कैसे
है ? धीरू अच्छी तरह रहता है? तोफान करता है ?
पंडित तोतारामजी
हरिजन आश्रम
साबरमती जंकशन
बी० बी० ऐंड सी० आई० रेलवे
जी० एन० २५४० की फोटो नकल से ।
भाई बबलभाई,
{{C|'''५१४. पत्र : बबलभाई मेहताको'''}}
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||८ दिसम्बर, १९३०}}
तुम्हारा पत्र मिला। जेलमें चाहे जिस व्यक्तिके साथ भोजन किया जा सकता
है। इस पर कोई प्रायश्चित्त आवश्यक नहीं होता ।
प्रायश्चित्त स्वच्छता अथवा
अस्वच्छताको लेकर नहीं किया जाता। वह तो बिरादरीके बाहरके किसी व्यक्तिके
हाथका खाना खाने पर किया जाता है। जो लोग ऐसे बन्धनोंको नहीं मानते वे
प्रायश्चित्त करते ही नहीं हैं। अन्य बातोंके सम्बन्धमें काकासाहब तुम्हारा पथ-निर्देश
करेंगे।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९४५५ ) की फोटो नकलसे।
१. दाण्डी- मूल
२. तात्पर्य शायद 'टावेल' अर्थात् तौलियासे है।
३ और ४. मूल पत्रमें ये शब्द अंग्रेजी लिपिमें है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३६८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
अनुभव है। दूसरा, मेरे-खराब अक्षर पढ़नेवालेको होनेवाले कष्टका अनुभव। यह लिखने-
का उद्देश्य यही है कि आश्रम में रहनेवाला हर व्यक्ति स्त्री, पुरुष, बालक, बालिका
खूब सुन्दर अक्षर लिखनेका ध्यान रखे। इसके लिए समय नहीं सिर्फ विचार करने-
भरकी जरूरत है, दूसरे व्यक्तिके प्रति प्रेमकी जरूरत है। सब इन नियमोंका पालन
करें :
१. शब्द खुले लिखें।
२. बनावटका त्याग करें।
३. अधूरे अक्षर न लिखें।
४. एक अक्षरको दूसरे में न मिलायें ।
५. जहाँ तक हो सके कोई भी मुझे पेंसिलसे न लिखे।
इतने नियमोंका पालन करते हुए अक्षर लिखें तो जरूर अच्छे होंगे। जल्दबाजी में
आसक्ति है। जल्दीमें कोई न लिखे। धीरजसे जितना लिखा जा सके उतना लिखकर
सन्तोष करे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च :]
आज ८३ पत्र हैं। किन्तु ३६वीं क्र० सं० वाला पत्र छूट गया लगता है;
इसलिए ठीक तरहसे देखें तो ८० ही है । ८१व पत्र स्वर्गीय सेठ मंगलदासके भाईके
लिए है। वह उन्हें तुरन्त पहुँचा देना ।
प्रवचन सम्बन्धी पत्रों पर भी अंक हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की फोटो नकलसे ।
चि० प्रभावती,
{{C|'''५१७. पत्र प्रभावतीको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||९ दिसम्बर, १९३०}}
बहुत दिनोंसे तेरा कोई पत्र नहीं आया। मैं चिन्तित तो अवश्य हैं, लेकिन
मान लेता हूँ कि वहाँ सब ठीक है। ईश्वर तेरा रक्षक है।
गुजराती (जी० एन० ३३८३ ) की फोटो नकलसे।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
२. इसके बाद लिये गये गीता सम्बन्धी पत्रके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९, “गीता पत्रावलि, "
अध्याय ५ ।<noinclude></noinclude>
jfnyf8k3wl1za64ruojfewg3uh10x2a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५१८. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको'''}}
{{Rh|||११ दिसम्बर १९३०}}
प्रिय कुमारप्पा,
कमलाबनके बारेमें तुमने जो लिखा है उसे मैंने ध्यानमें भर लिया है। ईश्वर
करे वह सच्चे अर्थोंमें उन्नति करे !! "यह पत्र-व्यवहार बन्द होनेकी जरुरत नहीं
है। यदि तुम मुझसे और आगे जिरह करोगे तो मैं इसे खुशीके साथ जारी रखूंगा ।
मैंने देखा है कि कई चीजें समय बीतनेके साथ और इस बीच अनजाने ही हम जो
देखते रहते हैं उससे स्पष्ट हो जाती हैं।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००८३) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापू}}
{{C|'''५१९. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}
{{Rh|||११ दिसम्बर १९३०}}
चि० कुसुम (बड़ी),
तेरा पत्र मिला। मुझे अपने स्वास्थ्यमें कोई खराबी नहीं दिखती। परिवर्तनसे
उसमें सुधार ही दिखाई देता है। जरा भी चिन्ता न करना ।
प्यारेलालका समय इन कामोंमें बँटा हुआ है :
३७५ तार चरखेपर कातना और १०० तार तकलीपर; जितनी चाहिए
उतनी पूनियाँ बनाना अभी तो इन तीन कामोंसे ही मुश्किलसे फुरसत मिल पाती
है। तकली दो घंटे ले लेती है। मैं भी लगभग यही करता हूँ। तकलीके १०० तारके
साथ चरखेके २७५ तार रखें तो काम चल सकता है। दोनोंके मिलाकर ३७५
तार ।
लड़कियोंके बारेमें तू जो लिखती है सो ठीक है। मुझे और अधिक स्पष्टता-
से लिखना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० १८१३) की फोटो - नकलसे ।
४४-२४<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३७२|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
समय जो आहार चुना था वही लेता रहता तो आज भी मैं उसीपर पनप रहा
होता। वर्तमान आहार वर्षावाले आहारका थोड़ा सुधरा रूप है।
जब कभी बीमार पड़ो तो साप्ताहिक पत्र- दिवसकी प्रतीक्षा किये बिना मुझे
पत्र लिखने में हिचकना नहीं ।
सप्रेम,
{{Rh|||बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८३) की फोटो नकलसे
{{C|'''५२२. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर १९३०}}
{{Rh|||सौजन्य : मीराबहन}}
चि० वसुमती,
तेरे सब पत्र मुझे एक-साथ मिले हैं। बहनें पकड़ी गई यह अच्छा हुआ ।
चूंकि सर्वसाधारणको लिखे पत्र में मैं अपने वारेमें सब कुछ लिखता हूँ, इसलिए व्यक्तिगत
पत्रोंमें कुछ नहीं कहता। मेरी तबीयत अच्छी है। इस समय मैंने दूध छोड़ दिया है
तथा ज्वार-बाजराकी रोटी, साग और तीन तोला बादाम लेता हूँ। इनके अतिरिक्त
नींबू और कभी-कभी खजूर भी लेता हूँ। इससे मुझे एनीमा नहीं लेना पड़ता। अब
देखना यह है कि ऐसा हमेशा कर पाता हूँ या नहीं। वजन कम हो गया है, लेकिन
इसकी कोई चिन्ता नहीं।
गुजराती (एस० एन० ९२९६) की फोटो नकलसे।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''५२३. पत्र: निर्मला देसाईको'''}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर, १९३०}}
चि० निर्मला,
तेरा पत्र मिला । तेरे किसी पत्रका उत्तर देना रह गया हो, ऐसा मुझे याद
तो नहीं पड़ता । बा वापस क्यों गई? वहाँ उन्हें अच्छा नहीं लगा ? अथवा वे
थोड़े दिनोंके लिए ही आई थीं ? तेरा पैर अब कैसा है ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ९४५७ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५२४. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर, १९३०}}
चि० रामचन्द्र,
तुम्हारा खत मिला । तुमारे शाहिसे खत लिखना और अक्षर शुद्ध बनाना ।
आश्रममें सब आ गए अच्छा हुआ। जीजीसे कहो शांतिसे रहे और छुआछूत छोड़
देवे छुआछुतमें धर्म कभी नहीं हो सकता ।
जी० एन० ५२६५ की फोटो नकलसे।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{C|'''५२५. पत्र : शारदा सी० शाहको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
चि० शारदा,
तेरे पत्रका जवाब लिखना रह गया हो ऐसा तो मुझे नहीं लगता । हाँ, उता-
वलीमें रह गया हो तो आश्चर्य नहीं । तुझे यह श्वासका कष्ट होता ही रहता है।
तू इसे भगा क्यों नहीं पाती ? तेरे खाने-पीनेमें कुछ बदपरहेजी होती होगी। या
फिर तू क्रोधमें आ जाती होगी। मनुष्य उत्तेजित हो जाये तो उसे दमाका दौरा पड़
जाता है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९८९५) से । सौजन्य:
शारदाबहन जी० चोखावाला
१. रामचन्द्र त्रिवेदीकी माता, जो उस समय आश्रममें रह रही थीं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१७
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५३४. पत्र : शान्ता त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०←}}
चि० शांता,
तुमारा खत मिला। जीजीकी सेवा भी एक प्रकारकी देश सेवा है। यह सेवा
विगतमोह होनी चाहिए अर्थात् दूसरी कोई सेवा कर सके ऐसी
सेवाको आवश्यकता है और सेवामें हमारी कुछ निजी स्वार्थ नहि है ।
जी० एन० ५२६८ की फोटो नकलसे ।
चि० रामचंद्र,
{{C|'''५३५. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
रविवार [ १४ दिसम्बर, १९३० या उसके पश्चात् ]
तुमने दस्तखत नहि दिये हैं परंतु तुमारा हि खत है। तुमने अच्छे अशर
लिखनेका ठीक प्रयत्न किया है। ऐसे हि करते रहो। जीजीसे कहो धर्म पालनमें
पिताजीकी प्रसन्नता अप्रसन्नताका प्रश्न रहता हि नहि। अंतमें धर्म पालनसे सब प्रसन्न
हो जाते हैं। मीरा बाईका दृष्टान्त हमारे सामने हि है। छुआछुतको जीजी यदि पाप
समझती है और समझना चाहिए तो उसे छोड़ दें।
जी० एन० ५२९१ की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
१. पत्रकी सामग्रीसे लगता है कि यह पत्र १३ दिसम्बर, १९३० को रामचन्द्र त्रिवेदीको लिखे पत्रके
पश्चात् लिखा गया था। इसके बाद रविवार १४ दिसम्बरको था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१८
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५३६. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Rh|||१५ दिसम्बर, १९३०}}
चि० प्रभावती,
आश्रम पहुँच गई होगी।
जायेंगे। लेकिन आज और
नहीं गई है तो अविलम्ब
जयप्रकाशके पत्रके अनुसार तो शायद तू अबतक
अब ऐसा बन्दोबस्त हुआ है कि तेरे पत्र मुझे तुरन्त दिये
कल मुझे कोई पत्र नहीं मिला । यदि तू अबतक आश्रम
चली जाना । वहाँसे भी फिलहाल मुझे रोज पत्र लिखा करना । तुझे जो दौरे पड़ते
हैं, वे बन्द होने चाहिए; आश्रममें आनेपर वे अवश्य बन्द हो जायेंगे। फलादि
जिन वस्तुओंकी जरूरत हो, उन्हें मँगवाने में संकोच न करना । जाते ही एकदम काममें
न लग जाना। तूने आश्रमकी बहुत सेवा की है, इसलिए पूरा आराम लेना । मनमें
किसी तरह की चिन्ता मत करना। ईश्वरको जो करना होगा, सो करेगा। 'प्रेमल
ज्योति भजनका चिन्तन करना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३८४ ) की फोटो नकलसे ।
२. न्यूमैनको "लीड, काडली लाइट" का नरसिंहराव दिवेतिया द्वारा किया गया गुजराती अनुवाद ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३३
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Sonu kumar 07
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|परिशिष्ट}}
४
समुद्र-वसने ! देवि ! पर्वत स्तन मण्डले !।
विष्णु-पत्नि ! नमस्तुभ्यम्; पाद-स्पर्श क्षमस्व मे ।।
५.
{{Rh|||९-५-१९३०}}
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माऽच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
३९५
{{Rh|||१०-५-१९३०}}
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ !
६
निविडनं कुरु मे देव !
शुभ-कार्येषु सर्वदा ।।
{{Rh|||११-५-१९३०}}
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर् विष्णुर्, गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म
तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
{{Rh|||१२-५-१९३०}}
८
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर् ध्यान- गम्यम्
वन्दे विष्णुं भय-भय-हरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
{{Rh|||१३-५-१९३०}}
९
कर-चरण कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं या मानस वाऽपराधम् ।
विहितम् अविहितं वा सर्वम् एतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे ! श्रीमहादेव शम्भो ! ॥
{{Rh|||१४-५-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३४
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३९६|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
१०.
न त्वहं कामये राज्यम् न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनाम् आर्ति-नाशनम् ।।
{{Rh|||१५-५-१९३०}}
११
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्ताम्
न्याय्येन मार्गेण महीं महीनाः ।
गो-ब्राह्मणेभ्यः शुभम् अस्तु नित्यम्;
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥
{{Rh|||१६-५-१९३०}}
१२
नमस् ते सते ते जगत्-कारणाय
नमस् ते चिते सर्व-लोकाश्रयाय ।
नमोऽद्वैत तत्त्वाय मुक्ति प्रदाय
नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय ।।
{{Rh|||१७-५-१९३०}}
१३
त्वम् एकं शरण्यं त्वम् एकं वरेण्यम्
त्वम् एकं जगत्-पालक स्व-प्रकाशम् ।
त्वम् एकं जगत्-कर्तृमातृ-प्रहर्तुं
त्वम् एकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।।
{{Rh|||१८-५-१९३०}}
१४
भयानां भयं भीषणं भीषणानाम्
गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् ।
महोच्चैः पदानां नियन्तु त्वम् एकम्
परेषां परं रक्षणं रक्षणानाम् ॥
{{Rh|||१९-५-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३५
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट'''}}
वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो
वयं त्वां जगत् साक्षि-रूपं नमामः ।
सद् एकं निधानं निरालंबम् ईशम्
भवाम्भोधि-पोतं शरण्यं व्रजामः ॥
१६
{{Rh|||२०-५-१९३०}}
विपदो नैव विपदः संपदो नैव संपदः ;
विपद् विस्मरणं विष्णोः संपन् नारायण-स्मृतिः ।।
१७
{{Rh||`२१-५-१९३०}}
विष्णुर् या त्रिपुरान्तको भवतु वा ब्रह्मा सुरेन्द्रोऽथवा
भानुर् वा शश-लक्षणोऽथ भगवान् बुद्धोऽथ सिद्धोऽथवा ।
राग-द्वेष-विपाति- मोह-रहितः सत्त्वानुकंपयतो
यः सर्वेः सह संस्कृतो गुणगणैस् तस्मै नमः सर्वदा ।।
१८
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत् त्वं पूषन् ! अपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये ॥
[ ईश, १५ ]
{{Rh|||२२-५-१९३०}}
१९
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणम् एनो
भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥
{{Rh|||२३-५-१९३०}}
[ ईश, १८]
{{Rh|||२४-५-१९३०}}
२०
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यम् एतः
तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयो वृणीते ।
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
[ कठ, १. २. २]
३९७
{{Rh|||२५-५-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३९८|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
२१
सर्वे वेदा यत्पदम् आमनन्ति
तपांसि सर्वाणि न यद् वदन्ति ।
यद् इच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत् ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॐ इत्येतत् ।।
[कठ, १.२.१५]
२२
न तत्र सूर्यो भाति, न चन्द्र-तारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयम् अग्निः ?
तम् एव भान्तम् अनुभाति सर्वम्
तस्य भासा सर्वम् इदं विभाति ।।
२३
[ कठ, २.५. १५ ]
तपःश्रद्धे ये
धुपवसन्त्यरण्ये
शान्ता विद्वांसो भैक्षचयाँ चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति
२६-५-१९३०
२७-५-१९३०
यत्रामृतः स पुरुषो
व्ययात्मा ।।
[ मुंडक १.२.११]
२८-५-१९३०
२४
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथम् एव तु ।
बुद्धि तु सारथि विद्धि मनः प्रग्रहम् एव च ।।
इन्द्रियाणि हयान् आहुर् विषयांस् ते
आरमेन्द्रियमनोयुक्तम् भोक्ते त्याहुर् मनीषिण: ।
२५
[ कठ, १. ३. ३-४ ]
२९-५-१९३०
विज्ञानसारथिर् यस् तु मनः प्रग्रहवान् नरः ।
सोऽध्वनः पारम् आप्नोति तद्
विष्णोः परमं पदम् ।।
[ कठ, १.३.९]
३०-५-१९३०<noinclude></noinclude>
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