विकिस्रोत
hiwikisource
https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.16
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिस्रोत
विकिस्रोत वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
लेखक
लेखक वार्ता
अनुवाद
अनुवाद वार्ता
पृष्ठ
पृष्ठ वार्ता
विषयसूची
विषयसूची वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
विकिस्रोत:चौपाल
4
15
673199
672697
2026-08-23T09:25:02Z
AMAN KUMAR
6475
/* प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें */ समर्थन
673199
wikitext
text/x-wiki
{{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}}
<!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें -->
----
== सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ ==
: दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
# [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== मार्च गतिविधि अपडेट ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ:
* 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है।
* गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया।
* फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए।
* राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ।
* आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं।
: हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== Request for comment (global AI policy) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}}
A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}}
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC)
== अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें ==
<section begin="announcement-content" />
योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा।
यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" />
[[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC)
लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है।
== [[Special:Import]] ==
*[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]]
*[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]]
:[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC)
== RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons ==
<bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="Message"/>
'''Legal & Safety Contacts'''
Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]].
<section end="Message"/>
</div>
-- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि ==
प्रबंधक महोदय,
मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है।
मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC)
:आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC)
==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें ==
'''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ।
* [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें।
* [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं।
* [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]
:सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
== Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) ==
<bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}}
You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}}
[[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC)
</bdi>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> ==
<div lang="en" dir="ltr">
<section begin="announcement-content" />
<em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em>
Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier.
If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation.
There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki.
To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]].
<section end="announcement-content" />
</div>
[[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश -->
== प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें ==
:हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है।
:मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके।
:इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
* मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[s:en:Wikisource:Copyright policy | Wikisource:Copyright policy]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
;समर्थन:
# {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# {{समर्थन}} विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड की सुविधा होनी चाहिए। कई ऐसी पुस्तकें हैं जिनके djvu फ़ाइल का आकार ज्यादा होने के कारण कॉमन्स पर अपलोड करने में असुविधा होती है। इसके साथ ही कई ऐसी फ़ाइलें हैं जो कॉमन्स पर गलत नाम से मौजूद हैं। ऐसी फ़ाइलों का नाम बदलवाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार नाम बदल भी नहीं पाता है। स्थानीय अपलोड की सुविधा होने से चित्र वाले पृष्ठों का शोधन कार्य भी आसान होगा। —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०३:५८, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# {{समर्थन}} इस सुविधा से संपादन करना सुविधाजनक होगा।[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
;विरोध:
;तटस्थ:
;परिणाम:
== संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 अक्तूबर के प्रस्तावित नियम पर मत दें ==
[[w:hi: विकिपीडिया:संपर्क सूत्र|विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर आगामी अक्तूबर में होने वाले संपर्क सूत्र के निर्वाचन के नियम प्रस्तावित किए गए हैं। पिछले वर्ष के निर्वाचन के दौरान हुई चर्चाओं के आधार पर प्रबंधक बैठक में चर्चा के उपरांत संशोधित नियम प्रस्तावित किए गए हैं। इनपर सदस्यों के मत का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ००:१२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
0i96myzzn19o46j4ay5n5dvnvojq69s
विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf
252
158594
673203
619916
2026-08-23T09:34:55Z
सौरभ तिवारी 05
49
[[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] जोड़ी गई
673203
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=१३
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी|मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=प्रकाशन विभाग
|Address=दिल्ली
|Year=
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist
1=आवरण-पृष्ठ 2to4=- 5=मुखपृष्ठ 6to7=- 8=चित्र 9=मुखपृष्ठ 10=प्रकाशक 11to14=भूमिका 15=आभार 16=सूचना 17to29=विषय-सूची 30=चित्र-सूची 31=1 127to128=चित्र 129=97 193to194=चित्र 195=161 403to404=चित्र 405=369 700to704=-
/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks={{scrollpane|border=1px dashed silver|height=600px|width=320px|
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२०}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२४}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२५}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२६}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/३०}}}}
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव अप्रैल २०२३]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
[[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
6q3j1b7j4h5eyewnl2sxk1hy1qq13ad
673209
673203
2026-08-23T09:48:08Z
सौरभ तिवारी 05
49
पृष्ठसूची।
673209
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=१३
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी|मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=प्रकाशन विभाग
|Address=दिल्ली
|Year=
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist
1=आवरण-पृष्ठ 2to4=- 5=मुखपृष्ठ 6to7=- 8=चित्र 9=मुखपृष्ठ 10=प्रकाशक 11to14=भूमिका 15=आभार 16=सूचना 17to29=विषय-सूची 30=चित्र-सूची 31=1 127to128=चित्र 129=97 193to194=चित्र 195=161 403to404=चित्र 405=369 677to699=सांकेतिका 700to704=-
/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks={{scrollpane|border=1px dashed silver|height=600px|width=320px|
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२०}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२४}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२५}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२६}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/३०}}}}
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव अप्रैल २०२३]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
[[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
7tuiyb2dv3kwt5h681bv4tfa4uubs2x
विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf
252
158631
673219
546448
2026-08-23T10:06:00Z
सौरभ तिवारी 05
49
पृष्ठसूची।
673219
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=२५
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी|मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=प्रकाशन विभाग
|Address=दिल्ली
|Year=
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist 1=आवरण-पृष्ठ 2to4=- 5=मुखपृष्ठ 6to7=- 8=चित्र 9=मुखपृष्ठ 10=प्रकाशक 11to17=भूमिका 18=- 19=आभार 20=सूचना 21to34=विषय-सूची 35=1 227to228=चित्र 229=193 688to712=सांकेतिका 713to716=-
/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks={{scrollpane|border=1px dashed silver|height=600px|width=320px|
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२४}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२५}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२६}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३०}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३४}}}}
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव नवंबर २०२२]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
9ygngru7grlk29ztdf6zuqonijd8pgc
673224
673219
2026-08-23T10:12:41Z
सौरभ तिवारी 05
49
[[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] जोड़ी गई
673224
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=२५
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी|मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=प्रकाशन विभाग
|Address=दिल्ली
|Year=
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist 1=आवरण-पृष्ठ 2to4=- 5=मुखपृष्ठ 6to7=- 8=चित्र 9=मुखपृष्ठ 10=प्रकाशक 11to17=भूमिका 18=- 19=आभार 20=सूचना 21to34=विषय-सूची 35=1 227to228=चित्र 229=193 688to712=सांकेतिका 713to716=-
/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks={{scrollpane|border=1px dashed silver|height=600px|width=320px|
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२४}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२५}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२६}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३०}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/३४}}}}
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव नवंबर २०२२]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
[[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
sripkqsc8zxfshxjw7tzvk4mvb0ltnx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६११
250
159520
672891
508702
2026-08-22T14:19:34Z
अँजली चौधरी
2439
672891
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|५७९}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}२४१-४२, २४९, २५५-५६; —और शाकाहार, १०८, १४६; सरकारकी सहायता, १, १०७; —और सविनय अवज्ञा, २३१-३२; -का अर्थ, ३३, ९५, ३७१-७२, ५०३; -का उद्देश्य, ३०५-६, ४८८; -का कार्यक्रम, १३४-३५; -का कार्यक्रम गुजरातमें, १८०; -का कार्यक्रम पंजाबमें, १८१-८२; -का स्वरूप स्वराज्य-प्राप्तिके बाद, १२१-२२; -की आलोचनाका जवाब, १७-२०, १६१-६४, २६०-६३; -की रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा आलोचना, १६१-६४; के अंग, ४३१; –के गुण, ५२, ५७, ८६, ३७०-७१, ४०७, ४६१, ५३३-३४; के
मूल तत्व, ११८-१९; -देशी राज्योंमें, ९६, ५०७; —नकारात्मकता और नैराश्यका सिद्धान्त नहीं, १६१-६४; —विरोधी दमन कार्रवाइयाँ, २२२-२५, -व्यक्तिगत नहीं बल्कि शासन पद्धतिके विरुद्ध, ९५, १३३-३४,}}
{{Outdent|असहयोग समिति, -की रिपोर्ट, ३९४-९६}}
{{Outdent|अस्पृश्यता, २९, ४४, ५३, ११८, ४०८, ५३०; -और धर्म, २३८-३९, २८९; -और राष्ट्रीयता, ५२८-३०; -और वैष्णव, ३५८; -और सफाईका काम,
२६८, ४०६; -और स्वराज्य, ८०-८१, २७६-७७, २८९, ३३१-३३, ५२६, ५२९-३०; -और हिन्दू धर्म, ७-८, ११३, २६७, ३१६-१७, ३३१- ३३; -निवारण कांग्रेस कार्यक्रम में सबसे ऊपर, १३४-३५}}
{{Outdent|अहिंसा, ३४, ९५, १४५, १७१, २३८, ३८५, ५००, ५५१; -और असहयोग, ४३, ५३-५४, ५७-५८, ७०, ९२, १२८, १७१-७२, २२०, ४०२-३, ४५८; और खिलाफत, ५८, १६४-६६, ——और धर्म,}}
३२, २७७-७८; -और मद्यपान निषेध
आन्दोलन, ४१७; -और मुसलमान,
५१२; - का व्रत वीरताका सूचक,
४७८; के सिद्धान्तका प्रतिपादन,
१६४-६५, ५३३; - जैन धर्ममें, ३२-
३३; -दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहमें,
४८६; -पालन और हिन्दू, ३०१;
-पालन सिखों द्वारा ननकाना साहबमें,
६७-६८; - पालनसे स्वराज्यका मार्ग
सुगम, ८३, ३८६-८७
आगाखाँ, ४९
आ
आजाद, अबुल कलाम, २३६, २५१
आयंगार, एस० श्रीनिवास, ३४६
इंगलिश मैन, २३३
इंडिपेंडेंट, ३४७, ३६९, ५२२, ५४६
इंडियन डेली टेलीग्राफ, ४९९
इंडियन सिविल सर्विस, २६२
इंडियन सोशल रिफॉर्मर, ५६, १२५-२६,
४५२; -चरखेके विषयपर, ३०४-६;
-धरना देनेपर, ३३९-४०
इदरस, एस० एफ०, २९७
इमाम हसन, ५१, २९३
इमाम हुसैन, ५१
इस्लाम, ४, २०, ३०, ३३, ५९, १००, १०९,
३९५, ५४१; -और स्त्रिय, ४२८
ईदुलजी, सेठ, ६४
ई
ईसा, २७, २९३, २९७, ३७९-८०
ईसाई, २३, २६, ३४, ३७७, ४३४, ४४५,
४५३, ४७७; -और जजीरत-उल-अरब,
१२७-२८
ईस्ट इंडिया कम्पनी, ७९, ४५१
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
85wa6a6jve7oqdz2kvs3xbb7ng5xg03
672909
672891
2026-08-22T14:51:12Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672909
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|५७९}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}२४१-४२, २४९, २५५-५६; —और शाकाहार, १०८, १४६; सरकारकी सहायता, १, १०७; —और सविनय अवज्ञा, २३१-३२; -का अर्थ, ३३, ९५, ३७१-७२, ५०३; -का उद्देश्य, ३०५-६, ४८८; -का कार्यक्रम, १३४-३५; -का कार्यक्रम गुजरातमें, १८०; -का कार्यक्रम पंजाबमें, १८१-८२; -का स्वरूप स्वराज्य-प्राप्तिके बाद, १२१-२२; -की आलोचनाका जवाब, १७-२०, १६१-६४, २६०-६३; -की रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा आलोचना, १६१-६४; के अंग, ४३१; –के गुण, ५२, ५७, ८६, ३७०-७१, ४०७, ४६१, ५३३-३४; के
मूल तत्व, ११८-१९; -देशी राज्योंमें, ९६, ५०७; —नकारात्मकता और नैराश्यका सिद्धान्त नहीं, १६१-६४; —विरोधी दमन कार्रवाइयाँ, २२२-२५, -व्यक्तिगत नहीं बल्कि शासन पद्धतिके विरुद्ध, ९५, १३३-३४,}}
{{Outdent|असहयोग समिति, -की रिपोर्ट, ३९४-९६}}
{{Outdent|अस्पृश्यता, २९, ४४, ५३, ११८, ४०८, ५३०; -और धर्म, २३८-३९, २८९; -और राष्ट्रीयता, ५२८-३०; -और वैष्णव, ३५८; -और सफाईका काम,
२६८, ४०६; -और स्वराज्य, ८०-८१, २७६-७७, २८९, ३३१-३३, ५२६, ५२९-३०; -और हिन्दू धर्म, ७-८, ११३, २६७, ३१६-१७, ३३१- ३३; -निवारण कांग्रेस कार्यक्रम में सबसे ऊपर, १३४-३५}}
{{Outdent|अहिंसा, ३४, ९५, १४५, १७१, २३८, ३८५, ५००, ५५१; -और असहयोग, ४३, ५३-५४, ५७-५८, ७०, ९२, १२८, १७१-७२, २२०, ४०२-३, ४५८; और खिलाफत, ५८, १६४-६६, ——और धर्म,}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}३२, २७७-७८; -और मद्यपान निषेध आन्दोलन, ४१७; -और मुसलमान, ५१२; —का व्रत वीरताका सूचक, ४७८; ——के सिद्धान्तका प्रतिपादन, १६४-६५, ५३३; —जैन धर्ममें, ३२-३३; -दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहमें, ४८६; -पालन और हिन्दू, ३०१; -पालन सिखों द्वारा ननकाना साहबमें, ६७-६८; -पालनसे स्वराज्यका मार्ग सुगम, ८३, ३८६-८७}}
{{c|'''आ'''}}
{{Outdent| '''आ'''गाखाँ, ४९}}
{{Outdent|आजाद, अबुल कलाम, २३६, २५१}}
{{Outdent|आयंगार, एस॰ श्रीनिवास, ३४६}}
{{c|'''इ'''}}
{{Outdent|'''इंगलिश मैन,''' २३३}}
{{Outdent|''cइंडिपेंडेंट,''' ३४७, ३६९, ५२२, ५४६}}
{{Outdent|'''इंडियन डेली टेलीग्राफ,''' ४९९}}
{{Outdent|'''इंडियन सिविल सर्विस,''' २६२}}
{{Outdent|'''इंडियन सोशल रिफॉर्मर,''' ५६, १२५-२६, ४५२; -चरखेके विषयपर, ३०४-६; -धरना देनेपर, ३३९-४०}}
{{Outdent|इदरस, एस॰ एफ॰, २९७}}
{{Outdent|इमाम हसन, ५१, २९३}}
{{Outdent|इमाम हुसैन, ५१}}
{{Outdent|इस्लाम, ४, २०, ३०, ३३, ५९, १००, १०९, ३९५, ५४१; -और स्त्रिय, ४२८}}
{{c|'''ई'''}}
{{Outdent|'''ई'''दुलजी, सेठ, ६४}}
{{Outdent|ईसा, २७, २९३, २९७, ३७९-८०}}
{{Outdent|ईसाई, २३, २६, ३४, ३७७, ४३४, ४४५, ४५३, ४७७; -और जजीरत-उल-अरब, १२७-२८}}
{{Outdent|'''ईस्ट इंडिया कम्पनी,''' ७९, ४५१}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
50wfb0jx9z9h5jn935jzjof7q3yfkyi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१२
250
159521
672927
508703
2026-08-22T15:11:15Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672927
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{c|''' ए'''}}
{{Outdent|एन्ड्रयूज, सी॰ एफ॰, ४१, १०६, १३३, १५१, १५७, १८२, २३३, २४३, ३५१, ३६८, ३७१, ४१०, ४२७, ४३०, ४५३, ५१९; ——के असमिया मजदूरों की समस्या से सम्बन्धित विचार, २२७-३०}}
{{c|'''ओ'''}}
{{Outdent|'''ओ’'''डायर, सर माइकेल, ६८, २३४, ३७८, ५४६}}
{{c|'''क'''}}
{{Outdent|'''कं'''डास्वामी, सी॰, ५० पा॰ टि॰}}
{{Outdent|कताई, —अकालके विरुद्ध बीमा, ८९, २१३; -और स्वराज्य, २३९; और हाथ-बुनाई, १९६-९७ -का देशकी अर्थ-व्यवस्था में महत्त्व, ९१-९२, ४५०-५१; -की प्रक्रियाएँ, ७५-७६; -बच्चों द्वारा, ७४, ४२०; -बढ़िया सूतकी, २४६; -स्कूलों में, ९, २७०, ५४८-४९}}
{{Outdent|कपूरसिंह, ४२५, ५३५}}
{{Outdent|कबीर, ४५}}
{{Outdent|कशालकर, ——की बरखास्तगी, ३९३-९४}}
{{Outdent|कानुगा, डाक्टर, १२-१३}}
{{Outdent|काबुली, ५२४}}
{{Outdent|कामदार, रामीबाई, ४६५}}
{{Outdent|'''कामरेड,''' ५४०}}
{{Outdent|कालेलकर, दत्तात्रेय बालकृष्ण, ३६१, पा॰ टि॰, ३८८}}
{{Outdent|कुँवरजी आनन्दजी, २५२}}
{{Outdent|कुँवरजी विट्ठलभाई, ३९९, ४४२}}
{{Outdent|'''कुरान शरीफ,''' ४११}}
{{Outdent|कृपलानी, जीवतराम बी॰, ५२२}}
{{Outdent|कृष्ण, [भगवान्,] ६३, १२८, २०१, ३६३, ३७४, ४०४, ४६६, ५२०}}
{{Outdent|कृष्णदास, ५३६}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|कृष्णराव, ९२}}
{{Outdent|कृष्णानन्द, स्वामी, ४९३}}
{{Outdent|कृष्णाबाई, ३६९-७१}}
{{Outdent|केन्द्रीय खिलाफत समिति, ३९४, ३९६}}
{{Outdent|केलकर, नरसिंह चिन्तामण, १२२, ३३४}}
{{Outdent|केलकर, नरसोपन्त, ७९}}
{{Outdent|कैनिंग, लॉर्ड, १५}}
{{Outdent|'''कैपिटल,''' ४४९-५०; -का सावरकर भाइयों-पर आरोप, २९२}}
{{Outdent|'''कैलेनबैक,''' ४८५}}
{{Outdent|कोठारी, मणिलाल, ५०२}}
{{Outdent|कोठावाला, श्रीमती, ३५}}
{{Outdent|कौजलगी, हनुमन्तराव, २०४-५}}
{{Outdent|क्रिस्टोदास, देखिए कृष्णदास}}
{{Outdent|क्रेडॉक, सर आर॰, २२}}
{{Outdent|क्लाइव, रॉबर्ट, ७७-७८, ५२९}}
{{c|'''ख'''}}
{{Outdent|'''ख'''त्री, ४१०, ४५६}}
{{Outdent|खद्दर, देखिए स्वदेशी}}
{{Outdent|खबरदार, अर्देशर फ्रामजी, ६३, ५३४}}
{{Outdent|खलीफा, ३२}}
{{Outdent|खादी, देखिए स्वदेशी}}
{{Outdent|खादी टोपी, देखिए स्वदेशी टोपी}}
{{Outdent|खिलाफत, २०, ३०, ३२-३३, ६२, ६८, ७०, ८२, ८६, ११८, १२८, ४१२; -और अहिंसा, ५८, १६४-६६; -और कांग्रेसका कार्यक्रम, ५४२; ——और गुजराती, १६६-६८; -और गोरक्षा, १०९, १५५, १९४-९५, ४५६, ४९५-९६, ५०३-४, ५१८; -और चरखा, २३९; -और पंजाबपर किये गये अत्याचार, १४५, १५१, १५३, २३९; और स्वदेशी, ४७४; ——और स्वराज्य, ५४२- ४३; और हिन्दू, ८९, ५२३; -और हिन्दू-मुस्लिम एकता, ८३-८४, ५००; -के बारेमें लॉर्ड रीडिंगका रवैया, ३७७-७८}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
hfc18n3ir1y9szlirj7bls1titel6o1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१३
250
159522
672931
508704
2026-08-22T15:30:21Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672931
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|५८१}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|खिलाफत समिति, ५१, ४००; —और स्वदेशी, ४४२}}
{{Outdent|खिलाफत सम्मेलन, ९९; —गुजरातमें, १७४- ८०}}
{{Outdent|खूबचन्दानी, गिरधारीलाल, १४१}}
{{Outdent|खेड़ा, ——में भरतीका काम, १२८}}
{{Outdent|ख्वाजा, श्रीमती, ५०९}}
{{c|'''ग'''}}
{{Outdent|'''ग'''र्स्ट, सर जॉन, २४२}}
{{Outdent|गांधी, कस्तूरबा, ५३६, ५५०; -और खादी, ३१७-१८}}
{{Outdent|गांधी, छगनलाल, २१३}}
{{Outdent|गांधी टोपी, देखिए स्वदेशी टोपी}}
{{Outdent|गांधी, देवदास, ३४७, ५२२, ५३६, ५५०}}
{{Outdent|गांधी, प्रभुदास, ४८८}}
{{Outdent|गांधी, मगनलाल, ५२१, ५३६}}
{{Outdent|गांधी, मोहनदास करमचन्द, —अपने चरण-स्पर्शपर, ११४; -आदमियोंके रिक्शा खींचनेपर, ११५-१६; -आधुनिक अंग्रेजी शिक्षापर ४४-४५, १४४-४५, १५७-५८, १६२, २२६-२७; —और असहयोग आन्दोलन, १६१-६४; —का महिलाओंकी अंग्रेजी शिक्षापर रवीन्द्रनाथ ठाकुरको प्रत्युत्तर, १५७-५८; —कुली-मजदूरोंके शोषणपर, ३०७-१०; —के अखिल इस्लामवादके सम्बन्धमें विचार, १५४; -के पशु-बलि सम्बन्धी विचार, ११५; -को चित्रोंमें भगवान्के रूपमें दिखाना, ३७४, ४०४-५; -गोवधपर, ३३-३४; —घुड़दौड़के बारेमें, ४८-४९, ११५, १३१, २५७; -द्वारा मालेगाँव-काण्डकी भर्त्सना, ६८-७१, ८३, ८६, ११३, १७१-७२, ५०३; -द्वारा विदेशी कपड़ों के बहिष्कारसे सम्बन्धित प्रश्नोंका उत्तर, ४६२-६३; -भारतमें अफगानी हमलेके हौएपर, ५८-५९, १००, १०६-}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}७, १५४-५७; -लक्ष्य तथा साधनपर, ५११-१२}}
{{Outdent|गांधी, हरिलाल, ५५०}}
{{Outdent|गायकवाड़, महाराजा, २४}}
{{Outdent|गिडवानी, आचार्य, २२१-२२, २२५, ३८८}}
{{Outdent|गुजरात राजनीतिक परिषद्, १६७-७०, १७३, १७६, १८०, २०२, २०६-७}}
{{Outdent|गुजरात विद्यापीठ, १८१}}
{{Outdent|गुप्त, कृष्ण, २४७}}
{{Outdent|गुप्त, के॰ बी॰ लाल, ४२९}}
{{Outdent|गुलाम महबूब, ३५१}}
{{Outdent|गेट, सर एडवर्ड, २४३}}
{{Outdent|गोकीबेन, देखिए रलियातबेन}}
{{Outdent|गोखले, गोपाल कृष्ण, १४४, १९०, २४२,
३८२, ३८५}}
{{Outdent|गोदरेज, अर्देशर बरजोरजी, ३३७, ४७०; —का तिलक स्वराज्य कोष में दान, २९४-९५, ३१३, ३१९}}
{{Outdent|गोरक्षा, ८९, ११३, ५१७; ——और खिला-फत, १५५, १९४-९५, ४५६, ४९६, ५०३-४, ५१८; और हिंसा, १०८-९; -और हिन्दू-मुस्लिम एकता, २९९}}
{{Outdent|गोवध, ——निषेध, ३३-३४; -और मुसलमान, ४५६-५७}}
{{Outdent|गोविन्दसिंह, गुरु, २७, ४५}}
{{Outdent|गोविन्दानन्द, स्वामी, ८५, १४१}}
{{Outdent|'''ग्रन्थ साहब,''' ६७-६८}}
{{Outdent|ग्लैड्स्टन, १३३}}
{{c|'''घ'''}}
{{Outdent|'''घा'''रपुरे, प्रोफेसर, ४१८}}
{{Outdent|घोरखोदू, देखिए रुस्तमजी पारसी}}
{{c|'''च'''}}
{{Outdent|चक्रवर्ती, जगद्बन्धु, ३७६}}
{{Outdent|चतुर्वेदी, माखनलाल, ३६९, ३७३}}
{{Outdent|चरखा, ९, १५-१६, १८, २२, २९, ३१, ३६, ४०, ४४, ८३, ८९, १०३, १२३-२४,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
on2sphbysime19xd9t5oanrgrhxp0nx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१४
250
159523
672944
508705
2026-08-22T15:58:27Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
672944
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५८२|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|१३५, २०२, २१३, २१५, २६०, ३२६, ३९१, ४९०-९१, ५०४, -अकालके विरुद्ध बीमा, १४५, ४७३; -आत्म-शुद्धिका साधन, २०९; -और काठिया-वाड़के राज्य, ४९६-९८; —और महिलाएँ, २९६-९७, ४४५, ५००-१; -और राष्ट्रकी समृद्धि, ४२९; -और विदेशी कपड़ेका बहिष्कार, ३५६-५७; -और शिक्षा, २२६-२७; —और स्वराज्य, १६७-६८, ३१३-१४, ४४६, ४७५, ५४९; —घरका '''श्रृं'''गार, ३५६-५७; —'''राष्ट्रीय झण्डेमें,''' १०५, १२०; '''-[खे]''' के उत्कृष्ट नमूने के लिए पुरस्कार, २६८; -को दाखिल करनेका अर्थ, १२०, २८८; - पर 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' की टिप्पणी, ३०४-६}}
{{Outdent|चिन्तामणि, चिरावुरी यज्ञेश्वर, ५०३, ५४६}}
{{Outdent|चैतन्य, ४५}}
{{Outdent|चैम्बरलेन, जोजेफ, ८५}}
{{c|'''छ'''}}
{{Outdent|'''छो'''टानी, मियाँ मुहम्मद हाजी जान मुहम्मद, १७९, १९४, २४६, ४५६}}
{{c|'''ज'''}}
{{Outdent|जकरिया, १६४-६६}}
{{Outdent|जगतनारायण, ४२४}}
{{Outdent|जगतियानी, ३७५}}
{{Outdent|जगासिया ब्रदर्स, ४१६}}
{{Outdent|जफरअली खाँ, ३७०}}
{{Outdent|'''जमींदार,''' ३७०-७१}}
{{Outdent|जयकर, मुकन्दराव रामराव, ४३८}}
{{Outdent|जयरामदास दौलतराम, १३१}}
{{Outdent|जरतुश्त, २६-२७, ४०४}}
{{Outdent|जलियाँवाला बाग, १८, ५२, ६१, ३५८, ३६८, ३७८, ५४६}}
{{Outdent|जसलक्ष्मी, २६९-७१, २७४, २७८}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|जॉन्सन, ५२१}}
{{Outdent|जुए, -के सम्बन्धमें मनुस्मृतिका कथन, १३०}}
{{Outdent|जूठाभाई, शिवजी, ८०}}
{{Outdent|जेठमल, १२७-२८}}
{{Outdent|जेराजाणी, विट्ठलदास, ३३८, ४७३}}
{{Outdent|जैन, छोटेलाल, ५३६}}
{{Outdent|जैन धर्म, —में अहिंसा, ३२-३३}}
{{Outdent|जैन लोग, ३१, ३७७}}
{{Outdent|जोजेफ, ३४७, ४४८, ४९५, ५३६, ५४६}}
{{Outdent|जोशी, वामनराव, ५}}
{{c|'''झ'''}}
{{Outdent|'''झ'''वेरी, रेवाशंकर जगजीवन, ३३७}}
{{Outdent|झीणाभाई, रजबअली, ९८}}
{{c|'''ट'''}}
{{Outdent|'''ट'''र्की, और ब्रिटिश सरकार, ३९५; —और भारत के मुसलमान, ३९५, ४७४}}
{{Outdent|'''टाइम्स ऑफ इंडिया,''' ५४, ६०, ६२, १८३, २५५, ४१८}}
{{Outdent|टाटा कम्पनी, —और भूमि अधिग्रहण अधि-नियम, ६७}}
{{Outdent|टाटा, जमशेदजी, ३२०}}
{{Outdent|टॉड, २९}}
{{Outdent|टॉमसन, २२५}}
{{c|'''ठ'''}}
{{Outdent|'''ठ'''क्कर, अमृतलाल वि॰, १९७, २४५, ३०४}}
{{Outdent|ठाकुर, द्विजेन्द्रनाथ, ३७१}}
{{Outdent|ठाकुर, रवीन्द्रनाथ, १५७, -द्वारा की गई असहयोग सम्बन्धी आलोचनाका उत्तर, १६१-६४}}
{{Outdent|ठाकोर साहब, राजकोटके, ६४}}
{{c|'''ड'''}}
{{Outdent|'''डा'''यर, जनरल, ५२, ६८, ९३, २४२, २४४, २४८}}<noinclude></noinclude>
bb3vm7q05invl80c56qa0ejlgomt0ha
672945
672944
2026-08-22T15:58:56Z
अँजली चौधरी
2439
672945
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५८२|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}१३५, २०२, २१३, २१५, २६०, ३२६, ३९१, ४९०-९१, ५०४, -अकालके विरुद्ध बीमा, १४५, ४७३; -आत्म-शुद्धिका साधन, २०९; -और काठिया-वाड़के राज्य, ४९६-९८; —और महिलाएँ, २९६-९७, ४४५, ५००-१; -और राष्ट्रकी समृद्धि, ४२९; -और विदेशी कपड़ेका बहिष्कार, ३५६-५७; -और शिक्षा, २२६-२७; —और स्वराज्य, १६७-६८, ३१३-१४, ४४६, ४७५, ५४९; —घरका '''श्रृं'''गार, ३५६-५७; —'''राष्ट्रीय झण्डेमें,''' १०५, १२०; '''-[खे]''' के उत्कृष्ट नमूने के लिए पुरस्कार, २६८; -को दाखिल करनेका अर्थ, १२०, २८८; - पर 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' की टिप्पणी, ३०४-६}}
{{Outdent|चिन्तामणि, चिरावुरी यज्ञेश्वर, ५०३, ५४६}}
{{Outdent|चैतन्य, ४५}}
{{Outdent|चैम्बरलेन, जोजेफ, ८५}}
{{c|'''छ'''}}
{{Outdent|'''छो'''टानी, मियाँ मुहम्मद हाजी जान मुहम्मद, १७९, १९४, २४६, ४५६}}
{{c|'''ज'''}}
{{Outdent|जकरिया, १६४-६६}}
{{Outdent|जगतनारायण, ४२४}}
{{Outdent|जगतियानी, ३७५}}
{{Outdent|जगासिया ब्रदर्स, ४१६}}
{{Outdent|जफरअली खाँ, ३७०}}
{{Outdent|'''जमींदार,''' ३७०-७१}}
{{Outdent|जयकर, मुकन्दराव रामराव, ४३८}}
{{Outdent|जयरामदास दौलतराम, १३१}}
{{Outdent|जरतुश्त, २६-२७, ४०४}}
{{Outdent|जलियाँवाला बाग, १८, ५२, ६१, ३५८, ३६८, ३७८, ५४६}}
{{Outdent|जसलक्ष्मी, २६९-७१, २७४, २७८}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|जॉन्सन, ५२१}}
{{Outdent|जुए, -के सम्बन्धमें मनुस्मृतिका कथन, १३०}}
{{Outdent|जूठाभाई, शिवजी, ८०}}
{{Outdent|जेठमल, १२७-२८}}
{{Outdent|जेराजाणी, विट्ठलदास, ३३८, ४७३}}
{{Outdent|जैन, छोटेलाल, ५३६}}
{{Outdent|जैन धर्म, —में अहिंसा, ३२-३३}}
{{Outdent|जैन लोग, ३१, ३७७}}
{{Outdent|जोजेफ, ३४७, ४४८, ४९५, ५३६, ५४६}}
{{Outdent|जोशी, वामनराव, ५}}
{{c|'''झ'''}}
{{Outdent|'''झ'''वेरी, रेवाशंकर जगजीवन, ३३७}}
{{Outdent|झीणाभाई, रजबअली, ९८}}
{{c|'''ट'''}}
{{Outdent|'''ट'''र्की, और ब्रिटिश सरकार, ३९५; —और भारत के मुसलमान, ३९५, ४७४}}
{{Outdent|'''टाइम्स ऑफ इंडिया,''' ५४, ६०, ६२, १८३, २५५, ४१८}}
{{Outdent|टाटा कम्पनी, —और भूमि अधिग्रहण अधि-नियम, ६७}}
{{Outdent|टाटा, जमशेदजी, ३२०}}
{{Outdent|टॉड, २९}}
{{Outdent|टॉमसन, २२५}}
{{c|'''ठ'''}}
{{Outdent|'''ठ'''क्कर, अमृतलाल वि॰, १९७, २४५, ३०४}}
{{Outdent|ठाकुर, द्विजेन्द्रनाथ, ३७१}}
{{Outdent|ठाकुर, रवीन्द्रनाथ, १५७, -द्वारा की गई असहयोग सम्बन्धी आलोचनाका उत्तर, १६१-६४}}
{{Outdent|ठाकोर साहब, राजकोटके, ६४}}
{{c|'''ड'''}}
{{Outdent|'''डा'''यर, जनरल, ५२, ६८, ९३, २४२, २४४, २४८}}<noinclude></noinclude>
2zhophwe9ng81zhl020cwe78mxmj9yz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९२
250
159713
673150
508939
2026-08-23T05:57:42Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673150
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कपड़ा पहनना चाहिए। कालबादेवीके स्वदेशी भण्डारमें १०,००० रुपयेकी खादी है और वह बिकाऊ है। मैंने आज भाई नारणदास पुरुषोत्तमदासके साथ विचार-विमर्श किया है और थोड़े ही दिनोंमें ५०,००० रुपयेकी खादी आ जायेगी।
खादीका उपयोग आवश्यकतासे अधिक न करें। देश अभी इतना माल तैयार नहीं कर सकता जो सब तक पहुँच सके। खादीका उपयोग घी और सोनेकी तरह होना चाहिए। जबतक स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक हमें ठाठ-बाटसे नहीं रहना चाहिए। पुरुषोंके पास दो कुर्ते और धोती होनी चाहिए। स्त्रियोंको भी कम कपड़ोंमें गुजारा करना चाहिए। एक भाईने सुझाव दिया है कि हमें फाँसीपर भी चढ़नेके लिए तैयार रहना चाहिए लेकिन आपको फाँसीपर नहीं चढ़ना है। अगर सारा भारत फाँसीपर चढ़नेके लिए तैयार हो जाये तो आज ही स्वराज्य है। लेकिन जब ऐसा समय आयेगा तब मुझे आपको विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेके लिए कहनेकी जरूरत ही न रह जायेगी। फिलहाल तो हममें ताकत ही नहीं रही है। कितनी ही बहनें यह कहती हैं कि जापानकी साड़ी और फ्रांसकी मखमल मुझे सौंपकर खादी पहनना मुश्किल लगता है। लेकिन हममें सच्ची सामर्थ्य आई है या नहीं—इस बातका पता लगानेकी यह कुंजी है। कितने ही लोगोंका कहना है कि आपने मेरी खातिर ही पैसा दिया है, लोगोंने सच्चा त्याग नहीं किया है। इसे भी आप विदेशी कपड़ेका त्याग कर झूठा साबित कर सकेंगे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती''', १७–७–१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१७१. तार : सी॰ विजयराघवाचार्यको'''}}}}
{{Right|[१० जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>सी॰ विजयराघवाचार्यने १० जुलाईको कोडाइकनालसे तार दिया था : "धारवाड़ प्रार्थना करता है, केलकर समर्थन करते हैं, तुरन्त तार दें बम्बई या धारवाड़ तारीख आवश्यक।"</ref>}}
बम्बईमें अट्ठाईसको बैठककी सूचना भेजी जा रही है।
{{Right|{{larger|'''गांधी'''}}}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६८) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
jvn48sf2tno4evq0am4xvuensghys1n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९३
250
159714
673153
508940
2026-08-23T06:07:09Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673153
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|सोमवार, ११ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारा पत्र मिल गया। कपड़े जलानेका हेतु तो यह है कि विदेशी कपड़ोंकी तरफ और वैराग्यवृत्ति पैदा की जाये। ये कपड़े गरीबोंको दिये जायें, इस विचारमें भी मोह है। लाख दो लाखके कपड़े गरीबोंको गये तो क्या, न गये तो क्या? इतने दिनतक ये कपड़े मँगवाकर हमने हिन्दुस्तानको बड़ा नुकसान पहुँचाया है। मैं मानता हूँ कि अब ये कपड़े गरीबोंको देनेसे भी लाभ नहीं होगा। ये कपड़े विदेश भेज देनेमें कुछ सार अवश्य है। फिर भी मैं सबकी राय लेता रहता हूँ। उसमें से जो सबको ठीक लगेगा वह मान लेंगे। अब भी शंका हो तो पूछना।
डाह्याभाईकी वानरसेना अच्छा काम कर रही दीखती है। एक बात वे याद रखें। लोगोंसे विनयपूर्वक अपनी बात कहें। घृणा या खिल्ली उड़ाने, मजाकका भाव तनिक भी न रखें। शराब पीनेवाले पर दया रखी जाये।
काकासाहब<ref>दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर (जन्म १८८५); १९१५ से गांधीजीके साथ हुए।</ref> बढ़िया शिक्षक हैं, इसमें तो शक ही नहीं। तुम सबको वे पसन्द आये, इससे मैं खुश हुआ हूँ।
काका विट्ठलभाईसे मुलाकात हुई है; काफी बातचीत हुई। उन्होंने अपने जिला बोर्डमें ठीक प्रस्ताव पास करवाया है। मेरे पास आने-जानेवाले लोग कहते हैं कि काकाकी अभी चरखेपर श्रद्धा नहीं है। इतना ही नहीं, मण्डलियों में चरखेके प्रति अरुचि प्रकट करते रहते हैं। फिर भी जब उनसे मिलूँगा तब फिर बात करूँगा। मुझपर पिछली मुलाकातका यह असर पड़ा था कि उनके मनका बहुत-कुछ समाधान हो गया है।
{{Right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Right|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने'''}}}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
4ecbk5c8xutj9vx8320obaltfekh44o
673154
673153
2026-08-23T06:07:26Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673154
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|सोमवार, ११ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारा पत्र मिल गया। कपड़े जलानेका हेतु तो यह है कि विदेशी कपड़ोंकी तरफ और वैराग्यवृत्ति पैदा की जाये। ये कपड़े गरीबोंको दिये जायें, इस विचारमें भी मोह है। लाख दो लाखके कपड़े गरीबोंको गये तो क्या, न गये तो क्या? इतने दिनतक ये कपड़े मँगवाकर हमने हिन्दुस्तानको बड़ा नुकसान पहुँचाया है। मैं मानता हूँ कि अब ये कपड़े गरीबोंको देनेसे भी लाभ नहीं होगा। ये कपड़े विदेश भेज देनेमें कुछ सार अवश्य है। फिर भी मैं सबकी राय लेता रहता हूँ। उसमें से जो सबको ठीक लगेगा वह मान लेंगे। अब भी शंका हो तो पूछना।
डाह्याभाईकी वानरसेना अच्छा काम कर रही दीखती है। एक बात वे याद रखें। लोगोंसे विनयपूर्वक अपनी बात कहें। घृणा या खिल्ली उड़ाने, मजाकका भाव तनिक भी न रखें। शराब पीनेवाले पर दया रखी जाये।
काकासाहब<ref>दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर (जन्म १८८५); १९१५ से गांधीजीके साथ हुए।</ref> बढ़िया शिक्षक हैं, इसमें तो शक ही नहीं। तुम सबको वे पसन्द आये, इससे मैं खुश हुआ हूँ।
काका विट्ठलभाईसे मुलाकात हुई है; काफी बातचीत हुई। उन्होंने अपने जिला बोर्डमें ठीक प्रस्ताव पास करवाया है। मेरे पास आने-जानेवाले लोग कहते हैं कि काकाकी अभी चरखेपर श्रद्धा नहीं है। इतना ही नहीं, मण्डलियों में चरखेके प्रति अरुचि प्रकट करते रहते हैं। फिर भी जब उनसे मिलूँगा तब फिर बात करूँगा। मुझपर पिछली मुलाकातका यह असर पड़ा था कि उनके मनका बहुत-कुछ समाधान हो गया है।
{{Right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Right|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने'''}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
05gecc8cfsf7y4cvio0nl0iljxodj3e
673155
673154
2026-08-23T06:08:14Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673155
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|सोमवार, ११ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारा पत्र मिल गया। कपड़े जलानेका हेतु तो यह है कि विदेशी कपड़ोंकी तरफ और वैराग्यवृत्ति पैदा की जाये। ये कपड़े गरीबोंको दिये जायें, इस विचारमें भी मोह है। लाख दो लाखके कपड़े गरीबोंको गये तो क्या, न गये तो क्या? इतने दिनतक ये कपड़े मँगवाकर हमने हिन्दुस्तानको बड़ा नुकसान पहुँचाया है। मैं मानता हूँ कि अब ये कपड़े गरीबोंको देनेसे भी लाभ नहीं होगा। ये कपड़े विदेश भेज देनेमें कुछ सार अवश्य है। फिर भी मैं सबकी राय लेता रहता हूँ। उसमें से जो सबको ठीक लगेगा वह मान लेंगे। अब भी शंका हो तो पूछना।
डाह्याभाईकी वानरसेना अच्छा काम कर रही दीखती है। एक बात वे याद रखें। लोगोंसे विनयपूर्वक अपनी बात कहें। घृणा या खिल्ली उड़ाने, मजाकका भाव तनिक भी न रखें। शराब पीनेवाले पर दया रखी जाये।
काकासाहब<ref>दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर (जन्म १८८५); १९१५ से गांधीजीके साथ हुए।</ref> बढ़िया शिक्षक हैं, इसमें तो शक ही नहीं। तुम सबको वे पसन्द आये, इससे मैं खुश हुआ हूँ।
काका विट्ठलभाईसे मुलाकात हुई है; काफी बातचीत हुई। उन्होंने अपने जिला बोर्डमें ठीक प्रस्ताव पास करवाया है। मेरे पास आने-जानेवाले लोग कहते हैं कि काकाकी अभी चरखेपर श्रद्धा नहीं है। इतना ही नहीं, मण्डलियों में चरखेके प्रति अरुचि प्रकट करते रहते हैं। फिर भी जब उनसे मिलूँगा तब फिर बात करूँगा। मुझपर पिछली मुलाकातका यह असर पड़ा था कि उनके मनका बहुत-कुछ समाधान हो गया है।
{{Right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने'''|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
q1bpwkmm6dmfq1sdxx8ay388kc4jw99
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९४
250
159721
673161
508947
2026-08-23T06:21:42Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673161
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७३. पत्र : देवचन्द पारेखको'''}}}}
{{Right|गामदेवी, बम्बई<br>११ जुलाई, १९२१}}
{{Left|भाईश्री देवचन्दभाई,}}
आपके पत्र मिले। काठियावाड़ने तो आशासे अधिक किया है। मैं चाहता हूँ कि अब आप खादी तैयार करनेमें लग जायें।
कानूनकी सविनय अवज्ञा एकाएक नहीं करनी है। आपका हिसाब ठीक नहीं है। छः करोड़ चरखे अपने-आप शुरू हो जायेंगे। बीस लाख चरखे शुरू करनेमें हमें बहुत ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ा है। हो भी नहीं सकता, क्योंकि थोड़ा-सा खर्च करनेके बाद लोकोपयोगी वस्तुको लोग स्वयंमेव उठा लेते हैं। सदस्य बढ़ानेका काम भी चलता रहता है।
{{Right|{{larger|'''मोहनदास गांधी वन्देमातरम्'''}}}}
गुजराती पत्र (जी॰ एन॰ ५७१७) से।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१७४. भाषण : बम्बईमें शराब-बन्दीपर'''}}}}
{{Right|१२ जुलाई, १९२१}}
महात्मा गांधीने कहा : बम्बई लौटनेके बाद मैंने शराब ठेकेदारोंकी स्थिति
समझ ली है और में सोचता रहा हूँ कि में प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको, और शराबके
व्यापारियों को भी, क्या सलाह दूँ | मैं इन बातोंके बारेमें गहराई से सोचता रहा हूँ ।
शराबके व्यापारियोंका, जो अपनी आजीविका लोगोंको शराब बेचकर कमा रहे हैं, मुझे
बहुत खयाल रहता है। श्री बी० एफ० भरूचाने मुझे इस सम्बन्धमें तथ्य और आँकड़े
दिये हैं तथा कई पारसी भाइयोंने गुमनाम और अपना नाम देते हुए पत्र भी लिखे हैं ।
मुझे इन सब पत्रोंसे यह मालूम हो गया है कि इस व्यापारके सम्बन्धमें शहरको वास्त-
विक स्थिति क्या है । मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि पारसियोंकी ८०,००० की
छोटी-सी बिरादरी में यदि एक दर्जन था ऐसे ही कुछ बुरे लोग हों तो भी उनसे उसे
नुकसान पहुँचेगा, जब कि हिन्दुओं या मुसलमानोंमें इन बुरे आदमियोंकी संख्या ५ या
७ लाख होनेपर भी उनका इतना साफ परिणाम नहीं दिखेगा। संसार में सदा ऐसा
१. महात्मा गांधीने मंगलवारको प्रातः बम्बई में मारवाड़ी विद्यालयके भवन में शरावके व्यापारियोंकी
सभा में भाषण दिया था। यह सभा पारसी राजकीय सभाके तत्वावधान में बुलाई गई थी।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
240fa0z3j7v0thxwaknnkep4qpc9u7l
673162
673161
2026-08-23T06:39:56Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673162
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७३. पत्र : देवचन्द पारेखको'''}}}}
{{Right|गामदेवी, बम्बई<br>११ जुलाई, १९२१}}
{{Left|भाईश्री देवचन्दभाई,}}
आपके पत्र मिले। काठियावाड़ने तो आशासे अधिक किया है। मैं चाहता हूँ कि अब आप खादी तैयार करनेमें लग जायें।
कानूनकी सविनय अवज्ञा एकाएक नहीं करनी है। आपका हिसाब ठीक नहीं है। छः करोड़ चरखे अपने-आप शुरू हो जायेंगे। बीस लाख चरखे शुरू करनेमें हमें बहुत ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ा है। हो भी नहीं सकता, क्योंकि थोड़ा-सा खर्च करनेके बाद लोकोपयोगी वस्तुको लोग स्वयंमेव उठा लेते हैं। सदस्य बढ़ानेका काम भी चलता रहता है।
{{Right|{{larger|'''मोहनदास गांधी वन्देमातरम्'''}}}}
गुजराती पत्र (जी॰ एन॰ ५७१७) से।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१७४. भाषण : बम्बईमें शराब-बन्दीपर<ref>महात्मा गांधीने मंगलवारको प्रातः बम्बईमें मारवाड़ी विद्यालयके भवनमें शराबके व्यापारियोंकी सभामें भाषण दिया था। यह सभा पारसी राजकीय सभाके तत्वावधानमें बुलाई गई थी।</ref>'''}}}}
{{Right|१२ जुलाई, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने कहा : बम्बई लौटनेके बाद मैंने शराब ठेकेदारोंकी स्थिति समझ ली है और मैं सोचता रहा हूँ कि मैं प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको, और शराबके व्यापारियों को भी, क्या सलाह दूँ। मैं इन बातोंके बारेमें गहराईसे सोचता रहा हूँ। शराबके व्यापारियोंका, जो अपनी आजीविका लोगोंको शराब बेचकर कमा रहे हैं, मुझे बहुत खयाल रहता है। श्री बी॰ एफ॰ भरूचाने मुझे इस सम्बन्धमें तथ्य और आँकड़े दिये हैं तथा कई पारसी भाइयोंने गुमनाम और अपना नाम देते हुए पत्र भी लिखे हैं। मुझे इन सब पत्रोंसे यह मालूम हो गया है कि इस व्यापारके सम्बन्धमें शहरको वास्तविक स्थिति क्या है। मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि पारसियोंकी ८०,००० की छोटी-सी बिरादरीमें यदि एक दर्जन था ऐसे ही कुछ बुरे लोग हों तो भी उनसे उसे नुकसान पहुँचेगा, जब कि हिन्दुओं या मुसलमानोंमें इन बुरे आदमियोंकी संख्या ५ या ७ लाख होनेपर भी उनका इतना साफ परिणाम नहीं दिखेगा। संसारमें सदा ऐसा'''<noinclude></noinclude>
6bk258cjz7feve09bs90ci6uv87kza0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१७
250
164411
673221
519490
2026-08-23T10:08:56Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673221
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || नौ
|-
| || पाठकोंको सूचना || दस
|-
| || चित्र-सूची || चौबीस
|-
|१. || भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको (९-१-१९१५) || १
|-
|२. || ॲट : 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के प्रतिनिधिको (९-१-१९१५) || २
|-
|३. || भाषण : घाटकोपरके स्वागत समारोहमें (११-१-१९१५) || ३
|-
|४. || पत्र : मगनलाल गांधीको (११-१-१९१५) || ४
|-
|५. || भाषण : बम्बईके सार्वजनिक स्वागत-समारोहों (१२-१-१९१५) || ६
|-
|६. || भाषण : नेशनल यूनियनकी सभामें (१३-१-१९१५) || ८
|-
|७. || भाषण : सवेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी बम्बई द्वारा आयोजित स्वागत<br>समारोहमें (१४-१-१९१५) || ९
|-
|८. || भाषण : गुर्जर-सभा द्वारा आयोजित स्वागत समारोहमें (१४-१-१९१५) || १०
|-
|९. || पत्रका अंश (१५-१-१९१५ से पूर्व) || ११
|-
|१०. || राजकोटके नागरिकोंके द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका<br>उत्तर (१७-१-१९१५) || १२
|-
|११. || राजकोटमें मोढ-समाज द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका<br>उत्तर (२०-१-१९१५) || १३
|-
|१२. || दरबारगढ़में भेंट किये गये मानपत्रका उत्तर (२२-१-१९१५) || १४
|-
|१३. || पोरबन्दरके मोढ समाज द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका<br>उत्तर (२५-१-१९१५) || १४
|-
|१४. || पोरबन्दरमें नागरिकों द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका <br>उत्तर (२५-१-१९१५) || १५
|-
|१५. || पत्र : मेजर हेनकॉकको (२६-१-१९१५) ||१५
|-
|१६. || पत्र : प्रभुदास भगवानदासको (२६-१-१९१५) || १६
|-
|१७. || गोंडलकी रसशालामें भेंट किये गये मानपत्रका उत्तर (२७-१-१९१५) || १६
|-
|१८. || गोंडलमें नागरिकों द्वारा भेंट किये गये मानपत्रका उत्तर (२७-१-१९१५) || १७
|-
|१९. || अहमदाबादमें नागरिकोंके मानपत्रका उत्तर (२-२-१९१५) || १७
|-
|२०. || भाषण : मिशन स्कूल, बम्बईमें (७-२-१९१५) || १८
|-
|२१. || पत्र : सी° एफ° ऐण्ड्रयूजको (७-२-१९१५) || १८
|-
|२२. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (७-२-१९१५) || १९
|-
|२३. || पत्र: महात्मा मुंशीरामको (७-२-१९१५) ||१९
|-
|२४. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१०-२-१९१५) || २०
|}<noinclude></noinclude>
cgm5a2g2cpcpbd75jobg22lfpa32iuk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१८
250
164412
673238
519491
2026-08-23T11:01:06Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673238
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''बारह'''}}}}
|-
|२५. || पूनाकी सभाओं में प्रश्नों के उत्तर (११/१२-२-१९१५) || २१
|-
|२६. ||भाषण : पूनाकी सार्वजनिक सभा (१३-२-१९१५) || २३
|-
|२७. ||भाषण : बम्बईमें छात्रोंके पुरस्कार वितरणमें (१४-२-१९१५) || २४
|-
|२८. || भाषण : कपोल छात्रावास, बम्बईमें (१५-२-१९१५) || २५
|-
|२९. || भाषण : शान्तिनिकेतनके स्वागत समारोहमें (१७-२-१९१५) || २६
|-
|३०. || तार : हृ° ना° कुंजरूको (२०-२-१९१५) || २७
|-
|३१. || तार : करसनदास चितलियाको (२०-२-१९१५) || २७
|-
|३२. || तार : ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघको (२०-२-१९१५) || २८
|-
|३३. || भाषण : गोखलेकी मृत्युपर शान्तिनिकेतनमें (२०-२-१९१५) || २८
|-
|३४. || पत्र : पूर्व भारतीय रेलवे के मुख्य ट्रैफिक मैनेजरको (२३-२-१९१५) || ३०
|-
|३५. || पत्र : रतिलाल एम° सेठको (२७-२-१९१५) || ३२
|-
|३६. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२८-२-१९१५) || ३३
|-
|३७. || पत्र : डी° बी° शुक्लको (२-३-१९१५) || ३३
|-
|३८. || पत्र : सर विलियम वेडरबर्नको (३-३-१९१५) || ३४
|-
|३९. || भाषण : गोखलेके निवनपर आयोजित शोक सभा (३-३-१९१५) || ३५
|-
|४०. || पत्र : मगनलाल गांधीको (४-३-१९१५) || ३६
|-
|४१. || मोढ मण्डल, कलकत्ता द्वारा दिये गये मानपत्रका उत्तर (१२-३-१९१५) || ३७
|-
|४२. || भाषण : कलकत्ताके स्वागत-समारोहमें (१३-३-१९१५) || ३८
|-
|४३. || पत्र : नारणदास गांधीको (१४-३-१९१५) || ३९
|-
|४४. || मगनलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (१४-३-१९१५) || ४०
|-
|४५. || साम्राज्यीय भारतीय नागरिक संघके 'उद्देश्यों' में संशोधन (१६-३-१९१५<br>
या उसके बाद) || ४२
|-
|४६. || पत्र : बी° आई° एस° एन° कम्पनीके एजेंटगणको (१९-३-१९१५) || ४३
|-
|४७. || रंगूनमें भेंट (२२-३-१९१५ से पूर्व) || ४४
|-
|४८. || पत्र: जमनादास गांधीको (२८-३-१९१५) || ४५
|-
|४९. || भाषण : विद्यार्थी भवन, कलकत्तामें (३१-३-१९१५) || ४६
|-
|५०. || गुरुकुल कांगड़ीमें दिये गये मानपत्रका उत्तर (८-४-१९१५) || ४९
|-
|५१. || भाषण : मद्रास पहुँचनेपर (१७-४-१९१५) || ५०
|-
|५२. || पत्र : लाजरसको (१७-४-१९१५) || ५१
|-
|५३. || भाषण : गोखले-क्लब, मद्रासमें (२०-४-१९१५) || ५३
|-
|५४. || भाषण : मद्रासके स्वागत समारोहमें (२१-४-१९१५) || ५४
|-
|५५. || भेंट : मद्रास मेल' के प्रतिनिधिको (२२-४-१९१५) || ५७
|-
|५६. || मद्रासकी महाजन-सभा और कांग्रेसके मानपत्रका उत्तर (२३-४-१९१५) || ५९
|-
|५७. || भेंट : असोसिएटेड प्रेस, मद्रासके प्रतिनिधिको (२३-४-१९१५) || ६०
|-
|५८. || भाषण मद्रास मुस्लिम लीगके स्वागत समारोहमें (२४-४-१९१५) || ६१
|-
|५९. || भाषण : मद्रासके कानून-पेशा लोगों द्वारा दिये गये भोजमें (२४-४-१९१५) || ६२
|-
|६०. || भाषण : सोशल सर्विस लीग, मद्रासकी सभा (२५-४-१९१५) || ६३
|}<noinclude></noinclude>
gh5btt4thvqxt8jnb3ttuirsg39yk2l
सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29
3
175824
673198
660703
2026-08-23T09:22:49Z
नीलम
26
673198
wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
{{स्वागत}} [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०४:१३, ६ अगस्त २०२३ (UTC)
== [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] सूचना ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|100px|left]]
<span style="font-size:14pt">बधाई हो! प्रिय {{PAGENAME}}, [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]]
के एक हजार से भी अधिक मुश्किल पृष्ठ शोधित करने के अभियान में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है।
आपको विशेष उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार के लिए चुना गया है। पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ८ अगस्त २०२३ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLScbuTiNx4yx-3F2JpBuPQBZpkOF8dB96fd21tCIe7F_Yn9XJA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] भरकर जमा करें। १५ अगस्त तक आपको पुरस्कार तथा ई-प्रमाण-पत्र भेज दिया जाएगा। पहले सूचना प्रपत्र भर लेने तथा बाद में पुरस्कार कूपन या प्रमाण-प्रपत्र मिलने की सूचना इस संदेश के उत्तर के रूप में अवश्य दें।</span> -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०४:१४, ६ अगस्त २०२३ (UTC)
:{{सुनो|अनिरुद्ध कुमार}} जी, धन्यवाद! मैंने प्रतिभागी सूचना प्रपत्र भर दिया है। --[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १८:४१, ७ अगस्त २०२३ (UTC)
:{{PAGENAME}} जी, नमस्ते। आयोजकों द्वारा सभी चयनित सदस्यों को ई-उपहार पर्णिका भेज दी गई है। प्रमाण-पत्र के निर्माण में अभी कुछ दिन और लगेंगे। हम प्रमाण-पत्र पर गूगल के लोगो का उपयोग करने के लिए अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। आपसे अनुरोद है कि समपादनोत्सव से मिले अपने अनुभव और सीख को [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023/रपट]] पर अपने सदस्य नाम का अनुभाग बनाकर जरूर दर्ज करें। भविष्य के संपादनोत्सवों में भाग लेने के लिए यह अनिवार्य है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:४४, २० अगस्त २०२३ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 सूचना ==
:आपको संपादनोत्सव में सौ पृष्ठ संपादन करने का लक्ष्य हासिल करने की बधाई! -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:२०, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC)
::ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १६:२७, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:०५, २२ मार्च २०२४ (UTC)
:ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:४७, २२ मार्च २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:४६, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
:ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४६, ९ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:५६, १० जनवरी २०२६ (UTC)
ध्यानवाद @अनिरुद्ध कुमार जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १८:४१, ११ जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५१, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
==संपादन सुझाव==
नमस्ते @[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] जी, आपका संपादन कार्य सराहनीय है किंतु आप वर्तमान में जिस [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|पुस्तक]] परिधि के अंतर्गत विद्यमान पृष्ठ में संपादन कर रहे हैं उस परिधि में पहले से ही अन्य सदस्य द्वारा संपादन किया जा रहा है। अतः आपसे निवेदन है कि आपके द्वारा चयनित परिधि में "पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक" ५ पृष्ठ संपादित करने के बाद उस पृष्ठ-परिधि को छोड़कर किसी अन्य पुस्तक या परिधि को चुनें। इससे सदस्य को काम करने में भी आसानी होगी और आप भी अपने संपादन कार्य को निर्विघ्न रूप से जारी रख सकेंगे। आपसे संपादन सहयोग जारी रखने की अपेक्षा की जाती है। शुभकामनाओं सहित धन्यवाद।--[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०९:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
eay4m71les3xfv3pp4xmriikxuu7cgm
673200
673198
2026-08-23T09:25:46Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* संपादन सुझाव */ उत्तर
673200
wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
{{स्वागत}} [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०४:१३, ६ अगस्त २०२३ (UTC)
== [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] सूचना ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|100px|left]]
<span style="font-size:14pt">बधाई हो! प्रिय {{PAGENAME}}, [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]]
के एक हजार से भी अधिक मुश्किल पृष्ठ शोधित करने के अभियान में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है।
आपको विशेष उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार के लिए चुना गया है। पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ८ अगस्त २०२३ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLScbuTiNx4yx-3F2JpBuPQBZpkOF8dB96fd21tCIe7F_Yn9XJA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] भरकर जमा करें। १५ अगस्त तक आपको पुरस्कार तथा ई-प्रमाण-पत्र भेज दिया जाएगा। पहले सूचना प्रपत्र भर लेने तथा बाद में पुरस्कार कूपन या प्रमाण-प्रपत्र मिलने की सूचना इस संदेश के उत्तर के रूप में अवश्य दें।</span> -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०४:१४, ६ अगस्त २०२३ (UTC)
:{{सुनो|अनिरुद्ध कुमार}} जी, धन्यवाद! मैंने प्रतिभागी सूचना प्रपत्र भर दिया है। --[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १८:४१, ७ अगस्त २०२३ (UTC)
:{{PAGENAME}} जी, नमस्ते। आयोजकों द्वारा सभी चयनित सदस्यों को ई-उपहार पर्णिका भेज दी गई है। प्रमाण-पत्र के निर्माण में अभी कुछ दिन और लगेंगे। हम प्रमाण-पत्र पर गूगल के लोगो का उपयोग करने के लिए अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। आपसे अनुरोद है कि समपादनोत्सव से मिले अपने अनुभव और सीख को [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023/रपट]] पर अपने सदस्य नाम का अनुभाग बनाकर जरूर दर्ज करें। भविष्य के संपादनोत्सवों में भाग लेने के लिए यह अनिवार्य है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:४४, २० अगस्त २०२३ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 सूचना ==
:आपको संपादनोत्सव में सौ पृष्ठ संपादन करने का लक्ष्य हासिल करने की बधाई! -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:२०, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC)
::ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १६:२७, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:०५, २२ मार्च २०२४ (UTC)
:ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:४७, २२ मार्च २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:४६, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
:ध्यानवाद @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४६, ९ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:५६, १० जनवरी २०२६ (UTC)
ध्यानवाद @अनिरुद्ध कुमार जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) १८:४१, ११ जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५१, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
==संपादन सुझाव==
नमस्ते @[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] जी, आपका संपादन कार्य सराहनीय है किंतु आप वर्तमान में जिस [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|पुस्तक]] परिधि के अंतर्गत विद्यमान पृष्ठ में संपादन कर रहे हैं उस परिधि में पहले से ही अन्य सदस्य द्वारा संपादन किया जा रहा है। अतः आपसे निवेदन है कि आपके द्वारा चयनित परिधि में "पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक" ५ पृष्ठ संपादित करने के बाद उस पृष्ठ-परिधि को छोड़कर किसी अन्य पुस्तक या परिधि को चुनें। इससे सदस्य को काम करने में भी आसानी होगी और आप भी अपने संपादन कार्य को निर्विघ्न रूप से जारी रख सकेंगे। आपसे संपादन सहयोग जारी रखने की अपेक्षा की जाती है। शुभकामनाओं सहित धन्यवाद।--[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) ०९:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
:ठीक है @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] जी [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
3m6s0ddk45z8ismuxofr3cfkvam071z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१०
250
176746
673207
619482
2026-08-23T09:43:51Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673207
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|मार्च १९६५ (फाल्गुन १८८६)}}
{{dhr|5em}}
{{c|© नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९६५}}
{{dhr|5em}}
{{c|'''साढ़े सात रुपये'''}}
{{dhr|5em}}
{{c|कापीराइट<br>नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमति से}}
{{dhr|15em}}
{{c|निदेशक, प्रकाशन विभाग, दिल्ली–६, द्वारा प्रकाशित<br>
और जीवणजी डाह्याभाई देसाई, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद–१४, द्वारा मुद्रित}}<noinclude></noinclude>
6amzm3lyee9ueig6n2bcx6livlv6x1l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/३०
250
176750
673249
619487
2026-08-23T11:13:23Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673249
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}}
|-
|भारत पहुँचनेपर || मुखचित्र
|-
|याकूब हसन और जी° नटेसनके साथ || ९६ के सामने
|-
|महात्मा मुन्शीरामको पत्र, जून १४, १९१५ || ९७ {{ditto}}
|-
|"डायरी : १९१५" से || १६० {{ditto}}
|-
|काश्मीरी टोपी पहने हुए || १६१ {{ditto}}
|-
|काठियावाड़ी पगड़ी पहने हुए || ३६८ {{ditto}}
|-
|चम्पारनके कार्यकर्त्ताओंके लिए निर्देश, १९१७ || ३६९ {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
i1k6leq4fkk67gpvseolybpfnqaxiqr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५६
250
183104
673043
672745
2026-08-22T20:09:45Z
सीमा1
430
673043
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>मानदण्ड नहीं । सातवाँ प्रश्न : पर्याप्त रूपसे शिक्षित पंजीकृत भारतीयोंको परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं। आठवाँ प्रश्न : जाने-माने एशियाइयोंको यदि वे अंग्रेजीमें हस्ताक्षर कर सकें तो परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं ।
मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ७'''}}</center>
{{c|'''क'''}}
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल स्थानीय शासन अध्यादेश, १९११ का प्रारूप'''}}</center>
{{c|'''एशियाइयोंसे सम्बधित अंश'''}}
{{c|'''एशियाई बाजार'''<ref>क्रूगरकी सरकारने एशियाइयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में सीमित करनेका निर्णय सबसे पहले अप्रैल १८९९ में किया था और इनको विनियमित करनेकी सत्ता नगर परिषदोंको सौंपी गई थी; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ६२-६३ | अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५ । १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७ ।</ref>}}
६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी । ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी ।
<br>(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी।}}
<br>(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो ।
६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
<br>(२) ऐसा प्रत्येक पट्टा वैध होगा, चाहे उसकी लिखा-पढ़ी नाजिर-रजिस्ट्री के सामने न हुई हो और ऐसा
__________________________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
afvkm7e1iuc6ie8ofol5486if9gnq0l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५७
250
183105
672911
630950
2026-08-22T14:51:44Z
सीमा1
430
/* शोधित */
672911
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>{{gap}}प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला- शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगले अदा किया जायेगा और परिषद्इ स प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंको रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;
(१२) चायघरों, कॉफीवरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है :
{{blockcenter(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।|}}
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ls1o6sthm300wp0s1s1qnxk2dwmfbn3
672913
672911
2026-08-22T14:52:30Z
सीमा1
430
672913
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।<br>
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला- शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगले अदा किया जायेगा और परिषद्इ स प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंको रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;
(१२) चायघरों, कॉफीवरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है :
{{blockcenter(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।|}}
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
471by4x5fr0m1cnit5kmlctdyokaygq
672925
672913
2026-08-22T15:10:22Z
सीमा1
430
672925
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।<br>
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला- शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगले अदा किया जायेगा और परिषद्इ स प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंको रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(१२) चायघरों, कॉफीवरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;<br>
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:<br>
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;<br>
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है:<br>(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;<br>
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;<br>
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;<br>
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;<br>
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।|}}
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
4anw5fqe22ch6zmw785ph327l5rl1yk
672928
672925
2026-08-22T15:16:09Z
सीमा1
430
672928
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।<br>
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला- शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगले अदा किया जायेगा और परिषद्इ स प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंको रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(१२) चायघरों, कॉफीवरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;<br>
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:<br>
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;<br>
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है:
{{blockcenter|(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;<br>
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;<br>
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;<br>
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;}}
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
0rj5phaj23hze5i2r6tpgxu3vbztmzw
673044
672928
2026-08-22T20:16:42Z
सीमा1
430
673044
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।<br>
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला-शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगसे अदा किया जायेगा और परिषद्स इस प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(१२) चायघरों, कॉफीघरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;<br>
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:<br>
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;<br>
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है:
{{blockcenter|(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;<br>
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;<br>
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;<br>
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;}}
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
5lfgg017xdoo9robuxhqzn4zgpekbgy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५८
250
183106
672992
630951
2026-08-22T17:48:48Z
सीमा1
430
/* शोधित */
672992
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधार-पर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेका अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
{{blockcenter(क) ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको काम-पर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;<br>
(ख) भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको काम-पर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करने की शर्तें लगा सकेगी;|}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्त परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा । परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे ।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
{{blockcenter(क) परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;
(ख) परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।<br>
(ग) ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर )जुर्माना करनेके लिए ।|}}
______________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ap0qccya1vyx3fmgi6nfdysf60glrmw
672993
672992
2026-08-22T17:50:23Z
सीमा1
430
672993
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधार-पर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेका अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
(क) ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको काम-पर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;<br>
(ख) भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको काम-पर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करने की शर्तें लगा सकेगी;
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्त परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा । परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे ।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
(क) परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;
(ख) परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।<br>
(ग) ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर )जुर्माना करनेके लिए ।
______________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
bglbgwb0smxjuq0o8b1km5y1ywtutpa
672997
672993
2026-08-22T18:00:47Z
सीमा1
430
672997
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधार-पर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेका अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
(क){{blockcenter|ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको काम-पर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;}}<br>
(ख){{blockcenter|भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको काम-पर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करने की शर्तें लगा सकेगी;}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्त परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा । परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे ।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
(क){{blockcenter|परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;}}
(ख){{blockcenter|परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।}}<br>
(ग){{blockcenter|ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर)जुर्माना करनेके लिए ।}}
______________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
tp5gnmzvd5dj0nve39ys1xtjuesuuxg
673045
672997
2026-08-22T20:25:10Z
सीमा1
430
673045
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधार-पर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेकी अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
(क){{blockcenter|ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको काम-पर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;}}<br>
(ख){{blockcenter|भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको काम-पर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेकी शर्तें लगा सकेगी;}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्ते परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा । परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे ।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
(क){{blockcenter|परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;}}
(ख){{blockcenter|परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।}}<br>
(ग){{blockcenter|ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर)जुर्माना करनेके लिए ।}}
______________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
pfdn0uyvzhguhswk1uwstv731tmy86a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५९
250
183107
672994
631146
2026-08-22T17:51:28Z
सीमा1
430
/* शोधित */
672994
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग}}
{{right|जून ५, १९११}}
माननीय प्रशासक
तथा सदस्यगण
प्रान्तीय परिषद्,
ट्रान्सवाल
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षको हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११ का प्रारूप पद लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् ( गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से ) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बढ़े ही हानिकारक ढंगले प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके " बाजारोंको " बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे " बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिपदे भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________
१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।<noinclude></noinclude>
qpjx9icx1b20ofujkfxpkzvcnoyctod
672995
672994
2026-08-22T17:53:52Z
सीमा1
430
672995
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग}}
{{right|जून ५, १९११}}
माननीय प्रशासक<br>
तथा सदस्यगण<br>
प्रान्तीय परिषद्,<br>
ट्रान्सवाल<br>
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षको हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पद लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् ( गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से ) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बढ़े ही हानिकारक ढंगले प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके " बाजारोंको " बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे " बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिपदे भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude></noinclude>
iflecrn0kawf0o6gy3v58y14fmzqgr8
672996
672995
2026-08-22T17:54:37Z
सीमा1
430
672996
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग}}
{{right|जून ५, १९११}}
<br>माननीय प्रशासक<br>
तथा सदस्यगण<br>
प्रान्तीय परिषद्,<br>
ट्रान्सवाल<br>
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षको हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पद लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् ( गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से ) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बढ़े ही हानिकारक ढंगले प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके " बाजारोंको " बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे " बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिपदे भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
mk5e8btcy2brh7qrd7h1qsirupxafyv
673046
672996
2026-08-22T20:27:37Z
सीमा1
430
673046
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग<br>जून ५,१९११}}
{{left|माननीय प्रशासक<br>तथा सदस्यगण<br>प्रान्तीय परिषद् <br> ट्रान्सवाल}}
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षको हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पद लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् ( गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से ) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बढ़े ही हानिकारक ढंगले प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके " बाजारोंको " बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे " बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिपदे भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
l62nz6ymbn3wbgc7wot76cx7ewrjhrh
673047
673046
2026-08-22T20:28:59Z
सीमा1
430
673047
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग<br>जून ५,१९११}}
{{left|माननीय प्रशासक<br>तथा सदस्यगण<br>प्रान्तीय परिषद् <br> ट्रान्सवाल}}
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षकी हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पढ़ लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् ( गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से ) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बढ़े ही हानिकारक ढंगले प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके " बाजारोंको " बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे " बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिपदे भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
fbdk42xvw4e9htkdi93hvope3gkk1gq
673048
673047
2026-08-22T20:35:43Z
सीमा1
430
673048
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग<br>जून ५,१९११}}
{{left|माननीय प्रशासक<br>तथा सदस्यगण<br>प्रान्तीय परिषद् <br> ट्रान्सवाल}}
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षकी हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पढ़ लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय- समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् (गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बड़े ही हानिकारक ढंगसे प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके "बाजारोंको" बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है । अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे
"बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है । इन खण्डों के अन्तर्गत परिषदें भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
eyop0ypmuxn6swnocvp79cjb79v92du
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६०
250
183109
672998
631145
2026-08-22T18:02:40Z
सीमा1
430
/* शोधित */
672998
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>द्वारा नामंजूर कर दिये जानेपर तो रेजीडेंट मजिस्टेटके यहाँ अपील की जा सकती है, लेकिन खण्ड ९१ में स्पष्ट व्यवस्था है कि “उक्त परवानोंमें से किसीके परिषद द्वारा नामंजूर हो जानेपर कोई अपील नहीं की जा सकेगी। " संघके जिन प्रान्तों में परवाना निकायों या परिषदोंको इसी प्रकारकी अनियन्त्रित सत्ता प्रदान की गई है या की गई थी, वहाँके ब्रिटिश भारतीयोंके अनुभवको देखते हुए, प्रार्थी मनमानी नामंजूरीके विरुद्ध उचित रूपसे संगठित न्यायिक न्यायाधिकरण ( जुडीशियल ट्रिब्युनल ) में अपील करनेके अधिकारसे स्पष्टतः वंचित किये जानेका बड़ी उत्कटतासे विरोध करता है । साथ ही, मैं यह भी कह दूँ कि ऐसी व्यवस्था प्रजाकी स्वतंत्रतापर कुठाराघात करती है ।
४. साथ ही प्रार्थी इस महती सभाका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करता है कि चीनी गिरमिटिया मजदूरोंकी वापसीके बाद एशियाई चायघर या भोजनालय रह ही नहीं गये हैं इसलिए अब उनको परवानोंके द्वारा नियन्त्रित करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रान्तमें रहनेवाले छोटे-से एशियाई समाजकी आवश्यकताएँ खानगी भोजनालयोंसे पूरी हो जाती हैं ।
५. खण्ड ९२ के आधारपर एशियाई मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध किया जा सकता है और उसके कारण उपयोगी उद्योगों में काम करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भारी कठिनाई पैदा हो जायेगी और कुछको तो अपनी जीविकासे भी हाथ धोना पड़ सकता है । प्रार्थीका विनम्र मत है कि इस खण्ड में एशियाइयोंके साथ जो भेदभाव किया गया है उसे हटा दिया जाना चाहिए ।
६. आगे प्रार्थीका निवेदन है कि चालकोंके परवाने देने या न देनेकी परिषदको स्वविवेकके आधारपर जो शक्ति प्रदान की गई है ( खण्ड ९३), उसके निर्णयके विरुद्ध न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करनेका अधिकार दिया जाना चाहिए ।
७. इस प्रान्तमें मौजूद एशियाइयोंके बारेमें दुर्भाग्यपूर्ण पूर्वग्रहको देखते हुए हमारे समाजने विवशतावश राजनीतिक मताधिकारकी माँग तो नहीं की परन्तु खण्ड ११४ ने हमारे समाजके लोगोंको नगरपालिकाकी मतदाता सूचीसे अलग रखकर उनपर जो एक स्पष्ट निर्योग्यता थोप दी है उससे हमारे मनको बड़ी गहरी चोट पहुँची है । यह निर्योग्यता केवल उन गोरे लोगोंपर लागू होती है जो गम्भीर किस्म के अपराधोंके दोषी पाये गये हों ।
प्रार्थी इस महती सभाको स्मरण दिलाना चाहता है कि भारतीय लोग करके रूपमें नगरपालिकाको काफी बड़ी राशि देते हैं और जैसा कि आँकड़ोंसे सहज ही सिद्ध हो जाता है, वे कानूनका सबसे अधिक पालन करनेवालोंमें से हैं। इसलिए प्रार्थीको इसपर बड़ी आपत्ति है कि उनका शुमार सजायाफ्ता गोरोंके साथ किया गया है ।
८. खण्ड १७१ (ख) की व्यवस्थाके अनुसार “ वतनियों, एशियाइयों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे होन सभी व्यक्तियों" के लिए ट्रामगाड़ियों का इस्तेमाल निषिद्ध या प्रतिबन्धित किया जा सकता है । एशियाई समाजके लिए यह प्रतिबन्ध अपमानपूर्ण है और असुविधाजनक भी, और प्रार्थीके विनम्र मतसे यह सर्वथा अनावश्यक है ।
९. अन्तमें, प्रार्थी बड़ी उत्कटतासे उपरोक्त कष्टोंकी ओर इस महतो सभाका ध्यान आकर्षित करता है कि ऊपर बताये अनुसार हमारी सहायता करनेके लिए अध्यादेशके प्रारूपका संशोधन किया जाये । इस कृपा और न्यायपूर्ण कार्यके लिए प्रार्थी अपना कर्तव्य मानकर दुआ करता रहेगा ।
{{right|अध्यक्ष,}}
{{right|अ० मु० काछलिया}}
{{right|ब्रिटिश भारतीय संघ}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११; और कलोनियल ऑफिस रेकर्डस (सी० ओ० ५५२/२२ ) से भी ।<noinclude></noinclude>
j0e2pa4mb1ahnwsk1mubc822t5l6itb
672999
672998
2026-08-22T18:03:56Z
सीमा1
430
672999
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>द्वारा नामंजूर कर दिये जानेपर तो रेजीडेंट मजिस्टेटके यहाँ अपील की जा सकती है, लेकिन खण्ड ९१ में स्पष्ट व्यवस्था है कि “उक्त परवानोंमें से किसीके परिषद द्वारा नामंजूर हो जानेपर कोई अपील नहीं की जा सकेगी। " संघके जिन प्रान्तों में परवाना निकायों या परिषदोंको इसी प्रकारकी अनियन्त्रित सत्ता प्रदान की गई है या की गई थी, वहाँके ब्रिटिश भारतीयोंके अनुभवको देखते हुए, प्रार्थी मनमानी नामंजूरीके विरुद्ध उचित रूपसे संगठित न्यायिक न्यायाधिकरण ( जुडीशियल ट्रिब्युनल ) में अपील करनेके अधिकारसे स्पष्टतः वंचित किये जानेका बड़ी उत्कटतासे विरोध करता है । साथ ही, मैं यह भी कह दूँ कि ऐसी व्यवस्था प्रजाकी स्वतंत्रतापर कुठाराघात करती है ।
४. साथ ही प्रार्थी इस महती सभाका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करता है कि चीनी गिरमिटिया मजदूरोंकी वापसीके बाद एशियाई चायघर या भोजनालय रह ही नहीं गये हैं इसलिए अब उनको परवानोंके द्वारा नियन्त्रित करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रान्तमें रहनेवाले छोटे-से एशियाई समाजकी आवश्यकताएँ खानगी भोजनालयोंसे पूरी हो जाती हैं ।
५. खण्ड ९२ के आधारपर एशियाई मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध किया जा सकता है और उसके कारण उपयोगी उद्योगों में काम करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भारी कठिनाई पैदा हो जायेगी और कुछको तो अपनी जीविकासे भी हाथ धोना पड़ सकता है । प्रार्थीका विनम्र मत है कि इस खण्ड में एशियाइयोंके साथ जो भेदभाव किया गया है उसे हटा दिया जाना चाहिए ।
६. आगे प्रार्थीका निवेदन है कि चालकोंके परवाने देने या न देनेकी परिषदको स्वविवेकके आधारपर जो शक्ति प्रदान की गई है ( खण्ड ९३), उसके निर्णयके विरुद्ध न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करनेका अधिकार दिया जाना चाहिए ।
७. इस प्रान्तमें मौजूद एशियाइयोंके बारेमें दुर्भाग्यपूर्ण पूर्वग्रहको देखते हुए हमारे समाजने विवशतावश राजनीतिक मताधिकारकी माँग तो नहीं की परन्तु खण्ड ११४ ने हमारे समाजके लोगोंको नगरपालिकाकी मतदाता सूचीसे अलग रखकर उनपर जो एक स्पष्ट निर्योग्यता थोप दी है उससे हमारे मनको बड़ी गहरी चोट पहुँची है । यह निर्योग्यता केवल उन गोरे लोगोंपर लागू होती है जो गम्भीर किस्म के अपराधोंके दोषी पाये गये हों ।
प्रार्थी इस महती सभाको स्मरण दिलाना चाहता है कि भारतीय लोग करके रूपमें नगरपालिकाको काफी बड़ी राशि देते हैं और जैसा कि आँकड़ोंसे सहज ही सिद्ध हो जाता है, वे कानूनका सबसे अधिक पालन करनेवालोंमें से हैं। इसलिए प्रार्थीको इसपर बड़ी आपत्ति है कि उनका शुमार सजायाफ्ता गोरोंके साथ किया गया है ।
८. खण्ड १७१ (ख) की व्यवस्थाके अनुसार “ वतनियों, एशियाइयों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे होन सभी व्यक्तियों" के लिए ट्रामगाड़ियों का इस्तेमाल निषिद्ध या प्रतिबन्धित किया जा सकता है । एशियाई समाजके लिए यह प्रतिबन्ध अपमानपूर्ण है और असुविधाजनक भी, और प्रार्थीके विनम्र मतसे यह सर्वथा अनावश्यक है ।
९. अन्तमें, प्रार्थी बड़ी उत्कटतासे उपरोक्त कष्टोंकी ओर इस महतो सभाका ध्यान आकर्षित करता है कि ऊपर बताये अनुसार हमारी सहायता करनेके लिए अध्यादेशके प्रारूपका संशोधन किया जाये । इस कृपा और न्यायपूर्ण कार्यके लिए प्रार्थी अपना कर्तव्य मानकर दुआ करता रहेगा ।
{{right|अध्यक्ष,<br>अ० मु० काछलिया< br>ब्रिटिश भारतीय संघ}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११; और कलोनियल ऑफिस रेकर्डस (सी० ओ० ५५२/२२ ) से भी ।<noinclude></noinclude>
je0rscck8wfyu9hc8qkjk3cz144mklx
673000
672999
2026-08-22T18:04:17Z
सीमा1
430
673000
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>द्वारा नामंजूर कर दिये जानेपर तो रेजीडेंट मजिस्टेटके यहाँ अपील की जा सकती है, लेकिन खण्ड ९१ में स्पष्ट व्यवस्था है कि “उक्त परवानोंमें से किसीके परिषद द्वारा नामंजूर हो जानेपर कोई अपील नहीं की जा सकेगी। " संघके जिन प्रान्तों में परवाना निकायों या परिषदोंको इसी प्रकारकी अनियन्त्रित सत्ता प्रदान की गई है या की गई थी, वहाँके ब्रिटिश भारतीयोंके अनुभवको देखते हुए, प्रार्थी मनमानी नामंजूरीके विरुद्ध उचित रूपसे संगठित न्यायिक न्यायाधिकरण ( जुडीशियल ट्रिब्युनल ) में अपील करनेके अधिकारसे स्पष्टतः वंचित किये जानेका बड़ी उत्कटतासे विरोध करता है । साथ ही, मैं यह भी कह दूँ कि ऐसी व्यवस्था प्रजाकी स्वतंत्रतापर कुठाराघात करती है ।
४. साथ ही प्रार्थी इस महती सभाका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करता है कि चीनी गिरमिटिया मजदूरोंकी वापसीके बाद एशियाई चायघर या भोजनालय रह ही नहीं गये हैं इसलिए अब उनको परवानोंके द्वारा नियन्त्रित करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रान्तमें रहनेवाले छोटे-से एशियाई समाजकी आवश्यकताएँ खानगी भोजनालयोंसे पूरी हो जाती हैं ।
५. खण्ड ९२ के आधारपर एशियाई मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध किया जा सकता है और उसके कारण उपयोगी उद्योगों में काम करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भारी कठिनाई पैदा हो जायेगी और कुछको तो अपनी जीविकासे भी हाथ धोना पड़ सकता है । प्रार्थीका विनम्र मत है कि इस खण्ड में एशियाइयोंके साथ जो भेदभाव किया गया है उसे हटा दिया जाना चाहिए ।
६. आगे प्रार्थीका निवेदन है कि चालकोंके परवाने देने या न देनेकी परिषदको स्वविवेकके आधारपर जो शक्ति प्रदान की गई है ( खण्ड ९३), उसके निर्णयके विरुद्ध न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करनेका अधिकार दिया जाना चाहिए ।
७. इस प्रान्तमें मौजूद एशियाइयोंके बारेमें दुर्भाग्यपूर्ण पूर्वग्रहको देखते हुए हमारे समाजने विवशतावश राजनीतिक मताधिकारकी माँग तो नहीं की परन्तु खण्ड ११४ ने हमारे समाजके लोगोंको नगरपालिकाकी मतदाता सूचीसे अलग रखकर उनपर जो एक स्पष्ट निर्योग्यता थोप दी है उससे हमारे मनको बड़ी गहरी चोट पहुँची है । यह निर्योग्यता केवल उन गोरे लोगोंपर लागू होती है जो गम्भीर किस्म के अपराधोंके दोषी पाये गये हों ।
प्रार्थी इस महती सभाको स्मरण दिलाना चाहता है कि भारतीय लोग करके रूपमें नगरपालिकाको काफी बड़ी राशि देते हैं और जैसा कि आँकड़ोंसे सहज ही सिद्ध हो जाता है, वे कानूनका सबसे अधिक पालन करनेवालोंमें से हैं। इसलिए प्रार्थीको इसपर बड़ी आपत्ति है कि उनका शुमार सजायाफ्ता गोरोंके साथ किया गया है ।
८. खण्ड १७१ (ख) की व्यवस्थाके अनुसार “ वतनियों, एशियाइयों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे होन सभी व्यक्तियों" के लिए ट्रामगाड़ियों का इस्तेमाल निषिद्ध या प्रतिबन्धित किया जा सकता है । एशियाई समाजके लिए यह प्रतिबन्ध अपमानपूर्ण है और असुविधाजनक भी, और प्रार्थीके विनम्र मतसे यह सर्वथा अनावश्यक है ।
९. अन्तमें, प्रार्थी बड़ी उत्कटतासे उपरोक्त कष्टोंकी ओर इस महतो सभाका ध्यान आकर्षित करता है कि ऊपर बताये अनुसार हमारी सहायता करनेके लिए अध्यादेशके प्रारूपका संशोधन किया जाये । इस कृपा और न्यायपूर्ण कार्यके लिए प्रार्थी अपना कर्तव्य मानकर दुआ करता रहेगा ।
{{right|अध्यक्ष,<br>अ० मु० काछलिया<br>ब्रिटिश भारतीय संघ}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११; और कलोनियल ऑफिस रेकर्डस (सी० ओ० ५५२/२२ ) से भी ।<noinclude></noinclude>
bkg8b8l32wy3irppcr9a5z6t842ks28
673049
673000
2026-08-22T20:49:43Z
सीमा1
430
673049
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>द्वारा नामंजूर कर दिये जानेपर तो रेजीडेंट मजिस्ट्रेटकी यहाँ अपील की जा सकती है, लेकिन खण्ड ९१ में स्पष्ट व्यवस्था है कि “उक्त परवानोंमें से किसीके परिषद द्वारा नामंजूर हो जानेपर कोई अपील नहीं की जा सकेगी।" संघके जिन प्रान्तों में परवाना निकायों या परिषदोंको इसी प्रकारकी अनियन्त्रित सत्ता प्रदान की गई है या की गई थी, वहाँके ब्रिटिश भारतीयोंके अनुभवको देखते हुए, प्रार्थी मनमानी नामंजूरीके विरुद्ध उचित रूपसे संगठित न्यायिक न्यायाधिकरण (जुडीशियल ट्रिब्युनल) में अपील करनेके अधिकारसे स्पष्टतः वंचित किये जानेका बड़ी उत्कटतासे विरोध करता है । साथ ही, मैं यह भी कह दूँ कि ऐसी व्यवस्था प्रजाकी स्वतंत्रतापर कुठाराघात करती है ।
४. साथ ही प्रार्थी इस महती सभाका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करता है कि चीनी गिरमिटिया मजदूरोंकी वापसीके बाद एशियाई चायघर या भोजनालय रह ही नहीं गये हैं इसलिए अब उनको परवानोंके द्वारा नियन्त्रित करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रान्तमें रहनेवाले छोटे-से एशियाई समाजकी आवश्यकताएँ खानगी भोजनालयोंसे पूरी हो जाती हैं ।
५. खण्ड ९२ के आधारपर एशियाई मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध किया जा सकता है और उसके कारण उपयोगी उद्योगों में काम करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भारी कठिनाई पैदा हो जायेगी और कुछको तो अपनी जीविकासे भी हाथ धोना पड़ सकता है । प्रार्थीका विनम्र मत है कि इस खण्ड में एशियाइयोंके साथ जो भेदभाव किया गया है उसे हटा दिया जाना चाहिए ।
६. आगे प्रार्थीका निवेदन है कि चालकोंके परवाने देने या न देनेकी परिषदको स्वविवेकके आधारपर जो शक्ति प्रदान की गई है ( खण्ड ९३), उसके निर्णयके विरुद्ध न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करनेका अधिकार दिया जाना चाहिए ।
७. इस प्रान्तमें मौजूद एशियाइयोंके बारेमें दुर्भाग्यपूर्ण पूर्वग्रहको देखते हुए हमारे समाजने विवशतावश राजनीतिक मताधिकारकी माँग तो नहीं की परन्तु खण्ड ११४ ने हमारे समाजके लोगोंको नगरपालिकाकी मतदाता सूचीसे अलग रखकर उनपर जो एक स्पष्ट निर्योग्यता थोप दी है उससे हमारे मनको बड़ी गहरी चोट पहुँची है । यह निर्योग्यता केवल उन गोरे लोगोंपर लागू होती है जो गम्भीर किस्म के अपराधोंके दोषी पाये गये हों ।
प्रार्थी इस महती सभाको स्मरण दिलाना चाहता है कि भारतीय लोग करके रूपमें नगरपालिकाको काफी बड़ी राशि देते हैं और जैसा कि आँकड़ोंसे सहज ही सिद्ध हो जाता है, वे कानूनका सबसे अधिक पालन करनेवालोंमें से हैं। इसलिए प्रार्थीको इसपर बड़ी आपत्ति है कि उनका शुमार सजायाफ्ता गोरोंके साथ किया गया है ।
८. खण्ड १७१ (ख) की व्यवस्थाके अनुसार “वतनियों, एशियाइयों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों" के लिए ट्रामगाड़ियों का इस्तेमाल निषिद्ध या प्रतिबन्धित किया जा सकता है । एशियाई समाजके लिए यह प्रतिबन्ध अपमानपूर्ण है और असुविधाजनक भी, और प्रार्थीके विनम्र मतसे यह सर्वथा अनावश्यक है ।
९. अन्तमें, प्रार्थी बड़ी उत्कटतासे उपरोक्त कष्टोंकी ओर इस महती सभाका ध्यान आकर्षित करता है कि ऊपर बताये अनुसार हमारी सहायता करनेके लिए अध्यादेशके प्रारूपका संशोधन किया जाये। इस कृपा और न्यायपूर्ण कार्यके लिए प्रार्थी अपना कर्तव्य मानकर दुआ करता रहेगा ।
{{right|अध्यक्ष,<br>अ० मु० काछलिया<br>ब्रिटिश भारतीय संघ}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११; और कलोनियल ऑफिस रेकर्डस (सी० ओ० ५५२/२२ ) से भी ।<noinclude></noinclude>
97wguwaf15574jcgvk59l2up36ehluo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६१
250
183110
673050
630980
2026-08-22T20:58:33Z
सीमा1
430
673050
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''परिशिष्ट ८'''}}<br>
{{larger|'''उपनिवेश कार्यालयको दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समितिका पत्र'''}}}}
{{right|थैनेट हाउस<br>२३१-२३२, स्ट्रैंड़, डब्ल्यू॰ सी॰<br>जून १७, १९११}}
:उपनिवेश-उपमन्त्री
:उपनिवेश कार्यालय, एस॰ डब्ल्यू॰
:महोदय,
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र, संख्या १८५४२/१९११, प्राप्त हुआ। उसमें मुझे उपनिवेश मन्त्रीकी ओरसे इस बात के लिए आमन्त्रित किया गया है कि यदि मुझे ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा औपचारिक रूपसे किये गये निवेदनके अतिरिक्त कुछ और कहना हो तो मैं उसे लिखित रूपमें उनके सामने पेश कर दूँ । ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघके निवेदनकी एक प्रति मुझे भेजी गई है। किन्तु मुझसे केप और नेटालके भारतीयोंकी ओरसे उनकी बात पेश करनेके लिए भी कहा गया है और उनके स्मरणपत्रोंकी प्रतियाँ भी मेरे पास भेजी गई हैं; इसलिए मैं मन्त्री श्री हरकोर्ट से अनुमति चाहूँगा कि मुझे [समस्त] दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजकी स्थिति के बारेमें सामान्य रूपसे कुछ कहने दिया जाये।
२. भारतीय समाजके विभिन्न समुदायोंमें जो भावना सबसे अधिक प्रबल है, वह है भारी क्षोभ और अरक्षितताकी। दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समझ गये हैं कि यदि सम्राटकी सरकार उनके पक्षमें बार-बार हस्तक्षेप न करे तो उनका जीवन दूभर हो जायेगा। उन लोगोंने काफी गहरी आशंका के साथ उस वार्ताकी प्रगतिपर नजर रखी है जिसकी परिणति संघके अधिनियम के पास होनेके रूपमें हुई है। ट्रान्सवालके भारतीयों को भय था कि केप और नेटालके परवाना कानूनों में निहित सिद्धान्तों को वहाँ भी लागू कर दिया जायेगा; और केप और नेटाल प्रान्तोंके भारतीयोंको यह भय था कि ट्रान्सवालमें लागू बस्तियों के पंजीयन और प्रवास सम्बन्धी कानूनों को उनके यहाँ लागू कर दिया जायेगा। वेरीनिगिंग के समझौते के बादसे यह एक प्रवृत्ति देखने में आई है कि समूचे दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके साथ एक ही तरहका बरताव किया जाये; और इसका आधार हो उनके साथ [विभिन्न प्रदेशों में] जैसा बरताव होता रहा है उसका सख्त से सख्त रूप। उपनिवेश-मन्त्रीको स्मरण होगा कि लॉर्ड मिलनरने १९०३ में जब बाजार सम्बन्धी आदेश जारी किया था, तब नेटालने उसे शीघ्र ही अपना लिया था। नेटाल्के परवाना-सम्बन्धी सख्त कानूनको केपने अपना लिया था, और अब ट्रान्सवालमें भी उसे लागू करनेकी कोशिश की जा रही है। इसीलिए दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयों में यह भावना बड़ी तेजीसे घर करती जा रही है कि यदि वे अपने यत्किचित् नागरिक अधिकार और सुविधाएँ बनाये रखना चाहते हैं तो उनको अपने हितोंपर संघमें चारों ओरसे होनेवाले नित नये हमलेके खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा खड़ा करना चाहिए। वास्तव में केप और नेटालके भारतीयों द्वारा पिछले सत्याग्रह आन्दोलनके दौरान अनेक प्रकारसे ट्रान्सवालके अपने भाइयोंके दावोंका इतनी मुस्तैदीके साथ समर्थन किये जानेका यह भी एक मुख्य कारण था।
३. ट्रान्सवालके भारतीयोंको सदासे इसका बड़ा भय रहा है कि १८८५ के कानून ३ की उस धाराको लागू करने की कोशिश की जायेगी, जो उन्हें निर्दिष्ट बस्तियोंमें रखनेके लिए बाध्य करती है।<noinclude></noinclude>
su1ikehi6q5gbq62hxrp6deljdkkuuh
673051
673050
2026-08-22T21:00:23Z
सीमा1
430
/* प्रमाणित */
673051
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="सीमा1" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''परिशिष्ट ८'''}}<br>
{{larger|'''उपनिवेश कार्यालयको दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समितिका पत्र'''}}}}
{{right|थैनेट हाउस<br>२३१-२३२, स्ट्रैंड़, डब्ल्यू॰ सी॰<br>जून १७, १९११}}
:उपनिवेश-उपमन्त्री
:उपनिवेश कार्यालय, एस॰ डब्ल्यू॰
:महोदय,
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र, संख्या १८५४२/१९११, प्राप्त हुआ। उसमें मुझे उपनिवेश मन्त्रीकी ओरसे इस बात के लिए आमन्त्रित किया गया है कि यदि मुझे ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा औपचारिक रूपसे किये गये निवेदनके अतिरिक्त कुछ और कहना हो तो मैं उसे लिखित रूपमें उनके सामने पेश कर दूँ । ट्रान्सवाल ब्रिटिश भारतीय संघके निवेदनकी एक प्रति मुझे भेजी गई है। किन्तु मुझसे केप और नेटालके भारतीयोंकी ओरसे उनकी बात पेश करनेके लिए भी कहा गया है और उनके स्मरणपत्रोंकी प्रतियाँ भी मेरे पास भेजी गई हैं; इसलिए मैं मन्त्री श्री हरकोर्ट से अनुमति चाहूँगा कि मुझे [समस्त] दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजकी स्थिति के बारेमें सामान्य रूपसे कुछ कहने दिया जाये।
२. भारतीय समाजके विभिन्न समुदायोंमें जो भावना सबसे अधिक प्रबल है, वह है भारी क्षोभ और अरक्षितताकी। दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समझ गये हैं कि यदि सम्राटकी सरकार उनके पक्षमें बार-बार हस्तक्षेप न करे तो उनका जीवन दूभर हो जायेगा। उन लोगोंने काफी गहरी आशंका के साथ उस वार्ताकी प्रगतिपर नजर रखी है जिसकी परिणति संघके अधिनियम के पास होनेके रूपमें हुई है। ट्रान्सवालके भारतीयों को भय था कि केप और नेटालके परवाना कानूनों में निहित सिद्धान्तों को वहाँ भी लागू कर दिया जायेगा; और केप और नेटाल प्रान्तोंके भारतीयोंको यह भय था कि ट्रान्सवालमें लागू बस्तियों के पंजीयन और प्रवास सम्बन्धी कानूनों को उनके यहाँ लागू कर दिया जायेगा। वेरीनिगिंग के समझौते के बादसे यह एक प्रवृत्ति देखने में आई है कि समूचे दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके साथ एक ही तरहका बरताव किया जाये; और इसका आधार हो उनके साथ [विभिन्न प्रदेशों में] जैसा बरताव होता रहा है उसका सख्त से सख्त रूप। उपनिवेश-मन्त्रीको स्मरण होगा कि लॉर्ड मिलनरने १९०३ में जब बाजार सम्बन्धी आदेश जारी किया था, तब नेटालने उसे शीघ्र ही अपना लिया था। नेटाल्के परवाना-सम्बन्धी सख्त कानूनको केपने अपना लिया था, और अब ट्रान्सवालमें भी उसे लागू करनेकी कोशिश की जा रही है। इसीलिए दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयों में यह भावना बड़ी तेजीसे घर करती जा रही है कि यदि वे अपने यत्किचित् नागरिक अधिकार और सुविधाएँ बनाये रखना चाहते हैं तो उनको अपने हितोंपर संघमें चारों ओरसे होनेवाले नित नये हमलेके खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा खड़ा करना चाहिए। वास्तव में केप और नेटालके भारतीयों द्वारा पिछले सत्याग्रह आन्दोलनके दौरान अनेक प्रकारसे ट्रान्सवालके अपने भाइयोंके दावोंका इतनी मुस्तैदीके साथ समर्थन किये जानेका यह भी एक मुख्य कारण था।
३. ट्रान्सवालके भारतीयोंको सदासे इसका बड़ा भय रहा है कि १८८५ के कानून ३ की उस धाराको लागू करने की कोशिश की जायेगी, जो उन्हें निर्दिष्ट बस्तियोंमें रखनेके लिए बाध्य करती है।<noinclude></noinclude>
nek7x5nc34mutjfo66s8cm3rr5yglb2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६२
250
183111
673001
631144
2026-08-22T18:06:11Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673001
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>ट्रान्सवालके सर्वोच्च न्यायालयने १९०३ में निर्णय दिया था कि निर्दिष्ट बस्तियोंसे ही बाहर व्यापार करनेवाले भारतीयोंको भी व्यापारिक परवाने दिये जाने चाहिए, परन्तु भारतीयोंको निर्दिष्ट बस्तियोंमें ही निवास और व्यापार करनेपर विवश करनेके उद्देश्यसे पास किया गया सबसे पहला कानून था फ्रीडडॉ बाड़ा अधिनियम । वस्ती अधिनियम और स्वर्ण कानूनने तो भारतीयोंकी बड़ी-बड़ी आशंकाको भी सही सिद्ध कर दिया है । हालाँकि १८८५ के कानून ३ की एक व्यवस्थाके अनुसार अचल सम्पत्तिका स्वामित्व भारतीयोंके नामपर दर्ज नहीं हो सकता, किन्तु ट्रान्सवालके न्यायालयोंने यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच हुए ऐसे करारोंको, जिनसे भारतीयोंको उसका न्यायिक स्वामित्व प्राप्त होता है, मान्यता दी है, जैसा कि सैयद इस्माइल तथा एक अन्य बनाम एस० जैकन्स एन० ओ० के मुकदमेमें हुआ था । परन्तु इन नये कानूनों का परिणाम यह होगा कि ऐसी अचल सम्पत्तिके पंजीयित यूरोपीय स्वामियों और न्याय्य भारतीय स्वामियोंको दण्डित किया जायेगा । मेरे जैसे यूरोपीय स्वामियोंपर काफी बड़ा जुर्माना इसलिए किया जा सकेगा कि उन्होंने भारतीय रंगदार लोगोंको उनकी अपनी जगहमें निवास करनेकी अनुमति दी; और भारतीय स्वामियोंकी सारी सम्पत्तिको, जो उनकी अपनी ही है, जब्त किया जा सकेगा । इन विविध कानूनों के फलस्वरूप भारतीयोंके विनियोजित धनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी और भारतीय व्यापारियोंकी अनिवार्यतः ऐसी पृथक बस्तियोंमें जाकर रहना पड़ेगा जहाँ वे कोई कारोबार नहीं कर सकते और जहाँ अपने मौजूदा ग्राहकोंके साथ उनका कोई भी सम्बन्ध बना नहीं रह सकता । उनमें से सैकड़ों बिल्कुल बरबाद हो जायेंगे और बिना अपने किसी अपराधके इतनी क्षति उठानेके कारण उनको आफ्रिका छोड़नेपर विवश होना पड़ेगा। इस प्रकार बरबाद होनेवालोंमें से कई ऐसे होंगे जिन्होंने सत्याग्रहियोंके साथ सहानुभूति तो रखी है और रुपये पैसेसे उनकी सहायता भी की है, पर स्वयं कभी संघर्ष में सक्रिय रूपसे भाग नहीं लिया । परन्तु यदि ये कानून लागू कर दिये गये और उनके लागू कर दिये जानेकी आशंका सर्वथा सकारण है, तो मुझे कोई सन्देह नहीं है, कि अभी जिस संघर्षको समाप्त मानकर सन्तोष किया जा रहा है, उससे भी कहीं अधिक कटु संघर्ष शुरू हो जायेगा; क्योंकि उन विनाशकारी प्रयत्नोंके विरोधमें समाजके सभी लोगोंके कमर कसकर एक हो जानेकी पूरी सम्भावना है । आजकल जिस नीतिपर अमल किया जा रहा है, वह केवल परेशान करनेकी नीति नहीं है, इसका एक जाना समझा हुआ उद्देश्य है और वह यह कि जिन वैध अधिवासी भारतीयोंको किसी और तरीकेसे नहीं हटाया जा सकता, उनकी स्थिति बिलकुल असहनीय बनाकर उन्हें देश छोड़नेपर विवश कर दिया जाये और देखने में यही लगे कि वे अपनी इच्छासे देश छोड़ कर जा रहे हैं ।
४. ये बातें केप और नेटालके भारतीयोंपर भी काफी हद तक लागू होती हैं । केपके प्रवासी कानूनका उपयोग निवासी भारतीयोंकी पहलेसे घटती जा रही संख्याको और घटानेके लिए किया गया है। अभी हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें अनुपस्थितिके लिए मंजूर अवधिसे दो-तीन दिन भी ज्यादा अनुपस्थित हो जानेपर प्रान्तके काफी पुराने निवासी भारतीयोंको प्रवेश नहीं दिया गया; उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिनका कारोबार वहाँ अभीतक फैला हुआ है। नेटाल्के कानून में अधिवासकी परिभाषा है, किन्तु केपके कानूनमें अधिवासकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और उसका अमल जिस प्रकार किया जा रहा है, उससे लोगोंको लगातार कष्ट होता रहता है। सच तो यह है कि इन दोनों प्रान्तोंके भारतीयोंका ख्याल है कि प्रवास-सम्बन्धी प्रशासनका रवैया उनके प्रति सबसे अधिक कठोर और असहानुभूतिपूर्ण है, और उसके अधिकारी यह मान कर चलते हैं कि वहाँ पूर्व अधिवासी भारतीयको किसी भी बहाने पुनःप्रवेश न करने देना ही उनका कर्तव्य है । प्रवासी अधिकारी बहुधा बड़े मनमाने ढंगले काम करते हैं मन्त्री श्री हरकोर्ट १४ तारीखके तारोंको देखकर स्वयं ही निष्कर्ष निकाल लेंगे कि ये अधिकारी बहुधा न्यायालयोंके आदेशोंका अपमान और उल्लंघन भी करते हैं । परन्तु जिन भारतीयोंको उनका शिकार बनना पड़ता है उनमें से हरएककी सामर्थ्य तो इतनी नहीं होती कि वह प्रान्तीय न्यायालयोंकी शरण ले सके;<noinclude></noinclude>
d0vmi8hght1n0roob03t122cs3udqkg
673052
673001
2026-08-22T21:11:30Z
सीमा1
430
673052
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>ट्रान्सवालके सर्वोच्च न्यायालयने १९०३ में निर्णय दिया था कि निर्दिष्ट बस्तियोंसे ही बाहर व्यापार करनेवाले भारतीयोंको भी व्यापारिक परवाने दिये जाने चाहिए, परन्तु भारतीयोंको निर्दिष्ट बस्तियोंमें ही निवास और व्यापार करनेपर विवश करनेके उद्देश्यसे पास किया गया सबसे पहला कानून था फ्रीडडॉर्प बाड़ा अधिनियम । वस्ती अधिनियम और स्वर्ण कानूनने तो भारतीयोंकी बड़ीसे-बड़ी आशंकाको भी सही सिद्ध कर दिया है । हालाँकि १८८५ के कानून ३ की एक व्यवस्थाके अनुसार अचल सम्पत्तिका स्वामित्व भारतीयोंके नामपर दर्ज नहीं हो सकता, किन्तु ट्रान्सवालके न्यायालयोंने यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच हुए ऐसे करारोंको, जिनसे भारतीयोंको उसका न्यायिक स्वामित्व प्राप्त होता है, मान्यता दी है, जैसा कि सैयद इस्माइल तथा एक अन्य बनाम एस० जैकन्स एन० ओ० के मुकदमेमें हुआ था । परन्तु इन नये कानूनों का परिणाम यह होगा कि ऐसी अचल सम्पत्तिके पंजीयित यूरोपीय स्वामियों और न्याय्य भारतीय स्वामियोंको दण्डित किया जायेगा । मेरे जैसे यूरोपीय स्वामियोंपर काफी बड़ा जुर्माना इसलिए किया जा सकेगा कि उन्होंने भारतीय रंगदार लोगोंको उनकी अपनी जगहमें निवास करनेकी अनुमति दी; और भारतीय स्वामियोंकी सारी सम्पत्तिको, जो उनकी अपनी ही है, जब्त किया जा सकेगा । इन विविध कानूनों के फलस्वरूप भारतीयोंके विनियोजित धनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी और भारतीय व्यापारियोंकी अनिवार्यतः ऐसी पृथक बस्तियोंमें जाकर रहना पड़ेगा जहाँ वे कोई कारोबार नहीं कर सकते और जहाँ अपने मौजूदा ग्राहकोंके साथ उनका कोई भी सम्बन्ध बना नहीं रह सकता । उनमें से सैकड़ों बिल्कुल बरबाद हो जायेंगे और बिना अपने किसी अपराधके इतनी क्षति उठानेके कारण उनको आफ्रिका छोड़नेपर विवश होना पड़ेगा। इस प्रकार बरबाद होनेवालोंमें से कई ऐसे होंगे जिन्होंने सत्याग्रहियोंके साथ सहानुभूति तो रखी है और रुपये पैसेसे उनकी सहायता भी की है, पर स्वयं कभी संघर्ष में सक्रिय रूपसे भाग नहीं लिया । परन्तु यदि ये कानून लागू कर दिये गये और उनके लागू कर दिये जानेकी आशंका सर्वथा सकारण है, तो मुझे कोई सन्देह नहीं है, कि अभी जिस संघर्षको समाप्त मानकर सन्तोष किया जा रहा है, उससे भी कहीं अधिक कटु संघर्ष शुरू हो जायेगा; क्योंकि उन विनाशकारी प्रयत्नोंके विरोधमें समाजके सभी लोगोंके कमर कसकर एक हो जानेकी पूरी सम्भावना है । आजकल जिस नीतिपर अमल किया जा रहा है, वह केवल परेशान करनेकी नीति नहीं है, इसका एक जाना समझा हुआ उद्देश्य है और वह यह कि जिन वैध अधिवासी भारतीयोंको किसी और तरीकेसे नहीं हटाया जा सकता, उनकी स्थिति बिलकुल असहनीय बनाकर उन्हें देश छोड़नेपर विवश कर दिया जाये और देखने में यही लगे कि वे अपनी इच्छासे देश छोड़ कर जा रहे हैं ।
४. ये बातें केप और नेटालके भारतीयोंपर भी काफी हद तक लागू होती हैं । केपके प्रवासी कानूनका उपयोग निवासी भारतीयोंकी पहलेसे घटती जा रही संख्याको और घटानेके लिए किया गया है। अभी हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें अनुपस्थितिके लिए मंजूर अवधिसे दो-तीन दिन भी ज्यादा अनुपस्थित हो जानेपर प्रान्तके काफी पुराने निवासी भारतीयोंको प्रवेश नहीं दिया गया; उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिनका कारोबार वहाँ अभीतक फैला हुआ है। नेटाल्के कानून में अधिवासकी परिभाषा है, किन्तु केपके कानूनमें अधिवासकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और उसका अमल जिस प्रकार किया जा रहा है, उससे लोगोंको लगातार कष्ट होता रहता है। सच तो यह है कि इन दोनों प्रान्तोंके भारतीयोंका ख्याल है कि प्रवास-सम्बन्धी प्रशासनका रवैया उनके प्रति सबसे अधिक कठोर और असहानुभूतिपूर्ण है, और उसके अधिकारी यह मान कर चलते हैं कि वहाँ पूर्व अधिवासी भारतीयको किसी भी बहाने पुनःप्रवेश न करने देना ही उनका कर्तव्य है । प्रवासी अधिकारी बहुधा बड़े मनमाने ढंगसे काम करते हैं मन्त्री श्री हरकोर्ट १४ तारीखके तारोंको देखकर स्वयं ही निष्कर्ष निकाल लेंगे कि ये अधिकारी बहुधा न्यायालयोंके आदेशोंका अपमान और उल्लंघन भी करते हैं । परन्तु जिन भारतीयोंको उनका शिकार बनना पड़ता है उनमें से हरएककी सामर्थ्य तो इतनी नहीं होती कि वह प्रान्तीय न्यायालयोंकी शरण ले सके;<noinclude></noinclude>
4udrwa27fwd27rf4k1jo5vmo9uv6foa
673056
673052
2026-08-22T21:45:45Z
सीमा1
430
673056
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>ट्रान्सवालके सर्वोच्च न्यायालयने १९०३ में निर्णय दिया था कि निर्दिष्ट बस्तियोंसे ही बाहर व्यापार करनेवाले भारतीयोंको भी व्यापारिक परवाने दिये जाने चाहिए, परन्तु भारतीयोंको निर्दिष्ट बस्तियोंमें ही निवास और व्यापार करनेपर विवश करनेके उद्देश्यसे पास किया गया सबसे पहला कानून था फ्रीडडॉर्प बाड़ा अधिनियम । वस्ती अधिनियम और स्वर्ण कानूनने तो भारतीयोंकी बड़ीसे-बड़ी आशंकाको भी सही सिद्ध कर दिया है । हालाँकि १८८५ के कानून ३ की एक व्यवस्थाके अनुसार अचल सम्पत्तिका स्वामित्व भारतीयोंके नामपर दर्ज नहीं हो सकता, किन्तु ट्रान्सवालके न्यायालयोंने यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच हुए ऐसे करारोंको, जिनसे भारतीयोंको उसका न्यायिक स्वामित्व प्राप्त होता है, मान्यता दी है, जैसा कि सैयद इस्माइल तथा एक अन्य '''बनाम''' एस० जैकन्स एन० ओ० के मुकदमेमें हुआ था । परन्तु इन नये कानूनों का परिणाम यह होगा कि ऐसी अचल सम्पत्तिके पंजीयित यूरोपीय स्वामियों और न्याय्य भारतीय स्वामियोंको दण्डित किया जायेगा । मेरे जैसे यूरोपीय स्वामियोंपर काफी बड़ा जुर्माना इसलिए किया जा सकेगा कि उन्होंने भारतीय रंगदार लोगोंको उनकी अपनी जगहमें निवास करनेकी अनुमति दी; और भारतीय स्वामियोंकी सारी सम्पत्तिको, जो उनकी अपनी ही है, जब्त किया जा सकेगा । इन विविध कानूनों के फलस्वरूप भारतीयोंके विनियोजित धनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी और भारतीय व्यापारियोंकी अनिवार्यतः ऐसी पृथक बस्तियोंमें जाकर रहना पड़ेगा जहाँ वे कोई कारोबार नहीं कर सकते और जहाँ अपने मौजूदा ग्राहकोंके साथ उनका कोई भी सम्बन्ध बना नहीं रह सकता । उनमें से सैकड़ों बिल्कुल बरबाद हो जायेंगे और बिना अपने किसी अपराधके इतनी क्षति उठानेके कारण उनको आफ्रिका छोड़नेपर विवश होना पड़ेगा। इस प्रकार बरबाद होनेवालोंमें से कई ऐसे होंगे जिन्होंने सत्याग्रहियोंके साथ सहानुभूति तो रखी है और रुपये पैसेसे उनकी सहायता भी की है, पर स्वयं कभी संघर्ष में सक्रिय रूपसे भाग नहीं लिया । परन्तु यदि ये कानून लागू कर दिये गये और उनके लागू कर दिये जानेकी आशंका सर्वथा सकारण है, तो मुझे कोई सन्देह नहीं है, कि अभी जिस संघर्षको समाप्त मानकर सन्तोष किया जा रहा है, उससे भी कहीं अधिक कटु संघर्ष शुरू हो जायेगा; क्योंकि उन विनाशकारी प्रयत्नोंके विरोधमें समाजके सभी लोगोंके कमर कसकर एक हो जानेकी पूरी सम्भावना है । आजकल जिस नीतिपर अमल किया जा रहा है, वह केवल परेशान करनेकी नीति नहीं है, इसका एक जाना समझा हुआ उद्देश्य है और वह यह कि जिन वैध अधिवासी भारतीयोंको किसी और तरीकेसे नहीं हटाया जा सकता, उनकी स्थिति बिलकुल असहनीय बनाकर उन्हें देश छोड़नेपर विवश कर दिया जाये और देखने में यही लगे कि वे अपनी इच्छासे देश छोड़ कर जा रहे हैं ।
४. ये बातें केप और नेटालके भारतीयोंपर भी काफी हद तक लागू होती हैं । केपके प्रवासी कानूनका उपयोग निवासी भारतीयोंकी पहलेसे घटती जा रही संख्याको और घटानेके लिए किया गया है। अभी हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें अनुपस्थितिके लिए मंजूर अवधिसे दो-तीन दिन भी ज्यादा अनुपस्थित हो जानेपर प्रान्तके काफी पुराने निवासी भारतीयोंको प्रवेश नहीं दिया गया; उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिनका कारोबार वहाँ अभीतक फैला हुआ है। नेटाल्के कानून में अधिवासकी परिभाषा है, किन्तु केपके कानूनमें अधिवासकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और उसका अमल जिस प्रकार किया जा रहा है, उससे लोगोंको लगातार कष्ट होता रहता है। सच तो यह है कि इन दोनों प्रान्तोंके भारतीयोंका ख्याल है कि प्रवास-सम्बन्धी प्रशासनका रवैया उनके प्रति सबसे अधिक कठोर और असहानुभूतिपूर्ण है, और उसके अधिकारी यह मान कर चलते हैं कि वहाँ पूर्व अधिवासी भारतीयको किसी भी बहाने पुनःप्रवेश न करने देना ही उनका कर्तव्य है । प्रवासी अधिकारी बहुधा बड़े मनमाने ढंगसे काम करते हैं मन्त्री श्री हरकोर्ट १४ तारीखके तारोंको देखकर स्वयं ही निष्कर्ष निकाल लेंगे कि ये अधिकारी बहुधा न्यायालयोंके आदेशोंका अपमान और उल्लंघन भी करते हैं । परन्तु जिन भारतीयोंको उनका शिकार बनना पड़ता है उनमें से हरएककी सामर्थ्य तो इतनी नहीं होती कि वह प्रान्तीय न्यायालयोंकी शरण ले सके;<noinclude></noinclude>
1pgfdcyhkmgqsixy51eymu8q8fb5o26
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६३
250
183112
673002
631153
2026-08-22T18:06:53Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673002
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२५}}</noinclude>और इसमें कोई सन्देह नहीं कि केप और नेटाल दोनों ही प्रान्तों के प्रवासी अधिकारियों ने अपनी मनमानी से कई निर्दोष व्यक्तियों को बड़ा कष्ट पहुँचाया है। केप के भारतीयों का सुझाव है कि प्रान्त के प्रवासी कानूनों में रद्दोबदल करते समय प्रवासी अधिकारी के ऊपर एक प्रवासी बोर्ड बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए और उसमें भारतीयों को प्रभावपूर्ण प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
५. परवाना कानूनों से भारतीय व्यापारी और फेरीवाले बड़ी मुसीबत में पड़ गये है । तटवर्ती प्रान्तों के परवाना-अधिकारियों ने कई विचित्र से कारणों का बहाना लेकर, और कभी-कभी तो बिना किसी कारण के ही, भारतीय व्यापारियों को “ उखाड़ने " की नीति अपना ली है । केप में सैकड़ों भारतीय फेरीवाले बरबाद हो चुके हैं, और जिनमें वे काम करते थे, ऐसी सैकड़ों फर्मों बन्द हो चुकी हैं। नेटाल में १९०९ के संशोधन कानून से भारतीय समाज पर होनेवाले पहले के घोर अन्याय को रोकने में निःसन्देह ही काफी सहायता मिली, लेकिन अब परवाना अधिकारी परवानादारों को उनकी जीविका से वंचित करने के अन्य तरीके निकाल रहे हैं । जिन भारतीय व्यापारियों ने ऋणदाताओं से कोई करार कर रखा है, वे तो व्यापार चालू रहने पर ही उन करारों की पूर्ति कर सकते थे, लेकिन उन्हें परवाना देने से इनकार कर दिया गया है । यदि भारतीय व्यापारी अपना कारोबार किसी दूसरी दूकान में ले जाना चाहता है, तो उसके परवाने पर स्थानान्तरण के लिए आवश्यक पृष्ठांकन करने से इनकार कर दिया जाता है और यदि वह अपने कारोबार में किसी को साझेदार बनाना चाहता है तो परवाना अधिकारी उसे, इसकी भी इजाजत नहीं देते । यदि वह अपना कारोबार अपने पुत्र को सौंपना चाहता है तो उसकी इजाजत नहीं दी जाती और कोशिश यह होती है कि परवाना जिसके नाम- पर है, उसके जीवन काल तक ही परवाने की अवधि सीमित कर दी जाये, जिससे कि पुत्र अपने पिता के कारोबार का उत्तराधिकारी न हो सके । परवाना दूसरों के नाम पर भी करवाना, यहाँतक कि उपनिवेश में जन्मे किसी भारतीय के नाम पर करवाना भी लगभग असम्भव है । यदि इसी प्रकार उनकी उन्नति के रास्ते एक के बाद एक बन्द होते रहे, जैसा कि दिख रहा है, तो वास्तव में यह कहना कठिन है कि उपनिवेश में जन्मे भारतीयों का भविष्य क्या होगा । केप और नेटाल के भारतीयों का मत है कि अब निवासी भारतीय समाज की संख्या में आगे कोई वृद्धि होने को सम्भावना नहीं है; इसे देखते हुए भारतीय व्यापार पर लगे ये प्रतिबन्ध शीघ्र ही हटाये जाने चाहिए । परन्तु इसके विपरीत श्री जी० एच० ह्यूलेट ने, जैसा कि उन्होंने खुद ही स्वीकार किया है, भारतीय व्यापारी समाज को इस मान्यता के कारण कि भारत सरकार द्वारा गिरमिटिया मजदूरों का भेजा जाना बन्द किये जाने में उनका हाथ रहा है, दण्डित करने के उद्देश्य से हाल ही में नेटाल प्रान्तीय परिषद् में एक प्रस्ताव पास कराया है, जिसमें यह माँग की गई है कि सम्बन्धित कामकाज, जिसके बारे में अभी केवल संघ-संसद कानून बनाती है, उसके बजाय परिषद् को सौंप दिया जाये । नेटाल के भारतीयों ने ऐसी हर कार्रवाई का जोरदार विरोध किया है । उनका यह विरोध दक्षिण आफ्रिका अधिनियम के खण्ड १४७ की लागू व्यवस्थाओं पर आधारित है । मैं मन्त्री श्री हरकोर्ट की और अधिक जानकारी के लिए इस सम्बन्ध में नेटाल भारतीय कांग्रेस में हुई बहस और प्रस्ताव की एक प्रति इसके साथ नत्थी कर रहा हूँ ।
६. भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीय पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों पर तीन पौंडी वार्षिक कर लगने के कारण दक्षिण आफ्रिका के समूचे भारतीय समाज में बड़ी कटुता फैल गई है, विशेषकर त्रियों और बच्चों- पर कर लगने से उनमें क्षोभ है। इससे भारतीय समाजकी भावनाओं को बड़ी ठेस लगी है। उनका कहना है कि कम से कम स्त्रियों और बच्चों को तो इस करसे विमुक्त रखकर उन्हें ऐसे करों से उत्पन्न होनेवाली बुराइयों से बचाना चाहिए । १९१० के संशोधन अधिनियम से परिस्थिति में बहुत ही थोड़ा सुधार हुआ है । कुछ मजिस्ट्रेट तो कभी-कभी कुछ व्यक्तियों को पूरी छूट दे देते हैं, कुछ मजिस्ट्रेट एक निश्चित अवधि के लिए कुछ व्यक्तियों को अस्थायी तौरपर विमुक्त कर देते हैं, परन्तु कुछ मजिस्ट्रेट ऐसे भी हैं जो बिलकुल छूट नहीं देते; किन्तु मेहरबानी के तौर पर कर की अदायगी के लिए बहुत थोड़ा-सा समय दे देते हैं<noinclude></noinclude>
g4d5bj5llz9xfoc30alduz8hogmmmti
673053
673002
2026-08-22T21:25:44Z
सीमा1
430
673053
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२५}}</noinclude>और इसमें कोई सन्देह नहीं कि केप और नेटाल दोनों ही प्रान्तों के प्रवासी अधिकारियों ने अपनी मनमानी से कई निर्दोष व्यक्तियों को बड़ा कष्ट पहुँचाया है। केप के भारतीयों का सुझाव है कि प्रान्त के प्रवासी कानूनों में रद्दोबदल करते समय प्रवासी अधिकारी के ऊपर एक प्रवासी बोर्ड बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए और उसमें भारतीयों को प्रभावपूर्ण प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
५. परवाना कानूनों से भारतीय व्यापारी और फेरीवाले बड़ी मुसीबत में पड़ गये है । तटवर्ती प्रान्तों के परवाना-अधिकारियों ने कई विचित्र-से कारणों का बहाना लेकर, और कभी-कभी तो बिना किसी कारण के ही, भारतीय व्यापारियों को “उखाड़ने" की नीति अपना ली है । केपमें सैकड़ों भारतीय फेरीवाले बरबाद हो चुके हैं, और जिनमें वे काम करते थे, ऐसी सैकड़ों फर्मों बन्द हो चुकी हैं। नेटाल में १९०९ के संशोधन कानून से भारतीय समाज पर होनेवाले पहले के घोर अन्याय को रोकने में निःसन्देह ही काफी सहायता मिली, लेकिन अब परवाना अधिकारी परवानादारों को उनकी जीविका से वंचित करने के अन्य तरीके निकाल रहे हैं । जिन भारतीय व्यापारियों ने ऋणदाताओं से कोई करार कर रखा है, वे तो व्यापार चालू रहने पर ही उन करारों की पूर्ति कर सकते थे, लेकिन उन्हें परवाना देने से इनकार कर दिया गया है । यदि भारतीय व्यापारी अपना कारोबार किसी दूसरी दूकान में ले जाना चाहता है, तो उसके परवाने पर स्थानान्तरण के लिए आवश्यक पृष्ठांकन करने से इनकार कर दिया जाता है और यदि वह अपने कारोबार में किसी को साझेदार बनाना चाहता है तो परवाना अधिकारी उसे, इसकी भी इजाजत नहीं देते । यदि वह अपना कारोबार अपने पुत्र को सौंपना चाहता है तो उसकी इजाजत नहीं दी जाती और कोशिश यह होती है कि परवाना जिसके नाम-पर है, उसके जीवन काल तक ही परवाने की अवधि सीमित कर दी जाये, जिससे कि पुत्र अपने पिता के कारोबार का उत्तराधिकारी न हो सके । परवाना दूसरों के नाम पर भी करवाना, यहाँतक कि उपनिवेश में जन्मे किसी भारतीय के नाम पर करवाना भी लगभग असम्भव है । यदि इसी प्रकार उनकी उन्नति के रास्ते एकके बाद एक बन्द होते रहे, जैसा कि दिख रहा है, तो वास्तव में यह कहना कठिन है कि उपनिवेशमें जन्मे भारतीयों का भविष्य क्या होगा । केप और नेटाल के भारतीयों का मत है कि अब निवासी भारतीय समाज की संख्या में आगे कोई वृद्धि होनेकी सम्भावना नहीं है; इसे देखते हुए भारतीय व्यापारपर लगे ये प्रतिबन्ध शीघ्र ही हटाये जाने चाहिए । परन्तु इसके विपरीत श्री जी० एच० ह्यूलेट ने, जैसा कि उन्होंने खुद ही स्वीकार किया है, भारतीय व्यापारी समाज को इस मान्यताके कारण कि भारत-सरकार द्वारा गिरमिटिया मजदूरों का भेजाजाना बन्द किये जानेमें उनका हाथ रहा है, दण्डित करनेके उद्देश्यसे हाल ही में नेटाल प्रान्तीय परिषद्में एक प्रस्ताव पास कराया है, जिसमें यह माँग की गई है कि सम्बन्धित कामकाज, जिसके बारेमें अभी केवल संघ-संसद ही कानून बनाती है, उसके बजाय परिषद्को सौंप दिया जाये । नेटालके भारतीयोंने ऐसी हर कार्रवाईका जोरदार विरोध किया है । उनका यह विरोध दक्षिण आफ्रिका अधिनियमके खण्ड १४७ की लागू व्यवस्थाओंपर आधारित है । मैं मन्त्री श्री हरकोर्टकी और अधिक जानकारीके लिए इस सम्बन्धमें नेटाल भारतीय कांग्रेसमें हुई बहस और प्रस्तावकी एक प्रति इसके साथ नत्थी कर रहा हूँ ।
६. भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीय पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों पर तीन पौंडी वार्षिक कर लगने के कारण दक्षिण आफ्रिकाके समूचे भारतीय समाजमें बड़ी कटुता फैल गई है, विशेषकर स्त्रियों और बच्चों पर कर लगनेसे उनमें क्षोभ है। इससे भारतीय समाजकी भावनाओं को बड़ी ठेस लगी है। उनका कहना है कि कमसे-कम स्त्रियों और बच्चोंको तो इस करसे विमुक्त रखकर उन्हें ऐसे करों से उत्पन्न होनेवाली बुराइयों से बचाना चाहिए । १९१० के संशोधन अधिनियम से परिस्थितिमें बहुत ही थोड़ा सुधार हुआ है । कुछ मजिस्ट्रेट तो कभी-कभी कुछ व्यक्तियों को पूरी छूट दे देते हैं, कुछ मजिस्ट्रेट एक निश्चित अवधि के लिए कुछ व्यक्तियोंको अस्थायी तौरपर विमुक्त कर देते हैं, परन्तु कुछ मजिस्ट्रेट ऐसे भी हैं जो बिलकुल छूट नहीं देते; किन्तु मेहरबानीके तौरपर करकी अदायगीके लिए बहुत थोड़ा-सा समय दे देते हैं<noinclude></noinclude>
blgcqytekusnery1lyn6zep5o9qxrkb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६४
250
183113
673003
631142
2026-08-22T18:07:34Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673003
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और फिर अदायगी नहीं पानेपर दुर्भाग्यकी मारी स्त्रियोंको सपरिश्रम कारावासकी सजा दे देते हैं। इस प्रकारकी जबरन वसूलीसे अनिवार्यत: पैदा होनेवाली आर्थिक और सामाजिक बुराइयोंको अधिक विस्तारसे पेश करना मैं अनावश्यक समझता हूँ ।
७. मन्त्री श्री हरकोर्टने दक्षिण आफ्रिका संघके गवर्नर-जनरलको जो खरीते भेजे थे, उनको पढ़कर केप और नेटालके भारतीयोंको बड़ा सन्तोष हुआ था । उपनिवेश मन्त्रीने उनमें कहा था कि ट्रान्सवालके विवादके सम्बन्धमें जो भी समझौता किया जाये, उसमें केप और नेटाल्के भारतीयोंके अधिकारों और सुविधाओं को कम नहीं होने देना चाहिए । पर दुर्भाग्य की बात है कि पिछले सत्र के दौरान संसद में जो विधेयक पेश किया गया, उसका भारतीय हितोंपर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था; और अगले वर्ष पेश होनेवाले विधेयक के बारेमें भी बड़ी आशंका यह है कि उसमें सभी आवश्यक रक्षोपाय सम्मिलित नहीं किये जायेंगे। निवेदन है कि वर्तमान नेटाल कानूनमें जैसा किया हो गया है, संविहित अधिवासकी स्पष्ट परिभाषा की जानी चाहिए, मौजूदा परीक्षाओंको अधिक सख्त नहीं बनाना चाहिए और भारतसे मुनीम तथा अन्य विश्वस्त सहायक लानेका भारतीय व्यापारियोंका मौजूदा अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए । मुझे अधिकार देकर यह अनुरोध करनेके लिए विशेष रूपले हिदायत दी गई है कि उपनिवेश मन्त्री इन प्रान्तोंके भारतीय निवासियोंको गम्भीर हानि और अन्यायसे बचानेके लिए प्रत्येक प्रस्तावित प्रवासी विधानकी बड़ी सावधानीसे छानबीन करें।
८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीयोंकी शिकायतों के दो बड़े कारण है । पहला तो यह कि दक्षिण आफ्रिका अधिनियमके खण्ड १४७ में सम्मिलित संरक्षणके उपायोंके प्रयोजनको निष्फल बनानेके लिए ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं, जो हैं तो एशियाई विरोधी, पर जिनकी भाषा ऐसी रखी जाती है जिससे ऐसा लगे कि वे सर्वसामान्य रूपसे सभी लोगोंपर लागू होते हैं। दूसरा यह कि विधान विशेष तो चाहे स्वीकार्य हो लेकिन उसके अन्तर्गत बनाये गये विनियम ऐसे होते हैं जिनमें बहुधा जातीय भेदभावको अत्यन्त आपत्ति- जनक व्यवस्थाओं का समावेश रहता है और ये विनियम बहुधा मंजूरी के लिए संसद में पेश नहीं किये जाते ।
९. लगता है कि मैंने दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके कष्टों के बारेमें पहले कही बातोंको ही काफी हद तक दोहराया है। लेकिन साम्राज्य-सम्मेलनमें स्वशासित उपनिवेशोंके ( डोमीनियन्सके) भारतीय निवासियोंके साथ होनेवाले बरतावसे सम्बन्धित चर्चाका दिन निकट आ रहा है और चूँकि उपनिवेश-मन्त्रीके साथ मैं परिस्थितिके बारेमें व्यक्तिगत रूपसे बातचीत नहीं कर सकूँगा इसलिए मैंने सोचा कि यह ज्यादा अच्छा रहेगा कि कोई भी तत्सम्बन्धी मामला ऐसा न रह पाये जिसका पर्याप्त निरूपण न हुआ हो, फिर चाहे कुछ बातोंको दोहराना ही पड़ जाये । मन्त्री श्री हरकोर्ट, प्राप्त जानकारीके अतिरिक्त यदि कोई और ऐसी जानकारी चाहें, जो में उन्हें दे सकता हूँ, तो मैं बड़ी खुशीसे उनकी सेवांके लिए तैयार रहूँगा ।
{{right|आपका}}
{{right|एच० एस० एल० पोलक}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्डस; सी० ओ० ५५१/२२ ।<noinclude></noinclude>
g20aq4wqwcr3vlk7ybtiymqlz34dpwk
673054
673003
2026-08-22T21:36:07Z
सीमा1
430
673054
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और फिर अदायगी नहीं पानेपर दुर्भाग्यकी मारी स्त्रियोंको सपरिश्रम कारावासकी सजा दे देते हैं। इस प्रकारकी जबरन वसूलीसे अनिवार्यत: पैदा होनेवाली आर्थिक और सामाजिक बुराइयोंको अधिक विस्तारसे पेश करना मैं अनावश्यक समझता हूँ ।
७. मन्त्री श्री हरकोर्टने दक्षिण आफ्रिका संघके गवर्नर-जनरलको जो खरीते भेजे थे, उनको पढ़कर केप और नेटालके भारतीयोंको बड़ा सन्तोष हुआ था । उपनिवेश मन्त्रीने उनमें कहा था कि ट्रान्सवालके विवादके सम्बन्धमें जो भी समझौता किया जाये, उसमें केप और नेटालके भारतीयोंके अधिकारों और सुविधाओंको कम नहीं होने देना चाहिए । पर दुर्भाग्य की बात है कि पिछले सत्रके दौरान संसद में जो विधेयक पेश किया गया, उसका भारतीय हितोंपर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था; और अगले वर्ष पेश होनेवाले विधेयकके बारेमें भी बड़ी आशंका यह है कि उसमें सभी आवश्यक रक्षोपाय सम्मिलित नहीं किये जायेंगे। निवेदन है कि वर्तमान नेटाल कानूनमें जैसा किया ही गया है, संविहित अधिवासकी स्पष्ट परिभाषा की जानी चाहिए, मौजूदा परीक्षाओंको अधिक सख्त नहीं बनाना चाहिए और भारतसे मुनीम तथा अन्य विश्वस्त सहायक लानेका भारतीय व्यापारियोंका मौजूदा अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए । मुझे अधिकार देकर यह अनुरोध करनेकेलिए विशेष रूपसे हिदायत दी गई है कि उपनिवेश-मन्त्री इन प्रान्तोंके भारतीय निवासियोंको गम्भीर हानि और अन्यायसे बचानेके लिए प्रत्येक प्रस्तावित प्रवासी विधानकी बड़ी सावधानीसे छानबीन करें।
८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीयोंकी शिकायतोंके दो बड़े कारण है । पहला तो यह कि दक्षिण आफ्रिका अधिनियमके खण्ड १४७ में सम्मिलित संरक्षणके उपायोंके प्रयोजनको निष्फल बनानेके लिए ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं, जो हैं तो एशियाई-विरोधी, पर जिनकी भाषा ऐसी रखी जाती है जिससे ऐसा लगे कि वे सर्वसामान्य रूपसे सभी लोगोंपर लागू होते हैं। दूसरा यह कि विधान विशेष तो चाहे स्वीकार्य हो लेकिन उसके अन्तर्गत बनाये गये विनियम ऐसे होते हैं जिनमें बहुधा जातीय भेदभावको अत्यन्त आपत्ति-जनक व्यवस्थाओं का समावेश रहता है और ये विनियम बहुधा मंजूरीके लिए संसदमें पेश नहीं किये जाते ।
९. लगता है कि मैंने दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके कष्टोंके बारेमें पहले कही बातोंको ही काफी हद तक दोहराया है। लेकिन साम्राज्य-सम्मेलनमें स्वशासित उपनिवेशोंके (डोमीनियन्सके) भारतीय निवासियोंके साथ होनेवाले बरतावसे सम्बन्धित चर्चाका दिन निकट आ रहा है और चूँकि उपनिवेश-मन्त्रीके साथ मैं परिस्थितिके बारेमें व्यक्तिगत रूपसे बातचीत नहीं कर सकूँगा इसलिए मैंने सोचा कि यह ज्यादा अच्छा रहेगा कि कोई भी तत्सम्बन्धी मामला ऐसा न रह पाये जिसका पर्याप्त निरूपण न हुआ हो, फिर चाहे कुछ बातोंको दोहराना ही पड़ जाये । मन्त्री श्री हरकोर्ट, प्राप्त जानकारीके अतिरिक्त यदि कोई और ऐसी जानकारी चाहें, जो में उन्हें दे सकता हूँ, तो मैं बड़ी खुशीसे उनकी सेवांके लिए तैयार रहूँगा ।
{{right|आपका}}
{{right|एच० एस० एल० पोलक}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्डस; सी० ओ० ५५१/२२ ।<noinclude></noinclude>
eccc28vbbk9sa3u44fk8z8uciwq5f3i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६५
250
183114
673004
631141
2026-08-22T18:10:08Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673004
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ९'''}}</center>
{{c|'''संरक्षककी रिपोर्टका सारांश'''}}
भारतीय प्रवासी संरक्षक द्वारा सन् १९१० के प्रकाशित विवरणसे स्पष्ट है कि १९०९की अपेक्षा सन् १९१०में गिरमिटिया-प्रथा के अन्तर्गत नेटाल आनेवालोंकी संख्या दोगुनीसे भी काफी अधिक थी । यह संख्या सन् १९०९ में २४८७ और सन् १९१० में ५८५८ थी । जहाजपर १६ व्यक्ति मरे, जिसके बारेमें संरक्षकका कथन है कि "यह संख्या औसत संख्यासे बहुत अधिक है। इस बढ़ी हुई संख्याका मुख्य कारण था मद्रास छठी बार आफ्रिका जानेवाले ' उमलोटी' नामक जहाजपर आठ मौतोंका हो जाना । " पाठकों को स्मरण होगा कि उमलोटी जहाजपर गर्दन तोड़ बुखार (स्पॉटेड फीवर) फैल गया था । संरक्षक द्वारा प्रस्तुत निम्नलिखित विवरण से उस ज्वरके फैलनेके बारेमें कुछ जानकारी प्राप्त होती है । वह कहता है : सर्जन सुपरिटेंडेंटने मुझे सूचित किया कि अनेक बच्चे बहुत ही कमजोर हालत में जहाजपर चढ़ाये गये थे; और यह विवश होकर करना पड़ा था नहीं तो बहुतसे भारतीयोंको रोक देना पड़ता । इससे स्पष्ट है कि एजेंटोंको एक बड़ा जत्था भेजनेकी ऐसी फिक्र सवार थी कि वे यात्राके दौरान बीमारी फैलने या मौतें हो जानेका खतरा उठानेको तैयार थे; और हुआ भी यही, एक भयंकर बीमारी फैल गई । हमें यह भी बताया गया है कि इस जहाजपर जो भारतीय सवार थे उनमें से अनेक तो जहाजसे उतर चुकनेके बाद मरे थे । गर्दनतोड़ बुखारके कारण मरनेवाले आठ भारतीय इन्हीं में से थे । वर्ष भर में इस बुखारसे १४ मौतें हुईं। हम तो ऐसा समझते हैं कि इन हकीकतों<ref>गिरमिटिया भारतीयोंका एक जत्था उमलोटी जहाज द्वारा रवाना हुआ था । (ये भारतीय विशेषकर सर लोएज ह्यूलॅटके बागानोंके लिए भेजे गये थे ) । जहाज सितम्बर १९१० में डर्बन पहुँचा;यात्रियों में से कुछ भारतीय गर्दैनतोड़ बुखारसे मर गये । सरकारकी ओरसे कुछ सूचना न मिलनेके कारण २२ सितम्बरको संपादक '''इंडियन ओपिनियन'''ने भारतीय प्रवासियोंके संरक्षक पोल्किंगहॉर्नको लिखा कि जो समाचार छपा है क्या वह सही है । २४ सितम्बरको पोल्किंगहॉर्नने अपने उत्तर में यह स्वीकार किया कि " कुछ " मौतें हुई जरूर हैं और विश्वास दिलाया कि “ भयका कोई कारण नहीं है । ” सम्पादकने उस अधिकारीको फिर पूछा कि मरनेवालोंकी अथवा उन भारतीयोंकी जो उस रोगसे पीड़ित हैं अथवा जिन्हें उस रोगके कारण रोक रखा गया है, संख्या क्या है । अधिकारीने उत्तर में लिखा कि “ फलाँ तारीखके '''नेटाल मर्क्युरी''' में समाचारको देखिए"। इस उत्तरपर १ अक्तूबर के '''इंडियन ओपिनियन''' में सम्पादकने कड़ी टिप्पणी लिखी । इसपर उस अधिकारीने सम्पादकको और कोई सूचना या समाचार देनेसे इनकार कर दिया । २६ अक्तूबरको नेटाल इंडियन कांग्रेसने पोल्किगहोंनेको एक पत्र भेजा; उत्तर में इस अधिकारीने कहा कि आप जो जानकारी चाहते हैं वह प्रस्तुत की जा सकती है, परन्तु शर्त यह है कि उसे '''इंडियन ओपिनियन''' में प्रकाशित न किया जाये । कांग्रेसने ३१ अक्तूबर को उसे यह लिख भेजा कि चूँकि यह मामला सार्वजनिक है इसलिए आप जो उत्तर भेजेंगे, वह समाचार-पत्रोंको जरूर दिया जायेगा । '''इंडियन ओपिनियन'''से यह नहीं कहा जा सकता कि आप दैनिक</ref> को देखते हुए हमारे द्वारा उस समय की गई पूछताछके उत्तरमें संरक्षकने जो यह कहा था : " भयका कोई कारण नहीं है”, “ थोड़े ही लोग मरे हैं ", " आशा है कि रोग अब तक शान्त हो गया है ", – यह किसी हालत में भी पूरी जानकारी नहीं थी ।
_________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
5yck0b6psnw6roc6wrb82biwtmyc0ch
673012
673004
2026-08-22T18:24:15Z
सीमा1
430
673012
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ९'''}}</center>
<center>{{larger|'''संरक्षककी रिपोर्टका सारांश'''}}</center>
भारतीय प्रवासी संरक्षक द्वारा सन् १९१० के प्रकाशित विवरणसे स्पष्ट है कि १९०९की अपेक्षा सन् १९१०में गिरमिटिया-प्रथा के अन्तर्गत नेटाल आनेवालोंकी संख्या दोगुनीसे भी काफी अधिक थी । यह संख्या सन् १९०९ में २४८७ और सन् १९१० में ५८५८ थी । जहाजपर १६ व्यक्ति मरे, जिसके बारेमें संरक्षकका कथन है कि "यह संख्या औसत संख्यासे बहुत अधिक है। इस बढ़ी हुई संख्याका मुख्य कारण था मद्रास छठी बार आफ्रिका जानेवाले ' उमलोटी' नामक जहाजपर आठ मौतोंका हो जाना । " पाठकों को स्मरण होगा कि उमलोटी जहाजपर गर्दन तोड़ बुखार (स्पॉटेड फीवर) फैल गया था । संरक्षक द्वारा प्रस्तुत निम्नलिखित विवरण से उस ज्वरके फैलनेके बारेमें कुछ जानकारी प्राप्त होती है । वह कहता है : सर्जन सुपरिटेंडेंटने मुझे सूचित किया कि अनेक बच्चे बहुत ही कमजोर हालत में जहाजपर चढ़ाये गये थे; और यह विवश होकर करना पड़ा था नहीं तो बहुतसे भारतीयोंको रोक देना पड़ता । इससे स्पष्ट है कि एजेंटोंको एक बड़ा जत्था भेजनेकी ऐसी फिक्र सवार थी कि वे यात्राके दौरान बीमारी फैलने या मौतें हो जानेका खतरा उठानेको तैयार थे; और हुआ भी यही, एक भयंकर बीमारी फैल गई । हमें यह भी बताया गया है कि इस जहाजपर जो भारतीय सवार थे उनमें से अनेक तो जहाजसे उतर चुकनेके बाद मरे थे । गर्दनतोड़ बुखारके कारण मरनेवाले आठ भारतीय इन्हीं में से थे । वर्ष भर में इस बुखारसे १४ मौतें हुईं। हम तो ऐसा समझते हैं कि इन हकीकतों<ref>गिरमिटिया भारतीयोंका एक जत्था उमलोटी जहाज द्वारा रवाना हुआ था । (ये भारतीय विशेषकर सर लोएज ह्यूलॅटके बागानोंके लिए भेजे गये थे ) । जहाज सितम्बर १९१० में डर्बन पहुँचा;यात्रियों में से कुछ भारतीय गर्दैनतोड़ बुखारसे मर गये । सरकारकी ओरसे कुछ सूचना न मिलनेके कारण २२ सितम्बरको संपादक '''इंडियन ओपिनियन'''ने भारतीय प्रवासियोंके संरक्षक पोल्किंगहॉर्नको लिखा कि जो समाचार छपा है क्या वह सही है । २४ सितम्बरको पोल्किंगहॉर्नने अपने उत्तर में यह स्वीकार किया कि " कुछ " मौतें हुई जरूर हैं और विश्वास दिलाया कि “ भयका कोई कारण नहीं है । ” सम्पादकने उस अधिकारीको फिर पूछा कि मरनेवालोंकी अथवा उन भारतीयोंकी जो उस रोगसे पीड़ित हैं अथवा जिन्हें उस रोगके कारण रोक रखा गया है, संख्या क्या है । अधिकारीने उत्तर में लिखा कि “ फलाँ तारीखके '''नेटाल मर्क्युरी''' में समाचारको देखिए"। इस उत्तरपर १ अक्तूबर के '''इंडियन ओपिनियन''' में सम्पादकने कड़ी टिप्पणी लिखी । इसपर उस अधिकारीने सम्पादकको और कोई सूचना या समाचार देनेसे इनकार कर दिया । २६ अक्तूबरको नेटाल इंडियन कांग्रेसने पोल्किगहोंनेको एक पत्र भेजा; उत्तर में इस अधिकारीने कहा कि आप जो जानकारी चाहते हैं वह प्रस्तुत की जा सकती है, परन्तु शर्त यह है कि उसे '''इंडियन ओपिनियन''' में प्रकाशित न किया जाये । कांग्रेसने ३१ अक्तूबर को उसे यह लिख भेजा कि चूँकि यह मामला सार्वजनिक है इसलिए आप जो उत्तर भेजेंगे, वह समाचार-पत्रोंको जरूर दिया जायेगा । '''इंडियन ओपिनियन'''से यह नहीं कहा जा सकता कि आप दैनिक</ref> को देखते हुए हमारे द्वारा उस समय की गई पूछताछके उत्तरमें संरक्षकने जो यह कहा था : " भयका कोई कारण नहीं है”, “ थोड़े ही लोग मरे हैं ", " आशा है कि रोग अब तक शान्त हो गया है ", – यह किसी हालत में भी पूरी जानकारी नहीं थी ।
_________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
nsq97ghj4wnpfot95w13mg6ey8w224f
673055
673012
2026-08-22T21:45:16Z
सीमा1
430
673055
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ९'''}}</center>
<center>{{larger|'''संरक्षककी रिपोर्टका सारांश'''}}</center>
भारतीय-प्रवासी संरक्षक द्वारा सन् १९१० के प्रकाशित विवरणसे स्पष्ट है कि १९०९की अपेक्षा सन् १९१०में गिरमिटिया-प्रथा के अन्तर्गत नेटाल आनेवालोंकी संख्या दोगुनीसे भी काफी अधिक थी । यह संख्या सन् १९०९ में २४८७ और सन् १९१० में ५८५८ थी । जहाजपर १६ व्यक्ति मरे, जिसके बारेमें संरक्षकका कथन है कि "यह संख्या औसत संख्यासे बहुत अधिक है। इस बढ़ी हुई संख्याका मुख्य कारण था मद्राससे छठी बार आफ्रिका जानेवाले 'उमलोटी' नामक जहाजपर आठ मौतोंका हो जाना ।" पाठकों को स्मरण होगा कि उमलोटी जहाजपर गर्दन तोड़ बुखार (स्पॉटेड फीवर) फैल गया था । संरक्षक द्वारा प्रस्तुत निम्नलिखित विवरणसे उस ज्वरके फैलनेके बारेमें कुछ जानकारी प्राप्त होती है । वह कहता है : सर्जन सुपरिटेंडेंटने मुझे सूचित किया कि अनेक बच्चे बहुत ही कमजोर हालत में जहाजपर चढ़ाये गये थे; और यह विवश होकर करना पड़ा था नहीं तो बहुतसे भारतीयोंको रोक देना पड़ता । इससे स्पष्ट है कि एजेंटोंको एक '''बड़ा''' जत्था भेजनेकी ऐसी फिक्र सवार थी कि वे यात्राके दौरान बीमारी फैलने या मौतें हो जानेका खतरा उठानेको तैयार थे; और हुआ भी यही, एक भयंकर बीमारी फैल गई । हमें यह भी बताया गया है कि इस जहाजपर जो भारतीय सवार थे उनमें से अनेक तो जहाजसे उतर चुकनेके बाद मरे थे। गर्दनतोड़ बुखारके कारण मरनेवाले आठ भारतीय इन्हीं में से थे । वर्ष भर में इस बुखारसे १४ मौतें हुईं। हम तो ऐसा समझते हैं कि इन हकीकतों<ref>गिरमिटिया भारतीयोंका एक जत्था उमलोटी जहाज द्वारा रवाना हुआ था । (ये भारतीय विशेषकर सर लोएज ह्यूलॅटके बागानोंके लिए भेजे गये थे ) । जहाज सितम्बर १९१० में डर्बन पहुँचा;यात्रियों में से कुछ भारतीय गर्दैनतोड़ बुखारसे मर गये । सरकारकी ओरसे कुछ सूचना न मिलनेके कारण २२ सितम्बरको संपादक '''इंडियन ओपिनियन'''ने भारतीय प्रवासियोंके संरक्षक पोल्किंगहॉर्नको लिखा कि जो समाचार छपा है क्या वह सही है । २४ सितम्बरको पोल्किंगहॉर्नने अपने उत्तर में यह स्वीकार किया कि " कुछ " मौतें हुई जरूर हैं और विश्वास दिलाया कि “ भयका कोई कारण नहीं है । ” सम्पादकने उस अधिकारीको फिर पूछा कि मरनेवालोंकी अथवा उन भारतीयोंकी जो उस रोगसे पीड़ित हैं अथवा जिन्हें उस रोगके कारण रोक रखा गया है, संख्या क्या है । अधिकारीने उत्तर में लिखा कि “ फलाँ तारीखके '''नेटाल मर्क्युरी''' में समाचारको देखिए"। इस उत्तरपर १ अक्तूबर के '''इंडियन ओपिनियन''' में सम्पादकने कड़ी टिप्पणी लिखी । इसपर उस अधिकारीने सम्पादकको और कोई सूचना या समाचार देनेसे इनकार कर दिया । २६ अक्तूबरको नेटाल इंडियन कांग्रेसने पोल्किगहोंनेको एक पत्र भेजा; उत्तर में इस अधिकारीने कहा कि आप जो जानकारी चाहते हैं वह प्रस्तुत की जा सकती है, परन्तु शर्त यह है कि उसे '''इंडियन ओपिनियन''' में प्रकाशित न किया जाये । कांग्रेसने ३१ अक्तूबर को उसे यह लिख भेजा कि चूँकि यह मामला सार्वजनिक है इसलिए आप जो उत्तर भेजेंगे, वह समाचार-पत्रोंको जरूर दिया जायेगा । '''इंडियन ओपिनियन'''से यह नहीं कहा जा सकता कि आप दैनिक</ref> को देखते हुए हमारे द्वारा उस समय की गई पूछताछके उत्तरमें संरक्षकने जो यह कहा था: "भयका कोई कारण नहीं है”, “थोड़े ही लोग मरे हैं", "आशा है कि रोग अब तक शान्त हो गया है ",---यह किसी हालत में भी पूरी जानकारी नहीं थी ।
_________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
l2j5njoclc1k0nykec3fvoa4hpz8h1g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८८
250
183185
673132
631172
2026-08-23T05:28:18Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673132
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|१६८. पंच महायज्ञ}}
यज्ञके अनेक अर्थ हो सकते हैं। हिन्दुस्तानमें गृहस्थ, संसारीके लिए पाँच यज्ञ आवश्यक हैं: चूल्हा, मूसल, चक्की, घड़ा और चरखा। इनमें से जिस घरमें जो चीज जितनी कम होगी उतनी ही कम बरकत होगी। लेकिन इन यज्ञोंपर दृष्टिपात करनेसे आप देखेंगे कि वस्तुतः दो ही यज्ञ हैं और बीचके तीन यज्ञ गौण हैं। चक्की, मूसल और घड़ा ये चूल्हेके ही अंग हैं। जिसके यहाँ चक्की अथवा मूसल नहीं चलता उसका चूल्हा मन्द हो जाता है, उसका तेज कम हो जाता है, लेकिन चूल्हा तो जलता ही है। लेकिन जिसके यहाँ चरखा नहीं चलता उसके यहाँसे तो एक मुख्य अंग ही चला गया, उसे तो पक्षाघात हो गया। अन्न अथवा वस्त्रके लिए जो यज्ञ न करे उसे अन्न अथवा वस्त्रका अधिकार ही नहीं है। ऐसा रिवाज होना चाहिए कि जो चूल्हा न जलाये वह खाना न खाये, जो चरखा न चलाये वह कपड़ा न पहने। लेकिन हमने तो चरखा छोड़नेपर भी वस्त्र न छोड़े। जो यज्ञ किये बिना खाता है वह चोर कहलाता है। वैसे ही जो यज्ञ किये बिना कपड़े पहनता है वह भी चोर है। यज्ञ अर्थात् कुरबानी, यज्ञ अर्थात् आत्मत्याग अर्थात् शारीरिक परिश्रम। जो चूल्हा और चरखा चलाता है वह बुद्धिपूर्वक यज्ञ करता है। जो व्यक्ति ऐसी पोषक मजूरी नहीं करता सो अन्तमें थोड़ी-बहुत कसरत करके अन्नको पचाता है।
अब कदाचित् अधिकांश लोग समझ गये होंगे कि हमने चरखेको छोड़कर कितना पाप किया है। किसी समय हिन्दुस्तानकी महिलाएँ जब यह कोमल किन्तु पोषक परिश्रम किया करती थीं तब हिन्दुस्तान सुखी था, स्वस्थ था, तेजस्वी था। आज हिन्दुस्तान चरखेको छोड़कर दुःखी, रोगी और तेजहीन हो गया है।
चूल्हा, चरखा आदि घरके श्रृंगार हैं। चरखेके जानेके बादसे हिन्दुस्तानमें लाखों घर खंडहर हो गये हैं। इस कथनमें कोई अतिशयोक्ति न माने। पाठकका घर भले ही ऐसा न हो। पानीकी तंगीका अर्थ यह नहीं होता कि किसीको पानी ही न मिले। लेकिन होता यह है कि पानी सबको कम, अनेकको बहुत ही कम और थोड़े लोगोंको बिलकुल ही नहीं मिलता। चरखेके अभावमें भी छ: करोड़ घरोंका बहुत अच्छा गुजारा होता है। लेकिन कितने ही घर तो जमींदोज हो गये हैं। उड़ीसा और चम्पारनको ही देखिए। उनके बहुतसे गाँव खण्डहर हैं। डेढ़ सौ वर्ष पहले जिस देशके लोग बारहों महीने किसी-न-किसी प्रवृतिमें व्यस्त रहते थे उनमें से कुछ वर्षोंसे अगर अस्सी प्रतिशत लोग बिना कामके चार महीने बेकार रहते हों तो उस देशका क्या हाल होगा?
धातु तो दौलतकी निशानी मात्र है, खरा पैसा तो मजूरी ही है। अस्सी प्रतिशत लोग चार महीने बेकार रहते हैं अर्थात् उनकी एक तिहाई शक्ति कम हो गई। वर्षोंसे तीन रुपयेका काम करनेकी योग्यता और इच्छा दोनों ही के बावजूद हिन्दुस्तानके लोग दो रुपयेका काम कर रहे हैं, उनको दो रुपयेका ही काम मिलता है। ऐसा देश<noinclude></noinclude>
hgjsq485i6bg56dtpgb8chzctpcqgeq
673133
673132
2026-08-23T05:28:59Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673133
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६८. पंच महायज्ञ'''}}}}
यज्ञके अनेक अर्थ हो सकते हैं। हिन्दुस्तानमें गृहस्थ, संसारीके लिए पाँच यज्ञ आवश्यक हैं: चूल्हा, मूसल, चक्की, घड़ा और चरखा। इनमें से जिस घरमें जो चीज जितनी कम होगी उतनी ही कम बरकत होगी। लेकिन इन यज्ञोंपर दृष्टिपात करनेसे आप देखेंगे कि वस्तुतः दो ही यज्ञ हैं और बीचके तीन यज्ञ गौण हैं। चक्की, मूसल और घड़ा ये चूल्हेके ही अंग हैं। जिसके यहाँ चक्की अथवा मूसल नहीं चलता उसका चूल्हा मन्द हो जाता है, उसका तेज कम हो जाता है, लेकिन चूल्हा तो जलता ही है। लेकिन जिसके यहाँ चरखा नहीं चलता उसके यहाँसे तो एक मुख्य अंग ही चला गया, उसे तो पक्षाघात हो गया। अन्न अथवा वस्त्रके लिए जो यज्ञ न करे उसे अन्न अथवा वस्त्रका अधिकार ही नहीं है। ऐसा रिवाज होना चाहिए कि जो चूल्हा न जलाये वह खाना न खाये, जो चरखा न चलाये वह कपड़ा न पहने। लेकिन हमने तो चरखा छोड़नेपर भी वस्त्र न छोड़े। जो यज्ञ किये बिना खाता है वह चोर कहलाता है। वैसे ही जो यज्ञ किये बिना कपड़े पहनता है वह भी चोर है। यज्ञ अर्थात् कुरबानी, यज्ञ अर्थात् आत्मत्याग अर्थात् शारीरिक परिश्रम। जो चूल्हा और चरखा चलाता है वह बुद्धिपूर्वक यज्ञ करता है। जो व्यक्ति ऐसी पोषक मजूरी नहीं करता सो अन्तमें थोड़ी-बहुत कसरत करके अन्नको पचाता है।
अब कदाचित् अधिकांश लोग समझ गये होंगे कि हमने चरखेको छोड़कर कितना पाप किया है। किसी समय हिन्दुस्तानकी महिलाएँ जब यह कोमल किन्तु पोषक परिश्रम किया करती थीं तब हिन्दुस्तान सुखी था, स्वस्थ था, तेजस्वी था। आज हिन्दुस्तान चरखेको छोड़कर दुःखी, रोगी और तेजहीन हो गया है।
चूल्हा, चरखा आदि घरके श्रृंगार हैं। चरखेके जानेके बादसे हिन्दुस्तानमें लाखों घर खंडहर हो गये हैं। इस कथनमें कोई अतिशयोक्ति न माने। पाठकका घर भले ही ऐसा न हो। पानीकी तंगीका अर्थ यह नहीं होता कि किसीको पानी ही न मिले। लेकिन होता यह है कि पानी सबको कम, अनेकको बहुत ही कम और थोड़े लोगोंको बिलकुल ही नहीं मिलता। चरखेके अभावमें भी छ: करोड़ घरोंका बहुत अच्छा गुजारा होता है। लेकिन कितने ही घर तो जमींदोज हो गये हैं। उड़ीसा और चम्पारनको ही देखिए। उनके बहुतसे गाँव खण्डहर हैं। डेढ़ सौ वर्ष पहले जिस देशके लोग बारहों महीने किसी-न-किसी प्रवृतिमें व्यस्त रहते थे उनमें से कुछ वर्षोंसे अगर अस्सी प्रतिशत लोग बिना कामके चार महीने बेकार रहते हों तो उस देशका क्या हाल होगा?
धातु तो दौलतकी निशानी मात्र है, खरा पैसा तो मजूरी ही है। अस्सी प्रतिशत लोग चार महीने बेकार रहते हैं अर्थात् उनकी एक तिहाई शक्ति कम हो गई। वर्षोंसे तीन रुपयेका काम करनेकी योग्यता और इच्छा दोनों ही के बावजूद हिन्दुस्तानके लोग दो रुपयेका काम कर रहे हैं, उनको दो रुपयेका ही काम मिलता है। ऐसा देश<noinclude></noinclude>
a9kqj8digyo0t1lf2p1rqnb2rvc9uwm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७५
250
183186
673037
631173
2026-08-22T19:40:47Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673037
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३७}}</noinclude>प्रजाजन, चाहे इनके शरीर-गठन, रीति-रिवाज और धर्म यूरोपीय प्रजातियोंसे कितने भी भिन्न क्यों न हों,
विदेशी नहीं हैं। यह बात पर्याप्त रूपसे अनुभव नहीं की गई है कि विशुद्ध स्थानीय कारणोंसे
अधिराज्यों (डोमिनियन्स) ने ऐसी नीति अपनाई है जिसके कारण एशियाई ब्रिटिश प्रजाजनोंको भी
विदेशी एशियाइयोंके समान मान लिया गया है । वस्तुत: उपर्युक्त कारणोंसे कैनेडा अधिराज्यमें जापानी
प्रवासियोंकी अपेक्षा भारतीय प्रवासियोंके प्रति अधिक कठोरता बरती जाती है। एक दूसरा महत्वपूर्ण
तथ्य, जिसकी सामान्यतः उपेक्षा कर दी जाती है, यह है कि ब्रिटिश साम्राज्यके कुछ भागोंमें एशियाई
ब्रिटिश प्रजाजनोंके प्रति बहिष्कारकी ऐसी नीति अपनाई गई है जिसे ब्रिटिश साम्राज्यके बाहरके देशोंने
भी नहीं अपनाया है । निःसन्देह यह सच है कि यद्यपि यूरोपीय शक्तियोंके अधिकारके उष्ण कटिबन्ध
और उससे संलग्न भागोंमें स्थित देशोंकी जलवायु और परिस्थितियाँ ब्रिटिश सम्राटके अधीन उपनिवेशों से
मिलती-जुलती हैं किन्तु वहाँकी स्थानीय अवस्था अभीतक वैसी नहीं हुई है जिसके कारण उपनिवेशोंने
अपनी प्रवास नीति ऐसी बनाई है। फिर भी यह एक विचित्र तथ्य है कि दूसरे राष्ट्र ब्रिटिश भारतीयोंको
ऐसे विशिष्ट अधिकार देते हैं जो उपनिवेशों में उन्हें नहीं दिये जाते ।
यदि यह विचार ठीक हो कि किसी भी प्रजातिको ब्रिटिश प्रजाके हर व्यक्तिको साम्राज्यके किसी
भी भागमें अबाध प्रवेशका अधिकार होना चाहिए तो फिर साम्राज्यमें यूरोपीयोंके नये राष्ट्र बनानेकी
नीतिका इसके साथ मेल नहीं बैठता; और इस असंगतिपर पर्दा डालनेकी कोशिश व्यर्थ है ।
इस स्थिति में
ब्रिटिश सरकारको इतना कहनेका अधिकार है कि उपनिवेशोंकी नीतिका निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति
ऐसे ढंगसे की जाये कि उससे गैर-यूरोपीय ब्रिटिश प्रजाजनोंके आत्म-सम्मानपर ख़्वाहमख्वाह आघात
न लगे । प्रवेश निषेधको प्रजातीयताको अपेक्षा शैक्षणिक कसौटीपर आधारित करनेसे इस बातकी रक्षा
हो जाती है; यद्यपि इसे व्यक्तिशः मामलोंपर लागू करनेमें प्रजातीय आधारपर भारतीयोंको प्रविष्ट न
होने देने की गुंजाइश बनी रहती है । कैनेडाके कानूनमें प्रवासको सीमित करनेके ऐसे तरीके मौजूद
हैं जिनसे किसी प्रजाति विशेषके विरुद्ध विना कानूनी भेदभाव किये (१) स्थानीय जलवायु या आवश्यकताके
लिए अनुपयुक्त समझे गये प्रवासियोंका या किसी विशेष वर्ग, व्यवसाय या चरित्रके प्रवासियोंका प्रवेश
रोकनेकी; और (२) प्रवासियोंको एक न्यूनतम निश्चित रकम लेकर ही आने देनेकी सत्ता मिल जाती है ।
इस बात से तो सभी सहमत होंगे कि प्रत्येक उपनिवेशका सर्वाधिक बड़ा नैतिक कर्तव्य यह है
कि वह सबसे अलग हटकर कोई ऐसी कार्रवाई न करे जिससे साम्राज्य किसी विदेशी शक्तिके साथ
युद्धमें फँस जाये । किन्तु इस बातपर अच्छी तरह विचार किया गया प्रतीत नहीं होता कि प्रत्येक
उपनिवेशको शेष साम्राज्यके प्रति कर्तव्य-दृष्टिसे यह तय कर लेना चाहिए कि उसकी घरेलू नीति से
भारतके प्रशासनमें कोई अनावश्यक परेशानी पैदा न होने पाये । जिन राजनीतिज्ञोंने भारतीयोंको केवल
मजदूरों और छोटे व्यापारियोंके रूपमें ही देखा है, उनके लिए यह कठिन है कि वे उस समूचे देशका
साम्राज्यके लिए महत्व समझ सकें जिसमें ३० करोड़ लोग रहते हैं, जिसकी सभ्यता अति प्राचीन और
बहुत उच्च कोटिकी है, जिसने साम्राज्यकी सेनाओंके लिए कुछ उत्तम सैनिक सामग्री दी है और अब भी
देता है तथा जहाँ आर्थिक एवं व्यापारिक उद्यमकी जबर्दस्त गुंजाइश है । जो लोग भारत से परिचित नहीं
हैं उन्हें यह समझाना कठिन है कि भारतीय सेनाके पुराने सैनिकोंने जब यह देखा कि ब्रिटिश साम्राज्यके
भागों में ही उन्हें “कुली" कहा जाता है और उनके साथ तिरस्कारपूर्ण और कठोर व्यवहार किया जाता
है तो उनमें कितना तीव्र और स्वाभाविक रोष उत्पन्न हुआ । (यह घटना वास्तविक है ।) ये वे सैनिक
थे जिन्होंने ब्रिटिश ध्वजाके नीचे सक्रिय सेवा की है और पदक प्राप्त किये हैं एवं जिनके साथ उनके
अंग्रेज अफसरोंने सम्मानपूर्ण और शिष्ट व्यवहार किया है; अवश्य ही वे अपने चरित्रके कारण इसके
अधिकारी थे । माना कि इस तरहकी बातें बहुत कुछ सरकारके नियन्त्रणसे बाहर होती हैं; किन्तु लोगों की
भ्रान्त धारणाएँ बड़ी आसानीसे अनिष्टको जन्म दे सकती हैं इसलिए इस गम्भीर तथ्यको स्पष्ट करना<br><noinclude></noinclude>
ml5i091h1wu96cjjpv3itzkgf5sqh45
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७६
250
183187
673038
631174
2026-08-22T19:43:03Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673038
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उचित प्रतीत होता है कि साम्राज्यके कई भागोंमें भारतकी वस्तुस्थितिके विषयमें ऐसी अनेक धारणाएँ
फैली हुई हैं जो मूलतः गलत हैं । . . .
...किन्तु कुल मिलाकर प्रवास सम्बन्धी कठिनाई कुछ क्रमिक विधानोंके द्वारा दूर की जा चुकी है।
इन विधानोंसे भेदभावकारी और अपमानजनक भाषाका प्रयोग किये बिना एशियाइयोंका अति-प्रवास रोकने में सफलता मिल गई है । यह बात मान ली गई है कि वे लोग, जिनके रहन-सहनका तरीका अधिराज्योंके अपने राजनीतिक और सामाजिक आदर्शों से भिन्न है, अधिराज्योंमें स्थायी निवासीके रूपमें प्रविष्ट नहीं किये जायेंगे ।
किन्तु अस्थायी आगन्तुकोंके प्रवेशको बात, जिसपर आपत्ति लागू नहीं होती, अभी सन्तोषजनक
रूपसे तय नहीं हुई है । यदि यह प्रश्न गम्भीर न होता तो यह बात हास्यास्पद कही जा सकती थी कि जो विनियम कुलियोंको ध्यानमें रखकर बनाये गये थे, उनका प्रभाव उन सभी राजाओंपर, जो महामहिम सम्राट के मित्र (अलाइ ) हैं और जिन्होंने अपनी सेनाएँ उनको सौंप दी हैं; या जो सज्जन साम्राज्य की प्रिवी कौंसिलके सदस्य हैं, या जिन्हें महामहिम सम्राट के निजी अंगरक्षक होनेका सम्मान प्राप्त है,पड़ता है । इसमें शक नहीं कि यदि ऐसी विशिष्ट स्थितिवाला कोई व्यक्ति किसी उपनिवेशमें आयेगा तो वह लौटाया नहीं जायेगा । किन्तु यह प्रसिद्ध है कि इन भारतीय सज्जनोंमें यह भावना बहुत ही प्रबल है कि जहाँ वे यूरोपके किसी भी देशकी राजधानीमें उसके सर्वोत्तम समाजमें स्वतन्त्रतापूर्वक आ-जा सकते हैं, वहाँ वे कतिपय उपनिवेशोंमें छोटे-छोटे अधिकारियोंकी क्षोभकारी पूछताछसे गुजरे बिना पैर नहीं रख सकते, जब कि भारतमें बड़ी-बड़ी नौकरियोंके द्वार महामहिमके उपनिवेशवासी प्रजाजनोंके लिए खुले हैं।
ब्रिटिश सरकारने पिछले कुछ वर्षोंमें भारतमें नागरिकताको भावनाको उत्पन्न और पुष्ट करनेके जो
प्रयत्न किये हैं, उनमें निःसन्देह भारतीयों के प्रति उपनिवेशोंमें आम तौरपर फैली हुई कटुताकी भावनासे बाधा पड़ी है । ताजके प्रति भारतीयोंके विशाल लोक-समुदायकी वफादारी एक विशिष्ट तथ्य है और यह ध्यान देने योग्य है कि ब्रिटिश शासनकी छोटी-छोटी बातोंकी आलोचना करनेवाले बहुत-से भारतीय सच्चाईके साथ इस वफादारीका अनुभव करते हैं । अभी हालमें जो संवैधानिक परिवर्तन किये गये हैं। उनसे उस देशके लोगोंको उसके शासनमें अधिक भाग दिया गया है और उससे भारतीयोंको सीधे सरकारके ध्यानमें यह बात लानेका और भी अधिक अवसर मिला है कि साम्राज्य में भारत के स्थानके प्रश्नपर उनके क्या विचार हैं। भारतीयों और उपनिवेशोंमें उपनिवेशोंके प्रश्नपर ही गम्भीर मतभेद हैं और यही एक ऐसा प्रश्न हैं जिसपर भारतमें राजद्रोहको भड़कानेवाले आन्दोलनकारी और नरम विचारके भारतीयोंके पूर्ण राजभक्त प्रतिनिधि एक ही मत रखते हैं । भारत सरकार यदि उपनिवेशोंके दृष्टिकोण से सहमत बनी रहती है तो वह भारतको निराशाकी उस व्यापक भावनासे मुक्त नहीं रख सकती जो उपनिवेशों द्वारा उसे प्रतिष्ठाका अधिकारी न माननेकी इच्छासे उत्पन्न होती है । उच्च-शिक्षा प्राप्त तथा उच्चवंशीय अनेक भारतीयोंको साम्राज्यके दूसरे भागोंको देखनेकी सहज और सराहनीय इच्छा होती हैं; किन्तु इस समय उनका उपनिवेशोंमें जानेका मार्ग अवरुद्ध है । महामहिम सम्राटको सरकारको पूरी आशा है कि ऐसी कार्रवाई जो निम्न श्रेणीके भारतीयोंका इतनी बड़ी संख्या में प्रवेश रोकनेके लिए आवश्यक है कि उससे उपनिवेशोंकी आबादी ही बदल जाये और गम्भीर स्थानीय कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जायें, उन आगन्तुकोंपर लागू न की जायेगी जिनका सामाजिक दर्जा अच्छा है, जो अच्छी स्थितिवाले ऐसे व्यापारी हैं जिनका भारत से बाहर व्यापार है या जो विश्वविद्यालयके उपाधि प्राप्त विद्वान हैं ।
<center>{{x-larger|'''(२) उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयोंका दर्जा'''}}</center>
केवल दक्षिण आफ्रिकामें ही भारतीय निवासियोंकी आबादी कुछ ज्यादा है और वह मुख्यतः नेटाल
सरकार द्वारा जानबूझकर भारतीय गिरमिटिया मजदूरोंके बुलाये जानेके कारण है। गिरमिटिया भारतीयोंका लाया जाना तब आरम्भ हुआ था जब नेटाल शाही उपनिवेश था। किन्तु वह उत्तरदायी सरकार बननेपर<noinclude></noinclude>
5palxpjmwsd1duz5nnezipmiynkq0qj
673039
673038
2026-08-22T19:43:19Z
सीमा1
430
673039
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उचित प्रतीत होता है कि साम्राज्यके कई भागोंमें भारतकी वस्तुस्थितिके विषयमें ऐसी अनेक धारणाएँ
फैली हुई हैं जो मूलतः गलत हैं । . . .
...किन्तु कुल मिलाकर प्रवास सम्बन्धी कठिनाई कुछ क्रमिक विधानोंके द्वारा दूर की जा चुकी है।
इन विधानोंसे भेदभावकारी और अपमानजनक भाषाका प्रयोग किये बिना एशियाइयोंका अति-प्रवास रोकने में सफलता मिल गई है । यह बात मान ली गई है कि वे लोग, जिनके रहन-सहनका तरीका अधिराज्योंके अपने राजनीतिक और सामाजिक आदर्शों से भिन्न है, अधिराज्योंमें स्थायी निवासीके रूपमें प्रविष्ट नहीं किये जायेंगे ।
किन्तु अस्थायी आगन्तुकोंके प्रवेशको बात, जिसपर आपत्ति लागू नहीं होती, अभी सन्तोषजनक
रूपसे तय नहीं हुई है । यदि यह प्रश्न गम्भीर न होता तो यह बात हास्यास्पद कही जा सकती थी कि जो विनियम कुलियोंको ध्यानमें रखकर बनाये गये थे, उनका प्रभाव उन सभी राजाओंपर, जो महामहिम सम्राट के मित्र (अलाइ ) हैं और जिन्होंने अपनी सेनाएँ उनको सौंप दी हैं; या जो सज्जन साम्राज्य की प्रिवी कौंसिलके सदस्य हैं, या जिन्हें महामहिम सम्राट के निजी अंगरक्षक होनेका सम्मान प्राप्त है,पड़ता है । इसमें शक नहीं कि यदि ऐसी विशिष्ट स्थितिवाला कोई व्यक्ति किसी उपनिवेशमें आयेगा तो वह लौटाया नहीं जायेगा । किन्तु यह प्रसिद्ध है कि इन भारतीय सज्जनोंमें यह भावना बहुत ही प्रबल है कि जहाँ वे यूरोपके किसी भी देशकी राजधानीमें उसके सर्वोत्तम समाजमें स्वतन्त्रतापूर्वक आ-जा सकते हैं, वहाँ वे कतिपय उपनिवेशोंमें छोटे-छोटे अधिकारियोंकी क्षोभकारी पूछताछसे गुजरे बिना पैर नहीं रख सकते, जब कि भारतमें बड़ी-बड़ी नौकरियोंके द्वार महामहिमके उपनिवेशवासी प्रजाजनोंके लिए खुले हैं।
ब्रिटिश सरकारने पिछले कुछ वर्षोंमें भारतमें नागरिकताको भावनाको उत्पन्न और पुष्ट करनेके जो
प्रयत्न किये हैं, उनमें निःसन्देह भारतीयों के प्रति उपनिवेशोंमें आम तौरपर फैली हुई कटुताकी भावनासे बाधा पड़ी है । ताजके प्रति भारतीयोंके विशाल लोक-समुदायकी वफादारी एक विशिष्ट तथ्य है और यह ध्यान देने योग्य है कि ब्रिटिश शासनकी छोटी-छोटी बातोंकी आलोचना करनेवाले बहुत-से भारतीय सच्चाईके साथ इस वफादारीका अनुभव करते हैं । अभी हालमें जो संवैधानिक परिवर्तन किये गये हैं। उनसे उस देशके लोगोंको उसके शासनमें अधिक भाग दिया गया है और उससे भारतीयोंको सीधे सरकारके ध्यानमें यह बात लानेका और भी अधिक अवसर मिला है कि साम्राज्य में भारत के स्थानके प्रश्नपर उनके क्या विचार हैं। भारतीयों और उपनिवेशोंमें उपनिवेशोंके प्रश्नपर ही गम्भीर मतभेद हैं और यही एक ऐसा प्रश्न हैं जिसपर भारतमें राजद्रोहको भड़कानेवाले आन्दोलनकारी और नरम विचारके भारतीयोंके पूर्ण राजभक्त प्रतिनिधि एक ही मत रखते हैं । भारत सरकार यदि उपनिवेशोंके दृष्टिकोण से सहमत बनी रहती है तो वह भारतको निराशाकी उस व्यापक भावनासे मुक्त नहीं रख सकती जो उपनिवेशों द्वारा उसे प्रतिष्ठाका अधिकारी न माननेकी इच्छासे उत्पन्न होती है । उच्च-शिक्षा प्राप्त तथा उच्चवंशीय अनेक भारतीयोंको साम्राज्यके दूसरे भागोंको देखनेकी सहज और सराहनीय इच्छा होती हैं; किन्तु इस समय उनका उपनिवेशोंमें जानेका मार्ग अवरुद्ध है । महामहिम सम्राटको सरकारको पूरी आशा है कि ऐसी कार्रवाई जो निम्न श्रेणीके भारतीयोंका इतनी बड़ी संख्या में प्रवेश रोकनेके लिए आवश्यक है कि उससे उपनिवेशोंकी आबादी ही बदल जाये और गम्भीर स्थानीय कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जायें, उन आगन्तुकोंपर लागू न की जायेगी जिनका सामाजिक दर्जा अच्छा है, जो अच्छी स्थितिवाले ऐसे व्यापारी हैं जिनका भारत से बाहर व्यापार है या जो विश्वविद्यालयके उपाधि प्राप्त विद्वान हैं ।
<center>{{larger|'''(२) उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयोंका दर्जा'''}}</center>
केवल दक्षिण आफ्रिकामें ही भारतीय निवासियोंकी आबादी कुछ ज्यादा है और वह मुख्यतः नेटाल
सरकार द्वारा जानबूझकर भारतीय गिरमिटिया मजदूरोंके बुलाये जानेके कारण है। गिरमिटिया भारतीयोंका लाया जाना तब आरम्भ हुआ था जब नेटाल शाही उपनिवेश था। किन्तु वह उत्तरदायी सरकार बननेपर<noinclude></noinclude>
logegwzcoufh6uimb5us7k5ylvrv6n1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७७
250
183188
673041
631177
2026-08-22T19:57:05Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673041
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३९}}</noinclude>भी जारी रहा । कैनेडा और आस्ट्रेलियामें भारतीय प्रवासी अपेक्षाकृत कम ही हैं और वे वहाँ अपने व्यापारिक कार्य से आये हैं । किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें पिछली कई शताब्दियोंसे, उष्ण कटिबन्धीय आफ्रिकाके पूर्वी तटपर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके कुछ प्रतिनिधियोंके प्रवेशके अतिरिक्त, भारतीय ज्यादातर सरकारकी उस कार्रवाईके कारण पहुँचे हैं जो उसने नेटालकी यूरोपीय आवादीके एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भागके कहनेसे और उसके लाभकी दृष्टिसे की थी ।
तब जहाँतक भारतीय आबादीके अस्तित्वका सम्बन्ध है, उपनिवेश भारतमें अशान्ति दूर करनेकी
दिशामें बहुत-कुछ कर सकते हैं । इसके लिए वे ऐसी प्रशासनिक नीतिसे बचें जिससे यह प्रकट हो कि वे भारतीयोंको निकाल बाहर करना चाहते हैं या उनको दीन-हीन अवस्थामें पहुँचा देना चाहते हैं । दक्षिण आफ्रिकामें भारतीय मुख्यतः यूरोपीय व्यापारियोंसे होड़ करते हैं • जो प्रायः निम्न वर्गके यूरोपीय विदेशी हैं — और ब्रिटिश कोलम्बिया में उनकी होड़ विदेशोंसे आये गोरे मजदूरोंसे है । इसलिए इस आर्थिक होइसे समय-समयपर संघर्ष उत्पन्न होना स्वाभाविक है । किन्तु नेटालमें नगरपालिका अधि-कारियोंका भारतीय व्यापारियोंसे किया गया व्यवहार कभी-कभी बहुत अनुचित रहा है और अब भी परवाना देनेवाले निकायोंके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपीलके द्वारा अपने व्यापारिक अधिकारके स्वामित्वको बचानेकी गुंजाइश केवल उन व्यक्तियोंको दी गई है जिनको पहलेसे व्यापारिक परवाने मिले हुए हैं। वर्तमान परवानोंको हस्तान्तरित करना या नये परवाने देना पूर्णत: नगरपालिका-अधिकारियोंके हाथोंमें है। नेटालमें कुछ कानून-निर्माणकी और ट्रान्सवालमें कुछ प्रशासनिक कार्रवाईकी योजनाओंसे भारतीयोंमें बहुत डर पैदा हो गया है और यह आशा की जाती है कि जब संघको यह सन्तोष हो जायेगा कि असीमित एशियाई प्रवासके विरुद्ध संरक्षणकी व्यवस्था की जा चुकी है, तब संघके निवासी भारतीयोंके साथ उदारताका व्यवहार करनेकी कृपा करेंगे ।
उदारतापूर्ण व्यवहारको किसी भी पद्धतिमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित मानी जा सकती हैं :
(१) {{blockcenter|ऐसे कानून न बनाये जायें जिनका मन्शा परेशान करनेवाले विनियमोंके द्वारा सम्मानित व्यापारियोंसे आजीविकाके साधन छीने जानेका हो;}}
(२) {{blockcenter|सफाई सम्बन्धी कानून केवल सफाईकी आवश्यकताओं तक ही सीमित रखे जायें और ऐसे विनियम बनाये जाये जो भारतीय अधिवासियोंको परेशान करनेके अप्रत्यक्ष साधनके रूपमें उन कानूनोंका उपयोग करनेपर लगा सकें;}}
(३){{blockcenter|शिक्षा-सम्बन्धी सुविधाएँ दी जायें । निःसन्देह इनके परिणामस्वरूप मिली-जुली प्राथमिक शालाओं में एशियाई और यूरोपीय बच्चोंका साथ-साथ पढ़ना लाजिमी नहीं है;}}
(४) {{blockcenter|यह निश्चय कर लिया जाये कि प्रवासी कानूनोंका उपयोग कानूनी वाक्छलका सहारा लेकर
वैध निवासियोंको निर्वासित करने, या अधिवासी परिवारोंको भंग करने, या अस्थायी आगमन पासों (टेम्पोररी विज़िटिंग परमिटस) द्वारा निवासी भारतीयोंको जिन सम्बन्धियोंकी तत्काल आवश्यकता हो उनका अस्थायी प्रवेश अस्वीकृत करनेके लिए न किया जायेगा । (ऐसी एक घटना हुई है जब बेटेको अपने वापको अन्त्येष्टिमें भाग लेनेके लिए अनुमतिपत्र देनेसे इनकार कर दिया गया था । यह घटना ब्रिटिश कोलम्बियाकी बताई जाती है। ऐसी घटनासे उन लोगोंमें, जो अन्त्येष्टि सम्बन्धी रीतियोंको सर्वाधिक महत्व देते हैं, बहुत ही कटुता पैदा होगी ) ।}}
यह लगभग निश्चित है कि कैनेडा, आस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंडमें भारतीयोंकी कोई बड़ी आबादी कभी
न होगी । इन उपनिवेशोंमें आदिवासियोंकी आबादी बहुत कम है और वह कुछ जगह घट रही है और उनकी आबादी कालान्तर में व्यवहारतः विशुद्ध यूरोपीय हो जायेगी। किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें वतनी लोगोंकी संख्या ही गोरोंसे इतनी अधिक है कि अकुशल श्रम लगभग सदा वतनियोंके हाथोंमें रहेगा । इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ एक छोटा एशियाई तत्व लगभग दो शताब्दीसे मौजूद है। केप कालोनीमें राज-काज<noinclude></noinclude>
arhc3t16qwxx1420vocj1m1dhbfocip
673067
673041
2026-08-22T23:23:25Z
सीमा1
430
673067
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३९}}</noinclude>भी जारी रहा । कैनेडा और आस्ट्रेलियामें भारतीय प्रवासी अपेक्षाकृत कम ही हैं और वे वहाँ अपने व्यापारिक कार्य से आये हैं । किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें पिछली कई शताब्दियोंसे, उष्ण कटिबन्धीय आफ्रिकाके पूर्वी तटपर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके कुछ प्रतिनिधियोंके प्रवेशके अतिरिक्त, भारतीय ज्यादातर सरकारकी उस कार्रवाईके कारण पहुँचे हैं जो उसने नेटालकी यूरोपीय आवादीके एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भागके कहनेसे और उसके लाभकी दृष्टिसे की थी ।
तब जहाँतक भारतीय आबादीके अस्तित्वका सम्बन्ध है, उपनिवेश भारतमें अशान्ति दूर करनेकी
दिशामें बहुत-कुछ कर सकते हैं । इसके लिए वे ऐसी प्रशासनिक नीतिसे बचें जिससे यह प्रकट हो कि वे भारतीयोंको निकाल बाहर करना चाहते हैं या उनको दीन-हीन अवस्थामें पहुँचा देना चाहते हैं । दक्षिण आफ्रिकामें भारतीय मुख्यतः यूरोपीय व्यापारियोंसे होड़ करते हैं--जो प्रायः निम्न वर्गके यूरोपीय विदेशी हैं--और ब्रिटिश कोलम्बिया में उनकी होड़ विदेशोंसे आये गोरे मजदूरोंसे है । इसलिए इस आर्थिक होइसे समय-समयपर संघर्ष उत्पन्न होना स्वाभाविक है । किन्तु नेटालमें नगरपालिका अधि-कारियोंका भारतीय व्यापारियोंसे किया गया व्यवहार कभी-कभी बहुत अनुचित रहा है और अब भी परवाना देनेवाले निकायोंके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपीलके द्वारा अपने व्यापारिक अधिकारके स्वामित्वको बचानेकी गुंजाइश केवल उन व्यक्तियोंको दी गई है जिनको पहलेसे व्यापारिक परवाने मिले हुए हैं। वर्तमान परवानोंको हस्तान्तरित करना या नये परवाने देना पूर्णत: नगरपालिका-अधिकारियोंके हाथोंमें है। नेटालमें कुछ कानून-निर्माणकी और ट्रान्सवालमें कुछ प्रशासनिक कार्रवाईकी योजनाओंसे भारतीयोंमें बहुत डर पैदा हो गया है और यह आशा की जाती है कि जब संघको यह सन्तोष हो जायेगा कि असीमित एशियाई प्रवासके विरुद्ध संरक्षणकी व्यवस्था की जा चुकी है, तब संघके निवासी भारतीयोंके साथ उदारताका व्यवहार करनेकी कृपा करेंगे ।
उदारतापूर्ण व्यवहारको किसी भी पद्धतिमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित मानी जा सकती हैं :
(१) {{blockcenter|ऐसे कानून न बनाये जायें जिनका मन्शा परेशान करनेवाले विनियमोंके द्वारा सम्मानित व्यापारियोंसे आजीविकाके साधन छीने जानेका हो;}}
(२) {{blockcenter|सफाई सम्बन्धी कानून केवल सफाईकी आवश्यकताओं तक ही सीमित रखे जायें और ऐसे विनियम बनाये जाये जो भारतीय अधिवासियोंको परेशान करनेके अप्रत्यक्ष साधनके रूपमें उन कानूनोंका उपयोग करनेपर लगा सकें;}}
(३){{blockcenter|शिक्षा-सम्बन्धी सुविधाएँ दी जायें । निःसन्देह इनके परिणामस्वरूप मिली-जुली प्राथमिक शालाओं में एशियाई और यूरोपीय बच्चोंका साथ-साथ पढ़ना लाजिमी नहीं है;}}
(४) {{blockcenter|यह निश्चय कर लिया जाये कि प्रवासी कानूनोंका उपयोग कानूनी वाक्छलका सहारा लेकर
वैध निवासियोंको निर्वासित करने, या अधिवासी परिवारोंको भंग करने, या अस्थायी आगमन पासों (टेम्पोररी विज़िटिंग परमिटस) द्वारा निवासी भारतीयोंको जिन सम्बन्धियोंकी तत्काल आवश्यकता हो उनका अस्थायी प्रवेश अस्वीकृत करनेके लिए न किया जायेगा । (ऐसी एक घटना हुई है जब बेटेको अपने वापको अन्त्येष्टिमें भाग लेनेके लिए अनुमतिपत्र देनेसे इनकार कर दिया गया था । यह घटना ब्रिटिश कोलम्बियाकी बताई जाती है। ऐसी घटनासे उन लोगोंमें, जो अन्त्येष्टि सम्बन्धी रीतियोंको सर्वाधिक महत्व देते हैं, बहुत ही कटुता पैदा होगी ) ।}}
यह लगभग निश्चित है कि कैनेडा, आस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंडमें भारतीयोंकी कोई बड़ी आबादी कभी
न होगी । इन उपनिवेशोंमें आदिवासियोंकी आबादी बहुत कम है और वह कुछ जगह घट रही है और उनकी आबादी कालान्तर में व्यवहारतः विशुद्ध यूरोपीय हो जायेगी। किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें वतनी लोगोंकी संख्या ही गोरोंसे इतनी अधिक है कि अकुशल श्रम लगभग सदा वतनियोंके हाथोंमें रहेगा । इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ एक छोटा एशियाई तत्व लगभग दो शताब्दीसे मौजूद है। केप कालोनीमें राज-काज<noinclude></noinclude>
rhgcm2wrrais9qrmw42d6ja03n2695o
673068
673067
2026-08-22T23:32:41Z
सीमा1
430
673068
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३९}}</noinclude>भी जारी रहा । कैनेडा और आस्ट्रेलियामें भारतीय प्रवासी अपेक्षाकृत कम ही हैं और वे वहाँ अपने व्यापारिक कार्य से आये हैं । किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें पिछली कई शताब्दियोंसे, उष्ण कटिबन्धीय आफ्रिकाके पूर्वी तटपर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके कुछ प्रतिनिधियोंके प्रवेशके अतिरिक्त, भारतीय ज्यादातर सरकारकी उस कार्रवाईके कारण पहुँचे हैं जो उसने नेटालकी यूरोपीय आवादीके एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भागके कहनेसे और उसके लाभकी दृष्टिसे की थी ।
तब जहाँतक भारतीय आबादीके अस्तित्वका सम्बन्ध है, उपनिवेश भारतमें अशान्ति दूर करनेकी
दिशामें बहुत-कुछ कर सकते हैं । इसके लिए वे ऐसी प्रशासनिक नीतिसे बचें जिससे यह प्रकट हो कि वे भारतीयोंको निकाल बाहर करना चाहते हैं या उनको दीन-हीन अवस्थामें पहुँचा देना चाहते हैं । दक्षिण आफ्रिकामें भारतीय मुख्यतः यूरोपीय व्यापारियोंसे होड़ करते हैं--जो प्रायः निम्न वर्गके यूरोपीय विदेशी हैं--और ब्रिटिश कोलम्बिया में उनकी होड़ विदेशोंसे आये गोरे मजदूरोंसे है । इसलिए इस आर्थिक होइसे समय-समयपर संघर्ष उत्पन्न होना स्वाभाविक है । किन्तु नेटालमें नगरपालिका अधि-कारियोंका भारतीय व्यापारियोंसे किया गया व्यवहार कभी-कभी बहुत अनुचित रहा है और अब भी परवाना देनेवाले निकायोंके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपीलके द्वारा अपने व्यापारिक अधिकारके स्वामित्वको बचानेकी गुंजाइश केवल उन व्यक्तियोंको दी गई है जिनको पहलेसे व्यापारिक परवाने मिले हुए हैं। वर्तमान परवानोंको हस्तान्तरित करना या नये परवाने देना पूर्णत: नगरपालिका-अधिकारियोंके हाथोंमें है। नेटालमें कुछ कानून-निर्माणकी और ट्रान्सवालमें कुछ प्रशासनिक कार्रवाईकी योजनाओंसे भारतीयोंमें बहुत डर पैदा हो गया है और यह आशा की जाती है कि जब संघको यह सन्तोष हो जायेगा कि असीमित एशियाई प्रवासके विरुद्ध संरक्षणकी व्यवस्था की जा चुकी है, तब संघके निवासी भारतीयोंके साथ उदारताका व्यवहार करनेकी कृपा करेंगे ।
उदारतापूर्ण व्यवहारकी किसी भी पद्धतिमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित मानी जा सकती हैं :
(१) {{blockcenter|ऐसे कानून न बनाये जायें जिनका मन्शा परेशान करनेवाले विनियमोंके द्वारा सम्मानित व्यापारियोंसे आजीविकाके साधन छीने जानेका हो;}}
(२) {{blockcenter|सफाई सम्बन्धी कानून केवल सफाईकी आवश्यकताओं तक ही सीमित रखे जायें और ऐसे विनियम बनाये जाये जो भारतीय अधिवासियोंको परेशान करनेके अप्रत्यक्ष साधनके रूपमें उन कानूनोंका उपयोग करनेपर लगा सकें;}}
(३){{blockcenter|शिक्षा-सम्बन्धी सुविधाएँ दी जायें । निःसन्देह इनके परिणामस्वरूप मिली-जुली प्राथमिक शालाओं में एशियाई और यूरोपीय बच्चोंका साथ-साथ पढ़ना लाजिमी नहीं है;}}
(४) {{blockcenter|यह निश्चय कर लिया जाये कि प्रवासी कानूनोंका उपयोग कानूनी वाक्छलका सहारा लेकर वैध निवासियोंको निर्वासित करने, या अधिवासी परिवारोंको भंग करने, या अस्थायी आगमन पासों (टेम्पोररी विज़िटिंग परमिटस) द्वारा निवासी भारतीयोंको जिन सम्बन्धियोंकी तत्काल आवश्यकता हो उनका अस्थायी प्रवेश अस्वीकृत करनेके लिए न किया जायेगा । (ऐसी एक घटना हुई है जब बेटेको अपने बापकी अन्त्येष्टिमें भाग लेनेके लिए अनुमतिपत्र देनेसे इनकार कर दिया गया था । यह घटना ब्रिटिश कोलम्बियाकी बताई जाती है। ऐसी घटनासे उन लोगोंमें, जो अन्त्येष्टि सम्बन्धी रीतियोंको सर्वाधिक महत्व देते हैं, बहुत ही कटुता पैदा होगी ) ।}}
यह लगभग निश्चित है कि कैनेडा, आस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंडमें भारतीयोंकी कोई बड़ी आबादी कभी
न होगी । इन उपनिवेशोंमें आदिवासियोंकी आबादी बहुत कम है और वह कुछ जगह घट रही है और उनकी आबादी कालान्तर में व्यवहारतः विशुद्ध यूरोपीय हो जायेगी। किन्तु दक्षिण आफ्रिकामें वतनी लोगोंकी संख्या ही गोरोंसे इतनी अधिक है कि अकुशल श्रम लगभग सदा वतनियोंके हाथोंमें रहेगा । इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ एक छोटा एशियाई तत्व लगभग दो शताब्दीसे मौजूद है। केप कालोनीमें राज-काज<noinclude></noinclude>
0o53ixsg6dnoprrju773kares6331qz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७८
250
183189
673042
631178
2026-08-22T20:00:26Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673042
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>किसी तरह के संघर्ष के बिना चलाना और डच ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा लाये गये मलायी लोगोंसे कामलेना सम्भव हो सका है। ये मुसलमान हैं और इनकी सामाजिक आदतें भिन्न हैं। वे मछुओं, ड्राइवरों और छोटे किसानोंके रूपमें अच्छे माने जा चुके हैं । इस विचारका समर्थन नहीं किया जा सकता कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल गोरे और काले लोग ही रह सकते हैं और उसमें गेहुँआ रंगकी प्रजातियोंके लिए कोई स्थान नहीं है; क्योंकि यद्यपि एक अपेक्षाकृत नये बसे हुए क्षेत्रके बारेमें, जैसे दोनों भूतपूर्व गणतन्त्रोंके प्रदेशों के बारेमें, यह बात कही जा सकती है, फिर भी केप कालोनीमें आबादीका एक बड़ा तत्व जिसमें मलायी ही नहीं बल्कि रंगदार लोग भी हैं, सभ्यता और स्वभावकी दृष्टिसे आफ्रिकी वतनियों और यूरोपीयोंके बीच हैं । इस मध्यस्थ तत्वके अस्तित्व से जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है, उनको कम आँकनेका कोई इरादा नहीं है, फिर वह मध्यस्थ तत्व चाहे मिश्रित रक्त हो या विशुद्ध एशियाई । किन्तु यह विश्वास किया जाता है कि यदि प्रशासन न्याययुक्त हो तो ये कठिनाइयों खतरनाक रूप धारण नहीं कर पायेंगी ।
<center>{{larger|'''(३) उपनिवेशीय समुद्रोंमें चलनेवाले जहाजोंमें भारतीयोंकी नियुक्ति'''}}</center>
पहले दिये हुए संक्षिप्त इतिहासमें इस मुद्देके सम्बन्धमें जो कुछ कहा जा चुका है उसके अतिरिक्त
कुछ कहना अनावश्यक है । वहाँ यह बता दिया गया है कि १९१० के न्यूजीलैंड जहाजरानी विधेयकसे भारतीय जहाजियोंपर कौन-कौनसी गम्भीर निर्योग्यताएँ लग जायेंगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ९-९-१९११, १६-९-१९११, २३-९-१९११ और ३०-९-१९११
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १२'''}}</center>
<center>{{larger|'''प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) पर संघीय मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}</center>
{{c|'''क'''<ref>गवर्नर जनरल लॉर्ड ग्लैडस्टन और जनरल स्मट्सके बीच जो बातचीत हुई थी, उसके आधार-
पर गवर्नर जनरलके निजी सचिवने रिपोर्ट तैयार की थी। इसे २८ अक्तूबर १९११ को ग्लैडस्टनने
उपनिवेश कार्यालयको भेजा था ।</ref>}}
आज प्रात:काल जनरल स्मटसने बातचीत के दौरान प्रवासी विधेयकके मसविदेका उल्लेख किया ।
मैंने उनसे पूछा कि धारा २८ के अन्तर्गत इमला परीक्षाके आधारपर जो सीमित संख्या में शिक्षित
भारतीय प्रविष्ट होंगे उनमें से कोई यदि फ्री स्टेटमें प्रविष्ट होना चाहेगा, तो उसकी स्थिति क्या होगी । मन्त्री महोदयने कहा कि फ्री स्टेटमें या किसी अन्य प्रान्त में उसके प्रवेशपर कोई प्रतिबन्ध न होगा और उसपर जो एकमात्र विशेष निर्योग्यताएँ लागू की जायेगी वे, जैसा कि धारा २८ की उपधारा २ में बताया गया है, फ्री स्टेटमें अचल सम्पत्ति खरीदने या व्यापार या खेती करनेके निषेधको होंगी । जनरल स्मट्सके कथनानुसार उसको डॉक्टरके रूपमें अपना कारवार जमाने में कोई रुकावट न होगी । हाँ, उसके धन्धेको लाभप्रद बनानेकी दृष्टिसे पर्याप्त संख्या में उसके देशवासी वहाँ न हों, यह एक बाधाहो सकती है। फ्री स्टेटकी कानूनकी पुस्तकके अध्याय ३३ की शेष धाराएँ रद नहीं की जा रही हैं,किन्तु इमला - परीक्षाके अन्तर्गत प्रविष्ट होनेवाले भारतीयोंकी हद तक उसके अनुच्छेद ७ और धारा ८ के अतिरिक्त अन्य सारे अनुच्छेद व्यवहारतः अमल बाहर होंगे, क्योंकि उनका दर्जा और उनके अधिकार
__________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
96lyuasgyzj09sjpwfw1l9obffd17vr
673069
673042
2026-08-22T23:40:46Z
सीमा1
430
673069
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>किसी तरह के संघर्ष के बिना चलाना और डच ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा लाये गये मलायी लोगोंसे कामलेना सम्भव हो सका है। ये मुसलमान हैं और इनकी सामाजिक आदतें भिन्न हैं। वे मछुओं, ड्राइवरों और छोटे किसानोंके रूपमें अच्छे माने जा चुके हैं । इस विचारका समर्थन नहीं किया जा सकता कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल गोरे और काले लोग ही रह सकते हैं और उसमें गेहुँआ रंगकी प्रजातियोंके लिए कोई स्थान नहीं है; क्योंकि यद्यपि एक अपेक्षाकृत नये बसे हुए क्षेत्रके बारेमें, जैसे दोनों भूतपूर्व गणतन्त्रोंके प्रदेशों के बारेमें, यह बात कही जा सकती है, फिर भी केप कालोनीमें आबादीका एक बड़ा तत्व जिसमें मलायी ही नहीं बल्कि रंगदार लोग भी हैं, सभ्यता और स्वभावकी दृष्टिसे आफ्रिकी वतनियों और यूरोपीयोंके बीच हैं । इस मध्यस्थ तत्वके अस्तित्व से जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है, उनको कम आँकनेका कोई इरादा नहीं है, फिर वह मध्यस्थ तत्व चाहे मिश्रित रक्त हो या विशुद्ध एशियाई । किन्तु यह विश्वास किया जाता है कि यदि प्रशासन न्याययुक्त हो तो ये कठिनाइयों खतरनाक रूप धारण नहीं कर पायेंगी ।
<center>{{larger|'''(३) उपनिवेशीय समुद्रोंमें चलनेवाले जहाजोंमें भारतीयोंकी नियुक्ति'''}}</center>
पहले दिये हुए संक्षिप्त इतिहासमें इस मुद्देके सम्बन्धमें जो कुछ कहा जा चुका है उसके अतिरिक्त
कुछ कहना अनावश्यक है । वहाँ यह बता दिया गया है कि १९१० के न्यूजीलैंड जहाजरानी विधेयकसे भारतीय जहाजियोंपर कौन-कौनसी गम्भीर निर्योग्यताएँ लग जायेंगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ९-९-१९११, १६-९-१९११, २३-९-१९११ और ३०-९-१९११
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १२'''}}</center>
<center>{{larger|'''प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) पर संघीय मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}</center>
{{c|'''क'''<ref>गवर्नर जनरल लॉर्ड ग्लैडस्टन और जनरल स्मट्सके बीच जो बातचीत हुई थी, उसके आधार-
पर गवर्नर जनरलके निजी सचिवने रिपोर्ट तैयार की थी। इसे २८ अक्तूबर १९११ को ग्लैडस्टनने
उपनिवेश कार्यालयको भेजा था ।</ref>}}
आज प्रात:काल जनरल स्मट्सने बातचीत के दौरान प्रवासी विधेयकके मसविदेका उल्लेख किया ।
मैंने उनसे पूछा कि धारा २८ के अन्तर्गत इमला-परीक्षाके आधारपर जो सीमित संख्या में शिक्षित
भारतीय प्रविष्ट होंगे उनमें से कोई यदि फ्री स्टेटमें प्रविष्ट होना चाहेगा, तो उसकी स्थिति क्या होगी । मन्त्री महोदयने कहा कि फ्री स्टेटमें या किसी अन्य प्रान्त में उसके प्रवेशपर कोई प्रतिबन्ध न होगा और उसपर जो एकमात्र विशेष निर्योग्यताएँ लागू की जायेगी वे, जैसा कि धारा २८ की उपधारा २ में बताया गया है, फ्री स्टेटमें अचल सम्पत्ति खरीदने या व्यापार या खेती करनेके निषेधकी होंगी । जनरल स्मट्सके कथनानुसार उसको डॉक्टरके रूपमें अपना कारवार जमाने में कोई रुकावट न होगी । हाँ, उसके धन्धेको लाभप्रद बनानेकी दृष्टिसे पर्याप्त संख्या में उसके देशवासी वहाँ न हों, यह एक बाधाहो सकती है। फ्री स्टेटकी कानूनकी पुस्तकके अध्याय ३३ की शेष धाराएँ रद नहीं की जा रही हैं,किन्तु इमला-परीक्षाके अन्तर्गत प्रविष्ट होनेवाले भारतीयोंकी हद तक उसके अनुच्छेद ७ और धारा ८ के अतिरिक्त अन्य सारे अनुच्छेद व्यवहारतः अमल बाहर होंगे, क्योंकि उनका दर्जा और उनके अधिकार
__________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
elvhm3yjzc037zbxugcqtqlumlb9mda
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६६
250
184109
673005
639978
2026-08-22T18:15:12Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673005
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
स्वतंत्रता छोड़नेको तैयार संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
फैसला करनेकी समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
t8kv31rt4vrz6rphsodl0bds5e0vq8u
673006
673005
2026-08-22T18:16:05Z
सीमा1
430
673006
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
फैसला करनेकी समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
8pgk7fbbd3tj8zrrmufspkcfrz56lfz
673007
673006
2026-08-22T18:17:17Z
सीमा1
430
673007
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
jqh1zwwij6kaa9kb40vh6f3pk9l55j7
673008
673007
2026-08-22T18:17:34Z
सीमा1
430
673008
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
kii5ge2s6woqmwb2xd81c6p4i8o1z34
673015
673008
2026-08-22T18:36:30Z
सीमा1
430
673015
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
50mp0jjqruyiau7da6rr5jr330zj7qw
673016
673015
2026-08-22T18:37:04Z
सीमा1
430
673016
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षको संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है - इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
o8tmnkoym6x2i8vbr6wu5uvvmk7g5iu
673057
673016
2026-08-22T21:47:54Z
सीमा1
430
673057
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं । गत वर्षकी संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया । इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है । २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है---इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं । पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था । इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचार से बच्चों की मृत्यु- संख्या में इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चों की बढ़ी हुई मृत्यु- संख्यापर “ विचार किया जा रहा है", और
हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयों की मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत संख्या में वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्त में सम्भवतः गिरमिटियों की संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षों में रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन वृद्धिको बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षकको धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
6hsqrkj6by1d61ujtt568bf75en4ihl
673058
673057
2026-08-22T22:06:31Z
सीमा1
430
673058
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं। गत वर्षकी संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया। इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है। २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है---इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं। पेचिश, क्षय-रोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था। इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचारसे बच्चोंकी मृत्यु-संख्यामें इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चोंकी बढ़ी हुई मृत्यु-संख्यापर “विचार किया जा रहा है", और हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे ।
संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयोंकी मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत-संख्यामें वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्तमें सम्भवतः गिरमिटियोंकी संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षोंमें रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन-वृद्धिकी बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी स्वतंत्रता छोड़नेको तैयार हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षककी धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई फैसला नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय करनेकी कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ
____________________________
समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और
'''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude>
ijkpjg8y7k03c1yzm3nld15ncbbfqy3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६७
250
184110
673009
639979
2026-08-22T18:20:56Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673009
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>परिशिष्ट
५२९
रहते हैं; उनको व्यवस्थापकों और सरदारोंकी नाराजगी सहनी पड़ती है। बुरे बरतावकी जहाँ-जहाँ शिकायत होती है वहाँ-वहाँ उसके मूलमें दिन-भर के कामके एक निश्चित परिमाणको प्रणाली ही रहा करती है।
सहायक संरक्षकने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिनको पात्र समझा गया ऐसी अनेक स्त्रियोंको
१८९५ के कानून १७ के अन्तर्गत लिये जानेवाले ३ पौंडी शुल्कसे मुक्त कर दिया गया है; और उनको प्राप्त सूचना के अनुसार स्त्रियोंको शुल्क अदायगीके सम्बन्धमें सामान्यतया बेजा तौरपर दबाया भी नहीं जाता । संरक्षकका यह कथन भी है कि मजिस्ट्रेटने ४८५ स्त्रियों को शुल्क अदायगीसे छूट देनेवाले प्रमाणपत्र बाँट दिये हैं । यह बात साफ तौरपर समझ ली जानी चाहिए कि इन आँकड़ोंसे चाहे जो जाहिर होता हो, स्त्रियोंसे यह शुल्क कदापि तलब नहीं किया जाना चाहिए। किसी देशके निर्माण और विकासके लिए अत्यधिक परिश्रम करनेवाले पुरुषोंको उसमें स्वतन्त्र व्यक्तियोंकी तरह रहने-बसने की अनुमति प्राप्त करनेके लिए कर चुकाना पड़े - यही काफी खराब बात है; परन्तु १३ वर्षसे अधिक उम्रकी औरतों और लड़कियोंसे इतना अधिक शुल्क वसूल किया जाना तो अंधेर ही है । हमें ऐसे अनेक मामलोंका पता है जिनमें मजिस्टेटोंने भारतीय स्त्रियोंको शुल्क अदायगीसे छुटकारा दिलानेवाले प्रमाणपत्र देनेसे इनकार कर दिया है। इस तरह की बातको मजिस्ट्रेटकी दयापर छोड़ देनेकी क्या जरूरत है ? वेरुलममें मजिस्ट्रेट उन सब स्त्रियोंको, जो छुटकारा प्रमाणपत्र माँगती हैं, ऐसा प्रमाणपत्र दे दिया करता है और वह इस प्रकार अपने विवेकाधिकारका
क्षेत्र संकुचित न रखनेकी बुद्धिमत्ता प्रकट करता है; परन्तु स्टॅगर में मजिस्ट्रेटने अपने जिलेकी किसी निर्धन स्त्रीको शायद ही ऐसा छुटकारा देनेकी कृपा दिखलाई हो ।
इस वर्ष भारतसे एक भी नया गिरमिटिया नहीं भेजा गया; इसके लिए हम भारत सरकारके कृतज्ञ
हैं । हमारा विश्वास है कि भारत सरकारका यह काम यहाँ बसे हुए भारतीयोंके लिए लाभकारी सिद्ध होगा ।'नेटाल मर्क्युरी' का खयाल है कि भारतीय प्रवासियोंका यहाँ आना बन्द हो जानेके फलस्वरूप भारतीय आवादीकी अपेक्षा यूरोपीय आबादी अधिक अनुपात से बढ़ेगी । इसके दो कारण हैं: एक तो यह कि यूरोपीय प्रवासियोंके लिए अब द्वार खुला रहेगा, और दूसरे, वह भारतीय प्रवासियोंके लिए बन्द रहेगा । ऐसा होगा या नहीं, सो देखना बाकी है, परन्तु कमसेकम अब यहाँ बस गये भारतीयोंको सतानेका कोई बहाना नहीं रहेगा। वे यहाँ निश्चित रूपसे बस गये हैं, इसलिए उनका भला या बुरा भविष्य में बहुत अंश तक यूरोपीय समाजके ऊपर निर्भर करता है । यदि दक्षिण आफ्रिकी ब्रिटिश साम्राज्यकी परम्पराओंको निभाते रहेंगे, तो भयका कोई भी कारण न रहेगा और इस देशमें सभी जातियाँ सुखचैन से रहेंगी। रही हमारी बात, सो हम तो तबतक दम न लेंगे जबतक गिरमिटिया प्रथा समाप्त नहीं हो जाती । हम तो सबकी स्वतन्त्रतामें
विश्वास करते हैं। हम दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजको स्वतन्त्र और सुखी देखना चाहते हैं । और यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक हजारों पुरुष, स्त्रियों और बच्चे उस परिस्थितिमें रहते रहेंगे जिसके अच्छे-अच्छे रूपको भी आधी गुलामी ही कहा जा सकता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:इंडियन ओपिनियन, ११-११-१९११<noinclude>११-३४</noinclude>
79ob8dj2nah5z3q5ybrh3md2eaqww2o
673010
673009
2026-08-22T18:22:38Z
सीमा1
430
673010
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२९}}</noinclude>रहते हैं; उनको व्यवस्थापकों और सरदारोंकी नाराजगी सहनी पड़ती है। बुरे बरतावकी जहाँ-जहाँ शिकायत होती है वहाँ-वहाँ उसके मूलमें दिन-भर के कामके एक निश्चित परिमाणको प्रणाली ही रहा करती है।
सहायक संरक्षकने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिनको पात्र समझा गया ऐसी अनेक स्त्रियोंको
१८९५ के कानून १७ के अन्तर्गत लिये जानेवाले ३ पौंडी शुल्कसे मुक्त कर दिया गया है; और उनको प्राप्त सूचना के अनुसार स्त्रियोंको शुल्क अदायगीके सम्बन्धमें सामान्यतया बेजा तौरपर दबाया भी नहीं जाता । संरक्षकका यह कथन भी है कि मजिस्ट्रेटने ४८५ स्त्रियों को शुल्क अदायगीसे छूट देनेवाले प्रमाणपत्र बाँट दिये हैं । यह बात साफ तौरपर समझ ली जानी चाहिए कि इन आँकड़ोंसे चाहे जो जाहिर होता हो, स्त्रियोंसे यह शुल्क कदापि तलब नहीं किया जाना चाहिए। किसी देशके निर्माण और विकासके लिए अत्यधिक परिश्रम करनेवाले पुरुषोंको उसमें स्वतन्त्र व्यक्तियोंकी तरह रहने-बसने की अनुमति प्राप्त करनेके लिए कर चुकाना पड़े - यही काफी खराब बात है; परन्तु १३ वर्षसे अधिक उम्रकी औरतों और लड़कियोंसे इतना अधिक शुल्क वसूल किया जाना तो अंधेर ही है । हमें ऐसे अनेक मामलोंका पता है जिनमें मजिस्टेटोंने भारतीय स्त्रियोंको शुल्क अदायगीसे छुटकारा दिलानेवाले प्रमाणपत्र देनेसे इनकार कर दिया है। इस तरह की बातको मजिस्ट्रेटकी दयापर छोड़ देनेकी क्या जरूरत है ? वेरुलममें मजिस्ट्रेट उन सब स्त्रियोंको, जो छुटकारा प्रमाणपत्र माँगती हैं, ऐसा प्रमाणपत्र दे दिया करता है और वह इस प्रकार अपने विवेकाधिकारका
क्षेत्र संकुचित न रखनेकी बुद्धिमत्ता प्रकट करता है; परन्तु स्टॅगर में मजिस्ट्रेटने अपने जिलेकी किसी निर्धन स्त्रीको शायद ही ऐसा छुटकारा देनेकी कृपा दिखलाई हो ।
इस वर्ष भारतसे एक भी नया गिरमिटिया नहीं भेजा गया; इसके लिए हम भारत सरकारके कृतज्ञ
हैं । हमारा विश्वास है कि भारत सरकारका यह काम यहाँ बसे हुए भारतीयोंके लिए लाभकारी सिद्ध होगा ।'नेटाल मर्क्युरी' का खयाल है कि भारतीय प्रवासियोंका यहाँ आना बन्द हो जानेके फलस्वरूप भारतीय आवादीकी अपेक्षा यूरोपीय आबादी अधिक अनुपात से बढ़ेगी । इसके दो कारण हैं: एक तो यह कि यूरोपीय प्रवासियोंके लिए अब द्वार खुला रहेगा, और दूसरे, वह भारतीय प्रवासियोंके लिए बन्द रहेगा । ऐसा होगा या नहीं, सो देखना बाकी है, परन्तु कमसेकम अब यहाँ बस गये भारतीयोंको सतानेका कोई बहाना नहीं रहेगा। वे यहाँ निश्चित रूपसे बस गये हैं, इसलिए उनका भला या बुरा भविष्य में बहुत अंश तक यूरोपीय समाजके ऊपर निर्भर करता है । यदि दक्षिण आफ्रिकी ब्रिटिश साम्राज्यकी परम्पराओंको निभाते रहेंगे, तो भयका कोई भी कारण न रहेगा और इस देशमें सभी जातियाँ सुखचैन से रहेंगी। रही हमारी बात, सो हम तो तबतक दम न लेंगे जबतक गिरमिटिया प्रथा समाप्त नहीं हो जाती । हम तो सबकी स्वतन्त्रतामें
विश्वास करते हैं। हम दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजको स्वतन्त्र और सुखी देखना चाहते हैं । और यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक हजारों पुरुष, स्त्रियों और बच्चे उस परिस्थितिमें रहते रहेंगे जिसके अच्छे-अच्छे रूपको भी आधी गुलामी ही कहा जा सकता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:इंडियन ओपिनियन, ११-११-१९११<noinclude>११-३४</noinclude>
1l9w2nwud7m9us7qdrljm318pnpudbf
673011
673010
2026-08-22T18:22:55Z
सीमा1
430
673011
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२९}}</noinclude>रहते हैं; उनको व्यवस्थापकों और सरदारोंकी नाराजगी सहनी पड़ती है। बुरे बरतावकी जहाँ-जहाँ शिकायत होती है वहाँ-वहाँ उसके मूलमें दिन-भर के कामके एक निश्चित परिमाणको प्रणाली ही रहा करती है।
सहायक संरक्षकने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिनको पात्र समझा गया ऐसी अनेक स्त्रियोंको
१८९५ के कानून १७ के अन्तर्गत लिये जानेवाले ३ पौंडी शुल्कसे मुक्त कर दिया गया है; और उनको प्राप्त सूचना के अनुसार स्त्रियोंको शुल्क अदायगीके सम्बन्धमें सामान्यतया बेजा तौरपर दबाया भी नहीं जाता । संरक्षकका यह कथन भी है कि मजिस्ट्रेटने ४८५ स्त्रियों को शुल्क अदायगीसे छूट देनेवाले प्रमाणपत्र बाँट दिये हैं । यह बात साफ तौरपर समझ ली जानी चाहिए कि इन आँकड़ोंसे चाहे जो जाहिर होता हो, स्त्रियोंसे यह शुल्क कदापि तलब नहीं किया जाना चाहिए। किसी देशके निर्माण और विकासके लिए अत्यधिक परिश्रम करनेवाले पुरुषोंको उसमें स्वतन्त्र व्यक्तियोंकी तरह रहने-बसने की अनुमति प्राप्त करनेके लिए कर चुकाना पड़े - यही काफी खराब बात है; परन्तु १३ वर्षसे अधिक उम्रकी औरतों और लड़कियोंसे इतना अधिक शुल्क वसूल किया जाना तो अंधेर ही है । हमें ऐसे अनेक मामलोंका पता है जिनमें मजिस्टेटोंने भारतीय स्त्रियोंको शुल्क अदायगीसे छुटकारा दिलानेवाले प्रमाणपत्र देनेसे इनकार कर दिया है। इस तरह की बातको मजिस्ट्रेटकी दयापर छोड़ देनेकी क्या जरूरत है ? वेरुलममें मजिस्ट्रेट उन सब स्त्रियोंको, जो छुटकारा प्रमाणपत्र माँगती हैं, ऐसा प्रमाणपत्र दे दिया करता है और वह इस प्रकार अपने विवेकाधिकारका
क्षेत्र संकुचित न रखनेकी बुद्धिमत्ता प्रकट करता है; परन्तु स्टॅगर में मजिस्ट्रेटने अपने जिलेकी किसी निर्धन स्त्रीको शायद ही ऐसा छुटकारा देनेकी कृपा दिखलाई हो ।
इस वर्ष भारतसे एक भी नया गिरमिटिया नहीं भेजा गया; इसके लिए हम भारत सरकारके कृतज्ञ
हैं । हमारा विश्वास है कि भारत सरकारका यह काम यहाँ बसे हुए भारतीयोंके लिए लाभकारी सिद्ध होगा ।'नेटाल मर्क्युरी' का खयाल है कि भारतीय प्रवासियोंका यहाँ आना बन्द हो जानेके फलस्वरूप भारतीय आवादीकी अपेक्षा यूरोपीय आबादी अधिक अनुपात से बढ़ेगी । इसके दो कारण हैं: एक तो यह कि यूरोपीय प्रवासियोंके लिए अब द्वार खुला रहेगा, और दूसरे, वह भारतीय प्रवासियोंके लिए बन्द रहेगा । ऐसा होगा या नहीं, सो देखना बाकी है, परन्तु कमसेकम अब यहाँ बस गये भारतीयोंको सतानेका कोई बहाना नहीं रहेगा। वे यहाँ निश्चित रूपसे बस गये हैं, इसलिए उनका भला या बुरा भविष्य में बहुत अंश तक यूरोपीय समाजके ऊपर निर्भर करता है । यदि दक्षिण आफ्रिकी ब्रिटिश साम्राज्यकी परम्पराओंको निभाते रहेंगे, तो भयका कोई भी कारण न रहेगा और इस देशमें सभी जातियाँ सुखचैन से रहेंगी। रही हमारी बात, सो हम तो तबतक दम न लेंगे जबतक गिरमिटिया प्रथा समाप्त नहीं हो जाती । हम तो सबकी स्वतन्त्रतामें
विश्वास करते हैं। हम दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजको स्वतन्त्र और सुखी देखना चाहते हैं । और यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक हजारों पुरुष, स्त्रियों और बच्चे उस परिस्थितिमें रहते रहेंगे जिसके अच्छे-अच्छे रूपको भी आधी गुलामी ही कहा जा सकता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:इंडियन ओपिनियन, ११-११-१९११<noinclude>
११-३४</noinclude>
6j5tnx67kdctnbtso692plof2wply7t
673059
673011
2026-08-22T22:16:41Z
सीमा1
430
673059
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२९}}</noinclude>रहते हैं; उनको व्यवस्थापकों और सरदारोंकी नाराजगी सहनी पड़ती है। बुरे बरतावकी जहाँ-जहाँ शिकायत होती है वहाँ-वहाँ उसके मूलमें दिन-भर के कामके एक निश्चित परिमाणकी प्रणाली ही रहा करती है।
सहायक संरक्षकने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिनको पात्र समझा गया ऐसी अनेक स्त्रियोंको
१८९५ के कानून १७ के अन्तर्गत लिये जानेवाले ३ पौंडी शुल्कसे मुक्त कर दिया गया है; और उनको प्राप्त सूचना के अनुसार स्त्रियोंको शुल्क अदायगीके सम्बन्धमें सामान्यतया बेजा तौरपर दबाया भी नहीं जाता । संरक्षकका यह कथन भी है कि मजिस्ट्रेटने ४८५ स्त्रियों को शुल्क अदायगीसे छूट देनेवाले प्रमाणपत्र बाँट दिये हैं । यह बात साफ तौरपर समझ ली जानी चाहिए कि इन आँकड़ोंसे चाहे जो जाहिर होता हो, स्त्रियोंसे यह शुल्क कदापि तलब नहीं किया जाना चाहिए। किसी देशके निर्माण और विकासके लिए अत्यधिक परिश्रम करनेवाले पुरुषोंको उसमें स्वतन्त्र व्यक्तियोंकी तरह रहने-बसने की अनुमति प्राप्त करनेके लिए कर चुकाना पड़े--यही काफी खराब बात है; परन्तु १३ वर्षसे अधिक उम्रकी औरतों और लड़कियोंसे इतना अधिक शुल्क वसूल किया जाना तो अंधेर ही है । हमें ऐसे अनेक मामलोंका पता है जिनमें मजिस्टेटोंने भारतीय स्त्रियोंको शुल्क अदायगीसे छुटकारा दिलानेवाले प्रमाणपत्र देनेसे इनकार कर दिया है। इस तरह की बातको मजिस्ट्रेटकी दयापर छोड़ देनेकी क्या जरूरत है ? वेरुलममें मजिस्ट्रेट उन सब स्त्रियोंको, जो छुटकारा प्रमाणपत्र माँगती हैं, ऐसा प्रमाणपत्र दे दिया करता है और वह इस प्रकार अपने विवेकाधिकारका
क्षेत्र संकुचित न रखनेकी बुद्धिमत्ता प्रकट करता है; परन्तु स्टॅगर में मजिस्ट्रेटने अपने जिलेकी किसी निर्धन स्त्रीको शायद ही ऐसा छुटकारा देनेकी कृपा दिखलाई हो ।
इस वर्ष भारतसे एक भी नया गिरमिटिया नहीं भेजा गया; इसके लिए हम भारत-सरकारके कृतज्ञ
हैं । हमारा विश्वास है कि भारत सरकारका यह काम यहाँ बसे हुए भारतीयोंके लिए लाभकारी सिद्ध होगा ।'नेटाल मर्क्युरी' का खयाल है कि भारतीय प्रवासियोंका यहाँ आना बन्द हो जानेके फलस्वरूप भारतीय आबादीकी अपेक्षा यूरोपीय आबादी अधिक अनुपातसे बढ़ेगी । इसके दो कारण हैं: एक तो यह कि यूरोपीय प्रवासियोंके लिए अब द्वार खुला रहेगा, और दूसरे, वह भारतीय प्रवासियोंके लिए बन्द रहेगा । ऐसा होगा या नहीं, सो देखना बाकी है, परन्तु कमसेकम अब यहाँ बस गये भारतीयोंको सतानेका कोई बहाना नहीं रहेगा। वे यहाँ निश्चित रूपसे बस गये हैं, इसलिए उनका भला या बुरा भविष्य में बहुत अंश तक यूरोपीय समाजके ऊपर निर्भर करता है । यदि दक्षिण आफ्रिकी ब्रिटिश साम्राज्यकी परम्पराओंको निभाते रहेंगे, तो भयका कोई भी कारण न रहेगा और इस देशमें सभी जातियाँ सुखचैन से रहेंगी। रही हमारी बात, सो हम तो तबतक दम न लेंगे जबतक गिरमिटिया-प्रथा समाप्त नहीं हो जाती । हम तो सबकी स्वतन्त्रतामें विश्वास करते हैं। हम दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय समाजको स्वतन्त्र और सुखी देखना चाहते हैं । और यह तबतक सम्भव नहीं है जबतक हजारों पुरुष, स्त्रियों और बच्चे उस परिस्थितिमें रहते रहेंगे जिसके अच्छे-अच्छे रूपको भी आधी गुलामी ही कहा जा सकता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ११-११-१९११<noinclude>
११-३४</noinclude>
bfusrswrgfs5xa9ghtj2xy4wgtegftl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६८
250
184111
673013
639980
2026-08-22T18:33:08Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673013
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र''}}</center></noinclude>[ अडयार
नवम्बर १२, १९११ ]
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। । आप लौटे ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
आपका भाई,
जॉन एच० कॉडिज़
[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
8wejtcpxfgj5va6he5uf0e5gia5v0rz
673014
673013
2026-08-22T18:33:39Z
सीमा1
430
673014
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>[ अडयार
नवम्बर १२, १९११ ]
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। । आप लौटे ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
आपका भाई,
जॉन एच० कॉडिज़
[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
hsuj1b8m2csfoe7jxgnyoo0coe2xuzo
673017
673014
2026-08-22T18:39:27Z
सीमा1
430
673017
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>{{larger|'''उपनिवेश कार्यालयको दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समितिका पत्र'''}}}}
थैनेट हाउस<br>२३१-२३२, स्ट्रैंड़, डब्ल्यू॰ सी॰<br>जून १७, १९११}}
:उपनिवेश-उपमन्त्री
:उपनिवेश कार्यालय, एस॰ डब्ल्यू॰
:महोदय,
{{right|[ अडयार<br>नवम्बर १२, १९११]}}
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। । आप लौटे ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
{{rh|आपका भाई,<br>जॉन एच० कॉडिज़}}
[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
8nohytu5hlji40nrn7wmisbbr5pi22i
673018
673017
2026-08-22T18:39:43Z
सीमा1
430
673018
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>{{right|[ अडयार<br>नवम्बर १२, १९११]}}
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। । आप लौटे ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
{{rh|आपका भाई,<br>जॉन एच० कॉडिज़}}
[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
f79p7neykvi7h0emv21sy4xfjqwc53u
673019
673018
2026-08-22T18:40:57Z
सीमा1
430
673019
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>{{right|[ अडयार<br>नवम्बर १२, १९११]}}
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। । आप लौटे ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
{{right|आपका भाई,<br>जॉन एच० कॉडिज़}}
[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
dnr2thw55qwwy8h254ktnwc93xa61jr
673060
673019
2026-08-22T22:24:42Z
सीमा1
430
673060
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम कॉर्डिजका पत्र'''}}</center></noinclude>{{right|[ अडयार<br>नवम्बर १२, १९११]}}
प्रिय श्री गांधी,
न्यासपत्र भेज रहा हूँ । उसमें गवाहों तथा न्यासकर्ताके हस्ताक्षर विधिवत् हो चुके हैं । मैं १६
दिसम्बरको कलकत्तेसे गुजर रहा हूँ। मैंने श्री नटेसनको पत्र लिखकर उनसे पूछा है कि क्या प्राचीन
आर्यावर्तकी भूमिपर मुझे आपसे दुआ-सलाम करनेका अवसर मिल पायेगा । चूँकि हम आपसमें अभिन्न हैं इसलिए आशा है इससे आपको उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी मुझे । यदि मैं अपने मनकी बात आपसे कहूँ तो कहना होगा कि जहाँतक प्रकट सद्गुणोंका सवाल है मुझे आप जैसा कोई व्यक्ति नहीं मिला । मेरी समझमें बालक कृष्ण<ref>अभिप्राय जे० कृष्णमूर्तिसे है ।</ref> आपके समकक्ष हैं। माधुर्यमें तो वे आपसे भी बढ़े- चढ़े हैं, परन्तु मैं तो सयानोंकी बात कर रहा था । आप रहस्यवादी हैं और फिलहाल जिन्हें जानने और जिनसे प्रेम करनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है वे लोग हैं चमत्कारवादी (ऑकल्टिस्ट) जिन्हें चमत्कार दिखाई पड़ते हैं और जिनका उसके बिना काम ही नहीं चलता । प्रिय बन्धु डॉ०. . . .<ref>शब्दावली स्पष्ट नहीं है ।</ref> भी आपकी तरह सच्चे रहस्यवादी हैं । उन्हें चमत्कार (विजन) इत्यादिसे घृणा है । क्या ही अच्छा होता यदि वे भी आपकी तरह विशाल हृदय होते ! अस्तु ! पूर्वं इसके कि आप लौटे और यह पत्र आपके हाथ तक पहुँचे, हम लोगोंकी भेंट कलकत्ते में ही हो जायेगी । यदि ऐसा न हो पाया तो यह मानियेगा कि हम लोग इस पत्रके द्वारा एक-दूसरेसे स्नेह मिलन कर रहे हैं। ईश्वर करे आप बड़ा-दिन प्रिय कैलेनबैकके साथ फीनिक्स में सुखपूर्वक मनायें
{{right|आपका भाई,<br>जॉन एच० कॉडिज़}}
:[ पुनश्च : ]
चि० मणिलाल, रामदास, देवदास, मगनलाल, अन्य लोगों – श्रीमती गांधी एवं सभी स्त्री-बच्चोंको
मेरा स्नेहाभिवादन कहें ।
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५९२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
3e04jafmmilr35uh2uqoemeil9aw3w4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६९
250
184112
673021
639981
2026-08-22T18:59:44Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673021
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{x-larger|परिशिष्ट ११}}
{{larger|साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण}}</noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।
जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।
सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बोचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
ajkxo2jhuhwps12fopxktxzf63k00q8
673022
673021
2026-08-22T19:00:42Z
सीमा1
430
673022
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{x-larger|परिशिष्ट ११}}
{{larger|साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण}}</noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
'''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।
जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।
सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :'''
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बोचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
01493uxojllqc0iur95mn8yiwtog31h
673023
673022
2026-08-22T19:01:21Z
सीमा1
430
673023
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{x-larger|परिशिष्ट ११}}
{{larger|साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण}}</noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
'''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।'''
'''जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।'''
'''सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :'''
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बोचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
t92l99s3li7i6edfyspxel37bxu7tij
673024
673023
2026-08-22T19:07:16Z
सीमा1
430
673024
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|परिशिष्ट ११}}</center>
<center>{{larger|साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण}}</center></noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
'''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।'''
'''जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।'''
'''सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :'''
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बोचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
7hathqyqph32rwmgxvykb6d800qzfjr
673025
673024
2026-08-22T19:10:39Z
सीमा1
430
673025
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ११'''}}</center>
<center>{{larger|'''साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण'''}}</center></noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
'''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।'''
'''जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।'''
'''सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :'''
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बोचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
5rzjwq99bputk3ghk0u62qyk46inygx
673061
673025
2026-08-22T22:33:29Z
सीमा1
430
673061
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ११'''}}</center>
<center>{{larger|'''साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण'''}}</center></noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}}
{{c|'''क'''}}
'''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश-मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान ( शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।'''
'''जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[ इस प्रस्तावके द्वारा ] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।'''
'''सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :'''
. . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बीचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड ] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. . . मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं ।
अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude>
kmqn0f71036v6zov3xhexzx07ob5xae
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७०
250
184113
673026
639982
2026-08-22T19:17:00Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673026
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है । या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने-अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है।
यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राटको सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ । मैं यह
भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं । यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...।
उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और
माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है । आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं,वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थ-व्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही ।
यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है । और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है...।
१८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना
चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा । किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है । फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, मैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है। अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि " इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे<noinclude></noinclude>
jrsbxqbffp1fjkadjqikcsb8oj37qw8
673062
673026
2026-08-22T22:37:45Z
सीमा1
430
673062
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है । या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने-अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है।
यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राट्की सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। मैं यह
भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं। यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...।
. . . उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और
माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है । आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं,वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थ-व्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही ।
यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है । और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है...।
१८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना
चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा । किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है । फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, मैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है। अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि " इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे<noinclude></noinclude>
sjevvdrej1xw90d9fi13rlqiv2k2rqx
673063
673062
2026-08-22T22:48:15Z
सीमा1
430
673063
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है । या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने-अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है।
यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राट्की सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। मैं यह
भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं। यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...।
. . . उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और
माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है । आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं,वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थ-व्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही ।
. . . यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है । और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है...।
१८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में..... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना
चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा । किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है । फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, सैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है। अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।..... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि " इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे<noinclude></noinclude>
e2bv1p7m031ptcge66yk2qrsapx0b4r
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७१
250
184114
673027
639983
2026-08-22T19:21:53Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673027
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३३}}</noinclude>लोगोंका दावा वास्तविक और ठोस है । चाहे हम बौद्धिक विकासको महत्व दें, चाहे धार्मिक मतामत से भिन्न धार्मिक मनोवृत्तिको महत्त्व दें, चाहे हम अदृष्ट वस्तुओं के प्रति अनुपम भक्ति और उनकी समझको, जा भारत में असाधारण रूपसे गहरी है और जो मेरा खयाल है, अपेक्ष कृत कठिनाई और भौतिकता की पूजाके इन दिनों में बहुत-से लोगों को प्रभावित करती है, महत्त्व दें; चाहे हम शुद्ध बौद्धिक शक्तिको महत्त्व दें जिसका, में स्वीकार करता हूँ, कुछ दिशाओं में बहुत फलप्रद प्रयोग नहीं किया जा सकता; किन्तु जो दूसरी दिशाओं में अधिक से अधिक तेज और अच्छा उपकरण सिद्ध होती है – हम चाहे इन सब वस्तुओंको महत्व दें या इनमें से किसी एकको महत्व दें यह तथ्य असन्दिग्ध है कि भारत और भारतीय हमारे सामने एक ऊँचा और वास्तविक दावा प्रस्तुत कर सकते है । भारतको उन गृहीत तथ्योंको मंजूर करना चाहिए जो मैंने अपने इस निवेदनके आरम्भ में बताये ये । उसे यह मंजूर करना चाहिए कि स्वशासित उपनिवेशोंको अपनी नागरिकत के नियम बनानेकी असन्दिग्ध स्वतन्त्रता है और मैं भारत कार्यालय और भारत सरकारकी ओरसे प्रसन्नतापूर्वक कह सकता हूँ कि हम इस मामले में जो स्थिति है उसे भारतके लोगोंको समझानेका सदा पूरा प्रयत्न करेंगे। वर्तमान स्थितियों में स्वशासित उपनिवेशोंमें प्रवेशको जेंसी माँगें हैं उन्हें अतिशयतापूर्ण ही कहा जा सकता है: हम भारतको वैसी माँग प्रस्तुत करनेमें प्रोत्साहन न देंगे और हम उन्हें साम्राज्यकी वास्तविक परिस्थितियाँ समझानेका यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे । यदि ब्रिटिश साम्राज्यके किसी भागमें भारतीयोंकी निर्योग्यता का प्रश्न उठता है तो उसके बारेमें भारतके सभी वर्गों और विचारोंके लोग... एक हो जाते हैं । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतमें जो हमारे शासनक विरुद्ध हैं उनके लिए यह बात एक बड़ा उपयोगी शस्त्र बन जाती है । वे पूछते हैं- यदि साम्राज्यके विभिन्न भागोंमें भारतीय निर्योग्यताओंसे पीड़ित हैं तो ब्रिटेनसे सम्बन्ध बनाये रखनेसे लाभ ही क्या है ? मैं यह भी बता दूँ कि भारतपर स्वशासनका सिद्धान्त लागू करनेकी वर्तमान प्रवृत्तिसे यह मामला और भी उलझ जाता है और कठिन हो जाता है,
क्योंकि यदि किसी उपनिवेशको सरकारकी ओरसे धारासभामें पास किये गये कानून या प्रशासनिक कार्यके विरुद्ध भारतकी व्यवस्थापिका सभा (लेजिस्लेटिव असेम्बली) कोई खास आपत्ति उठाती है, जिसकी सम्भावना सदा ही रहती है, तो मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि मामलेको बिना समझे उसपर नाराज होनेकी अपेक्षा उसे कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए ।...
• दूसरी ओर, जो लोग वहाँ बस चुके हैं उनको संरक्षण देनेके बारेमे मैं आपको स्मरण दिला
दूँ कि उनमें से कुछ लोग वस्तुतः वहाँ बहुत लम्बे अर्सेसे रहते हैं। कमसेकम एक उपनिवेश ऐसा है जिसमें पूर्वके लोग कोई २०० वर्षसे बसे हुए हैं ।
• मैं यह बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि कठिनाई वस्तुतः स्वयं मन्त्रियोंके पूर्वग्रही विचारोंसे
उत्पन्न नहीं होती; अक्सर उनके लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियोंको, उन बिलकुल छोटे कर्मचारियोंको जिनमें रंग विद्वेषको भावना शायद बहुत तीव्र है, इस तरहके छोटे प्रतीत होनेवाले प्रश्नोंका उतना महत्त्व समझा सकना आसान नहीं होता - जितना महत्त्व उन्हें हम या जिनका सम्बन्ध भारतसे पड़ता है और जो भारतको जानते हैं वे देते है...। इंग्लैंड और स्वशासित उपनिवेशों में भले ही निकट सम्बन्ध और पूर्ण सद्भाव हो, किन्तु हमारा साम्राज्य तबतक एक सुसंगठित साम्राज्य नहीं कहा जा सकता जबतक खासी मात्रा में वही सद्भाव साम्राज्यके उस विशाल भागके प्रति भी उत्पन्न न हो जाये जिसका भारत एक अत्यन्त प्रमुख भाग है; और जिसमें सम्राटके अधीनस्थ वे सभी उपनिवेश भी सम्मिलित हैं जिनमें विभिन्न वतनी प्रजातियाँ बसी हुई हैं । यदि इंग्लैंड लगातार साम्राज्यके विभिन्न भागोंके बीच की समस्याओं में फँसा रहे तो यह स्पष्टतः दुर्भाग्यकी बात होगी; और इससे साम्राज्यकी एकतामें अन्तर पड़ जायेगा ।. मैं यह बात एक बार फिर दुहराता हूँ कि मैं ऐसा नहीं कहता कि यह प्रश्न वस्तुतः पूरी तरह तय किया जा सकता है । में नहीं समझता कि यह प्रश्न सम्पूर्ण रूपसे सदाके लिए हल हो सकता<noinclude></noinclude>
oorqfhvp1y3wh1h00nc6lbjd7osl5b4
673028
673027
2026-08-22T19:23:29Z
सीमा1
430
673028
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३३}}</noinclude>लोगोंका दावा वास्तविक और ठोस है । चाहे हम बौद्धिक विकासको महत्व दें, चाहे धार्मिक मतामत से भिन्न धार्मिक मनोवृत्तिको महत्त्व दें, चाहे हम अदृष्ट वस्तुओं के प्रति अनुपम भक्ति और उनकी समझको, जा भारत में असाधारण रूपसे गहरी है और जो मेरा खयाल है, अपेक्ष कृत कठिनाई और भौतिकता की पूजाके इन दिनों में बहुत-से लोगों को प्रभावित करती है, महत्त्व दें; चाहे हम शुद्ध बौद्धिक शक्तिको महत्त्व दें जिसका, में स्वीकार करता हूँ, कुछ दिशाओं में बहुत फलप्रद प्रयोग नहीं किया जा सकता; किन्तु जो दूसरी दिशाओं में अधिक से अधिक तेज और अच्छा उपकरण सिद्ध होती है – हम चाहे इन सब वस्तुओंको महत्व दें या इनमें से किसी एकको महत्व दें यह तथ्य असन्दिग्ध है कि भारत और भारतीय हमारे सामने एक ऊँचा और वास्तविक दावा प्रस्तुत कर सकते है ।
....भारतको उन गृहीत तथ्योंको मंजूर करना चाहिए जो मैंने अपने इस निवेदनके आरम्भ में बताये ये । उसे यह मंजूर करना चाहिए कि स्वशासित उपनिवेशोंको अपनी नागरिकत के नियम बनानेकी असन्दिग्ध स्वतन्त्रता है और मैं भारत कार्यालय और भारत सरकारकी ओरसे प्रसन्नतापूर्वक कह सकता हूँ कि हम इस मामले में जो स्थिति है उसे भारतके लोगोंको समझानेका सदा पूरा प्रयत्न करेंगे। वर्तमान स्थितियों में स्वशासित उपनिवेशोंमें प्रवेशको जेंसी माँगें हैं उन्हें अतिशयतापूर्ण ही कहा जा सकता है: हम भारतको वैसी माँग प्रस्तुत करनेमें प्रोत्साहन न देंगे और हम उन्हें साम्राज्यकी वास्तविक परिस्थितियाँ समझानेका यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे । यदि ब्रिटिश साम्राज्यके किसी भागमें भारतीयोंकी निर्योग्यता का प्रश्न उठता है तो उसके बारेमें भारतके सभी वर्गों और विचारोंके लोग... एक हो जाते हैं । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतमें जो हमारे शासनक विरुद्ध हैं उनके लिए यह बात एक बड़ा उपयोगी शस्त्र बन जाती है । वे पूछते हैं- यदि साम्राज्यके विभिन्न भागोंमें भारतीय निर्योग्यताओंसे पीड़ित हैं तो ब्रिटेनसे सम्बन्ध बनाये रखनेसे लाभ ही क्या है ? मैं यह भी बता दूँ कि भारतपर स्वशासनका सिद्धान्त लागू करनेकी वर्तमान प्रवृत्तिसे यह मामला और भी उलझ जाता है और कठिन हो जाता है,
क्योंकि यदि किसी उपनिवेशको सरकारकी ओरसे धारासभामें पास किये गये कानून या प्रशासनिक कार्यके विरुद्ध भारतकी व्यवस्थापिका सभा (लेजिस्लेटिव असेम्बली) कोई खास आपत्ति उठाती है, जिसकी सम्भावना सदा ही रहती है, तो मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि मामलेको बिना समझे उसपर नाराज होनेकी अपेक्षा उसे कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए ।
...दूसरी ओर, जो लोग वहाँ बस चुके हैं उनको संरक्षण देनेके बारेमे मैं आपको स्मरण दिला
दूँ कि उनमें से कुछ लोग वस्तुतः वहाँ बहुत लम्बे अर्सेसे रहते हैं। कमसेकम एक उपनिवेश ऐसा है जिसमें पूर्वके लोग कोई २०० वर्षसे बसे हुए हैं ।
...मैं यह बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि कठिनाई वस्तुतः स्वयं मन्त्रियोंके पूर्वग्रही विचारोंसे
उत्पन्न नहीं होती; अक्सर उनके लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियोंको, उन बिलकुल छोटे कर्मचारियोंको जिनमें रंग विद्वेषको भावना शायद बहुत तीव्र है, इस तरहके छोटे प्रतीत होनेवाले प्रश्नोंका उतना महत्त्व समझा सकना आसान नहीं होता - जितना महत्त्व उन्हें हम या जिनका सम्बन्ध भारतसे पड़ता है और जो भारतको जानते हैं वे देते है...। इंग्लैंड और स्वशासित उपनिवेशों में भले ही निकट सम्बन्ध और पूर्ण सद्भाव हो, किन्तु हमारा साम्राज्य तबतक एक सुसंगठित साम्राज्य नहीं कहा जा सकता जबतक खासी मात्रा में वही सद्भाव साम्राज्यके उस विशाल भागके प्रति भी उत्पन्न न हो जाये जिसका भारत एक अत्यन्त प्रमुख भाग है; और जिसमें सम्राटके अधीनस्थ वे सभी उपनिवेश भी सम्मिलित हैं जिनमें विभिन्न वतनी प्रजातियाँ बसी हुई हैं । यदि इंग्लैंड लगातार साम्राज्यके विभिन्न भागोंके बीच की समस्याओं में फँसा रहे तो यह स्पष्टतः दुर्भाग्यकी बात होगी; और इससे साम्राज्यकी एकतामें अन्तर पड़ जायेगा ।
...मैं यह बात एक बार फिर दुहराता हूँ कि मैं ऐसा नहीं कहता कि यह प्रश्न वस्तुतः पूरी तरह तय किया जा सकता है । में नहीं समझता कि यह प्रश्न सम्पूर्ण रूपसे सदाके लिए हल हो सकता<noinclude></noinclude>
lep99pfqohwitnuiaxktdt5vwyjwvye
673029
673028
2026-08-22T19:24:19Z
सीमा1
430
673029
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३३}}</noinclude>लोगोंका दावा वास्तविक और ठोस है । चाहे हम बौद्धिक विकासको महत्व दें, चाहे धार्मिक मतामत से भिन्न धार्मिक मनोवृत्तिको महत्त्व दें, चाहे हम अदृष्ट वस्तुओं के प्रति अनुपम भक्ति और उनकी समझको, जा भारत में असाधारण रूपसे गहरी है और जो मेरा खयाल है, अपेक्ष कृत कठिनाई और भौतिकता की पूजाके इन दिनों में बहुत-से लोगों को प्रभावित करती है, महत्त्व दें; चाहे हम शुद्ध बौद्धिक शक्तिको महत्त्व दें जिसका, में स्वीकार करता हूँ, कुछ दिशाओं में बहुत फलप्रद प्रयोग नहीं किया जा सकता; किन्तु जो दूसरी दिशाओं में अधिक से अधिक तेज और अच्छा उपकरण सिद्ध होती है – हम चाहे इन सब वस्तुओंको महत्व दें या इनमें से किसी एकको महत्व दें यह तथ्य असन्दिग्ध है कि भारत और भारतीय हमारे सामने एक ऊँचा और वास्तविक दावा प्रस्तुत कर सकते है ।
. . . भारतको उन गृहीत तथ्योंको मंजूर करना चाहिए जो मैंने अपने इस निवेदनके आरम्भ में बताये ये । उसे यह मंजूर करना चाहिए कि स्वशासित उपनिवेशोंको अपनी नागरिकत के नियम बनानेकी असन्दिग्ध स्वतन्त्रता है और मैं भारत कार्यालय और भारत सरकारकी ओरसे प्रसन्नतापूर्वक कह सकता हूँ कि हम इस मामले में जो स्थिति है उसे भारतके लोगोंको समझानेका सदा पूरा प्रयत्न करेंगे। वर्तमान स्थितियों में स्वशासित उपनिवेशोंमें प्रवेशको जेंसी माँगें हैं उन्हें अतिशयतापूर्ण ही कहा जा सकता है: हम भारतको वैसी माँग प्रस्तुत करनेमें प्रोत्साहन न देंगे और हम उन्हें साम्राज्यकी वास्तविक परिस्थितियाँ समझानेका यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे । यदि ब्रिटिश साम्राज्यके किसी भागमें भारतीयोंकी निर्योग्यता का प्रश्न उठता है तो उसके बारेमें भारतके सभी वर्गों और विचारोंके लोग... एक हो जाते हैं । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतमें जो हमारे शासनक विरुद्ध हैं उनके लिए यह बात एक बड़ा उपयोगी शस्त्र बन जाती है । वे पूछते हैं- यदि साम्राज्यके विभिन्न भागोंमें भारतीय निर्योग्यताओंसे पीड़ित हैं तो ब्रिटेनसे सम्बन्ध बनाये रखनेसे लाभ ही क्या है ? मैं यह भी बता दूँ कि भारतपर स्वशासनका सिद्धान्त लागू करनेकी वर्तमान प्रवृत्तिसे यह मामला और भी उलझ जाता है और कठिन हो जाता है,
क्योंकि यदि किसी उपनिवेशको सरकारकी ओरसे धारासभामें पास किये गये कानून या प्रशासनिक कार्यके विरुद्ध भारतकी व्यवस्थापिका सभा (लेजिस्लेटिव असेम्बली) कोई खास आपत्ति उठाती है, जिसकी सम्भावना सदा ही रहती है, तो मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि मामलेको बिना समझे उसपर नाराज होनेकी अपेक्षा उसे कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए ।
. . . दूसरी ओर, जो लोग वहाँ बस चुके हैं उनको संरक्षण देनेके बारेमे मैं आपको स्मरण दिला दूँ कि उनमें से कुछ लोग वस्तुतः वहाँ बहुत लम्बे अर्सेसे रहते हैं। कमसेकम एक उपनिवेश ऐसा है जिसमें पूर्वके लोग कोई २०० वर्षसे बसे हुए हैं ।
. . . मैं यह बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि कठिनाई वस्तुतः स्वयं मन्त्रियोंके पूर्वग्रही विचारोंसे
उत्पन्न नहीं होती; अक्सर उनके लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियोंको, उन बिलकुल छोटे कर्मचारियोंको जिनमें रंग विद्वेषको भावना शायद बहुत तीव्र है, इस तरहके छोटे प्रतीत होनेवाले प्रश्नोंका उतना महत्त्व समझा सकना आसान नहीं होता - जितना महत्त्व उन्हें हम या जिनका सम्बन्ध भारतसे पड़ता है और जो भारतको जानते हैं वे देते है...। इंग्लैंड और स्वशासित उपनिवेशों में भले ही निकट सम्बन्ध और पूर्ण सद्भाव हो, किन्तु हमारा साम्राज्य तबतक एक सुसंगठित साम्राज्य नहीं कहा जा सकता जबतक खासी मात्रा में वही सद्भाव साम्राज्यके उस विशाल भागके प्रति भी उत्पन्न न हो जाये जिसका भारत एक अत्यन्त प्रमुख भाग है; और जिसमें सम्राटके अधीनस्थ वे सभी उपनिवेश भी सम्मिलित हैं जिनमें विभिन्न वतनी प्रजातियाँ बसी हुई हैं । यदि इंग्लैंड लगातार साम्राज्यके विभिन्न भागोंके बीच की समस्याओं में फँसा रहे तो यह स्पष्टतः दुर्भाग्यकी बात होगी; और इससे साम्राज्यकी एकतामें अन्तर पड़ जायेगा ।
. . . मैं यह बात एक बार फिर दुहराता हूँ कि मैं ऐसा नहीं कहता कि यह प्रश्न वस्तुतः पूरी तरह तय किया जा सकता है । में नहीं समझता कि यह प्रश्न सम्पूर्ण रूपसे सदाके लिए हल हो सकता<noinclude></noinclude>
9ht2101z7rjghq824jhpjnqjwwnpw0l
673064
673029
2026-08-22T23:03:38Z
सीमा1
430
673064
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३३}}</noinclude>लोगोंका दावा वास्तविक और ठोस है । चाहे हम बौद्धिक विकासको महत्व दें, चाहे धार्मिक मतामत से भिन्न धार्मिक मनोवृत्तिको महत्त्व दें, चाहे हम अदृष्ट वस्तुओं के प्रति अनुपम भक्ति और उनकी समझको, जा भारत में असाधारण रूपसे गहरी है और जो मेरा खयाल है, अपेक्षाकृत कठिनाई और भौतिकताकी पूजाके इन दिनों में बहुत-से लोगों को प्रभावित करती है, महत्त्व दें; चाहे हम शुद्ध बौद्धिक शक्तिको महत्त्व दें जिसका, मैं स्वीकार करता हूँ, कुछ दिशाओं में बहुत फलप्रद प्रयोग नहीं किया जा सकता; किन्तु जो दूसरी दिशाओं में अधिकसे-अधिक तेज और अच्छा उपकरण सिद्ध होती है--हम चाहे इन सब वस्तुओंको महत्व दें या इनमें से किसी एकको महत्व दें यह तथ्य असन्दिग्ध है कि भारत और भारतीय हमारे सामने एक ऊँचा और वास्तविक दावा प्रस्तुत कर सकते है ।
. . . भारतको उन गृहीत तथ्योंको मंजूर करना चाहिए जो मैंने अपने इस निवेदनके आरम्भ में बताये ये । उसे यह मंजूर करना चाहिए कि स्वशासित उपनिवेशोंको अपनी नागरिकता के नियम बनानेकी असन्दिग्ध स्वतन्त्रता है और मैं भारत कार्यालय और भारत सरकारकी ओरसे प्रसन्नतापूर्वक कह सकता हूँ कि हम इस मामले में जो स्थिति है उसे भारतके लोगोंको समझानेका सदा पूरा प्रयत्न करेंगे। वर्तमान स्थितियों में स्वशासित उपनिवेशोंमें प्रवेशकी जेंसी माँगें हैं उन्हें अतिशयतापूर्ण ही कहा जा सकता है: हम भारतको वैसी माँग प्रस्तुत करनेमें प्रोत्साहन न देंगे और हम उन्हें साम्राज्यकी वास्तविक परिस्थितियाँ समझानेका यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे ।....यदि ब्रिटिश साम्राज्यके किसी भागमें भारतीयोंकी निर्योग्यताका प्रश्न उठता है तो उसके बारेमें भारतके सभी वर्गों और विचारोंके लोग... एक हो जाते हैं । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतमें जो हमारे शासनके विरुद्ध हैं उनके लिए यह बात एक बड़ा उपयोगी शस्त्र बन जाती है....। वे पूछते हैं--यदि साम्राज्यके विभिन्न भागोंमें भारतीय निर्योग्यताओंसे पीड़ित हैं तो ब्रिटेनसे सम्बन्ध बनाये रखनेसे लाभ ही क्या है ?..... मैं यह भी बता दूँ कि भारतपर स्वशासनका सिद्धान्त लागू करनेकी वर्तमान प्रवृत्तिसे यह मामला और भी उलझजाता है और कठिन हो जाता है,
क्योंकि यदि किसी उपनिवेशकी सरकारकी ओरसे धारासभामें पास किये गये कानून या प्रशासनिक कार्यके विरुद्ध भारतकी व्यवस्थापिका सभा (लेजिस्लेटिव असेम्बली) कोई खास आपत्ति उठाती है, जिसकी सम्भावना सदा ही रहती है, तो मुझे विश्वास है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि मामलेको बिना समझे उसपर नाराज होनेकी अपेक्षा उसे कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए ।
. . . दूसरी ओर, जो लोग वहाँ बस चुके हैं उनको संरक्षण देनेके बारेमे मैं आपको स्मरण दिला दूँ कि उनमें से कुछ लोग वस्तुतः वहाँ बहुत लम्बे अर्सेसे रहते हैं। कमसेकम एक उपनिवेश ऐसा है जिसमें पूर्वके लोग कोई २०० वर्षसे बसे हुए हैं ।
. . . मैं यह बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि कठिनाई वस्तुतः स्वयं मन्त्रियोंके पूर्वग्रही विचारोंसे
उत्पन्न नहीं होती; अक्सर उनके लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियोंको, उन बिलकुल छोटे कर्मचारियोंको जिनमें रंग विद्वेषकी भावना शायद बहुत तीव्र है, इस तरहके छोटे प्रतीत होनेवाले प्रश्नोंका उतना महत्त्व समझा सकना आसान नहीं होता--जितना महत्त्व उन्हें हम या जिनका सम्बन्ध भारतसे पड़ता है और जो भारतको जानते हैं वे देते है...। इंग्लैंड और स्वशासित उपनिवेशों में भले ही निकट सम्बन्ध और पूर्ण सद्भाव हो, किन्तु हमारा साम्राज्य तबतक एक सुसंगठित साम्राज्य नहीं कहा जा सकता जबतक खासी मात्रा में वही सद्भाव साम्राज्यके उस विशाल भागके प्रति भी उत्पन्न न हो जाये जिसका भारत एक अत्यन्त प्रमुख भाग है; और जिसमें सम्राटके अधीनस्थ वे सभी उपनिवेश भी सम्मिलित हैं जिनमें विभिन्न वतनी प्रजातियाँ बसी हुई हैं । यदि इंग्लैंड लगातार साम्राज्यके विभिन्न भागोंके बीच की समस्याओं में फँसा रहे तो यह स्पष्टतः दुर्भाग्यकी बात होगी; और इससे साम्राज्यकी एकतामें अन्तर पड़ जायेगा ।
. . . मैं यह बात एक बार फिर दुहराता हूँ कि मैं ऐसा नहीं कहता कि यह प्रश्न वस्तुतः पूरी तरह तय किया जा सकता है । में नहीं समझता कि यह प्रश्न सम्पूर्ण रूपसे सदाके लिए हल हो सकता<noinclude></noinclude>
hmw1qtykjxlw532ssbl9jt4e47mbdof
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७२
250
184115
673030
639984
2026-08-22T19:30:14Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673030
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११
{{x-larger|ख<br>साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन}}
'''श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में
वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और
स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित
किये थे :'''
हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशों के हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंको भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके
हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनको परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं। और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते।
मेरे खयालते यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा-मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी । एक उज्ज्वलतम और समान ही राजभक्त मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ<noinclude></noinclude>
9rpwnbyrwpkeyvd8o4o33rt4woa6jhb
673031
673030
2026-08-22T19:30:47Z
सीमा1
430
673031
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११
{{x-larger|'''ख<br>साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन'''}}
'''श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में
वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और
स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित
किये थे :'''
हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशों के हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंको भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके
हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनको परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं। और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते।
मेरे खयालते यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा-मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी । एक उज्ज्वलतम और समान ही राजभक्त मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ<noinclude></noinclude>
a0c9xgjahlekjf0ohdcg3eeqr417wrm
673032
673031
2026-08-22T19:31:26Z
सीमा1
430
673032
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११
<center>{{x-larger|'''ख<br>साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन'''}}</center>
'''श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में
वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और
स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित
किये थे :'''
हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशों के हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंको भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके
हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनको परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं। और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते।
मेरे खयालते यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा-मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी । एक उज्ज्वलतम और समान ही राजभक्त मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ<noinclude></noinclude>
hwlwjvsgx2wuuqf06r13kf1j3py2kel
673033
673032
2026-08-22T19:31:51Z
सीमा1
430
673033
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११
<center>{{x-larger|'''ख<br>साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन'''}}</center>
'''श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित किये थे :'''
हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशों के हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंको भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके
हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनको परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं। और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते।
मेरे खयालते यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा-मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी । एक उज्ज्वलतम और समान ही राजभक्त मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ<noinclude></noinclude>
4sq7usga04ymqcmx9rdoaqkzangkf63
673065
673033
2026-08-22T23:19:19Z
सीमा1
430
673065
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है; किन्तु मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि यदि उपनिवेश एकमत से समस्त कार्रवाई में भारतके प्रति समझौते और मैत्रीकी भावना दिखायेंगे तो. ..।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', १४-१०-१९११ और २१-१०-१९११
<center>{{x-larger|'''ख<br>साम्राज्य सम्मेलनमें भारत-कार्यालयका ज्ञापन'''}}</center>
'''श्री चेम्बरलेनने १८९७ में उपनिवेश प्रधानमन्त्री सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण में वे सामान्य सिद्वान्त, जिनको महामहिम सम्राट्की सरकार सम्राट्के भारतीय प्रजाजनों और स्वशासित उपनिवेशोंके सम्बन्धोंके विषय में प्रतिपादित करना चाहती है, इस प्रकार निरूपित किये थे :'''
हम उपनिवेशोंके उन गोरे निवासियोंके, जो अपेक्षतया लाखों-करोड़ों एशियाइयोंके अति निकट हैं, इस निश्चयसे पूरी सहानुभूति रखते हैं कि वहाँ ऐसे लोगोंको भारी संख्या में न आने दिया जायगा जिनकी सभ्यता, जिनका धर्म और जिनके रीति-रिवाज भिन्न हैं एवं जिनका बड़ी संख्या में आना गम्भीर रूपसे वर्तमान मजदूर आबादीके उचित अधिकारोंके विरुद्ध पड़ेगा | मैं पूरी तरह समझता हूँ कि उपनिवेशोंके हितकी दृष्टिसे इस प्रकारके प्रवासको हर तरहकी जोखिम उठाकर भी रोका जाना चाहिए; और इस उद्देश्यसे रखे गये प्रस्तावोंका हम कोई विरोध न करेंगे । किन्तु हमारा आपसे यह कहना है कि आप साम्राज्यकी उस परम्पराका ध्यान अवश्य रखें जिसमें प्रजाति या रंगके कारण कोई पक्षपात नहीं बरता जाता । महामहिमामयी साम्राज्ञीके भारतीय प्रजाजनों या समस्त एशियाइयोंकी भी, रंग या प्रजाति के कारण, न आने देनेके कार्यसे उन्हें बहुत क्षोभ होगा और मुझे निश्चय है कि उसपर स्वीकृति देना महामहिमामयी साम्राज्ञीको भी कष्टदायक होगा । इस देश में आनेपर आपका ध्यान जिस बात की ओर खींचा गया है उसपर विचार कीजिए । विशाल भारतीय साम्राज्य ब्रिटेनका एक उज्ज्वलतम और महानतम अधीनस्थ देश है; उसमें ३०,००,००,००० लोग रहते हैं । वे आपके समान ही राजभक्त हैं और उनमें सैकड़ों और हजारों लोग सभ्यता में हमसे किसी प्रकार कम नहीं हैं यदि उच्च वंशमें उत्पन्न होनेका कोई महत्व है तो वे हमसे अधिक कुलीन हैं; उनकी परम्पराएँ हमसे अधिक पुरानी हैं और उनके कुल भी हमसे पुराने हैं, वे सम्पत्तिशाली हैं, सुसंस्कृत हैं और उनकी वीरता विशिष्ट है; ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरीकी-पूरी सेनाएँ साम्राज्ञीकी सेवामें अर्पित कर दी हैं और भारी कठिनाई और मुसीबतके दिनोंमें, उदाहरणार्थं भारतीय विद्रोहके अवसरपर अपनी वफादारीसे साम्राज्यको बचाया है । मैं कहता हूँ कि आप लोग, जिन्होंने यह सब देखा है, उन लोगोंका तिरस्कार करनेकी इच्छा नहीं रख सकते। मेरे खयालसे यह आपकी उद्देश्य सिद्धिके लिए नितान्त अनावश्यक है; इससे दुर्भाव, असन्तोष एवं चिढ़ उत्पन्न होने की संभावना है तथा तिरस्कार करनेकी ऐसी इच्छा महामहिमा-मयी साम्राज्ञीकी ही नहीं, बल्कि उनके सब प्रजाजनोंकी भावनाके भी प्रतिकूल होगी ।
मेरे खयालसे आपको जिस बातपर विचार करना है वह है प्रवासका स्वरूप । कोई व्यक्ति इसी कारण अवांच्छनीय प्रवासी नहीं हो सकता कि उसका रंग हमारे रंगसे भिन्न है; बल्कि अवांछनीय प्रवासी उसे होना चाहिए जो मैला हो, या अनाचारी हो या कंगाल हो या उसके विरुद्ध कोई दूसरी आपत्ति हो । इस आपत्तिकी व्याख्या संसदीय कानूनसे की जा सकती है और उसीके द्वारा उन सब लोगोंका, जिनको आप वस्तुतः देशमें नहीं आने देना चाहते, प्रवेश रोकनेकी व्यवस्था की जा सकती है । अस्तु, सज्जनो, मेरा विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसे हम आपसमें मैत्रीपूर्ण बातचीत से तथ<noinclude></noinclude>
9mew29zf12nqpao9g8r4jfgs8dha025
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७३
250
184117
673034
639986
2026-08-22T19:38:57Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673034
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३५}}</noinclude>कर सकते हैं। मैं कह चुका हूँ कि नेटाल उपनिवेशके लोगोंने ऐसी व्यवस्था कर ली है; मेरे खयालसे उससे उन्हें पूर्ण सन्तोष है और स्मरण रखिए कि उनका स्वार्थं सम्भवतः आपसे बड़ा है क्योंकि उनका प्रदेश प्रवासके लिए अधिक समीप पड़ता है । यह प्रवास वहाँ बहुत बड़े पैमानेपर आरम्भ भी हो चुका है और वहाँके लोगोंने एक कानून बना लिया है जिससे उनका खयाल है वह सब मिल जात है जो उन्हें अभीष्ट है एवं जिसपर मेरी की गई आपत्ति भी लागू नहीं होती । साथ ही वह कानून इस भावना के विरुद्ध भी नहीं है जिसमें मेरा विश्वास है, आप भी मेरे साथ हैं । इसलिए मुझे आशा है कि आपके यहाँके प्रवास कालमें हमारे लिए कानूनकी एक ऐसी शब्दावली तैयार कर लेना सम्भव हो सकता है जिससे महामहिमामयी साम्राज्ञीकी भावनाओं को चोट न पहुँचे और साथ ही आस्ट्रेलियाई उपनिवेशोंकी उस वर्गकी आक्रमणले रक्षा भी हो जाये जिसके विरुद्ध उनका आपत्ति करना उचित है ।"
इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यमें भारतकी स्थितिपर १९०७ के उपनिवेशीय सम्मेलनमें श्री ऐस्क्विथने भी जोर दिया था । उन्होंने कहा था : “जिन जहाजोंपर हमारे भारतीय सह-प्रजाजनोंको नौकरी नहीं दी जाती उनमें माल ढुलाईके सम्बन्धमें हम किसी भी हालत में ऐसी कोई रियायत स्वीकार करना नहीं चाहते जो केवल हमें ही दी जा सकती हो। हम किसी प्रकार इससे सहमत नहीं हो सकते और यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि हम इस तरहको शर्तसे मर्यादित रियायत न लेना अधिक पसन्द करेंगे ।
<center>{{larger|खास कठिनाइयाँ}}l</center>
सन् १८९७ के बादके घटनाक्रमका संक्षेपमें उल्लेख करना अनावश्यक है; किन्तु स्वशासित उपनिवेशों में एशियाई प्रश्न जिन रूपोंमें उठे हैं, वे संक्षेप में बताये जा सकते हैं ।
<center>{{larger|नेटाल}}l</center>
भारतीय मजदूर केवल नेटालमें आते हैं; वहाँ कुलियोंकी बहुत बड़ी संख्या आ जानेसे भारतीय निवासियोंकी आबादी बढ़ गई है । ये कुली अपनी गिरमिट पूरी होनेके बाद एक विशिष्ट कर देना स्वीकार करके उपनिवेशमें ही रह जाते हैं । यह आबादी कुछ हद तक उन लोगोंके " स्वतन्त्र ” प्रवाससे भी बड़ी है जो प्रवासी अधिनियम के अन्तर्गत लागू की गई शिक्षा-परीक्षा पास करके आ सके हैं। व्यापारिक परवानों, नगरपालिका मताधिकार और भारतीय बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ पैदा हुईं, और १९०८ में संसद द्वारा दो विधेयकोंके पास किये जानेसे वे और भी उग्र हो गई । इनमें एक विधेयक एशियाइयोंको नये व्यापारिक परवाने देना बन्द करनेके सम्बन्धमें था और दूसरा एक निश्चित समयके बाद एशियाइयों द्वारा व्यापारिक परवानोंका रखा जाना निषिद्ध करनेके सम्बन्धमें । ये विधेयक भविष्यके लिए सुरक्षित कर दिये गये और उसके बाद अमल नहीं लाये गये । किन्तु सन् १९०९ में १८९७ के व्यापारिक परवाना कानूनमें इस आशयका संशोधन कर दिया गया कि वर्तमान परवानोंको नया करनेके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यद्यपि परवानोंका हस्तान्तरण करने या नये परवाने देनेके सम्बन्धमें अपील नहीं की जा सकती ।
<center>{{larger|ट्रान्सवाल}}l</center>
ट्रान्सवालमें, जहाँ से युद्धकालमें अधिकांश भारतीय चले गये थे, स्वायत्तीकरण (एनेक्सेशन) के बाद बड़ी संख्या में भारतीयोंके आनेसे और दक्षिण आफ्रिकी गणतन्त्रके कुछ कानूनों और विनियमोंके निश्चित प्रभावक सम्बन्धमें सन्देह होनेसे भारी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत उन्हीं एशियाई लोगोंको उपनिवेशमें प्रवेशके अनुमतिपत्र दिये गये थे जो वहाँ युद्धसे पूर्वं रहते थे । यह विधान १९०७ के एशियाई कानून संशोधन अधिनियमसे, जो उत्तरदायी शासन दिये जानेके तुरन्त बाद पास किया गया था, स्थायी बना दिया गया और यद्यपि उसी वर्षंका प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम नेटालके अधिनियमके नमूनेका बनाया गया था, किन्तु इन दोनों अधिनियमोंका संयुक्त प्रभाव यह होता था कि<noinclude></noinclude>
6an5kyuj45x799aattg6ks8rgh3vaxs
673035
673034
2026-08-22T19:39:35Z
सीमा1
430
673035
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३५}}</noinclude>कर सकते हैं। मैं कह चुका हूँ कि नेटाल उपनिवेशके लोगोंने ऐसी व्यवस्था कर ली है; मेरे खयालसे उससे उन्हें पूर्ण सन्तोष है और स्मरण रखिए कि उनका स्वार्थं सम्भवतः आपसे बड़ा है क्योंकि उनका प्रदेश प्रवासके लिए अधिक समीप पड़ता है । यह प्रवास वहाँ बहुत बड़े पैमानेपर आरम्भ भी हो चुका है और वहाँके लोगोंने एक कानून बना लिया है जिससे उनका खयाल है वह सब मिल जात है जो उन्हें अभीष्ट है एवं जिसपर मेरी की गई आपत्ति भी लागू नहीं होती । साथ ही वह कानून इस भावना के विरुद्ध भी नहीं है जिसमें मेरा विश्वास है, आप भी मेरे साथ हैं । इसलिए मुझे आशा है कि आपके यहाँके प्रवास कालमें हमारे लिए कानूनकी एक ऐसी शब्दावली तैयार कर लेना सम्भव हो सकता है जिससे महामहिमामयी साम्राज्ञीकी भावनाओं को चोट न पहुँचे और साथ ही आस्ट्रेलियाई उपनिवेशोंकी उस वर्गकी आक्रमणले रक्षा भी हो जाये जिसके विरुद्ध उनका आपत्ति करना उचित है ।"
इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यमें भारतकी स्थितिपर १९०७ के उपनिवेशीय सम्मेलनमें श्री ऐस्क्विथने भी जोर दिया था । उन्होंने कहा था : “जिन जहाजोंपर हमारे भारतीय सह-प्रजाजनोंको नौकरी नहीं दी जाती उनमें माल ढुलाईके सम्बन्धमें हम किसी भी हालत में ऐसी कोई रियायत स्वीकार करना नहीं चाहते जो केवल हमें ही दी जा सकती हो। हम किसी प्रकार इससे सहमत नहीं हो सकते और यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि हम इस तरहको शर्तसे मर्यादित रियायत न लेना अधिक पसन्द करेंगे ।
<center>{{larger|'''खास कठिनाइयाँ'''}}</center>
सन् १८९७ के बादके घटनाक्रमका संक्षेपमें उल्लेख करना अनावश्यक है; किन्तु स्वशासित उपनिवेशों में एशियाई प्रश्न जिन रूपोंमें उठे हैं, वे संक्षेप में बताये जा सकते हैं ।
<center>{{larger|'''नेटाल'''}}l</center>
भारतीय मजदूर केवल नेटालमें आते हैं; वहाँ कुलियोंकी बहुत बड़ी संख्या आ जानेसे भारतीय निवासियोंकी आबादी बढ़ गई है । ये कुली अपनी गिरमिट पूरी होनेके बाद एक विशिष्ट कर देना स्वीकार करके उपनिवेशमें ही रह जाते हैं । यह आबादी कुछ हद तक उन लोगोंके " स्वतन्त्र ” प्रवाससे भी बड़ी है जो प्रवासी अधिनियम के अन्तर्गत लागू की गई शिक्षा-परीक्षा पास करके आ सके हैं। व्यापारिक परवानों, नगरपालिका मताधिकार और भारतीय बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ पैदा हुईं, और १९०८ में संसद द्वारा दो विधेयकोंके पास किये जानेसे वे और भी उग्र हो गई । इनमें एक विधेयक एशियाइयोंको नये व्यापारिक परवाने देना बन्द करनेके सम्बन्धमें था और दूसरा एक निश्चित समयके बाद एशियाइयों द्वारा व्यापारिक परवानोंका रखा जाना निषिद्ध करनेके सम्बन्धमें । ये विधेयक भविष्यके लिए सुरक्षित कर दिये गये और उसके बाद अमल नहीं लाये गये । किन्तु सन् १९०९ में १८९७ के व्यापारिक परवाना कानूनमें इस आशयका संशोधन कर दिया गया कि वर्तमान परवानोंको नया करनेके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यद्यपि परवानोंका हस्तान्तरण करने या नये परवाने देनेके सम्बन्धमें अपील नहीं की जा सकती ।
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल'''}}l</center>
ट्रान्सवालमें, जहाँ से युद्धकालमें अधिकांश भारतीय चले गये थे, स्वायत्तीकरण (एनेक्सेशन) के बाद बड़ी संख्या में भारतीयोंके आनेसे और दक्षिण आफ्रिकी गणतन्त्रके कुछ कानूनों और विनियमोंके निश्चित प्रभावक सम्बन्धमें सन्देह होनेसे भारी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत उन्हीं एशियाई लोगोंको उपनिवेशमें प्रवेशके अनुमतिपत्र दिये गये थे जो वहाँ युद्धसे पूर्वं रहते थे । यह विधान १९०७ के एशियाई कानून संशोधन अधिनियमसे, जो उत्तरदायी शासन दिये जानेके तुरन्त बाद पास किया गया था, स्थायी बना दिया गया और यद्यपि उसी वर्षंका प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम नेटालके अधिनियमके नमूनेका बनाया गया था, किन्तु इन दोनों अधिनियमोंका संयुक्त प्रभाव यह होता था कि<noinclude></noinclude>
k6i261qkjsq5whoc4wo90befu4noao8
673036
673035
2026-08-22T19:39:56Z
सीमा1
430
673036
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३५}}</noinclude>कर सकते हैं। मैं कह चुका हूँ कि नेटाल उपनिवेशके लोगोंने ऐसी व्यवस्था कर ली है; मेरे खयालसे उससे उन्हें पूर्ण सन्तोष है और स्मरण रखिए कि उनका स्वार्थं सम्भवतः आपसे बड़ा है क्योंकि उनका प्रदेश प्रवासके लिए अधिक समीप पड़ता है । यह प्रवास वहाँ बहुत बड़े पैमानेपर आरम्भ भी हो चुका है और वहाँके लोगोंने एक कानून बना लिया है जिससे उनका खयाल है वह सब मिल जात है जो उन्हें अभीष्ट है एवं जिसपर मेरी की गई आपत्ति भी लागू नहीं होती । साथ ही वह कानून इस भावना के विरुद्ध भी नहीं है जिसमें मेरा विश्वास है, आप भी मेरे साथ हैं । इसलिए मुझे आशा है कि आपके यहाँके प्रवास कालमें हमारे लिए कानूनकी एक ऐसी शब्दावली तैयार कर लेना सम्भव हो सकता है जिससे महामहिमामयी साम्राज्ञीकी भावनाओं को चोट न पहुँचे और साथ ही आस्ट्रेलियाई उपनिवेशोंकी उस वर्गकी आक्रमणले रक्षा भी हो जाये जिसके विरुद्ध उनका आपत्ति करना उचित है ।"
इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यमें भारतकी स्थितिपर १९०७ के उपनिवेशीय सम्मेलनमें श्री ऐस्क्विथने भी जोर दिया था । उन्होंने कहा था : “जिन जहाजोंपर हमारे भारतीय सह-प्रजाजनोंको नौकरी नहीं दी जाती उनमें माल ढुलाईके सम्बन्धमें हम किसी भी हालत में ऐसी कोई रियायत स्वीकार करना नहीं चाहते जो केवल हमें ही दी जा सकती हो। हम किसी प्रकार इससे सहमत नहीं हो सकते और यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि हम इस तरहको शर्तसे मर्यादित रियायत न लेना अधिक पसन्द करेंगे ।
<center>{{larger|'''खास कठिनाइयाँ'''}}</center>
सन् १८९७ के बादके घटनाक्रमका संक्षेपमें उल्लेख करना अनावश्यक है; किन्तु स्वशासित उपनिवेशों में एशियाई प्रश्न जिन रूपोंमें उठे हैं, वे संक्षेप में बताये जा सकते हैं ।
<center>{{larger|'''नेटाल'''}}</center>
भारतीय मजदूर केवल नेटालमें आते हैं; वहाँ कुलियोंकी बहुत बड़ी संख्या आ जानेसे भारतीय निवासियोंकी आबादी बढ़ गई है । ये कुली अपनी गिरमिट पूरी होनेके बाद एक विशिष्ट कर देना स्वीकार करके उपनिवेशमें ही रह जाते हैं । यह आबादी कुछ हद तक उन लोगोंके " स्वतन्त्र ” प्रवाससे भी बड़ी है जो प्रवासी अधिनियम के अन्तर्गत लागू की गई शिक्षा-परीक्षा पास करके आ सके हैं। व्यापारिक परवानों, नगरपालिका मताधिकार और भारतीय बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ पैदा हुईं, और १९०८ में संसद द्वारा दो विधेयकोंके पास किये जानेसे वे और भी उग्र हो गई । इनमें एक विधेयक एशियाइयोंको नये व्यापारिक परवाने देना बन्द करनेके सम्बन्धमें था और दूसरा एक निश्चित समयके बाद एशियाइयों द्वारा व्यापारिक परवानोंका रखा जाना निषिद्ध करनेके सम्बन्धमें । ये विधेयक भविष्यके लिए सुरक्षित कर दिये गये और उसके बाद अमल नहीं लाये गये । किन्तु सन् १९०९ में १८९७ के व्यापारिक परवाना कानूनमें इस आशयका संशोधन कर दिया गया कि वर्तमान परवानोंको नया करनेके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यद्यपि परवानोंका हस्तान्तरण करने या नये परवाने देनेके सम्बन्धमें अपील नहीं की जा सकती ।
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल'''}}</center>
ट्रान्सवालमें, जहाँ से युद्धकालमें अधिकांश भारतीय चले गये थे, स्वायत्तीकरण (एनेक्सेशन) के बाद बड़ी संख्या में भारतीयोंके आनेसे और दक्षिण आफ्रिकी गणतन्त्रके कुछ कानूनों और विनियमोंके निश्चित प्रभावक सम्बन्धमें सन्देह होनेसे भारी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत उन्हीं एशियाई लोगोंको उपनिवेशमें प्रवेशके अनुमतिपत्र दिये गये थे जो वहाँ युद्धसे पूर्वं रहते थे । यह विधान १९०७ के एशियाई कानून संशोधन अधिनियमसे, जो उत्तरदायी शासन दिये जानेके तुरन्त बाद पास किया गया था, स्थायी बना दिया गया और यद्यपि उसी वर्षंका प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम नेटालके अधिनियमके नमूनेका बनाया गया था, किन्तु इन दोनों अधिनियमोंका संयुक्त प्रभाव यह होता था कि<noinclude></noinclude>
db1x4958e5g12njkbcagutx1alv86g5
673066
673036
2026-08-22T23:21:06Z
सीमा1
430
673066
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५३५}}</noinclude>कर सकते हैं। मैं कह चुका हूँ कि नेटाल उपनिवेशके लोगोंने ऐसी व्यवस्था कर ली है; मेरे खयालसे उससे उन्हें पूर्ण सन्तोष है और स्मरण रखिए कि उनका स्वार्थं सम्भवतः आपसे बड़ा है क्योंकि उनका प्रदेश प्रवासके लिए अधिक समीप पड़ता है । यह प्रवास वहाँ बहुत बड़े पैमानेपर आरम्भ भी हो चुका है और वहाँके लोगोंने एक कानून बना लिया है जिससे उनका खयाल है वह सब मिल जात है जो उन्हें अभीष्ट है एवं जिसपर मेरी की गई आपत्ति भी लागू नहीं होती । साथ ही वह कानून इस भावना के विरुद्ध भी नहीं है जिसमें मेरा विश्वास है, आप भी मेरे साथ हैं । इसलिए मुझे आशा है कि आपके यहाँके प्रवास कालमें हमारे लिए कानूनकी एक ऐसी शब्दावली तैयार कर लेना सम्भव हो सकता है जिससे महामहिमामयी साम्राज्ञीकी भावनाओं को चोट न पहुँचे और साथ ही आस्ट्रेलियाई उपनिवेशोंकी उस वर्गकी आक्रमणले रक्षा भी हो जाये जिसके विरुद्ध उनका आपत्ति करना उचित है ।"
इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यमें भारतकी स्थितिपर १९०७ के उपनिवेशीय सम्मेलनमें श्री ऐस्क्विथने भी जोर दिया था । उन्होंने कहा था : “जिन जहाजोंपर हमारे भारतीय सह-प्रजाजनोंको नौकरी नहीं दी जाती उनमें माल ढुलाईके सम्बन्धमें हम किसी भी हालत में ऐसी कोई रियायत स्वीकार करना नहीं चाहते जो केवल हमें ही दी जा सकती हो। हम किसी प्रकार इससे सहमत नहीं हो सकते और यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि हम इस तरहकी शर्तसे मर्यादित रियायत न लेना अधिक पसन्द करेंगे ।
<center>{{larger|'''खास कठिनाइयाँ'''}}</center>
सन् १८९७ के बादके घटनाक्रमका संक्षेपमें उल्लेख करना अनावश्यक है; किन्तु स्वशासित उपनिवेशों में एशियाई प्रश्न जिन रूपोंमें उठे हैं, वे संक्षेप में बताये जा सकते हैं ।
<center>{{larger|'''नेटाल'''}}</center>
भारतीय मजदूर केवल नेटालमें आते हैं; वहाँ कुलियोंकी बहुत बड़ी संख्या आ जानेसे भारतीय निवासियोंकी आबादी बढ़ गई है । ये कुली अपनी गिरमिट पूरी होनेके बाद एक विशिष्ट कर देना स्वीकार करके उपनिवेशमें ही रह जाते हैं । यह आबादी कुछ हद तक उन लोगोंके " स्वतन्त्र ” प्रवाससे भी बड़ी है जो प्रवासी अधिनियम के अन्तर्गत लागू की गई शिक्षा-परीक्षा पास करके आ सके हैं। व्यापारिक परवानों, नगरपालिका मताधिकार और भारतीय बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ पैदा हुईं, और १९०८ में संसद द्वारा दो विधेयकोंके पास किये जानेसे वे और भी उग्र हो गई । इनमें एक विधेयक एशियाइयोंको नये व्यापारिक परवाने देना बन्द करनेके सम्बन्धमें था और दूसरा एक निश्चित समयके बाद एशियाइयों द्वारा व्यापारिक परवानोंका रखा जाना निषिद्ध करनेके सम्बन्धमें । ये विधेयक भविष्यके लिए सुरक्षित कर दिये गये और उसके बाद अमल नहीं लाये गये । किन्तु सन् १९०९ में १८९७ के व्यापारिक परवाना कानूनमें इस आशयका संशोधन कर दिया गया कि वर्तमान परवानोंको नया करनेके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यद्यपि परवानोंका हस्तान्तरण करने या नये परवाने देनेके सम्बन्धमें अपील नहीं की जा सकती ।
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल'''}}</center>
ट्रान्सवालमें, जहाँ से युद्धकालमें अधिकांश भारतीय चले गये थे, स्वायत्तीकरण (एनेक्सेशन) के बाद बड़ी संख्या में भारतीयोंके आनेसे और दक्षिण आफ्रिकी गणतन्त्रके कुछ कानूनों और विनियमोंके निश्चित प्रभावक सम्बन्धमें सन्देह होनेसे भारी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत उन्हीं एशियाई लोगोंको उपनिवेशमें प्रवेशके अनुमतिपत्र दिये गये थे जो वहाँ युद्धसे पूर्वं रहते थे । यह विधान १९०७ के एशियाई कानून संशोधन अधिनियमसे, जो उत्तरदायी शासन दिये जानेके तुरन्त बाद पास किया गया था, स्थायी बना दिया गया और यद्यपि उसी वर्षंका प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम नेटालके अधिनियमके नमूनेका बनाया गया था, किन्तु इन दोनों अधिनियमोंका संयुक्त प्रभाव यह होता था कि<noinclude></noinclude>
34ru353vh3wjshxipafgs8p3sczhyfn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७४
250
184118
673040
639987
2026-08-22T19:49:43Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673040
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कोई भी एशियाई, जबतक वह यह सिद्ध न कर सके कि वह युद्धसे पूर्व एक वैध नागरिक था, फिर वह सुशिक्षित भी क्यों न हो, अधिकारके रूपमें उपनिवेश में प्रविष्ट होनेका दावा नहीं कर सकता था । साम्राज्यके अन्य किसी भी भागमें ऐसी स्थिति नहीं है; तथापि यह अनिच्छापूर्वक महामहिम सम्राट्की सरकार द्वारा स्वीकार कर ली गई। वैध निवासियों की शिनाख्त के लिए बनाई गई कड़ी धाराओंसे बड़ा तीव्र और कटु विवाद उठ खड़ा हुआ, यद्यपि ट्रान्सवाल सरकारने यह घोषित किया कि व्यापारके जाली कागजातकी बिक्रीसे ऐसा करना आवश्यक हो गया है। यह विवाद केवल कुछ महीनेके लिए १९०८ के एक संशोधन कानूनसे कुछ कम हुआ । इधर एक ओर भारतीयोंने सोच-विचारकर कानूनके विरुद्ध सत्याग्रहकी नीति स्वीकार की, दूसरी ओर भारतीयोंको जेलमें भेजने और निर्वासित करनेकी कुछ घटनाओंसे उधर भारतमें रोषकी भावना जाग्रत हुई; दक्षिण आफ्रिकामें इसकी सचाई और गुरुतापर बहुत ही कम ध्यान दिया गया ।
<center>{{larger|'''केप ऑफ गुड होप और ऑरेंज फ्री स्टेट केप'''}}</center>
उपनिवेशमें, जहाँ केवल वे भारतीय ही प्रविष्ट होने दिये जाते थे जो शिक्षा-परीक्षा पास कर सकते थे, और ऑरेंज फ्री स्टेटमें, जहाँ एशियाई प्रश्न कभी उठा ही नहीं था, पिछले कुछ अरसेमें ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिसकी ओर ध्यान देना आवश्यक हो । केवल एक दो शिकायतें इसकी अपवाद हैं : कुछ पुराने निवासियोंको, जो अस्थायी अनुमतिमत्र लेकर भारत वापस चले गये थे, कानूनी बारीकियोंके आधारपर केप कालोनी में फिर प्रविष्ट नहीं होने दिया गया और इससे कष्ट हुआ ।
<center>{{larger|'''दक्षिण आफ्रिका संघ'''}}</center>
संघ अधिनियम के अंतर्गत जिन मामलोंमें एशियाइयोंपर भेदभावकारी प्रभाव पड़ता है, उन्हें संघ-
सरकार के लिए सुरक्षित कर दिया गया था । संव-सरकारने अभी हाल्के संसदीय अधिवेशनमें एक प्रवासी विधेयक प्रस्तुत किया जिसका उद्देश्य इस प्रश्नका अन्तिम निर्णय करना था । यह विधेयक अधिवेशनके अन्तमें वापस ले लिया गया, किन्तु यह मालूम हुआ कि यह विषय फिर उठाया जायेगा । इस बीच संव- सरकारने एक अस्थायी समझौता कर लिया है जिसके फलस्वरूप सत्याग्रह आन्दोलन बन्द कर दिया गया है । भारतसे नेटालको गिरमिटिया मजदूरोंका प्रवास बन्द होनेसे संघमें अशिक्षित वर्गोंके भारतीयोंकी भर्ती और भी रुक गई है । इस प्रकार दक्षिण आफ्रिकामें आगे व्यावहारिक समस्या यहाँ रहनेवाली एशियाई आबादीके प्रशासनकी होगी जो नेटालमें ही खासी बड़ी संख्या में हैं ।...
<center>{{larger|'''नीतिके प्रश्न'''}}</center>
केप ऑफ गुड होप और ऑरेंज फ्री स्टेट केपइससे पहले दिये गये संक्षिप्त विवरणसे प्रकट होता है कि भारतीयोंके प्रवासका प्रभाव विभिन्न रूपोंमें और विभिन्न मामलोंमें कई उपनिवेशोंपर पड़ता है । किन्तु कहा जा सकता है कि यह प्रश्न तीन शीर्षकोंके अन्तर्गत आता है :
(१) नये प्रवासियोंका प्रवेश ।
(२) जिन भारतीयोंको प्रवेश करने दिया गया है उनका दर्जा और उनकी अवस्था ।
(३) उपनिवेशीय समुद्रोंमें चलनेवाले जहाजोंमें भारतीयोंकी नियुक्ति ।
<center>{{larger|'''(१) प्रवासियोंका प्रवेश'''}}</center>
महामहिम सम्राट की सरकार इस सिद्धांतको पूर्णतः स्वीकार करती है कि प्रत्येक उपनिवेशको यह निर्णय स्वयं करने दिया जाना चाहिए कि वह अपने यहाँ किन लोगोंको बसने देना चाहता है जिम्मेदार भारतीयोंका तो नहीं किन्तु कुछ भारतीय वढी उग्रताके साथ कहते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यका सदस्य होनेसे किसी भी ब्रिटिश प्रजाजनको साम्राज्यमें जहाँ चाहे वहाँ रहनेका अधिकार होना चाहिए । सर्वसम्मत राजनीतिक तथ्योंसे यह तर्क रद हो जाता है। साथ ही यह मानना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है कि बादशाह के<noinclude></noinclude>
p9ad9kndq4uk8anycfqmh139694fwf5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७३
250
184269
672929
640141
2026-08-22T15:18:31Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
672929
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६३५}}
{{Multicol}}
{{outdent|रणछोड़, १५१}}
{{outdent|रणछोड़, हरी, ३७२, ३७७}}
{{outdent|रतनसी, ४०६}}
{{outdent|रतनसी, ४१२}}
{{outdent|रत्नम्, ३७३, ३९१, ३९५, ४०६}}
{{outdent|रमा; -के बालोंका गांधीजी द्वारा वपन, ४०६}}
{{outdent|रसूलबाई, ११८; -की ट्रान्सवाल प्रवेश संबंधी प्रार्थना असंमत, ११५, ११७}}
{{outdent|रसूल, शेख, ४०५}}
{{outdent|रसेल, लार्ड जॉन, १९२}}
{{outdent|रस्किन, जॉन, १३०; -का आदर्श फीनिक्सके निवासी स्वीकार करें, ३१९}}
{{outdent|रहमान, अब्दुल, ५६}}
{{outdent|रहीम, ३८३}}
{{outdent|राँदेरिया, छगनलाल भवानीदास घीवाला, ३८८}}
{{outdent|राघवजी, ३६२,, ३९२, ३९३}}
{{outdent|'''राइज़ ऑफ द मराठा पॉवर,''' ३०५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''राइजिंग टाइड,''' ३१० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|राजकीय मताधिकार; -की माँग ब्रिटिश भारतीय नहीं करते, ५२, १८२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|राजकुमार, ३९७}}
{{outdent|राजपुतानाके महाराजा, ४२०}}
{{outdent|राजा, ३६६}}
{{outdent|रानडे, महादेव गोविंद, ३०५}}
{{outdent|राम, ४१५}}
{{outdent|रामजी, ३७२}}
{{outdent|रामपियारी, ४०७}}
{{outdent|रामलाल ३६५}}
{{outdent|रामसामी, सी॰, ५८}}
{{outdent|'''रामायण,''' १४१, ३५४, ३६३; -तुलसी, ९३; -वाल्मीकि, ३६३}}
{{outdent|रामावतार, ३८३}}
{{outdent|रामी, ९२}}
{{outdent|रायप्पन, जोजेफ, २८, ४८, ४९, ५३, ५८, ६४, ७४, ८८, ३४५ '''पा॰ टि॰,''' ३९५, ३९६}}
{{outdent|रावजी, ३६९, ३८३, ४०४}}
{{outdent|रावजी, श्रीमती, ४०१}}
{{outdent|रावजी, कानजी, ३९३}}
{{outdent|रावजी, मेघजी, ३८०}}
{{outdent|रॉबिन्सन, सर जॉन, २१६}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|रॉबिन्सन, सी॰ पी॰, ८}}
{{outdent|रॉस, रेव॰ डॉ॰, २८९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|रिच, एल॰ डब्ल्यू॰, २, ३, ५, ७, ८, ९ '''पा॰ टि॰,''' ११, १५, १७, १८, २०, २१, २३ -से ३७ '''पा॰ टि॰,''' ३५, ३६, ३८, ४५, ५६, ५८, ६४, ११४, ११७, १३०, १३५, १३७, १३९, १५५, १६६, १९१, २८५ '''पा॰ टि॰,''' २८६ '''पा॰ टि॰,''' २९७, ३६५, ३६८, ३७१ -से ३७५, ३७७, ३७८, ३८१, ३८७, ३९०, ३९३, ३९६, ३९७; -का इंग्लैंडमें सेवाकार्य, ७९; -का गांधीजीके भारत जानेके बाद दक्षिण आफ्रिकामें निवास, ४८४; -का फीनिक्स न्यासपत्रके न्यासीकी हैसियतसे समावेश, ३९८; -के कार्यका भारतीय कैसे सम्मान करें, २५, २८; -को क्रूगर्सडॉर्पके उनके नामसे रखे बाड़ोंमें भारतीयोंको न रहने नहीं देनेकी सूचना, १३५; -को स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत की जानेवाली कार्रवाईमें ब्रिटिश भारतीय संघकी सहायता, १३७-३८}}
{{outdent|'''रिटर्न टू नेचर,''' ४९० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|रुकनुद्दीन, ३९६}}
{{outdent|रुस्तमजी, पारसी, ४३, ४७, १७०, १७३ '''पा॰ टि॰,''' ३६१, ३६५, ३६७, ३७३, ३७७, ३७९, ३८५, ३८६, ३९१, ३९३, ३९४, ३९७, ३९९, ४०५, ४१५; -फीनिक्स न्यासपत्रमें एक न्यासी, ३१७}}
{{outdent|रूडिपोर्ट; -के भारतीय बाड़ा मालिकोंके विरोधमें स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत कार्रवाई, १३५}}
{{outdent|रेल; -से गरीबोंको हानि, १७८}}
{{outdent|'''रेस प्रेजुडिस,''' २२}}
{{outdent|'''रैंड डेली मेल;''' -द्वारा गिरमिट-मुक्त भारतीयोंपर तीन पौंडी करका निषेध, १९६ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|रोड्स, २९४ '''पा॰ टि॰,''' ३३४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|रोडेशिया; -में ट्रान्सवाल सत्याग्रहके फलस्वरूप एशियाई कानूनके समान कानून संमत नहीं हुआ, ९८}}
{{outdent|रोश, ३७२, ३८३}}
{{outdent|रोश, श्रीमती, ३७२}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ल'''}}
{{outdent|'''लंदन पंच,''' २७४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|लजारस, ३७२, ३८३, ३८४, ३८८}}
{{outdent|ललिता, ४०२; -का केश-वपन गांधीजी द्वारा, ४०५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
lvu0gywuk19yk9bq459qcl81glb81jc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७४
250
184270
672932
640142
2026-08-22T15:33:58Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
672932
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{outdent|लल्लू, ४०६}}
{{outdent|लल्लूभाई, २९९, ३६९, ३७१, ३९८}}
{{outdent|लक्ष्मण (पाण्डे), ३७७, ३७९, ३८३, ३९०, ३९९, ४०६}}
{{outdent|लाजपतराय, लाला, ४५३}}
{{outdent|लॉटन, ३७४, ३९३, ३९७, ४०२; -का 'नेटाल मर्क्युरी' को पत्र, कजिन्स द्वारा केप कॉलोनीके प्रवास-अधिकारोंके निर्णयके सम्बन्धमें, ३२४}}
{{outdent|लॉरेन, ३७२}}
{{outdent|लॉरेंको मार्क्विस, -में गोखलेको प्रीतिभोज, ३४९}}
{{outdent|लॉर्ड ऍम्टहिलकी समिति, देखिए द॰ आ॰ ब्रिटिश भारतीय समिति}}
{{outdent|लॉर्ड सभा, ३३४ '''पा॰ टि॰;''' -में गोखलेके द॰ आ॰ के दौरेके बारेमें प्रश्न, ४९२-९३; - में लॉर्ड ऍम्टहिल द्वारा द॰ आ॰ भारतीयोंकी स्थिति सुधारनेके प्रयत्न, ४९५-९६; -में लॉर्ड लेमिंग्टन द्वारा नगरपालिका अध्यादेशके मसविदेके बारेमें प्रश्न, २०८ '''पा॰ टि॰,''' और स्वर्ण-अधिनियम तथा कस्बा-कानूनके बारेमें प्रश्न, १९६}}
{{outdent|लाल बहादुरसिंह, ३७०, ३९४, ३९३}}
{{outdent|लियोनार्ड, १९१}}
{{outdent|'लीग ऑफ ऑनर', १११, ११२}}
{{outdent|लीग ऑफ नेशन्स (राष्ट्र संघ) ३४३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''लीडर,''' ४४३}}
{{outdent|लुटावन, १५७, ३६४}}
{{outdent|'''लेटर्स ऑफ जॉन चाइनामन,''' १२८}}
{{outdent|लेडबीटर, ६३}}
{{outdent|लेफ्राय, विशप, १५}}
{{outdent|लेन, ई॰ एफ॰ सी॰, ३, ७, ८, ९, ११, १७, २१, २६, २८, २९, ३७-३९, ४७, ५८, ६९ '''पा॰ टि॰,''' ९० '''पा॰ टि॰,''' ९१ '''पा॰ टि॰,''' १९०, २१०, २३८, २४७ '''पा॰ टि॰,''' २५०, २५३ २६०, २६८ '''पा॰ टि॰,''' २७२, ३६५, -३६६, ३७७, ३८२, ३८५, ३८८}}
{{outdent|लेपिन, २८, ३६४, ३७६}}
{{outdent|लैंग्स्टन, ३७६}}
{{outdent|लैमिंग्टन, लॉर्ड, १२२, -द्वारा नगरपालिका अध्यादेशके मसविदेके सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें प्रश्न, २०८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|लोकसेवा आयोग, (पब्लिक सर्विसेस कमीशन), और श्री गोखले, ४८५}}
{{outdent|लो हो, ८३}}
{{gap|7em}}{{larger|'''व'''}}
{{outdent|'''वॅन,''' वीनेन, ५७}}
{{outdent|वली, ३५४}}
{{outdent|वल्लभ, गोपाल, ३९३}}
{{outdent|वश, दुल्लभ, ३६३}}
{{outdent|वॅसेल्स, जस्टिस सर जॉन, ३९ '''पा॰ टि॰,''' -का फातिमा जसातके मामलेमें निर्णय, २३९-४०; -का भारतीय पत्नियोंके ट्रान्सवालमें प्रवेशके सम्बन्धमें निर्णय, ११५, ११७, ११८, २५८-५९}}
{{outdent|वाइबर्ग, डब्ल्यू॰ जे॰, ३९६}}
{{outdent|वाइबर्ग, श्रीमती, -द्वारा मिश्रित स्कूलोंपर अनैतिकताका आरोप, १९२-९३}}
{{outdent|वॉकर, एरिक, ३२४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|वॉगल, (श्रीमती), ७६ '''पा॰ टि॰,''' ९९, १३०, १६९, १८४ '''पा॰ टि॰,''' २४८, ३६४, ३७८, ३९२, ४४१, ४५८; -द्वारा ट्रान्सवाल भारतीय महिला संघकी सेवाएँ, १७९; -द्वारा नागप्पन स्मारकके लिए प्रयत्न २६७-६८; -द्वारा शानदार भारतीय बाजारका आयोजन, १७९}}
{{outdent|वाजा, ३६६, ३८१, ३८९, ३९०}}
{{outdent|वाजा, ए॰ एम॰, १३८}}
{{outdent|वाटसन, डॉ॰ टॉमस, -का मत कि वैद्यक व्यवसाय "सन्देहके समुद्रपर भटक रहा है", ४३१}}
{{outdent|वानप्रस्थ, -लेनेवाले वैष्णवोंको मासिक वृत्तिका लालच देना अनुचित, ४४२}}
{{outdent|वालजी, ३६६, ३७५, ३७६, ३८८, ३९६}}
{{outdent|वॉलर, २६५}}
{{outdent|विक्टोरिया, महारानी, -का घोषणापत्र, २८७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|विजया, ३८७, -का गांधीजी द्वारा केश-वपन, ४०५}}
{{outdent|विटवाटर्स रैंड स्कूल निकाय, -का निर्णय कि भारतीय स्कूलोंमें भारतीय भाषाओंके माध्यमसे शिक्षा दी जाय, ३५१, ३५२; -द्वारा जोहानिसबर्गमें भारतीय स्कूलें स्थापित करनेके सम्बन्धमें शर्तें, ३५१ '''पा॰ टि॰;''' -द्वारा यूरोपीय और भारतीय शिक्षकोंके वेतनमें भेद, ३२३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|विटेकर, ३७४}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
q9a28u645zvjatxh4m9082q1o1gd8md
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७५
250
184271
672937
640143
2026-08-22T15:44:20Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
672937
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६३७}}
{{Multicol}}
{{outdent|वित्तीय सम्बन्ध विधेयक; -के अन्तर्गत परवानोंका नियंत्रण प्रान्तीय परिषदोंके हाथमें, ४४०}}
{{outdent|विल्सन, डॉ॰ वुडरो, ३४६}}
{{outdent|विल्सन, जस्टिस डोव, २१४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|विवाह; -गैर ईसाई पद्धतिसे हुए, सरकार द्वारा अमान्य: जनूबीका मामला, ५०२, मरियमबाईका मामला, ४९४, सर्वोच्च न्यायालयका फैसला, ४९३; -के बारेमें पोलकका भारत सरकारसे पत्र-व्यवहार ३१४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|विभीषण, १९२}}
{{outdent|विशनदास, हरचन्द्र राय, ४५३}}
{{outdent|विष्णु, २२१}}
{{outdent|विंटर बॉटम् (कुमारी), ३६३, ३६४, ३६६, ३७०, ३७४-७६, ३७८, ३७९, ३८३, ३८५, ३८६, ३८८-९०, ३९३-९६, ३९७, ४०३, ४०६}}
{{outdent|विंढम, -से श्री गोखलेकी भेंट, ४१०}}
{{outdent|वी, आह, ८३}}
{{outdent|वीरजी, २५२, ३९४, ३९९, ४१४, ४४६}}
{{outdent|वुड स्टॉक, मकादम, २१४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|वेथन, ३८०}}
{{outdent|'''वेद,''' १४१}}
{{outdent|वेदधर्म सभा, ३८३}}
{{outdent|वेनगोल्ड, ३४४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|वेयरन, वॉन, ९६}}
{{outdent|वेल्वी आयोग, ३०५}}
{{outdent|वेलसी, ३६४, ३६६, ३६८, ३६९, ३७३, ३७६, ३८०-८२, ३८४-८६, ३८८, ३८९, ३९२, ३९९, ४०५}}
{{outdent|वेसनराम, ३७३}}
{{outdent|वेस्ट, ए॰ एच॰, ६१, ११८, १७२, १८६, २५२ पा॰ टि॰, २५३-५५, ३६५-६६, ३७२, ३७४, ३७६-७९, ३८२-९०, ३९३, ३९५, ४०५, ४०६, ४१४}}
{{outdent|वेस्ट, श्रीमती, ३७९, ३९५}}
{{outdent|वेस्ट, एडा, देखिए देवी बहन}}
{{outdent|वैद्य प्रभुराम, १४७}}
{{outdent|वो, किम, ८३}}
{{outdent|वोरा, वली बहन, १२४, २३४, २९२}}
{{outdent|व्यापारी परवाने, (नों) -का प्रश्न गोखलेके प्रयत्नोंके बावजूद ज्योंका-त्यों, ३५४; -का वितरण स्थगित}}
{{Multicol-break}}
: करनेके बारेमें नेटाल विधेयक असम्मत, ९८; -के वितरणका गोरे व्यापारियों द्वारा विरोध, ५०३; -के हस्तान्तरणके लिये नेटाल व्यापारी परवाना अधिनियम द्वारा परिवर्तनकी माँग, ७१; -पर ट्रान्सवाल नगरपालिका अध्यादेशके मसविदेके अन्तर्गत नगरपालिकाओंको अधिकार, २०६; -पर वित्तीय सम्बन्ध विधेयकके अन्तर्गत प्रान्तीय परिषदोंको अधिकार, ४४०; -से भारतीय व्यापारियोंको वंचित करनेका नेटाल प्रान्तीय परिषद्का प्रयत्न, ७१
{{outdent|व्यावहारिक, मदनजीत, ४५३}}
{{outdent|व्यास, जयकृष्ण, १४५, १५० पा॰ टि॰, १५१}}
{{outdent|व्यास, जयशंकर, ३८३, ३९७}}
{{outdent|व्यास, श्रीमती जयशंकर, २९२ पा॰ टि॰}}
{{outdent|व्हाइट लीग, ९६}}
{{gap|7em}}{{larger|'''श'''}}
{{outdent|शान्ति, ४१५}}
{{outdent|शास्त्री, वी॰ एस॰ श्रीनिवास ३४३, ३५१}}
{{outdent|शान्तिरक्षा अध्यादेश, लॉर्ड मिलनरकी सलाहपर ट्रान्सवाल भारतीयों द्वारा स्वीकृत, २७९ पा॰ टि॰; - के अनुमति-पत्र, १४३; के अनुमति-पत्र-प्राप्त चीनियोंकी संख्या ८८, -के अनुमति-पत्र प्राप्त सत्याग्रही निष्कासितोंको अस्थायी समझौतेके अनुसार रोका नहीं जायगा, ४८}}
{{outdent|शाह, फूलचंद, ३९६}}
{{outdent|शिवपूजन, ३७४, ३७५, ३८१, ३८४, ३८६, ३९०, ४००, ४०२, ४०३, ४१५}}
{{outdent|शिवप्रसाद, ४०२}}
{{outdent|शिवलाल, ४१८}}
{{outdent|शेख, ३१६}}
{{outdent|शेख, एन॰ जे॰, ३९७}}
{{outdent|शेर, ३६४, ३६८, ३७१, ३९०}}
{{outdent|शेर, श्रीमती, ३६३, ३९३, ४१४}}
{{outdent|शेलत, यू॰ एम॰, ४८, ५७, ३६४, ३६८, ३७०, ३७३, ३७४, ३९३, ४०३}}
{{outdent|श्रम, १८७}}
{{outdent|श्राइनर, श्रीमती ऑलिव, ३३४ पा॰ टि॰, ४०८}}
{{outdent|श्राइनर, विलियम फिलिप, ३३४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|श्लेसिन, कु॰ सोंजा, १२, २२, ३०, ३५, ५७, १३०, १६९, १७९, ३६३ -से ३९०, ३९३}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
9baspfvfbpjt4aqys0wsokn5mls5u0m
672939
672937
2026-08-22T15:46:18Z
AMAN KUMAR
6475
Bold
672939
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६३७}}
{{Multicol}}
{{outdent|वित्तीय सम्बन्ध विधेयक; -के अन्तर्गत परवानोंका नियंत्रण प्रान्तीय परिषदोंके हाथमें, ४४०}}
{{outdent|विल्सन, डॉ॰ वुडरो, ३४६}}
{{outdent|विल्सन, जस्टिस डोव, २१४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|विवाह; -गैर ईसाई पद्धतिसे हुए, सरकार द्वारा अमान्य: जनूबीका मामला, ५०२, मरियमबाईका मामला, ४९४, सर्वोच्च न्यायालयका फैसला, ४९३; -के बारेमें पोलकका भारत सरकारसे पत्र-व्यवहार ३१४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|विभीषण, १९२}}
{{outdent|विशनदास, हरचन्द्र राय, ४५३}}
{{outdent|विष्णु, २२१}}
{{outdent|विंटर बॉटम् (कुमारी), ३६३, ३६४, ३६६, ३७०, ३७४-७६, ३७८, ३७९, ३८३, ३८५, ३८६, ३८८-९०, ३९३-९६, ३९७, ४०३, ४०६}}
{{outdent|विंढम, -से श्री गोखलेकी भेंट, ४१०}}
{{outdent|वी, आह, ८३}}
{{outdent|वीरजी, २५२, ३९४, ३९९, ४१४, ४४६}}
{{outdent|वुड स्टॉक, मकादम, २१४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|वेथन, ३८०}}
{{outdent|'''वेद,''' १४१}}
{{outdent|वेदधर्म सभा, ३८३}}
{{outdent|वेनगोल्ड, ३४४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|वेयरन, वॉन, ९६}}
{{outdent|वेल्वी आयोग, ३०५}}
{{outdent|वेलसी, ३६४, ३६६, ३६८, ३६९, ३७३, ३७६, ३८०-८२, ३८४-८६, ३८८, ३८९, ३९२, ३९९, ४०५}}
{{outdent|वेसनराम, ३७३}}
{{outdent|वेस्ट, ए॰ एच॰, ६१, ११८, १७२, १८६, २५२ '''पा॰ टि॰,''' २५३-५५, ३६५-६६, ३७२, ३७४, ३७६-७९, ३८२-९०, ३९३, ३९५, ४०५, ४०६, ४१४}}
{{outdent|वेस्ट, श्रीमती, ३७९, ३९५}}
{{outdent|वेस्ट, एडा, देखिए देवी बहन}}
{{outdent|वैद्य प्रभुराम, १४७}}
{{outdent|वो, किम, ८३}}
{{outdent|वोरा, वली बहन, १२४, २३४, २९२}}
{{outdent|व्यापारी परवाने, (नों) -का प्रश्न गोखलेके प्रयत्नोंके बावजूद ज्योंका-त्यों, ३५४; -का वितरण स्थगित}}
{{Multicol-break}}
: करनेके बारेमें नेटाल विधेयक असम्मत, ९८; -के वितरणका गोरे व्यापारियों द्वारा विरोध, ५०३; -के हस्तान्तरणके लिये नेटाल व्यापारी परवाना अधिनियम द्वारा परिवर्तनकी माँग, ७१; -पर ट्रान्सवाल नगरपालिका अध्यादेशके मसविदेके अन्तर्गत नगरपालिकाओंको अधिकार, २०६; -पर वित्तीय सम्बन्ध विधेयकके अन्तर्गत प्रान्तीय परिषदोंको अधिकार, ४४०; -से भारतीय व्यापारियोंको वंचित करनेका नेटाल प्रान्तीय परिषद्का प्रयत्न, ७१
{{outdent|व्यावहारिक, मदनजीत, ४५३}}
{{outdent|व्यास, जयकृष्ण, १४५, १५० '''पा॰ टि॰,''' १५१}}
{{outdent|व्यास, जयशंकर, ३८३, ३९७}}
{{outdent|व्यास, श्रीमती जयशंकर, २९२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|व्हाइट लीग, ९६}}
{{gap|7em}}{{larger|'''श'''}}
{{outdent|शान्ति, ४१५}}
{{outdent|शास्त्री, वी॰ एस॰ श्रीनिवास ३४३, ३५१}}
{{outdent|शान्तिरक्षा अध्यादेश, लॉर्ड मिलनरकी सलाहपर ट्रान्सवाल भारतीयों द्वारा स्वीकृत, २७९ '''पा॰ टि॰;''' - के अनुमति-पत्र, १४३; के अनुमति-पत्र-प्राप्त चीनियोंकी संख्या ८८, -के अनुमति-पत्र प्राप्त सत्याग्रही निष्कासितोंको अस्थायी समझौतेके अनुसार रोका नहीं जायगा, ४८}}
{{outdent|शाह, फूलचंद, ३९६}}
{{outdent|शिवपूजन, ३७४, ३७५, ३८१, ३८४, ३८६, ३९०, ४००, ४०२, ४०३, ४१५}}
{{outdent|शिवप्रसाद, ४०२}}
{{outdent|शिवलाल, ४१८}}
{{outdent|शेख, ३१६}}
{{outdent|शेख, एन॰ जे॰, ३९७}}
{{outdent|शेर, ३६४, ३६८, ३७१, ३९०}}
{{outdent|शेर, श्रीमती, ३६३, ३९३, ४१४}}
{{outdent|शेलत, यू॰ एम॰, ४८, ५७, ३६४, ३६८, ३७०, ३७३, ३७४, ३९३, ४०३}}
{{outdent|श्रम, १८७}}
{{outdent|श्राइनर, श्रीमती ऑलिव, ३३४ '''पा॰ टि॰,''' ४०८}}
{{outdent|श्राइनर, विलियम फिलिप, ३३४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|श्लेसिन, कु॰ सोंजा, १२, २२, ३०, ३५, ५७, १३०, १६९, १७९, ३६३ -से ३९०, ३९३}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
rm1z9up4d05u7cob2s9knnur85p70ch
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७६
250
184272
672950
640144
2026-08-22T16:06:33Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
672950
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
: -से ४०१, ४०५, ४११, ४१३, ४८१; -अंतमें भारत जाना संभव, ४८४; -द्वारा रेल विनियमोंका उल्लंघन, ३११
{{gap|8em}}{{larger|'''स'''}}
{{outdent|संघ सरकार, १६३, १९६, २८६, ३२८, ३३३, ३५५-५६; -का गोखलेको आश्वासन कि प्रवासी कानूनका अमल अनुचित रीतिसे नहीं किया जायगा, ३५५; -द्वारा दोबारा गिरमिट-करार करनेवाले भारतीयोंपर तीन पौंडी कर लादना विश्वासघातपूर्ण, १८१; -द्वारा नाबालिगोंको परेशान करना, हसनका मामला, ४९५; -द्वारा भारतीयोंके प्रति शत्रुताकी भावना नहीं, बोथाकी घोषणा, २२५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''सं'''घवी, ३६८, ३८७}}
{{outdent|'''संडे पोस्ट;''' -का भारतीयोंके सफाईके नियमोंके उल्लंघनका आरोप, ३००}}
{{outdent|सकाई, श्रीमती जमनाबाई नगीनदास, १६८}}
{{outdent|सकीना, ३२७}}
{{outdent|सकूर, तयब, ४११, ४१३}}
{{outdent|सत्य, वाणीका व आचारका, १४६; -सत्याग्रहकी बुनियाद, १५८, १७७; -के बलपर दुःखोंके समुद्र भी पार किये जा सकते हैं, २७१; -के बारेमें जागरूकता फीनिक्समें अनिवार्य, १८७; -के व धर्मके पालनेसे ही विजय, ९९}}
{{outdent|सत्याग्रह; देखिए अनाक्रामक प्रतिरोध}}
{{outdent|'''सत्याग्रह इन साउथ आफ्रिका,''' २ '''पा॰ टि॰,''' ६ '''पा॰ टि॰,''' (द॰ आ॰ स॰ इतिहास?) ११ '''पा॰ टि॰,''' -से १३ '''पा॰ टि॰,''' १७ '''पा॰ टि॰,''' २८ '''पा॰ टि॰,''' ३४ '''पा॰ टि॰,''' ४२ '''पा॰ टि॰,''' १८५ '''पा॰ टि॰,''' २५४ '''पा॰ टि॰,''' ३२३ '''पा॰ टि॰,''' ३३४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सदाकत आश्रम, ४५३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सदाशिव, यशवंत, ३८४}}
{{outdent|सफाई; -के नियमोंका भारतीयों द्वारा भंगकी '''संडे पोस्ट'''की टीका, ३००; -को जारी रखना भारतीयोंको अलग रखकर सम्भव नहीं, २०८}}
{{outdent|"समर्थही जीने योग्य", एक अवांछनीय तत्त्व, १८९-९०}}
{{outdent|सर्फुद्दीन, रसूल, ८८}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|सर्वेंटस् ऑफ इंडिया सोसायटी, ३४३; -गोखले द्वारा प्रस्थापित, ३०६}}
{{outdent|सर्वेंटस् ऑफ पीपुल सोसायटी, ४५३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सर्ले, न्यायाधीश; -का केप प्रवासी प्रतिबंधक अधिनियमके अन्तर्गत पाँच भारतीयोंके सम्बन्धमें निर्णय, ३१२}}
{{outdent|सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट), ३२५, ५०१; }}
:-(केप)के निर्णयानुसार इस्लामी विवाह केप प्रवासी कानूनसे विसंगत, ४९३, ४९४; -को नाथा ऊकाकी अपील, ३२८
:-(नाताल) ४२८ '''पा॰ टि॰''' ४७५; -द्वारा तीन पौंडी करके बारेमें मजिस्ट्रेटके विरुद्ध एन॰ मुडलेकी अपील नामंजूर, २३१, २३२; -प्रवासी अधिकारीके निर्णयको सुधारनेमें असमर्थ, २२७ '''पा॰ टि॰,''' ३१२
:-(ट्रान्सवाल), ११५ '''पा॰ टि॰,''' ५०३; -का एन॰ दला नाबालिग होनेके कारण उसे निष्कासित करनेकी आज्ञाको रद्द करनेका निर्णय, ११७;
: -का बाई रसूलको निवासी भारतीयकी पत्नी होनेके नाते प्रवेश देनेसे इन्कार, ११७-१८; -की दयालबंधुके मामलेमें निरोध आज्ञा, ४७३-७४
{{outdent|सलोमी, ३६३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सहाय, दयाराम, ४०३}}
{{outdent|सामी, ४०९}}
{{outdent|सारथी, भारत, ३५०}}
{{outdent|सारनासजी, गुलाम हुसेन, ४१३}}
{{outdent|साली, एम॰, २३६, ३७० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सालेजी, हकीम, ३६५}}
{{outdent|सॉअर, १९६}}
{{outdent|सॉलोमन, ४४, ३९६}}
{{outdent|सॉलोमन, सर रिचर्ड, ३४१}}
{{outdent|सिंगाराम, ३९६}}
{{outdent|सिंदिया, श्रीमंत सरदार बलवन्तराय भाईसाहेब -का वैष्णव-वानप्रस्थोंको आर्थिक प्रोत्साहन, ४४२}}
{{outdent|सिल्बर्न, मेजर, ३४७, ४१८; द्वारा गोखलेके निवेदनका विपर्यास, ४२१}}
{{outdent|'''सीक्रेट मेडिसिन्स,''' ४३२}}
{{outdent|सीदत, दाउद, २७१}}
{{outdent|सीनसिंगल, ३८५}}
{{outdent|सुग्रीव, ३५४}}
{{outdent|सुदामा, १४५, १५१}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
93daavlgfiongr506pvpje5r74kuwvu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७७
250
184273
673116
640145
2026-08-23T04:39:41Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673116
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६३९}}
{{Multicol}}
{{outdent|'''सुधारक,''' ३०५}}
{{outdent|सुनारा, मुहम्मद अहमद, ३९३}}
{{outdent|सुब्रह्मण्यम्, ३४८}}
{{outdent|सुलेमान, ३७०, ३७४, ३७५, ३८३, ३८५, ३८६, ३९२, ४०३}}
{{outdent|सूजी, ३८७}}
{{outdent|सूर्य-प्रकाश; -की आरोग्यके लिए आवश्यकता, ४४३}}
{{outdent|सेरिज, ४६८}}
{{outdent|सैंडर्स, ३४४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|सैक्सन, आर॰ एम॰ एस॰, ३२९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|सैम, ६७, २५२, ३९३}}
{{outdent|सैम, श्रीमती, ३९२}}
{{outdent|सोढा, आर॰ एम॰, २९ पा॰ टि॰, ४३, ५७, ९५, १५२, २७०, ३७४ से ३७८, ३८० से ३८२, ३९७; -को पंजीयनका अधिकार देनेकी स्मट्ससे प्रार्थना, ४९; -का युद्धपूर्व निवासीकी हैसियतसे ट्रान्सवाल प्रवेशका अधिकार, २९२; -को पंजीयनपत्र बिना व्यापारी-परवाना देनेके लिए प्रार्थना, २८३, २९२ पा॰ टि॰}}
{{outdent|सोढा, रंभाबाई, २९, ९५, १२५, १५२, २४८, २५५, ३८२, ३८५; -अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत, माफीकी पात्र, ३०, ३१, ३४-३५, ४०; -को कैद करनेका स्मट्सका इरादा नहीं, ३०, ३१, ३४-३६, ४०}}
{{outdent|सोनी, ३७५}}
{{outdent|सोनी, मोहन, ३६४}}
{{outdent|सोमाभाई, ३९५, ३९७}}
{{outdent|सोमाली, (एस॰ एस॰) १२२ पा॰ टि॰}}
{{outdent|सोल बेन, ३९२}}
{{outdent|'''स्टार,''' ४४, ४५, १०६, ११४, २२६ -की रिपोर्ट कि गोखलेसे मुलाकात लेनेके हकके लिए बोथा व हर्टसॉगके बीच झगड़ा, ४४७-४८; -से संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) के अन्तर्गत शिक्षा परीक्षाकी भर्त्सना, २२६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|'''(द) स्टार इन द ईस्ट,''' ३१० पा॰ टि॰}}
{{outdent|स्टीफन, न्यायाधीश, ४३१}}
{{outdent|स्टुअर्ट, कैप्टन, ३८२, ३८६}}
{{outdent|'''स्टेट्समन;''' -में प्रकाशित पत्रके अनुसार इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक भारत ही है, ४३६}}
{{outdent|स्टेड, श्रीमती, ३९३}}
{{outdent|स्टैटन, डॉ॰, ३९२}}
{{outdent|स्टैंडर्टन; -में गोखलेको मानपत्र, ४१०}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|स्पार्क्स, कैप्टन, १०५}}
{{outdent|'''(द) स्पीचेस ऑफ द ऑनरेबल मिस्टर जी॰ के॰ गोखले,''' ३०६}}
{{outdent|स्पैंडजिपन, एम॰, ४१६}}
{{outdent|'''स्पोर्टिंग स्टार,''' २५७}}
{{outdent|स्मट्स, जॉन क्रिश्चियन, ३, ५, ७, ९, १२, १५, १७, १८, २०, २१, २६, २८ से ३०, ३२ से ४०, ४३ से ५०, ५७ से ५९, ६२, ७४, ७७, ८०, ८४, ८९ से ९१, ९४, ९९, १०२, १०७, १२५, १५४, १५८, १९०, १९६, १९७, २०१, २१० से २१५, २२४, २२८, २३७, २३९, २४६, २६०, २६३, २७२, २८४, २९४ पा॰ टि॰, २९५, ३४७, ३६६, ३६७, ३७५; -का आश्वासन कि भारतीयोंकी माँगें पार्लियामेंटकी आगामी बैठकमें मान्य होंगी, ४१; -का आश्वासन कि कष्टपूर्ण आप्रजनके मामलोंमें खास राहत दी जायेगी, २३९; -का भारतीयोंके सम्बन्धमें ऑ॰ फ्री स्टेटका निर्बन्ध दूर करके संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) पास करा लेनेका इरादा, ३०; -का रंभाबाई सोढाको कैद करनेका इरादा नहीं, ३०, ३३, ३४-३५; -का संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२)के अन्तर्गत भारतीयोंका आंतरप्रांतीय प्रवास-सम्बन्धी रुख अग्राह्य २६३; -का संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) को वापस लेनेका (रद्द करनेका) निर्णय, ३७; -की गोखलेसे मुलाकात, ३५५ पा॰ टि॰, ४१०; -के सम्बन्धमें बोथाका कथन कि वे एशियाई समस्याको हल करनेमें 'सूखकर काँटा हो गये', २८४ पा॰ टि॰; -से चालू पार्लियामेंटकी बैठकमें ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम पास करा लेनेकी प्रार्थना, ३२, ३३, ३७-३८; -से संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) की संमतिके पूर्व छः भारतीयोंको ट्रान्सवालमें प्रवेश देनेकी प्रार्थना, ३१; -से सोढाको एक खास राहत देकर पंजीयनका हक देनेकी प्रार्थना, ४९}}
{{outdent|स्मार्ट, सर टॉमस, १२; -की गोखलेसे भेंट, ४१०}}
{{outdent|स्मिथ, कुमारी ए॰ ए॰, १६१, ४१७}}
{{outdent|स्मिथ, हैरी; -की कजिन्सके स्थानपर नेटाल प्रवासी अधिकारीकी हैसियतसे नियुक्ति, ४२९}}
{{outdent|स्वादेन्द्रिय; -के सन्तोषके लिए ही खाना आरोग्यके लिए हानिकारक, ४१७, ५०४; -को नियंत्रित करनेकी आवश्यकता, ४७०-७१}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7fan56hddigmym594awyqilcxzkysx6
673125
673116
2026-08-23T05:06:22Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
673125
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६३९}}
{{Multicol}}
{{outdent|'''सुधारक,''' ३०५}}
{{outdent|सुनारा, मुहम्मद अहमद, ३९३}}
{{outdent|सुब्रह्मण्यम्, ३४८}}
{{outdent|सुलेमान, ३७०, ३७४, ३७५, ३८३, ३८५, ३८६, ३९२, ४०३}}
{{outdent|सूजी, ३८७}}
{{outdent|सूर्य-प्रकाश; -की आरोग्यके लिए आवश्यकता, ४४३}}
{{outdent|सेरिज, ४६८}}
{{outdent|सैंडर्स, ३४४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सैक्सन, आर॰ एम॰ एस॰, ३२९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सैम, ६७, २५२, ३९३}}
{{outdent|सैम, श्रीमती, ३९२}}
{{outdent|सोढा, आर॰ एम॰, २९ '''पा॰ टि॰,''' ४३, ५७, ९५, १५२, २७०, ३७४ से ३७८, ३८० से ३८२, ३९७; -को पंजीयनका अधिकार देनेकी स्मट्ससे प्रार्थना, ४९; -का युद्धपूर्व निवासीकी हैसियतसे ट्रान्सवाल प्रवेशका अधिकार, २९२; -को पंजीयनपत्र बिना व्यापारी-परवाना देनेके लिए प्रार्थना, २८३, २९२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सोढा, रंभाबाई, २९, ९५, १२५, १५२, २४८, २५५, ३८२, ३८५; -अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत, माफीकी पात्र, ३०, ३१, ३४-३५, ४०; -को कैद करनेका स्मट्सका इरादा नहीं, ३०, ३१, ३४-३६, ४०}}
{{outdent|सोनी, ३७५}}
{{outdent|सोनी, मोहन, ३६४}}
{{outdent|सोमाभाई, ३९५, ३९७}}
{{outdent|'''सोमाली,''' (एस॰ एस॰) १२२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|सोल बेन, ३९२}}
{{outdent|'''स्टार,''' ४४, ४५, १०६, ११४, २२६ -की रिपोर्ट कि गोखलेसे मुलाकात लेनेके हकके लिए बोथा व हर्टसॉगके बीच झगड़ा, ४४७-४८; -से संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) के अन्तर्गत शिक्षा परीक्षाकी भर्त्सना, २२६ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''(द) स्टार इन द ईस्ट,''' ३१० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|स्टीफन, न्यायाधीश, ४३१}}
{{outdent|स्टुअर्ट, कैप्टन, ३८२, ३८६}}
{{outdent|'''स्टेट्समन;''' -में प्रकाशित पत्रके अनुसार इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक भारत ही है, ४३६}}
{{outdent|स्टेड, श्रीमती, ३९३}}
{{outdent|स्टैंटन, डॉ॰, ३९२}}
{{outdent|स्टैंडर्टन; -में गोखलेको मानपत्र, ४१०}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|स्पार्क्स, कैप्टन, १०५}}
{{outdent|'''(द) स्पीचेस ऑफ द ऑनरेबल मिस्टर जी॰ के॰ गोखले,''' ३०६}}
{{outdent|स्पैंडजियन, एम॰, ४१६}}
{{outdent|'''स्पोर्टिंग स्टार,''' २५७}}
{{outdent|स्मट्स, जॉन क्रिश्चियन, ३, ५, ७, ९, १२, १५, १७, १८, २०, २१, २६, २८ से ३०, ३२ से ४०, ४३ से ५०, ५७ से ५९, ६२, ७४, ७७, ८०, ८४, ८९ से ९१, ९४, ९९, १०२, १०७, १२५, १५४, १५८, १९०, १९६, १९७, २०१, २१० से २१५, २२४, २२८, २३७, २३९, २४६, २६०, २६३, २७२, २८४, २९४ '''पा॰ टि॰,''' २९५, ३४७, ३६६, ३६७, ३७५; -का आश्वासन कि भारतीयोंकी माँगें पार्लियामेंटकी आगामी बैठकमें मान्य होंगी, ४१; -का आश्वासन कि कष्टपूर्ण आप्रजनके मामलोंमें खास राहत दी जायेगी, २३९; -का भारतीयोंके सम्बन्धमें ऑ॰ फ्री स्टेटका निर्बन्ध दूर करके संघ प्रवासी प्रतिबन्धक वधेयक (१९१२) पास करा लेनेका इरादा, ३०; -का रंभाबाई सोढाको कैद करनेका इरादा नहीं, ३०, ३३, ३४-३५; -का संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२)के अन्तर्गत भारतीयोंका आंतरप्रांतीय प्रवास-सम्बन्धी रुख अग्राह्य २६३; -का संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) को वापस लेनेका (रद करनेका) निर्णय, ३७; -की गोखलेसे मुलाकात, ३५५ '''पा॰ टि॰,''' ४१०; -के सम्बन्धमें बोथाका कथन कि वे एशियाई समस्याको हल करनेमें 'सूखकर काँटा हो गये', २८४ '''पा॰ टि॰;''' -से चालू पार्लियामेंटकी बैठकमें ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम पास करा लेनेकी प्रार्थना, ३२, ३३, ३७-३८; -से संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) की संमतिके पूर्व छः भारतीयोंको ट्रान्सवालमें प्रवेश देनेकी प्रार्थना, ३१; -से सोढाको एक खास राहत देकर पंजीयनका हक देनेकी प्रार्थना, ४९}}
{{outdent|स्मार्ट, सर टॉमस, १२; -की गोखलेसे भेंट, ४१०}}
{{outdent|स्मिथ, कुमारी ए॰ ए॰, १६१, ४१७}}
{{outdent|स्मिथ, हैरी; -की कज़िन्सके स्थानपर नेटाल प्रवासी अधिकारीकी हैसियतसे नियुक्ति, ४२९}}
{{outdent|स्वादेन्द्रिय; -के सन्तोषके लिए ही खाना आरोग्यके लिए हानिकारक, ४१७, ५०४; -को नियंत्रित करनेकी आवश्यकता, ४७०-७१}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
159g80fw9ge70epcse9sd7mdwuzanod
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६७८
250
184274
673117
640146
2026-08-23T04:42:21Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673117
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ह'''}}
{{outdent|हंटर, ३९७}}
{{outdent|हंटर, सर डेविड, ३६, ३४७ पा॰ टि॰}}
{{outdent|हक, अब्दुल, ३९१, ४०१, ४०५, ४०६, ४१५}}
{{outdent|हक, मौलाना मजहरूल, ४५२, ४५३}}
{{outdent|हजूरासिंह, ३७४, ३८७}}
{{outdent|हठयोग, -की तुलनामें भक्तियोग ज्यादा अच्छा, ६४}}
{{outdent|हनीफ, ३६८, ३७०, ३७३, ३७५, ३७६, ३७८, ३८१ से ८४, ३९०, ३९२, ३९९, ४०२}}
{{outdent|हबीब, हाजी, ३०८, ३६५, ३७९, ३९१, ३९५}}
{{outdent|हमीदिया इस्लामिया अंजुमन, ११८, १३७, २०९ पा॰ टि॰ २३९, ३०७, ३०८, ३३१, -द्वारा गोखलेको मानपत्र, ३३८ पा॰ टि॰; -द्वारा न्यायाधीश वेसेल्सके एकसे अधिक भारतीय पत्नियों सम्बन्धी निर्णयका विरोध, ११५-१६, ११८; -द्वारा लन्दनमें मस्जिद तथा अलीगढ़में विद्यापीठकी स्थापनाका निर्णय, ८१; -से भारतीय पत्नियोंके सम्बन्धमें न्याय प्राप्त होने तक संघर्ष करते रहनेकी गांधीजीकी अपेक्षा, २४०}}
{{outdent|हरकोर्ट, १९५ पा॰ टि॰, १९६ से १९८, २६८ पा॰ टि॰, ३४१; -का नाथलियाके मामलेमें हस्तक्षेप करनेसे इन्कार २३८; -का तीन पौंडी करके सम्बन्धमें दुर्भाग्यपूर्ण उत्तर, १८३}}
{{outdent|हर्थ, श्रीमती, १९५}}
{{outdent|हलीम, ३७६}}
{{outdent|हलीम, मुहम्मद, ३७९}}
{{outdent|हसन, ३६४, ३८७, ३९७; -के जन्मका प्रमाण-पत्र न होनेके कारण उसे प्रवेशकी मुमानियत, ४९५}}
{{outdent|हॉथोर्न, मार्क हेनरी, -की फीनिक्सके न्यास-पत्रपर साक्ष, ३१८}}
{{outdent|हाफेजी, मुहम्मद, ३९३}}
{{outdent|हार्डिज, लॉर्ड, -पर घातक हमलेकी भर्त्सना, ३५९}}
{{outdent|हार्डिज, लेडी, बाल-बाल बच गईं, ३५९}}
{{outdent|हॉलैंडर, एफ॰ सी॰, ३४७ पा॰ टि॰}}
{{outdent|हॉवर्ड, ३७१}}
{{outdent|हासिम, मुहम्मद, ३८२, ३८७, ३८९}}
{{outdent|हासिम, हाजी, ३९१}}
{{outdent|हॉस्केन, विलियम, ७७ पा॰ टि॰, ९८, १०६, १४४ पा॰ टि॰, २९०, ३३१, ४०५ -से ४०९}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|'''हिन्द स्वराज,''' १४८ पा॰ टि॰}}
{{outdent|हिन्दू, अपने असली धर्मको भुला बैठे हैं, १२१; -और मुसलमानोंके बीच भेद दृष्टि, २०; -और मुसलमानोंमें एकता, ८१, १६९-७०, २७१; -गोखलेके स्वागतके लिए, २९८}}
{{outdent|हिन्दू मण्डल, देखिए हिन्दू संघ}}
{{outdent|हिन्दू संघ, १३०, १६६}}
{{outdent|हिन्दू सम्मेलन (कान्फरेंस), -निरा ढोंग और प्रदर्शन-बाजी, ३९९}}
{{outdent|हिरानन्द, ११}}
{{outdent|हुसेन, ३६५, ३६६, ३६७, ३७०, ३७३, ३७४, ३८२}}
{{outdent|हेट फोक, १८२ पा॰ टि॰}}
{{outdent|हेट सॉग (हर्ट सॉग) जनरल, २५९; -कट्टर एशियाई विरोधी, ४४८; -का गोखलेकी मुलाकातके सम्बन्धमें बोथासे झगड़ा, ४४७-४८, ४५७; -का मन्त्रि-मंडलसे हटाया जाना, ४४८, -का मत कि "दक्षिण आफ्रिकाके हितोंका महत्त्व सर्वोपरि", ४४८ पा॰ टि॰; -का शिक्षाके सम्बन्धमें मत, १४०-४१}}
{{outdent|'''हेराल्ड,''' १५, २२}}
{{outdent|ह्यूम, एलेन, ऑक्टेवियन, -का देहान्त, ३१०-११}}
{{outdent|ह्यूलेट, जी॰ एच॰; -का प्रस्ताव कि व्यापारी परवानोंके नियंत्रणका अधिकार प्रान्तीय परिषद्को दिया जाय, ७१ पा॰ टि॰; ४४०-४१}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर जॉन, ४१४}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर लिएझ, १७५}}
{{outdent|हेग, डॉ॰ -द्वारा सिद्ध कि दाल आदि खाद्य बहुत हानिकारक पदार्थ हैं ४९९; -द्वारा सिद्ध कि मांस भक्षणसे अम्लत्व पैदा होता है, ५०७}}
{{outdent|हेवार्ट, डॉ॰ ५}}
{{outdent|हैंड्स, हैरी, ३३२}}
{{gap|7em}}{{larger|'''क्ष'''}}
{{outdent|क्षय, ४४१; -आधुनिक सभ्यताका परिपाक, २५०; -का कारण दूषित हवा, ४५१; -के उपचारोंमें खुली हवाका महत्त्व, १२४, १३१; -के निवारणकी डर्बनमें मुहीम, १३१-३२}}
{{outdent|क्षय आयोग, २५०, २५२}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7wkkv3gsnv80wryeted687p79sbcfzw
673130
673117
2026-08-23T05:17:43Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
673130
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ह'''}}
{{outdent|हंटर, ३९७}}
{{outdent|हंटर, सर डेविड, ३६, ३४७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हक, अब्दुल, ३९१, ४०१, ४०५, ४०६, ४१५}}
{{outdent|हक, मौलाना मजहरूल, ४५२, ४५३}}
{{outdent|हजूरासिंह, ३७४, ३८७}}
{{outdent|हठयोग, -की तुलनामें भक्तियोग ज्यादा अच्छा, ६४}}
{{outdent|हनीफ, ३६८, ३७०, ३७३, ३७५, ३७६, ३७८, ३८१ से ८४, ३९०, ३९२, ३९९, ४०२}}
{{outdent|हबीब, हाजी, ३०८, ३६५, ३७९, ३९१, ३९५}}
{{outdent|हमीदिया इस्लामिया अंजुमन, ११८, १३७, २०९ '''पा॰ टि॰''' २३९, ३०७, ३०८, ३३१, -द्वारा गोखलेको मानपत्र, ३३८ '''पा॰ टि॰;''' -द्वारा न्यायाधीश वेसेल्सके एकसे अधिक भारतीय पत्नियों सम्बन्धी निर्णयका विरोध, ११५-१६, ११८; -द्वारा लन्दनमें मस्जिद तथा अलीगढ़में विद्यापीठकी स्थापनाका निर्णय, ८१; -से भारतीय पत्नियोंके सम्बन्धमें न्याय प्राप्त होने तक संघर्ष करते रहनेकी गांधीजीकी अपेक्षा, २४०}}
{{outdent|हरकोर्ट, १९५ '''पा॰ टि॰,''' १९६ से १९८, २६८ '''पा॰ टि॰,''' ३४१; -का नाथलियाके मामलेमें हस्तक्षेप करनेसे इन्कार २३८; -का तीन पौंडी करके सम्बन्धमें दुर्भाग्यपूर्ण उत्तर, १८३}}
{{outdent|हर्थ, श्रीमती, १९५}}
{{outdent|हलीम, ३७६}}
{{outdent|हलीम, मुहम्मद, ३७९}}
{{outdent|हसन, ३६४, ३८७, ३९७; -के जन्मका प्रमाण-पत्र न होनेके कारण उसे प्रवेशकी मुमानियत, ४९५}}
{{outdent|हॉथॉर्न, मार्क हेनरी, -की फीनिक्सके न्यास-पत्रपर साक्ष, ३१८}}
{{outdent|हाफेजी, मुहम्मद, ३९३}}
{{outdent|हार्डिंज़, लॉर्ड, -पर घातक हमलेकी भर्त्सना, ३५९}}
{{outdent|हार्डिज, लेडी, बाल-बाल बच गईं, ३५९}}
{{outdent|हॉलैंडर, एफ॰ सी॰, ३४७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हॉवर्ड, ३७१}}
{{outdent|हासिम, मुहम्मद, ३८२, ३८७, ३८९}}
{{outdent|हासिम, हाजी, ३९१}}
{{outdent|हॉस्केन, विलियम, ७७ '''पा॰ टि॰,''' ९८, १०६, १४४ '''पा॰ टि॰,''' २९०, ३३१, ४०५ -से ४०९}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|'''हिन्द स्वराज,''' १४८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हिन्दू, अपने असली धर्मको भुला बैठे हैं, १२१; -और मुसलमानोंके बीच भेद दृष्टि, २०; -और मुसलमानोंमें एकता, ८१, १६९-७०, २७१; -गोखलेके स्वागतके लिए, २९८}}
{{outdent|हिन्दू मण्डल, देखिए हिन्दू संघ}}
{{outdent|हिन्दू संघ, १३०, १६६}}
{{outdent|हिन्दू सम्मेलन (कान्फरेंस), -निरा ढोंग और प्रदर्शन-बाजी, ३९९}}
{{outdent|हिरानन्द, ११}}
{{outdent|हुसेन, ३६५, ३६६, ३६७, ३७०, ३७३, ३७४, ३८२}}
{{outdent|हेट फोक, १८२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हेट सॉग (हर्ट सॉग) जनरल, २५९; -कट्टर एशियाई विरोधी, ४४८; -का गोखलेकी मुलाकातके सम्बन्धमें बोथासे झगड़ा, ४४७-४८, ४५७; -का मन्त्रि-मंडलसे हटाया जाना, ४४८, -का मत कि "दक्षिण आफ्रिकाके हितोंका महत्त्व सर्वोपरि", ४४८ '''पा॰ टि॰;''' -का शिक्षाके सम्बन्धमें मत, १४०-४१}}
{{outdent|हेराल्ड, १५, २२}}
{{outdent|ह्यूम, एलेन, ऑक्टेवियन, -का देहान्त, ३१०-११}}
{{outdent|ह्यूलेट, जी॰ एच॰; -का प्रस्ताव कि व्यापारी परवानोंके नियंत्रणका अधिकार प्रान्तीय परिषद्को दिया जाय, ७१ '''पा॰ टि॰;''' ४४०-४१}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर जॉन, ४१४}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर लिएझ, १७५}}
{{outdent|हेग, डॉ॰ -द्वारा सिद्ध कि दाल आदि खाद्य बहुत हानिकारक पदार्थ हैं ४९९; -द्वारा सिद्ध कि मांस भक्षणसे अम्लत्व पैदा होता है, ५०७}}
{{outdent|हेवार्ट, डॉ॰ ५}}
{{outdent|हैंड्स, हैरी, ३३२}}
{{gap|7em}}{{larger|'''क्ष'''}}
{{outdent|'''क्षय,''' ४४१; -आधुनिक सभ्यताका परिपाक, २५०; -का कारण दूषित हवा, ४५१; -के उपचारोंमें खुली हवाका महत्त्व, १२४, १३१; -के निवारणकी डर्बनमें मुहीम, १३१-३२}}
{{outdent|क्षय आयोग, २५०, २५२}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
8adg517ezj0sjajd3o0u4ss8dozhtbj
673131
673130
2026-08-23T05:22:20Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
673131
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ह'''}}
{{outdent|हंटर, ३९७}}
{{outdent|हंटर, सर डेविड, ३६, ३४७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हक, अब्दुल, ३९१, ४०१, ४०५, ४०६, ४१५}}
{{outdent|हक, मौलाना मजहरूल, ४५२, ४५३}}
{{outdent|हजूरासिंह, ३७४, ३८७}}
{{outdent|हठयोग, -की तुलनामें भक्तियोग ज्यादा अच्छा, ६४}}
{{outdent|हनीफ, ३६८, ३७०, ३७३, ३७५, ३७६, ३७८, ३८१ से ८४, ३९०, ३९२, ३९९, ४०२}}
{{outdent|हबीब, हाजी, ३०८, ३६५, ३७९, ३९१, ३९५}}
{{outdent|हमीदिया इस्लामिया अंजुमन, ११८, १३७, २०९ '''पा॰ टि॰''' २३९, ३०७, ३०८, ३३१, -द्वारा गोखलेको मानपत्र, ३३८ '''पा॰ टि॰;''' -द्वारा न्यायाधीश वेसेल्सके एकसे अधिक भारतीय पत्नियों सम्बन्धी निर्णयका विरोध, ११५-१६, ११८; -द्वारा लन्दनमें मस्जिद तथा अलीगढ़में विद्यापीठकी स्थापनाका निर्णय, ८१; -से भारतीय पत्नियोंके सम्बन्धमें न्याय प्राप्त होने तक संघर्ष करते रहनेकी गांधीजीकी अपेक्षा, २४०}}
{{outdent|हरकोर्ट, १९५ '''पा॰ टि॰,''' १९६ से १९८, २६८ '''पा॰ टि॰,''' ३४१; -का नाथलियाके मामलेमें हस्तक्षेप करनेसे इन्कार २३८; -का तीन पौंडी करके सम्बन्धमें दुर्भाग्यपूर्ण उत्तर, १८३}}
{{outdent|हर्थ, श्रीमती, १९५}}
{{outdent|हलीम, ३७६}}
{{outdent|हलीम, मुहम्मद, ३७९}}
{{outdent|हसन, ३६४, ३८७, ३९७; -के जन्मका प्रमाण-पत्र न होनेके कारण उसे प्रवेशकी मुमानियत, ४९५}}
{{outdent|हॉथॉर्न, मार्क हेनरी, -की फीनिक्सके न्यास-पत्रपर साक्ष, ३१८}}
{{outdent|हाफेजी, मुहम्मद, ३९३}}
{{outdent|हार्डिंज़, लॉर्ड, -पर घातक हमलेकी भर्त्सना, ३५९}}
{{outdent|हार्डिज, लेडी, बाल-बाल बच गईं, ३५९}}
{{outdent|हॉलैंडर, एफ॰ सी॰, ३४७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हॉवर्ड, ३७१}}
{{outdent|हासिम, मुहम्मद, ३८२, ३८७, ३८९}}
{{outdent|हासिम, हाजी, ३९१}}
{{outdent|हॉस्केन, विलियम, ७७ '''पा॰ टि॰,''' ९८, १०६, १४४ '''पा॰ टि॰,''' २९०, ३३१, ४०५ -से ४०९}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|'''हिन्द स्वराज,''' १४८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हिन्दू, अपने असली धर्मको भुला बैठे हैं, १२१; -और मुसलमानोंके बीच भेद दृष्टि, २०; -और मुसलमानोंमें एकता, ८१, १६९-७०, २७१; -गोखलेके स्वागतके लिए, २९८}}
{{outdent|हिन्दू मण्डल, देखिए हिन्दू संघ}}
{{outdent|हिन्दू संघ, १३०, १६६}}
{{outdent|हिन्दू सम्मेलन (कान्फरेंस), -निरा ढोंग और प्रदर्शन-बाजी, ३९९}}
{{outdent|हिरानन्द, ११}}
{{outdent|हुसेन, ३६५, ३६६, ३६७, ३७०, ३७३, ३७४, ३८२}}
{{outdent|हेट फोक, १८२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|हेट सॉग (हर्ट सॉग) जनरल, २५९; -कट्टर एशियाई विरोधी, ४४८; -का गोखलेकी मुलाकातके सम्बन्धमें बोथासे झगड़ा, ४४७-४८, ४५७; -का मन्त्रि-मंडलसे हटाया जाना, ४४८, -का मत कि "दक्षिण आफ्रिकाके हितोंका महत्त्व सर्वोपरि", ४४८ '''पा॰ टि॰;''' -का शिक्षाके सम्बन्धमें मत, १४०-४१}}
{{outdent|हेराल्ड, १५, २२}}
{{outdent|ह्यूम, एलेन, ऑक्टेवियन, -का देहान्त, ३१०-११}}
{{outdent|ह्यूलेट, जी॰ एच॰; -का प्रस्ताव कि व्यापारी परवानोंके नियंत्रणका अधिकार प्रान्तीय परिषद्को दिया जाय, ७१ '''पा॰ टि॰;''' ४४०-४१}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर जॉन, ४१४}}
{{outdent|ह्यूलेट, सर लिएझ, १७५}}
{{outdent|हेग, डॉ॰ -द्वारा सिद्ध कि दाल आदि खाद्य बहुत हानिकारक पदार्थ हैं ४९९; -द्वारा सिद्ध कि मांस भक्षणसे अम्लत्व पैदा होता है, ५०७}}
{{outdent|हेवार्ट, डॉ॰ ५}}
{{outdent|हैंड्स, हैरी, ३३२}}
{{gap|7em}}{{larger|'''क्ष'''}}
{{outdent|'''क्षय,''' ४४१; -आधुनिक सभ्यताका परिपाक, २५०; -का कारण दूषित हवा, ४५१; -के उपचारोंमें खुली हवाका महत्त्व, १२४, १३१; -के निवारणकी डर्बनमें मुहीम, १३१-३२}}
{{outdent|क्षय आयोग, २५०, २५२}}
{{Multicol-end}}
{{Rule|5em}}<noinclude></noinclude>
8x2ofojisi6m9s6w62hmpj5ij4bgpia
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७८
250
184897
672831
641177
2026-08-22T12:19:39Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672831
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''१५९. तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और
एस॰ श्रीनिवास आयंगारको'''<ref>यह श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस॰ श्रीनिवास आयंगारके ६ जुलाईको मद्राससे दियेगये इस तारके उत्तरमें भेजा गया था : "बम्बईमें कार्य आरम्भ कर देनेके बाद यहाँ जल्दी ही दो सप्ताहके दौरेके लिए जरूर आये।"</ref>}}}}
{{Right|[६ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]}}
कांग्रेस महासमितिकी बैठक और अन्य दायित्वोंको देखते हुए अगस्तसे पहले दो सप्ताह देना असम्भव।
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६२) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|बुधवार [६ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>'२५ लाख' के उल्लेखसे प्रतीत होता है कि यह पत्र ३० जूनके बाद पड़नेवाले बुधवार अथवा उसके बाद अर्थात ६ जुलाईको लिखा गया था; देखिए "नवजीवन' को तार", १-७-१९२१।</ref>}}
{{Left|चि॰ महादेव,}}
कल तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो लिखा था सो मैं समझ ही गया था। मैंने न उलटा अर्थ किया और न करनेकी मेरी आदत है। जब एक वाक्यके दो अर्थ होते हों तब जो अर्थ हमारे प्रतिकूल पड़े उसे ही अपने ऊपर लागू करना चाहिए; यही उचित है और यही सच भी है। उपर्युक्त दोनों वाक्योंमें यह दोष नहीं था। दोष तो मैंने जो बताया वही था। २५ लाख मानना हमारे कोई विशेष अनुकूल नहीं होता; क्योंकि इस रकमके बिना भी एक करोड़ हो गये थे और अन्तिम पत्र लिखनेके बाद ही यह तार आया था। वे एक लाख चरखे दानमें देना चाहते हैं अथवा कम दाममें देना चाहते हैं इससे भी हमारे कार्यमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अभीतक एक लाख चरखोंवाले वाक्यका मैं दूसरा अर्थ नहीं करता। लेकिन वाक्योंका अर्थ लगानेमें उतावली की गई है और यह उतावली भी आसक्तिकी सूचक है। आसक्तिमें हमेशा असत्य ही भरा होता है। अनासक्त पुरुषके पास सोचने-विचारनेका समय होता है और वह कुछ ऐसा ही अर्थ करता है जिससे विरोधी पक्षका बचाव हो सके और यदि व्यक्ति सत्यनिष्ठ है तो जैसा मैंने बताया है वह पत्र-लेखकके अभिप्रायकी सही कल्पना कर लेता है।
तुम्हारे बारेमें पढ़ा। जो हुआ सो विपरीत हुआ। इससे यह प्रकट होता है कि हम किस तरह भूलमें पड़ जाते हैं। सच्चा प्रायश्चित्त तो यही हो सकता है कि<noinclude></noinclude>
j93g9aho8ihm142kc3u3z846gf2mput
672832
672831
2026-08-22T12:20:05Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
672832
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''१५९. तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस॰ श्रीनिवास आयंगारको'''<ref>यह श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस॰ श्रीनिवास आयंगारके ६ जुलाईको मद्राससे दियेगये इस तारके उत्तरमें भेजा गया था : "बम्बईमें कार्य आरम्भ कर देनेके बाद यहाँ जल्दी ही दो सप्ताहके दौरेके लिए जरूर आये।"</ref>}}}}
{{Right|[६ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]}}
कांग्रेस महासमितिकी बैठक और अन्य दायित्वोंको देखते हुए अगस्तसे पहले दो सप्ताह देना असम्भव।
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६२) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|बुधवार [६ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>'२५ लाख' के उल्लेखसे प्रतीत होता है कि यह पत्र ३० जूनके बाद पड़नेवाले बुधवार अथवा उसके बाद अर्थात ६ जुलाईको लिखा गया था; देखिए "नवजीवन' को तार", १-७-१९२१।</ref>}}
{{Left|चि॰ महादेव,}}
कल तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो लिखा था सो मैं समझ ही गया था। मैंने न उलटा अर्थ किया और न करनेकी मेरी आदत है। जब एक वाक्यके दो अर्थ होते हों तब जो अर्थ हमारे प्रतिकूल पड़े उसे ही अपने ऊपर लागू करना चाहिए; यही उचित है और यही सच भी है। उपर्युक्त दोनों वाक्योंमें यह दोष नहीं था। दोष तो मैंने जो बताया वही था। २५ लाख मानना हमारे कोई विशेष अनुकूल नहीं होता; क्योंकि इस रकमके बिना भी एक करोड़ हो गये थे और अन्तिम पत्र लिखनेके बाद ही यह तार आया था। वे एक लाख चरखे दानमें देना चाहते हैं अथवा कम दाममें देना चाहते हैं इससे भी हमारे कार्यमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अभीतक एक लाख चरखोंवाले वाक्यका मैं दूसरा अर्थ नहीं करता। लेकिन वाक्योंका अर्थ लगानेमें उतावली की गई है और यह उतावली भी आसक्तिकी सूचक है। आसक्तिमें हमेशा असत्य ही भरा होता है। अनासक्त पुरुषके पास सोचने-विचारनेका समय होता है और वह कुछ ऐसा ही अर्थ करता है जिससे विरोधी पक्षका बचाव हो सके और यदि व्यक्ति सत्यनिष्ठ है तो जैसा मैंने बताया है वह पत्र-लेखकके अभिप्रायकी सही कल्पना कर लेता है।
तुम्हारे बारेमें पढ़ा। जो हुआ सो विपरीत हुआ। इससे यह प्रकट होता है कि हम किस तरह भूलमें पड़ जाते हैं। सच्चा प्रायश्चित्त तो यही हो सकता है कि<noinclude></noinclude>
3g83h5m1o5vnda27owk4lfqqjyxu1of
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७९
250
184898
672836
641178
2026-08-22T12:27:49Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672836
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||पत्र : महादेव देसाईको|३४७}}</noinclude>फिर कभी ऐसा न हो। तथापि मैं निम्नलिखित सुझाव देता हूँ। प्रत्येक एकादशीको सिर्फ एक सेर, ८० तोला, गर्म दूध पर रहो। न फल लो, न शक्कर। और वह दूध भी दो या तीन बारमें पियो, एक ही बारमें नहीं। अगली एकादशीसे ऐसा एक वर्षतक करो।
श्रीमद् राजचन्द्रजीके<ref>श्रीमद् राजचन्द्र, जिनका गांधीजीपर बहुत प्रभाव पड़ा; देखिए खण्ड १३, पृष्ठ १४६।</ref> लेखोंको पढ़ जाना और उनपर विचार करना।
तुलसीदासकी 'मणिरत्नमाला' पढ़कर उसपर मनन करना।
भर्तृहरिके 'वैराग्यशतक' को पढ़ उसपर अच्छी तरहसे विचार करना।
'योगवासिष्ठ' का वैराग्य प्रकरण खूब ध्यानसे पढ़ जाना।
हर रोज कमसे-कम एक घंटा चरखा कातना और उस समय हमेशा यह विचार करना कि इस यज्ञके द्वारा मनकी मलिनता धुल जाये। यह भी एक वर्षतक करना, यात्रा और बीमारी अपवाद हैं।
सवेरे उठनेपर अन्य समस्त कार्य बादमें करना। सवेरे उठ शौचादि करना हो तो वह करके, यदि आश्रममें हो तो प्रार्थना करके, आध घंटेतक चुपचाप उपर्युक्त पुस्तकोंका पाठ करना और बादमें एक घंटा चरखा चलाना। इसके बाद कुछ और काम करना।
एक वर्षके लिए नौ बजनेसे पहले सो जाना और चार बजनेके बाद बिस्तरपर कतई न रहना। इस कार्यक्रममें परिवर्तन तभी हो सकता है जब तुम बीमार पड़ो।
इस प्रायश्चित्तका विधान करते समय मैं दोषको बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहता और न ही मैं उसको कम मानता हूँ। इसमें से तुम्हें जो-कुछ निकालना हो उसे निकाल देना। लेकिन लोक-लाजके अधीन होकर चरखेको मत निकालना। और लोक-लाज अथवा लोक-सेवाके विचारसे नौ बजे सोना मत छोड़ना। 'इंडिपेंडेंट' को आड़े नहीं आने देना। ...दैनिकके लिए लिखनेके लिए रातको जागनेकी जरूरत नहीं है। और फिर जिस शैलीसे हम चलाना चाहते हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं है।
और जान लो कि ऊपरका डेढ़ घंटा तो मौनका ही है। देवदासने निर्दोष भावसे तुम्हारे पत्रको पढ़ना शुरू किया, इससे उसे रोकना मुझे उचित नहीं लगा।
तुमने न आने का जो कारण दिया है वह सबल है इसलिए चाहो तो मत आओ। पण्डितजी अथवा जोसेफ भेजें और आओ, यह अलहदा बात है। तुम्हारे न आनेकी मुझे चिन्ता नहीं; लेकिन अगर आ जाते तो मुझे खुशी ही होती।
तुम्हारे दोषको देखनेपर मेरे प्रेममें कोई कमी आ जायेगी, ऐसा तो तुम कभी नहीं मानोगे। मैं पूर्ण होऊँ तो कमीको अवकाश नहीं हो सकता। मैं अपूर्ण मुमुक्षु अगर दूसरोंके दोषोंको बढ़ा-चढ़ाकर देखूँ तो अपनी अपूर्णतामें वृद्धि करूँगा।
मैंने नित्य-स्मरण करनेके लिए कहा है तथापि ग्लानि नहीं होनी चाहिए। शुद्ध पश्चात्ताप ग्लानिका विरोधी है। पाप लम्बा मुँह बनाता है। मलिनताका स्मरण हमें विनम्र बनाता है, ग्लानि कभी नहीं देता।<noinclude></noinclude>
0on5yvbwmg9sk98zp32uiklksug07zg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८०
250
184899
672846
641179
2026-08-22T12:45:35Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672846
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'सुख दुःखे समेकृत्वा'<ref>'''भगवद्गीता,''' २–३८।</ref> की बात यहाँ भी लागू होती है।
{{Right|{{Larger|'''बापूके आशीर्वाद'''}}}}
गुजराती पत्र (एस॰ एन॰ ११४२९) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६१. कपड़े व्यापारियोंको खुला पत्र'''}}}}
{{Right|७ जुलाई, १९२१}}
{{Left|सज्जनो,}}
कल मैंने मिल-मालिकोंको विदेशी कपड़ेके बहिष्कार-आन्दोलनमें सहायता देनेके लिए निमन्त्रित किया था। सम्भव है वे सहायता दें, शायद न भी दें। आशा तो यही है कि वे सहायता देंगे। लेकिन आपका इस आन्दोलनसे अलग रह सकना असम्भव है, क्योंकि आपमें से अधिकतर लोग असहयोगमें पक्का विश्वास रखनेवाले हैं। आपके सहयोगसे तिलक स्मारक-कोषके सम्बन्धमें हमारी बेजवाड़ामें की गई प्रतिज्ञाकी पूर्ति सम्भव हुई है। लेकिन आप कहेंगे कि चन्दा देना तो हमारे लिए एक छोटी-सी बात थी किन्तु हमारा व्यापार हमारे लिए जीवन-मरणका मामला है। इसी प्रकारके भ्रमके कारण हमें स्वराज्य नहीं मिल रहा है। यदि आपका व्यापार आपके लिए जीवन-मरणका मामला है तो क्या देशका हित आपके नजदीक उससे कम महत्त्व रखता है? स्वराज्यका अर्थ यह है कि मैं और आप लोग निजी व्यापारसे देशके व्यापारको अधिक महत्त्व दें। दूसरे शब्दोंमें आपसे विदेशी कपड़ा न मँगानेका जो अनुरोध किया गया है वह इस बातका अनुरोध है कि आप देशके लाभसे अपने लाभको कम महत्त्व दें।
आप इंग्लैंड, जापान या अमेरिकासे जो कपड़ा मँगाते हैं उसके प्रत्येक गजपर आप अपने देशवासियोंसे कमसे-कम तीन आने छीन लेते हैं और बदलेमें उन्हें कुछ नहीं देते। मैं यह बात स्पष्ट करके कहूँ। भारतमें बहुत मजदूर हैं जो गाँवोंमें बेकार पड़े हुए हैं। पहले ये बेकार मजदूर सूत और कपड़ा तैयार करनेमें लगे हुए थे। विदेशी कपड़ेके आयातके फलस्वरूप वे अनिवार्यतः बेकार बन गये और इस लम्बे अरसेमें उनमें से बहुतेरोंको कोई दूसरा धन्धा नहीं मिल पाया। इसी कारण जब-जब भारतमें अनावृष्टि होती है तब-तब दयार्द्र व्यक्तियोंके हृदय काँप उठते हैं। ऐसा होनेकी जरूरत नहीं है। भारतमें अनावृष्टि कोई असाधारण बात नहीं है। हमको उसके इतना घातक होनेका अनुभव इसलिए होता है कि हम करीब-करीब भूखों मर रहे हैं। लम्बी बेकारीके फलस्वरूप अपना निर्वाह करते रहनेकी हमारी शक्ति क्षीण हो गई है। आप यह खयाल न कीजिए कि झोंपड़ियोंमें रहनेवाले ये करोड़ों लाचार लोग सबके-सब हमारे दर्जनभर शहरोंमें, जहाँ मजदूरोंकी कमी है, इकट्ठे होकर अपनी रोजी कमा सकते<noinclude></noinclude>
8lwoa038y1xenmmiyt4nbfbxy6ei9jf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८१
250
184900
672850
641180
2026-08-22T12:57:18Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672850
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||कपड़ेके व्यापारियोंको खुला पत्र|३४९}}</noinclude>हैं। उनके ऊपर जमीनका भार है और वे इच्छा रहते हुए भी अपनी जमीनको नहीं छोड़ सकते। भारतके तमाम शहरोंमें भी ये करोड़ों लोग समा नहीं सकते। उनकी आँखोंमें चमक हाथ-कताई और हाथ-बुनाईके धन्धेकी पुनः स्थापनासे ही आ सकती है, अन्यथा नहीं। और यदि मैं आपसे यह न कहूँ कि भारतकी गहरी और दुःख-जनक दरिद्रताके लिए मिल-मालिकोंकी अपेक्षा व्यापारी अधिक उत्तरदायी हैं तो मैं अपने प्रति और देशके प्रति कर्त्तव्य-पालनसे च्युत माना जाऊँगा। इसमें सन्देह नहीं कि जब मिल-मालिक ऊँची कीमतें वसूल करते हैं तो वे इस दरिद्रताको और भी भीषण बना देते हैं। लेकिन इसके लिए आप इतने उत्तरदायी हैं कि यदि आप विदेशी कपड़ेका आयात बन्द कर दें तो आप हाथ-कताईके प्राचीन और सम्मानपूर्ण धर्मको पुनरुज्जीवित कर सकते हैं। और हाथ-बुनाईके उद्योगको उत्तेजन दे सकते हैं।
आखिर जिस व्यापारसे भारतको हानि पहुँच रही है उसको छोड़ना आपमेंसे बहुतेरोंके लिए जीवन-मरणका मामला क्यों होना चाहिए? निश्चय ही आपमें इतनी सूझ-बूझ है कि आप कोई दूसरा ऐसा व्यापार खोज निकाल सकते हैं जो आपके लिए और देशके लिए समान रूपसे लाभप्रद हो। आयात बन्द करनेका अर्थ है प्रति वर्ष ६० करोड़ रुपये बाहर जानेसे बचा लेना। लेकिन इसका अर्थ इससे कहीं ज्यादा बड़ी पूँजीको यहाँ व्यवहारमें लाना है। इसका अर्थ यह है कि रुईकी समस्त प्रक्रियाएँ भारतमें ही पूरी की जायें। इसमें आपके लिए व्यापारकी गुंजाइश है। इसका अर्थ है कि इस समय दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई मात्रामें जो धन हमारे प्यारे देशसे बाहर जा रहा है वह नहीं जायेगा और वह देशके व्यापारमें लगेगा। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी तीक्ष्ण बुद्धिकी मददसे इसे अनुचित कामोंमें लगाना बन्द करके ऐसे हितकर काममें लगायें जो आपके लिए सुलभ हो सकते हैं। आपको हाथ-कताई और हाथ-बुनाईके उद्योगका संगठन अवश्य करना चाहिए। तब आप मेरी तरह मोटी-झोटी खादीसे सन्तुष्ट नहीं होंगे। आप अपने कतैयोंसे बारीकसे-बारीक सूत कातनेका और बुनकरोंसे ढाकाकी विश्वविख्यात मलमल बुननेका आग्रह करेंगे। आप इसमें बड़ी-बड़ी पूँजी लगायेंगे। परन्तु मैंने तो अपनी बहनोंको केवल कुछ हजार रुपये दिये हैं, जो आपसे मुझे दानमें मिले थे। आपके लिए इस विदेशी कपड़ेके अपवित्र व्यापारको छोड़नेका अर्थ है हाथ-कते सूतके उत्पादन और वितरणका संगठन करना। यह उद्योग आपकी देशभक्तिके अनुरूप है। शायद आप यह कहें कि ऐसा संगठन करनेमें कुछ साल लग जायेंगे। आपने अपना वर्तमान व्यापार एक क्षणमें तो नहीं जमा लिया है। यदि आपको यह विश्वास हो गया है कि यह ऐसा व्यापार है जिसने भारतको गरीब और गुलाम बनाया है, तो आप इसके नष्ट होनेके परिणामोंपर विचार करनेके लिए नहीं रुकेंगे। आप कैसी भी हानि उठाकर इसकी इतिश्री हो जाने देंगे।
और इसमें हानि ही क्या है? बहुत तो नहीं है। आपको विदेशी कपड़े और सूतके सब नये ऑर्डर रोक देने हैं। इसमें कुछ खर्च नहीं होता। आपके पास विदेशी कपड़ा जमा है जो आपको खपाना है। इसकी खपतके लिए संसारका बाजार आपके लिए खुला पड़ा है। भारतकी जरूरतकी कपड़ेकी खास किस्में मारिशस, दक्षिण आफ्रिका या पूर्व आफ्रिका जैसे देशोंमें कई कामोंमें प्रयुक्त की जा सकती हैं। आप<noinclude></noinclude>
hvaizi3qnv5g77plrrmvobasj4n9bw2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८२
250
184901
672853
641181
2026-08-22T13:10:09Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672853
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>सिर्फ मुझे यह अनुमति दे दें कि आपके पास जो विदेशी कपड़ा और सूत जमा है उसको खपानेका सर्वोत्तम तरीका आपके लिए मैं सोच निकालूँ।
आपमें से कुछ लोगोंको उपभोक्ताओंकी जरूरतोंके बारेमें चिन्ता हो गई है। कपड़ेकी जो भी कमी होगी वे उसमें किसी तरह अपना निर्वाह कर लेंगे, उससे उन्हें कोई असुविधा न होगी और वे अगले साल हर तरहके अर्जकी और बारीक सुन्दर खादीको बड़ी मात्रामें इससे भी ज्यादा पसन्द कर सकेंगे।
मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उपभोक्ताओंकी बात जरूरतसे ज्यादा न सोचें। आपका झीनी जापानी धोतियाँ या साड़ियाँ या माँड़ीदार महीन सूती कपड़े दिखाकर उनको प्रलोभन देना उचित नहीं है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप इसकी अपेक्षा उपभोक्ताओंमें खादीमें कला देखनेकी रुचि पैदा करें। कपड़ेमें एकसापन और मुलायमियत ही कला हो, सो बात नहीं है। बहुत ही बढ़िया बने हुए रेशमके गुलाबी फूलमें कोई कला नहीं है। क्योंकि उसमें कोई जीवन नहीं है। लेकिन बागसे तोड़ा हुआ गुलाबका ऐसा फूल जिसकी बहुत-सी पँखुड़ियाँ झर गई हों सफाईसे बनाये हुए नकली गुलाबकी अपेक्षा, जो सजी हुई खिड़कीमें रखा गया है, किसी भी हालतमें बढ़िया बैठता है। असली फूलमें जीवनका संचार है। क्या ही अच्छा हो कि भारतके व्यापारी पैसेके लिए काम न करें, बल्कि उसकी अपेक्षा प्राचीन कलाका अध्ययन करें और उसे पुनरुज्जीवित करना अपना व्यवसाय बना लें। इससे आपको और देशको धन मिलेगा। हमें सबसे बड़ी जिस कलाको पुनरुज्जीवित करना है वह स्वराज्य है। स्वदेशीको अपनाये बिना स्वराज्य मिल नहीं सकता। और भारतके लिए स्वदेशीको अपनानेका अर्थ है विदेशी कपड़ेका स्थायी रूपसे बहिष्कार करना। मैं आपको अगुआ बननेके लिए निमन्त्रित करता हूँ क्यों कि आपमें इसकी क्षमता है। परमात्मा आपको इस नेतृत्वकी शक्ति और समझ दे।
{{Right|आपका विश्वस्त मित्र,<br>{{larger|'''मो॰ क॰ गांधी'''}}}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ७–७–१९२१|1em}}
{{Dhr|7em}}<noinclude></noinclude>
iynx7wu32vodeboe7n4cmkt0ub7pjzm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८३
250
184902
672857
641182
2026-08-22T13:25:57Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
672857
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६२. तार : गुलाम महबूबको<ref></ref>'''}}}}
{{Right|[७ जुलाई, १९२१]<ref></ref>}}
{{Left|गुलाम महबूब<br>मोगा<br>जमानत न दें। वकील न करें। ब्यौरा भेजें।}}
{{Right|{{larger|'''गांधी'''}}}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६४) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६३. पत्र : ज॰ बो॰ पेटिटको'''}}}}
{{Right|[७ जुलाई, १९२१ के पश्चात्]<ref></ref>}}
{{Left|प्रिय श्री पेटिट,<ref></ref>}}
एसोसिएशनने जो दो हजार रुपये मंजूर किये हैं उनमें से कृपया ५०० रुपये मुझे
दें। मैंने यह रकम श्री बनारसीदासके लिए माँगी है जो श्री एन्ड्रयूजकी अधीनता-
में काम कर रहे हैं। उन्होंने यह रकम खर्च कर ली है। मैंने इन ५०० रुपयोंके
बारेमें आपसे कहा था कि वह मुझे इस कार्य के लिए कलकत्ताके एक मित्रने दिये थे ।
यह खर्च केवल फीजीसे लौटे हुए उन प्रवासियोंपर ही हुआ जिनकी श्री एन्ड्रयूज
की देख-रेख में श्री बनारसीदास सार-संभाल कर रहे हैं ।
पेंसिलसे लिखे हुए अंग्रेजी मसविदे (एस० एन० ७५६५ ) से ।
आपका,
१. यह तार गुलाम महबूबके उस तारके जवाब में दिया गया था जिसमें उन्होंने लिखा था : " हम
७ कांग्रेस कार्यकर्ताओंपर नौकरशाही और उसके खुशामदियोंके भड़कानेपर गैर-सरकारी लोगोंने धारा
१०७ के अन्तर्गत मुकदमा दायर कर दिया है। मुकदमा गैर-सरकारी है, हाजिरीकी जमानत और सफाई के
बारेमें सलाह दें ।
२. यह तारीख डाक मुहरके आधारपर दी गई है ।
३. स्पष्ट है कि यह पत्र बनारसीदासके बोलपुरसे भेजे गये ७ जुलाईका पत्र मिलनेके बाद लिखा
गया था और इसमें उन्होंने ५०० रुपये माँगे थे । यह रकम गांधीजीको दिसम्बर १९२० में, जब वे
कलकत्तासे नागपुर आये थे, एक मारवाड़ी सज्जनने दी थी और उन्होंने इसे अमृतलाल ठक्कर और बनारसी-
दासको सौंप दिया था । पत्रका मसविदा, जो बनारसीदासके पत्रके पीछे लिखा गया है, सम्भवत: गांधीजीने
बोलकर लिखवाया था ।
४. जहाँगीर बोमनजी पेटिट, प्रसिद्ध पारसी दानवीर ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
2tpfa4yttp7aa3z9rpxupkbynqbnwgw
672888
672857
2026-08-22T14:15:08Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672888
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६२. तार : गुलाम महबूबको<ref>यह तार गुलाम महबूबके उस तारके जवाबमें दिया गया था जिसमें उन्होंने लिखा था : "हम ७ कांग्रेस कार्यकर्त्ताओंपर नौकरशाही और उसके खुशामदियोंके भड़कानेपर गैर-सरकारी लोगोंने धारा १०७ के अन्तर्गत मुकदमा दायर कर दिया है। मुकदमा गैर-सरकारी है, हाजिरीकी जमानत और सफाईके बारेमें सलाह दें।"</ref>'''}}}}
{{Right|[७ जुलाई, १९२१]<ref>यह तारीख डाक मुहरके आधारपर दी गई है।</ref>}}
{{Left|गुलाम महबूब<br>मोगा<br>जमानत न दें। वकील न करें। ब्यौरा भेजें।}}
{{Right|{{larger|'''गांधी'''}}}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६४) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६३. पत्र : ज॰ बो॰ पेटिटको'''}}}}
{{Right|[७ जुलाई, १९२१ के पश्चात्]<ref>स्पष्ट है कि यह पत्र बनारसीदासके बोलपुरसे भेजे गये ७ जुलाईका पत्र मिलनेके बाद लिखा गया था और इसमें उन्होंने ५०० रुपये माँगे थे। यह रकम गांधीजीको दिसम्बर १९२० में, जब वे कलकत्तासे नागपुर आये थे, एक मारवाड़ी सज्जनने दी थी और उन्होंने इसे अमृतलाल ठक्कर और बनारसीदासको सौंप दिया था। पत्रका मसविदा, जो बनारसीदासके पत्रके पीछे लिखा गया है, सम्भवतः गांधीजीने बोलकर लिखवाया था।</ref>}}
{{Left|प्रिय श्री पेटिट,<ref>जहाँगीर बोमनजी पेटिट, प्रसिद्ध पारसी दानवीर।</ref>}}
एसोसिएशनने जो दो हजार रुपये मंजूर किये हैं उनमें से कृपया ५०० रुपये मुझे दें। मैंने यह रकम श्री बनारसीदासके लिए माँगी है जो श्री एन्ड्र्यूजकी अधीनतामें काम कर रहे हैं। उन्होंने यह रकम खर्च कर ली है। मैंने इन ५०० रुपयोंके बारेमें आपसे कहा था कि वह मुझे इस कार्यके लिए कलकत्ताके एक मित्रने दिये थे। यह खर्च केवल फीजीसे लौटे हुए उन प्रवासियोंपर ही हुआ जिनकी श्री एन्ड्र्यूज की देख-रेखमें श्री बनारसीदास सार-सँभाल कर रहे हैं।
{{Right|आपका,}}
पेंसिलसे लिखे हुए अंग्रेजी मसविदे (एस॰ एन॰ ७५६५) से।<noinclude></noinclude>
lx4ks6z3wk82qeu4v3pwhd896znadwc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८४
250
184903
672900
641183
2026-08-22T14:31:41Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672900
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६४. पत्र : वल्लभभाई पटेलको'''}}}}
{{Right|'''बम्बई'''<br>८ जुलाई, १९२१}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
मैं सोमवारको सुबह वहाँ जाऊँगा और उसी दिन वापस हो जाऊँगा। राजनीतिक मण्डलको क्या करना चाहिए, इस बारेमें भाई इन्दुलालको<ref>श्री इन्दुलाल पाशिक, एक सक्रिय राजनैतिक कार्यकर्त्ता; गुजरात प्रान्तीय समितिकी स्थापनाके समय उसके मन्त्री। बादमें कांग्रेससे अलग हो गये। गांधीजीने इन्हींसे '''नवजीवन''' लेकर उसे साप्ताहिकका रूप दिया था।</ref> पत्र लिखा है। उसे देख लें। मुझे आशा है कि असहयोगका निश्चय किया जायेगा। कौंसिलोंका सर्वथा बहिष्कार ही हमारा आसरा है।
भाई मावलंकर<ref>श्री गणेश वासुदेव मावलंकर (१८७७–१९५६); अहमदाबादके सुप्रसिद्ध वकील, संसदीय मामलोंके विशेषज्ञ और कांग्रेसी नेता। १९३७ में बम्बई विधान परिषद्के तथा १९४६ में केन्द्रीय विधान परिषद् के अध्यक्ष निर्वाचित; मृत्युपर्यन्त लोकसभा के अध्यक्ष।</ref> वगैराको खबर दे दें।
{{Right|{{larger|मोहनदासके वन्देमातरम्}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : सरदार वल्लभभाईने'''|1em}}
{{C|{{larger|'''१६५. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>[८ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>गांधीजीने यह तार कोडाइकनालसे ८ जुलाईको सी॰ विजयराघवाचार्थके नीचे लिखे तारके उत्तरमें भेजा था : "खुशोसे लेकिन तारीख इतवार २४ के बाद रखें। स्वराज्य-कोषमें आश्चर्यजनक सफलतापर सधन्यवाद हार्दिक बधाइयाँ। तारीख तार द्वारा सूचित करें।"</ref>}}
{{Left|मोतीलाल नेहरू}}
अध्यक्षका आग्रह है कि बहिष्कारके संगठनका खयाल करते हुए समितिकी तारीख चौबीसके बाद रखी जाये। मेरा सुझाव है कि बैठक अट्ठाईसको बम्बईमें बुलाई जाये। मंजूरी तारसे दें।
{{Right|{{larger|'''गांधी'''}}}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
s0jt89ytt7cporpywm2bt2cquysdeaa
672901
672900
2026-08-22T14:32:07Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
672901
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६४. पत्र : वल्लभभाई पटेलको'''}}}}
{{Right|'''बम्बई'''<br>८ जुलाई, १९२१}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
मैं सोमवारको सुबह वहाँ जाऊँगा और उसी दिन वापस हो जाऊँगा। राजनीतिक मण्डलको क्या करना चाहिए, इस बारेमें भाई इन्दुलालको<ref>श्री इन्दुलाल पाशिक, एक सक्रिय राजनैतिक कार्यकर्त्ता; गुजरात प्रान्तीय समितिकी स्थापनाके समय उसके मन्त्री। बादमें कांग्रेससे अलग हो गये। गांधीजीने इन्हींसे '''नवजीवन''' लेकर उसे साप्ताहिकका रूप दिया था।</ref> पत्र लिखा है। उसे देख लें। मुझे आशा है कि असहयोगका निश्चय किया जायेगा। कौंसिलोंका सर्वथा बहिष्कार ही हमारा आसरा है।
भाई मावलंकर<ref>श्री गणेश वासुदेव मावलंकर (१८७७–१९५६); अहमदाबादके सुप्रसिद्ध वकील, संसदीय मामलोंके विशेषज्ञ और कांग्रेसी नेता। १९३७ में बम्बई विधान परिषद्के तथा १९४६ में केन्द्रीय विधान परिषद् के अध्यक्ष निर्वाचित; मृत्युपर्यन्त लोकसभा के अध्यक्ष।</ref> वगैराको खबर दे दें।
{{Right|{{larger|मोहनदासके वन्देमातरम्}}}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : सरदार वल्लभभाईने'''|1em}}
{{C|{{larger|'''१६५. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>[८ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>गांधीजीने यह तार कोडाइकनालसे ८ जुलाईको सी॰ विजयराघवाचार्थके नीचे लिखे तारके उत्तरमें भेजा था : "खुशोसे लेकिन तारीख इतवार २४ के बाद रखें। स्वराज्य-कोषमें आश्चर्यजनक सफलतापर सधन्यवाद हार्दिक बधाइयाँ। तारीख तार द्वारा सूचित करें।"</ref>}}
{{Left|मोतीलाल नेहरू}}
अध्यक्षका आग्रह है कि बहिष्कारके संगठनका खयाल करते हुए समितिकी तारीख चौबीसके बाद रखी जाये। मेरा सुझाव है कि बैठक अट्ठाईसको बम्बईमें बुलाई जाये। मंजूरी तारसे दें।
{{Right|{{larger|'''गांधी'''}}}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५६७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
9vvq0byq8v8wm2p9yl4d794q3ismoeg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८५
250
184904
672905
641184
2026-08-22T14:41:51Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672905
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१६६. पत्र : कुँवरजी मेहताको'''}}}}
{{Right|शनिवार [९ जुलाई, १९२१]}}
{{Left|भाईश्री कुँवरजी,<ref>एक सार्वजनिक कार्यकर्त्ता, जिनका सम्बन्ध गुजरातके पाटीदार मण्डलसे था।</ref>}}
आपके पत्रको मैं अभी-अभी पढ़ पाया हूँ। भाई मकनजी और वराड गाँवके भाइयोंको मेरी ओरसे धन्यवाद दीजियेगा। भाई मकनजीने सच्ची बहादुरीका परिचय दिया है। उन्होंने घड़ी-भरके लिए चले जानेके लिए कहा सो उसकी फिक्र नहीं; बादमें क्रोधपर विजय प्राप्त कर क्षमाके गुणको धारण किया और गाँवके लोगोंने भी शान्ति रखी, इसे मैं महत्त्वकी बात मानता हूँ।<ref>इसमें जिस घटनाका जिक्र किया गया है उसके लिए देखिए "टिप्पणियाँ", १७–७–१९२१।</ref>
{{Right|{{larger|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}}}
मूल गुजराती पत्र (जी॰ एन॰ २६७१) से।
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१६७. शुभ घड़ी'''}}}}
गिरनारकी चोटीपर पहुँचनेकी इच्छा करनेवाला व्यक्ति पगडंडीपर पहुँचनेपर जिस तरह वहाँ पहुँचा हुआ नहीं कहलाता उसी तरह हम स्वराज्यकी नसैनीपर एक सीढ़ी चढ़कर ही रुक जायें तो हम स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे। हमें एक साँसमें ही चढ़ना होगा। पैसा इकट्ठा किया यह तो ठीक किया, इससे विश्वास आया। हमारे साथ कौन-कौन हैं, कितने लोग हैं इसका कुछ अन्दाज हुआ। हमें जो काम करने हैं उन कामोंपर खर्च करनेके लिए हमें साधन मिले। लेकिन जिस कामसे हमें स्वराज्यकी झाँकी मिलती है वह तो स्वदेशी ही है। हजारों रुपया देनेसे हम स्वराज्य-मन्दिरमें प्रवेश नहीं पा सकते। उस मन्दिरमें प्रवेश पानेकी शर्त तो स्वदेशी ही है। इस मन्दिरका दरबान यह नहीं पूछेगा कि हमारे पास कितने पैसे हैं। बल्कि हमने खादी पहनी है या नहीं, यह देखेगा; हमारे मुँहसे शराबकी गन्ध आती है या नहीं, इसकी जाँच करेगा। स्वदेशीका पालन करनेवाला स्वयमेव स्वतन्त्रताका अनुभव करेगा। जिसके मनमें स्वतन्त्रताकी भावनाका प्रादुर्भाव नहीं हुआ वह दूसरोंके कहनेसे स्वतन्त्र हो ही नहीं सकता। सभीको इस बातका अनुभव हो रहा है। विदेशी कपड़ेका त्याग न करनेवाले को ऐसा अनुभव कभी हो ही नहीं सकता।
जापानी साड़ी, फ्रेंच साटिन, मैनचेस्टरकी मलमल, यह सब एक प्रकारका व्यसन ही है। इस व्यसनकी गुलामीमें पड़ा हुआ व्यक्ति स्वतन्त्रताका कोई विचार नहीं करता<noinclude>{{Left|२०–२३|2em}}</noinclude>
porurvq5h4bo9fb0tcpnilajrzywhzw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८६
250
184905
672910
641185
2026-08-22T14:51:26Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
672910
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>क्योंकि वह पहरावेसे विदेशी हो जाता है। जिसके मनमें यह भावना है कि विदेशी सब चीजें अच्छी हैं उसमें स्वदेशकी भावना कहाँसे आ सकती है? उनका अपना तन्त्र कैसे हो सकता है? जिसे हिन्दुस्तानकी हवा माफिक नहीं आती, उसकी पोशाक नहीं भाती, उसकी खुराक रुचिकर नहीं लगती, उसके लिए हिन्दुस्तानको अपना देश माननेका क्या अर्थ हो सकता है? अभी करोड़ों हिन्दुस्तानकी हवासे उकताये नहीं हैं, हिन्दुस्तानकी गेहूँ-बाजरेकी रोटीको हाथसे पकाकर सन्तोष मानते हैं; लेकिन हिन्दुस्तान हमें जो कपड़ा देता है उससे हमारी तृप्ति नहीं होती। विदेशी कपड़ेसे हमें मोह हो गया है। जबतक यह मोह नहीं जाता तबतक हिन्दुस्तानको पराधीन रहना पड़ेगा।
कोई अगर हमें विदेशी कपड़ा मुफ्त दे तो भी व्यर्थ है। इतना ही नहीं बल्कि हानिकारक है क्योंकि भेंट लेकर जीनेवाला व्यक्ति तो भिक्षुक बनता है। और भिक्षुक तो हमेशा ही पराधीन रहता है, उसने तो अपनी आत्मा बेच दी है।
हमें स्वराज्य-मन्दिरमें प्रवेश करनेके लिए स्वदेशीकी ही जरूरत है। स्वदेशी अर्थात् विदेशी कपड़ेका बहिष्कार। चरखेकी शक्तिको हिन्दुस्तानने परख लिया है। हिन्दुस्तानका कोई भी प्रान्त अब चरखेसे अनजान नहीं है। कम-अधिक प्रमाणमें हर एक प्रान्तमें खादी बुनी जाने लगी है। यह कला हाथमें आ गई है। लेकिन—?
लेकिन विदेशी कपड़ेका मोह जाना चाहिए। जबतक यह मोह नहीं जाता तबतक चरखेका निरन्तर चलते रहना सम्भव नहीं है। हिन्दुस्तान जबतक चरखेके चमत्कारको नहीं पहचानता तबतक उसमें बाहुबल नहीं आयेगा, आत्मविश्वास नहीं आयेगा। विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेकी शुभ घड़ी अब आ पहुँची है।
अक्तूबरकी पहली तारीख तक अगर स्वराज्य नहीं मिला तो मेरी लाज जायेगी, हिन्दुस्तानके प्रति मेरा विश्वास झूठा ठहरेगा। दिसम्बर तक नहीं मिला तो हिन्दुस्तानकी प्रतिज्ञा टूट जायेगी, हिन्दुस्तानकी नाक कट जायेगी, नागपुर कांग्रेसमें सम्मिलित हुए प्रतिनिधियोंकी लाज जायेगी।
विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके बिना स्वराज्य नहीं मिलेगा। विदेशी कपड़ेका त्याग करना शरीरकी शुद्धि करना है। शरीर-शुद्धिके बिना स्वराज्य-मन्त्र जपनेका हमें अधिकार नहीं है।
इसलिए यदि हम इस वर्ष स्वराज्य-मन्दिरमें प्रवेश करना चाहते हैं तो अब हमें बहिष्कारमें ढील नहीं डालनी चाहिए। क्योंकि स्वदेशी धारण करनेका अर्थ अपूर्व शक्ति धारण करना है। लेकिन अगर इस मन्दिरपर जिनका कब्जा है वे हमारी शक्तिको नहीं पहचानते और हमें कब्जा देनेको तैयार नहीं होते तो हमें उनके साथ लड़ना होगा। उसमें थोड़ा समय तो अवश्य लगेगा तथापि मेरा यह विश्वास भी है कि यदि हम विदेशी कपड़ेका सर्वथा बहिष्कार कर दें तो हमें युद्ध नहीं करना पड़ेगा
और हमें कब्जा मिल जायेगा।
तथापि हमें युद्धकी अवधिका भी ध्यान रखना चाहिए। अतः अगर हम अक्तूबरमें स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हों तो हमें ३१ अगस्त तक बहिष्कार पूरा कर लेना चाहिए। ऐसा कर सकेंगे या नहीं इसका निश्चय पहली अगस्ततक हो सकता<noinclude></noinclude>
e37q2ff2rve5byb21ztq4x4kd9loebm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८७
250
184906
673128
641186
2026-08-23T05:13:58Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673128
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>शुभ घड़ी
है। पहली अगस्तको तिलक महाराजकी पुण्यतिथि है। यदि कार्य किया होगा तो वह दिन हम उत्साहसे मनायेंगे; यदि हम कर्त्तव्यका पालन न कर सके होंगे तो लज्जाके मारे घर बैठे रहेंगे। जिस तरह हमने जूनके अन्तिम दिनोंमें ही खूब काम किया उसी तरह हम इस मासके बाकी दिनोंमें खूब काम करके विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूरा करें। जो अपने-आपको असहयोगी कहलवाता है उसे सिर्फ खादी ही पहननी चाहिए।
उसे कमसे-कम कपड़ोंसे काम चलाना चाहिए। यह सन्धिकाल—कठिन काल—है। एकदम बहिष्कार करनेसे हमारे पास कपड़े कम हो जायेंगे, देशमें कपड़ेकी तंगी हो जायेगी, यह जानकर भी हमें कम कपड़े प्रयोगमें लाने चाहिए। और फिर हर कोई नये कपड़े बनवा भी तो नहीं सकता, अतएव कमसे-कम कपड़े पहननेमें ही हमारी गति है।
हमारे पास जितना विदेशी कपड़ा हो उसे या तो हम जला दें अथवा विदेश भेज दें अथवा शौचादि क्रियाके समय पहनकर फाड़ डालें। विदेशी कपड़ेको हम गुलामीकी निशानी समझकर उसका उपयोग उसी अवस्थामें करें जब अत्यन्त गरीब होनेके कारण गुजारा न हो सके।
गरीबोंको सुविधा प्रदान करनेके लिए हम विदेशी कपड़ेको वापस लेनेके लिए भंडार रखें और बदलेमें खादीकी आवश्यकताको पूरा करें। इस तरह अनेक प्रकारकी योजनाएँ बनाकर हमें पहली अगस्त तक अपने पहावेमें तो विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूरा करना चाहिए। हम सबको अब अपने-अपने घरोंमें विदेशी मालको न लेने और प्रतिदिन अमुक तोले सूत कातनेका निश्चय कर लेना चाहिए।
लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। हमें कपड़ेकी प्रत्येक दुकानपर घूम आना चाहिए। जो विदेशी माल बेचते हों उनसे विदेशी माल न मँगवानेकी प्रार्थना करनी चाहिए। और अगर उनके पास विदेशी माल पड़ा हो तो उसे विदेशमें बेचनेके लिए कहें।
खरीददारों तथा व्यापारियोंका जो फर्ज है वही मिल-मालिकोंका भी है। उनसे हम प्रार्थना कर रहे हैं कि वे बहिष्कारको लेकर कपड़ेके दाम न बढ़ायें। आज भी वे इतना ज्यादा दाम लेते हैं कि उसमें कमी की जानी चाहिए। तिसपर भी अगर वे जनताकी तंगीका लाभ उठाकर दाम बढ़ाते हैं तो वे स्वयं विदेशी बनते हैं, देशके दुश्मन बनते हैं। मेरा खयाल है कि वे सीमाका अतिक्रमण नहीं करेंगे।
स्वराज्य प्राप्त करनेके आन्दोलनको हमने आत्मशुद्धि माना है। हम जैसे-जैसे ऊँचे उठते जाते हैं वैसे-वैसे हमारी कसौटी होती जाती है। अगर प्रत्येक व्यक्तिके दिलमें देशभक्ति होगी, अगर हर व्यक्ति देशको अपना घर समझ उसे शुद्ध रखनेकी इच्छा करेगा तो इस वर्ष स्वराज्य प्राप्त करना मैं बहुत ही आसान बात समझता हूँ। जूनकी तीस तारीखको देशने एक चमत्कार कर दिखाया, इसलिए बहिष्कारके चमत्कारकी आशा रखनेका हमारे पास कारण है। प्रभु लाज रखना।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १०–७–१९२१|1em}}
{{Dhr|3em}}<noinclude></noinclude>
893wj8525jp2hjjd4ixp3fj8qyi75a6
673129
673128
2026-08-23T05:14:36Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673129
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||शुभ घड़ी|३५५}}</noinclude>है। पहली अगस्तको तिलक महाराजकी पुण्यतिथि है। यदि कार्य किया होगा तो वह दिन हम उत्साहसे मनायेंगे; यदि हम कर्त्तव्यका पालन न कर सके होंगे तो लज्जाके मारे घर बैठे रहेंगे। जिस तरह हमने जूनके अन्तिम दिनोंमें ही खूब काम किया उसी तरह हम इस मासके बाकी दिनोंमें खूब काम करके विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूरा करें। जो अपने-आपको असहयोगी कहलवाता है उसे सिर्फ खादी ही पहननी चाहिए।
उसे कमसे-कम कपड़ोंसे काम चलाना चाहिए। यह सन्धिकाल—कठिन काल—है। एकदम बहिष्कार करनेसे हमारे पास कपड़े कम हो जायेंगे, देशमें कपड़ेकी तंगी हो जायेगी, यह जानकर भी हमें कम कपड़े प्रयोगमें लाने चाहिए। और फिर हर कोई नये कपड़े बनवा भी तो नहीं सकता, अतएव कमसे-कम कपड़े पहननेमें ही हमारी गति है।
हमारे पास जितना विदेशी कपड़ा हो उसे या तो हम जला दें अथवा विदेश भेज दें अथवा शौचादि क्रियाके समय पहनकर फाड़ डालें। विदेशी कपड़ेको हम गुलामीकी निशानी समझकर उसका उपयोग उसी अवस्थामें करें जब अत्यन्त गरीब होनेके कारण गुजारा न हो सके।
गरीबोंको सुविधा प्रदान करनेके लिए हम विदेशी कपड़ेको वापस लेनेके लिए भंडार रखें और बदलेमें खादीकी आवश्यकताको पूरा करें। इस तरह अनेक प्रकारकी योजनाएँ बनाकर हमें पहली अगस्त तक अपने पहावेमें तो विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूरा करना चाहिए। हम सबको अब अपने-अपने घरोंमें विदेशी मालको न लेने और प्रतिदिन अमुक तोले सूत कातनेका निश्चय कर लेना चाहिए।
लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। हमें कपड़ेकी प्रत्येक दुकानपर घूम आना चाहिए। जो विदेशी माल बेचते हों उनसे विदेशी माल न मँगवानेकी प्रार्थना करनी चाहिए। और अगर उनके पास विदेशी माल पड़ा हो तो उसे विदेशमें बेचनेके लिए कहें।
खरीददारों तथा व्यापारियोंका जो फर्ज है वही मिल-मालिकोंका भी है। उनसे हम प्रार्थना कर रहे हैं कि वे बहिष्कारको लेकर कपड़ेके दाम न बढ़ायें। आज भी वे इतना ज्यादा दाम लेते हैं कि उसमें कमी की जानी चाहिए। तिसपर भी अगर वे जनताकी तंगीका लाभ उठाकर दाम बढ़ाते हैं तो वे स्वयं विदेशी बनते हैं, देशके दुश्मन बनते हैं। मेरा खयाल है कि वे सीमाका अतिक्रमण नहीं करेंगे।
स्वराज्य प्राप्त करनेके आन्दोलनको हमने आत्मशुद्धि माना है। हम जैसे-जैसे ऊँचे उठते जाते हैं वैसे-वैसे हमारी कसौटी होती जाती है। अगर प्रत्येक व्यक्तिके दिलमें देशभक्ति होगी, अगर हर व्यक्ति देशको अपना घर समझ उसे शुद्ध रखनेकी इच्छा करेगा तो इस वर्ष स्वराज्य प्राप्त करना मैं बहुत ही आसान बात समझता हूँ। जूनकी तीस तारीखको देशने एक चमत्कार कर दिखाया, इसलिए बहिष्कारके चमत्कारकी आशा रखनेका हमारे पास कारण है। प्रभु लाज रखना।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १०–७–१९२१|1em}}
{{Dhr|3em}}<noinclude></noinclude>
a2mcstsin69cixa61n84jllg6co6plf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९०
250
184908
673136
641190
2026-08-23T05:37:43Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673136
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हैं कि "आप चीजोंको इतने सुन्दर ढंगसे प्रस्तुत करके अपने विरोधियोंको भी अपनी ओर करना चाहते हैं"।
इस पत्र-लेखककी बातमें अर्धसत्य है। मैं विरोधियोंको अपनी ओर जरूर करना चाहता हूँ लेकिन जो मैं मानता नहीं, उसे कहकर नहीं। ये भाई लिखते हैं कि "यदि गुस्सा भी प्रेमकी निशानी हो तो फिर कहा जायेगा कि जनरल डायरने भी प्रेमके कारण जलियाँवालाका कत्लेआम करवाया था।" मुझे तो लगता है कि इस दलीलमें बहुत अज्ञान भरा हुआ है। अनेक बार बाप बेटेपर क्रोधित होता है, सो प्रेमवश ही होता है; लेकिन जनरल डायरका गुस्सा तो सिर्फ द्वेषके कारण ही था। वैष्णवोंके गुस्सेको मैं प्रेमकी निशानी समझता हूँ, इसका कारण स्पष्ट है। मेरे साथ उनका कोई निजी वैर नहीं है। मेरे दूसरे आचरणोंको वे पसन्द करते हैं। लेकिन अस्पृश्यता सम्बन्धी मेरे विचारोंको वे भूल मानते हैं और उसे मेरा दोष मानकर मुझसे नाराज होते हैं। अन्य अनेक लोग मर्यादाका उल्लंघन करते हैं लेकिन वे उन्हें कोई पत्र नहीं लिखते और उनपर नाराज भी नहीं होते। ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। पत्र-लेखकको मैं फिरसे विचार करनेकी सलाह देता हूँ।
{{C|'''आक्षेप'''}}
एक भाई माणावदरसे लिखते हैं :
:{{gap}}'''आप लिखते हैं कि अगर पंजाब और खिलाफतके मामलेमें न्याय मिल जाये तो आप स्वराज्यकी लड़ाईका शेष कार्य अन्य नेताओंको सौंपकर निवृत्त हो जायेंगे।'''
उनका कहना है कि मैं ऐसा कर ही नहीं सकता और यह सच भी है। बात सिर्फ इतनी ही है कि वे मेरे कथनको नहीं समझ सके हैं। मैंने उपर्युक्त बात कहकर यह बताया है कि खिलाफत और पंजाबके न्यायमें ही स्वराज्यकी चाबी है। इन दोनोंके मिलनेके बाद स्वराज्य प्राप्त करनेमें किसीको विशेष अड़चन नहीं होगी। इन दोनोंके मिलनेपर हमें आवश्यक शक्ति प्राप्त हो जायेगी, ऐसी मेरी मान्यता है। बाकी स्वराज्यकी लड़ाई शुरू हो गई है और उसे मैं कभी छोड़ ही नहीं सकता।
{{C|'''सुन्दरलालजीका पत्र'''}}
सुन्दरलालजी जबलपुरमें पकड़े गये हैं और उन्हें सपरिश्रम कारावास मिला है, इस बातको सब कोई जानते हैं। उन्होंने जेल जानेसे पूर्व मुझे एक पत्र लिखा है उसमें से जानने योग्य अंश मैं नीचे उद्धृत कर रहा हूँ।<ref>यहाँ नहीं दिया गया है। इस पत्रमें पण्डित सुन्दरलालने स्वराज्य प्राप्तिके साधनके रूपमें अहिंसामें अपना विश्वास प्रकट किया था तथा जेलकी सजाका, आत्मशुद्धिका अवसर मिलनेके कारण, स्वागत किया था।</ref>
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १०-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
79359grr9efo7w4teckco7boqtln62a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९१
250
184909
673143
641191
2026-08-23T05:48:08Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673143
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''१७०. भाषण : दवा-विक्रेताओंकी सभा, बम्बईमें'''}}}}
{{Right|१० जुलाई, १९२१}}
कितने लोग विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी प्रतिज्ञा लेनेवाले हैं—इस लोभसे
खिचकर मैं यहाँ आया हूँ। विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका कारण मैं दे चुका हूँ। मिल-मालिक अथवा विदेशी कपड़ेके व्यापारी हमारी मदद करें या न करें लेकिन यदि हिन्दके लोग चाहें तो वे विदेशी कपड़ेका बहिष्कार कर सकते हैं। बाहरसे आनेवाले कपड़ोंका हिन्द इस्तेमाल न करे, यह विदेशी कपड़ेका बहिष्कार हुआ। आप सिर्फ अबसे विदेशी कपड़ेका उपयोग न करनेकी प्रतिज्ञा लें, इससे मुझे सन्तोष नहीं होगा। आपके पास अगर विदेशी कपड़ा हो तो आप उसको भी इस्तेमालमें नहीं ला सकते। इसके लिए मैंने तीन उपाय ढूँढ़ रखे हैं। श्रेष्ठ तो यही है कि हमारे पास जितना विदेशी कपड़ा हो उसे हम जला डालें। इस उपायके सम्बन्धमें अनेक लोगोंका कहना है कि हमारे देशमें अनेक गरीब लोग भूखे और नग्नावस्थामें घूमते हैं, क्यों न उन्हें ये कपड़े दे दें? कपड़े जलानेमें तो द्वेषभाव दिखाई देगा। उसके जवाबमें मैं कहता हूँ कि यदि मैं द्वेष-बुद्धिसे विदेशी कपड़ोंको जलानेकी बात कहता होऊँ तो लोगोंके मनमें द्वेष-भाव बढ़ सकता है परन्तु अगर हम यह समझते हों कि विदेशी कपड़ेका इस्तेमाल करके हमने भयंकर भूल की है तो गुलामीसे छुटकारा पानेका श्रेष्ठ उपाय उसे जलाना ही है।
दूसरा उपाय है ऐसे कपड़ोंको हिन्दसे बाहर भेजना। अपने देशमें तो हम गरीबसे-गरीब और कंगालसे-कंगालको भी विदेशी कपड़ा नहीं दे सकते। मद्य और विदेशी कपड़ेको मैं एक ही कोटिमें रखता हूँ। आपसे विदेशी कपड़ेका तिरस्कार नहीं हो पाता, सो मैं समझता हूँ। मेरे ये विचार एक बहुत लम्बे अर्सेसे हैं इसलिए मुझे यह कठिन नहीं लगता। और आपको थोड़े ही समयमें अपने विचारोंमें परिवर्तन करना है। यदि आपका भी यही मत है कि विदेशी कपड़ेका उपयोग विदेश भेजनेमें ही किया जाना चाहिए तो आपके पास जितना भी कपड़ा वह सब मेरे पास भेज दें। उसके लिए वैसी व्यवस्था कर दी जायेगी; लेकिन अगर आप यह मानते हों कि विदेशी कपड़ेके बहिष्कारसे द्वेष नहीं बल्कि जोश बढ़ेगा, हिन्दका निश्चय और दृढ़ होगा तो मैं उसे अवश्य आगमें जला डालना चाहूँगा।
जो गरीब हैं अथवा जिनके पास स्वदेशी खरीदने लायक पैसे भी नहीं हैं, उनसे विदेशी कपड़े लेकर बदलेमें उन्हें खादी देनेकी व्यवस्था की जा रही है। हमारे पास इस समय स्वदेशी दो तरहकी है, मिलका कपड़ा और चरखेकी खादी। हमारे लिए तो खादी ही हो सकती है; मिलका कपड़ा हमें गरीबोंके लिए रहने देना चाहिए। भोग-विलासमें पड़े हुए अनेक लोग खादी पहनना पसन्द नहीं करते; उसके प्रति उनमें रुचि नहीं है। लेकिन आप जबतक इतना त्याग नहीं कर सकते तबतक गुलामीका त्याग असम्भव लगता है। यदि आप खादी न पहन सकें तो आपको मिलका<noinclude></noinclude>
no2wb3fjw828t3msgkcjzbfea4qd312
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१५
250
186129
673090
644444
2026-08-23T02:21:03Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673090
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|५८३}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent| डेविड, ४५२}}
{{Outdent|ड्यूक ऑफ कनॉट, ३४१}}
{{c|'''त'''}}
{{Outdent|'''ता'''ज मुहम्मद, मौलवी, २२३}}
{{Outdent|तारामती, २१५}}
{{Outdent|तिलक, बाल गंगाधर, ६९, ११३-१४, १२३, १४४-४५, १४९, १५२, १९०, २५८, २९३, ३२६, ३२८-२९, ३४२, ३५५, ३९०, ३९३, ४१७, ४३८, ४४०, ४४६, ४७०, ४७६-७७, ४९१; -और अंग्रेजी शिक्षा, ४४-४५, ६९; —और गांधीजी, ३८२-८४}}
{{Outdent|तिलक स्मारक स्वराज्य-कोष, १०-१२, २२, ४६, ६२, ८२-८३, ८६, ९६-९७, ११८-१९, १२२, १३४-३५, १४२, १४५, १४७, २००, २०२, २०४, २१२-१३, २३५, २५०, २८५, २९९, ३९३, ४००, ४३५, ४६७, ४७६, ५१५; -और अस्पृश्यता, ३३२-३३; -का लेखा-जोखा, ३१२-१३, ३३५-३६; —की रकमका पूरा हिसाब-किताब, ७९-८०, १७९-८०; —के धनके '''उप'''योगके उद्देश्य, ३३५-३७; -के लिए गुजरातमें चन्दा, २८४, ३११; —के लिए चन्दा एकत्र करनेका कामचलाऊ आधार, १७८-८०, १९९; —के लिए
प्रवासी भारतीयोंका दान, १५०, १५२, ३५७-५८; -के लिए बंगालमें चन्दा, ३२७; -के लिए बम्बई में चन्दा, ३४२-४३; -के लिए मिल-मालिकोंका चन्दा, २५३; —के लिए श्रमिकोंका योगदान, ५०७-८; -में चन्दा, ४६, २५८-६०; -में पारसियोंका योगदान, २९४-९५, ४७१; -में प्रान्तोंका चन्दा, ३२८ पा॰ टि॰; -में स्त्रियोंका दान, २१५-१६, २७२, २८६-८८, ३२४, ३९२;}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}राष्ट्रीय कार्योंके लिए ऋणके बतौर
२६८}}
{{Outdent|तुकाराम, १४९}}
{{Outdent|तुलसीदास, ५३, ३४७}}
{{Outdent|तैयबजी, अब्बास, २९५, २९७, ४७६, ४९३}}
{{Outdent|तैयबजी, बदरुद्दीन, १९०, ३८४}}
{{Outdent|तैरसी, लक्ष्मीदास, २८९, ३३७}}
{{Outdent|त्रिवेदी, दलपतराय डाह्याभाई, २७८}}
{{c|'''थ'''}}
{{Outdent|'''थ'''र्मापोली, २९}}
{{Outdent|'''थॉ'''मसन, ३७७}}
{{c|'''द'''}}
{{Outdent|'''द'''क्षिण आफ्रिका, -में भारतीयोंसे अछूतोंका-सा व्यवहार, ६२-६३, ३१६; -में सत्याग्रह, १४-१५, ६०-६२, १२१, २२१, ४८५-८६ ; -में सत्याग्रहकी सफलता ४९२-९३}}
{{Outdent|दत्त, रमेशचन्द्र, ४५१}}
{{Outdent|दमन, -संयुक्त प्रान्तमें, ५३८, ५४५-४६}}
{{Outdent|दमयन्ती, २१४-१५}}
{{Outdent|दयाराम गीदुमल, ६}}
{{Outdent|दरमल, मोहनसिंह, ५४५}}
{{Outdent|दलपतराय, देखिए त्रिवेदी, दलपतराय डाह्याभाई}}
{{Outdent|दलीपसिंह, ५१, ६७, ८६, १००; —और अहिंसा, १४५, १७१-७२}}
{{Outdent|दशरथ, १२०}}
{{Outdent|दास, गोपबन्धु, ७९}}
{{Outdent|दास, चित्तरंजन, ११, २२, ७९, १०१, १८३, २०३, २४१, ३२७, ३४२, ४१८}}
{{Outdent|दिवेटिया, नरसिंहराव, ६}}
{{Outdent|दीक्षित, डा॰, २९७}}
{{Outdent|दुनीचन्द, लाला, २४३}}
{{Outdent|दुमसिया, एन॰ एम॰, २४७-४८}}
{{Outdent|दुर्गा, ४८८, ५३६}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
q3k3woucw6930t4bc5qvcbt5x4z36ga
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१६
250
186133
673101
644448
2026-08-23T02:36:54Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673101
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''५८४'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|देशपाण्डे, गंगाधरराव, ७९, ४१४}}
{{Outdent|देशी रा'''ज्य''', ——और स्वराज्य, २८५}}
{{Outdent|देसाई, चन्दूलाल, २९७}}
{{Outdent|देसाई, महादेव, ६, १४३, २४०, २९७, ३४६, ४८८, ४९५, ५२०, ५३५}}
{{Outdent|द्रविड़, -प्रान्त, ५५२; -लोगोंमें हिन्दीका प्रचार, ४८५; -सभ्यताका भारतीय सभ्यता में योगदान, ५०}}
{{c|'''घ'''}}
{{Outdent|'''घ'''रना, -गांधीजी के विचार, ३३९-४०; -शराबकी दुकानोंपर, ३६४, ४१३-१६, ४७१; -स्त्रियों द्वारा ४५२, ४७१}}
{{Outdent|धर्म, —और अस्पृश्यता, २३८, २८९; —और अहिंसा, ३३, २७७; ——और पशुबलि, ११५; —और स्वराज्य, ३१६}}
{{c|'''न'''}}
{{Outdent|'''न'''नकाना साहब, —की दुःखद घटना, ६७-६८}}
{{Outdent|नय्यर, प्यारेलाल, ५३६}}
{{Outdent|नरमदलीय, —और मद्य-निषेध, ३३८-३९}}
{{Outdent|नरिमन, जी॰ के॰, ३०}}
{{Outdent|'''नवजीवन,''' ३०, ७८, ९६, २८४, ५३९, ५५०-५१ -का हिन्दी संस्करण, ५३९-४०, ५५१; —की भाषा, ३७, ५३३-३४}}
{{Outdent|नवलराम, २०१}}
{{Outdent|नाइट, हॉल्फोर्ड, १५७}}
{{Outdent|नानक, गुरु, ४५}}
{{Outdent|नापू, वेलजी लखमसी, २५०, ३३७}}
{{Outdent|नायडू, थम्बी, ४६०}}
{{Outdent|नायडू, सरोजिनी, २८९, ४३५, ४४०}}
{{Outdent|नारणदास पुरुषोत्तमदास, ३६०, ४७३}}
{{Outdent|नारायणदास, महन्त, ६१, ६७, १००, १४५}}
{{Outdent|'''नेशन,''' ४३०}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|नेहरू, कमला, ४२४}}
{{Outdent|नेहरू, जवाहरलाल, १८, ७९, ४४८, ५२२, ५३८, ५४६}}
{{Outdent|नेहरू, मोतीलाल, ११, २२, १३८, १७९, २२१, २४१, २४६, ३५२, ४२३, ५३५, ५४५}}
{{Outdent|नौरोजी, दादाभाई, २५, १९०, २४२, ३१८-१९; -और गांधीजी, ३८३}}
{{c|'''प'''}}
{{Outdent|'''प'''टवारी, रणछोड़दास, २१३}}
{{Outdent|पटेल, डाह्याभाई, २४०, ३६१, ३८९}}
{{Outdent|पटेल, मणिबेन, २४०, ३६१, ३८८-८९}}
{{Outdent|पटेल, बल्लभभाई, ३४, ७९, १८०, २०६, २५३, २९७, ३५२, ३८८}}
{{Outdent|पटेल, विट्ठलभाई, ७, १६७, २४०, ३६१, ३७२, ३८९}}
{{Outdent|पट्टणी, प्रभाशंकर, २१४}}
{{Outdent|पठान, १००, ४८६}}
{{Outdent|पण्डित, विजयलक्ष्मी, ४२३}}
{{Outdent|पण्ड्या, मोहनलाल, २९७, ४९३}}
{{Outdent|पश्चिमोत्तर सीमा- प्रान्त, —के कबाइलियों द्वारा हमला, १३६-३७, ३६६-६७}}
{{Outdent|पारसी, २७, ३१८, ३७७, ३७९, ३९६, ४३४, ४४५, ४७७; -और असहयोग आन्दोलन, २५-२९, ३०-३४, २४१-४२, २४९, २५५-५६, ३१२; -और गुजराती भाषा, ५३३-३४; -और पश्चिमी सभ्यता, २७, ४०३ ; -और मद्यपान-निषेध, ३३, ४७, २९५, ३२१-२२, ३६२-६५; -और राष्ट्रीय आन्दोलन, ४७०-७१; -और स्वदेशी, २७-२८, ४६८-६९; -और स्वराज्य, २३, ४०३-४; -और हिन्दू, २४१-४२, ३१९-२०; -और हिन्दू-मुस्लिम एकता, २४७, २४९-५०, ४०३-४; -[सियों] की प्रशंसा, २५-२९, ६३-६४, २४१, २४४, ३१८-}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
hqsc0la1i4xwib8sv1tjojhpto463te
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१७
250
186135
673103
644450
2026-08-23T02:52:59Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673103
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||''' सांकेतिका'''|'''५८५'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}१९; ——द्वारा तिलक स्वराज्य-कोषमें दान, २८६, २९४-९५, ३१२-१३}}
{{Outdent|पारेख, देवचन्द, ६६, ३६२}}
{{Outdent|पारेख, मंगलदास, २५३}}
{{Outdent|पाल, विपिनचन्द्र, १४४, ५३६; -द्वारा गांधीजीकी वाइसरायके साथ भेंटकी आलोचना, २३३-३५}}
{{Outdent|पॉलेन, डा॰ जॉन, —द्वारा की गई असहयोग आन्दोलन '''की आलोचना'''का जवाब, २६०-६३}}
{{Outdent|पिक्थॉल, ४६९-७०}}
{{Outdent|पियर्सन, विलियम विंस्टेनली, १५७}}
{{Outdent|पुराणी, २०७}}
{{Outdent|पुरोहित, ओंकारनाथ, ५३४}}
{{Outdent|पुष्पा, २८०; —का स्वराज्य-कोषमें दान, २८२-८३}}
{{Outdent|पेंटर, ३६४}}
{{Outdent|पेटिट, जो॰ बो॰, ३५१, ४७६, ५२०}}
{{Outdent|पेटिट, श्रीमती जाईजी, ८९}}
{{Outdent|पेरीनबेन, ४७१}}
{{Outdent|पोलक, एच॰ एस॰ एल॰ ४११, ४८५}}
{{Outdent|प्रकाशम्, ५१०}}
{{Outdent|'''प्रजामित्र,''' ३६४, ४०७}}
{{Outdent|प्रताप, राणा, ४५}}
{{Outdent|प्रह्लाद, ५१, १७२}}
{{c|''' फ'''}}
{{Outdent|'''फि'''लिस्तीन, —में ब्रिटिश संरक्षण, १२७}}
{{c|'''ब'''}}
{{Outdent|'''ब'''जाज, जमनालाल, ७९, १११, १७९, २३६, २४६, ५३९}}
{{Outdent|बनर्जी, जितेन्द्रलाल, २५१}}
{{Outdent|बनारसीदास, ३५१}}
{{Outdent|बहिष्कार, -अदालतोंका, २९३; -और विदेशी कपड़ेकी होली, ३५९, ३६१, ३९६-९७, ४६४, ४७४, ५०५; —और}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}स्वदेशी, ९१; -और स्वराज्य, १५-१६, ३९२-९३, ४३४; -'''यू'''रोपीय पेढ़ियोंका, ४४८; -विदेशी कपड़ेका, ३२९-३०, ३३३-३४, ३४३, ३५३-५५, ३५७, ३८१, ३९०-९१, ३९६-९७, ४१०, ४१२-१३, ४१७, ४२०, ४३१-३२, ४३६-३८, ४४३-४४, ४४७, ४६२-६६, ४८०, ४८९-९०, ४९५, ५०४, ५०९,
५१५, ५३२, ५३७; -विदेशी कपड़ेका और मिल-मालिक, ३४४-४५, ३५५; -विदेशी कपड़ेका और व्यापारी, ३४८-५०, ३९८-९९, ५५२; -विदेशी वस्तुओंका, ३२६, ३८२; -शराबियोंका, ११८-१९; -सरकारी अधिकारियोंका,
५०३}}
{{Outdent|'''बाइबिल,''' २७, ४५, १२८}}
{{Outdent|'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ४२, ४६, ३४०}}
{{Outdent|बाल विवाह, ४२७}}
{{Outdent|बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर, २९७, ४६०}}
{{Outdent|बुद्ध, २९१}}
{{Outdent|बेगार, ४११, ४२५-२६, ४२९, ५३५}}
{{Outdent|बेन, स्पूर, १५७}}
{{Outdent|बैंकर, शंकरलाल, ७९, २१०, २३६, २४६, २७१, २८९, ३३७, ४६५, ५३९}}
{{Outdent|बैन्थम, जैरमी, ६९}}
{{Outdent|बोअर युद्ध, १२९, ५२४}}
{{Outdent|बोमनजी, २३७}}
{{Outdent|बोर्न, जे॰ सी॰, ३७३}}
{{Outdent|बोल्शेविक खतरा, -भारतको नहीं, ५८-५९}}
{{Outdent|बौद्ध धर्म, १६३}}
{{Outdent|ब्रिटिश नौकरशाही, —और जातीय असमानता, २९०; -और भारतीय, ४८२}}
{{Outdent|ब्रिटिश राज्य, और भारतीय शिक्षा, ४४; -के अधीन भारत, २४२, २५५, २६२-६३, २६५-६७; -भारतमें, के बारेमें लॉर्ड रीडिंग के दावोंका खण्डन, १८८-}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
cr0p2qrjq7w86lbid4o8fxgkpe1smrq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१८
250
186139
673104
644454
2026-08-23T03:08:21Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673104
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''५८६'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}९०; -भारत में सबसे अधिक खर्चीला, २६२-६३}}
{{Outdent|ब्रिटिश सरकार, -और खिलाफत, ४०९- १०; और ट'''र्की''', ३००, ३९५, ५४२; -की अफगानिस्तानसे सन्धि करनेकी चिन्ता, ५८-५९; -द्वारा प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान की गई गुप्त सन्धियाँ, ४६}}
{{c|'''भ'''}}
{{Outdent|'''भगवद्गीता,''' २६, १२८, १४५, २७४, ४०५, ४१८, ४६३, ४६५}}
{{Outdent|भगवानदास, १३०}}
{{Outdent|भरूचा, ३१२, ३६२, ४१६}}
{{Outdent|भc'''र्तृह'''रि, ३४७}}
{{Outdent|'''भागवत,''' २३९, ४७८}}
{{Outdent|भाण्डारकर, डा॰, —तथा गांधीजी, ३८४}}
{{Outdent|भारत सुरक्षा कानून, १९}}
{{Outdent|भारत सेवक समाज (सवेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी), २७८}}
{{Outdent|भारतीय दण्ड संहिता, २९२}}
{{Outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ८, १५, २१, ५१-५२, ८२, १५१; —और खिलाफत, ५४२; —और मुसलमान, २९८-९९, ४५५-५६; -और सिख, ४८३; -का अहमदाबाद अधिवेशन, ३६७; -का नागपुर अधिवेशन, १७२; -का बेजवाड़ा कार्यक्रम, १७८-८०, १९४-९५, १९७-९८, २४४, २५१, २५८, २६०, ३२५-२७, ३९५-९६, ४८९; -का लक्ष्य, ३०२-३; -का संविधान, ३०२-३; -का स्वदेशी सम्बन्धी प्रस्ताव, ४४२; -की कार्य- समिति, ३३४, ५१०-११; -की कार्य समितिका लखनऊ
समझौतेपर प्रस्ताव, २९८-९९; -की पंजाब कमेटी, ११, २९५; -की प्रान्तीय कमेटियों द्वारा चन्देकी रकमका हिसाब,
७९-८१; -की बम्बई प्रान्तीय कमेटी,}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}२८८-८९; -की बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी द्वारा तिलक स्वराज्य-कोषका इन्तजाम, ३३७; की सदस्यता के पात्र सहयोगी भी, १२०; -के नागपुर अधिवेशन में प्रस्ताव, ५४८; -के सदस्य बनाना, ५४, ११८-२०, १३५, १५१-५२, ३१३-१४, ३२५-२६, ४२०; —के सदस्यों के लिए शर्ते, १७७, १८७, ४२९-३०}}
{{Outdent|भारतीयों के साथ मेसोपोटामियामें दुर्व्यवहार, ४७; -पर यूरोपीय लोगों द्वारा जुल्म, २९०}}
{{Outdent|भुँवरजी, ५३६}}
{{Outdent|भूतनाथ, १०८}}
{{Outdent|भेसानिया, मेहरबाई, ६५}}
{{Outdent|भोजा भगत, ४०६, ४९४}}
{{c|'''म'''}}
{{Outdent|'''म'''कनजी, ३५३, ३९९}}
{{Outdent|मक्का शरीफ, ४६}}
{{Outdent|मजहरुल हक, २४३}}
{{Outdent|मजहरुल हक, श्रीमती, ४१२}}
{{Outdent|मथुरादास त्रिकमजी, ३२२, ४८८, ५२२}}
{{Outdent|मद्यपान निषेध, १६, १८, २२, ४९, ११८-१९, १३५, १९१, ३८२; -और धरना देना, ३३९-४०; —और नरम दलके लोग, १९०-९२, ३३८-३९; -और पारसी, २८, ३३, ४६-४७, ३२१-२२, ३६२-६३; -और शराब के ठेके-दार, ४१३-१५; -और शिक्षक, २७६; -कानून द्वारा, ३३८, ३४०; -के संघर्षमें बल-प्रयोग, ७३-७४; -सम्बन्धी थाना जिला बोर्डका प्रस्ताव, ३७२; -स्वराज्यमें, २७-२८}}
{{Outdent|'''मनुस्मृति,''' ५१८, -में जुएकी निन्दा, १३०}}
{{Outdent|मलबारी, ६३, ५३४}}
{{Outdent|महमूदाबाद, —के राजा, ५०३, ५४६}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
a49us7tgjm2wh95x4ru11r6zbj524u1
673105
673104
2026-08-23T03:08:50Z
अँजली चौधरी
2439
673105
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''५८६'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}९०; -भारत में सबसे अधिक खर्चीला, २६२-६३}}
{{Outdent|ब्रिटिश सरकार, -और खिलाफत, ४०९- १०; और ट'''र्की''', ३००, ३९५, ५४२; -की अफगानिस्तानसे सन्धि करनेकी चिन्ता, ५८-५९; -द्वारा प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान की गई गुप्त सन्धियाँ, ४६}}
{{c|'''भ'''}}
{{Outdent|'''भगवद्गीता,''' २६, १२८, १४५, २७४, ४०५, ४१८, ४६३, ४६५}}
{{Outdent|भगवानदास, १३०}}
{{Outdent|भरूचा, ३१२, ३६२, ४१६}}
{{Outdent|भ'''र्तृह'''रि, ३४७}}
{{Outdent|'''भागवत,''' २३९, ४७८}}
{{Outdent|भाण्डारकर, डा॰, —तथा गांधीजी, ३८४}}
{{Outdent|भारत सुरक्षा कानून, १९}}
{{Outdent|भारत सेवक समाज (सवेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी), २७८}}
{{Outdent|भारतीय दण्ड संहिता, २९२}}
{{Outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ८, १५, २१, ५१-५२, ८२, १५१; —और खिलाफत, ५४२; —और मुसलमान, २९८-९९, ४५५-५६; -और सिख, ४८३; -का अहमदाबाद अधिवेशन, ३६७; -का नागपुर अधिवेशन, १७२; -का बेजवाड़ा कार्यक्रम, १७८-८०, १९४-९५, १९७-९८, २४४, २५१, २५८, २६०, ३२५-२७, ३९५-९६, ४८९; -का लक्ष्य, ३०२-३; -का संविधान, ३०२-३; -का स्वदेशी सम्बन्धी प्रस्ताव, ४४२; -की कार्य- समिति, ३३४, ५१०-११; -की कार्य समितिका लखनऊ
समझौतेपर प्रस्ताव, २९८-९९; -की पंजाब कमेटी, ११, २९५; -की प्रान्तीय कमेटियों द्वारा चन्देकी रकमका हिसाब, ७९-८१; -की बम्बई प्रान्तीय कमेटी,}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}२८८-८९; -की बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी द्वारा तिलक स्वराज्य-कोषका इन्तजाम, ३३७; की सदस्यता के पात्र सहयोगी भी, १२०; -के नागपुर अधिवेशन में प्रस्ताव, ५४८; -के सदस्य बनाना, ५४, ११८-२०, १३५, १५१-५२, ३१३-१४, ३२५-२६, ४२०; —के सदस्यों के लिए शर्ते, १७७, १८७, ४२९-३०}}
{{Outdent|भारतीयों के साथ मेसोपोटामियामें दुर्व्यवहार, ४७; -पर यूरोपीय लोगों द्वारा जुल्म, २९०}}
{{Outdent|भुँवरजी, ५३६}}
{{Outdent|भूतनाथ, १०८}}
{{Outdent|भेसानिया, मेहरबाई, ६५}}
{{Outdent|भोजा भगत, ४०६, ४९४}}
{{c|'''म'''}}
{{Outdent|'''म'''कनजी, ३५३, ३९९}}
{{Outdent|मक्का शरीफ, ४६}}
{{Outdent|मजहरुल हक, २४३}}
{{Outdent|मजहरुल हक, श्रीमती, ४१२}}
{{Outdent|मथुरादास त्रिकमजी, ३२२, ४८८, ५२२}}
{{Outdent|मद्यपान निषेध, १६, १८, २२, ४९, ११८-१९, १३५, १९१, ३८२; -और धरना देना, ३३९-४०; —और नरम दलके लोग, १९०-९२, ३३८-३९; -और पारसी, २८, ३३, ४६-४७, ३२१-२२, ३६२-६३; -और शराब के ठेके-दार, ४१३-१५; -और शिक्षक, २७६; -कानून द्वारा, ३३८, ३४०; -के संघर्षमें बल-प्रयोग, ७३-७४; -सम्बन्धी थाना जिला बोर्डका प्रस्ताव, ३७२; -स्वराज्यमें, २७-२८}}
{{Outdent|'''मनुस्मृति,''' ५१८, -में जुएकी निन्दा, १३०}}
{{Outdent|मलबारी, ६३, ५३४}}
{{Outdent|महमूदाबाद, —के राजा, ५०३, ५४६}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
1hl2iabch9yic4sq0kglcyo2wdwyf9i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६१९
250
186141
673106
644456
2026-08-23T03:17:09Z
अँजली चौधरी
2439
673106
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" />{{rh||'''सांकेतिका'''|'''५८७'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|'''महाभारत,''' १४५, ५१८}}
{{Outdent|माधुरी, -का स्वराज्य-कोष में दान, २८०-८३}}
{{Outdent|मॉन्टेग्यु २००}}
{{Outdent|मालवीय, कपिलदेव, ५२२}}
{{Outdent|मालवीय, मदनमोहन, ११, ३०, ९९, ११५, १३३, १५१, १८१, २३३, २९०, ५२०}}
{{Outdent|मालेगाँव —में हिंसापूर्ण कार्य, ५३, ६८-७१, ८३, ८६, ११३, १७१-७२, ३६४, ५०३, ५०९}}
मावलंकर, गणेश वासुदेव, ३५२
मित्र, डा० एस० बी०, ९१-९२
मिल, जॉन स्टुअर्ट, ६९
मिश्र, निशाकर, ३७६
मिस्त्री, फीरोजशाह तेमुलजी, ७३
मुकादम, वामनराव, २९७
१७१-७२,
मुसलमान, २६, २८, ३४, ५९, ३७७, ३९६,
मेसोपोटामिया, - में भारतीयोंके साथ दुर्व्य-
वहार, ४७
मेहता, कुँवरजी, ३५३
मेहता, जे० के०, २८८
3712
मेहता, सर फीरोजशाह, १९०, २४२, २४४,
३१८, ३२०; -और गांधीजी, ३८४
मैकेंजी, ४९९
मोतीवाला, २८९
मोतीवाला, श्रीमती, २७२
मोदी, एच० पी०, २४४, २४८
य
यंग इंडिया, १३, ४१, ६६, १२५, १३९,
१५१, २५४, २५७, २६३, ३३५,
४११, ५२२, ४३६, ५३९, ५५०-५१
यशवन्तप्रसाद हरिप्रसाद, २०४
यहूदी, २३, २६, ३७७, ४३४, ४४५,
-और जजीरत-उल-अरव,
४७७;
१२७-२८
याकूब हसन, २०, ४५३
याज्ञिक, इन्दुलाल, २९७, ३५२
यादव, ३६३
'युधिष्ठिर, २८४
४११, ४३४, ४४५, ४७७, ५५१;
-और अहिंसा, ५१२; -और कांग्रेस,
२९८-९९, ४५५-५६; और गोरक्षा,
१५५, ४५६-५७; -और जजीरत-उल-
अरब, १२७; -और टर्कीको कुचलने के
लिए ब्रिटिश सरकारकी योजना, ३००-
१, ३९४-९६; -और स्वदेशी, २८;
- [T] की सुन्नी और बोहरा जातियों- यूनियन जॅक, ५१, ५०३
में झगड़ा, ४६१; - हिन्दू एकता, देखिए
हिन्दू-मुस्लिम एकता
युवराज, ३४१
र
रलियातबेन, ५३६
रम्भा, १७१
मुहम्मद अनवरुद्दीन, १९८
मुहम्मद अली, २९, ५८, ८३,
१२५, १५५,
३६७,
१५७, १६८, १८८, २१०,
३७१, ४१५, ४७८, ५००, ५२३,
५४०; देखिए अलीभाई भी
मुहम्मद नवाज़खाँ, ३६६
मूलचन्द, ५४, २२३
मूलशी, में सत्याग्रह, ४२-४३, ६७
मूसा, ३७९
मृत्यु का भय, ५२४-२६
राघवजी पुरुषोत्तम, ३३७
राजगोपालाचारी, चक्रवर्ती, ७९, ३३५,
३४६
राजेन्द्रप्रसाद, ७९
रानडे, न्यायमूर्ति, १४४ -और गांधीजी,
३८४
राबर्ट्स, लेडी, ५१९
राम, [भगवान्], १२०, १५३, २४६, ४०६,
४९८, ५२१, ५४१
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
6elmwi5clypltp2lbw0mj3vefoxcdr3
673110
673106
2026-08-23T04:14:24Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673110
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|'''५८७'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|'''महाभारत,''' १४५, ५१८}}
{{Outdent|माधुरी, -का स्वराज्य-कोष में दान, २८०-८३}}
{{Outdent|मॉन्टेग्यु २००}}
{{Outdent|मालवीय, कपिलदेव, ५२२}}
{{Outdent|मालवीय, मदनमोहन, ११, ३०, ९९, ११५, १३३, १५१, १८१, २३३, २९०, ५२०}}
{{Outdent|मालेगाँव —में हिंसापूर्ण कार्य, ५३, ६८-७१, ८३, ८६, ११३, १७१-७२, ३६४, ५०३, ५०९}}
{{Outdent|मावलंकर, गणेश वासुदेव, ३५२}}
{{Outdent|मित्र, डा॰ एस॰ बी॰, ९१-९२}}
{{Outdent|मिल, जॉन स्टुअर्ट, ६९}}
{{Outdent|मिश्र, निशाकर, ३७६}}
{{Outdent|मिस्त्री, फीरोजशाह तेमुलजी, ७३}}
{{Outdent|मुकादम, वामनराव, २९७}}
{{Outdent|मुसलमान, २६, २८, ३४, ५९, ३७७, ३९६, ४११, ४३४, ४४५, ४७७, ५५१; -और अहिंसा, ५१२; -और कांग्रेस, २९८-९९, ४५५-५६; —और गोरक्षा, १५५, ४५६-५७; -और जजीरत-उल-अरब, १२७; -और टर्कीको कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकारकी योजना, ३००-१, ३९४-९६; -और स्वदेशी, २८; -[ों] की सुन्नी और बोहरा जातियों-में झगड़ा, ४६१; -हिन्दू एकता, देखिए हिन्दू-मुस्लिम एकता}}
{{Outdent|मुहम्मद अनवरुद्दीन, १९८}}
{{Outdent|मुहम्मद अली, २९, ५८, ८३, १२५, १५५, ३६७, १५७, १६८, १८८, २१०, ३७१, ४१५, ४७८, ५००, ५२३, ५४०; देखिए अलीभाई भी}}
{{Outdent|मुहम्मद नवाज़खाँ, ३६६}}
{{Outdent|मूलचन्द, ५४, २२३}}
{{Outdent|मूलशी, —में सत्याग्रह, ४२-४३, ६७}}
{{Outdent|मूसा, ३७९}}
{{Outdent|मृत्यु का भय, ५२४-२६}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|मेसोपोटामिया, -में भारतीयोंके साथ दुर्व्यवहार, ४७}}
{{Outdent|मेहता, कुँवरजी, ३५३}}
{{Outdent|मेहता, जे॰ के॰, २८८}}
{{Outdent|मेहता, सर फीरोजशाह, १९०, २४२, २४४, ३१८, ३२०; -और '''गांधीजी,''' ३८४}}
{{Outdent|मैकेंजी, ४९९}}
{{Outdent|मोतीवाला, २८९}}
{{Outdent|मोतीवाला, श्रीमती, २७२}}
{{Outdent|मोदी, एच॰ पी॰, २४४, २४८}}
{{c|'''य'''}}
{{Outdent|'''यंग इंडिया,''' १३, ४१, ६६, १२५, १३९, १५१, २५४, २५७, २६३, ३३५, ४११, ५२२, ४३६, ५३९, ५५०-५१}}
{{Outdent|यशवन्तप्रसाद हरिप्रसाद, २०४}}
{{Outdent|यहूदी, २३, २६, ३७७, ४३४, ४४५, ४७७; -और जजीरत-उल-अरव, १२७-२८}}
{{Outdent|याकूब हसन, २०, ४५३}}
{{Outdent|याज्ञिक, इन्दुलाल, २९७, ३५२}}
{{Outdent|यादव, ३६३}}
{{Outdent|युधिष्ठिर, २८४}}
{{Outdent|युवराज, ३४१}}
{{Outdent|यूनियन जॅक, ५१, ५०३}}
{{c|'''र'''}}
{{Outdent|'''र'''म्भा, १७१}}
{{Outdent|रलियातबेन, ५३६}}
{{Outdent|राघवजी पुरुषोत्तम, ३३७}}
{{Outdent|राजगोपालाचारी, चक्रवर्ती, ७९, ३३५, ३४६}}
{{Outdent|राजेन्द्रप्रसाद, ७९}}
{{Outdent|रानडे, न्यायमूर्ति, १४४ -और गांधीजी, ३८४}}
{{Outdent|राबर्ट्स, लेडी, ५१९}}
{{Outdent|राम, [भगवान्], १२०, १५३, २४६, ४०६, ४९८, ५२१, ५४१}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
em5e83fn2q2akxvp4mc8cwq2tmn4h18
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०२
250
186269
672908
644615
2026-08-22T14:48:35Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
672908
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|४७०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सुधारकी आवश्यकताको स्वीकार कर दृश्यपट और वेषभूषामें मौलिक परिवर्तन करे तो वह नाटक प्रेमी जनताके धन्यवादका पात्र ही होगा ।
{{C|'''अक्लमन्दीका एक सुझाव'''}}
खादीके आन्दोलनमें पूरा देश जिस तरह्की दिलचस्पी ले रहा है वह सचमुच उल्लेखनीय है । थियेटरोंके जरिये खादीको लोकप्रिय बनानेका सुझाव पूनाके एक ग्रेजुएटने भेजा था। पंजाब के एक सज्जनने अपने पंजाब के अनुभवके आधारपर यह सुझाव दिया है । भारतमें सबसे ज्यादा सर्दी शायद पंजाबमें ही पड़ती है और वहाँ शरीरको गर्म रखने का सबसे आम तरीका है रुई-भरे चार सूती कपड़े पहनना और रुई-भरी रजाइयाँ ओढ़ना । उनसे शरीरको ऊनी कपड़ों और ऊनी कम्बलोंसे भी अधिक गर्मी मिलती है। लेकिन सूती कपड़े कुछ समय बाद बेहद गन्दे हो जाते हैं। इसके लिए उसका सुझाव है कि इन कपड़ों को या इनके भीतरकी रुईको हर साल सर्दियों में बदल दिया जाये । रजाइयाँ बहुत ही आसानीसे बदली जा सकती हैं। इसलिए उसका कहना यह है कि इनकी रुईको फिर धुन लेना चाहिए और खादी बनाने के लिए कात लेना चाहिए। पहले लिहाफ, यदि विलायती हों तो, स्वभावतः नष्ट कर देने चाहिए। इनका जलाना उचित ठहराने के लिए विनाशके गुण-दोषोंपर विचार करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इनमें से बहुतोंपर वर्षोंकी गन्दगी जमी होती है। लेकिन यदि लिहाफ खादीके बना लिये जायें तो वे रुई निकालकर गर्मियोंमें भी इस्तेमाल किये जा सकते हैं और इस सुझावके अनुसार जब फिर सर्दी आये तब उनके लिए नई रुई खरीद ली जा सकती है। यह सुझाव एक मेहनती परिवार के लिए वाकई बहुत अच्छा और एक गरीब परिवार के लिए बहुत किफायतका सुझाव है, क्योंकि इसमें कोई भी चीज बर्बाद नहीं जाती और सफाई रहती है । यदि गरीब लोग सिर्फ मामूली सिलाई सीख लें, जो कि जरूरी है, तो उन्हें बिना अधिक खर्चा किये ही कई सालतक अलग-अलग मौसमोंके लायक गर्म या ठंडे स्वास्थ्यप्रद कपड़े मिल सकते हैं। यदि यह सारी व्यवस्था होशियारीसे की जाये तो पाठक देखेंगे कि एक परिवारको हर साल थोड़ी रुई खरीदने से और ज्यादासे ज्यादा अपने जुलाहेको बुनाई देने से, पहनने और ओढ़ने के कपड़े मिल सकते हैं। उससे धुनाई, कताई और सिलाईका खर्च बच जाता है । ये काम बिना किसी कठिनाईके फुरसतके समयमें किये जा सकते हैं। इनसे मनोरंजन के समयमें कोई कमी नहीं होगी, या जैसा कि स्वर्गीय लॉर्ड केल्विन अपने बारेमें कहा करते थे, कार्यके परिवर्तनसे मनोरंजन प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन मैं जितना किसी गुजरातीको जानता हूँ उतना ही पंजाबी- को भी जानता हूँ । मुझे मालूम है कि कपड़ोंकी अपनी जरूरतोंको पूरा करनेके लिए उसके पास काफी समय बचता है। लेकिन अक्लमन्दीके इस सुझावको अमलमें लानेके लिये राष्ट्रीय आदतों में पूर्ण परिवर्तन करना आवश्यक है । यदि राष्ट्रको दरिद्रताकी स्थितिमें से निकालना है, तो इस तरहके परिवर्तनकी आवश्यकतासे कौन इनकार कर सकता है ? जैसा कि श्री एन्ड्रयूजने अपने दो लेखोंमें <ref>१. यंग इंडिया में ३-११-१९२१ और २०-११-१९२१ को प्रकाशित “ हाथ कताई और हाथ- बुनाई " शीर्षक लेख । </Ref>बहुत ही उचित ढंगसे दिखाया है, उष्ण कटि-<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
lfngbwg2m207qmo3ippd8owyxt3lkaw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०३
250
186270
672941
644616
2026-08-22T15:51:34Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
672941
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||कलम या तलवार ?|
४७१}}</noinclude>बन्धकी अर्थव्यवस्था समशीतोष्ण कटिबन्धकी अर्थव्यवस्थाकी तरह नहीं हो सकती । श्रमिकों को एक जगह एकत्रित करके भारतको औद्योगिक देश बनाना राष्ट्रकी हत्या करना है । कुटिया में ही स्वास्थ्यप्रद तथा आवश्यक अतिरिक्त धन्धा देकर भारतको श्रमशील बनाने का अर्थ है भारतको स्वस्थ और सम्पन्न बनाना व सुखी और सन्तुष्ट बनाना ।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}
{{C|{{larger|'''१९१. कलम या तलवार ?'''}}}}
लाहौरकी माल रोडपर जॉन लारेंसकी मूर्ति है। मूर्तिकी सूरत बड़ी घुड़कीली है और उसके दायें हाथमें कलम और बायें में तलवार है । उसके नीचे लिखा है-"तुम कलमकी हुकूमत चाहते हो या तलवारकी ? वह कलाकी दृष्टिसे तो एक अच्छी चीज बताई जाती है। लेकिन उसे देखकर लाहौरके लोगोंको सदा ही चिढ़ मालूम होती रहती है। उन्हें जबरदस्ती तो न कलमकी हुकूमत दरकार है और न तलवारकी ।
यह मूर्ति नगरपालिकाकी सम्पत्ति है। वह १८८० के आसपास खड़ी की गई थी। उस समय लोगोंमें स्वाभिमानका भाव उतना जाग्रत नहीं था जितना जाग्रत वह् आज है । तथापि, मुझे मालूम हुआ है कि उस समय भी कुछ नागरिकोंने इस अप- मानको बहुत तीव्रतासे अनुभव किया था। अभी हाल ही में लाहौरकी नगरपालिकाने बहुमतसे यह प्रस्ताव पास किया था कि फिलहाल, अन्तिम फैसला होनेतक वह मूर्ति उस जगहसे उठवाकर टाउन हालकी इमारतमें रखवा दी जाये । अन्य प्रस्तावोंकी तरह यह प्रस्ताव भी नियम के अनुसार सरकार के पास भेजा गया। इसके तीन-चार दिन बाद वहाँ नगरपालिकाकी ओरसे एक इंजीनियर यह देखने के लिए भेजा गया कि मूर्ति वहाँसे किस तरह हटायी जा सकती है। उसपर वहाँके डिप्टी कमिश्नरने, नगरपालिकाको कोई सूचना दिये बिना ही, पुलिसका एक दल भेजा कि वह उस इंजीनियरको और उसके आदमियोंको वहाँसे हटा दे। और जब नगरपालिकाने पूछा कि यह अनुचित हस्तक्षेप क्यों और कैसे किया गया तब कमिश्नरने यह हुक्म जारी कर दिया<ref>१. यह यहाँ नहीं दिया गया है। इसमें कहा गया था कि नगरपालिकाके उस प्रस्तावको कार्यान्वित न किया जाये ।</ref> ...।
इंजीनियर वहाँ बाकायदा अपना कर्त्तव्य पालन करनेके लिए गया था । उसको हटाने के लिए पुलिस भेजकर डिप्टी कमिश्नरने साफ तौरपर हमलेका जुर्म किया है । कमिश्नरका यह हुक्म कलमके मानीका नमूना है। कमिश्नरकी कलममें उतना ही अत्याचार भरा है जितना डिप्टी कमिश्नरकी तलवारमें। कमिश्नरको अदालती अधिकार नहीं हैं; परन्तु उसके पास तलवार है । इसलिए उसने उनका प्रयोग कर लिया । नगरपालिको खुद अपनी चीजको हटानेका अधिकार है या नहीं, इसका फैसला करना तो अदालतका काम है । परन्तु कमिश्नरको नगरपालिकापर 'दुर्भाव' की तोहमत<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
fwleaeyw456c3i4wew5a1ly7fou9fww
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०४
250
186271
673190
644617
2026-08-23T09:03:52Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673190
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४७२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लगाने का क्या अधिकार था? बात यह है कि कमिश्नर इस बात को गवारा नहीं
कर सकता कि उस मूर्ति से जो भावना प्रदर्शित होती है वह लाहौर के उस बढ़िया
हलके से लुप्त हो जाए। इसलिए उसने नगरपालिका को कानून सिखाने में आगा-पीछा
नहीं सोचा।
इस तरह नगरपालिका के मामले की एक मामूली घटना, जो इस नई जागृति का
परिणाम है, अब बड़े-से-बड़े सार्वजनिक महत्व की बात हो गई है। लाहौर के नागरिकों
और करदाताओं को अवश्य ही आम सभाएं करके नगरपालिका के उन सदस्यों की
तरफदारी करनी चाहिए जिन्होंने उस प्रस्ताव को पास किया है। और उन सदस्यों को
भी चाहिए कि वे इस मामले में तुरंत कदम बढ़ाएं और सरकार को अब तक इस
तरह का नोटिस न दिया हो तो अब दें कि अगर सरकार अपने पक्ष के समर्थन में कोई
उचित कारण न देगी तो नगरपालिका को अपना फर्ज अदा करना होगा और उस
मूर्ति को वहां से हटाना होगा।
कमिश्नर ने अनजान में ही लाहौर के सत्याग्रहियों को एक बड़ा अच्छा अवसर दिया
है। वे इस अवसर पर साफ तरीकों से और जोर से सविनय अवज्ञा की आजमाइश कर
सकते हैं। अगर सरकार नगरपालिका को ललकारे और पशु-बल का उपयोग कर मूर्ति को
न हटाने दे तो सत्याग्रही सरकार को अवश्य नोटिस देकर उस मूर्ति को हटाने के इरादे से
उस मुकाम पर जाएं और गिरफ्तार हों अथवा अगर सरकार चाहे तो गोलियां
खाकर वीर गति को प्राप्त हों।
लेकिन इस आखिरी काम के लिए सिर्फ वे लोग ही आगे बढ़ें जिन्होंने इसकी
अच्छी तैयारी कर ली हो। यह काम उसी वक्त किया जा सकता है जब लाहौर के
लोग एक होकर, एक आदमी की तरह काम करने को तैयार हों। वहां लोगों को भीड़ नहीं
करनी चाहिए। वहां एक बार में कुछ लोग, जैसे पांच लोग जा सकते हैं और उनमें से
एक आदमी उनका प्रवक्ता होना चाहिए। वे न तो गुल-गपाड़ा करें, न कोई दलील करें,
बल्कि सिर्फ वहां जाकर गिरफ्तार हो जाएं। क्योंकि इस समय उनका उद्देश्य मूर्ति को
हटाना नहीं, बल्कि गिरफ्तार होना है। हां, अगर काफी स्त्रियां और पुरुष वहां अपनी
बलि चढ़ाने के लिए मुस्तैद हों तो उससे जरूर ही यह मूर्ति वहां से हटा दी जाएगी।
ऐसे कानून-भंग में सफलता तभी मिल सकती है जब लोगों में शांति और अहिंसा की
भावना सोलह आने आ जाए। मैं यह सविनय कानून-भंग की उग्र दवा बताता तो
हूं; परन्तु साथ ही लाहौर के नागरिकों को यह भी चेताए देता हूं कि वे अच्छी तरह
सोचे-समझे बिना इस दवा का इस्तेमाल हरगिज न करें। मुझे तो लाहौर के जन-
समूह का यही तजुर्बा हुआ है कि वह सोचता-विचारता नहीं। वह नियम-पालन तो
जानता ही नहीं। स्वयंसेवकों को लोगों में एक कायदे से काम करना चाहिए जिससे उनमें
शांति और नियम-पालन का वातावरण तैयार हो सके। पिछली ९ तारीख को राष्ट्रीय-
शिक्षा-मंडल की ओर से जो दीक्षांत समारोह किया गया था उसमें कितने ही लोग बिना
टिकट और बिना इजाजत ही ब्रेडला हॉल में घुस आए थे। मुझे यह देखकर बड़ा दुख
हुआ। यह केवल असभ्यता ही नहीं, बल्कि ऐसी अवज्ञा भी है जिसे जुर्म कहना चाहिए,
क्योंकि वे ऐसी जगह घुस आए थे जहां वे जानते थे कि उनकी इस जबरदस्ती का विरोध<noinclude></noinclude>
gml7ykjzqrsuaq5bv1ok4rr38gqvjgi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०५
250
186272
673192
644618
2026-08-23T09:12:22Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673192
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||गाली किसे कहते हैं ?|
४७३}}</noinclude>कोई बल-पूर्वक नहीं करेगा। ऐसे लोग सविनय कानून-भंग के लायक नहीं हैं। सविनय
कानून-भंग में तो यह पहले से मान लिया जाता है कि लोग उन तमाम कानून-कायदों को,
जो नीति के विरुद्ध नहीं हैं, स्वेच्छापूर्वक ठीक तरह से मानेंगे। उस दीक्षांत समारोह के
व्यवस्थापकों के बनाए नियम की तरह के सार्वजनिक संस्थाओं के कानून-कायदों को मानना,
राज्य के कानूनों को स्वेच्छापूर्वक बिना दरेग मानने की पहली सीढ़ी के सिवा और कुछ
नहीं है। अविचारपूर्वक अवज्ञा करने का अर्थ है समाज को छिन्न-भिन्न कर देना। अतः
जो लोग सविनय कानून-भंग की आकांक्षा रखते हों उनका पहला काम यह है कि
वे सार्वजनिक संस्थाओं के, कांग्रेस अधिवेशनों, सम्मेलनों तथा दूसरी सभा-समितियों के,
कानून-कायदों को बाखुशी मानने की कला सीखें। इसी प्रकार वे राज्य के कानूनों को
भी मानना सीखें, फिर चाहे वे उन्हें पसंद करते हों चाहे न करते हों। सविनय
कानून-भंग की अवस्था अराजकता और मनमानी की अवस्था नहीं है; बल्कि उसमें
कानून को मानने की प्रवृत्ति और साथ ही आत्मसंयम का अंतर्भाव पहले ही से गृहीत
माना जाता है।
{{Left|[ अंग्रेजी से ]
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}
{{C|'''१९२. गाली किसे कहते हैं ?'''}}
संयुक्त प्रांत से एक महोदय लिखते हैं-
:'''आजकल चारों तरफ बड़ी बुलंद आवाजों में सरकार की मलामत करने की बाढ़-सी आ रही है। ऐसा मालूम होता है कि मानो हर आदमी इस बात की कोशिश करता है कि सरकार को गालियां देने में मैं दूसरे लोगों से आगे किस तरह बढ़ जाऊं। सच पूछिए तो हर एक व्याख्यान बदज़बानी और गालियों से भरा रहता है। . . .
:'''मुझे तो ऐसी बुरी बात से बहुत नफरत होती है। . .'''
:'''मेरी दृष्टि में हिंसा केवल दूसरों पर प्रत्यक्ष हमला करने और उन्हें मारडालने में ही नहीं है; बल्कि बुरी बात मुंह से निकालना भी हिंसा के अंतर्गत आता है। अगर यह ठीक है तो मेरी समझ में नहीं आता कि आप खुद जो इस सरकार को 'शैतानी', 'राक्षसी' और 'बर्बर' की उपाधियां देते हैं उसका समर्थन कैसे किया जा सकता है। इस बात में रत्ती भर भी शक नहीं है कि इन शब्दों का समावेश हिंसा में होता है; परन्तु इस बात का स्वप्न में भी खयाल नहीं किया जा सकता कि आप अहिंसा के परम प्रचारक होकर भी हिंसापूर्ण शब्दों का प्रयोग करेंगे।'''
:'''यह तो गाली-गलौज की बात हुई। अब मैं एक दूसरे सवाल को लेता हूं। आप हमेशा कहते हैं कि मैं और मेरे साथी लोग तो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ'''<noinclude></noinclude>
ofuugai5lmc3y2jy2s3451rd214apap
673196
673192
2026-08-23T09:21:32Z
Shivaniya shaw
4129
673196
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||गाली किसे कहते हैं ?|
४७३}}</noinclude>कोई बल-पूर्वक नहीं करेगा। ऐसे लोग सविनय कानून-भंग के लायक नहीं हैं। सविनय
कानून-भंग में तो यह पहले से मान लिया जाता है कि लोग उन तमाम कानून-कायदों को,
जो नीति के विरुद्ध नहीं हैं, स्वेच्छापूर्वक ठीक तरह से मानेंगे। उस दीक्षांत समारोह के
व्यवस्थापकों के बनाए नियम की तरह के सार्वजनिक संस्थाओं के कानून-कायदों को मानना,
राज्य के कानूनों को स्वेच्छापूर्वक बिना दरेग मानने की पहली सीढ़ी के सिवा और कुछ
नहीं है। अविचारपूर्वक अवज्ञा करने का अर्थ है समाज को छिन्न-भिन्न कर देना। अतः
जो लोग सविनय कानून-भंग की आकांक्षा रखते हों उनका पहला काम यह है कि
वे सार्वजनिक संस्थाओं के, कांग्रेस अधिवेशनों, सम्मेलनों तथा दूसरी सभा-समितियों के,
कानून-कायदों को बाखुशी मानने की कला सीखें। इसी प्रकार वे राज्य के कानूनों को
भी मानना सीखें, फिर चाहे वे उन्हें पसंद करते हों चाहे न करते हों। सविनय
कानून-भंग की अवस्था अराजकता और मनमानी की अवस्था नहीं है; बल्कि उसमें
कानून को मानने की प्रवृत्ति और साथ ही आत्मसंयम का अंतर्भाव पहले ही से गृहीत
माना जाता है।
{{Left|[ अंग्रेजी से ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}
{{C|'''१९२. गाली किसे कहते हैं ?'''}}
संयुक्त प्रांत से एक महोदय लिखते हैं-
:'''आजकल चारों तरफ बड़ी बुलंद आवाजों में सरकार की मलामत करने की बाढ़-सी आ रही है। ऐसा मालूम होता है कि मानो हर आदमी इस बात की कोशिश करता है कि सरकार को गालियां देने में मैं दूसरे लोगों से आगे किस तरह बढ़ जाऊं। सच पूछिए तो हर एक व्याख्यान बदज़बानी और गालियों से भरा रहता है। . . .
:'''मुझे तो ऐसी बुरी बात से बहुत नफरत होती है। . .'''
:'''मेरी दृष्टि में हिंसा केवल दूसरों पर प्रत्यक्ष हमला करने और उन्हें मारडालने में ही नहीं है; बल्कि बुरी बात मुंह से निकालना भी हिंसा के अंतर्गत आता है। अगर यह ठीक है तो मेरी समझ में नहीं आता कि आप खुद जो इस सरकार को 'शैतानी', 'राक्षसी' और 'बर्बर' की उपाधियां देते हैं उसका समर्थन कैसे किया जा सकता है। इस बात में रत्ती भर भी शक नहीं है कि इन शब्दों का समावेश हिंसा में होता है; परन्तु इस बात का स्वप्न में भी खयाल नहीं किया जा सकता कि आप अहिंसा के परम प्रचारक होकर भी हिंसापूर्ण शब्दों का प्रयोग करेंगे।'''
:'''यह तो गाली-गलौज की बात हुई। अब मैं एक दूसरे सवाल को लेता हूं। आप हमेशा कहते हैं कि मैं और मेरे साथी लोग तो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ'''<noinclude></noinclude>
4euh1uj00dnf6lrblk0vqklrab2appb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०६
250
186273
673201
644619
2026-08-23T09:27:41Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673201
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४७४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''लड़ने के लिए खड़े हुए हैं, अंग्रेजों के खिलाफ नहीं। आप इस शासन-प्रणाली के तो विरोधी हैं और इसे सुधारना या मिटाना चाहते हैं परन्तु खुद अंग्रेजों के प्रति आपके दिल में किसी तरह का बुरा खयाल नहीं है। अतः इससे यह साफ है कि यद्यपि आप इस शासन-पद्धति को तो मटियामेट कर देना चाहते हैं, परन्तु अंग्रेजों को निकालना नहीं चाहते। अगर यह बात ठीक है तो यह ऊंचा सिद्धान्त अभी उन लोगों के हृदय में भी पूरी तरह अंकित नहीं हुआ है जो आपके सच्चे अनुयायी होने का दम भरते हैं। मैं इसकी एक मिसाल देता हूं। आगरा में अभी हाल में राजनैतिक परिषद हुई थी।उसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू काभाषण हुआ, जिसमें उन्होंने विदेशी कपड़े के बहिष्कार पर बोलते हुए कहा : "मैं उन लोगों में से हूं जो सच्चे दिल से अंग्रेजों को भारत से निकालना चाहते हैं और अगर मुझे इसका कोई उपाय हाथ लगा है तो वह है स्वदेशी।" यह बात अखबारों में भी प्रकाशित हो चुकी है और, मैं समझता हूं, शायद आपने भी पढ़ी होगी। ऐसी हालत में यह कैसे कहा जा सकता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आपके उस सिद्धान्त का मर्म समझ लिया है जिसके द्वारा हम मनुष्य और उसके कार्य में भेद कर सकते हैं, ताकि हम उसके कार्य की तो निंदा कर सकें; परन्तु स्वयं उसके प्रति हमारे मन में किसी तरह का दुर्भाव न आए? इस मामले में तो मैं जोर देकर यह कह सकता हूं कि नेहरू जी की बात किसी तरह भी वाजिब नहीं कही जा सकती; तथापि मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या आप उसे पसंद करते हैं या नापसंद।<ref>१. जवाहरलाल नेहरू के उत्तर के लिए देखिए "टिप्पणियां", ८-१२-१९२१ का उप-शीर्षक,
"पंडित जवाहरलाल नेहरू का जवाब"।</ref>'''
{{Gap}}अगर असहयोगी लोग गालियों का व्यवहार करते हैं तो वे निसंदेह हिंसा करते
हैं और अहिंसा के व्रत का भंग करते हैं। लेकिन मैं इस बात को नहीं मान सकता कि हर एक
भाषण में महज बदज़बानी और बददुआएं ही भरी रहती हैं। मैं लेखक महोदय को यकीन
दिलाता हूं कि भाषणों में क्या सरकार की और क्या खुद हमारी दोनों की ही निंदा
होती है और उनमें निंदा की अपेक्षा अहिंसा, हिन्दू-मुस्लिम-एकता और स्वदेशी समर्थक
दलीलें ही अधिक रहती हैं। और इन तीनों बातों का लोगों की ओर से जो इतना आश्चर्य-
जनक उत्तर मिला है, वह मेरे इस कथन का शायद सबसे बड़ा सबूत है। फिर लोगों ने
इतनी प्रगति बिना प्रभावपूर्ण आग्रह के ही नहीं की है।
लेकिन आखिर गाली कहते किसे हैं? अंग्रेजी के कोष में गाली के पर्यायवाची अंग्रेजी शब्द का अर्थ है - अनुचित प्रयोग, कुप्रयोग, बुरा प्रयोग। अतः अगर हम चोर को चोर अथवा बदमाश को बदमाश कहते हैं तो इससे हम उसे गाली नहीं देते। हम कोढ़ी को कोढ़ी कहते हैं तो वह इसका बुरा नहीं मानता। हां, यह जरूर है कि ऐसे विशेषणों- का प्रयोग उसी नीयत से किया जाना चाहिए और उनके प्रयोगकर्ता के पास उसकी यथार्थता का प्रमाण होना चाहिए। इस दशा में मैं हर जगह और हर मौके पर किए गए<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
sjyai84x647kd5bav895odvpyd5zcnm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०७
250
186274
673206
644620
2026-08-23T09:43:30Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673206
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||गाली किसे कहते हैं ?|
४७५}}</noinclude>इन विशेषणों के प्रयोग को निंदनीय नहीं मान सकता। मैं यह भी नहीं मानता कि इन
निंदाकारी शब्दों का प्रयोग करना सदा हिंसा का लक्षण ही होता है। मैं यह बात
अच्छी तरह से जानता हूं कि उचित विशेषणों का प्रयोग भी हिंसा का लक्षण हो सकता
है। परन्तु कब? तभी जब उनका उपयोग उस व्यक्ति के प्रति जिसकी निंदा की गई
है, हिंसा को उत्तेजन देने के लिए किया गया हो। जब किसी मनुष्य की निंदा इसलिए
की जाती है कि वह अपनी बुरी आदत को छोड़ दे या श्रोता उसका साथ छोड़ दें तो
ऐसी निंदा बिल्कुल जायज होती है। हिन्दू-शास्त्र तो दुराचारियों की भर्त्सना से भरे
पड़े हैं। उन्होंने तो उन्हें कोसा तक है -- शाप तक दिए हैं। तुलसीदास तो मूर्तिमान
दया के अवतार थे। उन्होंने अपनी 'रामायण' में भगवान राम के द्रोहियों के लिए ढूंढ-ढूंढ
कर बुरे विशेषण प्रयुक्त किए हैं। असल में उन पापाचारियों के जो नाम चुने गए हैं वे
भी उनके गुणों के ही सूचक हैं। ईसामसीह उन लोगों पर दैवी कोप अवतरित करने में
नहीं हिचके जिनको वे 'दुष्टों, धूर्तों, और पाखंडियों की औलाद' कहते थे। बुद्ध ने उन
लोगों को नहीं छोड़ा जो धर्म के नाम पर निरपराध बकरों की बलि देते थे। 'कुरान' और
'जेंद अवेस्ता' भी ऐसे प्रयोगों से बची हुई नहीं हैं। हां, उनका प्रयोग करने में उन सब
ऋषियों और पैगंबरों की कोई बुरी नीयत नहीं थी। उन्हें तो लोगों और चीजों का
यथार्थ वर्णन करना था और उन्हें इसके लिए ऐसी भाषा का सहारा लेना पड़ा जिससे
हम लोग अच्छे और बुरे की पहचान कर सकें। हां, इस बात में मैं लेखक से सहमत
हूं कि हम सरकार अथवा शासकों के बारे में जितना कम कहें हमारे लिए उतना ही
अच्छा है। पहले ही हममें इतने विकार और दोष भरे हुए हैं कि हमारे लिए दिल
दुखाने वाली बातों का प्रयोग करना अनुचित है। हम इस सरकार का जो अच्छे से अच्छा
उपयोग कर सकते हैं वह यह है कि हम इसके अस्तित्व की उपेक्षा करें और इसका
संपर्क भ्रष्टकारी और पतनकारी है, यह विश्वास करते हुए जहां तक हो सके इसे
अपने जीवन से अलग रखें।
मैं बार-बार यह बात कहता जा रहा हूं कि इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेजों को
निकालना नहीं है, बल्कि उस शासन-प्रणाली को सुधारना या मिटा देना है जो उन्होंने
हम पर जबरदस्ती लाद रखी है। मैंने पंडित जवाहरलाल नेहरू का वह भाषण नहीं पढ़ा
है, जिसका जिक्र पत्र-प्रेषक महोदय ने किया है। लेकिन मैं उन्हें इतनी अच्छी तरह
जानता हूं कि मुझे यह विश्वास नहीं हो सकता कि उन्होंने वह बात कही होगी,
जिसका दोष उन पर लगाया गया है। मैं जानता हूं कि वे मनमौजीपन के खातिर ही
उनका चला जाना नहीं चाहते बल्कि वे उन अंग्रेज सज्जनों को सबसे पहले अपने हार्दिक
मित्र की तरह गले लगाएंगे जो भारत के प्रेमी हैं और जो उसके सेवक बनकर यहां
रहना चाहते हैं। इतना ही नहीं हम यह भी खयाल नहीं करते कि स्वतंत्र भारत में
भी जो अंग्रेज हमारी आशाओं की भावी राजसत्ता द्वारा तय हुई शर्तों के अनुसार रहना
चाहेंगे उन्हें यहां नहीं रहने दिया जाएगा।
[ अंग्रेजी से ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१<noinclude></noinclude>
mb5411octxiyltug0nubsffhy7r0rpc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०८
250
186275
673216
644621
2026-08-23T10:04:57Z
Shivaniya shaw
4129
/* अशोधित */
673216
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|'''१९३. पत्र लेखकोंसे'''}}
'''सी० एन० वेंकटशास्त्री :''' मुझे खेद है कि इन स्तम्भोंमें बताये गये कारणोंसे
तुम्हारा पत्र प्रकाशित नहीं किया जा सकता । परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे हिन्दू-
।
धर्म सम्बन्धी लेखको<ref>१. देखिए " हिन्दू धर्म ", ६-१०-१९२१ ।
।</ref> दुबारा पढ़ देखो। इससे तुम्हें पता चलेगा कि मेरे और तुम्हारे
विचारोंमें साम्य अधिक और अन्तर कम है। तुम केवल सतहपर ही रह गये हो, मैं
जड़तक पहुँच गया हूँ । इसलिए हमारे प्रयासोंके परिणाम भिन्न-भिन्न निकलना तो
लाजमी ही था ।
'''ए० एच० जयसिंहानी :''' १. असहयोगीके रूपमें में न जॉर्जको अपना राजा मानता
हूँ और न इस बातसे इनकार करता हूँ कि वे मेरे राजा हैं, मैं तो राजाके नामसे
चलाई जानेवाली शासन व्यवस्थासे बिलकुल अलग हो गया हूँ। मैं इस बातके लए
बिलकुल स्वतन्त्र हूँ कि यदि मैं उसके राज्यमें अपना पूर्ण विकास कर सकूं और मुझे
पंजाव और खिलाफतके सम्बन्धमें हुए अन्यायोंका पूर्ण प्रतिकार मिल जाये तो मैं
उनको अपनी पूर्ण निष्ठा अर्पित कर दूंगा ।
२. असहयोगियोंके रूपमें हमें जेलोंमें जरूर काम करना चाहिए क्योंकि हम
जेलोंसे तो असहयोग नहीं करते। जब हम अदालतोंमें ले जाये जाते हैं तब हम अदा-
लतोंके अनुशासन के सामने झुक जाते हैं । सविनय अवज्ञाका स्वरूप ही ऐसा है जिसके
कारण हमारा जेलोंके कायदे-कानूनोंको मानना लाजिमी है क्योंकि सविनय विरोध
करनेके कारण हम स्वयं कैदमें जाते हैं और इसीलिए उसके अनुशासनके कष्ट उठाने के
लिए बाध्य होते हैं। लेकिन हम ऐसे कायदे-कानूनोंका सविनय विरोध कर सकते हैं
जो केवल परेशान करनेवाले या कष्टसाध्य ही न हों, वरन् विशेष रूपसे असहयो-
गियोंको अपमानित करने और नीचा दिखाने के लिए ही बनाये गये हों। हमारे आत्म-
सम्मानका यह तकाजा है कि हम स्वेच्छासे जेल के अनुशासनका पालन करें। इसी
आत्मसम्मान के कारण हम ऐसे दुर्व्यवहारका विरोध भी कर सकते हैं जिसे नरम
भाषामें अनुशासन कहते हैं। उदाहरण के लिए हम, चाहे जेलके भीतर हों या बाहर,
अपनी नाक जमीनपर रगड़ने से इनकार कर सकते हैं।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,'''१७-११-१९२१}}<noinclude>{{dhrp</noinclude>
0d84n9v9vaznatmk4ykfpcpp7z1y2xn
673220
673216
2026-08-23T10:08:30Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673220
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|'''१९३. पत्र-लेखकों से'''}}
'''सी० एन० वेंकटशास्त्री :''' मुझे खेद है कि इन स्तंभों में बताए गए कारणों से
तुम्हारा पत्र प्रकाशित नहीं किया जा सकता। परन्तु मैं चाहता हूं कि तुम मेरे हिन्दू-
।
धर्म संबंधी लेख को<ref>१. देखिए " हिन्दू धर्म ", ६-१०-१९२१।
।</ref> दोबारा पढ़ देखो। इससे तुम्हें पता चलेगा कि मेरे और तुम्हारे
विचारों में साम्य अधिक और अंतर कम है। तुम केवल सतह पर ही रह गए हो, मैं
जड़ तक पहुंच गया हूं। इसलिए हमारे प्रयासों के परिणाम भिन्न-भिन्न निकलना तो
लाजिमी ही था।
'''ए० एच० जयसिंहानी :''' १. असहयोगी के रूप में मैं न जॉर्ज को अपना राजा मानता
हूं और न इस बात से इनकार करता हूं कि वे मेरे राजा हैं, मैं तो राजा के नाम से
चलाई जाने वाली शासन व्यवस्था से बिल्कुल अलग हो गया हूं। मैं इस बात के लिए
बिल्कुल स्वतंत्र हूं कि यदि मैं उनके राज्य में अपना पूर्ण विकास कर सकूं और मुझे
पंजाब और खिलाफत के संबंध में हुए अन्यायों का पूर्ण प्रतिकार मिल जाए तो मैं
उनको अपनी पूर्ण निष्ठा अर्पित कर दूंगा।
२. असहयोगियों के रूप में हमें जेलों में जरूर काम करना चाहिए क्योंकि हम
जेलों से तो असहयोग नहीं करते। जब हम अदालतों में ले जाए जाते हैं तब हम अदा-
लतों के अनुशासन के सामने झुक जाते हैं। सविनय अवज्ञा का स्वरूप ही ऐसा है जिसके
कारण हमारा जेलों के कायदे-कानूनों को मानना लाजिमी है क्योंकि सविनय विरोध
करने के कारण हम स्वयं कैद में जाते हैं और इसीलिए उसके अनुशासन के कष्ट उठाने के
लिए बाध्य होते हैं। लेकिन हम ऐसे कायदे-कानूनों का सविनय विरोध कर सकते हैं
जो केवल परेशान करने वाले या कष्टसाध्य ही न हों, वरन् विशेष रूप से असहयोगियों को अपमानित करने और नीचा दिखाने के लिए ही बनाए गए हों। हमारे आत्मसम्मान का यह तकाजा है कि हम स्वेच्छा से जेल के अनुशासन का पालन करें। इसी
आत्मसम्मान के कारण हम ऐसे दुर्व्यवहार का विरोध भी कर सकते हैं जिसे नरम
भाषा में अनुशासन कहते हैं। उदाहरण के लिए हम, चाहे जेल के भीतर हों या बाहर,
अपनी नाक जमीन पर रगड़ने से इनकार कर सकते हैं।
{{Left|[ अंग्रेजी से ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
jw77ctoc0u2xh3hb2jt0syt28y7drkn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५०९
250
186276
673226
644622
2026-08-23T10:19:22Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673226
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|'''१९४. निर्दोष अवज्ञा बनाम दोषपूर्ण अवज्ञा'''}}
जब आदमी खुद अपने बनाए हुए कानूनों को खुद ही जान-बूझकर भंग करता है, तब ऐसा कानून-भंग अपराध हो जाता है। क्योंकि तब वह अपने प्रति नहीं, बल्कि किसी दूसरे के प्रति अपराध करता है, और चूंकि कानून-निर्माता ने उसकी कोई सजा अपने लिए निश्चित नहीं की है अतः वह न केवल इस कानून-भंग की सजा से ही बचता है बल्कि उन कानूनों का पालन करने की असुविधा से भी बच जाता है। जो बात व्यक्ति के विषय में चरितार्थ होती है वही संस्थाओं के विषय में भी चरितार्थ होती है। हम देखते हैं कि आज इसी प्रकार यह सरकार अपने ही बनाए कानूनों को भारत-भर में भंग कर रही है। दंड संहिता और फौजदारी कानून की धाराओं का मनमाना दुरुपयोग किया जा रहा है। और चूंकि असहयोगियों ने अधिकारियों की दी हुई आज्ञाओं पर आपत्ति करना छोड़ दिया है, इसलिए वे अब निडर होकर बड़ी निर्लज्जता से गैर-कानूनी कार्रवाइयां कर रहे हैं। हमने देखा है कि इस प्रकार की कार्रवाइयां बुलंदशहर, चटगांव और तमाम सिंध प्रांत में की गई हैं और वे मद्रास प्रांत में तो सबसे ज्यादा व्यवस्थित रूप से और जान-बूझकर की गई हैं। श्री याकूब हसन ने ठीक-ठीक तौर से यह दिखा दिया है कि उनकी गिरफ्तारी और सजा वाइसराय के वचन की भावना के खिलाफ है। सच पूछिए तो वह केवल लॉर्ड रीडिंग के वचन के भाव के ही विरुद्ध नहीं है, बल्कि उनके पूर्ववर्ती वाइसराय की उस विज्ञप्ति के भी अक्षरशः विरुद्ध है जिसमें उन्होंने गंभीरता से घोषित किया था कि दमन-नीति का अवलंबन तब तक नहीं लिया जाएगा जब तक असहयोग शांतिमय बना रहेगा। और श्री याकूब हसन पर तो यह दोषारोपण कोई भी नहीं कर सकता कि उन्होंने अपने तंजौर के भाषण में, जो उन्होंने खास-खास चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने दिया था, लोगों को हिंसा के लिए उकसाया था; और तंजौर जिले भर में उनके उस भाषण से खून-खराबी या झगड़ा-फसाद भी कहीं नहीं हुआ है। "देश भक्तन्" के संपादक श्री अय्यर के मामले में तो मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट स्वीकार किया है कि जिन लेखों को आपत्तिजनक माना गया है उनमें हिंसा की भावना का नामो-निशान तक नहीं है। इतना ही नहीं वरन् उनमें तो उल्टा अहिंसा के पालन का अनुरोध किया गया है। कोयंबटूर के प्रमुख वकील, श्री रामस्वामी आयंगर, महज इसलिए पकड़े गए हैं कि उन्होंने "हिंदू" को एक जोशीला पत्र भेजा था, यद्यपि उसमें हिंसा का भाव जरा भी नहीं था। इसी तरह डा० वरदराजुलु और श्री गोपालकृष्णय्या भी भाषण और लेखों के कारण गिरफ्तार किए गए हैं, यद्यपि उनके विषय में यह कहा जाता है कि उनसे हिंसा को उत्तेजन नहीं मिलता, इतना ही नहीं बल्कि उत्तेजना की अवस्था में भी उनका प्रभाव संयतकारी होता है। ऐसी हालत में जब कि सरकार इस प्रकार चारों ओर दमन करने पर तुली है, अगर कोई यह अनुमान करे कि सरकार लोगों को झगड़ा-फसाद करने के लिए उकसाना चाहती है, तो क्या आश्चर्य है? उक्त उदाहरणों में एक भी ऐसा नहीं है जिसमें किसी के इन संबंधित लेखों या भाषणों के कारण कहीं भी हिंसा का उद्रेक हुआ हो।<noinclude></noinclude>
t9r3f5yrd32itca3c0lrs7hyua3dnwk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१०
250
186278
673233
644624
2026-08-23T10:44:10Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673233
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४७८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इस प्रकार हम देखते हैं कि सरकार खुद अपने ही बनाए कानूनों को भंग करने का गुनाह
कर रही है। और उन पीड़ित दुखी व्यक्तियों के पास सरकार के जुल्म से बचाव का कौन-
सा कानूनी उपाय है? सचमुच यदि किन्हीं नीच उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सरकार अपने
बनाए कानून का खुद ही दुरुपयोग करती है तो कानून में उसको रोकने की कोई व्यवस्था
नहीं है। इसलिए जब कोई सरकार कानून की अवहेलना करके व्यवस्थित रूप से मनमानी
करने लगती है तब विशेषतः उन लोगों के लिए सविनय कानून-भंग करना एक
पवित्र कर्तव्य हो जाता है जिनका हाथ उस सरकार को या उसके कानून को बनाने में
नहीं था। हां, एक दूसरा भी उपाय है और वह है - सशस्त्र विद्रोह। सविनय कानून-
भंग उसका पूरा, कारगर और शांतिपूर्ण रक्तपात-हीन स्थान-पूरक है। और यह भी
अच्छा ही है कि हमने केवल अन्याय-युक्त ही नहीं, बल्कि गैर-कानूनी आदेशों का भी
पालन करने में जिस अनुकरणीय संयम और नियम-पालन का परिचय दिया है उससे
ठीक वैसी ही परिस्थिति तैयार हो गई है जैसी सविनय कानून-भंग के लिए आवश्यक
होती है। इसका फल यह हुआ है कि एक ओर तो इस सरकार का अन्यायी रूप अधिक
स्पष्ट दिखाई देने लग गया है और दूसरी ओर हम स्वयं स्वेच्छापूर्वक आज्ञा-पालन करके
सविनय कानून-भंग के योग्य बन गए हैं।
साथ ही यह भी उतनी ही अच्छी बात है कि अब भी सविनय भंग का क्षेत्र
भरसक मर्यादित ही रखा जा रहा है। हां, हमें मानना होगा कि जिस तरह भ्रष्ट
और प्रजा-निंदित सरकार किसी सभ्य-समुन्नत समाज में रोग की तरह एक अस्वाभाविक
वस्तु होती है उसी तरह कानून का सविनय भंग भी एक असाधारण स्थिति है। इस-
लिए जिस नागरिक ने राज्य के कानून का स्वेच्छापूर्वक पालन करने के विषय में पूरी-पूरी
तालीम पाई है वही बिरले प्रसंगों पर जान-बूझकर परन्तु विनय-पूर्वक कानून का भंग
करके सजा प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है। इसलिए यदि हमें थोड़े-से-थोड़े
समय में अधिक-से-अधिक काम करना हो तो जब तक एक परिमित क्षेत्र में भयंकर-से-भयंकर
कानून-भंग चल रहा हो तब तक हमें दूसरे भागों में कानून का पूरा पालन करना
चाहिए, जिससे देश की स्वेच्छापूर्वक आज्ञा-पालन की शक्ति और सविनय कानून-भंग की
खूबी की परीक्षा एक ही साथ हो जाए। इसलिए देश के किसी भी दूसरे भाग में अगर
आवश्यक अधिकार और अनुमति प्राप्त किए बिना कानून-भंग की थोड़ी भी शुरुआत
होगी तो उससे हमारे कार्य को बड़ी हानि पहुंचेगी और सविनय कानून-भंग के सिद्धांतों-
के संबंध में हमारा अक्षम्य अज्ञान प्रकट होगा।
हमें यह जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि सरकार अपनी सत्ता के इस भंग का,
जो कि शीघ्र ही शुरू किया जाने वाला है, दमन करने के लिए कठोर-से-कठोर उपायों-
को काम में लाएगी; क्योंकि उसका सारा अस्तित्व उसी पर अवलंबित है
। केवल
"आत्मरक्षा" की स्वाभाविक भावना ही उसे ऐसी दमन-नीति का सहारा लेने के लिए
प्रेरित कर सकती है जो इस आंदोलन को कुचलने के लिए पर्याप्त हो और यदि वह
नीति असफल रही तो सरकार अवश्य ही लुप्त हो जाएगी अर्थात् या तो वह देश के
लोकमत के सामने झुक जाएगी या भंग हो जाएगी। सबसे बड़ा खतरा यह है कि
उकसाए जाने के कारण कहीं हिंसा का उद्रेक न हो जाए। अगर ऐसा हो तो इससे हमारी<noinclude></noinclude>
ci2fsglm2ke8jqrrg9imcv63mcn3bv8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/६४०
250
186408
672924
644763
2026-08-22T15:08:54Z
Avantika Shaw
4732
/* अशोधित */
672924
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{outdent|अपील; –बम्बईके नागरिकोंसे, ४८९-९१; –बम्बईके मारवाड़ियोंसे, ४९२-९३; –हिन्दी प्रेमी मित्रोंसे, ११०-११}}
{{outdent|अलबेले अनुभव, [–१,] ५३-५८; [–२,] ८६-९३}}
{{outdent|उत्तर; ‘इंडियन टेलिग्राफ’ के सम्पादकके प्रश्नोंके, १६२-६३}}
{{outdent|एक ज्ञापन, २४४-४५; –का मसविदा, २४३-४४}}
{{outdent|गुजरात; –की परीक्षा, २७६-७८; –को क्या करना चाहिए, १४५-४७}}
{{outdent|टिप्पणियाँ, २-४, ७-१४, २८-३७, ५३, ६३-६७, ९७-९८, १०१-२, १४८-४९, १६६-८१, २१३-१५, २२१-३०, २४१-४३, २४८-५५, २५८-७०, २७८-८४, २९३-३००, ३१०-१७, ३२१-३१, ३३८-४४, ३४८-५२, ३५६-६०, ३५८-९०, ३९३-४०४, ४२३-३१, ४३९-४१, ४५७-७१, ५०३-७, ५१७-२१, ५२२-३५, ५५१-५६, ५५७-६४, ५९१-९५}}
{{outdent|तार; –गोरखबाबू दासको, २७३; –चित्तरंजन दासको, ५५७; –डाक्टर टी० एस० एस० राजनको, ९९; –देवदास गांधीको, ५९५; –पारसी रुस्तमजीको, ३९१; –फरीदपुरकी कांग्रेस और खिलाफत समितियोंको, ८१; –मदनमोहन मालवीयको, ५९७; –मोतीलाल नेहरूको, ३२०; –श्रीमती बासन्ती देवी दासको, ५८५; –श्रीमती मोतीलाल नेहरूको, ५८३; –सौ० विजयराघवाचार्यको, ३१९; –सरदार वल्लभभाई पटेलको, २२}}
{{multicol-break}}
{{outdent|पत्र; –अब्बास तैयबजीको, ५४३-४४; –ए० जी० कानिटकरको, ३१७-१८; –ए० एस० पी० मैटालको, ४४८; –ऐश्वर मेननको, ५८-५९; –गंगाधरराव देशपांडेको, २००; –गिरधारीलाल दयालको, ४९१; –जी० वी० सुब्बारावको, ३२०; –डी० वी० शुक्लको, ३५४-५५; –दयालजी और कल्याणजीको, ४८५; –प्रभाशंकर पट्टणीको, २०४-५; –बनारसीदास चतुर्वेदीको, २१८, ३१८-१९, ३५४; –बहरामजी लम्बाताको, ३१८; –‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ को, २४६-४७, ३४४; –बारडोली और आनन्दके निवासियोंके नाम, ५१४-१६; –मणिबहन पटेलको, १८-१९, ६०-६१, २१७; –मथुरादास त्रिकमजीको, १५१, २९२-९३, ३७५, ५५६-५७, ५९७; –महादेव देसाईको, ६, २२, ४७-४८, १९२, २१६, ३२१, ३९१, ४१८-१९, ४४७-४८, ५८३-८४, ५८४; –मियां मुहम्मद हाजी जान मुहम्मद छोटानीको, ३१०; –रेहाना तैयबजीको, ४६; –वालजीभाई देसाईको, ३९२; –सरदार वल्लभभाई पटेलको, २३, ६९-७०; –सिडनी बर्नको, १५१; –सी० एफ० एन्ड्रयूजको, ९९-१००, २१५-१६; –सी० एम० डोकको, ५९६; –हाजी निट्रीक सत्रीको, ४२७}}
{{outdent|पत्रका अंश; –श्यामसुन्दर चक्रवर्तीको लिखे, ५८५}}
{{outdent|पत्र-लेखकोंसे, ३६०, ४०९-१०, ४७६, ५३७-३८, ५४१-४३, ५७७}}
{{outdent|बम्बई; –के नागरिकोंसे, ५१०-११; –क्या करेगा, ३०६-९}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
enrn2nfhoerfn2g43hyvo3k1hciywon
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/८
250
186586
673135
644950
2026-08-23T05:35:23Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673135
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|मई १९६९ (ज्येष्ठ १८९१)}}
{{Dhr|5em}}
{{center|© नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९६९}}
{{Dhr|5em}}
{{center|'''साढ़े सात रुपये'''}}
{{Dhr|5em}}
{{center|कापीराइट<br />नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमतिसे}}
{{Dhr|12em}}
{{center|निदेशक, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली - १ द्वारा प्रकाशित<br />और शान्तिलाल हरजीवन शाह, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद-१४ द्वारा मुद्रित}}<noinclude></noinclude>
k4y7vkvwzpu5zny7innvph4a53mvfxq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/९
250
186587
673140
644951
2026-08-23T05:40:04Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673140
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{larger|'''भूमिका'''}}}}
प्रस्तुत खण्डमें १५ जूनसे ५ नवम्बर, १९२६ तककी सामग्री आ जाती है । यह वही अवधि है जिसमें गांधीजीने एक वर्षके लिए ऐसे सभी सार्वजनिक कामोंसे संन्यास ले लिया था जो अनिवार्य नहीं थे । स्वेच्छासे लिया गया यह संन्यास विश्राम और मननके विचारसे लिया गया था । और इसका भंग केवल दक्षिण आफ्रिकाके प्रवासी भारतीयोंकी समस्याके सम्बन्धमें, जब वे दो बार बम्बई गये, तभी हुआ । सत्याग्रह आश्रम, साबरमतीमें रहते हुए गांधीजीने कब्जियतका उपचार ढूँढ़नेकी दृष्टिसे फलाहारका प्रयोग जारी रखा और वे इस अवधिमें 'भगवद्गीता' और 'रामायण' पर कक्षाएँ भी लेते रहे । यद्यपि उन्होंने अपने कार्यकलापको आश्रमतक ही सीमित कर रखा था, तथापि वे देश-विदेशके लोगोंसे पत्र-व्यवहार करते थे और 'नवजीवन' तथा 'यंग इंडिया' के द्वारा तत्कालीन सार्वजनिक और राजनीतिक जीवनपर अपने विचार प्रकट करते रहे । इन पत्रोंके माध्यमसे वे उन पत्रलेखकोंको भी अपने कार्यकलापोंके विषयमें सूचनाएँ देते रहे, जो उनके प्रति जिज्ञासा रखते थे ।
इस अवधिमें उन्होंने विधानसभाओंमें होनेवाले काम और हिन्दू-मुस्लिम दंगोंके विषयमें मौन ही रखा । किन्तु वे अस्पृश्यता-निवारण, खादी और राष्ट्रीय-शिक्षाके विषयमें सोचते-विचारते और अपना मत व्यक्त करते रहे । उनके लेखे चरखे तो ईश्वरके ही चक्र हैं और वे "ईश्वरके चक्र धीरे-धीरे लेकिन निहायत कारगर तौरपर चलते हैं ।" (पृष्ठ ३८३) सूत कातकर वे भगवानके साथ एकात्मताका अनुभव करते थे, क्योंकि भगवान उनके लिए गरीबों और दलितोंकी सेवाका ही दूसरा नाम था । वे मानते थे कि खादीके प्रसारसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार होगा और परिणामस्वरूप वह भारतीयोंमें स्वावलम्बनकी भावना और अधिक शक्ति लाएगी तथा करोड़ों रुपया प्रतिवर्ष बचेगा । गांधीजी मानते थे कि समूची भारतीय जनताका कल्याण चरखेसे सम्बद्ध है । "उद्देश्य मनुष्यसे कहीं बड़ा होता है । सचमुच चरखा मुझसे अधिक महत्त्वका है ।" (पृष्ठ ५०) अपनी इस दृढ़ श्रद्धाके अनुसार गांधीजी निष्ठापूर्वक सदाकी तरह इस अवधिमें भी कातते रहे और कताईके विषयमें विचार करते रहे ।
गांधीजीने अस्पृश्यताको एक अनन्त सिरवाला असुर कहा और यह चाहा कि यह असुर जब-जब सिर उठाये, उसका दमन किया जाना चाहिए । समाजमें फैले हुए ऊँच-नीचके भाव उनकी दृष्टिमें अस्पृश्यताके रोगसे ही निःसृत और अस्पृश्यताके चिह्न थे । उन्हें यह देखकर बड़ा दुःख होता था कि अस्पृश्यताके विरुद्ध लगातार पाँच<noinclude></noinclude>
k8d725jdx1iqlabxxzfwn612mpok54p
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१०
250
186588
673141
644952
2026-08-23T05:42:48Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673141
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|छ:}}
वर्षोंतक समझाते-बुझाते रहनेपर भी अभीतक ऐसे शिक्षित लोग बचे हुए हैं जो इस अनीतिपूर्ण कुप्रथाका समर्थन किये ही चले जा रहे हैं । गांधीजीने थोड़े दुःखके साथ लिखा : “यदि किसी धार्मिक ग्रन्थमें किसी प्रसिद्ध पुरुषके पाप करनेका उल्लेख हो तो क्या उससे हमें भी पाप करनेकी आज्ञा मिल जाती है ? यदि हमसे उन्होंने केवल एक बार ही यह कह दिया कि इस संसारमें केवल सत्यकी ही सत्ता है और सत्य परमेश्वरके तुल्य है तो हमारे लिए इतना ही बहुत है ।” (पृष्ठ २२०-२१)
“शब्दोंका अत्याचार” नामक एक लेखमें गांधीजीने लिखा कि तर्क और तर्क-बुद्धिसे भी पहले आते हैं श्रद्धा और प्रार्थना । इनका स्थान पहला है । उनके विचारसे जब तर्क-बुद्धि अपने-आपको सर्वशक्तिमान मानने लगती है तो वह एक आसुरी वृत्ति बन जाती है, क्योंकि “श्रद्धा और विश्वासके बिना जो काम किया जाता है वह उस कागजी फूलके समान होता है, जिसमें सुवास नहीं होती ।” (पृष्ठ ५१९) तर्क अथवा तर्क-बुद्धिकी परवाह न की जाये, ऐसा वे नहीं चाहते थे, किन्तु वे यह अवश्य चाहते थे कि बुद्धिको पवित्र बनानेवाले विश्वासको आवश्यक स्थान दिया ही जाना चाहिए । प्रार्थना तो उनके जीवनका एक अविच्छिन्न अंश ही था । वे भोजनके बिना रह सकते थे प्रार्थनाके बिना नहीं । “बिना खाये तो मनुष्य काफी दिनों जीवित रह जाता है परन्तु ईश्वराराधनाके बिना वह एक पल भी जीवित नहीं रह सकता । इस तथ्यको चाहे वह न माने, किन्तु इसे न मानना वैसा ही होगा, जैसा किसी बेसमझ व्यक्तिका अपने शरीरमें फेफड़ोंके अस्तित्व अथवा रक्तके प्रवाहको न मानना ।” (पृष्ठ १०८) एक सज्जनको पत्र लिखते हुए उन्होंने कहा, “प्रार्थना तो नित्य शुद्धिके लिए की जाती है । शरीर-शुद्धिके लिए नित्य स्नानका जो महत्त्व है, हृदय और मस्तिष्कके लिए वही महत्त्व प्रार्थनाका है ।” (पृष्ठ २३५) वे प्रार्थनाको याचना नहीं, आत्माकी पुकार मानते थे । ‘यंग इंडिया’ के स्तंभोंमें किसी राष्ट्रीय संस्थाके प्रधानाचार्यको, जिनका प्रार्थनामें विश्वास नहीं था, गांधीजीने उत्तर देते हुए लिखा : “ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता और न उसे सिद्ध करनेकी जरूरत ही है । ईश्वर तो है ही ।” (पृष्ठ ४५८) यही वह निष्ठा है जिसके बलपर गांधीजी कठिनसे-कठिन परिस्थितियोंमें भी आन्तरिक शान्ति बनाये रखकर सरल मार्गको अपना पाते थे ।
अहिंसाके तत्त्वसे ओतप्रोत तथा सत्य और अहिंसाको अपनी एक-एक साँस खींचनेके लिए फेफड़ोंकी तरह आवश्यक माननेके कारण उन्होंने नित्य अधिकाधिक रूपमें अहिंसाकी अपारशक्ति सम्बन्धी अपने विश्वासको स्पष्ट रूपमें देखा और यह भी देखा कि आदमी स्वयं कितना नगण्य है । उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : “सबसे बड़ी ताकत जो मानवको प्रदान की गई है, अहिंसा है । सत्य उसका एकमात्र लक्ष्य है । क्योंकि ईश्वर सत्यसे इतर कुछ और नहीं है । लेकिन सत्यकी प्राप्ति अहिंसाके अतिरिक्त<noinclude></noinclude>
kdw7vcaalhmq0ukdf0srys9rhxkjjix
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/११
250
186589
673144
644953
2026-08-23T05:50:06Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673144
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सात}}
किसी अन्य उपायसे नहीं हो सकती; कभी नहीं होगी ।” (पृष्ठ १४८) वे चाहते थे कि संसारका एक-एक व्यक्ति इस बातको समझ ले ।
अहिंसाके बिना, जिसे वे प्रेमका कानून कहते थे, संसारमें सच्ची शान्ति सम्भव नहीं है । शस्त्रके बलपर लोगोंको चुप तो रखा जा सकता है, किन्तु यदि करोड़ों स्त्री-पुरुषोंके मन अहिंसाके भावसे ओतप्रोत नहीं होते, तो शान्तिकी पुकार अरण्य-रोदन ही सिद्ध होगी ।
वे अहिंसाको कायरता छिपानेका साधन नहीं मानते थे । वे तो यह कहते थे कि यह वीरका बड़ेसे-बड़ा गुण है । शस्त्र-कौशलकी अपेक्षा अहिंसाकी पद्धतिसे काम लेना अधिक वीरताकी अपेक्षा रखता है । अहिंसा और कायरतामें कोई सामंजस्य ही नहीं हो सकता । जिसमें हिंसा करनेकी शक्ति है, अर्थात् जो शरीरसे भी सबल है, वही आदमी जब सोच-समझकर बदला लेनेकी अपनी प्रवृत्तिका निरोध करता है और हाथ उठानेसे बाज आता है, तभी वह वास्तविक अहिंसा कहलाती है । “निष्क्रिय होकर औरतों-जैसे असहाय बनकर आत्मसमर्पण करनेसे तो बदला लेना ही कहीं अच्छा है । बदला लेनेसे क्षमा करना बड़ी चीज है । बदला लेना भी एक कमजोरी ही है ।” (पृष्ठ ३०३)
“क्या यह जीवदया है ?” शीर्षकसे लिखी गई लेखमालामें गांधीजीने आवारा कुत्तोंको मारनेकी पैरवी बिना किसी लाग-लपेटके की, मित्रभावसे अथवा क्रोधसे की गई तत्सम्बन्धी अपनी आलोचनाओंको निरस्त करनेका उन्होंने पूरा प्रयत्न किया । उनके सामने अनेक ऐसे अवसर आते रहते थे जब लोग ऐसा मानते थे कि गांधीजी गलतीपर हैं । ऐसी परिस्थितियोंमें वे अपनी कथनी और करनीमें विरोध नहीं पाते थे और दृढ़ रहते थे । यदि गुस्सेमें आकर कोई असंगत ढंगसे तर्क प्रस्तुत करता था, तो वे उससे विचलित नहीं होते थे । क्योंकि उनका कहना था कि क्रोध आ जाना तो हिंसा करना है । “क्रोध तो अहिंसाका वैरी है और अभिमान है उसे खा जाने-वाला राक्षस ।” (पृष्ठ ५०९) गांधीजीकी अहिंसामें पागल कुत्ते या हत्याकर्ममें आनन्द लेनेवाले व्यक्तिके नाशको स्थान है और वे मानते थे कि उनकी यह राय अहिंसा-सम्बन्धी उनके विचारसे पूर्णतया सुसंगत है । संसार हिंसासे भरा हुआ है, और इसमें अहिंसाके मार्गपर चलना तलवारकी पैनी धारपर चलने जैसा है । (पृष्ठ ५०९)
अहिंसक असहयोगमें उनकी अविचल निष्ठा इस अवधिमें लिखे गये उनके लेखों तथा उन पत्रोंमें व्यक्त होती रही जो उन्होंने मित्रों अथवा अपरिचितोंको लिखे । वे कहते रहे कि जिन्हें इस विचारमें विश्वास है, वे इसका अनुभव कर सकते हैं कि यह कोई निष्प्राण तत्त्व नहीं है, बल्कि एक अत्यन्त जीवन्त तत्त्व है और जब<noinclude></noinclude>
phhnqd6hywypremdyqnfxtqiojbuw3k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१२
250
186590
673145
644954
2026-08-23T05:52:37Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673145
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|आठ}}
क्षितिजपर घनेसे-घने काले बादल छा जायेंगे, तब यह विचार अपनी उपयोगिताको भली-भाँति सिद्ध करके दिखायेगा । लोग उस समय देखेंगे कि यह भारतकी आशाका बड़ेसे-बड़ा सहारा है । (पृष्ठ ९)
भारतका मानवताके आनन्दमें सर्वाधिक योगदान यह होगा कि वह शान्ति तथा सत्यमय साधनोंके द्वारा अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त कर ले । ऐसा कब होगा, सो कहना तो गांधीजी कठिन मानते थे और यहाँतक कि सतहपर जो-कुछ दिख रहा था, उससे इस प्रकारके विश्वासका खण्डन ही होता था, तथापि उन्होंने कहा कि भारत जब आजाद होगा, शान्ति और सत्यके मार्गपर चलकर ही होगा, अन्य किसी मार्गपर चलकर नहीं । साध्य और साधनका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अपने इस विश्वासको उन्होंने बार-बार दोहराया और उसे कार्यरूप देकर प्रमाणित किया । अर्थात् उन्होंने इस बातपर जोर दिया कि दोषपूर्ण साधनोंसे निर्दोषकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती ।
गांधीजी द्वारा भारतकी जो सेवा हो रही थी, वह वास्तवमें उनके द्वारा होनेवाली समूची मानवताकी सेवाका एक अंश ही थी । “जो निःस्पृह होकर निःस्वार्थ भावसे एक ही सेवा करता है, वह सबकी सेवा करता है ।” (पृष्ठ १२८) मानवताकी सेवाके बिना त्याग असम्भव है, इसलिए आत्मत्याग उनके लेखे बड़ेसे-बड़ा आचार-नियम था । उन्होंने सभी भारतीयोंको, चाहे वे देशके भीतर हों, चाहे दक्षिणी आफ्रिका आदिमें देशके बाहर, यही सलाह दी कि अन्ततोगत्वा सफलताका दारोमदार खुद उन्हींपर है । उन्होंने कहा कि स्वावलम्बनसे बढ़कर अन्य कोई अवलम्बन नहीं है । दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको उन्होंने सलाह दी कि वे अपनी माँगोंको बढ़ा-चढ़ाकर पेश न करें, एक स्वरमें बोले और सत्यके रास्तेसे तिल-भर भी न हटें । उन्होंने यह भी कहा कि वहाँके भारतीयोंको समझौतेमें स्वयंसे सम्बन्धित भागको पूरी-पूरी तरह निभाना चाहिए अर्थात् उन्हें स्वच्छता और इमारतों सम्बन्धी सारे नियमोंका पालन करना चाहिए और “उद्देश्यके हेतु सामुदायिक रूपसे एक-समाज बने रहकर, कष्ट झेलनेके लिए तैयार” रहना चाहिए । (पृष्ठ ४७१) क्योंकि बिना कष्ट सहे छुटकारा है ही नहीं ।
यद्यपि गांधीजी इस अवधिमें हिन्दू-मुस्लिम प्रश्नके प्रति तटस्थ-से बने रहे, किन्तु वे इस समस्यापर विचार तो करते ही रहे । वे मानते थे कि अंशतः यह समस्या ब्रिटिश शासनकी बनाई हुई समस्या है, क्योंकि ब्रिटिश शासन अविश्वासपर आधारित है । अविश्वास पक्षपातको जन्म देता है और पक्षपात विभिन्न पक्षोंमें फूट पैदा करता है । इसे सिद्ध करनेके लिए उन्हें इस बातकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती थी कि वे सरकारी अधिकारियोंके मनमें निहित बुरे उद्देश्यको सिद्ध करें । उन्होंने साम्प्रदायिक झगड़ोंके लिए मुख्यतया लोगोंको ही दोषी ठहराया और कहा कि यदि<noinclude></noinclude>
niqcer9opqulffx61y7mt19w840q1si
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१३
250
186591
673147
644955
2026-08-23T05:54:35Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673147
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|नौ}}
लोग अपने झगड़े आपसमें नहीं निपटाते, तो बाहरकी कोई भी शक्ति ऐसे झगड़ोंका अन्त नहीं कर सकती । सरकार और जनताके स्वार्थोंमें विरोध होनेके कारण सरकार तो फूट डालकर शासन करनेकी नीतिपर चले बिना रह नहीं सकती और इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम ऐक्यके बिना स्वराज्य एक असम्भव चीज है -- गांधीजी नित्य इस बातके प्रमाण देखते थे । वे यह भी मानते थे कि परिस्थिति देखनेमें ही कठिन है । भीतर उनके मनमें यह पक्का विश्वास था कि किसी न किसी दिन लोग अपनेको अधिक बलवान और निष्कलंक देख पायेंगे, क्योंकि कुछ लोग तो ऐसे हैं ही जो ऐसे पारस्परिक झगड़ोंको हृदयसे नापसन्द करते हैं और जो अहिंसाको अपना अन्तिम सहारा मानते हैं । उन्हें भरोसा था कि हम चाहें या न चाहें, एकता होकर रहेगी, क्योंकि जहाँ आदमीके प्रयत्न बेकार हो जाते हैं, वहाँ ईश्वरकी कृपा फलीभूत हो सकती है । क्योंकि भगवानका शासन भेद-नीतिपर आधारित नहीं है । (पृष्ठ ३०१)
“अनीतिकी राहपर” शीर्षक लेख-मालामें गांधीजीने वासनाओंके नंगे नाचकी निन्दा की, तथा नैतिक संयम और ब्रह्मचर्यपर जोर देते हुए सन्तति-निरोधको सफल बनानेकी सलाह दी । उन्होंने एम॰ पॉलब्यूरोकी फ्रांसीसी भाषाकी पुस्तक 'ला इनडिस्लिने डेस मोर्स' से लम्बे-लम्बे उद्धरण दिये । इस पुस्तकमें उक्त समस्याका वैज्ञानिक विवेचन किया गया था और अन्तमें उन्होंने 'टॉम मान' के इस वचनसे लेखमाला समाप्त की : “जो जातियाँ आचारवान् रहेंगी, भविष्य उनके साथ रहेगा ।” (पृष्ठ ३२४)
इस अवधिमें गुजरात राष्ट्रीय विद्यापीठके विद्यार्थियोंको गांधीजी 'न्यू टेस्टामेंट' पढ़ाते थे । अनेक पत्र-लेखकोंने इसके लिए गांधीजीकी आलोचना की । “ 'बाइबिल' पढ़नेका गुनाह ' ” नामक लेखमें गांधीजीने बलपूर्वक कहा कि हर संस्कारवान् स्त्री अथवा पुरुषको चाहिए कि वह सारे संसारके धर्म-शास्त्रोंका श्रद्धा और सहानुभूतिके साथ अध्ययन करे । उन्होंने स्वयं सनातनी हिन्दू होनेका दावा किया और कहा कि अन्य धर्मोंका श्रद्धासे अध्ययन करनेके फलस्वरूप “मैं हिन्दू धर्म-ग्रन्थोंके गूढ़ अंशोंको अधिक अच्छी तरह समझ सका हूँ ।” (पृष्ठ ३६४)
उन्हीं दिनों 'यंग इंडिया' में गांधीजीकी 'आत्मकथा' के अध्याय क्रमशः प्रकाशित हो रहे थे और तभी “गुरुकी तलाश” नामक जो अध्याय प्रकाशित हुआ था, उसे लेकर अनेक पत्रलेखकोंने गांधीजीको अपने-अपने सुझाव भेजे । किन्तु गांधीजीके सामने गुरुकी जो मूर्ति थी, वह साधारण नहीं थी । केवल कोई पूर्ण पुरुष ही उनकी आत्माको सन्तोष दे सकता था । उन्हें तो ऐसे गुरुकी तलाश थी, जो शरीरमें रहते हुए भी निर्विकार हो, वासनाएँ जिसे छू न पाती हों, जो द्वन्द्वोंसे परे हो, जो सत्य<noinclude></noinclude>
d8iaz3t6bm46s1gsf11nesh7fy6xqbu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१४
250
186592
673149
644956
2026-08-23T05:56:49Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673149
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|दस}}
और अहिंसाका साकार स्वरूप हो और इसलिए न जो स्वयं किसीसे डरता हो और न जिससे कोई दूसरा डरता हो । उन्होंने नम्रतापूर्वक कहा : मुझे (ऐसे किसी) देहधारी गुरुको प्राप्त करनेके पहले खुद पूर्ण बननेका प्रयत्न करना चाहिए । (पृष्ठ ९) तथापि वे मनमें गुरुके गुणोंका चिन्तन करते रहे । मार्ग तो वे जानते ही थे । वे जानते थे कि मार्ग सरल है, किन्तु वह तलवारकी धारकी तरह संकीर्ण और पैना है और उसपर चलना आनन्दका विषय है ।
१० अक्तूबर, १९२६ को गांधीजीने जो वसीयतनामा लिखा था, वह इस खण्डका विशिष्ट दस्तावेज है । उन्होंने वसीयतनामेमें लिखा : “मेरे पास मेरी अपनी कोई मिल्कीयत नहीं है, फिर भी यदि मेरी मृत्युके बाद किसी वस्तुको मेरी निजी मिल्कीयत माना जाये तो मैं सत्याग्रहाश्रमके ट्रस्टियों...को...उसका वारिस नियुक्त करता हूँ । मैंने जो-जो पुस्तकें लिखी हैं, जो भी लेख लिखे हैं और इसके बाद जो-जो पुस्तकें अथवा लेखादि लिखूँगा उनका वारिस भी मैं उक्त ट्रस्टियोंको नियुक्त करता हूँ । मैं उन्हें अपनी मृत्युके बाद उन सारी हलचलोंके संचालनका भार भी सौंपता हूँ, जिन्हें मेरे मरणके बाद मेरे नामसे चलाना आवश्यक हो जाये । साथ ही उक्त पुस्तकों और लेखों अथवा उनके स्वत्वाधिकारसे जो-कुछ आमदनी होगी तथा जो मेरी निजी मिल्कीयतकी तरह जो-कुछ माना जायेगा, उस सबका उपयोग उक्त ट्रस्टीगण सत्याग्रहाश्रमके उद्देश्योंको सफल बनानेकी दृष्टिसे इस रीतिसे करेंगे, जो उन्हें उस कार्यकी दृष्टिसे योग्य जान पड़े ।” (पृष्ठ ५११-१२) इस तरह हम देखते हैं कि जो उद्देश्य उन्हें प्रिय था, वे उसके प्रति जितने समर्पित थे, उतने ही पूर्ण रूपसे अनासक्त भी थे ।<noinclude></noinclude>
k0zhj6cf8mvet2e54djrjbljs0b6a24
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१७
250
186595
673158
644959
2026-08-23T06:10:24Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673158
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
| || || पृष्ठ
|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || ग्यारह
|-
| || पाठकोंको सूचना || बारह
|-
| १. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१५-६-१९२६) || १
|-
| २. || पत्र : गंगाबहन मजमूदारको (१५-६-१९२६) || १
|-
| ३. || पत्र : मूलचन्द उत्तमभाई पारेखको (१५-६-१९२६) || २
|-
| ४. || तार : डा॰ सुन्दरी मोहन दासको (१६ जून, १९२६ या उससे पूर्व) || २
|-
| ५. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१६-६-१९२६) || ३
|-
| ६. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (१६-६-१९२६) || ३
|-
| ७. || पत्र : गिरधारीलालको (१६-६-१९२६) || ४
|-
| ८. || पत्र : 'पीपुल' के सह-सम्पादकको (१६-६-१९२६) || ६
|-
| ९. || पत्र : मुहम्मद हासम चमनको (१६-६-१९२६) || ६
|-
| १०. || पत्र : हुसन अलीको (१६-६-१९२६) || ७
|-
| ११. || टिप्पणियाँ : देशबन्धुकी बरसी; असहयोगियोंकी स्थिति; गुरुकी तलाश;<br />{{gap}}गोशालाके व्यवस्थापकोंको; दक्षिण आफ्रिकी कानून; अप्रैलके आँकड़े<br />{{gap}}(१७-६-१९२६) || ७
|-
| १२. || कुछ उलझे हुए प्रश्न (१७-६-१९२६) || १२
|-
| १३. || खादी-केन्द्रोंके व्यवस्थापकोंसे (१७-६-१९२६) || १४
|-
| १४. || नीलगिरि जिलेमें खादी (१७-६-१९२६) || १५
|-
| १५. || पशु-धन (१७-६-१९२६) || १५
|-
| १६. || खादीकी फेरी (१७-६-१९२६) || १६
|-
| १७. || पत्र : परशुराम मेहरोत्राको (१८-६-१९२६) || १७
|-
| १८. || पत्र : किशनसिंह चावड़ाको (१८-६-१९२६) || १७
|-
| १९. || पत्र : फूलसिंहको (१८-६-१९२६) || १८
|-
| २०. || पत्र : देवदास गांधीको (१८-६-१९२६) || १८
|-
| २१. || सन्देश : नेलौर आदि-आन्ध्र सम्मेलनको (१९-६-१९२६ या उससे पूर्व) || १९
|-
| २२. || पत्र : वीरेन्द्रनाथ सेनगुप्तको (१९-६-१९२६) || १९
|-
| २३. || पत्र : ए॰ एस॰ डेविडको (१९-६-१९२६) || २१
|}<noinclude></noinclude>
18as8yxdr3cnn9paujkqf8zq17v5td1
673159
673158
2026-08-23T06:18:17Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार का प्रयास
673159
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
| || || पृष्ठ
|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || ग्यारह
|-
| || पाठकोंको सूचना || बारह
|-
| १. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१५-६-१९२६) || १
|-
| २. || पत्र : गंगाबहन मजमूदारको (१५-६-१९२६) || १
|-
| ३. || पत्र : मूलचन्द उत्तमभाई पारेखको (१५-६-१९२६) || २
|-
| ४. || तार : डा॰ सुन्दरी मोहन दासको (१६ जून, १९२६ या उससे पूर्व) || २
|-
| ५. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१६-६-१९२६) || ३
|-
| ६. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (१६-६-१९२६) || ३
|-
| ७. || पत्र : गिरधारीलालको (१६-६-१९२६) || ४
|-
| ८. || पत्र : 'पीपुल' के सह-सम्पादकको (१६-६-१९२६) || ६
|-
| ९. || पत्र : मुहम्मद हासम चमनको (१६-६-१९२६) || ६
|-
| १०. || पत्र : हुसन अलीको (१६-६-१९२६) || ७
|-
| ११. || टिप्पणियाँ : देशबन्धुकी बरसी; असहयोगियोंकी स्थिति; गुरुकी तलाश; गोशालाके व्यवस्थापकोंको; दक्षिण आफ्रिकी कानून; अप्रैलके आँकड़े (१७-६-१९२६) || ७
|-
| १२. || कुछ उलझे हुए प्रश्न (१७-६-१९२६) || १२
|-
| १३. || खादी-केन्द्रोंके व्यवस्थापकोंसे (१७-६-१९२६) || १४
|-
| १४. || नीलगिरि जिलेमें खादी (१७-६-१९२६) || १५
|-
| १५. || पशु-धन (१७-६-१९२६) || १५
|-
| १६. || खादीकी फेरी (१७-६-१९२६) || १६
|-
| १७. || पत्र : परशुराम मेहरोत्राको (१८-६-१९२६) || १७
|-
| १८. || पत्र : किशनसिंह चावड़ाको (१८-६-१९२६) || १७
|-
| १९. || पत्र : फूलसिंहको (१८-६-१९२६) || १८
|-
| २०. || पत्र : देवदास गांधीको (१८-६-१९२६) || १८
|-
| २१. || सन्देश : नेलौर आदि-आन्ध्र सम्मेलनको (१९-६-१९२६ या उससे पूर्व) || १९
|-
| २२. || पत्र : वीरेन्द्रनाथ सेनगुप्तको (१९-६-१९२६) || १९
|-
| २३. || पत्र : ए॰ एस॰ डेविडको (१९-६-१९२६) || २१
|}<noinclude></noinclude>
tisf39fv3keaiy6zbwadl1xtsjc8zat
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७७
250
186903
672849
645300
2026-08-22T12:53:08Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672849
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९२. पत्र: सुरेन्द्रनाथ विश्वासको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र<ref>सुरेन्द्रनाथ विश्वासने लिखा था कि मैं जब १९२५ में फरीदपुर में हुए बंगाल प्रान्तीय सम्मेलनकी स्वागत समितिका प्रधान था, उस वक्त मुझपर कुछ कर्ज हो गया था। कुछ कर्जे मुझपर निजी तौरपर भी हो गया था। मेरे खिलाफ कई मुकदमे चल रहे हैं और कुछ वक्त मैं हिरासत में भी रह चुका हूँ। गांधीजीसे अपील करते हुए उन्होंने लिखा था: क्या मैं आपसे परिचय-पत्र प्राप्त करनेकी प्रार्थना कर सकता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप केवल यह लिख दें कि आप सम्मेलनमें उपस्थित थे और आपने यह सुना था कि खर्च पूरा करनेके लिए स्वागत-समितिने कुछ कर्ज लिया था और यह कि मैं स्वागत समितिका प्रधान
था तथा आपका परिचित हूँ। यह भी लिख दें कि प्रधानकी हैसियत से मेरे कर्जकी अदायगी करनेके लिए मुझे कृपालु जनताकी मदद चाहिए।</ref> मिला। आपके साथ मेरी सहानुभूति तो है परन्तु मेरी बुद्धि आपकी बातका समर्थन नहीं कर सकती। जैसा कि आप जानते हैं मैं इस चीजके
हमेशा खिलाफ रहा हूँ कि कार्यकर्त्ता आमदनी से ज्यादा खर्च करके कर्जदार हो जायें और परेशानी में पड़ें। मैं इसे एक भयंकर आदत मानता हूँ। मैं आपकी मदद किस तरह कर सकता हूँ? या यह कहना और भी बेहतर होगा कि मैं आपकी इतनी ही सहायता कर सकता हूँ, कि आपको दिवालिया करार देनेवाली कचहरी में चले जानेकी सलाह दूँ या कहूँ कि आप अपने ऋणदाताओंके पास जाकर अपना सब कुछ उनके हवाले कर दें और फिर बिलकुल एक मजदूर का-सा जीवन बितायें। यदि हमें ईमानदारीसे भारतकी सेवा करनी है, तो हम पढ़े-लिखे लोगोंके लिए मुझे और
कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत सुरेन्द्रनाथ विश्वास<br>
पी १४ ए, न्यू पार्क स्ट्रीट<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ १३४२१) की फोटो-नकल से।
{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
9d63szws6ksooyyezyf8m4nxpmg2t58
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७८
250
186904
672851
645301
2026-08-22T13:04:34Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672851
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९३. पत्र: फ्लोरेंस के॰ क्रेन्सको <ref>एक अमेरिकी यात्री जो पूर्वी धर्मोंका अध्ययन कर रहा था और पत्रिकाओंके लिए देख लिख रहा था।</ref>'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। आप जब भी आश्रममें आ पायेंगे, मुझे आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी। इस सालके दौरान मेरे आश्रमसे बाहर जानेकी सम्भावना नहीं है। यदि आप बहुत ही सादे शाकाहारी भोजन और अपेक्षाकृत साधारण रहन-सहनसे काम चला सकें, तो आप यहाँ आने पर आश्रममें ही ठहरेंगे भी।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|फ्लोरेंस के॰ केब्स<br>
द्वारा पोस्ट मास्टर<br>
श्रीनगर<br>
कश्मीर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४९४. पत्र: एन॰ सी॰ बारवोलाईको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
श्री बैंकरने मुझे आपका पत्र दिया है। मुझे इससे दुख हुआ। आपको राजेन्द्र बाबूके कहने पर निश्चित उद्देश्यके लिए कर्ज दिया गया था। और फिर आप अनुशासनको आदेश क्यों समझते हैं? यदि हर आदमी कार्यकर्त्ताओंको कर्ज देनेवाले
मुख्यालयके हस्तक्षेपके बिना काम करना चाहे तो क्या कोई भी संगठन सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है? निश्चय ही किसी स्वयंसेवी संगठन और उसके स्वयंसेवी कार्यकर्त्ताओंके बीचके सम्बन्धोंको नियमित करनेवाले नियम-विधानको लाभके लिए चलाये जानेवाले किसी सरासर व्यापारिक संगठन और उसके कर्मचारियोंके सम्बन्धको नियमित करनेवाले नियम-विधानसे श्रेष्ठतर होना ही चाहिए।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
7akpsw950xoggb32e2adhn9vp2ewle2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७९
250
186905
672967
645302
2026-08-22T16:37:31Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672967
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको|४४७}}</noinclude>परन्तु आपके अन्तिम वाक्यने तो मुझे आश्चर्यमें ही डाल दिया। आप कहते हैं कि आप कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे; जब कि कर्ज लेनेके वक्त जिन शर्तोके अधीन कर्ज दिया गया था उनको अच्छी तरह जानते हुए आपने जिम्मेदारी ली थी। आप यह क्यों चाहते हैं कि अ॰ भा॰ च॰ संघका एक एजेंट आपकी सहायताके लिए रहे? मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि यह कर्ज निश्चित रूपसे कानूनी कर्ज तो
है ही, किन्तु वह एक नैतिक कर्ज भी है और आपको सौजन्यतापूर्वक इसकी अदायगी कर देनी चाहिए।<ref>पत्रकी एक प्रति सचिव, अ॰ भा॰ च॰ संघको भेजी गई थी।</ref>
{{right|हृदयसे आपका,<br>
मो॰ क॰ गांधी}}
{{left|श्रीयुत एन॰ सी॰ बारदोलाई<br>
शान्ति भवन<br>
गोहाटी (असम)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४९५. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। मैं निखिलके बारेमें चिन्ता नहीं कर रहा हूँ। स्वयं तो मैं समझ गया हूँ कि उसकी मृत्यु आसन्न है और मैंने अपनेको इसके लिए तैयार कर लिया है। मुझे तो इस बातकी चिन्ता है कि इससे हेमप्रभादेवीको कितना आघात पहुँचेगा। यद्यपि वह मुझे बहादुरीसे लिखती रही हैं, मुझे मालूम है कि वास्तविक घटनासे उनपर क्या गुजरेगी और आप पर भी क्या बीतेगी। परन्तु मगनलालकी मृत्युकी दुःखकी आँचमें से गुजरकर परिशुद्ध होनेके बाद मुझे आपको यह कहनेका साहस है कि आप अपने हृदयको कड़ा कर लें और शोकातुर न होने दें। जो देता है, उसे वापस ले लेनेका अधिकार भी अवश्य होना चाहिए। और फिर वापस ले लेने जैसी बात वस्तुतः तो कुछ है नहीं। "मृत्यु केवल निद्रा और विस्मरण है।" मगनलाल अपनी जीवितावस्थाकी अपेक्षा अब और अधिक जीवित है। आश्रममें इन दिनों मगनलालके साथी कार्यकर्त्ता उन सारे परिवर्तनोंको जिन्हें मगनलाल स्वयं करना चाहते परन्तु सम्भवतः कार्यान्वित नहीं कर सकते थे बड़े उत्साहसे और स्वेच्छापूर्वक कर रहे हैं।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
q5od73pf26m6unlyz9p4voja2rybk9i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८०
250
186906
672972
645303
2026-08-22T16:48:51Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672972
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>काश! मुझे यह सारा विवरण देनेका वक्त होता!
कांग्रेस प्रदर्शनीके साथ-साथ अपनी प्रदर्शनी अलगसे लगानेमें सक्रिय विरोधकी गंध आयेगी। मेरा खयाल है कि हमारा ऐसा करना उचित न होगा। यदि [कांग्रेस] प्रदर्शनी में मिलका बना कपड़ा शामिल किया गया तो यह मेरा पूरा निश्चय है कि हम इसमें भाग नहीं लेंगे। परन्तु कांग्रेस प्रदर्शनीके विरोध में प्रदर्शनी लगानेके औचित्य अथवा उपयोगिताके बारेमें मैं बिल्कुल आश्वस्त नहीं हूँ। क्योंकि हमारी प्रदर्शनी कांग्रेस प्रदर्शनीके विरोध में ही मानी जायेगी, उसका कोई दूसरा अर्थ निकाला भी नहीं जा सकता। इसलिए मैं चाहूँगा कि आप इस पर गम्भीरतासे विचार कर लें।
कलकत्ता निगमसे आर्डर प्राप्त करना बढ़िया रहा।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९१७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४९६. पत्र: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय जवाहर,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले। कमला और इन्दुके समाचारोंसे चिन्ता होती है। आशा है कि मुझे तुमसे और अधिक निश्चित जानकारी मिलेगी। मैं तो दोनोंके लिए, कमसे कम कमलाके लिए तो निश्चय ही 'गरीब आदमीका इलाज' सुझाना चाहता
हूँ। वह यह है कि कूनेकी पद्धतिके अनुसार कटि-स्नान और घर्षण-स्नान (सिट्ज़-बाथ) किया जाये और सूर्य स्नानके साथ पथ्य आहारका प्रयोग किया जाये। परन्तु मैं जानता हूँ यह व्यवहार्य नहीं है और उसे साधारण इलाज ही करवाना पड़ेगा।
मुझे आशा है कि समिति संविधानका सर्व-सम्मत और सम्पूर्ण मसविदा तैयार कर सकेगी।
महादेव आश्रमके कुएँ परसे गिर गया था, बहुत चोट आई, चारपाई पर पड़ा है पर अब पहलेसे ठीक है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
a84ggomn77on4htv90svwk150aylg5h
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८१
250
186907
672976
645304
2026-08-22T17:00:38Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672976
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९७. पत्र: सी॰ विजयराघवाचारियरको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मुझे आपका स्नेहपूर्ण पत्र और कृपापूर्ण चेक भी मिला। मुझे मालूम है कि वल्लभभाई इसकी बड़ी सराहना करेंगे।
मैं आपके इस कथन से सहमत हूँ कि यदि सर्वदलीय समिति एक सुसम्पूर्ण संविधान प्रस्तुत नहीं कर पाती, तो यह बड़े दुःखकी बात होगी। मुझे मालूम है कि मोतीलालजी इसके लिए बहुत उत्सुक हैं और इसलिए मुझे आशा है कि समिति इस कामको अवश्य पूरा कर देगी।
मुझे 'हिन्दू' के कार्यालयसे वह कतरन जरूर मिली थी जिसमें आपकी भेंट-वार्ताका विवरण था। मैंने इसे बड़े चावसे पढ़ा, परन्तु मैं श्री दासके बारेमें आपके मन्तव्य से सहमत नहीं हूँ। बहरहाल अब मेरे लिए अपनी असहमतिके कारणोंकी चर्चा करना अनावश्यक है। मेरे प्रति आपका स्नेह जो मुझे उस भेंटमें छलकता हुआ दिखाई दे रहा है और जिसको मैंने सदा अपनी एक बड़ी प्राप्ति माना है, मेरे लिए कोई नया आविष्कार नहीं था।
मैं 'यंग इंडिया' के प्रबन्धकको आपको अपेक्षित जानकारी भेजनेके लिए कह रहा हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|7em}}
{{left|३६–२९}}<noinclude></noinclude>
75apqq2b4gx9373cb7280so65m6ds8f
672977
672976
2026-08-22T17:01:06Z
अनुश्री साव
80
672977
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९७. पत्र: सी॰ विजयराघवाचारियरको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मुझे आपका स्नेहपूर्ण पत्र और कृपापूर्ण चेक भी मिला। मुझे मालूम है कि वल्लभभाई इसकी बड़ी सराहना करेंगे।
मैं आपके इस कथन से सहमत हूँ कि यदि सर्वदलीय समिति एक सुसम्पूर्ण संविधान प्रस्तुत नहीं कर पाती, तो यह बड़े दुःखकी बात होगी। मुझे मालूम है कि मोतीलालजी इसके लिए बहुत उत्सुक हैं और इसलिए मुझे आशा है कि समिति इस कामको अवश्य पूरा कर देगी।
मुझे 'हिन्दू' के कार्यालयसे वह कतरन जरूर मिली थी जिसमें आपकी भेंट-वार्ताका विवरण था। मैंने इसे बड़े चावसे पढ़ा, परन्तु मैं श्री दासके बारेमें आपके मन्तव्य से सहमत नहीं हूँ। बहरहाल अब मेरे लिए अपनी असहमतिके कारणोंकी चर्चा करना अनावश्यक है। मेरे प्रति आपका स्नेह जो मुझे उस भेंटमें छलकता हुआ दिखाई दे रहा है और जिसको मैंने सदा अपनी एक बड़ी प्राप्ति माना है, मेरे लिए कोई नया आविष्कार नहीं था।
मैं 'यंग इंडिया' के प्रबन्धकको आपको अपेक्षित जानकारी भेजनेके लिए कह रहा हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|10em}}
{{left|३६–२९}}<noinclude></noinclude>
csz79p8mo4gmgb9rqorpw4amia4p5rg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८२
250
186908
672983
645305
2026-08-22T17:15:26Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672983
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९८. पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|१७ जून, १९२८}}
रामचन्द्रन्का पत्र भेज रहा हूँ; मुझे लगा आप उसे पढ़ना चाहेंगे और वह आपको पसन्द भी आयेगा।
'नवजीवन' का ट्रस्ट बना दिया गया है। मैंने आपका नाम ट्रस्टियोंमें शामिल कर लिया है। आशा है कि आप इसमें आपत्ति नहीं करेंगे। दूसरे ट्रस्टी इस प्रकार हैं:—
:श्रीयुत दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर
:श्रीयुत शंकरलाल घेलाभाई बैंकर
:श्रीयुत जमनालालजी बजाज
:श्रीयुत महादेव हरिभाई देसाई
:श्रीयुत वल्लभभाई झवेरभाई पटेल
:श्रीयुत छगनलाल खुशालचन्द गांधी
:श्रीयुत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
:श्रीयुत मोहनलाल मगनलाल भट्ट
आश्रममें बहुतसे परिवर्तन कर दिये गये हैं। दो चोरियाँ भी हो चुकी हैं। उनमें से एक बड़ी गम्भीर किस्म की थी। मैंने भी सुब्बैयासे कहा है कि इन सबका विवरण आपको दे।
इसके साथ रामनाथन्का पत्र और अपना उत्तर<ref>देखिए "पत्र: एस॰ रामनाथनको", १६-६-१९२८।</ref> भेज रहा हूँ।
{{left|संलग्न पत्र ३ (५ पन्ने)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
5phg2nain7gv1xrhbctg8k8f7ndmlw5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८३
250
186909
672989
645306
2026-08-22T17:39:58Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
672989
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४९९. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
१७ जून, १९२८}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम सहस्रधारा देख पाई, यह तो बहुत अच्छा हुआ। शब्द 'सहस्त्र' नहीं 'सहस्र' है। भैंसके दूध और घीका त्याग सिर्फ आश्रम में ही किया जायेगा। यदि आश्रमके बाहर जायें तो वहाँ यह नियम लागू नहीं होगा। हालाँकि जिसने गाय
और भैंसका भेद अच्छी तरह समझ लिया हो वह चाहे जहाँ हो, उसका त्याग कर सकता है। इस समय आश्रम में गायका दूध काफी मिल रहा है। एक जगहसे गायका घी मिलनेका भी बन्दोबस्त हो गया है।
यह पत्र सुबह चार बजेसे पहले लिखवाया था। दिनमें तुम्हारा दूसरा पत्र भी मिला। कमलाको माफी वाला भाग पढ़वा दिया था। काम निपट नहीं पाता था, इसलिए आजकल सुबह तीन बजे उठ जाता हूँ। चि॰ कुसुम भी उसी समय उठनेका हठ करती है, इसका मैं विरोध नहीं करता।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४८०) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५००. पत्र: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}}
{{right|१७ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री विट्ठलभाई,}}
वल्लभभाई, स्वामी और जमनालालजी आ गये हैं। मसविदा इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। मुझे लगता है कि इससे ज्यादा ब्यौरेमें जानेकी कोई जरूरत नहीं है। इस समय तो वह जो चाहे सो कर लें। यदि सत्याग्रही सच्चे हैं तो जीतेंगे ही। यदि अन्तमें वे निर्बल पड़ जायें तो जब जागेंगे, हम तभी सुबह समझेंगे।
निर्बल मित्र भी दुश्मनकी तरह स्वार्थी होते हैं, इस समय तो यह कहावत सिद्ध हो रही है।
आपके कामसे तो इस समय सभी बहुत खुश हो रहे हैं। खूब जियें और खूब काम करें।
{{right|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ १४४४५) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
odzx4iu8incu7e30lj1fimqu9pj7g6u
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८४
250
186910
673227
645307
2026-08-23T10:23:07Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673227
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५०१. पत्र: प्रभाशंकर पट्टणीको'''}}}}
{{right|१८ जून, १९२८}}
{{left|सुज्ञ भाईश्री,}}
आपके कुशल-क्षेमसे पहुँचनेकी खबर मैंने पढ़ ली थी। यह तो भिक्षा पत्र है। मेरे पास कितने ही दुर्बल ढोर, सूखी हुई गायें और बछड़े हुई गायें और बछड़े हैं। इन सबको आश्रम में पालना खर्चीला काम है। यदि आप उन्हें अपनी जमीनमें रख लें तो खर्च कम हो जाये। आप कहें तो खर्च मेज दूँगा। यदि ऐसा लगे कि यह काम हो सकता है तो भाई जोशीको यहाँ भेज दें। वह वहाँ हैं इसीसे मुझे यह बात सूझी है। वह आकर देख जायें और आपको पूरा हाल बता दें, तथा यदि आपको ठीक लगे तो आश्रमके ढोरोंको आप आश्रय दें। यह प्रयोग गोरक्षा मण्डलके लिए कर रहा हूँ। क्या लेडी रमाबाईको चरखेकी बात याद है?
{{right|मोहनदासके वन्देमातरम्}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५९०८) की फोटो-नकलसे तथा सी॰ डब्ल्यू॰ ३२२२ से।
सौजन्य: महेश पट्टणी
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०२. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
१८ जून, १९२८}}
{{left|भाई घनश्यामदासजी,}}
इस पत्रके साथ दो पत्र आस्ट्रीयाके मित्रोंका<ref>श्री और श्रीमती स्टेंडेनथ।</ref> भेजता हूँ। दोनों बहोत अच्छे
हैं। उनका हिंदुस्थानमें बुलाना और हिंदुस्थानका परिचय दिलाना आवश्यक समझता हुं। ऐसी बातों में आपके दानका उपयोग मैं नहि करना चाहता हुं। ऐसे कार्यमें भाई जुगलकिशोरजी रस लेते हैं। यदि आप उचित समझें तो उनको सब पत्र भेज दें। उनके लिये २०० पाउंड भेजना चाहिये। यदि वे इस दान देना चाहते हैं तो शीघ्रतासे पैसे भेजने होंगे।
आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा। आश्रम नियमावली<ref>देखिए "सत्याग्रह आश्रम", १४-६-१९२८।</ref> ध्यानसे पढ़ें और कुछ सूचना
देना उचित समझें तो अवश्य भेजें।
{{right|आपका,<br>
{{larger|मोहनदास}}}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ६१६० से।
सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
m877xt38tmq9wu377yx59moj6wkaigx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८१
250
187020
672854
645420
2026-08-22T13:11:38Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672854
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६०. वृद्ध–विवाह बनाम बाल–विवाह'''}}}}
एक गृहस्थ सूरतसे लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>
इसमें बाल-विवाहकी जो आलोचना की गई है, वह बहुत अंश तक सही है ।
लेखक अगर 'नवजीवन' के पिछले अंक पढ़ जायें तो उन्हें मालूम हो जायेगा कि
'नवजीवन' में बाल-विवाहकी सख्त टीका अनेक बार की गई है। मैं यह भी जानता
हूँ कि उन लेखोंसे अनेक बाल-विवाह होते होते रुके भी हैं। पर उसमें अभी तक
सुधार करनेकी काफी गुंजाइश है । वृद्ध-विवाहके प्रति जितनी अरुचि समाजमें है,
उतनी बाल-विवाह के प्रति नहीं । मेरी दृष्टिसे तो दोनों वस्तुएँ जड़से खोद फेंकने
लायक हैं। इसलिए बाल-विवाहके विरोध के बारेमें लेखकके और मेरे बीच मतभेद
नहीं है । मेरे हाथमें सत्ता हो या मेरी कलममें यथेष्ट ताकत हो तो मैं उनका उपयोग
प्रत्येक बाल-विवाहको रोकने में करूँ । जो माँ-बाप अपने लड़कोंका विवाह बचपन में
करते हैं, वे उनसे दुश्मनी करते हैं और उन्हें पराधीन और अशक्त बना डालते हैं ।
किन्तु लेखकका उद्देश्य तो बाल-विवाहको निन्दा करके वृद्ध विवाहकी स्तुति
करना जान पड़ता है । वृद्ध-विवाहके जो लाभ ये बतलाते हैं, वे हास्यजनक लगते
हैं; इतना ही नहीं, उसमें तो बेचारी गरीब लड़कीके मनके भावोंका विचार भी नहीं
किया गया है, यदि कुछ विचार किया गया है तो उसकी आर्थिक स्थितिकी हद
तक ही किया गया लगता है । लगता है कि लेखक यह भूल ही गये हैं या उनकी
दृष्टिमें इसका विचार ही अनावश्यक है कि जिन कन्याओंका विवाह वृद्ध पुरुषोंके
साथ किया जाता है, उसमें उनकी सम्मति नहीं ली जाती। लेखकको तो इसका भान
भी नहीं है कि विवाह धार्मिक विधि है और उनका यह भूल जाना उससे भी बड़ा
दोष है कि वृद्ध-विवाह तो दुगुना बाल-विवाह है; क्योंकि वृद्ध-विवाह में कन्या तो
बालिका होती ही है और जो वृद्ध पुरुष वृद्ध होनेपर भी विवाह करनेका विचार
करता है, वह बालक बल्कि उससे भी कम माना जायेगा । कन्या तो, वरके जीते
हुए भी एक तरहसे विधवा ही गिनी जायेगी । जो बुढ़े पुरुष अपने विकारोंको रोकने में
असमर्थ हों और इसलिए अथवा किसी दूसरे कारणसे विवाह करनेको तैयार हों, वे
अपने ही जैसी किसी वृद्ध स्त्रीसे या बड़ी उम्रकी किसी ऐसी स्त्रीसे विवाह करें
जो बूढ़ेसे सम्बन्ध जोड़नेको तैयार हो तो समाजकी कमसे कम हानि होगी ।
{{c|'''धन्यवाद'''}}
जिस लेखका उल्लेख ऊपर किया गया उसका परिणाम यह हुआ है कि एक गरीब लड़की बच गई। क्योंकि जो वृद्ध पुरुष लड़कीसे विवाह करने को तैयार हुए थे, उन्होंने वह लेख देखकर अपनी भूल समझी और फिरसे विवाह करनेका विचार छोड़ दिया। इस शुभ परिणामके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। हम यही उम्मीद<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
m36syrhvp1lgp6k2r7ays6dno3eun4j
672855
672854
2026-08-22T13:17:46Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672855
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६०. वृद्ध–विवाह बनाम बाल–विवाह'''}}}}
एक गृहस्थ सूरतसे लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>
इसमें बाल–विवाहकी जो आलोचना की गई है, वह बहुत अंश तक सही है। लेखक अगर 'नवजीवन' के पिछले अंक पढ़ जायें तो उन्हें मालूम हो जायेगा कि 'नवजीवन' में बाल–विवाहकी सख्त टीका अनेक बार की गई है। मैं यह भी जानता हूँ कि उन लेखोंसे अनेक बाल–विवाह होते होते रुके भी हैं। पर उसमें अभी तक सुधार करनेकी काफी गुंजाइश है। वृद्ध–विवाहके प्रति जितनी अरुचि समाजमें है, उतनी बाल–विवाह के प्रति नहीं। मेरी दृष्टिसे तो दोनों वस्तुएँ जड़से खोद फेंकने लायक हैं। इसलिए बाल–विवाहके विरोध के बारेमें लेखकके और मेरे बीच मतभेद नहीं है। मेरे हाथमें सत्ता हो या मेरी कलममें यथेष्ट ताकत हो तो मैं उनका उपयोग
प्रत्येक बाल–विवाहको रोकने में करूँ। जो माँ–बाप अपने लड़कोंका विवाह बचपन में करते हैं, वे उनसे दुश्मनी करते हैं और उन्हें पराधीन और अशक्त बना डालते हैं।
किन्तु लेखकका उद्देश्य तो बाल–विवाहकी निन्दा करके वृद्ध–विवाहकी स्तुति करना जान पड़ता है। वृद्ध–विवाहके जो लाभ ये बतलाते हैं, वे हास्यजनक लगते हैं; इतना ही नहीं, उसमें तो बेचारी गरीब लड़कीके मनके भावोंका विचार भी नहीं किया गया है, यदि कुछ विचार किया गया है तो उसकी आर्थिक स्थितिकी हद तक ही किया गया लगता है। लगता है कि लेखक यह भूल ही गये हैं या उनकी दृष्टिमें इसका विचार ही अनावश्यक है कि जिन कन्याओंका विवाह वृद्ध पुरुषोंके साथ किया जाता है, उसमें उनकी सम्मति नहीं ली जाती। लेखकको तो इसका भान भी नहीं है कि विवाह धार्मिक विधि है और उनका यह भूल जाना उससे भी बड़ा दोष है कि वृद्ध–विवाह तो दुगुना बाल–विवाह है; क्योंकि वृद्ध–विवाह में कन्या तो बालिका होती ही है और जो वृद्ध पुरुष वृद्ध होनेपर भी विवाह करनेका विचार करता है, वह बालक बल्कि उससे भी कम माना जायेगा ल। कन्या तो, वरके जीते हुए भी एक तरहसे विधवा ही गिनी जायेगी। जो बूढ़े पुरुष अपने विकारोंको रोकने में असमर्थ हों और इसलिए अथवा किसी दूसरे कारणसे विवाह करनेको तैयार हों, वे अपने ही जैसी किसी वृद्ध स्त्रीसे या बड़ी उम्रकी किसी ऐसी स्त्रीसे विवाह करें जो बूढ़ेसे सम्बन्ध जोड़नेको तैयार हो तो समाजकी कमसे कम हानि होगी।
{{c|'''धन्यवाद'''}}
जिस लेखका उल्लेख ऊपर किया गया उसका परिणाम यह हुआ है कि एक गरीब लड़की बच गई। क्योंकि जो वृद्ध पुरुष लड़कीसे विवाह करने को तैयार हुए थे, उन्होंने वह लेख देखकर अपनी भूल समझी और फिरसे विवाह करनेका विचार छोड़ दिया। इस शुभ परिणामके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। हम यही उम्मीद<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
dnc4rvvk8f0i896cni3lpibpwciq9ru
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८२
250
187021
672856
645421
2026-08-22T13:22:09Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672856
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करें कि वे फिरसे जब-जब विकारवश होंगे, तब लड़कीके, समाजके और देशके हितका
विचार करेंगे, ईश्वरका स्मरण करेंगे और शान्त हो जायेंगे। इस दृष्टान्तसे समाज-
सेवक और भी उत्साहित हों। हम इससे और ऐसे ही दूसरे दृष्टान्तोंसे समझ सकते
हैं कि मर्यादाका पालन करते हुए दृढ़तापूर्वक और समुचित अवसर पर अगर समाजमें
होनेवाले या दूसरे अन्यायोंके विरुद्ध आवाज उठायें तो अन्यायको रोका जा
सकता है।
{{c|'''दूसरी गाय बचेगी?'''}}
कितनी ही बालिकाएँ बूढ़ोंके हाथ बिकनेसे बच गई हैं इस बातको ध्यानमें
रखते हुए रानपुरके एक गृहस्थ लिखते हैं।
इस पत्रको देखते हुए मैं भावनगरके मोढ़ वणिक भाईसे अवश्य यह प्रार्थना
करूँगा कि वे यह विवाह न करें। पचपन वर्षकी उम्र में जो बालिका उनकी पौत्री
होनेके लायक है उससे विवाह करते समय उन्हें काँपना चाहिए। मैं आशा करता
हूँ कि भावनगरकी मोढ़ जातिके सेठ भी इस विवाहको रोकनेके लिए जो कुछ करना
चाहिए, करेंगे । सच तो यह है कि जहाँ जनता जागृत है वहां ऐसे मामलों में
सिर्फ छोटी जातियोंके सेठ ही नहीं वरन सभी लोग, यहाँ तक कि राज्य भी इन
बालिकाओंका रक्षक है और इस प्रकार बेची जा रही बालिकाओंको बचाना उनका
धर्म है। युवकवर्ग उन सबका चौकीदार है। इसमें कोई शक नहीं है कि जहाँ युवक
वर्ग नीति, विनय और वीरताका कवच पहनकर अपने कर्त्तव्यका पालन करेगा वहाँ
सभी गरीब गायोंकी रक्षा हो सकेगी और होनी भी चाहिए ।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''' २५-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१६१. पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय गोविन्द,}}
तुम्हारा सहज बातचीतके रससे युक्त पत्र मिला। मुझे खुशी है कि तुम बगैर
किसी तकलीफके उतना फासला चलकर तय कर सके। मैं ठीक हो रहा हूँ। तुमने
एनिमाके बारेमें जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने गौर किया है। बंगलोर में जिन
डाक्टरोंने मुझे सलाह दी, उन्होंने परमँगनेट पर जोर दिया था, लेकिन घोल बहुत
पतला है । ठीक गुलाबी रंगके घोलकी जरूरत होती है।
पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude>
pvyeo8dmtl2hsg481y9lzb2xamio8z9
672858
672856
2026-08-22T13:26:26Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672858
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करें कि वे फिरसे जब–जब विकारवश होंगे, तब लड़कीके, समाजके और देशके हितका विचार करेंगे, ईश्वरका स्मरण करेंगे और शान्त हो जायेंगे। इस दृष्टान्तसे समाजसेवक और भी उत्साहित हों। हम इससे और ऐसे ही दूसरे दृष्टान्तोंसे समझ सकते हैं कि मर्यादाका पालन करते हुए दृढ़तापूर्वक और समुचित अवसर पर अगर समाजमें होनेवाले या दूसरे अन्यायोंके विरुद्ध आवाज उठायें तो अन्यायको रोका जा सकता है।
{{c|'''दूसरी गाय बचेगी?'''}}
कितनी ही बालिकाएँ बूढ़ोंके हाथ बिकनेसे बच गई हैं इस बातको ध्यानमें रखते हुए रानपुरके एक गृहस्थ लिखते हैं।<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>
इस पत्रको देखते हुए मैं भावनगरके मोढ़ वणिक भाईसे अवश्य यह प्रार्थना करूँगा कि वे यह विवाह न करें। पचपन वर्षकी उम्रमें जो बालिका उनकी पौत्री होनेके लायक है उससे विवाह करते समय उन्हें काँपना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि भावनगरकी मोढ़ जातिके सेठ भी इस विवाहको रोकनेके लिए जो कुछ करना चाहिए, करेंगे। सच तो यह है कि जहाँ जनता जागृत है वहां ऐसे मामलों में सिर्फ छोटी जातियोंके सेठ ही नहीं वरन सभी लोग, यहाँ तक कि राज्य भी इन बालिकाओंका रक्षक है और इस प्रकार बेची जा रही बालिकाओंको बचाना उनका धर्म है। युवकवर्ग उन सबका चौकीदार है। इसमें कोई शक नहीं है कि जहाँ युवक वर्ग नीति, विनय और वीरताका कवच पहनकर अपने कर्त्तव्यका पालन करेगा वहाँ सभी गरीब गायोंकी रक्षा हो सकेगी और होनी भी चाहिए।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''' २५-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१६१. पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय गोविन्द,}}
तुम्हारा सहज बातचीतके रससे युक्त पत्र मिला। मुझे खुशी है कि तुम बगैर किसी तकलीफके उतना फासला चलकर तय कर सके। मैं ठीक हो रहा हूँ। तुमने एनिमाके बारेमें जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने गौर किया है। बंगलोर में जिन डाक्टरोंने मुझे सलाह दी, उन्होंने परमँगनेट पर जोर दिया था, लेकिन घोल बहुत पतला है। ठीक गुलाबी रंगके घोलकी जरूरत होती है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
qixs69jzbkilbwvejx11hipe0a5zliz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८३
250
187022
672860
645422
2026-08-22T13:33:36Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672860
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको|१५१}}</noinclude>
गणेशनके यहाँ तुम्हारी किताबकी छपाईका काम कैसा चल रहा है? उसके कब तक तैयार हो जानेकी उम्मीद है?
{{left|तुम सबको सस्नेह,}}
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२८) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१६२. पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला । सादगी तो हृदयकी चीज है । लेकिन इसकी आड़ में हम
स्वयं अपनेको धोखा न देने लगें अतः आदर्श यह है कि कोई भी ऐसी चीज जिसे
संसारका गरीब से गरीब व्यक्ति न रखता हो, हम अपने पास न रखें।
आप अपनी पत्नीको उसकी इच्छाके विरुद्ध गहने त्याग देनेके लिए मजबूर
नहीं कर सकते। लेकिन आपको अपने वासनाविहीन निस्स्वार्थ प्रेमके द्वारा और अपने
दिन-ब-दिन बढ़ते आत्मनिग्रहके द्वारा उसे राजी कर लेनेकी कोशिश करनी चाहिए।
अपने पिताका त्याग किये बिना और हमेशा उनकी सेवा करनेके लिए तैयार
रहते हुए भी आप उनसे अलग रह सकते हैं और एक अछूत बच्चेको उस तरह पाल
सकते हैं जिस तरह आपने सुझाव रखा है।
मुझे खेद है कि मैं आपकी बहनको नहीं ले सकूंगा क्योंकि वह हिन्दुस्तानी
नहीं जानती होगी। आप उसे वहाँ वह सब प्रशिक्षण दें, जिसकी उसे जरूरत है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत के॰ एस॰ आचार्य<br>
सहायक अध्यापक<br>
गवर्नमेंट हाईस्कूल
देवनगिरी}}<br>
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२७) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
cao026wz97g8vu3yv6o9wmavwb7dhvy
672864
672860
2026-08-22T13:39:28Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672864
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको|१५१}}</noinclude>
गणेशनके यहाँ तुम्हारी किताबकी छपाईका काम कैसा चल रहा है? उसके कब तक तैयार हो जानेकी उम्मीद है?
तुम सबको सस्नेह,
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२८) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१६२. पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। सादगी तो हृदयकी चीज है। लेकिन इसकी आड़ में हम स्वयं अपनेको धोखा न देने लगें अतः आदर्श यह है कि कोई भी ऐसी चीज जिसे संसारका गरीब से गरीब व्यक्ति न रखता हो, हम अपने पास न रखें।
आप अपनी पत्नीको उसकी इच्छाके विरुद्ध गहने त्याग देनेके लिए मजबूर नहीं कर सकते। लेकिन आपको अपने वासनाविहीन निस्स्वार्थ प्रेमके द्वारा और अपने दिन–ब–दिन बढ़ते आत्मनिग्रहके द्वारा उसे राजी कर लेनेकी कोशिश करनी चाहिए।
अपने पिताका त्याग किये बिना और हमेशा उनकी सेवा करनेके लिए तैयार रहते हुए भी आप उनसे अलग रह सकते हैं और एक अछूत बच्चेको उस तरह पाल सकते हैं जिस तरह आपने सुझाव रखा है।
मुझे खेद है कि मैं आपकी बहनको नहीं ले सकूंगा क्योंकि वह हिन्दुस्तानी नहीं जानती होगी। आप उसे वहाँ वह सब प्रशिक्षण दें, जिसकी उसे जरूरत है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|'''श्रीयुत के॰ एस॰ आचार्य'''<br>
'''सहायक अध्यापक'''<br>
'''गवर्नमेंट हाईस्कूल'''<br>
'''देवनगिरी'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२७) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
e5buu9cpeh8xqnc2n4q3szkfxmuzjgd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८४
250
187023
672870
645423
2026-08-22T13:54:03Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672870
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>'''१६३. पत्र : एन॰ राम रावको'''
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
बडनावल कताई केन्द्र पर श्रीयुत पुजारीकी रिपोर्टके साथ प्रेषित आपके पत्रके लिए धन्यवाद। उसकी चर्चा 'यंग इंडिया' के पृष्ठोंमें की गई।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एन॰ राम राव<br>
सचिव,<br>
विकास विभाग<br>
सचिवालय, बंगलोर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३०) की माइक्रोफिल्मसे।
'''{{larger|'''१६४. पत्र : एच० एम० पेरीराको'''}}'''
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय पेरीरा,}}
पता वही है जैसा ऊपर छपा है। कोई दूसरा सांकेतिक पता नहीं है। गांधी,
साबरमती लिखनेसे भी पत्र मुझे मिल जायेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एच॰ एम॰ पेरीरा<br>
२२५, ओक स्ट्रीट<br>
बेलौर, एल॰ आई॰।}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२७१) की माइक्रोफिल्मसे।
८ मार्च, १९२८ के अंक में प्रकाशित च॰ राजगोपालाचारीके लेख 'एक राजकीय खादी केन्द्र' में इसकी चर्चा थी।<noinclude></noinclude>
pv4qaws8icv030yky759suoe3jlq3j6
672874
672870
2026-08-22T13:57:45Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672874
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६३. पत्र : एन॰ राम रावको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
बडनावल कताई केन्द्र पर श्रीयुत पुजारीकी रिपोर्टके साथ प्रेषित आपके पत्रके लिए धन्यवाद। उसकी चर्चा 'यंग इंडिया' के पृष्ठोंमें की गई।<ref>८ मार्च, १९२८ के अंक में प्रकाशित च॰ राजगोपालाचारीके लेख 'एक राजकीय खादी केन्द्र' में इसकी चर्चा थी।</ref>
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एन॰ राम राव<br>
सचिव,<br>
विकास विभाग<br>
सचिवालय, बंगलोर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३०) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''१६४. पत्र : एच॰ एम॰ पेरीराको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय पेरीरा,}}
पता वही है जैसा ऊपर छपा है। कोई दूसरा सांकेतिक पता नहीं है। गांधी, साबरमती लिखनेसे भी पत्र मुझे मिल जायेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एच॰ एम॰ पेरीरा<br>
२२५, ओक स्ट्रीट<br>
बेलौर, एल॰ आई॰।}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२७१) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
7u7yu2multo2n23v7ob9vvv495rug11
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८५
250
187024
672876
645424
2026-08-22T14:00:21Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672876
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६५. पत्र : पी० एस० किचलूको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका हार्दिक निमन्त्रण मिला। लेकिन और नहीं तो केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी
कारणोंसे ही मुझे परिषद् में शरीक नहीं होना चाहिए। यदि आपकी यह भविष्यवाणी
सच हो जाये और पंजाबके हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिखोंमें दिली एकता
स्थापित हो जाये, तो मेरे मनको खुशी होगी। मैं जानता हूँ कि तब हिन्दू-मुस्लिम
एकता हो जानेका भरोसा हो जायेगा और उस एकताकी शक्तिमें मेरा इतना विश्वास
है कि मैं कहूँगा कि फिर स्वराज्य मिलना भी पक्का हो जायेगा ।
खैर, मैं आशा करता हूँ कि परिषद खादीको नहीं भूलेगी और न ही उसकी
उपेक्षा करेगी ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा० पी० एस० किचलू<br>
अध्यक्ष<br>
स्वागत समिति<br>
१३वीं पंजाब प्रान्तीय परिषद<br>
अमृतसर}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१२९) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१६६. पत्र : च० राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
आपका पत्र मिला । कुछ फैसला करनेसे पहले मैं रोमाँ रोलाँके पत्रको प्रतीक्षा
कर रहा हूँ । आपने महादेवको लिखे अपने पत्र में जो दलील पेश की है उसका मैंने
पहलेसे ही अन्दाज लगा लिया था। लेकिन यह पत्र कोई प्रेम-पत्र नहीं है । यह तो
आपको डा० एम० ई० नायडू से प्राप्त संलग्न पत्र भेजने के लिए लिखा है। कृपया<noinclude></noinclude>
3db4zsvdwzsxzsxd02q4y0a3cvq00dw
672880
672876
2026-08-22T14:04:09Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672880
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६५. पत्र : पी॰ एस॰ किचलूको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका हार्दिक निमन्त्रण मिला। लेकिन और नहीं तो केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणोंसे ही मुझे परिषद् में शरीक नहीं होना चाहिए। यदि आपकी यह भविष्यवाणी सच हो जाये और पंजाबके हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिखोंमें दिली एकता स्थापित हो जाये, तो मेरे मनको खुशी होगी। मैं जानता हूँ कि तब हिन्दू–मुस्लिम एकता हो जानेका भरोसा हो जायेगा और उस एकताकी शक्तिमें मेरा इतना विश्वास है कि मैं कहूँगा कि फिर स्वराज्य मिलना भी पक्का हो जायेगा।
खैर, मैं आशा करता हूँ कि परिषद खादीको नहीं भूलेगी और न ही उसकी उपेक्षा करेगी।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ पी॰ एस॰ किचलू<br>
अध्यक्ष<br>
स्वागत समिति<br>
१३वीं पंजाब प्रान्तीय परिषद<br>
अमृतसर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२९) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१६६. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
आपका पत्र मिला। कुछ फैसला करनेसे पहले मैं रोमाँ रोलाँके पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आपने महादेवको लिखे अपने पत्रमें जो दलील पेश की है उसका मैंने पहलेसे ही अन्दाज लगा लिया था। लेकिन यह पत्र कोई प्रेम–पत्र नहीं है। यह तो आपको डा॰ एम॰ ई॰ नायडू से प्राप्त संलग्न पत्र भेजने के लिए लिखा है। कृपया<noinclude></noinclude>
sl3r573g9xu3x6rm0i8pf5onsqvqhp5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८६
250
187025
672882
645425
2026-08-22T14:07:38Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672882
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इसपर स्वयं तुरन्त यथोचित कार्यवाही कीजिये। मैंने उन्हें बता दिया है कि आप
इस पत्रका जवाब देंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सह-पत्र - १<br>
श्रीयुत च० राजगोपालाचारी<br>
गांधी आश्रम<br>
तिरुचेन्गोड}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३१) की फोटो- नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१६७. पत्र : प्रताप एस० पण्डितको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय प्रताप,}}
मैं आपसे तो अपने लिये चर्मालय नहीं बनवा सका, लेकिन फिर भी मेरे
यहाँ अब एक चर्मालय जैसा कुछ हो गया है; क्योंकि मुझे मेरे ही जैसा सनकी
एक व्यक्ति मिल गया है जो चमड़े कामकी बाबत काम चलानेके लायक काफी
जानता है। मैं चाहूँगा कि आप जब अहमदाबाद आयें तो इसपर भी एक नजर
डालें । लेकिन मैं चाहूँगा कि आप मुझे चमड़ा कमानेके सम्बन्धमें कुछ ऐसा साहित्य
भेज दें जिसे एक मामूली आदमी भी समझ सके और उसके सहारे कुछ कर सके,
या मुझे बताइए कि ऐसा साहित्य मुझे कहाँसे मिल सकता है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|प्रताप एस० पण्डित}}
अंग्रेजी (एस० एन० १५३६३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
sbfx88s1lcs97jr2dt76uv2fa8kxndb
672884
672882
2026-08-22T14:10:49Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672884
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इसपर स्वयं तुरन्त यथोचित कार्यवाही कीजिये। मैंने उन्हें बता दिया है कि आप इस पत्रका जवाब देंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सह–पत्र — १<br>
श्रीयुत च॰ राजगोपालाचारी<br>
गांधी आश्रम<br>
तिरुचेन्गोड}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३१) की फोटो–नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१६७. पत्र : प्रताप एस॰ पण्डितको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह<br>
साबरमती<br>
२६ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय प्रताप,}}
मैं आपसे तो अपने लिये चर्मालय नहीं बनवा सका, लेकिन फिर भी मेरे यहाँ अब एक चर्मालय जैसा कुछ हो गया है; क्योंकि मुझे मेरे ही जैसा सनकी एक व्यक्ति मिल गया है जो चमड़े कामकी बाबत काम चलानेके लायक काफी जानता है। मैं चाहूँगा कि आप जब अहमदाबाद आयें तो इसपर भी एक नजर डालें। लेकिन मैं चाहूँगा कि आप मुझे चमड़ा कमानेके सम्बन्धमें कुछ ऐसा साहित्य भेज दें जिसे एक मामूली आदमी भी समझ सके और उसके सहारे कुछ कर सके,
या मुझे बताइए कि ऐसा साहित्य मुझे कहाँसे मिल सकता है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|प्रताप एस॰ पण्डित}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५३६३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
i0odski42y77nxi3c4nzbmjc9btmkpg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८७
250
187026
672886
645426
2026-08-22T14:13:47Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672886
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६८. पत्र : एम० पिगॉटको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती,<br>
२७ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला । आपने लिखा है कि ३००० रु० मेरे लिये बहुत छोटी
रकम है और उक्त विधवा तथा उसके बच्चे के लिए वह बहुत बड़ी है। आपको
यह नहीं मालूम है कि मैं इस विधवासे भी ज्यादा गरीब हूँ क्योंकि मेरे पास कोई
ऐसी सम्पत्ति नहीं जिसके लिए मैं किसी अदालतमें जा सकूं और प्रिवी कौंसिल तो
और भी नहीं जा सकता। मेरे पास खुदका कोई पैसा नहीं है । मैं तो एक मामूली
न्यासी हूँ जिसके पास कतिपय सुनिश्चित न्यासोंके लिए कुछ कोष रहते हैं । मैं अपनेमें
निहित विश्वासको भंग करनेका जोखिम उठाये बिना उन कोषोंको निर्धारित कामोंके
अलावा अन्य कामोंमें नहीं लगा सकता। आपको इस सम्बन्धमें किसी धनवान व्यक्ति से
कहना-सुनना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एम० पिगॉट<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३२) की फोटो - नकलसे।
{{c|{{larger|'''१६९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|आश्रम,<br>
साबरमती,<br>
२७ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मोतीलालजी,}}
जिस पत्रकी आशा थी, वह चूँकि रजिस्ट्रीसे भेजा गया था इसलिए आज ही
मिला है। यह एक लम्बा पत्र है । वह' चाहेंगे कि मैं यूरोप जाऊँ, लेकिन खुद जूनसे
पहले अपनी जगहपर उनके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मैं एक और पत्रके जवाब में
उनके पत्रकी आशा कर रहा हूँ। मुझे जानेकी कोई जल्दी नहीं है । इसलिए मैं उनसे
और खबर पानेका इन्तजार करूँगा । जाने क्यों इस प्रस्तावित यात्राके लिए मैं मनसे
राजी नहीं हो पा रहा हूँ । मेरा मन तो बहिष्कारमें रखा है । अगर बहिष्कारको
१. रोमा रोला ।<noinclude></noinclude>
1ig9bra0tjrbiz9iggb1qihr0lvwh14
672892
672886
2026-08-22T14:19:51Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672892
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६८. पत्र : एम॰ पिगॉटको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती,<br>
२७ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। आपने लिखा है कि ३००० रु॰ मेरे लिये बहुत छोटी रकम है और उक्त विधवा तथा उसके बच्चे के लिए वह बहुत बड़ी है। आपको यह नहीं मालूम है कि मैं इस विधवासे भी ज्यादा गरीब हूँ क्योंकि मेरे पास कोई ऐसी सम्पत्ति नहीं जिसके लिए मैं किसी अदालतमें जा सकूं और प्रिवी कौंसिल तो और भी नहीं जा सकता। मेरे पास खुदका कोई पैसा नहीं है। मैं तो एक मामूली न्यासी हूँ जिसके पास कतिपय सुनिश्चित न्यासोंके लिए कुछ कोष रहते हैं। मैं अपनेमें
निहित विश्वासको भंग करनेका जोखिम उठाये बिना उन कोषोंको निर्धारित कामोंके अलावा अन्य कामोंमें नहीं लगा सकता। आपको इस सम्बन्धमें किसी धनवान व्यक्ति से कहना–सुनना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एम॰ पिगॉट<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३२) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१६९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|आश्रम,<br>
साबरमती,<br>
२७ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मोतीलालजी,}}
जिस पत्रकी आशा थी, वह चूँकि रजिस्ट्रीसे भेजा गया था इसलिए आज ही मिला है। यह एक लम्बा पत्र है। वह<ref>रोमाॅं रोलाॅं।</ref> चाहेंगे कि मैं यूरोप जाऊँ, लेकिन खुद जूनसे पहले अपनी जगहपर उनके रहनेकी सम्भावना नहीं है। मैं एक और पत्रके जवाबमें उनके पत्रकी आशा कर रहा हूँ। मुझे जानेकी कोई जल्दी नहीं है। इसलिए मैं उनसे और खबर पानेका इन्तजार करूँगा। जाने क्यों इस प्रस्तावित यात्राके लिए मैं मनसे राजी नहीं हो पा रहा हूँ। मेरा मन तो बहिष्कारमें रखा है। अगर बहिष्कारको<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
irnweqrh7wha94iy336xyuww4e1hbsg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८८
250
187027
672902
645427
2026-08-22T14:34:46Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित नहीं */
672902
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कार्यान्वित करना सम्भव सिद्ध न हो तो मैं खादी कार्यक्रमको आगे बढ़ाने में भी
बिलकुल सन्तुष्ट हूँ। मैं चाहूँगा कि खादी आन्दोलनने जो शानदार असर पैदा किया
है, उसे आप महसूस करें। अगर मिल मालिक ईमानदार रहते, तो हम बहुत कुछ
आगे बढ़ गये होते।
मिलोंके खादी उत्पादनके आँकड़े अब मुझे मिल गये हैं। तीन वर्षोंके आँकड़े
इस प्रकार हैं :
ये आँकड़े दिसम्बर तकके ९ महीनोंके हैं।
|||१९२५||१९२६ |१९२६ ||
|-
||पौण्ड|२२८८७९७०|२७२३६३३७|३३९७७८५१ ||
|-
||गज|६५०४८४८७|७४३१३२३०|८४३८०३६८ ||
आप देखेंगे कि मिलें कितनी तीव्र गतिसे खादीकी दिशामें आगे बढ़ती रही
हैं। एक सालमें ९४.३ गज! इसका अर्थ यह है वह सारा पैसा कंगालोंकी जेबोंसे
छीना गया है। यह खादी आन्दोलनकी शक्तिको भी जाहिर करता है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३३) की फोटो नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७०. भाषण : हरिजनों को सभामें'''}}}}
{{right|२७ मार्च, १९२८}}
अभी जो भजन गाये गये हैं उन्हें सुननेके बाद मुझे ऐसा प्रतीत हुआ है कि
आपके और मेरे बीच किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। अभी मेरा स्वास्थ्य ऐसा नहीं है
कि मैं किसी भी सभामें भाग ले सकूं। और डाक्टरोंने भी मुझे सभाओंमें जानेके लिए
मना किया है। आज मैं आया हूँ इससे आप यह न मान लें कि मेरी तबीयत बिलकुल
ठीक है। काफी समयके बाद और अहमदाबाद आनेके बाद मैं आज पहली बार इस
सभामें आया हूँ, क्योंकि श्री बैंकर और दूसरे लोग बहुत दिनोंसे अनुरोध कर रहे
थे कि मुझे शहरके भंगी भाइयोंको भी कुछ समझाना चाहिए।
ठीक-ठीक देखा जाये तो आप लोग ही उच्च वर्णके हिन्दू हैं। आपने बहुत
त्याग किया है। यदि आपमें कुछ बुराइयाँ हैं तो उनके लिए आपसे ज्यादा तथाकथित
उच्च वर्णके हिन्दू ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने आपको त्याग दिया इसीलिए ये बुराइयाँ
आप लोगों में आईं। अब मैं यही चाहता हूँ कि आप अपने इन दोषोंको दूर करें।
१. देखिए "बहिष्कार पर एक मिल मालिक", ५-४-१९२८ ।
२. यह सभा ७.३० बजे शामको मगनवाड़ी में हुई थी। कस्तूरबा गांधी, वल्लभभाई पटेल और
अनसूया बहन साराभाई भी समामें उपस्थित थे। कार्यक्रमके प्रारम्भमें भजन गाये गये थे।<noinclude></noinclude>
ghzpa2wsurf8cj7eo3kny5krkprn7dl
672906
672902
2026-08-22T14:42:53Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672906
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कार्यान्वित करना सम्भव सिद्ध न हो तो मैं खादी कार्यक्रमको आगे बढ़ाने में भी बिलकुल सन्तुष्ट हूँ। मैं चाहूँगा कि खादी आन्दोलनने जो शानदार असर पैदा किया है, उसे आप महसूस करें। अगर मिल मालिक ईमानदार रहते, तो हम बहुत कुछ आगे बढ़ गये होते।
मिलोंके खादी उत्पादनके आँकड़े अब मुझे मिल गये हैं। तीन वर्षोंके आँकड़े इस प्रकार हैं :
ये आँकड़े दिसम्बर तकके ९ महीनोंके हैं<ref>देखिए "बहिष्कार पर एक मिल मालिक", ५-४-१९२८।</ref>
{|width=100%
|-
|| || १९२५ || १९२६ || १९२६ ||
|-
|| पौण्ड || २२८८७९७० ||२७२३६३३७ ||३३९७७८५१ ||
|-
|| गज || ६५०४८४८७ || ७४३१३२३० || ८४३८०३६८ ||
|}
आप देखेंगे कि मिलें कितनी तीव्र गतिसे खादीकी दिशामें आगे बढ़ती रही हैं। एक सालमें ९४.३ गज! इसका अर्थ यह है वह सारा पैसा कंगालोंकी जेबोंसे छीना गया है। यह खादी आन्दोलनकी शक्तिको भी जाहिर करता है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३३) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७०. भाषण : हरिजनों को सभामें<ref>यह सभा ७.३० बजे शामको मगनवाड़ी में हुई थी। कस्तूरबा गांधी, वल्लभभाई पटेल और अनसूया बहन साराभाई भी सभामें उपस्थित थे। कार्यक्रमके प्रारम्भमें भजन गाये गये थे।</ref>'''}}}}
{{right|२७ मार्च, १९२८}}
अभी जो भजन गाये गये हैं उन्हें सुननेके बाद मुझे ऐसा प्रतीत हुआ है कि आपके और मेरे बीच किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। अभी मेरा स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि मैं किसी भी सभामें भाग ले सकूं। और डाक्टरोंने भी मुझे सभाओंमें जानेके लिए मना किया है। आज मैं आया हूँ इससे आप यह न मान लें कि मेरी तबीयत बिलकुल ठीक है। काफी समयके बाद और अहमदाबाद आनेके बाद मैं आज पहली बार इस सभामें आया हूँ, क्योंकि श्री बैंकर और दूसरे लोग बहुत दिनोंसे अनुरोध कर रहे थे कि मुझे शहरके भंगी भाइयोंको भी कुछ समझाना चाहिए। ठीक–ठीक देखा जाये तो आप लोग ही उच्च वर्णके हिन्दू हैं। आपने बहुत त्याग किया है। यदि आपमें कुछ बुराइयाँ हैं तो उनके लिए आपसे ज्यादा तथाकथित उच्च वर्णके हिन्दू ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने आपको त्याग दिया इसीलिए ये बुराइयाँ आप लोगोंमें आईं। अब मैं यही चाहता हूँ कि आप अपने इन दोषोंको दूर करें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
o76oe5w47pa0q8z6b3ll7r3noabzryp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८९
250
187028
672907
645428
2026-08-22T14:46:33Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672907
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||भाषण : हरिजनोंकी सभा में|१५७}}</noinclude>मैं आपकी अपेक्षा पाखाना ज्यादा अच्छी तरह साफ कर सकता हूँ, परन्तु आप मुझे
वैसा नहीं करने देते। यह ठीक नहीं है। आपको दूसरोंको यह काम करनेसे क्यों
रोकना चाहिए?
उच्च वर्णके लोग आपके कामको हीन- हलका मानते हैं; परन्तु मेरी यह दृढ़
धारणा है कि आपका काम सबसे अच्छा है । हम जबतक यह काम अच्छी तरह
नहीं कर सकते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि हमने ठीक-ठीक सेवा की है।
आज अहमदाबादकी सड़कों और गलियोंकी क्या हालत है ? मैं तो सभी कुछ अपने
हाथसे साफ करनेवाला हूँ इसलिए यह सब आपसे कहता हूँ । आपको तो मनमें यह
सोचना चाहिए कि इस कार्यके द्वारा आप शहरकी सबसे बड़ी और जरूरी सेवा कर
रहे हैं। इस सेवा कार्यमें दूसरे लोग भी भाग लें, इसमें आपको क्या आपत्ति हो
सकती है?
यदि मेरे वश में हो तो अहमदाबादकी गलियाँ और पाखानें हाई स्कूलके
विद्यार्थियोंसे साफ कराऊँ और अहमदाबादको इतना सुन्दर शहर बना दूं कि दूसरोंसे
कह सकूं कि हमारे शहरको देखो। इसकी चाबी तो आपके हाथ में है । आप इसे
सेवा कार्य समझें और इसे मनसे करें, क्योंकि शहरकी तन्दुरुस्ती मुख्यत: इसीपर निर्भर
है। यदि आप यह बात समझ लें तो श्री वल्लभभाईकी' बहुत-सी समस्याएँ हल हो
जायें और शहर निवासी आपकी प्रशंसा करें। आप अपने कार्यसे बड़े लोगोंको भी
लज्जित कर सकते हैं।
शराबका व्यसन कम हो गया इस बातपर मुझे विश्वास नहीं आता। मैं
यह मानता हूँ कि न पीनेवाले दो आना और पीनेवाले १४ आना है । मैं आपसे
शराबकी लत छोड़ देनेकी सिफारिश करता हूँ। मैं यह नहीं मान सकता कि कोई
मनुष्य भोजनके लिए कर्ज लेगा। यह तो सिर्फ मौज-मजा उड़ानेके लिए ही किया
जाता है। आपको अपने सभी व्यसनोंका त्याग करना चाहिए।
अन्तमें मैं आप सबसे यही कहूँगा कि जूठनका त्याग करें और अपने बच्चोंको
भी यही सिखायें । उनके साथ आप भी यही प्रतिज्ञा करें। जो वस्तु बिना अपमानके
सहज ढंगसे प्राप्त हो उसीको लें। ऐसा करके आप अपने बालकोंको अच्छी शिक्षा
दे सकेंगे। चाहे आपको पढ़ना न आता हो, तो भी आप गिनती तो सीख ही लें,
ताकि कोई आपको धोखा न दे सके। आपको शौच-शुद्धिके नियम भी समझ लेने
चाहिए और समाज के नेताओंसे आत्म-शुद्धि करना सीखना होगा । उसके लिए आपको
अपने सभी व्यसन छोड़ देने होंगे । खादीकी टोपी पहन लेनेपर भी यदि आपमें
यह दुर्व्यसन विद्यमान हों तो यह खादीकी टोपीके लिए शर्मकी बात है । आप जहाँ
जो कुछ भी करेंगे उसीमें आपको नगरपालिका और अहमदाबादके समाजके अगुओंसे
अच्छी सहायता प्राप्त करवाऊँगा।
:[गुजरातीसे]
:'''प्रजाबन्धु''', १-४-१९२८
१. वल्लभभाई इन दिनों अहमदाबादमें नगरपालिकाके प्रधान थे ।<noinclude></noinclude>
47upj3qq0pe5rhaqf7zyhrc9cxgmmdk
672912
672907
2026-08-22T14:52:15Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672912
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||भाषण : हरिजनोंकी सभा में|१५७}}</noinclude>मैं आपकी अपेक्षा पाखाना ज्यादा अच्छी तरह साफ कर सकता हूँ, परन्तु आप मुझे वैसा नहीं करने देते। यह ठीक नहीं है। आपको दूसरोंको यह काम करनेसे क्यों रोकना चाहिए?
उच्च वर्णके लोग आपके कामको हीन–हलका मानते हैं; परन्तु मेरी यह दृढ़ धारणा है कि आपका काम सबसे अच्छा है। हम जबतक यह काम अच्छी तरह नहीं कर सकते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि हमने ठीक–ठीक सेवा की है। आज अहमदाबादकी सड़कों और गलियोंकी क्या हालत है? मैं तो सभी कुछ अपने हाथसे साफ करनेवाला हूँ इसलिए यह सब आपसे कहता हूँ। आपको तो मनमें यह सोचना चाहिए कि इस कार्यके द्वारा आप शहरकी सबसे बड़ी और जरूरी सेवा कर रहे हैं। इस सेवा कार्यमें दूसरे लोग भी भाग लें, इसमें आपको क्या आपत्ति हो सकती है?
यदि मेरे वश में हो तो अहमदाबादकी गलियाँ और पाखानें हाई स्कूलके विद्यार्थियोंसे साफ कराऊँ और अहमदाबादको इतना सुन्दर शहर बना दूं कि दूसरोंसे कह सकूं कि हमारे शहरको देखो। इसकी चाबी तो आपके हाथ में है। आप इसे सेवा कार्य समझें और इसे मनसे करें, क्योंकि शहरकी तन्दुरुस्ती मुख्यत: इसीपर निर्भर है। यदि आप यह बात समझ लें तो श्री वल्लभभाईकी<ref>वल्लभभाई इन दिनों अहमदाबादमें नगरपालिकाके प्रधान थे।</ref> बहुत–सी समस्याएँ हल हो जायें और शहर निवासी आपकी प्रशंसा करें। आप अपने कार्यसे बड़े लोगोंको भी
लज्जित कर सकते हैं।
शराबका व्यसन कम हो गया इस बातपर मुझे विश्वास नहीं आता। मैं यह मानता हूँ कि न पीनेवाले दो आना और पीनेवाले १४ आना है। मैं आपसे शराबकी लत छोड़ देनेकी सिफारिश करता हूँ। मैं यह नहीं मान सकता कि कोई मनुष्य भोजनके लिए कर्ज लेगा। यह तो सिर्फ मौज–मजा उड़ानेके लिए ही किया जाता है। आपको अपने सभी व्यसनोंका त्याग करना चाहिए।
अन्तमें मैं आप सबसे यही कहूँगा कि जूठनका त्याग करें और अपने बच्चोंको भी यही सिखायें। उनके साथ आप भी यही प्रतिज्ञा करें। जो वस्तु बिना अपमानके सहज ढंगसे प्राप्त हो उसीको लें। ऐसा करके आप अपने बालकोंको अच्छी शिक्षा दे सकेंगे। चाहे आपको पढ़ना न आता हो, तो भी आप गिनती तो सीख ही लें, ताकि कोई आपको धोखा न दे सके। आपको शौच–शुद्धिके नियम भी समझ लेने चाहिए और समाजके नेताओंसे आत्म–शुद्धि करना सीखना होगा। उसके लिए आपको अपने सभी व्यसन छोड़ देने होंगे। खादीकी टोपी पहन लेनेपर भी यदि आपमें यह दुर्व्यसन विद्यमान हों तो यह खादीकी टोपीके लिए शर्मकी बात है। आप जहाँ जो कुछ भी करेंगे उसीमें आपको नगरपालिका और अहमदाबादके समाजके अगुओंसे अच्छी सहायता प्राप्त करवाऊँगा।
:[गुजरातीसे]
:'''प्रजाबन्धु''', १-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
qunmfi4zeoxolujbot74x8zdyoy4a3a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९०
250
187029
672916
645429
2026-08-22T14:55:03Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672916
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७१. पत्र : एम० टी० के० माधवन्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय माधवन्,}}
आपका पत्र मिला । आपने मुझे वहाँके हालातोंकी निराशाजनक तस्वीर भेजी
है। अभी फिलहाल आपके लिए मेरी सलाह यह है कि आप वहाँ चुपचाप जनमत
तैयार करते रहिये । आपने जो कुछ लिखा है उससे मुझे ऐसा लगता है कि सरकारका
रवैया सहानुभूति-शून्य नहीं है, लेकिन उसमें साहसकी कमी है और उसपर कट्टर
सनातनी मतका बहुत ज्यादा असर होता है। आपको मुझे यह भी बताना चाहिए
कि क्या आप शुचिन्द्रम या थिरूवारप्पूमें सत्याग्रह करनेके लिए तैयार हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत टी० के० माधवन्
एस० एन० डी० पी० योगम्
वाइकोम
(त्रावणकोर राज्य)}}
अंग्रेजी (एस० एन० १२८९३ - ए) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{c|{{larger|'''१७२. पत्र : एम० देवनदास नारायणदासको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके दो पत्र मिले। आपका नाम मैं प्रबन्धक मण्डलके सामने रख सकूँ, इसके
पहले मुझे उतनी जानकारीसे कहीं ज्यादाकी जरूरत होगी, जितनी कि आपने अपने
पत्रमें दी है। आपको अपनी उम्र, आपके माता-पिता जीवित हैं अथवा नहीं, आपका
भावी लक्ष्य क्या है, जरूर लिखना चाहिए। जबतक आपने कराचीमें कमसे कम
६ महीने तक निम्नलिखित कामोंमें अपनी परीक्षा न ले ली हो, आप किसी भी तरहसे
दाखिल नहीं किये जा सकते ।<noinclude></noinclude>
1kfn9t7sn5i0yz9w4hh9uammipawjzr
672917
672916
2026-08-22T14:59:13Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672917
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७१. पत्र : एम॰ टी॰ के॰ माधवन्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय माधवन्,}}
आपका पत्र मिला। आपने मुझे वहाँके हालातोंकी निराशाजनक तस्वीर भेजी है। अभी फिलहाल आपके लिए मेरी सलाह यह है कि आप वहाँ चुपचाप जनमत तैयार करते रहिये। आपने जो कुछ लिखा है उससे मुझे ऐसा लगता है कि सरकारका रवैया सहानुभूति–शून्य नहीं है, लेकिन उसमें साहसकी कमी है और उसपर कट्टर सनातनी मतका बहुत ज्यादा असर होता है। आपको मुझे यह भी बताना चाहिए कि क्या आप शुचिन्द्रम या थिरूवारप्पूमें सत्याग्रह करनेके लिए तैयार हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत टी॰ के॰ माधवन्<br>
एस॰ एन॰ डी॰ पी॰ योगम्<br>
वाइकोम<br>
(त्रावणकोर राज्य)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १२८९३—ए) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''१७२. पत्र : एम॰ देवनदास नारायणदासको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके दो पत्र मिले। आपका नाम मैं प्रबन्धक मण्डलके सामने रख सकूँ, इसके पहले मुझे उतनी जानकारीसे कहीं ज्यादाकी जरूरत होगी, जितनी कि आपने अपने पत्रमें दी है। आपको अपनी उम्र, आपके माता–पिता जीवित हैं अथवा नहीं, आपका भावी लक्ष्य क्या है, जरूर लिखना चाहिए। जबतक आपने कराचीमें कमसे–कम ६ महीने तक निम्नलिखित कामोंमें अपनी परीक्षा न ले ली हो, आप किसी भी तरहसे दाखिल नहीं किये जा सकते।<noinclude></noinclude>
ctfe5b19y6ze9ko5ex3wt1bt9stkgv1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९१
250
187030
672957
645430
2026-08-22T16:19:59Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672957
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : रामी गांधीको|१५९}}</noinclude>
(क) पहले तो कमसे कम एक घंटा रोज खुदकी तैयार की हुई पूनियोंसे
भली-भाँति कातना ।
(ख) यदि आपको हिन्दी नहीं आती तो उसे सीखना ताकि आप सही हिन्दी
बोल और लिख सकें ।
(ग) अन्य सभी किस्मोंके कपड़ेको छोड़कर खद्दर पहनना ।
(घ) अपने माता-पिताकी खुली इजाजत लेना।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत एम० देवनदास नारायणदास<br>
छात्र कक्षा ७<br>
न्यू हाई स्कूल<br>
कराची}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३६) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{c|{{larger|'''१७३. पत्र : रामी गांधीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|चि० रामी,}}
तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला। जैसे सुन्दर अक्षर तुमने इस बार लिखे हैं वैसे ही
हमेशा लिखती रहना। इसके बाद पत्रोंमें मुझे अपना रोजका कार्यक्रम लिखकर भेजना ।
वहाँकी जलवायु कैसी लगती हैं यह भी लिखना । यह सही है कि मेरे यूरोप जानेकी
बात चल रही है, परन्तु अभी कुछ पक्का फैसला नहीं हुआ है । जाना हुआ मी तो
कुछ दिनोंके बाद ही होगा। वहाँ तुम्हें कुछ पढ़नेका समय भी मिलता है या नहीं ?
चि० राधा बिहारकी एक कन्याकी शिक्षिका होकर बिहार गई है। दुर्गा भी मदद
करनेके लिए उसके साथ गई है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९७०९) की फोटो- नकलसे ।<noinclude></noinclude>
akk0hcroibpr9oggxw28v328ijq4wci
672959
672957
2026-08-22T16:24:12Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672959
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : रामी गांधीको|१५९}}</noinclude>
(क) पहले तो कमसे–कम एक घंटा रोज खुदकी तैयार की हुई पूनियोंसे भली–भाँति कातना।
(ख) यदि आपको हिन्दी नहीं आती तो उसे सीखना ताकि आप सही हिन्दी बोल और लिख सकें।
(ग) अन्य सभी किस्मोंके कपड़ेको छोड़कर खद्दर पहनना।
(घ) अपने माता–पिताकी खुली इजाजत लेना।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत एम॰ देवनदास नारायणदास<br>
छात्र कक्षा ७<br>
न्यू हाई स्कूल<br>
कराची}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३६) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''१७३. पत्र : रामी गांधीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|चि॰ रामी,}}
तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला। जैसे सुन्दर अक्षर तुमने इस बार लिखे हैं वैसे ही हमेशा लिखती रहना। इसके बाद पत्रोंमें मुझे अपना रोजका कार्यक्रम लिखकर भेजना। वहाँकी जलवायु कैसी लगती हैं यह भी लिखना। यह सही है कि मेरे यूरोप जानेकी बात चल रही है, परन्तु अभी कुछ पक्का फैसला नहीं हुआ है। जाना हुआ भी तो कुछ दिनोंके बाद ही होगा। वहाँ तुम्हें कुछ पढ़नेका समय भी मिलता है या नहीं? चि॰ राधा बिहारकी एक कन्याकी शिक्षिका होकर बिहार गई है। दुर्गा भी मदद करनेके लिए उसके साथ गई है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९७०९) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
mzbyertw8juws4icdh19s0kqydetiwm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९२
250
187031
672960
645431
2026-08-22T16:27:06Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672960
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७४. पत्र : एच० एन० वेनको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका सुखद पत्र मिला । श्री एण्ड्रयूज मुझे आपके आश्रम आकर मुझे मिलने के
इरादेकी बात बताना भूल गये । ८ अप्रैलको आपसे मिलकर मुझे खुशी होगी। यदि
इससे आपके लिए कोई फर्क न पड़ता हो तो ५ के बजाय शामके ४ बजेका समय
रखिये। लेकिन आपके लिए मैं ५ बजे भी तैयार रहूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एच० एन० वेन<br>
मेडेन्स होटल<br>
दिल्ली}}
अंग्रेजी (एस० एन० ११९७०) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१७५. पत्र : राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय च० रा०}}
प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपका पत्र मुझे मिला। खुद मेरा मन भी
उसके लिए राजी नहीं है और न ही मुझे खुद अपने-आपमें ऐसा विश्वास है कि मैं
उसे सफल बना सकूंगा; लेकिन रोमाँ रोलाँसे मुलाकातका एक आकर्षण अब भी है।
पश्चिममें मेरी जितनी भी ख्याति है, वह उनके ही कारण है और मुझे लगता है कि
अगर मैं उनसे आमने-सामने मिलूँ तो कई बातों में निराशा हो सकती है। यह भी हो
सकता है कि हम एक-दूसरेके इतने करीब खिंच जायें जितने कि पहले कभी नहीं थे
मैं इस चीजको जरूर काफी महत्वकी मानता हूँ कि हम एक-दूसरेको जितना जानते
हैं उससे ज्यादा अच्छी तरहसे जानें।
मैं आपकी इस बातसे बिलकुल सहमत हूँ कि स्वास्थ्यकी दृष्टिसे कुछ लाभ नहीं
होनेवाला है । हो सकता है कि मुझे कुछ कष्ट ही मिले और इस प्रस्तावित यात्राके<noinclude></noinclude>
i7uwbfpsqlsp1cgjeedjiuhcbhv3cm3
672965
672960
2026-08-22T16:31:16Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672965
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७४. पत्र : एच॰ एन॰ वेनको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका सुखद पत्र मिला। श्री एण्ड्रयूज मुझे आपके आश्रम आकर मुझे मिलने के इरादेकी बात बताना भूल गये। ८ अप्रैलको आपसे मिलकर मुझे खुशी होगी। यदि इससे आपके लिए कोई फर्क न पड़ता हो तो ५ के बजाय शामके ४ बजेका समय रखिये। लेकिन आपके लिए मैं ५ बजे भी तैयार रहूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री एच॰ एन॰ वेन<br>
मेडेन्स होटल<br>
दिल्ली}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९७०) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७५. पत्र : राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय च॰ रा॰}}
प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपका पत्र मुझे मिला। खुद मेरा मन भी उसके लिए राजी नहीं है और न ही मुझे खुद अपने–आपमें ऐसा विश्वास है कि मैं उसे सफल बना सकूंगा; लेकिन रोमाँ रोलाँसे मुलाकातका एक आकर्षण अब भी है। पश्चिममें मेरी जितनी भी ख्याति है, वह उनके ही कारण है और मुझे लगता है कि अगर मैं उनसे आमने–सामने मिलूँ तो कई बातोंमें निराशा हो सकती है। यह भी हो सकता है कि हम एक–दूसरेके इतने करीब खिंच जायें जितने कि पहले कभी नहीं थे। मैं इस चीजको जरूर काफी महत्वकी मानता हूँ कि हम एक–दूसरेको जितना जानते हैं उससे ज्यादा अच्छी तरहसे जानें।
मैं आपकी इस बातसे बिलकुल सहमत हूँ कि स्वास्थ्यकी दृष्टिसे कुछ लाभ नहीं होनेवाला है। हो सकता है कि मुझे कुछ कष्ट ही मिले और इस प्रस्तावित यात्राके<noinclude></noinclude>
6l81stut4y1i5jdihuq9la8fz9e6rcb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९३
250
187032
672966
645432
2026-08-22T16:34:07Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672966
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको|१६१}}</noinclude>पीछे स्वास्थ्यका कोई विचार नहीं है। उस दृष्टिसे तो भारतका कोई पर्वतीय
स्थान मेरे लिये कहीं ज्यादा अच्छा रहेगा।
आपकी तरह मुझे भी ऐसा लगता है कि मेरी अनुपस्थितिके कारण हमारा कार्य
यहाँ कुछ डगमगा सकता है, खास करके बारडोलीमें । मेरी नामौजूदगी में विदेशी वस्त्र
बहिष्कार निश्चय ही खास आगे नहीं बढ़ सकता है। लेकिन अब चूंकि आप सब
लोग कलकत्तेमें एक-साथ इकट्ठा हो ही रहे हैं, मैं चाहूँगा कि आप कौंसिलकी बैठक में
प्रस्तावित यात्रापर चर्चा करें। मैं चाहता हूँ कि मिलने-जुलने के मामलेमें मेरा दायरा
बहुत ही इने-गिने व्यक्तियों तक सीमित न हो जाये। और मैं इतना नम्र रहूँ कि
सत्य तक पहुँच सकूं, चाहे वह किसी भी स्रोतसे क्यों न आये।
पैसा हड़पनेके मामलोंके लिए मुझे खेद है, लेकिन मैं आपकी इस चेतावनीको
मानूंगा कि मैं स्वयंको परेशानी में न डालूं और न ही उनकी चर्चा करूँ ।
रामचन्द्र के बारेमें आप जो कुछ कहते हैं, मैं समझ गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि
आप उन्हें एक स्नेह-भरा पत्र लिखें और उनको अपनी तरफ खींचनेके लिए हर
तरहसे प्रयत्न करें। वह एक तरहके 'चेट्टी' मी हैं। क्योंकि उन्होंने जामिया में खादीके
लिए बहुत अच्छा काम किया था।
आपने पैसा हड़पनेके जिन मामलोंका उल्लेख किया है, उनके बारेमें मुझे एक
बात लिखना बिलकुल नहीं भूल जाना चाहिए। यदि दोषी व्यक्ति आपको ५०० रु० दे
देता है और प्रकाशनके लिए एक लिखित क्षमा याचना आपको दे देता है, तो आपको
पूरी तरह सन्तोष हो जाना चाहिए। लेकिन यह तो एक सामान्य व्यक्तिकी बिना
विचारे दी गई राय है।
केवल दूध पर रहनेके मेरे इस साहसपूर्ण प्रयोगके बारेमें आपको क्या कहना
है ? हाँ मैं यह नहीं सुनना चाहता कि इस खबरको सुनकर कि वह वास्तव में दूध
और पानीका ही प्रयोग है, आप सचमुच मूर्छित हो गये
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१२३) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}
३६–११</noinclude>
lb2rilzsu4ovtp8d0sfdqsdyq5dwir0
672968
672966
2026-08-22T16:38:44Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672968
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको|१६१}}</noinclude>पीछे स्वास्थ्यका कोई विचार नहीं है। उस दृष्टिसे तो भारतका कोई पर्वतीय स्थान मेरे लिये कहीं ज्यादा अच्छा रहेगा।
आपकी तरह मुझे भी ऐसा लगता है कि मेरी अनुपस्थितिके कारण हमारा कार्य यहाँ कुछ डगमगा सकता है, खास करके बारडोलीमें। मेरी नामौजूदगी में विदेशी वस्त्र बहिष्कार निश्चय ही खास आगे नहीं बढ़ सकता है। लेकिन अब चूंकि आप सब लोग कलकत्तेमें एक–साथ इकट्ठा हो ही रहे हैं, मैं चाहूँगा कि आप कौंसिलकी बैठक में प्रस्तावित यात्रापर चर्चा करें। मैं चाहता हूँ कि मिलने–जुलने के मामलेमें मेरा दायरा बहुत ही इने–गिने व्यक्तियों तक सीमित न हो जाये। और मैं इतना नम्र रहूँ कि सत्य तक पहुँच सकूं, चाहे वह किसी भी स्रोतसे क्यों न आये।
पैसा हड़पनेके मामलोंके लिए मुझे खेद है, लेकिन मैं आपकी इस चेतावनीको मानूंगा कि मैं स्वयंको परेशानीमें न डालूं और न ही उनकी चर्चा करूँ।
रामचन्द्रके बारेमें आप जो कुछ कहते हैं, मैं समझ गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप उन्हें एक स्नेह–भरा पत्र लिखें और उनको अपनी तरफ खींचनेके लिए हर तरहसे प्रयत्न करें। वह एक तरहके 'चेट्टी' भी हैं। क्योंकि उन्होंने जामिया में खादीके लिए बहुत अच्छा काम किया था।
आपने पैसा हड़पनेके जिन मामलोंका उल्लेख किया है, उनके बारेमें मुझे एक बात लिखना बिलकुल नहीं भूल जाना चाहिए। यदि दोषी व्यक्ति आपको ५०० रु॰ दे देता है और प्रकाशनके लिए एक लिखित क्षमा याचना आपको दे देता है, तो आपको पूरी तरह सन्तोष हो जाना चाहिए। लेकिन यह तो एक सामान्य व्यक्तिकी बिना विचारे दी गई राय है।
केवल दूध पर रहनेके मेरे इस साहसपूर्ण प्रयोगके बारेमें आपको क्या कहना है? हाँ मैं यह नहीं सुनना चाहता कि इस खबरको सुनकर कि वह वास्तव में दूध और पानीका ही प्रयोग है, आप सचमुच मूर्छित हो गये
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२३) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}
३६–११</noinclude>
0geyzqgnqhyiref0fzwhppkkjaksdr5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९४
250
187033
672969
645433
2026-08-22T16:42:04Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672969
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७६. पत्र : अरुलमणि पिचमुथुको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती,<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका बीमा शुदा छोटा-सा पार्सल आपके पत्रसे पहले मिला और मैं सोच रहा
था कि यह किसने भेजा है। महादेवने ठीक अन्दाज लगा लिया था । आपने बहुमूल्य
जवाहरातोंका जिस ढंगसे उपयोग किया, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मैं
आशा करता हूँ कि किसी तरीकेसे किसी रूपमें मैं इस उपहारकी, आपका नाम
जाहिर न करते हुए 'यंग इंडिया " के पृष्ठोंमें चर्चा करूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा० अरुलमणि पिचमुथु<br>
पंथाडी नं० १, मदुरा}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३४) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१७७. पत्र : सैम हिगिन बॉटमको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
जब जमुना किनारेका आपका फॉर्म देखनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था,
ऐसा याद पड़ता है कि तब मैंने एक ऐसा साधन देखा था जिसके जरिये आप सूर्यकी
गर्मीसे अपना पानी गरम करते थे। क्या आप कृपया मुझे बतायेंगे कि वह आपकी
इमारतके ऊपर बना हुआ मात्र एक हौज था जो पूरी तरह धूपमें खुला रहता था
या कि आप किसी यान्त्रिक विधिसे सूर्यकी किरणोंको हौजपर संकेन्द्रित करते थे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सैम हिगिनबॉटम महोदय
ऐग्रीकल्चरल इन्स्टीटयूट
इलाहाबाद}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३७) की फोटो नकलसे ।
१. देखिये " टिप्पणियाँ ", ५-४-१९२८, को उपशीर्षक "त्रियों और गहने " ।<noinclude></noinclude>
nppt9w8gxs391gggxq1n17nh4ru9gpu
672970
672969
2026-08-22T16:46:25Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672970
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७६. पत्र : अरुलमणि पिचमुथुको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती,<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका बीमा शुदा छोटा–सा पार्सल आपके पत्रसे पहले मिला और मैं सोच रहा था कि यह किसने भेजा है। महादेवने ठीक अन्दाज लगा लिया था। आपने बहुमूल्य जवाहरातोंका जिस ढंगसे उपयोग किया, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि किसी तरीकेसे किसी रूपमें मैं इस उपहारकी, आपका नाम।जाहिर न करते हुए 'यंग इंडिया'<ref>देखिये "टिप्पणियाँ", ५-४-१९२८, को उपशीर्षक "स्त्रियाँ और गहने"।</ref> के पृष्ठोंमें चर्चा करूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ अरुलमणि पिचमुथु<br>
पंथाडी नं॰ १, मदुरा}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३४) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७७. पत्र : सैम हिगिनबॉटमको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
जब जमुना किनारेका आपका फॉर्म देखनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, ऐसा याद पड़ता है कि तब मैंने एक ऐसा साधन देखा था जिसके जरिये आप सूर्यकी गर्मीसे अपना पानी गरम करते थे। क्या आप कृपया मुझे बतायेंगे कि वह आपकी इमारतके ऊपर बना हुआ मात्र एक हौज था जो पूरी तरह धूपमें खुला रहता था या कि आप किसी यान्त्रिक विधिसे सूर्यकी किरणोंको हौजपर संकेन्द्रित करते थे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सैम हिगिनबॉटम महोदय
ऐग्रीकल्चरल इन्स्टीटयूट
इलाहाबाद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३७) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
n06uzhjkni5t4ifnbowffau3q818gig
672971
672970
2026-08-22T16:47:06Z
आदेश यादव
3609
672971
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७६. पत्र : अरुलमणि पिचमुथुको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती,<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका बीमा शुदा छोटा–सा पार्सल आपके पत्रसे पहले मिला और मैं सोच रहा था कि यह किसने भेजा है। महादेवने ठीक अन्दाज लगा लिया था। आपने बहुमूल्य जवाहरातोंका जिस ढंगसे उपयोग किया, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि किसी तरीकेसे किसी रूपमें मैं इस उपहारकी, आपका नाम।जाहिर न करते हुए 'यंग इंडिया'<ref>देखिये "टिप्पणियाँ", ५-४-१९२८, को उपशीर्षक "स्त्रियाँ और गहने"।</ref> के पृष्ठोंमें चर्चा करूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ अरुलमणि पिचमुथु<br>
पंथाडी नं॰ १, मदुरा}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३४) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७७. पत्र : सैम हिगिनबॉटमको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२८ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
जब जमुना किनारेका आपका फॉर्म देखनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, ऐसा याद पड़ता है कि तब मैंने एक ऐसा साधन देखा था जिसके जरिये आप सूर्यकी गर्मीसे अपना पानी गरम करते थे। क्या आप कृपया मुझे बतायेंगे कि वह आपकी इमारतके ऊपर बना हुआ मात्र एक हौज था जो पूरी तरह धूपमें खुला रहता था या कि आप किसी यान्त्रिक विधिसे सूर्यकी किरणोंको हौजपर संकेन्द्रित करते थे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सैम हिगिनबॉटम महोदय
ऐग्रीकल्चरल इन्स्टीटयूट
इलाहाबाद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३७) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
thveyrtkwa7pt9fg93n18ahsrmaqtpe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९५
250
187034
672973
645434
2026-08-22T16:51:23Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672973
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१७८. जाति विद्वेषको जीत'''}}}}
मुझे विश्वास है कि यदि ऐम्स्टर्डम इन्टरनेशनल भी वैसी ही स्थिति में होता
जैसी जोहानिसबर्गके गोरे मजदूर संघकी है, तो जैसा व्यवहार इस गोरे मजदूर
संघने किया है वैसा ही व्यवहार वह भी करता और इसीलिए यदि इसके सदस्य
श्री रैम्जे मैकडोनल्ड या श्री लैन्सबरीकी स्थिति में होते तो उनका व्यवहार भी इन
लोगोंके व्यवहारसे भिन्न न होता।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१७९. आतंकवादका सिद्धान्त'''}}}}
जनरल डायरने हंटर कमेटीके एक सदस्यके प्रश्नका उत्तर देते हुए यह स्वीकार
किया था कि जलियाँवाला बागकी योजना आतंक उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे की गई
थी । यह स्वीकारोक्ति करके स्वर्गीय जनरलने किसी नये सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं
किया था । असल बात यह है कि संसारकी इस 'योग्यतम शासन सेवा' ने अपनी
महानताका निर्माण आतंकवादकी नींव पर ही किया है।
इस अंकको छपनेके लिए देते समय जो समाचार मिले हैं उनके अनुसार ऐसा
जान पड़ता है कि इस सुविदित ब्रिटिश नीतिके अनुसार बारडोलीमें किसानोंको
झुकानेके लिए उनके विरुद्ध फौरी कार्रवाईकी जा रही है, क्योंकि बारडोलीके कुछ
सत्याग्रहियों पर जब्तीके आठ शुरुआती नोटिस तामील किये गये हैं । इन लोगोंके
नाम सावधानीसे चुने गये जान पड़ते हैं, क्योंकि संयोगसे वे सभी प्रमुख बनिये हैं ।
यह चुनाव शायद इस आशासे किया गया है कि बनिये जो कमजोर डरपोक समझे
जाते हैं जब्तीके नोटिस देनेसे जल्दी घुटने टेक देंगे। अधिकारी सोचते होंगे कि इससे
अधिक स्वाभाविक और क्या होगा कि बनियोंके कमजोर हो जानेपर दूसरे भी
कमजोर हो जायें । सत्याग्रहियोंको आतंकवादके इस प्रथम प्रदर्शनसे चकित होनेकी
आवश्यकता नहीं है। उनसे बार-बार कहा जाता रहा है कि उन्हें जब्ती या इससे
१. सी० एफ० एन्ड्रयूजका यह लेख जिसपर गांधीजी टिप्पणी कर रहे हैं, यहीं नहीं दिया जा रहा
है उन्होंने लिखा था कि यूरोपमें इन्टरनेशनल लेबर मूवमेंटने अपने 'द ट्रायम्फ ऑफ रेस हेट्रेड " शीर्षक
बुलेटिन में गोरे मजदूरोंके दक्षिण आफ्रिकी मजदूर संघकी इस बात के लिए निन्दाकी थी कि उन्होंने रंगदार
मजदूरोंके उस औद्योगिक और व्यवसायिक कर्मचारी संघको अपने साथ सम्बद्ध करनेसे इन्कार कर दिया
जो पहले ही से ऐम्सटर्डम इन्टरनेशनल यानी कि सभी राष्ट्रोंके मजदूर संघों के संगठनमें शामिल था ।
अपने इस लेख में एन्ड्यूजने रेम्जे मैक्डॉनल्ड और इंग्लैंडके संसदीय मजदूर दलके लोगों द्वारा जातीय
आधारपर साइमन कमीशनकी नियुक्तिमें चुपचाप अपनी सम्मति दे देनेपर भी खेद व्यक्त किया था ।<noinclude></noinclude>
9nt61qih28lup33hwvz4jcstk0olnh3
672975
672973
2026-08-22T17:00:02Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672975
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७८. जाति विद्वेषकी जीत<ref>सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजका यह लेख जिसपर गांधीजी टिप्पणी कर रहे हैं, यहां नहीं दिया जा रहा है उन्होंने लिखा था कि यूरोपमें इन्टरनेशनल लेबर मूवमेंटने अपने 'द ट्रायम्फ ऑफ रेस हेट्रेड" शीर्षक बुलेटिनमें गोरे मजदूरोंके दक्षिण आफ्रिकी मजदूर संघकी इस बातके लिए निन्दाकी थी कि उन्होंने रंगदार मजदूरोंके उस औद्योगिक और व्यवसायिक कर्मचारी संघको अपने साथ सम्बद्ध करनेसे इन्कार कर दिया जो पहले ही से ऐम्सटर्डम इन्टरनेशनल यानी कि सभी राष्ट्रोंके मजदूर संघों के संगठनमें शामिल था। अपने इस लेख में एन्ड्यूजने रेम्जे मैक्डॉनल्ड और इंग्लैंडके संसदीय मजदूर दलके लोगों द्वारा जातीय आधारपर साइमन कमीशनकी नियुक्तिमें चुपचाप अपनी सम्मति दे देनेपर भी खेद व्यक्त किया था।</ref>'''}}}} मुझे विश्वास है कि यदि ऐम्स्टर्डम इन्टरनेशनल भी वैसी ही स्थितिमें होता जैसी जोहानिसबर्गके गोरे मजदूर संघकी है, तो जैसा व्यवहार इस गोरे मजदूर संघने किया है वैसा ही व्यवहार वह भी करता और इसीलिए यदि इसके सदस्य श्री रैम्जे मैकडोनल्ड या श्री लैन्सबरीकी स्थिति में होते तो उनका व्यवहार भी इन लोगोंके व्यवहारसे भिन्न न होता।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१७९. आतंकवादका सिद्धान्त'''}}}}
जनरल डायरने हंटर कमेटीके एक सदस्यके प्रश्नका उत्तर देते हुए यह स्वीकार किया था कि जलियाँवाला बागकी योजना आतंक उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे की गई थी। यह स्वीकारोक्ति करके स्वर्गीय जनरलने किसी नये सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं किया था। असल बात यह है कि संसारकी इस 'योग्यतम शासन सेवा' ने अपनी महानताका निर्माण आतंकवादकी नींव पर ही किया है।
इस अंकको छपनेके लिए देते समय जो समाचार मिले हैं उनके अनुसार ऐसा जान पड़ता है कि इस सुविदित ब्रिटिश नीतिके अनुसार बारडोलीमें किसानोंको झुकानेके लिए उनके विरुद्ध फौरी कार्रवाईकी जा रही है, क्योंकि बारडोलीके कुछ सत्याग्रहियों पर जब्तीके आठ शुरुआती नोटिस तामील किये गये हैं। इन लोगोंके नाम सावधानीसे चुने गये जान पड़ते हैं, क्योंकि संयोगसे वे सभी प्रमुख बनिये हैं। यह चुनाव शायद इस आशासे किया गया है कि बनिये जो कमजोर डरपोक समझे जाते हैं जब्तीके नोटिस देनेसे जल्दी घुटने टेक देंगे। अधिकारी सोचते होंगे कि इससे अधिक स्वाभाविक और क्या होगा कि बनियोंके कमजोर हो जानेपर दूसरे भी कमजोर हो जायें। सत्याग्रहियोंको आतंकवादके इस प्रथम प्रदर्शनसे चकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। उनसे बार–बार कहा जाता रहा है कि उन्हें जब्ती या इससे<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
m95ul2nddk1dsx2t75gl7kpz9xu8pxg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९६
250
187035
672979
645435
2026-08-22T17:03:48Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672979
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भी बुरी दूसरी कार्रवाइयोंकी अपेक्षा रखनी चाहिए। यदि उनमें शक्ति है तो वे अब उसे दिखायें ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८०. राष्ट्रीय सप्ताह'''}}}}
राष्ट्रीय सप्ताह हर साल आनेवाले मौसमोंकी तरह नियमित रूपसे आता रहता
है, मगर १९२२ के बादसे बराबर ही हममें कुछ न कुछ कमी बनी रही है । ६ से १३
अप्रैल तक दिन सौभाग्यके, आत्म-निरीक्षणके, खूब जोरोंसे राष्ट्रीय काम करनेके और
आत्म शुद्धिके समझे जाने चाहिए। इन बहुमूल्य सात दिनोंमें अपने किये कामोंका लेखा-
जोखा करना चाहिए और अपने दिलको टटोलना चाहिए। ६ अप्रैल, १९१९ की
सुबह हिन्दुस्तान के लोगों में अपनी प्रतिष्ठाकी भावना जागी थी । हिन्दू, मुसलमान और
राष्ट्रके दूसरे लोग एक दूसरेको सगे भाईकी तरह मानने लग गये थे; अगर वे
अपने को इसीं देशकी सन्तान मानें, तो सगे भाई तो हैं ही।
६ अप्रैल, १९१९ को हिन्दुस्तान में स्वदेशीकी सच्ची भावना जागी जिसके फलस्वरूप
खादी आन्दोलन चला, जो हमारी अन्तिम गणनाके अनुसार आज ९०,००० से भी
अधिक गरीब कतैयोंका पेट भर रहा है।
इस तरह जो भावना जागी, वह १९२० और २१ में बढ़ती ही गई और
हमें लगने लगा कि कानूनी स्वराज्य भी अब नजदीक ही है।
मगर वह स्वराज्य नहीं आया और गतिरोध हो गया। तबसे तो देखनेमें ऐसा
लगता है कि मानो हम पीछे ही लौटते जा रहे हैं। हिन्दू और मुसलमान एक
दूसरेका गला काटनेको टूटे पड़ रहे हैं।
आज यह पुकार मची हुई है कि जबतक सरकारसे कुछ फैसला न हो जाये तब-
तक स्वदेशी अपनानेके बदले ब्रिटिश मालका बहिष्कार किया जाये; मानो इसमें जापानके
सस्ते मालका जिसमें वहाँका सस्ता कपड़ा भी शामिल है, जो समर्थन है वह स्वदेशी
अर्थात् शुद्ध खादीका जिसमें सभी विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारकी बात है, स्थान ले
सकता है । सन् १९२०-२१ में जान पड़ता था कि बहुत खोज, सोच विचार और
अनुभवके बाद हम इसी नतीजे पर आ गये हैं कि एकमात्र व्यावहारिक, बा-असर
और आवश्यक स्वदेशी वस्तु तो खादी ही है; और वह भी सरकारके साथ किसी
फैसले पर न पहुँचने तकके लिए नहीं, बल्कि हमेशाके लिए या कमसे-कम तबतकके लिए है जबतक कि हम भूखों मरनेवाले करोड़ों आदमियोंके लिए इससे कोई अच्छा और
अधिक आमदनीका धंधा ढूंढ नहीं लेते। कोई ऐसी नई स्थिति पैदा नहीं हो गई है।
जिसके कारण हम यह मानने लगे कि ब्रिटिश मालका बहिष्कार एक व्यावहारिक
प्रस्ताव है और ब्रिटिश मालकी जगह दूसरे विदेशी कपड़ोंका उपयोग करते रहने से भी
भारतवर्षके स्वार्थको शायद कोई बड़ी हानि नहीं होगी ।<noinclude></noinclude>
d5rattw58jz1yjcp0tvkmoa42wyw3c6
672981
672979
2026-08-22T17:11:23Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672981
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भी बुरी दूसरी कार्रवाइयोंकी अपेक्षा रखनी चाहिए। यदि उनमें शक्ति है तो वे अब उसे दिखायें।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८०. राष्ट्रीय सप्ताह'''}}}}
राष्ट्रीय सप्ताह हर साल आनेवाले मौसमोंकी तरह नियमित रूपसे आता रहता है, मगर १९२२ के बादसे बराबर ही हममें कुछ न कुछ कमी बनी रही है। ६ से १३ अप्रैल तकके दिन सौभाग्यके, आत्म–निरीक्षणके, खूब जोरोंसे राष्ट्रीय काम करनेके और आत्म–शुद्धिके समझे जाने चाहिए। इन बहुमूल्य सात दिनोंमें अपने किये कामोंका लेखा–जोखा करना चाहिए और अपने दिलको टटोलना चाहिए। ६ अप्रैल, १९१९ की सुबह हिन्दुस्तानके लोगोंमें अपनी प्रतिष्ठाकी भावना जागी थी। हिन्दू, मुसलमान और राष्ट्रके दूसरे लोग एक दूसरेको सगे भाईकी तरह मानने लग गये थे; अगर वे
अपने को इसीं देशकी सन्तान मानें, तो सगे भाई तो हैं ही।
६ अप्रैल, १९१९ को हिन्दुस्तानमें स्वदेशीकी सच्ची भावना जागी जिसके फलस्वरूप खादी आन्दोलन चला, जो हमारी अन्तिम गणनाके अनुसार आज ९०,००० से भी अधिक गरीब कतैयोंका पेट भर रहा है।
इस तरह जो भावना जागी, वह १९२० और २१ में बढ़ती ही गई और हमें लगने लगा कि कानूनी स्वराज्य भी अब नजदीक ही है।
मगर वह स्वराज्य नहीं आया और गतिरोध हो गया। तबसे तो देखनेमें ऐसा लगता है कि मानो हम पीछे ही लौटते जा रहे हैं। हिन्दू और मुसलमान एक दूसरेका गला काटनेको टूटे पड़ रहे हैं।
आज यह पुकार मची हुई है कि जबतक सरकारसे कुछ फैसला न हो जाये तबतक स्वदेशी अपनानेके बदले ब्रिटिश मालका बहिष्कार किया जाये; मानो इसमें जापानके सस्ते मालका जिसमें वहाँका सस्ता कपड़ा भी शामिल है, जो समर्थन है वह स्वदेशी अर्थात् शुद्ध खादीका जिसमें सभी विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारकी बात है, स्थान ले सकता है। सन् १९२०–२१ में जान पड़ता था कि बहुत खोज, सोच विचार और अनुभवके बाद हम इसी नतीजे पर आ गये हैं कि एकमात्र व्यावहारिक, बा–असर और आवश्यक स्वदेशी वस्तु तो खादी ही है; और वह भी सरकारके साथ किसी.फैसले पर न पहुँचने तकके लिए नहीं, बल्कि हमेशाके लिए या कमसे–कम तबतकके लिए है जबतक कि हम भूखों मरनेवाले करोड़ों आदमियोंके लिए इससे कोई अच्छा और अधिक आमदनीका धंधा ढूंढ नहीं लेते। कोई ऐसी नई स्थिति पैदा नहीं हो गई है। जिसके कारण हम यह मानने लगे कि ब्रिटिश मालका बहिष्कार एक व्यावहारिक प्रस्ताव है और ब्रिटिश मालकी जगह दूसरे विदेशी कपड़ोंका उपयोग करते रहनेसे भी भारतवर्षके स्वार्थको शायद कोई बड़ी हानि नहीं होगी।<noinclude></noinclude>
3ik8ab6cy5mq7k864x61ct8362coyrb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९७
250
187036
672982
645436
2026-08-22T17:14:22Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672982
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||राष्ट्रीय सप्ताह|१६५}}</noinclude>
अच्छा हो यदि ब्रिटिश मालके बहिष्कारकी पुकारका समर्थन करनेवाले लोग
अपने कार्यक्रम पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें और जरूरत जान पड़नेपर अपनी
योजनाको बदलें और इस हार्दिक विश्वासके साथ खादी आन्दोलनमें शरीक हों, कि
केवल खादीसे ही, सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका ही नहीं, सभी तरहके विदेशी कपड़ेका
पूरा-पूरा बहिष्कार निष्पन्न हो सकता है?
वे यह करें या न करें, मुझे विश्वास है कि वे ब्रिटिश कपड़ेके सिवाय अन्य विदेशी
कपड़े के समर्थनको सिद्धान्त बनाकर नहीं बैठे हैं। अगर मेरी यह मान्यता ठीक हो
तो, उनको चाहिए कि वे राष्ट्रीय सप्ताहमें खादीकी बिक्रीका समर्थन करें। अगर वे
सिर्फ पिछले सात वर्षोंमें हुई खादी आन्दोलनकी प्रगतिका अध्ययन करें तो वे इतना
जरूर ही समझ जायेंगे कि चरखेमें कल्पनानीत शक्ति है । अगर देशके राजनीतिक
दृष्टिसे जागृत लोग उसका पूरे मनसे सक्रिय समर्थन करें तो वह मिलोंकी सहायताके
बिना भी विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सफल करनेमें समर्थ हो सकती है। मिलोंकी
सक्रिय और संगठित सहायतासे तो विदेशी वस्त्रका बहिष्कार बहुत ही सहज काम
हो जाता है। सच पूछिए तो इसकी कुंजी मिलवालोंके हाथमें है, अलबत्ता उन्हें
राष्ट्रके हितकी दृष्टिसे काम करना चाहिए। उनके साथमें एक बना बनाया और व्यापक
संगठन है, जिसका उपयोग अगर वे राष्ट्रको सेवाके लिए करें तो वह बहिष्कार
आन्दोलनको बहुत कुछ आसान बना सकता है और राष्ट्रको ऐसी शक्ति दे सकता है,
जिसकी उसे बड़ी जरूरत है।
फिर हिन्दू तथा मुसलमानोंको भी उन बहुमूल्य सात दिनोंकी याद क्यों नहीं
करनी चाहिए और क्यों सारे भय, पारस्परिक अविश्वास तथा निर्बलताको तिलांजलि
नहीं दे देनी चाहिए?
मुझे उन अछूतोंकी बात भी नहीं भूलनी चाहिए, हम हिन्दू लोग जिन्हें आज तक
दबाते रहनेका अपराध करते आये हैं। क्या हम यह नहीं देख सकेंगे कि अपने छठवें
अंशको (भले ही यह संख्या इससे कम या ज्यादा हो) गिराकर हमने अपने आपको
ही नीचे गिराया है ? कोई आदमी खुद गड्ढेमें उतरे बिना और स्वयं पापका भागी
हुए बिना दूसरेको गिरा नहीं सकता । दलित लोग पापके भागी नहीं हैं। दबाने के
पापका जवाब तलब किया जायेगा तो उन्हीं लोगोंसे जो दूसरोंको नीचे दबाकर रखे
हुए हैं।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८<noinclude></noinclude>
0lfb4oz50rbqpvnsftkarfmprvxx6lj
672984
672982
2026-08-22T17:19:15Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672984
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||राष्ट्रीय सप्ताह|१६५}}</noinclude>
अच्छा हो यदि ब्रिटिश मालके बहिष्कारकी पुकारका समर्थन करनेवाले लोग अपने कार्यक्रम पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें और जरूरत जान पड़नेपर अपनी योजनाको बदलें और इस हार्दिक विश्वासके साथ खादी आन्दोलनमें शरीक हों, कि केवल खादीसे ही, सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका ही नहीं, सभी तरहके विदेशी कपड़ेका पूरा–पूरा बहिष्कार निष्पन्न हो सकता है?
वे यह करें या न करें, मुझे विश्वास है कि वे ब्रिटिश कपड़ेके सिवाय अन्य विदेशी कपड़े के समर्थनको सिद्धान्त बनाकर नहीं बैठे हैं। अगर मेरी यह मान्यता ठीक हो तो, उनको चाहिए कि वे राष्ट्रीय सप्ताहमें खादीकी बिक्रीका समर्थन करें। अगर वे सिर्फ पिछले सात वर्षोंमें हुई खादी आन्दोलनकी प्रगतिका अध्ययन करें तो वे इतना जरूर ही समझ जायेंगे कि चरखेमें कल्पनानीत शक्ति है। अगर देशके राजनीतिक दृष्टिसे जागृत लोग उसका पूरे मनसे सक्रिय समर्थन करें तो वह मिलोंकी सहायताके बिना भी विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार सफल करनेमें समर्थ हो सकती है। मिलोंकी
सक्रिय और संगठित सहायतासे तो विदेशी वस्त्रका बहिष्कार बहुत ही सहज काम हो जाता है। सच पूछिए तो इसकी कुंजी मिलवालोंके हाथमें है, अलबत्ता उन्हें राष्ट्रके हितकी दृष्टिसे काम करना चाहिए। उनके साथमें एक बना बनाया और व्यापक संगठन है, जिसका उपयोग अगर वे राष्ट्रकी सेवाके लिए करें तो वह बहिष्कार आन्दोलनको बहुत कुछ आसान बना सकता है और राष्ट्रको ऐसी शक्ति दे सकता है, जिसकी उसे बड़ी जरूरत है।
फिर हिन्दू तथा मुसलमानोंको भी उन बहुमूल्य सात दिनोंकी याद क्यों नहीं करनी चाहिए और क्यों सारे भय, पारस्परिक अविश्वास तथा निर्बलताको तिलांजलि नहीं दे देनी चाहिए?
मुझे उन अछूतोंकी बात भी नहीं भूलनी चाहिए, हम हिन्दू लोग जिन्हें आज तक दबाते रहनेका अपराध करते आये हैं। क्या हम यह नहीं देख सकेंगे कि अपने छठवें अंशको (भले ही यह संख्या इससे कम या ज्यादा हो) गिराकर हमने अपने आपको ही नीचे गिराया है? कोई आदमी खुद गड्ढेमें उतरे बिना और स्वयं पापका भागी हुए बिना दूसरेको गिरा नहीं सकता । दलित लोग पापके भागी नहीं हैं। दबाने के पापका जवाब तलब किया जायेगा तो उन्हीं लोगोंसे जो दूसरोंको नीचे दबाकर रखे हुए हैं।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''' २९-३-१९२८<noinclude></noinclude>
99d0qs2fki654frsp3p20b3wqrbs49f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९८
250
187037
672985
645437
2026-08-22T17:25:12Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
672985
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''राष्ट्रीय सप्ताहके लिए विशेष'''}}
श्रीयुत विट्ठलदास जेराजाणी (खादी भंडार, प्रिन्सेस स्ट्रीट, बम्बई) लिखते हैं : '
मुझे पूरी आशा है कि खादी श्रीयुत जेराजाणीकी समुचित इच्छा और आशाके
अनुरूप ही यथेष्ट बिकेगी। बम्बई पर राष्ट्रके मनोभावोंका हमेशा ही असर पड़ता आया
है । बम्बईने पहला खादी भण्डार खोलकर राष्ट्रीय खादी आन्दोलनकी नींव डाली थी ।
पत्रमें दिये गये आँकड़े भी शिक्षाप्रद हैं । १९२५ में इतनी मंदी आ जानेका कारण
कालवादेवी रोडमें एक और खादीका बड़ा भण्डार खुलना बतलाया जा सकता है ।
तो भी दूसरे बरसोंके आँकड़े यह स्पष्ट सिद्ध करते हैं कि बम्बई राजनीतिक दृष्टिसे
जागृत हिन्दुस्तानकी स्थितिका सच्चा परिचायक है । १९२७ के अंकोंसे तो १९२६ की
बनिस्बत बिक्री में काफी बढ़ोतरी दिखलाई पड़ती है । क्या बम्बई फिर १९२२ की जैसी
बिक्री करेगा ? मगर इसका यह मतलब नहीं है कि १९२२ की जैसी बिक्री करनेसे
ही यह बहिष्कार सफल हो सकेगा । हम इसे सफल करना चाहते हैं और अगर हममें
केवल आवश्यक त्याग और दृढ़ संकल्प हो तो उसे सफल कर भी सकते हैं।
दूसरी एक और विज्ञप्ति शुद्ध खादी भण्डार, रिची रोड, अहमदाबादसे मेरे पास
आई है। यह भण्डार भी कपड़ेकी किस्मके अनुसार, रुपये पीछे एकसे लेकर चार आने
तककी छूट देगा।
मैं आशा करता हूँ कि सभी खादी भण्डार चाहे वे चरखा संघके हों, या उससे
प्रमाणपत्र प्राप्त हों, जनताका ध्यान खादीकी ओर दिलानेकी खास कोशिश करेंगे और
सर्व साधारण भी पर्याप्त खादी खरीदेंगे।
{{c|'''खादीके सिलसिलेमें बंगालका दौरा'''}}
बंगाल में शायद इस बातको जोर देकर कहने की जरूरत है कि श्रीयुत सतीश
चन्द्र दासगुप्तने जिस खादी सम्बन्धी दौरेका आयोजन किया है वह दौरा अखिल
भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषके सिलसिले में भी है। बंगालके बेताजके राजा स्व०
देशबन्धु चित्तरंजन दासकी स्मृतिमें खोले गये अ० भा० देशबन्धु स्मारक कोषके लिए,
जो खादीके लिए इकट्ठा किया जा रहा है, सेठ जमनालाल बजाज, श्रीयुत राज-
गोपालाचारी, श्रीयुत मणिलाल कोठारी और श्रीयुत शंकरलाल बैंकर अगले महीनेकी ५
१. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने १९२२ से १९२७ तकके राष्ट्रीय सप्ताहोंगे
खादी बिक्री आंकड़े दिये थे और यह आशा व्यक्तकी थी कि विविध और अच्छी किस्मकी खादी
और स्वदेशीको भावनाका विकास देखते हुए आगामी राष्ट्रीय सप्ताह में अधिक बिक्री होगी, उन्होंने १ से १५ तारीख तक के लिए खादीकी खरीददारीपर रुपये में एक आने छूटकी भी घोषणा की थी। देखिए "राष्ट्रीय सप्ताह", १-४-१९२२ भी।<noinclude></noinclude>
2fpp88f7jb2165jzj3soznpzb8qyzgg
672987
672985
2026-08-22T17:34:33Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
672987
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''राष्ट्रीय सप्ताहके लिए विशेष'''}}
श्रीयुत विट्ठलदास जेराजाणी (खादी भंडार, प्रिन्सेस स्ट्रीट, बम्बई) लिखते हैं :<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने १९२२ से १९२७ तकके राष्ट्रीय सप्ताहोंगे खादी बिक्री आंकड़े दिये थे और यह आशा व्यक्तकी थी कि विविध और अच्छी किस्मकी खादी और स्वदेशीको भावनाका विकास देखते हुए आगामी राष्ट्रीय सप्ताह में अधिक बिक्री होगी, उन्होंने १ से १५ तारीख तक के लिए खादीकी खरीददारीपर रुपये में एक आने छूटकी भी घोषणा की थी। देखिए "राष्ट्रीय सप्ताह", १-४-१९२२ भी।</ref>
मुझे पूरी आशा है कि खादी श्रीयुत जेराजाणीकी समुचित इच्छा और आशाके अनुरूप ही यथेष्ट बिकेगी। बम्बई पर राष्ट्रके मनोभावोंका हमेशा ही असर पड़ता आया है। बम्बईने पहला खादी भण्डार खोलकर राष्ट्रीय खादी आन्दोलनकी नींव डाली थी। पत्रमें दिये गये आँकड़े भी शिक्षाप्रद हैं। १९२५ में इतनी मंदी आ जानेका कारण कालवादेवी रोडमें एक और खादीका बड़ा भण्डार खुलना बतलाया जा सकता है। तो भी दूसरे बरसोंके आँकड़े यह स्पष्ट सिद्ध करते हैं कि बम्बई राजनीतिक दृष्टिसे जागृत हिन्दुस्तानकी स्थितिका सच्चा परिचायक है। १९२७ के अंकोंसे तो १९२६ की बनिस्बत बिक्री में काफी बढ़ोतरी दिखलाई पड़ती है। क्या बम्बई फिर १९२२ की जैसी बिक्री करेगा? मगर इसका यह मतलब नहीं है कि १९२२ की जैसी बिक्री करनेसे ही यह बहिष्कार सफल हो सकेगा। हम इसे सफल करना चाहते हैं और अगर हममें केवल आवश्यक त्याग और दृढ़ संकल्प हो तो उसे सफल कर भी सकते हैं।
दूसरी एक और विज्ञप्ति शुद्ध खादी भण्डार, रिची रोड, अहमदाबादसे मेरे पास आई है। यह भण्डार भी कपड़ेकी किस्मके अनुसार, रुपये पीछे एकसे लेकर चार आने तककी छूट देगा।
मैं आशा करता हूँ कि सभी खादी भण्डार चाहे वे चरखा संघके हों, या उससे प्रमाणपत्र–प्राप्त हों, जनताका ध्यान खादीकी ओर दिलानेकी खास कोशिश करेंगे और सर्व साधारण भी पर्याप्त खादी खरीदेंगे।
{{c|'''खादीके सिलसिलेमें बंगालका दौरा'''}}
बंगाल में शायद इस बातको जोर देकर कहने की जरूरत है कि श्रीयुत सतीश चन्द्र दासगुप्तने जिस खादी सम्बन्धी दौरेका आयोजन किया है वह दौरा अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषके सिलसिले में भी है। बंगालके बेताजके राजा स्व॰ देशबन्धु चित्तरंजन दासकी स्मृतिमें खोले गये अ॰ भा॰ देशबन्धु स्मारक कोषके लिए, जो खादीके लिए इकट्ठा किया जा रहा है, सेठ जमनालाल बजाज, श्रीयुत राजगोपालाचारी, श्रीयुत मणिलाल कोठारी और श्रीयुत शंकरलाल बैंकर अगले महीनेकी ५<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
lu66pa57mu86ravv4ei9v7d7fmi4edt
673256
672987
2026-08-23T11:29:49Z
आदेश यादव
3609
673256
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''राष्ट्रीय सप्ताहके लिए विशेष'''}}
श्रीयुत विट्ठलदास जेराजाणी (खादी भंडार, प्रिन्सेस स्ट्रीट, बम्बई) लिखते हैं :<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र–लेखकने १९२२ से १९२७ तकके राष्ट्रीय सप्ताहोंगे खादी बिक्री आंकड़े दिये थे और यह आशा व्यक्तकी थी कि विविध और अच्छी किस्मकी खादी और स्वदेशीको भावनाका विकास देखते हुए आगामी राष्ट्रीय सप्ताह में अधिक बिक्री होगी, उन्होंने १ से १५ तारीख तक के लिए खादीकी खरीददारीपर रुपये में एक आने छूटकी भी घोषणा की थी। देखिए "राष्ट्रीय सप्ताह", १-४-१९२२ भी।</ref>
मुझे पूरी आशा है कि खादी श्रीयुत जेराजाणीकी समुचित इच्छा और आशाके अनुरूप ही यथेष्ट बिकेगी। बम्बई पर राष्ट्रके मनोभावोंका हमेशा ही असर पड़ता आया है। बम्बईने पहला खादी भण्डार खोलकर राष्ट्रीय खादी आन्दोलनकी नींव डाली थी। पत्रमें दिये गये आँकड़े भी शिक्षाप्रद हैं। १९२५ में इतनी मंदी आ जानेका कारण कालवादेवी रोडमें एक और खादीका बड़ा भण्डार खुलना बतलाया जा सकता है। तो भी दूसरे बरसोंके आँकड़े यह स्पष्ट सिद्ध करते हैं कि बम्बई राजनीतिक दृष्टिसे जागृत हिन्दुस्तानकी स्थितिका सच्चा परिचायक है। १९२७ के अंकोंसे तो १९२६ की बनिस्बत बिक्रीमें काफी बढ़ोतरी दिखलाई पड़ती है। क्या बम्बई फिर १९२२ की जैसी बिक्री करेगा? मगर इसका यह मतलब नहीं है कि १९२२ की जैसी बिक्री करनेसे ही यह बहिष्कार सफल हो सकेगा। हम इसे सफल करना चाहते हैं और अगर हममें केवल आवश्यक त्याग और दृढ़ संकल्प हो तो उसे सफल कर भी सकते हैं।
दूसरी एक और विज्ञप्ति शुद्ध खादी भण्डार, रिची रोड, अहमदाबादसे मेरे पास आई है। यह भण्डार भी कपड़ेकी किस्मके अनुसार, रुपये पीछे एकसे लेकर चार आने तककी छूट देगा।
मैं आशा करता हूँ कि सभी खादी भण्डार चाहे वे चरखा संघके हों, या उससे प्रमाणपत्र–प्राप्त हों, जनताका ध्यान खादीकी ओर दिलानेकी खास कोशिश करेंगे और सर्व साधारण भी पर्याप्त खादी खरीदेंगे।
{{c|'''खादीके सिलसिलेमें बंगालका दौरा'''}}
बंगाल में शायद इस बातको जोर देकर कहने की जरूरत है कि श्रीयुत सतीश चन्द्र दासगुप्तने जिस खादी सम्बन्धी दौरेका आयोजन किया है वह दौरा अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषके सिलसिले में भी है। बंगालके बेताजके राजा स्व॰ देशबन्धु चित्तरंजन दासकी स्मृतिमें खोले गये अ॰ भा॰ देशबन्धु स्मारक कोषके लिए, जो खादीके लिए इकट्ठा किया जा रहा है, सेठ जमनालाल बजाज, श्रीयुत राजगोपालाचारी, श्रीयुत मणिलाल कोठारी और श्रीयुत शंकरलाल बैंकर अगले महीनेकी ५<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
tlea17w2bqdaufs3pmojcx5w9gqc3u6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९९
250
187038
673257
645438
2026-08-23T11:32:16Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673257
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६७}}</noinclude>तारीख से बंगाल में दौरा करनेवाले हैं। हालमें बंगालमें स्वदेशीकी एक लहर चल रही
है। मगर मुझे लगता है कि शायद इस सीधे-सादे जीवनदायी स्वदेशी शब्दके चारों
ओरके शब्दाडम्बरमें पड़कर हम उसका सच्चा अर्थ भूलते जा रहे हैं। हमें चाहिए कि
इसके शब्दार्थको ही पकड़े रहें; तब फिर हमें उसमें खादीके सिवाय और दूसरा कुछ
नहीं मिलेगा। स्वदेशीका अर्थ है 'अपने देशका'। गाँववालोंके रोजमर्राके इस्तेमालकी
चीजोंमें सिर्फ कपड़ा ही एक ऐसी चीज है जो 'अपने देशकी ' नहीं है । और जो चीज
वे सहज ही तैयार कर सकते हैं, वह भी कपड़ा ही है। इसलिए स्वदेशीका जो
काम वे सहज ही पूरा कर सकते हैं, और जिसके बिना उन्हें भूखों ही मरना पड़ेगा,
वह केवल खादी ही का काम है और कुछ नहीं । इसलिए सिर्फ खादीका काम
सभी देशभक्तोंके लिए सच्चा स्वदेशीका काम है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि
सेठ जमनालालजी और उनके साथी जहाँ कहीं जायेंगे, बंगालके लोग पूरे मनसे उनकी
सहायता करेंगे। एक गज भी खादी खरीदनेसे और स्मारक कोषमें दिये गये छोटे-से-
छोटे दानसे बहिष्कार आन्दोलनको और देशके गरीब से गरीब लोगोंको बहुत सहायता
मिलेगी।
{{c|'''बहिष्कार और विद्यार्थी'''}}
एक कालेजके प्रधानाचार्य लिखते हैं :
बहिष्कार आन्दोलनके संचालक विद्यार्थियोंको अपने आन्दोलनमें खींच
रहे हैं। जब लड़के अपने स्कूल और कालेज छोड़कर किसी प्रदर्शनमें शामिल
होते हैं, तब वे वहाँके हुल्लड़बाज लोगोंमें मिल जाते हैं और उन्हें बदमाशोंकी
सभी ज्यादतियोंके लिए जिम्मेदार होना पड़ता है तथा अक्सर पुलिस के डंडे
पहले उन्हें ही खाने होते हैं। इसके अलावा वे स्कूल या कालेजमें अधिकारियोंके
कोप भाजन बन जाते हैं। और उन्हें दण्ड सहनेपर मजबूर होना पड़ता है;
वे अपने अभिभावकों की हुक्म उदूली करते हैं; अभिभावक उन्हें आगे खर्च देनेसे
इन्कार कर सकते हैं और इस तरह उनका सत्यानाश हो सकता है। मैं ऐसे
युवक आन्दोलनोंकी बात तो समझ सकता हूँ कि लड़के छुट्टीके दिनोंमें निरक्षर
किसानोंको पढ़ाने, उन्हें सफाईके नियम सिखलाने इत्यादिके काम करें; मगर
यह देखकर तो कष्ट होता है कि वे अपने ही माँ-बाप और शिक्षकोंका विरोध
करें और बुरे लोगोंके साथ सड़कोंपर घूमते फिरें और नियम और शान्ति-
भंग करनेमें हाथ बँटावें । क्या मैं आपसे राजनीतिज्ञोंको यह सलाह देनेकी
विनती कर सकता हूँ कि वे अपने प्रदर्शनोंको ज्यादा बाअसर बनानेके लिए
विद्यार्थियों को उनके सही कामसे न खींच ले जायें?
पत्र - लेखकने इस आशासे पत्र लिखा है, कि मैं विद्यार्थियोंके सक्रिय राजनीतिक
कामों में शरीक होनेका विरोध करूँगा । मगर खेद हैं कि मुझे उन्हें निराश करना
१. पत्रके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।<noinclude></noinclude>
qrmhi8k1q6iiror7ehu8s9fjpsr6mds
673259
673257
2026-08-23T11:38:43Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673259
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६७}}</noinclude>तारीखसे बंगालमें दौरा करनेवाले हैं। हालमें बंगालमें स्वदेशीकी एक लहर चल रही है। मगर मुझे लगता है कि शायद इस सीधे–सादे जीवनदायी स्वदेशी शब्दके चारों ओरके शब्दाडम्बरमें पड़कर हम उसका सच्चा अर्थ भूलते जा रहे हैं। हमें चाहिए कि इसके शब्दार्थको ही पकड़े रहें; तब फिर हमें उसमें खादीके सिवाय और दूसरा कुछ नहीं मिलेगा। स्वदेशीका अर्थ है 'अपने देशका'। गाँववालोंके रोजमर्राके इस्तेमालकी चीजोंमें सिर्फ कपड़ा ही एक ऐसी चीज है जो 'अपने देशकी' नहीं है। और जो चीज वे सहज ही तैयार कर सकते हैं, वह भी कपड़ा ही है। इसलिए स्वदेशीका जो काम वे सहज ही पूरा कर सकते हैं, और जिसके बिना उन्हें भूखों ही मरना पड़ेगा, वह केवल खादी ही का काम है और कुछ नहीं। इसलिए सिर्फ खादीका काम सभी देशभक्तोंके लिए सच्चा स्वदेशीका काम है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि सेठ जमनालालजी और उनके साथी जहाँ कहीं जायेंगे, बंगालके लोग पूरे मनसे उनकी सहायता करेंगे। एक गज भी खादी खरीदनेसे और स्मारक कोषमें दिये गये छोटे–से–छोटे दानसे बहिष्कार आन्दोलनको और देशके गरीब से गरीब लोगोंको बहुत सहायता मिलेगी।
{{c|'''बहिष्कार और विद्यार्थी'''}}
एक कालेजके प्रधानाचार्य लिखते हैं :<ref>पत्रके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।</ref>
'''बहिष्कार आन्दोलनके संचालक विद्यार्थियोंको अपने आन्दोलनमें खींच रहे हैं। जब लड़के अपने स्कूल और कालेज छोड़कर किसी प्रदर्शनमें शामिल होते हैं, तब वे वहाँके हुल्लड़बाज लोगोंमें मिल जाते हैं और उन्हें बदमाशोंकी सभी ज्यादतियोंके लिए जिम्मेदार होना पड़ता है तथा अक्सर पुलिस के डंडे पहले उन्हें ही खाने होते हैं। इसके अलावा वे स्कूल या कालेजमें अधिकारियोंके कोप भाजन बन जाते हैं। और उन्हें दण्ड सहनेपर मजबूर होना पड़ता है; वे अपने अभिभावकों की हुक्म उदूली करते हैं; अभिभावक उन्हें आगे खर्च देनेसे इन्कार कर सकते हैं और इस तरह उनका सत्यानाश हो सकता है। मैं ऐसे युवक आन्दोलनोंकी बात तो समझ सकता हूँ कि लड़के छुट्टीके दिनोंमें निरक्षर किसानोंको पढ़ाने, उन्हें सफाईके नियम सिखलाने इत्यादिके काम करें; मगर यह देखकर तो कष्ट होता है कि वे अपने ही माँ–बाप और शिक्षकोंका विरोध करें और बुरे लोगोंके साथ सड़कोंपर घूमते फिरें और नियम और शान्तिभंग करनेमें हाथ बँटावें। क्या मैं आपसे राजनीतिज्ञोंको यह सलाह देनेकी विनती कर सकता हूँ कि वे अपने प्रदर्शनोंको ज्यादा बाअसर बनानेके लिए विद्यार्थियों को उनके सही कामसे न खींच ले जायें?'''
पत्र–लेखकने इस आशासे पत्र लिखा है, कि मैं विद्यार्थियोंके सक्रिय राजनीतिक कामों में शरीक होनेका विरोध करूँगा। मगर खेद हैं कि मुझे उन्हें निराश करना<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
rhmau2xjia2hmh3dx9ufhkem65h50jt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२००
250
187039
673260
645439
2026-08-23T11:40:58Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673260
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पड़ रहा है। उन्हें मालूम होना चाहिए था कि सन् १९२०-२१ में विद्यार्थियों को
उनके स्कूलों, कालेजोंसे बाहर निकालने और ऐसा राजनीतिक काम करनेको कहने में
जिसमें जेल जानेका भी खतरा था, मेरा हाथ कुछ कम नहीं था । मेरी समझमें अपने
देशके राजनीतिक आन्दोलनमें आगे बढ़कर हिस्सा लेना उनका स्पष्ट कर्त्तव्य है ।
सारे संसार में विद्यार्थी ऐसा ही कर रहे हैं। हिन्दुस्तानमें जहाँकि अभी हाल तक
राजनीतिक जागृति दुर्भाग्यवश केवल थोड़े-से अंग्रेजीदां लोगों तक ही सीमित रही है,
यह उनके लिए और भी कर्त्तव्य रूप बन जाता है। चीन और मिस्रमें तो राष्ट्रीय
आन्दोलन विद्यार्थियोंकी ही बदौलत चल सके हैं। हिन्दुस्तानमें भी वे कुछ कम काम
नहीं कर सकते हैं।
प्रधानाचार्य महोदय इस बात पर जोर दे सकते थे कि विद्यार्थियोंके लिए अहिंसाके
नियमोंका पालन करना तथा हुल्लड़बाजोंके कहने में चलनेके बदले उनको काबू में रखना
जरूरी है।
{{c|'''मैकॉलेका सपना'''}}
मैकॉलेका 'जीवन चरित्र और पत्र' नामकी अंग्रेजी पुस्तकमें से एक मित्रने
मेरे पास नीचे लिखा उद्धरण भेजा है :
हिन्दुस्तान के वतनी लोगोंमें यूरोपीय साहित्य और विज्ञानका प्रचार-
प्रसार करना ब्रिटिश सरकारका महान ध्येय होना चाहिए - यह निश्चय
लॉर्ड विलियम बेंटिकने ७ मार्च, १८३५ को किया । और मेकॉलेने अध्यक्ष
के रूपमें अपना काम शुरू कर दिया।
लॉर्ड मेकॉलेने कहा कि, हमारी अंग्रेजी शालाएँ आश्चर्यजनक ढंगसे प्रगति
कर रही हैं . हिन्दुओंपर इस शिक्षासे होनेवाले असर की सीमा नहीं है।
अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ एक भी हिन्दू कभी अपने धर्ममें श्रद्धावान् नहीं रहता ।
कुछ लोग एक युक्ति के तौरपर उसका नाम लेते रहते हैं; मगर ज्यादातर
लोग धर्म के मामलेमें अपनेको बिलकुल स्वतन्त्र कहते हैं और कुछ ईसाई धर्म
स्वीकार कर लेते हैं। मेरा यह पक्का विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षाकी
योजनाओंपर अमल किया गया, तो आजसे ३० साल बाद बंगालके प्रतिष्ठित
वर्गीमें एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा । ...
मैं नहीं कह सकता कि मैकॉलेका यह सपना कि अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ
हिन्दुस्तान अपने धार्मिक विश्वास छोड़ देगा अथवा नहीं; सच्चा निकला है या नहीं ।
लेकिन हम यह भी जानते हैं कि उनका एक और सपना था -- अंग्रेजी शिक्षा पाये
हुए हिन्दुस्तान द्वारा अंग्रेज हाकिमोंके लिए कारकून वगैरा तैयार करना। यह सपना
सचमुच उनकी आशाओंसे भी अधिक सच निकला है ।
१. केवल अंशःत उद्धृत। उद्धरणके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।<noinclude></noinclude>
8mz6uxum4k62hpnbphfphulmu3yyb2j
673262
673260
2026-08-23T11:48:42Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673262
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पड़ रहा है। उन्हें मालूम होना चाहिए था कि सन् १९२०-२१ में विद्यार्थियों को उनके स्कूलों, कालेजोंसे बाहर निकालने और ऐसा राजनीतिक काम करनेको कहनेमें जिसमें जेल जानेका भी खतरा था, मेरा हाथ कुछ कम नहीं था। मेरी समझमें अपने देशके राजनीतिक आन्दोलनमें आगे बढ़कर हिस्सा लेना उनका स्पष्ट कर्त्तव्य है। सारे संसारमें विद्यार्थी ऐसा ही कर रहे हैं। हिन्दुस्तानमें जहाँकि अभी हाल तक राजनीतिक जागृति दुर्भाग्यवश केवल थोड़े–से अंग्रेजीदां लोगों तक ही सीमित रही है, यह उनके लिए और भी कर्त्तव्य रूप बन जाता है। चीन और मिस्रमें तो राष्ट्रीय
आन्दोलन विद्यार्थियोंकी ही बदौलत चल सके हैं। हिन्दुस्तानमें भी वे कुछ कम काम नहीं कर सकते हैं।
प्रधानाचार्य महोदय इस बात पर जोर दे सकते थे कि विद्यार्थियोंके लिए अहिंसाके नियमोंका पालन करना तथा हुल्लड़बाजोंके कहनेमें चलनेके बदले उनको काबू में रखना जरूरी है।
{{c|'''मैकॉलेका सपना'''}}
मैकॉलेका 'जीवन चरित्र और पत्र' नामकी अंग्रेजी पुस्तकमें से एक मित्रने मेरे पास नीचे लिखा उद्धरण भेजा है :<ref>केवल अंशःत उद्धृत। उद्धरणके केवल कुछ अंश ही यहाँ दिये जा रहे हैं।</ref>
'''हिन्दुस्तान के वतनी लोगोंमें यूरोपीय साहित्य और विज्ञानका प्रचार–प्रसार करना ब्रिटिश सरकारका महान ध्येय होना चाहिए — यह निश्चय लॉर्ड विलियम बेंटिकने ७ मार्च, १८३५ को किया। और मेकॉलेने अध्यक्षके रूपमें अपना काम शुरू कर दिया।'''
'''लॉर्ड मेकॉलेने कहा कि, हमारी अंग्रेजी शालाएँ आश्चर्यजनक ढंगसे प्रगति कर रही हैं ... हिन्दुओंपर इस शिक्षासे होनेवाले असर की सीमा नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ एक भी हिन्दू कभी अपने धर्ममें श्रद्धावान् नहीं रहता। ... कुछ लोग एक युक्तिके तौरपर उसका नाम लेते रहते हैं; मगर ज्यादातर लोग धर्मके मामलेमें अपनेको बिलकुल स्वतन्त्र कहते हैं और कुछ ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं। मेरा यह पक्का विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षाकी योजनाओंपर अमल किया गया, तो आजसे ३० साल बाद बंगालके प्रतिष्ठित वर्गोंमें एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा। ..."'''
मैं नहीं कह सकता कि मैकॉलेका यह सपना कि अंग्रेजी शिक्षा पाया हुआ हिन्दुस्तान अपने धार्मिक विश्वास छोड़ देगा अथवा नहीं; सच्चा निकला है या नहीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि उनका एक और सपना था — अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए हिन्दुस्तान द्वारा अंग्रेज हाकिमोंके लिए कारकून वगैरा तैयार करना। यह सपना सचमुच उनकी आशाओंसे भी अधिक सच निकला है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
cb0gnmdpqrxx6rj4kt502q5kd3lwdoh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०१
250
187040
673264
645440
2026-08-23T11:51:27Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673264
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६९}}</noinclude>
{{c|'''संघर्षके बीच शान्ति'''}}
एक मित्र समय-समय पर मेरे सोमवारके मौन दिवसके लिए जो सुन्दर चीजें भेजते
हैं, उनमें से कुछ मैंने पहले भी पाठकोंके लिए छापी हैं। मैं उनके लिए एक और
किश्त जो बहुत दिनोंसे मेरी बंडीमें पड़ी है प्रकाशित करनेको लालायित हूँ । अन्तिम
दो को छोड़कर शेष सब बौद्ध लेखोंके उद्धरण हैं । अन्तिममें से पहला इमर्सनकी
उक्ति है और अन्तिम एक हिन्दू कहावत है।
उस मनुष्यके सुन्दर वचन जो स्वयं तदनुसार आचरण नहीं करता वैसे ही
निरर्थक हैं, जैसे कि सुन्दर रंगवाला निर्गन्ध फूल।
जीवनके उलट-फेरसे अविचलित, शोक एवं आवेशसे असंक्षुब्ध मन सबसे बड़ा
वरदान है।
जिसकी सदा ही प्रशंसा की जाती हो या जिसकी सदा ही निन्दा की जाती
हो ऐसा व्यक्ति न कभी हुआ है और न कभी होगा।
जैसे एक दृढ़ चट्टान वायुसे चलायमान नहीं होती, इसी प्रकार बुद्धिमान लोग
निन्दा अथवा स्तुतिसे विचलित नहीं होते।
जो हमसे घृणा करते हैं, उनसे घृणा न करके हम प्रसन्नता से रहें ।
घृणा करनेवालोंके बीच घृणासे विमुक्त होकर रहें ।
हमें दुखितोंके बीच दुःखसे विमुक्त होकर सुखसे रहना चाहिए ।
मनमें सन्तप्त लोगों के बीच मनस्तापसे विमुक्त होकर रहना चाहिए।
व्यस्त लोगोंके बीच चिन्तासे विमुक्त होकर प्रसन्नता से रहें ।
चिन्तित लोगोंके बीच कामनाओंसे विमुक्त होकर रहें।
यद्यपि हम किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानते, फिर भी हम प्रसन्नतासे रहें ।
हम उन दीप्तिमान देवताओंके समान बन जायेंगे जो आनन्दका उपभोग करते हैं ।
सबसे बड़ी प्रार्थना धैर्य है ।
इस संसार में घृणा कभी घृणासे शान्त नहीं होती ।
घृणा प्रेमसे शान्त होती है : यह सदा इसका स्वभाव है ।
मान एवं विनम्रता
सन्तोष एवं कृतज्ञता,
उपयुक्त समय पर ईश्वरकी वाणी सुनना
सबसे महान् वरदान है।
जैसे कोई माता अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी अपने पुत्र
• अपने इकलौते
पुत्रकी रक्षा करती है, इसी तरह मनुष्यको सब प्राणियोंके बीच असीम सद्भाव
बढ़ाना चाहिए।
मनुष्य सारे संसारके प्रति, छोटे बड़ोंके प्रति असीम सद्भाव बढ़ाये; वह सद्भाव
अपरिसीमित हो ; इसमें विभिन्न या विरोधी हितोंका भाव न हो। मानव जितनी देर
जागृत अवस्थामें रहे, चाहे वह खड़ा हो, चल रहा हो, बैठा हो या लेटा हुआ हो,
सारे समय दृढ़तासे उसी मानसिक स्थितिमें रहे, मनकी यह स्थिति संसारमें सबसे
अच्छी स्थिति है ।<noinclude></noinclude>
k7q7ztkvdwkc46nkhwp9o4ktocc23cq
673265
673264
2026-08-23T11:56:03Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673265
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१६९}}</noinclude>
{{c|'''संघर्षके बीच शान्ति'''}}
एक मित्र समय–समय पर मेरे सोमवारके मौन दिवसके लिए जो सुन्दर चीजें भेजते हैं, उनमें से कुछ मैंने पहले भी पाठकोंके लिए छापी हैं। मैं उनके लिए एक और किश्त जो बहुत दिनोंसे मेरी बंडीमें पड़ी है प्रकाशित करनेको लालायित हूँ। अन्तिम दो को छोड़कर शेष सब बौद्ध लेखोंके उद्धरण हैं। अन्तिममें से पहला इमर्सनकी उक्ति है और अन्तिम एक हिन्दू कहावत है।
उस मनुष्यके सुन्दर वचन जो स्वयं तदनुसार आचरण नहीं करता वैसे ही निरर्थक हैं, जैसे कि सुन्दर रंगवाला निर्गन्ध फूल।
जीवनके उलट–फेरसे अविचलित, शोक एवं आवेशसे असंक्षुब्ध मन सबसे बड़ा वरदान है।
जिसकी सदा ही प्रशंसा की जाती हो या जिसकी सदा ही निन्दा की जाती हो ऐसा व्यक्ति न कभी हुआ है और न कभी होगा।
जैसे एक दृढ़ चट्टान वायुसे चलायमान नहीं होती, इसी प्रकार बुद्धिमान लोग निन्दा अथवा स्तुतिसे विचलित नहीं होते।
जो हमसे घृणा करते हैं, उनसे घृणा न करके हम प्रसन्नता से रहें।
घृणा करनेवालोंके बीच घृणासे विमुक्त होकर रहें।
हमें दुखितोंके बीच दुःखसे विमुक्त होकर सुखसे रहना चाहिए।
मनमें सन्तप्त लोगों के बीच मनस्तापसे विमुक्त होकर रहना चाहिए।
व्यस्त लोगोंके बीच चिन्तासे विमुक्त होकर प्रसन्नता से रहें।
चिन्तित लोगोंके बीच कामनाओंसे विमुक्त होकर रहें।
यद्यपि हम किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानते, फिर भी हम प्रसन्नतासे रहें।
हम उन दीप्तिमान देवताओंके समान बन जायेंगे जो आनन्दका उपभोग करते हैं।
सबसे बड़ी प्रार्थना धैर्य है।
इस संसार में घृणा कभी घृणासे शान्त नहीं होती।
घृणा प्रेमसे शान्त होती है : यह सदा इसका स्वभाव है।
मान एवं विनम्रता
सन्तोष एवं कृतज्ञता,
उपयुक्त समय पर ईश्वरकी वाणी सुनना
सबसे महान् वरदान है।
जैसे कोई माता अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी अपने पुत्र — अपने इकलौते
पुत्रकी रक्षा करती है, इसी तरह मनुष्यको सब प्राणियोंके बीच असीम सद्भाव बढ़ाना चाहिए।
मनुष्य सारे संसारके प्रति, छोटे बड़ोंके प्रति असीम सद्भाव बढ़ाये; वह सद्भाव अपरिसीमित हो; इसमें विभिन्न या विरोधी हितोंका भाव न हो। मानव जितनी देर जागृत अवस्थामें रहे, चाहे वह खड़ा हो, चल रहा हो, बैठा हो या लेटा हुआ हो, सारे समय दृढ़तासे उसी मानसिक स्थितिमें रहे, मनकी यह स्थिति संसारमें सबसे अच्छी स्थिति है।<noinclude></noinclude>
hbudz6vzdk9ij57eipg2vm74mu7t2ra
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०२
250
187041
673266
645441
2026-08-23T11:57:59Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673266
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
तत्परता, निग्रह और संयमसे अपने आपको चैतन्य रखते हुए बुद्धिमान मनुष्य
अपने लिए ऐसा द्वीप बना ले जिसे कोई भी प्रलय तबाह न कर सके ।
जैसे मधुमक्खी फूलके रंग और गन्धको क्षति पहुँचाये बिना उसका रस लेकर
उड़ जाती है, इसी तरह बुद्धिमान मनुष्यको सत्यपर स्थिर रहना चाहिए।
तूने मेरे होठोंको जहाँ एक वाणी दी है वहाँ हजार बार मौन रहना सिखाया है।
एक बार बुद्ध भी गाड़ीका घोड़ा बने थे और उन्होंने दूसरोंका बोझा ढोया था ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८२. उपवासकी महिमा'''}}}}
पाठक उस पोलिश प्रोफेसरके पत्रोंसे परिचित हैं जिनके उद्धरण में जब तब इस
पत्रके स्तम्भोंमें प्रकाशित करता रहा हूँ। अपने एक पत्रमें मेरे उपवासोंके सम्बन्धमें वे
लिखते हैं:
मैं यह पत्र ऐसी खोजोंमें रुचि रखनेवाले पाठकोंके लिए उपयोगी समझकर
छाप रहा हूँ । उपवाससे होनेवाले शारीरिक और नैतिक लाभोंको लोग दिनोंदिन
अधिकाधिक मानते जा रहे हैं । बनिस्बत तरह-तरह की दवाओं और भयंकर इन्जेक्शनोंके
- भयंकर इसीलिए नहीं कि उनसे तकलीफ होती है किन्तु इसलिए कि उनके फल-
स्वरूप अक्सर और दूसरे रोग हो जाते हैं - विवेकपूर्वक किये गये उपवासके द्वारा
बहुतसे रोगोंका इलाज कहीं ज्यादा अच्छा और अक्सीर होता है। दवाओंसे होनेवाली
बहुतेरी हानियोंको हम जानते ही नहीं हैं। मगर उपवाससे हुई हानिके उदाहरण विरल
ही हो सकते हों । उपवास करनेवाले प्रायः सभी आदमियोंका अनुभव है कि इससे स्फूर्ति
बढ़ जाती है, क्योंकि मन और शरीरको सच्चा आराम तो केवल उपवासमें ही मिल
सकता है। अगर जरूरतसे ज्यादा भरा और शक्तिके बाहर काम करनेवाला पेट आराम
न पावे तो महज शारीरिक काम बन्द कर देनेसे ही शरीरको आराम नहीं मिलता ।
उपवाससे आत्मिक लाभ भी पर्याप्त होते हैं किन्तु वे इस तरह सहज ही नहीं दिखलाये
जा सकते। आत्मिक लाभ तभी होंगे, जब मन और देहका पूरा मेल हो । किन्तु इसमें
आत्म-प्रवचनाका खतरा है। मुझे ऐसे बहुतसे उदाहरण मालूम हैं जबकि आत्मिक लाभके
लिए किये गये उपवास जरूरतसे अधिक दिनों तक चलाये जाते रहे। अगर उपवासी
१. देखिए खण्ड ३३ “सत्य एक है", २१-४-१९२७ और खण्ड ३४ “
११-८-१९२७ ।
अनेकता में एकता ",
२. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने उपवासके अपने अनुभव लिखे थे और कहा था कि
उससे न केवल शारीरिक स्फूर्ति बढ़ती है, वरन् आध्यात्मिक लाभ भी अधिक होता है।
३. पत्र लेखकने लिखा था कि जब कभी मेरे सामने नैतिक या बौद्धिक कठिनाई पेश होती है, मैं
उपवास करता हूँ ... एक बार छापाखाना वाला अन्य अधिक पैसा देनेवाली अन्य चीजें छापता रहा और
उसने मेरे काममें देर लगा दी। मैंने उपवास किया और उनकी मनोवृत्ति बदलने में समर्थ हो सका...।<noinclude></noinclude>
g2cmfzcgx1u9w77r5i00udpyhfj3ea5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३२
250
187312
672914
645732
2026-08-22T14:54:00Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
672914
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहता। मगर चूंकि तुम इस काममें स्वभावतः कुशल हो इसलिए भोजनालयको सुघड़तासे चलाने और भोजन अच्छा बनानेका बोझ तुमपर डालता हूँ।
ये दो बोझ उचित हैं न?
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
मीराबाई आज रिवाड़ी आश्रम जा रही हैं, जहाँ जमनालालजीकी लड़की है।
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३६४२) की फोटो- नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१८०. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{T
Right|भरतपुरसे आगे गाड़ीमें<br>२२ मार्च, १९२७}}
{{Left|चि॰ मीरा,}}
आजकी जुदाई दुःखद रही; मैंने देखा कि मैंने तुम्हें कष्ट पहुँचाया। लेकिन फिर भी यह अनिवार्य था। में चाहता हूँ कि तुम आदर्श नारी बनो। मेरी इच्छा है कि तुम अपनी सारी कमियोंको दूर कर दो। तुम्हें सारा अनावश्यक संकोच त्याग देना चाहिए। आश्रम तुम्हारे घरका केन्द्र है। मगर यदि तुम संयोगवश कहीं अन्यत्र
पहुँच जाती हो तो तुम्हारा घर वहीं बन जाना चाहिए। हम जिन लोगोंके सम्पर्कमें आते हैं, हमें उनसे अपनी जरूरतें इस तरह पूरी करानी चाहिए कि उन्हें हमारा
भार न मालूम हो। हमें सबके साथ एकताकी भावना रखनी चाहिए। और मैंने यह देखा है कि हम जाने-अनजाने कुछ लिये बिना कभी कुछ नहीं देते। मैं चाहता
हूँ कि एक हदतक संकोच सबमें हो, मगर वह संकोच आत्मसंयमका परिणाम होना चाहिए; भावुकताका नहीं। तुम्हारा संकोच भावुकताका परिणाम है। वह दूर होना
ही चाहिए। मैंने सोचा कि में तुम्हारा ध्यान इस तरफ खीचूं। लेकिन देखता हूँ कि मुझे इसके लिए अभी ठहरना चाहिए था। फिर भी अब तो मैंने कह ही दिया।
घबराहटको तो उतार फेंको। तुम्हें मेरे शरीरसे मोह हरगिज नहीं होना चाहिए। शरीर-रहित आत्मा तो हमेशा तुम्हारे साथ ही है। और वह उस शरीरबद्ध दुर्बल जीवात्मासे अधिक सबल है, जिसके साथ शरीरकी सारी मर्यादायें जुड़ी हैं। शरीर-रहित आत्मा सम्पूर्ण है और उसीकी हमें आवश्यकता है। यह हम अनासक्तिका अभ्यास करनेपर ही अनुभव कर सकते हैं। अब तुम्हें इसे प्राप्त करनेका प्रयत्न करना चाहिए।
अगर में तुम्हारी जगह होऊँ तो इसी तरह अपना विकास करूँ। मगर तुम्हें अपने ही ढंगसे विकास करना चाहिए। इसलिए मैंने इस पत्रमें जो कुछ कहा है, उसमें से जो तुम्हारे दिल व दिमागको न जँचे, तुम उसे छोड़ देना। चाहे कुछ भी<noinclude></noinclude>
pyhoz84n3p65pd0gvta63i7ta128j5x
672915
672914
2026-08-22T14:54:27Z
रितु कुमारी साव
6333
672915
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहता। मगर चूंकि तुम इस काममें स्वभावतः कुशल हो इसलिए भोजनालयको सुघड़तासे चलाने और भोजन अच्छा बनानेका बोझ तुमपर डालता हूँ।
ये दो बोझ उचित हैं न?
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
मीराबाई आज रिवाड़ी आश्रम जा रही हैं, जहाँ जमनालालजीकी लड़की है।
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३६४२) की फोटो- नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१८०. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|भरतपुरसे आगे गाड़ीमें<br>२२ मार्च, १९२७}}
{{Left|चि॰ मीरा,}}
आजकी जुदाई दुःखद रही; मैंने देखा कि मैंने तुम्हें कष्ट पहुँचाया। लेकिन फिर भी यह अनिवार्य था। में चाहता हूँ कि तुम आदर्श नारी बनो। मेरी इच्छा है कि तुम अपनी सारी कमियोंको दूर कर दो। तुम्हें सारा अनावश्यक संकोच त्याग देना चाहिए। आश्रम तुम्हारे घरका केन्द्र है। मगर यदि तुम संयोगवश कहीं अन्यत्र
पहुँच जाती हो तो तुम्हारा घर वहीं बन जाना चाहिए। हम जिन लोगोंके सम्पर्कमें आते हैं, हमें उनसे अपनी जरूरतें इस तरह पूरी करानी चाहिए कि उन्हें हमारा
भार न मालूम हो। हमें सबके साथ एकताकी भावना रखनी चाहिए। और मैंने यह देखा है कि हम जाने-अनजाने कुछ लिये बिना कभी कुछ नहीं देते। मैं चाहता
हूँ कि एक हदतक संकोच सबमें हो, मगर वह संकोच आत्मसंयमका परिणाम होना चाहिए; भावुकताका नहीं। तुम्हारा संकोच भावुकताका परिणाम है। वह दूर होना
ही चाहिए। मैंने सोचा कि में तुम्हारा ध्यान इस तरफ खीचूं। लेकिन देखता हूँ कि मुझे इसके लिए अभी ठहरना चाहिए था। फिर भी अब तो मैंने कह ही दिया।
घबराहटको तो उतार फेंको। तुम्हें मेरे शरीरसे मोह हरगिज नहीं होना चाहिए। शरीर-रहित आत्मा तो हमेशा तुम्हारे साथ ही है। और वह उस शरीरबद्ध दुर्बल जीवात्मासे अधिक सबल है, जिसके साथ शरीरकी सारी मर्यादायें जुड़ी हैं। शरीर-रहित आत्मा सम्पूर्ण है और उसीकी हमें आवश्यकता है। यह हम अनासक्तिका अभ्यास करनेपर ही अनुभव कर सकते हैं। अब तुम्हें इसे प्राप्त करनेका प्रयत्न करना चाहिए।
अगर में तुम्हारी जगह होऊँ तो इसी तरह अपना विकास करूँ। मगर तुम्हें अपने ही ढंगसे विकास करना चाहिए। इसलिए मैंने इस पत्रमें जो कुछ कहा है, उसमें से जो तुम्हारे दिल व दिमागको न जँचे, तुम उसे छोड़ देना। चाहे कुछ भी<noinclude></noinclude>
ff49zlifzerj9t8nfk046x96aun1d66
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३३
250
187313
672918
645733
2026-08-22T15:02:27Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
672918
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : सान्ताक्रूज, बम्बईमें|१९५}}</noinclude>हो तुम्हें अपना व्यक्तित्व अवश्य कायम रखना चाहिए। जहाँ आवश्यक हो, मेरी बात तुम्हें नहीं माननी चाहिए, क्योंकि यह सम्भव है कि तुम्हारे प्रति पूरा प्रेम होनेपर
भी मैं तुम्हारे बारेमें गलत खयाल बना लूं। मैं नहीं चाहता कि तुम यह समझो कि मुझसे कभी भूल हो ही नहीं सकती।
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए "पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको", १४-३-१९२७।</ref>}}
सस्नेह,
{{Right|तुम्हारा,<br>बापू}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
तुम रुपया और चैक नहीं ले गईं। वह तुम्हारे पास भेज दिया गया है।
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२११) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{C|{{larger|'''१८१. भाषण: सान्ताक्रूज, बम्बईमें '''<ref>बम्बई उपनगर जिला कांग्रेस कमेटीके प्रधान, जयसुखलाल के० मेहता द्वारा दिये गये स्वागत-भाषणके उत्तरमें।</ref>}}}}
{{Right|२३ मार्च, १९२७}}
'''गांधीजीने सभामें अपनी जगहपर बैठे-बैठे ही गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया, जब कि उनसे हिन्दीमें भाषण देनेका अनुरोध किया गया था, क्योंकि सभामें बहुतसे मद्रासी और ऐसे अन्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्हें गुजराती नहीं आती थी। गांधीजीने मत लिया और बहुमतकी इच्छानुसार गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया। लेकिन अल्पमतवालोंको उन्होंने विश्वास दिलाया कि उन लोगोंके हककी उपेक्षा नहीं की जायेगी। उन्होंने कहा:'''
श्री जे॰ के॰ मेहताको जिस चीजकी आशंका है उसका कारण काफी हदतक सही है। सान्ताक्रूजमें छः साल पहले दी गई<ref>छः साल पहले दिये गये ५२,००० रुपयोंकी तुलना में इस सभामें गांधीजीको केवल ३,००० रुपये दिये गये थे।</ref> और आज दी गई रकममें जो इतना अधिक अन्तर है उसपर अहिंसाको अपना सिद्धान्त माननेवाला कोई व्यक्ति जितनी करारी चोट कर सकता है, में आज उतनी करारी चोट करनेवाला हूँ। श्री मेहताके साग्रह आमन्त्रणपर ही मैं रिवाड़ी, जहाँ जाना पहले तय हो चुका था, जानेके बजाय यहाँ आया। आप शायद जानते हैं कि यद्यपि मैं शहरोंकी उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ, फिर भी आजकल में बहुधा गाँवोंमें ज्यादा जाता हूँ, क्योंकि भारत अपने मुट्ठीभर<noinclude></noinclude>
juion1qzc3mjzkxkv6nv17dbugn6hqm
672919
672918
2026-08-22T15:03:06Z
रितु कुमारी साव
6333
672919
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : सान्ताक्रूज, बम्बईमें|१९५}}</noinclude>हो तुम्हें अपना व्यक्तित्व अवश्य कायम रखना चाहिए। जहाँ आवश्यक हो, मेरी बात तुम्हें नहीं माननी चाहिए, क्योंकि यह सम्भव है कि तुम्हारे प्रति पूरा प्रेम होनेपर
भी मैं तुम्हारे बारेमें गलत खयाल बना लूं। मैं नहीं चाहता कि तुम यह समझो कि मुझसे कभी भूल हो ही नहीं सकती।
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए "पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको", १४-३-१९२७।</ref>}}
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|तुम्हारा,<br>बापू}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
तुम रुपया और चैक नहीं ले गईं। वह तुम्हारे पास भेज दिया गया है।
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२११) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{C|{{larger|'''१८१. भाषण: सान्ताक्रूज, बम्बईमें '''<ref>बम्बई उपनगर जिला कांग्रेस कमेटीके प्रधान, जयसुखलाल के० मेहता द्वारा दिये गये स्वागत-भाषणके उत्तरमें।</ref>}}}}
{{Right|२३ मार्च, १९२७}}
'''गांधीजीने सभामें अपनी जगहपर बैठे-बैठे ही गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया, जब कि उनसे हिन्दीमें भाषण देनेका अनुरोध किया गया था, क्योंकि सभामें बहुतसे मद्रासी और ऐसे अन्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्हें गुजराती नहीं आती थी। गांधीजीने मत लिया और बहुमतकी इच्छानुसार गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया। लेकिन अल्पमतवालोंको उन्होंने विश्वास दिलाया कि उन लोगोंके हककी उपेक्षा नहीं की जायेगी। उन्होंने कहा:'''
श्री जे॰ के॰ मेहताको जिस चीजकी आशंका है उसका कारण काफी हदतक सही है। सान्ताक्रूजमें छः साल पहले दी गई<ref>छः साल पहले दिये गये ५२,००० रुपयोंकी तुलना में इस सभामें गांधीजीको केवल ३,००० रुपये दिये गये थे।</ref> और आज दी गई रकममें जो इतना अधिक अन्तर है उसपर अहिंसाको अपना सिद्धान्त माननेवाला कोई व्यक्ति जितनी करारी चोट कर सकता है, में आज उतनी करारी चोट करनेवाला हूँ। श्री मेहताके साग्रह आमन्त्रणपर ही मैं रिवाड़ी, जहाँ जाना पहले तय हो चुका था, जानेके बजाय यहाँ आया। आप शायद जानते हैं कि यद्यपि मैं शहरोंकी उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ, फिर भी आजकल में बहुधा गाँवोंमें ज्यादा जाता हूँ, क्योंकि भारत अपने मुट्ठीभर<noinclude></noinclude>
plt4p4an689w0kpezkq1mzirgcm749j
672920
672919
2026-08-22T15:03:28Z
रितु कुमारी साव
6333
672920
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : सान्ताक्रूज, बम्बईमें|१९५}}</noinclude>हो तुम्हें अपना व्यक्तित्व अवश्य कायम रखना चाहिए। जहाँ आवश्यक हो, मेरी बात तुम्हें नहीं माननी चाहिए, क्योंकि यह सम्भव है कि तुम्हारे प्रति पूरा प्रेम होनेपर
भी मैं तुम्हारे बारेमें गलत खयाल बना लूं। मैं नहीं चाहता कि तुम यह समझो कि मुझसे कभी भूल हो ही नहीं सकती।
{{Left|[कार्यक्रम]<ref>दौरेके कार्यक्रमके लिए देखिए "पत्र: क्षितीशचन्द्र दासगुप्तको", १४-३-१९२७।</ref>}}
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|तुम्हारा,<br>बापू}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
तुम रुपया और चैक नहीं ले गईं। वह तुम्हारे पास भेज दिया गया है।
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२११) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{C|{{larger|'''१८१. भाषण: सान्ताक्रूज, बम्बईमें '''<ref>बम्बई उपनगर जिला कांग्रेस कमेटीके प्रधान, जयसुखलाल के० मेहता द्वारा दिये गये स्वागत-भाषणके उत्तरमें।</ref>}}}}
{{Right|२३ मार्च, १९२७}}
'''गांधीजीने सभामें अपनी जगहपर बैठे-बैठे ही गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया, जब कि उनसे हिन्दीमें भाषण देनेका अनुरोध किया गया था, क्योंकि सभामें बहुतसे मद्रासी और ऐसे अन्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्हें गुजराती नहीं आती थी। गांधीजीने मत लिया और बहुमतकी इच्छानुसार गुजरातीमें भाषण देना शुरू किया। लेकिन अल्पमतवालोंको उन्होंने विश्वास दिलाया कि उन लोगोंके हककी उपेक्षा नहीं की जायेगी। उन्होंने कहा:'''
श्री जे॰ के॰ मेहताको जिस चीजकी आशंका है उसका कारण काफी हदतक सही है। सान्ताक्रूजमें छः साल पहले दी गई<ref>छः साल पहले दिये गये ५२,००० रुपयोंकी तुलना में इस सभामें गांधीजीको केवल ३,००० रुपये दिये गये थे।</ref> और आज दी गई रकममें जो इतना अधिक अन्तर है उसपर अहिंसाको अपना सिद्धान्त माननेवाला कोई व्यक्ति जितनी करारी चोट कर सकता है, में आज उतनी करारी चोट करनेवाला हूँ। श्री मेहताके साग्रह आमन्त्रणपर ही मैं रिवाड़ी, जहाँ जाना पहले तय हो चुका था, जानेके बजाय यहाँ आया। आप शायद जानते हैं कि यद्यपि मैं शहरोंकी उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ, फिर भी आजकल में बहुधा गाँवोंमें ज्यादा जाता हूँ, क्योंकि भारत अपने मुट्ठीभर<noinclude></noinclude>
27dgy2oze6j7shob27mpws0dfph3jy4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३४
250
187314
673121
645734
2026-08-23T04:47:38Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673121
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>शहरोंमें नहीं; अपितु अपने गाँवोंमें वास करता है। वहाँ भी ३,००० रुपये इकट्ठा करना कोई कठिन काम नहीं है। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे
पिछले दौरेमें महाराष्ट्र और बिहारके गाँवोंने सवा-सवा लाख रुपया चन्दा दिया था। गाँवोंमें भी खादीका खूब तेजीसे और बड़ी दूरतक प्रचार हो रहा है। बावजूद ऐसी उल्टी-सीधी तमाम फवावाहोंके कि खादीका नामोनिशान मिट गया है; में आँकड़े देकर सिद्ध कर सकता हूँ कि १९२० में जब आन्दोलन आरम्भ ही हुआ था जितनी
खादी तैयार होती थी, उससे बीस गुना ज्यादा आज तैयार की जा रही है। १९२६ में कमसे-कम बीस लाखकी खादी तैयार की गई और देशके १,५०० गाँवोंमें रहनेवाली कमसे कम ५०,००० स्त्रियोंको कताईका काम दिया गया, जिसके लिए उन्हें नौ लाख रुपयेसे ज्यादा पारिश्रमिकमें दिये गये। फिर भी यह स्थिति पूर्णतया सन्तोषजनक नहीं है। उससे में सन्तुष्ट नहीं हूँ। मैंने देखा है कि बम्बई और दूसरे शहरोंमें बहुत कम लोग खादी पहनते हैं। १९२१ में बम्बईकी हालत आजकी हालतसे विलकुल भिन्न थी। खद्दरके बारेमें इस ढिलाईके में दो ही कारण सोच सकता हूँ या तो यह कि जो लोग पहले खादी पहनते थे, उनकी खादीके सम्बन्धमें राय अब बदल गई है या फिर यह कि वे १९२१ में ढोंग कर रहे थे।
यद्यपि असहयोग या हिन्दू-मुस्लिम एकताके विषयमें कुछ कहने का यह अवसर नहीं है, लेकिन मुझे साफ-साफ कह देना चाहिए कि इन दोनों चीजोंमें मेरा पहले जैसा ही दृढ़ और अत्यधिक विश्वास है। बल्कि मुझे यह कहना चाहिए कि पहलेसे भी ज्यादा हो गया है। यदि मैं उस तरहका स्वराज्य चाहता हूँ, जिसके लिए मैं पिछले कुछ वर्षोंसे संघर्ष कर रहा हूँ, तो मैं ऐसा महसूस करनेको विवश हूँ कि हिन्दू-मुस्लिम एकता उसके लिए निहायत जरूरी है। परन्तु मानव-प्रकृतिके एक पारखीके रूपमें मैंने पाया है कि पूरा वातावरण ही बदल गया है। लेकिन खादीके साथ ऐसी बात नहीं है; खादी-कार्यका परिणाम निराशाजनक नहीं है। मैंने पाया है कि लोग उससे ऊबे नहीं हैं। और इसके लिए हमें समाचारपत्रोंपर निर्भर रहनेकी जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि समाचारपत्र सिर्फ शहरोंमें ही पढ़े जाते हैं। हरिद्वारमें कोई समाचारपत्र नहीं है, फिर भी वहाँ आसानीसे दो लाख रुपये जमा हो गये। वह स्थान इस बम्बई जैसा नहीं है, जो मुझे तो इंग्लैंडकी एक प्रशाखा जैसा लगता है।
मैं आजकल जो धन एकत्र कर रहा हूँ, वह उस अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषमें जमा किया जाता है और यह ग्राम-संगठन कार्यमें खर्च किया जायेगा। गाँवोंका पूर्ण रूपसे संगठन ही स्वर्गीय देशबन्धुका उपयुक्त स्मारक होगा। मैं कह सकता हूँ कि भारतके गाँवोंके संगठनका उपाय चरखा ही है। मैं आपको सूरत जिलेकी रानीपरज जातिका उदाहरण दे सकता हूँ, जहाँ चरखेके सन्देश द्वारा लगभग १०४ गाँवोंमें रहनेवाले रानीपरज लोगोंको पूरी तरह संगठित किया गया है। रानी-परज जातिकी अनपढ़ स्त्रियोंने भारी गहने पहनना छोड़ दिया है और स्त्री, पुरुष, बच्चे सभी शुद्ध खादी पहनते हैं। ऐसी जातियों और गाँवोंमें काम करनेके लिए धनकी जरूरत है। में भारतके लाखों निर्धन लोगोंका स्वयं नियुक्त वकील हूँ और<noinclude></noinclude>
t7h0ggdkhr7jmf7pigj5g1sqwevzic7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३५
250
187315
673123
645735
2026-08-23T04:58:17Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673123
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||गरीबके आमने-सामने|१९७}}</noinclude>उनकी ओरसे धनिक वर्गके आप जैसे लोगोंसे खादीके इस महान आन्दोलनके लिए अधिकसे-अधिक दान देनेकी अपील करता हूँ।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८२. एक मित्रके ज्ञान-कोषसे'''}}}}
अपने जिन मित्रका परिचय में पाठकोंको पहले ही दे चुका हूँ, उन्होंने मेरे मौनवारके लिए कुछ उद्धरण भेजे हैं। उसमें से कुछ रत्न चुन कर मैं पाठकोंके लिए
यहाँ देता हूँ:
'''मनुष्यकी वाणी ईश्वरके रहस्योंको इतने अपूर्ण रूपमें व्यक्त करती है कि शब्द हमें कोई सान्त्वना देनेके बजाय हमारे मार्गमें बाधा ही डालते हैं।'''
{{Right|'''--ब्रदर गाइल्स'''}}
'''तुम अपने चित्तको शांत करके एकान्तमें बैठो और ईश्वर तुम्हें अपने भीतर ही मिल जायेगा।'''
{{Right|'''--टेरेसा'''}}
'''तुझे प्रभुको दूरसे अपने पास बुलाने की जरूरत नहीं है। तू जिस क्षण अपना हृदय खोलेगा, वह उसी क्षण उसमें आ जायेगा। प्रतीक्षा करना तेरे लिए जितना कठिन है, उसके लिए वह उससे भी कठिन है।'''
{{Right|'''--मास्टर एकहार्ट'''}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८३. गरीबके आमने-सामने'''}}}}
बारडोली ताल्लुका गुजरातके सबसे ज्यादा उपजाऊ इलाकों में माना जाता है। किन्तु उसके कुछ भागोंमें कितनी गरीबी है इसका एक सही और स्पष्ट विवरण
एक खादी कार्यकर्त्ताने लिखा है जो 'नवजीवन' में
देसाई कृत स्वतन्त्र अनुवाद नीचे दिया जाता है।<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> छप चुका है। यह विवरण एक कहानीके रूपमें लिखा गया है। लेखक बहुत ऊँचे दर्जेका लोक-कवि बन सकता है। इस विवरणमें जो कलात्मक सौन्दर्य है उसके कारण इसका सहज मूल्य और भी बढ़ गया है। मैं आलोचकों का ध्यान इसकी ओर विशेष रूपसे आकर्षित करता हूँ।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२६|2em}}<noinclude></noinclude>
tltj3glsaekxvnb4ta379z3lw7r1yxi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३६
250
187316
673138
645736
2026-08-23T05:39:29Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673138
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१८४. गुरुकुल काँगड़ी'''}}
स्वामी श्रद्धानन्दके प्राण गुरुकुल कांगड़ीमें ही वसते थे, भले ही उनका नश्वर शरीर समय-समयपर चाहे जहाँ क्यों न घूमता फिरता रहा हो। और जबतक गुरुकुलका अस्तित्व है तबतक स्वामी श्रद्धानन्दजी भी जीते रहेंगे। इसलिए इस स्वर्गीय शहीदकी यादमें जो अच्छेसे अच्छा स्मारक खड़ा किया जा सकता है, वह है इस गुरु-
कुलको स्थायी बनाना। इसमें सन्देह नहीं कि वास्तविक स्थायी स्मारक तो गुरुकुलके अध्यापकों और स्नातकोंके सुन्दर चारित्र्यबल और प्राचीन शिक्षा और उसपर आधारित आचरणको प्रधानता देते रहनेके दृढ़ संकल्पसे ही बनकर निखरेगा। असहयोग आन्दोलन शुरू होनेके काफी पहलेसे ही श्रद्धानन्दजी यह कहते थे और उनका कहना काफी उचित भी था, कि यह गुरुकुल असहयोग आन्दोलनमें दी गई व्याख्याके अनुसारएक राष्ट्रीय संस्था है। उनकी धारणा थी कि हम चाहें अथवा न चाहें, सरकारी शिक्षा संस्थाओं में जानेका अर्थ ही पश्चिमके प्रभावको प्रधान स्थान देना है। पश्चिमकी लाभप्रद चीजोंको अपने तरीकेसे अपनी सुविधाके अनुसार देखकर अपना लेनेमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। इसलिए स्वामीजीका योग्य स्मारक होनेके लिए गुरुकुलको पूरी तौरपर सरकारसे स्वाधीन रखना होगा। यह कुछ कम सन्तोषकी बात नहीं है कि सरकारी सहायता और प्रभावसे मुक्त होनेके बावजूद भी गुरुकुलके सदस्योंकी संख्या बढ़ती जा रही है और मैं आशा करता हूँ कि उसी प्रकार इसके श्रद्धेय संस्थापककी भावनाके अनुरूप इसके शिक्षकों और स्नातकों का चरित्र भी उन्नत होगा।
परन्तु यदि स्मारक अपने वास्तविक अस्तित्वके लिए अन्ततोगत्वा गुरुकुलके विद्यार्थियों और अध्यापकोंके चरित्रपर निर्भर करता है, तो उसे अभी फिलहाल जनताकी आर्थिक सहायतापर निर्भर रहना है। आचार्य रामदेवने तीन लाख रुपयोंकी याचना करते हुए अपील जारी की है। मैं समझता हूँ कि लगभग दो लाख तो पहले ही मिल चुके हैं। गत १९ तारीखको गुरुकुलके मैदानमें, उस बड़े मंडपके भीतर अपीलके<ref>देखिए परिशिष्ट २।</ref> अवसरपर मैंने जो दृश्य देखा था<ref>देखिए "भाषण: हरिद्वार में", १९-३-१९२७।</ref> वह कभी न भूलने लायक दृश्य है स्वयंसेवकगण बाल्टियाँ लिए हुए दर्शकों के बीच, घूम रहे थे। उनमें अपने रुपयों और नोटोंको डालनेके लिए मानो सभी स्त्री-पुरुषोंमें होड़-सी लग गई थी। रेजगारी
तो दिखाई ही नहीं पड़ती थी। मैं इस अपीलपर जनताका ध्यान देनेकी दिली सिफारिश करता हूँ। आर्यसमाज तथा उसके सिद्धान्तोंसे मेरे जो मतभेद हैं उन्हें में बतला ही चुका हूँ। वे तो हैं ही। गुरुकुलोंको चलानेके तरीकोंसे भी मेरा मतभेद है। मगर आर्यसमाजकी सेवाओं और गुरुकुलोंकी आवश्यकतासे में अनभिज्ञ नहीं हूँ। यदि उन्होंने धर्मके विकासको सीमित कर दिया है तो साथ ही उसमें नई जान भी<noinclude></noinclude>
ekw6n6tudyd038b716er3xearpj7wzq
673139
673138
2026-08-23T05:39:48Z
रितु कुमारी साव
6333
673139
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१८४. गुरुकुल काँगड़ी'''}}}}
स्वामी श्रद्धानन्दके प्राण गुरुकुल कांगड़ीमें ही वसते थे, भले ही उनका नश्वर शरीर समय-समयपर चाहे जहाँ क्यों न घूमता फिरता रहा हो। और जबतक गुरुकुलका अस्तित्व है तबतक स्वामी श्रद्धानन्दजी भी जीते रहेंगे। इसलिए इस स्वर्गीय शहीदकी यादमें जो अच्छेसे अच्छा स्मारक खड़ा किया जा सकता है, वह है इस गुरु-
कुलको स्थायी बनाना। इसमें सन्देह नहीं कि वास्तविक स्थायी स्मारक तो गुरुकुलके अध्यापकों और स्नातकोंके सुन्दर चारित्र्यबल और प्राचीन शिक्षा और उसपर आधारित आचरणको प्रधानता देते रहनेके दृढ़ संकल्पसे ही बनकर निखरेगा। असहयोग आन्दोलन शुरू होनेके काफी पहलेसे ही श्रद्धानन्दजी यह कहते थे और उनका कहना काफी उचित भी था, कि यह गुरुकुल असहयोग आन्दोलनमें दी गई व्याख्याके अनुसारएक राष्ट्रीय संस्था है। उनकी धारणा थी कि हम चाहें अथवा न चाहें, सरकारी शिक्षा संस्थाओं में जानेका अर्थ ही पश्चिमके प्रभावको प्रधान स्थान देना है। पश्चिमकी लाभप्रद चीजोंको अपने तरीकेसे अपनी सुविधाके अनुसार देखकर अपना लेनेमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। इसलिए स्वामीजीका योग्य स्मारक होनेके लिए गुरुकुलको पूरी तौरपर सरकारसे स्वाधीन रखना होगा। यह कुछ कम सन्तोषकी बात नहीं है कि सरकारी सहायता और प्रभावसे मुक्त होनेके बावजूद भी गुरुकुलके सदस्योंकी संख्या बढ़ती जा रही है और मैं आशा करता हूँ कि उसी प्रकार इसके श्रद्धेय संस्थापककी भावनाके अनुरूप इसके शिक्षकों और स्नातकों का चरित्र भी उन्नत होगा।
परन्तु यदि स्मारक अपने वास्तविक अस्तित्वके लिए अन्ततोगत्वा गुरुकुलके विद्यार्थियों और अध्यापकोंके चरित्रपर निर्भर करता है, तो उसे अभी फिलहाल जनताकी आर्थिक सहायतापर निर्भर रहना है। आचार्य रामदेवने तीन लाख रुपयोंकी याचना करते हुए अपील जारी की है। मैं समझता हूँ कि लगभग दो लाख तो पहले ही मिल चुके हैं। गत १९ तारीखको गुरुकुलके मैदानमें, उस बड़े मंडपके भीतर अपीलके<ref>देखिए परिशिष्ट २।</ref> अवसरपर मैंने जो दृश्य देखा था<ref>देखिए "भाषण: हरिद्वार में", १९-३-१९२७।</ref> वह कभी न भूलने लायक दृश्य है स्वयंसेवकगण बाल्टियाँ लिए हुए दर्शकों के बीच, घूम रहे थे। उनमें अपने रुपयों और नोटोंको डालनेके लिए मानो सभी स्त्री-पुरुषोंमें होड़-सी लग गई थी। रेजगारी
तो दिखाई ही नहीं पड़ती थी। मैं इस अपीलपर जनताका ध्यान देनेकी दिली सिफारिश करता हूँ। आर्यसमाज तथा उसके सिद्धान्तोंसे मेरे जो मतभेद हैं उन्हें में बतला ही चुका हूँ। वे तो हैं ही। गुरुकुलोंको चलानेके तरीकोंसे भी मेरा मतभेद है। मगर आर्यसमाजकी सेवाओं और गुरुकुलोंकी आवश्यकतासे में अनभिज्ञ नहीं हूँ। यदि उन्होंने धर्मके विकासको सीमित कर दिया है तो साथ ही उसमें नई जान भी<noinclude></noinclude>
id7h35rvb0hqjvkkvap2xkgxtaf0uty
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३७
250
187317
673142
645737
2026-08-23T05:46:42Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673142
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||प्रस्तावना: 'आत्मसंयम बनाम विषयासक्ति'|१९९}}</noinclude>डाल दी है। यह प्रवृत्ति सभी सुधारोंमें होती है। बुद्धिमान पुरुषोंका काम अच्छाईको बुराईसे अलग करके अच्छाईको धारण करना है। गुरुकुलमें बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना होगा, और जो लोग यह चाहते हैं कि यह जैसी स्थितिमें आज है, उससे भी अच्छा बने तो उन्हें इसको बेहतर बनानेके लिए कोई तबदीलियाँ सुझानेसे पहले इसके प्रति अपना मित्रभाव सिद्ध करना होगा, इसलिए धनकी इस अपीलपर अपना हस्ताक्षर करनेमें मुझे जरा भी संकोच नहीं है। अपीलमें अपेक्षित इतनी छोटी रकम इकट्ठी करनेमें कोई विलम्ब या कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया, '''२४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८५. प्रस्तावना: 'आत्मसंयम बनाम विषयासक्ति''''<ref>यह प्रस्तावना सेल्फ-रेस्टेन्ट वर्सेज सेल्फ-इनडलजेन्स नामक पुस्तकके द्वितीय संस्करणके लिए लिखी गई थी। बादमें यह दूसरा संस्करण सेल्फ कन्ट्रोल नामसे छपा।</ref>}}}}
इस पुस्तकका पहला संस्करण प्रकाशित होनेके लगभग एक सप्ताह के भीतर ही बिक गया। यह मेरे लिए बड़ी खुशीकी बात है। इस पुस्तकमें संकलित लेखों पर जो पत्र आये हैं, उनसे प्रकट होता है कि ऐसी पुस्तकोंको प्रकाशित करनेकी आवश्यकता है। उन लोगोंको इन पृष्ठोंके पढ़नेसे कुछ सहायता मिल सकती है, जिन्होंने
विलासिताको धर्म नहीं बना लिया है, जो अपने खोये हुए सहज आत्मसंयमको, जो सामान्य अवस्थामें होना चाहिए, फिरसे प्राप्त करनेके लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे लोगों के मार्गदर्शनके लिए निम्न निर्देश लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं:
१. यदि आप विवाहित हैं तो याद रखें कि आपकी पत्नी आपकी सहचरी, साथिन और मित्र है, भोग-विलासका साधन नहीं।
२. संयम आपके जीवनका नियम है। इसलिए सहवास तभी किया जाना चाहिए जब पति और पत्नी दोनोंकी इच्छा हो और उसमें भी उन नियमोंका ध्यान रखा जाना चाहिए जिनके सम्बन्धमें स्पष्ट ही दोनोंकी राय एक हो।
३. यदि आप अविवाहित हैं तो आपका अपने प्रति, समाजके प्रति और अपनी भावी पत्नीके प्रति यह कर्त्तव्य है कि आप पवित्र जीवन बितायें। यदि आप अपने भीतर सचाईकी यह भावना पैदा कर लेंगे तो आप समस्त प्रलोभनोंसे अवश्य ही सुरक्षित रह सकेंगे।
४. इस संसारमें जो अज्ञात शक्ति है, आप सदा उसका ध्यान रखें। सम्भव है उस शक्तिके दर्शन हमें कभी न हों किन्तु हम अपने मनमें यह अनुभव करें कि वह शक्ति हमें देख रही है और हमारे प्रत्येक पापमय विचारका लेखा रख रही है। यदि आप ऐसा करेंगे तो इस शक्तिसे आपको सदा सहायता मिलेगी।<noinclude></noinclude>
41s8qf2ut2q0s0xh5ppzl0wuvz24gbe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३८
250
187318
673146
645738
2026-08-23T05:52:48Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673146
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२००|सम्पूर्ण गांधी वामय|}}</noinclude>५. संयत जीवनके नियम विलासी जीवनके नियमोंसे अवश्य ही भिन्न होते हैं इसलिए आप अपनी संगति, अपने पठन-पाठन, अपने मनोरंजन और अपने भोजनको नियमोंमें बाँधे।
आप अच्छे और शुद्ध चरित्रके लोगोंका साथ ढूंढ़े।
आप अपने आपको ऐसे उपन्यास और मासिक पत्र पढ़नेसे दृढ़तापूर्वक रोकें, जो मनमें विकार पैदा करते हैं और ऐसी रचनाएँ पढ़ें जिनसे मनुष्यका उत्थान होता है। आप सन्दर्भ और मार्गदर्शनके लिए ऐसी कोई पुस्तक सदा साथ रखें।
आप सिनेमाओं और नाटकघरोंमें न जायें। मनोरंजन वही होता है जहाँ आपकी शक्तिका क्षय न हो, वल्कि उसका पुनर्निर्माण हो। इसलिए आप भजन मण्डलियोंमें
जायें, जहाँ शब्द और लय दोनों ही आत्माको ऊपर उठानेवाले हैं।
आप अपनी जीभके स्वादके लिए भोजन न करें, बल्कि क्षुधाकी निवृत्तिके लिए भोजन करें। विलासी आदमी खानेके लिए जीता है; संयमी आदमी जीवित रहनेके
लिए खाता है। इसलिए आप समस्त तेज मसालोंसे परहेज करें; शराब न पियें, क्योंकि वह हमारे तन्तुओंको उत्तेजित करती है; और नशीली चीजोंका भी सेवन न करें, क्योंकि वे उचित और अनुचित विवेककी शक्तिको समाप्त कर देती हैं। आप अपने भोजनकी मात्रा और भोजनका समय बाँध लें।
६. जब वासनाएँ आपपर हावी होनेका प्रयत्न करें, आप अपने घुटनोंके बल बैठ जायें और ईश्वरसे सहायताके लिए प्रार्थना करें। मुझे रामनामसे सदा ही सहायता मिली है। बाहरी सहायताके रूपमें आप कटिस्नान करें, इसके लिए आप अपनी टाँगें बाहर कर के ठण्डे पानीके टबमें बैठ जायें। आप देखेंगे कि आपकी वासनाएँ उसी क्षण शान्त हो गई हैं। यदि आप कमजोर न हों और आपको ठण्ड लगनेका भय न हो तो आप उसमें कुछ मिनटतक बैठे रहें।
७. व्यायामकी दृष्टिसे सुबह-सवेरे और रातको सोनेसे पहले खुली हवामें तेज कदमोंसे टहलें।
८. जल्दी सोने और जल्दी जागनेसे मनुष्यको स्वास्थ्य, सम्पत्ति और ज्ञानकी प्राप्ति होती है। यह कहावत बिलकुल ठीक है। ९ बजे सो जाना और ४ बजे जग
जाना एक अच्छा नियम है। आप जब सोयें तब आपका पेट खाली हो, इसके लिए आपको अपना शामका भोजन ६ बजेतक कर लेना चाहिए।
९. स्मरण रखें कि मनुष्य ईश्वरका प्रतिनिधि है और उसका उद्देश्य समस्त प्राणियों की सेवा करना और इस प्रकार ईश्वरकी महत्ता और उसके प्रेमको व्यक्त करना है। आप सेवामें ही सुखका अनुभव करें और तब आपको जीवनमें किसी दूसरे सुखकी आवश्यकता नहीं रहेगी।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
0tt68c3tt6v04y1tkw5d1l9k2sq448g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२३९
250
187319
673151
645739
2026-08-23T06:01:07Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673151
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१८६.'यंग इंडिया'के एक पाठकको'''}}}}
पर्दे के पक्ष में आपका पत्र में छापना नहीं चाहता। मेरा मत है कि हिन्दुस्तानमें पर्देकी प्रथा अभी हाल ही की चीज है और यह हिन्दू-समाजके पतनकालमें अपनाई
गई थी। जिस युगमें स्वाभिमानिनी द्रौपदी और निष्कलंक सीता रहती थीं, उसमें पर्दा जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती थी। गार्गी पर्दे के भीतरसे तो अपने शास्त्रार्थ नहीं कर सकती थी। पर्दा सारे हिन्दुस्तानमें सर्वत्र प्रचलित भी नहीं है। दक्षिण भारत, गुजरात और पंजाबमें इसका नामोनिशान भी नहीं है। किसान इस चीजको जानते भी नहीं। मगर उन प्रान्तों अथवा किसानों की स्त्रियाँ जो अपेक्षाकृत थोड़ी-बहुत स्वतन्त्रता भोग रही हैं, उसके कोई अवांछनीय दुष्परिणाम सुननेमें नहीं आये हैं। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि दुनियाके अन्य हिस्सों में पर्दा न होनेके कारण वहाँके स्त्रियों या पुरुषोंमें कम नैतिकता है। 'यंग इंडिया' के एक पाठक महोदय हर पुरातन चीजका समर्थन करनेकी कोशिश करते हैं। यद्यपि में यह मानता हूँ कि हमारे पूर्वजोंने हमें ऐसे नैतिक नियम दिये हैं, जिनसे बेहतर नियम हो ही नहीं सकते, फिर भी में इस मान्यतामें अपना योग नहीं दे सकता कि वे किसी बातमें भूल कर ही नहीं सकते थे और यह कह भी कौन सकता है कि अमुक वस्तु सचमुच प्राचीन है? क्या सभी १०८ उपनिषद्, समान रूपसे पूज्य हैं? मुझे तो ऐसा लगता
है कि जिस बातको हम तर्ककी कसौटीपर कस सकते हों अवश्य कसें और जो बात इस कसौटीपर खरी न उतरे, वह भले ही प्राचीनताके परिवेशमें दिखलाई देती
हो, उसे मानने से इनकार कर दें।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८७, 'ज्ञानकी खोजमें''''}}}}
श्रीयुत एस० डी० नादकर्णी लिखते है:
'''"क्या साधारण जनता आप जैसा 'आत्मबल' प्राप्त कर सकती है?" इस प्रश्नका उत्तर आपने अक्तूबर, १९२१ में एक पत्रलेखकको यह दिया था:
"उसके पास तो वह बल पहले ही बहुतायत से है। एक दफा फ्रांसीसी वैज्ञानिकों का एक दल ज्ञानकी खोजमें निकला और घूमता-फिरता भारत आ पहुँचा। दलके सदस्योंने अपनी अपेक्षाके अनुसार उस ज्ञानको विद्वानमण्डलीमें खोजने का भगीरथ प्रयत्न किया, परन्तु वे इसमें कृतकार्य न हो सके। पर उन्हें वह अचानक एक पंचम (पेरिया) के घरमें मिल गया।<ref>देखिए खण्ड २१, पृष्ठ ३७०।</ref><noinclude></noinclude>
njb0njk0ai0rgu3f894zt304te62mc9
673152
673151
2026-08-23T06:01:53Z
रितु कुमारी साव
6333
673152
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१८६.'यंग इंडिया'के एक पाठकको'''}}}}
पर्दे के पक्ष में आपका पत्र में छापना नहीं चाहता। मेरा मत है कि हिन्दुस्तानमें पर्देकी प्रथा अभी हाल ही की चीज है और यह हिन्दू-समाजके पतनकालमें अपनाई
गई थी। जिस युगमें स्वाभिमानिनी द्रौपदी और निष्कलंक सीता रहती थीं, उसमें पर्दा जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती थी। गार्गी पर्दे के भीतरसे तो अपने शास्त्रार्थ नहीं कर सकती थी। पर्दा सारे हिन्दुस्तानमें सर्वत्र प्रचलित भी नहीं है। दक्षिण भारत, गुजरात और पंजाबमें इसका नामोनिशान भी नहीं है। किसान इस चीजको जानते भी नहीं। मगर उन प्रान्तों अथवा किसानों की स्त्रियाँ जो अपेक्षाकृत थोड़ी-बहुत स्वतन्त्रता भोग रही हैं, उसके कोई अवांछनीय दुष्परिणाम सुननेमें नहीं आये हैं। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि दुनियाके अन्य हिस्सों में पर्दा न होनेके कारण वहाँके स्त्रियों या पुरुषोंमें कम नैतिकता है। 'यंग इंडिया' के एक पाठक महोदय हर पुरातन चीजका समर्थन करनेकी कोशिश करते हैं। यद्यपि में यह मानता हूँ कि हमारे पूर्वजोंने हमें ऐसे नैतिक नियम दिये हैं, जिनसे बेहतर नियम हो ही नहीं सकते, फिर भी में इस मान्यतामें अपना योग नहीं दे सकता कि वे किसी बातमें भूल कर ही नहीं सकते थे और यह कह भी कौन सकता है कि अमुक वस्तु सचमुच प्राचीन है? क्या सभी १०८ उपनिषद्, समान रूपसे पूज्य हैं? मुझे तो ऐसा लगता
है कि जिस बातको हम तर्ककी कसौटीपर कस सकते हों अवश्य कसें और जो बात इस कसौटीपर खरी न उतरे, वह भले ही प्राचीनताके परिवेशमें दिखलाई देती
हो, उसे मानने से इनकार कर दें।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८७, 'ज्ञानकी खोजमें''''}}}}
श्रीयुत एस० डी० नादकर्णी लिखते है:
'''"क्या साधारण जनता आप जैसा 'आत्मबल' प्राप्त कर सकती है?" इस प्रश्नका उत्तर आपने अक्तूबर, १९२१ में एक पत्रलेखकको यह दिया था:"उसके पास तो वह बल पहले ही बहुतायत से है। एक दफा फ्रांसीसी वैज्ञानिकों का एक दल ज्ञानकी खोजमें निकला और घूमता-फिरता भारत आ पहुँचा। दलके सदस्योंने अपनी अपेक्षाके अनुसार उस ज्ञानको विद्वानमण्डलीमें खोजने का भगीरथ प्रयत्न किया, परन्तु वे इसमें कृतकार्य न हो सके। पर उन्हें वह अचानक एक पंचम (पेरिया) के घरमें मिल गया।'''<ref>देखिए खण्ड २१, पृष्ठ ३७०।</ref><noinclude></noinclude>
6mf72dfk7zybiljc1gj920nckh7lfhx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४०
250
187320
673156
645740
2026-08-23T06:09:05Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673156
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''मैंने उस समय भोलेपनमें यह सोचा था कि आप अपनी पढ़ी हुई किसी वास्तविक घटनाका उल्लेख कर रहे हैं। इसलिए फ्रांसीसी सदस्योंके दल जैसी उत्सुकतासे मैंने आपसे उसका विस्तृत विवरण पूछा। आपने कृपा करके
मेरे प्रश्नका उत्तर स्वयं देते हुए कहा "मेरा खयाल था कि मेरे लेखसे यह बात पर्याप्त रूपसे स्पष्ट हो जाती है कि उक्त विवरण बिलकुल काल्पनिक था।"'''
'''इसके बाद १९२५ में कलकत्तामें मिशनरियोंको सभामें आपने यह कहा:"मैं नहीं कह सकता कि इस सुन्दर भूमिमें रहनेवाले मनुष्य नीच हैं। वे नीच नहीं हैं; वे सत्यकी खोज उतनी ही आकुलतासे कर रहे हैं जितनी आकुलतासे में और आप कर रहे हैं, बल्कि शायद मुझसे और आपसे ज्यादा आकुलतासे हो। यह मुझे फ्रेंच भाषाकी एक पुस्तककी याद दिलाता है, जिसका अनुवाद एक फ्रांसीसी मित्रने मेरे पढ़नेके लिए किया था। इस पुस्तकमें ज्ञानकी खोजमें किये गये काल्पनिक अभियानका वर्णन है। इन यात्रियोंका एक दल भारतमें उतरता है और उसको एक पेरियाकी छोटीसी कुटियामें सत्य और प्रभुका मूर्तिमन्त रूप देखनेको मिलता है।'''<ref>देखिए खण्ड २७, पृष्ठ ४५२।</ref>
'''अब इस बारेमें यदि आप अपनी 'आत्मकथा' में आगे और कुछ लिखनेवाले नहीं तो मैं आपका बहुत अनुगृहीत होऊँगा। यदि आप मुझे यह जानकारी दे दें कि उस पुस्तक और उसके लेखकका नाम क्या है, आपके लिए उसका अनुवाद किसने किया था, कब किया था और कहाँ किया था। आप यह जानकारी 'यंग इंडिया' में (या स्वयं मुझे पत्र लिखकर) दे सकते हैं। यह भी लिखें कि क्या वह अनुवाद प्रकाशित हुआ था और क्या वह इस समय उपलब्ध है? मैं यह भी निश्चय करना चाहता हूँ कि यह यूल एण्ड बर्नेलके 'हॉब्सन-जॉब्सनमें' (पेरिया शीर्षकके अन्तर्गत) उल्लिखित दो पुस्तकोंमेंसे
तो एक नहीं है? वह कहानी बर्नार्डीन डी सेंट पियरेकी लिखी है और उसका फ्रांसीसी नाम है शोमिये इन्डियन (भारतीय झोंपड़ी)। कहानी अस्वाभाविक है; किन्तु वह कभी लोक-प्रसिद्ध थी। इस (पेरिया) शब्दसे जो एक गौरवकी भावना भ्रमवश जुड़ गई है, जो कैसीमीर डेलावीके नाटकमें चरमावस्थाको प्राप्त हुई है और जो कुछ इस शब्दसे अभीतक संलग्न है, उसका स्रोत भी वही पुस्तक तो नहीं है? अवश्य ही फ्रांसीसी लेखकोंके बारेमें अंग्रेज आलोचकोंने जो मत प्रकट किया है उससे मेरी सहमतिका कोई प्रश्न नहीं उठता।'''
मैं चाहता था कि मैं श्री नादकर्णीको, जो अपेक्षित है सो जानकारी पूरी तरहसे दे सकता। मुझे इस कहानीका नाम याद नहीं रहा है। इस पुस्तकका अनुवाद खास<noinclude></noinclude>
h0x288szsylmcetnno7k9x255jli3ih
673157
673156
2026-08-23T06:10:19Z
रितु कुमारी साव
6333
673157
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''मैंने उस समय भोलेपनमें यह सोचा था कि आप अपनी पढ़ी हुई किसी वास्तविक घटनाका उल्लेख कर रहे हैं। इसलिए फ्रांसीसी सदस्योंके दल जैसी उत्सुकतासे मैंने आपसे उसका विस्तृत विवरण पूछा। आपने कृपा करके मेरे प्रश्नका उत्तर स्वयं देते हुए कहा "मेरा खयाल था कि मेरे लेखसे यह बात पर्याप्त रूपसे स्पष्ट हो जाती है कि उक्त विवरण बिलकुल काल्पनिक था।"'''
'''इसके बाद १९२५ में कलकत्तामें मिशनरियोंको सभामें आपने यह कहा:"मैं नहीं कह सकता कि इस सुन्दर भूमिमें रहनेवाले मनुष्य नीच हैं। वे नीच नहीं हैं; वे सत्यकी खोज उतनी ही आकुलतासे कर रहे हैं जितनी आकुलतासे में और आप कर रहे हैं, बल्कि शायद मुझसे और आपसे ज्यादा आकुलतासे हो। यह मुझे फ्रेंच भाषाकी एक पुस्तककी याद दिलाता है, जिसका अनुवाद एक फ्रांसीसी मित्रने मेरे पढ़नेके लिए किया था। इस पुस्तकमें ज्ञानकी खोजमें किये गये काल्पनिक अभियानका वर्णन है। इन यात्रियोंका एक दल भारतमें उतरता है और उसको एक पेरियाकी छोटीसी कुटियामें सत्य और प्रभुका मूर्तिमन्त रूप देखनेको मिलता है।'''<ref>देखिए खण्ड २७, पृष्ठ ४५२।</ref>
'''अब इस बारेमें यदि आप अपनी 'आत्मकथा' में आगे और कुछ लिखनेवाले नहीं तो मैं आपका बहुत अनुगृहीत होऊँगा। यदि आप मुझे यह जानकारी दे दें कि उस पुस्तक और उसके लेखकका नाम क्या है, आपके लिए उसका अनुवाद किसने किया था, कब किया था और कहाँ किया था। आप यह जानकारी 'यंग इंडिया' में (या स्वयं मुझे पत्र लिखकर) दे सकते हैं। यह भी लिखें कि क्या वह अनुवाद प्रकाशित हुआ था और क्या वह इस समय उपलब्ध है? मैं यह भी निश्चय करना चाहता हूँ कि यह यूल एण्ड बर्नेलके 'हॉब्सन-जॉब्सनमें' (पेरिया शीर्षकके अन्तर्गत) उल्लिखित दो पुस्तकोंमेंसे तो एक नहीं है? वह कहानी बर्नार्डीन डी सेंट पियरेकी लिखी है और उसका फ्रांसीसी नाम है शोमिये इन्डियन (भारतीय झोंपड़ी)। कहानी अस्वाभाविक है; किन्तु वह कभी लोक-प्रसिद्ध थी। इस (पेरिया) शब्दसे जो एक गौरवकी भावना भ्रमवश जुड़ गई है, जो कैसीमीर डेलावीके नाटकमें चरमावस्थाको प्राप्त हुई है और जो कुछ इस शब्दसे अभीतक संलग्न है, उसका स्रोत भी वही पुस्तक तो नहीं है? अवश्य ही फ्रांसीसी लेखकोंके बारेमें अंग्रेज आलोचकोंने जो मत प्रकट किया है उससे मेरी सहमतिका कोई प्रश्न नहीं उठता।'''
मैं चाहता था कि मैं श्री नादकर्णीको, जो अपेक्षित है सो जानकारी पूरी तरहसे दे सकता। मुझे इस कहानीका नाम याद नहीं रहा है। इस पुस्तकका अनुवाद खास<noinclude></noinclude>
8uo62yuxtsccjanjribx5pf25rwtw7f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४१
250
187321
673160
645741
2026-08-23T06:18:30Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673160
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भेंट: 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिसे|२०३}}</noinclude>तौरसे मेरे लिए एक आंग्ल-फ्रांसीसी मित्रने १९१०में उस समय किया था जब वे जोहानिसबर्गके निकट स्थित टॉल्स्टॉय फार्ममें मेरे साथ रहते थे। मैं इसे प्रकाशित करना चाहता था, लेकिन जो हालत मेरी दूसरी कीमती चीजोंकी हुई है, वहीं मेरी कीमती किताबोंकी हुई है। मेरी बहुत-सी कीमती किताबें और पाण्डुलिपियाँ सन् १९१५की यात्रामें खो गई थीं। यह कीमती अनुवाद भी उन्हीं किताबों में था, किन्तु मेरे कुछ पाठकगण शायद श्री नादकर्णी द्वारा अपेक्षित जानकारी दे सकें। योग्य लेखककी पुस्तककी कहानी वैसे तो प्रशंसाके योग्य है। किन्तु मुझे याद आता है कि उसने कहानीके अन्तमें एक पेरिया कन्याका विवाह एक ईसाई लेखकसे कराया है; मानो जिस पेरिया घरमें उसके वैज्ञानिकोंको ज्ञानकी उपलब्धि हुई, वह घर इस प्रेम-व्यापार और इस विवाह के बिना, जो कन्याको वातावरणसे विलग करता है और जो पड़ोसियोंकी सेवाकी दृष्टिसे भी उसे कम उपयोगी बना देता है, पूर्ण नहीं था।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८८. भेंट: 'बॉम्बे क्रॉनिकल'के प्रतिनिधिसे'''}}}}
{{Right|२४ मार्च, १९२७}}
'''प्रश्न: कामरेड सकलातवालाने आपसे भारतके मजदूर संघ आन्दोलनका नेतृत्व करनेका अनुरोध किया है। इस आह्वानके प्रति आपका क्या कहना है?'''
'''उत्तर:''' मुझे नहीं लगता कि उसका नेतृत्व करनेकी योग्यता मुझमें है।
'''परन्तु श्री सकलातवालाका कहना है कि आप ही उसे सँभालनेके लिए सबसे योग्य व्यक्ति हैं।'''
उससे मेरे अहंभावको बढ़ावा मिलता है परन्तु इस उक्तिपर मुझे विश्वास नहीं होता।
'''आप यह किस प्रकार कह सकते हैं कि आपके बारडोली निर्णयसे सरकारका<ref>देखिए “नहीं और हाँ ", १७-३-१९२७।</ref> बल घटा है?'''
यदि मैं आन्दोलन जारी रखता तो बारडोलीके लोग तबाह हो जाते और हमारे उद्देश्यको भी हानि पहुँचती। तनाव भी आजसे कहीं ज्यादा होता। सच तो यह है कि लोग अहिंसाके लिए तैयार नहीं थे और आन्दोलनका अन्त व्यापक आतंकमें होता। सरकार जानती है कि असहयोग मरा नहीं है और वह असहयोगसे ज्यादा किसी अन्य चीजसे डरती भी नहीं है। सरकार हिंसाको दबाना जानती है, पर अहिंसा और असहयोगका सामना करना उसे नहीं आता। बारडोली निर्णय द्वारा हमने व्यवस्थापूर्ण ढंगसे और जानबूझकर अपना कदम वापस लिया, भगदड़में नहीं। तथाकथित चेतावनी देनेसे सरकारकी प्रतिष्ठाको जो धक्का लगा था वह अब भी<noinclude></noinclude>
js93na68fnjnj3tvvs28fi5or90vwma
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३३
250
187626
672923
646058
2026-08-22T15:07:46Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
672923
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|पच्चीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|३४७. ||भाषण: आरसीकेरेकी सार्वजनिक समामें (२०-८-१९२७)||४१०
|-
|३४८. ||पत्र: मीराबहनको (२१-८-१९२७)||४११
|-
|३४९. ||पत्र: जमनादासको (२२-८-१९२७)||४१३
|-
|३५०. ||पत्र: आश्रमकी बह्नोंको (२२-८-१९२७)||४१४
|-
|३५१. ||पत्र: छगनलाल जोशीको (२२-८-१९२७)||४१४
|-
|३५२. ||पत्र: छगनलाल जोशीको (२२-८-१९२७)||४१५
|-
|३५३. ||पत्र: गंगाबह्नको (२२-८-१९२७)||४१६
|-
|३५४. ||पत्र: आनन्दी बाईको (२२-८-१९२७)|| ४१७
|-
|३५५. ||पत्र: शारदाको (२२-८-१९२७)|| ४१८
|-
|३५६. ||विदाई-सन्देश: विद्यार्थियोंको (२२-८-१९२७ के पश्चात्)||४१९
|-
|३५७. ||पत्र: कुवलयानन्दको (२३-८-१९२७)|| ४१९
|-
|३५८. ||पत्र: टी० आर० कृष्णस्वामी अय्यरको (२३-८-१९२७)|| ४२०
|-
|३५९. ||पत्र: कमला दासगुप्तको (२३-८-१९२७)|| ४२१
|-
|३६०. ||पत्र: टी० आर० महादेव अय्यरको (२३-८-१९२७)|| ४२२
|-
|३६१. ||पत्र: कृष्णदासको (२३-८-१९२७)|| ४२२
|-
|३६२. ||पत्र: डॉ० सत्यपालको (२३-८-१९२७)|| ४२३
|-
|३६३. ||पत्र: मणिबह्न पटेलको (२३-८-१९२७ के पश्चात्)|| ४२३
|-
|३६४. ||पत्र: एक गुजराती विद्यार्थीको (२३-८-१९२७ के पश्चात्)||
४२४
|-
|३६५. ||तार: मोतीलाल नेहरूको (२४-८-१९२७) || ४२५
|-
|३६६. ||भाषण: कृष्णगिरिमें (२४-८-१९२७)|| ४२५
|-
|३६७. ||विद्यार्थी और 'गीता' (२५-८-१९२७)|| ४२७
|-
|३६८. ||टिप्पणियाँ: ये धृष्ट स्मारक; क्या सत्य इतना सुन्दर हो सकता है? (२५-८-१९२७)|| ४२९
|-
|३६९. ||संयमका नियम (२५-८-१९२७)|| ४३२
|-
|३७०. ||अन्धे कर्तये (२५-८-१९२७)|| ४३३
|-
|३७१. ||पत्र: मीराबहनको (२६-८-१९२७) ||४३४
|-
|३७२. ||पत्र: डॉ० मु० अ० अन्सारीको (२६-८-१९२७)|| ४३७
|-
|३७३. ||पत्र: मोतीलाल नेहरूको (२६-८-१९२७)|| ४३८
|-
|३७४. ||वर्णसंकर सन्तानकी समस्या ( २८-८-१९२७)|| ४४०
|-
|३७५. ||दीक्षा कौन ले? (२८-८-१९२७) ||४४२
|-
|३७६. ||पत्र: मणिलाल और सुशीला गांधीको (२८-८-१९२७)|| ४४३
|-
|३७७. ||भाषण: बंगलोर में स्वयंसेवकोंके समक्ष (२८-८-१९२७)||४४४
|-
|३७८. ||भाषण: बंगलोर में व्यायामशालाके उद्घाटनके अवसरपर (२८-८-१९२७)|| ४४६
|-
|३७९.||भाषण: बंगलोरके कपड़ा मिल मजदूर संघके समक्ष (२८-८-१९२७)|| ४४७
|-
|३८०. ||भाषण: आदि कर्नाटकोंके समक्ष (२८-८-१९२७)|| ४४८<noinclude></noinclude>
4o0q7ilw30u2mitmxsipe857md6pt79
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३४
250
187627
672930
646059
2026-08-22T15:23:26Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
672930
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|छब्बीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|३८१.|| भाषण: बंगलोरके नागरिकोंकी समामें (२८-८-१९२७)||४४९
|-
|३८२.|| विदाई भाषण: बंगलोरकी प्रार्थना सभामें (२८-८-१९२७)|| ४५४
|-
|३८३.|| तार: अब्राह्मणोंकी परिषद्को (२९-८-१९२७ या उसके पूर्व)||४५५
|-
|३८४.|| पत्र: मीराबहनको (२९-८-१९२७) ||४५५
|-
|३८५.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (२९-८-१९२७) ||४५६
|-
|३८६.|| भेंट: एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (२९-८-१९२७) ||४५७
|-
|३८७.|| भाषण: वेल्लूरके वूरीज़ कालेजमें (३०-८-१९२७)||४५७
|-
|३८८.|| पत्र: टी० आर० महादेव अय्यरको (३१-८-१९२७) ||४६१
|-
|३८९.|| भाषण: वेल्लूरकी सार्वजनिक सभा में (३१-८-१९२७)||४६२
|-
|३९०.|| इसे भी विवाह कहेंगे? (१-९-१९२७)||४६५
|-
|३९१.|| कहीं हम भूल न जायें (१-९-१९२७)||४६६
|-
|३९२.|| सच्चा श्राद्ध (१-९-१९२७)||४६७
|-
|३९३.|| स्वास्थ्य-रक्षा कैसे करें (१-९-१९२७) ||४६८
|-
|३९४.|| पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१-९-१९२७) ||४७०
|-
|३९५.|| पत्र: डा० कैलाशनाथ काटजूको (१-९-१९२७)|| ४७०
|-
|३९६.|| पत्र: गुलजार मुहम्मद अकील' को (१-९-१९२७)|| ४७२
|-
|३९७.|| पत्र: एस० जी० वझेको (१-९-१९२७)|| ४७३
|-
|३९८.|| पत्र: बाल कालेलकरको (२-९-१९२७) ||४७४
|-
|३९९.|| भाषण: आरनीमें (२-९-१९२७) ||४७६
|-
|४००.|| भाषण: अर्काटमें ( २-९-१९२७) ||४७६
|-
|४०१.|| पत्र: बलवन्तराय मेहताको (२-९-१९२७)|| ४७७
|-
|४०२.|| तार: मीराबहनको (३-९-१९२७)|| ४७९
|-
|४०३.|| तार: मीराबहनको (३-९-१९२७) ||४७९
|-
|४०४.|| भाषण: पेरावेल्लूरमें मजदूरोंके समक्ष (३-९-१९२७)||४८०
|-
|४०५.|| भाषण: मद्रास में विद्यार्थियोंके समक्ष ( ३-९-१९२७)||४८१
|-
|४०६.|| बाढ़के बाद (४-९-१९२७)||४८४
|-
|४०७.|| भाषण: वाई० एम० सी० ए०, मद्रासमें (४-९-१९२७)||४८७
|-
|४०८.|| भाषण: मद्रासकी सार्वजनिक सभामें (४-९-१९२७)||४९३
|-
|४०९.|| भाषण: 'गीता' पर, मद्रासमें (४-९-१९२७)||४९५
|-
|४१०.|| तार: मीराबहनको (५-९-१९२७)||४९७
|-
|४११.|| पत्र: मीराबहनको (५-९-१९२७)|| ४९७
|-
|४१२.|| पत्र: एक आश्रमवासीको (५-९-१९२७) ||४९८
|-
|४१३.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (५-९-१९२७) ||४९९
|-
|४१४.|| पत्र: शान्तिकुमार मोरारजीको (५-९-१९२७के पश्चात्)||५००
|-
|४१५.|| भाषण: मद्य-निषेधके बारेमें, मद्रास में ( ६-९-१९२७)|| ५०१
|-
|४१६.|| भाषण: हिन्दी प्रचार कार्यालय में ( ६-९-१९२७) ||५०५<noinclude></noinclude>
ejmqlp6lgt9nkmdybx2a9d5ti6gpqyo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/३५
250
187628
672990
646060
2026-08-22T17:43:29Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
672990
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|सत्ताईस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|४१७.|| पत्र: मीराबहनको (७-९-१९२७)||५०६
|-
|४१८.||बातचीत: नीलकी मूर्ति हटानेका आन्दोलन करनेवाले स्वयंसेवकोंसे (६ और ७-९-१९२९)||५०७
|-
|४१९.|| भाषण: पचैयप्पा कॉलेज, मद्रासमें (७-९-१९२७)||५२०
|-
|४२०.|| भाषण: रायपुरम्, मद्रासमें (७-१-१९२७)||५२६
|-
|४२१.|| पूर्ण मद्य-निषेध (८-९-१९२७)||५२९
|-
|४२२.|| हमारी सभ्यता (८-९-१९२७)||५३१
|-
|४२३.|| भाषण: कांजीवरममें (८-९-१९२७)||५३३
|-
|४२४.|| भाषण: पेराम्बुरके "आरुन्धतीयों" के समक्ष, मद्रासमें (८-९-१९२७)|| ५३६
|-
|४२५.||भाषण: गुजरातियों और मारवाड़ियोंके समक्ष, मद्रासमें (९-९-१९२७) ||५३७
|-
|४२६.|| भाषण: महिलाओंके समक्ष, मद्रास में (९-९-१९२७)||५३८
|-
|४२७.|| भाषण: चि० रं० दासके बारेमें, मद्रास में (९-९-१९२७)||५४०
|-
|४२८.|| भाषण: सेंट टॉमस माउंट, मद्रास में (९-९-१९२७)||५४५
|-
|४२९.|| भेंट: 'हिन्दू' के प्रतिनिधिसे (९-९-१९२७)||५४६
|-
|४३०.|| तार: मीराबहनको (१०-९-१९२७)||५४८
|-
|४३१.|| भाषण: वाई० एम० सी० ए०, कडलूरमें, (१०-९-१९२७)||५४८
|-
|४३२.|| भाषण: कडलूरकी सार्वजनिक सभा में (१०-९-१९२७)||५५२
|-
|४३३.|| विद्यार्थियोंकी कसौटी (११-९-१९२७)||५५७
|-
|४३४.|| “क्या किया जाये?” (११-९-१९२७)||५५८
|-
|४३५.|| एक विद्यार्थीके प्रश्नोंके उत्तर (११-९-१९२७)||५५९
|-
|४३६.|| भाषण: चिदम्बरम् में आदि द्रविड़ोंके समक्ष (११-९-१९२७)|| ५६०
|-
|४३७.|| भाषण: चिदम्बरम्की सार्वजनिक सभामें (११-९-१९२७)|| ५६२
|-
|४३८.|| पत्र: मीराबह्नको (१२-९-१९२७)|| ५६५
|-
|४३९.|| पत्र: गंगाबहन वैद्यको (१२-९-१९२७के पूर्व)|| ५६७
|-
|४४०.|| पत्र: जेठालाल जोशीको (१२-९-१९२७)|| ५६७
|-
|४४१.|| पत्र: प्रभाशंकर पट्टणीको (१२-९-१९२७)|| ५६८
|-
|४४२.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१२-९-१९२७)|| ५६८
|-
|४४३.|| पत्र: गंगाबहन झवेरीको (१२-९-१९२७ के आसपास)|| ५६९
|-
|४४४.|| पत्र: मीराबहनको (१३-९-१९२७)|| ५७०
|-
|४४५.|| पत्र: विजयसिंह पथिकको (१३-९-१९२७)|| ५७०
|-
|४४६.|| भाषण: मायावरम् में (१३-९-१९२७)|| ५७१
|-
|४४७.|| पत्र: मीराबहनको (१३-९-१९२७के पश्चात्)|| ५७७
|-
|४४८.|| पत्र: ओ० ० विलार्डको (१४-९-१९२७)|| ५७८
|-
|४४९.|| पत्र: ना० मो० खरेको (१४-९-१९२७)|| ५७८
|-
|४५०.|| भाषण: कुम्भकोणम्में (१४-९-१९२७)|| ५७९
|-
|४५१.|| बातचीत: कुम्भकोणम्में पण्डितोंके साथ (१४-९-१९२७)|| ५८३<noinclude></noinclude>
bv5vu668js40j762tgdqxw5k0uuzoud
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५५
250
196474
672852
668859
2026-08-22T13:05:54Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
672852
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''१९. पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मैथ्य,
आपका पत्र मिला, लेकिन मैं नहीं समझता कि अब मुझे इसके बारेमें कुछ लिखने की जरूरत है, क्योंकि अबतक आपको मेरा पहले वाला पत्र अवश्य मिल चुका होगा। यदि वह आपको नहीं मिला है, तो कृपया मुझे सूचित करें। खैर; मेरे पहलेवाले पत्रका सार यह था कि मैं आपको कोई आर्थिक मदद नहीं दे सकूँगा। उसमें मैंने आपको यह सलाह दी थी कि कामका जितना तजुरबा आपको अभी है, आप उससे और ज्यादा तजुरबा हासिल करें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
पी० जी० मैथ्यू महोदय
अंग्रेजी (एस० एन० १५६८७ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
२०. पत्र : ना० रा० मलकानीको
१८ अक्टूबर, १९२९
प्रिय मलकानी,
मुझे तुम्हारा और जमशेदजीका' भी एक पत्र मिला। इसलिए मैंने उन्हें यह तार दिया है कि तुम उनकी समितिकी उपयोगी ढंगसे सेवा नहीं कर सकते; अतः तुम्हें समिति से अलग हो जानेकी अनुमति दे दी जाये। उन्होंने अपने पिछले पत्र में लिखा था कि तुम स्वेच्छा से उनकी समिति में शामिल हुए थे और तुमने इसमें अपने विचारोंसे किसी भी तरहका समझौता नहीं किया था । इसलिए मैंने उनसे कहा कि अगर ऐसी बात है और अगर तुम उनकी समिति में रहना चाहते हो तो मैं अपनी आपत्ति वापस ले लूंगा । परन्तु मैंने उनसे कहा कि ऐसा करनेसे पहले मैं तुम्हारे
१. इस पत्र में मैथ्यूने, जो साबरमती भाश्रममें रह रहे थे, गांधीजीसे एक ऐसी योजनाके लिए आर्थिक सहायता देनेका अनुरोध किया था जिसके लिए शुरूमें ही कुछ हजार रुपये लगाना जरूरी था । २. जमशेद एन० आर० मेहता, सिन्धके एक सार्वजनिक कार्यकर्त्ता, जो कराची निगम में लम्बे अर्से तक मेथर रहे ।
३. सिन्धकी लोक बाद सहायता समिति, जिसके मलकानी सचिव थे।<noinclude></noinclude>
2nbtw6mjtwjgsf2ebra9kjolayi2e06
672933
672852
2026-08-22T15:36:06Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
672933
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''१९. पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मैथ्य,
आपका पत्र<ref>इस पत्र में मैथ्यूने, जो साबरमती आश्रममें रह रहे थे, गांधीजीसे एक ऐसी योजनाके लिए आर्थिक सहायता देनेका अनुरोध किया था जिसके लिए शुरूमें ही कुछ हजार रुपये लगाना जरूरी था।</ref> मिला, लेकिन मैं नहीं समझता कि अब मुझे इसके बारेमें कुछ लिखने की जरूरत है, क्योंकि अबतक आपको मेरा पहले वाला पत्र अवश्य मिल चुका होगा। यदि वह आपको नहीं मिला है, तो कृपया मुझे सूचित करें। खैर; मेरे पहलेवाले पत्रका सार यह था कि मैं आपको कोई आर्थिक मदद नहीं दे सकूँगा। उसमें मैंने आपको यह सलाह दी थी कि कामका जितना तजुरबा आपको अभी है, आप उससे और ज्यादा तजुरबा हासिल करें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>पी॰ जी॰ मैथ्यू महोदय
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८७) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''२०. पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको'''}}}}
{{right|१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय मलकानी,
मुझे तुम्हारा और जमशेदजीका<ref>जमशेद एन॰ आर॰ मेहता, सिन्धके एक सार्वजनिक कार्यकर्त्ता, जो कराची निगम में लम्बे अर्से तक मेयर रहे।</ref> भी एक पत्र मिला। इसलिए मैंने उन्हें यह तार दिया है कि तुम उनकी समितिकी<ref>सिन्धकी लोक बाद सहायता समिति, जिसके मलकानी सचिव थे।</ref> उपयोगी ढंगसे सेवा नहीं कर सकते; अतः तुम्हें समिति से अलग हो जानेकी अनुमति दे दी जाये। उन्होंने अपने पिछले पत्र में लिखा था कि तुम स्वेच्छा से उनकी समिति में शामिल हुए थे और तुमने इसमें अपने विचारोंसे किसी भी तरहका समझौता नहीं किया था। इसलिए मैंने उनसे कहा कि अगर ऐसी बात है और अगर तुम उनकी समिति में रहना चाहते हो तो मैं अपनी आपत्ति वापस ले लूँगा। परन्तु मैंने उनसे कहा कि ऐसा करनेसे पहले मैं तुम्हारे<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
i8ex4grwmk6n8kwewj3xs4wwkgo6gg9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२७६
250
196695
672868
669080
2026-08-22T13:50:25Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672868
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२३८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
कार्यकर्ता अपनेको नौकर मानते होंगे। कल वे अपनेको उसका सच्चा मालिक समझने
लगें, यही मेरी और मेरे साथियोंकी इच्छा है। इसी गरजसे साबरमती स्टेशनके
नजदीक खुली जमीनका एक टुकड़ा खरीदा गया है। हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
कि प्रेसके कार्यकर्ता और मजदूर वहाँ जाकर खुली हवामें रहें, नन्हा सा आदर्श गाँव
बसावें, सुखी बनें और इस सेवा वृक्षको जलसे सींचें, खुद उसकी छायाका सुख उठायें
और देशको भी उसका लाभ दें। संस्थाका उद्देश्य सर्वव्यापी है। उक्त संस्थाको सफल
बनानेके लिए संचालकों, कार्यकर्ताओं और पाठकोंके बीच सम्पूर्ण सहयोग होना चाहिए।
अबतक थोड़ा-बहुत सहयोग मिलता रहा है। मुझे इन पत्रोंको चलाने में बोझ नहीं
लगा। पाठकोंकी कृपा और साथियोंकी वफादारीसे मैने अथाह रसपान किया है; और
उसके द्वारा स्वराज्यकी झलक लेकर आत्मदर्शनकी आशाका सिंचन किया है। लेकिन
जिस प्रकार लोग अँगुली पकड़कर पहुँचा पकड़नेकी आशा करते हैं, उसी तरह मैं
पाठकोंसे और अधिक व्यावहारिक सहयोगकी अपेक्षा करता हूँ। अगर वह सफल हो
तो स्वराज्य हस्तामलकवत् है।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १-१२-१९२९
{{C|'''२४७. पत्र: छगनलाल जोशीको'''}}
{{Rh|||२ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० छगनलाल,
{{Gap}}तुम आश्रम में नहीं हो इस कारण मैं तुम्हें प्रतिदिन पत्र लिखनेकी चिन्ता नहीं
करता । किन्तु तुम्हारे हालके पत्रसे ऐसा लगता है कि तुम आश्रमका बोझ अपने साथ
ही लेते गये हो। तुम्हें इस बोझको उतार देना चाहिए। तुम आश्रमके कामसे बाहर
निकल कर गये हो। अपना काम दूसरेको सौंप देनेके बाद तुम उस बोझको ढोते
क्यों फिर रहे हो ? जो होना हो सो हो। जनकका उदाहरण तो सदा हमारे सामने
ही है। गिबनका इतिहास बहुत अच्छा होते हुए भी सच्चा इतिहास नहीं है। क्योंकि
वह बाह्य साधनों तथा क्षणिक कालके अधूरे तथ्योंके आधारपर लिखा गया है।
किन्तु 'महाभारत' अनन्त कालके चिरस्थायी आन्तरिक अनुभवके आधारपर रचित
होनेके कारण ही सच्चा इतिहास है। अतः हमें जनकके दृष्टान्तको प्राचीन नहीं बल्कि
आधुनिक मानना चाहिए। अस्तु, यह विश्वास रखो कि कृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि
नामोंसे नहीं तो अन्य नामोंसे यही बातें कही जा रही हैं और तदनुसार आचरण
किया जा रहा है। गिबनकी ऐतिहासिक कथाओंको भी तो हमने विश्वास रखकर
ही माना है न ? किन्तु उनपर विश्वास करनेका जो आधार है उसकी अपेक्षा कहीं
अधिक प्रामाणिक आधार 'महाभारत की कथाओंपर विश्वास करनेका हमारे पास है ।
यदि इतनी-सी सहज और स्पष्ट बात हमारी समझमें आ जाये तो हमारी बहुत-सी<noinclude></noinclude>
nx71v93mlj6z3kzzssotmapbkue2w3w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२७७
250
196696
672869
669081
2026-08-22T13:52:35Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672869
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र: छगनलाल जोशीको|
२३९}}
समस्याएँ तत्काल हल हो जायें । अतः हम जनकके दृष्टान्तको कहानीमें वर्णित बैंगन
न मानें बल्कि अपने खेतमें होनेवाले सुन्दर बैंगनकी तरह ही उसे भी तोड़कर खाया
जा सकनेवाला पदार्थ समझें ।
{{Gap}}अब तुम समझ सकोगे कि जो प्रस्ताव मैंने तुम्हारी अनुपस्थितिमें लागू होने
दिये अथवा कहो कि उन्हें लागू करनेकी प्रेरणा दी, उनके कारण तुम्हें आघात नहीं
पहुँचना चाहिए। तुमने जिन बातोंको स्पष्ट कराना चाहा था उन्हें मैंने धैर्यपूर्वक आपसमें
चर्चा करके और कराके स्पष्ट कर दिया है। इससे अधिक या कम हमसे हो ही
नहीं सकता। यह जो बार-बार उफान आता है वह तो जरा फूंक मार देने या
थोडेसे पानी के छींटे दे देनेसे बैठ जायेगा। हमें दूधको चूल्हे परसे उतारने की जरूरत
नहीं है। यदि मैं चौकस रहूँगा तो न तो उसके जलनेकी संभावना है और न
उफननेकी ही । और अगर चौकसीके बावजूद वह उफन जाये या जल जाये तो
इसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। 'गीता' इसका प्रमाण है ।
{{Gap}}वहाँके कुछ काम तुम्हें अच्छे लगते हैं और यहाँके कुछ काम बुरे लगते हैं,
इसमें सचाई है और नहीं भी है। किन्तु नहीं की मात्रा अधिक है। किन्तु हम अपने
दोषोंको बढ़ा-चढ़ाकर देखें यही उचित है। ऐसा करते-करते ही हमें प्रमाणका अन्दाज
हो जायेगा। इसलिए मैं यह मानता हूँ कि तुम सही हो। तुम्हारे पहले पत्रोंकी
जो बातें मुझे याद रह गई, इतना उनके उत्तरमें है ।
{{Gap}}अब तुम्हारे हालके पत्रका उत्तर देता हूँ । यदि तुम्हारा स्वास्थ्य वहाँ ठीक
नहीं रहेगा तो मैं तुम्हें वहाँ नहीं रहने दे सकता । तुम्हारा स्वास्थ्य बिगड़नेका कारण
यह है कि तुमने झूठी विनय और झूठी शर्म दिखाई है। कच्चा खाना तो खाना
ही नहीं चाहिए। तुम्हें जिस चीजकी आवश्यकता है यदि वह वहाँ न मिल सके तो
स्वयं दुःख माने बिना या किसीको आघात पहुँचाये बिना तुम्हें खुद बाहर जाकर उक्त
वस्तु प्राप्त कर लेनी चाहिए। यही सच्ची मित्रताका लक्षण है। यदि तुम वहाँकी
दाल नहीं खा पाते तो तुम दूध-रोटी और फलों या कच्ची तरकारियों जैसे टमाटर
आदिपर आराम तथा आसानीसे रह सकते हो ।
{{Gap}}मैं तो तम्बूमें ही रहना चाहता हूँ। टंडनजीने भी यही तय किया है।
वल्लभभाईने अहमदाबादमें जैसी व्यवस्था की थी यदि वैसी ही लाहौरमें भी हो
जाये तो ठीक है। तुम्हारे विवरणसे मुझे ऐसा लगता है कि वैसी ही व्यवस्था होगी ।
डा० गोपीचन्द इतना याद रखें कि मेरे साथ बहुतसे लूले लंगड़े होंगे। वे सब वहाँ
रह सकें इतनी जगह होनी चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि मेरे लिए जो व्यवस्था
हो उसे एक छोटे-मोटे आश्रमका रूप दे देना चाहिए। और दर्शनाभिलाषियोंसे त्राण
पानेके लिए मैं कैद हो सकूं ऐसी बाड़ लगा देनी चाहिए। यदि इतना हो जाये तो
फिर कोई और कष्ट देने लेनेको नहीं रह जायेगा ।
यह एक बड़ा आशाजनक लक्षण है कि तुम्हें वहां जब-तब खादी भक्तोंके दर्शन
हो जाते हैं और वे सब मिलकर रहते हैं ।
{{Gap}}मगनलाल स्मारकके सम्बन्ध में मैं अवश्य याद रखूंगा। हम उक्त स्मारककी
आश्रम में व्यवस्था कर सकेंगे या नहीं, इस बारेमें मुझे सन्देह है। हम तो 'एसोसिएट'<noinclude></noinclude>
1yihf3emcat2s16hdgtvte99fli7ryb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२७८
250
196697
672871
669082
2026-08-22T13:54:50Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672871
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२४०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
( सहायक ) को ही रख सकते हैं किन्तु यह नियम इस काममें बहुत आड़े आयेगा,
ऐसा नहीं लगता । और इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। किन्तु यह जान
लेनेके बावजूद कि 'एसोसिएट' (सहायक) मिलेगा ही नहीं, तुम्हें आत्मविश्वास हो
तो मुझे लिखना । डाक्टरका मकान न तो मिल सकता है और न उसका उपयोग
किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त नीचे के हिस्सेको मैं पर्याप्त नहीं मानता। स्मारक
के लिए नया मकान चिनवानेपर ही मुक्ति मिलेगी। स्मारक विद्यापीठमें रहे, या
वर्धा में जमनालालजीके बगीचे में, मुझे इसमें कोई बुराई दिखाई नहीं देती। किन्तु
दोनों जगहों में से कहाँ हो, इस प्रकारका दो टूक निर्णय फिलहाल नहीं कर सकता।
पानी आदिके बारेमें यदि रतिलाल कोई अड़चन खड़ी करे तो उसपर ध्यान देनेकी
जरूरत नहीं। क्योंकि वह उसका मालिक है। किन्तु हम उसके न्यासी हैं इसलिए
हमें इस बातपर स्वतन्त्रतापूर्वक विचार करना है कि उस पानीका किस हदतक
तथा कहाँ उपयोग करना चाहिए। यह बात मैंने रमणीकलालको समझा दी है।
{{Gap}}सिन्ध संकट निवारणके बारेमें तुमने याद दिलाकर बहुत ठीक किया। मेरे
ध्यान से भी यह बात उतरी नहीं थी । किन्तु उतावलीमें उस पैसेका उपयोग कर
बैठनेसे धर्मका पालन नहीं होता। मलाबार संकटका धन खादीके काम में लगानेकी राय
मैंने नहीं दी। बल्कि मलावार संकटके नामपर हमने जो पैसा उगाहा है उसे मलाबारके
बाहरके संकटोंमें खर्च करने की छूट ली थी। संकटका निवारण खादीके द्वारा हुआ,
क्योंकि ऐसे संकटोंके निवारणके लिए हमने खादीको चुना है। मलाबारमें भी खादी
के द्वारा बहुत हद तक संकटका सामना किया गया था। इस सम्बन्धमें मेरे मनमें
कोई दुविधा नहीं है। सिन्धके बारेमें तो निर्णय किया ही जा चुका है। वह इस
प्रकार कि जब जयरामदास या मलकानी माँगें तब यह पैसा भेज दिया जाये। और
ये दोनों संकट में पड़े व्यक्तियोंको खादीके द्वारा मदद पहुँचाने की योजना बना रहे हैं।
मलकानीके पास फिलहाल तो पैसेकी इफरात है। उसमें का आधेसे अधिक पैसा बेकार
खर्च हो चुका है और अब वह बेचारा टुकुर-टुकुर ताक रहा है। मलाबारके बारेमें
एक बात लिखना मैं भूल गया। मलावार संकट निवारण [ कोष ] का ही दूसरा नाम
दक्षिण संकट निवारण [कोष ] था, किन्तु लोगोंको भ्रम न हो जाये इस विचारसे
मैंने उक्त मामले को अधिक स्पष्ट करते हुए नोटिस निकाला था। यह पैसा दक्षिणके
संकट निवारण में खर्च किया गया था। असमके पैसेके बारे में मैं निर्णय नहीं कर सका ।
किन्तु इसका निर्णय करनेके लिए मुझे सतीशबाबूकी सलाह लेनी पड़ेगी। एक महीने से
मैं उनसे पत्रव्यवहार कर रहा हूँ ।
{{Gap}}वरमाला पहननेके लिए दो उम्मीदवार हैं। एक तो सिलहटके धीरेन और
दूसरे कोमिल्लाके सुरेश । अब सिर्फ इसी बातपर विचार करना है कि यह वरमाला
किसको पहननी चाहिए या दोनोंको पहननी चाहिए।
{{Gap}}औपनिवेशिक मददका खाता भले बना रहे। इस बारेमें मैंने रमणीकलालको कबका
सब कुछ समझा दिया है। अभी तो ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं यह पैसा जहांगीरजीसे
ले सकूं। किन्तु जीतेजी यदि में यह पैसा न ले सकूं और तुम उसे बट्टे खाते<noinclude></noinclude>
buzlqwggb4k1mk84txfh5vidwkx9f5i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२७९
250
196698
672873
669083
2026-08-22T13:56:57Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672873
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र: छगनलाल जोशीको|
२४१}}
डाल दो या मूल न जाओ तो मेरे बाद भी उस पैसेको वहाँसे ले सकते हो। आज
मी यदि मैं इस काम में अपना समय लगाऊँ, कुछ जोर डालूं बार-बार तकाजा करूँ तो
यह पैसा मैं ले तो सकता हूँ किन्तु ऐसा करनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है और
ऐसा करने की आवश्यकता भी नहीं है। मुझे इतना विश्वास है कि जहाँगीरजीके पास
जो पैसा पड़ा है वह इसी खातेका है; इसी में मुझे सन्तोष है। आगामी वर्ष बिड़लाकी
तरफ से जो पैसा मिलनेवाला है वह मिलेगा। वे और उनकी पेढ़ी अगर सही-सलामत
रहेगी तो पैसा अवश्य मिलेगा। इस खाते में से मजूर-महाजनको जो मदद दी जाती
है, वह तबतक दी जाती रहेगी जबतक अनसूयाबहन चाहेंगी। वे कोई दूसरा प्रबन्ध
कर लेने की कोशिश कर रही है।
{{Gap}}जो रकमें वसूल होतो नजर नहीं आतीं उन्हें में अवश्य जाँचना चाहूँगा । किन्तु
ऐसी रकमें हमारे पक्के चिट्ठेमें अलगसे दिखाई जानी चाहिए ताकि किसी तरहका
भ्रम पैदा न हो। क्योंकि आज जो रकम वसूल होती नजर नहीं आती उसे भविष्य में
वसूल करना सम्भव नहीं होगा। ऐसी एक-दो रकमें तो आज भी मुझे याद हैं- - जैसे
कि सीतला सहायकी और दूसरी रूपालीकी रकम ।
{{Gap}}नानुभाईको ले लेनेका प्रयत्न तो मैं कर रहा हूँ। वे कल मुझसे मिले थे ।
ये आश्रम में रहने में शरमाते हैं और बीजापुरमें रहना उन्हें रुचेगा नहीं। उन्होंने कहीं
और रखनेका आग्रह किया है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करना सम्भव होगा। किन्तु
मैं ऐसा मानता हूँ कि उन्हें आश्रम की ओर आकृष्ट किया जा सकता है। उन्होंने इस
बारेमें सोचने-विचारनेके लिए समय मांगा और वे कल बीजापुर चले गये ।
{{Gap}}मनजीकी समस्या ऐसी नहीं है जिससे परेशानी हो। जबतक गंगाबहनको पुसाये,
सास-बहू वहाँ सुखसे रहें । यहाँतक मैंने ४.१५ बजे तक लिखवाया । यहाँ आगे
लिलयानेके लिए २.४५ बजे उठा । तुमपर उपकार करनेके लिए मैंने ऐसा नहीं किया
बल्कि जिन लोगों से मुझे काम लेना है उनका पथ-प्रदर्शन करनेके लिए किया है।
इससे मुझे आत्मिक शान्ति मिलती है ।
{{Gap}}कृष्णमैया देवीके बारेमें गंगाबहनसे बात करनेपर उन्होंने कहा कि अभी तो
गाड़ी चल रही है और वह ठीक-ठीक काम कर रही है। मौनी भी काम करती
जान पड़ती है। जबतक कि उसके बारेमें कोई शिकायत नहीं है तबतक कुछ करनेकी
जरूरत नहीं जान पड़ती।
भणसालीसे बातचीत नहीं हो सकी। वे जबसे नानीबहनके बारेमें मुझसे मिलकर
गये हैं उसके बाद फिर नहीं आये। मैं खुद भी नहीं जा सका। किन्तु मैं उनसे
बात कर लूंगा। उनके बच्चोंका विद्यापीठ जाना मुझे अच्छा नहीं लगता । किन्तु वे
एक प्रकार से मेहमानके तौरपर रहते हैं, यह मानकर में अपनेको समझा लेता हूँ ।
किन्तु इस दृष्टान्तके आधारपर कोई मन्दिरवासी अपने बच्चोंको विद्यापीठमें नहीं
भेज सकता । नयन और रूपी जाते हैं, इस बातको हमें सहन कर लेना चाहिए,
क्योंकि उन्हें शिक्षा, ग्राम्य जीवन बितानेके लिए नहीं बल्कि शहरी जीवनकी दी जा
रही है।
<Br>४२-१६<noinclude></noinclude>
0pdpegc9y0ybcqwsg896b8ulrbtr93v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८०
250
196699
672875
669084
2026-08-22T13:59:14Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672875
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२४२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
मैने दिनकररावसे बात की थी। इस बारेमें मैंने गोशाला समितिकी बैठक
भी बुलाई थी। इस सम्बन्ध में मुझे अब नियमोंका मसविदा तैयार करना होगा। वे
जबतक मन्दिरमें रहें तबतक ब्रह्मचयंका पालन करें, इतना ही काफी है। इससे मैं या
हम कुछ गंवायेंगे नहीं। मनुष्य यदि अपने नैतिक कल्याण या सेवाके लिए ब्रह्मचर्यका
पालन करे तो यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा करना निरर्थक अथवा अनुचित
है। हमारे लिए इतना ही काफी होगा कि वह हमें चकमा न दे। मेरा विश्वास है
कि मन्दिर में रहनेवाले ईमानदारीसे प्रयत्न करते हैं। यह सम्भव है कि कोई हमें
धोखा देता हो । किन्तु इससे न तो हमारे नियमोंका प्रभाव कम होता है और न
उन्हें अनावश्यक ही सिद्ध किया जा सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि
जबतक यह दुनिया कायम है तबतक धोला देनेवाले भी रहेंगे ही। हमें तो सिर्फ यही
देखना है कि इस नियमकी शीतल छाया तले किसीको शान्ति मिली है या नहीं ।
इसका उत्तर तो इतना स्पष्ट है जिसके बारेमें कोई शंका ही नहीं कर सकता ।
इन नियमोंकी छायाके कारण मगनलाल तथा अन्य लोग तर गये। प्रभुदास तथा अन्य
बालक, राधा तथा अन्य बालिकाएँ इन नियमोंके प्रतापसे टिकी हुई हैं। मुझे ऐसा
नहीं लगता कि दिनकरराव धोखा देगा । यो कौन किसके बारेमें गारंटी दे सकता
है ? " अनिच्छत्मपि पापं चरति पुरुष "
यह शाश्वत वाक्य है। मुझे विश्वास
है कि दिनकरराव अपने वचनका पालन करेगा। पारनेरकर आदिका यही विश्वास है ।
फिलहाल दुग्धालयको मन्दिरके नियमोंके अनुसार ही चलाना चाहिए। वह अभी स्वतन्त्र
रूपसे चलाने लायक नहीं बन सका है। यह उनका अपना स्वतन्त्र विचार है और
इसमें दिनकरराव भी शामिल है।
{{Gap}}सम्मिलित भोजनालय से जो पुराने परिवार अलग होना चाहें, मैंने उन्हें अलग
होनेकी अनुमति दे देनेको कह दिया है। इस मामलेमें रमावहनने कल पहल की ।
मैंने इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया। उसकी स्पष्टताके लिए मैंने उसे मन ही मन
{{Gap}}धन्यवाद दिया। इस कारण तुम्हें दुःख न करके प्रसन्न होना चाहिए। उससे मैं
खुलकर बातें नहीं कर सका और शायद वह भी नहीं करना चाहेगी।
बालिकाओंके लिए अलग भोजनालयकी बात मेरे गले नहीं उतरती। जो होना
होगा सो धीरे-धीरे सामने आ जायेगा ।
आजकल कन्या आश्रमके नियमोंका मतलब है गंगाबहन । वह भले ही अन्य
नियमोंको ध्यान में रखकर चलें ।
{{Gap}}हमें यह आशा रखनी चाहिए कि जो यह सब हम आज नहीं कर पा रहे हैं उसे
भविष्य में करनेकी सामर्थ्य हममें आ जायेगी। यदि हम असफल होंगे और मूल दिखाई
देगी तो हम उसे सुधार लेंगे ।
{{Gap}}शिवाभाईको मैं जिम्मेदार आदमी मानता हूँ । यदि यह गिरेगा तो अपनी जगह से
हट जायेगा और दूसरोंके लिए रास्ता छोड़ देगा। जहाँ नियमोंके बन्धनमें बंधकर
चलना पड़ता है वहाँ दंभीको भी थोड़ी-बहुत जगह मिल जाती है। उसमें हम क्या
<Br>२. भगवद्गीता, ३-३६ ।<noinclude></noinclude>
ipyq2iuo4pshav6od87xvnv0e98iyml
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८१
250
196700
672877
669085
2026-08-22T14:01:42Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672877
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : मीराबहनको|
२४३}}
कर सकते हैं? सूरजके पीछे अँधेरा तो होता ही है। अब तुम्हारे पत्रोंकी किसी
बातका उत्तर देने को नहीं रहा।
गुजराती (जी० एन० ४२११ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh||||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|२४८. पत्र : मीराबहनको}}
चि० मीरा,
प्रात: ५.३०, मौनवार, २ दिसम्बर, १९२९
{{Gap}}मैं यह पत्र साप्ताहिक मौन शुरू कर देनेके बाद लिख रहा हूँ। मुझे तुम्हारे
सब पत्र और तार मिले। मुझे 'यंग इंडिया के लिए लिखी तुम्हारी टिप्पणियाँ भी
मिल गई। इनमें से एक आगामी संस्करण [में] प्रकाशित हो जायेगी। इस बार
इसे [ अधिक सामग्री हो जानेके कारण ] स्थान नहीं मिला।
{{Gap}}अब तुम्हारा स्वास्थ्य सामान्य है यह जानकर मुझे राहत मिली है। आशा है
कि अब वह नहीं बिगढ़ पायेगा।
मथुरादासने धुनाईका नया तरीका चलाया है। मैं इसे सीखनेकी कोशिश कर
रहा हूँ।
डा० और श्रीमती शेरवुड एडी और श्री तथा श्रीमती कर्कले पेज कल आ रहे
हैं। कितना अच्छा होता कि तुम उनसे मिल पाती। आशा है कि मैं उन्हें बहुत
अच्छा पाऊँगा ।
स्नेह,
[ पुनश्चः ]
{{Rh|||बापू}}
{{Gap}}सम्भव है कि इस पत्रके पहुँचनेसे पहले महादेव तुमसे मिल ले। तब वह तुम्हें
सारी खबरें बतायेगा ।
{{Gap}}मैंने तुम्हारी दो टिप्पणियाँ रेल यात्रा और हिंसा पढ़ी है । तुमने दूसरी
टिप्पणी उसी कागजपर शुरू कर दी है जहाँ पहली खत्म होती है। यह मेरे लिए
और कम्पोजीटरके लिए असुविधाजनक होता है। अलग टिप्पणी अलग कागजपर
शुरू की जानी चाहिए। टॉम टॉम (Tom-Tom ) तो एक तरहका नगाड़ा हुआ ।
{{Gap}}गाड़ीको टमटम कहते हैं और उसके हिज्जेमें Tum-Tum किये जाते हैं। दोनों
टिप्पणियाँ छप जायेंगी। एक जगह मुझे शिथिल विचार लगा था और दूसरी एक
जगह घटनाओंके कथन अप्रासंगिक; उनको मैंने संशोधित कर दिया है।
१. देखिए "हमारे भाईबन्द पेड़, ५-१२-१९२९ ।
२. देखिए "तीसरे दर्जेका डिब्बा, १२-१२-१९२९ ।
३. यंग इंडिया, १९-१२-१९२९ में "द फ्यूटिलिटी ऑफ वास", शीर्षकसे प्रकाशित ।<noinclude></noinclude>
f9g2iyq4dscc6zz2tx0ejm8d526px5k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८२
250
196701
672879
669086
2026-08-22T14:04:06Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672879
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२४४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
है कि दोनों संशोधन तुम्हारी निगाह में आ जायेंगे। कुछ अन्य मामूली संशोधन
भी किये हैं। यद्यपि टिप्पणियाँ छपने दी जा रही है: परन्तु वे तुम्हारे स्तरके अनुरूप
नहीं हैं। सुधारकी काफी गुंजाइश है। सम्भवतः जब तुम अपने उस लिखे हुएको
सपाट छपी छपाई सामग्रीके रूपमें देखोगी तब तुम्हें खुद ऐसा ही महसूस होगा।
इसलिए लिखने में नियमित होनेकी कोशिश मत करो। तुम जो लिखना चाहो उसपर
खूब विचार करो और यदि तुम चाहो तो उसे बार-बार दस बार तबतक लिखो जबतक
कि कमसे कम खुद तुम्हें यह लगने लगे कि अब में इसमें और सुधार नहीं कर
सकती। फिलहाल तुम तत्काल मेरा बोझ हल्का करनेके विचारसे बिलकुल मत लिखो;
बल्कि इसलिए लिखती रहो कि भविष्य में मेरा स्थान ले सको । बोझ तो पहलेसे ही
हल्का हो गया है। बालजीने मुझे जितनी सामग्री दी है, उसमेंसे में इस हफ्तेके लिए
सिर्फ छठवाँ हिस्सा ले सका हूँ। कुमारप्पा और महादेवने जो सामग्री दी है वह तुम
देख चुकी हो ।
[ पुनश्च: ]
तुमने मुंगेर के बारेमें स्वयं जो निर्णय किया है वह बिलकुल सही है ।
अंग्रेजी (जी० एन० ९४३८) से; तथा सी० डब्ल्यू० ५३८२से भी ।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|'''२४९. पुर्जी : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}
{{Rh|||बापू}}
{{Rh|||मौनवार [ २ दिसम्बर, १९२९}}
प्रिय रेनॉल्ड्स,
{{Gap}}मैंने आपकी नाक से खून बहते देखा था। चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है ।
थोड़ा आराम करें और नाकसे ठण्डा पानी पीकर उसे मुंहसे बाहर निकालें तथा सिर
और उसके पीछे भागवर ठण्डा पानी डालें ।
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ४५३७ ) की फोटो- नकलसे ।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज फिलाडेल्फिया
१. तिथिका निर्धारण इन्सीडेंट्स आफ गांधीजीज लाइफके रेजिर्नोस्ड रेनॉल्ट्सके लेटर्स फ्रॉम
बापू नामक लेखमें दी गई उसके आधारपर किया गया है।<noinclude></noinclude>
lpqxl8fuwjiu1eee03dtl4h67p7pdtc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८३
250
196702
672881
669087
2026-08-22T14:07:35Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672881
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५०. पत्र : एम० जे० को'''}}
{{Rh|||उद्योग मन्दिर}}
{{Rh|||सत्याग्रहाश्रम, साबरमती}}
{{Rh|||२ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>भाई एम० जे०,
{{Gap}}यदि तुम अपना पूरा धन परोपकारार्थं खर्च करना चाहो तो बहनको कुछ
देनेका प्रश्न ही नहीं उठता। जो गलती होनी थी सो हो गई। बहनपर कोई कर्ज
नहीं है। फिलहाल तुमने जिस कर्जके बारेमें लिखा है वह काल्पनिक है और उसे
द्रव्यके द्वारा नहीं चुकाया जा सकता। हाँ, स्त्री-जगतकी सेवा करके उक्त कर्ज कुछ
हद तक चुकाया जा सकता है।
{{Gap}}अब तुम्हारे बारे में यदि तुम्हारे पास पैसा है तो तुम यहाँसे थोड़ा-सा पैसा
मी क्यों लेते हों ? जिज्ञासु मुमुक्षु बिना कारण ऐसा नहीं करते। यह बात तो मैंने
सामान्य रूपसे कही। भाई छगनलाल जोशी यदि किसी रूपमें तुमसे वचनबद्ध हों तो
उससे उद्योग मन्दिर और में दोनों ही बँधे हुए हैं। अतः तुमने जो पैसा मांगा है
वह तुम्हें मिलना चाहिए या नहीं उसका निर्णय तो जोशी ही कर सकते हैं या
फिर उनसे बात करनेके बाद मैं अपनी राय दे सकता हूँ । यदि भाई रमणीकलाल
या शिवाभाई इस सम्बन्धमें कुछ जानते हों तो इस मामलेका तुरन्त निबटारा हो
सकता है। तुम उनसे मिलना। इस प्रकार यदि तुम्हें पैसा दिया जा सके तो भी
तुम्हारे सामने नैतिक प्रश्न तो बना ही रहेगा ।
तुम्हारे छुट्टीपर जानेके बारेमें -
{{Gap}}यह काम भाई रमणीकलालके अधिकार क्षेत्रका ही है। यदि वे जाने दें तो
अवश्य जाओ। तुम्हारा जाना आवश्यक तो है ही ।
{{Gap}}तुम्हें हिसाब-किताबका काम दे दिया गया है यह मुझे भी गलत ही लगता
है। मैं यह नहीं जानता कि तुम्हें यह काम क्यों दिया गया है। सामान्यतः मेरी
राय यह है कि जो नये लोग आयें जबतक वे कताई और उससे सम्बन्धित क्रियाएँ
भलीभांति न सीख लें तबतक बही-खाता आदि रखनेकी उनकी जानकारीका लाभ
नहीं उठाना चाहिए ।
{{Rh|||}}बापूके आशीर्वाद
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० १५८३९ ) की माइक्रोफिल्म से ।<noinclude></noinclude>
dry8e4q7hr10zdx14zkmphtscog26tp
672883
672881
2026-08-22T14:07:58Z
Lado Shaw
6039
672883
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५०. पत्र : एम० जे० को'''}}
{{Rh|||उद्योग मन्दिर}}
{{Rh|||सत्याग्रहाश्रम, साबरमती}}
{{Rh|||२ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>भाई एम० जे०,
{{Gap}}यदि तुम अपना पूरा धन परोपकारार्थं खर्च करना चाहो तो बहनको कुछ
देनेका प्रश्न ही नहीं उठता। जो गलती होनी थी सो हो गई। बहनपर कोई कर्ज
नहीं है। फिलहाल तुमने जिस कर्जके बारेमें लिखा है वह काल्पनिक है और उसे
द्रव्यके द्वारा नहीं चुकाया जा सकता। हाँ, स्त्री-जगतकी सेवा करके उक्त कर्ज कुछ
हद तक चुकाया जा सकता है।
{{Gap}}अब तुम्हारे बारे में यदि तुम्हारे पास पैसा है तो तुम यहाँसे थोड़ा-सा पैसा
मी क्यों लेते हों ? जिज्ञासु मुमुक्षु बिना कारण ऐसा नहीं करते। यह बात तो मैंने
सामान्य रूपसे कही। भाई छगनलाल जोशी यदि किसी रूपमें तुमसे वचनबद्ध हों तो
उससे उद्योग मन्दिर और में दोनों ही बँधे हुए हैं। अतः तुमने जो पैसा मांगा है
वह तुम्हें मिलना चाहिए या नहीं उसका निर्णय तो जोशी ही कर सकते हैं या
फिर उनसे बात करनेके बाद मैं अपनी राय दे सकता हूँ । यदि भाई रमणीकलाल
या शिवाभाई इस सम्बन्धमें कुछ जानते हों तो इस मामलेका तुरन्त निबटारा हो
सकता है। तुम उनसे मिलना। इस प्रकार यदि तुम्हें पैसा दिया जा सके तो भी
तुम्हारे सामने नैतिक प्रश्न तो बना ही रहेगा ।
तुम्हारे छुट्टीपर जानेके बारेमें -
{{Gap}}यह काम भाई रमणीकलालके अधिकार क्षेत्रका ही है। यदि वे जाने दें तो
अवश्य जाओ। तुम्हारा जाना आवश्यक तो है ही ।
{{Gap}}तुम्हें हिसाब-किताबका काम दे दिया गया है यह मुझे भी गलत ही लगता
है। मैं यह नहीं जानता कि तुम्हें यह काम क्यों दिया गया है। सामान्यतः मेरी
राय यह है कि जो नये लोग आयें जबतक वे कताई और उससे सम्बन्धित क्रियाएँ
भलीभांति न सीख लें तबतक बही-खाता आदि रखनेकी उनकी जानकारीका लाभ
नहीं उठाना चाहिए ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० १५८३९ ) की माइक्रोफिल्म से ।<noinclude></noinclude>
ff860fzbak1j7as3alpz4hddjgq1mh0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८४
250
196703
672899
669088
2026-08-22T14:31:40Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672899
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५१. पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको'''}}
{{Rh|||२ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>सुज्ञ माईश्री,
{{Gap}}आपका पत्र और तार मिला। मैंने यह मान लिया था कि आप यह समझ
लेंगे कि मेरा उत्तर तो उसीके बारेमें है जो वहाँ हुआ। कामकी फसल इतनी
जोरदार है कि उससे मेरा दम ही घुटने लगा है। यदि ऐसा न होता तो आपको
विस्तारते लिखता । फिलहाल तो इतना ही आश्वासन दे सकता हूँ कि आपके जैसे
मित्र समय-समयपर मुझे लिखते हैं उसे मैं ध्यान में रखता हूँ। मैं आपको इतना
विश्वास दिलाता हूँ कि मैं वही करूँगा जो मेरी अन्तरात्मा कहेगी। अपने कुकर्मोंके
कारण यदि मेरी अन्तरात्मा जड़ हो जाये और कोई दूसरी शक्ति काम करने लगे
तो कौन जाने, अन्तरात्मा कब पुकारती है तथा परिपुओंमें से एक या सब, कब
सिरपर चढ़कर बोलते हैं इस बातका कैसे पता चले ? इसका पता तो
चल सकता है न ? मेरी तबीयत बहुत अच्छी है। लगता है आप
आश्रम जानेके अपने वचनका ठीक-ठीक पालन कर रहे हैं।
गुजराती (जी० एन० ५९११ ) की फोटो नकलसे।
{{Rh|||मोहनदासके वन्देमातरम्}}
{{C|'''२५२. पुर्जी : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}
{{Rh|||मौनवार [३ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>प्रिय रेनॉल्ड्स,
{{Gap}}मैं आज आनेवाले मेहमानोंके सम्बन्धमें कुछ चिन्तित हूँ। मेरी यह हार्दिक
इच्छा है कि हम अपनी शक्तिभर उन्हें आवश्यक शारीरिक सुविधाएं मुहैय्या कर दें ।
आप कृपया उनका आथित्य करनेमें सोतलासहायकी मदद करें और इसका खयाल
रखें कि इस अपरिचित जगहपर उन्हें अजनबी जैसा न लगे ।
{{Rh|||मो० क० गांधी}}
{{Gap}}अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ४५३८ ) की फोटो - नकलसे ।
सौजन्य: स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{Gap}}१. देखिए “पुर्जी रेजिर्नोड रेनॉल्ड्सको” तथा “पत्र मीराबदनको <br>२-१२-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
r8ku0wkjiqi39n8zijbv7pb3dle4fy4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८५
250
196704
672887
669089
2026-08-22T14:13:48Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672887
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५३. भाषण: प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रम में'''}}
{{Rh|||४ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}किसीके मन में यह प्रश्न उठेगा कि आश्रम और विवाह, इन दो बातोंका मेल
कैसे बैठ सकता है ? इसका उत्तर यह है कि इसमें परस्पर कुछ भी विरोध नहीं
है। जो ब्रह्मचर्य का पालन कर सकें वे ब्रह्मचारी रहें और जो न कर सकें ये विवाह
कर लें, यह उचित है। कोई यह न समझे कि ब्रह्मचारी सभी अच्छे होते हैं और
विवाहित सभी घटिया होते हैं। हो सकता है कि ग्रहस्य गुणवान हो और ब्रह्मचारी
दम्भी । यही कारण है कि विवाहको उपाधी समझते हुए भी हम इष्ट मानते हैं ।
{{Gap}}इस विवाह में हम एक कदम आगे बढ़े हैं। मणिलाल (बापूके द्वितीय पुत्र ) के
fare में हमने जातिकी बाढ़ तोड़ी, इस विवाह में प्रान्तको सीमाको लांघा । गुजरातसे
मेवाड़ गये। यह शुभ चिह्न है। परन्तु इससे हमारी जिम्मेवारी भी बढ़ गई है।
हम जो विवाह यहाँ करते हैं वे धार्मिक विधि और धार्मिक दृष्टिसे करते हैं। उनमें
मर्यादा पालनकी चेष्टा रहती है। आजके इस आपत्कालमें देशकी स्थितिको देखकर
यदि इन्द्रिय-निग्रह कर सकें तो बहुत अच्छी बात है; किन्तु यह बात जोर-जबसे
नहीं हो सकती। इसलिए यदि लड़का-लड़की चाहें तो उनका विवाह कर देना चाहिये
और उनके लिये जोड़ी ढूंढकर अपने आशीर्वादके साथ उनका विवाह कर देना आश्रमका
कर्तव्य है। अबतक इसीके अनुसार यहाँ व्यवहार होता रहा है और उसका फल
बुरा नहीं हुआ। हम बिना किसी आडंबरके, थोड़े समयमें, पवित्र हृदयके द्वारा
विवाह विधि सम्पन्न करते हैं, यह हर्षकी बात है ।
{{Gap}}इस विवाह आरंभ में क्षोभ और व्यग्रता उत्पन्न हुई थी; पर धीरे-धीरे वह
शान्त हो गई। इस सम्बन्धमें जितनी सावधानी रखी जा सकती है उतनी रखी गई
है । वर-वधुकी सम्मती लेकर ही यह विवाह किया गया है। इसमें मैंने व्यक्तिगत
सुखका विचार नहीं किया है। इसी बात को अपनी दृष्टिके सामने रखा है कि देशका
हित किस बात में है। इस विवाह द्वारा एक प्रान्त दूसरे प्रान्तके निकट आता है ।
यह पहला प्रयोग है।
'''श्री शंकरलालको संबोधन करके कहा :'''
{{Gap}}इसमें जितनी जिम्मेवारी उमियापर है उससे सौ-गुनी ज्यादा आपपर है ।
उमियाकी हिम्मतको देखकर मुझे खुशी हुई है। उसकी इच्छाओंको जानते रहियेगा ।
हिन्दू समाज में स्त्रीका स्त्रीत्व कम हो गया है। वह अबला हो गई है। इसलिये आप उसे
स्वतन्त्रता दीजियेगा । आप तो स्काउट है। स्काउटका धर्म है सबकी रक्षा करना ।
उमिया यह न अनुभव करे कि मुझे दुःख है। वह यही समझती रहे कि यहाँ तो
{{Gap}}१. इस दिन आश्रम में शंकरलाल अग्रवाल और उमियाका विवाह हुआ था।<noinclude></noinclude>
3bkqcuu4aphql2d814icr27tfhbghmj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८६
250
196705
672889
669090
2026-08-22T14:17:03Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672889
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२४८|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
सब मुझपर प्रेमामृत बरसाते हैं। मैं उसे हिन्दी अधिक न पढ़ा सका सो उसे
निवाह लीजियेगा। यदि सब अपनी-अपनी जिम्मेदारीकी समझकर काम करें, तो
मारवाड़ी और गुजराती में भेद नहीं रह सकता। धर्म और मर्यादाको कभी न
भूलियेगा। दोनोंसे कहता हूँ कि मर्यादित रहकर भोगोंको भोगना और अपने देशको
कभी न भूलना ।
{{Gap}}उमिया तुमसे कया कहूँ? इतना समय नहीं कि तुमसे अकेले में बातचीत करूँ ।
तुमने बहादुरी दिखाई है। तुम अपने कुल प्रान्त और आश्रमकी कीर्ति बढ़ाना। तुम्हारे
हाथसे कोई बुरा काम न हो। मैंने तुम दोनोंको छोटासा हार पहनाया है। पर मेरी
दृष्टि में यह बड़ा है। 'गीताजी 'का रोज पाठ करना। जब-जब मनमें निराशा आने
लगे तब तब 'भजनावलिमें से भजन गाना। फुरसतके समय तकली कातना और
आनंदसे रहना । ईश्वर तुम लोगोंको सच्चे सेवक-सेविका बनावे, दीर्घायु करे। तुम
दोनों इस तरह जीवन बिताना कि मुझे पश्चाताप न हो।
'''बापू मैने क्या देखा, क्या समझा ?'''
{{C|'''२५४. हमारे भाईबन्द - पेड़''''}}
{{<Gap}}यद्यपि समय बहुत हो चुका था फिर भी गांधीजी सोनेसे पहले थोड़ी
ई धुनकर पूनियाँ बना लेना चाहते थे। में धुनकी वगैरा ठीक करनेके लिए
चली गई, और जल्दीमें एक स्थानीय स्वयंसेवकसे पास के बगीचेमें जाकर बबूलके
कुछ पते ले आनेको कहा। घुनकीकी तांतपर मलनेके लिए इन पत्तोंकी
जरूरत पड़ती है।
{{Gap}}स्वयंसेवक एक बड़ी-सी डाली ले आया, और जैसे ही उसने वह मेरे
हायपर रखी, मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके सारेके सारे नन्हें पत्ते
एक-दूसरे से सटकर पड़े हुए थे ।
{{Gap}}में उन्हें लेकर गांधीजीके कमरेमें गई और बोली “बापूजी, देखिए तो,
ये नन्हें-नन्हें हरे पत्ते सो रहे हैं! "
{{Gap}}गांधीजीने सिर उठाकर देखा। उनकी आंखोंमें रोष और दया भरी हुई
थी। वह बोले : 'सचमुच ही सो रहे हैं। क्योंकि पेड़ भी हमारे जैसे ही प्राणवान
प्राणी हैं। उनमें जान है, वे सांस लेते हैं, हमारी ही तरह वे खाते-पीते
हैं और हमारी ही तरह उन्हें सोनेकी जरूरत है। रातको जब कि पेड़ आराम
करते हैं, उस समय पत्तियां तोड़ना बहुत बुरी बात है; दुःखद है। तुम इतनी
सारी पत्तियाँ क्यों तोड़ लाई हो ? दो-चार पत्तियाँ हो तो चाहिए थीं। कलकी
सभामें फूलोंके बारेमें मैंने जो कुछ कहा था, सो तो तुमने सुना ही होगा;
मुझे यह देखकर कितना ज्यादा दुःख होता है कि लोग मुझपर बरसाने या
<Br>१. देखिए १४२४३-४४ ।<noinclude></noinclude>
lbx6mt4gp954ueuyzn7zfzdwhmbrtxb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८७
250
196706
672890
669091
2026-08-22T14:19:26Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672890
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||हमारे भाईबन्द - पेड़|
२४९}}
मेरे गलेमें माला डालनेके लिए फूलकी ढेरों कोमल कलियाँको तोड़-मरोड़ डालते
हैं। इस तरह इतनी रात बीते उस पेड़को कष्ट पहुँचानेके लिए, जब उसने
सोनेके लिए अपनी पत्तियाँ समेट ली थीं किसीको भेजना, मूर्खता हो तो थी
न? हमें शेष सब प्राणी जगतसे अपना अत्यन्त सजीव प्रेम महसूस करना
चाहिए।
{{Gap}}मारे शर्मके सिर झुकाकर मैंने कहा: “बापू, आप ठीक कहते हैं। में
समझ रही हूँ, में जानती हूँ कि सचमुच मैंने बड़ी बेवकूफी की । आगेसे में
हमेशा खुद जाया करूंगी और जहाँतक बन सकेगा रात पड़ने पर कभी बिला
जरूरत पत्तियां तोड़कर किसी पेड़की मीठी नींद नहीं तोहूंगी।
{{Gap}}और जब मुझे यह विचार आया कि एक नहीं, बल्कि अनेक बार मुझे
अपने इन बनवासी भाइयोंके द्वारा शान्ति मिली है, ये मेरे पथप्रदर्शक बने हैं,
तब तो मेरी शर्मका ठिकाना न रहा । बहुधा किसी बड़े पुराने पेड़ के तनेसे
लिपटकर मैंने उससे उसकी मूक भावामें शान्ति और बुद्धिमानीका सन्देश
पाया है।
'''फिर भी में इतनी निर्दय कैसे बन सकी।'''
{{Gap}}पाठक इन पंक्तियोंको किसी पागलकी बहक न समझें, न मुझपर या मीराबाई
पर असंगतिका दोष ही मढ़ें। सम्भव है, वे कहें कि गाड़ियों शाक-भाजी खानेवाले
आदमीको रातको सोते हुए पेड़की पती न तोड़नेका उपदेश देना तो ऊँट निगलकर
चीटीसे परहेज करना है। 'कसाई भी किसी हदतक दयालु हो सकता है।' जो
आदमी मांस खाता है, वह रातमें सोती हुई भेंड़ोंके समूहको कल नहीं करता ।
मनुष्यताका सार तो यह है कि प्राणी जगतकी हरएक चीजकी, चाहे वह पेड़ हो या
पशु हो, भरसक कद्र करे जो आदमी अपने मनोविनोदके लिए दूसरोंके दुःख-दर्दका
बहुत कम खयाल रखता है, वह निश्चय ही मनुष्य नहीं है; मनुष्यसे कुछ कम
है । अर्थात् वह बुद्धिहीन है विचारहीन है।"
{{Gap}}भारतने पेड़ों और अन्य चेतन वस्तुओंका भरपूर आदर करना जाना है। उसके
कवियोंने जंगलमें दमयन्तीको पेड़-पौधोंसे रोते हुए अपना दुःख वर्णित करते हुए
दिखाया है। पशु-पक्षियोंके साथ पेड़-पौधे भी शकुन्तलाके साथी थे। महाकवि कालिदास
हमें बताते हैं कि उनसे बिछुड़ते हुए शकुन्तलाको कितना दुःख हुआ था ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, ५-१२-१९२९ और नवजीवन, १२-१-१९३०
{{Gap}}१. इसके भागेका अनुच्छेद नयजीवन, १२-१-१९३० से लिया गया है।<noinclude></noinclude>
he8flfm1igmbk44qq17n2yb7ag4ey7y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८८
250
196707
672893
669092
2026-08-22T14:20:33Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672893
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५५. जमींदार और ताल्लुकेदार'''}}
{{Gap}}हाल के संयुक्त प्रान्तके दौरेमें मुझे जितना हर्ष इस बातको देखकर हुआ उतना
और किसी वातसे नहीं हुआ कि कई युवक जमींदारों और ताल्लुकेदारोंने अपने
जीवनको काफी सादा बना लिया है और देशभक्तिपूर्ण उत्साहसे वे किसानोंका भार
कम कर रहे हैं। मैंने बहुतसे जमींदारोंके कथित अत्याचारोंके भयंकर वर्णन सुने थे
और यह भी सुना था कि वे कैसे सभी तरहके मौकोंपर जायज और नाजायज कर
वसूल करते हैं जिसके परिणामस्वरूप किसानकी स्थिति बिलकुल गुलाम की-सी हो
गई है। इसलिए इस तरहके कई नौजवान ताल्लुकेदार जब मेरे देखने में आये तो
मुझे सानन्द आश्चर्य हुआ ।
{{Gap}}परन्तु अभी इस तरह के सुधारकी और भी जरूरत है और इस सुधारको पूर्णता
तक पहुँचना है। अभीतक इनमें जो अच्छे-अच्छे ताल्लुकेदार और किसान हैं उनके
बीच एक बड़ी खाई है। जो थोड़ा-सा काम किया गया है उसके लिए उनके मनमें
अहंकारमूलक कृपाकी और आत्म-सन्तोषकी भावना भी है, जो नहीं होनी चाहिए। असल
बात यह है कि कितना भी किया जाये, वह किसानोंको उनका प्राप्य देरसे देनेके
सिवाय और कुछ नहीं है। यह वर्णाश्रम धर्मकी भयंकर विकृतिका परिणाम है कि
तथाकथित क्षत्रिय अपनेको श्रेष्ठ मानता है और गरीब किसान परम्परागत निकृष्टताका
दर्जा चुपचाप यह मानकर स्वीकार कर लेता है कि उसके भाग्ययें यही लिखा है।
यदि भारतीय समाजको शान्तिपूर्ण तरीके से सच्ची प्रगति करनी है, तो धनिक वर्गको
निश्चित रूपसे यह स्वीकार कर लेना होगा कि किसानके भी वैसी ही आत्मा है
जैसी उनके है और अपनी दौलत के कारण वे गरीवसे श्रेष्ठ नहीं हैं। जैसा जापानके
उमरावोंने किया, उसी तरह उन्हें भी अपने-आपको संरक्षक मानना चाहिए और उनके
पास जो धन है उसे यह समझकर रखना चाहिए कि उसका उपयोग उन्हें अपने
संरक्षित किसानोंकी मलाईके लिए करना है। उस हालत में वे अपने परिश्रमके शुल्कके
रूपमें वाजिव रकमसे ज्यादा नहीं लेंगे। इस समय धनिक वर्ग सर्वथा अनावश्यक
दिखावे और फिजूलखर्ची तथा जिन किसानोंके बीच वे रहते हैं उनके गन्दगीसे भरे
वातावरण और पीस डालनेवाले दारिद्र्घके बीच कोई अनुपात नहीं है। इसलिए
एक आदर्श जमींदारको चाहिए कि यह किसानका बहुत कुछ बोझा, जो यह अभी
उठाये चल रहा है, एकदम कम कर दे। वह रैयतोंके गहरे सम्पर्क में आये और उनकी
आवश्यकताओंको जानकर उस निराशाके स्थानपर, जो उनके प्राणोंको ही सुखाये
डाल रही है, उनमें आशाका संचार करे। वह रैयतोंमें सफाई और तन्दुरुस्तीके नियमोंकी
जो अनभिज्ञता है, उसे वदस्ति न करे और उन्हें इस बारे में समझाये। किसानोंके
जीवनकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करनेके लिए वह स्वयं अपनेको दरिद्र बना ले। वह
अपने संरक्षित किसानोंकी आर्थिक स्थितिका अध्ययन करे और ऐसे विद्यालय खोले<noinclude></noinclude>
fammjgny4bj0zc07ryucwsl791yej7c
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२८९
250
196708
672896
669093
2026-08-22T14:22:41Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672896
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||खादी और ईमानदारी|
२५१}}
जिनमें किसानोंके बच्चोंके साथ-साथ वह अपने खुदके बच्चोंको भी पढ़ाये। वह गाँवके
कुएँ और तालाबोंको साफ कराये। वह किसानोंको अपनी सड़कें और अपने पाखाने खुद
आवश्यक परिश्रम करके साफ करना सिखाये। वह किसानोंके वे रोकटोक इस्तेमालके
लिए अपने खुदके बाग निःसंकोच भावसे खोल दे। जो गैरजरूरी इमारतें वह
अपनी मौजके लिए रखता है, उनका उपयोग अस्पताल, स्कूल या ऐसी ही बातोंके
लिए करे। यदि पूँजीपति वर्ग कालका संकेत समझकर सम्पत्तिके बारेमें अपने इस
विचारको बदल डाले कि उसपर इस वर्गका ईश्वर प्रदत्त अधिकार है, तो जो सात
लाख घूरे आज गाँव कहलाते हैं उन्हें आनन-फानन शान्ति, स्वास्थ्य और सुखके
धाम बनाया जा सकता है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि पूँजीपति जापानके उमरावोंका
अनुसरण करनेसे सचमुच कुछ खोयेगा नहीं और सब कुछ पायेगा। केवल दो मार्ग
हैं जिनमें से हमें अपना चुनाव कर लेना है। एक तो यह कि पूँजीपति अपना अतिरिक्त
संग्रह स्वेच्छासे छोड़ दें और उसके परिणामस्वरूप सबको वास्तविक सुख प्राप्त
हो जाये। दूसरा यह कि अगर पूँजीपति समय रहते न चेते तो करोड़ों जाग्रत किन्तु
अज्ञानी और भूले रहनेवाले लोग देशमें ऐसी गड़बड़ी मचा देंगे कि एक बलशाली
हुकूमत की फौजी ताकत भी उसे नहीं रोक सकेगी। मैने यह आशा रखी है कि भारतवर्ष
इस विपत्तिसे बचने में सफल रहेगा। संयुक्त प्रान्तके कुछ नौजवान ताल्लुकेदारोंसे मेरा
जो घनिष्ठ सम्पर्क हुआ है उससे मेरी इस आशाको बल मिला है।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, ५-१२-१९२९
{{C|'''२५६. खादी और ईमानदारी'''}}
{{Gap}}श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारीने एक दिलचस्प पत्र भेजा है; कुछ व्यक्तिगत
बातों और गैरजरूरी पंक्तियोंको निकाल कर मैं उसे यहाँ दे रहा हूँ :
{{Gap}}'''में कबूल करता हूँ कि अबतक में खादीके प्रति लापरवाह रहा।
लेकिन अब मैंने जाना है कि खादी कार्यकर्ता सत्यके अनुयायी होते हैं । परसों
मैं कोयम्बटूर खादी भण्डार में गया था... मेरे पास उस समय १०,००० रु०
के नोट थे। मैंने उन्हें मेजपर रख दिया। फिर मुझे रुपयोंका कोई खयाल
नहीं रहा, और में भण्डारसे चला आया। कुछ समय बाद आपके प्रबन्धकने
वह रकम देखी; वह पोदानुर आये और वह रकम मुझे सौंप
गये ।'''
{{Gap}}इस पत्र से हमारी बुद्धिहीनता और तर्कशून्यताका पता चलता है। वस्तुतः खादी
और ईमानदारीके बीच कोई खास सम्बन्ध नहीं है। बदमाशोंको भी अपने आपको
ढकना है और इसलिए वे भी खादी पहन सकते हैं। मुझे दुःखके साथ कबूल करना
पड़ता है कि अखिल भारतीय चरला संघके अधीन काम करनेवाले सब कार्यकर्ता
{{Gap}}१. केवल कुछ अंश ही यह दिये जा रहे हैं।<noinclude></noinclude>
8hr0siy8ksyvnjlrf2ojl1pa935mayx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९०
250
196709
672897
669094
2026-08-22T14:24:45Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672897
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२५२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
हमेशा ईमानदार साबित नहीं हुए हैं। कितना अच्छा होता कि उनमें से हरएक ऐसा
होता जो कभी लालचका शिकार न बन सकता। लेकिन अफसोस ! सब सेवाओंकी
तरह खादी क्षेत्र में भी बुरे लोग मिल जाते हैं। थोड़ी देरके लिए यह मान लें कि
सब खादी सेवक विशुद्ध होते हैं, तो भी हो सकता है कि खादी स्वयं ही एक भयंकर
मूल हो या आर्थिक क्षतिका कारण हो। लेकिन मैं जानता हूँ कि कई ऐसे लोग
हैं जो खादीके गुणोंपर मोहित होकर खादी नहीं पहनते, बल्कि किन्हीं अन्य कारणोंसे,
जिनका खादीसे कोई वास्ता नहीं है, खादी प्रेमी बने हैं; और में कुछ ऐसे लोगोंको भी
जानता हूँ, जिन्होंने खादी पहनना छोड़ दिया है, और सो भी उसे गलत चीज समझ
कर नहीं, बल्कि सिर्फ इसलिए कि उन्हें कुछ खादी-प्रेमियोंके किये कामों या त्रुटियोंसे
नफरत हो गई थी । अतएव इन दस हजार रुपयोंवाले सज्जनने जो प्रत्युपकार किया
है उससे मिलनेवाले आश्वासनकी ओर में लुब्ध होकर नहीं देखता और यह मानता
हूँ कि स्थायी होनेके लिए खुद खादीको ही अजेय आधारपर खड़ा होना चाहिए।
और उसका यह गुण तो, सौभाग्यसे, दिन-ब-दिन सिद्ध होता जा रहा है !
{{Gap}}उक्त पत्रसे जो दूसरा विचार उठता है, वह कुछ शर्मनाक है। कोई यह देखकर
बेहद खुश क्यों हो कि एक आदमी में दूसरेके धनको न चुराने की सामान्य ईमानदारी
है ? क्या हम इतने गिर गये हैं कि यदि कोई हमारी दुकानपर कीमती चीज
मूल जाये तो उसे इस बातका विश्वास ही न रहे कि वह चीज अब भी उतनी ही
सुरक्षित होगी जितनी यह चीज उसके पास होनेपर थी। कुछ भी क्यों न हो,
इस पत्र से खादीसेवामें लगे हुए स्त्री-पुरुषोंको एक सबक तो मिलता हो है । उनकी
ईमानदारीसे कई धनाढ्य दरिद्रनारायणके पुजारी बन सकते हैं। और दरिद्रनारायणको
तो इन सबकी जरूरत है ही।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, ५-१२-१९२९
{{C|'''२५७. बारडोलीकी कहानी'''}}
{{Gap}}महादेव देसाईने, जो बारडोली सत्याग्रह आन्दोलन में सरदार वल्लभभाईके
साहित्यिक सचिव थे, उस महान एवं प्रसिद्ध संघर्षका इतिहास कुछ महीने पहले गुजराती में
लिखा था। सरदार वल्लभभाईकी इच्छा थी कि इसका एक अंग्रेजी संस्करण भी
प्रकाशित किया जाये, ताकि ज्यादा लोगोंको घटनाओंका सही विवरण मालूम हो सके।
महादेव देसाईको उन उत्तेजनापूर्ण दिनोंकी हृदय हिला देनेवाली घटनाओंकी प्रत्यक्ष
और गहरी जानकारी थी। अब उन्होंने जनताके सामने उसका अंग्रेजीका संस्करण
भी रख दिया है। अगले सालके दौरान आनेवाली उथल-पुथलको ध्यान में रखते हुए
हर राष्ट्रीय कार्यकर्ताको यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। इसकी पाठ्य सामग्री ३२३ पृष्ठों
में है और परिशिष्ट तथा सांकेतिका मिलाकर ३६३ पृष्ठ हो जाते हैं। यह नवजीवन
प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई है। इसकी कीमत रु० २-८ ० है । गत्तेकी जिल्द है और<noinclude></noinclude>
fe27o1nztytvz32q9ay34zb796fvow3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९१
250
196710
672898
669095
2026-08-22T14:27:47Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672898
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||हमारा भ्रम|
२५३}}
उसपर खादीका अस्तर है। इसमें खास तौर पर तैयार किया गया नकशा, अच्छे
चित्र आदि और आये हुए गुजराती शब्दोंकी अर्थ-तालिका भी है जो उपयोगी है।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, ५-१२-१९२९
{{C|'''२५८. हमारा भ्रम'''}}
तुलसीदासजीने कहा है
रजत सीप महं भास जिमि यथा भानुकर
जदपि मृषा तिहुं काल सोई, भ्रम न सके कोउ
वारि ।
टारि ॥
{{Gap}}इसमें जो गूढ़ सत्य मरा है, उसका अनुभव मुझे तो नित्य प्रति होता रहता
हैं। अच्छी या बुरी, जो बात हमारे सयाल में या हृदय में उस गई है, वह तबतक
नहीं मिटती, जबतक तजुरबा नहीं होता ।
{{Gap}}ठीक इसी तरह अस्पृश्यता- रूपी भ्रम हिन्दू जनताके हृदयमें घर कर गया है।
बुद्धिके सहारे हम देखते हैं कि कोई अस्पृश्य नहीं है । जनताके पास अस्पृश्यकी कोई
संज्ञा या परिभाषा नहीं है। यदि अस्पृश्य अपनी मानी गई काल्पनिक अस्पृश्यताको
छिपाये, तो उसे पहचाननेवाले चन्द आदमियोंको छोड़कर कोई इस बातका कयास
भी नहीं कर सकेगा कि वह अस्पृश्य है। इस तरह कई 'अस्पृश्य' भाई हर जगह
वगैर किसी रोक-टोकके मन्दिरोंमें और दूसरे स्थलोंमें चले जाते हैं।
{{Gap}}यदि अस्पृश्यता कोई धर्म होता तो एक प्रान्तका अस्पृश्य हरएक प्रान्तमें अस्पृश्य
माना जाता । किन्तु वस्तुतः असम के अस्पृश्य सिन्ध में अस्पृश्य नहीं माने जाते ।
त्रावणकोरके अस्पृश्य कहीं अस्पृश्य नहीं हैं । वहाँकी अस्पृश्यता, अनुपगम्यता, इत्यादिकी
तो और जगहों में गन्धतक नहीं है।
{{Gap}}हिन्दू जाति में अस्पृश्यताका यह भ्रम इतना घोर इतना भयानक हो उठा है ।
श्री जमनालालजी इसे मिटानेका खूब प्रयत्न कर रहे हैं। उन्हें मन्दिरोंको खुलवानेकी
अपनी प्रवृत्ति में काफी सफलता मिलती जाती है। जबलपुरमें एक साथ आठ मन्दिरोंका
खुलना, उसमें प्रतिष्ठित लोगोंका शामिल होना इत्यादि आशाजनक बातें हैं। इस भ्रमको
मिटानेका राजमार्ग तो यह है कि जिनका भ्रम दूर हो चुका है ये अपने कार्योंसे
भ्रममें डूबे हुओंको बता दें कि अस्पृश्यता नामका कोई धर्म है ही नहीं ।
<br>'''हिन्दी नवजीवन''' ५-१२-१९२९<noinclude></noinclude>
h317ohx5xs0noqs1xcx3dwmzbv6h1wr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९३
250
196712
672903
669097
2026-08-22T14:36:30Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672903
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२६१. पत्र : हरदत्त शर्माको ''''}}
{{Rh|||[ ७ दिसम्बर, १९२९ से पूर्व ]}}
<Br>प्रिय मित्र,
{{Gap}}आपका पत्र मिला। मैंने दूसरा (कारण) केवल सत्यकी पूर्तिके लिए दिया
था । निर्णायक कारण यह था कि कांग्रेस सप्ताहके दौरान जो राजनीतिक स्थिति
हमारे सामने आयेगी उसके अलावा दूसरी किसी भी चीजके साथ न्याय कर पाने में
मैं पूरी तरह असमर्थ था ।
{{Rh|||हृदयसे आपका,}}
{{Rh|||मो० क० गांधी}}
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>ट्रिब्यून १०-१२-१९२९
{{C|'''२६२. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}हम लोग सुबह ६ बजे यहाँ पहुँचे ।
{{Gap}}ताराके बारेमें जुगतरामसे मेरी खूब खुलकर बातचीत हुई। जुगतरामका विचार
है कि यदि तारा वर्षामें रहे तो अच्छा हो और स्वस्थ होकर उसे बेड़छीमें काम
पर लग जाना चाहिए। जैसा कि हमने सोचा था जुगतराम वही काम उसे देगा।
इस बातचीत के बाद कल मैंने तुम्हें एक पत्र लिखा था। मैं आज तारका इन्तजार
कर रहा हूँ। इसके साथ में वे सब कागज पत्र भेज रहा हूँ जो तुम्हारे पास फाइलमें
रखे जाने चाहिए।
{{Gap}}इस बार आश्रम में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, उन्हें नोट कर लेना। जिन-
जिन कामों में जिस-जिससे गफलत हुई हो उसका ब्यौरा हमें अवश्य रखना चाहिए।
जैसे मान लो कि पाठशाला में किसीने नियमानुसार अपना काम नहीं किया तो उसके
{{Gap}}१. पद पत्र समाज परिषद्की अध्यक्षता करने में अपनी असमर्थता विषयमें गांधीजीने जो कारण
दिये थे उन्हें स्पष्ट करनेके लिए गांधीजी की गई हरदत्त शर्माकी प्रार्थनाके उत्तर में लिखा गया था।
देखिए "तार : रुचिराम साहनीको ", २३-११-१९२९ ।
{{Gap}}२. ट्रिब्यून की रिपोर्टकी तारीख ७ दिसम्बर है।<noinclude></noinclude>
25lyj7mca8qexguztwtsopktzbysoix
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९४
250
196713
672904
669098
2026-08-22T14:39:43Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672904
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२५६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
बारेमें एक नोट कार्यालयको भेजा जाना चाहिए। भले ही उसके खिलाफ कोई कदम
न उठाया जाये किन्तु इस बात की जानकारी उस विभाग विशेषके व्यवस्थापक तथा
मुख्य व्यवस्थापकको अवश्य होनी चाहिए। जिम्मेदार विद्यार्थियों अर्थात् १६ वर्षकी
आयुके सभी विद्यार्थियोंके पत्रक पूरे होने चाहिए, जिससे हमें यह पता चल सके कि
उनमें से कौन कितने दिन दोनों समयकी प्रार्थनामें आया था और किसने किस दिन
सूत्र यज्ञ किया या नहीं किया था। सभीको अपना सूत हर हफ्ते अवश्य जमा करवा
देना चाहिए और उस पूरे सूतको अलग से इकट्ठा करके उसकी खादी बनवा लेनी
चाहिए। किसीसे १६० [ गज से अधिक तार इसमें कदापि नहीं लेने चाहिए।
{{Gap}}सफाई विभागका काम अवश्य नियमित हो जाना चाहिए। यह काम जिसके
जिम्मे हो उसे प्रतिदिन एक बार पाखानों में झांक लेना चाहिए। गंगाबहनके
अतिरिक्त कुछ अन्य लोगोंको रोटी बनाना सीख लेना चाहिए ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१५५ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''२६३. पत्र: छगनलाल जोशीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० छगनलाल,
{{Gap}}आज अधिक नहीं लिख सकूंगा। चरखा संघकी बैठक में भाग लेने या सिर्फ
मुझसे मिलनेकी खातिर वर्धा आनेकी तुम्हारी इच्छा हो और आ सको तो अवश्य
चले आना । किन्तु किसी तरह की परेशानी उठाकर आनेकी जरूरत नहीं है। मगनलालके
स्मारकके बारेमें मैं अवश्य विचार करूँगा । बा, प्यारेलाल, कुसुम, बाल और कमला
मेरे साथ हैं। अन्य दो व्यक्ति बनारससे आये हुए हैं।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ५४७१) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
9xd58fn9qrjlfzbjzw3niy4tycaeb3g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९५
250
196714
673070
669099
2026-08-23T01:45:04Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673070
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२६४. पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको'''}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}तुम्हारे निश्चयसे मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। यहां भी तुम्हारा समय
बेकार तो जाता ही नहीं। दिलीप व तारा शारीरिक तथा मानसिक शिक्षा प्राप्त
कर रहे हैं। अलमोड़ा हिमालय में है और हिमालय में असंख्य साधु रहते आये हैं। यदि
तारा इस बात को समझ ले कि हिमालय में रहकर अनेक साधुओंने आत्मदर्शन किया
है तो वह वहाँ रहते हुए आत्मिक शिक्षा भी प्राप्त कर सकेगी।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>'''बापुनी प्रसादी'''
{{C|'''२६५. अपील : अहमदाबादके मजदूरोंसे ''''}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}पंच, दीवान बहादुर कृष्णलाल मोहनलाल झवेरीके फैसला देनेके बाद महात्मा
गांधीने मजदूरोंके नाम एक अपील जारी की है जिसमें यह कहते हैं -- चूंकि पंचने
उनकी माँग पूरी तरह स्वीकार नहीं की है इसलिए जैसा मजदूरोंको दुःख लगा
होगा वैसा ही मुझे भी लगा है। उनकी माँग बिलकुल सही थी। परन्तु पंचफैसलेका
सिद्धांत स्वीकार कर लेनेके बाद उन्हें मध्यस्थोंका या पंचका निर्णय अवश्य मान
लेना चाहिए, चाहे वह उन्हें पसन्द हो या न हो ।
{{Gap}}पंचने एक सिद्धान्त स्वीकार किया है जो मजदूरोंके दृष्टिकोणसे बड़े महत्त्वका
है। वे कई बरसोंसे संघर्ष करते आ रहे हैं कि उन्हें जीवन निर्वाह करने योग्य
मजदूरी भी नहीं मिलती; इसे पाना उनका हक है और उसमें कोई कटौती नहीं की
जा सकती। पंचने यह बात सिद्धान्त रूपमें स्वीकार कर ली है। वह इस बात से
सहमत है कि उन्होंने खर्चेके जो आँकड़े दिए हैं वे न्यायसंगत हैं और उन आंकड़ोंकी
तुलनामें उनकी मजदूरी कम है। इस आधारपर उनकी मांग पूरी तरह स्वीकार
होनी थी। परन्तु पंचने जो कुछ दिया है, उससे सन्तुष्ट होना उनका कर्तव्य है ।
१. अल्मोड़ामें रहनेके ।
२. मथुरादास त्रिकमजीके पुत्र ।।
३. मथुरादास त्रिकमनीकी पत्नी ।
४. इस विषयपर गांधीजीके लेखोंके लिए देखिए "एक महत्वपूर्ण फैसला १२-१२-१९२९ । और
" मिल मजदूरों की मांग, १५-१२-१९२९ पंचका फैसला यंग इंडिया, १२-१२-१९२९ में " अहमदाबादके
मजदूर", शीर्षकसे छपा था।
<Br>४२-१७<noinclude></noinclude>
oz2azdg4jyd5pn0toevveb9klbzpk7p
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९६
250
196715
673072
669100
2026-08-23T01:47:40Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673072
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२५८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}बहरहाल इसका यह मतलब नहीं कि वे निर्वाह-योग्य मजदूरी पानेका अपना
प्रयत्न छोड़ दें। वह प्रयत्न सभी न्यायसंगत तरीकोंसे किया जाता रहेगा और जो
पहले से पहला उपयुक्त अवसर प्राप्त होगा वे उसके मिलते ही इस बातकी मांग
करेंगे। इस दौरान उनका यह कर्तव्य है कि अभी उनकी मजदूरी में जो वृद्धि हुई है,
वे उसका सदुपयोग अपनी बुरी बातें छोड़कर अपना सुधार करके और अपनी
कार्यकुशलता बढ़ाकर करें। पंचने जितनी सावधानीसे उनके मामलेकी छानबीन की
है, उसके लिए उन्हें पंचको धन्यवाद देना चाहिए।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १०-१२-१९२९
{{C|'''२६६. टिप्पणी'''}}
{{C|'''गुजरात विद्यापीठ'''}}
{{Gap}}गुजरात विद्यापीठकी ओरसे सरदार वल्लभभाई और काकासाहब कालेलकरने
जो अपील प्रकाशित की है, उसकी ओर में पाठकोंका ध्यान खींचता हूँ। इस विद्यापीठने
जो सेवा की है और असहयोगमें जिस प्रकार सहायता पहुँचाई है, वह गुजरातसे
छिपी नहीं है। आचार्यं गिडवानी और आचार्य कृपलानीके बाद अब काकासाहब
इस वृक्षके माली हैं। गुजराती भाई उसके लिए आवश्यक मात्रामें पानी पहुँचाते
रहे हैं। अब और अधिक पानीकी जरूरत है। विद्यापीठने 'रक्षित कोष' रखनेके
बदले लोक कृपापर भरोसा रखनेकी नीति अपनाई है। यह संस्था जनताकी है ।
जबतक उन्हें रुचे तबतक वे सींचते रहें। सार्वजनिक संस्थाको शुद्ध बनाये रखनेका
यह एक सर्वोत्तम बाह्य उपाय है। आमतौर पर घर-घर जाकर लोगोंसे द्रव्य मांगा
जाता है। इस बार वल्लभभाई और काकासाहबने नई आशा प्रकट की है।
सर्व-साधारणसे वे यह आशा रखते हैं कि द्वार-द्वार भटकनेके बदले वे स्वयं ही यथाशक्ति
चन्दा भेज देंगे। मुख्य संचालकोंको पैसा इकट्ठा करनेमें समय खर्च करने की जरूरत
नहीं होनी चाहिए। अपनी प्रिय संस्थाके लिए उन्हें खुद ही यथाशक्ति दान देना
चाहिए। मुझे आशा है, गुजराती भाई सरदार और काकाकी आशा पूरी करेंगे।
यह विनती गुजरातसे नहीं बल्कि गुजरातियोंसे है। यानी उन गुजरातियोंसे जो गुजरातके
बाहर दूसरे प्रान्तों, ब्रह्मदेश, सिंगापुर, जापान, पूर्व, दक्षिण और उत्तर आफ्रिका,
मॉरिशस, मैडागास्कर और दूसरे देशों में रहते हैं उनके लिए भी अपनी ओरसे
यथाशक्ति चन्दा भेजना आवश्यक है ।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>''' नवजीवन ''', ८-१२-१९२९<noinclude></noinclude>
5d18mnom12u89kpw6h0caugm9zeyw5s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९७
250
196716
673073
669101
2026-08-23T01:49:37Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673073
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२६७. कुछ महत्त्वके प्रश्न'''}}
{{Gap}}वाइसरायने हमारे बीच गोला फेंककर जो खलबली पैदा कर दी है, और
उसके कारण कुछ लोगोंने जो आशाएँ बाँध रखी हैं, उनके सम्बन्धमें एक मित्रने कुछ
महत्त्वपूर्ण सवाल पूछे हैं। ये सवाल और भी बहुतसे लोगोंके दिलमें उठते होंगे।
इसलिए उनके बारेमें अपना मत प्रकट कर देना एक हदतक जरूरी है। नीचे में
उक्त प्रश्न और उनके उत्तर दे रहा हूँ :
{{Gap}}'''१. औपनिवेशिक स्वराज्य (डोमीनियन स्टेटस) क्या है ? ब्रिटिश साम्राज्य में
वास्तविक भागीदारी और समानता या अंग्रेजोंकी देखरेखमें उत्तरदायी शासन ? १९१९ से
पहलेका 'औपनिवेशिक स्वराज्य' या १९२६ में साम्राज्य परिषद द्वारा निश्चित
की गई व्याख्यावाला स्थान ?'''
{{Gap}}'औपनिवेशिक स्वराज्य' एक ऐसा शब्द है जिसकी कोई निश्चित व्याख्या नहीं ।
अगर उसके लिए जीवित प्राणीके अनुरूप भाषाका प्रयोग किया जा सकता हो तो
मैं यह कहूँगा कि अभी तो वह बालिग भी नहीं हुआ है, इसलिए उसे रक्षाकी जरूरत
है, और उचित खुराक मिलनेपर वह हृष्ट-पुष्ट हो सकता है। यदि वातावरण
प्रतिकूल हुआ तो सम्भव है, वह अपनी सुकुमारताके कारण, निस्तेज हो जाये और
यदि प्राणवायु न मिले तो हो सकता है कि उसका दम ही घुट जाये। इसलिए वह
बालक जिस वातावरण में खा-पीकर बड़ा होगा, उसकी तन्दुरुस्ती और उसकी जीवनशक्ति
उसीपर निर्भर करेगी। अगर वह भारतवर्ष में आया तो हम किस तरहसे उसकी
सार-सँभाल करते हैं, उसका विकास इसपर निर्भर करेगा। इस कारण मेरी राय में
तो १९१९ और १९२६ की व्याख्यासे हमारा बहुत कम सम्बन्ध है । उसे पाने की हमारी
शक्तिपर 'औपनिवेशिक स्वराज्य' की व्याख्या निश्चित होगी । और जिसकी विस्तृत
व्याख्या निश्चित नहीं हुई है, उसकी व्याख्या सब कोई अपने मनके अनुसार कर
सकता है । मेरी व्याख्या यों है भारतके लिए 'औपनिवेशिक स्वराज्य' का मतलब यह
है कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजी राज्यके साथ सब तरहसे समान और ऐच्छिक सम्बन्ध हो
और इस सम्बन्धको कोई भी पक्ष कारण बताकर या बिना बताये स्वेच्छासे तोड़
सकता हो । जहाँ ऊँच-नीचके खयालकी थोड़ी-सी भी गुंजाइश हो वहाँ 'औपनिवेशिक
स्वराज्य' हो नहीं सकता। 'औपनिवेशिक स्वराज्य' का अर्थ है स्वतन्त्रता ।
{{Gap}}'''२. देशी रियासतोंको ब्रिटिश भारतके साथ एक ही परिषदमें भले ही बुलाया
जाये। लेकिन अगर देशी रियासतें ब्रिटिश भारतके सच्चे स्वराज्यमें बाधक बने तो ?
इसका क्या भरोसा कि अंग्रेज सरकार उनका पक्ष लेकर उनके साथ हुई संधियोंका
बहाना करके हमारी राजनैतिक प्रगतिमँ रोड़ा नहीं अटकायेगी ? आज तक देशी
रियासतोंको, खासकर ब्रिटिश भारत के राजनैतिक आन्दोलनसे, जानबूझकर अलग रखा'''<noinclude></noinclude>
k83ez7kd1g7rmjluhtle2l8q4jxiph9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९८
250
196717
673075
669102
2026-08-23T01:52:40Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673075
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२६०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}'''जाता रहा है, तो फिर आज यह नीति एकाएक क्यों बदली जा रही है ? स्वयं
बटलर कमेटो भी रियासतोंकी रजामन्दीके बिना उन्हें ब्रिटिश भारतके साम्राज्यमें
मिला देनेके खिलाफ है। ऐसी दशामें उक्त दृष्टिकोणमें एकाएक यह परिवर्तन क्यों
हो रहा है? और देशी रियासतोंको जनताका क्या होगा ? क्या उनके प्रतिनिधियोंका
आगामी परिषद में कोई स्थान ही नहीं होगा ?'''
{{Gap}}देशी रियासतें चाहें या न चाहें, हममें, यानी स्वराज्य चाहनेवालोंमें दम न
होगा तो वे जरूर राहके रोड़े बनेंगे। आज देशी राज्योंको आगे बढ़ाने में स्वयं मुझे
मी चालाकीकी बू आती ही है। पहले भी यह साम्राज्य देशी रियासतोंको अपनी बाजी
का मुहरा बना चुका है। मालूम होता है इस बार फिर इन मुहरोंका उपयोग किया
गया है। देशी राजाओंकी हस्ती साम्राज्यपर निर्भर है। इस कारण उन्हें साम्राज्यके
इशारेपर नाचना ही पड़ता है, अगर यह बात हमारी समझ में आ जाये तो हम
यह जान जायेंगे कि उन्हें डुबोकर हम कोई फायदा नहीं उठा सकते। उनकी गुलामी
को ध्यान में रखकर और यह जानकर कि वे साम्राज्यके अंग हैं, हमें सावधान रहना
चाहिए; और ऐसे मौकोंपर वे जो बोलते या करते हैं, उसे सल्तनतका कथन और
कार्य समझकर हम अपनी नजर साम्राज्यपर ही गड़ाये रखें। देशी रियासतोंकी
रयत के बारे में मैं निर्भय हूँ। जबतक स्वराज्यकी स्थापना नहीं होती, साम्राज्यके बहुतेरे
दोष तो देशी राज्यों में ज्यादातर पाये ही जायेंगे। किन्तु मैं ऐसे किसी स्वराज्यतन्त्रकी
कल्पना नहीं कर सकता, जिसमें स्वराज्य-पक्ष द्वारा देशी राज्यकी रियायाके अधिकार
बेच दिये गये हों ।
{{Gap}}''''३. परिषद में सबके एकमत होनेपर भी संसदको तो उसमें हेरफेर करनेका
अधिकार रहेगा न ? अधिकृत रूपसे यह कहा गया है कि इस सम्बन्ध में संसदने
अपनी स्वतन्त्रता कायम हो रखी है, और ब्रिटेनके राजनैतिक दल भी इस बन्धन से
परे हैं। ऐसी दशामें आगामी परिषदकी सारी मेहनत व्यर्थ जानेकी सम्भावना नहीं
है क्या? इस बारे में भी कुछ आश्वासन मिलना चाहिए - और सो भी हमारे
द्वारा सहयोग करनेसे पहले ही ।
यह सवाल हमारी कमजोरीको प्रतिध्वनित करता है। एक वकीलको हैसियतसे
अवश्य ही संसद सर्वोपरि है। परिषदके कार्योंपर वह पानी फेर सकती है। लेकिन
अगर भारतवर्ष परिषद में अपने साथ अपनी शक्ति भी लेता जायेगा, तो परिषदके
निर्णय सम्बन्ध में प्रश्नकर्तानेि जिस तरहका आश्वासन मांगा है, उसकी कोई जरूरत
ही नहीं रहेगी। साथ ही मैं यह भी मानता हूँ कि इस तरहका आश्वासन मांगने में
न तो हमारा गौरव है, और न कोई ब्रिटिश दल ही ऐसा है, जिसे ऐसा आश्वासन
देनेका अधिकार हो ।'''
{{Gap}}४. सन् १९१७की नीति और १९२९के कानूनपर इतना ज्यादा जोर क्यों
दिया जाता है ? लॉर्ड इविन कहते हैं कि १९१७ की नीतिके अनुसार स्वभावतः<noinclude></noinclude>
soe6ha1ninqmyq8t2pi3log7iccavm2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९९
250
196718
673076
669103
2026-08-23T01:55:23Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673076
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|कुछ महत्वके प्रश्न|
२६१}}
{{Gap}}भारतको स्वराज्य मिल जायेगा । 'समय आनेपर' से क्या तात्पर्य है ? श्री बेन
कहते हैं कि "परिषद्को बैठक होनेके पहले न तो मूल विषयमें और न उसके समय में
किसी तरहका परिवर्तन होगा। "
{{Gap}}क्या ये वाक्य भयावने नहीं मालूम होते ? और इस सबमें भारतके आर्थिक
अधिकारों आर्थिक स्वातन्त्र्य --
- का तो कहीं जिक्र भी नहीं है । १९२२ की कांग्रेसके
प्रस्तावके अनुसार अपना राष्ट्रीय ऋण चुकानेके लिए भारतको जनता बंधी हुई
नहीं है। क्या इस प्रस्तावको बिलकुल रद्द कर दिया गया है ?
{{Gap}}कोस्टल रिजर्वेशन बिल भी खटाईमें पड़ जायेगा क्या ? विदेशी बैंक बहुत-से
हक हजम किये बैठे हैं, क्या हम उनका लेखा कभी ले सकेंगे ? लार्ड इविनके
स्पष्टीकरणमें ये सब बातें नहीं हैं, लेकिन इस कारण हम इन्हें कैसे भूल सकते हैं ?
{{Gap}}सन् १९१९ के कानूनपर जोर देना भयका कारण जरूर है, और भय न हो
तो भी द्विअर्थीक तो वह है ही। इसी कारण दस्तखत करनेवाले नेताओंने स्पष्टीकरण
देनेकी इच्छा प्रकट की है। इस बातसे मुझे दुःख नहीं होता कि वाइसरायके वक्तव्यमें
भारतके आर्थिक अधिकारोंका जिक्र नहीं है। जिसमें आर्थिक स्वतन्त्रता न हो उसे
तो स्वराज्य कहा ही नहीं जा सकता। सन् १९२२ की कांग्रेसका ऋण सम्बन्धी प्रस्ताव
कभी रद नहीं हुआ है। वह लागू है और स्वराज्यकी योजनामें उसपर विचार
करना आवश्यक है। यही बात हाजीके बिल और बैंकोंके बारेमें कही जा सकती है।
वाइसरायके वक्तव्य से हम स्वराज्यकी योजनाकी आशा नहीं रख सकते। लेकिन इतनी
बात अवश्य साफ हो जानी चाहिए कि कांग्रेस दलवाले तभी किसी परिषद में भाग
ले सकेंगे जब स्वराज्य सम्बन्धी प्रत्येक प्रश्नपर खुले दिलसे - स्वतन्त्रतापूर्वक चर्चा
कर सकनेकी परिस्थिति पैदा हो जाये। लॉर्ड इविनके वक्तव्यमें इसका कोई खुलासा
नहीं मिलता। अतएव मेरे विचारमें परिषद् में शामिल होनेसे पहले इसे स्पष्ट करा
लेना न सिर्फ कांग्रेसका बल्कि सब दलोंका कर्तव्य है ।
{{Gap}}अन्तमें मैं यह भी कहे देता हूँ कि मजदूर दलकी सरकारके हाथमें अधिकार
तो हैं, किन्तु उन अधिकारोंका पूरी तरह उपयोग करनेकी सामर्थ्य उसमें नहीं है ।
और हममें वह ताकत नहीं, जिससे हम अपनी माँग कबूल करा सकें । इसलिए मैं
इस बातकी आशा छोड़े ही देता हूँ कि दो कमजोर पक्ष मिलकर भारतकी कोई
भारी सेवा कर सकेंगे। मेरी अन्तरात्मा तो यह कहती है कि अगर इंग्लैंडका मजदूर
दल सचमुच यह चाहता है कि भारतको स्वतन्त्रता मिले तो फिलहाल उसे अपनी
शक्ति बढ़ानी चाहिए और फिर इस स्वतन्त्रताकी प्राप्तिके लिए मरते दमतक जूझते
रहना चाहिए। हम अपनी शक्तिकी मर्यादा समझकर नम्रतापूर्वक परिषद वगैराके
झगड़ोंसे दूर रहें। लेकिन दुनियाका काम इस तरह अकेले तर्कके आधार पर नहीं
चलता। इसलिए जब कमजोर मजदूर दलकी ओरसे कोई आशाजनक बात कही जाती
{{Gap}}२. वैवुड बेन, भारत-मन्त्री ।
{{Gap}}२. कारखानों और बन्दर स्थानोंके विचारसे भारतके व्यापारको सुरक्षित रखनेसे सम्बन्धि विधेयक<noinclude></noinclude>
tan74r2f8iz87an6xc61jwpxk3g838o
673077
673076
2026-08-23T01:55:39Z
Lado Shaw
6039
673077
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||कुछ महत्वके प्रश्न|
२६१}}
{{Gap}}भारतको स्वराज्य मिल जायेगा । 'समय आनेपर' से क्या तात्पर्य है ? श्री बेन
कहते हैं कि "परिषद्को बैठक होनेके पहले न तो मूल विषयमें और न उसके समय में
किसी तरहका परिवर्तन होगा। "
{{Gap}}क्या ये वाक्य भयावने नहीं मालूम होते ? और इस सबमें भारतके आर्थिक
अधिकारों आर्थिक स्वातन्त्र्य --
- का तो कहीं जिक्र भी नहीं है । १९२२ की कांग्रेसके
प्रस्तावके अनुसार अपना राष्ट्रीय ऋण चुकानेके लिए भारतको जनता बंधी हुई
नहीं है। क्या इस प्रस्तावको बिलकुल रद्द कर दिया गया है ?
{{Gap}}कोस्टल रिजर्वेशन बिल भी खटाईमें पड़ जायेगा क्या ? विदेशी बैंक बहुत-से
हक हजम किये बैठे हैं, क्या हम उनका लेखा कभी ले सकेंगे ? लार्ड इविनके
स्पष्टीकरणमें ये सब बातें नहीं हैं, लेकिन इस कारण हम इन्हें कैसे भूल सकते हैं ?
{{Gap}}सन् १९१९ के कानूनपर जोर देना भयका कारण जरूर है, और भय न हो
तो भी द्विअर्थीक तो वह है ही। इसी कारण दस्तखत करनेवाले नेताओंने स्पष्टीकरण
देनेकी इच्छा प्रकट की है। इस बातसे मुझे दुःख नहीं होता कि वाइसरायके वक्तव्यमें
भारतके आर्थिक अधिकारोंका जिक्र नहीं है। जिसमें आर्थिक स्वतन्त्रता न हो उसे
तो स्वराज्य कहा ही नहीं जा सकता। सन् १९२२ की कांग्रेसका ऋण सम्बन्धी प्रस्ताव
कभी रद नहीं हुआ है। वह लागू है और स्वराज्यकी योजनामें उसपर विचार
करना आवश्यक है। यही बात हाजीके बिल और बैंकोंके बारेमें कही जा सकती है।
वाइसरायके वक्तव्य से हम स्वराज्यकी योजनाकी आशा नहीं रख सकते। लेकिन इतनी
बात अवश्य साफ हो जानी चाहिए कि कांग्रेस दलवाले तभी किसी परिषद में भाग
ले सकेंगे जब स्वराज्य सम्बन्धी प्रत्येक प्रश्नपर खुले दिलसे - स्वतन्त्रतापूर्वक चर्चा
कर सकनेकी परिस्थिति पैदा हो जाये। लॉर्ड इविनके वक्तव्यमें इसका कोई खुलासा
नहीं मिलता। अतएव मेरे विचारमें परिषद् में शामिल होनेसे पहले इसे स्पष्ट करा
लेना न सिर्फ कांग्रेसका बल्कि सब दलोंका कर्तव्य है ।
{{Gap}}अन्तमें मैं यह भी कहे देता हूँ कि मजदूर दलकी सरकारके हाथमें अधिकार
तो हैं, किन्तु उन अधिकारोंका पूरी तरह उपयोग करनेकी सामर्थ्य उसमें नहीं है ।
और हममें वह ताकत नहीं, जिससे हम अपनी माँग कबूल करा सकें । इसलिए मैं
इस बातकी आशा छोड़े ही देता हूँ कि दो कमजोर पक्ष मिलकर भारतकी कोई
भारी सेवा कर सकेंगे। मेरी अन्तरात्मा तो यह कहती है कि अगर इंग्लैंडका मजदूर
दल सचमुच यह चाहता है कि भारतको स्वतन्त्रता मिले तो फिलहाल उसे अपनी
शक्ति बढ़ानी चाहिए और फिर इस स्वतन्त्रताकी प्राप्तिके लिए मरते दमतक जूझते
रहना चाहिए। हम अपनी शक्तिकी मर्यादा समझकर नम्रतापूर्वक परिषद वगैराके
झगड़ोंसे दूर रहें। लेकिन दुनियाका काम इस तरह अकेले तर्कके आधार पर नहीं
चलता। इसलिए जब कमजोर मजदूर दलकी ओरसे कोई आशाजनक बात कही जाती
{{Gap}}२. वैवुड बेन, भारत-मन्त्री ।
{{Gap}}२. कारखानों और बन्दर स्थानोंके विचारसे भारतके व्यापारको सुरक्षित रखनेसे सम्बन्धि विधेयक<noinclude></noinclude>
jee1ccr3ljptfxe4gqtqdh493l78b45
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०२
250
196721
673078
669106
2026-08-23T01:57:36Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673078
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{C|'''२७२. पत्र : आश्रमको बहनोंको'''}}
{{Rh|||वर्षा}}
{{Rh|||मौनवार, ९ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>बहनों,
{{Gap}}इस बारकी दौड़धूपमें दो बातें रह गई। एक बात जो पकड़में आई थी उसपर
ध्यान देनेका समय ही नहीं रहा था। दूसरी में भूल गया था ।
{{Gap}}आखिरी बातको में पहले लेता हूँ। हमारी स्त्रियाँ पुरुष डाक्टरोंको न तो अपने
अवयव दिखाती हैं और न शल्य क्रिया ही करने देती हैं। यह झूठी शर्म है और
यह विकारपूर्ण मानसिक स्थितिके कारण उत्पन्न होती है। मैं तो इस मामले में पश्चिम
के लोगोंके रुपको पसन्द करता हूँ। मुझे मालूम है कि कभी-कभी उसका अनिष्ट
परिणाम निकला है। दुष्ट डाक्टर और भोली तथा जल्दी ही विकारवश हो जानेवाली
स्त्रीका मिलाप होनेपर दुराचार हुए हैं। ऐसा तो दुनियामें हर हालत में होता रहा
है। मगर इससे हम अच्छे और जरूरी काम करना बन्द न करें। हमें अपने पर
भरोसा होना चाहिए। इसलिए सन्तोकका डा० हरिभाईसे ऑपरेशन कराना मुझे
बहुत अच्छा लगा और सन्तोककी बहादुरीके बारेमें मेरा विश्वास दृढ़ हुआ है।
फीनिक्स में तो यह नियम ही हो गया था। देवदासके जन्मके समय डाक्टर पुरुष
था वा को योनिकी बीमारी थी और उसकी शल्य क्रिया करानी थी। वह पुरुष
डाक्टरसे कराई थी। ऐसे मामलों में वा बहुत बहादुर और मोली है। हाँ, ऐसे अवसर
पर उसे मेरी मौजूदगीकी जरूरत अवश्य रहती है। मगर यह तो छोटी-सी बात
है । हरएकको ऐसे मौकपर कोई भरोसेका आदमी चाहिए और यह ठीक भी है।
इतना सब लिखनेका उद्देश्य यही है कि आश्रममें हम अपने में इस किस्मकी हिम्मत
पैदा करें और झूठी शर्मको छोड़ दें। झूठी शर्मके कारण सैकड़ों या हजारों स्त्रियाँ
तकलीफ पाती हैं। विद्यावतीका उदाहरण तो हमारे सामने ही है। वह तो स्त्री
डाक्टरको भी अपने अंग दिखलाने को तैयार नहीं थी। हम तो शुकदेवजी जैसी
निर्दोषता साधना चाहते हैं। जबतक ऐसी निर्दोषता न आई हो, तबतक ऐसा दम्भ
भी न करें। ऐसे पुरुष हैं जिनके मनमें स्त्रीमात्रके स्पर्शसे विकार आ जाता है।
ऐसी स्त्रियाँ हैं, जिनका हर मर्दके स्पर्शसे यही हाल होता है। ऐसे लोगोंको तो जबरन
ही सही, सबसे बचकर रहना उचित है, फिर भले ही शरीर रोगोंसे पीड़ित रहे ।
मैंने तो सिर्फ झूठी शर्म छोड़नेकी बात लिखी है। जिसके मनमें स्पर्शमात्रसे विकार
उत्पन्न होनेका डर हो, उसे निश्छल भावसे इस बातको स्वीकार कर लेना चाहिए
और अपनी मर्यादा में रहना चाहिए। ऐसी विकारी स्थिति एक तरह की बीमारी है,
और उसे पर पुरुष या स्त्रीका स्पर्श छोड़ ही देना चाहिए। समय पाकर सम्भव है
वह रोग मिट जाये ।<noinclude></noinclude>
m5yhs4xqjnyvqxc0ny3hvvz41rqly64
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०३
250
196722
673079
669107
2026-08-23T01:59:28Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673079
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र आश्रमकी बहनोंको|
२६५}}
{{Gap}}इस पत्रका यह भाग दो-चार बार पढ़कर भी समझने की कोशिश करना। यदि
समझ में न आये तो मुझसे पूछना। वालजीभाई से पूछोगी तो वे भी समझा देंगे ।
यह है तो सरल ही।
{{Gap}}दूसरी यात उमियाकी शादीसे उठती है। विवाह होते ही उमियाने तुरन्त नाक-
Hybrid गहने पहन लिये। यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा । इसमें देनेवालेका कसूर
था और लेनेवालेका भी। यह बात आश्रमके रिवाजके विरुद्ध हुई । उमिया अपनी
ससुराल जाकर गहने पहन सकती थी, मगर वह बेचारी रह न सकी। मैं अपना
दुखड़ा रोनेके लिए यह घटना बयान नहीं कर रहा हूँ, मगर सबक सिखानेके लिए
ही इसका उल्लेख कर रहा हूँ। उमियाका अनुकरण कोई और लड़की न करे ।
बेचारी उमियाको आश्रमकी तालीम थोड़ी ही मिली है। जयसुखलालने उसपर पूरा
ध्यान नहीं दिया। मां भली हैं और अच्छा-बुरा सोचे बिना पुरानी सब बातोंको
मानती हैं। इसलिए उसका दोष क्षम्य है। मैंने उमिया और उसके पतिको सावधान
कर दिया है। पतिकी तरफसे तो उसे छोटी-सी चूड़ीके सिवा और कुछ नहीं मिला ।
मगर आश्रम के नियमोंको जाननेवाली स्त्री या कन्या ऐसा कभी न करे यह बतानेके
लिए मैंने यह किस्सा बयान किया है। मगर मैं इससे एक और भी निष्कर्ष निकालना
चाहता हूँ। स्त्रीको विकारी पुरुषोंने गिराया है। उसे अपनेको लुभानेवाले हाव-भाव
सिखाये, बनाव- सिंगार करना सिखाया है। स्त्रीने इसमें अपनी पराधीनता नहीं देखी,
अपना पतन नहीं देखा। उसे भी विकार अच्छे लगे इसलिए अपने नाक, कान छेदे
और पैरोंमें बेड़ियाँ पहनकर वह गुलाम बनी। नाककी नथ या कानकी बालीसे लम्पट
पुरुष स्त्रीको एक घड़ी में घसीट ले जाये । इस प्रकार अपंग बनानेवाली चीज समझदार
स्त्री क्यों पहनती होगी, यह मेरी समझ में नहीं आता। सच्ची शोभा तो हृदयमें
है । आश्रमकी प्रत्येक स्त्री बाह्य शोभासे, नाक छिदवानेसे बचे। हम पशुको नाथते
हैं, क्या इतना काफी नहीं है ? अब छः बज गये हैं इसलिए बन्द करता हूँ। मैंने
सुबह-सुबह तुम्हारा स्मरण किया, क्योंकि तुमसे बहुत काम लेना है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३७११) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
jdz88hcicf227thgjtzy1ncrrjoetm3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०४
250
196723
673080
669108
2026-08-23T02:02:43Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673080
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२७३. पत्र : रमणीकलाल मोदीका'''}}
{{Rh|||वर्षा}}
{{Rh|||मौनवार, ९ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला ।
{{Gap}}छगनलालका पत्र वापस भेज रहा हूँ। उसका दृष्टिकोण सही है। चर्मालय
तो विद्यालय ही है। वह स्वावलम्बी बने इसमें कोई बुराई नहीं है। ऐसी बहुत-सी
स्वावलम्बी पाठशालाएँ हैं किन्तु फिर भी वे पाठशालाओंके रूपमें जानी-पहचानी जाती
हैं। हमारा उद्देश्य व्यापार करना नहीं बल्कि ज्ञानवृद्धि और सेवा करना है। इसलिए
यदि तुम बचत कर सको तो करना । कानूनकी वह दफा जिसमें कहा गया है कि
किन हालात में मुकर्रर लगान नहीं बढ़ता, खोजकर मुझे भेज देना । किन्तु यदि
यह माफी मिल रही हो तो उसे स्वीकार कर लेना ।
{{Gap}}तुम मुझे विस्तृत समाचार लिखते रहते हो इससे मेरा काम नहीं बढ़ता।
बुधाभाईके बारेमें लिखना भी जरूरी था ।
{{Gap}}चिमनलालकी तबीयत क्यों नहीं सुधर रही है ?
{{Gap}}आज अब अधिक लिखनेका समय नहीं है ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१५७) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''२७४. पत्र : डाह्याभाई म० पटेलको'''}}
{{Rh|||[ १० दिसम्बर १९२९]}}
<Br>भाईश्री डाह्याभाई,
{{Gap}}पहले रावजीभाई और फिर ठक्कर बापासे यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ
कि तुमने उन जाने-पहचाने अन्त्यज-सेवकोंको दुत्कार कर भगा दिया जिन्हें ठक्कर बापाने
अपना लिया था। मुझे तो लगता है कि ऐसा करके तुमने एक बहुत बड़ा अपराध
किया है। ठक्कर बापा कह रहे थे कि तुमने उनसे माफी चाही थी। माफी तो
{{Gap}}१. डाककी मुहरसे।<noinclude></noinclude>
r8f5dq643cwowsfrbtnf1mdbbnr8rt3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०५
250
196724
673081
669109
2026-08-23T02:04:47Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673081
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : रमणीकलाल मोदीको|
२६७}}
{{Gap}}अन्त्य भाई-बहनोंसे मांगनी चाहिए थी। इसमें यदि मुझसे कहीं कोई अन्याय
हुआ हो तो उसे सुधार लेना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनश्च : ]
तुम्हारी रिपोर्ट छापी नहीं जायेगी ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २७००) से ।
सौजन्य : डाह्याभाई म० पटेल
{{C|'''२७५. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१० दिसम्बर १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}आज तुम्हारी तरफसे डाक नहीं मिली। हर विभागके व्यवस्थापकको प्रतिदिन
अपने विभागका निरीक्षण करना चाहिए और इसका उल्लेख उसे नोटबुकमें करना
चाहिए। फुरसत मिलनेपर तुम्हें इन नोटबुकोंको जाँच लेना चाहिए। यदि हम सतर्क
रहना चाहते हों और अपनी चौकसी खुद ही करते रहना चाहते हों तो हमें ऐसे
कामोंकी तनिक भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम सबको तो ऐसी उपेक्षा करनी
ही नहीं चाहिए; क्योंकि हम उन्हें इतना महत्व देते हैं कि इसके कारण ही जगन्नाथको
आश्रम चलता कर देना पड़ा। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ लोगोंको भी हमने
आश्रम से अलग कर दिया था किन्तु उनके नाम में भूल गया हूँ। सहज पालन किये
जा सकनेवाले नियमोंके पालन में यदि ढिलाई बरती जाये और उसे हम सहन करते
रहें तो इसके फलस्वरूप एक दिन आश्रम न केवल टूट जायेगा बल्कि उसके नाम पर
कलंकका टीका भी लगे बिना नहीं रहेगा। हमारी सतर्कताके बावजूद उसमें जो कमियाँ
रह जायेंगी उनके लिए दुनिया हमें माफ कर देगी। किन्तु हमारे प्रमादके कारण
जो कुछ होगा उसके लिए दुनियाको हमारी बुराई करनेका हक है। मैं आजकल इस
बारेमें काफी सोच-विचार कर रहा हूँ। मेरे मन में बहुत उधेड़ बुन चलती रही है और
मैंने वहाँ रहते हुए जो विचार व्यक्त किये थे वे दृढ़ होते जा रहे हैं। अर्थात् जो
लोग उन नियमोंको भंग करते ही रहते हैं जिनका पालन करना सबके लिए सम्भव
हैं, उन्हें या तो आश्रमसे निकाल दिया जाये या फिर वे स्वयं चले जायें। ऐसा
होनेपर हम भी बहुतसे खतरोंसे बच जायेंगे। हमारा आश्रम कोई अपंगालय नहीं
है । वहाँ एक विशेष उद्देश्यसे प्रेरित होकर प्रौढ़ भाई बहन एकत्रित हुए हैं। जो
बहनें बहुत दिनों वहीं रहती आ रही हैं उन बहनोंको आंशिक रूपसे मैं इसमें से
छोड़ देता हूँ। इस प्रकार जो लोग सोच-समझकर एकत्रित हुए हैं यदि वे स्वेच्छा से<noinclude></noinclude>
byb26lhono0yvz0c64htwnt2n4tjckd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०६
250
196725
673083
669110
2026-08-23T02:09:02Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673083
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२६८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}स्वीकृत किये गये नियमोंका पालन न करें और इसे हम सहन करते रहें तो इसमें
मुझे धर्म और समाजके प्रति द्रोह नजर आता है।
{{Gap}}यदि तुम सबको यह खबर न मिली हो तो जान लेना कि एक समय आश्रम में
रहनेवाली राजीबहनकी अपने गाँव में बीमारीके कारण मृत्यु हो गई है। भाई चन्द्रलाल
आये थे और उन्होंने मुझे यह खबर दी थी। उन्होंने भयंकर भूलें तो की थीं किन्तु
चूंकि उन्होंने आश्रमका नमक खाया था अतः उनका स्मरण करना हमारा कर्तव्य है ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१५८ ) की फोटो नकलसे।
{{C|'''२७६. पत्र : प्रभावतीको ''''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||११ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० प्रभावती,
{{Gap}}तेरा पत्र मिला। आश्चर्यकी बात है कि तुझे मेरा पत्र नहीं मिला। मैंने तो
उत्तर दिया ही था। मैंने यहाँसे रवाना होने की तारीखकी सूचना तुझे दी थी। जल्दी
से जल्दी मैं यहाँसे २० तारीखको रवाना हो सकूंगा। तेरे सभी पत्र मुझे मिले हैं
और मुझे बहुत सन्तोष हुआ है। मैंने एक पत्र लिखा था, उसीके साथ जयप्रकाशका
पत्र भी रख दिया था। क्या वह भी रास्ते में गुम हो गया ? जितनी जल्दी आ सके
उतनी जल्दी आ जा।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>'''बापुना पत्रो-१०: श्री प्रभावतीबहेनने'''
{{C|'''२७७. टिप्पणियाँ'''}}
{{C|'''अछूतोद्धार आन्दोलन'''}}
{{Gap}}जबलपुरके आठ मन्दिरों और बम्बईके एक मन्दिरको
लिए खोल देनेके कारण इन मन्दिरोंके न्यासी और अन्य सज्जन
करनेके लिए बधाईके पात्र हैं। अपने इस कार्य द्वारा उन्होंने
हिन्दुस्तानकी सेवा की है और उन अछूतोंमें नई आशाका संचार
अधीरताके लक्षण दिखाई देने लगे थे। अछूतोंको उनकी दुःखद स्थितिका मान करा देनेके
{{Gap}}१. पत्रके अन्तमें दी गई एक टिप्पणी में कहा गया है कि गांधीजी तकली और चरखेकी कताई
प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे, इस कारण इस पत्रपर खुद हस्ताक्षर नहीं कर सके।
{{Gap}}२. रामचन्द्र मन्दिर देखिए "अछूतोंके लिए मन्दिर, २८-११-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
0vobqpltowfktrh2f0wxz5lsxbaztuc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०७
250
196726
673084
669111
2026-08-23T02:12:16Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673084
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||टिप्पणियाँ|
२६९}}
बाद अगर हम समय रहते ही उनके लिए अनुकूल वातावरण पैदा करनेमें सफल न
हों तो, उनकी अधीरता और उससे भी भयंकर बेचैनीके प्रदर्शनको रोक पाना हमारे
लिये असम्भव है । जो जागृति आम जनतामें इस समय फैल गई है, उसके फलस्वरूप
अछूतोंको भी स्वातन्त्र्य-सुखका पान करनेकी उतनी ही स्वतन्त्रता होनी चाहिए,
जितनी स्वतन्त्रताकी आशा तथाकथित उच्च जातियाँ रखती हैं। जबतक हम हिन्दू
अपने पांचवें भागको गुलाम बनाये हुए हैं- • ऐसे गुलाम, जो हमें छू नहीं सकते,
एक निश्चित हदसे आगे हमारे पास या हमारी नजरोंके सामने नहीं आ सकते
तबतक हमें स्वतन्त्रताकी आशा नहीं रखनी चाहिए।
{{C|'''लालाजी स्मारक'''}}
{{Gap}}संयुक्त प्रान्त में लालाजी स्मारकके लिए मिले हुए चन्देकी बात मैंने अपनी
याददाश्त से लिखी थी, और कहा था कि ३०,००० रु० से ऊपर मिले हैं। श्रीयुत
पुरुषोत्तमदास टण्डनने इस सम्बन्ध में मुझे एक पत्र लिखा है, जिसके अनुसार संयुक्त
प्रान्तके दौरेमें लालाजी स्मारकके लिए मिले हुए चन्देकी कुल रकम ४२,१३८-८-९
होती है। इसमें दौरेसे पहले मिली हुई रकम और वचन दी हुई रकम, जो अभी
मिली नहीं है, शामिल नहीं है। हालांकि जैसा कि मैंने सोचा था, वह रकम उससे
अधिक सन्तोषजनक है, लेकिन मेरी यह शिकायत तो फिर भी है कि उस महान्
देशको स्मृतिके साथ संयुक्त प्रान्तने पूरा-पूरा न्याय नहीं किया है। आशा है, श्री
पुरुषोत्तमदास टण्डन एक बार और चन्दा उगाहीके लिए दौरा करेंगे और जबतक
संयुक्त प्रान्तसे कमसे कम १ लाख न मिल जाये, आराम नहीं करेंगे ।
{{C|'''दिल्लीके हिन्दू कालेजका चन्दा'''}}
{{Gap}}हिन्दू कालेजके प्रिंसिपल लिखते हैं:"
{{Gap}}जो रकम वास्तव में यहाँ मिली थी, उसे दिल्ली में प्राप्त रकमके साथ मिलाकर
स्तम्भों में छाप दिया गया था। ८०० रु० की इस प्राप्त रकमके लिए मैं आभारी हूँ ।
इसमें शक नहीं कि यात्राके वर्णनमें कालेजका कोई जिक्र नहीं था; ऐसी ही अनेक
महत्वपूर्ण और दिलचस्प बातोंको भी छोड़ देना पड़ा था। सभी घटनाओंका इतना
सविस्तार हवाला दे सकना असम्भव था । जो बातें बहुत ही ज्यादा महत्वकी थी,
वे चुन ली गई थीं। संयुक्त प्रान्तका सारा कार्यक्रम बड़ा व्यस्त और काफी लम्बा
था तथा इतने बड़े प्रान्तके इतने भारी कार्यक्रमको पूरा करनेके लिए जितना समय
चाहिए था, उससे आये समय में उसे पूरा करना पड़ा था।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, १२-१२-१९२९
{{Gap}}१. देखिए “टिप्पणियां २८-११-१९२९ का उप-शीर्षक “लालाजी स्मारक " ।
{{Gap}}२. यह पत्र नहीं दिया जा रहा है। वायदेके मुताबिक ८०० रु० भेजते हुए हिन्दू कालेज
प्रिंसिपल लिखा था कि उनके कालेज में गांधीजीके आने और जो रकम इकट्ठी की गई थी, उसका
हवाला यंग इंडिया में छपे गांधीजीके दौरेके ब्योरे में नहीं दिया गया था।<noinclude></noinclude>
eathbgirhocvmjqr2o04k3czzhl0sjm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०८
250
196727
673085
669112
2026-08-23T02:13:35Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673085
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२७८. संयुक्त प्रान्त राष्ट्र सेवा संघ'''}}
{{Gap}}प्रान्तीय राष्ट्र सेवा संघ कायम करनेके लिए पण्डित जवाहरलाल नेहरूने मेरी
अभी हालकी यात्रामें धन संग्रह करनेका जो तरीका अख्तियार किया था, वह मुझे
बहुत पसन्द आया । इस कामके लिए कुल १२,०३६-१५-९ रु० इकट्ठे हुए। जिस
कामके लिए यह रकम मांगी गई थी, उसके लिए यद्यपि यह काफी नहीं है, तथापि
इसमें शक नहीं कि प्रारम्भकी दृष्टिसे यह अच्छी रकम है। राष्ट्र सेवा संघकी कल्पना
नई नहीं है । सन् १९२० से यह प्रश्न देशके सामने रहा है। लेकिन पण्डित जवाहरलाल
नेहरूने पहली बार उसे मूर्त रूप और आश्रय दिया है। जबतक हम अपने कामके
लिए स्वयंसेवकोंपर निर्भर रहेंगे, राष्ट्रीय कामको जरूर हानि पहुँचेगी, क्योंकि
स्वयंसेवक तो अपने समयका कुछ ही हिस्सा राष्ट्र सेवा संघके काममें देते हैं और सो
भी कभी-कभी स्थायी कामके लिए तो स्थायी और पूरे समयतक काम करने वाले
लोगोंकी जरूरत है। यह काम पूरी खूबीके साथ तभी किया जा सकता है जब कि
हरएक प्रान्त अपनी आवश्यकता अनुसार एक-एक सेवा संघ कायम करे और प्रान्त
ही से उसके लिए जरूरी चन्दा जमा कर ले। कदम-कदमपर प्रशिक्षित और कसे
हुए स्थायी कार्यकर्ताओंके अभावका अनुभव तो पण्डित जवाहरलाल कर ही रहे थे;
सेवा संघके कोपके लिए उन्होंने पिछली संयुक्त प्रान्तकी यात्राके अवसरसे लाभ अवश्य
उठा लिया। आशा है कि अब नियम बनाने और संघके लिए प्रार्थनापत्र मँगाने में
देरी नहीं की जायेगी। अस्पृश्यता, हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य, विदेशी वस्त्र- बहिष्कार, शराबबन्दी
और राष्ट्रीय शिक्षा वगैरा, ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें काफी बड़ी तादाद में स्थायी
कार्यकर्ता रूप सकते हैं। वास्तव में हमारा ध्येय यह होना चाहिए कि देशके ७ लाख
गाँवों से हरएक गाँव में हमारा कमसे कम एक कार्यकर्त्ता जरूर हो। लेकिन अखिल
भारतीय चरखा संघको छोड़कर, शायद देशके जिलों में भी हमारा एक-एक कार्यकर्त्ता
नहीं है। अतएव स्वाभाविक है कि सब प्रान्त संयुक्त प्रान्तके भावी राष्ट्र सेवासंघकी
ओर ध्यान देंगे । अनुभव बताता है कि सच्चे अर्थ में राष्ट्रीय और स्थायी बननेके
लिए किसी भी सेवा संघको, भले ही वह कांग्रेसका ही बनाया हुआ क्यों न हो,
अनेकरूपा राजनीतिके क्षेत्र से परे रहना चाहिए और उसे अपने आपमें सम्पूर्ण उत्तरदायी
स्वशासित एकांश होना चाहिए। हमें अपने इन कार्यकर्त्ताओंको इस बातका पूरा-पूरा
विश्वास दिला सकना चाहिए कि हर साल कांग्रेसके पदाधिकारियोंका नया चुनाव
होनेपर भी वे बर्खास्त नहीं किये जायेंगे। इस तरहका आश्वासन तभी दिया जा
सकता है, जब कि संघ स्वशासित हो और उसका अपना संविधान अच्छा और खूब
सोच समझकर बनाया गया हो ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया १२-१२-१९२९<noinclude></noinclude>
ecjkkpyey1b1m4p01snqk3wjebbk4jw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०९
250
196728
673086
669113
2026-08-23T02:16:44Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673086
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२७९. तीसरे दर्जेका डिब्बा'''}}
{{Gap}}पिछली बार २० नवम्बरको मैंने इलाहाबाद से पटना तक तीसरे दर्जेमें
यात्रा की थी।
{{Gap}}पिछले चार सालों में मैनेसारे भारतमें हजारों मील तीसरे दर्जेमें सफर
किया है और मेरा अनुभव है कि इस तरहकी कठिन परीक्षाएं आम तौर पर
होती रहती हैं।
किसी सुचारु रूपसे प्रशासित देशमें ऐसे हालात बिलकुल नामुमकिन है।
{{Gap}}महात्मा वन जानेके बाद यद्यपि मैंने पिछले १२ महीनों या उससे भी ज्यादा
समयसे फिरसे तीसरे दर्जे में सफर करना शुरू कर दिया है, मेरे भीड़के अनुभव, जो
ज्यादातर मीराबाईके अनुभवोंसे मिलते-जुलते हैं, अभी १९१५ से १९१७ तक जैसे
ही हैं। ये अखबारोंमें मेरे अनुभव कर चुकनेके बाद यथासमय ही प्रकाशित हुए थे।
बहरहाल ऐसा मानकर कि इन बातोंके प्रकट करनेके परिणाम स्वरूप [ गाड़ियोंकी ]
बहुत ज्यादा भीड़ कम से कम अब उतनी असह्य नहीं रही है, मैं अपने मनमें प्रसन्न
होता रहता था । परन्तु अब मुझे पता चला है कि यह मेरी गलतफहमी थी ।
जहाँतक यूरोपीयोंसे इतर या अंग्रेजी रहन-सहन न रखनेवाले भारतीयोंका सम्बन्ध है,
रेलवेके प्रबन्धक लोगोंकी [ परवाह ] नहीं करते। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तीसरे दर्जेमें
यात्रा करनेवाले यूरोपीयों और अंग्रेजी रहन-सहनवाले भारतीयोंको जरूरत से ज्यादा
आराम मिलता है। तीसरे दर्जेके ६०,१७,७८,००० यात्रियोंको जिन्होंने १९२५-२६ में
रेलवेको ३४,७६,४५,००० रु० की अदायगी की, डिब्बों में बन्द मछलियोंकी तरह
यात्रा करके ही सन्तोष कर लेना पड़ता है । यद्यपि उनको जरूरतें पहले और दूसरे
दर्जेके यात्रियों जैसी है और वे उसके लिए किराया देते हैं, फिर भी उनके साथ
ऐसा बरताव किया जाता है कि मानो वे मालगाड़ी में एकके ऊपर एक डाल देने
लायक सामानके गट्ठर हों। अगर मीराबाईने अपने रंग और जन्मके विशेषाधिकारका
प्रयोग किया होता तो उन्हें जो अनुभव हुए, वे न हुए होते या वैसे अनुभव होते
भी तो शिकायत करनेपर उनकी ठीक जगहपर सुनवाई हो जाती । पाठक तथा
दूसरे सम्बन्धित लोग १९२५-२६ के निम्नलिखित ज्ञानवर्धक आँकड़ोंपर ध्यान दें :
{{C|'''यात्री}}
पहला दर्जा
संख्या हजारों में
आय हजार रुपयोंमें
११,६९
१,२०,४२
दूसरा दर्जा डघोड़ा दर्जा तीसरा दर्जा
१,०४,८७
१,८९,४२
१,४०,०९
१,५९,६१
६०, १७,७८
३४,७६,४५ *
{{Gap}}२. केवल. मीराबइनके लेखके कुछ अंश ही दिये जा रहे हैं।
{{Gap}}२. देखिए खण्ड १३, १० २८७-९ तथा ५५८-६२ खण्ड १४, १०१२२-४ तथा १६४ ।
{{Gap}}३. इसके बादका अनुच्छेद नवजीवन, १९-१-१९३० से लिया गया है।<noinclude></noinclude>
m3i6vcdb46vzfxn90e40680bdl4lxb3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१०
250
196729
673087
669114
2026-08-23T02:18:44Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673087
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२७२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}लेकिन उनके लेखका अधिकारियोंपर कुछ असर होगा या नहीं; फिलहाल
इसमें संदेह है।
{{Gap}}इस दुरवस्थाका एक कारण तो हम खुद ही हैं। 'चिल्लाये तो माल बिके
तथा 'मांगे बिना माँ भी दूध नहीं पिलाती' ये दोनों कहावतें जितनी प्रसिद्ध हैं।
उतनी ही सच भी हैं। हमारी सहिष्णुता की हद हो गई है और उसके फलस्वरूप
उत्पन्न हुए हैं आलस्य तथा दुःखद प्रमाद । यदि हममें स्वाभिमानकी भावना जाग्रत
हो जाये, जहाँ कठिनाइयोंको सहन करना हमारा कर्तव्य नहीं है, वहाँ उन्हें दूर
करना हम अपना कर्तव्य मानने लगे और इस कर्त्तव्यका पालन करते हुए जो
कठिनाइयाँ सामने आयें उन्हें सहन करने को तैयार हो जायें, तो बहुत-सी कठिनाइयोंको
दूर किया जा सकता है। मुसाफिरोंको चाहिए कि जब डिब्बेमें कायदेके मुताबिक
निश्चित संख्पासे अधिक मुसाफिर भरे हुए हों तो उन्हें उस डिब्बेमें बैठने से इनकार
कर देना चाहिए। ऐसा करनेमें यदि कभी उन्हें अपनी गाड़ी भी छोड़ देनी पड़े
तो उन्हें यह जोखिम उठाने को तैयार रहना चाहिए। मुझे ऐसा लगता है कि
यदि यह बात रेलवे अधिकारीके ध्यान में लानेपर वह गाड़ी में मुसाफिरको जगह नहीं
देता तो उसके खिलाफ मुकदमा भी दायर किया जा सकता है। सामान्य मुसाफिर
यह कदम नहीं उठा सकते। वे या तो बक सकते हैं या मारपीट कर सकते हैं।
धीरज, दृढ़ता और समझ-बूझके साथ तो पढ़े-लिखे तथा अनुभवी मुसाफिर ही उक्त
कदम उठा सकते हैं। अतः ऐसे मुसाफिरोंको प्रसंग आनेपर सदा आवश्यक कदम
उठाने चाहिए।
<Br>[ अंग्रेजी व गुजरातीसे ]
<Br>यंग इंडिया, १२-१२-१९२९ और नवजीवन, १९-१-१९३
{{C|'''२८०. एक महत्त्वपूर्ण फैसला *'''}}
{{Gap}}अहमदावाद के मिल मालिक संघ और कपड़ा मजदूर संघने स्वेच्छापूर्वक पंचोंका
जो गैर-सरकारी और स्थायी आयोग नियत कर रखा है, उसके द्वारा पेश किये गये
मामले में सरपंच दीवान बहादुर कृष्णलाल मोहनलाल झवेरीने जो निर्णय दिया है,
वह, जैसा कि पाठक अन्यत्र प्रकाशित विषय-वस्तु पढ़कर खुद मानेंगे, एक महत्वपूर्ण
दस्तावेज है। सरपंचका निर्णय यह बताता है कि मामलेके तथ्योंका ध्यानसे अध्ययन
किया गया है। और उसमें साहसके साथ यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया
है कि जब 'मजदूरको इतनी मजदूरी न मिले जिससे वह जीवन निर्वाहका उचित
स्तर कायम रख सके, तो वह अपने मालिक से उसके लिए आवश्यक मजदूरीकी
{{Gap}}१. पद और इसके बादका अनुच्छेद नवजीवनसे लिया गया है।
{{Gap}}२. देखिए अपील: अहमदाबाद के मजदूरोंसे, ७-१२-१९२९ और " मिल मजदूरों की मांग,
१५-१२-१९२९ भी ।
{{Gap}}३. यंग इंडिया, १२-१२-१९२९ में प्रकाशित।<noinclude></noinclude>
eoerc47l70mb20kdfrllkwm02pnn3k2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३११
250
196730
673088
669115
2026-08-23T02:20:24Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673088
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||एक महत्वपूर्ण फैसला|
२७३}}
माँग कर सकता है।" मजदूर पिछले कई वर्षोंसे यह दावा कर रहे थे कि उन्हें
जीवन निर्वाह लायक वेतन पानेका अधिकार है, लेकिन मालिक उसे मान नहीं रहे
थे। सरपंचने, जैसा कि मेरी राय में होना ही चाहिए था, यह दावा पूरी तरह
स्वीकार कर लिया है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उन्हें इस हकीकतका
पता चल गया है कि कमसे कम और अधिक से अधिक पानेवाले मजदूर परिवारोंकी
औसत आमदनी ४० रुपये माहवारसे ज्यादा नहीं है और खर्च ५० रुपये मासिकसे
कम नहीं है। सरपंचके सामने जो मामला पेश किया गया था, वह यह था कि
१९२३ में मजदूरोंकी मजदूरी में मिल मालिकोंने जो १५ फीसदीकी कटौती कर दी थी,
उसे पूरा कर दिया जाये। विद्वान् सरपंचने जब यह बात मान ली है कि मजदूरोंको
जीवन-निर्वाहके योग्य वेतन पानेका अधिकार है और वास्तव में अहमदाबादके कपड़ा
उद्योगके मजदूरोंको उतना वेतन नहीं मिल रहा है; ऐसी हालत में यह समझना
कठिन है कि वेतनमें की गई पूरी कटौतीकी फिरसे पूर्ति क्यों नहीं की जाती। पाठक
देखेंगे कि सारी कमी पूरी कर दी जाने पर भी मजदूरी बढ़कर ५० रुपये नहीं
होगी। सिद्धान्तकी दृष्टिसे किये गये निर्णय और मजदूरीकी दृष्टिसे उसके प्रत्यक्ष
अमलके बीच जो फर्क है, उसका मुझे यही कारण मालूम होता है कि या तो सरपंच
अपने निर्णयके बारे में ही सशंकित थे या उन्होंने अप्रत्यक्ष रूपसे सही मिल मालिकों
द्वारा १९२३ में की गई कटौतीकी कार्रवाईकी निन्दा करनेमें संकोच किया है। कटौतीकी
वह कार्रवाई पंच- फैसले से नहीं, बल्कि मिल मालिकोंकी मजदूरोंको दबानेकी निरंकुश
सत्ताके बलपर की गई थी। यह सच है कि तब मिल उद्योगकी स्थिति उतनी अच्छी
नहीं थी जितनी युद्धकालमें थी; फिर भी वह समय [ १९२३] केवल कम मुनाफेका
था, न कि घाटका या मूल पूँजी खर्च करनेका । कटौतीका प्रश्न तभी खड़ा हो
सकता है जब मजदूरी इतनी अच्छी हो कि जीवन निर्वाहका खर्च चुका देनेके बाद
वेतन में कुछ बचत हो जाती हो और सम्बन्धित उद्योगको सचमुच घाटा उठाना पड़
रहा हो। परन्तु मजदूर पंच-फैसले के सिद्धान्तसे बंधे हुए हैं, इसलिए उन्हें कटौती
पूरी वापस न मिलनेपर भी सरपंच निर्णयको सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
दीवान बहादुरने उन्हें जो कुछ दिया है, उसे धन्यवाद सहित शिरोवार्य करना चाहिए
और बाकी रकमके लिए लगातार शान्तिपूर्वक प्रयत्न करते रहना चाहिए। सच
तो यह है कि उन्हें या मालिकet race चैन नहीं लेना चाहिए, जबतक सचमुच
जीवन-निर्वाहके लायक वेतन मिलनेकी स्थिति न आ जाये और बेहतर मकान और
जीवनको दूसरी साधारण सुविधाऐं न मिल जायें। परन्तु यदि हड़ताले अनावश्यक हो
जायें और पंच-फैसलेके सिद्धान्तपर दोनों पक्ष पूरी तरह अमल करें, तो इससे बड़ा लाभ
होगा । इसलिए मजदूरोंकी आंशिक असफलताके बावजूद मैं दीवान बहादुरको उनके
अथक परिश्रमके लिए, जो उन्होंने दोनों पक्षों द्वारा सौंपे गये कठिन काममें किया
और जिस तरह निष्पक्ष ढंगसे और जल्दीसे निर्णय दिया, उसके लिए बधाई देता हूँ ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, १२-१२-१९२९
{{Gap}}४२-१८<noinclude></noinclude>
03gznosw2iq5jecfpb2u36am1yei7xu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१२
250
196731
673091
669116
2026-08-23T02:22:49Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673091
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८१. धर्मक्षेत्र में अधर्म'''}}
{{Gap}}एक काशीनिवासी लिखते हैं:
{{Gap}}सम्भव है, इसमें अतिशयोक्ति हो, लेकिन अतिशयोक्ति वाला अंश निकाल
डालनेपर भी जो रहेगा, वह हमारे लिए शोचनीय होगा। कोई यह कहकर इन
बुराइयोंकी ओर दुर्लक्ष्य न करे कि ऐसी अपवित्रता अन्य धर्मो क्षेत्रोंमें भी पाई
जाती है, या हिन्दू धर्मके दूसरे तीर्थक्षेत्रोंकी भी यही दशा है। हर हालत में, हर जगह
ऐसी अनीति निन्दनीय है और उसे दूर करनेके लिए प्रयत्न करना जरूरी है। इन
बुराइयोंको दूर करनेका सबसे अच्छा मार्ग तो यह है कि जो इन बुराइयोंको जानते
हैं और इन्हें निन्दनीय समझते हैं, वे अपने जीवनको शुद्ध बनायें और शुद्धतामें
दिनों-दिन वृद्धि करते रहें। यह प्राचीन मार्ग है। जब अथ
पुरुष तपश्चर्या करते हैं। और तपश्चर्याका अर्थ शुद्धि है।
{{Gap}}एक दूसरा और आधुनिक मार्ग नवयुवकों द्वारा आन्दोलन करनेका है।
आजकल युवक संघ बढ़ रहे हैं। युवकोंमें सेवाभाव बढ़ा है और बढ़ रहा है। यदि
वे इस कामको उठा लें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। सब मन्दिरोंकी सूची बनाकर,
उनके संरक्षकों और पुजारियोंसे परिचय बढ़ावें और जिन मन्दिरोंके खिलाफ शिकायत
हो उनकी यथासम्भव जांच करें। यात्रियों और दूसरे दर्शनार्थी लोगोंको इन बातोंसे
सावधान कर दें अनाथालय आदि संस्थाओंकी जानकारी हासिल करें। इन कार्योंसे
बहुतेरा सुधार अपने आप हो जायेगा। क्योंकि अनीति अन्धेरेमें ही जी सकती है,
प्रकाशमें नहीं ।
{{Gap}}ऐसे कार्य करनेवाले युवकोंका जीवन विशुद्ध होना चाहिए। जो दूसरोंकी शुद्धि
करना चाहते हैं, उनके खुद शुद्ध न होनेपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
तीसरा सम्भावित मार्ग इज्जतदार और पवित्र लोगोंकी समिति बनाकर उसके
द्वारा तीर्थक्षेत्रोंके सुधारकी चेष्टा करना है।
{{Gap}}ये तीनों मार्ग साथ-साथ चल सकते हैं, चलने चाहिए। ऐसी अनोति होते देख
हम बहुधा निराश हो जाते हैं। परन्तु निराशाका कोई कारण नहीं है। हमारी निराशा
और ढिलाईके कारण बहुतेरी अनीतियाँ जिन्दा रह सकती है। हममें यह श्रद्धा होनी
चाहिए कि अनोति क्षणिक वस्तु है, और कुछ ही लोगोंकी क्यों न हो, मगर
तेजस्विनोति सामने वह टिक नहीं सकती ।
<Br>'''हिन्दी नवजीवन,''' १२-१२-१९२९
{{Gap}}१. पत्र पा नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने इसमें बनारस में विधवाश्रमों, अनाथालयों आदिमें
होनेवाले व्यभिचार और अनाचारका वर्णन किया था।<noinclude></noinclude>
o5k940a5cok7sdtmrugre56s44tfydb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१३
250
196732
673093
669117
2026-08-23T02:24:47Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673093
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८२. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१२ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। मैं पद्माकी चिन्ता नहीं करता। बुधाभाईसे सम्बन्धित
कागजात इसके साथ भेज रहा हूँ । लीलाबहनको तुमने जो उत्तर दिया है वह ठीक
है । यदि लीलाबहन अपनी माँके लिए अलग रसोई मांगती हो तो वह बुधाभाईके
घरमें बना सकती है। मणसालीको हमने रख छोड़ा है, क्यों कि अभी उसे जबाबदार
आदमी नहीं माना जा सकता। मैं तो यह मानता हूँ कि जब तक उसकी स्मरणशक्ति
पूरी तरह लौट नहीं आती तबतक उसे रखना हमारा कर्तव्य है। इस सम्बन्ध में
सुरेन्द्रसे बातचीत करना और इसमें यदि उसे कोई विचार-दोष नजर आये तो मुझे
सूचित करना। पारनेरकर आदि यहाँ आये थे और कुछ घंटे ठहरकर चले गये ।
मथुरादासके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है वह मैं समझता हूँ। उसके सामने मुश्किलें
आती ही रहेंगी। में यह नहीं कह सकता कि वहाँकी अपेक्षा यहाँ अधिक शान्ति
है जब कि उसका मतलब यह हो कि यहाँ मुझे शान्ति नहीं मिली। हाँ, यह कहा
जा सकता है कि वहाँ मुझे अशान्ति नहीं बल्कि आराम कम मिल पाता था। यहाँ
मुझे अच्छा आराम मिल जाता है। यहाँ बाहरका काम थोड़ा ही होता है और
आश्रमके मामलों में पड़नेकी मुझे जरूरत ही नहीं होती ।
{{Gap}}महादेव और मीराबहनको परसोंतक यहाँ पहुँच जाना चाहिए । प्यार अली
और नूरबानू आ गये हैं। माधवजी और उनकी पत्नी महालक्ष्मी भी आ गये हैं।
यहाँ आश्रम में १६ व्यक्ति हैं किन्तु आजकल लगभग ३२ व्यक्ति हो गये हैं, जिससे
सभी जगहकी तंगी से परेशान हैं।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१५९ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
jixd3dn93r0vbvprwtab5ilv86j8qy3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१४
250
196733
673094
669118
2026-08-23T02:28:15Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673094
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८३. पत्र : हेमप्रभादेवीदासगुप्तको'''}}
<Br>प्रिय भगिनी,
{{Gap}}अब स्वास्थ्य कैसा है? मेरी अभिलाषा तो यह है
निरोग बन जाय । मेरा शरीर तो बहोत अच्छा कहा जा
और फल ही लेता हूं। अनाज बिलकुल नहि ।
जी० एन० १६६५की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}वर्धा
१३ दिसम्बर, १९२९
{{C|'''२८४. पत्र : मथुरादास पु० गांधीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० मथुरादास,
{{Gap}}तुम्हारा मार्ग निष्कंटक नहीं है। इसके साथका पत्र पढ़ लेना । तुमसे बात
करनेको मैंने रामसहायको भी लिखा है। यदि तुम अटूट प्रेम और धीरज रखो तथा
कभी निराश न होओ तो आखिरकार तुम्हारी ही जीत होगी। तुम अपने कामसे तो
जल्दी ही सन्तुष्ट मत होना; किन्तु दूसरोंके कामके बारेमें उदार बने रहना। ईमानदार
आदमीके अधूरे कामको सहन मत करना और बेईमान व्यक्तिसे असहयोग करना ।
दोनोंके प्रति प्रेम रखनेका नाम ही समभाव है। भूखेको भोजन देना और अजीर्णके
रोगीसे उपवास कराना ये दोनों प्रेमसे उत्पन्न होते हैं और कीढ़ी कुंजरको एक जैसा
माननेके कारण ही इसे समभाव कहा गया है। अपनी नई पद्धतिको सर्वथा सफल
मानकर काम करनेके बजाय यदि तुम पुरानी पद्धतिका आग्रह करनेवालोंको समझा-
बुझाकर उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ोगे तो कमसे कम संघर्ष होगा। पद्धति चाहे नई
हो या पुरानी उसपर पूरी तरह अमल होना चाहिए। तुम्हारे सामने जो कठिनाइयाँ
आयें उनके बारेमें मुझे लिखने में तनिक भी मत हिचकिचाना। यदि तुम्हें मेरी धारणा
अधकचरी सूचनाओंपर आधारित या गलत जान पड़े तो ऐसी स्थिति में मुझे चेता
देना । मैं जिन सिद्धान्तका प्रतिपादन करता हूँ उनमें भले ही तुम्हारी श्रद्धा हो
किन्तु किन्हीं तथ्योंके आधारपर मैं जो धारणा बनाऊँ वह श्रद्धाका विषय नहीं हो
सकती। क्योंकि जो बुद्धिग्राह्य है वहाँ श्रद्धाके लिए स्थान हो ही नहीं सकता।
इसलिए तथ्योंके बारेमें जहाँ तुम्हें मेरी मूल नजर आये और उसकी वजहसे गलती<noinclude></noinclude>
5donsccul4mheci4ky917ds8088qast
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१५
250
196734
673096
669119
2026-08-23T02:31:09Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673096
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{Rh||पत्र : रमणीकलाल मोदीको|
२७७}}
{{Gap}}हो सकती हो वहाँ मुझे सही बातकी जानकारी अवश्य करा देना । यदि तुम ऐसी
तुम्हें और भी खुलकर लिख सकूँगा तथा भली-भांति तुम्हारा
पथ-प्रदर्शन कर सकूंगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३७३५ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''२८५. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । जयन्तीप्रसादकी स्त्रीको आनेकी अनुमति देकर तुमने अच्छा
किया। व्रजबन्धु मिश्रकी पत्नीके बारेमें भी यही करो। दिनकररावकी पत्नी चली
गई, अच्छा हुआ । मैं समझता हूँ कि दिनकररावकी अनुपस्थिति में तो वह वहाँ नहीं
रहेगी। स्त्रियोंको आश्रम में लेने के बारेमें एक अचूक नियम यह होना चाहिए कि जिस
स्त्रीको गंगाबहन अनुमति दें उसीको लिया जाये। किसी स्त्रीको आश्रम में रखनेके
बारे में भी जैसा वे चाहें वैसा ही करना चाहिए। गंगावनको ऐसा चाहनेका
अधिकार है और मुझे विश्वास है कि इससे अधिक और कुछ वे चाहती भी नहीं ।
इसी प्रसंग में यह बता देना चाहता हूँ कि सुमंगलप्रकाशकी बहन चन्द्रकान्ता आ
गई है। मैं यह मानता हूँ कि गंगाबहन तथा प्रबन्ध समितिने भी उसे आश्रम में
लेने की अनुमति दे दी है। मेरे विचारसे यह बालिका आश्रमका नाम रोशन करेगी।
हालांकि १६ वर्षकी है किन्तु बहुत सयानी है, दृढ़ है और बहादुर है। वह तीक्ष्ण
बुद्धि है, उसका चरित्र निर्मल जान पड़ता है तथा उसके विचार और अभिलाषाएँ
परिपक्व है। किन्तु आखिरकार कैसी निकलेगी यह कैसे कहा जा सकता है ? अतः
इस सम्बन्धमें यदि अवतक विचार न हुआ हो तो पहले गंगाबहन और फिर प्रबन्ध
समिति विचार कर लें।
{{Gap}}दिल्ली से जो रकमें प्राप्त हुई होंगी वे सब चरखा संघको दी जायेंगी। लाला
लाजपतराय से प्राप्त रकमें भी चरखा संघकी मारफत ही दी जा रही हैं न ?
{{Gap}}चिमनलाल और शारदाका बाहर जाना वांछनीय है। शारदापर नियंत्रण
रखने की जरूरत है। वह खुद तो अपनेपर नियन्त्रण रख नहीं सकती इसलिए उस
पर निर्दयतापूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिए। जो हो किन्तु दोनों थोड़े दिन बाहर
रहें तो अच्छा होगा । गोविन्दबाबूको मैं लिखूंगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६० ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
fkpsi28uncxs8y7h1jgohs1ymjfxwhf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१६
250
196735
673097
669120
2026-08-23T02:33:05Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673097
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८६. पत्र : शिवाभाई पटेलको'''}}
{{Rh||`वर्धा}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}भाई शिवाभाई,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। प्रश्न ही गलत आधारपर पूछा गया है। कार्यकलाप
और नियम दो स्वतन्त्र वस्तुएँ नहीं हैं, जिस प्रकार कि हाथी और अंकुश स्वतन्त्र
नहीं है। जिस प्रकार निरंकुश हाथी निरर्थक और खतरनाक प्राणी है उसी प्रकार
नियमहीन निरंकुश कार्यकलाप भी निरर्थक है। अब तुम्हीं बताओ कि इनमें पहला
स्थान किसका है। मजदूरोंको कम नहीं किया जा सकता या वे हमसे मिलतेजुलते
नहीं ये दोनों कमियां हैं। और आश्रम में रहनेवाले सभी लोगोंका कर्त्तव्य है कि
वे इन दोषोंको दूर करें। मैं जो चाहता हूँ यदि वह ठीक हो तो नियमका अर्थ यह
है कि जो उसका पालन नहीं कर सकता वह आश्रम में न रहे। भोजनालयके बारेमें
तुमने जो लिखा वह ठीक है। मैं देख पा रहा हूँ कि हमारी गतिविधियां बढ़ती
जा रही हैं किन्तु चूंकि यह उन्हीं गतिविधियोंका विस्तृत रूप है अतः उनपर अंकुश
लगानेकी इच्छा नहीं होती। मैं समझता हूँ कि जेठालाल, मनजी और भगवानजीको
जो काम सौंपे गये हैं वे ठीक नहीं हैं। किन्तु अब मेरा काम आश्रमके संचालनमें
दखल देना नहीं बल्कि दर्शक बने रहना और जहाँ आवश्यक जान पड़े वहाँ
आलोचना करना है। तुम्हारा यह कहना ठीक है कि बहुतसे नियम लागू करनेकी
आवश्यकताका अर्थ है कि मन्त्री कमजोर है । मन्त्री कमजोर है, यह बात वह स्वयं
जानता है और हम सब भी जानते हैं। वह जान-बूझकर गलती नहीं करेगा। मेरे
लिए तो इतना ही काफी है और हम सबके लिए भी काफी होना चाहिए कि वह
अपनी तरफसे पूरी कोशिश करता है।
{{Gap}}तुमने जो प्रश्न उठाये हैं वे सभी अच्छे हैं। मेरे लौट आनेपर उन सभी
प्रश्नोंके बारेमें हम विचार-विमर्श करेंगे और तब जो हो सकेगा सो करेंगे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० ९४९७ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
ewu4m1gypsyo7tcb8hg9htf8led4kr7
673098
673097
2026-08-23T02:33:33Z
Lado Shaw
6039
673098
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८६. पत्र : शिवाभाई पटेलको'''}}
{{Rh|||`वर्धा}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}भाई शिवाभाई,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। प्रश्न ही गलत आधारपर पूछा गया है। कार्यकलाप
और नियम दो स्वतन्त्र वस्तुएँ नहीं हैं, जिस प्रकार कि हाथी और अंकुश स्वतन्त्र
नहीं है। जिस प्रकार निरंकुश हाथी निरर्थक और खतरनाक प्राणी है उसी प्रकार
नियमहीन निरंकुश कार्यकलाप भी निरर्थक है। अब तुम्हीं बताओ कि इनमें पहला
स्थान किसका है। मजदूरोंको कम नहीं किया जा सकता या वे हमसे मिलतेजुलते
नहीं ये दोनों कमियां हैं। और आश्रम में रहनेवाले सभी लोगोंका कर्त्तव्य है कि
वे इन दोषोंको दूर करें। मैं जो चाहता हूँ यदि वह ठीक हो तो नियमका अर्थ यह
है कि जो उसका पालन नहीं कर सकता वह आश्रम में न रहे। भोजनालयके बारेमें
तुमने जो लिखा वह ठीक है। मैं देख पा रहा हूँ कि हमारी गतिविधियां बढ़ती
जा रही हैं किन्तु चूंकि यह उन्हीं गतिविधियोंका विस्तृत रूप है अतः उनपर अंकुश
लगानेकी इच्छा नहीं होती। मैं समझता हूँ कि जेठालाल, मनजी और भगवानजीको
जो काम सौंपे गये हैं वे ठीक नहीं हैं। किन्तु अब मेरा काम आश्रमके संचालनमें
दखल देना नहीं बल्कि दर्शक बने रहना और जहाँ आवश्यक जान पड़े वहाँ
आलोचना करना है। तुम्हारा यह कहना ठीक है कि बहुतसे नियम लागू करनेकी
आवश्यकताका अर्थ है कि मन्त्री कमजोर है । मन्त्री कमजोर है, यह बात वह स्वयं
जानता है और हम सब भी जानते हैं। वह जान-बूझकर गलती नहीं करेगा। मेरे
लिए तो इतना ही काफी है और हम सबके लिए भी काफी होना चाहिए कि वह
अपनी तरफसे पूरी कोशिश करता है।
{{Gap}}तुमने जो प्रश्न उठाये हैं वे सभी अच्छे हैं। मेरे लौट आनेपर उन सभी
प्रश्नोंके बारेमें हम विचार-विमर्श करेंगे और तब जो हो सकेगा सो करेंगे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० ९४९७ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
rqtixud5blkiqgxw6oqqlzqhoueadnu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१७
250
196736
673100
669121
2026-08-23T02:36:11Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673100
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८७. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। लीलाबहनके बारेमें इससे अधिक और कुछ नहीं किया
जा सकता था। मेहमानोंको तकलीफ होती है, किन्तु हम लाचार है। नियमोंके बारेमें
तुम्हारी कठिनाई में समझता हूँ। तुमसे जितना हो सके उतना करो, इतना ही काफी
है। मुझे यह बात कतई पसन्द नहीं आती कि नवीन, कुसुम आदि जब चाहें तब
उड़े उड़े फिरते रहें। रेलगाड़ी एक सुविधाको बजाय मुझे तो असुविधा नजर आ
रही है; उसकी वजहसे होनेवाली जानीमानी असुविधाएं तो हमारे सामने ही हैं।
जब रेलगाड़ी नहीं थी तो डाक हरकारों द्वारा ले जाई जाती थी। उन दिनों जब
सगे-सम्बन्धी दूर रहा करते थे तो जो सिरपर आ पड़ती थी लोग उसे सह लिया
करते थे और एक-दूसरे की खातिर दौड़े नहीं जाते थे, जा ही नहीं पाते थे। आज
भी करोड़ों लोगोंकी यही अवस्था है। पैसेवाले तरह-तरहके नखरे कर सकते हैं।
हम भी इस कोटि में आ जाते हैं। यह बात ऐसे हर मौके पर मुझे हमेशा ही खटकी
है। इसी कारण वा का रसिकके पास दौड़े चले जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। इस
एक उदाहरणसे शेष सब समझा जा सकता है। ऐसे मामलोंमें जोर-जबरदस्तीसे
किसीको कुछ समझाया नहीं जा सकता; किन्तु हम जानते हैं कि आश्रम धर्म
कठोर धर्म है। यदि एक ओर सेवाका क्षेत्र बढ़ता है तो इसीलिए दूसरी ओर घटता
भी है। हम सब आध्यात्मिक सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं तो भौतिक सम्बन्ध
क्षीण हो ही जाने चाहिए। किन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इन कोरे
उपदेशोंपर हम आज तो अमल नहीं करते।
{{Gap}}मोती और तोतारामजीके बारेमें तुम जो कहते हो उसे मैं समझता हूँ ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६१) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
7ugj6e7u3i8n7brtstm6qfcfzxsjtln
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१८
250
196737
673102
669122
2026-08-23T02:39:43Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673102
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२८८. पत्र : रघुनाथको'''}}
{{Rh|||[ १४ दिसम्बर, १९२९ के पश्चात् ]}}
<Br>भाई रघुनाथ,
{{Gap}}मैं तो तुम दोनोंसे बात करना चाहता था परंतु एक क्षण भी न मीली और
तुममें से किसीने मांगा नहि ।
{{Gap}}चिता मत करो। आज कर्तव्यको भली भाँति पालन करनेसे भविष्यका
पता मील जाता है ।
{{Gap}}सत्यकी कोई स्वतंत्र पहचान नहि है। हमारे हृदयमें जो प्रतीत हो वह सत्य
है | बहोत सी बातों में तो हम सत्यको जान लेते हैं और हृदयकी प्रतिति शुद्ध होनेके
लिये हृदय शुद्धि आवश्यक है। इसी कारण यम नियमादिका पालन आवश्यक है।
{{Rh|||बापुना आशीर्वाद}}
{{Gap}}जी० एन० ४२१५ की फोटो नकलसे ।
{{C|'''२८९. विद्यापीठकी भिक्षा'''}}
{{Gap}}वल्लभभाई और काकाकी अपीलको जिनके मनने स्वीकार कर लिया हो उन्हें
यह लेटिन कहावत याद रखनी चाहिए: 'समयपर देनेवाला दूना देता है।' ऐसी
ही एक कहावत हमारे यहाँ भी है : 'तुरत दान महाकल्याण । इस कहावत में छिपे
हुए सत्यको हम हररोज अनुभव करते हैं। अगर डाक्टर या वैद्य समयपर रोगी की
चिकित्सा न करें तो या तो रोगीकी पीड़ा असह्य हो जाती है, या फिर वह मर
जाता है - इस बातके उदाहरणोंकी कमी नहीं है। सौपके
की जाये तो आदमी जी जाता है, नहीं तो चल बसता है यह हमारा रात-दिनका
अनुभव है। भूखोंको खिलाना धर्म है, यह जानते हुए भी जो तुरत नहीं खिलाता
वह हिंसा करता है। यही बात हर तरहके दानपर भी लागू होती है। किसीके
मांगनेपर देने में उदारता नहीं, अविचार है, मूर्खता है, तथा उसमें मोह और
अभिमान भी हो सकते हैं। लेकिन मांग वाजिब है, और वह अच्छे कामके लिए मांगी
जा रही है, यह जानते हुए भी जो आदमी, जब कोई उसके दरवाजेपर जाये तभी
कुछ देता है, तो वह जनताका समय नष्ट करता है, अपनी प्रतिष्ठा खोता है और
इस तरह संस्थाके श्रेष्ठ कार्यकर्ताओंका दुरुपयोग करता है । इस दृष्टिसे विचार करने
{{Gap}}२. प पत्र रमणीलाल मोदी द्वारा संग्रहीत और संरक्षित टाइप शुदा पत्र २४-१२-१९२९ के
पथके बाद रखा गया है।<noinclude></noinclude>
0co1zhztghpezvv1p0ijfm536exo4bz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३१९
250
196738
672885
669123
2026-08-22T14:10:54Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
672885
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||किंकर्तव्यविमूक पति|
२८१}}
पर मालूम होगा कि विद्यापीठको यह अपील एक प्रकारकी लोक-शिक्षा है। जिन्हें
विद्यापीठसे प्रेम नहीं है, उनसे यह प्रार्थना नहीं की गई है। इसका उद्देश्य उन्हें
अपने कर्तव्यपालनकी प्रेरणा देना है जिनके मनमें उसकी उपयोगिता और उसके
द्वारा अबतक की गई सेवाके बारेमें जरा भी शंका नहीं है; और जो तटस्थ या
उदासीन हैं, लेकिन विद्यापीठका महत्व जान लेनेपर ही देना चाहते हों उन्हें प्रोत्साहित
करना, ललचाना भी इस अपीलका एक हेतु है। लोक-जागृति इस युग में जहाँ
तक हो सके किसीको तटस्थ नहीं रहना चाहिए। जो संकटके समय देशकी मदद नहीं
करते वे भी उसके दुश्मनका काम करते हैं। ऐसे समय अपनी इच्छाके अनुसार कुछ
देना उनका धर्म है। विद्यापीठ असहयोगकी यानी आपत्ति कालमें सेवाके लिए निर्मित
एक संस्था है। उसका उपयोग सदा होता रहेगा, यह उसका एक अतिरिक्त लाभ है ।
लेकिन उसका जन्म तो वृद्धकालमें और युद्धमें मदद करनेके लिए हुआ था। अतएव
मैं आशा करता हूँ कि जो विद्यापीठको हानिकर या निकम्मी संस्था नहीं मान बैठे
हैं ऐसे लोगोंके लिए विद्यापीठ क्या है, उसने क्या किया है और भविष्य में क्या कर
सकता है आदि बातें जान लेना आवश्यक है। और यह सब जान लेने तथा विश्वास
हो जाने पर दानकी रकम पहुँचाना वे अपना कर्तव्य समझें। नीचे लिखे पतोंपर
दान भेजा जा सकता है: सेठ जमनालाल बजाज, कोषाध्यक्ष, ३९५-३९७, कालबादेवी
रोड, बम्बई नं० २, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद प्रान्तीय कमेटी, अहमदाबाद;
'नवजीवन' कार्यालय, अहमदाबाद और उद्योग-मन्दिर साबरमती ।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{C|'''२९०. किंकर्त्तव्यविमूढ़ पति'''}}
एक किंकर्तव्यविमूढ़ पति लिखते हैं:
{{Gap}}मैं आश्वासन देना तो जरूर चाहता हूँ, लेकिन ऐसे उलझनके समय अगर
मनुष्य खुद आश्वासन न पा सके तो दूसरे शायद ही उसे ढांढस बँधा सकें। हाँ,
सलाह-मशविरे भी आदमी बहुत कुछ आश्वासन पा सकता है। इसलिए इन नवयुवक
पतिकी उलझनका हम पृथक्करण कर देखें उनकी उलझनके पीछे चली आ रही
afer प्रभाव दिखाई देता है। मालूम होता है कि पतिके मनमें स्वामित्वकी सत्ता
आजमाने की इच्छा काम कर रही है। अगर यह बात न होती और पति, पत्नीको
मित्रवत् मानते होते तो निराशाका कोई कारण ही न रह जाता। मित्रको हम
पूर्व समझाते हैं और उसके न माननेपर निराश नहीं होते, जबर्दस्ती नहीं करते ।
{{Gap}}अगर पतिको पत्नीसे कुछ आशा रखनेका अधिकार है तो पत्नीको भी तो कुछ होगा।
{{Gap}}२. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र देखने लिखा था कि कम उम्र में ही उन्हें मजबूरन
विवाद करना पड़ा था और अब वे अपनी पत्नीके रूखे बरताव तथा उसकी नासमझीसे बहुत परेशान हैं।<noinclude></noinclude>
08z3qyj4kgdyws26lmkx97ea2xz4ner
विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
4
196812
672934
672825
2026-08-22T15:37:53Z
Koyal Singh
6351
/* पुस्तक सूची */
672934
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३७, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
mns4j7tgg38c1p9ipc580ybndftem42
672938
672934
2026-08-22T15:46:02Z
Koyal Singh
6351
/* पुस्तक सूची */
672938
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
p6s7xr77osdxu7wzca1dpktfpl2occi
672949
672938
2026-08-22T16:04:26Z
अँजली चौधरी
2439
/* पुस्तक सूची */
672949
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
t1o3ve4pqfb7qfspm413svnos35lwt1
673119
672949
2026-08-23T04:44:20Z
AMAN KUMAR
6475
/* पुस्तक सूची */ चुनाव किया
673119
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]][[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:००, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
jrrdxl7a3rxdx80z2tnlodu3q3g91xd
673134
673119
2026-08-23T05:34:07Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* पुस्तक सूची */ परिधि सुधार।
673134
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
lqihj61yt2fva86aoctd1i299y2zd9x
673172
673134
2026-08-23T07:57:48Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* पुस्तक सूची */
673172
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
4vrun28ytxrobnfzcso9exx68h4x5h6
673178
673172
2026-08-23T08:24:33Z
Koyal Singh
6351
/* पुस्तक सूची */
673178
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:२४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
2blcbu9lu6kxv2flrh2e4k6k5in6qh2
673182
673178
2026-08-23T08:34:09Z
Koyal Singh
6351
/* पुस्तक सूची */
673182
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
6tj8igaa34hcovl7ajqjto02ipzemm5
673184
673182
2026-08-23T08:42:29Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* पुस्तक सूची */ उत्तर
673184
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या २३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
3cu60gznrb0ah22kfdoeaicntqnca22
673202
673184
2026-08-23T09:31:11Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* पुस्तक सूची */ सुधार।
673202
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
dpqjooq9p16g5a5ir0f8s9x1wnzqfpu
673204
673202
2026-08-23T09:35:36Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* पुस्तक सूची */
673204
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
9o5cvtr709x6fd40vvck7df9xu03vyu
673210
673204
2026-08-23T09:48:19Z
AMAN KUMAR
6475
/* पुस्तक सूची */ उत्तर
673210
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
jlvrj52pd15xeburfvgqncvtmo3rlhb
673223
673210
2026-08-23T10:12:13Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* पुस्तक सूची */ पुस्तक जोड़ा।
673223
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
h4y98jp5h49plz2uhi0wkmb3eye5u68
673253
673223
2026-08-23T11:25:53Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* पुस्तक सूची */
673253
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
oi2qldck0y9vdjjbn78kb00mzdxhn8b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४०६
250
196826
672955
669211
2026-08-22T16:17:43Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
672955
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४७. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय-समितिमें-१'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''प्रस्तावका<ref>प्रस्ताव इस प्रकार था: कि कांग्रेस स्वयंको गरीब जनताका प्रतिनिधि मानती है तथा जहाँ तक कांग्रेस [अभिवेशन] दिसम्बर के अन्त में करनेकी बात है, जिसमें गरीब लोगोंको अपने लिए अतिरिक्त कपड़े बनवानेवर पर्याप्त पैसा खर्च करना पड़ेगा तथा उनके लिए असुविधाजनक भी होगा, कांग्रेस अधिवेशनको फरवरी या मार्चमें किसी तारीखको, जिसका निर्धारण कार्यसमिति सम्बन्धित प्रान्तकी प्रान्तीय कमेटी से सलाह करके करेगी, रखा जाता है।</ref> समर्थन करते हुए महात्मा गांधीने कहा:'''
मैं किसी भी अन्य व्यक्तिसे देश भरमें अधिक घूमा हूँ।}}
{{Outdent|'''श्री जमनादास मेहता: मेरा खयाल है कि सेठ जमनालाल बजाजके अलावा [अन्य लोगों से अधिक घूमे हैं]।'''
महात्माजी: मैं नहीं समझता इसमें कोई अपवाद रखनेकी बात है।
'''श्री जमनादास मेहता पर जमनालालजी ऐसा दावा करते हैं।'''
महात्माजी: मैं इस आरोपका खण्डन करता हूँ। मैंने देश भरमें तीसरे दर्जेमें यात्रा की है और किसी भी अन्य व्यक्तिकी बनिस्बत गरीबोंसे अधिक हिला-मिला हूँ तथा स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है कि सर्दीमें गरीबोंको कितनी कठिनाई उठानी पड़ती है। वर्षके सभी महीनोंका बहुत सावधानीसे अध्ययन करनेके बाद यह प्रस्ताव आपके सम्मुख रखा गया है। सुझाए गये महीनेमें वर्षा नहीं होती, मलेरिया या महामारी अथवा बीमारी नहीं फैलती। यह कहा जा सकता है कि क्रिसमसपर रेल किराए में छूट मिलती है। पर मैं समझता हूँ कि ऐसा कहना अर्थहीन है। फिर हम काफी जल्दी रेलोंके अपने अधिकारमें होनेकी आशा करते हैं। (हर्ष-ध्वनि)। इसी प्रकार यह सवाल कि हमें छात्र स्वयंसेवक नहीं मिलेंगे, अर्थहीन लगता है; क्योंकि छात्रोंके साथ-साथ ऐसे लाखों लोग हैं जो छात्र नहीं है और मैं आशा करता हूँ कि ये गरीब लोग कांग्रेस अधिवेशनमें भाग लेंगे। फरवरी और मार्चके महीने सुविधा और कम खर्चको देखते हुए सबसे अच्छे हैं। मैं इस उक्तिको काफी कुछ ठीक महसूस करता हूँ कि हम लोग छुट्टियोंमें मनोरंजनके लिए मिलकर राजनैतिक चर्चा करनेवाले राजनीतिज्ञ हैं। इसके अनन्तर हम अपने कार्यक्रमको बहुत जल्दी समाप्त करना चाहते हैं। मैं समझता हूँ कि इस प्रस्तावपर मुझे और अधिक बोलनेकी आवश्यकता नहीं है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|2em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
6lmq8f90r5mfmnrs3lbjmo3skpayt9g
672956
672955
2026-08-22T16:18:56Z
Priyanka1114
6799
672956
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४७. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय-समितिमें-१'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''प्रस्तावका<ref>प्रस्ताव इस प्रकार था: कि कांग्रेस स्वयंको गरीब जनताका प्रतिनिधि मानती है तथा जहाँ तक कांग्रेस [अभिवेशन] दिसम्बर के अन्त में करनेकी बात है, जिसमें गरीब लोगोंको अपने लिए अतिरिक्त कपड़े बनवानेवर पर्याप्त पैसा खर्च करना पड़ेगा तथा उनके लिए असुविधाजनक भी होगा, कांग्रेस अधिवेशनको फरवरी या मार्चमें किसी तारीखको, जिसका निर्धारण कार्यसमिति सम्बन्धित प्रान्तकी प्रान्तीय कमेटी से सलाह करके करेगी, रखा जाता है।</ref> समर्थन करते हुए महात्मा गांधीने कहा:'''
मैं किसी भी अन्य व्यक्तिसे देश भरमें अधिक घूमा हूँ।
'''श्री जमनादास मेहता: मेरा खयाल है कि सेठ जमनालाल बजाजके अलावा [अन्य लोगों से अधिक घूमे हैं]।'''
महात्माजी: मैं नहीं समझता इसमें कोई अपवाद रखनेकी बात है।
'''श्री जमनादास मेहता पर जमनालालजी ऐसा दावा करते हैं।'''
महात्माजी: मैं इस आरोपका खण्डन करता हूँ। मैंने देश भरमें तीसरे दर्जेमें यात्रा की है और किसी भी अन्य व्यक्तिकी बनिस्बत गरीबोंसे अधिक हिला-मिला हूँ तथा स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है कि सर्दीमें गरीबोंको कितनी कठिनाई उठानी पड़ती है। वर्षके सभी महीनोंका बहुत सावधानीसे अध्ययन करनेके बाद यह प्रस्ताव आपके सम्मुख रखा गया है। सुझाए गये महीनेमें वर्षा नहीं होती, मलेरिया या महामारी अथवा बीमारी नहीं फैलती। यह कहा जा सकता है कि क्रिसमसपर रेल किराए में छूट मिलती है। पर मैं समझता हूँ कि ऐसा कहना अर्थहीन है। फिर हम काफी जल्दी रेलोंके अपने अधिकारमें होनेकी आशा करते हैं। (हर्ष-ध्वनि)। इसी प्रकार यह सवाल कि हमें छात्र स्वयंसेवक नहीं मिलेंगे, अर्थहीन लगता है; क्योंकि छात्रोंके साथ-साथ ऐसे लाखों लोग हैं जो छात्र नहीं है और मैं आशा करता हूँ कि ये गरीब लोग कांग्रेस अधिवेशनमें भाग लेंगे। फरवरी और मार्चके महीने सुविधा और कम खर्चको देखते हुए सबसे अच्छे हैं। मैं इस उक्तिको काफी कुछ ठीक महसूस करता हूँ कि हम लोग छुट्टियोंमें मनोरंजनके लिए मिलकर राजनैतिक चर्चा करनेवाले राजनीतिज्ञ हैं। इसके अनन्तर हम अपने कार्यक्रमको बहुत जल्दी समाप्त करना चाहते हैं। मैं समझता हूँ कि इस प्रस्तावपर मुझे और अधिक बोलनेकी आवश्यकता नहीं है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|2em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
1ie1fhgvb32noulx1ae906sskrub39n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४०७
250
196827
672961
669212
2026-08-22T16:27:28Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
672961
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४८. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें-२'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''इसके बाद महात्मा गांधीने राष्ट्रीय ऋणको अस्वीकार करते हुए कार्य समितिके प्रस्तावको यह घोषणा करते हुए पेश किया कि भारतके राष्ट्रीय ऋणके अन्तिम भुगतान के समय यह तय करनेके लिए कि भारत कौनसे/ऋणका भुगतान करे एक न्यायाधिकरण नियुक्त किया जायेगा और ऋणका भुगतान भारत उस न्यायाधिकरणके फैसले के अनुसार करेगा।'''
इस कांग्रेसका यह मत है कि विदेशी शासन द्वारा भारतपर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे लादे गये आर्थिक भार ऐसे हैं जिनको स्वतन्त्र भारत वहन नहीं कर सकता तथा जिन्हें वहन करनेकी उससे आशा नहीं की जा सकती। अतएव, यह कांग्रेस १९२२ में गया कांग्रेस में पास किये गये प्रस्तावकी पुनः पुष्टि करते हुए, प्रत्येक सम्बन्धित व्यक्तिकी जानकारीके लिए अपना यह मत प्रकट करती है कि स्वतन्त्र भारतको उत्तराधिकारमें मिलनेवाले प्रत्येक ऋण और रियायतकी एक स्वतन्त्र न्यायाधिकारण कड़ी छानबीन करेगा और ऐसे प्रत्येक ऋण और रियायतको―चाहे वह जैसे भी दिया गया हो अथवा दी गई हो -यदि यह न्यायाधिकरण उचित और
न्याय सम्मत नहीं मानेगा, भारत अस्वीकार कर देगा।<ref>यह प्रस्ताव यहाँ '''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३० से दिया जा रहा है।</ref>
'''प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।'''
'''श्री सान्याल: क्या में जान सकता हूँ कि इस न्यायाधिकरणमें कौन-कौन लोग होंगे।'''
'''जोरकी हँसीके बीच महात्मा गांधीने कहा:'''
यदि आप यह जानकारी चाहते हैं तो आप इस बारेमें पत्राचार करें। मैं नहीं बता सकता। स्वतन्त्र भारत उसका गठन करेगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]/<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-२४|1em}}</noinclude>
f2bda0r2yyajneq9uke19nt3iviah40
672962
672961
2026-08-22T16:28:03Z
Priyanka1114
6799
672962
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४८. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें-२'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''इसके बाद महात्मा गांधीने राष्ट्रीय ऋणको अस्वीकार करते हुए कार्य समितिके प्रस्तावको यह घोषणा करते हुए पेश किया कि भारतके राष्ट्रीय ऋणके अन्तिम भुगतान के समय यह तय करनेके लिए कि भारत कौनसे/ऋणका भुगतान करे एक न्यायाधिकरण नियुक्त किया जायेगा और ऋणका भुगतान भारत उस न्यायाधिकरणके फैसले के अनुसार करेगा।'''
इस कांग्रेसका यह मत है कि विदेशी शासन द्वारा भारतपर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे लादे गये आर्थिक भार ऐसे हैं जिनको स्वतन्त्र भारत वहन नहीं कर सकता तथा जिन्हें वहन करनेकी उससे आशा नहीं की जा सकती। अतएव, यह कांग्रेस १९२२ में गया कांग्रेस में पास किये गये प्रस्तावकी पुनः पुष्टि करते हुए, प्रत्येक सम्बन्धित व्यक्तिकी जानकारीके लिए अपना यह मत प्रकट करती है कि स्वतन्त्र भारतको उत्तराधिकारमें मिलनेवाले प्रत्येक ऋण और रियायतकी एक स्वतन्त्र न्यायाधिकारण कड़ी छानबीन करेगा और ऐसे प्रत्येक ऋण और रियायतको―चाहे वह जैसे भी दिया गया हो अथवा दी गई हो -यदि यह न्यायाधिकरण उचित और
न्याय सम्मत नहीं मानेगा, भारत अस्वीकार कर देगा।<ref>यह प्रस्ताव यहाँ '''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३० से दिया जा रहा है।</ref>
'''प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।'''
'''श्री सान्याल: क्या में जान सकता हूँ कि इस न्यायाधिकरणमें कौन-कौन लोग होंगे।'''
'''जोरकी हँसीके बीच महात्मा गांधीने कहा:'''
यदि आप यह जानकारी चाहते हैं तो आप इस बारेमें पत्राचार करें। मैं नहीं बता सकता। स्वतन्त्र भारत उसका गठन करेगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०<br>
'''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-२४|1em}}</noinclude>
33n4sdx0ult1gzdth3ufhx8vb9tumrr
672963
672962
2026-08-22T16:28:40Z
Priyanka1114
6799
672963
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४८. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें-२'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''इसके बाद महात्मा गांधीने राष्ट्रीय ऋणको अस्वीकार करते हुए कार्य समितिके प्रस्तावको यह घोषणा करते हुए पेश किया कि भारतके राष्ट्रीय ऋणके अन्तिम भुगतान के समय यह तय करनेके लिए कि भारत कौनसे/ऋणका भुगतान करे एक न्यायाधिकरण नियुक्त किया जायेगा और ऋणका भुगतान भारत उस न्यायाधिकरणके फैसले के अनुसार करेगा।'''
इस कांग्रेसका यह मत है कि विदेशी शासन द्वारा भारतपर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे लादे गये आर्थिक भार ऐसे हैं जिनको स्वतन्त्र भारत वहन नहीं कर सकता तथा जिन्हें वहन करनेकी उससे आशा नहीं की जा सकती। अतएव, यह कांग्रेस १९२२ में गया कांग्रेस में पास किये गये प्रस्तावकी पुनः पुष्टि करते हुए, प्रत्येक सम्बन्धित व्यक्तिकी जानकारीके लिए अपना यह मत प्रकट करती है कि स्वतन्त्र भारतको उत्तराधिकारमें मिलनेवाले प्रत्येक ऋण और रियायतकी एक स्वतन्त्र न्यायाधिकारण कड़ी छानबीन करेगा और ऐसे प्रत्येक ऋण और रियायतको―चाहे वह जैसे भी दिया गया हो अथवा दी गई हो -यदि यह न्यायाधिकरण उचित और
न्याय सम्मत नहीं मानेगा, भारत अस्वीकार कर देगा।<ref>यह प्रस्ताव यहाँ '''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३० से दिया जा रहा है।</ref>
'''प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।'''
'''श्री सान्याल: क्या में जान सकता हूँ कि इस न्यायाधिकरणमें कौन-कौन लोग होंगे।'''
'''जोरकी हँसीके बीच महात्मा गांधीने कहा:'''
यदि आप यह जानकारी चाहते हैं तो आप इस बारेमें पत्राचार करें। मैं नहीं बता सकता। स्वतन्त्र भारत उसका गठन करेगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०<br> '''यंग इंडिया,''' २०-२-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-२४|1em}}</noinclude>
chyhjn5pl0yba2i0i5tjukhbh7cfy6v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४०८
250
196828
673111
669213
2026-08-23T04:25:43Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673111
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४९. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें―३'''}}}}
{{right|१ जनवरी १९३०}}
'''विरोधियोंको उत्तर देते हुए महात्माजीने कहा:'''
मुझे विश्वास है कि आप इस प्रस्तावके<ref>प्रस्ताव इस प्रकार था: यह देखते हुए कि नेहरू संविधान रद हो गया है साम्प्रदायिक प्रश्न पर कांग्रेसकी नीति की घोषणा करना अनावश्यक है; क्योंकि कांग्रेसका यह विश्वास है कि स्वतन्त्र भारतमें साम्प्रदायिक प्रश्नको पूरी तरहसे केवल राष्ट्रीय स्तरपर ही हल किया जा सकता है पर चूँकि विशेष रूपसे सिखने तथा सामान्यतया मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकोंने नेहरू रिपोर्ट सुझाये गये साम्प्रदायिक प्रश्नोंपर असन्तोष व्यक्त किया है, यह कांग्रेस सिलों, मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकोंको यह आश्वासन देती है कि भविष्य के किसी भी संविधानका ऐसा कोई भी समाधान कांग्रेसको मान्य नहीं होगा, जो सम्बन्धित दलोंको पूरा सन्तोष नहीं देता होगा।</ref> वास्तविक महत्वको समझेंगे। आप सब जानते हैं कि इस राष्ट्रीय सप्ताहसे कुछ दिन पूर्व पण्डित मोतीलाल नेहरू लाहौर आये थे। ये केवल दो कारणों अर्थात् सिलोंमें व्याप्त गलतफहमीको दूर करने तथा पंजाब कांग्रेसके झगड़ेको तय करनेके लिए यहाँ आये थे। गलतफहमीको दूर करनेके लिए पण्डितजी, मैं और डा॰ अन्सारी सिख नेता सरदार खड़गसिहसे इस सम्बन्ध में मिले थे। उनकी यह शिकायत थी कि नेहरू रिपोर्टमें उनको समुचित स्थान नहीं दिया गया। हमने सिखोंसे बातचीत<ref>देखिए “सिख नेताओंसे बातचीत”, २७-१२-१९२९।</ref> की और उन्हें इस बातका आश्वासन दिया कि भविष्य में यदि किसी भी राष्ट्रीय समस्याका समाधान साम्प्रदायिक स्तरपर किया गया तो हम उनको और अन्य अल्पसंख्यकोंको पूरी तरहसे सन्तुष्ट करेंगे। साथ ही मैं यह कहता हूँ कि स्वतन्त्र भारतमें प्रत्येक समस्याका समाधान राष्ट्रीय स्तरपर होगा, साम्प्रदायिक स्तरपर नहीं। फिर भी चूँकि हमारे ये भाई नेहरू रिपोर्टसे नाराज हुए हैं मैं उन्हें सन्तुष्ट करना चाहता हूँ और उन्हें अपने साथ लाना चाहता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि जिस क्षण हम इस प्रस्तावको पास करेंगे, उसी क्षण यह पण्डाल सिखों और मुसलमानोंसे भर जायेगा। यदि वे आते हैं तो हमें उनका स्वागत करना चाहिए और यदि वे नहीं आते हैं तो भी हमें स्वतन्त्रताके लिए संघर्ष जारी रखना है। यदि हम केवल पांच ही आदमी हों तो हम पाँचको ही स्वतन्त्रता पानेके लिए संघर्ष करना है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|2em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
aw73j8n3jjxi8va7b1ru9n2lvq893rv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४०९
250
196829
673113
669214
2026-08-23T04:35:45Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673113
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३५०. भेंट: पत्र-प्रतिनिधियोंसे'''}}}}
{{right|[लाहौर,<br>१ जनवरी, १९३०]<ref>गांधीजीने पद भेंट १-१-१९३० को लाहौरसे जानेके पहले की थी।</ref>}}
'''१९२१ के असहयोग आन्दोलन और वर्तमान आन्दोलन में क्या अन्तर है?'''
वर्तमान आन्दोलन स्वतन्त्रता प्राप्तिके लिए है जबकि १९२१ का आन्दोलन खिलाफत और पंजाबमें हुई ज्यादतियोंको दूर करनेके लिए तथा यदि सम्भव हो सके तो साम्राज्य में रहकर अथवा यदि आवश्यक हो तो उससे बाहर रहकर स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए किया गया था। इस बार बहिष्कार केवल विधान सभाओं तक ही सीमित है, परन्तु सविनय अवज्ञा और करबन्दी आन्दोलन, तथा सत्य और अहिंसा भी दोनोंके समान तत्व है।<ref>इसके बादका अंश '''स्टेट्समैन,''' ५-१-१९३० में भी छपा था।</ref>
'''क्या सविनय अवज्ञा बारडोली [आन्दोलन] जैसी ही होगी?'''
आपका मतलब १९२८ के सत्याग्रहसे है? जी हाँ, कुछ-कुछ उसीके जैसा है; अन्तर इतना ही है कि बारडोलीमें लोगोंने कुछ खास स्थानीय शिकायतोंको दूर करनेके लिए संघर्ष किया था।<ref>देखिए खण्ड ३७।</ref>
'''अन्य बहिष्कारोंके बारेमें आपका क्या कहना है?'''
यदि हम सविनय अवज्ञाको उचित रूपसे कर सकें तो हो सकता है कि उनकी आवश्यकता ही न हो।
'''आपको कबतक सफल होने की आशा है?'''
यह बता सकना मानव-शक्तिके बाहरकी बात है।
'''मान लीजिए कि चौरी-चौरा जैसा काण्ड<ref>देखिए खण्ड २२।</ref> फिर हो जाये, तो क्या आप सविनय अवज्ञा स्थगित कर देंगे?'''
मैं एक ऐसी योजना तैयार करनेका प्रयत्न कर रहा हूँ जिसमें किसी बाहरी अड़चनकी वजहसे इसे स्थगित न करना पड़े――ऐसी योजना जिसके अन्तर्गत सविनय अवज्ञा एक बार प्रारम्भ हो जानेपर बिना किसी रुकावटके अपने ध्येयकी प्राप्ति होनेतक चलती रहे।
'''क्या आपके पास ऐसी कोई योजना है?'''
अभी तो फिलहाल मेरे सामने ऐसी कोई ठोस योजना नहीं है। पर मैं सोचता हूँ कि ऐसी योजना बनाना असम्भव बात नहीं होनी चाहिए। इसके लिए मैं कोई<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
r9egvmmf126ptdxgxswvfwz6bu892ty
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१०
250
196830
673118
669215
2026-08-23T04:42:44Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673118
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मये|}}</noinclude>भी प्रयत्न उठा नहीं रखूँगा। ऐसा भी हो सकता है कि मानवसुलभ रोकथामके सभी उपाय काममें लानेपर भी कोई विस्फोट हो जाये। जो योजना बनानेका विचार मैं कर रहा हूँ वह यह है कि ऐसी स्थिति आनेपर भी सविनय अवज्ञाको स्थगित होनेसे बचाना।
'''पर मान लीजिए आपको अपनी गलती नजर आ जाये?'''
उस स्थितिसे पार निकलने भरकी शक्ति मुझमें है।
'''लेकिन यदि आप, जैसा कि आप सोच रहे हैं, वैसी योजना न बना सके तो आप क्या करेंगे?'''
यदि मैं ऐसा कोई उपाय ढूँढ़ पानेमें सफल नहीं हुआ और यदि फिर दोबारा चौरी-चौरा जैसा काण्ड हुआ तो मैं आन्दोलनको रोकने में हिचकूँगा नहीं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ३०-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५१. बमकी उपासना'''}}}}
भारतके राजनैतिक विचार रखनेवाले तबके के वातावरणमें हम लोगोंके चारों ओर इतनी ज्यादा हिंसा व्याप्त है कि कभी इधर तो कभी उधर बमोंके फेंके जानेसे किसीको कोई परेशानी महसूस नहीं होती; और शायद ऐसी किसी घटनाके हो जानेपर कुछ लोगोंके दिलोंमें खुशी तक होती है। यदि मैं यह न जानता होता कि यह हिंसा किसी हिलाये गये तरल पदार्थमें ऊपरके तलपर उठकर आया हुआ झाग ही है तो शायद मैं निकट भविष्यमें अहिंसासे स्वतन्त्रता दिला सकने में सफल होनके बारेमें निराश हो जाता। हिंसा या अहिंसाका सिद्धान्त माननेवाले हम सब लोग ही स्वतन्त्रताके लिए प्रयत्नशील हैं। खुशकिस्मतीसे पिछले लगभग १२ महीनोंमें भारतके अपने दौरेके अनुभवोंके आधारपर मुझे ऐसा कुछ विश्वास हो गया है कि देशकी विशाल जनता जो इस तथ्यसे वाकिफ है कि हमें स्वतन्त्रता प्राप्त करनी ही है, हिसाकी भावनासे अछूती है। इसलिए वाइसरायकी रेलगाड़ीके नीचे हुए बम विस्फोटोंकी तरह होनेवाले इक्के-दुक्के हिंसापूर्ण विस्फोटोंके बावजूद में यह मानता हूँ कि हमारे राजनीतिक संघर्षमें अहिंसाकी जड़ें जम गई हैं। राजनीतिक संघर्ष में अहिंसाकी प्रभावशीलतामें मेरे बढ़ते हुए विश्वास और जनताके इसपर चल सकनेकी सम्भावनाके कारण ही, मैं उन लोगोंको जो अभी हिंसाके विचारोंसे इतने ओतप्रोत नहीं हुए हैं कि उनपर तकका कोई असर ही न हो, अपनी बात समझाना चाहता हूँ।
तो फिर हम एक क्षण यह सोचें कि यदि वाइसराय गम्भीर रूपसे घायल हो जाते या मारे जाते तो क्या होता। तब यह तो निश्चित ही है कि पिछले महीनेकी २३ तारीखको कोई सभा नहीं हो पाती और इसलिए यह निश्चित न हो पाता कि कांग्रेसको क्या तरीका अपनाना है। कमसे कम कहा जाये तो भी यह एक अवांछनीय<noinclude></noinclude>
0yedzzcevv3zecld6p7yyw0fw4zfaii
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४११
250
196831
673122
669216
2026-08-23T04:52:00Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673122
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||'''बमकी उपासना'''|'''३७३'''}}</noinclude>परिणाम तो होता ही। हम लोगोंके सौभाग्यसे वाइसराय और उनके दलमें कोई जख्मी नहीं हुआ और उन्होंने बड़े सहज भावसे दिनभरका अपना कार्यक्रम इस तरह निभाया, मानो कुछ हुआ ही न हो। मैं जानता हूँ कि जिन लोगोंको कांग्रेसका भी कोई खयाल नहीं है, जो उससे कुछ आशा नहीं रखते और जिन्हें सिर्फ हिंसाके साधनका ही भरोसा है, उनपर इस परिकल्पी तर्कका कुछ असर नहीं पड़ेगा। लेकिन मैं आशा करता हूँ कि अन्य लोग इस दलील के सारको समझ सकेंगे और मैंने जिस परिस्थितिकी कल्पना करके बात सामने रखी है उससे जो महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं उन्हें एक साथ मिलाकर देख सकते हैं।
फिर, इस देशमें अभीतक राजनीतिक हिंसासे जो-कुछ हाथ लगा है, उसे लीजिए। जब-जब हिंसा हुई है, हर बार हमें गहरा नुकसान पहुँचा है; अर्थात् सैनिक खर्च बढ़ा है। अगर कोई इसके उत्तरमें मार्ले-मिन्टो सुधार, मॉन्टेग्यु सुधार जैसी चीजोंकी ओर इशारा करे तो मैं उन्हें मानने को तैयार हूँ। लेकिन अब दिनों-दिन राजनीतिज्ञोंमें यह बात महसूस करनेवालोंकी संख्या बढ़ती जा रही है कि जबर्दस्त आर्थिक बोझके बदले हमें खिलौनों-जैसे ये सुधार दिये गये है। नगण्य रियायतें तो दी गई हैं, कुछ और भारतीयोंको सरकारी नौकरियाँ मिल गई हैं, किन्तु उस जनताका बोझ, जिसके नामपर और जिसके लिए हम स्वतन्त्रता चाहते हैं, और भी बढ़ गया है और बदले में उसे कुछ भी नहीं मिला है। यदि हम इतना ही समझ लें कि सिर्फ विदेशियोंको डराकर ही हमें स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होगी, बल्कि खुद भय त्याग कर और ग्रामीणोंको अपना भय त्यागना सिखलाकर हम सच्ची स्वतन्त्रता प्राप्त करेंगे, तो यह बात तुरन्त हमारी समझ में आ जायेगी कि हिंसा आत्मघातक है।
फिर आप इसकी खुद हम लोगोंपर होनेवाली प्रतिक्रियाकी बात सोचिए। विदेशी शासकोंको मारनेके बाद अपने ऐसे देशवासियोंको मारना एक स्वाभाविक कदम ही होगा, जिन्हें हम देशकी प्रगतिमें बाधा डालनेवाला मानेंगे। अन्य देशोंमें हिंसात्मक कार्यवाहियोंका चाहे जो भी परिणाम हुआ हो और अहिंसाके दर्शनका हवाला दिये बिना भी यह समझने में कुछ बहुत बौद्धिक प्रयत्नकी जरूरत नहीं है कि यदि हम प्रगतिमें बाधा डालनेवाले उन अनेक दोषोंसे समाजको मुक्त करानेके लिए हिंसाका सहारा लेते हैं तो हम केवल अपनी कठिनाइयाँ ही बढ़ायेंगे और इससे स्वतन्त्रताका दिन और भी दूर हटेगा। जो लोग सुधारोंकी आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि वे उनके लिए तैयार नहीं है, सुधारोंके जबर्दस्ती लाये जानेपर वे क्रोधसे पागल हो उठेंगे और बदला लेनेके लिए विदेशोंकी मदद मागेंगे। क्या पिछले कई वर्षों में हमारी आँखोंके सामने यही नहीं होता रहा है; अब भी इसकी दुःखद याद हमारे सामने स्पष्ट है।
अब तर्कका भावात्मक पहलू ले लीजिए। जब १९२० में अहिंसा कांग्रेसके सिद्धान्त का अंग बन गई<ref>देखिए खण्ड १९, १४ १६२-७७।</ref> और कांग्रेस मानो जादूसे एक सर्वथा परिवर्तित संस्था बन गई। कोई नहीं जानता कि जनतामें जागृति कैसे आ गई। यहाँतक कि दूरस्थ गाँवोंमें भी हलचल मच गई। ऐसा लगता था कि बहुतेरी बुराइयाँ बिलकुल निकल गई हैं।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
m4u1jawmoaurzu10mldigyfdd650pq3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१२
250
196832
673124
669217
2026-08-23T04:58:28Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673124
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और लोग अपनी शक्ति पहचानने लगे हैं। उन्होंने सत्ताधारियोंको मदद देना बन्द कर दिया। अलमोड़ा में तथा भारतके अन्य कई भागों में जहाँ कहीं जनताको अपने भीतर निहित शक्तिका भान हुआ, बेगारकी प्रथा कुहरेकी तरह छट गई। यह स्वयं अपनी शक्तिसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना था। यह आम जनता द्वारा आम जनताके लिए प्राप्त सच्चा स्वराज्य था। यदि चौरी-चौरा काण्डमें परिणत होनेवाली घटनाओंसे अहिंसाकी प्रगतिमें बाधा न पड़ी होती, तो मैं बिना संकोचके यह कह सकता हूँ कि हम लोग अबतक पूर्ण स्वराज्य पा चुके होते। इस बातपर किसीने मतभेद प्रकट नहीं किया है। लेकिन कई लोगोंने मतभेद प्रकट करते हुए यह तो अवश्य कहा है, “लेकिन आप आम जनताको अहिंसा नहीं सिखला सकते।” यह तो व्यक्तियोंको ही सिखलाई जा सकती है और ऐसे व्यक्ति भी विरले ही होंगे। मेरी समझमें ऐसा सोचना अपने आपको जबर्दस्त धोखा देना है। यदि मानव स्वभावसे अहिंसक न होता तो वह अपने आपको युगों पूर्व नष्ट कर चुका होता। लेकिन हिंसा और अहिंसाकी शक्तियों में होनेवाले द्वन्द्व में अन्तमें अहिंसा सदैव विजयी रही है। सच तो यह है कि हममें प्रतीक्षा करने और लोगों में यह प्रचार करनेके लिए अपने आपको पूरे मनसे लगा देनेका धैर्य नहीं है कि वे राजनीतिक उद्देश्योंके लिए अहिंसाको साधन रूपमें अपनायें।
अब हम लोग एक नये युगमें प्रवेश कर रहे हैं। पूर्ण स्वराज्य―हमारा गन्तव्य दूरस्थ नहीं वरन तात्कालिक उद्देश्य है। क्या यह स्पष्ट नहीं है कि यदि हमें करोड़ों लोगोंमें स्वराज्यकी सच्ची भावना उपजानी है तो वैसा हम सिर्फ अहिंसा द्वारा और उसके अन्तर्गत आनेवाली सभी चीजों द्वारा ही कर सकेंगे। इतना ही काफी नहीं है कि हम गुप्त हिंसा द्वारा अंग्रेजोंका जीवन खतरेमें डालकर उन्हें बाहर भगा दें। इससे स्वराज्य नहीं मिलेगा; एकदम अराजकता फैल जायेगी। हम अपनी बात लोगोंके दिल और दिमागको जँचाकर, अपने बीच परस्पर एकता पैदा करके और अपने मतभेद समाप्त करके स्वराज्य स्थापित कर सकते हैं; और जिन्हें हम अपनी प्रगति में बाधा डालनेवाला मानते हैं उन लोगोंको डराकर या मारकर नहीं बल्कि उनसे धैर्य और नरमीसे व्यवहार करके, विरोधीका हृदय-परिवर्तन करके हम सामूहिक सविनय अवज्ञा करना चाहते हैं। यह बात तो सभी स्वीकार करते हैं कि यह उपाय एक निश्चित उपाय है। सभी समझते हैं कि सविनयका अर्थ यहाँ पूर्ण अहिंसा है; और क्या यह कई बार स्पष्ट नहीं हो चुका है कि सामूहिक अहिंसा और सामूहिक अनुशासनके बिना सविनय अवज्ञा असम्भव है? और कुछ नहीं तो जिसकी
ओर मैंने संकेत किया है ऐसी सीमित ढंगकी अहिंसा हमारी स्थितिकी मांग है; इस बातका विश्वास दिलानेके लिए हमारी धार्मिक भावनाको उभारनेकी निश्चय ही आवश्यकता नहीं है। इसलिए जो लोग विवेकशील हैं उन्हें इस हालके बम विस्फोट जैसे कार्योंका छुपे या खुले ढंगसे अनुमोदन करना बन्द कर देना चाहिए। बल्कि उन्हें खुले आम और पूरे हृदयसे इन विस्फोटोंकी निन्दा करनी चाहिए, ताकि हमारे बहके हुए देशभक्त अपनी हिंसात्मक भावनाओंको मिलनेवाले प्रोत्साहनके अभाव में<noinclude></noinclude>
tw4aemx2zhyybdpcjdrrb0x6w67osdj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१३
250
196833
673126
669218
2026-08-23T05:07:13Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673126
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||कांग्रेस में हिन्दी|३७५}}</noinclude>हिंसाकी व्यर्थता और हिंसात्मक कार्यवाहियोंने हर बार जो बड़ा भारी नुकसान किया है, उसे समझ जायें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५२. कांग्रेस में हिन्दी'''}}}}
हमारा दुर्देव कुछ ऐसा है कि हमें ‘कांग्रेस’ नामसे जितना परिचय है उतना ‘महासभा’ से नहीं। महासभाका नाम लेनेसे कोई हिन्दू-महासभा समझते हैं और कोई किसी दूसरी ही सभाका खयाल करते हैं। संयुक्त प्रान्तके दौरेमें जब मैं कांग्रेसके लिए महासभा शब्दका प्रयोग करता था तो मुझसे कहा जाता था कि महासभाके नामसे कोई कांग्रेसका अर्थ नहीं लगायेगा। यह आदतका प्रभाव है। हमें अंग्रेजी शब्दके प्रयोगकी आदत पड़ गई है, इसलिए जब कोई हिन्दी शब्दका प्रयोग करता है, तो उसे समझने में हमें कष्ट होता है।
इसीलिए यद्यपि महासभा में हिन्दी भाषाका ही प्रयोग करनेका कानून है, तो भी अधिकतर प्रयोग अंग्रेजीका ही होता है। महासभाके इश्तहार प्राय: अंग्रेजीमें छपते हैं। महासभाके दफ्तरमें भी प्रायः अंग्रेजीका ही व्यवहार होता है। एक दूसरोंको खत अंग्रेजीमें लिखे जाते हैं। लाजपतनगरमें <ref>लाहौरको एक बस्ती, जहां कांग्रेस अधिवेशन हुआ था।</ref> रास्तोंपर जहाँ देखो अंग्रेजीमें लिखे नामपट्ट ही दिखाई पड़ते थे। यह सब शोचनीय है। परन्तु इस व्याधिकी औषधि इस रोगकी दवा सख्ती के साथ कानून बनवाना नहीं है। इसकी औषधि या दवा तो है जनताका राष्ट्रभाषाके प्रति प्रेम और जनताकी तदनुसार चेष्टा, कोशिश है। जनता चाहे तो महासभाका सारा काम हिन्दीमें करवा सकती है। बात यह है कि न जनतामें इतनी जागृति है, न इतना उत्साह है और न इतना भाषा-प्रेम ही है।
महासभा के दफ्तर में हिन्दीका प्रयोग करनेके मार्गमें एक बड़ी व्यावहारिक रुकावट है। राष्ट्रपति (अध्यक्ष) जवाहरलाल नेहरूने इस ओर सदस्योंका ध्यान भी खींचा था। जैसा कि मैं पिछली बार लिख चुका हूँ,<ref> देखिए “राष्ट्रभाषा”, २६-१२-१९२९।</ref> संयुक्त प्रान्त, बिहार वगैरा, हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तों में ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं, जो इस कामके लिए तैयार हों। जो थोड़े-बहुत है या होंगे वे अपने काममें लगे हुए हैं। महासभा कार्यमें क्या, और जगहों में क्या हिन्दी जिनकी मातृभाषा है, वे लोग राष्ट्रकार्यमें बहुत कम पाये जाते हैं। ऐसी दशामें क्या आश्चर्य है कि राष्ट्रभाषाके व्यवहारका कानून होते हुए भी महासभाका बहुतेरा काम अंग्रेजीमें ही होता है।
दस साल पहले तो सारा काम अंग्रेजीमें ही होता था। इधर इस दिशा में बहुत परिवर्तन हुआ है, फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी है। महासभाका कुछ बहस-मुबाहसा<noinclude></noinclude>
1lrq2czolpjbbp3hxl788oovbx07uv2
673127
673126
2026-08-23T05:07:47Z
Priyanka1114
6799
673127
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||कांग्रेस में हिन्दी|३७५}}</noinclude>हिंसाकी व्यर्थता और हिंसात्मक कार्यवाहियोंने हर बार जो बड़ा भारी नुकसान किया है, उसे समझ जायें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५२. कांग्रेस में हिन्दी'''}}}}
हमारा दुर्देव कुछ ऐसा है कि हमें ‘कांग्रेस’ नामसे जितना परिचय है उतना ‘महासभा’ से नहीं। महासभाका नाम लेनेसे कोई हिन्दू-महासभा समझते हैं और कोई किसी दूसरी ही सभाका खयाल करते हैं। संयुक्त प्रान्तके दौरेमें जब मैं कांग्रेसके लिए महासभा शब्दका प्रयोग करता था तो मुझसे कहा जाता था कि महासभाके नामसे कोई कांग्रेसका अर्थ नहीं लगायेगा। यह आदतका प्रभाव है। हमें अंग्रेजी शब्दके प्रयोगकी आदत पड़ गई है, इसलिए जब कोई हिन्दी शब्दका प्रयोग करता है, तो उसे समझने में हमें कष्ट होता है।
इसीलिए यद्यपि महासभा में हिन्दी भाषाका ही प्रयोग करनेका कानून है, तो भी अधिकतर प्रयोग अंग्रेजीका ही होता है। महासभाके इश्तहार प्राय: अंग्रेजीमें छपते हैं। महासभाके दफ्तरमें भी प्रायः अंग्रेजीका ही व्यवहार होता है। एक दूसरोंको खत अंग्रेजीमें लिखे जाते हैं। लाजपतनगरमें <ref>लाहौरको एक बस्ती, जहां कांग्रेस अधिवेशन हुआ था।</ref> रास्तोंपर जहाँ देखो अंग्रेजीमें लिखे नामपट्ट ही दिखाई पड़ते थे। यह सब शोचनीय है। परन्तु इस व्याधिकी औषधि इस रोगकी दवा सख्ती के साथ कानून बनवाना नहीं है। इसकी औषधि या दवा तो है जनताका राष्ट्रभाषाके प्रति प्रेम और जनताकी तदनुसार चेष्टा, कोशिश है। जनता चाहे तो महासभाका सारा काम हिन्दीमें करवा सकती है। बात यह है कि न जनतामें इतनी जागृति है, न इतना उत्साह है और न इतना भाषा-प्रेम ही है।
महासभा के दफ्तर में हिन्दीका प्रयोग करनेके मार्गमें एक बड़ी व्यावहारिक रुकावट है। राष्ट्रपति (अध्यक्ष) जवाहरलाल नेहरूने इस ओर सदस्योंका ध्यान भी खींचा था। जैसा कि मैं पिछली बार लिख चुका हूँ,<ref> देखिए “राष्ट्रभाषा”, २६-१२-१९२९।</ref> संयुक्त प्रान्त, बिहार वगैरा, हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तों में ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं, जो इस कामके लिए तैयार हों। जो थोड़े-बहुत है या होंगे वे अपने काममें लगे हुए हैं। महासभा कार्यमें क्या, और जगहों में क्या हिन्दी जिनकी मातृभाषा है, वे लोग राष्ट्रकार्यमें बहुत कम पाये जाते हैं। ऐसी दशामें क्या आश्चर्य है कि राष्ट्रभाषाके व्यवहारका कानून होते हुए भी महासभाका बहुतेरा काम अंग्रेजीमें ही होता है।
दस साल पहले तो सारा काम अंग्रेजीमें ही होता था। इधर इस दिशा में बहुत परिवर्तन हुआ है, फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी है। महासभाका कुछ बहस-मुबाहसा<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
teea3vf68zzi702fkdbxa7ngql99dct
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१४
250
196835
673148
669220
2026-08-23T05:54:56Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673148
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और सारा वाद-विवाद राष्ट्रभाषा में ही होना चाहिए और उसके अंग्रेजी अनुवादकी भी कोई जरूरत न रहनी चाहिए। इसमें दो दिक्कतें पेश आती हैं। एक तो यह कि बंगाल, तमिलनाड़ वगैराके सदस्य बहुत कम हिन्दी समझते हैं और दूसरी यह कि वक्ता जो-कुछ कहना चाहता है, सो सबको समझाना भी चाहता है। इसलिए अगर वह दोनों भाषायें जानता है, तो दोनोंमें बहस करके अपना काम बना लेता है। इन दिक्कतों को दूर करनेके दो उपाय हैं। एक तो यह कि जब कोई वक्ता अंग्रेजीमें बोलने लगे, तब उसे और राष्ट्रपति (अध्यक्ष) को इस बातका स्मरण दिलाना चाहिए। दूसरे, बंगाली और तमिल भाई बहन कह दें कि उन्हें अंग्रेजीकी कोई आवश्यकता नहीं है। उनका धर्म है कि वे हिन्दी सीख लें अथवा जो-कुछ कहा जाये, उसका मतलब अपने पड़ोसियोंसे समझ लें। हिन्दी भाषा भाषियोंके प्रेम, उनके निश्चय और विनयपर ही बंगाली, तमिल वगैरा भाइयोंके हृदयका परिवर्तन निर्भर है। बगैर विनयके कुछ काम नहीं हो सकेगा। बलात्कार या जबर्दस्तीसे हिन्दीको अपना उचित स्थान नहीं मिल सकेगा।
{{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' २-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५३. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|गुरुवार [२ जनवरी]<ref>१९३० में गिरफ्तार होनेसे पहले केवल यही गुरुवार ऐसा था जिसको गांधीजीने रेलसे यात्रा की थी।</ref>, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि,}}
तेरे दो पत्र मिले हैं। यह रेलसे यात्रा करते समय लिख रहा हूँ। तुझसे जो हो सके सो दृढ़तासे कर डालना। तूने अपने दूसरे पत्रमें जो लिखा है यदि वह प्रसंग उठ खड़ा हो तो तू विले पारले अथवा वर्धा पहुँच जाना। यदि मेरे पास आ जायेगी तो मैं तुझे विस्तारपूर्वक समझाऊँगा और इससे तुझे शान्ति भी मिलेगी। मंगलवार या बुधवारको आना। इससे तू वहाँके अधिक समाचार भी दे सकेगी। थोड़ी-सी बहनोंको लेकर भी जो हो सके सो करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|चि॰ मणिबहन पटेल<br>
नडियाद}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो-४: मणिबेहन पटेलने'''|1em}}
{{dhr}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
bhm9wyk2hdluej6bjolc68ije8zrqd6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१५
250
196836
673232
669221
2026-08-23T10:41:57Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673232
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३५४. नवयुवक न्यायाधीश'''}}}}
एक नवयुवक न्यायाधीशने निम्नलिखित प्रश्न पूछा है:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने गुजरातमें किये गये सहायता-कार्य पर आपत्ति की थी।</ref>
जब गुजरात में बाढ़ आई थी और बहुतसे नवयुवक तथा अन्य स्वयंसेवक सरदार वल्लभभाईकी देखरेख में काम कर रहे थे, यह प्रश्न उससे सम्बन्धित है। मनुष्य जैसा करता है वैसा पाता है यह तो एक अटल सिद्धान्त है। इस सिद्धान्तका किस प्रकार अनर्थ किया जा सकता है, उसका उपर्युक्त विवरण एक अच्छा उदाहरण है। बहुत से लोग यही बात सोचते हैं और मैं यह जानता हूँ कि प्रस्तुत प्रश्नकर्ताने केवल तर्क-वितर्ककी खातिर ही अपना तर्क सामने नहीं रखा, इसलिए इस प्रश्नपर चर्चा करना आवश्यक है। ‘मनुष्य जैसा करता है वैसा पाता है’ यह सनातन सूक्ति है। संस्कृतके धर्मग्रन्थों तथा ‘बाइबिल’ में भी इसका उल्लेख मिलता है। किन्तु इस उक्तिका यह अर्थ नहीं मिलता कि मनुष्य जैसा करे हम उसे ‘वैसा भरने पर मजबूर करें।’ किन्तु प्रस्तुत प्रश्नकर्त्ताने मूल उक्तिसे ऐसा वाक्य बना लिया है, जिससे भयंकर म्रामक अर्थ निकलता है। मनुष्य जैसा करता है वैसा पाता है, इसका अर्थ यह है कि उसका फल उसे ईश्वरकी ओरसे मिलेगा; यह नहीं कि हम सभी ईश्वर बन बैठें और अपनी दृष्टिसे जिसने जो कुछ किया हो, उसे तदनुसार फल दें। यदि हमारे हाथमें इस प्रकार मनुष्य के कर्मो को परखने और तदनुसार उसे पुरस्कार या दण्ड देनेका अधिकार हो तो किसीको किसीके लिए कुछ करनेकी आवश्यकता ही न रहे। ऐसी स्थिति में तो सेवाभावका कोई अर्थ ही नहीं रह जायेगा। यदि सेवाभाव न रहे तो संसारका अन्त ही हो जायेगा। किन्तु संसारका अन्त अभी नहीं आया है। असंख्य व्यक्ति एक-दूसरे की सेवा करते हैं, एक-दूसरेकी भूलें सुधारते हैं और एक-दूसरे के दोषोंको भी दरगुजर कर देते हैं। इससे हम यह देख सकते हैं कि इस महान् उक्तिका वह अर्थ नहीं जो प्रश्नकर्ताfने किया है बल्कि मैंने जो सुझाया है वह अर्थ है।
हमें मनुष्यके कर्मोकी परख करना पूरी तरह नहीं आता। हम अपने सामान्य अनुभव के आधारपर किसी कार्य विशेषके सम्बन्ध में सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं। अनेक बार हरएकका अनुमान अलग-अलग होता है। सात अन्धोंकी कहानीके अनुसार हाथीके विभिन्न अंगोंको छूकर सातोंने उसके आधारपर अपना-अपना निष्कर्ष निकाला। इसलिए सभी अन्धे अपने निष्कर्ष के अनुसार सच्चे होते हुए भी अज्ञानी सिद्ध हुए और हाथीको कोई नहीं पहचान सका। इसी प्रकार हमारा न्याय भी सदा अन्धोंका न्याय होता है और इस कारण वह अपूर्ण होता है। हम तो सेवाके भूखे हैं; अतः हमारा कर्तव्य है कि दूसरोंकी सेवा करते रहें। दण्ड या पुरस्कार देना तो त्रिकालदर्शी प्रभुका अधिकार है। फिर चाहे हम उसे प्रभुके नामसे जानें, ईश्वरके नामसे जानें, सिद्धान्तके रूपमें जानें अथवा चाहे जिससे उसकी उपमा दें या न दें। किन्तु<noinclude>{{smaller|}}</noinclude>
lszcbb0csygcrreavpx1kw616ta2puj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१६
250
196837
673237
669222
2026-08-23T10:54:23Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673237
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कोई ऐसा चेतनमय तत्व इस संसारमें है अवश्य, जिसके इशारेपर हम नाचते हैं और केवल यह शक्ति ही हम जैसा करते हैं वैसा फल हमें देती है। किन्तु वह शक्ति हम नहीं है इसलिए ‘मनुष्य जैसा करता है हम उसे वैसा फल दें’ कहनेके बदले यह कहें कि ‘मनुष्य जैसा करता है वैसा पाता है’। मनुष्यकी अपनी इस अपूर्णताके अनुभवसे सेवा, उदारता, प्रेम, क्षमा, अहिंसा आदि गुणोंके परिवारकी उत्पत्ति हुई। अतः हम नहीं कह सकते कि गुजरातको जो मुसीबत उठानी पड़ी वह पापके कारण उठानी पड़ी या पुण्यके कारण वह इस जन्मकी थी या उस जन्मकी। किन्तु उस विपत्तिके निवारण में जिन लोगोंने जिस हदतक भाग लिया उस हदतक उन्हें आत्मसन्तोष हुआ है। यदि वे कर्मके नियमका उलटा अर्थ करके हायपर हाथ धरे घरमें बैठे रहे होते तो कृतघ्न माने जाते।
आशा है प्रश्नकर्ता अब यह समझ गये होंगे कि उनका प्रश्न न केवल एकांगी था बल्कि सर्वथा गलत था तथा वे इस बातकी सावधानी बरतेंगे जिससे भविष्य में इस भूलकी पुनरावृत्ति न हो।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' ५-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५५. पत्र: हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}}
{{right|७ जनवरी, १९३०}}
{{left|भाई हरिभाऊ,}}
...और<ref>व</ref>...ने<ref>नाम निकाल दिये गये हैं।</ref> मुझसे खूब खुलकर बातें कीं। ...की बातमें तनिक भी सार नहीं है। मुझपर उसकी अच्छी छाप नहीं पड़ी। ...की अच्छी छाप पड़ी।
...दोनोंने यह स्वीकार किया कि विकारवश वे एक-दूसरेके प्रति बुरी तरह आकृष्ट हो गये थे और अब भी हैं। आज भी उनकी यही हालत है। ...का कहना है कि निर्दोष भावसे सेवा करते हुए उसके मनमें विकार उत्पन्न हुआ था। ...ने इस बारे में पूछनेपर चुप्पी साध ली। डाक्टरसे जाँच करवानेको वह तैयार हो गई थी। किन्तु मुझे इस बात में पूरा सन्देह है कि यदि उसे सचमुच डाक्टरके सामने ले जाकर खड़ा कर दिया जाये तो वह भागेगी नहीं। ...का कहना है कि वे अन्तिम क्रिया तक नहीं पहुँचे थे, क्योंकि उन्हें इस बातकी शर्म थी कि ऐसा करनेपर कहीं यह बात हम दोनों तक न पहुँच जाये। ...के पितासे ...मिला था। उनसे हुई बातचीतसे में यह अनुमान करता हूँ कि इस मलिन सम्बन्धकी बातका उन्हें पता नहीं है किन्तु इस बातको साफ कर लेनेकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ी। पिता मुझे प्रभावित नहीं कर सके। इस सम्बन्धमें तुमने जो लिखा है उससे मुझे लगता है कि यह व्यक्ति...का पिता नहीं है। तुम भी इस बातको सिद्ध हुआ<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
jmfa0zujqmqfkgzmbxftkavaxus0n7e
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१७
250
196838
673252
669223
2026-08-23T11:18:07Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673252
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||पत्र वसुमती पण्डितको|३७९}}</noinclude>मानते हो। किन्तु दूसरे पत्रसे यह जान पड़ता है कि तुमने अपनी राय बदल दी है। ...तो कहती ही है कि वही उसके पिता हैं। सब बातोंपर सोच-विचार करनेके बाद मैंने यह फैसला किया है:
१...को पत्नीकी तरह...के पास जाकर रहना चाहिए।
२. यदि उसकी इस तरह रहनेकी इच्छा न हो और वह निर्विकार भावसे
रह सके तो उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
३. यदि वासनाको दबा न सके तो उसे किसी अन्य नवयुवकसे विवाह कर लेना चाहिए।
४. जबतक उसका विवाह नहीं होता तब तक ...के साथ उसे पवित्र सम्बन्ध रखना चाहिए था। हालाँकि दोनों यह दावा करते हैं कि ये पवित्र हैं किन्तु मैं उनके आपसी सम्बन्धको धर्म नहीं मानता। इसके अतिरिक्त यदि वे एक-दूसरे के साथ सम्भोग किये बिना न रह सकते हों तो दोनोंको खुले तौर पर सम्बन्ध रखना चाहिए। किन्तु इस चौथी अवस्थामें उन्हें न तो मेरा आशीर्वाद मिल सकता है और न मेरी सहमति ही मिल सकती है और जिन संस्थाओंसे मेरा निकट सम्बन्ध है उन संस्थाओंमें भी वे नहीं रह सकते। मुझे भय है कि... के बिना नहीं रह सकती। मेरे विचारसे उसे हिस्टीरिया के दौरे पड़नेका कारण उसकी विषयेच्छा है। और ... का विकारयुक्त स्पर्श उसके हिस्टीरियाको और भी बढ़ा देता है।
अब तुम्हें जो उचित जान पड़े सो करना। मैंने यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६०६९ ) की नकलसे।
सौजन्य: हरिभाऊ उपाध्याय
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५६. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>८ जनवरी १९३०}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
इस बार बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र मिला। जब में कांग्रेस में भाग लेता
होऊँ तो एक पोस्टकार्डकी तो बात ही क्या, मैं अपने बेटे-बेटियोंके पत्रोंको भी पी सकता हूँ। तुम्हारा वजन कितना है? तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा रहता है? यदि तुम अपनी दैनन्दिनी नियमसे न लिखती हो तो नियमपूर्वक लिखना और उसमें अपने मनोभावोंको भी दर्शाना। जो व्यक्ति अपने भले-बुरे विचारोंको नहीं छिपाता, वह धन्य है जो उन विचारोंको छिपाता है वह निश्चय ही अस्तेयव्रतको भंग करता है। यदि यह बात तुम्हारी समझमें न आई हो तो विनोवासे समझ लेना। कमलासे<noinclude></noinclude>
bxf679w4xy9xyg9thoqhqd19dzeyyqk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१८
250
196839
673261
669224
2026-08-23T11:41:44Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673261
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पत्र लिखनेको कहना। उसे भी दैनन्दिनी लिखनी चाहिए। मेरी तबीयत अच्छी है। मैंने बहुत-सा काम किया; थकावट भी महसूस हो रही है। किन्तु फिर भी तबीयत नहीं बिगड़ी।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२७३ ) की फोटो नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५७. पत्र: नौतमलाल भगवानजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br> ८ जनवरी १९३०}}
{{left|भाईश्री नौतमलाल,}}
डाक्टर<ref>प्राणजीवन दास मेहता।</ref> साहब कल रात यहाँ पहुँचे। उन्होंने यहाँ पहुँचते ही अपनी यह इच्छा व्यक्त की कि जैसे रतिलालका<ref>और</ref> विवाह यहाँ आश्रममें हुआ था वैसे ही मगनलालका<ref>प्राणजीवन दास मेहताके पुत्र।</ref> भी किया जाये तथा इस सम्बन्धमें मैं आपको लिखूँ। यह एक सामान्य बात है कि विवाहके अवसरपर स्त्री जाति उससे अनेक प्रकारका आनन्द उठानेकी इच्छा रखती है। किन्तु यदि आप डाक्टरको इच्छाका सम्मान करते हों तो मेरी ओरसे स्त्रियोंसे प्रार्थना करना और उन्हें समझाना। यह तो आप स्वीकार करेंगे ही कि यदि धनाढ्य माता-पिता अपनी सन्तानका विवाह धार्मिक विधिसे करें तो उसमें लोक कल्याण है और गरीबोंके लिए वह अनुकरणीय उदाहरण होगा। अतः मैं आशा करता हूँ कि आप बहनोंको समझा सकेंगे और ऐसी व्यवस्था कर देंगे ताकि विवाह यहीं हो सके। यह तो आप जानते ही होंगे कि यहाँ गाना-बजाना और खान-पान नहीं होता। केवल धार्मिक विधि ही होती है और वर-कन्या खादी ही पहनते हैं।
{{right|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ २५८३) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
pvsey6cp08ngm597fpom09zyuompapr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४८०
250
196901
672991
669286
2026-08-22T17:46:02Z
MuskanChaudhary121
6707
/* अशोधित */
672991
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="MuskanChaudhary121" /></noinclude>४४२{{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
की स्वतन्त्रताके अधिकारोंसे हमें वंचित रखा गया है। हमारे कई देशभाई
निर्वासितों की भाँति विदेशोंमें रहनेको विवश किये गये हैं और वे अपने घर
वापस नहीं आ सकते। हमारी सारी शासन-क्षमता मार दी गई है। और
जनताको पटेल, पटवारी या मुहररीके छोटे-मोटे कामसे ही सन्तोष कर लेना
पड़ता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो इस शिक्षा-प्रणाली के कारण हम अपनी संस्कृति से
कटकर दूर जा पड़े हैं और हमें जो प्रशिक्षण मिला है उसने हमें उन्हीं जंजीरों से
और जोरसे लिपटे रहना सिखाया है जो हमें [ दासतामें] बाँधे हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिले देखें तो हथियार न रखने देनेकी नीतिने हमें नामर्द
बना दिया है। हमारे प्रतिरोधको भावनाको कुचल डालने घातक इरादे जो
विदेशी सेना रखी गई है, उसने हमें ऐसा सोचनेवाला बना दिया है कि न
तो हम अपनी रक्षा कर सकते हैं, न विदेशियोंके आक्रमणका सामना कर
सकते हैं और न ही अपने घरों तथा कुटुम्बियों को चोर, डाकू या गुण्डों के
हमलों से बचा सकते हैं ।
इसलिए जिस शासनने हमारे देशपर इन चार प्रकारकी विपत्तियोंका बोझ
लाद दिया है, उसके अधीन रहना हम सब ईश्वर और मानव जातिके
प्रति अपराध करना समझते हैं। हम मानते हैं कि स्वाधीनता प्राप्त करनेके
तरीकों में हिंसाका तरीका सबसे ज्यादा कारगर नहीं है। अतः हम ब्रिटिश
सरकारसे जहाँतक हमसे हो सकता है स्वेच्छापूर्वक सहयोग करना छोड़कर
सविनय अवज्ञा करनेकी, जिसमें कर न देना भी शामिल है, तैयारी करेंगे।
हमारा विश्वास है कि यदि हम ब्रिटिश सरकारसे सहयोग करना भर छोड़
दें और उत्तेजनाका कारण उपस्थित होनेपर भी उपद्रव न करते हुए कर देनेसे
इनकार कर दें तो इस अमानुषिक शासनका अन्त निश्चित है। अतएव हम
पवित्र प्रतिज्ञा करते हैं कि पूर्ण-स्वराज्यकी स्थापनाके लिए कांग्रेस समय-समय
पर जो हिदायतें देगी उनका हम पालन करेंगे ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २३-१-१९३०
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
57vg94swiujm5a7cgjz862sefgqiu7y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०३
250
197023
673137
669412
2026-08-23T05:38:32Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
673137
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|५६५}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}५०, ११५, १३६, १८२, १९४, २२२, २३७, २८९, ३१२, ३१३, ३१६, ३१८, ४४६, ४४७, ४७८, ५१२ पा॰ टि॰, ५१३, ५१४; -का एक मुख्य उद्देश्य स्त्रियोंकी उन्नति, ३१३; -को नीरस न बनने देनेका प्रयत्न, ९०-९२}}
{{outdent|नवजीवन-कार्यालय, ४४६}}
{{outdent|नवजीवन - ट्रस्ट २३७; -घोषित, २२१-२५}}
{{outdent|'''नवजीवन-माला''' ४७४}}
{{outdent|नवजीवन-मुद्रणालय, २२२, २५२}}
{{outdent|नवयुवक, —और ग्राम सेवा, ११५; -[ ों]के लिए खेती उत्तम पेशा, १३९-४०}}
{{outdent|नसीम, मुहम्मद, १२५}}
{{outdent|नाग, लाला हरदयाल, ११६, ११७}}
{{outdent|नागपुर-कांग्रेस, ३५१}}
{{outdent|नाथ, १४६, १७८}}
{{outdent|नादिरशाह, ४६८}}
{{outdent|नानीबहन, २४१, ३०६, ३२०}}
{{outdent|नानुभाई, २४१}}
{{outdent|नायडू, सरोजिनी, ८६ पा॰ टि॰, १७३, २५४}}
{{outdent|नारद, १०६}}
{{outdent|निधीश, निधालाल, १२४}}
{{outdent|निरंजनबाबू, ९५, १३४, ४२८}}
{{outdent|निरीश्वरवाद, -और सत्य, ४२४}}
{{outdent|नूरबानू, २७५, २९२}}
{{outdent|नेगी, ठाकुर पूनमसिंह, ७४}}
{{outdent|नेशनल ऐंटी- वेक्सिनेशन लीग, लन्दन, ४८७}}
{{outdent|नेशनल होम क्राफ्ट एसोसिएशन, २०५}}
{{outdent|नेहरू, कमला, १०३, २२८, २५६, ४७५, ५१४}}
{{outdent|नेहरू, जवाहरलाल, १९, १०८, १२३, १९१ पा॰ टि॰, १९२, २२६, २२८, २३१ २७०, २९७, ३०२, ३४१, ३४५, ३४७ पा॰ टि॰, ३६३, ३७५, ३९४, ४०३, ४०६, ४१८, ४१९,}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}४७५, ४८६, ४९५, ५१४, ५१५; -देशका स्वाभिमानी सपूत, महान नेता, ३८५, ४००; -हिन्दका जवाहर, ३९१}}
{{outdent|नेहरू, मोतीलाल, ४२, ५०, ८६ पा॰ टि॰, ११९, १५१, १६२, १७३, १९०, १९१, २१०, २२८, २३५, २५४, २६३, ३०८ पा॰ टि॰, ३२४, ३२९, ३३३, ३३६ पा॰ टि॰, ३४२, ३४३, ३४४, ३५६, ३५७, ३५८, ३६०, ३६१, ३६५, ३७०, ३८२, ३८६, ४३५, ४७८, ४९५, ५२६-२७}}
{{outdent|नेहरू- रिपोर्ट, ६०, ३३४, ३५६, ३७०, ३८३, ४५१}}
{{outdent|नैतिकता, -और राजनीति, ४०७}}
{{outdent|नैयर, प्यारेलाल, ६७, ८० पा॰ टि॰, १९४, १९७-९८, २५६, ४४४}}
{{outdent|नौतमलाल भगवानजी, ३८०, ४०५, ४९३, ५०९, ५२९}}
{{outdent|नौरोजी बहनें ३०२}}
{{outdent|'''न्यूयार्क वर्ल्ड''', ३८२}}
{{outdent|'''न्यू रिपब्लिक''', ४५९}}
{{c|'''प'''}}
{{outdent|पटवर्धन, डा॰, ४८९}}
{{outdent|पटेल, छोटूभाई, ४८१}}
{{outdent|पटेल, डाह्याभाई, २६६}}
{{outdent|पटेल, मणिबहन, ३७६}}
{{outdent|पटेल, रावजीभाई मणिभाई, ५९, ८४, ११०}}
{{outdent|पटेल, वल्लभभाई, ८६ पा॰ टि॰, १०५, १५१, २०५, २२३, २३१, २३५, २३७, २३९, २५२, २८०, ३०२, ३०९, ३१९, ३३५, ३४१, ३७७, ३९९, ४६०, ४६३, ४७०, ४८६}}
{{outdent|पटेल, विट्ठलभाई, १५१, २३५, २५४, पा० टि०, २६३, ३०८ पा॰ टि॰, ३०८, ३४१}}<noinclude></noinclude>
pvgmwhvg1sq8kbe8ip9qa1ama8a7qk2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०४
250
197024
673185
669413
2026-08-23T08:52:47Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
673185
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|५६६|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|पटेल, शिवाभाई, ८४, १०९, १९३, २७८,
३१२}}
{{outdent|पट्टणी, प्रभाशंकर, २४६}}
{{outdent|पण्डित, प्रताप, ३०}}
{{outdent|पण्डित, वसुमती, १०, ३२, ४९, ६६,
१४८, २१६, २२६, ३७९, ४२६,
४४४, ४५५}}
{{outdent|पतंजलि, ४९८ पा॰ टि॰}}
{{outdent|पति -पत्नीके सम्बन्धोंके आधार, २८१-२}}
{{outdent|पद्मा, २७५}}
{{outdent|'''पब्लिक फाइनेन्स एण्ड अवर पावर्टी,'''
(लोकवित्त और हमारी दरिद्रता )
२३२}}
{{outdent|परमेश्वर, ७७}}
{{outdent|परिवर्तन -प्रगतिकी शर्त है, २९९}}
{{outdent|पशु प्रजनन, -का अर्थशास्त्र, ३९}}
{{outdent|पशुबलि, और युद्धोचित जोशकी भावना,
२०८}}
{{outdent|पाण्डे, कोटेश्वरप्रसाद, १६}}
{{outdent|पाप,-और भूल, २१९}}
{{outdent|पारनेरकर, २४२, २७५}}
{{outdent|पारसी, ३०४, ३९०, ४११, ५०२, ५०७}}
{{outdent|पारेल, कुँवरजी, ४३०, ४०५, ४८३}}
{{outdent|पारेख, देवचन्द, ४३०}}
{{outdent|पारेख, रामी, ४०५, ४३०, ४८३}}
{{outdent|पार्वतीबहन, ३०६}}
{{outdent|पॉल, ए० ए०, १३०}}
{{outdent|पियर्सन-स्मारक, १९७}}
{{outdent|पुननैया, ३६}}
{{outdent|पुरुषोत्तम, २२}}
{{outdent|पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, सर, ३०६, ४४६,
४६१, ४८१}}
{{outdent|पूँजी, -और मजदूरीका महत्त्व समान, २८६;
-और श्रमका सम्बन्ध, ८९}}
{{outdent|पूँजीपति, -अतिरिक्त संग्रह स्वेच्छासे छोड़ें,
२५१; -[यों] के कर्तव्यका घन-
श्यामदास बिड़ला द्वारा पालन, ३०३,}}
{{ Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}३१७; -ब्रिटेनके सिद्धान्तोंके 'पिट्ठू
और दलाल,' ४६९}}
{{outdent|पूर्ण स्वाधीनता, -का अर्थ साम्राज्य विहीन}}
{{outdent|स्वराज्य, ४७१; -की २६ जनवरी १९३०
की घोषणा, २९५-७ ४४०-२,; -ही
स्वराज्य, ३२९-३४, ३३३-५, ३५६-७,
३७४-७५}}
{{outdent|पेज, कर्कले, २४३}}
{{outdent|पेज, श्रीमती कर्कले, २४३}}
{{outdent|पेटिट, मीठुबहन, ३०२, ५१५}}
{{outdent|पेटिट, सर दिनशा ३०६}}
{{outdent|पेड़, -हमारे भाईबन्द, २४८}}
{{outdent|पेनिंगटन, जे॰ बी॰, १७४, २०३-५, ३९१}}
{{outdent|पेरीनवहन, ५१५}}
{{outdent|पोद्दार, रामेश्वरदास, ४४४, ४५८}}
{{outdent|पोलक, हेनरी, ३१९}}
{{outdent|'''प्रजाबन्धु,''' ३९९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|प्रधान, जी॰ आर॰, ४८८}}
{{outdent|प्रभावती, १९९, २२१, २६८, २९२}}
{{outdent|प्रसन्नबाबू, १९८}}
{{outdent|प्यारअली, २७५, २९२, ३२०}}
{{outdent|प्लेग,-से बचनेका उपाय स्वच्छ जीवन, १५६}}
{{outdent|'''प्राब्लम ऑफ एज्यूकेशन,''' १६९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|प्रार्थना, का अर्थ और उसकी आवश्यकता,
४२५-६; -भोजनसे अधिक जरूरी, ६४;
-ही ईश्वरकी कृपा पानेका उपाय, २६}}
{{outdent|प्रेम, -का स्वभाव, २०, ५१०}}
{{outdent|प्रेम महाविद्यालय, १६६, २२९ ३३७}}
{{c|'''फ'''}}
{{outdent|फिजी कांग्रेस, १७६}}
{{outdent|फिजी, -में भारतीय, २०१}}
{{outdent|फ्री प्रेस, ६८, ३२९}}
{{c|'''ब'''}}
{{outdent|बजाज, जमनालाल, ३, २७, ४८, ९७,
११४, १२६, १२७, १३४, १८३,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
0jsynh26zh2ddv3cx9c9fv9l7sy0anu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६४
250
197208
672988
672807
2026-08-22T17:36:10Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672988
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''११४. सन्देश : महाराष्ट्रको'''}}}}
{{right|आमोद<br>२२ मार्च, १९३०}}
महाराष्ट्रमें दोनों पक्षने इकट्ठे होकर स्वराज्यकी लड़ाईमें हिस्सा लेनेका निश्चय किया है, इससे मुझे बहोत हि आनंद हुआ है। मैं आशा रखता हूं कि इस धर्म-युद्ध में महाराष्ट्र प्रथम स्थान लेगा।
{{Right|'''मोहनदास गांधी'''}}
जी° एन° ९८ की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{C|{{larger|'''११५. भेंट : यूसुफ मेहरअलीको'''}}<ref name="Gandhi" />}}
{{right|[आमोद<br>२२ मार्च, १९३०]<ref name="Gandhi">• साधन-सूत्रके • अनुसार भेंटकी रिपोर्ट बैंगार्डके २२-३-१९३० के अंक में प्रकाशित हुई थी। गांधीजी २२ मार्चकी • सांझको • आमोद पहुँचे थे।</ref>}}
'''प्रश्न : वर्तमान संघर्षमें आप युवक आन्दोलनसे किस भूमिकाको अपेक्षा रखते हैं?'''
उत्तर : युवक संगठन तो इसमें बहुत कुछ कर सकते हैं। वे सविनय अवज्ञा
अभियानके लिए काफी बड़ी संख्यामें स्वयंसेवक दे सकते हैं। इसके अलावा, वे
स्वतन्त्रताके सन्देशको देशके कोने-कोने में फैलाने में सहायक हो सकते हैं। वे विदेशी
वस्त्रों और शराबकी दुकानोंपर धरना देकर उपयोगी काम कर सकते हैं।
जो युवक इस संघर्षमें सक्रिय रूपसे शामिल होनेमें असमर्थ हैं वे समाज-सुधारके क्षेत्र में, खादी तथा स्वदेशी वस्तुओंको लोकप्रिय बनाने में, मद्य-निषेधका प्रचार करने
आदिमें बहुत अच्छा काम कर सकते हैं।
वास्तवमें इस समय देशके युवकोंसे बड़ी-बड़ी चीजोंकी आशा की जाती है और मुझे इस बात में कोई सन्देह नहीं कि वे अपने-आपको अवसरके सर्वथा योग्य साबित करेंगे।
'''प्रश्न: क्या आप विद्यार्थियोंको स्कूल और कालेज तत्काल छोड़ देनेकी सलाह
देना चाहेंगे?'''
उत्तर : हाँ, मैं तो देना चाहूँगा। मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस बार विद्यार्थियोंसे जो अपेक्षा की जाती है वह १९२१ में की गई अपेक्षासे भिन्न है। उस समय तो विद्यार्थियोंसे सरकारी नियन्त्रणमें चलनेवाली शिक्षण-संस्थाओंको छोड़कर<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
041wwubczl64ivj41ax7weypwcjwi3t
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६५
250
197209
672935
669726
2026-08-22T15:40:36Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672935
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भेंट : यूसुफ मेहरअलीको|१२३}}</noinclude>राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं में दाखिल होने को कहा गया था। इस समय उनसे हमारा अनुरोध यह है पढ़ाई-लिखाईको छोड़कर स्वतन्त्र्य संग्राम में शरीक हों। यदि आप विजय मिलनेके बाद जीवित रहे तो फिर अपनी ही सरकारके स्कूलोंमें पढ़ सकेंगे। क्योंकि मेरे विचारसे तो यह लड़ाई ऐसी है जिसमें अन्तिम फैसला हो ही जाना है। अतः विद्यार्थी लोग जो सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं वह यह है कि स्कूलों और कालेजोंको छोड़कर वे सत्याग्रही स्वयंसेवकों की तादाद बढ़ायें।
'''प्रश्न: क्या आप युवक संगठनोंसे उन विद्यार्थियोंका भी आह्वान करने को कहेंगे जिनकी परीक्षा सिर्फ एक महीने या एक ही सप्ताह बाद होनेवाली है?'''
उत्तर: हाँ, मैं तो उनका भी आह्वान करनेको कहूँगा। यदि विद्यार्थी खुद ही इसकी आवश्यकता महसूस करते हों तो उन्हें तुरन्त बाहर आ जाना चाहिए। मैंने कहा न कि इसे मैं ऐसी लड़ाई मानता हूँ जिसमें आखिरी फैसला हो जाना है। अगर उनमें श्रद्धा नहीं है, तो वे स्कूल-कालेज छोड़कर संघर्ष में शामिल नहीं होंगे।
'''प्रश्न : युवक संगठनके हलकोंमें ऐसा सुझाव दिया जा रहा है कि अपने-अपने स्थान न छोड़नेवाले 'गद्दार' विधान पार्षदों तथा कुछ चुने हुए सरकारी अधिकारियोंके घरोंपर धरना दिया जाये और उन्हें दूसरे तरीकोंसे भी जितना हो सके उतना परेशान किया जाये। क्या आप इस सुझावको ठीक मानते हैं?'''
उत्तर : नहीं, मैं तो कहूँगा कि यह ठीक नहीं है। असहयोग आन्दोलन के दिनोंमें ऐसे तीन उदाहरण मेरे ध्यानमें आये थे। उनसे कोई लाभ नहीं हुआ; बल्कि मैं जानता हूँ कि उनसे हानि ही हुई थी।
'''प्रश्न: क्या आप कोई ऐसा उपाय सुझायेंगे जिससे मुसलमानोंको और भी अधिक तादाद कांग्रेसके प्रभाव क्षेत्रमें लाया जा सके और सम्प्रदायवादियोंके घातक प्रचार से बचाया जा सके?'''
उत्तर : कांग्रेस में मुसलमानोंकी रुचि बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि कांग्रेस उनकी सेवा करे। उनमें यह विश्वास पैदा कीजिए कि कांग्रेस जितनी दूसरोंकी है उतनी ही उनकी भी है। मेरा वर्तमान कार्यक्रम—नमक-कानूनको भंग करनेका कार्य-क्रम—भारतके सभी समुदायोंको पसन्द आना चाहिए, क्योंकि इससे समान रूपसे सभी प्रभावित होते हैं। मैं आशावादी हूँ। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि बहुत जल्दी कांग्रेसको मुसलमानोंका इतना अधिक स्नेह सम्मान प्राप्त होगा जितना पहले कभी नहीं हुआ था। हमारी जनताका दिल बिलकुल साफ़ है। उन्हें सिर्फ सही और साहसपूर्ण नेतृत्वकी आवश्यकता है। मैं फिर कहता हूँ कि मुसलमानोंको अपने पक्षमें लानेका सबसे अच्छा तरीका उनकी सेवाके अवसर इंढ़ते रहना और उन्हें यह विश्वास दिला देना है कि साम्प्रदायिक प्रश्नपर कांग्रेसके प्रस्तावमें जो कुछ कहा गया है उसका उद्देश्य और आशय भी वास्तवमें वही हैं।
'''प्रश्न : यदि आप अगले कुछ दिनोंमें गिरवतार नहीं किये जाते तो क्या अन्य प्रान्तोंको सत्याग्रह शुरू नहीं करना चाहिए?'''<noinclude></noinclude>
sxmbrcgze1ky8qdz48fu449cxhkwb21
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६६
250
197210
672947
669728
2026-08-22T16:01:17Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672947
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>
उत्तर: यदि मुझे जलालपुर पहुँचनेतक गिरफ्तार नहीं किया जाता तो मैं यह उम्मीद रखता हूँ कि ज्यों ही मैं नमक कानून भंग करता हूँ, विभिन्न प्रान्तोंको सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेकी पूरी छूट होगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दू,''' २५-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११६. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{right|[२३ मार्च, १९३० के पूर्व]<ref>पत्रके पिछली और "२३ मार्च, १९३०" तारीख लिखी हुई है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि मीराबदनने शायद इसी तारीखको यह पत्र प्राप्त किया था।</ref>}}
{{left|चि° मीरा,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। कुछ कहने के लिए मेरे पास समय नहीं है। देखता हूँ, लोग सब जगह यही कहते हैं कि तुमने आश्रमका पूरा कार्यभार सँभाल लिया है। इसके खण्डनकी<ref>देखिए "टिप्पणिया", २७-३-१९३० का उपशीर्षक "मीराबाई प्रबन्धक नहीं"।</ref> जरूरत है। मैं कोई रास्ता सोच-निकालनेकी कोशिश कर रहा हूँ।
मैं आशा करता हूँ कि जिन्हें बिच्छूने डंक मारा था, वे अब ठीक हो गये होंगे।
{{right|'''बापू'''}}
मूल अंग्रेजी (सी° डब्ल्यू ° ५३८७ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११७. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}}
{{right|आमोद<br>प्रार्थनासे पहले, २३ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° कुसुम,}}
तेरा पत्र मिला।
नारणदास व गंगाबहनकी अनुमति मिले तो यहाँ आकर एक दिन बिता जाना। भड़ौच बुधवारको पहुँचना है, यह तो जानती है न? यह तुझे सोमवारको मिलना चाहिए। आज मिल सकता था, परन्तु पत्र लिखनेका समय ही नहीं था।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
aefv2al888vjvgsagdtzdwidibwrf2b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६७
250
197211
672964
669729
2026-08-22T16:29:14Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672964
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : बुवामें|१२५}}</noinclude>
तीन बजे नहीं उठ सकती, इसका दुःख मानना तेरा पागलपन है। शरीर काम न करे तो इसमें तू क्या करे। शेष सब ईश्वरके अधीन है। तू असावधान न रहे, इतना काफी है? प्रयत्नशील तो है ही। अधिक लिखनेका समय नहीं है।
दूधीबहनको मैंने पत्र तो लिखा ही है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° १७९६) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११८. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|बुवा<br>रविवार, २३ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° प्रेमा,}}
तूने तो अब मुझे पत्र न लिखनेका व्रत ले लिया है, ऐसा मालूम होता है। तू काममें डूबी हुई है, यह मैं जानता हूँ। इसीलिए मुझे पत्र चाहिए। काम इस हद तक न करना कि तू बीमार पड़ जाये। आवाज हलकी रखकर गलेकी संभाल करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो-५ : कुमारी प्रेमाबहेन कंटकने'''|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११९. भाषण : बुवामें'''}}}}
{{right|२३ मार्च, १९३०}}
हालांकि मैं सरकारके विरुद्ध कड़े भाषण देता हूँ और नमक कानून तोड़नेके लिए निकल पड़ा हूँ, तब भी सरकारमें मुझे गिरफ्तार करनेकी हिम्मत नहीं है। आप ऐसी सरकारसे क्यों डरते हैं? सरकार श्री सेनगुप्तको रंगून ले गई और वहाँ उसने उन्हें दस दिनकी सादी कैदको सजा दी। इससे क्या हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि १८५७ और १९१९ की तुलना में इसकी शक्तिका कुछ हास हो गया है? मेरे साथ केवल ८० स्वयंसेवक हैं। तिसपर भी सरकार मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकती, तब ८०,००० स्वयंसेवकोंके होनेपर यह क्या कर पायेगी? इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानों, स्त्रियों तथा पुरुषोंको चाहिए कि वे इस युद्ध में भाग लें।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती, ३०-३-१९३०'''|1em}}<noinclude></noinclude>
mtphvojacjcvjvo8n0h8bvdv1nrr5y5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६८
250
197212
672974
669730
2026-08-22T16:53:03Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672974
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१२०. भाषण: समनी में'''<ref>सभा रातको ९ बजे हुई थी।</ref>}}}}
{{right|२३ मार्च, १९३०}}
आजतक कमसे कम ८० व्यक्ति इस्तीफे दे चुके हैं। इस्तीफा देकर उसे वापस लेना तो कायरता मानी जायेगी। इस्तीफा देना लाजमी नहीं है। यदि आपने मुखियागिरीको ओछा काम मानकर, उसे मैल और कूड़ा मानकर निकाल फेंका हो तो अच्छा है। आश्रम में स्त्रियोंको १५ दिनमें प्रशिक्षित करनेवाली कक्षाएँ चलाई जा रही हैं। वहाँ दादाभाईकी पौत्री<ref>दबदन नौरोजी</ref> शिक्षा देती हैं। समनीकी महिलाओंको भी आगे आना चाहिए। यदि ऐसा न हो सके तो आप खादीका उत्पादन तो करेंगी ही न? आजकल बहुत से लोग खादी पहनने लगे हैं किन्तु यदि खादी बनानेवाले सभी लोग जेल चले जायें तो खादी कौन बनायेगा? अतः आपको खादी बनानी चाहिए।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' २०३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१२१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|समनी<br>सोमवार [२४ मार्च, १९३०]<ref>गांधीजी इस तारीखको समनी में थे।</ref>}}
{{left|चि° महादेव,}}
इस पुलिन्देमें सात लेख भेज रहा हूँ। अब रातके दस बज रहे हैं। मैं इनमें संशोधन तो कर गया हूँ। अब इनमें और जितना संशोधन करना उचित जान पड़े, उतना कर लेना। कुछ बाकी रह गया जान नहीं पड़ता । साथमें आश्रमके लोगोंके लिए थोड़े पत्र हैं। वे उन्हें देना भूल नहीं जाना और यह भी देखना कि वे खो न जायें।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
बहनों आदिको पत्र लिखनेका इरादा था लेकिन सारा समय आराम करने और 'यंग इंडिया' में चला गया।
तीन पत्र खुले हैं और दो लिफाफे हैं।
गुजराती (एस° एन° ११४८४) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
etfsvdspos2tqj0y7h29jf8uvsz2eay
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१६९
250
197213
672978
669731
2026-08-22T17:01:55Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672978
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१२२. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{right|त्रालसा<br>२५ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° मीरा,}}
मैंने अभी-अभी नोनामीको एक पोस्ट कार्ड भेजा है।
'यंग इंडिया' में मैंने तुम्हारे बारेमें कुछ लिखा है।<ref>देखिए "टिप्पणिय", २७-३-१९३० का उपशीर्षक "मीराबाई प्रबन्धक नहीं"।</ref> उसे देख लेना।
अपना ताजा समय-पत्रक बताना। मैंने नारणदाससे कहा है कि केशुसे प्रार्थनामें आगे-आगे गायन करनेको कहा जाये। वह अच्छा गाता है। उसके कानोंको संगीतका ठीक अन्दाज है और उसका संस्कृतका उच्चारण भी निर्दोष है। क्या 'स्त्रियोंकी प्रार्थना' रोज गायी जाती है?
मैं अपनी यात्रा सचमुच बहुत अच्छी तरह कर रहा हूँ। लेकिन पन्द्रहसे ज्यादा आदमी असमर्थ हो गये हैं। कलतक उनके बिलकुल अच्छे हो जानेकी आशा है। वे सब भड़ों में हैं, जहाँ हम कल प्रातःकाल पहुँचेंगे।
अब मुझे नींद आ रही है।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
मेरे पास आनेवाले ये पांचों नौजवान यदि हृदयसे पश्चात्ताप कर रहे हों और वे नियमों का पालन करनेका वचन दें तो वास्तव में मेरा ऐसा इरादा था कि उन्हें ले लिया जाये।
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी° डब्ल्यू° ५३८९) से सौजन्य : मीराबहन जी° एन° ९६२३ से भी।<noinclude>{{Dhr|10em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
dtlk9lxgny56fyzfh2l6x8jo3qop93o
673020
672978
2026-08-22T18:58:08Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
673020
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१२२. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{right|त्रालसा<br>२५ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° मीरा,}}
मैंने अभी-अभी नोनामीको एक पोस्ट कार्ड भेजा है।
'यंग इंडिया' में मैंने तुम्हारे बारेमें कुछ लिखा है।<ref>देखिए "टिप्पणिय", २७-३-१९३० का उपशीर्षक "मीराबाई प्रबन्धक नहीं"।</ref> उसे देख लेना।
अपना ताजा समय-पत्रक बताना। मैंने नारणदाससे कहा है कि केशुसे प्रार्थनामें आगे-आगे गायन करनेको कहा जाये। वह अच्छा गाता है। उसके कानोंको संगीतका ठीक अन्दाज है और उसका संस्कृतका उच्चारण भी निर्दोष है। क्या 'स्त्रियोंकी प्रार्थना' रोज गायी जाती है?
मैं अपनी यात्रा सचमुच बहुत अच्छी तरह कर रहा हूँ। लेकिन पन्द्रहसे ज्यादा आदमी असमर्थ हो गये हैं। कलतक उनके बिलकुल अच्छे हो जानेकी आशा है। वे सब भड़ौंचमें हैं, जहाँ हम कल प्रातःकाल पहुँचेंगे।
अब मुझे नींद आ रही है।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
मेरे पास आनेवाले ये पांचों नौजवान यदि हृदयसे पश्चात्ताप कर रहे हों और वे नियमों का पालन करनेका वचन दें तो वास्तव में मेरा ऐसा इरादा था कि उन्हें ले लिया जाये।
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी° डब्ल्यू° ५३८९) से सौजन्य : मीराबहन जी° एन° ९६२३ से भी।<noinclude>{{Dhr|10em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
1gl1w347ydblei6b3rub7rl42fjeh6x
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७०
250
197214
672980
669732
2026-08-22T17:10:38Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672980
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१२३. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|मंगलवार [२५ मार्च, १९३०]<ref>यह पत्र व्रजकृष्ण चांदीवालाको २६ मार्च, १९३० को मिला था।</ref>}}
{{left|चि° ब्रजकृष्ण,}}
तुमारा खत मीला है। तुमारे चिंता छोड़ना चाहीये। तुमारे प्रयत्नमें हि तुमारी सफलता है। "न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति"<ref>भगवद्गीता, ६-४०।</ref> इसका अर्थ देख लो। जो कुछ हो सके करते हो। शरीर अच्छा न रहे तो मोरबी जाना। जानेमें कोई हानि तो है हि नहि। मैं बाहर हुं वहां तक लीखे रहो। 'गीता' का उच्चार कृष्णदाससे सीखो।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी° एन° २३७८ की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१२४. भाषण : त्रालसाकी सार्वजनिक सभामें'''}}}}
{{right|२५ मार्च, १९३०}}
'''महात्माजी ने कहा कि सुना है, कुछ मुसलमान भाइयोंकी शिकायत है कि मैं और मेरे साथ चलनेवाला जत्था मुसलमानोंके गाँवोंसे होकर नहीं गुजरा। अगर मुझे आमन्त्रित किया जाता तो में निश्चय ही ऐसे गाँवोंमें जाता। लेकिन मेरी यह यात्रा ऐसी है कि मैं किसी भी गाँवमें बिना बुलाये नहीं जा सकता, और न ख़्वाहमख्वाह ग्रामवासियोंपर अपना स्वागत करनेकी जिम्मेदारी डाल सकता हूँ।'''
दाँडी-निवासी एक मुसलमानने मुझे आमन्त्रित किया है और मैं उन्हींके बँगलेमें ठहरूँगा। इन मुसलमान मित्रके घरसे ही सत्याग्रह आरम्भ होगा। इसलिए मेरे मुसलमान मित्रोंको बुरा नहीं मानना चाहिए। मैं तो उनका आशीर्वाद चाहता हूँ ताकि इस धर्म-युद्ध में मेरी विजय हो। मुसलमान व हिन्दू दोनों चाहते हैं कि यह कर खत्म हो जाये, क्योंकि दोनों ही समान रूपमें नमकका उपयोग करते हैं और दोनोंको ही यह कर खटकता है। जब वे इस करको समाप्त करा देंगे तभी उन्हें स्वराज्यकी प्राप्ति के लिए पर्याप्त शक्ति मिलेगी। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि अलग-अलग ढंगसे करोड़ों रुपये इंग्लैंड भेजे जा रहे हैं।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
lraybpskvyj76avx1dgfca4c9ukkzy2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७१
250
197215
672986
669733
2026-08-22T17:29:55Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
672986
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : सुशीला गांधीको|१२९}}</noinclude>
'''शारदा कानूनका सरसरी तौर पर उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा कि इस विधेयकसे डरनेकी जरूरत नहीं है। इस तरहके मामलोंमें सरकारकी दखलन्दाजीके बारेमें में सोच भी नहीं सकता, लेकिन जनताको यह बात समझ लेनी चाहिए कि कम उम्र के बच्चों का विवाह रचानेसे कोई लाभ नहीं होता।'''
'''आजका समय, जब कि देशमें स्वराज्यकी लड़ाई चल रही है, शादी-विवाहका समय नहीं है। लोगोंको अपने लड़कोंपर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए। किन्तु यह घोर अज्ञान भी तो हमारे बन्धन और पराधीनताके कारण ही है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१२५. पत्र : सुशीला गांधीको'''}}}}
{{right|बुधवार, २६ मार्च, १९३०}}
{{left|चि° सुशीला,}}
तेरा पत्र मिला। मणिलालको लिखा तेरा पत्र भी मैंने पढ़ा। इसलिए इस बारेमें मैं तुझसे मजाक नहीं करूँगा।
मैं तेरे पक्षको समझता हूँ, उसका समर्थन कर सकता हूँ और तू जैसा चाहे वैसा ही करना चाहिए, ऐसा मानता हूँ। लेकिन यदि तू सीताको अकोलामें रखना चाहती हो तो तुझे भी वहीं रहना चाहिए। जहाँ तू वहाँ वह और जहाँ वह वहाँ तू।
लेकिन आश्रममें तू सीताका पालन-पोषण अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकती, सो मैं नहीं मानता। यदि तू अपनी कल्पना-शक्तिका उपयोग करे और विचार करे तो देखेगी कि आश्रमके जैसा वातावरण अन्यत्र मिल ही नहीं सकता। नैतिक वातावरणसे बूढ़े और बच्चे, सभी अदृश्य रूपसे बहुत-कुछ ग्रहण करते हैं। तू लड़कोंको उद्धत मानती है, इसमें तो अर्धसत्य ही है। आश्रममें बालकोंको स्वतन्त्र बनानेका प्रयत्न
किया जाता है। उन्हें पीटा नहीं जाता, इसीसे वे उच्छृंखल जान पड़ते हैं। लेकिन मैं मानता हूँ कि परिणाम तो अन्ततः शुभ ही होगा। लेकिन यदि तु आश्रममें रहती है और सीताको भी रखती है तो तुझे इतने नियमोंका पालन तो करना ही होगा :
(१) सीताको रोता छोड़ तुझे किसी भी कार्यमें लगे नहीं रहना चाहिए।
(२) तू सीताको जिसे सौंपे उसे यह बता देना चाहिए कि वह किसी भी हालत में सीताको खाने-पीने को कुछ भी न दे।
(३) सीताको निर्धारित समयपर ही खाना देना चाहिए।
(४) जहाँतक हो सके उसे फल और दूधपर ही रखना।
(५) उससे रोज कसरत करवानी चाहिए।
(६) तेरी अथवा सीताकी तबीयत यदि ठीक न रहे तो तुझे वहाँसे चल देना होगा।<noinclude>{{Dhr}}
{{left|४३–९|1em}}</noinclude>
6h0u8ykdhfrdv4yj8xrpj7qvtpimu57
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७२
250
197216
673166
669734
2026-08-23T07:48:18Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673166
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
चाहे जो व्यक्ति इनका प्रतिरोध करे, तुझे इन नियमोंका पालन करना होगा। यदि तेरे मनमें इतना सब निश्चय करनेकी बात नहीं है तो मैं तेरे लिए आश्रम में रहना कठिन मानता हूँ| तू मजेसे सूरत चली आना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° ४७६७) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''१२६. भाषण : भड़ौंचमें'''}}}}
{{right|२६ मार्च, १९३०}}
चन्द्रभाईने मुझसे आशीर्वाद माँगा है। लेकिन आशीर्वाद देनेवाला मैं कौन होता हूँ? मैं तो आशीर्वाद लेनेके लिए निकला हूँ। गाँव-गाँव घूमते हुए मैं जो आशीर्वाद प्राप्त कर रहा हूँ वह दाँडी पहुँचने तक तो एक बहुत बड़ा पहाड़ बन जायेगा और चाहे कैसी भी राक्षसी हुकूमत हो वह इसके प्रताप के सामने टिक नहीं पायेगी।
१९२१ में स्कूलोंसे असहयोग करनेवाले एक मुस्लिम नवयुवकका मुझे अभी-अभी एक पत्र मिला है। उसमें उसने दो प्रश्न पूछे हैं, उन्हें मैंने सँभालकर रखा है।
पहला प्रश्न यह है : "क्या आप यह मानते हैं कि आप अकेले ही स्वराज्य प्राप्त कर लेंगे? अथवा आप अपने हिन्दू भाइयोंके बलपर ही जो करना है सो कर लेंगे?"
मैंने ऐसी आशा स्वप्न अथवा कल्पनामें भी नहीं की है कि मैं अकेले अपने बूतेपर अथवा हिन्दुओंके बलपर स्वराज्य प्राप्त कर लूंगा। मुझे तो मुसलमान, पारसी, ईसाई, यहूदी सब लोगोंके बलकी जरूरत है। लेकिन उन सबका बल, उन सबकी सहायता मिले तो भी एक ऐसा बल है जो न मिले तो स्वराज्य नहीं मिलेगा। और वह बल है ईश्वरका बल। उसके बिना अन्य सब बेकार हैं; और यदि वह हो तो किसी औरकी जरूरत नहीं है।
मैं आपसे जिस आशीर्वादकी भीख माँग रहा हूँ उसमें कहीं कहीं मुझे ईश्वरका नाद सुनाई देता है। मनुष्यके जीवनमें ऐसे प्रसंग भी आते हैं जब समस्त संसारके धिक्कारनेपर भी उसे अपने हृदयमें ईश्वरका नाद सुनाई देता है। लेकिन आज ऐसा अवसर नहीं है। आज तो मैं वह कर रहा हूँ जिसके लिए पिछले दस वर्षोंसे हिन्दुस्तान व्याकुल। जन-जन पुकार पुकारकर मुझसे कहता था कि मैं स्वराज्यकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न क्यों नहीं कर रहा हूँ, कुछ-एक लोग मुझे गालियाँ भी देते थे, कितने ही मित्र प्रेमसे मुझे लाल आँखें भी दिखाते थे और कहते थे कि तू प्रगतिको रोक रहा है। तू कहता है, सविनय अवज्ञा हो तो स्वराज्य आज ही मिल जायेगा। बात सच है। मैं प्रगतिका रास्ता रोके हुए था; कारण, मुझमें आत्मविश्वास न था। मुझे कहीं से भी ईश्वरका नाद सुनाई नहीं देता था; मैं आत्माकी उस सूक्ष्म आवाजको सुन नहीं पा रहा था।<noinclude></noinclude>
gp91n934yh0d4iv66qrcvpoo6ydzv12
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७३
250
197217
673167
669735
2026-08-23T07:49:28Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673167
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : भड़ौंचमें|१३१}}</noinclude>
लाहौर में ही एक गोरे संवाददाताको मैंने उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए कहा था कि हिन्दुस्तान में सविनय अवज्ञा करनेका समय आ गया है, इसका आज मुझे कोई चिह्न दिखाई नहीं देता। तब एकाएक यह अवसर कैसे उपस्थित हो गया?
समस्त हिन्दुस्तान कहता है कि यह उचित अवसर नहीं है। अंग्रेज भी यही कहते हैं, कितने ही हिन्दू भाइयोंका भी यही कहना है, लेकिन मुझे विश्वास हो गया है कि यही उचित अवसर है और यदि यह अवसर नहीं है तो फिर कभी कोई अवसर आनेवाला नहीं है। इसमें से आज या तो मुझे निकल जाना चाहिए अथवा मुझमें जितनी शक्ति है उसका उपयोग कर लेना चाहिए।
इसीसे मैं आज हिन्दू-मुसलमानोंसे, श्वेत दाढ़ीवाले इन अब्बास तैयबजी से और कुमारियोंसे भी हाथ जोड़कर मदद माँगता हूँ। इस युद्धमें तो छोटी-छोटी लड़कियाँ भी काम कर सकती हैं। मेरे पास अनेक बालिकाओंके पत्र आते रहते हैं कि आप हमें अपने साथ क्यों नहीं ले जाते; साथ ले जाते तो हम आपका सहारा भी बनतीं और नमक बनाते-बनाते जेल भी जाती।
इस तरह मुसलमान नवयुवकको उत्तर देते हुए मैंने आपको और आपके द्वारा समस्त जगत्को उत्तर दे दिया है। मुझे तो सबकी, अंग्रेजोंकी, पूर्व और पश्चिमके लोगों की मददकी जरूरत है।
सत्याग्रही में अपने-आप चलनेकी शक्ति नहीं होती। सत्याग्रह तो संसारकी भावनाओं को उभारकर ही चल सकता है। ईश्वरका आशीर्वाद होनेपर ही वह चल सकता है। वह न हो तो सत्याग्रह लूला, पंगु और अंधा है।
१९२१ से मैं दो शब्द कहता आया हूँ : पाकीजगी और कुर्बानी, आत्मशुद्धि और बलिदान। इनके बिना सत्याग्रहकी विजय नहीं हो सकती, क्योंकि इनके न होनेपर ईश्वर भी हमारे साथ नहीं हो सकता।
जगत् जिस ओर कुर्बानी देखता है उसी ओर झुक जाता है, उसे कुर्बानी अच्छी लगती है। कुर्बानी है किस चीजके लिए, यह बात जगत् नहीं देखता। लेकिन ईश्वर अन्धा नहीं है। कुर्बानी में मैल अथवा स्वार्थ है या नहीं इसका हिसाब-किताब उसके पास मौजूद रहता है। इसीलिए कुर्बानी के साथ यदि आत्मशुद्धि न हो तो मुझे-जैसे लोग थरथरा उठें।
रेहाना बहनने अभी-अभी गाया है, 'जो जागत है सो पावत है'। इस तरह यदि मैं जाग्रत रहूँगा तभी लक्ष्यकी प्राप्ति कर सकूंगा। सो भी मैं नहीं प्राप्त करूँगा। वह तो ईश्वर मुझे—अपने बन्देको—एक निमित्त मात्र समझकर देगा। इससे अधिक कुछ नहीं।
यह तो मुसलमान भाईने पूछा है। यदि किसी पारसीने भी पूछा होता, "हम तो मुट्ठी-भर, एक लाख पारसी हैं। क्या आप हम सबको नर्मदामें फेंककर स्वराज्य लेनेवाले हैं?" उससे भी मैं यही कहता कि पारसियों की मदद न मिले तो मैं स्वराज्य नहीं ले सकता। पारसियोंको मेरे साथ आना ही होगा। मुसलमान तो आनेवाले हैं। उनकी दुआ तो मुझे रोज मिलती रहती है। जबसे कूच आरम्भ हुआ है
तबसे मुझे मुसलमानोंकी आँखोंमें यह भाव दिखाई देता है और उन्होंने मुँहसे कहा<noinclude></noinclude>
8e9ak5peztxhq9ud4490buk22pg14ct
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७४
250
197218
673168
669736
2026-08-23T07:51:13Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673168
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भी है कि तेरी फतह होगी, भगवान् तेरा भला ही करेगा। मुसलमान भाइयों और भड़ौंच जिलेके मनुबरके बोहरा भाइयोंने इस युद्धके लिए रुपये भी भेजे हैं।
तथापि मुझे स्वीकार करना चाहिए कि जो मुझे अपनी जेबमें रखकर चला करते थे वे मौलाना शौकत अली आज मेरे साथ नहीं हैं। यह बात मेरे लिए कुछ कम दुःखदायी नहीं है। मैं तो इतना जानता हूँ कि वे मेरे सगे भाईके समान हैं। उनके बारेमें मैंने स्वप्न में भी और कुछ नहीं सोचा। इसलिए उनका विरोध कबतक टिकेगा? आज नहीं तो कल उन्हें मेरे साथ आना पड़ेगा। अतएव मैं निश्चिन्त हूँ और यदि
मैं सच्चा हूँ तो जो अली-भाई आजतक मुझे जेबमें रखकर चलते थे उन्हें मैं जेलमें रखूंगा।
इस युद्ध में मुझे अंग्रेज भाइयोंकी मददकी भी जरूरत है। मैं वाइसरायको रजिस्टर्ड पत्र भेज सकता था लेकिन वैसा न कर मैंने इस पत्रको पहुँचाने के लिए एक अंग्रेजको भेजा। मैंने अपना मान, अपनी शान बढ़ानेकी खातिर एक अंग्रेजको नहीं भेजा है; इतना मूर्ख तो मुझे कोई नहीं मानेगा। मैं तो एक अंग्रेजको भेजकर उनके और अपने बीच बन्धनको और भी मजबूत करना चाहता था। मेरे मनमें अंग्रेजोंके प्रति द्वेष नहीं है, द्वेष तो उनके राज्यके प्रति है और अब मुझे लगता है कि अंग्रेजोंके
राज्यको नष्ट करनेके लिए ही मेरा जन्म हुआ है। लेकिन यदि एक भी अंग्रेजका बाल बाँका हुआ तो मुझे लगेगा कि मानों मेरे सगे भाईको कष्ट पहुँचा है। मेरे हृदयमें अंग्रेजों के प्रति मैत्रीका भाव ही है। उन्हें मैं कहता हूँ कि आपके लोग हमारे देशको नष्ट किये दे रहे हैं। लेकिन आप इस बातको अभीतक क्यों नहीं समझ सके हैं? हमें इस राजनीतिको नष्ट करना है। वे चाहे हमारी धज्जियाँ उड़ा दें, हमें दरिया में डुबा दें, जो जी चाहे करें, लेकिन हम अपनी बात कहकर रहेंगे।
दूसरा प्रश्न यह है : "स्वराज्य मिलनेपर आप मुसलमानोंको कितने अधिकार, संविधान में उन्हें कितनी सीटें देनेवाले हैं?" इसका उत्तर मैं क्या दे सकता हूँ! मुझे यदि कोई वाइसराय बना दे तब मैं यह कहूँ कि मुसलमानोंको जितनी सीटें चाहिए उतनी दे दी जायें। पहले मुसलमान, पारसी, ईसाई ले लिये जायें और बादमें हिन्दुओंको लिया जाये। लेकिन सनातनी हिन्दू मुझे वाइसराय होने ही न देंगे। सच्ची बात यह है कि यह सारा हिसाब मुझसे नहीं हो सकता। इतना ही पर्याप्त होना चाहिए कि कांग्रेस वचनबद्ध हो गई है और इसलिए मैं भी एक तरह से वचनबद्ध हो गया हूँ। कांग्रेसने प्रस्ताव पास किया है, जिसके अनुसार जबतक एक भी कौमको सन्तोष नहीं मिलता तबतक कौमी प्रश्नका कोई हल कांग्रेस स्वीकार नहीं करेगी। इस तरह कांग्रेसने इससे अपने हाथ धो लिये हैं। उसके लिए तो हिन्दू, मुसलमान, पारसी,
ईसाई, यहूदी सब कोई—फिर भले ही वे मन्दिर, मस्जिद, अगियारी अथवा देवलमें जाते हों—हिन्दुस्तानी ही हैं। कांग्रेसके मण्डपमें सब हिन्दुस्तानी है।
जिस प्रस्तावसे सब कौमोंको सन्तोष नहीं होता उसपर चाहे कैसी भी मुहर क्यों न लगी हो, कांग्रेस उसे स्वीकार करनेवाली नहीं है।
कांग्रेस इससे अधिक खुलासा और क्या कर सकती है? सविनय अवज्ञामें तो स्वराज्यकी शक्ति प्राप्त करनेकी बात है। लेकिन स्वराज्य लेते समय तो सबके<noinclude></noinclude>
02ujbxy7yke7ej4apbb9uxm0hfrq9kf
विकिस्रोत वार्ता:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
5
197255
673214
670147
2026-08-23T10:04:03Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* संपादनोत्सव की पुस्तक सूची में चल रही चर्चा */ नया अनुभाग
673214
wikitext
text/x-wiki
== पृष्ठ शोध समस्या ==
@[[सदस्य:नीलम|नीलम]], @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] और @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, मैं पृष्ठ [[पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६४७|६४७]] शोधित कर रहा था जिसके एक लाइन में ''''सत्याग्रह, अनाक्रामक प्रतिरोध -''' पैसिव रेजिस्टेंस' यह विकिस्रोत पर दिए पृष्ठ के अनुसार सही है पर मैं इसे [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.480233/page/n639/mode/1up आर्काइव] पर देखा तो उसके अनुसार इसे इस तरह ''''सत्याग्रह, अनाक्रामक प्रतिरोध -''' पैसिव रेजिस्टेस' लिखा जाना चाहिए, स्पष्ट करें [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
:@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, सर्वप्रथम संपादनोत्सव में भाग लेकर पृष्ठों को शोधित करने के लिए आपका धन्यवाद। आप पृष्ठों को शोधित करते समय प्राथमिक स्रोत के लिए पुस्तक के पीडीएफ पृष्ठ का ही सहारा लें। स्रोत पृष्ठ के धुंधले या अस्पष्ट होने की स्थिति में ही आप किन्हीं अन्य स्रोतों का सहारा लें। शाब्दिक अर्थ के अनुसार '''रेजिस्टेंस''' का अर्थ '''प्रतिरोध''' होता है, जबकि '''रेजिस्टेस''' का कोई शाब्दिक अर्थ अभी तक मुझे नहीं मिल पाया है। अगर आपको मिले तो आप हमारे साथ अवश्य साझा करें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०७:४९, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== संपादनोत्सव की पुस्तक सूची में चल रही चर्चा ==
@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी और @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, संपादनोत्सव से संबंधित किसी भी प्रकार की चर्चा के लिए संपादनोत्सव के वार्ता पृष्ठ पर संदेश भेजे। संपादनोत्सव के पृष्ठ पर खासतौर से पुस्तक सूची अनुभाग में पुस्तक परिधि चुनाव के हस्ताक्षर के अलावा अन्य किसी भी प्रकार का संदेश ना लिखें। इससे पुस्तक सूची में संपादन या हस्ताक्षर कर रहे अन्य सदस्यों को संपादन अंतर्विरोध जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:०४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
nk41cl6w92z5z3pmygi1cg03814y48d
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२२९
250
197272
672862
669794
2026-08-22T13:34:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
672862
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|१६९. भाषण : दांडी में}}}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
दांडी आनेके लिए जिस समय अपने साथियोंको लेकर मैं साबरमतीसे निकला उस समय मेरे मनमें यह विश्वास नहीं था कि मैं और मेरे साथी यहाँतक आ पहुंचेंगे। साबरमती में ही यह अफवाह थी कि मुझे पकड़ लिया जायेगा। मैं समझता था कि सरकार शायद मेरे साथियोंको तो दांडी तक पहुंचने देगी, किन्तु मुझे नहीं पहुँचने देगी। यदि इसमें किसीको ऐसा लगे कि यह मेरी श्रद्धाकी अपूर्णताका सूचक है तो मैं इससे इनकार नहीं करूँगा। मैं यहाँतक आ सका हूँ, यह बड़ी हद शान्ति और अहिंसाका ही प्रभाव है। शान्ति और अहिंसाका प्रभाव जगद्व्यापी है। सरकार चाहे तो इस बात के लिए बधाई ले सकती है; क्योंकि सरकार में इतनी शक्ति तो है ही कि वह हममें से हरएकको गिरफ्तार कर लेती। ऐसा होते हुए भी इस शान्ति सेनाको गिरफ्तार करनेका साहस उसे नहीं हुआ, यह कहकर भी हम सरकार की प्रशंसा ही कर रहे हैं। ऐसी सेनाको पकड़ने में उसे लज्जाका अनुभव हुआ।
यदि कोई मनुष्य यह सोचकर किसी निन्दनीय कार्यको करनेसे हिचकता है।
कि मेरे इस कार्यकी पड़ोसी निन्दा करेंगे तो यह मनुष्य सभ्य कहा जायेगा ।
यदि सरकारने दुनियाकी निन्दाके भयसे हमें न पकड़ा हो तो उस सीमातक
वह धन्यवादकी पात्र है।
कल नमक कर कानूनी सविनय अवज्ञा की जायेगी। वह इस चीजको भी सह लेगी या नहीं, यह एक अलग सवाल है। सम्भव है न सहे; किन्तु सरकारने हमारी इसे टुकड़ीके सम्बन्धमें जो धैर्य और शान्ति दिखाई, उसके लिए तो वह धन्यबादकी पात्र मानी ही जायेगी।
सारे भारतमें व्यापक सविनय अवज्ञा शुरू हो और उसे वह सह ले तो इसका सही मतलब होगा कि नमक कर अब नहीं रहा। मैंने तो तभी यह मान लिया। था कि नमक कर समाप्त हो गया है, जब हमने नमक कानून तोड़नेका संकल्प किया और जब हममें से कुछ लोगोंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक स्वाधीनता न मिले तबतक अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी हम इस प्रयत्नमें लगे ही रहेंगे।
यदि सरकार सविनय अवज्ञाको सह लेती है तो यह निश्चयपूर्वक माना जा सकता है कि सरकारने भी जल्दी या देरसे इस कर को समाप्त कर देनेका निर्णय कर लिया है। कल मुझे या मेरे साथियोंको गिरफ्तार किया जाये तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। दुःख तो कदापि नहीं होगा। हम जिस चीजको न्योता देनेके लिए निकले हों उसके मिलनेपर यदि हम दुःख मानें तो यह हमारी नादानी कही जायेगी।
सरकार मुझे गिरफ्तार कर ले और गुजरात या भारतके सभी प्रख्यात नेताओं को भी गिरफ्तार कर ले तो भी क्या हुआ? इस लड़ाईकी योजना ही इस<noinclude></noinclude>
dnw6zgtx6vv7gtk5guvfviix36m5dpt
672863
672862
2026-08-22T13:36:39Z
Kumari Arpana Sinha
2191
672863
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६९. भाषण : दांडी में'''}}}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
दांडी आनेके लिए जिस समय अपने साथियोंको लेकर मैं साबरमतीसे निकला उस समय मेरे मनमें यह विश्वास नहीं था कि मैं और मेरे साथी यहाँतक आ पहुंचेंगे। साबरमती में ही यह अफवाह थी कि मुझे पकड़ लिया जायेगा। मैं समझता था कि सरकार शायद मेरे साथियोंको तो दांडी तक पहुंचने देगी, किन्तु मुझे नहीं पहुँचने देगी। यदि इसमें किसीको ऐसा लगे कि यह मेरी श्रद्धाकी अपूर्णताका सूचक है तो मैं इससे इनकार नहीं करूँगा। मैं यहाँतक आ सका हूँ, यह बड़ी हद शान्ति और अहिंसाका ही प्रभाव है। शान्ति और अहिंसाका प्रभाव जगद्व्यापी है। सरकार चाहे तो इस बात के लिए बधाई ले सकती है; क्योंकि सरकार में इतनी शक्ति तो है ही कि वह हममें से हरएकको गिरफ्तार कर लेती। ऐसा होते हुए भी इस शान्ति सेनाको गिरफ्तार करनेका साहस उसे नहीं हुआ, यह कहकर भी हम सरकार की प्रशंसा ही कर रहे हैं। ऐसी सेनाको पकड़ने में उसे लज्जाका अनुभव हुआ।
यदि कोई मनुष्य यह सोचकर किसी निन्दनीय कार्यको करनेसे हिचकता है।
कि मेरे इस कार्यकी पड़ोसी निन्दा करेंगे तो यह मनुष्य सभ्य कहा जायेगा।
यदि सरकारने दुनियाकी निन्दाके भयसे हमें न पकड़ा हो तो उस सीमातक
वह धन्यवादकी पात्र है।
कल नमक कर कानूनी सविनय अवज्ञा की जायेगी। वह इस चीजको भी सह लेगी या नहीं, यह एक अलग सवाल है। सम्भव है न सहे; किन्तु सरकारने हमारी इसे टुकड़ीके सम्बन्धमें जो धैर्य और शान्ति दिखाई, उसके लिए तो वह धन्यबादकी पात्र मानी ही जायेगी।
सारे भारतमें व्यापक सविनय अवज्ञा शुरू हो और उसे वह सह ले तो इसका सही मतलब होगा कि नमक कर अब नहीं रहा। मैंने तो तभी यह मान लिया। था कि नमक कर समाप्त हो गया है, जब हमने नमक कानून तोड़नेका संकल्प किया और जब हममें से कुछ लोगोंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक स्वाधीनता न मिले तबतक अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी हम इस प्रयत्नमें लगे ही रहेंगे।
यदि सरकार सविनय अवज्ञाको सह लेती है तो यह निश्चयपूर्वक माना जा सकता है कि सरकारने भी जल्दी या देरसे इस कर को समाप्त कर देनेका निर्णय कर लिया है। कल मुझे या मेरे साथियोंको गिरफ्तार किया जाये तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। दुःख तो कदापि नहीं होगा। हम जिस चीजको न्योता देनेके लिए निकले हों उसके मिलनेपर यदि हम दुःख मानें तो यह हमारी नादानी कही जायेगी।
सरकार मुझे गिरफ्तार कर ले और गुजरात या भारतके सभी प्रख्यात नेताओं को भी गिरफ्तार कर ले तो भी क्या हुआ? इस लड़ाईकी योजना ही इस<noinclude></noinclude>
h0xnvzj5dbbey9e2ujyz7u2d4ckb6i4
672865
672863
2026-08-22T13:41:22Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672865
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१६९. भाषण : दांडी में'''}}}}
{{Right|५ अप्रैल, १९३०}}
दांडी आनेके लिए जिस समय अपने साथियोंको लेकर मैं साबरमतीसे निकला उस समय मेरे मनमें यह विश्वास नहीं था कि मैं और मेरे साथी यहाँतक आ पहुंचेंगे। साबरमती में ही यह अफवाह थी कि मुझे पकड़ लिया जायेगा। मैं समझता था कि सरकार शायद मेरे साथियोंको तो दांडी तक पहुंचने देगी, किन्तु मुझे नहीं पहुँचने देगी। यदि इसमें किसीको ऐसा लगे कि यह मेरी श्रद्धाकी अपूर्णताका सूचक है तो मैं इससे इनकार नहीं करूँगा। मैं यहाँतक आ सका हूँ, यह बड़ी हद शान्ति और अहिंसाका ही प्रभाव है। शान्ति और अहिंसाका प्रभाव जगद्व्यापी है। सरकार चाहे तो इस बात के लिए बधाई ले सकती है; क्योंकि सरकार में इतनी शक्ति तो है ही कि वह हममें से हरएकको गिरफ्तार कर लेती। ऐसा होते हुए भी इस शान्ति सेनाको गिरफ्तार करनेका साहस उसे नहीं हुआ, यह कहकर भी हम सरकार की प्रशंसा ही कर रहे हैं। ऐसी सेनाको पकड़ने में उसे लज्जाका अनुभव हुआ।
यदि कोई मनुष्य यह सोचकर किसी निन्दनीय कार्यको करनेसे हिचकता है।
कि मेरे इस कार्यकी पड़ोसी निन्दा करेंगे तो यह मनुष्य सभ्य कहा जायेगा।
यदि सरकारने दुनियाकी निन्दाके भयसे हमें न पकड़ा हो तो उस सीमातक
वह धन्यवादकी पात्र है।
कल नमक-कर कानूनी सविनय अवज्ञा की जायेगी। वह इस चीजको भी सह लेगी या नहीं, यह एक अलग सवाल है। सम्भव है न सहे; किन्तु सरकारने हमारी इसे टुकड़ीके सम्बन्धमें जो धैर्य और शान्ति दिखाई, उसके लिए तो वह धन्यवादकी पात्र मानी ही जायेगी।
सारे भारतमें व्यापक सविनय अवज्ञा शुरू हो और उसे वह सह ले तो इसका सही मतलब होगा कि नमक कर अब नहीं रहा। मैंने तो तभी यह मान लिया। था कि नमक कर समाप्त हो गया है, जब हमने नमक कानून तोड़नेका संकल्प किया और जब हममें से कुछ लोगोंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक स्वाधीनता न मिले तबतक अपने प्राणोंको संकटमें डालकर भी हम इस प्रयत्नमें लगे ही रहेंगे।
यदि सरकार सविनय अवज्ञाको सह लेती है तो यह निश्चयपूर्वक माना जा सकता है कि सरकारने भी जल्दी या देरसे इस कर को समाप्त कर देनेका निर्णय कर लिया है। कल मुझे या मेरे साथियोंको गिरफ्तार किया जाये तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। दुःख तो कदापि नहीं होगा। हम जिस चीजको न्योता देनेके लिए निकले हों उसके मिलनेपर यदि हम दुःख मानें तो यह हमारी नादानी कही जायेगी।
सरकार मुझे गिरफ्तार कर ले और गुजरात या भारतके सभी प्रख्यात नेताओं को भी गिरफ्तार कर ले तो भी क्या हुआ? इस लड़ाईकी योजना ही इस<noinclude></noinclude>
4smf2bvwtbz0ykwys02mnaktv06nhvu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३०
250
197273
672872
669795
2026-08-22T13:54:56Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672872
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विश्वासपर की गई है कि जहाँ सारीकी सारी प्रजा उठ खड़ी हुई हो, जहाँ सारी प्रजा जाग्रत हो गई हो वहाँ नेताकी आवश्यकता नहीं रहती। जिन लाखों मनुष्योंने हमारी यात्राके दरम्यान हमें अपना आशीर्वाद दिया है और मेरे भाषणोंको सुना है, मैं आशा करता हूँ कि उनमें से कई अवश्य ही इस लड़ाईमें शामिल होनेके लिए तैयार हो जायेंगे। ऐसा होगा तभी इस लड़ाईको व्यापक सत्याग्रहका नाम दिया जा सकता है।
हमें तो अब जबतक सरकार थक नहीं जाती तबतक जहां-जहां नमक बनाना सम्भव हो वहाँ-वहाँ जिस तरह हमारे पूर्वज नमक बनाया करते थे उस तरह घर-घर नमक बनाना है और उसे जगह-जगह बेचना है और यह काम इतनी हदतक करना है कि सरकारके गोदामोंमें जो नमक पड़ा हुआ है वह बेकार हो जाये। यदि देशकी जनता सचमुच जाग्रत हो चुकी होगी तो नमकका कानून अब रह नहीं सकता।
इस आन्दोलनके द्वारा हम अन्तमें जहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारा वह लक्ष्य तो बहुत दूर है। हमारी यात्राका गन्तव्य फिलहाल दांडी है किन्तु अन्तमें तो हमें स्वतन्त्रता-
देवी धाम तक पहुँचना है। जबतक हमें स्वतन्त्रता देवी के दर्शन नहीं होते तबतक
न तो हम स्वयं चैन लेंगे और न सरकारको चैन लेने देंगे।
जिन पटेलोंने त्यागपत्र दिये हैं उन्हें सिद्ध करना चाहिए कि ये त्यागपत्र उन्होंने सच्चे मनसे दिये हैं। जबतक स्वतन्त्रताकी स्थापना नहीं हो जाती तबतक उन्हें इस सरकारकी सेवा करना पाप समझना चाहिए।
पिछले चार-पांच दिनोंसे में जिन दूसरे रचनात्मक कामोंकी चर्चा कर रहा हूँ उनपर भी जलालपुर तहसीलमें तो तुरन्त ही अमल होना चाहिए। शराब पीने में सूरत जिला कुख्यात है और उसमें भी सूरत जिलेकी यह तहसील तो और भी कुख्यात है। इस तहसील में आज जब आत्मशुद्धिकी हवा वह रही है तब शराब और ताड़ीका सम्पूर्ण नाश करना कठिन काम नहीं है। इन खजुरके झाड़ोंका पत्ता-पत्ता पापका सूचक है हमारे नाशका कारण होनेके सिवा उनका और कोई अर्थ नहीं है। ऐसे झाड़ जो हमारे लिए विषके समान हैं, पूरी तरह नष्ट कर दिये जाने चाहिए।
जलालपुर में ऐसा एक भी आदमी नहीं होना चाहिए जो विदेशी वस्त्र पहनता हो। दांडीमें जो भी आदमी आये उसे अपने मन में यही भावना लेकर आना चाहिए
कि वह इस स्वराज्य-यज्ञ में भाग लेनेके लिए आ रहा है।
दांडीमें किसी भी व्यक्तिका विदेशी वस्त्र पहनकर आना मुझे अच्छा नहीं लगेगा। यदि हम दांडीको तीर्थस्थल मानते हों या उसे पूर्ण स्वराज्यका दुर्ग बनाना चाहते हों तो सब लोगोंको यहाँ खादी पहनकर ही आना चाहिए। मैं जानता हूँ कि हमारे खादी भण्डारोंमें आज खादीकी कमी अनुभव की जा रही है, इसलिए यदि लम्बे पनहेकी साड़ी या धोती वहां न मिले तो आप लोग यहाँ केवल लँगोटी पहनकर ही आयें। खादीकी लँगोटी पहनकर आनेवाले व्यक्तियोंका यहाँ वैसा ही सत्कार किया जायेगा जैसा कि सभ्य व्यक्तियोंका होता है, किन्तु यदि कोई यहाँ विदेशी वस्त्र<noinclude></noinclude>
decxflyyk8avumjeua2nsfnkcpy94b9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३१
250
197274
672878
672688
2026-08-22T14:02:23Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672878
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण:दांडीमें|१८९}}</noinclude>पहनकर आयेगा तो मुझे दांडीकी सीमापर स्वयंसेवक नियुक्त करने पड़ेंगे और वे
लोग उनके पांवोंमें गिरकर उनसे खादी पहननेका अनुरोध करेंगे और उनके ऐसा
करनेसे यदि आपको दुःख हो और आप उन्हें थप्पड़ मारें तो भी ये सत्याग्रही आपके
प्रहारोको सहन करेंगे।
इस कार्यके लिए दांडीका चुनाव मनुष्यका नहीं, ईश्वरका किया हुआ है। जहाँ अनाज न मिलता हो, जहाँ पानीके अभावका डर हो, जहां हजारों लोग बहुत असुविधा सहकर ही पहुँच सकते हों, जहाँ पहुँचने के लिए स्टेशनसे दस मील चलना पड़ता हो, पैदल चलनेवालेको कीचड़ भरी खाड़ी लाँघनी पड़ती हो, ऐसी एक दूरवर्ती
जगहको सत्याग्रहके लिए चुना गया, इसका भला इसके सिवा और क्या कारण हो
सकता है? सच तो यह है कि हमारी यह लड़ाई कष्ट सहनेकी ही लड़ाई है।
आप लोगोंने नवसारीसे दांडी तक सारे रास्तेमें जगह-जगह प्याऊकी व्यवस्था करके इस रास्तेको सारी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया है। यदि इस लड़ाईमें आपकी सम्मति न होती, आपकी शुभेच्छा न होती तो आप यह सब क्यों करते?
दांडीमें जो भी आये उसे इस भावनासे आना चाहिए कि दांडी एक पवित्र स्थान है, यहाँ झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी तरहका पाप नहीं करना चाहिए। यदि आप यहाँ सच्चे सेवकोंकी भावनासे आयेंगे और सरकार कितना भी डर दिखाये उसका डर माने बिना नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञा करेंगे तथा जो भी दूसरे काम आपसे करने को कहा जाये उन्हें उठा लेंगे तो आप देखेंगे कि इसी एक सप्ताह में स्वराज्यका कानून बनने लगेगा। ईश्वरकी शक्ति ऐसी महान् है कि अपना यह जन्मसिद्ध अधिकार हम एक ही दिनमें पा सकते हैं।
ब्रिटिश कानून कहता है कि हरएक व्यक्तिका शरीर पवित्र है। उसकी इसी सीखसे आकृष्ट होकर मैं ब्रिटिश राज्यपर मुग्ध हुआ था। इस कानूनके अनुसार, मनुष्य भयंकर हत्याका अपराधी हो तो भी सिपाही उसे मार नहीं सकता; सिपाही-को उसे जीवित पकड़कर ही न्यायालय में हाजिर करना चाहिए। जेलके बाहर सिपाहीको किसी आदमीसे चोरीका माल छीनने का भी अधिकार नहीं है। किन्तु आज तो उलटा न्याय चल रहा है। मेरी बंद मुट्ठीमें नमक है या कंकड़, इसका निर्णय पुलिस कैसे कर सकती है?
प्रत्येक मनुष्यका घर उसका किला है। हमारा शरीर भी एक प्रकारका किला ही है। और यदि नमक एक बार इस किले के भीतर आ जाये तो फिर वह बाहर नहीं जाना चाहिए, चाहे हमारे सिरोपर घोड़े ही क्यों न दौड़ा दिये जायें। हमें आजसे
ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा मनोबल इतना दृढ़ हो कि चाहे हाथ कट
जाये, पर नमककी मुट्ठी न खुले।
किसीके घरमें जबरदस्ती घुसना जंगलीपन है मेरे हाथमें धूल है या नमक, इसका निर्णय तो न्यायाधीश करता है । अंग्रेजोंका कानून तो शरीरको पवित्र मानता है। हरएक सरकारी अधिकारी न्यायाधीश बनकर लोगोंके घरोंमें प्रवेश करने लगे तो उसके इस कार्यको डाकुओंका धंधा ही कहा जा सकता है।<noinclude></noinclude>
sm3r56p91kzdyojsjpw8k54byngbok6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३२
250
197275
672894
672692
2026-08-22T14:21:10Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672894
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>किन्तु भारतके अधिकारी तो जरूरत पड़नेपर इन सारे कानूनोंको ताक पर रख देते हैं और १८१८ के कानूनका सहारा लेकर उनकी सम्पूर्ण उपेक्षा कर देते हैं।
इस समय एकके-बाद-एक सारे नेता पकड़े जा रहे हैं। लेकिन इस लड़ाई में तो ऐसा कोई भी आदमी, जो सबसे ज्यादा कष्ट सहनेके लिए तैयार हो, नेता बन सकता है। इस नियमके अनुसार जो लोग बाहर हैं, उनमें से कोई भी नेताका पद सँभाल सकता है और लड़ाईको जारी रख सकता है।
यह लड़ाई किसी एक मनुष्यकी नहीं, करोड़ोंकी है। यदि तीन-चार आदमी ही लड़कर स्वराज्य प्राप्त कर सकते हों तब तो देशकी शासन सत्ता भी उन तीन-चार आदमियोंके हाथ में ही चली जायेगी। अतः स्वराज्यकी इस लड़ाई में तो करोड़ों आदमियोंको अपना बलिदान देकर ऐसा स्वराज्य हासिल करना है जो करोड़ोंके लिए लाभदायी हो।
सरकार देशके बड़े नेताओंको एक-एक करके गिरफ्तार करती जा रही है। यदि हम उनके बताये रास्तेपर चलनेके लिए तैयार हों और उनके बताये धर्मका पालन कर सकते हो तब तो हम हँस सकते हैं, अन्यथा हमें लज्जित होना चाहिए। नेता लोग तो चले गये; अब हमें यही मानना चाहिए कि हमारी बारी आ गयी है।
गुजरात और अन्यान्य प्रदेशोंके इतने सारे नेता जेल गये हैं और कितने हीस्वयंसेवक अपने नमककी रक्षाके प्रयत्नमें घायल हो चुके हैं तथा कहीं-कहीं कुछ स्वयं-सेवकों पर तो इतनी मार पड़ी है कि वे बेहोश तक हो गये। किन्तु मेरे मन पर इसका कोई असर नहीं हुआ है। मेरा हृदय आज पत्थर जैसा कठोर हो गया है। यदि इस लड़ाई में हजारों नहीं, लाखों मनुष्योंकी बलि देनी पड़े तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ। हमने हजारों आदमियोंको जेल भेजनेका आन्दोलन ही छेड़ा है, इसलिए यदि कोई उन्हें गिरफ्तार करता है और जेल ले जाता है तो इसमें रोनेका कोई कारण नहीं है। यह तो चौपड़का एक ऐसा खेल है जिसमें हमारा मनचाहा पासा पड़ रहा है। तब इसमें हँसने या रोनेकी क्या बात है ? यह तो ईश्वरकी कृपा है; जो चमत्कार हो रहे हैं, हम उनका तटस्थतापूर्वक निरीक्षण करें।
हमारे नमक-कानूनकी विविध धाराओंको तोड़नेके बावजूद यदि सरकार हमारे ऊपर हाथ नहीं डालती तो तेरह तारीखके बाद में इस शिविरको तोड़ दूंगा और हम कहीं अन्यत्र चले जायेंगे। लेकिन यह योजना इस बात पर निर्भर है कि सरकार क्या करती है। अभी तो हमें सरकारके रंग-ढंगको देखकर ही अपने व्यवहारका निश्चय करना है।
आप लोग अभी तक नमक लानेके लिए न गये हों तो सारे गाँव के लोग मिलकर एक साथ जायें। अपनी मुट्ठीमें नमक भर लें और ऐसा समझें कि आपके हाथमें ६ करोड़ रुपयेका नमक है। सरकार इस नमक कर के द्वारा हर वर्ष हमारे पाससे ६ करोड़ रुपया ले जाती है।
आप लोग आजसे सरकारी नमक न खानेकी प्रतिज्ञा कर सकते हैं। आपके
घरके आंगन में तो नमककी खान पड़ी है।<noinclude></noinclude>
pb8ylg0a5ac343q0r4bowwrer50entw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३३
250
197276
672921
669798
2026-08-22T15:03:37Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
672921
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||१९२|पत्र : नारणदास गांधीको}}</noinclude>रोहतकमें लाला श्यामलाल नामक एक नम्र, बहादुर और त्यागी सेवक हैं। उन्होंने १९२१ के असहयोग आन्दोलनके समय अपनी वकालत छोड़ दी थी। आन्दोलनमें निःस्व हो जाने पर उन्होंने फिर वकालत शुरू की और हजारों रुपये कमाये। किन्तु लाहौरकी कांग्रेसके बाद उनका हृदय फिर पिघला और उन्होंने आश्रम में आनेके लिए अनुरोध किया। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी इस दाँडी-यात्रामें शामिल होनेकी भी इच्छा प्रगट की थी। किन्तु यह तो सोनेकी मुद्रासे पैसेके बराबर काम लेना होता। इसलिए मैंने उन्हें फिर वापस रोहतक भेज दिया । और जैसा कि उन्होंने लिखा है, उन्होंन अहिंसाका अमृत पीकर, सत्य और अहिंसाकी कीमत पहलेसे ज्यादा समझनेके बाद विदा ली और यह प्रतिज्ञा ली कि अब वे अहिंसाको कभी नहीं छोड़ेंगे। ये लाला श्यामलाल अराजभक्तिके अपराध में गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
राज्यके नाशकी
मतलब यह कि
उन्होंने 'यंग इंडिया' में लिखे उस लेखके-जैसा, जिसमें अराजभक्तिको धर्म
बताया गया है, कोई भाषण किया होगा। पहली बात तो यह है कि सरकारको धारा
१२४ (अ) उस मनुष्यके खिलाफ लागू करनी चाहिए जो प्रतिक्षण इस प्रार्थना कर रहा है और उसके लिए प्रयत्न भी कर रहा है। उन्हें इस धाराको मेरे खिलाफ लागू करना चाहिए। किन्तु सच तो यह है कि इस धाराका प्रयोग उसीके खिलाफ किया जाना चाहिए जो विद्रोह करके और शस्त्रास्त्र के द्वारा राज्यका नाश करनेकी कोशिश करे। जो व्यक्ति सत्य और अहिंसाके मार्ग पर चलकर स्वयं कष्ट सहन करके राज्यका नाश करना चाहता हो उसके खिलाफ इसका प्रयोग नहीं हो सकता। लेकिन मैं तो कोई न्यायाधीश नहीं हूँ। मेरी तो बैरिस्टरी भी छीन ली गयी है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|दांडी कूचके दौरान}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३०के पूर्व]१}}
चि० नारणदास,
रेजिनाल्डने अगर नाम माँगा हो और तुमने उसे 'अंगद ' २ नाम दिया तो यह उचित ही है।
कृष्णदास जैसे-जैसे पैसा मँगाये वैसे-वैसे उसे पैसा देते जाना। जबतक वह
एक बारमें एक सौ रुपयेसे एक हजार रुपये तककी रकम माँगता है तबतक मुझसे
१. विषय-वस्तुसे लगता है कि यह ६ अप्रैल, १९३० को नारणदास गांधीको लिखे पत्रके पहले लिखा गया होगा।
२. दौत्य करनेके कारण।<noinclude></noinclude>
5jyefl67q996jocraoumzaf7nl2jf4s
672922
672921
2026-08-22T15:04:39Z
Kumari Arpana Sinha
2191
672922
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|१९२}}</noinclude>रोहतकमें लाला श्यामलाल नामक एक नम्र, बहादुर और त्यागी सेवक हैं। उन्होंने १९२१ के असहयोग आन्दोलनके समय अपनी वकालत छोड़ दी थी। आन्दोलनमें निःस्व हो जाने पर उन्होंने फिर वकालत शुरू की और हजारों रुपये कमाये। किन्तु लाहौरकी कांग्रेसके बाद उनका हृदय फिर पिघला और उन्होंने आश्रम में आनेके लिए अनुरोध किया। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी इस दाँडी-यात्रामें शामिल होनेकी भी इच्छा प्रगट की थी। किन्तु यह तो सोनेकी मुद्रासे पैसेके बराबर काम लेना होता। इसलिए मैंने उन्हें फिर वापस रोहतक भेज दिया । और जैसा कि उन्होंने लिखा है, उन्होंन अहिंसाका अमृत पीकर, सत्य और अहिंसाकी कीमत पहलेसे ज्यादा समझनेके बाद विदा ली और यह प्रतिज्ञा ली कि अब वे अहिंसाको कभी नहीं छोड़ेंगे। ये लाला श्यामलाल अराजभक्तिके अपराध में गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
राज्यके नाशकी
मतलब यह कि
उन्होंने 'यंग इंडिया' में लिखे उस लेखके-जैसा, जिसमें अराजभक्तिको धर्म
बताया गया है, कोई भाषण किया होगा। पहली बात तो यह है कि सरकारको धारा
१२४ (अ) उस मनुष्यके खिलाफ लागू करनी चाहिए जो प्रतिक्षण इस प्रार्थना कर रहा है और उसके लिए प्रयत्न भी कर रहा है। उन्हें इस धाराको मेरे खिलाफ लागू करना चाहिए। किन्तु सच तो यह है कि इस धाराका प्रयोग उसीके खिलाफ किया जाना चाहिए जो विद्रोह करके और शस्त्रास्त्र के द्वारा राज्यका नाश करनेकी कोशिश करे। जो व्यक्ति सत्य और अहिंसाके मार्ग पर चलकर स्वयं कष्ट सहन करके राज्यका नाश करना चाहता हो उसके खिलाफ इसका प्रयोग नहीं हो सकता। लेकिन मैं तो कोई न्यायाधीश नहीं हूँ। मेरी तो बैरिस्टरी भी छीन ली गयी है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|दांडी कूचके दौरान}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३०के पूर्व]१}}
चि० नारणदास,
रेजिनाल्डने अगर नाम माँगा हो और तुमने उसे 'अंगद ' २ नाम दिया तो यह उचित ही है।
कृष्णदास जैसे-जैसे पैसा मँगाये वैसे-वैसे उसे पैसा देते जाना। जबतक वह
एक बारमें एक सौ रुपयेसे एक हजार रुपये तककी रकम माँगता है तबतक मुझसे
१. विषय-वस्तुसे लगता है कि यह ६ अप्रैल, १९३० को नारणदास गांधीको लिखे पत्रके पहले लिखा गया होगा।
२. दौत्य करनेके कारण।<noinclude></noinclude>
2pgqb2rhpy6zzhfo424dbp0yid6q1rj
672926
672922
2026-08-22T15:10:25Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672926
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|१९२}}</noinclude>रोहतकमें लाला श्यामलाल नामक एक नम्र, बहादुर और त्यागी सेवक हैं। उन्होंने १९२१ के असहयोग आन्दोलनके समय अपनी वकालत छोड़ दी थी। आन्दोलनमें निःस्व हो जाने पर उन्होंने फिर वकालत शुरू की और हजारों रुपये कमाये। किन्तु लाहौरकी कांग्रेसके बाद उनका हृदय फिर पिघला और उन्होंने आश्रम में आनेके लिए अनुरोध किया। उन्होंने सत्याग्रहियोंकी इस दाँडी-यात्रामें शामिल होनेकी भी इच्छा प्रगट की थी। किन्तु यह तो सोनेकी मुद्रासे पैसेके बराबर काम लेना होता। इसलिए मैंने उन्हें फिर वापस रोहतक भेज दिया। और जैसा कि उन्होंने लिखा है, उन्होंन अहिंसाका अमृत पीकर, सत्य और अहिंसाकी कीमत पहलेसे ज्यादा समझनेके बाद विदा ली और यह प्रतिज्ञा ली कि अब वे अहिंसाको कभी नहीं छोड़ेंगे। ये लाला श्यामलाल अराजभक्तिके अपराध में गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
उन्होंने 'यंग इंडिया' में लिखे उस लेखके-जैसा, जिसमें अराजभक्तिको धर्म बताया गया है, कोई भाषण किया होगा। पहली बात तो यह है कि सरकारको धारा १२४ (अ) उस मनुष्यके खिलाफ लागू करनी चाहिए जो प्रतिक्षण इस राज्यके नाशकी प्रार्थना कर रहा है और उसके लिए प्रयत्न भी कर रहा है। मतलब यह कि उन्हें इस धाराको मेरे खिलाफ लागू करना चाहिए। किन्तु सच तो यह है कि इस धाराका प्रयोग उसीके खिलाफ किया जाना चाहिए जो विद्रोह करके और शस्त्रास्त्र के द्वारा राज्यका नाश करनेकी कोशिश करे। जो व्यक्ति सत्य और अहिंसाके मार्ग पर चलकर स्वयं कष्ट सहन करके राज्यका नाश करना चाहता हो उसके खिलाफ इसका प्रयोग नहीं हो सकता। लेकिन मैं तो कोई न्यायाधीश नहीं हूँ। मेरी तो बैरिस्टरी भी छीन ली गयी है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|दांडी कूचके दौरान}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३०के पूर्व]१}}
चि० नारणदास,
रेजिनाल्डने अगर नाम माँगा हो और तुमने उसे 'अंगद ' २ नाम दिया तो यह उचित ही है।
कृष्णदास जैसे-जैसे पैसा मँगाये वैसे-वैसे उसे पैसा देते जाना। जबतक वह एक बारमें एक सौ रुपयेसे एक हजार रुपये तककी रकम माँगता है तबतक मुझसे
१. विषय-वस्तुसे लगता है कि यह ६ अप्रैल, १९३० को नारणदास गांधीको लिखे पत्रके पहले लिखा गया होगा।
२. दौत्य करनेके कारण।<noinclude></noinclude>
itwgryfeu90vdtk88u9oio1vyzse9o2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३४
250
197277
672948
669799
2026-08-22T16:03:26Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
672948
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>पूछनेकी कोई जरूरत नहीं। वैसे यदि तुम्हें कुछ पूछने जैसी बात लगे तो तुम पूछ
सकते हो।
जहाँ कोई विशेष सामान न हो और जहां पहरेदारी करने की जरूरत न हो,
जमनाकुटीर-जैसे उन बेंगलों में से [बचा खुचा] सामान निकलवा लेना चाहिए।
गिरिराजका मन यदि शान्त हो तो फिलहाल उसे वहीं रहना चाहिए और चर्मालयका काम देखना चाहिए। जूते आदि बनानेका काम चलता रहे, यह आवश्यक है। हां, यदि उसके मनमें आनेकी इच्छा हो तो आ भी सकता है। मैं उसे लिख रहा हूँ।
सत्याग्रहके लिए मिलनेवाली रकमोंका क्या किया जाना चाहिए सो कहना मुश्किल है। मेरा विचार यह है कि जो पैसे कूचके दौरान गाँवोंसे प्राप्त हुए हैं उन्हें तो प्रान्तीय समितिमें भेज दिया जाना चाहिए। दूसरी जो रकमें आयें वे फिलहाल आश्रममें जमा रहें। फिर भी इस बारे में महादेव जैसा कहे वैसा करना। और मनमें शंका उठे तो वल्लभभाईसे पूछना। वे जो कहें उसे अन्तिम निर्णय समझना।
भणसाली यदि रातके समय आश्रमकी चौकसी रखता है तो मेरे खयालसे उसे ऐसा करने देना चाहिए। यह सरल हृदय व्यक्ति है। उसे रातको नींद कम आती है। उसका पहरेदारी करना शुद्ध रूपसे सात्त्विक होगा । उसके पहरेदारी करने से चोरका पकड़ में आ जाना सम्भव है। लेकिन इस बारेमें इमाम साहब, महादेव और मीराबहन के साथ सोच-विचार कर लेना।
बिड़ला कोषमें से हमने लगभग २५,००० रुपये दिये हैं। वह रकम भले ही कितनी ही क्यों न हो, उसके तारीखवार आंकड़े मिल मालिक संघके मन्त्री गोरधनभाई पटेलको भेज देना मुझे भी बताना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
तुरन्त भेजना। यह पैसा हमें मिलेगा।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९५) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude>
n3k3ldry62v7rbs682497eoymog4s8n
672951
672948
2026-08-22T16:07:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672951
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>पूछनेकी कोई जरूरत नहीं। वैसे यदि तुम्हें कुछ पूछने जैसी बात लगे तो तुम पूछ
सकते हो।
जहाँ कोई विशेष सामान न हो और जहां पहरेदारी करने की जरूरत न हो,
जमनाकुटीर-जैसे उन बंगालों में से [बचा खुचा] सामान निकलवा लेना चाहिए।
गिरिराजका मन यदि शान्त हो तो फिलहाल उसे वहीं रहना चाहिए और चर्मालयका काम देखना चाहिए। जूते आदि बनानेका काम चलता रहे, यह आवश्यक है। हां, यदि उसके मनमें आनेकी इच्छा हो तो आ भी सकता है। मैं उसे लिख रहा हूँ।
सत्याग्रहके लिए मिलनेवाली रकमोंका क्या किया जाना चाहिए सो कहना मुश्किल है। मेरा विचार यह है कि जो पैसे कूचके दौरान गाँवोंसे प्राप्त हुए हैं उन्हें तो प्रान्तीय समितिमें भेज दिया जाना चाहिए। दूसरी जो रकमें आयें वे फिलहाल आश्रममें जमा रहें। फिर भी इस बारे में महादेव जैसा कहे वैसा करना। और मनमें शंका उठे तो वल्लभभाईसे पूछना। वे जो कहें उसे अन्तिम निर्णय समझना।
भणसाली यदि रातके समय आश्रमकी चौकसी रखता है तो मेरे खयालसे उसे ऐसा करने देना चाहिए। वह सरल हृदय व्यक्ति है। उसे रातको नींद कम आती है। उसका पहरेदारी करना शुद्ध रूपसे सात्त्विक होगा। उसके पहरेदारी करने से चोरका पकड़ में आ जाना सम्भव है। लेकिन इस बारेमें इमाम साहब, महादेव और मीराबहन के साथ सोच-विचार कर लेना।
बिड़ला कोषमें से हमने लगभग २५,००० रुपये दिये हैं। वह रकम भले ही कितनी ही क्यों न हो, उसके तारीखवार आंकड़े मिल मालिक संघके मन्त्री गोरधनभाई पटेलको भेज देना। मुझे भी बताना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
तुरन्त भेजना। यह पैसा हमें मिलेगा।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९५) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude>
hsmxjjmaavtbeomh4uqsc1perml4b0p
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३६
250
197279
672952
669801
2026-08-22T16:10:36Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
672952
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude><noinclude></noinclude>
iadvkux1346hm5suzlt7qa741dg1ucm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३७
250
197280
673071
669802
2026-08-23T01:47:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673071
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७१. सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश१'''}}}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
आप सरदारको तीन महीने और तीन सप्ताह के पहले छुड़ाना चाहते हों तो
शान्तिका - अहिंसाका पालन करके आप उन्हें छुड़ा सकते हैं। आपसे में पचास प्रति-
शत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत मुखियों द्वारा त्यागपत्र दिये जाने की मांग करता हूँ।
तलाटी भी इसमें शामिल हैं ही। मुखिया और तलाटी सरकारके दो स्तम्भ हैं। इन्हीं
पर भारतका राजनीतिक शरीर आधारित है। यदि ये टूट जायें तो सारा ढाँचा ही चरमराकर टूट जायेगा और धूलमें मिल जायेगा।
X X X
सावधान, झूठे त्यागपत्रोंको जला डालिए। उनके बिना भी हमारा काम चल
सकता है। अगर कोई यह समझता हो कि गांधी तो महात्मा है, उसने तपश्चर्या
की है, सरदार उसका सहकारी है, इसलिए दो महीने में हम सब फिर अपनी-अपनी
जगह बहाल हो ही जायेंगे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। स्वराज्य एक-दो महीने में
भी मिल सकता है और उसमें पूरा जीवन भी लग सकता है। सरदारकी और मेरी
हड्डियाँ राखमें मिल जायें, हो सकता है, तब भी स्वराज्य न मिले। लेकिन अब
तो हम बागी हो गये हैं। और हमारी यह बगावत कोई ऐसी-वैसी नहीं है। जिस
साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता, हम उसके खिलाफ बगावत कर रहे हैं। यह
साम्राज्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, असत्यका पुंज है। सत्यकी फूंक मात्र से वह
बात-की- बातमें उड़ जायेगा। लेकिन ऐसा सत्य हममें प्रकट हो तब न ? इसलिए आज
आरम्भ में ही आप सबको पुकारकर में हिसाब कर लेना चाहता हूँ, आपको सचेत
करता हूँ कि हमें दगा न दीजिएगा। मुझे दगा देनेका मतलब सरदारको दगा देना
है, भारत माताको दगा देना है, खुद अपनेको दगा देना है। किसीको आपके त्यागपत्रकी भूख नहीं है। आनन-फानन में कार्य सिद्ध हो जायेगा, ऐसा मानकर त्यागपत्र न दें। आप ऐसा समझकर ही त्यागपत्र दें कि अब आपको मुखियागिरी या तलाटीगिरी कभी मिलनेकी नही।
X X X
बहनोंने गाया है कि 'स्वराज्य लेना सरल है'; है तो, लेकिन तभी जब वे
करके दिखायें। नमकके बारेमें इतना कहकर अब मैं एक-दो वाक्योंमें चरखेकी बात
समझा रहा हूँ। आप ऐसा न समझें कि स्वराज्य नमकके पहाड़में तो है, लेकिन
सूतके तारमें नहीं है। स्वराज्य तो सूतके तारमें ही है। करोड़ों लोगोंको सुखी बनाने
१. "स्वराज्य गीता" से उद्धृत साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया है कि ये भाषण सूरत जिले के किन स्थानों में और किन तारीखोंको दिये गये थे।
४३-१३<noinclude></noinclude>
f7ccbe33nclfsmo9lrh31a9fi71rogc
673074
673071
2026-08-23T01:52:06Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673074
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१७१. सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश१'''}}}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
आप सरदारको तीन महीने और तीन सप्ताह के पहले छुड़ाना चाहते हों तो
शान्तिका - अहिंसाका पालन करके आप उन्हें छुड़ा सकते हैं। आपसे में पचास प्रति-
शत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत मुखियों द्वारा त्यागपत्र दिये जाने की मांग करता हूँ।
तलाटी भी इसमें शामिल हैं ही। मुखिया और तलाटी सरकारके दो स्तम्भ हैं। इन्हीं
पर भारतका राजनीतिक शरीर आधारित है। यदि ये टूट जायें तो सारा ढाँचा ही चरमराकर टूट जायेगा और धूलमें मिल जायेगा।
X X X
सावधान, झूठे त्यागपत्रोंको जला डालिए। उनके बिना भी हमारा काम चल
सकता है। अगर कोई यह समझता हो कि गांधी तो महात्मा है, उसने तपश्चर्या
की है, सरदार उसका सहकारी है, इसलिए दो महीने में हम सब फिर अपनी-अपनी
जगह बहाल हो ही जायेंगे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। स्वराज्य एक-दो महीने में
भी मिल सकता है और उसमें पूरा जीवन भी लग सकता है। सरदारकी और मेरी
हड्डियाँ राखमें मिल जायें, हो सकता है, तब भी स्वराज्य न मिले। लेकिन अब
तो हम बागी हो गये हैं। और हमारी यह बगावत कोई ऐसी-वैसी नहीं है। जिस
साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता, हम उसके खिलाफ बगावत कर रहे हैं। यह
साम्राज्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, असत्यका पुंज है। सत्यकी फूंक मात्र से वह
बात-की- बातमें उड़ जायेगा। लेकिन ऐसा सत्य हममें प्रकट हो तब न? इसलिए आज
आरम्भ में ही आप सबको पुकारकर में हिसाब कर लेना चाहता हूँ, आपको सचेत
करता हूँ कि हमें दगा न दीजिएगा। मुझे दगा देनेका मतलब सरदारको दगा देना
है, भारत माताको दगा देना है, खुद अपनेको दगा देना है। किसीको आपके त्यागपत्रकी भूख नहीं है। आनन-फानन में कार्य सिद्ध हो जायेगा, ऐसा मानकर त्यागपत्र न दें। आप ऐसा समझकर ही त्यागपत्र दें कि अब आपको मुखियागिरी या तलाटीगिरी कभी मिलनेकी नही।
X X X
बहनोंने गाया है कि 'स्वराज्य लेना सरल है'; है तो, लेकिन तभी जब वे
करके दिखायें। नमकके बारेमें इतना कहकर अब मैं एक-दो वाक्योंमें चरखेकी बात
समझा रहा हूँ। आप ऐसा न समझें कि स्वराज्य नमकके पहाड़में तो है, लेकिन
सूतके तारमें नहीं है। स्वराज्य तो सूतके तारमें ही है। करोड़ों लोगोंको सुखी बनाने
१. "स्वराज्य गीता" से उद्धृत साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया है कि ये भाषण सूरत जिले के किन स्थानों में और किन तारीखोंको दिये गये थे।
४३-१३<noinclude></noinclude>
i3cbugrpf0c4g3q6ztnmjt8tziajtg7
673082
673074
2026-08-23T02:04:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित नहीं */
673082
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७१. सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश१'''}}}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
आप सरदारको तीन महीने और तीन सप्ताह के पहले छुड़ाना चाहते हों तो
शान्तिका - अहिंसाका पालन करके आप उन्हें छुड़ा सकते हैं। आपसे में पचास प्रति-
शत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत मुखियों द्वारा त्यागपत्र दिये जाने की मांग करता हूँ।
तलाटी भी इसमें शामिल हैं ही। मुखिया और तलाटी सरकारके दो स्तम्भ हैं। इन्हीं
पर भारतका राजनीतिक शरीर आधारित है। यदि ये टूट जायें तो सारा ढाँचा ही चरमराकर टूट जायेगा और धूलमें मिल जायेगा।
X X X
सावधान, झूठे त्यागपत्रोंको जला डालिए। उनके बिना भी हमारा काम चल
सकता है। अगर कोई यह समझता हो कि गांधी तो महात्मा है, उसने तपश्चर्या
की है, सरदार उसका सहकारी है, इसलिए दो महीने में हम सब फिर अपनी-अपनी
जगह बहाल हो ही जायेंगे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। स्वराज्य एक-दो महीने में
भी मिल सकता है और उसमें पूरा जीवन भी लग सकता है। सरदारकी और मेरी
हड्डियाँ राखमें मिल जायें, हो सकता है, तब भी स्वराज्य न मिले। लेकिन अब
तो हम बागी हो गये हैं। और हमारी यह बगावत कोई ऐसी-वैसी नहीं है। जिस
साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता, हम उसके खिलाफ बगावत कर रहे हैं। यह
साम्राज्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, असत्यका पुंज है। सत्यकी फूंक मात्र से वह
बात-की- बातमें उड़ जायेगा। लेकिन ऐसा सत्य हममें प्रकट हो तब न? इसलिए आज
आरम्भ में ही आप सबको पुकारकर में हिसाब कर लेना चाहता हूँ, आपको सचेत
करता हूँ कि हमें दगा न दीजिएगा। मुझे दगा देनेका मतलब सरदारको दगा देना
है, भारत माताको दगा देना है, खुद अपनेको दगा देना है। किसीको आपके त्यागपत्रकी भूख नहीं है। आनन-फानन में कार्य सिद्ध हो जायेगा, ऐसा मानकर त्यागपत्र न दें। आप ऐसा समझकर ही त्यागपत्र दें कि अब आपको मुखियागिरी या तलाटीगिरी कभी मिलनेकी नही।
X X X
बहनोंने गाया है कि 'स्वराज्य लेना सरल है'; है तो, लेकिन तभी जब वे
करके दिखायें। नमकके बारेमें इतना कहकर अब मैं एक-दो वाक्योंमें चरखेकी बात
समझा रहा हूँ। आप ऐसा न समझें कि स्वराज्य नमकके पहाड़में तो है, लेकिन
सूतके तारमें नहीं है। स्वराज्य तो सूतके तारमें ही है। करोड़ों लोगोंको सुखी बनाने
१. "स्वराज्य गीता" से उद्धृत साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया है कि ये भाषण सूरत जिले के किन स्थानों में और किन तारीखोंको दिये गये थे।
४३-१३<noinclude></noinclude>
g51lp8r8ei4umfpkntd8piaw5vr1qg5
673194
673082
2026-08-23T09:15:05Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673194
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७१. सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश१'''}}}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
आप सरदारको तीन महीने और तीन सप्ताह के पहले छुड़ाना चाहते हों तो शान्तिका-अहिंसाका पालन करके आप उन्हें छुड़ा सकते हैं। आपसे मैं पचास प्रतिशत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत मुखियों द्वारा त्यागपत्र दिये जाने की मांग करता हूँ। तलाटी भी इसमें शामिल हैं ही। मुखिया और तलाटी सरकारके दो स्तम्भ हैं। इन्हीं पर भारतका राजनीतिक शरीर आधारित है। यदि ये टूट जायें तो सारा ढाँचा ही चरमराकर टूट जायेगा और धूलमें मिल जायेगा।
X X X
सावधान, झूठे त्यागपत्रोंको जला डालिए। उनके बिना भी हमारा काम चल सकता है। अगर कोई यह समझता हो कि गांधी तो महात्मा है, उसने तपश्चर्या की है, सरदार उसका सहकारी है, इसलिए दो महीने में हम सब फिर अपनी-अपनी जगह बहाल हो ही जायेंगे तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। स्वराज्य एक-दो महीने में भी मिल सकता है और उसमें पूरा जीवन भी लग सकता है। सरदारकी और मेरी हड्डियाँ राखमें मिल जायें, हो सकता है, तब भी स्वराज्य न मिले। लेकिन अब तो हम बागी हो गये हैं। और हमारी यह बगावत कोई ऐसी-वैसी नहीं है। जिस साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता, हम उसके खिलाफ बगावत कर रहे हैं। यह साम्राज्य कितना भी बड़ा क्यों न हो, असत्यका पुंज है। सत्यकी फूंक मात्र से वह बात-की-बातमें उड़ जायेगा। लेकिन ऐसा सत्य हममें प्रकट हो तब न? इसलिए आज आरम्भ में ही आप सबको पुकारकर मैं हिसाब कर लेना चाहता हूँ, आपको सचेत करता हूँ कि हमें दगा न दीजिएगा। मुझे दगा देनेका मतलब सरदारको दगा देना है, भारत माताको दगा देना है, खुद अपनेको दगा देना है। किसीको आपके त्यागपत्रकी भूख नहीं है। आनन-फानन में कार्य सिद्ध हो जायेगा, ऐसा मानकर त्यागपत्र न दें। आप ऐसा समझकर ही त्यागपत्र दें कि अब आपको मुखियागिरी या तलाटीगिरी कभी मिलनेकी नही।
X X X
बहनोंने गाया है कि 'स्वराज्य लेना सरल है'; है तो, लेकिन तभी जब वे करके दिखायें। नमकके बारेमें इतना कहकर अब मैं एक-दो वाक्योंमें चरखेकी बात समझा रहा हूँ। आप ऐसा न समझें कि स्वराज्य नमकके पहाड़में तो है, लेकिन सूतके तारमें नहीं है। स्वराज्य तो सूतके तारमें ही है। करोड़ों लोगोंको सुखी बनाने
१. "स्वराज्य गीता" से उद्धृत साधन-सूत्र में यह नहीं बताया गया है कि ये भाषण सूरत जिले के किन स्थानों में और किन तारीखोंको दिये गये थे।
४३-१३<noinclude></noinclude>
0l26a3q30v31axixsyvjw6o9qlshn1b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३८
250
197281
673089
669803
2026-08-23T02:21:00Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673089
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|१९४}}</noinclude>और शान्त रखनेवाला दूसरा कोई भी साधन नहीं है। आप सब नमककी खातिर आगे आयें या न आयें, खादीका मन्त्र तो जपते ही रहें। और शराब? इस बुराईक दूर करनेके लिए तो मीठ्बहन पागल बनी ही हुई हैं। इसकी खातिर एक पारसिन घर छोड़ दे और तब भी हम इस लतको न छोड़ें, यह शर्म की बात है।
X X X
स्वराज्यकी ये शर्तें रोज-रोज सुनाकर मैं तो थक गया। अब इसके बाद एक धर्म रह जाता है, जिसका पालन में कर लूँ। मेरा काम तो आपको अपना धर्म बताना था। मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, लेकिन मुझे सविनय अवज्ञा करके या तो अपना बलिदान कर देना है या स्वराज्य प्राप्त करना है। इसीलिए मैंने लोगोंको आमन्त्रित किया और खुद निकल पड़ा। कल जिन्दा रहा तो आपके आशीर्वाद लेकर यहांसे भी चल पड़गा। जो तैयार हैं उन्हें मैं अपने साथ चलनेको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग न आयें वे खादी पहनें और बनायें। खादीकी कमी पड़ गई है। इसको बनानेवाला मैं तो चला। मैं बैठा होऊ तब तो चाहे जहाँसे खादी लाकर सबकी मांग पूरी कर दूँ। खादी बनानेवाला में तो दूसरे खादी बनानेवालोंको भी लेकर चला और जो बनानेवाले रह गये हैं उनमें यह मांग पूरी करनेकी शक्ति नहीं है। इसलिए खादी पहनना और बनाना आपका धर्म है।
x x x
मैं तो अंग्रेज, पारसी या मुसलमान किसीका सपने में भी बुरा नहीं चाहता।
मैं तो सबका भला ही चाहनेवाला हूँ। इसलिए वह हमारा क्या कर सकती है?
कुछ करनेकी उसकी हिम्मत ही नहीं होती। हिम्मत होगी तो पकड़ेगी और मुझे
पकड़ ले तो भी जेल में पड़ा पड़ा में यही प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, इस सरकार-
का तू हृदय परिवर्तन कर और इसके हृदयमें मनुष्यको, इन्सानको शोभा न देनेवाली
जो भावना पैदा हुई है उसे तू दूर कर अर्थात् जेलमें भी मैं तो इसके भलेकी
ही कामना करूँगा मैं नहीं चाहता कि राजा या उसके अधिकारी मार डाले जायें।
इसलिए मुझ जैसे व्यक्तिको पकड़ना या जेलमें डालना जरा भारी पड़ता है। राज्या-
धिकारी चाहें तो मुझे पकड़ सकते हैं, लेकिन मुझे पकड़ने में उन्हें शर्म आती है और
इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। लेकिन हमेशा ऐसा ही चलनेवाला नहीं है।
एक न एक दिन उसको मुझे पकड़ना ही है। और अगर मुझे नहीं पकड़ते तो कुछ
ही दिनोंमें सारा हिन्दुस्तान थथक उठेगा। मैं जानता हूँ कि आप सब भाई-बहन
अभी जेल जानेके लिए नहीं आये है। मेरे लिए तो पकड़े जाना या यहीं बैठे
रहना, दोनों समान हैं। एक न एक दिन आप सबकी भी यही स्थिति होनेवाली है।
सरकारकी गति तो सांप-छछुन्दरकी-सी हो गई है। मुझे बाहर रहने देना या
जेल में डालना, ये दोनों बातें उसके लिए मुश्किल हैं। आपको मैं यह सामान्य धर्म
१. तात्पर्य अंग्रेज सरकार से है।<noinclude></noinclude>
bhs7xp674ghorl0e2guiacpjnfzrwhe
673092
673089
2026-08-23T02:23:38Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673092
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|१९४}}</noinclude>और शान्त रखनेवाला दूसरा कोई भी साधन नहीं है। आप सब नमककी खातिर आगे आयें या न आयें, खादीका मन्त्र तो जपते ही रहें। और शराब? इस बुराईक दूर करनेके लिए तो मीठ्बहन पागल बनी ही हुई हैं। इसकी खातिर एक पारसिन घर छोड़ दे और तब भी हम इस लतको न छोड़ें, यह शर्म की बात है।
X X X
स्वराज्यकी ये शर्तें रोज-रोज सुनाकर मैं तो थक गया। अब इसके बाद एक धर्म रह जाता है, जिसका पालन में कर लूँ। मेरा काम तो आपको अपना धर्म बताना था। मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, लेकिन मुझे सविनय अवज्ञा करके या तो अपना बलिदान कर देना है या स्वराज्य प्राप्त करना है। इसीलिए मैंने लोगोंको आमन्त्रित किया और खुद निकल पड़ा। कल जिन्दा रहा तो आपके आशीर्वाद लेकर यहांसे भी चल पड़गा। जो तैयार हैं उन्हें मैं अपने साथ चलनेको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग न आयें वे खादी पहनें और बनायें। खादीकी कमी पड़ गई है। इसको बनानेवाला मैं तो चला। मैं बैठा होऊ तब तो चाहे जहाँसे खादी लाकर सबकी मांग पूरी कर दूँ। खादी बनानेवाला में तो दूसरे खादी बनानेवालोंको भी लेकर चला और जो बनानेवाले रह गये हैं उनमें यह मांग पूरी करनेकी शक्ति नहीं है। इसलिए खादी पहनना और बनाना आपका धर्म है।
x x x
मैं तो अंग्रेज, पारसी या मुसलमान किसीका सपने में भी बुरा नहीं चाहता। मैं तो सबका भला ही चाहनेवाला हूँ। इसलिए वह हमारा क्या कर सकती है? कुछ करनेकी उसकी हिम्मत ही नहीं होती। हिम्मत होगी तो पकड़ेगी और मुझे पकड़ ले तो भी जेल में पड़ा पड़ा में यही प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, इस सरकारका तू हृदय परिवर्तन कर और इसके हृदयमें मनुष्यको, इन्सानको शोभा न देनेवाली जो भावना पैदा हुई है उसे तू दूर कर अर्थात् जेलमें भी मैं तो इसके भलेकी ही कामना करूँगा मैं नहीं चाहता कि राजा या उसके अधिकारी मार डाले जायें। इसलिए मुझ जैसे व्यक्तिको पकड़ना या जेलमें डालना जरा भारी पड़ता है। राज्याधिकारी चाहें तो मुझे पकड़ सकते हैं, लेकिन मुझे पकड़ने में उन्हें शर्म आती है और इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। लेकिन हमेशा ऐसा ही चलनेवाला नहीं है। एक न एक दिन उसको मुझे पकड़ना ही है। और अगर मुझे नहीं पकड़ते तो कुछ ही दिनोंमें सारा हिन्दुस्तान थथक उठेगा। मैं जानता हूँ कि आप सब भाई-बहन अभी जेल जानेके लिए नहीं आये है। मेरे लिए तो पकड़े जाना या यहीं बैठे रहना, दोनों समान हैं। एक न एक दिन आप सबकी भी यही स्थिति होनेवाली है।
सरकारकी गति तो सांप-छछुन्दरकी-सी हो गई है। मुझे बाहर रहने देना या
जेल में डालना, ये दोनों बातें उसके लिए मुश्किल हैं। आपको मैं यह सामान्य धर्म
'''१. तात्पर्य अंग्रेज सरकार से है।'''<noinclude></noinclude>
kyfhorqxoyu9u6frpnyu89owrcrxglb
673095
673092
2026-08-23T02:28:34Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673095
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और शान्त रखनेवाला दूसरा कोई भी साधन नहीं है। आप सब नमककी खातिर आगे आयें या न आयें, खादीका मन्त्र तो जपते ही रहें। और शराब? इस बुराईक दूर करनेके लिए तो मीठ्बहन पागल बनी ही हुई हैं। इसकी खातिर एक पारसिन घर छोड़ दे और तब भी हम इस लतको न छोड़ें, यह शर्म की बात है।
X X X
स्वराज्यकी ये शर्तें रोज-रोज सुनाकर मैं तो थक गया। अब इसके बाद एक धर्म रह जाता है, जिसका पालन में कर लूँ। मेरा काम तो आपको अपना धर्म बताना था। मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, लेकिन मुझे सविनय अवज्ञा करके या तो अपना बलिदान कर देना है या स्वराज्य प्राप्त करना है। इसीलिए मैंने लोगोंको आमन्त्रित किया और खुद निकल पड़ा। कल जिन्दा रहा तो आपके आशीर्वाद लेकर यहांसे भी चल पड़गा। जो तैयार हैं उन्हें मैं अपने साथ चलनेको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग न आयें वे खादी पहनें और बनायें। खादीकी कमी पड़ गई है। इसको बनानेवाला मैं तो चला। मैं बैठा होऊ तब तो चाहे जहाँसे खादी लाकर सबकी मांग पूरी कर दूँ। खादी बनानेवाला में तो दूसरे खादी बनानेवालोंको भी लेकर चला और जो बनानेवाले रह गये हैं उनमें यह मांग पूरी करनेकी शक्ति नहीं है। इसलिए खादी पहनना और बनाना आपका धर्म है।
x x x
मैं तो अंग्रेज, पारसी या मुसलमान किसीका सपने में भी बुरा नहीं चाहता। मैं तो सबका भला ही चाहनेवाला हूँ। इसलिए वह हमारा क्या कर सकती है? कुछ करनेकी उसकी हिम्मत ही नहीं होती। हिम्मत होगी तो पकड़ेगी और मुझे पकड़ ले तो भी जेल में पड़ा पड़ा में यही प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, इस सरकारका तू हृदय परिवर्तन कर और इसके हृदयमें मनुष्यको, इन्सानको शोभा न देनेवाली जो भावना पैदा हुई है उसे तू दूर कर अर्थात् जेलमें भी मैं तो इसके भलेकी ही कामना करूँगा मैं नहीं चाहता कि राजा या उसके अधिकारी मार डाले जायें। इसलिए मुझ जैसे व्यक्तिको पकड़ना या जेलमें डालना जरा भारी पड़ता है। राज्याधिकारी चाहें तो मुझे पकड़ सकते हैं, लेकिन मुझे पकड़ने में उन्हें शर्म आती है और इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। लेकिन हमेशा ऐसा ही चलनेवाला नहीं है। एक न एक दिन उसको मुझे पकड़ना ही है। और अगर मुझे नहीं पकड़ते तो कुछ ही दिनोंमें सारा हिन्दुस्तान थथक उठेगा। मैं जानता हूँ कि आप सब भाई-बहन अभी जेल जानेके लिए नहीं आये है। मेरे लिए तो पकड़े जाना या यहीं बैठे रहना, दोनों समान हैं। एक न एक दिन आप सबकी भी यही स्थिति होनेवाली है।
सरकारकी गति तो सांप-छछुन्दरकी-सी हो गई है। मुझे बाहर रहने देना या
जेल में डालना, ये दोनों बातें उसके लिए मुश्किल हैं। आपको मैं यह सामान्य धर्म
'''१. तात्पर्य अंग्रेज सरकार से है।'''<noinclude></noinclude>
lse7qlrsjd6cmdlwyws1s0dweky2b5a
673195
673095
2026-08-23T09:20:37Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673195
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>और शान्त रखनेवाला दूसरा कोई भी साधन नहीं है। आप सब नमककी खातिर आगे आयें या न आयें, खादीका मन्त्र तो जपते ही रहें। और शराब? इस बुराईको दूर करनेके लिए तो मीठ्बहन पागल बनी ही हुई हैं। इसकी खातिर एक पारसिन घर छोड़ दे और तब भी हम इस लतको न छोड़ें, यह शर्म की बात है।
X X X
स्वराज्यकी ये शर्तें रोज-रोज सुनाकर मैं तो थक गया। अब इसके बाद एक धर्म रह जाता है, जिसका पालन मैं कर लूँ। मेरा काम तो आपको अपना धर्म बताना था। मैंने तो यह निश्चय कर लिया है कि हिन्दुस्तानमें चाहे जो हो, लेकिन मुझे सविनय अवज्ञा करके या तो अपना बलिदान कर देना है या स्वराज्य प्राप्त करना है। इसीलिए मैंने लोगोंको आमन्त्रित किया और खुद निकल पड़ा। कल जिन्दा रहा तो आपके आशीर्वाद लेकर यहांसे भी चल पड़ूगा। जो तैयार हैं उन्हें मैं अपने साथ चलनेको आमन्त्रित करता हूँ। जो लोग न आयें वे खादी पहनें और बनायें। खादीकी कमी पड़ गई है। इसको बनानेवाला मैं तो चला। मैं बैठा होऊ तब तो चाहे जहाँसे खादी लाकर सबकी मांग पूरी कर दूँ। खादी बनानेवाला मैं तो दूसरे खादी बनानेवालोंको भी लेकर चला और जो बनानेवाले रह गये हैं उनमें यह मांग पूरी करनेकी शक्ति नहीं है। इसलिए खादी पहनना और बनाना आपका धर्म है।
x x x
मैं तो अंग्रेज, पारसी या मुसलमान किसीका सपने में भी बुरा नहीं चाहता। मैं तो सबका भला ही चाहनेवाला हूँ। इसलिए वह हमारा क्या कर सकती है? कुछ करनेकी उसकी हिम्मत ही नहीं होती। हिम्मत होगी तो पकड़ेगी और मुझे पकड़ ले तो भी जेल में पड़ा पड़ा मैं यही प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, इस सरकारका तू हृदय परिवर्तन कर और इसके हृदयमें मनुष्यको, इन्सानको शोभा न देनेवाली जो भावना पैदा हुई है उसे तू दूर कर अर्थात् जेलमें भी मैं तो इसके भलेकी ही कामना करूँगा मैं नहीं चाहता कि राजा या उसके अधिकारी मार डाले जायें। इसलिए मुझ जैसे व्यक्तिको पकड़ना या जेलमें डालना जरा भारी पड़ता है। राज्याधिकारी चाहें तो मुझे पकड़ सकते हैं, लेकिन मुझे पकड़ने में उन्हें शर्म आती है और इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। लेकिन हमेशा ऐसा ही चलनेवाला नहीं है। एक न एक दिन उसको मुझे पकड़ना ही है। और अगर मुझे नहीं पकड़ते तो कुछ ही दिनोंमें सारा हिन्दुस्तान धधक उठेगा। मैं जानता हूँ कि आप सब भाई-बहन अभी जेल जानेके लिए नहीं आये है। मेरे लिए तो पकड़े जाना या यहीं बैठे रहना, दोनों समान हैं। एक न एक दिन आप सबकी भी यही स्थिति होनेवाली है।
सरकारकी गति तो सांप-छछुन्दरकी-सी हो गई है। मुझे बाहर रहने देना या जेल में डालना, ये दोनों बातें उसके लिए मुश्किल हैं। आपको मैं यह सामान्य धर्म
'''१. तात्पर्य अंग्रेज सरकार से है।'''<noinclude></noinclude>
n3lgxbp5yf4ft49xnutaqqmgvczxbck
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२३९
250
197282
673099
669804
2026-08-23T02:35:42Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673099
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंके प्रति|१९५}}</noinclude>बताता हूँ। हिन्दू, मुसलमान, पारसी तथा अन्य सब भी इस धर्मका पालन करें। हम सब ऐसा करें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सत्ता की शक्तिके बाहरकी बात होगी।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७२. बहनोंके प्रति१'''}}}}
मैं इस तथ्य से भली-भांति अवगत हैं कि हिन्दुस्तानकी असंख्य स्त्रियाँ अनपढ़ हैं। लेकिन शिक्षाके अभाव के बावजूद वे समाजमें अपना स्थान किस तरहसे प्राप्त कर सकती है, इस बातको ध्यान में रखकर ही मैंने अपने शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्तोंकी
रचना की है और इन्हीं सिद्धान्तोंमें से स्वराज्य प्राप्त करनेके साधनोंकी संयोजना हुई है। अब तो मैं दावेके साथ यह कह सकता हूँ कि यह लड़ाई कुछ ऐसे ढंगकी है कि यदि बहनें चाहें तो इसमें वे पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक योगदान दे सकती हैं। खादीका समस्त कार्य बहनोंके अधीन है। यदि वे अपना सहयोग न दें तो यह कार्य आज ही ठप हो जाये। आज जितने पुरुष खादी कार्यको प्रोत्साहन दे रहे हैं उनकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या कमसे कम पांच गुनी ज्यादा है। वस्तुतः इसे दस गुनी माननी चाहिए, क्योंकि लगातार आठ घंटे चलनेवाले एक करके लिए दस बहनोंको काम करना होता है। यह बात तो सभी जानते हैं कि करोंके लिए सूत प्रदान करनेमें पुरुषोंका हिस्सा बहुत कम है; परन्तु खादी आन्दोलनके अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों ठीक संख्या में अपना योगदान दे रही हैं। करघा तो अनेक स्त्रियाँ चलाती ही हैं। इसलिए खादीके विषय में तो यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह कार्य केवल बहनोंके ही अधीन है और इस कार्यको लेकर ही बहनोंने ऐसी प्रगति की है जैसी हिन्दुस्तानके इतिहासमें पहले कभी नहीं हुई थी और न कभी किसीने इसकी कल्पना ही की थी। समस्त हिन्दुस्तानकी अपनी तीन बारकी यात्राके दौरान मैंने यही है और आज गुजरातमें कुचके दौरान भी मैं यही देख रहा है और सो भी इस सीमा तक कि हम त्रैराशिक तक लगा सकते हैं, अर्थात् कह सकते हैं कि आज जिस स्थान पर जितने अंश तक चरखेका चलन है उतने अंशतः स्त्रियोंमें जागृति आई है।
इस तरह विचार करते हुए और बहनोंकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेकी अधीरताको देखते हुए मुझे तो ऐसा लगा है कि यदि बहनें सचमुच जोखिम उठाना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानके ही नहीं, संसारके इतिहास पर अपनी छाप छोड़ना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानकी सभ्यताका पुनरुद्धार करना चाहती हों तो उन्हें
१. इस शीर्षकके प्रथम तीन अनुच्छेदोंका अनुवाद यह नहीं दिया गया है। ये अनुच्छेद "भारतकी महिला भोंसे " के प्रारम्भिक तीन अनुच्छेदोंमें आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२६<noinclude></noinclude>
qz9hejv1alh0axrs8us0npxx8dr2a8g
673205
673099
2026-08-23T09:37:30Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673205
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंके प्रति|१९५}}</noinclude>बताता हूँ। हिन्दू, मुसलमान, पारसी तथा अन्य सब भी इस धर्मका पालन करें। हम सब ऐसा करें तो हमें गिरफ्तार करना किसी भी सत्ता की शक्तिके बाहरकी बात होगी।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७२. बहनोंके प्रति१'''}}}}
मैं इस तथ्य से भली-भांति अवगत हूं कि हिन्दुस्तानकी असंख्य स्त्रियाँ अनपढ़ हैं। लेकिन शिक्षाके अभाव के बावजूद वे समाजमें अपना स्थान किस तरहसे प्राप्त कर सकती है, इस बातको ध्यान में रखकर ही मैंने अपने शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्तोंकी
रचना की है और इन्हीं सिद्धान्तोंमें से स्वराज्य प्राप्त करनेके साधनोंकी संयोजना हुई है। अब तो मैं दावेके साथ यह कह सकता हूँ कि यह लड़ाई कुछ ऐसे ढंगकी है कि यदि बहनें चाहें तो इसमें वे पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक योगदान दे सकती हैं। खादीका समस्त कार्य बहनोंके अधीन है। यदि वे अपना सहयोग न दें तो यह कार्य आज ही ठप हो जाये। आज जितने पुरुष खादी कार्यको प्रोत्साहन दे रहे हैं उनकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या कमसे कम पांच गुनी ज्यादा है। वस्तुतः इसे दस गुनी माननी चाहिए, क्योंकि लगातार आठ घंटे चलनेवाले एक करघे के लिए दस बहनोंको काम करना होता है। यह बात तो सभी जानते हैं कि करघोके लिए सूत प्रदान करनेमें पुरुषोंका हिस्सा बहुत कम है; परन्तु खादी आन्दोलनके अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों ठीक संख्या में अपना योगदान दे रही हैं। करघा तो अनेक स्त्रियाँ चलाती ही हैं। इसलिए खादीके विषय में तो यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह कार्य केवल बहनोंके ही अधीन है और इस कार्यको लेकर ही बहनोंने ऐसी प्रगति की है जैसी हिन्दुस्तानके इतिहासमें पहले कभी नहीं हुई थी और न कभी किसीने इसकी कल्पना ही की थी। समस्त हिन्दुस्तानकी अपनी तीन बारकी यात्राके दौरान मैंने यही देखा है और आज गुजरातमें कूचके दौरान भी मैं यही देख रहा हूं और सो भी इस सीमा तक कि हम त्रैराशिक तक लगा सकते हैं, अर्थात् कह सकते हैं कि आज जिस स्थान पर जितने अंश तक चरखेका चलन है उतने अंशतः स्त्रियोंमें जागृति आई है।
इस तरह विचार करते हुए और बहनोंकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेकी अधीरताको देखते हुए मुझे तो ऐसा लगा है कि यदि बहनें सचमुच जोखिम उठाना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानके ही नहीं, संसारके इतिहास पर अपनी छाप छोड़ना चाहती हों, यदि वे हिन्दुस्तानकी सभ्यताका पुनरुद्धार करना चाहती हों तो उन्हें
१. इस शीर्षकके प्रथम तीन अनुच्छेदोंका अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। ये अनुच्छेद "भारतकी महिलाओं " के प्रारम्भिक तीन अनुच्छेदोंमें आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२६<noinclude></noinclude>
rtvdw3pgl0i0swqwzzv6yoel30oeq1t
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४०
250
197283
673107
669805
2026-08-23T03:45:13Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673107
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अपने लिए कोई विशेष क्षेत्र चुन लेना चाहिए। तो अब इस दृष्टिसे विचार करें। यदि बहनें सविनय अवज्ञामें भाग लेना चाहती है तो वे निकट भविष्यमें ही ऐसा कर सकेंगी। परन्तु उनके लिए नवीन क्षेत्रकी खोज करनेके बाद अब उन्हें नमककानूनकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित करनेका मेरा तनिक भी मन नहीं होता। बहनें यदि उसमें शामिल हुईं भी तो वे पुरुषोंके हजुममें खो जायेंगी,क्योंकि मुझे उम्मीद है कि इसमें जगह-जगह से पुरुषोंके दल-के-दल उमड़ पड़ेंगे। इतनी बड़ी संख्या में बहनें भी निकल पड़ेंगी, ऐसा मैं नहीं मानता और यदि निकल भी पड़े तो बहनों अथवा भाइयोंके लिए करनेको कुछ नहीं रह जायेगा और नमक-कर भी हट जायेगा। में जैसे-जैसे विचार करता हूँ वैसे-वैसे मुझे यह एहसास होता है कि नमक कर दूर करवाने में हमें विशेष कष्ट नहीं उठाना होगा।१
मुझे लगता है कि इन लोगोंका हृदय परिवर्तन करना स्त्रियोंका खास क्षेत्र है अथवा वे उसे अपना खास क्षेत्र बना सकती हैं। इतिहास साक्षी है, हृदयके साम्राज्यको स्त्री जितनी जल्दी जीत सकती है उतनी जल्दी पुरुष नहीं जीत सकता। यदि स्त्रियां चाहें तो मद्य निषेधके इस कार्यको वे आज ही अपने हाथमें ले सकती है।
इसके बारेमें मेरा विचार यह है :
१. अच्छी अर्थात् सभी हुई स्त्रियां स्थान-स्थानपर सत्याग्रह-दल बनायें और वे अकेली ही मद्य विक्रेताओंके पास जायें और उनसे इस धन्धेको छोड़ देनेका अनुरोध करें।
२. शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और शराबकी दुकानोंपर भी खड़ी रहें,
भजन कीर्तन करें तथा शराबकी दुकानपर जानेवालोंको जाल में फँसने से रोकें।२
यदि शराबकी दुकानें बन्द हो जायें, अफीमकी दुकानें बन्द हो जायें तो उसका मतलब यह होगा कि जनताके २५ करोड़ रुपयोंकी बचत हो गई। २५ करोड़ रुपयेका राजस्व हिन्दुस्तानमें अन्य तरीकेसे निकल सकता है। इसका केवल एक ही परिणाम होगा, वह यह कि सेना और प्रशासनके खर्च में भी बहुत कमी हो जायेगी और यह कमी इस हदतक होगी कि उससे देशकी राजनीतिका रूप ही बदल जायेगा। आजकी नीति जनताके अविश्वासपर आधारित है। कलकी नीतिकी रचना जनताके विश्वासपर होगी। जनताके विश्वासपर आधारित राजनीति में न तो बड़े पुलिस विभागकी आवश्यकता होती है और न बहुत बड़ी सेना रखनेकी जरूरत होती है।
लेकिन मैं बहनोंको इस झंझटमें डालू ही क्यों? अभी तो किसी अन्य क्षेत्रकी चर्चा किये बिना मैं यह्नोंके समक्ष मद्यपान निषेधके क्षेत्रको प्रस्तुत करता हूँ। मैं मानता हूँ कि इस कार्यको करनेके लिए गुजरात सबसे अधिक उपयुक्त क्षेत्र है। इस क्षेत्रको तैयार करनेवाली कोमलकाय पारसी महिला मोहूबहून पेटिट है और इस
१. इसके बाद अनुच्छेदका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद "भारतकी महिला-अओसे" के चौबे भनुच्छेदमें आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६।
२. इसके बादका एक अनुच्छेद यह नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओंसे " के पाँचवें अनुच्छेद में आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६ /<noinclude></noinclude>
t6rhhiepgwb7mijpjclv8hlmlrdtg14
673208
673107
2026-08-23T09:45:36Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673208
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अपने लिए कोई विशेष क्षेत्र चुन लेना चाहिए। तो अब इस दृष्टिसे विचार करें। यदि बहनें सविनय अवज्ञामें भाग लेना चाहती है तो वे निकट भविष्यमें ही ऐसा कर सकेंगी। परन्तु उनके लिए नवीन क्षेत्रकी खोज करनेके बाद अब उन्हें नमककानूनकी सविनय अवज्ञामें भाग लेनेके लिए आमन्त्रित करनेका मेरा तनिक भी मन नहीं होता। बहनें यदि उसमें शामिल हुईं भी तो वे पुरुषोंके हजुममें खो जायेंगी,क्योंकि मुझे उम्मीद है कि इसमें जगह-जगह से पुरुषोंके दल-के-दल उमड़ पड़ेंगे। इतनी बड़ी संख्या में बहनें भी निकल पड़ेंगी, ऐसा मैं नहीं मानता और यदि निकल भी पड़े तो बहनों अथवा भाइयोंके लिए करनेको कुछ नहीं रह जायेगा और नमक-कर भी हट जायेगा। मैं जैसे-जैसे विचार करता हूँ वैसे-वैसे मुझे यह एहसास होता है कि नमक कर दूर करवाने में हमें विशेष कष्ट नहीं उठाना होगा।१
मुझे लगता है कि इन लोगोंका हृदय परिवर्तन करना स्त्रियोंका खास क्षेत्र है अथवा वे उसे अपना खास क्षेत्र बना सकती हैं। इतिहास साक्षी है, हृदयके साम्राज्यको स्त्री जितनी जल्दी जीत सकती है उतनी जल्दी पुरुष नहीं जीत सकता। यदि स्त्रियां चाहें तो मद्य निषेधके इस कार्यको वे आज ही अपने हाथमें ले सकती है। इसके बारेमें मेरा विचार यह है :
१. अच्छी अर्थात् सधी हुई स्त्रियां स्थान-स्थानपर सत्याग्रह-दल बनायें और वे अकेली ही मद्य विक्रेताओंके पास जायें और उनसे इस धन्धेको छोड़ देनेका अनुरोध करें।
२. शराब पीनेवालोंके घरोंमें जायें और शराबकी दुकानोंपर भी खड़ी रहें,
भजन कीर्तन करें तथा शराबकी दुकानपर जानेवालोंको जाल में फँसने से रोकें।२
यदि शराबकी दुकानें बन्द हो जायें, अफीमकी दुकानें बन्द हो जायें तो उसका मतलब यह होगा कि जनताके २५ करोड़ रुपयोंकी बचत हो गई। २५ करोड़ रुपयेका राजस्व हिन्दुस्तानमें अन्य तरीकेसे निकल सकता है। इसका केवल एक ही परिणाम होगा, वह यह कि सेना और प्रशासनके खर्च में भी बहुत कमी हो जायेगी और यह कमी इस हदतक होगी कि उससे देशकी राजनीतिका रूप ही बदल जायेगा। आजकी नीति जनताके अविश्वासपर आधारित है। कलकी नीतिकी रचना जनताके विश्वासपर होगी। जनताके विश्वासपर आधारित राजनीति में न तो बड़े पुलिस विभागकी आवश्यकता होती है और न बहुत बड़ी सेना रखनेकी जरूरत होती है।
लेकिन मैं बहनोंको इस झंझटमें डालू ही क्यों? अभी तो किसी अन्य क्षेत्रकी चर्चा किये बिना मैं यह्नोंके समक्ष मद्यपान निषेधके क्षेत्रको प्रस्तुत करता हूँ। मैं मानता हूँ कि इस कार्यको करनेके लिए गुजरात सबसे अधिक उपयुक्त क्षेत्र है। इस क्षेत्रको तैयार करनेवाली कोमलकाय पारसी महिला मीठूबहन पेटिट है और इस
१. इसके बाद अनुच्छेदका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद "भारतकी महिला-अओसे" के चौबे भनुच्छेदमें आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६।
२. इसके बादका एक अनुच्छेद यह नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओंसे " के पाँचवें अनुच्छेद में आ जाता है; देखिए पृष्ठ २२६ /<noinclude></noinclude>
9mwgpwlihilgnj85sbt4vd07h7dunz0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४१
250
197284
673108
669806
2026-08-23T04:03:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673108
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अन्त्यजोंके लिए कुएँ|१९७}}</noinclude>क्षेत्रका विचार भी मेरे मनमें उनके अलौकिक कार्यको देखकर ही आया है। इसलिए
करनेको केवल इतना ही रह जाता है कि हम मीठूबहनके कार्यको सौ गुना बढ़ायें।
इसका मतलब यह नहीं कि केवल सौ बहनें ही इस कार्यके लिए तैयार हों अपितु यह
कि असंख्य बहनें तैयार हों जिससे यह कार्य सौ गुना ज्यादा अर्थात् असंख्य गुना ज्यादा बढ़ जाये। अभी जिस ढंगसे काम हो रहा है उसमें थोड़ा परिवर्तन करना होगा।
पुरुष मात्र उस कार्यमें से निकल आयेंगे। बहनों द्वारा बताया हुआ काम ही वे लोग
करेंगे। लेकिन मुख्य काम-जैसे धरना देना, लोगोंसे विनती करना, आरजू-मिन्नत करना, मद्य विक्रेताओंके पास दल लेकर विनय करनेके लिए जाना तो बहनोंका ही है।मैंने इस योजनाकी केवल रूपरेखा-भर ही बताई है, इसमें थ्योरोको जोड़ा जा सकता है। मेरी इच्छा है, बहनें इस कार्य में पहल करें और चाकू प्रवृत्तिको इतनी गति प्रदान करें जिससे जनता और सरकार दोनों ही हिल उठें।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७३. अन्त्यजोंके लिए कुएँ'''}}
ठक्कर बाकी अन्त्यज भाइयोंके लिए कुएँ बनवाने सम्बन्धी अपील कुछ
सप्ताह पूर्व 'नवजीवन' में प्रकाशित हुई थी। बम्बईसे कुछ एक भाई सांधियेरमें मुझसे
मिलने आये थे। उन लोगोंसे मैने कहा था कि ठक्कर बापाकी झोली उन्हें ही भर
देनी चाहिए। ४०,००० रुपयेकी रकम उनके लिए कोई बड़ी रकम न थी और इन
[ अन्त्यज ] भाइयोंको इतने ही रुपयोंकी जरूरत है। उनमें से एक भाईने तुरन्त ही
एक कुऍके लिए पैसे दे दिये। श्री नारणदासने सबके साथ सलाह-मशविरा कर तुरन्त
४०,००० रुपये इकट्ठा कर देनेकी बात कही। इससे मुझे बहुत हर्ष हुआ और मैंने
आये हुए भाइयोंको बधाई दी। अब मेरी सलाह है कि यह पैसा तुरन्त इकट्ठा करके
ठक्कर बापाके पास पहुँचा दिया जाये। आगामी तीन महीनोंमें ही कुओंकी खुदाई
हो सकती है। चौमासा शुरू होनेपर कुऍकी खुदाईका काम नहीं हो सकता।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
१. इसके बादके दो अनुच्छेदों का अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओं" के अन्तिम दो छेदों का जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२८।<noinclude></noinclude>
miz9ecjypqcbn3pb4dzurdkd8th2g6q
673109
673108
2026-08-23T04:05:32Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673109
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अन्त्यजोंके लिए कुएँ|१९७}}</noinclude>क्षेत्रका विचार भी मेरे मनमें उनके अलौकिक कार्यको देखकर ही आया है। इसलिए
करनेको केवल इतना ही रह जाता है कि हम मीठूबहनके कार्यको सौ गुना बढ़ायें।
इसका मतलब यह नहीं कि केवल सौ बहनें ही इस कार्यके लिए तैयार हों अपितु यह
कि असंख्य बहनें तैयार हों जिससे यह कार्य सौ गुना ज्यादा अर्थात् असंख्य गुना ज्यादा बढ़ जाये। अभी जिस ढंगसे काम हो रहा है उसमें थोड़ा परिवर्तन करना होगा।
पुरुष मात्र उस कार्यमें से निकल आयेंगे। बहनों द्वारा बताया हुआ काम ही वे लोग
करेंगे। लेकिन मुख्य काम-जैसे धरना देना, लोगोंसे विनती करना, आरजू-मिन्नत करना, मद्य विक्रेताओंके पास दल लेकर विनय करनेके लिए जाना तो बहनोंका ही है।मैंने इस योजनाकी केवल रूपरेखा-भर ही बताई है, इसमें थ्योरोको जोड़ा जा सकता है। मेरी इच्छा है, बहनें इस कार्य में पहल करें और चाकू प्रवृत्तिको इतनी गति प्रदान करें जिससे जनता और सरकार दोनों ही हिल उठें।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७३. अन्त्यजोंके लिए कुएँ'''}}}}
ठक्कर बाकी अन्त्यज भाइयोंके लिए कुएँ बनवाने सम्बन्धी अपील कुछ
सप्ताह पूर्व 'नवजीवन' में प्रकाशित हुई थी। बम्बईसे कुछ एक भाई सांधियेरमें मुझसे
मिलने आये थे। उन लोगोंसे मैने कहा था कि ठक्कर बापाकी झोली उन्हें ही भर
देनी चाहिए। ४०,००० रुपयेकी रकम उनके लिए कोई बड़ी रकम न थी और इन
[ अन्त्यज ] भाइयोंको इतने ही रुपयोंकी जरूरत है। उनमें से एक भाईने तुरन्त ही
एक कुऍके लिए पैसे दे दिये। श्री नारणदासने सबके साथ सलाह-मशविरा कर तुरन्त
४०,००० रुपये इकट्ठा कर देनेकी बात कही। इससे मुझे बहुत हर्ष हुआ और मैंने
आये हुए भाइयोंको बधाई दी। अब मेरी सलाह है कि यह पैसा तुरन्त इकट्ठा करके
ठक्कर बापाके पास पहुँचा दिया जाये। आगामी तीन महीनोंमें ही कुओंकी खुदाई
हो सकती है। चौमासा शुरू होनेपर कुऍकी खुदाईका काम नहीं हो सकता।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
१. इसके बादके दो अनुच्छेदों का अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओं" के अन्तिम दो छेदों का जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२८।<noinclude></noinclude>
lme6p01pvc2f9021il71bsma3u4fuxw
673230
673109
2026-08-23T10:31:33Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673230
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अन्त्यजोंके लिए कुएँ|१९७}}</noinclude>क्षेत्रका विचार भी मेरे मनमें उनके अलौकिक कार्यको देखकर ही आया है। इसलिए
करनेको केवल इतना ही रह जाता है कि हम मीठूबहनके कार्यको सौ गुना बढ़ायें।
इसका मतलब यह नहीं कि केवल सौ बहनें ही इस कार्यके लिए तैयार हों अपितु यह
कि असंख्य बहनें तैयार हों जिससे यह कार्य सौ गुना ज्यादा अर्थात् असंख्य गुना ज्यादा बढ़ जाये। अभी जिस ढंगसे काम हो रहा है उसमें थोड़ा परिवर्तन करना होगा।
पुरुष मात्र उस कार्यमें से निकल आयेंगे। बहनों द्वारा बताया हुआ काम ही वे लोग
करेंगे। लेकिन मुख्य काम-जैसे धरना देना, लोगोंसे विनती करना, आरजू-मिन्नत करना, मद्य विक्रेताओंके पास दल लेकर विनय करनेके लिए जाना तो बहनोंका ही है१।
मैंने इस योजनाकी केवल रूपरेखा-भर ही बताई है, इसमें व्योराको जोड़ा जा सकता है। मेरी इच्छा है, बहनें इस कार्य में पहल करें और चालू प्रवृत्तिको इतनी गति प्रदान करें जिससे जनता और सरकार दोनों ही हिल उठें।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७३. अन्त्यजोंके लिए कुएँ'''}}}}
ठक्कर बापाकी अन्त्यज भाइयोंके लिए कुएँ बनवाने सम्बन्धी अपील कुछ सप्ताह पूर्व 'नवजीवन' में प्रकाशित हुई थी। बम्बईसे कुछ एक भाई सांधियेरमें मुझसे मिलने आये थे। उन लोगोंसे मैने कहा था कि ठक्कर बापाकी झोली उन्हें ही भर देनी चाहिए। ४०,००० रुपयेकी रकम उनके लिए कोई बड़ी रकम न थी और इन [अन्त्यज] भाइयोंको इतने ही रुपयोंकी जरूरत है। उनमें से एक भाईने तुरन्त ही एक कुऍके लिए पैसे दे दिये। श्री नारणदासने सबके साथ सलाह-मशविरा कर तुरन्त ४०,००० रुपये इकट्ठा कर देनेकी बात कही। इससे मुझे बहुत हर्ष हुआ और मैंने आये हुए भाइयोंको बधाई दी। अब मेरी सलाह है कि यह पैसा तुरन्त इकट्ठा करके ठक्कर बापाके पास पहुँचा दिया जाये। आगामी तीन महीनोंमें ही कुओंकी खुदाई हो सकती है। चौमासा शुरू होनेपर कुऍकी खुदाईका काम नहीं हो सकता।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
१. इसके बादके दो अनुच्छेदों का अनुवाद यहां नहीं दिया गया है। उक्त अनुच्छेद “भारतकी महिलाओं" के अन्तिम दो अनुच्छेदों में आ जाते हैं; देखिए पृष्ठ २२८।<noinclude></noinclude>
0kc9kf1l2oe8xkklwc9ffwqk4jcqskm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४२
250
197285
673112
669807
2026-08-23T04:35:40Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673112
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''कुछ प्रश्न'''}}
प्र०: जेल में खादीका आग्रह किया जा सकता है या नहीं?
उ० : खादी-प्रतकी कल्पनाके समय यह आग्रह मेरे ध्यानमें नहीं था। मुझे
तो यह अनावश्यक मालूम होता है। आम तौर पर सत्याग्रहीको जेलके उन नियमोंका
अनादर नहीं करना चाहिए, जो धर्म-विरुद्ध नहीं हैं। किन्तु ऐसे मामलों में सबको
अपने-अपने धर्मका विचार कर लेना चाहिए। अगर किसीका यही व्रत हो कि
वह किसी भी दशामें खादीके सिवा और कोई कपड़ा नहीं पहनेगा तो उसका धर्म
है कि वह खादीका आग्रह करे लेकिन अब कोई ऐसा व्रत लेकर जेल जाये तो मैं
उसे अनुचित मानूंगा।
प्र० जिसका यह नियम है कि १६० तार सूत काते बिना अन्न ग्रहण नहीं
करना वह तो तकलीकी अपेक्षा चरखेको ही ज्यादा पसन्द करेगा अतएव क्या चरखा
और धुनकी पानेका आग्रह किया जा सकता है ? तकलीपर कातनेमें तो बहुत समय
लग जाता है। इससे जेलके काम में रुकावट पहुँचती है; अतः बगैर चरखेके काम नहीं
चल सकता । १६० तार सूत कातनेका आग्रह भी उचित है या नहीं ? या उसे कुछ
ही तार कातकर सन्तोष कर लेना चाहिए?
उ० : कताई यज्ञ कार्य है, इसलिए चरखे और धुनकीका आग्रह किया जा सकता
है। जिसने कताईका व्रत लिया है, उसे चरखे और धुनकीके लिए जरूर आग्रह करना
चाहिए। उसे एक तकली दे देना ही काफी नहीं है। १६० तारसे कममें काम चल
सकता है या नहीं, सो तो व्रतपर निर्भर है। अगर १६० तारका व्रत हो तो इससे
कममें काम नहीं चला सकता।
प्र० :गन्दा भोजन दिया जाये, पेशाबका ठीक इन्तजाम न हो, २-३ मिनटमें
ही शीचसे निबटकर उठना पड़े, बीचमें जरूरत पड़ने पर जाना मना हो, सामर्थ्यसे
अधिक काम कराया जाये, वार्डरों द्वारा रात-भर चिल्ला-चिल्लाकर गिनती करनेके
कारण नींद न आ पाये तो इन मामलोंमें आमतौर पर कौन-सी नीति अख्तियार करनी
चाहिए? किस सम्बन्धमें किस सीमा तक आग्रह धर्मानुमोदित कहा जा सकता है?
उ० : इस सम्बन्धमें सामान्य नियम तो यह है कि जो कष्ट सहन किया जा
सकता हो और जिसमें अपमान न होता हो, उसे सहन किया जाये, और शेष मामलोंमें जो ढंग सत्याग्रहीको शोभा दे, उस ढंगसे लड़ा जाये। मैं गन्दे भोजन और गन्दे बरतनोंको सहन नहीं करूँगा। पेशाबखानोंकी गन्दगी मेरे लिए असह्य होगी; लेकिन
अगर कोठरीमें पेशाब करनेकी सुविधा कर दी जाये तो मैं उसका विरोध नहीं
करूँगा। पाखानेके लिए जरूरी समय अवश्य लूंगा, इस बारेमें में किसी तरहकी जल्दीसहन नहीं करूँगा। पर गिनतीकी चिल्लाहटको सह लूंगा।<noinclude></noinclude>
1ek07p7tndkz5thb0pp6wxy13au4j7p
673114
673112
2026-08-23T04:36:10Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673114
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''कुछ प्रश्न'''}}
प्र०: जेल में खादीका आग्रह किया जा सकता है या नहीं?
उ० : खादी-प्रतकी कल्पनाके समय यह आग्रह मेरे ध्यानमें नहीं था। मुझे
तो यह अनावश्यक मालूम होता है। आम तौर पर सत्याग्रहीको जेलके उन नियमोंका
अनादर नहीं करना चाहिए, जो धर्म-विरुद्ध नहीं हैं। किन्तु ऐसे मामलों में सबको
अपने-अपने धर्मका विचार कर लेना चाहिए। अगर किसीका यही व्रत हो कि
वह किसी भी दशामें खादीके सिवा और कोई कपड़ा नहीं पहनेगा तो उसका धर्म
है कि वह खादीका आग्रह करे लेकिन अब कोई ऐसा व्रत लेकर जेल जाये तो मैं
उसे अनुचित मानूंगा।
प्र० जिसका यह नियम है कि १६० तार सूत काते बिना अन्न ग्रहण नहीं
करना वह तो तकलीकी अपेक्षा चरखेको ही ज्यादा पसन्द करेगा अतएव क्या चरखा
और धुनकी पानेका आग्रह किया जा सकता है ? तकलीपर कातनेमें तो बहुत समय
लग जाता है। इससे जेलके काम में रुकावट पहुँचती है; अतः बगैर चरखेके काम नहीं
चल सकता । १६० तार सूत कातनेका आग्रह भी उचित है या नहीं ? या उसे कुछ
ही तार कातकर सन्तोष कर लेना चाहिए?
उ० : कताई यज्ञ कार्य है, इसलिए चरखे और धुनकीका आग्रह किया जा सकता
है। जिसने कताईका व्रत लिया है, उसे चरखे और धुनकीके लिए जरूर आग्रह करना
चाहिए। उसे एक तकली दे देना ही काफी नहीं है। १६० तारसे कममें काम चल
सकता है या नहीं, सो तो व्रतपर निर्भर है। अगर १६० तारका व्रत हो तो इससे
कममें काम नहीं चला सकता।
प्र० :गन्दा भोजन दिया जाये, पेशाबका ठीक इन्तजाम न हो, २-३ मिनटमें
ही शीचसे निबटकर उठना पड़े, बीचमें जरूरत पड़ने पर जाना मना हो, सामर्थ्यसे
अधिक काम कराया जाये, वार्डरों द्वारा रात-भर चिल्ला-चिल्लाकर गिनती करनेके
कारण नींद न आ पाये तो इन मामलोंमें आमतौर पर कौन-सी नीति अख्तियार करनी
चाहिए? किस सम्बन्धमें किस सीमा तक आग्रह धर्मानुमोदित कहा जा सकता है?
उ० : इस सम्बन्धमें सामान्य नियम तो यह है कि जो कष्ट सहन किया जा
सकता हो और जिसमें अपमान न होता हो, उसे सहन किया जाये, और शेष मामलोंमें जो ढंग सत्याग्रहीको शोभा दे, उस ढंगसे लड़ा जाये। मैं गन्दे भोजन और गन्दे बरतनोंको सहन नहीं करूँगा। पेशाबखानोंकी गन्दगी मेरे लिए असह्य होगी; लेकिन
अगर कोठरीमें पेशाब करनेकी सुविधा कर दी जाये तो मैं उसका विरोध नहीं
करूँगा। पाखानेके लिए जरूरी समय अवश्य लूंगा, इस बारेमें में किसी तरहकी जल्दीसहन नहीं करूँगा। पर गिनतीकी चिल्लाहटको सह लूंगा।<noinclude></noinclude>
i6o1gis51jqzzasa8piodvwoluv98xh
673115
673114
2026-08-23T04:37:11Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673115
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''कुछ प्रश्न'''}}
प्र०: जेल में खादीका आग्रह किया जा सकता है या नहीं?
उ० : खादी-प्रतकी कल्पनाके समय यह आग्रह मेरे ध्यानमें नहीं था। मुझे
तो यह अनावश्यक मालूम होता है। आम तौर पर सत्याग्रहीको जेलके उन नियमोंका
अनादर नहीं करना चाहिए, जो धर्म-विरुद्ध नहीं हैं। किन्तु ऐसे मामलों में सबको
अपने-अपने धर्मका विचार कर लेना चाहिए। अगर किसीका यही व्रत हो कि
वह किसी भी दशामें खादीके सिवा और कोई कपड़ा नहीं पहनेगा तो उसका धर्म
है कि वह खादीका आग्रह करे लेकिन अब कोई ऐसा व्रत लेकर जेल जाये तो मैं
उसे अनुचित मानूंगा।
प्र० जिसका यह नियम है कि १६० तार सूत काते बिना अन्न ग्रहण नहीं
करना वह तो तकलीकी अपेक्षा चरखेको ही ज्यादा पसन्द करेगा अतएव क्या चरखा
और धुनकी पानेका आग्रह किया जा सकता है? तकलीपर कातनेमें तो बहुत समय
लग जाता है। इससे जेलके काम में रुकावट पहुँचती है; अतः बगैर चरखेके काम नहीं
चल सकता। १६० तार सूत कातनेका आग्रह भी उचित है या नहीं? या उसे कुछ
ही तार कातकर सन्तोष कर लेना चाहिए?
उ० : कताई यज्ञ कार्य है, इसलिए चरखे और धुनकीका आग्रह किया जा सकता
है। जिसने कताईका व्रत लिया है, उसे चरखे और धुनकीके लिए जरूर आग्रह करना
चाहिए। उसे एक तकली दे देना ही काफी नहीं है। १६० तारसे कममें काम चल
सकता है या नहीं, सो तो व्रतपर निर्भर है। अगर १६० तारका व्रत हो तो इससे
कममें काम नहीं चला सकता।
प्र० :गन्दा भोजन दिया जाये, पेशाबका ठीक इन्तजाम न हो, २-३ मिनटमें
ही शीचसे निबटकर उठना पड़े, बीचमें जरूरत पड़ने पर जाना मना हो, सामर्थ्यसे
अधिक काम कराया जाये, वार्डरों द्वारा रात-भर चिल्ला-चिल्लाकर गिनती करनेके
कारण नींद न आ पाये तो इन मामलोंमें आमतौर पर कौन-सी नीति अख्तियार करनी
चाहिए? किस सम्बन्धमें किस सीमा तक आग्रह धर्मानुमोदित कहा जा सकता है?
उ० : इस सम्बन्धमें सामान्य नियम तो यह है कि जो कष्ट सहन किया जा
सकता हो और जिसमें अपमान न होता हो, उसे सहन किया जाये, और शेष मामलोंमें जो ढंग सत्याग्रहीको शोभा दे, उस ढंगसे लड़ा जाये। मैं गन्दे भोजन और गन्दे बरतनोंको सहन नहीं करूँगा। पेशाबखानोंकी गन्दगी मेरे लिए असह्य होगी; लेकिन
अगर कोठरीमें पेशाब करनेकी सुविधा कर दी जाये तो मैं उसका विरोध नहीं
करूँगा। पाखानेके लिए जरूरी समय अवश्य लूंगा, इस बारेमें में किसी तरहकी जल्दीसहन नहीं करूँगा। पर गिनतीकी चिल्लाहटको सह लूंगा।<noinclude></noinclude>
9ntkyenis6fo4fod00mc0bvult5ssp6
673231
673115
2026-08-23T10:37:42Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673231
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''कुछ प्रश्न'''}}
प्र०: जेल में खादीका आग्रह किया जा सकता है या नहीं?
उ० : खादी-व्रतकी कल्पनाके समय यह आग्रह मेरे ध्यानमें नहीं था। मुझे तो यह अनावश्यक मालूम होता है। आम तौर पर सत्याग्रहीको जेलके उन नियमोंका अनादर नहीं करना चाहिए, जो धर्म-विरुद्ध नहीं हैं। किन्तु ऐसे मामलों में सबको अपने-अपने धर्मका विचार कर लेना चाहिए। अगर किसीका यही व्रत हो कि वह किसी भी दशामें खादीके सिवा और कोई कपड़ा नहीं पहनेगा तो उसका धर्म है कि वह खादीका आग्रह करे लेकिन अब कोई ऐसा व्रत लेकर जेल जाये तो मैं उसे अनुचित मानूंगा।
प्र० जिसका यह नियम है कि १६० तार सूत काते बिना अन्न ग्रहण नहीं करना वह तो तकलीकी अपेक्षा चरखेको ही ज्यादा पसन्द करेगा अतएव क्या चरखा और धुनकी पानेका आग्रह किया जा सकता है? तकलीपर कातनेमें तो बहुत समय लग जाता है। इससे जेलके काम में रुकावट पहुँचती है; अतः बगैर चरखेके काम नहीं चल सकता। १६० तार सूत कातनेका आग्रह भी उचित है या नहीं? या उसे कुछ ही तार कातकर सन्तोष कर लेना चाहिए?
उ० : कताई यज्ञ कार्य है, इसलिए चरखे और धुनकीका आग्रह किया जा सकता
है। जिसने कताईका व्रत लिया है, उसे चरखे और धुनकीके लिए जरूर आग्रह करना
चाहिए। उसे एक तकली दे देना ही काफी नहीं है। १६० तारसे कममें काम चल सकता है या नहीं, सो तो व्रतपर निर्भर है। अगर १६० तारका व्रत हो तो इससे
कममें काम नहीं चला सकता।
प्र० :गन्दा भोजन दिया जाये, पेशाबका ठीक इन्तजाम न हो, २-३ मिनटमें ही शीचसे निबटकर उठना पड़े, बीचमें जरूरत पड़ने पर जाना मना हो, सामर्थ्यसे
अधिक काम कराया जाये, वार्डरों द्वारा रात-भर चिल्ला-चिल्लाकर गिनती करनेके
कारण नींद न आ पाये तो इन मामलोंमें आमतौर पर कौन-सी नीति अख्तियार करनी
चाहिए? किस सम्बन्धमें किस सीमा तक आग्रह धर्मानुमोदित कहा जा सकता है?
उ० : इस सम्बन्धमें सामान्य नियम तो यह है कि जो कष्ट सहन किया जा सकता हो और जिसमें अपमान न होता हो, उसे सहन किया जाये, और शेष मामलोंमें जो ढंग सत्याग्रहीको शोभा दे, उस ढंगसे लड़ा जाये। मैं गन्दे भोजन और गन्दे बरतनोंको सहन नहीं करूँगा। पेशाबखानोंकी गन्दगी मेरे लिए असह्य होगी; लेकिन अगर कोठरीमें पेशाब करनेकी सुविधा कर दी जाये तो मैं उसका विरोध नहीं करूँगा। पाखानेके लिए जरूरी समय अवश्य लूंगा, इस बारेमें में किसी तरहकी जल्दीसहन नहीं करूँगा। पर गिनतीकी चिल्लाहटको सह लूंगा।<noinclude></noinclude>
4v8qsnpampfdn6xya39qnlzrzhzxyg3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४३
250
197286
673120
669808
2026-08-23T04:46:23Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673120
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वदेशी|१९९}}</noinclude>{{C|'''निर्दयी पुरुषोंके प्रति'''}}
प्राइमस स्टोवके कारण रोज गुजराती बहनें मरती रहती है, किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता कि निर्दयी गुजराती इसकी कुछ चिन्ता करते हों। मुझे अभी-अभी दो बहनोंकी मृत्युका समाचार मिला है। अपनी इस यात्राके दौरान मैंने खुद उस खतरेको अनुभव किया है। मेरे साथ यात्रा करनेवाले एक अनुभवी और कुशल साथी ही दो बार बाल-बाल बचे। फलस्वरूप मैने स्टोवका व्यवहार करनेकी सर्वथा मनाही कर दी। स्त्रियोंको प्राइमस स्टोव व्यवहार करना नहीं आता। उसका व्यवहार करनेमें कुशलताको आवश्यकता तो होती ही है। तिस पर हमारी स्त्रियों इस चूल्हेको मेज पर नहीं रख सकती। अतः पुरुषोंका कर्तव्य है कि वे इस चूल्हेका बहिष्कार करें और जबतक वे ऐसा नहीं करते तबतक प्राइमससे जल जानेवाली लड़की या स्त्रीकी मृत्युका पाप पुरुषके सिर रहेगा। खरीदे हुए प्राइमस स्टोवको फेंक देना चाहिए। प्राइमसका व्यवहार करनेसे समयकी बचत होती है, यह बात झूठ है। स्टोव बिगड़ जानेपर हमें उस तरफ कितना ध्यान देना पड़ता है, इसका भी हिसाव लगाना चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७५. स्वदेशी'''}}}}
एक ओर बम्बईके कपड़ा व्यापारी विदेशी वस्त्रके बहिष्कारकी बातें कर रहे
हैं और दूसरी ओर अहमदाबादकी गुजरात सभा भी यही कर रही है। दोनोंका
उद्देश्य वर्तमान आन्दोलनकी यथाशक्ति सहायता करना है। लेकिन यदि इन दोनोंने
गलती की तो अनजाने ही क्यों न हो, विदेशी कपड़ोंके बहिष्कार आन्दोलनको नुक
सान पहुँचनेकी सम्भावना है।
स्वदेशीके नीचे लिखे प्रकार पाये जाते हैं :
१. शुद्ध अर्थात् हाथ कते सूतकी हाथ-चुनी खादी।
२. भारतकी उन मिलों द्वारा बने और कते हुए सूतके कपड़े जिनके मालिक
भारतीय हैं और जिनका संचालन तथा प्रबन्ध भी भारतीय ही करते हैं।
३. ऐसी मिलोंका थोड़े या बहुत अंशमें विदेशी मिलोंमें कते हुए सूतका कपड़ा।
४. विदेशी मालिकों और विदेशी व्यवस्थापकों द्वारा संचालित भारतकी किसी
भी मिलका कपड़ा।
५. भारतवर्ष में बनी हुई हरएक चीज।
६. वे चीजें जिन्हें बनानेकी कुछ किया हिन्दुस्तानमें की गई हो, जैसे हारमो
नियम बाजा। इस बाजेके तमाम हिस्से विदेशी होते हैं। किन्तु हिन्दुस्तान में इन
हिस्सोंको जोड़कर बाजा बना लिया जाता है।<noinclude></noinclude>
ittgktkg2u95ce0ge4sff12cchs7xcx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४४
250
197287
673189
669809
2026-08-23T09:02:26Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673189
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>बहिष्कारके निम्न रूप हैं :
(अ) विदेशी वस्त्र मात्रका बहिष्कार।
(ब) सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका बहिष्कार।
(क) तमाम ब्रिटिश चीजोंका बहिष्कार।
(ग) तमाम विदेशी चीजोंका बहिष्कार।
मेरे खयालमें (१) अर्थात् शुद्ध खादी ही सच्ची स्वदेशी है और सच्चा बहिष्कार (अ) अर्थात् विदेशी वस्त्र मात्रका बहिष्कार है। यदि स्वदेशीका उपर्युक्त पहला प्रकार अर्थात् शुद्ध सादीका उत्पादन सध जाये तो उसके आधारपर अन्य आवश्यक स्वदेशी वस्तुओंको भी स्वतः प्रोत्साहन मिल जायेगा। यदि हम एकसाथ सभी आवश्यक वस्तुओंके पीछे पड़े रहे तो एक भी आवश्यक स्वदेशी वस्तुको अपनाने के अपने लक्ष्यतक भी नहीं पहुँच सकेंगे।
बहिष्कारकी दृष्टिसे सिर्फ (अ) अर्थात् हर तरहके विदेशी वस्त्रका बहिष्कार
आवश्यक है और यह खादी द्वारा ही हो सकता है।
पाठक यह याद रखें कि दूसरी तरहकी स्वदेशीकी चर्चा कांग्रेसके जन्मकालसे अर्थात् ४५ वर्षसे चलती आई है, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली है। शुद्ध स्वदेशी अर्थात् खादीकी बातको अभी सिर्फ नौ साल ही हुए हैं; और तब भी उसमें अच्छी कामयाबी हासिल हुई है। उसके प्रसारके लिए एक ऐसी राष्ट्रीय संस्थाका जन्म हुआ है, जिसके मुकाबलेकी दूसरी कोई संस्था मुझे सारी दुनियामें नहीं दिखाई पड़ती। और इस खादीके कार्यके कारण ही तो आज व्यापक सविनय अवज्ञाका प्रयोग सम्भव हो सका है।
पाठक यह भी याद रखें कि ४५ वर्षोंसे विदेशी चीजों और अंग्रेजी मालके बहिष्कारकी बातें होती आई हैं। लेकिन अबतक इसमें किसी तरहकी सफलता नहीं मिली है, जबकि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ है कि आज उसकी शक्यताके बारेमें लोगों में विश्वास पैदा हो गया है।
मेरी राय में व्यावहारिक दृष्टिसे भी विदेशी वस्त्रके बहिष्कारको छोड़कर दूसरी ओर लोगोंका ध्यान खींचनेमें नुकसान है, और खादीको छोड़कर विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारको सफल बनानेका विचार करना दूरंदेशीकी निशानी नहीं है। अगर देशी मिलोंके द्वारा ही बहिष्कार सफल हो पाता तो अबतक अर्थात् इन ५० वर्षो में मिलोंको उसमें कामयाबी मिल गई होती। हां, यह मैं मानता हूँ कि खादीका समर्थन करके मिलें बहिष्कार आन्दोलनकी खासी मदद कर सकती हैं। यह किस तरह हो सकता है, सो मैं बता चुका हूँ।
हिन्दुस्तानकी मिलोंका बना स्वदेशी कपड़ा निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी है। क्योंकि उससे खादी और मिलके कपड़ेको बराबरीका स्थान मिल जाता है। यह तो किसी ऊँचे और बौने आदमीकी दोस्ती जैसी बात हुई। ऊँचेको धानेकी बराबरीके हक देनेका मतलब बौनेको कुछ भी न देना है। यह तो साफ जाहिर है। कि बौना, ऊँचे आदमीकी पंक्ति में खड़ा ही नहीं रह सकता। अतएव अगर ऊँचा<noinclude></noinclude>
h451u0f3effuvjob3lmdud7qevnnsv7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४५
250
197288
673212
669810
2026-08-23T09:57:21Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673212
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वदेशी|२०१}}</noinclude>आदमी बीनेके साथ इन्साफ करना चाहे तो उसे बौनेको हमेशा आगे रखना चाहिए,
बौनेके लिए आवश्यक चीजका उसे त्याग करना चाहिए और मौका पड़ने पर उसे
अपने कन्धों पर उठाकर उसकी हिफाजत करनी चाहिए। ठीक यही हाल मिलके
कपड़े और खादीका है। मिलके कपड़ेका तो काम चलता ही है। पर खादी तो अभी
रेंगना सीख रही है। अतएव जिसने शुद्ध खादीका ही व्रत न लिया हो, वह इतना
तो अवश्य कर सकता है: "मैं ऐसा विदेशी कपड़ा कभी इस्तेमाल नहीं करूँगा,
जिसमें विलायती सूतका एक भी धागा हो, जहाँतक हो सकेगा शुद्ध खादीका ही
उपयोग करूंगा। और अगर वैसी खादी न मिल सकी तो भारतीय मालिकों और
भारतीय व्यवस्थापकों द्वारा संचालित मिलके कपड़ोंका ही इस्तेमाल करूँगा।
अगर हमने खादीको बराबर अपनी नजरोंके सामने न रखा तो उसका नतीजा
यही होगा कि देशकी-देशी नहीं-मिलोंके कपड़े का भाव बढ़ेगा और बहिष्कारका काम कभी सफल न हो सकेगा।
१. इस जमाने में हमारी मिलें चाहे जितना प्रयत्न क्यों न करें, हिन्दुस्तानके
लिए जरूरी कपड़ा पैदा कर ही नहीं सकती।
२. आम तौर पर मिलोंका ध्यान अपने लाभकी ओर रहता है, और आग भी रहेगा।
३. मिलोंको सरकार जब चाहे तब दबा सकती है।
४. आजकल हवाके रुखको देखनेसे तो यह पता चलता है कि देशकी मिलें विदेशी मालिकों और व्यवस्थापकोंके हाथोंमें चली जा रही हैं।
५. मिलोंको विदेशी कल-पुर्जों और विदेशियोंके शिल्प कौशलका सहारा लेना
पड़ता है। इस कारण भी मिलें एकाएक संकटमें पड़ सकती हैं।
इसके विपरीत :
(१) यदि देशमें सादीकी भावना व्यापक रूपसे फैल जाये तो आज ही आवश्यक खादीका उत्पादन हो सकता है।
(२) सादीके लिए मिलके जितनी पूँजीकी आवश्यकता नहीं।
(३) खादी के लिए मिलके समान शिल्प कौशल आवश्यक नहीं।
(४) यह कहा जा सकता है कि खादी बनानेवाले तो तीस करोड़ हैं।
(५) खादी के लिए जरूरी तमाम कल-पुर्जे देश ही में बनते हैं।
(६) खादीको सरकार या और कोई दूसरी ताकत दवा नहीं सकती।
(७) खादीका उत्पादन घर-घर हो सकता है।
(८) खादीको एक जगह तैयार करके दूसरी जगह भेजना अनिवार्य नहीं है।
आज कुछ हद तक उसे सफर करना पड़ता है, क्योंकि खादी भावना अभी देशव्यापी
नहीं हुई है।
इन सब बातोंसे पाठक समझ सकेंगे कि खादी ही एक स्वदेशी धर्म है। जिसमें स्वदेशी भावना है वह इस धर्मका पालन करते हुए स्वदेशीके और पहलुओंको भी सिद्ध कर लेगा। जो अज्ञानवश देखा-देखी या दम्भवश खादी पहनता है, उसे तो<noinclude></noinclude>
0mfvfj6dwc11m6m6jsn563xzp6rq0qi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४६
250
197289
673215
669811
2026-08-23T10:04:33Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673215
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>खादी पहनते हुए भी स्वदेशी व्रतधारी नहीं माना जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि इस तरहके शौकीन खादीधारी स्वदेशीकी भावनाका पोषण करते हैं। जो समझ-बूझकर खादी पहनता है वह तो उन सब विदेशी चीजोंको स्वयं ही छोड़ देगा, जो अनिवार्य नहीं हैं।
अब रहा बहिष्कार तमाम चीजोंका बहिष्कार पागलपन है। और इस बारे में
कोई दलील नहीं हो सकती।
सिर्फ इंग्लंडकी बनी चीजों या कपड़ोंका बहिष्कार भी नामुमकिन है, क्योंकि इंग्लैंड की बनी चीजें और इंग्लैंडका कपड़ा विदेशी चीजों और विदेशी कपड़ेके नामसे आ सकता है। बंग-भंग आन्दोलन के समय इंग्लैंडके बने कपड़े परसे इंग्लैंड की छाप निकालकर उसे स्वदेशीके नामसे बेचा गया था। इसलिए ब्रिटिश कपड़े बहिष्कारसे जापान इत्यादि अन्य देशोंके कपड़ा उद्योगको लाभ पहुँचाने के सिवा और कोई मतलब सिद्ध नहीं हो सकता।
यहाँतक मैंने सिर्फ विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी दृष्टिसे ही विचार किया है। स्वराज्य प्राप्त कर लेनेके बादकी स्थितिका और भारतके करोड़ों भूखों मरने-वाले कंगालोंके हितका विचार करते हुए तो सिर्फ एक खादीकी ही बात सोची जा सकती है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७६. अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे'''}}}}
अहमदाबाद के मिल मालिकोंकी प्रेम-भरी दृष्टिसे मुझे बहुत आनन्द हुआ है, यह कहना केवल विनयकी भाषा नहीं बल्कि मेरे हृदयके सच्चे उद्गार हैं। साबरमतीसे विदा होते समय उनका हाजिर रहना, बादमें भी समय-समयपर मिलते रहना और आखिर बहुत प्रेमपूर्वक उन सबका सूरत आना, इस बातका शुभ चिह्न है कि यह लड़ाई मालिकों या पूँजीपतियोंके विरुद्ध नहीं है।
लेकिन उनकी उपस्थिति और उनके आशीर्वादका में स्वयं तो कुछ विशेष अर्थ
भी लगाता हूँ। उनके साथका मेरा सम्बन्ध लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना हो चुका है।
इस बीच सम्भव है कि किसीने अपने स्वार्थकी दृष्टिसे मेरे व्यवहारको विरोधी पाया
हो, तो भी उन्होंने मेरी मित्रताको स्वीकार किया है, और लड़ते समय भी उनके
तथा मेरे बीच सदा मधुर सम्बन्ध ही रहा है। मैं यह मानता हूँ कि इस समय वे
जो साथ दे रहे हैं, एक हदतक यह उस सम्बन्धका ही परिणाम है। यदि मेरा
यह विश्वास सच हो तो उनकी उपस्थिति और आशीर्वादके अतिरिक्त भी मुझे
अधिकार है कि मैं उनसे कुछ व्यावहारिक समर्थनकी आशा रखूं।
उन्होंने एक कदम उठाया है और वह यह कि अबसे ये विदेशी कपड़ेका बहि-
कार करेंगे और स्वदेशी कपड़ेका ही उपयोग करेंगे। यह प्रस्ताव वैसे तो बड़ा अच्छा<noinclude></noinclude>
trh0ufyxi72s9yuoblbr1k3pwpxlsbb
673217
673215
2026-08-23T10:05:23Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673217
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
खादी पहनते हुए भी स्वदेशी व्रतधारी नहीं माना जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि इस तरहके शौकीन खादीधारी स्वदेशीकी भावनाका पोषण करते हैं। जो समझ-बूझकर खादी पहनता है वह तो उन सब विदेशी चीजोंको स्वयं ही छोड़ देगा, जो अनिवार्य नहीं हैं।
अब रहा बहिष्कार तमाम चीजोंका बहिष्कार पागलपन है। और इस बारे में
कोई दलील नहीं हो सकती।
सिर्फ इंग्लंडकी बनी चीजों या कपड़ोंका बहिष्कार भी नामुमकिन है, क्योंकि इंग्लैंड की बनी चीजें और इंग्लैंडका कपड़ा विदेशी चीजों और विदेशी कपड़ेके नामसे आ सकता है। बंग-भंग आन्दोलन के समय इंग्लैंडके बने कपड़े परसे इंग्लैंड की छाप निकालकर उसे स्वदेशीके नामसे बेचा गया था। इसलिए ब्रिटिश कपड़े बहिष्कारसे जापान इत्यादि अन्य देशोंके कपड़ा उद्योगको लाभ पहुँचाने के सिवा और कोई मतलब सिद्ध नहीं हो सकता।
यहाँतक मैंने सिर्फ विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी दृष्टिसे ही विचार किया है। स्वराज्य प्राप्त कर लेनेके बादकी स्थितिका और भारतके करोड़ों भूखों मरने-वाले कंगालोंके हितका विचार करते हुए तो सिर्फ एक खादीकी ही बात सोची जा सकती है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७६. अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे'''}}}}
अहमदाबाद के मिल मालिकोंकी प्रेम-भरी दृष्टिसे मुझे बहुत आनन्द हुआ है, यह कहना केवल विनयकी भाषा नहीं बल्कि मेरे हृदयके सच्चे उद्गार हैं। साबरमतीसे विदा होते समय उनका हाजिर रहना, बादमें भी समय-समयपर मिलते रहना और आखिर बहुत प्रेमपूर्वक उन सबका सूरत आना, इस बातका शुभ चिह्न है कि यह लड़ाई मालिकों या पूँजीपतियोंके विरुद्ध नहीं है।
लेकिन उनकी उपस्थिति और उनके आशीर्वादका में स्वयं तो कुछ विशेष अर्थ
भी लगाता हूँ। उनके साथका मेरा सम्बन्ध लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना हो चुका है।
इस बीच सम्भव है कि किसीने अपने स्वार्थकी दृष्टिसे मेरे व्यवहारको विरोधी पाया
हो, तो भी उन्होंने मेरी मित्रताको स्वीकार किया है, और लड़ते समय भी उनके
तथा मेरे बीच सदा मधुर सम्बन्ध ही रहा है। मैं यह मानता हूँ कि इस समय वे
जो साथ दे रहे हैं, एक हदतक यह उस सम्बन्धका ही परिणाम है। यदि मेरा
यह विश्वास सच हो तो उनकी उपस्थिति और आशीर्वादके अतिरिक्त भी मुझे
अधिकार है कि मैं उनसे कुछ व्यावहारिक समर्थनकी आशा रखूं।
उन्होंने एक कदम उठाया है और वह यह कि अबसे ये विदेशी कपड़ेका बहि-
कार करेंगे और स्वदेशी कपड़ेका ही उपयोग करेंगे। यह प्रस्ताव वैसे तो बड़ा अच्छा<noinclude></noinclude>
c7nrwseehh8i3bw1bw7ehuh63vk00am
673218
673217
2026-08-23T10:05:45Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673218
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>खादी पहनते हुए भी स्वदेशी व्रतधारी नहीं माना जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि इस तरहके शौकीन खादीधारी स्वदेशीकी भावनाका पोषण करते हैं। जो समझ-बूझकर खादी पहनता है वह तो उन सब विदेशी चीजोंको स्वयं ही छोड़ देगा, जो अनिवार्य नहीं हैं।
अब रहा बहिष्कार तमाम चीजोंका बहिष्कार पागलपन है। और इस बारे में
कोई दलील नहीं हो सकती।
सिर्फ इंग्लंडकी बनी चीजों या कपड़ोंका बहिष्कार भी नामुमकिन है, क्योंकि इंग्लैंड की बनी चीजें और इंग्लैंडका कपड़ा विदेशी चीजों और विदेशी कपड़ेके नामसे आ सकता है। बंग-भंग आन्दोलन के समय इंग्लैंडके बने कपड़े परसे इंग्लैंड की छाप निकालकर उसे स्वदेशीके नामसे बेचा गया था। इसलिए ब्रिटिश कपड़े बहिष्कारसे जापान इत्यादि अन्य देशोंके कपड़ा उद्योगको लाभ पहुँचाने के सिवा और कोई मतलब सिद्ध नहीं हो सकता।
यहाँतक मैंने सिर्फ विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी दृष्टिसे ही विचार किया है। स्वराज्य प्राप्त कर लेनेके बादकी स्थितिका और भारतके करोड़ों भूखों मरने-वाले कंगालोंके हितका विचार करते हुए तो सिर्फ एक खादीकी ही बात सोची जा सकती है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७६. अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे'''}}}}
अहमदाबाद के मिल मालिकोंकी प्रेम-भरी दृष्टिसे मुझे बहुत आनन्द हुआ है, यह कहना केवल विनयकी भाषा नहीं बल्कि मेरे हृदयके सच्चे उद्गार हैं। साबरमतीसे विदा होते समय उनका हाजिर रहना, बादमें भी समय-समयपर मिलते रहना और आखिर बहुत प्रेमपूर्वक उन सबका सूरत आना, इस बातका शुभ चिह्न है कि यह लड़ाई मालिकों या पूँजीपतियोंके विरुद्ध नहीं है।
लेकिन उनकी उपस्थिति और उनके आशीर्वादका में स्वयं तो कुछ विशेष अर्थ
भी लगाता हूँ। उनके साथका मेरा सम्बन्ध लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना हो चुका है।
इस बीच सम्भव है कि किसीने अपने स्वार्थकी दृष्टिसे मेरे व्यवहारको विरोधी पाया
हो, तो भी उन्होंने मेरी मित्रताको स्वीकार किया है, और लड़ते समय भी उनके
तथा मेरे बीच सदा मधुर सम्बन्ध ही रहा है। मैं यह मानता हूँ कि इस समय वे
जो साथ दे रहे हैं, एक हदतक यह उस सम्बन्धका ही परिणाम है। यदि मेरा
यह विश्वास सच हो तो उनकी उपस्थिति और आशीर्वादके अतिरिक्त भी मुझे
अधिकार है कि मैं उनसे कुछ व्यावहारिक समर्थनकी आशा रखूं।
उन्होंने एक कदम उठाया है और वह यह कि अबसे ये विदेशी कपड़ेका बहि-
कार करेंगे और स्वदेशी कपड़ेका ही उपयोग करेंगे। यह प्रस्ताव वैसे तो बड़ा अच्छा<noinclude></noinclude>
trh0ufyxi72s9yuoblbr1k3pwpxlsbb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४७
250
197290
673234
669812
2026-08-23T10:46:55Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673234
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे|२०३}}</noinclude>हैं, लेकिन इसमें कुछ कमियाँ भी हैं। स्वदेशीका अर्थ कोई खादी करेगा और कोई
विलायती सूतसे बनी किनारवाले मिलके कपड़े को पसन्द करेगा। स्वदेशी धर्मका पालन
इस तरह नहीं किया जा सकता। मेरी रायमें जहाँतक हो सके खादी पहनना कमसे- कम स्वदेशी धर्म है। ऐसा करना असम्भव होनेपर हिन्दुस्तानकी मिलोंमें कते हुए सूतका उन्हीं मिलोंमें बना हुआ कपड़ा स्वदेशी माना जा सकता है। यदि इतना भी न किया जा सके तो स्वदेशीका कोई अर्थ नहीं रह जाता; यही नहीं बल्कि उस हालत में बहिष्कारकी दृष्टिसे यह हानिकारक भी है।
यदि मिल मालिक खादीको प्रोत्साहन दें और स्वदेशीकी दृष्टि रखकर मिलें चलायें तो मेरी राय में विदेशी वस्त्रका वहिष्कार बहुत आसान काम है। मैं इस बारे में, समय मिलने पर किसी दूसरे लेखमें विस्तृत रूपसे विचार करनेकी आशा करता हूँ।
यहाँ तो मैं सिर्फ यही बताना चाहता हूँ कि मिल मालिक खासकर इस आन्दोलनकी
कैसे और किस-किस प्रकारसे सहायता कर सकते हैं। निर्विवाद रूपसे इतना तो होना
ही चाहिए कि मिल मालिकों और मजदूरोंके बीच अच्छा सम्बन्ध हो । परस्पर विरोधी
होनेके बदले यदि वे एक-दूसरे के सहायक बनें तो उससे स्वराज्यकी समस्याको
सुलझाने में सहायता मिलेगी। इस दृष्टिसे नीचे लिखी बातें विचार करने योग्य हैं :
१. छोटी-मोटी बातोंके कारण मजदूरोंके सामने अड़चनें आती ही रहती हैं, मिल मालिक ध्यानपूर्वक इन्हें दूर करें।
२. अब मैं तो गैरहाजिर हूँ और सेठ मंगलदास मुझसे भी ज्यादा वृद्ध हो चुके हैं। इसलिए छोटी-मोटी शिकायतोंका तुरन्त निर्णय करनेके लिए स्थायी पंच नियुक्त होने चाहिए।
३. मिल मालिक मजूर महाजन संघको अपना सहायक समझकर उसपर विश्वास
रखें, वे उससे पूरी मदद लें और उसकी पूरी मदद करें।
४. मजदूरोंकी नैतिक और सामाजिक स्थितिको सुधारनेकी दृष्टिसे जहाँ-जहाँ जरूरत हो, आर्थिक तथा अन्य तरीकोंसे उनकी मदद करें। अर्थात् बदलेमें कुछ आशा किये बिना उनकी स्वतन्त्र शालाओं, स्वतन्त्र अस्पतालों और स्वतन्त्र वाचनालयों तथा इसी तरहकी दूसरी प्रवृत्तियोंका पोषण करें।
५. जो मजदूर और अन्य कर्मचारी सविनय अवज्ञा या ऐसे ही किसी दूसरे राष्ट्रीय काममें शामिल होना चाहें, वे उनकी मदद करें, और यदि कामसे मुक्त कर देने की जरूरत पड़े तो कामपर वापस आनेके उनके अधिकारको सुरक्षित रखकर उन्हें जाने दें, और यदि जानेवालोंके कुटुम्बकी व्यवस्था करना आवश्यक हो तो उसका भार उठा लें।
६. शराबखोरीकी लत छुड़ाने के लिए मजदूरोंके मनोरंजनार्थं खेल-कूद तथा अल्पाहारके साधन जुटा दें। शराबकी लत छुड़ाने के लिए उन्हें इनाम दें और ऐसे ही
दूसरे तरीकोंसे उनकी मदद करें।
७. मिलें धन कमानेके उद्देश्यसे कपड़ा न बनायें, बल्कि सिर्फ विदेशी कपड़ेके
बहिष्कार की दृष्टिसे ही कपड़ेका उत्पादन करें ।<noinclude></noinclude>
6r1p2kbb3e068u2gv19050jmwa9gbl3
673235
673234
2026-08-23T10:48:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673235
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे|२०३}}</noinclude>हैं, लेकिन इसमें कुछ कमियाँ भी हैं। स्वदेशीका अर्थ कोई खादी करेगा और कोई
विलायती सूतसे बनी किनारवाले मिलके कपड़े को पसन्द करेगा। स्वदेशी धर्मका पालन
इस तरह नहीं किया जा सकता। मेरी रायमें जहाँतक हो सके खादी पहनना कमसे- कम स्वदेशी धर्म है। ऐसा करना असम्भव होनेपर हिन्दुस्तानकी मिलोंमें कते हुए सूतका उन्हीं मिलोंमें बना हुआ कपड़ा स्वदेशी माना जा सकता है। यदि इतना भी न किया जा सके तो स्वदेशीका कोई अर्थ नहीं रह जाता; यही नहीं बल्कि उस हालत में बहिष्कारकी दृष्टिसे यह हानिकारक भी है।
यदि मिल मालिक खादीको प्रोत्साहन दें और स्वदेशीकी दृष्टि रखकर मिलें चलायें तो मेरी राय में विदेशी वस्त्रका वहिष्कार बहुत आसान काम है। मैं इस बारे में, समय मिलने पर किसी दूसरे लेखमें विस्तृत रूपसे विचार करनेकी आशा करता हूँ।
यहाँ तो मैं सिर्फ यही बताना चाहता हूँ कि मिल मालिक खासकर इस आन्दोलनकी
कैसे और किस-किस प्रकारसे सहायता कर सकते हैं। निर्विवाद रूपसे इतना तो होना
ही चाहिए कि मिल मालिकों और मजदूरोंके बीच अच्छा सम्बन्ध हो । परस्पर विरोधी
होनेके बदले यदि वे एक-दूसरे के सहायक बनें तो उससे स्वराज्यकी समस्याको
सुलझाने में सहायता मिलेगी। इस दृष्टिसे नीचे लिखी बातें विचार करने योग्य हैं :
१. छोटी-मोटी बातोंके कारण मजदूरोंके सामने अड़चनें आती ही रहती हैं, मिल मालिक ध्यानपूर्वक इन्हें दूर करें।
२. अब मैं तो गैरहाजिर हूँ और सेठ मंगलदास मुझसे भी ज्यादा वृद्ध हो चुके हैं। इसलिए छोटी-मोटी शिकायतोंका तुरन्त निर्णय करनेके लिए स्थायी पंच नियुक्त होने चाहिए।
३. मिल मालिक मजूर महाजन संघको अपना सहायक समझकर उसपर विश्वास
रखें, वे उससे पूरी मदद लें और उसकी पूरी मदद करें।
४. मजदूरोंकी नैतिक और सामाजिक स्थितिको सुधारनेकी दृष्टिसे जहाँ-जहाँ जरूरत हो, आर्थिक तथा अन्य तरीकोंसे उनकी मदद करें। अर्थात् बदलेमें कुछ आशा किये बिना उनकी स्वतन्त्र शालाओं, स्वतन्त्र अस्पतालों और स्वतन्त्र वाचनालयों तथा इसी तरहकी दूसरी प्रवृत्तियोंका पोषण करें।
५. जो मजदूर और अन्य कर्मचारी सविनय अवज्ञा या ऐसे ही किसी दूसरे राष्ट्रीय काममें शामिल होना चाहें, वे उनकी मदद करें, और यदि कामसे मुक्त कर देने की जरूरत पड़े तो कामपर वापस आनेके उनके अधिकारको सुरक्षित रखकर उन्हें जाने दें, और यदि जानेवालोंके कुटुम्बकी व्यवस्था करना आवश्यक हो तो उसका भार उठा लें।
६. शराबखोरीकी लत छुड़ाने के लिए मजदूरोंके मनोरंजनार्थं खेल-कूद तथा अल्पाहारके साधन जुटा दें। शराबकी लत छुड़ाने के लिए उन्हें इनाम दें और ऐसे ही
दूसरे तरीकोंसे उनकी मदद करें।
७. मिलें धन कमानेके उद्देश्यसे कपड़ा न बनायें, बल्कि सिर्फ विदेशी कपड़ेके
बहिष्कार की दृष्टिसे ही कपड़ेका उत्पादन करें ।<noinclude></noinclude>
g1gg23et6stp047eizj60rkl5fkie7s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४८
250
197291
673240
669813
2026-08-23T11:02:53Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673240
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>८. मिलें खादीके नामपर मिलका कपड़ा कभी न बनायें, खादीकी छापका
उपयोग न करें, चरखेकी तसवीर न चिपकायें; बल्कि इसके विपरीत आज जिन-जिन
किस्मोंकी खादी तैयार नहीं हो सकती, उन्हीं किस्मोंका कपड़ा बनायें, अर्थात् चरखा-
संघसे मिलकर कपड़ेकी किस्म मुकर्रर कर लें।
९. मिलें खादीका संग्रह करें, प्रचार करें और उसके उत्पादनमें अपनी बुद्धि
और अपने अनुभवका उपयोग करें।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७७. पत्र : रेजिनल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेजिनल्ड,
आशा है तुम्हें मेरा पहला पत्र' मिल गया होगा।
विल्सनका पत्र बहुत अच्छा है। भगवान् तुम्हें अकल्याणसे बचायेगा।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३४ ) से।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|{{larger|'''१७८. पत्र : लाला दुनीचन्दको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय लाला दुनीचन्द,
रोहतक के लाला शामलालकी गिरफ्तारीकी खबर पाते ही लाला सूरजभानको तुरन्त पंजाब चले जानेकी जरूरत महसूस हुई है। मैंने इस सुझावका समर्थन किया है। कृपया इनसे जो काम लेना चाहें, लें। मैं आशा करता हूँ कि स्वतन्त्रताके इस अन्तिम संघर्ष में आप व आपकी धर्मपत्नी अपना सर्वस्व त्याग करनेसे पीछे नहीं हटेंगे।
{{Right|आपका,}}
{{Right|'''मो० क० गांधी'''}}
अंग्रेजी (जी० एन० ५५८८ ) की फोटो नकलसे।
१. देखिए पत्र रेजिनस्ट रेनॉल्डसको, ४-४-१९३०।
२. रेनॉल्ड्सने गांधीजी के अनुरोधपर क्रॉनिकलमें प्रकाशित अपने उत्तरकी सफाई देते हुए क्षमायाचनाका एक पत्र लिख दिया था। उस सकाईको पढ़नेके बाद विल्सनने बहुत मैत्रीपूर्ण उत्तर दिया था जो रेनॉइड्सने गांधीजी को भेज दिया था।<noinclude></noinclude>
e5lob11ve8rn9bp0885bcmuabmfijdz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४९
250
197292
673245
669814
2026-08-23T11:10:12Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673245
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१७९. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको '
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
अब तो नमक-कानून तोड़नेकी रस्म अदा हो ही चुकी है, इसलिए जो कोई भी नमक-कानूनके अनुसार सरकार द्वारा की जानेवाली कार्रवाईको झेलनेको तैयार हो, वह जहाँ चाहे और जहाँ सुविधा हो वहाँ नमक बना सकता है। मेरी सलाह है कि कार्यकर्त्ताओंको सर्वत्र नमक तैयार करना चाहिए, और जहाँ कार्यकर्त्ता साफ नमक बनाना जानते हों वहाँ वे वैसा नमक बनायें और ग्रामवासियोंसे भी ऐसा ही करनेके लिए कहें। पर उनको यह भी बता दिया जाये कि ऐसा करनेसे सरकार उन पर मुकदमा चला सकती है। दूसरे शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि उन्हें यह बता दिया जाये कि सरकारने नमकपर जो कर लगा रखा है उसका किसपर कितना बोझ पड़ता है और नमक-कर को रद करानेके लिए उससे सम्बन्धित नियमों और उपनियमोंको किस प्रकार तोड़ना चाहिए। ग्रामवासियोंको यह बात भी बिलकुल साफ बता देनी चाहिए कि यह काम उन्हें खुले आम करना होगा, छिपाकर नहीं। यह शर्त मालूम हो जानेपर वे चाहें तो खुद नमक तैयार करें, चाहें समुद्र-तट पर दरारों और गढ़ोंमें जमा हुआ प्राकृतिक नमक उठा लायें और उसका उपयोग करें। अपने और अपने ढोरोंके लिए काममें लानेके अतिरिक्त यदि कोई चाहे तो उसके हाथ वे उसे बेच भी सकते हैं। पर यह बात जता दी जाये कि खरीदनेवाला भी नमक- कानून तोड़नेका अपराधी होगा और उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है या बिना मुकदमा चलाये भी नमक अधिकारी उसको हैरान कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान १३ अप्रैलतक नमक कर के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो लोग इस धर्म-कार्यमें लगे हुए हैं, उन्हें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और खद्दरके व्यवहारके लिए जोरोंसे आन्दोलन करना चाहिए। उन्हें अधिकसे अधिक खद्दर तैयार करनेका भी प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्यके लिए तथा मद्य निषेधके विषयमें मैं भारतकी स्त्रियोंके लिए एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-दिन अधिक दृढ़ होता जाता है कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक कार्य कर सकती हैं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा वे अहिंसाका ज्यादा अच्छा उदाहरण पेश कर सकेंगी -इसलिए नहीं कि वे कमजोर हैं, जैसा कि पुरुष अपने घमण्डके कारण उनको समझा करते हैं; बल्कि इसलिए कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा सही किस्मका साहस अधिक है, और त्यागकी भावना तो कई गुना ज्यादा है।
१. इस भेंटवार्ता पहले गांधीजी ने कीचड़ सने नमकका एक डेला उठाकर नमक कानून भंग किया था।<noinclude></noinclude>
eakgcva3ka9qwtznyspmtvqx3wtbti8
673247
673245
2026-08-23T11:12:13Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673247
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७९. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको ''''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
अब तो नमक-कानून तोड़नेकी रस्म अदा हो ही चुकी है, इसलिए जो कोई भी नमक-कानूनके अनुसार सरकार द्वारा की जानेवाली कार्रवाईको झेलनेको तैयार हो, वह जहाँ चाहे और जहाँ सुविधा हो वहाँ नमक बना सकता है। मेरी सलाह है कि कार्यकर्त्ताओंको सर्वत्र नमक तैयार करना चाहिए, और जहाँ कार्यकर्त्ता साफ नमक बनाना जानते हों वहाँ वे वैसा नमक बनायें और ग्रामवासियोंसे भी ऐसा ही करनेके लिए कहें। पर उनको यह भी बता दिया जाये कि ऐसा करनेसे सरकार उन पर मुकदमा चला सकती है। दूसरे शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि उन्हें यह बता दिया जाये कि सरकारने नमकपर जो कर लगा रखा है उसका किसपर कितना बोझ पड़ता है और नमक-कर को रद करानेके लिए उससे सम्बन्धित नियमों और उपनियमोंको किस प्रकार तोड़ना चाहिए। ग्रामवासियोंको यह बात भी बिलकुल साफ बता देनी चाहिए कि यह काम उन्हें खुले आम करना होगा, छिपाकर नहीं। यह शर्त मालूम हो जानेपर वे चाहें तो खुद नमक तैयार करें, चाहें समुद्र-तट पर दरारों और गढ़ोंमें जमा हुआ प्राकृतिक नमक उठा लायें और उसका उपयोग करें। अपने और अपने ढोरोंके लिए काममें लानेके अतिरिक्त यदि कोई चाहे तो उसके हाथ वे उसे बेच भी सकते हैं। पर यह बात जता दी जाये कि खरीदनेवाला भी नमक- कानून तोड़नेका अपराधी होगा और उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है या बिना मुकदमा चलाये भी नमक अधिकारी उसको हैरान कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान १३ अप्रैलतक नमक कर के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो लोग इस धर्म-कार्यमें लगे हुए हैं, उन्हें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और खद्दरके व्यवहारके लिए जोरोंसे आन्दोलन करना चाहिए। उन्हें अधिकसे अधिक खद्दर तैयार करनेका भी प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्यके लिए तथा मद्य निषेधके विषयमें मैं भारतकी स्त्रियोंके लिए एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-दिन अधिक दृढ़ होता जाता है कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक कार्य कर सकती हैं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा वे अहिंसाका ज्यादा अच्छा उदाहरण पेश कर सकेंगी -इसलिए नहीं कि वे कमजोर हैं, जैसा कि पुरुष अपने घमण्डके कारण उनको समझा करते हैं; बल्कि इसलिए कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा सही किस्मका साहस अधिक है, और त्यागकी भावना तो कई गुना ज्यादा है।
१. इस भेंटवार्ता पहले गांधीजी ने कीचड़ सने नमकका एक डेला उठाकर नमक कानून भंग किया था।<noinclude></noinclude>
mgglmekwtzgczj4rtnw6gad703r989w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५०
250
197293
673254
669815
2026-08-23T11:25:56Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673254
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{C|{{larger|'''इसके बाद फ्री प्रेस के प्रतिनिधिने गांधीजी से यह सवाल किया अब तो आप नमक-कानून भंग कर चुके हैं और सरकारने आपको कहीं रोका-टोका भी नहीं।इसलिए आगे आपका क्या करनेका इरादा है ?'''}}}}
करना क्या है? मैं अवैध नमक तैयार करता रहूँगा।
'''दुसरा प्रश्न फ्री प्रेसके एक प्रतिनिधिने खास तौरसे अपनी संस्थाकी ओरसे पूछा था, लेकिन उसका जवाब दूसरा प्रेस प्रतिनिधि भी नोट करने लगा। इस पर गांधीजी के सामने ही दोनों प्रेस प्रतिनिधियोंमें कुछ कहा-सुनी हो गई। इस हानिक स्पर्धाको देखकर गांधीजी ने पत्रकारोंको सम्बोधित करते हुए कहा :'''
आपको अपनी रोटी कमानेकी फिक्के मुकाबले राष्ट्रीय हितको तरजीह देनी चाहिए। आपको भारतको स्वतन्त्रता दिलानेके लिए काम करना चाहिए और उसे इस घृणित कर के दुर्बह भारसे मुक्त करानेकी चिन्ता करनी चाहिए। आप सबको मिल-जुल कर काम करना चाहिए और भारतके हकमें आपस में सहयोग करना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''अमृतबाजार पत्रिका''', ७-४-१९३०
'''१८०. भाषण : दांडीमें'''
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजीने दोपहर बाद चार बजे एक सभामें भाषण दिया। उस दिन हुए कार्यक्रम
पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सप्ताहका आरम्भ बहुत शुभ रहा
है। सरकार आपको गिरफ्तार करे अथवा नहीं, आपको तो अपना कर्तव्य पूरा करते
रहना है। मुझे विश्वास है कि आज लोगोंने देशके कोने-कोने में सत्याग्रह आरम्भ
कर दिया होगा। उन्होंने आगे कहा कि दांडीमें प्राकृतिक नमक अधिक नहीं है,
क्योंकि सरकारी कर्मचारियोंने समय रहते उसे नष्ट कर दिया है। यह एक राक्षसी
कृत्य है और इनसे अपना पीछा छुड़ाना आपका कर्तव्य है। प्रातःकाल जब हमने
कार्य आरम्भ किया तो स्वयं मेरे हाथोंमें नमकको अपेक्षा कीचड़ ही अधिक आया,
लेकिन उसको धोकर साफ करनेके बाद मुझे दो तोले अच्छे किस्मका नमक मिल
गया जो मेरी दिन-भरकी जरूरतके लिए काफी है। यह तो इस कार्यकी शुरुआत
ही थी, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। आज जिन्होंने कानून तोड़ा है वे या
तो चोर बन गये हैं अथवा मालिक।'''
'''इसके बाद उन्होंने आटमें हुए हमलेका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी श्री एंडियाने अपने व्यवहारमें काफी विवेक दिखाया। यह अहिंसाकी विजय थी। नमक छीननेके लिए सरकारने कितना ज्यादा सार्वजनिक पैसा बरबाद किया है।'''<noinclude></noinclude>
97b9caaqjaf774ftr9a73tnewbstctt
673255
673254
2026-08-23T11:28:17Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673255
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{C|{{larger|'''इसके बाद फ्री प्रेस के प्रतिनिधिने गांधीजी से यह सवाल किया अब तो आप नमक-कानून भंग कर चुके हैं और सरकारने आपको कहीं रोका-टोका भी नहीं।इसलिए आगे आपका क्या करनेका इरादा है ?'''}}}}
करना क्या है? मैं अवैध नमक तैयार करता रहूँगा।
'''दुसरा प्रश्न फ्री प्रेसके एक प्रतिनिधिने खास तौरसे अपनी संस्थाकी ओरसे पूछा था, लेकिन उसका जवाब दूसरा प्रेस प्रतिनिधि भी नोट करने लगा। इस पर गांधीजी के सामने ही दोनों प्रेस प्रतिनिधियोंमें कुछ कहा-सुनी हो गई। इस हानिक स्पर्धाको देखकर गांधीजी ने पत्रकारोंको सम्बोधित करते हुए कहा :'''
आपको अपनी रोटी कमानेकी फिक्के मुकाबले राष्ट्रीय हितको तरजीह देनी चाहिए। आपको भारतको स्वतन्त्रता दिलानेके लिए काम करना चाहिए और उसे इस घृणित कर के दुर्बह भारसे मुक्त करानेकी चिन्ता करनी चाहिए। आप सबको मिल-जुल कर काम करना चाहिए और भारतके हकमें आपस में सहयोग करना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''अमृतबाजार पत्रिका''', ७-४-१९३०
'''१८०. भाषण : दांडीमें'''
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजीने दोपहर बाद चार बजे एक सभामें भाषण दिया। उस दिन हुए कार्यक्रम पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सप्ताहका आरम्भ बहुत शुभ रहा है। सरकार आपको गिरफ्तार करे अथवा नहीं, आपको तो अपना कर्तव्य पूरा करते रहना है। मुझे विश्वास है कि आज लोगोंने देशके कोने-कोने में सत्याग्रह आरम्भ कर दिया होगा। उन्होंने आगे कहा कि दांडीमें प्राकृतिक नमक अधिक नहीं है, क्योंकि सरकारी कर्मचारियोंने समय रहते उसे नष्ट कर दिया है। यह एक राक्षसीकृत्य है और इनसे अपना पीछा छुड़ाना आपका कर्तव्य है। प्रातःकाल जब हमने कार्य आरम्भ किया तो स्वयं मेरे हाथोंमें नमकको अपेक्षा कीचड़ ही अधिक आया, लेकिन उसको धोकर साफ करनेके बाद मुझे दो तोले अच्छे किस्मका नमक मिल गया जो मेरी दिन-भरकी जरूरतके लिए काफी है। यह तो इस कार्यकी शुरुआत ही थी, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। आज जिन्होंने कानून तोड़ा है वे या तो चोर बन गये हैं अथवा मालिक।'''
'''इसके बाद उन्होंने आटमें हुए हमलेका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी श्री एंडियाने अपने व्यवहारमें काफी विवेक दिखाया। यह अहिंसाकी विजय थी। नमक छीननेके लिए सरकारने कितना ज्यादा सार्वजनिक पैसा बरबाद किया है।'''<noinclude></noinclude>
ehpjzpkwfld3ms5rkuddeqx6dzza1t1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५१
250
197294
673258
669816
2026-08-23T11:38:05Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673258
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२०७}}</noinclude>फिर गांधीजी ने रोहतक के लाला शामलालकी धारा १२४ ए के अधीन हुई
गिरफ्तारीका उल्लेख किया। उनकी शानदार राष्ट्रीय सेवाओंके लिए उन्होंने लाला
शामलालकी बड़ी प्रशंसा की।
सरकार अन्य कार्यकर्त्ताओंको गिरफ्तार कर रही है, लेकिन मुझको नहीं। उसकी
यह नीति मेरी समझमें नहीं आ रही है। ऐसा नहीं कि में गिरफ्तार होनेके लिए
बहुत उत्सुक हूँ, लेकिन जो कुछ हो रहा है वह न्यायसंगत नहीं है। गिरफ्तारीसे मुझे
कोई बड़ा सम्मान मिल जायेगा, ऐसी बात भी नहीं है। में तो पहले से ही महात्मा
कहा जाता हूँ, हालांकि में यह उपाधि नहीं चाहता।
जेल जानेके लिए में बिलकुल उत्सुक नहीं हूँ। दांडीकी अच्छी आबो-हवाका में
मजा ले रहा हूँ। लेकिन सरकारको चाहिए कि वह अन्य लोगों से पहले मुझे गिरफ्तार
करे, क्योंकि सबसे बड़ा अपराधी तो में ही हूँ। रोहतक हर व्यक्तिका यह कर्त्तव्य
है कि वह उस धारा १२४ ए का उल्लंघन करे जिसके अधीन लाला शामलालको
गिरफ्तार किया गया है। अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजी ने लोगों से अपील
की कि जिस नमकपर सरकार कर लेती है, वह नमक वे न खायें।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे फॉनिकल''', ८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|रविवार, रातको दस बजे के बाद}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
मणिलाल कोठारीके पकड़े जानेकी बात सुनी है। रामदास आदि तो गिरफ्तार
किये ही जा चुके हैं। यह सब अच्छा हो रहा है। तुम्हें भी दिन अथवा घंटे गिनने
चाहिए। मैं जेलसे बाहर रहूँ अथवा जेलमें, दोनों तरहसे ठीक है।
'यंग इंडिया' के लेख मैंने मोहनलालको सीधे भेजे हैं। [कौन जाने] तुम यहाँ हो अथवा नहीं।
समय मिले तो महिलाओंको संगठित कर लेना। आश्रमकी बहनें यदि पहल करती हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं, कदाचित् यही जरूरी हो मैं यह बात शराब-बन्दीके विषय में कह रहा हूँ।
१. मणिलाल कोठारी, रामदास और अन्य लोगों के पकड़े जानेकी सूचना १३-४-१९३० के नवजीवन में दी गई थी। पत्र स्पष्टतः इससे पहले रविवार को लिखा गया होगा।<noinclude></noinclude>
4u68thnm3roxxfijv01powyg9ceewv5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५२
250
197295
673263
669817
2026-08-23T11:50:40Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673263
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब
जा रहे हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं
रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका
निश्चय किया है।
{{Right|बापू}}
गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{|Right|कराडी}}
{{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}}
चि० नारणदास,
तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना
कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये
तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते।
कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके
बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है।
यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न
पड़ जाये।
रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]
सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
१. पत्र सूरजभान पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।<noinclude></noinclude>
687dbpsguh158vhsudsf60bjb118jbm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८२
250
197325
673179
669848
2026-08-23T08:26:39Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673179
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१२. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
प्रिय भुर् र् र,
आपका प्यारा पत्र मिला। तो कसौटीका समय आनेपर आपने अपने लिए बहुत बढ़िया कार्यक्रम बनाया है। ईश्वर करे, आप सदा जवान बने रहें।
दादूभाईके व्यवहारसे बड़ा दुःख हुआ और आश्चर्य भी। लेकिन खेड़ाने तो चमत्कार कर दिखाया है। दरबार और अन्य लोगोंको बेड़ियाँ पहनाई गईं और उनके सिर मुँड़वा दिये गये–जरा सोचिए तो! यह एक तरहसे अच्छी खबर है और दूसरी तरहसे बुरी भी। अच्छी इस तरह कि इससे लोगोंको और अधिक प्रयत्न करनेके लिए साहस प्राप्त होना चाहिए और बुरी इस तरह कि मानव स्वभाव इतना पतित हो सकता है, यह देखकर मनको क्लेश होता है। लेकिन यह प्रणाली ही ऐसी है। हमें या तो इसे समाप्त करना है या इसे समाप्त करने के प्रयत्नमें खुद मिट जाना है।
श्रीमती अब्बासने मुझे एक बहुत अच्छा पत्र लिखा है।
{{right|सदा आपका ही,<br>'''मो° क° गांधी'''}}
अंग्रेजी (एस° एन° ९५७० ) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२१३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° नारणदास,}}
नमक-कानून भंग करनेकी खातिर भी नमकको चोरी-छिपे नहीं लाया जा सकता। जो साधन अपने-आपमें ही दोषयुक्त हों उनके द्वारा हम सत्याग्रह कैसे कर सकते हैं?
सूरत जिलेसे मिली रकम तो काफी बड़ी थी, लेकिन जान पड़ता है कि वह सारी रकम प्रान्तीय कमेटीके पास चली गई है।
इस सम्बन्धमें महादेवके साथ बातचीत करना। मैं महादेवको लिख रहा हूँ।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस° एन° ११४७६) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
gbruc0bjf2xo4b2qyukpekhklj5jmw8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८३
250
197326
673180
669849
2026-08-23T08:32:51Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673180
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|२१४. पत्र : महादेव देसाईको}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° महादेव,}}
तुम्हारा पत्र मिला। चूँकि कल्याणजी ऐसी खबर लाये थे कि मैं आज ही पकड़ा जानेवाला हूँ इसलिए मैं सारी रात जागता रहा और इस समय मुझे कभी झपकी लग जाती है, कभी सचेत हो जाता हूँ; कभी लिखने लगता हूँ तो कभी सो जाता हूँ। ऐसे ही चल रहा है।
लगता है, देवदास पकड़ा गया। तुम अभीतक पकड़े नहीं गये, यह आश्चर्यकी बात है। कालेज और अदालतोंके आगे धरना देना मैं बहुत खतरनाक बात समझता हूँ। काकाको मैंने सब-कुछ समझा दिया है। जो विद्यार्थी मैट्रिककी परीक्षामें नहीं बैठना चाहते वे भले ही न बैठें। लेकिन मेरी सलाह है कि वे परीक्षा भवनके आगे धरना न दें। शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दूकानोंकी बात अलग है।
टुकड़ीको किस तरहसे बाँटा जाये, इस विषयपर मैं विचार कर रहा हूँ। १३ तारीख तक मैं केवल उतने ही लोगोंको भेजनेका इरादा रखता हूँ जितनोंकी आवश्यकता होगी।
आज इससे अधिक लिखनेको कुछ नहीं जान पड़ता।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
सूरत जिलेमें बाहरसे जो पैसे आये वे भी प्रान्तीय कमेटीको चले गये हैं। मेरा तो अभी यही विचार है कि फिलहाल सारे पैसे नारणदासके पास रहें। यही उचित जान पड़ता है। लेकिन जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करना। इस बारेमें काकाको भी समझाया तो है।
गुजराती (एस° एन° ११४७५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
ci4104i1yxfmxcg25fl3enzeej2gzn5
673181
673180
2026-08-23T08:33:13Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
673181
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१४. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° महादेव,}}
तुम्हारा पत्र मिला। चूँकि कल्याणजी ऐसी खबर लाये थे कि मैं आज ही पकड़ा जानेवाला हूँ इसलिए मैं सारी रात जागता रहा और इस समय मुझे कभी झपकी लग जाती है, कभी सचेत हो जाता हूँ; कभी लिखने लगता हूँ तो कभी सो जाता हूँ। ऐसे ही चल रहा है।
लगता है, देवदास पकड़ा गया। तुम अभीतक पकड़े नहीं गये, यह आश्चर्यकी बात है। कालेज और अदालतोंके आगे धरना देना मैं बहुत खतरनाक बात समझता हूँ। काकाको मैंने सब-कुछ समझा दिया है। जो विद्यार्थी मैट्रिककी परीक्षामें नहीं बैठना चाहते वे भले ही न बैठें। लेकिन मेरी सलाह है कि वे परीक्षा भवनके आगे धरना न दें। शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दूकानोंकी बात अलग है।
टुकड़ीको किस तरहसे बाँटा जाये, इस विषयपर मैं विचार कर रहा हूँ। १३ तारीख तक मैं केवल उतने ही लोगोंको भेजनेका इरादा रखता हूँ जितनोंकी आवश्यकता होगी।
आज इससे अधिक लिखनेको कुछ नहीं जान पड़ता।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
सूरत जिलेमें बाहरसे जो पैसे आये वे भी प्रान्तीय कमेटीको चले गये हैं। मेरा तो अभी यही विचार है कि फिलहाल सारे पैसे नारणदासके पास रहें। यही उचित जान पड़ता है। लेकिन जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करना। इस बारेमें काकाको भी समझाया तो है।
गुजराती (एस° एन° ११४७५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
lda9x9bgj5y1ps2hss2qumgf6mt1422
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८४
250
197327
673183
669850
2026-08-23T08:41:38Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673183
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° प्रेमा,}}
शराब-बन्दी और विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके मेरे मतके बारेमें तेरे क्या विचार हैं?
तेरे पत्र तो मिले ही हैं; मुझे लिखती ही रहना। धुरन्धर<ref>बम्बईसे प्रकाशित होनेवाले मराठी दैनिक नवाकालके सहायक सम्पादक। वे सत्याग्रहीके रूपमें दांडी कूचमें शामिल हो गये थे।</ref> अच्छा आदमी मालूम होता है। कमलादेवी भी मुझे बहुत पसन्द आई है। उनकी लड़कीको आबहवा अनुकूल आई तो रहेंगी, ऐसा कहती हैं। तू उन्हें रखनेकी कोशिश करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी° डब्ल्यू° ६६६८) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२१६. पत्र : लीलावतीको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° लीलावती,}}
तेरा पत्र मिला। कवायद में तेरा नाम नहीं लिया जायेगा; लेकिन समय आने पर लड़ाईमें तो तुझे लेना ही होगा न? वे तुझे लड़ाईमें शामिल करेंगे। जिनमें श्रद्धा है, उन्हें सेवाका अवसर मिलता ही रहता है। तू घबराना नहीं; कब्ज और मासिक धर्मकी दवा गंगाबहन से लेना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° ९३१६) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|8em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
1htrwep04610k04omj20rdc1h1s4no2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८५
250
197328
673187
669851
2026-08-23T08:58:30Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673187
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१७. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° प्रभावती,}}
तेरे पत्रका उत्तर मैं दे चुका हूँ। अब तो तुम दोनोंने बात कर ही ली होगी। मेरे आज ही पकड़े जानेकी अफवाह जोरों पर है; इसलिए मैं अधिक नहीं लिखता। ईश्वर तुम दोनोंका कल्याण करे, तुमको दृढ़ता प्रदान करे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° ३३६४ ) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२१८. पत्र : रुक्मिणी बजाजको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° रुक्मिणी,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। मेरे पास लम्बा पत्र लिखनेका समय नहीं है। तू सुखी है, इसलिए मुझे सन्तोष है। वहाँ 'नवजीवन' आदि तो आते होंगे। रामदास जेल चला गया है। देवदास गिरफ्तार हो गया है। जमनालालजी, किशोरलालभाई जेल गये। ऐसे तो सैंकड़ों चले गये हैं। लोगोंके उत्साहकी कोई सीमा नहीं है।
जिस तरह दूधमें चीनी घुल-मिल जाती है उसी तरह मुझे विश्वास है, तू लोगोंसे घुल-मिल जायेगी।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी° एन° ९०४८) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|8em}}
{{left|४३–१६}}</noinclude>
acqx7i4jf22feo0rmngmz5orrjrfdiz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८६
250
197329
673191
669852
2026-08-23T09:05:50Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673191
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१९. पत्र : जयसुखलाल गांधीको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° जयसुखलाल,}}
मैं तुम्हारे पत्रकी बाट जोह रहा था। तुम्हें जो खुराक अनुकूल आई है वही खुराक औरोंको भी अनुकूल आयेगी इसे मैं मुश्किल मानता हूँ। तुम वहाँ पड़े-पड़े खादी तैयार करवाते रहो, यह भी एक महत्त्वपूर्ण काम है। जब मुझे तुमको नमक-यज्ञमें होम करनेकी जरूरत महसूस होगी, तब तुम्हें होम देने में मुझे तनिक भी देर नहीं लगेगी। रोज मेरे पकड़े जानेकी अफवाह उड़ती है, लेकिन मैं पकड़ा ही नहीं जाता।
वे लोग मुझे पकड़ें या न पकड़ें, मेरे लिए दोनों एक समान हैं। यह बात सच है कि शिवाभाई यहाँ 'सत्याग्रह समाचार' प्रकाशित करते हैं। मेरे खयालमें उसकी एक ही प्रति निकलती है और अन्तमें उसका सार-संक्षेप 'नवजीवन' में प्रकाशित तो होता ही है। उमिया जबसे अजमेर गई है तबसे उसने मुझे कोई पत्र नहीं लिखा। अब चूंकि उसे वहाँ रहनेकी आदत पड़ गई है इसलिए वह मुझे पत्र लिखनेकी जरूरत
महसूस नहीं करती। रुखी भी सुखी जान पड़ती है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|भाईश्री जयसुखलाल गांधी<br>खादी कार्यालय<br>छलाला<br>काठियावाड़}}
गुजराती (एम° एम° यू° ३–७३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२२०. पत्र : बनारसीलाल बजाजको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° बनारसी,}}
तुमारे दोनों पत्र मीले भी। तुम दोनों खुश हो तो मुझे परम संतोष है। तुम दोनोंकी ईश्वर चिरायु करे और सेवा कार्यके लिए प्रेरित करे।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
सी° डब्ल्यू° ९३०२ से।
सौजन्य : बनारसीलाल बजाज<noinclude></noinclude>
aysi3q8n9y7azdvu9j7rtbzhvjzq1mq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८७
250
197330
673193
669853
2026-08-23T09:13:57Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673193
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२१. भाषण: स्वयंसेवकोंके समक्ष'''}}}}
{{right|जलालपुर<br>१० अप्रैल, १९३०}}
आज सुबह अपने स्वयंसेवकोंके समक्ष बोलते हुए महात्मा गांधीने कहा कि जल्दी ही आपको कसौटीका समय आ रहा है। लेकिन गिरफ्तार होनेके लिए अधीरता नहीं दिखानी चाहिए। आपको पुलिसकी किसी कार्रवाईसे उत्तेजित होकर कोई भी जल्दबाजो भरा कदम नहीं उठाना चाहिए। अगर अधिकारीगण कहीं "अपना आपा खो बैठे और जनताको आतंकित करें" तो आपको वहाँ जाकर उन लोगोंके सामने धैर्य और शान्ति तथा अविचल भावसे कष्टसहनका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
आपसे मेरा यही अनुरोध है कि जिस ढंगसे जनरल डायरने समूचे राष्ट्रका अपमान किया, वैसा अपमान बरदाश्त करनेके बजाय आप मर मिटनेको तैयार रहें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल, ११-४-१९३०'''|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२२२. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
आटमें दिये मेरे भाषणकी 'टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्टकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया गया है। इसमें तो कुटिलतापूर्वक भाषणको तोड़-मरोड़कर छापा गया है। मैंने देखा कि एक व्यक्तिसे पुलिसके पांच जवान नमक छीननेकी कोशिश कर रहे हैं और उस छीना-झपटीमें उस व्यक्तिकी कलाईपर कुछ चोट आ गई है। इसपर मैंने कहा कि सत्याग्रहियों द्वारा उठाया गया नमक भारतकी प्रतिष्ठाका प्रतीक है और सत्याग्रहियोंसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने प्राण देकर भी उसकी प्रतिष्ठाकी रक्षा करेंगे। मैंने कहा कि लोग तबतक नमकको अपने-अपने हाथोंसे अलग न होने दें जबतक कि वे अपने साथ की जानेवाली जोर-जबरदस्तीको बरदाश्त कर सकें और यदि पुलिसकी मार-पीटके कारण इन अरक्षित और निरीह लोगोंके शरीरसे खून भी वह चले तो वे इसकी परवाह न करें। मैंने आगे यह भी कहा कि इस प्रकार नमक छीने जानेका विरोध करते हुए लोगोंको मनमें कोई दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए और न उन्हें क्रोधित ही होना चाहिए। मैंने उन्हें गाली-गलौज भी न करने की सलाह दी। अनावश्यक चोटोंसे बचनेके लिए मैंने उन्हें यह सलाह दी कि वे अपने हाथमें मुट्ठी भर ही नमक लें, जिसे वे अपनी मुट्ठीमें बांधकर रख सकें।
मैंने स्त्रियों और बच्चोंको भी, अगर उनमें साहस हो तो, इस संघर्षमें भाग लेनेके<noinclude></noinclude>
aqy8q8r7umadde39sk7iivofnv6gwbg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८८
250
197331
673197
669854
2026-08-23T09:22:41Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673197
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|२४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लिए आमन्त्रित किया और पुलिसको चुनौती दी कि अगर वे चाहें तो इन स्त्रियों और बच्चोंपर हाथ डालें। मैंने कहा था कि यदि पुलिसने स्त्रियों और बच्चोंपर हाथ डाला तो सारे भारतकी भावना भड़क उठेगी और देशके सभी लोग इन स्त्रियों और बच्चोंके ही समान कष्ट सहनके लिए आगे आ जायेंगे। मैंने भारतीय जनतासे इस प्रकारके अपमानकी प्रतिक्रिया-स्वरूप सविनय अवज्ञाके अन्य तरीके अपनानेकी अपेक्षा करके यह बात कही थी। मेरी अपेक्षा यह थी कि विद्यार्थी स्कूलोंका बहिष्कार करेंगे और सरकारी नौकर विरोध-स्वरूप अपनी-अपनी नौकरियाँ छोड़ देंगे। इसमें अहिंसा-धर्मसे विचलित होने का कोई सवाल ही नहीं उठता, और सत्याग्रहियोंसे इस प्रकार नमक छीनना मैं बर्बरता मानता हूँ। सरकार जितनी अधिक बर्बरता करेगी मैं लोगों को खुशी-खुशी कष्ट सहनके लिए उतना ही अधिक आमन्त्रित करूँगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दू,''' ११-४-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२२३. भेंट : 'हिन्दू' के प्रतिनिधिको'''}}}}
{{right|जलालपुर<br>१० अप्रैल, १९३०}}
'''मैंने महात्माजी से 'रक्षात्मक अहिंसक प्रतिरोध' को परिभाषा करनेका अनुरोध किया। बात यह थी कि महात्माजी ने ऐसी सलाह दी थी कि जबतक पुलिस अपनी ताकतके बूतेपर नमक छीन न ले तबतक स्वयंसेवकोंको अपने हाथसे नमकको नहीं जाने देना चाहिए। अतएव मैंने उनसे पूछा : "क्या स्वयंसेवकोंको नमकको जैसे भी हो, अपनी मुट्ठीमें बाँधे रखने के लिए पुलिससे जोर-आजमाई करनेकी छूट है? अर्थात् क्या वे नमकको अपने हाथसे न जाने देनेकी कोशिशमें अपने शरीरको इधर-उधर घुमाते रह सकते हैं, जिससे हो सकता है, उनके विरोधीको कुछ चोट भी आ जाये?" इसपर महात्माजी ने कहा :'''
नमकको अपने प्राणोंके समान मूल्यवान मानकर उससे चिपटे रहना स्वयंसेवकोंका कर्त्तव्य है, बशर्ते कि वे वैसा करते हुए अपने विरोधीपर हाथ न उठायें। यदि किसी स्त्रीसे कोई उसका बच्चा छीनना चाहे तो वह जिस प्रकार उससे अपने बच्चेको बचानेकी कोशिश करेगी, उसी प्रकार सत्याग्रहियोंको भी नमकको अपने हाथसे न जाने देनेकी कोशिश करनी चाहिए।
'''गांधीजी ने आगे कहा कि किसी भी सभ्य देशमें यह उचित नहीं समझा जाता कि पुलिस कानूनको अपने हाथोंमें ले। जब कोई स्वयंसेवक अपना नमक पुलिसके हाथोंमें सौंपने से इनकार करता है तो वह एक जुर्म तो करता है, लेकिन उसके लिए पुलिसको उसे शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए। पुलिस अधिकारियोंको स्वयंसेवकोंको गिरफ्तार करके थाने ले जाने और उसे अदालतके सुपुर्द कर देनेका ही अधिकार है।'''<noinclude></noinclude>
88harpu1w7o9jqphp83qvohvl4lcd0z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५२
250
197395
673169
669919
2026-08-23T07:54:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673169
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>'''२९४. विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह'''
{{Right|२० अप्रैल, १९३०}}
{{C|{{larger|'''गांधीजी ने कहा कि मुझे लगता है, जहाँ कहीं विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संगठन सर्वथा अहिंसात्मक ढंगले किया जा सकता है, वहाँ इसे यदि बन्द किया जा सकता है तो केवल यही वचन देनेपर कि हम विदेशी वस्त्र नहीं बेचेंगे।'''}}}}
यह सौदेबाजीका समय नहीं है। जिनका इस आन्दोलन में विश्वास है और जो मानते हैं कि इसके परिणामस्वरूप स्वराज्य मिलना निश्चित है तथा जो यह मानते हैं कि विदेशी वस्त्र खरीदना बन्द कर देना अच्छा है, उन्हें कुछ समयके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए विदेशी वस्त्र खरीदना छोड़ देना चाहिए। लेकिन जिनका इसमें विश्वास तो नहीं है, लेकिन जनमतके बढ़ते हुए तकाजेका खयाल करके विदेशी वस्त्रोंकी बिक्री बन्द कर देना चाहते हैं, उन्हें मैं निम्नलिखित सलाह दूंगा। ऐसे लोग धरना देना बन्द करनेको कहनेके बजाय फिलहाल विदेशी वस्त्र बेचना छोड़ दें और अगर यह आन्दोलन विफल हो जाये तो भविष्यमें फिर बेचना शुरू कर दें। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो उन्हें अपने मालके लिए अन्यत्र बाजार मिल जायेगा। यदि इससे उन्हें घाटा होता है और वे इतने गरीब हैं कि घाटा बरदाश्त नहीं कर सकते तो उनको भरोसा रखना चाहिए कि भावी राष्ट्रीय सरकार उन्हें वाजिब मुआवजा देगी। लेकिन धरना देनेवालों को मैं आगाह कर देना चाहता हूँ कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हर प्रकारकी हिंसा करनेसे बचें। जिन कारणोंसे मैंने यह योजना बनाई कि शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर सिर्फ स्त्रियाँ ही धरना दें उनमें एक यह भी था। लेकिन जहां स्त्रियां इसके लिए तैयार न हों और पुरुषों में पूरा आत्म-विश्वास हो कि वे धरना देनेका काम अहिंसात्मक ढंगले सम्पन्न कर सकेंगे,वहाँ बखूबी उन्हें भी धरना देना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude>
ijwczdlhr939lcr8osj757q7kxhe08q
673170
673169
2026-08-23T07:54:42Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673170
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>'''२९४. विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह'''
{{Right|२० अप्रैल, १९३०}}
{{C|'''गांधीजी ने कहा कि मुझे लगता है, जहाँ कहीं विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संगठन सर्वथा अहिंसात्मक ढंगले किया जा सकता है, वहाँ इसे यदि बन्द किया जा सकता है तो केवल यही वचन देनेपर कि हम विदेशी वस्त्र नहीं बेचेंगे।'''}}
यह सौदेबाजीका समय नहीं है। जिनका इस आन्दोलन में विश्वास है और जो मानते हैं कि इसके परिणामस्वरूप स्वराज्य मिलना निश्चित है तथा जो यह मानते हैं कि विदेशी वस्त्र खरीदना बन्द कर देना अच्छा है, उन्हें कुछ समयके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए विदेशी वस्त्र खरीदना छोड़ देना चाहिए। लेकिन जिनका इसमें विश्वास तो नहीं है, लेकिन जनमतके बढ़ते हुए तकाजेका खयाल करके विदेशी वस्त्रोंकी बिक्री बन्द कर देना चाहते हैं, उन्हें मैं निम्नलिखित सलाह दूंगा। ऐसे लोग धरना देना बन्द करनेको कहनेके बजाय फिलहाल विदेशी वस्त्र बेचना छोड़ दें और अगर यह आन्दोलन विफल हो जाये तो भविष्यमें फिर बेचना शुरू कर दें। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो उन्हें अपने मालके लिए अन्यत्र बाजार मिल जायेगा। यदि इससे उन्हें घाटा होता है और वे इतने गरीब हैं कि घाटा बरदाश्त नहीं कर सकते तो उनको भरोसा रखना चाहिए कि भावी राष्ट्रीय सरकार उन्हें वाजिब मुआवजा देगी। लेकिन धरना देनेवालों को मैं आगाह कर देना चाहता हूँ कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हर प्रकारकी हिंसा करनेसे बचें। जिन कारणोंसे मैंने यह योजना बनाई कि शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर सिर्फ स्त्रियाँ ही धरना दें उनमें एक यह भी था। लेकिन जहां स्त्रियां इसके लिए तैयार न हों और पुरुषों में पूरा आत्म-विश्वास हो कि वे धरना देनेका काम अहिंसात्मक ढंगले सम्पन्न कर सकेंगे,वहाँ बखूबी उन्हें भी धरना देना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude>
n7rb6zlxbyptrzw9qnbf2277fqbrici
673171
673170
2026-08-23T07:55:42Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673171
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९४. विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह'''}}}}
{{Right|२० अप्रैल, १९३०}}
{{C|'''गांधीजी ने कहा कि मुझे लगता है, जहाँ कहीं विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संगठन सर्वथा अहिंसात्मक ढंगले किया जा सकता है, वहाँ इसे यदि बन्द किया जा सकता है तो केवल यही वचन देनेपर कि हम विदेशी वस्त्र नहीं बेचेंगे।'''}}
यह सौदेबाजीका समय नहीं है। जिनका इस आन्दोलन में विश्वास है और जो मानते हैं कि इसके परिणामस्वरूप स्वराज्य मिलना निश्चित है तथा जो यह मानते हैं कि विदेशी वस्त्र खरीदना बन्द कर देना अच्छा है, उन्हें कुछ समयके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए विदेशी वस्त्र खरीदना छोड़ देना चाहिए। लेकिन जिनका इसमें विश्वास तो नहीं है, लेकिन जनमतके बढ़ते हुए तकाजेका खयाल करके विदेशी वस्त्रोंकी बिक्री बन्द कर देना चाहते हैं, उन्हें मैं निम्नलिखित सलाह दूंगा। ऐसे लोग धरना देना बन्द करनेको कहनेके बजाय फिलहाल विदेशी वस्त्र बेचना छोड़ दें और अगर यह आन्दोलन विफल हो जाये तो भविष्यमें फिर बेचना शुरू कर दें। अगर आन्दोलन सफल हो जाता है तो उन्हें अपने मालके लिए अन्यत्र बाजार मिल जायेगा। यदि इससे उन्हें घाटा होता है और वे इतने गरीब हैं कि घाटा बरदाश्त नहीं कर सकते तो उनको भरोसा रखना चाहिए कि भावी राष्ट्रीय सरकार उन्हें वाजिब मुआवजा देगी। लेकिन धरना देनेवालों को मैं आगाह कर देना चाहता हूँ कि वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हर प्रकारकी हिंसा करनेसे बचें। जिन कारणोंसे मैंने यह योजना बनाई कि शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर सिर्फ स्त्रियाँ ही धरना दें उनमें एक यह भी था। लेकिन जहां स्त्रियां इसके लिए तैयार न हों और पुरुषों में पूरा आत्म-विश्वास हो कि वे धरना देनेका काम अहिंसात्मक ढंगले सम्पन्न कर सकेंगे,वहाँ बखूबी उन्हें भी धरना देना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude>
jmam96ug1xy2z14ry665naanlmbulgl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५३
250
197396
673173
669920
2026-08-23T07:59:29Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673173
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९५. काला शासन'''}}
{{Right|कराडी}}
{{Right|२१ अप्रैल, १९३०}}
पिछला सप्ताह सिर्फ खुशीका ही सप्ताह नहीं था। उस सप्ताह कलकत्ता और
कराचीमें उपद्रव हुए। और अब बटगांवसे दुःखद समाचार आया है। उससे प्रकट
होता है कि देश भरमें अहिंसाको वृत्तिका जो जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है, उसके बाव
जूद वातावरण में हिंसा है और उस वृत्तिके घर हैं देशके नगर कलकत्ता और
कराचीकी घटनाओं और चटगाँवकी घटनाओं में भेद किया जा सकता है। उन दो
नगरोंमें हुई घटनाएँ क्षणिक आवेशके कारण हुई प्रतीत होती है। चटगाँव में उनके
पीछे पूर्व योजना प्रतीत होती है। वे जैसी भी रही हों, मगर है बहुत खेदजनक
और उनसे आन्दोलनकी प्रगति में बाधा पड़ी है। वैसे यह आन्दोलन बहुत ठीक चल
रहा है और दिन-दिन ज्यादा जोर पकड़ता जा रहा है। मैं तो हिंसा में विश्वास
रखनेवालों से यही अनुरोध कर सकता हूँ कि वे अहिंसात्मक प्रदर्शनके सहज प्रवाहमें
विघ्न न डालें। चाहे वे मेरी बात सुनें या न सुनें, यह आन्दोलन तो चलता ही
रहेगा। यह बात निश्चित है कि हिंसासे स्वराज्यकी ओर हमारी प्रगति रुकेगी। मैं
यह नहीं समझा सकता कि यह कैसे होगा। जो लोग इस संघर्षके बाद जीवित रहेंगे
ये देखेंगे कि वह हमारी प्रगति के लिए किस प्रकार बाधक सिद्ध हुई।
फिलहाल सत्याग्रही लोग तो दूनी शक्तिसे अपना काम जारी रखें। हमें अपने
खिलाफ खड़ी दोतरफा हिंसाका मुकाबला करना है। मेरे लिए तो जनता द्वारा की
गई हिंसा हमारे मार्गमें उतनी ही बड़ी बाधा है जितनी बड़ी बाधा सरकारकी हिंसा
है। सच तो यह है कि मैं सरकारकी हिंसाका मुकाबला जनताकी हिंसाकी तुलना में
अधिक सफलतापूर्वक कर सकता हूँ। एक बात तो यह है कि जनताकी हिंसाका
मुकाबला करनेके लिए मुझे वह समर्थन नहीं मिलेगा जो सरकारकी हिंसाका मुकाबला
करनेके लिए मिलेगा। फिर, चूंकि हिंसामें विश्वास रखनेवाली जनताका उद्देश्य भी
उतना ही नेक है जितना कि सत्याग्रहियोंका, इसलिए उसकी हिंसाका मुकाबला करनेके
लिए तरीके भी उससे भिन्न अपनाने होंगे जो हम सरकारकी हिंसाका मुकाबला करनेके
लिए अपना सकते हैं।
मुझे उम्मीद है कि कराचीकी ही तरह कलकत्ता और चटगांवमें भी सत्याग्रही
लोग हिंसात्मक कार्रवाईको रोकनेकी कोशिश कर रहे थे। बहादुर युवक दत्तात्रेय
माने का सत्याग्रहसे कोई मतलब नहीं था। एक कसरती जवान होनेके कारण वह
सिर्फ व्यवस्था बनाये रखने में मदद देनेकी गरजसे मौकेपर गया था। लेकिन उसे
१. जवाहरलाल नेहरू और जे० एम० सेनगुप्तकी गिरफ्तारीके विरोध में १९ अप्रैलको एकतामें दुई हड़तालके दौरान दंगा हो गया था।<noinclude></noinclude>
fktwv9dwoivr3gylj3n9s88c0mbvjx2
673174
673173
2026-08-23T07:59:55Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673174
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९५. काला शासन'''}}}}
{{Right|कराडी}}
{{Right|२१ अप्रैल, १९३०}}
पिछला सप्ताह सिर्फ खुशीका ही सप्ताह नहीं था। उस सप्ताह कलकत्ता और
कराचीमें उपद्रव हुए। और अब बटगांवसे दुःखद समाचार आया है। उससे प्रकट
होता है कि देश भरमें अहिंसाको वृत्तिका जो जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है, उसके बाव
जूद वातावरण में हिंसा है और उस वृत्तिके घर हैं देशके नगर कलकत्ता और
कराचीकी घटनाओं और चटगाँवकी घटनाओं में भेद किया जा सकता है। उन दो
नगरोंमें हुई घटनाएँ क्षणिक आवेशके कारण हुई प्रतीत होती है। चटगाँव में उनके
पीछे पूर्व योजना प्रतीत होती है। वे जैसी भी रही हों, मगर है बहुत खेदजनक
और उनसे आन्दोलनकी प्रगति में बाधा पड़ी है। वैसे यह आन्दोलन बहुत ठीक चल
रहा है और दिन-दिन ज्यादा जोर पकड़ता जा रहा है। मैं तो हिंसा में विश्वास
रखनेवालों से यही अनुरोध कर सकता हूँ कि वे अहिंसात्मक प्रदर्शनके सहज प्रवाहमें
विघ्न न डालें। चाहे वे मेरी बात सुनें या न सुनें, यह आन्दोलन तो चलता ही
रहेगा। यह बात निश्चित है कि हिंसासे स्वराज्यकी ओर हमारी प्रगति रुकेगी। मैं
यह नहीं समझा सकता कि यह कैसे होगा। जो लोग इस संघर्षके बाद जीवित रहेंगे
ये देखेंगे कि वह हमारी प्रगति के लिए किस प्रकार बाधक सिद्ध हुई।
फिलहाल सत्याग्रही लोग तो दूनी शक्तिसे अपना काम जारी रखें। हमें अपने
खिलाफ खड़ी दोतरफा हिंसाका मुकाबला करना है। मेरे लिए तो जनता द्वारा की
गई हिंसा हमारे मार्गमें उतनी ही बड़ी बाधा है जितनी बड़ी बाधा सरकारकी हिंसा
है। सच तो यह है कि मैं सरकारकी हिंसाका मुकाबला जनताकी हिंसाकी तुलना में
अधिक सफलतापूर्वक कर सकता हूँ। एक बात तो यह है कि जनताकी हिंसाका
मुकाबला करनेके लिए मुझे वह समर्थन नहीं मिलेगा जो सरकारकी हिंसाका मुकाबला
करनेके लिए मिलेगा। फिर, चूंकि हिंसामें विश्वास रखनेवाली जनताका उद्देश्य भी
उतना ही नेक है जितना कि सत्याग्रहियोंका, इसलिए उसकी हिंसाका मुकाबला करनेके
लिए तरीके भी उससे भिन्न अपनाने होंगे जो हम सरकारकी हिंसाका मुकाबला करनेके
लिए अपना सकते हैं।
मुझे उम्मीद है कि कराचीकी ही तरह कलकत्ता और चटगांवमें भी सत्याग्रही
लोग हिंसात्मक कार्रवाईको रोकनेकी कोशिश कर रहे थे। बहादुर युवक दत्तात्रेय
माने का सत्याग्रहसे कोई मतलब नहीं था। एक कसरती जवान होनेके कारण वह
सिर्फ व्यवस्था बनाये रखने में मदद देनेकी गरजसे मौकेपर गया था। लेकिन उसे
१. जवाहरलाल नेहरू और जे० एम० सेनगुप्तकी गिरफ्तारीके विरोध में १९ अप्रैलको एकतामें दुई हड़तालके दौरान दंगा हो गया था।<noinclude></noinclude>
t93q44kt8lhxdc8rpa9e5953aers7t7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५४
250
197397
673175
669921
2026-08-23T08:13:45Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673175
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गोली लग गई और वह चल बसा। इसी तरह १८ वर्षीय मेघराज रेवाचन्दको
गोली लगी और यह भी चल बसा। इस प्रकार जयरामदास सहित सात व्यक्तियोंको
गोलियां लगी। जयरामदासको गोली लगने की खबर सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई
विशुद्ध प्रसन्नता । नेताओंको लगे घावोंसे ही इस अन्यायका निराकरण होगा।
बलिदानका नियम संसारमें सर्वत्र एक-सा है। वह तभी होगा जब परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति बलिदान देंगे और जयरामदास ऐसे ही परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति हैं। इसलिए जब मुझे जयरामदासके जख्मी होनेका समाचार मिला तो मैं इस आशयका तार भेजे बिना नहीं रह सका कि जेलमें बन्द रहने से जांघ में गोली लगना बेहतर है और सीनेमें लगा घाव तो जांघ में लगे घावसे भी अच्छा होता है।"।
अतएव यद्यपि मैं दोनों दिवंगत वीर युवकोंके माता-पिताओंके प्रति अपनी
समवेदना प्रकट करता है, किन्तु मेरे अन्तरतममें यही इच्छा उठ रही है कि यदि वे
स्वीकार करें तो मैं उनके सपूतोंके इस सुशोभन बलिदानके लिए उन्हें बधाई है।
योद्धाकी मृत्यु पर आँसू नहीं बहाये जाते और सत्याग्रही योद्धाकी मृत्युमें तो इसके
लिए और भी कम अवकाश है। स्वतन्त्रताके लिए आकुल राष्ट्रको जो सबक सीखने
पड़ते हैं उनमें से एक यह है कि भय मात्रका त्याग कर दिया जाये; उपाधियाँ
सोनेका भय, धन-ऐश्वर्य छिननेका भय, कारावासका भय और शरीरको चोट आने
तथा अन्ततः मृत्युका भय सबको त्याग देना है।
भारत-भरसे मिली तमाम खबरोंसे मुझे यही जान पड़ता है कि लोग अधिकाधिक
निर्भीक होते जा रहे हैं। हम अन्यत्र विहारसे आया एक पत्र छाप रहे हैं। उसे
पढ़कर आत्मा संकृत हो उठती है।
एक चीज ऐसी है, जिससे हमें जल्दी ही छुटकारा पा लेना चाहिए। अर्थात् शारीरिक शक्तिके मनमाने प्रयोगको जैसे भी हो, बन्द कराना है। चाहे उसके लिए हमें सरकारको अपनी संगीनों और बन्दूकोंका प्रयोग करनेके लिए ही बाध्य क्यों न
करना पड़े।
वीरमगाँव में पुलिसने कुत्सित तरीकेसे जो मारपीट की उसके अनेक उदाहरणों में से
मैं यहाँ केवल एक नमूना दे रहा हूँ
{{C|'''दक्षिणामूर्ति विद्यार्थी भवन के छात्र अनिरुद्ध, व्यास'''}}
{{C|'''स्वयंसेवक सं० ३५ / ३ का बया'''न}}
{{C|'''मैं अपने कई साथियोंके साथ ६-३० शामकी डाकगाड़ीसे नमककी
बोरियों के साथ वीरमगाँव रेलवे स्टेशनपर उतरा। तभी पुलिसके ८-१० लोगोंने
हमें घेर लिया। नमकको न छिनने देनेके खयालसे में बोरीके साथ जमीनपर
बैठ गया और पूरी ताकत से बोरीसे चिपक गया'''।}}
१. देखिए "तार एन० आर० मलकानीको ", १८-४-१९३०।<noinclude></noinclude>
lmxioq3recm2ady318u5tvnt5raayf5
673176
673175
2026-08-23T08:14:46Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673176
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गोली लग गई और वह चल बसा। इसी तरह १८ वर्षीय मेघराज रेवाचन्दको
गोली लगी और यह भी चल बसा। इस प्रकार जयरामदास सहित सात व्यक्तियोंको
गोलियां लगी। जयरामदासको गोली लगने की खबर सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई
विशुद्ध प्रसन्नता । नेताओंको लगे घावोंसे ही इस अन्यायका निराकरण होगा।
बलिदानका नियम संसारमें सर्वत्र एक-सा है। वह तभी होगा जब परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति बलिदान देंगे और जयरामदास ऐसे ही परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति हैं। इसलिए जब मुझे जयरामदासके जख्मी होनेका समाचार मिला तो मैं इस आशयका तार भेजे बिना नहीं रह सका कि जेलमें बन्द रहने से जांघ में गोली लगना बेहतर है और सीनेमें लगा घाव तो जांघ में लगे घावसे भी अच्छा होता है।"।
अतएव यद्यपि मैं दोनों दिवंगत वीर युवकोंके माता-पिताओंके प्रति अपनी
समवेदना प्रकट करता है, किन्तु मेरे अन्तरतममें यही इच्छा उठ रही है कि यदि वे
स्वीकार करें तो मैं उनके सपूतोंके इस सुशोभन बलिदानके लिए उन्हें बधाई है।
योद्धाकी मृत्यु पर आँसू नहीं बहाये जाते और सत्याग्रही योद्धाकी मृत्युमें तो इसके
लिए और भी कम अवकाश है। स्वतन्त्रताके लिए आकुल राष्ट्रको जो सबक सीखने
पड़ते हैं उनमें से एक यह है कि भय मात्रका त्याग कर दिया जाये; उपाधियाँ
सोनेका भय, धन-ऐश्वर्य छिननेका भय, कारावासका भय और शरीरको चोट आने
तथा अन्ततः मृत्युका भय सबको त्याग देना है।
भारत-भरसे मिली तमाम खबरोंसे मुझे यही जान पड़ता है कि लोग अधिकाधिक
निर्भीक होते जा रहे हैं। हम अन्यत्र विहारसे आया एक पत्र छाप रहे हैं। उसे
पढ़कर आत्मा संकृत हो उठती है।
एक चीज ऐसी है, जिससे हमें जल्दी ही छुटकारा पा लेना चाहिए। अर्थात् शारीरिक शक्तिके मनमाने प्रयोगको जैसे भी हो, बन्द कराना है। चाहे उसके लिए हमें सरकारको अपनी संगीनों और बन्दूकोंका प्रयोग करनेके लिए ही बाध्य क्यों न
करना पड़े।
वीरमगाँव में पुलिसने कुत्सित तरीकेसे जो मारपीट की उसके अनेक उदाहरणों में से
मैं यहाँ केवल एक नमूना दे रहा हूँ
{{C|'''दक्षिणामूर्ति विद्यार्थी भवन के छात्र अनिरुद्ध, व्यास'''}}
{{C|'''स्वयंसेवक सं० ३५ / ३ का बया'''न}}
{{C|'''मैं अपने कई साथियोंके साथ ६-३० शामकी डाकगाड़ीसे नमककी बोरियों के साथ वीरमगाँव रेलवे स्टेशनपर उतरा। तभी पुलिसके ८-१० लोगोंने हमें घेर लिया। नमकको न छिनने देनेके खयालसे में बोरीके साथ जमीनपर बैठ गया और पूरी ताकत से बोरीसे चिपक गया'''।}}
१. देखिए "तार एन० आर० मलकानीको ", १८-४-१९३०।<noinclude></noinclude>
gx43luhciz0r9dr2trhzdmjbhrq44p7
673177
673176
2026-08-23T08:15:52Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673177
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गोली लग गई और वह चल बसा। इसी तरह १८ वर्षीय मेघराज रेवाचन्दको
गोली लगी और यह भी चल बसा। इस प्रकार जयरामदास सहित सात व्यक्तियोंको
गोलियां लगी। जयरामदासको गोली लगने की खबर सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई
विशुद्ध प्रसन्नता । नेताओंको लगे घावोंसे ही इस अन्यायका निराकरण होगा।
बलिदानका नियम संसारमें सर्वत्र एक-सा है। वह तभी होगा जब परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति बलिदान देंगे और जयरामदास ऐसे ही परमवीर और सर्वथा निष्कलंक व्यक्ति हैं। इसलिए जब मुझे जयरामदासके जख्मी होनेका समाचार मिला तो मैं इस आशयका तार भेजे बिना नहीं रह सका कि जेलमें बन्द रहने से जांघ में गोली लगना बेहतर है और सीनेमें लगा घाव तो जांघ में लगे घावसे भी अच्छा होता है।"।
अतएव यद्यपि मैं दोनों दिवंगत वीर युवकोंके माता-पिताओंके प्रति अपनी
समवेदना प्रकट करता है, किन्तु मेरे अन्तरतममें यही इच्छा उठ रही है कि यदि वे
स्वीकार करें तो मैं उनके सपूतोंके इस सुशोभन बलिदानके लिए उन्हें बधाई है।
योद्धाकी मृत्यु पर आँसू नहीं बहाये जाते और सत्याग्रही योद्धाकी मृत्युमें तो इसके
लिए और भी कम अवकाश है। स्वतन्त्रताके लिए आकुल राष्ट्रको जो सबक सीखने
पड़ते हैं उनमें से एक यह है कि भय मात्रका त्याग कर दिया जाये; उपाधियाँ
सोनेका भय, धन-ऐश्वर्य छिननेका भय, कारावासका भय और शरीरको चोट आने
तथा अन्ततः मृत्युका भय सबको त्याग देना है।
भारत-भरसे मिली तमाम खबरोंसे मुझे यही जान पड़ता है कि लोग अधिकाधिक
निर्भीक होते जा रहे हैं। हम अन्यत्र विहारसे आया एक पत्र छाप रहे हैं। उसे
पढ़कर आत्मा संकृत हो उठती है।
एक चीज ऐसी है, जिससे हमें जल्दी ही छुटकारा पा लेना चाहिए। अर्थात् शारीरिक शक्तिके मनमाने प्रयोगको जैसे भी हो, बन्द कराना है। चाहे उसके लिए हमें सरकारको अपनी संगीनों और बन्दूकोंका प्रयोग करनेके लिए ही बाध्य क्यों न
करना पड़े।
वीरमगाँव में पुलिसने कुत्सित तरीकेसे जो मारपीट की उसके अनेक उदाहरणों में से
मैं यहाँ केवल एक नमूना दे रहा हूँ
{{C|'''दक्षिणामूर्ति विद्यार्थी भवन के छात्र अनिरुद्ध, व्यास'''}}
{{C|'''स्वयंसेवक सं० ३५ / ३ का बयान'''}}
{{C|'''मैं अपने कई साथियोंके साथ ६-३० शामकी डाकगाड़ीसे नमककी बोरियों के साथ वीरमगाँव रेलवे स्टेशनपर उतरा। तभी पुलिसके ८-१० लोगोंने हमें घेर लिया। नमकको न छिनने देनेके खयालसे में बोरीके साथ जमीनपर बैठ गया और पूरी ताकत से बोरीसे चिपक गया'''।}}
१. देखिए "तार एन० आर० मलकानीको ", १८-४-१९३०।<noinclude></noinclude>
r7qoig83uuhkcz0yim6akl9mt2yry2k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३९
250
197482
672859
670010
2026-08-22T13:28:32Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672859
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|चि० जानकीबहन,}}
मदालसाका पत्र आज मिला है। तुम्हारा पत्र मिलनेकी मुझे याद नहीं है। मुझे रोप किस बातपर चढ़ेगा? ऐसा लगता है, वहाँ तुम काममें जुट गई हो, इसलिए वहाँ पेरीनबहन के साथ तुम्हारा काम करना मुझे ठीक लगता है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २८८६) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''३८१. पत्र : नरहरि परीखको'''}}}}
{{Right|२ मई, १९३०}}
{{Left|चि० नरहरि,}}
मुखियाके बारेमें सारी हकीकत तो मैं नहीं जानता। लेकिन वह अपना बचाव क्यों करना चाहेगा? यदि उसमें साहस हो तो जो हो सो उसे भोगना चाहिए। लेकिन यदि उसमें साहस न हो तो वह अपना बचाव कर सकता है। मैं तो केवल एक ही अवसरपर बचाव करनेकी बात सोच सकता हूँ और वह यह कि जब किसी पर झूठा आरोप लगाया जाये तब यदि यह अपना बचाव करना चाहे तो वह कर सकता है। लेकिन इस बारेमें स्थानीय व्यक्ति ही सही निर्णय दे सकते हैं।
भगवती कहता है कि तुम्हारे पीछे वहाँ अँधेरा-ही-अंधेरा है। पूरे दिन काम कर सके, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है। इस बारे में विचारकर मुझे लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (एस० एन० ९०५२) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
9c3k8jnpvyeqcfxjx2k1x0aix70jb4z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४०
250
197483
672861
670011
2026-08-22T13:34:17Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672861
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८२. सन्देश : बम्बईकी साहू सभाके लिए'''}}}}
{{Right|कराडी<br>
२ मई, १९३०}}
मैं आशा करता हूँ कि साहू सभाको सभी ब्राह्मणेतर देश भक्तोंका सहयोग मिलेगा। मौजूदा संघर्ष किसी विशेष वर्ग या जातिके कल्याणके लिए नहीं, बल्कि करोड़ों लोगोंकी भलाई के लिए चलाया जा रहा है।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ३-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३८३. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको'''}}}}
{{Right|३ मई, १९३०}}
{{Left|प्रिय कुमारप्पा,}}
केवल " इं० सो० रि० '<ref>१. इंडियन सोशल रिफॉर्मर</ref> में ही प्रकाशित करो।<ref>२. यह वाक्य गांधीजी की लिखावटमें नहीं है। किन्तु पोस्टकार्डपर टाइप किये चार वैकल्पिक वाक्यों से इसे बरकरार रखा गया है।</ref> तुम अपना काम बड़ी बहादुरीसे कर रहे हो। यदि 'इं० सो० रि०' छापनेसे इनकार करे तो बताना ।
{{Right|बापू}}
{{Left|श्रीयुत जे० सी० कुमारप्पा<br>
गुजरात विद्यापीठ<br>
अहमदाबाद}}
अंग्रेजी (एस० एन० १००८६ और १००८७) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
e0hvx3rnkwo672mzqelewmyme0pzy2w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४१
250
197484
672866
670012
2026-08-22T13:43:09Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672866
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८४. पत्र : नारणदास गांधीको'''
{{Right|३ मई, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
भाई सुन्दरम् पुराने आश्रमवासी हैं। यथा नाम तथा गुण । हिन्दू विश्वविद्यालय छोड़कर आये हैं। थोड़े दिन वहां रहेंगे। उनसे मिलना तथा दूसरोंसे उन्हें मिलाना । और अधिक डाक आनेपर ही लिख सकूंगा ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०९) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''३८५. बी० ए० सुन्दरम्को प्रमाणपत्र'''<ref>१. मूलमें इसे कोई शीर्षक नहीं दिया गया, तथापि जी० एन० रजिस्टर में इसे प्रमाणपत्र कहा गया है।</ref>}}}}
{{Right|[३ मई, १९३० के आसपास ]<ref>२. ऐसा लगता है कि पिछले पत्रके साथ ही लिखा गया था, क्योंकि उसमें भी गांधीजीने पदी बातें लिखी है।</ref>}}
वी० ए० सुन्दरम् १९१५से मेरे सम्पर्क में हैं तथा सत्याग्रह आश्रमकी स्थापना होनेके बाद काफी अरसेतक ये वहाँ रहे हैं। इन्होंने पण्डित मालवीयजी का आशीर्वाद लेकर संघर्ष में शामिल होनेके लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छोड़ दिया है। उनके इस निर्णय में उनकी पत्नी<ref>३. सावित्री ।</ref> भी पूरे हृदयसे शामिल हैं। इन दोनोंकी सेवाओंका सबसे अच्छा उपयोग यही हो सकता है कि ये तमिलनाड जाकर नमक-कानून तोड़ें तथा वहाँ, विशेषकर अपने जिले कोयम्बटूरमें, विदेशी कपड़े और शराबके बहिष्कारके कार्य में सहयोग दें।
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (जी० एन० ३२०७) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
gsmjpcvsojhg0okwhm53ycgq3nesa70
672867
672866
2026-08-22T13:43:47Z
अंजली राजभर
4516
672867
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८४. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|३ मई, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
भाई सुन्दरम् पुराने आश्रमवासी हैं। यथा नाम तथा गुण । हिन्दू विश्वविद्यालय छोड़कर आये हैं। थोड़े दिन वहां रहेंगे। उनसे मिलना तथा दूसरोंसे उन्हें मिलाना । और अधिक डाक आनेपर ही लिख सकूंगा ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०९) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''३८५. बी० ए० सुन्दरम्को प्रमाणपत्र'''<ref>१. मूलमें इसे कोई शीर्षक नहीं दिया गया, तथापि जी० एन० रजिस्टर में इसे प्रमाणपत्र कहा गया है।</ref>}}}}
{{Right|[३ मई, १९३० के आसपास ]<ref>२. ऐसा लगता है कि पिछले पत्रके साथ ही लिखा गया था, क्योंकि उसमें भी गांधीजीने पदी बातें लिखी है।</ref>}}
वी० ए० सुन्दरम् १९१५से मेरे सम्पर्क में हैं तथा सत्याग्रह आश्रमकी स्थापना होनेके बाद काफी अरसेतक ये वहाँ रहे हैं। इन्होंने पण्डित मालवीयजी का आशीर्वाद लेकर संघर्ष में शामिल होनेके लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छोड़ दिया है। उनके इस निर्णय में उनकी पत्नी<ref>३. सावित्री ।</ref> भी पूरे हृदयसे शामिल हैं। इन दोनोंकी सेवाओंका सबसे अच्छा उपयोग यही हो सकता है कि ये तमिलनाड जाकर नमक-कानून तोड़ें तथा वहाँ, विशेषकर अपने जिले कोयम्बटूरमें, विदेशी कपड़े और शराबके बहिष्कारके कार्य में सहयोग दें।
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (जी० एन० ३२०७) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
jbr2vg273isw711oas0wnq6u2riruti
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४२
250
197485
672895
670013
2026-08-22T14:21:49Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672895
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८६. खेड़ावासियोंके प्रति'''}}}}
गुजरातमें इस समय खेड़ा जिला हमारी लड़ाईका केन्द्र बन गया जान पड़ता है । खेड़ामें जो अत्याचार हो रहे हैं वे गुजरात के किसी अन्य भागमें हुए प्रतीत नहीं होते। वहाँ तो अधिकारिगण चाहे जिसे पकड़ लेते हैं, चाहे जिसे छोड़ देते हैं, चाहे जिसे मारते हैं और चाहे जिसे गालियाँ देते हैं। इतना सब होनेके बावजूद लोग भली-भाँति शान्ति बनाये हुए हैं। परन्तु काका साहबको कुछ कमियां दिखाई दी हैं। लोग अत्याचारको बरदाश्त तो कर रहे हैं, परन्तु उनके तीव्र बहिष्कारमें क्रोध है, द्वेष है और इसलिए हिंसा है। वे सरकारी अधिकारियोंको छोटी-छोटी बातों में सताते हैं, उनकी निन्दा करते हैं। इस तरह तो वे जीतनेवाले नहीं। नौकरशाहीकी जी भरकर निन्दाकी जा सकती है; लेकिन सरकारी अधिकारियोंकी नहीं की जा सकती । वे लोग तो बेचारे हम जैसे ही हैं। एक समय ऐसा था जब हम नहीं तो हमारे सगे-सम्बन्धी पटेल बनने की इच्छा रखते थे, मामलतदार बननेकी कोशिश करते थे । हम मामलतदारकी खुशामद किया करते थे। अब हमारा मोह दूर हो गया है, इसलिए उनका भी तुरन्त दूर हो गया होगा, ऐसा हम क्योंकर मान सकते हैं? यह ठीक है कि हो जाना चाहिए; किन्तु इसके लिए हम विनयपूर्वक प्रयत्न करें। मामलतदारी, दरोगागिरी आदिके दोष बतायें, लेकिन मामलतदार, दरोगा पर क्रोध न करें। हमारे तीव्रतम बहिष्कारमें भी माधुर्य और विनय होनी चाहिए। ऐसा नहीं होगा तो किसी दिन उत्पात भी हो जायेगा। मामलतदार, दरोगा आदि मर्यादा खो बैठेंगे। दरोगा तो मर्यादा सो ही बैठे हैं। दरोगाने मगनभाई देसाई-जैसे व्यक्तिका अपमान किया, उन्हें मारा-पीटा, सो तो मैं जानता ही हूँ। और यदि इसी तरह लोग भी मर्यादा छोड़ बैठें तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात होगी ? यदि कुछ लोग गाली देनेकी बातको मर्यादाके भीतर मानते हैं, उस हालत में यदि अन्य लोग हाथ चला बैठनेको मर्यादाकी सीमा समझते हों तो गाली देनेवाले लोग उन्हें कैसे दोष दे सकते हैं ? और एक बार हाथ चलाबैटनेपर सीमा कहाँ रह पायेगी ? अतएव बाजी अभी हाथमें है। इस बीच खेड़ा जिलेके निवासियोंको सावधान हो जाना चाहिए और जहाँ-जहाँ सुधार करनेकी आवश्यकता हो वहाँ वहाँ सुधार कर लिया जाना चाहिए। मैंने जो मर्यादा बताई है, उसमें रहकर वे खुशीसे बहिष्कारोंको जारी रख सकते हैं। मैं मर्यादा बताये देता हूँ । काकाका लेख पढ़नेवाले पाठकगण इसे भी उसके साथ ही समझ लें। हम पटेलका ही उदाहरण लें।
पटेल यदि गाँवका ही हो तो उससे उसका घरवार न छीना जाये, उसका खाना-पानी बन्द न हो। उसका बहिष्कार केवल उसके पदके कारण हो । तात्पर्य यह कि उसके हुक्मको न माना जाये, पदके आधार पर यदि वह एक बूंद पानी भी मांगे तो वह न दिया जाये। यदि पदके आधारपर वह अधिकारियोंके लिए सीधा - सामान आदि माँगे तो वह न दिया जाये। लेकिन यदि वह बीमार पड़ जाये तो प्रेमपूर्वक
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
2buv322ztipih24ck650hknd4l3pvrx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४३
250
197486
672936
670014
2026-08-22T15:40:57Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672936
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||खेड़ावासियोंके प्रति|३९९}}</noinclude>उसकी तीमारदारी करें। यदि हममें ऐसा करनेकी शक्ति न हो अर्थात् यदि हममें इतना प्रेम न हो तो हम बहिष्कारको छोड़ दें। इसको विधाताके लेखके समान अटल मानना चाहिए कि यदि बहिष्कार वैरभावसे प्रेरित होकर किया गया होगा तो जहाँतक इस लड़ाईका सम्बन्ध है, इसका कोई शुभ परिणाम कदापि नहीं निकल सकता ।
कोई कहेगा कि यह अहिंसा तो बड़ी कठिन है। बात सच है । अहिंसा जितनी कठिन है उतनी ही सरल भी है। जो समझ ले उसके लिए तो आसान है, न समझने- वाले व्यक्ति लिए आकाश में उड़नेसे भी कठिन है। इस बातको मैं अच्छी तरह जानता था, इसी कारण मैंने जनताके सामने बहिष्कारको नहीं रखा। चूंकि गुजरातने खुद-ब-खुद इसे अपने हाथ में ले लिया, इसलिए मैंने इसे चलने दिया और अपने भाषणोंमें उसे प्रोत्साहन भी दिया। तथापि मैंने हमेशा उसकी मर्यादाकी चर्चा भी की है। यदि बहिष्कारमें ऐसी मर्यादा और अहिंसका पालन नहीं किया जा सकता और उसे छोड़ दिया जाता है तो अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है।
मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं हार-जीत के बारेमें तटस्थ हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ, अहिंसासे ही विजय प्राप्त की जा सकती है और हिंसासे अभी चाहे कितने ही शुभ परिणाम निकलते दिखाई देते हों तथापि अंततः उसमें हार ही होगी। क्षय रोग से पीड़ित मनुष्य के चेहरेकी लालिमा आरोग्यकी द्योतक नहीं, बल्कि वह तो निकट भविष्य में आनेवाली मृत्युकी सूचक है; सच पूछिए तो उस लालिमासे मृत्यु झांकती है। लेकिन इतना कहने भरसे मेरा हिसाब पूरा नहीं हो जाता।
विना प्रतिरोध किये मार खानेकी अहिंसा यदि लोगोंके गले न उतरे तो मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। तथापि यह बात तो हमारी मूल प्रतिज्ञामें निहित है। मैं जानता हूँ कि जब देहवणके ठाकुरने पुलिसके साथ मिलकर लोगोंपर आक्रमण किया, उस समय लोग उसका प्रतिरोध कर उसे हटा सकते थे। इसी तरहके अन्य अनेक प्रसंग भी आये हैं। तथापि लोगोंने शान्ति कायम रखी और इस तरह बहादुरी दिखाई। उसके लिए ये लोग बधाईके पात्र हैं। लेकिन जहाँ लोग इस तरह शान्ति बनाये रखना अपना धर्म नहीं समझते और मन-ही-मन दूसरोंको दुःख देनेकी बात सोचते हैं वहाँ शान्ति लम्बे समयतक नहीं चल सकती। ऐसे लोग या तो भाग खड़े होंगे अथवा अपना बचाव करनेके लिए प्रतिरोध करेंगे। इन दोनों बातोंका इस लड़ाई में निषेध है। इसमें न तो लोग भाग सकते हैं और न प्रतिरोध कर सकते हैं। यह लड़ाई तो 'मर कर जीने' का मन्त्र साधनेकी है।
किसीने अभीतक यह नहीं कहा कि यदि हम मर जायेंगे तो विजयश्री हमारे हाथ नहीं आयेगी। मर-मिटनेकी दाक्तिके बारेमें कुछ एक लोगोंको सन्देह अवश्य है। लेकिन इस बारे में अनेक लोगोंका सन्देह तो मिट चुका है। गत संघर्षके आंकड़े निकालकर बताया जा सकता है कि इस चार सप्ताहके संघर्षमें जितने व्यक्ति मारे गये हैं और हमारे जितने पैसे खर्च हुए हैं, वे यूरोपके दारुण युद्धमें जितने व्यक्ति कल हुए थे और प्रत्येक राज्यके जितने पैसे खर्च हुए थे उससे बहुत कम है और इसके अलावा हम काफी आगे भी बढ़े हैं। यदि हमारा यह संघर्ष अन्ततक अहिंसक
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
ijmbq5efkimyri56dk5f276dz11phon
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४४
250
197487
672940
670015
2026-08-22T15:46:20Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672940
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ही रहा तो यूरोपके युद्धके दौरान एक दिनमें जितने मनुष्योंकी जानें गई और जितना पैसा खर्च हुआ, हमारे यहाँ कुल मिलाकर उतना नहीं होगा और हम स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर लेंगे। इतना जाननेके बाद किसी व्यक्तिके लिए सन्देहका कोई कारण नहीं रह जाता और यदि सन्देह दूर हो जाये तो जनतामें अपेक्षित वातावरण अवश्य तैयार हो जायेगा ।
इतना तो सामाजिक बहिष्कारके सम्बन्धमें ।
और अब अनुशासनके बारेमें।
स्वयंसेवकोंमें यदि अनुशासनमें रहनेकी शक्ति नहीं होगी तो हम किसी-न-किसी दिन संकटमें पड़ जायेंगे। संघर्षमें अनुशासन ही सब कुछ होता है। क्रीमियाके युद्धमें अंग्रेज अधिकारियोंने भारी भूल की थी, जिसके फलस्वरूप अनेक सिपाही मारे गये ।bबेचारे सिपाही तो आदेशानुसार काम करते जाते थे और मरते जाते थे। लोग अंग्रेज अधिकारियोंकी जड़ताको तो भूल गये, परन्तु योद्धाओंकी वीरताको प्रख्यात कवि टेनिसनने एक सुन्दर काव्य लिखकर अमर कर दिया। उसमें उन्होंने सच्चे सिपाहीके गुणोंका वर्णन किया है, जिसका भावार्थ निम्नलिखित है:
सच्चा सिपाही कारणके विषयमें वादविवाद नहीं करता सच्चा सिपाही सामने उत्तर नहीं देता; वह तो आदेशका पालन करता है और मरता है।
मुझे लगता है कि यह बात सच है। इसका मतलब यह नहीं कि उसकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है अथवा वह उसका उपयोग नहीं करता। सिपाहियोंमें अपना नाम दर्ज करानेसे पहले उम्मीदवार बुद्धिका पूर्ण उपयोग करता है। वह सेनापतिको अच्छी तरहसे जानने और सेनाके नियमोंकी भली भाँति जाँच करनेके बाद ही उसमें शामिल होता है । इतना सब करनेके पश्चात् उपनियमोंकी रचना होनेपर यदि वह पग-पगपर उनकी चर्चा करे, आदेश जारी होनेपर उसके औचित्य अनौचित्यका विचार करे, तो उसका समय सोच-विचार और उन नियमोंकी चर्चामें ही निकल जायेगा और उसका काम अटक जायेगा। यदि प्रत्येक सिपाही सेनापतिसे वाद-विवाद करनेका दावा करे तो लड़ाईमें हार खानी पड़े। इसलिए सेनामें शामिल होनेके बाद बुद्धिको अलग रखना पड़ता है। सिपाही बननेके बाद सिपाहीके कर्तव्यको लेकर जो वाद-विवादमें पड़ता है, उसकी बुद्धि व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः ऐसा करना बुद्धिका दुरुपयोग करना होगा ।
इस बातको जो खेड़ा निवासी समझ ले, उसे चाहिए कि वह सूक्ष्म रूपसे अनु-शासनके नियमोंका पालन करे।
अनुशासनके इन नियमोंमें कातने पींजनेकी क्रिया अनिवार्य है। जो सिपाही ऐसा नहीं करता वह स्वराज्यकी लड़ाईमें नहीं रह सकता; क्योंकि 'सूतके धागेके द्वारा स्वराज्य' को हमने मन्त्र रूपमें स्वीकार किया है। और यदि यह बात सच है तो अब यह चर्चाका विषय नहीं रह जाता, बल्कि इसे कर दिखाना हमारा धर्म हो जाता है। नमक सत्याग्रहके अन्तर्गत कातनेकी आवश्यकता भले ही न हो, परन्तु स्वराज्य-अन्दोलनमें तो उसकी आवश्यकता है ही। और यद्यपि नमक-कानून अभीतक हटा नहीं
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
6r920e7ergt0qwk0bubx9vy5i6tqgg7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४५
250
197488
672942
670016
2026-08-22T15:52:49Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672942
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||वकीलोंका धर्म|४०१}}</noinclude>है, तथापि इस समय जो लड़ाई चल रही है वह केवल नमक कर हटवानेके लिए ही नहीं है, बल्कि स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए है।
यह कहने की जरूरत नहीं कि जैसे पींजना- कातना आवश्यक है, उसी तरह सिरसे पैर तक सादीकी पोशाक पहनना भी आवश्यक है।
खेड़ा निवासियोंके उत्साहकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन वह उत्साह यदि सात्विक हो, अहिंसामय हो तो कातनेकी शान्त किया उसका चिह्न है, उससे उसका पोषण होता है। शान्त उत्साह हमेशा क्रियात्मक होता है। अशान्त उत्साहका आरम्भ और अन्त आवेशमें ही होता है।
मैं एक बात विशेष रूपसे कहना चाहता हूँ। केवल रासने ही नहीं, अन्य गाँवोंने भी भूमि कर न देनेकी प्रतिज्ञा की है । यह प्रतिज्ञा मुझे अच्छी लगी है। इसका पालन करनेवाले लोग भारत के इतिहासमें वीर पुरुषों में गिने जायेंगे। लेकिन इस प्रतिज्ञाके क्या परिणाम होंगे, यह बात विचार करने लायक है।
ऐसी प्रतिज्ञा लेने वाले व्यक्तिको जमीन, घर, ढोर-डंगर आदिसे हाथ धो बैठनेके लिए तैयार रहना चाहिए और तिसपर भी उसे मारपीट नहीं करनी चाहिए, न दूसरोसे मारपीट करवानी चाहिए। जिसे स्वराज्य मिलने के बारेमें विश्वास होगा, उसे किसी बातकी चिन्ता नहीं होगी उसके मनमें ऐसी कोई दुविधा नहीं होती कि उसे घरवार खो देना पड़ेगा। आज घरवार छिन भी जाये तो बादमें वापस मिल ही जायेगा । सरकार उसे कभी हजम नहीं कर सकती। लेकिन स्वराज्य मिलनेके बारेमें जिसे सन्देह हो उसे फिलहाल कर न भरनेकी जोखिम नहीं उठानी चाहिए। कांग्रेसके कार्यक्रममें कर न भरनेकी बात कतई नहीं है। इसलिए लगान भरनेमें किसीकी लाज नहीं जानेवाली है। लेकिन जिन्हें आत्मविश्वास है, जिनमें दुःख सहन करनेकी शक्ति है, जिनमें देश अथवा अपने सरदारकी खातिर त्याग करनेकी शक्ति है वे लोग अवश्य अपनी जिम्मेदारीपर लगान न भरें; उन्हें न भरनेका अधिकार है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३८७. वकीलोंका धर्म'''}}}}
वकीलोंकी आलोचना करनेमें मैंने कभी कोई कसर नहीं रखी। महादेवने भी अपने थोड़े दिनोंके राज्यमें वकीलोंकी जी भरकर आलोचना की। परन्तु वकीलोंने उसका गलत अर्थ नहीं लगाया। उन्होंने समझ लिया कि ये तो प्रेमबाण थे । निन्दाके पात्र होते हुए भी स्वराज्यकी लड़ाईमें वकीलोंका हिस्सा कम नहीं है। बम्बईके बेताज बादशाह फीरोजशाह मेहता सुप्रसिद्ध वकील थे, लोकमान्य वकील थे, मनमोहन घोष और लालमोहन घोष वकील थे, पंजाब केसरी लालाजी वकील थे और देशबन्धु भी, जिन्होंने लाखों रुपये देशसेवामें खर्च किये थे, वकील थे। मोतीलालजी वकील है, मालवीयजी वकील हैं, विट्ठलभाई पटेल वकील हैं, सरदार वकील हैं, जयरामदास, राजगोपालाचारी, प्रकाशम्, वेंकटप्पैया, सन्तानम्, मुंशी, कामदार, पुरुषोत्तमदास त्रिकमदास और ब्रोकर
४३-२६
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
1uij172cmqy67oam93pp2avs7s4o0ua
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४६
250
197489
672943
670017
2026-08-22T15:57:56Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672943
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४०२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>वकील हैं, तथा स्वयं राष्ट्रपति भी वकील ही हैं। यह सूची पूरी नहीं है। जो नाम मुझे याद पड़े वे मैंने लिख दिये हैं। लेकिन ऐसे तो अन्य अनेक नाम गिनाये जा सकते हैं।
अतएव यद्यपि वकीलोंके लिए लज्जित होनेका कोई कारण नहीं है, तथापि मन-ही-मन फूल उठनेकी भी कोई वजह नहीं। इतने वकीलोंके त्यागको देखते हुए भी लोग वकीलोंकी निन्दा करते हैं मेरे जैसोंने भी उनकी निन्दा की है, सो सकारण ही है।
लोग यह आशा रखते हैं कि जैसे ब्राह्मण मात्रको ब्रह्मज्ञानी होना चाहिए वैसे ही प्रत्येक वकीलको देशभक्त होना चाहिए। वकीलका अर्थ ही लोगोंकी हिमायत करनेवाला, कानूनका पण्डित, राजनीतिको जाननेवाला और राज्य द्वारा सताये हुए लोगोंको सन्तापसे मुक्त करानेवाला होता है। अतएव जिन लोगोंका धन्धा ही देशसेवा करना होना चाहिए वे जब स्वार्थी बन जाते हैं, भोग विलास में पड़े रहते हैं या लोगोंको आपस में लड़ाकर पैसा कमानेके चक्कर में पड़ जाते हैं, तो लोग उनकी निन्दा करने लगते हैं । यद्यपि स्वतंत्र रूपसे विचार करते हुए उपर्युक्त देशभक्त वकीलोंकी संख्या हमें कम न भी लगे तो भी वकीलोंकी संख्या और उनके कर्त्तव्यको देखते हुए देशसेवक वकीलोंकी संख्या उनकी कुल संख्याके अनुपात में कम ही जान पड़ेगी।
इस बार जो जागृति आई है, वकील उससे मुक्त नहीं हैं। श्री मुन्शी वगैराका बलिदान इस लड़ाईका ही परिणाम है। मुझे लगता है कि जो वकील डरके कारण अपना धन्धा छोड़ना नहीं चाहते या छोड़ नहीं सकते वे भी डरते-डरते कुछ-न-कुछ सेवा करना चाहते हैं। मैंने सुना है कि बम्बईके बहुत से वकीलोंने विलायती टोपी और विदेशी कपड़ोंका त्याग कर दिया है। गुजरातके अनेक वकील लोगोंपर किये जा रहे अत्याचारकी जाँच करने निकल पड़े हैं। यह सब अभिनन्दनीय है । परन्तु वकालत छोड़नेकी बात यदि छोड़ भी दें तो भी बड़ी बात तो यह है कि वे बड़ी संख्या में सविनय कानून भंग करें और यदि अदालत सनद छीन ले तो भी निर्भय बने रहें। सनदकी खातिर देशको नहीं बेचा जा सकता। देशसेवा करते हुए यदि सनद छिन जाये तो यह समझना चाहिए कि पाप कटा । यदि उनमें इतनी निडरता आ जाये तो वे अपने-अपने जिलोंके लोगों की बहुत मदद कर सकते हैं। यदि वकील निडर बन जायें तो
१. जनताके पैसेका हिसाब-किताब रख सकते हैं;
२. कानूनकी बारीकियां लोगोंको समझा सकते हैं;
३. सविनय अवज्ञाको लेकर कारण मनमाने ढंगसे चलाये गये मामलोंका निरीक्षण करके उन्हें प्रकाशमें ला सकते हैं;
४. जहाँ मारपीटका भय हो वहाँ वे हाजिर रह सकते हैं;
५. जो अन्याय हो रहे हों, उनका पृथक्करण जनताके सामने कर सकते हैं;
६. वर्तमान अन्यायोंकी जांच करके सरकारके दोषोंका परिचय करा सकते हैं;
७. खादीके उत्पादनमें हाथ बँटा सकते हैं;
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
jejqli1p927a2xzubkdx9n3mad5bo3b
672946
672943
2026-08-22T15:59:25Z
अंजली राजभर
4516
672946
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४०२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>वकील हैं, तथा स्वयं राष्ट्रपति भी वकील ही हैं। यह सूची पूरी नहीं है। जो नाम मुझे याद पड़े वे मैंने लिख दिये हैं। लेकिन ऐसे तो अन्य अनेक नाम गिनाये जा सकते हैं।
अतएव यद्यपि वकीलोंके लिए लज्जित होनेका कोई कारण नहीं है, तथापि मन-ही-मन फूल उठनेकी भी कोई वजह नहीं। इतने वकीलोंके त्यागको देखते हुए भी लोग वकीलोंकी निन्दा करते हैं मेरे जैसोंने भी उनकी निन्दा की है, सो सकारण ही है।
लोग यह आशा रखते हैं कि जैसे ब्राह्मण मात्रको ब्रह्मज्ञानी होना चाहिए वैसे ही प्रत्येक वकीलको देशभक्त होना चाहिए। वकीलका अर्थ ही लोगोंकी हिमायत करनेवाला, कानूनका पण्डित, राजनीतिको जाननेवाला और राज्य द्वारा सताये हुए लोगोंको सन्तापसे मुक्त करानेवाला होता है। अतएव जिन लोगोंका धन्धा ही देशसेवा करना होना चाहिए वे जब स्वार्थी बन जाते हैं, भोग विलास में पड़े रहते हैं या लोगोंको आपस में लड़ाकर पैसा कमानेके चक्कर में पड़ जाते हैं, तो लोग उनकी निन्दा करने लगते हैं । यद्यपि स्वतंत्र रूपसे विचार करते हुए उपर्युक्त देशभक्त वकीलोंकी संख्या हमें कम न भी लगे तो भी वकीलोंकी संख्या और उनके कर्त्तव्यको देखते हुए देशसेवक वकीलोंकी संख्या उनकी कुल संख्याके अनुपात में कम ही जान पड़ेगी।
इस बार जो जागृति आई है, वकील उससे मुक्त नहीं हैं। श्री मुन्शी वगैराका बलिदान इस लड़ाईका ही परिणाम है। मुझे लगता है कि जो वकील डरके कारण अपना धन्धा छोड़ना नहीं चाहते या छोड़ नहीं सकते वे भी डरते-डरते कुछ-न-कुछ सेवा करना चाहते हैं। मैंने सुना है कि बम्बईके बहुत से वकीलोंने विलायती टोपी और विदेशी कपड़ोंका त्याग कर दिया है। गुजरातके अनेक वकील लोगोंपर किये जा रहे अत्याचारकी जाँच करने निकल पड़े हैं। यह सब अभिनन्दनीय है । परन्तु वकालत छोड़नेकी बात यदि छोड़ भी दें तो भी बड़ी बात तो यह है कि वे बड़ी संख्या में सविनय कानून भंग करें और यदि अदालत सनद छीन ले तो भी निर्भय बने रहें। सनदकी खातिर देशको नहीं बेचा जा सकता। देशसेवा करते हुए यदि सनद छिन जाये तो यह समझना चाहिए कि पाप कटा । यदि उनमें इतनी निडरता आ जाये तो वे अपने-अपने जिलोंके लोगों की बहुत मदद कर सकते हैं। यदि वकील निडर बन जायें तो
१. जनताके पैसेका हिसाब-किताब रख सकते हैं;
२. कानूनकी बारीकियां लोगोंको समझा सकते हैं;
३. सविनय अवज्ञाको लेकर कारण मनमाने ढंगसे चलाये गये मामलोंका निरीक्षण करके उन्हें प्रकाशमें ला सकते हैं;
४. जहाँ मारपीटका भय हो वहाँ वे हाजिर रह सकते हैं;
५. जो अन्याय हो रहे हों, उनका पृथक्करण जनताके सामने कर सकते हैं;
६. वर्तमान अन्यायोंकी जांच करके सरकारके दोषोंका परिचय करा सकते हैं;
७. खादीके उत्पादनमें हाथ बँटा सकते हैं;
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
r8g7fom2hs2mfot1socmjjzf6szoaha
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४७
250
197490
672953
670018
2026-08-22T16:11:53Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672953
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||टिप्पणियाँ|४०३}}</noinclude>८. बहिष्कारके काममें बहनोंकी सहायता कर सकते हैं; और
९. सब प्रान्तोंके लगभग सभी सुप्रसिद्ध नेताओंके पकड़े जानेसे जहाँ जरूरत हो, वहाँ जनताका पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं और वर्तमान वातावरणको अधिक निडरतापूर्ण बनाने में सहायक हो सकते हैं।
ये बातें मैंने मिसाल के तौर पर सुझाई हैं। पर जिन्हें सेवा ही करनी है उन्हें तो सेवाके बहुतेरे तरीके सूझ जायेंगे ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३९}}
{{C|{{larger|'''३८८. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''शराबकी दुकानोंपर धरना'''}}
अहमदाबादमें एक मद्य विक्रेताने निरीह मजदूरोंको बिना किसी अपराधके मार-मारकर अधमरा कर दिया। सूरतमें बहनोंको गन्दी गन्दी गालियाँ दी गई और उनपर मिट्टी के ढेले फेंके गये और जलालपुरमें तो बहनोंको बीभत्स और गन्दी गालियाँ देना शुरू किया गया है। इस सबको बहनोंने सहन किया, इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं। लेकिन पुरुषोंका क्या ? बहनोंको जब गालियाँ दी जायें उस समय किसी पुरुषको बीचमें पड़ने की जरूरत नहीं है। शराबियों अथवा शराब बेचनेवालों की गालियोंसे घबरानेकी भी कोई आवश्यकता नहीं। तथापि पुरुष निष्क्रिय होकर नहीं बैठ सकते। उन्हें चाहिए कि वे स्वयं मद्य विक्रेताओंसे मिलें, उन्हें विनयपूर्वक समझायें, लोकमत तैयार करके उसे प्रकाश में लायें। मद्य विक्रेताओंके हाथों भी बहनोंका अपमान नहीं हो सकता, न होना चाहिए। मेरा दृढ़ मत है कि यदि प्रत्येक बातको सभ्य भाषामें प्रस्तुत किया जाये और मद्य विक्रेताओंको लोगोंकी भावनासे अवगत कराया जाये तो वे यह धन्धा अवश्य छोड़ देंगे। मद्य विक्रेताओंको चाहिए कि जिस धन्धेका नाश हो रहा है उस धन्धेका स्वयमेव त्याग कर दें।
{{C|'''एक पारसी बालिकाकी भेंट'''}}
एक पारसी बालिकाकी ओरसे मुझे जो पत्र मिला है उसे मैं ज्यों-का-त्यों नीचे दे रहा हूँ।<ref>१. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसमें उपर्युक्त सात वर्षीय बालिकाने लिखा था कि यह वर्तमान आन्दोलनके लिए अपने योगदानके रूपमें १० रुपये भेज रही है।</ref>
ठीक इसी तरह वापीके पारसी बालकोंने ३०० रुपये दिये थे और उनमें से एक नन्हीं बच्चीने मुझसे पूछा था, " क्या में लड़ाईमें भाग नहीं ले सकती ? " ऐसे निर्दोष बच्चे जब इस तरहकी सेवा करना चाहें तब कौन यह माने बिना रह सकता है कि इसमें ईश्वरका हाथ नहीं है ? मैं इन बच्चियोंमें कृत्रिमता नहीं देखता ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
t0xmo4kpuzpngw9ujq2z0ckqiskkrfx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४८
250
197491
672954
670019
2026-08-22T16:16:03Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672954
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८९. मुद्रणालयोंपर छापा'''}}}}
मुझे उम्मीद है कि वाइसराय महोदयने मुद्रणालयोंके सिरपर जो तलवार लटकाई है उससे कोई नहीं डरेगा।
नौकरशाहीकी निन्दा करना प्रजाका कर्तव्य है, उसका नाश चाहना हमारा धर्म है, सविनय अवज्ञा धर्म है, नौकरोंको सरकारी नौकरी छोड़नेके लिए समझाना धर्म है, सिपाहियोंको सरकारी सिपाहीगिरी छोड़नेको समझाना धर्म है, और जब लोगों में ऐसी ताकत आ जाये तब कर न देनेके लिए लोगोंको समझाना भी धर्म है। तो भी सरकारी कानूनकी रूसे ऊपरकी हर बात गुनाह है। इस नये कानूनके अनुसार जो प्रेस इनमें से एक भी गुनाह करेगा, सरकार उसे जब्त कर सकेगी। अच्छा हो, यदि तमाम समाचार-पत्रोंके संचालक और प्रकाशक ऐसे कानूनको मानना पाप समझें। इस समय जब कि साधारणजन निडर होकर अनीतिमय कानूनोंकी सविनय अवज्ञा कर रहे हैं, यदि पत्रकारोंने कमजोरी दिखाई तो देशको हानि पहुंचेगी। अतः जिसके नाम जमानत देनेका नोटिस आये वह प्रेस जमानत देनेके बजाय अपना काम ही बन्द कर दे। अगर सब मुद्रणालय इस तरह करें तो सरकारके नये कानून पर अमल ही न हो सकेगा।
इस लड़ाई में समाचार-पत्रोंकी पूरी तरहसे सहायता ली जा रही है, तो भी यह लड़ाई समाचार-पत्रोंपर तनिक भी निर्भर नहीं है। लोग अपनी शक्तिको समझने लगे हैं, और क्या करना है, यह भी जान गये हैं। अतएव आजकल अखबारोंमें उन्हें बहुत थोड़ी बातें जानने योग्य मिलती है। दूर-दूरकी कुछ खबरें नहीं मिल सकेंगी, लेकिन उनके बिना भी हम अपना काम चला सकते हैं। अतएव मुझे आशा है कि कोई मुद्रणालय जमानत नहीं देगा। यदि वे इस हद तक संयत रहेंगे तो देखेंगे कि यह कानून अधिक समय तक नहीं चल सकेगा ।
हाथ के लिखे समाचार-पत्र भी हो सकते हैं; यदि लोगों में देशहित के लिए मेहनत करनेकी शक्ति पैदा हो गई है, तो असंख्य हस्तलिखित अखबार रोज प्रकाशित किये जा सकते हैं। यदि लोग चाहें तो श्रीफल न्यायसे हाथसे लिखे गये अखबारोंकी हजारों प्रतियाँ तैयार कर सकते हैं। जैसे मैं ५० आदमियोंसे एक अखबार लिखवाकर उसे जुदा-जुदा जगहोंमें ५० आदमियोंको दूं। यदि ये पचास आदमी अपने-अपने मित्रोंसे उसकी उतनीकी प्रतियां तैयार करायें तो २,५०० प्रतियां तैयार हो जायें । और यदि वे २,५०० आदमी भी ऐसा ही करें तो ? उपर्युक्त ढंगसे काम करने में गरीवोंको तो कोई आपत्ति हो नहीं सकती। आवश्यकता केवल इस तरहकी भावना पैदा करने की है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
ap8fyc2r9qr7k8xuet88ctgb4d5y5c8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४९
250
197492
672958
670020
2026-08-22T16:23:16Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
672958
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३९०. खादीके विषयमें चेतावनी'''}}}}
ऐसे समय जब खादी बाजारमें मिलनी मुश्किल हो गई है, कुछ व्यापारी, जिन्हें न तो देशसे प्रेम है और न जिन्हें अपनी प्रतिष्ठाकी चिन्ता है बल्कि चाहे जिस तरह पैसा कमाना ही जिनका ध्येय है, चाहे जहाँसे कैसी भी खादी खरीद लेना चाहते हैं, और खादीके नाम पर दो रुपये गजका मिलका बना कपड़ा आठ रुपये गजके भाव बेचने में नहीं हिचकिचाते। ऐसे व्यापारियोंसे खादी पहननेवाले लोगोंको बचाने के इरादे से श्री शंकरलाल बैंकर निम्नानुसार लिखते हैं।<ref>१. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है।</ref>
इन विचारोंसे में पूर्णतया सहमत हूँ और मुझे उम्मीद है कि जिसे चरखा संघने प्रमाणपत्र न दिया हो, ऐसे स्थान से खादीके नामपर बेचा जानेवाला कपड़ा कोई नहीं खरीदेगा। जो बहिष्कारकी रीतिको अच्छी तरहसे समझ गये हैं और जो जानते हैं कि खादीके बिना बहिष्कार सफल हो ही नहीं सकता, वे लोग यदि खादी न मिले तो प्रतीक्षा करें, परन्तु उतावलीमें, घोसेमें आकर खादीके नामपर कोई दूसरा कपड़ा न पहनें।
चरला संघ द्वारा स्वीकृत भण्डारोंमें खादी रखनेका प्रयत्न किया जा रहा है। जो नया तरीका मैंने बताया है यदि लोग उसे समझ लेंगे तो थोड़े ही दिनोंमें खादीका ढेर लग जायेगा। खादी पहननेवाले लोग सूत कातें और कतवायें । कतवानेवाले बाजारमें जानी-मानी दुकानोंसे सूत न खरीदें बल्कि नये लोगोंको कातनेमें लगायें, अर्थात्
१. स्वयं कातें;
२. अपने सगे-सम्बन्धियोंसे कतवाय
३. अपने पड़ोसियोंसे कतवायें;
४. अपने आसपासके गाँवोंमें नये चरखोंका प्रवेश करायें अथवा तकलीसे कतवायें, और
५. उनके प्रभावमें जो स्कूल आदि हों वहाँके विद्यार्थियों और शिक्षकोंसे कतवायें ।
यह तो मैंने कुछ एक क्षेत्र ही गिनाये हैं । ३० करोड़की आबादीवाले इस देशमें कपास पीजने और सूत कतवानेके असंख्य तरीके सोचे जा सकते हैं और यदि कातना- पींजना आदि जाननेवाले सब भाई-बहन मेहनत करें तो देशका नक्शा बदल जायेगा, इस बारेमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं है।
लालची व्यापारियोंसे मेरी विनती है कि वे खादीको अपनी लालचकी परिधि से दूर रखें। वे खादीका व्यापार ही न करें; और यदि करें तो शुद्ध खादीका ही व्यापार करें और वह भी पूरी ईमानदारीके साथ खादीके बारेमें ऐसा कहनेका मौका न दें
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
aze6opyk96j7wu8pzkkkldr6qxlchrk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५०
250
197493
673163
670021
2026-08-23T06:44:15Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
673163
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|४०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कि जब खादीकी तंगी होती है तभी खादी महँगी हो जाती है। खादी जब अपना उचित स्थान प्राप्त कर लेगी तब खादीकी तंगी ही नहीं होगी । घरकी रुई और मेहनत भी घरकी हो तो फिर तंगी किस बात की ? आज तो हम दिवालियों-जैसा व्यापार करते हैं। रुई घरमें होनेके बावजूद उसे परदेश भेजते हैं और हाथका धन्धा होनेपर भी हाथ चलाने में आलस्य करके विदेशसे मँगवाया हुआ कपड़ा पहनते हैं। जागृति और शुद्धिके इस समय हम अपना आलस्य त्यागकर उद्यमी बनें और खादीके लिए विदेशी कपड़े बहिष्कारको पूर्णतया सफल बनायें ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३९१. काकासाहब'''}}}}
काका भी महादेवके पीछे गये, इसलिए कह सकते हैं कि 'नवजीवन' की ओरसे संघर्षमें ठीक योगदान दिया गया है। लेकिन फिलहाल तो काकाका सम्बन्ध 'नवजीवन' की अपेक्षा विद्यापीठके साथ ज्यादा था; और वे उसके आचार्य थे, इसलिए उनके जेल जानेसे विद्यापीठकी शोभा बढ़ी है। विद्यापीठके कुलपति जेल में हैं, आचार्य जेल में हैं, स्नातक और विद्यार्थी तथा अध्यापकगण जेल जाने अथवा उससे उच्च पद प्राप्त करनेके उम्मीदवार हैं। इससे बढ़कर विद्यापीठका मूल्यांकन और कैसे किया जा सकता है ?
लेकिन अब तो ऐसा समय आ रहा है कि जेल जानेमें प्रशंसाके बदले निन्दा होगी। जब कोई वस्तु सामान्य हो जाती है तो वह प्रशंसाके लायक नहीं रह जाती। हर हालत में प्रशंसा की ही जाये, यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। जिस वस्तुकी हम प्रशंसा करते हैं, हम चाहते हैं कि वह वस्तु सामान्य हो जाये। और जब वह वस्तु सामान्य बन जाती है तब हम उसकी प्रशंसा करना छोड़ देते हैं। एक समय जेल जाना प्रशंसनीय बात समझी जाती थी। अब तो मार खाना, गोली खाना प्रशंसाकी बात हो गई है। इसलिए थोड़े ही समयमें जेल जानेवालोंके सम्बन्ध में लोग शंका करने लगेंगे। वे कहेंगे 'फलाँ आदमी गोली खानेके भयसे जेलमें जा बैठा है।' महादेव और काकाके मामलेमें यही बात प्रतिध्वनित होती जान पड़ती है, और वह उचित भी है।
सच पूछिए तो बात यहींतक नहीं रहती, इससे भी आगे जाती है। किसी भी व्यक्तिको जेल जाने, मार खाने अथवा फॉसीपर चढ़ने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इन सबके लिए अथवा इनसे भी कुछ विशेष हो तो उसके लिए हमें तैयार रहना है। जिनके लिए फाँसीका फन्दा और फूलोंका हार एक समान है वे घरमें रहकर सेवा करें, तो उसकी कीमत फांसीके तख्ते पर चढ़ने जितनी ही है, कदाचित् ज्यादा ही हो फांसी चढ़ने में बहुत मान है। सिर झुकाकर रोज लिखते रहना, हिसाब रखना या रोज विवेकपूर्वक लोगोंकी बातें सुनना और दिशा-निर्देश करना-- इनमें सामान्यतया कोई
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
7hz3f1i0qhah7q8l9zpnfrmzdxt1r8w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५१
250
197494
673164
670022
2026-08-23T06:48:53Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
673164
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||तार: मोतीलाल नेहरूको|४०७}}</noinclude>मान नहीं देखता । लेकिन अनेक बार ऐसे कार्यका मूल्य मौतका आलिंगन करनेकी अपेक्षा अधिक हो सकता है।
काकाका वक्तव्य हमें एक और पाठ भी पढ़ाता है। खेड़ामें होनेवाले अत्याचारों का जो चित्रण किया गया है उसे प्रामाणिक साक्षी कहा जा सकता है। उसमें हमें गुंडाशाहीकी झांकी देखनेको मिलती है। कुछ लोग मार पड़नेपर भाग खड़े हुए, यह बात काकाको चुभी और चुभनी चाहिए भी जब लोग मार पड़ने पर भागनेकी बात बिलकुल भूल जायेंगे तब मार पड़ना अपने-आप बन्द हो जायेगा और उस शक्तिमें से गोली से मरनेकी शक्ति सहज ही उत्पन्न हो जायेगी ।
अपने वक्तव्यमें काकाने एक अन्य बातकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है । खेड़ा में अहिंसाका वातावरण है। किन्तु सभी अहिंसाको हृदयंगम नहीं कर सके हैं। खेड़ाको देखकर ही काकाने बहिष्कारकी मर्यादाके नियमोंकी रचना की है। सब लोग उन्हें देखें, समझें और उन पर अमल करें। सत्याग्रहीके बहिष्कारमें द्वेष अथवा रोषको स्थान नहीं है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३९२. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|जलालपुर<br>
४ मई, १९३०}}
चूंकि १२ तारीखको सोमवार है और सोमवारके दिन मेरा मौनव्रत होता है इसलिए मैं कार्य समितिकी बैठकके लिए १० अथवा १३ तारीखका सुझाय देता हूँ। बेशक पहले की तारीख ज्यादा अच्छी रहेगी और बैठकके स्थानके रूपमें मैं जलालपुरका सुझाव रखता हूँ ।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''हिन्दू,''' ६-५-१९३०}}
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
29eg39ss0o6wbyd1lxmanmi7cle69uj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४५२
250
197495
673165
670023
2026-08-23T06:54:17Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
673165
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३९३. पत्र : वाइसरायको'''}}}}
{{Right|[४ मई, १९३० ]<ref>१. यह पत्र गांधीजी ने अपनी गिरफ्तारी से कुछ ही समय पहले लिखा था ये ५ मईको रातके १२ बजकर ४५ मिनटपर गिरफ्तार हुए थे।</ref>}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
ईश्वरकी इच्छा हुई तो मेरा इरादा अपने साथियोंके साथ ... को यहाँसे चलकर .. को धरासणा पहुँचकर वहाँके नमक- कारखानेका कब्जा देनेकी माँग करनेका है। लोगोंको बताया गया है कि धरासणा कारखाना निजी सम्पत्ति है। यह बिलकुल झूठ है। सरकारका जितना नियन्त्रण वाइसराय हाउस पर है उतना ही इस कारखाने पर भी है। अधिकारियोंकी अनुमति विना वहाँसे चुटकी भर नमक भी नहीं लिया जा सकता।
इस आक्रमणको -- कौतुकवश और दुष्टतापूर्वक कुछ हलकों में हमारी इस प्रस्ता-वित कार्रवाईको आक्रमण ही कहा गया है। -- आप तीन उपायोंसे रोक सकते हैं:
१. नमक- करको समाप्त करके;
२. मेरे और मेरे साथियोंको गिरफ्तार करके, बशर्ते कि जितने लोग गिरफ्तार हों, मेरी आशाके विपरीत उनका स्थान लेनेके लिए देश और स्वयंसेवक मुहैया न कर सके;
३. केवल गुंडागर्दी के जोर पर, बशर्ते कि मेरी यह आशा फलवती न हो कि इसमें जिन सत्याग्रहियोंके सिर फूटते हैं और इस तरह जो कुछ भी करनेमें असमर्थ हो जाते हैं, उनका स्थान लेने के लिए नये लोग आगे आ जायेंगे ।
हमने यह कदम उठानेका फैसला बहुत हिचकके साथ किया है। मैंने आशा की थी कि सरकार सत्याग्रहियों का मुकाबला सभ्य तरीकेसे करेगी। यदि सत्याग्रहियोंसे निबटने में सरकारने कानूनकी सामान्य प्रक्रियाका पालन करनेका खयाल रखा होता तो मेरे पास कहने को कुछ न होता। इसके बजाय, जहाँ जाने-माने नेताओंके साथ कानूनी औपचारिकताका कमोवेश निर्वाह किया गया है, साधारण लोगोंके साथ अकसर बर्बरतापूर्ण और कभी-कभी तो अशोभन व्यवहार भी किया गया है। यदि ऐसा कुछ छिटपुट मामलोंमें ही हुआ होता तो इस बातको नजरअन्दाज किया जा सकता था। लेकिन बंगाल, बिहार, उत्कल, संयुक्त प्रान्त, दिल्ली और बम्बईसे प्राप्त विवरणोंसे पता चलता है कि सर्वत्र वही तरीका अपनाया गया है जो गुजरातमें अख्तियार किया गया है और गुजरातमें बरती गई बर्बरताके तो मेरे पास पर्याप्त प्रमाण हैं। शायद आपको भी लगेगा कि कराची, पेशावर और मद्रासमें बिना उत्तेजनाके और बेवजह गोलियोंकी बौछार की गई। स्वयंसेवकोंसे नमक --- जिसका सरकारकी दृष्टिमें कोई
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
bx7z0tro54d5v5f70sr11kk4bfqt5em
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६६
250
197665
673186
670377
2026-08-23T08:57:54Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673186
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''४१. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>१८ जुलाई, १९३०}}
चि० नारणदास,
इस सप्ताहके प्रेमपत्रोंका पुलिन्दा कल शामको मिला। और पत्रोंका जवाब तो मौनवारको ही लिखूँगा। यह तो इसलिए लिख रहा हूँ कि पत्रोंको या तो कपड़ेके लिफाफेमें डाला करो या उसके चारों ओर मजबूत डोरी बाँधो। सब पत्र निकल कर गिरनेकी हालतमें थे। रुई १६ तारीखको मिली।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
चि० नारणदास गांधी<br>सत्याग्रह आश्रम<br>साबरमती<br>बी० बी० [एंड] सी० आई० रेलवे
गुजराती (एम० एम० यू०/१) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|'''४२. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>१८ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० प्रभावती,}}
अनेक सप्ताह बाद मुझे तेरा पत्र मिला, निश्चिन्त हुआ।
मेरी तबीयत अच्छी है। वजन १०३-४ तक रहता है। भोजनमें दूध, दही, मुनक्का, खजूर और खट्टा नींबू है। मेरी चिन्ता न करना। मैं रोज ३७५ तार कातता हूँ। सीना भी सीख लिया है। काकासाहब साथ हैं।
तू जो लिखना चाहे सो लिखना।<br>पिताजी गाँव-गाँव जाते हैं क्या ?<br>जयप्रकाशको आशीर्वाद।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३६५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
83uqr9ky9mykpi0k08dma1wbl9qwcda
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६७
250
197666
673188
670378
2026-08-23T09:02:16Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673188
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''४३. पत्र : शिवाभाईको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० शिवाभाई,}}
तुम्हारा पत्र मिला। भगवानका यह निरपवाद वचन है कि जो जिसे भजता है वह उसे प्राप्त होता है। हम निर्विकार और पूर्ण त्यागमय सेवाभाव पानेकी कामना करते हैं। इसलिए यदि यह भावना हमारे मनमें जाग्रत नहीं होती तो भगवानका वचन मिथ्या हो जाता है; या फिर हमारी भावना ही सच्ची नहीं होगी। अतः हम तो श्रद्धापूर्वक अपनी साधनामें तन्मय रहें।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० १४९९) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''४४. पत्र : दूधीबहन देसाईको'''}}
{{Right|१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० दूधीबहन,}}
तुम्हारा पत्र मिला। अब तुम आश्रम पहुँच गई होगी। क्या तुम बालजीसे मिलती हो? उनकी तबीयत कैसी रहती है? अब जब मिलो तो उनसे कहना कि मुझे उनकी बहुत याद आती है। अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना।
हरिइच्छा तथा अन्य लोग क्या कर रहे हैं?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०४) की फोटो-नकलसे।
:सौजन्य : बा० गो० देसाई<noinclude></noinclude>
s3bpt56xzwjy8fcn50ov4k4pupamei7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६८
250
197667
673211
670379
2026-08-23T09:51:54Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673211
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''४५. पत्र : अमीना कुरेशीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० अमीना,}}
तेरा पत्र मिला। अब्बा और कुरेशी जेलमें हैं। तू भी वहाँ जाना चाहती है; किन्तु तू आश्रममें है, अतः वही समझ कि तू भी इस लड़ाईमें शामिल है। खुदा हमें जहाँ और जिस हालतमें रखे हम उसीमें सन्तोष मानें, इसमें बहुत-कुछ आ जाता है। तुझे उर्दूकी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए। गिरिराजजी तुझे सिखा सकेंगे। अब्बा या कुरेशी, जिनसे भी तू मिले उनसे कहना कि मैं किसीको भूल नहीं सकता।
{{Right|बापूकी दुआ}}
गुजराती (जी० एन० ६६५७) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र मिला। काकूको ठीक अनुभव हो रहा है। रमीबाईको पत्र लिखना और मुझे लिखनेको भी कहना। उसे और कामदार <sup>१</sup>को अक्सर याद करता हूँ।
शंकरलालसे तुमने ठीक ही कहा। अन्त्यज आयें तो हम उन्हें अवश्य लें।
फल लेनेमें कंजूसी करके स्वास्थ्य न बिगाड़ लेना।
काकासाहब की खुराक तो तुमने देखी होगी। उसमें किसी तरहके फेरफारका सुझाव देना हो तो लिखना। उनका स्वास्थ्य तो अच्छा ही रहता है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ गुजरातीसे ]
'''बापुना पत्रो – ६ : गं० स्व० गंगाबहनने;''' सी० डब्ल्यू० ८७५३ से भी। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
<small>१. रमीबाईके पति।</small><noinclude></noinclude>
0l1uaqh3jkpnldgglwdsm4mjouxz9g7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६९
250
197668
673213
670380
2026-08-23T10:00:04Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673213
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''४७. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० प्रेमा,}}
तेरा विनोदपूर्ण और समाचारोंसे भरा हुआ पत्र मिला। ऐसे ही लिखती रहना। मुझे उम्मीद है मैं यहाँ बीमार नहीं ही होऊँगा। मुझे कुछ हो गया है, यह मानकर कठिन समयमें मेरी सहायता करनेवाली प्रेमा और वसुमतीको कहाँसे लाऊँगा? मेरा वजन कम हो जानेकी बातको गलत समझना। मेरी तबीयत निस्सन्देह अच्छी है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७४) से। सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन० १०२२६ की फोटो-नकलसे भी।
{{c|'''४८. पत्र : लालजी परमारको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० लालजी,}}
मैं और काकासाहब तेरा लम्बा पत्र पढ़कर प्रसन्न हुए। भविष्यमें स्याहीसे लिखना। खूब मेहनत करना। सत्य तथा अपनी मर्यादा कभी मत छोड़ना। तुझे खुद तो सुबह ठीक चार बजे उठनेकी आदत बना लेनी चाहिए। इसका पूरा लाभ तू भविष्यमें समझ सकेगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|[ पुनश्च : ]}}{{smallrefs}}
मामासाहब से मुझे पत्र लिखनेको कहना।
गुजराती (जी० एन० ३२९४) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
kgourv4i4q8u2i8iyfjps6kuqy8gw57
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७०
250
197669
673222
670381
2026-08-23T10:10:45Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673222
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''४९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० मथुरादास,}}
{{Gap}}हम दोनों तुम्हारा पारिभाषिक कोष पढ़ गये। मैं एक संशोधन सुझाना चाहता हूँ। बैठकमें पीठको पालथीके दायीं ओर रखना ही काफी नहीं है। दायें पैरके पंजेको बाएँ पैरके बीच तक ले लेना जरूरी है, नहीं तो पैर जाँघ या गुल्फसे टकरायेगा। इस बारेमें विचार करना। यदि हो सका तो अन्य आासनोंके सम्बन्धमें भी विचार करूँगा। पूर्णता तक पहुँचनेका तुम्हारा उत्साह मुझे बहुत रुचता है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३०४०) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''५०. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० रमा,}}
तुम्हारा पत्र मिला। सुन्दर है। तुमने अपने ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी ली है। लेकिन मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारी शक्तिके बाहर नहीं है। और हम वह श्लोक भी तो जानते हैं जिसमें कहा गया है कि जो अनन्य भावसे भगवानका चिन्तन करते हैं उनके योगक्षेमकी चिन्ता भी वही करता है।<sup>१</sup> फिर हमें किस बातकी चिन्ता? वहाँ तुम्हें प्रार्थनाका समय बदलना पड़ा है, सो ठीक ही है। सब बहनोंको आशीर्वाद।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ५३२२) की फोटो-नकलसे।
<small>१. भगवद्गीता, ९. २२।</small><noinclude></noinclude>
bo621mzszd69nncddwv28y6a1i2uqeh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७१
250
197670
673225
670382
2026-08-23T10:19:08Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673225
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''५१. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Right|२० जुलाई, १९३०}}
'''दुआरा नहीं पढ़ा'''
{{Left|चि० मीरा,}}
तुमने मिलनेसे इनकार करते हुए मुझे कष्ट हुआ था।<sup>१</sup> लेकिन मैंने ठीक किया था, इसका प्रमाण अगले दिन सुबह मिला। सरकारने मेरा प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है और इसलिए अब मुलाकातें नहीं हो सकतीं। अपने दृष्टिकोण पर आग्रह करना मेरे लिए अयोग्यही होगा। उन्हें, जैसाकि दुनिया भरमें अभी भी माना जाता है या उनके काफी बाद तक किया जाता था, बंदियोंको हर सुविधासे वंचित करनेका अधिकार है। पयोंकि आदान-प्रदानकी अनुमति है, वही काफी है। लेकिन तुम मानोगी कि यह भी अनिश्चित ही है। किसी भी क्षण वे पत्र-व्यवहार रोक सकते हैं या ऐसी शर्तें लगा सकते हैं जो स्वीकार्य न हों। आत्म-त्यागसे हमारा तो लाभ ही हो सकता है। इसलिए मुलाकातें बन्द होनेसे किसी प्रकारका क्षोभ होनेकी जरूरत नहीं है। आत्माका आत्मासे मिलाप हो, यह ज्यादा अच्छा है। इस सुखद सम्पर्कको पृथिवीकी कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
अब तुम जो उपहार छोड़ गई हो, उसकी बात। इसमें छोटी-छोटी चीजें भेजनेमें भी जो असाधारण सावधानी बरती गई है, वह मैंने देखी। मैंने नये चरखेका इस्तेमाल तुरंत ही शुरू कर दिया था। इसलिए आज उसके इस्तेमालका दूसरा दिन था। आज रविवार है; कौंत आरम्भ कर चुका हूँ। वह फ्रेम गहरा तो है, लेकिन जितना बुद्धिमत्तापूर्ण होना चाहिए उतना नहीं है। तुम्हारे चरखेसे परिश्रम कम नहीं हुआ है। जैसाकि मैंने मथुरादासको बताया, वह काम लगभग एक ही आसानमें पाँच घंटे तक बैठनेमें है। यदि मैं घंटोंमें कमी करके उतना ही उत्पादन कर सकूँ तो वह दूसरी बात होगी। यह चीज नये चरखेसे सम्भव नहीं लगती। नये चरखेको चलानेमें बाएँ हाथ पर मेहनत पड़ती है क्योंकि इसे चलाते समय हाथको दूर ले जाना पड़ता है और उठाना भी पड़ता है। इसके विपरीत ऐसी करकेमें हाथ सब स्तर पर रहता है और शरीरकी ओर आता है। इसके सिवा, जबतक मैं न चाहूँ तबतक तुम्हें ऐसी चीजों पर अपना समय और कुशल कारीगरोंका समय नहीं लगाना चाहिए। मुझे इतना स्वस्थ तो होने ही देना चाहिए कि मैं अपनी देख-रेख कर सकूँ और अपनी जरूरतें बता सकूँ। तीसरे, ऐसी करके पर में जितना बारीक सूत निकाल सकता हूँ उतना इसपर अभी नहीं निकाल सका हूँ। परिणाम है ५० अधिक पूनियोंका इस्तेमाल — वह राष्ट्रीय अपव्यय है। तथापि आलोचना बहुत हो चुकी। इसने प्रेममें
<small>१. देखिए "पत्र : मीराबहनको", १८-७-१९३०।</small><noinclude></noinclude>
7who43waftl4e8gkb8wbvcd4lc63swl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७२
250
197671
673228
670383
2026-08-23T10:24:21Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673228
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पगी चीजको मैं यूँ ही नहीं छोड़नेवाला हूँ। इसलिए मैं इस चरखेका उपयोग जारी रखूँगा और समय-समय पर तुम्हें सूचित करूँगा। तुम होल्डर और धुरीमें किस तेलका प्रयोग करती हो? मालमें तुम कितने-कितने दिनमें राल लगाती हो?
तकलियाँ चला कर मैंने देखी हैं। ये उतनी अच्छी नहीं हैं जितनी कि यहाँ बनाई हुई मेरी तकली है। चकरी बहुत बड़ी है और बाँस पर अच्छी पालिश नहीं है। तकलीके छड़कर मोटाई और चकरीकी परिधिके बीच एक निश्चित अनुपात दिखाई पड़ता है। यदि वजनकी कमी हो तो इसकी कमी चकरीको मोटा बनाकर पूरी की जानी चाहिए। अगली बार जब तुम तकली बनाना तो इन बातोंको ध्यानमें रखना और अपनी राय मुझे लिखना।
मेरे स्वास्थ्यके बारेमें बतानेको नया कुछ नहीं है। वजन स्थिर है।
दौरेंमें अपने शरीरके साथ मनमानी मत करना।
भजनोंके अनुवादमें मैं और अधिक समय लगा रहा हूँ। मैंने अब संस्कृत श्लोकोंका अनुवाद खत्म कर दिया है और भजनोंका कर रहा हूँ।
हरिप्रसादको मेरा प्यार कहना।
सप्रेम,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०३) से;
सौजन्य: मीराबहन; जी० एन० ९६३५से भी।
{{c|'''५२. पत्र : पैट्रिक क्विनको'''<sup>१</sup>}}
{{Right|२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय श्री क्विन,}}
संलग्न पोस्टकार्ड, आप देखेंगे, प्राप्ति-सूचना मात्र है। क्या आप इसे डाकमें डलवा देंगे? क्या आपने सेवक मँगवानेके लिए ऑर्डर दे दिया था?
{{Right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]}}
<br>'''महात्मा गांधी : सोर्स मैटेरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८४
<small>१. यरवडा सैंट्रल जेलके सुपरिटेंडेंट।</small><noinclude></noinclude>
guwbeapxsxqmfkgddkm0sh6d4v7hpcv
673229
673228
2026-08-23T10:26:08Z
Koyal Singh
6351
673229
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh|३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>पगी चीजको मैं यूँ ही नहीं छोड़नेवाला हूँ। इसलिए मैं इस चरखेका उपयोग जारी रखूँगा और समय-समय पर तुम्हें सूचित करूँगा। तुम होल्डर और धुरीमें किस तेलका प्रयोग करती हो? मालमें तुम कितने-कितने दिनमें राल लगाती हो?
तकलियाँ चला कर मैंने देखी हैं। ये उतनी अच्छी नहीं हैं जितनी कि यहाँ बनाई हुई मेरी तकली है। चकरी बहुत बड़ी है और बाँस पर अच्छी पालिश नहीं है। तकलीके छड़कर मोटाई और चकरीकी परिधिके बीच एक निश्चित अनुपात दिखाई पड़ता है। यदि वजनकी कमी हो तो इसकी कमी चकरीको मोटा बनाकर पूरी की जानी चाहिए। अगली बार जब तुम तकली बनाना तो इन बातोंको ध्यानमें रखना और अपनी राय मुझे लिखना।
मेरे स्वास्थ्यके बारेमें बतानेको नया कुछ नहीं है। वजन स्थिर है।
दौरेंमें अपने शरीरके साथ मनमानी मत करना।
भजनोंके अनुवादमें मैं और अधिक समय लगा रहा हूँ। मैंने अब संस्कृत श्लोकोंका अनुवाद खत्म कर दिया है और भजनोंका कर रहा हूँ।
हरिप्रसादको मेरा प्यार कहना।
सप्रेम,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०३) से;
सौजन्य: मीराबहन; जी० एन० ९६३५से भी।
{{c|'''५२. पत्र : पैट्रिक क्विनको'''<sup>१</sup>}}
{{Right|२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय श्री क्विन,}}
संलग्न पोस्टकार्ड, आप देखेंगे, प्राप्ति-सूचना मात्र है। क्या आप इसे डाकमें डलवा देंगे? क्या आपने सेवक मँगवानेके लिए ऑर्डर दे दिया था?
{{Right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]}}
<br>'''महात्मा गांधी : सोर्स मैटेरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८४
<small>१. यरवडा सैंट्रल जेलके सुपरिटेंडेंट।</small><noinclude></noinclude>
29rmyoxclalhx7oiyvomlzo1rhk24dg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७३
250
197672
673236
670384
2026-08-23T10:49:05Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673236
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५३. पत्र : पैट्रिक क्विनको'''}}
{{Right|[ २० जुलाई, १९३० ]}}
{{Left|प्रिय श्री क्विन,}}
क्या आप कृपया २ पौंड खजूर और २ पौंड किशमिश मँगवा देंगे?
{{Right|हृदयसे आपका,<br>
मो० क० गांधी}}
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]}}
'''महात्मा गांधी : सोर्स मैटेरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८५
{{c|'''५४. पत्र : रतिलाल शाहको'''}}
{{Right|२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाईश्री ५ रतिलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। घटना दुःखद है किन्तु यह सिलसिला तो चलता ही रहता है। मैं तो इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि हमने अकारण ही मृत्युको दुःखका विषय मान लिया है। जिस प्रकार अन्य प्राकृतिक क्रियाएँ आवश्यक और लाभदायक हैं वैसी ही यह क्रिया भी है। अतः आत्माके अस्तित्व या उसके गुणोंको स्वीकार न करनेवालेके लिए भी मृत्युसे डरनेका कोई कारण नहीं है। और जो व्यक्ति आत्मा और उसकी अमरतामें विश्वास रखता है, उसके बारेमें तो कहना ही क्या ? बहन जबकन्ने जिस देहका उपयोग पूरा हो चुका था उसका त्याग किया इसलिए हमें इसे दुःखद बात नहीं माननी चाहिए।
पढ़ने और मनन करने लायक बहुत पुस्तकें दुनियामें मुझे नहीं मिलीं। मेरे लिए 'गीता' और तुलसीदास ही काफी हैं और आधुनिक लेखकोंमें रायचन्दभाई के लेख। किन्तु यदि कोई नई चीज पढ़नेकी इच्छा हो तो किशोरलालका 'जीवन-शोधन' देख जाना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४६५८) से। सौजन्य : नारणदास गांधी; जी० एन० ७१६४ की फोटो-नकलसे भी।
<small>१. साधन-सूत्रमें इस पत्रको जिस क्रममें रखा गया है, उसपरसे इसकी तिथि निर्धारित की गई है।</small><noinclude></noinclude>
76oy24bby6vxlbzamxpsqb39pjpfrbt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०६
250
197805
673239
670533
2026-08-23T11:02:26Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673239
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४०. पत्र: वा॰ गो॰ देसाईको'''}}}}
{{right|२३ सितम्बर, १९३०}}
{{left|भाईश्री वालजी,}}
तुम तो यह जानते ही होगे कि पहले मैं अपनी तिथि ही लिखा करता था, किन्तु बादमें मैंने देखा कि यह तो दुराग्रह है। हिन्दुस्तानके बाहर तो [अंग्रेजी] तारीखका ही प्रयोग किया जाता है, इस बातको जान लेने पर ही समस्या हल हो सकेगी। मुझे ऐसा लगता है कि स्वराज्य मिल जाने पर भी हमें तारीखका प्रयोग करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई पंचांग नहीं है जिसे पूरा हिन्दुस्तान स्वीकार करता हो। प्रत्येक प्रान्तमें लगभग अलग-अलग सम्बत्का प्रयोग किया जाता है। विदेशी-मात्र से हमें कोई द्वेष थोड़े ही है। इसके सिवा और भी दलीलें हैं। फिलहाल तो इतनी बातों पर विचार करके मुझे लिखना कि क्या करना उचित है। आजकल तुम क्या कर रहे हो?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ७४०७) की फोटो-नकलसे सौजन्य: वा॰ गो॰ देसाई
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२४१. पत्र: मोतीबहन चोकसीको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
मंगलवार, [२३ सितम्बर, १९३०]<ref>मूल पत्रपर किसी अन्य व्यक्तिके हाथसे "२५-९-१९३० के आसपास", लिखा हुआ है। इससे पहले मंगलवार इसी तारीखको पड़ा था।</ref>}}
{{left|चि॰ मोतीबहन,}}
तुम्हारे विस्तृत पत्रका संक्षेपमें उत्तर दे रहा हूँ। बीती बातोंका विचार करनेके बजाय हमें उन बातोंका विचार करना चाहिए जो हमारे सामने हैं। आश्रम में जितने लोग रहते हैं उन सबको मेघजी समझकर उनपर प्रेमके मोती बरसाना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७४१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
2qn0upjuqutw4szmcm43hll2sq914mo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०७
250
197806
673241
670534
2026-08-23T11:05:29Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673241
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४२. पत्र: पी॰ जी॰ मैथ्यूको'''}}}}
{{right|२६ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय मैथ्यू,}}
जिन चीजोंके बारेमें तुमने लिखा है उनका निर्णय अन्ततः श्रद्धासे होता है। बुद्धि हमें कुछ दूर तक ही ले जा सकती है। मनुष्य तो एक व्यक्ति होता है, ईश्वर उस अर्थ में व्यक्ति नहीं है। मनुष्यको सही और गलतका ज्ञान है इसीलिए वह पाप करता है। हम अपने तुच्छ पैमानोंसे ईश्वरको नापने की कोशिश करते हैं, यही हमारी कठिनाइयोंका कारण है। वह तो सभी पैमानोंसे परे है।
सप्रेम,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १५५३) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२४३. पत्र: कुसुम देसाईको'''}}}}
{{right|२६ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कुसुम (देसाई),}}
तेरा पत्र मिला। प्यारेलाल के बारेमें मैंने पिछले पत्र में लिखा है। अभी उससे भेंट तो नहीं हुई, लेकिन अब उसके बारेमें समाचार मिल सकते है। भेंट तो अवश्य होगी। साथ रहने की बात देवके अधीन है। जब मैं जेलसे बाहर निकलूँगा तब तो वह मुझे मिलेगा ही और मेरे साथ रहेगा भी। परन्तु भविष्यकी कौन जानता है? काकासाहब नवम्बर के अन्त में छूटेंगे। इतने में तो प्यारेलालकी अवधि भी खत्म होनेको
आ जायेगी न? प्यारेलालने अन्ततः 'गीता' और 'रामायण' का आश्रय लिया और मैं उसकी ओरसे चिन्तासे मुक्त हो गया। अभी तक उसे उनसे सन्तोष क्यों नहीं मिलता था, यह बात मेरी समझ में नहीं आती।
तू स्वयं स्वीकार करती है कि मुझे लिखकर ही तू सुरक्षित रह सकती है। तो मुझे पूरा ब्यौरा लिखा कर।
मैंने पुरानी चप्पलें नहीं माँगीं। नई चप्पलोंके बारेमें तू भूल गई जान पड़ती है। परन्तु अभी तो काम चलता है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ १८०५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
2eyx4nrpg4jtgej5rpl1s6sezz7nfxq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०८
250
197807
673242
670535
2026-08-23T11:06:41Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673242
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४४. पत्र: पन्नालालको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ पन्नालाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम यह जानते हो न कि वर्धामें कुछ लोग तकलीपर एक घंटे में दो सौ तार निकाल सकते हैं। मैं तो यह पढ़कर हक्का-बक्का रह गया था। इतनी गति किस प्रकार आ सकती है, यह वर्धा पत्र लिखकर जान लेना।
वैसे छोटेलालने मुझे इसका पूरा विवरण लिख तो भेजा था।
निराशाको अपने पास मत फटकने देना। निराशामें नास्तिकता निहित है। आस्तिकताका तात्पर्य है आशीर्वाद। तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा रहता है?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३१०५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२४५. पत्र: युक्तिको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ युक्ति,}}
तू पेंसिलसे क्यों लिखती है? जहाँतक हो सके बच्चोंको पेंसिलसे लिखना ही नहीं चाहिए। अब मुझे लिखती रहना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/३) की माइक्रोफिल्म से।<noinclude></noinclude>
a3p6s1gyuuhhgdsvnprdnpza89vnkh3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०९
250
197808
673243
670536
2026-08-23T11:08:09Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673243
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४६. पत्र: विनोद बालाको'''}}}}
{{right|२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ विनोद बाला,}}
तू यह क्यों मानती है कि तू मुझे पत्र नहीं लिखती, इसलिए मैं तुझे याद नहीं करता होऊँगा और तुझे ऐसा भी नहीं मानना चाहिए कि जिन्हें मैं नहीं लिखता उन्हें याद नहीं करता। ऐसे बहुत से लोगोंकी मुझे रोज याद आती है जिन्हें मैं नहीं लिखता। तेरा पत्र बहुत सुन्दर है। लिखावटके बारेमें रामदास स्वामीकी एक कविताका अनुवाद मैंने आश्रमको भेजा था। यदि तूने यह न देखा हो तो मँगवाकर देख लेना। अब मुझे नियमित रूपसे लिखती रहना और बहुत अच्छी बिटिया बनना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
माँसे मेरे आशीर्वाद कहना। क्या अब उसका मन शान्त है?
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰। ३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२४७. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि (पटेल),}}
तूने मुझे हर हफ्ते पत्र लिखनेको तो कहा है परन्तु वह मिलेगा क्या? तू लिख सकेगी या नहीं, इस बारेमें भी शंका है। देखना शरीरको सँभालना। प्रत्येक क्षणका सदुपयोग करना और हिसाब रखना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो–४: मणिबहेन पटेलने'''}}<noinclude></noinclude>
k80c0fmlmuzeypxai5eaecv5vsgpq7l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१०
250
197809
673244
670537
2026-08-23T11:09:30Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673244
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४८. पत्र: लीलावती आसरको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ लीलावती (आसर),}}
तेरा पत्र मिला। मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि जबतक तेरा शरीर स्वस्थ न हो जाये तबतक तुझे आश्रम में रहते हुए सेवा-कार्य करना चाहिए। यदि खुर्शेदबहन तुझे बुलायेंगी तो नारणदासभाई तुझे रोकेंगे नहीं। स्वयंसेविका को तो जहाँ जो काम मिले उसीमें आनन्द आना चाहिए। तू अपनी इच्छासे या आलस्यके कारण थोड़े ही आश्रममें पड़ी हुई है? और आश्रम यदि सेवा-स्थल नहीं तो फिर क्या है?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ९५६७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२४९. पत्र: मणिबहन परीखको'''}}}}
{{right|२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मणिबहन,}}
ऐसा लगता है कि नरहरि और रमणीकलालको जेल ठीक फली है। मोहनको बुखार कैसे आ गया? तू उसके खाने-पीने पर निगाह रखती है क्या?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५९६१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
tsowpyc28hjtl5zfbhfvpzn7dpukssu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२११
250
197810
673246
670538
2026-08-23T11:10:47Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673246
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५०. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको'''}}}}
{{right|२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ पण्डितजी,}}
कदम-कदम चढ़ना ही मेरे लिए उचित होगा, अन्यथा गिर पड़ूँगा। तिसपर यदि मैं तुम्हें 'नारायण' लिखने और पुकारने लगूँ और मोक्ष मिल जाये तो कैसा हो?
तुम्हें भाषण देने पड़ते हैं, किन्तु यह भी एक अच्छा अनुभव है। सभी कार्य-कर्त्ताओंको तरह-तरहके अनुभव हो रहे हैं और वे उनसे लाभान्वित हो रहे हैं। यदि तुम्हें रामभाऊके बारेमें कोई समाचार मिले, तो मुझे लिखना। उन तीनोंके आश्रमसे जानेके बाद मुझे कोई समाचार नहीं मिला है।
गुजराती (सी॰ डबल्यू॰ २११) की फोटो-नकलसे। सौजन्य: लक्ष्मीबाई खरे
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५१. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तेरा पत्र मिला। हम अकेले पड़ जायें, कोई हमें न पुकारे, कोई हमारी न सुने और भले होनेके बावजूद लोग हमें गालियाँ दें, और इतने पर भी यदि हम मुस्कराते रहें और प्रसन्न रहें तो इसीको सच्चा आनन्द कहा जा सकता है। संसार भले ही हमारी निन्दा या स्तुति करे, किन्तु इन बातोंका स्पर्श तक हमें अपनी आत्मासे नहीं होने देना चाहिए। यह स्थितप्रज्ञ-सम्बन्धी उन श्लोकोंका अर्थ है जिनका
हम नित्य पाठ करते हैं। नित्य नियम और श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करनेसे किसी दिन हम उसे आत्मसात् कर लेंगे।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२८९) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
b93spn1io2vlc72q7urtg7ryq4kyxk1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१२
250
197811
673248
670539
2026-08-23T11:12:33Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673248
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५२. पत्र: गंगाबहन झवेरी और नानीबहन झवेरीको'''}}}}
{{right|२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन और नानीवहन,}}
तुम दोनोंके पत्र मिले। मैं तुम दोनोंको हर हफ्ते तो याद करता ही हूँ, किन्तु बादमें तुम्हें पत्र लिखनेका विचार छोड़ देता हूँ। एक प्रकारसे मैं तुम दोनोंकी एक आदर्श जोड़ी मानता हूँ। तुम दोनों सास-बहू नहीं बल्कि सगी बहनोंसे भी बढ़-चढ़ कर हो। ऐसा वातावरण तैयार करनेमें पन्नालालका भी हाथ तो है ही। किन्तु यदि तुम दोनों ऐसी न होतीं तो वह क्या कर पाता? अभी तो हमें बहुत आगे बढ़ना है; और तुम तीनों आगे बढ़ने योग्य भी हो ही भाई पानाचन्दसे कहना कि उनका तार मुझे मिल गया था।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३१०४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५३. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुमपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। प्रभु तुम्हें यह बोझ उठानेकी शक्ति दे। अम्बालालने<ref>अम्बालाल चतुरभाई पटेल, जो उस समय काकासाहब कालेलकरके शिष्य थे।</ref> काकासाहब को लिखा है। काकासाहब मजे में हैं। कातते हैं, पींजते हैं, नियमपूर्वक घूमने जाते हैं, नियमपूर्वक खाते हैं।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
रमीबाई जो चाहती थी वह उसे मिल गया है।<ref>रमीबाई गिरफ्तार हो गई थीं।</ref> बहुत शोभा देता है।
[गुजरातीसे]
'''बापुना पत्रो-६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने;''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७५९ से भी।
{{left|सौजन्य: गंगाबहन वैद्य}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
61yfw7llnohztkzykd7xk1lnrovki22
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१३
250
197812
673250
670540
2026-08-23T11:13:38Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673250
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५४. पत्र: रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ रेहाना,}}
तेरा पत्र मिला। तेरा स्वास्थ्य पहलेसे कुछ अच्छा है; यह जानकर प्रसन्नता हुई। जब तू कमलादेवीको पत्र लिखे तो लिखना कि मैं उसे प्रायः याद करता हूँ। बाबाजानसे कहना कि पूरी 'सीरत' का अनुवाद अच्छा नहीं लगेगा, बल्कि यदि उसके मुख्य-मुख्य अंशोंका अनुवाद दिया जायेगा तो अच्छी पुस्तक बन जायेगी। मौलाना शिबलीने मुसलमानोंको ध्यानमें रखकर 'सीरत' लिखी है और यह उचित भी है,
किन्तु आम लोग ऐसी पुस्तकका अनुवाद नहीं पड़ेंगे। अमीर अली, मौलवी मुहम्मद अली कादियानी, वाशिंगटन इविंग और कार्लाइल की पुस्तकें तो हमारे पास है। इसमें यदि मौ॰ शिबलीकी पुस्तकका संक्षिप्त अनुवाद और जोड़ दिया जाये तो इससे [हमारे साहित्य में] एक अच्छी पुस्तककी वृद्धि होगी रामदास लिखता है कि बाबाजान दिन-दिन जवान होते जा रहे हैं, छः-छः घंटे लिखनेमें मेहनत करते हैं और उनकी स्मरण-शक्ति बड़ी है। यदि ऐसा है तो उनकी दाढ़ी सफेद हो जानेसे क्या हुआ? और तिसपर महादेवको फ्रेंच सिखाते हैं। उनसे किसे ईर्ष्या न होगी? तुम दोनों माँ-बेटीने
खेड़ा जिलेमें खूब काम किया और वह हमीदा सूरत जिलेको गुँजाये हुए है।
खुदा हाफिज।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
क्या मेरी लिखावट पढ़ने में तुझे मुश्किल होती है?
गुजराती (एस॰ एन॰ ९६२१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
gx0bewh5x03juv7blyvajj4drl8zovr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१४
250
197813
673251
670541
2026-08-23T11:14:29Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673251
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५५. पत्र: जयप्रकाश नारायणको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ जयप्रकाश,}}
तुमारी शरी [र] प्रवृत्ति अच्छी नहिं रहती ऐसा प्रभावती लिखती है। इतना जान पानेके बाद शरीर क्यों बिलकुल दुरुस्त नहि बन सकता? इस बारेमें प्रयत्न करना आवश्यक है। अब क्या करते हो।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ३३७४ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५६. पत्र: कलावती त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ कलावती,}}
तुमारा खत पाकर आनंद हुआ। ऐसे हि नियम पालनमें दृढ़ रहो। भले निदा करना है वह करते रहें। ऐसे लोगों पर क्रोध भी मत करो परंतु प्रेम करो।
अक्षरमें सुधारके लिये काफी स्थान है। प्रयत्नसे अक्षर अच्छे बन सकेंगे।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ५२५२ की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
hv84djvlws961qao1kne64eqnmbl5ju
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३७
250
198036
672827
670769
2026-08-22T12:04:27Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672827
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|
३९९}}
२६
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस् तत् कवयो वदन्ति ॥
{{C|[ कठ, १. ३. १४ ]}}
{{Rh|||३१-५-१९३०}}
{{Rh|||
१-६-१९३०}}
२७
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूप
एकस् तथा
रूपं रूपं
प्रतिरूपो बभूव ।
सर्व भूतान्तरात्मा
प्रतिरूपो वहिश् च ॥
{{C|[कठ, २५.९}}
वायुर्
यसैको
रूपं रूपं
{{Rh|||२-६-१९३०}}
२८
भुवनं प्रविष्टो
प्रतिरूपो बभूव ।
एकस् तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश् च ॥
२९
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्
एकस्
न लिप्यते चाक्षुर् बाह्यदोषः ।
सर्वभूतान्तरात्मा
तथा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाहाः ॥
{{Rh|||३-६-१९३०}}
३०
एको वशी
सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तम् आत्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्
तेषां सुखं शादयतं; नेतरेषाम् ।।
{{Rh|||४-६-१९३०}}<noinclude></noinclude>
0bdbm3zhu3yk5tsiygoc5wq9ywqc4rn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३८
250
198037
672828
670770
2026-08-22T12:07:10Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672828
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४००|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
३१
नित्योऽनित्यानां चेतनश् चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तम् आत्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्
तेषां शान्तिः शाश्वतो; नेतरेषाम् ॥
{{Rh||[ कठ, २. ५. १०-१३]}}
परीक्ष्य
लोकान्
३२
कर्मचितान्
ब्राह्मणो निर्वेदम् आयान् 'नास्त्यकृतः कृतेन '।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छत्
समित्पाणिः
श्रोत्रियं
ब्रह्म-निष्ठम् ॥
{{C|[ मुंडक, १.३. ११, १२]}}
३३
{{Rh|||६-६-१९३०}}
तस्मै स विद्वान् उपसन्नाय सम्यक्
प्रशान्त-चित्ताय
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्
शमान्विताय ।
प्रोवाच तो ततो
ब्रह्मविद्याम् ।।
{{C|[ मुंडक, १.२.१]}}
{{Rh|||७-६-१९३०}}
३४
प्रणव धनुः शरोह्यात्मा, ब्रह्म तत् लक्ष्यम् उच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यम् शरवत् तन्मयो भवेत् ।।
{{C|[ मुंडक, २. २.४]}}
३५
{{Rh|||८-६-१९३०}}
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥
{{C|[ मुंडक, २. २.८]}}
{{Rh|||९-६-१९३०}}<noinclude></noinclude>
iwo2vps46el8dwrh9n988yjcdvtd622
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३९
250
198038
672829
670771
2026-08-22T12:13:14Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672829
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४०९}}
३६
ब्रह्मैवेदम्
अमृतं पुरस्ताद् ब्रह्म
पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश् चोत्तरेण ।
अथश् चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मवेदम्
विश्वम्
इर्द
वरिष्ठम् ।।
{{C|[ मुंडक, २.२.११]}}
{{Rh|||१०-६-१९३०}}
३७
सत्येन लभ्यस् तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।।
{{Rh|||११-६-१९३०}}
३८
सत्यम् एव जयते, नानृतम्
सत्येन पन्था
विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्ति ऋषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ।।
{{C|[ मुंडक, ३. १.५, ६]}}
नायम् आत्मा
न
मेघया
{{Rh|||१२-६-१९३०}}
३९
प्रवचनेन लभ्यो
न बहुना श्रुतेन ।
यम् एवैष वृणुते तेन लभ्यस्
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।
{{Rh|||१३-६-१९३०}}
नायम्
४०
आत्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात् तपसो वायलिंगात् ।
एतैर् उपायर् यतते यस्तु विद्वांस्
तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।
{{C|[ मुंडक, ३. २.३, ४]}}
{{Rh|||१३-६-१९३०}}<noinclude></noinclude>
4jeahex7u9s5kaom7d8r8fgcvpbu8t0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४०
250
198039
672830
670772
2026-08-22T12:17:03Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672830
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४०२|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
४१
सम्प्राप्यैनम् ऋषयो ज्ञान-तृप्ताः
कृतात्मानो वीतरागाः
प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य
धीरा
युक्तात्मानः सर्वम् एवाविशन्ति ।।
४२
वेदान्त - विज्ञान-सुनिश्चितार्थाः
संन्यास-योगाद् यतयः शुद्ध-सत्वाः ।
ते
ब्रह्म-लोकेषु
परामृताः
परान्तकाले
परिमुच्यन्ति
सर्वे ॥
{{Rh||[ मुंडक, ३.२.५, ६]}}
यथा
नद्यः
४३
स्यन्दमानाः समुद्रे
अस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्त:
परात्परं पुरुषम् उपैति दिव्यम् ॥
१४-६-१९३०
{{Rh|||१५-६-१९३०}}
૪૪
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद, ब्रह्मैव भवति ।
नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं, तरति पाप्मानम्
गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ।।
{{C|[ मुंडक, ३. २. ८, ९]}}
४५
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ।।
एतं हि वाव न तपति 'किम् अहं साधु नाकरवम् ।
किम्
अहं
१६-६-१९३०
{{Rh|||१७-६-१९३०}}
पापम्
अकरवम्' इति ॥
{{C|
[ तैत्तिरीय, २. ९]}}
{{Rh|||१८-६-१९३०}}<noinclude></noinclude>
kbz97rni184yb7j4rbspw10781tvmrc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४१
250
198040
672833
670773
2026-08-22T12:20:40Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672833
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४०३}}
४६
युवा स्यात् साधु युवाध्यायकः आशिष्ठोद्ररिष्ठो बलिष्ठः ।
तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् ।।
{{C|[ तैत्तिरीय, २. ८ ]}}
४७
{{Rh|||१९-६-१९३०}}
अनृतदर्शी । सभा: समाजांश्चागन्ता ।
अजनवादशीलः । रहः शीलः । गुरोरुदाचारेष्वकर्ता स्वैरिकर्माणि । स्त्रीषु यावदर्थ-
संभाषी । मृदुः । शान्तः । हीमान् । दृधृतिः ।
अग्लास्तुः । अक्रोधनः । अनसूयः । सायं-
प्रातरुवकुम्भमात् । अरण्यादेधानाहृत्याथो निदध्यात् ।।
{{Rh|||२०-६-१९३०}}
४८
बलं वाव विज्ञानाद् भूयः; अपि ह शतं विज्ञानवताम् एको
बलवान् आकम्पयते । स यदा बली भवति अथोत्थाता
भवति, उत्तिष्ठन् परिचरिता भवति, परिचरन् उपसत्ता
भवति, उपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति, मन्ता
भवति, योद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवति ॥
{{Rh|||[ छान्दोग्य, ७ ८ १ |}}
४९
मधुवाता ऋतायते । मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर् नः
सन्त्वोषधीः । मधु नक्तम् उतोषसः । मधुमत् पार्थिवं
रजः । मधु चीर् अस्तु नः पिता । मधुमान् नो वनस्पतिः ।
मधुमान् अस्तु सूर्य माध्वीर् गावो भवन्तु नः ।।
{{Rh||[ बृहदारण्यक, ६. ३.६ ]}}
{{Rh|||२१-६-१९३०}}
५०
न जातु कामात् न भयात् न लोभात्
धर्मं त्यजेत् जीवितस्यापि हेतोः ।
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये
जीवो नित्यो हेतुर् अस्य त्वनित्यः ।।
{{Rh|||२२-६-१९३०}}<noinclude></noinclude>
7himvh8pqde71mchn7qu69tcjtfdldz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४२
250
198041
672834
670774
2026-08-22T12:23:22Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672834
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४०४|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
५१
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ।
{{c|[ छान्दोग्य, १. १. १०]}}
५२
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तर्वैर्
वेदैः सांग-पदक्रमोपनिषदैर् गायन्ति यं सामगाः ।
ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥
५३
विद्या मन्दिरकी प्रार्थना
{{Rh||`२४-६-१९३०}}
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतम्
अस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
५४
{{C|[ तैत्तिरीय, २ ( शान्ति पाठ ) ]}}
{{Rh|||२६-६-१९३०}}
ॐ असतो मा सद् गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर् माऽमृतं गमय ।
५५
{{Rh||[वृहदारण्यक, ३,२८]}}
{{Rh|||२७-६-१९३०}}
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचम् इमां प्रसुप्ताम्
संजीवयत्यखिल-शक्ति-धरः स्वधाम्ना ।
हस्त-चरण-श्रवण त्वगादीन्
अन्यांश्च
प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ।।
{{Rh|||२८-६-१९३०}}
५६
स्त्रीवर्गकी प्रार्थना
गोविन्द ! द्वारिकावासिन् ! कृष्ण !
नाथ ! हे
गोपीजनप्रिय !
कौरवः परिभूतां माम् कि न जानासि केशव ।।
रमानाथ! व्रजनाथार्तिनाशन !।
कौरवार्णव-मग्नां माम् उद्धरस्व जनार्दन ॥<noinclude></noinclude>
ra35rcu1fa6i1tbzmdekqsoxczuu678
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४३
250
198042
672835
670775
2026-08-22T12:26:14Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672835
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४४५}}
कृष्ण ! कृष्ण ! महायोगिन् ! विश्वात्मन् ! विश्वभावन
प्रपन्नां
पाहि
गोविन्द !
"
कुरुमध्ये ऽवसीदतीम् ।।
{{Rh|||२९-६-१९३०}}
५७
धर्मं चरत, माध्यमंम् सत्यं वदत, नानुतम् ।
दीर्घ पश्यत मा ह्रस्वम्; परं पश्यत, माऽपरम् ।।
५८
अहिंसा सत्यम् अस्तेयम् शौचम् इन्द्रिय-निग्रहः ।
एतं सामासिकं धर्मम् चातुर्वण्र्येऽब्रवीन् मनुः ।।
{{Rh|||३०-६-१९३०}}
{{Rh|||१-७-१९३०}}
५९
अहिंसा सत्यम् अस्तेयम् अकाम-क्रोध-लोभता ।
भूत-प्रिय-हितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः ।।
{{Rh|||२-७-१९३०}}
३-७-१९३०
६०
विद्यद्भिः सेवितः सद्भिर् नित्यम् अद्वेष-रागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस् तं निबोधत ॥
६१
श्रूयतां धर्म-सर्वस्वम्, श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।
दलोकार्थेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
परोपकारः
पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
६२
आदित्य-चन्द्रावनिलोऽनलश्च
योर् भूमिर् आपो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
धर्मोऽपि जानाति नरस्य वृत्तम् ।।
{{Rh|||४-७-१९३०}}<noinclude></noinclude>
2t2x9yxpw2a2bjxckr4a8r3w3e9v47q
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४५
250
198044
672837
670777
2026-08-22T12:27:54Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672837
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४०७}}
६९
कुन्ती : स्वकर्म-फल- निर्दिष्टां यां यां योनि व्रजाम्यहम् ।
तस्यां तस्यां हृषीकेश ! त्वयि भक्तिर् दृढाऽस्तु मे ।।
७०
द्रोण ये ये हताश् चक्रधरेण राजन् !
त्रैलोक्यनाथेन
जनार्दनेन ।
ते ते गता विष्णुपुरीं
प्रयाताः
क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः ॥
{{Rh|||१२-७-१९३०}}
७१
गान्धारी : त्वम् एव माता च पिता त्वम् एव
त्वम् एव बंधुश्च सखा त्वम् एव ।
त्वम् एव विद्या द्रविणं त्वम् एव
त्वम् एव सर्व मम देवदेव ! ॥
{{Rh|||१४-७-१९३०}}
७२
विराट: नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।।
प्रह्लाद :
नाथ !
योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् ।
तेषु तेष्वचलाभक्तिर् अच्युतास्तु सदा त्वय ।।
या प्रीतिर् अविवेकानां विषयेष्वनपायिनी ।
त्वाम् अनुस्मरतः सा मे हृदयान् मापसर्पतु ॥
भरद्वाज :
लाभस् तेषां जयस् तेषां कुतस् तेषां पराजयः ।
येषाम् इन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥
मार्कण्डेय :
सा हानिस् तन् महच्छिद्रं सा चान्ध-जड मूढता ।
यन्मुहूर्त क्षणं वापि वासुदेवं न चितयेत् ॥
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
q80jgpdgfo4zeefqvrbq05pqy4fxoiw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४६
250
198045
672838
670778
2026-08-22T12:29:55Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672838
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
शौनक :
भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः ।
योऽसौ विश्वम्भरो देवः स भक्तान् किम् उपेक्षते ।।
सनत्कुमार:
आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्व देव-नमस्कारः केशवं प्रति
७३
गच्छति ।।
{{Rh|||१५-७-१९३०}}
मुकुन्दमालासे
श्रीवल्लभेति वरदेति
दयापरेति
भक्त प्रियेति
भव लुण्ठन- कोविदेति ।
नाथेति नाग-शयनेति जगन्निवासे-
त्यालापिनं प्रतिदिनं कुरु मां मुकुन्द ।।
{{Rh|||१५-७-१९३०}}
मुकुन्द
७४
! मूर्ध्ना प्रणिपत्य याचे
भवन्तम् एकान्तम् इयन्तम् अर्थम् ।
अविस्मृतिस् त्वच्चरणारविन्दे
भवे भवे मेऽस्तु भवत्प्रसादात् ।।
नास्था धर्मे न वसु-निचये नैव कामोपभोगे
यद् भाव्यं तद् भवतु भगवन् पूर्व-कर्मानुरूपम् ।
एतत् प्राप्यं मम बहु-मतं जन्म-जन्मान्तरेऽपि
स्वतपादाम्भोरुह युग-गता निश्चला भक्तिर् अस्तु ।।
दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो
नरके वा नरकान्तक ! प्रकामम् ।
| अवधीरित शारदारविन्दी
चरणी ते मरणेऽपि
चिन्तयामि ॥
भव जलधि-गतानां द्वन्द्व वाताहतानाम्
सुत दुहितृ-फल- प्राण-भारावृतानाम् ।
विषम-विषय-तोये मज्जताम् अपल्वानाम्
भवति शरणम् एको विष्णु-पोतो नराणाम् ।।
{{Rh|||१६-७-१९३०}}<noinclude></noinclude>
gae9zyq3bfzbcdt0gx2wsjisbzl1hvi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४७
250
198046
672839
670779
2026-08-22T12:32:01Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672839
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४०९}}
७५
भव- जलधिम् अगाधं दुस्तरं निस्तरेयम्
कथम् अहम् इति चेतो मा स्म गाः कातरत्वम् ।
सरसिज दृशि देवे तावकी भक्तिर् एका
नरक - भिदि-निषण्णा
तारयिष्यत्यवश्यम् ।।
बढेनाञ्जलिना नतेन शिरसा गात्रैः सरोमोद्गमैः
कण्ठेन स्वर- गद्गदेन नयनेनोद्गीर्ण- बाप्पाम्बुना ।
नित्यं त्वच्चरणारविन्द-युगल-ध्यानामृतास्वादिनाम्
अस्माकं सरसीरुहाक्ष! सततं संपयतां जीवितम् ।।
स्थिति मदीये
मुकुन्द पदारविन्द धाग्नि ।
मदन !
परिहर
मनसि
हर-नयन-कृशानुना
शोऽसि
स्मरसि न
चक्र-पराक्रमं मुरारे : ।।
इदं
शरीरं
शत- सन्धि जर्जर
पतत्यवश्यं
परिणाम-पेशलम् ।
क्लिव्यसि
मूढ! दुर्मते !
निरामयं
कृष्ण रसायनं
पिच ॥
{{Rh|||१७-७-१९३०}}
७६
नमामि
करोमि
वदामि
नारायण-नाम निर्मलम्
स्मरामि
नारायण-पाद-पङ्कजम्
नारायण-पूजनं सदा ।
नारायण तत्वम् अव्ययम् ।।
अनन्त !
वैकुण्ठ !
मुकुन्द !
कृष्ण !
गोविन्द !
दामोदर !
माधवेति ।
वक्तुं
समर्थोऽपि
न ववित कश्चिद्
अहो !
जनानां
व्यसनाभिमुख्यम् ।।
{{Rh|||१८-७-१९२०}}<noinclude></noinclude>
m6w796xqomk2owyb5yli7qvexnhdiu3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४८
250
198047
672840
670780
2026-08-22T12:34:55Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672840
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४१०|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
७७
भजन
(सोरठा)
जेहि सुमिरत सिधि होइ,
गण-नायक करिवर वदन ।
बुद्धि- रासि सुभ-गुण-सदन ।।
होइ वाचाल,
करो
अनुग्रह सोइ,
मूक
जासु
कृपासु
पंगु चढ़े गिरिवर गहन ।
दयालु,
द्रवी सकल कलि-मल दहन ।।
{{Rh|||१९-७-१९३०}}
{{C|[ राग टोडी.}}
७८
- द्रुत एक ताल (चार ताल ) ]
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ ।
जासों दीनता कहीं, ह्रीं देखों दीनसोऊ ॥ १ ॥
सुर नर मुनि असुर नाग साहिब तो घनेरे
तोलों, जौलों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल विदित वदति वेद चारी
आदि अंत मध्य राम! साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
तोहि माँगि माँगनो न माँगनो कहायो !
सुनि सुभाउ सील सुजस जाचन जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन, पसु, विटप, विहेंग अपने कर लीन्हें।
महाराज दसरथके ! रंक राय
तू गरीब को निवाज, ह्रीं गरीब
बारक कहिये कृपालु ! 'तुलसिदास'
कीन्हें ॥। ५ ।।
तेरो ।
मेरो ॥६॥
{{Rh|||२०-७-१९३०}}
७९
( राग देस
- ताल दादरा )
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी ।
ह्रीं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ||१||
नाथ तू अनाथको, अनाथ कौन मोसो ?
मो समान आरत नहि, आरत-हरतोसो ||२||<noinclude></noinclude>
la4qeyitubbexrm9iwo3ubstx4xwmz9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५०
250
198049
672841
670782
2026-08-22T12:36:19Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672841
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४१२|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
कुटिल करम लै जाइ मोहि जहाँ जहँ अपनी बरिआई ।
तहँ तहँ जनि छिन छोह छोड़िये कमठ-अण्डकी नाई ॥
या जगमें जहँ लगि या तनुकी, प्रीति प्रतीति सगाई ।
ते सब तुलसिदास प्रभु ही सो होहि सिमिटि इक ठाई ॥
{{Rh|||२४-७-१९३०}}
८३
( राग खमाज तीन ताल)
-
साधव! मोह-पास क्यों टूट ?
बाहर कोटि उपाय करिय अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ॥
घृतपूरन कराह अन्तरगत ससि प्रतिविम्व दिखावे ।
ईंधन अगन
लगाय कल्पसत औटत नास न पावै ॥
तरु कोटर महँ बस विहंग तरु काटे मरे न जैसे ।
साधन करिय विचार-हीन मन सुद्ध होइ नहि तैसे ||
अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पारे ।
मरइ न उरग अनेक जतन वल्मीक विविध विधि मारे ।
तुलसिदास हरि गुरु-करुना विनु, विमल विवेक न होई ।
बिनु विवेक संसार- घोर निधि पार न पायें कोई ।।
{{Rh|||२५-७-१९३०}}
८४
( राग कौशिया
त
तीन ताल )
श्रीरघुबीर दीन हितकारी ।।
आइ बसे बहु चोरा ॥
मानहि नहि विनय निहोरा ।।
मद, क्रोध, बोध-रिपु, मारा ।।
मरदहं मोहि जानि अनाथा ।।
मैं केहि कहीं विपति अति भारी
मम हृदै भवन प्रभु तोरा
अति कठिन करहिं बरजोरा
तम, मोह, लोभ, अहंकारा
अति करहिं उपद्रव नाथा ।
मैं एक अमित बटपारा कोउ सुनै न मोर पुकारा ।।
भागेउ नहि नाथ, उवारा रघुनायक! करहु सँभारा ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहि तस्कर तय धामा ।
चिन्ता यह मोहि अपारा। अपजस नहि होई तुम्हारा ॥
{{Rh|||२६-७-१९३०}}<noinclude></noinclude>
kamc1e8ptpas0r0dc93r6sgreyxk149
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५१
250
198050
672842
670783
2026-08-22T12:38:04Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672842
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh ||रिशिष्ट|४१३}}
८५
( राग आसावरी या टोडी तीन ताल)
ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो वे दीन पर राम सरिस कोड नाही ।।
जो गति योग विराग जतन करि नहि पावत मुनि ग्यानी ।
सो गति देत गीध सबरी कहें, प्रभु न बहुत जिय जानी ।।
जो संपति दस सीस अरपि करि रावन सिव पहें लीन्ही ।
सो संपदा विभीषन कहें अति सकुच सहित हरि दीन्ही ॥
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चासि मन मेरो ।
तौ भजु राम काम सब पूरन करहि कृपानिधि तेरो ।।
{{Rh|||२७-७-१९३०}}
८६
{{C|(राग खमाज तीन ताल)}}
जाके प्रिय न राम वैदेही ।
सो छोड़िये कोटि बेरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी ।
बलि गुरु राज्यो, कंत व्रजवनितनि, भये मुद-मंगलकारी ।।
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आंति जेहि फूटै, बहुत कहाँ कहाँ ह्रीं ॥
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों होय सनेह रामपद, एतो मतो हमारो ॥
{{Rh|||२८-७-१९३०}}
८७
{{C|( राग आसावरी तीन ताल)}}
कौन जतन विनति करिये।
निज आचरन विचारि हारि हिय मानि जाति हरिये ||१||
जेहि साधन हरि बहु जानि जन, सो हठ परिहरिये
जाते विपति जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ||२||
जानत हूँ मन वचन करम परहित कीन्हें तरिये ।
सो विपरीत देखि परसुल विमुकारन ही जरिये ||३||
सुति पुरान सबको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये ।
निज अभिमान मोह इरषा बस तिन्हहिं न आदरिये ॥४॥<noinclude></noinclude>
cy8fwxi8ye34b7i6fpx09g1kt85jltd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५२
250
198051
672843
670784
2026-08-22T12:39:29Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672843
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४१४|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
संतत सोइ प्रिय मोहि सदा जाते भवनिधि परिये
कहो अब नाथ, कौन बल ते संसार-सोग हरिये ॥५॥
जब कब निजु करुना सुभाउते, द्रवहु तो निस्तरिये
तुलसिदास विस्वास आन नहि कत पचि पचि मरिये ॥६॥
८८
{{C|( राग खमाज तीन ताल)}}
जानत प्रीत-रीत रघुराई ।
{{Rh|||२९-७-१९३०}}
नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह सगाई ॥१॥
नेह निवाहि देह तजि दशरथकी रति अचल-चलाई।
ऐसें हु पितु तें अधिक गीध पर ममता गुन गरुआई ||२||
तिय बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई ।
रन पर्यो बंधु विभीषन ही को सोच हृदय अधिकाई ॥३॥
घर, गुरुगृह, प्रियसदन सासुरे, भई जब जह पहुनाई ।
तव तह कहि सबरीके फलनकी रुचि माधुरी न पाई ॥४॥
सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिरनाई ।
केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई ||५||
तुलसी राम सनेह सील लखि जो न भगति उर आई।
त तोहि जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गँवाई ||६||
८९
{{C|(राग पीलू - तीन ताल)}}
रघुवर ! तुमको मेरी लाज ।
सदा सदा में सरन तिहारी, तुम बड़े
पतित- उधारन बिरुद तिहारो स्रवनन
ह्रीं तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो
अघ- खंडन, दुख भंजन जनके यही तिहारो
तुलसिदास पर किरपा करिये भक्ति दान देहू
९०
गरीबनिवाज ।।
सुनी
अवाज ।।
जहाज ।।
काज ॥
आज ||
{{C|[ राग विभास- द्रुत चीताल (एक ताल) ]}}
जागिये रघुनाथ कुँवर ! पंछी बन बोले ॥ध्रु०॥
चंद्र- किरन शीतल भई, चकई पिय मिलन गई,
त्रिविध मंद चलत पवन पल्लव द्रुम डोले ॥१॥
प्रात भानु प्रकट भयो,
भृंग करत गुंज-गान
रजनीको तिमिर गयो
कमलन दल खोले ॥२॥<noinclude></noinclude>
2eas5y6edljpx7lyandy30kwadfaedz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५४
250
198053
672844
670786
2026-08-22T12:41:01Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672844
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४१६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
मिटाई ।
धाई || ४ ||
जिन चरननकी चरन-पादुका भरत रह्यो लव लाई ।
सोई चरन केवट धोय लीने तब हरि नाव चलाई ! ॥२॥
सोई चरन संतन जन सेवत सदा रहत सुखदाई ।
सोई चरन गौतम ऋषि - नारी परसि परम पद पाई ॥३॥
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो ऋषियन त्रास
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनक मुगा सँग
कपि सुग्रीव बंधु-भय-व्याकुल तिन जय छत्र
रिपुको अनुज विभीषण निसिचर परसत लंका पाई ॥५॥
सिव-सनकादिक अरु ब्रह्मादिक शेष सहस मुख गाई ।
तुलसिदास मारुत सुतकी प्रभु निज मुख करत बड़ाई ।। ६ ।।
धराई ।
९४
( राग गौड़ सारंग तीन ताल)
अब लौं नसानी, अब न नर्सहीं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिरि न
पायो नाम
चारु चितामनि डर कर तें न
स्याम रूप सुचि रुचिर कसोटी चित कंचनहि
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज यस है न
मन मधुपछि प्रन करि, तुलसी रघुपति-पद-कमल
{{C|२-८-१९३०}}
उसैहौं ।
खर्सहीं ।
कसैहौं ।
हँसेहीं ।
बसैहीं ॥
{{Rh|||३-८-१९३०}}
९५
( राग पूर्वी तीन ताल)
मन पछिते है अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाई हरिपद भजु, करम, वचन अरु होतें ॥१॥
सहस-बहु दस वदन आदि नृप, बचे न काल वली सें ।
हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते ॥२॥
सुत वनितादि जानि स्वारथ रत न करु नेह सब ही तें ।
अंतहुँ तोहि तजेंगे, पामर ! तू न त
अब ही तें ॥३॥
अब नाथहि अनुरागु जागु जड़, त्यागु दुरासा जीतें ।
बुझे न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, विषय-भोग बहु धीतें ||४||
{{Rh|||४-८-१९३०}}<noinclude></noinclude>
j8n6dgx6rv01t4u8eh0f2f6peh18ru7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५५
250
198054
672845
670787
2026-08-22T12:42:47Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672845
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh ||रिशिष्ट|४१७}}
९६
( राग खमाज तीन ताल)
-
माधव ! मो समान जग माहीं ।
सब विधि हीन मलीन दीन अति लीन विषय कोड
तुम सम हेतु रहित,
मैं दुख सोक विकल, कृपालु, केहि कारन दया न
नाहिन कछु अवगुन तुम्हार, अपराध मोर में
ग्यान भवन तनु दियहु नाथ सोउ पाय न मैं प्रभु
बेनु करील, श्रीखंड वसंतहि दूषन मृषा
सार रहित हतभाग्य सुरभि पल्लव सो कहें कह
सब प्रकार में कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय
तुलसिदास प्रभु मोह संखला छुटिहि तुम्हारे
कृपालु, आरत-हित, ईसहि
कलि
९७
( राग कल्याण - तीन ताल)
नाम कामतरु रामको ।
दलनिहार दारिद दुकाल दुख
दोष घोर धन धामको ॥ ध्रु०॥
नाहीं ॥
त्यागी ।
लागी ।।
माना।
जाना ।
लगावै ।
पायें ।।
मोरे ।
छोरे ।।
नाम
लेत दाहिनो होत
मन
वाम
विधाता
बामको ।
कहत
उलटे
भलो
लोक
मुनीस महेस महातम
सू
परलोक तासु
जाके बल ललित ललामको।
तुलसी जग जानियत नाम ते
नामको
सोच न
कूच मुकामको ||
{{Rh|||-८-१९३०}}
४४-२७
जय
राम
९८
रमा-रमनं
समनं ।
पाहि
जनं ॥
भव-ताप भयाकुल
अवधेस, सुरेस, रमेस, विभो ।
सरनागत मांगत पाहि प्रभो ।।
दस-सीस विनासन बीस भुजा ।
कृत दूरी महा-महि भूरि-रुजा ।।
मेहाबाद- 13.<noinclude></noinclude>
84tjqc98w7wgcpdq5unh5n7tfwt8w75
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५७
250
198056
672847
670789
2026-08-22T12:46:11Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672847
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४१९}}
९९
तुलसी-बोध-मौक्तिक
परहित सरिस धरम नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई ॥
सुमति कुमति
सबके उर बसहीं ।
नाथ
पुरान
जहाँ
सुमति
निगम अस कहहीं ॥
तहें संपति नाना ।
जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना ।।
धन्य सो भूप
नीति जो करई ।
धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥
धन्य परी सोइ जब
सतसंगा ।
धन्य
जन्म
हरिभक्ति
अभंगा ॥
साधु
चरित
सुभ सरिस
कपासू ।
गुनमय फल जासू ॥
निरस विसद
जो सहि दुख
परछिद्र दुरावा ।
वंदनीय जेहि जग जस
जेहिके
जेहि पर
पावा ।।
सत्य सनेहू ।
सो तेहि मिलत न कछु सन्देहू ||
परहित बस जिनके मन माँहीं ।
तिन्ह कहें जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
रघुकुल रीति
सदा
चलि आई।
प्राण जाय बरु वचन न जाई ॥
नहि असत्य
सम
पातक-पुंजा ।
गिरि सम होई कि कोटिक गुंजा ॥
सत्य मूल सब
सुकृत सुहाये ।
वेद-पुरान विहित
मुनि गाये ॥
तुम
समान
मोसम दीन न दीन-हित
अस विचारि रघु वंश मणि
विषम
हरहु
रघुवीर ।
भव-पीर ॥
{{Rh|||७-८-१९३०}}<noinclude></noinclude>
j4nl1kiqhz7xwydeifbnrulr6onxn58
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५८
250
198057
672848
670790
2026-08-22T12:47:59Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
672848
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४२०|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
१००
( राग कल्याण - तीन ताल)
चरन कमल बन्दों हरि राई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे अंधेको सब कछु दरसाई ।।
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलें; रंक चलें सिर छत्र धराई ॥
सूरदास स्वामी करुणामय बार-बार बन्द तेहि पाई ॥
{{Rh|||८-८-१९३०}}
१०१
(राग जयतिथी - तीन ताल)
जैसे राखहु वैसे हि रहीं।
जानत दुःख सुख सब जनके तुम ।
मुखतें कहा कहीं ॥
कबहुँक भोजन लहीं कृपानिधि,
कबहूँ भूख सहीं।
कबहुँक चढ़ तुरंग महा-गज,
कबहुँक भार वहीं ॥
कमल नयन घनश्याम
मनोहर,
अनुचर भयो रहीं।
सूरदास
प्रभु
भक्त कृपानिधि,
तुम्हरे चरन गहीं ।
{{Rh|||९-८-१९३०}}
१०२
( राग आसा ताल दादरा )
दीनन दुख हरन देव सन्तन हितकारी ॥ ध्रु० ॥
अजामील गीध व्याध, इनमें कहो कौन साथ
पंछीको पद पढ़ात, गणिका -सी तारी ॥ १ ॥
ध्रुवके सिर छत्र देत प्रह्लादको उबार लेत ॥
भक्त हेत बांध्यो सेत, लंक-पुरी जारी
संकुल देत रीझ जात, सागपातसों
॥ २ ॥
अघात ।
गिनत नहि जूठे फल, खाटे मीठे खारी ॥ ३ ॥<noinclude></noinclude>
g9z1yrsqabdakbams3xzay31t4ikjvq