विकिस्रोत
hiwikisource
https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.16
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिस्रोत
विकिस्रोत वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
लेखक
लेखक वार्ता
अनुवाद
अनुवाद वार्ता
पृष्ठ
पृष्ठ वार्ता
विषयसूची
विषयसूची वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf
252
158589
673435
631358
2026-08-23T18:04:26Z
सौरभ तिवारी 05
49
[[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] जोड़ी गई
673435
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=१२
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=प्रकाशन विभाग
|Address=दिल्ली
|Year=1965
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist 1=आवरण-पृष्ठ 2to4=- 5=मुखपृष्ठ 6to7=- 8=चित्र 9=मुखपृष्ठ 10=प्रकाशक 11to16=भूमिका 17=आभार 18to19=सूचना 20=चित्र-सूची 21to33=विषय-सूची 34=- 35=1 83to84=चित्र 85=49 341to342=चित्र 343=305 511to512=चित्र 513=473 715to720=-
/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks={{scrollpane|border=1px dashed silver|height=600px|width=320px|
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२३}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२४}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२५}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२६}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२७}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२८}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२९}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३०}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३१}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३२}}
{{पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३३}}}}
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:मातृभाषा दिवस यंत्राभिज्ञानोत्सव २०२२]]
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव मार्च २०२२]]
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव अप्रैल २०२३]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
[[श्रेणी:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव फरवरी 2024]]
[[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
r8x9si9wb97wyd21zc98pijrbfor8se
विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf
252
158636
673436
644391
2026-08-23T18:04:33Z
सौरभ तिवारी 05
49
[[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] जोड़ी गई
673436
proofread-index
text/x-wiki
{{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template
|Type=book
|Title=सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
|Language=hi
|Volume=३०
|Author=[[लेखक:मोहनदास करमचंद गाँधी]]
|Co-author1=
|Co-author2=
|Translator=
|Co-translator1=
|Editor=
|Illustrator=
|Publisher=
|Address=
|Year=
|Key=
|ISBN=
|Source=pdf
|Image=1
|Progress=अ
|Pages=<pagelist
1=आवरण-पृष्ठ
2=-
3=-
4=-
5=मुखपृष्ठ
6=-
7=मुखपृष्ठ
8=प्रकाशक
9=भूमिका
10=भूमिका
11=भूमिका
12=भूमिका
13=आभार
14=सूचना
15=विषय-सूची
16=विषय-सूची
17=विषय-सूची
18=विषय-सूची
19=विषय-सूची
20=विषय-सूची
21=विषय-सूची
22=विषय-सूची
23=विषय-सूची
24=विषय-सूची
25=विषय-सूची
26=विषय-सूची
27=विषय-सूची
28=विषय-सूची
29=विषय-सूची
30=विषय-सूची
31=विषय-सूची
32=विषय-सूची
33=विषय-सूची
34=विषय-सूची
35=विषय-सूची
36=विषय-सूची/>
|Volumes={{सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय संस्करण}}
|Remarks=
|Width=
|Css=
|Header=
|Footer=
}}
[[श्रेणी:मातृभाषा दिवस यंत्राभिज्ञानोत्सव २०२२]]
[[श्रेणी:भारतीय विकिस्रोत संपादनोत्सव अप्रैल २०२३]]
[[श्रेणी:संपूर्ण गांधी वाङ्मय]]
[[श्रेणी:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव फरवरी 2024]]
[[श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]]
[[श्रेणी:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]]
ihg26db3a8arw3xvu82uczgfwv0miio
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६२२
250
159688
673493
508914
2026-08-24T03:47:37Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673493
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''५९०'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}का तिलक स्वराज्य-कोषमें योगदान, ३४-३५, ४४, ५५, २००-१, २१५-१६, २७२, २८६-८७, ३२४, ३९२; -की अंग्रेजी शिक्षा, १५७-५८; -में जागृति, गुजरातकी, ४०, -द्वारा राष्ट्रकी सेवा, २७४; —द्वारा शराबकी दुकानोंपर धरना देना, ४७१}}
{{Outdent|स्वदेशी, ९०-९२, ११२, २६१, ३१७-१८, ३९०, ४३३, ४४३-४४, ४४६, ४७२-७३, ५१८, ५३२; -असहयोग आन्दोलनके कार्यक्रमका ही एक अंग, १५- १६; -एक कर्त्तव्य, ४९०; -और कपड़े के व्यापारी, ३४८-५०; -और कस्तूरबा, ३१७-१८, -और काठिया-वाड़की रियासतें, ४९६-९८; -और खिलाफत, ४७४, ५४२-४३; -और पारसी, २७-२९, ४६९; -और बुनकर, ४०९-१०, ४२०, ५१३-१४; -और महिलाएँ, २०८, २३७-३८, २७२, ३२३-२४, ३२९-३०, ४१२-१३, ४३६-४०, ५१५-१७; -और मिल-मालिक, ३४४-४५; -और मुसलमान, २८; -और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार, ३३३-३४; -और स्वराज्य, २-३, ३२६, ३५३-५५, ३८१, ४१९, ४३१-३३, ४३८, ४७७-७८, ४९०-५००; -और हिन्दू, २८; -कपड़ेका रंग, ४६९-७०; -कपड़े-की कीमत, ४७३, ४८९; -का अर्थ, २-३, ३६, ४९०, ५०४, का प्रचार, ५१३; -का प्रयोग न करनेसे भारतमें निर्धनता, ४५१, ४६९; -का मन्दिरोंमें उपयोग, ११४, २२५; -का महत्त्व, १२३-२४, ४६३-६६, के अंग, ४४२; –के नामसे मिलके बने कपड़ेको बेचनेकी निन्दा, ४००-२, ४२२-२४, ५४०-४१; -के प्रचारमें जोर-जबरदस्ती नहीं, ५१०; -में कलात्मकता, ४६९
{{Multicol-break}}
{{Outdent|स्वदेशी टोपी; -के उपयोगके बारेमें लाहौर-का अनुकरण, ५०७; -पहननेके कारण बरखास्तगी, ३९३-९४; -पननेपर प्रतिबन्ध, १०३, १२१, २०५-७, ५०६-७}}
{{Outdent|स्वदेशी व्रत, ३९०, ४६९, ४७७-७८}}
{{Outdent|स्वराज्य, १४५; -और अस्पृश्यता, २७६- ७७, ३३१-३३, ५२६, ५२९; -और अहिंसा, ३८६; -और आत्मनिर्भरता, १८६; -और खिलाफत, ५४२-५३; -और देशी राज्य, २८५; -और धर्म, ३१६; -और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार, ३४३, ३५३-५५, ३९२-९३, ४३५; -और शिक्षक, २७३-७७; -और स्त्रियाँ, ५००-१; -और स्वदेशी, ३, ३५३-५५, ४१८, ४३१-३३, ४४४, ४७७- ७८, ४९०-५००; -और हिन्दू-मुस्लिम एकता, २२, ४३५, ५२६; -का अर्थ, २३-२५, २८, ५८, ९८, १५२, २७९, ४४०-४१, ५२४-२७, ५४६; -प्राप्त करनेके लिए शर्ते, ७०-७१, ८०, १००-१०१, ११२-१३, १४५; -प्राप्तिका साधन चरखा, ३१, ७४-७६, ७८-७९, ११०, ११९-२०, १६७-६८, २३९, ३१३-१४, ४४५, ४७५, ५४९}}
{{c|'''ह'''}}
{{Outdent|'''ह'''ड़ताल, १४०-४१; -करनेके उपयुक्त अव-सर, ५०-५१, ५६-५७, २३०; -जहाजी कर्मचारियोंकी, २३०}}
{{Outdent|हमीद अहमद, २१८}}
{{Outdent|हरकिशनलाल, लाला, ३०-३२, २४३}}
{{Outdent|हरिश्चन्द्र, २१५, २८४, २९३}}
{{Outdent|हसन इमाम, १४६}}
{{Outdent|हार्डिंग, लॉर्ड, १६१}}
{{Outdent|हॉर्निमैन, बी॰ जी॰, ४२, १०२}}
{{Outdent|हिंसा, -अपनानेसे स्वराज्य-प्राप्ति में देरी, ८३; -अलीगढ़ में, ४५८-५९, ५०३,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
lvq8iwhvr30fevqw3jvgcyn7uhhs8aj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६२३
250
159689
673515
508915
2026-08-24T04:50:50Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673515
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|'''५९१'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}५०९; -और असहयोग, ९७-९८, ४०२-३; और स्वतन्त्रता-संग्राम, १२८; -मालेगाँवमें, ५३, ६८-७१, ८३, ८६, ११३, ११८, १७१-७२, ३६४, ५०३}}
{{Outdent|हिगनेल, एस॰ आर॰, २७३}}
{{Outdent|'''हिन्द स्वराज्य,''' १४०}}
{{Outdent|हिन्दी, -स्कूलोंमें, ७५}}
{{Outdent|हिन्दुस्तानी, ५३९; -का कांग्रेस अधिवेशनों में प्रयोग, ४८५; -की स्कूलोंमें शिक्षा, ७५; -राष्ट्रभाषाके रूपमें, ५५१}}
{{Outdent|हिन्दू, २६, २८, ३४, ३७७, ३९६, ४११, ४३४, ४४५, ४७७, ५५१; -और असहयोग, ३२; -और अस्पृश्यता, ७-९, ८०-८१; -और अहिंसा-पालन, ३०३; -और इस्लाम, ३००-१; -और खिलाफत, ८९, १५५, ५५१; -और पारसी, २४१-४२; -और स्वदेशी, २८; -मुस्लिम एकता, देखिए हिन्दू-मुस्लिम एकता -[ओं] का मुसलमानोंको मांस खानेसे रोकना, १४६; -द्वारा मस्जिदों-
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}के सामने बाजे बजाना, ८८-८९; -पर पश्चिमोत्तर सीमान्तके कबाइलियों द्वारा हमला, १३६-३७}}
{{Outdent|हिन्दू धर्म, ७-८, २३-२४, ३०, ५३, ४५७; -और अस्पृश्यता, ६३, ११३, २३८-३९, २६७, २८९, ३१५-१७, ३३१-३३; और अहिंसा, ३४; -और गोरक्षा, १०८-९ – के गुण, २०९}}
{{Outdent|हिन्दू-मुस्लिम एकता, १८, २३, २४, ३४, ३६, ५८-५९, ७०, ८३-८४, ८८, १००, ११३, १३४, १५१, १७१, २०९, २१३, २३८, २९९, ४१७, ४४२-४३, ४५३, ४५५, ४९५, ५००, ५०३, ५३७; -और पारसी, २४९, ४०३-४; -और स्वराज्य, ४३५, ५२०, ५२६; -बनाये रखना शिक्षकोंका कर्त्तव्य, २७६-७७}}
{{Outdent|हिब्रू, २७}}
{{Outdent|हिरण्यकशिपु, ५१}}
{{Multicol-end}}
{{Rule|5em}}<noinclude></noinclude>
f9ueye11vuqz8t6cja57ruarxeygm63
673516
673515
2026-08-24T04:51:13Z
अँजली चौधरी
2439
673516
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|'''५९१'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}५०९; -और असहयोग, ९७-९८, ४०२-३; और स्वतन्त्रता-संग्राम, १२८; -मालेगाँवमें, ५३, ६८-७१, ८३, ८६, ११३, ११८, १७१-७२, ३६४, ५०३}}
{{Outdent|हिगनेल, एस॰ आर॰, २७३}}
{{Outdent|'''हिन्द स्वराज्य,''' १४०}}
{{Outdent|हिन्दी, -स्कूलोंमें, ७५}}
{{Outdent|हिन्दुस्तानी, ५३९; -का कांग्रेस अधिवेशनों में प्रयोग, ४८५; -की स्कूलोंमें शिक्षा, ७५; -राष्ट्रभाषाके रूपमें, ५५१}}
{{Outdent|हिन्दू, २६, २८, ३४, ३७७, ३९६, ४११, ४३४, ४४५, ४७७, ५५१; -और असहयोग, ३२; -और अस्पृश्यता, ७-९, ८०-८१; -और अहिंसा-पालन, ३०३; -और इस्लाम, ३००-१; -और खिलाफत, ८९, १५५, ५५१; -और पारसी, २४१-४२; -और स्वदेशी, २८; -मुस्लिम एकता, देखिए हिन्दू-मुस्लिम एकता -[ओं] का मुसलमानोंको मांस खानेसे रोकना, १४६; -द्वारा मस्जिदों-}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}के सामने बाजे बजाना, ८८-८९; -पर पश्चिमोत्तर सीमान्तके कबाइलियों द्वारा हमला, १३६-३७}}
{{Outdent|हिन्दू धर्म, ७-८, २३-२४, ३०, ५३, ४५७; -और अस्पृश्यता, ६३, ११३, २३८-३९, २६७, २८९, ३१५-१७, ३३१-३३; और अहिंसा, ३४; -और गोरक्षा, १०८-९ – के गुण, २०९}}
{{Outdent|हिन्दू-मुस्लिम एकता, १८, २३, २४, ३४, ३६, ५८-५९, ७०, ८३-८४, ८८, १००, ११३, १३४, १५१, १७१, २०९, २१३, २३८, २९९, ४१७, ४४२-४३, ४५३, ४५५, ४९५, ५००, ५०३, ५३७; -और पारसी, २४९, ४०३-४; -और स्वराज्य, ४३५, ५२०, ५२६; -बनाये रखना शिक्षकोंका कर्त्तव्य, २७६-७७}}
{{Outdent|हिब्रू, २७}}
{{Outdent|हिरण्यकशिपु, ५१}}
{{Multicol-end}}
{{Rule|5em}}<noinclude></noinclude>
3r3kn9b2huzn5o1shngj8o4vuuz1rru
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९५
250
159730
673323
508956
2026-08-23T13:57:31Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673323
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें शराब-बन्दीपर|३६३}}</noinclude>ही होता आया है। इसलिए थोड़े-से पारसी शराब-विक्रेता बदनाम हो गये हैं और दूसरे नजरोंके सामने भी नहीं आये हैं। शराबके पारसी व्यापारियोंका उदाहरण बहुत स्पष्ट होकर देशके सामने आ गया है। मैंने एक्सलसियर थियेटर [वाली सभा] में अपने पारसी मित्रोंसे कहा था कि वे अपने शिष्टतम आचरणसे समस्त देशके सामने एक आदर्श उपस्थित कर सकेंगे। किन्तु मुझे गहरा दुःख है कि पारसियोंमें से इतने लोग जनताको शराब बेचकर अपनी आजीविका कमा रहे हैं और मेरा खयाल है कि यह उनके लिए बहुत बदनामीकी बात है। मुझे इस बातका भी खेद है कि इतनी सारी विधवाओंको अपना गुजारा शराब बेचकर करना पड़ता है। मेरी रायमें शराब बेचनेकी अपेक्षा इन बहनोंके लिए पत्थर तोड़कर या भीख माँगकर भी अपना पेट भरना ज्यादा अच्छा है।
अगर मेरे पास पेटिट या टाटाके<ref>उद्योगपति व दानी।</ref> जैसे साधन होते तो मैं इन पारसी विधवाओंके पैरोंपर जा गिरता और उनसे प्रार्थना करता कि वे जितना रुपया चाहें ले लें, परन्तु उस व्यापारको छोड़ दें। मैं बहुत ही खुशीसे इन बहनोंकी सार-सँभाल करता। यदि मेरे पास रुपया होता तो मैं उसका सबसे पहला उपयोग यही करता कि उसे अपने पारसी भाई-बहनोंको देता और उनसे शराबका व्यापार बन्द कर देनेकी प्रार्थना करता। मेरे कुछ पारसी मित्रोंने मुझसे कहा है कि हम तो केवल एक गिलास शराब पीते हैं और उसे छोड़ नहीं सकते; हमारे धर्ममें मद्यपानका निषेध नहीं है। इसके विपरीत दूसरे कुछ लोगोंने बताया है कि पारसी धर्ममें मद्यपान निषिद्ध है। लेकिन आपके धर्ममें मद्यपानकी अनुमति हो या न हो, मेरा हृदय अपनी इन पारसी बहनोंके प्रति क्षोभसे भरा हुआ है। यदि शराब रूपी जहरका बेचना ज्यादा दिनतक जारी रहा तो वह आपके जैसी छोटी बिरादरीको बरबाद करनेके लिए बहुत काफी है।
आप पारसी मित्रोंने श्रीकृष्णका नाम सुना होगा और यादवोंके सम्बन्धमें, जिनकी संख्या लाखों या उससे भी ज्यादा थी, उनकी भविष्यवाणी भी सुनी होगी। श्रीकृष्णने उनसे कहा था कि यदि वे मद्यपान करेंगे और व्यभिचार करेंगे तो उनका समस्त वंश इस पृथ्वीतलसे सदाके लिए मिट जायेगा। और उन शक्तिशाली यादवोंका अब क्या चिह्न बचा है? क्या व्यभिचार मद्यपानका निकटतम साथी नहीं है? मुझे अपने दक्षिण आफ्रिकाके अनुभवसे मालूम है कि ये शराबके विक्रेता और खरीददार कैसे लोग होते हैं। जो लोग शराब बेचते हैं उनको शराबखोरोंके स्तरपर उतर आना पड़ता है और अपनी मनोवृत्ति भी उसी स्तरकी बना लेनी पड़ती है। मुझे इन बातोंका बहुत अनुभव है और मैंने वस्तुतः समस्त देशमें जो-कुछ देखा है वहीं मैं आपको बता रहा हूँ। मेरी यह भी राय है कि जो लोग शराब बेचते हैं वे ईमानदार नहीं हो सकते। मैं यह बात अपने पारसी भाइयोंसे ही नहीं कह रहा हूँ, बल्कि भण्डारियोंसे भी कह रहा हूँ जिन्होंने मुझे लिखा है कि वे बरबाद हो गये हैं और वे धीरे-धीरे २० या २५ सालमें<noinclude></noinclude>
su86wgmtzjjr5k9khrp9l5xt53n2eh4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/१९
250
164413
673561
519492
2026-08-24T06:31:05Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673561
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''तेरह'''}}}}
|-
|६१. || भाषण : आर्य वैश्य महासभा, मद्रासके स्वागत समारोहमें (२५-४-१९१५) || ६५
|-
|६२. || पत्र : नारणदास गांधीको (२५-४-१९१५) || ६६
|-
|६३. || भाषण : मद्रासके भारतीय ईसाइयोंके स्वागत समारोहमें (२६-४-१९१५) || ६७
|-
|६४. || भाषण : वाई° एम° सी° ए°, मद्रासमें (२७-४-१९१५) || ६७
|-
|६५. || भाषण : लक्ष्मी मेमोरियल आर्य पाठशाला, मद्रासमें (२९-४-१९१५) || ७१
|-
|६६. || मद्रासके गुजरातियोंके मानपत्रका उत्तर (२९-४-१९१५) || ७१
|-
|६७. || भाषण : ट्रेंकेबारके स्वागत समारोहमें (३०-४-१९१५) || ७२
|-
|६८. || ट्रेंकेबारमें दक्षिण भारतीय दलित वर्ग संघके मानपत्रका उत्तर (३०-४-१९१५) || ७२
|-
|६९. || भाषण : मायावरम्के स्वागत समारोहमें (१-५-१९१५) || ७३
|-
|७०. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (४-५-१९१५) || ७६
|-
|७१. || पत्र : नारणदास गांधीको (४-५-१९१५) || ७७
|-
|७२. || भाषण : नेलौरमें (५-५-१९१५) || ७८
|-
|७३. || भाषण : नेलौरमें आयोजित छात्रोंकी सभा (६-५-१९१५) || ७९
|-
|७४. || पत्रका अंश (६-५-१९१५) || ८०
|-
|७५. || वक्तव्य : भारतीय दक्षिण आफ्रिकी संघ, मद्रासकी सभा (७-५-१९१५) || ८०
|-
|७६. || भाषण : बंगलौरमें (८-५-१९१५) || ८२
|-
|७७. || बंगलौरके नागरिकोंके साथ वार्तालाप (८-५-१९१५) || ८४
|-
|७८. || बंगलौरके नागरिकोंको उत्तर (८-५-१९१५) || ८६
|-
|७९. || पत्र : जी° ए° नटेसनको (१०-५-१९१५) || ८७
|-
|८०. || आश्रम : आनुमानिक व्यय (११-५-१९१५) || ८८
|-
|८१. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-५-१९१५) || ९२
|-
|८२. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१४-५-१९१५) || ९३
|-
|८३. || भाषण : लीमड़ीमें (१९-५-१९१५) || ९४
|-
|८४. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-५-१९१५) || ९४
|-
|८५. || आश्रमके संविधानका मसविदा (२०-५-१९१५ से पूर्व) || ९५
|-
|८६. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (२०-५-१९१५) || १०२
|-
|८७. || पत्र: उमियाशंकरको (२१-५-१९१५) || १०३
|-
|८८. || पत्र: जी° ए° नटेसनको (२८-५-१९१५) || १०३
|-
|८९. || पत्र : मगनलाल गांधीको (४-६-१९१५) || १०४
|-
|९०. || पत्र : रणछोड़लाल पटवारीको (५-६-१९१५) || १०५
|-
|९१. || पत्र: कुंवरजी मेहताको (६-६-१९१५) || १०६
|-
|९२. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (८-६-१९१५) || १०६
|-
|९३. || पत्र : रणछोड़लाल पटवारीको (९-६-१९१५) || १०७
|-
|९४. || पत्र : वीरचन्द शाहको (१०-६-१९१५ या उसके लगभग) || १०७
|-
|९५. || पत्र : रणछोड़लाल पटवारीको (१०-६-१९१५) || १०८
|-
|९६. || पत्र : कोतवालको (१३-६-१९१५) || १०९
|-
|९७. || पत्र : महात्मा मुंशीरामको (१४-६-१९१५) || ११०
|}<noinclude></noinclude>
8m86n8ne4xc7df8u3943pohvmhmrdkz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२०
250
164414
673571
519493
2026-08-24T06:57:33Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673571
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''चौदह'''}}}}
|-
|९८. || पत्र : जे° बी° पेटिटको (१६-६-१९१५) || ११०
|-
|९९. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-६-१९१५) || ११६
|-
|१००. || पत्र : जनरल ट्रैफिक मैनेजरको (२९-६-१९१५) || ११७
|-
|१०१. || मणिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (७-७-१९१५ के बाद) || ११८
|-
|१०२. || भाषण : १५ वें बम्बई प्रान्तीय सम्मेलन, पूनामें (११-७-१९१५) || ११८
|-
|१०३. || पत्र : सुन्दरम्को (१३-७-१९१५ को या उसके बाद) || १२०
|-
|१०४. || पत्र : मणिलाल गांधीको (१५-७-१९१५) || १२१
|-
|१०५. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१६-७-१९१५) || १२१
|-
|१०६. || पत्र : छोटालाल तेजपालको (२२-७-१९१५) || १२२
|-
|१०७. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२६-७-१९१५) || १२२
|-
|१०८. || मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२६-७-१९१५) || १२३
|-
|१०९. || पत्र : बालगंगाधर तिलकको (२७-७-१९१५) || १२३
|-
|११०. || पत्र : छोटालाल तेजपालको (३१-७-१९१५) || १२४
|-
|१११. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१-८-१९१५) || १२४
|-
|११२. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (३-८-१९१५) || १२५
|-
|११३. || पत्र : बालगंगाधर तिलकको (१७-८-१९१५) || १२६
|-
|११४. || पत्र : छोटालाल तेजपालको (१८-८-१९१५) || १२६
|-
|११५. || पत्र : नारणदास गांधीको (२१-८-१९१५) || १२७
|-
|११६. || पत्र: वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (२३-८-१९१५) || १२७
|-
|११७. || पत्र : माधुरीप्रसादको (१०-९-१९१५) || १२८
|-
|११८. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१४-९-१९१८) || १२८
|-
|११९. || पत्र : नारणदास गांधीको (१६-९-१९१५) || १२९
|-
|१२०. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (२३-९-१९१५) || १२९
|-
|१२१. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२६-९-१९१५) || १३०
|-
|१२२. || पत्र: ए° एच° वेस्टको (२६-९-१९१५) || १३१
|-
|१२३. || भाषण : भारतीय गिरमिटिया मजदूरोंके सम्बन्धमें (२८-१०-१९१५) || १३२
|-
|१२४. || मगनलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (२८-१०-१९१५ के बाद) || १३६
|-
|१२५. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (३१-१०-१९१५) || १३७
|-
|१२६. || पत्र: मगनलाल गांधीको (३-११-१९१५) || १४०
|-
|१२७. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (५-११-१९१५) || १४१
|-
|१२८. || पत्र: खुशालचन्द गांधीको (८-११-१९१५) || १४२
|-
|१२९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१०-११-१९१५) || १४२
|-
|१३०. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-११-१९१५) || १४३
|-
|१३१. || भाषण : फीरोजशाह मेहताके निधनपर (१५-११-१९१५) || १४४
|-
|१३२. || भाषण : अहमदाबादमें राजचन्द्र जयन्तीके अवसरपर (२१-११-१९१५) || १४६
|-
|१३३. || एक पत्रका अंश (२६-११-१९१५ से पूर्व) || १४७
|-
|१३४. || भाषण : अहमदाबादके समारोहमें (२८-११-१९१५) || १४८
|}<noinclude></noinclude>
fl3bwiwku1dmvgpimah380f6pzarb7t
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२१
250
164415
673580
519494
2026-08-24T07:12:27Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673580
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''पन्द्रह'''}}}}
|-
|१३५. || गिरमिट या गुलामी? (दिसम्बर, १९१५) || १५०
|-
|१३६. || भाषण : वीरमगाँवमें (१-१२-१९१५) || १५१
|-
|१३७. || भाषण : गोंडलकी सभा (४-१२-१९१५) || १५२
|-
|१३८. || भाषण : जैतपुरमें गोखले-स्मारक-कोषके लिए (५-१२-१९१५) || १५२
|-
|१३९. || भाषण : भावनगरमें गोखले- स्मारक-कोषके लिए (८-१२-१९१५) || १५३
|-
|१४०. || भाषण : भावनगरमें (९-१२-१९१५) || १५३
|-
|१४१. || भाषण : बगसरामें (१२-१२-१९१५) || १५४
|-
|१४२. || वा° गो° देसाईके पत्रका मसविदा (२१-१२-१९१५ से पूर्व) || १५५
|-
|१४३. || तार : वा° गो° देसाईको (२१-१२-१९१५) || १५५
|-
|१४४. || पत्र : वा° गो° देसाईको (२१-१२-१९१५) || १५६
|-
|१४५. || भाषण : ११ वें भारतीय औद्योगिक सम्मेलनमें (२४-१२-१९१५) || १५६
|-
|१४६. || भाषण : बम्बई कांग्रेसमें भारत और उपनिवेशोंके<br>सम्बन्धमें (२८-१२-१९१५) || १५७
|-
|१४७. || रतनसी सोढाको लिखे पत्रका अंश (१९१५) || १५९
|-
|१४८. || डायरी : १९१५ || १६०
|-
|१४९. || भाषण : सालेज में (१-१-१९१६) || १८८
|-
|१५०. || भाषण : सूरतमें (२-१-१९१६) || १८९
|-
|१५१. || भाषण : सूरत आर्य समाजके वार्षिकोत्सव में (२-१-१९१६) || १८९
|-
|१५२. || भाषण : सुरतमें अंग्रेजीके स्थानके बारेमें (३-१-१९१६) || १९३
|-
|१५३. || भाषण : युवक-मण्डल, सूरतमें (३-१-१९१६) || १९४
|-
|१५४. || भाषण : सूरत आर्यसमाजके उत्सवमें (३-१-१९१६) || १९५
|-
|१५५. || भाषण : सूरतके स्वागत समारोहमें (३-१-१९१६) || १९७
|-
|१५६. || भाषण : सूरतके मुहम्मडन असोसिएशनमें (३-१-१९१६) || १९९
|-
|१५७. || भाषण : कठोड़में (४-१-१९१६) || २००
|-
|१५८. || भाषण : मोटा बराछामें (४-१-१९१६) || २००
|-
|१५९. || भाषण : नवसारीमें (५-१-१९१६) || २०१
|-
|१६०. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१३-१-१९१६) || २०२
|-
|१६१. || पत्र : सोंजा इलेसिनको (१६-१-१९१६) || २०३
|-
|१६२. || भाषण : बावलामें (१७-१-१९१६) || २०४
|-
|१६३. || महात्मा गोखलेका जीवन-सन्देश (४-२-१९१६ से पूर्व) || २०४
|-
|१६४. || पत्र: करसनदास चितलियाको (४-२-१९१६) || २१०
|-
|१६५. || भाषण : काशी नागरीप्रचारिणी सभा (५-२-१९१६) || २११
|-
|१६६. || भाषण : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयमें (६-२-१९१६) || २१२
|-
|१६७. || महाराजा दरभंगाको लिखे पत्रका अंश (७-२-१९१६) || २१८
|-
|१६८. || भेंट : बनारसकी 'घटना' के सम्बन्धमें ए° पी०° आई° को (९-२-१९१६) || २१९
|-
|१६९. || भाषण : मद्रासमें 'स्वदेशी' पर (१५-२-१९१६) || २२१
|-
|१७०. || भाषण : आश्रमके व्रतोंपर (१६-२-१९१६) || २२७
|}<noinclude></noinclude>
jpcl2kdjq131mestcoyb4kuo6jhzbxy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२२
250
164416
673611
519495
2026-08-24T08:41:29Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673611
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''सोलह'''}}}}
|-
|१७१. || भाषण : सोशल सर्विस लीग, मद्रासमें (१६-२-१९१६) || २३७
|-
|१७२. || श्रीमती बेसेंटको उत्तर (१७-२-१९१६ से पूर्व) || २४१
|-
|१७३. || पत्र : 'न्यू इंडिया' को बनारसकी घटनाके सम्बन्धमें (१७-२-१९१६) २४४
|-
|१७४. || भाषण : देशी भाषाओं और शिक्षापर (१७-२-१९१६) || २४५
|-
|१७५. || भाषण: पूनामें गोखलेकी बरसीके अवसरपर (१९-२-१९१६) || २४५
|-
|१७६. || भाषण : भारतीय महिला विश्वविद्यालयपर (२३-२-१९१६) || २४७
|-
|१७७. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२३-२-१९१६) || २४८
|-
|१७८. || गिरमिट प्रथा (२५-२-१९१६) || २४९
|-
|१७९. || भाषण : स्वागत समारोहमें (२६-२-१९१६) || २५२
|-
|१८०. || भाषण : हैदराबाद, सिन्धमें (२७-२-१९१६) || २५३
|-
|१८१. || भाषण : हैदराबादमें चेचकके टीकेपर (२८-२-१९१६) || २५४
|-
|१८२. || भाषण : कराचीमें नागरिकों द्वारा दिये गये मानपत्रके<br>उत्तरमें (२९-२-१९१६) || २५५
|-
|१८३. || भाषण : कराचीमें गोपाल कृष्ण गोखलेपर (२९-२-१९१६) || २५७
|-
|१८४. || भाषण : कराचीमें (२९-२-१९१६) || २५८
|-
|१८५. || भाषण : कराचीके स्वागत समारोहमें (२-३-१९१६) || २५९
|-
|१८६. || भेंट : कराचीमें पत्र प्रतिनिधियोंसे (२-३-१९१६) || २५९
|-
|१८७. || बादिन स्वागत समारोहमें उत्तर (३-३-१९१६) || २६०
|-
|१८८. || पत्र: मगनलाल गांधीको (११-३-१९१६) || २६०
|-
|१८९. || भाषण : गुरुकुलके अछूतोद्धार सम्मेलनमें (१८-३-१९१६) || २६१
|-
|१९०. || भाषण : गुरुकुलके पुरस्कार वितरण समारोहमें (२०-३-१९१६) || २६२
|-
|१९१. || भाषण : गुरुकुलके वार्षिक उत्सवमें (२०-३-१९१६) || २६२
|-
|१९२. || भाषण : आर्य-समाज भवन, हरद्वारमें (२३-३-१९१६) || २६७
|-
|१९३. || पत्र : जे° बी° पेटिटको (३०-३-१९१६) || २६८
|-
|१९४. || गुजरात वर्नाक्यूलर सोसाइटीकी सदस्यताका प्रार्थनापत्र (१४-४-१९१६) || २७०
|-
|१९५. || भाषण : शोकसभामें (१६-४-१९१६) || २७१
|-
|१९६. || पत्र : प्रजाबन्धुको (२०-४-१९१६) || २७१
|-
|१९७. || पत्र : गंगाधरराव देशपाण्डेको (२९-४-१९१६ के पूर्व) || २७४
|-
|१९८. || भाषण : बेलगाँवमें (३०-४-१९१६) || २७४
|-
|१९९. || भाषण : बम्बई प्रान्तीय सम्मेलन, बेलगाँवमें (१-५-१९१६) || २७५
|-
|२००. || पत्र : जैन बोर्डिंग हाउस, भावनगरके छात्रोंको (१३-५-१९१६) || २७७
|-
|२०१. || पत्र : कोटवालको (२१-५-१९१६) || २७७
|-
|२०२. || पत्र : वीरचन्द शाहको (२५-५-१९१६) || २७८
|-
|२०३. || भाषण : अहमदाबादके जाति-सम्मेलनमें (४-६-१९१६) || २७९
|-
|२०४. || भाषण : जाति-प्रथाके सम्बन्ध में (५-६-१९१६) || २८०
|-
|२०५. || पत्र : नरहर शम्भूराव भावेको (७-६-१९१६ के बाद) || २८२
|-
|२०६. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (१५-६-१९१६) || २८२
|}<noinclude></noinclude>
dncozckvzbyh8zbs505rkfhr963grli
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२३
250
164417
673618
519496
2026-08-24T09:03:17Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
673618
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''सत्रह'''}}}}
|-
|२०७. || भाषण : समाचारपत्र-कानूनके विरोध में (२४-६-१९१६) || २८३
|-
|२०८. || पत्र : सी° एफ° ऐन्ड्रयूजको (३०-६-१९१६) || २८७
|-
|२०९. || रेलके यात्री (२६-७-१९१६ से पूर्व ) || २८७
|-
|२१०. || भाषण : दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहके रहस्यपर (२७-७-१९१६) || २९०
|-
|२११. || पत्र : एच° एस° एल° पोलकको (८-८-१९१६) || २९४
|-
|२१२. || पत्र: कुंवरजी मेहताको (८-८-१९१६) || २९४
|-
|२१३. || पत्र : जे° बी° पेटिटको (१९-८-१९१६) || २९५
|-
|२१४. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (१४-९-१९१६) || २९५
|-
|२१५. || पत्र : श्रीमती ए° एच° वेस्टको (१४-९-१९१६) || २९६
|-
|२१६. || अहिंसाके विषयमें लाला लाजपतरायको उत्तर (अक्तूबर, १९१६) || २९७
|-
|२१७. || आधुनिक शिक्षा (अक्तूबर, १९१६) || ३००
|-
|२१८. || हिन्दुओंमें जाति-प्रथा (अक्तूबर, १९१६) || ३०३
|-
|२१९. || भाषण : बम्बई प्रान्तीय सम्मेलन, अहमदाबादमें (२१-१०-१९१६) || ३०५
|-
|२२०. || भाषण : भारत प्रतिरक्षा कानूनके बारेमें (२२-१०-१९१६) || ३०६
|-
|२२१. || प्रस्ताव : अहमदाबादमें गिरमिट-प्रथापर. (२३-१०-१९१६) || ३०७
|-
|२२२. || भाषण : वीरमगाँव चुंगी नाकेके सम्बन्धमें (२३-१०-१९१६) || ३०८
|-
|२२३. || पत्र : अजितप्रसादको (१-११-१९१६) || ३०८
|-
|२२४. || भाषण : बढ़वानमें राजचन्द्र जयन्तीके अवसरपर (९-११-१९१६) || ३०९
|-
|२२५. || पत्र : ए° एच° वेस्टको (१८-१२-१९१६) || ३१०
|-
|२२६. || भाषण: म्योर कॉलेज, इलाहाबादमें (२२-१२-१९१६) || ३११
|-
|२२७. || भाषण : इलाहाबाद में प्राचीन और अर्वाचीन शिक्षापर (२३-१२-१९१६) || ३२०
|-
|२२८. || भाषण: लखनऊ कांग्रेसमें (२८-१२-१९१६) || ३२२
|-
|२२९. || भाषण : अखिल भारतीय एक-भाषा व एक-लिपि सम्मेलन,<br>लखनऊमें (२९-१२-१९१६) || ३२३
|-
|२३०. || अध्यक्षीय भाषण : अखिल भारतीय एक-भाषा व एक-लिपि<br>सम्मेलन, लखनऊमें (२९-१२-१९१६) || ३२४
|-
|२३१. || भेंट : लखनऊमें (२९/३१-१२-१९१६ के आसपास) || ३२५
|-
|२३२. || भाषण : मुस्लिम लीगके सम्मेलनमें (३१-१२-१९१६) || ३२७
|-
|२३३. || पत्रका अंश (१९१६) || ३२७
|-
|२३४. || पत्र : व्र° गो° सरैयाको (३-१-१९१७) || ३२८
|-
|२३५. || पत्र: एस्थर फैरिंगको (११-१-१९१७) || ३२९
|-
|२३६. || पत्र : कल्याणजी मेहताको (१२-१-१९१७) || ३२९
|-
|२३७. || वक्तव्य : लायनेल कटिसके पत्रके सम्बन्ध में (१४-१-१९१७ के पूर्व) || ३३०
|-
|२३८. || पत्र : एस्थर फैरिंगको (१५-१-१९१७) || ३३१
|-
|२३९. || पत्र : एस° हिगिनबॉटमको (१६-१-१९१७) || ३३२
|-
|२४०. || पत्र : नारणदास गांधीको (१७-१-१९१७) || ३३२
|-
|२४१. || पत्र : कल्याणजी मेहताको (१८-१-१९१७) || ३३३
|}<noinclude></noinclude>
lrlil0rf5l17yr4l4xpkuh979inwure
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६७
250
166769
673545
523400
2026-08-24T05:49:20Z
Manikantkmr
5554
673545
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करने की विधि|६३१}}</noinclude>रसीदोंकी तीन-तीन प्रतियां छपवानी चाहिए। पहली प्रति सूत इकट्ठा करने-वाले कार्यालय में रखी जानी चाहिए, दूसरी प्रति ताल्लुका कार्यालयको भेजी जानी चाहिए और तीसरी प्रति सदस्यको दी जानी चाहिए। चाहे सूत सदस्योंके घर जाकर इकट्ठा किया जाये या सदस्य लोग कांग्रेस कार्यालय में आकर सूत जमा करें, रसीद उसी फार्मपर दी जानी चाहिए। यदि बदले में रुई दी जाये तो रुईकी मात्रा रसीद पर दर्ज कर दी जानी चाहिए।
सूत इकट्ठा करनेवालेको प्राप्त होनेवाले सूतपर सदस्यकी सदस्यता-संख्या, और सदस्यका नाम तथा और कुछ अन्य विवरण नीचे बताये गये रूपमें एक पर्ची पर लिखकर लगाना चाहिए। पर्ची मजबूत कागजकी और दोहरी मुड़ी हुई हो जिसके बीचमें एक डोरा पड़ा हो और इस डोरेसे पर्चीको सुतके बण्डलपर बाँध दिया जाये।
{{C|'''पर्ची'''}}
सदस्य संख्या ... गज
नाम : कां० कमेटीका कोटा
इकट्ठा करनेवालेका नाम :
वर्ग :
तारीख
सूत इकट्ठा करनेवाला व्यक्ति सूतको ताल्लुका कांग्रेस कमेटीके कार्यालय में जमा कर देगा।
यह माना जाता है कि गाँवकी या ताल्लुकाके अधीन आनेवाली अन्य सभी कमेटियाँ रसीदकी किताब केवल ताल्लुका कमेटीसे प्राप्त करेंगी और सभी किताबें ताल्लुका कार्यालय में रहेंगी । जो अधीनस्थ कमेटियाँ अन्य किताबें अपने पास रखनेको तैयार हों, वे अपना काम और सुचारु रूपसे कर सकनेकी दृष्टिसे उन्हें रख सकती हैं।
रसीदी किताबें प्रान्तीय कार्यालय छपवायेगा और इनपर एक ही क्रममें नम्बर पड़ेंगे। प्रत्येक सदस्यके लिए प्रतिवर्ष १२ रसीदोंकी आवश्यकता होगी।
रसीदकी किताबें अर्जी देकर प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियोंसे प्राप्त की जा सकेंगी। जो रसीदकी किताबें जारी की जायेंगी उन्हें प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियाँ एक रजिस्टर-पर निम्न रूपमें दर्ज करेंगी :
{{C|'''रसीदकी किताबोंका रजिस्टर'''}}
जिस अधिका-
तारीख
कांग्रेस कमेटीका नाम और जिला
रसीद नं.
रीको भेजी गई बॉक्स नं.
उसका नाम
इतने से
इतनेतक
सूत प्राप्त करनेवाली कमेटी इकट्ठा हुआ सूत सीधे प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको या प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी जिस कार्यालयको कहे, उस कार्यालयको भेजेगी।<noinclude></noinclude>
l2ongvrwkitznrbcgx9wig1eyik92ek
673546
673545
2026-08-24T05:50:09Z
Manikantkmr
5554
673546
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh||सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करने की विधि|६३१}}</noinclude>रसीदोंकी तीन-तीन प्रतियां छपवानी चाहिए। पहली प्रति सूत इकट्ठा करने-वाले कार्यालय में रखी जानी चाहिए, दूसरी प्रति ताल्लुका कार्यालयको भेजी जानी चाहिए और तीसरी प्रति सदस्यको दी जानी चाहिए। चाहे सूत सदस्योंके घर जाकर इकट्ठा किया जाये या सदस्य लोग कांग्रेस कार्यालय में आकर सूत जमा करें, रसीद उसी फार्मपर दी जानी चाहिए। यदि बदले में रुई दी जाये तो रुईकी मात्रा रसीद पर दर्ज कर दी जानी चाहिए।
सूत इकट्ठा करनेवालेको प्राप्त होनेवाले सूतपर सदस्यकी सदस्यता-संख्या, और सदस्यका नाम तथा और कुछ अन्य विवरण नीचे बताये गये रूपमें एक पर्ची पर लिखकर लगाना चाहिए। पर्ची मजबूत कागजकी और दोहरी मुड़ी हुई हो जिसके बीचमें एक डोरा पड़ा हो और इस डोरेसे पर्चीको सुतके बण्डलपर बाँध दिया जाये।
{{C|'''पर्ची'''}}
सदस्य संख्या ... गज
नाम : कां० कमेटीका कोटा
इकट्ठा करनेवालेका नाम :
वर्ग :
तारीख
सूत इकट्ठा करनेवाला व्यक्ति सूतको ताल्लुका कांग्रेस कमेटीके कार्यालय में जमा कर देगा।
यह माना जाता है कि गाँवकी या ताल्लुकाके अधीन आनेवाली अन्य सभी कमेटियाँ रसीदकी किताब केवल ताल्लुका कमेटीसे प्राप्त करेंगी और सभी किताबें ताल्लुका कार्यालय में रहेंगी । जो अधीनस्थ कमेटियाँ अन्य किताबें अपने पास रखनेको तैयार हों, वे अपना काम और सुचारु रूपसे कर सकनेकी दृष्टिसे उन्हें रख सकती हैं।
रसीदी किताबें प्रान्तीय कार्यालय छपवायेगा और इनपर एक ही क्रममें नम्बर पड़ेंगे। प्रत्येक सदस्यके लिए प्रतिवर्ष १२ रसीदोंकी आवश्यकता होगी।
रसीदकी किताबें अर्जी देकर प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियोंसे प्राप्त की जा सकेंगी। जो रसीदकी किताबें जारी की जायेंगी उन्हें प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियाँ एक रजिस्टर-पर निम्न रूपमें दर्ज करेंगी :
{{C|'''रसीदकी किताबोंका रजिस्टर'''}}
जिस अधिका-
तारीख
कांग्रेस कमेटीका नाम और जिला
रसीद नं.
रीको भेजी गई बॉक्स नं.
उसका नाम
इतने से
इतनेतक
सूत प्राप्त करनेवाली कमेटी इकट्ठा हुआ सूत सीधे प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको या प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी जिस कार्यालयको कहे, उस कार्यालयको भेजेगी।<noinclude></noinclude>
51ebmfiufx4pdlcm2gg44s2kkijp0or
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६६
250
166770
673548
523401
2026-08-24T05:56:11Z
Manikantkmr
5554
673548
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि'''}}}}
मेरे अनुरोधपर खादी प्रतिष्ठानके श्रीयुत सतीश दासगुप्तने कांग्रेस कमेटियों और कायकर्त्ताओंके लाभार्थ कुछ सूचनाएँ तैयार की हैं। मैं नीचे उनका संक्षेप दे रहा हूँ । कांग्रेस कमेटियोंके लिए यह आदर्श नमूने के तौरपर काम दे सकता है।
सदस्योंसे प्राप्त होनेवाले सूतके कोटेको एक जगह जमा करने और बाहर भेजने के लिए ताल्लुका कमेटियों या सदस्य बनानेवाली अन्य कमेटियोंको कई किताबें रखनी होंगी: (१) सदस्य सूची; (२) सूत प्राप्तिकी रसीदकी किताब, (३) सदस्यों का सूतका रजिस्टर।
'''सदस्य सूची''' : नये सदस्यके लिए जब वह प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर कर दे, और पुराने सदस्यके लिए, जब उसका सूतका पहला कोटा प्राप्त हो जाये, तब उस सदस्यका नाम सदस्य-सूचीमें दर्ज किया जाना चाहिए।
ताल्लुका
१.
२.
The F
नाम व पता
जे० एफ० अय्यर के० आर० नाथन
सदस्य-सूची, १९२५
जिला
प्राप्त सूतका कोटा
प्रान्त
#
जनवरी
अप्रैल
मई
सितम्बर
अगस्त
१ मार्च
जुलाई
1 फरवरी
जून
नवम्बर
अक्तूबर
दिसम्बर
क क
क
ख ख ख
सदस्य-सूचीवाले रजिस्टर में सदस्यकी क्रम संख्या और उसका नाम-पता लिखा जाना चाहिए। नामके सामने सदस्य के सूतके कोटेका प्रकार लिखा जायेगा। सदस्योंका वर्गीकरण करना जरूरी है, ताकि पता चल सके कि सदस्यता की नई शर्तका काम कैसा चलता है।
'''सदस्यों का वर्गीकरण''' : वर्ग 'क' - वे लोग जो स्वयं सूत कातते हैं। वर्ग 'ख' जो दूसरे साधनोंसे सूत प्राप्त करते हैं।
'''रसीदें''' : सूत पानेवाला जिस सदस्यसे सूत प्राप्त करेगा, उसे नीचे लिखी रसीद देगा।
{{C|'''सूतकी रसीद'''}}
तारीख
देनेवालेका नाम : क्रम संख्या :
वर्ग :
कितने तोला रुई दी गई: सूतकी गुंडियाँ; सूत सूतका नम्बर :
रसीद-संख्या
कांग्रेस कमेटी
.
गज बताया गया है
पानेवालेके हस्ताक्षर<noinclude></noinclude>
izhqufsw5bp93s7cviktk1c4gsnpir9
673550
673548
2026-08-24T05:57:30Z
Manikantkmr
5554
673550
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि'''}}}}
मेरे अनुरोधपर खादी प्रतिष्ठानके श्रीयुत सतीश दासगुप्तने कांग्रेस कमेटियों और कायकर्त्ताओंके लाभार्थ कुछ सूचनाएँ तैयार की हैं। मैं नीचे उनका संक्षेप दे रहा हूँ । कांग्रेस कमेटियोंके लिए यह आदर्श नमूने के तौरपर काम दे सकता है।
सदस्योंसे प्राप्त होनेवाले सूतके कोटेको एक जगह जमा करने और बाहर भेजने के लिए ताल्लुका कमेटियों या सदस्य बनानेवाली अन्य कमेटियोंको कई किताबें रखनी होंगी: (१) सदस्य सूची; (२) सूत प्राप्तिकी रसीदकी किताब, (३) सदस्यों का सूतका रजिस्टर।
'''सदस्य सूची''' : नये सदस्यके लिए जब वह प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर कर दे, और पुराने सदस्यके लिए, जब उसका सूतका पहला कोटा प्राप्त हो जाये, तब उस सदस्यका नाम सदस्य-सूचीमें दर्ज किया जाना चाहिए।
ताल्लुका
१.
२.
The F
नाम व पता
जे० एफ० अय्यर के० आर० नाथन
सदस्य-सूची, १९२५
जिला
प्राप्त सूतका कोटा
प्रान्त
#
जनवरी
अप्रैल
मई
सितम्बर
अगस्त
१ मार्च
जुलाई
1 फरवरी
जून
नवम्बर
अक्तूबर
दिसम्बर
क क
क
ख ख ख
सदस्य-सूचीवाले रजिस्टर में सदस्यकी क्रम संख्या और उसका नाम-पता लिखा जाना चाहिए। नामके सामने सदस्य के सूतके कोटेका प्रकार लिखा जायेगा। सदस्योंका वर्गीकरण करना जरूरी है, ताकि पता चल सके कि सदस्यता की नई शर्तका काम कैसा चलता है।
'''सदस्यों का वर्गीकरण''' : वर्ग 'क' - वे लोग जो स्वयं सूत कातते हैं। वर्ग 'ख' जो दूसरे साधनोंसे सूत प्राप्त करते हैं।
'''रसीदें''' : सूत पानेवाला जिस सदस्यसे सूत प्राप्त करेगा, उसे नीचे लिखी रसीद देगा।
{{C|'''सूतकी रसीद'''}}
तारीख
देनेवालेका नाम : क्रम संख्या :
वर्ग :
कितने तोला रुई दी गई: सूतकी गुंडियाँ; सूत सूतका नम्बर :
रसीद-संख्या
कांग्रेस कमेटी
.
गज बताया गया है
पानेवालेके हस्ताक्षर<noinclude></noinclude>
0p4fqm5qbcq6f3kaue3wj09wx4rlbbh
673551
673550
2026-08-24T05:59:01Z
Manikantkmr
5554
673551
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि'''}}}}
मेरे अनुरोधपर खादी प्रतिष्ठानके श्रीयुत सतीश दासगुप्तने कांग्रेस कमेटियों और कायकर्त्ताओंके लाभार्थ कुछ सूचनाएँ तैयार की हैं। मैं नीचे उनका संक्षेप दे रहा हूँ । कांग्रेस कमेटियोंके लिए यह आदर्श नमूने के तौरपर काम दे सकता है।
सदस्योंसे प्राप्त होनेवाले सूतके कोटेको एक जगह जमा करने और बाहर भेजने के लिए ताल्लुका कमेटियों या सदस्य बनानेवाली अन्य कमेटियोंको कई किताबें रखनी होंगी: (१) सदस्य सूची; (२) सूत प्राप्तिकी रसीदकी किताब, (३) सदस्यों का सूतका रजिस्टर।
'''सदस्य सूची''' : नये सदस्यके लिए जब वह प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर कर दे, और पुराने सदस्यके लिए, जब उसका सूतका पहला कोटा प्राप्त हो जाये, तब उस सदस्यका नाम सदस्य-सूचीमें दर्ज किया जाना चाहिए।
ताल्लुका
१.
२.
The F
नाम व पता
जे० एफ० अय्यर के० आर० नाथन
सदस्य-सूची, १९२५
जिला
प्राप्त सूतका कोटा
प्रान्त
#
जनवरी
अप्रैल
मई
सितम्बर
अगस्त
१ मार्च
जुलाई
1 फरवरी
जून
नवम्बर
अक्तूबर
दिसम्बर
क क
क
ख ख ख
सदस्य-सूचीवाले रजिस्टर में सदस्यकी क्रम संख्या और उसका नाम-पता लिखा जाना चाहिए। नामके सामने सदस्य के सूतके कोटेका प्रकार लिखा जायेगा। सदस्योंका वर्गीकरण करना जरूरी है, ताकि पता चल सके कि सदस्यता की नई शर्तका काम कैसा चलता है।
'''सदस्यों का वर्गीकरण''' : वर्ग 'क' - वे लोग जो स्वयं सूत कातते हैं। वर्ग 'ख' जो दूसरे साधनोंसे सूत प्राप्त करते हैं।
'''रसीदें''' : सूत पानेवाला जिस सदस्यसे सूत प्राप्त करेगा, उसे नीचे लिखी रसीद देगा।
{{C|'''सूतकी रसीद'''}}
तारीख
देनेवालेका नाम : क्रम संख्या :
वर्ग :
कितने तोला रुई दी गई: सूतकी गुंडियाँ; सूत सूतका नम्बर :
रसीद-संख्या
कांग्रेस कमेटी
.
गज बताया गया है
पानेवालेके हस्ताक्षर<noinclude></noinclude>
cty7z1v1g8tr3jfakyqpsp7rcs1rp85
673552
673551
2026-08-24T06:00:43Z
Manikantkmr
5554
673552
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि'''}}}}
मेरे अनुरोधपर खादी प्रतिष्ठानके श्रीयुत सतीश दासगुप्तने कांग्रेस कमेटियों और कायकर्त्ताओंके लाभार्थ कुछ सूचनाएँ तैयार की हैं। मैं नीचे उनका संक्षेप दे रहा हूँ । कांग्रेस कमेटियोंके लिए यह आदर्श नमूने के तौरपर काम दे सकता है।
सदस्योंसे प्राप्त होनेवाले सूतके कोटेको एक जगह जमा करने और बाहर भेजने के लिए ताल्लुका कमेटियों या सदस्य बनानेवाली अन्य कमेटियोंको कई किताबें रखनी होंगी: (१) सदस्य सूची; (२) सूत प्राप्तिकी रसीदकी किताब, (३) सदस्यों का सूतका रजिस्टर।
'''सदस्य सूची''' : नये सदस्यके लिए जब वह प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर कर दे, और पुराने सदस्यके लिए, जब उसका सूतका पहला कोटा प्राप्त हो जाये, तब उस सदस्यका नाम सदस्य-सूचीमें दर्ज किया जाना चाहिए।
ताल्लुका
१.
२.
The F
नाम व पता
जे० एफ० अय्यर के० आर० नाथन
सदस्य-सूची, १९२५
जिला
प्राप्त सूतका कोटा
प्रान्त
जनवरी
अप्रैल
मई
सितम्बर
अगस्त
१ मार्च
जुलाई
1 फरवरी
जून
नवम्बर
अक्तूबर
दिसम्बर
क क
क
ख ख ख
सदस्य-सूचीवाले रजिस्टर में सदस्यकी क्रम संख्या और उसका नाम-पता लिखा जाना चाहिए। नामके सामने सदस्य के सूतके कोटेका प्रकार लिखा जायेगा। सदस्योंका वर्गीकरण करना जरूरी है, ताकि पता चल सके कि सदस्यता की नई शर्तका काम कैसा चलता है।
'''सदस्यों का वर्गीकरण''' : वर्ग 'क' - वे लोग जो स्वयं सूत कातते हैं। वर्ग 'ख' जो दूसरे साधनोंसे सूत प्राप्त करते हैं।
'''रसीदें''' : सूत पानेवाला जिस सदस्यसे सूत प्राप्त करेगा, उसे नीचे लिखी रसीद देगा।
{{C|'''सूतकी रसीद'''}}
तारीख
देनेवालेका नाम : क्रम संख्या :
वर्ग :
कितने तोला रुई दी गई: सूतकी गुंडियाँ; सूत सूतका नम्बर :
रसीद-संख्या
कांग्रेस कमेटी
गज बताया गया है
पानेवालेके हस्ताक्षर<noinclude></noinclude>
kqdy3ua40axry3hac6c16t93urapa7n
673553
673552
2026-08-24T06:02:39Z
Manikantkmr
5554
673553
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>{{C|{{larger|'''४३९. सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि'''}}}}
मेरे अनुरोधपर खादी प्रतिष्ठानके श्रीयुत सतीश दासगुप्तने कांग्रेस कमेटियों और कायकर्त्ताओंके लाभार्थ कुछ सूचनाएँ तैयार की हैं। मैं नीचे उनका संक्षेप दे रहा हूँ । कांग्रेस कमेटियोंके लिए यह आदर्श नमूने के तौरपर काम दे सकता है।
सदस्योंसे प्राप्त होनेवाले सूतके कोटेको एक जगह जमा करने और बाहर भेजने के लिए ताल्लुका कमेटियों या सदस्य बनानेवाली अन्य कमेटियोंको कई किताबें रखनी होंगी: (१) सदस्य सूची; (२) सूत प्राप्तिकी रसीदकी किताब, (३) सदस्यों का सूतका रजिस्टर।
'''सदस्य सूची''' : नये सदस्यके लिए जब वह प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर कर दे, और पुराने सदस्यके लिए, जब उसका सूतका पहला कोटा प्राप्त हो जाये, तब उस सदस्यका नाम सदस्य-सूचीमें दर्ज किया जाना चाहिए।
{{C|'''सदस्य-सूची, १९२५'''}}
ताल्लुका
१.
२.
The F
नाम व पता
जे० एफ० अय्यर के० आर० नाथन
जिला
प्राप्त सूतका कोटा
प्रान्त
जनवरी
अप्रैल
मई
सितम्बर
अगस्त
१ मार्च
जुलाई
1 फरवरी
जून
नवम्बर
अक्तूबर
दिसम्बर
क क
क
ख ख ख
सदस्य-सूचीवाले रजिस्टर में सदस्यकी क्रम संख्या और उसका नाम-पता लिखा जाना चाहिए। नामके सामने सदस्य के सूतके कोटेका प्रकार लिखा जायेगा। सदस्योंका वर्गीकरण करना जरूरी है, ताकि पता चल सके कि सदस्यता की नई शर्तका काम कैसा चलता है।
'''सदस्यों का वर्गीकरण''' : वर्ग 'क' - वे लोग जो स्वयं सूत कातते हैं। वर्ग 'ख' जो दूसरे साधनोंसे सूत प्राप्त करते हैं।
'''रसीदें''' : सूत पानेवाला जिस सदस्यसे सूत प्राप्त करेगा, उसे नीचे लिखी रसीद देगा।
{{C|'''सूतकी रसीद'''}}
तारीख
देनेवालेका नाम : क्रम संख्या :
वर्ग :
कितने तोला रुई दी गई: सूतकी गुंडियाँ; सूत सूतका नम्बर :
रसीद-संख्या
कांग्रेस कमेटी
गज बताया गया है
पानेवालेके हस्ताक्षर<noinclude></noinclude>
1br2zc25w2e3d4oonu64q52o7cn2t96
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६८
250
166771
673533
523402
2026-08-24T05:19:26Z
Manikantkmr
5554
673533
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|६३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सदस्यताके कोटेके रूपमें एक बार प्राप्त हुआ सूत दुबारा उसी उद्देश्य से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियाँ एक “दैनिक पुस्तिका" रखेंगी जिसमें वे प्राप्त होनेवाले सूत, बाहर दिये गये सूत और हाथमें बचे सूतका लेखा रखेंगी।
{{C|'''सूत सम्बन्धी दैनिक पुस्तिका'''}}
प्रान्त
वर्ष
मात्रा
मात्रा
तारीख जिससे सूत प्राप्त हुआ
दिया गया
داها
५-२
हरिपुर ता०कां०क०
को मधुबनी ग्राम कां० क० के लिए
१० ५ पी० के०बी०
१५-२
को बुनने
लिए
८
शेष
४
तोला
{{C|'''मूल्यांकन'''}}
प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी हर महीने प्राप्त होनेवाले कुल सूतका मूल्यांकन करेगी और उसका १० प्रतिशत अ० भा० कांग्रेस कमेटीको भेजेगी।
प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी सदस्योंकी सूचीका पूरा व्यौरा निम्नलिखित रूपमें अ० भा० कांग्रेस कमेटीको भेजेगी:
{{C|'''सदस्योंका मासिक ब्यौरा'''}}
प्रान्त
माह
जिला कांग्रेस कमेटी
रजिस्टरपर सदस्योंकी संख्या
सूतका कोटा भेजने वाले सदस्योंकी संख्या
वर्ग 'क'
वर्ग 'ख'
प्रान्तीय काँग्रेस कमेटी सूत भेजनेवाली प्रत्येक कांग्रेस कमेटीका हिसाब रखेगी ताकि किसी भी समय इस बातका निश्चय किया जा सके कि उस कमेटीको दी जाने वाली रुईपर जो खर्च आया उसके मुकाबले सूतकी बिक्री से होनेवाली आय कितनी हुई है और अब उस कमेटीको कितना पैसा देना है?
सूत प्राप्त होनेपर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए और पहली अवस्थामें उसे कांग्रेस कमेटीके ही जमा खातेमें दर्ज किया जाना चाहिए। समय-समयपर सूतके मूल्यमें से अ. भा. कांग्रेस कमेटी, प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी और जिला कांग्रेस कमेटीके<noinclude></noinclude>
nuwrpl56udqscjnwp4m0k5t8fuls596
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५११
250
176025
673329
644625
2026-08-23T14:30:49Z
Shivaniya shaw
4129
/* अशोधित */
673329
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||आत्म-निरीक्षण|
४७९}}</noinclude>अहिंसाकी पुनीत प्रतिज्ञा तो निश्चित रूपसे भंग होगी ही; उसके अतिरिक्त इस प्रकार कठोरसे-कठोर दमनका आह्वान करनेके बाद उसके कारण क्रोधसे उन्मत्त होना और भी अनुचित और कायरतापूर्ण होगा। सम्भव है, मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊँ और साथ ही इस शान्तिमय क्रांति में भाग लेनेवाले दूसरे हजारों भाई भी गिरफ्तार कर लिये जायें, जेलखानोंमें डाले दिये जायें और उत्पीड़ित भी किये जायें। फिर भी भारतके दूसरे भागोंके लोगोंको अपनी विचार-शक्ति न खो बैठनी चाहिए। उचित समय आनेपर वे भी सविनय कानून-भंग शुरू करें और गिरफ्तारी, कैद और उत्पीड़नका आह्वान करें । हमें तो केवल निरपराध लोगोंका ही बलिदान करना है । केवल ऐसा बलिदान ही परमात्मा के यहाँ मंजूर किया जायेगा । इसलिए उस भारी जंगके पहले जो देशमें शीघ्र ही छिड़ने वाली है मेरा हरएक असहयोगीसे बार-बार यही हार्दिक अनुरोध है कि वह दिल्ली के प्रस्तावकी' हरएक शर्तका अक्षरशः पालन करके सविनय कानून-भंग करनेकी योग्यता प्राप्त करे और चारों ओर अहिंसा तथा शान्तिका वायुमण्डल तैयार करे । हमें केवल इतनेपर ही सन्तोष न मानना चाहिए कि हम व्यक्तिशः शान्ति भंग न करेंगे । हम तो दावे के साथ यह कहते हैं कि असह्योग तमाम हिन्दुस्तानमें फैल गया है। हम यह भी कहते हैं कि हमने भारत के उन बेकाबू जनसाधारणपर भी इतना अधिकार कर लिया है कि हम उनको हिंसा करने से रोक सकते हैं। हमें अपनी यह बात सच्ची कर दिखानी चाहिए।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}
{{C|'''१९५. आत्म-निरीक्षण'''}}
अनेक लोगोंने बड़ी करुण भाषामें पत्र लिखकर मुझसे यह कहा है कि यदि जनवरीतक स्वराज्य न मिले और यदि उस समयतक मैं जेलसे बाहर ही रहूँ तो भी मैं आत्महत्या न करूँ। मैंने देखा है कि भाषा मनुष्यके विचारोंको पर्याप्त रूपसे व्यक्त करने में समर्थ नहीं हो पाती, विशेष रूपसे तब जब स्वयं विचार ही अपने-आपमें उलझे हुए या अपूर्ण हों। 'नवजीवन' में मैंने जो कुछ लिखा, उसके बारेमें मेरा तो यही खयाल था कि वह बिलकुल स्पष्ट था। लेकिन मैं देखता हूँ कि उसके अनुवादको बहुत-से लोगोंने गलत समझा है । जो हाल अनुवादका हुआ है, वही हाल मूल लेखका भी हुआ है।
मेरी बातको गलत समझनेका एक बड़ा कारण तो यह है कि लोग मुझे लगभग पूर्ण पुरुष मानते हैं । जिन मित्रोंको 'भगवद्गीता' के प्रति मेरी आस्थाकी जानकारी है, उन्होंने सम्बन्धित श्लोकोंके दृष्टान्त दे-देकर यह दिखाने की कोशिश की है कि आत्म-हत्या
१. देखिए “अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, १०-११-१९२१ ।
२. देखिए " आशावाद ", २३-१०-१९२१ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude>{{dhr|}}</noinclude>
oiudprv8nh7ko5vm4k845qxymmy34c8
673379
673329
2026-08-23T16:42:40Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673379
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||आत्म-निरीक्षण|
४७९}}</noinclude>अहिंसाकी पुनीत प्रतिज्ञा तो निश्चित रूपसे भंग होगी ही; उसके अतिरिक्त इस प्रकार कठोरसे-कठोर दमनका आह्वान करनेके बाद उसके कारण क्रोधसे उन्मत्त होना और भी अनुचित और कायरतापूर्ण होगा। सम्भव है, मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊँ और साथ ही इस शान्तिमय क्रांति में भाग लेनेवाले दूसरे हजारों भाई भी गिरफ्तार कर लिये जायें, जेलखानोंमें डाले दिये जायें और उत्पीड़ित भी किये जायें। फिर भी भारतके दूसरे भागोंके लोगोंको अपनी विचार-शक्ति न खो बैठनी चाहिए। उचित समय आनेपर वे भी सविनय कानून-भंग शुरू करें और गिरफ्तारी, कैद और उत्पीड़नका आह्वान करें । हमें तो केवल निरपराध लोगोंका ही बलिदान करना है । केवल ऐसा बलिदान ही परमात्मा के यहाँ मंजूर किया जायेगा । इसलिए उस भारी जंगके पहले जो देशमें शीघ्र ही छिड़ने वाली है मेरा हरएक असहयोगीसे बार-बार यही हार्दिक अनुरोध है कि वह दिल्ली के प्रस्तावकी<ref>१. देखिए “अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, १०-११-१९२१ ।</ref> हरएक शर्तका अक्षरशः पालन करके सविनय कानून-भंग करनेकी योग्यता प्राप्त करे और चारों ओर अहिंसा तथा शान्तिका वायुमण्डल तैयार करे । हमें केवल इतनेपर ही सन्तोष न मानना चाहिए कि हम व्यक्तिशः शान्ति भंग न करेंगे । हम तो दावे के साथ यह कहते हैं कि असह्योग तमाम हिन्दुस्तानमें फैल गया है। हम यह भी कहते हैं कि हमने भारत के उन बेकाबू जनसाधारणपर भी इतना अधिकार कर लिया है कि हम उनको हिंसा करने से रोक सकते हैं। हमें अपनी यह बात सच्ची कर दिखानी चाहिए।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१}}
{{C|'''१९५. आत्म-निरीक्षण'''}}
अनेक लोगोंने बड़ी करुण भाषामें पत्र लिखकर मुझसे यह कहा है कि यदि जनवरीतक स्वराज्य न मिले और यदि उस समयतक मैं जेलसे बाहर ही रहूँ तो भी मैं आत्महत्या न करूँ। मैंने देखा है कि भाषा मनुष्यके विचारोंको पर्याप्त रूपसे व्यक्त करने में समर्थ नहीं हो पाती, विशेष रूपसे तब जब स्वयं विचार ही अपने-आपमें उलझे हुए या अपूर्ण हों। 'नवजीवन' में मैंने जो कुछ लिखा, <ref>२. देखिए " आशावाद ", २३-१०-१९२१ ।</ref>उसके बारेमें मेरा तो यही खयाल था कि वह बिलकुल स्पष्ट था। लेकिन मैं देखता हूँ कि उसके अनुवादको बहुत-से लोगोंने गलत समझा है । जो हाल अनुवादका हुआ है, वही हाल मूल लेखका भी हुआ है।
मेरी बातको गलत समझनेका एक बड़ा कारण तो यह है कि लोग मुझे लगभग पूर्ण पुरुष मानते हैं । जिन मित्रोंको 'भगवद्गीता' के प्रति मेरी आस्थाकी जानकारी है, उन्होंने सम्बन्धित श्लोकोंके दृष्टान्त दे-देकर यह दिखाने की कोशिश की है कि आत्म-हत्या<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
885qi2peu61vzpk7w6tobivuv4woxu5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/११
250
184059
673453
669495
2026-08-23T19:04:15Z
सीमा1
430
673453
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|{{x-larger|'''भूमिका'''}}}}</noinclude>इस खण्डमें अप्रैल १९११ से मार्च १९१३ तक की सामग्रीका समावेश हुआ है। समझौतेकी बातचीत मार्चमें शुरू हुई थी और इस खण्डके प्रारम्भ में ऐसा दिखाई पड़ता है कि उसके फलस्वरूप सत्याग्रहका दीर्घकालसे चल रहा संघर्ष सफलतापूर्वक समाप्त हो जायेगा। लेकिन खण्डका अन्त होता है उस बवंडरकी आगाहीसे जो न्यायालयों द्वारा फरवरी और मार्च १९९३में दिये गये विवाह-सम्बन्धी निर्णयोंके कारण उठनको था। इन निर्णयोंमें भारतीय विवाहकी वैधताको चुनौती दी गई थी जिससे भारतीय नारीकी सामाजिक स्थिति बहुत विषम हो जाती थी। इसी बीच १९१२ की शरद् ऋतु में श्री गोखलेकी दक्षिण आफ्रिकाकी ऐतिहासिक यात्रा हुई जिससे पारस्परिक
सद्भावनाका सुन्दर वातावरण निर्माण हुआ और यह उम्मीद बँध चली थी कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा। गांधीजी तो आफ्रिकासे छुट्टी पाकर भारत लौटनेकी बात भी सोचने लगे थे: “मैं यहाँसे मुक्त होते ही वहाँ आ जाऊँगा।” (पृष्ठ १६१)।
अप्रैल १ को भारत सरकारने भी अधिकृत तौरसे घोषित कर दिया कि जुलाई १ से गिरमिटिया मजदूरोंका दक्षिण आफ्रिका भेजा जाना बन्द हो जायेगा। यह एक महान विजय थी--दक्षिण आफ्रिकामें गांधीजीकी ही नहीं बल्कि भारत-स्थित उनके सह-योगियोंकी भी जिनमें मद्रासकी दक्षिण आफ्रिकी लीगका नाम खास तौरसे उल्लेखनीय है। यह घटना भारत सरकारमें प्रवासी भारतीयोंके प्रति अपने कर्तव्यकी नई भावनाके उदयकी सूचक थी।
गांधीजी प्रायः पूरा अप्रैल केप टाउनमें रहे। वे संघके प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकमें कुछ संशोधन कराना चाहते थे और इसी सिलसिलेमें संसदके सदस्योंसे मिलने-जुलने और उनका सहयोग प्राप्त करनेमें लगे हुए थे। परन्तु अपने इस व्यस्त कार्यक्रमकेबीच ट्रान्सवाल, नेटाल और केपमें जो-कुछ चल रहा था उससे भी वे अपना सम्पर्क बनाये हुए थे। श्री रिच जोहानिसबर्गमें थे और ब्रिटिश भारतीय संघके दफ्तरको सम्हाले हुए थे। श्री पोलक डर्बनमें काम कर रहे थे। और इस प्रकार गांधीजी केप टाउनमें समझोता वार्ताका नाजुक कार्य दक्षिण आफ्रिकी भारतीय समाजके सम्पूर्ण सह-योगके साथ चला रहे थे। गांधीजी और श्री रिच तथा पोलकके बीच विचारोंकी परिपूर्ण एकताके कारण ही ऐसा हो सका।
भारतीयोंकी यह बुनियादी माँग कि संघके प्रवासी कानूनसे जातीय प्रभेद हटा दिया जाये। विधेयकमें स्वीकार-सी कर ली गई थी; किन्तु ऑरेंज फ्री स्टेटके विधान में यह जातीय प्रभेद अन्तर्निहित था और उसे कायम रखा जा रहा था। बेशक,भारतीयोंके मौजूदा अधिकारोंसे सम्बन्धित कुछ दूसरे मुद्दे भी थे। पर वे ऐसी समस्या उपस्थित नहीं कर रहे थे जिसका कोई हल ही न हो। असल कठिनाई ऑरेंज फ्री स्टेटके विधानमें अन्तर्निहित जातीय प्रभेदकी ही थी और जनरल स्मट्स या तो फ्रीस्टेटके सदस्योंको इस बातके लिए राजी नहीं कर पाये या करना ही नहीं चाहते थे कि<noinclude></noinclude>
06m9y1tzodz7j61t7dwphupdoojrxb6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१२
250
184060
673454
669496
2026-08-23T19:05:38Z
सीमा1
430
673454
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|छः|}}</noinclude>वे--सिद्धान्त रूपसे ही सही--फ्री स्टेटसे प्रभेदमूलक माँगोंको हटाना स्वीकार कर लें
और संघमें अन्यत्र चलते हुए रुखको अपना लें। जनरल स्मट्स इस बातके लिए उत्सुक
थे कि संसदके इस सत्रकी समाप्तिके पूर्व ही यह विधेयक स्वीकृत हो जाये। इसका कारण
था। राज्याभिषेकका उत्सव समीप आ पहुँचा था और वे इस कार्यक्रमको शान्तिपूर्वक
सम्पन्न करना चाहते थे । गांधीजीने उन्हें एक वैकल्पिक हल सुझाया जिसे अपना
लेनेपर न केवल फ्री स्टेटवालोंसे बचकर निकला जा सकता था बल्कि नेटाल और
केपकी तत्कालीन समस्याएँ भी अधिक नहीं रह जाती थीं । गांधीजीका सुझाव यह था
कि संघके प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकको उठा लिया जाये और उसके स्थानपर ट्रान्स-
वाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियममें संशोधन किया जाये--क्योंकि सत्याग्रह संघर्ष तो
ट्रान्सवालके इसी कानूनको लेकर था। परन्तु जनरल स्मट्स इसे माननेको तैयार नहीं
थे। उन्हें भय था कि गोरे लोग उसके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाली स्थितिको स्वीकार
नहीं करेंगे। ऐसी दुविधामें जनरल स्मट्सने अपनी अड़चनें गांधीजीके समक्ष रखीं ।
उन्होंने मंजूर किया कि शायद विधेयकको मुल्तवी रखना होगा लेकिन साथ ही आग्रह
किया कि सत्याग्रह बन्द कर दिया जाये। दूसरेकी कठिनाइयोंका खयाल करनेके
लिए सदा तैयार और स्वभावसे उदार गांधीजीने स्मट्सकी कठिनाईको समझा और
सत्याग्रहको मुल्तवी कर देना स्वीकार कर लिया। इसकी एवज में उन्होंने स्मट्ससे यह
अभिवचन जरूर माँगा कि अगले सत्रमें ट्रान्सवाल एशियाई पंजीयन अधिनियमको रद
करते हुए; किन्तु नाबालिगोंके अधिकारोंकी रक्षा करते हुए उपयुक्त कानून पास किया
जायेगा; मौजूदा अधिकार कायम रखे जायेंगे; जो सत्याग्रही पंजीयनके हकदार थे
उन्हें पंजीयन कराने दिया जायेगा और जो शिक्षित सत्याग्रही उस समय ट्रान्सवालमें
रहते थे किन्तु जिन्हें एशियाई अधिनियमके तहत पंजीयनका हक नहीं था उन्हें जबतक
आगामी कानून पारित नहीं होता तबतक के लिए वहाँ रहनेकी विशेष अनुमति दी
जायेगी । यह बात २१ अप्रैलको हुई थी । दूसरे दिन स्मट्सने आवश्यक आश्वासन
दिये और कहा कि आगामी सत्रमें पास किये जानेवाले कानूनमें ऐसी धाराएँ होंगी
जिनसे सब प्रवेशार्थियोंको कानूनी समानता मिल जायेगी। ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा
२७ तारीखको अपनी सभामें “ 'अनाक्रामक प्रतिरोध बन्द करनेके प्रस्तावको जनरल
स्मट्स द्वारा दिये गये वादोंके पूरा होनेकी शर्तोंके साथ स्वीकार" कर लिया गया
(पृष्ठ ५७) । २९ अप्रैलसे २० मई तक इस सम्बन्धमें पत्रों और तारोंके आदान-प्रदानके
बाद अस्थायी समझौता सम्पन्न हो गया।
किन्तु गांधीजीने एक सतर्कता यह बरती कि टॉल्स्टॉय फार्म, जहाँ कि सत्याग्रहि-
योंके निवास और निर्वाहकी व्यवस्था की गई थी, कायम रखा गया क्योंकि अभी और
कई अन्याय थे जिनका प्रतिकार करना बाकी था और भारतीयोंने उनके सम्बन्धमें
आन्दोलन करनेका अपना अधिकार सुरक्षित रखा था। खैर, कुछ समयके लिए शान्ति
तो हो गई और गांधीजीने राजनीतिक जीवनकी चिन्ताओंको यथासम्भव एक ओर
रखकर अपना ध्यान ज्यादा महत्त्वकी वस्तुओंकी ओर लगाया । वे पहलेसे ज्यादा कठोर
आत्मनियमनके प्रयत्नमें, चिन्तन और मननमें तथा शैक्षणिक प्रयोगोंमें जुट गये।<noinclude></noinclude>
9brcuc8hdizfkalbsor2aqozr9aa4ci
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३
250
184080
673360
672572
2026-08-23T16:10:48Z
सीमा1
430
673360
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''चित्र-सूची'''}}}}
|-
|स्मट्ससे १९ अप्रैल १९१९ को हुई बातचीतकी टीप----||गांधीजीके स्वाक्षरोंमें||मुखचित्र
|-
|“केला खाकर तो वह बिल्कुल शेर हो जाता है !"||(व्यंग्य चित्र)||१०४ के सामने
|-
|बिलजी ऑस्केन्धी|| ({{ditto}})|| १०४ {{ditto}}
|-
|“पच्चर ठोकी जा रही है”||(व्यंग्य चित्र)|| १०५ {{ditto}}
|-
|“डायरी : १९२२” से (दो पृष्ठ)|| || ४१६ {{ditto}}
|-
|श्री गोखले और केपटाउनकी स्वागत समिति|| || ४१७ {{ditto}}
|}<noinclude></noinclude>
b38py8vpp480ay3f8ars5p74jutabhv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९९
250
184122
673408
639991
2026-08-23T17:29:10Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673408
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>परिशिष्ट
५६१
पट्टेकी एक शर्त यह है कि उसपर किसी रंगदार व्यक्तिको नहीं रहने दिया जायेगा। फिर भी, मन्त्रिगण
अपने पहले इस आश्वासनको दुहराना चाहते हैं कि इन बस्तियों में ऐसे अनुदानोंकी तारीखसे पूर्व लोगोंने जो
निहित स्वार्थ प्राप्त कर लिये हैं, उनमें हस्तक्षेप करनेका उनका कोई इरादा नहीं है। किन्तु, नये अधिकार
प्राप्त करनेकी कोशिशोके विरुद्ध वे कोई कार्रवाई न करें, यह असम्भव है । इस सम्बन्धमें वे इतना और
कहना चाहते हैं कि एशियाई समाजके लोग उन कस्बों (टाउनशिप्स ) को एशियाई आबादीसे भर देनेके
लिए संगठित रूपसे प्रयत्न कर रहे हैं जहाँ उन्हें पहले कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे, और फलस्वरूप
यूरोपीय समाज अत्यधिक क्षुब्ध होता जा रहा है, - इतना क्षुब्ध कि इससे सम्भवतः मन्त्रियोंको मजबूर होकर
स्वामित्व-पट्टोंमें विहित शर्तोंको लागू करनेके लिए कस्वा कानूनके अन्तर्गत कार्रवाई करनी पड़ेगी ।
{{right|एस. डब्ल्यू. सावर}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २७-४-१९१२
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गोखलेका पत्र'''}}</center>
{{right|बैनेट हाउस<br>२३१-३२ स्टड<br>लन्दन, डब्ल्यू० सी०<br>जुलाई २७, १९१२}}
प्रिय श्री गांधी,
मैंने आपको इस बातकी निश्चित सूचना देनेके लिए परसों तार भेजा है कि मैंने 'सैक्सन
जहाजसे अपनी यात्राका टिकट ले लिया है । जहाज ५ अक्तूबर को साउदैम्पटनसे चलेगा । इसका मतलब
यह हुआ कि मैं २२ अक्तूबरको केप टाउन पहुँचूँगा । इस तरह मुझे दक्षिण आफ्रिकामें २४ दिनोंका
समय मिलेगा कौर १६ नवम्बरको मुझे डरबनसे बम्बई के लिए अवश्य ही प्रस्थान कर देना पड़ेगा ।
पिछले शनिवारको मुझे लार्ड क्रू का एक पत्र मिला था । उसमें प्रस्ताव था कि मैं भारतीय लोक-सेवाओंके
सम्बन्ध में नियुक्त होनेवाले शाही कमीशनमें एक स्थान स्वीकार कर लूँ। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर
लिया है । किन्तु कमीशन अगली जनवरीके पहले अपना काम शुरू नहीं करेगा । अतः, उसके कारण मुझे ५
अक्तूबर से पहले दक्षिण आफ्रिकाके लिए प्रस्थान करनेकी जरूरत नहीं पढ़ेगी। कुमारी पोल्कने मुझे बताया
है कि आज ही उन्होंने आपको एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने मुझे अपनी यात्राका टिकट लेनेमें जो
कठिनाई हुई उसका जिक्र किया है । किन्तु, आज सुबह मुझे यूनियन कैसिल कम्पनीके अध्यक्ष सर
ओवेन फिलिप्सका एक पत्र मिला है। उसमें उन्होंने लिखा है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा और
मेरी यात्राको सुविधापूर्ण बनानेके लिए पूरी व्यवस्था कर दी जायेगी। यदि श्री ओवेनका उत्तर असन्तोष-
जनक होता तो उस हालत में मेरा इरादा अखबारों और अनेक सम्पादकों के नाम पत्र लिखनेका था ।
'वेस्ट मिन्स्टर गजट' के श्री स्पेंडर, 'डेली न्यूज' के श्री गार्डिनर, 'नेशन' के श्री मैसिंघम, जो
'टाइम्स' के भी कर्मचारी हैं, इस सम्बन्धमें अपनी पूरी ताकत लगा देते । श्री रैम्जे मे कडाडका
इरादा तो सदनमें प्रश्न पूछनेका भी था। श्री हरकोर्ट भी इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध थे । उनसे
मैं स्पेंडर-परिवारके घर दिनके भोजनपर मिला था । उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन्हें यह सूचित कर<noinclude>११-३६</noinclude>
p3n4b9a5qtdtekxan9lrzawdyhavf2p
673409
673408
2026-08-23T17:30:22Z
सीमा1
430
673409
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६१}}</noinclude>पट्टेकी एक शर्त यह है कि उसपर किसी रंगदार व्यक्तिको नहीं रहने दिया जायेगा। फिर भी, मन्त्रिगण
अपने पहले इस आश्वासनको दुहराना चाहते हैं कि इन बस्तियों में ऐसे अनुदानोंकी तारीखसे पूर्व लोगोंने जो
निहित स्वार्थ प्राप्त कर लिये हैं, उनमें हस्तक्षेप करनेका उनका कोई इरादा नहीं है। किन्तु, नये अधिकार
प्राप्त करनेकी कोशिशोके विरुद्ध वे कोई कार्रवाई न करें, यह असम्भव है । इस सम्बन्धमें वे इतना और
कहना चाहते हैं कि एशियाई समाजके लोग उन कस्बों (टाउनशिप्स ) को एशियाई आबादीसे भर देनेके
लिए संगठित रूपसे प्रयत्न कर रहे हैं जहाँ उन्हें पहले कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे, और फलस्वरूप
यूरोपीय समाज अत्यधिक क्षुब्ध होता जा रहा है, - इतना क्षुब्ध कि इससे सम्भवतः मन्त्रियोंको मजबूर होकर
स्वामित्व-पट्टोंमें विहित शर्तोंको लागू करनेके लिए कस्वा कानूनके अन्तर्गत कार्रवाई करनी पड़ेगी ।
{{right|एस. डब्ल्यू. सावर}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २७-४-१९१२
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २०'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गोखलेका पत्र'''}}</center>
{{right|बैनेट हाउस<br>२३१-३२ स्टड<br>लन्दन, डब्ल्यू० सी०<br>जुलाई २७, १९१२}}
प्रिय श्री गांधी,
मैंने आपको इस बातकी निश्चित सूचना देनेके लिए परसों तार भेजा है कि मैंने 'सैक्सन
जहाजसे अपनी यात्राका टिकट ले लिया है । जहाज ५ अक्तूबर को साउदैम्पटनसे चलेगा । इसका मतलब
यह हुआ कि मैं २२ अक्तूबरको केप टाउन पहुँचूँगा । इस तरह मुझे दक्षिण आफ्रिकामें २४ दिनोंका
समय मिलेगा कौर १६ नवम्बरको मुझे डरबनसे बम्बई के लिए अवश्य ही प्रस्थान कर देना पड़ेगा ।
पिछले शनिवारको मुझे लार्ड क्रू का एक पत्र मिला था । उसमें प्रस्ताव था कि मैं भारतीय लोक-सेवाओंके
सम्बन्ध में नियुक्त होनेवाले शाही कमीशनमें एक स्थान स्वीकार कर लूँ। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर
लिया है । किन्तु कमीशन अगली जनवरीके पहले अपना काम शुरू नहीं करेगा । अतः, उसके कारण मुझे ५
अक्तूबर से पहले दक्षिण आफ्रिकाके लिए प्रस्थान करनेकी जरूरत नहीं पढ़ेगी। कुमारी पोल्कने मुझे बताया
है कि आज ही उन्होंने आपको एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने मुझे अपनी यात्राका टिकट लेनेमें जो
कठिनाई हुई उसका जिक्र किया है । किन्तु, आज सुबह मुझे यूनियन कैसिल कम्पनीके अध्यक्ष सर
ओवेन फिलिप्सका एक पत्र मिला है। उसमें उन्होंने लिखा है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा और
मेरी यात्राको सुविधापूर्ण बनानेके लिए पूरी व्यवस्था कर दी जायेगी। यदि श्री ओवेनका उत्तर असन्तोष-
जनक होता तो उस हालत में मेरा इरादा अखबारों और अनेक सम्पादकों के नाम पत्र लिखनेका था ।
'वेस्ट मिन्स्टर गजट' के श्री स्पेंडर, 'डेली न्यूज' के श्री गार्डिनर, 'नेशन' के श्री मैसिंघम, जो
'टाइम्स' के भी कर्मचारी हैं, इस सम्बन्धमें अपनी पूरी ताकत लगा देते । श्री रैम्जे मे कडाडका
इरादा तो सदनमें प्रश्न पूछनेका भी था। श्री हरकोर्ट भी इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध थे । उनसे
मैं स्पेंडर-परिवारके घर दिनके भोजनपर मिला था । उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन्हें यह सूचित कर<noinclude>११-३६</noinclude>
4raon5kkurgq35oda9r0eqd30wbcoph
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६००
250
184123
673404
639992
2026-08-23T17:19:08Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673404
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दूँ कि श्री ओवेनका उत्तर सन्तोषजनक है अथवा नहीं। किन्तु, मेरा खयाल है, अब इस सम्बन्धमें
कुछ करने की जरूरत नहीं है, हालाँकि मैं इस मामलेको समाप्त करके एक प्रकारसे दुःखी भी हूँ;
क्योंकि इसमें एक सिद्धान्तका प्रश्न समाहित था और वह न्यूनाधिक अनिर्णीत ही रह गया ।
कुमारी पोलकने मुझे यह भी बताया है कि उन्होंने आपको लिखे पत्र में ऐसा आभास दिया है
कि उन्हें इसी सर्दियोंमें दक्षिण आफ्रिका जाना चाहिए, ताकि वे वहाँकी परिस्थितिकी चश्मदीद
जानकारी प्राप्त करके हमारी दक्षिण आफ्रिकी समस्याओं को हल करनेका प्रयत्न कर सकेँ । मैं उनसे
सर्वथा सहमत हूँ, और मुझे पूरी आशा है कि आप उनके सुझावको स्वीकार कर लेंगे। मैंने देखा
है कि उन्हें इस पदके दायित्वोंको सँभालने में कितनी जबरदस्त कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है,
और उनके काम में सहायता पहुँचानेके लिए कमसे कम इतना तो किया ही जाना चाहिए कि उन्हें
दक्षिण आफ्रिकाकी परिस्थितियोंकी चश्मदीद जानकारी प्राप्त करनेका एक अवसर दिया जाये । उनका
विचार हर दृष्टिसे सही है । यदि खर्चेकी बात को लेकर आपको स्वीकृति देनेमें कोई बाधा होनेकी
सम्भावना हो तो मैं भारत लौटनेपर, उनकी यात्रामें जो सौ-एक पौंड ऑोंगे, उनका प्रबन्ध करनेकी
जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता हूँ । अतः, आज कृपया उनकी योजनाको स्वीकृति दे दें और तार द्वारा
उन्हें अपनी यात्राके टिकट आदिका प्रबन्ध करनेकी अनुमति भेज दें ।
मैं ५ अगस्तको यूरोपके लिए प्रस्थान कर रहा हूँ । यहाँ नेशनल लिबरल क्लब ( व्हाइट प्लेस,
एस० डब्ल्यू ० ) के पतेपर आये पत्र मैं जहाँ कहीं भी होऊँगा, मुझे भेज दिये जायेंगे ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>गो० कृ० गोखले}}
हस्तलिखित मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६७२ ) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २१'''}}</center>
<center>{{larger|''' स्वर्ण-कानून और कस्बा-अधिनियम (१९०८) के बारेमें भारत सरकारको पोलकका पत्र'''}}</center>
{{right|अप्रैल १९, १९१२}}
{{left|सचिव, भारत सरकार<br>वाणिज्य और उद्योग विभाग<br>शिमला<br>[ महोदय, ]}}
हाल ही में प्रकाशित श्वेत-पत्र (सी० डी० ६०८७) के सम्बन्धमें, जिसमें " ट्रान्सवालके स्वर्ण कानून और १९०८ के कस्वा अधिनियमोंके अन्तर्गत भारतीयों की स्थिति के बारेमें हुआ पत्र-व्यवहार " दिया गया है, और विशेष रूपसे उसके पृष्ठ १७ पर छपी संघ-सरकारकी टिप्पणी (संलग्न संख्या ९) के दूसरे अनुच्छेद के बारेमें मैं इस प्रान्तके भारतीय समाजकी ओरसे निम्नलिखित बातें निवेदित करना चाहता हूँ ।
२. सन् १८८५ का कानून ३ एशियाकी वतनी जातियोंके ऊपर लागू होता है, और उसके
अन्तर्गत भारतीयों तथा अन्य एशियाइयोंको बस्तियों या बाजारोंको छोड़कर अन्यत्र कहीं अचल सम्पत्ति
रखनेका निषेध है ।<noinclude></noinclude>
f1n9l6eii8c41kfzppomk8i8y9b541m
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०१
250
184124
673395
639993
2026-08-23T17:02:22Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673395
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६३}}</noinclude>३. परन्तु ट्रान्सवाल प्रशासनने उन्हें ऐसी बस्तियोंमें भी भूसम्पत्तिकी निःशुल्क मिल्कियत देने या लम्बी अवधिका पट्टा देनेसे इनकार कर दिया है, और उन्हें बाड़ोंका, जिनमें ये बस्तियाँ विभाजित हैं, केवल २१ वर्षका पट्टा प्राप्त करनेकी अनुमति दी है। जोहानिसबर्ग में तो केवल माहवारी किरायेपर ही भूमि प्राप्त की जा सकती है ।
४. किन्तु, किसी भारतीय द्वारा भूसम्पत्तिकी मिल्कियतके कानूनी निषेधके बावजूद ट्रस्ट-जैसी एक नामाचारके लिए भारतीयोंके यूरोपीय मित्रोंके नाम इस्तान्तरित कर दिया जाता है, किन्तु चीज बनानेका रिवाज बन गया । इस रिवाजके मुताबिक किसी भी जायदादका स्वामित्व उसकी खरीद और भुगतान कोई भारतीय व्यापारी ही करता है और वही उसका वास्तविक मालिक भी होता है । इस प्रकारकी जायदादें सट्टेबाजीकी गरजसे नहीं खरीदी गई थीं, बल्कि व्यापार बढ़ानेकी गरजसे खरीदी गई थीं, और उनके वास्तविक भारतीय मालिकोंमें से लगभग सभीने हजारों पौंडकी लागतसे इन जायदादों पर अपने रहने और व्यापार करनेके लिए खासे ठोस और आधुनिक ढंगकी इमारतें बनवाई।
५. इस बातके पर्याप्त प्रमाण हैं कि ये सारी कार्रवाइयाँ कानूनसे बचनेकी गरजसे नहीं की गई ।
६. १८८५ का कानून ३ लागू होनेसे पहले, क्लार्क्सडोंपैकी व्यापारिक पेढी, मेसर्सं मुहम्मद इस्माइलने सार्वजनिक नीलाम में कस्बेमें कुछ दूकानें खरीदीं इस शर्त पर कि वे उनके लिए मासिक परवानेका शुल्क देंगे । ये दूकानें उनके नाम रजिस्टर कर दी गई । लार्क्सडॉर्पके बाड़ा-मालिकोंका आम रिवाज यह बन गया कि वे दूकानोंका परवाना शुल्क हर छमाहीके हिसाब से दें । मेसर्स मुहम्मद इस्माइल भी इसी प्रकार अपने शुल्कका भुगतान करते थे । कुछ समय बाद एक भारतीय-विरोधी आन्दोलन खड़ा हुआ, गणतांत्रिक सरकारने हस्तक्षेप किया, और बिना किसी सुनवाईके और भारतीय मालिकोंको कोई मुआवजा दिये बगैर उनके बाड़े जब्त कर लिये गये । भारतीय मालिकोंने लूटपाटकी इस अनुचित और अकारण कार्रवाईका जोरदार विरोध किया । लम्बी लिखा-पढ़ीके बाद सरकारने भारतीय व्यापारियोंको सूचित किया कि उन्हें मिल्कियत रखनेकी फिर अनुमति दे दी जायेगी,बशर्ते कि भूमि-पंजी (लैंड रजिस्ट्री) में उन्हें किसी यूरोपीयके नाम रजिस्टर करवाया जाये । यह शर्त मंजूर कर ली गई और स्वयं अधिकारियोंके सुझावपर भूमिको उपर्युक्त ढंगसे हस्तान्तरित कर दिया गया था ।
७. स्वर्गीय श्री अबूबकर आमदने, जो दक्षिण आफ्रिकाके अग्रणी भारतीय व्यापारी थे, १८८५ में कानून लागू होनेसे पहले, प्रिटोरियामें चर्च स्ट्रीटपर एक दूकान खरीदी थी, लेकिन हस्तान्तरणको अनुमति
उन्हें कानून लागू होनेकी तारीखसे पहले नहीं दी गई थी। भारतीय मालिककी मृत्यु हो गई, और सीधे
उनके उत्तराधिकारियोंके नाम दूकानका हस्तान्तरण करनेकी अनुमति नहीं दी गई, बल्कि उनके एवज में
उनके द्वारा नामजद कतिपय यूरोपीयोंके नाम की गई । इस अन्यायपूर्ण स्थितिको ट्रान्सवालकी नई सरकारने
१९०७ में अनुभव किया, और उसने उसी वर्ष अधिनियम २ में उत्तराधिकारियों के नाम हस्तान्तरणकी
व्यवस्था करनेका प्रयत्न किया । इस बीच जायदाद मेरे नाम दर्ज थी। किन्तु, सर्वोच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र
देनेपर उसने निर्णय दिया कि अधिनियम २ की व्यवस्थाओंकी वाक्य-रचना इस प्रकार की गई है कि उत्तरा-
धिकारियोंके नाम हस्तान्तरणका निषेध होता था । आखिर १९०८ के अधिनियम ३६ को बनाते समय मेरे
नाम दर्ज दूकानको उत्तराधिकारियोंके नाम हस्तान्तरित करनेकी व्यवस्था की गई और इस सारी कार्यवाही को
संसद द्वारा निर्मित ट्रान्सवालके अधिनियमकी एक धारामें लिपिबद्ध कर दिया गया ।
८. १९०५ में सैयद इस्माइल तथा एक अन्य बनाम जैकब्स, एन० ओ० वाले अपीलके मामले में
अदालत ने ऐसे वास्तविक ट्रस्टोंको स्पष्ट रूपसे मान्यता प्रदान कर दी। कुछ महीने बाद जब ऐसे
उठाई और विभाग द्वारा कानूनी
हस्तान्तरणोंकी वैधतापर विलेख कार्यालय (डीडस ऑफिस ) ने शंका
सम्मति ली गई तो यह निर्णय हुआ कि इस मामलेमें सर्वोच्च न्यायालयके निर्णयसे इस प्रकारके
Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude>
fj0goatogxawkycy1p1k1flo6bwqyzg
673400
673395
2026-08-23T17:06:25Z
सीमा1
430
673400
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६३}}</noinclude>३. परन्तु ट्रान्सवाल प्रशासनने उन्हें ऐसी बस्तियोंमें भी भूसम्पत्तिकी निःशुल्क मिल्कियत देने या लम्बी अवधिका पट्टा देनेसे इनकार कर दिया है, और उन्हें बाड़ोंका, जिनमें ये बस्तियाँ विभाजित हैं, केवल २१ वर्षका पट्टा प्राप्त करनेकी अनुमति दी है। जोहानिसबर्ग में तो केवल माहवारी किरायेपर ही भूमि प्राप्त की जा सकती है ।
४. किन्तु, किसी भारतीय द्वारा भूसम्पत्तिकी मिल्कियतके कानूनी निषेधके बावजूद ट्रस्ट-जैसी एक नामाचारके लिए भारतीयोंके यूरोपीय मित्रोंके नाम इस्तान्तरित कर दिया जाता है, किन्तु चीज बनानेका रिवाज बन गया । इस रिवाजके मुताबिक किसी भी जायदादका स्वामित्व उसकी खरीद और भुगतान कोई भारतीय व्यापारी ही करता है और वही उसका वास्तविक मालिक भी होता है । इस प्रकारकी जायदादें सट्टेबाजीकी गरजसे नहीं खरीदी गई थीं, बल्कि व्यापार बढ़ानेकी गरजसे खरीदी गई थीं, और उनके वास्तविक भारतीय मालिकोंमें से लगभग सभीने हजारों पौंडकी लागतसे इन जायदादों पर अपने रहने और व्यापार करनेके लिए खासे ठोस और आधुनिक ढंगकी इमारतें बनवाई।
५. इस बातके पर्याप्त प्रमाण हैं कि ये सारी कार्रवाइयाँ कानूनसे बचनेकी गरजसे नहीं की गई ।
६. १८८५ का कानून ३ लागू होनेसे पहले, क्लार्क्सडोंपैकी व्यापारिक पेढी, मेसर्सं मुहम्मद इस्माइलने सार्वजनिक नीलाम में कस्बेमें कुछ दूकानें खरीदीं इस शर्त पर कि वे उनके लिए मासिक परवानेका शुल्क देंगे । ये दूकानें उनके नाम रजिस्टर कर दी गई । लार्क्सडॉर्पके बाड़ा-मालिकोंका आम रिवाज यह बन गया कि वे दूकानोंका परवाना शुल्क हर छमाहीके हिसाब से दें । मेसर्स मुहम्मद इस्माइल भी इसी प्रकार अपने शुल्कका भुगतान करते थे । कुछ समय बाद एक भारतीय-विरोधी आन्दोलन खड़ा हुआ, गणतांत्रिक सरकारने हस्तक्षेप किया, और बिना किसी सुनवाईके और भारतीय मालिकोंको कोई मुआवजा दिये बगैर उनके बाड़े जब्त कर लिये गये । भारतीय मालिकोंने लूटपाटकी इस अनुचित और अकारण कार्रवाईका जोरदार विरोध किया । लम्बी लिखा-पढ़ीके बाद सरकारने भारतीय व्यापारियोंको सूचित किया कि उन्हें मिल्कियत रखनेकी फिर अनुमति दे दी जायेगी,बशर्ते कि भूमि-पंजी (लैंड रजिस्ट्री) में उन्हें किसी यूरोपीयके नाम रजिस्टर करवाया जाये । यह शर्त मंजूर कर ली गई और स्वयं अधिकारियोंके सुझावपर भूमिको उपर्युक्त ढंगसे हस्तान्तरित कर दिया गया था ।
७. स्वर्गीय श्री अबूबकर आमदने, जो दक्षिण आफ्रिकाके अग्रणी भारतीय व्यापारी थे, १८८५ में कानून लागू होनेसे पहले, प्रिटोरियामें चर्च स्ट्रीटपर एक दूकान खरीदी थी, लेकिन हस्तान्तरणको अनुमति उन्हें कानून लागू होनेकी तारीखसे पहले नहीं दी गई थी। भारतीय मालिककी मृत्यु हो गई, और सीधे उनके उत्तराधिकारियोंके नाम दूकानका हस्तान्तरण करनेकी अनुमति नहीं दी गई, बल्कि उनके एवज में उनके द्वारा नामजद कतिपय यूरोपीयोंके नाम की गई । इस अन्यायपूर्ण स्थितिको ट्रान्सवालकी नई सरकारने १९०७ में अनुभव किया, और उसने उसी वर्ष अधिनियम २ में उत्तराधिकारियों के नाम हस्तान्तरणकी व्यवस्था करनेका प्रयत्न किया । इस बीच जायदाद मेरे नाम दर्ज थी। किन्तु, सर्वोच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र देनेपर उसने निर्णय दिया कि अधिनियम २ की व्यवस्थाओंकी वाक्य-रचना इस प्रकार की गई है कि उत्तरा-धिकारियोंके नाम हस्तान्तरणका निषेध होता था । आखिर १९०८ के अधिनियम ३६ को बनाते समय मेरे नाम दर्ज दूकानको उत्तराधिकारियोंके नाम हस्तान्तरित करनेकी व्यवस्था की गई और इस सारी कार्यवाही को संसद द्वारा निर्मित ट्रान्सवालके अधिनियमकी एक धारामें लिपिबद्ध कर दिया गया ।
८. १९०५ में सैयद इस्माइल तथा एक अन्य बनाम जैकब्स, एन० ओ० वाले अपीलके मामले में
अदालत ने ऐसे वास्तविक ट्रस्टोंको स्पष्ट रूपसे मान्यता प्रदान कर दी। कुछ महीने बाद जब ऐसे
उठाई और विभाग द्वारा कानूनी हस्तान्तरणोंकी वैधतापर विलेख कार्यालय (डीडस ऑफिस ) ने शंका सम्मति ली गई तो यह निर्णय हुआ कि इस मामलेमें सर्वोच्च न्यायालयके निर्णयसे इस प्रकारके<noinclude></noinclude>
b3245lxhmfaypgai0yg65o1404p8qhd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०२
250
184125
673388
639994
2026-08-23T16:52:12Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673388
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६४|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>हस्तान्तरगकी वैधता निर्विवाद रूपसे निश्चित हो जाती है और उसके बादसे इस प्रकारके कई
हस्तान्तरण किये गये ।
९. गत १९ फरवरीको लार्ड सभामें बहसके दौरान १९०८ और १९०९ के करना कानून संशोधन अधिनियमोंके कार्यान्वयनके विषयमें लॉर्ड ऍम्टहिल द्वारा पूछे गये प्रश्नोंके उत्तर में दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटेनके भूतपूर्व उच्चायुक्त और ट्रान्सवालके गवर्नर लॉर्ड सेल्बोर्नैने इस बातकी ताईद की कि ये हस्तान्तरण खुले ढंगसे और बिना किसी छिपावके होते रहे थे । अधिकृत रिपोर्ट ( ऑफीशियल रिपोर्ट) में उनका यह कथन उद्धृत है : एक ब्रिटिश भारतीय प्रजाजन भूमिका स्वामी नहीं हो सकता और प्रत्यक्ष रूपसे खान उद्योग भी नहीं चला सकता । लॉर्ड महोदय, मैं यहाँ वही बात कहता हूँ, जो मैंने ट्रान्सवाल्की एक सभामें कही थी । मैं नहीं समझता कि ये दोनों प्रतिबन्ध न्यायोचित हैं । मेरी रायमें ये [ प्रतिबन्ध ] न केवल न्यायोचित ही नहीं हैं, बल्कि अत्यन्त मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि वे सर्वथा अव्यावहारिक हैं। किसी भी ब्रिटिश भारतीयको भूमिका पूर्ण स्वामित्व प्राप्त करनेका निषेध है, किन्तु किसी गोरेके साथ आपली व्यवस्था करके उसके जरिये वह भूमिको बिल्कुल पक्के ढंगसे अपने कब्जे में रखता है ।
१०. तब, जहाँ यह साफ है कि कानून में भारतीयोंको अचल सम्पत्तिके स्वामित्वका निषेध है,वहाँ पह उतना ही साफ है कि उपनिवेशकी अदालतों और सरकार द्वारा मान्य अप्रत्यक्ष स्वामित्वका रिवाज बन जानेक कारण कुछ अतिरिक्त आनुषंगिक खर्चोंको छोड़कर ट्रान्सवालके भारतीय समाजके अपेक्षाकृत धनी वर्गको कोई वास्तविक कठिनाई नहीं हुई है ।
११. यदि साम्राज्य सरकार और ट्रान्सवालके भारतीय १८८५ के कानून ३ की निषेधक धाराको रद करनेपर जोर देते हैं तो वे ऐसा न केवल समाजके कम सम्पन्न सदस्योंकी रक्षाके लिए करते हैं, बल्कि उस जातिभेदपर आधारित निर्योग्यताको दूर करानेके लिए भी करते हैं जो न तो ट्रान्सवाल्के वतनियोंपर लागू है और न अन्य किसी [गैर भारतीय] रंगदार ब्रिटिश प्रजापर ही ।
१२. यह बात समझ ली जानी चाहिए कि जहाँ भारतीयोंने व्यक्तिशः भूमिके अप्रत्यक्ष स्वामित्वके अधिकारका लाभ उठाया है यह अधिकार सम्भावनाकी दृष्टिले समाजके प्रत्येक सदस्यको प्राप्त है ।
१३. सन् १९०८ में १९०७ के कस्वा अधिनियमका संशोधन करते हुए कस्बा संशोधन अधिनियम (१९०८ का, संख्या ३४, ट्रान्सवाल) पास किया गया । यह कानून विशेष रूपसे कस्बोंमें स्थित बाक बारेमें बनाया गया था । यह कानून तथा इसके बाद १९०९ का एक संशोधन अधिनियम, दोनों सामान्य नियम निर्धारित करते थे, अर्थात् उनमें कोई जातीय भेदभाव नहीं किया गया था, और उनमें अमुक परिस्थितियोंमें और अमुक शर्तोंपर पट्टेको पूर्ण स्वामित्वके अधिकार में बदले जानेकी व्यवस्था की गई थी ।
१४. ययपि साधारण परिस्थितियोंमें किसी पट्टेदारको पूर्ण स्वामित्वका पट्टा प्राप्त करनेके लिए भर्जी देना आवश्यक नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियोंमें इस प्रकारकी अर्जी देना अनिवार्य कर दिया गया ।
१५. इन अधिनियमों में भूमिका पूर्ण स्वामित्व देनेकी शंत निर्धारित करनेवाले विनियमों (देखिये, श्वेतपत्रका परिशिष्ट सी० डी० ६०८७)<ref>१. यहाँ नहीं दिया गया ।</ref> के प्रकाशनकी व्यवस्था की गई थी ।
१६. ये शर्ते १९०९ के सरकारी नोटिस ( ट्रान्सवाल), संख्या ६४०, के अन्तर्गत प्रकाशित की गई थी। उसकी उपधारा (घ) निम्नलिखित है :
" यह (स्वामित्वके पट्टे द्वारा प्रदत्त भूमि ) या इसका कोई भाग किसी भी रंगदार व्यक्तिको हस्तान्तरित नहीं किया जा जायेगा, और न उसे पट्टेपर अथवा किसी भी अन्य रूपमें ही दिया जायेगा;
______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
q12trl45jy1gjcp4twkzlr2iindev5i
673389
673388
2026-08-23T16:53:33Z
सीमा1
430
673389
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६४|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>हस्तान्तरगकी वैधता निर्विवाद रूपसे निश्चित हो जाती है और उसके बादसे इस प्रकारके कई
हस्तान्तरण किये गये ।
९. गत १९ फरवरीको लार्ड सभामें बहसके दौरान १९०८ और १९०९ के करना कानून संशोधन अधिनियमोंके कार्यान्वयनके विषयमें लॉर्ड ऍम्टहिल द्वारा पूछे गये प्रश्नोंके उत्तर में दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटेनके भूतपूर्व उच्चायुक्त और ट्रान्सवालके गवर्नर लॉर्ड सेल्बोर्नैने इस बातकी ताईद की कि ये हस्तान्तरण खुले ढंगसे और बिना किसी छिपावके होते रहे थे । अधिकृत रिपोर्ट ( ऑफीशियल रिपोर्ट) में उनका यह कथन उद्धृत है : एक ब्रिटिश भारतीय प्रजाजन भूमिका स्वामी नहीं हो सकता और प्रत्यक्ष रूपसे खान उद्योग भी नहीं चला सकता । लॉर्ड महोदय, मैं यहाँ वही बात कहता हूँ, जो मैंने ट्रान्सवाल्की एक सभामें कही थी । मैं नहीं समझता कि ये दोनों प्रतिबन्ध न्यायोचित हैं । मेरी रायमें ये [ प्रतिबन्ध ] न केवल न्यायोचित ही नहीं हैं, बल्कि अत्यन्त मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि वे सर्वथा '''अव्यावहारिक हैं।''' किसी भी ब्रिटिश भारतीयको भूमिका पूर्ण स्वामित्व प्राप्त करनेका निषेध है, '''किन्तु किसी गोरेके साथ आपली व्यवस्था करके उसके जरिये वह भूमिको बिल्कुल पक्के ढंगसे अपने कब्जे में रखता है ।'''
१०. तब, जहाँ यह साफ है कि कानून में भारतीयोंको अचल सम्पत्तिके स्वामित्वका निषेध है,वहाँ पह उतना ही साफ है कि उपनिवेशकी अदालतों और सरकार द्वारा मान्य अप्रत्यक्ष स्वामित्वका रिवाज बन जानेक कारण कुछ अतिरिक्त आनुषंगिक खर्चोंको छोड़कर ट्रान्सवालके भारतीय समाजके अपेक्षाकृत धनी वर्गको कोई वास्तविक कठिनाई नहीं हुई है ।
११. यदि साम्राज्य सरकार और ट्रान्सवालके भारतीय १८८५ के कानून ३ की निषेधक धाराको रद करनेपर जोर देते हैं तो वे ऐसा न केवल समाजके कम सम्पन्न सदस्योंकी रक्षाके लिए करते हैं, बल्कि उस जातिभेदपर आधारित निर्योग्यताको दूर करानेके लिए भी करते हैं जो न तो ट्रान्सवाल्के वतनियोंपर लागू है और न अन्य किसी [गैर भारतीय] रंगदार ब्रिटिश प्रजापर ही ।
१२. यह बात समझ ली जानी चाहिए कि जहाँ भारतीयोंने व्यक्तिशः भूमिके अप्रत्यक्ष स्वामित्वके अधिकारका लाभ उठाया है यह अधिकार सम्भावनाकी दृष्टिले समाजके प्रत्येक सदस्यको प्राप्त है ।
१३. सन् १९०८ में १९०७ के कस्वा अधिनियमका संशोधन करते हुए कस्बा संशोधन अधिनियम (१९०८ का, संख्या ३४, ट्रान्सवाल) पास किया गया । यह कानून विशेष रूपसे कस्बोंमें स्थित बाक बारेमें बनाया गया था । यह कानून तथा इसके बाद १९०९ का एक संशोधन अधिनियम, दोनों सामान्य नियम निर्धारित करते थे, अर्थात् उनमें कोई जातीय भेदभाव नहीं किया गया था, और उनमें अमुक परिस्थितियोंमें और अमुक शर्तोंपर पट्टेको पूर्ण स्वामित्वके अधिकार में बदले जानेकी व्यवस्था की गई थी ।
१४. ययपि साधारण परिस्थितियोंमें किसी पट्टेदारको पूर्ण स्वामित्वका पट्टा प्राप्त करनेके लिए भर्जी देना आवश्यक नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियोंमें इस प्रकारकी अर्जी देना अनिवार्य कर दिया गया ।
१५. इन अधिनियमों में भूमिका पूर्ण स्वामित्व देनेकी शंत निर्धारित करनेवाले विनियमों (देखिये, श्वेतपत्रका परिशिष्ट सी० डी० ६०८७)<ref>१. यहाँ नहीं दिया गया ।</ref> के प्रकाशनकी व्यवस्था की गई थी ।
१६. ये शर्ते १९०९ के सरकारी नोटिस ( ट्रान्सवाल), संख्या ६४०, के अन्तर्गत प्रकाशित की गई थी। उसकी उपधारा (घ) निम्नलिखित है :
" यह (स्वामित्वके पट्टे द्वारा प्रदत्त भूमि ) या इसका कोई भाग किसी भी रंगदार व्यक्तिको हस्तान्तरित नहीं किया जा जायेगा, और न उसे पट्टेपर अथवा किसी भी अन्य रूपमें ही दिया जायेगा;
______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
i41c8g8cww0gn0j8qp9ba9wgdnjnwdy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०३
250
184126
673380
639995
2026-08-23T16:42:52Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673380
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६५}}</noinclude>और पंजीकृत स्वामीके घरेलू नौकरों या उसके असामियोंको छोड़कर कोई रंगदार व्यक्ति उस भूमिपर
नहीं रहेगा । '''पूर्वोक्त शर्तका उल्लंघन होनेपर ट्रान्सवाल सरकारको अधिकार होगा कि वह
इस पट्टेको रद कर दे और उस भूमिपर बनाई गई इमारतों या किसी अन्य निर्माणका
अथवा उक्त भूमिमें किये गये किसी सुधारका कोई मुआवजा दिये बगैर उसे वापस अपने
कब्जे में ले ले । "'''
१७. यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि मुख्य कानूनकी व्यवस्थाएँ भेदभावसे मुक्त हैं, किन्तु शाही पट्टकी शर्तें, जो मुख्य कानूनका अभिन्न अंग हैं, इस अर्थ में जातिभेदपर आधारित एक गम्भीर निर्योग्यता थोप देती हैं कि भारतीय समाजको अप्रत्यक्ष रूपसे अचल सम्पत्तिके स्वामित्वका जो अधिकार अभीतक प्राप्त रहा है, उसे उससे वंचित करता है। इसके अतिरिक्त ऊपरके अनुच्छेद १४ में उल्लिखित परिस्थितियों में उन भारतीयोंको, जिन्हें आज भूसम्पत्तिका अप्रत्यक्ष स्वामित्व प्राप्त है, भविष्य में बिना कोई मुआवजा दिये उनकी वैध ढंगले प्राप्त सम्पत्तिसे वंचित कर दिया जायेगा ।
१८. भारतीय समाजका कहना है कि ये शर्तें कानूनके विपरीत हैं, अथवा यों कहें कि कानून स्वयं ही गैरकानूनी है, और इसलिए अवैधानिक है । उसका कहना है कि १९०८ और १९०९ के कस्बा संशोधन अधिनियमोंका अभिप्राय स्पष्टतया भेदभावपूर्ण विनियमोंकी रचनाका निषेध करनेका है। दूसरी ओर, १९०६ के ट्रान्सवाल संविधानमें व्यवस्था है कि भेदभावपूर्ण कानूनोंपर शाही स्वीकृति होने तक उसे अमलमें न लाया जाये । चूँकि १९०८ और १९०९ के अधिनियम सामान्यतः सभीपर लागू होते थे, इसलिए उन्हें [ शादी अनुमति प्राप्त करनेके लिए ] रोका नहीं गया, बल्कि गवर्नरने उनपर तुरन्त स्वीकृति दे दी । उनके अन्तर्गत बनाये गये भेदभावपूर्ण विनियम संसदकी जानकारीमें कभी नहीं लाये गये और न उन्हें सम्राट उपनिवेश-मन्त्रीके परीक्षणके लिए ही भेजा गया । उसका कहना है कि संविधानकी शर्तें पूरी नहीं की गईं हैं और इन विनियमोंको कानूनकी कोई शक्ति अथवा प्रभाव प्राप्त नहीं है ।
१९. कुछ तो अपना व्यापार फैलानेकी दृष्टिसे और कुछ इन विनियमोंकी वैधता जाँचनेकी दृष्टिसे श्री अहमद मूसा भायातने भू-सम्पत्तिको अप्रत्यक्ष मिल्कियत के अपने उस अधिकारका उपयोग करते हुए, जिसे अबतक इस प्रान्तको अदालतों और सरकारकी मान्यता प्राप्त रही है, पिछले वर्षके उत्तरार्द्ध में बॉक्सवर्ग कस्बेमें कुछ बाड़ोंकी पूरी मिल्कियत खरीद ली । ये बाड़े श्री लुई वाल्टर रिच, बैरिस्टर-इन-लॉक नाम रजिस्टर कराये गये । श्री रिच कुछ समय पहले तक इंग्लैंडमें दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति के मन्त्री थे, और इस समय जोहानिसबर्ग में दक्षिण आफ्रिका संघके सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं।
२०. उन्होंने उक्त बाड़े जब खरीदे उससे पहले उस कस्बेके गोरे निवासियोंने मिलकर निश्चय किया था कि कस्बेका कोई बाड़ा भारतीयोंके हाथ अप्रत्यक्ष रूपसे नहीं बेचेंगे। इसमें उनका उद्देश्य बॉक्सबर्गको विशुद्ध रूपसे गोरोंकी बस्ती बनाये रखना और भारतीयोंको बस्तियोंमें सीमित रखना था । श्री भाषातको एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जो अपने बाड़े बेचनेको इच्छुक था, अतः उन्होंने उक्त सम्पत्ति खरीद ली और बहुत धन व्यय करके उस जमीनपर उपयुक्त इमारतें बनवाई, और चूँकि वे सरकारसे व्यापारिक-परवाना पहले ही ले चुके थे, इसलिए उन्होंने उस इमारतमें आम वस्तुओंके विक्रयका रोजगार शुरू कर दिया।
२१. किन्तु, श्री भाषातके यूरोपीय व्यापारी प्रतिद्वन्दियोंकी व्यापारिक ईर्ष्या जग उठी है। श्री भाषातको संगठित बहिष्कारका शिकार बनाया गया है। वहाँके गोरे निवासियोंने संघ सरकार पर दबाव डालकर सर्वश्री रिच और भाषातके खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया है ताकि अदालतसे उनका स्वामित्वका पट्टा रद कर दिया जाये, उन्हें उस जमीनसे निकाल बाहर किया जाये, और उनसे इर्जाना वसूला जाये । अपने बचाव के लिए दोनों [ श्री रिच और श्री भायात ] को व्यय-साध्य मुकदमेबाजी करनी पड़ रही है,और श्री भाषातके सामने बिना कोई मुआवजा पाये अपनी जायदाद और व्यापारसे हाथ धो बैठनेका खतरा<noinclude></noinclude>
fltxl2vr1onmvqya0lwas9ncqisqw6a
673382
673380
2026-08-23T16:43:57Z
सीमा1
430
673382
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६५}}</noinclude>और पंजीकृत स्वामीके घरेलू नौकरों या उसके असामियोंको छोड़कर कोई रंगदार व्यक्ति उस भूमिपर
नहीं रहेगा । '''पूर्वोक्त शर्तका उल्लंघन होनेपर ट्रान्सवाल सरकारको अधिकार होगा कि वह
इस पट्टेको रद कर दे और उस भूमिपर बनाई गई इमारतों या किसी अन्य निर्माणका
अथवा उक्त भूमिमें किये गये किसी सुधारका कोई मुआवजा दिये बगैर उसे वापस अपने
कब्जे में ले ले ।" '''
१७. यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि मुख्य कानूनकी व्यवस्थाएँ भेदभावसे मुक्त हैं, किन्तु शाही पट्टकी शर्तें, जो मुख्य कानूनका अभिन्न अंग हैं, इस अर्थ में जातिभेदपर आधारित एक गम्भीर निर्योग्यता थोप देती हैं कि भारतीय समाजको अप्रत्यक्ष रूपसे अचल सम्पत्तिके स्वामित्वका जो अधिकार अभीतक प्राप्त रहा है, उसे उससे वंचित करता है। इसके अतिरिक्त ऊपरके अनुच्छेद १४ में उल्लिखित परिस्थितियों में उन भारतीयोंको, जिन्हें आज भूसम्पत्तिका अप्रत्यक्ष स्वामित्व प्राप्त है, भविष्य में बिना कोई मुआवजा दिये उनकी वैध ढंगले प्राप्त सम्पत्तिसे वंचित कर दिया जायेगा ।
१८. भारतीय समाजका कहना है कि ये शर्तें कानूनके विपरीत हैं, अथवा यों कहें कि कानून स्वयं ही गैरकानूनी है, और इसलिए अवैधानिक है । उसका कहना है कि १९०८ और १९०९ के कस्बा संशोधन अधिनियमोंका अभिप्राय स्पष्टतया भेदभावपूर्ण विनियमोंकी रचनाका निषेध करनेका है। दूसरी ओर, १९०६ के ट्रान्सवाल संविधानमें व्यवस्था है कि भेदभावपूर्ण कानूनोंपर शाही स्वीकृति होने तक उसे अमलमें न लाया जाये । चूँकि १९०८ और १९०९ के अधिनियम सामान्यतः सभीपर लागू होते थे, इसलिए उन्हें [ शादी अनुमति प्राप्त करनेके लिए ] रोका नहीं गया, बल्कि गवर्नरने उनपर तुरन्त स्वीकृति दे दी । उनके अन्तर्गत बनाये गये भेदभावपूर्ण विनियम संसदकी जानकारीमें कभी नहीं लाये गये और न उन्हें सम्राट उपनिवेश-मन्त्रीके परीक्षणके लिए ही भेजा गया । उसका कहना है कि संविधानकी शर्तें पूरी नहीं की गईं हैं और इन विनियमोंको कानूनकी कोई शक्ति अथवा प्रभाव प्राप्त नहीं है ।
१९. कुछ तो अपना व्यापार फैलानेकी दृष्टिसे और कुछ इन विनियमोंकी वैधता जाँचनेकी दृष्टिसे श्री अहमद मूसा भायातने भू-सम्पत्तिको अप्रत्यक्ष मिल्कियत के अपने उस अधिकारका उपयोग करते हुए, जिसे अबतक इस प्रान्तको अदालतों और सरकारकी मान्यता प्राप्त रही है, पिछले वर्षके उत्तरार्द्ध में बॉक्सवर्ग कस्बेमें कुछ बाड़ोंकी पूरी मिल्कियत खरीद ली । ये बाड़े श्री लुई वाल्टर रिच, बैरिस्टर-इन-लॉक नाम रजिस्टर कराये गये । श्री रिच कुछ समय पहले तक इंग्लैंडमें दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति के मन्त्री थे, और इस समय जोहानिसबर्ग में दक्षिण आफ्रिका संघके सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं।
२०. उन्होंने उक्त बाड़े जब खरीदे उससे पहले उस कस्बेके गोरे निवासियोंने मिलकर निश्चय किया था कि कस्बेका कोई बाड़ा भारतीयोंके हाथ अप्रत्यक्ष रूपसे नहीं बेचेंगे। इसमें उनका उद्देश्य बॉक्सबर्गको विशुद्ध रूपसे गोरोंकी बस्ती बनाये रखना और भारतीयोंको बस्तियोंमें सीमित रखना था । श्री भाषातको एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जो अपने बाड़े बेचनेको इच्छुक था, अतः उन्होंने उक्त सम्पत्ति खरीद ली और बहुत धन व्यय करके उस जमीनपर उपयुक्त इमारतें बनवाई, और चूँकि वे सरकारसे व्यापारिक-परवाना पहले ही ले चुके थे, इसलिए उन्होंने उस इमारतमें आम वस्तुओंके विक्रयका रोजगार शुरू कर दिया।
२१. किन्तु, श्री भाषातके यूरोपीय व्यापारी प्रतिद्वन्दियोंकी व्यापारिक ईर्ष्या जग उठी है। श्री भाषातको संगठित बहिष्कारका शिकार बनाया गया है। वहाँके गोरे निवासियोंने संघ सरकार पर दबाव डालकर सर्वश्री रिच और भाषातके खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया है ताकि अदालतसे उनका स्वामित्वका पट्टा रद कर दिया जाये, उन्हें उस जमीनसे निकाल बाहर किया जाये, और उनसे इर्जाना वसूला जाये । अपने बचाव के लिए दोनों [ श्री रिच और श्री भायात ] को व्यय-साध्य मुकदमेबाजी करनी पड़ रही है,और श्री भाषातके सामने बिना कोई मुआवजा पाये अपनी जायदाद और व्यापारसे हाथ धो बैठनेका खतरा<noinclude></noinclude>
mey5euwgfts9dg9llf27s9hbpxm7up9
673383
673382
2026-08-23T16:44:58Z
सीमा1
430
673383
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६५}}</noinclude>और पंजीकृत स्वामीके घरेलू नौकरों या उसके असामियोंको छोड़कर कोई रंगदार व्यक्ति उस भूमिपर नहीं रहेगा। '''पूर्वोक्त शर्तका उल्लंघन होनेपर ट्रान्सवाल सरकारको अधिकार होगा कि वह इस पट्टेको रद कर दे और उस भूमिपर बनाई गई इमारतों या किसी अन्य निर्माणका अथवा उक्त भूमिमें किये गये किसी सुधारका कोई मुआवजा दिये बगैर उसे वापस अपने कब्जे में ले ले ।" '''
१७. यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि मुख्य कानूनकी व्यवस्थाएँ भेदभावसे मुक्त हैं, किन्तु शाही पट्टकी शर्तें, जो मुख्य कानूनका अभिन्न अंग हैं, इस अर्थ में जातिभेदपर आधारित एक गम्भीर निर्योग्यता थोप देती हैं कि भारतीय समाजको अप्रत्यक्ष रूपसे अचल सम्पत्तिके स्वामित्वका जो अधिकार अभीतक प्राप्त रहा है, उसे उससे वंचित करता है। इसके अतिरिक्त ऊपरके अनुच्छेद १४ में उल्लिखित परिस्थितियों में उन भारतीयोंको, जिन्हें आज भूसम्पत्तिका अप्रत्यक्ष स्वामित्व प्राप्त है, भविष्य में बिना कोई मुआवजा दिये उनकी वैध ढंगले प्राप्त सम्पत्तिसे वंचित कर दिया जायेगा ।
१८. भारतीय समाजका कहना है कि ये शर्तें कानूनके विपरीत हैं, अथवा यों कहें कि कानून स्वयं ही गैरकानूनी है, और इसलिए अवैधानिक है । उसका कहना है कि १९०८ और १९०९ के कस्बा संशोधन अधिनियमोंका अभिप्राय स्पष्टतया भेदभावपूर्ण विनियमोंकी रचनाका निषेध करनेका है। दूसरी ओर, १९०६ के ट्रान्सवाल संविधानमें व्यवस्था है कि भेदभावपूर्ण कानूनोंपर शाही स्वीकृति होने तक उसे अमलमें न लाया जाये । चूँकि १९०८ और १९०९ के अधिनियम सामान्यतः सभीपर लागू होते थे, इसलिए उन्हें [ शादी अनुमति प्राप्त करनेके लिए ] रोका नहीं गया, बल्कि गवर्नरने उनपर तुरन्त स्वीकृति दे दी । उनके अन्तर्गत बनाये गये भेदभावपूर्ण विनियम संसदकी जानकारीमें कभी नहीं लाये गये और न उन्हें सम्राट उपनिवेश-मन्त्रीके परीक्षणके लिए ही भेजा गया । उसका कहना है कि संविधानकी शर्तें पूरी नहीं की गईं हैं और इन विनियमोंको कानूनकी कोई शक्ति अथवा प्रभाव प्राप्त नहीं है ।
१९. कुछ तो अपना व्यापार फैलानेकी दृष्टिसे और कुछ इन विनियमोंकी वैधता जाँचनेकी दृष्टिसे श्री अहमद मूसा भायातने भू-सम्पत्तिको अप्रत्यक्ष मिल्कियत के अपने उस अधिकारका उपयोग करते हुए, जिसे अबतक इस प्रान्तको अदालतों और सरकारकी मान्यता प्राप्त रही है, पिछले वर्षके उत्तरार्द्ध में बॉक्सवर्ग कस्बेमें कुछ बाड़ोंकी पूरी मिल्कियत खरीद ली । ये बाड़े श्री लुई वाल्टर रिच, बैरिस्टर-इन-लॉक नाम रजिस्टर कराये गये । श्री रिच कुछ समय पहले तक इंग्लैंडमें दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति के मन्त्री थे, और इस समय जोहानिसबर्ग में दक्षिण आफ्रिका संघके सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं।
२०. उन्होंने उक्त बाड़े जब खरीदे उससे पहले उस कस्बेके गोरे निवासियोंने मिलकर निश्चय किया था कि कस्बेका कोई बाड़ा भारतीयोंके हाथ अप्रत्यक्ष रूपसे नहीं बेचेंगे। इसमें उनका उद्देश्य बॉक्सबर्गको विशुद्ध रूपसे गोरोंकी बस्ती बनाये रखना और भारतीयोंको बस्तियोंमें सीमित रखना था । श्री भाषातको एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जो अपने बाड़े बेचनेको इच्छुक था, अतः उन्होंने उक्त सम्पत्ति खरीद ली और बहुत धन व्यय करके उस जमीनपर उपयुक्त इमारतें बनवाई, और चूँकि वे सरकारसे व्यापारिक-परवाना पहले ही ले चुके थे, इसलिए उन्होंने उस इमारतमें आम वस्तुओंके विक्रयका रोजगार शुरू कर दिया।
२१. किन्तु, श्री भाषातके यूरोपीय व्यापारी प्रतिद्वन्दियोंकी व्यापारिक ईर्ष्या जग उठी है। श्री भाषातको संगठित बहिष्कारका शिकार बनाया गया है। वहाँके गोरे निवासियोंने संघ सरकार पर दबाव डालकर सर्वश्री रिच और भाषातके खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया है ताकि अदालतसे उनका स्वामित्वका पट्टा रद कर दिया जाये, उन्हें उस जमीनसे निकाल बाहर किया जाये, और उनसे इर्जाना वसूला जाये । अपने बचाव के लिए दोनों [ श्री रिच और श्री भायात ] को व्यय-साध्य मुकदमेबाजी करनी पड़ रही है,और श्री भाषातके सामने बिना कोई मुआवजा पाये अपनी जायदाद और व्यापारसे हाथ धो बैठनेका खतरा<noinclude></noinclude>
o94wjz7xrc91dgjat9j47gg4v6asxff
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०४
250
184127
673368
639996
2026-08-23T16:22:30Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673368
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मौजूद है । यहाँ इतना और कह दिया जाये कि उनका माल जोहानिसबर्ग की यूरोपीय पेढ़ियोंने सप्लाई किया है। ये पेढ़ियाँ श्री भाषातको एक अत्यन्त ईमानदार व्यापारीके रूपमें कई वर्षोंसे जानती हैं ।
२२. सरकारके ध्यानमें ये तथ्य लाते समय मैं दक्षिण आफ्रिकी संघमें विनियमोंके जरिये कानून बनानेकी बढ़ती हुई प्रवृत्तिकी ओर विशेष रूपसे ध्यान खींचना चाहता हूँ । संघ-संसद और साम्राज्य-सरकारको इनकी कोई जानकारी नहीं है । मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भारतीय समाज कोई नई सुविधा या अधिकारकी नहीं, बल्कि सिर्फ उस अधिकारको बनाये रखनेकी माँग कर रहा है जो उसे उक्त अधिनियमोंके लागू होनेसे पहले प्राप्त था । किन्तु, फिर भी वह १८८५ के कानून ३ की उन भेदभावपूर्ण व्यवस्थाओंको रद करने की अपनी माँगपर दृढ़ है, जिनके अनौचित्यके विरुद्ध साम्राज्य सरकारने युद्धसे पहले भी और उसके बाद भी कई बार रोष प्रकट किया है ।
२३. अतः मैं सरकारसे अनुरोध करूँगा कि वह इस बात के लिए अधिक से अधिक प्रयास करे कि
जिस समाजपर पहले ही बहुत निर्योग्यताओंका भार है, उसपर और अधिक निर्योग्यताएँ न थोपी जायें,
और उसका वह अधिकार, जो वास्तविक और संभावित है, तथा जिसे अबतक मान्य किया गया है और
उचित ठहराया गया है, बरकरार रहे।
{{right|[ आपका, ]<br>एच० एस० एल० पोलक}}
:[ अंग्रेजी से ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ६-७-१९१२ ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २२'''}}</center>
<center>{{larger|'''गोखलेके साथ हुई भेंटपर ग्लैडस्टनकी टिप्पणी'''}}</center>
{{left|गवर्नमेंट हाउस<br>प्रिटोरिया<br>नवम्बर २६, १९१२,}}
{{right|'''गोपनीय'''<br>महोदय,}}
श्री गोखले कल मेरे साथ भोजन करने आये, और [भोजनोपरान्त ] हमने ब्रिटिश भारतीय प्रश्नपर
चर्चा की ।
२. मैंने प्रधानमन्त्रीसे निश्चित पता चला लिया है कि उनके कुछ मन्त्रियोंने और औरेंज फ्री स्टेटमें
बहुत से लोगोंने श्री गोखलेके किसी भाषणके अंश-विशेषका बहुत बुरा माना है क्योंकि उनकी रायमें उसमें
धमकी दी गई थी । लेकिन मैं सन्तुष्ट हूँ कि श्री गोखलेका कोई इरादा धमकी देनेका नहीं था । उनकी
इच्छा श्रोताओंको भारतमें जो स्थिति है उससे, और दक्षिण आफ्रिकामें लगातार संघर्ष से उत्पन्न होनेवाले
सम्भावित खतरेसे परिचित करानेकी थी । खतरा और भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि हर बात बढ़-चढ़कर
ही पहुँचती है और दक्षिण आफ्रिकाके ब्रिटिश भारतीयोंकी शिकायतोंका क्रान्तिकारी लोग भारतमें अंग्रेजोंके
विरुद्ध उपयोग करनेकी कोशिश कर रहे हैं। डर्बनमें अपने एक भाषण में उन्होंने अपना मंशा स्पष्ट किया ।
उन्होंने कहा कि प्रवासी विधेयक ( इमिग्रेशन बिल) पास हो जाये, इसके लिए मैं हृदयसे उत्सुक हूँ,
हालाँकि आस्ट्रेलियन ढंगकी परीक्षाके स्थानपर कनाडियन ढंगकी परीक्षा लागू करनेकी श्री फिशरकी स्पष्ट
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
10gjiq6hyaftxx8ngyp1xojouh52c26
673369
673368
2026-08-23T16:23:31Z
सीमा1
430
673369
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मौजूद है । यहाँ इतना और कह दिया जाये कि उनका माल जोहानिसबर्ग की यूरोपीय पेढ़ियोंने सप्लाई किया है। ये पेढ़ियाँ श्री भाषातको एक अत्यन्त ईमानदार व्यापारीके रूपमें कई वर्षोंसे जानती हैं ।
२२. सरकारके ध्यानमें ये तथ्य लाते समय मैं दक्षिण आफ्रिकी संघमें विनियमोंके जरिये कानून बनानेकी बढ़ती हुई प्रवृत्तिकी ओर विशेष रूपसे ध्यान खींचना चाहता हूँ । संघ-संसद और साम्राज्य-सरकारको इनकी कोई जानकारी नहीं है । मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भारतीय समाज कोई नई सुविधा या अधिकारकी नहीं, बल्कि सिर्फ उस अधिकारको बनाये रखनेकी माँग कर रहा है जो उसे उक्त अधिनियमोंके लागू होनेसे पहले प्राप्त था । किन्तु, फिर भी वह १८८५ के कानून ३ की उन भेदभावपूर्ण व्यवस्थाओंको रद करने की अपनी माँगपर दृढ़ है, जिनके अनौचित्यके विरुद्ध साम्राज्य सरकारने युद्धसे पहले भी और उसके बाद भी कई बार रोष प्रकट किया है ।
२३. अतः मैं सरकारसे अनुरोध करूँगा कि वह इस बात के लिए अधिक से अधिक प्रयास करे कि
जिस समाजपर पहले ही बहुत निर्योग्यताओंका भार है, उसपर और अधिक निर्योग्यताएँ न थोपी जायें,
और उसका वह अधिकार, जो वास्तविक और संभावित है, तथा जिसे अबतक मान्य किया गया है और
उचित ठहराया गया है, बरकरार रहे।
{{right|[ आपका, ]<br>एच० एस० एल० पोलक}}
:[ अंग्रेजी से ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ६-७-१९१२ ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २२'''}}</center>
<center>{{larger|'''गोखलेके साथ हुई भेंटपर ग्लैडस्टनकी टिप्पणी'''}}</center>
{{right|गवर्नमेंट हाउस<br>प्रिटोरिया<br>नवम्बर २६, १९१२,}}
{{left|'''गोपनीय'''<br>महोदय,}}
श्री गोखले कल मेरे साथ भोजन करने आये, और [भोजनोपरान्त ] हमने ब्रिटिश भारतीय प्रश्नपर
चर्चा की ।
२. मैंने प्रधानमन्त्रीसे निश्चित पता चला लिया है कि उनके कुछ मन्त्रियोंने और औरेंज फ्री स्टेटमें
बहुत से लोगोंने श्री गोखलेके किसी भाषणके अंश-विशेषका बहुत बुरा माना है क्योंकि उनकी रायमें उसमें
धमकी दी गई थी । लेकिन मैं सन्तुष्ट हूँ कि श्री गोखलेका कोई इरादा धमकी देनेका नहीं था । उनकी
इच्छा श्रोताओंको भारतमें जो स्थिति है उससे, और दक्षिण आफ्रिकामें लगातार संघर्ष से उत्पन्न होनेवाले
सम्भावित खतरेसे परिचित करानेकी थी । खतरा और भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि हर बात बढ़-चढ़कर
ही पहुँचती है और दक्षिण आफ्रिकाके ब्रिटिश भारतीयोंकी शिकायतोंका क्रान्तिकारी लोग भारतमें अंग्रेजोंके
विरुद्ध उपयोग करनेकी कोशिश कर रहे हैं। डर्बनमें अपने एक भाषण में उन्होंने अपना मंशा स्पष्ट किया ।
उन्होंने कहा कि प्रवासी विधेयक ( इमिग्रेशन बिल) पास हो जाये, इसके लिए मैं हृदयसे उत्सुक हूँ,
हालाँकि आस्ट्रेलियन ढंगकी परीक्षाके स्थानपर कनाडियन ढंगकी परीक्षा लागू करनेकी श्री फिशरकी स्पष्ट
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
3hn2ag6y2x0iguk1jyjvfyeoqdzvmuw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०५
250
184128
673358
639998
2026-08-23T16:02:12Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673358
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५६७}}</noinclude>इच्छासे में चिन्तित भी हूँ । पर मन्त्रियोंका कहना है कि ये विचार श्री फिशरके हैं, उनके नहीं। श्री गोखले
परवानेके सवाल और ३ पौंडी करको कहीं ज्यादा महत्व देते प्रतीत होते थे ।
३. ३ पौंडी करके विषय में प्रधानमन्त्रीने मुझे बताया कि उनकी रायमें नेटालमें बहुत ज्यादा विरोध
होनेकी सम्भावनाके बावजूद श्री गोखलेकी रायको मान्य कर सकना मुमकिन होगा । श्री गोखलेने जो कुछ
कहा उससे मैं यह जान सका हूँ कि प्रधानमन्त्रीने उन्हें सन्तोषजनक आश्वासन दिया है ।
४. परवानेके सवालपर मुश्किल पैदा होनेकी सम्भावना है, किन्तु इस समय मेरी राय में सारा ध्यान प्रवासी विधेयकको पास करनेकी तरफ लगाना सर्वोत्तम होगा । मुझे पूरा इत्मीनान है कि प्रधानमन्त्री और जनरल स्मट्स उसे पास करानेके लिए सचमुच उत्सुक हैं। श्री गोखलेने भारतको स्थितिके बारेमें जो थोड़ी-बहुत अविवेकपूर्ण भाषाका प्रयोग किया, उससे उत्पन्न उत्तेजना शायद धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगी ।
५. श्री गोखलेने, श्री अलेक्जेंडर सहित जो विधेयक के विरोधियोंके समर्थक थे, यूनियनिस्ट दलके अधिकांश
प्रभावशाली सदस्योंसे भेंट की है। इन सबसे उन्होंने इस आशयका सन्तोषजनक वचन प्राप्त कर लिया
है कि विधेयक सदनमें आनेपर वे उसका समर्थन करेंगे । सोमवारको लारेंको माक्विससे रवाना होनेसे
पहले उन्होंने सर टॉमस स्मार्टसे भेंट करनेका कार्यक्रम बनाया था ।
६. [ संसदके ] पिछले सत्र में विधेयकका द्वितीय वाचन बहुत विलम्बसे किया गया था। विरोधी दल्के
नेताओंकी खामोशी, और सामान्य सदस्योंमें से कुछ लोगोंके दृढ़ विरोधने विधेयक के भाग्यका निर्णय कर
दिया था ।
७. मैं यह नहीं मान सकता कि [ संसदके ] अगले सत्र में यूनियनिस्ट पार्टी जनरल बोथा और उनके
सहयोगियोंको, साम्राज्यके सर्वोच्च हितको ध्यान में रखते हुए, दक्षिण आफ्रिकामें उन तमाम शिकायतोंको
दूर करनेके उनके प्रयत्नमें अपना समर्थन देनेसे फिर इनकार कर देगी जिनके कारण भारत में भारी उपद्रव
और खतरेकी स्थिति उत्पन्न होती रहती है। यदि विरोधी दलके नेता अगले सत्र में साम्राज्य के प्रति अपना
कर्तव्य करें और यदि मन्त्रिगण विधेयकको जल्दी ही पेश करनेका अपना वादा पूरा करें, तो कोई कारण
नहीं है कि फिरसे वही खेदजनक विफलता हाथ लगे ।
८. श्री गोखलेने संव-सरकारके सौजन्य और सद्भावके प्रति और सभी सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा
दक्षिण आफ्रिकामें उनके ठहरनेकी पूरी अवधि-भर उनके आराम और सुविधाके लिए किये गये प्रबन्धके
लिए कृतज्ञता व्यक्त की ।
९. भारत में उतरनेके बाद वे यथाशीघ्र अपनी रिपोर्ट लॉर्ड हार्डिजको देंगे, जो निःसन्देह यथासमय
आपको प्रेषित कर दी जायेगी ।
आपका,
{{right|आपका,<br>ग्लैडस्टन<br>गवर्नर-जनरल}}
कलोनियल ऑफिस रेकर्ड्स (सी० ओ० ५५१/३० ) ।<noinclude></noinclude>
pnqo8smwvkniq1gdkouhl9cqc88fj5k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६०६
250
184129
673350
639999
2026-08-23T15:51:07Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673350
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २३'''}}</center>
<center>{{larger|''' गोखलेका भाषण'''}}</center></noinclude>{{right|दिसम्बर १४, १९१२}}
माननीय श्री गोखले जब बोलनेके लिए उठे तो लोगोंने बड़े उत्साहके साथ उनका स्वागत किया ।
श्री गोखलेने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा :
अध्यक्ष महोदय, देवियो और सज्जनो, मैं आपको नहीं बता सकता कि भारत वापस आकर मैं कितना प्रसन्न हूँ। और इस विशाल जनसमुदायने मेरा जो सौजन्यपूर्ण तथा हार्दिक स्वागत किया है तथा अध्यक्ष महोदयने दक्षिण आफ्रिकामें मेरे कार्योंकी जिस मुक्तकण्ठले प्रशंसा की है, उससे मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ जाती है । वहाँ मुझे अपने कामके दौरान काफी श्रम करना पड़ा, किन्तु निस्सन्देह हमारे दक्षिण आफ्रिकी देशमाइयोंने मेरी यात्रापर बड़ा सन्तोष प्रकट किया है, और उनके सन्तोष तथा आपके द्वारा किये गये इस हार्दिक स्वागतके रूपमें मुझे उस कठिन श्रमका पर्याप्त पुरस्कार मिल गया है । आप शायद जानते होंगे, और यह बात मैं सार्वजनिक रूपसे भी कह चुका हूँ कि मैंने यह यात्रा हमारे दक्षिण आफ्रिकावासी महान् देश-बन्धु श्री गांधीके हार्दिक निमन्त्रणपर की थी। उन्होंने इसके लिए मुझसे बार- बार आग्रह किया था । किन्तु, जब मैंने पहले-पहल वहाँ जानेका निश्चय किया तो मेरा इरादा था कि मैं उस देशमें जहाँतक हो सके, बिना किसी शोर-शराबेके जाऊँ और सभी प्रमुख भारतीय केन्द्रोंका दौरा करके, वहाँ हमारे देशभाइयोंके साथ जो बरताव किया जाता है, उसके सम्बन्धमें तथ्य एकत्र करके लौट आऊँ और फिर उन तथ्योंको इस देशकी सरकार और जनताके सामने पेश कर दूँ, ताकि दक्षिण आफ्रिका में भारतीय पक्षको समर्थन देनेके लिए यहाँ अधिक सरगर्मी से कोशिश की जा सके लेकिन, केप टाउन पहुँचकर जब मैंने सचमुच देखा कि संघ-सरकार किस तरह मुझे हर प्रकारकी सम्मान सुविधा प्रदान करनेको उत्सुक है और उन सारे प्रमुख केन्द्रोंमें किस तरह न केवल हमारे देशभाश्योंने, बल्कि यूरोपीय समुदायके लोगोंने भी मेरे लिए सभा आदिको पूरी व्यवस्था कर रखी है, तब मेरे सामने इसके अलावा और कोई चारा नहीं रह गया कि मैं इन सारी व्यवस्थाओंकी भावनाके साथ हार्दिक सहयोग करूँ और मुझे जो अवसर सुलभ कराया गया था उसका पूरा-पूरा उपयोग करूँ। इस परिस्थितिमें यदि मैंने कुछ और किया होता तो उसका मतलब मैं जिस उद्देश्यकी सेवा करने वहाँ गया था उसके साथ विश्वासघात करना और अपने आपको, उस विश्वासके अयोग्य सावित करना होता जो मेरे दक्षिण आफ्रिकी देशभाइयोंने मुझमें व्यक्त किया ।
<center>{{larger|''' समय कैसे बिताया'''}}</center>
इसके बाद श्री गोखलेने बताया कि किस प्रकार उनका दक्षिण आफ्रिकाका चार सप्ताहका प्रवास प्रमुख भारतीय केन्द्रोंका निरीक्षण करनेमें बीता । उन्होंने कहा कि मैं इस दौरान वहाँ बसे हजारों भारतीयोंसे ही नहीं, बल्कि बहुत-से यूरोपीयोंसे भी मिला, जिनमें से कई तो काफी प्रसिद्ध लोग हैं । मैं जिन सभाओं में बोला, उनमें से कुछ तो विशुद्ध रूपसे भारतीयोंकी थीं और कुछ यूरोपीयोंकी; किन्तु अधिकांश सभाओं में इन दोनों समुदायोंके श्रोता शामिल थे। मैंने सभी मतों और विभिन्न हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले अनेक प्रमुख लोगोंके साथ हुई मुलाकात और गोष्टियोंमें इस प्रश्नके विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया । प्रश्नके भारतीय पक्षसे मैं पहलेसे ही अवगत था, और केप टाउन पहुँचनेपर भारतीयोंकी हद तक इस मामले सम्बन्धित तथ्योंको पूरी तरह देखने-समझने में मुझे देर नहीं लगी ।<noinclude></noinclude>
2kl79lucozriwkr5clo2vs4pew8t4ra
673352
673350
2026-08-23T15:56:03Z
सीमा1
430
673352
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २३'''}}</center>
<center>{{larger|''' बम्बईमें गोखलेका भाषण'''}}</center></noinclude>{{right|दिसम्बर १४, १९१२}}
माननीय श्री गोखले जब बोलनेके लिए उठे तो लोगोंने बड़े उत्साहके साथ उनका स्वागत किया ।
श्री गोखलेने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा :
अध्यक्ष महोदय, देवियो और सज्जनो, मैं आपको नहीं बता सकता कि भारत वापस आकर मैं कितना प्रसन्न हूँ। और इस विशाल जनसमुदायने मेरा जो सौजन्यपूर्ण तथा हार्दिक स्वागत किया है तथा अध्यक्ष महोदयने दक्षिण आफ्रिकामें मेरे कार्योंकी जिस मुक्तकण्ठले प्रशंसा की है, उससे मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ जाती है । वहाँ मुझे अपने कामके दौरान काफी श्रम करना पड़ा, किन्तु निस्सन्देह हमारे दक्षिण आफ्रिकी देशमाइयोंने मेरी यात्रापर बड़ा सन्तोष प्रकट किया है, और उनके सन्तोष तथा आपके द्वारा किये गये इस हार्दिक स्वागतके रूपमें मुझे उस कठिन श्रमका पर्याप्त पुरस्कार मिल गया है । आप शायद जानते होंगे, और यह बात मैं सार्वजनिक रूपसे भी कह चुका हूँ कि मैंने यह यात्रा हमारे दक्षिण आफ्रिकावासी महान् देश-बन्धु श्री गांधीके हार्दिक निमन्त्रणपर की थी। उन्होंने इसके लिए मुझसे बार- बार आग्रह किया था । किन्तु, जब मैंने पहले-पहल वहाँ जानेका निश्चय किया तो मेरा इरादा था कि मैं उस देशमें जहाँतक हो सके, बिना किसी शोर-शराबेके जाऊँ और सभी प्रमुख भारतीय केन्द्रोंका दौरा करके, वहाँ हमारे देशभाइयोंके साथ जो बरताव किया जाता है, उसके सम्बन्धमें तथ्य एकत्र करके लौट आऊँ और फिर उन तथ्योंको इस देशकी सरकार और जनताके सामने पेश कर दूँ, ताकि दक्षिण आफ्रिका में भारतीय पक्षको समर्थन देनेके लिए यहाँ अधिक सरगर्मी से कोशिश की जा सके लेकिन, केप टाउन पहुँचकर जब मैंने सचमुच देखा कि संघ-सरकार किस तरह मुझे हर प्रकारकी सम्मान सुविधा प्रदान करनेको उत्सुक है और उन सारे प्रमुख केन्द्रोंमें किस तरह न केवल हमारे देशभाश्योंने, बल्कि यूरोपीय समुदायके लोगोंने भी मेरे लिए सभा आदिको पूरी व्यवस्था कर रखी है, तब मेरे सामने इसके अलावा और कोई चारा नहीं रह गया कि मैं इन सारी व्यवस्थाओंकी भावनाके साथ हार्दिक सहयोग करूँ और मुझे जो अवसर सुलभ कराया गया था उसका पूरा-पूरा उपयोग करूँ। इस परिस्थितिमें यदि मैंने कुछ और किया होता तो उसका मतलब मैं जिस उद्देश्यकी सेवा करने वहाँ गया था उसके साथ विश्वासघात करना और अपने आपको, उस विश्वासके अयोग्य सावित करना होता जो मेरे दक्षिण आफ्रिकी देशभाइयोंने मुझमें व्यक्त किया ।
<center>{{larger|''' समय कैसे बिताया'''}}</center>
इसके बाद श्री गोखलेने बताया कि किस प्रकार उनका दक्षिण आफ्रिकाका चार सप्ताहका प्रवास प्रमुख भारतीय केन्द्रोंका निरीक्षण करनेमें बीता । उन्होंने कहा कि मैं इस दौरान वहाँ बसे हजारों भारतीयोंसे ही नहीं, बल्कि बहुत-से यूरोपीयोंसे भी मिला, जिनमें से कई तो काफी प्रसिद्ध लोग हैं । मैं जिन सभाओं में बोला, उनमें से कुछ तो विशुद्ध रूपसे भारतीयोंकी थीं और कुछ यूरोपीयोंकी; किन्तु अधिकांश सभाओं में इन दोनों समुदायोंके श्रोता शामिल थे। मैंने सभी मतों और विभिन्न हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले अनेक प्रमुख लोगोंके साथ हुई मुलाकात और गोष्टियोंमें इस प्रश्नके विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया । प्रश्नके भारतीय पक्षसे मैं पहलेसे ही अवगत था, और केप टाउन पहुँचनेपर भारतीयोंकी हद तक इस मामले सम्बन्धित तथ्योंको पूरी तरह देखने-समझने में मुझे देर नहीं लगी ।<noinclude></noinclude>
f571hzzzycy66nazcdg3p9tblrz80ee
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५८७
250
184149
673452
640019
2026-08-23T18:57:53Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673452
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५४९}}</noinclude>निर्धारित जुर्माने अथवा कैदका भागी होगा । (प्रथम अपराधके लिए अधिक से अधिक २५ पौंड या जुर्माना;
इसे न देनेपर अधिक से अधिक तीन मासकी या सादी कैद की सजा, और उसके बादके अपराधोंपर
जुर्मानेकी रकम या कारावासको अवधि हर बार दुगनी होती चली जायेगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ३-२-१९१२
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १४'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{right|जनवरी ३१, १९१२}}
बात है; कोई भी
अधिकारीके हाथ में
सकता है; किन्तु
अधिकारों में
वर्तमान
आपके कलके तारके सिलसिले में : जहाँतक खण्ड पाँचकी
कानूनी अधिकार नहीं छिनते, क्योंकि किसी भी हालत में
विवेकाधिकार तो रखना ही होगा I उसके निर्णयको निकाय बदल
सबसे अंतिम निर्णयका अधिकार मन्त्रीको होगा । खण्ड ७ के अन्तर्गत
कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि अन्तर्प्रान्तीय प्रवास अब भी प्रशासनिक विवेकाधिकारका
विषय रहेगा । परन्तु निःसन्देह यह बात अच्छी तरह समझ ली गई है कि
जहाँतक सम्भव होगा इस प्रकारके प्रवासको बहुत सीमित रखा जायेगा । आपको
मालूम ही है कि यह वही नीति है जिसे वर्तमान प्रवासी अधिनियमों के अन्तर्गत
अमल में लाया गया था 1 रही नेटालमें अधिवास प्रमाणपत्रोंकी बात, उन्हें जारी करना
वैकल्पिक था और उनके दुरुपयोगको शिकायतें मन्त्रीके पास बराबर आती रही हैं
पंजीयनकी प्रणालीके
।
प्रमाणपत्र ऐसे
।
अधिवास सम्बन्धी प्रमाणपत्र देते रहना
लोगोंके पास पहुँचवा दिये जाते हैं
बिना किसी शिनाख्त और
असम्भव है, क्योंकि अक्सर ये
जो उनके अधिकारी नहीं हैं।
अन्य प्रान्तों में तो है भी नहीं 1 मन्त्री महोदयको विश्वास है कि
प्रणालीको सही ढंगसे अमल में लाया जाये तो इससे उन भारतीयों को
होगा जो लम्बे या थोड़ असके लिए अपने देशकी या
हैं । खण्ड २८ के बारेमें कहना यह है कि ज्ञापन देना
केवल इसलिए रखी गई है जिससे फ्री स्टेटमें प्रविष्ट
व्यवसाय में हाथ न डाल सके । ऐसी परिस्थिति में
इसके विरुद्ध क्या आपत्ति हो सकती है।
कि एशियाई लोग उस प्रान्त में कृषि
इस आशयका ज्ञापन लेना भी उचित
अनुमतिपत्रोंकी जो प्रणाली केपमें लागू है वह संघके
केपमें भी इस
अवश्य संतोष
अन्य देशोंकी
यात्रा करना चाहते
प्रवालकी शर्त नहीं है । वह तो
होनेवाला व्यक्ति खेती-बाडी. व्यापार-
मन्त्री महोदय नहीं समझते कि
यदि
यह
बात
उचित मानी जाती है
अथवा व्यापार न करें, तो ऐसी स्थिति में उनसे
ही है 1
टाइप की हुई अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६१९ ) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
4onwzbxs98xsq4str45p4o3gqcracbz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५८८
250
184150
673448
640020
2026-08-23T18:51:12Z
सीमा1
430
673448
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{right|फरवरी ७, १९१२}}</noinclude>६ / इ. आपके पहली फरवरीके तारका संदर्भ, जान पड़ता है आपको कुछ गलतफहमी हुई है । विधेयकमें कहीं भी न्यायालयोंको क्षेत्राधिकारसे वंचित नहीं रखा गया है, और यह सोचना गलत है कि धारा पांच या अन्य किसी धाराके अन्तर्गत अन्तमें न्यायालय में अपील नहीं की जा सकेगी । अधिवास प्रमाणपत्रोंके बारेमें, समूचे संघ में ऐसी एक व्यवस्था करना बिलकुल असम्भव है। नेटाल तकमें इन प्रमाणपत्रोंका घोर दुरुपयोग हुआ है, और एक हजार से अधिक प्रमाणपत्र अनधिकारी लोगोंके पास पाये और जब्त किये जा चुके हैं । प्रवासियों द्वारा दिये जानेवाले हलफनामेके सम्बन्धमें परिच्छेद ३३ के खण्ड आठके अन्तर्गत उठनेवाले प्रश्नके सिलसिले में ऑरेंज फ्री स्टेट कुछ कठिनाइयाँ बतला रहा है और विभाग इसके बारेमें विधि-विभागके अधिकारियोंको राय ले रहा है। विधेयककी धाराके वर्तमान स्वरूपके अनुसार भी क्या हलफनामा अपेक्षित है, यह बात संदिग्ध मालूम होती है।
आशा है कि इस व्याख्या के साथ विधेयककी व्यवस्थाएँ स्वीकार्य होंगी, क्योंकि भेदमूलक व्यवस्थाओंसे रहित एक सामान्य प्रवासी कानून पास करनेकी किसी दूसरी कोशिशको बिलकुल भी सम्भावना नहीं । मन्त्रीने दक्षिण आफ्रिकाके सभी भागोंके लोगोंको अत्यधिक उत्तेजित करनेवाले इस प्रश्नके बारेमें अन्तिम रूपसे समझौता करनेकी भरसक कोशिश की है, और उनको आशा है कि उससे सीधे सम्बन्धित लोग उनकी कोशिशोंको बल पहुँचायेंगे, और वे आशा व्यक्त करते हैं कि आप अपने देशवासियोंपर अपने निर्विवाद प्रभावका उपयोग इसी
लक्ष्यके लिए करेंगे । विधेयकमें भेदमूलक व्यवस्थाएँ नहीं हैं और आप सदा ही प्रतिष्ठा और आत्मसम्मानकी जिस भावनापर सबसे अधिक जोर देते रहे हैं, उसे भी यह सन्तुष्ट करता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
टाइप की हुई अंग्रेजी प्रति (५६१९ ) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{right|केप टाउन<br>मई १४, १९१२}}
प्रिय श्री गांधी,
मन्त्री महोदयने मुझसे कहा है कि मैं आपके २४ फरवरीके पत्रके सिलसिले में आपको लिखूँ ।
उस पत्र में आपने प्रस्तावित प्रवासी विधेयकके सम्बन्ध में अपने वकील द्वारा दी हुई रायका जिक्र किया था ।जनरल स्मटसने मुझसे कहा है कि मैं संसदमें आजकल पेश प्रवासी विधेयकके प्रारूपके खण्ड २८ के उप-खण्ड २ के स्थानपर रखे जानेवाले उप-खण्डके नये प्रस्तावित प्रारूपकी एक प्रति आपको<noinclude></noinclude>
q4kioim4ry7smxcuzd40z9hyy6e2mii
673449
673448
2026-08-23T18:51:23Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673449
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{right|फरवरी ७, १९१२}}</noinclude>६ / इ. आपके पहली फरवरीके तारका संदर्भ, जान पड़ता है आपको कुछ गलतफहमी हुई है । विधेयकमें कहीं भी न्यायालयोंको क्षेत्राधिकारसे वंचित नहीं रखा गया है, और यह सोचना गलत है कि धारा पांच या अन्य किसी धाराके अन्तर्गत अन्तमें न्यायालय में अपील नहीं की जा सकेगी । अधिवास प्रमाणपत्रोंके बारेमें, समूचे संघ में ऐसी एक व्यवस्था करना बिलकुल असम्भव है। नेटाल तकमें इन प्रमाणपत्रोंका घोर दुरुपयोग हुआ है, और एक हजार से अधिक प्रमाणपत्र अनधिकारी लोगोंके पास पाये और जब्त किये जा चुके हैं । प्रवासियों द्वारा दिये जानेवाले हलफनामेके सम्बन्धमें परिच्छेद ३३ के खण्ड आठके अन्तर्गत उठनेवाले प्रश्नके सिलसिले में ऑरेंज फ्री स्टेट कुछ कठिनाइयाँ बतला रहा है और विभाग इसके बारेमें विधि-विभागके अधिकारियोंको राय ले रहा है। विधेयककी धाराके वर्तमान स्वरूपके अनुसार भी क्या हलफनामा अपेक्षित है, यह बात संदिग्ध मालूम होती है।
आशा है कि इस व्याख्या के साथ विधेयककी व्यवस्थाएँ स्वीकार्य होंगी, क्योंकि भेदमूलक व्यवस्थाओंसे रहित एक सामान्य प्रवासी कानून पास करनेकी किसी दूसरी कोशिशको बिलकुल भी सम्भावना नहीं । मन्त्रीने दक्षिण आफ्रिकाके सभी भागोंके लोगोंको अत्यधिक उत्तेजित करनेवाले इस प्रश्नके बारेमें अन्तिम रूपसे समझौता करनेकी भरसक कोशिश की है, और उनको आशा है कि उससे सीधे सम्बन्धित लोग उनकी कोशिशोंको बल पहुँचायेंगे, और वे आशा व्यक्त करते हैं कि आप अपने देशवासियोंपर अपने निर्विवाद प्रभावका उपयोग इसी
लक्ष्यके लिए करेंगे । विधेयकमें भेदमूलक व्यवस्थाएँ नहीं हैं और आप सदा ही प्रतिष्ठा और आत्मसम्मानकी जिस भावनापर सबसे अधिक जोर देते रहे हैं, उसे भी यह सन्तुष्ट करता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
टाइप की हुई अंग्रेजी प्रति (५६१९ ) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{right|केप टाउन<br>मई १४, १९१२}}
प्रिय श्री गांधी,
मन्त्री महोदयने मुझसे कहा है कि मैं आपके २४ फरवरीके पत्रके सिलसिले में आपको लिखूँ ।
उस पत्र में आपने प्रस्तावित प्रवासी विधेयकके सम्बन्ध में अपने वकील द्वारा दी हुई रायका जिक्र किया था ।जनरल स्मटसने मुझसे कहा है कि मैं संसदमें आजकल पेश प्रवासी विधेयकके प्रारूपके खण्ड २८ के उप-खण्ड २ के स्थानपर रखे जानेवाले उप-खण्डके नये प्रस्तावित प्रारूपकी एक प्रति आपको<noinclude></noinclude>
2l6pcc9jlytqbfoagwtrq322g3c1iyt
673450
673449
2026-08-23T18:51:42Z
सीमा1
430
673450
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{right|फरवरी ७, १९१२}}</noinclude>६/इ. आपके पहली फरवरीके तारका संदर्भ, जान पड़ता है आपको कुछ गलतफहमी हुई है । विधेयकमें कहीं भी न्यायालयोंको क्षेत्राधिकारसे वंचित नहीं रखा गया है, और यह सोचना गलत है कि धारा पांच या अन्य किसी धाराके अन्तर्गत अन्तमें न्यायालय में अपील नहीं की जा सकेगी । अधिवास प्रमाणपत्रोंके बारेमें, समूचे संघ में ऐसी एक व्यवस्था करना बिलकुल असम्भव है। नेटाल तकमें इन प्रमाणपत्रोंका घोर दुरुपयोग हुआ है, और एक हजार से अधिक प्रमाणपत्र अनधिकारी लोगोंके पास पाये और जब्त किये जा चुके हैं । प्रवासियों द्वारा दिये जानेवाले हलफनामेके सम्बन्धमें परिच्छेद ३३ के खण्ड आठके अन्तर्गत उठनेवाले प्रश्नके सिलसिले में ऑरेंज फ्री स्टेट कुछ कठिनाइयाँ बतला रहा है और विभाग इसके बारेमें विधि-विभागके अधिकारियोंको राय ले रहा है। विधेयककी धाराके वर्तमान स्वरूपके अनुसार भी क्या हलफनामा अपेक्षित है, यह बात संदिग्ध मालूम होती है।
आशा है कि इस व्याख्या के साथ विधेयककी व्यवस्थाएँ स्वीकार्य होंगी, क्योंकि भेदमूलक व्यवस्थाओंसे रहित एक सामान्य प्रवासी कानून पास करनेकी किसी दूसरी कोशिशको बिलकुल भी सम्भावना नहीं । मन्त्रीने दक्षिण आफ्रिकाके सभी भागोंके लोगोंको अत्यधिक उत्तेजित करनेवाले इस प्रश्नके बारेमें अन्तिम रूपसे समझौता करनेकी भरसक कोशिश की है, और उनको आशा है कि उससे सीधे सम्बन्धित लोग उनकी कोशिशोंको बल पहुँचायेंगे, और वे आशा व्यक्त करते हैं कि आप अपने देशवासियोंपर अपने निर्विवाद प्रभावका उपयोग इसी
लक्ष्यके लिए करेंगे । विधेयकमें भेदमूलक व्यवस्थाएँ नहीं हैं और आप सदा ही प्रतिष्ठा और आत्मसम्मानकी जिस भावनापर सबसे अधिक जोर देते रहे हैं, उसे भी यह सन्तुष्ट करता है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
टाइप की हुई अंग्रेजी प्रति (५६१९ ) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{right|केप टाउन<br>मई १४, १९१२}}
प्रिय श्री गांधी,
मन्त्री महोदयने मुझसे कहा है कि मैं आपके २४ फरवरीके पत्रके सिलसिले में आपको लिखूँ ।
उस पत्र में आपने प्रस्तावित प्रवासी विधेयकके सम्बन्ध में अपने वकील द्वारा दी हुई रायका जिक्र किया था ।जनरल स्मटसने मुझसे कहा है कि मैं संसदमें आजकल पेश प्रवासी विधेयकके प्रारूपके खण्ड २८ के उप-खण्ड २ के स्थानपर रखे जानेवाले उप-खण्डके नये प्रस्तावित प्रारूपकी एक प्रति आपको<noinclude></noinclude>
ao5o8vcneapidhnjpkomeipxjws7bwm
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५८९
250
184151
673445
640021
2026-08-23T18:32:20Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673445
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५१}}</noinclude>सूचनार्थं भेज दूँ । आपको स्मरण होगा कि उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि क्या धारा जिस रूपमें
पेश की गई थी उसकी व्यवस्थाओंके अन्तर्गत भी शिक्षित एशियाई प्रवासियोंको वैसा हलफनामा देना
अनिवार्य होगा, जैसा कि ऑरेंज फ्री स्टेट कानूनके परिच्छेद ३३ के खण्ड ८ के अन्तर्गत अपेक्षित है;
और विभागने किसी निश्चित निर्णयपर पहुँचनेसे पहले उसपर विचार करने की बात कही थी ।
अब विचार कर लिया गया है और इस पत्रके साथ जो मसविदा भेजा जा रहा है वह विधेयक में
इस समय मौजूदा धाराके स्थानपर रखनेकी दृष्टिसे ही तैयार किया गया है, जो इस पत्रके साथ भेजा
जा रहा है। कानूनी सलाहकारोंका मत है कि यदि हलफनामेसे सम्बन्धित व्यवस्थाएँ विधेयक में सम्मिलित
कर ली जाये तो परिच्छेदकी अनुसूची २ में उल्लिखित हलफनामा पूरा करनेकी आवश्यकता नहीं
रह जाती ।
आपने अधिवासका जो प्रश्न उठाया है उसके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि मन्त्री महोदय एक
और धारा जोड़ना चाहते हैं, जो इसके बारेमें सभी सन्देह दूर कर देगी और इसलिए जिसे आपकी सहमति
प्राप्त हो जायेगी ।
मन्त्री महोदय बहुत शीघ्र ही यह विधेयक " असेम्बली " में पेश करनेवाले हैं, इसलिए यदि आप अपने
पास भेजे गये इस संशोधनके बारेमें अपने विचार जल्द ही भेज दें तो मुझे बदी प्रसन्नता होगी ।
{{right|आपका,<br>अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
टाइप की हुई मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६५० १) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १७'''}}</center>
<center>{{larger|'''संघ-संसद में प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) के सम्बन्ध में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
{{right|केप टाउन,<br>मई ३०, १९१२}}
गृह मन्त्रीने पिछले महीनेकी ३० तारीखको विधान सभामें प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकको द्वितीय
वाचनके लिए प्रस्तुत किया था । उन्होंने कहा कि तपेदिक आयोगको कह दिया गया था कि विधेयककी
दृष्टिसे महत्व रखनेवाले प्रश्नोंके बारेमें वह अपना प्रतिवेदन पहले ही दे दे।उनकी रायसे प्रतिवेदन बड़े
कामका और सभा शायद कानून बननेसे पहले ही उसकी कुछ सिफारिशें आंशिक रूपसे स्वीकार कर
लेगी। हालाँकि विशुद्ध दक्षिण आफ्रिकी दृष्टिकोणसे विधेयक अत्यधिक अविलम्बनीय महत्त्व नहीं रखता,
फिर भी व्यापकतर दृष्टिकोणसे तो वह महत्त्वपूर्ण और अविलम्वनीय है ही । इस विधेयकमें जिन प्रश्नोंको
हल किया गया है, वे साम्राज्यके लिए बड़ा महत्व रखते हैं। यह विधेयक एशियाइयोंके और दक्षिण
आफ्रिकामें एशियाइयों, विशेषकर भारतीयोंके प्रवासके सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकारके साथ १९१० में ही तय
की गई कुछ बातोंको लागू करने और उनको कानूनमें शामिल करनेके लिए तैयार किया गया है ।
मन्त्रीने कहा कि यह विधेयक दक्षिण आफ्रिकामें केवल गोरोंके प्रवासकी ही नहीं बल्कि उससे कुछ भिन्न
तथा अधिक पेचीदा एशियाइयोंके प्रवासकी समस्यासे भी सम्बन्ध रखता है । दक्षिण आफ्रिकाकी एशियाई
जनता - विशेषकर भारतीय जनताने अपना एक दृष्टिकोण बना लिया है और इसमें उसे इंडिया ऑफिस
तथा ब्रिटिश सरकार दोनों ही का समर्थन प्राप्त है । अपने इस दृष्टिकोणके अनुसार वह दावा करती है।
कि उसमें और गोरी जनतामें कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए । भारतीय जनता प्रशासनिक कार्यों या
Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude>
oeuqch78rfq6g44ch5h4n17b82zhrls
673446
673445
2026-08-23T18:33:20Z
सीमा1
430
673446
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५१}}</noinclude>सूचनार्थं भेज दूँ । आपको स्मरण होगा कि उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि क्या धारा जिस रूपमें
पेश की गई थी उसकी व्यवस्थाओंके अन्तर्गत भी शिक्षित एशियाई प्रवासियोंको वैसा हलफनामा देना
अनिवार्य होगा, जैसा कि ऑरेंज फ्री स्टेट कानूनके परिच्छेद ३३ के खण्ड ८ के अन्तर्गत अपेक्षित है;
और विभागने किसी निश्चित निर्णयपर पहुँचनेसे पहले उसपर विचार करने की बात कही थी ।
अब विचार कर लिया गया है और इस पत्रके साथ जो मसविदा भेजा जा रहा है वह विधेयक में
इस समय मौजूदा धाराके स्थानपर रखनेकी दृष्टिसे ही तैयार किया गया है, जो इस पत्रके साथ भेजा
जा रहा है। कानूनी सलाहकारोंका मत है कि यदि हलफनामेसे सम्बन्धित व्यवस्थाएँ विधेयक में सम्मिलित
कर ली जाये तो परिच्छेदकी अनुसूची २ में उल्लिखित हलफनामा पूरा करनेकी आवश्यकता नहीं
रह जाती ।
आपने अधिवासका जो प्रश्न उठाया है उसके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि मन्त्री महोदय एक
और धारा जोड़ना चाहते हैं, जो इसके बारेमें सभी सन्देह दूर कर देगी और इसलिए जिसे आपकी सहमति
प्राप्त हो जायेगी ।
मन्त्री महोदय बहुत शीघ्र ही यह विधेयक " असेम्बली " में पेश करनेवाले हैं, इसलिए यदि आप अपने
पास भेजे गये इस संशोधनके बारेमें अपने विचार जल्द ही भेज दें तो मुझे बदी प्रसन्नता होगी ।
{{right|आपका,<br>अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
टाइप की हुई मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६५० १) की फोटो नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १७'''}}</center>
<center>{{larger|'''संघ-संसद में प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) के सम्बन्ध में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
{{right|केप टाउन,<br>मई ३०, १९१२}}
गृह मन्त्रीने पिछले महीनेकी ३० तारीखको विधान सभामें प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकको द्वितीय
वाचनके लिए प्रस्तुत किया था । उन्होंने कहा कि तपेदिक आयोगको कह दिया गया था कि विधेयककी
दृष्टिसे महत्व रखनेवाले प्रश्नोंके बारेमें वह अपना प्रतिवेदन पहले ही दे दे।उनकी रायसे प्रतिवेदन बड़े
कामका और सभा शायद कानून बननेसे पहले ही उसकी कुछ सिफारिशें आंशिक रूपसे स्वीकार कर
लेगी। हालाँकि विशुद्ध दक्षिण आफ्रिकी दृष्टिकोणसे विधेयक अत्यधिक अविलम्बनीय महत्त्व नहीं रखता,
फिर भी व्यापकतर दृष्टिकोणसे तो वह महत्त्वपूर्ण और अविलम्वनीय है ही । इस विधेयकमें जिन प्रश्नोंको
हल किया गया है, वे साम्राज्यके लिए बड़ा महत्व रखते हैं। यह विधेयक एशियाइयोंके और दक्षिण
आफ्रिकामें एशियाइयों, विशेषकर भारतीयोंके प्रवासके सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकारके साथ १९१० में ही तय
की गई कुछ बातोंको लागू करने और उनको कानूनमें शामिल करनेके लिए तैयार किया गया है ।
मन्त्रीने कहा कि यह विधेयक दक्षिण आफ्रिकामें केवल गोरोंके प्रवासकी ही नहीं बल्कि उससे कुछ भिन्न
तथा अधिक पेचीदा एशियाइयोंके प्रवासकी समस्यासे भी सम्बन्ध रखता है । दक्षिण आफ्रिकाकी एशियाई
जनता - विशेषकर भारतीय जनताने अपना एक दृष्टिकोण बना लिया है और इसमें उसे इंडिया ऑफिस
तथा ब्रिटिश सरकार दोनों ही का समर्थन प्राप्त है । अपने इस दृष्टिकोणके अनुसार वह दावा करती है।
कि उसमें और गोरी जनतामें कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए । भारतीय जनता प्रशासनिक कार्यों या<noinclude></noinclude>
onn0ubljmx4rlrzg8cjy5x9m4wyd22z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९०
250
184152
673443
640022
2026-08-23T18:13:43Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673443
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>व्यवहारके क्षेत्रमें भेदभाव होनेपर तो कोई आपत्ति नहीं करती, लेकिन भेदभाव जब भी वैधानिक व्यवस्थाओं के
क्षेत्रमें किया जाता है तो वह बहुत मुस्तैदीके साथ कसकर विरोध करती है। ब्रिटिश सरकार उसके
इस रुखकी ताईद करती है । और, सदस्यगण जानते ही हैं कि वर्तमान सरकारने काफी परेशानी उठाकर
और उससे बातचीत के बाद इस स्थितिको स्वीकार कर लिया है और यह मान लिया है कि इस देशके
कानूनमें ऐसा कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए; और इस भेदभावको, जो कानून पास कर दिया
जाये, उसे लागू करनेके क्षेत्र तक ही सीमित रखा जायेगा । इस देश में प्रवासी कानूनको अमलमें लानेमें
काफी कठिनाईका सामना करना पड़ता है, क्योंकि हम एक ओर तो बड़े जोरसे चाहते हैं कि गोरे यहाँ
अधिकसे-अधिक संख्यामें आये पर दूसरी ओर उतने ही जोरसे चाहते हैं किं एशियाई न आये । ( वाह !
वाह!) इसलिए हमें एक ऐसा कानून पास करना है जो सभी वर्गोंके लिए समान तो हो, लेकिन जिसका
उद्देश्य एक प्रकारके लोगोंको प्रवेश देना और दूसरे प्रकारके लोगों को बाहर रखना हो । यह काम चीन
देशकी पहेली बूझने जैसा ही पेचीदा था । हमने बहुत काफी सोच-विचारके बाद ऑस्ट्रेलियामें प्रचलित
शैक्षणिक परीक्षा लागू करनेका कलोनियल ऑफिसका सुझाव मान लिया है। भारत सरकारने भी उसका
समर्थन किया । ऊपरसे देखने में यह परीक्षा बड़ी सख्त है, लेकिन खूबी यह कि उसे एक जगह सख्तीसे,
पर दूसरी जगह ढिलाईसे भी लागू किया जा सकता है, जिससे कि इसका उपयोग गोरोंको इस देशमें
प्रवेश देने और एशियाइयोंके प्रवेशको रोकनेके लिए किया जा सकता है। विधेयककी सबसे मुख्य व्यवस्था
इसमें शामिल की गई आस्ट्रेलियाई परीक्षाकी व्यवस्था है और उसीपर सबसे अधिक बहसकी सम्भावना
भी है । वह सरकारके हाथमें बहुत अधिक शक्ति दे देती है, लेकिन मैं सरकारकी ओरसे यह कहनेको
तैयार हूँ कि इस कानूनको जिस तरह अमल में लाया जायेगा उसमें हमारा यह मंशा जरा भी नहीं है।
कि इस देश में गोरोंके प्रवासको आजके मुकाबिले अधिक मुश्किल बनाया जाये। मंशा तो इससे उलटा
है । पहले कालमें उस समयके कानूनके अन्तर्गत केवल शैक्षणिक योग्यतापर जरूरतसे ज्यादा जोर देनेकी
प्रवृत्ति रही है । (वाह ! वाह ! ) । इस देशमें प्रवेशकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिसे, जो साथ ही शरीर से
स्वस्थ और हर प्रकार से भला नागरिक बनने योग्य हो, किसी एक यूरोपीय भाषामें अपने ज्ञानकी परीक्षा
देनेके लिए कहा जाता था । उनमें कुछ भाषाएँ ऐसी भी थीं, जिनसे कमसे-कम इस देशमें उनको कोई
काम नहीं पड़ता था । यदि किसी व्यक्तिको [यहूदियोंकी ] यिडिश भाषाकी बड़ी अच्छी जानकारी हो,
तो मैं तो उसका कोई उपयोग नहीं समझता । और यही बात रूसी तथा अन्य कई भाषाओं पर भी
लागू होती है । हमें इस देशमें एक खास स्वभाव तथा चरित्रके तथा शरीरसे स्वस्थ व्यक्तियोंकी आवश्यकता
है । प्रवासियोंमें हमें इस देशके लिए अनुपयोगी भाषाओंकी शैक्षणिक योग्यता या साहित्यिक ज्ञानको
अत्यधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए । और अन्य सभी बातों में प्रवासी विभाग इसी प्रकार चलेगा, जैसा
कि वर्तमान कानूनों के अन्तर्गत चल रहा है । मैं यह कहनेके लिए बिलकुल तैयार हूँ कि भविष्यमें गोरोंके
लिए ऐसी कोई भी परीक्षा नहीं रखी जायेगी जो पहलेकी परीक्षाओंसे अधिक सख्त हो । और भारतीय
तथा एशियाई लोगोंके लिए हम ब्रिटिश सरकारके सहयोगसे ऐसा प्रबन्ध कर रहे हैं कि शिक्षित और
शिक्षा-साध्य काम-धन्धेवाले एशियाइयोंको प्रति वर्ष एक सीमित संख्या में प्रवेशकी अनुमति दी जाये - हाँ,
एक सीमित संख्या में ही; लेकिन अन्य लोगों के लिए ऐसे ढंगसे व्यवस्था की जायेगी कि इस देशमें एशियाइ-
योंकी बाद-सी न आ जाये ।
मैं कोई ऐसी बात नहीं कहना चाहता, जिससे इस सभाकी राय किसी तरह प्रभावित हो ।
आपने विधेयक देख लिया है और आप इसको संविधि पुस्तकमें सम्मिलित करानेके लिए अत्यन्त
उत्कंठित हैं, हालाँकि आपने अधिवासियोंके सम्बन्धमें एक ऐसा मुद्दा उठाया है, जिसे मैं एक संशोधनके
रूपमें प्रस्तुत करना चाहता हूँ। भारत सरकारने भी यह विधेयक देख लिया है और सहमति प्रकट
की है और उसकी इच्छा है कि इसे यथाशीघ्र संविधि पुस्तक में सम्मिलित कर लिया जाये। श्री स्मटसने<noinclude></noinclude>
rmipx5yag7fi6gfd2cniwyvoir84mh7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९१
250
184153
673442
640023
2026-08-23T18:12:48Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673442
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५३}}</noinclude>आगे कहा कि निषिद्ध प्रवासियोंकी परिभाषा के बारेमें इस विधेयक में वैसी ही व्यवस्थाएँ हैं जैसी आमतौर-
पर अन्य विधेयकोंमें होती हैं । इस सिलसिले में मुझे इतना ही कहना है कि इस खण्ड में अब हमें तपेदिक
आयोग प्रतिवेदन अनुसार एक और पैरा बढ़ाना पड़ेगा । उसमें यह व्यवस्था की जायेगी कि कुछ
परिस्थितियोंमें तपेदिकके रोगियों को भी इस देशमें प्रवेशकी अनुमति दी जा सकेगी । तपेदिकके रोगियों को
इस देश में प्रवेशकी अनुमति देनेके प्रश्नपर मतभेद जरूर है, पर यह भी तो है कि इन रोगियोंके
तपेदिककी अवस्थाका खयाल किये बिना उन सभीके लिए द्वार बन्द कर देनेसे वे काफी मुश्किलमें पड़
जायेंगे और इसीलिए आयोग इस नतीजेपर पहुँचा है कि यदि वे आयोगके प्रतिवेदनमें उल्लिखित
कुछ शर्ते पूरी करते हों तो कुछ परिस्थितियोंमें उनको प्रवेशकी अनुमति दी जा सकती है । मैं चाहता
हूँ, प्रतिवेदनके उतने भागको स्वीकार कर लिया जाये। ( बहुत खूब ! वाह ! ) । हमें उस देशमें तपेदिकके
प्रकोपके विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, क्योंकि वह देशका एक सबसे खतरनाक रोग बनता है । हमें
अपने समुद्र तटोंपर काम शुरू करना चाहिए, जिससे कि इस रोगका प्रभाव और अधिक न फैल सके ।
(वाह ! वाह ! ) मैं मानता हूँ कि हमें अपने द्वार बिलकुल ही बन्द नहीं कर देने चाहिए, लेकिन
प्रतिवेदन की सिफारिशें स्वीकार कर ली जायें, तो देशके बाहरसे इस रोगके और अधिक संक्रमणकी
रोकथाम की जा सकती है । विधेयकमें अपवादोंकी भी व्यवस्था की गई है, जिससे कुछ वर्गों के लोगोंको
इस देशमें आनेकी छूट रहेगी और और उनपर इस विधेयकी व्यवस्थाएँ बिलकुल लागू नहीं होंगी ।
गत वर्षके विधेयककी तत्सम्बन्धी व्यवस्थाएँ कुछ अधिक व्यापक बना दी गई हैं, जिससे कि अब सभी
दक्षिण आफ्रिकी लोग अपने स्त्री-बच्चों सहित विदेशोंसे वापस आ सकेंगे। एक अनुच्छेदके बारेमें
ट्रान्सवालके खान- मण्डल ( चेम्बर ऑफ माइंस ) के साथ कुछ मतभेद हो गया था । धारा पाँचमें
व्यवस्था की गई थी कि निम्नलिखित लोग, अर्थात् पड़ौसी सरकारके किसी कानून या उसके साथ
हुए किसी समझौता ( कन्वेंशन ) के अनुसार संघमें प्रवेश करनेवाले लोग, निषिद्ध प्रवासी नहीं होंगे ।
इस व्यवस्थाके अनुसार आफ्रिकाके पूर्वीय तट ( ईस्ट कोस्ट ) के सभी वर्तनी मजदूरोंको विमुक्ति मिल जाती
है । जिस इकरारनामेका उल्लेख किया गया है, वह मोजाम्बिक-समझौता है। खान-मण्डलने कई आपत्तियाँ
कीं और कहा कि इस खण्डके अनुसार बसूटोलेंड से आनेवाले वतनी लोग प्राविधिक दृष्टिसे निषिद्ध प्रवासी बन
जा सकते हैं। उनका कहना है कि न्यासालैंडसे आनेवाले वतनी भी इसके अनुसार निषिद्ध प्रवासी माने जा सकते
हैं। मेरा खयाल है कि इन आपत्तियों में अधिक बल नहीं है। वस्टोलेंडसे आनेवाले वतनियोंके सम्बन्ध में गत वर्षके
भर्ती-कानूनके उपबन्धों में व्यवस्था की गई थी । मण्डलने न्यासालैंडके वतनियोंका मामला भी उठाया था
दरअसल, बसूटोलैंडसे आनेवाले वतनी निषिद्ध प्रवासी नहीं हैं, क्योंकि किसी भी अन्य कानूनके अनुसार
यहाँ आनेवाले वतनियोंको छूट दे दी गई है, लेकिन यदि कोई सन्देह हो तो मैं खान- मण्डलके साथ
बातचीत करने को तैयार हूँ । न्यासालैंडके वतनियोंके बारेमें मुझे यह बतलाया गया है कि उनकी भर्ती
न्यासालैंड में नहीं की जाती। वे बहुधा पुर्तगाली प्रदेशोंमें चले जाते है और वहाँ विटवाटसँरेंड वतनी
मजदूर संघके एजेंट उनकी भर्ती करते हैं, और इस प्रकार वे “ मोजाम्बिक-समझौते " के अंतर्गत आ
जाते हैं । इसलिए मेरा खयाल है कि इन आपत्तियोंके सिलसिले में किसी भी संशोधनकी आवश्यकता
नहीं पड़ेगी । इस विधेयकके अन्तर्गत एक दूसरा महत्त्वपूर्ण मुद्दा दक्षिण आफ्रिकामें एशियाइयोंकी
गतिविधियोंके बारेमें उठाया गया था। संघ में बड़े पैमानेपर एशियाइयोंके प्रवासकी रोकथाम तो
भविष्य में की जा सकेगी, परन्तु अन्तर्प्रान्तीय आवागमनका पेचीदा प्रश्न फिर भी रह जाता है; और
जिन मुद्दोंके बारेमें ब्रिटिश सरकारने जोर दिया था उनमें एक यह भी है । ट्रान्सवाल या फ्री स्टेटमें
तो एशियाइयोंको प्रवासकी अनुमति लगभग दी ही नहीं जाती, परन्तु केप और नेटाल प्रान्तोंके कानूनोंके
अन्तर्गत भारतीय और एशियाई लोग शैक्षणिक परीक्षा पास करके न केवल दूसरे देशोंसे बल्कि दूसरे
प्रान्तोंसे भी इनमें प्रवेश पा सकते हैं। केप जानेके इच्छुक नेटालके भारतीय केप कानूनके अन्तर्गत एक<noinclude></noinclude>
1n4m0jgd9fhsh8gbdbo7o6xopou64ml
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९२
250
184154
673439
640024
2026-08-23T18:11:17Z
सीमा1
430
673439
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh|५५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मामूली-सी परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं; और इसी तरह ट्रान्सवाल या केपके जो एशियाई
नेटालमें प्रवेश करना चाहते हों, वे नेटाल कानूनके अन्तर्गत परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं ।
इस तरह वे केप या नेटालमें प्रवेश पा सकते हैं, क्योंकि इन प्रान्तोंमें एशियाइयोंके प्रवासके बारेमें कोई
कानून नहीं है; पर चूँकि ट्रान्सवाल और फ्री स्टेटमें है इसलिए एशियाई लोग आजकल ट्रान्सवाल और
फ्री स्टेटमें नहीं जा सकते । माननीय सदस्य इस विषमताको समझ सकते हैं और ब्रिटिश सरकारने
हमसे कहा है कि इस विधेयकको इस तरह लागू न किया जाये कि एशियाइयोंकी हालत बदतर हो
जाये । विधेयकके अंतर्गत तो एशियाइयोंकी अन्तर्प्रान्तीय गतिविधियोंपर प्रतिबन्ध लगाये गये हैं, किन्तु
ब्रिटिश सरकारने कहा है कि वास्तविक प्रशासन इस ढंगसे किया जाये कि कानूनमें केप और नेटाल्के
बारेमें जितने की व्यवस्था की गई है उससे अधिक प्रतिबन्ध न लगाये जा सकेँ । ट्रान्सवालकी स्थितिके
सम्बन्धमें मन्त्रीने कहा कि वहाँ “हमें कोई बाधा नहीं है और हम इस प्रान्तमें संघके अन्य हिस्सोंसे
एशियाइयोंका प्रवेश रोक सकते हैं । " हम संघके भीतरी प्रान्तोंमें अपना कानून लागू करना चाहते हैं,
पर हम इसके लिए तैयार हैं कि उसे अमल में लानेमें वर्तमान कानूनके अन्तर्गत अभीतक जितनी
सख्ती बरती जाती रही है उससे अधिक न बरती जाये । अब प्रश्न उठता है कि इस विधेयक के कानून
बन जानेपर फ्री स्टेट-जैसे प्रान्तमें वास्तविक स्थिति क्या होगी । वह स्थिति यही होगी कि इस अधिनियमके
अन्तर्गत एशियाइयोंको एक सीमित संख्या में प्रतिवर्ष संघ में प्रवेश करने दिया जायगा, बशर्ते कि
ऐसे एशियाई शिक्षित या शिक्षा-साध्य पेशेवाले लोग हों और उतनी ही संख्यामें आये जितनेकी
सरकार मंजूरी दे | अब अगर इस प्रकार प्रवेश करनेवाले एशियाई चाहेंगे, तो वे संघके किसी भी
प्रान्तमें और फ्री स्टेटमें भी बस सकेंगे; किन्तु फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनको व्यवस्थाओंके अनुसार
वे कुछ विशेष प्रकारके व्यापार और धन्धे नहीं कर सकते और न भू-सम्पत्तिके स्वामी ही हो
सकते । यदि वे वहाँ जाना भी चाहेंगे तो ये सारे प्रतिबन्ध और वहाँ लगाई जानेवाली सभी
निर्योग्यताएँ उनपर लागू रहेंगी । यदि धारा २८ से पूरी तरह सन्तोष न होता हो तो मैं इसे
अधिक स्पष्ट बनानेके लिए इसमें यह संशोधन शामिल करनेको तैयार हूँ कि एशियाइयोंको संघमें कहीं भी,
फ्री स्टेटमें भी, जानेकी छूट तो रहेगी पर फ्री स्टेटमें वे ऐसे किसी भी अधिकारका उपभोग नहीं कर
सकेंगे जिससे वे फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनमें आजकल वंचित हैं । फ्री स्टेटमें कुल मिलाकर इसका नतीजा
यह होगा कि गोरोंकी दृष्टिसे स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी, क्योंकि फ्री स्टेटका मौजूदा कानून सचमुच
ही बड़ा ढीला-ढाला है । फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनके अनुसार कोई भी एशियाई प्रान्तमें प्रवेश तो कर
सकता है पर उसे अपने प्रवेशके दो महीनेके अन्दर वहाँ बने रहने की अनुमतिके लिए प्रार्थनापत्र दे देना
चाहिए । अनुमति मिल जानेपर ही वह रह सकता है, लेकिन एक बार द्वार तो खुल जाता है ।
एशियाई लोग पहले तो फ्री स्टेटमें प्रवेश कर लेते हैं और उसके दो महीने बाद बनेकी अनुमति ले लेते
हैं । यह बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण व्यवस्था है, क्योंकि यदि लोगोंको प्रान्त में आनेसे रोकना हो तो उनको
सीमापर ही रोक देना सबसे अच्छा होगा । एक बार प्रवेश पा लेनेके बाद उनको निकालना काफी
मुश्किल हो जाता है । लेकिन इसके बाद अब फ्री स्टेटमें स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी । मन्त्रीने
अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि प्रवासी विभागके प्रशासनके बारेमें जब-तब काफी असन्तोष पैदा
हो जाता है । विभागके अधिकारी बड़े योग्य और मेहनती हैं, पर हैं तो आखिर आदमी ही । उनसे
कभी-कभी गलतियाँ भी हो जाती हैं, जिनको लेकर जनतामें कुछ चीख-पुकार मचने लगती है । वे जो
निर्णय करते हैं, उनकी कभी-कभी आलोचना की जाती है, परन्तु इससे बचा जा सकता है, और इसलिए
मैं कुछ स्थानोंपर सलाहकार निकाय नियुक्त करना चाहता हूँ । संघमें रेल या जहाज द्वारा प्रवेश करनेके
हर केन्द्र के लिए एक-एक निकाय नियुक्त करना तो मुमकिन नहीं, लेकिन केप टाउन और डर्बनमें ऐसे निकाय
बना देना चाहिए जो प्रवासी अधिकारियों द्वारा प्रवेश करनेसे रोके जानेवाले लोगोंके मामलोंपर विचार
Gandhi Heritage Porta<noinclude></noinclude>
d45wa9puacx67hapypr7teiukgb6hot
673440
673439
2026-08-23T18:11:48Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673440
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मामूली-सी परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं; और इसी तरह ट्रान्सवाल या केपके जो एशियाई
नेटालमें प्रवेश करना चाहते हों, वे नेटाल कानूनके अन्तर्गत परीक्षा पास करके प्रवेश पा सकते हैं ।
इस तरह वे केप या नेटालमें प्रवेश पा सकते हैं, क्योंकि इन प्रान्तोंमें एशियाइयोंके प्रवासके बारेमें कोई
कानून नहीं है; पर चूँकि ट्रान्सवाल और फ्री स्टेटमें है इसलिए एशियाई लोग आजकल ट्रान्सवाल और
फ्री स्टेटमें नहीं जा सकते । माननीय सदस्य इस विषमताको समझ सकते हैं और ब्रिटिश सरकारने
हमसे कहा है कि इस विधेयकको इस तरह लागू न किया जाये कि एशियाइयोंकी हालत बदतर हो
जाये । विधेयकके अंतर्गत तो एशियाइयोंकी अन्तर्प्रान्तीय गतिविधियोंपर प्रतिबन्ध लगाये गये हैं, किन्तु
ब्रिटिश सरकारने कहा है कि वास्तविक प्रशासन इस ढंगसे किया जाये कि कानूनमें केप और नेटाल्के
बारेमें जितने की व्यवस्था की गई है उससे अधिक प्रतिबन्ध न लगाये जा सकेँ । ट्रान्सवालकी स्थितिके
सम्बन्धमें मन्त्रीने कहा कि वहाँ “हमें कोई बाधा नहीं है और हम इस प्रान्तमें संघके अन्य हिस्सोंसे
एशियाइयोंका प्रवेश रोक सकते हैं । " हम संघके भीतरी प्रान्तोंमें अपना कानून लागू करना चाहते हैं,
पर हम इसके लिए तैयार हैं कि उसे अमल में लानेमें वर्तमान कानूनके अन्तर्गत अभीतक जितनी
सख्ती बरती जाती रही है उससे अधिक न बरती जाये । अब प्रश्न उठता है कि इस विधेयक के कानून
बन जानेपर फ्री स्टेट-जैसे प्रान्तमें वास्तविक स्थिति क्या होगी । वह स्थिति यही होगी कि इस अधिनियमके
अन्तर्गत एशियाइयोंको एक सीमित संख्या में प्रतिवर्ष संघ में प्रवेश करने दिया जायगा, बशर्ते कि
ऐसे एशियाई शिक्षित या शिक्षा-साध्य पेशेवाले लोग हों और उतनी ही संख्यामें आये जितनेकी
सरकार मंजूरी दे | अब अगर इस प्रकार प्रवेश करनेवाले एशियाई चाहेंगे, तो वे संघके किसी भी
प्रान्तमें और फ्री स्टेटमें भी बस सकेंगे; किन्तु फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनको व्यवस्थाओंके अनुसार
वे कुछ विशेष प्रकारके व्यापार और धन्धे नहीं कर सकते और न भू-सम्पत्तिके स्वामी ही हो
सकते । यदि वे वहाँ जाना भी चाहेंगे तो ये सारे प्रतिबन्ध और वहाँ लगाई जानेवाली सभी
निर्योग्यताएँ उनपर लागू रहेंगी । यदि धारा २८ से पूरी तरह सन्तोष न होता हो तो मैं इसे
अधिक स्पष्ट बनानेके लिए इसमें यह संशोधन शामिल करनेको तैयार हूँ कि एशियाइयोंको संघमें कहीं भी,
फ्री स्टेटमें भी, जानेकी छूट तो रहेगी पर फ्री स्टेटमें वे ऐसे किसी भी अधिकारका उपभोग नहीं कर
सकेंगे जिससे वे फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनमें आजकल वंचित हैं । फ्री स्टेटमें कुल मिलाकर इसका नतीजा
यह होगा कि गोरोंकी दृष्टिसे स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी, क्योंकि फ्री स्टेटका मौजूदा कानून सचमुच
ही बड़ा ढीला-ढाला है । फ्री स्टेटके मौजूदा कानूनके अनुसार कोई भी एशियाई प्रान्तमें प्रवेश तो कर
सकता है पर उसे अपने प्रवेशके दो महीनेके अन्दर वहाँ बने रहने की अनुमतिके लिए प्रार्थनापत्र दे देना
चाहिए । अनुमति मिल जानेपर ही वह रह सकता है, लेकिन एक बार द्वार तो खुल जाता है ।
एशियाई लोग पहले तो फ्री स्टेटमें प्रवेश कर लेते हैं और उसके दो महीने बाद बनेकी अनुमति ले लेते
हैं । यह बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण व्यवस्था है, क्योंकि यदि लोगोंको प्रान्त में आनेसे रोकना हो तो उनको
सीमापर ही रोक देना सबसे अच्छा होगा । एक बार प्रवेश पा लेनेके बाद उनको निकालना काफी
मुश्किल हो जाता है । लेकिन इसके बाद अब फ्री स्टेटमें स्थिति अधिक निरापद हो जायेगी । मन्त्रीने
अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि प्रवासी विभागके प्रशासनके बारेमें जब-तब काफी असन्तोष पैदा
हो जाता है । विभागके अधिकारी बड़े योग्य और मेहनती हैं, पर हैं तो आखिर आदमी ही । उनसे
कभी-कभी गलतियाँ भी हो जाती हैं, जिनको लेकर जनतामें कुछ चीख-पुकार मचने लगती है । वे जो
निर्णय करते हैं, उनकी कभी-कभी आलोचना की जाती है, परन्तु इससे बचा जा सकता है, और इसलिए
मैं कुछ स्थानोंपर सलाहकार निकाय नियुक्त करना चाहता हूँ । संघमें रेल या जहाज द्वारा प्रवेश करनेके
हर केन्द्र के लिए एक-एक निकाय नियुक्त करना तो मुमकिन नहीं, लेकिन केप टाउन और डर्बनमें ऐसे निकाय बना देना चाहिए जो प्रवासी अधिकारियों द्वारा प्रवेश करनेसे रोके जानेवाले लोगोंके मामलोंपर विचार<noinclude></noinclude>
htmdbqkhexq11tndinegm3ramyszsng
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९३
250
184155
673437
640025
2026-08-23T18:08:53Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673437
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५५}}</noinclude>करें । इन बोर्डों का गठन इस प्रकार किया जायेगा कि वे अपीलोंपर निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंगसे विचारकर सकें । विधेयकमें कुछ संशोधन आवश्यक होंगे, जैसे कि यह संशोधन कि दक्षिण आफ्रिकाका
अधिवासी बन जानेवाले व्यक्तिको न्यायालय में अपील करनेकी अनुमति होनी चाहिए । मन्त्रीने विधेयकको
द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत किया । ( हर्ष-ध्वनि । )
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ८-६-१९१२
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १८'''}}</center>
<center>{{larger|'''अस्थायी समझौते के सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड ऍम्टहिलका भाषण'''}</center>
{{right|लन्दन <br>जुलाई १७, १९१२}}
लॉर्ड महोदयो, मैं लम्बा भाषण देकर आपका समय नष्ट नहीं करना चाहता, परन्तु मुझे अपने
नामसे पेश हुए प्रश्नकी सफाईमें कुछ शब्द तो कहने ही पड़ेंगे। मुझे विवश होकर यह प्रश्न पूछना
पड़ा है; क्योंकि दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटिश भारतीयोंके साथ होनेवाले बरतावके इतने अधिक महत्त्वपूर्ण
प्रश्नके बारेमें मन्त्री महोदयले जानकारी हासिल करनेका अन्य कहीं कोई दूसरा मौका नहीं मिल सकता
था। आपको स्मरण होगा कि मन्त्री महोदय कामन्स सभाके सदस्योंको साम्राज्यीय उपनिवेशोंके दौरे-
पर ले गये थे । दौरा इतना दिलचस्प था और इतना लम्बा था कि उसे और अधिक नहीं बढ़ाया जा
सकता था । हममें से जो लोग पिछले कुछ वर्षोंसे इस प्रश्नमें दिलचस्पी रखते आ रहे हैं, वे आजकल
अत्यन्त चिन्तित हो उठे हैं । हमारी चिन्ताके दो कारण हैं - पहला तो यह कि भूतपूर्वं उपनिवेश
मन्त्रीने इतने अर्से पहले जिस समझौतेको कार्यान्वित करनेका वचन इतने निश्चित और आशापूर्ण शब्दोंमें
दिया था उसे इस बार फिर स्थगित कर दिया गया है; और दूसरा यह कि उस समझौतेको कार्यान्वित
करनेका भार अब दूसरे लोगोंपर है। जनरल स्मट्स, जो पहले गृह-मन्त्री थे, इस समझौतेको अमलमें
लानेके लिए वचनबद्ध थे, क्योंकि इसे, जैसा कि हमारा विश्वास है, दक्षिण आफ्रिकाका भारतीय समाज
ही नहीं, सम्राटको सरकार और भारत सरकारने भी सन्तोषप्रद मानकर इससे सहमति प्रकट की थी ।
परन्तु अब दुर्भाग्यवश विधेयकको स्थगित कर दिया गया है, और गृह-मन्त्रीके पदपर भी अब एक
दूसरे सज्जन, मेरा ख्याल है कि श्री फिशर, विराजमान हैं। और उनके सम्बन्धमें हम जानते हैं।
कि दुर्भाग्यवश ब्रिटिश भारतीय समाजके प्रति उनका रुख - मैं इतना ही कहूँगा- जनरल स्मटससे
कम ही मैत्रीपूर्ण हैं । हम बहुत ही स्पष्ट रूपसे यह जानना चाहेंगे कि क्या नये गृह मन्त्रीके आनेसे
समझौतेकी स्थितिमें कोई अन्तर पड़ेगा, और साथ ही निःसन्देह यह भी कि इस समझौतेको स्थगित
करनेका ठीक-ठीक कारण क्या है ।
माननीय सदस्योंको याद होगा एक सालसे भी अधिक समय पहले उन लोर्ड महोदयने, जो इस सभाके नेता और उन दिनों मन्त्री पदपर थे, हमें पूरे विश्वासके साथ आशापूर्ण शब्दोंमें आश्वस्त किया था कि समझौता शीघ्र ही होनेवाला है और उनको सचमुच पूर्ण विश्वास था कि समझौता हो ही जायगा । मैं आपको यह भी याद दिला दूँ कि समझौता क्या था । समझौतेका सार यह था कि १९०७ का ट्रान्सवाल अधिनियम २ रद कर दिया जायेगा, क्योंकि वह दक्षिण अफ्रिकाके हमारे सहयोगी भारतीय नागरिकोंकी भावनाओंको इतनी अधिक ठेस पहुँचाता है । वह अधिनियम सर्वथा अनुपयोगी है और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंका अपमान करना और उनकी भावनाओंको<noinclude></noinclude>
fooskrxthu3msooscfa17qidy4jh1tz
673438
673437
2026-08-23T18:09:43Z
सीमा1
430
673438
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५५}}</noinclude>करें । इन बोर्डों का गठन इस प्रकार किया जायेगा कि वे अपीलोंपर निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंगसे विचारकर सकें । विधेयकमें कुछ संशोधन आवश्यक होंगे, जैसे कि यह संशोधन कि दक्षिण आफ्रिकाका
अधिवासी बन जानेवाले व्यक्तिको न्यायालय में अपील करनेकी अनुमति होनी चाहिए । मन्त्रीने विधेयकको
द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत किया । ( हर्ष-ध्वनि । )
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ८-६-१९१२'''
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १८'''}}</center>
<center>{{larger|'''अस्थायी समझौते के सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड ऍम्टहिलका भाषण'''}</center>
{{right|लन्दन <br>जुलाई १७, १९१२}}
लॉर्ड महोदयो, मैं लम्बा भाषण देकर आपका समय नष्ट नहीं करना चाहता, परन्तु मुझे अपने
नामसे पेश हुए प्रश्नकी सफाईमें कुछ शब्द तो कहने ही पड़ेंगे। मुझे विवश होकर यह प्रश्न पूछना
पड़ा है; क्योंकि दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटिश भारतीयोंके साथ होनेवाले बरतावके इतने अधिक महत्त्वपूर्ण
प्रश्नके बारेमें मन्त्री महोदयले जानकारी हासिल करनेका अन्य कहीं कोई दूसरा मौका नहीं मिल सकता
था। आपको स्मरण होगा कि मन्त्री महोदय कामन्स सभाके सदस्योंको साम्राज्यीय उपनिवेशोंके दौरे-
पर ले गये थे । दौरा इतना दिलचस्प था और इतना लम्बा था कि उसे और अधिक नहीं बढ़ाया जा
सकता था । हममें से जो लोग पिछले कुछ वर्षोंसे इस प्रश्नमें दिलचस्पी रखते आ रहे हैं, वे आजकल
अत्यन्त चिन्तित हो उठे हैं । हमारी चिन्ताके दो कारण हैं - पहला तो यह कि भूतपूर्वं उपनिवेश
मन्त्रीने इतने अर्से पहले जिस समझौतेको कार्यान्वित करनेका वचन इतने निश्चित और आशापूर्ण शब्दोंमें
दिया था उसे इस बार फिर स्थगित कर दिया गया है; और दूसरा यह कि उस समझौतेको कार्यान्वित
करनेका भार अब दूसरे लोगोंपर है। जनरल स्मट्स, जो पहले गृह-मन्त्री थे, इस समझौतेको अमलमें
लानेके लिए वचनबद्ध थे, क्योंकि इसे, जैसा कि हमारा विश्वास है, दक्षिण आफ्रिकाका भारतीय समाज
ही नहीं, सम्राटको सरकार और भारत सरकारने भी सन्तोषप्रद मानकर इससे सहमति प्रकट की थी ।
परन्तु अब दुर्भाग्यवश विधेयकको स्थगित कर दिया गया है, और गृह-मन्त्रीके पदपर भी अब एक
दूसरे सज्जन, मेरा ख्याल है कि श्री फिशर, विराजमान हैं। और उनके सम्बन्धमें हम जानते हैं।
कि दुर्भाग्यवश ब्रिटिश भारतीय समाजके प्रति उनका रुख - मैं इतना ही कहूँगा- जनरल स्मटससे
कम ही मैत्रीपूर्ण हैं । हम बहुत ही स्पष्ट रूपसे यह जानना चाहेंगे कि क्या नये गृह मन्त्रीके आनेसे
समझौतेकी स्थितिमें कोई अन्तर पड़ेगा, और साथ ही निःसन्देह यह भी कि इस समझौतेको स्थगित
करनेका ठीक-ठीक कारण क्या है ।
माननीय सदस्योंको याद होगा एक सालसे भी अधिक समय पहले उन लोर्ड महोदयने, जो इस सभाके नेता और उन दिनों मन्त्री पदपर थे, हमें पूरे विश्वासके साथ आशापूर्ण शब्दोंमें आश्वस्त किया था कि समझौता शीघ्र ही होनेवाला है और उनको सचमुच पूर्ण विश्वास था कि समझौता हो ही जायगा । मैं आपको यह भी याद दिला दूँ कि समझौता क्या था । समझौतेका सार यह था कि १९०७ का ट्रान्सवाल अधिनियम २ रद कर दिया जायेगा, क्योंकि वह दक्षिण अफ्रिकाके हमारे सहयोगी भारतीय नागरिकोंकी भावनाओंको इतनी अधिक ठेस पहुँचाता है । वह अधिनियम सर्वथा अनुपयोगी है और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंका अपमान करना और उनकी भावनाओंको<noinclude></noinclude>
2ttbkmftwfnb3no26i1sdsaq5v1bnpc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९४
250
184156
673429
640026
2026-08-23T18:00:49Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673429
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>ठेस पहुँचाना ही उसका एकमात्र उपयोग है । अतः अल्पवयस्कोंके अधिकारोंको सुरक्षित रखते हुए उस
अधिनियमको रद किया जाना था तथा एशियाइयोंके प्रवासको प्रतिबन्धित करनेके सिद्धान्तको इस प्रकार
समाविष्ट किया जाना था कि जातीय भेदभावको उपनिवेशमें मान्यता न मिले। और प्रतिबन्धकी बातसे
भारतीयोंने स्वयं सहमति व्यक्त की थी और इसे अनिवार्य ही नहीं उचित भी माना था । भारतीयोंकी
केवल यही एक मांग रही है कि रंगके आधारपर उनके साथ भेदभाव न किया जाये । उनका
कहना है : " यदि आप हमें उपनिवेशमें प्रवेश नहीं ही देना चाहें तो प्रशासकीय तौरपर भेदभाव करके
वैसा कीजिए । या फिर आप आर्थिक सुविधाके आधारपर वैसा कीजिए, किन्तु स्पष्ट रूपसे यह कहकर
तो मत कीजिए कि हम एक निम्नतर प्रजातिके लोग हैं ।" हमें तो आशा थी कि समझौता बहुत
पहले ही कार्यान्वित हो जायेगा । उसे दो बार स्थगित किया जा चुका है। इसलिए मैं सबसे पहले
तो यही जानना चाहूँगा कि इसे स्थगित करनेके ठीक-ठीक कारण क्या हैं और इसके बाद मैं जानना
चाहूँगा कि क्या सम्राट्की सरकार समझती है कि संघ-संसद् में हालमें जो विधेयक पेश हुआ है वह
वास्तवमें समझौते की उन शर्तोंको पूरा करता है जिनका मैंने उल्लेख किया है । मुझे मालूम है कि
दक्षिण आफ्रिकाके कई बड़े अधिकारी वकील कहते हैं कि यह विधेयक उन सीधी-सादी और स्पष्ट शर्तोंको
पूरा नहीं करता, बल्कि एक दूसरे रूपमें प्रजातिगत भेदभावको बरकरार रखता है । इसके बारेमें सम्राटको
सरकारकी क्या राय है ? और यदि उसकी रायमें यह उन शर्तोंको पूरा नहीं करता तो इसे ठीक करनेके
लिए वह क्या कदम उठाने जा रही है ?
और यह भी कहा गया है कि यह विधेयक तटवर्ती प्रान्तोंके भारतीयोंको उन अधिकारोंसे भी
वंचित करता है, जिनपर अभीतक किसीने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी। हो सकता है कि यह बात
गलत हो, पर इसके बारेमें भी मैं माननीय मन्त्रीसे सूचना चाहता हूँ । वे बताये कि सचाई क्या है ।
मेरा खयाल है कि सम्राट्की सरकारने अक्टूबर १९१० के अपने खरीतेमें कहा था कि ट्रान्सवाल्के भारतीयोंकी
समस्याके हलके रूपमें ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जायेगा जो अन्य प्रान्तों में भारतीयोंके
अधिकारों को कम करता हो । दक्षिण आफ्रिकी सरकार संघ बननेके काफी पहलेसे लगातार यही कहती
आई है कि वह इस देशमें विधिपूर्वक निवासी बन चुके भारतीयोंके अधिकारोंमें कोई कमी नहीं करना
चाहती । जब लॉर्ड सेल्बोर्न [ दक्षिण आफ्रिकामें ] उच्चायुक्त थे, उन दिनों इस विषयसे सम्बन्धित उनके
सभी भाषणोंका मुख्य स्वर यही बात थी; उन्होंने कहा था कि वे इस देशमें विधिपूर्वक निवासी बन चुके
भारतीयोंके साथ पहलेकी बनिस्बत किसी भी तरह कम अच्छा बरताव नहीं करना चाहते । वे केवल एक
इस चीज पर अड़े रहे कि समाजके सहज-सुखद जीवनके लिए जिन पादरी-पुजारियों, डॉक्टरों और वकीलोंकी
आवश्यकता है ऐसे कुछ उचित अपवादोंको छोड़कर बाकी किसी भारतीयको प्रवेश नहीं दिया जायेगा;
और अब तो अपवादकी श्रेणीमें आनेवाले उन लोगोंके प्रवेशके बारेमें सभी दल सहमत हैं । समाजको
आवश्यकताओंको देखते हुए प्रति वर्ष अधिकसे-अधिक छः लोगोंको प्रवेश देना उचित माना गया। आशा
है कि इस नये विधेयकको समुचित जाँच-परखके बाद यह निष्कर्ष नहीं निकाला जायेगा कि यह वास्तवमें
इस देशके भारतीयोंके मौजूदा अधिकारोंमें कटौती करता है, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो यह बहुत ही
गम्भीर और अक्षम्य विश्वासघात होगा । इसलिए मुझे भरोसा है कि हम यही सुनेंगे कि सम्राट की सरकारने
इस दृष्टिसे विधेयककी बड़ी सावधानीसे जाँच-परख कर ली है और वह इस मुद्देपर संघ-सरकारके साथ
मैत्रीपूर्ण ढंगसे लिखा-पढ़ी कर रही है ।
अपना प्रश्न पूछनेकी सफाईमें मैं एक बात और कहना चाहता हूँ । वह यह कि जिस समझौतेके बारेमें
हमसे तब कहा गया था कि बस होने ही वाला है उसको इतने दिन तक स्थगित करते जानेके इस कालमें
समझौते की भावनाका उल्लंघन हुआ है, ऐसा लगता है । भारतीय समाज सत्याग्रह आन्दोलनका अपना विचार
त्यागने के लिए इसीलिए सहमत हो गया था कि हमें यह आशा बँधाई गई थी कि समझौता फौरन ही<noinclude></noinclude>
eckbhky2c81thvmx4aqozt1xctyyig4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९६
250
184158
673428
640028
2026-08-23T17:59:23Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673428
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>प्रवासी अधिकारियों द्वारा जब-तब की जानेवाली अति है, एक प्रकारसे कुछ सफाई दी थी । प्रवासी अधि-
कारियोंकी इसी कार्रवाई के समान उधर मोजाम्बिक्के पुर्तगाली अधिकारियोंका काम भी है जो संघके
प्रवासी विभाग के कहनेपर देशके विधि सम्मत निवासियोंके बाल-बच्चोंको प्रवेश नहीं करने देते । इसका
परिणाम क्या निकला है ? परिणाम बहुत ही गम्भीर निकला है, परन्तु मैं तो लाख सर खपानेके बाद
भी नहीं समझ पाया कि उसकी ओर अधिक ध्यान क्यों नहीं दिया गया । परिणाम यह है कि जर्मन
लोग भी अब हमारी नकल करने लगे हैं। जर्मन पूर्व आफ्रिकामें अब वे हमारी मिसाल देकर भारतीय-
विरोधी कानून बना रहे हैं। और यदि हमें यह स्वीकार करनेपर विवश होना पड़ा कि चूँकि हम भी ऐसा ही करते हैं इसलिए एक अन्य देश द्वारा किये जानेवाले इस बहिष्कारका हम विरोध नहीं कर सकते, तो भारतीय जनता के सामने एक राष्ट्रके रूपमें हमारी क्या स्थिति होगी ? कुछ और बातें भी हैं जो अपेक्षाकृत छोटी, पर बहुत ही गम्भीर हैं। उदाहरण के लिए, नेटाल्के व्यापारिक परवाना कानूनोंका अमल स्पष्ट रूपसे इस उद्देश्य से करनेकी प्रवृत्ति उत्तरोतर बढ़ती जा रही है कि उनसे भारतीयोंके नेटालमें रहनेके वे सारे अधिकार, जिनपर आजतक किसीने कोई आपत्ति नहीं की, छिन जायें और इस प्रकार वे इस देशको छोड़ने-पर विवश हो जायें । मैं जिसका जिक्र कर चुका हूँ, इस विलम्बके कालमें स्वर्ण-कानूनको और ट्रान्सवालके कस्बा -अधिनियमको भी इसी ढंगसे लागू किया जा रहा है । उस अधिनियम के अन्तर्गत बनाये जानेवाले विनियमोंकी प्रवृत्ति भारतीयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में रहनेपर विवश कर देना है, हालाँकि स्वयं ये विनियम ही अवैध प्रतीत होते हैं। चीनीकी गुलामीमें भी यही होता था । उसकी एक परिस्थिति यह थी कि चीनी मजदूरों को कुछ निश्चित बस्तियोंमें रहना पड़ता था । तब फिर भारतीयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में रहनेपर विवश करनेकी इस जानी-बूझी कोशिशकी सफाईमें सरकार क्या कहना चाहती है, वह इसका क्या औचित्य ठहराती है ?
ट्रान्सवालके विधि सम्मत भारतीय निवासियोंके उत्पीड़नके लिए इस विधेयकको किस ढंगसे प्रयुक्त
किया गया है इसके मैं अनेक उदाहरण पेश कर सकता हूँ । हाँ, उसके लिए " उत्पीड़न " के अलावा
और किसी शब्दका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता । मैं जानना यह चाहता हूँ कि क्या सम्राट की सरकार
इन उत्पीड़क कार्यों पर निगाह रखती आई है और क्या उसने सम्राटकी प्रजा, हमारे उन भारतीय
सह-प्रजाजनोंकी रक्षाके लिए कुछ किया भी है जो दक्षिण आफ्रिकामें रहते हैं और जिनको वहाँ
रहनेका पूरा अधिकार है और जिस अधिकारपर कभी कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है ।
मैं इसपर जोर दे रहा हूँ, क्योंकि यह मामला ऐसे प्रवासियोंका नहीं जो बिना किसी अनुमतिके देशमें आ धमके
हों । और मुझे आशा है कि मेरे इस प्रश्नका उत्तर देनेवाले लॉर्ड महोदय इसका वही उत्तर नहीं देंगे
जो मुझे पहले अक्सर मिलता रहा है। मैं यह कहनेकी धृष्टता करता हूँ कि सामनेकी सरकारी बेचोंके
सदस्यगण उस उत्तरको ही मेरे लिए समुचित मानते हैं, परन्तु मैं जिनकी ओरसे बोल रहा हूँ उनके
लिए वह समुचित नहीं । और न ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए समुचित है जो इस प्रश्नको संसद्के
राजनीतिक दलोंकी सामान्य उखाड़-पछाइसे अलग रखकर इसपर समझदारी और साम्राज्यके दृष्टिकोणसे
विचार करता हो । मुझे अक्सर जो उत्तर मिलता रहा है वह यह है कि एक स्वशासित उपनिवेशके
मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता । यह उत्तर कई लोगोंको सन्तोषजनक लगता है, लेकिन वह
है बड़ा सड़ा-गला-सा, एक मूढ़ता-भरा उत्तर ही । पहली चीज यह कि हस्तक्षेपका इसमें प्रश्न ही नहीं ।
मैं आपको मालेकावाले मामलेकी याद दिला । आप यदि एक ऐसी महिलाकी खातिर, जो यदि
ब्रिटिश नागरिक थी भी तो केवल आधी ब्रिटिश नागरिक थी, न्यायालयके निर्णयको बदलवानेके लिए
एक ऐसे देशकी सरकारके मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिसको आप किसी भी तरह बाध्य नहीं
कर सकते, तो आपको निश्चय ही ऐसे हजारों व्यक्तियोंके बारेमें, जो पूरी तौरपर ब्रिटिश नागरिक
हैं, कुछ करने, कुछ कहने, कुछ माँगने और किसी तरहका समझौता करनेका भी अधिकार है; और<noinclude></noinclude>
ghbtolijnpnkbsucch1w7jujiaiav4s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९७
250
184159
673419
640029
2026-08-23T17:50:53Z
सीमा1
430
673419
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh||परिशिष्ट|५५९}}</noinclude>आपको ऐसा समझौता करनेका अधिकार है, विशेष रूपले उन लोगोंके साथ जो आप ही के राष्ट्र-बन्धु हैं, जो ब्रिटिश झण्डेके नीचे हमारे सम्राटको सत्ताके अधीन है, और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिनके आधारभूत हित वही हैं जो हमारे हैं। यदि आप साम्राज्यके सम्पूर्ण कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले मामलोंके बारेमें भी हमारे समुद्रपारके डोमीनियनोंमें रहनेवाले हमारे सजातीय बन्धुओंके साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, तो मैं कहूँगा कि वास्तवमें साम्राज्यका कोई अस्तित्व भी नहीं रह सकता ।
मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे ऐसी शक्ति या इतनी समझ दे कि मैं उसके बलपर उसी प्रकार लोकमत तैयार कर सकूँ और हमारे भाग्यको भले था बुरेके लिए प्रभावित करनेवाले अखबारोंके जादूगरों को उसी तरह अपने ऊपर कृपालु बना सकूँ, जिस तरह कि मालेकावाले मामलेके सिलसिले में किया गया था। पिछले पाँच सालसे ट्रान्सवालके हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेका औचित्य उससे दस हजार गुना अधिक रहा है । यदि मालेकावाले मामले में लोकमत और अखबारोंके प्रभावके बलपर इस देशकी सरकारको कुछ करनेके लिए, और जिस देशपर हमारा कोई काबू नहीं है उस देशमें भी हस्तक्षेप करनेके लिए, तैयार किया जा सकता था, तो यदि मुझे वह तरकीब आती तो ट्रान्सवाल्के हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेमें सरकार को कितना अधिक सक्रिय बनाया जा सकता था ? आशा है कि माननीय लॉर्ड (मन्त्री) महोदयको मैंने पूरी स्पष्टताके साथ बतला दिया है कि मैं किन-किन बातों का उत्तर चाहता हूँ ।
महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयने अपनी इसी १२ तारीखकी टिप्पणी, संख्या १५/१३९, में ब्रिटिश भारतीय संघके प्रार्थनापत्रपर और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा अपने ५ मईके पत्र में ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानूनके खण्ड १३० के परिणामोंके सम्बन्ध में उठाये गये प्रश्नपर मन्त्रियोंके विचार माँगे हैं । उक्त टिप्पणीके साथ माननीय उपनिवेश मन्त्रीसे प्राप्त एक तार भी भेजा गया है । गवर्नर जनरल महोदयने अपनी ८ मईकी टिप्पणी में उपर्युक्त प्रार्थनापत्रको एक प्रति पहले ही भेज दी थी। अब, इस सम्बन्धर्मे मन्त्रिगण यह कहता चाहते हैं कि उनके विचार में बस्तियों और बाजारोंके बाहर सम्पत्तिकास्वामित्व प्राप्त करने या उसे किसी अन्य प्रकार से अपने कब्जे में रखने- सम्बन्धी एशियाइयोंके अधिकारके सम्बन्धर्मे १८८५ के कानून संख्या ३, और उसके बाद पास किये गये कानूनोंसे उत्पन्न स्थितिपर पुनःविचार करना आवश्यक नहीं है ।
गवर्नर-जनरल महोदयको टिप्पणीक साथ संलग्न पत्रों में जिस शिकायतकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिलाया गया है, उसका सम्बन्ध १९०८ के बहुमूल्य और अपधातु अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत क्लार्क्सडॉप में की गई पुलिस कार्रवाईसे है; और ब्रिटिश भारतीय संघने १९०८ के कस्बा कानून संशोधन अधिनियमका जो उल्लेख किया है, वह मन्त्रियोंकी समझमें कुछ आया नहीं, क्योंकि उस कानूनमें वैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं, जिसकी शिकायत प्रार्थनापत्र में की गई है ।<noinclude></noinclude>
gk5s7a90pg06j11cpmke3qxw69lst35
673420
673419
2026-08-23T17:51:35Z
सीमा1
430
673420
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh||परिशिष्ट|५५९}}</noinclude>आपको ऐसा समझौता करनेका अधिकार है, विशेष रूपले उन लोगोंके साथ जो आप ही के राष्ट्र-बन्धु हैं, जो ब्रिटिश झण्डेके नीचे हमारे सम्राटको सत्ताके अधीन है, और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिनके आधारभूत हित वही हैं जो हमारे हैं। यदि आप साम्राज्यके सम्पूर्ण कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले मामलोंके बारेमें भी हमारे समुद्रपारके डोमीनियनोंमें रहनेवाले हमारे सजातीय बन्धुओंके साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, तो मैं कहूँगा कि वास्तवमें साम्राज्यका कोई अस्तित्व भी नहीं रह सकता ।
मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे ऐसी शक्ति या इतनी समझ दे कि मैं उसके बलपर उसी प्रकार लोकमत तैयार कर सकूँ और हमारे भाग्यको भले था बुरेके लिए प्रभावित करनेवाले अखबारोंके जादूगरों को उसी तरह अपने ऊपर कृपालु बना सकूँ, जिस तरह कि मालेकावाले मामलेके सिलसिले में किया गया था। पिछले पाँच सालसे ट्रान्सवालके हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेका औचित्य उससे दस हजार गुना अधिक रहा है । यदि मालेकावाले मामले में लोकमत और अखबारोंके प्रभावके बलपर इस देशकी सरकारको कुछ करनेके लिए, और जिस देशपर हमारा कोई काबू नहीं है उस देशमें भी हस्तक्षेप करनेके लिए, तैयार किया जा सकता था, तो यदि मुझे वह तरकीब आती तो ट्रान्सवाल्के हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेमें सरकार को कितना अधिक सक्रिय बनाया जा सकता था ? आशा है कि माननीय लॉर्ड (मन्त्री) महोदयको मैंने पूरी स्पष्टताके साथ बतला दिया है कि मैं किन-किन बातों का उत्तर चाहता हूँ ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ७-९-१९१२
{{x-larger|'''परिशिष्ट १९'''}}
{{larger|'''कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें
साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}
{{c|'''(क)'''}}
{{right|जून १६, १९११}}
महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयने अपनी इसी १२ तारीखकी टिप्पणी, संख्या १५/१३९, में ब्रिटिश भारतीय संघके प्रार्थनापत्रपर और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा अपने ५ मईके पत्र में ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानूनके खण्ड १३० के परिणामोंके सम्बन्ध में उठाये गये प्रश्नपर मन्त्रियोंके विचार माँगे हैं । उक्त टिप्पणीके साथ माननीय उपनिवेश मन्त्रीसे प्राप्त एक तार भी भेजा गया है । गवर्नर जनरल महोदयने अपनी ८ मईकी टिप्पणी में उपर्युक्त प्रार्थनापत्रको एक प्रति पहले ही भेज दी थी। अब, इस सम्बन्धर्मे मन्त्रिगण यह कहता चाहते हैं कि उनके विचार में बस्तियों और बाजारोंके बाहर सम्पत्तिकास्वामित्व प्राप्त करने या उसे किसी अन्य प्रकार से अपने कब्जे में रखने- सम्बन्धी एशियाइयोंके अधिकारके सम्बन्धर्मे १८८५ के कानून संख्या ३, और उसके बाद पास किये गये कानूनोंसे उत्पन्न स्थितिपर पुनःविचार करना आवश्यक नहीं है ।
गवर्नर-जनरल महोदयको टिप्पणीक साथ संलग्न पत्रों में जिस शिकायतकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिलाया गया है, उसका सम्बन्ध १९०८ के बहुमूल्य और अपधातु अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत क्लार्क्सडॉप में की गई पुलिस कार्रवाईसे है; और ब्रिटिश भारतीय संघने १९०८ के कस्बा कानून संशोधन अधिनियमका जो उल्लेख किया है, वह मन्त्रियोंकी समझमें कुछ आया नहीं, क्योंकि उस कानूनमें वैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं, जिसकी शिकायत प्रार्थनापत्र में की गई है ।<noinclude></noinclude>
p59q0b8k4k05gr9lqggjfr0zrhule14
673421
673420
2026-08-23T17:52:37Z
सीमा1
430
673421
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh||परिशिष्ट|५५९}}</noinclude>आपको ऐसा समझौता करनेका अधिकार है, विशेष रूपले उन लोगोंके साथ जो आप ही के राष्ट्र-बन्धु हैं, जो ब्रिटिश झण्डेके नीचे हमारे सम्राटको सत्ताके अधीन है, और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिनके आधारभूत हित वही हैं जो हमारे हैं। यदि आप साम्राज्यके सम्पूर्ण कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले मामलोंके बारेमें भी हमारे समुद्रपारके डोमीनियनोंमें रहनेवाले हमारे सजातीय बन्धुओंके साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, तो मैं कहूँगा कि वास्तवमें साम्राज्यका कोई अस्तित्व भी नहीं रह सकता ।
मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे ऐसी शक्ति या इतनी समझ दे कि मैं उसके बलपर उसी प्रकार लोकमत तैयार कर सकूँ और हमारे भाग्यको भले था बुरेके लिए प्रभावित करनेवाले अखबारोंके जादूगरों को उसी तरह अपने ऊपर कृपालु बना सकूँ, जिस तरह कि मालेकावाले मामलेके सिलसिले में किया गया था। पिछले पाँच सालसे ट्रान्सवालके हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेका औचित्य उससे दस हजार गुना अधिक रहा है । यदि मालेकावाले मामले में लोकमत और अखबारोंके प्रभावके बलपर इस देशकी सरकारको कुछ करनेके लिए, और जिस देशपर हमारा कोई काबू नहीं है उस देशमें भी हस्तक्षेप करनेके लिए, तैयार किया जा सकता था, तो यदि मुझे वह तरकीब आती तो ट्रान्सवाल्के हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेमें सरकार को कितना अधिक सक्रिय बनाया जा सकता था ? आशा है कि माननीय लॉर्ड (मन्त्री) महोदयको मैंने पूरी स्पष्टताके साथ बतला दिया है कि मैं किन-किन बातों का उत्तर चाहता हूँ ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ७-९-१९१२
{{x-larger|'''परिशिष्ट १९'''}}
{{larger|'''कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}
{{c|'''(क)'''}}
{{right|जून १६, १९११}}
महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयने अपनी इसी १२ तारीखकी टिप्पणी, संख्या १५/१३९, में ब्रिटिश भारतीय संघके प्रार्थनापत्रपर और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा अपने ५ मईके पत्र में ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानूनके खण्ड १३० के परिणामोंके सम्बन्ध में उठाये गये प्रश्नपर मन्त्रियोंके विचार माँगे हैं । उक्त टिप्पणीके साथ माननीय उपनिवेश मन्त्रीसे प्राप्त एक तार भी भेजा गया है । गवर्नर जनरल महोदयने अपनी ८ मईकी टिप्पणी में उपर्युक्त प्रार्थनापत्रको एक प्रति पहले ही भेज दी थी। अब, इस सम्बन्धर्मे मन्त्रिगण यह कहता चाहते हैं कि उनके विचार में बस्तियों और बाजारोंके बाहर सम्पत्तिकास्वामित्व प्राप्त करने या उसे किसी अन्य प्रकार से अपने कब्जे में रखने- सम्बन्धी एशियाइयोंके अधिकारके सम्बन्धर्मे १८८५ के कानून संख्या ३, और उसके बाद पास किये गये कानूनोंसे उत्पन्न स्थितिपर पुनःविचार करना आवश्यक नहीं है ।
गवर्नर-जनरल महोदयको टिप्पणीक साथ संलग्न पत्रों में जिस शिकायतकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिलाया गया है, उसका सम्बन्ध १९०८ के बहुमूल्य और अपधातु अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत क्लार्क्सडॉप में की गई पुलिस कार्रवाईसे है; और ब्रिटिश भारतीय संघने १९०८ के कस्बा कानून संशोधन अधिनियमका जो उल्लेख किया है, वह मन्त्रियोंकी समझमें कुछ आया नहीं, क्योंकि उस कानूनमें वैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं, जिसकी शिकायत प्रार्थनापत्र में की गई है ।<noinclude></noinclude>
iuun4qi6xwdzm4k67a0py8umhjlgb7u
673422
673421
2026-08-23T17:53:19Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673422
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५९}}</noinclude>आपको ऐसा समझौता करनेका अधिकार है, विशेष रूपले उन लोगोंके साथ जो आप ही के राष्ट्र-बन्धु हैं, जो ब्रिटिश झण्डेके नीचे हमारे सम्राटको सत्ताके अधीन है, और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिनके आधारभूत हित वही हैं जो हमारे हैं। यदि आप साम्राज्यके सम्पूर्ण कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले मामलोंके बारेमें भी हमारे समुद्रपारके डोमीनियनोंमें रहनेवाले हमारे सजातीय बन्धुओंके साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, तो मैं कहूँगा कि वास्तवमें साम्राज्यका कोई अस्तित्व भी नहीं रह सकता ।
मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे ऐसी शक्ति या इतनी समझ दे कि मैं उसके बलपर उसी प्रकार लोकमत तैयार कर सकूँ और हमारे भाग्यको भले था बुरेके लिए प्रभावित करनेवाले अखबारोंके जादूगरों को उसी तरह अपने ऊपर कृपालु बना सकूँ, जिस तरह कि मालेकावाले मामलेके सिलसिले में किया गया था। पिछले पाँच सालसे ट्रान्सवालके हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेका औचित्य उससे दस हजार गुना अधिक रहा है । यदि मालेकावाले मामले में लोकमत और अखबारोंके प्रभावके बलपर इस देशकी सरकारको कुछ करनेके लिए, और जिस देशपर हमारा कोई काबू नहीं है उस देशमें भी हस्तक्षेप करनेके लिए, तैयार किया जा सकता था, तो यदि मुझे वह तरकीब आती तो ट्रान्सवाल्के हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेमें सरकार को कितना अधिक सक्रिय बनाया जा सकता था ? आशा है कि माननीय लॉर्ड (मन्त्री) महोदयको मैंने पूरी स्पष्टताके साथ बतला दिया है कि मैं किन-किन बातों का उत्तर चाहता हूँ ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ७-९-१९१२
{{x-larger|'''परिशिष्ट १९'''}}
{{larger|'''कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}
{{c|'''(क)'''}}
{{right|जून १६, १९११}}
महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयने अपनी इसी १२ तारीखकी टिप्पणी, संख्या १५/१३९, में ब्रिटिश भारतीय संघके प्रार्थनापत्रपर और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा अपने ५ मईके पत्र में ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानूनके खण्ड १३० के परिणामोंके सम्बन्ध में उठाये गये प्रश्नपर मन्त्रियोंके विचार माँगे हैं । उक्त टिप्पणीके साथ माननीय उपनिवेश मन्त्रीसे प्राप्त एक तार भी भेजा गया है । गवर्नर जनरल महोदयने अपनी ८ मईकी टिप्पणी में उपर्युक्त प्रार्थनापत्रको एक प्रति पहले ही भेज दी थी। अब, इस सम्बन्धर्मे मन्त्रिगण यह कहता चाहते हैं कि उनके विचार में बस्तियों और बाजारोंके बाहर सम्पत्तिकास्वामित्व प्राप्त करने या उसे किसी अन्य प्रकार से अपने कब्जे में रखने- सम्बन्धी एशियाइयोंके अधिकारके सम्बन्धर्मे १८८५ के कानून संख्या ३, और उसके बाद पास किये गये कानूनोंसे उत्पन्न स्थितिपर पुनःविचार करना आवश्यक नहीं है ।
गवर्नर-जनरल महोदयको टिप्पणीक साथ संलग्न पत्रों में जिस शिकायतकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिलाया गया है, उसका सम्बन्ध १९०८ के बहुमूल्य और अपधातु अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत क्लार्क्सडॉप में की गई पुलिस कार्रवाईसे है; और ब्रिटिश भारतीय संघने १९०८ के कस्बा कानून संशोधन अधिनियमका जो उल्लेख किया है, वह मन्त्रियोंकी समझमें कुछ आया नहीं, क्योंकि उस कानूनमें वैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं, जिसकी शिकायत प्रार्थनापत्र में की गई है ।<noinclude></noinclude>
8m3yk7emm6te6vf4drxvnbajtzurhae
673424
673422
2026-08-23T17:55:17Z
सीमा1
430
673424
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५५९}}</noinclude>आपको ऐसा समझौता करनेका अधिकार है, विशेष रूपले उन लोगोंके साथ जो आप ही के राष्ट्र-बन्धु हैं, जो ब्रिटिश झण्डेके नीचे हमारे सम्राटको सत्ताके अधीन है, और सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिनके आधारभूत हित वही हैं जो हमारे हैं। यदि आप साम्राज्यके सम्पूर्ण कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले मामलोंके बारेमें भी हमारे समुद्रपारके डोमीनियनोंमें रहनेवाले हमारे सजातीय बन्धुओंके साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, तो मैं कहूँगा कि वास्तवमें साम्राज्यका कोई अस्तित्व भी नहीं रह सकता ।
मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे ऐसी शक्ति या इतनी समझ दे कि मैं उसके बलपर उसी प्रकार लोकमत तैयार कर सकूँ और हमारे भाग्यको भले था बुरेके लिए प्रभावित करनेवाले अखबारोंके जादूगरों को उसी तरह अपने ऊपर कृपालु बना सकूँ, जिस तरह कि मालेकावाले मामलेके सिलसिले में किया गया था। पिछले पाँच सालसे ट्रान्सवालके हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेका औचित्य उससे दस हजार गुना अधिक रहा है । यदि मालेकावाले मामले में लोकमत और अखबारोंके प्रभावके बलपर इस देशकी सरकारको कुछ करनेके लिए, और जिस देशपर हमारा कोई काबू नहीं है उस देशमें भी हस्तक्षेप करनेके लिए, तैयार किया जा सकता था, तो यदि मुझे वह तरकीब आती तो ट्रान्सवाल्के हमारे भारतीय बन्धुओंके मामलेमें सरकार को कितना अधिक सक्रिय बनाया जा सकता था ? आशा है कि माननीय लॉर्ड (मन्त्री) महोदयको मैंने पूरी स्पष्टताके साथ बतला दिया है कि मैं किन-किन बातों का उत्तर चाहता हूँ ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', ७-९-१९१२
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १९'''}}</center>
<center>{{larger|'''कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ'''}}</center>
{{c|'''(क)'''}}
{{right|जून १६, १९११}}
महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयने अपनी इसी १२ तारीखकी टिप्पणी, संख्या १५/१३९, में ब्रिटिश भारतीय संघके प्रार्थनापत्रपर और दक्षिण आफ्रिका ब्रिटिश भारतीय समिति द्वारा अपने ५ मईके पत्र में ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानूनके खण्ड १३० के परिणामोंके सम्बन्ध में उठाये गये प्रश्नपर मन्त्रियोंके विचार माँगे हैं । उक्त टिप्पणीके साथ माननीय उपनिवेश मन्त्रीसे प्राप्त एक तार भी भेजा गया है । गवर्नर जनरल महोदयने अपनी ८ मईकी टिप्पणी में उपर्युक्त प्रार्थनापत्रको एक प्रति पहले ही भेज दी थी। अब, इस सम्बन्धर्मे मन्त्रिगण यह कहता चाहते हैं कि उनके विचार में बस्तियों और बाजारोंके बाहर सम्पत्तिकास्वामित्व प्राप्त करने या उसे किसी अन्य प्रकार से अपने कब्जे में रखने- सम्बन्धी एशियाइयोंके अधिकारके सम्बन्धर्मे १८८५ के कानून संख्या ३, और उसके बाद पास किये गये कानूनोंसे उत्पन्न स्थितिपर पुनःविचार करना आवश्यक नहीं है ।
गवर्नर-जनरल महोदयको टिप्पणीक साथ संलग्न पत्रों में जिस शिकायतकी ओर विशेष रूपसे ध्यान दिलाया गया है, उसका सम्बन्ध १९०८ के बहुमूल्य और अपधातु अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत क्लार्क्सडॉप में की गई पुलिस कार्रवाईसे है; और ब्रिटिश भारतीय संघने १९०८ के कस्बा कानून संशोधन अधिनियमका जो उल्लेख किया है, वह मन्त्रियोंकी समझमें कुछ आया नहीं, क्योंकि उस कानूनमें वैसी कोई व्यवस्था है ही नहीं, जिसकी शिकायत प्रार्थनापत्र में की गई है ।<noinclude></noinclude>
220vzoyk129ohnvg9hzoecpid2z6kyl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५९८
250
184160
673412
640030
2026-08-23T17:35:49Z
सीमा1
430
673412
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh|५६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और बहुमूल्य तथा अपधातु अधिनियमके जिस खण्डका उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में
मन्त्रिगण यह कहना चाहते हैं कि उस कानूनका सम्बन्ध मुख्यतः, बल्कि लगभग सम्पूर्णतः, खनिज पदार्थों
और खननके अधिकारोंसे है, और ट्रान्सवालके खनन सम्बन्धी कानूनके अन्तर्गत रंगदार लोग इन
अधिकारोंसे सदा ही वंचित रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि खण्ड १३० की शब्द-योजना इतनी व्यापक
है कि १९०८ के कानून तथा उसके पहलेके स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत दिये गये सारे अधिकार उसमें
समाहित हो जाते हैं; किन्तु १९०८ के अधिनियम संख्या ३५ के पास होनेके पूर्वं भारतीयोंने जो भी
कारोबार, या कारोबार चलानेके अधिकार, प्राप्त किये थे, उनमें किसी प्रकारका हस्तक्षेप करनेका कोई
इरादा नहीं है । मन्त्रियोंको बताया गया है कि क्लार्क्सडॉ के जिन बाड़ोंके सम्बन्धमें [ पुलिस ]
कार्रवाई की गई है, उन्हें भारतीयोंने इस कानूनके पास होनेके बाद व्यावसायिक उद्देशोंसे चोरी-छिपे
प्राप्त किया था, और इस प्रकार उल्लिखित खण्डका उल्लंघन किया था । उनका खयाल है कि यह
कार्रवाई स्थानीय व्यापारी समुदायके इशारेपर की गई है; क्योंकि वह इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध
हैं कि भारतीयोंके चलते गोरे व्यापारियोंका कारोबार बड़ी तेजीसे उखड़ता चला जा रहा है । फिर भी
मन्त्रिगण आगे जाँच-पड़ताल करवा रहे हैं ताकि उक्त कानूनके खण्ड १३० की धाराओंको बेजा सख्ती से
अमल में लानेकी सम्भावनाको यथासम्भव टाला जा सके ।
{{rh|जे० सी० स्मट्स}}
{{c|'''(ख)'''}}
{{right|दिसम्बर २, १९११}}
सन् १९०८ के ट्रान्सवाल कस्वा कानून संशोधन अधिनियम और ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानून ब्रिटिश भारतीयों की स्थिति के बारेमें महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयको १ सितम्बरको टिप्पणी, संख्या १५/१७०, के सम्बन्धमें मन्त्रिगण यह निवेदन करना चाहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है, अदालतोंने टैम्बलिनके मामले<ref>रुडीपूर्टमें अल्फ्रेड टैम्बलिन नामक एक व्यक्तिपर अहमद खाँ और अब्दुल्ला खाँ नामक दो एशियाइयोंको शिकमी-पट्टे पर खान क्षेत्रमें एक बाड़ा देनेके कारण १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया । उसके वकीलने यह दलील पेश की कि पुराने स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत बाड़ा-मालिकको किसी भी रंगदार व्यक्तिको शिकमी-पट्टे पर अपना बाड़ा देनेका अधिकार प्राप्त था और वर्तमान स्वर्ण कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत रंगदार लोगोंको बाड़ेका स्वामित्व प्राप्त करनेका अधिकार भी दिया गया है । किन्तु, इसके बाद सुनवाई स्थगित कर दी गई। आगे चलकर क्रूगर्सडोंके एक मजिस्ट्रेटने टैम्बलिनको दोषी पाया और उसे सजा दे दी । अपील करनेपर दक्षिण आफ्रिका के सर्वोच्च न्यायालयकी ट्रान्सवाल शाखाने टैम्बलिनको रिहा कर दिया और यह व्यवस्था दी कि सम्बन्धित दोनों एशियाई स्वर्ण-कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत सुरक्षित हैं। देखिए इंडियन ओपिनियन, २४-६-१९११ और २-९-१९११ ।</ref> में दिये गये अपने हालके निर्णय द्वारा १९०८ के (ट्रान्सवाल) कानून ३५ के खण्ड १३० के अर्थ तथा व्याप्तिकी उस हद तक अन्तिम व्याख्या कर दी है, जिस हद तक उससे रंगदार लोगोंका कस्बों के बाहरके घोषित क्षेत्रोंमें गोरे मालिकोंसे पट्टेपर भाड़े लेने और उन्हें अपने कब्जे में रखनेका अधिकार प्रभावित होता हैं । खान क्षेत्रोंकी सीमामें आनेवाली बस्तियाँ ( टाउनशिप्स) में ऐसे लोगोंकी स्थितिके सम्बन्ध में महाविभवको ज्ञात ही होगा कि सरकारी और गैरसरकारी, दोनों तरहके कस्बोंमें जमीनके पूर्ण स्वामित्वके<noinclude></noinclude>
8q0jbgcmndcyvqkspj1xdw01he5ryih
673413
673412
2026-08-23T17:37:39Z
सीमा1
430
673413
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" />{{rh|५६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और बहुमूल्य तथा अपधातु अधिनियमके जिस खण्डका उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में
मन्त्रिगण यह कहना चाहते हैं कि उस कानूनका सम्बन्ध मुख्यतः, बल्कि लगभग सम्पूर्णतः, खनिज पदार्थों
और खननके अधिकारोंसे है, और ट्रान्सवालके खनन सम्बन्धी कानूनके अन्तर्गत रंगदार लोग इन
अधिकारोंसे सदा ही वंचित रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि खण्ड १३० की शब्द-योजना इतनी व्यापक
है कि १९०८ के कानून तथा उसके पहलेके स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत दिये गये सारे अधिकार उसमें
समाहित हो जाते हैं; किन्तु १९०८ के अधिनियम संख्या ३५ के पास होनेके पूर्वं भारतीयोंने जो भी
कारोबार, या कारोबार चलानेके अधिकार, प्राप्त किये थे, उनमें किसी प्रकारका हस्तक्षेप करनेका कोई
इरादा नहीं है । मन्त्रियोंको बताया गया है कि क्लार्क्सडॉ के जिन बाड़ोंके सम्बन्धमें [ पुलिस ]
कार्रवाई की गई है, उन्हें भारतीयोंने इस कानूनके पास होनेके बाद व्यावसायिक उद्देशोंसे चोरी-छिपे
प्राप्त किया था, और इस प्रकार उल्लिखित खण्डका उल्लंघन किया था । उनका खयाल है कि यह
कार्रवाई स्थानीय व्यापारी समुदायके इशारेपर की गई है; क्योंकि वह इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध
हैं कि भारतीयोंके चलते गोरे व्यापारियोंका कारोबार बड़ी तेजीसे उखड़ता चला जा रहा है । फिर भी
मन्त्रिगण आगे जाँच-पड़ताल करवा रहे हैं ताकि उक्त कानूनके खण्ड १३० की धाराओंको बेजा सख्ती से
अमल में लानेकी सम्भावनाको यथासम्भव टाला जा सके ।
{{rh|जे० सी० स्मट्स}}
{{c|'''(ख)'''}}
{{right|दिसम्बर २, १९११}}
सन् १९०८ के ट्रान्सवाल कस्वा कानून संशोधन अधिनियम और ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानून ब्रिटिश भारतीयों की स्थिति के बारेमें महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयको १ सितम्बरको टिप्पणी, संख्या १५/१७०, के सम्बन्धमें मन्त्रिगण यह निवेदन करना चाहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है, अदालतोंने टैम्बलिनके मामले<ref>रुडीपूर्टमें अल्फ्रेड टैम्बलिन नामक एक व्यक्तिपर अहमद खाँ और अब्दुल्ला खाँ नामक दो एशियाइयोंको शिकमी-पट्टे पर खान क्षेत्रमें एक बाड़ा देनेके कारण १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया । उसके वकीलने यह दलील पेश की कि पुराने स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत बाड़ा-मालिकको किसी भी रंगदार व्यक्तिको शिकमी-पट्टे पर अपना बाड़ा देनेका अधिकार प्राप्त था और वर्तमान स्वर्ण कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत रंगदार लोगोंको बाड़ेका स्वामित्व प्राप्त करनेका अधिकार भी दिया गया है । किन्तु, इसके बाद सुनवाई स्थगित कर दी गई। आगे चलकर क्रूगर्सडोंके एक मजिस्ट्रेटने टैम्बलिनको दोषी पाया और उसे सजा दे दी । अपील करनेपर दक्षिण आफ्रिका के सर्वोच्च न्यायालयकी ट्रान्सवाल शाखाने टैम्बलिनको रिहा कर दिया और यह व्यवस्था दी कि सम्बन्धित दोनों एशियाई स्वर्ण-कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत सुरक्षित हैं। देखिए इंडियन ओपिनियन, २४-६-१९११ और २-९-१९११ ।</ref> में दिये गये अपने हालके निर्णय द्वारा १९०८ के (ट्रान्सवाल) कानून ३५ के खण्ड १३० के अर्थ तथा व्याप्तिकी उस हद तक अन्तिम व्याख्या कर दी है, जिस हद तक उससे रंगदार लोगोंका कस्बों के बाहरके घोषित क्षेत्रोंमें गोरे मालिकोंसे पट्टेपर भाड़े लेने और उन्हें अपने कब्जे में रखनेका अधिकार प्रभावित होता हैं ।
खान क्षेत्रोंकी सीमामें आनेवाली बस्तियाँ ( टाउनशिप्स) में ऐसे लोगोंकी स्थितिके सम्बन्ध में महाविभवको ज्ञात ही होगा कि सरकारी और गैरसरकारी, दोनों तरहके कस्बोंमें जमीनके पूर्ण स्वामित्वके
______________________________<noinclude></noinclude>
o4y79g8pfh1g7y78cr4czvy1lnibzfg
673415
673413
2026-08-23T17:38:23Z
सीमा1
430
/* शोधित */
673415
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और बहुमूल्य तथा अपधातु अधिनियमके जिस खण्डका उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में
मन्त्रिगण यह कहना चाहते हैं कि उस कानूनका सम्बन्ध मुख्यतः, बल्कि लगभग सम्पूर्णतः, खनिज पदार्थों
और खननके अधिकारोंसे है, और ट्रान्सवालके खनन सम्बन्धी कानूनके अन्तर्गत रंगदार लोग इन
अधिकारोंसे सदा ही वंचित रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि खण्ड १३० की शब्द-योजना इतनी व्यापक
है कि १९०८ के कानून तथा उसके पहलेके स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत दिये गये सारे अधिकार उसमें
समाहित हो जाते हैं; किन्तु १९०८ के अधिनियम संख्या ३५ के पास होनेके पूर्वं भारतीयोंने जो भी
कारोबार, या कारोबार चलानेके अधिकार, प्राप्त किये थे, उनमें किसी प्रकारका हस्तक्षेप करनेका कोई
इरादा नहीं है । मन्त्रियोंको बताया गया है कि क्लार्क्सडॉ के जिन बाड़ोंके सम्बन्धमें [ पुलिस ]
कार्रवाई की गई है, उन्हें भारतीयोंने इस कानूनके पास होनेके बाद व्यावसायिक उद्देशोंसे चोरी-छिपे
प्राप्त किया था, और इस प्रकार उल्लिखित खण्डका उल्लंघन किया था । उनका खयाल है कि यह
कार्रवाई स्थानीय व्यापारी समुदायके इशारेपर की गई है; क्योंकि वह इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध
हैं कि भारतीयोंके चलते गोरे व्यापारियोंका कारोबार बड़ी तेजीसे उखड़ता चला जा रहा है । फिर भी
मन्त्रिगण आगे जाँच-पड़ताल करवा रहे हैं ताकि उक्त कानूनके खण्ड १३० की धाराओंको बेजा सख्ती से
अमल में लानेकी सम्भावनाको यथासम्भव टाला जा सके ।
{{rh|जे० सी० स्मट्स}}
{{c|'''(ख)'''}}
{{right|दिसम्बर २, १९११}}
सन् १९०८ के ट्रान्सवाल कस्वा कानून संशोधन अधिनियम और ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानून ब्रिटिश भारतीयों की स्थिति के बारेमें महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयको १ सितम्बरको टिप्पणी, संख्या १५/१७०, के सम्बन्धमें मन्त्रिगण यह निवेदन करना चाहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है, अदालतोंने टैम्बलिनके मामले<ref>रुडीपूर्टमें अल्फ्रेड टैम्बलिन नामक एक व्यक्तिपर अहमद खाँ और अब्दुल्ला खाँ नामक दो एशियाइयोंको शिकमी-पट्टे पर खान क्षेत्रमें एक बाड़ा देनेके कारण १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया । उसके वकीलने यह दलील पेश की कि पुराने स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत बाड़ा-मालिकको किसी भी रंगदार व्यक्तिको शिकमी-पट्टे पर अपना बाड़ा देनेका अधिकार प्राप्त था और वर्तमान स्वर्ण कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत रंगदार लोगोंको बाड़ेका स्वामित्व प्राप्त करनेका अधिकार भी दिया गया है । किन्तु, इसके बाद सुनवाई स्थगित कर दी गई। आगे चलकर क्रूगर्सडोंके एक मजिस्ट्रेटने टैम्बलिनको दोषी पाया और उसे सजा दे दी । अपील करनेपर दक्षिण आफ्रिका के सर्वोच्च न्यायालयकी ट्रान्सवाल शाखाने टैम्बलिनको रिहा कर दिया और यह व्यवस्था दी कि सम्बन्धित दोनों एशियाई स्वर्ण-कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत सुरक्षित हैं। देखिए '''इंडियन ओपिनियन''', २४-६-१९११ और २-९-१९११ ।</ref> में दिये गये अपने हालके निर्णय द्वारा १९०८ के (ट्रान्सवाल) कानून ३५ के खण्ड १३० के अर्थ तथा व्याप्तिकी उस हद तक अन्तिम व्याख्या कर दी है, जिस हद तक उससे रंगदार लोगोंका कस्बों के बाहरके घोषित क्षेत्रोंमें गोरे मालिकोंसे पट्टेपर भाड़े लेने और उन्हें अपने कब्जे में रखनेका अधिकार प्रभावित होता हैं ।
खान क्षेत्रोंकी सीमामें आनेवाली बस्तियाँ ( टाउनशिप्स) में ऐसे लोगोंकी स्थितिके सम्बन्ध में महाविभवको ज्ञात ही होगा कि सरकारी और गैरसरकारी, दोनों तरहके कस्बोंमें जमीनके पूर्ण स्वामित्वके
______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
h5939nlpbrexgqrba2vytk1lrgd8fky
673416
673415
2026-08-23T17:39:13Z
सीमा1
430
673416
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और बहुमूल्य तथा अपधातु अधिनियमके जिस खण्डका उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में
मन्त्रिगण यह कहना चाहते हैं कि उस कानूनका सम्बन्ध मुख्यतः, बल्कि लगभग सम्पूर्णतः, खनिज पदार्थों
और खननके अधिकारोंसे है, और ट्रान्सवालके खनन सम्बन्धी कानूनके अन्तर्गत रंगदार लोग इन
अधिकारोंसे सदा ही वंचित रहे हैं। इसमें सन्देह नहीं कि खण्ड १३० की शब्द-योजना इतनी व्यापक
है कि १९०८ के कानून तथा उसके पहलेके स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत दिये गये सारे अधिकार उसमें
समाहित हो जाते हैं; किन्तु १९०८ के अधिनियम संख्या ३५ के पास होनेके पूर्वं भारतीयोंने जो भी
कारोबार, या कारोबार चलानेके अधिकार, प्राप्त किये थे, उनमें किसी प्रकारका हस्तक्षेप करनेका कोई
इरादा नहीं है । मन्त्रियोंको बताया गया है कि क्लार्क्सडॉ के जिन बाड़ोंके सम्बन्धमें [ पुलिस ]
कार्रवाई की गई है, उन्हें भारतीयोंने इस कानूनके पास होनेके बाद व्यावसायिक उद्देशोंसे चोरी-छिपे
प्राप्त किया था, और इस प्रकार उल्लिखित खण्डका उल्लंघन किया था । उनका खयाल है कि यह
कार्रवाई स्थानीय व्यापारी समुदायके इशारेपर की गई है; क्योंकि वह इस बातको लेकर बहुत क्षुब्ध
हैं कि भारतीयोंके चलते गोरे व्यापारियोंका कारोबार बड़ी तेजीसे उखड़ता चला जा रहा है । फिर भी
मन्त्रिगण आगे जाँच-पड़ताल करवा रहे हैं ताकि उक्त कानूनके खण्ड १३० की धाराओंको बेजा सख्ती से
अमल में लानेकी सम्भावनाको यथासम्भव टाला जा सके ।
{{right|जे० सी० स्मट्स}}
{{c|'''(ख)'''}}
{{right|दिसम्बर २, १९११}}
सन् १९०८ के ट्रान्सवाल कस्वा कानून संशोधन अधिनियम और ट्रान्सवाल स्वर्ण-कानून ब्रिटिश भारतीयों की स्थिति के बारेमें महाविभव गवर्नर-जनरल महोदयको १ सितम्बरको टिप्पणी, संख्या १५/१७०, के सम्बन्धमें मन्त्रिगण यह निवेदन करना चाहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है, अदालतोंने टैम्बलिनके मामले<ref>रुडीपूर्टमें अल्फ्रेड टैम्बलिन नामक एक व्यक्तिपर अहमद खाँ और अब्दुल्ला खाँ नामक दो एशियाइयोंको शिकमी-पट्टे पर खान क्षेत्रमें एक बाड़ा देनेके कारण १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके खण्ड १३० के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया । उसके वकीलने यह दलील पेश की कि पुराने स्वर्ण कानूनके अन्तर्गत बाड़ा-मालिकको किसी भी रंगदार व्यक्तिको शिकमी-पट्टे पर अपना बाड़ा देनेका अधिकार प्राप्त था और वर्तमान स्वर्ण कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत रंगदार लोगोंको बाड़ेका स्वामित्व प्राप्त करनेका अधिकार भी दिया गया है । किन्तु, इसके बाद सुनवाई स्थगित कर दी गई। आगे चलकर क्रूगर्सडोंके एक मजिस्ट्रेटने टैम्बलिनको दोषी पाया और उसे सजा दे दी । अपील करनेपर दक्षिण आफ्रिका के सर्वोच्च न्यायालयकी ट्रान्सवाल शाखाने टैम्बलिनको रिहा कर दिया और यह व्यवस्था दी कि सम्बन्धित दोनों एशियाई स्वर्ण-कानूनके खण्ड ७७ के अन्तर्गत सुरक्षित हैं। देखिए '''इंडियन ओपिनियन''', २४-६-१९११ और २-९-१९११ ।</ref> में दिये गये अपने हालके निर्णय द्वारा १९०८ के (ट्रान्सवाल) कानून ३५ के खण्ड १३० के अर्थ तथा व्याप्तिकी उस हद तक अन्तिम व्याख्या कर दी है, जिस हद तक उससे रंगदार लोगोंका कस्बों के बाहरके घोषित क्षेत्रोंमें गोरे मालिकोंसे पट्टेपर भाड़े लेने और उन्हें अपने कब्जे में रखनेका अधिकार प्रभावित होता हैं ।
खान क्षेत्रोंकी सीमामें आनेवाली बस्तियाँ ( टाउनशिप्स) में ऐसे लोगोंकी स्थितिके सम्बन्ध में महाविभवको ज्ञात ही होगा कि सरकारी और गैरसरकारी, दोनों तरहके कस्बोंमें जमीनके पूर्ण स्वामित्वके
______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
s2zsm6fwxcmuch54ad3eqhoucm4gtaf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९६
250
184910
673328
641192
2026-08-23T14:10:37Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673328
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अपना यह व्यापार बन्द कर देंगे। क्या इस देशके लिए तबतक रुकना सम्भव है? यदि एक चोर या व्यभिचारी यह कहे कि वह अपने व्यसनको कुछ दिनमें छोड़ देगा तो इससे देशका क्या लाभ? यदि पारसी लोग इस व्यापारको तुरन्त नहीं छोड़ देते तो इससे उनकी बिरादरी और उनके देशको नुकसान पहुँचेगा। आपने शराबका व्यापार करके ऊपरसे दीख पड़नेवाली जो समृद्धि प्राप्त की है उसकी बात आपको नहीं सोचनी चाहिए। मैं पारसी मित्रोंते अनुरोध करता हूँ कि उन्हें चाहे कितना ही खर्च क्यों न उठाना पड़े या कितना ही बड़ा त्याग क्यों न करना पड़े, फिर भी वे पारसी विधवाओंकी देखभाल करें। लोगोंके बहुत बड़े फिरकेको नुकसान पहुँचाकर धनी बननेकी अपेक्षा कोई दूसरा निष्कलंक धन्धा करना ज्यादा अच्छा है।
रही धरनेकी बात। मैंने यह कभी नहीं सोचा कि वह स्थायी रूपसे बन्द किया जा सकता है। मुझे रक्तपातसे बड़ी चिढ़ है, किन्तु मैं शराबखोरीकी बुराई रोकनेकी खातिर हर तरहका खतरा मोल लेनेके लिए तैयार हूँ। जबतक धरना देनेवाले हिंसापर नहीं उतर आते तबतक सरकार क्या करती है, उसके प्रति मैं उदासीन हूँ। धारबाड़में क्या हुआ है वह मैं जानता हूँ। मुझे यकीन है कि धारवाड़के लोगोंने वह भूल नहीं की थी जो मालेगाँवके निवासियोंने की थी। धारवाड़के कलेक्टर श्री पेंटर अहमदाबाद भेजे जानेवाले हैं; इस खबरको सुनकर मुझे भारी धक्का लगा है। उनपर ठीक ही यह आरोप लगाया जा रहा है कि निर्दोष लोगोंकी हत्या उनकी मौन सम्मतिसे की गई। यदि श्री पेंटर अहमदाबाद जायेंगे तो वहाँ भी वे चैनसे न बैठ पायेंगे। अहमदाबादमें उनको धरना बन्द करवाने के लिए निर्दोष लड़कों और लड़कियोंकी हत्या करवानी पड़ेगी। श्री पेंटर-जैसे अधिकारीको गुजरातमें भेजना गुजरातके लोगोंका अपमान करता है।
इसके बाद श्री गांधीने धरनेके सम्बन्धमें अपने डर्बनके अनुभव सुनाये। उन्होंने कहा कि भारी कठिनाइयोंका सामना करने पर भी १४ या १५ सालके लड़कोंने बिना किसी भय या अनुग्रहको आकांक्षाके अपने कर्त्तव्यका पालन किया। फलतः एक भी आदमीने अपना पंजीयन नहीं कराया। इन युवकोंने किसी तरहकी हिंसाका प्रयोग कभी नहीं किया था।
मैं समस्त देशमें पूरे धरनेके पक्षमें हूँ; लेकिन इस प्रणालीमें इस समय जो दोष विद्यमान हैं मैं उनको जानता हूँ। मुझे मालूम है कि गलत किस्मके लोग धरना-देनेवालों में घुस गये हैं। इसलिए मैंने यह सुझाव दिया है कि केवल बम्बईमें धरना इस महीनेके अन्ततक के लिए स्थगित किया जा सकता है ताकि उसका ज्यादा अच्छा संगठन किया जा सके और वह पूरी बम्बईमें लागू किया जा सके। इसके अलावा पहली अगस्ततक विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करवानेकी व्यवस्थाके लिए सब कार्यकर्त्ताओंकी आवश्यकता है। लेकिन इस सम्बन्धमें अन्तिम निर्णय करना कांग्रेस कमेटीका काम है। मैं कोई निरंकुश व्यक्ति नहीं हूँ जैसा कि 'प्रजामित्र' कहता है। मेरे लिए<noinclude></noinclude>
3ue4va3fycrkc1evj054ac4n6dhyvr1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९७
250
184911
673334
641193
2026-08-23T15:01:12Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673334
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें शराब-बन्दीपर|३६५}}</noinclude>३२ करोड़ लोगोंको उनके कर्त्तव्यका आदेश देना सम्भव नहीं है। मैं तो केवल सलाह दे सकता हूँ और रास्ता दिखा सकता हूँ। इस बीच शराबके व्यापारियोंका यह कर्त्तव्य है कि उनको जो-कुछ सोचना-विचारना हो वे सोच-विचार लें और यह देखें कि क्या वे कोई दूसरा धन्धा हाथमें ले सकते हैं और शराबका विक्रय बन्द कर सकते हैं। धारवाड़की घटनासे उनके द्वारा बेची जानेवाली शराबमें निर्दोष लोगोंका खून मिल गया है। मेरा यह पक्का विश्वास है कि धारवाड़के धरना देनेवालोंने कुछ नहीं किया था; उन्होंने मारपीट नहीं की थी; उनपर जो आरोप लगाये गये हैं वे निराधार हैं और मुझे बखूबी मालूम है कि पुलिसने शराबके ठेकेदारोंको तरह दी थी, इसलिए मैं शराबके व्यापारियोंकी भी इतनी ही जिम्मेदारी समझता हूँ जितनी इन अधिकारियोंकी।
पारसी समाजमें सज्जनता है, ज्ञान और साहस है, इस कारण मैं उससे बड़े-बड़े कामोंकी अपेक्षा रखता हूँ। धारवाड़में एक उद्धत कलेक्टरने क्या-क्या किया है, सो हम जानते हैं। मुझे विश्वास है कि मेरे सामने जो उद्देश्य है वह धरनेसे अवश्य पूरा होगा; किन्तु यदि सम्भव हो तो मैं यह चाहता हूँ कि वह उसके बिना ही प्राप्त किया जा सके। मुझसे ठेकेदार लोग कहेंगे कि वे अपने लाइसेंसोंका रुपया सरकारको दे चुके हैं। आपने सरकारको जो-कुछ दिया है वह आप उससे आसानीके साथ वापस ले सकते हैं। आपने जो रुपया दिया है यदि उसे आप सब वापस लेनेका इरादा कर लें तो मुझे निश्चय है कि आप उसे वापस ले सकते हैं। आप सरकारको दर्ख्वास्त दे सकते हैं कि आपका रुपया आपको लौटा दिया जाये, क्योंकि आप असहयोगी नहीं हैं; और यदि आपको इसमें सफलता न मिले तो आप अन्य उपायोंका आश्रय ले सकते हैं। यदि भारतको सितम्बर या दिसम्बर तक भी स्वराज्य न मिले तो आप यह समझ लें कि आपने सरकारको जो रुपया दिया है वह भावी सरकारके पास आपके नाम जमा रहेगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपका रुपया कदापि नहीं मारा जायेगा।
लेकिन आखिर क्या आप लोग इतने गरीब हैं कि आप इस रुपयेका मारा जाना बरदाश्त नहीं कर सकते? मुझे अभी पिछले दिनों एक पारसी शराब-विक्रेताका पत्र मिला है उसमें कहा गया है कि आप लोगोंको जितना गरीब बतानेका प्रयत्न किया जाता है आप उतने गरीब नहीं हैं। पारसी विधवाएँ भी गरीब नहीं हैं; उनके पास बहुत रुपया है और मेरा भी यही विश्वास है। मैं अपनी निजी जानकारीके बलपर कहता हूँ कि आप गरीब नहीं है और यदि आप शराब बेचना बन्द कर देते हैं तो आप असहाय नहीं हो जायेंगे। मैं आपसे कहता हूँ कि आप डरपोक न बनें और परिणामोंसे भयभीत न हों; बल्कि साहसी स्त्री-पुरुषोंकी तरह तनकर खड़े हों। मैं चाहता हूँ कि पारसी लोग समानताके दर्जेकी माँग करनेमें राष्ट्रके साथ रहें। किसी तरहकी हीनताका दर्जा अब उन्हें बरदाश्त नहीं करना चाहिए। मुझसे कुछ लोगोंने<noinclude></noinclude>
no4kk7cj2a53jtp98w2dixk8ld6tdx8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९८
250
184912
673335
641194
2026-08-23T15:15:19Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673335
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कहा कि जो लोग २० सालसे ज्यादा अरसेसे इस व्यापारमें लगे हुए हैं अब उनके लिए इस व्यवसायको छोड़ना कैसे सम्भव होगा? मेरी समझमें शान्त चित्तसे उन्हें परिस्थितिपर विचार करना चाहिए और इसके बारेमें कोई निश्चित निर्णय कर लेना चाहिए। मैंने इस समस्यापर विचार किया है और मैं यह अनुभव करता हूँ कि चूँकि आप लोग गरीब नहीं हैं, इसलिए आप कोई दूसरा धन्धा, जिसे आप पसन्द करें, आसानीसे आरम्भ कर सकते हैं। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी एक समिति बना लें और तब यह विचार करें कि आपको इस मामलेमें क्या करना चाहिए। किन्तु आपको आशा तो कदापि नहीं छोड़नी चाहिए। आप दूसरे धन्धे और दूसरे काम कर सकते हैं और यह प्रयत्न करके देख सकते हैं कि क्या आप उनके द्वारा भी शराबके व्यापारकी तरह आसानीसे धनवान नहीं हो सकते। लेकिन सबसे पहले तो आपका कर्त्तव्य यही है कि आप शराबका व्यापार इसी दम छोड़ दें। जबतक आप अपने देशके निमित्त कुछ त्याग करनेके लिए तैयार नहीं होंगे तबतक आप स्वतन्त्रताकी रक्षा नहीं कर सकेंगे और न स्वराज्य ही ले सकेंगे। केवल त्यागके द्वारा ही हम स्वराज्य और पूर्ण स्वतन्त्रताके योग्य हो सकते हैं। आपको अपनी ही योग्यतापर निर्भर रहना चाहिए और अपने ऊपर भरोसा रखना चाहिए। अंग्रेज जातिने भी आत्मविश्वासके कारण ही सबसे अधिक उन्नति की है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप आशा न छोड़ें और अपने ऊपर भरोसा रखें, आपसे जितने त्यागकी अपेक्षा की जाती है उसके लिए परमात्मा आपको बुद्धि देगा।
श्री गांधीने इसके बाद कहा कि यदि व्यापारी मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे तो मैं उनका उत्तर देने को तैयार हूँ।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १३-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१७५. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''सीमा-प्रान्तके मित्र'''}}
मैंने सीमा-प्रान्तके मित्रोंसे जो अपील की है उसके बारेमें बन्नूके मुहम्मद नवाज़खाँ साहब, बी॰ ए॰, एलएल॰ बी॰ ने मुझे एक लम्बा पत्र भेजा है। 'यंग इंडिया' में उसे उद्धृत करना सम्भव नहीं है; इसलिए मैं उसका सारांश यहाँ दे रहा हूँ। उनका विचार है कि जो कबायली सन्देशको समझ जायेंगे वे प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकार करेंगे। उन्होंने कबायलियोंकी भूमि हथियाये जानेका इतिहास बतलाते हुए यह सिद्ध किया है कि इस भूमिके हथियाये जानेसे पहले हमले बिलकुल नहीं होते थे। और चूँकि सभीके पास हथियार होते थे, इसलिए जिनपर हमला होता था वे अपनी रक्षा कर सकते थे। किन्तु इस इलाकेके हड़प कर लिये जानेके बाद जिन कबायलियोंकी भूमि उनसे जबरदस्ती छीन ली गई थी वे हथियाये गये इलाके के हिन्दू और मुसलमान<noinclude></noinclude>
3meujmg698rpf8bgk0obzbmdzml4s5c
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३९९
250
184913
673342
641195
2026-08-23T15:24:32Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673342
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३६७}}</noinclude>दोनोंको अपना दुश्मन समझने लगे। खासकर इसलिए कि इन लोगोंने कबायलियोंको दबानेमें अंग्रेजोंकी मदद की थी। पत्र-लेखकका, जो स्थितिको बहुत नजदीकसे जाननेका दावा करते हैं, विचार है कि कबायली लोग धर्मोकी परवाह नहीं करते और वे हिन्दुओं और मुसलमानों दोनोंको बिना कोई फर्क किये लूटते रहे हैं। वे यह भी कहते हैं कि मुसलमानोंने कबायली हमलोंके खिलाफ हिन्दुओंकी कभी सहायता नहीं की। कबायलियोंकी तटस्थताके सबूतमें पत्र-लेखकने उस सौहार्दपूर्ण व्यवहारका हवाला दिया है जो कबायली सीमा-प्रान्तके स्वतन्त्र इलाकेमें रहनेवाले अपने साथी हिन्दुओंके साथ करते हैं। उनका कहना है कि वहाँ हिन्दुओंको ब्रिटिश राज्यसे अधिक धार्मिक स्वतन्त्रता है। ब्रिटिश राज्यकी तुलनामें वहाँ हिन्दुओंकी सामाजिक प्रतिष्ठा कहीं अच्छी है। वहाँके मलिक<ref>कबीलेके मुखिया।</ref> अपनी समस्त शक्तिके साथ अपनी छत्रछायामें रहनेवाले हिन्दू भाइयोंकी रक्षाके लिए तैयार रहते हैं। पत्र-लेखकके मतमें ब्रिटिश सरकारने लज्जाजनक रूपसे वहाँके उन निवासियोंकी सुरक्षाके अपने कर्त्तव्यको तिलांजलि दे दी है, जो दुर्भाग्यवश ब्रिटिश साम्राज्यके संरक्षणमें आ गये हैं। अपने पत्रको समाप्त करते हुए वे कहते हैं कि सीमान्तमें लागू विधियाँ पढ़ने लायक हैं। वहाँ न्याय-प्रक्रियामें मनमानी चलती है और जनताका जीवन और धन उन सैनिक अफसरोंकी दयापर निर्भर है जिनमें कानूनी फैसले देनेकी योग्यता नहीं है। उनका कहना है कि एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर अपन पदका दुरुपयोग करते हैं एवं अन्याय और दमनके साधन बन जाते हैं। उन्हें किसी भी भले आदमीको जरा-से भी शकपर हवालातमें बन्द कर देनेका अधिकार है।
{{C|'''भारतीय लोकतन्त्र'''}}
एक आदरणीय महानुभाव लिखते हैं:
:{{gap}}'''मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अलीने जो वक्तव्य दिये हैं उनकी ओर आपका ध्यान गया होगा। उन्होंने कहा है कि हमारे आन्दोलनके सम्बन्धमें बड़े दिनसे पहले कोई समझौता नहीं हो जाता तो कांग्रेसके अहमदाबाद अधिवेशनमें एक भारतीय लोकतन्त्रकी घोषणा कर दी जायेगी। इस वक्तव्यका विशेष महत्त्व है, क्योंकि यह किसी गैर जिम्मेदार व्यक्तिने नहीं बल्कि मौलाना बन्धुओं-जैसे जिम्मेदार लोगोंने दिया है। किन्तु लगता है कि यह वक्तव्य अनुचित और असामयिक भी है; कांग्रेसने देशके सामने जो कार्यक्रम रखा है यह उसकी पूर्तिमें बाधक होगा। समूचे देशन कांग्रेसकी अपीलका शानदार समर्थन किया है और कुछ हिस्सोंको छोड़कर सारा देश स्वराज्य-प्राप्तिके लिए काम करनेको तैयार है। मेरा निवेदन है कि आप मौलाना बन्धुओंके वक्तव्यपर अपनी सम्मति दें और जनताको आश्वासन दें कि कांग्रेसने जो अहिंसात्मक असहयोगका सिद्धान्त स्वीकार किया है उससे वह नहीं भटकेगी।'''
मुझे दुःखके साथ स्वीकार करना पड़ता है कि मैंने मौलाना बन्धुओंका उक्त वक्तव्य नहीं देखा। किन्तु यह आश्वासन देनेमें मुझे कोई हिचक नहीं है कि देशने<noinclude></noinclude>
iv0xrl1atx6cqp4bn6gplsxzvjhxjmc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४००
250
184914
673357
641196
2026-08-23T16:02:05Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673357
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बहुत सोच-समझकर अहिंसात्मक असह्योगका मार्ग चुना है; मैं उससे उसे तनिक भी न हटने देनेमें कोई प्रयत्न उठा नहीं रखूँगा। अली बन्धुओंके भी इस मार्गसे हटनेकी मुझे कोई आशंका नहीं है। किन्तु मुझे उनके मनको समझनेमें कठिनाई नहीं है। वे यह जरूर कह सकते कि यदि भारतको पंजाब और खिलाफतके मामलोंमें वह राहत नहीं मिलती जिसकी माँग की गई है, तो कांग्रेस अपने अगले अधिवेशनमें स्वतन्त्रताकी घोषणा कर देगी। साम्राज्यके अन्दर स्वराज्य तभी सम्भव है जब इंग्लैंड खिलाफत सम्बन्धी विश्वासघात और जलियाँवाला बागके हत्याकाण्डसे उसपर जो धब्बा लगा है उसे धो दे। कांग्रेसका सिद्धान्त जान-बूझकर ऐसा लचीला बनाया गया है कि स्व-राज्यकी माँगके लिए उसमें जगह रहे। बहुत न कहकर इतना तो कह ही सकते हैं हैं कि मौलानाओंने अधिकसे-अधिक वही मत दुहरा दिया है जो श्री एन्ड्र्यूज द्वारा प्रकट किया गया था। मेरी रायसे भिन्न, श्री एन्ड्र्यूजकी यह धारणा है कि स्वशासित और आत्मसम्मानी भारतके लिए ब्रिटिश साम्राज्यमें बने रहनेकी गुंजाइश नहीं। वे यह आशा भी करते हैं कि एक-न-एक दिन मैं भी इसी नतीजेपर पहुँचूँगा। किन्तु मेरा मानसिक गठन दूसरी तरहका है। जबतक थोड़ी भी गुंजाइश हो, मैं आशा नहीं छोड़ता। ब्रिटिश जनतापर मेरा इतना विश्वास अवश्य है कि वे भले ही अन्ततक हमारे निश्चय और शक्तिकी परीक्षा ले लें किन्तु ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होने देंगे कि बात इतनी बिगड़ जाये कि फिर सुधर न सके। उनमें इतना विवेक तो है ही कि वे डायरशाही और ओ'डायरशाहीके लिए और यूनानसे मैत्रीके अस्पष्ट लाभके लिए जाग्रत और सशक्त भारतको हाथसे नहीं जाने देंगे। हम देखेंगे कि लीक-लीक न चलनेवाली उनकी आत्मामें बहादुर तुर्कोंकी न्यायसंगत आकांक्षाओंके प्रति अज्ञानवश द्वेषभाव है। भारतके दिनों-दिन बढ़ते दबावके आगे वह अवश्य झुकेगी। कांग्रेस अधिवेशनसे बहुत पहले ही, यदि भारत अपनी सचाईपर टिका रहता है, तो मैं स्वतन्त्रताकी घोषणाकी नहीं बल्कि एक सम्मानपूर्ण समझौतेकी आशा रखता हूँ—ऐसे समझौतेकी जो पंजाब और खिलाफत सम्बन्धी भारतकी माँगोंको पूरा करेगा और जो तुरन्त भारतको उसके चुने हुए प्रतिनिधियोंकी इच्छाके अनुरूप स्वराज्य देनेके लिए आश्वासन देगा। किन्तु पाठक इससे यह न समझ बैठें कि मेरी यह भविष्यवाणी उस कार्रवाईकी जानकारीपर आधारित है, जो शिमलामें वाइसरायकी कोठी या इंग्लैंडके सरकारी हल्कोंमें हो रही है। इस भविष्यवाणीका आधार मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारतमें अगले तीन महीनोंमें अपनी शक्ति दिखानेकी योग्यता है; यानी यह योग्यता है कि वह विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार कर दे और दिखा दे कि इससे भी बड़े आत्मसंयमके साथ वह एक कठोर प्रकारकी सविनय अवज्ञाका कार्यक्रम अपना सकता है।
{{C|'''मार्गकी कठिनाइयाँ'''}}
किन्तु हमारे मार्गमें जो कठिनाइयाँ हैं उनके प्रति मैं आँखें नहीं मूँदे हूँ। अलीगढ़से प्राप्त समाचार चिन्ताजनक<ref>देखिए "सन्देश : अलीगढ़की जनताको", १६-७-१९२१।</ref> है, घटनाका सरकारी विवरण और दूसरा विवरण मैंने 'इंडिपेन्डेन्ट' में देखा है। यदि मैं गलतीपर हुआ तो मैं अलीगढ़की जनतासे क्षमा-<noinclude></noinclude>
43ku75g27y8v6i78frp7v66pf0yim8i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४०१
250
184915
673361
641197
2026-08-23T16:11:25Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673361
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३६९}}</noinclude>याचना कर लूँगा; किन्तु 'इंडिपेन्डेन्ट' के संवाददाताका विवरण तथ्योंसे मेल नहीं खाता और तथ्योंसे जितना निष्कर्ष निकल सकता है उससे कहीं अधिक निष्कर्ष निकालनेकी कोशिश करता है। वह इस बातसे इनकार नहीं करता कि भीड़ने आगजनी की; और फिर भी भीड़को दोषी न माननेका प्रयत्न करता है। यह विश्वास करनेके लिए कि अलीगढ़में अधिकारियोंने क्षोभका कोई कारण उत्पन्न हुए बिना ही द्वेषपूर्ण ढंगसे ज्यादती की है, मुझे बहुत स्पष्ट प्रमाणकी जरूरत होगी। मुझे यह सम्भव लगता है कि पुलिस भीड़ द्वारा एक आक्रामक प्रदर्शनको रोकना चाहती थी और ऐसा करते हुए वह आत्म-संयम खो बैठी और उसने गोली चला दी। मेरा कहना यह है कि हमारी ओरसे कोई आक्रामक कार्रवाई होनी ही नहीं चाहिए। असहयोगियोंको किसीको सताना या धमकाना नहीं चाहिए। हमारे अन्दर एक अदम्य उत्साह बढ़ रहा है जो केवल भगवान्पर भरोसा रखने—यानी अपने लक्ष्यकी न्यायपूर्णतापर विश्वास—का परिणाम है। यदि हम चाहते हैं कि अपने कार्यक्रमको सफल बनायें—और वह भी इसी सालके अन्दर—तो हमारे लिए धमकी देने या शक्तिप्रदर्शन करनेका अवसर ही नहीं है। हमें अपने संकल्पके प्रति पूरी दृढ़ताके साथ सच्चे रहना चाहिए। हम आशातीत रूपसे तभी सफल हो सकते हैं जब हम विचार, वाणी और कर्ममें अहिंसा बरतें। अहिंसा चाहे हमारा सर्वोपरि जीवन-सिद्धान्त न हो, किन्तु अपने लक्ष्यतक पहुँचनेके लिए हमारा मौजूदा सिद्धान्त तो होना ही चाहिए। इसमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि हमने जिस तरह अपने प्रतिद्वन्द्वियोंके प्रति बुरा बरताव न करना तय किया है उसी प्रकार हम उनके प्रति बुरा न सोचें, बुरा न कहें। अहिंसा और सत्यकी प्रतिज्ञाका उपयोग हमें हिंसा और असत्य—अतिशयोक्तिको छिपानेके लिए भी नहीं करना चाहिए; न हमें अपने अच्छेसे-अच्छे साथियोंके जेल चले जानेसे डरना चाहिए। मैं इस विश्वासपर कायम हूँ—जो मैंने अक्सर प्रकट किया है—कि पण्डित सुन्दरलाल और पण्डित माखनलाल<ref>माखनलाल चतुर्वेदी, हिन्दीके जाने-माने कवि और देशभक्त; '''कर्मचीर'''के सम्पादक।</ref> अपनी आत्माकी शान्तिके लिए जेल जाकर वहाँ राष्ट्रकी उससे अच्छी सेवा कर रहे हैं जितनी वे स्वतन्त्र रहनेपर करते। जो ऐसा नहीं सोचते वे असहयोगकी गतिशीलताको नहीं समझते। इस महान् आन्दोलनकी प्रेरक शक्ति मौखिक प्रचार नहीं, बल्कि वह मौन प्रचार है जो इस पागल सरकारके शिकार बननेवाले निर्दोष लोगोंको यातना देता है।
{{C|'''एक पीड़ितका पत्र'''}}
अपनी गिरफ्तारीसे कुछ ही दिन पूर्व पण्डित सुन्दरलालने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा था। मैं उसके सम्बन्धित भागका भावानुवाद दे रहा हूँ। पूरा पत्र मुझे स्वाभाविक और साफ लगा। यह कहना आवश्यक नहीं कि वह केवल मेरी सूचनाके लिए लिखा गया था।
:'''{{gap}}स्वराज्य-प्राप्तिके लिए अहिंसापर मेरा विश्वास दृढ़ हो गया है, मेरी बुद्धिने यह सिद्धान्त पक्की तरहसे ग्रहण कर लिया है। मैं अब उसे केवल'''<noinclude>{{Left|२०–२४|2em}}</noinclude>
4m1x7jog7xfptkd0rdlclr5pb2wdyiz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४०२
250
184916
673366
641198
2026-08-23T16:21:12Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673366
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>:'''निर्बलका अस्त्र ही नहीं, अपितु बलवानका अस्त्र भी मानने लगा हूँ। किन्तु मैं यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि कई वर्षोंतक मेरा विश्वास इसके विरोधी और गलत सिद्धान्त, हिंसापर रहा है, इसलिए मैं बड़ी लगनके साथ इस नये सिद्धान्तके अनुसार अपने जीवनको ढाल रहा हूँ। यदि मैं अपने जेल भेजे जानेके बारेमें, जो सम्भावित लगता है, चिन्तित हूँ तो यह चिन्ता उस कामको लेकर ही है जो मैंने मध्य-भारतमें शुरू किया है। यदि लापरवाहीसे मेरे मुँहसे निकली किसी बातसे इस काममें बाधा पड़ेगी, तो मुझे दुःख होगा। किन्तु जो प्रसन्नता और सन्तोष मुझे इस समय है वह इस विचारसे है कि शायद ब्रिटिश जेलके कठोर अनुशासनसे मेरा जीवन अधिक अच्छी तरह गठित हो सकेगा। जेलमें प्राण दे देना मुझे उतना ही प्रिय है जितना (नये ढंगसे) ठोक-पीटकर मानवताकी सेवाके लिए ठीक तरह गढ़ा जाना। इसलिए मैं आगामी गिरफ्तारीके लिए पूरी तरह तैयार हूँ।'''
मुझे विश्वास है कि सैकड़ों असहयोगी जो जेलकी सजा भोग रहे हैं इसी भावनासे प्रेरित हैं जो पण्डित सुन्दरलालने दिखाई है। अलीगढ़के लोगोंको प्रसन्नतासे अपने साथीको पकड़े जाने देना चाहिए था और उसका स्थान लेकर उसका काम करना चाहिए था। हमें सिर्फ इतना ही करना है कि हम अपने साथियोंके जेल जानेसे खाली होनेवाली जगहोंको भरते चले जायें। हमारा कार्यक्रम बिलकुल स्पष्ट है। उसे पूरा करनेका अर्थ वह-सब प्राप्त कर लेना है जिसकी हमें कामना है।
{{C|''''जमींदार' के विरुद्ध धमकी'''}}
मुझे मालूम हुआ है कि लाहौरसे निकलनेवाली पत्रिका 'जमींदार' पर, जिसका सम्पादन अपनी गिरफ्तारीतक श्री जफर अली खाँ करते थे और अब उनके सुपुत्र कर रहे हैं, मुकदमा चलाये जानेकी धमकी दी गई है। सम्पादकसे कहा गया है कि यदि वे इस मुकदमेसे बचना चाहते हैं तो, अपने मनके खिलाफ, क्षमा-याचना करें। उनसे कहा गया है कि दिये गये वे वक्तव्य, जिनको वे सही मानते हैं, वापस ले लिये जायें। इनमें से एक वक्तव्य नाजिफपर तथाकथित बमबारी है। यह सूचना उन्होंने दूसरे समाचारपत्रोंसे ली है। हजारों मुसलमानोंको विश्वास है कि यह सच बात है। उन्होंने सरकारको आश्वासन दिया है कि यदि स्वतन्त्र जिम्मेदार मुसलमान उस जगह जाकर जाँच करें और यदि वे कह दें कि यह बमबारी नहीं हुई तो वे अपना वक्तव्य वापस ले लेंगे। यह प्रस्ताव काफी सम्मानजनक है। उन्होंने एक जोशीली कविता प्रकाशित की है जिसकी कुछ पंक्तियोंका ऐसा अर्थ निकाला जा सकता है कि उनसे हिंसाको प्रोत्साहन मिलता है। उन्होंने एक असहयोगीके नाते इन पंक्तियोंके लिए क्षमा-याचना करना स्वीकार किया है, वह इसलिए नहीं कि वे मुकदमेसे डरते हैं बल्कि इसलिए कि अहिंसाके अपने सिद्धान्तके सम्बन्धमें वे अपनेको एक गलत स्थितिमें नहीं पड़ने देना चाहते। तीसरा वक्तव्य जिसपर सरकारको ऐतराज है बंगालमें एक मुकदमेकी रिपोर्ट और उसपर टिप्पणीसे सम्बन्धित है, जिसमें एक<noinclude></noinclude>
7d0dc7ymt5tzzhp6s2lrffopj005g8s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४०३
250
184917
673371
641199
2026-08-23T16:28:16Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673371
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३७१}}</noinclude>यूरोपीय द्वारा एक खानसामाके मारे जाने और अदालत द्वारा उसपर ३००) रु॰ जुर्माना किये जानेका जिक्र था। टिप्पणी, जिसपर ऐतराज किया गया है, सचमुच कड़ी है। उसमें कहा गया है कि ब्रिटिश अदालतें यूरोपीयोंको ३००) रु॰ जुर्माना-भर कर भारतीयोंकी हत्या करनेकी छूट देती हैं। किन्तु उसमें हिंसाको कोई उकसावा नहीं है, और अखबारोंमें छपनेवाली उन कई घटनाओंसे जिनमें न्यायपर कुठाराघात हुआ है, वह उचित ठहरती है। सरकारको कोई भान नहीं है कि यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच समान रूपसे न्याय एक असम्भव-सी बात माननेकी भावना भारतीयोंके दिलमें कितनी गहरी बैठ गई है। 'जमींदार' के विरुद्ध चौथा इलजाम मौलाना मुहम्मद अलीके उस वक्तव्यको छापनेका है जिसमें अफगानिस्तानके हौएका जिक्र है। सम्पादकों और सार्वजनिक नेताओंसे क्षमा-याचना के लिए कहनेका यह विचार अली भाइयोंकी क्षमायाचनाका मजाक बनाना है, क्योंकि संयुक्त प्रान्तकी सरकार भी 'इंडिपेन्डेन्ट' पत्र और दूसरे लोगोंसे इसी प्रकार क्षमा-याचनाकी माँग कर रही है। मुझे मालूम नहीं कि सरकार द्वारा आत्मसम्मानी असहयोगियोंसे क्षमा-याचनाकी मॉंगका इलाहाबादमें क्या परिणाम हुआ। ज्यादा ईमानदार और सम्मानजनक तरीका यह होता कि सरकार जिन असहयोगियोंको पसन्द नहीं करती, उन्हें जेल भेज देती। पंजाबमें सरकारने हमारी बेइज्जती करनेका जो ढंग अपनाया था, उससे हटकर अब क्षमायाचनाकी माँग करनेका यह घुमावदार तरीका उसे नहीं अपनाना चाहिए।
{{C|'''सहयोग और असहयोगकी परिभाषा'''}}
देशके लिए यह कोई छोटी बात नहीं कि श्री द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर जिन्हें उनके मित्र प्यारसे 'बड़ो दादा' कहते हैं, अपनी वृद्धावस्था और शान्तिनिकेतनके अपने एकान्तमें भी, देशमें जो-कुछ हो रहा है उसपर बारीकीसे निगाह रखते हैं। श्री एन्ड्र्यूजने असहयोगपर प्रकट किये उनके हालके विचारोंका स्वतन्त्र अनुवाद जगह-जगह भेजा है। यद्यपि यह अनुवाद पूराका-पूरा अखबारोंमें छपा है, मैं श्री ठाकुर द्वारा की गई
सहयोग और असहयोगकी परिभाषाओंको, जो इतनी ही सच्ची और प्रभावपूर्ण हैं, प्रकाशित करनेका लोभ संवरण नहीं कर सकता। सहयोग के बारेमें लिखते हुए वे कहते हैं :
:{{gap}}'''हमारे शासकोंने अपने निरंकुश कृत्योंको दुनियासे छिपानेके लिए विधान-मण्डलोंके रूपमें एक कठपुतलीका तमाशा खड़ा किया है जिनमें सहयोग देनेके लिए कुछ पेशेवर भाषण-शूरोंको आमन्त्रित किया गया है। हमारे शासकोंका विचार है कि ऐसा करके उन्होंने हमें हमेशाके लिए अपने अहसानसे दबा दिया है। दरअसल उन्होंने जलेपर नमक छिड़का है। ये विधान-मण्डल हमारे गले पड़ गये हैं और डर यह है कि सिन्दबाद नाविककी कहानीमें वर्णित बूढ़ेकी भाँति वे हमारा दम घोट देंगे। बड़ो दादा आगे कहते हैं : यदि हमारे अंग्रेज शासकोंके अनुसार सहयोगका यही अर्थ है, तो यह समझ पाना बहुत कठिन नहीं कि असहयोगका हमारे लिए क्या अर्थ है। हम कोई भी ऐसी चीज, जो'''<noinclude></noinclude>
mvnkyggv348c3xk77xnny2pxoujuzme
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४०४
250
184918
673374
641200
2026-08-23T16:34:15Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
673374
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>३७२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
देशके लिए घातक हो,
हमारी जान ही क्यों न
कभी स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे उसे अस्वीकार करने में
चली जाये । यही असहयोग है ।
अनुकरणीय
श्री विट्ठलभाई पटेलको नगरपालिका या विधान मण्डलोंसे जूझनेमें जो सुख
मिलता है वह और किसी काममें नहीं मिलता । ६ तारीखको थानाके जिला बोर्डमें
निम्नलिखित प्रस्ताव रखते हुए वे पूरे जोशमें थे :
(१) यह बोर्ड इस बातपर दुःख प्रकट करता है कि शराबकी बिक्री बढ़
रही है और उसके फलस्वरूप जनताके चरित्र, स्वास्थ्य और सम्पत्तिका नाश
हो रहा है।
(२) यह बोर्ड इस अभिशापको दूर करनेके लिए आरम्भ किये गये
आन्दोलनका स्वागत करता है और इस आन्दोलनके संगठनकर्त्ताओंने जनसेवाकी
जो भावना दिखाई है उसके लिए बधाई देता है।
(३) यह बोर्ड इस बातपर दुःख प्रकट करता है कि उसके पास इस
तरहका कोई अधिकार नहीं है, जिसके बलपर वह शराबकी बिक्री रोक सके ।
इसलिए बोर्डकी सम्मति है कि जो अधिकार उसे प्राप्त हैं, अपने दायित्वपर वह
उनका उपयोग धरना और कांग्रेस कमेटियोंको सहायता देन में करे, ताकि वह
उन शराब बेचनेवालों को, जो स्वेच्छासे अपनी दूकानें बन्द कर दें, मुआवजा
दे सके।
(४) ऊपर लिखे उद्देश्यको पूरा करनेके लिए यह बोर्ड एक समिति
नियुक्त करता है जिसके प्रधान और उपप्रधान -- प्रस्तावक -- तथा श्री आचार्य
सदस्य होंगे। यह समिति धरना देने के कामको नियोजित करेगी और पूरी तरह
मद्य-निषेधको सफल बनायेगी ।
(५) बोर्ड इस समितिको अधिकार देता है कि शुरूमें वह ३,०००) ६०
तक खर्च कर सकती है; और आगे चलकर इससे भी अधिक धन खर्च कर
सकेगी।
यह स्पष्ट ही एक साहसपूर्ण कदम है। यदि बोर्ड अन्ततक अपने प्रस्तावको
कार्यान्वित करनेके लिए कटिबद्ध रहता है और अपने शासन-क्षेत्रमें पूरी तरह शराबकी
दूकानें बन्द करनेमें सफल होता है, तो वह अपनेको गौरवान्वित करेगा और देशकी
महत्त्वपूर्ण सेवा करेगा। आशा है कि सारे भारतमें स्थानीय बोर्ड और नगरपालिकाओंके
सदस्य श्री पटेलका अनुकरण करेंगे। यदि सारे भारतमें स्थानीय बोर्ड और नगर-
पालिकाएँ इस सम्बन्धमें एक साथ कदम उठायें तो यह समाज-सुधारकोंको बल देगा
और सरकारको मजबूत करेगा तथा इस तरह हिंसाका वह खतरा भी दूर होगा जो
धरना देनेवालों, पुलिस और जनताके झगड़ोंसे पैदा हो सकता है ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
rvy3hkvhs0q5a0qpwb88f4h7foq6wyt
673627
673374
2026-08-24T09:31:47Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673627
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>:'''देशके लिए घातक हो, कभी स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे उसे अस्वीकार करनेमें हमारी जान ही क्यों न चली जाये। यही असहयोग है।'''
{{C|'''अनुकरणीय'''}}
श्री विट्ठलभाई पटेलको नगरपालिका या विधान-मण्डलोंसे जूझनेमें जो सुख मिलता है वह और किसी काममें नहीं मिलता। ६ तारीखको थानाके जिला बोर्डमें निम्नलिखित प्रस्ताव रखते हुए वे पूरे जोशमें थे :
:'''{{gap}}(१) यह बोर्ड इस बातपर दुःख प्रकट करता है कि शराबकी बिक्री बढ़ रही है और उसके फलस्वरूप जनताके चरित्र, स्वास्थ्य और सम्पत्तिका नाश हो रहा है।'''
:'''{{gap}}(२) यह बोर्ड इस अभिशापको दूर करनेके लिए आरम्भ किये गये आन्दोलनका स्वागत करता है और इस आन्दोलनके संगठनकर्त्ताओंने जनसेवाकी जो भावना दिखाई है उसके लिए बधाई देता है।'''
:'''{{gap}}(३) यह बोर्ड इस बातपर दुःख प्रकट करता है कि उसके पास इस तरहका कोई अधिकार नहीं है, जिसके बलपर वह शराबकी बिक्री रोक सके। इसलिए बोर्डकी सम्मति है कि जो अधिकार उसे प्राप्त हैं, अपने दायित्वपर वह उनका उपयोग धरना और कांग्रेस कमेटियोंको सहायता देने में करे, ताकि वह उन शराब बेचनेवालों को, जो स्वेच्छासे अपनी दूकानें बन्द कर दें, मुआवजा दे सके।'''
:'''{{gap}}(४) ऊपर लिखे उद्देश्यको पूरा करनेके लिए यह बोर्ड एक समिति नियुक्त करता है जिसके प्रधान और उपप्रधान—प्रस्तावक—तथा श्री आचार्य सदस्य होंगे। यह समिति धरना देनेके कामको नियोजित करेगी और पूरी तरह मद्य-निषेधको सफल बनायेगी।'''
:'''{{gap}}(५) बोर्ड इस समितिको अधिकार देता है कि शुरूमें वह ३,०००) रु॰ तक खर्च कर सकती है; और आगे चलकर इससे भी अधिक धन खर्च कर सकेगी।'''
यह स्पष्ट ही एक साहसपूर्ण कदम है। यदि बोर्ड अन्ततक अपने प्रस्तावको कार्यान्वित करनेके लिए कटिबद्ध रहता है और अपने शासन-क्षेत्रमें पूरी तरह शराबकी दूकानें बन्द करनेमें सफल होता है, तो वह अपनेको गौरवान्वित करेगा और देशकी महत्त्वपूर्ण सेवा करेगा। आशा है कि सारे भारतमें स्थानीय बोर्ड और नगरपालिकाओंके सदस्य श्री पटेलका अनुकरण करेंगे। यदि सारे भारतमें स्थानीय बोर्ड और नगर-पालिकाएँ इस सम्बन्धमें एक साथ कदम उठायें तो यह समाज-सुधारकोंको बल देगा और सरकारको मजबूत करेगा तथा इस तरह हिंसाका वह खतरा भी दूर होगा जो धरना देनेवालों, पुलिस और जनताके झगड़ोंसे पैदा हो सकता है।<noinclude></noinclude>
3gyef1vpxfguah4vi30p9zqol5g2na9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४०५
250
184919
673631
641201
2026-08-24T09:45:43Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
673631
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|३७३}}</noinclude>{{C|'''शस्त्र अधिनियम'''}}
स्वामी श्रद्धानन्द एक घटना प्रकाशमें लाये हैं कि बिजनौर जिलेके एक मजिस्ट्रेटने गुरुकुल कांगड़ीके सहायक प्रबन्धककी बन्दूकके लाइसेंसका नवीकरण करनेसे इनकार कर दिया। यह सुधारोंकी निरर्थकताका खुला प्रदर्शन है। यदि स्वामी श्रद्धानन्दका यह अनुमान ठीक है कि लाइसेंसका नवीकरण न किये जानेका कारण असहयोग आन्दोलनसे उनका सम्बन्ध है तो इससे यह जाहिर होता है कि जनताके दैनिक जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाली बातोंके प्रति सरकारका रवैया और शासनका तरीका बिलकुल नहीं बदला है; जो-कुछ थोड़ा परिवर्तन हुआ है वह असहयोगके प्रभावके कारण। लेकिन स्वामी श्रद्धानन्द-जैसे जाने-माने नागरिकके प्रति बिजनौरके जिला मजिस्ट्रेट के ऐसे हृदयहीन व्यवहारके लिए जनता तैयार नहीं थी। मैंने इस व्यवहारको हृदयहीन कहा है, क्योंकि जिस बन्दूकके लिए लाइसेंस लेना था उसकी जरूरत शिकारके लिए नहीं बल्कि एक
घने जंगलमें जंगली जानवरोंसे बचावके लिए थी।
{{C|'''बहाना'''}}
मैं पण्डित माखनलाल चतुर्वेदीपर चलाये गये मुकदमे और उनको दिये दण्डका पहले ही जिक्र कर चुका हूँ। मुझे अदालतमें दिये उनके बयानकी एक प्रति अभी मिली है। उन्होंने गवाह पेश करने या दूसरी तरहसे अपना बयान देनेसे इनकार कर दिया। केवल अदालतके सामने एक वक्तव्य दिया जिसमें उन्होंने अहिंसाके सिद्धान्तपर अपना विश्वास दुहराया। इसलिए मेरी तरह पाठकोंको भी यह जानकर अचम्भा होगा कि यदि पण्डित माखनलालके वक्तव्यको सच माना जाये तो उनपर मुकदमा उस कसूरके लिए नहीं चलाया गया जिसके लिए सरकार उन्हें दोषी समझती थी; बल्कि एक निर्दोष भाषणके लिए चलाया गया। मेरा मतलब वक्तव्यके निम्नलिखित भागसे स्पष्ट हो जायेगा कि जब पण्डित माखनलालपर मुकदमा चलानेका निश्चय किया गया, उस समयतक उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था।
:'''{{gap}}मैं जबलपुर से निकलनेवाले 'कर्मवीर' का सम्पादक रहा हूँ। पत्रकारिताका अपना कर्त्तव्य निभाते हुए मुझे जनताकी कई कठिनाइयोंको प्रकाशमें लाने और प्रान्तमें प्रशासन सम्बन्धी कार्योंकी आलोचना करनेके अवसर आते रहे हैं। नरसिंहपुर जिलेका प्रशासन बहुत बदनाम हो गया था और यह जरूरी हो गया था कि डिप्टी कमिश्नर श्री जे॰ सी॰ बोनके प्रशासनसे सम्बन्धित गोलमालका मेरे पत्र द्वारा निर्भयतापूर्वक भण्डाफोड़ किया जाये। वहाँके स्थानीय अधिकारी लगातार जनतापर अत्याचार करते थे। इसके बारेमें विधान-मण्डलमें कहा गया था, "पुलिसकी एक टुकड़ीने एक गाँववर धावा बोला, लोगोंको यातनाएँ
दीं, उनके मुँहपर थूका, ठोकरें मारों, उन्हें गिरफ्तार करके उनके साथ दुर्व्यवहार किया, कई दिनतक उनको भूखा रखा और अन्तमें स्त्रियोंकी इज्जत खराब की।" सरकारकी कारगुजारियोंका इस तरह पर्दाफाश होनके बादसे ही मैं उसका कोपभाजन हो गया। और इससे मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं होता कि'''<noinclude></noinclude>
3bl6stxxp0hatdqdxov24fxemrciiu2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६६९
250
185123
673528
643183
2026-08-24T05:11:11Z
Manikantkmr
5554
673528
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh||सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करने की विधि|६३३}}</noinclude>हिस्सोंकी रकम तय करके उतनी रकम सम्बन्धित कांग्रेस कमेटीके जमा खातेसे निकाल कर प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके जमा खातेमें डाल दी जानी चाहिए।
{{C|'''प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके लिए खातेका फार्म'''}}
खाता...
ताल्लुका कांग्रेस कमेटी
तारीख
दी गई रुई
देना
तारीख प्राप्त किया गया सूत
पावना
१०-१ | मन प्रति मन ४० ) की दरसे
२०
५-२ १० सेर ५ तोला २) प्रति सेरकी दरसे २०
२
२०-१
१ मन, प्रति मन
४०) की दरसे
४०
२० से २ । ) प्रति सेरकी दरसे
४५
मार्चका कोटा
१६ ४
६
वर्ष
१०-३ | जनवरी, फरवरीऔर
यदि ऊपर बताये गये ढंगसे कांग्रेस कमेटियों और अ. भा. कांग्रेस कमेटीके सम्बन्ध- में कोई हिसाब रखा जाता है तो सभी पक्षोंको सन्तुष्ट कर सकना सरल होगा। प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी रुईका वितरण करती है और सूतकी कीमत वसूल करती है और उस कीमत में से अ. भा. कांग्रेस कमेटी तथा अन्य कमेटियोंका हिस्सा निकालती है। यह काम बहुत जटिल है, और अगर उचित हिसाब नहीं रखा जाता तो इसमें विफलताकी सम्भावनाएँ बहुत हैं।
{{C|'''कताई-कार्य'''}}
जिन प्रान्तों में स्वयं कताई करनेवालोंकी संख्या काफी है और खादी सम्बन्धी गतिविधि महत्त्वपूर्ण है, वहाँ सूत-सदस्यताके आधारपर सदस्योंको भरती करना और मौजूदा चरखोंपर कताई कराना कठिन नहीं होगा। लेकिन जिन प्रान्तोंमें कताईका काम बहुत नहीं बढ़ पाया है, वहाँ प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको सदस्य भरती करने के लिए विशेष प्रबन्ध करने होंगे।
अभीतक कांग्रेस कमेटियाँ पैसेका ही हिसाब-किताब रखती थीं, लेकिन कताई- सदस्यता की व्यवस्था लागू होनेके बाद उन्हें सूत और खादीका हिसाब रखना होगा। कांग्रेस कार्यालयमें एक सूत और खादी विभाग होगा। तौलनेके लिए तराजू और बाट तथा सूत और खादीको एक जगह रखने, पैकिंग करने, भेजने और सूत तथा खादीकी बिक्रीका भी प्रबन्ध करना होगा। किताबोंका एक पूरा सेट रखना होगा। प्रत्येक कांग्रेस कार्यालय आवश्यक रूपसे एक खादी उत्पादन केन्द्र बन जायेगा।
सदस्योंको चरखा आसानीसे उपलब्ध करनेकी भी व्यवस्था करनी होगी। प्रत्येक कांग्रेस कमेटीसे सम्बद्ध प्रशिक्षण केन्द्र होना भी जरूरी होगा। कताई-विभागकी देखरेख करनेवाले कार्यकर्ताको रुई धुनना सीखना जरूरी है और उसे धुनकी-<noinclude></noinclude>
q4ibcpva98b9ydcdkdvze32q9if8rn3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७०
250
185124
673372
643184
2026-08-23T16:31:48Z
Manikantkmr
5554
673372
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh|६३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>का एक कुशल धुनियेकी तरह उपयोग करना आना चाहिए तथा उसे एक अच्छा सूत कातनेवाला भी होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
''''यंग इंडिया,''' १५-१-२९२५
{{C|{{larger|'''४४०. भाषण : खेडूत परिषद्''''}}}}
{{Right|१५ जनवरी, १९२५}}
अध्यक्ष महोदय ने जो भिक्षा माँगी है, वह अगर उन्हें नहीं दी जा सकती तो मैं मानूंगा कि यह परिषद् निरर्थक रही। उनकी माँग यदि बहुत ज्यादा होती और आपके बूते से बाहर होती तो कुछ कहने को नहीं रह जाता। इस परिषद् में से ४० स्वयंसेवक भी न मिलें तो आप सबके लिए यह शर्मंकी बात कही जायेगी। और जितनी आपके लिए उतनी ही मेरे लिए भी। कारण, पाटीदारोंके साथ मेरा निकटका सम्बन्ध रहा है. - और सो यहाँ आकर जबसे मैं काममें जुटा हूँ तबसे नहीं, बल्कि दक्षिण आफ्रिकासे ही - और इस सम्बन्धका खयाल करते हुए मैं आशा रखता हूँ कि इतने लोगोंके समुदायमें से ४० स्वयंसेवक अवश्य मिलने चाहिए; और पुरुष स्वयंसेवक ही नहीं, अपितु स्वयंसेविकाएँ भी मिलनी चाहिए। इस लड़ाई में यदि महिलाओंका हिस्सा नहीं होगा तो हमसे केवल आधा ही काम होगा। ये स्वयंसेवक वेतन लेनेवाले नहीं हों, एक तरह से यह बात है। जो वेतनके मोहके कारण ही वेतन लेना चाहते हों, वे स्वयंसेवक नहीं हैं। लेकिन स्वयंसेवककी सेवा स्वीकार करनेवाली जनता उसके निर्वाहकी व्यवस्था करनेके लिए भी बँधी हुई है। ४० स्वयंसेवक हमारे कामके लिए पर्याप्त नहीं हैं। हिन्दुस्तान में तो ४० लाख स्वयंसेवक चाहिए। हमने आज जो काम हाथ में ले रखा है उसके लिए पाँच-सात हजार स्वयंसेवक तो अवश्य चाहिए और इस गरीब देशमें इतने स्वयंसेवक निर्वाहके लिए कुछ भी लिये बिना काम कर सकें, यह असम्भव है। यूरोप- जैसे देशों में भी ऐसे स्वयंसेवक प्राप्त करना असम्भव है। ईश्वरने हमें इसलिए पैदा नहीं किया कि हम खायें और काम न करें। प्रकृतिके सर्वसामान्य नियमको हमने भंग किया है। कुछ लोग हैं जो खाते तो हैं किन्तु उसके लिए काम नहीं करते, इसीका यह परिणाम है कि कुछ तो अपने ऊपर हजारों रुपये खर्च करते हैं और दूसरी ओर हजारों लोग भूखों मरते हैं। हिन्दुस्तानके अंग्रेज इतिहासकार इंटरका कहना है कि यहाँ लगभग दस करोड़ व्यक्तियोंको मुश्किलसे एक जून ही खानेको मिलता है और वह भी रोटी तथा नमक। कांग्रेसने भी इस आशयका प्रस्ताव पास किया है कि सभी स्वसेयंवक बिना पैसेके मिल जायें, ऐसी अपेक्षा न करनी चाहिए।
१. किसानोंका यह सम्मेलन सोजित्रामें हुआ था।
२. परिषद् के अध्यक्ष डा० सुमन्त मेहताने ४० स्वयंसेवकोंकी माँग की थी।<noinclude></noinclude>
08e8f144mbbczwy20ahswo174t3zvpi
673373
673372
2026-08-23T16:34:12Z
Manikantkmr
5554
673373
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh|६३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>का एक कुशल धुनियेकी तरह उपयोग करना आना चाहिए तथा उसे एक अच्छा सूत कातनेवाला भी होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
''''यंग इंडिया,''' १५-१-२९२५
{{C|{{larger|'''४४०. भाषण : खेडूत परिषद्१'''}}}}
{{Right|१५ जनवरी, १९२५}}
अध्यक्ष महोदय ने जो भिक्षा माँगी है, वह अगर उन्हें नहीं दी जा सकती तो मैं मानूंगा कि यह परिषद् निरर्थक रही। उनकी माँग यदि बहुत ज्यादा होती और आपके बूते से बाहर होती तो कुछ कहने को नहीं रह जाता। इस परिषद् में से ४० स्वयंसेवक भी न मिलें तो आप सबके लिए यह शर्मंकी बात कही जायेगी। और जितनी आपके लिए उतनी ही मेरे लिए भी। कारण, पाटीदारोंके साथ मेरा निकटका सम्बन्ध रहा है. - और सो यहाँ आकर जबसे मैं काममें जुटा हूँ तबसे नहीं, बल्कि दक्षिण आफ्रिकासे ही - और इस सम्बन्धका खयाल करते हुए मैं आशा रखता हूँ कि इतने लोगोंके समुदायमें से ४० स्वयंसेवक अवश्य मिलने चाहिए; और पुरुष स्वयंसेवक ही नहीं, अपितु स्वयंसेविकाएँ भी मिलनी चाहिए। इस लड़ाई में यदि महिलाओंका हिस्सा नहीं होगा तो हमसे केवल आधा ही काम होगा। ये स्वयंसेवक वेतन लेनेवाले नहीं हों, एक तरह से यह बात है। जो वेतनके मोहके कारण ही वेतन लेना चाहते हों, वे स्वयंसेवक नहीं हैं। लेकिन स्वयंसेवककी सेवा स्वीकार करनेवाली जनता उसके निर्वाहकी व्यवस्था करनेके लिए भी बँधी हुई है। ४० स्वयंसेवक हमारे कामके लिए पर्याप्त नहीं हैं। हिन्दुस्तान में तो ४० लाख स्वयंसेवक चाहिए। हमने आज जो काम हाथ में ले रखा है उसके लिए पाँच-सात हजार स्वयंसेवक तो अवश्य चाहिए और इस गरीब देशमें इतने स्वयंसेवक निर्वाहके लिए कुछ भी लिये बिना काम कर सकें, यह असम्भव है। यूरोप- जैसे देशों में भी ऐसे स्वयंसेवक प्राप्त करना असम्भव है। ईश्वरने हमें इसलिए पैदा नहीं किया कि हम खायें और काम न करें। प्रकृतिके सर्वसामान्य नियमको हमने भंग किया है। कुछ लोग हैं जो खाते तो हैं किन्तु उसके लिए काम नहीं करते, इसीका यह परिणाम है कि कुछ तो अपने ऊपर हजारों रुपये खर्च करते हैं और दूसरी ओर हजारों लोग भूखों मरते हैं। हिन्दुस्तानके अंग्रेज इतिहासकार इंटरका कहना है कि यहाँ लगभग दस करोड़ व्यक्तियोंको मुश्किलसे एक जून ही खानेको मिलता है और वह भी रोटी तथा नमक। कांग्रेसने भी इस आशयका प्रस्ताव पास किया है कि सभी स्वसेयंवक बिना पैसेके मिल जायें, ऐसी अपेक्षा न करनी चाहिए।
१. किसानोंका यह सम्मेलन सोजित्रामें हुआ था।
२. परिषद् के अध्यक्ष डा० सुमन्त मेहताने ४० स्वयंसेवकोंकी माँग की थी।<noinclude></noinclude>
8xap5kyjwsxj8hyrk03w4ai3y9afckd
673447
673373
2026-08-23T18:42:59Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673447
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>का एक कुशल धुनियेकी तरह उपयोग करना आना चाहिए तथा उसे एक अच्छा सूत कातनेवाला भी होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
''''यंग इंडिया,''' १५-१-२९२५
{{C|{{larger|'''४४०. भाषण : खेडूत परिषद्१'''}}}}
{{Right|१५ जनवरी, १९२५}}
अध्यक्ष महोदय ने जो भिक्षा माँगी है, वह अगर उन्हें नहीं दी जा सकती तो मैं मानूंगा कि यह परिषद् निरर्थक रही। उनकी माँग यदि बहुत ज्यादा होती और आपके बूते से बाहर होती तो कुछ कहने को नहीं रह जाता। इस परिषद् में से ४० स्वयंसेवक भी न मिलें तो आप सबके लिए यह शर्मंकी बात कही जायेगी। और जितनी आपके लिए उतनी ही मेरे लिए भी। कारण, पाटीदारोंके साथ मेरा निकटका सम्बन्ध रहा है. - और सो यहाँ आकर जबसे मैं काममें जुटा हूँ तबसे नहीं, बल्कि दक्षिण आफ्रिकासे ही - और इस सम्बन्धका खयाल करते हुए मैं आशा रखता हूँ कि इतने लोगोंके समुदायमें से ४० स्वयंसेवक अवश्य मिलने चाहिए; और पुरुष स्वयंसेवक ही नहीं, अपितु स्वयंसेविकाएँ भी मिलनी चाहिए। इस लड़ाई में यदि महिलाओंका हिस्सा नहीं होगा तो हमसे केवल आधा ही काम होगा। ये स्वयंसेवक वेतन लेनेवाले नहीं हों, एक तरह से यह बात है। जो वेतनके मोहके कारण ही वेतन लेना चाहते हों, वे स्वयंसेवक नहीं हैं। लेकिन स्वयंसेवककी सेवा स्वीकार करनेवाली जनता उसके निर्वाहकी व्यवस्था करनेके लिए भी बँधी हुई है। ४० स्वयंसेवक हमारे कामके लिए पर्याप्त नहीं हैं। हिन्दुस्तान में तो ४० लाख स्वयंसेवक चाहिए। हमने आज जो काम हाथ में ले रखा है उसके लिए पाँच-सात हजार स्वयंसेवक तो अवश्य चाहिए और इस गरीब देशमें इतने स्वयंसेवक निर्वाहके लिए कुछ भी लिये बिना काम कर सकें, यह असम्भव है। यूरोप- जैसे देशों में भी ऐसे स्वयंसेवक प्राप्त करना असम्भव है। ईश्वरने हमें इसलिए पैदा नहीं किया कि हम खायें और काम न करें। प्रकृतिके सर्वसामान्य नियमको हमने भंग किया है। कुछ लोग हैं जो खाते तो हैं किन्तु उसके लिए काम नहीं करते, इसीका यह परिणाम है कि कुछ तो अपने ऊपर हजारों रुपये खर्च करते हैं और दूसरी ओर हजारों लोग भूखों मरते हैं। हिन्दुस्तानके अंग्रेज इतिहासकार हंटरका कहना है कि यहाँ लगभग दस करोड़ व्यक्तियोंको मुश्किलसे एक जून ही खानेको मिलता है और वह भी रोटी तथा नमक। कांग्रेसने भी इस आशयका प्रस्ताव पास किया है कि सभी स्वसेयंवक बिना पैसेके मिल जायें, ऐसी अपेक्षा न करनी चाहिए।
१. किसानोंका यह सम्मेलन सोजित्रामें हुआ था।
२. परिषद् के अध्यक्ष डा० सुमन्त मेहताने ४० स्वयंसेवकोंकी माँग की थी।<noinclude></noinclude>
i7qoo522j71wa36s87pdscqc4usedvt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७१
250
185125
673376
643185
2026-08-23T16:39:56Z
Manikantkmr
5554
673376
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh||भाषण : खेडूत परिषद् में|६३५}}</noinclude>लोगोंके सामने इसका उदाहरण प्रस्तुत करनेके लिए अग्रगण्य व्यक्तियोंको पहल करनी चाहिए। यदि जरूरत जान पड़े तो मुझे भी गुजारेके लायक पैसा लेना चाहिए। वल्लभभाईको भी लेना चाहिए। वैसे मैं तो मित्रोंसे असंख्य वस्तुएँ प्राप्त करता ही रहता हू। आज कदाचित् मुझे और वल्लभभाईको इसकी जरूरत न हो, लेकिन ऐसा समय आयेगा तो वेतन लेनेवाले स्वयंसेवकोंकी भरतीमें वल्लभभाई और मैं, दोनों दाखिल होंगे। तिलक महाराज और गोखलेजीके उदाहरण लें। जब फर्ग्युसन कॉलेज खुला तब दोनोंने उसमें ४० रुपयेके अल्प वेतनसे सन्तोष मानकर शिक्षाके लिए सेवा करनेकी दीक्षा ली थी। तिलक महाराजने बादमें अमुक कारणोंसे कॉलेज छोड़ दिया था, लेकिन वे जबतक वहाँ रहे तबतक उतना वेतन लेनेमें वे अपना मान समझते थे। गोखलेजीने तो २० वर्ष पूरे किये। इस बीच वे विधान परिषद् के सदस्य थे, अनेक समितियोंका कार्य करते थे, और इस सबसे भी उन्हें कुछ पैसा मिलता ही था; लेकिन फर्ग्युसन कॉलेजसे जो वेतन उन्हें मिलता था, उसे लेना उन्होंने बन्द नहीं किया। जब वे स्वयं " महान् " बन गये और जब १०,००० रुपयेका वेतन मिल सके, ऐसी स्थिति थी, तब भी उन्होंने पहलेके ७५ रुपयेके मासिक वेतनको जितना मान प्रदान किया था उतना इन मोटी रकमोंको भी नहीं दिया। अपनी पेन्शनकी छोटी-सी रकम भी उन्होंने बहुत कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार की।
स्वयंसेवकों को लोकापवादकी परवाह नहीं करनी चाहिए। निठल्ला व्यक्ति घर घालता है, इसलिए निठल्ले लोग स्वयंसेवकों की निन्दा करें तो इससे उन्हें घबरानेका कोई कारण नहीं है। स्वयंसेवक निन्दाको अपनी खुराक मानें। जो जगतकी निन्दाको सहन नहीं कर सकता, वह स्वयंसेवक नहीं हो सकता। उसकी चमड़ी तो भैंसेकी होनी चाहिए। नीचा सिर करके काम करता जाये, आगे-पीछे न देखे, केवल अपने में और अपने काममें ही ध्यान हो - उसे ऐसा योगी होना चाहिए। जो स्वयंसेवक मानता है कि वह जनताके हाथों बिक चुका है, उसे दिन-रात अपने कामके ही सपने आने चाहिए, लेकिन आजीविका-भरको • अर्थात् खीर-पूरीके लायक नहीं बल्कि ज्वार-बाजराके लायक -- • लेनेमें उसे संकोच न करना चाहिए। ऐसे कसे हुए स्वयं- सेवकोंको ही इसमें आना चाहिए और अध्यक्ष महोदयको निश्चिन्त कर देना चाहिए। अध्यक्ष महोदयको यहीं इसी काममें बाँध रखना चाहते हों तो सामने आइये! इतने कमसे सन्तोष माननेवाला अध्यक्ष आपको दूसरा शायद ही मिले।
हिन्दुस्तान में आज जो सबसे बड़ी और प्रौढ़ प्रवृत्ति चल रही है, उसके सम्बन्धमें तो मुझे आपसे कुछ कहना ही होगा। यह प्रवृत्ति है खादीकी, चरखेकी। जैसे-जैसे चरखेका विरोध किया जाता है वैसे-वैसे उसके प्रति मेरा विश्वास और भी दृढ़ होता जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कीजिएगा कि मैं मूर्ख और जिद्दी हूँ और न समझनेपर भी एक वस्तुके पीछे लगा हुआ हूँ। मैं जिस वस्तुकी बात कर रहा हूँ वह वस्तु तो मैंने हिन्दुस्तानके आगे सिर्फ चार-पाँच वर्ष पहले ही रखी थी, लेकिन<noinclude></noinclude>
qitmme7mi8yzopjtc8nba46x9oydzma
673451
673376
2026-08-23T18:57:31Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673451
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||भाषण : खेडूत परिषद् में|६३५}}</noinclude>लोगोंके सामने इसका उदाहरण प्रस्तुत करनेके लिए अग्रगण्य व्यक्तियोंको पहल करनी चाहिए। यदि जरूरत जान पड़े तो मुझे भी गुजारेके लायक पैसा लेना चाहिए। वल्लभभाईको भी लेना चाहिए। वैसे मैं तो मित्रोंसे असंख्य वस्तुएँ प्राप्त करता ही रहता हू। आज कदाचित् मुझे और वल्लभभाईको इसकी जरूरत न हो, लेकिन ऐसा समय आयेगा तो वेतन लेनेवाले स्वयंसेवकोंकी भरतीमें वल्लभभाई और मैं, दोनों दाखिल होंगे। तिलक महाराज और गोखलेजीके उदाहरण लें। जब फर्ग्युसन कॉलेज खुला तब दोनोंने उसमें ४० रुपयेके अल्प वेतनसे सन्तोष मानकर शिक्षाके लिए सेवा करनेकी दीक्षा ली थी। तिलक महाराजने बादमें अमुक कारणोंसे कॉलेज छोड़ दिया था, लेकिन वे जबतक वहाँ रहे तबतक उतना वेतन लेनेमें वे अपना मान समझते थे। गोखलेजीने तो २० वर्ष पूरे किये। इस बीच वे विधान परिषद् के सदस्य थे, अनेक समितियोंका कार्य करते थे, और इस सबसे भी उन्हें कुछ पैसा मिलता ही था; लेकिन फर्ग्युसन कॉलेजसे जो वेतन उन्हें मिलता था, उसे लेना उन्होंने बन्द नहीं किया। जब वे स्वयं " महान् " बन गये और जब १०,००० रुपयेका वेतन मिल सके, ऐसी स्थिति थी, तब भी उन्होंने पहलेके ७५ रुपयेके मासिक वेतनको जितना मान प्रदान किया था उतना इन मोटी रकमोंको भी नहीं दिया। अपनी पेन्शनकी छोटी-सी रकम भी उन्होंने बहुत कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार की।
स्वयंसेवकों को लोकापवादकी परवाह नहीं करनी चाहिए। निठल्ला व्यक्ति घर घालता है, इसलिए निठल्ले लोग स्वयंसेवकों की निन्दा करें तो इससे उन्हें घबरानेका कोई कारण नहीं है। स्वयंसेवक निन्दाको अपनी खुराक मानें। जो जगतकी निन्दाको सहन नहीं कर सकता, वह स्वयंसेवक नहीं हो सकता। उसकी चमड़ी तो भैंसेकी होनी चाहिए। नीचा सिर करके काम करता जाये, आगे-पीछे न देखे, केवल अपने में और अपने काममें ही ध्यान हो - उसे ऐसा योगी होना चाहिए। जो स्वयंसेवक मानता है कि वह जनताके हाथों बिक चुका है, उसे दिन-रात अपने कामके ही सपने आने चाहिए, लेकिन आजीविका-भरको • अर्थात् खीर-पूरीके लायक नहीं बल्कि ज्वार-बाजराके लायक -- • लेनेमें उसे संकोच न करना चाहिए। ऐसे कसे हुए स्वयं- सेवकोंको ही इसमें आना चाहिए और अध्यक्ष महोदयको निश्चिन्त कर देना चाहिए। अध्यक्ष महोदयको यहीं इसी काममें बाँध रखना चाहते हों तो सामने आइये! इतने कमसे सन्तोष माननेवाला अध्यक्ष आपको दूसरा शायद ही मिले।
हिन्दुस्तान में आज जो सबसे बड़ी और प्रौढ़ प्रवृत्ति चल रही है, उसके सम्बन्धमें तो मुझे आपसे कुछ कहना ही होगा। यह प्रवृत्ति है खादीकी, चरखेकी। जैसे-जैसे चरखेका विरोध किया जाता है वैसे-वैसे उसके प्रति मेरा विश्वास और भी दृढ़ होता जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कीजिएगा कि मैं मूर्ख और जिद्दी हूँ और न समझनेपर भी एक वस्तुके पीछे लगा हुआ हूँ। मैं जिस वस्तुकी बात कर रहा हूँ वह वस्तु तो मैंने हिन्दुस्तानके आगे सिर्फ चार-पाँच वर्ष पहले ही रखी थी, लेकिन<noinclude></noinclude>
pjqy5175idws0a6j5rdkm2uullhw95i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७२
250
185126
673385
643186
2026-08-23T16:46:52Z
Manikantkmr
5554
673385
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh|६३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>चरखेके पक्षमें दलील तो मैंने इससे बहुत पहले, जब उसके दर्शन भी न किये थे, तभी 'हिन्द-स्वराज्य' में पेश की थी। और जैसे-जैसे इसका विरोध होता है, वैसे-वैसे मैं देखता हूँ कि इस विरोधके पीछे अनुभव और विचार नहीं है और मेरी दलीलोंमें गहरा विचार और अनुभव है। मैं अपनेको सीधा व्यक्ति मानता हूँ। भूल स्वीकार करना मैं अपना धर्म समझता हूँ, मलिनता मुझे पसन्द नहीं। शरीरमें, मनमें, हृदयमें मैल रखना रोग है, इसलिए भूल स्वीकार न करना भी रोग है। जो मनुष्य ईश्वरके आगे भूल स्वीकार नहीं करता - यद्यपि ईश्वर तो सब कुछ देखनेवाला है, लेकिन साथ ही वह बड़ा कौतुकी भी है और मनुष्यको भुलावेमें डालनेवाला है. • जो व्यक्ति ईश्वरके आगे अर्थात् जगतके आगे अपनी भूल स्वीकार नहीं करता, उसे क्षयरोग हो जाता है, उसका आध्यात्मिक क्षय होता है। यह क्षय शारीरिक क्षयकी अपेक्षा अधिक हानिकारक है। शारीरिक क्षयमें केवल शरीरका नाश है, लेकिन इसमें तो आत्माका नाश है। आत्मा तो अमर है, अक्षय है, इसलिए उसका नाश नहीं होता, पर नाशकी भ्रान्ति होती है। इसलिए अमर आत्माके नाशकी कल्पनामें दुहरा रोग होता है। अतएव मुझसे भूल हो तो उसे स्वीकार करनेमें मुझे तनिक भी संकोच नहीं होता । बादमें मेरे भूल स्वीकार करनेके फलस्वरूप सारे चरखे बन्द हो जायें और मैं पागल माना जाऊँ तो कोई बात नहीं; लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी ऐसा समय नहीं आया है। मुझे चरखेमें इतना अधिक विश्वास है कि मेरी स्त्री, मेरे लड़के और जो मेरे लिए मेरे लड़कोंसे भी बढ़कर हैं, ऐसे साथी अगर चरखेको छोड़ दें तो भी मैं अकेला इसका मंत्र जपा करूँगा और उसे चलाता चला जाऊँग। हिन्दुस्तानमें आलस्य- का महारोग है। यह स्वाभाविक नहीं है। किसानोंके लिए तो यह स्वाभाविक हो ही नहीं सकता; यदि हो तो उनकी खेती बरबाद हो जाय। हमारे यहाँ चरखेका नाश हुआ, इसीसे आलस्य आया। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये। अब, कोई छोटी-मोटी चीज करोड़ोंके लिए धन्धा नहीं बन सकती। कोई कहता है, हम टोकरियाँ बनायेंगे; कोई कहता है, ताले बनायेंगे; कोई दियासलाई तो कोई साबुन। इन कामोंमें करोड़ोंका उपयोग नहीं हो सकता और अगर वे सब इनमें भी लग जायें तो इन सारी चीजों की खपत नहीं हो सकती। इस तरहसे काम करनेसे सारी जनता एक नहीं हो सकती, वह अलग-अलग व्यक्तियोंके समूहमें बँटकर ही रह जायेगी। ऐसे काममें उद्धार नहीं है। इसीसे मैं कहता हूँ कि हिन्दुस्तान में सहायक धन्धेकी आवश्यकता है। खेड़ा में बहुत थोड़े-से गाँव होंगे, जहाँ मैं गया न होऊँ और थोड़े ही लोग होंगे जिन्हें मैंने देखा नहीं होगा। इनमें से बहुत-से लोगोंके पास काफी समय रहता है। इस समयका उपयोग करनेका साधन चरखा है, ऐसा कहूँ तो यह बात सबको पसन्द नहीं आती। परिणामतः कुछ लोग चोरी करते हैं, कुछ ऋण लेते हैं, तो कुछ भूखों मरते हैं। ऐसी दयनीय स्थितिमें पड़ी हुई -- मजबूरन आलसी हो गई- -- जनताका नाश ही सम्भव है। यदि वह स्वयं जागृत नहीं होती और दूसरोंको जागृत नहीं<noinclude></noinclude>
04xjh452nqa2fi4nvu0wsv62bjpe5ca
673387
673385
2026-08-23T16:49:33Z
Manikantkmr
5554
673387
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{rh|६३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>चरखेके पक्षमें दलील तो मैंने इससे बहुत पहले, जब उसके दर्शन भी न किये थे, तभी 'हिन्द-स्वराज्य' में पेश की थी। और जैसे-जैसे इसका विरोध होता है, वैसे-वैसे मैं देखता हूँ कि इस विरोधके पीछे अनुभव और विचार नहीं है और मेरी दलीलोंमें गहरा विचार और अनुभव है। मैं अपनेको सीधा व्यक्ति मानता हूँ। भूल स्वीकार करना मैं अपना धर्म समझता हूँ, मलिनता मुझे पसन्द नहीं। शरीरमें, मनमें, हृदयमें मैल रखना रोग है, इसलिए भूल स्वीकार न करना भी रोग है। जो मनुष्य ईश्वरके आगे भूल स्वीकार नहीं करता - यद्यपि ईश्वर तो सब कुछ देखनेवाला है, लेकिन साथ ही वह बड़ा कौतुकी भी है और मनुष्यको भुलावेमें डालनेवाला है. • जो व्यक्ति ईश्वरके आगे अर्थात् जगतके आगे अपनी भूल स्वीकार नहीं करता, उसे क्षयरोग हो जाता है, उसका आध्यात्मिक क्षय होता है। यह क्षय शारीरिक क्षयकी अपेक्षा अधिक हानिकारक है। शारीरिक क्षयमें केवल शरीरका नाश है, लेकिन इसमें तो आत्माका नाश है। आत्मा तो अमर है, अक्षय है, इसलिए उसका नाश नहीं होता, पर नाशकी भ्रान्ति होती है। इसलिए अमर आत्माके नाशकी कल्पनामें दुहरा रोग होता है। अतएव मुझसे भूल हो तो उसे स्वीकार करनेमें मुझे तनिक भी संकोच नहीं होता। बादमें मेरे भूल स्वीकार करनेके फलस्वरूप सारे चरखे बन्द हो जायें और मैं पागल माना जाऊँ तो कोई बात नहीं; लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी ऐसा समय नहीं आया है। मुझे चरखेमें इतना अधिक विश्वास है कि मेरी स्त्री, मेरे लड़के और जो मेरे लिए मेरे लड़कोंसे भी बढ़कर हैं, ऐसे साथी अगर चरखेको छोड़ दें तो भी मैं अकेला इसका मंत्र जपा करूँगा और उसे चलाता चला जाऊँग। हिन्दुस्तानमें आलस्य- का महारोग है। यह स्वाभाविक नहीं है। किसानोंके लिए तो यह स्वाभाविक हो ही नहीं सकता; यदि हो तो उनकी खेती बरबाद हो जाय। हमारे यहाँ चरखेका नाश हुआ, इसीसे आलस्य आया। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये। अब, कोई छोटी-मोटी चीज करोड़ोंके लिए धन्धा नहीं बन सकती। कोई कहता है, हम टोकरियाँ बनायेंगे; कोई कहता है, ताले बनायेंगे; कोई दियासलाई तो कोई साबुन। इन कामोंमें करोड़ोंका उपयोग नहीं हो सकता और अगर वे सब इनमें भी लग जायें तो इन सारी चीजों की खपत नहीं हो सकती। इस तरहसे काम करनेसे सारी जनता एक नहीं हो सकती, वह अलग-अलग व्यक्तियोंके समूहमें बँटकर ही रह जायेगी। ऐसे काममें उद्धार नहीं है। इसीसे मैं कहता हूँ कि हिन्दुस्तान में सहायक धन्धेकी आवश्यकता है। खेड़ा में बहुत थोड़े-से गाँव होंगे, जहाँ मैं गया न होऊँ और थोड़े ही लोग होंगे जिन्हें मैंने देखा नहीं होगा। इनमें से बहुत-से लोगोंके पास काफी समय रहता है। इस समयका उपयोग करनेका साधन चरखा है, ऐसा कहूँ तो यह बात सबको पसन्द नहीं आती। परिणामतः कुछ लोग चोरी करते हैं, कुछ ऋण लेते हैं, तो कुछ भूखों मरते हैं। ऐसी दयनीय स्थितिमें पड़ी हुई -- मजबूरन आलसी हो गई- -- जनताका नाश ही सम्भव है। यदि वह स्वयं जागृत नहीं होती और दूसरोंको जागृत नहीं<noinclude></noinclude>
rk3xdob9o7w183k3n6pi1zn3tj2lfu7
673467
673387
2026-08-24T02:47:38Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673467
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>चरखेके पक्षमें दलील तो मैंने इससे बहुत पहले, जब उसके दर्शन भी न किये थे, तभी 'हिन्द-स्वराज्य' में पेश की थी। और जैसे-जैसे इसका विरोध होता है, वैसे-वैसे मैं देखता हूँ कि इस विरोधके पीछे अनुभव और विचार नहीं है और मेरी दलीलोंमें गहरा विचार और अनुभव है। मैं अपनेको सीधा व्यक्ति मानता हूँ। भूल स्वीकार करना मैं अपना धर्म समझता हूँ, मलिनता मुझे पसन्द नहीं। शरीरमें, मनमें, हृदयमें मैल रखना रोग है, इसलिए भूल स्वीकार न करना भी रोग है। जो मनुष्य ईश्वरके आगे भूल स्वीकार नहीं करता - यद्यपि ईश्वर तो सब कुछ देखनेवाला है, लेकिन साथ ही वह बड़ा कौतुकी भी है और मनुष्यको भुलावेमें डालनेवाला है। - जो व्यक्ति ईश्वरके आगे अर्थात् जगतके आगे अपनी भूल स्वीकार नहीं करता, उसे क्षयरोग हो जाता है, उसका आध्यात्मिक क्षय होता है। यह क्षय शारीरिक क्षयकी अपेक्षा अधिक हानिकारक है। शारीरिक क्षयमें केवल शरीरका नाश है, लेकिन इसमें तो आत्माका नाश है। आत्मा तो अमर है, अक्षय है, इसलिए उसका नाश नहीं होता, पर नाशकी भ्रान्ति होती है। इसलिए अमर आत्माके नाशकी कल्पनामें दुहरा रोग होता है। अतएव मुझसे भूल हो तो उसे स्वीकार करनेमें मुझे तनिक भी संकोच नहीं होता। बादमें मेरे भूल स्वीकार करनेके फलस्वरूप सारे चरखे बन्द हो जायें और मैं पागल माना जाऊँ तो कोई बात नहीं; लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी ऐसा समय नहीं आया है। मुझे चरखेमें इतना अधिक विश्वास है कि मेरी स्त्री, मेरे लड़के और जो मेरे लिए मेरे लड़कोंसे भी बढ़कर हैं, ऐसे साथी अगर चरखेको छोड़ दें तो भी मैं अकेला इसका मंत्र जपा करूँगा और उसे चलाता चला जाऊँग। हिन्दुस्तानमें आलस्य- का महारोग है। यह स्वाभाविक नहीं है। किसानोंके लिए तो यह स्वाभाविक हो ही नहीं सकता; यदि हो तो उनकी खेती बरबाद हो जाय। हमारे यहाँ चरखेका नाश हुआ, इसीसे आलस्य आया। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये। अब, कोई छोटी-मोटी चीज करोड़ोंके लिए धन्धा नहीं बन सकती। कोई कहता है, हम टोकरियाँ बनायेंगे; कोई कहता है, ताले बनायेंगे; कोई दियासलाई तो कोई साबुन। इन कामोंमें करोड़ोंका उपयोग नहीं हो सकता और अगर वे सब इनमें भी लग जायें तो इन सारी चीजों की खपत नहीं हो सकती। इस तरहसे काम करनेसे सारी जनता एक नहीं हो सकती, वह अलग-अलग व्यक्तियोंके समूहमें बँटकर ही रह जायेगी। ऐसे काममें उद्धार नहीं है। इसीसे मैं कहता हूँ कि हिन्दुस्तान में सहायक धन्धेकी आवश्यकता है। खेड़ा में बहुत थोड़े-से गाँव होंगे, जहाँ मैं गया न होऊँ और थोड़े ही लोग होंगे जिन्हें मैंने देखा नहीं होगा। इनमें से बहुत-से लोगोंके पास काफी समय रहता है। इस समयका उपयोग करनेका साधन चरखा है, ऐसा कहूँ तो यह बात सबको पसन्द नहीं आती। परिणामतः कुछ लोग चोरी करते हैं, कुछ ऋण लेते हैं, तो कुछ भूखों मरते हैं। ऐसी दयनीय स्थितिमें पड़ी हुई -- मजबूरन आलसी हो गई- -- जनताका नाश ही सम्भव है। यदि वह स्वयं जागृत नहीं होती और दूसरोंको जागृत नहीं<noinclude></noinclude>
8710xou90yolhldt0e6ny36cfjwx5vi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७३
250
185128
673393
643192
2026-08-23T16:59:12Z
Manikantkmr
5554
673393
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|भाषण : खेडूत परिषद् में|६३७}}</noinclude>
चरखा ।
करती तो नाश ही होगा। यह समाज-शास्त्रका नियम है। व्यक्तिगत शास्त्रका नहीं,
यह समाज-शास्त्रका नियम है। करोड़ों इससे आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते
और न इसे आजीविकाके साधनके रूपमें पेश ही किया गया है। इसका वर्णन तो
अन्नपूर्णाके रूपमें किया गया है। अन्नपूर्णा अर्थात् घी-दूध। असंख्य गरीबोंको आज'
घी-दूध नहीं मिल सकता। गेहूँकी लपसीमें दूधकी बूंद अथवा घीका छींटा भी डालनेको नहीं मिल सकता। यह भयानक स्थिति है। इसका एक ही इलाज है यदि एक-एक व्यक्ति एक-एक रुपयेका काम करें तो वह मालूम नहीं होगा, परन्तु यदि सात हजारकी आबादी वाला गाँव इस तरहसे सात हजार रुपया पैदा करे तो वह देखा जा सकता है। इस चरखेको साधनेसे दूसरे अनेक गुण खुद-ब-खुद आ जाते हैं। इसके साथ सादगी आती है, सरलता आती है, नियमितता आती है और एक बात में नियमितता आ जानेका मतलब है सारे जीवन में नियमितता आ जाना --
ठीक उसी तरह जिस तरह टेढ़े हो गये चौखटेका जो एक कोना खराब हो गया हो उसे ठीक कर देने से बाकीके सारे कोने खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं। यह भूमितिका नियम है। एक कामके नियमित होनेसे सब काम नियमित हो जाते हैं। आज यदि आप चरखेको स्वीकार न करेंगे तो कल मुझे याद करेंगे। जब पानी थोड़ा बरसता हो, तभी बाँध बाँधकर उसे इकट्ठा कर लीजिए। जब प्रवाह आता है, तब बाँध बाँधनेवाला उसे नहीं रोक सकता तथा बाँध और पानी दोनोंको खो बैठता है। इसलिए आज, जबकि समय है, मैं आपसे कहता हूँ कि आप चेतें, जागें। बनिये-का हिसाब न करें; चरखेसे आपमें से एक व्यक्तिको कितनी आमदनी होती है, उसपर विचार न कर राष्ट्रको कितनी आय होगी, इसका विचार करे। त्रापज-जैसे छोटे गाँवमें जब लोगोंको हिसाब करके बताया, तब वे चकित रह गये। काठिया-वाड़ उपजाऊ नहीं है। उसमें तो लकड़ीकी फसल पत्थरकी फसल -- पकती है, और जमीनके उर्वर न होनेसे लोग छः महीने तो क्या, आठ महीने बरोठेपर बैठकर गप्पें मारते हैं, और न हुआ तो थोड़ी अफीम ही खा लेते हैं। मैंने त्रापजके लोगोंको समझाया कि वे किस तरहसे आसानीसे दो हजार बचा सकते हैं। एक सेर रुईके पीछे ज्यादा खर्च तो कताईका ही है, बुनाईका नहीं। अपने घरकी रुई आप घरमें ही साफ करें और कातें तो केवल बुनाईका ही खर्च पड़े तथा यदि केवल बुनाईका ही खर्च पड़ता हो तो हम दुनियाकी मिलोंके साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते है। कारण कि बुनने का खर्च तो मिलोंको भी लगभग हाथ करघे जितना ही पड़ जाता है। इस चाबीका महत्त्व हिन्दुस्तान की जनता समझती थी, इसलिए उसने चूल्हेकी भाँति चरखेको भी साथ रखा था। यह चाबी उसके हाथसे गई, और बस हमारा जीवन अपवित्र हो गया, हम नास्तिक हो गये, हमें ईश्वरका भय नहीं रहा। आप आस्तिक बनना चाहते हों, पवित्र होना चाहते हों, अपनी बहनोंके शीलकी रक्षा करना चाहते हों
तो चरखेको अंगीकार करें। चरखेमें ही देशकी जागृति है, हिन्दू-मुस्लिम एकता है,<noinclude></noinclude>
n1a6919mp1pomjknfcbd3pdp01y83g9
673394
673393
2026-08-23T17:00:31Z
Manikantkmr
5554
673394
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|भाषण : खेडूत परिषद् में|६३७}}</noinclude>करती तो नाश ही होगा। यह समाज-शास्त्रका नियम है। व्यक्तिगत शास्त्रका नहीं,
यह समाज-शास्त्रका नियम है। करोड़ों इससे आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते और न इसे आजीविकाके साधनके रूपमें पेश ही किया गया है। इसका वर्णन तो अन्नपूर्णाके रूपमें किया गया है। अन्नपूर्णा अर्थात् घी-दूध। असंख्य गरीबोंको आज' घी-दूध नहीं मिल सकता। गेहूँकी लपसीमें दूधकी बूंद अथवा घीका छींटा भी डालनेको नहीं मिल सकता। यह भयानक स्थिति है। इसका एक ही इलाज है यदि एक-एक व्यक्ति एक-एक रुपयेका काम करें तो वह मालूम नहीं होगा, परन्तु यदि सात हजारकी आबादी वाला गाँव इस तरहसे सात हजार रुपया पैदा करे तो वह देखा जा सकता है। इस चरखेको साधनेसे दूसरे अनेक गुण खुद-ब-खुद आ जाते हैं। इसके साथ सादगी आती है, सरलता आती है, नियमितता आती है और एक बात में नियमितता आ जानेका मतलब है सारे जीवन में नियमितता आ जाना --ठीक उसी तरह जिस तरह टेढ़े हो गये चौखटेका जो एक कोना खराब हो गया हो उसे ठीक कर देने से बाकीके सारे कोने खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं। यह भूमितिका नियम है। एक कामके नियमित होनेसे सब काम नियमित हो जाते हैं। आज यदि आप चरखेको स्वीकार न करेंगे तो कल मुझे याद करेंगे। जब पानी थोड़ा बरसता हो, तभी बाँध बाँधकर उसे इकट्ठा कर लीजिए। जब प्रवाह आता है, तब बाँध बाँधनेवाला उसे नहीं रोक सकता तथा बाँध और पानी दोनोंको खो बैठता है। इसलिए आज, जबकि समय है, मैं आपसे कहता हूँ कि आप चेतें, जागें। बनिये-का हिसाब न करें; चरखेसे आपमें से एक व्यक्तिको कितनी आमदनी होती है, उसपर विचार न कर राष्ट्रको कितनी आय होगी, इसका विचार करे। त्रापज-जैसे छोटे गाँवमें जब लोगोंको हिसाब करके बताया, तब वे चकित रह गये। काठिया-वाड़ उपजाऊ नहीं है। उसमें तो लकड़ीकी फसल पत्थरकी फसल -- पकती है, और जमीनके उर्वर न होनेसे लोग छः महीने तो क्या, आठ महीने बरोठेपर बैठकर गप्पें मारते हैं, और न हुआ तो थोड़ी अफीम ही खा लेते हैं। मैंने त्रापजके लोगोंको समझाया कि वे किस तरहसे आसानीसे दो हजार बचा सकते हैं। एक सेर रुईके पीछे ज्यादा खर्च तो कताईका ही है, बुनाईका नहीं। अपने घरकी रुई आप घरमें ही साफ करें और कातें तो केवल बुनाईका ही खर्च पड़े तथा यदि केवल बुनाईका ही खर्च पड़ता हो तो हम दुनियाकी मिलोंके साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते है। कारण कि बुनने का खर्च तो मिलोंको भी लगभग हाथ करघे जितना ही पड़ जाता है। इस चाबीका महत्त्व हिन्दुस्तान की जनता समझती थी, इसलिए उसने चूल्हेकी भाँति चरखेको भी साथ रखा था। यह चाबी उसके हाथसे गई, और बस हमारा जीवन अपवित्र हो गया, हम नास्तिक हो गये, हमें ईश्वरका भय नहीं रहा। आप आस्तिक बनना चाहते हों, पवित्र होना चाहते हों, अपनी बहनोंके शीलकी रक्षा करना चाहते हों
तो चरखेको अंगीकार करें। चरखेमें ही देशकी जागृति है, हिन्दू-मुस्लिम एकता है,<noinclude></noinclude>
rf9t9iwuv5y1ytwxzcapdvnd46clr8y
673397
673394
2026-08-23T17:03:31Z
Manikantkmr
5554
673397
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh||भाषण : खेडूत परिषद् में|६३७}}</noinclude>करती तो नाश ही होगा। यह समाज-शास्त्रका नियम है। व्यक्तिगत शास्त्रका नहीं,
यह समाज-शास्त्रका नियम है। करोड़ों इससे आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते और न इसे आजीविकाके साधनके रूपमें पेश ही किया गया है। इसका वर्णन तो अन्नपूर्णाके रूपमें किया गया है। अन्नपूर्णा अर्थात् घी-दूध। असंख्य गरीबोंको आज' घी-दूध नहीं मिल सकता। गेहूँकी लपसीमें दूधकी बूंद अथवा घीका छींटा भी डालनेको नहीं मिल सकता। यह भयानक स्थिति है। इसका एक ही इलाज है यदि एक-एक व्यक्ति एक-एक रुपयेका काम करें तो वह मालूम नहीं होगा, परन्तु यदि सात हजारकी आबादी वाला गाँव इस तरहसे सात हजार रुपया पैदा करे तो वह देखा जा सकता है। इस चरखेको साधनेसे दूसरे अनेक गुण खुद-ब-खुद आ जाते हैं। इसके साथ सादगी आती है, सरलता आती है, नियमितता आती है और एक बात में नियमितता आ जानेका मतलब है सारे जीवन में नियमितता आ जाना --ठीक उसी तरह जिस तरह टेढ़े हो गये चौखटेका जो एक कोना खराब हो गया हो उसे ठीक कर देने से बाकीके सारे कोने खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं। यह भूमितिका नियम है। एक कामके नियमित होनेसे सब काम नियमित हो जाते हैं। आज यदि आप चरखेको स्वीकार न करेंगे तो कल मुझे याद करेंगे। जब पानी थोड़ा बरसता हो, तभी बाँध बाँधकर उसे इकट्ठा कर लीजिए। जब प्रवाह आता है, तब बाँध बाँधनेवाला उसे नहीं रोक सकता तथा बाँध और पानी दोनोंको खो बैठता है। इसलिए आज, जबकि समय है, मैं आपसे कहता हूँ कि आप चेतें, जागें। बनिये-का हिसाब न करें; चरखेसे आपमें से एक व्यक्तिको कितनी आमदनी होती है, उसपर विचार न कर राष्ट्रको कितनी आय होगी, इसका विचार करे। त्रापज-जैसे छोटे गाँवमें जब लोगोंको हिसाब करके बताया, तब वे चकित रह गये। काठिया-वाड़ उपजाऊ नहीं है। उसमें तो लकड़ीकी फसल पत्थरकी फसल -- पकती है, और जमीनके उर्वर न होनेसे लोग छः महीने तो क्या, आठ महीने बरोठेपर बैठकर गप्पें मारते हैं, और न हुआ तो थोड़ी अफीम ही खा लेते हैं। मैंने त्रापजके लोगोंको समझाया कि वे किस तरहसे आसानीसे दो हजार बचा सकते हैं। एक सेर रुईके पीछे ज्यादा खर्च तो कताईका ही है, बुनाईका नहीं। अपने घरकी रुई आप घरमें ही साफ करें और कातें तो केवल बुनाईका ही खर्च पड़े तथा यदि केवल बुनाईका ही खर्च पड़ता हो तो हम दुनियाकी मिलोंके साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते है। कारण कि बुनने का खर्च तो मिलोंको भी लगभग हाथ करघे जितना ही पड़ जाता है। इस चाबीका महत्त्व हिन्दुस्तान की जनता समझती थी, इसलिए उसने चूल्हेकी भाँति चरखेको भी साथ रखा था। यह चाबी उसके हाथसे गई, और बस हमारा जीवन अपवित्र हो गया, हम नास्तिक हो गये, हमें ईश्वरका भय नहीं रहा। आप आस्तिक बनना चाहते हों, पवित्र होना चाहते हों, अपनी बहनोंके शीलकी रक्षा करना चाहते हों
तो चरखेको अंगीकार करें। चरखेमें ही देशकी जागृति है, हिन्दू-मुस्लिम एकता है,<noinclude></noinclude>
q92h526vphcrtki4sspnzxdt479uq5b
673468
673397
2026-08-24T02:53:41Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673468
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||भाषण : खेडूत परिषद् में|६३७}}</noinclude>करती तो नाश ही होगा। यह समाज-शास्त्रका नियम है। व्यक्तिगत शास्त्रका नहीं, यह समाज-शास्त्रका नियम है। करोड़ों इससे आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते और न इसे आजीविकाके साधनके रूपमें पेश ही किया गया है। इसका वर्णन तो अन्नपूर्णाके रूपमें किया गया है। अन्नपूर्णा अर्थात् घी-दूध। असंख्य गरीबोंको आज घी-दूध नहीं मिल सकता। गेहूँकी लपसीमें दूधकी बूंद अथवा घीका छींटा भी डालनेको नहीं मिल सकता। यह भयानक स्थिति है। इसका एक ही इलाज है यदि एक-एक व्यक्ति एक-एक रुपयेका काम करें तो वह मालूम नहीं होगा, परन्तु यदि सात हजारकी आबादी वाला गाँव इस तरहसे सात हजार रुपया पैदा करे तो वह देखा जा सकता है। इस चरखेको साधनेसे दूसरे अनेक गुण खुद-ब-खुद आ जाते हैं। इसके साथ सादगी आती है, सरलता आती है, नियमितता आती है और एक बात में नियमितता आ जानेका मतलब है सारे जीवन में नियमितता आ जाना --ठीक उसी तरह जिस तरह टेढ़े हो गये चौखटेका जो एक कोना खराब हो गया हो उसे ठीक कर देने से बाकीके सारे कोने खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं। यह भूमितिका नियम है। एक कामके नियमित होनेसे सब काम नियमित हो जाते हैं। आज यदि आप चरखेको स्वीकार न करेंगे तो कल मुझे याद करेंगे। जब पानी थोड़ा बरसता हो, तभी बाँध बाँधकर उसे इकट्ठा कर लीजिए। जब प्रवाह आता है, तब बाँध बाँधनेवाला उसे नहीं रोक सकता तथा बाँध और पानी दोनोंको खो बैठता है। इसलिए आज, जबकि समय है, मैं आपसे कहता हूँ कि आप चेतें, जागें। बनिये-का हिसाब न करें; चरखेसे आपमें से एक व्यक्तिको कितनी आमदनी होती है, उसपर विचार न कर राष्ट्रको कितनी आय होगी, इसका विचार करे। त्रापज-जैसे छोटे गाँवमें जब लोगोंको हिसाब करके बताया, तब वे चकित रह गये। काठिया-वाड़ उपजाऊ नहीं है। उसमें तो लकड़ीकी फसल पत्थरकी फसल-- पकती है, और जमीनके उर्वर न होनेसे लोग छः महीने तो क्या, आठ महीने बरोठेपर बैठकर गप्पें मारते हैं, और न हुआ तो थोड़ी अफीम ही खा लेते हैं। मैंने त्रापजके लोगोंको समझाया कि वे किस तरहसे आसानीसे दो हजार बचा सकते हैं। एक सेर रुईके पीछे ज्यादा खर्च तो कताईका ही है, बुनाईका नहीं। अपने घरकी रुई आप घरमें ही साफ करें और कातें तो केवल बुनाईका ही खर्च पड़े तथा यदि केवल बुनाईका ही खर्च पड़ता हो तो हम दुनियाकी मिलोंके साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते है। कारण कि बुनने का खर्च तो मिलोंको भी लगभग हाथ करघे जितना ही पड़ जाता है। इस चाबीका महत्त्व हिन्दुस्तान की जनता समझती थी, इसलिए उसने चूल्हेकी भाँति चरखेको भी साथ रखा था। यह चाबी उसके हाथसे गई, और बस हमारा जीवन अपवित्र हो गया, हम नास्तिक हो गये, हमें ईश्वरका भय नहीं रहा। आप आस्तिक बनना चाहते हों, पवित्र होना चाहते हों, अपनी बहनोंके शीलकी रक्षा करना चाहते हों
तो चरखेको अंगीकार करें। चरखेमें ही देशकी जागृति है, हिन्दू-मुस्लिम एकता है,<noinclude></noinclude>
88s6dci1y9rq0lzmjgjmwa895wpch37
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७४
250
185129
673401
643193
2026-08-23T17:08:36Z
Manikantkmr
5554
673401
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>देशकी गरीबीका निराकरण है, सारे देशके किसानोंका उद्धार है; और हिन्दू समाज-
शास्त्रके पालनका आधार भी इसीपर है।
आप पाटीदार लोग अन्त्यजोंके साथ अच्छी तरहसे व्यवहार नहीं करते, ऐसा मैंने सुना है। आप अपनेको क्षत्रिय मानते हों तो आप अन्त्यजोंके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते, उन्हें मार-पीट नहीं सकते, ज्यादा काम लेना और कम दाम देना, ऐसा राक्षसी न्याय नहीं कर सकते। 'गीता' देवताओंको सन्तुष्ट रखनेको कहती है, "देवताओंको सन्तुष्ट रखोगे तो देवता वर्षा देंगे।" देवता आकाशमें नहीं हैं। आपके देवता अन्त्यज हैं, आपके देवता आपके पौनी-पसारी हैं। हिन्दुस्तानका देवता हिन्दुस्तानकी गरीब जनता है। दया-धर्मसे विहीन धर्म पाखण्ड ह। दया ही धर्मका मूल है और उसका त्याग करनेवाला ईश्वरका त्याग करता है; रंकका त्याग करनेवाला सबका त्याग करता है। अन्त्यजों और रंकोंको यदि हम स्थान न देंगे तो हमारा नाश निश्चित है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' १-२-१९२५<noinclude></noinclude>
9fcp58kciphmbk4yq10mtol6foq3fjb
673469
673401
2026-08-24T02:56:30Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673469
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>देशकी गरीबीका निराकरण है, सारे देशके किसानोंका उद्धार है; और हिन्दू समाज-
शास्त्रके पालनका आधार भी इसीपर है।
आप पाटीदार लोग अन्त्यजोंके साथ अच्छी तरहसे व्यवहार नहीं करते, ऐसा मैंने सुना है। आप अपनेको क्षत्रिय मानते हों तो आप अन्त्यजोंके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते, उन्हें मार-पीट नहीं सकते, ज्यादा काम लेना और कम दाम देना, ऐसा राक्षसी न्याय नहीं कर सकते। 'गीता' देवताओंको सन्तुष्ट रखनेको कहती है, "देवताओंको सन्तुष्ट रखोगे तो देवता वर्षा देंगे।" देवता आकाशमें नहीं हैं। आपके देवता अन्त्यज हैं, आपके देवता आपके पौनी-पसारी हैं। हिन्दुस्तानका देवता हिन्दुस्तानकी गरीब जनता है। दया-धर्मसे विहीन धर्म पाखण्ड हैं। दया ही धर्मका मूल है और उसका त्याग करनेवाला ईश्वरका त्याग करता है; रंकका त्याग करनेवाला सबका त्याग करता है। अन्त्यजों और रंकोंको यदि हम स्थान न देंगे तो हमारा नाश निश्चित है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' १-२-१९२५<noinclude></noinclude>
6fc1adg9gps7t49unyk9n9rnj34tyss
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७५
250
185130
673403
643194
2026-08-23T17:18:40Z
Manikantkmr
5554
673403
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{C|{{X-larger|परिशिष्ट}}}}
{{C|{{larger|परिशिष्ट १}}}}
{{C|बोलशेविज्मपर मानवेन्द्रनाथ रायके विचार}}
महात्मा गांधी के कुछ अमेरिकी मित्रोंने उन्हें लिखा कि धमके नामपर आप भारतमें शायद बोलशेविज्मको दाखिल कर रहे हैं। ये ख्वामखाह "मित्र" बननेवाले लोग, स्पष्ट ही आंग्ल-सैक्सन साम्राज्यवादके पक्षधरोंसे (जो अकसर दुनिया के सामने अपने को शान्तिवादियों के बानेमें पेश करते हैं) प्रेरणा लेकर, मुसलमान जातियोंके विद्रोहको विश्वके लिए एक भारी खतरा बताते हैं, क्योंकि इस विद्रोहको बोलशेविक रूसका
समर्थन प्राप्त है। महात्माजी चाहते तो बड़ी आसानीसे इस उद्धततापूर्ण पत्रका मुनासिब
जवाब दे सकते थे । वे अपने “ जिम्मेदार (?) विदेशी मित्रों" से कह सकते थे कि
मुसलमान जातियोंके पास विद्रोह करनेके उचित कारण हैं, और इस विद्रोहका समर्थन
करनेवाला कोई भी राजनीतिक सिद्धान्त या सरकार स्वतन्त्रताके तमाम पक्षधरोंकी दृष्टिमें सम्मानकी पात्र होनी चाहिए। इसके अलावा वे अपने अमेरिकी मित्रोंसे यह भी कह सकते हैं कि अगर सचमुच आपको इस विद्रोहमें विश्व के लिए कोई बहुत बड़ा
खतरा दिखाई देता है तो कृपा कर अपने यहाँ उसका कुछ उपाय करिये। दुनियाको
आज अमेरिकी साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरा और किस चीजसे है? क्या मुसलमान
जातियोंका विद्रोह 'कू-क्लक्स-क्लान" और 'अमेरिकन लीजन' से भी ज्यादा खतरनाक है? क्या बोलशेविकोंका अनीश्वरवाद अमेरिकी लोकतन्त्रकी एशिया - विरोधी भावनासे भी अधिक अधर्ममय है?
किन्तु, महात्माजी ने ऐसा दो टूक जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने दृष्टिकोणका औचित्य सिद्ध करना उचित समझा। कोई उनपर बोलशेविक प्रवृत्तिका सन्देह न कर सके, उन्होंने इसकी पेशबन्दी कर डाली । किन्तु, विचित्र बात यह है कि यद्यपि स्वयं अपने कथनके अनुसार वे बोलशेविज्म के विषय में कुछ नहीं जानते, फिर भी वे दुनिया के सामने यह सिद्ध करनेके लिए अत्यन्त उत्सुक थे कि इसके प्रति उनका कोई रुझान नहीं है। उनकी सहज बोलशेविज्म-विरोधी भावना इतनी प्रबल है । 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख में वे कहते हैं कि " सबसे पहले तो मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मुझे पता नहीं, बोलशेविज्मके मानी क्या हैं।" यह तो उनकी प्रतिष्ठाको बहुत आँच पहुँचानेवाली स्वीकारोक्ति है, क्योंकि यह स्वीकारोक्ति उस व्यक्तिकी है जो एक बहुत बड़े जन-आन्दोलनका नेतृत्व कर रहा है। उसी लेखमें महात्माजीने यह भी कहा कि वे जानते हैं कि इस मामले में दो परस्पर विरोधी पक्ष हैं -- “एक तो उसका बड़ा भद्दा और
'''१. गृह-युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राज्य अमेरिकाके दक्षिणी राज्योंकी नीग्रो-विरोधी गुप्त समिति।'''<noinclude></noinclude>
9nlu37eioz4mrtwawjuze7fvpzf7l7d
673405
673403
2026-08-23T17:19:26Z
Manikantkmr
5554
673405
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{C|{{X-larger|परिशिष्ट}}}}
{{C|{{larger|परिशिष्ट १}}}}
{{C|बोलशेविज्मपर मानवेन्द्रनाथ रायके विचार}}
महात्मा गांधी के कुछ अमेरिकी मित्रोंने उन्हें लिखा कि धमके नामपर आप भारतमें शायद बोलशेविज्मको दाखिल कर रहे हैं। ये ख्वामखाह "मित्र" बननेवाले लोग, स्पष्ट ही आंग्ल-सैक्सन साम्राज्यवादके पक्षधरोंसे (जो अकसर दुनिया के सामने अपने को शान्तिवादियों के बानेमें पेश करते हैं) प्रेरणा लेकर, मुसलमान जातियोंके विद्रोहको विश्वके लिए एक भारी खतरा बताते हैं, क्योंकि इस विद्रोहको बोलशेविक रूसका
समर्थन प्राप्त है। महात्माजी चाहते तो बड़ी आसानीसे इस उद्धततापूर्ण पत्रका मुनासिब
जवाब दे सकते थे । वे अपने “ जिम्मेदार (?) विदेशी मित्रों" से कह सकते थे कि
मुसलमान जातियोंके पास विद्रोह करनेके उचित कारण हैं, और इस विद्रोहका समर्थन
करनेवाला कोई भी राजनीतिक सिद्धान्त या सरकार स्वतन्त्रताके तमाम पक्षधरोंकी दृष्टिमें सम्मानकी पात्र होनी चाहिए। इसके अलावा वे अपने अमेरिकी मित्रोंसे यह भी कह सकते हैं कि अगर सचमुच आपको इस विद्रोहमें विश्व के लिए कोई बहुत बड़ा
खतरा दिखाई देता है तो कृपा कर अपने यहाँ उसका कुछ उपाय करिये। दुनियाको
आज अमेरिकी साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरा और किस चीजसे है? क्या मुसलमान
जातियोंका विद्रोह 'कू-क्लक्स-क्लान" और 'अमेरिकन लीजन' से भी ज्यादा खतरनाक है? क्या बोलशेविकोंका अनीश्वरवाद अमेरिकी लोकतन्त्रकी एशिया - विरोधी भावनासे भी अधिक अधर्ममय है?
किन्तु, महात्माजी ने ऐसा दो टूक जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने दृष्टिकोणका औचित्य सिद्ध करना उचित समझा। कोई उनपर बोलशेविक प्रवृत्तिका सन्देह न कर सके, उन्होंने इसकी पेशबन्दी कर डाली। किन्तु, विचित्र बात यह है कि यद्यपि स्वयं अपने कथनके अनुसार वे बोलशेविज्म के विषय में कुछ नहीं जानते, फिर भी वे दुनिया के सामने यह सिद्ध करनेके लिए अत्यन्त उत्सुक थे कि इसके प्रति उनका कोई रुझान नहीं है। उनकी सहज बोलशेविज्म-विरोधी भावना इतनी प्रबल है। 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख में वे कहते हैं कि " सबसे पहले तो मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मुझे पता नहीं, बोलशेविज्मके मानी क्या हैं।" यह तो उनकी प्रतिष्ठाको बहुत आँच पहुँचानेवाली स्वीकारोक्ति है, क्योंकि यह स्वीकारोक्ति उस व्यक्तिकी है जो एक बहुत बड़े जन-आन्दोलनका नेतृत्व कर रहा है। उसी लेखमें महात्माजीने यह भी कहा कि वे जानते हैं कि इस मामले में दो परस्पर विरोधी पक्ष हैं -- “एक तो उसका बड़ा भद्दा और
'''१. गृह-युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राज्य अमेरिकाके दक्षिणी राज्योंकी नीग्रो-विरोधी गुप्त समिति।'''<noinclude></noinclude>
bpck321ojni8hoy3bst2s1btqu2w03h
673471
673405
2026-08-24T03:01:40Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673471
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{X-larger|परिशिष्ट}}}}
{{C|{{larger|परिशिष्ट १}}}}
{{C|बोलशेविज्मपर मानवेन्द्रनाथ रायके विचार}}
महात्मा गांधी के कुछ अमेरिकी मित्रोंने उन्हें लिखा कि धमके नामपर आप भारतमें शायद बोलशेविज्मको दाखिल कर रहे हैं। ये ख्वामखाह "मित्र" बननेवाले लोग, स्पष्ट ही आंग्ल-सैक्सन साम्राज्यवादके पक्षधरोंसे (जो अकसर दुनिया के सामने अपने को शान्तिवादियों के बानेमें पेश करते हैं) प्रेरणा लेकर, मुसलमान जातियोंके विद्रोहको विश्वके लिए एक भारी खतरा बताते हैं, क्योंकि इस विद्रोहको बोलशेविक रूसका
समर्थन प्राप्त है। महात्माजी चाहते तो बड़ी आसानीसे इस उद्धततापूर्ण पत्रका मुनासिब
जवाब दे सकते थे । वे अपने “ जिम्मेदार (?) विदेशी मित्रों" से कह सकते थे कि
मुसलमान जातियोंके पास विद्रोह करनेके उचित कारण हैं, और इस विद्रोहका समर्थन
करनेवाला कोई भी राजनीतिक सिद्धान्त या सरकार स्वतन्त्रताके तमाम पक्षधरोंकी दृष्टिमें सम्मानकी पात्र होनी चाहिए। इसके अलावा वे अपने अमेरिकी मित्रोंसे यह भी कह सकते हैं कि अगर सचमुच आपको इस विद्रोहमें विश्व के लिए कोई बहुत बड़ा खतरा दिखाई देता है तो कृपा कर अपने यहाँ उसका कुछ उपाय करिये। दुनियाको आज अमेरिकी साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरा और किस चीजसे है? क्या मुसलमान
जातियोंका विद्रोह 'कू-क्लक्स-क्लान" और 'अमेरिकन लीजन' से भी ज्यादा खतरनाक है? क्या बोलशेविकोंका अनीश्वरवाद अमेरिकी लोकतन्त्रकी एशिया-विरोधी भावनासे भी अधिक अधर्ममय है?
किन्तु, महात्माजी ने ऐसा दो टूक जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने दृष्टिकोणका औचित्य सिद्ध करना उचित समझा। कोई उनपर बोलशेविक प्रवृत्तिका सन्देह न कर सके, उन्होंने इसकी पेशबन्दी कर डाली। किन्तु, विचित्र बात यह है कि यद्यपि स्वयं अपने कथनके अनुसार वे बोलशेविज्म के विषय में कुछ नहीं जानते, फिर भी वे दुनिया के सामने यह सिद्ध करनेके लिए अत्यन्त उत्सुक थे कि इसके प्रति उनका कोई रुझान नहीं है। उनकी सहज बोलशेविज्म-विरोधी भावना इतनी प्रबल है। 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख में वे कहते हैं कि " सबसे पहले तो मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मुझे पता नहीं, बोलशेविज्मके मानी क्या हैं।" यह तो उनकी प्रतिष्ठाको बहुत आँच पहुँचानेवाली स्वीकारोक्ति है, क्योंकि यह स्वीकारोक्ति उस व्यक्तिकी है जो एक बहुत बड़े जन-आन्दोलनका नेतृत्व कर रहा है। उसी लेखमें महात्माजीने यह भी कहा कि वे जानते हैं कि इस मामले में दो परस्पर विरोधी पक्ष हैं -- “एक तो उसका बड़ा भद्दा और
'''१. गृह-युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राज्य अमेरिकाके दक्षिणी राज्योंकी नीग्रो-विरोधी गुप्त समिति।'''<noinclude></noinclude>
3prusu5bbmhgcshoon9ctfk8t8anifp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७६
250
185131
673407
643195
2026-08-23T17:24:33Z
Manikantkmr
5554
673407
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>काला चित्र खींचा करता है और दूसरा उसे संसारकी तमाम दलित-पतित और पीड़ित
जातियोंके उद्धारका आन्दोलन बताता है।" लेकिन वे यह नहीं जानते कि वे किसकी
बातका विश्वास करें। यहाँ भी वे साधारण मानव-बुद्धिसे काम ले सकते थे। वे बड़ी
आसानीसे यह बात देख सकते थे कि वे कौन हैं जो उसका काला और भद्दा चित्र
खींचते हैं। ये वे ही लोग हैं जो खून और खंजरकी नीति के बलपर दुनियापर शासन
कर रहे हैं। महात्माजीको अपनी निष्पक्षताका बड़ा ध्यान रहता है, सो उसका ध्यान
रखते हुए भले ही वे बोलशेविज्मका उज्ज्वल चित्र पेश करनेवालोंपर विश्वास न करें; किन्तु उन्हें इस बातकी प्रतीति करानेकी भी क्या कोई आवश्यकता है कि पहला पक्ष मानव-जातिका मित्र या उद्धारकर्त्ता नहीं है? इसलिए, जब इस पक्षवाले किसी चीजका बहुत काला चित्र पेश करते हैं तो मानव-जातिके दलित-शोषित वर्गको सहज ही उसमें किसी घोर अनिष्टकारी उद्देश्यका आभास मिल जाता है; इस दलित मानव-वर्गको लगता है कि यह कालेपनका मुलम्मा उसे छलनेके लिए लगाया गया है। युद्ध-कालमें जब रायटर मित्र राष्ट्रोंकी एक विजयकी खबर देता था तब राष्ट्रवादी भारतीय लोग अन्तरकी इसी अचूक सहज प्रेरणा के कारण समझते थे कि जर्मनीने दो लड़ाइयाँ जीती होंगी और इसी सहज बुद्धिकी प्रेरणाका अनुसरण करते हुए एक अदना मैक्सिकन चपरासी अपनेको गर्वके साथ बोलशेविक कहता है, क्योंकि वह देखता है कि अमेरिकी पूंजीपति बोलशेविज्म के इतने ज्यादा विरुद्ध हैं। लेकिन मैं समझता हूँ, महात्माओं की मनोवृत्ति शायद इतनी जटिल होती है कि उसमें ऐसी किसी सीधी-सादी और सहज मानसिक प्रक्रियाकी गुंजाइश ही नहीं होती।
चूँकि बोलशेविज्म के प्रति इस दुःखद अज्ञानके शिकार सिर्फ महात्माजी ही नहीं, बल्कि और भी बहुतसे भारतीय हैं, और चूंकि इस अज्ञानके बावजूद वे उसके विषय में कोई राय बनानेसे बाज नहीं आते, इसलिए इस भयंकर सिद्धान्त के बारेमें दो शब्द
कह देना अप्रासंगिक नहीं होगा। चूँकि बोलशेविज्म आजकी दुनियाका सबसे प्रमुख
राजनीतिक तत्त्व है, इसलिए इसके सम्बन्ध में कुछ कहना और भी जरूरी हो जाता है। यहाँ प्रसंगवश में यह बता दूँ कि इस आम धारणाके विपरीत कि वह १९१७ की
रूसी क्रान्तिका परिणाम है, वास्तवमें वह उसका बुनियादी सिद्धान्त है। जिस प्रकार
१७८९ की महान् फ्रांसीसी क्रान्तिने अपने समय में यूरोपके राजनीतिक जीवन और
विचारको प्रभावित किया, उसी प्रकार रूसी क्रान्ति भी हमारे युगमें वैसी ही महत्वपूर्ण
भूमिका निभायेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि रूसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है और
रूसी क्रांतिके सिद्धान्त ऐसे हैं कि उसका प्रभाव क्षेत्र अधिक व्यापक होगा - उसमें
एशिया और आफ्रिका भी आ जायेंगे। वस्तुस्थिति यही है। शान्तिवादी मनोवृत्तिकी
जिन स्त्रियों और पुरुषोंकी सदाशयतामें गांधीजी सहज ही विश्वास करके चलते हैं,
उसे दुनिया के अधिक व्यावहारिक लोग गम्भीर सन्देहकी दृष्टिसे देखते हैं। इन शान्ति-
वादियोंकी आशंकासे, जिसका कारण भली-भाँति समझा जा सकता है, और उनकी
रोष-भावनासे उपरोक्त वस्तुस्थितिमें कोई अन्तर नहीं पड़ता।
अब, जहाँतक महात्माजीका सम्बन्ध है, बोलशेविज्मके मुख्य सिद्धान्त कुछ नये नहीं
होंगे। वे खुद भी ऐसा ही मानेंगे। लेकिन अगर सिद्धान्तोंको कार्यान्वित न किया जाये<noinclude></noinclude>
cqvbomjou3l3qxqjs3qwuzp69382sjn
673475
673407
2026-08-24T03:08:36Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673475
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>काला चित्र खींचा करता है और दूसरा उसे संसारकी तमाम दलित-पतित और पीड़ित
जातियोंके उद्धारका आन्दोलन बताता है।" लेकिन वे यह नहीं जानते कि वे किसकी
बातका विश्वास करें। यहाँ भी वे साधारण मानव-बुद्धिसे काम ले सकते थे। वे बड़ी
आसानीसे यह बात देख सकते थे कि वे कौन हैं जो उसका काला और भद्दा चित्र
खींचते हैं। ये वे ही लोग हैं जो खून और खंजरकी नीति के बलपर दुनियापर शासन
कर रहे हैं। महात्माजीको अपनी निष्पक्षताका बड़ा ध्यान रहता है, सो उसका ध्यान
रखते हुए भले ही वे बोलशेविज्मका उज्ज्वल चित्र पेश करनेवालोंपर विश्वास न करें; किन्तु उन्हें इस बातकी प्रतीति करानेकी भी क्या कोई आवश्यकता है कि पहला पक्ष मानव-जातिका मित्र या उद्धारकर्त्ता नहीं है? इसलिए, जब इस पक्षवाले किसी चीजका बहुत काला चित्र पेश करते हैं तो मानव-जातिके दलित-शोषित वर्गको सहज ही उसमें किसी घोर अनिष्टकारी उद्देश्यका आभास मिल जाता है; इस दलित मानव-वर्गको लगता है कि यह कालेपनका मुलम्मा उसे छलनेके लिए लगाया गया है। युद्ध-कालमें जब रायटर मित्र राष्ट्रोंकी एक विजयकी खबर देता था तब राष्ट्रवादी भारतीय लोग अन्तरकी इसी अचूक सहज प्रेरणा के कारण समझते थे कि जर्मनीने दो लड़ाइयाँ जीती होंगी और इसी सहज बुद्धिकी प्रेरणाका अनुसरण करते हुए एक अदना मैक्सिकन चपरासी अपनेको गर्वके साथ बोलशेविक कहता है, क्योंकि वह देखता है कि अमेरिकी पूंजीपति बोलशेविज्म के इतने ज्यादा विरुद्ध हैं। लेकिन मैं समझता हूँ, महात्माओं की मनोवृत्ति शायद इतनी जटिल होती है कि उसमें ऐसी किसी सीधी-सादी और सहज मानसिक प्रक्रियाकी गुंजाइश ही नहीं होती।
चूँकि बोलशेविज्म के प्रति इस दुःखद अज्ञानके शिकार सिर्फ महात्माजी ही नहीं, बल्कि और भी बहुतसे भारतीय हैं, और चूंकि इस अज्ञानके बावजूद वे उसके विषय में कोई राय बनानेसे बाज नहीं आते, इसलिए इस भयंकर सिद्धान्त के बारेमें दो शब्द
कह देना अप्रासंगिक नहीं होगा। चूँकि बोलशेविज्म आजकी दुनियाका सबसे प्रमुख
राजनीतिक तत्त्व है, इसलिए इसके सम्बन्ध में कुछ कहना और भी जरूरी हो जाता है। यहाँ प्रसंगवश मैं यह बता दूँ कि इस आम धारणाके विपरीत कि वह १९१७ की
रूसी क्रान्तिका परिणाम है, वास्तवमें वह उसका बुनियादी सिद्धान्त है। जिस प्रकार
१७८९ की महान् फ्रांसीसी क्रान्तिने अपने समय में यूरोपके राजनीतिक जीवन और
विचारको प्रभावित किया, उसी प्रकार रूसी क्रान्ति भी हमारे युगमें वैसी ही महत्वपूर्ण
भूमिका निभायेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि रूसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है और
रूसी क्रांतिके सिद्धान्त ऐसे हैं कि उसका प्रभाव क्षेत्र अधिक व्यापक होगा--उसमें
एशिया और आफ्रिका भी आ जायेंगे। वस्तुस्थिति यही है। शान्तिवादी मनोवृत्तिकी
जिन स्त्रियों और पुरुषोंकी सदाशयतामें गांधीजी सहज ही विश्वास करके चलते हैं,
उसे दुनिया के अधिक व्यावहारिक लोग गम्भीर सन्देहकी दृष्टिसे देखते हैं। इन शान्ति-
वादियोंकी आशंकासे, जिसका कारण भली-भाँति समझा जा सकता है, और उनकी
रोष-भावनासे उपरोक्त वस्तुस्थितिमें कोई अन्तर नहीं पड़ता।
अब, जहाँतक महात्माजीका सम्बन्ध है, बोलशेविज्मके मुख्य सिद्धान्त कुछ नये नहीं
होंगे। वे खुद भी ऐसा ही मानेंगे। लेकिन अगर सिद्धान्तोंको कार्यान्वित न किया जाये<noinclude></noinclude>
6eflm6o3oeo9p77fd71hj8z34vf3l85
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७७
250
185132
673411
643196
2026-08-23T17:32:50Z
Manikantkmr
5554
673411
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh||परिशिष्ट|६४१}}</noinclude>तो वे निष्प्राण शब्द-भर रह जाते हैं। महात्माजीने खुद कहा है कि वे जनसाधारणको
पूँजीवादके प्रभुत्वसे मुक्त देखना चाहते है। स्वयं बोलशेविज्म इससे कोई अधिक भयं-
कर लक्ष्य लेकर कहाँ चल रहा है? बोलशेविक लोग भी महात्माजी के इस कथन से
सामान्यतः सहमत हैं कि "दुनियाका सबसे बड़ा संकट तो आज वह साम्राज्यवाद है,
जो दिनपर-दिन अपने पैर फैलाता जाता है, दुनियाको लूटता जाता है, जो किसीके
प्रति जिम्मेवार नहीं है, और जो तमाम निर्बल जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व और विकास के लिए खतरा उपस्थित कर रहा है।" लेकिन महात्माजी और बोलशेविकों के
बीच अन्तर यह है कि जहाँ महात्माजी स्वतन्त्रता के इस सिद्धान्तको नैतिकता, धर्म और ईश्वरकी जटिल कल्पनाके सामने गौण बनाकर उसे समस्त व्यावहारिक महत्त्वसे
वंचित कर देते हैं, वहाँ बोलशेविक लोग अपनी दृष्टिपर इस प्रकारके भ्रमों का पर्दा नहीं चढ़ने देते और दुनिया जैसी है, उसके साथ वैसा ही बरतते हैं। नतीजा यह है कि जहाँ बोलशेविज्म इन साम्राज्यवादी शक्तियोंके संयुक्त और दृढ़ विरोधके बावजूद
अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ता है और युगों पुरानी दासताकी फौलादी बेड़ियों की
कड़ियाँ एकके बाद एक तोड़ता जाता है, वहाँ गांधीवाद अन्धेरेमें हाथ-पाँव मार रहा है। और ऐसे नैतिक तथा धार्मिक विधानोंकी सृष्टि करता जा रहा है, जो जन साधारण की अपनी स्वतन्त्रता के लिए लड़नेकी संकल्प-शक्ति के सिर्फ आड़े ही आते हैं।
इतना तो माना ही जा सकता है कि महात्माजी समाजवाद के सामान्य सिद्धान्तों से
परिचित हैं। यहाँ मेरा मतलब सेंट साइमन, टामस मूर, टाल्स्टाय, आदिके अव्यवहार्यं
समाजवादके सिद्धान्तोंसे नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा वस्तुस्थितिकी वास्तविक जानकारी और आर्थिक तथ्यों के आधारपर रचे समाजवादके सिद्धान्तोंसे है। ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं : (१) उत्पादनकी पूँजीवादी प्रणालीका उच्छेद; (२) वैयक्तिक सम्पत्तिकी समाप्ति; (३) सामाजिक स्वामित्व के आधारपर उत्पादन और वितरण के साधनों का पुनर्गठन; और (४) वर्गों में विभाजित समाजका बन्धुत्वकी भावनासे युक्त मानव-परिवार में रूपान्तर। यही सब सिद्धान्त बोलशेविज्म के भी हैं, क्योंकि समाज-वादकी उम्र और विजयगामी प्रारम्भिक अवस्थाका नाम ही बोलशेविज्म है।
'बोलशेविज्म' शब्दको रक्तपात, विनाश, आतंक आदिके साथ जोड़ दिया गया है, लेकिन उसका असली अर्थ बिलकुल निर्दोष है । बोलशेविज्म रूसी शब्द 'बोलशेविकी 'से बना है और बोलशेविकीका अर्थ है बहुसंख्यक पक्षके अनुगामी । इस शब्दका प्रयोग पहले-पहल तब हुआ था, जब सन् १९०३ में कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के सवालपर रूसकी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी दो टुकड़ों में बँट गई थी । लेनिन और कुछ दूसरे लोगों के नेतृत्व में चलनेवाले बहुसंख्यक दलके कार्यक्रम और कार्य-प्रणालीका नाम बोलशेविज्म पड़ गया । और चूंकि रूस के सर्वहारा वर्गने अक्तूबर, १९१७ में जो विजय प्राप्त की, वह उसी कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के अनुसार लड़कर प्राप्त की जिसकी वकालत बहुसंख्यक दल १९०३ से ही करता आ रहा था, इसलिए अक्तूबर क्रान्तिको बोलशेविस्ट विजय कहा जाता है । यह बोलशेविस्ट विजय समाजवाद की पहली विजय है। अब हम देखें कि रूसी क्रान्तिके ठोस परिणाम क्या हैं : (१) एक भ्रष्ट, गैरजिम्मे-
२५-४१<noinclude></noinclude>
bn17p286mmllifrc8h7mldnoj79nnf3
673479
673411
2026-08-24T03:14:58Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673479
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||परिशिष्ट|६४१}}</noinclude>तो वे निष्प्राण शब्द-भर रह जाते हैं। महात्माजीने खुद कहा है कि वे जनसाधारणको
पूँजीवादके प्रभुत्वसे मुक्त देखना चाहते है। स्वयं बोलशेविज्म इससे कोई अधिक भयंकर लक्ष्य लेकर कहाँ चल रहा है? बोलशेविक लोग भी महात्माजी के इस कथन से
सामान्यतः सहमत हैं कि "दुनियाका सबसे बड़ा संकट तो आज वह साम्राज्यवाद है,
जो दिनपर-दिन अपने पैर फैलाता जाता है, दुनियाको लूटता जाता है, जो किसीके
प्रति जिम्मेवार नहीं है, और जो तमाम निर्बल जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व और विकास के लिए खतरा उपस्थित कर रहा है।" लेकिन महात्माजी और बोलशेविकों के
बीच अन्तर यह है कि जहाँ महात्माजी स्वतन्त्रता के इस सिद्धान्तको नैतिकता, धर्म और ईश्वरकी जटिल कल्पनाके सामने गौण बनाकर उसे समस्त व्यावहारिक महत्त्वसे
वंचित कर देते हैं, वहाँ बोलशेविक लोग अपनी दृष्टिपर इस प्रकारके भ्रमों का पर्दा नहीं चढ़ने देते और दुनिया जैसी है, उसके साथ वैसा ही बरतते हैं। नतीजा यह है कि जहाँ बोलशेविज्म इन साम्राज्यवादी शक्तियोंके संयुक्त और दृढ़ विरोधके बावजूद
अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ता है और युगों पुरानी दासताकी फौलादी बेड़ियों की
कड़ियाँ एकके बाद एक तोड़ता जाता है, वहाँ गांधीवाद अन्धेरेमें हाथ-पाँव मार रहा है। और ऐसे नैतिक तथा धार्मिक विधानोंकी सृष्टि करता जा रहा है, जो जन साधारण की अपनी स्वतन्त्रता के लिए लड़नेकी संकल्प-शक्ति के सिर्फ आड़े ही आते हैं।
इतना तो माना ही जा सकता है कि महात्माजी समाजवाद के सामान्य सिद्धान्तों से
परिचित हैं। यहाँ मेरा मतलब सेंट साइमन, टामस मूर, टाल्स्टाय, आदिके अव्यवहार्यं
समाजवादके सिद्धान्तोंसे नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा वस्तुस्थितिकी वास्तविक जानकारी और आर्थिक तथ्यों के आधारपर रचे समाजवादके सिद्धान्तोंसे है। ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं : (१) उत्पादनकी पूँजीवादी प्रणालीका उच्छेद; (२) वैयक्तिक सम्पत्तिकी समाप्ति; (३) सामाजिक स्वामित्व के आधारपर उत्पादन और वितरण के साधनों का पुनर्गठन; और (४) वर्गों में विभाजित समाजका बन्धुत्वकी भावनासे युक्त मानव-परिवार में रूपान्तर। यही सब सिद्धान्त बोलशेविज्म के भी हैं, क्योंकि समाज-वादकी उम्र और विजयगामी प्रारम्भिक अवस्थाका नाम ही बोलशेविज्म है।
'बोलशेविज्म' शब्दको रक्तपात, विनाश, आतंक आदिके साथ जोड़ दिया गया है, लेकिन उसका असली अर्थ बिलकुल निर्दोष है। बोलशेविज्म रूसी शब्द 'बोलशेविकी 'से बना है और बोलशेविकीका अर्थ है बहुसंख्यक पक्षके अनुगामी। इस शब्दका प्रयोग पहले-पहल तब हुआ था, जब सन् १९०३ में कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के सवालपर रूसकी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी दो टुकड़ों में बँट गई थी। लेनिन और कुछ दूसरे लोगों के नेतृत्व में चलनेवाले बहुसंख्यक दलके कार्यक्रम और कार्य-प्रणालीका नाम बोलशेविज्म पड़ गया। और चूंकि रूस के सर्वहारा वर्गने अक्तूबर, १९१७ में जो विजय प्राप्त की, वह उसी कार्यक्रम और कार्य-प्रणाली के अनुसार लड़कर प्राप्त की जिसकी वकालत बहुसंख्यक दल १९०३ से ही करता आ रहा था, इसलिए अक्तूबर क्रान्तिको बोलशेविस्ट विजय कहा जाता है। यह बोलशेविस्ट विजय समाजवाद की पहली विजय है। अब हम देखें कि रूसी क्रान्तिके ठोस परिणाम क्या हैं : (१) एक भ्रष्ट, गैरजिम्मे-
२५-४१<noinclude></noinclude>
s6c2fwa4eqt4d703m5vuhkobgpu2vq9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७८
250
185133
673417
643197
2026-08-23T17:39:39Z
Manikantkmr
5554
673417
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दार और निरंकुश शासनका अन्त हो गया। (२) उस बुर्जुआ वर्गका भी सफाया हो
गया जो जनतन्त्रकी आड़ में, विदेशी सरकारों की मददसे, रूसी जनताको क्रान्तिके लाभोंसे वंचित करना चाहता था। (३) जमींदार वर्ग, जो जारकी निरंकुश सत्ताका मूलाधार था, नष्ट कर दिया गया और जमीन पूरे राष्ट्रकी सम्पत्ति घोषित कर दी गई
और किसानों में बाँट दी गई। (४) बड़े-बड़े उद्योग राष्ट्रकी सम्पत्ति घोषित कर दिये
गये। (५) विदेशी व्यापारपर राज्यका एकाधिकार हो गया। (६) विधान बनाने और
प्रशासन चलाने की सारी सत्ता जनताके उस हिस्सेको सौंप दी गई जिसका प्रबल बहुमत था, अर्थात् सत्ता मजदूरों, किसानों और सैनिकोंको सौंप दी गई। वे इस सत्ताका प्रयोग अपनी परिषदों (सोवियतों) द्वारा करते हैं । (७) निजी तौरपर सम्पत्ति रखने का सारा अधिकार और उसकी रूसे मिलनेवाले सब विशेषाधिकार खत्म कर दिये गये। ये हैं बोल विज्म के सिद्धान्त, जिन्हें रूस में क्रान्तिके फलस्वरूप व्यवहारमें उतारा गया है। तो अब चूंकि महात्माजी बोलशेविज्मका अर्थ जान गये इसलिए हम यह जानना चाहेंगे कि उसके प्रति उनका क्या रुख है। इस प्रश्न के उत्तर में न सिर्फ भारतको बल्कि सारी दुनियाको दिलचस्पी होगी।
अब हम ज्यादा नाजुक सवालपर आते हैं। महात्माजीको शायद इन सिद्धान्तों के खिलाफ कोई आपत्ति न हो, लेकिन उन्हें कार्यान्वित करने की रीतिके बारेमें वे निश्चय
ही अनेक शर्तें रखेंगे। उनके लिए तो हर चीजकी एक ही कसौटी है। अगर बोलशेविज्म अनीश्वरवादी है, तो बस, वे उसके खिलाफ हैं। खैर, हमने तो उन्हें संक्षेपमें बोलशेविज्मकी परिभाषा दे दी है। अब वे विचार करें और कहें कि बोलशेविज्म ईश्वरको नकारता। है या क्या करता है। जबतक वे वैयक्तिक सम्पत्ति और निहित स्वार्थोको ईश्वरीय विधान न मान लें, तबतक उनके उन्मूलनको वे ईश्वरको नकारना नहीं कह सकते। कारण, इसमें शक नहीं कि बोलशेविज्म वैयक्तिक सम्पत्ति और स्थापित स्वार्थीको, जो इतिहासके आदिकाल से ही मनुष्य-समाज के लिए अभिशाप-रूप सिद्ध हुए हैं, अमान्य करता है। बोलशेविज्म के व्यावहारिक कार्यक्रममें ईश्वर या धर्मका कोई सवाल ही नहीं उठता। वह न ईश्वरवादी है और न अनीश्वरवादी है। उसका सम्बन्ध मनुष्य के ऐहिक जीवनसे है। ईश्वर या धर्म के साथ उसका झगड़ा यदि होता है तो तब होता है, जब ईश्वर और धर्म उसके आड़े आते हैं। ऐसी हालत में, साम्यवाद कल्पित सर्वशक्तिमान -से भी टक्कर लेने में नहीं हिचकिचाता और नास्तिक बन जाता है और इस तरह वह महात्मा गांधी के समर्थनको खो बैठने का खतरा मोल लेता है । लेकिन ऐसा करके वह न केवल जनताके भौतिक अधिकारोंका प्रबलतम समर्थक बन जाता है बल्कि शासित वर्गने सदियोंसे जनताको जिस अज्ञान और अन्धविश्वास के अन्धकारमें रख छोड़ा है, उसे नष्ट करनेके लिए बौद्धिक और आत्मिक मुक्तिकी मशालको भी प्रज्वलित करता हैं।
महात्माजी यदि खुले तौरपर उच्च वर्गीका समर्थन नहीं करते हों तो वे इस
बात से इनकार नहीं कर सकते कि बोलशेविज्म एक मानव कल्याणकारी आन्दोलन
है। लेकिन हाँ उसे सरलतापूर्वक कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। रूस में क्रान्तिके<noinclude></noinclude>
huow8uabfb8xqab0sovadrzh4vso2dk
673486
673417
2026-08-24T03:21:48Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673486
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दार और निरंकुश शासनका अन्त हो गया। (२) उस बुर्जुआ वर्गका भी सफाया हो
गया जो जनतन्त्रकी आड़ में, विदेशी सरकारों की मददसे, रूसी जनताको क्रान्तिके लाभोंसे वंचित करना चाहता था। (३) जमींदार वर्ग, जो जारकी निरंकुश सत्ताका मूलाधार था, नष्ट कर दिया गया और जमीन पूरे राष्ट्रकी सम्पत्ति घोषित कर दी गई
और किसानों में बाँट दी गई। (४) बड़े-बड़े उद्योग राष्ट्रकी सम्पत्ति घोषित कर दिये
गये। (५) विदेशी व्यापारपर राज्यका एकाधिकार हो गया। (६) विधान बनाने और
प्रशासन चलाने की सारी सत्ता जनताके उस हिस्सेको सौंप दी गई जिसका प्रबल बहुमत था, अर्थात् सत्ता मजदूरों, किसानों और सैनिकोंको सौंप दी गई। वे इस सत्ताका प्रयोग अपनी परिषदों (सोवियतों) द्वारा करते हैं । (७) निजी तौरपर सम्पत्ति रखने का सारा अधिकार और उसकी रूसे मिलनेवाले सब विशेषाधिकार खत्म कर दिये गये। ये हैं बोलशविज्म के सिद्धान्त, जिन्हें रूस में क्रान्तिके फलस्वरूप व्यवहारमें उतारा गया है। तो अब चूंकि महात्माजी बोलशेविज्मका अर्थ जान गये इसलिए हम यह जानना चाहेंगे कि उसके प्रति उनका क्या रुख है। इस प्रश्न के उत्तर में न सिर्फ भारतको बल्कि सारी दुनियाको दिलचस्पी होगी।
अब हम ज्यादा नाजुक सवालपर आते हैं। महात्माजीको शायद इन सिद्धान्तों के खिलाफ कोई आपत्ति न हो, लेकिन उन्हें कार्यान्वित करने की रीतिके बारेमें वे निश्चय
ही अनेक शर्तें रखेंगे। उनके लिए तो हर चीजकी एक ही कसौटी है। अगर बोलशेविज्म अनीश्वरवादी है, तो बस, वे उसके खिलाफ हैं। खैर, हमने तो उन्हें संक्षेपमें बोलशेविज्मकी परिभाषा दे दी है। अब वे विचार करें और कहें कि बोलशेविज्म ईश्वरको नकारता है या क्या करता है। जबतक वे वैयक्तिक सम्पत्ति और निहित स्वार्थोको ईश्वरीय विधान न मान लें, तबतक उनके उन्मूलनको वे ईश्वरको नकारना नहीं कह सकते। कारण, इसमें शक नहीं कि बोलशेविज्म वैयक्तिक सम्पत्ति और स्थापित स्वार्थीको, जो इतिहासके आदिकाल से ही मनुष्य-समाज के लिए अभिशाप-रूप सिद्ध हुए हैं, अमान्य करता है। बोलशेविज्म के व्यावहारिक कार्यक्रममें ईश्वर या धर्मका कोई सवाल ही नहीं उठता। वह न ईश्वरवादी है और न अनीश्वरवादी है। उसका सम्बन्ध मनुष्य के ऐहिक जीवनसे है। ईश्वर या धर्म के साथ उसका झगड़ा यदि होता है तो तब होता है, जब ईश्वर और धर्म उसके आड़े आते हैं। ऐसी हालत में, साम्यवाद कल्पित सर्वशक्तिमानसे भी टक्कर लेने में नहीं हिचकिचाता और नास्तिक बन जाता है और इस तरह वह महात्मा गांधी के समर्थनको खो बैठने का खतरा मोल लेता है । लेकिन ऐसा करके वह न केवल जनताके भौतिक अधिकारोंका प्रबलतम समर्थक बन जाता है बल्कि शासित वर्गने सदियोंसे जनताको जिस अज्ञान और अन्धविश्वास के अन्धकारमें रख छोड़ा है, उसे नष्ट करनेके लिए बौद्धिक और आत्मिक मुक्तिकी मशालको भी प्रज्वलित करता हैं।
महात्माजी यदि खुले तौरपर उच्च वर्गीका समर्थन नहीं करते हों तो वे इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि बोलशेविज्म एक मानव कल्याणकारी आन्दोलन है। लेकिन हाँ उसे सरलतापूर्वक कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। रूस में क्रान्तिके<noinclude></noinclude>
2vcywmbcbtby47mucgvra63om0mcxxk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६७९
250
185134
673418
643198
2026-08-23T17:46:06Z
Manikantkmr
5554
673418
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh||परिशिष्ट|६४३}}</noinclude>बाद निर्विवाद रूपसे जो आतंकका साम्राज्य रहा और विनाशकारी गृहयुद्ध छिड़ा उसका मूल कारण यह था कि इस कार्यक्रमको कार्यान्वित करनेमें बहुत ज्यादा बाधा उपस्थित की गई थी ओर हिंसा बरती गई थी। न केवल रूसी अभिजात वर्ग और बुर्जुआ वर्गने, जिन्होंने स्वभावतः अपनी खोई हुई स्थितिको पुनः प्राप्त करनेकी भरसक
चेष्टा की, बाधा उपस्थित की वरन् उसे अन्तर्राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्गका समर्थन भी प्राप्त था,जिसे रूसी क्रान्तिके रूप में अपने गढ़की दीवारों में दरार पड़ने के प्रथम चिह्न दिखाई पड़ने लगे थे। इस अनवरत विरोधी कार्रवाई और प्रचारका एक अंग था -- बोलशेविज्मको बहुत ही डरावने रूपमें चित्रित करना, और इस चित्रके प्रभावसे महात्माजी भी बिलकुल अछूते नहीं रह पाये । किन्तु सवाल यह है कि उस परिस्थिति में बोलशेविक लोग करते क्या? दो ही सस्ते थे -- या तो रूसी श्रमिकों और किसानोंसे ईश्वरका भय रखते हुए चुपचाप फिर उन्हीं बेड़ियों में जकड़ जाने को कहा जाता, जिन्हें उन्होंने इतनी बहादुरी से तोड़ डाला था, या फिर प्राप्त स्वतन्त्रताकी रक्षा करने और उसे स्थायी बनाने के लिए, ईश्वर और धर्म बाधक बनें तो उनके खिलाफ भी लड़ाई जारी रखनेको कहा जाता। बोलशेविज्मको दूसरा विकल्प स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि रूसी मजदूरों और किसानोंको फिरसे पूँजीवाद और अत्याचारी जारशाही के अधीन होनेको ंमजबूर करनेके लिए न केवल सभी भौतिक शक्तियाँ एकजुट हो गई थीं, बल्कि ईश्वर और धर्मकी भी तमाम ताकतें मोचेंपर लगा दी गई थीं। बोलशेविज्म कोई ईश्वरसे सम्बन्धित सिद्धान्त नहीं है । बोलशेविक लोग फरिश्ते नहीं हैं । किन्तु साथ ही बोलशेविज्मका मतलब शैतानी प्रवृत्ति भी नहीं है । महात्माजी " जनसाधारण के हृदय को झकझोरकर, उसकी उच्चतर वृत्तियों को जगाकर उसे अपनी बात समझाना चाहते हैं। यह योजना तो बहुत आकर्षक है और अगर यह जनसाधारणको वर्ग प्रभुत्व और साम्राज्यवादी अत्याचारसे मुक्त कराने में व्यवहारतः कामके लायक साबित हुई होती तो बोलशेविज्मको इसपर कोई आपत्ति नहीं होती। उनका 'संयम-विषयक। सिद्धान्त भी बहुत शंकास्पद है। जनसाधारण के आध्यात्मिक विकासके लिए यह अच्छी चीज हो सकती है, लेकिन निश्चय ही इससे अपनी स्वतन्त्रताके लिए लड़नेका जनताका मनोबल कमजोर होता है। जो लोग (शायद अनजाने ही) वर्ग-प्रभुत्व के साधन सदृश रहे हैं, वे न जाने कबसे " "हृदय", 'उच्चतर वृत्तियों", "संयम" आदिसे सम्बन्धित इन तमाम सिद्धान्तों की चर्चा करते आये हैं। कोई कर्तव्य चाहे कितना भी अप्रिय या कठिन हो, बोलशेविज्म उससे जी नहीं चुराता। यह ईश्वरके अस्तित्वको इसलिए अस्वीकार करता है और तज्जनित धार्मिक तथा नैतिक विधानोंकी भर्त्सना इसलिए करता है कि स्वातन्त्र्य संग्राम में ईश्वर, धर्म और नैतिकता के सिद्धान्त निरंकुशता, दमन और अन्यायके दलमें खड़े दिखाई देते हैं।
अगर ईश्वर और धरतीपर ईश्वरकी ध्वजा फहरानेवाले लोग भौतिक मामलों में हस्तक्षेप न करने को राजी हो जायें तो बोल्शेविज्म ईश्वरको अपनी जगहपर बने रहने देने को तैयार है। लेकिन, अगर उन्हें अपनी लोकोत्तर स्थिति से सन्तुष्ट रहना मंजूर नहीं है और वे दुनिया में संकट और कठिनाई पैदा करना चाहते हैं तो बोल्शेविज्म<noinclude></noinclude>
350fqjxwx69abknsjdwd5s7lyuis9v9
673489
673418
2026-08-24T03:29:32Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673489
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||परिशिष्ट|६४३}}</noinclude>बाद निर्विवाद रूपसे जो आतंकका साम्राज्य रहा और विनाशकारी गृहयुद्ध छिड़ा उसका मूल कारण यह था कि इस कार्यक्रमको कार्यान्वित करनेमें बहुत ज्यादा बाधा उपस्थित की गई थी और हिंसा बरती गई थी। न केवल रूसी अभिजात वर्ग और बुर्जुआ वर्गने, जिन्होंने स्वभावतः अपनी खोई हुई स्थितिको पुनः प्राप्त करनेकी भरसक चेष्टा की, बाधा उपस्थित की वरन् उसे अन्तर्राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्गका समर्थन भी प्राप्त था,जिसे रूसी क्रान्तिके रूप में अपने गढ़की दीवारों में दरार पड़ने के प्रथम चिह्न दिखाई पड़ने लगे थे। इस अनवरत विरोधी कार्रवाई और प्रचारका एक अंग था -- बोलशेविज्मको बहुत ही डरावने रूपमें चित्रित करना, और इस चित्रके प्रभावसे महात्माजी भी बिलकुल अछूते नहीं रह पाये । किन्तु सवाल यह है कि उस परिस्थिति में बोलशेविक लोग करते क्या? दो ही सस्ते थे--या तो रूसी श्रमिकों और किसानोंसे ईश्वरका भय रखते हुए चुपचाप फिर उन्हीं बेड़ियों में जकड़ जाने को कहा जाता, जिन्हें उन्होंने इतनी बहादुरी से तोड़ डाला था, या फिर प्राप्त स्वतन्त्रताकी रक्षा करने और उसे स्थायी बनाने के लिए, ईश्वर और धर्म बाधक बनें तो उनके खिलाफ भी लड़ाई जारी रखनेको कहा जाता। बोलशेविज्मको दूसरा विकल्प स्वीकार करना पड़ा, क्योंकि रूसी मजदूरों और किसानोंको फिरसे पूँजीवाद और अत्याचारी जारशाही के अधीन होनेको मजबूर करनेके लिए न केवल सभी भौतिक शक्तियाँ एकजुट हो गई थीं, बल्कि ईश्वर और धर्मकी भी तमाम ताकतें मोर्चेपर लगा दी गई थीं। बोलशेविज्म कोई ईश्वरसे सम्बन्धित सिद्धान्त नहीं है। बोलशेविक लोग फरिश्ते नहीं हैं। किन्तु साथ ही बोलशेविज्मका मतलब शैतानी प्रवृत्ति भी नहीं है। महात्माजी " जनसाधारण के हृदय को झकझोरकर, उसकी उच्चतर वृत्तियों को जगाकर उसे अपनी बात समझाना चाहते हैं। यह योजना तो बहुत आकर्षक है और अगर यह जनसाधारणको वर्ग प्रभुत्व और साम्राज्यवादी अत्याचारसे मुक्त कराने में व्यवहारतः कामके लायक साबित हुई होती तो बोलशेविज्मको इसपर कोई आपत्ति नहीं होती। उनका 'संयम-विषयक। सिद्धान्त भी बहुत शंकास्पद है। जनसाधारण के आध्यात्मिक विकासके लिए यह अच्छी चीज हो सकती है, लेकिन निश्चय ही इससे अपनी स्वतन्त्रताके लिए लड़नेका जनताका मनोबल कमजोर होता है। जो लोग (शायद अनजाने ही) वर्ग-प्रभुत्व के साधन सदृश रहे हैं, वे न जाने कबसे " "हृदय", 'उच्चतर वृत्तियों", "संयम" आदिसे सम्बन्धित इन तमाम सिद्धान्तों की चर्चा करते आये हैं। कोई कर्तव्य चाहे कितना भी अप्रिय या कठिन हो, बोलशेविज्म उससे जी नहीं चुराता। यह ईश्वरके अस्तित्वको इसलिए अस्वीकार करता है और तज्जनित धार्मिक तथा नैतिक विधानोंकी भर्त्सना इसलिए करता है कि स्वातन्त्र्य संग्राम में ईश्वर, धर्म और नैतिकता के सिद्धान्त निरंकुशता, दमन और अन्यायके दलमें खड़े दिखाई देते हैं।
अगर ईश्वर और धरतीपर ईश्वरकी ध्वजा फहरानेवाले लोग भौतिक मामलों में हस्तक्षेप न करने को राजी हो जायें तो बोल्शेविज्म ईश्वरको अपनी जगहपर बने रहने देने को तैयार है। लेकिन, अगर उन्हें अपनी लोकोत्तर स्थिति से सन्तुष्ट रहना मंजूर नहीं है और वे दुनिया में संकट और कठिनाई पैदा करना चाहते हैं तो बोल्शेविज्म<noinclude></noinclude>
62kfvbuq4x5xcxmq9lti5e1lewi0v8g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८०
250
185135
673423
643199
2026-08-23T17:55:15Z
Manikantkmr
5554
673423
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार
अवश्य करेगा।
{{Right|मानवेन्द्रनाथ राय}}
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १-१-१९२५
{{C|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}}
{{C|'''चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश'''}}
अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश। चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है। जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था। इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी। लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है ।
किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है। लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ।
[अंग्रेजी से]
{{Right|राजगोपालाचारी}}
'''यंग इंडिया,''' १५-१-१९२५<noinclude></noinclude>
fs1wog27gxbu8ygla6ebh7xytwjw7s3
673425
673423
2026-08-23T17:55:46Z
Manikantkmr
5554
673425
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार
अवश्य करेगा।
{{Right|मानवेन्द्रनाथ राय}}
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १-१-१९२५
{{C|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}}
{{C|'''चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश'''}}
अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश। चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है। जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था। इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी। लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है ।
किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है। लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ।
[अंग्रेजी से]
{{Right|राजगोपालाचारी}}
'''यंग इंडिया,''' १५-१-१९२५<noinclude></noinclude>
o8r7oqr964vhpf73owsp2j9vsvncb4z
673426
673425
2026-08-23T17:56:28Z
Manikantkmr
5554
673426
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार
अवश्य करेगा।
{{Right|मानवेन्द्रनाथ राय}}
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १-१-१९२५
{{C|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}}
{{C|'''चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश'''}}
अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश। चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है। जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था। इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी। लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है।
किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है। लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ।
[अंग्रेजी से]
{{Right|राजगोपालाचारी}}
'''यंग इंडिया,''' १५-१-१९२५<noinclude></noinclude>
9rk7vcmrw6mjxgwlqzm4cpqlpvckkt0
673427
673426
2026-08-23T17:57:22Z
Manikantkmr
5554
673427
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार
अवश्य करेगा।
{{Right|मानवेन्द्रनाथ राय}}
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १-१-१९२५
{{C|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}}
{{C|'''चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश'''}}
अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश। चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है। जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था। इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी। लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है।
किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है। लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ।
{{Right|राजगोपालाचारी}}
[अंग्रेजी से]
'''यंग इंडिया,''' १५-१-१९२५<noinclude></noinclude>
osijoerrgew88od8elq57jvqzyf64b9
673490
673427
2026-08-24T03:31:58Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673490
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जनसाधारणको धर्म द्वारा बुने अज्ञानके जालसे मुक्त करने के लिए नास्तिकताका प्रचार
अवश्य करेगा।
{{Right|मानवेन्द्रनाथ राय}}
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १-१-१९२५
{{C|{{larger|'''परिशिष्ट २'''}}}}
{{C|'''चरखेके सम्बन्धमें च० राजगोपालाचारीकी टिप्पणीका अंश'''}}
अपरिवर्तनवादियों को, जिन्हें लगता है कि देशकी मुक्तिका मार्ग, हमारी आशाका स्थायी आधार, चरखा ही है, इधर-उधरकी कोई चिन्ता किये बिना निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते चलना चाहिए। हमारे लिए न विश्रामका अवकाश है और न थककर बैठ जानेकी गुंजाइश। चरखा ही हमारी आशा है, हमारा आनन्द है, हमारा मित्र और नेक रहनुमा है। जागते हुए हमें इसीके लिए काम करते रहना चाहिए, सोते हुए इसीका स्वप्न देखना चाहिए। पहले मुझे इन बातों का मतलब पूरी तरहसे समझ में नहीं आया था। इसलिए मैं ऐसा समझता था कि महात्माजी ऐसी राह जा रहे हैं, जिसमें मुझे न कोई औचित्य दिखाई पड़ता था, न रोशनी। लेकिन, अब मैं चीज़ोंको बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ और आशा करता हूँ कि जो लोग मेरी ही तरह अबतक शंकाग्रस्त और दिग्भ्रमित रहे हैं वे भी इन चीजोंको साफ-साफ देखेंगे। कातो, कातो, कातो और दूसरोंसे भी कतवाओ - यही हमारा एक मात्र मंत्र है, यही हमारा गायत्री जाप है।
किन्तु, जहाँ मुझे वस्तुस्थितिका सही भान हुआ, वहाँ यह भी लगा कि इस सबमें एक प्रकारकी अवास्तविकता भी है, सत्य के साथ किसी प्रकारका कोई राजनीतिक खेल खेला जा रहा है, जो सत्याग्रहकी योजनापर अपनी अशुभ काली छाया डाल रहा है। लेकिन, यहाँ मैं उस गुरुकी निर्णयबुद्धिपर निर्भर करता हूँ, जिसका सहज सत्यबोध मेरे सत्यबोधसे न जाने कितना बढ़-चढ़कर है। अतः मैं पूर्णतः निश्चिन्त हूँ।
{{Right|राजगोपालाचारी}}
[अंग्रेजी से]
'''यंग इंडिया,''' १५-१-१९२५<noinclude></noinclude>
0kvxrm73hfje623m46wp6qvqwjdu7c6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८१
250
185136
673430
643200
2026-08-23T18:02:56Z
Manikantkmr
5554
673430
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{C|{{larger|सामग्री के साधन-सूत्र}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय। देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३४९।
साबरमती संग्रहालय : पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय : जहाँ गांधीजीके दक्षिण
आफ्रिकी काल और १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात सुरक्षित हैं;
देखिए खण्ड, १, पृष्ठ ३४९।
'अमृतबाजार पत्रिका', कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'आज', बनारस से प्रकाशित हिन्दी दैनिक।
'इंडियन रिव्यू', मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी मासिक ।
'गुणसुन्दरी' : गुजराती मासिक।
'ट्रिब्यून', लाहौरसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । १९४८ से यह पत्र अम्बालासे प्रकाशित होने लगा है।
'नवजीवन' (१९१९-१९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'न्यू इंडिया, : मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' : बम्बई से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'यंग इंडिया' (१९१९ - १९३२) : अहमदाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक ।
'हिन्दी नवजीवन' (१९२१ - १९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदा-
बादसे प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक।
'हिन्दुस्तान टाइम्स' : नई दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स, १९२४।
'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके ३९ वें अधिवेशनकी रिपोर्ट', १९२४।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स' : जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस,
बम्बई, १९५८।,
'द स्टोरी ऑफ माई लाइफ' खण्ड २ : मु० रा० जयकर, एशिया पब्लिशिंग
हाउस, बम्बई, १९५९।
'बापुना पत्रो २ -- सरदार वल्लभभाई पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
'बापुना पत्रो ४ -- मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।<noinclude></noinclude>
jldrhhlsa1c8474bglc7h8bx5ycqtcy
673432
673430
2026-08-23T18:03:34Z
Manikantkmr
5554
673432
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{C|{{larger|सामग्री के साधन-सूत्र}}}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय। देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३४९।
साबरमती संग्रहालय : पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय : जहाँ गांधीजीके दक्षिण
आफ्रिकी काल और १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात सुरक्षित हैं;
देखिए खण्ड, १, पृष्ठ ३४९।
'अमृतबाजार पत्रिका', कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'आज', बनारस से प्रकाशित हिन्दी दैनिक।
'इंडियन रिव्यू', मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी मासिक ।
'गुणसुन्दरी' : गुजराती मासिक।
'ट्रिब्यून', लाहौरसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । १९४८ से यह पत्र अम्बालासे प्रकाशित होने लगा है।
'नवजीवन' (१९१९-१९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'न्यू इंडिया, : मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' : बम्बई से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'यंग इंडिया' (१९१९ - १९३२) : अहमदाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक ।
'हिन्दी नवजीवन' (१९२१ - १९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदा-
बादसे प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक।
'हिन्दुस्तान टाइम्स' : नई दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स, १९२४।
'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके ३९ वें अधिवेशनकी रिपोर्ट', १९२४।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स' : जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस,
बम्बई, १९५८।,
'द स्टोरी ऑफ माई लाइफ' खण्ड २ : मु० रा० जयकर, एशिया पब्लिशिंग
हाउस, बम्बई, १९५९।
'बापुना पत्रो २ -- सरदार वल्लभभाई पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
'बापुना पत्रो ४ -- मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।<noinclude></noinclude>
bxkf3a7n3thpekhwros7qtoe42jtieh
673434
673432
2026-08-23T18:04:23Z
Manikantkmr
5554
673434
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{C|{{larger|सामग्री के साधन-सूत्र}}}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय। देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३४९।
साबरमती संग्रहालय : पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय : जहाँ गांधीजीके दक्षिण
आफ्रिकी काल और १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात सुरक्षित हैं;
देखिए खण्ड, १, पृष्ठ ३४९।
'अमृतबाजार पत्रिका', कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'आज', बनारस से प्रकाशित हिन्दी दैनिक।
'इंडियन रिव्यू', मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी मासिक ।
'गुणसुन्दरी' : गुजराती मासिक।
'ट्रिब्यून', लाहौरसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । १९४८ से यह पत्र अम्बालासे प्रकाशित होने लगा है।
'नवजीवन' (१९१९-१९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'न्यू इंडिया, : मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' : बम्बई से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'यंग इंडिया' (१९१९ - १९३२) : अहमदाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक।
'हिन्दी नवजीवन' (१९२१ - १९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदा-
बादसे प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक।
'हिन्दुस्तान टाइम्स' : नई दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स, १९२४।
'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके ३९ वें अधिवेशनकी रिपोर्ट', १९२४।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स' : जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस,
बम्बई, १९५८।,
'द स्टोरी ऑफ माई लाइफ' खण्ड २ : मु० रा० जयकर, एशिया पब्लिशिंग
हाउस, बम्बई, १९५९।
'बापुना पत्रो २ -- सरदार वल्लभभाई पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
'बापुना पत्रो ४ -- मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।<noinclude></noinclude>
cda4dvpk9szytzmfhfr0u4z3fk4ixf1
673491
673434
2026-08-24T03:34:53Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673491
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|सामग्री के साधन-सूत्र}}}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय। देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३४९।
साबरमती संग्रहालय : पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय : जहाँ गांधीजीके दक्षिण
आफ्रिकी काल और १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात सुरक्षित हैं;
देखिए खण्ड, १, पृष्ठ ३४९।
'अमृतबाजार पत्रिका', कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'आज', बनारस से प्रकाशित हिन्दी दैनिक।
'इंडियन रिव्यू', मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी मासिक ।
'गुणसुन्दरी' : गुजराती मासिक।
'ट्रिब्यून', लाहौरसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । १९४८ से यह पत्र अम्बालासे प्रकाशित होने लगा है।
'नवजीवन' (१९१९-१९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'न्यू इंडिया, : मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' : बम्बई से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'यंग इंडिया' (१९१९ - १९३२) : अहमदाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक।
'हिन्दी नवजीवन' (१९२१ - १९३२) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक।
'हिन्दुस्तान टाइम्स' : नई दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स, १९२४।
'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके ३९ वें अधिवेशनकी रिपोर्ट', १९२४।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स' : जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस,
बम्बई, १९५८।,
'द स्टोरी ऑफ माई लाइफ' खण्ड २ : मु० रा० जयकर, एशिया पब्लिशिंग
हाउस, बम्बई, १९५९।
'बापुना पत्रो २ -- सरदार वल्लभभाई पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।
'बापुना पत्रो ४ -- मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) : मणिबहेन पटेल द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७।<noinclude></noinclude>
tmfxvo64m7kecfq3ehcc0gfg8fm5mpn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८२
250
185137
673495
643201
2026-08-24T04:02:32Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673495
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />६४६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय</noinclude>'बापुना पत्रो ६--गंगाबहेनने' (गुजराती) : द० बा० कालेलकर द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुनी प्रसादी'--(गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, द्वारा अनुवादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९४८ ।
महात्मा-- लाइफ ऑफ मोहनदास करमचन्द गांधी', खण्ड २ : डी० जी० तेन्दुलकर, विट्ठलभाई के० झवेरी और डी० जी० तेन्दुलकर, बम्बई, १९५१ ।
'महादेवभाईनी डायरी' खण्ड ७ (गुजराती) : चन्द्रलाल भगुभाई दलाल द्वारा सम्पादित, साबरमती आश्रम सुरक्षा और स्मारक ट्रस्ट, अहमदाबाद- १३, १९६५ ।
'लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण', अद्वैत आश्रम, ४ विलिंग्डन लेन, कलकत्ता, १९५५ ।
'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री ' सम्पादक - टी० एन० जगदीशन, एशिया
पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, १९६३ ।<noinclude></noinclude>
erdrflhaa99k13xdbobuo6wch3qraug
673496
673495
2026-08-24T04:03:20Z
Manikantkmr
5554
673496
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'बापुना पत्रो ६--गंगाबहेनने' (गुजराती) : द० बा० कालेलकर द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुनी प्रसादी'--(गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, द्वारा अनुवादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९४८ ।
महात्मा-- लाइफ ऑफ मोहनदास करमचन्द गांधी', खण्ड २ : डी० जी० तेन्दुलकर, विट्ठलभाई के० झवेरी और डी० जी० तेन्दुलकर, बम्बई, १९५१ ।
'महादेवभाईनी डायरी' खण्ड ७ (गुजराती) : चन्द्रलाल भगुभाई दलाल द्वारा सम्पादित, साबरमती आश्रम सुरक्षा और स्मारक ट्रस्ट, अहमदाबाद- १३, १९६५ ।
'लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण', अद्वैत आश्रम, ४ विलिंग्डन लेन, कलकत्ता, १९५५ ।
'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री ' सम्पादक - टी० एन० जगदीशन, एशिया
पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, १९६३ ।<noinclude></noinclude>
q1u0x5vv7c0poxb1vjudeoaw9j5zdvm
673497
673496
2026-08-24T04:04:14Z
Manikantkmr
5554
673497
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'बापुना पत्रो ६--गंगाबहेनने' (गुजराती) : द० बा० कालेलकर द्वारा
सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुनी प्रसादी'--(गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, द्वारा अनुवादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९४८ ।
'महात्मा-- लाइफ ऑफ मोहनदास करमचन्द गांधी', खण्ड २ : डी० जी० तेन्दुलकर, विट्ठलभाई के० झवेरी और डी० जी० तेन्दुलकर, बम्बई, १९५१ ।
'महादेवभाईनी डायरी' खण्ड ७ (गुजराती) : चन्द्रलाल भगुभाई दलाल द्वारा सम्पादित, साबरमती आश्रम सुरक्षा और स्मारक ट्रस्ट, अहमदाबाद- १३, १९६५ ।
'लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण', अद्वैत आश्रम, ४ विलिंग्डन लेन, कलकत्ता, १९५५ ।
'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री ' सम्पादक - टी० एन० जगदीशन, एशिया
पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, १९६३ ।<noinclude></noinclude>
iyvnyplctmyt5xiz44o2vlgqs4j8m33
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८३
250
185138
673498
643202
2026-08-24T04:15:15Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673498
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{C|(१६ अगस्त, १९२४ से १५ जनवरी, १९२५ तक)}}
१६ अगस्त : साम्प्रदायिक दंगोंको सुलझाने के लिए सम्बन्धित हिन्दू-मुस्लिम समझौते के लिए गांधीजी अहमदाबाद से दिल्लीके लिए रवाना हुए।
१७ अगस्त : दिल्ली पहुँचे।
'नवजीवन' में मलाबारके बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए चन्देकी अपील।
२२ अगस्त: हिन्दू-मुस्लिम समझौते के बारेमें एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे भेंट।
बम्बईके रास्ते दिल्लीसे अहमदाबाद के लिए रवाना।
२३ अगस्त : अहमदाबाद में मजदूरोंकी सभा में भाषण।
२६ अगस्त : अहमदाबाद नगरपालिकाके अभिनन्दनके उत्तर में भाषण।
२८ अगस्त : 'यंग इंडिया' में प्रकाशित अपने लेख "गुलबर्गाका पागलपन" में हिन्दू- मुस्लिम एकता के लिए अपील की।
२९ अगस्त : बम्बई पहुँचे।
बम्बई निगम अभिनन्दन के उत्तरमें भाषण।
३० अगस्त : मोतीलाल नेहरूको लिखे अपने पत्र में गांधीजीने 'पूर्ण समर्पण' की अपनी शर्तोंका उल्लेख किया तथा कांग्रेस-संगठनके सुधारके लिए सुझाव दिये।
राष्ट्रीय महिला परिषद् द्वारा आयोजित दादाभाई नौरोजीके जयन्ती समारोहमें
भाग लिया।
३१ अगस्त : राष्ट्रीय एकतापर वक्तव्य देते हुए मोतीलाल नेहरू के सम्मुख अपने 'पूर्ण
समर्पण' के कारणोंपर प्रकाश डाला।
एक्सेल्सियर थियेटर में मलाबार बाढ़-सहायता कोष के लिए आयोजित पारसी राजकीय मण्डलकी सभा में भाषण।
बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक में अहमदाबादमें पास किये गये कताई-प्रस्तावकी आलोचनाका उत्तर दिया ।
२ सितम्बर : प्रिंसेस स्ट्रीटपर स्थित खादी भण्डार देखने गये।
शासको नेशनल मैडिकल कालेज में पारितोषिक वितरण किया।
रात के ९ बजे बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस समितिकी सभा में भाषण
३ सितम्बर : बम्बई से रातकी गाड़ी द्वारा पूनाके लिए रवाना हुए।
४ सितम्बर : पूना में सार्वजनिक सभामें भाषण।
भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी) गये। तिलक महाविद्यालयके
दीक्षांत समारोह में भाषण।
कांग्रेसी कार्यकर्ताओंको पद त्याग करने और कातनेकी सलाह दी।<noinclude></noinclude>
b3ivd301z5yaqi7vcjnpij30a82one2
673499
673498
2026-08-24T04:19:02Z
Manikantkmr
5554
673499
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" /></noinclude>{{C|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{C|(१६ अगस्त, १९२४ से १५ जनवरी, १९२५ तक)}}
१६ अगस्त : साम्प्रदायिक दंगोंको सुलझाने के लिए सम्बन्धित हिन्दू-मुस्लिम समझौते के लिए गांधीजी अहमदाबाद से दिल्लीके लिए रवाना हुए।
१७ अगस्त : दिल्ली पहुँचे।
'नवजीवन' में मलाबारके बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए चन्देकी अपील।
२२ अगस्त: हिन्दू-मुस्लिम समझौते के बारेमें एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे भेंट।
बम्बईके रास्ते दिल्लीसे अहमदाबाद के लिए रवाना।
२३ अगस्त : अहमदाबाद में मजदूरोंकी सभा में भाषण।
२६ अगस्त : अहमदाबाद नगरपालिकाके अभिनन्दनके उत्तर में भाषण।
२८ अगस्त : 'यंग इंडिया' में प्रकाशित अपने लेख "गुलबर्गाका पागलपन" में हिन्दू- मुस्लिम एकता के लिए अपील की।
२९ अगस्त : बम्बई पहुँचे।
बम्बई निगम अभिनन्दन के उत्तरमें भाषण।
३० अगस्त : मोतीलाल नेहरूको लिखे अपने पत्र में गांधीजीने 'पूर्ण समर्पण' की अपनी शर्तोंका उल्लेख किया तथा कांग्रेस-संगठनके सुधारके लिए सुझाव दिये।
राष्ट्रीय महिला परिषद् द्वारा आयोजित दादाभाई नौरोजीके जयन्ती समारोहमें
भाग लिया।
३१ अगस्त : राष्ट्रीय एकतापर वक्तव्य देते हुए मोतीलाल नेहरू के सम्मुख अपने 'पूर्ण
समर्पण' के कारणोंपर प्रकाश डाला।
एक्सेल्सियर थियेटर में मलाबार बाढ़-सहायता कोष के लिए आयोजित पारसी राजकीय मण्डलकी सभा में भाषण।
बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक में अहमदाबादमें पास किये गये कताई-प्रस्तावकी आलोचनाका उत्तर दिया ।
२ सितम्बर : प्रिंसेस स्ट्रीटपर स्थित खादी भण्डार देखने गये।
शासको नेशनल मैडिकल कालेज में पारितोषिक वितरण किया।
रात के ९ बजे बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस समितिकी सभा में भाषण
३ सितम्बर : बम्बई से रातकी गाड़ी द्वारा पूनाके लिए रवाना हुए।
४ सितम्बर : पूना में सार्वजनिक सभामें भाषण।
भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी) गये। तिलक महाविद्यालयके दीक्षांत समारोह में भाषण।
कांग्रेसी कार्यकर्ताओंको पद त्याग करने और कातनेकी सलाह दी।<noinclude></noinclude>
bcjsv3ob494nji8hch8azea6kqu2ibv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८४
250
185139
673501
643203
2026-08-24T04:27:30Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673501
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६४८ |सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय }}</noinclude>५ सितम्बर : अहमदाबादके रास्ते बम्बई वापिस आये।
सूरत पहुँचे और शामको सार्वजनिक सभामें भाषण दिया।
५ सितम्बर : मोतीलाल नेहरूको एक पत्र में कांग्रेसका विभाजन न होने देने के निर्णय-पर जोर दिया।
राजगोपालाचारीको लिखे अपने पत्र में गांधीजीने इस बातपर जोर दिया कि "यदि हमें अपने उद्देश्योंमें आस्था है तो हमें पूर्णरूपसे सत्ताका परित्याग कर
देना चाहिए।"
९, १० सितम्बर : कोहाटमें दंगे ;- हिन्दुओंको निकाला गया।
१३ सितम्बर : हिन्दू-मुस्लिम दंगों के सम्बन्ध में अहमदाबाद से दिल्ली के लिए रवाना हुए।
१४ सितम्बर : दिल्ली पहुँचे।
१५ सितम्बर : दिल्ली में 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का उद्घाटन किया।
१७ सितम्बर : मुहम्मद अलीके घरपर २१ दिनका उपवास शुरू किया।
१८ सितम्बर : प्रातः २ बजे दिये गये अपने वक्तव्य में गांधीजीने बताया कि २१ दिनका यह उपवास प्रायश्चित्त और प्रार्थना दोनों ही हैं।
२४ सितम्बर : एकता सम्मेलन के सम्बन्ध में समाचारपत्रोंको दिये एक वक्तव्यमें
गांधीजीने 'पैबन्द और थेगलीवाली कृत्रिम शान्ति' की अपेक्षा हृदयकी एकता के
बढ़ाने पर जोर दिया।
२६ सितम्बर : दिल्ली एकता सम्मेलन में एक प्रस्ताव पासकर गांधीजीसे उपवास
समाप्त करने की प्रार्थना की गई।
२७ सितम्बर : गांधीजीने एकता सम्मेलनकी प्रार्थनाको माननेसे इनकार कर दिया।
१ अक्तूबर : बम्बईकी महिलाओंका एक शिष्ट-मण्डल गांधीजीसे मिला और उनसे
उपवास तोड़ने का अनुरोध किया।
बम्बईकी एक सार्वजनिक सभामें एनी बेसेंटकी ७८ वीं वर्षगाँठपर गांधीजी द्वारा भेजा गया संदेश पढ़ा गया।
२ अक्तूबरसे पूर्व : जेनेवा अन्तर्राष्ट्रीय अफीम-सम्मेलनसे रवीन्द्रनाथ ठाकुरके साथ गांधीजीने अपील की कि दवाओंको छोड़कर दूसरे सभी उद्देश्योंके लिए अफीम-व्यापार बन्द किया जाये।
८ अक्तूबर : हिन्दू-मुस्लिम एकतापर वक्तव्य देनेके बाद गांधीजीने १२ बजे दोपहर को अपना २१ दिनका उपवास तोड़ा।
पिंजरापोलको भेजने के लिए मुहम्मद अलीने कसाईसे एक गाय खरीदकर
गांधीजीको भेंट की।
९ अक्तूबर : गांधीजीने अखबारोंको एक संदेश में कहा कि भारत के सभी भाई-बहन
एकताके लिए ईश्वरसे प्रार्थना करें और अपना पूरा सहयोग दें।
१६ अक्तूबर : 'यंग इंडिया' में कताई सदस्यता की आवश्यकता पर फिर जोर दिया।
एक पत्र लिखकर वाइसरायसे कोहाट जानेकी अनुमति माँगी।
२०_अक्तूबर : ट्रान्सवालके भारतीयों को एक सन्देशमें कहा कि वे अपने सम्मानपूर्ण अस्तित्व के लिए अन्ततक संघर्ष करें।<noinclude></noinclude>
gqder0b1dqrt8sylh5ponpvo41pwsq2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८५
250
185140
673510
643204
2026-08-24T04:39:42Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673510
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६४९}}</noinclude>२३ अक्तूबर : 'यंग इंडिया' में प्रकाशित 'प्रेमका विधान' में गांधीजीने अपरिवर्तन-
वादियों से कहा कि वे अपने साथी स्वराज्यवादियों एवं लिबरलोंके सामने शोभनीय
ढंग से झुक जायें।
२८ अक्तूबर: वाइसरायने गांधीजीको कोहाट जानेकी अनुमति देने से इनकार कर दिया।
३० अक्तूबर : संयुक्त प्रान्त राजनीतिक परिषद्, गोरखपुर के लिए एक सन्देशमें गांधीजीने बंगाल सरकारकी अनियमितताकी निन्दा की और लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील की।
२ नवम्बर : दिल्ली से कलकत्ताके लिए रवाना।
६ नवम्बर : स्वराज्य दलके नेताओंके साथ एक संयुक्त वक्तव्य में संगठित ढंगसे कार्य
करनेकी और असहयोग तथा कताई सदस्यताको स्थगित करनेकी घोषणा की।
टाउन हाल में कलकत्ता निगम द्वारां दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
७ नवम्बर : अपरिवर्तनवादियों के साथ हुई बातचीत में स्वराज्य दलके नेताओंके साथ
हुए समझौते की पेचीदगियोंका खुलासा किया।
हावड़ा टाउन हाल में हावड़ा नगर पालिका द्वारा दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
स्वराज्य दलके नेताओंसे हुए समझौतेपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधि से भेंट।
दिल्लीके लिए रवाना हुए।
१० नवम्बर : दिल्ली में एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे एक भेंटमें बताया कि कलकत्ता समझौते को अन्तिम निर्णयके लिए बम्बईके सर्वदलीय सम्मेलन में रखा जायेगा।
१३ नवम्बर : 'यंग इंडिया' में कलकत्ता- समझौते के बारेमें सविस्तार लिखा।
एक पत्र में रोमाँ रोलाँको लिखा कि कुमारी मैडिलीन स्लेड (मीराबहन) भारत पहुँच गई हैं और में उनके पूर्व और पश्चिमके बीच एक लघु सेतु बन सकने में पूरी सहायता करूँगा।
माडर्न स्कूल गये; रामजस कालिजके विद्यार्थियों के बीच भाषण दिया।
अली भाइयोंकी माता, बी-अम्माँके कफन- दफन में शामिल हुए।
१४ नवम्बर : न्यूयार्क के 'वर्ल्ड टुमारो' को एक सन्देशमें कहा कि 'अहिंसा संसारकी
सबसे बड़ी शक्ति है।
१६ नवम्बर : कोहाटके प्रश्नपर वक्तव्य।
१७ नवम्बरसे पूर्व : गांधीजीने तिरुवन्नामलई में हुई तमिलनाड परिषद्को एक संदेशमें
बताया कि स्वराज्यवादियोंके साथ हुए समझौतेका आधार अहिंसाकी भावना थी।
१९. नवम्बर : दिल्ली से बम्बई के लिए रवाना हुए।
२० नवम्बर : बम्बई पहुँचे।
२१. नवम्बर : बम्बई में कांग्रेस कार्यसमितिको बैठकमें भाषण।
बम्बई में, सर्वदलीय सम्मेलन में गांधीजीने बंगाल अधिनियमपर पहला प्रस्ताव पेश किया।<noinclude></noinclude>
stf9ltuz6wbyekqv0xbkrlrpezuhovh
673511
673510
2026-08-24T04:41:29Z
Manikantkmr
5554
673511
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६४९}}</noinclude>२३ अक्तूबर : 'यंग इंडिया' में प्रकाशित 'प्रेमका विधान' में गांधीजीने अपरिवर्तन-
वादियों से कहा कि वे अपने साथी स्वराज्यवादियों एवं लिबरलोंके सामने शोभनीय
ढंग से झुक जायें।
२८ अक्तूबर: वाइसरायने गांधीजीको कोहाट जानेकी अनुमति देने से इनकार कर दिया।
३० अक्तूबर : संयुक्त प्रान्त राजनीतिक परिषद्, गोरखपुर के लिए एक सन्देशमें गांधीजीने बंगाल सरकारकी अनियमितताकी निन्दा की और लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील की।
२ नवम्बर : दिल्ली से कलकत्ताके लिए रवाना।
६ नवम्बर : स्वराज्य दलके नेताओंके साथ एक संयुक्त वक्तव्य में संगठित ढंगसे कार्य
करनेकी और असहयोग तथा कताई सदस्यताको स्थगित करनेकी घोषणा की।
टाउन हाल में कलकत्ता निगम द्वारां दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
७ नवम्बर : अपरिवर्तनवादियों के साथ हुई बातचीत में स्वराज्य दलके नेताओंके साथ
हुए समझौते की पेचीदगियोंका खुलासा किया।
हावड़ा टाउन हाल में हावड़ा नगर पालिका द्वारा दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
स्वराज्य दलके नेताओंसे हुए समझौतेपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधि से भेंट।
दिल्लीके लिए रवाना हुए।
१० नवम्बर : दिल्ली में एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे एक भेंटमें बताया कि कलकत्ता समझौते को अन्तिम निर्णयके लिए बम्बईके सर्वदलीय सम्मेलन में रखा जायेगा।
१३ नवम्बर : 'यंग इंडिया' में कलकत्ता- समझौते के बारेमें सविस्तार लिखा।
एक पत्र में रोमाँ रोलाँको लिखा कि कुमारी मैडिलीन स्लेड (मीराबहन) भारत पहुँच गई हैं और में उनके पूर्व और पश्चिमके बीच एक लघु सेतु बन सकने में पूरी सहायता करूँगा।
माडर्न स्कूल गये; रामजस कालिजके विद्यार्थियों के बीच भाषण दिया।
अली भाइयोंकी माता, बी-अम्माँके कफन- दफन में शामिल हुए।
१४ नवम्बर : न्यूयार्क के 'वर्ल्ड टुमारो' को एक सन्देशमें कहा कि 'अहिंसा संसारकी
सबसे बड़ी शक्ति है।
१६ नवम्बर : कोहाटके प्रश्नपर वक्तव्य।
१७ नवम्बरसे पूर्व : गांधीजीने तिरुवन्नामलई में हुई तमिलनाड परिषद्को एक संदेशमें
बताया कि स्वराज्यवादियोंके साथ हुए समझौतेका आधार अहिंसाकी भावना थी।
१९. नवम्बर : दिल्ली से बम्बई के लिए रवाना हुए।
२० नवम्बर : बम्बई पहुँचे।
२१. नवम्बर : बम्बई में कांग्रेस कार्यसमितिको बैठकमें भाषण।
बम्बई में, सर्वदलीय सम्मेलन में गांधीजीने बंगाल अधिनियमपर पहला प्रस्ताव पेश किया।<noinclude></noinclude>
jzfygnd2ea4y7gu8wik5t1bses8supe
673512
673511
2026-08-24T04:43:53Z
Manikantkmr
5554
673512
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६४९}}</noinclude>२३ अक्तूबर : 'यंग इंडिया' में प्रकाशित 'प्रेमका विधान' में गांधीजीने अपरिवर्तन-
वादियों से कहा कि वे अपने साथी स्वराज्यवादियों एवं लिबरलोंके सामने शोभनीय
ढंग से झुक जायें।
२८ अक्तूबर: वाइसरायने गांधीजीको कोहाट जानेकी अनुमति देने से इनकार कर दिया।
३० अक्तूबर : संयुक्त प्रान्त राजनीतिक परिषद्, गोरखपुर के लिए एक सन्देशमें गांधीजीने बंगाल सरकारकी अनियमितताकी निन्दा की और लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील की।
२ नवम्बर : दिल्ली से कलकत्ताके लिए रवाना।
६ नवम्बर : स्वराज्य दलके नेताओंके साथ एक संयुक्त वक्तव्य में संगठित ढंगसे कार्य
करनेकी और असहयोग तथा कताई सदस्यताको स्थगित करनेकी घोषणा की।
टाउन हाल में कलकत्ता निगम द्वारां दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
७ नवम्बर : अपरिवर्तनवादियों के साथ हुई बातचीत में स्वराज्य दलके नेताओंके साथ
हुए समझौते की पेचीदगियोंका खुलासा किया।
हावड़ा टाउन हाल में हावड़ा नगर पालिका द्वारा दिये गये मानपत्रके उत्तरमें भाषण।
स्वराज्य दलके नेताओंसे हुए समझौतेपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधि से भेंट।
दिल्लीके लिए रवाना हुए।
१० नवम्बर : दिल्ली में एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे एक भेंटमें बताया कि कलकत्ता समझौते को अन्तिम निर्णयके लिए बम्बईके सर्वदलीय सम्मेलन में रखा जायेगा।
१३ नवम्बर : 'यंग इंडिया' में कलकत्ता- समझौते के बारेमें सविस्तार लिखा।
एक पत्र में रोमाँ रोलाँको लिखा कि कुमारी मैडिलीन स्लेड (मीराबहन) भारत पहुँच गई हैं और में उनके पूर्व और पश्चिमके बीच एक लघु सेतु बन सकने में पूरी सहायता करूँगा।
माडर्न स्कूल गये; रामजस कालिजके विद्यार्थियों के बीच भाषण दिया।
अली भाइयोंकी माता, बी-अम्माँके कफन- दफन में शामिल हुए।
१४ नवम्बर : न्यूयार्क के 'वर्ल्ड टुमारो' को एक सन्देशमें कहा कि 'अहिंसा संसारकी
सबसे बड़ी शक्ति है।
१६ नवम्बर : कोहाटके प्रश्नपर वक्तव्य।
१७ नवम्बरसे पूर्व : गांधीजीने तिरुवन्नामलई में हुई तमिलनाड परिषद्को एक संदेशमें
बताया कि स्वराज्यवादियोंके साथ हुए समझौतेका आधार अहिंसाकी भावना थी।
१९. नवम्बर : दिल्ली से बम्बई के लिए रवाना हुए।
२० नवम्बर : बम्बई पहुँचे।
२१. नवम्बर : बम्बई में कांग्रेस कार्यसमितिको बैठकमें भाषण।
बम्बई में, सर्वदलीय सम्मेलन में गांधीजीने बंगाल अधिनियमपर पहला प्रस्ताव पेश किया।<noinclude></noinclude>
22ydray6b92haimj6xq8vkedoppocab
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८६
250
185141
673518
643205
2026-08-24T04:51:33Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673518
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|६५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गांधीजी ने ऐसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे हुई एक भेंटमें स्थानीय अखबारों में प्रकाशित कताई -सदस्यता हटा लेनेकी खबरको गलत बताया।
२२ नवम्बर : सर्वदलीय सम्मेलन में एकतापर भाषण।
२३ नवम्बर : अखिल भारतीय कांग्रेस समितिको बैठकमें कलकत्ता समझौते की स्वीकृति का प्रस्ताव रखा।
बी० अम्माँकी मृत्युपर शोक प्रकट करते हुए गांधीजीने चौपाटी की सभा में भाषण दिया।
२५ नवम्बर : बम्बई से अहमदाबाद के लिए रवाना हुए।
२६ नवम्बर : अहमदाबाद पहुँचे।
३० नवम्बर : अहमदाबाद में गुजरात राष्ट्रीय विद्यालयके विद्यार्थियों के समक्ष भाषण ।
४ दिसम्बर : लाहौर पहुँचे; श्री लाजपतरायके घरपर उनसे और पं० मदनमोहन मालवीयसे सलाह-मशविरा किया।
५ दिसम्बर : अमृतसर पहुँचे।
दोपहर बाद स्वर्ण - मन्दिर में भाषण।
शामको जलियाँवाला बागमें आयोजित एक सार्वजनिक सभा में भाषण।
६ दिसम्बर : पंजाब प्रान्तीय खिलाफत सम्मेलन में हिन्दू नेताओंपर जफरअली द्वारा
लगाये गये आरोपोंका उत्तर।
लाहौर की पंजाब कौमी विद्यापीठमें दीक्षान्त भाषण दिया।
७ दिसम्बर : पंजाब प्रान्तीय सम्मेलन में अध्यक्ष पदसे भाषण दिया।
८ दिसम्बर : गांधीजीके अनुरोधपर हिन्दू-मुस्लिम एकताको दृढ़ करने के उपाय खोजने
के लिए खिलाफत सम्मेलन के प्रतिनिधि लाहौर में मिले।
९ दिसम्बर : रावलपिंडी में भाषण करते हुए गांधीजीने हिन्दू शरणार्थियों को सलाह दी कि वे सरकारके कहनेपर कोहाट वापस न जाये।
११ दिसम्बर : प्रात: रावलपिंडीसे अहमदाबाद के लिए रवाना हुए; रास्तेमें लाहौर
स्टेशनपर 'ट्रिब्यून' के प्रतिनिधिसे कोहाट के मामलेपर भेंट।
१३ दिसम्बर : अहमदाबाद पहुँचे।
१४ दिसम्बर : समाचारपत्रोंको दिये गये अपने वक्तव्य में गांधीजीने लोगोंको चेतावनी दी कि मेरे द्वारा प्रमाणित न किये गये पंजाब के मेरे भाषणोंके विवरणोंपर
वे विश्वास न करें।
१८ दिसम्बर : अहमदाबादसे बेलगाँव के लिए रवाना।
२० दिसम्बर : गांधीजी बेलगाँव पहुँचे।
२१ दिसम्बर : बेलगाँव नगरपालिका और जिला बोर्ड द्वारा दिये गये मानत्रपके उत्तर में भाषण।
२३ दिसम्बर : बेलगाँव में, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने कलकत्ताके समझौते की
पुष्टि करने के लिए एक प्रस्तावका मसविदा तैयार करनेके उद्देश्यसे गांधीजी की
अध्यक्षता में सोलह सदस्योंकी एक विषय समितिका गठन किया।<noinclude></noinclude>
lg1uqps0c6siyqdyhsqr97meejrcxn6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८७
250
185142
673522
643206
2026-08-24T05:01:10Z
Manikantkmr
5554
/* शोधित */
673522
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh|तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६५१}}</noinclude>२४ दिसम्बर : विषय समितिने कलकत्ता समझौता और कताई सदस्यताका समर्थन
करनेवाले प्रस्तावको स्वीकृत किया।
कांग्रेस पंडाल में डा० किचलूकी अध्यक्षतामें खिलाफत सम्मेलन हुआ।
२५ दिसम्बर : बेलगाँव में विषय समितिकी बैठक में गांधीजीने अपरिवर्तनवादियोंसे अपील की कि वे स्वराज्यवादियों में विश्वास रखें।
२६ दिसम्बर : गांधीजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसका ३९ वाँ अधिवेशन शुरू हुआ। गांधीजीने अध्यक्षीय भाषण दिया तथा कलकत्ता समझौतेका समर्थन करने-
वाले प्रस्तावपर अपने विचार व्यक्त किए।
२७ दिसम्बर : सुबह पांचवें अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन में भाषण।
कांग्रेस अधिवेशन में विभिन्न प्रस्तावों और एनी बेसेंटके वक्तव्यपर भाषण।
गांधीजी द्वारा पहले हिन्दी तथा बाद में अंग्रेजीमें दिये गये प्रभावशाली भाषण के
साथ कांग्रेस अधिवेशन समाप्त हुआ।
अस्पृश्यता परिषद् में भाषण।
कांग्रेस पंडाल में हुए हिन्दू महासभा के अधिवेशन में शामिल हुए।
२८ दिसम्बर : गोरक्षा परिषद् में अध्यक्षीय भाषण।
३० दिसम्बर : अखिल भारतीय देशी रियासत-परिषद् में भाषण।
३१ दिसम्बर : बम्बई में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन में गांधीजीने
'नेटाल- बरोज अध्यादेश 'की निन्दा की।
{{C|'''१९२५'''}}
१ जनवरी : गांधीजी ने अपने लेख बोलशेविज्म या आत्मसंयम " पर श्री एम० एन०
रायकी आलोचनाका 'यंग इंडिया' में उत्तर दिया।
२ जनवरी : दाहोद और गोधरामें भाषण।
८ जनवरी : भावनगर में हुई तीसरी काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में अध्यक्षीय
भाषण।
९ जनवरी : काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में समापन भाषण दिया।
सामलदास कालेज में विद्यार्थियों के कर्त्तव्यपर भाषण।
१४ जनवरी : अहमदाबाद में, गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भाषण।
गुजरात विद्यापीठमें दीक्षान्त भाषण।
१५ जनवरी : गांधीजीने कताई सदस्यताको कार्यान्वित करने सम्बन्धी सूचनाएँ 'यंग
इंडिया' में संक्षेपमें दी।
सोजित्रामें हुई खेडूत परिषद् में भाषण।<noinclude></noinclude>
4mzgyjpdxty2nfvg6es98tx8olgs8ci
673523
673522
2026-08-24T05:01:31Z
Manikantkmr
5554
673523
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Manikantkmr" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|६५१}}</noinclude>२४ दिसम्बर : विषय समितिने कलकत्ता समझौता और कताई सदस्यताका समर्थन
करनेवाले प्रस्तावको स्वीकृत किया।
कांग्रेस पंडाल में डा० किचलूकी अध्यक्षतामें खिलाफत सम्मेलन हुआ।
२५ दिसम्बर : बेलगाँव में विषय समितिकी बैठक में गांधीजीने अपरिवर्तनवादियोंसे अपील की कि वे स्वराज्यवादियों में विश्वास रखें।
२६ दिसम्बर : गांधीजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसका ३९ वाँ अधिवेशन शुरू हुआ। गांधीजीने अध्यक्षीय भाषण दिया तथा कलकत्ता समझौतेका समर्थन करने-
वाले प्रस्तावपर अपने विचार व्यक्त किए।
२७ दिसम्बर : सुबह पांचवें अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन में भाषण।
कांग्रेस अधिवेशन में विभिन्न प्रस्तावों और एनी बेसेंटके वक्तव्यपर भाषण।
गांधीजी द्वारा पहले हिन्दी तथा बाद में अंग्रेजीमें दिये गये प्रभावशाली भाषण के
साथ कांग्रेस अधिवेशन समाप्त हुआ।
अस्पृश्यता परिषद् में भाषण।
कांग्रेस पंडाल में हुए हिन्दू महासभा के अधिवेशन में शामिल हुए।
२८ दिसम्बर : गोरक्षा परिषद् में अध्यक्षीय भाषण।
३० दिसम्बर : अखिल भारतीय देशी रियासत-परिषद् में भाषण।
३१ दिसम्बर : बम्बई में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन में गांधीजीने
'नेटाल- बरोज अध्यादेश 'की निन्दा की।
{{C|'''१९२५'''}}
१ जनवरी : गांधीजी ने अपने लेख बोलशेविज्म या आत्मसंयम " पर श्री एम० एन०
रायकी आलोचनाका 'यंग इंडिया' में उत्तर दिया।
२ जनवरी : दाहोद और गोधरामें भाषण।
८ जनवरी : भावनगर में हुई तीसरी काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में अध्यक्षीय
भाषण।
९ जनवरी : काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में समापन भाषण दिया।
सामलदास कालेज में विद्यार्थियों के कर्त्तव्यपर भाषण।
१४ जनवरी : अहमदाबाद में, गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भाषण।
गुजरात विद्यापीठमें दीक्षान्त भाषण।
१५ जनवरी : गांधीजीने कताई सदस्यताको कार्यान्वित करने सम्बन्धी सूचनाएँ 'यंग
इंडिया' में संक्षेपमें दी।
सोजित्रामें हुई खेडूत परिषद् में भाषण।<noinclude></noinclude>
r9uogko3f0ko05tffbb9t80we7dv2nx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६२०
250
186143
673480
644458
2026-08-24T03:14:59Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673480
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''५८८'''|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|रामदास, १४९}}
{{Outdent|राममोहन राय, राजा, —और अंग्रेजी शिक्षा, ४४-४५}}
{{Outdent|'''रामायण,''' ५३, ४०६, ५१८}}
{{Outdent|रायमल, सेठ, २०४}}
{{Outdent|राली ब्रर्दस, ५४३-४४}}
{{Outdent|रावण, ११३, २०१, ३३०}}
{{Outdent|राष्ट्रीय झण्डा, —और चरखा, १२०; -और सिख, १०५, ४८३; -[डे] में धर्म विशेष-का प्रतीक न हो, १२०}}
{{Outdent|राष्ट्रीय स्कूल, -सिन्धमें ५५; -[ो] का लक्ष्य, २६९-७१; -में कताई, ९, ७४-७७, ५४८-४९}}
{{Outdent|रिश्वतखोरी, -रेलोंमें, ४४१}}
{{Outdent|रीडिंग, लॉर्ड, ३५, ९९, १५१, १८६, २१९-२२०, २२४, २३३, २६३, २९४, ३२१, ३७८-७९, ४२५, ४८४, ४९९; -का गांधीजीसे हुई भेंटपर वक्तव्य, ४८४; —द्वारा नौकरशाहीका समर्थन, २९०-९९}}
{{Outdent|रुस्तमजी, पारसी, १५२, १६०, १७०, २३६, २४६, २९५, ३१२, ३१९, ४६०}}
{{Outdent|रौलट अधिनियम, १२१}}
{{c|'''ल'''}}
{{Outdent|'''ल'''क्ष्मी, देवी, ४०५}}
{{Outdent|लक्ष्य, —और साधन, ५११-१२}}
{{Outdent|लछमनसिंह, ५१, ६७, ८६, १००; -और अहिंसा, १४५, १७१-७२}}
{{Outdent|ललित, ४३९}}
{{Outdent|लाजपतराय, लाला, ७९, १५५, १८१,
३१४, ४४५; -द्वारा नरम दल-वालोंकी आलोचना, १२५-२६}}
{{Outdent|लॉयड, जॉर्ज, २२४, २३४}}
{{Outdent|लालचन्द, ४१}}
{{Outdent|'''लीडर,''' १८४}}
{{Multicol-break}}
{{c|'''व'''}}
{{Outdent|'''व'''र्णाश्रम, —धर्मका सार, २३८-३९}}
{{Outdent|वर्मा, तेजसिंह, ४३०}}
{{Outdent|वलेछा, चोइथराम, २२४}}
{{Outdent|वल्लभाचार्य, ३१६}}
{{Outdent|वाज, १६४}}
{{Outdent|वामनराव, देखिए मुकादम, वामनराव}}
{{Outdent|वासवाणी, प्रो॰ टी॰ एल, ५६, १९४-९५}}
{{Outdent|विजयराघवाचार्य, सी॰, २४९, ३६०}}
{{Outdent|विद्यानन्द, १०८}}
{{Outdent|विनोबा, ५३६}}
{{Outdent|विन्सेंट, सर विलियम, ८५; —द्वारा की गई असहयोगकी आलोचनाका जवाब, १७-२०}}
{{Outdent|विमदलाल, २४७}}
{{Outdent|विल्सन, प्रेसीडेंट, १६४}}
{{Outdent|विश्व-युद्ध, प्रथम, —और गुप्त सन्धियाँ, ४६}}
{{Outdent|वीरुमल, बेगराज, २२३}}
{{Outdent|वेलकर, डॉ॰, २८९}}
{{Outdent|वैष्णव धर्म, देखिए “हिन्दू धर्म”}}
{{Outdent|वैंकटप्पैया, कोण्डा, ७९, ४५४, ४७२, ४८१,}}
५०९
{{Outdent|वैंकटरमन, के॰ एस॰, १९८}}
{{Outdent|वैजवुड, १५७}}
{{c|'''श'''}}
{{Outdent|'''शं'''करलाल, २७८}}
{{Outdent|शफी, १८८}}
{{Outdent|शबाडी, गुण्डप्पा, १४३}}
{{Outdent|शम्भुनाथ, ५४५}}
{{Outdent|शराबबन्दी, देखिए “मद्यपान निषेध”}}
{{Outdent|शर्मा, गंगाराम, १०८}}
{{Outdent|शार्दूलसिंह, —को जेलकी सजा, ३४०-४१}}
{{Outdent|शास्त्री, वसन्तराम, ४०८, ५२१, ५३०}}
{{Outdent|शास्त्री, वी॰ एस॰ श्रीनिवास, ३०, १३३, १४४}}
{{Outdent|शाह, फूलचन्द, ५०२}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
ezdo4skxliogjo25h53zwwzvz56wmsd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/६२१
250
186146
673488
644461
2026-08-24T03:29:01Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673488
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''सांकेतिका'''|'''सांकेतिका'''}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|शिक्षकों, —का कर्त्तव्य, २७३-७६}}
{{Outdent|शिक्षा, —अंग्रेजी का विरोध, १५७-५८; -अंग्रेजी माध्यम द्वारा, ४४-४५; -कताईकी, ७२-७४, २२६, २४५}}
{{Outdent|शिवाजी, ४५, १४९}}
{{Outdent|शेरवानी, ४११, ४१३, ४१५, ४५४, ४५९, ४८२, ५०९, ५४६}}
{{Outdent|शौकत अली, ३, ४७, ६३, ८२-८३, ८६, १५५, १७१, १८८, २१०, ३६७, ३८७; देखिए अलीभाई भी}}
{{Outdent|श्रद्धानन्द, स्वामी, ३७३}}
{{c|'''स'''}}
{{Outdent|सत्य, १२७; -और असहयोग, ९५; -और धर्म, २७७}}
{{Outdent|सत्याग्रह, १, ६०, १२१; -और असहयोग, ४९२; -और अहिंसा, ४३, ६१-६२; -दक्षिण आफ्रिकामें, १४-१५, ६०-६२}}
{{Outdent|सत्याग्रह सप्ताह, ५०, ७६, ९८}}
{{Outdent|सन्तराम, ५३५}}
{{Outdent|सन्तानम्, १८२}}
{{Outdent|सप्रू, सर तेजबहादुर, १५४}}
{{Outdent|सफाई, -की आवश्यकता, ४०६}}
{{Outdent|'''समाज,''' ३७६}}
{{Outdent|सरलादेवी, ४२६}}
{{Outdent|सरस्वती, [देवी], ६५}}
{{Outdent|'''सवेंट ऑफ इंडिया,''' १३, १६४, २४५, ३०४; -की अली बन्धुओंकी क्षमा-याचनापर टिप्पणी, २५३-५४}}
{{Outdent|सलामतुल्ला, ५४२}}
{{Outdent|सविनय अवज्ञा, ३६८, ४८५, ५०९, ५४४, ५४८; -और असहयोग, २३१-३२; -के सिद्धान्त, ४८५-८६; -में स्वयं-सेवकों का कर्त्तव्य, ५३१-३२}}
{{Outdent|साधन, और लक्ष्य, ५११-१२}}
{{Outdent|साम्राज्यवाद, -और राष्ट्रमण्डल, ३०५}}
{{Outdent|साराभाई, अनसूयाबेन, २१०, २९७, ३८८}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|साराभाई, अम्बालाल, ४०१}}
{{Outdent|सावरकर, गणेश दामोदर, २९२, ४४९-५०}}
{{Outdent|सावरकर, डा॰, २९२}}
{{Outdent|सावरकर बन्धु १०२, २९२-९३}}
{{Outdent|सिख, २३, ३७७, ४७७, ५२९; -और अहिंसा, १००; -और कांग्रेस, ४८३; -और कृपाण, ४२२; -और राष्ट्रीय झण्डा, १०५, ४८३}}
{{Outdent|सिख लीग, ९९}}
{{Outdent|सिद्धार्थ, २९१}}
{{Outdent|सिन्हा, लॉर्ड सत्येन्द्रप्रसन्न, २००, २४३, ३७६}}
{{Outdent|सिष्टा, पी॰, ४२९}}
{{Outdent|सीता, ११३, १५३, २०१, २१५, ३३०, ४२८, ४९८, ५४१}}
{{Outdent|सुखिया, डाक्टर एन॰ एम॰, २४९}}
{{Outdent|सुदामा, २०१}}
{{Outdent|सुन्दरलाल, १११, १३८, ३६९-७०; -की गिरफ्तारी, ३५८}}
{{Outdent|सुब्बियाहिएर, के॰ एस॰, १९८}}
{{Outdent|सुलाखे, १२३}}
{{Outdent|सेठी, अर्जुनलाल, -की गिरफ्तारी, ७१}}
{{Outdent|सैली, ४११}}
{{Outdent|सोबानी, आजाद, ५३१}}
{{Outdent|सोबानी, उमर, २४६, २८९, ३३७, ४६५, ४८१}}
{{Outdent|सोबानी, यूसुफ, ४९१}}
{{Outdent|स्टोक्स, सैम्युअल, १५७, ४१०, ४२५-२६, ४८८, ५१९-२०, ५३१, ५३५}}
{{Outdent|स्त्रियाँ, -और इस्लाम, ४२८; -और चरखा, २४५, २९६-९७, ४३८, ५००-१, ५१६-१७; -और राष्ट्रीय जागृति, २१४-१५; -और स्वदेशी, ११३, १५३, २०८, २३७-३८, २७२, ३२३-२४, ३२९-३०, ४१२-१३, ४३६-३८, ४४०, ५००-१, ५१६-१७; —तमिलनाडकी, ५०५-६; -धर्मकी संरक्षिकाएँ, ६३; -लखनऊकी पतित, ५४१-४२; -[ो]
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
i5aq19bgh2qd8k7ooxb1s6hwuvwe63z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१२
250
186279
673503
644626
2026-08-24T04:29:21Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673503
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|४८०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करने की मेरी धमकी किस प्रकार उन उपदेशों के प्रतिकूल है जिनका पालन करने का मैं प्रयास कर रहा हूँ। मुझे सदुपदेश देने वाले ये सभी लोग शायद भूल जाते हैं कि मैं तो केवल एक सत्यान्वेषी हूँ। मेरा दावा है कि मैंने सत्य तक पहुँचने का एक रास्ता ढूंढ़ लिया है। मेरा यह दावा भी है कि मैं सत्य तक पहुँचने का अनवरत प्रयत्न कर रहा हूँ। लेकिन साथ ही मैं स्वीकार करता हूँ कि अब तक मुझे वह मिला नहीं है। पूर्ण सत्य को खोज निकालना तो स्वयं अपने-आपको पहचान लेना, अपने भवितव्य को समझ लेना है, अर्थात् सर्वथा त्रुटिरहित बन जाना है। मैं अपनी त्रुटियों को जानता हूँ और इनका मुझे दुःख भी है। अपनी कमियों की इस जानकारी में ही मेरी पूरी शक्ति निहित है, क्योंकि चन्द मनुष्य ही ऐसे होते हैं जो अपनी मर्यादाओं से परिचित हों।
यदि मैं पूर्ण पुरुष होता, तो मुझे अपने पड़ोसियों के कष्ट देखकर पीड़ा का अनुभव नहीं होता, जैसा कि अभी होता है। पूर्ण पुरुष होने के नाते मेरा कर्त्तव्य तो यह होता कि मैं उनकी कठिनाइयाँ देखकर उनको दूर करने का उपाय बताता और अपने भीतर निहित अजेय सत्य की शक्ति से उस उपाय को अपनाने के लिए लोगों को विवश कर देता। लेकिन मुझे तो अब तक ऐसा लगता है कि मैं सत्य को धुंधले काँच के पीछे से ही देख पा रहा हूँ और इसीलिए मुझे लोगों को किसी बात की प्रतीति कराने में बहुत धीमे और श्रमसाध्य तरीकों को काम में लाना पड़ता है, और तब भी ऐसा नहीं कि मैं सदा सफल ही हो जाता हूँ। ऐसी स्थिति में आज जब कि मैं देख रहा हूँ कि सारा भारत कष्टों के भार से - ऐसे कष्टों के भार से जिनसे बचा जा सकता है - दबा हुआ है और जगन्नाथस्वामी के चरणों के नीचे ही इन्सान केवल हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया है, यदि मैं करोड़ों पीड़ित और मूक भारतीयों के कष्ट में कष्ट का अनुभव न करूँ तो अपने-आपको इन्सान नहीं मानूँगा। एक यही आशा मुझे सम्बल देती है कि जनता का यह कष्ट निरन्तर कम होता जायेगा। परन्तु मान लीजिये कि कष्ट, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी के प्रति अपनी इस समस्त संवेदनशीलता के बावजूद, चरखे का शान्तिप्रदायक सन्देश लोगों के हृदय तक पहुँचाने की अपनी सारी कोशिशों के बावजूद, मैं लोगों को केवल अपनी बात सुना ही सकूँ, उनके हृदय तक न पहुँचा सकूँ; और यह भी मान लीजिए कि साल के अन्त में मैं यह देखूँ कि लोग चरखे की शान्तिपूर्ण क्रान्ति द्वारा स्वराज्य प्राप्ति की वर्तमान सम्भावना के सम्बन्ध में उतने ही सन्देहशील बने हुए हैं जितने आज हैं; मान लीजिए मैं देखूँ कि पिछले बारह महीने बल्कि इससे भी अधिक अवधि तक लोगों में जो उत्साह दिखाई देता रहा है वह महज ऊपरी हलचल और अस्थायी आवेश मात्र था, हमारे कार्यक्रम के प्रति सुदृढ़ आस्था का प्रतीक नहीं और अन्त में मान लीजिए कि मैं देखूँ कि शान्ति का सन्देश अंग्रेजों के हृदय में घर नहीं कर पाया है तो उस हालत में क्या मुझे अपनी समस्या पर सन्देह नहीं करना चाहिए और मुझे यह महसूस नहीं करना चाहिए कि मैं इस संघर्ष का नेतृत्व करने योग्य नहीं हूँ? एक सच्चे इन्सान के रूप में मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे पूर्ण विनय के साथ अपने सिरजनहार के सामने घुटने टेककर उससे यह प्रार्थना नहीं करनी चाहिए कि वह इस व्यर्थ शरीर को उठा ले और मुझे सेवा का कोई अधिक उपयुक्त साधन बना दे?<noinclude></noinclude>
oedt317xnl2ryuxueaebillckbrqend
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१३
250
186280
673504
644627
2026-08-24T04:30:35Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673504
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||आत्म-निरीक्षण|
४८१}}</noinclude>स्वराज्यका मतलब सरकारको बदलना और उसपर जनताके वास्तविक नियन्त्रण-
की स्थापना है । परन्तु वह तो केवल उसके स्वरूपकी बात हुई। लेकिन मैं जिस असली
चीजके लिए लालायित हूँ वह तो यह है कि सरकारको बदलनेके साधनको निश्चित
रूपसे स्वीकार किया जाये अर्थात् वास्तवमें जनताका हृदय परिवर्तन हो । मेरा यह दृढ़
विश्वास है कि छुआछूतकी गलत प्रथाको त्यागने के लिए हिन्दुओंको, तथा वैर-भाव
छोड़कर हार्दिक मैत्रीभावको राष्ट्रीय-जीवनका चिरस्थायी अंग मानने के लिए हिन्दुओं व
मुसलमानोंको और हिन्दुस्तानको आर्थिक दासतासे मुक्ति दिलानेवाले एकमात्र साधनके
रूपमें चरखेको अपनानेके लिए समस्त जनताको युगोंका समय नहीं चाहिए; और
अन्तमें सभी के हृदयमें यह विश्वास उत्पन्न होने में भी बहुत लम्बी अवधि नहीं लगनी
चाहिए कि हिन्दुस्तानको अहिंसाके रास्तेसे ही स्वराज्य मिलेगा, अन्य किसी साधनसे
नहीं । मेरा विश्वास है कि जनता द्वारा स्वेच्छासे समझ-बूझकर, निश्चित तौरपर इस
कार्यक्रमको स्वीकार करना ही उस वास्तविक स्वराज्यको प्राप्त करना है। इसके बाद,
स्वराज्यका प्रतीक अर्थात् सत्ता हस्तान्तरण उसी प्रकार अवश्यम्भावी है जिस प्रकार
सही ढंगसे बोया गया बीज बढ़कर वृक्षका रूप धारण कर लेता है ।
पाठक इससे समझ गये होंगे कि मैंने संयोगवश जो बात पहले-पहल पूनामें कही
और बादमें दूसरोंके सामने भी दोहराई वह और कुछ नहीं, केवल अपनी कमियोंकी
स्वीकारोक्ति और अपनी इस धारणाकी अभिव्यक्ति मात्र थी कि जिस महान् अभियान-
का मैं इस समय नेतृत्व करता प्रतीत होता हूँ उसके लिए मैं अपने आपको कितना
अयोग्य समझता हूँ। मैंने किसी निराशावादी विचारका प्रतिपादन नहीं किया है।
उलटे, मुझे पहले कभी भी इस बातकी इतनी अधिक आशा नहीं थी जितनी यह
लिखते समय है कि हम इस वर्ष के भीतर स्वराज्यका सार प्राप्त कर लेंगे। साथ ही
एक व्यावहारिक आदर्शवादीके रूपमें मैंने यह भी कहा है कि मुझे अपने-आपको ऐसे
महान कार्यका नेतृत्व करने योग्य नहीं समझना चाहिए, जिसे संभाल सकनेका भरोसा
मुझे स्वयं ही न हो। निष्काम कर्मका अर्थ जितना यह है कि अडिग भावसे सत्यकी
खोजमें लगे रहो, उतना ही यह भी है कि अपनी गलती मालूम होनेपर गलत रास्ते से
पीछे हट जाओ और जब अपनेको नेतृत्वके अयोग्य समझने लगो उस समय नेतृत्वका
मोह त्यागने में कष्टका अनुभव भी न करो। मैंने तो केवल अपनी इसी हार्दिक
कामनाको अभिव्यक्ति दी है कि मैं अनन्तमें विलीन होकर सिरजनहारके हाथों में
गीली मिट्टीका लोंदा बन जाऊँ ताकि मेरी सेवा अधिक प्रभावकारी हो, क्योंकि तब
उसमें मेरे व्यक्तित्वका निकृष्ट अंश बाधक नहीं बनेगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''यंग इंडिया,''' १७-११-१९२१
२१-३१<noinclude></noinclude>
c1pz1zecxfyqckig3qrmoui3nf1ng06
673505
673504
2026-08-24T04:32:23Z
Shivaniya shaw
4129
673505
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||आत्म-निरीक्षण|
४८१}}</noinclude>स्वराज्य का मतलब सरकार को बदलना और उस पर जनता के वास्तविक नियन्त्रण की स्थापना है। परन्तु वह तो केवल उसके स्वरूप की बात हुई। लेकिन मैं जिस असली चीज के लिए लालायित हूँ वह तो यह है कि सरकार को बदलने के साधन को निश्चित रूप से स्वीकार किया जाये अर्थात् वास्तव में जनता का हृदय परिवर्तन हो। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि छुआछूत की गलत प्रथा को त्यागने के लिए हिन्दुओं को, तथा वैर-भाव छोड़कर हार्दिक मैत्रीभाव को राष्ट्रीय-जीवन का चिरस्थायी अंग मानने के लिए हिन्दुओं व मुसलमानों को और हिन्दुस्तान को आर्थिक दासता से मुक्ति दिलाने वाले एकमात्र साधन के रूप में चरखे को अपनाने के लिए समस्त जनता को युगों का समय नहीं चाहिए; और अन्त में सभी के हृदय में यह विश्वास उत्पन्न होने में भी बहुत लम्बी अवधि नहीं लगनी चाहिए कि हिन्दुस्तान को अहिंसा के रास्ते से ही स्वराज्य मिलेगा, अन्य किसी साधन से नहीं। मेरा विश्वास है कि जनता द्वारा स्वेच्छा से समझ-बूझकर, निश्चित तौर पर इस कार्यक्रम को स्वीकार करना ही उस वास्तविक स्वराज्य को प्राप्त करना है। इसके बाद, स्वराज्य का प्रतीक अर्थात् सत्ता हस्तान्तरण उसी प्रकार अवश्यम्भावी है जिस प्रकार सही ढंग से बोया गया बीज बढ़कर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है।
पाठक इससे समझ गये होंगे कि मैंने संयोगवश जो बात पहले-पहल पूना में कही और बाद में दूसरों के सामने भी दोहराई वह और कुछ नहीं, केवल अपनी कमियों की स्वीकारोक्ति और अपनी इस धारणा की अभिव्यक्ति मात्र थी कि जिस महान् अभियान का मैं इस समय नेतृत्व करता प्रतीत होता हूँ उसके लिए मैं अपने आपको कितना अयोग्य समझता हूँ। मैंने किसी निराशावादी विचार का प्रतिपादन नहीं किया है। उलटे, मुझे पहले कभी भी इस बात की इतनी अधिक आशा नहीं थी जितनी यह लिखते समय है कि हम इस वर्ष के भीतर स्वराज्य का सार प्राप्त कर लेंगे। साथ ही एक व्यावहारिक आदर्शवादी के रूप में मैंने यह भी कहा है कि मुझे अपने-आपको ऐसे महान कार्य का नेतृत्व करने योग्य नहीं समझना चाहिए, जिसे संभाल सकने का भरोसा मुझे स्वयं ही न हो। निष्काम कर्म का अर्थ जितना यह है कि अडिग भाव से सत्य की खोज में लगे रहो, उतना ही यह भी है कि अपनी गलती मालूम होने पर गलत रास्ते से पीछे हट जाओ और जब अपने को नेतृत्व के अयोग्य समझने लगो उस समय नेतृत्व का मोह त्यागने में कष्ट का अनुभव भी न करो। मैंने तो केवल अपनी इसी हार्दिक कामना को अभिव्यक्ति दी है कि मैं अनन्त में विलीन होकर सिरजनहार के हाथों में गीली मिट्टी का लोंदा बन जाऊँ ताकि मेरी सेवा अधिक प्रभावकारी हो, क्योंकि तब उसमें मेरे व्यक्तित्व का निकृष्ट अंश बाधक नहीं बनेगा।
:[अंग्रेजी से]
:'''यंग इंडिया,'''१७-११-१९२१
२१-३१<noinclude></noinclude>
r4xccvh21vnddah9ii4gg65j6biytmr
673506
673505
2026-08-24T04:32:43Z
Shivaniya shaw
4129
673506
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||आत्म-निरीक्षण|
४८१}}</noinclude>{{gap}}स्वराज्य का मतलब सरकार को बदलना और उस पर जनता के वास्तविक नियन्त्रण की स्थापना है। परन्तु वह तो केवल उसके स्वरूप की बात हुई। लेकिन मैं जिस असली चीज के लिए लालायित हूँ वह तो यह है कि सरकार को बदलने के साधन को निश्चित रूप से स्वीकार किया जाये अर्थात् वास्तव में जनता का हृदय परिवर्तन हो। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि छुआछूत की गलत प्रथा को त्यागने के लिए हिन्दुओं को, तथा वैर-भाव छोड़कर हार्दिक मैत्रीभाव को राष्ट्रीय-जीवन का चिरस्थायी अंग मानने के लिए हिन्दुओं व मुसलमानों को और हिन्दुस्तान को आर्थिक दासता से मुक्ति दिलाने वाले एकमात्र साधन के रूप में चरखे को अपनाने के लिए समस्त जनता को युगों का समय नहीं चाहिए; और अन्त में सभी के हृदय में यह विश्वास उत्पन्न होने में भी बहुत लम्बी अवधि नहीं लगनी चाहिए कि हिन्दुस्तान को अहिंसा के रास्ते से ही स्वराज्य मिलेगा, अन्य किसी साधन से नहीं। मेरा विश्वास है कि जनता द्वारा स्वेच्छा से समझ-बूझकर, निश्चित तौर पर इस कार्यक्रम को स्वीकार करना ही उस वास्तविक स्वराज्य को प्राप्त करना है। इसके बाद, स्वराज्य का प्रतीक अर्थात् सत्ता हस्तान्तरण उसी प्रकार अवश्यम्भावी है जिस प्रकार सही ढंग से बोया गया बीज बढ़कर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है।
पाठक इससे समझ गये होंगे कि मैंने संयोगवश जो बात पहले-पहल पूना में कही और बाद में दूसरों के सामने भी दोहराई वह और कुछ नहीं, केवल अपनी कमियों की स्वीकारोक्ति और अपनी इस धारणा की अभिव्यक्ति मात्र थी कि जिस महान् अभियान का मैं इस समय नेतृत्व करता प्रतीत होता हूँ उसके लिए मैं अपने आपको कितना अयोग्य समझता हूँ। मैंने किसी निराशावादी विचार का प्रतिपादन नहीं किया है। उलटे, मुझे पहले कभी भी इस बात की इतनी अधिक आशा नहीं थी जितनी यह लिखते समय है कि हम इस वर्ष के भीतर स्वराज्य का सार प्राप्त कर लेंगे। साथ ही एक व्यावहारिक आदर्शवादी के रूप में मैंने यह भी कहा है कि मुझे अपने-आपको ऐसे महान कार्य का नेतृत्व करने योग्य नहीं समझना चाहिए, जिसे संभाल सकने का भरोसा मुझे स्वयं ही न हो। निष्काम कर्म का अर्थ जितना यह है कि अडिग भाव से सत्य की खोज में लगे रहो, उतना ही यह भी है कि अपनी गलती मालूम होने पर गलत रास्ते से पीछे हट जाओ और जब अपने को नेतृत्व के अयोग्य समझने लगो उस समय नेतृत्व का मोह त्यागने में कष्ट का अनुभव भी न करो। मैंने तो केवल अपनी इसी हार्दिक कामना को अभिव्यक्ति दी है कि मैं अनन्त में विलीन होकर सिरजनहार के हाथों में गीली मिट्टी का लोंदा बन जाऊँ ताकि मेरी सेवा अधिक प्रभावकारी हो, क्योंकि तब उसमें मेरे व्यक्तित्व का निकृष्ट अंश बाधक नहीं बनेगा।
:[अंग्रेजी से]
:'''यंग इंडिया,'''१७-११-१९२१
२१-३१<noinclude></noinclude>
3lz6vzd7u2lxyf8hjuopmeyu6bc4rn7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१४
250
186282
673508
644629
2026-08-24T04:36:11Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673508
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१९६. भाषण : बम्बई की सार्वजनिक सभा में'''<ref>१. यह सभा एलफिंस्टन मिल्स के पीछे साढ़े दस बजे दिन में हुई थी।</ref>}}}}
{{Right|१७ नवम्बर, १९२१}}
अपने भाषण के दौरान महात्मा गांधी ने कहा कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने मुझे कुछ काम दे रखा है। काम बहुत जरूरी है और मैं किसी दूसरे काम में एक क्षण भी लगाने की स्थिति में नहीं हूँ। इसलिए मैं लगभग अपनी मर्जी के खिलाफ ही बम्बई आया हूँ। श्री एच० एस० खत्री तथा श्रीमती एस० जी० बैंकर ने मुझे आने के लिए बार-बार तार भेजा। आखिर को मैं इस सभा में हाजिर होने को बम्बई आ गया हूँ। उन्होंने बम्बई के लोगों को बधाई देते हुए कहा कि आपके सामने उत्तेजना के बहुत से कारण आये। आपके स्वयंसेवकों और नेताओं ने, युवराज की यात्रा के सम्बन्ध में आयोजित समारोहों में लोगों से शामिल न होने का अनुरोध करते हुए दीवारों पर पर्चे चिपकाये, और इतने पर ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फिर भी, आपने अब तक पूरी शान्ति बनाये रखी है, इसके लिए आपको बधाई देता हूँ। उन पर्चों में मुझे तो कोई भी बात आपत्तिजनक नहीं दिखाई देती। बल्कि इसके विपरीत, वे लोग युवराज को सम्मानित करने के लिए ही वह सब कर रहे थे, क्योंकि उन पर्चों के माध्यम से वे उन्हें सत्य से अवगत करा रहे थे। वे युवराज को इस सत्य से अवगत करा रहे थे कि उनका जो स्वागत किया जा रहा है वह अधिकारियों की ओर से किया जा रहा है और जनता के एक बहुत बड़े बहुमत का इसमें कोई हिस्सा नहीं है। ऐसा करके वे वास्तव में अपने कर्तव्य का ही पालन कर रहे थे। इसके बाद महात्मा जी ने लोगों को सलाह दी कि अगर आपसे सभी पर्चे छीन भी लिये जायें तब भी आप शान्ति बनाये रखिए और अहिंसा पर दृढ़ रहिए, क्योंकि भारतीयों को खिलाफत और पंजाब के साथ किये गये अन्यायों का परिशोधन कराना है। अहिंसा आपका धर्म है और आपको बड़ी से बड़ी कीमत चुकाकर भी अपने इस धर्म पर आरूढ़ रहना है। अतः, मैं बम्बई के लोगों को उनकी अहिंसावादिता पर बधाई देता हूँ। बारडोली, आनन्द और नडियाद ताल्लुकों में से कहीं भी जब एक बार सविनय अवज्ञा प्रारम्भ कर दी जाये, तो मैं चाहता हूँ कि बम्बई के लोग, चाहे कुछ भी हो जाये, शान्त बने रहें। पहले लोग जेल जाने से डरते थे, लेकिन अब हर कोई जेल जाने को उत्सुक है। मेरे पास आकर बहुत सी पुरुषों और स्त्रियों ने आकुलता के साथ मुझसे पूछा है कि क्या उनके लिए जेल जाना सम्भव नहीं है। सिपाही चाहे अपना कर्त्तव्य पूरा करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो, अथवा जेल जाये, या चुपचाप अपना कर्तव्य पूरा करता रहे उसके लिए यह सब एक ही बात है। जो आदेश दिये गये हैं, उनका हर मामले में आपको पालन करना<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
bei7mru0aljvgg1krzyqqm1ufclj5nv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१५
250
186283
673519
644630
2026-08-24T04:52:41Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
673519
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||भाषण : बम्बई की सार्वजनिक सभा में|
४८३}}</noinclude>है। आप सब स्वराज्य सेना के सेनानी हैं और आपमें से हर एक को जो भी आदेश दिये जायें, उनका पालन करना है। बारडोली में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ होने पर गोलियाँ भी चल सकती हैं, लेकिन आप सभी बम्बई-वासियों को शान्त बैठे रहना चाहिए — कोई हड़ताल नहीं होनी चाहिए, किसी तरह का उपद्रव नहीं होना चाहिए; स्वराज्य आपको तभी मिल सकता है। मेरा निश्चित मत है कि आवश्यक बलिदान के बिना आप कभी स्वराज्य नहीं पा सकते। मुझे यह भी लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना भी स्वराज्य नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि अभी दोनों समुदायों में पूरी एकता नहीं है। हिन्दू मुसलमानों से डरते हैं और मुसलमान हिन्दुओं से। सन्देह-शंका की ये सारी भावनाएँ सदा के लिए मिट जानी चाहिए। दोनों समुदायों के भीतर आज जो एक-दूसरे के प्रति ये शंकाएँ हैं, उनका कारण यह है कि हम कायर हो गये हैं और हमने अपना धर्म छोड़ दिया है। जो अपने धर्म के नाम पर मर-मिटने को तैयार हैं वे ही सच्चे देशभक्त और धर्मनिष्ठ व्यक्ति हैं। इसलिए मैं हिन्दू भाइयों से कहता हूँ कि जब तक आप सच्चे हिन्दू बने हुए हैं तब तक किसी दूसरे धर्म से डरने का कोई कारण नहीं है। अगर कोई छः फुटा पठान भी अपना छुरा घुमाते हुए सामने आ जाये तब भी डरने की कोई बात नहीं है। यही सलाह मैंने मुसलमान भाइयों को भी दी है। आज भी दोनों समुदायों के मन में एक-दूसरे के प्रति कुछ शंकाएँ बनी हुई हैं। दूसरी चीज है, स्वदेशी। सभा में आये हुए कुछ स्त्री-पुरुषों के शरीर पर अब भी कुछ विदेशी कपड़े दिखाई दे रहे हैं। इस मामले में मौलाना आजाद सोबानी ने अपना यह धन्धा ही बना लिया है कि वे अपने जिस किसी मित्र के शरीर पर विदेशी कपड़ा देखते हैं, उसे माँगकर नष्ट कर देते हैं। लोगों को मोटा खद्दर पहनना भी बुरा नहीं मानना चाहिए। श्रीमती नायडू ने मुझसे शिकायत की कि मोटा खद्दर पहनना तो बहुत मुश्किल काम है। लेकिन सत्याग्रह प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करने वालों में उनका नाम पहला या दूसरा है, इसलिए उन्हें खद्दर तो पहनना ही पड़ेगा। अगर आप मोटा खद्दर नहीं पहन सकते तो इसका मतलब है, आप कमजोर हो गये हैं और आपमें ऐसा करने की ताकत नहीं है। पंजाब में एक बहन ने मुझसे पूछा कि उसे अपने कपड़ों के बारे में क्या करना चाहिए। मैंने उसे सलाह दी कि उसे एक पेटीकोट और स्कर्ट से ही सन्तोष कर लेना चाहिए। जहाँ तक बन सके आपको कम कपड़े का इस्तेमाल करना चाहिए।
लोग अपना काम अहिंसक तरीके से करने को कर्त्तव्य-बद्ध हैं। जब तक आप अहिंसा, स्वदेशी और हिन्दू-मुस्लिम एकता में विश्वास करते हैं तब तक आपको हिंसा का सहारा लेने का कोई अधिकार नहीं है। फिर आपके सामने अपने मरने का भी कोई अवसर नहीं आयेगा। वैसे, जीवन और मृत्यु में कोई ज्यादा अन्तर नहीं है; दरअसल, वे एक समान हैं। जब तक आप मरने को तैयार नहीं रहते, आपको स्वराज्य नहीं मिल सकता और न आप खिलाफत तथा पंजाब-सम्बन्धी अन्यायों का ही निराकरण करा सकते हैं।<noinclude></noinclude>
3sc49k2il01iemhd5ahvwvs6z12smkk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६००
250
186515
673598
644878
2026-08-24T08:02:42Z
Bikki97
6801
/* शोधित */
673598
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५८३. शोकांजलियाँ'''}}
{{Gap}}हिन्दू' के भूतपूर्व सम्पादक, एस० रंगास्वामी आयंगारके निधनपर उनके परिवार
और पत्रके कर्मचारियोंको लोगोंने समवेदनाके अनेक सन्देश भेजे हैं। मैं भी दिवंगत
आत्माके प्रति अपनी शोकांजलि अर्पित करता हूँ। श्री एस० कस्तूरीरंगा आयंगारके
निधनके बाद इतने कम समयमें ही श्री रंगास्वामीकी मृत्युसे भारतीय पत्रकार जगतको
एक भारी धक्का लगा है ।
{{Gap}}}पाठकोंको यह जानकर बड़ा दुःख होगा कि श्री एच० एस० एल० पोलकका
सबसे बड़ा पुत्र, वाल्डो उनका साथ छोड़ गया है ।' सप्ताहके शुरू में श्री पोलकने
तार द्वारा उसकी गम्भीर अस्वस्थताकी सूचना दी थी। दो ही दिन बाद, दूसरा तार
आया कि बच्चा नहीं रहा । मैं जानता हूँ कि श्री पोलक और श्रीमती पोलकको
भारतके मित्रोंके रूपमें जाननेवाले अनेक पाठक माता-पिताकी हार्दिक वेदनामें उनके
साथ समवेदना प्रगट करेंगे ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, २८-१०-१९२६
{{C|'''५८४. पत्र : सम्पादकको र '''}}
{{Rh|||[२९ अक्तूबर, १९२६ से पूर्व ]}}
{{Gap}}आपने जिन साहित्यकारोंसे लेख आमन्त्रित किये हैं, मुझे उनकी पंक्तिमें बैठते
हुए संकोचका अनुभव हो रहा था। यह दिखावटी विनय नहीं बल्कि मेरी आन्तरिक
भावना है । में स्वीकार करता हूँ कि मैं इस कामके लिए इस दृष्टिसे भी अयोग्य
हूँ कि मुझे उक्त सज्जनके विषयमें भी लगभग कुछ मालूम नहीं था जिन्होंने अपने
मनसे मेरा विज्ञापन करनेका भार अपने ऊपर ले लिया था । कदाचित् आपको यह
जानकर आश्चर्य होगा कि मैं अब भी उनके विषयमें उतना ही जानता हूँ, जितना
अपने विषयमें लिखी गई उस पुस्तिकापर सरसरी निगाह डालनेके बाद जान सका
हूँ । मुझे इतना काम रहता है कि जिन अन्य चीजोंको में पढ़ लेना चाहता हूँ उन्हें
पढ़नेका मेरे पास समय नहीं रहता। इसलिए मैंने अभीतक उन सज्जनके किसी
महान ग्रन्थका अवलोकन नहीं किया है ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>रोमाँ रोलाँ, पृष्ठ १६०
{{Gap}}१. देखिए " पत्र : श्री और श्रीमती पोल्कको”, २६-१०-१९२६ ।
{{Gap}}२. रोमाँ रोलां बर्थडे बुकके सम्पादकके नाम । पुस्तक १९२६ में रोटोपेलवेरलाग, जूरिचसे
प्रकाशित हुई थी।<noinclude></noinclude>
564odrmz500ed3lpcjik1t7d5af7fpa
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१०
250
186525
673596
644889
2026-08-24T07:56:26Z
Bikki97
6801
/* शोधित */
673596
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{C|'''५९५. लौटे हुए प्रवासी'''}}
<Br>सम्पादक,
<Br>'यंग इंडिया'
<Br>महोदय,
{{Gap}}में स्वीकार करता हूँ कि उपनिवेशोंमें जन्मे भारतीयोंकी हिन्दुस्तानी
भाषाकी जानकारीके बारेमें मेरा 'पक्का' अनुमान गलत निकला । ...
मुझे पूर्ण रूपसे निश्चय है कि फोजीसे लौटे हुए भारतीयोंको ब्रिटिश
गियाना भेजनसे उन्हें पुनः निराशा होगी ।. .
मैं आपको सन् १९२० की याद दिलाता हूँ जबकि आपने ५०० मजदूरोंको
प्रयोगके तौरपर ब्रिटिश गियाना भेजने की अनुमति देनेकी भूल की थी। आपने
मि० पोलक इत्यादिके द्वारा चेताये जानेपर उस भूलको स्वीकार भी किया था।'
{{Gap}}आप इस बार फिर वही भूल कर रहे हैं। ब्रिटिश गियानाकी आबोहवा खराब,
दलदलमय है और फीजीकी अत्युत्तम । इसलिए फीजीसे लौटे भारतीयोंको वहीं
जीना दूभर हो जायेगा । इसलिए में उनके ब्रिटिश गियाना भेजे जानके
कतई खिलाफ हूँ । आपके इस प्रयोगके विरुद्ध मेरी दलीलका आधार मानवीय-
ताकी उच्चतर भावना है । मेरा आग्रह है कि आप इस सारी चीजपर
पुनः विचार करें और फीजीमें बसे भारतीयोंको एक बार फिर निराशा और
विपत्तिमें न डालें ।
{{Rh|||आपका,}}
{{Rh|||बनारसीदास चतुर्वेदी}}
{{Gap}}उक्त पत्र मेरे पास कुछ दिन हुए आया था। मेरी कथित 'भूल-स्वीकृति ' को
मैं पक्के तौरपर जानना चाहता था । पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदीने एक कतरन भेजी
है, जिसमें प्रयोगस्वरूप आदमियोंको बाहर भेजने विषयमें कई वर्ष हुए मेरी किसीके
साथ हुई मुलाकात दी हुई है । मेरी समझमें उसमें और इस वक्तकी मेरी रायमें
कोई सम्बन्ध नहीं। मेरी राय तो केवल उन्हींसे ताल्लुक रखती है जो आज कलकत्ते में
शर्मनाक हालत में दिन गुजार रहे हैं, जो अपने गाँवोंको न तो जाते हैं और न जाना
ही चाहते हैं और जिनके वास्ते इस हालतको छोड़कर अन्य कोई भी हालत शायद।
{{Gap}}१. पत्र अंशतः दिया जा रहा है।
{{Gap}}२. देखिए “लौटे हुए प्रवासी, २३-९-१९२६ ॥
{{Gap}}३. यह उल्लेख शायद " ब्रिटिश गियाना और फीजीके शिष्टमण्डल ", ४-२-१९२० से पूर्व और
" पत्र : डा० न्यूनन ”, ५-२-१९२० का है; देखिए खण्ड १७, पृष्ठ ९ और १६ ।<noinclude></noinclude>
1xsj5swnohfbzngh4u45sf8jrlzd00o
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१५
250
186593
673313
644957
2026-08-23T13:30:21Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673313
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{larger|'''आभार'''}}}}
इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक और स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) तथा संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया), नई दिल्ली; श्री परशुराम मेहरोत्रा, नई दिल्ली; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्रीमती तेहमीना खम्भाता, बम्बई; श्री महेश पट्टणी, भावनगर; श्री हरिभाऊ उपाध्याय, बम्बई; श्री विष्णु दयाल, अजमेर; श्री गजानन कानिटकर, पूना; श्री मुन्नालाल जी॰ शाह, सेवाग्राम; श्री राधानाथ रथ, कटक; श्रीमती मीराबहन, गाडेन, ऑस्ट्रिया; श्री डाह्याभाई म॰ पटेल, अहमदाबाद; 'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'माई डियर चाइल्ड', 'रोमाँ रोलाँ बर्थ डे बुक', पुस्तकोंके प्रकाशकों और निम्नलिखित समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओंके आभारी हैं : 'गुजराती', 'नवजीवन', 'फॉरवर्ड', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'यंग इंडिया', 'सर्चलाइट', 'हिन्दी नवजीवन' और 'हिन्दू'
अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्लीके अनुसन्धान तथा सन्दर्भ विभाग, साबरमती संग्रहालय, गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद और प्यारेलाल नैयर, नई दिल्ली और कागजातोंकी फोटो-नकलें बनानेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके फोटो-विभागके आभारी हैं ।<noinclude></noinclude>
6tf624d01d0v63bv1ftlhu60hrf1bw0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१८
250
186596
673470
644960
2026-08-24T02:59:34Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673470
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|चौदह}}
{|width=100%
|-
| २४. || पत्र : एस॰ रामनाथनको (१९-६-१९२६) || २१
|-
| २५. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१९-६-१९२६) || २२
|-
| २६. || पत्र : डी॰ एन॰ बहादुरजीको (१९-६-१९२६) || २३
|-
| २७. || पत्र : शान्तिसुधा घोषको (१९-६-१९२६) || २३
|-
| २८. || पत्र : गंगाबहन मजमूदारको (१९-६-१९२६) || २४
|-
| २९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१९-६-१९२६) || २४
|-
| ३०. || विविध : मरणोत्तर भोज; शराबकी दुकानें और पारसी (२०-६-१९२६) || २५
|-
| ३१. || सूरतमें खादी (२०-६-१९२६) || २७
|-
| ३२. || नेपालमें यज्ञ-चक्र (२०-६-१९२६) || २७
|-
| ३३. || पत्र : कृष्णदासको (२०-६-१९२६) || २८
|-
| ३४. || पत्र : तुलसीदासको (२१-६-१९२६) || २९
|-
| ३५. || पत्र : डॉ॰ दलालको (२१-६-१९२६) || ३०
|-
| ३६. || पत्र : पट्टाभि सीतारमैयाको (२२-६-१९२६) || ३०
|-
| ३७. || पत्र : एन॰ एस॰ वरदाचारीको (२२-६-१९२६) || ३१
|-
| ३८. || एक पत्र (२२-६-१९२६) || ३२
|-
| ३९. || पत्र : मुहम्मद शफीको (२२-६-१९२६) || ३३
|-
| ४०. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२२-६-१९२६) || ३४
|-
| ४१. || पत्र : पेरीन कैप्टेनको (२२-६-१९२६) || ३५
|-
| ४२. || पत्र : के॰ टी॰ मैथ्यूको (२२-६-१९२६) || ३६
|-
| ४३. || पत्र : वी॰ वी॰ दास्तानेको (२२-६-१९२६) || ३७
|-
| ४४. || पत्र : तीरथराम तनेजाको (२२-६-१९२६) || ३७
|-
| ४५. || पत्र : भूपेन्द्रनारायण सेनको (२२-६-१९२६) || ३८
|-
| ४६. || पत्र : चम्पाबहन मेहताको (२२-६-१९२६) || ३९
|-
| ४७. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२२-६-१९२६) || ४०
|-
| ४८. || पत्र : दूदाभाईको (२२-६-१९२६) || ४०
|-
| ४९. || पत्र : विष्णु करन्दीकरको (२३-६-१९२६) || ४१
|-
| ५०. || पत्र : एस्थर मेननको (२३-६-१९२६) || ४२
|-
| ५१. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (२३-६-१९२६) || ४३
|-
| ५२. || पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको (२३-६-१९२६) || ४३
|-
| ५३. || पत्र : जगजीवनको (२३-६-१९२६) || ४४
|-
| ५४. || पत्र : शम्भुशंकरको (२३-६-१९२६) || ४४
|-
| ५५. || पत्र : नानाभाई भट्टको (२३-६-१९२६) || ४५
|}<noinclude></noinclude>
4vlxt05b5bn5q2boior5uhb5tbz1zom
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/१९
250
186597
673472
644961
2026-08-24T03:02:30Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673472
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|पन्द्रह}}
{|width=100%
|-
| ५६. || अन्य देशोंमें चरखा (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५७. || भारत सेवक समाज सहायता-कोष (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५८. || आत्मत्याग (२४-६-१९२६) || ४७
|-
| ५९. || 'महात्माजीका हुक्म' (२४-६-१९२६) || ४९
|-
| ६०. || अखिल भारतीय चरखा संघके सदस्योंके लिए (२४-६-१९२६) || ५१
|-
| ६१. || टिप्पणियाँ : ग्राम-संगठन; एक विडम्बना; सच्चा गुरु (२४-६-१९२६) || ५२
|-
| ६२. || 'हिन्दी नवजीवन' के पाठकोंसे (२४-६-१९२६) || ५४
|-
| ६३. || पत्र : देवी वेस्टको (२४-६-१९२६) || ५५
|-
| ६४. || पत्र : विलियम पैटनको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६५. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६६. || पत्र : लक्ष्मीदास आसरको (२४-६-१९२६) || ५७
|-
| ६७. || पत्र : प्रभालक्ष्मीको (२४-६-१९२६) || ५८
|-
| ६८. || पत्र : देवदास गांधीको (२४-६-१९२६) || ५९
|-
| ६९. || पत्र : देवदास गांधीको (२५-६-१९२६) || ५९
|-
| ७०. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७१. || पत्र : गोकुलदास हीरजी ठक्करको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७२. || शंकाका भूत (२७-६-१९२६) || ६१
|-
| ७३. || टिप्पणियाँ : सणोसलीमें कताई; चौधराओंमें आत्मशुद्धि; ग्राम-व्यवस्था;
:भूल-सुधार; सच्चा गुरु (२७-६-१९२६)
|| ६२
|-
| ७४. || पत्र : जी॰ डी॰ चटर्जीको (२७-६-१९२६) || ६५
|-
| ७५. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७६. || पत्र : एस॰ शंकरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७७. || पत्र : डी॰ एन॰ बहादुरजीको (२७-६-१९२६) || ६७
|-
| ७८. || पत्र : भगवानजी मेहताको (२७-६-१९२६) || ६८
|-
| ७९. || पत्र : लक्ष्मीदास पु॰ आसरको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८०. || पत्र : देवदास गांधीको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८१. || पत्र : राय प्रभुदास भीखाभाईको (२७-६-१९२६) || ७०
|-
| ८२. || पत्र : वासन्ती देवी दासको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८३. || पत्र : नारणदास आनन्दजीको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८४. || पत्र : मोतीलालको (२९-६-१९२६) || ७२
|-
| ८५. || पत्र : उर्मिला देवीको (३०-६-१९२६) || ७३
|-
| ८६. || पत्र : इग्नेशियसको (३०-६-१९२६) || ७४
|}<noinclude></noinclude>
7qpkc0v2tkkzk83xabn4tevg8nmk18g
673473
673472
2026-08-24T03:05:34Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
673473
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|पन्द्रह}}
{|width=100%
|-
| ५६. || अन्य देशोंमें चरखा (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५७. || भारत सेवक समाज सहायता-कोष (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५८. || आत्मत्याग (२४-६-१९२६) || ४७
|-
| ५९. || 'महात्माजीका हुक्म' (२४-६-१९२६) || ४९
|-
| ६०. || अखिल भारतीय चरखा संघके सदस्योंके लिए (२४-६-१९२६) || ५१
|-
| ६१. || टिप्पणियाँ : ग्राम-संगठन; एक विडम्बना; सच्चा गुरु (२४-६-१९२६) || ५२
|-
| ६२. || 'हिन्दी नवजीवन' के पाठकोंसे (२४-६-१९२६) || ५४
|-
| ६३. || पत्र : देवी वेस्टको (२४-६-१९२६) || ५५
|-
| ६४. || पत्र : विलियम पैटनको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६५. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६६. || पत्र : लक्ष्मीदास आसरको (२४-६-१९२६) || ५७
|-
| ६७. || पत्र : प्रभालक्ष्मीको (२४-६-१९२६) || ५८
|-
| ६८. || पत्र : देवदास गांधीको (२४-६-१९२६) || ५९
|-
| ६९. || पत्र : देवदास गांधीको (२५-६-१९२६) || ५९
|-
| ७०. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७१. || पत्र : गोकुलदास हीरजी ठक्करको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७२. || शंकाका भूत (२७-६-१९२६) || ६१
|-
| ७३. || टिप्पणियाँ : सणोसलीमें कताई; चौधराओंमें आत्मशुद्धि; ग्राम-व्यवस्था;
::भूल-सुधार; सच्चा गुरु (२७-६-१९२६)
|| ६२
|-
| ७४. || पत्र : जी॰ डी॰ चटर्जीको (२७-६-१९२६) || ६५
|-
| ७५. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७६. || पत्र : एस॰ शंकरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७७. || पत्र : डी॰ एन॰ बहादुरजीको (२७-६-१९२६) || ६७
|-
| ७८. || पत्र : भगवानजी मेहताको (२७-६-१९२६) || ६८
|-
| ७९. || पत्र : लक्ष्मीदास पु॰ आसरको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८०. || पत्र : देवदास गांधीको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८१. || पत्र : राय प्रभुदास भीखाभाईको (२७-६-१९२६) || ७०
|-
| ८२. || पत्र : वासन्ती देवी दासको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८३. || पत्र : नारणदास आनन्दजीको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८४. || पत्र : मोतीलालको (२९-६-१९२६) || ७२
|-
| ८५. || पत्र : उर्मिला देवीको (३०-६-१९२६) || ७३
|-
| ८६. || पत्र : इग्नेशियसको (३०-६-१९२६) || ७४
|}<noinclude></noinclude>
4g9q8fd0nkzdqt3k8q3jcp51uoyofkz
673477
673473
2026-08-24T03:12:14Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार का प्रयास
673477
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|पन्द्रह}}
{|width=100%
|-
| ५६. || अन्य देशोंमें चरखा (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५७. || भारत सेवक समाज सहायता-कोष (२४-६-१९२६) || ४६
|-
| ५८. || आत्मत्याग (२४-६-१९२६) || ४७
|-
| ५९. || 'महात्माजीका हुक्म' (२४-६-१९२६) || ४९
|-
| ६०. || अखिल भारतीय चरखा संघके सदस्योंके लिए (२४-६-१९२६) || ५१
|-
| ६१. || टिप्पणियाँ : ग्राम-संगठन; एक विडम्बना; सच्चा गुरु (२४-६-१९२६) || ५२
|-
| ६२. || 'हिन्दी नवजीवन' के पाठकोंसे (२४-६-१९२६) || ५४
|-
| ६३. || पत्र : देवी वेस्टको (२४-६-१९२६) || ५५
|-
| ६४. || पत्र : विलियम पैटनको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६५. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२४-६-१९२६) || ५६
|-
| ६६. || पत्र : लक्ष्मीदास आसरको (२४-६-१९२६) || ५७
|-
| ६७. || पत्र : प्रभालक्ष्मीको (२४-६-१९२६) || ५८
|-
| ६८. || पत्र : देवदास गांधीको (२४-६-१९२६) || ५९
|-
| ६९. || पत्र : देवदास गांधीको (२५-६-१९२६) || ५९
|-
| ७०. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७१. || पत्र : गोकुलदास हीरजी ठक्करको (२६-६-१९२६) || ६०
|-
| ७२. || शंकाका भूत (२७-६-१९२६) || ६१
|-
| ७३. || टिप्पणियाँ : सणोसलीमें कताई; चौधराओंमें आत्मशुद्धि; ग्राम-व्यवस्था; भूल-सुधार; सच्चा गुरु (२७-६-१९२६)
|| ६२
|-
| ७४. || पत्र : जी॰ डी॰ चटर्जीको (२७-६-१९२६) || ६५
|-
| ७५. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७६. || पत्र : एस॰ शंकरको (२७-६-१९२६) || ६६
|-
| ७७. || पत्र : डी॰ एन॰ बहादुरजीको (२७-६-१९२६) || ६७
|-
| ७८. || पत्र : भगवानजी मेहताको (२७-६-१९२६) || ६८
|-
| ७९. || पत्र : लक्ष्मीदास पु॰ आसरको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८०. || पत्र : देवदास गांधीको (२७-६-१९२६) || ६९
|-
| ८१. || पत्र : राय प्रभुदास भीखाभाईको (२७-६-१९२६) || ७०
|-
| ८२. || पत्र : वासन्ती देवी दासको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८३. || पत्र : नारणदास आनन्दजीको (२९-६-१९२६) || ७१
|-
| ८४. || पत्र : मोतीलालको (२९-६-१९२६) || ७२
|-
| ८५. || पत्र : उर्मिला देवीको (३०-६-१९२६) || ७३
|-
| ८६. || पत्र : इग्नेशियसको (३०-६-१९२६) || ७४
|}<noinclude></noinclude>
hxgt1kgruewq3xd91qqoqcza591338q
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२०
250
186598
673476
644962
2026-08-24T03:09:30Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673476
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सोलह}}
{|width=100%
|-
| ८७. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-६-१९२६) || ७४
|-
| ८८. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (३०-६-१९२६) || ७६
|-
| ८९. || अखिल भारतीय गोरक्षा मण्डलके आय-व्ययका ब्योरा (१-७-१९२६) || ७६
|-
| ९०. || रंगभेद बनाम स्वदेशी (१-७-१९२६) || ७७
|-
| ९१. || अनीतिकी राह पर - १ (१-७-१९२६) || ८०
|-
| ९२. || टिप्पणियाँ : बिहारमें खादी प्रदर्शनियाँ; प्राध्यापकको खादी भेंट; मैसूरमें
::खद्दर; मान्यता कौन दे? (१-७-१९२६)
|| ८२
|-
| ९३. || अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक-कोष (१-७-१९२६) || ८५
|-
| ९४. || पत्र : सेवकराम करमचन्दको (२-७-१९२६) || ८६
|-
| ९५. || पत्र : सतकौड़ीपति रायको (२-७-१९२६) || ८७
|-
| ९६. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२-७-१९२६) || ८७
|-
| ९७. || पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको (२-७-१९२६) || ८८
|-
| ९८. || पत्र : वी॰ आर॰ कोठारीको (३-७-१९२६) || ९०
|-
| ९९. || पत्र : शालिग्राम शास्त्रीको (३-७-१९२६) || ९१
|-
| १००. || गारियाधारमें खादी-कार्य (४-७-१९२६) || ९१
|-
| १०१. || रजस्वला क्या करे? (४-७-१९२६) || ९३
|-
| १०२. || गुजरात खादी प्रचारक मण्डल (४-७-१९२६) || ९३
|-
| १०३. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (५-७-१९२६) || ९४
|-
| १०४. || पत्र : 'हिन्दू' के सम्पादकको (५-७-१९२६) || ९५
|-
| १०५. || सन्देश : 'हिन्दू' के लिए (५-७-१९२६) || ९५
|-
| १०६. || पत्र : मणिलाल गांधीको (५-७-१९२६) || ९६
|-
| १०७. || पत्र : तेहमीना खम्भाताको (६-७-१९२६) || ९७
|-
| १०८. || सन्देश (७-७-१९२६) || ९८
|-
| १०९. || पत्र : नरगिस कैप्टेनको (७-७-१९२६) || ९८
|-
| ११०. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (७-७-१९२६) || ९९
|-
| १११. || पत्र : वी॰ बी॰ तैयरको (७-७-१९२६) || १००
|-
| ११२. || पत्र : भूपेन्द्रनारायण सेनको (७-७-१९२६) || १००
|-
| ११३. || पत्र : कुमारी कैथरीन मेयोको (७-७-१९२६) || १०१
|-
| ११४. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (७-७-१९२६) || १०१
|-
| ११५. || टिप्पणियाँ : भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी)
::को सहायता; त्यागकी सीमा; कुएँसे निकल कर (८-७-१९२६)
|| १०२
|-
| ११६. || मनुष्यतासे पहले पशुता (८-७-१९२६) || १०५
|}<noinclude></noinclude>
mzucq52zd0xg3k5mm32ctmj7usa6ygp
673478
673476
2026-08-24T03:12:56Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
673478
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सोलह}}
{|width=100%
|-
| ८७. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-६-१९२६) || ७४
|-
| ८८. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (३०-६-१९२६) || ७६
|-
| ८९. || अखिल भारतीय गोरक्षा मण्डलके आय-व्ययका ब्योरा (१-७-१९२६) || ७६
|-
| ९०. || रंगभेद बनाम स्वदेशी (१-७-१९२६) || ७७
|-
| ९१. || अनीतिकी राह पर - १ (१-७-१९२६) || ८०
|-
| ९२. || टिप्पणियाँ : बिहारमें खादी प्रदर्शनियाँ; प्राध्यापकको खादी भेंट; मैसूरमें खद्दर; मान्यता कौन दे? (१-७-१९२६)
|| ८२
|-
| ९३. || अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक-कोष (१-७-१९२६) || ८५
|-
| ९४. || पत्र : सेवकराम करमचन्दको (२-७-१९२६) || ८६
|-
| ९५. || पत्र : सतकौड़ीपति रायको (२-७-१९२६) || ८७
|-
| ९६. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२-७-१९२६) || ८७
|-
| ९७. || पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको (२-७-१९२६) || ८८
|-
| ९८. || पत्र : वी॰ आर॰ कोठारीको (३-७-१९२६) || ९०
|-
| ९९. || पत्र : शालिग्राम शास्त्रीको (३-७-१९२६) || ९१
|-
| १००. || गारियाधारमें खादी-कार्य (४-७-१९२६) || ९१
|-
| १०१. || रजस्वला क्या करे? (४-७-१९२६) || ९३
|-
| १०२. || गुजरात खादी प्रचारक मण्डल (४-७-१९२६) || ९३
|-
| १०३. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (५-७-१९२६) || ९४
|-
| १०४. || पत्र : 'हिन्दू' के सम्पादकको (५-७-१९२६) || ९५
|-
| १०५. || सन्देश : 'हिन्दू' के लिए (५-७-१९२६) || ९५
|-
| १०६. || पत्र : मणिलाल गांधीको (५-७-१९२६) || ९६
|-
| १०७. || पत्र : तेहमीना खम्भाताको (६-७-१९२६) || ९७
|-
| १०८. || सन्देश (७-७-१९२६) || ९८
|-
| १०९. || पत्र : नरगिस कैप्टेनको (७-७-१९२६) || ९८
|-
| ११०. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (७-७-१९२६) || ९९
|-
| १११. || पत्र : वी॰ बी॰ तैयरको (७-७-१९२६) || १००
|-
| ११२. || पत्र : भूपेन्द्रनारायण सेनको (७-७-१९२६) || १००
|-
| ११३. || पत्र : कुमारी कैथरीन मेयोको (७-७-१९२६) || १०१
|-
| ११४. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (७-७-१९२६) || १०१
|-
| ११५. || टिप्पणियाँ : भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी) को सहायता; त्यागकी सीमा; कुएँसे निकल कर (८-७-१९२६)
|| १०२
|-
| ११६. || मनुष्यतासे पहले पशुता (८-७-१९२६) || १०५
|}<noinclude></noinclude>
edmzn8yz6bfb8ezs1j7u6m794ax97em
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२१
250
186599
673481
644963
2026-08-24T03:15:33Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673481
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सत्रह}}
{|width=100%
|-
| ११७. || अनीतिकी राहपर - २ (८-७-१९२६) || १०९
|-
| ११८. || पत्र : पुरुषोत्तम रामचन्द्र लेलेको (८-७-१९२६) || १११
|-
| ११९. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (८-७-१९२६) || ११२
|-
| १२०. || पत्र : कृष्णदासको (८-७-१९२६) || ११३
|-
| १२१. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (८-७-१९२६) || ११४
|-
| १२२. || पत्र : लालचन्द जयचन्द वोराको (८-७-१९२६) || ११५
|-
| १२३. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (८-७-१९२६) || ११५
|-
| १२४. || पत्र : जमनादास गांधीको (८-७-१९२६) || ११६
|-
| १२५. || पत्र : श्रीमती आर॰ आर्मस्ट्राँग और श्रीमती पी॰ आर॰ हॉवर्डको (९-७-१९२६) || ११७
|-
| १२६. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (९-७-१९२६) || ११८
|-
| १२७. || एक पत्र (९-७-१९२६) || ११८
|-
| १२८. || पत्र : प्यारेलाल नैयरको (९-७-१९२६) || ११९
|-
| १२९. || पत्र : कान्तिलालको (९-७-१९२६) || १२०
|-
| १३०. || पत्र : नानाभाई भट्टको (९-७-१९२६) || १२१
|-
| १३१. || सन्देश : 'नायक' को (१०-७-१९२६ या उससे पूर्व) || १२१
|-
| १३२. || पत्र : वी॰ आर॰ कोठारीको (१०-७-१९२६) || १२२
|-
| १३३. || पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको (१०-७-१९२६) || १२३
|-
| १३४. || पत्र : मु॰ रा॰ जयकरको (१०-७-१९२६) || १२४
|-
| १३५. || पत्र : गोपालदास मकनदासको (१०-७-१९२६) || १२४
|-
| १३६. || कातनेका अर्थ (११-७-१९२६) || १२५
|-
| १३७. || एक पत्र (११-७-१९२६) || १२७
|-
| १३८. || पत्र : धरमशी भानजी खोजाको (११-७-१९२६) || १२७
|-
| १३९. || पत्र : नौतमलाल एम॰ खण्डेरियाको (११-७-१९२६) || १३०
|-
| १४०. || पत्र : अम्बालाल साराभाईको (११-७-१९२६) || १३०
|-
| १४१. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१२-७-१९२६) || १३३
|-
| १४२. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (१३-७-१९२६) || १३४
|-
| १४३. || सन्देश : 'सर्चलाइट' को (१४-७-१९२६ या उससे पूर्व) || १३५
|-
| १४४. || एक पत्र (१४-७-१९२६) || १३५
|-
| १४५. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१४-७-१९२६) || १३६
|-
| १४६. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (१४-७-१९२६) || १३७
|-
| १४७. || एक महान् हृदय (१५-७-१९२६) || १३८
|}
३१<noinclude></noinclude>
gh7rrjnrmzqmzs59xtcxd9g4ojvmemi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२२
250
186600
673484
644964
2026-08-24T03:17:35Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
673484
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|अठारह}}
{|width=100%
|-
| १४८. || छात्र और असहयोग (१५-७-१९२६) || १३९
|-
| १४९. || अनीतिकी राहपर - ३ (१५-७-१९२६) || १४१
|-
| १५०. || एक महान देशभक्त (१५-७-१९२६) || १४७
|-
| १५१. || अहिंसा -- सबसे बड़ी ताकत (१५-७-१९२६) || १४८
|-
| १५२. || पत्र : किर्बी पेजको (१५-७-१९२६) || १५०
|-
| १५३. || पत्र : कुरूर नीलकण्ठन नम्बूद्रिपादको (१५-७-१९२६) || १५१
|-
| १५४. || पत्र : सलिवतीश्वरन्को (१५-७-१९२६) || १५२
|-
| १५५. || पत्र : बी॰ जी॰ हॉर्निमैनको (१५-७-१९२६) || १५२
|-
| १५६. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (१५-७-१९२६) || १५३
|-
| १५७. || पत्र : देवरत्नको (१५-७-१९२६) || १५४
|-
| १५८. || पत्र : बलवन्तराय भगवानजी मनियारको (१५-७-१९२६) || १५४
|-
| १५९. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१५-७-१९२६) || १५५
|-
| १६०. || पत्र : एस्थर मेननको (१६-७-१९२६) || १५६
|-
| १६१. || पत्र : जफर-उल-मुल्क अल्वीको (१६-७-१९२६) || १५७
|-
| १६२. || पत्र : डी॰ एन॰ बहादुरजीको (१६-७-१९२६) || १५८
|-
| १६३. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१६-७-१९२६) || १५९
|-
| १६४. || पत्र : मोहनलाल पण्ड्याको (१६-७-१९२६) || १६०
|-
| १६५. || पत्र : आदम सालेहअलीभाईको (१६-७-१९२६) || १६१
|-
| १६६. || पत्र : बी॰ जी॰ हॉर्निमैनको (१७-७-१९२६) || १६१
|-
| १६७. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (१७-७-१९२६) || १६२
|-
| १६८. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (१७-७-१९२६) || १६३
|-
| १६९. || पत्र : गुलबाई और शीरींबाईको (१७-७-१९२६) || १६४
|-
| १७०. || एक अटपटा सवाल (१८-७-१९२६) || १६४
|-
| १७१. || सूतका बल और प्रकार (१८-७-१९२६) || १६७
|-
| १७२. || टिप्पणी : पाँच तलावड़ामें कपास संग्रह (१८-७-१९२६) || १६९
|-
| १७३. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१९-७-१९२६) || १७०
|-
| १७४. || पत्र : डाह्याभाई मनोरदास पटेलको (१९-७-१९२६) || १७१
|-
| १७५. || पत्र : चमन कविको (१९-७-१९२६) || १७१
|-
| १७६. || पत्र : नानाभाई भट्टको (१९-७-१९२६) || १७२
|-
| १७७. || पत्र : के॰ राजगोपालाचारीको (२०-७-१९२६) || १७३
|-
| १७८. || पत्र : सी॰ वी॰ रंगनचेट्टीको (२०-७-१९२६) || १७४
|-
| १७९. || पत्र : सर हैरॉल्ड मैनको (२०-७-१९२६) || १७५
|}<noinclude></noinclude>
mihlt0s5c9oruuih0o8kdztg14bdwqv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८५
250
186911
673295
645308
2026-08-23T13:01:34Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673295
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५०३. पत्र: मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ जून, १९२८}}
{{left|चि॰ मणिलाल और सुशीला,}}
तुम्हारे पत्र तो मिलते रहते हैं, किन्तु यह नहीं कह सकता कि उनसे सन्तोष होता है। तुम दोनों हमेशा जल्दी में रहते हो। तुम्हें इतना ज्यादा काम रहता है, मैं इसकी कल्पना नहीं कर पाता। किन्तु 'मामा नहीं है, इससे किसीको भी मामा कह लें,' वाली कहावतका विचार करके हम दोनों सन्तोष कर लेते हैं। सुशीलासे मैंने कुछ ज्यादा आशा की थी। सोचता था उसमें मणिलालका-सा शरीरबल नहीं आया तो भी अक्ल तो आ ही गई होगी, किन्तु तुम दोनों एक दूसरेसे दोष ही ग्रहण करते हो, गुण क्यों ग्रहण नहीं करते? यह जबर्दस्त आलस्य त्याग दो तो मुझे अच्छा
लगेगा और तुम्हारा भी भला होगा। अफ्रिकासे जो दूसरे पत्र आते हैं उनमें हमेशा तुम्हारे पत्रोंसे ज्यादा समाचार रहते हैं। पिछले पत्रोंमें मैंने तुम्हें याद दिलाया था कि तुम्हें आश्रमके पैसे देने हैं। इसका उत्तर मुझे मिलना ही चाहिए। यह ऋण
बट्टे खाते डाल दिया जाये, यदि तुम यह बात सहना चाहो तो सुखसे सहन करो किन्तु मुझसे तो यह नहीं सहा जायेगा। आश्रममें आजकल महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं। उनका विवरण देनेका फिलहाल समय नहीं है। आजकल बहुतसे पत्र सुबह चार बजे ही प्रार्थनासे पूर्व उठकर लिखाता हूँ, तभी कुछ निपट पाता है। इतना लिखवाते-लिखवाते चार बजेका घंटा बज गया है, इसलिए समाप्त करता हूँ।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४७३९) की फोटो-नकल से।<noinclude></noinclude>
7d5i1i48o1u6woe89j8b6u7ghjdpmb4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८६
250
186912
673301
645309
2026-08-23T13:11:52Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673301
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५०४. पत्र: प्यारेलाल नैयरको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय प्यारेलाल,}}
मैं यह पत्र बोलकर लिखवा रहा हूँ, क्योंकि मैं कात रहा हूँ और गुजरातीमें पत्र लिखनेमें जो-कुछ मिनट लग सकते हैं, उन्हें बचा लेना चाहता हूँ।
मैं तुम्हें एकदम यह लिखकर बतानेके लिए आतुर हूँ कि तुम्हारा लेख अत्युत्तम है। चाहे जल्दी में ही सही, मैंने इसे पूरा पढ़ा है। इसमें मुझे कोई भी खटकनेवाली बात नहीं मिली; यह ठीक वैसी चीज है जो बाहरके लोगोंके लिए––सरकारी अर्थमें नहीं परन्तु हमारे अपने अर्थमें जरूरी थी। मुझे यकीन है कि यह लेख और कोई नहीं लिख सकता था, क्योंकि किसी दूसरेमें तुम्हारे जैसी कुशाग्रता नहीं है। तुमने दिखाया है कि संघर्ष सम्भव कैसे हुआ और यह शानदार संगठन अस्तित्वमें कैसे आया। मैं यही आशा करता हूँ कि भारतीय अखबार देशमें सभी जगह इस लेखको उद्धृत करेंगे। इस लेखसे पता चलता है कि तुममें जबर्दस्त क्षमता है; किन्तु तुम्हारे मनमें आत्मविश्वास होना चाहिए। मुझे तो 'यंग इंडिया' में तुम्हारा निबन्ध पढ़नेके बाद इसमें कोई सन्देह ही नहीं रहा। महादेव और तुम्हारे हाथमें सौंपकर मैं 'यंग इंडिया' की ओरसे बिलकुल निश्चिन्त हो सकता हूँ। इसकी आशा और प्रतीक्षा तो मैं करूँगा ही।
महादेव अब ठीक है। वह एक या दो दिनमें उठ खड़ा होगा और काम करने लगेगा। वह काम अब भी कर रहा है। तुम्हें सबब तो मालूम होगा। वह कुएँ परसे पानी भरते हुए गिर गया। आश्रममें हमारे पास मजदूर नहीं हैं। तुम जानते
हो कि हमारे यहाँ एक बार डकैती हो चुकी है और एक बार सेंध लग चुकी है। डाकू ५० के लगभग थे। चर्मालयमें कार्यकर्त्ताओंके साथ सुरेन्द्र और शंकरभाईको खूब मार पड़ी। जो लोग पिटे उनमें ये दोनों थे, इससे मुझे बड़ी खुशी हुई। डकैतीके दो दिन बाद भण्डारमें सेंध लगाई गई। वैसे मैं इन दोनोंमें परस्पर सम्बन्ध नहीं मानता।
चकित कर देनेवाले और भी बहुत-से परिवर्तन हुए हैं। संयुक्त रसोई घरमें खानेवालोंकी संख्या बढ़कर सी हो गई है। और जहाँ मैं रह रहा था वह जगह महिलाओंका आवास बना दी गई है। मेरा कार्यालय मगनलालके कमरेमें है। रसोई-घर छात्रालयसे संलग्न रसोईघरमें चला गया है। मैं वहीं बाकी लोगोंके साथ खाना खाता हूँ। यदि तुम्हें किसीसे कभी बात करनी ही हो तो दूसरी चीजोंके बारेमें इमाम साहबसे ही जान लेना।<noinclude></noinclude>
hqyzge8fgih1tzis8ef1zre4cwas67d
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८७
250
186913
673310
645310
2026-08-23T13:24:51Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673310
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम्को|४५५}}</noinclude>आशा है कि तुम अपने शरीरको बिलकुल ठीक बनाये हुए हो। देवदास वापस अलमोड़ा चला गया है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२७) की फोटो-नकल से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०५. पत्र: मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ जन, १९२८}}
{{left|प्रिय मोतीलालजी,}}
सेनगुप्तने पत्रमें मुझे लिखा है कि मैं गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीको आगामी कांग्रेसके अध्यक्ष पदके लिए आपके पक्षमें मत देनेके लिए कहूँ। मुझे तो यह विचार पसन्द आया। परन्तु कोई प्रयत्न करनेके पहले मैं इस बारेमें आपकी राय
जानना चाहूँगा। शायद अभी जवाहरके गद्दी पर बैठनेका वक्त नहीं आया है। और यदि वह कमेटी, जिसका आप प्रबन्ध कर रहे हैं, कुछ ठोस काम आगे बढ़ा सके तो आपका ताज पहनना ठीक रहेगा। सेनगुप्तने मालवीयजीका नाम विकल्पके रूपमें सुझाया है। सेनगुप्तको लिखनेसे<ref>देखिए, "पत्र: जे॰ एम॰ सेनगुप्तको", २१-६-१९२८।</ref> पहले मैं आपके उत्तरकी प्रतीक्षा करूँगा।
कमलाके स्वास्थ्यके सम्बन्धमें तो मैं उद्विग्न था ही। जवाहरने बुरी खबर यह दी है कि डाक्टरोंका विचार है कि इन्दुका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। डाक्टरोंसे मुझे स्वयं कभी भय नहीं लगता। परन्तु मैं यह चाहता हूँ कि कमलाको कुछ भी नहीं हुआ है; और इन्दुको भी कोई रोग नहीं है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०६. पत्र: के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय सुब्रह्मण्यम,}}
मैंने सुब्बैयाकी आवश्यकताओं पर सोच-विचार किया है और मैं महसूस करता हूँ कि उसे पूरे सौ रुपये मिलने चाहिए और यदि किरायेके मकान में रहना हो तो बीस रुपये तक किरायेके लिए अलग। यह व्यवस्था पिछली तारीख यानी कि १५ मईसे होनी चाहिए। इसलिए उन्हें रु॰ १५ और मिलने चाहिए; आधेकी अदायगी
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
hzkb8ynp7f4tygl7lcftezvmi973g9n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८८
250
186914
673317
645311
2026-08-23T13:38:15Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673317
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>संघ द्वारा और आधेकी 'यंग इंडिया' के कार्यालय द्वारा की जानी चाहिए। इसके लिए मैं मोहनलालको लिख रहा हूँ। आपको जमनालालजी और श्री बैंकरकी मंजूरी चाहिए होगी। कृपया वह मंजूरी ले लें और रकमकी अदायगी कर दें। अब मुझे इस बारे में और ज्यादा चिन्ता करनेकी या श्री बैंकरको लिखने या जमनालालजीसे बात करनेकी जरूरत नहीं है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम<br>
अ॰ मा॰ च॰ संघ, मिर्जापुर<br>
अहमदाबाद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२८) की माइक्रोफिल्म से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०७. पत्र: शंकरन्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० जून, १९२८}}
{{left|प्रिय शंकरन्,}}
तुम्हारा पत्र मिला। सूची मेरे ही पास बनी रही। बिना मुझसे वह सूची लिये प्राप्ति-स्वीकृति 'नवजीवन' में छप गई थी। 'नवजीवन 'में प्राप्ति-स्वीकृतिके छप जानेका मुझे केवल तुम्हारे पत्रसे पता चला। 'यंग इंडिया' के बारेमें में स्वयं इस सम्बन्धमें देख रहा था और इसलिए मैंने कल गलती ठीक कर दी और पूरी सूची छपवा दी है, जिसे तुम इस सप्ताहके 'यंग इंडिया' में देखोगे। यह सब तुम्हारा पत्र आनेसे पहले हो गया था। बहरहाल मुझे आशा है कि सारे नाम 'नवजीवन' में प्रकाशित मिलेंगे। मैंने कहा, मुझे आशा है, क्योंकि मुझ पर इस वक्त कामका इतना बोझ है कि मैं यह भूल भी सकता हूँ।
महादेव कुएँ पर वहाँसे पानी भरते हुए बड़ी बुरी तरह गिर पड़ा था। वह ५ दिन विस्तरपर पड़ा रहा। अब पहलेसे बेहतर है और दो तीन दिनोंमें बिलकुल ठीक हो जायेगा।
अब तुम्हारे प्रश्नोंके बारेमें: यद्यपि वह काम जिसके लिए चन्दा दिया गया था पूरा हो गया हो, तो भी बाकी बचा पैसा दान लेनेवालेकी इच्छाके किसी काम पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। क्योंकि हो सकता है, जिसे दान लेनेवाला बेहतर काम समझता हो, दान देनेवालेकी नजर में वह बुरा काम हो। अभी उसी किस्मका एक उदाहरण मेरे सामने आया और जिसका मुझे कल ही निर्णय करना
पड़ा। एक सज्जनने जमनालालजीको राष्ट्रीय पाठशालाओंके सम्बन्धमें रु॰ १०,००० दिये। वह धन-राशि अभी बिना इस्तेमाल किये पड़ी है। जमनालालजी उस धनका उपयोग राष्ट्रीय शिक्षाके लिए करना चाहते हैं और राष्ट्रीय शिक्षामें अछूत भी शामिल<noinclude></noinclude>
6e0ds9tr1h5c32w0myrd5ldlb6vxhgy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८९
250
186915
673321
645312
2026-08-23T13:55:25Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673321
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा|४५७}}</noinclude>हैं। तुम, जमनालालजी और मैं तो यही समझेंगे कि यह अच्छा काम है। परन्तु मैंने सलाह दी है कि यह देखते हुए कि पैसा अभी इस्तेमाल नहीं हुआ है, दान देनेवालेकी अनुमतिके बिना यह पैसा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह निश्चित है कि दान देनेवाला इसकी अनुमति नहीं देगा; क्योंकि तथाकथित अछूतोंके बारेमें लोग ठीक तरहसे नहीं जानते। यदि जमनालालजी उस पैसेको ऐसे उद्देश्यके लिए
इस्तेमाल करते हैं, जिसका कि दान देनेवालेके मनमें कभी खयाल ही नहीं था, तो वह गलती होगी और वे अस्तेयकी प्रतिज्ञाभंगके दोषी होंगे।
दूसरे प्रश्नके सम्बन्धमें: मैं तुम्हारा ही मसला लेता हूँ। तुम अपनी नौकरीको तिलांजलि देकर अपने आपको अपेक्षत: निर्धनताकी स्थितिमें ले आये हो। निस्सन्देह इस कारण तुम अधिक समृद्धिशाली हो और यदि तुम्हारी निजी जरूरतें आगे और कम हो जायें तो तुम फिर और भी अधिक समृद्ध हो जाओगे। यह ज्यादा अच्छा है कि आदमी अपना सर्वस्व दे दे, इसकी अपेक्षा कि वह एक भाग अपने लिए और एक भाग समाजके लिए रखे ही। जब आदमीकी आवश्यकताएँ शून्य हो जाती हैं, वह अपना सर्वस्व दे देता है।
आशा है कि अब बात साफ हो गई है। मैं ठीक हूँ।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४२९) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०८. मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा'''}}}}
महादेव देसाईने इन पृष्ठोंमें पठानोंके व्यवहारके सम्बन्धमें जो आरोप<ref>ये '''यंग इंडिया'''के मई और जूनके अंकोंमें प्रकाशित हुए थे।</ref> लगाए हैं, सूचना निदेशकने उनका जिस तरह खण्डन किया है वह ध्यान देने योग्य है। महादेव देसाईको कुएँसे पानी निकालनेके वक्त गिर जानेसे गहरी चोट आ गई है, इसलिए वे बिस्तर पर पड़े हैं और इस कारण वे साप्ताहिक टिप्पणियाँ लिखने और इस खण्डनकी आलोचना करनेमें असमर्थ हैं। किन्तु निदेशकने जो खण्डन किया है, उसके विवेचनके लिए किसी विशेषज्ञकी जरूरत नहीं है। इस खण्डनमें उन्होंने जो बातें स्वीकार की हैं वे उनके पक्षके लिए अर्थात् सरकारके लिए अति प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करनेवाली हैं। उनका खण्डन बिलकुल निरर्थक है; जहाँ उसमें थोड़ा-बहुत अर्थ है भी वहाँ वह असमाधानकारक है।
किन्तु निदेशककी विज्ञप्तियोंकी जाँच करनेसे पहले मैं इस बातको स्पष्ट कर दूँ। निदेशककी मार्फत इन विज्ञप्तियोंकी सूचना प्रकाशित करनेमें सरकारका हेतु क्या है? क्या वह अपने अधिकारियोंके विरुद्ध अभियोगोंमें अदालतोंकी जगह लेना और स्वयं निर्णायक बनना चाहती है? मैं बिना किसी झिझकके स्वीकार करता हूँ कि जहाँ तक जनताका सम्बन्ध है; सत्याग्रह प्रचार कार्यालयके आरोप एक पक्षीय असिद्ध
वक्तव्य हैं। किन्तु इस प्रचार-कार्यालयके सम्मुख तो दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
jkh9jy61ayzo2r0hsf4lhiltgux3sbc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९०
250
186916
673343
645313
2026-08-23T15:25:10Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673343
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यद्यपि सत्याग्रहियोंको अदालतोंमें जानेमें कोई झिझक नहीं है; किन्तु वे बारडोलीकी अदालतों में नहीं जा सकते। वे जानते हैं कि वहाँ उनको न्याय मिलना तो दूर रहा, उनकी सुनवाई भी न होगी; क्योंकि उनकी शिकायत निजी लोगोंके विरुद्ध नहीं है, बल्कि सरकारी अधिकारियोंके विरुद्ध और ऐसे शासनके विरुद्ध है जो लगभग मार्शल लॉ जैसा है। इसलिए सत्याग्रहियोंके सम्मुख कोई दूसरा मार्ग नहीं रहा है। उनके सम्मुख एक ही मार्ग है कि वह जनताको सरकार द्वारा अपनाई गई असाधारण दमनकारी कार्रवाइयोंसे परिचित करायें। किन्तु निदेशकके प्रत्यारोपोंका क्या अर्थ हो सकता है? उसके खण्डनका क्या मूल्य हो सकता है? उसकी स्थिति वैसी बुरी नहीं है जैसी सत्याग्रहियोंकी है। सरकारके हाथोंमें पूरी सत्ता है। यदि सत्याग्रह कार्यालयके आरोप असत्य हैं तो सरकारके पास इसका उपाय है। इस सरकारको इस बातका कोई भान ही नहीं है कि उसकी साख बिलकुल उठ गई है और उसकी ओरसे कही गई बात सत्य हो तो भी लोग उसके असत्य होनेका सन्देह करते हैं। उसके कारनामोंका लेखा उतना ही बुरा है। इसलिए यदि सरकार के पास इन आरोपोंको असत्य सिद्ध करनेके लिए प्रमाण हों तो वह एक खुली जाँच समिति नियुक्त कर दे। तब सत्याग्रह-कार्यालय अपने प्रत्येक कथनकी सत्यता सिद्ध करनेका जिम्मा लेगा और यदि वहाँ वह उनको सत्य सिद्ध न कर सकेगा तो माफी माँगेगा, अन्यथा दण्ड भोगेगा। किन्तु गवर्नरने लोक-सेवकोंको जो लम्बे-लम्बे पत्र भेजे हैं उनको देखते हुए ऐसी आशाकी कोई गुंजाइश नहीं रहती। इसलिए श्री मुन्शीने त्यागपत्र देते हुए गवर्नरको भेजी गई अपनी जोरदार चिट्ठीमें अपने जिस निश्चयकी ओर इशारा किया है, उसका स्वागत करता हूँ। मैं श्री मुन्शीके त्यागपत्र देने पर और उससे भी अधिक ऐसी साहसपूर्ण चिट्ठी लिखने पर बधाई देता हूँ। मुझे आशा है कि वे अपनी जाँच-समिति संगठित करनेके निश्चयको कार्य-रूप देंगे। वे खरेसे-खरे लोगोंको ढूँढें और यदि वे मेरा सुझाव मान सकें तो वे सरकारका ही अनुकरण करें और अपने साथी विभिन्न जातियोंमें से चुनें। वे समितिमें, एक पारसी, एक मुसलमान, और एक ईसाई, चाहें वह अंग्रेज हो या भारतीय लें और इस स्वयं नियोजित समितिका एक उचित विचार-क्षेत्र निर्धारित करें, जिसके भीतर रहती हुई वह कार्य करे; और यदि वे थोड़ा-सा कष्ट और करें तो मेरा सुझाव है कि वे अपनी जाँच दमनकारी कार्रवाइयों तक ही सीमित न रखें; बल्कि उसमें बढ़ाए हुए लगान के सम्बन्धमें सत्याग्रहियोंके मामलेको भी शामिल कर लें। मैं यह आशा करता हूँ कि समिति सरकारको भी अपना मामला सामने रखनेके लिए गवाह भेजनेके लिए निमन्त्रित करेगी। यह बहुत सम्भव है कि सरकार इस समितिके सम्मुख अपने गवाह न भेजे। यदि वह न भेजेगी तो वह उसकी निन्दाका एक और कारण होगा।
अव निदेशककी विज्ञप्तियोंको लें। गवर्नर कहते हैं कि कोई गलतफहमी हो तो उसे दूर करनेके लिए पठान हटा लिये जायेंगे। किन्तु निदेशक कहते हैं कि वर्षा पास आ जानेसे पठानोंकी सेवाकी जरूरत नहीं रहेगी, इसलिए वे अब हटाए जा रहे हैं। लोग किस बात पर विश्वास करें? और यदि वर्षा पास आ जानेसे पठानोंकी<noinclude></noinclude>
taxhxzyk6ugiush0ud27njqya14ra3v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९१
250
186917
673351
645314
2026-08-23T15:55:33Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673351
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||मुलजिम न्यायाधीश बन बैठा|४५९}}</noinclude>जरूरत नहीं रही है तो एक विशेष अधिकारीके साथ और विशेष मजिस्ट्रेटोंकी अधीनतामें कार्रवाई करनेके लिए अच्छे बहादुर पठानोंकी इस सशस्त्र पुलिसकी क्यों जरूरत है? यदि लोगोंको पठानोंके हटाए जानेके पीछे किसी ऐसी कुटिल योजनाका सन्देह हो, जिसका उद्देश्य सत्याग्रहियोंको और भी अधिक फँसाना और आतंकित करके वशमें करना हो, तो ऐसी आशंका क्षन्तव्य होगी।
एक और विज्ञप्तिमें एक दिन एक पठानके चोरी करते रंगे हाथों पकड़े जानेकी घटनाका खण्डन किया गया है। यह खण्डन एक न्यायाधीश-जैसी भाषा और निश्चित परिणाम निकालते हुए इस तरह दिया गया है मानो निदेशकके सामने वादी और प्रतिवादी दोनों मौजद थे। जिस पठान चौकीदारने उस मनुष्यको रंगे हाथों छुरा और चोरीका नमक लिए हुए बारडोली स्टेशन पर पकड़ा था, उसने श्रीयुत वल्लभभाई
पटेलके सम्मुख रेलवे यूनियन के अध्यक्षके रूपमें एक बयान पेश किया था। यह बयान इस समय मेरे सामने मौजूद है। उसने इसमें कहा है कि "पुलिस अधिकारी गवाहीको कमजोर बनानेकी कोशिश कर रहे हैं और मुझे शिकायत वापस ले लेनेके लिए डरा-धमका रहे हैं।" किन्तु निदेशकने यह निर्दोष परिणाम निकाला है; "पुलिसने इस मामलेको झूठे मामलोंके वर्ग में रखने लायक समझा है।" इसमें आश्चर्यकी बात कुछ नहीं है; क्योंकि रेलवेका पठान कर्मचारी पुलिसके हाथोंकी कठपुतली बननेके लिए तैयार नहीं है। यह बयान भी कि "डिप्टी सुपरिंटेंडेंट पुलिस निश्चित रूपसे कह सकते हैं कि असहयोगियोंने जो चित्र लिए हैं वे कथित चोरी करनेके वक्तके नहीं हैं" उसी दर्जेका है। किन्तु इस बातको स्वीकार करना कि अभियुक्त पठान रेलवे प्लेटफार्म पर था और उसने एक मुट्ठी, बल्कि दो मुट्ठी नमक चुराया था,
सरकारी पक्षको काफी धक्का पहुँचाता था। कौन नहीं जानता कि जब अपराध करते हुए पकड़े गए लोगोंको बचाना होता है तब भ्रष्ट पुलिस आँखों देखे तथ्योंको भी हल्का बनाकर पेश करती है? इस मामलेमें नमक खराब हो गया था और वह जमीन परसे उठाया गया था। चूँकि पठानके पास छुरा पाया जाना एक प्रतिकूल बात है, इसलिए उसके पास छुरा होनेकी बातका खण्डन कर दिया गया है। सौभाग्यसे मैं दक्षिण आफ्रिकामें पठानोंसे परिचित था और मैं यहाँ भी कितनों ही को जानता हूँ। जबतक उन्हें बिगाड़ा नहीं जाता, उनकी वीरता असन्दिग्ध होती है। किन्तु मुझे याद नहीं आता कि मैंने किसी पठानको बिना छुरेके देखा हो। फिर भी कथित असहयोगी यह दावा नहीं करते कि उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, उनकी सत्यतामें उनका पूरा विश्वास है। उनकी माँग यह है कि इस विषयमें निष्पक्ष जाँच की जाये। सूचना निदेशक ऐसा नहीं कहते। वे अपनी ही कही बातोंको फैसलेकी तरह प्रामाणिक मानते हैं।
निदेशककी दूसरी बातका खण्डन भी पहली बातके खण्डनकी तरह ही परेशानी में डालनेवाला है। पठानने कल्याणजीको धमकी दी, इस बात से इनकार नहीं किया गया है; बल्कि इस बात से इनकार किया गया है कि उसने उनको छुरा भोंकनेकी धमकी दी। कहा जाता है कि पठानको चित्र खिंचवाने में आपत्ति थी, इसलिए उसने धमकी<noinclude></noinclude>
fu17ga2bjlprsiztpgb0ep641ht7xe9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९२
250
186918
673367
645315
2026-08-23T16:22:18Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673367
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दी थी। निदेशक अकारण ही यह मान लेते हैं कि पठान चित्र खिंचवानेमें आपत्ति करते हैं। इस बातको असहयोगी भली-भाँति जानते हैं। मैं असहयोगी हूँ; किन्तु मुझे अभी तक किसी पठान द्वारा ऐसी आपत्ति किये जानेकी कोई जानकारी नहीं है। मैं जानता हूँ कि बहुतसे पठानोंने चित्र खिंचवाए हैं और मैं ऐसे कुछ पठानोंको भी जानता हूँ जो चित्र खिंचवानेके लिए उत्सुक रहते हैं। मुझे श्री वल्लभभाईसे
पता चला है कि यह बात मालूम होनेसे पहले कि कैमरा उनको बदनाम करनेके लिए प्रयुक्त किया जा रहा है, पठान चित्र खिचवानेके लिए लालायित रहते थे। उन्होंने मुझे यह विश्वास भी दिया है कि यदि मौका मिलेगा तो वे यह बताना चाहते हैं और यह सिद्ध भी कर सकेंगे कि यह आपत्ति कैसे और कहाँ गढ़ी थी। और हम सभी जानते हैं कि पठानोंके शाह महाविभव अमानुल्ला फोटोग्राफरोंसे होनेवाली परेशानियोंको स्वेच्छासे सहते हैं। किन्तु निदेशकने अपने बचाव के लिए जो शब्दजाल रचा है, उसमें एक बात स्पष्ट उभर कर आती है, और वह यह है कि कल्याणजीको धमकी दी गई थी। मैं इस प्रसंगमें यह भी स्पष्ट कर दूँ कि बारडोलीके सत्याग्रही इस समय असहयोग नहीं कर रहे हैं। प्रत्युत सरकारसे लगानकी दर निश्चित करनेके बारेमें वास्तविक स्थिति पता लगाने में सहयोग करना चाहते हैं। वे असहयोगीकी हैसियतसे तो समितिकी माँग नहीं कर सकते थे। उस हैसियतसे तो वे केवल सरकारकी सत्ताको ही अस्वीकार कर सकते हैं। किन्तु उन्होंने यह नहीं किया है। उनका सत्याग्रह वर्तमान सरकारसे न्याय प्राप्त करने तक ही सीमित है।
तीसरा खण्डन एक पठान द्वारा एक स्त्रीको उसके घरमेंसे घसीट ले जानेके सम्बन्धमें है। पठान खुले हुए दरवाजेके भीतर खड़ा था, यह बात स्वीकार की गई है। यह नहीं बताया गया है कि वह किसीके घर के दरवाजेके भीतर क्यों खड़ा था। यह बात भी स्वीकार कर ली गई है कि एक स्त्रीने हिम्मत के साथ आगे बढ़ कर यह कहा कि एक पठान घरमें घुसने की कोशिश कर रहा था और उसने मुझे
खींचा और धक्का दिया। इसके बाद लोगोंको यह बहुमूल्य जानकारी दी गई है कि इस स्त्रीने कुछ दिन बाद श्री बेंजामिनसे माफी माँग ली थी। श्री बेंजामिनने जब उसपर झूठ बोलनेका आरोप लगाया था तो उसने कहा, "मैं क्या करती।" निश्चय ही श्री बेंजामिन के कथनको कोई महत्व देनेके पहले उस स्त्रीसे जिरह की जानी चाहिए।
चौथा खण्डन एक पठानके अभद्र व्यवहारके सम्बन्ध में है। यहाँ भी पठानके नंगे होनेकी बातका खण्डन नहीं किया गया है। किन्तु केवल यही कहा गया है कि इस अभद्र दर्शनके पीछे हेतु अभद्र नहीं था। और हेतु अभद्र न होनेका निष्कर्ष
निकालनेकी कोशिश इस आधार पर की गई है कि ग्रामीण गाँवमें चाहे जहाँ पाखानेके लिए बैठ जाते हैं। समझदार लोग स्वयं इस प्रकारके खण्डनका निष्कर्ष आसानीसे निकाल सकते हैं।
उसी प्रकारका खण्डन दो लड़कियोंके सामने एक पठानके नंगे खड़े हो जानेकी बातका किया गया है।<noinclude></noinclude>
mze3ccwzp57ssjyvf8z6ikoejd0u12s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९३
250
186919
673377
645316
2026-08-23T16:41:36Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673377
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||मुलजिम न्याशाधीश बन बैठा|४६१}}</noinclude>छठा खण्डन एक स्त्री पर किए गए अशिष्ट आक्रमणका है। यह आक्रमण झिझकते-झिझकते स्वीकार किया गया है। किन्तु निदेशक इस सम्बन्धमें भोलेपनसे कहते हैं, सम्भव है जैसा रहमत कहती है, वैसा किसीने किया हो; किन्तु इस बातका कोई प्रमाण नहीं है कि वह मनुष्य (यदि कोई था तो) पठान था, मानो रहमतकी यह गवाही निरर्थक है कि आक्रमण करनेवाला मनुष्य पठान था। सत्याग्रह कार्यालयमें
रमतको बचानेवाले गाड़ीवानका यह बयान भी मौजूद है कि आक्रमण करनेवाला सरकार द्वारा नियुक्त पठान था।
मैंने विज्ञप्तियोंमें से ये कुछ ही नमूने लिए हैं और 'यंग इंडिया' से विशेष रूपसे सम्बन्धित उदाहरणका विशेष विश्लेषण किया है, क्योंकि मैं यह दावा करता हूँ कि यह पत्र पूर्णतः निष्पक्ष रहता है और मनुष्यसे चूक तो हो ही सकती है। फिर भी जहाँतक सम्भव है, वहाँतक सत्य बातें छापनेका ही आग्रह रखता है। 'यंग इंडिया' में जो लोग लिखते हैं उन्हें लेखोंपर अपने नामका संक्षिप्त हस्ताक्षर देना
ही होता है। श्रीयुत महादेव देसाई स्वयं वकील हैं। वे दस सालसे ज्यादा अर्से से पत्रकारिताके धन्धेसे सम्बद्ध हैं, अतः उन्हें एक पर्याप्त प्रशिक्षित पत्रकार माना जा सकता है। इस कारण अन्य कई योग्यताओंके साथ-साथ उनमें झूठ और सचको अलग-अलग छाँट सकनेकी योग्यता भी अवश्य है। वे तथ्योंको अपनी आँखोंसे देखने और अपने कानोंसे सुननेके लिए थोड़े-थोड़े दिन बाद बारडोली स्वयं जाते हैं। यह कहा
जा सकता है कि उनकी एक प्रतिष्ठा है, और ऐसे में उसपर आँच आ सकती है। इसलिए वे जब चारपाईमें पड़े हैं, मैं उनकी उन टिप्पणियोंको, जिनका खण्डन किया गया है और निदेशकके खण्डनोंको पढ़नेके लिए बाध्य था। मुझे उनमें कोई ऐसी बात नहीं मिली, जिससे महादेवने बारडोलीमें स्वयं देखकर जिन तथ्योंका निर्धारण किया था उनपर कोई आँच आती हो। और मैंने यह भी देख लिया कि निदेशकका खण्डन उनकी बातको झूठ सिद्ध नहीं कर पाता।
पठानोंने भैंसोंको जिस निर्दयतासे पीटा है और जिसके फलस्वरूप बेचारी एक भैंस तो मर भी गई, उसके सम्बन्ध में निदेशक मौन ही रह गए हैं, क्योंकि उसके लिए यही सुविधाजनक था। क्या उनको मालूम है कि उनके इस कथनके बावजूद तलाटियों और पटेलोंने इस्तीफे दबावमें आकर दिये हैं, स्वयं तलाटियों और पटेलोंने उनके इस बदनामी-भरे आरोपको दृढ़तापूर्वक गलत बताया है।
इन विज्ञप्तियोंमें और गवर्नरके पत्रोंमें भी इस एक बात पर बहुत जोर दिया गया है कि बारडोलीके बनिये भी पठानोंको चौकीदार रखते हैं; इसलिए सरकार पर पठानोंको लानेका दोष नहीं लगाया जा सकता। शायद गवर्नर और निदेशक
महोदय नहीं जानते कि पठानोंको चौकीदारों आदिके रूपमें नौकर रखनेकी बात गुजरात में भी कोई पसन्द नहीं करता। ऐसा नहीं कि गुजरातके लोगोंको पठानोंसे कोई द्वेष हो, किन्तु पठानोंको नौकर रखनेके पीछे एक दूषित हेतु है और जो लोग उनकी सेवाएँ लेते हैं वे पठानोंमें से भले लोगोंको रखनेकी बात नहीं सोचते; बल्कि ऐसे ही पठानोंको ठोक बजाकर नौकर रखते हैं जो ज्यादासे-ज्यादा धूर्तता कर सकते<noinclude></noinclude>
1xz3r3uw0t2wa5b1sppc0ngm8xfm123
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९४
250
186920
673396
645317
2026-08-23T17:03:15Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673396
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हों। और यदि स्वार्थी बनिए और अन्य लोग अपना रवैया न सुधारेंगे तो उन्हें और गुजरातके शेष लोगोंको भी स्वार्थकी दृष्टिसे बदमाशोंको हाथमें करके उनका उपयोग करनेकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; फिर वे बदमाश चाहे पठान हों, चाहे दूसरे कोई और, किन्तु जिस प्रथाके तत्वतः बुरे होनेका सरकारको ज्ञान है और जो सामान्य जनोंको कुरुचिपूर्ण लगती है, यदि सरकार किसी ऐसी प्रथाका अनुकरण करे तो यह तो एक गलतीके बाद दूसरी गलती करना कहलाएगा; और यदि तब उसपर अतिरिक्त दोष लगाया जाये तो उसे आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। सामान्य लोगोंका पठानोंको नौकर रखनेसे जो आशय होता है वही आशय बारडोलीमें सरकार द्वारा पठानोंको भेजनेका भी हो सकता है। और गवर्नर या निदेशक इस कथनका कि कुछ पठान विदेशी नहीं हैं, लोगोंसे क्या निष्कर्ष निकालनेकी अपेक्षा रखते हैं। निश्चय ही दोनोंमें इतना जानने योग्य समझ तो होनी ही चाहिए कि बारडोलीमें पठानोंके विरुद्ध जो आपत्ति उठाई गई है वह उनके पठान होनेके कारण नहीं उठाई गई है। यहाँ 'पठान' शब्दका अर्थ अलग है। बारडोलीके लोगोंने इसका प्रयोग मुख्यतः 'बदमाश या गुण्डे' के अर्थमें किया है। बारडोलीके लोग अच्छे पठानोंका स्वागत करेंगे, फिर चाहे वे कहींसे क्यों न आयें। और फिर जिसने उनका पक्ष लिया और एक पठानके सम्बन्धमें वल्लभभाईको वक्तव्य दिया वह भी तो आखिर रेलवे द्वारा नियुक्त एक पठान ही था। इस तरह जो आपत्ति है वह किसी जाति-विशेषके सम्बन्धमें
न होकर, उन जैसे लोगोंको लेकर है जो बारडोलीमें रखे जाते हैं। इसलिए सरकार द्वारा पठानोंको हटाए जानेसे और उसकी जगह सशस्त्र पुलिस भेजनेसे स्थिति तनिक भी नहीं बदलती। सरकारके बारेमें यह न कहा जाये कि यदि बारडोलीके लोग अभी तक पठान रूपी चाबुकोंकी शिकायत करते थे, तो अब उनकी जगह सरकारने उनको विशेष मजिस्ट्रेटों द्वारा समर्थित सशस्त्र पुलिस रूपी बिच्छू बख्श दिए हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २१-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५०९. बारडोलीका घपला'''}}}}
सरकार बारडोलीके मामलेमें जितना ही अपना बचाव करना चाहती है, वह अपना अपराध उतना ही बढ़ाती जाती है। श्रीयुत मुन्शीको लिखे गये गवर्नरके लम्बे पत्र तो इस गुत्थीको और भी उलझा देते हैं और श्रीयुत मुन्शी जैसे संविधानज्ञकी दृष्टिमें भी उनकी स्थिति सुधरती नहीं है।
गवर्नरके पत्र तो मामलेको साफ टाल जाते हैं। गवर्नर साहब कहते हैं एक और जाँच की जा चुकी है और अपने पत्र-लेखकको आश्वासन देते हैं कि सरकारकी कार्यकारी परिषद्का एक भी सदस्य ऐसा नहीं है, जो सरकारी कार्रवाईके औचित्यके बारेमें, बल्कि जिसे दरअसल उसकी उदारता कहना चाहिए, पूरी तरह सन्तुष्ट न हो।<noinclude></noinclude>
ku3vavmuzuerrripdmu2yw129spb521
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९५
250
186921
673474
645318
2026-08-24T03:05:38Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673474
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||बारडोलीका घपला|४६३}}</noinclude>यह तो सरकार अपनी पुरानी दलील दुहरा रही है, जिससे कोई परिणाम नहीं निकलता। अगर सरकार, पत्र-व्यवहारमें जिनका जिक्र किया गया है वैसी पचासों जाँच कर ले, तो भी उससे स्थिति नहीं सुधरेगी। बल्कि उल्टे इन जाँचोंसे यही
बात सिद्ध होगी कि सरकार इस बात पर तुली हुई है कि जब-जब बारडोलीवाले रोटी माँगें, सरकार उन्हें पत्थर मारे। वे कोई ऐसी गुप्त जाँच नहीं चाहते, जिसमें उनके अपने आदमी न हों और उनका स्थान वहाँ ऐसा न हो कि वे उसमें उपयोगी और प्रभावकारी कार्य कर सकें। वे तो खुली और स्वतन्त्र जाँच चाहते हैं। उनका दावा है कि सरकार जिसे न्याय बल्कि उदारता कहती है, वह उन लोगोंकी समझ में अन्याय और जुल्म है। उनका दावा है, और इस पत्रमें भी यह प्रमाणित करनेका प्रयत्न किया गया है कि श्री जयकर और श्री एन्डर्सनकी रिपोर्टोकी कोई कीमत नहीं है और वे गलत बयानियों और हिसाब जोड़नेकी भूलोंसे भी भरी पड़ी हैं।<ref>देखिए: 'बारडोलीका मामला वधा है?", १४-६-१९२८।</ref> वे कहते हैं कि हम किसी भी खुली, निष्पक्ष और स्वतन्त्र जाँच समितिके आगे अपने
इल्जाम साबित कर सकेंगे।
सरकार गर्वसे और बार-बार वही बात कहकर कान पका रही है कि उसने
न तो श्री जयकरकी ३० फीसदीकी और न श्री एन्डर्सनकी २९ फीसदीकी (सचमुच बहुत बड़ी उदारता है!) बढ़ोतरी करनेकी ही सलाह मानी है, बल्कि उसने तो उसे घटाकर २० फीसदी रखा है। और अब गवर्नर साहब यह भी फरमाते हैं कि इतनी कमी न सिर्फ न्यायसंगत ही है, बल्कि उदारतापूर्ण भी है! मगर जनता तो उदारताकी भीख नहीं माँगती। वह तो सीधा साफ इन्साफ मांगती है और दावा
करती है कि २० फीसदीकी बढ़ती भी, वहाँकी हकीकतको देखते हुऐ, वहाँके किसानोंकी स्थितिको देखते हुए नहीं होनी चाहिए थी। दूसरी ओर गवर्नर साहब फिर भी यही कहते जा रहे हैं कि अगर कोई जाँच समिति बैठाई जाती तो लगानमें इससे अधिक बढ़ती होती। अगर सरकार सच्चे दिलसे यही विश्वास करती है तो फिर वह प्रजाकी जाँच-समिति बैठानेकी अत्यन्त वाजिब प्रार्थनाको क्यों नहीं मान लेती? प्रजा उसका फैसला माननेको तो तैयार ही है।
जब लोग सरकारी अधिकारियोंकी रिपोर्टोंको ही गलत बताते हैं, तब तो यह घोर अन्याय और अपमान है कि सरकार उनके सामने उन दूसरे अधिकारियोंकी रिपोर्ट ला फेंकती है, जो अपने निर्णयोंका आधार उन दस्तावेजोंको बनाते हैं जिनमें अक्सर गलतियाँ छिपाई गई होती हैं और इससे भी ज्यादा बार जो केवल सतही होती हैं। गवर्नर साहब अगर सचमुच जैसा कि वे कहते हैं न्याय करना चाहते हैं तो वे बारडोली के जिन लोगोंके लिए अपने पत्रमें सहानुभूति और चिन्ताका इजहार करते हैं, उन लोगोंके कष्टोंसे पावनीकृत उनकी इस सम्मानजनक माँगको स्वीकार कर लें।
मगर गवर्नर साहब यह घोषित करते हैं कि उनकी सहानुभूतिकी धारा, 'बाहरी लोगों' के बीचमें आ पड़नेसे, जिन्हें गालियाँ दे देकर गुजरात के कमिश्नरने प्रसिद्ध कर
दिया है, पूरी-पूरी नहीं बहने पाती! अगर इन किसानोंके रास्तेमें, जिनके बारेमें
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
bbt4kuylg3fxazzhmycnth7gunaxpwh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९६
250
186922
673485
645319
2026-08-24T03:19:03Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673485
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गवर्नर साहब कहते हैं, वे बखूबी "जानते हैं कि अगर उन्हें लगान भरने दिया जाये तो दूसरे किसानोंके समान वे भी अपना लगान भर देंगे" वे ही खड़े हुए हैं तो सरकार इन बाहरसे अनधिकार प्रवेश करनेवालोंको एक ही बार वहाँसे हटा क्यों नहीं देती? अबतक तो सरकारके रास्तेमें जिसने भी सिर उठाया, उसे हटा देनेका उपाय सरकारको मिल जाता था! तब फिर वह (गुजरातके कमिश्नरकी सुन्दर भाषा में) "खेड़ाके इन आन्दोलनकारियोंके गिरोहको जो गरीब बारडोलीवालों पर ही जीते हैं" अछूता क्यों छोड़ती है और निर्दोष किसानोंको एक साथ ही इन आन्दोलनकारियों और पठानोंका या उनके बदले बुलाई गई पुलिसका शिकार क्यों होने देती है?
गवर्नर अपनी "संवैधानिक" स्थितिका औचित्य बताने और श्रीयुत वल्लभभाई और उनके वफादार साथियोंको बदनाम करनेकी जल्दी में अपना यह बयान भी भूल गये कि एक पत्रमें उन्होंने कहा था कि ४० पठान हैं और दूसरेमें वह कहते हैं केवल २५ ही हैं। परन्तु पठानोंके बारेमें मैं ज्यादा एक दूसरे लेखमें बहुत कुछ कहूँगा।
गवर्नर बारडोलीमें कर वृद्धिका औचित्य यह कहकर सिद्ध करना चाहते हैं कि ऐसी ही बढ़तीका विरोध चौरासी ताल्लुकावालोंने नहीं किया है। मैं चौरासीके बारेमें कुछ भी नहीं जानता। मगर मैं यह जानता हूँ कि हिन्दुस्तानके लोगोंने इससे पहले बहुतसे अन्याय सहे हैं और इसलिए हिन्दुओंने अपने लिये 'नम्र हिन्दू' का निन्दापूर्ण खिताब पाया है। सम्भव है कि चौरासीवाले इतने निर्बल हों कि सरकार द्वारा
लगाये गये लगानका विरोध नहीं कर सकते, जब कि पिछले छ: साल स्वस्थ प्रभाव में रहकर बारडोलीवालोंने इतनी ताकत और इच्छा-शक्ति पैदा कर ली है कि वे ऐसी
सरकारका विरोध करनेके कष्टोंको सह सकें, जो कि अपने अविवेक और आतंकप्रियताके लिए बदनाम हो गई है।
शेरका नंगा पंजा अब देखिए। गवर्नर साहब फर्माते हैं:
{{outdent|'''सरकार शासन करनेके अपने निर्विवाद हकको छोड़कर, जैसा कि आप सलाह देते हैं, उसे किसी स्वतन्त्र समितिको क्यों दे दे? मैं तो हर सम्भव उपायसे इस स्थितिको सुधारनेके लिए उत्सुक हूँ, मगर जो सरकार ऐसी बात होने दे, वह सरकार ही किस कामकी?'''}}
यह "शासन करनेका निर्विवाद हक" है। हिन्दुस्तानका खून बेरोक-टोक निचोड़कर उसे भूखों मार डालनेका हक! अगर सरकारी अधिकारियों और प्रजाके बीच झगड़ेका फैसला करनेके लिए कोई स्वतन्त्र समिति नियुक्त की जाये तो उसकी इस स्वच्छन्दता पर कुछ अंकुश लगेगा। यहाँ खयाल रहे कि स्वतन्त्र समितिके मानी सरकारसे बिलकुल स्वतन्त्र कोई गैर-सरकारी समिति नहीं है। इसके मानी हैं कि सरकार ऐसे लोगोंकी एक समिति बनाये जिसके बारेमें यह विदित हो कि उन पर सरकारी अधिकारियोंका दबाव नहीं पड़ेगा और उसे खुले आम जाँच करने तथा पीड़ित लोगोंकी उचित और कारगर ढंगसे सुनाई करनेका अधिकार हो। मगर ऐसी खुली जाँचके मानी होंगे सरकारकी छिपी और स्वच्छन्द लगान-नीतिका "रामनाम सत्य बोल जाना।" लोगोंकी इस सरल माँगमें "सरकारके कामोंको हथियानेकी बात<noinclude></noinclude>
8femehei8vxidcla8ygac493hvgz40a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९७
250
186923
673500
645320
2026-08-24T04:20:09Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673500
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||बारडोलीका घपला|४६५}}</noinclude>कहाँ है?" मगर सरकारके अधिकारियोंकी स्वच्छन्दता पर जरा भी लगाम लगानेसे सरकारका पारा बहुत ऊँचा चढ़ जाता है। और जब ब्रिटिश सिंह भारतमें क्रुद्ध हो उठे, तब 'नम्र हिन्दुओं' का रक्षक तो राम ही है। मगर हाँ, ईश्वर असहायोंकी सहायता अवश्य करता है, परन्तु वह तभी करता है जब मनुष्य पूरी तरह असहाय हो जाये। परमात्माने भारतके लोगोंको सत्याग्रहके रूपमें आप ही कष्ट सहनेका
'गाण्डीव' दिया है। उसके प्रभावसे लोग युग-युगका आलस्य छोड़कर उठ रहे हैं। बारडोलीके किसान हिन्दुस्तानियोंको दिखा रहे हैं कि वे निर्बल भले ही हों, मगर उनमें अपने विश्वासोंके लिए कष्ट सहन करनेका साहस है।
अब इतने दिनों बाद तो सत्याग्रहको अवैध कहनेका अवसर नहीं रह जाता। यह तो तभी अवैध होगा, जब सत्य और उससे सम्बद्ध आत्म-त्याग अवैध बन जायेंगे। लॉर्ड हार्डिगने दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहको आशीर्वाद दिया था और उसके आगे वहाँकी सर्वशक्तिमान संघ सरकारको भी झुकना ही पड़ा था। उस समयके वाइसराय लॉर्ड चैम्सफोर्ड तथा बिहारके गवर्नर सर एडवर्ड गेटने इसकी वैधता और इसकी
कार्य-साधकताको स्वीकार किया था और चम्पारनकी रैयतकी शिकायतोंकी जाँचके लिए एक स्वतन्त्र समिति बैठाई गई थी, जिसके फलस्वरूप सरकारकी प्रतिष्ठा बढ़ी और सौ वर्ष पुराना अन्याय दूर हुआ। फिर यह खेड़ामें भी स्वीकार किया गया और चाहे बेदिलीसे ही सही और चाहे यह अधूरा ही था, मगर खेड़ाके सरकारी अधिकारियों और आन्दोलन चलानेवालों तथा प्रजाके नेताओंके बीच समझौता हुआ था। मध्य-प्रान्तके तात्कालिक गवर्नरने नागपुर झंडा सत्याग्रहियोंसे समझौता करना ही ठीक समझा था, कैदियोंको छोड़ दिया था और सत्याग्रहियोंके हकको स्वीकार किया था। अन्तमें, और तो और बम्बईके गवर्नर लेस्ली विल्सनने भी, जब वह शुरू-शुरू में "संसारके सबसे अधिक योग्य शासनाधिकारियोंके संसर्ग" से अछूते थे, स्वयं बोरसदमें सत्याग्रहके बलको स्वीकार किया था और बोरसदवालोंको राहत दी थी।
मैं चाहता हूँ कि गवर्नर साहब और श्री मुंशी, दोनों ही पिछले चौदह वर्षोंकी इन घटनाओंको गाँठ बाँध लें। बारडोलीका सत्याग्रह अब अचानक अवैध घोषित नहीं किया जा सकता। हकीकत तो यह है कि सरकारके पास कोई दलील नहीं है। वह नहीं चाहती कि खुली जाँचमें उसकी लगान-नीतिको चुनौती दी जाये। अगर बारडोलीवाले आखिरी आँच सह गये तो या तो खुली जाँच होगी या इजाफा
लगान मंसूख होगा। यह उनका निर्विवाद हक है कि वे अपनी शिकायतके लिए निष्पक्ष अदालत के सामने सुनवाईका दावा करें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २१-६-१९२८}}
{{dhr|5em}}
३६–३०<noinclude></noinclude>
g4wu10ax71pmrs0ifz1dwtu1m52lu6u
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९८
250
186924
673509
645321
2026-08-24T04:38:18Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673509
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५१०. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू'''}}
मैं 'यंग इंडिया' के लिए लिखने बैठा हूँ और इसी बीचमें मुझे नीलकण्ठ बाबूका यह तार मिला है कि साखी गोपालमें पण्डित गोपबन्धुदासका देहान्त हो गया है। पं॰ गोपबन्धुदास दुःख और विपत्तिसे मारे उड़ीसाके सर्वश्रेष्ठ सुपुत्रोंमें से एक
थे। गोपबन्धु बाबूने उड़ीसाको अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया था। मैंने गोपबन्धु बाबूके बारेमें और उनके निष्कलंक चरित्र तथा दृढ़ताके बारेमें सन् १९१६ में जब अकाल-पीड़ितोंको सहायता पहुँचानेके लिए श्री अमृतलाल ठक्कर उड़ीसा भेजे गये थे, तब सुना था। श्री ठक्कर मुझे लिखा करते थे कि किस भाँति असहायोंकी सहायता करनेके लिए गोपबन्धु बाबूने कष्टों और रोगोंका बहादुरीसे सामना किया।
असहयोगके जमाने में उन्होंने अपनी वकालत और कौंसिलकी मेम्बरी छोड़ दी और फिर वे कभी डिगे नहीं। मगर उनके लिए जो इससे भी बड़ा त्याग था, वह यह कि उन्होंने अपनी प्रियतम कृति सत्यवादी स्कूलको भी खतरेमें डाल दिया। इसके लिए उन्होंने अपने कुछ निकटतम मित्रोंके ताने सहे, किन्तु वे अपने मार्गसे, जिसे उनके ये मित्र उनकी मूर्खता समझते थे, विचलित नहीं हुए। यह एक ऐसी बात है जो उनकी कीर्तिको चिरकाल तक जीवित रखेगी। उनके जीवनकी एक अभिलाषा यह थी कि वह टुकड़ोंमें विभक्त उत्कलको संयुक्त और सुखी देखना चाहते थे। अभी हालमें वे लाला लाजपतरायकी समितिमें शामिल हो गये थे। वे गरीबी तथा बाढ़से पीड़ित उत्कलको आर्थिक सहायता पहुँचानेके लिए खादीको उपयोगी साधन बनानेकी योजना बना रहे थे। पण्डित गोपबन्धु दासके अवसानसे देश और भी गरीब हो गया है। यद्यपि आज वे सशरीर हम लोगोंके बीच नहीं हैं मगर उनकी आत्मा तो है ही। तब वही पुण्यात्मा उड़ीसाके कार्यकर्ताओंका पथ-प्रदर्शन करे। उनकी
मृत्युसे हमारे इधर-उधर बिखरे कार्यकर्त्ताओंको, जिनकी संख्या राष्ट्रीय आवश्यकताओंके अनुपात में बहुत ही कम है, इस बातकी प्रेरणा मिलनी चाहिए कि वे अपने सेवा कार्यमें
और अधिक जुट जायें, पहलेसे अधिक प्रयत्न और अधिक आत्मत्याग करें और उनमें और अधिक एकता हो। मैं इस स्वर्गीय देशभक्तके कुटुम्बियों तथा शिष्योंके प्रति संवेदना प्रकट करता हूँ।
{{c|'''युवकोंके लिए लज्जास्पद'''}}
एक संवाददाताने मुझे एक अखबारकी कतरन भेजी है। इससे मालूम होता है कि कुछ समय से हैदराबाद, सिन्धमें वरोंकी दहेजकी माँग भयंकर रूपसे बढ़ती जा रही है। इम्पीरियल टेलीग्राफ इंजीनियरिंग सेवाके एक कर्मचारीने सगाईके वक्त ही २०,००० रुपये नकद वसूल किये हैं और उसके बाद विवाहमें और दूसरे खास मौकों पर भारी रकमें दिये जानेका वादा करा लिया है। यदि कोई युवक दहेजको विवाहकी<noinclude></noinclude>
5lupma0cjth24ext380hmmsklwwxil9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४९९
250
186925
673555
645322
2026-08-24T06:06:25Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673555
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||टिप्पणियाँ|४६७}}</noinclude>शर्त बनाता है तो वह अपनी शिक्षा और अपने देशको बदनाम करता है और स्त्री-जातिकी तौहीन करता है। देशमें कई युवक आन्दोलन चल रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि ये आन्दोलन ऐसे प्रश्नोंको हाथमें लें। ऐसी संस्थाएँ प्रायः आत्म-श्लाघी संस्थाएँ बन जाती हैं, जब कि उनको बनना चाहिए अन्दरसे ठोस सुधार करनेवाली संस्थाएँ। यद्यपि ये संस्थाएँ सार्वजनिक आन्दोलनोंमें सहायता पहुँचाकर कभी-कभी काफी अच्छा काम करती हैं तथापि यह स्मरण रखना चाहिए कि जनता उनके इस कार्यकी जो सराहना करती है उससे देशके युवकोंको पर्याप्त पुरस्कार मिल जाता है। यदि ऐसे कार्यके पीछे आन्तरिक सुधार न हो तो इससे युवकोंमें आत्म-तुष्टिकी अवांछनीय भावना पैदा हो जायेगी और उससे उनका नैतिक पतन होनेकी सम्भावना है। दहेजकी पतनकारी प्रथाकी निन्दा की जानी चाहिए और उसके विरुद्ध प्रबल लोकमत बनाया
जाना चाहिए और जो युवक इस प्रकार बुरे तरीकेसे लिए हुए धनसे अपने हाथोंको मलिन करते हैं उनको समाजसे बहिष्कृत किया जाना चाहिए। कन्याओंके पिताओंको अंग्रेजी उपाधियोंसे चकाचौंध में न आ जाना चाहिए और अपनी छोटी जातियोंके घेरेसे और अपने प्रान्तोंसे बाहर जाकर अपनी लड़कियोंके लिए सच्चे वीर युवक वर-रूपमें प्राप्त करने चाहिए।
{{c|'''एक प्रशस्ति'''}}
श्री एच॰ एस॰ एल॰ पोलकने श्री महादेव देसाईको प्रेषित एक पत्र में श्री मगनलाल गांधीके सम्बन्ध में यह लिखा है:<ref>यहां नहीं दिया जा रहा है। इसमें उन्होंने यह बताया था कि श्री मगनलाल आश्रमके लिए कितने उपयोगी थे और अन्तमें कहा था कि उनका शरीर न रहनेपर भी उनकी आत्मा आपके बीच कदाचित अधिक वास्तविक रूपसे गतिशील रहेगी।</ref>
लेखकने अपने पत्रके अन्तमें जो कुछ लिखा है उसकी सत्यता हम बहुतसे आश्रमवासी अनुभव करते हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया''' २१-६-१९२८}}
{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
7797ht4qxt0s0uugjgbilmlu4vj5l4p
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५००
250
186926
673557
645323
2026-08-24T06:17:20Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673557
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५११. पत्र: जे॰ एम॰ सेनगुप्तको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२१ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय सेनगुप्त,}}
आगामी कांग्रेसके अध्यक्षके बारेमें आपका पत्र मिला। मुझे आपका सुझाव पसन्द है। परन्तु अन्तिम रूपमें निर्णय करनेसे पहले मैं पण्डितजी के विचार जानना चाहता हूँ। इसलिए मैंने उन्हें इस मामलेमें पत्र<ref> देखिए "पत्र: मोतीलाल नेहरूको", १९-६-१९२८।</ref> लिखा है। जैसे ही उनका उत्तर आयेगा, मुझे आशा है कि मैं आपको और आगे और अधिक निश्चित रूपमें लिखूँगा।
प्रदर्शनी के बारेमें आपका पत्र मिला था। इससे मुझे सन्तोष नहीं है। लेकिन जाहिर है कि हमें इस मामले में असहमत होने पर ही राजी होना होगा। आपको मालूम है कि स्वदेशी के सम्बन्धमें मेरे विचार बड़े पक्के हैं। परन्तु यदि वे बंगालको पसन्द नहीं हैं तो मुझे तबतक प्रतीक्षा अवश्य करनी चाहिए जबतक बंगाल बदल न जाये या मैं धीरज न खो दूँ। बहरहाल मैं आपसे तर्क नहीं करूँगा। मैं वहाँकी
गतिविधियों पर ध्यान रखूँगा। आपने मुझे जो-कुछ लिखा है और जो जानकारी मुझे मिली थी उन दोनोंमें मुझे कोई अन्तर नहीं दिखाई देता। अन्तमें संक्षेपमें इतना ही कहूँगा कि वैसे मैं मशीनोंके खिलाफ नहीं हूँ परन्तु मैं ऐसी मशीनोंके खिलाफ हूँ जो जन-समुदायसे उसका काम छीन लें और एवज में उन्हें कोई दूसरा काफी और सन्तोषप्रद काम न दें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६२६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
pkxpvb1y4f9aodq85bjqi147baz43ke
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०१
250
186927
673559
645324
2026-08-24T06:28:36Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673559
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५१२. पत्र: ईथल एंगसको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२२ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला, धन्यवाद। यदि मैं अगले साल यूरोप जानेमें सफल हुआ और तब यदि यह किसी तरह भी सम्भव हुआ तो मैं निश्चय ही आपका कृपापूर्ण आतिथ्य स्वीकार करूँगा। इस बारेमें मुझे कोई सन्देह नहीं कि यूरोपके अन्य भागोंकी तरह इंग्लैंडमें भी मेरे बहुतसे मित्र हैं।
श्री राजगोपालाचारी दक्षिणमें अपने आश्रमकी बराबर उन्नति कर रहे हैं। मैं आपका पत्र उन्हें भेजनेकी धृष्टता कर रहा हूँ और मुझे मालूम है कि वह इस पत्रको बड़े चाव से और प्रसन्नतापूर्वक पढ़ेंगे।
मैं आपको और रेवरेंड जॉन टॉड फेरियरको उनकी पुस्तकोंके लिए धन्यवाद देता हूँ। मेरे मित्र जो कई एक पुस्तकें मुझे भेजते हैं, मैं उन्हें पढ़ना तो बहुत चाहता हूँ, परन्तु उसके लिए वक्त नहीं मिलता। परन्तु आपने जो पुस्तकें भेजी हैं, उनमें से कुछको मैं सरसरी नजरसे देख गया हूँ। भोजनकी शुद्धतासे सम्बन्धित तर्क मुझे, जैसा कि स्वाभाविक है, बहुत अच्छे लगे हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५१३. पत्रः रामलाल बलराम वाजपेयीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२२ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। आपने कु॰ मेयोका जो लेख मुझे भेजा था, उसे पढ़ गया हूँ। उस निन्दात्मक लेखका उत्तर देनेकी मेरी कोई इच्छा नहीं है। यदि ऐसे लोग हैं, जिन्हें कु॰ मेयो द्वारा गढ़ी हुई कहानी पर विश्वास है तो ऐसे लोगोंको मेरी ओरसे प्रतिवाद किये जाने पर भी कोई सन्तोष नहीं हो सकता।<noinclude></noinclude>
0psmfryolp9s3229sxyua7km1k0ych9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०२
250
186928
673569
645325
2026-08-24T06:52:26Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
673569
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मेरे स्वास्थ्यके सम्बन्धमें आपकी पूछताछके लिए आपको धन्यवाद। मेरी तबीयत काफी ठीक है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत रामलाल बलराम वाजपेयी<br>
२०९, सुलिवन प्लेस<br>
ब्रुकलिन<br>
न्यूयार्क<br>
सं॰ रा॰ अ॰}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''५१४. पत्र: के॰ श्रीनिवासनको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२२ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय श्रीनिवासन,}}
आपका पत्र और रु॰ ११ का चेक मिला। आपने अपने लिए जो पैसा लिया, यदि उसकी आपको जरूरत नहीं थी तो निश्चय ही आप भर्त्सनाके पात्र हैं।
यह देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है कि आप अपनी प्रतिज्ञा निभा रहे हैं। मैं आशा करता हूँ कि आपको अपने मित्रोंके सामने कताई करनेमें शर्म नहीं लगेगी। यदि आपका विश्वास है कि यह काम अच्छा है तो आप क्या कर रहे हैं, यह उन्हें देखने दें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत के॰ श्रीनिवासन<br>
मार्कोनी वायरलेस कालेज<br>
चेम्सफोर्ड<br>
एसेक्स}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३८) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
6vt2pfdollcfviha98qj544adldfl2n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०३
250
186929
673591
645326
2026-08-24T07:48:36Z
अनुश्री साव
80
/* अशोधित */
673591
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''५१५. पत्र: देवी वेस्टको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२२ जून, १९२८}}
आपका पत्र मिला और इसके साथ आया सुन्दर फोटोग्राफ' भी मिल गया ।
मैं इसे 'सुन्दर' इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि चित्र बहुत जीवन्त बन पड़ा है ।
आप मगनलालके बारेमें जो कहती हैं वह बहुत सही है ।
हमने आश्रम में जो परिवर्तन किये हैं, काश ! उनका वर्णन करनेका मेरे पास वक्त
होता । प्रभुदास पहाड़से, जहाँ वह स्वास्थ्य लाभ कर रहा था, अभी अभी आया है ।
कृष्णदास और छगनलाल तथा उसकी पत्नी यहाँ हैं । फिलहाल उसके माता-पिता
भी यहाँ हैं । देवदास पहाड़पर है । मैं तकरीबन ठीक हूँ। यह सम्भव है कि हम
अगले साल मिलें। यदि सब कुछ ठीक रहा तो शायद मैं अगले साल यूरोप आऊँ ।
अंग्रेजी (एस० एन० १४३३९ ) की फोटो नकलसे ।
प्रिय मित्र,
५१६. पत्र : होरेस जी० अलेक्जेंडरको
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२२ जून, १९२८
मुझे आशा थी कि मैं आपको काफी लम्बा जवाब भेजूंगा, इसलिए मैंने
आपके पत्रका उत्तर देने में बड़ी देर कर दी। परन्तु मुझे लगता है कि पूरा उत्तर
देनेका प्रयास करनेके लिए मुझे निकट भविष्य में पर्याप्त अवकाश मिलनेकी सम्भावना
नहीं है ।
मौन प्रार्थना और सामूहिक मौनके सम्बन्धमें आप जो कुछ कहते हैं, उसे मैं
समझता हूँ और सिद्धान्त रूपमें उसे पसन्द भी करता हूँ। जब मैं दक्षिण आफ्रिकामें
था तब मैं इस तरहकी कई सभाओं में सम्मिलित हुआ था । परन्तु वे लोग कार्य - रूपमें
जिस तरह इसका निर्वाह करते थे, उससे मैं बहुत प्रभावित नहीं हो सका । भारतमें
१. देवी वेस्टका ।
२. होरेस जी० अलेक्जेंडरने, जो पहले कभी आश्रममें आये थे, क्वेक के तरीकेका सामूहिक मौन
रखने की सलाह दी थी।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
oahxp6byb743n3crqttn46d6ya0n1mh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०२
250
187041
673270
673266
2026-08-23T12:07:23Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673270
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
तत्परता, निग्रह और संयमसे अपने आपको चैतन्य रखते हुए बुद्धिमान मनुष्य अपने लिए ऐसा द्वीप बना ले जिसे कोई भी प्रलय तबाह न कर सके।
जैसे मधुमक्खी फूलके रंग और गन्धको क्षति पहुँचाये बिना उसका रस लेकर उड़ जाती है, इसी तरह बुद्धिमान मनुष्यको सत्यपर स्थिर रहना चाहिए।
तूने मेरे होठोंको जहाँ एक वाणी दी है वहाँ हजार बार मौन रहना सिखाया है।
एक बार बुद्ध भी गाड़ीका घोड़ा बने थे और उन्होंने दूसरोंका बोझा ढोया था।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८२. उपवासकी महिमा'''}}}}
पाठक उस पोलिश प्रोफेसरके पत्रोंसे परिचित हैं जिनके उद्धरण में जब तब इस पत्रके स्तम्भोंमें प्रकाशित करता रहा हूँ।<ref>देखिए खण्ड ३३ "सत्य एक है", २१-४-१९२७ और खण्ड ३४ "अनेकता में एकता", ११-८-१९२७।</ref> अपने एक पत्रमें मेरे उपवासोंके सम्बन्धमें वे लिखते हैं:<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र–लेखकने उपवासके अपने अनुभव लिखे थे और कहा था कि
उससे न केवल शारीरिक स्फूर्ति बढ़ती है, वरन् आध्यात्मिक लाभ भी अधिक होता है।</ref>
मैं यह पत्र ऐसी खोजोंमें रुचि रखनेवाले पाठकोंके लिए उपयोगी समझकर छाप रहा हूँ। उपवाससे होनेवाले शारीरिक और नैतिक लाभोंको लोग दिनोंदिन अधिकाधिक मानते जा रहे हैं। बनिस्बत तरह–तरह की दवाओं और भयंकर इन्जेक्शनोंके — भयंकर इसीलिए नहीं कि उनसे तकलीफ होती है किन्तु इसलिए कि उनके फलस्वरूप अक्सर और दूसरे रोग हो जाते हैं — विवेकपूर्वक किये गये उपवासके द्वारा बहुतसे रोगोंका इलाज कहीं ज्यादा अच्छा और अक्सीर होता है। दवाओंसे होनेवाली बहुतेरी हानियोंको हम जानते ही नहीं हैं। मगर उपवाससे हुई हानिके उदाहरण विरल ही हो सकते हों। उपवास करनेवाले प्रायः सभी आदमियोंका अनुभव है कि इससे स्फूर्ति बढ़ जाती है, क्योंकि मन और शरीरको सच्चा आराम तो केवल उपवासमें ही मिल सकता है। अगर जरूरतसे ज्यादा भरा और शक्तिके बाहर काम करनेवाला पेट आराम न पावे तो महज शारीरिक काम बन्द कर देनेसे ही शरीरको आराम नहीं मिलता। उपवाससे आत्मिक लाभ भी पर्याप्त होते हैं किन्तु वे इस तरह सहज ही नहीं दिखलाये जा सकते।<ref>पत्र–लेखकने लिखा था कि जब कभी मेरे सामने नैतिक या बौद्धिक कठिनाई पेश होती है, मैं उपवास करता हूँ ... एक बार छापाखाना वाला अन्य अधिक पैसा देनेवाली अन्य चीजें छापता रहा और उसने मेरे काममें देर लगा दी। मैंने उपवास किया और उनकी मनोवृत्ति बदलने में समर्थ हो सका...।</ref> आत्मिक लाभ तभी होंगे, जब मन और देहका पूरा मेल हो। किन्तु इसमें आत्म–प्रवचनाका खतरा है। मुझे ऐसे बहुतसे उदाहरण मालूम हैं जबकि आत्मिक लाभके लिए किये गये उपवास जरूरतसे अधिक दिनों तक चलाये जाते रहे। अगर उपवासी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
pcprykqk2oovix7xxxf6wfru16g0qnu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०३
250
187042
673273
645442
2026-08-23T12:12:54Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673273
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : उर्मिलादेवीको|१७१}}</noinclude>
अपना उद्देश्य और साधन ठीक-ठीक पहचानता हो तो सीमामें रहकर उपवास करनेसे
बहुत आत्मिक लाभ होता है। मुहम्मद साहबने अपने अनुयायियोंको कहा था कि
'रमजानके उपवासके अलावा, और उपवासोंमें मेरी नकल मत करना । मेरा सिरजनहार
मेरे उपवासके दिनोंमें मेरे लिये पूरी खुराक भेज दिया करता है।' इस उपदेशमें भी
बहुत कुछ सार है । उस धार्मिक उपवाससे लाभ ही क्या जिसमें शरीरको जितना
ही भूखों मारो, मन तरह-तरहके व्यंजनोंकी ओर उतना ही दौड़ा करे ?
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८३. दो संशोधन'''}}}}
इसी २२ तारीखके 'यंग इंडिया' में ६३ पृष्ठपर छपे श्री आयरलैण्डके
पत्रकी पाद-टिप्पणी में दो खेदजनक गलतियाँ रह गई हैं। स्तम्भके लगभग बीचमें
मिलेगा कि “ ईश्वर पृथ्वी तक ऐसे करोड़ों तरीकोंसे पहुँचता है जिन्हें हम समझ
नहीं पाते; इस वाक्यमें संकेत लिपि-लेखकने 'हम' की जगह 'पृथ्वी' सुन लिया ।
इसके आगे छठी पंक्ति में लिखा है " यह कई दूसरी चीजोंकी तरह है जिन्हें हम देख
सकते हैं, आदि प्रसंगसे पता चलता है कि इस वाक्यमें 'तरह' के बाद 'नहीं' शब्द
छूट गया है। होना ऐसा चाहिए था : वह कई दूसरी चीजोंकी तरह नहीं है' आदि।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८४. पत्र : उर्मिलादेवीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपका पत्र मिला । मुसीबतें आपका पीछा नहीं छोड़तीं । परन्तु मानना चाहिए
कि वे कुछ सिखाने आती हैं। धीरेनके मामलेमें सलाह देना कठिन है ।' आदर्श की दृष्टिसे
तो उसे निष्कासन अथवा नजरबन्दी के प्रत्येक आदेशका उल्लंघन करना चाहिए और
बदले में जो भी दण्ड दिया जाये उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परन्तु यह मामला उनके
१. देखिए, “ मतभेद", २-३-१९२८।
सकता है। वह आदेशपर
मुकदमा चलाया जा सकता
२. उर्मिला देवीने लिखा था " धीरेनेके बारेमें भी परेशानी है। सरकार उसे बंगालसे निकाल
देना चाहती है। मैं नहीं समझती कि इस भयंकर विपत्तिको टाला जा
हस्ताक्षर करना अस्वीकार तो कर सकता है, परन्तु ऐसी स्थिति में
है, जिसका परिणाम तीन वर्षंका कठिन कारावास हो सकता है .
उसपर
( एस० एन० १३१२६ )<noinclude></noinclude>
8it1adqsyq6vbo8pt3zdw8rd48t6ji2
673276
673273
2026-08-23T12:20:46Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673276
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : उर्मिलादेवीको|१७१}}</noinclude>
अपना उद्देश्य और साधन ठीक–ठीक पहचानता हो तो सीमामें रहकर उपवास करनेसे बहुत आत्मिक लाभ होता है। मुहम्मद साहबने अपने अनुयायियोंको कहा था कि 'रमजानके उपवासके अलावा, और उपवासोंमें मेरी नकल मत करना। मेरा सिरजनहार मेरे उपवासके दिनोंमें मेरे लिये पूरी खुराक भेज दिया करता है।' इस उपदेशमें भी बहुत कुछ सार है। उस धार्मिक उपवाससे लाभ ही क्या जिसमें शरीरको जितना ही भूखों मारो, मन तरह–तरहके व्यंजनोंकी ओर उतना ही दौड़ा करे?
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८३. दो संशोधन'''}}}}
इसी २२ तारीखके 'यंग इंडिया' में ६३ पृष्ठपर छपे श्री आयरलैण्डके पत्रकी पाद–टिप्पणीमें<ref>देखिए, "मतभेद", २-३-१९२८।</ref> दो खेदजनक गलतियाँ रह गई हैं। स्तम्भके लगभग बीचमें मिलेगा कि "ईश्वर पृथ्वी तक ऐसे करोड़ों तरीकोंसे पहुँचता है जिन्हें हम समझ नहीं पाते;" इस वाक्यमें संकेत लिपि–लेखकने 'हम' की जगह 'पृथ्वी' सुन लिया। इसके आगे छठी पंक्ति में लिखा है "यह कई दूसरी चीजोंकी तरह है जिन्हें हम देख सकते हैं, आदि प्रसंगसे पता चलता है कि इस वाक्यमें 'तरह' के बाद 'नहीं' शब्द छूट गया है। होना ऐसा चाहिए था : वह कई दूसरी चीजोंकी तरह नहीं है' आदि।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', २९-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१८४. पत्र : उर्मिलादेवीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपका पत्र मिला। मुसीबतें आपका पीछा नहीं छोड़तीं। परन्तु मानना चाहिए कि वे कुछ सिखाने आती हैं। धीरेनके मामलेमें सलाह देना कठिन है।<ref>उर्मिला देवीने लिखा था ... "धीरेनेके बारेमें भी परेशानी है। सरकार उसे बंगालसे निकाल देना चाहती है। मैं नहीं समझती कि इस भयंकर विपत्तिको टाला जा सकता है। वह आदेशपर
हस्ताक्षर करना अस्वीकार तो कर सकता है, परन्तु ऐसी स्थितिमें उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसका परिणाम तीन वर्षंका कठिन कारावास हो सकता है ... (एस॰ एन॰ १३१२६)</ref> आदर्श की दृष्टिसे तो उसे निष्कासन अथवा नजरबन्दी के प्रत्येक आदेशका उल्लंघन करना चाहिए और बदले में जो भी दण्ड दिया जाये उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परन्तु यह मामला उनके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
cobwxirejk8k2y3lyhzrj22o7k935qc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०४
250
187043
673277
645443
2026-08-23T12:23:36Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673277
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>स्वयं निर्णय करनेका है। इससे पहले कि वह, जैसा कि मेरे मनमें है, आदेशका
उल्लंघन करें, उन्हें यह आन्तरिक विश्वास अवश्य होना चाहिये कि आदेशका उल्लंघन
कर्त्तव्य है और आदेशके उल्लंघनके लिए कारावास कोई बोझ नहीं अपितु हर्षका विषय
है । और यह तभी सम्भव है जब ऐसे कारावास कोई व्यक्ति अपने लिये और राष्ट्रीय
उत्थानके लिए प्रेरणा देनेवाला समझे । परन्तु वास्तवमें किया क्या जाना चाहिए, इस
विषय में मैं पूरे भरोसेके साथ कुछ नहीं कह सकता। आप धीरेनको मुझसे ज्यादा अच्छी
तरह जानती हैं। फिर भी धीरेन ज्यादातर तो वही करेंगे जैसा कि आप उनसे करवाना
चाहेंगी। आप यह भी अवश्य सोच समझ लें कि आप उनके कारावास और कष्टोंको
किस हदतक बर्दाश्त करेंगी; इसके बाद ही कोई निर्णय करें। यदि धीरेन निष्कासनके
आदेशको स्वीकार कर लें तो वह निश्चय ही आश्रम में आयें और वह जबतक उनकी
इच्छा हो यहाँ रहें। उन जैसे युवकोंके लिए यहाँ हमेशा ही काम रहता है।
प्रस्तावित यात्रा के बारेमें अभी कुछ निश्चित नहीं है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती उर्मिला देवी<br>
४ ए नफर कुण्डु रोड<br>
कालीघाट, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१२६) की फोटो- नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१८५. पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघ के सचिवको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
निजी एजेन्सियोंके सम्बन्धमें लिखे गये, आपके २८ मार्च पत्र संख्या २१६९ के
सन्दर्भ में, एकदम कोई राय दे पाना कठिन है। मैं इसे आवश्यक मानता हूँ कि निजी
एजेन्सियोंपर अधिक अंकुश लगानेकी शक्ति प्राप्त कर ली जाये। इससे पहले कि मैं कुछ
सलाह दूँ, यह अच्छा रहेगा कि तमिलनाड एजेन्सीसे ठोस सुझाव प्राप्त कर लिये जायें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सचिव
अ० भा० च० संघ
अहमदाबाद}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१३९ ) की माइक्रोफिल्मसे ।<noinclude></noinclude>
mz6jacearzsl4d7buqqyfhxr3ebzy7o
673279
673277
2026-08-23T12:27:42Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673279
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
स्वयं निर्णय करनेका है। इससे पहले कि वह, जैसा कि मेरे मनमें है, आदेशका उल्लंघन करें, उन्हें यह आन्तरिक विश्वास अवश्य होना चाहिये कि आदेशका उल्लंघन कर्त्तव्य है और आदेशके उल्लंघनके लिए कारावास कोई बोझ नहीं अपितु हर्षका विषय है। और यह तभी सम्भव है जब ऐसे कारावास कोई व्यक्ति अपने लिये और राष्ट्रीय उत्थानके लिए प्रेरणा देनेवाला समझे। परन्तु वास्तवमें किया क्या जाना चाहिए, इस विषय में मैं पूरे भरोसेके साथ कुछ नहीं कह सकता। आप धीरेनको मुझसे ज्यादा अच्छी तरह जानती हैं। फिर भी धीरेन ज्यादातर तो वही करेंगे जैसा कि आप उनसे करवाना चाहेंगी। आप यह भी अवश्य सोच समझ लें कि आप उनके कारावास और कष्टोंको किस हदतक बर्दाश्त करेंगी; इसके बाद ही कोई निर्णय करें। यदि धीरेन निष्कासनके
आदेशको स्वीकार कर लें तो वह निश्चय ही आश्रममें आयें और वह जबतक उनकी इच्छा हो यहाँ रहें। उन जैसे युवकोंके लिए यहाँ हमेशा ही काम रहता है। प्रस्तावित यात्रा के बारेमें अभी कुछ निश्चित नहीं है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती उर्मिला देवी<br>
४ ए नफर कुण्डु रोड<br>
कालीघाट, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२६) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१८५. पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघ के सचिवको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
निजी एजेन्सियोंके सम्बन्धमें लिखे गये, आपके २८ मार्च पत्र संख्या २१६९ के सन्दर्भ में, एकदम कोई राय दे पाना कठिन है। मैं इसे आवश्यक मानता हूँ कि निजी एजेन्सियोंपर अधिक अंकुश लगानेकी शक्ति प्राप्त कर ली जाये। इससे पहले कि मैं कुछ सलाह दूँ, यह अच्छा रहेगा कि तमिलनाड एजेन्सीसे ठोस सुझाव प्राप्त कर लिये जायें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सचिव
अ॰ भा॰ च॰ संघ
अहमदाबाद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१३९ ) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
c9owmgcpjw4gcpni90w724sogjn1hll
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०५
250
187044
673285
645444
2026-08-23T12:43:27Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673285
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८६. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आप मुझे सारे नये अतिरिक्त तथ्य और आँकड़े अवश्य भेजते रहिये ।
उस दिन आपने जो संयुक्त पक्का चिट्ठा भेजा है, उसे मैं इस पत्रके साथ भेज
रहा हूँ ।
भी ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४७८६) की फोटो नकलसे तथा एस० एन० १३१२५ से
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{c|{{larger|'''१८७. पत्रः ना० २० मलकानीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें अपनी आवश्यकताओं और अन्य किसी भी मामले में मुझे
लिखने में बिलकुल संकोच नहीं करना चाहिए। जहाँतक हो सकेगा मैं तुमसे मिलनेकी
कोशिश करूँगा, परन्तु तुम्हें मुसीबत बर्दाश्त करनेके लिए तैयार करना चाहिए । गृह कलह
भी राष्ट्र सेवकके भाग्य में बदा हो सकता है।
ठक्कर बापा आपके वेतनके बारेमें सर पुरुषोत्तमदाससे मिले थे। आपको
केन्द्रीय समितिसे वेतन मिलनेकी बातको सर पुरुषोत्तमदास अत्यन्त स्वाभाविक और
रु० १५० बिलकुल ठीक मानते हैं। अब मुझे रु० २०० माँगने पड़ेंगे। मुझे कोई
कठिनाई दिखाई नहीं देती है।
मैं यह पता लगानेकी कोशिशमें हूँ कि क्या जेठालाल या पतलाल कुछ दिनोंके
लिए भेजे जा सकते हैं । कल्याणजी और नरहरि भाईको भेज सकना असम्भव है ।
नरहरिने अपने लिये कामकी योजना स्वयं बना रखी है । और कल्याणजी बारडोली में
अवश्य ही व्यस्त होंगे। परन्तु मेरे पास एक ऐसे योग्य व्यापारी हैं, जो इस वक्त ऐसे<noinclude></noinclude>
6cptyttc50a8wzbevt0jcs5by1g5o2j
673287
673285
2026-08-23T12:49:33Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673287
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८६. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आप मुझे सारे नये अतिरिक्त तथ्य और आँकड़े अवश्य भेजते रहिये। उस दिन आपने जो संयुक्त पक्का चिट्ठा भेजा है, उसे मैं इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८६) की फोटो–नकलसे तथा एस॰ एन॰ १३१२५ से भी।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{c|{{larger|'''१८७. पत्रः ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें अपनी आवश्यकताओं और अन्य किसी भी मामलेमें मुझे लिखनेमें बिलकुल संकोच नहीं करना चाहिए। जहाँतक हो सकेगा मैं तुमसे मिलनेकी कोशिश करूँगा, परन्तु तुम्हें मुसीबत बर्दाश्त करनेके लिए तैयार करना चाहिए। गृह कलह भी राष्ट्र सेवकके भाग्य में बदा हो सकता है।
ठक्कर बापा आपके वेतनके बारेमें सर पुरुषोत्तमदाससे मिले थे। आपको केन्द्रीय समितिसे वेतन मिलनेकी बातको सर पुरुषोत्तमदास अत्यन्त स्वाभाविक और रु॰ १५० बिलकुल ठीक मानते हैं। अब मुझे रु॰ २०० माँगने पड़ेंगे। मुझे कोई कठिनाई दिखाई नहीं देती है।
मैं यह पता लगानेकी कोशिशमें हूँ कि क्या जेठालाल या पर्शतलाल कुछ दिनोंके लिए भेजे जा सकते हैं। कल्याणजी और नरहरि भाईको भेज सकना असम्भव है। नरहरिने अपने लिये कामकी योजना स्वयं बना रखी है। और कल्याणजी बारडोलीमें अवश्य ही व्यस्त होंगे। परन्तु मेरे पास एक ऐसे योग्य व्यापारी हैं, जो इस वक्त ऐसे<noinclude></noinclude>
tw8ov4mpdx4vbjabkuq6qkeyrrk0wak
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०६
250
187045
673290
645445
2026-08-23T12:52:49Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673290
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कामके लिए खाली हैं। वह जयसुखलाल गांधी' है । वह अमरेली खादी कार्यालयके
अधिकारी थे । अब इसकी फिरसे व्यवस्था की जा रही है और जयसुखलालको अवकाश
दिया जा रहा है। उत्तराधीन तुम्हारा पत्र बिलकुल ठीक समयपर आया है और
उन्हें खाली रखा जा सकता है । परन्तु यह जरूरी है कि उन्हें मुख्य कार्यालयको समेटने
और सारा सामान यहां भेज देनेके लिये पहले अमरेली भेजा जाये। इसमें एक
पखवाड़ा लग जानेकी सम्भावना है। अभी मैंने उनसे बातकी कि क्या वे यह करनेके
लिए तैयार हैं। वे रजामन्द हैं, बशर्ते कि मैं पहले उन्हें सीधा अमरेली जाकर वहाँका
काम समेट लेने दूं। आज मैंने उन्हें तार' भेजा है। यदि मुझे तुम्हारा उत्तर तुरन्त न
मिला, तो तुम्हें अपने अन्तिम उत्तरके यहाँ मिलनेके बादसे एक पखवाड़े तकका समय
देना पड़ेगा ।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,<br>
'''बापू'''}}
{{left|श्रीयुत ना० र० मलकानी
पीपल्स फ्लड रिलीफ कमेटी
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी० एन० ९५१) की फोटो नकलसे।
{{c|{{larger|'''१८८. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको'''}}}}
{{right|३० मार्च, १९२८}}
मैंने आपके समुद्री तारका उत्तर दे दिया है । अभीतक कुछ निश्चित नहीं है।
मुझे क्या करना चाहिए, यह बात मेरे अपने मनमें स्पष्ट नहीं है। मैं एम० रोमाँ
रोलांसे पत्र-व्यवहार कर रहा । मुझे उनके अन्तिम उत्तरसे किसी निश्चयपर पहुँचने में
सहायता मिलेगी। यदि यूरोपकी यात्राका निश्चय हो जाये और यदि मैं समयपर
पहुँच जाऊँ तो मुझे समारोह का उद्घाटन' करनेमें प्रसन्नता होगी। परन्तु जहाँतक में
समझ सकता हूँ, मैं सम्भवतः समयपर नहीं पहुँच सकता। यदि भारत छोड़ना सम्भव
हुआ भी तो मई से पहले भारतसे निकलनेकी कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती ।
इसलिए मेरा सुझाव है कि आप कोई दूसरा प्रबन्ध कर लें।
१. परन्तु जयसुखलाल गांधीकी जगह मथुरा व्यासको भेजा गया है। देखिए "पत्र: ना० २०
, ४-४-१९२८ ।
मलकानी ",
२. यह उपलब्ध नहीं है।
३. ७ जुलाईको; हस्तकला कक्षका उद्घाटन ।<noinclude></noinclude>
idwt7c5zu2u81ltey1ulaf1h5hi0tii
673294
673290
2026-08-23T13:01:27Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673294
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कामके लिए खाली हैं। वह जयसुखलाल गांधी<ref>परन्तु जयसुखलाल गांधीकी जगह मथुरा व्यासको भेजा गया है। देखिए "पत्र: ना० २० मलकानी", ४-४-१९२८।</ref> है। वह अमरेली खादी कार्यालयके अधिकारी थे। अब इसकी फिरसे व्यवस्था की जा रही है और जयसुखलालको अवकाश दिया जा रहा है। उत्तराधीन तुम्हारा पत्र बिलकुल ठीक समयपर आया है और उन्हें खाली रखा जा सकता है। परन्तु यह जरूरी है कि उन्हें मुख्य कार्यालयको समेटने और सारा सामान यहां भेज देनेके लिये पहले अमरेली भेजा जाये। इसमें एक पखवाड़ा लग जानेकी सम्भावना है। अभी मैंने उनसे बातकी कि क्या वे यह करनेके लिए तैयार हैं। वे रजामन्द हैं, बशर्ते कि मैं पहले उन्हें सीधा अमरेली जाकर वहाँका काम समेट लेने दूं। आज मैंने उन्हें तार<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> भेजा है। यदि मुझे तुम्हारा उत्तर तुरन्त न मिला, तो तुम्हें अपने अन्तिम उत्तरके यहाँ मिलनेके बादसे एक पखवाड़े तकका समय देना पड़ेगा।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,<br>
'''बापू'''}}
{{left|श्रीयुत ना॰ र॰ मलकानी
पीपल्स फ्लड रिलीफ कमेटी
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ९५१) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१८८. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको'''}}}}
{{right|३० मार्च, १९२८}}
मैंने आपके समुद्री तारका उत्तर दे दिया है। अभीतक कुछ निश्चित नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए, यह बात मेरे अपने मनमें स्पष्ट नहीं है। मैं एम॰ रोमाँ रोलाॅंसे पत्र–व्यवहार कर रहा। मुझे उनके अन्तिम उत्तरसे किसी निश्चयपर पहुँचनेमें सहायता मिलेगी। यदि यूरोपकी यात्राका निश्चय हो जाये और यदि मैं समयपर पहुँच जाऊँ तो मुझे समारोह का उद्घाटन<ref>७ जुलाईको; हस्तकला कक्षका उद्घाटन।</ref> करनेमें प्रसन्नता होगी। परन्तु जहाँतक मैं समझ सकता हूँ, मैं सम्भवतः समयपर नहीं पहुँच सकता। यदि भारत छोड़ना सम्भव हुआ भी तो मईसे पहले भारतसे निकलनेकी कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती। इसलिए मेरा सुझाव है कि आप कोई दूसरा प्रबन्ध कर लें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
21pfu2lypqbiw2k0i626glt0fws2nws
673302
673294
2026-08-23T13:11:59Z
आदेश यादव
3609
673302
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कामके लिए खाली हैं। वह जयसुखलाल गांधी<ref>परन्तु जयसुखलाल गांधीकी जगह मथुरा व्यासको भेजा गया है। देखिए "पत्र: ना० २० मलकानी", ४-४-१९२८।</ref> है। वह अमरेली खादी कार्यालयके अधिकारी थे। अब इसकी फिरसे व्यवस्था की जा रही है और जयसुखलालको अवकाश दिया जा रहा है। उत्तराधीन तुम्हारा पत्र बिलकुल ठीक समयपर आया है और उन्हें खाली रखा जा सकता है। परन्तु यह जरूरी है कि उन्हें मुख्य कार्यालयको समेटने और सारा सामान यहां भेज देनेके लिये पहले अमरेली भेजा जाये। इसमें एक पखवाड़ा लग जानेकी सम्भावना है। अभी मैंने उनसे बातकी कि क्या वे यह करनेके लिए तैयार हैं। वे रजामन्द हैं, बशर्ते कि मैं पहले उन्हें सीधा अमरेली जाकर वहाँका काम समेट लेने दूं। आज मैंने उन्हें तार<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> भेजा है। यदि मुझे तुम्हारा उत्तर तुरन्त न मिला, तो तुम्हें अपने अन्तिम उत्तरके यहाँ मिलनेके बादसे एक पखवाड़े तकका समय देना पड़ेगा।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,<br>
{{larger|बापू}}}}
{{left|श्रीयुत ना॰ र॰ मलकानी
पीपल्स फ्लड रिलीफ कमेटी
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ९५१) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१८८. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको'''}}}}
{{right|३० मार्च, १९२८}}
मैंने आपके समुद्री तारका उत्तर दे दिया है। अभीतक कुछ निश्चित नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए, यह बात मेरे अपने मनमें स्पष्ट नहीं है। मैं एम॰ रोमाँ रोलाॅंसे पत्र–व्यवहार कर रहा। मुझे उनके अन्तिम उत्तरसे किसी निश्चयपर पहुँचनेमें सहायता मिलेगी। यदि यूरोपकी यात्राका निश्चय हो जाये और यदि मैं समयपर पहुँच जाऊँ तो मुझे समारोह का उद्घाटन<ref>७ जुलाईको; हस्तकला कक्षका उद्घाटन।</ref> करनेमें प्रसन्नता होगी। परन्तु जहाँतक मैं समझ सकता हूँ, मैं सम्भवतः समयपर नहीं पहुँच सकता। यदि भारत छोड़ना सम्भव हुआ भी तो मईसे पहले भारतसे निकलनेकी कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती। इसलिए मेरा सुझाव है कि आप कोई दूसरा प्रबन्ध कर लें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
lox3vu23fcb80e86qmmvtu58xpqbb0z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०७
250
187046
673297
645446
2026-08-23T13:05:21Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673297
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको|१७५}}</noinclude>
जहाँतक आपके साथ ठहरनेका सम्बन्ध है, यदि आप मुझे और मेरे साथियोंको
आश्रय दे सकें, तो निस्सन्देह मैं आपके पास ठहरना चाहूँगा; यदि मैं आया भी तो
अकेला नहीं आऊँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|कु० म्यूरियल लेस्टर<br>
किंगस्ले हॉल<br>
पॉविस रोड<br>
बो० ई० ३<br>
लन्दन}}
अंग्रेजी (एस० एन० १४९४९) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१८९. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
रामनवमी [३० मार्च, १९२८]}}
{{left|भाई घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मीला है। यूरोप जानेके बारेमें मैं अब तक कुछ निश्चय नहिं कर
सका हूं । जानेका दिल नहीं है। रोमेरोलांको मीलनेकी इच्छा है सही। परंतु इस
बारेमें उनके पत्रकी मैं प्रतीक्षा करता हूँ । एक पत्र आया है उससे जानेका निश्चय
नहिं होता है । यदि जानेका हुआ भी तो मेईमें होगा और अक्टोबरमें वापिस आ
जाउंगा। थोड़े दिन भी यदि मैं अपके साथ मसूरी में रह सकता हूं तो प्रयत्न करूंगा ।
एप्रिल १३ तारीख तक तो यहीं रहना चाहता हूं ।
विदेसी कपड़ोंके बहिष्कारके बारेमें मीलोंके सहकारके बारेमें मैंने जो कुछ लीखा'
है उसपर मुझे आपका अभिप्राय भेजें।
स्वास्थ्यके पूरे हाल मुझे दे दें। अब कुछ खा सकते हो ?
{{right|आपका,<br>
{{larger|मोहनदास}}}}
सी० डब्ल्यू ० ६१५५ से ।
सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
१. पत्र में आये उल्लेखोंसे यह स्पष्ट है कि यह १९२८ में लिखा गया था।
२. सत्याग्रह सप्ताहका अन्तिम दिन ।
३. देखिए “हमारी मिलें क्या कर सकती है ?", १५-३-१९२८ ।<noinclude></noinclude>
jvnrdv9f7u9v6lv6ksbbvo01eimuum1
673300
673297
2026-08-23T13:11:17Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673300
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको|१७५}}</noinclude>
जहाँतक आपके साथ ठहरनेका सम्बन्ध है, यदि आप मुझे और मेरे साथियोंको आश्रय दे सकें, तो निस्सन्देह मैं आपके पास ठहरना चाहूँगा; यदि मैं आया भी तो अकेला नहीं आऊँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|कु॰ म्यूरियल लेस्टर<br>
किंगस्ले हॉल<br>
पॉविस रोड<br>
बो॰ ई॰ ३<br>
लन्दन}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४९४९) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१८९. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
रामनवमी [३० मार्च, १९२८]<ref>पत्र में आये उल्लेखोंसे यह स्पष्ट है कि यह १९२८ में लिखा गया था।</ref>}}
{{left|भाई घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मीला है। यूरोप जानेके बारेमें मैं अब तक कुछ निश्चय नहिं कर सका हूं। जानेका दिल नहीं है। रोमेरोलांको मीलनेकी इच्छा है सही। परंतु इस बारेमें उनके पत्रकी मैं प्रतीक्षा करता हूँ। एक पत्र आया है उससे जानेका निश्चय नहिं होता है। यदि जानेका हुआ भी तो मेईमें होगा और अक्टोबरमें वापिस आ जाउंगा। थोड़े दिन भी यदि मैं अपके साथ मसूरीमें रह सकता हूं तो प्रयत्न करूंगा। एप्रिल १३ तारीख<ref>सत्याग्रह सप्ताहका अन्तिम दिन।</ref> तक तो यहीं रहना चाहता हूं।
विदेसी कपड़ोंके बहिष्कारके बारेमें मीलोंके सहकारके बारेमें मैंने जो कुछ लीखा<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती है?", १५-३-१९२८।</ref> है उसपर मुझे आपका अभिप्राय भेजें।
स्वास्थ्यके पूरे हाल मुझे दे दें। अब कुछ खा सकते हो?
{{right|आपका,<br>
{{larger|मोहनदास}}}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ६१५५ से।
सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
0jhw39np1ooyixf6np1r8iya675osjj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०८
250
187047
673303
645447
2026-08-23T13:13:24Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673303
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९०. मोक्षदाता राम'''}}}}
हम जिन रामके गुण गाते हैं, वे राम वाल्मीकिके राम नहीं हैं, तुलसी 'रामायण
के राम भी नहीं है - हालाँकि तुलसीदासकी 'रामायण' मुझे अत्यन्त प्रिय है और
उसे मैं अद्वितीय ग्रन्थ मानता हूँ, तथा एक बार पढ़ना शुरू करनेपर कभी उकताता नहीं;
तो भी हम आज तुलसीदासके रामका स्मरण करनेवाले नहीं हैं और न गिरधरदास
के रामका । तब फिर कालिदास और भवभूतिके रामका तो कहना ही क्या ?
भवभूतिके 'उत्तररामचरित' में बहुत सौन्दर्य है, किन्तु उसमें वे राम नहीं हैं जिनका
नाम लेकर हम भवसागर तर सकें या जिनका नाम हम दुःखके अवसर पर लिया
करें। मैं असह्य वेदनासे पीड़ित व्यक्तिसे कहता हूं कि 'राम नाम' लो'; अगर नींद
न आती हो तो भी कहता हूँ कि, 'रामनाम लो' । किन्तु ये राम तो दशरथके
कुँवर या सीताके पति राम नहीं हैं। ये तो देहधारी राम ही नहीं हैं। जो हमारे
हृदयमें बसते हैं वे राम देवारी हो ही नहीं सकते। अँगूठेके समान छोटा-सा तो
हमारा हृदय और उसमें भी समाये हुए राम देहधारी क्यों कर हो सकते हैं, या
किसी साल चैत्रकी नवमीको उनका जन्म हुआ ही नहीं होगा। वे तो अजन्मा हैं।
वे तो सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं, संसारके स्वामी हैं। इसलिए हम जिन रामका
स्मरण करना चाहते हैं और जिनका स्मरण करना चाहिए वे राम हमारी कल्पनाके
राम हैं, दूसरेकी कल्पनाके राम नहीं।
इतना याद रखें तो हमारे मनमें जो अनेक प्रश्न उठा करते हैं वे न उठें।
कितनी बार यह सवाल उठता है कि बालिका वध करनेवाले राम सम्पूर्ण पुरुष कैसे हो
सकते हैं? मेरे पास भी ऐसे अनेक प्रश्न आते हैं। इसलिए मैं मन ही मन हँसता हूँ ।
किसीने अगर छल से या सीधी रीतिसे किसीको मारा अथवा दस सिरवाले किसी
देहधारी रावणको भी मारा हो तो इसमें कौन-सा बड़ा काम कर लिया ? आजका
जमाना तो ऐसा है कि बीस क्या, असंख्य मुजाओंका भी कोई रावण पैदा हो तो एक
बालक तोपके एक ही गोलेसे उसके असंख्य हाथ और माथा उड़ा दे । उसे हम अलौकिक
बालक नहीं मानेंगे। उसे हम बड़ा राक्षस मानेंगे। मैं मानता हूँ कि हम राक्षसके
बड़े भाईके समान शक्ति पैदा करना नहीं चाहते। उसकी पूजा करनेसे हमें शान्ति
नहीं मिलेगी। हम पूजा करें तो उस अन्तर्यामीकी, जो सबके भीतर है और साथ ही
सबसे जुदा है और सबका स्वामी है। उन्हींके बारेमें हमने गाया कि 'निर्बलके बल
राम'। इसमें तो 'द्रुपद-सुता निर्बल भई' की बात आई है। अब द्रौपदी और देहधारी
रामका मेल कहाँ बैठेगा ? तो भी कविने गाया है कि द्रौपदीकी लाज रामने रखी।
इसमें तो वही राम हैं जो समीके हैं, तो भी जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता। हम
उसी रामका स्मरण करते हैं। इन अन्तर्यामी राम और कृष्णमें भेद नहीं है।
१. आश्रम में राम नवमीके दिन दिये प्रवचनका सारांश ।<noinclude></noinclude>
hmbyihk7k5yn0jqfs1zyznz6q32qizb
673306
673303
2026-08-23T13:22:07Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673306
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९०. मोक्षदाता राम<ref>आश्रम में राम नवमीके दिन दिये प्रवचनका सारांश।</ref>'''}}}}
हम जिन रामके गुण गाते हैं, वे राम वाल्मीकिके राम नहीं हैं, तुलसी 'रामायण' के राम भी नहीं है — हालाँकि तुलसीदासकी 'रामायण' मुझे अत्यन्त प्रिय है और उसे मैं अद्वितीय ग्रन्थ मानता हूँ, तथा एक बार पढ़ना शुरू करनेपर कभी उकताता नहीं; तो भी हम आज तुलसीदासके रामका स्मरण करनेवाले नहीं हैं और न गिरधरदास के रामका। तब फिर कालिदास और भवभूतिके रामका तो कहना ही क्या? भवभूतिके 'उत्तररामचरित' में बहुत सौन्दर्य है, किन्तु उसमें वे राम नहीं हैं जिनका नाम लेकर हम भवसागर तर सकें या जिनका नाम हम दुःखके अवसर पर लिया करें। मैं असह्य वेदनासे पीड़ित व्यक्तिसे कहता हूं कि 'राम नाम' लो'; अगर नींद न आती हो तो भी कहता हूँ कि, 'रामनाम लो'। किन्तु ये राम तो दशरथके कुँवर या सीताके पति राम नहीं हैं। ये तो देहधारी राम ही नहीं हैं। जो हमारे हृदयमें बसते हैं वे राम देवारी हो ही नहीं सकते। अँगूठेके समान छोटा–सा तो हमारा हृदय और उसमें भी समाये हुए राम देहधारी क्यों कर हो सकते हैं, या किसी साल चैत्रकी नवमीको उनका जन्म हुआ ही नहीं होगा। वे तो अजन्मा हैं। वे तो सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं, संसारके स्वामी हैं। इसलिए हम जिन रामका स्मरण करना चाहते हैं और जिनका स्मरण करना चाहिए वे राम हमारी कल्पनाके राम हैं, दूसरेकी कल्पनाके राम नहीं।
इतना याद रखें तो हमारे मनमें जो अनेक प्रश्न उठा करते हैं वे न उठें। कितनी बार यह सवाल उठता है कि बालिका वध करनेवाले राम सम्पूर्ण पुरुष कैसे हो सकते हैं? मेरे पास भी ऐसे अनेक प्रश्न आते हैं। इसलिए मैं मन ही मन हँसता हूँ। किसीने अगर छलसे या सीधी रीतिसे किसीको मारा अथवा दस सिरवाले किसी देहधारी रावणको भी मारा हो तो इसमें कौन–सा बड़ा काम कर लिया? आजका जमाना तो ऐसा है कि बीस क्या, असंख्य भुजाओंका भी कोई रावण पैदा हो तो एक बालक तोपके एक ही गोलेसे उसके असंख्य हाथ और माथा उड़ा दे। उसे हम अलौकिक बालक नहीं मानेंगे। उसे हम बड़ा राक्षस मानेंगे। मैं मानता हूँ कि हम राक्षसके बड़े भाईके समान शक्ति पैदा करना नहीं चाहते। उसकी पूजा करनेसे हमें शान्ति नहीं मिलेगी। हम पूजा करें तो उस अन्तर्यामीकी, जो सबके भीतर है और साथ ही सबसे जुदा है और सबका स्वामी है। उन्हींके बारेमें हमने गाया कि 'निर्बलके बल राम'। इसमें तो 'द्रुपद–सुता निर्बल भई' की बात आई है। अब द्रौपदी और देहधारी रामका मेल कहाँ बैठेगा? तो भी कविने गाया है कि द्रौपदीकी लाज रामने रखी। इसमें तो वही राम हैं जो सभीके हैं, तो भी जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता। हम उसी रामका स्मरण करते हैं। इन अन्तर्यामी राम और कृष्णमें भेद नहीं है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
lsbr3nimf3b4ov8muufbjpq3eftbq1v
673308
673306
2026-08-23T13:22:33Z
आदेश यादव
3609
673308
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९०. मोक्षदाता राम<ref>आश्रम में राम–नवमीके दिन दिये प्रवचनका सारांश।</ref>'''}}}}
हम जिन रामके गुण गाते हैं, वे राम वाल्मीकिके राम नहीं हैं, तुलसी 'रामायण' के राम भी नहीं है — हालाँकि तुलसीदासकी 'रामायण' मुझे अत्यन्त प्रिय है और उसे मैं अद्वितीय ग्रन्थ मानता हूँ, तथा एक बार पढ़ना शुरू करनेपर कभी उकताता नहीं; तो भी हम आज तुलसीदासके रामका स्मरण करनेवाले नहीं हैं और न गिरधरदास के रामका। तब फिर कालिदास और भवभूतिके रामका तो कहना ही क्या? भवभूतिके 'उत्तररामचरित' में बहुत सौन्दर्य है, किन्तु उसमें वे राम नहीं हैं जिनका नाम लेकर हम भवसागर तर सकें या जिनका नाम हम दुःखके अवसर पर लिया करें। मैं असह्य वेदनासे पीड़ित व्यक्तिसे कहता हूं कि 'राम नाम' लो'; अगर नींद न आती हो तो भी कहता हूँ कि, 'रामनाम लो'। किन्तु ये राम तो दशरथके कुँवर या सीताके पति राम नहीं हैं। ये तो देहधारी राम ही नहीं हैं। जो हमारे हृदयमें बसते हैं वे राम देवारी हो ही नहीं सकते। अँगूठेके समान छोटा–सा तो हमारा हृदय और उसमें भी समाये हुए राम देहधारी क्यों कर हो सकते हैं, या किसी साल चैत्रकी नवमीको उनका जन्म हुआ ही नहीं होगा। वे तो अजन्मा हैं। वे तो सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं, संसारके स्वामी हैं। इसलिए हम जिन रामका स्मरण करना चाहते हैं और जिनका स्मरण करना चाहिए वे राम हमारी कल्पनाके राम हैं, दूसरेकी कल्पनाके राम नहीं।
इतना याद रखें तो हमारे मनमें जो अनेक प्रश्न उठा करते हैं वे न उठें। कितनी बार यह सवाल उठता है कि बालिका वध करनेवाले राम सम्पूर्ण पुरुष कैसे हो सकते हैं? मेरे पास भी ऐसे अनेक प्रश्न आते हैं। इसलिए मैं मन ही मन हँसता हूँ। किसीने अगर छलसे या सीधी रीतिसे किसीको मारा अथवा दस सिरवाले किसी देहधारी रावणको भी मारा हो तो इसमें कौन–सा बड़ा काम कर लिया? आजका जमाना तो ऐसा है कि बीस क्या, असंख्य भुजाओंका भी कोई रावण पैदा हो तो एक बालक तोपके एक ही गोलेसे उसके असंख्य हाथ और माथा उड़ा दे। उसे हम अलौकिक बालक नहीं मानेंगे। उसे हम बड़ा राक्षस मानेंगे। मैं मानता हूँ कि हम राक्षसके बड़े भाईके समान शक्ति पैदा करना नहीं चाहते। उसकी पूजा करनेसे हमें शान्ति नहीं मिलेगी। हम पूजा करें तो उस अन्तर्यामीकी, जो सबके भीतर है और साथ ही सबसे जुदा है और सबका स्वामी है। उन्हींके बारेमें हमने गाया कि 'निर्बलके बल राम'। इसमें तो 'द्रुपद–सुता निर्बल भई' की बात आई है। अब द्रौपदी और देहधारी रामका मेल कहाँ बैठेगा? तो भी कविने गाया है कि द्रौपदीकी लाज रामने रखी। इसमें तो वही राम हैं जो सभीके हैं, तो भी जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता। हम उसी रामका स्मरण करते हैं। इन अन्तर्यामी राम और कृष्णमें भेद नहीं है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
3j0z8ji56ofx44nkta9j4ht117zb214
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२०९
250
187048
673309
645448
2026-08-23T13:24:10Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673309
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||मोक्षदाता राम|१७७}}</noinclude>
रामनवमीका पर्व इसीलिए मनाया गया कि इसके निमित्त हम कुछ संयमका
पालन करें, लड़के कुछ निर्दोष आनन्द लें और 'रामायण' पढ़कर कुछ सीखें। देहधारी
मनुष्य परमेश्वरको दूसरे तरीकेसे सहज ही नहीं पहचान सकता । उसकी कल्पना अधिक
दूर नहीं दौड़ सकती और इसलिए वह मानता है कि परमेश्वरने मनुष्यके रूपमें अवतार
लिया था । हिन्दू धर्ममें उदारताका पार नहीं है। इसलिए वर्णन किया है कि परमेश्वरने
मछली के रूप में वराहके रूपमें और नरसिंहके रूपमें अवतार लिया था। यों मनुष्यने
देहाध्यास से ईश्वरकी कल्पना देहधारीके रूपमें की है और जब तब उसके अवतार
लेनेकी कल्पना की है। कहा है कि जब धर्मका पतन हो और अधर्म फैल जाये तो
ईश्वर धर्मकी रक्षा करनेके लिए अवतार लेता है। यह बात भी उसी तरह और
उतनी ही हद तक सच्ची है, जितनी मैंने कही है। नहीं तो अजन्माका अवतार ही
कैसा ? यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कोई ऐतिहासिक पुरुष ईश्वर के रूप में
या ईश्वर किसी ऐतिहासिक पुरुषके रूपमें अवतार लेता है । ईश्वरके सभी गुण किसी
मनुष्य में हों तो यह माना जाता है कि ईश्वरने अवतार लिया। जो-जो महापुरुष
हो गये हैं, उनके गुण देखकर मनुष्योंने उन्हें पूर्ण अथवा अंशावतार माना । और यह
जानते हुए भी बाल्मीकिके या तुलसीदास के रामके निमित्तसे विभिन्न उपासक अपने
ही भगवान्की महिमा गाते हैं । उनके उस भावनासे पूर्ण भजनोंको गाने में कोई दोष नहीं
है । किन्तु मैंने जो बात पहले कही है आप उसे याद रखें तो भ्रमजालमें पड़नेका कोई
कारण न रहे । हमारे सामने अगर कोई शंकाएँ रखकर हमें उलझनमें डालना चाहे तो
उसे कहें कि हम किसी देहधारी रामकी पूजा नहीं करते हैं। हम तो अपने निरंजन,
निराकार रामको पूजते हैं। हम उसके पास सीधे नहीं पहुँच सकते, इसलिए जिनमें
ईश्वरकी मूर्तिमन्त कल्पना की गई है, उन भजनोंको गाते हैं।
जबतक हम देहकी दीवारके पार नहीं देख सकते, तबतक सत्य और अहिंसा के
गुण हममें पूरे-पूरे प्रकट होनेवाले नहीं हैं। जब सत्यके पालनका विचार करें तब
देहाध्यास छोड़ना ही चाहिए, क्योंकि सत्यके पालनके लिए मरना जरूरी होगा ।
अहिंसाकी भी यही बात है । देह तो अभिमानका मूल है। देहके बारेमें जिसका
मोह बना हुआ है, वह अभिमानसे मुक्त हो ही नहीं सकता। जबतक मेरे मन में यह
विचार है कि देह मेरी है, तबतक मैं सर्वथा हिंसामुक्त हो ही नहीं सकता हूँ ।
जिसकी अभिलाषा ईश्वरको देखनेकी है, उसे देहके पार जाना पड़ेगा, अपनी देहका
तिरस्कार करना पड़ेगा, मौतसे भेंट करनी पड़ेगी।
जब ये दो गुण मिलें तभी हम तर सकेंगे । ब्रह्मचर्यादिका पालन कर सकेंगे। अगर
उनका पालन करना चाहें तो सत्यके बिना कैसे चलेगा ? सत्यका मुख तो सुवर्णमय
पात्रसे' ढँका हुआ है । सत्य बोलने, सत्यके आचरण करनेका डर क्यों हो ? असत्यरूपी
चमकीला ढक्कन जबतक दूर न करें तबतक सत्यकी झाँकी क्योंकर होगी ? कोई
कसूर करे तो उस पर क्रोध करनेके बदले प्रेम करना क्या हमें रुचता है, हम संसारको
असार कहकर गाते हैं सही, मगर क्या उसे असार समझते भी हैं ?
१. ईशोपनिषद, ५-१५।<noinclude>{{smallrefs}}
३६-१२</noinclude>
cnm8340u1qbezhk9w8yknbczqu1b8r1
673314
673309
2026-08-23T13:32:21Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673314
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||मोक्षदाता राम|१७७}}</noinclude>
रामनवमीका पर्व इसीलिए मनाया गया कि इसके निमित्त हम कुछ संयमका पालन करें, लड़के कुछ निर्दोष आनन्द लें और 'रामायण' पढ़कर कुछ सीखें। देहधारी मनुष्य परमेश्वरको दूसरे तरीकेसे सहज ही नहीं पहचान सकता। उसकी कल्पना अधिक दूर नहीं दौड़ सकती और इसलिए वह मानता है कि परमेश्वरने मनुष्यके रूपमें अवतार लिया था। हिन्दू धर्ममें उदारताका पार नहीं है। इसलिए वर्णन किया है कि परमेश्वरने मछली के रूप में वराहके रूपमें और नरसिंहके रूपमें अवतार लिया था। यों मनुष्यने देहाध्याससे ईश्वरकी कल्पना देहधारीके रूपमें की है और जब तब उसके अवतार लेनेकी कल्पना की है। कहा है कि जब धर्मका पतन हो और अधर्म फैल जाये तो
ईश्वर धर्मकी रक्षा करनेके लिए अवतार लेता है। यह बात भी उसी तरह और उतनी ही हद तक सच्ची है, जितनी मैंने कही है। नहीं तो अजन्माका अवतार ही कैसा? यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कोई ऐतिहासिक पुरुष ईश्वरके रूपमें या ईश्वर किसी ऐतिहासिक पुरुषके रूपमें अवतार लेता है। ईश्वरके सभी गुण किसी मनुष्यमें हों तो यह माना जाता है कि ईश्वरने अवतार लिया। जो–जो महापुरुष हो गये हैं, उनके गुण देखकर मनुष्योंने उन्हें पूर्ण अथवा अंशावतार माना। और यह जानते हुए भी बाल्मीकिके या तुलसीदासके रामके निमित्तसे विभिन्न उपासक अपने ही भगवान्की महिमा गाते हैं। उनके उस भावनासे पूर्ण भजनोंको गाने में कोई दोष नहीं है। किन्तु मैंने जो बात पहले कही है आप उसे याद रखें तो भ्रमजालमें पड़नेका कोई कारण न रहे। हमारे सामने अगर कोई शंकाएँ रखकर हमें उलझनमें डालना चाहे तो उसे कहें कि हम किसी देहधारी रामकी पूजा नहीं करते हैं। हम तो अपने निरंजन, निराकार रामको पूजते हैं। हम उसके पास सीधे नहीं पहुँच सकते, इसलिए जिनमें ईश्वरकी मूर्तिमन्त कल्पना की गई है, उन भजनोंको गाते हैं।
जबतक हम देहकी दीवारके पार नहीं देख सकते, तबतक सत्य और अहिंसा के गुण हममें पूरे–पूरे प्रकट होनेवाले नहीं हैं। जब सत्यके पालनका विचार करें तब देहाध्यास छोड़ना ही चाहिए, क्योंकि सत्यके पालनके लिए मरना जरूरी होगा। अहिंसाकी भी यही बात है। देह तो अभिमानका मूल है। देहके बारेमें जिसका मोह बना हुआ है, वह अभिमानसे मुक्त हो ही नहीं सकता। जबतक मेरे मन में यह विचार है कि देह मेरी है, तबतक मैं सर्वथा हिंसामुक्त हो ही नहीं सकता हूँ। जिसकी अभिलाषा ईश्वरको देखनेकी है, उसे देहके पार जाना पड़ेगा, अपनी देहका तिरस्कार करना पड़ेगा, मौतसे भेंट करनी पड़ेगी।
जब ये दो गुण मिलें तभी हम तर सकेंगे। ब्रह्मचर्यादिका पालन कर सकेंगे। अगर उनका पालन करना चाहें तो सत्यके बिना कैसे चलेगा? सत्यका मुख तो सुवर्णमय पात्रसे<ref>ईशोपनिषद, ५-१५।</ref> ढँका हुआ है। सत्य बोलने, सत्यके आचरण करनेका डर क्यों हो? असत्यरूपी चमकीला ढक्कन जबतक दूर न करें तबतक सत्यकी झाँकी क्योंकर होगी? कोई कसूर करे तो उस पर क्रोध करनेके बदले प्रेम करना क्या हमें रुचता है, हम संसारको असार कहकर गाते हैं सही, मगर क्या उसे असार समझते भी हैं?<noinclude>{{smallrefs}}
३६-१२</noinclude>
po4km9b1vph1wlylwzntwhvz7usbsa2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१०
250
187049
673315
645449
2026-08-23T13:35:19Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित नहीं */
673315
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
राम तो कहते हैं कि मुझसे मिलना हो तो इस संसारसे भाग जा। मगर शरीरको भगानेसे भागा नहीं जाता। असारताकी वृत्ति पैदा करके चौबीस घंटे काम करते हुए
मी हम रामसे मिल सकते हैं । यही बात 'गीता' में सिखलाई गई है। 'गीता' को मैं
इसीलिए आध्यात्मिक शब्दकोष मानता हूँ । तुलसीदासने यही बात हमें सुन्दर काव्यके
रूपमें सिखलाई है।
किन्तु चाबी तो वही है जो मैंने बतलाई है यानी हमारी अपनी कल्पनाके ही
राम हमारे तारण हार हैं। मेरा राम मुझे तारेगा, आपको नहीं और आपका राम
आपको तारेगा, मुझे नहीं। हम सब तुलसीदासके समान सुन्दर काव्य नहीं लिख सकते
किन्तु जीवनमें ईश्वरको उतारकर उसे काव्यमय बना सकते हैं।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''', १-४-१९२८
{{c|{{larger|'''१९१. भाषण : विद्यार्थियों और अध्यापकोंका सभामें'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>
३१ मार्च, १९२८}}
विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए महात्माजीने अपने सुझावोंको कार्यान्वित कर
दिये जानेपर सन्तोष व्यक्त किया। उन्होंने इसपर अवश्य खेद व्यक्त किया कि
लड़कों को जितना स्वच्छ होना चाहिए उतने स्वच्छ वे नहीं हैं। उन्होंने कहा कि खद्दर
पहनने का अभिप्राय यह होना चाहिए कि वे शरीर और मन दोनोंसे स्वच्छ हैं ।
गांधीजीने भाषणको जारी रखते हुए कहा कि मिल-मालिक उदारतासे धन देकर
अपना सहायताका हाथ आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि में मिल-मालिकों से
सलाह कर रहा हूँ और उनसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि उन्होंने जो पैसा तिलक
स्वराज्य कोषके लिए जमा कर रखा है, उसे वे बिना किसी शर्तके और स्कूलोंके
प्रशासनमें किसी भी तरहका हस्तक्षेप किये बिना, बच्चोंके लाभके लिए दे दें। स्कूलों
का प्रशासन पूरी तरह से श्रम संघ पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। यदि वे कुछ भी
पैसा न दें तब भी ये स्कूल चलते रहेंगे ।
ईश्वर महान है और यदि आपका उसमें विश्वास है तो आपको पैसा किसी
दूसरे स्रोतसे मिल जायेगा परन्तु शर्त यह है कि आपके आदर्श सच्चे हों ।
गांधीजीने अध्यापकों से कहा -- आप शिक्षा देनेके लिए पुस्तकोंका प्रयोग बिलकुल
मत कीजिये । पुस्तकोंसे आँखें खराब हो जाती हैं, और दिमाग कुष्ठित हो जाता है।
१. अहमदाबाद श्रम-संघ द्वारा चलाये गये स्कूलोंक विद्यार्थियोंने सुबह कताई प्रदर्शन किया था। संघ-
सचिवने अपनी रिपोर्ट में कहा कि गांधीजीने जो कुछेक सुझाव दिये थे वे स्कूलोंमें कार्यान्वित कर दिये
गये हैं ।<noinclude></noinclude>
kyw7q5q3wbf5fzbiau1nivmlu5xxswl
673318
673315
2026-08-23T13:42:41Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673318
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
राम तो कहते हैं कि मुझसे मिलना हो तो इस संसारसे भाग जा। मगर शरीरको भगानेसे भागा नहीं जाता। असारताकी वृत्ति पैदा करके चौबीस घंटे काम करते हुए भी हम रामसे मिल सकते हैं। यही बात 'गीता' में सिखलाई गई है। 'गीता' को मैं इसीलिए आध्यात्मिक शब्दकोष मानता हूँ। तुलसीदासने यही बात हमें सुन्दर काव्यके रूपमें सिखलाई है।
किन्तु चाबी तो वही है जो मैंने बतलाई है यानी हमारी अपनी कल्पनाके ही राम हमारे तारण हार हैं। मेरा राम मुझे तारेगा, आपको नहीं और आपका राम आपको तारेगा, मुझे नहीं। हम सब तुलसीदासके समान सुन्दर काव्य नहीं लिख सकते किन्तु जीवनमें ईश्वरको उतारकर उसे काव्यमय बना सकते हैं।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''', १-४-१९२८
{{c|{{larger|'''१९१. भाषण : विद्यार्थियों और अध्यापकोंका सभामें<ref>अहमदाबाद श्रम–संघ द्वारा चलाये गये स्कूलोंके विद्यार्थियोंने सुबह कताई–प्रदर्शन किया था। संघ–सचिवने अपनी रिपोर्टमें कहा कि गांधीजीने जो कुछेक सुझाव दिये थे वे स्कूलोंमें कार्यान्वित कर दिये गये हैं।</ref>'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>
३१ मार्च, १९२८}}
विद्यार्थियोंको सम्बोधित करते हुए महात्माजीने अपने सुझावोंको कार्यान्वित कर दिये जानेपर सन्तोष व्यक्त किया। उन्होंने इसपर अवश्य खेद व्यक्त किया कि लड़कों को जितना स्वच्छ होना चाहिए उतने स्वच्छ वे नहीं हैं। उन्होंने कहा कि खद्दर पहनने का अभिप्राय यह होना चाहिए कि वे शरीर और मन दोनोंसे स्वच्छ हैं।
गांधीजीने भाषणको जारी रखते हुए कहा कि मिल–मालिक उदारतासे धन देकर अपना सहायताका हाथ आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि में मिल–मालिकोंसे सलाह कर रहा हूँ और उनसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि उन्होंने जो पैसा तिलक स्वराज्य कोषके लिए जमा कर रखा है, उसे वे बिना किसी शर्तके और स्कूलोंके प्रशासनमें किसी भी तरहका हस्तक्षेप किये बिना, बच्चोंके लाभके लिए दे दें। स्कूलों का प्रशासन पूरी तरहसे श्रम–संघ पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। यदि वे कुछ भी।पैसा न दें तब भी ये स्कूल चलते रहेंगे।
ईश्वर महान है और यदि आपका उसमें विश्वास है तो आपको पैसा किसी दूसरे स्रोतसे मिल जायेगा परन्तु शर्त यह है कि आपके आदर्श सच्चे हों।
गांधीजीने अध्यापकोंसे कहा — आप शिक्षा देनेके लिए पुस्तकोंका प्रयोग बिलकुल मत कीजिये। पुस्तकोंसे आँखें खराब हो जाती हैं, और दिमाग कुष्ठित हो जाता है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
67sqapcs2m42olgxoa242n840tyw0i5
673652
673318
2026-08-24T11:20:57Z
आदेश यादव
3609
673652
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
राम तो कहते हैं कि मुझसे मिलना हो तो इस संसारसे भाग जा। मगर शरीरको भगानेसे भागा नहीं जाता। असारताकी वृत्ति पैदा करके चौबीस घंटे काम करते हुए भी हम रामसे मिल सकते हैं। यही बात 'गीता' में सिखलाई गई है। 'गीता' को मैं इसीलिए आध्यात्मिक शब्दकोष मानता हूँ। तुलसीदासने यही बात हमें सुन्दर काव्यके रूपमें सिखलाई है।
किन्तु चाबी तो वही है जो मैंने बतलाई है यानी हमारी अपनी कल्पनाके ही राम हमारे तारण हार हैं। मेरा राम मुझे तारेगा, आपको नहीं और आपका राम आपको तारेगा, मुझे नहीं। हम सब तुलसीदासके समान सुन्दर काव्य नहीं लिख सकते किन्तु जीवनमें ईश्वरको उतारकर उसे काव्यमय बना सकते हैं।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''', १-४-१९२८
{{c|{{larger|'''१९१. भाषण : विद्यार्थियों और अध्यापकोंका सभामें<ref>अहमदाबाद श्रम–संघ द्वारा चलाये गये स्कूलोंके विद्यार्थियोंने सुबह कताई–प्रदर्शन किया था। संघ–सचिवने अपनी रिपोर्टमें कहा कि गांधीजीने जो कुछेक सुझाव दिये थे वे स्कूलोंमें कार्यान्वित कर दिये गये हैं।</ref>'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>
३१ मार्च, १९२८}}
'''विद्यार्थियोंको सम्बोधित करते हुए महात्माजीने अपने सुझावोंको कार्यान्वित कर दिये जानेपर सन्तोष व्यक्त किया। उन्होंने इसपर अवश्य खेद व्यक्त किया कि लड़कों को जितना स्वच्छ होना चाहिए उतने स्वच्छ वे नहीं हैं। उन्होंने कहा कि खद्दर पहनने का अभिप्राय यह होना चाहिए कि वे शरीर और मन दोनोंसे स्वच्छ हैं।'''
'''गांधीजीने भाषणको जारी रखते हुए कहा कि मिल–मालिक उदारतासे धन देकर अपना सहायताका हाथ आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि में मिल–मालिकोंसे सलाह कर रहा हूँ और उनसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि उन्होंने जो पैसा तिलक स्वराज्य कोषके लिए जमा कर रखा है, उसे वे बिना किसी शर्तके और स्कूलोंके प्रशासनमें किसी भी तरहका हस्तक्षेप किये बिना, बच्चोंके लाभके लिए दे दें। स्कूलों का प्रशासन पूरी तरहसे श्रम–संघ पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। यदि वे कुछ भी पैसा न दें तब भी ये स्कूल चलते रहेंगे।'''
'''ईश्वर महान है और यदि आपका उसमें विश्वास है तो आपको पैसा किसी दूसरे स्रोतसे मिल जायेगा परन्तु शर्त यह है कि आपके आदर्श सच्चे हों।'''
'''गांधीजीने अध्यापकोंसे कहा — आप शिक्षा देनेके लिए पुस्तकोंका प्रयोग बिलकुल मत कीजिये। पुस्तकोंसे आँखें खराब हो जाती हैं, और दिमाग कुष्ठित हो जाता है।'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
koorleqlywu860ecurjtk204gmzg3dv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२११
250
187050
673654
645450
2026-08-24T11:23:47Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673654
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको|१७९}}</noinclude>
मेरा अपना अनुभव ऐसा है। मुझे पता लगा है कि रूसमें किसानोंके लिए ऐसे
एक हजार स्कूल चलाये जा रहे हैं जहाँ ज्ञानेन्द्रियोंका यथा सम्भव सभी विभिन्न
साधनों का प्रयोग करके पुस्तकोंकी सहायता के बिना शिक्षा दी जाती है। उन्होंने
अध्यापकों से कहा कि आप अपने घरों और गलियोंकी सफाई स्वयं करें और इसके
लिए दूसरों पर निर्भर न रहें।
भाषण समाप्त करते हुए महात्माजीने उनसे कहा कि अपने स्कूलोंको आप हर
तरहसे आदर्श बनायें, जिससे कि मिल-मालिकोंके लड़के, लड़कियाँ उनसे स्पर्द्धा करने
लगे और मिल मालिक अपने बच्चोंको श्रमिक-स्कूलोंमें भेजना चाहें। शिक्षाको नींव
सत्यपर आधारित है और आपको सदैव सत्यका ही सहारा लेना चाहिए।
:[अंग्रेजीसे]
:'''हिन्दू''', ३१-३-१९२८
'''१९२. पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको'''
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र}}
काफी समयसे मैं आपको एक-आध पंक्ति लिखना चाहता रहा हूँ । मुझे बताया
गया था कि मैं मद्रासमें आपसे मिलनेकी उम्मीद कर सकता था। परन्तु वैसा नहीं
होना था।
क्या आप कृपा करके मुझे बतायेंगे कि आपने विदेशी वस्त्र बहिष्कार के बजाय
अंग्रेजी वस्तुओंके और मुख्य रूपसे अंग्रेजी वस्त्रके बहिष्कारका नारा क्यों अधिक
पसन्द किया है और यह अंग्रेजी वस्त्र बहिष्कारकी बात भी सिर्फ समझौता न होने
तक ही क्यों?
आशा है कि आप की सेहत फिर पहले जैसी हो गई होगी।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१४३) की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
bbbd1xy11tp1fcexitrqy7g0okou1v0
673656
673654
2026-08-24T11:28:01Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673656
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको|१७९}}</noinclude>
'''मेरा अपना अनुभव ऐसा है। मुझे पता लगा है कि रूसमें किसानोंके लिए ऐसे एक हजार स्कूल चलाये जा रहे हैं जहाँ ज्ञानेन्द्रियोंका यथा सम्भव सभी विभिन्न साधनों का प्रयोग करके पुस्तकोंकी सहायता के बिना शिक्षा दी जाती है। उन्होंने अध्यापकों से कहा कि आप अपने घरों और गलियोंकी सफाई स्वयं करें और इसके लिए दूसरों पर निर्भर न रहें।'''
'''भाषण समाप्त करते हुए महात्माजीने उनसे कहा कि अपने स्कूलोंको आप हर तरहसे आदर्श बनायें, जिससे कि मिल–मालिकोंके लड़के, लड़कियाँ उनसे स्पर्द्धा करने लगे और मिल मालिक अपने बच्चोंको श्रमिक–स्कूलोंमें भेजना चाहें। शिक्षाकी नींव सत्यपर आधारित है और आपको सदैव सत्यका ही सहारा लेना चाहिए।'''
:[अंग्रेजीसे]
:'''हिन्दू''', ३१-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१९२. पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र}}
काफी समयसे मैं आपको एक–आध पंक्ति लिखना चाहता रहा हूँ। मुझे बताया गया था कि मैं मद्रासमें आपसे मिलनेकी उम्मीद कर सकता था। परन्तु वैसा नहीं होना था।
क्या आप कृपा करके मुझे बतायेंगे कि आपने विदेशी वस्त्र बहिष्कार के बजाय अंग्रेजी वस्तुओंके और मुख्य रूपसे अंग्रेजी वस्त्रके बहिष्कारका नारा क्यों अधिक पसन्द किया है और यह अंग्रेजी वस्त्र बहिष्कारकी बात भी सिर्फ समझौता न होने तक ही क्यों?
आशा है कि आप की सेहत फिर पहले जैसी हो गई होगी।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१४३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
gfrkfzax02j9a10e12u7r5e9dxnc089
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१२
250
187051
673658
645451
2026-08-24T11:29:43Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673658
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१९३. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आपका पत्र मिला । वे शर्तें जो मेरी समझ में मिल मालिकोंको मान लेनी चाहिए,
निम्नलिखित हैं :
(१) कीमतोंका नियमन सब हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली विशेष समिति
द्वारा किया जाना चाहिए।
(२) किस किस्मका और कितना उत्पादन हो, इसकी व्यवस्था भी उसी
समिति द्वारा की जानी चाहिए।
(३) मिलें खादीके नामपर बना कोई भी मिलका कपड़ा बेचना बन्द कर दें ।
वे शर्तोंके स्वीकार करनेकी तारीखसे ज्यादासे ज्यादा तीन महीनोंके अन्दर ऐसा कोई
भी कपड़ा बनाना भी बन्द कर दें जो खादीसे मुकाबला कर सके और इस उद्देश्यसे
समिति समय-समयपर यह निश्चय करती रहेगी कि मिलोंको कैसा कपड़ा नहीं
बनाना चाहिए।
(४) मिलें केवल मिल-कपड़े विक्रय ही का प्रबन्ध नहीं करेंगी परन्तु वे इस
प्रकारसे चलाई गई एजेंसियों द्वारा खादी भी बेचेंगी ।
(५) मिलें विदेशी सूत, विदेशी रेशम, विदेशी ऊन और नकली रेशम इस्तेमाल
नहीं करेंगी ।
(६) मिलें विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलनसे पूरी तरह एकात्मता स्थापित
कर लेंगी और इस उद्देश्यके लिए कपड़ा व्यापारियों, दूसरे दलालों और रूईके बाजार
पर जहाँतक हो सकेगा अधिकार प्राप्त करनेमें अपनी पूरी शक्ति लगायेंगी ।
(७) यदि मिलोंके साथ स्पष्ट समझौता हो जाये तो खादी भण्डार स्वाभाविक
रूपसे, उक्त समिति द्वारा नियत शर्तोंके आधार पर मिल कपड़ेकी विक्रीकी एजेंसियाँ
बन जायेंगे ।
(८) मिलें उस समितिको वह निधि सौंप दें, जिसकी समय-समय पर प्रचारके
लिए आवश्यकता पड़ती रहेगी। मेरे विचारमें यह रकम एक लाख रुपयेसे ज्यादा
नहीं होनी चाहिए ।
यह पत्र जल्दी में लिखवाया जा रहा है। इसलिए यदि इन शर्तोंमें कोई कमी
रह गई हो तो उसे आप कृपया 'यंग इंडिया' के दो अंकोंमें' बताई गई शर्तोंसे पूरा
१. देखिए “हमारी मिले क्या कर सकती है ?" १५-३-१९२८ और “विदेशी वस्त्र बहिष्कार :
कुछ प्रश्न", २२-३-१९२८ ।<noinclude></noinclude>
avcpjmmsxkzbb7yjc13w544zxxotyg1
673659
673658
2026-08-24T11:35:42Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673659
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९३. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आपका पत्र मिला। वे शर्तें जो मेरी समझमें मिल–मालिकोंको मान लेनी चाहिए, निम्नलिखित हैं :
(१) कीमतोंका नियमन सब हितोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली विशेष समिति द्वारा किया जाना चाहिए।
(२) किस किस्मका और कितना उत्पादन हो, इसकी व्यवस्था भी उसी समिति द्वारा की जानी चाहिए।
(३) मिलें खादीके नामपर बना कोई भी मिलका कपड़ा बेचना बन्द कर दें। वे शर्तोंके स्वीकार करनेकी तारीखसे ज्यादासे ज्यादा तीन महीनोंके अन्दर ऐसा कोई भी कपड़ा बनाना भी बन्द कर दें जो खादीसे मुकाबला कर सके और इस उद्देश्यसे समिति समय–समयपर यह निश्चय करती रहेगी कि मिलोंको कैसा कपड़ा नहीं बनाना चाहिए।
(४) मिलें केवल मिल–कपड़े विक्रय ही का प्रबन्ध नहीं करेंगी परन्तु वे इस प्रकारसे चलाई गई एजेंसियों द्वारा खादी भी बेचेंगी।
(५) मिलें विदेशी सूत, विदेशी रेशम, विदेशी ऊन और नकली रेशम इस्तेमाल नहीं करेंगी।
(६) मिलें विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलनसे पूरी तरह एकात्मता स्थापित कर लेंगी और इस उद्देश्यके लिए कपड़ा व्यापारियों, दूसरे दलालों और रूईके बाजार पर जहाँतक हो सकेगा अधिकार प्राप्त करनेमें अपनी पूरी शक्ति लगायेंगी।
(७) यदि मिलोंके साथ स्पष्ट समझौता हो जाये तो खादी भण्डार स्वाभाविक रूपसे, उक्त समिति द्वारा नियत शर्तोंके आधार पर मिल कपड़ेकी विक्रीकी एजेंसियाँ बन जायेंगे।
(८) मिलें उस समितिको वह निधि सौंप दें, जिसकी समय–समय पर प्रचारके लिए आवश्यकता पड़ती रहेगी। मेरे विचारमें यह रकम एक लाख रुपयेसे ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
यह पत्र जल्दीमें लिखवाया जा रहा है। इसलिए यदि इन शर्तोंमें कोई कमी रह गई हो तो उसे आप कृपया 'यंग इंडिया' के दो अंकोंमें<ref>देखिए "हमारी मिले क्या कर सकती है?" १५-३-१९२८ और "विदेशी–वस्त्र बहिष्कार :
कुछ प्रश्न", २२-३-१९२८।</ref> बताई गई शर्तोंसे पूरा<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
1snoditprp8r8lk94rp0wv69tl0l56s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१३
250
187052
673661
645452
2026-08-24T11:38:59Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673661
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : राय हरेन्द्रनाथको|१८१}}</noinclude>
कर लेंगे। आप इस पत्रको किसी भी हालत में प्रकाशित न करें और कृपया ध्यान
रखें कि ये मेरे निजी विचार हैं और यदि इस बातचीतसे कुछ ठोस परिणाम निकलना
है, तो सभी सम्बन्धित लोगोंकी औपचारिक सभा बुलवानी होगी।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''मो० क० गांधी'''}}
{{left|श्रीयुत शान्तिकुमार<br>
बम्बई}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४७८७) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{c|{{larger|'''१९४. पत्र : राय हरेन्द्रनाथको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
आपका कृपापूर्ण तार मिला। मुझे अत्यन्त खेद है कि मैं सम्मेलनमें उपस्थित नहीं
हो सकूंगा । बहरहाल मैं आपके लिए सब तरहसे सफलताकी कामना करता हूँ और
आशा करता हूँ कि सम्मेलन लाखों मूक लोगोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले खद्दरको
नहीं भूलेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत राय हरेन्द्रनाथ<br>
अध्यक्ष स्वागत समिति<br>
बंगाल प्रान्तीय परिषद<br>
चान्द्री, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१४२) की माइक्रोफिल्मसे ।<noinclude></noinclude>
0tdprcp6n7rsp6vy19mubtr9j5g86g0
673662
673661
2026-08-24T11:41:35Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673662
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : राय हरेन्द्रनाथको|१८१}}</noinclude>
कर लेंगे। आप इस पत्रको किसी भी हालतमें प्रकाशित न करें और कृपया ध्यान रखें कि ये मेरे निजी विचार हैं और यदि इस बातचीतसे कुछ ठोस परिणाम निकलना है, तो सभी सम्बन्धित लोगोंकी औपचारिक सभा बुलवानी होगी।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{left|श्रीयुत शान्तिकुमार<br>
बम्बई}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८७) की फोटो–नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{c|{{larger|'''१९४. पत्र : राय हरेन्द्रनाथको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
आपका कृपापूर्ण तार मिला। मुझे अत्यन्त खेद है कि मैं सम्मेलनमें उपस्थित नहीं हो सकूंगा। बहरहाल मैं आपके लिए सब तरहसे सफलताकी कामना करता हूँ और आशा करता हूँ कि सम्मेलन लाखों मूक लोगोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले खद्दरको नहीं भूलेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत राय हरेन्द्रनाथ<br>
अध्यक्ष स्वागत समिति<br>
बंगाल प्रान्तीय परिषद<br>
चान्द्री, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१४२) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
q6p29zqdm8grumqhaoersag3c6h5dcr
673663
673662
2026-08-24T11:42:10Z
आदेश यादव
3609
673663
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : राय हरेन्द्रनाथको|१८१}}</noinclude>
कर लेंगे। आप इस पत्रको किसी भी हालतमें प्रकाशित न करें और कृपया ध्यान रखें कि ये मेरे निजी विचार हैं और यदि इस बातचीतसे कुछ ठोस परिणाम निकलना है, तो सभी सम्बन्धित लोगोंकी औपचारिक सभा बुलवानी होगी।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{left|श्रीयुत शान्तिकुमार<br>
बम्बई}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८७) की फोटो–नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{c|{{larger|'''१९४. पत्र : राय हरेन्द्रनाथको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय महोदय,}}
आपका कृपापूर्ण तार मिला। मुझे अत्यन्त खेद है कि मैं सम्मेलनमें उपस्थित नहीं हो सकूॅंगा। बहरहाल मैं आपके लिए सब तरहसे सफलताकी कामना करता हूँ और आशा करता हूँ कि सम्मेलन लाखों मूक लोगोंका प्रतिनिधित्व करनेवाले खद्दरको नहीं भूलेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत राय हरेन्द्रनाथ<br>
अध्यक्ष स्वागत समिति<br>
बंगाल प्रान्तीय परिषद<br>
चान्द्री, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१४२) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
tiylcblpjspj9e1111rga63c8gnuqzn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१४
250
187053
673664
645453
2026-08-24T11:43:58Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673664
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९५. सत्याग्रहियो सावधान!'''}}}}
जब हंटर कमेटीके एक सदस्यने जनरल डायरसे जलियाँवाला बागके कत्लके बारेमें
प्रश्न पूछा
क्या तुम्हारा विचार नादिरशाही चलाकर लोगोंके मनमें सरकारका रोब
जमाना, भय पैदा करना था ? " तब जनरल डायरने इस बातको उत्साहपूर्वक स्वीकार
करते हुए कहा,
"हाँ" किन्तु नादिरशाहीका आरम्भ कोई जनरल डायरसे शुरू
नहीं हुआ था । यह तो भारतीय नौकरशाहीको परम्परासे प्राप्त है और इसपर उसका
एकाधिकार है । लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस नादिरशाहीने चूंकि जनरल
डायरको विख्यात कर दिया है, इसलिए हम उसे डायरशाही के नामसे भी जानने लगे
हैं। डायरशाही नीतिके ऊपर ही नौकरशाहीका अस्तित्व निर्भर है। इसलिए अवसर
आनेपर उसका आश्रय लेनेसे वह नहीं चूकती । उसके लेखे बारडोली में ऐसा ही अवसर
उपस्थित है। इसलिए डरपोक या कायर माने जानेवाले बनिया सत्याग्रहियों पर
नादिरशाही की आजमाइश शुरू कर दी गई है। इस प्रकार आठ बनिया सत्याग्रहियों के
पास यह नोटिस पहुँचा है कि यदि वे १२ अप्रैलसे पूर्व नोटिस में बताई गई जमीनका
लगान अदा नहीं करेंगे तो वह सारी जमीन जब्त कर ली जायेगी। एक बनिया
सज्जनके नोटिस में जमीनका लगान १६० रुपये बताया गया है। यदि सरकार १६०
रुपयेकी कीमतकी जमीन ही जब्त करती तो कदाचित उसका ज्यादा दोष न माना
जाता । परन्तु १६० रुपयेके लिए हजारों रुपयोंकी जमीन जब्त कर लेना तो नादिर-
शाही ही है। इस राज्यकी नीतिमें कई बार तमाचेका उत्तर तमाचेसे नहीं वरन्
फाँसीसे दिया जाता है। एक रुपयेका लेनदार एक हजार रुपये ले ले तो उसे जालिम
या दस सिरवाला रावण ही कहेंगे ।
अग्रिम बुद्धि माने जानेवाले वैश्य इसका क्या जवाब देंगे ? अपनी भीरुता सिद्ध
करके दिखायेंगे या सत्याग्रही सेनामें सम्मिलित होनेकी अपनी योग्यता ?
वल्लभभाईने एक बार नहीं अनेक बार यह चेतावनी दी है कि सरकार कायदा
बनाकर जमीन जब्त करने और जेल भेजनेके अधिकार प्राप्त कर चुकी है। और
उसने अनेक बार यह सिद्ध भी कर दिया है कि वह अपने इन अधिकारों पर अमल
करते हुए तनिक भी संकोच नहीं करेगी। इसलिए जब्तीके इस नोटिससे वे और दूसरे
व्यक्ति भयभीत न हों। वे विश्वास रखें कि इस प्रकार जब्त की गई जमीन सरकारको
नहीं पचेगी और उस जमीनको नीलामी में खरीदनेवाला कोई देशद्रोही निकल भी
पड़ा तो वह उसको भी नहीं पचेगी। इस प्रकार लूटी हुई जमीन कच्चे पारेके
समान है; वह फुटकर निकल ही जायेगी ।
जमीन अपने वचन और अपनी प्रतिष्ठासे बढ़कर कदापि नहीं है । ऐसे असंख्य
मनुष्य देशमें हैं जिनके पास जमीन नहीं है। कई जमीनवालोंकी भूमि पिछली बाढ़ में
डूब गई थी और अब उसके ऊपर रेत जमी पड़ी है। गुजरातियोंने जिस प्रकार इस
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
k119y96vnlcpzli5z6jt1cxujnrs2sk
673665
673664
2026-08-24T11:51:04Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673665
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९५. सत्याग्रहियो सावधान!'''}}}}
जब हंटर कमेटीके एक सदस्यने जनरल डायरसे जलियाँवाला बागके कत्लके बारेमें प्रश्न पूछा "क्या तुम्हारा विचार नादिरशाही चलाकर लोगोंके मनमें सरकारका रोब जमाना, भय पैदा करना था?" तब जनरल डायरने इस बातको उत्साहपूर्वक स्वीकार करते हुए कहा, "हाँ" किन्तु नादिरशाहीका आरम्भ कोई जनरल डायरसे शुरू नहीं हुआ था। यह तो भारतीय नौकरशाहीको परम्परासे प्राप्त है और इसपर उसका एकाधिकार है। लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस नादिरशाहीने चूंकि जनरल डायरको विख्यात कर दिया है, इसलिए हम उसे डायरशाहीके नामसे भी जानने लगे हैं। डायरशाही नीतिके ऊपर ही नौकरशाहीका अस्तित्व निर्भर है। इसलिए अवसर आनेपर उसका आश्रय लेनेसे वह नहीं चूकती। उसके लेखे बारडोलीमें ऐसा ही अवसर उपस्थित है। इसलिए डरपोक या कायर माने जानेवाले बनिया सत्याग्रहियों पर नादिरशाही की आजमाइश शुरू कर दी गई है। इस प्रकार आठ बनिया सत्याग्रहियों के पास यह नोटिस पहुँचा है कि यदि वे १२ अप्रैलसे पूर्व नोटिसमें बताई गई जमीनका लगान अदा नहीं करेंगे तो वह सारी जमीन जब्त कर ली जायेगी। एक बनिया सज्जनके नोटिसमें जमीनका लगान १६० रुपये बताया गया है। यदि सरकार १६० रुपयेकी कीमतकी जमीन ही जब्त करती तो कदाचित उसका ज्यादा दोष न माना जाता। परन्तु १६० रुपयेके लिए हजारों रुपयोंकी जमीन जब्त कर लेना तो नादिरशाही ही है। इस राज्यकी नीतिमें कई बार तमाचेका उत्तर तमाचेसे नहीं वरन् फाँसीसे दिया जाता है। एक रुपयेका लेनदार एक हजार रुपये ले ले तो उसे जालिम या दस सिरवाला रावण ही कहेंगे।
अग्रिम बुद्धि माने जानेवाले वैश्य इसका क्या जवाब देंगे? अपनी भीरुता सिद्ध करके दिखायेंगे या सत्याग्रही सेनामें सम्मिलित होनेकी अपनी योग्यता?
वल्लभभाईने एक बार नहीं अनेक बार यह चेतावनी दी है कि सरकार कायदा बनाकर जमीन जब्त करने और जेल भेजनेके अधिकार प्राप्त कर चुकी है। और उसने अनेक बार यह सिद्ध भी कर दिया है कि वह अपने इन अधिकारों पर अमल करते हुए तनिक भी संकोच नहीं करेगी। इसलिए जब्तीके इस नोटिससे वे और दूसरे व्यक्ति भयभीत न हों। वे विश्वास रखें कि इस प्रकार जब्त की गई जमीन सरकारको नहीं पचेगी और उस जमीनको नीलामी में खरीदनेवाला कोई देशद्रोही निकल भी पड़ा तो वह उसको भी नहीं पचेगी। इस प्रकार लूटी हुई जमीन कच्चे पारेके समान है; वह फुटकर निकल ही जायेगी।
जमीन अपने वचन और अपनी प्रतिष्ठासे बढ़कर कदापि नहीं है। ऐसे असंख्य मनुष्य देशमें हैं जिनके पास जमीन नहीं है। कई जमीनवालोंकी भूमि पिछली बाढ़में डूब गई थी और अब उसके ऊपर रेत जमी पड़ी है। गुजरातियोंने जिस प्रकार इस<noinclude></noinclude>
4gtra7l813vddtuxkx6jfrs1sscc17e
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२१५
250
187054
673666
645454
2026-08-24T11:52:29Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
673666
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||राष्ट्रीय सप्ताह|१८३}}</noinclude>
आसमानी प्रकोपका धीरज और वीरतापूर्वक सामना किया वैसे ही बारडोली के सत्याग्रही
इस सुल्तानी बाढ़का सामना करते हुए अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें।
[गुजरातीसे]
नवजीवन, १-४-१९२८
{{c|{{larger|'''१९६. राष्ट्रीय सप्ताह'''}}}}
आगामी राष्ट्रीय सप्ताह नौवाँ राष्ट्रीय सप्ताह है। इस सप्ताह में लोगोंकी
उत्तरोत्तर प्रगतिका हिसाब लगाया जाना चाहिए। किन्तु इसमें हमें कई जगहों पर
निराशा ही दिख रही है । यह सप्ताह हमारे लिये राष्ट्रीय तलपट निकालनेका, आत्म-
निरीक्षण करनेका, आत्मशुद्धि करनेका, हिन्दुओं, मुसलमानों और पारसियों आदिका
हृदय एक करनेका, हिन्दुओंके लिए अस्पृश्य माने जानेवाले भाइयों और बहनोंसे भेंट
करने और उनकी सेवा करनेका और हिन्दुओं, मुसलमानोंके लिए खादीधारी बनकर
विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेका है ।
किन्तु ऐसा लगता है कि हम राष्ट्रके इन पोषक अंगोंको अब भूल गये हैं ।
भिन्न-भिन्न विषयोंमें जिन लोगोंकी श्रद्धा है उनके सम्बन्धमें वे तो प्रयत्न कर ही रहे
हैं । किन्तु इन कार्योंको अब व्यापक रूप नहीं दिया जाता। पहले सबके मुँहपर यह
बातें रहती थीं कि इन कार्योंके किये बिना स्वराज्य नहीं मिल सकता, किन्तु आज
हमें वैसी बात सुनाई नहीं देती।
राष्ट्रीय सप्ताह में इस स्थितिको बदलनेका प्रयत्न किया जाना चाहिए। ऐसा
प्रयत्न सब लोग और सभी राष्ट्रीय संस्थाएँ चाहे न भी करें, फिर भी इन रचनात्मक
कार्यों में जिनकी अविचल श्रद्धा है वे तो अपनी ओरसे महान् उद्योग अवश्य करें ।
ऐसे प्रयत्नोंसे ही एक व्यापक प्रवृत्ति उत्पन्न होगी और अवश्य उत्पन्न होगी, इस
सम्बन्ध में कोई भी शंका न करें ।
खादीका कार्य बालकों, स्त्रियों और पुरुषों, हिन्दुओं और मुसलमानों सभी के
करने योग्य कार्य है । यह वे अपनी आँखोंसे देख सकते हैं । बहिष्कारकी चर्चा चारों
ओर चल रही है। किन्तु ऐसा जान पड़ता है कि हम बहिष्कारके सम्बन्ध में अभी
भ्रममें पड़े हैं। कोई कहता है अंग्रेजी मालका बहिष्कार करो, कोई कहता है सिर्फ
अंग्रेजी कपड़ेका बहिष्कार करो और वह भी समझौता होने तक ही, कोई कहता
है कि हर तरहके विदेशी कपड़ोंका बहिष्कार करो। ये सभी कार्य ऐसे हैं जो साथ-
साथ नहीं किये जा सकते। पहले दो कार्योंकी बीस साल तक पुकार हुई । तब सन्
१९२० में लोगोंने लम्बे विचारके बाद यह देखा कि एक ही बहिष्कार सम्भव और
कर्तव्य है. - वह है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और वह भी खादीकी मार्फत । फिर
इस विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी कल्पनाके मूलमें कोई शर्त नहीं है, बल्कि वह सदाके
लिए है । और जो कार्य सदाके लिए हो वह कम होनेपर भी लाभदायक ही होता
है । जिस कार्यके लिए जो शर्त होती है उसके उचित मात्रामें पूरे होनेपर ही फल
Gandhi Heritage Portall<noinclude></noinclude>
fdq40vsezi0bstj8sexyqvfaxucn3z9
673667
673666
2026-08-24T11:57:48Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
673667
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||राष्ट्रीय सप्ताह|१८३}}</noinclude>
आसमानी प्रकोपका धीरज और वीरतापूर्वक सामना किया वैसे ही बारडोलीके सत्याग्रही इस सुल्तानी बाढ़का सामना करते हुए अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें।
:[गुजरातीसे]
:'''नवजीवन''', १-४-१९२८
{{c|{{larger|'''१९६. राष्ट्रीय सप्ताह'''}}}}
आगामी राष्ट्रीय सप्ताह नौवाँ राष्ट्रीय सप्ताह है। इस सप्ताहमें लोगोंकी उत्तरोत्तर प्रगतिका हिसाब लगाया जाना चाहिए। किन्तु इसमें हमें कई जगहों पर निराशा ही दिख रही है। यह सप्ताह हमारे लिये राष्ट्रीय तलपट निकालनेका, आत्मनिरीक्षण करनेका, आत्मशुद्धि करनेका, हिन्दुओं, मुसलमानों और पारसियों आदिका हृदय एक करनेका, हिन्दुओंके लिए अस्पृश्य माने जानेवाले भाइयों और बहनोंसे भेंट करने और उनकी सेवा करनेका और हिन्दुओं, मुसलमानोंके लिए खादीधारी बनकर
विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेका है।
किन्तु ऐसा लगता है कि हम राष्ट्रके इन पोषक अंगोंको अब भूल गये हैं। भिन्न–भिन्न विषयोंमें जिन लोगोंकी श्रद्धा है उनके सम्बन्धमें वे तो प्रयत्न कर ही रहे हैं। किन्तु इन कार्योंको अब व्यापक रूप नहीं दिया जाता। पहले सबके मुँहपर यह बातें रहती थीं कि इन कार्योंके किये बिना स्वराज्य नहीं मिल सकता, किन्तु आज हमें वैसी बात सुनाई नहीं देती।
राष्ट्रीय सप्ताहमें इस स्थितिको बदलनेका प्रयत्न किया जाना चाहिए। ऐसा प्रयत्न सब लोग और सभी राष्ट्रीय संस्थाएँ चाहे न भी करें, फिर भी इन रचनात्मक कार्योंमें जिनकी अविचल श्रद्धा है वे तो अपनी ओरसे महान् उद्योग अवश्य करें। ऐसे प्रयत्नोंसे ही एक व्यापक प्रवृत्ति उत्पन्न होगी और अवश्य उत्पन्न होगी, इस सम्बन्ध में कोई भी शंका न करें।
खादीका कार्य बालकों, स्त्रियों और पुरुषों, हिन्दुओं और मुसलमानों सभीके करने योग्य कार्य है। यह वे अपनी आँखोंसे देख सकते हैं। बहिष्कारकी चर्चा चारों ओर चल रही है। किन्तु ऐसा जान पड़ता है कि हम बहिष्कारके सम्बन्धमें अभी भ्रममें पड़े हैं। कोई कहता है अंग्रेजी मालका बहिष्कार करो, कोई कहता है सिर्फ अंग्रेजी कपड़ेका बहिष्कार करो और वह भी समझौता होने तक ही, कोई कहता है कि हर तरहके विदेशी कपड़ोंका बहिष्कार करो। ये सभी कार्य ऐसे हैं जो साथ–साथ नहीं किये जा सकते। पहले दो कार्योंकी बीस साल तक पुकार हुई। तब सन् १९२० में लोगोंने लम्बे विचारके बाद यह देखा कि एक ही बहिष्कार सम्भव और कर्तव्य है — वह है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और वह भी खादीकी मार्फत। फिर इस विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी कल्पनाके मूलमें कोई शर्त नहीं है, बल्कि वह सदाके लिए है। और जो कार्य सदाके लिए हो वह कम होनेपर भी लाभदायक ही होता है। जिस कार्यके लिए जो शर्त होती है उसके उचित मात्रामें पूरे होनेपर ही फल<noinclude></noinclude>
pj237fou7e8wznyb4hmet981r9x5t46
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४२
250
187322
673564
645742
2026-08-24T06:46:20Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673564
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कायम है। अब यह हमपर निर्भर है कि हम जब चाहें आगे कदम उठायें। [लोगोंके मनसे] सरकारका भय तो सदाके लिए समाप्त हो गया है।
'''लोगोंकी सामान्य राय यही है कि आप कामरेड सकलातवालाको जरा ज्यादा ब्यौरेवार जवाब देते। क्या आप उन्हें इस बारेमें कुछ और जवाब देनेवाले हैं?'''
मेरी रायमें तो मैंने उन्हें उपयुक्त जवाब दे दिया है। मैं हर बातका विवेचन विस्तारसे नहीं कर सका। लेकिन अगर मेरा जवाब कहीं स्पष्ट न हो तो मैं सब भ्रम दूर करनेको तैयार हूँ।
'''आपने अपने जवाब में कहा है कि मजदूरोंका संगठन करनेके आपके अपने अलग तरीके हैं। क्या आप अपनी बात कुछ और स्पष्ट करेंगे?'''
हाँ, मैं मजदूरोंका संगठन उनके अपने प्रयत्नों द्वारा कराऊँगा। मैं उनमें पूँजीके प्रति असन्तोषकी भावना उतनी नहीं, जितनी कि स्वयं अपने प्रति असन्तोषकी
भावना भरना चाहूँगा। मैं चाहता हूँ कि पूंजी और श्रमके बीच सच्चा सहयोग हो। मैं मजदूरों को यकीन दिलाऊँगा कि बहुतसे मामलोंमें दोष पूँजीपतियोंका नहीं, उनका
अपना है। राजनैतिक आन्दोलनकी तरह मजदूरोंके आन्दोलनमें भी में आन्तरिक सुधार पर अर्थात् उनमें आत्मसन्तोषकी भावना भरनेपर विश्वास करता हूँ। इस तरहका सुधार मालिकोंको उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करनेके लिए बाध्य कर देगा। दक्षिण आफ्रिका और भारत दोनोंमें बराबर अपने अनुभवसे मैंने हमेशा इस सिद्धान्तपर अत्यधिक जोर दिया है कि मजदूरोंको आत्मबलका विकास करना चाहिए। तब पूंजी सचमुच श्रमकी दास बन जायेगी। जिस प्रकार मैं चाहता हूँ कि भारत और इंग्लैंड एक-दूसरे से सहयोग करें, उसी प्रकार में चाहता हूँ कि पूंजी और श्रम भी एक-दूसरेसे
सहयोग करें।
'''मुसलमानों द्वारा प्रस्तावित संयुक्त मतदानके सम्बन्धमें महात्मा गांधीने कहा कि संयुक्त मतदानका प्रस्ताव एक शुभ लक्षण है और अच्छा शकुन है। पर जबतक में
प्रश्नके सभी पहलुओं पर विचार न कर लूँ, तबतक अपनी राय विस्तारसे देनेका खतरा नहीं उठा सकता। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित अखिल भारतीय सम्मेलनमें इस मामलेका अन्तिम रूपसे फैसला हो जायेगा।'''
'''क्या निकट भविष्यमें आपका विदेश यात्राका कोई इरादा है?'''
इस समय तो मेरा कोई इरादा नहीं है।
'''चीन जानेका भी नहीं?'''
मैं अभी कुछ निश्चित रूपसे नहीं कह सकता पर इतना जानता हूँ कि इस साल में चीन नहीं जा रहा हूँ।
'''
क्या खादोके सन्देशका हरिद्वारके तीर्थयात्रियों और साधुओंपर कुछ प्रभाव पड़ा था?'''
इस सम्बन्धमें कुछ कहना बड़ा कठिन है। सच तो यह है कि पंडित मदनमोहन मालवीय खादी प्रचार कार्यमें इन साधुओं और तीर्थयात्रियोंकी सहानुभूति पानेका<noinclude></noinclude>
8xrpzzpwokp0ym2c4l0ieuv0818iodh
673565
673564
2026-08-24T06:47:49Z
रितु कुमारी साव
6333
673565
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कायम है। अब यह हमपर निर्भर है कि हम जब चाहें आगे कदम उठायें। [लोगोंके मनसे] सरकारका भय तो सदाके लिए समाप्त हो गया है।
'''लोगोंकी सामान्य राय यही है कि आप कामरेड सकलातवालाको जरा ज्यादा ब्यौरेवार जवाब देते। क्या आप उन्हें इस बारेमें कुछ और जवाब देनेवाले हैं?'''
मेरी रायमें तो मैंने उन्हें उपयुक्त जवाब दे दिया है। मैं हर बातका विवेचन विस्तारसे नहीं कर सका। लेकिन अगर मेरा जवाब कहीं स्पष्ट न हो तो मैं सब भ्रम दूर करनेको तैयार हूँ।
'''आपने अपने जवाब में कहा है कि मजदूरोंका संगठन करनेके आपके अपने अलग तरीके हैं। क्या आप अपनी बात कुछ और स्पष्ट करेंगे?'''
हाँ, मैं मजदूरोंका संगठन उनके अपने प्रयत्नों द्वारा कराऊँगा। मैं उनमें पूँजीके प्रति असन्तोषकी भावना उतनी नहीं, जितनी कि स्वयं अपने प्रति असन्तोषकी
भावना भरना चाहूँगा। मैं चाहता हूँ कि पूंजी और श्रमके बीच सच्चा सहयोग हो। मैं मजदूरों को यकीन दिलाऊँगा कि बहुतसे मामलोंमें दोष पूँजीपतियोंका नहीं, उनका
अपना है। राजनैतिक आन्दोलनकी तरह मजदूरोंके आन्दोलनमें भी में आन्तरिक सुधार पर अर्थात् उनमें आत्मसन्तोषकी भावना भरनेपर विश्वास करता हूँ। इस तरहका सुधार मालिकोंको उनके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करनेके लिए बाध्य कर देगा। दक्षिण आफ्रिका और भारत दोनोंमें बराबर अपने अनुभवसे मैंने हमेशा इस सिद्धान्तपर अत्यधिक जोर दिया है कि मजदूरोंको आत्मबलका विकास करना चाहिए। तब पूंजी सचमुच श्रमकी दास बन जायेगी। जिस प्रकार मैं चाहता हूँ कि भारत और इंग्लैंड एक-दूसरे से सहयोग करें, उसी प्रकार में चाहता हूँ कि पूंजी और श्रम भी एक-दूसरेसे
सहयोग करें।
'''मुसलमानों द्वारा प्रस्तावित संयुक्त मतदानके सम्बन्धमें महात्मा गांधीने कहा कि संयुक्त मतदानका प्रस्ताव एक शुभ लक्षण है और अच्छा शकुन है। पर जबतक में प्रश्नके सभी पहलुओं पर विचार न कर लूँ, तबतक अपनी राय विस्तारसे देनेका खतरा नहीं उठा सकता। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित अखिल भारतीय सम्मेलनमें इस मामलेका अन्तिम रूपसे फैसला हो जायेगा।'''
'''क्या निकट भविष्यमें आपका विदेश यात्राका कोई इरादा है?'''
इस समय तो मेरा कोई इरादा नहीं है।
'''चीन जानेका भी नहीं?'''
मैं अभी कुछ निश्चित रूपसे नहीं कह सकता पर इतना जानता हूँ कि इस साल में चीन नहीं जा रहा हूँ।
'''
क्या खादोके सन्देशका हरिद्वारके तीर्थयात्रियों और साधुओंपर कुछ प्रभाव पड़ा था?'''
इस सम्बन्धमें कुछ कहना बड़ा कठिन है। सच तो यह है कि पंडित मदनमोहन मालवीय खादी प्रचार कार्यमें इन साधुओं और तीर्थयात्रियोंकी सहानुभूति पानेका<noinclude></noinclude>
73o1bh96foy1szg2qjm1v6g8n0rxw2v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४३
250
187323
673570
645743
2026-08-24T06:56:13Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673570
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: घाटकोपरके सार्वजनिक जीवदया खातामें|२०५}}</noinclude>भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। वे इन लोगोंके कहीं ज्यादा सम्पर्कमें हैं। मेलेके समय वे १० दिनतक हरिद्वारमें रहेंगे और खादी आन्दोलनमें साधु दिलचस्पी लेने लगें, इसके लिए वे यथासम्भव सब-कुछ करेंगे।
'''खादी और मद्यनिषेध कार्य तथा अस्पृश्यता-निवारणके लिए उन लोगोंकी सहायता प्राप्त करनेकी दृष्टिसे क्या आप और अधिक संख्यामें सम्मेलनोंका आयोजन करेंगे?'''
यह सही है कि साधु इन सब कामोंमें बहुत कुछ कर सकते हैं, पर इस वक्त मैं यह नहीं कह सकता कि मैं उनके साथ बातचीत करनेके लिए विशेष सम्मेलनोंका आयोजन करूँगा। पण्डित मालवीयजीने इस दिशामें कदम उठाया है और वे उनपर मुझसे ज्यादा प्रभाव डाल सकते हैं।
'''भारतमें मद्यनिषेध जल्दी किया जा सके, इसके लिए आप प्रचारके किन खास तरीकोंका सुझाव देंगे। उचित सावधानी बरतते हुए शान्तिपूर्ण धरना फिरसे शुरू करनेके बारेमें आपका क्या विचार?'''
यदि जितनी चाहिए उतनी सावधानीके साथ धरना देना सम्भव हो तो मैं किसी समय भी उसका स्वागत करूँगा। परन्तु मैं नहीं जानता कि अब फिरसे धरना
देना शुरू किया जा सकता है या नहीं। धरना देनेके लिए शान्तिपूर्ण वातावरणकी आवश्यकता होती है, लेकिन सवाल तो यह है कि क्या आज देशमें सचमुच ऐसा वातावरण है। मुझे जिस समय वातावरणके शान्तिपूर्ण होनेका विश्वास हो जायेगा उसी समय में स्वयं धरना शुरू करनेके लिए तैयार हूँ। लेकिन अभी इस समय मुझे ऐसा विश्वास नहीं है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८९. भाषण : घाटकोपर के सार्वजनिक जीवदया खातामें'''}}}}
{{Right|२४ मार्च, १९२७}}
'''गुरुवार की सुबह बम्बई सरकारके वित्त मन्त्री सर चुन्नीलाल मेहता और अहमदाबाद के वल्लभभाई पटेलके साथ गांधीजी घाटकोपर जीवदया खाता<ref>१९२३ में स्थापित एक संस्था। जिसका उद्देश्य बम्बई में दुधारू पशुओंके वथको रोकना और नागरिकोंको शुद्ध दूध देना था।</ref> देखने गये... उन्हें संस्थाकी पशुशाला और पशु दिखाने के बाद ...संस्थाके मन्त्रीन उनका हार्दिक स्वागत किया। ...'''
'''[उत्तर देते हुए] गांधीजीने कहा कि मैं [संस्थाको देखकर] बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ और जीवदया खाता समितिको बधाई देता हूँ। जबसे मैंने १९२५ में बेलगाँवमें
गोरक्षा कार्य हाथमें लिया, तबसे मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं इस संस्थाको देखूं।'''<noinclude></noinclude>
iqv76ws45gwxtl9dx75qz632w1d0xbi
673572
673570
2026-08-24T06:58:28Z
रितु कुमारी साव
6333
673572
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: घाटकोपरके सार्वजनिक जीवदया खातामें|२०५}}</noinclude>भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। वे इन लोगोंके कहीं ज्यादा सम्पर्कमें हैं। मेलेके समय वे १० दिनतक हरिद्वारमें रहेंगे और खादी आन्दोलनमें साधु दिलचस्पी लेने लगें, इसके लिए वे यथासम्भव सब-कुछ करेंगे।
'''खादी और मद्यनिषेध कार्य तथा अस्पृश्यता-निवारणके लिए उन लोगोंकी सहायता प्राप्त करनेकी दृष्टिसे क्या आप और अधिक संख्यामें सम्मेलनोंका आयोजन करेंगे?'''
यह सही है कि साधु इन सब कामोंमें बहुत कुछ कर सकते हैं, पर इस वक्त मैं यह नहीं कह सकता कि मैं उनके साथ बातचीत करनेके लिए विशेष सम्मेलनोंका आयोजन करूँगा। पण्डित मालवीयजीने इस दिशामें कदम उठाया है और वे उनपर मुझसे ज्यादा प्रभाव डाल सकते हैं।
'''भारतमें मद्यनिषेध जल्दी किया जा सके, इसके लिए आप प्रचारके किन खास तरीकोंका सुझाव देंगे। उचित सावधानी बरतते हुए शान्तिपूर्ण धरना फिरसे शुरू करनेके बारेमें आपका क्या विचार?'''
यदि जितनी चाहिए उतनी सावधानीके साथ धरना देना सम्भव हो तो मैं किसी समय भी उसका स्वागत करूँगा। परन्तु मैं नहीं जानता कि अब फिरसे धरना
देना शुरू किया जा सकता है या नहीं। धरना देनेके लिए शान्तिपूर्ण वातावरणकी आवश्यकता होती है, लेकिन सवाल तो यह है कि क्या आज देशमें सचमुच ऐसा वातावरण है। मुझे जिस समय वातावरणके शान्तिपूर्ण होनेका विश्वास हो जायेगा उसी समय में स्वयं धरना शुरू करनेके लिए तैयार हूँ। लेकिन अभी इस समय मुझे ऐसा विश्वास नहीं है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१८९. भाषण : घाटकोपर के सार्वजनिक जीवदया खातामें'''}}}}
{{Right|२४ मार्च, १९२७}}
'''गुरुवार की सुबह बम्बई सरकारके वित्त मन्त्री सर चुन्नीलाल मेहता और अहमदाबाद के वल्लभभाई पटेलके साथ गांधीजी घाटकोपर जीवदया खाता<ref>१९२३ में स्थापित एक संस्था। जिसका उद्देश्य बम्बई में दुधारू पशुओंके वथको रोकना और नागरिकोंको शुद्ध दूध देना था।</ref> देखने गये... उन्हें संस्थाकी पशुशाला और पशु दिखाने के बाद ...संस्थाके मन्त्रीन उनका हार्दिक स्वागत किया। ...'''
'''[उत्तर देते हुए] गांधीजीने कहा कि मैं [संस्थाको देखकर] बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ और जीवदया खाता समितिको बधाई देता हूँ। जबसे मैंने १९२५ में बेलगाँवमें
गोरक्षा-कार्य हाथमें लिया, तबसे मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं इस संस्थाको देखूं।'''<noinclude></noinclude>
orpwlghu3cysdrsagu847ouegrns1vv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४४
250
187324
673578
645744
2026-08-24T07:07:31Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673578
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''परन्तु में इतना व्यस्त रहा हूँ कि मैं ऐसा नहीं कर पाया। १९२५में अपने दौरेके दौरान मुझे भारतमें दुधारू पशुओंके संरक्षणसे सम्बन्धित विषयका अध्ययन करनेके
बहुतसे अवसर मिले थे। और मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि दुधारू पशुओंका वध तबतक कारगर रूपसे बन्द नहीं किया जा सकता जबतक उनका वध रोकनेके इच्छुक लोग भी चमड़ेका काम शुरू नहीं करते। यह देखते हुए कि भारतसे प्रतिवर्ष ९ करोड़ रुपयेकी खालें विदेश भेजी जाती हैं, इस उद्योगका काफी महत्त्व है। हिन्दुओंके लिए भी चमड़ेका व्यापार करना पाप नहीं है। और मुझे आशा है कि जब में अगली बार सार्वजनिक जीवदया खाता देखने आऊँगा तब यहाँ चमड़ा साफ करनेका एक कारखाना भी चालू हो चुका होगा। अन्तमें गांधीजीने संस्थाकी समितिको सलाह दी कि वह भैंसें पालनेके बजाय अपने सब साधनोंका उपयोग गोपालनके लिए करे।'''
'''महात्माजीने कहा कि यदि में बम्बईका गवर्नर होता तो में इस पशुशालाको बीस मील दूर ले जाता और उसके लिए केवल १० एकड़ ही नहीं, वरन् चरागाह बनानेके लायक हजारों एकड़ भूमि देता। संस्थाको आर्थिक लाभके लिए पशुशालासे सम्बद्ध एक चमड़ेका कारखाना भी खोलना चाहिए। उसे खेतीसे सम्बन्धित संस्थाओंसे सम्पर्क बढ़ाना चाहिए ताकि खादका अधिक लाभदायक उपयोग हो सके।'''<ref>यह अनुच्छेद २६-३-१९२७ के हिन्दुस्तान टाइम्सले लिया गया है।</ref>
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}
{{C|{{large|'''१९०. भेंट: महाराष्ट्रके दौरेके सम्बन्धमें'''<ref>यह भेंट गांधीजीने कोल्हापुरके लिए रवाना होते समय पूना रेलवे स्टेशनपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको दी थी।</ref>}}}}
{{Right|२४ मार्च, १९२७}}
मैं अपने कुछ मित्रोंकी इस आशंकासे कि महाराष्ट्र चरखा और कताई सम्बन्धी सन्देशको प्रेमसे नहीं अपनायेगा, कभी सहमत नहीं था। अबतक जो चन्दा इकट्ठा हुआ है मेरे अनुमानसे बहुत ज्यादा है, क्योंकि मेरा अनुमान सिर्फ १ लाखका था। कुल मिलाकर १,२०,००० रुपये प्राप्त हुए। इसमें खादीकी बिक्रीसे प्राप्त रकम शामिल नहीं की गई जो लगभग बिहारके बराबर ही अच्छी हुई।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
5wlnsuszhrikrrbu0d3956cen0w18i5
673579
673578
2026-08-24T07:09:47Z
रितु कुमारी साव
6333
673579
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''परन्तु में इतना व्यस्त रहा हूँ कि मैं ऐसा नहीं कर पाया। १९२५में अपने दौरेके दौरान मुझे भारतमें दुधारू पशुओंके संरक्षणसे सम्बन्धित विषयका अध्ययन करनेके
बहुतसे अवसर मिले थे। और मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि दुधारू पशुओंका वध तबतक कारगर रूपसे बन्द नहीं किया जा सकता जबतक उनका वध रोकनेके इच्छुक लोग भी चमड़ेका काम शुरू नहीं करते। यह देखते हुए कि भारतसे प्रतिवर्ष ९ करोड़ रुपयेकी खालें विदेश भेजी जाती हैं, इस उद्योगका काफी महत्त्व है। हिन्दुओंके लिए भी चमड़ेका व्यापार करना पाप नहीं है। और मुझे आशा है कि जब में अगली बार सार्वजनिक जीवदया खाता देखने आऊँगा तब यहाँ चमड़ा साफ करनेका एक कारखाना भी चालू हो चुका होगा। अन्तमें गांधीजीने संस्थाकी समितिको सलाह दी कि वह भैंसें पालनेके बजाय अपने सब साधनोंका उपयोग गोपालनके लिए करे।'''
'''महात्माजीने कहा कि यदि में बम्बईका गवर्नर होता तो में इस पशुशालाको बीस मील दूर ले जाता और उसके लिए केवल १० एकड़ ही नहीं, वरन् चरागाह बनानेके लायक हजारों एकड़ भूमि देता। संस्थाको आर्थिक लाभके लिए पशुशालासे सम्बद्ध एक चमड़ेका कारखाना भी खोलना चाहिए। उसे खेतीसे सम्बन्धित संस्थाओंसे सम्पर्क बढ़ाना चाहिए ताकि खादका अधिक लाभदायक उपयोग हो सके।'''<ref>यह अनुच्छेद २६-३-१९२७ के हिन्दुस्तान टाइम्सले लिया गया है।</ref>
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१९०. भेंट: महाराष्ट्रके दौरेके सम्बन्धमें'''<ref>यह भेंट गांधीजीने कोल्हापुरके लिए रवाना होते समय पूना रेलवे स्टेशनपर एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको दी थी।</ref>}}}}
{{Right|२४ मार्च, १९२७}}
मैं अपने कुछ मित्रोंकी इस आशंकासे कि महाराष्ट्र चरखा और कताई सम्बन्धी सन्देशको प्रेमसे नहीं अपनायेगा, कभी सहमत नहीं था। अबतक जो चन्दा इकट्ठा हुआ है मेरे अनुमानसे बहुत ज्यादा है, क्योंकि मेरा अनुमान सिर्फ १ लाखका था। कुल मिलाकर १,२०,००० रुपये प्राप्त हुए। इसमें खादीकी बिक्रीसे प्राप्त रकम शामिल नहीं की गई जो लगभग बिहारके बराबर ही अच्छी हुई।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २५-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
2t6j9iaemjmcikbpocukjmc6jd3f689
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४५
250
187325
673583
645745
2026-08-24T07:36:11Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673583
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१९१. भाषण: बालकोंकी सभा, कोल्हापुरमें'''<ref>महादेव देसाईंकी “साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|२५ मार्च, १९२७}}
'''स्कूलके सारे ही छोटे-छोटे बच्चे खासी-अच्छी रकमकी थैली लिये हुए धूपमें खड़े गांधीजीका इन्तजार करते रहे। थैलीको रकम उन्होंने ही इकट्ठा की थी। गांधीजीने उन्हें निर्भीकताका पाठ सिखाया:'''
निर्भीकता समस्त शिक्षणका आधार है, अथ है इति नहीं है। यदि शिक्षाका महल तुम उसी [निर्भीकताकी] नींवपर बनाकर तैयार नहीं करोगे तो तुम्हारी सारी शिक्षा व्यर्थ ढह जायेगी।
'''उन्हें इस पाठको हृदयंगम करानेके लिए उन्होंने बच्चोंको प्रह्लाद की कथा सुनाई और उसी तरह शालीनतासे, बहादुरीसे परिणामोंकी परवाह किये बिना जैसे कि बारह सालके प्रह्लादने किया था, सत्यको घोषणा करनेकी प्रेरणा दी।'''
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ३१-३-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१९२. भाषण: कोल्हापुरके ईसाइयोंके समक्ष'''}}}}
{{Right|कोल्हापुर<br>२५ मार्च, १९२७}}
'ईश्वरका राज्य' आनेके बारेमें मेरा अनुभव यही कहता है कि ईश्वरका राज्य तो आज भी है और आप जिस 'बाइबिल'को मानते हो, उसके अनुसार ईश्वरका राज्य हमारे दिलमें है, और यदि ईश्वरके भक्त उसे देखना चाहते हों तो ईश्वरका कार्य करके ही उसे देख सकते हैं। उसका सिर्फ नाम जपकर उसे नहीं देखा जा सकता। इसलिए आप यदि यह बाट जोहते हुए बैठे हों कि ईश्वरका राज्य किसी दिन आनेवाला है, तो यह आपकी भारी भूल है। आपको तो यह समझ लेना चाहिए कि ईश्वरका राज्य हमारे दिलमें ही है। आप कहते हैं कि आपको मेरा काम अच्छा लगता है। यह सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है। किन्तु मैं यह कहना चाहता कि मैं जो कार्य कर रहा हूँ उसका उद्देश्य इसी राज्यको लाना है। इसे सिद्ध करनेके लिए ही में अस्पृश्यता दूर करनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। मैं यह भी कह देना चाहता हूँ कि यदि आपको यह काम पसन्द हो तो आपको खादी भी अपनानी चाहिए, क्योंकि मेरे मतानुसार अस्पृश्यता निवारणके द्वारा हम जो कुछ करना चाहते हैं, खादी कार्य उससे भी आगे जाता है। क्या आपको मालूम है कि<noinclude></noinclude>
8o3feu90fjlwwozdgfv2jxebbs9cvjn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४६
250
187326
673588
645746
2026-08-24T07:42:26Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673588
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भारतमें लाखों ऐसे गाँव हैं जहाँके लोग भूखों मर रहे हैं और सर्वनाशके किनारे पर खड़े हैं। यदि हम ईश्वरकी आवाज सुनना चाहते हैं, तो वह यही कहती है कि
आप भूखसे मर रही इस जनताका विचार करें, मेरा नाम लेना झूठ है। इसलिए यदि हम गरीबों को मदद देना चाहते हैं और उनका काम करना चाहते हैं तो हमें
क्या करना चाहिए? यहीं चरखा सामने आता है। कोई आठ दिन हुए सम हिगिनबॉटम नामके ईसाई मिशनरी मित्र मुझे मिलने आये थे। वे जानना चाहते थे कि गरीबों के लिए क्या धन्धा हो सकता है, संयोगवश वे जिस जगह मुझसे मिलने आये वह उस क्षेत्रमें है, जहाँ गरीबोंने चरखेकी मदद ली है। उन्होंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा कि चरखेमें कितनी शक्ति है। यदि आप भी स्वयं देखना चाहते हैं तो वहाँ जाकर देखिए। और आपको जाकर देखनेका अवकाश न हो तो मेरे जैसे जो व्यक्ति उनके बीच रहते हैं उनकी बातपर विश्वास कीजिए। यदि आपको विश्वास हो तो स्वयं सूत कातिए और गरीबों द्वारा बनाई हुई खादीका उपयोग कीजिए। यहाँ प्रदर्शनी हो रही है। यदि आपको मेरी बात ठीक लगती हो तो प्रदर्शनीमें जाकर खादी देखिए और उसकी सारी खादी खरीद डालिए।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ३-४-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१९३. भाषण: कोल्हापुरको सार्वजनिक सभामें'''}}}}
{{Right|२५ मार्च, १९२७}}
खादीका उद्देश्य बहुत महान है। लेकिन ऐसा नहीं है कि खादी पहननेसे कोई बुरा मनुष्य अपने आप अच्छा बन जाता है। पर मैं तो व्यभिचारी और वेश्यासे भी कहूँगा कि आप खादी पहनें। मैं उनसे कहूँगा कि आपके चरित्रके बारेमें तो मैं आपसे क्यों कहूँ? उसका जवाब तो ईश्वर लेगा ही। लेकिन गरीबोंके लिए आपके हृदयमें सहानुभूति हो तो आप खादी जरूर पहनें। हम गेहूँ खाते हैं; वे भी उसी तरह गेहूँ खाते हैं न? उसी तरह वे खादी भी पहनें, ब्राह्मण पहनें, ब्राह्मणेतर पहनें, पारसी पहनें, ईसाई पहनें, मुसलमान पहनें, जिन्हें देशसे प्रेम हो वे सब खादी पहनें। खादीमें स्वार्थके साथ परमार्थ भी सकता है। शराब और व्यभिचारमें रुपया लुटानेवाला पापी है। बीड़ी पीनेवाला अपेक्षाकृत कम पाप करता है। विदेशी कपड़ा पहननेवाला भी कदाचित बीड़ी पीनेवालेके बराबर ही पाप करता है। मिलका कपड़ा पहननेवाला पाप नहीं करता तो पुण्य भी नहीं करता, क्योंकि धनवानका घर भरना हमारा कर्त्तव्य नहीं है। पर खादी लेनेवालेकी बात दूसरी हो जाती है। खादीकी पूरी-पूरी कीमत गरीबके घर जाती है, गरीबोंके साथ उसका सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार, खादी पहननेवालेकी वृत्ति सुधरती है, इसमें कोई शंका नहीं है।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ३-४-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
gfpfo1a6wdrfp616ra6uq5a4izc15lu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४७
250
187327
673594
645747
2026-08-24T07:55:50Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673594
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१९४. पत्र: एस्थर मेननको'''}}}}
{{Right|[२६ मार्च, १९२७ से पूर्व]<ref>पत्रमें आए दक्षिण भारतके दौरेके उल्लेखसे प्रतीत होता है कि यह पत्र अवश्य ही गांधीजीने बीमार पड़नेसे पहले लिखा होगा। गांधीजी अधिक काम करनेके फलस्वरूप २५ मार्चको मस्तिष्क की नसों की संज्ञा-शून्यतासे बाल-बाल बचे थे। रक्त चाप बहुत बढ़ गया था। इस शीर्षकसे लेकर आगेके अनेक पत्रोंमें उसीका उल्लेख है। “पत्र : मीराबद्दनको", की पाद-टिप्पणी भी देखिए।</ref>}}
{{Left|मेरी प्यारी बच्ची,}}
तुम्हारा दर्द-भरा पत्र मिला। मैं सोच रहाथा कि इतने लम्बे अर्से से तुम्हारा पत्र जाने क्यों नहीं आया। अब मै समझ गया। तुम्हें इतनी पस्त हालतमें देखकर मुझे दुःख होता है। यह पत्र लिखनेमें काफी खलल पड़ रहे हैं। मेरे पास एक पलका भी अवकाश नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें अपना प्यार और प्रार्थनायुक्त आशीर्वाद भेजता हूँ। अप्रैलमें दक्षिणमें रहूँगा। अपने दौरेके बीच में तुमसे मिलनेकी जी तोड़ कोशिश जरूर करूँगा।
जब मेरिया लौटेगी, मुझे देखना ही होगा कि कताईके लिए क्या कुछ किया जा सकता है।
{{Left|तुम सबको सस्नेह,}}
{{Right|तुम्हारा,<br>बापू}}
{{Left|'''माई डियर चाइल्ड''' तथा अंग्रेजी पत्रकी फोटो नकलसे भी।<br>सौजन्य: नेशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इंडिया|2em}}
{{C|{{larger|'''१९५. डा० वेन्लेसके साथ बातचीत'''<ref>महादेव देसाईको “साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[२६ मार्च, १९२७]<ref>बॉम्बे क्रॉनिकल, २८-३-१९२७ और यंग इंडिया, ३१-३-१९२७ से।</ref>}}
'''यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें डाक्टर लोग सौभाग्यसे गांधीजीको मना सकने में सफल हुए। जहाँ वे असफल रहे हैं ऐसे उदाहरण तो हो ही चुके हैं, बहुतसे डाक्टरोंने प्रमाणित किया है कि गांधीजी बहुत दृष्टियोंसे एक आदर्श रोगी हैं;परन्तु कभी-कभी वह डाक्टरोंके लिए निराशाका कारण भी बन जाते हैं। डाक्टरने'''
{{Left|३३-१४}}<noinclude></noinclude>
grzgo7av2smsm8jsjs9xi2xe204dvca
673597
673594
2026-08-24T07:56:56Z
रितु कुमारी साव
6333
673597
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१९४. पत्र: एस्थर मेननको'''}}}}
{{Right|[२६ मार्च, १९२७ से पूर्व]<ref>पत्रमें आए दक्षिण भारतके दौरेके उल्लेखसे प्रतीत होता है कि यह पत्र अवश्य ही गांधीजीने बीमार पड़नेसे पहले लिखा होगा। गांधीजी अधिक काम करनेके फलस्वरूप २५ मार्चको मस्तिष्क की नसों की संज्ञा-शून्यतासे बाल-बाल बचे थे। रक्त चाप बहुत बढ़ गया था। इस शीर्षकसे लेकर आगेके अनेक पत्रोंमें उसीका उल्लेख है। “पत्र : मीराबद्दनको", की पाद-टिप्पणी भी देखिए।</ref>}}
{{Left|मेरी प्यारी बच्ची,}}
तुम्हारा दर्द-भरा पत्र मिला। मैं सोच रहाथा कि इतने लम्बे अर्से से तुम्हारा पत्र जाने क्यों नहीं आया। अब मै समझ गया। तुम्हें इतनी पस्त हालतमें देखकर मुझे दुःख होता है। यह पत्र लिखनेमें काफी खलल पड़ रहे हैं। मेरे पास एक पलका भी अवकाश नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें अपना प्यार और प्रार्थनायुक्त आशीर्वाद भेजता हूँ। अप्रैलमें दक्षिणमें रहूँगा। अपने दौरेके बीच में तुमसे मिलनेकी जी तोड़ कोशिश जरूर करूँगा।
जब मेरिया लौटेगी, मुझे देखना ही होगा कि कताईके लिए क्या कुछ किया जा सकता है।
{{Left|तुम सबको सस्नेह,|2em}}
{{Right|तुम्हारा,<br>बापू}}
{{Left|'''माई डियर चाइल्ड''' तथा अंग्रेजी पत्रकी फोटो नकलसे भी।<br>सौजन्य: नेशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इंडिया|2em}}
{{C|{{larger|'''१९५. डा० वेन्लेसके साथ बातचीत'''<ref>महादेव देसाईको “साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[२६ मार्च, १९२७]<ref>बॉम्बे क्रॉनिकल, २८-३-१९२७ और यंग इंडिया, ३१-३-१९२७ से।</ref>}}
'''यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें डाक्टर लोग सौभाग्यसे गांधीजीको मना सकने में सफल हुए। जहाँ वे असफल रहे हैं ऐसे उदाहरण तो हो ही चुके हैं, बहुतसे डाक्टरोंने प्रमाणित किया है कि गांधीजी बहुत दृष्टियोंसे एक आदर्श रोगी हैं;परन्तु कभी-कभी वह डाक्टरोंके लिए निराशाका कारण भी बन जाते हैं। डाक्टरने'''
{{Left|३३-१४|2em}}<noinclude></noinclude>
lecxdmmd4b0s2zmkuwehkhxeuiugvdy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२४८
250
187328
673603
645748
2026-08-24T08:10:02Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
673603
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|२१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''गांधीजीको विपत्ति<ref>डाक्टरी रायके बारेमें देखिए परिशिष्ट ३।</ref> आते ही पूर्ण शारीरिक विश्राम लेनेकी हिदायत दी। इसमें कताई
बन्द कर देना भी शामिल था।'''
अच्छा, तो आप मेरा कातनेसे पहले और कातनेके बाद रक्तचाप ले लें और यदि आप मुझे विश्वास दिला सकें कि कातनेके बाद रक्तचाप चिन्ताजनक दशा तक बढ़ गया है, तो में आपकी सलाह मान लूंगा। इसके विपरीत में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि कातना निश्चय ही उद्योगसे विश्रान्ति है। इससे स्नायुमण्डलको शान्ति मिलती है। और डाक्टर, आपको यह अवश्य मालूम होना चाहिए कि मेरी जीवनसंहिता आपकी जीवनसंहितासे नितान्त भिन्न है। दृष्टान्तके रूपमें आप सब तरहकी औषधियोंका विधान करेंगे। मैंने जीवनकी ऐसी पद्धति बनाई है जिसे मैं शायद कुछ विशेष स्थितियोंमें न बदलूं। अतः यदि आप मुझे ऐसी औषधि दें जो पाँच ही चीजों की बनी हो, तो मैं इसे ले लूंगा। किन्तु तब आप इस बात के लिए सहमत हो जायें कि मैं भोजन त्याग दूँ; क्योंकि में दिनमें पाँचसे ज्यादा चीजें किसी भी दशामें नहीं ले सकता। इसलिए या तो आप मुझे यह विश्वास दिला दें कि औषधि मेरे स्वास्थ्यके लिए भोजनसे भी ज्यादा जरूरी है, या आप इसपर सहमत हो जायें कि आप मुझे कोई औषधि नहीं देंगे। एक और भी बात है। कातना एक ऐसी चीज है जिसके बिना में जीवित नहीं रह सकता। यदि मेरे लिये भोजन करना और जीवित रहना जरूरी है तो कातना भी जरूरी है और यदि आप आकर देखें कि में काटते-कातते ही लुढ़क गया हूँ तो वह कितनी गरिमामय मृत्यु होगी। यदि आप डाक्टरके रूपमें अपने अनुशासनपर अड़े रहेंगे तब तो आप मेरे आसपासके लोगोंको इसपर बहुत भला-बुरा कहेंगे; परन्तु यदि आप अच्छे व्यक्ति हैं तो आप कहेंगे कि यह स्वागत योग्य मृत्यु है। आपको यह अवश्य जान लेना चाहिए कि यदि में जीवित रहूँ और कात न सकूं तो इससे मेरी अन्तरात्माको बड़ा आघात पहुँचेगा और इससे मेरा जीवन अत्यन्त दुःखी हो जायेगा। में पढ़ना, लिखना और कातना भी तभी बन्द कर सकता जब मैं भोजन करना भी बन्द कर दूँ। क्या आप मुझे ऐसा करनेकी आज्ञा देंगे?
नहीं, डाक्टर जबतक आप अपने उपचारके अचूक होनेका दावा नहीं कर सकते मैं आपकी आज्ञाका पूरी तरह पालन नहीं कर सकता।
'''डाक्टरने न्यायसंगत उत्तर दिया कि यदि हम इस प्रकारका दावा कर सकें, तो हमें दवाइयाँ नहीं देनी चाहिए अपितु भविष्यवाणी करनेवाले देवताओंकी तरह
मन्दिरोंमें बैठे रहना चाहिए।'''
'''फिर इसम आश्चर्यकी क्या बात है कि डाक्टर वेन्लेसने साफ शब्दोंमें कह दिया कि अनिश्चित कालतक विश्रामके अतिरिक्त अन्य कोई उपचार आवश्यक नहीं है।'''
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १४-४-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
0gaf78che2u6w3gotsm7jc6pfxfe094
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२९६
250
187377
673398
645797
2026-08-23T17:03:46Z
Sweta rani Gupta
6713
/* शोधित */
673398
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२५१. पत्र : हरिइच्छा देसाईको}}}}
{{Right|नन्दी हिल्स, मैसूर¹<br>
चैत्र पूर्णिमा [१६ अप्रैल, १९२७]}}
चि० हरिइच्छा,
तुम सब बहनों का पत्र मिला। मेरी तबीयत सुधरती जा रही है। तुम सब का
खयाल मुझे प्रायः आता रहता है। मैंने तो तुम सब को आश्रम में लाने की बहुत कोशिश
की। यदि तुम आना चाहो तो अब भी आ सकती हो। तुम सब जहाँ अच्छा लगे
वहाँ रहो, किन्तु खूब कातो, खूब पढ़ो और खूब घूमो-फिरो। शरीर और मन से स्वस्थ
रहना ही चाहिए। मुझे पत्र लिखती रहना।
{{Right|बापू के आशीर्वाद}}
चि० हरिइच्छा देसाई
मार्फत सुन्दरजी गोविन्दजी देसाई
रतिलाल मणियार के पुराने मकान में
राजकोट
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४९०६) से।
सौजन्य : हरिइच्छा कामदार
{{c|{{larger|'''२५२. सावन्तवाड़ी के प्रमुख से बातचीत²}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
[१७ अप्रैल, १९२७]³}}
हमारे अम्बोली से रवाना होने से एक दिन पूर्व महाराजा और रानी गांधीजी से
मिले। हमेशा की तरह उनका व्यवहार बड़ा शालीन था और उन्होंने पूछा कि अब
भी क्या हम आपसे अम्बोली में कुछ दिन और रहने के लिए अनुरोध नहीं कर सकते।
गांधीजी ने कहा कि मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं इस सुरम्य और मनोरम दृश्यों से
भरपूर स्थान पर रहूँ। वास्तव में मुझे इस स्थान को छोड़ते हुए बड़ा दुःख हो रहा
है। परन्तु मैं विवश हूँ, क्योंकि मैं विश्राम के साथ-साथ काम भी करना चाहता हूँ।
और तब गांधीजी ने वे प्रश्न पूछे जो मैंने उस दिन नहीं पूछे थे।
१. देखिए पिछले शीर्षक की पाद-टिप्पणी।
२. महादेव देसाई के लेख "ए पोपुलर प्रिंस" से।
३. गांधीजी अम्बोली से १८ तारीख को गये थे। देखिए अगला शीर्षक।<noinclude></noinclude>
9j0nb9gyr2b257jh8nahexfpj98128t
673441
673398
2026-08-23T18:12:41Z
नीलम
26
+साँचा
673441
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२५१. पत्र : हरिइच्छा देसाईको}}}}
{{Right|नन्दी हिल्स, मैसूर¹<br>
चैत्र पूर्णिमा [१६ अप्रैल, १९२७]}}
चि० हरिइच्छा,
तुम सब बहनों का पत्र मिला। मेरी तबीयत सुधरती जा रही है। तुम सब का
खयाल मुझे प्रायः आता रहता है। मैंने तो तुम सब को आश्रम में लाने की बहुत कोशिश
की। यदि तुम आना चाहो तो अब भी आ सकती हो। तुम सब जहाँ अच्छा लगे
वहाँ रहो, किन्तु खूब कातो, खूब पढ़ो और खूब घूमो-फिरो। शरीर और मन से स्वस्थ
रहना ही चाहिए। मुझे पत्र लिखती रहना।
{{Right|बापू के आशीर्वाद}}
<poem>चि० हरिइच्छा देसाई
मार्फत सुन्दरजी गोविन्दजी देसाई
रतिलाल मणियार के पुराने मकान में
राजकोट</poem>
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४९०६) से।
सौजन्य : हरिइच्छा कामदार
{{c|{{larger|'''२५२. सावन्तवाड़ी के प्रमुख से बातचीत²}}}}
{{Right|अम्बोली<br>
[१७ अप्रैल, १९२७]³}}
हमारे अम्बोली से रवाना होने से एक दिन पूर्व महाराजा और रानी गांधीजी से
मिले। हमेशा की तरह उनका व्यवहार बड़ा शालीन था और उन्होंने पूछा कि अब
भी क्या हम आपसे अम्बोली में कुछ दिन और रहने के लिए अनुरोध नहीं कर सकते।
गांधीजी ने कहा कि मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं इस सुरम्य और मनोरम दृश्यों से
भरपूर स्थान पर रहूँ। वास्तव में मुझे इस स्थान को छोड़ते हुए बड़ा दुःख हो रहा
है। परन्तु मैं विवश हूँ, क्योंकि मैं विश्राम के साथ-साथ काम भी करना चाहता हूँ।
और तब गांधीजी ने वे प्रश्न पूछे जो मैंने उस दिन नहीं पूछे थे।
१. देखिए पिछले शीर्षक की पाद-टिप्पणी।
२. महादेव देसाई के लेख "ए पोपुलर प्रिंस" से।
३. गांधीजी अम्बोली से १८ तारीख को गये थे। देखिए अगला शीर्षक।<noinclude></noinclude>
i4o4nhtfjlmvquyznxuj4tm3himlnvc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५६
250
196475
673354
668860
2026-08-23T15:59:16Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
673354
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्वीकृति-पत्रकी प्रतीक्षा करूँगा। तुम्हारा पत्र आनेसे पहले मैं उन्हें पत्र लिख चुका हूँ। इसलिए तुम्हारे लिए समिति में रहकर सेवा करनेका या समितिमें न रखें जाने पर भी समिति की मदद करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। आशा है कि अब एक बार फिर तुम्हारी जान में जान आ गई होगी। इसलिए मैं चाहूँगा कि तुम अब से अपने-आपको दृढ़ बना लो और तबतक कोई उत्तरदायित्व या भार कभी न स्वीकार करो जबतक तुम जो कुछ कर रहे हो उसके बारेमें पूरी तरह निश्चित न हो जाओ। बहुधा हम मित्रोंकी जो सर्वोत्तम सेवा कर सकते हैं वह तो यह है कि यदि वे कोई ऐसी बात कहें जो हमारी अन्तरात्माको न भाती हो तो हम उन्हें निराश कर दें और उन्हें नाराज भी कर दें। मित्रोंके खो देनेका खतरा मोल ले लेना ज्यादा अच्छा है बनिस्बत इसके कि हम अपने-आपसे समझौता करें और सेवाके अयोग्य हो जानेका उससे भी बड़ा खतरा मोल लें।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
<br>प्रो॰ मलकानी
<br>कांग्रेस कार्यालय, हैदराबाद (सिन्ध)
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९६) की फोटो नकलसे।
{{c|{{'''x-larger|२१. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>चि॰ छगनलाल,
तुम्हारी भेजी हुई डाक आज अभीतक मुझे नहीं मिली। देखता हूँ, पण्डितजी भी तुम्हारे स्वास्थ्यके बारेमें चिन्तित हैं। अपना स्वास्थ्य जल्दी ही सुधार लेना। आज और अधिक कुछ नहीं लिखता।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
q34satpyhsvrkpw7y9phx7npy5b4pia
673355
673354
2026-08-23T16:00:17Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
673355
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्वीकृति-पत्रकी प्रतीक्षा करूँगा। तुम्हारा पत्र आनेसे पहले मैं उन्हें पत्र लिख चुका हूँ। इसलिए तुम्हारे लिए समिति में रहकर सेवा करनेका या समितिमें न रखें जाने पर भी समिति की मदद करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। आशा है कि अब एक बार फिर तुम्हारी जान में जान आ गई होगी। इसलिए मैं चाहूँगा कि तुम अब से अपने-आपको दृढ़ बना लो और तबतक कोई उत्तरदायित्व या भार कभी न स्वीकार करो जबतक तुम जो कुछ कर रहे हो उसके बारेमें पूरी तरह निश्चित न हो जाओ। बहुधा हम मित्रोंकी जो सर्वोत्तम सेवा कर सकते हैं वह तो यह है कि यदि वे कोई ऐसी बात कहें जो हमारी अन्तरात्माको न भाती हो तो हम उन्हें निराश कर दें और उन्हें नाराज भी कर दें। मित्रोंके खो देनेका खतरा मोल ले लेना ज्यादा अच्छा है बनिस्बत इसके कि हम अपने-आपसे समझौता करें और सेवाके अयोग्य हो जानेका उससे भी बड़ा खतरा मोल लें।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
<br>प्रो॰ मलकानी
<br>कांग्रेस कार्यालय, हैदराबाद (सिन्ध)
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९६) की फोटो नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२१. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>चि॰ छगनलाल,
तुम्हारी भेजी हुई डाक आज अभीतक मुझे नहीं मिली। देखता हूँ, पण्डितजी भी तुम्हारे स्वास्थ्यके बारेमें चिन्तित हैं। अपना स्वास्थ्य जल्दी ही सुधार लेना। आज और अधिक कुछ नहीं लिखता।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ahhvqoz5df8ri2pm3bpq6tb0gdhwfif
673356
673355
2026-08-23T16:00:58Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
673356
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्वीकृति-पत्रकी प्रतीक्षा करूँगा। तुम्हारा पत्र आनेसे पहले मैं उन्हें पत्र लिख चुका हूँ। इसलिए तुम्हारे लिए समिति में रहकर सेवा करनेका या समितिमें न रखें जाने पर भी समिति की मदद करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। आशा है कि अब एक बार फिर तुम्हारी जान में जान आ गई होगी। इसलिए मैं चाहूँगा कि तुम अब से अपने-आपको दृढ़ बना लो और तबतक कोई उत्तरदायित्व या भार कभी न स्वीकार करो जबतक तुम जो कुछ कर रहे हो उसके बारेमें पूरी तरह निश्चित न हो जाओ। बहुधा हम मित्रोंकी जो सर्वोत्तम सेवा कर सकते हैं वह तो यह है कि यदि वे कोई ऐसी बात कहें जो हमारी अन्तरात्माको न भाती हो तो हम उन्हें निराश कर दें और उन्हें नाराज भी कर दें। मित्रोंके खो देनेका खतरा मोल ले लेना ज्यादा अच्छा है बनिस्बत इसके कि हम अपने-आपसे समझौता करें और सेवाके अयोग्य हो जानेका उससे भी बड़ा खतरा मोल लें।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
<br>प्रो॰ मलकानी
<br>कांग्रेस कार्यालय, हैदराबाद (सिन्ध)
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९६) की फोटो नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२१. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
१८ अक्टूबर, १९२९}}
<br>चि॰ छगनलाल,
तुम्हारी भेजी हुई डाक आज अभीतक मुझे नहीं मिली। देखता हूँ, पण्डितजी भी तुम्हारे स्वास्थ्यके बारेमें चिन्तित हैं। अपना स्वास्थ्य जल्दी ही सुधार लेना। आज और अधिक कुछ नहीं लिखता।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
imp4c8d717nuhh3mzbnvuwcjwtdk5pe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५७
250
196476
673455
668861
2026-08-24T01:55:24Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
673455
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''२२. पत्र : अब्बास तैयबजीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय भर्रर<ref>गांधीजी और तैयबजी एक-दूसरेका अभिवादन इसी तरह करते थे।</ref>
इतने ज्यादा दिनोंके बाद आपका पत्र और सो भी प्रसन्नताप्रद पत्र पाकर खुशी हुई। मुझे यह जाननेके लिए कि आपकी शुभकामनाएँ मेरे साथ हैं, आपके पत्रकी कोई जरूरत नहीं थी। इन लिखित शब्दोंकी अपेक्षा कहीं अधिक सच्ची आपके हृदयकी धड़कन मैं इतनी दूरीसे भी सुन सकता हूँ। रेहानाने मुझे आपके ऑपरेशनके बारेमें सब कुछ बताया था। लेकिन मुझे उसका पत्र सब-कुछ हो चुकनेके काफी बाद में मिला। अगर कोई बुरी खबर उस समय मिले जबकि उसका सारा असर समाप्त हो चुका हो, तो वह कितनी आह्लादकारी होती है। उस समय व्यक्ति ऐसी स्थिति में होता है कि वह इस विचारसे विशुद्ध आनन्दका अनुभव कर सके कि सब कुछ बादमें ठीक ही हो गया। मेरे मनमें जवाहरलाल द्वारा अध्यक्ष-पदसे<ref>कांग्रेस अध्यक्षका पद।</ref> किये जानेवाले आचरणको लेकर कोई आशंकाएँ नहीं हैं।
{{right|आपका,<br>
भर्रर...}}
<br>श्रीयुत अब्बास तैयबजी,
<br>मुकाम बड़ौदा
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९५६८) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२३. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय रेहाना,
उपनिषदों में नचिकेताकी एक सुन्दर कहानी है। क्या उसे तुम जानती हो? उसके पिता कंजूस थे। एक बार उन्होंने वह गाय, जो उनके लिए बोझ थी, दानमें दे दी। नचिकेताने विनम्रतापूर्वक अपने पितासे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया और इस तरहके दान देनेसे वे क्या आशा रखते हैं। पिताने नचिकेताको बुरा-भला<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ge1m0malkwtm1tnsl69ngyjvgvbijdi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८
250
196477
673482
668862
2026-08-24T03:15:40Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
673482
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कहा। उसने उनकी बातको अच्छे भावसे ग्रहण किया और यमराजसे पिताके हृदय-परिवर्तनका वरदान प्राप्त कर लिया। स्नेह पर्वतोंको भी पिघला देता है। जब पितासे कोई शिकायत हो तो उनसे न बोलना पाप होगा। बहुत सम्भव है कि पिताके पास अपने वैसे आचरणके लिए पर्याप्त कारण हों, लेकिन मान लो कि वे गलतीपर हैं, तो जब उनके अपने प्रियजन उन्हें आगाह करेंगे तब वे फिर अपना बर्ताव सुधार लेंगे। इसलिए तुम अपने पितासे जितनी जल्दी बोलने लगो उतना ही बेहतर होगा। जरूरत केवल इतनी ही है कि तुम्हारे मनमें क्रोध बिलकुल नहीं होना चाहिए। मुझे पूरा भरोसा है कि वे उस सबको सही ढंगसे ग्रहण करेंगे। तुम्हें उन्हें सट्टेबाजी से भी विमुख करना चाहिए। उन्हें अब किसीके भी लिए दौलत इकट्ठा करनेकी जरूरत नहीं है। अपने कमजोर शरीरके बावजूद तुम भी अपने ढंगसे अपना निर्वाह कर सकती हो। ईश्वरने तुम्हें एक आवाज दी है, जो हमेशा तुम्हारी मदद करेगी। और आखिरकार सिर्फ परमेश्वर ही हमारे प्रतिपालनके लिए उत्तरदायी है, यदि हम केवल उसमें विश्वास रखें।
मुझे [तुम्हारे] पिताका एक प्रसन्नताप्रद पत्र मिला है।
स्नेह,
{{right|बापू}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६१२) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२४. पत्र : के॰ श्रीनिवासनको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय श्रीनिवासन,
आपके पत्र और उसके संलग्न पत्रोंके लिए धन्यवाद। 'आफटर मदर इंडिया' के सम्बन्धमें आपकी उदासीनता बिलकुल ठीक ही है। खैर, अगर मुझे कुछ अवकाश मिला, तो मैं उन अध्यायोंको पढ़ेगा जो आपने भेजे हैं और अगर मुझे उनमें कुछ ऐसा मिलेगा जिसपर मैं उपयोगी ढंगसे चर्चा कर सकूँ, तो मैं करूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो॰ क॰ गांधी}}
<br>के॰ श्रीनिवासन महोदय
<br>फ्री प्रेस ऑफ इंडिया लिमिटेड
<br>२४ ब्राइड लेन
<br>लन्दन ई॰ सी० ४
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५८२७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
00a1625rzq0cbss3hbaal093ekkme55
673483
673482
2026-08-24T03:17:22Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
673483
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कहा। उसने उनकी बातको अच्छे भावसे ग्रहण किया और यमराजसे पिताके हृदय-परिवर्तनका वरदान प्राप्त कर लिया। स्नेह पर्वतोंको भी पिघला देता है। जब पितासे कोई शिकायत हो तो उनसे न बोलना पाप होगा। बहुत सम्भव है कि पिताके पास अपने वैसे आचरणके लिए पर्याप्त कारण हों, लेकिन मान लो कि वे गलतीपर हैं, तो जब उनके अपने प्रियजन उन्हें आगाह करेंगे तब वे फिर अपना बर्ताव सुधार लेंगे। इसलिए तुम अपने पितासे जितनी जल्दी बोलने लगो उतना ही बेहतर होगा। जरूरत केवल इतनी ही है कि तुम्हारे मनमें क्रोध बिलकुल नहीं होना चाहिए। मुझे पूरा भरोसा है कि वे उस सबको सही ढंगसे ग्रहण करेंगे। तुम्हें उन्हें सट्टेबाजी से भी विमुख करना चाहिए। उन्हें अब किसीके भी लिए दौलत इकट्ठा करनेकी जरूरत नहीं है। अपने कमजोर शरीरके बावजूद तुम भी अपने ढंगसे अपना निर्वाह कर सकती हो। ईश्वरने तुम्हें एक आवाज दी है, जो हमेशा तुम्हारी मदद करेगी। और आखिरकार सिर्फ परमेश्वर ही हमारे प्रतिपालनके लिए उत्तरदायी है, यदि हम केवल उसमें विश्वास रखें।
मुझे [तुम्हारे] पिताका एक प्रसन्नताप्रद पत्र मिला है।
स्नेह,
{{right|{{larger|बापू}}}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६१२) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२४. पत्र : के॰ श्रीनिवासनको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय श्रीनिवासन,
आपके पत्र और उसके संलग्न पत्रोंके लिए धन्यवाद। 'आफटर मदर इंडिया' के सम्बन्धमें आपकी उदासीनता बिलकुल ठीक ही है। खैर, अगर मुझे कुछ अवकाश मिला, तो मैं उन अध्यायोंको पढ़ेगा जो आपने भेजे हैं और अगर मुझे उनमें कुछ ऐसा मिलेगा जिसपर मैं उपयोगी ढंगसे चर्चा कर सकूँ, तो मैं करूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
<br>के॰ श्रीनिवासन महोदय
<br>फ्री प्रेस ऑफ इंडिया लिमिटेड
<br>२४ ब्राइड लेन
<br>लन्दन ई॰ सी० ४
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५८२७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
nunvne7409jvvj2j2ozq2g8rcdjczpg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९
250
196478
673487
668863
2026-08-24T03:26:46Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
673487
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''२५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
प्रिय सतीश बाबू,
मुकाम मसूरी
१९ अक्टूबर, १९२९
आपका पत्र मिला। मैंने स्वदेशीके बारेमें प्रदर्शनी समितिको' अपनी राय दे दी है। उनके साथ एक विशेषज्ञ भी होगा, जो उनका निर्देशन करेगा। परन्तु एक और कठिनाई उठ खड़ी हुई है । बहरहाल वह ज्यादा महत्त्वकी नहीं है । वे खद्दरकी दुकानोंका भी दूसरी दुकानोंके बराबर ही किराया लेना चाहते हैं । मैं महसूस करता हूँ कि उन्हें खद्दरकी दुकानोंके लिए कुछ नहीं लेना चाहिए। मुझे नहीं मालूम कि दूसरी प्रदर्शनियोंमें, उदाहरणके तौर पर मद्रास में, क्या प्रथा अपनाई गई थी । क्या कानपुर या गोहाटी में भी कुछ लिया गया था ? मैं कोई नई प्रथा नहीं चलाना चाहता; परन्तु हमें कलकत्ताके उदाहरणकी नकल भी नहीं करनी चाहिए । कृपया वापसी डाकसे अपने विचार लिख भेजिए ।
मुझे खुशी है कि कुमार बाबू आपके पास हैं । जैसे ही मुझे एक भी क्षणका अवकाश मिलेगा, मैं हेमप्रभादेवीको पत्र अवश्य लिखना चाहूँगा ।
हृदयसे आपका,
अंग्रेजी (जी० एन० १६१०) की फोटो - नकलसे ।
बापू
२६. पत्र : महादेव देसाईको
मसूरी
१९ अक्तूबर, १९२९
चि० महादेव,
इसे देख जाना । इसपर 'यंग इंडिया' में कोई टिप्पणी देना आवश्यक नहीं है । ऐसे गुमनाम पत्र तो आते ही रहते हैं। मुझे 'गीताजी' के प्रूफ भेजनेकी सूचना तारसे मिली थी किन्तु अभीतक प्रूफ पहुँचे नहीं । यह मानपत्र ' कन्या गुरुकुलका है, जिसे उन्होंने बहुत मीठे स्वरमें गाया था । यह अच्छा है कि मेरा मानसिक सन्तुलन बना हुआ है । मैं जब आश्रम पहुँचूँगा तबतक तुम भी वहाँ पहुँच चुके होओगे न ?
गुजराती (एस० एन० ११४६०) की फोटो - नकलसे ।
१. आगामी लाहौर कांग्रेस अधिवेशनको प्रदर्शनी समिति ।
२. मानपत्र १७ अक्टूबरको भेंट किया गया था ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
ti3xfrdvrqcobi9i21kwoopijxw7j7p
673492
673487
2026-08-24T03:45:02Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
673492
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''२५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय सतीश बाबू,
आपका पत्र मिला। मैंने स्वदेशीके बारेमें प्रदर्शनी समितिको' अपनी राय दे दी है। उनके साथ एक विशेषज्ञ भी होगा, जो उनका निर्देशन करेगा। परन्तु एक और कठिनाई उठ खड़ी हुई है। बहरहाल वह ज्यादा महत्त्वकी नहीं है। वे खद्दरकी दुकानोंका भी दूसरी दुकानोंके बराबर ही किराया लेना चाहते हैं। मैं महसूस करता हूँ कि उन्हें खद्दरकी दुकानोंके लिए कुछ नहीं लेना चाहिए। मुझे नहीं मालूम कि दूसरी प्रदर्शनियोंमें, उदाहरणके तौर पर मद्रास में, क्या प्रथा अपनाई गई थी। क्या कानपुर या गोहाटी में भी कुछ लिया गया था? मैं कोई नई प्रथा नहीं चलाना चाहता; परन्तु हमें कलकत्ताके उदाहरणकी नकल भी नहीं करनी चाहिए। कृपया वापसी डाकसे अपने विचार लिख भेजिए।
मुझे खुशी है कि कुमार बाबू आपके पास हैं। जैसे ही मुझे एक भी क्षणका अवकाश मिलेगा, मैं हेमप्रभादेवीको पत्र अवश्य लिखना चाहूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>{{larger|बापू}}}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १६१०) की फोटो-नकलसे।
२६. पत्र : महादेव देसाईको
मसूरी
१९ अक्तूबर, १९२९
चि० महादेव,
इसे देख जाना । इसपर 'यंग इंडिया' में कोई टिप्पणी देना आवश्यक नहीं है । ऐसे गुमनाम पत्र तो आते ही रहते हैं। मुझे 'गीताजी' के प्रूफ भेजनेकी सूचना तारसे मिली थी किन्तु अभीतक प्रूफ पहुँचे नहीं । यह मानपत्र ' कन्या गुरुकुलका है, जिसे उन्होंने बहुत मीठे स्वरमें गाया था । यह अच्छा है कि मेरा मानसिक सन्तुलन बना हुआ है । मैं जब आश्रम पहुँचूँगा तबतक तुम भी वहाँ पहुँच चुके होओगे न ?
गुजराती (एस० एन० ११४६०) की फोटो - नकलसे ।
१. आगामी लाहौर कांग्रेस अधिवेशनको प्रदर्शनी समिति ।
२. मानपत्र १७ अक्टूबरको भेंट किया गया था ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
4guiysumucp9bo6qkmxh2e5xupqe5a2
673494
673492
2026-08-24T03:58:03Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
673494
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''२५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
१९ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय सतीश बाबू,
आपका पत्र मिला। मैंने स्वदेशीके बारेमें प्रदर्शनी समितिको<ref>आगामी लाहौर कांग्रेस अधिवेशनको प्रदर्शनी समिति।</ref> अपनी राय दे दी है। उनके साथ एक विशेषज्ञ भी होगा, जो उनका निर्देशन करेगा। परन्तु एक और कठिनाई उठ खड़ी हुई है। बहरहाल वह ज्यादा महत्त्वकी नहीं है। वे खद्दरकी दुकानोंका भी दूसरी दुकानोंके बराबर ही किराया लेना चाहते हैं। मैं महसूस करता हूँ कि उन्हें खद्दरकी दुकानोंके लिए कुछ नहीं लेना चाहिए। मुझे नहीं मालूम कि दूसरी प्रदर्शनियोंमें, उदाहरणके तौर पर मद्रास में, क्या प्रथा अपनाई गई थी। क्या कानपुर या गोहाटी में भी कुछ लिया गया था? मैं कोई नई प्रथा नहीं चलाना चाहता; परन्तु हमें कलकत्ताके उदाहरणकी नकल भी नहीं करनी चाहिए। कृपया वापसी डाकसे अपने विचार लिख भेजिए।
मुझे खुशी है कि कुमार बाबू आपके पास हैं। जैसे ही मुझे एक भी क्षणका अवकाश मिलेगा, मैं हेमप्रभादेवीको पत्र अवश्य लिखना चाहूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>{{larger|बापू}}}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १६१०) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''२६. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
१९ अक्तूबर, १९२९}}
<br>चि॰ महादेव,
इसे देख जाना। इसपर 'यंग इंडिया' में कोई टिप्पणी देना आवश्यक नहीं है। ऐसे गुमनाम पत्र तो आते ही रहते हैं। मुझे 'गीताजी' के प्रूफ भेजनेकी सूचना तारसे मिली थी किन्तु अभीतक प्रूफ पहुँचे नहीं। यह मानपत्र<ref>मानपत्र १७ अक्टूबरको भेंट किया गया था।</ref> कन्या गुरुकुलका है, जिसे उन्होंने बहुत मीठे स्वरमें गाया था। यह अच्छा है कि मेरा मानसिक सन्तुलन बना हुआ है। मैं जब आश्रम पहुँचूँगा तबतक तुम भी वहाँ पहुँच चुके होओगे न?
गुजराती (एस॰ एन॰ ११४६०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
83r9156nyoph9r2a3yan87px7tkji7b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८०
250
196599
673365
668984
2026-08-23T16:19:41Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673365
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आदि प्रवृत्तियाँ शिथिल होनेके बदले और जोरसे आगे बढ़नी चाहिए। ऐसा न करके अगर जनता सो जाये तो यह निश्चय समझिए कि न तो आज कुछ है, और न
भविष्य में कुछ होने को है। सारांश यह कि बिना मरे स्वर्ग नहीं मिल सकता; स्वराज्य मिलना, न मिलना हमारी अपनी शक्तिपर निर्भर करता है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १०-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१५६. पत्र: रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>११ नवम्बर १९२९}}
{{left|प्रिय रेनॉल्ड्स,}}
मौनवारको आपकी याद मुझे अवश्य आती है। अपने मन्दिर-प्रवेश निषेधपर आपने उदारता दिखलाई है। एक-दूसरेके प्रति ऐसा रुख अपनाना हम सबके लिए ठीक भी है। पर लज्जाजनक सत्य तो यही है कि यह निषेध उस अस्पृश्यताके अभिशापका ही एक रूप है, जिसके निकृष्टतम रूपको दूर करनेका हम भरपूर प्रयत्न कर रहे हैं।
मेरी आपसे यह विनती है कि तत्काल बहुत कुछ करनेका लालच न करें। मैं चाहूँगा कि आप कमसे कम कुछ काम तो अच्छी तरहसे कर सकें। अब हमारे मिलने में ज्यादा विलम्ब नहीं है। यदि सब कुछ आशाके अनुरूप होता रहा, तो मैं वहाँ<ref>साबरमती आश्रम।</ref> २५ की रातको पहुँचूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४५२८) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
oukgo44o9tn26vr35k60et9onfkvphr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८१
250
196600
673370
668985
2026-08-23T16:27:25Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673370
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५७. पत्र: फूलचन्द के॰ शाहको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>११ नवम्बर, १९२९}}
{{left|भाई फूलचन्द,}}
तुम्हारा ५-११-१९२९ का पत्र मिला। इससे पहलेके पत्रोंका उत्तर मैं दे चुका हूँ।
तुम यह स्वीकार करते हो न कि ‘सौराष्ट्र मित्र ने गलती तो की ही है। तो फिर तुम इसके आधारपर किस तरहका संघर्ष आरम्भ करना चाहते हो? आशा है मैं २५ तारीखको रातको साबरमती पहुँच जाऊँगा और ६ दिसम्बर की सुबह वहाँसे चल पड़ूँगा। यदि तुम मुझे कुछ समझाना चाहो तो इस बीच वहाँ आ जाना। तुम कुछ न कहना चाहो तथा अपने कामके बारेमें तुम्हारे मनमें कोई शंका न हो तो मत आना। भले ही कहीं भूल होनेकी सम्भावना हो; किन्तु तुम्हारी अन्तरात्मा जो कुछ कहे उसके अनुसार चलने में हिचकिचाना नहीं। आखिर मेरा सहारा कहाँतक लोगे?
तुम्हारी यह बात मेरे गले नहीं उतरती कि अन्यायीके प्रति तुम अपने मनमें किसी तरहका द्वेष नहीं रखते। ऐसी द्वेष हीनता अभ्याससे ही प्राप्त होती है। तुम्हारे दलके अधिकांश लोगोंने इस गुणको प्राप्त करनेका प्रयास भी किया हो ऐसा मुझे नहीं लगा। अतः मैंने तुम्हें सामान्य चेतावनी दी थी।
अब यह कहा जा सकता है कि छाया<ref>पोरबन्दरके निकट।</ref> स्थित आश्रम पक्की नींवपर खड़ा हो गया है। बशर्ते कि उक्त नींव उसकी आत्माके लिए भी उतनी ही पक्की साबित हो। अन्यथा हम अपने मनको इस तरह भी समझा सकते हैं कि आश्रमकी आत्माकी तो पहलेसे ही पक्की नींव मौजूद थी और अब आश्रमने अपने लिए पक्की नींवका भवन भी खड़ाकर लिया है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २८३८) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: फूलचन्द के॰ शाह<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
0z35ifru6siah3ao5zgp8ktlftbyx5q
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८२
250
196601
673375
668986
2026-08-23T16:35:42Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673375
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५८. पत्र: शारदाबहन शाहको'''}}}}
{{right|शाहजहांपुर<br>मौनवार ११ नवम्बर, १९२९]<ref>इस दिन गांधीजी शाहजहाँपुरमें थे।</ref>}}
{{left|चि॰ शारदा,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैंने जो मर्यादा बताई है उसका उलटा अर्थ न निकाला जाये। जिनमें भक्तिबहन<ref>दरबार गोपालदासकी पत्नी।</ref> जैसी स्वतन्त्र हिम्मत है वे दलमें क्यों सम्मिलित नहीं हो सकते? अच्छा काम आरम्भ करनके लिए दूसरोंकी बाट नहीं जोहनी चाहिए। भक्तबहन तो दल में सम्मिलित हुई जैसी है। इसलिए यदि किसीमें सत्यका आग्रह रखनेकी स्वतन्त्र हिम्मत हो, यदि उसमें जेल आदिके दुखोंको सहनेकी शक्ति हो तो उसे दलमें सम्मिलित कर लेने में कोई हानि नहीं है। तुम यह मत मान लेना कि आजकल जो लोग दलमें हैं वे सभी उसकी प्रतिष्ठाको बढ़ानेवाले हैं। सत्याग्रहका तात्पर्य अन्यायका सामना करना है, उसका इतना ही अर्थ कभी मत
करना। अन्यायका सामना करने की शक्ति तो उसका एक चिह्न हो सकती है। क्योंकि कितने ही असत्याचारियोंको मैने अन्यायका सामना करते हुए देखा है। यह निश्चित है कि सत्यका आग्रह रखनेकी कला हस्तगत होते ही अन्यायका सामना करने की शक्ति आ ही जाती है। किन्तु सत्यका आग्रह तो प्रतिदिन निरालस भावसे कोई
विशुद्ध पारमार्थिक कार्य—निस्वार्थ, मोहरहित सेवा अर्थात् विशुद्ध यज्ञ करनेसे ही उत्पन्न होता है। मेरा अनुभव है कि जिस स्त्रीमें सामान्य ज्ञान उत्पन्न हो चुका है उसमें उक्त शक्ति जल्दी आ जाती है और शक्ति आ जानेके बाद वह टिकी भी रहती है।
सूत तुमने साड़ीके लिए रखकर ठीक किया। यह सूत तुमने काता था इतना ही पर्याप्त है। तुम्हें यह बात याद है न कि उसी कातनेवालेको कतैया कहा जा सकता है जो पींजता भी हो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २८३९ ) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: शारदाबहन शाह<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
73ieb5ji88q2r17iivcbsxg38ndxz7y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८३
250
196602
673378
668987
2026-08-23T16:42:16Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673378
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५९. पत्र: आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>मौनवार, ११ नवम्बर, १९२९}}
{{left|बहनो,}}
इसके बाद तो अब मुझे पत्र लिखनेको एक ही सोमवार रह जायेगा।
यह रोज साबित होता जा रहा है कि हमारे यहाँ जो चोरियाँ होती रहती हैं, उनका कारण हमारी गफलत है। गफलत दो तरह की है: हम सावधान नहीं रहते और कई बार समझानेपर भी कोई गहने रखती है, तो कोई रुपया रखती है। चोर तो दुनिया में रहेंगे ही। उनसे बचने के तीन उपाय हैं: पासमें कुछ रखा ही न जाये, इतनी पूर्णता तो आ नहीं सकती। जितना रखें उतने के बारेमें खुद सावधान रहें; और तीसरा उपाय चोरको सरकारका दण्डरूपी भय दिखाना और खुद भी उसे दण्ड देने में शरीक होना है। हमने इस तीसरे उपायका त्याग कर दिया है। पहला उपाय हमारा आदर्श है और दूसरा उपाय हम आजकल काममें ला रहे है। जहाँतक हो सके संग्रह कम किया जाये और जहाँतक अनिवार्य हो, उसकी चोरी वगैरासे रक्षा की जाये।
यह पत्र सबके लिए हो गया है, इसलिए शामकी प्रार्थनाके समय भी पढ़नेके लिए देना।
भोजनालायके भारसे घबरा न जाना। जो मदद चाहिए यह माँग लेना, परन्तु हारना मत। कोई काम हाथमें न लेना ठीक है परन्तु ले लें तो उसके लिए मरमिटना चाहिए। जो इतनी दृढ़तापूर्वक काम करता है उसकी भगवान अवश्य सहायता करता है। गजेन्द्र-मोक्ष और कच्छप-कच्छपीके भजनमें<ref>भोजा भगतका एक भक्तिपूर्ण भजन। जिसमें भगवानमें आस्थाके कारण कच्छप-कच्छपीके निस्तार की कथा है।</ref> यही सीख है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७०९) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-१०}}</noinclude>
rz3tif8v2vc08n5g21gl0m7mimlfker
673381
673378
2026-08-23T16:42:55Z
Sanjana Chowdhury
5438
673381
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५९. पत्र: आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>मौनवार, ११ नवम्बर, १९२९}}
{{left|बहनो,}}
इसके बाद तो अब मुझे पत्र लिखनेको एक ही सोमवार रह जायेगा।
यह रोज साबित होता जा रहा है कि हमारे यहाँ जो चोरियाँ होती रहती हैं, उनका कारण हमारी गफलत है। गफलत दो तरह की है: हम सावधान नहीं रहते और कई बार समझानेपर भी कोई गहने रखती है, तो कोई रुपया रखती है। चोर तो दुनिया में रहेंगे ही। उनसे बचने के तीन उपाय हैं: पासमें कुछ रखा ही न जाये, इतनी पूर्णता तो आ नहीं सकती। जितना रखें उतने के बारेमें खुद सावधान रहें; और तीसरा उपाय चोरको सरकारका दण्डरूपी भय दिखाना और खुद भी उसे दण्ड देने में शरीक होना है। हमने इस तीसरे उपायका त्याग कर दिया है। पहला उपाय हमारा आदर्श है और दूसरा उपाय हम आजकल काममें ला रहे है। जहाँतक हो सके संग्रह कम किया जाये और जहाँतक अनिवार्य हो, उसकी चोरी वगैरासे रक्षा की जाये।
यह पत्र सबके लिए हो गया है, इसलिए शामकी प्रार्थनाके समय भी पढ़नेके लिए देना।
भोजनालायके भारसे घबरा न जाना। जो मदद चाहिए यह माँग लेना, परन्तु हारना मत। कोई काम हाथमें न लेना ठीक है परन्तु ले लें तो उसके लिए मरमिटना चाहिए। जो इतनी दृढ़तापूर्वक काम करता है उसकी भगवान अवश्य सहायता करता है। गजेन्द्र-मोक्ष और कच्छप-कच्छपीके भजनमें<ref>भोजा भगतका एक भक्तिपूर्ण भजन। जिसमें भगवानमें आस्थाके कारण कच्छप-कच्छपीके निस्तार की कथा है।</ref> यही सीख है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७०९) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-१०|1em}}</noinclude>
arivi6be2rmiugi0j1j2w9rf61949lx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८४
250
196603
673386
668988
2026-08-23T16:49:17Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673386
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६०. पत्र: रमणीकलाल मोदीको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>११ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ रमणीकलाल,}}
इस चोरीने मुझे झकझोर दिया है। इसमें मुझे हम सबका दोष और ईश्वरकी कृपा दिखाई देती है। अपने दोषके बावजूद यदि हम संतुष्ट रहेंगे तो उसे में ईश्वरीय कोप मानूँगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति चौकीदारीके काम में बेवजह लापरवाह दिखाई दे उसे आश्रम छोड़कर चले जाना चाहिए। कितने ही काम ऐसे हैं जिनमें गफलत होनी ही नहीं चाहिए। जो वैद्य नमकके बदले संखियाकी पुड़िया देता है उसे वैद्यक करनी ही नहीं चाहिए; यह भी वैसी ही बात है। ऐसा लगता है कि चार बजे मी चौकीदारीकी जरूरत है। अपनी कोठरी में रुपया-पैसा न रखनेके नियमके बावजूद उसका उल्लंघन क्यों होता है? मुझे तो लगता है कि जो लोग आश्रमके सामान्य नियमोंको भंग करते हैं, उन्हें आश्रम छोड़ देना चाहिए। ऐसे लोगोंसे आश्रम छोड़नेके लिए कहने में मुझे दण्डकी भावना दिखाई नहीं देती; यह तो असहयोगका एक रूप है।
प्रबन्ध समिति ऐसा नियम बनाये या नहीं इस सम्बन्धमें तुम विचार कर लेना किन्तु मेरे मनोभावकी अभिव्यक्ति के रूप में उपर्युक्त अंश सभीको पढ़कर सुना और समझा देना। दस रुपये जानेकी बात उतनी नहीं चुभती जितनी यह बात कि हम अब भी इतने गाफिल हैं। यदि नाथजी वहाँ पहुँच गये हों तो इस मामलेमें उनकी राय भी लेना।
आसपास के गाँवोंमें हम नहीं पहुँच सके इसमें मुझे अपनी ही कमजोरी दिखाई देती है। हमारे ऐसा न कर सकने में हमारी कुशलताकी मी कमी है। हम किस प्रकार वहतिक पहुँच सकते हैं, इसके बारेमें भी विचार करना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४१४९ ) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
6gimcz5n3xwfg73g7tzt74kxc3bdggv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८५
250
196604
673390
668989
2026-08-23T16:55:47Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673390
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>११ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ गंगाबहन,}}
अब तो नाथजी आ गये होंगे। वे तुम्हें आश्वस्त करेंगे। मैं इस बातको समझ पा रहा हूँ कि तुम अपने निश्चयपर दृढ़ तो हो किन्तु शान्त नहीं हो।
अपने स्वास्थ्यको लातिर आवश्यक फल औषधिके रूपमें लेना। शरीरको तीर्थ-क्षेत्र समझकर उसकी सार-सँभाल करने में कोई पाप नहीं है; हाँ, उसे भोगकी वस्तु समझकर सहेजने में महापाप है। किन्तु तुम तो उससे मुक्त हो चुकी हो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजराती से]<br>'''बापुना पत्रो-६: गं स्व॰ गंगाबहेनने'''|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१६२. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर
११ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
मैंने बम्बईके पतेपर जो पोस्टकार्ड लिखा था, लगता है वह नहीं मिला। मालूम होता है कि तुम उससे पहले ही रवाना हो गई थी।
बम्बई में वजन बढ़े और आश्रम में घटे, यदि ऐसा ही होता रहा तो क्या तुम्हें आखिरकार आश्रम से ही अरुचि नहीं हो जायेगी?
आश्रमकी कीर्ति बम्बई में फैलानी उचित थी या अनुचित, यह तो अनुभव ही बता सकेगा। अभी तो आश्रमके दोष ही मेरी नजरके सामने घूमते रहते हैं। और मुझे तो वही अच्छा लगता है। हम अपने में दोष न देखकर गुण ही देखा करें तो यह समझ लेना चाहिए कि हमारी अवनति होनी शुरू हो गई है।
तैयारियोंके बारेमें वहाँ लोट आनेपर बातचीत करूँगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो-५: कु॰ प्रेमाबहेन कंटकने'''}}<noinclude></noinclude>
56xz1t9e5xbze0danmtk1h83vrtttpx
673391
673390
2026-08-23T16:56:10Z
Sanjana Chowdhury
5438
673391
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर<br>११ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ गंगाबहन,}}
अब तो नाथजी आ गये होंगे। वे तुम्हें आश्वस्त करेंगे। मैं इस बातको समझ पा रहा हूँ कि तुम अपने निश्चयपर दृढ़ तो हो किन्तु शान्त नहीं हो।
अपने स्वास्थ्यको लातिर आवश्यक फल औषधिके रूपमें लेना। शरीरको तीर्थ-क्षेत्र समझकर उसकी सार-सँभाल करने में कोई पाप नहीं है; हाँ, उसे भोगकी वस्तु समझकर सहेजने में महापाप है। किन्तु तुम तो उससे मुक्त हो चुकी हो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजराती से]<br>'''बापुना पत्रो-६: गं स्व॰ गंगाबहेनने'''|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१६२. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|शाहजहाँपुर
११ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
मैंने बम्बईके पतेपर जो पोस्टकार्ड लिखा था, लगता है वह नहीं मिला। मालूम होता है कि तुम उससे पहले ही रवाना हो गई थी।
बम्बई में वजन बढ़े और आश्रम में घटे, यदि ऐसा ही होता रहा तो क्या तुम्हें आखिरकार आश्रम से ही अरुचि नहीं हो जायेगी?
आश्रमकी कीर्ति बम्बई में फैलानी उचित थी या अनुचित, यह तो अनुभव ही बता सकेगा। अभी तो आश्रमके दोष ही मेरी नजरके सामने घूमते रहते हैं। और मुझे तो वही अच्छा लगता है। हम अपने में दोष न देखकर गुण ही देखा करें तो यह समझ लेना चाहिए कि हमारी अवनति होनी शुरू हो गई है।
तैयारियोंके बारेमें वहाँ लोट आनेपर बातचीत करूँगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो-५: कु॰ प्रेमाबहेन कंटकने'''|1em}}<noinclude></noinclude>
atw87sitmbb1l4qtns8cwerr3abhhdu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८६
250
196605
673406
668990
2026-08-23T17:22:27Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673406
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६३. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|मंगलवार [१२ नवम्बर, १९२९]<ref>अन्तिम अनुच्छेद में लखनऊका उल्लेख दोनेके आधारपर यह तारीख तय की गई है। इस तारीखको गांधीजी लखीमपुरमें थे जो लखनऊसे लगभग ८५ मील है।रायबरेली जाते हुए १३ तारीखको गांधीजी लखनऊ से गुजरे थे।</ref>}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारे पत्र मिले। मुझे यह ठीक जान पड़ता है कि जबतक तुम शारीरिक और मानसिक रूपसे स्वस्थ रहो तबतक बीजापुरमें ही रहो। इस प्रकार तुम वहाँ कुछ प्रचार-कार्य भी कर सकोगी और छगनलालको भी मदद मिलेगी। पीजने और पूनियाँ बनाने के काम में तुम जितनी मदद कर सको उतनी करना। यदि बीजापुरकी प्राथमिक पाठशाला में तुम कताईका काम शुरू करा सको तो वह भी कराना। यदि
सम्भव हो तो वहाँ के अच्छे परिवारोंसे हेलमेल बढ़ाना। किन्तु आखिर करना वही जो तुम्हारे मनको रुचे। जो व्यक्ति फिलहाल कातता नहीं उसे पिजाई मत सिखाना। काम कुछ जम जानेके बाद भले ही जो चाहे वह सीखे फिर उसे सिखाने में कोई
अड़चन नहीं है। धुनकी किसीको मुफ्त मत देना; कम कीमतपर देने में कोई हानि
नहीं है।
आज तो हम एक गाँवमें डेरा डाले हुए हैं। मीराबहन तथा अन्य लोगोंको लखनऊ में छोड़ आये है किन्तु कल फिर हम सब एकत्रित हो जायेंगे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९३७७) की फोटो-नकल से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१६४. पत्र: रमणीकलाल मोदीको'''}}}}
{{right|सीतापुर<br>१३ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ रमणीकलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। अपने अनुभवके आधारपर मैंने यह सिद्धान्त बना लिया है कि स्वार्थकी दृष्टिसे मनुष्यको पारमार्थिक कार्य करनेका विचार कभी नहीं करना चाहिए। स्वार्थ साधन करते हुए उसके द्वारा कभी-कभी परमार्थ भी हो जाता है किन्तु उसे ऐसे कार्यों को कदापि परमार्थमें नहीं गिनना चाहिए। क्योंकि ऐसे कार्यका पुण्य उसे नहीं मिलता। हालाँकि उसका पड़ोसी भले ही उसका फायदा उठाये। यह फायदा<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
bin00htr8g6v8luagidjm96r3rlgo73
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८७
250
196606
673410
668991
2026-08-23T17:32:35Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673410
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||पत्र: रमणीकलाल मोदीको|१४९}}</noinclude>तो उस कार्य विशेषकी उपयोगिताके कारण पहुँचता है, न कि कर्ताकी भलमनसाहत की वजहसे। उदाहरण के लिए, भंगी द्वारा पाखाना साफ करने में एक बड़ा परमार्थ निहित है किन्तु उक्त कार्यका पुण्यफल उसे नहीं मिलता क्योंकि उसके द्वारा वह अपनी रोजी कमाता है। किन्तु उसका कार्य उपयोगी होनेके कारण समाज उसका उतना ही लाभ उठा पाता है जितना कि किसीके द्वारा सेवाभावसे प्रेरित होकर मुफ्त में पाखाना साफ करनेसे होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति केवल शारीरिक रक्षाके लिए प्राणायाम आदि करता है उसे उतना ही फायदा पहुँचता है जितना कि स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। ऐसे प्राणायामसे उसकी आत्माको तनिक भी शान्ति नहीं मिलती। यह प्रस्तावना चोरोंके उपद्रवके बारेमें तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें है। पशुओं, गाँवोंकी सफाई तथा दयाई बाँटने आदिके सभी काम हम कर सकते थे। किन्तु यदि ये काम हम अब करना शुरू करेंगे तो उन्हें विशुद्ध स्वार्थ माना जायेगा और इससे हमें अपने कामका कोई यश नहीं मिलेगा। वास्तवमें शुरूसे ही यह काम करनेका हमारा विचार रहा है। हमें इसपर जमे रहना चाहिए और भविष्य में उसे पूरा करना चाहिए। चूँकि फिलहाल हमें अपना मतलब ही साधना है; अतः अपने कार्यक्रमकी घोषणा करते हुए हम गाँवोंतक जा सकते हैं। मैंने इस आशयका एक पत्रक तैयार किया था, जो छपा भी था किन्तु आश्रमवासियोंके अविश्वास, भीरुता और झूठी शर्मके कारण उसका प्रचार रोक देना पड़ा था। आज भी वही स्थिति है और मेरी राय अब भी वही है।
मैं तो यह मानता हूँ कि फिलहाल हमें लोगोंके बीच जाकर उन्हें अपनी बदकिस्मतीकी बात ही बतानी चाहिए और उनसे दयाकी भीख माँगनी चाहिए। यदि समय मिला तो मैं वैसा पत्रक फिर तैयार कर दूँगा अन्यथा वहाँ आकर तैयार करके दे दूँगा। फिर उक्त पत्रकका उपयोग करने या न करनेके बारेमें तुम सब विचार कर लेना। बहुत से लोगोंके शोर-गुलके बीच यह पत्र लिखवा रहा हूँ। अतः मैं अपनी बात पूरी तरहसे नहीं कह पा रहा हूँ। इसलिए जो बाकी रह जाये उसे तुम अपनी समझसे पूरा कर लेना।
चैकपर दस्तवत करनेके बारेमें तो मैं तुम्हें सोमवारको ही पत्र लिख चुका हूँ।
मेरे वहाँ लौटनेपर ही बाड़ लगानेके बारेमें पूछना; किन्तु यदि ऐसा लगे कि तबतक राह नहीं देखी जा सकती तो जो उचित जान पड़े वैसा करना।
मैंने पत्र समाप्त करनेके बाद उसे नहीं पड़ा है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|लखनऊ<ref>जान पड़ता है पत्र लखनऊ समाप्त हुआ था।
</ref>}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४१५०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
e50r9s1ind8gant0jhrp52xg07pjazj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८८
250
196607
673414
668992
2026-08-23T17:37:59Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673414
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६५. पत्र: हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}}
{{right|रायबरेली<br>१३ नवम्बर, १९२९}}
{{left|भाईश्री हरिभाऊ,}}
आपका पत्र मिला। यदि आप खुद आ सके होते तो अच्छा रहता। परन्तु अब यदि कोई जिम्मेदार प्रतिनिधि आ जाता है तो उसीसे काम चल जायेगा। सत्याग्रही बिलकुल पवित्र होना चाहिए। केवल तभी वह अजेय हो सकता है। जब हम मिलेंगे तब यदि आवश्यकता महसूस हुई तो इसपर और बातचीत करेंगे। मैं समझता हूँ कि यद्यपि आप साबरमती आश्रम नहीं आये, वर्धा तो जरूर ही आयेंगे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६०६३) की नकलसे।
सौजन्य: हरिभाऊ उपाध्याय
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१६६. पत्र: ईश्वरलाल जोशीको'''}}}}
{{right|रायबरेली<br>१३ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ ईश्वरलाल}}
तुम्हारा पत्र मिला। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि तुम्हारी अंग्रेजीकी पढ़ाई ठीक चल रही है। वहाँ सूत्र होशियारीसे अपना काम करना। मुझे नियमित रूपसे पत्र लिखते रहना। मुझे लिखना कि कौन-सी पुस्तकें पढ़ाई जा रही है? यदि तुम कापीपर लिखते हो तो ऐसी कोई भी कापी मुझे देखने को भेज देना ताकि मैं जान सकूँ कि तुम्हारी लिखावट कैसी है और तुम कैसी अंग्रेजी लिखते हो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२८१) से।
सौजन्य: ईश्वरलाल जोशी<noinclude></noinclude>
n695h6cjtk2i6r2h9lcwt72cy9tma84
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१८९
250
196608
673431
668993
2026-08-23T18:03:26Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673431
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१६७. तार: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}}
{{right|[१३ नवम्बर, १९२९ या उसके पश्चात्]<ref>यह वल्लभभाई पत्रके सन्दर्भसे, जिसपर ११ नवम्बर, १९२९ तारीख पड़ी थी और जो गांधीजीको १३ नवम्बर को मिला होगा।</ref>}}
{{left|अध्यक्ष पटेल<br>सरदार गृह<br>बम्बई}}
वल्लभभाईका पत्र<ref>देखिए परिशिष्ट ३; ११ नवम्बरको वल्लभभाईने एक तार भी भेजा था जो इस तरह था: “क्या विठ्ठलभाई, जिन्ना और मेरी मुलाकातकी व्यवस्था २४ तारीखको अहमदाबाद में अथवा २५ या २६ को बम्बई में आप करा सकते हैं। उत्तर अध्यक्ष पटेल, सरदार गृहके पतेपर तार द्वारा भेजें।</ref>
मिला। सह-हस्ताक्षरकर्ताओंको<ref>सर्वदलीय नेताओंके संयुक्त वक्तव्यके।</ref> १८ को बुलाया गया है। उनसे सलाह किये बिना वक्तव्य से अलग हटकर कुछ नहीं किया जा सकता है।
{{right|'''गांधी'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५५६९) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१६८. तार: मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|[१४ नवम्बर १९२९ या उसके पूर्व]<ref>इसके उत्तर में भेजे १४ नवम्बर के अपने सारमें मोतीलाल नेहरूने लिखा था: “एसोसिएटेड प्रेस और फ्री प्रेसके जरिये लालाजी स्मारक के लिए अपील जारी कर रहा हूँ।”</ref>}}
{{left|पण्डित नेहरू<br>लखनऊ}}
यदि १७ तारीखको पड़नेवाली लालाजीकी पुण्यतिथिके सम्बन्ध में कोई घोषणा नहीं की गई है तो कृपया इसे स्मारकके लिए पैसा इकट्ठा करके मनाने की घोषणा करें।
{{right|'''गांधी'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५५७०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
suj7yx3t9iv7djeyad1u83wa6n12xuc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१९०
250
196609
673444
668994
2026-08-23T18:25:09Z
Sanjana Chowdhury
5438
/* शोधित */
673444
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१६९. संवेदना'''<ref>इसी तरहकी एक टिप्पणी '''नवजीवन,''' २४-११-१९२९ में भी छपी थी।</ref>}}}}
सेठ नरोत्तम मोरारजीकी दुःखद मृत्यु हो जानेसे हमारे बीचम से एक व्यापारी उठ गया है। सेठ नरोत्तमजी में देशभक्ति और व्यापारिक महत्वाकांक्षा, दोनों बातें, एक साथ पाई जाती थी। पूँजीपति होते हुए भी वह मजदूरोंके साथ दयाका मनुष्यता का, व्यवहार करते थे। सिन्धिया स्टीम नेविगेशन कम्पनी खड़ी करनेमें उन्होंने जिस साहसका परिचय दिया था, उससे महत्वाकांक्षाके साथ उनकी देशभक्तिका भी परिचय मिलता है। उनका दान विशाल, विवेकपूर्ण और आधुनिक आवश्यकताओंके अनुकूल होता था। देशकी वर्तमान अवस्थामें इस सपूतके चल बसनेसे भारत माताको बड़ी क्षति पहुँची है। अब उनके कार्यका सारा बोझ उनके एकमात्र नौजवान पुत्रके सिर आ पड़ा है जो अभी उदीयमान ही है। लेकिन श्रीयुत शान्तिकुमार भी अपने स्वनामधन्य पिताके समान ही देशभक्त हैं और सम्भवतः अपने पिताके बहुसंख्यक कारखानों में काम करनेवाले मजदूरोंसे और भी अधिक प्रेम करते हैं। मैं उनके, उनकी बूढ़ी दादी माँ और दूसरे सब कुटुम्बियोंके प्रति हृदयसे संवेदना प्रकट करता हूँ
निकट सम्बन्धका मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' १४-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१७०. ग्राम-सुधार<ref>इसी विषयपर गांधीजीके लेख '''नवजीवन,''' २४-११-१९२९, १-१२-१९२९ और ८-१२-१९२९ में भी छपे थे।</ref>'''}}}}
आशा है कि पांच भागोंमें प्रकाशित लाला देशराजके लेखोंको<ref>ये लेख १७-१०-१९२९, २४-१०-१९२९, ३१-१०-१९२९ और ७-११-१९२९ के '''यंग इंडिया''' में प्रकाशित हुए थे। गांधीजी परिचयात्मक विचारोंके लिए देखिए “क्या यह ग्राम-सुधार है?”, १७-१०-१९२९</ref> न पाठकोंने सावधानीसे पड़ा और समझा होगा। मेरे विचारसे उनमें गुड़गाँव जिलेके भूतपूर्व डिप्टी कमिश्नर श्री ब्रेनके ‘गुड़गाँव कार्यक्रम’ नामसे मशहूर प्रयोगकी तटस्थ और निष्पक्ष आलोचना की गई है। ये लेख ‘यंग इंडिया’ में छप रहे थे, उस बीच मैने मि॰ ब्रेनकी ‘रोमेकिंग ऑफ विलेज इंडिया’ (ग्रामीण भारतका पुननिर्माण) नामक पुस्तक पढ़ी, जो उनकी मूल पुस्तक ‘विलेज अपलिफ्ट इन इंडिया’ (भारतमें ग्रामसुधार) का दूसरा संस्करण है। लाला देशराजके लेखोंसे हम इस नतीजेपर पहुँचते हैं कि गाँवोंके पुनर्निर्माणका गुड़गाँव जिलेका प्रयोग वास्तवमें असफल रहा। श्री ब्रेनके गुड़गाँवसे पीठ फेरते ही यहाँके लोग, जो उनकी प्रेरणा या दबायसे काम करते<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
smbszyvb84dfaeacec2jjs6jqk6e8x0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२९२
250
196711
673540
669096
2026-08-24T05:33:05Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673540
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२५९. तार : सरोजिनी नायडूको'''}}
{{Rh|||[ ६ दिसम्बर, १९२९ से पूर्व}}
वहाँके हमारे देशवासी किसी मी दशामें राष्ट्रीय सम्मानके
समझौता न करें।
{{Gap}}अंग्रेजी (एस० एन० १५५१८) की फोटो नकल से ।
{{C|'''२६०. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}
{{Rh|||गांधी}}
{{Rh|||अहमदाबाद}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>पण्डितजी नेहरू,
<Br>लखनऊ
{{Gap}}आपका तार मिला ।"
में
समझता हूँ । खयाल है
पूरा निभ जायेगा । यदि
कि
दिल्ली में अपनी उपस्थिति सर्वथा अनावश्यक
आपके उनसे मिलनेसे स्थितिका तकाजा
जरूरी हो तो वर्धा जवाब दीजिए ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
{{Gap}}मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल सं० - जी- १ ।
{{Gap}}सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय
{{Gap}}१. सरोजिनी नायडूने ६-१२-१९२९ से नैरोबी में हुई कांग्रेसकी अध्यक्षता की थी।
{{Rh|||गांधी}}
{{Gap}}२. ५-१२-१९२९ का तार; वह इस प्रकार था "आपका पत्र मिला। २३ तारीखके लिए वाइसरायका
नहीं है। उन्हें अब सूचित कर सकते
हमारे साथ खुलकर बातचीत सर्वया
मैं समझता हूँ कि केवल हम दोनों
निमन्त्रण मुझे खुद सपूके जरिए मिला और मैने स्वीकार कर लिया। वाइसरायका इरादा बहुत पहले ही
आपको भी छानेका था लेकिन उन्हें आशंका थी कि आपको फुर्सत
है कि आपका मिलना सम्भव उनका उद्देश्य कांग्रेसके विचारोंपर
भिन्न विचारोंवाले गैरकांग्रेसी लोगोंकी उपस्थितिसे लाभ नहीं होगा।
ही को उनसे मिलना चाहिए इसलिए विट्ठलभाईको तार नहीं दिया। अपने विचार तार द्वारा सूचित कीजिए।"
{{Gap}}३. ७-१२-१९२९ को तार जो इस प्रकार था "आपका तार मिला। समझता हूँ कि मुलाकात में
आपकी मौजूदगी जरूरी है विट्ठलभाई कल रात दिल्ली में मिल रहे है तार दूँगा।"<noinclude></noinclude>
tedq2g4e35b5ajlruhr0ctpf61j59to
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३००
250
196719
673541
669104
2026-08-24T05:37:16Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673541
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२६२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
है, तो एकाएक हम उसे अस्वीकार नहीं कर सकते। सफलता पाने योग्य शत पेश
करके अगर यह विश्वास किया जा सके कि उनका पालन हो सकेगा, और ऐसी
स्थिति पैदा हो जाये तो हम परिषद में भाग ले सकते हैं और ऐसी परिषद् में भाग
लेना सत्याग्रहीका धर्म होना चाहिए। सत्याग्रही समझौतेकी थोड़ी-सी भी सम्भावना
होने पर उसकी उपेक्षा नहीं करता।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, ८-१२-१९२९
{{C|'''२६८. पत्र : मथुरादास पु० गांधीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||८ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० मथुरादास,
{{Gap}}प्रतिदिनकी उपस्थिति आदिके बारेमें मैंने जो सुझाव दिये थे, आशा है तदनुसार
अमल किया जाता होगा। समय-समय पर मुझे सूचित करते रहना कि कैसा काम
चल रहा है ।
{{Gap}}मोतीबहनके दैनिक कार्यके बारेमें मुझे सूचित करना। उससे रोज डायरी
लिखवाना ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३७३४ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''२६९. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||८ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। जिसने पूरे वर्ष नियमित रूपसे दैनन्दिनी रखी हो ऐसा
व्यक्ति यदि चाहे तो वह पुस्तक भले ले ले। फिलहाल तो इतना ही काफी होगा
कि जैसी छोटी-सी पुस्तक में काममें लाता हूँ वैसी ही सब काम में लाने लगें । दैनन्दिनी
अच्छी तरह रखना भी तो एक कला है और इससे दैनन्दिनी रखनेवाले तथा आश्रम-
को बहुत लाभ पहुँचता है। दैनन्दिनी रखनेवाला उसमें कमसे कम शब्दोंमें अपनी
दिनचर्या तथा किये हुए कामोंका विवरण लिख सकता है।<noinclude></noinclude>
fkzw0xcpcloc6j4bcnxbg8h6f06xbsg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३०१
250
196720
673543
669105
2026-08-24T05:41:59Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673543
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||तार: विट्ठलभाई पटेलको|
२६३}}
{{Gap}}ताराके सम्बन्धमें मैने तुम्हें बारडोलीसे ही एक पत्र भेजा था । आप्टेके' पत्रके
साथ उक्त पत्र भेजा था।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१५६) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''२७०. पत्र : वी० ए० सुन्दरम्को'''}}
अ{{rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||९ दिसम्बर १९२९}}
<Br प्रिय सुन्दरम्
{{Gap}}आप अकसर बीमार क्यों पड़ जाते हैं ? आशा है
पनप रहा है। आप खाली पात्र किसीके द्वारा भेज दें।
बढ़ते रहने दें।
{{Gap}}अंग्रेजी (जी० एन० ३१७५ ) की फोटो नकलसे ।
कि बेबी मेरी ही तरह
पैसे आप अपने पास ही
{{Rh|||बापू}}
{{C|'''२७१. तार : विट्ठलभाई पटेलको'''}}
{{Rh|||अध्यक्ष पटेल,}}
{{Rh|||[९ दिसम्बर, १९२९ या उसके पश्चात् ] *}}
<Br>नई दिल्ली
{{Gap}}शनिवारको आपको लिखा था । मोतीलालजीने तार दिया है । वे
आपसे मिल रहे हैं ।
{{Gap}}अंग्रेजी (एस० एन० १५५७९ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||गांधी}}
{{Gap}}१. खादी कार्य की जानकारी हासिल करने के लिए कोल्हापुर से आये थे।
{{Gap}}२. यह विट्ठलभाईको ९-१२-१९२९ को मिले तारके उत्तर में भेजा गया था, जिसमें लिखा था
"बाइसरायको लिखनेके लिए आपके तारकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा कर रहा हूँ। समूने सहमति दे दी है।"
{{Gap}}३. इस पत्रका कथन विठ्ठलभाई पटेलने वाइसरायको अपने १२-१२-१९२९ के पत्र में इस तरह सूचित
किया था : " अब गांधीने मुझे लिखा है कि उन्हें मोतीलालका तार मिला है... और उन्हें (मोतीलालजीको)
आपका २३ दिसम्बरको मुलाकात करनेके लिए आमन्त्रण मिल चुका है; उसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है।
{{Gap}}उद्देश्य यह है कि आपसे केवल कांग्रेसियोंके साथ कांग्रेसके दृष्टिकोणकी चर्चा की जाये। गांधीने आगे कहा
है कि इन परिस्थितियोंमें इस मामले में मेरा आगे कुछ करना बिलकुल अनावश्यक है। इस पत्रके मिल्नेपर
मैंने इसकी एक प्रति तत्काल श्री जिन्नाको भेज दी और उन्हें सूचना देदी कि व्यवस्था विफल हो गई है।”
{{Gap}}विठ्ठलभाई पटेल : लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ० १०७२।<noinclude></noinclude>
ij407uf4zmv1b1g1am603iv8etrncq5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२०
250
196739
673457
669124
2026-08-24T02:00:20Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673457
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२८२|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
न? देवदर्शनकी इच्छुक अनेक पत्नियोंको आजकलके सुधारक पतियोंकी धुन जब
पसन्द न आती होगी तो वे बेचारी क्या करती होंगी ? उन्हें तो पतिको समझानेकी
हिम्मत तक न होती होगी। इसलिए इन पतिको और इनके समान दूसरोंको मैं
पहली सलाह तो यह देता हूँ कि वे जान-बूझकर अपना स्वामित्वका अधिकार छोड़
दें; पत्नीकी सेवा करते समय और शिक्षाके लिए शिक्षा देते समय वे अपने विकारोंको
भी वशमें रखें और फिर धैर्यके साथ उन्हें यह समझायें कि अन्धविश्वास, मन्दिरके
पुजारियोंपर आस्था रखना, तथाकथित प्रसिद्ध मन्दिरोंमें भटकना वगैरा फिजूल
है और ऐसा करना हानिकर भी हो सकता है। इस बारे में मुझे तनिक भी सन्देह
नहीं कि अगर पतिका प्रेम शुद्ध होगा तो पत्नी जरूर समझ जायेगी। जल्दीमें आम
नहीं पकते जब आम जैसे वृक्षके लिए वर्षोंकी सार-संभाल जरूरी है तो जिस स्त्रीरूपी
वृक्षको ज्ञानहीन रखा गया है, उसकी परवरिशमें कितनी और कैसी कोमलतापूर्ण
सार-संभाल आवश्यक होगी ? मेरा अपना अनुभव तो यह है कि इस तरह रोजरोज
सींचनेसे ही सन्तोष और सफलता मिल सकती है। एक बार कहनेपर अगर
बात गले न उतरे तो निराश होकर प्रयत्न करना नहीं छोड़ना चाहिए। उलटे
यह विश्वास रखना चाहिए कि रोजरोज इसी तरह सिंचाई करनेसे आखिर हृदय
अवश्य पिघलेगा। इस कारण मैं न तो जो हो चुका है उसे निभा लेनेकी और न
त्यागनेकी सलाह ही दे सकता हूँ। इस तरहका सम्बन्ध करके माता-पिताने जो मूल
की है, उसे ऊपर बताये अनुसार सुधार लेने में ही पुरुषार्थ है। पत्नीको धोखा देकर
त्याग देना और उसीमें सुख मानना तो आसान है; लेकिन न यह सच्चा सुख है और
न पुरुषार्थ और इसी कारण यह धर्म भी नहीं है। जिन्हें अपने देशकी कंगालीका
ज्ञान हो गया है, वे उसे छोड़ नहीं देते बल्कि उसकी कंगालीको मिटानेका मरते
दमतक प्रयत्न करते हैं; वे अनेक कष्ट सहते हैं, और केवल उसीमें सुख मानते हैं ।
अगर हम यह बात समझ जायें तो पत्नीके प्रति भी इसी तरहका बरताव करने
लगे। क्योंकि जो असुविधा और कष्ट इन किंकर्त्तव्यविमूढ़ पतिको है वही दूसरोंको
भी है, यह बात वे खुद कबूल करते हैं। अगर ऐसे सभी पति अपनी पत्नियोंको
छोड़ दें तो देशकी इन सभी स्त्रियोंकी क्या दशा होगी ? पति अगर नहीं संभालेगा
तो और कौन सँभालेगा ? आज पति और पत्नीके बीच जो असंगति दिखाई पड़ती
है, वह भी देशकी मौजूदा हालतकी एक निशानी है, यह सोचकर ही इस तरहके
fiedoविमूढ़ पतियोंको अपना मार्ग स्वयं ढूंढ लेना चाहिए। इस तरहकी समस्याओंको
सुलझाते-सुलझाते वे सहज ही स्वराज्यकी समस्याको हल करना सीख जायेंगे, जिससे
उन्हें और देशको दूना लाभ होगा ।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९<noinclude></noinclude>
717lxwjunkjxt8gg64gm330xyiws55f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२१
250
196740
673458
669125
2026-08-24T02:02:56Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673458
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२९१. टिप्पणियाँ'''}}
{{C|'''सत्ताके सामने सत्य पानी भरता है'''}}
{{Gap}}एक नवयुवक लिखते हैं:
{{Gap}}यह अच्छा सवाल पूछा गया है। सत्यके पालनमें ही शान्ति निहित है। सत्य
ही सत्यका पुरस्कार है। कीमती से कीमती वस्तु बेचनेवालेको जैसे उससे अधिक कीमती
वस्तु नहीं मिल सकती, वैसे ही सत्यवादी भी सत्यसे बढ़कर और किस वस्तुकी
कामना करेगा ? हरिश्चन्द्रको मैं अपवाद मानना ही नहीं चाहता, लेकिन यह कहना
भी गलत है कि हरिश्चन्द्र और धर्मराज आदि दुःखी रहे थे। उन्होंने दुःखमें सुख
माना था, और हम जिसे दुःख कहते हैं उन्होंने उसका स्वागत किया था। इसी कारण
भक्तकविने कहा है!
{{Gap}}नहि कायरनुं काम जोने। '
'हरिनो मारग शूरानो
{{Gap}}सत्य जहाँ सूर्यके समान ताप पहुँचाता है, तहाँ प्राणोंका सिंचन भी करता
है। एक घड़ीके लिए भी अगर सूर्य तपना बन्द कर दे तो यह सृष्टि जड़वत् बन
जाये, इसी तरह अगर सत्यरूपी सूर्य क्षणभरके लिए भी न तपे तो इस संसारका
नाश हो जाये। सच तो यह है कि जिस तरह शरीरके भीतरका मैल बाहर निकलता
ही रहता है उसी तरह हम झुठाईको भी संसारमें रात-दिन देखा करते हैं। परन्तु हम
यह कदापि न भूलें कि करोड़ों प्राणी स्वभावतः ही सत्यका उपयोग करते हैं। मेरा
अपना अनुभव तो निरपवाद है, और उससे पता चलता है कि मुझमें जो भी निर्मलता
रही हो उसका दुरुपयोग आखिर तक कोई नहीं कर सका है। इसके विपरीत जो
मेरी सत्यनिष्ठा से बेजा लाभ उठानेको तैयार हुए हैं उन्होंने अपनी प्रतिष्ठासे हाथ
धोये हैं तथा और भी बहुत कुछ खोया है। सत्य वचन, सत्य विचार और सत्य
आचारके कारण मुसीबतें आई है, लेकिन उनके कारण किसी दिन मुझे दुःखका
अनुभव नहीं हुआ। उनसे मुझे परम सुख और शान्ति ही मिली है। अपनी झुठाईका
एक उदाहरण मैंने संसारके सामने रखा है। वह जबतक मेरे भीतर रहा तबतक
रात-दिन मुझे वह कुतरकर खाता रहा था। निकाल कर जब में शुद्ध हुआ तभी
मुझे शान्ति मिली। अपने जीवनके ऐसे कुछ अन्य उदाहरण मुझे याद हैं। मैं तो
समझता हूँ कि दक्षिण अफ्रिकाके सत्याग्रहको आज मी सारी दुनिया जीत ही मानती
है। मालूम होता है, प्रस्तुत प्रश्नकर्त्ताको दक्षिण आफ्रिकाका कोई अनुभव नहीं है।
संसारके और मेरे अनुभवसे तो यही सीख मिलती है कि सत्ताके सामने सत्य पानी
नहीं भरता बल्कि सत्ताको ही हमेशा सत्यकी बेरी बनकर रहना पड़ता है ।
{{Gap}}२. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकका कहना था कि सत्यके मागैपर चलनेसे मानसिक
शान्ति नहीं मिलती।
{{Gap}}२. देखिए खण्ड ३९ १४ ५४-७१<noinclude></noinclude>
brne448kqnoej59namo9i9cr8jtlo0x
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२२
250
196741
673459
669126
2026-08-24T02:06:22Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673459
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२८४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{C|'''खादीका सूचीपत्र'''}}
{{Gap}}इस महीनेकी पहली दिसम्बरको श्री विठ्ठलदास जेराजाणीने 'खादी पत्रिका' के
steers रूपमें जो सूचीपत्र प्रकाशित किया है, मैं चाहता हूँ कि हरेक खादी-प्रेमी
उसे मँगाकर देखें । यह सूचीपत्र पुराने सूचीपत्रका नया संस्करण है। पुरानेके मुकाबले
इस नये सूचीपत्रमें जो प्रगति दिखाई देती है वहीं खादीके बारेमें भी लागू होती
है। इस संस्करणमें सुन्दर नये चित्र दिये गये हैं। इसमें हमें शाक-भाजीके थैले,
बगलझोले, बारडोली झोले और वर्मी ढंगके झोले वगैराका वर्णन मिलता है। खादीकी
टोपीको धोका सही और गलत तरीका बतलानेवाले चित्र देखने योग्य हैं। सही
तरीकेसे टोपीको ज्यादा टिकाऊ बनाया जा सकता है, और उसका आकार ज्योंका
त्यों बना रहता है। खादीकी टोपी पहननेवाला अगर उसे साफ नहीं रखता और
मैली होने देता है तो वह अपनी और खादीकी प्रतिष्ठा गवाता है। चित्रोंको देखते
ही यह तुरन्त मालूम हो जाता है कि खादीकी टोपीको धोना बिलकुल आसान काम
है । खादी टोपीके बारेमें यहाँ इतना और कह दूँ कि श्री दयालजीने आवश्यक लम्बाईवाले
खादी के एक टुकड़ेसे जब मनमें आये तब वगैर सिये टोपी बनानेका एक तरीका
हूँ निकाला है जो मुझे बहुत पसन्द आया है। मैं चाहता हूँ कि अगले सूचीपत्र में
इसका भी विवरण दे दिया जाये। इससे धुलाई सुविधा होती है और सिलाईका
खर्च भी बच जाता है। लेकिन इस सूचिपत्रकी सबसे अधिक आकर्षक बात तो उसमें
दिया गया निम्न आश्वासन है।
{{Gap}}ऊपर जो गारंटी दी गई है, वह अन्य विज्ञापनों में दी जानेवाली गारंटी के समान
झूठी नहीं है। मुझे मालूम है कि इस तरहके खरीदारोंने अपने पैसे वापस पाये हैं।
इसके सिवा इस सूचीपत्रमें और भी कई जानने योग्य बातें मिलेंगी; जैसे पुराने
कश्मीरी कपड़ेको नया-सा बनानेकी तरकीब, ऊनी कपड़े धोनेकी रीति, ऊनी कपड़ेको
सँभालनेका तरीका और इसी तरहकी अन्य जानकारी तथा सूचनाएँ इस पत्रकसे मिल
सकती हैं।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{Gap}}१. इसपर एक छोटी-सी टिप्पणी यंग इंडिया २१-११-१९२९ के अंक भी प्रकाशित हुई।
देखिए सचित्र खादी तालिका", २१-११-१९२९ ।
{{Gap}}२. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude>
0qroz9o9faxt952jqbsymuse29kay6n
673460
673459
2026-08-24T02:06:58Z
Lado Shaw
6039
673460
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२८४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{C|'''खादीका सूचीपत्र'''}}
{{Gap}}इस महीनेकी पहली दिसम्बरको श्री विठ्ठलदास जेराजाणीने 'खादी पत्रिका' के
steers रूपमें जो सूचीपत्र प्रकाशित किया है, मैं चाहता हूँ कि हरेक खादी-प्रेमी
उसे मँगाकर देखें । यह सूचीपत्र पुराने सूचीपत्रका नया संस्करण है। पुरानेके मुकाबले
इस नये सूचीपत्रमें जो प्रगति दिखाई देती है वहीं खादीके बारेमें भी लागू होती
है। इस संस्करणमें सुन्दर नये चित्र दिये गये हैं। इसमें हमें शाक-भाजीके थैले,
बगलझोले, बारडोली झोले और वर्मी ढंगके झोले वगैराका वर्णन मिलता है। खादीकी
टोपीको धोका सही और गलत तरीका बतलानेवाले चित्र देखने योग्य हैं। सही
तरीकेसे टोपीको ज्यादा टिकाऊ बनाया जा सकता है, और उसका आकार ज्योंका
त्यों बना रहता है। खादीकी टोपी पहननेवाला अगर उसे साफ नहीं रखता और
मैली होने देता है तो वह अपनी और खादीकी प्रतिष्ठा गवाता है। चित्रोंको देखते
ही यह तुरन्त मालूम हो जाता है कि खादीकी टोपीको धोना बिलकुल आसान काम
है । खादी टोपीके बारेमें यहाँ इतना और कह दूँ कि श्री दयालजीने आवश्यक लम्बाईवाले
खादी के एक टुकड़ेसे जब मनमें आये तब वगैर सिये टोपी बनानेका एक तरीका
हूँ निकाला है जो मुझे बहुत पसन्द आया है। मैं चाहता हूँ कि अगले सूचीपत्र में
इसका भी विवरण दे दिया जाये। इससे धुलाई सुविधा होती है और सिलाईका
खर्च भी बच जाता है। लेकिन इस सूचिपत्रकी सबसे अधिक आकर्षक बात तो उसमें
दिया गया निम्न आश्वासन है।
{{Gap}}ऊपर जो गारंटी दी गई है, वह अन्य विज्ञापनों में दी जानेवाली गारंटी के समान
झूठी नहीं है। मुझे मालूम है कि इस तरहके खरीदारोंने अपने पैसे वापस पाये हैं।
इसके सिवा इस सूचीपत्रमें और भी कई जानने योग्य बातें मिलेंगी; जैसे पुराने
कश्मीरी कपड़ेको नया-सा बनानेकी तरकीब, ऊनी कपड़े धोनेकी रीति, ऊनी कपड़ेको
सँभालनेका तरीका और इसी तरहकी अन्य जानकारी तथा सूचनाएँ इस पत्रकसे मिल
सकती हैं।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{Gap}}१. इसपर एक छोटी-सी टिप्पणी यंग इंडिया २१-११-१९२९ के अंक भी प्रकाशित हुई।
देखिए सचित्र खादी तालिका", २१-११-१९२९ ।
{{Gap}}२. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude>
mbpbdfd4c7fe59rjzw38o6c4mlr5rcd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२३
250
196742
673462
669127
2026-08-24T02:10:13Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673462
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२९२. मिल मजदूरोंकी माँग'''}}
{{Gap}}अहमदाबादके मिल मजदूरोंकी सब माँगे सरपंच श्री कृष्णलाल झवेरी कबूल
नहीं कर सके, यह देख कर मुझे दुःख और आश्चर्य दोनों हुए हैं। मैं तो आज
भी यह मानता हूँ कि उनकी तमाम मांगे मंजूर होनी चाहिए थी, लेकिन वे कबूल
नहीं की गई इस बातका मुझे दुःख है, और आश्चर्य इस कारण होता है कि सरपंचके
फैसले में नामंजूरीकी कोई वजह नहीं दी गई है। किन्तु मजबूत महाजनोंकी ओरसे
पेश किये गये सिद्धान्तको सरपंचने पूर्णतः मंजूर किया है और वह सिद्धान्त इस
प्रकार है अपने गुजारेके लिए आवश्यक वेतन पाने और माँगनेका मजदूरोंको पूरा
हक है। साथ ही सरपंचने मजदूर महाजनों द्वारा पेश किये गये आंकड़ोको भी स्वीकार
किया है। श्री कृष्णलाल झवेरी कहते हैं कि मजदूर परिवारकी औसत मासिक
आमदनी ४० रुपये से अधिक नहीं है, और उसका माहवारी खर्च ५० रुपये से कम
नहीं है। सरपंच महोदय यह भी मंजूर करते हैं कि मजदूर महाजनों द्वारा दिये गये
खर्चके आंकड़ोंमें, खचकी कुछ जरूरी मदें अर्थात् जन्म-मरणके अवसरोंपर होनेवाला
खर्च, नहीं दिया गया है। इसके अतिरिक्त सरपंच यह भी कहते हैं कि मिलोंको
अपने मूलधनमें घाटा नहीं सहना पड़ा है।
{{Gap}}मेरी दृष्टिमें तो घाटा उसीको कहा जा सकता है जब पूंजी में से रकम निकालनी
पड़े। कम मुनाफा लेनेवालोंको नुकसान नहीं उठाना पड़ता। कम मुनाफा मजदूरोंकी
मजदूरी घटानेका कारण कभी नहीं होना चाहिए। यह तो तभी हो सकता है जब
मजदूर भी भागीदारोंकी तरह ही और उसी हदतक मालिक बन जायें। यदि हमारे
विचार संकुचित न हों तो हम आसानीसे यह समझ सकते हैं कि भागीदारोंकी
बनिस्बत मजदूरोंको ही स्वामित्वका ज्यादा अधिकार होना चाहिए। भागीदार तो पैसा
देकर अलग हो जाता है; मगर मजदूर रोज अपना पसीना बहाता है और अगर
वफादार हुआ तो कभी पृथक हो ही नहीं सकता। भागीदारके बिना मिल चल सकती
है, मगर मजदूर न हों तो मिल चलाना नामुमकिन है। कोई कह सकता है, चूंकि
मजदूर बुद्धिहीन होता है, इसलिए अगर वह मालिक बना तो मिलका सत्यानाश
कर डालेगा। लेकिन यह कहना निराधार है। सभी भागीदार बुद्धिमान नहीं होते।
उनके मन और बुद्धिकी कोई जाँच भी नहीं करता। फिर भी भागीदारोंको मताधिकार
प्राप्त है, और मिलोंका काम चल सकता है। मेरी अपनी तो यह राय है कि अगर
मजदूरोंको भी मालिकोंके अधिकार मिल जायें तो मिलोंका काम और भी अच्छी
तरह पले । अमेरिकामें जो थोडेसे अरवपती इस तरहके प्रयोग कर रहे हैं उसका
अनुभव भी मेरे विचारोंका समर्थन करता है। अगर मजदूरोंको आजीविकाके सिवा
अपनी हालतको सुधारने या अच्छा बनाने योग्य मजदूरी मिलती हो तो ऐसी किसी
स्थितिकी कल्पना की जा सकती है जब उसमें कुछ कभी करना आवश्यक हो
जाये। जिस तरह मालिककी पूंजीपर हाथ डालना अनुचित है उसी तरह मजदूरकी<noinclude></noinclude>
gor9o8jjthiab6kay32kjhsj4m4z4nj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२४
250
196743
673463
669128
2026-08-24T02:12:29Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673463
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२८६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
गुजर-बसरके लायक मजदूरीको घटाना भी अनुचित है। इस मामले में सबसे अच्छी
बात तो यह होगी कि पंच हरसाल अनाज वगैराके भावोंके आधारपर मजदूरोंकी
आजीविका योग्य मजदूरी ठहरा दें और जिस तरह भागीदारोंको ब्याज मिलता है
उसी तरह और उसी अनुपात में मजदूरोंको भी प्रति वर्ष तरक्की दी जाये। इस
तरक्कीमें व्याजके अनुसार घट-बढ़का होना में बिलकुल उचित समझता हूँ। लेकिन
यहाँ तो में विषयसे बाहर चला गया ।
{{Gap}}सरपंचने अपने फैसलेमें कहा है कि
लाभ हो रहा है। ऐसी दशा में १९२३ में
१९२३ की अपेक्षा आजकल मिलोंको अधिक
मजदूरीकी जो दर घटाई गई थी उसे पूरी
न करनेका कोई उचित कारण दिख नहीं पड़ता। हाँ, सरपंचने एक बात जरूर कही
है। उनका कहना है कि १९२३ में जो मजदूरी घटाई गई थी वह अनुचित मानी गई
है, लेकिन यह ठीक नहीं है। उन दिनों लड़ाईके दिनोंकी अपेक्षा मिलोंकी हालत
गिरी हुई थी, इस बात से तो मजदूरोंने मी नहीं इनकार किया है। लेकिन उस साल
मिलोंकी पूंजीपर हाथ नहीं डालना पड़ा था। किसी मिल विशेषकी ऐसी स्थिति
साबित भी कर दी जाये तो भी सिर्फ उसके कारण पूरे मिल उद्योगके लिए वही
बात नहीं कही जा सकती। इसलिए आजीविका योग्य मजदूरी देनेके सिद्धान्तको स्वीकार
कर लेनेपर और यह मान लेनेपर कि मजदूरोंको उतनी मजदूरी नहीं मिलती है,
मेरी नाकिस राय में सरपंचके पास इस बातका कोई कारण न था कि यह मजदूरोंको
पूरे पन्द्रह फीसदी दिलानेका निर्णय क्यों न कर सके। यहाँ यह याद रखना चाहिए
कि पूरे पन्द्रह फीसदी मिलनेपर भी मजदूरी गुजर-बसर योग्य नहीं होती। आजीविकाके
लिए आवश्यक रकम तुरत ही पानेकी माँग पेश न करके मजदूर संघने विवेकका
परिचय दिया है।
{{Gap}}इस तरह मैं मानता हूँ कि मजदूरोंके साथ पूरा न्याय नहीं किया गया है फिर
मी श्री कृष्णलाल झवेरीके लिए तो मेरे हृदयसे धन्यवाद ही निकलता है। उन्होंने
इस कामके लिए जो भी परिश्रम किया, सव ईश्वर-प्रीत्यर्थ था। फिर भी उन्होंने
अपनी ओरसे कोई बात उठा न रखी। उन्होंने सावधानी के साथ सारे मामले की जांच
की थी। जांचके समय उनकी ओरसे एक दिनकी भी ढिलाई नहीं की गई; और
उनके काम में मुझे केवल निष्पक्षताका ही अनुभव हुआ है। इसलिए उन्होंने तो जिसे
न्याय समझा है उसे न्याय ही कहा है। इससे अधिककी कोई आशा भी नहीं रख
सकता। सबको समान रूपसे सन्तुष्ट करना मनुष्य जातिकी शक्तिसे परे है। वह तो
इस बात की कोशिश भर कर सकता है। सरपंच के फैसले में हम उक्त प्रयत्नको स्पष्ट
देख सकते हैं।
{{Gap}}अतएव मजदूरोंने कृतज्ञतापूर्वक सरपंचके फैसलेको स्वीकार करके ठीक ही किया
है। मजदूरोंका क्या कर्तव्य है यह में उनके लिए लिखी गई विशेष पत्रिकामें बता
चुका हूँ। मिल मालिकों और मजदूरोंके संघने पंच फैसलेको कबूल किया है, इस
कारण उसे मन, वचन और कर्मसे पूरी तरह मानना दोनोंका धर्म है ।
{{Gap}}१. देखिए "अपील अहमदाबाद के मजदूरोंसे ", ७-१२-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
9cfluuuadmovn46suwhikeytqsq6o0w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२५
250
196744
673464
669129
2026-08-24T02:14:09Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673464
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||मिल मजदूरोंकी मांग|
२८७}}
{{Gap}}और इसीलिए में मिल मालिकोंको भी धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने सरपंचके
फसलेको कबूल करनेका प्रस्ताव किया है। मैं देखता हूँ कि उनके द्वारा असन्तोष
प्रकट किया जा रहा है। में इस असन्तोषको समझ नहीं सका। मैं यह भी नहीं
समझ पाया कि उसके कारण मिल उद्योगको क्योंकर हानि पहुँचेगी। अगर सरपंच
द्वारा स्वीकृत आजीविका योग्य मजदूरीके सिद्धान्तको मिल मालिक मी मंजूर करते
हों और वे ऐसा करनेको बँधे हुए हैं- तो उन्हें यह जानकर खुश होना चाहिए
कि उन्हें लगभग बीस लाख रुपयोंकी बचत हुई है। और आजसे ही उन्हें ऐसी तैयारी
शुरू कर देनी चाहिए जिससे वे मजदूरोंको जल्दी से जल्दी निर्वाहके योग्य मजदूरी दे
सकें। उन्हें समझ लेना चाहिए कि यथासमय मजदूर इतनी तरक्कीके लिए अपनी
माँग जरूर पेश करेंगे । अतएव मिल मालिकोंका बड़प्पन तो इसीमें है कि वे उनकी
air पहले ही बढ़तीकी रकम तय कर लें और दे दें। सरपंच द्वारा ठहराई हुई
रकम - - औसत माहवार तनख्वाह ४० रु० और खर्च ५० रु० उन्हें मंजूर न हो तो
वे बारीकीसे इन आंकड़ोंकी जांच कर लें। अगर वे शुरुआत ही अनिच्छासे करेंगे
तो दोनों पक्षोंमें मित्रता बढ़नेके बदले मनमुटाव ही बढ़ेगा ।
{{Gap}}पंचके निर्णयको मान लेनेपर मित्रता और पारस्परिक विश्वास बढ़ना चाहिए।
और इस विश्वासको बढ़ाने के लिए पंच या सरपंचके फैसलेपर दोनों पक्षोंको अधूरे
मनसे नहीं, बल्कि शुद्ध भावसे अमल करना चाहिए। इस बारे में मजदूरोंकी ओरसे
यदि थोड़ी भी गफलत हो गई हो तो मजदूरोंको उसे दूर कर लेना चाहिए । सो
तो साफ ही है कि मिलमालिकोंकी ओरसे लापरवाही बरती जाती है। पानी, मकान
वगैराका इन्तजाम करनेकी बात मालिकोंने कबूल की हैं, लेकिन इस सम्बन्धमें
बहुत-सी मिलों में अबतक कुछ भी नहीं हुआ है। हालांकि इन बातोंका उल्लेख पंचने
अपने फैसले में भी किया है, फिर भी मालिक लापरवाही कर रहे हैं। लेकिन मुझे
उम्मीद है कि यह शिकायत समय रहते दूर हो जायेगी ।
{{Gap}}एक दूसरी बातका विचार भी समय रहते ही हो जाना जरूरी है। सेठ
मंगलदासको और मुझे अब छुट्टी मिलनी चाहिए। मैं बूढ़ा हो गया हूँ और मैं मानता
हूँ कि मेरे साथीको भी अपने बारे में यही लगता होगा। मेरी समझमें अब दूसरे
पंच नियत करना आवश्यक है। मुझे लगभग हमेशा दौरेपर रहना पड़ता है, फिर
भी मुझपर कृपा करके सेठ मंगलदास और मजदूर-महाजनोंने मेरी सुविधाका सदा
खयाल रखा है। सरपंचकी ओरसे भी मुझे इसी तरह की सुविधा मांगनी पड़ी थी।
मेरी दृष्टिमें यह दयनीय स्थिति थी। मैं जानता हूँ कि मेरा कर्तव्य सरपंचकी सुविधा-
का खयाल रखना और वे जहाँ होते वहाँ उनके पास जाना था, लेकिन मेरी प्रतिकूल
स्थितिको उन्होंने निभा लिया और खुद परेशानी उठाई। लेकिन रोज-रोज यों नहीं
निम सकती। मजदूरोंकी छोटी-छोटी शिकायतें भी नियमानुसार और फौरन ही सुनी
जानी चाहिए। और इसके लिए स्थानिक पंच अनिवार्य है। मौजूदा पंचोंको शोभा
या 'अपील कोर्ट के रूपमें रखना चाहें तो भले रखें। यह कोई जरूरी नहीं है कि
दो आदमी ही नियुक्त होने चाहिए। अहमदाबादमें रहनेवाले एक ही निष्पक्ष व्यक्तिको<noinclude></noinclude>
0hqnfl7qoyaosa45i6sn4j1gcy0lwer
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२६
250
196745
673465
669130
2026-08-24T02:16:26Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673465
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२८८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
ढूंढ़ निकालना मुश्किल नहीं होना चाहिए। ईश्वर प्रीत्यर्थं इतना समय देकर काम
करनेवाला यदि कोई स्त्री या पुरुष न मिल सके तो मेरे विचारमें वेतन देकर किसी
व्यक्तिको नियुक्त करना भी लाभप्रद होगा। यह भी कोई आवश्यक नहीं कि पंच
पुरुष ही हों। अहमदाबादके सौभाग्य से हमारे यहाँ ऐसी सुशिक्षित बहनें भी हैं जो
सेवा कर सकती हैं, निष्पक्ष रह सकती है और मामले को समझ सकती हैं। और मैं
समझता हूँ कि उनमें से किसी एकको सहज ही चुना जा सकता है। अभी तो ये
सब बातें दोनों पक्षोंके सामने सूचनार्थ रखता हूँ। भारतके औद्योगिक केन्द्रोंमें बम्बईके
बाद दूसरा नम्बर अहमदाबाद ही आता है। इसलिए अगर अहमदाबादका उद्योग
स्थिर बन सके, पूँजी और मजदूरी, मालिकों और मजदूरोंके बीच निर्मल सम्बन्ध
स्थापित किया जा सके तो यहाँका उदाहरण सारे भारतके लिए अनुकरणीय बन
सकता है। इस कार्यमें खास जिम्मेदारी मालिकोंपर है। क्या वे उसे पूरा करेंगे ?
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{C|'''२९३. स्त्रियोंकी दुरावस्था'''}}
{{Gap}}एक काठियावाड़ी भाईने अपना नाम और पता देते हुए अपने पत्र में दो स्त्रियोंके
विषयमें लिखा है। उनका पत्र संक्षेपमें नोचे देता हूँ :
{{Gap}}ये बातें इतनी विस्तारके साथ कही गई है कि इनमें अतिशयोक्ति होनेका डर
नहीं रहता। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इस तरह की दर्दनाक हालत में फँसी हुई
बहन क्या करें ऐसी अधिकतर स्त्रियां खुद असहाय होती हैं। अर्थात् उन्हें अपने
अधिकारोंका ज्ञान नहीं होता, और अगर होता भी है तो वे बेचारी यह नहीं जानतीं
कि ऐसे मामलों में क्या किया जा सकता है। मुमकिन है कि वे यह भी जानती
हों; तथापि वैसे उपायोंसे काम लेने में वे अपनेको असमर्थ पाती है। इसलिए
सगे-सम्बन्धियोंकी सहायता मिलनेपर ही उनका उद्धार हो सकता है। प्रस्तुत पत्र लेखकने
जिस लेant जिक्र किया है, वह समझदार और समर्थ स्त्रियोंके लिए लिखा गया
था। इन दो बहनोंको अगर कानूनकी सहायता मिल सकती हो तो उससे लाभ उठाना
चाहिए। स्थानीय लोकमत बनाया जा सके तो बनाना चाहिए, धन या राज्यसत्ताकी
प्रतिष्ठा से चौंधिया जानेकी जरा भी जरूरत नहीं है। ऐसी स्त्रियोंको आश्रय देनेवाले
महिलाश्रम भी आजकल गुजरात में मौजूद हैं। उन्हें वहाँ रखकर शिक्षित और
स्वावलम्बी बनाने का प्रयत्न भी साथ-साथ करना चाहिए। अकसर झूठी लोकलाज के
{{Gap}}१. पत्र यहां नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने अपने पत्र धनवानों की पत्नियों अपने विरासत के
हक छोड़ दे, गोपोजीके कथनको पढ़कर दो सम्पन्न पतियों द्वारा परित्यक्त उनकी पत्नियोंकी दशाका वर्णन
किया था। इस समाचारके खण्डनके लिए देखिए " पत्र-लेखकोंसे ", २३-२-१९३० ।
{{Gap}}२. देखिए "स्त्रियोंका स्थान, २७-१०-१९२९<noinclude></noinclude>
bqzjktqf9i30vkd43qyl8rua6v3a8zf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२७
250
196746
673466
669131
2026-08-24T02:19:28Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673466
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||महीन खादी पहनेवालोंसे|
२८९}}
कारण ऐसे अन्यायोंपर पर्दा डाल दिया जाता है। लेकिन मेरी दृष्टिमें यह अनावश्यक
और अनुचित है। बहुतेरे अन्याय और दुराचार ऐसे हैं जो प्रकाशमें आते ही समाप्त
हो जाते हैं।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{C|'''२९४. झूठी खबर'''}}
{{Gap}}'नवजीवन के एक पाठकने किसी मासिकसे काटकर निम्न कतरन भेजी है :
{{Gap}}हालांकि हम दोनों पति-पत्नी वैष्णव सम्प्रदायके हैं, तो भी लगभग पैतीस
वर्ष पूर्व जबसे हमारा सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ है तबसे मेरी पत्नी कभी किन्हीं
महराजके दर्शनार्थं गई हों, यह बात हममें से किसीको याद तक नहीं आती। मेरी
समझ में नहीं आता कि लेखकने यह खबर देनेकी हिम्मत कैसे की होगी। मैं खुद
किसीके पैर छूने की बात में श्रद्धा नहीं रखता। फिर भी अगर इस भावनाका पोषण
करना उचित हो तो ऐसे व्यक्तियोंके ही चरण-स्पर्श करने चाहिए जो अपने उच्च
चरित्रके कारण प्रसिद्ध हो चुके हैं। साम्प्रदायिक महाराजोंके वंशमें उत्पन्न हर व्यक्ति
गुरुदेवके समान है, यह बात मेरे गले कभी उतर ही नहीं सकी ।
<Br>[ गुजराती से ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{C|'''२९५. महीन खादी पहननेवालोंसे'''}}
{{Gap}}मुझे दुःखके साथ कहना पड़ता है कि आन्ध्रदेशकी मशहूर महीन खादीके बारेमें
बहुत धोखाधड़ी चल रही है। जिस तरह मन्दिरके पुजारी मन्दिरकी चीजोंको चुराते
हुए नहीं डरते उसी तरह दरिद्रनारायणको प्रसादी-रूप खादीके बारेमें दरिद्रनारायणके
संरक्षक चोरी करते नहीं झिझकते । खादीके नामपर विलायती सूतका महीन कपड़ा
बेचते उन्हें जरा भी शर्म नहीं आती । चरखा संघको खबर मिलते ही उसने इस
मामले में सख्ती से काम लिया ही है लेकिन महीन खादी पहननेवालोंके लिए भी संघकी
मदद करना जरूरी है। जिस थानपर चरखा संघकी मुहर न हो, और जो थान
प्रमाणित खादी भण्डारका न हो, उसे उन्हें छूना भी न चाहिए। जिन्हें प्रमाणपत्र
प्राप्त भण्डारोंकी नामावलीकी जरूरत हो वे एक आनेका टिकट भेजकर चरखा संघके
मन्त्रीसे उक्त सूची मँगा सकते हैं। शुद्ध किन्तु महीन खादी पहननेकी इच्छा
{{Gap}}१. पत्र और कतरन पा नहीं दी जा रही है। पत्र टेकने गांधीजीसे इस सूचना के बारेमें अपना
मत व्यक्त करनेका अनुरोध किया था कि कस्तूरवाने किन्हीं महाराजके चरण-स्पर्श किये थे।
<Br>४२-१९<noinclude></noinclude>
d0j4qe4zz8kptt34o2waci3wsb5rvdt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२८
250
196747
673517
669132
2026-08-24T04:51:23Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673517
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२९०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
रखनेवालोंका धर्म है कि वे इतना कष्ट उठायें। जो बाहरी दिखायेके लिए नहीं
लेकिन स्वराज्यके लिए, भूखों मरनेवालोंके लिए खादी पहनना चाहते हैं उन्हें जबतक
खादीकी शुद्धताका विश्वास न हो जाये तबतक सन्तोष नहीं करना चाहिए। ऐसे
स्त्री-पुरुषोंको शुद्ध खादीकी जांच करनेका तरीका भी जान लेना चाहिए।
<Br][ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{C|'''२९६. देहातकी बीमारियाँ'''}}
{{Gap}}लोक शिक्षाका विचार करते समय किताबी ज्ञानकी आवश्यकताको बहुत ही
गौण स्थान मिलता है। यों कहा जा सकता है कि जीवनके खास खास अंगोंके लिए
किताबी ज्ञानका कोई स्थान ही नहीं है। मोक्ष हमारी अन्तिम स्थिति है। इससे
कौन इनकार करेगा कि इहलोक और पारलौकिक मोक्षके लिए पोथी पण्डित होना
जरूरी नहीं है करोड़ोंके साक्षर हो जानेको आधार मानकर अगर हम स्वराज्य
प्राप्तिकी राह देखते बैठे रहें तो स्वराज्य पाना लगभग नामुमकिन ही हो जायेगा ।
और यह तो कोई नहीं बता पाया कि दुनियाके बड़े-बड़े शिक्षक, जैसे कि ईसामसीह
वगैरा, साक्षर थे या नहीं ।
{{Gap}}इस लेखमालाकी कल्पना में किताबी ज्ञानका स्थान आखिरी है। वह साधन है,
साध्य नहीं। यह तो दुनिया जानती है कि साधनके रूपमें उसका बहुत-कुछ उपयोग
है। लेकिन काम-धन्धे में लगे हुए बड़ी उम्रवाले करोड़ों किसानोंके लिए जिस ज्ञानकी
बहुत जरूरत है, उसका विचार करनेसे हमें मालूम होता है कि ऐसी कई बातें हैं
जिनका ज्ञान उन्हें अक्षरज्ञानसे पहले ही हो जाना चाहिए। श्री ब्रेनकी पुस्तकके कुछ
अशोंका जो सारांश मैंने दिया है उससे भी हम इसी नतीजेपर पहुँचते हैं।
इस बातको खयाल में रखकर हम गाँवोंकी सफाईका विचार कर चुके हैं। पिछले
अध्यायोंमें जिन सुधारोंका जिक्र किया गया है, किसान उनका ज्ञान तुरन्त प्राप्त कर
सकते हैं। इस जानकारीको पानके मार्गमें जो रुकावट है, सो तो सच्चे शिक्षकोंकी कमी
और किसानोंका आलस्य है ।
{{Gap}}आज हम गाँवोंकी मामूली बीमारियोंपर विचार करेंगे। गाँवोंमें रहनेलाले सब
साथियोंका यही अनुभव है कि आम तौर पर बुखार, कब्जियत और फोड़ा-फूंसो
ही गाँवके रोग है । और भी कई बीमारियां होती हैं लेकिन आज उनपर विचार
करनेकी जरूरत नहीं। जिन रोगोंके कारण किसानोंके काम में रुकावट पड़ती है, सो
तो ऊपर बताये गये तीन रोग है। इन रोगोंका घरेलू इलाज जान लेना किसानोंके
लिए बहुत जरूरी है। इन रोगोंकी उपेक्षा करके हम करोड़ों रुपयोंका नुकसान उठाते
{{Gap}}१. यह नवजीवनके क्रोडपत्र शिक्षण अने साहित्य में प्रकाशित हुआ था।
{{Gap}{२. देखिए ग्राम-सुवार, १४-११-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
q586w8ghts1ersmz8obsj2b1dil3jle
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३२९
250
196748
673521
669133
2026-08-24T04:57:33Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673521
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||देहातकी बीमारियाँ|
२९१}}
आये हैं, हालांकि ये रोग बड़ी आसानीसे दूर किये जा सकते हैं। स्वर्गीय डाक्टर
देवकी देखरेख में जो काम चम्पारन में शुरू हुआ था उसमें इन बीमारियोंको मिटाना
भी एक था। स्वयंसेवकोंके पास तीन ही दवायें होती थी; चौथी नहीं होती थी ।
उसके बाद जो नये अनुभव हुए हैं, वे भी इसकी पुष्टि करते हैं। लेकिन इस लेखमालाका
ध्येय ऐसे उपायोंको अमल में लानेके तरीके बताना नहीं है। यह तो एक सर्वथा
अलग और रोचक विषय है। यहां तो मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि किसानोंको
यह बात सिखा देनी चाहिए कि इन तीनों रोगोंका शास्त्रीय ढंगसे इलाज कैसे हो
सकता है, और यह सिखाना बिलकुल आसान है। अगर गाँव में ठीक-ठीक सफाई
रखी जाये तो बहुतेरे रोग यों ही मिट जायेंगे। और यह तो हरएक वैद्य जानता
हैं कि किसी रोगका सर्वोत्तम इलाज उसे न होने देना ही है। बदहजमीको रोकनेसे
कब्ज रुक जायेगा; गांवकी हवा साफ रखनेसे बुखार मिट जायेगा। इसी तरह अगर
गाँव का पानी साफ रखा जाये और रोज साफ पानीसे नहाया जाये तो फोड़े-फंसी भी
नहीं होंगे। अगर तीनों रोग एक-साथ आ धमकें तो उनका सबसे अच्छा इलाज
उपवास है; उपवासके दिनोंमें कटिस्नान और सूर्यस्नान करना है। इस सम्बन्ध में
'आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान' नामक पुस्तकमें विस्तारसे विचार किया गया है।
हरएक स्वयंसेवकको में यह सलाह दूंगा कि वह उसे एक बार पढ़ जाये ।
{{Gap}}मैं देखता हूँ कि हर जगह लोग यह महसूस करते हैं कि गाँवोंमें एक
अस्पताल होना चाहिए और अस्पताल न हो तो एक दवाखाना अवश्य होना चाहिए ।
लेकिन मैं इसकी कोई आवश्यकता नहीं समझता। बहुत से गांवोंके बीच एकाध ऐसी
संस्थाका होना ठीक हो सकता है, लेकिन यह चीज इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है । जहाँ
अस्पताल है वहाँ मरीज तो आयेंगे ही। इससे कोई यह सोचे कि देशके सात लाख
गाँवोंमें अगर सात लाख अस्पताल हों तो बड़ा उपकार हो। गाँवका मदरसा ही
गाँवका दवाखाना हो और वहीं गाँवका वाचनालय भी रहे। रोग हरएक गाँवमें
होते हैं, वाचनालय भी हरएक गाँव में होना चाहिए और मदरसा तो होना ही चाहिए।
अगर इन तीनोंके लिए जुदा-जुदा मकान बनवानेका विचार किया जाये तो पता
चलेगा कि इस तरह सब गांवोंकी जरूरत पूरी करनेमें करोड़ों रुपये और बरसोंका
लोक शिक्षा और ग्राम-सुधारका विचार करते समय हमें
देशकी दर्दनाक गरीबीको कभी न भूलना चाहिए।
{{Gap}}समय चाहिए। इस कारण
अगर इन बातोंके सम्बन्ध में अपने विचार हमने दूसरे देशोंको लूटकर धनवान
हुए लोगोंसे उधार न लिये होते, और हममें सच्ची जागृति पैदा हुई होती तो बहुत
पहले ही हमारे देहातोंकी दशा बदल गई होती।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>नवजीवन, १५-१२-१९२९
{{Gap}}२. इस श्रृंखलाके लेखोंके लिए देखिए खण्ड १२ तथा १२ ।<noinclude></noinclude>
n457kjvwtaugepj4erxm88b5ql5lr7d
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३०
250
196749
673524
669134
2026-08-24T05:04:03Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673524
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{c|'''{२९७. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा,}}
{{Rh|||१५ दिसंबर १९२९}}
<Br>चि. रमणीकलाल,
{{Gap}}'आश्रम समाचार' पढ़कर मैंने तुमसे उसके बारेमें लिखनेकी बात कही थी;
उस विषय में कल तुम्हारा पत्र मिला। परिवर्तनोंके बारेमें दी गई टिप्पणी ठीक है।
खबरों [के कालम ] से ज्ञात हुआ कि वेलाबहनने अलग रसोई बनानी शुरू कर दी
है। अच्छा किया।
{{Gap}}मीराबहन आ गई है। प्रभावती, उसके पति और महादेव आनेवाले हैं।
शुद्ध घो बेचनेवाला बम्बईका एक मारवाड़ी यहां आया था। वह गायका घी
भी बेचता है। घीका भाव सवा रुपये रतल [ पौंड ] है किन्तु वह हमें एक रुपये के
भावसे देने को कह गया है। उसका नाम खेमराज अग्रवाल है और पता १९२, कालबादेवी
रोड, बम्बई है। वह घी-विक्रेताके रूपमें मशहूर है। जरूरत पड़नेपर काम आयेगा,
इस खयालसे मैं तुम्हारी जानकारीके लिए यह लिख रहा हूँ ।
{{Gap}}उपर्युक्त अंश मैंने प्रातःकालीन प्रार्थनाके बाद लिखवाया था। अब आजकी
डाक आ गई है; उसमें तुम्हारा पत्र भी है। क्या मैं तुम्हें यह लिख चुका हूँ कि
माधवजी और उनकी पत्नी यहीं है? इसके अतिरिक्त प्यारअली और नूरबानू भी
हैं। मुझे ऐसा लगता है कि दैनन्दिनीमें हर घंटेका काम लिखना आवश्यक है। किन्तु
यदि कोई आठ घंटे बाद या आश्रमके बाहर किये गये सामाजिक कामके बारेमें
न लिखना चाहे तो वैसा करनेके लिए उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। किन्तु
मैं ऐसे व्यक्तिके बारेमें इतना अवश्य कहूँगा कि उसे विचार करना भी नहीं आता ।
परन्तु यह तो केवल खादीके विद्यार्थियोंके बारेमें है। तुम्हारे और मेरे पास तो ऐसा
कोई क्षण ही नहीं हैं जिसे निजी क्षण कहा जा सके। अपना निजी समय या निजी
विचार रखना, पैसे आदि रखनेकी तरह परिग्रह तो है ही; सम्भव है वह उसकी
अपेक्षा कहीं अधिक बुरा परिग्रहतक हो। इसके भयंकर उदाहरण तो यह लिखवाते
हुए ही मेरी जबान तक आ रहे हैं। सचमुच देखा जाये तो सुबह चार बजे [ उठने ]
से रात आठ बजे [ सोने ] तक की बातें दैनन्दिनी में नोट की जानी चाहिए।
यदि रोकड़ बही रखना आश्रमका कर्तव्य है तो दैनन्दिनी रखना भी सबका कर्तव्य
है। क्योंकि सच्चा धन धातु नहीं, बल्कि समय है । [ गीताका ] वाक्य है
"काल:
कलयतामहम और जो व्यक्ति अपने समयका हिसाब नहीं रखता वह छल
करनेवालोंमें सरताज है ।
{{Gap}}१. गिननेवाले काल में हूँ। भगवद्गीता, १०-३० ।<noinclude></noinclude>
ljvnznvcmqv4ptby4evbfu3ajyaia17
673525
673524
2026-08-24T05:04:36Z
Lado Shaw
6039
673525
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''{२९७. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा,}}
{{Rh|||१५ दिसंबर १९२९}}
<Br>चि. रमणीकलाल,
{{Gap}}'आश्रम समाचार' पढ़कर मैंने तुमसे उसके बारेमें लिखनेकी बात कही थी;
उस विषय में कल तुम्हारा पत्र मिला। परिवर्तनोंके बारेमें दी गई टिप्पणी ठीक है।
खबरों [के कालम ] से ज्ञात हुआ कि वेलाबहनने अलग रसोई बनानी शुरू कर दी
है। अच्छा किया।
{{Gap}}मीराबहन आ गई है। प्रभावती, उसके पति और महादेव आनेवाले हैं।
शुद्ध घो बेचनेवाला बम्बईका एक मारवाड़ी यहां आया था। वह गायका घी
भी बेचता है। घीका भाव सवा रुपये रतल [ पौंड ] है किन्तु वह हमें एक रुपये के
भावसे देने को कह गया है। उसका नाम खेमराज अग्रवाल है और पता १९२, कालबादेवी
रोड, बम्बई है। वह घी-विक्रेताके रूपमें मशहूर है। जरूरत पड़नेपर काम आयेगा,
इस खयालसे मैं तुम्हारी जानकारीके लिए यह लिख रहा हूँ ।
{{Gap}}उपर्युक्त अंश मैंने प्रातःकालीन प्रार्थनाके बाद लिखवाया था। अब आजकी
डाक आ गई है; उसमें तुम्हारा पत्र भी है। क्या मैं तुम्हें यह लिख चुका हूँ कि
माधवजी और उनकी पत्नी यहीं है? इसके अतिरिक्त प्यारअली और नूरबानू भी
हैं। मुझे ऐसा लगता है कि दैनन्दिनीमें हर घंटेका काम लिखना आवश्यक है। किन्तु
यदि कोई आठ घंटे बाद या आश्रमके बाहर किये गये सामाजिक कामके बारेमें
न लिखना चाहे तो वैसा करनेके लिए उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। किन्तु
मैं ऐसे व्यक्तिके बारेमें इतना अवश्य कहूँगा कि उसे विचार करना भी नहीं आता ।
परन्तु यह तो केवल खादीके विद्यार्थियोंके बारेमें है। तुम्हारे और मेरे पास तो ऐसा
कोई क्षण ही नहीं हैं जिसे निजी क्षण कहा जा सके। अपना निजी समय या निजी
विचार रखना, पैसे आदि रखनेकी तरह परिग्रह तो है ही; सम्भव है वह उसकी
अपेक्षा कहीं अधिक बुरा परिग्रहतक हो। इसके भयंकर उदाहरण तो यह लिखवाते
हुए ही मेरी जबान तक आ रहे हैं। सचमुच देखा जाये तो सुबह चार बजे [ उठने ]
से रात आठ बजे [ सोने ] तक की बातें दैनन्दिनी में नोट की जानी चाहिए।
यदि रोकड़ बही रखना आश्रमका कर्तव्य है तो दैनन्दिनी रखना भी सबका कर्तव्य
है। क्योंकि सच्चा धन धातु नहीं, बल्कि समय है । [ गीताका ] वाक्य है
"काल:
कलयतामहम और जो व्यक्ति अपने समयका हिसाब नहीं रखता वह छल
करनेवालोंमें सरताज है ।
{{Gap}}१. गिननेवाले काल में हूँ। भगवद्गीता, १०-३० ।<noinclude></noinclude>
6k4ypdyj6fybajngd2wb40mrr7gs385
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३१
250
196750
673526
669135
2026-08-24T05:07:29Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673526
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र: रमणीकलाल मोदीको|
२९३}}
{{Gap}}प्रार्थनामें न आनेवालेसे यह कहनेका अर्थ कि "यदि तुम नहीं आते तो
आश्रमसे चले जाओ", कदाचित मेरी समझमें भी न आये। किन्तु मेरा कहना तो यह
है कि यदि किसीको प्रार्थना या किसी अन्य कार्यमें भाग लेना मंजूर है और फिर
भी वह उसमें भाग नहीं लेता तो फिर उससे चले जानेके लिए कह देना चाहिए;
क्योंकि सम्भावना है, जो व्यक्ति एक मामलेमें अपना वचनभंग करता है वह अन्य
मामलोंमें भी करेगा। क्या यह दिनकी भांति स्पष्ट नहीं है ? किन्तु इन सभी नियमोंको
आवश्यक मानकर भी तुम उनका पालन तत्काल नहीं करा सकते; क्योंकि इस
मामलेमें हम काफी लम्बे अरसेसे ढिलाई बरतते आ रहे हैं। अतः फिलहाल तो तुम
लोगोंको चेताते रहो। मेरे लौटनेपर यदि तुम सबकी राय होगी तो इनपर अमल
करवाने की जिम्मेदारी में ले लूंगा ।
{{Gap}}ताराका आने से इनकार करनेमें भी मेरे प्रति प्रेम था, यह बात मैं न समझता
होऊँ ऐसा नहीं । आज ही मुझे उसका एक अच्छा पत्र मिला है। यह तो मैं एकदम
बता सकता हूँ कि सामूहिक रूपसे वर्धा आश्रमसे क्या लिया जा सकता है। यहाँ की
शान्ति, यहाँका नियमपालन और यज्ञ-कार्य मुझे बहुत पसन्द आये हैं। शान्तिसे मेरा
मतलब शोर-गुलके अभावसे है। नियमपालनसे तात्पर्य है आश्रमके बाह्यजीवनको
ठीक बनाये रखनेके लिए प्रार्थनासे लेकर निश्चित समयपर किये जानेवाले कार्य
करना । यज्ञमें सभी तीस नम्बरका ही सूत कातनेपर बाध्य हैं। सवा आठ गजकी
पचास [इंच] पनहेकी सुन्दर साड़ी अभी हाल ही में तैयार हुई है। उसे
आश्रमवासियोंने ही बुना था। इसकी बुनाईमें चौबीस घंटे लगे। सूत बहुत अच्छा है।
ऐसा बारीक कपड़ा पूरा बिक जाता है । आश्रमके लोग आठ-दस नम्बरके सूतसे अधिक
बारीक सूतकी खादी पहनते ही नहीं । सारा काम नियमानुसार चलनेके कारण किसी
का मन ऊबता नजर नहीं आता। इस स्थितिका एक कारण यह भी है कि यहाँ
बहुत कम लोग हैं। मैंने तो सिर्फ तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दिया है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Gap}}उमिया और उसके पति पत्र मिले हैं जो मैं इसके साथ भेज रहा हूँ । उक्त
पत्र बहनोंकी प्रार्थनामें तो पढ़कर सुनाया ही जाये । अन्य लोगोंको भी यह समाचार
दे देना ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६२ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
iokxf1eakufa0y5w8zat2eu8enlehee
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३२
250
196751
673527
669136
2026-08-24T05:10:46Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673527
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''२९८. पत्र : रामानन्द चटर्जीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१६ दिसम्बर १९२९}}
<Br>प्रिय रामानन्द बाबू',
{{Gap}}२६ नवम्बरका आपका पत्र मुझे आज ही मिला। आप चाहते हैं कि मैं
आपको १००० शब्दोंमें कुछ लिखकर भेज दूँ । इस समय यह १००० मजबूत दांत
निकाल भेजने के बराबर है; और आप यह क्रिसमसके अंकके लिए चाहते हैं। क्या
इसका यह अभिप्राय नहीं कि अब जरूरत से ज्यादा देर हो गई है ? यदि मुझे ज्यादा
देर न हुई हो तो भी जितने आकारकी चीज आप चाहते हैं, उसे लिखनेके लिए
समय निकाल पाना शारीरिक रूपसे असम्भव है। हर मिनट पहलेसे ही किसी न
किसी कामके लिए निश्चित किया जा चुका है।
{{Gap}}मैं वायदे के बारे में सब कुछ भूल गया हूँ । परन्तु यदि आप इन्तजार कर
सकते हैं और यदि आप देखें कि मैं जनवरीमें कहीं यरवदाके नजदीक [ जेलमें] ही
विश्राम करने नहीं पहुँच गया हूँ और उस समय आप फिरसे याद दिला सकें तो मैं
इसे खुशीसे पूरा करूँगा ।
{{Rh|||हृदयसे आपका,}}
{{Rh|||मो० क० गांधी}}
<Br>अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८२ ) से ।
<Br>सौजन्य : शान्तादेवी
{{C|'''२९९. पत्र : आश्रमकी बहनोंको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||मौनवार, १६ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>बहनो,
{{Gap}}पिछली बार तुम्हें जी भरकर लिखा था इसलिए आज थोड़ेमें ही निपटा देना
चाहता हूँ। और भी बहुत से पत्र लिखने हैं और समय पूरा हो गया है। मैं तो
बहुत अधिक लिखा करता हूँ। उसमें से तुम जो आत्मसात कर सको वह ले लो।
बाकी छोड़ सकती हो। जो समझ लो और स्वीकार करो, उसे जी-जान से पूरा
करनेकी कोशिश करो।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३७१३) की फोटो नकलसे ।
{{Gap}}१. सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू, कलकत्ता ।<noinclude></noinclude>
gin3k8x98sek1aifjvc4qjnps95su5b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३३
250
196752
673529
669137
2026-08-24T05:12:55Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673529
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{C|'''३००. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||मौनवार, १६ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । बुधाभाईसे कहना कि उन्होंने जो सुझाव दिया था तदनुसार
दस्तावेज में रद्दोबदल जरूर की जा सकती है। छोटूभाईके आनेपर मैं उनसे मिलूंगा ।
{{Gap}}प्रार्थना [ में उपस्थित रहने ] के सम्बन्धमें कल लिख चुका हूँ, उससे मेरे विचार
स्पष्ट हो जायेंगे। मैथ्यू जैसे लोगों के सामने यदि धार्मिक बाधा हो तो हमें उसका
सम्मान करना चाहिए। हालांकि ऐसे लोगोंको भी नियमानुसार उपस्थित तो रहना
ही चाहिए। किन्तु मेरा यह कहना है कि जिसने नियमको स्वीकार कर लिया है
उसे अनुपस्थित नहीं रहना चाहिए।
{{Gap}}मैं तो तुम्हें पहले ही लिख चुका हूँ कि माधवजी और उनकी पत्नी यहीं
हैं। वे अन्य सब काम छोड़कर सेवाके काम में लग जानेकी बात सोच रहे हैं ।
फिलहाल अनुभव प्राप्त करनेके लिए वे आश्रम में आना चाहते हैं। मेरा विचार है कि
यदि वे आयें तो उन्हें अनुमति अवश्य दे देनी चाहिए। गंगाबहनके पत्र में मैंने यह
लिखा था। इस बारे में प्रबन्ध समितिको और तुम्हें भी विचार करना चाहिए। मैं
इस दम्पतीको हर तरहसे अच्छा मानता हूँ और वे नियमोंका पालन करनेवाले हैं।
{{Gap}}किन्तु इससे सर्वथा भिन्न सवाल चन्द्रकान्ताकी मांका है। वे योग्य महिला है ।
फिलहाल मेरे पास इतना समय नहीं है कि पूरे किस्सेमें उतरा जाये। शायद वे
फिलहाल सम्मिलित भोजनालय में भोजन करते कुछ झिझकें। वे स्वयं स्वावलम्बी होना
और अपनी कन्याके पास रहना चाहती हैं। मैंने उनसे कहा है कि वे अपना पूरा
समय आश्रमको दें, जो काम दिया जाये उसे करें, २५ रुपये वेतन लें और बुधाभाईकी
कोठरी में रहें और अपनी रसोई स्वयं बनायें। शायद वे मेरे इस सुझावको स्वीकार
कर लें। वे कहती हैं कि उन्हें सीने-पिरोनेका काम अच्छा आता है। मुझे लगता
है कि यदि वे यह काम करें तो हमारे लिए भारी नहीं पड़ेगी। इसके अतिरिक्त
यदि वे अन्य सभी नियमोंका पालन करें तो उन्हें लेने में अड़चन नहीं होगी। इस
बारेमें भी विचार करना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
rtpfvw9kelaiayc2w2uuxgnnyxacfjd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३४
250
196753
673532
669138
2026-08-24T05:16:50Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673532
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३०१. पत्र : म को'''}}
{{Rh|||१६ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>भाई म ..."
{{Gap}}यदि तुम हर काम सोच-विचार कर और पूरी तरह करो तो इसकी वजहसे
तुम्हें आगेका रास्ता अपने-आप सूझने लगेगा तथा उससे तुम्हें आत्मसन्तोष प्राप्त
होगा ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४२१६) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''३०२. पत्र : म को'''}}
{{Rh|||१६ दिसम्बर १९२९}}
<Br>चि० म"
{{Gap}}किसी कामको स्वीकार ही न करनेमें कोई बुराई नहीं है किन्तु स्वीकार करके
छोड़ देना सर्वथा गलत है। अब जब कि तुमने दैनन्दिनी लिखनेकी प्रतिज्ञा कर ली
है तो यह क्रम किसी भी हालत में टूटना नहीं चाहिए। क्योंकि हम कताई-यज्ञ करते
हैं इसलिए हमें यह क्रिया भली-भाँति सीख लेनी चाहिए। मुझे पत्र लिखते रहना ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४२१७ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''३०३. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१७ दिसम्बर १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। मैंने जो टिप्पणी लिखवाई
विस्तारसे पुन: विचार करें। जनवरीमें जब मैं वहाँ
विचार करेंगे। इस बीच यह आवश्यक है कि सब लोग अपनी दृष्टिसे इसपर विचार
कर लें।
{{Gap}}सन्तोकको अपना भोजन बनानेकी अनुमति देकर ठीक ही किया। इस मामले में
मैंने उदासीनताका रुख अख्तियार कर लिया है। हमने जो कदम उठाया है यदि
उससे पीछे न हटें तो इतना ही काफी होगा। वर्धा जानेकी बात भी मैं समझता
हूँ और इसके लिए सहमत हो गया हूँ। कलकत्तेके बारेम मुझे कुछ याद नहीं है.<noinclude></noinclude>
j6zvvjivx83qbu1vfr1ryfc9casvxk7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३५
250
196754
673538
669139
2026-08-24T05:25:45Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673538
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र : रमणीकलाल मोदीको|
२९७}}
किन्तु फिलहाल तो मैं यह चाहता भी नहीं फिर भी मेरे वहाँ लौट आनेपर इस
बारेमें हम लोग विचार कर लेंगे। मैं ऐसा नहीं होने दूंगा कि इस मामलेमें तुम्हें
जिम्मेदारी उठानी पड़े।
{{Gap}}रामचन्द्र कोस (लिफ्ट) ने हमारे धैर्यकी कड़ी परीक्षा ली। 'गीताजी' लगभग
पूरी हो आई है। इस कामको समेटकर और यहांसे प्रूफ भेजने के बाद ही मेरा रवाना
होनेका विचार है। आज जवाहरलाल नेहरू आये हैं और दो दिन रहेंगे ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६४ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''३०४. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१८ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}भाई माधवजीसे में घनिष्ठ परिचय करनेकी कोशिश कर रहा हूँ। मेरी नजर
इन दोनोंपर अच्छी तरह जमी हुई है। डेढ़ वर्ष हुआ दोनों स्वेच्छा से ब्रह्मचर्य व्रतका
पालन कर रहे हैं। कई वर्ष पहले ही माघवजी में सेवावृत्ति जाग्रत हो चुकी है।
उनमें पर्याप्त उत्साह है। वे चतुर व्यापारी हैं इसलिए हम उनकी योग्यताका पूरा
उपयोग कर सकेंगे। मैंने उन्हें सलाह दी है कि वे सभी विभागोंके कार्यकी जानकारी
प्राप्त कर लें। मैं तुम्हें यह सलाह दूंगा कि तुम उन्हें कताई तककी सभी प्रक्रियाओंकी
पूरी जानकारी प्राप्त करनेमें तो लगाओगे ही किन्तु उन्हें प्रतिदिन कुछ समय के
लिए खेती-बाड़ी और मजदूरीका काम भी दिया जाना चाहिए। मैं समझता हूँ कि
ये भण्डारका काम भी कर सकेंगे और वही खातेका ज्ञान तो उन्हें होगा ही। उनकी
पत्नी अच्छे स्वभावकी हैं; किन्तु वहाँ वे कैसी सिद्ध होंगी यह तो देव जाने ।
{{Gap}}चन्द्रकान्ता और उसकी माँ तैयारी कर रही हैं। फिलहाल तो माँ ने भी
भोजनालय में भोजन करना स्वीकार कर लिया है इसलिए वेतन या अलग रसोईका प्रश्न
ही नहीं उठता। इसके साथ चन्द्रकान्ताका मेरे नाम लिखा पत्र फाइल करानेके लिए
भेज रहा हूँ। उसकी माँ का पत्र भी भेजूंगा ।
{{Gap}}मैं २१ तारीखको यहाँसे रवाना हो जाऊँगा । २२ - २३को दिल्लीमें और २४
को लाहौर में । २२ - २३ के लिए पत्र लक्ष्मीनारायण गाडोदियाकी मारफत भेजे जाने
चाहिए। यह पत्र तुम्हें २० तारीखको मिल जाना चाहिए । २० तारीखको पत्र दिल्ली
भेजना और २१ को भी । २२ तारीख से लाहौर भेजना ।
{{Gap}}१. देखिए खण्ड ३३ ।<noinclude></noinclude>
01ucua5i23ot7lhrrto5ttscjknbim0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३६
250
196755
673534
669140
2026-08-24T05:19:46Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673534
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२९८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}लीलाबहनने बुधाभाईके घरमे खाना बनाना शुरू कर दिया, इसकी चिन्ता मत
करना। मुझे विश्वास है कि भणसाली अच्छे हो जानेपर कदापि नहीं रहेंगे । लीलाबहन
अलग खाने-पकाने लगी है इसलिए अगर वह बुधाभाईके यहाँ जाकर रहने लगें तो
इसमें कोई आश्चर्य नहीं ।
{{Gap}}अयोध्याप्रसादका कोई पत्र नजर नहीं आया। तुमने उसके बारेमें जो लिखा
है, वैसा करना ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६५ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{C|'''३०५. पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको'''}}
{{Rh|||वर्धा}}
{{Rh|||१८ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० मणिलाल और सुशीला,
{{Gap}}तुम अच्छे आये। मणिलाल तो लाहौर अवश्य जायेगा। सुशीलाके बारेमें
रामदासने अपने पत्र में लिखा है कि वा की उत्कट इच्छा है कि सुशीलाको भी जानेकी
अनुमति दी जाये। मेरी ओरसे तो कोई प्रतिबन्ध है ही नहीं। मैंने तो सिर्फ सलाह
दी थी। बा यह मानती है कि सुशीलाको भी कांग्रेस देखनेकी इच्छा होगी। यदि
यह बात सच हो और उसकी भी इच्छा हो, सीताका स्वास्थ्य ठीक हो और सुशीलाका
शरीर भी पनप गया हो तो भले चली जाये। थोड़े में, तुम दोनों कुछ बच्चे नहीं
बल्कि सयाने हो और स्वयं निर्णय करने में स्वतन्त्र हो। तुम मुझसे पूछते हो यह तो
तुम्हारा विवेक और स्वेच्छासे लगाई हुई मर्यादा है। इसलिए तुम दोनोंको जो अच्छा
लगे वैसा ही करो, यही मैं चाहता हूँ ।
{{Gap}}मणिलालको चार महीने के भीतर लोट ही जाना चाहिए, जब हम मिलेंगे तो
इसपर विचार कर लेंगे।
{{Gap}}मैं ११ जनवरीके पहले तो आश्रम पहुँच ही जाऊँगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४७६४ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
ro5duhc5684n0mn6g9pzey5k3nq00sh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३७
250
196756
673536
669141
2026-08-24T05:21:17Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673536
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३०६. सैनिकीकरणका कार्यक्रम''''}}
{{Gap}}जॉर्ज जोजेफ मेरे सबसे ज्यादा प्रिय साथियोंमें से एक रहे हैं। जब मैं यरवदामें
विश्राम कर रहा था वह 'यंग इंडिया' के सम्पादक थे। उससे पहले भी वे मेरे
कहनेपर ही 'इंडिपेंडेंट के --- जो अब प्रकाशित नहीं होता- सम्पादक थे। उन्होंने
देशके लिए अपनी वकालत • जिससे उन्हें बड़ी आय होती थी- त्याग दी थी।
देशके लिए ही वे जेल गये। वे लगनवाले और ईमानदार कार्यकर्त्ता हैं। इसलिए
उनकी बात आदरपूर्वक सुनी जानी चाहिए- -- खासकर जब ऐसे आदमीकी राय आपसे
मित्र हो और वह धर्मान्तरण करनेवाले किसी व्यक्ति जैसे जोश से पुरानी नोति छोड़कर
नई नीति अपनानेका समर्थन करता हो। जॉर्ज जोजेफने ऐसा ही किया है। उनके
पुराने साथियोंमेंसे एकने समाचारपत्रसे एक कतरन भेजी है, जिसमें जोजेफकी नई
नीति की घोषणा की गई है और उसका शीर्षक दिया है "जॉर्ज जोजेफ द्वारा अपने
मतकी स्वीकारोक्ति । एक दूसरे आदमीने, जो जॉर्ज जोजफके अपरिचित प्रशंसक
हैं, एक रिपोर्टसे जोज़ेफ द्वारा की गई खादी कार्यक्रमकी सारी आलोचनाकी नकल
करके भेजी है। उन्होंने यह बड़ी विक्षिप्त-सी मनोदशामें लिखा है और आग्रह किया
है कि खादीके बारेमें जो टीका-टिप्पणी की गई है, उसपर में अवश्य ध्यान दूँ ।
{{Gap}}इसमें व्याकुलता, दुःख अथवा भयका कोई कारण नहीं है। यदि महान् राष्ट्रीय
उथल-पुथल में हमें ऐसे आदमी न मिलें जो पुराने विचारोंका खण्डन करते और नये
विचारोंका प्रतिपादन करते हों तो यह आश्चर्यजनक बात होगी। परिवर्तन प्रगतिकी
शर्त है। एक ईमानदार आदमी जब उसका मन किसी भूलके विरोधमें क्रान्ति करता
है तो वह यन्त्रयत नहीं बरत सकता। इसलिए जॉर्ज जोजेफ जो कुछ कहते हैं उसे
से समझने की कोशिश करनी चाहिए और जो हमें युक्तिसंगत लगे उसे स्वीकार
करने में संकोच नहीं करना चाहिए, चाहे इससे हमें किसी अभीष्ट आदर्शको त्याग
भी देना पड़े।
{{Gap}}मुझे आशा है कि मैंने उसी भावनासे जोजेफके भाषणका अध्ययन करनेका
प्रयास किया है। उन्होंने खादीकी भर्त्सना की है। उन्हें “पूरा इतमीनान है कि
अस्पृश्यता निवारण मूलतः राजनयिकको समस्या नहीं है," उनका कार्यक्रम सरल
वाक्यमें यह है : 'भारतका सैनिकीकरण कर दो।" उनके भाषणका उद्धरण नीचे
दिया जा रहा है।
{{Gap}}हम सब सिवाही नहीं बन सकते। हम सब सिपाही बन जायें तो सबके
लिए काफी जगह ही नहीं है। फिर भी हमारे लिये यह सम्भव होना चाहिए।
{{Gap}}१. इसी पिपर दूसरा लेस नवजीवन, २९-१२-१९२९ में "खादी बनाम खाकी" शीर्षकके
अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था।<noinclude></noinclude>
otfj61oiytxrnfdtjdhullueyvkbb64
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३८
250
196757
673461
669142
2026-08-24T02:08:45Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673461
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|३००|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}कि हम प्रेसीडेंसीके शहरी एकांशोंमें हर साल लगभग ५,००० आदमियोंको
प्रशिक्षण देनेका विचार रखें। लोग हफ्तेमें दो या तीन बार कवायद करने
जायेंगे और सालमें तीन हफ्ते शिविर [ कैम्प ] लगानेके लिए बाहर जायेंगे ।
ऐसा प्रशिक्षण केवल कालेज में पढ़नेवाले विद्यार्थियोंके लिए ही नहीं बल्कि
समाजमें और शिक्षा क्षेत्रमें काफी प्रतिष्ठावाले लोगोंके लिए भी उपलब्ध किया
जाना चाहिए। प्रवेशार्थीके लिए शिक्षाका स्तर शालाकी अंतिम कक्षा तकका
होना चाहिए। यदि आपको खाकी [ वर्दी ] धारण किये हुए ऐसे लोग हर
गलोमें घूमते हुए दिखाई दें तो हमारे आसपास एक नया वातावरण बन
जायेगा। इस प्रकारका प्रशिक्षण पाकर लोग सिर उठाकर खड़े हो जायेंगे,
उनकी विचारधारा सुलझेगी और वे सीधी बात कहेंगे। इससे हमारे जीवनमें
परिपूर्णता आयेगी।
{{Gap}}मेरे अनुभव मुझे इससे विपरीत बात बताते हैं। मैंने खाकी [ वर्दी] धारण
किये हुए लोगोंको सिर उठाकर खड़े रहने के बजाय गन्दी नालियोंमें लोटते हुए देखा
है, मैंने डायर जैसे लोगोंको दूषित विचार रखते हुए और सीधी बातें नहीं बेतुकी
बातें करते देखा है। मैं एक सेनाध्यक्षको जानता हूँ जो सुलझे विचारोंवाला होनेकी
तो बात ही छोड़ दीजिए बिलकुल सोच ही नहीं सकता था। जिन्हें सैनिक
प्रशिक्षणका मोह है वे सैनिक प्रशिक्षण जरूर ग्रहण करें, परन्तु यह सुझाव देना कि
यह "नया और रचनात्मक कार्यक्रम है " अधीरता और उतावलेपनको ही सूचित करता
है। इस नये कार्यक्रमके भारत-भूमिमें जड़ जमानेकी ज्यादा आशंका नहीं है। दूसरे,
यह कार्यक्रम उस नये वायुमण्डल भी विपरीत है जो युद्ध से तंग आये हुए पश्चिममें
बन रहा है। पश्चिममें युद्धकी भावना मानवकी मानवता तकको नष्ट किये डाल रही
है और उसे पशुके स्तरपर लाये दे रही है। आज जिसकी जरूरत है और ईश्वरका
धन्यवाद है कि पहले कभी सपने में भी न आनेवाले परिमाणमें भारतने जिसे सीखा
है, वह है निःशस्त्र प्रतिरोधकी भावना -- • जिसके सामने संगीनोंको जंग लग जाता
है और बन्दूकका बारूद धूलमें बदल जाता है। जोजेफने शस्त्रोंकी आवाजके द्वारा
अल्पसंख्यकों को अपनी मर्जीके आगे झुकानेवाली हथियारबन्द सरकारका जो नजारा
हमारे सामने रखा है उससे जनतन्त्रकी भावना और उन्नतिकी अवहेलना होती है ।
यदि नया कार्यक्रम ऐसा ही कुछ कर दिखानेकी आशा बँधाता है तो हमारे यहाँ
आज तो केवल अल्पसंख्यकों का ही नहीं, भारी बहुसंख्यक लोगोंका सशस्त्र उत्पीड़न
हो रहा है। मुझे आशा है कि हम जैसी सरकार चाहते हैं, वह अल्पसंख्यकोंका
भी उत्पीड़न करके नहीं, उसके हृदय परिवर्तनपर आधारित होनी चाहिए। यदि
इस परिवर्तनका इतना ही मतलब है कि गोरी फौजके बदले हुए रंगकी फौज हो
तो हमें ज्यादा हंगामा मचानेकी जरूरत नहीं है। तब फिर किसी भी हालत में
जनसमुदायका कोई महत्व नहीं होगा। तब भी उनका यदि ज्यादा नहीं तो आजके
जैसा ही शोषण होता रहेगा। जब जॉर्ज जोजेफकी अधीरता समाप्त हो जायेगी<noinclude></noinclude>
7oj30l1tofnevnvyciqxtoduizkfhwv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३९
250
196758
673456
669143
2026-08-24T01:57:38Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
673456
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|सैनिकीकरणका कार्यक्रम|
३०१}}
क्योंकि में उन्हें जानता हूँ कि वे इतने ईमानदार हैं कि ऐसी दशामें वे अपनी भूल
सुधारे बिना नहीं रहेंगे - तब ये जनतन्त्रम विश्वास रखनेवाले ऊँचे आदमीके रूपमें
हमारे सामने आयेंगे जैसा कि मैंने उन्हें खुशकिस्मतीसे १९१९ में मद्रासके समुद्रतट
पर पाया था।
{{Gap}}अब हम देखें कि वे खादीके बारेमें क्या कहते हैं :
{{Gap}}जबतक में कांग्रेस में था रचनात्मक कार्यक्रममें केवल सहर, अस्पृश्यता
निवारण और बाद के सालोंमें मद्य-निषेध सम्मिलित थे। में आपको स्पष्ट बता
यूँ कि में अब समझ-बूझकर इस निष्कर्षपर पहुंचा हूं कि इनमें से एक भी
चीज राष्ट्रकी मौलिक, प्राथमिक आवश्यकताकी जड़ तक नहीं पहुँचती । खद्दरका
इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। मेरे खयाल से यह आन्दोलनके जन्मदाता गांधीजीके
बाद जोवित नहीं रहेगी। पर खद्दरमें जो मौलिक आर्थिक त्रुटि है उसके कारण
में इस fronपर पहुँचा हूँ कि खादी बनाई जानेमें और खरीदने में बहुत
महँगी पड़ती है और परिणामतः उपभोक्ता के साथ न्याय नहीं होता। खद्दर
जिसकी कीमत लगभग एक रुपया प्रति गज पड़ती है कल-कारखानों द्वारा बनाये
गये ६ आने प्रति गज कीमतवाले कपड़के आगे नहीं टिक सकेगी। मेरा खद्दरका
अनुभव यह है कि अन्तमें खाद बनानेवालेको भी हानि ही उठानी पड़ती
है । कत्तिनों को जिनपर खद्दरका काम निर्भर है --दिनमें दस घंटे काम
करके ३ आनेकी मजदूरीसे सन्तुष्ट रहना पड़ता है। मेरी राय यह है कि
वह उद्योग, जिससे कुशल मजदूरको ३ आनेकी मजदूरी मिलती है; कभी
सफल नहीं हो सकता। क्योंकि इसका मतलब तो मजदूरका पसीना बहाना
ही है। मजदूरका पसीना बहाने का मतलब है कि उसे भरण-पोषणके लिए
जरूरत से बहुत कम मजदूरी देना। जवाब में यह कहना कि देशमें अकाल रहता
है, लाखों लोग बेकार हैं और इस कारण कुछ भी आमदनी न होनेसे तो
३ आने ही बेहतर है - युक्तिसंगत नहीं है। में यह दलील बिलकुल नहीं मानता।
यह ऐसी दलील नहीं है जो अपने देशके मामलोंमें प्रगतिशील विचारधारावाले
किसी राजनीतिज्ञ या मजदूर रखनेवाले किसी आदमीको अच्छी लग सके। ऐसा
कहे जानेसे कोई सन्तोष नहीं होता कि मेरा किसीको दिनमें तीन आने मजदूरी
वेना सही होगा, जबकि में जानता हूँ कि आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उसके
परिवारकी तो बात हो क्या, काम करनेवालेके भरण-पोषणके लिए भी वह
मजदूरी काफी नहीं होगी। मेरे मनमें यह निराशाजनक, अमिट और क्रूर पाप
खद्दरके साथ संलग्न है। यही कारण है कि आज गांधीजीको ७ या ८ साल
मेहनत करनेके बावजूद और इस उद्योगमें लाखों रुपया पानीकी तरह बहाये
जानेके बावजूद खद्दरका निर्माण अत्यन्त कम हुआ है। इसकी तुलना में समस्या
जिसका कि समाधान करना है, बहुत बड़ी है, और वह है सारे भारतके लिए<noinclude></noinclude>
niqao7c74cns1tvx6n7uq72ngpb86g0
विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
4
196812
673307
673253
2026-08-23T13:22:20Z
Manikantkmr
5554
/* पुस्तक सूची */
673307
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
4rzjoddok7h6yf2dyl51kpbnwnblw55
673311
673307
2026-08-23T13:27:42Z
Manikantkmr
5554
/* प्रतिभागी */
673311
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
ctvn1zxnolv8zpkogpsmmg2vs5as4yn
673333
673311
2026-08-23T14:58:34Z
सीमा1
430
/* पुस्तक सूची */
673333
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
70s4ie3l1oaacu45tvb09phrb2mvqhi
673433
673333
2026-08-23T18:03:56Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* पुस्तक सूची */ पुस्तक जोड़ा।
673433
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
बारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
owmc3oc06qk8awg61quwqlvkrjsf4t3
673582
673433
2026-08-24T07:35:04Z
सीमा1
430
/* प्रतिभागी */
673582
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
बारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
rudhkxxeq2ciockttjaz6if8r443f2e
673585
673582
2026-08-24T07:38:30Z
सीमा1
430
/* पुस्तक सूची */
673585
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
बारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
rma60ouiu242krgbfm2yjcgpxpr07xl
673587
673585
2026-08-24T07:42:11Z
सीमा1
430
/* पुस्तक सूची */
673587
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था।
##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तेरह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
पचीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
बारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)—
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)—
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
dvda1izmz454mrsjd94vaol32nuce1k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१९
250
196840
673268
669225
2026-08-23T12:04:22Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673268
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३५८. पत्र: ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>८ जनवरी १९३०}}
{{left|चि॰ व्रजकिशन,}}
तुम्हारा पत्र मिला। आज भी मिलनेकी आशा करता था। अब तो प्रभुदास
अच्छा होगा। तुम्हारी रोजनिशी अच्छी तरहसे चलती होगी। अब उसमें खलल पहुँचना ही नहीं चाहिए। वर्धा जानेका दिन निश्चित कर लेना और मुझे लिखना। धुनकी तो चलती है ना?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ २३७१ की फोटो नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३५९. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|[९ जनवरी १९३० से पूर्व]<ref>पत्रके पाठसे पता चलता है कि यह ९-१-१९३० के पत्र से पहले लिखा गया था। देखिए “पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको”, ९-१-१९३०।</ref>}}
{{left|भाई घनश्यामदासजी,}}
आपका आखरका तारका उत्तर मैंने नहीं दिया। दूर बैठा हुआ मैं सूचना क्या दूँ? आपकी तरफसे जतनमें तो कुछ भी न्यूनता हो हि नहीं सकती है। केशको<ref>मगनलाल गांधीका पुत्र</ref> आश्वासन चाहिये इतना मैं जानता हूँ। इसलिए देवदासको भेज रहा हूँ। दवाइओंमें मेरा विश्वास कम है। लेकिन मेरेसे जो दूर रहते हैं उनकी भावनामें में कुछ दखल नहीं देता। इसलिए तारके उत्तरमें कोई सूचना देनेकी जरूरत नहीं थी। मेरा उपचार तो जाहिर है――उपवास या तो फलोंका रस, और सूर्यस्नान। रातको भी खुले कमरेमें सोना। पखाना न आवे तो इनीमा। इतने उपचारसे केशवके जैसे बहुत केस ठीक हुए। परंतु दूर बैठा हुआ इस पांडित्यको मैं चलाना नहीं चाहता। आपका दिल चाहे<noinclude>{{dhr|1em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
ik87zpjglvqr72kmvt6hptmepbngb4p
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२०
250
196841
673280
669226
2026-08-23T12:30:25Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673280
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वैसे करें। केशय अपने आप दवाईका आग्रह न करे, न ऐसा आग्रह किया जाय। मेरी उम्मीद तो यह है कि इस पत्रके पहुँचनेसे पहले केशव भयमुक्त हुआ होगा।
{{right|आपका,<br>मोहनदास}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ६१७९से।
सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला
{{c|{{larger|'''३६०. वक्तव्य: ‘न्यूयार्क वर्ल्ड’ को'''}}}}
{{right|[९ जनवरी, १९३० से पूर्व]<ref>यह '''न्यूयार्क वर्ल्ड,''' ९-२-१९३० में प्रकाशित हुआ था।</ref>}}
संसारको यह समझ लेना चाहिए कि कांग्रेसी प्रतिनिधि होनेके नाते, केन्द्रीय विधान सभाके राष्ट्रवादी नेता पण्डित मोतीलाल नेहरू और मैं वाइसरायकी भारतमें औपनिवेशिक स्वराज्य सम्बन्धी घोषणाको १९२८ की कलकत्ता कांग्रेसके प्रस्तावकी<ref>देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ ३०३-१५।</ref> केवल एक प्रतिक्रिया मान सकते हैं। इसलिए उस प्रस्तावको देखते हुए हम इस प्रकार एक स्पष्ट घोषणा करनेपर जोर डालनेके लिए बाध्य हो गये कि प्रस्तावित गोलमेज परिषद में केवल औपनिवेशिक स्वराज्यके संविधानका गठन करनेके तौर तरीकोंपर विचार किया जायेगा, किसी अन्य बातपर नहीं। वाइसराय लॉर्ड इविन ऐसा कुछ नहीं कर सके। इसलिए यद्यपि हम उनके सत्प्रयत्नोंकी सराहना करते हैं और उनकी कठिनाइयोंको समझते हैं, पर हमारे सामने प्रस्तावित परिषद में कांग्रेसका प्रतिनिधित्व करना नामंजूर करनेके अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। परिषदने, जहाँतक कांग्रेसका सम्बन्ध है, स्वतन्त्रता प्रस्तावको<ref>देखिए “भाषण: कांग्रेस अभिवेश लाहौर में- २”, ३१-१२-१९२९।</ref> गलत ढंगसे लिया है; पर इससे किसीको घबरानेकी आवश्यकता नहीं है। मैंने बार-बार यह कहा है कि मेरे लिए, जैसा कि सारे कांग्रेसियोंके लिए है, औपनिवेशिक स्वराज्यका अर्थ वास्तविक स्वतन्त्रता है, अर्थात् आपसी लाभके लिए एक ऐसी स्वैच्छिक साझेदारी, जिसे किसी भी एक साझेदारकी ओरसे समाप्त किया जा सके। इससे [वायसरायकी घोषणासे] मामला बिलकुल साफ हो जाता है, विशेषकर भारत मन्त्री वैजवुड बेनके इस दुर्भाग्यपूर्ण वक्तव्यसे कि भारतमें अब भी औपनिवेशिक स्वराज्य है।
शान्तिप्रिय लोगोंके लिए सन्तोषकी बात असलमें यह है कि अन्य सब तरीकोंको छोड़कर पूरी बहसमें कांग्रेसने अहिंसा और सत्यके मार्गका ही समर्थन किया। सविनय अवज्ञा अहिंसाका एक शक्तिशाली प्रदर्शन है।निःसन्देह इस रास्तेमें बहुतेरे खतरे और कठिनाइयाँ हैं; पर वे बहुतसे युवकोंके समझमें आने योग्य और क्षम्य, उतावलेपनके कारण भारतके कई हिस्सोंमें आजकल हो रही बेलगाम, पर गुप्त हिंसाके
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
2txsxbqwhxzrzjrzqyzdjlzcxrsnqll
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२१
250
196842
673298
669227
2026-08-23T13:05:31Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673298
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||वक्तव्य: ‘न्यूयार्क वर्ल्ड’ को|३८३}}</noinclude>खतरोंसे अपेक्षाकृत निश्चय ही कम है। सविनय अवज्ञाकी शुरुआत करनेकी जिम्मेदारी मेरी है और मैं इसके सम्बन्धमें कोई उतावलापन करनेवाला नहीं हूँ। इसके साथ ही साथ में यह भी मानता हूँ कि मैं कमसे-कम उतना जोखिम उठानेमें नहीं हिचकूँगा, जो किसी भी स्वतन्त्रता संघर्षके लिए उठानी अनिवार्य है। लदी हुई यह गुलामी और उसके कारण होनेवाली वर्तमान पीड़ाको और आगे जारी रहने देनेका जोखिम उस जोखिमसे कहीं बढ़कर है जिसे में उठाने जा रहा हूँ।
विधान सभाओंका बहिष्कार भी राष्ट्रीय मांगको जोरदार ढंगसे पेश करनेके कार्यक्रमका एक अंग है। स्वतन्त्रता प्रस्तावका यह स्वाभाविक और सहज फल था और मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि कांग्रेसियोंमें इसकी पर्याप्त प्रतिक्रिया हुई है। एक रचनात्मक कार्यक्रम जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन, साम्प्रदायिक एकता, शराबबन्दी और विदेशी कपड़ा बहिष्कार चलाना बाकी है। इनका अत्यधिक सामाजिक व आर्थिक महत्व है तथा इसमें बहुतसे राजनीतिक परिणाम निहित हैं। स्वभावतः ही नेहरू संविधान, अपने प्रयोगात्मक साम्प्रदायिक समाधानोंके साथ रद हो जाता है।
अतः कांग्रेस अलग सम्प्रदायोंकी दृष्टिसे नहीं वरन पूर्णतः राष्ट्रीय दृष्टिसे साम्प्रदायिक प्रश्नका समाधान करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगी। ऋणोंके सम्बन्धमें भी एक प्रस्ताव था।<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ का कमेटीकी विषय समिति―२”, १-१-१९३०।</ref> इससे किसी वैध हितवाले विदेशीको घबरानेकी आवश्यकता नहीं है। यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी भी विदेशी सरकारके अन्तर्गत ऐसे ऋण लिए जाते हैं और रियायतें दी जाती हैं, जो किसी भी तरह सम्बन्धित देशके हित में नहीं होते और निश्चय ही अकसर उस देशके लिए नुकसानदेह होते हैं। इनको उत्तराधिकारियों द्वारा, जो इस प्रकारके प्रत्येक ऋण और रियायतकी जाँच करनेका अधिकार रखते हैं, कभी नहीं स्वीकार किया जा सकता। कांग्रेसने इनकी जाँच एक स्वतन्त्र न्यायाधिकरणके सुपुर्द की है।अन्तमें मेरा कहना यह है कि ऐसी परिषदके लिए जो राष्ट्रीय आकांक्षाओं अर्थात स्वाधीनताकी योजनाकी रूपरेखा तैयार करनेके उद्देश्यसे बुलाई जाये, रास्ता खुला रखा गया है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दु,''' २५-३-१९३०}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
55jbgot499j7bh4nhonvt1asnf5x39z
673299
673298
2026-08-23T13:06:00Z
Priyanka1114
6799
673299
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||वक्तव्य: ‘न्यूयार्क वर्ल्ड’ को|३८३}}</noinclude>खतरोंसे अपेक्षाकृत निश्चय ही कम है। सविनय अवज्ञाकी शुरुआत करनेकी जिम्मेदारी मेरी है और मैं इसके सम्बन्धमें कोई उतावलापन करनेवाला नहीं हूँ। इसके साथ ही साथ में यह भी मानता हूँ कि मैं कमसे-कम उतना जोखिम उठानेमें नहीं हिचकूँगा, जो किसी भी स्वतन्त्रता संघर्षके लिए उठानी अनिवार्य है। लदी हुई यह गुलामी और उसके कारण होनेवाली वर्तमान पीड़ाको और आगे जारी रहने देनेका जोखिम उस जोखिमसे कहीं बढ़कर है जिसे में उठाने जा रहा हूँ।
विधान सभाओंका बहिष्कार भी राष्ट्रीय मांगको जोरदार ढंगसे पेश करनेके कार्यक्रमका एक अंग है। स्वतन्त्रता प्रस्तावका यह स्वाभाविक और सहज फल था और मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि कांग्रेसियोंमें इसकी पर्याप्त प्रतिक्रिया हुई है। एक रचनात्मक कार्यक्रम जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन, साम्प्रदायिक एकता, शराबबन्दी और विदेशी कपड़ा बहिष्कार चलाना बाकी है। इनका अत्यधिक सामाजिक व आर्थिक महत्व है तथा इसमें बहुतसे राजनीतिक परिणाम निहित हैं। स्वभावतः ही नेहरू संविधान, अपने प्रयोगात्मक साम्प्रदायिक समाधानोंके साथ रद हो जाता है।
अतः कांग्रेस अलग सम्प्रदायोंकी दृष्टिसे नहीं वरन पूर्णतः राष्ट्रीय दृष्टिसे साम्प्रदायिक प्रश्नका समाधान करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगी। ऋणोंके सम्बन्धमें भी एक प्रस्ताव था।<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ का कमेटीकी विषय समिति―२”, १-१-१९३०।</ref> इससे किसी वैध हितवाले विदेशीको घबरानेकी आवश्यकता नहीं है। यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी भी विदेशी सरकारके अन्तर्गत ऐसे ऋण लिए जाते हैं और रियायतें दी जाती हैं, जो किसी भी तरह सम्बन्धित देशके हित में नहीं होते और निश्चय ही अकसर उस देशके लिए नुकसानदेह होते हैं। इनको उत्तराधिकारियों द्वारा, जो इस प्रकारके प्रत्येक ऋण और रियायतकी जाँच करनेका अधिकार रखते हैं, कभी नहीं स्वीकार किया जा सकता। कांग्रेसने इनकी जाँच एक स्वतन्त्र न्यायाधिकरणके सुपुर्द की है।अन्तमें मेरा कहना यह है कि ऐसी परिषदके लिए जो राष्ट्रीय आकांक्षाओं अर्थात स्वाधीनताकी योजनाकी रूपरेखा तैयार करनेके उद्देश्यसे बुलाई जाये, रास्ता खुला रखा गया है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दु,''' २५-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
pdmsseb1klyh45adwg12t0d9hvhvub9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२२
250
196843
673304
669228
2026-08-23T13:17:02Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673304
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३६१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''स्वर्गीय मजहर-उल-हक'''}}
स्वर्गीय मजहर-उल-हक एक महान देशभक्त, अच्छे मुसलमान और दार्शनिक थे। स्वभावसे आराम-पसन्द होते हुए भी, जब असहयोग शुरू हुआ, उन्होंने उसे उसी तरह छोड़ दिया जैसे हम गैरजरूरी मैलको अपने शरीरसे छुड़ा देते हैं। बादमें तो वे साधु जीवनके उतने ही शौकीन बन गये, जितने कि ये शाही जीवनके थे। हमारे आपसी मतभेदोंसे आजिज आकर वे सबसे अलग रहने लगे थे और चुपचाप उस तरहकी सेवा करते रहते थे जिसे लोग देख न सकें और अच्छी स्थितिके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे। वह निडर होकर बोलते और निर्भीक होकर काम करते थे। पटनाके समीप जो सदाकत आश्रम है, वह उन्हीके रचनात्मक पुरुषार्थका फल है। यद्यपि वह अपनी इच्छानुसार उस आश्रममें बहुत समयतक नहीं रह सके, तथापि उनके आश्रम सम्बन्धी विचारोंकी बदौलत बिहार विद्यापीठको आश्रमके रूपमें एक स्थायी भवन मिल सका। यही कारण है कि आज भी वह दोनों कीमोंको एक बनानेका एक जरिया हो सकता है। ऐसे पुरुषका अभाव सदा खटकता रहता है। खासकर देश के इतिहासकी वर्तमान स्थितिमें उनका अभाव और भी खटकेगा। मैं बेगम मजहर-उल-हक और उनके कुटुम्बियोंके प्रति अपनी हार्दिक सहानुभूति व्यक्त करता हूँ।
{{c|'''मद्यनिषेध अभियान'''}}
मद्यनिषेध परिषदने लाहौरमें अन्य प्रस्तावोंके साथ एक प्रस्ताव यह भी पास किया था:<ref>यह प्रस्ताव यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसमें माँग की गई थी कि समाचारपत्रोंमें और सार्वजनिक स्थानोंपर मादक पेयोंका विज्ञापन तत्काल बन्द किया जाये।</ref>
यह दुःखकी बात है कि भारतवर्ष-जैसे देशमें, जहाँ शराबखोरी प्रायः सब जगह दुर्व्यसन मानी जाती है, ऐसे प्रतिष्ठित अखबार भी काफी तादाद में हैं, जो एक ओरसे शराब आदि मादक वस्तुओंके विज्ञापन छापते हैं और दूसरी ओर अपने सम्पादकीय स्तम्भों में पूर्ण मद्य-निषेधका समर्थन करते हैं। मैं आशा करता हूँ कि परिषदके इस प्रस्तावसे प्रभावित होकर ऐसे अखबार इन घातक विज्ञापनोंको छापना बन्द कर देंगे। इस सम्बन्धमें विज्ञापकोंके साथ किये गये करारका सवाल खड़ा हो सकता है। लेकिन चूँकि अखबारोंके मालिकोंने अबतक ऐसे विज्ञापनोंको लेकर राष्ट्रकी काफी हानि की है, अतएव उनसे यह आशा करना अनुचित न होगा कि वे मियादसे पहले ऐसे इकरारोंसे हाथ खींच लें और ऐसा करनेमें जो हानि उठानी पड़े उसे अनुचित रूपसे कमाये गये मुनाफे में से पूरी करें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ९-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
5577idriuz4h75ap1tznm7z1wwbgzcm
673305
673304
2026-08-23T13:17:31Z
Priyanka1114
6799
673305
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३६१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''स्वर्गीय मजहर-उल-हक'''}}
स्वर्गीय मजहर-उल-हक एक महान देशभक्त, अच्छे मुसलमान और दार्शनिक थे। स्वभावसे आराम-पसन्द होते हुए भी, जब असहयोग शुरू हुआ, उन्होंने उसे उसी तरह छोड़ दिया जैसे हम गैरजरूरी मैलको अपने शरीरसे छुड़ा देते हैं। बादमें तो वे साधु जीवनके उतने ही शौकीन बन गये, जितने कि ये शाही जीवनके थे। हमारे आपसी मतभेदोंसे आजिज आकर वे सबसे अलग रहने लगे थे और चुपचाप उस तरहकी सेवा करते रहते थे जिसे लोग देख न सकें और अच्छी स्थितिके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे। वह निडर होकर बोलते और निर्भीक होकर काम करते थे। पटनाके समीप जो सदाकत आश्रम है, वह उन्हीके रचनात्मक पुरुषार्थका फल है। यद्यपि वह अपनी इच्छानुसार उस आश्रममें बहुत समयतक नहीं रह सके, तथापि उनके आश्रम सम्बन्धी विचारोंकी बदौलत बिहार विद्यापीठको आश्रमके रूपमें एक स्थायी भवन मिल सका। यही कारण है कि आज भी वह दोनों कीमोंको एक बनानेका एक जरिया हो सकता है। ऐसे पुरुषका अभाव सदा खटकता रहता है। खासकर देश के इतिहासकी वर्तमान स्थितिमें उनका अभाव और भी खटकेगा। मैं बेगम मजहर-उल-हक और उनके कुटुम्बियोंके प्रति अपनी हार्दिक सहानुभूति व्यक्त करता हूँ।
{{c|'''मद्यनिषेध अभियान'''}}
मद्यनिषेध परिषदने लाहौरमें अन्य प्रस्तावोंके साथ एक प्रस्ताव यह भी पास किया था:<ref>यह प्रस्ताव यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसमें माँग की गई थी कि समाचारपत्रोंमें और सार्वजनिक स्थानोंपर मादक पेयोंका विज्ञापन तत्काल बन्द किया जाये।</ref>
यह दुःखकी बात है कि भारतवर्ष-जैसे देशमें, जहाँ शराबखोरी प्रायः सब जगह दुर्व्यसन मानी जाती है, ऐसे प्रतिष्ठित अखबार भी काफी तादाद में हैं, जो एक ओरसे शराब आदि मादक वस्तुओंके विज्ञापन छापते हैं और दूसरी ओर अपने सम्पादकीय स्तम्भों में पूर्ण मद्य-निषेधका समर्थन करते हैं। मैं आशा करता हूँ कि परिषदके इस प्रस्तावसे प्रभावित होकर ऐसे अखबार इन घातक विज्ञापनोंको छापना बन्द कर देंगे। इस सम्बन्धमें विज्ञापकोंके साथ किये गये करारका सवाल खड़ा हो सकता है। लेकिन चूँकि अखबारोंके मालिकोंने अबतक ऐसे विज्ञापनोंको लेकर राष्ट्रकी काफी हानि की है, अतएव उनसे यह आशा करना अनुचित न होगा कि वे मियादसे पहले ऐसे इकरारोंसे हाथ खींच लें और ऐसा करनेमें जो हानि उठानी पड़े उसे अनुचित रूपसे कमाये गये मुनाफे में से पूरी करें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ९-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
jv8bszhpf7m6s109e4ht9g6zro7l25n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२३
250
196844
673312
669229
2026-08-23T13:28:09Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673312
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३६२. कांग्रेस'''}}}}
{{c|'''अध्यक्ष'''}}
पण्डित जवाहरलाल नेहरूको अध्यक्ष चुनना उचित ही था। उनका भाषण छोटा, सारगर्भित और जोरदार था। उग्र विचारोंको उन्होंने सौम्य भाषामें प्रकट किया था। उनका भाषण इस बातका सबूत था कि उग्र विचार रखते हुए भी पूरी तरह तटस्थ रहकर स्थिति देख सकनेकी ताकत उनमें है। वह खुद तो पक्के समाजवादी हैं, लेकिन देशके लिए वह उतना ही कार्यक्रम रखना चाहते हैं, जितना वह सँभाल सकता है। वे एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हैं और अपने आदर्शोंको देशके लिए कुछ हलका बनाते हुए अपने जीवनमें आदर्शोंका सम्पूर्ण पालन करनेके लिए हमेशा
प्रयत्नशील रहते हैं।
जैसा उनका भाषण था, ठीक वैसा ही अध्यक्ष पदसे उन्होंने काम भी किया। सख्त होते हुए भी नम्र और लचीले रहे। कई बार मुश्किल मौकोंपर विनोद भरी बातों द्वारा वह उनसे पार पा जाते थे; फिर भी जब कोई कार्य अपेक्षित होता, तो उसे करनेमें कभी नहीं झिझकते थे। उनके अथक उत्साह और अखण्ड तन्मयता, उनकी सहज सादगी और भलमनसीपर सभी मुग्ध थे। किसी भी सरकारके लिए जो जरा भी इन्साफ करना चाहती है, जवाहरलाल नेहरूसे डरनेकी कोई वजह नहीं है। दुष्ट सरकारको देशकी सरहदसे बाहर निकाल फेंकनेके लिए जो बहादुर हर तरहकी कुरबानीके लिए तैयार है, उसके तेजको सरकार जल्दी ही महसूस करेगी।
देशके नौजवानोंको अपने इस प्रतिनिधिपर गर्व करनेका पूरा हक है। मुल्कको भी जवाहरलाल नेहरूके समान स्वाभिमानी सपूत पाकर खुशी होगी। ईश्वर जवाहरलालको आशीष दे और उन्हींके कार्यकालमें देश अपनी मंजिल तय करे, यही चाह है।
{{c|'''स्वराज्य'''}}
कांग्रेसके प्रस्ताव<ref>देखिए “लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा,” २६-१२-१९२९।</ref> अध्यक्षीय भाषणके रुखके अनुरूप ही थे। आइए हम पहले मुख्य प्रस्तावपर<ref>देखिए “भाषण: कांग्रेस अभिवेशन लाहौर में-२, ३१-१२-१९२९।</ref> ही विचार करें। कलकत्ताके प्रस्तावकी <ref>देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ ३०३-२५।</ref> राय और उसकी आत्माका अनुसरण करते हुए और उसके बाद जो किसीकी गढ़ी हुई नहीं थीं ऐसी कई घटनाओंके फलस्वरूप ३१ दिसम्बर, १९२९ की आधी रातको कांग्रेसका ध्येय औपनिवेशिक स्वराज्यके बदले पूर्ण स्वराज्य निश्चित किया गया। कांग्रेसके संगठनकी पहली धारामें जो ‘स्वराज्य’ शब्द है, उसका अर्थ अबसे ‘पूर्ण स्वराज्य’ होगा । और यह ठीक हुआ। कलकत्ताके प्रस्तावको छोड़ दें तो भी श्री [बेजवुड] बेनके इस कथनसे कि भारतवर्षको तो आज भी व्यवहारमें औपनिवेशिक स्वराज्य प्राप्त है, औपनिवेशिक<noinclude>{{smallrefs}}
{{left|४२-२५}}</noinclude>
3fgtbnt9jkro6kdug8u6pokckjyfrd4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२४
250
196845
673316
669230
2026-08-23T13:36:37Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673316
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्वराज्यका जो अर्थ निकलता है वह हमारा ध्येय कदापि नहीं हो सकता है। हिन्दुस्तान खास-खास राजनैतिक मौकोंपर ब्रिटिश सरकार द्वारा पसन्द किये गये अपने प्रतिनिधि भेज सकता है। अगर ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’ का मतलब यही है, तो भगवान उससे भारतवर्षको बचाये! कांग्रेस तो इससे बिलकुल जुदा ही कोई चीज चाहती है। कांग्रेसके लिए औपनिवेशिक स्वराज्यका मतलब है, पूरी आजादी और ब्रिटेनके साथ इच्छानुसार भाईचारा, जिसे हिन्दुस्तान दूसरे किसी भी देशके साथ एक-दूसरे के कल्याणकी इच्छासे जोड़ सकता है। इसके सिवाय एक और भी वजह है।कई जगह आजकल यह अफवाह गर्म है कि पूर्ण स्वराज्यकी बात करना कानूनके खिलाफ है, और औपनिवेशिक स्वराज्य के बदले पूर्ण स्वराज्यको अपना ध्येय बनानेसे कांग्रेसका अन्त हो जायेगा। इस धमकी के कारण तो कांग्रेसका यह और भी पवित्र कर्तव्य हो गया है कि वह अपने ध्येयमें पूर्ण स्वराज्यको स्थान दे। जिस चीजको पाना देशका जन्मसिद्ध अधिकार है, उसे साफ-साफ जाहिर करनेसे कांग्रेस अगर डर जाये तो वह राष्ट्रकी प्रतिनिधि संस्था कहलाने योग्य नहीं रहेगी। अगर ‘स्वराज्य’ शब्दके मतलब के बारेमें कोई शंका थी तो ‘पूर्ण स्वराज्य’ लिखनेसे वह शंका दूर हो जाती है।
{{c|'''सत्य और अहिंसा'''}}
अब रही साधनकी बात मौजूदा साधनों-सत्य और अहिंसा में परिवर्तन करानेका प्रयत्न किया गया; लेकिन कांग्रेसने बहुत बड़े बहुमतसे उसे ठुकरा दिया। विषय समितिमें कुछ सदस्योंने अपना यह विचार प्रकट किया था कि अहिंसा और सत्यके रास्तेसे पूर्ण स्वराज्य नहीं मिल सकता।वायुमण्डलमें भी जहाँ-तहाँ हिंसा दिखाई पड़ती थी। लेकिन मैं तो यह अनुभव कर रहा हूँ कि जो लोग हर साल कांग्रेसके अधिवेशनमें आते हैं, उनमें भारतकी खोई हुई स्वतन्त्रताको फिरसे पानेके लिए एक ही साधनके प्रति जागृत श्रद्धा है, और वह साधन अहिंसा है। अगर करोड़ों लोगोंके आलस्य और जड़ताको दूर करना हो और एक दूसरेसे झगड़ा करनेवाली कौमोंको आपसमें मिलाना हो तो अहिंसा और सत्य ही इस देशके लिए नितान्त आवश्यक है। अगर किसी कौमको दूसरी कौम या कौमोंके साथ जबर्दस्ती करनी हो तो जरूर ही उसे बाहरी ताकतकी जरूरत होगी। लेकिन कांग्रेसको तो सभी कौमोंका प्रतिनिधित्व पाना है; उसका दावा भी यहीं रहा है, अतएव उसे तो अहिंसक रहना ही होगा। इसलिए मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि पूर्ण स्वराज्य पानेमें एक सालका समय लगे या कई साल बीत जायें, तो भी अहिंसा और सत्यका रास्ता ही उसे पानेके लिए सबसे छोटा रास्ता है। कांग्रेसने जिस पूर्ण स्वराज्यको अपना ध्येय बना लिया है, उससे विदेशियोंके न्यायोचित हित-सम्बन्धोंको कोई खतरा नहीं है और न किसी अंग्रेजके, जो स्वाधीन भारतमें सब जगह लागू होनेवाले कानून-कायदोंको मानते हुए एक मित्रकी तरह रहना चाहता है, डरनेकी कोई वजह है।
यह बात कांग्रेसके दो प्रस्तावों द्वारा साफ जाहिर है―एक, वाइसरायकी स्पेशलको उड़ा देनेकी गरजसे, जो बम फेंका गया था उसकी निन्दा करनेवाले प्रस्ताव<noinclude></noinclude>
fjlov10xdx1hxcnmvtfw887w96ij7vs
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२५
250
196846
673319
669231
2026-08-23T13:42:58Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673319
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||कांग्रेस|३८७}}</noinclude>द्वारा, और दूसरे, राजनैतिक सवालको शान्तिमय तरीकेसे हल करनेके लिए बाइसरायने जो कोशिश की, उसकी कद्र करनेकी जो बात मुख्य प्रस्तावमें कही गई है, उसके द्वारा। इन दोनों प्रस्तावोंपर गर्मा-गर्म बहस-मुबाहसा हुआ था; लेकिन कांग्रेसने दोनों प्रस्तावोंको पास करके अपने ध्येयका पालन किया है और दुनियाकी निगाहोंमें अपने आपको ऊँचा उठाया है। इनमें से एक प्रस्ताव तो मत लिये जानेके बाद पर्याप्त बहुमतसे पास हुआ और दूसरा बहुत बड़े बहुमतसे पास हुआ। इसके खिलाफ अगर बम काण्डकी निन्दा करनेवाला प्रस्ताव गिर गया होता और जिस शासनको हम मिटाना चाहते हैं उसके प्रतिनिधि द्वारा किये गये अच्छे कामकी कद्र करनेके मामूली विवेकमें हमने भूल की होती तो भारत अपने ध्येयका पालन करनेसे चूक जाता और दुनियाकी नजरोंमें उसकी कीमत घट जाती।
{{c|'''विधानसभाओंका बहिष्कार'''}}
रचनात्मक कार्यक्रमके साथ कांग्रेसने विधान सभाओंके बहिष्कारका कार्यक्रम भी जोड़ दिया है। मेरी रायमें यह अनिवार्य था। जिन लोगोंको पूर्ण स्वराज्य लेना है, उन्हें विधानसभाओंसे बाहर लोगों में जाकर काम करना होगा। कांग्रेसियोंके विधान-सभाओंसे निकल आनेपर भी वहाँ कोई जगह खाली नहीं रह जायेगी, यह दलील बहिष्कारके विरोध में कोई ठीक दलील नहीं है। जो लोग विधानसभाओं में विश्वास रखते हैं, वे खुशीसे विधानसभाओं में जायें। हमारे लिये तो यही काफी है कि कांग्रेसी विधानसभाओंमें जानेके बदले दूसरे अच्छे कामोंमें लगें और उनके जानेसे
इन संस्थाओंको जो इज्जत मिल रही है वह उन्हें न मिलने दें। मेरे लिए तो पण्डित मोतीलालजी द्वारा बहिष्कारका स्पष्ट समर्थन ही इस सम्बन्धका प्रस्ताव करनेके लिए काफी था।
अगर इस बहिष्कारमें अदालतों और सरकारी मदरसोंका बहिष्कार भी जोड़ दिया जाता तो निस्सन्देह यह कार्यक्रम खूब पुख्ता हो जाता, मगर इसके लिए वातावरण न था। कांग्रेस सिद्धान्त बनानेवाली संस्था नहीं है, बल्कि राष्ट्रकी अभिलाषा और आवश्यकताको जानकर उसे सफल करने योग्य उपायोंको, खास सिद्धान्तोंके अंतर्गत, काममें लानेवाली संस्था है।
स्थानीय संस्थाओं या बोडका सवाल इससे जुदा है। मूल प्रस्तावमें उनको भी शामिल किया गया था। लेकिन उसपर तीव्र मतभेद पैदा हो जानेसे, मैं इस बातका आग्रह न कर सका कि उन्हें बहिष्कार की धारामें बना रहने दिया जाये। लेकिन कोई यह न समझे कि सिर्फ इसलिए ऐसी संस्थाओंमें जाना और उनपर अपना अधिकार जमाना कांग्रेसियोंका कर्त्तव्य हो जाता है, इसके विपरीत अगर इन संस्थाओंके कारण हमारे अच्छे-से-अच्छे कार्यकर्त्ताओंका ध्यान अधिक अच्छे कामोंकी ओर न लग पाता हो, या इन संस्थाओं में जानेसे हमेशा मारपीट और गाली-गलौज और उससे भी बुरी कुछ बातें सामने आती रहती हों तो इन संस्थाओंसे हट जाना और इनसे दूर रहना ही हरएक कांग्रेसीका कर्त्तव्य हो जाता है। लेकिन अगर उन्हें यह पक्की प्रतीति हो कि इन संस्थाओंमें उनके जानेसे किसी उचित हितकी ही नहीं, किन्तु राष्ट्रहित<noinclude></noinclude>
7cmpmm995zg5qpkcg08953vxt0rykh5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२६
250
196847
673324
669232
2026-08-23T13:58:15Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673324
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>याने पूर्ण स्वराज्यकी भी साधना की जा सकती है, वह प्राप्त किया जा सकता है, तो जरूर वे इन संस्थाओं में बने रहें या इनके लिए चुने जाने की कोशिश करें।
{{c|'''सविनय अवज्ञा'''}}
लेकिन कांग्रेसके ध्येयको सफल करनेके लिए सबसे बड़ा और अमोघ साधन तो सविनय अवज्ञा और कर देनेसे इनकार करना है। वैसे तो इस शस्त्रका उपयोग करनेका समय और उसके तरीकेको निश्चित करनेका भार कार्यसमितिपर नाममात्रको छोड़ा गया है, और यही उचित भी है; तो भी मैं जानता हूँ कि आखिरकार इस कामकी सारी जिम्मेदारी खासकर मुझ पर ही पड़नेवाली है। मुझे कबूल कर लेना चाहिए कि इसके लिए आज मैं अनुकूल वातावरण नहीं पा रहा हूँ। चौरी-चौरा जैसा विघ्न आ पड़नेपर भी सविनय अवज्ञाकी लड़ाईको रोकना न पड़े, इस तरहके किसी उपायकी मैं खोजमें हूँ।<ref>देखिए “भेंट पत्र-प्रतिनिधियोंसे”, १-१-१९३०।</ref> किसी न किसी दिन बगैर कहीं रुके, सिर देकर भी सौदा कर ही लेना पड़ेगा। लेकिन बहुतेरे कांग्रेसियोंकी मौजूदा तबीयतको देखते हुए, हमारे आपसी झगड़ोंका खयाल करते हुए, जातिगत द्वेषको देखते हुए, ऐसा कोई कारगर और निर्दोष उपाय ढूँढ निकालना आज मुश्किल हो रहा है। मौजूदा हालतको देखते हुए मुमकिन है कि कांग्रेसके नामसे सविनय अवज्ञा करना नामुमकिन हो जाये और शायद यह जरूरी हो जाये कि बगैर कांग्रेसकी मुहरके तथा कांग्रेससे अलग रहकर ही सविनय अवज्ञा करनी पड़े। लेकिन अभी तो फिलहाल मिट्टी चाकपर है। फिर भी मैं अधीर देशभक्तोंको यह विश्वास दिला देना चाहता हूँ कि किसी कामचलाऊ उपायकी खोजमें मैं अपनी सारी शक्ति लगा रहा हूँ। ये देशभक्त देशमें अहिसक वातावरणको पैदा करनेमें मदद करके और रचनात्मक कार्यक्रमको आगे बढ़ाकर मुझे सहायता पहुँचा सकते हैं। मैं जानता हूँ कि बहुतेरे लोगोंकी राय में रचनात्मक कार्यक्रम और सविनय अवज्ञाके बीच कोई सम्बन्ध नहीं है। लेकिन जिस आदमीका अहिंसा में विश्वास है, उसके लिए तो रचनात्मक कार्यक्रम और स्वराज्यके लिए की जानेवाली सविनय अवज्ञाके बीचके तात्त्विक सम्बन्धको खोज निकालना कठिन नहीं है। ‘स्वराज्यके लिए’ शब्दोंका उपयोग मैं जानबूझकर कर रहा हूँ और मैं चाहता हूँ कि पाठक भी मेरे आशयको ठीक-ठीक समझ लें। हो सकता है कि किसी खास स्थानीय सवालको हल करनेके लिए स्थानिक सविनय
अवज्ञा करते समय, जैसा कि बारडोलीमें हुआ था, रचनात्मक कार्यक्रम अनिवार्य न हो। उसके लिए सिर्फ यही काफी हो सकता है कि एक खास जगहकी कुछ सामान्य शिकायतें हों और लोग उन्हें दूर कराना चाहते हों। लेकिन स्वराज्यके समान अमूर्त वस्तुके लिए देशव्यापी पैमानेपर आन्दोलन करते समय तो लोगोंको खास तौरसे प्रशिक्षित होनेकी जरूरत है। ऐसे काममें जनताको और उनके नेताओंको, जिनपर जनताका अखण्ड विश्वास हो एक दूसरेके निकट सम्पर्क में आना ही होगा। रचनात्मक काममें बराबर इस तरह लगे रहनेसे उत्पन्न विश्वास ही नाजुक मौकेपर बेशकीमती पूँजीका<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
0zzslnrz5te078ih1pkmnnyig9mhuip
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२७
250
196848
673326
669233
2026-08-23T14:06:19Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673326
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||कांग्रेस|३८९}}</noinclude>काम देता है; इसलिए जैसे हिसक लड़ाई लड़नेवाली सेनाके लिए कवायद वगैराकी तालीम जरूरी है, वैसे ही अहिंसक सेनाके लिए भी इस तरहके रचनात्मक कार्यकी आवश्यकता है। अगर वे लोग जो ठीकसे प्रशिक्षित नहीं हैं और वे नेता जिन्हें लोग जानते नहीं हैं और जिनपर लोग विश्वास नहीं करते, व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा करेंगे, तो उसका कोई उपयोग नहीं होगा और सामूहिक सविनय अवज्ञा भी अशक्य हो जायेगी। इसलिए रचनात्मक कार्यक्रमकी जितनी प्रगति होगी, सविनय अवज्ञाकी भी उतनी ही अधिक सम्भावना रहेगी। अगर पूर्ण अहिंसामय वातावरण और पूर्ण तथा सफल रचनात्मक कार्यक्रम, ये दो बातें हों, तो कुछ ही महीनोंके भीतर सामूहिक सविनय अवज्ञाको सफल बनानेका विश्वास में दिला सकता हूँ।
{{c|'''मौजूदा हालतें'''}}
यों मुख्य प्रस्ताव देशके ध्येय और उसकी प्राप्तिके तरीकोंको साफ शब्दों में बयान करता है, तो भी उसमें गोलमेज परिषद में जानेकी बातको हर हालत में असम्भवनीय नहीं कहा गया है। प्रस्ताव तो सिर्फ यही कहता है कि मौजूदा हालत में कांग्रेस के प्रतिनिधियोंके गोलमेज परिषदमें जानेसे हमें कुछ भी लाभ नहीं हो सकता। तो फिर वह कौन-सी हालतें हैं, जिनमें कांग्रेसके प्रतिनिधि ऐसी परिषद में शामिल हो सकते हैं? ऐसा कमसे कम एक अवसर तो मैं बता सकता हूँ। अगर ब्रिटिश सरकार कांग्रेसको परिषद में शामिल होने का न्योता दे याने चाहे जिस योजनापर चर्चा करनेके लिए नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज्यकी एक योजनापर विचार करनेके लिए बुलाई गई परिषद् में सरकार भारतको निमन्त्रित करे, और उस परिषदके सम्बन्ध में दूसरी शर्तें भी मान ले तो मैं समझता हूँ कि कांग्रेसके नेता ऐसे निमन्त्रणको खुशीसे स्वीकार करेंगे। यह तो है नहीं कि परिषद कभी होगी ही नहीं। परिषदके दो मौके हो सकते हैं―या तो वह ब्रिटेनकी मेहरबानीसे या संसारके लोकमतके दबावमें आकर बुलाई जाये या फिर हमारे खुदके दबावमें आकर बुलाई जाये। ऐसा समय जल्दी ही आयेगा या देरसे आयेगा, इसका फैसला तो इस बातपर निर्भर है कि हम इस अनमोल सालका सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग।
{{c|'''कर्ज का बोझ'''}}
मुख्य प्रस्तावके बाद महत्वकी दृष्टिसे दूसरे नम्बरका और प्रायः मुख्य प्रस्तावका ही अंगरूप एक प्रस्ताव हमारे ऋण-भारके सम्बन्धमें था।<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिर्मे-२”, १-१-१९३०।</ref> हमारे देशकी आर्थिक स्थितिका जिसे ज्ञान है, वह जानता है कि यह सरकार कितना फिजूल खर्च करनेवाली है और जनता कर्जके कैसे भयंकर बोझ के तले पिसी जा रही है। यह भी सभी जानते हैं कि देशके हितको एक ओर रखकर इस देशमें विदेशियोंको कैसी-कैसी
[व्यापारिक] सुविधाएँ दी गई हैं। इस बातकी आशा नहीं की जा सकती कि आजाद भारत इन सुविधाओं या लाभोंको ‘निहित अधिकारों’ के नामसे मंजूर कर लेगा। यह सम्भव नहीं कि सभी ‘निहित स्वार्थी’ की रक्षा की जायेगी। जैसे जुआखोरी या<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
aei96kka2hh9amoqvmjo8cc1dxlo4jq
673327
673326
2026-08-23T14:06:53Z
Priyanka1114
6799
673327
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||कांग्रेस|३८९}}</noinclude>काम देता है; इसलिए जैसे हिसक लड़ाई लड़नेवाली सेनाके लिए कवायद वगैराकी तालीम जरूरी है, वैसे ही अहिंसक सेनाके लिए भी इस तरहके रचनात्मक कार्यकी आवश्यकता है। अगर वे लोग जो ठीकसे प्रशिक्षित नहीं हैं और वे नेता जिन्हें लोग जानते नहीं हैं और जिनपर लोग विश्वास नहीं करते, व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा करेंगे, तो उसका कोई उपयोग नहीं होगा और सामूहिक सविनय अवज्ञा भी अशक्य हो जायेगी। इसलिए रचनात्मक कार्यक्रमकी जितनी प्रगति होगी, सविनय अवज्ञाकी भी उतनी ही अधिक सम्भावना रहेगी। अगर पूर्ण अहिंसामय वातावरण और पूर्ण तथा सफल रचनात्मक कार्यक्रम, ये दो बातें हों, तो कुछ ही महीनोंके भीतर सामूहिक सविनय अवज्ञाको सफल बनानेका विश्वास में दिला सकता हूँ।
{{c|'''मौजूदा हालतें'''}}
यों मुख्य प्रस्ताव देशके ध्येय और उसकी प्राप्तिके तरीकोंको साफ शब्दों में बयान करता है, तो भी उसमें गोलमेज परिषद में जानेकी बातको हर हालत में असम्भवनीय नहीं कहा गया है। प्रस्ताव तो सिर्फ यही कहता है कि मौजूदा हालत में कांग्रेस के प्रतिनिधियोंके गोलमेज परिषदमें जानेसे हमें कुछ भी लाभ नहीं हो सकता। तो फिर वह कौन-सी हालतें हैं, जिनमें कांग्रेसके प्रतिनिधि ऐसी परिषद में शामिल हो सकते हैं? ऐसा कमसे कम एक अवसर तो मैं बता सकता हूँ। अगर ब्रिटिश सरकार कांग्रेसको परिषद में शामिल होने का न्योता दे याने चाहे जिस योजनापर चर्चा करनेके लिए नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज्यकी एक योजनापर विचार करनेके लिए बुलाई गई परिषद् में सरकार भारतको निमन्त्रित करे, और उस परिषदके सम्बन्ध में दूसरी शर्तें भी मान ले तो मैं समझता हूँ कि कांग्रेसके नेता ऐसे निमन्त्रणको खुशीसे स्वीकार करेंगे। यह तो है नहीं कि परिषद कभी होगी ही नहीं। परिषदके दो मौके हो सकते हैं―या तो वह ब्रिटेनकी मेहरबानीसे या संसारके लोकमतके दबावमें आकर बुलाई जाये या फिर हमारे खुदके दबावमें आकर बुलाई जाये। ऐसा समय जल्दी ही आयेगा या देरसे आयेगा, इसका फैसला तो इस बातपर निर्भर है कि हम इस अनमोल सालका सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग।
{{c|'''कर्ज का बोझ'''}}
मुख्य प्रस्तावके बाद महत्वकी दृष्टिसे दूसरे नम्बरका और प्रायः मुख्य प्रस्तावका ही अंगरूप एक प्रस्ताव हमारे ऋण-भारके सम्बन्धमें था।<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिर्मे-२”, १-१-१९३०।</ref> हमारे देशकी आर्थिक स्थितिका जिसे ज्ञान है, वह जानता है कि यह सरकार कितना फिजूल खर्च करनेवाली है और जनता कर्जके कैसे भयंकर बोझ के तले पिसी जा रही है। यह भी सभी जानते हैं कि देशके हितको एक ओर रखकर इस देशमें विदेशियोंको कैसी-कैसी [व्यापारिक] सुविधाएँ दी गई हैं। इस बातकी आशा नहीं की जा सकती कि आजाद भारत इन सुविधाओं या लाभोंको ‘निहित अधिकारों’ के नामसे मंजूर कर लेगा। यह सम्भव नहीं कि सभी ‘निहित स्वार्थी’ की रक्षा की जायेगी। जैसे जुआखोरी या<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
8g2j2h3ub44afjpg0c3154rr4vypfm0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२८
250
196849
673549
669234
2026-08-24T05:56:24Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673549
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>व्यभिचारकी दुकान चलानेवालेको उसे चलाते रहनेका कोई निहित अधिकार नहीं है, वैसे ही देशकी दौलतका जुआ खेलकर देशको निःसत्व बनानेवाली सरकारको भी वैसा करनेका कोई ‘निहित अधिकार’ नहीं है। इसीलिए १९२२ में गया कांग्रेसने<ref>सन् १९२२ में।</ref> कुछ कर्जोको नामंजूर करनेवाला एक व्यापक प्रस्ताव पास किया था। इस सालके प्रस्तावसे गयाका प्रस्ताव फिरसे ताजा किया गया है, और यह तय किया गया है कि कोई भी निष्पक्ष और स्वतन्त्र न्यायाधिकरण जिन-जिन कर्जों और व्यापारिक लाभोंको अन्यायपूर्ण और अनुचित बतायेगा, आजाद भारतकी सरकार उन्हें कबूल नहीं करेगी। मेरी राय में इस न्यायोचित प्रस्तावका कोई विरोध कर ही नहीं सकता। इस सवालको लेकर दलबन्दी करना आफत बुलाना है।
{{c|'''साम्प्रदायिक प्रश्न'''}}
साम्प्रदायिक प्रस्ताव<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें-३”, १-१-१९३०।</ref> भी इतना ही महत्वका है। यद्यपि यह प्रस्ताव सिखोंके लिए किया गया था, फिर भी उसके मूलमें जो सिद्धान्त है उसका प्रतिपादन करना वैसे भी आवश्यक था। स्वतन्त्र भारतवर्ष में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्वका तत्त्व रह ही नहीं सकता, तथापि अगर स्वतन्त्र भारत छोटी-छोटी कौमोंको दबाकर राज्य करना नापसन्द करता है, तो उसके लिए सब कौमोंको सन्तुष्ट करना जरूरी है। लेकिन कांग्रेसको तो अब एक राष्ट्रीयताकी भावना पैदा करनेकी जरूरत है। और साम्प्रदायिक सवालके समान महत्त्वपूर्ण मामले में तो कांग्रेसको सिर्फ आँख में धूल डालनेकी गरजसे या क्षणिक लाभके खयालसे कुछ भी नहीं करना चाहिए। कांग्रेसमें रहकर हमें दूसरी जातियोंका निरादर करना भूलना होगा और हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई या यहूदी न रहकर हिन्दुस्तानी बनना होगा। हम सब अपने-अपने धर्मपर दृढ़ रहते हुए भी कांग्रेस में तो हरएक सवालका निबटारा हिन्दुस्तानी, केवल हिन्दुस्तानीके ही रूपमें करेंगे। एक अच्छे हिन्दू या अच्छे मुसलमानके देशभक्त बननेसे उसे और भी अच्छा हिन्दू या मुसलमान बन जाना चाहिए। देशके सच्चे हित और धर्मके हितके बीच कोई विरोध ही नहीं हो सकता है। जहाँ इनमें विरोध पाया जाता है, वहाँ समझना चाहिए कि उसके धर्ममें याने उसकी नीतिमें सम्भवतः कोई खामी है। सच्चा धर्म तो सद्विचार और सदाचार में है। सच्ची देशभक्तिका अर्थ भी सद्विचार और सदाचार ही है। अतएव इस तरहकी दो समानार्थक चीजोंकी परस्पर तुलना करना गलत है। लेकिन अगर कभी कांग्रेसको कौमी खयालसे प्रतिनिधित्वके सवालको हल करना ही पड़े, तो लाहोरके प्रस्ताव द्वारा यह ठहराया गया है कि कोई ऐसा फैसला न किया जाये, जो सम्बद्ध दलोंको सन्तुष्ट न कर सके। जो भी हो कांग्रेसके सामने इस सवालको कौमी बुनियादपर हल करनेका मौका ही न आये, इसलिए मुसलमानों, सिखों और दूसरी कौमोंको चाहिए कि वे हिन्दुस्तानको अखण्ड राष्ट्र समझकर राष्ट्रीय कांग्रेस में बड़ीसे-बड़ी तादाद में शामिल होने लगें। कांग्रेस किसी<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
tsgrca3nv7lo7epnolbkieot9z8gsf8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२९
250
196850
673554
669235
2026-08-24T06:06:11Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673554
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||जवाहरलाल नेहरू|३९१}}</noinclude>जाति विशेषकी संस्था बन जाये, इसकी अपेक्षा तो मैं यह चाहूँगा कि वह मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई और यहूदियोंके हाथोंमें चली जाये। जिनमें सेवाभाव है, वे कांग्रेसपर अपना अधिकार जमा सकते हैं। कांग्रेसका मताधिकार नितान्त प्रजातान्त्रिक है। जो सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए इसके दरवाजे हमेशा खुले हैं। अतएव मैं आशा करता हूँ कि उसमें सब शामिल होंगे और कांग्रेसको गरीवसे-गरीब, कमजोरसे-कमजोर तथा दलितसे-दलित-लोगोंके लिए पूर्ण स्वराज्य पानेका एक शक्तिशाली साधन बनायेंगे। इस महत्त्वपूर्ण कांग्रेसके दूसरे प्रस्तावों और अन्य बातोंपर विचार अगले या किसी दूसरे अंकके<ref>देखिए “आगामी कांग्रेस”, १६-१-१९३०।</ref> लिए मुल्तवी कर देना होगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ९-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३६३. सदाबहार पेनिंगटन'''}}}}
कांग्रेसपर व्यक्त मेरा मन्तव्य इस पत्रका उचित उत्तर है।<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> हमें क्या चाहिए इसका निर्णय खुद हमें करना है न कि अंग्रेजोंको; फिर चाहे उनकी भावनाएँ कितनी ही अच्छी क्यों न हों।<ref>गांधीजीके लेख “शुद्ध-मतभेद” २१-११-१९२९ का हवाला देते हुए श्री पेनिंगटनने लिखा था कि इसमें अंग्रेजोंके राज्यकी बुराईयोंको बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है और भारत के लिए तत्काल स्वतन्त्रता [मिलना] असम्भव है।</ref>
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ९-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३६४. जवाहरलाल नेहरू'''}}}}
जवाहरलाल नेहरू हिन्दका जवाहर सिद्ध हुआ है। उनके व्याख्यानमें उच्चतम विचार मधुर और नम्र भाषामें प्रकट हुए हैं। अनेक विषयोंका प्रतिपादन होनेपर भी व्याख्यान छोटा है। आत्माका तेज प्रत्येक वाक्यसे झलकता है। कई लोगोंके दिलमें जो भय था, भाषणके बाद वह सब मिट गया। जैसा उनका व्यास्थान था वैसा ही उनका आचरण भी। अधिवेशनके दिनोंमें उन्होंने अपना सारा काम स्वतन्त्रता और सम्पूर्ण न्यायबुद्धिसे किया।और अपना काम सतत उद्यमसे करते रहनेके कारण सब कुछ ठीक समयपर निर्विघ्न पूर्ण हुआ।
ऐसे वीर और पुण्यात्मा नवयुवकके सभापतित्वमें यदि हम कुछ न कर पायेंगे तो मुझे बड़ा आश्चर्य होगा। परन्तु यदि सेना ही नालायक हो तो वीर नायक भी क्या<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
hb9e8k5uvy4w100pb2ztuh0pkyoss22
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३०
250
196851
673556
669236
2026-08-24T06:12:06Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673556
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कर सकता है? इसलिए हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। क्या हम जवाहरलालके नेतृत्वके लायक हैं? यदि हैं, तो परिणाम शुभ ही होगा। स्वतन्त्रताकी घोषणा करने मात्रसे स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती। हममें स्वतन्त्रताका वायुमण्डल पैदा होना चाहिए। स्वतन्त्रता एक चीज है, स्वच्छन्दता दूसरी कई बार हम स्वच्छन्दताको ही स्वतन्त्रता मान बैठते हैं और स्वतन्त्रता गँवा देते हैं। स्वच्छन्दताकी पराकाष्ठा स्वार्थ है; स्वतन्त्रताकी परमार्थ। स्वच्छन्दता समाजका नाश करती है, स्वतन्त्रता समाजको जीवन देती है। स्वच्छन्दतामें मर्यादाका त्याग किया जाता है; स्वतन्त्रतामें मर्यादाका पूर्ण पालन किया जाता है। पराधीनतामें हम बहुत-सी बातें डरके मारे करते हैं; स्वाधीनतामें वे ही बातें हम इच्छापूर्वक करते हैं।
पराधीन मनुष्य डरके वश होकर चोरी नहीं करेगा, किसीके साथ फसाद नहीं करेगा, झूठ नहीं बोलेगा, बाह्याचारमें शुद्ध-सा प्रतीत होगा, डाकू आदिसे स्वामीके बलसे बचेगा। पराधीन मनुष्य जो कुछ करता है, उसमें वह अपने मनका साथ नहीं देता। स्वाधीन मनुष्यके जैसे आचार होते हैं वैसे ही विचार भी वह जो-कुछ अच्छा बुरा करता है, स्वेच्छासे करता है। इसलिए स्वाधीन मनुष्य अपने सत्कार्यका पूरा फल पाता है, और ऐसा होनेसे समाजकी दिनोंदिन प्रगति होती है। स्वाधीन मनुष्य दूसरोंकी रक्षाके कर्त्तव्यकी उपेक्षा नहीं करेगा।
इसलिए यदि हममें सच्ची स्वतन्त्रता आई है तो हम कीमी डरको छोड़ देंगे। हिन्दू-मुसलमान एक दूसरेसे डरना भूल जायेंगे। दोनों साथ-साथ भूलें तो बहुत ही अच्छा है, परन्तु स्वतन्त्र मनुष्य डर छोड़नेके लिए साथियोंके सहयोगकी अपेक्षा न करे। यदि एक पक्ष न्यायकी मर्यादाको छोड़ दे तो भी वह तीसरी ताकतका सहारा नहीं माँगेगा। वह अपनी ताकतपर ही निर्भर रहेगा, और हार गया तो अपनी ताकत बढ़ानेकी कोशिश करेगा। लड़ते हुए मर जाना जीत है, धर्म है। लड़नेसे भागना पराधीनता है, दीनता है। शुद्ध क्षत्रियत्वके बिना शुद्ध स्वाधीनता असम्भव है। इसीलिए क्षत्रियके लक्षणमें ‘अपलायनम्’ को ही अद्वितीय स्थान है। इस कारण हमें
अपनी हरएक बातमें ‘अपलायनम्’ का सेवन करना आवश्यक है।
{{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' ९-१-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
caebyn1id6oo25oemx3ri662xlyqryl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३१
250
196852
673558
669237
2026-08-24T06:20:24Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673558
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३६५. पत्र: बहरामजी खम्भाताको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>९ जनवरी, १९३०}}
{{left|भाईश्री सम्भाता,}}
तुम्हारा ३४५ रुपयेका चेक मिला। तुम्हारे लिखे अनुसार रकमका उपयोग किया जायेगा। आशा है, तुम दोनोंका स्वास्थ्य अच्छा होगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७५४३) की फोटो नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३६६. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>९ जनवरी १९३०}}
{{left|भाईश्री घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मिला है। केशुके लिए आप सबकी तरफसे प्रेमधारा वह रही है ऐसा देवदास लिखता है और राधाबहिन भी लिख रही है। इस बारेमें तो क्या कहूँ? उपचार भी करीब करीब मैं चाहता था वैसे ही हो रहे हैं। बस इस बारे में और कुछ लिखना अविनय समझता हूँ। मैं निश्चिन्त हूँ।
लाहोरके बारेमें जो कुछ प्रस्ताव हुए हैं वह मुझको बहुत प्रिय लगते हैं। और अब जो हो रहा है उससे मेरा अभिप्राय दृढ़तर होता जा रहा है। ‘यं॰ ई॰’ में मैंने लिखा<ref>देखिए “कांग्रेस”, ९-१-१९३०।</ref> है उसे पढ़े और कुछ लिखनेका उचित समझें तो लिखें। आपको अभिप्राय और सलाह देनेका सम्पूर्ण अधिकार है।
{{right|'''आपका,'''<br>'''मोहनदास'''}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ६१८० से।
सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला।<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
0pfr9gjj1ckbgo1pc3eiuuv0spszmc6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३२
250
196853
673560
669238
2026-08-24T06:29:51Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673560
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३६७. पत्र: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|१० जनवरी १९३०}}
{{left|प्रिय जवाहरलाल,}}
२६ तारीखके अपने प्रस्ताव या अपनी घोषणाका मसविदा<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ। मुझे अभीतक किसीसे कोई सुझाव नहीं मिला है। लेकिन मैंने सोचा कि अब मैं अन्ततक इन्तजार नहीं करूँ। अब तुम इसे काट-छाँट लो या तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा परिवर्द्धन-संशोधन कर लो। जितना ज्यादा छोटा होगा उतना ही ज्यादा अच्छा रहेगा।
लाहौर में जबसे हम लोग एक दूसरेसे अलग हुए हैं तभीसे मैं सविनय अवज्ञाकी योजनाएँ बनाता रहा हूँ। अभीतक तो मुझे अपना रास्ता साफ नहीं दिखाई दिया है। लेकिन मैं इस निर्णय तक तो पहुँच गया हूँ कि कांग्रेसकी वर्तमान स्थिति में उसके नामसे किसी भी प्रकारकी सविनय अवज्ञा अभी नहीं की जा सकती है और न ही की जानी चाहिए। वह अकेले या कुछ साथियोंके साथ मेरे द्वारा ही की जा सकती है―जैसी कि मैंने दक्षिण आफ्रिकामें की थी। उसके बारेमें यदि तुमने सत्याग्रहका इतिहास<ref>देखिए दक्षिण आफ्रिका सत्याग्रहका इतिहास; खण्ड २९।</ref> पढ़ा है तो तुम जानते होओगे। यदि तुमने उसे न पढ़ा हो तो वह पढ़ लेना। यदि मुझे अन्ततोगत्वा अपना रास्ता साफ दिखाई दिया तो मैं सोचूँगा कि उसमें कांग्रेस कितना हाथ बटा सकती है। कुछ भी हो, इस सबपर मुझे पत्र-व्यवहार द्वारा बातचीत करने योग्य समय नहीं है। यदि मैं कुछ और सोच सका तो तुम्हें सूचित करूँगा। यदि तुम्हें इसपर कुछ कहना हो तो मुझे सूचित करना। हर हालत में तुम कार्य समितिको बैठकवाले दिनसे एक या दो दिन पहले आनेको तैयार रहना। यों तो तुम और भी जल्दी आ सकते हो...<ref>मूलमें यहाँ कुछ अस्पष्ट है।</ref> यदि आवश्यक हो तो २६ से भी पहले।
आशा है कि निश्चित तिथिपर पिताजी बंगाल जा रहे होंगे।
मैं तुम्हारे कार्यकालके वर्ष में अपनी स्थिति मजबूत करनेको बहुत उत्सुक हूँ लेकिन सर्वथा अपनी दृष्टिके अनुसार। इसलिए मैं जो-कुछ कहूँ या सुझाव दूँ उसकी आलोचना करनेमें अपने आपको स्वतन्त्र समझो। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता जो तुम्हारे उद्दिष्ट कार्यके विपरीत पड़े या तुम्हारी योजनाओंको, यदि तुमने उन्हें स्वतन्त्ररूपसे बनाया हो, चोट पहुँचाये। मैं जितना ही ज्यादा सोचता हूँ उतना ही मुझे और विश्वास होता जाता है कि देशके लिए यह अच्छी ही बात हुई कि मैं अध्यक्ष नहीं बना। तब सर्वथा तटस्थ रहकर योजनाओंको पक्की बनाने में मुझे अड़चन<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
tpv6wlan0en28gt88k2umaz5w80kyce
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३३
250
196854
673563
669239
2026-08-24T06:43:24Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673563
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||२६ जनवरीकी घोषणाका मसविदा|३९५}}</noinclude>महसूस होती। जैसा कि अभी है, जबतक तुम कांग्रेसके मुखिया हो मैं अपना परीक्षण करनेका इससे और बेहतर मौका नहीं सोच सकता।
{{right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{left|[पुनश्चः]}}
यह लिखनेके बाद तुम्हारा पत्र मिला।<ref>पत्र में यह कहा गया था कि में कुछ दिनों में २६ के लिए आपके वक्तव्य और प्रस्तावको पानेको आशा कर रहा हूँ। क्या आप वह दिन कैसे मनाया जाये इसके सम्बन्धमें कुछ निर्देश भी दे सकते हैं? -राजगोपालाचारीका पत्र साथमें भेज रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि वे जो कहते है उसमें कुछ सार तो है। समाचारपत्रोंमें कितने ही वक्तब्य और उनके जवाब में वक्तव्य आते रहते हैं। इनसे मामलोंके उलझ जाने की सम्भावना है। निजी तौरपर में बहुत ज्यादा दौरे करना नापसन्द करता हूँ लेकिन यदि आप समझते हैं कि मुझे इधर-उधर भाग-दौड़ करनी चाहिए तो में वैसा करूँगा। राजगोपालाचारीका यह सोचना कि कुछ गैर कांग्रेसी सदस्योंको भी शायद विधानसभाओंसे बाहर ला सकें, मुझे बेहद आशावादी लगता है...लेकिन कौंसिल बहिष्कारके अलावा भी देशको यह महसूस कराना वांछनीय है कि हमारा इरादा सच्चा है। यदि हम कुछ हफ्ते चुप रहे तो शायद इसका असर बुरा पड़े।...(एस॰ एन॰ १६३३५)।</ref> मैंने ऊपर जो कुछ कहा है उसे देखते हुए मुझे बाहर कतई नहीं जाना चाहिए। तुम्हारे पिता ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो कुछ जगहों की यात्रा कर सकते हैं और जिनका प्रभाव पड़ेगा। कौंसिल-बहिष्कारके मामले में उनकी बातका जितना वजन हो सकता है उतना किसीका नहीं हो सकता। क्या वे जा सकते हैं?
तुम्हारी टिप्पणियोंको<ref>इंग्लैंड द्वारा किये गये भारतके शोषण के सम्बन्धमें। (एस॰ एन॰ १६३३५)।</ref> पढ़नेके बाद मैं अपना मसविदा बदलना जरूरी ही समझता हूँ।
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी १६-९-१९३०
सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३६८. २६ जनवरीको घोषणाका मसविदा'''<ref>अन्तिम घोषणा के लिए देखिए “२६ को यह याद रखिए”, २३-१-१९३०।</ref>'''}}}}
{{right|[१० जनवरी १९३०]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref>}}
हमारा विश्वास है कि अपनी प्रगतिके लिए पूरा-पूरा अवसर पानेकी दृष्टिसे दूसरे देशवासियोंकी तरह हिन्दुस्तानके लोगोंका स्वाधीनता पाने, अपनी मेहनतका सुख<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ozhgovd1ai5szjsjznqpsiq2lbzy4cs
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३४
250
196855
673575
669240
2026-08-24T07:02:14Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673575
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भोगने तथा जीवनके लिए आवश्यक वस्तुओंको प्राप्त करनेका पूर्ण अधिकार है। हमारा यह भी विश्वास है कि अगर कोई सरकार लोगोंको उनके अधिकारसे वंचित करती है और उनपर जल्म करती है तो लोगोंको यह भी अधिकार है कि वे उसे बदल दें या उसे समाप्त कर दें। भारतकी अंग्रेज सरकारने हिन्दुस्तानियोंको न केवल उनकी स्वाधीनतासे वंचित कर दिया है, बल्कि उसने जनताके शोषणको ही अपना आधार बनाया है और हिन्दुस्तानको आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिसे तबाह कर दिया है। इसलिए हम मानते हैं कि हिन्दुस्तानको अवश्य ही ब्रिटेनसे सम्बन्ध तोड़ देना चाहिए और ‘पूर्ण स्वराज्य’ या पूर्ण-स्वाधीनता हासिल करनी चाहिए।
आर्थिक दृष्टिसे भारत बरबाद कर दिया गया है। लोगोंसे जो कर वसूल किया जाता है, अनुपातमें उसका हमारी आमदनीसे कोई मेल ही नहीं बैठता। हमारी औसत आमदनी प्रतिदिन सात पैसा (दो पैससे भी कम) है, और जो कर हम देते हैं वह २.५ पाई प्रतिदिन है। २० फीसदी किसानोंसे लगानके रूपमें वसूल किया जाता है, और उसका ३ फीसदी नमक-करसे वसूल किया जाता है। नमक-करका भार गरीबों पर ही सबसे ज्यादा पड़ता है।
गाँवके उद्योग-धन्थे, जैसे कि हाथ-कताई, नष्ट कर दिये गये हैं और इस कारण किसानोंको सालमें कमसे-कम चार महीने बेकार रहना पड़ता है।हस्त-कला-कौशलके अभाव में उनकी बुद्धि मन्द होती जा रही है। जो हुनर इस तरह नष्ट हो गये हैं, उनके बदले में और देशोंकी भाँति, कोई नया धन्धा भी नहीं मिल सका है।
आयात-निर्यात-कर और मुद्राकी कुछ ऐसी व्यवस्था की गई है कि उनसे किसानोंका बोझ और भी ज्यादा बढ़ जाता है। इस देशमें ब्रिटेनका तैयार किया गया माल ही ज्यादा तादाद में आता है और इनपर लगनेवाली चुंगी, जिसे जनता पर करोंका बोझ कम करनेके लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए था, भारतमें रूसकी बनिस्बत ४४ दर्जे और अमेरिका और जर्मनीकी वनिस्वत क्रमश: ४४<ref>और</ref> और २४<ref> संख्याओंमें हुए अन्तिम सुधारके लिए देखिए “तार: जवाहरलाल नेहरूको”, १६-१-१९३०।</ref> दर्जे कम है। विनिमय दरके मनमाने निर्धारणसे देशका करोड़ों रुपया बाहर भेजा जा रहा है।
राजनैतिक दृष्टिसे हिन्दुस्तानकी प्रतिष्ठा पहले कभी इतनी नहीं घटी थी, जितनी कि अंग्रेजी राज्यमें घटी है। हमारी सारी शासन-क्षमता समाप्त कर दी गई है और जनताको पटेल-पटवारी या मुहर्रिरीके छोटे-मोटे पदोंसे ही सन्तोष कर लेना पड़ता है। हममें से बड़ेसे-बड़े व्यक्तिको भी विदेशी सत्ताके सामने झुकना पड़ता है। जो सुधार किये भी गये हैं उनमें से किसी एकसे भी जनताके हाथमें सच्ची राजनैतिक शक्ति नहीं आई है।
सांस्कृतिक दृष्टिसे देखें तो इस शिक्षा-प्रणालीके कारण हम अपनी संस्कृतिसे कट कर दूर जा पड़े हैं और हमें जो प्रशिक्षण मिला है उसने हमें उन्हीं जंजीरोंसे और जोरसे लिपटे रहना सिखाया है जो हमें [दासतामें] बाँध है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
tkred624ifh26ri9qyenq6lpucaeqr6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३५
250
196856
673615
669241
2026-08-24T08:55:06Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673615
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||पत्र डॉ॰ सैयद महमूदको|३९७}}</noinclude>
आध्यात्मिक दृष्टिसे देखें तो हथियार न रखने देनेकी नीतिने हमें नामर्द बना दिया है। हमारे प्रतिरोधको भावनाको कुचल डालनेके घातक इरादेसे जो विदेशी सेना रखी गई है, उसके कारण हम ऐसा कुछ सोचने लगे हैं कि न तो हम अपनी रक्षा कर सकते हैं न विदेशियोंके आक्रमणका सामना कर सकते हैं और न ही अपने घरों तथा कुटुम्बियोंको चोर, डाकू या गुण्डों के हमलोंसे बचा सकते हैं।
इसलिए जिस शासनने हमारे देशपर इन चार प्रकारकी विपत्तियोंका बोझ लाद दिया है, उस राज्यके अधीन रहना हम अब ईश्वर और मानव जातिके प्रति अपराध करना समझते हैं। हम मानते हैं कि स्वाधीनता प्राप्त करनेके तरीकोंमें हिंसाका तरीका सर्वाधिक कारगर तरीका नहीं है। अतः हम ब्रिटिश सरकारसे जहाँतक हमसे हो सकता है स्वेच्छापूर्वक सहयोग करना छोड़कर सविनय अवज्ञा करनेकी, जिसमें कर न देना भी शामिल है, तैयारी करेंगे। हमारा विश्वास है कि यदि हम ब्रिटिश सरकारसे सहयोग करना-भर छोड़ दें और उत्तेजनाका कारण उपस्थित होने पर भी उपद्रव न करते हुए, कर देनेसे इनकार कर दें तो इस अमानुषिक शासनका अन्त निश्चित है। अतएव हम पवित्र प्रतिज्ञा करते हैं कि पूर्ण-स्वराज्यकी स्थापनाके लिए कांग्रेस समय-समयपर जो हिदायतें देगी उनका पालन करेंगें।
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
अ॰ भा॰ कॉ॰ क॰ फाईल संख्या, १६-ए, १९३०
सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३६९. पत्र: डॉ० सैयद महमूदको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१० जनवरी १९३०}}
{{left|प्रिय डा॰ महमूद,}}
आपका मर्मस्पर्शी पत्र मिला। निस्सन्देह इस समय यह मृत्यु<ref>मजहर-उल-हककी मृत्यु, देखिए “टिप्पणियाँ”, ९-१-१९३० का उपशीर्षक ‘स्वर्गीय मजहर-उल-हक’।</ref> हमारे इतिहासपर एक बहुत बड़ा धक्का है। आशा है कि वेगम साहिबाको मेरा तार मिल गया होगा। उनसे कहें कि वे दुःखी न हों। हम सबको ही उस घटनाका, जो सभी प्राणियोंके लिए अनिवार्य है, साहसपूर्वक सामना करना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५०७४) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
h5pij4yw7mlna0wfqtjihet2ufibrl2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३६
250
196857
673617
669242
2026-08-24T09:01:26Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673617
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude> {{c|{{larger|'''३७०. एक पत्र'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१० जनवरी १९३०}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
अब्बास साहबका एक पत्र मुझे मिला। मुझे ऐसा जरूर लगता है कि यदि आप गवर्नरके समारोह में जाना टाल सकते हों तो आपको यही करना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
अंग्रेजी (एम॰ एम॰ यू॰ २२/६६) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७१. पत्र: दुनीचन्दको'''}}}}
{{right|११ जनवरी १९३०}}
{{left|प्रिय लाला दुनीचन्द,<ref>लाहौर उच्च न्यायालय के एक वकील</ref>}}
आपके पत्रके लिए धन्यवाद। आप जो कुछ कहते हैं उसे मैं निश्चय ही ध्यानमें रखूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५५८०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
iudbhldzr11xu0o4ysbkrw6oldaud0e
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३७
250
196858
673624
669243
2026-08-24T09:22:06Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673624
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३७२. भाषण: गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहम'''}}}}
{{right|११ जनवरी १९३०<ref>बॉम्बे सीक्रेट एक्सट्रेक्टसे।</ref>}}
नरेन्द्रदेवजीने आपसे कहा कि “आप राष्ट्रकी सेवा करनेको उत्सुक हैं।आपका हृदय शुद्ध है, आप वीर हैं, त्यागी हैं और राष्ट्रकी सेवा करनेके इच्छुक हैं तथा जब आप इस संसार में प्रवेश करेंगे तो कुछ-न-कुछ करके दिखायेंगे।” मैं कामना करता हूँ कि ये सभी विशेषण सही सिद्ध हों। किन्तु आजतकके अनुभव के आधारपर मैं तो आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप शुद्ध बनें और शुद्ध रहें। आपने अभी जो प्रतिज्ञा ली है उसे कागजपर ही न रहने दें बल्कि उसे अपने हृदयपर अंकित कर लें तथा आपपर जो धन और अध्यापकोंकी शक्ति खर्च हुई है उसे सफल बनायें।
श्री वल्लभभाई और काकाने भिक्षाकी झोली फैलाई है। इस भिक्षाके लिए किसी अंग्रेजी अखबार में अपील देखने में नहीं आई; क्योंकि उसका उद्देश्य यह देखना है कि विद्यापीठके प्रति गुजरातका मुख्य कर्तव्य क्या है। मुझे आशा थी कि इस बीच हमारी माँग के अनुसार साठ हजार मिल जायेंगे। यदि इस राष्ट्रीय कार्यको तेजी से प्रगतिकी ओर ले जाना हो तो जनताको चाहिए कि वह राष्ट्रीय कार्यकर्ताओंको आर्थिक चिन्तासे मुक्त कर दे। यदि अहमदाबाद के नागरिक ही चाहें तो इस माँगको पूरा कर सकते हैं। यदि ऐसा हो सका तो अध्यापकगण अपने कामपर पूरी तरह ध्यान दे सकेंगे। विद्यापीठमें हमें संख्याकी अपेक्षा शक्तिकी अधिक आवश्यकता है। सविनय अवज्ञाका प्रस्ताव लागू करने तथा उस पूरे प्रस्तावके पीछे हमारे मनमें यह भावना काम कर रही थी कि कुछ थोड़े-से विद्यार्थी तो अपने कर्तव्यका पालन अवश्य करेंगे।
कलकत्ते में अ॰ भा॰ कांग्रेस कमेटीने निर्णय किया था कि पण्डित नेहरूकी योजनानुसार औपनिवेशिक स्वराज्य यदि न मिला तो पूर्ण स्वराज्यका प्रस्ताव पास कर दिया जायेगा फिर भले ही संसार उसकी निन्दा करे। यदि स्वतन्त्रता और औपनिवेशिक स्वराज्य में चुनाव करना हो तो मेरे जैसा व्यक्ति स्वतन्त्रताकी ही हिमायत करेगा।<ref>यह और इससे पहलेके दो अनुच्छेद गुजराती '''प्रजाबन्धु''' १२-१-१९३० से लिये गए हैं। अगले अनुच्छेद '''यंग इंडिया'''से लिये गए हैं।</ref>
यह स्वाभाविक है कि आप मुझसे यह आशा रखें कि मैं लाहौर कांग्रेस में
पारित स्वतन्त्रता प्रस्तावपर<ref>देखिए “भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमे-२”, ३१-१२-१९२९।</ref>, विशेषकर इसके सविनय अवज्ञावाले भाग पर कुछ कहूँ और संघर्ष में आपका क्या भाग होगा यह भी आप जानना चाहेंगे। जैसा कि मैंने यहाँ अकसर कहा है, यह ठीक है कि हम संख्याके बलपर नहीं परन्तु चरित्र<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
civugzh72y171tsr8nzotw0thpmn6d5
673625
673624
2026-08-24T09:23:01Z
Priyanka1114
6799
673625
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३७२. भाषण: गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहम'''}}}}
{{right|११ जनवरी १९३०<ref>बॉम्बे सीक्रेट एक्सट्रेक्टसे।</ref>}}
नरेन्द्रदेवजीने आपसे कहा कि “आप राष्ट्रकी सेवा करनेको उत्सुक हैं।आपका हृदय शुद्ध है, आप वीर हैं, त्यागी हैं और राष्ट्रकी सेवा करनेके इच्छुक हैं तथा जब आप इस संसार में प्रवेश करेंगे तो कुछ-न-कुछ करके दिखायेंगे।” मैं कामना करता हूँ कि ये सभी विशेषण सही सिद्ध हों। किन्तु आजतकके अनुभव के आधारपर मैं तो आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप शुद्ध बनें और शुद्ध रहें। आपने अभी जो प्रतिज्ञा ली है उसे कागजपर ही न रहने दें बल्कि उसे अपने हृदयपर अंकित कर लें तथा आपपर जो धन और अध्यापकोंकी शक्ति खर्च हुई है उसे सफल बनायें।
श्री वल्लभभाई और काकाने भिक्षाकी झोली फैलाई है। इस भिक्षाके लिए किसी अंग्रेजी अखबार में अपील देखने में नहीं आई; क्योंकि उसका उद्देश्य यह देखना है कि विद्यापीठके प्रति गुजरातका मुख्य कर्तव्य क्या है। मुझे आशा थी कि इस बीच हमारी माँग के अनुसार साठ हजार मिल जायेंगे। यदि इस राष्ट्रीय कार्यको तेजी से प्रगतिकी ओर ले जाना हो तो जनताको चाहिए कि वह राष्ट्रीय कार्यकर्ताओंको आर्थिक चिन्तासे मुक्त कर दे। यदि अहमदाबाद के नागरिक ही चाहें तो इस माँगको पूरा कर सकते हैं। यदि ऐसा हो सका तो अध्यापकगण अपने कामपर पूरी तरह ध्यान दे सकेंगे। विद्यापीठमें हमें संख्याकी अपेक्षा शक्तिकी अधिक आवश्यकता है। सविनय अवज्ञाका प्रस्ताव लागू करने तथा उस पूरे प्रस्तावके पीछे हमारे मनमें यह भावना काम कर रही थी कि कुछ थोड़े-से विद्यार्थी तो अपने कर्तव्यका पालन अवश्य करेंगे।
कलकत्ते में अ॰ भा॰ कांग्रेस कमेटीने निर्णय किया था कि पण्डित नेहरूकी योजनानुसार औपनिवेशिक स्वराज्य यदि न मिला तो पूर्ण स्वराज्यका प्रस्ताव पास कर दिया जायेगा फिर भले ही संसार उसकी निन्दा करे। यदि स्वतन्त्रता और औपनिवेशिक स्वराज्य में चुनाव करना हो तो मेरे जैसा व्यक्ति स्वतन्त्रताकी ही हिमायत करेगा।<ref>यह और इससे पहलेके दो अनुच्छेद गुजराती '''प्रजाबन्धु''' १२-१-१९३० से लिये गए हैं। अगले अनुच्छेद '''यंग इंडिया'''से लिये गए हैं।</ref>
यह स्वाभाविक है कि आप मुझसे यह आशा रखें कि मैं लाहौर कांग्रेस में पारित स्वतन्त्रता प्रस्तावपर<ref>देखिए “भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमे-२”, ३१-१२-१९२९।</ref>, विशेषकर इसके सविनय अवज्ञावाले भाग पर कुछ कहूँ और संघर्ष में आपका क्या भाग होगा यह भी आप जानना चाहेंगे। जैसा कि मैंने यहाँ अकसर कहा है, यह ठीक है कि हम संख्याके बलपर नहीं परन्तु चरित्र<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
n2xktftmlpo6le7hjk8gamvmjl8yb51
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३८
250
196859
673629
669244
2026-08-24T09:34:13Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673629
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>के बलपर विश्वास करते हैं। सविनय अवज्ञा प्रस्ताव ज्यादातर तो इसलिए सामने रखा गया था कि मुझे आह्वानके प्रत्युत्तरमें आगे आनेवाले लोगोंकी संख्या की अपेक्षा उद्देश्यके लिए आत्मत्याग करनेवाले कुछ-एक लोगोंपर विश्वास था। आपको मालूम है कि कलकत्ता प्रस्तावने हमें कांग्रेस संविधानके प्रथम अनुच्छेदको बदल देने और यदि औपनिवेशिक स्वराज्य १९२९ तक न मिले तो सविनय अवज्ञाके कार्यक्रमके लिए तैयार होनेको वचनवद्ध किया था। इसमें यह कहा गया था कि यदि यह काम पूरा नहीं हुआ तो हमारे पास प्रतिकूल आलोचना और गलत अर्थ निकाले जानेके खतरेके बावजूद प्रतिज्ञा निभानेके सिवाय और कोई चारा नहीं बचेगा। प्रस्तावके उपरान्त जो घटनाएँ घटी हैं, उन्होंने प्रस्तावको और भी बल पहुँचाया है। अर्ल रसलने हमें साफ तौरपर बतला दिया है कि भारतका औपनिवेशिक स्वराज्य हमारे विश्वासके विपरीत है; अर्थात् कनाडा, न्यूजीलैण्ड और आस्ट्रेलियाके जैसे औपनिवेशिक स्वराज्यसे कुछ भिन्न है। अर्ल स्वीकार करते हैं कि ये देश वास्तवमें स्वतन्त्र हैं। जब मैंने भारतके लिए औपनिवेशिक स्वराज्यकी बात की थी, उस समय मेरे मनमें कोई और बात कभी नहीं थी। जो अर्ल रसल कहते हैं उसका तो यही अभिप्राय है कि भारत बरसोंसे जिन लोहेकी जंजीरोंमें जकड़ा रहा है, वह अब उन्हें चाहे तो सोनेकी जंजीरोंमें बदल सकता है। ऐसा लगता है कि हममें से कुछ लोगोंको यह प्रस्ताव प्रिय लगता है। हम लोग इस भयसे आक्रान्त हैं कि हमारे लिये अंग्रेजोंसे सम्बन्ध तोड़ देनेका मतलब होगा―― हिंसा और विप्लव। मैं एक बार फिर अपना अभिप्राय स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। वैसे तो मैं अहिंसाके सिद्धान्तका हामी हूँ परन्तु यदि मुझे विवश होकर विप्लव और शाश्वत दासतामें से एकको चुननेका विकल्प दे दिया जाये तो मैं निःसंकोच कहूँगा कि मैं भारतमें विप्लव देखना कहीं ज्यादा पसन्द करूँगा, मैं हिन्दुओं और मुसलमानोंको एक-दूसरेको मौतके घाट उतारते देखना ज्यादा पसन्द करूँगा बनिस्बत इसके कि देश नित्य दासताकी स्वर्ण श्रृंखलामें जकड़ा रहे। मेरे खयालसे सोनेकी जंजीरें लोहेकी जंजीरोंसे कहीं ज्यादा बुरी हैं, क्योंकि आदमी लोहेकी जंजीरोंका भारीपन और उनसे होनेवाली पीड़ाको आसानीसे अनुभव करता है और सम्भव है कि सोनेकी जंजीरोंकी पीड़ाको भूल जाये। इसलिए यदि भारतको जंजीरोंमें
ही बँधा रहना है तो मैं चाहूँगा कि वे सोने या और किसी कीमती धातुकी बनी होने के बजाय लोहेकी ही बनी हों।
जिस क्षण हम स्वतन्त्रताकी बात करते हैं――कुछ लोग अफगान―― आक्रमणका भूत खड़ा कर देते हैं। ब्रिटेनसे दासताका सम्बन्ध तोड़ चुकनेपर यदि हमपर आक्रमण भी हो जाये तो उसकी मुझे कोई परवाह नहीं है। परन्तु मैं पक्का आशावादी हूँ; मेरा यह अडिग विश्वास है कि भारतको रक्तपात रहित क्रान्ति द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू जैसा व्यक्ति हमारा कर्णधार है। मैं समझता हूँ कि हमें अपने अध्यक्षके रूपमें इससे ज्यादा अच्छा कोई नौजवान कभी नहीं मिलेगा। कितना अच्छा हो कि हम अपने मामलोंकी बागडोर उसके हाथमें रहते हुए अपना उद्देश्य प्राप्त कर लें। मैं समझता हूँ कि यदि आप अपनी प्रतिज्ञापर दृढ़ रहें तो<noinclude></noinclude>
t1urqrtql7vqisbef6pvld0l4eof42i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३९
250
196860
673630
669245
2026-08-24T09:44:44Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673630
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोह में|४०१}}</noinclude>यह बिलकुल सम्भव है। मैं इस विद्यापीठके स्नातकोंको स्वराज्यके लिए किये गये किसी भी आन्दोलनमें सबके आगे देखना चाहूँगा। मैं चाहता हूँ कि आप यह समझ लें कि क्या होनेवाला है। आपकी परीक्षा जेल जानेसे ज्यादा कठिन है। चोर, डाकू और हत्यारे भी जेल जा सकते हैं और वे वहाँ पूरी तरह आरामका अनुभव करते हैं। परन्तु वे जेल जाकर देशकी सेवा नहीं करते। केवल जेल जानेवाला आदमी देशकी सेवा नहीं करता। मैं आपसे यह चाहता हूँ कि आप संघर्ष में स्वेच्छासे शुद्ध त्याग करनेके लिए तैयार रहें। वातावरणमें जबर्दस्त हिंसा भरी हुई है। यदि मुझे जेलमें डाल दिया जाये और हिंसा फूट पड़े तो आपको अपने-आपको हिंसाकी ज्वाला में होम कर देना होगा। यदि आप अपनी सत्य और अहिंसाकी प्रतिज्ञाके प्रति सच्चे हैं तो जब हिंसा या आगजनी हो रही हो तब आप अपने घरोंमें नहीं छिपे रहेंगे और न उसमें सक्रिय भाग ही लेंगे। परन्तु आप शान्त करनेके विचारसे प्रचण्ड अग्निमें घुस जायेंगे; आपसे निस्सन्देह यही अपेक्षित होगा। हिंसाके समर्थक भी आपसे यही आशा रखेंगे और कुछ नहीं पाप, पुण्यका मान करता है; और कभी वह पुण्यका मान करनेके लिए जो मार्ग चुनता है, वह यह है कि पुण्यसे यह आशा रखे कि जब
चारों ओर पाप व्याप्त हो तो भी वह अपनी जगहसे न हिले।
आप निस्सन्देह जेल जानेके लिए तैयार होंगे; परन्तु मैं नहीं समझता कि जेल जानेके लिए आपका आह्वान किया जायेगा। अभी जिस बड़ी और कठिन परीक्षाकी तसवीर मैंने आपके सामने खींची है, वह आपकी प्रतीक्षा कर रही है। मुझे नहीं मालूम कि सविनय अवज्ञा कैसा रूप धारण करेगी परन्तु में किसी प्रभावपूर्ण सूत्रकी खोजमें हूँ।<ref>इससे अगला अनुच्छेद गुजराती '''प्रजाबन्धु,''' १२-१-१९३० से लिया गया है।</ref>
यदि रचनात्मक कार्यमें ढिलाई आ गई हो, तो उसे दूर करें। यदि उसमें हिंसा और असत्य हो तो उन्हें निकाल फेंकें। इस वर्ष हमें कुछ न कुछ कर ही डालना चाहिए; और हिन्दमें इसका उत्तरदायित्व मुझपर है। सबको यह आशा है कि मैं इस समस्याको हल कर सकता हूँ। मुझे भी यह विश्वास है कि मैं इसे हल कर सकता हूँ। मैं यह सब आपको उत्साहित करनेके लिए नहीं बल्कि सचेत करनेके लिए कह रहा हूँ। आप इसपर विश्वास करें कि कल कुछ न कुछ होकर रहेगा।
यदि हम अहिंसा और सत्य द्वारा ध्येयकी प्राप्ति कर सकें तो मैं इसके लिए आतुर हूँ। यदि हम अहिंसा और सत्यका त्याग किये बिना ध्येयतक न पहुँच सकें तो मुझमें प्रतीक्षा करनेका असीम धैर्य है। इन दोनों भावोंका जन्म अहिंसा और सत्यकी श्रेष्ठतापर मेरे अटल विश्वाससे हुआ है। मुझे मालूम है कि यह रास्ता चाहे कितना भी लम्बा क्यों न लगे, मेरी रायमें यही सबसे छोटा रास्ता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १६-१-१९३०<br> '''प्रजाबन्धु,''' १२-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-२६|1em}}</noinclude>
cuwn78ttkchy9ugwkno51udc6tpqvln
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४०
250
196861
673632
669246
2026-08-24T09:55:14Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673632
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३७३. कुएँ और तालाब<ref>यह '''नवजीवन'''के क्रोड़पत्र '''शिक्षण''' अने '''साहित्य'''में प्रकाशित हुआ था।</ref>'''}}}}
पहलेकी भांति आज भी नया गाँव बसानेवाला पहली बात पानीकी सोचेगा; और अगर पानीकी ठीक व्यवस्था न हो या न हो सके तो वहाँ गाँव बसानेका विचारतक नहीं करेगा। दक्षिण में ऐसे प्रदेश पाये जाते हैं जहाँ और सब तरहकी सहूलियत और सुन्दरता रहते हुए भी पानीकी दिक्कत है; और इसी कारण वहाँ गाँव नहीं बसाये जा सकते। हवा मनुष्यकी पहली आवश्यकता है, किन्तु उसे कहीं खोजने नहीं जाना पड़ता पानी उसकी दूसरी आवश्यकता है। और यद्यपि पानी हवाके समान आसानीसे नहीं मिल सकता तो भी इसे प्राप्त करनेमें अन्न उत्पन्न करने जितना कष्ट नहीं उठाना पड़ता। लेकिन जिस तरह हवा और अनाजका अच्छा होना जरूरी है उसी तरह पानी भी अच्छा होना चाहिए।
हममें से सभी यह जानते हैं कि या तो गाँववाले इन बातोंसे अनजान है या जानते हुए भी वे इस तरफसे लापरवाह रहते हैं। इसलिए ग्रामसेवकके लिए गाँववालोंको सिखानेके कार्यक्रम में पानीके बारेमें जरूरी बातें बताना बहुत महत्त्व रखता है, और इस काम में सेवकके धैर्यकी पूरी-पूरी परीक्षा हो जाती है। हम इस बातकी तो आशा भी नहीं कर सकते कि गाँववाले खुद मेहनत करके पानी साफ रखनेके उपाय ढूँढ निकालेंगे या उसका प्रबन्ध कर लेंगे। धीरे-धीरे गाँववालोंको पानी साफ रखनेके फायदे और नियम बताने होंगे और इस तरह अपने काम में उनकी मदद लेनी होगी। कई जगह ऐसा भी देखनेमें आया है कि अपने फायदेकी बातमें भी गाँववाले मदद करने को तैयार नहीं हो होते। ऐसे मौकेपर सेवकको अकेले ही मजदूरी करके और भरसक अकेले ही अपने हाथों काम करके गाँववालोंको शर्मिन्दा करना होगा।
अब हम जरा यह देखें कि हमें क्या करना चाहिए। कई गाँवोंमें एक ही तालाब होता है। उसमें मवेशी पानी पीते हैं, मनुष्य नहाते धोते हैं, बरतन साफ करते हैं, कपड़े धोते हैं और वही पानी पीते भी है। आरोग्य शास्त्रके जानकारोंने तरह-तरह के प्रयोगों द्वारा यह साबित कर दिया है कि ऐसे पानीमें जहरीले कीटाणु पैदा हो जाते हैं और उसे पीनेसे सहज ही हैजा वगैरा बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। थोड़ी ही मेहनत और प्रयत्नसे ऐसे तालाब साफ रखे जा सकते है। गाँवके तालाबको चारों ओर पक्का बाँध लेना चाहिए, जिससे उसमें ढोर न जा सकें। लेकिन वहाँ ढोरोंके पानी पीनेकी सहूलियत तो होनी ही चाहिए। उसके लिए कुओंकी तरह तालाबके नजदीक ही पानीके हौज बना लेने चाहिए। उस हौजमें अगर गाँवके सब लोग एक-एक घड़ा पानी रोज डालते रहें तो जरूरतके लायक काफी पानी उसमें भरा रहेगा।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
mkbvl3czp2t487om4xewtjwnf7sx18t
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४१
250
196862
673633
669247
2026-08-24T10:09:22Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673633
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||पत्र: जवाहरलाल नेहरूको|४०३}}</noinclude>
जिस तालाब का पानी पिया जाता हो, उसमें न तो कभी बरतन मलने चाहिए और न कपड़े ही धोये जाने चाहिए। इसके दो उपाय हैं। एक तो यह कि सब कोई अपनी जरूरतका पानी अपने घर ले जायें और वहीं सब कुछ धो लें। दूसरा उपाय यह है कि तालाबके पास ही एक टंकी रखी जाये और उसमें भी सब अपने-अपने हिस्सेका पानी भरें और फिर उस पानीका उपयोग करें। यह तभी हो सकता है जब गाँववालोंमें इतना सहयोग और इस तरहकी परोपकारवृत्ति हो। अगर इस तरह एक-दूसरेकी मददसे काम न हो सके तो थोड़ी मजदूरी देकर टंकी और हौज भरवाये जा सकते हैं। कपड़े धोनेकी जगह पानी गिरना तो अनिवार्य है; इसलिए
उतना हिस्सा पक्का बनवा लेना चाहिए जिससे वहां कीचड़ न हो सके।पीनेका पानी भरनेके बर्तन पहले बाहर साफ कर लिये जायें और फिर पानी में डुबाये जायें। इसमें भी कुछ ऐसी सुविधा होनी चाहिए कि जिससे पानी भरनेवालोंके पैर पानीमें न पड़ें। यह उन गाँवोंकी बात हुई जहाँ एक ही तालाब है।
कई गाँवोंमें एकसे अधिक तालाब होते हैं, या एकसे अधिक तालाब बनानेकी व्यवस्था होती है। वहाँ पीने के पानीका तालाब जुदा ही होना चाहिए।
तीसरी तरहके गाँवोंमें कुएँ होते हैं। इन कुओंका पानी साफ रहना चाहिए।इसलिए ऐसे कुओंके आसपास बाँध होना चाहिए और वहाँ कीचड़ न रहना चाहिए। कुएँकी गावको समय-समयपर निकलवाते रहना चाहिए। यह सारा काम सेवकको पहले खुद करके फिर गाँववालोंसे कराना होगा। यह तालीम सस्ती, सच्ची और आवश्यक है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १२-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७४. पत्र: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३०}}
{{left|प्रिय जवाहरलाल,}}
मैने अपने पत्र में<ref>१०-१-१९३० को लिखे पत्र में।</ref> २६ तारीखसे सम्बन्धित तुम्हारे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्नका उत्तर नहीं दिया था। मैं समझता हूँ कि जुलूसोंके बारेमें कुछ नहीं कहना चाहिए। हम नहीं चाहते कि लोग लाइसेन्सके अधीन अथवा लाइसेन्सके बिना जुलूस निकालें। इसलिए एकमात्र बात जो उन्हें करनी चाहिए वह यह कि वे सभाएँ करें और यदि हो सके तो सारा दिन सदस्य बनाने में लगायें। मैं भाषण आवश्यक या उचित नहीं समझता। मैं संकटकी सम्भावनाको टालना चाहता हूँ। सविनय अवज्ञा शुरू करनेके लिए मैं पूर्ण शान्तिको महत्त्व दूँगा। इस सम्बन्धमें मैं ‘यंग इंडिया’ में लिख<ref>देखिए “स्वतन्त्रता दिवस”, १६-१-१९३०।</ref> रहा हूँ।<noinclude></noinclude>
juslblhb7tvbr9928ctsslldl47uhep
673634
673633
2026-08-24T10:10:09Z
Priyanka1114
6799
673634
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||पत्र: जवाहरलाल नेहरूको|४०३}}</noinclude>
जिस तालाब का पानी पिया जाता हो, उसमें न तो कभी बरतन मलने चाहिए और न कपड़े ही धोये जाने चाहिए। इसके दो उपाय हैं। एक तो यह कि सब कोई अपनी जरूरतका पानी अपने घर ले जायें और वहीं सब कुछ धो लें। दूसरा उपाय यह है कि तालाबके पास ही एक टंकी रखी जाये और उसमें भी सब अपने-अपने हिस्सेका पानी भरें और फिर उस पानीका उपयोग करें। यह तभी हो सकता है जब गाँववालोंमें इतना सहयोग और इस तरहकी परोपकारवृत्ति हो। अगर इस तरह एक-दूसरेकी मददसे काम न हो सके तो थोड़ी मजदूरी देकर टंकी और हौज भरवाये जा सकते हैं। कपड़े धोनेकी जगह पानी गिरना तो अनिवार्य है; इसलिए
उतना हिस्सा पक्का बनवा लेना चाहिए जिससे वहां कीचड़ न हो सके।पीनेका पानी भरनेके बर्तन पहले बाहर साफ कर लिये जायें और फिर पानी में डुबाये जायें। इसमें भी कुछ ऐसी सुविधा होनी चाहिए कि जिससे पानी भरनेवालोंके पैर पानीमें न पड़ें। यह उन गाँवोंकी बात हुई जहाँ एक ही तालाब है।
कई गाँवोंमें एकसे अधिक तालाब होते हैं, या एकसे अधिक तालाब बनानेकी व्यवस्था होती है। वहाँ पीने के पानीका तालाब जुदा ही होना चाहिए।
तीसरी तरहके गाँवोंमें कुएँ होते हैं। इन कुओंका पानी साफ रहना चाहिए।इसलिए ऐसे कुओंके आसपास बाँध होना चाहिए और वहाँ कीचड़ न रहना चाहिए। कुएँकी गावको समय-समयपर निकलवाते रहना चाहिए। यह सारा काम सेवकको पहले खुद करके फिर गाँववालोंसे कराना होगा। यह तालीम सस्ती, सच्ची और आवश्यक है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १२-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७४. पत्र: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३०}}
{{left|प्रिय जवाहरलाल,}}
मैने अपने पत्र में<ref>१०-१-१९३० को लिखे पत्र में।</ref> २६ तारीखसे सम्बन्धित तुम्हारे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्नका उत्तर नहीं दिया था। मैं समझता हूँ कि जुलूसोंके बारेमें कुछ नहीं कहना चाहिए। हम नहीं चाहते कि लोग लाइसेन्सके अधीन अथवा लाइसेन्सके बिना जुलूस निकालें। इसलिए एकमात्र बात जो उन्हें करनी चाहिए वह यह कि वे सभाएँ करें और यदि हो सके तो सारा दिन सदस्य बनाने में लगायें। मैं भाषण आवश्यक या उचित नहीं समझता। मैं संकटकी सम्भावनाको टालना चाहता हूँ। सविनय अवज्ञा शुरू करनेके लिए मैं पूर्ण शान्तिको महत्त्व दूँगा। इस सम्बन्धमें मैं ‘यंग इंडिया’ में लिख<ref>देखिए “स्वतन्त्रता दिवस”, १६-१-१९३०।</ref> रहा हूँ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
k92apvv6w3mf2s07ijaz3p4rs4ufspp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४२
250
196863
673635
669248
2026-08-24T10:22:16Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673635
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
आशा है तुम्हें घोषणाका मसविदा ठीक समयपर मिल गया होगा।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,<br>बापू}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
ए॰ आई॰ सी॰ सी॰ फाइल सं० १६-ए, १९३०
सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७५. पत्र: वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३०}}
{{left|प्रिय बन्धु,}}
यह पत्र मैं आपको यह पूछनेके विचारसे लिख रहा हूँ कि क्या आप ‘इंडियन ओपिनियन’ का कार्यभार सँभालनेके लिए किसीको दक्षिण आफ्रिका भेज सकते हैं। मणिलाल अपनी पत्नीके साथ आजकल यहाँ है।वे दोनों अब भारतमें रहना चाहेंगे। मणिलालको किसी भी प्रकार कुशाग्रबुद्धि अथवा कामके लायक सम्पादक भी नहीं कहा जा सकता। एक बार देवधर<ref>सर्वेन्टस ऑफ इंडिया सोसाइटीवाले गो॰ कृ॰ देवधर।</ref> किसीको भेजनेकी बात सोच रहे थे। यदि आप इस प्रस्तावको उपयुक्त एवं सम्भाव्य मानते हैं, तो कृपया मुझे सूचित करें।
आशा है आप लाहौरमें मेरे किये कार्योंपर जरूरत से ज्यादा नाराज नहीं होंगे। मैंने अपनी अन्तरात्माकी आवाजका अनुसरण भर किया है। इसके अतिरिक्त मुझे और कोई सम्मानजनक तरीका नजर नहीं आया। रसलके भाषणने <ref>समाचारपत्रोंकी सूचना के अनुसार रसलने कैम्ब्रिज में मजदूर दलकी सभा में कहा था कि इस बातको भारतीयोंसे ज्यादा अच्छी तरह और कोई नहीं जानता कि पूर्ण स्वतन्त्रताकी बात करना कितना मूर्खतापूर्ण है।</ref>मेरे विचारसे निर्णयकी पुष्टि की है। लेकिन मैं जानता हूँ कि गहरे मतभेदोंके बावजूद हम एक दूसरेको प्यार कर सकते हैं।
आजकल आपका स्वास्थ्य कैसा है?
{{right|आपका,<br>'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री'''|1em}}<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
jycn387bn0c7qf9vpedor28pi31qk4j
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४३
250
196864
673638
669249
2026-08-24T10:31:25Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673638
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३७६. पत्र: रामी पारेखको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३०}}
{{left|चि॰ रामी,<ref>हरिलाल गांधीकी कन्या और कुँवरजी पारेकी पत्नी।</ref>}}
तू भला क्यों पत्र लिखेगी? बा तेरे नामकी माला जपती रहती है। मुझे तो तुममेंसे किसीके बारेमें सोचनेकी फुरसत ही नहीं मिलती। मैं भी यह चाहता हूँ कि यदि कुंवरजी तुझे छुट्टी दें और तेरी इच्छा हो तो तू चली आ। वा तो अभी बीजापुर गई हुई है। यहाँसे वह थोड़े दिनमें लौट आयेगी। मणिलाल यही है और सुशीला तो है ही।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९७१३) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७७. पत्र: नौतमलाल भगवानजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३०}}
{{left|भाईश्री नौतमलाल,}}
आपका पत्र मिला। उक्त पत्र मैंने डाक्टरको पढ़नेको दिया था। ये प्रसन्न हुए और मुझे आशा है कि आपका प्रयत्न सफल होगा।
{{right|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}
{{left|श्री नौतमलाल भगवानजी<br>जैतपुर, काठियावाड़}}
गुजराती (जी॰ एन॰ २५८२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
7ruuptld6xlqafbjjo56sgeb1jpm0lu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४४
250
196865
673643
669250
2026-08-24T10:42:09Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
673643
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३७८. पत्र: ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>साबरमती<br>१२ जनवरी, १९३० }}
{{left|चि॰ ब्रजकृष्ण,}}
तुम्हारा खत मिला है। यदि प्रभुदास और उत्तमचंद नीकलनेके लायक हो गये हैं तो दोनोंको वहांसे हटा दो और दोनोंको छोटी लाईनसे यहां आ जाव और पीछे वर्धा चले जाना। देवदास कहता है प्रभुदासको उसके आने तक वहां रखनेकी कोई आवश्यकता नहीं है प्रभुदाससे कहो वैद्यकी पुडीयां खाता है उसमें कोई हर्ज नहीं है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ २३७२ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३७९. तार: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>१३ जनवरी १९३०}}
उत्सवकी घोषणाका<ref>देखिए “२६ जनवरीको घोषणाका मसविदा,” १०-१-१९३०</ref> मजमून मिल गया हो और मंजूर हो गया हो तो तार दो। यदि बहुत परिवर्तन किये जाने हैं तो ‘यंग इंडिया’ के अगले अंक में छापना चाहता हूँ। मजमून तार से भेजो ताकि कल सवेरे मिल जाये।
{{right|'''गांधी'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
अ॰ भा॰ कां॰ क॰ फाइल सं॰ १६-ए, १९३०
सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
axwxw9fuofg1t60o5u1lb88moa40gar
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०५
250
197025
673267
669414
2026-08-23T12:00:38Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
673267
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|५६७}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}१९४, २१६, २२३, २३६, २४०, २५३, २८१, ३०२, ३२२, ३४८, ३६८, ४३१, ४४५}}
{{outdent|बजाज, बनारसीलाल, ४२९}}
{{outdent|बनर्जी, सुरेश, ३०२}}
{{outdent|बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, ११३}}
{{outdent|बरेलवी, सैयद अब्दुल्ला, ४५९}}
{{outdent|बकिंघम और कर्नाटक मिल्स, ९६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|बर्केनहेड, लॉर्ड, ४४८}}
{{outdent|बहादुर, मेहताबसिंह, ३३६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|बहिष्कार, -और ११ माँगें, ४८५; -विदेशी वस्त्रका, २१४, २१५, २७०, ३३०, ३४७, ३८३, ४३२; -विधानपरिषदोंका, ३३५, ३४१-२, ३४३-४, ३५६, ३६५-६, ३८३, ३८७; -शैक्षणिक संस्थानों और कानूनी अदालतोंके, -का समय अभी नहीं, ३६६, ४१०, ४१६-७; -से सरकारी प्रतिष्ठाको धक्का, ४१७; देखिए असहयोग भी}}
{{outdent|'''बाइबिल''', ३७७, ४९९}}
{{outdent|'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ४५९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|'''बारडोलीका इतिहास''', ४७०, ४७१}}
{{outdent|बारडोली सत्याग्रह, -२०५, २५२, ३३५, ३७१, ३८८, ४७१; -को १९२२में स्थगित करना गलत नहीं, १३७-३८}}
{{outdent|बालक, -की निर्दोषतासे हमारी बुद्धिका तेजस्वी बनना, २१९; -सत्यके पुजारी, २१९}}
{{outdent|बालकृष्ण, २१८}}
{{outdent|बाल-विवाह, ४५४}}
{{outdent|बाल्मीकि, ३२२}}
{{outdent|बावजीर, ईमाम साहब, ११}}
{{outdent|बिड़ला, घनश्यामदास, २४१, ३२०, ३८१, ३९३, ४१९, ४९७, ५२८, ५३०; -द्वारा व्यापारियोंके धर्मका पालन, ३०३, ३१७}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|बिहार-विद्यापीठ, ५७}}
{{outdent|बिहारीलाल, ७५}}
{{outdent|ब्रिटिश भारत, -की शर्तोंका विरोध, ३२७ ब्रिटिश हकूमत, -और शिक्षा ४१७; -के अधीन, हिंसा में बेशुमार बढ़ोतरी, ४५९; - के 'पिट्ठू और दलाल' पूँजीपति, ४६९; -पशुबलपर आधारित, २०४; -से हानि ३९५-७, ४४०-२; -हिंसाका ही प्रतिरूप, ४६८}}
{{outdent|बुद्ध, -और शारीरिक श्रम, ५०८}}
{{outdent|बुधाभाई, २९, २७५, २९५, २९८, ३०६, ३२०, ३३१}}
{{outdent|बुरनाफ, ५०९}}
{{outdent|बेन, वैजवुड़, १७१, १९१, २६१, ३८२, ५०६}}
{{outdent|बेलाबहन, ५९, २९२}}
{{outdent|बेसेन्ट, डा॰ एनी, ८६ पा॰ टि॰, ११९}}
{{outdent|बैंकर, शंकरलाल, ३, ९५, १००, १३१, १३३, २२५, २३७, ३०२, ४९६}}
{{outdent|बैजनाथ, १०९}}
{{outdent|बैल, -हमारा भाई, ८५}}
{{outdent|बोअर युद्ध, ४५२}}
{{outdent|बोमनजी, ४५० पा॰ टि॰, ४६०}}
{{outdent|बोस, सतीशचन्द्र, ३५८ पा॰ टि॰}}
{{outdent|बोस, सुभाषचन्द्र, ९८ पा॰ टि॰, ३६२, ४४४, ४५३; -का प्रस्ताव समानान्तर सरकार चलाने के बारेमें, ३६७}}
{{outdent|ब्रजलाल, लाला, ४४}}
{{outdent|ब्रह्मचर्य, २४२, ३७९, ४२०, ४८२; -और अच्छा भोजन बनाना, ११०}}
{{outdent|ब्रह्मचारी, ४२३}}
{{outdent|ब्रॉकवे, ए॰ फ्रेनर, १६० पा॰ टि॰, १७१}}
{{outdent|ब्रूमफील्ड, आर॰ एस॰ ४७० पा॰ टि॰}}
{{outdent|ब्रूमफील्ड समिति, -बारडोली कांडकी जाँचके लिए, ४७०}}
{{outdent|ब्रेन, एफ॰ एल॰, ३, १५२, १५३, १५६-५९, १९४, २९०, ३१३}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
rpd0g5vz0s0o5b8eabjemga1jdn9qgo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०६
250
197026
673336
669415
2026-08-23T15:16:59Z
~2026-46006-46
6828
/* अशोधित */
673336
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="2401:4900:8606:7F52:C57D:1B2F:B407:FB60" /></noinclude>{{rh|५६८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
{{Multicol}}
{{outdent|ब्रेडलॉ, -का अनीश्वरवाद, ४२४}}
{{c|'''भ'''}}
{{outdent|भक्तिबहन, १४४}}
{{outdent|'''भगवद्गीता''', २, २१, २७, ३३, ३८, १०४, १३०, १६७, १९३, २१६, २२१, २३९, २४२ पा॰ टि॰, २४८, २९२, २९७, ३१३ पा॰ टि॰, ४९२}}
{{outdent|भगवानजी, २७८}}
{{outdent|भगवानदास, डॉ॰, २२९}}
{{outdent|'''भजनावलि''', २४८}}
{{outdent|भट्ट, कस्तुरबहन, ४९३}}
{{outdent|भट्ट, मोहनलाल, ३३, १२९, २३७; -द्वारा 'नवजीवन'को न्यास घोषित करना, २२२}}
{{outdent|भट्ट, हरिहर पी॰, ४९३}}
{{outdent|भणसाली, जे॰ पी॰, २५, २९, ७१, १७८, १७९, २४१, २७५, २९८, ३३१}}
{{outdent|भवानीदयाल, ४५३}}
{{outdent|भागीदार, -की तुलनामें मजदूरोंके अधिकार, २८५}}
{{outdent|भारत-कार्यालय, ४६२}}
{{outdent|भारतके राष्ट्रपति, -की कल्पना, ३१८}}
{{outdent|भारतीय गणतन्त्र; -का भावी रूप, और अंग्रेजोंसे उसके सम्बन्ध, २०४; -का राष्ट्रपति, ३१८}}
{{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ५६, ५७, ६१, ७२, ७९, ८६, ८९, ११९, १३३, १४१, १६०, १८२, १९१, १९२, २०३, २१३, २२१, २६१, २६३ पा॰ टि॰ २७०, २९८, ३०१, ३२१, ३७२, ३७३, ३९४, ३९५, ४०७, ४१३-६, ४३५, ४४८, ४५०, ४६७, ४७०, ४७१-३, ४९५, ५०१-३, ५०६, ५१७; -और खादी, ५२६-७ और उसके लिए ग्यारह माँगें, ४४९-५१, ४६९-७० ; -का गोलमेज परिषदमें भाग}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|लेना, ३८२; -की वकीलों द्वारा कारगर ढंगसे मदद, ४८३-४; -द्वारा गांधीजी को सविनय अवज्ञा आरम्भ करनेका अधिकार, ४९८-५००; -में और संस्थाओंकी अपेक्षा ज्यादा गुण, २१६}}
{{outdent|भारतीय वाणिज्य और उद्योग व्यापार-संघ, ५२८}}
{{outdent|भावे, विनोबा, ३७९, ४४५}}
{{outdent|भाषा, देखिए, राष्ट्रभाषा}}
{{outdent|भिक्षा, -देने में अविचार, २८०}}
{{outdent|भूल, -और पाप, २१९}}
{{outdent|भोंसले, एन॰ डी॰, ४४६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|भोजा, भगत, १४५ पा॰ टि॰}}
{{outdent|भोपाल, -के नवाब, १८६}}
{{c|'''म'''}}
{{outdent|मंगलदास गिरधरदास, सेठ, २, १३, ३४, २८७}}
{{outdent|मगनलाल-स्मारक, २३९, २५६}}
{{outdent|मजदूर और मालिक, ३१६}}
{{outdent|मजदूर, -और मालिकमें पिता-पुत्रका-सा सम्बन्ध होना चाहिए, ८९; -[ों] के वेतनका झगड़ा, अहमदाबाद मिलोंमें, १-२; -को उचित मजदूरी, २७२; -को सत्याग्रहका अधिकार, ३१७; -को स्वामित्वका ज्यादा अधिकार होना चाहिए, २८५}}
{{outdent|मज़हर-उल-हक़, बेगम, ३८४, ३९७}}
{{outdent|मजमूदार, पी॰ के॰, ४९०}}
{{outdent|मजूर महाजन, देखिए अहमदाबाद कपड़ा मजदूर-संघ}}
{{outdent|मथुरादास त्रिकमजी, २५७, ३१०, ४२७}}
{{outdent|मथुरादास पुरुषोत्तम, १०, २४३, २६२, २७५, २७६}}
{{outdent|मद्यनिषेध, ७८, ३०१; -और समाचार-पत्र, ३८४; -का लागू होना अनिवार्य, ३२३-४}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
bj4a4lzfylmjd5xf8xfuj8g2n94oew2
673347
673336
2026-08-23T15:42:04Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
673347
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh|५६८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|ब्रेडलॉ, -का अनीश्वरवाद, ४२४}}
{{c|'''भ'''}}
{{outdent|भक्तिबहन, १४४}}
{{outdent|'''भगवद्गीता''', २, २१, २७, ३३, ३८, १०४, १३०, १६७, १९३, २१६, २२१, २३९, २४२ पा॰ टि॰, २४८, २९२, २९७, ३१३ पा॰ टि॰, ४९२}}
{{outdent|भगवानजी, २७८}}
{{outdent|भगवानदास, डॉ॰, २२९}}
{{outdent|'''भजनावलि''', २४८}}
{{outdent|भट्ट, कस्तुरबहन, ४९३}}
{{outdent|भट्ट, मोहनलाल, ३३, १२९, २३७; -द्वारा 'नवजीवन'को न्यास घोषित करना, २२२}}
{{outdent|भट्ट, हरिहर पी॰, ४९३}}
{{outdent|भणसाली, जे॰ पी॰, २५, २९, ७१, १७८, १७९, २४१, २७५, २९८, ३३१}}
{{outdent|भवानीदयाल, ४५३}}
{{outdent|भागीदार, -की तुलनामें मजदूरोंके अधिकार, २८५}}
{{outdent|भारत-कार्यालय, ४६२}}
{{outdent|भारतके राष्ट्रपति, -की कल्पना, ३१८}}
{{outdent|भारतीय गणतन्त्र; -का भावी रूप, और अंग्रेजोंसे उसके सम्बन्ध, २०४; -का राष्ट्रपति, ३१८}}
{{outdent|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ५६, ५७, ६१, ७२, ७९, ८६, ८९, ११९, १३३, १४१, १६०, १८२, १९१, १९२, २०३, २१३, २२१, २६१, २६३ पा॰ टि॰ २७०, २९८, ३०१, ३२१, ३७२, ३७३, ३९४, ३९५, ४०७, ४१३-६, ४३५, ४४८, ४५०, ४६७, ४७०, ४७१-३, ४९५, ५०१-३, ५०६, ५१७; -और खादी, ५२६-७ और उसके लिए ग्यारह माँगें, ४४९-५१, ४६९-७० ; -का गोलमेज परिषदमें भाग}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|लेना, ३८२; -की वकीलों द्वारा कारगर ढंगसे मदद, ४८३-४; -द्वारा गांधीजी को सविनय अवज्ञा आरम्भ करनेका अधिकार, ४९८-५००; -में और संस्थाओंकी अपेक्षा ज्यादा गुण, २१६}}
{{outdent|भारतीय वाणिज्य और उद्योग व्यापार-संघ, ५२८}}
{{outdent|भावे, विनोबा, ३७९, ४४५}}
{{outdent|भाषा, देखिए, राष्ट्रभाषा}}
{{outdent|भिक्षा, -देने में अविचार, २८०}}
{{outdent|भूल, -और पाप, २१९}}
{{outdent|भोंसले, एन॰ डी॰, ४४६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|भोजा, भगत, १४५ पा॰ टि॰}}
{{outdent|भोपाल, -के नवाब, १८६}}
{{c|'''म'''}}
{{outdent|मंगलदास गिरधरदास, सेठ, २, १३, ३४, २८७}}
{{outdent|मगनलाल-स्मारक, २३९, २५६}}
{{outdent|मजदूर और मालिक, ३१६}}
{{outdent|मजदूर, -और मालिकमें पिता-पुत्रका-सा सम्बन्ध होना चाहिए, ८९; -[ों] के वेतनका झगड़ा, अहमदाबाद मिलोंमें, १-२; -को उचित मजदूरी, २७२; -को सत्याग्रहका अधिकार, ३१७; -को स्वामित्वका ज्यादा अधिकार होना चाहिए, २८५}}
{{outdent|मज़हर-उल-हक़, बेगम, ३८४, ३९७}}
{{outdent|मजमूदार, पी॰ के॰, ४९०}}
{{outdent|मजूर महाजन, देखिए अहमदाबाद कपड़ा मजदूर-संघ}}
{{outdent|मथुरादास त्रिकमजी, २५७, ३१०, ४२७}}
{{outdent|मथुरादास पुरुषोत्तम, १०, २४३, २६२, २७५, २७६}}
{{outdent|मद्यनिषेध, ७८, ३०१; -और समाचार-पत्र, ३८४; -का लागू होना अनिवार्य, ३२३-४}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
0j2cial10hede084fwfzsor74uhjqkf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६०७
250
197027
673392
669416
2026-08-23T16:57:54Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
673392
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||सांकेतिका|५६९}}</noinclude>{{ Multicol}}
{{outdent|मद्यनिषेध-समिति, ३३०, ३४७, ३४८}}
{{outdent|मनजी, २४१, २७२}}
{{outdent|मन्दिर-प्रवेश, ९७ पा॰ टि॰, १४२, २३४,
३२२}}
{{outdent|मराठे, १७८}}
{{outdent|मलकानी ना॰ रा॰, १७, १३३, २४०}}
{{outdent|मशरूवाला, किशोरीलाल, ३१, १०५ पा॰
टि॰}}
{{outdent|मसूद, सैयद रौस, ७१}}
{{outdent|महमूद, डा॰ सैयद, ३९७}}
{{outdent|महमूदाबाद -के महाराजा, ८६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|'''महाभारत,''' २३८}}
{{outdent|महाराजाओं, -को गहनोंका शौक, ३१३}}
{{outdent|महाराष्ट्र व्यापारी-सम्मेलन, २९४}}
{{outdent|महालक्ष्मी, २७५}}
{{Outdent|महिलाओं, -की प्रगति नवजीवनका लक्ष्य,
३१३; -की बाह्य सजावट, २६५,
३१३-४; -को अपना शरीर डाक्टर-
को दिखाने में संकोच, १९५ की
स्थिति, ४-६}}
{{outdent|महेन्द्रप्रताप, राजा, १६६}}
{{outdent|महेश्वरसिंह कुँवर, ४४}}
{{outdent|माँटेग्यु-घोषणाएँ, ६०, १७१, ३७३}}
{{outdent|'''मॉडर्न रिव्यू,''' २९४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|माथुर, अयोध्याप्रसाद, ११}}
{{outdent|'''माथुरी हितैषी,''' ४५४}}
{{outdent|मादक-द्रव्य, -और समाचारपत्रोंके विज्ञापन,
३८४; -विरोधी (आबकारी) कानून
ढीले नहीं करने चाहिए, ८९, ३२३}}
{{outdent|मानपत्र तैयार करनेके लिए नियम, १६७}}
{{outdent|मानव शरीरों, -[सभी], में एक ही आत्मा
व्याप्त ८३}}
{{outdent|'''मॉरल ऐंड मेटीरियल प्रोग्रेस''' १९१०-११,
५२३}}
{{outdent|माववुड, फेड्रिक टी॰, ५१९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|मालेॅ-मिन्टो सुधार, ३७३}}
{{outdent|मालवीय, मदनमोहन, ४२, ८६ पा॰ टि॰,}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}३२०, ३२२, ३४०, ३४३, ३५८
पा॰ टि॰, ४१९}}
{{outdent|मिल-मालिक संघ, अहमदाबाद, -और मज-
दूरोंके बेतनका झगड़ा, १-२}}
{{outdent|मिल्टन, १२२}}
{{outdent|मिश्र, उदित, ४९७}}
{{outdent|मिश्र, गोविन्द, ९५}}
{{outdent|मिश्र, ब्रजबन्धु, २७७}}
{{outdent|मीराबहन, ७६, १४८, १९९, २००, २१७,
२२५, २२७, २४३, २४९, २७२,
२७५, २९२, ३१९, ४९०, ५०७}}
{{outdent|मुंजे, बी॰ एस॰, ८६ पा॰ टि॰}}
{{outdent|मुखर्जी, सतीशचन्द्र, ३२४}}
{{outdent|मुजीब, एम०, १२२, १२५}}
{{outdent|मुमुक्षु, २४५}}
{{outdent|मुसलमान, २४, ७६, ७९, १०७, १२१,
१६४, १६५, १६७, १६९ पा॰ टि॰,
३०४, ३३४, ३७० पा॰ टि॰, ३८४,
३९०, ४०८, ४११, ४४९, ४९५,
५०१, ५०२, ५०७, ५१२, ५२४}}
{{outdent|मुहम्मद अली, सर, ११९}}
{{outdent|मृत्यु -का भय, ४०९-१०; -भोज, ४५७}}
{{outdent|मेरठ षड्यन्त्रके कैदी, -[दियों] से बातचीत
६०, ११२-१३}}
{{outdent|मेहता, डा॰ प्राणजीवनदास, ३०५, ३१०,
३४५, ३८०, ४०५, ४९३}}
{{outdent|मेहता, जमनादास, ३६०, ३६८}}
{{outdent|मेहता, जमशेद एन॰ आर॰, १७ पा॰ टि॰
१३३}}
{{outdent|मेहता, मगनलाल, ३८०}}
{{outdent|मेहता मोहनलाल के॰ २१६}}
{{outdent|मेहता, रतिलाल पी॰, २२५, २४०, ३८०}}
{{outdent|मेहर, तुलसी, ५१०}}
{{outdent|मैकमिलन कम्पनी, १९७}}
{{outdent|मेक्डोनल्ड, रैमजे, ४५० पा॰ टि॰}}
{{outdent|मैक्सवेल, आर॰ एम॰, ४७० पा॰ टि॰}}
{{outdent|मैथ्यू, पी॰ जी॰ १७}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
2sj7nm0inivmndtt6svwvc44iohbn59
विकिस्रोत वार्ता:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
5
197255
673322
673214
2026-08-23T13:55:34Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* संपादनोत्सव की पुस्तक सूची में चल रही चर्चा */ उत्तर
673322
wikitext
text/x-wiki
== पृष्ठ शोध समस्या ==
@[[सदस्य:नीलम|नीलम]], @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] और @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, मैं पृष्ठ [[पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६४७|६४७]] शोधित कर रहा था जिसके एक लाइन में ''''सत्याग्रह, अनाक्रामक प्रतिरोध -''' पैसिव रेजिस्टेंस' यह विकिस्रोत पर दिए पृष्ठ के अनुसार सही है पर मैं इसे [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.480233/page/n639/mode/1up आर्काइव] पर देखा तो उसके अनुसार इसे इस तरह ''''सत्याग्रह, अनाक्रामक प्रतिरोध -''' पैसिव रेजिस्टेस' लिखा जाना चाहिए, स्पष्ट करें [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
:@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, सर्वप्रथम संपादनोत्सव में भाग लेकर पृष्ठों को शोधित करने के लिए आपका धन्यवाद। आप पृष्ठों को शोधित करते समय प्राथमिक स्रोत के लिए पुस्तक के पीडीएफ पृष्ठ का ही सहारा लें। स्रोत पृष्ठ के धुंधले या अस्पष्ट होने की स्थिति में ही आप किन्हीं अन्य स्रोतों का सहारा लें। शाब्दिक अर्थ के अनुसार '''रेजिस्टेंस''' का अर्थ '''प्रतिरोध''' होता है, जबकि '''रेजिस्टेस''' का कोई शाब्दिक अर्थ अभी तक मुझे नहीं मिल पाया है। अगर आपको मिले तो आप हमारे साथ अवश्य साझा करें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०७:४९, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== संपादनोत्सव की पुस्तक सूची में चल रही चर्चा ==
@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी और @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, संपादनोत्सव से संबंधित किसी भी प्रकार की चर्चा के लिए संपादनोत्सव के वार्ता पृष्ठ पर संदेश भेजे। संपादनोत्सव के पृष्ठ पर खासतौर से पुस्तक सूची अनुभाग में पुस्तक परिधि चुनाव के हस्ताक्षर के अलावा अन्य किसी भी प्रकार का संदेश ना लिखें। इससे पुस्तक सूची में संपादन या हस्ताक्षर कर रहे अन्य सदस्यों को संपादन अंतर्विरोध जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:०४, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
:@[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]]
:धन्यवाद [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) १३:५५, २३ अगस्त २०२६ (UTC)
febfrve7kxzb7mke9qcakkmzbs14h79
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४३
250
197286
673274
673120
2026-08-23T12:18:54Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673274
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वदेशी|१९९}}</noinclude>{{C|'''निर्दयी पुरुषोंके प्रति'''}}
प्राइमस स्टोवके कारण रोज गुजराती बहनें मरती रहती है, किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता कि निर्दयी गुजराती इसकी कुछ चिन्ता करते हों। मुझे अभी-अभी दो बहनोंकी मृत्युका समाचार मिला है। अपनी इस यात्राके दौरान मैंने खुद उस खतरेको अनुभव किया है। मेरे साथ यात्रा करनेवाले एक अनुभवी और कुशल साथी ही दो बार बाल-बाल बचे। फलस्वरूप मैने स्टोवका व्यवहार करनेकी सर्वथा मनाही कर दी। स्त्रियोंको प्राइमस स्टोव व्यवहार करना नहीं आता। उसका व्यवहार करनेमें कुशलताकी आवश्यकता तो होती ही है। तिस पर हमारी स्त्रियों इस चूल्हेको मेज पर नहीं रख सकती। अतः पुरुषोंका कर्तव्य है कि वे इस चूल्हेका बहिष्कार करें और जबतक वे ऐसा नहीं करते तबतक प्राइमससे जल जानेवाली लड़की या स्त्रीकी मृत्युका पाप पुरुषके सिर रहेगा। खरीदे हुए प्राइमस स्टोवको फेंक देना चाहिए। प्राइमसका व्यवहार करनेसे समयकी बचत होती है, यह बात झूठ है। स्टोव बिगड़ जानेपर हमें उस तरफ कितना ध्यान देना पड़ता है, इसका भी हिसाव लगाना चाहिए।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७५. स्वदेशी'''}}}}
एक ओर बम्बईके कपड़ा व्यापारी विदेशी वस्त्रके बहिष्कारकी बातें कर रहे
हैं और दूसरी ओर अहमदाबादकी गुजरात सभा भी यही कर रही है। दोनोंका
उद्देश्य वर्तमान आन्दोलनकी यथाशक्ति सहायता करना है। लेकिन यदि इन दोनोंने
गलती की तो अनजाने ही क्यों न हो, विदेशी कपड़ोंके बहिष्कार आन्दोलनको नुक
सान पहुँचनेकी सम्भावना है।
स्वदेशीके नीचे लिखे प्रकार पाये जाते हैं :
१. शुद्ध अर्थात् हाथ कते सूतकी हाथ-बुनी खादी।
२. भारतकी उन मिलों द्वारा बने और कते हुए सूतके कपड़े जिनके मालिक भारतीय हैं और जिनका संचालन तथा प्रबन्ध भी भारतीय ही करते हैं।
३. ऐसी मिलोंका थोड़े या बहुत अंशमें विदेशी मिलोंमें कते हुए सूतका कपड़ा।
४. विदेशी मालिकों और विदेशी व्यवस्थापकों द्वारा संचालित भारतकी किसी
भी मिलका कपड़ा।
५. भारतवर्ष में बनी हुई हरएक चीज।
६. वे चीजें जिन्हें बनानेकी कुछ क्रिया हिन्दुस्तानमें की गई हो, जैसे हारमोनियम बाजा। इस बाजेके तमाम हिस्से विदेशी होते हैं। किन्तु हिन्दुस्तान में इन हिस्सोंको जोड़कर बाजा बना लिया जाता है।<noinclude></noinclude>
81sytixzdthb32g63xkvlh8zh5ogyxp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४४
250
197287
673278
673189
2026-08-23T12:25:11Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673278
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>बहिष्कारके निम्न रूप हैं :
(अ) विदेशी वस्त्र मात्रका बहिष्कार।
(ब) सिर्फ ब्रिटिश कपड़ेका बहिष्कार।
(क) तमाम ब्रिटिश चीजोंका बहिष्कार।
(ग) तमाम विदेशी चीजोंका बहिष्कार।
मेरे खयालमें (१) अर्थात् शुद्ध खादी ही सच्ची स्वदेशी है और सच्चा बहिष्कार (अ) अर्थात् विदेशी वस्त्र मात्रका बहिष्कार है। यदि स्वदेशीका उपर्युक्त पहला प्रकार अर्थात् शुद्ध सादीका उत्पादन सध जाये तो उसके आधारपर अन्य आवश्यक स्वदेशी वस्तुओंको भी स्वतः प्रोत्साहन मिल जायेगा। यदि हम एकसाथ सभी आवश्यक वस्तुओंके पीछे पड़े रहे तो एक भी आवश्यक स्वदेशी वस्तुको अपनाने के अपने लक्ष्यतक भी नहीं पहुँच सकेंगे।
बहिष्कारकी दृष्टिसे सिर्फ (अ) अर्थात् हर तरहके विदेशी वस्त्रका बहिष्कार
आवश्यक है और यह खादी द्वारा ही हो सकता है।
पाठक यह याद रखें कि दूसरी तरहकी स्वदेशीकी चर्चा कांग्रेसके जन्मकालसे अर्थात् ४५ वर्षसे चलती आई है, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली है। शुद्ध स्वदेशी अर्थात् खादीकी बातको अभी सिर्फ नौ साल ही हुए हैं; और तब भी उसमें अच्छी कामयाबी हासिल हुई है। उसके प्रसारके लिए एक ऐसी राष्ट्रीय संस्थाका जन्म हुआ है, जिसके मुकाबलेकी दूसरी कोई संस्था मुझे सारी दुनियामें नहीं दिखाई पड़ती। और इस खादीके कार्यके कारण ही तो आज व्यापक सविनय अवज्ञाका प्रयोग सम्भव हो सका है।
पाठक यह भी याद रखें कि ४५ वर्षोंसे विदेशी चीजों और अंग्रेजी मालके बहिष्कारकी बातें होती आई हैं। लेकिन अबतक इसमें किसी तरहकी सफलता नहीं मिली है, जबकि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ है कि आज उसकी शक्यताके बारेमें लोगों में विश्वास पैदा हो गया है।
मेरी राय में व्यावहारिक दृष्टिसे भी विदेशी वस्त्रके बहिष्कारको छोड़कर दूसरी ओर लोगोंका ध्यान खींचनेमें नुकसान है, और खादीको छोड़कर विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारको सफल बनानेका विचार करना दूरंदेशीकी निशानी नहीं है। अगर देशी मिलोंके द्वारा ही बहिष्कार सफल हो पाता तो अबतक अर्थात् इन ५० वर्षो में मिलोंको उसमें कामयाबी मिल गई होती। हां, यह मैं मानता हूँ कि खादीका समर्थन करके मिलें बहिष्कार आन्दोलनकी खासी मदद कर सकती हैं। यह किस तरह हो सकता है, सो मैं बता चुका हूँ।
हिन्दुस्तानकी मिलोंका बना स्वदेशी कपड़ा निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी है। क्योंकि उससे खादी और मिलके कपड़ेको बराबरीका स्थान मिल जाता है। यह तो किसी ऊँचे और बौने आदमीकी दोस्ती जैसी बात हुई। ऊँचेको बौनेकी बराबरीके हक देनेका मतलब बौनेको कुछ भी न देना है। यह तो साफ जाहिर है। कि बौना, ऊँचे आदमीकी पंक्ति में खड़ा ही नहीं रह सकता। अतएव अगर ऊँचा<noinclude></noinclude>
ruszp6tm5tepr96subcvo7ngkq8xn8b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४५
250
197288
673281
673212
2026-08-23T12:31:29Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673281
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वदेशी|२०१}}</noinclude>आदमी बौनेके साथ इन्साफ करना चाहे तो उसे बौनेको हमेशा आगे रखना चाहिए, बौनेके लिए आवश्यक चीजका उसे त्याग करना चाहिए और मौका पड़ने पर उसे अपने कन्धों पर उठाकर उसकी हिफाजत करनी चाहिए। ठीक यही हाल मिलके कपड़े और खादीका है। मिलके कपड़ेका तो काम चलता ही है। पर खादी तो अभी रेंगना सीख रही है। अतएव जिसने शुद्ध खादीका ही व्रत न लिया हो, वह इतना तो अवश्य कर सकता है: "मैं ऐसा विदेशी कपड़ा कभी इस्तेमाल नहीं करूँगा, जिसमें विलायती सूतका एक भी धागा हो, जहाँतक हो सकेगा शुद्ध खादीका ही उपयोग करूंगा। और अगर वैसी खादी न मिल सकी तो भारतीय मालिकों और भारतीय व्यवस्थापकों द्वारा संचालित मिलके कपड़ोंका ही इस्तेमाल करूँगा।
अगर हमने खादीको बराबर अपनी नजरोंके सामने न रखा तो उसका नतीजा यही होगा कि देशकी-देशी नहीं-मिलोंके कपड़े का भाव बढ़ेगा और बहिष्कारका काम कभी सफल न हो सकेगा।
१. इस जमाने में हमारी मिलें चाहे जितना प्रयत्न क्यों न करें, हिन्दुस्तानके
लिए जरूरी कपड़ा पैदा कर ही नहीं सकती।
२. आम तौर पर मिलोंका ध्यान अपने लाभकी ओर रहता है, और आगे भी रहेगा।
३. मिलोंको सरकार जब चाहे तब दबा सकती है।
४. आजकल हवाके रुखको देखनेसे तो यह पता चलता है कि देशकी मिलें विदेशी मालिकों और व्यवस्थापकोंके हाथोंमें चली जा रही हैं।
५. मिलोंको विदेशी कल-पुर्जों और विदेशियोंके शिल्प कौशलका सहारा लेना पड़ता है। इस कारण भी मिलें एकाएक संकटमें पड़ सकती हैं।
इसके विपरीत :
(१) यदि देशमें खादीकी भावना व्यापक रूपसे फैल जाये तो आज ही आवश्यक खादीका उत्पादन हो सकता है।
(२) खादीके लिए मिलके जितनी पूँजीकी आवश्यकता नहीं।
(३) खादी के लिए मिलके समान शिल्प कौशल आवश्यक नहीं।
(४) यह कहा जा सकता है कि खादी बनानेवाले तो तीस करोड़ हैं।
(५) खादी के लिए जरूरी तमाम कल-पुर्जे देश ही में बनते हैं।
(६) खादीको सरकार या और कोई दूसरी ताकत दवा नहीं सकती।
(७) खादीका उत्पादन घर-घर हो सकता है।
(८) खादीको एक जगह तैयार करके दूसरी जगह भेजना अनिवार्य नहीं है।
आज कुछ हद तक उसे सफर करना पड़ता है, क्योंकि खादी भावना अभी देशव्यापी
नहीं हुई है।
इन सब बातोंसे पाठक समझ सकेंगे कि खादी ही एक स्वदेशी धर्म है। जिसमें स्वदेशी भावना है वह इस धर्मका पालन करते हुए स्वदेशीके और पहलुओंको भी सिद्ध कर लेगा। जो अज्ञानवश देखा-देखी या दम्भवश खादी पहनता है, उसे तो<noinclude></noinclude>
tq6r6hd1f3hjpn3birj9850cmagmxoa
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४६
250
197289
673283
673218
2026-08-23T12:36:38Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673283
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>खादी पहनते हुए भी स्वदेशी व्रतधारी नहीं माना जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि इस तरहके शौकीन खादीधारी स्वदेशीकी भावनाका पोषण करते हैं। जो समझ-बूझकर खादी पहनता है वह तो उन सब विदेशी चीजोंको स्वयं ही छोड़ देगा, जो अनिवार्य नहीं हैं।
अब रहा बहिष्कार तमाम चीजोंका बहिष्कार पागलपन है। और इस बारे में कोई दलील नहीं हो सकती।
सिर्फ इंग्लैंडकी बनी चीजों या कपड़ोंका बहिष्कार भी नामुमकिन है, क्योंकि इंग्लैंड की बनी चीजें और इंग्लैंडका कपड़ा विदेशी चीजों और विदेशी कपड़ेके नामसे आ सकता है। बंग-भंग आन्दोलन के समय इंग्लैंडके बने कपड़े परसे इंग्लैंड की छाप निकालकर उसे स्वदेशीके नामसे बेचा गया था। इसलिए ब्रिटिश कपड़े बहिष्कारसे जापान इत्यादि अन्य देशोंके कपड़ा उद्योगको लाभ पहुँचाने के सिवा और कोई मतलब सिद्ध नहीं हो सकता।
यहाँतक मैंने सिर्फ विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी दृष्टिसे ही विचार किया है। स्वराज्य प्राप्त कर लेनेके बादकी स्थितिका और भारतके करोड़ों भूखों मरने-वाले कंगालोंके हितका विचार करते हुए तो सिर्फ एक खादीकी ही बात सोची जा सकती है।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७६. अहमदाबाद के मिल मालिकोंसे'''}}}}
अहमदाबाद के मिल मालिकोंकी प्रेम-भरी दृष्टिसे मुझे बहुत आनन्द हुआ है, यह कहना केवल विनयकी भाषा नहीं बल्कि मेरे हृदयके सच्चे उद्गार हैं। साबरमतीसे विदा होते समय उनका हाजिर रहना, बादमें भी समय-समयपर मिलते रहना और आखिर बहुत प्रेमपूर्वक उन सबका सूरत आना, इस बातका शुभ चिह्न है कि यह लड़ाई मालिकों या पूँजीपतियोंके विरुद्ध नहीं है।
लेकिन उनकी उपस्थिति और उनके आशीर्वादका मैं स्वयं तो कुछ विशेष अर्थ भी लगाता हूँ। उनके साथका मेरा सम्बन्ध लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना हो चुका है। इस बीच सम्भव है कि किसीने अपने स्वार्थकी दृष्टिसे मेरे व्यवहारको विरोधी पाया हो, तो भी उन्होंने मेरी मित्रताको स्वीकार किया है, और लड़ते समय भी उनके तथा मेरे बीच सदा मधुर सम्बन्ध ही रहा है। मैं यह मानता हूँ कि इस समय वे जो साथ दे रहे हैं, एक हदतक यह उस सम्बन्धका ही परिणाम है। यदि मेरा यह विश्वास सच हो तो उनकी उपस्थिति और आशीर्वादके अतिरिक्त भी मुझे अधिकार है कि मैं उनसे कुछ व्यावहारिक समर्थनकी आशा रखूं।
उन्होंने एक कदम उठाया है और वह यह कि अबसे ये विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करेंगे और स्वदेशी कपड़ेका ही उपयोग करेंगे। यह प्रस्ताव वैसे तो बड़ा अच्छा<noinclude></noinclude>
5uonpr0cis3vtn6iqcwgknizyaeg9c4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४७
250
197290
673284
673235
2026-08-23T12:41:45Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673284
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||अहमदाबाद के मिल-मालिकोंसे|२०३}}</noinclude>हैं, लेकिन इसमें कुछ कमियाँ भी हैं। स्वदेशीका अर्थ कोई खादी करेगा और कोई
विलायती सूतसे बनी किनारवाले मिलके कपड़े को पसन्द करेगा। स्वदेशी धर्मका पालन
इस तरह नहीं किया जा सकता। मेरी रायमें जहाँतक हो सके खादी पहनना कमसे- कम स्वदेशी धर्म है। ऐसा करना असम्भव होनेपर हिन्दुस्तानकी मिलोंमें कते हुए सूतका उन्हीं मिलोंमें बना हुआ कपड़ा स्वदेशी माना जा सकता है। यदि इतना भी न किया जा सके तो स्वदेशीका कोई अर्थ नहीं रह जाता; यही नहीं बल्कि उस हालत में बहिष्कारकी दृष्टिसे यह हानिकारक भी है।
यदि मिल मालिक खादीको प्रोत्साहन दें और स्वदेशीकी दृष्टि रखकर मिलें चलायें तो मेरी राय में विदेशी वस्त्रका वहिष्कार बहुत आसान काम है। मैं इस बारे में, समय मिलने पर किसी दूसरे लेखमें विस्तृत रूपसे विचार करनेकी आशा करता हूँ। यहाँ तो मैं सिर्फ यही बताना चाहता हूँ कि मिल मालिक खासकर इस आन्दोलनकी कैसे और किस-किस प्रकारसे सहायता कर सकते हैं। निर्विवाद रूपसे इतना तो होना ही चाहिए कि मिल मालिकों और मजदूरोंके बीच अच्छा सम्बन्ध हो। परस्पर विरोधी होनेके बदले यदि वे एक-दूसरे के सहायक बनें तो उससे स्वराज्यकी समस्याको सुलझाने में सहायता मिलेगी। इस दृष्टिसे नीचे लिखी बातें विचार करने योग्य हैं :
१. छोटी-मोटी बातोंके कारण मजदूरोंके सामने अड़चनें आती ही रहती हैं, मिल मालिक ध्यानपूर्वक इन्हें दूर करें।
२. अब मैं तो गैरहाजिर हूँ और सेठ मंगलदास मुझसे भी ज्यादा वृद्ध हो चुके हैं। इसलिए छोटी-मोटी शिकायतोंका तुरन्त निर्णय करनेके लिए स्थायी पंच नियुक्त होने चाहिए।
३. मिल मालिक मजूर महाजन संघको अपना सहायक समझकर उसपर विश्वास रखें, वे उससे पूरी मदद लें और उसकी पूरी मदद करें।
४. मजदूरोंकी नैतिक और सामाजिक स्थितिको सुधारनेकी दृष्टिसे जहाँ-जहाँ जरूरत हो, आर्थिक तथा अन्य तरीकोंसे उनकी मदद करें। अर्थात् बदलेमें कुछ आशा किये बिना उनकी स्वतन्त्र शालाओं, स्वतन्त्र अस्पतालों और स्वतन्त्र वाचनालयों तथा इसी तरहकी दूसरी प्रवृत्तियोंका पोषण करें।
५. जो मजदूर और अन्य कर्मचारी सविनय अवज्ञा या ऐसे ही किसी दूसरे राष्ट्रीय काममें शामिल होना चाहें, वे उनकी मदद करें, और यदि कामसे मुक्त कर देने की जरूरत पड़े तो कामपर वापस आनेके उनके अधिकारको सुरक्षित रखकर उन्हें जाने दें, और यदि जानेवालोंके कुटुम्बकी व्यवस्था करना आवश्यक हो तो उसका भार उठा लें।
६. शराबखोरीकी लत छुड़ाने के लिए मजदूरोंके मनोरंजनार्थं खेल-कूद तथा अल्पाहारके साधन जुटा दें। शराबकी लत छुड़ाने के लिए उन्हें इनाम दें और ऐसे ही दूसरे तरीकोंसे उनकी मदद करें।
७. मिलें धन कमानेके उद्देश्यसे कपड़ा न बनायें, बल्कि सिर्फ विदेशी कपड़ेके बहिष्कार की दृष्टिसे ही कपड़ेका उत्पादन करें ।<noinclude></noinclude>
6d6yzn2hyfahripr3lq5vjykcsee2f3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४८
250
197291
673286
673240
2026-08-23T12:49:08Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673286
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>८. मिलें खादीके नामपर मिलका कपड़ा कभी न बनायें, खादीकी छापका
उपयोग न करें, चरखेकी तसवीर न चिपकायें; बल्कि इसके विपरीत आज जिन-जिन
किस्मोंकी खादी तैयार नहीं हो सकती, उन्हीं किस्मोंका कपड़ा बनायें, अर्थात् चरखा-
संघसे मिलकर कपड़ेकी किस्म मुकर्रर कर लें।
९. मिलें खादीका संग्रह करें, प्रचार करें और उसके उत्पादनमें अपनी बुद्धि
और अपने अनुभवका उपयोग करें।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७७. पत्र : रेजिनल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेजिनल्ड,
आशा है तुम्हें मेरा पहला पत्र' मिल गया होगा।
विल्सनका पत्र<small>२<small/>बहुत अच्छा है। भगवान् तुम्हें अकल्याणसे बचायेगा।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३४ ) से।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|{{larger|'''१७८. पत्र : लाला दुनीचन्दको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय लाला दुनीचन्द,
रोहतक के लाला शामलालकी गिरफ्तारीकी खबर पाते ही लाला सूरजभानको तुरन्त पंजाब चले जानेकी जरूरत महसूस हुई है। मैंने इस सुझावका समर्थन किया है। कृपया इनसे जो काम लेना चाहें, लें। मैं आशा करता हूँ कि स्वतन्त्रताके इस अन्तिम संघर्ष में आप व आपकी धर्मपत्नी अपना सर्वस्व त्याग करनेसे पीछे नहीं हटेंगे।
{{Right|आपका,}}
{{Right|'''मो० क० गांधी'''}}
अंग्रेजी (जी० एन० ५५८८ ) की फोटो नकलसे।
१. देखिए पत्र रेजिनस्ट रेनॉल्डसको, ४-४-१९३०।
२. रेनॉल्ड्सने गांधीजी के अनुरोधपर क्रॉनिकलमें प्रकाशित अपने उत्तरकी सफाई देते हुए क्षमायाचनाका एक पत्र लिख दिया था। उस सकाईको पढ़नेके बाद विल्सनने बहुत मैत्रीपूर्ण उत्तर दिया था जो रेनॉइड्सने गांधीजी को भेज दिया था।<noinclude></noinclude>
lcct2t2i3g35bp6d040ql3x55mn8clh
673289
673286
2026-08-23T12:52:18Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673289
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>८. मिलें खादीके नामपर मिलका कपड़ा कभी न बनायें, खादीकी छापका
उपयोग न करें, चरखेकी तसवीर न चिपकायें; बल्कि इसके विपरीत आज जिन-जिन
किस्मोंकी खादी तैयार नहीं हो सकती, उन्हीं किस्मोंका कपड़ा बनायें, अर्थात् चरखा-
संघसे मिलकर कपड़ेकी किस्म मुकर्रर कर लें।
९. मिलें खादीका संग्रह करें, प्रचार करें और उसके उत्पादनमें अपनी बुद्धि
और अपने अनुभवका उपयोग करें।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' ६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१७७. पत्र : रेजिनल्ड रेनॉल्ड्सको'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेजिनल्ड,
आशा है तुम्हें मेरा पहला पत्र' मिल गया होगा।
विल्सनका पत्र बहुत अच्छा है। भगवान् तुम्हें अकल्याणसे बचायेगा।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५३४ ) से।
सौजन्य : स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया
{{C|{{larger|'''१७८. पत्र : लाला दुनीचन्दको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय लाला दुनीचन्द,
रोहतक के लाला शामलालकी गिरफ्तारीकी खबर पाते ही लाला सूरजभानको तुरन्त पंजाब चले जानेकी जरूरत महसूस हुई है। मैंने इस सुझावका समर्थन किया है। कृपया इनसे जो काम लेना चाहें, लें। मैं आशा करता हूँ कि स्वतन्त्रताके इस अन्तिम संघर्ष में आप व आपकी धर्मपत्नी अपना सर्वस्व त्याग करनेसे पीछे नहीं हटेंगे।
{{Right|आपका,}}
{{Right|'''मो० क० गांधी'''}}
अंग्रेजी (जी० एन० ५५८८ ) की फोटो नकलसे।
१. देखिए पत्र रेजिनस्ट रेनॉल्डसको, ४-४-१९३०।
२. रेनॉल्ड्सने गांधीजी के अनुरोधपर क्रॉनिकलमें प्रकाशित अपने उत्तरकी सफाई देते हुए क्षमायाचनाका एक पत्र लिख दिया था। उस सकाईको पढ़नेके बाद विल्सनने बहुत मैत्रीपूर्ण उत्तर दिया था जो रेनॉल्ड्सने गांधीजी को भेज दिया था।<noinclude></noinclude>
ojnllsg2ob71x8xc4ysegktqqyi9vju
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२४९
250
197292
673292
673247
2026-08-23T12:56:28Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673292
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१७९. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको ''''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
अब तो नमक-कानून तोड़नेकी रस्म अदा हो ही चुकी है, इसलिए जो कोई भी नमक-कानूनके अनुसार सरकार द्वारा की जानेवाली कार्रवाईको झेलनेको तैयार हो, वह जहाँ चाहे और जहाँ सुविधा हो वहाँ नमक बना सकता है। मेरी सलाह है कि कार्यकर्त्ताओंको सर्वत्र नमक तैयार करना चाहिए, और जहाँ कार्यकर्त्ता साफ नमक बनाना जानते हों वहाँ वे वैसा नमक बनायें और ग्रामवासियोंसे भी ऐसा ही करनेके लिए कहें। पर उनको यह भी बता दिया जाये कि ऐसा करनेसे सरकार उन पर मुकदमा चला सकती है। दूसरे शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि उन्हें यह बता दिया जाये कि सरकारने नमकपर जो कर लगा रखा है उसका किसपर कितना बोझ पड़ता है और नमक-कर को रद करानेके लिए उससे सम्बन्धित नियमों और उपनियमोंको किस प्रकार तोड़ना चाहिए। ग्रामवासियोंको यह बात भी बिलकुल साफ बता देनी चाहिए कि यह काम उन्हें खुले आम करना होगा, छिपाकर नहीं। यह शर्त मालूम हो जानेपर वे चाहें तो खुद नमक तैयार करें, चाहें समुद्र-तट पर दरारों और गढ़ोंमें जमा हुआ प्राकृतिक नमक उठा लायें और उसका उपयोग करें। अपने और अपने ढोरोंके लिए काममें लानेके अतिरिक्त यदि कोई चाहे तो उसके हाथ वे उसे बेच भी सकते हैं। पर यह बात जता दी जाये कि खरीदनेवाला भी नमक-कानून तोड़नेका अपराधी होगा और उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है या बिना मुकदमा चलाये भी नमक अधिकारी उसको हैरान कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान १३ अप्रैलतक नमक कर के खिलाफ लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो लोग इस धर्म-कार्यमें लगे हुए हैं, उन्हें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और खद्दरके व्यवहारके लिए जोरोंसे आन्दोलन करना चाहिए। उन्हें अधिकसे अधिक खद्दर तैयार करनेका भी प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्यके लिए तथा मद्य निषेधके विषयमें मैं भारतकी स्त्रियोंके लिए एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-दिन अधिक दृढ़ होता जाता है कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक कार्य कर सकती हैं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा वे अहिंसाका ज्यादा अच्छा उदाहरण पेश कर सकेंगी -इसलिए नहीं कि वे कमजोर हैं, जैसा कि पुरुष अपने घमण्डके कारण उनको समझा करते हैं; बल्कि इसलिए कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा सही किस्मका साहस अधिक है, और त्यागकी भावना तो कई गुना ज्यादा है।
१. इस भेंटवार्ता पहले गांधीजी ने कीचड़ सने नमकका एक डेला उठाकर नमक कानून भंग किया था।<noinclude></noinclude>
0u6q4nhadsykj71t1rq1fr8jfxti68y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५०
250
197293
673293
673255
2026-08-23T12:57:31Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673293
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''इसके बाद फ्री प्रेस के प्रतिनिधिने गांधीजी से यह सवाल किया अब तो आप नमक-कानून भंग कर चुके हैं और सरकारने आपको कहीं रोका-टोका भी नहीं।इसलिए आगे आपका क्या करनेका इरादा है ?'''
करना क्या है? मैं अवैध नमक तैयार करता रहूँगा।
'''दुसरा प्रश्न फ्री प्रेसके एक प्रतिनिधिने खास तौरसे अपनी संस्थाकी ओरसे पूछा था, लेकिन उसका जवाब दूसरा प्रेस प्रतिनिधि भी नोट करने लगा। इस पर गांधीजी के सामने ही दोनों प्रेस प्रतिनिधियोंमें कुछ कहा-सुनी हो गई। इस हानिक स्पर्धाको देखकर गांधीजी ने पत्रकारोंको सम्बोधित करते हुए कहा :'''
आपको अपनी रोटी कमानेकी फिक्के मुकाबले राष्ट्रीय हितको तरजीह देनी चाहिए। आपको भारतको स्वतन्त्रता दिलानेके लिए काम करना चाहिए और उसे इस घृणित कर के दुर्बह भारसे मुक्त करानेकी चिन्ता करनी चाहिए। आप सबको मिल-जुल कर काम करना चाहिए और भारतके हकमें आपस में सहयोग करना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''अमृतबाजार पत्रिका''', ७-४-१९३०
'''१८०. भाषण : दांडीमें'''
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजीने दोपहर बाद चार बजे एक सभामें भाषण दिया। उस दिन हुए कार्यक्रम पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सप्ताहका आरम्भ बहुत शुभ रहा है। सरकार आपको गिरफ्तार करे अथवा नहीं, आपको तो अपना कर्तव्य पूरा करते रहना है। मुझे विश्वास है कि आज लोगोंने देशके कोने-कोने में सत्याग्रह आरम्भ कर दिया होगा। उन्होंने आगे कहा कि दांडीमें प्राकृतिक नमक अधिक नहीं है, क्योंकि सरकारी कर्मचारियोंने समय रहते उसे नष्ट कर दिया है। यह एक राक्षसीकृत्य है और इनसे अपना पीछा छुड़ाना आपका कर्तव्य है। प्रातःकाल जब हमने कार्य आरम्भ किया तो स्वयं मेरे हाथोंमें नमकको अपेक्षा कीचड़ ही अधिक आया, लेकिन उसको धोकर साफ करनेके बाद मुझे दो तोले अच्छे किस्मका नमक मिल गया जो मेरी दिन-भरकी जरूरतके लिए काफी है। यह तो इस कार्यकी शुरुआत ही थी, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। आज जिन्होंने कानून तोड़ा है वे या तो चोर बन गये हैं अथवा मालिक।'''
'''इसके बाद उन्होंने आटमें हुए हमलेका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी श्री एंडियाने अपने व्यवहारमें काफी विवेक दिखाया। यह अहिंसाकी विजय थी। नमक छीननेके लिए सरकारने कितना ज्यादा सार्वजनिक पैसा बरबाद किया है।'''<noinclude></noinclude>
moifjmtcz9bk2imozp66ck8xz2iiiba
673296
673293
2026-08-23T13:02:24Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673296
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''इसके बाद फ्री प्रेस के प्रतिनिधिने गांधीजी से यह सवाल किया: अब तो आप नमक-कानून भंग कर चुके हैं और सरकारने आपको कहीं रोका-टोका भी नहीं। इसलिए आगे आपका क्या करनेका इरादा है ?'''
करना क्या है? मैं अवैध नमक तैयार करता रहूँगा।
'''दुसरा प्रश्न फ्री प्रेसके एक प्रतिनिधिने खास तौरसे अपनी संस्थाकी ओरसे पूछा था, लेकिन उसका जवाब दूसरा प्रेस प्रतिनिधि भी नोट करने लगा। इस पर गांधीजी के सामने ही दोनों प्रेस प्रतिनिधियोंमें कुछ कहा-सुनी हो गई। इस हानिकर स्पर्धाको देखकर गांधीजी ने पत्रकारोंको सम्बोधित करते हुए कहा :'''
आपको अपनी रोटी कमानेकी फिक्र के मुकाबले राष्ट्रीय हितको तरजीह देनी चाहिए। आपको भारतको स्वतन्त्रता दिलानेके लिए काम करना चाहिए और उसे इस घृणित कर के दुर्बह भारसे मुक्त करानेकी चिन्ता करनी चाहिए। आप सबको मिल-जुल कर काम करना चाहिए और भारतके हकमें आपस में सहयोग करना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''अमृतबाजार पत्रिका''', ७-४-१९३०
'''१८०. भाषण : दांडीमें'''
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजीने दोपहर बाद चार बजे एक सभामें भाषण दिया। उस दिन हुए कार्यक्रम पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सप्ताहका आरम्भ बहुत शुभ रहा है। सरकार आपको गिरफ्तार करे अथवा नहीं, आपको तो अपना कर्तव्य पूरा करते रहना है। मुझे विश्वास है कि आज लोगोंने देशके कोने-कोने में सत्याग्रह आरम्भ कर दिया होगा। उन्होंने आगे कहा कि दांडीमें प्राकृतिक नमक अधिक नहीं है, क्योंकि सरकारी कर्मचारियोंने समय रहते उसे नष्ट कर दिया है। यह एक राक्षसीकृत्य है और इनसे अपना पीछा छुड़ाना आपका कर्तव्य है। प्रातःकाल जब हमने कार्य आरम्भ किया तो स्वयं मेरे हाथोंमें नमककी अपेक्षा कीचड़ ही अधिक आया, लेकिन उसको धोकर साफ करनेके बाद मुझे दो तोले अच्छे किस्मका नमक मिल गया जो मेरी दिन-भरकी जरूरतके लिए काफी है। यह तो इस कार्यकी शुरुआत ही थी, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। आज जिन्होंने कानून तोड़ा है वे या तो चोर बन गये हैं अथवा मालिक।'''
'''इसके बाद उन्होंने आटमें हुए हमलेका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी श्री एंटियाने अपने व्यवहारमें काफी विवेक दिखाया। यह अहिंसाकी विजय थी। नमक छीननेके लिए सरकारने कितना ज्यादा सार्वजनिक पैसा बरबाद किया है।'''<noinclude></noinclude>
thrd0jk05j9vheufjentmlhcawcqpll
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५१
250
197294
673320
673258
2026-08-23T13:50:43Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673320
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२०७}}</noinclude>फिर गांधीजी ने रोहतक के लाला शामलालकी धारा १२४ ए के अधीन हुई गिरफ्तारीका उल्लेख किया। उनकी शानदार राष्ट्रीय सेवाओंके लिए उन्होंने लाला शामलालकी बड़ी प्रशंसा की।
'''सरकार अन्य कार्यकर्त्ताओंको गिरफ्तार कर रही है, लेकिन मुझको नहीं। उसकी यह नीति मेरी समझमें नहीं आ रही है। ऐसा नहीं कि मैं गिरफ्तार होनेके लिए बहुत उत्सुक हूँ, लेकिन जो कुछ हो रहा है वह न्यायसंगत नहीं है। गिरफ्तारीसे मुझे कोई बड़ा सम्मान मिल जायेगा, ऐसी बात भी नहीं है। मैं तो पहले से ही महात्मा कहा जाता हूँ, हालांकि मैं यह उपाधि नहीं चाहता।'''
'''जेल जानेके लिए मैं बिलकुल उत्सुक नहीं हूँ। दांडीकी अच्छी आबो-हवाका में मजा ले रहा हूँ। लेकिन सरकारको चाहिए कि वह अन्य लोगों से पहले मुझे गिरफ्तार
करे, क्योंकि सबसे बड़ा अपराधी तो मैं ही हूँ। रोहतकके हर व्यक्तिका यह कर्त्तव्य
है कि वह उस धारा १२४ ए का उल्लंघन करे जिसके अधीन लाला शामलालको
गिरफ्तार किया गया है। अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजी ने लोगों से अपील
की कि जिस नमकपर सरकार कर लेती है, वह नमक वे न खायें।'''
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे फॉनिकल''', ८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|रविवार, रातको दस बजे के बाद}}
{{Right|[६ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
मणिलाल कोठारीके पकड़े जानेकी बात सुनी है। रामदास आदि तो गिरफ्तार किये ही जा चुके हैं। यह सब अच्छा हो रहा है। तुम्हें भी दिन अथवा घंटे गिनने चाहिए। मैं जेलसे बाहर रहूँ अथवा जेलमें, दोनों तरहसे ठीक है।
'यंग इंडिया' के लेख मैंने मोहनलालको सीधे भेजे हैं। [कौन जाने] तुम यहाँ हो अथवा नहीं।
समय मिले तो महिलाओंको संगठित कर लेना। आश्रमकी बहनें यदि पहल करती हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं, कदाचित् यही जरूरी हो मैं यह बात शराब-बन्दीके विषय में कह रहा हूँ।
१. मणिलाल कोठारी, रामदास और अन्य लोगों के पकड़े जानेकी सूचना १३-४-१९३० के नवजीवन में दी गई थी। पत्र स्पष्टतः इससे पहले रविवार को लिखा गया होगा।<noinclude></noinclude>
magg1e93e876v94bfbnujbgwt9pm3m3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५२
250
197295
673325
673263
2026-08-23T14:01:12Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673325
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२०८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>लाला शामलालके पकड़े जाने की बात सुनकर मेरी अनुमतिसे सूरजभान पंजाब
जा रहे हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
यहाँपर तो अभी सरकारने किसीपर हाथ नहीं डाला है। सरोजिनीदेवी यहीं रह गई हैं और उन्होंने वृद्ध अब्बास साहबके पकड़े जानेपर उनका स्थान लेनेका निश्चय किया है।
{{Right|बापू}}
गुजराती (एस० एन० ११४७२ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|कराडी}}
{{Right|सवा दस बजे रातको [६ अप्रैल,]१ १९३०}}
चि० नारणदास,
तुम्हारे सवाल का जवाब तो तुम्हें मिल गया होगा। पुरुषोत्तमका यहाँ आ जाना कदाचित् अच्छा रहेगा। यहाँकी हवा तो उत्तम है; यदि उसे पानी अनूकूल आ जाये
तो बहुत अच्छा हो। मेरे पकड़े जानेके अभी कोई आसार नहीं दिखाई देते।
कमलादेवी एक बहुत भली महिला है। वह पन्द्रह एक दिन रहेगी। उसके बच्चेको यदि यह जगह माफिक आ गई तो वह ज्यादा दिन भी रह सकती है।
यदि वह रहना चाहे तो उसे प्रोत्साहित करना और यह देखना कि वह अकेली न
पड़ जाये।
रतिलाल यदि काममें लगा रहे तब तो बहुत अच्छा है। सबसे कहना मुझे समय नहीं मिलता, इसीसे कुछ एक पत्र रह जाते हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]
सूरजभान मेरी अनुमतिसे पंजाब जा रहा है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९६) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
१. पत्र सूरजभानके पंजाब जानेकी चर्चा लगता है कि पिछला पत्र और यह एक ही दिन लिखे गये होंगे।<noinclude></noinclude>
6c4wkt0lqimb04598to05mfj0u07w1z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५३
250
197296
673337
669818
2026-08-23T15:18:50Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित नहीं */
673337
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
56bu8j78b8atujdgs5rp11ba8qz3tew
673338
673337
2026-08-23T15:19:44Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673338
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{१८३.| पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
1sg2hw68f5ogybawqyq3kvd84z9y20y
673339
673338
2026-08-23T15:20:12Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673339
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{'''१८३.| पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
o9ph8le4y79e9me46jn5se33jm2h9s0
673340
673339
2026-08-23T15:21:12Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673340
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{'''१८३ पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
cp59fwyifzrzz5vc4z2uefn84q7prkz
673341
673340
2026-08-23T15:22:25Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673341
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
4onl3jf69lml7hhdgsvgf8b4oqclgft
673344
673341
2026-08-23T15:27:06Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673344
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
rzofkagd817wtpmy94odj7hhjn8c0y3
673345
673344
2026-08-23T15:32:14Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673345
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
{{Right|चि० मीरा,}}
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
159vvvgwngygzc874ocpd1zinimcgn8
673349
673345
2026-08-23T15:50:36Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673349
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : मीराबहनको,'''}}}}
{{Right|६ अप्रैल, १९३०}}
चि० मीरा,
इतना समय नहीं है कि तुम्हें विस्तारसे लिखूं। रातके ११ बजने वाले हैं। दोनों संघोंको देनेके लिए तुम्हारे पास अब कितना सूत बच रहा है, और किन तिथियों तककी अदायगी की जा चुकी है?
शेष समय मिलनेपर मणि लाल रामदासकी जगह काम करने गया है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८८) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२२ से भी।
{{C|{{larger|'''१८४. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
चि० मीरा,
अगर तुम्हारा जी आनेको चाहे तो तुम खुशीसे आ सकती हो। दांडी तो तुम नहीं जा सकोगी। अगर तुम्हारा मन बिलकुल शान्त और स्वस्थ हो तो आनेकी जरूरत नहीं। तुम्हें बादमें मद्य निषेधके कार्यमें शामिल होना हो तो भी यहाँ आने से तुमको उसके बारेमें कोई विशेष ज्ञान नहीं प्राप्त हो जायेगा। सारी बातचीत गुजरातीमें होगी। लेकिन अगर तुम इसलिए आना चाहो कि तुम्हें मुझसे मिलना ही है तो उस एकमात्र उद्देश्यसे किसी और दिन आओ। मगर आखिरकार तुम्हें क्या करना है, यह तो तुम्हींको तय करना है। तुम्हें मैं निर्णयकी पूरी छूट देता हूँ।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
[पुनश्च :]
इन दिनों तुम 'यंग इंडिया' को ध्यानसे पढ़ना।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८४) से; सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६१८ से भी।
१. पत्र गांधीजीने शायद दांडीमे १३ अप्रैको होनेवाले महिला सम्मेलनका उल्लेख किया है जिसमें मध-निषेधके बारेमें प्रस्ताव पास किया गया था। इससे पहलेवाला सोमवार ७ अप्रेलको पड़ा था।
४३-१४<noinclude></noinclude>
djfqa2f3vqd52ht1imt0cxrsdvbost4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५४
250
197297
673346
669819
2026-08-23T15:38:18Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673346
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८५. बर्बरतापूर्ण'''}}}}
{{Right|[७ अप्रैल, १९३०]}}
सरकार जो धमकियाँ दे रही थी, वे अब रंग ला रही हैं। कमसे कम गुजरात में नमक-कर का विरोध करनेवाले सत्याग्रहियोंको सरकारने बढ़ी तत्परता से गिरफ्तार
करना शुरू कर दिया है। इसके लिए मैं उसे बधाई देता हूँ। श्री मणिलाल कोठारी
और उनके तमाम साथी, श्री अमृतलाल सेठ और उनके तमाम साथी तथा भोंच-
सेवाश्रम के डॉ० चन्द्रलाल देसाई और उनके सभी साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
दरबार गोपालदास और श्रीयुत फूलचन्द तथा साथ ही खेड़ा जिलेके बहादुर किन्तु भोले राजपूतोंको अनेक बुराइयोंसे विमुख करनेवाले साहसी सुधारक श्रीयुत रविशंकर भी गिरफ्तार कर लिये गये है। सरकार ने रामदास गांधी, केशवभाई गणेशजी, चिमनलाल प्राणशंकर वगैराको भी गिरफ्तार कर लिया है। उसे यह सब करनेका अधिकार था। लेकिन दांडीसे चार मील दूर आट गाँवमें उसने आज जैसा व्यवहार किया, वैसा व्यवहार करनेका उसे कोई अधिकार न था। पुलिसने सत्याग्रहियों से जवरदस्ती नमक छीननेकी कोशिश की। अगर पुलिसवाले एक सभ्य सरकारके प्रतिनिधि थे तो मैं कहूँगा कि उन्हें इस तरह जबरदस्ती करने का कोई अधिकार न था । सत्याग्रहियोंकी ओरसे उत्तेजना फैलानेका कोई काम नहीं किया जा रहा था। सत्याग्रही भागे भी नहीं जा रहे थे। उनके नाम लिख लिये जा सकते थे। लेकिन पुलिसने इन वीरोंके पवित्र शरीरको बिना किसी वारंट अथवा उचित कारणके हाथ लगाकर इनका तो अपमान किया ही, साथ ही सारे राष्ट्रका भी अपमान किया है। बारडोलीके एक सत्याग्रही उकाभाई रामकी कलाईपर कुछ चोट भी पहुँची है। में यह कबूल करता हूँ कि पुलिस उस जगह बिना किसी हथियारके गई थी और शायद पुलिसवाले भी इसे स्वीकार करेंगे कि यहाँ हथियार लेकर जानेकी कोई जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि लोगोंका बरताव स्पष्ट ही सम्पूर्णतया शान्तिमय था। इसके बावजूद नमक छीनने के लिए लोगोंके शरीरको इस तरह हाथ लगाना नैतिक दृष्टिसे गुनाह था और मैं समझता हूँ इंग्लैंड परम्परागत कानूनकी रूसे भी यह गुनाह ही था। हाँ, मैं यह नहीं जानता कि उस कानूनके द्वारा सरकारी अमलोंको कौन-से अधिकार दिये गये है, जिसके अन्तर्गत कायरताको, जिसकी कोई व्याख्या नहीं की गई है, जुर्म करार दिया गया है।
पहली बार घटित इस छोटी-सी खूनी घटनाके कारण गाँवके प्रायः सब स्त्री-
पुरुष मौकेपर आ पहुँचे। स्त्रियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनमें अभी कोई भाग नहीं
२. सोमवार, ७ अप्रैल, १९३० को।<noinclude></noinclude>
riqmtna276mfqrxbapir5zbgyptjxak
673353
673346
2026-08-23T15:57:54Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673353
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८५. बर्बरतापूर्ण'''}}}}
{{Right|[७ अप्रैल, १९३०]}}
सरकार जो धमकियाँ दे रही थी, वे अब रंग ला रही हैं। कमसे कम गुजरात में नमक-कर का विरोध करनेवाले सत्याग्रहियोंको सरकारने बड़ी तत्परता से गिरफ्तार
करना शुरू कर दिया है। इसके लिए मैं उसे बधाई देता हूँ। श्री मणिलाल कोठारी
और उनके तमाम साथी, श्री अमृतलाल सेठ और उनके तमाम साथी तथा भोंड़ौच-
सेवाश्रम के डॉ० चन्द्रलाल देसाई और उनके सभी साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
दरबार गोपालदास और श्रीयुत फूलचन्द तथा साथ ही खेड़ा जिलेके बहादुर किन्तु भोले राजपूतोंको अनेक बुराइयोंसे विमुख करनेवाले साहसी सुधारक श्रीयुत रविशंकर भी गिरफ्तार कर लिये गये है। सरकार ने रामदास गांधी, केशवभाई गणेशजी, चिमनलाल प्राणशंकर वगैराको भी गिरफ्तार कर लिया है। उसे यह सब करनेका अधिकार था। लेकिन दांडीसे चार मील दूर आट गाँवमें उसने आज जैसा व्यवहार किया, वैसा व्यवहार करनेका उसे कोई अधिकार न था। पुलिसने सत्याग्रहियों से जवरदस्ती नमक छीननेकी कोशिश की। अगर पुलिसवाले एक सभ्य सरकारके प्रतिनिधि थे तो मैं कहूँगा कि उन्हें इस तरह जबरदस्ती करने का कोई अधिकार न था । सत्याग्रहियोंकी ओरसे उत्तेजना फैलानेका कोई काम नहीं किया जा रहा था। सत्याग्रही भागे भी नहीं जा रहे थे। उनके नाम लिख लिये जा सकते थे। लेकिन पुलिसने इन वीरोंके पवित्र शरीरको बिना किसी वारंट अथवा उचित कारणके हाथ लगाकर इनका तो अपमान किया ही, साथ ही सारे राष्ट्रका भी अपमान किया है। बारडोलीके एक सत्याग्रही उकाभाई रामकी कलाईपर कुछ चोट भी पहुँची है। मैं यह कबूल करता हूँ कि पुलिस उस जगह बिना किसी हथियारके गई थी और शायद पुलिसवाले भी इसे स्वीकार करेंगे कि यहाँ हथियार लेकर जानेकी कोई जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि लोगोंका बरताव स्पष्ट ही सम्पूर्णतया शान्तिमय था। इसके बावजूद नमक छीनने के लिए लोगोंके शरीरको इस तरह हाथ लगाना नैतिक दृष्टिसे गुनाह था और मैं समझता हूँ इंग्लैंड परम्परागत कानूनकी रूसे भी यह गुनाह ही था। हाँ, मैं यह नहीं जानता कि उस कानूनके द्वारा सरकारी अमलोंको कौन-से अधिकार दिये गये है, जिसके अन्तर्गत कायरताको, जिसकी कोई व्याख्या नहीं की गई है, जुर्म करार दिया गया है।
पहली बार घटित इस छोटी-सी खूनी घटनाके कारण गाँवके प्रायः सब स्त्री-पुरुष मौकेपर आ पहुँचे। स्त्रियोंको सविनय अवज्ञा आन्दोलनमें अभी कोई भाग नहीं
१. सोमवार, ७ अप्रैल, १९३० को।<noinclude></noinclude>
7u97lsfkoqxof4eqqtrhc91hj5np4dx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५५
250
197298
673348
669820
2026-08-23T15:46:53Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673348
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बर्बरतापूर्ण|२११}}</noinclude>लेना था, और न ही गाँवके पुरुषोंसे इस समय उसकी आशा की जाती थी। लेकिन
यह खबर पाकर कि नमक जबरदस्ती छीना जा रहा है और एक स्वयंसेवक घायल
भी हो चुका है, वे सभी स्त्रियाँ (जिनमें से कुछकी गोद में बच्चे भी थे) और पुरुष
दौड़ पड़े और एक ओरसे पुरुष तथा दूसरी ओरसे स्त्रियाँ खाड़ीमें उतर पड़ी तथा
नमक खोदने लगी। जैसे ही मुझे यह खबर मिली कि सत्याग्रहियोंसे जबरदस्ती नमक
छीनने की कोशिश की जा रही है, सोमवारका मौन होनेके कारण मैंने एक चिटपर
लिखा कि श्रीमती सरोजिनीदेवी और श्रीयुत अब्बास तैयबजी मौकेपर जायें और
अगर पुलिस न माने तो स्वयं भी नमक खोदना शुरू कर दें तथा पुलिसको अपने
हाथोंमें से नमक छीननेके लिए चुनौती दें। लेकिन में उदारतापूर्वक यह मान लेता
हूँ कि इन मित्रोंके मौकेपर पहुँचनेसे पहले ही पुलिसवालोंने अपनी गलती महसूस
कर ली थी और उनमें इतना साहस नहीं रह गया था कि ये सारे गाँव के लोगों पर,
जिनमें स्त्रियां भी शामिल थीं, हाथ उठायें। सत्याग्रही जानते थे कि मौनवारके कारण
मैं कुछ बोल नहीं सकूंगा तो भी वे चाहते थे कि मैं मौकेपर पहुँचूँ। इसके बिना
ये सन्तुष्ट होनेवाले नहीं थे। स्पष्ट ही उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं वहाँ जा-
कर प्रत्यक्ष देखूं कि उन्होंने कैसा व्यवहार किया था और किस उत्साहके साथ सारा
गाँव युद्धमें हाथ बँटा रहा था। बचाये हुए नमकके साथ उकाभाई राम मेरे पास
दांडी लाये गये में आठ गया। वहाँ जाकर मैंने जो कुछ देखा, उससे मेरा रोज-
रोआं पुलकित हो उठा। पुलिस द्वारा जबरदस्ती नमक छीननेका असर अच्छा हुआ
था। इससे सारे गांव में नई चेतना फैल गई। फिर भी मेरी आन्तरिक अभिलाषा
तो यह है कि सरकारके हमें और इस नमक युद्धको शान्तिमय तथा सभ्यतापूर्ण
बनाये रखनेके लिए अच्छा यही होता कि यह भद्दी घटना न घटती।
इस समय सरकारके लिए सारी कार्रवाई पूरी तरह कानूनके अनुसार करना। भारी हो सकता है। लेकिन चूंकि उसने शुरुआत अच्छी तरह की है, अन्त भी भली प्रकार ही करे तो अच्छा हो। क्या ही अच्छा हो यदि इस युद्धका स्वरूप सरकार और जनताकी कसौटीका हो! अगर सरकारने आतंकसे काम लिया तो। मेरी राय में, यदि में गलत नहीं समझ रहा हूँ, वह देखेगी कि लोग क्या मर्द और क्या औरतें उसके द्वारा दिये जानेवाले हर तरहके कष्टोंका सामना करने को तैयार हैं। सत्याग्रहियोंके हाथका नमक राष्ट्रके सम्मानका प्रतीक है। वह तबतक नहीं दिया जा सकता जबतक कोई जबरदस्ती हाथको तोड़कर उसे छीन न ले। पुलिसके व्यवहारका वर्णन करते हुए उकाभाईने कहा था : "अपनी थातीकी रक्षा करनेके लिए सत्याग्रहीको ईश्वरसे बल और प्रेरणा मिलती है।" लोगोंको चाहिए कि वे अपने पासका नमक तबतक न दें जबतक कि वे निरुपाय न हो जायें। लेकिन ऐसा करते हुए वे अपने हृदयमें जरा भी द्वेष भाव न रखें, थोड़ा भी गुस्सा न करें, एक शब्द भी गुस्से में न बोलें। नमकपर अधिकार करनेके लिए पुलिसके पास एक बिल्कुल आसान तरीका पड़ा हुआ है। वह सत्याग्रहियोंको गिरफ्तार कर ले। इस तरह वह नमक पर भी अधिकार कर सकती है, क्योंकि तब उनका शरीर उसके अधिकारमें होगा।<noinclude></noinclude>
qtfnpn8ivr6kc8z8emzd254tuhq9b50
673359
673348
2026-08-23T16:07:22Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673359
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बर्बरतापूर्ण|२११}}</noinclude>लेना था, और न ही गाँवके पुरुषोंसे इस समय उसकी आशा की जाती थी। लेकिन
यह खबर पाकर कि नमक जबरदस्ती छीना जा रहा है और एक स्वयंसेवक घायल
भी हो चुका है, वे सभी स्त्रियाँ (जिनमें से कुछकी गोद में बच्चे भी थे) और पुरुष
दौड़ पड़े और एक ओरसे पुरुष तथा दूसरी ओरसे स्त्रियाँ खाड़ीमें उतर पड़ी तथा
नमक खोदने लगी। जैसे ही मुझे यह खबर मिली कि सत्याग्रहियोंसे जबरदस्ती नमक
छीनने की कोशिश की जा रही है, सोमवारका मौन होनेके कारण मैंने एक चिटपर
लिखा कि श्रीमती सरोजिनीदेवी और श्रीयुत अब्बास तैयबजी मौकेपर जायें और
अगर पुलिस न माने तो स्वयं भी नमक खोदना शुरू कर दें तथा पुलिसको अपने
हाथोंमें से नमक छीननेके लिए चुनौती दें। लेकिन मैं उदारतापूर्वक यह मान लेता
हूँ कि इन मित्रोंके मौकेपर पहुँचनेसे पहले ही पुलिसवालोंने अपनी गलती महसूस
कर ली थी और उनमें इतना साहस नहीं रह गया था कि ये सारे गाँव के लोगों पर,
जिनमें स्त्रियां भी शामिल थीं, हाथ उठायें। सत्याग्रही जानते थे कि मौनवारके कारण
मैं कुछ बोल नहीं सकूंगा तो भी वे चाहते थे कि मैं मौकेपर पहुँचूँ। इसके बिना ये सन्तुष्ट होनेवाले नहीं थे। स्पष्ट ही उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखूं कि उन्होंने कैसा व्यवहार किया था और किस उत्साहके साथ सारा गाँव युद्धमें हाथ बँटा रहा था। बचाये हुए नमकके साथ उकाभाई राम मेरे पास दांडी लाये गये। मैं आट गया। वहाँ जाकर मैंने जो कुछ देखा, उससे मेरा रोआं-रोआं पुलकित हो उठा। पुलिस द्वारा जबरदस्ती नमक छीननेका असर अच्छा हुआ था। इससे सारे गांव में नई चेतना फैल गई। फिर भी मेरी आन्तरिक अभिलाषा तो यह है कि सरकारके हमें और इस नमक युद्धको शान्तिमय तथा सभ्यतापूर्ण बनाये रखनेके लिए अच्छा यही होता कि यह भद्दी घटना न घटती।
इस समय सरकारके लिए सारी कार्रवाई पूरी तरह कानूनके अनुसार करना भारी हो सकता है। लेकिन चूंकि उसने शुरुआत अच्छी तरह की है, अन्त भी भली प्रकार ही करे तो अच्छा हो। क्या ही अच्छा हो यदि इस युद्धका स्वरूप सरकार और जनताकी कसौटीका हो! अगर सरकारने आतंकसे काम लिया तो। मेरी राय में, यदि मैं गलत नहीं समझ रहा हूँ, वह देखेगी कि लोग क्या मर्द और क्या औरतें उसके द्वारा दिये जानेवाले हर तरहके कष्टोंका सामना करने को तैयार हैं। सत्याग्रहियोंके हाथका नमक राष्ट्रके सम्मानका प्रतीक है। वह तबतक नहीं दिया जा सकता जबतक कोई जबरदस्ती हाथको तोड़कर उसे छीन न ले। पुलिसके व्यवहारका वर्णन करते हुए उकाभाईने कहा था : "अपनी थातीकी रक्षा करनेके लिए सत्याग्रहीको ईश्वरसे बल और प्रेरणा मिलती है।" लोगोंको चाहिए कि वे अपने पासका नमक तबतक न दें जबतक कि वे निरुपाय न हो जायें। लेकिन ऐसा करते हुए वे अपने हृदयमें जरा भी द्वेष भाव न रखें, थोड़ा भी गुस्सा न करें, एक शब्द भी गुस्से में न बोलें। नमकपर अधिकार करनेके लिए पुलिसके पास एक बिल्कुल आसान तरीका पड़ा हुआ है। वह सत्याग्रहियोंको गिरफ्तार कर ले। इस तरह वह नमक पर भी अधिकार कर सकती है, क्योंकि तब उनका शरीर उसके अधिकारमें होगा।<noinclude></noinclude>
e9s4udhr3o01gd6vdp1qdkjw52tfmlo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५६
250
197299
673362
669821
2026-08-23T16:13:44Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673362
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन नमक तो तभी जब्त किया जा सकता है जब वे दोषी ठहराये जा चुके, इससे पहले नहीं।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८६. वक्तव्य : समाचार पत्रोंको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
अबतक मिली खबरोंसे ऐसा जान पड़ता है कि सामुदायिक सविनय अवज्ञाकी जो चमत्कारिक लहर गुजरातमें आई है उसका असर सरकारपर भी हुआ है। सरकार ने इस आन्दोलनके नेताओंको पकड़ने में तनिक भी समय नहीं गंवाया और मैं समझता हूँ कि सरकारने अन्य प्रान्तोंके कार्यकर्त्ताओंपर भी इतना ही ध्यान दिया होगा। यह तो स्वयंको ही बधाई देने जैसा समाचार है। आश्चर्य की बात तो तब होती जब कि सरकार सत्याग्रहियोंको उनकी इच्छानुसार काम करने देती। यदि सरकारने बाकायदा जांच-पड़ताल किये बिना सत्याग्रहियोंकी जान-मालपर हमला किया होता तो उसे बर्बरता माना जाता । पुरानी पद्धति के अनुसार बाकायदा मुकदमे चलाये जायें और सजा दी जाये तो इसमें किसीको आपत्ति नहीं हो सकती। कैद या ऐसी ही दूसरी सजाएँ तो सत्याग्रहियोंकी कसौटी हैं, जिनसे होकर उन्हें गुजरना है। जब सत्याग्रही डिगता नहीं, जिनके प्रतिनिधिके रूपमें वह काम कर रहा है उन्हें धोखा नहीं देता तथा नायकके पकड़े जानेपर घबराता नहीं तभी यह कहा जा सकता है कि वह अपने उद्देश्यमें सफल हुआ है। अब वह समय आ पहुंचा है जब प्रत्येकको स्वयं ही सैनिक और स्वयं ही नायक बनना होगा। जो विद्यार्थी सरकारी अथवा सरकार द्वारा नियन्त्रित स्कूलों और कालेजोंमें पढ़ते हैं, यदि वे इस पकड़-धकड़के बाद भी अपने स्कूल-कालेज नहीं छोड़ते तो इससे मुझे बहुत ही दुःख होगा। नमक बनाने में जो खतरा है, लोगोंको उसे समझकर ही नमक बनाना चाहिए या फिर समुद्र के किनारे दरारों और गड्डोंमें पड़े हुए कुदरती नमकको इकट्ठा करके अपने और अपने पशुओंके लिए उसका उपयोग करना चाहिए और जो लोग खरीदना चाहें। उनके हाथ यह नमक बेच देना चाहिए। नमक कानून भंग करते हुए इन लोगोंको यह समझ लेना चाहिए कि वे ऐसी जोखिम उठा रहे हैं जिसकी बिना पर कायदेके मुताबिक कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। या फिर यह भी सम्भव है कि नमक-विभागके तथाकथित अधिकारी किसी तरहकी कानूनी कार्रवाई किये बिना ही उन्हें परेशान करें। १३ अप्रैलको समाप्त होनेवाले पूरे राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान नमक-कानूनके विरुद्ध इस ढंग से यह लड़ाई चलती रहेगी। जो लोग इस पवित्र कार्यमें भाग नहीं लेते उन्हें विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी जबरदस्त लड़ाईमें स्वयंको झोंक देना चाहिए और खादीका व्यवहार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें यथासम्भव<noinclude></noinclude>
gx9wt27ti2a95z9hvb9r1xt0x5vwx1t
673364
673362
2026-08-23T16:17:27Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673364
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन नमक तो तभी जब्त किया जा सकता है जब वे दोषी ठहराये जा चुके, इससे पहले नहीं।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८६. वक्तव्य : समाचार पत्रोंको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
अबतक मिली खबरोंसे ऐसा जान पड़ता है कि सामुदायिक सविनय अवज्ञाकी जो चमत्कारिक लहर गुजरातमें आई है उसका असर सरकारपर भी हुआ है। सरकार ने इस आन्दोलनके नेताओंको पकड़ने में तनिक भी समय नहीं गंवाया और मैं समझता हूँ कि सरकारने अन्य प्रान्तोंके कार्यकर्त्ताओंपर भी इतना ही ध्यान दिया होगा। यह तो स्वयंको ही बधाई देने जैसा समाचार है। आश्चर्य की बात तो तब होती जब कि सरकार सत्याग्रहियोंको उनकी इच्छानुसार काम करने देती। यदि सरकारने बाकायदा जांच-पड़ताल किये बिना सत्याग्रहियोंकी जान-मालपर हमला किया होता तो उसे बर्बरता माना जाता। पुरानी पद्धति के अनुसार बाकायदा मुकदमे चलाये जायें और सजा दी जाये तो इसमें किसीको आपत्ति नहीं हो सकती। कैद या ऐसी ही दूसरी सजाएँ तो सत्याग्रहियोंकी कसौटी हैं, जिनसे होकर उन्हें गुजरना है। जब सत्याग्रही डिगता नहीं, जिनके प्रतिनिधिके रूपमें वह काम कर रहा है उन्हें धोखा नहीं देता तथा नायकके पकड़े जानेपर घबराता नहीं तभी यह कहा जा सकता है कि वह अपने उद्देश्यमें सफल हुआ है। अब वह समय आ पहुंचा है जब प्रत्येकको स्वयं ही सैनिक और स्वयं ही नायक बनना होगा। जो विद्यार्थी सरकारी अथवा सरकार द्वारा नियन्त्रित स्कूलों और कालेजोंमें पढ़ते हैं, यदि वे इस पकड़-धकड़के बाद भी अपने स्कूल-कालेज नहीं छोड़ते तो इससे मुझे बहुत ही दुःख होगा। नमक बनाने में जो खतरा है, लोगोंको उसे समझकर ही नमक बनाना चाहिए या फिर समुद्र के किनारे दरारों और गड्डोंमें पड़े हुए कुदरती नमकको इकट्ठा करके अपने और अपने पशुओंके लिए उसका उपयोग करना चाहिए और जो लोग खरीदना चाहें। उनके हाथ यह नमक बेच देना चाहिए। नमक कानून भंग करते हुए इन लोगोंको यह समझ लेना चाहिए कि वे ऐसी जोखिम उठा रहे हैं जिसकी बिना पर कायदेके मुताबिक कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। या फिर यह भी सम्भव है कि नमक-विभागके तथाकथित अधिकारी किसी तरहकी कानूनी कार्रवाई किये बिना ही उन्हें परेशान करें। १३ अप्रैलको समाप्त होनेवाले पूरे राष्ट्रीय सप्ताहके दौरान नमक-कानूनके विरुद्ध इस ढंग से यह लड़ाई चलती रहेगी। जो लोग इस पवित्र कार्यमें भाग नहीं लेते उन्हें विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी जबरदस्त लड़ाईमें स्वयंको झोंक देना चाहिए और खादीका व्यवहार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें यथासम्भव<noinclude></noinclude>
8rfmu2jnkeinrnis9wu59f7v38xoubz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५७
250
197300
673562
669822
2026-08-24T06:34:58Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673562
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२१३}}</noinclude>अधिक से अधिक खादीका उत्पादन बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहिए और मद्यनिषेध-
आन्दोलनको चलाते रहना चाहिए।
भारतकी स्त्रियोंके लिए मैं एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मुझे दिन-प्रतिदिन यह विश्वास होता जाता है कि स्वतन्त्रता प्राप्तिके युद्ध में पुरुषोंकी अपेक्षा इस देशकी स्त्रियाँ कहीं अधिक योगदान दे सकती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियाँ देशको अहिंसाका अर्थ ज्यादा अच्छी तरहसे समझाने में समर्थ होंगी। उसका कारण यह नहीं है कि अपने मिथ्या अभिमानवश पुरुष उन्हें अबला मानता है; बल्कि स्त्रियोंमें सच्चा साहस कहीं अधिक मात्रामें है और उनमें आत्म समर्पणका अपार उत्साह है।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८७. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। पहला दिन तो गुजरातने अच्छी तरहसे मनाया है और कह सकते हैं कि सरकारने भी अच्छी तरहसे मनाया है। आटमें जो हुआ उसके अलावा ऐसी कोई बात नहीं हुई है जिसको लेकर शिकायत की जा सके। आटके बारेमें तो मैंने 'यंग इंडिया' में लिखकर भेज ही दिया है। उसमें देख लेना। दरबार आदिको अच्छी सजा मिली है। मेरा लेख मुझे जो खबर मिली, उसपर आधारित है, इसलिए यदि उसमें संशोधन परिवर्तन करनेकी आवश्यकता महसूस हो तो कर लेना । यदि तुममें हिम्मत हो और इच्छा हो तो तुम सार्वजनिक सभामें नमक बेचना। लेकिन यहाँ बैठे हुए मैं तो यही मानता हूँ कि सार्वजनिक सभामें नमक बेचना व्यर्थका खतरा मोल लेना है। स्त्रियों और मद्यपानके सम्बन्ध में मैंने गंगावनको सब कुछ समझा दिया है। फुरसत मिले तो इसपर विचार और चर्चा कर लेना। फुरसत न मिले तो ऐसा करनेका विचार त्याग देना।
खेड़ा जिलेसे मुझे अभी-अभी एक लम्बा पत्र मिला है, मैं उसमें व्यस्त हो गया हूँ।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस० एन० ११४७३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
altbxm2c2n9r27xxz4v1ktvx49x39uq
673639
673562
2026-08-24T10:33:44Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673639
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२१३}}</noinclude>अधिक से अधिक खादीका उत्पादन बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहिए और मद्यनिषेध-
आन्दोलनको चलाते रहना चाहिए।
भारतकी स्त्रियोंके लिए मैं एक सन्देश तैयार कर रहा हूँ। मुझे दिन-प्रतिदिन यह विश्वास होता जाता है कि स्वतन्त्रता प्राप्तिके युद्ध में पुरुषोंकी अपेक्षा इस देशकी स्त्रियाँ कहीं अधिक योगदान दे सकती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियाँ देशको अहिंसाका अर्थ ज्यादा अच्छी तरहसे समझाने में समर्थ होंगी। उसका कारण यह नहीं है कि अपने मिथ्या अभिमानवश पुरुष उन्हें अबला मानता है; बल्कि स्त्रियोंमें सच्चा साहस कहीं अधिक मात्रामें है और उनमें आत्म समर्पणका अपार उत्साह है।
[गुजरातीसे]
'''प्रजावन्धु''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१८७. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। पहला दिन तो गुजरातने अच्छी तरहसे मनाया है और कह सकते हैं कि सरकारने भी अच्छी तरहसे मनाया है। आटमें जो हुआ उसके अलावा ऐसी कोई बात नहीं हुई है जिसको लेकर शिकायत की जा सके। आटके बारेमें तो मैंने 'यंग इंडिया' में लिखकर भेज ही दिया है। उसमें देख लेना। दरबार आदिको अच्छी सजा मिली है। मेरा लेख मुझे जो खबर मिली, उसपर आधारित है, इसलिए यदि उसमें संशोधन परिवर्तन करनेकी आवश्यकता महसूस हो तो कर लेना । यदि तुममें हिम्मत हो और इच्छा हो तो तुम सार्वजनिक सभामें नमक बेचना। लेकिन यहाँ बैठे हुए मैं तो यही मानता हूँ कि सार्वजनिक सभामें नमक बेचना व्यर्थका खतरा मोल लेना है। स्त्रियों और मद्यपानके सम्बन्ध में मैंने गंगावनको सब कुछ समझा दिया है। फुरसत मिले तो इसपर विचार और चर्चा कर लेना। फुरसत न मिले तो ऐसा करनेका विचार त्याग देना।
खेड़ा जिलेसे मुझे अभी-अभी एक लम्बा पत्र मिला है, मैं उसमें व्यस्त हो गया हूँ।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस० एन० ११४७३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
5okech8d1leopqwfae63d7o573noce8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५८
250
197301
673566
669824
2026-08-24T06:48:22Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673566
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८८. पत्र प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३०}}
चि० प्रभावती,
तेरे पत्र तो मिलते ही रहते हैं। परन्तु मैं क्या करूँ? समय ही नहीं मिलता इसीलिए तुझे पत्र नहीं लिख सका विचार तो बहुत करता हूँ। आज पकड़ा जाऊँ, कल पकड़ा जाऊँ ऐसी परिस्थितियों में संघर्षके सम्बन्धमें जो कुछ लिखना होता है उसमें समय चला जाता है। यदि तुझे अनुमति मिल सके और तू आश्रम चली जाये तब तो बहुत अच्छा हो। अभी तो सरकारने मुझे गिरफ्तार नहीं किया है। अन्य लोगोंकी धर-पकड़ तो शुरू हो गई है। रामदास पकड़ा गया है। इसलिए उसके स्थानपर मणिलालको भेजा है। यहाँ तो काम अच्छी तरह चल रहा है। दांडी छोटा-सा गाँव है, यहाँकी आबोहवा अच्छी है।
और अधिक नहीं लिखता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३६३) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
इसके साथ भाई शान्तिकुमार द्वारा भेजा गया चेक भेज रहा हूँ। इसे गुप्तदान
समझना।
गंगाबहन कल सवेरे यहाँसे रवाना होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
जयन्तीप्रसादको सं० प्रा० जानेकी अनुमति दी है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९७ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
२. पत्रमें रामदासकी गिरफ्तारी की चर्चा लगता है कि यह पत्र सोमवार ७ अप्रैल १९३० को लिखा गया होगा। देखिए "पत्र प्रभावतीको १०-४-१९३० भी।<noinclude></noinclude>
8hs3eicva3sw3vs736l3owgljrlhgqw
673567
673566
2026-08-24T06:50:05Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673567
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८८. पत्र प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३०}}
चि० प्रभावती,
तेरे पत्र तो मिलते ही रहते हैं। परन्तु मैं क्या करूँ? समय ही नहीं मिलता इसीलिए तुझे पत्र नहीं लिख सका विचार तो बहुत करता हूँ। आज पकड़ा जाऊँ, कल पकड़ा जाऊँ ऐसी परिस्थितियों में संघर्षके सम्बन्धमें जो कुछ लिखना होता है उसमें समय चला जाता है। यदि तुझे अनुमति मिल सके और तू आश्रम चली जाये तब तो बहुत अच्छा हो। अभी तो सरकारने मुझे गिरफ्तार नहीं किया है। अन्य लोगोंकी धर-पकड़ तो शुरू हो गई है। रामदास पकड़ा गया है। इसलिए उसके स्थानपर मणिलालको भेजा है। यहाँ तो काम अच्छी तरह चल रहा है। दांडी छोटा-सा गाँव है, यहाँकी आबोहवा अच्छी है।
और अधिक नहीं लिखता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३६३) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
इसके साथ भाई शान्तिकुमार द्वारा भेजा गया चेक भेज रहा हूँ। इसे गुप्तदान
समझना।
गंगाबहन कल सवेरे यहाँसे रवाना होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
जयन्तीप्रसादको सं० प्रा० जानेकी अनुमति दी है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९७ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
२. पत्रमें रामदासकी गिरफ्तारी की चर्चा लगता है कि यह पत्र सोमवार ७ अप्रैल १९३० को लिखा गया होगा। देखिए "पत्र प्रभावतीको १०-४-१९३० भी।<noinclude></noinclude>
t28ygbhh964f5nc31yptbgw3lh3yh0q
673568
673567
2026-08-24T06:50:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673568
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८८. पत्र प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० प्रभावती,
तेरे पत्र तो मिलते ही रहते हैं। परन्तु मैं क्या करूँ? समय ही नहीं मिलता इसीलिए तुझे पत्र नहीं लिख सका विचार तो बहुत करता हूँ। आज पकड़ा जाऊँ, कल पकड़ा जाऊँ ऐसी परिस्थितियों में संघर्षके सम्बन्धमें जो कुछ लिखना होता है उसमें समय चला जाता है। यदि तुझे अनुमति मिल सके और तू आश्रम चली जाये तब तो बहुत अच्छा हो। अभी तो सरकारने मुझे गिरफ्तार नहीं किया है। अन्य लोगोंकी धर-पकड़ तो शुरू हो गई है। रामदास पकड़ा गया है। इसलिए उसके स्थानपर मणिलालको भेजा है। यहाँ तो काम अच्छी तरह चल रहा है। दांडी छोटा-सा गाँव है, यहाँकी आबोहवा अच्छी है।
और अधिक नहीं लिखता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३६३) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
इसके साथ भाई शान्तिकुमार द्वारा भेजा गया चेक भेज रहा हूँ। इसे गुप्तदान
समझना।
गंगाबहन कल सवेरे यहाँसे रवाना होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
जयन्तीप्रसादको सं० प्रा० जानेकी अनुमति दी है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९७ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
१. पत्रमें रामदासकी गिरफ्तारी की चर्चा लगता है कि यह पत्र सोमवार ७ अप्रैल १९३० को लिखा गया होगा। देखिए "पत्र प्रभावतीको १०-४-१९३० भी।<noinclude></noinclude>
5ntcqbx1l3xfd4fvs230rbouys3too6
673640
673568
2026-08-24T10:35:58Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673640
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१८८. पत्र प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० प्रभावती,
तेरे पत्र तो मिलते ही रहते हैं। परन्तु मैं क्या करूँ? समय ही नहीं मिलता इसीलिए तुझे पत्र नहीं लिख सका विचार तो बहुत करता हूँ। आज पकड़ा जाऊँ, कल पकड़ा जाऊँ ऐसी परिस्थितियों में संघर्षके सम्बन्धमें जो कुछ लिखना होता है उसमें समय चला जाता है। यदि तुझे अनुमति मिल सके और तू आश्रम चली जाये तब तो बहुत अच्छा हो। अभी तो सरकारने मुझे गिरफ्तार नहीं किया है। अन्य लोगोंकी धर-पकड़ तो शुरू हो गई है। रामदास पकड़ा गया है। इसलिए उसके स्थानपर मणिलालको भेजा है। यहाँ तो काम अच्छी तरह चल रहा है। दांडी छोटा-सा गाँव है, यहाँकी आबोहवा अच्छी है।
और अधिक नहीं लिखता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३६३) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
इसके साथ भाई शान्तिकुमार द्वारा भेजा गया चेक भेज रहा हूँ। इसे गुप्तदान
समझना।
गंगाबहन कल सवेरे यहाँसे रवाना होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
जयन्तीप्रसादको सं० प्रा० जानेकी अनुमति दी है।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९७ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
<small>१. पत्रमें रामदासकी गिरफ्तारी की चर्चा लगता है कि यह पत्र सोमवार ७ अप्रैल १९३० को लिखा गया होगा। देखिए "पत्र प्रभावतीको १०-४-१९३० भी।</small><noinclude></noinclude>
nwdlg5ocybrqyqvi0yk2shuh52krvz2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२५९
250
197302
673573
669825
2026-08-24T07:01:05Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673573
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० शान्तिकुमार,
तुम्हारा पत्र और चेक भी मिला। तुमसे मैं फिलहाल चेककी आशा नहीं रखता। लेकिन भेजते हो तो मैं उसकी कीमत सौ गुना ज्यादा मानता हूँ। मैं जानता है कि तुम्हारा मन तो यहीं है लेकिन हमें तो अनासक्तियोगकी सिद्धि करनी चाहिए, सब शास्त्रोंका सार यही है। 'गीता की दोनों प्रतियोंमें मैने हस्ताक्षर किये हैं और आशीर्वाद भी दिया है। तुम दोनोंको भगवान् शान्ति दे, सुमति दे और तुम अपने नामको चरितार्थ करो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१८ ) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{C|{{larger|'''१९१. सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें१'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजीने स्वयंसेवकों से कहा कि आप लोग हर परिस्थितिमें अपने निश्चय पर डटे रहें। आपको ऐसा कोई प्रतिरोध नहीं करना चाहिए जिससे पुलिसको हिंसात्मक कदम उठानेका मौका मिले। आप जो नमक इकट्ठा करें उसे अपने सीनेसे चिपकाकर रखनेका आपको पूरा अधिकार है। यह हिंसा नहीं है। हमारा नमक हमें उतना ही प्यारा है जितना कि अपना रक्त । में आशा करता हूँ कि अपने धैर्य और कष्टसहनसे आप पुलिसवालोंका भी हृदय परिवर्तन कर देंगे। आपको पुलिस-की ओरसे ऐसी वस्तन्दाजोकी परवाह किये बिना अपना काम जारी रखना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
१. आटमें दो स्वयंसेवकोंकी गिरफ्तारी के बाद गांधीजी अभ्यास तैयबजी और सरोजिनी नायडूके साथ सत्याग्रह स्थलपर गये। चूंकि उस दिन गांधीजी का मौनवार था, इसलिए उन्होंने एक कागजपर छोटासा सन्देश लिख दिया, जिसे स्वयंसेवकों नायकने पढ़कर सुनाया था।<noinclude></noinclude>
ix4ysycrkbmonytg253o9hfnjjl6thg
673576
673573
2026-08-24T07:02:24Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673576
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० शान्तिकुमार,
तुम्हारा पत्र और चेक भी मिला। तुमसे मैं फिलहाल चेककी आशा नहीं रखता। लेकिन भेजते हो तो मैं उसकी कीमत सौ गुना ज्यादा मानता हूँ। मैं जानता है कि तुम्हारा मन तो यहीं है लेकिन हमें तो अनासक्तियोगकी सिद्धि करनी चाहिए, सब शास्त्रोंका सार यही है। 'गीता की दोनों प्रतियोंमें मैने हस्ताक्षर किये हैं और आशीर्वाद भी दिया है। तुम दोनोंको भगवान् शान्ति दे, सुमति दे और तुम अपने नामको चरितार्थ करो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१८ ) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{C|{{larger|'''१९१. सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें१'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजीने स्वयंसेवकों से कहा कि आप लोग हर परिस्थितिमें अपने निश्चय पर डटे रहें। आपको ऐसा कोई प्रतिरोध नहीं करना चाहिए जिससे पुलिसको हिंसात्मक कदम उठानेका मौका मिले। आप जो नमक इकट्ठा करें उसे अपने सीनेसे चिपकाकर रखनेका आपको पूरा अधिकार है। यह हिंसा नहीं है। हमारा नमक हमें उतना ही प्यारा है जितना कि अपना रक्त । में आशा करता हूँ कि अपने धैर्य और कष्टसहनसे आप पुलिसवालोंका भी हृदय परिवर्तन कर देंगे। आपको पुलिस-की ओरसे ऐसी वस्तन्दाजोकी परवाह किये बिना अपना काम जारी रखना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
१. आटमें दो स्वयंसेवकोंकी गिरफ्तारी के बाद गांधीजी अभ्यास तैयबजी और सरोजिनी नायडूके साथ सत्याग्रह स्थलपर गये। चूंकि उस दिन गांधीजी का मौनवार था, इसलिए उन्होंने एक कागजपर छोटासा सन्देश लिख दिया, जिसे स्वयंसेवकों नायकने पढ़कर सुनाया था।<noinclude></noinclude>
2iqtll31l7ik09q1slqs1kmfckpmebb
673641
673576
2026-08-24T10:38:00Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673641
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० शान्तिकुमार,
तुम्हारा पत्र और चेक भी मिला। तुमसे मैं फिलहाल चेककी आशा नहीं रखता। लेकिन भेजते हो तो मैं उसकी कीमत सौ गुना ज्यादा मानता हूँ। मैं जानता है कि तुम्हारा मन तो यहीं है लेकिन हमें तो अनासक्तियोगकी सिद्धि करनी चाहिए, सब शास्त्रोंका सार यही है। 'गीता' की दोनों प्रतियोंमें मैने हस्ताक्षर किये हैं और आशीर्वाद भी दिया है। तुम दोनोंको भगवान् शान्ति दे, सुमति दे और तुम अपने नामको चरितार्थ करो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१८ ) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{C|{{larger|'''१९१. सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें१'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजीने स्वयंसेवकों से कहा कि आप लोग हर परिस्थितिमें अपने निश्चय पर डटे रहें। आपको ऐसा कोई प्रतिरोध नहीं करना चाहिए जिससे पुलिसको हिंसात्मक कदम उठानेका मौका मिले। आप जो नमक इकट्ठा करें उसे अपने सीनेसे चिपकाकर रखनेका आपको पूरा अधिकार है। यह हिंसा नहीं है। हमारा नमक हमें उतना ही प्यारा है जितना कि अपना रक्त । में आशा करता हूँ कि अपने धैर्य और कष्टसहनसे आप पुलिसवालोंका भी हृदय परिवर्तन कर देंगे। आपको पुलिस-की ओरसे ऐसी वस्तन्दाजोकी परवाह किये बिना अपना काम जारी रखना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
<small>१. आटमें दो स्वयंसेवकोंकी गिरफ्तारी के बाद गांधीजी अभ्यास तैयबजी और सरोजिनी नायडूके साथ सत्याग्रह स्थलपर गये। चूंकि उस दिन गांधीजी का मौनवार था, इसलिए उन्होंने एक कागजपर छोटासा सन्देश लिख दिया, जिसे स्वयंसेवकों नायकने पढ़कर सुनाया था।</small><noinclude></noinclude>
o9qocfuksrfiz7riduxf05lsm4l2yex
673642
673641
2026-08-24T10:39:50Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673642
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
चि० शान्तिकुमार,
तुम्हारा पत्र और चेक भी मिला। तुमसे मैं फिलहाल चेककी आशा नहीं रखता। लेकिन भेजते हो तो मैं उसकी कीमत सौ गुना ज्यादा मानता हूँ। मैं जानता है कि तुम्हारा मन तो यहीं है लेकिन हमें तो अनासक्तियोगकी सिद्धि करनी चाहिए, सब शास्त्रोंका सार यही है। 'गीता' की दोनों प्रतियोंमें मैने हस्ताक्षर किये हैं और आशीर्वाद भी दिया है। तुम दोनोंको भगवान् शान्ति दे, सुमति दे और तुम अपने नामको चरितार्थ करो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४७१८ ) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
{{C|{{larger|'''१९१. सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें१'''}}}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजीने स्वयंसेवकों से कहा कि आप लोग हर परिस्थितिमें अपने निश्चय पर डटे रहें। आपको ऐसा कोई प्रतिरोध नहीं करना चाहिए जिससे पुलिसको हिंसात्मक कदम उठानेका मौका मिले। आप जो नमक इकट्ठा करें उसे अपने सीनेसे चिपकाकर रखनेका आपको पूरा अधिकार है। यह हिंसा नहीं है। हमारा नमक हमें उतना ही प्यारा है जितना कि अपना रक्त। मैं आशा करता हूँ कि अपने धैर्य और कष्टसहनसे आप पुलिसवालोंका भी हृदय परिवर्तन कर देंगे। आपको पुलिस-की ओरसे ऐसी वस्तन्दाजोकी परवाह किये बिना अपना काम जारी रखना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
<small>१. आटमें दो स्वयंसेवकोंकी गिरफ्तारी के बाद गांधीजी अभ्यास तैयबजी और सरोजिनी नायडूके साथ सत्याग्रह स्थलपर गये। चूंकि उस दिन गांधीजी का मौनवार था, इसलिए उन्होंने एक कागजपर छोटासा सन्देश लिख दिया, जिसे स्वयंसेवकों नायकने पढ़कर सुनाया था।</small><noinclude></noinclude>
fmkyg790w30pxk2gsvuophovkrkfem0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६०
250
197303
673592
669826
2026-08-24T07:54:03Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673592
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९२. सन्देश : काठियावाड़ के लोगोंके लिए'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
जो कुछ मैंने सुना है उससे लगता है कि सरकारने और स्थानोंकी अपेक्षा काठियावाको अधिक सम्मान दिया है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त जानकारीसे पता चलता है कि केवल नेताओंकी ही गिरफ्तारी हुई है । जहाँतक काठियावाड़का सम्बन्ध है, श्री मणिलाल कोठारी और सेठ अमृतलालको स्वयंसेवकों सहित गिरफ्तार किया गया है। काठियावाड़ के लिए इससे अधिक श्रेयस्कर और स्वागत योग्य और क्या हो सकता था ? इसके अतिरिक्त, हालमें ही श्री कोठारीकी पत्नीका स्वर्गवास हो जानेसे इस बहादुरीको चार चाँद लग जाते हैं। अपने प्रियकी मृत्युपर शोक-भावनाका उभरना स्वाभाविक है, और जब कोई योद्धा इस प्रकारके विछोहसे बहुत अधिक विदग्ध होकर भी दुःखको अपने ऊपर हावी होने देनेके बजाय क्षण-भरकी भी देर किये बिना मैदान में कूद पड़ता है तो उसकी बहादुरी और भी निखरती है। मैं आशा करता हूँ कि काठियावाड़ उनकी भावनाओंको समझेगा और उनका पोषण करेगा। ऐसा करनेका केवल एक ही तरीका है। यदि काठियावाड़ सत्याग्रहमें सम्मिलित होनेके लिए लगातार स्वयंसेवक भेजता रहे, ताकि गिरफ्तार हुए सेनानियों द्वारा छोड़े हुए कामको सँभाल लिया जाये, तो सफलता मिलना निश्चित मानिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
{{C|{{larger|१९३. सन्देश : गुजरातके नाम'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गुजरातने कमाल कर दिखाया है। जम्बुसर में पण्डित मोतीलाल नेहरूने जो आशा व्यक्त की थी, लगता है वह फलवती हो रही है। आत्मशुद्धिका पहला दिन शुभ-शकुनोंके साथ आरम्भ हुआ है। रनपुरसे लेकर सूरत तकके सभी केन्द्रोंसे शुभ समाचार मिल रहे हैं। स्वयंसेवकों के साथ सर्वश्री मणिलाल कोठारी और अमृतलाल सेठ गिरफ्तार हो गये हैं। अभी-अभी समाचार मिला है कि दरवार गोपालदास, तलाटी और रेवाशंकर, खेड़ा जिलेके ये सभी नेता गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इनके कारण गुजरात और भारतकी भी प्रतिष्ठा बढ़ी है। लेकिन गुजरातके बाकी कार्यकर्ता क्या करेंगे? मुझे आशा है कि किसी प्रकारके आह्वानकी प्रतीक्षा किये बिना सभी क्षेत्रोंसे स्वयंसेवक गण बड़ी संख्या में आगे आयेंगे और गिरफ्तार हुए लोगोंके स्थानोंकी तत्काल<noinclude></noinclude>
mxfe6uars7rqjbbu5rxynlc62cwjq9u
673593
673592
2026-08-24T07:54:34Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673593
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९२. सन्देश : काठियावाड़ के लोगोंके लिए'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
जो कुछ मैंने सुना है उससे लगता है कि सरकारने और स्थानोंकी अपेक्षा काठियावाको अधिक सम्मान दिया है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त जानकारीसे पता चलता है कि केवल नेताओंकी ही गिरफ्तारी हुई है। जहाँतक काठियावाड़का सम्बन्ध है, श्री मणिलाल कोठारी और सेठ अमृतलालको स्वयंसेवकों सहित गिरफ्तार किया गया है। काठियावाड़ के लिए इससे अधिक श्रेयस्कर और स्वागत योग्य और क्या हो सकता था? इसके अतिरिक्त, हालमें ही श्री कोठारीकी पत्नीका स्वर्गवास हो जानेसे इस बहादुरीको चार चाँद लग जाते हैं। अपने प्रियकी मृत्युपर शोक-भावनाका उभरना स्वाभाविक है, और जब कोई योद्धा इस प्रकारके विछोहसे बहुत अधिक विदग्ध होकर भी दुःखको अपने ऊपर हावी होने देनेके बजाय क्षण-भरकी भी देर किये बिना मैदान में कूद पड़ता है तो उसकी बहादुरी और भी निखरती है। मैं आशा करता हूँ कि काठियावाड़ उनकी भावनाओंको समझेगा और उनका पोषण करेगा। ऐसा करनेका केवल एक ही तरीका है। यदि काठियावाड़ सत्याग्रहमें सम्मिलित होनेके लिए लगातार स्वयंसेवक भेजता रहे, ताकि गिरफ्तार हुए सेनानियों द्वारा छोड़े हुए कामको सँभाल लिया जाये, तो सफलता मिलना निश्चित मानिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
{{C|{{larger|१९३. सन्देश : गुजरातके नाम'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गुजरातने कमाल कर दिखाया है। जम्बुसर में पण्डित मोतीलाल नेहरूने जो आशा व्यक्त की थी, लगता है वह फलवती हो रही है। आत्मशुद्धिका पहला दिन शुभ-शकुनोंके साथ आरम्भ हुआ है। रनपुरसे लेकर सूरत तकके सभी केन्द्रोंसे शुभ समाचार मिल रहे हैं। स्वयंसेवकों के साथ सर्वश्री मणिलाल कोठारी और अमृतलाल सेठ गिरफ्तार हो गये हैं। अभी-अभी समाचार मिला है कि दरवार गोपालदास, तलाटी और रेवाशंकर, खेड़ा जिलेके ये सभी नेता गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इनके कारण गुजरात और भारतकी भी प्रतिष्ठा बढ़ी है। लेकिन गुजरातके बाकी कार्यकर्ता क्या करेंगे? मुझे आशा है कि किसी प्रकारके आह्वानकी प्रतीक्षा किये बिना सभी क्षेत्रोंसे स्वयंसेवक गण बड़ी संख्या में आगे आयेंगे और गिरफ्तार हुए लोगोंके स्थानोंकी तत्काल<noinclude></noinclude>
66kokybloy63h6p0sangx59v1amm43x
673644
673593
2026-08-24T10:44:01Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673644
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९२. सन्देश : काठियावाड़ के लोगोंके लिए'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
जो कुछ मैंने सुना है उससे लगता है कि सरकारने और स्थानोंकी अपेक्षा काठियावाड़को अधिक सम्मान दिया है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त जानकारीसे पता चलता है कि केवल नेताओंकी ही गिरफ्तारी हुई है। जहाँतक काठियावाड़का सम्बन्ध है, श्री मणिलाल कोठारी और सेठ अमृतलालको स्वयंसेवकों सहित गिरफ्तार किया गया है। काठियावाड़ के लिए इससे अधिक श्रेयस्कर और स्वागत योग्य और क्या हो सकता था? इसके अतिरिक्त, हालमें ही श्री कोठारीकी पत्नीका स्वर्गवास हो जानेसे इस बहादुरीको चार चाँद लग जाते हैं। अपने प्रियकी मृत्युपर शोक-भावनाका उभरना स्वाभाविक है, और जब कोई योद्धा इस प्रकारके विछोहसे बहुत अधिक विदग्ध होकर भी दुःखको अपने ऊपर हावी होने देनेके बजाय क्षण-भरकी भी देर किये बिना मैदान में कूद पड़ता है तो उसकी बहादुरी और भी निखरती है। मैं आशा करता हूँ कि काठियावाड़ उनकी भावनाओंको समझेगा और उनका पोषण करेगा। ऐसा करनेका केवल एक ही तरीका है। यदि काठियावाड़ सत्याग्रहमें सम्मिलित होनेके लिए लगातार स्वयंसेवक भेजता रहे, ताकि गिरफ्तार हुए सेनानियों द्वारा छोड़े हुए कामको सँभाल लिया जाये, तो सफलता मिलना निश्चित मानिए।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', ८-४-१९३०
{{C|{{larger|१९३. सन्देश : गुजरातके नाम'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|७ अप्रैल, १९३०}}
गुजरातने कमाल कर दिखाया है। जम्बुसर में पण्डित मोतीलाल नेहरूने जो आशा व्यक्त की थी, लगता है वह फलवती हो रही है। आत्मशुद्धिका पहला दिन शुभ-शकुनोंके साथ आरम्भ हुआ है। रनपुरसे लेकर सूरत तकके सभी केन्द्रोंसे शुभ समाचार मिल रहे हैं। स्वयंसेवकों के साथ सर्वश्री मणिलाल कोठारी और अमृतलाल सेठ गिरफ्तार हो गये हैं। अभी-अभी समाचार मिला है कि दरवार गोपालदास, तलाटी और रेवाशंकर, खेड़ा जिलेके ये सभी नेता गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इनके कारण गुजरात और भारतकी भी प्रतिष्ठा बढ़ी है। लेकिन गुजरातके बाकी कार्यकर्ता क्या करेंगे? मुझे आशा है कि किसी प्रकारके आह्वानकी प्रतीक्षा किये बिना सभी क्षेत्रोंसे स्वयंसेवक गण बड़ी संख्या में आगे आयेंगे और गिरफ्तार हुए लोगोंके स्थानोंकी तत्काल<noinclude></noinclude>
06m2w0t1wwa6ji4xlaf5gn6wtn1hmbp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६१
250
197304
673601
669827
2026-08-24T08:08:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673601
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र मीराबहनको|२१७}}</noinclude>पूर्ति करेंगे। अब अवसर आ गया है जब कि विद्यार्थियों, वकीलों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगोंको परीक्षा होगी। जब तपे परखे सेनानी गिरफ्तार किये जा रहे हैं, तब क्या जो लोग बाहर खड़े हैं, वे केवल इन्तजार ही करते रहेंगे?
[ अंग्रेजीसे ]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ८-४-१९३०
{{C|{{larger|१९४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको १}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पश्चात् ]२}}
चि० कलावती
तुमारा खत मीला। मुझको अच्छा लगा। क्या काम करती है? अभ्यास कुछ चलता है? मन खुश है?
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
जी० एन० ५२८५ की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|१९५. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र और उसके साथ बादमें लिखी पंक्तियाँ भी मिलीं। मैं उम्मीद
करता हूँ कि माताजी को कैंसर नहीं है। लेकिन जीवन कुछ इतना कृत्रिम हो गया
है कि इस पर कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हमें जितना है उससे ज्यादा कष्ट क्यों
नहीं भोगना पड़ता।
हां, घटनाचक्र इतनी तेजीसे चल पड़ा है कि जल्दी ही वारा-न्यारा हो जायेगा।
जी नहीं चाहता था तो न जाकर तुमने ठोक ही किया। मैंने स्त्रियोंके लिए जो
बिलकुल अलग क्षेत्र सुझाया है, उसके बारेमें तुम्हें सारी जानकारी मिल जायेगी।
सस्नेह,
जी० एन० ९६२४ से भी।
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९० ) से सौजन्य : मीराबहन;
१. हिन्दी नवजीवन के तत्कालीन सह-सम्पादक काशिनाथ त्रिवेदीकी पत्नी वे उन दिनों साबरमती आश्रम में रहती थीं।
२. गांधीजी ५अप्रैल १९३० को दांडी पहुंचे थे।
३. देखिए पत्र मीराबहनको, ७-४-१९३० या उसके पूर्व<noinclude></noinclude>
mtcdq6ary3mjcwx8g4adwu54pb5yifj
673602
673601
2026-08-24T08:09:32Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673602
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र मीराबहनको|२१७}}</noinclude>पूर्ति करेंगे। अब अवसर आ गया है जब कि विद्यार्थियों, वकीलों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगोंको परीक्षा होगी। जब तपे परखे सेनानी गिरफ्तार किये जा रहे हैं, तब क्या जो लोग बाहर खड़े हैं, वे केवल इन्तजार ही करते रहेंगे?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ८-४-१९३०
{{C|{{larger|१९४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको १}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पश्चात् ]२}}
चि० कलावती
तुमारा खत मीला। मुझको अच्छा लगा। क्या काम करती है? अभ्यास कुछ चलता है? मन खुश है?
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
जी० एन० ५२८५ की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|१९५. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र और उसके साथ बादमें लिखी पंक्तियाँ भी मिलीं। मैं उम्मीद
करता हूँ कि माताजी को कैंसर नहीं है। लेकिन जीवन कुछ इतना कृत्रिम हो गया
है कि इस पर कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हमें जितना है उससे ज्यादा कष्ट क्यों
नहीं भोगना पड़ता।
हां, घटनाचक्र इतनी तेजीसे चल पड़ा है कि जल्दी ही वारा-न्यारा हो जायेगा।
जी नहीं चाहता था तो न जाकर तुमने ठोक ही किया। मैंने स्त्रियोंके लिए जो
बिलकुल अलग क्षेत्र सुझाया है, उसके बारेमें तुम्हें सारी जानकारी मिल जायेगी।
सस्नेह,
जी० एन० ९६२४ से भी।
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९० ) से सौजन्य : मीराबहन;
१. हिन्दी नवजीवन के तत्कालीन सह-सम्पादक काशिनाथ त्रिवेदीकी पत्नी वे उन दिनों साबरमती आश्रम में रहती थीं।
२. गांधीजी ५अप्रैल १९३० को दांडी पहुंचे थे।
३. देखिए पत्र मीराबहनको, ७-४-१९३० या उसके पूर्व<noinclude></noinclude>
3aqwnohenkn454g3d1jjwygts9aymzx
673604
673602
2026-08-24T08:12:29Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673604
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र मीराबहनको|२१७}}</noinclude>पूर्ति करेंगे। अब अवसर आ गया है जब कि विद्यार्थियों, वकीलों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगोंको परीक्षा होगी। जब तपे परखे सेनानी गिरफ्तार किये जा रहे हैं, तब क्या जो लोग बाहर खड़े हैं, वे केवल इन्तजार ही करते रहेंगे?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१९४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको १'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पश्चात् ]२}}
चि० कलावती
तुमारा खत मीला। मुझको अच्छा लगा। क्या काम करती है? अभ्यास कुछ चलता है? मन खुश है?
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
जी० एन० ५२८५ की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९५. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र और उसके साथ बादमें लिखी पंक्तियाँ भी मिलीं। मैं उम्मीद
करता हूँ कि माताजी को कैंसर नहीं है। लेकिन जीवन कुछ इतना कृत्रिम हो गया
है कि इस पर कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हमें जितना है उससे ज्यादा कष्ट क्यों
नहीं भोगना पड़ता।
हां, घटनाचक्र इतनी तेजीसे चल पड़ा है कि जल्दी ही वारा-न्यारा हो जायेगा।
जी नहीं चाहता था तो न जाकर तुमने ठोक ही किया। मैंने स्त्रियोंके लिए जो
बिलकुल अलग क्षेत्र सुझाया है, उसके बारेमें तुम्हें सारी जानकारी मिल जायेगी।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९० ) से सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२४ से भी।
१. हिन्दी नवजीवन के तत्कालीन सह-सम्पादक काशिनाथ त्रिवेदीकी पत्नी वे उन दिनों साबरमती आश्रम में रहती थीं।
२. गांधीजी ५अप्रैल १९३० को दांडी पहुंचे थे।
३. देखिए पत्र मीराबहनको, ७-४-१९३० या उसके पूर्व<noinclude></noinclude>
bmftczmtvxko1ei06ljiby428ffpf00
673645
673604
2026-08-24T10:48:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673645
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र मीराबहनको|२१७}}</noinclude>पूर्ति करेंगे। अब अवसर आ गया है जब कि विद्यार्थियों, वकीलों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगोंको परीक्षा होगी। जब तपे परखे सेनानी गिरफ्तार किये जा रहे हैं, तब क्या जो लोग बाहर खड़े हैं, वे केवल इन्तजार ही करते रहेंगे?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''१९४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको १'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मौनवार [७ अप्रैल, १९३० या उसके पश्चात् ]२}}
चि० कलावती
तुमारा खत मीला। मुझको अच्छा लगा। क्या काम करती है? अभ्यास कुछ चलता है? मन खुश है?
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
जी० एन० ५२८५ की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९५. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र और उसके साथ बादमें लिखी पंक्तियाँ भी मिलीं। मैं उम्मीद
करता हूँ कि माताजी को कैंसर नहीं है। लेकिन जीवन कुछ इतना कृत्रिम हो गया
है कि इस पर कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हमें जितना है उससे ज्यादा कष्ट क्यों
नहीं भोगना पड़ता।
हां, घटनाचक्र इतनी तेजीसे चल पड़ा है कि जल्दी ही वारा-न्यारा हो जायेगा।
जी नहीं चाहता था तो न जाकर तुमने ठीक ही किया।३ मैंने स्त्रियोंके लिए जो
बिलकुल अलग क्षेत्र सुझाया है, उसके बारेमें तुम्हें सारी जानकारी मिल जायेगी।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९० ) से सौजन्य : मीराबहन;
जी० एन० ९६२४ से भी।
<small>१. हिन्दी नवजीवन के तत्कालीन सह-सम्पादक काशिनाथ त्रिवेदीकी पत्नी वे उन दिनों साबरमती आश्रम में रहती थीं।</small>
<small>२. गांधीजी ५अप्रैल १९३० को दांडी पहुंचे थे।</small>
<small>३. देखिए पत्र मीराबहनको, ७-४-१९३० या उसके पूर्व</small><noinclude></noinclude>
n4ms0tuglxpdwmtsg7fiynu5gobjo0v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६२
250
197305
673606
669828
2026-08-24T08:19:06Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673606
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९६. पत्र : अमीना तैयबजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय बहन,
अब्बास साहब आज रातको नडियाद जा रहे हैं, क्योंकि फूलचन्द भी गिरफ्तार हो गये हैं। अब उनके भी गिरफ्तार कर लिये जानेकी आशा है। वे समझते हैं कि यहाँ मैं उनका रास्ता रोके हुए हैं। शायद उनका खयाल ठीक ही हो। खुदा हाफिज।
सस्नेह,
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६८७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|१९७. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
भाई रामेश्वरदास,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम चिन्ता छोड़ो। तुमसे जो हो सकता है सो किये जाओ; इतनेसे भगवान् प्रसन्न हो जायेंगे। रामनाम तो कदापि न छोड़ना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २१९ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
6427pibs9utnejlf2y5msf8nrh5yols
673607
673606
2026-08-24T08:19:58Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673607
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९६. पत्र : अमीना तैयबजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय बहन,
अब्बास साहब आज रातको नडियाद जा रहे हैं, क्योंकि फूलचन्द भी गिरफ्तार हो गये हैं। अब उनके भी गिरफ्तार कर लिये जानेकी आशा है। वे समझते हैं कि यहाँ मैं उनका रास्ता रोके हुए हैं। शायद उनका खयाल ठीक ही हो। खुदा हाफिज।
सस्नेह,
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६८७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९७. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
भाई रामेश्वरदास,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम चिन्ता छोड़ो। तुमसे जो हो सकता है सो किये जाओ; इतनेसे भगवान् प्रसन्न हो जायेंगे। रामनाम तो कदापि न छोड़ना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २१९ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
bxkfhxc3m6zpzyt771ome9e8ei1hmgr
673646
673607
2026-08-24T10:50:55Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673646
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९६. पत्र : अमीना तैयबजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय बहन,
अब्बास साहब आज रातको नडियाद जा रहे हैं, क्योंकि फूलचन्द भी गिरफ्तार हो गये हैं। अब उनके भी गिरफ्तार कर लिये जानेकी आशा है। वे समझते हैं कि यहाँ मैं उनका रास्ता रोके हुए हैं। शायद उनका खयाल ठीक ही हो। खुदा हाफिज।
सस्नेह,
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६८७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९७. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
भाई रामेश्वरदास,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम चिन्ता छोड़ो। तुमसे जो हो सकता है सो किये जाओ; इतनेसे भगवान् प्रसन्न हो जायेंगे। रामनाम तो कदापि न छोड़ना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २१९ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
lkbetg7rld3ehhfsknu0x7cza4ns0w5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६३
250
197306
673608
669829
2026-08-24T08:28:01Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673608
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
भाई अमृतलाल पकड़े गये और घोलेराकी ओर अधिकारी लोग नये तरीकेसे काम करते जान पड़ते हैं। मुझे लगता है कि यदि तुम उधरका एक चक्कर लगा आओ तो ठीक होगा। मैं आजसे आसपासके गाँवोंमें जानेके लिए निकल पड़ा हूँ। इस सप्ताह मेरा इरादा इस ताल्लुकेके बाहर अथवा उसके आसपास के गांवोंके आगे जानेका नहीं है। लेकिन यदि आवश्यकता पड़ी ही तो में धोलेरा अथवा ऐसी किसी जगहपर जानेके लिए तैयार रहूँगा । जमनालाल, ईश्वरलाल आदिके पकड़े जाने की खबर तो तुम्हें मिल ही चुकी होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७४ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९९. भाषण : आटमें'''}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
मुझे इस बातकी खुशी है कि कल मैंने आपको जो वचन दिया था उसे पूरा करनेके लिए सरकारने मुझे अभीतक मुक्त रस छोड़ा है। कल जब उकाभाईको पीटा गया और जब आप सब अचानक नमक बटोरनेके लिए कूद पड़े तो आप सब लोगों तथा स्त्रियोंके लिए भी उस दृश्यको देखना कठिन हो गया। यह घटना भारतके इतिहास में अमर रहेगी। हमारी पहली लड़ाई आटमें ही लड़ी जायेगी। हमारी लड़ाई प्रेमकी लड़ाई है, जिसमें हमें दुःख भी उठाने होंगे। जिस प्रकार माँ अपने बच्चेका छोना जाना बरदाश्त नहीं करती', चाहे उसे अपनी जानकी बाजी ही क्यों न लगा देनी पड़े, उसी प्रकार हम जीते-जी अपने हाथमें आये नमकको नहीं छोड़ेंगे। जब ऐसा समय आयेगा तो पूरा हिन्दुस्तान भड़क उठेगा। यदि पुरुषोंका भी इस तरह अपमान किया गया तो हिन्दुस्तान उसे सहन नहीं करेगा। तो फिर स्त्रियोंका हाथ पकड़नेवाला कौन है? हमारा गोला-बारूद तो एक ईश्वर ही है। आपने अपनी लड़ाईके दूसरे दिनको गौरवान्वित किया है और मुझे आशा है कि गुजरातके सभी गाँव और पूरा हिन्दुस्तान आपके उदाहरणका अनुकरण करेगा। सरकार चाहे जितने नेताओंको क्यों न पकड़ ले किन्तु उसे पता चल जायेगा कि उसकी यह धारणा
१. यह वाक्य ९-४-१९३० के बॉम्बे क्रॉनिकलसे लिया गया है<noinclude></noinclude>
7icwhsqi28anyve00vke1287wdpm3jj
673609
673608
2026-08-24T08:28:27Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673609
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
भाई अमृतलाल पकड़े गये और घोलेराकी ओर अधिकारी लोग नये तरीकेसे काम करते जान पड़ते हैं। मुझे लगता है कि यदि तुम उधरका एक चक्कर लगा आओ तो ठीक होगा। मैं आजसे आसपासके गाँवोंमें जानेके लिए निकल पड़ा हूँ। इस सप्ताह मेरा इरादा इस ताल्लुकेके बाहर अथवा उसके आसपास के गांवोंके आगे जानेका नहीं है। लेकिन यदि आवश्यकता पड़ी ही तो में धोलेरा अथवा ऐसी किसी जगहपर जानेके लिए तैयार रहूँगा । जमनालाल, ईश्वरलाल आदिके पकड़े जाने की खबर तो तुम्हें मिल ही चुकी होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७४ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९९. भाषण : आटमें'''}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
मुझे इस बातकी खुशी है कि कल मैंने आपको जो वचन दिया था उसे पूरा करनेके लिए सरकारने मुझे अभीतक मुक्त रस छोड़ा है। कल जब उकाभाईको पीटा गया और जब आप सब अचानक नमक बटोरनेके लिए कूद पड़े तो आप सब लोगों तथा स्त्रियोंके लिए भी उस दृश्यको देखना कठिन हो गया। यह घटना भारतके इतिहास में अमर रहेगी। हमारी पहली लड़ाई आटमें ही लड़ी जायेगी। हमारी लड़ाई प्रेमकी लड़ाई है, जिसमें हमें दुःख भी उठाने होंगे। जिस प्रकार माँ अपने बच्चेका छोना जाना बरदाश्त नहीं करती', चाहे उसे अपनी जानकी बाजी ही क्यों न लगा देनी पड़े, उसी प्रकार हम जीते-जी अपने हाथमें आये नमकको नहीं छोड़ेंगे। जब ऐसा समय आयेगा तो पूरा हिन्दुस्तान भड़क उठेगा। यदि पुरुषोंका भी इस तरह अपमान किया गया तो हिन्दुस्तान उसे सहन नहीं करेगा। तो फिर स्त्रियोंका हाथ पकड़नेवाला कौन है? हमारा गोला-बारूद तो एक ईश्वर ही है। आपने अपनी लड़ाईके दूसरे दिनको गौरवान्वित किया है और मुझे आशा है कि गुजरातके सभी गाँव और पूरा हिन्दुस्तान आपके उदाहरणका अनुकरण करेगा। सरकार चाहे जितने नेताओंको क्यों न पकड़ ले किन्तु उसे पता चल जायेगा कि उसकी यह धारणा
१. यह वाक्य ९-४-१९३० के बॉम्बे क्रॉनिकलसे लिया गया है<noinclude></noinclude>
g2sv0l18k747fnzz9z8cuct3ecby886
673647
673609
2026-08-24T10:53:11Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673647
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
भाई अमृतलाल पकड़े गये और घोलेराकी ओर अधिकारी लोग नये तरीकेसे काम करते जान पड़ते हैं। मुझे लगता है कि यदि तुम उधरका एक चक्कर लगा आओ तो ठीक होगा। मैं आजसे आसपासके गाँवोंमें जानेके लिए निकल पड़ा हूँ। इस सप्ताह मेरा इरादा इस ताल्लुकेके बाहर अथवा उसके आसपास के गांवोंके आगे जानेका नहीं है। लेकिन यदि आवश्यकता पड़ी ही तो मैं धोलेरा अथवा ऐसी किसी जगहपर जानेके लिए तैयार रहूँगा। जमनालाल, ईश्वरलाल आदिके पकड़े जाने की खबर तो तुम्हें मिल ही चुकी होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७४ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९९. भाषण : आटमें'''}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
मुझे इस बातकी खुशी है कि कल मैंने आपको जो वचन दिया था उसे पूरा करनेके लिए सरकारने मुझे अभीतक मुक्त रस छोड़ा है। कल जब उकाभाईको पीटा गया और जब आप सब अचानक नमक बटोरनेके लिए कूद पड़े तो आप सब लोगों तथा स्त्रियोंके लिए भी उस दृश्यको देखना कठिन हो गया। यह घटना भारतके इतिहास में अमर रहेगी। हमारी पहली लड़ाई आटमें ही लड़ी जायेगी। हमारी लड़ाई प्रेमकी लड़ाई है, जिसमें हमें दुःख भी उठाने होंगे। जिस प्रकार माँ अपने बच्चेका छोना जाना बरदाश्त नहीं करती', चाहे उसे अपनी जानकी बाजी ही क्यों न लगा देनी पड़े, उसी प्रकार हम जीते-जी अपने हाथमें आये नमकको नहीं छोड़ेंगे। जब ऐसा समय आयेगा तो पूरा हिन्दुस्तान भड़क उठेगा। यदि पुरुषोंका भी इस तरह अपमान किया गया तो हिन्दुस्तान उसे सहन नहीं करेगा। तो फिर स्त्रियोंका हाथ पकड़नेवाला कौन है? हमारा गोला-बारूद तो एक ईश्वर ही है। आपने अपनी लड़ाईके दूसरे दिनको गौरवान्वित किया है और मुझे आशा है कि गुजरातके सभी गाँव और पूरा हिन्दुस्तान आपके उदाहरणका अनुकरण करेगा। सरकार चाहे जितने नेताओंको क्यों न पकड़ ले किन्तु उसे पता चल जायेगा कि उसकी यह धारणा
<small>१. यह वाक्य ९-४-१९३० के बॉम्बे क्रॉनिकलसे लिया गया है</small><noinclude></noinclude>
saqb7zot30m0wogiqp9bpurhjwtt5u3
673648
673647
2026-08-24T10:58:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673648
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''१९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|मंगलवार, ८ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
भाई अमृतलाल पकड़े गये और घोलेराकी ओर अधिकारी लोग नये तरीकेसे काम करते जान पड़ते हैं। मुझे लगता है कि यदि तुम उधरका एक चक्कर लगा आओ तो ठीक होगा। मैं आजसे आसपासके गाँवोंमें जानेके लिए निकल पड़ा हूँ। इस सप्ताह मेरा इरादा इस ताल्लुकेके बाहर अथवा उसके आसपास के गांवोंके आगे जानेका नहीं है। लेकिन यदि आवश्यकता पड़ी ही तो मैं धोलेरा अथवा ऐसी किसी जगहपर जानेके लिए तैयार रहूँगा। जमनालाल, ईश्वरलाल आदिके पकड़े जाने की खबर तो तुम्हें मिल ही चुकी होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७४ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''१९९. भाषण : आटमें'''}}}}
{{Right|८ अप्रैल, १९३०}}
मुझे इस बातकी खुशी है कि कल मैंने आपको जो वचन दिया था उसे पूरा करनेके लिए सरकारने मुझे अभीतक मुक्त रख छोड़ा है। कल जब उकाभाईको पीटा गया और जब आप सब अचानक नमक बटोरनेके लिए कूद पड़े तो आप सब लोगों तथा स्त्रियोंके लिए भी उस दृश्यको देखना कठिन हो गया। यह घटना भारतके इतिहास में अमर रहेगी। हमारी पहली लड़ाई आटमें ही लड़ी जायेगी। हमारी लड़ाई प्रेमकी लड़ाई है, जिसमें हमें दुःख भी उठाने होंगे। जिस प्रकार माँ अपने बच्चेका छीना जाना बरदाश्त नहीं करती१, चाहे उसे अपनी जानकी बाजी ही क्यों न लगा देनी पड़े, उसी प्रकार हम जीते-जी अपने हाथमें आये नमकको नहीं छोड़ेंगे। जब ऐसा समय आयेगा तो पूरा हिन्दुस्तान भड़क उठेगा। यदि पुरुषोंका भी इस तरह अपमान किया गया तो हिन्दुस्तान उसे सहन नहीं करेगा। तो फिर स्त्रियोंका हाथ पकड़नेवाला कौन है? हमारा गोला-बारूद तो एक ईश्वर ही है। आपने अपनी लड़ाईके दूसरे दिनको गौरवान्वित किया है और मुझे आशा है कि गुजरातके सभी गाँव और पूरा हिन्दुस्तान आपके उदाहरणका अनुकरण करेगा। सरकार चाहे जितने नेताओंको क्यों न पकड़ ले किन्तु उसे पता चल जायेगा कि उसकी यह धारणा
<small>१. यह वाक्य ९-४-१९३० के बॉम्बे क्रॉनिकलसे लिया गया है</small><noinclude></noinclude>
2x26h5i9rec31gzw479ngissfhpgreg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६४
250
197307
673610
669830
2026-08-24T08:39:13Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673610
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>गलत थी कि नेताओके अभाव में हमारा आन्दोलन रुक जायेगा। आप इस नमकको
इकट्ठा कर रखें और उसकी एक कंकरी भी बरबाद न करें। आपको बिना कर वाले
नमकके अतिरिक्त दुसरा नमक न खानेका निश्चय कर लेना चाहिए। यदि सरकार
चावलपर कर लगा दे तो आप अपने ही खेतोंका चावल लाकर खाते रहें; नमकके
बारेमें भी आपको यही करना चाहिए।
जब पुलिस आपके हाथसे नमक छीनने आये तो आप उसे न छोड़ें। जब-
तक आपकी कलाइयों नहीं टूट जाती तबतक आप अपनी मुट्टियाँ जरा भी ढीली न
पड़ने दें। यदि आपके मनमें सत्याग्रहके प्रति श्रद्धा होगी तो आपकी मुट्टियां वज्रकी
वन जायेंगी।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु,''' १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२००. सन्देश : राष्ट्र के नाम१'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
लगता है कि आखिर चिरप्रतीक्षित घड़ी आ पहुँची है।
मेरे सहकर्मियों और साथियोंने रात के सन्नाटेमें मुझे गहरी निद्रासे उठाकर
अनुरोध किया कि मैं उनको सन्देश हूँ। इसलिए मैं यह सन्देश बोलकर लिखवा
रहा हूँ, हालांकि किसी भी तरह्का सन्देश देनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।
मैं पहले ही अनेक सन्देश दे चुका हूँ । यदि पिछले किसी सन्देशपर जनताने कान न दिया हो तो फिर इस सन्देशका फायदा ही क्या ? परन्तु आज मध्य रात्रि तक जो सूचना मिली है, उससे मुझे विश्वास हो गया है कि मेरे सन्देशको अनसुना नहीं किया गया, जनताने सच्चे हृदयसे उसे अपनाया है। लगता है जैसे गुजरातकी समूची जनता एक विशाल समुदायकी भांति उमड़ पड़ी है। मैंने आट और भीमराडमें हजारों-हजार स्त्री-पुरुषोंको निर्भयतापूर्वक नमक कानून तोड़ते अपनी आंखों देखा है। कहीं कोई शरारत नहीं, हिंसाका कोई आसार तक मुझे नहीं दिखा, हालांकि वहाँ लोग इतनी बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये पूर्णतः शान्त और अहिंसक बने रहे, हालांकि सरकारी अधिकारियोंने अपनी सारी सीमाओंका अतिक्रमण कर दिया था।
१. यह सन्देश इस टिप्पणीके साथ प्रकाशित हुआ था "दांडीमें ९ अप्रैल गांधी द्वारा रोकर लिखाये गये सन्देशका यह अंग्रेजी अनुवाद हैं। उस समय गांधीजी की सम्भावित गिरफ्तारी की चर्चा बड़े जोरों पर थी। सन्देश एक महीने पहले का है, पर आज भी उतना ही सार्थक है। हम सामने उपस्थित इस कठिन अग्निपरीक्षा भारतको प्रतिष्ठा तथा निष्ठाके लिए एक चुनौतीके रूपमें आज इसे प्रकाशित कर रहे हैं।"<noinclude></noinclude>
fp16elrdybzbekazgrfyzk7jccb2lnn
673612
673610
2026-08-24T08:44:40Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673612
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>गलत थी कि नेताओके अभाव में हमारा आन्दोलन रुक जायेगा। आप इस नमकको
इकट्ठा कर रखें और उसकी एक कंकरी भी बरबाद न करें। आपको बिना कर वाले
नमकके अतिरिक्त दुसरा नमक न खानेका निश्चय कर लेना चाहिए। यदि सरकार
चावलपर कर लगा दे तो आप अपने ही खेतोंका चावल लाकर खाते रहें; नमकके
बारेमें भी आपको यही करना चाहिए।
जब पुलिस आपके हाथसे नमक छीनने आये तो आप उसे न छोड़ें। जब-
तक आपकी कलाइयों नहीं टूट जाती तबतक आप अपनी मुट्टियाँ जरा भी ढीली न
पड़ने दें। यदि आपके मनमें सत्याग्रहके प्रति श्रद्धा होगी तो आपकी मुट्टियां वज्रकी
वन जायेंगी।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु,''' १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२००. सन्देश : राष्ट्र के नाम१'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
लगता है कि आखिर चिरप्रतीक्षित घड़ी आ पहुँची है।
मेरे सहकर्मियों और साथियोंने रात के सन्नाटेमें मुझे गहरी निद्रासे उठाकर
अनुरोध किया कि मैं उनको सन्देश हूँ। इसलिए मैं यह सन्देश बोलकर लिखवा
रहा हूँ, हालांकि किसी भी तरह्का सन्देश देनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।
मैं पहले ही अनेक सन्देश दे चुका हूँ । यदि पिछले किसी सन्देशपर जनताने कान न दिया हो तो फिर इस सन्देशका फायदा ही क्या ? परन्तु आज मध्य रात्रि तक जो सूचना मिली है, उससे मुझे विश्वास हो गया है कि मेरे सन्देशको अनसुना नहीं किया गया, जनताने सच्चे हृदयसे उसे अपनाया है। लगता है जैसे गुजरातकी समूची जनता एक विशाल समुदायकी भांति उमड़ पड़ी है। मैंने आट और भीमराडमें हजारों-हजार स्त्री-पुरुषोंको निर्भयतापूर्वक नमक कानून तोड़ते अपनी आंखों देखा है। कहीं कोई शरारत नहीं, हिंसाका कोई आसार तक मुझे नहीं दिखा, हालांकि वहाँ लोग इतनी बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये पूर्णतः शान्त और अहिंसक बने रहे, हालांकि सरकारी अधिकारियोंने अपनी सारी सीमाओंका अतिक्रमण कर दिया था।
<small> १. यह सन्देश इस टिप्पणीके साथ प्रकाशित हुआ था "दांडीमें ९ अप्रैल गांधी द्वारा रोकर लिखाये गये सन्देशका यह अंग्रेजी अनुवाद हैं। उस समय गांधीजी की सम्भावित गिरफ्तारी की चर्चा बड़े जोरों पर थी। सन्देश एक महीने पहले का है, पर आज भी उतना ही सार्थक है। हम सामने उपस्थित इस कठिन अग्निपरीक्षा भारतको प्रतिष्ठा तथा निष्ठाके लिए एक चुनौतीके रूपमें आज इसे प्रकाशित कर रहे हैं।"</small><noinclude></noinclude>
jvpvtliwfnfhfdu1fn91o33xfohlxpd
673649
673612
2026-08-24T11:01:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673649
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>गलत थी कि नेताओके अभाव में हमारा आन्दोलन रुक जायेगा। आप इस नमकको
इकट्ठा कर रखें और उसकी एक कंकरी भी बरबाद न करें। आपको बिना कर वाले
नमकके अतिरिक्त दुसरा नमक न खानेका निश्चय कर लेना चाहिए। यदि सरकार
चावलपर कर लगा दे तो आप अपने ही खेतोंका चावल लाकर खाते रहें; नमकके
बारेमें भी आपको यही करना चाहिए।
जब पुलिस आपके हाथसे नमक छीनने आये तो आप उसे न छोड़ें। जब-
तक आपकी कलाइयों नहीं टूट जाती तबतक आप अपनी मुट्टियाँ जरा भी ढीली न
पड़ने दें। यदि आपके मनमें सत्याग्रहके प्रति श्रद्धा होगी तो आपकी मुट्टियां वज्रकी
वन जायेंगी।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु,''' १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२००. सन्देश : राष्ट्र के नाम१'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
लगता है कि आखिर चिरप्रतीक्षित घड़ी आ पहुँची है।
मेरे सहकर्मियों और साथियोंने रात के सन्नाटेमें मुझे गहरी निद्रासे उठाकर
अनुरोध किया कि मैं उनको सन्देश हूँ। इसलिए मैं यह सन्देश बोलकर लिखवा
रहा हूँ, हालांकि किसी भी तरहका सन्देश देनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है।
मैं पहले ही अनेक सन्देश दे चुका हूँ। यदि पिछले किसी सन्देशपर जनताने कान न दिया हो तो फिर इस सन्देशका फायदा ही क्या? परन्तु आज मध्य रात्रि तक जो सूचना मिली है, उससे मुझे विश्वास हो गया है कि मेरे सन्देशको अनसुना नहीं किया गया, जनताने सच्चे हृदयसे उसे अपनाया है। लगता है जैसे गुजरातकी समूची जनता एक विशाल समुदायकी भांति उमड़ पड़ी है। मैंने आट और भीमराडमें हजारों-हजार स्त्री-पुरुषोंको निर्भयतापूर्वक नमक कानून तोड़ते अपनी आंखों देखा है। कहीं कोई शरारत नहीं, हिंसाका कोई आसार तक मुझे नहीं दिखा, हालांकि वहाँ लोग इतनी बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये पूर्णतः शान्त और अहिंसक बने रहे, हालांकि सरकारी अधिकारियोंने अपनी सारी सीमाओंका अतिक्रमण कर दिया था।
<small> १. यह सन्देश इस टिप्पणीके साथ प्रकाशित हुआ था "दांडीमें ९ अप्रैल गांधी द्वारा रोकर लिखाये गये सन्देशका यह अंग्रेजी अनुवाद हैं। उस समय गांधीजी की सम्भावित गिरफ्तारी की चर्चा बड़े जोरों पर थी। सन्देश एक महीने पहले का है, पर आज भी उतना ही सार्थक है। हम सामने उपस्थित इस कठिन अग्निपरीक्षा भारतको प्रतिष्ठा तथा निष्ठाके लिए एक चुनौतीके रूपमें आज इसे प्रकाशित कर रहे हैं।"</small><noinclude></noinclude>
0x5r5jprvtu0er81nxg9xi1lbsyxdl6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६५
250
197308
673613
669831
2026-08-24T08:51:49Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673613
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|सन्देश राष्ट्रके नाम|२२१}}</noinclude>यहाँ गुजरातमें तपे तपाये, लोकप्रिय जनसेवकोंको एक-एक करके गिरफ्तार किया
जा चुका है, फिर भी जनता पूर्णतः अहिंसक बनी रही है। जनताने घबराने या
आतंकित होनेसे इनकार कर दिया है, बल्कि उसने दिन-दिन और अधिक संख्यामें
असहयोग में शामिल होकर इन गिरफ्तारियों पर खुशी जाहिर की है। ठीक यही
होना भी चाहिए था।
ऐसी शुभ घड़ीमें आरम्भ किया गया यह संघर्ष यदि अन्ततक इसी तरह अहिंसात्मक बना रहा तो इतना ही नहीं कि भारत निकट भविष्यमें पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल कर लेगा, बल्कि हम विश्वको भारत और उसके गौरवशाली अतीतके योग्य एक पदार्थ पाठ भी दे देंगे।
बलिदान और त्यागके बिना हासिल किया गया स्वराज्य चिरजीवी नहीं हो सकता। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि हमारे देश की जनता अपनी शक्ति-भर बड़े-बड़ा बलिदान करनेके लिए तैयार रहे। सच्चे बलिदान या त्यागमें एक ही पक्षको, स्वयं ही को सारा कष्ट सहन करना पड़ता है ऐसे बलिदानीको दूसरेकी जान लिये बिना अपनी जान देने, जीवन देकर जीवन पानेकी कलामें सिद्धहस्त बनना पड़ता है। ईश्वर करे भारत अपने को इस मन्त्रके योग्य सिद्ध करे।
आज सत्याग्रहीके हाथ में यह मुट्ठी भर नमक भारतके आत्मसम्मानका ही क्या वास्तवमें उसके सर्वस्यका प्रतीक बन गया है। इसलिए चाहे मुट्ठी कुचल दी जाये, पर अपनी इच्छासे उसका नमक किसीको न लेने दिया जाये।
सरकार यदि अपने-आपको एक सभ्य सरकार कहती है तो उसे उन सभी लोगोंको खुशीसे जेलोंमें डालने दो जो गैरकानूनी तौरपर नमक बनाते हैं। असहयोगी लोग अपनी गिरफ्तारी के बाद वह नमक उतनी ही खुशी-खुशी सरकारके हवाले कर देंगे जितनी खुशी-खुशी वे अपने शरीर जेलरोंके हवाले करेंगे।
लेकिन बेचारे निर्दोष सत्याग्रहियोंके हाथसे बलपूर्वक नमक छीनना शुद्ध बर्बरताके अलावा और कुछ नहीं है; और वह भारतका अपमान भी है। ऐसे अपमानका एक ही उत्तर है। वह यह कि हाथ भले ही टूट जायें पर हम अपनी मुट्ठियाँ ढीली नहीं होने देंगे। लेकिन तब भी कष्ट सहन करनेवाला सत्याग्रही स्वयं और उसके साथी भी अपने हृदयोंमें अन्यायीके विरुद्ध किसी दुर्भावनाको स्थान नहीं देंगे। असज्जनताका उत्तर असौजन्यसे नहीं, बल्कि शान्त-चित्त रहकर गरिमाके साथ ईश्वरका नाम लेते हुए सारे कष्टोंको सहन करके ही दिया जाना चाहिए।
मेरे साथियोंको या जनताको मेरी गिरफ्तारीसे घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि इस आन्दोलनका मार्ग-दर्शन में नहीं ईश्वर कर रहा है। वह सदा ही सबके हृदयोंमें वास करता है और यदि हम उसपर निष्ठा रखें तो वह निश्चय ही हमारा सही मार्ग-दर्शन करेगा। हमारा मार्ग पहले ही सुनिश्चित हो चुका है। प्रत्येक गाँव गैर-कानूनी नमक लाये या अपने यहाँ तैयार करे, हमारी बहनें शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना दें। हर घरमें बूढ़े और जवान सभी तकली चलायें, कताई करें और प्रति दिन ढेरों सूत बनवायें। विदेशी वस्त्रोंको जला<noinclude></noinclude>
12ut8854sb1ck06ft5n8g5pnq1flcez
673614
673613
2026-08-24T08:52:31Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673614
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सन्देश राष्ट्रके नाम|२२१}}</noinclude>यहाँ गुजरातमें तपे तपाये, लोकप्रिय जनसेवकोंको एक-एक करके गिरफ्तार किया
जा चुका है, फिर भी जनता पूर्णतः अहिंसक बनी रही है। जनताने घबराने या
आतंकित होनेसे इनकार कर दिया है, बल्कि उसने दिन-दिन और अधिक संख्यामें
असहयोग में शामिल होकर इन गिरफ्तारियों पर खुशी जाहिर की है। ठीक यही
होना भी चाहिए था।
ऐसी शुभ घड़ीमें आरम्भ किया गया यह संघर्ष यदि अन्ततक इसी तरह अहिंसात्मक बना रहा तो इतना ही नहीं कि भारत निकट भविष्यमें पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल कर लेगा, बल्कि हम विश्वको भारत और उसके गौरवशाली अतीतके योग्य एक पदार्थ पाठ भी दे देंगे।
बलिदान और त्यागके बिना हासिल किया गया स्वराज्य चिरजीवी नहीं हो सकता। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि हमारे देश की जनता अपनी शक्ति-भर बड़े-बड़ा बलिदान करनेके लिए तैयार रहे। सच्चे बलिदान या त्यागमें एक ही पक्षको, स्वयं ही को सारा कष्ट सहन करना पड़ता है ऐसे बलिदानीको दूसरेकी जान लिये बिना अपनी जान देने, जीवन देकर जीवन पानेकी कलामें सिद्धहस्त बनना पड़ता है। ईश्वर करे भारत अपने को इस मन्त्रके योग्य सिद्ध करे।
आज सत्याग्रहीके हाथ में यह मुट्ठी भर नमक भारतके आत्मसम्मानका ही क्या वास्तवमें उसके सर्वस्यका प्रतीक बन गया है। इसलिए चाहे मुट्ठी कुचल दी जाये, पर अपनी इच्छासे उसका नमक किसीको न लेने दिया जाये।
सरकार यदि अपने-आपको एक सभ्य सरकार कहती है तो उसे उन सभी लोगोंको खुशीसे जेलोंमें डालने दो जो गैरकानूनी तौरपर नमक बनाते हैं। असहयोगी लोग अपनी गिरफ्तारी के बाद वह नमक उतनी ही खुशी-खुशी सरकारके हवाले कर देंगे जितनी खुशी-खुशी वे अपने शरीर जेलरोंके हवाले करेंगे।
लेकिन बेचारे निर्दोष सत्याग्रहियोंके हाथसे बलपूर्वक नमक छीनना शुद्ध बर्बरताके अलावा और कुछ नहीं है; और वह भारतका अपमान भी है। ऐसे अपमानका एक ही उत्तर है। वह यह कि हाथ भले ही टूट जायें पर हम अपनी मुट्ठियाँ ढीली नहीं होने देंगे। लेकिन तब भी कष्ट सहन करनेवाला सत्याग्रही स्वयं और उसके साथी भी अपने हृदयोंमें अन्यायीके विरुद्ध किसी दुर्भावनाको स्थान नहीं देंगे। असज्जनताका उत्तर असौजन्यसे नहीं, बल्कि शान्त-चित्त रहकर गरिमाके साथ ईश्वरका नाम लेते हुए सारे कष्टोंको सहन करके ही दिया जाना चाहिए।
मेरे साथियोंको या जनताको मेरी गिरफ्तारीसे घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि इस आन्दोलनका मार्ग-दर्शन में नहीं ईश्वर कर रहा है। वह सदा ही सबके हृदयोंमें वास करता है और यदि हम उसपर निष्ठा रखें तो वह निश्चय ही हमारा सही मार्ग-दर्शन करेगा। हमारा मार्ग पहले ही सुनिश्चित हो चुका है। प्रत्येक गाँव गैर-कानूनी नमक लाये या अपने यहाँ तैयार करे, हमारी बहनें शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना दें। हर घरमें बूढ़े और जवान सभी तकली चलायें, कताई करें और प्रति दिन ढेरों सूत बनवायें। विदेशी वस्त्रोंको जला<noinclude></noinclude>
5758n7f2l9q8wupf4mcvuyuph6t9oue
673650
673614
2026-08-24T11:10:06Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673650
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सन्देश राष्ट्रके नाम|२२१}}</noinclude>यहाँ गुजरातमें तपे तपाये, लोकप्रिय जनसेवकोंको एक-एक करके गिरफ्तार किया
जा चुका है, फिर भी जनता पूर्णतः अहिंसक बनी रही है। जनताने घबराने या
आतंकित होनेसे इनकार कर दिया है, बल्कि उसने दिन-दिन और अधिक संख्यामें
असहयोग में शामिल होकर इन गिरफ्तारियों पर खुशी जाहिर की है। ठीक यही
होना भी चाहिए था।
ऐसी शुभ घड़ीमें आरम्भ किया गया यह संघर्ष यदि अन्ततक इसी तरह अहिंसात्मक बना रहा तो इतना ही नहीं कि भारत निकट भविष्यमें पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल कर लेगा, बल्कि हम विश्वको भारत और उसके गौरवशाली अतीतके योग्य एक पदार्थ पाठ भी दे देंगे।
बलिदान और त्यागके बिना हासिल किया गया स्वराज्य चिरजीवी नहीं हो सकता। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि हमारे देश की जनता अपनी शक्ति-भर बड़ेसे-बड़ा बलिदान करनेके लिए तैयार रहे। सच्चे बलिदान या त्यागमें एक ही पक्षको, स्वयं ही को सारा कष्ट सहन करना पड़ता है ऐसे बलिदानीको दूसरेकी जान लिये बिना अपनी जान देने, जीवन देकर जीवन पानेकी कलामें सिद्धहस्त बनना पड़ता है। ईश्वर करे भारत अपने को इस मन्त्रके योग्य सिद्ध करे।
आज सत्याग्रहीके हाथ में यह मुट्ठी भर नमक भारतके आत्मसम्मानका ही क्या वास्तवमें उसके सर्वस्वका प्रतीक बन गया है। इसलिए चाहे मुट्ठी कुचल दी जाये, पर अपनी इच्छासे उसका नमक किसीको न लेने दिया जाये।
सरकार यदि अपने-आपको एक सभ्य सरकार कहती है तो उसे उन सभी लोगोंको खुशीसे जेलोंमें डालने दो जो गैरकानूनी तौरपर नमक बनाते हैं। असहयोगी लोग अपनी गिरफ्तारी के बाद वह नमक उतनी ही खुशी-खुशी सरकारके हवाले कर देंगे जितनी खुशी-खुशी वे अपने शरीर जेलरोंके हवाले करेंगे।
लेकिन बेचारे निर्दोष सत्याग्रहियोंके हाथसे बलपूर्वक नमक छीनना शुद्ध बर्बरताके अलावा और कुछ नहीं है; और वह भारतका अपमान भी है। ऐसे अपमानका एक ही उत्तर है। वह यह कि हाथ भले ही टूट जायें पर हम अपनी मुट्ठियाँ ढीली नहीं होने देंगे। लेकिन तब भी कष्ट सहन करनेवाला सत्याग्रही स्वयं और उसके साथी भी अपने हृदयोंमें अन्यायीके विरुद्ध किसी दुर्भावनाको स्थान नहीं देंगे। असज्जनताका उत्तर असौजन्यसे नहीं, बल्कि शान्त-चित्त रहकर गरिमाके साथ ईश्वरका नाम लेते हुए सारे कष्टोंको सहन करके ही दिया जाना चाहिए।
मेरे साथियोंको या जनताको मेरी गिरफ्तारीसे घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि इस आन्दोलनका मार्ग-दर्शन मैं नहीं ईश्वर कर रहा है। वह सदा ही सबके हृदयोंमें वास करता है और यदि हम उसपर निष्ठा रखें तो वह निश्चय ही हमारा सही मार्ग-दर्शन करेगा। हमारा मार्ग पहले ही सुनिश्चित हो चुका है। प्रत्येक गाँव गैर-कानूनी नमक लाये या अपने यहाँ तैयार करे, हमारी बहनें शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना दें। हर घरमें बूढ़े और जवान सभी तकली चलायें, कताई करें और प्रति दिन ढेरों सूत बनवायें। विदेशी वस्त्रोंको जला<noinclude></noinclude>
eav5p43ct4bimc5omf7s4iuj9oimaox
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६६
250
197309
673616
669832
2026-08-24T08:58:37Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673616
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दीजिए। हिन्दू अस्पृश्यताको तिलांजलि दें। हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी और ईसाई
सभी लोग आपस में हार्दिक एकता पैदा करें। बहुसंख्यक जातियाँ उसीपर सन्तोष करें जो अपने अल्पसंख्यक भाइयोंको सन्तुष्ट करनेके बाद बच रहे। विद्यार्थी-गण सरकारी स्कूल-कालेजोंको छोड़ दें और सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरियोंको लात मारकर जनताकी सेवामें लग जायें, और तब हम पायेंगे कि पूर्ण स्वराज्य हमारा द्वार खटखटा रहा है।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' ८-५-१९३०
{{C|{{larger|२०१. पत्र : महादेव देसाईको}}}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
मैं भीमराड जाने के लिए इस समय सूरतमें बैठा हूँ। मोटर गलत रास्तेपर पड़ गई, इसलिए गाड़ी निकल गई और फिर मुझे मोटर द्वारा ही यहाँ तक आना पड़ा। इस समय तो मेरे विचारोंको पंख लग गये है, यहाँतक कि वचन और कर्मके बिना भी वे अपना काम करते जान पड़ते हैं; और वस्तुत: है भी ऐसा ही। तपश्चर्याके अन्तर्गत मनमें जो विचार उठा करते हैं वे अव्यभिचारी होते हैं। इससे उनकी शक्ति बिजली अथवा उससे भी सूक्ष्म पदार्थ ईथरसे भी अधिक होती है। इसलिए तुम्हारे सुझाव पर कल ही अमल किया गया। मैं अपनी पूरी टुकड़ीको जहाँ-जहाँ जरूरत जान पड़े, वहां-वहाँ तैनात करनेवाला हूँ। सूरजभान तो गये, जयन्तीप्रसाद भी गये दोनों अपने-अपने जिलोंमें । यामनराव पतकी भी अपने जिलेमें गये। इन तीनोंसे मुझे कुछ भी नहीं कहना पड़ा, वे लोग खुद-ब-खुद समझ गये । सुरेन्द्र भीमराड जानेके लिए नवसारीमें बैठा है और पुरातन तथा हरिदास गांधी ओलपाड जानेके लिए नवसारीमें बैठे हैं। अब्बास साहबको मैंने नडियाद भेज दिया है। वे जितने लोगों की मांग करेंगे, उसीके मुताबिक अन्य लोगोंको भेजूंगा। मैं जेलसे बाहर रहूँ या न रहूँ तो भी तुम अगर जेलसे बाहर रहो तो लोगोंको भेज देना; अगर तुम भी बाहर न रहे तो जो बाकी बचेंगे वे खुद ही बन्दोबस्त कर लेंगे। सोभाग्यवश दयालजी तो पीछे रहनेवाले ही हैं, वे भी बच्चोंकी मारफत आदेश निकाला करेंगे और अन्ततः भगवान् बालकृष्ण तो है ही,इनके आदेश सबके हृदय में प्रेरणाका संचार करेंगे। फलतः जैसे-तैसे काम चलता रहेगा। छगनलालको वढवान भेजनेके लिए मैं तैयार तो हूँ लेकिन वहाँ केवलराम भी जा सकता है और केवलरामने जानेके लिए कहा भी है,यह तुम जानते हो न? तथापि, यदि तुम कार्यसे मुक्त हो और तुम्हें कोई और विचार सूझ पड़े तो मुझे बताना। भड़ोंच सेवाश्रमसे पुछवाया है कि यदि उन्हें व्यक्तियों की जरूरत हो तो मुझसे कहें। तुम्हें तो मैं घड़ी-भरका मेहमान समझता हूँ।<noinclude></noinclude>
6bvdau5j1oa5igxgp8s6k22e9xy4efv
673651
673616
2026-08-24T11:18:40Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673651
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>दीजिए। हिन्दू अस्पृश्यताको तिलांजलि दें। हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी और ईसाई
सभी लोग आपस में हार्दिक एकता पैदा करें। बहुसंख्यक जातियाँ उसीपर सन्तोष करें जो अपने अल्पसंख्यक भाइयोंको सन्तुष्ट करनेके बाद बच रहे। विद्यार्थी-गण सरकारी स्कूल-कालेजोंको छोड़ दें और सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरियोंको लात मारकर जनताकी सेवामें लग जायें, और तब हम पायेंगे कि पूर्ण स्वराज्य हमारा द्वार खटखटा रहा है।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' ८-५-१९३०
{{C|{{larger|'''२०१. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
मैं भीमराड जाने के लिए इस समय सूरतमें बैठा हूँ। मोटर गलत रास्तेपर पड़ गई, इसलिए गाड़ी निकल गई और फिर मुझे मोटर द्वारा ही यहाँ तक आना पड़ा। इस समय तो मेरे विचारोंको पंख लग गये है, यहाँतक कि वचन और कर्मके बिना भी वे अपना काम करते जान पड़ते हैं; और वस्तुत: है भी ऐसा ही। तपश्चर्याके अन्तर्गत मनमें जो विचार उठा करते हैं वे अव्यभिचारी होते हैं। इससे उनकी शक्ति बिजली अथवा उससे भी सूक्ष्म पदार्थ ईथरसे भी अधिक होती है। इसलिए तुम्हारे सुझाव पर कल ही अमल किया गया। मैं अपनी पूरी टुकड़ीको जहाँ-जहाँ जरूरत जान पड़े, वहां-वहाँ तैनात करनेवाला हूँ। सूरजभान तो गये, जयन्तीप्रसाद भी गये दोनों अपने-अपने जिलोंमें । यामनराव पतकी भी अपने जिलेमें गये। इन तीनोंसे मुझे कुछ भी नहीं कहना पड़ा, वे लोग खुद-ब-खुद समझ गये। सुरेन्द्र भीमराड जानेके लिए नवसारीमें बैठा है और पुरातन तथा हरिदास गांधी ओलपाड जानेके लिए नवसारीमें बैठे हैं। अब्बास साहबको मैंने नडियाद भेज दिया है। वे जितने लोगों की मांग करेंगे, उसीके मुताबिक अन्य लोगोंको भेजूंगा। मैं जेलसे बाहर रहूँ या न रहूँ तो भी तुम अगर जेलसे बाहर रहो तो लोगोंको भेज देना; अगर तुम भी बाहर न रहे तो जो बाकी बचेंगे वे खुद ही बन्दोबस्त कर लेंगे। सौभाग्यवश दयालजी तो पीछे रहनेवाले ही हैं, वे भी बच्चोंकी मारफत आदेश निकाला करेंगे और अन्ततः भगवान् बालकृष्ण तो है ही,इनके आदेश सबके हृदय में प्रेरणाका संचार करेंगे। फलतः जैसे-तैसे काम चलता रहेगा। छगनलालको वढवान भेजनेके लिए मैं तैयार तो हूँ लेकिन वहाँ केवलराम भी जा सकता है और केवलरामने जानेके लिए कहा भी है,यह तुम जानते हो न? तथापि, यदि तुम कार्यसे मुक्त हो और तुम्हें कोई और विचार सूझ पड़े तो मुझे बताना। भड़ौच सेवाश्रमसे पुछवाया है कि यदि उन्हें व्यक्तियों की जरूरत हो तो मुझसे कहें। तुम्हें तो मैं घड़ी-भरका मेहमान समझता हूँ।<noinclude></noinclude>
gc0r7p1st4cnprvypiz2x1l94z8eprn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६७
250
197310
673619
669833
2026-08-24T09:05:39Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673619
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२२३}}</noinclude>सरलादेवीको मैंने भी पत्र तो लिखा है। लेकिन वह पत्र मद्यपानके विषयमें है । कल इसी विषयपर मैने काकाको भी एक पत्र लिखा है वह तो तुमने पढ़ा ही होगा। उससे तुमने देखा होगा कि मैं तो १३ तारीखको नमक आन्दोलन के साथ-साथ मद्यपान निषेध और विदेशी कपड़ेका बहिष्कार सम्बन्धी आन्दोलन भी शुरू करना चाहता हूँ । यदि मैं ऐसा न कर पाऊँ और तुममें, काका आदि पुरुषों और आश्रमकी बहनों तथा बाहरसे आनेवाली बहनोंमें पर्याप्त आत्मविश्वास हो तो मैं चाहूँगा कि मद्यपान निषेधका मोर्चा सोमवार से लगाया जाये। मैंने इसमें कूद पड़नेके लिए सरला-देवीको लिखा है। लेकिन मेरी यह सारी कल्पना यदि तुम सबके गले न उतरे तो तुम इसे छोड़ देना। नमक कर सात दिनोंमें छूट जायेगा, सो मैं नहीं मानता। लेकिन इस शुभ घड़ीका लाभ उठाकर इस त्रिवेणीका संगम कर देना आवश्यक है। मैं तो इतना जानता हूँ कि यदि हम इन तीनों चीजोंमें सफलता प्राप्त कर लें तो स्वराज्य आज ही सिद्ध हो जायेगा, और स्त्रियाँ पल-भर में अपनी शक्तिको पहचान जायेंगी, और सारा संसार बिना कुछ समझाये समझ जायेगा कि यह तो सही अर्थोंमें धर्मयुद्ध है। अनेक स्त्रियाँ गृहस्थीको बागडोर अपने हाथोंमें थामे हुए भी इसमें शामिल हो सकती हैं। और आखिरी हथियारके रूपमें हमारे पास भूमिकर तो है ही। इसलिए हालांकि
'अनैतिक आधार" शीर्षक लेखमें मैंने इसकी चर्चा की है तथापि इस भूमिकाके
बारेमें कुछ कहनेकी मेरी इच्छा नहीं और इसकी जरूरत भी नहीं है। मेरी नजर
तो इस समय ९९ करोड़ रुपयोंपर जमी हुई है और इतना तो मुझे आजकी परिस्थितियोंको देखते हुए सहज साध्य लगता है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
मैंने मीटूबहनके साथ उपर्युक्त विषयपर खूब बातचीत की है। मीठबनने निश्चय कर लिया है। स्त्रियोंके लिए अनाविल आश्रम इनके हाथमें सौंप दिया जायेगा। जो स्त्रियाँ अपना पूरा समय इस कार्य में देने को तैयार होंगी उन्हें ही इस आश्रम में लिया जायेगा। इस आश्रम के अपने नियम तो होंगे ही। अभी तो विचार यह है कि सूरत जिलेमें जहां इस तरहका काम हुआ है वहां इसे बढ़ावा दिया जाये और जैसे-जैसे स्त्रियोंमें आत्मविश्वास आता जाये वैसे-वैसे कामको बढ़ाया जाये। इस दृष्टिसे मीठ्बहनकी तरह आश्रमकी जो बहनें इस काम के लिए तैयार हों वे यहाँ आती जायें । मीबहनको स्वयं तो इस कामका अनुभव है, इसलिए इन आनेवाली बहनोंको भी अनुभव मिलेगा और फिर आश्रमकी बहनोंसे, जो नियमोंसे अच्छी तरह परिचित होती हैं, काम लेने में मीठ्वहनको आसानी होगी। शारदावहनके साथ तो मेरी बात हो गई है। उन्हें तथा डॉ० सुमन्तको यह काम बहुत अच्छा लगा है। शारदाबहन यहाँ आनेवाली तो थीं।
गुजराती (एस० एन० १६७८५ ) की फोटो नकलसे।
<small>१. देखिए पृष्ठ २३०-३१।</small><noinclude></noinclude>
3qcbkye4klxjehvshsmv91s0w3xdz9j
673660
673619
2026-08-24T11:38:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
673660
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२२३}}</noinclude>सरलादेवीको मैंने भी पत्र तो लिखा है। लेकिन वह पत्र मद्यपानके विषयमें है । कल इसी विषयपर मैने काकाको भी एक पत्र लिखा है वह तो तुमने पढ़ा ही होगा। उससे तुमने देखा होगा कि मैं तो १३ तारीखको नमक आन्दोलन के साथ-साथ मद्यपान निषेध और विदेशी कपड़ेका बहिष्कार सम्बन्धी आन्दोलन भी शुरू करना चाहता हूँ । यदि मैं ऐसा न कर पाऊँ और तुममें, काका आदि पुरुषों और आश्रमकी बहनों तथा बाहरसे आनेवाली बहनोंमें पर्याप्त आत्मविश्वास हो तो मैं चाहूँगा कि मद्यपान निषेधका मोर्चा सोमवार से लगाया जाये। मैंने इसमें कूद पड़नेके लिए सरला-देवीको लिखा है। लेकिन मेरी यह सारी कल्पना यदि तुम सबके गले न उतरे तो तुम इसे छोड़ देना। नमक कर सात दिनोंमें छूट जायेगा, सो मैं नहीं मानता। लेकिन इस शुभ घड़ीका लाभ उठाकर इस त्रिवेणीका संगम कर देना आवश्यक है। मैं तो इतना जानता हूँ कि यदि हम इन तीनों चीजोंमें सफलता प्राप्त कर लें तो स्वराज्य आज ही सिद्ध हो जायेगा, और स्त्रियाँ पल-भर में अपनी शक्तिको पहचान जायेंगी, और सारा संसार बिना कुछ समझाये समझ जायेगा कि यह तो सही अर्थोंमें धर्मयुद्ध है। अनेक स्त्रियाँ गृहस्थीको बागडोर अपने हाथोंमें थामे हुए भी इसमें शामिल हो सकती हैं। और आखिरी हथियारके रूपमें हमारे पास भूमिकर तो है ही। इसलिए हालांकि
'अनैतिक आधार" शीर्षक लेखमें मैंने इसकी चर्चा की है तथापि इस भूमिकाके
बारेमें कुछ कहनेकी मेरी इच्छा नहीं और इसकी जरूरत भी नहीं है। मेरी नजर
तो इस समय ९९ करोड़ रुपयोंपर जमी हुई है और इतना तो मुझे आजकी परिस्थितियोंको देखते हुए सहज साध्य लगता है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
मैंने मीठूबहनके साथ उपर्युक्त विषयपर खूब बातचीत की है। मीठूबहनने निश्चय कर लिया है। स्त्रियोंके लिए अनाविल आश्रम इनके हाथमें सौंप दिया जायेगा। जो स्त्रियाँ अपना पूरा समय इस कार्य में देने को तैयार होंगी उन्हें ही इस आश्रम में लिया जायेगा। इस आश्रम के अपने नियम तो होंगे ही। अभी तो विचार यह है कि सूरत जिलेमें जहां इस तरहका काम हुआ है वहां इसे बढ़ावा दिया जाये और जैसे-जैसे स्त्रियोंमें आत्मविश्वास आता जाये वैसे-वैसे कामको बढ़ाया जाये। इस दृष्टिसे मीठूबहनकी तरह आश्रमकी जो बहनें इस काम के लिए तैयार हों वे यहाँ आती जायें। मीठूबहनको स्वयं तो इस कामका अनुभव है, इसलिए इन आनेवाली बहनोंको भी अनुभव मिलेगा और फिर आश्रमकी बहनोंसे, जो नियमोंसे अच्छी तरह परिचित होती हैं, काम लेने में मीठूबहनको आसानी होगी। शारदावहनके साथ तो मेरी बात हो गई है। उन्हें तथा डॉ० सुमन्तको यह काम बहुत अच्छा लगा है। शारदाबहन यहाँ आनेवाली तो थीं।
गुजराती (एस० एन० १६७८५ ) की फोटो नकलसे।
<small>१. देखिए पृष्ठ २३०-३१।</small><noinclude></noinclude>
431gwo7duwyrkh7r0uwhy1tio9fo50h
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६८
250
197311
673620
669834
2026-08-24T09:11:14Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673620
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२०२. भाषण : भीमराडमें'''}}}}
{{Right|९ अप्रैल, १९३०}}
भाइयो और बहनो,
यह सविनय प्रतिरोधियोंका शिविर है। आपमें से कुछ लोगोंको गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन मैं देखता हूँ कि इससे दुखी होनेके बजाय आप और भी प्रसन्न हो रहे हैं। हम लोगोंने एक चीजके लिए तैयारी की और फिर वह चीज माँगी। जब वह चीज हमें मिल रही है तो हमें उससे डरना नहीं चाहिए, अन्यथा हम सर्वशक्तिमान् ईश्वरके प्रति कृतघ्न माने जायेंगे। हम ईश्वरसे यही प्रार्थना करते है कि तुम हमें या तो स्वतन्त्रता दो या जेल और फांसी। हम दासता और पर-तन्त्रता नहीं चाहते। और ईश्वरका कहना है कि बलिदानके बिना तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। हमें अपने-आपको जेल जाने योग्य बनाना है। चोरी करने या शराबखोरीके जुर्म में जेल जाना बेकार होगा। हम उन्हीं लोगोंको बधाई देते हैं जो पवित्र कार्यक लिए जेल जाते हैं। हमारे दृष्टिकोणसे सत्कायोंके लिए जेल जानेवाले लोग कारावास के नहीं, बल्कि स्वतन्त्रताके पात्र है। इस शैतानी सरकारके राज्यमें तो निर्दोष और भले लोगोंको कष्ट सहना ही पड़ेगा। इस शासनमें अगर हम अच्छे हैं तो हमें हथकड़ियाँ और ठोकरें मिलेंगी, छुरोंके वार सहने पड़ेंगे और फांसीके तस्तेपर झूलना पड़ेगा। स्त्रियोंको अधिक बलिदान करना पड़ेगा। मैं अपने साथ यज्ञकी सामग्री ले आया हूँ मैं इसे एक पिकनिक वन-विहार-समझता हूँ और आशा करता हूँ कि अन्त तक यह ऐसा ही रहेगा। अभी तो शुरुआत ही है। सरदार वल्लभभाईकोतीस बरसके लिए जेल भेजना चाहिए था । सरकार हमारी परीक्षा कर रही है।भीमराडमें आपको मौतके घाट नहीं उतारा जायेगा । आपसे नमक छीना जायेगा,लेकिन अगर आपमें साहस हो तो नमक छीननेके लिए किये जानेवाले बल प्रयोगको जबतक आप शेल सकें तबतक आप नमकको अपने हाथसे अलग न होने दें।
मैं समझता हूँ कि अपने पास नमक रखकर हमने अपने हाथोंमें ६ करोड़ रुपये रखे हैं और इसीमें भारतकी स्वतन्त्रताका मर्म छिपा हुआ है। हम इस संघर्षके लिए। सोलह वर्षके नौजवान चाहते हैं। जिस मुट्ठीमें नमक हो उसे यदि हम कसकरबाँध रखें तो कोई भी उसे खोलनेकी हिम्मत नहीं कर सकता। वे चाहें तो आपपर गोलियां बरसायें। लोग भले ही संगीनें और लाठियाँ लेकर आपके पास आयें और आपपर उनका प्रयोग करें, लेकिन नमक आपके हाथोंसे नहीं छिनना चाहिए। यदि इतना होनेपर भी आपमें से कोई रोता-चीखता नहीं तो मैं इसे एक पिकनिक मानूंगा। भले शरीर निष्प्राण होकर जमीनपर गिर जाये, भले ही हाथ काट लिये जायें, किन्तु आप अपनी टेकपर अड़े रहिए। तब मैं समझँगा कि स्वराज्य आ रहा है। सरकार हमारी परीक्षा इसलिए कर रही है कि यह बहादुर लोगोंकी सरकार है।<noinclude></noinclude>
320jg387so59flfnpjuoxuz8syx2vtu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२६९
250
197312
673621
669835
2026-08-24T09:14:34Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673621
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{</noinclude>भाषण : भीमराडमें
२२५
ऐसा न समझें कि हम नपुंसकोंके खिलाफ जूझ रहे हैं। वे आसानीसे हार माननेवाले
नहीं है और न हम उन्हें जल्दी हरा ही सकते हैं। यदि ३० करोड़ लोग इस संघर्ष में एक होकर कूद पड़े तो अन्तमें सरकारको झुकना पड़ेगा। यदि आप अपनी टेकके सच्चे बने रहते हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि सफलताका प्रकाश हमें दिखाई देगा। मैं यहाँ आपसे यह अनुरोध करने आया हूँ कि विजय मिलने तक आप इस संघर्षमें सन्नद्ध रहिए। आप सब बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। नमक कर के बारेमें कोई सन्देह न कीजिए। जब उकाभाईको एक घाव लगा तो मैंने इसे इस बातका संकेत माना कि नमक कर को समाप्त होना है। ऐसा न समझें कि नमक कर समाप्त कर दिये जानेके बाद आप लोग सुखी हो जायेंगे । ३० करोड़ आबादीवाले देशके लिए छह करोड़ रुपये कुछ नहीं है। मैंने तैयबजीसे अनुरोध किया और वे खुशी-खुशी (खेड़ा के लिए) रवाना हो गये। शराबकी दुकानोंपर धरना पुरुष नहीं, बल्कि स्त्रियां देंगी। अगर वहाँ पुरुष जाते हैं तो ऐसा माना जायेगा कि वे दूसरोंको मारने-पीटनेके लिए आये हैं। सरकारको यह चीज पसन्द नहीं होगी, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप उसे शराबकी बिक्रीसे होनेवाली २५ करोड़ रुपयेकी सालाना आयसे हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए मैं आप सभी बहनोंको मीठूबहनके निर्देशपर काम करनेकी सलाह देता हूँ । विदेशी वस्त्र भी उतने ही बुरे हैं जितनी कि शराब। जिन्होंने विदेशी कपड़े पहन रखे हों, उन्हें उनको जला देना चाहिए। यदि आप खद्दरका प्रयोग करें तो भारतके ६० करोड़ रुपये भारतमें रह जायेंगे। आपको रुईसे सूत कातना चाहिए। आप बहनोंको तीन काम करने चाहिए अर्थात्, शराबबन्दी आन्दोलन में मदद देना, खद्दरका प्रयोग करना और सूत कातना । मैंने अपने लड़के मणिलालको इस कामके लिए भेजा है। वह यह काम करेगा। आप जेलोंमें खानेके लिए झगड़ा न करें; लड़ें तो अपने आत्म सम्मानके लिए लड़ें। जिन पटेलोंने त्यागपत्र दिये हैं उन्हें सरकारने अबतक नौकरीसे मुक्त नहीं किया है। इसमें कुछ चाल है। उन्हें सारे कागजात सरकारको सौंप देने चाहिए या फिर कार्यालय में ताला लगाकर पानी मामलतदारके सुपुर्द कर देनी चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रेक्ट्स, १९३०
४२-१५<noinclude></noinclude>
qtlr9w3uua6jihnvgap64kgyv8e2amx
673622
673621
2026-08-24T09:16:38Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673622
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : भीमराडमें|२२५}}</noinclude>ऐसा न समझें कि हम नपुंसकोंके खिलाफ जूझ रहे हैं। वे आसानीसे हार माननेवाले
नहीं है और न हम उन्हें जल्दी हरा ही सकते हैं। यदि ३० करोड़ लोग इस संघर्ष में एक होकर कूद पड़े तो अन्तमें सरकारको झुकना पड़ेगा। यदि आप अपनी टेकके सच्चे बने रहते हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि सफलताका प्रकाश हमें दिखाई देगा। मैं यहाँ आपसे यह अनुरोध करने आया हूँ कि विजय मिलने तक आप इस संघर्षमें सन्नद्ध रहिए। आप सब बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। नमक कर के बारेमें कोई सन्देह न कीजिए। जब उकाभाईको एक घाव लगा तो मैंने इसे इस बातका संकेत माना कि नमक कर को समाप्त होना है। ऐसा न समझें कि नमक कर समाप्त कर दिये जानेके बाद आप लोग सुखी हो जायेंगे । ३० करोड़ आबादीवाले देशके लिए छह करोड़ रुपये कुछ नहीं है। मैंने तैयबजीसे अनुरोध किया और वे खुशी-खुशी (खेड़ा के लिए) रवाना हो गये। शराबकी दुकानोंपर धरना पुरुष नहीं, बल्कि स्त्रियां देंगी। अगर वहाँ पुरुष जाते हैं तो ऐसा माना जायेगा कि वे दूसरोंको मारने-पीटनेके लिए आये हैं। सरकारको यह चीज पसन्द नहीं होगी, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप उसे शराबकी बिक्रीसे होनेवाली २५ करोड़ रुपयेकी सालाना आयसे हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए मैं आप सभी बहनोंको मीठूबहनके निर्देशपर काम करनेकी सलाह देता हूँ । विदेशी वस्त्र भी उतने ही बुरे हैं जितनी कि शराब। जिन्होंने विदेशी कपड़े पहन रखे हों, उन्हें उनको जला देना चाहिए। यदि आप खद्दरका प्रयोग करें तो भारतके ६० करोड़ रुपये भारतमें रह जायेंगे। आपको रुईसे सूत कातना चाहिए। आप बहनोंको तीन काम करने चाहिए अर्थात्, शराबबन्दी आन्दोलन में मदद देना, खद्दरका प्रयोग करना और सूत कातना । मैंने अपने लड़के मणिलालको इस कामके लिए भेजा है। वह यह काम करेगा। आप जेलोंमें खानेके लिए झगड़ा न करें; लड़ें तो अपने आत्म सम्मानके लिए लड़ें। जिन पटेलोंने त्यागपत्र दिये हैं उन्हें सरकारने अबतक नौकरीसे मुक्त नहीं किया है। इसमें कुछ चाल है। उन्हें सारे कागजात सरकारको सौंप देने चाहिए या फिर कार्यालय में ताला लगाकर पानी मामलतदारके सुपुर्द कर देनी चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रेक्ट्स, १९३०
४२-१५<noinclude></noinclude>
hs0lwzjsgh0q8j4hthtkmtuh6gycfi7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७०
250
197313
673623
669836
2026-08-24T09:20:32Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673623
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२०३. भारतकी महिलाओंसे'''}}}}
कुछ बहनें इस सत् संघर्ष में शामिल होनेके लिए बहुत अधीर हो रही हैं। मैं इसे एक शुभ लक्षण मानता हूँ। इससे में इस निष्कर्षपर पहुँचा हूँ कि नमक-कर विरोधी आन्दोलन चाहे जितना मोहक हो, स्त्रियोंके लिए अपनी प्रवृत्तियाँ उसी तक सीमित रखना अशर्फी देकर कोयला लेने के समान होगा। वे भीड़में खो जायेंगी।
इसमें उन्हें कष्ट सहनका वह अवसर ही नहीं मिलेगा जिसके लिए वे लालायित हैं।
इस अहिंसक लड़ाई में उनका योगदान पुरुषोंकी अपेक्षा बहुत अधिक होता चाहिए। स्त्रियोंको अबला कहना उनका अपमान करना है यह पुरुषों द्वारा उनके साथ किया गया अन्याय है। यदि शक्तिका मतलब केवल पशु-बल ही होता है तो बेशक स्त्रियोंमें पशुबल कम है। किन्तु यदि उसका अर्थ नैतिक शक्ति होता है तो स्त्रियोंकी शक्तिसे पुरुषोंकी शक्तिकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। क्या यह सच नहीं है कि उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक सहज बुद्धि, ज्यादा त्याग-भाव, अधिक सहन-शक्ति और अधिक साहस होता है? उनके बिना पुरुषके अस्तित्वका सवाल ही नहीं उठता। यदि अहिंसा हमारे अस्तित्वका नियम है तो भविष्य स्त्रियोंके ही हाथोंमें है।
यह विचार मेरे मनमें वर्षोंसे पल रहा है। मेरे कूच प्रारम्भ करनेसे पहले जब आश्रमकी महिलाओंने आग्रह किया कि उसमें पुरुषोंके साथ उन्हें भी ले चलूं, तो मेरे मनके किसी कोनेसे आवाज आई कि वे इस संघर्षमें केवल नमक-कानून भंग करनेसे कहीं बड़ा काम करनेवाली है।
मुझे लगता है कि अब मैंने वह काम ढूंढ लिया है। शराब तथा विदेशी कपड़े-की दुकानों पर पुरुषों द्वारा धरना देनेका काम यद्यपि १९२१ में कुछ समय के लिए एक हद तक आशातीत रूपसे सफल हुआ था, किन्तु अन्तमें हिंसा भड़क उठनेके कारण
वह विफल हो गया। यदि सचमुच कुछ प्रभाव उत्पन्न करना है, तो धरना देनेका काम फिरसे शुरू करना ही चाहिए। यदि यह अन्त तक शान्तिमय रहता है तो इससे
सम्बन्धित लोगोंको इस विषय में सबसे जल्दी शिक्षित और जाग्रत किया जा सकेगा।
यह काम जोर-जबरदस्तीसे नहीं, बल्कि लोगोंको कायल करके, नैतिक धरातलपर
उन्हें समझाकर ही सम्पन्न किया जा सकता है और इनके हृदयको स्त्रियोंसे अधिक
और कौन छू सकता है?
शराब तथा अफीम आदिका निषेध और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार तो अन्ततः
कानूनसे ही सम्पन्न होगा। लेकिन, जबतक नीचेसे महसूस होने लायक दबाव नहीं
डाला जायेगा तबतक ऐसे कानून नहीं बनाये जायेंगे।
इससे तो कोई इनकार कर ही नहीं सकता है कि राष्ट्रके लिए दोनों अत्यन्त आवश्यक है। शराब और अफीम वगैरहसे इनका सेवन करनेवालोंका नैतिक पतन होता है। विदेशी कपड़े देशको आर्थिक नींवको कमजोर बनाते हैं और करोड़ों लोगोंकी<noinclude></noinclude>
9tkczh3gjlyrt6wsywv7af6rc89vbty
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७१
250
197314
673626
669837
2026-08-24T09:24:58Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673626
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भारतकी महिलाओंसे|२२७}}</noinclude>बकारीका कारण बनते हैं। दोनोंसे होनेवाली हानियोंका अनुभव घरमें और इस प्रकार
स्त्रियों द्वारा किया जाता है। जिस घरमें किसी समय सुख-शान्तिका राज्य था उसमें
शरावने कैसी तबाही मचा रखी है, यह तो वही स्त्रियां जानती हैं जिनके पति शराबी
हैं। हमारे गांव पुरवोंकी करोड़ों स्त्रियाँ जानती हैं कि बेकारीका मतलब क्या होता है। आज एक लाख से अधिक स्त्रियाँ चरखा संघसे लाभ उठा रही है, जब कि ऐसे पुरुषोंकी संख्या १०,००० से भी कम है।
तो भारतकी स्त्रियाँ इन दो कार्योंको अपनाकर इनमें विशेषज्ञता प्राप्त करें। इस तरह वे राष्ट्रीय स्वातन्त्र्य संग्राम में पुरुषोंसे कहीं अधिक योगदान करेंगी। यह उन्हें वह शक्ति और आत्म-विश्वास प्रदान करेगा जिनसे अभीतक वे सर्वथा अपरिचित हैं। जब वे विदेशी कपड़े व्यापारियों तथा ग्राहकोंसे और शराव-विक्रेताओं तथा शराबियोंसे अनुरोध करेंगी तो उनका हृदय द्रवित हुए बिना नहीं रहेगा। और कमसेकम इतना तो है ही कि स्त्रियोंके बारेमें कोई यह सन्देह नहीं करेगा कि वे इन चारों वर्गोंके साथ कोई हिंसात्मक व्यवहार करनेका इरादा रखती हैं। इसके अलावा, सरकार भी इतने शान्तिपूर्ण तथा अप्रतिरोध्य आन्दोलनकी अधिक दिनों तक उपेक्षा नहीं कर सकती।
इस आन्दोलनकी सारी खूबसूरती इस बात में होगी कि इसका प्रारम्भ और
संचालन सिर्फ स्त्रियाँ ही करें। वे पुरुषोंसे चाहे जितनी मदद ले सकती हैं, बल्कि
उन्हें लेनी चाहिए, लेकिन इस क्षेत्रमें पुरुषोंको सर्वथा उनके अधीन रहकर ही काम
करना चाहिए।
इस आन्दोलनमें हजारों शिक्षित-अशिक्षित महिलाएँ भाग ले सकती हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओंको मेरी यह अपील सर्वसाधारण के साथ तादात्म्य स्थापित करने तथा उन्हें नैतिक तथा आर्थिक दृष्टिसे सहायता देनेका अवसर प्रदान करती हैं।
और विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके प्रश्नका अध्ययन करनेपर वे पायेंगी कि खादके बिना यह असम्भव है। खुद मिल मालिक भी यह स्वीकार करेंगे कि मिलें तो निकट भविष्यमें भारतकी जरूरतके लायक पूरा कपड़ा तैयार नहीं कर सकतीं। लेकिन ठीक वातावरण तैयार किया जाये तो सादी हमारे गाँवोंमें, हमारे असंख्य घरोंमें तैयार की जा सकती है। मेरा अनुरोध यह है कि भारतकी महिलाएँ अपने अवकाश समयके एक-एक मिनटका उपयोग सूत कातनेके लिए करके ऐसा वातावरण तैयार करनेका सौभाग्य प्राप्त करें। खादी तैयार करनेका सवाल निश्चित पर पर्याप्त सूत कातनेके सवालसे जुड़ा हुआ है। कूचके पिछले दस दिनोंमें परिस्थिति आ पड़ने पर मैंने अनुभवसे यह देखा है कि तकलीमें कितनी क्षमता है। इससे पहले मुझे यह मालूम नहीं था कि यह इतनी सक्षम है। यह तो सचमुच जादू की छड़ी है। मेरे साथियोंने अपने निर्धारित कार्यक्रममें कोई व्याघात पड़ने दिये बिना हँसते-खेलते प्रति-दिन १२ अंकका इतना सूत कात दिखाया है जिससे चार वर्ग गज खादी तैयार की जा सकती है। लड़ाईके साधनके रूपमें तो खादीकी कोई खुलना ही नहीं है। इन दोनों सुधारोके नैतिक परिणाम तो स्पष्टतः बहुत बड़े होंगे। राजनीतिक<noinclude></noinclude>
e03byzla71nwj5fslqxdgm461atkzcl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७२
250
197315
673628
669838
2026-08-24T09:33:57Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673628
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>परिणाम भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। शराब तथा अफीम आदिके निषेधसे सरकारको कोई पच्चीस करोड़ रुपयेके राजस्वकी हानि होगी। विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका मतलब है भारतके करोड़ों लोगों द्वारा अपने देशके कमसे कम साठ करोड़
रुपये की बचत। ये दोनों लाभ पैसेकी दृष्टिसे नमक कर के रद किये जानेसे होनेवाले
लाभसे बढ़-चढ़कर ही होंगे। और इन दोनों सुधारोंके नैतिक सुपरिणामोंका अन्दाजा
लगाना तो असम्भव ही है।
मगर कुछ बहनें कहती हैं कि 'शराब तथा विदेशी वस्त्रोंकी दुकानों पर धरना देनेमें मनको उत्तेजना देनेवाली और साहसिकताका बोध करानेवाली कोई बात नहीं है।' मेरा उत्तर यह है कि यदि वे पूरे मनसे इस आन्दोलनमें लग जायें तो वे देखेंगी कि इसमें भी मनको उत्तेजना देनेवाली और साहसिकताका बोध करानेवाली काफी बातें हैं। आन्दोलन सम्पन्न करने से पूर्व शायद उन्हें जेल भी जाना पड़े। यह भी असम्भव नहीं है कि उनका अपमान किया जाये और उनके शरीरको चोट पहुँचाई जाये। ऐसा अपमान और आघात सहना उनके लिए गर्वका विषय होगा। यदि उन्हें ऐसा कष्ट सहना पड़ा तो उससे इस संघर्षका अन्त जल्दी होगा। यदि भारतकी स्त्रियाँ मेरे अनुरोधकी ओर ध्यान देना चाहती हैं और उसके प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया दिखाना चाहती हैं तो उन्हें शीघ्र ही क्रियाशील हो जाना चाहिए। यदि यह काम अखिल भारतीय स्तर पर तुरन्त आरम्भ नहीं किया जा सकता तो जो प्रान्त संगठन कर सकते हैं वे वैसा करें। उनके उदाहरणका अनुकरण शीघ्र ही दूसरे प्रान्त भी करने लगेंगे।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया''', १०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२०४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''बधाई'''}}
पण्डित मालवीयजी और केन्द्रीय विधान सभाकी सदस्यतासे त्यागपत्र देनेवाले अन्य सदस्य अपने इस देश-भक्तिपूर्ण कार्यके लिए राष्ट्रकी हार्दिक बधाईके पात्र है। यदि हम मनुष्यकी अपने-आपको भुलावेमें रखनेकी क्षमतासे परिचित न होते तो यह बात समझना कठिन होता कि कोई भी आत्मसम्मानी व्यक्ति किसी ऐसी संस्थासे कैसे चिपटा रह सकता है जिसमें रहकर वह अपने आत्म सम्मानकी रक्षा नहीं कर सकता। सरकार हमसे साफ-साफ ऐसा कहती तो नहीं, लेकिन अपने कार्योंसे वह इस बातको बिलकुल स्पष्ट किये दे रही है कि वह और चाहे जो करे, लेकिन अपने मालिकों - ब्रिटिश उत्पादकों और भारतके शोषणपर जीनेवाले ऐसे ही अन्य लोगोंके आर्थिक हितोंकी बलि नहीं चढ़ायेगी। केन्द्रीय और प्रान्तीय सभी विधानमण्डल, उसकी अन्य संस्थाओंकी ही तरह, भारतके पास अब जो कुछ बच रहा है, उसेभी उससे छीन लेनेके मजबूत और लुभानेवाले जाल हैं। यदि उनकी चले तो वे इस देशको तभी छोड़ेंगे जब इसके पास लूटे जानेके लिए कुछ भी बच नहीं रहेगा।<noinclude></noinclude>
ociy3seaahocn2nacto1viq9u9dchnc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७३
250
197316
673636
669839
2026-08-24T10:29:54Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
673636
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|टिप्पणियाँ|२२९}}</noinclude>पण्डित मालवीयजी और अन्य लोगोंने विधान सभा छोड़ने में कोई जल्दी नहीं की है। किसी उच्चतर उद्देश्यके प्रति जैसी आस्था होनी चाहिए, वैसी ही आस्थासे वे तथाकथित विधानमण्डलसे चौथाई सदी तक चिपटे रहे और सो भी जनताकी ओरसे अकसर होनेवाले विरोधोंके बावजूद। संकटकी घड़ियोंमें उन्होंने सरकारकी महत्वपूर्ण सेवाएँ की । जितने दिनों तक पण्डित मालवीयजी ने दुर्लभ एकनिष्ठा के साथ सरकारकी सतत सेवा की है, उतने दिनों तक उसकी सेवा करनेवाला कोई भी भारतीय आज हमारे बीच नहीं रह गया है। इसलिए सरकारने एक ऐसा मित्र खो दिया है जैसा उसे फिर कभी प्राप्त नहीं हो सकेगा। आशा है, पण्डितजी और उनके साथी अब जनताके बीच वह काम करने में अपनी शक्ति लगायेंगे जो उनकी राह देख रहा है। और जैसा कि अन्य बहुत से लोगोंने देखा है, वे भी देखेंगे कि असली काम तो विधान मण्डलोंके बाहर ही किया जा सकता है। विधान मण्डल हितकर तो तभी होंगे जब उन्हें ऐसा रूप दिया जायेगा कि वे कुछ एक गुटों या वर्गोंके मतको नहीं, बल्कि सामान्य जनताके मलको वाणी देनेवाली संस्थाएँ बन जायेंगी। लेकिन। जब उन्हें केवल सरकारकी इच्छाको स्वीकार करानेका साधन बना दिया जाता है तब तो वे निश्चित रूपसे हानिकर ही होते हैं। इसलिए फिलहाल राष्ट्र सेवकोंको ऐसी शक्ति पैदा करनी है और ऐसा लोकमत तैयार करना है जिसकी अवहेलना न की जा सके।
{{C|{{larger|'''एक दुष्टतापूर्ण आक्षेप'''}}}}
एम० वी० उपाधि प्राप्त एक चिकित्साशास्त्री लिखते हैं:१
'लांसिट' के लेखकका आक्षेप निराधार और दुष्टतापूर्ण है। जब ऑपरेशन किया गया था तब मैं बेशक जेलमें था, लेकिन मेरे सामने यह विकल्प रखा गया था कि मैं चाहूँ तो अपने सर्जनसे ऑपरेशन करवा सकता हूँ। जिन ब्रिटिश सर्जनका उल्लेख किया गया है, वे थे कर्नल मैडॉक मुझे उनमें कोई अविश्वास नहीं था और मेरे काय चिकित्सक डॉ० जीवराज मेहता और शल्य चिकित्सक डॉ० दलाल चूंकि समय
पर नहीं पहुँच पाये, इसलिए मेरा ऑपरेशन कर्नल मैडॉकने ही किया। उन्होंने मेरा
जितना खयाल रखा, जितने मनोयोगपूर्वक मेरा उपचार किया उसके लिए में कई बार आभार व्यक्त कर चुका हूँ। मुझे तो ऊँबेसे ऊंचे दर्जेके भारतीय शल्य चिकित्सकों
<small>१. इसका अनुवाद यह नहीं दिया जा रहा है। पत्रलेखक गांधीजी को सूचित किया था कि लंदनसे प्रकाशित लांसिट नामक चिकित्साशास्त्र सम्बन्धी एक पत्रिकाने लिखा है कि राजनीतिक आन्दोलनकारी चाहे जो कह और भारत में चिकित्साशास्त्रको शिक्षाने चाहे जितनी प्रगति की हो, उसे ब्रिटेनके डाक्टरोंकी जरूरत रहेगी दी। पहा तक कि श्री गांधी भी, जिनका ऑपरेशन भारतीय चिकित्सा सेवाके एक अंग्रेजी शल्पचिकित्सक ने किया था, इस कथनको सचाईको स्वीकार करेंगे। यह सूचना देनेके बाद पत्र लेखकने कहा था कि यह तो सच है कि आप जब जेलमें थे तब पूनाके सिविल सर्जनने आपका ऑपरेशन किया था, किन्तु इसके पीछे मंशा यह सिद्ध करनेका दोलता है कि आपने अंग्रेज सर्जनको बेहतर मानकर उसीसे ऑपरेशन कराना पसन्द किया।</small><noinclude></noinclude>
17fjk8a0ixkfjt5shtbmm7888lxko8c
673637
673636
2026-08-24T10:30:19Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673637
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|२२९}}</noinclude>पण्डित मालवीयजी और अन्य लोगोंने विधान सभा छोड़ने में कोई जल्दी नहीं की है। किसी उच्चतर उद्देश्यके प्रति जैसी आस्था होनी चाहिए, वैसी ही आस्थासे वे तथाकथित विधानमण्डलसे चौथाई सदी तक चिपटे रहे और सो भी जनताकी ओरसे अकसर होनेवाले विरोधोंके बावजूद। संकटकी घड़ियोंमें उन्होंने सरकारकी महत्वपूर्ण सेवाएँ की । जितने दिनों तक पण्डित मालवीयजी ने दुर्लभ एकनिष्ठा के साथ सरकारकी सतत सेवा की है, उतने दिनों तक उसकी सेवा करनेवाला कोई भी भारतीय आज हमारे बीच नहीं रह गया है। इसलिए सरकारने एक ऐसा मित्र खो दिया है जैसा उसे फिर कभी प्राप्त नहीं हो सकेगा। आशा है, पण्डितजी और उनके साथी अब जनताके बीच वह काम करने में अपनी शक्ति लगायेंगे जो उनकी राह देख रहा है। और जैसा कि अन्य बहुत से लोगोंने देखा है, वे भी देखेंगे कि असली काम तो विधान मण्डलोंके बाहर ही किया जा सकता है। विधान मण्डल हितकर तो तभी होंगे जब उन्हें ऐसा रूप दिया जायेगा कि वे कुछ एक गुटों या वर्गोंके मतको नहीं, बल्कि सामान्य जनताके मलको वाणी देनेवाली संस्थाएँ बन जायेंगी। लेकिन। जब उन्हें केवल सरकारकी इच्छाको स्वीकार करानेका साधन बना दिया जाता है तब तो वे निश्चित रूपसे हानिकर ही होते हैं। इसलिए फिलहाल राष्ट्र सेवकोंको ऐसी शक्ति पैदा करनी है और ऐसा लोकमत तैयार करना है जिसकी अवहेलना न की जा सके।
{{C|{{larger|'''एक दुष्टतापूर्ण आक्षेप'''}}}}
एम० वी० उपाधि प्राप्त एक चिकित्साशास्त्री लिखते हैं:१
'लांसिट' के लेखकका आक्षेप निराधार और दुष्टतापूर्ण है। जब ऑपरेशन किया गया था तब मैं बेशक जेलमें था, लेकिन मेरे सामने यह विकल्प रखा गया था कि मैं चाहूँ तो अपने सर्जनसे ऑपरेशन करवा सकता हूँ। जिन ब्रिटिश सर्जनका उल्लेख किया गया है, वे थे कर्नल मैडॉक मुझे उनमें कोई अविश्वास नहीं था और मेरे काय चिकित्सक डॉ० जीवराज मेहता और शल्य चिकित्सक डॉ० दलाल चूंकि समय
पर नहीं पहुँच पाये, इसलिए मेरा ऑपरेशन कर्नल मैडॉकने ही किया। उन्होंने मेरा
जितना खयाल रखा, जितने मनोयोगपूर्वक मेरा उपचार किया उसके लिए में कई बार आभार व्यक्त कर चुका हूँ। मुझे तो ऊँबेसे ऊंचे दर्जेके भारतीय शल्य चिकित्सकों
<small>१. इसका अनुवाद यह नहीं दिया जा रहा है। पत्रलेखक गांधीजी को सूचित किया था कि लंदनसे प्रकाशित लांसिट नामक चिकित्साशास्त्र सम्बन्धी एक पत्रिकाने लिखा है कि राजनीतिक आन्दोलनकारी चाहे जो कह और भारत में चिकित्साशास्त्रको शिक्षाने चाहे जितनी प्रगति की हो, उसे ब्रिटेनके डाक्टरोंकी जरूरत रहेगी दी। पहा तक कि श्री गांधी भी, जिनका ऑपरेशन भारतीय चिकित्सा सेवाके एक अंग्रेजी शल्पचिकित्सक ने किया था, इस कथनको सचाईको स्वीकार करेंगे। यह सूचना देनेके बाद पत्र लेखकने कहा था कि यह तो सच है कि आप जब जेलमें थे तब पूनाके सिविल सर्जनने आपका ऑपरेशन किया था, किन्तु इसके पीछे मंशा यह सिद्ध करनेका दोलता है कि आपने अंग्रेज सर्जनको बेहतर मानकर उसीसे ऑपरेशन कराना पसन्द किया।</small><noinclude></noinclude>
2f7697mgjjdz4i4sstpww71cowdb84l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८५
250
197328
673653
673187
2026-08-24T11:21:30Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673653
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१७. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° प्रभावती,}}
तेरे पत्रका उत्तर मैं दे चुका हूँ। अब तो तुम दोनोंने बात कर ही ली होगी। मेरे आज ही पकड़े जानेकी अफवाह जोरों पर है; इसलिए मैं अधिक नहीं लिखता। ईश्वर तुम दोनोंका कल्याण करे, तुमको दृढ़ता प्रदान करे।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी° एन° ३३६४ ) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२१८. पत्र : रुक्मिणी बजाजको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° रुक्मिणी,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। मेरे पास लम्बा पत्र लिखनेका समय नहीं है। तू सुखी है, इसलिए मुझे सन्तोष है। वहाँ 'नवजीवन' आदि तो आते होंगे। रामदास जेल चला गया है। देवदास गिरफ्तार हो गया है। जमनालालजी, किशोरलालभाई जेल गये। ऐसे तो सैंकड़ों चले गये हैं। लोगोंके उत्साहकी कोई सीमा नहीं है।
जिस तरह दूधमें चीनी घुल-मिल जाती है उसी तरह मुझे विश्वास है, तू लोगोंसे घुल-मिल जायेगी।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी° एन° ९०४८) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{Dhr|8em}}
{{left|४३–१६}}</noinclude>
l7rffh12tb2ciy32iy6in9h5oabgyjg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८६
250
197329
673655
673191
2026-08-24T11:24:38Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673655
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१९. पत्र : जयसुखलाल गांधीको'''}}}}
{{right|दांडी<br>१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° जयसुखलाल,}}
मैं तुम्हारे पत्रकी बाट जोह रहा था। तुम्हें जो खुराक अनुकूल आई है वही खुराक औरोंको भी अनुकूल आयेगी इसे मैं मुश्किल मानता हूँ। तुम वहाँ पड़े-पड़े खादी तैयार करवाते रहो, यह भी एक महत्त्वपूर्ण काम है। जब मुझे तुमको नमक-यज्ञमें होम करनेकी जरूरत महसूस होगी, तब तुम्हें होम देने में मुझे तनिक भी देर नहीं लगेगी। रोज मेरे पकड़े जानेकी अफवाह उड़ती है, लेकिन मैं पकड़ा ही नहीं जाता।
वे लोग मुझे पकड़ें या न पकड़ें, मेरे लिए दोनों एक समान हैं। यह बात सच है कि शिवाभाई यहाँ 'सत्याग्रह समाचार' प्रकाशित करते हैं। मेरे खयालमें उसकी एक ही प्रति निकलती है और अन्तमें उसका सार-संक्षेप 'नवजीवन' में प्रकाशित तो होता ही है। उमिया जबसे अजमेर गई है तबसे उसने मुझे कोई पत्र नहीं लिखा। अब चूंकि उसे वहाँ रहनेकी आदत पड़ गई है इसलिए वह मुझे पत्र लिखनेकी जरूरत
महसूस नहीं करती। रुखी भी सुखी जान पड़ती है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|भाईश्री जयसुखलाल गांधी<br>खादी कार्यालय<br>छलाला<br>काठियावाड़}}
गुजराती (एम° एम° यू° ३–७३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२२०. पत्र : बनारसीलाल बजाजको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
{{left|चि° बनारसी,}}
तुमारे दोनों पत्र मीले भी। तुम दोनों खुश हो तो मुझे परम संतोष है। तुम दोनोंकी ईश्वर चिरायु करे और सेवा कार्यके लिए प्रेरित करे।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
सी° डब्ल्यू° ९३०२ से।
सौजन्य : बनारसीलाल बजाज<noinclude></noinclude>
hxuohzg2k66ssjptxmo0eln3iw76k2u
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८७
250
197330
673657
673193
2026-08-24T11:28:41Z
Kumari Arpana Sinha
2191
673657
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२१. भाषण: स्वयंसेवकोंके समक्ष'''}}}}
{{right|जलालपुर<br>१० अप्रैल, १९३०}}
आज सुबह अपने स्वयंसेवकोंके समक्ष बोलते हुए महात्मा गांधीने कहा कि जल्दी ही आपको कसौटीका समय आ रहा है। लेकिन गिरफ्तार होनेके लिए अधीरता नहीं दिखानी चाहिए। आपको पुलिसकी किसी कार्रवाईसे उत्तेजित होकर कोई भी जल्दबाजी भरा कदम नहीं उठाना चाहिए। अगर अधिकारीगण कहीं "अपना आपा खो बैठे और जनताको आतंकित करें" तो आपको वहाँ जाकर उन लोगोंके सामने धैर्य और शान्ति तथा अविचल भावसे कष्टसहनका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
आपसे मेरा यही अनुरोध है कि जिस ढंगसे जनरल डायरने समूचे राष्ट्रका अपमान किया, वैसा अपमान बरदाश्त करनेके बजाय आप मर मिटनेको तैयार रहें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल, ११-४-१९३०'''|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{c|{{larger|'''२२२. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको'''}}}}
{{right|१० अप्रैल, १९३०}}
आटमें दिये मेरे भाषणकी 'टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्टकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया गया है। इसमें तो कुटिलतापूर्वक भाषणको तोड़-मरोड़कर छापा गया है। मैंने देखा कि एक व्यक्तिसे पुलिसके पांच जवान नमक छीननेकी कोशिश कर रहे हैं और उस छीना-झपटीमें उस व्यक्तिकी कलाईपर कुछ चोट आ गई है। इसपर मैंने कहा कि सत्याग्रहियों द्वारा उठाया गया नमक भारतकी प्रतिष्ठाका प्रतीक है और सत्याग्रहियोंसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने प्राण देकर भी उसकी प्रतिष्ठाकी रक्षा करेंगे। मैंने कहा कि लोग तबतक नमकको अपने-अपने हाथोंसे अलग न होने दें जबतक कि वे अपने साथ की जानेवाली जोर-जबरदस्तीको बरदाश्त कर सकें और यदि पुलिसकी मार-पीटके कारण इन अरक्षित और निरीह लोगोंके शरीरसे खून भी वह चले तो वे इसकी परवाह न करें। मैंने आगे यह भी कहा कि इस प्रकार नमक छीने जानेका विरोध करते हुए लोगोंको मनमें कोई दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए और न उन्हें क्रोधित ही होना चाहिए। मैंने उन्हें गाली-गलौज भी न करने की सलाह दी। अनावश्यक चोटोंसे बचनेके लिए मैंने उन्हें यह सलाह दी कि वे अपने हाथमें मुट्ठी भर ही नमक लें, जिसे वे अपनी मुट्ठीमें बांधकर रख सकें। मैंने स्त्रियों और बच्चोंको भी, अगर उनमें साहस हो तो, इस संघर्षमें भाग लेनेके<noinclude></noinclude>
haabe96xpwuriihgrjlz03jwz58pw5c
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५३३
250
197576
673530
670105
2026-08-24T05:14:30Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
673530
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{Multicol}}
{{c|{{larger|'''शीर्षक सांकेतिका'''}}}}
{{Outdent|अपील: भारतके नौजवानोंसे, २६७}}
{{Outdent|अपीलका मसविदा: गुजरातकी महिलाओंसे अपीलका मसविदा, ३५५}}
{{Outdent|टिप्पणी: जे॰ बी॰ पेनिगटनके पत्रपर, ४१८; -[णियाँ], ११०-१३, १४३-४४, १७३-७५, १९८-९९, २२८-३०, ३००, ३५८-५९, ३८२-८५, ४०३; -साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें, १३-१४}}
{{Outdent|तार: एन॰ आर॰ मलकानीको, २९४; -एन॰ सी॰ केलकरको, २४७; -जवाहरलाल नेहरूको, २३; -जॉन हेनीज होम्सको, २६; -भवानीदयाल संन्यासी-को, ५२; -मोतीलाल नेहरूको, २६६, २७०, २९३, ४०७}}
{{Outdent|(दो) पत्र: १-२}}
{{Outdent|पत्र: अब्दुल कादिर बावजीरको ११९; -अब्बास तैयबजीको ९०, २३८, ३३६, ३८९; -अमीना कुरैशीको, ३७६, ४५१; -अमीना तैयबजीको २१८, ३६४; -आर॰ वी॰ मार्टिनको, ४५७-५८; -आश्रमके बालकोंको, ४२७; -ई॰ ई॰ डॉयलको, ४२२-२३, ४५५-५६; -ए॰ सुब्बारावको, ३४१; -क॰ मा॰ मुन्शीको २९५, ३०५-६; -कपिल-राय मेहताको १७८; -कमला नेहरूको, ४७४; -कलावती त्रिवेदीको २१७, ४५३, ४६५, ४६७; -कस्तूरबा गांधी-को, ४२८; -कुसुम देसाईको ७३, ७९, ९४, ११९, १२४-२५, २६८-६९, ३९४, ४३०; -गंगादेवी सनाढ्य-को, ११८; -गंगाबहन झवेरीको, ७२, ४४८; -गंगाबहन वैद्यको ९६, १७१,}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}२९६, ३१३, ३७३, ३७४, ४२६-२७, ४३४, ४५३, ४७४; -गुलाम रसूल कुरैशीको, २६५; -गोमती मशरुवालाको, ४४८; -घनश्यामदास बिड़लाको, २३६; -चन्द्रशंकर शुक्लको, ४४३; -चिमनलालको, २५१; -जमना-दास गांधीको ३०५, ३३९; -जमना-बहन गांधीको, ४४६; -जयप्रकाश नारायणको, ९६; -जयसुखलाल गांधीको, २३, २४२; -जवाहरलाल नेहरुको, २५, ५१-५२, ७१, १०७, १६५-६६; -जानकीदेवी बजाजको, ३९५, ४४५; -जे॰ सी॰ कुमारप्पाको, ३९६; -डा॰ प्राणजीवनदास मेहताको, ४४९; -डा॰ सैयद महमूदको ४१२-१३; -डोरोथी डि’सूवाको, ३३६; -तहमीना सम्भाताको, २४; -दुर्गा गिरिको, ८५; -नरहरि परीखको, ३६६, ३६७-६८, ३७२, ३७३, ३८९-९०, ३९५, ४३५; -नानुभाई दवेको, २५४; -नारणदास गांधीको, ६९, ८२, ९१, ९५, ११०, १९१-९२, २०८, २१४, २३८, २४८-४९, २८६-८७, २९५, ३०४, ३१७, ३१९, ३३८, ३४१, ३४२, ३९७, ४२४-२५,४३९-४०, ४४४-४५,
४६२-६४, ४७१-७३; -निर्मला गांधी-को, ४४६; -पद्मावती को, ४१३; -पी॰ जी॰ मैथ्यूको, ४५४; -पुंजाभाईको, २५; -पुरुषोत्तम गांधीको, ३९३, ४६९; -पैट्रिक क्विनको, ४५४, ४५६, ४६०, ४६१-६२, ४६५; -प्रभावतीको, ९४, २१४, २४१, ४३६, ४६६; -प्रेमलीला ठाकरसीको, ४३५-३६; -प्रेमावहन}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
rvjjnycw3i91yvn4it9t72qaleh6nxw
673531
673530
2026-08-24T05:15:05Z
अँजली चौधरी
2439
673531
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''शीर्षक सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{Outdent|अपील: भारतके नौजवानोंसे, २६७}}
{{Outdent|अपीलका मसविदा: गुजरातकी महिलाओंसे अपीलका मसविदा, ३५५}}
{{Outdent|टिप्पणी: जे॰ बी॰ पेनिगटनके पत्रपर, ४१८; -[णियाँ], ११०-१३, १४३-४४, १७३-७५, १९८-९९, २२८-३०, ३००, ३५८-५९, ३८२-८५, ४०३; -साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें, १३-१४}}
{{Outdent|तार: एन॰ आर॰ मलकानीको, २९४; -एन॰ सी॰ केलकरको, २४७; -जवाहरलाल नेहरूको, २३; -जॉन हेनीज होम्सको, २६; -भवानीदयाल संन्यासी-को, ५२; -मोतीलाल नेहरूको, २६६, २७०, २९३, ४०७}}
{{Outdent|(दो) पत्र: १-२}}
{{Outdent|पत्र: अब्दुल कादिर बावजीरको ११९; -अब्बास तैयबजीको ९०, २३८, ३३६, ३८९; -अमीना कुरैशीको, ३७६, ४५१; -अमीना तैयबजीको २१८, ३६४; -आर॰ वी॰ मार्टिनको, ४५७-५८; -आश्रमके बालकोंको, ४२७; -ई॰ ई॰ डॉयलको, ४२२-२३, ४५५-५६; -ए॰ सुब्बारावको, ३४१; -क॰ मा॰ मुन्शीको २९५, ३०५-६; -कपिल-राय मेहताको १७८; -कमला नेहरूको, ४७४; -कलावती त्रिवेदीको २१७, ४५३, ४६५, ४६७; -कस्तूरबा गांधी-को, ४२८; -कुसुम देसाईको ७३, ७९, ९४, ११९, १२४-२५, २६८-६९, ३९४, ४३०; -गंगादेवी सनाढ्य-को, ११८; -गंगाबहन झवेरीको, ७२, ४४८; -गंगाबहन वैद्यको ९६, १७१,}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}२९६, ३१३, ३७३, ३७४, ४२६-२७, ४३४, ४५३, ४७४; -गुलाम रसूल कुरैशीको, २६५; -गोमती मशरुवालाको, ४४८; -घनश्यामदास बिड़लाको, २३६; -चन्द्रशंकर शुक्लको, ४४३; -चिमनलालको, २५१; -जमना-दास गांधीको ३०५, ३३९; -जमना-बहन गांधीको, ४४६; -जयप्रकाश नारायणको, ९६; -जयसुखलाल गांधीको, २३, २४२; -जवाहरलाल नेहरुको, २५, ५१-५२, ७१, १०७, १६५-६६; -जानकीदेवी बजाजको, ३९५, ४४५; -जे॰ सी॰ कुमारप्पाको, ३९६; -डा॰ प्राणजीवनदास मेहताको, ४४९; -डा॰ सैयद महमूदको ४१२-१३; -डोरोथी डि’सूवाको, ३३६; -तहमीना सम्भाताको, २४; -दुर्गा गिरिको, ८५; -नरहरि परीखको, ३६६, ३६७-६८, ३७२, ३७३, ३८९-९०, ३९५, ४३५; -नानुभाई दवेको, २५४; -नारणदास गांधीको, ६९, ८२, ९१, ९५, ११०, १९१-९२, २०८, २१४, २३८, २४८-४९, २८६-८७, २९५, ३०४, ३१७, ३१९, ३३८, ३४१, ३४२, ३९७, ४२४-२५,४३९-४०, ४४४-४५,
४६२-६४, ४७१-७३; -निर्मला गांधी-को, ४४६; -पद्मावती को, ४१३; -पी॰ जी॰ मैथ्यूको, ४५४; -पुंजाभाईको, २५; -पुरुषोत्तम गांधीको, ३९३, ४६९; -पैट्रिक क्विनको, ४५४, ४५६, ४६०, ४६१-६२, ४६५; -प्रभावतीको, ९४, २१४, २४१, ४३६, ४६६; -प्रेमलीला ठाकरसीको, ४३५-३६; -प्रेमावहन}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
b2mwtswqrhcgxakataibzjh7ygtgqpj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२
250
197621
673288
670331
2026-08-23T12:51:24Z
Juhi1986
6803
/* शोधित */
673288
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''पाठकोंको सूचना'''}}}}
हिन्दीकी जो सामग्री गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मिली है उसे अविकल रूपमें दिया गया है। किन्तु दूसरों द्वारा सम्पादित उनके भाषण अथवा लेख आदिमें हिज्जोंकी स्पष्ट भूलोंको सुधारकर दिया गया है।
अंग्रेजी और गुजरातीसे अनुवाद करनेमें अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा प्रयत्न किया गया है, किन्तु साथ ही भाषा सुपाठ्य बनानेका भी पूरा ध्यान रखा गया है। छापेकी स्पष्ट भूलें सुधारनेके बाद अनुवाद किया गया है। और मूलमें
प्रयुक्त शब्दोंके संक्षिप्त रूप यथासम्भव पूरे करके दिये गये हैं। नामोंको सामान्य उच्चारणके अनुसार ही लिखनेकी नीतिका पालन किया गया है। जिन नामोंके उच्चारणमें संशय था उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने गुजराती
लेखोंमें लिखा है।
मूल सामग्रीके बीच चौकोर कोष्ठकोंमें दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजीने किसी लेख, भाषण आदिका जो अंश मूल रूपमें उद्धृत किया है, वह हाशिया छोड़कर गहरी स्याहीमें छापा गया है, लेकिन यदि कोई ऐसा अंश उन्होंने अनूदित करके दिया है तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़कर साधारण टाइपमें छापा गया है। भाषणकी परोक्ष रिपोर्ट तथा वे शब्द जो गांधीजीके कहे हुए नहीं हैं, बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याहीमें छापे गये हैं। भाषणों और भेंटकी रिपोर्टके उन अंशोंमें जो गांधीजीके नहीं हैं, कुछ परिवर्तन किया है और कहीं-कहीं कुछ छोड़ भी दिया गया है।
शीर्षककी लेखन-तिथि जहाँ उपलब्ध है वहाँ दायें कोनेमें ऊपर दे दी गई है। परन्तु जहाँ वह उपलब्ध नहीं है वहाँ उसकी पूर्ति अनुमानसे चौकोर कोष्ठकोंमेंकी गई है, और आवश्यक होनेपर उसका कारण स्पष्ट कर दिया गया है। जिन पत्रोंमें केवल मास या वर्षका उल्लेख है उन्हें आवश्यकतानुसार मास या वर्षके अन्तमें रखा गया है। शीर्षकके अन्तमें साधन-सूत्र के साथ दी गई तिथि प्रकाशन की है। गांधीजीकी सम्पादकीय टिप्पणियाँ और लेख, जहाँ उनकी लेखन-तिथि उपलब्ध है अथवा जहाँ किसी दृढ़ आधार पर उसका अनुमान किया जा सका है, वहाँ लेखन-तिथिके अनुसार और जहाँ ऐसा सम्भव नहीं हुआ वहाँ उनकी प्रकाशन-तिथिके अनुसार दिये गये हैं।
साधन-सूत्रोंमें 'एस॰ एन॰' संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें उपलब्ध सामग्रीका, 'जी॰ एन॰' गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्लीमें उपलब्ध कागज पत्रोंका, 'एम॰ एम॰ यू॰' गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली में उपलब्ध मोबाइल माइक्रोफिल्म यूनिटकी रीलोंका, तथा 'सी॰ डब्ल्यू॰' सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) द्वारा संगृहीत पत्रोंका सूचक है।
सामग्रीकी पृष्ठभूमि देनेके लिए मूलसे सम्बद्ध कुछ परिशिष्ट भी दिये गये हैं। अन्तमें साधन-सूत्रोंकी सूची और इस खण्डसे सम्बन्धित कालकी तारीखवार घटनाएँ दी गई हैं।<noinclude></noinclude>
sohofcd7hls5y5pg8t2msrtzx6lurxr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३
250
197622
673291
670332
2026-08-23T12:54:39Z
Juhi1986
6803
/* अशोधित */
673291
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Juhi1986" /></noinclude>विषय-सूची
भूमिका
आभार
पाठकोंको सूचना
१. पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०)
२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०)
३. पत्र : गंगाबह्न झवेरीको (३-७-१९३०)
४. पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०)
५. पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०)
६. पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०)
७. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०)
८. पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०)
९. पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३० )
१०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०)
११. पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०)
१२. पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०)
१३. पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०)
१४. पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०)
१५. पत्र : भगवानजी पण्डयाको (७-७-१९३०)
१६. पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०)
१७. पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०)
१८. पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०)
१९. पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०)
२०. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०)
२१. पत्र : शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०)
२२. पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०)
२३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०)
२४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०)
२५. पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०)
२६. पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०)
२७. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०)
२८. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०)
पृष्ठ
पाँच
पन्द्रह
सोलह<noinclude></noinclude>
44kxxirhziy2rqui2u60ma3g9c56qwh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७३
250
197672
673269
673236
2026-08-23T12:07:18Z
Koyal Singh
6351
673269
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५३. पत्र : पैट्रिक क्विनको'''}}
{{Right|[ २० जुलाई, १९३० ]<sup>१</sup>}}
{{Left|प्रिय श्री क्विन,}}
क्या आप कृपया २ पौंड खजूर और २ पौंड किशमिश मँगवा देंगे?
{{Right|हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''महात्मा गांधी : सोर्स मैटेरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,''' खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८५
{{c|'''५४. पत्र : रतिलाल शाहको'''}}
{{Right|२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाईश्री ५ रतिलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। घटना दुःखद है किन्तु यह सिलसिला तो चलता ही रहता है। मैं तो इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि हमने अकारण ही मृत्युको दुःखका विषय मान लिया है। जिस प्रकार अन्य प्राकृतिक क्रियाएँ आवश्यक और लाभदायक हैं वैसी ही यह क्रिया भी है। अतः आत्माके अस्तित्व या उसके गुणोंको स्वीकार न करनेवालेके लिए भी मृत्युसे डरनेका कोई कारण नहीं है। और जो व्यक्ति आत्मा और उसकी अमरतामें विश्वास रखता है, उसके बारेमें तो कहना ही क्या ? बहन जबकन्ने जिस देहका उपयोग पूरा हो चुका था उसका त्याग किया इसलिए हमें इसे दुःखद बात नहीं माननी चाहिए।
पढ़ने और मनन करने लायक बहुत पुस्तकें दुनियामें मुझे नहीं मिलीं। मेरे लिए 'गीता' और तुलसीदास ही काफी हैं और आधुनिक लेखकोंमें रायचन्दभाई के लेख। किन्तु यदि कोई नई चीज पढ़नेकी इच्छा हो तो किशोरलालका 'जीवन-शोधन' देख जाना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४६५८) से। सौजन्य : नारणदास गांधी; जी० एन० ७१६४ की फोटो-नकलसे भी।
<small>१. साधन-सूत्रमें इस पत्रको जिस क्रममें रखा गया है, उसपरसे इसकी तिथि निर्धारित की गई है।</small><noinclude></noinclude>
d0la73s83m4wducqrl3ys048u7dfhmu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७४
250
197673
673271
670385
2026-08-23T12:12:09Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673271
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५५. पत्र : पुरुषोत्तम डी० सरैयाको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० काकू,}}
तूने कहीं पत्र न लिखनेकी प्रतिज्ञा तो नहीं ले ली? या मेरे पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा है। तू खूब बच निकला। किन्तु शायद भगवान तुझसे और भी अच्छा काम लेना चाहता होगा। यदि हम तत्परायण रहें तो समझना चाहिए कि हमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। तू मुझे लिखेगा तो मुझे और काकासाहब दोनोंको प्रसन्नता होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८०५) से। सौजन्य : पी० डी० सरैया
{{c|'''५६. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाई रामेश्वरदास,}}
हम दोनोंके नाम लिखा आपका पत्र मिला। आप यथाशक्ति सेवा करते जा रहे हैं, बस इतना ही पर्याप्त है। उससे और अधिक शक्ति उत्पन्न होगी। यदि रामनामको कण्ठसे हृदयमें उतार लें तो असन्तोष मिट जायेगा।
{{Right|बापू तथा काकाके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २१७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
7dhrkrdw2aqkikbdciqeqfp9j10qyxo
673272
673271
2026-08-23T12:12:49Z
Koyal Singh
6351
673272
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५५. पत्र : पुरुषोत्तम डी० सरैयाको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० काकू,}}
{{Gap}}तूने कहीं पत्र न लिखनेकी प्रतिज्ञा तो नहीं ले ली? या मेरे पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा है। तू खूब बच निकला। किन्तु शायद भगवान तुझसे और भी अच्छा काम लेना चाहता होगा। यदि हम तत्परायण रहें तो समझना चाहिए कि हमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। तू मुझे लिखेगा तो मुझे और काकासाहब दोनोंको प्रसन्नता होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८०५) से। सौजन्य : पी० डी० सरैया
{{c|'''५६. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२० जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाई रामेश्वरदास,}}
हम दोनोंके नाम लिखा आपका पत्र मिला। आप यथाशक्ति सेवा करते जा रहे हैं, बस इतना ही पर्याप्त है। उससे और अधिक शक्ति उत्पन्न होगी। यदि रामनामको कण्ठसे हृदयमें उतार लें तो असन्तोष मिट जायेगा।
{{Right|बापू तथा काकाके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २१७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
r6hn7m46rv9nf78gjazn97mra58c8vs
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७५
250
197674
673275
670386
2026-08-23T12:20:24Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673275
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५७. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर
२१ जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय कुमारप्पा,}}
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारे भाई जब लौटें तो उन्हें पहले विद्यापीठ आकर सब-कुछ खुद देख-समझ लेना चाहिए। उसके बाद वह निर्णय लेनेको स्वतन्त्र हैं, लेकिन उससे पहले नहीं। उनके बारेमें कराड़ीसे भेजा गया मेरा पत्र तुम्हें मिल गया था कि नहीं ? जब वह आवें तो उनसे मेरा प्यार कहना। और अपनी बहनको पत्र लिखो तो उन्हें मेरी याद दिला देना।
'बोड़सो' शब्द 'बोड़सो' का तमिलमें विकृत रूप है।<br>
:हम दोनोंकी ओरसे प्यार सहित,
{{Right|तुम्हारा,
बापू}}
{{Left|[ पुनश्च : ]}}
हाँ, तुम्हारी पुस्तक यथासमय मिल गई थी। धन्यवाद।
अंग्रेजी (जी० एन० १००८७) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''५८. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० मनु (त्रिवेदी),}}
मगनभाईने तेरे बारेमें पूरे समाचार दिये हैं, जिसे पढ़कर हम दोनोंको प्रसन्नता हुई। भगवान तुझे स्वस्थ रखे और तेरे सेवाभावमें दिन-दिन वृद्धि करे। मैं यह बात भूला नहीं हूँ कि तू मेरे लिए ताजे अंगूर लाया करता था। जब पिताजीको पत्र लिखे तो उन्हें लिखना कि उनके बहुतसे मधुर संस्मरण मेरी स्मृतिमें हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ७३५८) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
q5185izx24rjefklqtephlw8u4wu0xe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७६
250
197675
673282
670387
2026-08-23T12:35:58Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673282
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''५९. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>२१जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० भगिनी,}}
तुम्हारे दो खत एक साथमें मिले हैं।
कई भक्तोंकी परीक्षा बहोत कड़ी रहती है। तुम्हारी परीक्षा भगवान ऐसे हि ले रहा है। परंतु साथ साथ सहन करनेका बल भी देता है यह उसकी कृपा है। अब अरुण <sup>१</sup> कैसे है ? तारीणी और चारुकी प्रकृतिमें कुछ अच्छा मालूम होता है क्या ? सोदपुरमें कितने आदमी काम करते हैं। ईश्वरका इतना अनुग्रह है कि क्षितिशबाबू <sup>२</sup> तुम्हारे साथ है और ईश्वरने उनको शरीर अच्छा दिया है मन दृढ़ बनाया है। डाक्टर रॉयका भी तो सहारा है हि। दोनोंको मेरे वंदेमातरम दे दो।
सतीशबाबूको खानेमें दूध इ० मिलता है ? सोने बैठनेका सुभिता है ? सब हाल लिखो।
ईश्वर तुम्हें आरोग्य, शांति, और धैर्य देवे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
जी० एन० १६६८ की फोटो-नकलसे।
{{c|'''६०. तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको'''<sup>३</sup>}}
{{Right|[ यरवडा सेंट्रल जेल
२२ जुलाई, १९३० ]<sup>४</sup>}}
तारके लिए धन्यवाद। आश्वस्त रहिए, मैं भरसक कोशिश करूँगा। 'प्रकाश' की प्रार्थना कर रहा हूँ। सप्रेम।
[ अंग्रेजीसे ]
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स,''' ७५० (५६), पृष्ठ २१
<small>१. हेमप्रभा दासगुप्तका सबसे छोटा और एकमात्र जीवित बालक।
२. सतीशचन्द्र दासगुप्तके छोटे भाई।
३. श्रीनिवास शास्त्रीने गांधीजीको तार देकर अनुरोध किया था कि वह सप्रू और जयकरके मध्यस्थताके प्रस्तावपर सहानुभूतिसे विचार करें।
४. गांधीजीको भेजे गये उक्त तारके ठीक नीचे दी गई एक टिप्पणीके अनुसार इस तारके साथ भेजे गये मेजर बॉफके पत्रपर २२ जुलाई, १९३० तारीख थी; देखिए अगला शीर्षक भी।</small><noinclude></noinclude>
4maaeuqm5atgumi71gon7xge07qp847
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७७
250
197676
673332
670388
2026-08-23T14:38:56Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673332
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''६१. पत्र : जी० ए० नटेसनको'''}}
{{Right|यरवडा सेंट्रल जेल
२२ जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
मुझे आपका पत्र और उसके साथ संलग्न कागजात दे दिये गये हैं। धन्यवाद। आप विश्वास रखें कि मैं भरसक जो हो सकेगा करूँगा। मुझे शास्त्रीवरका एक तार मिला था। मैं प्रकाशकी प्रार्थना कर रहा हूँ लेकिन इस अभेद्य अंधकारमें एक किरण भी नहीं दिखाई पड़ती।
{{Right|हृदयसे आपका,<Br>
मो० क० गांधी}}
श्रीयुत जी० ए० नटेसन <Br>
'इंडियन रिव्यू'<Br>
जॉर्ज टाउन <Br>
मद्रास}}
अंग्रेजी (जी० एन० २२३६) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''६२. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
{{Right|१८/२२ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
तुम्हारा पुलिन्दा कल मिला। इतने पत्र हलके लिफाफेमें नहीं आ सकते। सारा लिफाफा कट गया था। तुम या तो कपड़ेका लिफाफा इस्तेमाल करो या पत्र टिकटों के लिहाजसे चौड़ा हो तो भी चारों ओर डोरीसे अच्छी तरह बाँध दो ताकि पत्र डोरीको तोड़े बिना निकलें ही नहीं।
रुई आखिर १६ तारीखको मिली। किन्तु कोई कठिनाई नहीं हुई।
प्रभुदास और मुन्नालालके पत्रमें प्रार्थनाके शुष्क होनेका उल्लेख है। क्या बालकृष्ण भजन नहीं गाता? 'गीता' या किसी दूसरे विषयपर तुममें से कोई कुछ नहीं कह सकता? बालकृष्ण निश्चय करे तो कर सकता है। अनिवार्य हो तो सिर्फ संस्कृत श्लोकोंका पाठ करके ही काम चलायें। किन्तु सम्भव हो तो और कुछ शुरू तो करना ही चाहिए; या गुजरातीसे ही कुछ पढ़ा जाये। पहले प्रभुदास और मुन्नालालके साथ<noinclude></noinclude>
cm7s2ojg4ns4ckc0noav04106pr2l0g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७८
250
197677
673363
670389
2026-08-23T16:14:39Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673363
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|४०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
चर्चा करना, बालकृष्ण से बात करके जो ठीक लगे वह करना। मैं मानता हूँ कि तुम्हारे पास इसका विचार करने का तनिक भी समय नहीं है। ऐसा होते हुए भी सुझाव दे देता हूँ। जो सम्भव हो वह करना।
भरवाड़ लोगों को अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
१९ जुलाई, १९३०
इस पत्र का अधिकांश हमारे सारे समाज के लिए होता है इसलिए इसकी बातें अलग पत्रों में नहीं देता। ऐसी एक बात काकासाहब का आशीर्वाद है। सभी पत्रों में वह है, ऐसा सभी लोग समझें। काकासाहब को सबका प्रणाम तो पहुँचता ही है क्योंकि वे सब पत्र पढ़ते हैं और सब पत्रों में उनका नाम जरूर होता है। यह देख कर कि हमारे समाज में विनय है और उसका अनुभव करके हम दोनों आनन्दित होते हैं।
दैनिक-दिनचर्या का विचार करने पर देखता हूँ कि मेरे लिए तो वह एक अमूल्य वस्तु बन गई है। जो सत्य की आराधना करता है उसके लिए वह चौकीदार सिद्ध होती है, क्योंकि उसमें सत्य ही लिखना है। आलस किया हो तो उसका उल्लेख किये बिना छुटकारा नहीं। काम कम किया हो तो वह लिखे बिना छुटकारा नहीं। इस तरह वह अनेक प्रकार से सहायक बन गई है। इससे सब उसकी कीमत समझें, यह आवश्यक है। नियमित रूप से उसे लिखना शुरू करने पर हमें अपने-आप सूझता है कि उसे किस तरह लिखें। एक शर्त जरूर है कि हमें सच्चा बनना है। यदि ऐसा न हो तो दैनिक-दिनचर्या खोटे सिक्के की तरह हो जाती है। यदि उसमें सत्य ही लिखा हो तो वह सोने की मुहर से भी कीमती है।
६० नम्बर का पत्र श्रीमती जोलिगर¹ का है, उसे पढ़ लेना। उस बहन को क्या परेशानी है, यह मालूम करना।
तुम्हें पत्रों की सूची बनानी पड़ती है। देखता हूँ उसमें तकलीफ तो है ही। यदि उसमें बहुत समय लगता हो तो छोड़ देना। सिर्फ संख्या दे देना ही काफी है। आसानी से सूची बन सके तो बना देना।
मुलाकातों के लिए अभी तो मनाही ही करनी है। इसका कारण मीराबहन को लिखे पत्रों में देखोगे। यहाँ दोबारा नहीं लिखता। पत्र भी न लिख सकें तो कैसे चले? आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए न लिख सकें तो वह भी छोड़ दें। भक्ति का पथ कठिन है, पर हमारे सामने तो दूसरा मार्ग है ही नहीं।
पत्रों की संख्या बढ़ रही है, उसकी चिन्ता नहीं। जो लिखना चाहे उसे अपनी इच्छानुसार लिखने देना। जेल के नियमों की मर्यादा का पालन हो, इतना ही काफी है। राजनीतिक प्रश्नों की चर्चा न हो, मुझसे उस बारे में कुछ न पूछें। सबको खबर देने में न हानि है, न होगी।
डा० हरिभाई को कहना कि उनको कई बार याद करता हूँ। डा० कानूगा अब बिल्कुल ठीक हो गये होंग?
१. आश्रम में रहनेवाली स्विट्जरलैंड की एक महिला।
2.<noinclude></noinclude>
ppzdy3zjbdgf1s2nbc7lry9hx6jeoo7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७९
250
197678
673384
670390
2026-08-23T16:45:14Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673384
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र:नारणदास गांधीको|
४१|}}
{{Right|२२ जुलाई, १९३०<br>
सुबहकी प्रार्थनाके बाद}}
विश्वनाथके पत्रमें सुझाव है कि मुझे हर सप्ताह थोड़ासा प्रवचन प्रार्थनाके समय पढ़ा जानेके लिए भेजना चाहिए। विचार करनेपर मुझे उसकी यह माँग उचित लगी है। प्रार्थनाके समय थोड़ी और चेतनता डाल देनेमें यह मेरा योगदान मानना। दूसरे छः दिनोंके लिए भी पढ़ने लायक कुछ भेजा जा सकता हो तो भेजनेकी योजना काकाके साथ बना रहा हूँ। यह तो इस सप्ताहके लिए है।<sup>१</sup>
हमारी संस्थाके मूलमें सत्यका आग्रह है इसलिए पहले सत्यको ही लेता हूँ।
'सत्य' शब्द सत्से बना है। सत् अर्थात् होना। सत्य अर्थात् अस्तित्व। सत्यके सिवा दूसरी किसी चीजकी हस्ती हो ही नहीं। परमेश्वरका सच्चा नाम ही 'सत्' अर्थात् 'सत्य' है। इसलिए ईश्वर 'सत्य' है, ऐसा कहनेके बदले 'सत्य' ही ईश्वर है, यह कहना ज्यादा योग्य है। राजसत्ताके बिना या सरदारके बिना हमारा काम चलता नहीं, इसलिए ईश्वर नाम ज्यादा प्रचलित है और रहेगा। किन्तु विचार करके देखें तो 'सत्' या 'सत्य' यही ठीक नाम है और वही पूर्ण अर्थका सूचक है।
और जहाँ सत्य है वहाँ ज्ञान, शुद्ध ज्ञान है ही। जहाँ सत्य नहीं, वहाँ शुद्ध ज्ञान सम्भव नहीं। इसलिए ही ईश्वरके नामके साथ चित् अर्थात् ज्ञान शब्द जोड़ा है। और जहाँ सच्चा ज्ञान है वहाँ आनन्द ही होगा। शोक हो ही नहीं सकता। और सत्य शाश्वत है तो आनन्द भी शाश्वत होगा। इसीसे हम ईश्वरको सच्चिदानन्द (सत्-चित्-आनन्द) के नामसे भी पहचानते हैं।
हमारा अस्तित्व ही सत्यकी आराधनाके लिए है। हमारे प्रत्येक कामका वही कारण हो, हमारे प्रत्येक साँस लेनेका वही कारण हो, ऐसा करना सीख लें, तो दूसरे सभी नियम आसानीसे हमारे हाथ आ जायँ और उनका पालन भी आसान हो जाये। सत्यके बिना किसी भी नियमका शुद्ध पालन असम्भव है।
सामान्य तौर पर सत्य अर्थात् सत्य बोलना इतना ही हम समझते हैं। किन्तु हमने सत्य शब्दका विस्तृत अर्थ लिया है। सत्य वही है जिसका पालन विचार, वाणी और आचारमें करें। इस सत्यको सम्पूर्ण रूपमें समझ लेनेवालेके लिए संसारमें और कुछ जाननेके लिए नहीं रहता, क्योंकि हमने ऊपर देखा है कि ज्ञानमात्र उसमें समाया हुआ है। उसमें जो नहीं समाता वह सत्य नहीं, ज्ञान नहीं, फिर उसमें सच्चा आनन्द हो भी कहाँसे? इस कसौटी पर परखना सीख लें तो हमें फौरन मालूम पड़ जायेगा कि कौन-सी प्रवृत्ति ग्रहण करने योग्य है और कौन-सी त्याज्य। क्या देखने योग्य है, क्या नहीं? क्या पढ़ने लायक है, क्या नहीं?
किन्तु सत्य जो पारसमणि-जैसा है, जो कामधेनु-जैसा है, वह कैसे मिले? उसका जवाब भगवानने दिया है : अभ्यास और वैराग्यसे। सत्यकी ही लगन, यही अभ्यास
<small>१. इन प्रवचनोंका अनुवाद गांधीजी द्वारा पुनः सम्पादित '''नवजीवन''' प्रकाशनकी पुस्तिका '''मंगल-प्रभात'''से लिया गया है।</small><noinclude></noinclude>
50sfj8erorei19c5kodupwhf7bhuasd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८०
250
197679
673399
670391
2026-08-23T17:06:22Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673399
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
है। उसके बिना दूसरी सभी चीजोंके प्रति अतीव उदासीनता, यही वैराग्य है। ऐसा होते हुए भी हम देखते हैं कि जो एकके लिए सत्य है वही दूसरेके लिए असत्य है। उससे घबरानेका कोई कारण नहीं है। जहाँ शुद्ध प्रयत्न है वहाँ विभिन्न दिखाई देनेवाले सभी सत्य एक ही वृक्षके अलग-अलग दिखनेवाले असंख्य पत्तोंके समान हैं। ईश्वर भी क्या प्रत्येक मनुष्यको भिन्न नहीं दिखाई देता? तो भी वह एक ही है, यह हम जानते हैं। किन्तु सत्य ईश्वरका ही नाम है, इसलिए जिसे जो सत्य लगे उसीके अनुसार वह व्यवहार करे तो उसमें दोष नहीं है। इतना ही नहीं, बल्कि यही कर्तव्य है। फिर ऐसा करते हुए भूल हो तो वह भी सुधार ही जायेगी, क्योंकि सत्यकी शोधके पीछे तपश्चर्या होगी। इसलिए स्वयं दुख-सहन करना होगा; उसके लिए प्राण देने होंगे। इसलिए उसमें स्वार्थकी तो गन्ध भी न होगी। ऐसी निःस्वार्थ शोध करते हुए आज तक कोई अन्त तक उलटे मार्ग पर नहीं गया। उलटे मार्ग गया कि ठोकर लगी। इसलिए वह फिर सीधे मार्गकी ओर बढ़ जाता है। इसीलिए सत्यकी आराधना ही भक्ति है। और भक्ति "सिरका सौदा" है; वह तो हरिका मार्ग है और उसमें कायरताका स्थान नहीं, उसमें हारने जैसी कोई बात ही नहीं। वह तो मरकर जीनेका मन्त्र है।
किन्तु अब हम अहिंसाके किनारे आ पहुँचे हैं। इसका विचार अगले सप्ताह करेंगे।
इस मौके पर हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, रामचन्द्र, इमाम हसन और हुसैन, ईसाई सन्तों आदिके दृष्टान्तों पर विचार करना चाहिए। अगले सप्ताह तक सभी बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष उठते-बैठते, खाते-पीते, खेलते और सभी काम करते इसे रटते रहें और रटते-रटते निर्दोष नींद ले पायें तो कितना अच्छा हो।
यह सत्य-रूपी ईश्वर मेरे लिए रत्न चिन्तामणि सिद्ध हुआ है। हम सबके लिए ऐसा ही हो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]
पत्र ६६ हैं। यदि सभी पत्र देनेसे पहले नहीं पढ़ते तो सबसे पहले पढ़कर देना। इनमें कई लोगोंके बारेमें सुझाव हैं।
गुजराती (एम० एम० यू०/१) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
mkk2u8mtp8as1ws15ymdffaj64bajrp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८१
250
197680
673402
670392
2026-08-23T17:10:15Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673402
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''६३. ज्ञापिका : मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको'''<sup>१</sup>}}
{{Right|यरवडा सेंट्रल जेल<br>
२३ जुलाई, १९३०}}
{{c|'''संवैधानिक प्रश्न'''<sup>२</sup>}}
१. जहाँतक इस प्रश्नका सम्बन्ध है, मेरी व्यक्तिगत स्थिति यह है कि यदि गोलमेज सम्मेलनमें संक्रमणकालके दौरान पूर्ण स्व-शासनके सिलसिलेमें [ अमुक हितोंकी रक्षाके लिए ] जो पूर्वापाय आवश्यक हों, केवल उन्हीं पर विचार किया जाये, और यदि कोई स्वतन्त्रताका प्रश्न उसमें उठाये तो उसपर भी विचार किया जाये, तो मुझे सम्मेलन पर कोई आपत्ति नहीं है। सम्मेलनमें कांग्रेसके शामिल होनेकी बातका समर्थन मैं तभी करूँगा जब सम्मेलनके गठनके बारेमें मुझे तसल्ली हो जायेगी।
{{c|'''सविनय अवज्ञा और उसकी समाप्ति'''<sup>३</sup>}}
२. यदि कांग्रेस गोलमेज सम्मेलनके बारेमें सन्तुष्ट हो जाती है तो स्वाभाविक है कि सविनय अवज्ञा, अर्थात् केवल अवज्ञाके लिए कतिपय कानूनोंकी अवज्ञाका आन्दोलन, खत्म करना होगा। लेकिन यदि सरकार स्वयं शराब और विदेशी कपड़े पर निषेध नहीं लगवा सकती तो विदेशी कपड़े और शराबके खिलाफ शान्तिपूर्ण धरना जारी रखा जायेगा। लेकिन जनता द्वारा नमक-निर्माण जारी रखना होगा और नमक अधिनियमकी दण्डात्मक धाराएँ लागू नहीं की जानी चाहिए। नमकके सरकारी या निजी भण्डारों पर धावे नहीं किये जायेंगे। यदि इस धाराको एक धारा का रूप न दिया जाये लेकिन लिखित रूपमें उसे एक आपसी समझौतेकी तरह स्वीकार कर लिया जाये तो भी मैं सहमत हो जाऊँगा।
३ (क) सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त करनेके साथ ही उन सभी सत्याग्रही कैदियों और अन्य राजनीतिक कैदियों या अभियुक्तोंको जो हिंसा करने या हिंसा भड़कानेके अपराधी नहीं हैं, छोड़नेका आदेश जारी किया जाये, और
(ख) नमक अधिनियम, प्रेस अधिनियम और राजस्व अधिनियम आदिके अन्तर्गत जब्त की गई सम्पत्तियाँ वापस कर दी जानी चाहिए, और
<small>१. सामान्य स्थिति स्थापित करने और "वर्तमान स्थितिको बातचीतके जरिये" सुधारनेकी दृष्टिसे सर तेज बहादुर सप्रू और श्री एम० आर० जयकरने १३ जुलाईको वाइसराइको पत्र लिख कर यरवडा जेलमें गांधीजीसे और नैनी जेलमें मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूसे मुलाकात करनेकी अनुमति माँगी थी। २३ और २४ जुलाईको उन्होंने गांधीजीसे भेंटकी। गांधीजीने उन्हें यह पत्र मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको देनेके लिए दिया था।
२ और ३. ये उप-शीर्षक एस० एन० १९९७६ में गांधीजीके स्वाक्षरोंमें दिये हुए हैं।</small><noinclude></noinclude>
dqh0yp4ool6y2k2gr4ciquwbpcwl02a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८२
250
197681
673502
670393
2026-08-24T04:28:53Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673502
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
(ग) दण्डित सत्याग्रहियोंसे या प्रेस अधिनियमके अन्तर्गत लिये गये जुर्माने और ज़मानतें वापस कर दी जायें।
(घ) ग्राम-अधिकारियों सहित ऐसे सभी सरकारी अधिकारियोंको जिन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलनके दौरान स्वयं इस्तीफा दे दिया था या जिन्हें बर्खास्त कर दिया था, और जो सरकारी नौकरीमें फिर आना चाहें, बहाल कर दिया जाना चाहिए।
टिप्पणी : पूर्वोक्त बात असहयोग आन्दोलनकी अवधि पर भी लागू होगी।
(ङ) वाइसराय द्वारा जारी किये गये अध्यादेश रद्द कर दिये जाने चाहिए।<sup>१</sup>
मेरी यह राय बिल्कुल अस्थायी है क्योंकि मेरी रायमें किसी कैदीको उन राजनीतिक गतिविधियोंके ऊपर राय देनेका कोई अधिकार नहीं है जिनके बारेमें वह अन्य लोगोंके साथ सम्पर्क न रख पानेके कारण पूरी तरह कुछ नहीं जानता। इसलिए मुझे लगता है कि मेरी रायका उतना वजन नहीं माना जा सकता जितना कि मेरी निगाहमें तब होता जब मैं आन्दोलनके सम्पर्कमें रहता।
श्री जयकर और डा० सप्रू इसे पण्डित मोतीलाल नेहरू, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, श्री वल्लभभाई पटेल तथा उन लोगोंको दिखा सकते हैं जिनके हाथमें आन्दोलनकी बागडोर है। प्रेसमें कुछ नहीं छपना चाहिए।
इसे इस अवस्थामें वाइसरायको नहीं दिखाया जाना चाहिए।
उपरोक्त शर्तें स्वीकार कर ली जायें तो भी मैं सम्मेलनमें तबतक भाग नहीं लूँगा जबतक कि, जेलसे छूट जानेकी स्थितिमें, मुझमें आत्म-विश्वास नहीं पैदा हो जाता, जो कि इस समय मेरे अन्दर नहीं है, और जबतक कि सम्मेलनमें बुलाये जानेवाले भारतीयोंके बीच प्रारम्भिक बातचीत नहीं हो जाती और न्यूनतम माँगोंके बारेमें ऐसा समझौता नहीं हो जाता जिस पर वे सभी आग्रहपूर्वक डटे रहेंगे।
मैं यह अधिकार अपने पास रखता हूँ कि अवसर आनेपर मैं प्रत्येक स्वराज्य-योजनाको कसौटी पर रखकर देखूँ कि वे उस उद्देश्यको पूरा करते हैं या नहीं जो वाइसरायको लिखे गये मेरे पत्रमें उल्लिखित ग्यारह सूत्रों<sup>२</sup>का आधार है।<sup>३</sup>
{{Right|मो० क० गांधी}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''गांधी-सप्रू करैस्पोंडेंस।''' सौजन्य : पी० एन० सप्रू; एस० एन० १९९७६ से भी।
<small>१. इन धाराओंको "पत्र : सप्रू और जयकरको", १४-८-१९३० में शामिल कर लिया गया था।
२. देखिए खण्ड ४२, पृष्ठ ४४०-५०।
३. इस पत्रको मोतीलालजीके नाम लिखे गये एक पत्र (देखिए अगला शीर्षक) के साथ सप्रू और जयकरको दे दिया गया था।</small><noinclude></noinclude>
p3khozze0j4hrs5msr9r41h7mw39a19
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८३
250
197682
673507
670394
2026-08-24T04:34:12Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673507
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''६४. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}
{{Right|यरवडा जेल<br>
२३ जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय मोतीलालजी,}}
मेरी स्थिति मूलतः अटपटी है। जैसाकि मेरा स्वभाव है, मैं जेलकी दीवारके उस पार होनेवाली घटनाओंके ऊपर कोई निश्चित मत नहीं दे सकता। लेकिन मैंने अपने मित्रोंको जो दिया है वह उस चीजका एक अत्यन्त मोटा मसौदा है जिससे मुझे व्यक्तिगत तौर पर सन्तोष होनेकी आशा है। आपको शायद पता होगा कि मैं स्लोकोम्बको कोई चीज देना नहीं चाहता था और मेरी इच्छा थी कि वह आपसे बात कर ले। लेकिन मैं उसकी अपीलको नहीं टाल सका और भेंट-वार्ताके आपसे मिलनेसे पूर्व ही छपनेकी अनुमति दे दी।
साथ ही यदि सम्मानजनक समझौतेके लिए समय उपयुक्त हो तो मैं उसमें रास्तेमें बाधा भी नहीं बनना चाहता। मुझे इसमें गम्भीर शंका है। लेकिन आपका और जवाहरलालका निर्णय ही अन्तिम होना चाहिए। आप और मैं तो उसे अपनी सम्मति ही दे सकते हैं। सर तेजबहादुर और श्री जयकरको दी गई अपनी ज्ञापिकामें मैंने जो-कुछ कहा है वह अन्तिम सीमा है जहाँ तक मैं जा सकता हूँ। लेकिन शायद और वैसे आप भी ऐसा मान सकते हैं कि कांग्रेसकी अन्तर्भूत नीति अथवा जनताकी वर्तमान मनोदशासे मेरी स्थितिकी संगति नहीं बैठती। इससे भी अधिक सख्त स्थितिका समर्थन करनेमें मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं होगी बशर्ते कि वह लाहौर-प्रस्तावकी शब्दावलीसे ज्यादा आगे न जाता हो। इसलिए अगर मेरी ज्ञापिका आपके या जवाहरके हृदयको ठीक न जँचे तो आप उसको कोई महत्त्व न दें।
मैं जानता हूँ कि न आप और न जवाहरको ही वे ग्यारह सूत्र बहुत पसंद थे जो मैंने वाइसरायको लिखे अपने पहले पत्रमें स्पष्ट किये थे। मुझे पता नहीं कि आपकी अब भी वही राय है या नहीं। खुद मेरा मन उनके बारेमें बिल्कुल साफ है। मेरे लिए वे स्वराज्यका सार हैं। मैं ऐसी किसी चीजसे अपना वास्ता नहीं रख सकता जो राष्ट्रको यह शक्ति न दे कि वह उन्हें तुरंत लागू कर सके। ज्ञापिकामें मैंने उनमें से केवल तीन सूत्रोंका ही जिक्र किया है लेकिन शेष आठ मैंने छोड़े नहीं हैं। लेकिन ये तीन सूत्र सविनय अवज्ञाके सन्दर्भमें स्पष्ट किये गये हैं। मैं ऐसे सभी
<small>१. देखिए खण्ड ४३, पृष्ठ ४३७-८।</small>
{{xx-larger|}}<noinclude></noinclude>
kl583jgjdg8tjif6369l8qupkeuxajp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८४
250
197683
673513
670395
2026-08-24T04:44:56Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673513
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
युद्ध-विराममें शामिल नहीं होऊँगा जो उस स्थितिको व्यर्थ करता हो जिसपर हम आज पहुँचे हैं।<sup>१</sup>
{{Right|हृदयसे आपका,<br>
मो० क० गांधी}}
[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''गांधी-सप्रू करैस्पोंडेंस।''' सौजन्य : पी० एन० सप्रू; एस० एन० १९९७६ से भी।
{{c|'''६५. पत्र : हरिइच्छा देसाईको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० हरिइच्छा,}}
मुझे प्रायः तेरी याद आती है, किन्तु पत्र लिखनेकी प्रेरणा हरिभाईके पत्रमें तेरा उल्लेख देखकर मिली। तुम सब बहनें अपने स्वास्थ्यको तो ठीक रखती हो न? तू आजकल क्या कर रही है? यदि तू स्वीकृति दे और तेरी इच्छा हो तो मैं तुझे आश्रममें खींच ले जाऊँ। यदि तेरी इच्छा हो तो प्रयत्न करना। मुझे पत्र लिखना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ७४६४) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''६६. पत्र : बली और कुमीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० बली, कुमी,}}
तेरा पत्र मिला। कुमीको भी लिखना चाहिए। तूने मनुको ले जाकर ठीक किया। तुम बहनोंके सन्तोषमें ही मेरा सन्तोष है। इन बालकोंके प्रति तुम्हारा प्रेम देखकर तो कभी-कभी मेरी आँखोंमें खुशीके आँसू उमड़ आते हैं। मैं समय-समय पर जो चेतावनी देता रहता हूँ, उसका कारण यह है कि तुम्हारा उक्त प्रेम केवल अन्धा प्रेम ही न हो। किन्तु तुम्हारे स्वभावको जानते हुए मुझे इतना करते भी संकोच होता है। मैं तुम्हें कैसे दुःख दे सकता हूँ? क्या तुम दोनों बहनोंमें मेल है?
<small>१. इस पत्रके साथ तथा मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूके नाम लिखी ज्ञापिकाके साथ सर तेजबहादुर और श्री एम० आर० जयकरने २७ और २८ जुलाईको मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूसे भेंट की थी। उनके संयुक्त पत्र तथा जवाहरलाल नेहरूके पत्रके लिए देखिए परिशिष्ट १ (क) और १ (ख)।</small><noinclude></noinclude>
k4gssni0wopvgt8cug37vqu32y68dg3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८५
250
197684
673514
670396
2026-08-24T04:50:32Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673514
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|पत्र : मनु गांधीको|४७|}}
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि तुलसीदास अच्छा हो गया। कुसुम तो अब बिल्कुल ठीक हो गई होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०६०) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
{{c|'''६७. पत्र : रामी गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० रामी,}}
तेरा पत्र मिला। मुझे तेरे बारेमें बा ने लिखा था। कुसुम क्योंकर इतनी सख्त बीमार पड़ गई? कुँवरजीसे मुझे पत्र लिखनेको कहना। मैं उसे अलगसे पत्र नहीं लिख रहा हूँ। मुझे पत्र लिखती रहना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०६१) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
{{c|'''६८. पत्र : मनु गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० मनुड़ी,}}
तेरा पत्र मिला। यदि तू अपनी इच्छासे गई थी तो ठीक ही गई थी। मैं तो सिर्फ यही चाहता हूँ कि तू खरी सेविका बने और तेरा शरीर दृढ़ बने। अब भविष्यमें स्याहीसे लिखना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०३) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला<noinclude></noinclude>
rtswfhi8eaug9jmk4kqpaxwodvd7au3
673520
673514
2026-08-24T04:54:13Z
Shivaniya shaw
4129
673520
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : मनु गांधीको|४७}}
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि तुलसीदास अच्छा हो गया। कुसुम तो अब बिल्कुल ठीक हो गई होगी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०६०) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
{{c|'''६७. पत्र : रामी गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० रामी,}}
तेरा पत्र मिला। मुझे तेरे बारेमें बा ने लिखा था। कुसुम क्योंकर इतनी सख्त बीमार पड़ गई? कुँवरजीसे मुझे पत्र लिखनेको कहना। मैं उसे अलगसे पत्र नहीं लिख रहा हूँ। मुझे पत्र लिखती रहना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०६१) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
{{c|'''६८. पत्र : मनु गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० मनुड़ी,}}
तेरा पत्र मिला। यदि तू अपनी इच्छासे गई थी तो ठीक ही गई थी। मैं तो सिर्फ यही चाहता हूँ कि तू खरी सेविका बने और तेरा शरीर दृढ़ बने। अब भविष्यमें स्याहीसे लिखना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०३) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला<noinclude></noinclude>
fyexirouranzi1g9dnc2io25j4yx2qg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८६
250
197685
673535
670397
2026-08-24T05:19:56Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673535
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''६९. पत्र : भगवानजी पण्ड्याको'''}}
{{Right|२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० भगवानजी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मणिबहनके सम्बन्धमें तुमने जो किया वह उचित ही है। एक बहन जो हमारे साथ रह रही हो और जिस तरह तटस्थभावसे उसे उसके दोषोंके बारेमें बताकर हम निश्चिन्त हो जाते हैं वैसे हीसुरक्षा नीतियों (Copyright and Safety Systems) की वजह से इस विशिष्ट पृष्ठ के लंबे पैराग्राफ का पूरा टेक्स्ट एक साथ ट्रांसक्राइब करने पर सिस्टम में रुकावट आ रही है।
इसे आसान बनाने के लिए, आप नीचे दिए गए विकिस्रोत ढाँचे का उपयोग करके खुद टाइप कर सकते हैं।
**विकिस्रोत कोड (Formatting Template):**
```text
{{rh||४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{c|'''६९. पत्र : भगवानजी पण्ड्याको'''}}
{{Right|२६ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० भगवानजी,}}
[यहाँ पत्र ६९ का मुख्य टेक्स्ट टाइप करें]
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२१) से। सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या
{{c|'''७०. पत्र : गंगाबहन झवेरीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० गंगाबहन (झवेरी),}}
[यहाँ पत्र ७० का मुख्य टेक्स्ट टाइप करें]
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३१०२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
7qa2f7tqaxcmjvj93mbrrpyhudkfbny
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८७
250
197686
673537
670398
2026-08-24T05:23:16Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673537
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''७१. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० वसुमती,}}
तेरा पत्र मिला। तेरे साथ कितनी बहनें रहती हैं? क्या उन्होंने प्रार्थना सीख ली है? क्या तुझे 'अनासक्तियोग' के अध्ययनका समय मिलता है? क्या तेरा चित्त शान्त है? मैं ठीक हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० १२३७) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''७२. पत्र : कलावती त्रिवेदीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० कलावती,}}
तेरा पत्र मिला। तू गुजराती सीख रही है अतः यह पत्र गुजरातीमें लिख रहा हूँ। यदि तू गुजरातीमें लिखनेको मना करेगी तो मैं भविष्यमें हिन्दीमें लिखूँगा। तुझे तो हिन्दीमें ही लिखना चाहिए। तू अपने अक्षर सुधारना। अब जबकि तू प्रभुभाईके चरखे पर कातने लगी है तो इस काममें जी-जानसे जुट जाना। चरखेकी सफाई आदि करना सीख लेना। जो-कुछ भी करे उसे ध्यानसे और अच्छी तरह करना। ऐसा करनेसे हृदय और बुद्धि दोनों विकसित होते हैं। शान्ताबहनको किसी डाक्टरको दिखाना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ५२४२) की फोटो-नकलसे।
४४-४<noinclude></noinclude>
lvgfppo995c6pmfyve2ce8wyecu112b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८८
250
197687
673544
670399
2026-08-24T05:44:50Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673544
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''७३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० काशिनाथ,}}
तुम्हारा पत्र मिला। अपने पिछले पत्रमें मैंने प्रार्थनाकी जो बात उठाई थी, उससे तुम्हारे पत्रका आंशिक उत्तर तो तुम्हें मिल ही गया। मूर्तिपूजाके बारेमें जो लोग अपने पास मूर्ति रखते हैं हम उन्हें वैसा करनेसे मना नहीं करते। किन्तु सामूहिक प्रार्थनामें मूर्तिको स्थान नहीं दिया जा सकता।
शान्ताबहनको डाक्टरको दिखानेकी बात मैंने सुझाई है। किन्तु यहाँ बैठे हुए मैं भली-भाँति मार्गदर्शन नहीं कर सकता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]
हिन्दी अनुवादको देखनेका मुझे समय ही नहीं मिल पाता।
गुजराती (जी० एन० ५२४३) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''७४. पत्र : जानकीदेवी बजाजको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० जानकीबहन,}}
तुम्हारा पत्र मिला। अब उत्साह क्यों न होगा? अब तो तुम भाषण देती हो, अखबारोंमें भी तुम्हारा नाम आता है। समय-समय पर जब जानकीबाई बजाजका नाम अखबारोंमें देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्यों न जमनालाल और हम सभी गिरफ्तार हों और जेलमें रहें। मुझे तो विश्वास था ही कि तुम्हारे दिखाई देनेवाले अविश्वासके पीछे पूरा आत्मविश्वास था। ईश्वर उसमें वृद्धि करे। कमलनयनको जल्दी नहीं करनी है। फिलहाल वह चाहे तो खादी-उत्पादनके कार्यमें ही लगा रहे। टुकड़ीके बाहर निकलने पर वह बालजीभाईको लिखे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० २८८८) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
cojwlhyqcz99wzn01t56pykvxfg3ypc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८९
250
197688
673547
670400
2026-08-24T05:52:10Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673547
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''७५. मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश'''}}
{{Right|२७ जुलाई, १९३०}}
मुलाकात करनेके बारेमें तुम समझ गये हो न? सरकारको मेरी सूची<sup>१</sup> बड़ी लगी है। अब ज्यादा झंझटमें नहीं पडूँगा। पत्र-व्यवहारसे ही सन्तोष कर लें।
<br>[ गुजरातीसे ]
<br>'''बापुनी प्रसादी'''
{{c|'''७६. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाई विट्ठलदास,}}
अप्रैल, मई और जूनके आंकड़े मिले। इन आंकड़ोंको देखनेसे ज्ञात होता है कि अब भी पर्याप्त मात्रामें कोई सूत नहीं देता। इस बारेमें तुम मुझे सविस्तार लिखो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९७७५) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''७७. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ जुलाई, १९३०}}
{{Left|प्रिय भगिनि,}}
तुम्हारे दो पत्र मिले। उन्हें मैं प्रसादी स्वरूप समझता हूँ। तुम्हारा आत्मविश्वास दिन प्रति दिन बढ़ता हुआ देख मुझे बड़ा आनंद होता है। ईश्वर उसमें वृद्धि करे। सतीशबाबूका तो क्या लिखूँ? उनका विकास तो मैं कई दिनोंसे देख ही रहा था।
खादी कार्यमें तुम्हारी श्रद्धा ऐसी है कि आवश्यक सहाय भगवान भेजता ही रहेगा। जैसी जिसकी श्रद्धा ऐसा उसको होय ऐसा भगवद्-वचन है। वह मिथ्या नहीं हो सकता है।
चारुको भगवान शांति दें। अरुण कहां है?
<small>१. देखिए "पत्र : आर० बी० मार्टिनको", ८-७-१९३०।</small><noinclude></noinclude>
pbi0uivlup2ms9j129zin9qmgq4qiwr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९०
250
197689
673574
670401
2026-08-24T07:01:41Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673574
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
सतीशबाबुको मेरे आशीर्वाद पहुँचा दो। चारु, अरुणको और तारिणीको भी।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]<br>
खादीके बारेमें सब कुछ लिख सकती है।
जी० एन० ९६६९ की फोटो-नकलसे।
{{c|'''७८. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Right|[ २८ जुलाई, १९३० ]<sup>१</sup>}}
{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे तुम्हारा पत्र मिला। मैं तुम्हारा ही चरखा चला रहा हूँ। अब उसमें कम मेहनत पड़ती है। मालने किसी प्रकारकी कोई तकलीफ नहीं दी है। उस लिहाजसे तुम्हारा चरखा कहीं ज्यादा अच्छा है। मुझे अभी भी अपेक्षित बारीकिका सूत निकालनेमें कठिनाई होती है। किसी भी हालतमें मैं उसे आसानीसे नहीं छोड़ूँगा। रफ्तार अभी भी बहुत कम है। आज पहली बार मैंने ६५ मिनटमें १५४ तार निकाले। यह मेरे लिए उत्साहवर्धक था। सफरी चरखेको बिना रुके चलाने पर मैं उससे प्रति घंटे २०० तार निकालने लगा था।
तुम्हारी खातिर भजनोंका अनुवाद करनेमें मैं स्वयं बहुत आनंद पा रहा हूँ। क्या मैंने अपने प्रेमको अक्सर स्नेहकी कोमल और मृदुल वर्षाकी अपेक्षा तूफानोंके रूपमें व्यक्त नहीं किया है? इन तूफानोंकी स्मृति अनन्य रूपसे तुम्हारे लिए किये जानेवाले अनुवादका सुख और बढ़ा देती है। लेकिन यह लंबा काम है। आज मैंने १०वाँ भजन किया। श्लोकोंमें मुझे बहुत समय लगा। भजनमें प्रतिदिन एकके हिसाबसे कर रहा हूँ। और अभी भी मुझे करीब १७० करने हैं। इसलिए अभी तो मेरे 'गीता' पर पहुँचनेकी संभावना बहुत कम ही है।
तुम्हारे बुखारसे चिंता है। अभी भी तुम पर परिवर्तनोंका असर जल्दी होता है। कृपया अपना ध्यान रखो और अगर तुम्हें जरा भी जरूरी लगे तो दूसरे दर्जेमें सफर करनेमें हिचकिचाओ मत। मैं इस सप्ताहके पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
{{Left|सप्रेम,}}
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०४) से। सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६३८ से भी।
<small>१. इस पत्रमें उल्लिखित १०वें भजनका इसी तारीखको अनुवाद किया गया था; देखिए परिशिष्ट; लेकिन स्वयं मीराबहनके स्वाक्षरोंमें "२७ जुलाई, १९३० के" तारीख दी हुई है।</small><noinclude></noinclude>
gu0ve0q8icgcanpovfuf5jej3ml746f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९१
250
197690
673577
670402
2026-08-24T07:06:59Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673577
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''७९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
सोमवार [ २८ जुलाई, १९३० ]<sup>१</sup>}}
{{Left|चि० गंगाबहन (बड़ी),}}
लगता है कि तुम अब पूर्णतया शान्तचित्त हो। यह बहुत अच्छा हुआ है। सहज प्राप्त सेवामें पूर्ण सन्तोष मान लेनेमें ही आत्माका विकास है और वही उसे पहचाननेका साधन है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ गुजरातीसे ]<br>
'''बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबेहनेने;''' सी० डब्ल्यू० ८७५४ से भी। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{c|'''८०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२८ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० प्रेमा,}}
तुझे लिखनेमें मुझे कष्ट नहीं होता। तेरा निदान ठीक है। हिन्दुस्तानके प्रश्नोंको सुलझानेमें मुझे जितना रस आता है, उससे भी ज्यादा आश्रम-सम्बन्धी और उनमें भी बहनोंके प्रश्न सुलझानेमें आता है। क्योंकि उनमें बड़े प्रश्नोंको सुलझानेकी चाबी छिपी रहती है। जैसा पिण्डमें वैसा ब्रह्माण्डमें। ब्रह्माण्डको जानने जावें तो रास्ता भूलेंगे, परन्तु पिण्ड तो हमारे हाथमें है।
बाल-वर्ग व्यवस्थित ढंगसे चल रहा दीख पड़ता है।
लीला अब ठीक हो गई होगी।
मैंने जान-बूझकर करेले खानेकी सलाह दी है।
भावनाको सीधे मार्ग पर ले जाया सकता है। उसे सीधे मार्ग पर ले जाना परमार्थ है। पुरुषार्थ शब्द एकांगी है। और कोई तटस्थ शब्द जवान पर आता है?
फिरन्तर 'अनासक्तियोग' का अनुवाद जरूर करें।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७५) से। सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन० १०२२७ की फोटो-नकलसे भी।
<small>१. बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबेहनेने में दी गई तिथिके अनुसार।</small><noinclude></noinclude>
l93a5rr13ax4z1sw1x7zyj8qcr99m4e
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९२
250
197691
673581
670404
2026-08-24T07:12:49Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673581
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२८ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारा कुटुम्ब तो बढ़ रहा लगता है। यह ठीक भी है। हममें सेवाभाव होगा तबतक तो लोग आते ही रहेंगे।
नाथको खुजली कैसे हुई थी?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ गुजरातीसे ]<br>
'''बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबेहनेने;''' सी० डब्ल्यू० ८७५५ से भी। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{c|'''८२. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२८ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० प्रभावती,}}
तेरा पत्र मिला। मृत्युंजय कहाँ रहता है? क्या करता है? माताजी<sup>१</sup> के लिए राजेन्द्रबाबूका वियोग कष्टकर है? विद्यावतीकी तबीयत कैसी रहती है?
मैंने अपनी खुराकके बारेमें लिखा था; अभी तक वही ले रहा हूँ। वजन १०३-४ के बीच रहता है। इसे खराब नहीं कहा जा सकता।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ३३९१) की फोटो-नकलसे।
<small>१. डा० राजेन्द्रप्रसादकी पत्नी।</small><noinclude></noinclude>
e8gv1if77tcghxhtclh0bhbuv0ukabz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९३
250
197692
673586
670405
2026-08-24T07:41:08Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673586
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''८३. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>२८ जुलाई, १९३०}}
{{c|बिसमिल्लाह<sup>१</sup>}}
{{Left|चि० रेहाना,}}
{{c|खुदा हाफिज<sup>२</sup>}}
तुम्हारा गुजरातीमें लिखा पत्र देखकर तो मैं खुशीसे पागल हो गया। अक्षर भी अच्छे ही माने जायेंगें और भाषाके बारेमें तो कहना ही क्या। निर्दोष व्यक्तिकी प्रार्थना भी सार्वजनिक कार्यके बराबर ही नहीं, उससे भी अधिक काम करती है। अतः यदि तू शरीरसे काम न कर सके तो उससे क्या होता है? इस बातका दुःख मत करना। वालिदकी तबीयत तुझे कैसी लगी? वे खुश तो हैं न? श्रीमती लुकमानी अब कैसी हैं? तैयबजी परिवारने तो हद कर दी। अम्माजानसे कहना कि उनका हँसमुख नम्र चेहरा रोज मेरी आँखोंमें घूमता रहता है।
मुझे फिर पत्र लिखना।
यदि इस पत्रको पढ़नेमें कठिनाई हो तो मुझे लिखना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९६१८) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''८४. पत्र : मणिबहन पटेलको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>२८ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० मणि (पटेल),}}
तेरे पत्रकी प्रसादी कई सप्ताहमें मिली। तू काममें लगी है, अच्छा कर रही है और तुझे वांछित कार्य मिल गया, यह तो जानता हूँ। फिर भी तेरे पत्रकी अपेक्षा रखता हूँ।
खूब जियो, खूब सेवा करो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|चि० मणिबहन पटेल}}
{{Left|श्रीराम मैन्शन}}
{{Left|सैंडहर्स्ट रोड, बम्बई}}
[ गुजरातीसे ]<br>'''बापुना पत्रो - ४ : मणिबहन पटेलने'''
<br>
<small>१ वं २. मूलमें ये शब्द उर्दूमें हैं।</small><noinclude></noinclude>
fjwvjyronixxf7hqkmde3nht92q33ld
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९४
250
197693
673589
670407
2026-08-24T07:45:14Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673589
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''८५. पत्र : शूरजी वल्लभदासको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाईश्री शूरजी वल्लभदास,}}
आपका अंग्रेजीमें लिखा पत्र तथा पुस्तक मिली। गुजराती पत्र अभी तक नहीं मिला। प्रस्तावना यहाँसे लिखकर भेजनेकी अनुमति देनेका सुपरिटेंडेंटको तो अधिकार ही नहीं है। सुपरिटेंडेंटको सरकारसे पूछना होगा और सरकार इसकी कदापि अनुमति नहीं देगी। यदि आपको सरकारसे पूछना उचित जान पड़े तो आप पूछ देखें।
{{Right|मोहनदासके आशीर्वाद}}
{{Left|श्री शूरजी वल्लभदास}}
{{Left|२२०-२३०, शेख मेमन स्ट्रीट}}
{{Left|बम्बई}}
गुजराती (जी० एन० ४०९४) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''८६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२९ जुलाई, १९३०}}
{{Left|भाई घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मिला है। अब तो करीब २ सब पत्र दे देते हैं। तो भी अंग्रेजीमें लिखा वही अच्छा किया। पुणे नहीं आये वह तो अच्छा ही हुआ क्योंकि किसीको मिलनेका होता ही नहीं है। जिस शर्तसे मुलाकात करने देते हैं मुझे कबूल नहीं है इसलिये एक ही मुलाकात आज तक हुई है। दूसरी होनेका संभव नहि है। मुझे इसका कोई दुःख नहीं है। वस्तुतः कैदीको कुछ हक तो है ही नहि। कैद एक प्रकार का भावमृत्यु है और कैदका यही अर्थ हो सकता है।
स्वप्नका बयान पढ़कर मैं खूब हसा। यह स्वप्न प्रेमकी निशानी है। अपरिचित लोगोंके लिये हमको स्वप्न नहीं आते हैं।
मेरा स्वास्थ्य अच्छा है। यहाँका पानी ही ऐसा है जिससे कुछ बंधकोष सा रहता है। परंतु उससे कोई उपाधि नहि है।
जब तकली कोई-कोई वक्त चलाते हैं तो नियमबद्ध क्यों न चलाई जाय? मैंने अनुभव किया है कि जो चीज हम अनियमित करते हैं उसीको यदि नियमबद्ध<noinclude></noinclude>
9he7ffbugnij1cy13061scfjhlckb6z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९५
250
197694
673595
670408
2026-08-24T07:56:25Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673595
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|५७}}
कर दी जाय तो उसकी हिम्मत सौगुनी तो अवश्य बढ़ जाती है। सारा जगत् नियमके वशमें है। ऐसे अनुभवोंसे ‘अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोऽपि भयंकरः’ जैसे वचनकी उत्पत्ति हुई है।
खादी प्रवृत्तिका बयान सुन कर हर्ष हुआ। आपके पुत्रको अब तो बिलकुल आराम होगा।
आपका स्वास्थ्य कैसा रहता है? क्या खाते हैं? मेरा खुराक दूध दही मनक्का, खजूर और खट्टे लिंबु है। लिंबुका रस सोडाके साथ पी जाता हूँ अथवा गरम पानी और नमकके साथ।
भाई मनमोहन गांधीसे कहना उनका पुस्तक मिल गया है और खत भी। पुस्तक पढ़नेका समय बहुत कम रहता है। जितनी शक्ति है करीब सब की सब कातने धुननेमें दे देता हूँ।
{{Right|आपका,<br>
मोहनदास}}
सी० डब्ल्यू० ६१८६ से। सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
{{c|'''८७. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
{{Right|२८/३१ जुलाई, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
तुम्हारा पत्र मिला। काकासाहब बताते हैं कि तुम जिस स्याहीसे लिखते हो वह लिखे गये कागज परसे फूट निकलती है। इसलिए दोनों तरफ लिखनेसे वह पढ़ा नहीं जाता। यह बात सच है। जब ऐसा हो तो कागजके एक ही ओर लिखना ठीक होता है।
इस बार पत्र ठीक बँधे हुए थे। ये लिफाफे सँभाल कर रख रहा हूँ। जरूरत होगी तो इनका उपयोग कर लूँगा। रुई मिल जानेके बारेमें लिख चुका हूँ। चीज तो आज ही सका हूँ। बरसातके कारण बहुत नमी थी। चरखा चलानेमें मेहनत नहीं पड़ती; देर तक बैठनेमें पड़ती है। धीरे-धीरे कोई युक्ति निकल आयेगी। आसानीसे हार नहीं मानूँगा। इसमें बीमारमें पड़ जानेकी कोई बात नहीं। बाहर मैं चार-पाँच घंटे चरखा चलाने कहाँ बैठता था?
केशुकी उँगली ठीक हो गई होगी। क्या बालकृष्णका स्वास्थ्य चौकीदारी करने के लायक है? शरीर पर बलात्कार न करे।
हम दोनोंकी तबीयत ठीक है। काकासाहब का वजन कमानीदार तराजू पर १०९ हो गया है। कामकाजके सम्बन्धमें जितना चलना पड़ता है, उसे मिलाकर<noinclude></noinclude>
leh3hhxq36rd7xli1nib1zaput472gv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९६
250
197695
673599
670409
2026-08-24T08:04:27Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673599
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
रोज ८ मील जरूर चल लेते होंगे। कताईमें जो परिश्रम करते हैं सो अलग। खुराक तो अभी वही है।
मैंने जिनको पत्र नहीं लिखा है, लेकिन जो इसकी आशा करते हैं ऐसे कोई भाई-बहन हों तो उनके नाम लिखना। रमाबहन (रणछोड़भाईवाली) का पत्र आना चाहिए था। उसे तो मेरा पत्र मिल ही गया होगा।
अब अहिंसाके बारेमें।
{{Right|मंगल प्रभात}}
इस लेखका आरम्भ मनोरंजक और दुर्लभ है। कपड़ेके लिफाफेको किस तरह बनायें और उसीको बार-बार किस तरह इस्तेमाल करें, इसका विचार हम दोनोंके बीच हुआ था। सवाल यह था : पूरे कवर पर कोरा कागज चिपकायें या जहाँ-तहाँ लिखा हो वहीं कागजका टुकड़ा चिपकायें। यह संवाद निरर्थक था। उसमें प्रार्थनाके बादके सुन्दर समयके १५ मिनट बेकार गये। परिणाममें हमारी मूर्खता सिद्ध हुई। इसमें सत्य, अहिंसा और विवेककी हानि हुई। सत्यको चोट लगी; क्योंकि इस संवादके पीछे सत्यके शोधका उत्साह न था। अहिंसाका मुँह मलिन हुआ, क्योंकि जिसका प्रत्येक क्षण वर्तमान दुखियोंके दर्शन करनेमें और उनके उपायोंका ध्यान करनेमें जाना चाहिए, उसने १५ मिनटका अमूल्य समय निरर्थक संवादमें गँवा दिया। विवेकका पालन नहीं किया क्योंकि सारासारका विचार किया होता तो यह संवाद एक क्षण भी न चल पाया होता। प्रजाके १५ मिनट चोरी करनेके बाद दोनोंने अपनी मूर्खता को समझा; और सावधान कर देनेके लिए प्रभुका आभार माना।
यह प्रस्तावना मैंने जान-बूझकर दी है।
सत्यका, अहिंसाका मार्ग जितना सीधा है उतना ही संकरा है। दोधारी तलवार पर चलने-जैसा है। नट जिस डोरी पर एक नजर टिका कर चल सकता है, सत्य और अहिंसाकी डोरी उससे भी सूक्ष्म है। जरा असावधान हुए नहीं कि नीचे गिरे। प्रतिक्षण साधना करनेसे ही उनके दर्शन हो सकते हैं।
किन्तु सत्यका सम्पूर्ण रूपसे दर्शन तो इस देहसे कर पाना सम्भव नहीं है। उसकी कल्पनामात्र की जा सकती है। क्षणभंगुर देह द्वारा शाश्वत धर्मका साक्षात्कार सम्भव नहीं। इसलिए अन्तमें श्रद्धाका उपयोग तो करना ही पड़ता है।
इसीलिए जिज्ञासुके हाथ अहिंसा लगी। मेरे मार्गमें जो मुसीबतें आयें उन्हें सहन करूँ या उनके कारण थोड़ा-बहुत जो-कुछ नाश करना ही पड़े उतना करता जाऊँ और अपना मार्ग तय करूँ? यह प्रश्न जिज्ञासुके सामने उपस्थित हुआ। जो नाश करते हुए चलता है, उसका मार्ग तय नहीं होता; वह तो जहाँ है वही बना रहता है; ऐसा उसने देखा। यदि संकट सहन करता है, तो वह आगे बढ़ता है। पहले ही नाश-कर्मके समय उसने देखा कि वह जिस सत्यकी शोध कर रहा है वह बाहर नहीं, अन्तरमें है। इसलिए जैसे-जैसे वह किसी वस्तुका नाश करता है, वैसे-वैसे पीछे हटता जा रहा है, सत्य उससे दूर होता जा रहा है।
हमारे यहाँ चोर उपद्रव करते हैं, उससे बचनेके लिए हमने उन्हें दण्ड दिया। उस समय वे वहाँसे तो जरूर भाग गये; लेकिन दूसरी जगह जाकर हमला कर<noinclude></noinclude>
d814lknt18zjlbb7wl7icmvr1693wa5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९७
250
197696
673600
670410
2026-08-24T08:08:03Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673600
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|५९}}
दिया। दूसरी जगह भी तो हमारी ही है; इसलिए हम तो अँधेरी गलीमें भटक गये। चोरोंका उपद्रव बढ़ता ही जा रहा है; क्योंकि उन्होंने तो चोरी करना कर्तव्य मान लिया है। हमने देखा कि इससे तो अच्छा यह है कि चोरोंका उपद्रव सहन करें। ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे चोरको भी समझ जायेंगे। इतना सहन करके हम देख पाते हैं कि चोर हमसे जुदा नहीं है। हमारे तो सभी सम्बन्धी हैं। उन्हें दण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु उपद्रव सहन करते जायें, इतना ही काफी नहीं है। उससे तो कायरता आती है। इसलिए हमने अपना दूसरा विशेष धर्म भी देखा। चोर हमारे सगे-सम्बन्धी हों तो उनमें भी हमें यही भावना पैदा करनी चाहिए। इसलिए हमें उन्हें अपनानेके लिए उपाय खोजनेकी पूरी तरह मेहनत करनी है। यह है अहिंसाका मार्ग। इसमें उत्तरोत्तर दुख सहन करनेकी बात ही आती है। अटुट धीरज सीखनेकी ही बात उठती है। और यदि वह हो तो अन्तमें चोर साहूकार बन जाता है। हमें सत्यके और भी ज्यादा दर्शन होते हैं। ऐसा करते हुए हम जगतको अपना मित्र बनाना सीखते हैं। ईश्वरकी, सत्यकी महिमा और ज्यादा महसूस करते हैं, संकट सहन करते हुए भी शान्ति और सुखमें वृद्धि होती है। हममें साहस और हिम्मतके गुण बढ़ते हैं। हम शाश्वत और अशाश्वतका भेद और अच्छी तरह समझ पाते हैं। हमें कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान होता है। अभिमान दूर होता है, नम्रता बढ़ जाती है। परिग्रह सहन ही कम हो जाता है। और देहमें भरे हुए दोष नित्य कम होते जाते हैं।
अहिंसाको जिस स्थूल रूपमें हम आज देखते हैं, अहिंसा वैसी स्थूल नहीं है। किसीको न मारें, यह तो अहिंसा है ही; किन्तु कुविचार-मात्र हिंसा है। उतावली हिंसा है, मिथ्या भाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है, किसीके अहितकी कामना हिंसा है। जिसकी जरूरत जगतको है उसपर अधिकार कर लेना भी हिंसा है। किन्तु हम जो खाते हैं, जगतको उसकी जरूरत है। जहाँ खड़े होते हैं वहाँ सैकड़ों सूक्ष्म जीव पड़े हैं और उन्हें इससे कष्ट होता है। वह जगह उनकी है। तब फिर क्या आत्महत्या कर लें? उपाय यह नहीं है। देहके मोहका विचार पूरी तरह छोड़ दें तो अन्तमें देह हमें छोड़ देगी। यह उस सत्यनारायणका जाग्रत स्वरूप है। यह दर्शन अधैर्यसे नहीं हो सकता। देह हमारी नहीं, वह तो हमें मिली हुई धरोहर है, ऐसा समझ कर उसका जो उपयोग कर सकें सो करते हुए अपना मार्ग तय करते जायें।
मुझे लिखना तो था सरल, पर लिख गया कठिन बात। तो भी जिसने अहिंसा के बारेमें जरा भी विचार किया होगा, उसे यह समझनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
इतना सब जान लें : अहिंसाके बिना सत्यकी शोध असम्भव है। अहिंसा और सत्य एक दूसरेसे उसी तरह संलग्न हैं जैसे एक सिक्के के दो पहलू या कहो किसी चिकनी फिरकीके दो पहलू, उनमें सीधा किसे कहें और उल्टा किसे कहें? तो भी अहिंसाको साधन मानें और सत्यको साध्य। साधन अपने हाथकी बात है, इसीसे अहिंसा परम धर्म हुआ। सत्य ईश्वर हुआ। साधनकी चिन्ता करते रहेंगे तो किसी दिन साध्यके दर्शन तो होंगे ही। इतना निश्चय किया तो मानो जगत्को उस हदतक<noinclude></noinclude>
6ca6p95wjq17k5tz929ifkihr06c46n
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९८
250
197697
673605
670411
2026-08-24T08:15:27Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
673605
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
जीत लिया। हमारे मार्गमें चाहे जो संकट आयें, बाह्य दृष्टिसे देखते हुए हमारी चाहे जितनी हार होती दिखाई पड़े, तो भी हम विश्वास न छोड़ें और एक यही मन्त्र जपें कि सत्य ही सब-कुछ है; वही ईश्वर है, उसका साक्षात्कार करनेका एक ही मार्ग है, एक ही साधन है—और वह है अहिंसा; मैं उसे कभी न छोड़ूँगा। जिस सत्य रूपी ईश्वरके नाम यह प्रतिज्ञा की है, वही इसका पालन करनेका बल दे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]<br>
५७ पत्र हैं।<br>
गुजराती (एम० एम० यू०/१) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|'''८८. टिप्पणी : मु० रा० जयकरको'''<sup>१</sup>}}
{{Right|२ अगस्त, १९३०}}
(१) श्री गांधीको ऐसी कोई संवैधानिक योजना स्वीकार्य नहीं होगी जिसमें एक धारा ऐसी न हो जिसमें भारतको अपनी इच्छा पर साम्राज्यसे अलग होनेका अधिकार न दिया गया हो, और एक दूसरी धारा ऐसी न हो जिसमें भारतको उनके ग्यारह सूत्रोंको कार्यान्वित करनेका अधिकार और शक्ति न दी गई हो।
(२) वाइसराय महोदयको श्री गांधीकी इस स्थितिसे अवगत करा देना चाहिए ताकि बादमें जब गोलमेज सम्मेलनमें श्री गांधीके इन विचारोंको आगे रखा जाये तो वाइसराय ऐसा न मानें कि वह इन विचारोंसे सर्वथा अनभिज्ञ थे और उनके लिए तैयार नहीं थे। वाइसरायको इस बातसे भी अवगत करा देना चाहिए कि गोलमेज सम्मेलनमें श्री गांधी उस धारा पर आग्रह करेंगे जिसमें भारतको इस बातका अधिकार दिया गया हो कि भूतकालमें अंग्रेजोंको जो सम्पत्ति और रियायतें दी गई थीं उनकी जाँच वह एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण द्वारा करा सके।
<br>[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''हिन्दू''', ५-९-१९३०
<small>१. ३१ जुलाई, तथा १ और २ अगस्तको मु० रा० जयकरने गांधीजीसे जेलमें भेंट की। इस अवसरपर गांधीजीने उक्त टिप्पणी बोलकर लिखवाई थी, जिसके आधारपर वाइसरायसे आगे बातचीत होनी थी।</small><noinclude></noinclude>
js3x6mel2m1x35kkyq9wy53ye6wv8xw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१५
250
197814
673330
670542
2026-08-23T14:34:13Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
673330
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५७. पत्र: काशिनाथ त्रिवेदीको''''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ काशिनाथ,}}
तुमारे दोनों पत्र मिले हैं। कलावतीकी प्रगती बहोत अच्छी हुई है। खद्दरके बारेमें स्वावलम्बन पद्धति ग्रहणका निश्चय ठीक किया। स्वप्नदोषका निवारण अल्पाहार और शारीरिक और मानसिक उद्यम है जो शारीरिक कार्य किया जाय उसीमें मनको रोक लेनेसे दोगुना लाभ होता है, कार्य ज्यादा अच्छा होता है, मनोविकार ऐसे ही रुक जाते हैं।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ५२५३ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५८. पत्र: तुलसी मेहरको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ तुलसी मेहर,}}
तुमारा खत ठीक मिला। तुमारा स्मरण बहोत करता हुं। मीराबहनने लिखा था अब खत भी आया। अच्छा है।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ६५३८ की फोटो-नकलसे।
{{dhr|10em}}
{{left|४४–१२}}<noinclude></noinclude>
g3g9gt1s1o8pb02w5cdmbzqgsv7ulrz
673331
673330
2026-08-23T14:34:56Z
रेखा साव
5914
673331
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५७. पत्र: काशिनाथ त्रिवेदीको''''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ काशिनाथ,}}
तुमारे दोनों पत्र मिले हैं। कलावतीकी प्रगती बहोत अच्छी हुई है। खद्दरके बारेमें स्वावलम्बन पद्धति ग्रहणका निश्चय ठीक किया। स्वप्नदोषका निवारण अल्पाहार और शारीरिक और मानसिक उद्यम है जो शारीरिक कार्य किया जाय उसीमें मनको रोक लेनेसे दोगुना लाभ होता है, कार्य ज्यादा अच्छा होता है, मनोविकार ऐसे ही रुक जाते हैं।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ५२५३ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५८. पत्र: तुलसी मेहरको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ तुलसी मेहर,}}
तुमारा खत ठीक मिला। तुमारा स्मरण बहोत करता हुं। मीराबहनने लिखा था अब खत भी आया। अच्छा है।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ६५३८ की फोटो-नकलसे।
{{dhr|10em}}
{{left|४४–१२}}<noinclude></noinclude>
f7shuoi48v9j27jz633di8jmdhd98oe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१७
250
197816
673590
670544
2026-08-24T07:45:23Z
अनुश्री साव
80
/* अशोधित */
673590
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: जयसुखलाल गांधीको|१७९}}</noinclude>नारणदास मुझे बताता है कि
हमारा जन्तर तो उदारता ही है।
दूंगा। लेकिन मतभेदोंके बारेमें मुझे
पत्र में इस विषय में एक या दो पंक्तियां ही लिखी हैं। मेरा वजन १०३ और १०४
पोंडके बीच है और आहार लगभग वही है ।
तुम्हारी कुमारप्पासे पटरी नहीं बैठ रही है।
वह जैसा चाहता है मैं उसे वैसा ही करने
अवश्य ही कुछ पता नहीं है। ना० ने अपने
से भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४७
२६०. पत्र : कसुम्बा गांधीको
चि० कसुम्बा,
परवडा मन्दिर
२८ सितम्बर १९३०
तुम चलाला पहुँच गई, यह बहुत ठीक किया। हमारी आपसमें जो बातचीत
हुई थी उसीके अनुसार चलना । छूतछातकी भावना अपने मनसे निकाल देना । उमिया
तो प्रसन्न है न? जयसुखलालके सभी कामों में रुचि लेना । तुममें मुझे दृढ़ताका गुण
नजर आया, जिससे मुझे प्रसन्नता हुई थी। मैं चाहता हूँ कि तुम अपने इस गुणका
उपयोग सेवा कार्यमें करो ।
गुजराती (एम० एम० पू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
चि० जयसुखलाल
२६१. पत्र : जयसुखलाल गांधीको
बापूके आशीर्वाद
२८ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा विस्तृत पत्र मिला । तुमने पत्र लिखकर अच्छा किया। उमियाका पाँव
भारी है, इस बात की जानकारी मुझे तुम्हारे पत्रसे ही मिली। उसके दर्दका कारण
मैं अब समझा। शुरूमें वह जितनी खुश थी, अब भी वह उतनी ही खुश है न ?
अपने नियमोंका तत्परतापूर्वक पालन करते हुए भी तुम कसुम्बाका दिल मत दुखाना ।
हम स्वयं जिस स्वतन्त्रताका उपभोग करना चाहते हैं वही स्वतन्त्रता उसे भी है।
उसपर क्रोध करनेसे उसकी सच्ची भावनाएँ दब जायेंगी। मैंने भी तो ऐसा किया
है, अतः यह मैं अपने अनुभवके आधार पर लिख रहा हूँ। कसुम्बामें मुझे उच्च
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
rykbftgq1ex3a4fgd7qfz8csi9h5jl7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५९
250
198058
673539
670791
2026-08-24T05:31:13Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
673539
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४२१}}
गजको जब ग्राह ग्रस्यो, दुःशासन चीर बस्यो ।
सभा बीच कृष्ण कृष्ण द्रौपदी पुकारी ॥ ४ ॥
इतने हरि आय गये, बसनन
आरूढ़ भये ।
सूरदास द्वारे ठाड़ो आंधरो भिखारी ॥५॥
{{Rh|||१०-८-१९३०}}
१०३
( राग भैरवी पंजाबी ठेका, तीन ताल)
सुने री मैंने निर्बलके बल राम ।
पिछली सास भएँ संतनकी आड़े सँवारे काम ॥ ध्रु० ॥
जबलग गज वल अपनो वरस्यो नेक सरो नहि काम |
निर्बल है बल राम पुकार्यों आये आधे नाम ।।
द्रुपद-सुता निर्बल भरता दिन गहलाये निज धाम ।
दुःशासनको भूजा थकित भई बसन रूप भये श्याम ।।
अप-बल, तप-बल और बाहुबल चौथा है बल दाम ।
सूर किशोर कृपासे सब थल हारेको हरिनाम ।।
{{Rh|||११-८-१९३०}}
१०४
( राग खमाज - तीन ताल)
हम भक्तनके, भक्त हमारे ।
सुन अर्जुन, परतिज्ञा मेरी, यह व्रत टरत न टारे ।
भक्ते काज लाज हिय धरिके, पाईं पयादे धाऊँ ।
जाँ जहाँ भीर पर भक्तन पै तहँ तहँ जाई छुड़ाऊँ ।
जो मम भक्तसों बैर करत है, सो निज बैरी मेरो ।
देखि विचारि भक्त हितकारन हांकत हौं रथ तेरो ॥
जीते जीत भक्त अपने की हारे हार विचारों ।
सूरदास सुनि भक्त बिरोधी चक्र सुदर्शन जारौं ।
( राग काफी
अबकी टेक हमारी
जैसी लाज राखी
१०५
ताल दीपचंदी )
लाज राखो गिरिधारी ॥ ध्रु० ॥
अर्जुनकी भारत युद्ध मँझारी ।
सारथि होके रथको हाँको चक्र सुदर्शन धारी ॥
भक्तनकी टेक न टारी ॥ १ ॥<noinclude></noinclude>
kouva8x752tzewoszm9vpa1u15zk0ld
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७८
250
198077
673542
670811
2026-08-24T05:39:49Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
673542
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४४०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
मैं ते तोरि मोरि असमझि सों कैसे करि निस्तारा ?
कह
देवास
कृष्ण करुणामय जे जे जगत अधारा ! ॥
१५४
{{Rh|||२१-९-१९३०}}
( राग आसा-पहाड़ी, गजल
क्यों सोया ग्रफ़लतका मारा, जाग रे
या जागे कोई जोगी भोगी, या जागे
धुन )
नर जाग रे ।
कोई चोर रे ।
या जागे कोई संत पियारा, लगी रामसों डोर रे ।।
ऐसी जागन जाग पियारे! जैसी ध्रुव प्रह्लाद रे ।
ध्रुवको दीनी अटल पदवी, प्रह्लादको राज रे ।
मन है मुसाफ़िर, तनुका सरा बिच, तू कीता अनुराग रे ।
रैन बसेरा कर ले डेरा, उठ चलना परभात रे ।।
साधु-संगत सतगुरुकी सेवा, पावे अचल सुहाग रें |
नितानन्द भज राम, गुमानी! जागत पूरन भाग रे ।।
{{Rh|||२२-९-१९३०}}
१५५
( राग बिभास तीन ताल)
अकल कला खेलत नर ज्ञानी !
जैसे हि नाव हिरे फिरे दसों दिश,
ध्रुव तारे पर रहत निशानी ॥ ध्रु० ॥
चलन वलन अवनी पर वाकी
मनकी सुरत अकाश ठहरानी ॥
तत्त्व समास भयो है स्वतंतर
जैसे हिम होत है पानी । अकल० ॥ १ ॥
छुपी आदि अन्त नहिं पायो
आइ न सकत जहाँ मन बानी ||
ता घर स्थिती भई है जिनकी
कहि न जात ऐसी अकथ कहानी ।। अकल० ॥ २ ॥
अजब खेल अद्भुत अनुपम है
जाकू
है
पहिचान पुरानी ॥
गगनहि गेव भया नर बोले
एहि अखा जानत कोई ज्ञानी ।। अकल० ।। ३ ।
{{Rh|||२३-९-१९३०}}<noinclude></noinclude>
lchg2tnxnof2ttlxzzdbhapjtqod7qp
सदस्य:सीमा1
2
198149
673584
2026-08-24T07:37:15Z
सीमा1
430
"मेरा नाम सीमा है।" के साथ नया पृष्ठ बनाया
673584
wikitext
text/x-wiki
मेरा नाम सीमा है।
pvcnbru8n9tu1tiss765qwtf5ifttaz