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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||श्रद्धाका स्वरूप|३८३}}</noinclude>है, इसलिए इसका उत्तर अपेक्षित है। मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे स्वर्गीय लोकमान्यका अनुयायी होनेका गौरव प्राप्त है। मैं अपने करोड़ों दूसरे देशवासियोंकी भाँति, लोकमान्यकी अदम्य इच्छाशक्ति, उनकी अपार विद्वत्ता, उनके देशप्रेम और सबसे अधिक उनके व्यक्तिगत जीवनकी पवित्रता और उनके महान् त्यागके कारण उनका प्रशंसक हूँ। उन्होंने आधुनिक कालके दूसरे सभी लोगोंसे अधिक जनताके मनको प्रभावित किया है। उन्होंने हमारे अन्दर स्वराज्यकी भावना फूँकी है। मौजूदा शासनतन्त्रकी बुराइयोंको जितना श्री तिलकने समझा था उतना शायद किसी दूसरेने नहीं समझा। और मैं पूरी नम्रताके साथ यह दावा भी करता हूँ कि मैं उनके सन्देशको जनतातक पहुँचानेके लिए उतनी ही सचाईसे काम करता हूँ जितना उनका अच्छेसे-अच्छा शिष्य कर सकता है। किन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि मेरा तरीका श्री तिलकका तरीका नहीं है। और इसी कारण अभीतक महाराष्ट्रके नेताओंसे मेरी जैसी चाहिए वैसी पटरी नहीं बैठी, किन्तु मैं ईमानदारीसे महसूस करता हूँ कि मेरे तरीकेपर श्री तिलक अविश्वास नहीं करते थे। मुझे उनका विश्वासपात्र होनेका सौभाग्य प्राप्त था। उन्होंने कई मित्रोंके सामने अपनी मृत्युसे केवल १५ दिन पहले मुझसे जो अन्तिम बात कही थी वह यह थी कि यदि जनता द्वारा उसे स्वीकार कराया जा सके तो मेरा तरीका बहुत उत्तम सिद्ध होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें इसमें शक अवश्य है। पर मेरे पास कोई दूसरा तरीका नहीं है। मैं यही आशा कर सकता हूँ कि जब अन्तिम परीक्षाका समय आयेगा तब यह सिद्ध हो जायेगा कि देशने अहिंसात्मक असहयोगका तरीका पूरी तौरपर सीख लिया है। मैं अपनी अन्य मर्यादाओंको भूला नहीं हूँ। मैं किसी प्रकारकी विद्वत्ताका दावा नहीं कर सकता। मुझमें तिलक-जैसी संगठन-शक्ति भी नहीं है। मेरे साथ कोई ऐसा सुगठित, अनुशासित दल भी नहीं है जिसको मैं अपने नेतृत्वमें चला सकूँ; और २३ सालतक देशसे बाहर रहनेके कारण मुझे भारतका उतना अनुभव नहीं है जितना कि लोकमान्यको था। हम दोनोंमें दो चीजें बिलकुल ही समान रही है—देशके लिए प्रेम और स्वराज्यके लिए सतत प्रयास। इसलिए मैं गुमनाम पत्र-लेखकको आश्वस्त कर देना चाहता हूँ कि लोकमान्यकी स्मृतिके प्रति श्रद्धामें मैं किसीसे कम नहीं रहूँगा और स्वराज्य-प्राप्तिके लिए लोकमान्यके सबसे अग्रणी शिष्योंके कन्धेसे-कन्धा मिलाकर आगे बढ़ता रहूँगा। मैं जानता हूँ कि तिलकको एक ही प्रकारकी श्रद्धांजलि सबसे ज्यादा पसंद होगी और वह है कमसे-कम समयमें भारत द्वारा स्वराज्य-प्राप्ति। इसके अतिरिक्त और कोई भी चीज़ उनकी आत्माको शान्ति नहीं दे सकती।
जहाँतक शिष्यत्वका प्रश्न है वह एक पवित्र व्यक्तिगत मामला है। मैंने सन् १८८८ में<ref>जिन दिनों गांधीजी लन्दनमें वकालत पढ़ रहे थे; देखिए '''आत्मकथा''', भाग १, अध्याय २५।</ref> दादाभाईके चरणोंमें सिर रखा था, किन्तु वे मुझे अपनेसे बहुत दूर लगे। मैं उनका पुत्र बन सकता था, शिष्य नहीं। शिष्यका दर्जा पुत्रसे ऊँचा है। शिष्यत्व एक नया जन्म होता है। वह स्वैच्छिक आत्मसमर्पण होता है। सन् १८९६ में अपने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" /></noinclude>३८४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
दक्षिण आफ्रिकाके कामके' सम्बन्धमें में भारतके लगभग सभी जाने-माने नेताओंसे
मिला। जस्टिस रानडेका मुझपर रोब गालिब हो गया था । उनकी उपस्थितिमें मुझे
बात करनेका साहस नहीं होता था । बदरुद्दीन तैयबजीने मुझे पुत्रके समान समझा और
मुझे रानडे और फीरोजशाह के कहनेपर चलनेकी सलाह दी। फीरोजशाह एक प्रकारसे
मेरे संरक्षक बन गये। उनकी इच्छा मेरे लिए ब्रह्मवाक्य थी । “तुम्हें २६ सितम्बरको
एक सार्वजनिक सभामें भाषण देना है और तुम्हें वहाँ ठीक समयपर पहुँच जाना
चाहिए।" मैंने आज्ञा-पालन किया । २५ तारीखकी शामको मुझे उनसे मिलना था ।
मैं मिलने गया ।
"तुमने अपना भाषण लिख डाला ? - उन्होंने पूछा ।
"जी नहीं ।
"
" इस तरह नहीं चलेगा, युवक । क्या आज रातको लिख सकते हो ? -- मुंशी,
तुम श्री गांधी के पास जाकर भाषणकी पाण्डुलिपि ले आना । रातों-रात ही यह छप
जाये और उसकी एक प्रति मुझे भेज दी जाये ।" मेरी ओर मुड़कर उन्होंने आगे
कहा : " गांधी, बहुत लम्बा भाषण न लिखना । तुम नहीं जानते बम्बईके श्रोता
बहुत लम्बा भाषण पसन्द नहीं करते।" मैंने सिर झुका दिया ।
बम्बई- केसरीने मुझे आदेशका पालन करना सिखाया। उन्होंने मुझे अपना शिष्य
नहीं बनाया। उन्होंने इसके लिए कोशिश भी नहीं की ।
उसके बाद मैं पूना गया। मैं वहाँ बिलकुल अजनबी था। मेरे मेजबान मुझे
पहले श्री तिलकके पास ले गये । जब मैं उनसे मिला तो वे अपने सहयोगियोंसे घिरे
हुए थे। उन्होंने मेरी बात सुनी और कहा "हमें तुम्हारे लिए एक सभा आयोजित
करनी होगी। लेकिन शायद तुम्हें पता नहीं कि दुर्भाग्यवश यहाँ दो दल हैं। तुम
सभापतित्व करनेके लिए, कहीं से कोई निर्दलीय व्यक्ति जुटाओ। तुम डा० भाण्डारकरसे
मिलोगे ? " मैंने बात मान ली और वापस आ गया। मेरे मनमें श्री तिलककी बहुत
स्पष्ट स्मृति नहीं है। बस इतना ही याद है कि उन्होंने अपने प्रेम और अपनी
बेतकल्लुफीसे मेरी घबराहट दूर कर दी थी । वहाँसे, मुझे ऐसा याद है, मैं गोखलेके
पास गया और फिर डा० भाण्डारकरके पास । डा० भाण्डारकरने मेरे अभिवादनका उत्तर
कुछ उस भावसे दिया जैसा कि कोई अध्यापक अपने किसी विद्यार्थीको देता है ।
'तुम एक ईमानदार और जोशीले युवक लगते हो। दोपहरकी ऐसी गरमीमें
मुझसे मिलने बिरला ही आता । आजकल मैं सार्वजनिक सभाओंमें कभी नहीं जाता
किन्तु तुमने एक ऐसी दयनीय परिस्थिति सामने रखी है कि मैं अपना नियम-भंग
कर दूंगा।"
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श्रद्धेय डाक्टर और उनके बुद्धिमत्तापूर्ण चेहरे के लिए मेरे मनमें श्रद्धा पैदा हो
गई थी। किन्तु अपने हृदय के छोटेसे सिंहासनपर मैं उनको नहीं बैठा सका । वह
अभीतक खाली था। मैं कई व्यक्तियोंको अनुकरणीय मानता था, पर मुझे अपने
आदेशोंपर चलानेवाला हृदय सम्राट् अभीतक नहीं मिल सका था ।
१. देखिए आत्मकथा, भाग २ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दक्षिण आफ्रिकाके कामके<ref>देखिए '''आत्मकथा''', भाग २।</ref> सम्बन्धमें मैं भारतके लगभग सभी जाने-माने नेताओंसे मिला। जस्टिस रानडेका मुझपर रोब गालिब हो गया था। उनकी उपस्थितिमें मुझे बात करनेका साहस नहीं होता था। बदरुद्दीन तैयबजीने मुझे पुत्रके समान समझा और मुझे रानडे और फीरोजशाहके कहनेपर चलनेकी सलाह दी। फीरोजशाह एक प्रकारसे मेरे संरक्षक बन गये। उनकी इच्छा मेरे लिए ब्रह्मवाक्य थी। "तुम्हें २६ सितम्बरको एक सार्वजनिक सभामें भाषण देना है और तुम्हें वहाँ ठीक समयपर पहुँच जाना चाहिए।" मैंने आज्ञा-पालन किया। २५ तारीखकी शामको मुझे उनसे मिलना था। मैं मिलने गया।
"तुमने अपना भाषण लिख डाला?"—उन्होंने पूछा।
"जी नहीं।"
"इस तरह नहीं चलेगा, युवक। क्या आज रातको लिख सकते हो?—मुंशी, तुम श्री गांधीके पास जाकर भाषणकी पाण्डुलिपि ले आना। रातों-रात ही यह छप जाये और उसकी एक प्रति मुझे भेज दी जाये।" मेरी ओर मुड़कर उन्होंने आगे कहा : "गांधी, बहुत लम्बा भाषण न लिखना। तुम नहीं जानते बम्बईके श्रोता बहुत लम्बा भाषण पसन्द नहीं करते।" मैंने सिर झुका दिया।
बम्बई-केसरीने मुझे आदेशका पालन करना सिखाया। उन्होंने मुझे अपना शिष्य नहीं बनाया। उन्होंने इसके लिए कोशिश भी नहीं की।
उसके बाद मैं पूना गया। मैं वहाँ बिलकुल अजनबी था। मेरे मेजबान मुझे पहले श्री तिलकके पास ले गये। जब मैं उनसे मिला तो वे अपने सहयोगियोंसे घिरे हुए थे। उन्होंने मेरी बात सुनी और कहा "हमें तुम्हारे लिए एक सभा आयोजित करनी होगी। लेकिन शायद तुम्हें पता नहीं कि दुर्भाग्यवश यहाँ दो दल हैं। तुम सभापतित्व करनेके लिए, कहींसे कोई निर्दलीय व्यक्ति जुटाओ। तुम डा॰ भाण्डारकरसे मिलोगे?" मैंने बात मान ली और वापस आ गया। मेरे मनमें श्री तिलककी बहुत स्पष्ट स्मृति नहीं है। बस इतना ही याद है कि उन्होंने अपने प्रेम और अपनी बेतकल्लुफीसे मेरी घबराहट दूर कर दी थी। वहाँसे, मुझे ऐसा याद है, मैं गोखलेके पास गया और फिर डा॰ भाण्डारकरके पास। डा॰ भाण्डारकरने मेरे अभिवादनका उत्तर कुछ उस भावसे दिया जैसा कि कोई अध्यापक अपने किसी विद्यार्थीको देता है।
"तुम एक ईमानदार और जोशीले युवक लगते हो। दोपहरकी ऐसी गरमीमें मुझसे मिलने बिरला ही आता। आजकल मैं सार्वजनिक सभाओंमें कभी नहीं जाता किन्तु तुमने एक ऐसी दयनीय परिस्थिति सामने रखी है कि मैं अपना नियम-भंग कर दूँगा।"
श्रद्धेय डाक्टर और उनके बुद्धिमत्तापूर्ण चेहरेके लिए मेरे मनमें श्रद्धा पैदा हो गई थी। किन्तु अपने हृदयके छोटेसे सिंहासनपर मैं उनको नहीं बैठा सका। वह अभीतक खाली था। मैं कई व्यक्तियोंको अनुकरणीय मानता था, पर मुझे अपने आदेशोंपर चलानेवाला हृदय-सम्राट् अभीतक नहीं मिल सका था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||श्रद्धाका स्वरूप|३८५}}</noinclude>गोखलेकी बात कुछ दूसरी थी। कह नहीं सकता क्यों। कालेजके<ref>फर्ग्युसन कालेज, पूना।</ref> अहातेमें उनके मकानपर मैं उनसे मिला था। ऐसा लगा जैसे कोई पुराना मित्र मिल गया हो, बल्कि यों कहिए जैसे लम्बी जुदाईके बाद माँ मिल गई हो। उनका सौम्य चेहरा देखकर मैं एकदम आश्वस्त हो गया। उन्होंने मेरे व्यक्तिगत जीवनके बारेमें, आफ्रिकामें मेरे कामके बारेमें, बड़ी बारीकीसे छोटीसे-छोटी बातें पूछनी शुरू कीं, इस प्रकार उन्होंने मेरे हृदयमें घर कर लिया। उनसे जुदा होते समय मैंने अपने मनमें कहा—"तुम्ही हो वह, जिसकी मुझे तलाश थी।" तबसे गोखलेने मुझे अपनी आँखोंसे ओझल नहीं होने दिया। १९०१ में जब मैं<ref>गांधीजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके कलकत्ता अधिवेशनके समय, गोखलेके साथ एक महीनेतक ठहरे थे; देखिए '''आत्मकथा''', भाग ३, अध्याय १७, १८ और १९।</ref> दुबारा दक्षिण आफ्रिकासे आया, तो हम एक-दूसरेके और भी नजदीक आये। उन्होंने जैसे मुझे अपने हाथमें लेकर गढ़ना शुरू कर दिया। उन्हें इसका बहुत खयाल रहता था कि मैं कैसे बोलता हूँ, कैसे कपड़े पहनता हूँ, कैसे चलता हूँ, क्या खाता हूँ इत्यादि। मेरी माँ भी मेरा इतना खयाल नहीं रखती होगी, जितना गोखले रखते थे। जहाँतक मुझे याद है, हम एक-दूसरेसे कुछ नहीं छिपाते थे। वह सचमुच पहली नजरमें प्रेम हो जानेका मामला था; यह प्रेम १९१३ की<ref>बात उन दिनोंकी है जव गांधीजीने सत्याग्रह छेड़नेका निश्चय किया था; देखिए. खण्ड १२।</ref> कठोर तनावपूर्ण स्थितिमें भी टिका रहा। उनमें मुझे वे सारी बातें दिखीं जिनकी मैं एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता से अपेक्षा करता था। वे स्फटिकके समान शुद्ध, मेमनेकी भाँति विनम्र और सिंहके समान शूर थे। उनमें उदारता तो इतनी थी कि वह एक दोष बन गई थी। हो सकता है उनमें इनमें से एक भी गुण न रहा हो, लेकिन मेरे लिए इसका कोई महत्त्व नहीं। मेरे लिए इतना ही काफी है कि मुझे उनमें कोई दोष नहीं दिखाई पड़ा, जिसको लेकर मैं उनकी भर्त्सना कर सकूँ। मेरे लिए वे राजनीतिक क्षेत्रमें सबसे दोषरहित व्यक्ति थे और हैं। यह नहीं कि हममें मतभेद नहीं थे। सामाजिक प्रथाओंके बारेमें अपने विचारोंमें १९०१में भी हममें मतभेद था—उदाहरणके लिए विधवा-विवाहके प्रश्नपर। पश्चिमी सभ्यताके मूल्यांकनके सवालपर भी हमने देखा कि हमारे विचार भिन्न-भिन्न हैं। अहिंसापर मेरे कट्टर विचारोंसे उन्होंने स्पष्ट ही मतभेद प्रकट किया था। किन्तु इन मतभेदोंका न उनके लिए कोई महत्त्व था, न मेरे लिए। हमें दुनियाकी कोई चीज एक-दूसरेसे अलग नहीं कर सकती थी। यह अटकल लगाना कि यदि वे आज जीवित होते तो क्या होता, उनकी आत्माका अपमान करना है। मैं जानता हूँ कि मैं उनके नेतृत्वमें काम करता होता। मैंने यह-सब स्पष्टीकरण इसलिए किया है कि उस गुमनाम पत्रसे मुझे चोट पहुँची है, क्योंकि उसमें यह कहा गया है कि मैं अपने राजनीतिक शिष्यत्वके सम्बन्धमें धोखा देता हूँ। क्या मैंने उस दिवंगत आत्माका ऋण स्वीकार करनेमें कोताही की है? मैंने सोचा मुझे गोखलेके प्रति अपनी वफादारीकी घोषणा कर<noinclude>{{Left|२०–२५|2em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>देनी चाहिए, खासकर तब जब मैं एक ऐसे खेमेमें हूँ जिसको भारतीय जनता विरोधी दल मानती है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', १३-७-१९२१|2em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१७९. पत्र-लेखकोंसे'''}}}}
'''एक प्रशंसक''' : अली बन्धु खिलाफतके कोषसे निर्वाह नहीं करते।
'''आर॰ जे॰ वर्मा''' : जहाँ-जहाँ ताल्लुके, जिले या प्रान्तका पूरा भाग इकट्ठा नहीं किया जा सका है, वहाँ निश्चय ही कांग्रेस महासमितिकी बैठक के बाद भी चंदा इकट्ठा करना जारी रहना चाहिए। और जो व्यक्ति अपना चंदा लिखा चुका है वह सौजन्यपूर्वक यह कहकर तो इनकार कर ही नहीं सकता कि पूरा भाग तो इकट्ठा किया ही जा चुका है। जिन वकीलोंने कांग्रेसके प्रस्तावके अनुसार वकालत बन्द कर दी थी, वे यदि फिर वकालत आरम्भ करें तो शिष्टाचारका तकाज़ा तो यह होगा कि वे किसी कांग्रेस कमेटीमें पद-ग्रहण न करें।
''''स्वराज्य'''' : यदि कोई स्वदेशी भण्डार जापानी कपड़ेको स्वदेशी कपड़ेके नामसे बेच रहा है, तो निश्चय ही उसका भंडा-फोड़ किया जाना चाहिए और उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। इस तरहकी धोखाधड़ीके विरुद्ध विवेकपूर्ण सक्रिय लोकमत तैयार करना अत्यन्त अचूक उपाय होता है। इसके अतिरिक्त लोगोंको सब तरहका बारीक कपड़ा त्याग देना चाहिए। हाथ-कते सूतके और हाथ-बुने कपड़ेमें भ्रमकी गुंजाइश ही नहीं है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', १३-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१८०. सन्देश : धारवाड़की जनताको'''}}}}
{{Right|[१४ जुलाई, १९२१ के पूर्व]}}
धारवाड़में गवर्नमेंटकी कार्रवाइयोंको मैं अत्यन्त ध्यानपूर्वक देख रहा हूँ। जो लोग सरकारी जुल्मके शिकार हुए हैं उनके सम्बन्धियोंको मैं बधाई देता हूँ और जनताको भी उसके धैर्य और सहनशीलताके लिए बधाई देता हूँ। मुझे यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई है कि धारवाड़के निवासियोंका उत्साह गिरफ्तारियोंके बावजूद मन्द नहीं पड़ा। मुझे विश्वास है कि यदि हम लोग अपने धैर्य और अहिंसाके सिद्धान्तके अनुसार काम करते रहे तो धारवाड़ जैसी घटनाएँ स्वराज्य-सिद्धिमें बहुत सहायक होंगी। ज्ञानपूर्वक बदला न लेना जनताके साहसको दूना कर देता है और<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{dhr}}
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
|-
| || भूमिका || ५
|-
| || आभार || ११
|-
| || पाठकोंको सूचना ||१२
|-
| || चित्र-सूची || १४
|-
|१. || पत्र : गृह-मंत्रीको (१-४-१९१३) || १
|-
|२. ||तूफानका संकेत (५-४-१९१३) || २
|-
|३. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१४] (५-४-१९१३) ||४
|-
|४. || तार : गृह-मन्त्रीको (९-४-१९१३) || ७
|-
|५. || तार : गृह-मन्त्रीको (९-४-१९१३) || ८
|-
|६. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (९-४-१९१३) || ८
|-
|७. || तार : ब्रिटिश भारतीय संघको (९-४-१९१३ के बाद) || १०
|-
|८. || पत्र : गवर्नर-जनरलके निजी सचिवको (१०-४-१९१३) || १०
|-
|९. || पत्र : गृह-सचिवको (११-४-१९१३) || ११
|-
|१०. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (११-४-१९१३)|| १२
|-
|११. || नया विधेयक (१२-४-१९१३) || १३
|-
|१२. || वैवाहिक उलझन (१२-४-१९१३) || १४
|-
|१३. || विधेयकका परिणाम (१२-४-१९१३) || १५
|-
|१४. || नया और पुराना विधेयक (१२-४-१९१३)|| १६
|-
|१५. || जनूबीका मामला (१२-४-१९१३)|| १८
|-
|१६. || हिन्दुओंसे (१२-४-१९१३)|| १९
|-
|१७. || संघको उत्तर (१२-४-१९१३) || २०
|-
|१८. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१५] (१२-४-१९१३)|| २१
|-
|१९. || पत्र : गृह-सचिवको (१४-४-१९१३) || २४
|-
|२०. || तार : गृह-मन्त्रीको (१५-४-१९१३) ||२६
|-
|२१. || पत्र : गृह-सचिवको (१५-४-१९१३)|| २८
|-
|२२. || पत्र: ड्रमण्ड चैपलिनको (१६-४-१९१३)|| २९
|-
|२३. || कस्तूरबा गांधीसे बातचीत (१९-४-१९१३ के पूर्व)||३०
|-
|२४. || प्रवासी विधेयक (१९-४-१९१३)|| ३१
|-
|२५. || लॉर्ड ऍम्टहिलकी समिति (१९-४-१९१३)|| ३२
|-
|२६. || नेटाली भारतीयो, सावधान ! (१९-४-१९१३)|| ३३
|-
|२७. || शिकारीका जाल (१९-४-१९१३)|| ३४
|-
|२८. || नया विधेयक (१९-४-१९१३)|| ३५
|-
|२९. ||श्रीमती पैंकहर्टका त्याग (१९-४-१९१३) ||३६
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२१
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
|-
| || || पृष्ठ
|-
| || भूमिका || ५
|-
| || आभार || १३
|-
| || को सूचना || १४
|-
| || चित्र-सूची || २८
|-
|१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१६-८-१९२४) || १
|-
|२. || पत्र : राधा गांधीको (१६-८-१९२४) || १
|-
|३. || मलाबार संकट निवारण (१७-८-१९२४) || २
|-
|४. || शिक्षक और चरखेको शिक्षा (१७-८-१९२४) || ५
|-
|५. || टिप्पणियाँ : मौलाना शौकत अली काठियावाड़ में; तकलीकी उपयोगिता;<br>राष्ट्रीय स्कूलोंमें दण्ड-नीति क्या वे राक्षस थे?; अन्त्यजोंके प्रति<br>तिरस्कार; अन्त्यज स्कूलों की कमी; करुणाजनक; सहानुभूतिका अभाव;<br>परदेशी बनाम स्वदेशी खाँड; काठियावाड़ में खादी-प्रचार; अमरेली<br>खादी-कार्यालय (१७-९-१९२४) || ५
|-
|६. || गांधीजीके लिए या देशके लिए? (१७-८-१९२४) || ११
|-
|७. || क्षमा-प्रार्थना (१७-८-१९२४) || १२
|-
|८. || पत्र : अजमेरके यातायात अधीक्षकको (१८-८-१९२४) || १२
|-
|९. || तार : एन° एच° बेलगाँववालाको (१९-८-१९२४ या उसके पश्चात्) || १४
|-
|१०. || टिप्पणियाँ : पहली किस्त; अली भाइयोंका हिस्सा; आचार्य गिडवानी; मन्दिरों-<br>की पवित्रताका भंग; नेटालके भारतीय; केनियाका फैसला (२१-८-१९२४) || १४
|-
|११. || बोल्शेविज्म या आत्म-संयम? (२१-८-१९२४) || १९
|-
|१२. || शक्तिका अपव्यय? (२१-८-१९२४) || २१
|-
|१३. || अन्तःकरणकी आड़ में (२१-८-१९२४) || २४
|-
|१४. || मार्गको कठिनाइयाँ (२१-८-१९२४) || २६
|-
|१५. || हब्शियोंकी सहानुभूति (२१-८ १९२४) || २८
|-
|१६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२१-८-१९२४) || २९
|-
|१७. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२२-८-१९२४) || ३०
|-
|१८. || भेंट : हिन्दू-मुस्लिम एकतापर (२२-८-१९२४) || ३१
|-
|१९. || पत्र : जमनालाल बजाजको (२३-८-१९२४) || ३१
|-
|२०. || पत्र : भवानी दयालको (२३-८-१९२४) || ३२
|-
|२१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२३-८-१९२४) || ३२
|-
|२२. || भाषण : मजदूरोंकी सभा, अहमदाबादमें (२३-८-१९२४) || ३३
|-
|२३. || पहली परीक्षा (२४-८-१९२४) || ३३
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|-
|२४. || टिप्पणियाँ : वंध्या पार्लियामेंट; अन्तरात्माकी पुकार (२४-८-२९२४) || ३६
|-
|२५. || पत्र : च° राजगोपालाचारीको (२४-८-१९२४) || ३७
|-
|२६. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्र्यूजको (२५-८-१९२४ से पूर्व) || ३९
|-
|२७. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्रयूजको (२५-८-१९२४) || ४०
|-
|२८. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२५-८-१९२४) || ४१
|-
|२९. || भाषण : अहमदाबाद नगरपालिकाके अभिनन्दनके उत्तर में (२६-८-१९२४) || ४१
|-
|३०. || पत्र : अब्दुल मजीदको (२७-८-१९२४) || ४३
|-
|३१. || टिप्पणियाँ : लॉर्ड लिटनकी सफाई; अधीनताका विल्ला; मिलकी खादी;<br>विदेशों में रहनेवाले भारतीय; ध्यान दीजिए (२८-८-१९२४) || ४४
|-
|३२. || गुलबर्गाका पागलपन (२८-८-१९२४) || ४८
|-
|३३. || आंकड़ोंपर विचार (२८-८-१९२४) || ५१
|-
|३५. || दक्षिण भारतके बाढ़ पीड़ितों को सहायता (२८-८-१९२४) || ५२
|-
|३४. || दो पहलू (२८-८-१९२४) || ५५
|-
|३६. || भाषण : बम्बई - निगमके अभिनन्दनके उत्तरमें (२९-८-१९२४) || ५५
|-
|३७. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३०-८-१९२४) || ५६
|-
|३८. || वक्तव्य : राष्ट्रीय एकताके बारेमें (३१-८-१९२४) || ५८
|-
|३९. || भाषण : एक्सेल्सियर थियेटर, बम्बईमें (३१-८-१९२४) || ५९
|-
|४०. || भाषण : बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठकमें (३१-८-१९२४) || ६६
|-
|४१. || पत्र : वाइकोम सत्याग्रह आश्रमके मन्त्रीको (१-९-१९२४) || ६७
|-
|४२. || पत्र : शुएब कुरैशीको (१-९-१९२४) || ६७
|-
|४३. || पत्र : बम्बईके यातायात महाप्रबन्धकको (१-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || ६८
|-
|४४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२-९-१९२४) || ६८
|-
|४५. || पत्र : एक मित्रको (२-९-१९२४) || ६९
|-
|४६. || पत्र : कान्ति गांधीको (२-९-१९२४) || ७०
|-
|४७. || भाषण : नेशनल मैडिकल कालेज, बम्बई में (२-९-१९२४) || ७०
|-
|४८. || भाषण : कांग्रेस कमेटीकी बैठकमें (२-९-१९२४) || ७१
|-
|४९. || तार : मोतीलाल नेहरूको (२-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || ७१
|-
|५०. || पत्र : सन्तोक गांधीको (३-९-१९२४) || ७२
|-
|५१. || अविस्मरणीय (४-९-१९२४) || ७३
|-
|५२. || बम्बईका खादी-भण्डार (४-९-१९२४) || ७७
|-
|५३. || बनारस में कताई (४-९-१९२४) || ७७
|-
|५४. || पतितोंके लिए (४-९-१९२४) || ७९
|-
|५५. || टिप्पणियाँ: न्यूनतम समान कार्यक्रम; कब खत्म होगी?; सभापतिके<br>बारेमें? फिर नागपुर, आन्ध्रमें प्रगति (४-९-१९२४) || ८०
|-
|५६. || कसौटीपर (४-९-१९२४) || ८५
|-
|५७. || जेल के अनुभव - ११ (४-९-१९२४) || ८८
|-
|५८. || भाषण : पूनाकी सार्वजनिक सभा में (४-९-१९२४) || ९४
|}<noinclude></noinclude>
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|-
|५९. || भाषण : तिलक महाविद्यालय, पूनाके दीक्षान्त समारोह में (४-९-१९२४) || ९६
|-
|६०. || पूनाके कार्यकर्ताओंके साथ चर्चा (४-९-१९२४) || ९७
|-
|६१. || भाषण : सूरतके कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओंके समक्ष (५-९-१९२४) || ९९
|-
|६२. || भाषण : सूरतकी सार्वजनिक सभामें (५-९-१९२४) || ९९
|-
|६३. || सन्देश : 'साँझ वर्तमान'को (६-९-१९२४ से पूर्व) || १०१
|-
|६४. || तार : पण्डित मदनमोहन मालवीयको (६-९-१९२४) || १०२
|-
|६५. || तार : मुहम्मद अलीको (६-९-१९२४) || १०२
|-
|६६. || पत्र : गोपबन्धु दासको (६-९-१९२४) || १०३
|-
|६७. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (६-९-१९२४) || १०३
|-
|६८. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (६-९-१९२४) || १०४
|-
|६९. || पत्र : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको ( ६-९-१९२४) || १०५
|-
|७०. || पत्र : जमनालाल बजाजको (६-९-१९२४) || १०६
|-
|७१. || टिप्पणी : खादी प्रचार (७-९-१९२४) || १०७
|-
|७२. || सूतकी जाँच (७-९-१९२४) || १०८
|-
|७३. || दादाभाई नौरोजीकी जयन्ती (७-९-१९२४) || १०९
|-
|७४. || बम्बईकी उदारता (७-९-१९२४) || १११
|-
|७५. || दो प्राचीन पुस्तकें (७-९-१९२४) || ११२
|-
|७६. || पत्र : कनिकाके राजा साहबको (७-९-१९२४) || ११३
|-
|७७. || पत्र : मुहम्मद अलीको (८-९-१९२४) || ११३
|-
|७८. || पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको (८-९-१९२४) || ११५
|-
|७९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (८-९-१९२४) || ११६
|-
|८०. || पत्र : आनन्दानन्दको (८-९-१९२४) || ११७
|-
|८१. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१०-९-१९२४) || ११८
|-
|८२. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१०-९-१९२४) || ११८
|-
|८३. || पत्र : तारामती मथुरादासको (१०-९-१९२४) || ११९
|-
|८४. || टिप्पणियाँ : आगामी १५ तारीख ; कुछ और आँकड़े; प्रतिनिधियोंके<br>अतिरिक्त; योग्य कार्य; वाइकोम सत्याग्रह; राष्ट्रीय स्वयंसेवक; एक<br>भद्दी तुलना; असन्तोषजनक उत्तर; अनुकरणीय उदाहरण; कांग्रेसियों<br>द्वारा जालसाजी (११-९-१९२४) || ११९
|-
|८५. || वास्तविकताएँ (११-९-१९२४) || १२७
|-
|८६. || जेलके अनुभव–११ [चालू] (११-९-१९२४) || १३३
|-
|८७. || पत्र : एक मित्रको (११-९-१९२४) || १३७
|-
|८८. || पत्र : इन्द्र विद्यावाचस्पतिको (११-९-१९२४) || १३८
|-
|८९. || तार : कृष्णदासको (१२-९-१९२४ से पूर्व) || १३९
|-
|९०. || तार : बालमुकुन्द वाजपेयीको (१२-९-१९२४) || १३९
|-
|९१. || तार : अब्दुल बारीको (१२-९-१९२४) || १३९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
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|+{{c|{{larger|'''अठारह'''}}}}
|-
|९२. || पत्र : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (१३-९-१९२४) || १४०
|-
|९३. || पत्र : फूलचन्द शाहको (१३-९-१९२४) || १४०
|-
|९४. || पत्र : राधा गांधीको (१३-९-१९२४) || १४१
|-
|९५. || पत्र : सन्मुखरायको (१३-९-१९२४) || १४२
|-
|९६. || पत्र : शरद् कुमार घोषको (१३-९-१९२४ के पश्चात्) || १४२
|-
|९७. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (१४-९-१९२४) || १४३
|-
|९८. || असफलता के कारण (१४-९-१९२४) || १४७
|-
|९९. || टिप्पणियाँ : कातनेवालोंको निर्देश; काठियावाड़ियोंसे क्षमायाचना; प्रचार<br>कैसे करें?; बुनाईके कामसे कमाई (१४-९-१९२४) || १५२
|-
|१००. || पत्र : एनी बेसेंटको (१४-९-१९२४) || १५४
|-
|१०१. || पत्र : आनन्दानन्दको (१४-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || १५५
|-
|१०२. || तार : अब्दुल बारीको (१४-९-१९२४ के पश्चात्) || १५६
|-
|१०३. || टिप्पणी : आधी रातका कतैया (१५-९-१९२४) || १५६
|-
|१०४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१५-९-१९२४) || १५७
|-
|१०५. || पत्र : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (१५-९-१९२४) || १५८
|-
|१०६. || भाषण : 'हिन्दुस्तान टाइम्स' दिल्लीके उद्घाटन समारोह के अवसरपर<br>(१५-९-१९२४) || १५९
|-
|१०७. || तार : जमनादास द्वारकादास को (१५-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || १६०
|-
|१०८. || सन्देश : लाहौरके 'हिन्दू' को (१५-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || १६०
|-
|१०९. || पत्र : वल्लभभाई पटेलको (१६-९-१९२४) || १६१
|-
|११०. || टिप्पणियाँ: किसी कांग्रेसीका सम्बन्ध नहीं; किसीके जरिये नहीं<br>(१७-९-१९२४) || १६१
|-
|१११. || जेल के अनुभव—११ [चालू] (१७-९-१९२४ से पूर्व) || १६३
|-
|११२. || पत्र : मुहम्मद अलीको (१७-९-१९२४) || १६६
|-
|११३. || मौन-दिवसकी टीप (१७-९-१९२४) || १६६
|-
|११४. || पत्र : सी° एक° एन्ड्रयूजको (१७-९-१९२४) || १६७
|-
|११५. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१७-९-१९२४) || १६८
|-
|११६. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-१-१९२४) || १६८
|-
|११७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-१-१९२४) || १६९
|-
|११८. || पत्र : रुक्मिणी गांधीको (१७-१-१९२४) || १६९
|-
|११९. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्रयूजको (१८-९-१९२४ से पूर्व) || १७०
|-
|१२०. || टिप्पणियाँ : डा° एनी बेसेंटकी घोषणा; स्थगित किया जा रहा है<br>या रद?; हृदयको एकता; वाइकोम-सत्याग्रह; दक्षिण भारतके लिए<br>सहायता; अपने प्रान्तका गर्व (१८-९-१९२४) || १७१
|-
|१२१. || सबसे बड़ा प्रश्न (१८-९-१९२४) || १७७
|-
|१२२. || स्पष्टीकरण (१८-९-१९२४) || १८२
|-
|१२३. || गांधीजीका खुलासा (१८-१-१९२४) || १८४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||५०१|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करनेपर कटिबद्ध हैं। अगर हम सब लोगोंके हृदयमें अहिंसाकी भावना अच्छी तरह रम गई होती, या थोड़े ही लोगोंने उसे हृदयंगम कर लिया होता, पर दूसरे लोग सिर्फ निरुपद्रवी ही बने रहते, तो किसी तरहका खून-खराबा न होता। किन्तु होनहार ऐसी नहीं थी। ऐसी हालत में शान्तिपूर्ण वातावरण बनाने के लिए कुछ लोगोंके लिए स्वेच्छापूर्वक अपना खून बहाना जरूरी था। जबतक खून-खराबा करनेवाले दुर्बल लोग हमारे बीच मौजूद रहेंगे तबतक दूसरे ऐसे कमजोर लोग भी निकलेंगे ही जो मार-काटकी विद्यामें अधिक निपुण और हिंसाके साधनोंसे सम्पन्न लोगोंकी मदद लेना चाहेंगे। इसीलिए तो पारसियों और ईसाइयोंने सरकारकी सहायता मांगी और सरकारने दी भी यहाँतक दी कि उसने खुल्लमखुल्ला उनका पक्ष लिया और उनको हथियार देकर बदलेकी कार्रवाईके रूपमें खून-खराबा करनेके लिए उत्तेजित किया और उन लोगोंमें से किसी एककी भी जान बचानेकी जरा भी परवाह नहीं की, जो शुरूमें तो दरअसल गुनहगार थे, परन्तु बादमें पारसियों, ईसाइयों और यहूदियोंके क्षम्य कोपके शिकार हुए। इस तरह यह सरकार बिलकुल नग्नरूपमें सामने आ गई है। वह एक ऐसे पक्ष के रूपमें सामने आई है जो शान्तिकी रक्षाके लिए ही नहीं, बल्कि अपने क्षतिग्रस्त समर्थकोंकी आक्रामक हिंसाको बल पहुँचाने के लिए हिंसापूर्ण कार्य करता है। वैसे ईसाइयोंका क्रोध सकारण था। परन्तु जब वे बेकसूर लोगोंकी सफेद टोपियाँ छीन रहे थे और अपनी टोपियाँ न देनेवाले लोगोंकी पिटाई कर रहे थे अथवा जब पारसी लोग आत्मरक्षाके लिए नहीं बल्कि केवल इसीलिए लोगोंको मार रहे थे और उनपर गोलियाँ चला रहे थे कि वे व्यक्ति हिन्दू या मुसलमान या असहयोगी थे, तब सरकारी पुलिस और फौज निष्ठुरतापूर्ण उपेक्षाके साथ अलग खड़ी तमाशा देखती रही। मैं उन दुःखी और पीड़ित पारसी और ईसाइयोंको तो क्षमा कर सकता हूँ; परन्तु पुलिस और फौजने तरफदारी करते हुए जो मुजरिमाना बर्ताव किया है, उसका कोई औचित्य नहीं दिखाई देता।
इसलिए असहयोगी कार्यकर्त्ताओंका तो यही कर्त्तव्य है कि वे सरकार तथा अपने इन पथ भूले देशभाइयोंके हाथों चोटें सहन करें। बस, हिंसात्मक शक्तियोंको निष्प्रभावी बनाने का यह एक ही रास्ता हमारे लिए खुला है। शीघ्र स्वराज्य प्राप्तिका मार्ग तो यही है कि हम हिंसाकी ताकतोंपर अपना नियन्त्रण कायम कर लें — सो भी अधिक हिंसात्मक उपायोंके द्वारा नहीं, बल्कि नैतिक प्रभाव डालकर। हमें यह सूरजकी रोशनीकी तरह साफ-साफ दिखाई देना चाहिए कि हिंसात्मक कार्रवाइयोंके लिए अपने-आपको इतना प्रशिक्षित कर लेना, इतनी साधन-सामग्री जुटा लेना हमारे लिए असम्भव है कि उसके जरिये हम इस वर्तमान सरकारको बदल दें।
कई लोग यह खयाल करते हैं कि सत्रह तारीखके उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन यह दंगा-फसाद खड़ा हो जानेसे युवराज के स्वागत के प्रति जनताका रोष जिस तीव्रतासे प्रकट हुआ है उतने कारगर तौरसे वह दूसरे ढंगसे शायद ही होता। इस दलीलसे जितना अज्ञान प्रकट होता है उतनी ही दुर्बलता भी। अज्ञान इस दृष्टिसे कि हमारा लक्ष्य स्वागतको हानि पहुँचाना नहीं था, और दुर्बलता इस दृष्टिसे कि अब भी हम अपने बलकी जानकारीसे सन्तुष्ट रहनेकी अपेक्षा उसे दूसरोंपर जाहिर करने के लिए मरे जाते<noinclude></noinclude>
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इसलिए असहयोगी कार्यकर्त्ताओंका तो यही कर्त्तव्य है कि वे सरकार तथा अपने इन पथ भूले देशभाइयोंके हाथों चोटें सहन करें। बस, हिंसात्मक शक्तियोंको निष्प्रभावी बनाने का यह एक ही रास्ता हमारे लिए खुला है। शीघ्र स्वराज्य प्राप्तिका मार्ग तो यही है कि हम हिंसाकी ताकतोंपर अपना नियन्त्रण कायम कर लें — सो भी अधिक हिंसात्मक उपायोंके द्वारा नहीं, बल्कि नैतिक प्रभाव डालकर। हमें यह सूरजकी रोशनीकी तरह साफ-साफ दिखाई देना चाहिए कि हिंसात्मक कार्रवाइयोंके लिए अपने-आपको इतना प्रशिक्षित कर लेना, इतनी साधन-सामग्री जुटा लेना हमारे लिए असम्भव है कि उसके जरिये हम इस वर्तमान सरकारको बदल दें।
कई लोग यह खयाल करते हैं कि सत्रह तारीखके उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन यह दंगा-फसाद खड़ा हो जानेसे युवराज के स्वागत के प्रति जनताका रोष जिस तीव्रतासे प्रकट हुआ है उतने कारगर तौरसे वह दूसरे ढंगसे शायद ही होता। इस दलीलसे जितना अज्ञान प्रकट होता है उतनी ही दुर्बलता भी। अज्ञान इस दृष्टिसे कि हमारा लक्ष्य स्वागतको हानि पहुँचाना नहीं था, और दुर्बलता इस दृष्टिसे कि अब भी हम अपने बलकी जानकारीसे सन्तुष्ट रहनेकी अपेक्षा उसे दूसरोंपर जाहिर करने के लिए मरे जाते<noinclude></noinclude>
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{{C|{{larger|'''२०२. लोहे के चने'''}}}}
सविनय कानून-भंगके लिए गुजरातका सबसे पहले कदम बढ़ाना लोहे के चने चबाने से भी कठिनतर है। फिर भी एक भी तहसील अगर इसमें सफल हो जाये तो स्वराज्य हमारी मुट्ठीमें ही धरा है, मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं । इसका अर्थ यह है कि जो तहसील बीड़ा उठाये उसमें एक सत्याग्रही सेना तैयार हो जाये। मैं पहले कह चुका हूँ कि सत्याग्रही सेनामें औरत-मर्द, जवान-बूढ़े, लूले लंगड़े, दुर्बल-सबल, हिन्दू-मुसल- मान, पारसी-ईसाई-यहूदी, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य- शूद्र भंगी- चमार, सब भरती हो सकते हैं । प्रह्लादकी तरह कोई बालक भी आ जाये तो वह भी दाखिल हो सकता है। और माँ-बाप अपने लड़के-बालोंकी भी भरती करा सकते हैं। यह खासा पचमेल मेला ही है; पर फिर भी यह प्रतिपक्षी सेनाके मुकाबले में बहुत ही ज्यादा काम कर सकता है और इसपर खर्च भी [ उसके मुकाबले में ] क्या होगा ? इस सेनाके सिपाहियों में एक गुण जरूर होना चाहिए- - निर्भयता । उनमें मरनेकी शक्ति होनी चाहिए अर्थात् उस सिपाही में आस्तिकता होनी चाहिए।
जिन दूसरे गुणोंकी आवश्यकता मैंने बताई<ref>१. देखिए " परीक्षा”, १३-११-१९२१ ।</ref> है वे सदा आवश्यक नहीं हैं। वे गुण तो सिर्फ आजकी परिस्थितिके ही लिए आवश्यक हैं।
फिर भी, यद्यपि इस तरह लिख देना तो आसान है तथापि जबतक मनुष्य उसे समझ नहीं पाता तबतक वह कठिन मालूम होता है । जो तहसील बीड़ा उठाये उसमें जबर्दस्त परिवर्तन होने चाहिए। उस तहसील के सिपाही एक पल भी व्यर्थ न बैठें। इससे जब युद्ध शुरू होगा तब प्रत्येक सत्याग्रही या ग्रहिणी या तो जेल जानेके लिए किसी जगह सविनय अवज्ञा करते दिखाई देंगे या सूत कातते हुए, खादी बुनते हुए, या रुई धुनकते और कपास लोढ़ते हुए पाये जायेंगे। कोई छिन-भर भी अकर्मण्य नहीं बैठ सकता, फिर चाहे वह धनी हो चाहे भिखारी । सिपाहीगिरीमें धनवान और निर्धनका भेद नहीं रहता । जार्ज पंचम जब जहाजपर काम करते थे तब वे भी औरोंकी तरह जमीनपर सोते थे, बिना दूधकी चाय पीते थे तथा चौकर मिली मोटी रोटी खाते थे। ऐसा ही होना चाहिए।
इसलिए जिस तहसीलको तैयारी करनी हो उसे तथा जो तैयार हो गई हों उन्हें भी अपनी तहसीलके गाँवोंका अलग-अलग नकशा तैयार करना चाहिए। उसमें नीचे लिखा ब्यौरा हो :
१. गाँवका नाम
२. पड़ावसे उसका फासला
३. आबादी । इसमें स्त्री, पुरुष, सोलह वर्ष के अन्दरके लड़के-लड़कियाँ, हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, भंगी, चमारकी तादाद बताई जाये ।<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf/२९
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|-
| || {{Gap}}३. एल° एफ° मॉर्सेहेडके नाम गांधीजीके पत्रके सहपत्र || ५८३
|-
| || {{Gap}}४. आपराधिक कार्रवाईकी संहिताकी धारा १४४ के अन्तर्गत आदेश || ५८४
|-
| || {{Gap}}५. गांधीजीसे भेंटके सम्बन्धमें माननीय मॉडकी टिप्पणी || ५८६
|-
| || {{Gap}}६. गांधीजी द्वारा दर्ज किये गये किसानोंके बयान || ५८८
|-
| || {{Gap}}७. चम्पारन कृषीय जांच समितिके समक्ष साक्ष्य आमंत्रित<br>{{Gap}}करनेका सरकारी नोटिस || ५९०
|-
| || {{Gap}}८. गुजरात-सभा कार्यालयका परिपत्र || ५९१
|-
| || {{Gap}}९. चम्पारन समितिको बैठककी कार्यवाहीका विवरण || ४९२
|-
| || {{Gap}}१०. मो° क° गांधी और प्रमुख बागान मालिकों द्वारा<br>{{Gap}}हस्ताक्षरित समझौता || ५९३
|-
| || {{Gap}}११. चम्पारन कृषीय जाँच समितिका प्रतिवेदन || ५९४
|-
| || {{Gap}}१२. परिषदीय परमादेश || ६१९
|-
| || {{Gap}}१३. चम्पारन कृषीय विधेयक || ६२०
|-
| || सामग्री के साधन-सूत्र || ६२३
|-
| || तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ६२५
|-
| || शीर्षक सांकेतिका || ६४१
|-
| || सांकेतिका || ६४६
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२२
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|-
|३०. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [ -१६] (१९-४-१९१३) || ३७
|-
|३१. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१९-४-१९१३) || ३९
|-
|३२. || तार : कैलरेको (२६-४-१९१३) || ४१
|-
|३३. ||तीन पौंडी कर-सम्बन्धी निराशा (२६-४-१९१३) || ४१
|-
|३४. || वह विधेयक (२६-४-१९१३)|| ४२
|-
|३५. || नया विधेयक (२६-४-१९१३) || ४३
|-
|३६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [ -१७] (२६-४-१९१३) || ४४
|-
|३७. || तार : गुल और गुलमुहम्मदको (२६-४-१९१३) || ५०
|-
|३८. || भाषण : फ्रीडडॉर्प में (२७-४-१९१३) || ५९
|-
|३९. || तार : ड्रमंड चैपलिन तथा अन्य लोगोंको (२७-४-१९१३ के बाद) || ५२
|-
|४०. || तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२७-४-१९१३) ||५३
|-
|४१. || भेंट : 'स्टार' के प्रतिनिधिको (२८-४-१९१३) || ५४
|-
|४२. || पत्र : गवर्नर-जनरलके निजी सचिवको (३०-४-१९१३) || ५५
|-
|४३. || विधेयक ( ३-५ - १९१३) || ५६
|-
|४४. || संघर्ष (३-५-१९१३) || ५७
|-
|४५. || आयोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [ -१८] (३-५-१९१३) || ६०
|-
|४६. || पत्र : गृह-सचिवको (७-५-१९१३ के बाद) ||६२
|-
|४७. ||भारतीय महिलाएँ सत्याग्रहीके रूपमें ( १०-५-१९१३) || ६३
|-
|४८. || स्त्रियोंका प्रस्ताव ( १०-५-१९१३) || ६४
|-
|४९. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१९] ( १०-५-१९१३) || ६५
|-
|५०. || पत्र : भवानी दयालको (१२-५-१९१३) || ६८
|-
|५१. || पत्र : ड्रमंड चैपलिनको (१४-५-१९१३) || ६९
|-
|५२. || द्वितीय वाचन (१७-५-१९१३) || ७०
|-
|५३. ||आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [२०] (१७-५-१९१३) || ७१
|-
|५४. ||पत्र : गृह-सचिवको (१९-५-१९१३) || ७५
|-
|५५. ||पत्र : गृह-सचिवको (१९-५-१९१३) || ७५
|-
|५६. ||विधेयक (२४-५-१९१३) || ७६
|-
|५७. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२१] (२४-५-१९१३)|| ७८
|-
|५८. || तार : ड्रमंड चैपलिन और दूसरोंको (२४-५-१९१३) || ८०
|-
|५९. ||तार : मार्शल कैम्बेलको (२४-५-१९१३)|| ८१
|-
|६०. ||तार : पैट्रिक डंकनको (२७-५-१९१३) ||८१
|-
|६१. ||तार : गृह मन्त्रीको (२७-५-१९१३) ||८२
|-
|६२. ||तार : सर डेविड इंटरको (२७-५-१९१३) ||८३
|-
|६३. ||तार : श्राइनर और कैम्बेलको (२७-५-१९१३ ) || ८३
|-
|६४. || तार : गृह मन्त्रीको (२७-५-१९१३) || ८४
|-
|६५. ||तार : मॉरिस अलेक्जेन्डरको (२९-५-१९१३) || ८५
|-
|६६. || तार : सिनेटर श्राइनरको (२९-५-१९१३) ||८६
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|सोलह|}}
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|-
|३०. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१६] (१९-४-१९१३) || ३७
|-
|३१. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१९-४-१९१३) || ३९
|-
|३२. || तार : कैलरेको (२६-४-१९१३) || ४१
|-
|३३. ||तीन पौंडी कर-सम्बन्धी निराशा (२६-४-१९१३) || ४१
|-
|३४. || वह विधेयक (२६-४-१९१३)|| ४२
|-
|३५. || नया विधेयक (२६-४-१९१३) || ४३
|-
|३६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१७] (२६-४-१९१३) || ४४
|-
|३७. || तार : गुल और गुलमुहम्मदको (२६-४-१९१३) || ५०
|-
|३८. || भाषण : फ्रीडडॉर्प में (२७-४-१९१३) || ५९
|-
|३९. || तार : ड्रमंड चैपलिन तथा अन्य लोगोंको (२७-४-१९१३ के बाद) || ५२
|-
|४०. || तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२७-४-१९१३) ||५३
|-
|४१. || भेंट : 'स्टार' के प्रतिनिधिको (२८-४-१९१३) || ५४
|-
|४२. || पत्र : गवर्नर-जनरलके निजी सचिवको (३०-४-१९१३) || ५५
|-
|४३. || विधेयक ( ३-५-१९१३) || ५६
|-
|४४. || संघर्ष (३-५-१९१३) || ५७
|-
|४५. || आयोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१८] (३-५-१९१३) || ६०
|-
|४६. || पत्र : गृह-सचिवको (७-५-१९१३ के बाद) ||६२
|-
|४७. ||भारतीय महिलाएँ सत्याग्रहीके रूपमें ( १०-५-१९१३) || ६३
|-
|४८. || स्त्रियोंका प्रस्ताव ( १०-५-१९१३) || ६४
|-
|४९. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१९] ( १०-५-१९१३) || ६५
|-
|५०. || पत्र : भवानी दयालको (१२-५-१९१३) || ६८
|-
|५१. || पत्र : ड्रमंड चैपलिनको (१४-५-१९१३) || ६९
|-
|५२. || द्वितीय वाचन (१७-५-१९१३) || ७०
|-
|५३. ||आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [२०] (१७-५-१९१३) || ७१
|-
|५४. ||पत्र : गृह-सचिवको (१९-५-१९१३) || ७५
|-
|५५. ||पत्र : गृह-सचिवको (१९-५-१९१३) || ७५
|-
|५६. ||विधेयक (२४-५-१९१३) || ७६
|-
|५७. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२१] (२४-५-१९१३)|| ७८
|-
|५८. || तार : ड्रमंड चैपलिन और दूसरोंको (२४-५-१९१३) || ८०
|-
|५९. ||तार : मार्शल कैम्बेलको (२४-५-१९१३)|| ८१
|-
|६०. ||तार : पैट्रिक डंकनको (२७-५-१९१३) ||८१
|-
|६१. ||तार : गृह मन्त्रीको (२७-५-१९१३) ||८२
|-
|६२. ||तार : सर डेविड इंटरको (२७-५-१९१३) ||८३
|-
|६३. ||तार : श्राइनर और कैम्बेलको (२७-५-१९१३ ) || ८३
|-
|६४. || तार : गृह मन्त्रीको (२७-५-१९१३) || ८४
|-
|६५. ||तार : मॉरिस अलेक्जेन्डरको (२९-५-१९१३) || ८५
|-
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|सत्रह|}}
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|-
|६७. ||तार : सिनेटर श्राइनरको (३०-५-१९१३)||८६
|-
|६८. || तार : गृह मन्त्रीको (३०-५- १९१३ )||८७
|-
|६९. || पत्र : जमनादास गांधीको (३०-५-१९१३)||८८
|-
|७०. ||सम्भावना (३१-५-१९१३)||९१
|-
|७१. || मुनियनका मामला (३१-५-१९१३)||९२
|-
|७२. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२२] (३१-५-१९१३)||९३
|-
|७३. || वक्तव्य : प्रवासी विधेयकके सम्बन्धमें (२-६-१९१३)||९५
|-
|७४. || तार : गृहमन्त्रीको (५-६ - १९१३)||९७
|-
|७५. || विधेयक (७-६-१९१३)||९७
|-
|७६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२३] (७-६-१९१३)||९८
|-
|७७. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (७-६-१९१३)||१००
|-
|७८. || वक्तव्य : तीन पौंडी करके सम्बन्ध में (११-६-१९१३ से पूर्व )||१०२
|-
|७९. || वक्तव्य : प्रवासी विधेयकपर (१३-६-१९१३ )||१०३
|-
|८०. || विधेयक (१४-६-१९१३)||१०४
|-
|८१. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२४] (१४-६-१९१३)||१०६
|-
|८२. || तार : गवर्नर जनरलको (१६-६-१९१३)||१०८
|-
|८३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२०-६-१९१३) ||१०९
|-
|८४. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२५] (२१-६-१९१३) || १११
|-
|८५. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२५] (२१-६-१९१३)|| ११३
|-
|८६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२६] (२८-६-१९१३) || ११४
|-
|८७. || पत्र : गृहमन्त्रीके निजी सचिवको (२८-६-१९१३) || ११५
|-
|८८. || पत्र : गृह-सचिवको (२-७-१९१३) || ११८
|-
|८९. || पत्र : जमनादास गांधीको (२-७-१९१३ ) || १२१
|-
|९०. || पत्र : गृह-सचिवको (४-७-१९१३)||१२३
|-
|९१. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२७] (५-७-१९१३) || १२४
|-
|९२. || जोहानिसबर्ग में उपद्रव (१२-७-१९१३) || १२७
|-
|९३. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२८] (१२-७-१९१३) || १३०
|-
|९४. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१२-७-१९१३) || १३२
|-
|९५. || प्रवासी कानून सम्बन्धी विनियम (१९–७-१९१३) || १३३
|-
|९६. || नया प्रवासी विधेयक (१९-७-१९१३) || १३५
|-
|९७. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [२९] ( १९-७-१९१३) || ११२
|-
|९८. ||पत्र : जमनादास गांधीको (१९-७-१९१३) || ११३
|-
|९९. ||पत्र : भवानी दयालको (२३-७-१९१३) १४१ || १३६
|-
|१००. || पत्र : एशियाई-पंजीयकको (२३-७-१९१३ के बाद) || १३९
|-
|१०१. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-३०] ( २६-७-१९१३) || १४३
|-
|१०२. ||तार : गो० कृ० गोखलेको (२९-७-१९१३) || १४५
|-
|१०३. || पत्र : एच० एस० एल० पोलकको (१-८-१९१३) || १४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|सत्रह|}}
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|-
|६७. ||तार : सिनेटर श्राइनरको (३०-५-१९१३)||८६
|-
|६८. || तार : गृह मन्त्रीको (३०-५- १९१३ )||८७
|-
|६९. || पत्र : जमनादास गांधीको (३०-५-१९१३)||८८
|-
|७०. ||सम्भावना (३१-५-१९१३)||९१
|-
|७१. || मुनियनका मामला (३१-५-१९१३)||९२
|-
|७२. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२२] (३१-५-१९१३)||९३
|-
|७३. || वक्तव्य : प्रवासी विधेयकके सम्बन्धमें (२-६-१९१३)||९५
|-
|७४. || तार : गृहमन्त्रीको (५-६ - १९१३)||९७
|-
|७५. || विधेयक (७-६-१९१३)||९७
|-
|७६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२३] (७-६-१९१३)||९८
|-
|७७. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (७-६-१९१३)||१००
|-
|७८. || वक्तव्य : तीन पौंडी करके सम्बन्ध में (११-६-१९१३ से पूर्व )||१०२
|-
|७९. || वक्तव्य : प्रवासी विधेयकपर (१३-६-१९१३ )||१०३
|-
|८०. || विधेयक (१४-६-१९१३)||१०४
|-
|८१. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२४] (१४-६-१९१३)||१०६
|-
|८२. || तार : गवर्नर जनरलको (१६-६-१९१३)||१०८
|-
|८३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२०-६-१९१३) ||१०९
|-
|८४. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२५] (२१-६-१९१३) || १११
|-
|८५. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२१-६-१९१३)|| ११३
|-
|८६. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२६] (२८-६-१९१३) || ११४
|-
|८७. || पत्र : गृहमन्त्रीके निजी सचिवको (२८-६-१९१३) || ११५
|-
|८८. || पत्र : गृह-सचिवको (२-७-१९१३) || ११८
|-
|८९. || पत्र : जमनादास गांधीको (२-७-१९१३ ) || १२१
|-
|९०. || पत्र : गृह-सचिवको (४-७-१९१३)||१२३
|-
|९१. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-२७] (५-७-१९१३) || १२४
|-
|९२. || जोहानिसबर्ग में उपद्रव (१२-७-१९१३) || १२७
|-
|९३. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२८] (१२-७-१९१३) || १३०
|-
|९४. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१२-७-१९१३) || १३२
|-
|९५. || प्रवासी कानून सम्बन्धी विनियम (१९–७-१९१३) || १३३
|-
|९६. || नया प्रवासी विधेयक (१९-७-१९१३) || १३५
|-
|९७. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [२९] ( १९-७-१९१३) || १३६
|-
|९८. ||पत्र : जमनादास गांधीको (१९-७-१९१३) || १३९
|-
|९९. ||पत्र : भवानी दयालको (२३-७-१९१३) || १४१
|-
|१००. || पत्र : एशियाई-पंजीयकको (२३-७-१९१३ के बाद) ||१४२
|-
|१०१. || आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-३०] ( २६-७-१९१३) || १४३
|-
|१०२. ||तार : गो० कृ० गोखलेको (२९-७-१९१३) || १४५
|-
|१०३. || पत्र : एच० एस० एल० पोलकको (१-८-१९१३) || १४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|अठारह|}}
{|width=100%
|-
|१०४. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३१] (२-८-१९१३ ) || १४६
|-
|१०५. || पत्र : जमनादास गांधीको (७-८-१९१३) || १४७
|-
|१०६. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३२] (९-८-१९१३) || १४७
|-
|१०७. || पत्र : प्रवासी अधिकारीको (१०-८-१९१३) || १५४
|-
|१०८. || तार : गृह-सचिवको (११-८-१९१३)) || १५४
|-
|१०९. ||नये कानूनका एक असर (१६-८-१९१३) || १५५
|-
|११०. || स्वर्गीय सर आदमजी पीरभाई (१६-८-१९१३) || १५५
|-
|१११. || आरोग्य के सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३३] ( १६-८-१९१३) || १५६
|-
|११२. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३४] (१६-८-१९१३) || १५७
|-
|११३ || पत्र : मणिलाल गांधीको (१६-८-१९१३ के बाद) || १५९
|-
|११४. || स्वर्गीय श्री जोजेफ जे. डोक (२३-८-१९१३) || १६०
|-
|११५. || स्वर्गीय श्री डोक (२३-८-१९१३) || १६४
|-
|११६. || स्वर्गीय रेवरेंड जोजेफ डोक (२३-८-१९१३) || १६५
|-
|११७. || पत्र : गृह-सचिवको (२४-८-१९१३) || १६६
|-
|११८. || भाषण : शोक सभा में (२४-८-१९१३) || १६९
|-
|११९. || भारत के पितामह ( ३०-८-१९१३) || १७१
|-
|१२०. || और भी मित्र चल बसे (३०-८-१९१३) || १७१
|-
|१२१. || विवाह के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला (२३-८-१९१३) || १७२
|-
|१२२. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (१-९-१९१३ के बाद) || १७३
|-
|१२३. || पत्र : सहायक गृह-सचिवको (३-९-१९१३) ) || १७४
|-
|१२४. || लॉर्ड सभाकी बहस ( ६-९ - १९१३) || १७४
|-
|१२५. || तार : गृह-सचिवको (१०-९-१९१३) || १७६
|-
|१२६. || पत्र : गृह-सचिवको (११-९-१९१३) || १७६
|-
|१२७. || पत्र : गृह-सचिवको (१२-९-१९१३) || १७७
|-
|१२८. || समझौता न हो सका (१३-९-१९१३) || १८०
|-
|१२९. || मणिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश ( १७-९-१९१३) || १८२
|-
|१३०. || पत्र : हरिलाल गांधीको (१८-९-१९१३) || १८३
|-
|१३१. || पत्र : मणिलाल गांधीको (१८-९-१९१३ ) || १८५
|-
|१३२. || श्री काछलियाका पत्र ( १२-९-१९१३) || १८६
|-
|१३३. || इसे कैसे किया जाये ? (२०-९-१९१३) || १८९
|-
|१३४. || संघर्ष कैसे किया जाये (२०-९-१९१३) || १८९
|-
|१३५. || पत्र : 'नेटाल मर्क्युरी' को (२१-९-१९१३) || १९१
|-
|१३६. || पत्र : गृह-सचिवको (२२-९-१९१३) || १९४
|-
|१३७. || फोक्सरस्ट के सत्याग्रही (२४-९-१९१३) || १९६
|-
|१३८. || स्वर्गीय श्री हुसेन दाउद (२४-९-१९१३) || १९७
|-
|१३९. || तीन- पौंडी कर (२४-९-१९१३) || १९८
|-
|१४०. || अपील-निकाय किसलिए ?(२४-९-१९१३) || २००
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|अठारह|}}
{|width=100%
|-
|१०४. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३१] (२-८-१९१३ ) || १४६
|-
|१०५. || पत्र : जमनादास गांधीको (७-८-१९१३) || १४७
|-
|१०६. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३२] (९-८-१९१३) || १४७
|-
|१०७. || पत्र : प्रवासी अधिकारीको (१०-८-१९१३) || १५४
|-
|१०८. || तार : गृह-सचिवको (११-८-१९१३)) || १५४
|-
|१०९. ||नये कानूनका एक असर (१६-८-१९१३) || १५५
|-
|११०. || स्वर्गीय सर आदमजी पीरभाई (१६-८-१९१३) || १५५
|-
|१११. || आरोग्य के सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३३] (१६-८-१९१३) || १५६
|-
|११२. || आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [-३४] (१६-८-१९१३) || १५७
|-
|११३ || पत्र : मणिलाल गांधीको (१६-८-१९१३ के बाद) || १५९
|-
|११४. || स्वर्गीय श्री जोजेफ जे. डोक (२३-८-१९१३) || १६०
|-
|११५. || स्वर्गीय श्री डोक (२३-८-१९१३) || १६४
|-
|११६. || स्वर्गीय रेवरेंड जोजेफ डोक (२३-८-१९१३) || १६५
|-
|११७. || पत्र : गृह-सचिवको (२४-८-१९१३) || १६६
|-
|११८. || भाषण : शोक सभा में (२४-८-१९१३) || १६९
|-
|११९. || भारत के पितामह (३०-८-१९१३) || १७१
|-
|१२०. || और भी मित्र चल बसे (३०-८-१९१३) || १७१
|-
|१२१. || विवाह के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला (२३-८-१९१३) || १७२
|-
|१२२. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (१-९-१९१३ के बाद) || १७३
|-
|१२३. || पत्र : सहायक गृह-सचिवको (३-९-१९१३) ) || १७४
|-
|१२४. || लॉर्ड सभाकी बहस ( ६-९-१९१३) || १७४
|-
|१२५. || तार : गृह-सचिवको (१०-९-१९१३) || १७६
|-
|१२६. || पत्र : गृह-सचिवको (११-९-१९१३) || १७६
|-
|१२७. || पत्र : गृह-सचिवको (१२-९-१९१३) || १७७
|-
|१२८. || समझौता न हो सका (१३-९-१९१३) || १८०
|-
|१२९. || मणिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश ( १७-९-१९१३) || १८२
|-
|१३०. || पत्र : हरिलाल गांधीको (१८-९-१९१३) || १८३
|-
|१३१. || पत्र : मणिलाल गांधीको (१८-९-१९१३ ) || १८५
|-
|१३२. || श्री काछलियाका पत्र ( १२-९-१९१३) || १८६
|-
|१३३. || इसे कैसे किया जाये ? (२०-९-१९१३) || १८९
|-
|१३४. || संघर्ष कैसे किया जाये (२०-९-१९१३) || १८९
|-
|१३५. || पत्र : 'नेटाल मर्क्युरी' को (२१-९-१९१३) || १९१
|-
|१३६. || पत्र : गृह-सचिवको (२२-९-१९१३) || १९४
|-
|१३७. || फोक्सरस्ट के सत्याग्रही (२४-९-१९१३) || १९६
|-
|१३८. || स्वर्गीय श्री हुसेन दाउद (२४-९-१९१३) || १९७
|-
|१३९. || तीन- पौंडी कर (२४-९-१९१३) || १९८
|-
|१४०. || अपील-निकाय किसलिए ?(२४-९-१९१३) || २००
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|उन्नीस|}}
{|width=100%
|-
|१४१. || तीन पौंडी कर (२४-९-१९१३) || २००
|-
|१४२. || पत्र : क्लीमेंट डोकको (२४-९-१९१३) || २०२
|-
|१४३. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-९-१९१३ के बाद) || २०३
|-
|१४४. || पत्र : दक्षिण आफ्रिकी रेलवेको (२७-९-१९१३) || २०४
|-
|१४५. || श्री गांधी लगभग गिरफ्तार! (२७-९-१९१३) || २०६
|-
|१४६. || पत्र : गृह-सचिवको (२८-९-१९१३) || २०७
|-
|१४७. || 'भाषण' : फ्रीडडापेकी सभामें (२८-९-१९१३) || २०८
|-
|१४८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२९-९-१९१३) || २१०
|-
|१४९. ||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२९-९-१९१३) || २११
|-
|१५० || पत्र : 'ट्रान्सवाल लीडर' को (३०-९-१९१३) || २१२
|-
|१५१. || पत्र : मगनलाल गांधीको (३०-९-१९१३) || २१४
|-
|१५२. || स्वर्गीय श्री हाजी हुसेन दाउद मुहम्मद (१-१०-१९१३) || २१५
|-
|१५३. || विवाह समस्या (१-१०-१९१३) || २१८
|-
|१५४. || विवाहका प्रश्न (१-१०-१९१३) || २२१
|-
|१५५. || हथियारोंके बिना असहाय (१-१०-१९१३ ) || २२३
|-
|१५६. || हाजी हुसेन दाउद मुहम्मद (१-१०-१९१३) || २२४
|-
|१५७. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२-१०-१९१३) || २२८
|-
|१५८. || पत्र : ऑलिव डोकको (३-१०-१९१३) || २२९
|-
|१५९. || प्रस्ताव : पाटीदार संघकी सभा में (५-१०-१९१३) || २२९
|-
|१६०. || पत्र : मगनलाल गांधीको (५-१०-१९१३) || २३०
|-
|१६१. || व्रतका माहात्म्य (८-१०-१९१३) || २३०
|-
|१६२. || पत्र : जेल-निदेशकको (९-१०-१९१३) || २३१
|-
|१६३. ||एक अधिकृत वक्तव्य (१५-१०-१९१३) || २३२
|-
|१६४. || पत्र : हरिलाल गांधीको (१७-१०-१९१३)|| २३४
|-
|१६५. || भेंट : ' इवनिंग क्रॉनिकल' को (१७-१०-१९१३ के बाद) || २३५
|-
|१६६. || कुलसम बीबीका मुकदमा (२२-१०-१९१३)|| २३५
|-
|१६७. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१०-१९१३) || २३६
|-
|१६८. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१०-१९१३) || २३७
|-
|१६९. || भेंट : 'रैंड डेली मेल' को (२२-१०-१९१३) || २३७
|-
|१७०. || तार : जनरल बोथाको (२३-१०-१९१३ के पूर्व) || २४०
|-
|१७१. ||तार : अखबारोंको (२३-१०-१९१३) || २४०
|-
|१७२. || पत्र : गृह मन्त्रीको (२३-१०-१९१३) ||२४१
|-
|१७३. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-१०-१९१३) ||२४३
|-
|१७४. || तार : जी० ए० नटेसनको (२५-१०-१९१३ से पूर्व) || २४४
|-
|१७५. || भाषण : वाणिज्य-मण्डलमें (२५-१०-१९१३) || २४४
|-
|१७६. || भेंट : 'नेटाल मर्क्युरी' को (२५-१०-१९१३) || २४५
|-
|१७७. || तार : गृह मन्त्रीको (२८-१०-१९१३ से पूर्व) || २४७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|उन्नीस|}}
{|width=100%
|-
|१४१. || तीन पौंडी कर (२४-९-१९१३) || २००
|-
|१४२. || पत्र : क्लीमेंट डोकको (२४-९-१९१३) || २०२
|-
|१४३. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-९-१९१३ के बाद) || २०३
|-
|१४४. || पत्र : दक्षिण आफ्रिकी रेलवेको (२७-९-१९१३) || २०४
|-
|१४५. || श्री गांधी लगभग गिरफ्तार! (२७-९-१९१३) || २०६
|-
|१४६. || पत्र : गृह-सचिवको (२८-९-१९१३) || २०७
|-
|१४७. || 'भाषण' : फ्रीडडापेकी सभामें (२८-९-१९१३) || २०८
|-
|१४८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२९-९-१९१३) || २१०
|-
|१४९. ||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२९-९-१९१३) || २११
|-
|१५० || पत्र : 'ट्रान्सवाल लीडर' को (३०-९-१९१३) || २१२
|-
|१५१. || पत्र : मगनलाल गांधीको (३०-९-१९१३) || २१४
|-
|१५२. || स्वर्गीय श्री हाजी हुसेन दाउद मुहम्मद (१-१०-१९१३) || २१५
|-
|१५३. || विवाह समस्या (१-१०-१९१३) || २१८
|-
|१५४. || विवाहका प्रश्न (१-१०-१९१३) || २२१
|-
|१५५. || हथियारोंके बिना असहाय (१-१०-१९१३ ) || २२३
|-
|१५६. || हाजी हुसेन दाउद मुहम्मद (१-१०-१९१३) || २२४
|-
|१५७. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२-१०-१९१३) || २२८
|-
|१५८. || पत्र : ऑलिव डोकको (३-१०-१९१३) || २२९
|-
|१५९. || प्रस्ताव : पाटीदार संघकी सभा में (५-१०-१९१३) || २२९
|-
|१६०. || पत्र : मगनलाल गांधीको (५-१०-१९१३) || २३०
|-
|१६१. || व्रतका माहात्म्य (८-१०-१९१३) || २३०
|-
|१६२. || पत्र : जेल-निदेशकको (९-१०-१९१३) || २३१
|-
|१६३. ||एक अधिकृत वक्तव्य (१५-१०-१९१३) || २३२
|-
|१६४. || पत्र : हरिलाल गांधीको (१७-१०-१९१३)|| २३४
|-
|१६५. || भेंट : ' इवनिंग क्रॉनिकल' को (१७-१०-१९१३ के बाद) || २३५
|-
|१६६. || कुलसम बीबीका मुकदमा (२२-१०-१९१३)|| २३५
|-
|१६७. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१०-१९१३) || २३६
|-
|१६८. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१०-१९१३) || २३७
|-
|१६९. || भेंट : 'रैंड डेली मेल' को (२२-१०-१९१३) || २३७
|-
|१७०. || तार : जनरल बोथाको (२३-१०-१९१३ के पूर्व) || २४०
|-
|१७१. ||तार : अखबारोंको (२३-१०-१९१३) || २४०
|-
|१७२. || पत्र : गृह मन्त्रीको (२३-१०-१९१३) ||२४१
|-
|१७३. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-१०-१९१३) ||२४३
|-
|१७४. || तार : जी० ए० नटेसनको (२५-१०-१९१३ से पूर्व) || २४४
|-
|१७५. || भाषण : वाणिज्य-मण्डलमें (२५-१०-१९१३) || २४४
|-
|१७६. || भेंट : 'नेटाल मर्क्युरी' को (२५-१०-१९१३) || २४५
|-
|१७७. || तार : गृह मन्त्रीको (२८-१०-१९१३ से पूर्व) || २४७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बीस|}}
{|width=100%
|-
|१७८. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२९-१०-१९१३) || २४८
|-
|१७९. || तार : गृह-मन्त्रीको (३०-१०-१९१३) || २४८
|-
|१८०. || न्याय-सचिवको लिखे पत्रका सारांश (३१-१०-१९१३) || २४९
|-
|१८१. || प्रवासी अधिकारियोंको लिखे पत्रका सारांश (३१-१०-१९१३) || २४९
|-
|१८२. || भेंट : रायटरको (३-११-१९१३) || २५०
|-
|१८३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (४-११-१९१३ से पूर्व) || २५०
|-
|१८४. || भेंट : 'नेटाल मर्क्यूरी' को (५-११-१९१३) || २५१
|-
|१८५. || तार : गो० कृ० गोखलेको (६-११-१९१३ से पूर्व) || २५१
|-
|१८६. || लड़ाईके समाचार (६-११-१९१३ से पूर्व) || २५२
|-
|१८७. || तार : गृह-मन्त्रीको (७-११-१९१३) || २५२
|-
|१८८. || जमानतकी दरखास्त (८-११-१९१३) || २५३
|-
|१८९. || भेंट : रायटर्सको (८-११-१९१३) || २५४
|-
|१९०. || पत्र : भारतीयोंको (११-११-१९१३) || २५५
|-
|१९१. || डंडीमें मुकदमा (११-११-१९१३) || २५५
|-
|१९२. || हड़तालियोंको सन्देश (११-११-१९१३) || २५७
|-
|१९३. || पत्र : मणिलाल गांधीको (११-११-१९१३) || २५८
|-
|१९४. || फोकसरस्टमें मुकदमा (१४-११-१९१३) || २५९
|-
|१९५. || पोलकके मुकदमेंमें गवाही (१७-११-१९१३) || २६१
|-
|१९६. || पत्र : कुमारी देवी वेस्टको (१४-१२-१९१३) || २६२
|-
|१९७. || भाषण : जोहानिसबर्गमें (१८-१२-१९१३) || २६५
|-
|१९८. || भाषण : डर्बनमें (२०-१२-१९१३) || २६६
|-
|१९९. || भेंट : 'नेटाल मर्क्यूरी' को (२०-१२-१९१३) || २६६
|-
|२००. || भाषण : सार्वजनिक सभामें (२१-१२-१९१३) || २६७
|-
|२०१. || पत्र : गृह-मन्त्रीको (२१-१२-१९१३) || २७१
|-
|२०२. || भाषण : मैरिट्सबर्गकी सभामें (२२-१२-१९१३) || २७५
|-
|२०३. || भाषण : श्रीमती गांधीको रिहाईपर (२२-१२-१९१३) || २७६
|-
|२०४. || भाषण : मैरिट्सबर्गकी सार्वजनिक सभामें (२२-१२-१९१३) || २७६
|-
|२०५. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१२-१९१३) || २७७
|-
|२०६. || पत्र : 'नेटाल एडवर्टाइजर' को (२२-१२-१९१३ के बाद) || २७९
|-
|२०७. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३) || २८१
|-
|२०८. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३) || २८२
|-
|२०९. || तार : लॉर्ड एम्टहिलको (२३-१२-१९१३) || २८३
|-
|२१०. || तार : लॉर्ड एम्टहिलको (२३-१२-१९१३) || २८४
|-
|२११. || पत्र : "नेटाल मर्क्यूरी" को (२३-१२-१९१३) || २८५
|-
|२१२. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) || २८६
|-
|२१३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) || २८७
|-
|२१४. || तार : लॉर्ड एम्टहिलको (२४-१२-१९१३) || २८७
|}
बीस
१७८. पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२९-१०-१९१३)
२४८
१७९. तार : गृह मन्त्रीको (३०-१०-१९१३)
२४८
१८०. न्याय-सचिवको लिखे पत्रका सारांश ( ३१-१०-१९१३)
२४९
१८१. प्रवासी अधिकारीको लिखे पत्रका सारांश (३१-१०-१९१३)
२४९
१८२. भेंट : रायटरको (३-११-१९१३)
२५०
१८३. तार : गो० कृ० गोखलेको (४-११-१९१३ से पूर्व )
२५०
१८४. भेंट : ' नेटाल मर्क्युरीको (५-११-१९१३)
२५१
१८५. तार : गो० कृ० गोखलेको (६-११-१९१३ से पूर्व )
२५१
१८६. लड़ाईके समाचार (६-११-१९१३से पूर्व )
२५२
१८७. तार : गृह मन्त्रीको (७-११-१९१३)
२५२
१८८. जमानतकी दर्खास्त (८-११-१९१३) १८९. भेंट : रायटरको (८-११-१९१३)
२५३
२५४
१९०. पत्र : भारतीयोंको (११-११-१९१३) १९१. डंडी में मुकदमा (११-११-१९१३) १९२. हड़तालियों को सन्देश (११-११-१९१३)
२५५
२५५
२५७
१९३. पत्र : मगनलाल गांधीको (११-११-१९१३ ) १९४. फोक्सरस्ट में मुकदमा (१४-११-१९१३) १९५. पोलकके मुकदमे में गवाही (१७-११-१९१३) १९६. पत्र : कुमारी देवी वेस्टको (१४-१२-१९१३) १९७. भाषण : जोहानिसबर्ग में (१८-१२-१९१३) १९८. भाषण : डर्बनमें (२०-१२ - १९१३)
१९९. भेंट : 'नेटाल मर्क्युरी' को (२०-१२-१९१३)
२५८
२५९
२६१
२६२
२६५
२६६
२६६
२००. भाषण : सार्वजनिक सभामें (२१-१२-१९१३) २०१. पत्र : गृह मन्त्रीको (२१-१२-१९१३)
२६७
२७१
२०२. भाषण : मैरित्सबर्ग की सभा में ( २२-१२-१९१३)
२७५
२०३. भाषण : श्रीमती गांधीकी रिहाईपर (२२-१२-१९१३)
२७६
२०४. भाषण : मैरित्सबर्गको सार्वजनिक सभामें ( २२-१२-१९१३)
२७६
२०५. तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१२-१९१३)
२७७
२०६. पत्र : 'नेटाल ऐडवर्टाइजर' को (२२-१२-१९१३ के बाद)
२७९
२०७. तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३)
२८१
२०८. तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३)
२८२
२०९ तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२३-१२-१९१३) २१०. तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२३-१२-१९१३) २११. पत्र : “ नेटाल मर्क्युरी" को (२३-१२-१९१३) २१२. तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) २१३. तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) २१४. तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२४-१२-१९१३)
२८३
२८४
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बीस|}}
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|-
|१७८. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२९-१०-१९१३) || २४८
|-
|१७९. || तार : गृह-मन्त्रीको (३०-१०-१९१३) || २४८
|-
|१८०. || न्याय-सचिवको लिखे पत्रका सारांश (३१-१०-१९१३) || २४९
|-
|१८१. || प्रवासी अधिकारियोंको लिखे पत्रका सारांश (३१-१०-१९१३) || २४९
|-
|१८२. || भेंट : रायटरको (३-११-१९१३) || २५०
|-
|१८३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (४-११-१९१३ से पूर्व) || २५०
|-
|१८४. || भेंट : 'नेटाल मर्क्यूरी' को (५-११-१९१३) || २५१
|-
|१८५. || तार : गो० कृ० गोखलेको (६-११-१९१३ से पूर्व) || २५१
|-
|१८६. || लड़ाईके समाचार (६-११-१९१३ से पूर्व) || २५२
|-
|१८७. || तार : गृह-मन्त्रीको (७-११-१९१३) || २५२
|-
|१८८. || जमानतकी दर्खास्त (८-११-१९१३) || २५३
|-
|१८९. || भेंट : रायटरको (८-११-१९१३) || २५४
|-
|१९०. || पत्र : भारतीयोंको (११-११-१९१३) || २५५
|-
|१९१. || डंडीमें मुकदमा (११-११-१९१३) || २५५
|-
|१९२. || हड़तालियोंको सन्देश (११-११-१९१३) || २५७
|-
|१९३. || पत्र : मगनलाल गांधीको (११-११-१९१३) || २५८
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|१९४. || फोकसरस्टमें मुकदमा (१४-११-१९१३) || २५९
|-
|१९५. || पोलकके मुकदमेंमें गवाही (१७-११-१९१३) || २६१
|-
|१९६. || पत्र : कुमारी देवी वेस्टको (१४-१२-१९१३) || २६२
|-
|१९७. || भाषण : जोहानिसबर्गमें (१८-१२-१९१३) || २६५
|-
|१९८. || भाषण : डर्बनमें (२०-१२-१९१३) || २६६
|-
|१९९. || भेंट : 'नेटाल मर्क्यूरी' को (२०-१२-१९१३) || २६६
|-
|२००. || भाषण : सार्वजनिक सभामें (२१-१२-१९१३) || २६७
|-
|२०१. || पत्र : गृह-मन्त्रीको (२१-१२-१९१३) || २७१
|-
|२०२. || भाषण : मैरित्सबर्ग की सभामें (२२-१२-१९१३) || २७५
|-
|२०३. || भाषण : श्रीमती गांधीकी रिहाईपर (२२-१२-१९१३) || २७६
|-
|२०४. || भाषण : मैरित्सबर्गको सार्वजनिक सभामें (२२-१२-१९१३) || २७६
|-
|२०५. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२२-१२-१९१३) || २७७
|-
|२०६. || पत्र : 'नेटाल एडवर्टाइजर' को (२२-१२-१९१३ के बाद) || २७९
|-
|२०७. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३) || २८१
|-
|२०८. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२३-१२-१९१३) || २८२
|-
|२०९. || तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२३-१२-१९१३) || २८३
|-
|२१०. || तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२३-१२-१९१३) || २८४
|-
|२११. || पत्र : "नेटाल मर्क्यूरी" को (२३-१२-१९१३) || २८५
|-
|२१२. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) || २८६
|-
|२१३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-१२-१९१३) || २८७
|-
|२१४. || तार : लॉर्ड ऍम्टहिलको (२४-१२-१९१३) || २८७
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|-
|२१५. || तार : गृह-मन्त्रीको (२५-१२-१९१३) ||२८८
|-
|२१६. || तार : गो० कु० गोखलेको (२५-१२-१९१३) ||२८९
|-
|२१७. || तार : गो० कु० गोखलेको (२६-१२-१९१३) ||२९०
|-
|२१८. || तार : गो० कु० गोखलेको (२६-१२-१९१३) ||२९१
|-
|२१९. || तार : गो० कु० गोखलेको (२६-१२-१९१३) ||२९१
|-
|२२०. || पत्र : मार्शल कैम्बेलको (२६-१२-१९१३) ||२९२
|-
|२२१. || भेंट : रायटरको (२७-१२-१९१३ से पूर्व) ||२९४
|-
|२२२. || तार : गो० कु० गोखलेको (२७-१२-१९१३) ||२९५
|-
|२२३. || तार : गो० कु० गोखलेको (२७-१२-१९१३) ||२९५
|-
|२२४. || भाषण : मैरित्सबर्गमें (२७-१२-१९१३) ||२९६
|-
|२२५. || तार : गृह-मन्त्रीको (२९-१२-१९१३) ||२९७
|-
|२२६. || तार : गो० कु० गोखलेको (२९-१२-१९१३) ||२९८
|-
|२२७. || तार : गो० कु० गोखलेको (२९-१२-१९१३) ||२९९
|-
|२२८. || भेंट : ‘नेटाल मर्क्यूरी’ को (२९-१२-१९१३) ||३०२
|-
|२२९. || तार : गो० कु० गोखलेको (३०-१२-१९१३) ||३०४
|-
|२३०. || पत्र : ‘नेटाल मर्क्यूरी’ को (३०-१२-१९१३) ||३०५
|-
|२३१. || हिन्दी और तमिल (३१-१२-१९१३) ||३०६
|-
|२३२. || तार : गो० कु० गोखलेको (३१-१२-१९१३) ||३०७
|-
|२३३. || पत्र : मार्शल कैम्बेलको (१-१-१९१४) ||३०८
|-
|२३४. || तार : गो० कु० गोखलेको (१-१-१९१४) ||३०९
|-
|२३५. || तार : गो० कु० गोखलेको (२-१-१९१४) ||३१०
|-
|२३६. || तार : गो० कु० गोखलेको (२-१-१९१४) ||३१०
|-
|२३७. || तार : गो० कु० गोखलेको (३-१-१९१४) ||३११
|-
|२३८. || भाषण : सी० एफ० ऐण्ड्रयूजके स्वागत समारोह में (४-१-१९१४) ||३१२
|-
|२३९. || पत्र : मणिलाल गांधीको (४-१-१९१४) ||३१२
|-
|२४०. || भेंट : रायटरके प्रतिनिधिको (४-१-१९१४) ||३१३
|-
|२४१. || पत्र : ‘इंडियन ओपिनियन’ को (५-१-१९१४ के बाद) ||३१४
|-
|२४२. || अमर-पुरुष हरबतसिंह (७-१-१९१४) ||३१६
|-
|२४३. || भेंट : ‘प्रिटोरिया न्यूज’ के प्रतिनिधिको (९-१-१९१४ से पूर्व) ||३१६
|-
|२४४. || एक महत्वपूर्ण सलाह (१४-१-१९१४) ||३१८
|-
|२४५. || जनरल स्मट्ससे भेंट (१६-१-१९१४) ||३१८
|-
|२४६. || पत्र : गृह-सचिवको (२१-१-१९१४) ||३२१
|-
|२४७. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-१-१९१४) ||३२३
|-
|२४८. || तार : गो० कु० गोखलेको (२२-१-१९१४) ||३२४
|-
|२४९. || भेंट : ‘रैंड डेली मेल' के प्रतिनिधिको (२३-१-१९१४) ||३२५
|-
|२५०. || पत्र : भवानी दयालको (२३-१-१९१४) ||३२६
|-
|२५१. || तार : गो० कु० गोखलेको (२५-१-१९१४ या उससे पूर्व) ||३२६
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बाईस|}}
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|-
|२५२. || भाषण : सार्वजनिक सभा में (२५- १-१९१४)||३२७
|-
|२५३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२६-१-१९१४) ||३३१
|-
|२५४.|| पत्र : भारतीय परिवेदना आयोगको (२६-१-१९१४) ||३३१
|-
|२५५.||स्मट्स-गांधी पत्र-व्यवहार (२८-१-१९१४)||३३२
|-
|२५६.||तार : गो० कृ० गोखलेको (३०-१-१९१४) ||३३३
|-
|२५७.||विवाहकी समस्याके बारेमें विचार (२-२-१९१४)||३३४
|-
|२५८.||पत्र : मणिलाल गांधीको (३-२-१९१४)||२९८
|-
|२५९.|| देशनिकाला किन्हें होगा ? (४-२-१९१४)||३३६
|-
|२६०.||प्रवासी अधिनियम (११-२-१९१४)||३३७
|-
|२६१.|| नेताओंसे अपील (११-२-१९१४) ||३३९
|-
|२६२.||विवाहके सम्बन्धमें (११-२-१९१४)||३४०
|-
|२६३.||प्रवासके महत्वपूर्ण मामले (११-२-१९१४)||३४१
|-
|२६४.||नाबालिगोंके अधिकार (११-२-१९१४)||३४३
|-
|२६५.||हमारी आशाएं (११-२-१९१४)||३४४
|-
|२६६.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (१५-२-१९१४ के बाद)||३४६
|-
|२६७.||आँगलियाकी गवाही (१८-२-१९१४)||३४७
|-
|२६८.||तार : गो० कृ० गोखलेको (१८-२-१९१४)||३४८
|-
|२६९.||तार : गो० कृ० गोखलेको (१९-२-१९१४)||३४९
|-
|२७०.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-२-१९१४)||३४९
|-
|२७१.|| तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-२-१९१४)||३५०
|-
|२७२.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (२४-२-१९१४)||३५०
|-
|२७३. ||यादगारमें (२५-२-१९१४)||३५१
|-
|२७४.|| एक तरुण महिला सत्याग्रहीकी असामयिक मृत्यु (२५-२-१९१४)||३५२
|-
|२७५.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२६-२-१९१४) ||३५२
|-
|२७६.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२६-२-१९१४ के आसपास)||३५३
|-
|२७७.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२७-२-१९१४) ||३५४
|-
|२७८.|| तार : गो० कृ० गोखलेको (२८-२-१९१४)||३५५
|-
|२७९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-२-१९१४)||३५५
|-
|२८०.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२८-२-१९१४) ||३५६
|-
|२८१.|| पत्र : खुशालचन्द गांधीको (१-३-१९१४) ||३५८
|-
|२८२.||पत्र : श्री रावजीभाई पटेलको (१-३-१९१४)||३५९
|-
|२८३.||पत्रका अंश (१-३-१९१४ के आसपास) ||३६१
|-
|२८४.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२-३-१९१४) ||३६१
|-
|२८५.|| पत्र : सर बेंजामिन राबर्ट्सनको (४-३-१९१४) ||३६४
|-
|२८६.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (४-३-१९१४)||३६६
|-
|२८७.|| पत्र : देवदास गांधीको (५-३-१९१४)||३६६
|-
२८८.|| पत्र : सर बेंजामिन राबर्ट्सनको (६-३-१९१४)||३६७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बाईस|}}
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|-
|२५२. || भाषण : सार्वजनिक सभा में (२५- १-१९१४)||३२७
|-
|२५३. || तार : गो० कृ० गोखलेको (२६-१-१९१४) ||३३१
|-
|२५४.|| पत्र : भारतीय परिवेदना आयोगको (२६-१-१९१४) ||३३१
|-
|२५५.||स्मट्स-गांधी पत्र-व्यवहार (२८-१-१९१४)||३३२
|-
|२५६.||तार : गो० कृ० गोखलेको (३०-१-१९१४) ||३३३
|-
|२५७.||विवाहकी समस्याके बारेमें विचार (२-२-१९१४)||३३४
|-
|२५८.||पत्र : मणिलाल गांधीको (३-२-१९१४)||२९८
|-
|२५९.|| देशनिकाला किन्हें होगा ? (४-२-१९१४)||३३६
|-
|२६०.||प्रवासी अधिनियम (११-२-१९१४)||३३७
|-
|२६१.|| नेताओंसे अपील (११-२-१९१४) ||३३९
|-
|२६२.||विवाहके सम्बन्धमें (११-२-१९१४)||३४०
|-
|२६३.||प्रवासके महत्वपूर्ण मामले (११-२-१९१४)||३४१
|-
|२६४.||नाबालिगोंके अधिकार (११-२-१९१४)||३४३
|-
|२६५.||हमारी आशाएं (११-२-१९१४)||३४४
|-
|२६६.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (१५-२-१९१४ के बाद)||३४६
|-
|२६७.||आँगलियाकी गवाही (१८-२-१९१४)||३४७
|-
|२६८.||तार : गो० कृ० गोखलेको (१८-२-१९१४)||३४८
|-
|२६९.||तार : गो० कृ० गोखलेको (१९-२-१९१४)||३४९
|-
|२७०.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-२-१९१४)||३४९
|-
|२७१.|| तार : गो० कृ० गोखलेको (२४-२-१९१४)||३५०
|-
|२७२.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (२४-२-१९१४)||३५०
|-
|२७३. ||यादगारमें (२५-२-१९१४)||३५१
|-
|२७४.|| एक तरुण महिला सत्याग्रहीकी असामयिक मृत्यु (२५-२-१९१४)||३५२
|-
|२७५.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२६-२-१९१४) ||३५२
|-
|२७६.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२६-२-१९१४ के आसपास)||३५३
|-
|२७७.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२७-२-१९१४) ||३५४
|-
|२७८.|| तार : गो० कृ० गोखलेको (२८-२-१९१४)||३५५
|-
|२७९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-२-१९१४)||३५५
|-
|२८०.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२८-२-१९१४) ||३५६
|-
|२८१.|| पत्र : खुशालचन्द गांधीको (१-३-१९१४) ||३५८
|-
|२८२.||पत्र : श्री रावजीभाई पटेलको (१-३-१९१४)||३५९
|-
|२८३.||पत्रका अंश (१-३-१९१४ के आसपास) ||३६१
|-
|२८४.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२-३-१९१४) ||३६१
|-
|२८५.|| पत्र : सर बेंजामिन राबर्ट्सनको (४-३-१९१४) ||३६४
|-
|२८६.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (४-३-१९१४)||३६६
|-
|२८७.|| पत्र : देवदास गांधीको (५-३-१९१४)||३६६
|-
|२८८.|| पत्र : सर बेंजामिन राबर्ट्सनको (६-३-१९१४)||३६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="प्रथम 07" /></noinclude>{{c|तेईस|}}
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|-
|२८९.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (७-३-१९१४) ||३३९
|-
|२९०.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (८-३-१९१४)||३४०
|-
|२९१.|| पत्र : छगनलाल गांधीको (११-३-१९१४)||३४२
|-
|२९२.|| पत्र : सी० एफ० ऐण्ड्रयूजको (१३-३-१९१४)||३४३
|-
|२९३.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१४-३-१९१४)||३४४
|-
|२९४.||पत्र : जमनादास गांधीको (१७-३-१९१४)||३४५
|-
|२९५.|| आयोगकी रिपोर्टके बारेमें विचार (१७-३-१९१४ के बाद)||३४६
|-
|२९६.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके सम्मान-भोजमें (११-११-१९१२)||३४७
|-
|२९७.|| भाषण : प्रिटोरियामें गोखलेके स्वागत समारोहमें (१४-१२-१९१२)||३४७
|-
|२९८.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-११-१९१२ के आसपास)||३४८
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (१७-११-१९१२)||३४९
|-
|३००.|| भाषण : लोरेंको माक्विसमें गोखलेके सम्मानमें आयोजित भोजके अवसरपर (१८-१२-१९१२) ||३४९
|-
|३०१.|| एक तार (१८-११-१९१२ या उसके बाद )||३५०
|-
|३०२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (५-१२-१९१२ )||३५०
|-
|३०३.||अपनी भाषाओंके माध्यमसे शिक्षण (७-१२-१९१२)||३५१
|-
|३०४.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-१२-१९१२ )||३५२
|-
|३०५.|| श्री गोखले स्वदेश पहुँचे (२१-१२-१९१२)||३५५
|-
|३०६. ||श्री गांधी " नजरकैद ” (२३-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०७.|| भयंकर अनर्थ (२८-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०८.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२८-१२-१९१२)||३५९
|-
|३०९.|| डायरी : १९१२||३६०
|-
|३१०.|| राष्ट्रीय कांग्रेसमें श्री गोखले (४-१-१९१३)||४१८
|-
|३११. ||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम (४-१-१९१३)||४१९
|-
|३१२. ||सम्राट्की भारतीय नौसेना (४-१-१९१३)||४२०
|-
|३१३.|| भारतमें श्री गोखलेका भाषण (४-१-१९१३)||४२१
|-
|३१४. ||डेकके यात्री (४-१-१९१३)||४२३
|-
|३१५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१] (४-१-१९१३)||४२५
|-
|३१६.|| पत्र: मणिलाल इच्छाराम देसाईको (९-१-१९१३ या उसके बाद)||४२७
|-
|३१७. ||" अनुग्रह" का एक कार्य (११-१-१९१३)||४२८
|-
|३१८. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२] (११-१-१९१३)||४३०
|-
|३१९. ||पत्र: मणिलाल गांधीको (१८-१-१९१३ से पूर्व)||४३३
|-
|३२०. ||क्या फिर सत्याग्रह करना पड़ेगा ? (१८-१-१९१३)||४३३
|-
|३२१.|| गिरमिट प्रथा (१८-१-१९१३)||४३४
|}
३६८
३७१
३७३
३७६
३७८
३७९
३८१
२९६. पत्र: ' इंडियन ओपिनियन' को (१८-३ - १९१४)
२९७. पत्र : मणिलाल गांधीको (१९-३-१९१४)
२९८. पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-३-१९१४)
२९९. पत्र : जमनादास गांधीको (२२ -३ - १९१४)
३००. पत्र : मणिलाल गांधीको (२२-३-१९१४ )
३८२
३८३
३८४
३८५
३८६
३०१. पत्रका अंश (२२ -३ - १९१४)
३०२. आयोगकी रिपोर्ट और सिफारिशें ( २५-३ - १९१४)
३८७
३८८
३०३. भाषण : केप टाउनके स्वागत समारोहमें (२५-३-१९१४) ३०४. पत्र : महात्मा मुंशीरामको (२७-३-१९१४) ३०५. पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१-४-१९१४) ३०६. पत्र : मणिलाल गांधीको ( ३-४-१९१४)
३९१
३९१
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३९३
३९४
३९४
३९५
३९६
३९८
४००
४००
४०१
४०२
४०३
३०७. विवाह सम्बन्धी एक घोषणा (८-४-१९१४) ३०८. पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको ( ८-४-१९१४)
३०९. पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (८-४-१९१४) ३१०. पत्र : मणिलाल गांधीको (१२-४-१९१४) ३११. पत्र : मणिलाल गांधीको (१७-४-१९१४) ३१२. तार : गृहमन्त्रीको (२२-४-१९१४) ३१३. पत्रका अंश (२२-४-१९१४) ३१४. तार : गृह-मन्त्रीको (२४-४-१९१४) ३१५. हिन्द स्वराज्य (२९-४-१९१४)
३१६. तार : गृह मन्त्रीको (६-५-१९१४ के पूर्व ) ३१७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको (६-५-१९१४) ३१८. तार : गृह मन्त्रीको (७-५-१९१४ के बाद ) ३१९. तार : गृहमन्त्रीको (१९-५-१९१४) ३२०. स्वर्गीय श्रीमती मेयो (२०-५-१९१४) ३२१. तार : गृहमन्त्रीको (२२-५-१९१४) ३२२. पत्र : 'ट्रान्सवाल लीडर' को (२३-५-१९१४) ३२३. भाषण : प्रार्थना-सभामें (२३-५-१९१४) ३२४. भेंट : ई० एम० जॉर्जेससे (२७-५-१९१४) ३२५. पत्र : मणिलाल गांधीको (२८-५-१९१४)
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|-
|२८९.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (७-३-१९१४) ||३६८
|-
|२९०.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (८-३-१९१४)||३७१
|-
|२९१.|| पत्र : छगनलाल गांधीको (११-३-१९१४)||३७३
|-
|२९२.|| पत्र : सी० एफ० ऐण्ड्रयूजको (१३-३-१९१४)||३७६
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|२९३.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१४-३-१९१४)||३७८
|-
|२९४.||पत्र : जमनादास गांधीको (१७-३-१९१४)||३७९
|-
|२९५.|| आयोगकी रिपोर्टके बारेमें विचार (१७-३-१९१४ के बाद)||३८१
|-
|२९६.|| पत्र: ' इंडियन ओपिनियन' को (१८-३-१९१४)|३८२
|-
|२९७.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१९-३-१९१४)||३८३
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|२९८.|| पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-३-१९१४)||३८४
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२२-३-१९१४)||३८५
|-
|३००.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२२-३-१९१४)||३८६
|-
|३०१.|| पत्रका अंश (२२-३-१९१४)||३८७
|-
|३०२.|| आयोगकी रिपोर्ट और सिफारिशें (२५-३-१९१४)||३८८
|-
|३०३.||भाषण : केप टाउनके स्वागत समारोहमें (२५-३-१९१४)||३९१
|-
|३०४.||पत्र : महात्मा मुंशीरामको (२७-३-१९१४)||३९१
|-
|३०५.||पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१-४-१९१४) ||३९२
|-
|३०६. || पत्र : मणिलाल गांधीको (३-४-१९१४)||३९३
|-
|३०७.|| विवाह सम्बन्धी एक घोषणा (८-४-१९१४)||३९४
|-
|३०८.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको ( ८-४-१९१४)||३९४
|-
|३०९.||पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (८-४-१९१४)||३९५
|-
|३१०.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१२-४-१९१४)||३९६
|-
|३११. ||पत्र : मणिलाल गांधीको (१७-४-१९१४) ||३९८
|-
|३१२. ||तार : गृहमन्त्रीको (२२-४-१९१४)||४००
|-
|३१३.|| पत्रका अंश (२२-४-१९१४)||४००
|-
|३१४. || तार : गृह-मन्त्रीको (२४-४-१९१४)||४०१
|-
|३१५. ||हिन्द स्वराज्य (२९-४-१९१४)||४०२
|-
|३१६.|| तार : गृह मन्त्रीको (६-५-१९१४ के पूर्व)||४०३
|-
|३१७. ||पत्र : गो० कृ० गोखलेको (६-५-१९१४) ||४२८
|-
|३१८. ||तार : गृह मन्त्रीको (७-५-१९१४ के बाद)||४३०
|-
|३१९. ||तार : गृहमन्त्रीको (१९-५-१९१४)||४३३
|-
|३२०. ||स्वर्गीय श्रीमती मेयो (२०-५-१९१४)||४३३
|-
|३२१.|| तार : गृहमन्त्रीको (२२-५-१९१४) ||४३४
|-
|३२२.|| पत्र : 'ट्रान्सवाल लीडर' को (२३-५-१९१४) ||४३४
|-
|३२३.|| भाषण : प्रार्थना-सभामें (२३-५-१९१४)||४३४
|-
|३२४. ||भेंट : ई० एम० जॉर्जेससे (२७-५-१९१४) ||४२५
|-
|३२५. ||पत्र : मणिलाल गांधीको (२८-५-१९१४)||४२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|तेईस|}}
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|-
|२८९.||पत्र : रावजीभाई पटेलको (७-३-१९१४) ||३६८
|-
|२९०.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (८-३-१९१४)||३७१
|-
|२९१.|| पत्र : छगनलाल गांधीको (११-३-१९१४)||३७३
|-
|२९२.|| पत्र : सी० एफ० ऐण्ड्रयूजको (१३-३-१९१४)||३७६
|-
|२९३.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१४-३-१९१४)||३७८
|-
|२९४.||पत्र : जमनादास गांधीको (१७-३-१९१४)||३७९
|-
|२९५.|| आयोगकी रिपोर्टके बारेमें विचार (१७-३-१९१४ के बाद)||३८१
|-
|२९६.|| पत्र: ' इंडियन ओपिनियन' को (१८-३-१९१४)||३८२
|-
|२९७.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१९-३-१९१४)||३८३
|-
|२९८.|| पत्र : रावजीभाई पटेलको (२१-३-१९१४)||३८४
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२२-३-१९१४)||३८५
|-
|३००.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (२२-३-१९१४)||३८६
|-
|३०१.|| पत्रका अंश (२२-३-१९१४)||३८७
|-
|३०२.|| आयोगकी रिपोर्ट और सिफारिशें (२५-३-१९१४)||३८८
|-
|३०३.||भाषण : केप टाउनके स्वागत समारोहमें (२५-३-१९१४)||३९१
|-
|३०४.||पत्र : महात्मा मुंशीरामको (२७-३-१९१४)||३९१
|-
|३०५.||पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१-४-१९१४) ||३९२
|-
|३०६. || पत्र : मणिलाल गांधीको (३-४-१९१४)||३९३
|-
|३०७.|| विवाह सम्बन्धी एक घोषणा (८-४-१९१४)||३९४
|-
|३०८.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको ( ८-४-१९१४)||३९४
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|३०९.||पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (८-४-१९१४)||३९५
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|३१०.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (१२-४-१९१४)||३९६
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|३११. ||पत्र : मणिलाल गांधीको (१७-४-१९१४) ||३९८
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|३१२. ||तार : गृहमन्त्रीको (२२-४-१९१४)||४००
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|३१३.|| पत्रका अंश (२२-४-१९१४)||४००
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|चौबीस|}}
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|-
|३२६.|| राहत विधेयक (३-६-१९१४)||४१२
|-
|३२७.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (५-६-१९१४)||४१३
|-
|३२८.|| पत्रका अंश (९-६-१९१४)||४१३
|-
|३२९.|| भारतीयोंकी शिकायतें (१०-६-१९१४)||४१४
|-
|३३०.|| पत्र : रावजीभाई पटेलको (१०-६-१९१४)||४१५
|-
|३३१.|| याददाश्तके लिए (१०-६-१९१४ के आसपास)||४१६
|-
|३३२.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको (११-६-१९१४)||४१७
|-
|३३३.|| पत्र : रावजीभाई पटेलको (१३-६-१९१४)||४१८
|-
|३३४.|| मणिलाल और जमनादास गांधीको लिखे पत्रका अंश (१३-६-१९१४ को या उसके बाद)||४१९
|-
|३३५.|| पत्र : कुंवरजी मेहताको (१५-६-१९१४)||४२१
|-
|३३६.|| एक ऐतिहासिक बहस (१७-६-१९१४)||४२१
|-
|३३७.|| पत्र : मार्शल कैम्बेलको (२०-६-१९१४)||४२२
|-
|३३८.|| पत्र : गिरमिटिया भारतीयोंको (२२-६-१९१४ के बाद)||४२३
|-
|३३९.|| स्वर्गीय सर डेविड हंटर (२४-६-१९१४)||४२४
|-
|३४०.|| गृह मन्त्रीके साथ बातचीतके लिए मुद्दे (२७-६-१९१४ से पूर्व)||४२५
|-
|३४१.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको(२७-६-१९१४)||४२५
|-
|३४२.|| भाषण : बधाई-समारोहमें (२७-६-१९१४)||४२६
|-
|३४३.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको (३०-६-१९१४)||४२९
|-
|३४४.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१-७-१९१४)||४३०
|-
|३४५.|| भाषण : भाषण : किम्बर्लेके स्वागत समारोहमें (२-७-१९१४)||४३१
|-
|३४६.|| भाषण : डर्बनकी सभामें (५-७-१९१४)||४३२
|-
|३४७.|| तार : 'हिन्दू' को (६-७-१९१४)||४३२
|-
|३४८.|| तार : गो० कृ० गोखलेको (६-७-१९१४)||४३३
|-
|३४९.|| पत्र : ई० एम० जॉर्जेसको (७-७-१९१४)||४३३
|-
|३५०.|| भाषण : विदाई-सभामें (८-७-१९१४)||४३५
|-
|३५१.|| अंत (८-७-१९१४)||४३८
|-
|३५२.|| संघर्षकी समाप्ति (८-७-१९१४)||४३९
|-
|३५३.|| मॉरिशसका विवाह कानून (८-७-१९१४)||४४३
|-
|३५४.|| भाषण : गुजराती समाजकी सभामें (९-७-१९१४)||४४४
|-
|३५५.|| भाषण : गुजराती सभाके उत्सवमें (९-७-१९१४)||४४५
|-
|३५६.|| भाषण : खेलकूद समारोहमें (९-७-१९१४)||४४६
|-
|३५७.|| भाषण : ढेड़ों द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में (९-७-१९१४)||४४९
|-
|३५८.|| भाषण : प्रिटोरियाके विदाई-समारोहमें (१०-७-१९१४)||४५०
|-
|३५९.|| सत्याग्रहका सिद्धान्त और व्यवहार (११-७-१९१४ से पूर्व)||४५१
|-
|३६०.|| भाषण : डर्बनके भोजमें (११-७-१९१४)||४५३
|-
|३६१.|| भाषण : वेरुलम में (१२-७-१९१४)||४५६
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{Rh||पत्र: एशियाई पंजीयकको|२८१}}</noinclude>लगता है कि यदि हम चेचकका केस जाहिर कर देंगे, तो ये लोग हमें मार ही डालेंगे अथवा अस्पतालमें ले जाकर हमें हैरान करेंगे। इस अज्ञान और इससे उत्पन्न होनेवाले भयके कारण हम इस बीमारीको छिपाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई इस कारण हमें मार डाले, यह हो नहीं सकता। और यदि हममें तेज हो, तो अस्पतालमें भी कोई हैरान नहीं कर सकता। तो फिर हम डरते किसलिए हैं ? एक बात और है; झूठ बोलकर हम बीमारी छिपा भी नहीं सकते । सच्चा डर तो झूठ बोलनेका होना चाहिए। झूठ बोलने और बीमारीकी बात छिपाने और फिर उसके जाहिर हो जानेसे हमारी फजीहत ही होती है । हमारे ऊपर मुकदमा चलता है और सजा भी हो जाती है। बीमारी छिपाई हो,तो अस्पताल में भी हमें ज्यादा हैरान किया जाता है । हमारे नाते-रिश्तेदारोंको भी उसमें घसीटा जाता है। हम इस सवालको इस तरह देखना सीखें, तो फिर हमें डरनेका कोई कारण न रहे ।
किन्तु जो लोग सरकारी अधिकारियोंको धोखा देते हैं, हमारी यह टीका उनमें से शायद ही किसीकी नजरसे गुजरे। इसलिए जिम्मेदारी केवल नेताओंपर है ।यदि हम ईमानदार हों, ईमानदारीपर दृढ़ रहें और ऐसी इच्छा करें कि दूसरे लोग भी ईमानदार हों तो बहुत-कुछ कर सकते हैं। नेताओंका कर्त्तव्य है कि वे समाजके गरीब लोगोंके सम्पर्क में आयें और आते रहें, उन्हें बार-बार सही रास्ता दिखायें और स्वयं भी उसी रास्ते चलें । यदि हम ऐसा करें, तो फिर हमारे ऊपर एक भी आरोप लगाये जानेकी सम्भावना न रह जाये ।
:[ गुजरातीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन''', २०-७-१९१२
{{C|{{x-larger|'''२४०. पत्र : एशियाई पंजीयकको<ref>यह पत्र एशियाई पंजीयक श्री चैमनेके १३ जुलाईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। श्री चैमनेने
लिखा था : "इस माहकी ११ तारीखको आपकी मेरे साथ जो भेंट हुई थी, उसके संदर्भमें यदि आप मेरे कार्यालय के सामने सड़कपर प्रतीक्षा में खड़े रहनेवाले भारतीयोंको जो असुविधाएँ होती हैं और वे क्या चाहते हैं, इस सम्बन्धमें एक लिखित बयान दें तो मैं आभारी होऊँगा । " '''इंडियन ओपिनियन''', ३-८-१९१२ ।</ref>'''}}}}
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
:[सेवा में
:एशियाई पंजीयक
:प्रिटोरिया
:महोदय,]
आपका इसी माहकी १३ तारीखका कृपापत्र मिला । उत्तरमें निवेदन करना चाहता हूँ कि आपके कार्यालय के बाहर प्रतीक्षा करनेवाले भारतीयोंको बहुत अधिक असुविधा उठानी पड़ रही है। जैसा कि आप जानते हैं, बहुतोंको अपनी बारी आने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>म्यूरिसनके सामने आनेवाली कठिनाइयोंपर हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं। परन्तु हमारी धारणा तो यह है कि जो कुछेक बातें डॉक्टर साहबकी निगाह में आईं उन्होंने उन्हें अनजाने ही तूल दे दिया । हमें यह कहनेकी इजाजत दी जाये कि जैसा कष्ट उन्हें भारतीय रोगियोंसे पहुंचता है वैसा अन्य रोगियोंसे भी पहुँचता है । डॉ॰ म्यूरिसनसे हमारा यह कहना है कि सारी जातिपर झूठ बोलनेका आरोप मढ़नेसे उनका काम अधिक सुगम नहीं हो जाता। इस कठिनाईका एकमात्र हल यह है कि जो रोगी उनके विभागको चकमा देते हैं उनके साथ शिष्टता परन्तु दृढ़ताका व्यवहार किया जाये । यदि चेचकके कुछ भारतीय रोगियोंने अपने रोगको छिपाया तो अन्य भारतीयोंने रोगके निवारणमें उनके विभागकी सहायता भी तो की। इस बातपर हमसे बढ़कर खेद अन्य किसीको नहीं हो सकता कि भारतीय किसी भी रोगसे आक्रान्त हों, अथवा किसी संक्रामक रोगको भय या अपने अज्ञानके कारण छिपानेका यत्न करें । परन्तु भारतीयोंपर झूठ बोलने-जैसे गम्भीर आरोपकी पुष्टि केवल उन दुःखद अनुभवोंके आधारपर नहीं की जा सकती है जिनका डॉ० म्यूरिसनने जिक्र किया है।
परन्तु डॉ० म्यूरिसनकी स्पष्टवादिता और भारतीय तथा अन्य लोगोंकी समान रूपसे सेवा करनेकी उनकी प्रत्यक्ष इच्छाके लिए भारतीय समाजको उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए। हममें से जो व्यक्ति जिम्मेदार होनेका दावा करते हों उनका कर्त्तव्य है कि वे इस बातका ध्यान रखें कि नगरको रोग तथा ऐसे लापरवाह या डरपोक लोगोंके भयसे, जो छूतछातकी बीमारीकी उपेक्षा या दुराव करते हैं, मुक्त रखने में डॉ० म्यूरिसनको पूरी सहायता मिलती रहे। डॉ० म्यूरिसनके झूठ बोलने के सामान्य आरोपका प्रतिवाद करने में समर्थ होना ही सन्तोषके लिए काफी नहीं है; वास्तविक सन्तोष तो हमें तब होना चाहिए जब हम ऐसा कोई आरोप लगाये जा सकनेके छोटेसे-छोटे कारणका भी अन्त कर देनेका प्रयत्न करते हों ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३९. डॉ० म्यूरिसनका आरोप'''}}</center>
डॉ० म्यूरिसनने डर्बनके भारतीयोंपर झूठे व्यवहारका आरोप लगाया था । हमने उनसे उसका स्पष्टीकरण माँगा । उन्होंने जो जवाब दिया है वह सोचने-समझने लायक है। उनके इस जवाब से सारे समाजपर झूठे व्यवहारका आरोप सिद्ध नहीं होता। लेकिन हम अपने पक्ष में इतना कहकर चुप नहीं बैठे रह सकते । डॉ० म्यूरिसनने जो उदाहरण दिये हैं वे तो हमें स्वीकार करने ही चाहिए। कुछ भारतीयों में [संक्रामक] बीमारियोंको छिपाने और सरकारी अधिकारियोंको झूठे जवाब देनेकी आदत है ही । यह आदत जानी चाहिए। मनुष्य अक्सर भयके कारण झूठ बोलता है। भय अज्ञानका परिणाम है। इसलिए यदि अज्ञान दूर हो, तो भय दूर हो जाये और भय दूर हो जाये तो झूठ बोलना भी खत्म हो जाये । उदाहरणार्थ,हमें ऐसा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}तुमने बनियेको सिखानेका काम अपने ऊपर लिया होता तो ठीक ही होता। उससे तुम्हारी मानसिक अस्वस्थता कुछ दूर होती और उस कमाईसे एक तरहका सहारा मिलता।
मेरे आनेकी बातको तनिक भी निश्चित मत समझना। स्त्रियों और बच्चोंके बारेमें सत्याग्रह छिड़ सकता है। मुझे लगता है कि उस हालतमें मुझे रुकना पड़ेगा। यदि सत्याग्रह हुआ तो तुम उसमें कैसे भाग ले सकोगे ? मुझे तुम्हारा वहाँसे आना ठीक नहीं जान पड़ता। तुम्हारे जानेका उद्देश्य माता-पिताकी सेवा करना है। उसे मुख्य मानकर जो उचित हो वह करना। इसी कारण तुम बड़ौदा या दूसरी जगह बुनाई सीखने के लिए नहीं जा सकते।
स्वादको जीतने के सम्बन्धमें तुमने जो श्लोक उद्धृत किया है, वह मैंने देखा था। फिर भी मेरी टीका उपयुक्त ठहरती है। एक श्लोकसे कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने इस विषयको महत्व नहीं दिया है। यदि दिया होता तो हवेली<ref>वल्लभ सम्प्रदायका वैष्णव मन्दिर।</ref> आदिमें हर किसी बहाने मिष्ठान्नके भोजन न होते, हर त्योहारके दिन घी और गुड़के सीधे न दिये जाते और ब्रह्म-भोज भी न होते। आधुनिक ऋषि या साधु स्वादेन्द्रियको नहीं जीतते, बल्कि वे उसके वशीभूत दिखाई देते हैं। यह विषय बहुत बड़ा है। यदि हम दोष निकालने की दृष्टिसे ऐसा कहें तो पापके भागी होंगे। परन्तु जब हमारा मुख्य उद्देश्य अपना और दूसरोंका कल्याण करना होता है तब चाहे कोई कितना ही मान्य पुरुष क्यों न हो, उसमें भी अपूर्णता देखें तो उसपर विचार करना हमारा फर्ज है।
अब तुम्हारे एक पत्रका उत्तर समाप्त होता है। दूसरे पत्रोंका उत्तर फिर अर्थात् अगले हफ्ते लिखनेका प्रयत्न करूँगा । इस प्रकार तुम्हें हर हफ्ते लिख सकूंगा।
यहाँ तो बहुत-कुछ होता है। उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उतना वक्त नहीं है। किन्तु तुम्हारे पूछे हुए सवालोंके उत्तरके सिलसिले में कुछ आ जायेगा।
मणिलाल अपनी पढ़ाईमें व्यस्त रहता है। मैं उसे एक घड़ीकी भी फुरसत नहीं लेने देता। वह तुम्हें पत्र लिखेगा, यह आशा व्यर्थ है। तुम उसे पत्र लिखो तो सम्भव है, वह उत्तर दे दे। जेकी भी व्यस्त तो रहती ही है; फिर, वह पत्र लिखने में ढीली है और उसे पत्र लिखना आता भी नहीं, इसलिए उससे भी आशा कम ही रखना।
{{rh|||मोहनदासके आशीर्वाद}}
:गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रति (सी० डब्ल्यू० ५६४३) से ।
:सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{xx-larger|'''परिशिष्ट'''}}</center></noinclude>
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट १'''<br>'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{rh|||केप टाउन}}
{{rh|||अप्रैल ११, १९११}}
प्रिय श्री गांधी,
प्रवासी विधेयकके सम्बन्धमें आज तीसरे पहर आप यहाँ आये थे। उसीके विषय में खेदपूर्वक सूचित कर रहा हूँ कि इस समय जनरल स्मट्स आपको विधेयक या उसमें होनेवाले किसी संशोधनके बारेमें इससे पहले कि वह फिर संसद में लाया जाये कोई सूचना देनेकी स्थिति में नहीं हैं। पूरे मामलेपर अभी भी विचार किया जा रहा है और सम्भव है उसपर सप्ताह के अन्ततक विचार चलता रहे। इन परिस्थितियोंमें मुझे खेद है, हम आपको ऐसी कोई रूपरेखा नहीं दे सकते जिसका उपयोग आप अपने तार में कर सकें; मै तो केवल इतना ही सुझाव दे सकता हूँ कि आप तार दें कि आप विभाग से सम्पर्क बनाये हैं और जब वहाँसे कुछ निश्चित रूपसे पता लगेगा तो फिर भारत तार भेजेंगे।
{{rh|||आपका विश्वस्त}}
{{rh|||अनॅस्ट एफ० सी० लेन}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४५१ ) की फोटो नकलसे।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट २'''}}</center>
<center>{{x-larger|'''गांधीजीके नाम लेनका पत्र'''}}</center>
{{rh|||केप टाउन}}
{{rh|||अप्रैल २१, १९११}}
प्रिय श्री गांधी,
प्रवासी विधेयकके मसविदेके सम्बन्धमें आपके १९ और २० अप्रैलके लिखे पत्र मुझे मिल गये हैं और मैंने दोनों पत्र मन्त्रीके सामने पेश कर दिये हैं।
जनरल स्मटसने मुझसे आपको यह सूचित करने को कहा है कि अगले सप्ताहके प्रारम्भमें संसदके सत्रावसानकी सम्भावनाको देखते हुए, सरकारके लिए इस अधिवेशनमें प्रवासी कानूनको किसी रूपमें आगे बढ़ा सकना सम्भव नहीं होगा।
सरकारकी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पेचीदा प्रश्नका कोई हल निकाला जा सके; वह इस बीच फिर इस मामलेका अध्ययन करेगी और देखेगी कि समझौता कर सकनेकी दिशामें क्या किया जा सकता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इस बीच जनरल स्मट्स महसूस करते हैं कि सत्याग्रह आन्दोलन के कारण लोगोंने काफी कष्ट सहे और अभी तक सह रहे हैं; उसे अब समाप्त कर देना ही अच्छा होगा। उसके जारी रहनेसे स्थिति निरर्थक ही अधिक उलझती है, और जब सरकार भारतीय प्रवासके प्रश्नका सन्तोषजनक हल निकालनेकी कोशिश कर रही है तब भारतीय समाजको अपना आन्दोलन जारी रखकर मामलोंको पेचीदा नहीं बनाना चाहिए।
जनरल स्मट्सने इस बातपर ध्यान दिया है कि श्रीमती सोढाकी अपील आगामी शनिवारको ब्लूमफाॅटीनमें पेश हो रही है और वे मेरी मारफत यह कहला रहे हैं कि श्रीमती सोढाकी ओरसे आपके आवेदनपत्रपर अनुकूल रूपसे विचार किया जा रहा है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृह मन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५४९१ ) की फोटो नकल और 'इंडियन ओपिनियन', २९-४-१९११ से ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ३'''}}</center>
<center>{{x-larger|'''संघ- सरकार द्वारा प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९११)<br>वापस लेनेके कारण'''}}</center>
<center>{{larger|'''क <br> ग्लैड्स्टन द्वारा हरकोर्टको भेजे तारका सारांश'''}}</center>
{{rh|||अप्रैल १२, १९११}}
:'''प्राइवेट और व्यक्तिगत'''
:'''फौरी'''
प्रवासी विधेयक । जे० सी० स्मट्सने आज सुबह बताया कि गांधीका कहना है कि यदि चुने गये प्रवासियोंको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश नहीं दिया गया तो ट्रान्सवालमें सत्याग्रह जारी रहेगा । वे चाहते हैं कि जे० सी० स्मट्स इस विधेयकको वापस लेकर उसकी जगह दूसरा विधेयक लायें, जिसमें प्रवास सम्बन्धी प्रस्ताव केवल ट्रान्सवालपर लागू हों । उनका कहना है कि ऑरेंज फ्री स्टेट द्वारा [ प्रवासियोंका ] बहिष्कार कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही विधेयक केप ऑफ गुड होप तथा नेटालमें नई और गम्भीर कठिनाई पैदा करता है ।
जे० सी० स्मट्सका कहना है कि वे ऑरेंज फ्री स्टेटके सदस्योंको, जिन्हें अब प्रान्तीय परिषदके एक प्रस्तावका बल भी प्राप्त है, उससे मस नहीं कर सकते । वे कहते हैं कि [ संसदके ] सत्रके इन अन्तिम दिनोंमें नया विधेयक [लाना ] असम्भव है, और किसी भी स्थितिमें ट्रान्सवालको संघसे अलग मानना और उसकी सीमापर प्रवासका एक नया प्रशासन-तन्त्र स्थापित करना असम्भव है ।
ऐसी परिस्थितियोंमें जे० सी० स्मट्सकी रायमें सबसे अच्छा तरीका इस विधेयकको वापस लेकर अगले वर्ष एक ज्यादा ग्राह्य विधेयक लानेको कोशिश करना है। उनकी राय है कि सत्याग्रह लगभग समाप्तिपर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१३}}</noinclude>है, और नया विधेयक पेश किया जाये, तबतक के लिए वे गांधीसे अस्थायी सुलह कर सकते हैं। साथ ही, यदि आप आग्रह करें तो वे अवश्य ही विधेयकका काम आगे बढ़ायेंगे, लेकिन उनके विचार से भारत सरकार वर्तमान विधेयकको इतना ज्यादा नापसन्द करती है कि उनके सुझाये कदमपर वह आपत्ति नहीं करेगी। लेकिन वे आपके विचार जानना चाहेंगे।
इसमें जो विलम्ब होगा उसका मुझे खेद है, लेकिन इससे कम आपत्तिजनक कोई रास्ता मैं नहीं देख पाता।
{{rh|||ग्लैड्स्टन}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल ऑफिस रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१०
<center>{{larger|'''ख<br>हरकोर्टके उत्तरका सारांश'''}}</center>
आपके अप्रैल १२ के प्राइवेट और व्यक्तिगत तारके संदर्भ में भारत सरकारकी राय ली जा रही है, और अपनी राय व्यक्त करनेसे पहले मैं उसकी राय जाननेको उत्सुक हूँ।
मैं ऐसा मान रहा हूँ कि जे० सी० स्मट्सको इत्मीनान है कि वे गांधी द्वारा आन्दोलनका पुनरारम्भ रोक सकते हैं, और गांधीके विरोधका आदर करते हुए यदि वे विधेयकको वापस लेते हैं तो उनके ऐसा करनेसे वे इस बातकी कोई सम्भावना नहीं मानते कि गांधीकी प्रतिष्ठा बढ़ने और उनके विश्वासको बल मिलनेसे कि वे संघ-सरकारको भी अपनी शर्तें माननेपर मजबूर कर सकते हैं---भविष्य में और अधिक उत्पात खड़ा होगा। क्या जे० सी० स्मटस ऐसी स्थिति में है कि वे मान सके कि अगले वर्ष वे एक ऐसा विधेयक पेश कर सकेंगे जो गांधीको, जहाँतक दो-दो आपत्तिजनक मुद्दोंका सवाल है, वर्तमान विधेयककी अपेक्षा अधिक मान्य हो ? कृपया सूचित करें कि किस तारीख तक आपको मेरे विचार मालूम हो जाने चाहिए।
{{rh|||हरकोर्ट}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:कलोनियल रेकर्ड्स : सी० ओ० ५५१/१० ।
{{rh|||}}
<center>{{larger|'''ग<br>साम्राज्य सरकारको बोयाकी टिप्पणी'''}}</center>
....<ref>इस टिप्पणीके इससे पहलेवाले अनुच्छेद उपलब्ध नहीं हैं ।</ref>मन्त्रियोंने एक ऐसे कानूनकी रचना की थी, जिसमें सभी प्रवासियोंके लिए संविधि द्वारा अनुमोदित एक समान परीक्षा अनिवार्य करनेके साथ-साथ प्रवासी अधिकारियोंको वैसे ही व्यापक अधिकार प्रदान किये गये थे, जैसे कि इस समय आस्ट्रेलिया में प्राप्त हैं, और जिनके अधीन कुछ चन्द चुने हुए एशियाइयों---मुख्यत: शिक्षा-साध्य पेशोंके लोगों---को छोड़कर सारे एशियाइयोंको संघमें प्रवेशसे वर्जित किया जा सकता था। तब एक कठिनाई उत्पन्न हुई कि ऐसे एशियाइयोंके संघमें आनेके बाद उन्हें औरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशका अधिकार हो या नहीं। ऑरेंज फ्री स्टेटके क्षेत्रोंसे निर्वाचित सभी संसद सदस्योंने किसी भी शिक्षित भारतीयको ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेशकी अनुमति दिये जानेका एकमत होकर विरोध किया।
________________________________________<noinclude>{{smallrefs}}
{{left|११-३३}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>एशियाइयोंसे सम्बन्धित ऑरेंज फ्री स्टेटके कानूनोंमें किसी प्रकारके परिवर्तनका जोरदार विरोध प्रकट करते हुए ऑरेंज फ्री स्टेटकी प्रान्तीय परिषदने एक प्रस्ताव भी पास किया।
दूसरी ओर, भारतीय समाजने कहा कि विधेयकके मसविदेको उसी रूपमें वह स्वीकार करता है, किन्तु अपनी यह माँग पूरी करानेके लिए वह आन्दोलन जारी रखनेको विवश होगा कि विधेयककी शर्तोंक अनुसार प्रवेश पानेवाले शिक्षित एशियाइयोंको संघके अन्य प्रान्तों में जैसी स्वतन्त्रता प्रदान करनेका निश्चय किया गया है, वैसी ही स्वतन्त्रता ऑरेंज फ्री स्टेटमें भी प्राप्त हो।
मन्त्रियोंने अनुभव किया कि विकल्पके रूपमें एक ऐसा विधेयक पास किया जा सकता है जो सिर्फ ट्रान्सवालमें ही लागू हो, लेकिन इसमें संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए, और फिर जब यह देखा गया कि विधेयकका मुख्य उद्देश्य--अर्थात् भारतीयों के प्रवासका प्रश्न निपटानेका उद्देश्य पूरा नहीं होगा तब मन्त्रियोंने विचार किया कि एक ही रास्ता है, और वह यह कि फिलहाल मामलेको जहाँका तहाँ छोड़ दिया जाये, और सत्र समाप्त होनेपर अवकाशकी अवधि में कोई ऐसा हल निकालनेकी कोशिश की जाये जो स्थायी साबित हो।
तदनुसार मन्त्रियोंने भारतीय समाजके नेताओंको वस्तुस्थितिकी सूचना दे दी, और उनके पास यह आशा करनेके कुछ कारण हैं कि संसदके अगले सत्र में प्रवासी अधिनियम पेश होने तक के लिए सत्याग्रह आन्दोलन अस्थायी रूपसे स्थगित रखा जायेगा।
अन्त में मन्त्रिगण महाविभवको यह सूचित करना चाहते हैं कि उन्हें बड़े खेदके साथ सारे मामलेको कुछ समयके लिए स्थगित करना पड़ा है; लेकिन सरकार के पास विभिन्न क्षेत्रोंसे प्रस्तावित कानूनके खिलाफ जो आपत्तियाँ आई हैं, उन्हें देखते मन्त्रियोंने अनुभव किया कि मामलेपर और विचार करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा समझौता हो सके जो सभी पक्षोंको स्वीकार हो।
{{rh|||लुई बोथा}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:सी० डी० ६२८३
<center>{{larger|'''घ<br>संघ-संसद् में स्मट्सका भाषण'''}}</center>
जनरल स्मट्सने कहा कि इससे पहले कि अध्यक्ष महोदय अपनी कुर्सी छोड़ें, मैं चन्द शब्द कहना चाहूँगा। मुझे दुःख है कि यह विधेयक, जो इस सत्र में सदनमें पेश किये जानेवाले अत्यन्त महत्वपूर्ण और मूल्यवान विधेयकोंमें से है, विधि-पुस्तिकामें सम्मिलित नहीं किया जायेगा। किन्तु माननीय सदस्यगण देखेंगे कि अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आवश्यक कानूनोंको बनानेमें बहुत ज्यादा समय लग जानेके कारण उनके लिए सम्भव नहीं होगा कि इस विधेयकके बारेमें आगे कार्रवाई की जा सके, और प्रवासके प्रश्नको अगले वर्षे कानून बनाकर निपटाने तक ज्योंका-त्यों छोड़ना पड़ेगा। विधेयकको द्वितीय वाचनके लिए प्रस्तुत करते समय मैंने कहा था कि सरकारके सामने दो उद्देश्य हैं। पहला है, दक्षिण आफ्रिका के प्रवासी कानूनोंमें एकरूपता स्थापित करना; और दूसरा है, भारतीय प्रश्नका, जो पिछले कुछ वर्षोंसे काफी परेशानी और चिन्ताका कारण बन रहा है, कोई हल निकालना। मैंने उन कठिनाइयोंके शीघ्र हल हो सकनेकी सम्भावना के सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकार और संघ-सरकार के बीच हुए पत्र-व्यवहारको संसदकी मेजपर रखा है। हालाँकि इस विधेयकको चालू सत्र में पास करके उसे कानूनका रूप देना और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार तथा संघ सरकार द्वारा लगभग स्वीकृत हलको कार्यान्वित कर सकना सम्भव नहीं है, फिर भी मुझे इस बातकी काफी आशा है कि मैं इस विधेयकके बिना भी अगले बारह महीने तक सत्याग्रह आन्दोलनको रोक सकूँगा, और अगले सत्र में संसद इस मसलेपर कोई कानून बनायेगी, इस बीच उसके बारेमें दक्षिण<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वांग्मय}}</noinclude>प्रश्नपर उदारतापूर्वक विचार करनेको कहेंगे जो वर्तमान एशियाई कानून तोड़नेके अपराध में कैद भुगत रहे हैं ।
मैं आशा करता हूँ कि भारतीय समाजसे सलाह करनेके बाद आप जनरल स्मट्सको उनके प्रिटोरिया वापस आनेपर सत्याग्रह समाप्त कर दिये जानेकी सूचना दे सकेंगे, ताकि वे सम्राटको सरकारको ऐसा आश्वासन दे सकें कि भारतीय समाजके नेता समस्या के निश्चित हल्की दृष्टिसे सरकारसे सहयोग करना चाहते है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृहमन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५००) की फोटो नकल तथा २९-४-१९११ के से भी ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम ई० एम० गॉर्जेसका पत्र'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया<br>मई १९, १९११}}
महोदय,
आपके ४ तारीखके पत्रके ही सिलसिले में माननीय मन्त्रीने मुझे आपको यह और सूचित करनेका आदेश दिया है कि---
{{Outdent|(क) उन एशियाइयोंको जिनको अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अन्तर्गत १ जनवरी, १९०८ के बाद निर्वासित किया गया था और जिनको इन अधिनियमों के अन्तर्गत पंजीयन करानेका वैध अधिकार है किन्तु जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण अभी तक प्रार्थनापत्र नहीं दे सके हैं, उनको अगले ३१ दिसम्बर तक, अधिनियमों और विनियमोंकी व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए, प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति दी जायेगी।}}
{{Outdent|(ख)अधिनियम २/०७ या अधिनियम ३६/०८ और इनके अन्तर्गत बनाये गये विनियमों के अनुसार अगले ३१ दिसम्बर को या उससे पहले पंजीयन के लिए प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति उन एशियाइयोंको भी दी जायगी जिनका निर्वासन तो नहीं हुआ था लेकिन जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण पंजीयन के लिए प्रार्थना पत्र दिये बिना ही दक्षिण आफ्रिकासे चले गये थे और जो साबित कर सकते हैं कि उनको पंजीयन करानेका वैध अधिकार है; वशर्ते कि (क) और (ख) के अंतर्गत प्राप्त प्रार्थना-पत्रोंकी संख्या तीससे अधिक न हो।}}
{{Outdent|(ग)आपके पत्रके पाँचवे अनुच्छेदके संदर्भ में हमारी जानकारी यह है कि दक्षिण आफ्रिकामें ऐसे १८० भारतीय और चीनी हैं जिनका पंजीयन स्वेच्छिक प्रणालीके अंतर्गत नामंजूर कर दिया गया था और जिन्होंने अभीतक अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अंतर्गत अपने प्रार्थनापत्र पेश नहीं किये हैं। मुझे उनके सम्बन्ध में आपको सूचित करना है कि यदि कोई अनुसूचित विलम्ब किये बिना उनके नामोंकी एक सूची पेश कर दी जाये तो उनको उल्लिखित}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वांग्मय}}</noinclude>प्रश्नपर उदारतापूर्वक विचार करनेको कहेंगे जो वर्तमान एशियाई कानून तोड़नेके अपराध में कैद भुगत रहे हैं ।
मैं आशा करता हूँ कि भारतीय समाजसे सलाह करनेके बाद आप जनरल स्मट्सको उनके प्रिटोरिया वापस आनेपर सत्याग्रह समाप्त कर दिये जानेकी सूचना दे सकेंगे, ताकि वे सम्राटको सरकारको ऐसा आश्वासन दे सकें कि भारतीय समाजके नेता समस्या के निश्चित हल्की दृष्टिसे सरकारसे सहयोग करना चाहते है ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||अर्नेस्ट एफ० सी० लेन}}
{{rh|||गृहमन्त्रीका निजी सचिव}}
:श्री मो० क० गांधी
:केप टाउन
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५००) की फोटो नकल तथा २९-४-१९११ के से भी ।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ५'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम ई० एम० गॉर्जेसका पत्र'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया<br>मई १९, १९११}}
महोदय,
आपके ४ तारीखके पत्रके ही सिलसिले में माननीय मन्त्रीने मुझे आपको यह और सूचित करनेका आदेश दिया है कि---
{{Outdent|(क) उन एशियाइयोंको जिनको अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अन्तर्गत १ जनवरी, १९०८ के बाद निर्वासित किया गया था और जिनको इन अधिनियमों के अन्तर्गत पंजीयन करानेका वैध अधिकार है किन्तु जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण अभी तक प्रार्थनापत्र नहीं दे सके हैं, उनको अगले ३१ दिसम्बर तक, अधिनियमों और विनियमोंकी व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए, प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति दी जायेगी।}}
{{Outdent|(ख) अधिनियम २/०७ या अधिनियम ३६/०८ और इनके अन्तर्गत बनाये गये विनियमों के अनुसार अगले ३१ दिसम्बर को या उससे पहले पंजीयन के लिए प्रार्थनापत्र देनेकी अनुमति उन एशियाइयोंको भी दी जायगी जिनका निर्वासन तो नहीं हुआ था लेकिन जो सत्याग्रह आन्दोलनके कारण पंजीयन के लिए प्रार्थना पत्र दिये बिना ही दक्षिण आफ्रिकासे चले गये थे और जो साबित कर सकते हैं कि उनको पंजीयन करानेका वैध अधिकार है; वशर्ते कि (क) और (ख) के अंतर्गत प्राप्त प्रार्थना-पत्रोंकी संख्या तीससे अधिक न हो।}}
{{Outdent|(ग) आपके पत्रके पाँचवे अनुच्छेदके संदर्भ में हमारी जानकारी यह है कि दक्षिण आफ्रिकामें ऐसे १८० भारतीय और चीनी हैं जिनका पंजीयन स्वेच्छिक प्रणालीके अंतर्गत नामंजूर कर दिया गया था और जिन्होंने अभीतक अधिनियम २/०७ या ३६/०८ के अंतर्गत अपने प्रार्थनापत्र पेश नहीं किये हैं। मुझे उनके सम्बन्ध में आपको सूचित करना है कि यदि कोई अनुसूचित विलम्ब किये बिना उनके नामोंकी एक सूची पेश कर दी जाये तो उनको उल्लिखित}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१७}}</noinclude>{{Outdent|अधिनियमोंको व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए अगले ३१ दिसम्बर तक अपने प्रार्थनापत्र भेजनेका अवसर दिया जायेगा।}}
{{Outdent|(घ) जो सात शिक्षित भारतीय अभी ट्रान्सवालमें हैं और जिनके नाम आपने बतलाये हैं उनको कानूनके रद्दोबदल होने तक यहाँ निवास करनेके लिए अस्थायी अधिकारपत्र दे दिये जायेंगे। और कानूनमें रद्दोबदल हो जानेपर ट्रान्सवालमें उनके निवासको प्राधिकृत करनेके लिए स्थायी अधिकार-पत्र दे दिये जायेंगे। तीन शिक्षित मुसलमानोंके निवासको भी एक विशेष रियायत के तौरपर, इसी प्रकार प्राधिकृत कर दिया जायेगा। भविष्य में प्रतिवर्षं आनेवाले शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी। चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है। इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
{{rh|||आपका,}}
{{rh|||ई० एम० गॉर्जेस}}
{{rh|||कार्यवाहक गृह सचिव}}
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन''' से भी।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया}}
{{rh|||मई २०, १९११}}
आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में: व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे कलके पत्रके अनुच्छेद घ में लिया जा चुका है । छठवाँ प्रश्न :शिक्षाका कोई निर्धारित<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१७}}</noinclude>{{Outdent|अधिनियमोंको व्यवस्थाओंके अधीन रहते हुए अगले ३१ दिसम्बर तक अपने प्रार्थनापत्र भेजनेका अवसर दिया जायेगा।}}
{{Outdent|(घ) जो सात शिक्षित भारतीय अभी ट्रान्सवालमें हैं और जिनके नाम आपने बतलाये हैं उनको कानूनके रद्दोबदल होने तक यहाँ निवास करनेके लिए अस्थायी अधिकारपत्र दे दिये जायेंगे। और कानूनमें रद्दोबदल हो जानेपर ट्रान्सवालमें उनके निवासको प्राधिकृत करनेके लिए स्थायी अधिकार-पत्र दे दिये जायेंगे। तीन शिक्षित मुसलमानोंके निवासको भी एक विशेष रियायत के तौरपर, इसी प्रकार प्राधिकृत कर दिया जायेगा। भविष्य में प्रतिवर्षं आनेवाले शिक्षित भारतीयोंकी प्रस्तावित संख्या छः ही रहेगी; इन प्रवासियोंकी हमारे बीच यही संख्या तय हुई थी। चालू वर्षमें मामलेकी विशेष परिस्थितिके कारण ही उसे दस तक बढ़ाया गया है।}}
मन्त्री महोदयको भरोसा है कि एशियाई समाज इन अनुरोधोंके स्वीकार किये जानेका यही अर्थ लगायेगा कि सभी विवादग्रस्त प्रश्नोंपर अन्तिम रूपसे समझौता हो चुका है। इस सम्बन्धमें आपका इस आशयका उत्तर आनेपर एशियाई पंजीयन अधिनियमोंके उल्लंघनके लिए इस समय सजा काटनेवाले सत्याग्रहियोंकी रिहाई करानेके उद्देश्यसे न्याय विभागके साथ लिखा-पढ़ी की जायेगी।
जाली प्रमाणपत्र रखने या दूसरे किसीके लिए जारी किये गये प्रमाणपत्रोंको इस्तेमाल करनेके सिलसिले में सजा काटनेवाले बन्दियोंको रिहा नहीं किया जा सकता ।
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{{rh|||ई० एम० गॉर्जेस}}
{{rh|||कार्यवाहक गृह सचिव}}
मूल अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५५३३) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन''' से भी।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ६'''}}</center>
<center>{{larger|'''गांधीजीके नाम गृह-सचिवका तार'''}}</center>
{{rh|||प्रिटोरिया}}
{{rh|||मई २०, १९११}}
आपके कलके पत्र और आज फोन द्वारा उसके संशोधनके सम्बन्धमें: मेरे १९ के पत्रके अनुच्छेद छ: में उल्लिखित १८० एशियाइयों में ट्रान्सवालमें युद्धपूर्व तीन वर्षके निवासके आधारपर ऐसे लोगोंको शामिल करनेपर कोई आपत्ति नहीं जो अभी दक्षिण आफ्रिका में हैं पर जो पंजीयन के लिए उचित अवधि अन्दर प्रार्थनापत्र नहीं दे सके थे । आपके २९ अप्रैल के पत्रके पहले प्रश्नके सम्बन्ध में: व्यक्तियों के वास्तविक वर्तमान अधिकारों को छीननेका तो कोई मन्शा नहीं लेकिन सारे संघके लिए एकरूप और एक सामान्य प्रकारके कानूनले विभिन्न प्रान्तों में [भारतीयोंकी] स्थितिपर निःसन्देह प्रभाव पड़ेगा। दूसरे प्रश्नके बारेमें ऊपर कहा जा चुका है । तीसरे और चौथे प्रश्नके बारेमें में मैं कलके पत्रके अनुच्छेद क और ख में कह चुका हूँ ।पाँचवें प्रश्नको मेरे कलके पत्रके अनुच्छेद घ में लिया जा चुका है । छठवाँ प्रश्न :शिक्षाका कोई निर्धारित<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५६
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2026-08-25T22:56:16Z
सीमा1
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङमय|}}</noinclude>मानदण्ड नहीं । सातवाँ प्रश्न : पर्याप्त रूपसे शिक्षित पंजीकृत भारतीयोंको परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं। आठवाँ प्रश्न : जाने-माने एशियाइयोंको यदि वे अंग्रेजीमें हस्ताक्षर कर सकें तो परवाने लेते समय अँगुली या अँगूठा निशानी देना जरूरी नहीं ।
मूल अंग्रेजी तार ( एस० एन० ५५३६) की फोटो नकल और २७-५-१९११ के '''इंडियन ओपिनियन'''से भी।
<center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ७'''}}</center>
{{c|'''क'''}}
<center>{{larger|'''ट्रान्सवाल स्थानीय शासन अध्यादेश, १९११ का प्रारूप'''}}</center>
{{c|'''एशियाइयोंसे सम्बधित अंश'''}}
{{c|'''एशियाई बाजार'''<ref>क्रूगरकी सरकारने एशियाइयोंको कुछ निश्चित बस्तियों में सीमित करनेका निर्णय सबसे पहले अप्रैल १८९९ में किया था और इनको विनियमित करनेकी सत्ता नगर परिषदोंको सौंपी गई थी; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ६२-६३। अप्रैल १९०३ में युद्धके बाद बनी ब्रिटिश सरकारने ट्रान्सवालके लेफ्टिनेन्ट गवर्नर लॉर्ड मिलनरके शासन कालमें बाजार नोटिस जारी किया था; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३१४-१५। १९०५ में एक अध्यादेश द्वारा " बाजारों" की सीमाएँ निर्धारित करनेकी शक्ति नगर-परिषदोंको दे दी गई थी; देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ २७-२८; खण्ड ३, पृष्ठ ३२८-३०९ खण्ड ४, पृष्ठ ७९-८१, खण्ड ५, पृष्ठ ८४-८६ और पृष्ट १५३-५६; खण्ड ६, पृष्ट ५० और खण्ड ८, १४ १९४, २४३, २४८ और २८७।</ref>}}
६६(१) परिषद एशियाइयोंकी दूकानोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलग से निर्धारण कर सकेगी, उन्हें ठीक हालतमें रखेगी तथा चलायेगी। ये बाजार और क्षेत्र केवल एशियाइयोंके लिए ही होंगे। वह समय-समयपर स्वयं जो उपनियम बनायेगी उसके अनुसार उनका नियन्त्रण तथा पर्यवेक्षण कर सकेगी, और उनमें स्थित भूमि या किसी भी इमारत या अन्य किसी भी रचनाको ऐसे विनियमों द्वारा समय-समयपर निर्धारितकी जानेवाली शर्तों तथा किराये की दरोंपर एशियाइयों को पट्टेपर दे सकेगी।<br>(२) परिषद्को ऐसे बाजारों तथा क्षेत्रोंको बन्द करने और उनके लिए अन्य उपयुक्त प्रस्थान जुटानेकी क्षमता प्रदान करनेके लिए इससे पहलेके खण्डके उप-खण्ड (४) से (७) तककी सारी व्यवस्थाएँ यथोचित परिवर्तनोंके साथ लागू होंगी।<br>(३) परिषद् गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उनकी सहमतिके बिना एशियाइयोंके लिए अलग से सुरक्षित ऐसे बाजारों या अन्य क्षेत्रोंको न तो निर्धारित करेगी और न बन्द और इस खण्डके अन्तर्गत बनाये गये किसी भी उपनियमका तबतक कोई प्रभाव नहीं होगा और न वह तबतक लागू होगा जबतक कि उसके लिए गवर्नर-जनरलका अनुमोदन और सहमति प्राप्त न कर ली गई हो।
६७.(१) परिषद् अपने स्थापित किये हुए या अपने नियन्त्रणमें रहनेवाले किसी भी वतनी बस्ती या एशियाई बाजार या कस्बेमें तैंतीस वर्ष तक की अवधिके लिए गवर्नर-जनरल द्वारा अनुमोदित पद्धति और शर्तोंके अनुसार जमीनके टुकड़े पट्टेपर उठा सकेगा ।
<br>(२) ऐसा प्रत्येक पट्टा वैध होगा, चाहे उसकी लिखा-पढ़ी नाजिर-रजिस्ट्री के सामने न हुई हो और ऐसा
__________________________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५७
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५१९}}</noinclude>प्रत्येक पट्टा या उसका प्रत्यर्पण वैध होगा, यदि उसे गवर्नर-जनरल द्वारा निश्चित विनियमों के अनुसार परिषद् द्वारा रखी जानेवाली पंजी (रजिस्टर) में पंजीकृत किया गया हो ।<br>
ऐसे प्रत्येक पट्टे या उसके प्रत्यर्पणपर तबादिला-शुल्क या टिकट-शुल्कसे सम्बन्धित किसी भी कानूनके अन्तर्गत अदा किया जानेवाला शुल्क ऐसे विनियमों द्वारा संविहित ढंगसे अदा किया जायेगा और परिषद्स इस प्रकार अदा होनेवाले शुल्कका सारा ब्योरा वित्त-मंत्रीको देगी ।
{{c|'''सफाई, इत्यादि'''}}
७५. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उपनियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(१२) चायघरों, कॉफीघरों, जलपानगृहों, होटलों, भोजनालयों, भोजन और ठहरनेकी व्यवस्थावाले आवासों और सभी दुग्धविक्रेताओं, डेरियों, दूधकी दूकानों, गोशालाओं, नानबाईंकी दूकानों, मांसकी दूकानों, और सभी फेक्टरियों और स्थानोंको जहाँ, भोज्य तथा पेय पदार्थ विक्रय या उपयोगके लिए बनाये या तैयार किये या बेचे जाते हैं, परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए;<br>
(१३) काफिरोंके भोजनालयोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए:<br>
(१४) टेलेवालों और फेरीवालोंको परवाने देने और उनको विनियमित करनेके लिए; इस शर्तके साथ कि अपनी ही भूमिपर उगाई हुई केवल ताजी चीजोंको बेचनेवालोंको, ठेलेवालों या फेरीवालोंके लिए अपेक्षित परवाने नहीं लेने पड़ेंगे;<br>
(१५) सार्वजनिक या निजी स्थानोंपर कपड़े धोनेका नियमन करने या रोकने और धुलाई के कामके लिए व्यक्तियोंको परवाने देनेके लिए;
{{c|'''एशियाई चायघर'''<ref> सन् १९०५ में ही एक कानून पास करके सभी भारतीय होटल मालिकों के लिए परवाने लेना जरूरी बना दिया गया था; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ २९ और ८४-८५ खण्ड ६, पृष्ठ ३३८-३९ और ३४५-४६; खण्ड ७, पृष्ठ ९१-९२ और ३२९ ।
</ref>}}
८८. परिषद् समय-समय पर निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या इनमें से किसी भी एकके लिए उप- नियमोंकी रचना कर सकेगी या उनमें रद्दोबदल कर सकेगी;<br>
(६) एशियाई चायघरों या भोजनालयोंको विनियमित करने और उनको परवाने देनेके लिए ।
{{c|'''परवाने'''}}
९१. परिषद् नाटक-गृह, संगीत-भवन, सार्वजनिक भवन, नाचघर या आमोद-प्रमोदके किसी अन्य स्थान या मनुष्योंके उपयोगके लिए भोज्य या पेय वस्तुओंको बेचने, इस्तेमाल या तैयार करनेवाली दूकानों, या ठहरने तथा खानेकी व्यवस्थावाले किसी भी आवास या धुलाईका काम करनेवाली दुकानोंके लिए या फेरीवालों-ठेलेवालोंको इससे ठीक पहलेके खण्डमें उल्लिखित आधारों और निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी भी एक आधारपर परवाने देनेसे इनकार कर सकती है:
{{blockcenter|(क) कि प्रार्थी अच्छे चाल-चलनका सन्तोषप्रद प्रमाण पेश नहीं कर सका;<br>
(ख) जिसके लिए परवाना माँगा गया है उस स्थानमें या प्रार्थीके स्वामित्ववाले या उसके द्वारा अधिकृत उससे लगे हुए स्थानों में बहुधा बुरी चाल-चलनके लोगोंका आना-जाना रहता है;<br>
(ग) कि जिस स्थानके लिए परवाना माँगा गया है उसे मंजूर करनेसे पड़ोसके लोगोंको असुविधा या परेशानी होगी;<br>
(घ) कि ऐसा परवाना मंजूर करना लोक-हितके विरुद्ध होगा;}}
और परिषद् द्वारा परवाना देनेसे इनकार करनेके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी ।
_______________________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधारपर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेकी अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
{{Outdent|(क) ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;}}
{{Outdent|(ख) भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको कामपर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेकी शर्तें लगा सकेगी;}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्ते परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा। परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे ।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
{{Outdent|(क) परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;}}
{{Outdent|(ख) परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।}}
{{Outdent|(ग) ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर)जुर्माना करनेके लिए ।}}
______________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधारपर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेकी अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
{{Outdent|(क) ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;}}
{{Outdent|(ख) भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको कामपर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेकी शर्तें लगा सकेगी;}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्ते परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा। परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे।
<center>{{larger|'''ट्राम-गाड़ियाँ'''}}</center>
१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
{{Outdent|(क) परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;}}
{{Outdent|(ख) परिषद्की टाम गाड़ियोंके वतनियों और एशियाइयों द्वारा इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और वतनियों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों द्वारा ऐसी ट्राम-गाड़ियोंके इस्तेमालको निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेके लिए,<ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५ ।</ref>देखिए, खण्ड ५, पृष्ठ १९४-९५, २००-०१, २०२-०३, २१५, ३३२, ३४३ और ३५०-१ खण्ड ६, पृष्ठ ५११-१२; खण्ड ८, पृष्ठ २८७; और खण्ड ९, पृष्ठ ३१५।}}
{{Outdent|(ग) ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर)जुर्माना करनेके लिए।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}९२. परिषद् अपने उपनियमोंके अनुसार मंजूर किये गये उस परवानेके सम्बन्धमें, जिसके आधारपर मनुष्यों के उपयोगके लिए भोज्य तथा पेय वस्तुओंके निर्माण, तैयारी, विक्रय या उपभोगका व्यापार या व्यवसाय करनेकी अधिकार परवानाधारीको मिल जाता है,
{{Outdent|(क) ऐसी भोज्य तथा पेय वस्तुओंको तैयार करनेमें वतनी, एशियाई, या रंगदार मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध करने या प्रतिबन्धित करनेको शर्त लगा सकेगी;}}
{{Outdent|(ख) भोज्य तथा पेय वस्तुओंके विक्रयका दूकानोंमें सोलह वर्षसे कम अवस्थाकी लड़कियोंको कामपर रखना या ऐसी दूकानोंमें रातको आठ बजेके बाद स्त्रियोंसे काम कराना निषिद्ध या प्रतिबन्धित करनेकी शर्तें लगा सकेगी;}}
किन्तु शर्त यह रहेगी कि इस खण्डके अन्तर्गत परिषद् द्वारा लगाई शर्ते परवानेपर स्पष्ट रूपसे दर्ज की जाये और परवानाधारी उन शर्तोंसे युक्त परवानेके प्रपत्रकी एक दूसरी प्रतिपर हस्ताक्षर करेगा। परिषद् इस प्रकार पृष्ठांकित और हस्ताक्षरित दूसरी प्रतिको अपने पास रखेगी और किसी भी न्यायालय में उसे पेश किये जानेपर उसे उन लगाई गई शर्तोंका स्पष्टतः प्रमाण माना जायेगा ।
९३. इस अध्यादेशमें किसी बातके इसके विरुद्ध होते हुए भी, परिषद् रिक्शा खींचनेवालों, या सड़क-पर चलनेवाली यान्त्रिक गाड़ियों, ट्राम-गाड़ियों, बसों, मोटरगाड़ियों, घोडागाड़ियों, ट्रॉलियों, या अन्य गाड़ियोंके चालकोंको अपने विवेकसे परवाने मंजूर करनेसे इनकार कर सकती है ।
<center>{{larger|'''मतदाता सूची'''<ref>इस खण्ड में नगरपालिकाके चुनाव में भारतीयोंके मताधिकारका जिक्र न करके उनको इस अधिकारसे वंचित किया गया था। ट्रान्सवालके भारतीयोंको इस अधिकारसे १९०३ में ही वंचित कर दिया गया था; खण्ड ३, पृष्ठ ३५६-५७ खण्ड ४, पृष्ठ २०५-०६; और खण्ड ९, १४ २९०-३०० ।</ref>}}</center>
११४. ऐसे प्रत्येक गोरे स्त्री या पुरुषको, जो २१ वर्ष या इससे अधिक अवस्थाका ब्रिटिश नागरिक हो और जो नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी इमारतका स्वामी हो और उसमें निवास करता हो, जिससे प्राप्त हो सकनेवाली कुल वार्षिक आय १२ पौंड और इससे अधिक है या नगरपालिकाकी सीमा में स्थित किसी ऐसी अचल सम्पत्तिका स्वामी हो जो सम्पत्ति कर या इमारत के मूल्य निर्धारण के आधारपर कर अदायगीके यो य हो, नगरपालिकाकी मतदाता सूची में सम्मिलित किये जानेका अधिकारी होगा, परन्तु पति और पत्नी दोनों एक ही सम्पत्तिके आधारपर मतादाता सूचीमें सम्मिलित नहीं किये जायेंगे।
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१७१. परिषद् समय-समयपर निम्नलिखित सभी या इनमें से किसी एक प्रयोजनके लिए उप-नियमोंकी रचना या उसमें रद्दोबदल कर सकेगी :
{{Outdent|(क) परिषद् द्वारा स्थापित, अर्जित, या संचालित किसी भी ट्राम-पथके इस्तेमालका नियमन करनेके लिए और परिषद्की टामगाड़ियों के इस्तेमालके सम्बन्धमें रद्दोबदल करनेके लिए;}}
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{{Outdent|(ग) ट्राम-गाड़ियों में काम करनेके लिए परिषद् द्वारा नियुक्त व्यक्तियोंकी सेवा की शर्तों और कर्तव्यका नियमन करने और ऐसे व्यक्तियोंपर लापरवाही, कर्तव्य-चूक, या ट्रामगाड़ियोंके सही और उचित संचालनपर बुरा प्रभाव डालनेवाले अन्य अपराधोंके लिए (वेतन रोक कर)जुर्माना करनेके लिए।}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५५९
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२१}}</noinclude>ऐसा कोई भी उप-नियम इस अध्यादेश या नगरपालिकाकी सीमामें लागू किसी भी अन्य कानूनकी व्यवस्थाओं के साथ असंगत, उनके विरुद्ध या उनके प्रतिकूल नहीं होगा ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११
<center>{{x-larger|'''प्रार्थनापत्र : ट्रान्सवाल प्रान्तीय परिषद्को'''}}</center>
{{c|'''ख'''}}
{{right|जोहानिसबर्ग<br>जून ५,१९११}}
{{left|माननीय प्रशासक<br>तथा सदस्यगण<br>प्रान्तीय परिषद् <br> ट्रान्सवाल}}
ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्षकी हैसियतसे श्री अ० मु० काछलियाका प्रार्थनापत्र विनम्र निवेदन है कि
१. प्रार्थीने १७ मईके सरकारी सूचनापत्र में प्रकाशित स्थानीय शासन अध्यादेश १९११<ref>१. ट्रान्सवाल सरकारने १९०८ में लगभग इसी प्रकारके पंजीयनको एक व्यवस्था करनेकी कोशिश की थी लेकिन बादमें उसे त्याग देना पड़ा था; देखिए खण्ड ८, पृष्ठ २४३, २४८, २८६-८७, ३०९-१० ।</ref> का प्रारूप पढ़ लिया है। प्रार्थीको बड़ी गहरी आशंका है कि उसकी कई धाराएँ यहाँ वैधरूपसे रहनेवाले ब्रिटिश भारतीय निवासियोंपर नई-नई गम्भीर निर्योग्यताएँ थोप देंगी ।
२. प्रार्थी देखता है कि अध्यादेशका खण्ड ६६ और ६७ परिषद्को केवल एशियाइयोंके लिए बाजारों या अन्य क्षेत्रोंका अलगसे निर्धारण करने, उन्हें ठीक हालत में रखने तथा चलाने और परिषद् द्वारा समय-समयपर बनाये जानेवाले उप-नियमोंके अनुसार उनका नियन्त्रण करनेका अधिकार प्रदान करता है। और खण्ड ६६ के उपखण्ड (३) के अनुसार परिषद् (गवर्नर-जनरलके अनुमोदन और उसकी सहमति से) ऐसे किसी स्थानपर जहाँ सबकी नजर पड़ सके अपनी मंशाके बारेमें सूचना पत्र लगवाकर ऐसे बाजारोंको बन्द कर सकती है। इसके सम्बन्धमें प्रार्थी कहना चाहता है कि जातीय भेदभावके आधारपर अमुक लोगोंको अलग बसानेके सामान्य प्रश्नको न भी उठाया जाये, जिसके बारेमें आपके प्रार्थीको सिद्धान्तः आपत्ति है, तो भी परिषद्को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनको, ब्रिटिश भारतीयोंके, विशेषकर ऐसे बाजारोंमें अपना कारोबार जमा लेनेवाले दूकानदारोंके खिलाफ, बड़े ही हानिकारक ढंगसे प्रयुक्त किया जा सकता है। नगरोंका आकार बढ़नेपर लगभग हर बार पहलेके "बाजारोंको" बन्द कर दिया गया है और उसके फलस्वरूप दूकानदारोंको नगरके केन्द्रों और मार्गोंसे अधिक दूर-दूर स्थित दूसरे बाजारमें भेज दिया गया है। अवधिके बारेमें इस तरहकी अनिश्चितता व्यवसाय और खुशहालीके प्रतिकूल पड़ती है और ऐसे "बाजारों" में दूकान बनाने और धन्धा करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भीषण कठिनाई उत्पन्न कर देती है ।
३. खण्ड ७५ (१२), (१३) और (१४) और खण्ड ८८ (६) का एशियाइयोंके हितोंसे विशेष सम्बन्ध है। इन खण्डों के अन्तर्गत परिषदें भोजनालयों, मांसकी दूकानों, एशियाइयों और काफिरोंके भोजनालयों, ठेलेवालों, फेरीवालों, धोबियों और धुलाईघरोंका तथा उन्हें दिये जानेवाले परवानोंका नियन्त्रण करती रहेगी; और प्रार्थी देखता है कि विधानमें उल्लिखित दूसरे व्यवसायोंसे सम्बन्धित परवानोंके परिषद्
____________________<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>द्वारा नामंजूर कर दिये जानेपर तो रेजीडेंट मजिस्ट्रेटकी यहाँ अपील की जा सकती है, लेकिन खण्ड ९१ में स्पष्ट व्यवस्था है कि “उक्त परवानोंमें से किसीके परिषद द्वारा नामंजूर हो जानेपर कोई अपील नहीं की जा सकेगी।" संघके जिन प्रान्तों में परवाना निकायों या परिषदोंको इसी प्रकारकी अनियन्त्रित सत्ता प्रदान की गई है या की गई थी, वहाँके ब्रिटिश भारतीयोंके अनुभवको देखते हुए, प्रार्थी मनमानी नामंजूरीके विरुद्ध उचित रूपसे संगठित न्यायिक न्यायाधिकरण (जुडीशियल ट्रिब्युनल) में अपील करनेके अधिकारसे स्पष्टतः वंचित किये जानेका बड़ी उत्कटतासे विरोध करता है। साथ ही, मैं यह भी कह दूँ कि ऐसी व्यवस्था प्रजाकी स्वतंत्रतापर कुठाराघात करती है।
४. साथ ही प्रार्थी इस महती सभाका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करता है कि चीनी गिरमिटिया मजदूरोंकी वापसीके बाद एशियाई चायघर या भोजनालय रह ही नहीं गये हैं इसलिए अब उनको परवानोंके द्वारा नियन्त्रित करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रान्तमें रहनेवाले छोटे-से एशियाई समाजकी आवश्यकताएँ खानगी भोजनालयोंसे पूरी हो जाती हैं।
५. खण्ड ९२ के आधारपर एशियाई मजदूरोंको कामपर रखना निषिद्ध किया जा सकता है और उसके कारण उपयोगी उद्योगों में काम करनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके लिए भारी कठिनाई पैदा हो जायेगी और कुछको तो अपनी जीविकासे भी हाथ धोना पड़ सकता है। प्रार्थीका विनम्र मत है कि इस खण्ड में एशियाइयोंके साथ जो भेदभाव किया गया है उसे हटा दिया जाना चाहिए।
६. आगे प्रार्थीका निवेदन है कि चालकोंके परवाने देने या न देनेकी परिषदको स्वविवेकके आधारपर जो शक्ति प्रदान की गई है (खण्ड ९३), उसके निर्णयके विरुद्ध न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करनेका अधिकार दिया जाना चाहिए।
७. इस प्रान्तमें मौजूद एशियाइयोंके बारेमें दुर्भाग्यपूर्ण पूर्वग्रहको देखते हुए हमारे समाजने विवशतावश राजनीतिक मताधिकारकी माँग तो नहीं की परन्तु खण्ड ११४ ने हमारे समाजके लोगोंको नगरपालिकाकी मतदाता सूचीसे अलग रखकर उनपर जो एक स्पष्ट निर्योग्यता थोप दी है उससे हमारे मनको बड़ी गहरी चोट पहुँची है। यह निर्योग्यता केवल उन गोरे लोगोंपर लागू होती है जो गम्भीर किस्म के अपराधोंके दोषी पाये गये हों।
प्रार्थी इस महती सभाको स्मरण दिलाना चाहता है कि भारतीय लोग करके रूपमें नगरपालिकाको काफी बड़ी राशि देते हैं और जैसा कि आँकड़ोंसे सहज ही सिद्ध हो जाता है, वे कानूनका सबसे अधिक पालन करनेवालोंमें से हैं। इसलिए प्रार्थीको इसपर बड़ी आपत्ति है कि उनका शुमार सजायाफ्ता गोरोंके साथ किया गया है।
८. खण्ड १७१ (ख) की व्यवस्थाके अनुसार “वतनियों, एशियाइयों और सभ्य आचार या उचित वेष-भूषासे हीन सभी व्यक्तियों" के लिए ट्रामगाड़ियों का इस्तेमाल निषिद्ध या प्रतिबन्धित किया जा सकता है। एशियाई समाजके लिए यह प्रतिबन्ध अपमानपूर्ण है और असुविधाजनक भी, और प्रार्थीके विनम्र मतसे यह सर्वथा अनावश्यक है।
९. अन्तमें, प्रार्थी बड़ी उत्कटतासे उपरोक्त कष्टोंकी ओर इस महती सभाका ध्यान आकर्षित करता है कि ऊपर बताये अनुसार हमारी सहायता करनेके लिए अध्यादेशके प्रारूपका संशोधन किया जाये। इस कृपा और न्यायपूर्ण कार्यके लिए प्रार्थी अपना कर्तव्य मानकर दुआ करता रहेगा ।
{{right|अध्यक्ष,<br>अ० मु० काछलिया<br>ब्रिटिश भारतीय संघ}}
[ अंग्रेजीसे ]
'''इंडियन ओपिनियन,''' १०-६-१९११; और कलोनियल ऑफिस रेकर्डस (सी० ओ० ५५२/२२ ) से भी ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>ट्रान्सवालके सर्वोच्च न्यायालयने १९०३ में निर्णय दिया था कि निर्दिष्ट बस्तियोंसे ही बाहर व्यापार करनेवाले भारतीयोंको भी व्यापारिक परवाने दिये जाने चाहिए, परन्तु भारतीयोंको निर्दिष्ट बस्तियोंमें ही निवास और व्यापार करनेपर विवश करनेके उद्देश्यसे पास किया गया सबसे पहला कानून था फ्रीडडॉर्प बाड़ा अधिनियम। वस्ती अधिनियम और स्वर्ण कानूनने तो भारतीयोंकी बड़ीसे-बड़ी आशंकाको भी सही सिद्ध कर दिया है। हालाँकि १८८५ के कानून ३ की एक व्यवस्थाके अनुसार अचल सम्पत्तिका स्वामित्व भारतीयोंके नामपर दर्ज नहीं हो सकता, किन्तु ट्रान्सवालके न्यायालयोंने यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच हुए ऐसे करारोंको, जिनसे भारतीयोंको उसका न्यायिक स्वामित्व प्राप्त होता है, मान्यता दी है, जैसा कि सैयद इस्माइल तथा एक अन्य '''बनाम''' एस० जैकन्स एन० ओ० के मुकदमेमें हुआ था । परन्तु इन नये कानूनों का परिणाम यह होगा कि ऐसी अचल सम्पत्तिके पंजीयित यूरोपीय स्वामियों और न्याय्य भारतीय स्वामियोंको दण्डित किया जायेगा। मेरे जैसे यूरोपीय स्वामियोंपर काफी बड़ा जुर्माना इसलिए किया जा सकेगा कि उन्होंने भारतीय रंगदार लोगोंको उनकी अपनी जगहमें निवास करनेकी अनुमति दी; और भारतीय स्वामियोंकी सारी सम्पत्तिको, जो उनकी अपनी ही है, जब्त किया जा सकेगा । इन विविध कानूनों के फलस्वरूप भारतीयोंके विनियोजित धनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी और भारतीय व्यापारियोंकी अनिवार्यतः ऐसी पृथक बस्तियोंमें जाकर रहना पड़ेगा जहाँ वे कोई कारोबार नहीं कर सकते और जहाँ अपने मौजूदा ग्राहकोंके साथ उनका कोई भी सम्बन्ध बना नहीं रह सकता। उनमें से सैकड़ों बिल्कुल बरबाद हो जायेंगे और बिना अपने किसी अपराधके इतनी क्षति उठानेके कारण उनको आफ्रिका छोड़नेपर विवश होना पड़ेगा। इस प्रकार बरबाद होनेवालोंमें से कई ऐसे होंगे जिन्होंने सत्याग्रहियोंके साथ सहानुभूति तो रखी है और रुपये पैसेसे उनकी सहायता भी की है, पर स्वयं कभी संघर्ष में सक्रिय रूपसे भाग नहीं लिया । परन्तु यदि ये कानून लागू कर दिये गये और उनके लागू कर दिये जानेकी आशंका सर्वथा सकारण है, तो मुझे कोई सन्देह नहीं है, कि अभी जिस संघर्षको समाप्त मानकर सन्तोष किया जा रहा है, उससे भी कहीं अधिक कटु संघर्ष शुरू हो जायेगा; क्योंकि उन विनाशकारी प्रयत्नोंके विरोधमें समाजके सभी लोगोंके कमर कसकर एक हो जानेकी पूरी सम्भावना है। आजकल जिस नीतिपर अमल किया जा रहा है, वह केवल परेशान करनेकी नीति नहीं है, इसका एक जाना समझा हुआ उद्देश्य है और वह यह कि जिन वैध अधिवासी भारतीयोंको किसी और तरीकेसे नहीं हटाया जा सकता, उनकी स्थिति बिलकुल असहनीय बनाकर उन्हें देश छोड़नेपर विवश कर दिया जाये और देखने में यही लगे कि वे अपनी इच्छासे देश छोड़ कर जा रहे हैं।
४. ये बातें केप और नेटालके भारतीयोंपर भी काफी हद तक लागू होती हैं। केपके प्रवासी कानूनका उपयोग निवासी भारतीयोंकी पहलेसे घटती जा रही संख्याको और घटानेके लिए किया गया है। अभी हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें अनुपस्थितिके लिए मंजूर अवधिसे दो-तीन दिन भी ज्यादा अनुपस्थित हो जानेपर प्रान्तके काफी पुराने निवासी भारतीयोंको प्रवेश नहीं दिया गया; उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जिनका कारोबार वहाँ अभीतक फैला हुआ है। नेटाल्के कानून में अधिवासकी परिभाषा है, किन्तु केपके कानूनमें अधिवासकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और उसका अमल जिस प्रकार किया जा रहा है, उससे लोगोंको लगातार कष्ट होता रहता है। सच तो यह है कि इन दोनों प्रान्तोंके भारतीयोंका ख्याल है कि प्रवास-सम्बन्धी प्रशासनका रवैया उनके प्रति सबसे अधिक कठोर और असहानुभूतिपूर्ण है, और उसके अधिकारी यह मान कर चलते हैं कि वहाँ पूर्व अधिवासी भारतीयको किसी भी बहाने पुनःप्रवेश न करने देना ही उनका कर्तव्य है । प्रवासी अधिकारी बहुधा बड़े मनमाने ढंगसे काम करते हैं मन्त्री श्री हरकोर्ट १४ तारीखके तारोंको देखकर स्वयं ही निष्कर्ष निकाल लेंगे कि ये अधिकारी बहुधा न्यायालयोंके आदेशोंका अपमान और उल्लंघन भी करते हैं। परन्तु जिन भारतीयोंको उनका शिकार बनना पड़ता है उनमें से हरएककी सामर्थ्य तो इतनी नहीं होती कि वह प्रान्तीय न्यायालयोंकी शरण ले सके;<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||डॉ० म्यूरिसनका पत्र|२७९}}</noinclude>भी इन कागजातकी जाँच करेंगे। कागजातके मालिकोंने जिन प्रमाणोंके बलपर कागजात प्राप्त किये, श्री कजिन्स उनको भी पुनः परखनेका आग्रह कर रहे हैं । दूसरे शब्दोंमें, वे प्राप्त प्रमाणपत्रोंको ही मानने से इनकार करते हैं । यह ठीक वही बात है जो ट्रान्सवालकी सरकारने करनी चाही थी और फिर उसे मुँहकी खानी पड़ी थी ।<ref>सन् १९०३ में लॉर्ड मिलनरने यह माँग की थी कि भारतीय लोग युद्ध-पूर्व कालमें टान्सवालमें अपने निवास तथा अधिवासके अधिकारके प्रमाणके रूपमें बोअर सरकारको दिये तीन पौंडकी रसीद पेश करें। लॉर्ड मिलनरके अनुरोधपर अधिकांश भारतीयोंने ये रसीदें दे दीं और उनके बदले शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत दिये जानेवाले अनुमतिपत्र ले लिये। लॉर्ड मिलनरने इस प्रसंगमें यह आश्वासन दिया था कि "जहाँ एक बार उनका नाम पंजीयन पुस्तक (रजिस्टर) पर आ गया कि अधिवासीके रूपमें उनकी स्थिति कायम हो जायेगी और फिर दुबारा पंजीयन करानेकी जरूरत नहीं होगी और न नया अनुमतिपत्र ही लेना पड़ेगा”; देखिए खण्ड ३, पृष्ठ ३२७-२८ और ३३३ तथा खण्ड ६, पृष्ठ ५०-५१ । सन् १९०५ में एशियाई कानून संशोधन अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीयोंसे पुनः यह कहा गया कि वे सिद्ध करें कि उनके पास जो शां० र० अध्या० अनुमतिपत्र या तीन पौंडी डच प्रमाणपत्र हैं वे असली हैं; देखिए खण्ड ५, पृष्ठ ४२२-२३ ।</ref> वही हाल श्री कज़िन्सका भी होगा । जो यहाँ अधिवासके प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुके हैं वे निश्चय ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि उनके कागजात निरर्थक समझे जायें । यदि वे प्रमाणपत्र उन्हींके हैं तो वे उनके बलपर इस देशमें आनेका दावा करेंगे।
यह मामला बिलकुल ऐसा है जिसे कांग्रेसको अपने हाथमें लेना चाहिए और इसमें पल-भरका विलम्ब नहीं करना चाहिए । अब स्थिति असह्य होती जा रही है । हानि केवल गरीब लोगोंको उठानी पड़ रही है। कांग्रेसका अस्तित्व तभी सफल सिद्ध होगा जब वह गरीबोंकी पुकारकी अनसुनी न होने दे। यदि एक भी ईमानदार परन्तु गरीब भारतीय, निवासका अधिकार होते हुए भी, नेटालसे लौटा दिया गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेसपर होगी ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२३८. डॉ० म्यूरिसनका पत्र'''}}</center>
हमने गत सप्ताह इन स्तम्भोंमें डॉ० म्यूरिसनके नाम अपने जिस पत्रका<ref>गांधीजी द्वारा डॉ० म्यूरिसनको लिखा यह पत्र तथा इस मामलेसे सम्बन्धित अन्य पत्र भी उपलब्ध नहीं हैं।</ref> जिक्र किया था उसके उत्तरमें<ref>डर्बन नगरके स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारी डॉ० म्यूरिसनने तपेदिक आयोगके सामने गवाही देते हुए कहा था कि भारतीयोंको झूठ बोलनेकी आदत है । इसपर गांधीजीने २८ जून, १९१२ को डॉ० म्यूरिसनको एक पत्र लिखा, जिसका उत्तर उन्होंने १० जुलाई, १९१२ को भेजा । उत्तरमें डॉ० म्यूरिसनने अपने आरोपका बचाव किया था। उनका खयाल था कि “सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाईसे सम्बन्धित मामलों में इस जातिसे कोई सच्चा उत्तर प्राप्त करना असम्भव है । " '''इंडियन ओपिनियन,''' २०-७-१९१२ देखिए "डॉ० म्यूरिसनका आरोप, पृष्ठ २७३-७४ ।</ref> प्राप्त उनका पत्र हम अन्यत्र प्रकाशित कर रहे हैं। डॉ०<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''<ref>इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)</ref>}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृह-मन्त्री<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,
प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख का पत्र <ref>देखिए पादटिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।</ref>मिला। उसके लिए धन्यवाद।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौतेके अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलनेपर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''<ref>देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।</ref>}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं--यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ?--वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
h26m2se0om60z62mh87euf03hnbd2hl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तक काफी रुकना पड़ता है । अनिश्चित समय तक बाहर सड़कपर खड़े रहना, और कुछ न सही, बहुत थका देनवाला तो होता ही है। वस्तुतः जिन लोगोंको वहाँ खड़े रहकर प्रतीक्षा करनी पड़ी है, उन्होंने अक्सर ब्रिटिश भारतीय संघसे इसकी शिकायत की है। फिर, हवा, धूप और वर्षासे बचनेका भी कोई प्रबन्ध नहीं है । जब प्रतीक्षा करनेवालोंकी संख्या बहुत ज्यादा होती है तब तो यह समझना भी उनके लिए कठिन होता है कि अब सड़कपर खड़े हों अथवा पटरीपर; क्योंकि तब वे जहाँ-कहीं भी खड़े होंगे, रास्ता रुकेगा । सार्वजनिक कार्यालयोंसे जिस जनताका साबका पड़ता है, एशियाई भी चूंकि उसीका अंश हैं इसलिए हमारी नम्र रायमें अन्य सार्वजनिक कार्यालयोंकी भाँति आपके कार्यालय में भी उनके लिए ठीक स्थानका प्रबन्ध होना चाहिए जिसका उन्हें अधिकार है ।<ref>श्री चैमनेने इस पत्रके उत्तर में २६ जुलाईके अपने पत्रमें लिखा :"... मेरे कार्यालय में आनेवाले एशियाइयोंकी सुविधाके लिए कोई विशेष स्थान उपलब्ध नहीं है, और न ही इस कार्य के लिए हमें कोई पैसा मिल सकता है जिससे इस समय विशेष स्थानका प्रबन्ध किया जा सके। आपके पत्रके अन्तिम वाक्यके बारेमें मुझे यह कहना है कि मैंने ठीक पता चला लिया है कि ऐसे बहुत-से कार्यालय है जहाँ साधारण जनताको--जिसमें यूरोपीय भी शामिल हैं- जाना पड़ता है; किन्तु जहाँ विशेष स्थानको कोई सुविधा नहीं है ।" '''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२ ।</ref>
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४१. पत्र : गृह-सचिवको'''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
१९ तारीखका आपका तार और पत्र प्राप्त हुए ।<ref>देखिए " पत्र : गृह-मन्त्रीको ", पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २७८ ।</ref> तदर्थ धन्यवाद !
इस वर्षके छ: शिक्षित भारतीय प्रवेशाथियोंके नामोंकी सूची में यथासमय भेजूंगा ।<ref>यदि गांधीजीने सूची भेजी हो तो वह उपलब्ध नहीं है ।</ref>
{{right|आपका<br>मो० क० गांधी}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६८) तथा २७-७-१९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' से ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>
<center>{{x-larger|'''२४२. पत्र : गृह-सचिवको<ref>एशियाई पंजीयक माउन्ट फोर्ड चैमनेने अगस्त १ को इसका जवाब देते हुए लिखा “...मेरी समझके मुताबिक समझौतेका मंशा यह था कि प्रतिवर्ष छः शिक्षित एशियाइयोंको उनके ऐसे देशभाइयों के हित और लाभकी दृष्टिसे प्रवेश दिया जाये जिन्हें उन्हींकी तरह शिक्षा नहीं मिल पाई है। मेरी रायमें उसका यह मंशा कदापि नहीं था कि उक्त छः भारतीयोंको उनसे अपने स्वार्थ साधनके लिए प्रवेश दिया जाये । कृपया अपने विचारोंसे अवगत करें ।"--(एस० एन० ५८६२)</ref> '''}}</center>
{{right|जुलाई २२, १९१२}}
{{left|गृह-सचिव<br>प्रिटोरिया<br>महोदय,}}
जिन ब्रिटिश भारतीयोंको पिछले वर्ष समझौते के अन्तर्गत प्रवेश मिला था,उनमें से श्री आर० एम० सोढा एक हैं। जैसा कि मैंने गत वर्ष निवेदन किया था,श्री सोढा जीविकोपार्जनके लिए ट्रान्सवालमें कोई रोजगार करना चाहते हैं, परन्तु चूंकि खयाल यह था कि पिछले अधिवेशन में कानून बन ही जायेगा, इसलिए समाजने श्री सोढाके गुजारेकी व्यवस्था कर दी । परन्तु वे, स्वाभाविक है, बेकार नहीं बैठना चाहते, और व्यापारिक परवाना लेनेके लिए चिन्तित हैं। मैं समझता हूँ कि उन्हें जो अनुमतिपत्र दिया गया है, उसके आधारपर उन्हें परवाना नहीं मिल सकता । इसलिए यदि सोढा द्वारा पंजीयन प्रमाणपत्र पेश किये बिना, सरकार राजस्व आदाताको एक परवाना जारी करनेका अधिकार दे दे तो बड़ी कृपा हो ।
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६९) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४३. समझौता चलता रहेगा'''}}</center>
संघ-सरकार और श्री गांधीमें जो पत्र-व्यवहार<ref>जनवरी २९ और जुलाई १७, १९१२ के बीचमें </ref> हुआ है वह पढ़ने में मनोरंजक है। इसके अनुसार गत वर्षका<ref>२० मई १९११ का ।</ref> अस्थायी समझौता तबतक चलता रहेगा जबतक कि इस सम्बन्धमें कोई सन्तोषप्रद कानून, जिसे सरकार संसदके अगले अधिवेशनमें दुबारा पेश करनेकी बात सोच रही है, पास नहीं हो जाता। इस बीच छ: शिक्षित ब्रिटिश भारतीयोंको ट्रान्सवालमें इस प्रकार आने दिया जायेगा मानो यह कानून पहले ही स्वीकृत हो चुका हो ।<ref>देखिए " पत्र : गृह मन्त्रीको", पृष्ठ २७८ ।</ref> यह सब अच्छा है । इस पत्र-व्यवहारमें विवादास्पद प्रश्नोंके कारण पुनः सत्याग्रह छिड़ने से बचनेका यत्न किया गया है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}परन्तु लॉर्ड ऍम्टहिलके, जो हमारे पक्षका समर्थन अनथक उत्साहसे करते रहे हैं, आक्षेपोंका उत्तर अबतक नहीं दिया गया है।<ref>लॉर्ड सभामें अस्थायी समझौतेके अमलके विषय में लॉर्ड ऍम्टहिलके १७ जुलाई, १९१२ को किये गये प्रश्नके लिए देखिए परिशिष्ट १८ ।</ref> उनका प्रधान आक्षेप यह है कि समझौते के शब्दोंका तो पालन किया जा रहा है, परन्तु उसकी भावनाको भंग कर दिया गया है। भावना यह है--और जनरल बोथाकी सार्वजनिक घोषणाएँ<ref>सन् १९०९ में बोथाने लॉर्ड कर्ज़नको आश्वासन दिया था कि वे ब्रिटिश भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार करेंगे; देखिए खण्ड ९, पृष्ठ १७४ । २३ मई १९११ को अस्थायी समझौतेपर अपने विचार प्रकट करते हुए जनरल बोयाने कहा था कि समझौता बहुत उपयुक्त समयपर हुआ। उन्होंने यह चेतावनी तो दी थी कि दक्षिण आफ्रिकामें केवल उन्हीं भारतीयोंको प्रवेश करने दिया जायेगा, जिन्हें समझौते के अनुसार ऐसा करनेका अधिकार होगा; किन्तु साथ ही उन्होंने यह वचन भी दिया था कि भविष्य में भारतीय क जीवनकी परिस्थितियोंको दक्षिण आफ्रिकामें जितना सा बनाया जा सकता है, उतना सा बनानेकी पूरी कोशिश की जायेगी । सच तो यह है कि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनके मनमें भारतीयों के प्रति कोई दुर्भाव नहीं है । लन्दन में शादी परिषद् में भाग लेनेके बाद, २६ सितम्बर, १९१२ को रीट फॉटोनमें बोलते हुए उन्होंने कहा था कि एशियाई सवालको हल करनेकी कोशिश में जनरल स्मट्सने इतना परिश्रम किया कि वे सूख कर काँटा हो गये ।</ref> भी यही हैं--कि जो भारतीय दक्षिण आफ्रिकामें बस चुके हैं उन्हें शान्तिपूर्वक रहने दिया जायेगा । परन्तु जबतक भारतके कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त पत्नियोंको यहाँ से लौटाया जाता रहेगा, जबतक स्वर्ण-अधिनियम<ref>देखिए “कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५ और परिशिष्ट २१ ।</ref> और कस्बा-कानूनका<ref>स्वर्ण-अधिनियम या कस्बा-कानूनके द्वारा उन भारतीयोंको बस्तियोंमें जाकर बसनेपर मजबूर किया जा रहा था, जो "घोषित क्षेत्रों" तथा अन्य ऐसे क्षेत्रोंमें रह रहे थे, जहाँ उन्होंने अपना खासा कारोबार बना लिया था । जो स्थान इससे प्रत्यक्ष रूपसे प्रभावित होते थे उनमें क्लार्क्सडॉर्प (“कुमारी मॉड पोलकके नाम लिखे पत्रका अंश ", पृष्ठ ४-५) क्रूगर्सडॉप (“तूफान उमड़ रहा है", पृ४ १३५) और रूडीपूर्ट तथा जस्टिन ("जर्मिस्टनके भारतीय", पृष्ठ १५२-५३ और २४४) आदि शामिल थे ।</ref> प्रयोग इस प्रकार किया जाता रहेगा कि भारतीय व्यापारी लगभग तबाह हो जायें, जबतक पुराने निवासियोंके बसनेके लिए पहले जो वस्तियाँ निर्दिष्ट की गई थीं उन्हें उनसे निकलनेपर विवश किया जाता रहेगा, जबतक निवासके प्रमाणपत्रोंकी उपेक्षा की जाती रहेगी, जबतक विवाह अथवा अधिवास प्रमाणित करने के लिए असम्भव प्रमाणोंकी माँग की जाती रहेगी और जबतक परवाना कानूनोंके अत्याचारपूर्ण अमलके द्वारा व्यापार करना प्रायः असम्भव किया जाता रहेगा, तबतक शान्ति नहीं हो सकेगी ।<ref>भारतीयों के विरोध के परिणाम स्वरूप सन् १९११ और १९१२ के संघ प्रवासी विधेयक में जनरल स्मट्स द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनोंसे सहमत होते हुए गांधीजीने कहा था कि अपनी दूसरी शिकायतों (जिनका खासा ब्योरा इस लेख में मिल जाता है) को लेकर भारतीय भविष्य में संघर्ष कर सकते हैं; देखिए "तार : गृह-मन्त्रीको", पृष्ठ २२४-२५ और "आखिरकार !" पृष्ठ ९१-९२ ।</ref>
:[अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''२४४. जमिस्टनके भारतीय'''}}</center></noinclude>{{gap}}प्रत्यक्ष है कि जस्टिनकी नगरपालिका वहाँकी वस्तीमें बसे हुए भारतीयोंको बरबाद करनेमें सफल हो गई है । काला सिंह '''बनाम''' नगरपालिकाके मुकदमेके बाद, नगरपालिका भारतीयोंकी अनेक इमारतें गिरा चुकी है; और अब ऐसे कई भारतीयोंको, जिनपर बस्ती में व्यापार करनेका सन्देह है, नीचे लिखा हुआ अपने ढंगका निराला नोटिस जारी किया गया है :
'''मालूम हुआ है कि आप जॉर्ज टाउन बस्तीके बाड़े में स्थित दूकानपर परचूनकी चीजें बेचते हैं। अब मुझे हिदायत हुई है कि इस शिकायतकी पुष्टिके सबूत इकट्ठे करूँ । आपको [ जुर्म करते हुए ] पकड़ने की कोशिश की जायेगी और यदि वह सफल हो गई तो क्या परिणाम होगा, इसका आपको पता चल जायेगा ।'''
परिणाम उनकी इमारतोंकी जब्ती ही समझिए। और इस प्रकार नगरपालिका उम्मीद कर रही है कि वह भारतीयोंको धीरे-धीरे भूखों मरनेपर मजबूर करके उन घूरोंपर जा बसनेपर लाचार कर देगी जो उसने नई बस्ती बसाने के लिए चुन रखे हैं । १८८५ का कानून ३ भारतीयोंको बस्तियोंमें व्यापार करनेका विशेष रूपसे अधिकार देता है, परन्तु जर्मिस्टनकी नगरपालिका अब इसे भी सफलता के साथ खत्म किये दे रही है ।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन, ''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४५. बॉक्सबर्गका मुकदमा<ref>आमद मूसा भावात हाइडेलबर्गके एक जाने-माने व्यापारी थे । सत्याग्रहीके रूपमें उन्होंने बड़ी आर्थिक क्षति उठाई थी और कैद भी भोगी थी । ६ नवम्बर, १९११ को उन्होंने बॉक्सबर्ग में श्री रिचके नाम दर्ज अहाते में एक दूकान खोली । यूरोपीयोंने इसे अपने व्यापारके लिए खतरा समझा और इस बातको लेकर भारी तूफान खड़ा कर दिया । '''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस''' तथा '''ट्रान्सवाल लीडर'''--जैसे पत्र उनकी वकालत करनेको आगे आये और नगर परिषद् ने भी स्वभावतः उनका ही पक्ष लिया। सरकारपर जबरदस्त दबाव डाला गया और निदान उसने १२ जनवरी, १९१२ को श्री रिचके नाम नोटिस जारी किया कि वे २१ अगस्त, १९११ का ताजका अनुदान, जिसके अन्तर्गत उन्हें बाड़ोंपर निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) दिया गया था, वापस कर दें; क्योंकि उन्होंने एक रंगदार व्यक्तिको बाड़े में रहने की अनुमति देकर उस अनुदानकी शर्तें तोड़ डाली हैं । सरकारकी अर्जीपर १२ फरवरी, १९१२ को सर्वोच्च न्यायालय की ट्रान्सवाल शाखाने श्री रिच और श्री भायातके नाम समन्स जारी किये और ७ जूनको मुकदमेकी सुनवाई हुई ।'''इंडियन ओपिनियनके''' ४-११-१९११ से लेकर १३-७-१९१२ तकके अंकोंके आधारपर।</ref> '''}}</center>
श्री भायातके मुकदमेके फैसलेका<ref>न्यायाधीश मैसनने निर्णय दिया कि श्री रिच उन शर्तोंसे ( अर्थात्, कस्बा कानून और स्वर्ण-अधिनियमकी सम्बन्धित धाराओंसे ) बँधे हुए हैं, जिनपर उन्हें ताजकी जमीनका स्वामित्व हस्तान्तरित</ref> फल यह निकला है कि स्वर्ण-क्षेत्र में रहनेवाले ब्रिटिश भारतीयोंके कारोबारका मूल्य चार टके भी नहीं रहा । 'ईस्ट रैंड एक्सप्रेस' ने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
ar40z00w1mxdaus7iqsxiacp3g4n5np
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२२
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो अन्य नगरपालिकाओंको पहलेसे ही यह सलाह दे रखी है कि वे भी बॉक्सबर्गकी नगरपालिकाके जैसा कदम उठायें और सरकारको ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेपर विवश कर दें । निश्चय ही अब सरकार के लिए स्वर्ण-क्षेत्रोंमें ब्रिटिश भारतीय व्यापारियोंके कब्जे की जमीन के सम्बन्ध में मुकदमा दायर करनेका रास्ता साफ है । इस कारण सर्वाधिक महत्वकी बात यह है कि श्री भायातका मुकदमा अन्ततक लड़ा जाये । संघ-सरकारने साम्राज्य सरकारको विश्वास दिलाया था कि कस्बा कानून खास तौरपर ब्रिटिश भारतीयों या अन्य एशियाइयोंके विरुद्ध कार्रवाई करनेके लिए नहीं बनाया गया है और न इसमें कोई ऐसी धारा है जिसका प्रभाव विशेष रूपसे उनपर पड़ता हो ।<ref>देखिए परिशिष्ट १९ ।</ref> परन्तु जब हम देख रहे हैं कि यदि ट्रान्सवालके न्यायपीठ द्वारा किया हुआ निर्णय रद नहीं कराया गया तो कस्बा कानूनका प्रयोग स्वर्ण-अधिनियम के साथ मिलाकर किया जायेगा<ref>सन् १८८५ के कानून ३के अन्तर्गत ट्रान्सवालके एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं भी भूमिस्व प्राप्त नहीं कर सकते थे । किन्तु, ऐसा हो सकता था कि यूरोपीय अपने नामपर जमीनका पट्टास्वामित्व (लीजहोल्ड) अथवा निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) प्राप्त करके उस जमीनको पट्टेपर एशियाइयोंको दे दें। इसे न्यायोचित स्वामित्व (इक्विटेबल ओनरशिप) की संज्ञा दी गई थी और सन् १९०५ में ट्रान्सवाल सर्वोच्च न्यायालयने भी इस व्यवस्थाको मान्यता दी थी । इस प्रकार एशियाई पुश्त-दर-पुश्त इन जमीनोंके "न्यायोचित स्वामी" रह सकते थे । किन्तु, सन् १९०८ के कस्वा कानून में यह व्यवस्था की गई कि कस्बोंके सभी बादोंका पट्टा स्वामित्व परवाना शुल्कके रूपमें एक छोटी-सी रकम अदा करके निष्करस्वामित्वके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है; और कुछ स्थितियोंसे ऐसा परिवर्तन किया भी गया था। ऐसी ही एक स्थिति तब उत्पन्न होती थी जब वादोंके स्वामित्वके उत्तराधिकारका प्रश्न आता था । किन्तु, ज्यों ही इन बाड़ोंका पट्टा स्वामित्व निष्कर स्वामित्वमें परिवर्तित होता था, ये १९०८ के स्वर्ण अधिनियमके अन्तर्गत आ जाते थे, जिसके अनुसार इन बाड़ोंपर किसी भी रंगदार व्यक्तिको रहने देना दण्डनीय अपराध था । इस प्रकार कस्बा कानून और स्वर्ण अधिनियम, दोनोंका सम्मिलित प्रभाव यह था कि एशियाई लोग बस्तियोंसे बाहर कहीं किसी प्रकारका स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकते थे और घरेलू नौकरोंके अलावा किसी अन्य रूपमें वे बस्तियोंसे बाहर रह भी नहीं सकते थे ।</ref> और इन दोनों अधिनियमोंका सम्मिलित परिणाम यह होगा कि कस्बा कानून व्यवहारतः एक वर्ग-विभेदकारक विधान बन
_______________________
किया गया था । अतः दक्षिण आफ्रिका संघको उस हस्तान्तरणके दस्तावेजको रद करके श्री रिचसे तीनों बाड़ोंका स्वामित्व छीन लेनेका अधिकार है । उसे दूसरे प्रतिवादी भायातको बेदखल कर देनेका भी अधिकार है और वह मुकदमेके खर्चकी हकदार है । श्री रिचका तर्क था कि मूल पट्टे में, जो १८९६ में लिखा गया था, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि उस जमीनपर कोई रंगदार व्यक्ति नहीं रहेगा । और जिन शर्तोंपर पट्टा स्वामित्त (लीजहोल्ड) को निष्कर स्वामित्व (फ्रीहोल्ड) का रूप दिया गया वे शर्ते (अर्थात् वाडेको किसी रंगदार व्यक्तिके नाम हस्तान्तरित न करनेकी शत) विनियम द्वारा लागू की गई हैं और गैर-यूरोपीय माता-पिताओंसे उत्पन्न लोगोंके विरुद्ध उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि चूँकि ये शर्तें केवल एशियाइयोंपर लागू की गई हैं और यूरोपीयोंपर नहीं, इसलिए इनका स्वरूप वर्गभेदकारी है और इसलिए इनपर पहले साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति ली जानी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। '''इंडियन ओपिनियन,''' १३-७-१९१२ और २७-७-१९१२ ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२३
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||पत्र : मनसुखको|२८७}}</noinclude>बैठेगा ।<ref>गांधीजीने सदा वर्ग-विधानका विरोध किया था। चूँकि महारानी विक्टोरियाकी घोषणा अनुसार भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्यके सदस्य हो गये थे; इसलिए नेटाल तथा ट्रान्सवालके संविधानों में ऐसे सभी वर्ग-विधानोंपर साम्राज्य सरकारकी स्वीकृति लेनेकी व्यवस्था की गई थी जो सम्पूर्ण ब्रिटिश भारतीय समाजके विरुद्ध पड़ते हों । खण्ड ६, पृष्ठ ३-४ और २७८-७९</ref> इसलिए जहाँ यह आवश्यक है कि इस मामलेको अपीलके उच्चतम न्यायालय तक ले जाया जाये वहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रान्सवालके ब्रिटिश भारतीय समझ रखें कि न्यायालयोंके लिए इस प्रकारके मामलोंमें कोई अन्तिम निर्णय देना किसी तरह सम्भव नहीं है। यदि अपीलके उच्चतम न्यायालय में भी यही फैसला बहाल रहा तो उन्हें इन दोनों कानूनों में संशोधन करवानेका प्रयत्न करना पड़ेगा ।
अपीलका सारा भार उठा लेनेकी आशा श्री भायातसे नहीं की जा सकती । सारे समाजका कर्त्तव्य है कि वह उनकी सहायता करे। इस मुकदमेका फैसला सबपर लागू होता है; इसलिए आशा है कि अब जो कार्रवाई की जा रही है उसके खचमें हाथ बँटानेके लिए सम्पन्न ब्रिटिश भारतीय चन्दा देनेमें आगा-पीछा नहीं करेंगे।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' २७-७-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४६. पत्र : मनसुखको<ref>यह गांधीजी द्वारा हिन्दीमें लिखा गया पहला पत्र है। मूल हिन्दी पत्रोंमें हिज्जेकी दृष्टिसे भी कहीं कोई सुधार नहीं किया गया है, किन्तु जहाँ अर्थ स्पष्ट करनेके लिए पाद-टिप्पणियाँ देना आवश्यक लगा है, वहाँ वे दे दी गई हैं ।</ref>'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br> ट्रान्सवाल<br>आषाढ शुक्ल १४,[ जुलाई २७, १९१२]<ref>पत्र में मणिलालके फीजी जानेकी बात कही गई है । वे २६ जुलाई, १९१२ को केप टाउनसे रवाना हुए थे । इससे जान पड़ता है कि यह पत्र १९१२ में ही लिखा गया था। उस वर्ष आषाढ़ शुक्ल १४ को जुलाईकी २७ तारीख पड़ी थी ।</ref>}}
भाई श्री मनसुख,
आपका पत्र मीला है। मी० मणीलाल डॉक्टर के लिये में<ref>मैंने</ref> तार भेजा था। उसका जवाब आपने न भेजा इस परसे मैं समझा की आप लोग उसकु मुक्त करनेमें राजी न थे। दूसरे सबबोंके लिये भी मी० मणिलालजीने फीजी ही जानेका निश्चय किया । गत सूत्रके रोज ये भाई केपसे नीकल चुके हैं। आपको तार भी दिया है। अस्ट्रेलिया होकर वहाँ पहोंचेंगे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
bgxx4z0w72kb5z4wg2aa7dyx3vczvta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२४
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}मेरी उमीद है के आप सब अब राजी<ref>'''स्वस्थ'''</ref> होवेंगे और भी मणीलालजीकी अच्छी तरह बरदास करोगे। उनका रहना अन<ref>और</ref> खानेका बंदोबस्त वहाँके लोगोंने हाल तुरतमें करना चाहीये।
सब भाइओंको उत्तेजन मीलेगा तो अवश्य मी० मणीलालजी वहाँ स्थायी बनेंगे। फेर कुछ लिखना होगा तो लिखना।
{{right|मोहनदास गांधीके यथायोग्य}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल हिन्दी प्रति (जी० एन० २५५३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२४७. पत्र : गो० कृ० गोखलेको'''}}</center>
{{right|टॉल्स्टॉय फार्म<br>लॉली स्टेशन<br>ट्रान्सवाल<br>जुलाई २८, १९१२}}
प्रिय श्री गोखले,
आपका तार<ref>जुलाई २५, १९१२ का तार । उन्होंने इस तार द्वारा सूचित किया था कि वे ५ अक्तूबरको रवाना होनेवाले हैं ।</ref> पाकर हर्ष हुआ। सभी आपके यहाँ आनेकी तारीखके बारेमें पूछ रहे हैं। आशा करता हूँ कि आप हम लोगोंके बीच कमसे कम एक महीना रहेंगे। सभी प्रमुख नगरोंके भारतीय संघ आपको अपने यहाँ बुलानेके लिए बहुत उत्सुक हैं।
यदि आपके साथ आपके सचिव या अन्य कोई सज्जन आ रहे हों तो कृपया सूचित करें।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि दक्षिण आफ्रिका में सर्वत्र आपका बहुत हार्दिक स्वागत होगा।
आशा है, इस यात्रासे आपके स्वास्थ्यको बहुत लाभ पहुँचा होगा। जब कुमारी पोलकसे यह मालूम हुआ कि डॉक्टरोंने आपपर यह पाबन्दी लगा दी है कि आप फिलहाल कुछ दिन किसी आगन्तुकसे भेंट न करें, तब मैं चिन्तित-सा हो उठा था ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
:[गो० कृ० गोखले
:इंग्लैंड ]
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७२) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
e9fq5g4ghzkfxqcd9l5bckxjb347ium
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२४८. पत्र : एशियाई-पंजीयकको'''}}</center>
{{right|[ लॉली ]<br>जुलाई २९, १९१२}}
[ महोदय,]
आपका इसी २६ तारीखका कृपा-पत्र<ref>देखिए पृष्ठ २८२, पाद-टिप्पणी १ ।</ref> प्राप्त हुआ । मेरी नम्र रायमें, अगर किसी खास समुदाय के लोग सरकारी दफ्तर में लोगों को बैठाने आदिके लिए कोई समुचित व्यवस्था कर देनेकी प्रार्थना करते हैं और उत्तरमें एक इतनी बड़ी सरकार यह कहती है कि पैसेका अभाव है तो इसे कोई सन्तोषजनक कारण नहीं माना जा सकता।
मेरी समझ में मेरे पत्रके अन्तिम अंशका अर्थ नहीं समझा गया। मेरे कहनेका मतलब यह नहीं था कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें लोगोंको बैठाने आदिकी कोई विशेष, यानी असाधारण, व्यवस्था है। मैं इतना ही निवेदन करना चाहता था, और अब भी मेरा यही निवेदन है, कि दूसरे सरकारी दफ्तरोंमें आम जनताके बैठनेके लिए पर्याप्त स्थान हैं । मेरी जानकारीके मुताबिक तो आपके दफ्तरके अलावा और कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं है, जहाँ जनताको पैदल-पटरियों या आम सड़कों पर खड़े रहना पड़ता हो ।
{{right|मो० क० गांधी}}
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''इंडियन ओपिनियन,''' ३-८-१९१२
<center>{{x-larger|'''२४९. भाषण : वी० ए० चेट्टियारके लिए जोहानिसबर्ग में आयोजित विदाई-सभा में<ref>इस प्रीतिभोजका आयोजन श्री चेट्टियारके भारत लौटनेके अवसरपर जोहानिसबर्गके तमिल समाज द्वारा किया गया था । समारोह में कोई ३०० लोग उपस्थित थे, जिनमें भारतीयोंसे सहानुभूति रखनेवाले बहुतसे यूरोपीय सज्जन भी शामिल थे। इस अवसरपर रेवरेंड डॉ० रॉस, रेवरेंड डोक तथा हॉस्केन भी बोले थे।</ref>'''}}</center>
{{right|अगस्त १, १९१२}}
'''कल रात ट्रान्सवालके भारतीय सत्याग्रह संघर्षके सबसे कठिन दौरको चर्चा हुई और उसमें श्री गांधीने आगाह किया कि सम्भव है, स्वेच्छासे सपरिश्रम कारावास भोगनेवाले लोगोंको फिर ऐसे ही कष्ट उठाने पड़ें; और कहा कि उन्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए ।'''<noinclude>{{smallrefs}}
११-१९</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२८
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>काम करते हुए समाजकी सेवा भी अवश्य करेंगे। पिछले वर्ष आये हुए लोगोंके सम्बन्धमें मैंने श्री लेनसे खास तौरपर बातचीत की थी। तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गारंटी तो नहीं दे सकता, फिर भी मुझे आशा है कि श्री सोढाको छोड़कर उनमें से कोई दूसरा व्यक्ति व्यापार नहीं करेगा। मैंने उन्हें यह भी बताया कि श्री सोढा यहाँ युद्धसे पहले तीन वर्ष रह चुके हैं और निःसन्देह उनका इरादा व्यापार करनेका है। परन्तु श्री सोढाके व्यापार करने का अर्थ किसी भी तरह यह नहीं है कि वे समाज के लिए कतई उपयोगी नहीं रह जायेंगे। यह तो मानना ही पड़ेगा कि शिक्षित व्यक्तिकी हैसियतसे ट्रान्सवालमें प्रवेश करनेवाला हर आदमी अपने देशभाइयोंके बीच कोई-न-कोई स्वतन्त्र धन्धा करके रोजी कमायेगा । मैं आशा करता हूँ कि श्री सोढाके बारेमें शीघ्र ही निर्णय किया जायेगा । आप इस पत्रकी एक नकल मुझे भेज दें तो
कृपा होगी, क्योंकि मैं स्वयं इसकी नकल नहीं कर पाया हूँ ।<ref>एशियाई पंजीयकने इसके जवाब में १६ अगस्तको लिखा कि “ ... जबतक कोई ऐसा कानून पास नहीं कर दिया जाता जिसके द्वारा खास तौरसे बरी करार दिये गये शिक्षित एशियाइयोंके निवासको वैध रूप मिल जाये, तबतक यह कानून सम्मत नहीं होगा कि राजस्व आदाता उनके नाम सामान्य विक्रेता-परवाने जारी करे। मुझे खेद है कि उपर्युक्त कारणले मैं किसी राजस्व आदाताको ऐसा आदेश नहीं दे सकता कि वह श्री सोढाके नाम, जो फिलहाल ट्रान्सवालमें एक अस्थायी अनुमतिपत्रके आधारपर रह रहे हैं, व्यापारिक परवाना जारी करे ।" (एस० एन० ५६९६)</ref>
{{right|आपका<br>[ मो० क० गांधी ]}}
टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६९७) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५२. बली वोरा और चंचलबहन गांधीको लिखे पत्रका अंश'''}}</center>
{{right|[अगस्त ३, १९१२ के बाद]<ref>मणिलाल डॉक्टर, जिनका उल्लेख पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें किया गया है, जुलाई २६, १९१२ को जहाज द्वारा केप टाउनसे फीजीके लिए रवाना हुए थे और इसकी सूचना '''इंडियन ओपिनियन''' में ३ अगस्तको जाकर छपी थी (हालांकि उसमें छपाईकी भूलसे प्रस्थान तिथि २० जुलाई बताई गई थी )। अतः यह पत्र ३ अगस्तके बाद ही लिखा गया होगा।</ref>}}
{{left|चि० बली और चंची,}}
तुम दोनोंके पत्र मिले ।
मेरा खयाल है कि रामीका हाथ टूटने में थोड़ा-बहुत दोष तुम दोनोंका है। यों ऐसी दुर्घटनाएँ तो हुआ ही करती हैं। यदि भाग्य में जिन्दगी लिखी है तो ईश्वर ऐसी दुर्घटनाओंसे भी बचा लेता है।
चि० वेणीने<ref>प्रिटोरियाके एक प्रमुख भारतीय जयशंकर व्यासकी पत्नी।</ref> लिखा है कि चंची यहाँ आ जाना चाहती है। उसे इतना तो समझना ही चाहिए कि वह जब चाहे तब आ सकती है। मैंने तो उसे यह सोचकर<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
9xdmx7cxpxp02lupojreyebzxr8ydis
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३३१
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||श्री टाटाकी उदारता|२९५}}</noinclude>फिर आप डर्बनसे जहाज द्वारा प्रस्थान करेंगे। आपका भारत जानेका टिकट आपके यहाँ आ जानेके बाद सुविधापूर्वक लिया जा सकता है।
मैंने कार्यक्रमकी रूपरेखा पहलेसे ही इसलिए तैयार कर ली है कि यदि आप उसमें कोई परिवर्तन करना चाहें तो तार और पत्रसे सूचित कर दें।
यदि श्री फिशर जनरल स्मट्स द्वारा किये गये वादेसे पीछे हट जायें तो उससे कोई बड़ा अकाज नहीं होगा। उससे हमारा पक्ष और भी सबल हो जायेगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा कर पाना सरकारके लिए सम्भव होगा। जो बात अधिक सम्भव दीखती है, वह यह है कि (स्थानीय) संसद, सरकारी विधेयकको शायद पास न करे। और सम्भव है, सरकार (स्थानीय) संसदके इस आचरणको अपने सम्मानका प्रश्न न बनाये और हमें तथा शाही सरकारको भी सीधा कह दे कि वह लाचार है। उस हालत में संघर्ष तीव्र और भयानक हो जायेगा; परन्तु वह तबतक जारी ही रहेगा जबतक हममें से दो-चार भी जीवित हैं।
श्री सोराबजी अब वहीं हैं; और वे अबतक आपके दर्शन अवश्य कर चुके होंगे।
श्री टाटाने फिर २५,००० रुपये<ref>श्री टाटा द्वारा दिये गये अन्य अनुदानोंके लिए देखिए पाद-टिप्पणी १ पृष्ठ २४५ ।</ref> देकर कितनी बड़ी कृपा की है ? मैं जानता हूँ कि यह सब आपकी ही बदौलत है। हर बार दान ऐन मौकेपर पहुँचा है। फार्मको चलाना मुश्किल होता जा रहा था।
{{right|हृदयसे आपका,<br>मो० क० गांधी}}
गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल अंग्रेजी प्रति (जी० एन० ३७७३) की फोटो-नकलसे ।
<center>{{x-larger|'''२५४. श्री टाटाकी उदारता'''}}</center>
{{gap|1em}}श्री रतन टाटा खुद अपनेसे बाजी मार ले गये हैं। गत मासकी ३१ तारीखको बम्बई में शेरिफ द्वारा एक सभा<ref>यह सभा १ अगस्तको की गई थी । इसमें उपनिवेशोंमें, विशेष रूपसे दक्षिण आफ्रिका, पूर्व आफ्रिका तथा कैनेडामें भारतीयोंके साथ किये जानेवाले दुर्व्यवहारके प्रति विरोध प्रकट किया गया था; गिरमिटिया मजदूरोंकी प्रथाके प्रचलनकी भर्त्सना करते हुए मार्विस क्रू को भेजनेके लिए भारत सरकारके नाम एक स्मरणपत्रके मसविदेपर स्वीकृति दी गई; और दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सन्देश भेजा गया।</ref> बुलाई गई थी। सर जमशेदजीने उसकी अध्यक्षता की थी। सभा में घोषणा की गई कि श्री टाटाने दक्षिण आफ्रिका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु० का दान दिया है। इसे मिलाकर श्री टाटाके दानकी राशि ५,००० पौंड तक पहुँच जाती है--यह अपने-आपमें एक खासी बड़ी निधि है ।
श्री पेटिट १,५०० पौंड तो तारसे श्री गांधीको भेज भी चुके हैं। श्री टाटाकी उदारतासे उनके हृदयकी विशालता तो प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||असहयोग समितिका प्रतिवेदन|३९५}}</noinclude>तब हम असहयोगकी सफलताओंको और ज्यादा अच्छी तरह आँक सकेंगे और तभी हम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी सलाहसे परिस्थितिका सामना करनेके लिए उपयुक्त कदम उठा सकेंगे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक २२ जुलाईको लखनऊमें होने जा रही है।
{{C|'''सविनय अवज्ञा'''}}
असहयोगके सम्बन्धमें तो यह स्पष्ट है कि हमें अपना हर कदम भारतीय जनताकी तैयारीको देखकर ही निश्चित करना चाहिए। यह सुझाव दिया ही जा चुका है कि पिछले तीन महीनोंके दौरान जो प्रगति हुई है उसे देखते हुए सविनय अवज्ञा शुरू करना बिलकुल उचित जान पड़ता है। टर्कीके लोगों के बारेमें ब्रिटेनकी सरकारने एक बार फिर ऐसा रुख अपनाया है जिससे मुसलमानों और भारतीयोंके मतके प्रति घोर अवहेलना प्रकट होती है। साथ ही ब्रिटिश सरकारने भारतमें असहयोग आन्दोनके पूर्णतः अहिंसक होनेपर भी उसके दमनके लिए कानूनका जो घोर दुरुपयोग किया है, जान पड़ता है, उसके कारण हमें जल्दी ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करनेपर विवश होना पड़ेगा। जो भी हो, चूँकि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी लखनऊकी अपनी बैठकमें इस प्रस्तावपर विचार करनेवाली है, इसलिए उसके निर्णयोंतक रुके रहना ही ठीक होगा।
फिर भी हम यह बतला देना चाहते हैं कि यूरोपकी परिस्थितिसे लोगोंका
उत्साह बढ़ना चाहिए, खास तौरसे मुसलमानोंका। उनको देशके सामने प्रस्तुत कार्य-क्रमके सिलसिले में—अर्थात् खिताबों, परिषदों, स्कूलों-कालेजों, न्यायालयों और रंग-रूटोंकी भरतीसे सम्बन्धित कार्यक्रमकी ओर—और अधिक जोरसे काम करनेके लिए उत्साहित होना चाहिए। हमारी राय है कि जो लोग सेनामें भरती होते हैं उन्हें अब भरतीसे पहलेसे अधिक बचना चाहिए। हम समझते हैं कि यदि ब्रिटिश सरकार टर्कीके खिलाफ लड़नेके लिए कहे तो उसे सहायता देनेसे इनकार करना भारतीय सैनिकोंका कर्त्तव्य है। मुसलमान उलेमाओंको पूरी-पूरी कोशिश करनी चाहिए कि मुसलमान सैनिकोंको इस सम्बन्धमें इस्लाम के धार्मिक आदेश भली-भाँति समझाये जायें; और अब सारे असहयोगियोंको भी चाहिए कि वे टर्कीसे लड़ाई शुरू होनेकी सूरतमें कांग्रेस कार्य-समिति द्वारा भारतीय सैनिकोंके कर्त्तव्यके बारेमें दी गई रायपर खास जोर दें।
{{C|'''असहयोग कार्यक्रमकी मुख्य बातें'''}}
सबसे पहले तो लिखित रूपमें हम अपना यह विश्वास प्रकट करना चाहते हैं कि बेजवाड़ा कार्यक्रमपर ज्यादा मुस्तैदीसे अमल करना नितान्त आवश्यक है क्यों कि टर्की और इस्लामके बारेमें ब्रिटिश सरकारका रवैया निःसन्देह वैमनस्यपूर्ण मालूम पड़ता है उससे हमें सफलतापूर्वक जूझना है। किसी भी बालिग भारतीय युवक या युवतीको कांग्रेसके रजिस्टरमें अपना नाम लिखाने या तिलक स्वराज्य-कोषमें चन्दा देनेमें तनिक भी विलम्ब नहीं करना चाहिए। हम अपने उद्देश्यकी प्राप्तिके लिए हर घरमें चरखा चलवाना, सर्वत्र खादीका इस्तेमाल करना और विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण बहिष्कार करना नितान्त आवश्यक मानते हैं। साथ ही सभी लोगों, खासकर मुसलमानोंको<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|छः|}}</noinclude>वे--सिद्धान्त रूपसे ही सही--फ्री स्टेटसे प्रभेदमूलक माँगोंको हटाना स्वीकार कर लें और संघमें अन्यत्र चलते हुए रुखको अपना लें। जनरल स्मट्स इस बातके लिए उत्सुक थे कि संसदके इस सत्रकी समाप्तिके पूर्व ही यह विधेयक स्वीकृत हो जाये। इसका कारण था। राज्याभिषेकका उत्सव समीप आ पहुँचा था और वे इस कार्यक्रमको शान्तिपूर्वक सम्पन्न करना चाहते थे । गांधीजीने उन्हें एक वैकल्पिक हल सुझाया जिसे अपना लेनेपर न केवल फ्री स्टेटवालोंसे बचकर निकला जा सकता था बल्कि नेटाल और केपकी तत्कालीन समस्याएँ भी अधिक नहीं रह जाती थीं । गांधीजीका सुझाव यह था कि संघके प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकको उठा लिया जाये और उसके स्थानपर ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियममें संशोधन किया जाये--क्योंकि सत्याग्रह संघर्ष तो ट्रान्सवालके इसी कानूनको लेकर था। परन्तु जनरल स्मट्स इसे माननेको तैयार नहीं थे। उन्हें भय था कि गोरे लोग उसके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाली स्थितिको स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसी दुविधामें जनरल स्मट्सने अपनी अड़चनें गांधीजीके समक्ष रखीं । उन्होंने मंजूर किया कि शायद विधेयकको मुल्तवी रखना होगा लेकिन साथ ही आग्रह किया कि सत्याग्रह बन्द कर दिया जाये। दूसरेकी कठिनाइयोंका खयाल करनेके लिए सदा तैयार और स्वभावसे उदार गांधीजीने स्मट्सकी कठिनाईको समझा और सत्याग्रहको मुल्तवी कर देना स्वीकार कर लिया। इसकी एवज में उन्होंने स्मट्ससे यह अभिवचन जरूर माँगा कि अगले सत्रमें ट्रान्सवाल एशियाई पंजीयन अधिनियमको रद करते हुए; किन्तु नाबालिगोंके अधिकारोंकी रक्षा करते हुए उपयुक्त कानून पास किया जायेगा; मौजूदा अधिकार कायम रखे जायेंगे; जो सत्याग्रही पंजीयनके हकदार थे उन्हें पंजीयन कराने दिया जायेगा और जो शिक्षित सत्याग्रही उस समय ट्रान्सवालमें रहते थे किन्तु जिन्हें एशियाई अधिनियमके तहत पंजीयनका हक नहीं था उन्हें जबतक आगामी कानून पारित नहीं होता तबतक के लिए वहाँ रहनेकी विशेष अनुमति दी जायेगी। यह बात २१ अप्रैलको हुई थी । दूसरे दिन स्मट्सने आवश्यक आश्वासन दिये और कहा कि आगामी सत्रमें पास किये जानेवाले कानूनमें ऐसी धाराएँ होंगी जिनसे सब प्रवेशार्थियोंको कानूनी समानता मिल जायेगी। ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा २७ तारीखको अपनी सभामें “अनाक्रामक प्रतिरोध बन्द करनेके प्रस्तावको जनरल स्मट्स द्वारा दिये गये वादोंके पूरा होनेकी शर्तोंके साथ स्वीकार" कर लिया गया(पृष्ठ ५७) । २९ अप्रैलसे २० मई तक इस सम्बन्धमें पत्रों और तारोंके आदान-प्रदानके बाद अस्थायी समझौता सम्पन्न हो गया।
किन्तु गांधीजीने एक सतर्कता यह बरती कि टॉल्स्टॉय फार्म, जहाँ कि सत्याग्रहियोंके निवास और निर्वाहकी व्यवस्था की गई थी, कायम रखा गया क्योंकि अभी और कई अन्याय थे जिनका प्रतिकार करना बाकी था और भारतीयोंने उनके सम्बन्धमें आन्दोलन करनेका अपना अधिकार सुरक्षित रखा था। खैर, कुछ समयके लिए शान्ति
तो हो गई और गांधीजीने राजनीतिक जीवनकी चिन्ताओंको यथासम्भव एक ओर रखकर अपना ध्यान ज्यादा महत्त्वकी वस्तुओंकी ओर लगाया । वे पहलेसे ज्यादा कठोर आत्मनियमनके प्रयत्नमें, चिन्तन और मननमें तथा शैक्षणिक प्रयोगोंमें जुट गये।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|सात|}}</noinclude>{{gap}}डॉ० प्राणजीवन मेहताके नाम उन्हीं दिनों लिखे गये अपने ८ मईके पत्रमें वे कहते हैं: "यदि इन आठ या छः महीने मुझे कुछ अवकाश रहा, तो मेरा विचार खादी करघेपर ध्यान देनेका है।... मैं देखता हूँ कि यदि मैं शान्तिपूर्वक वकालत करता रहूँ तो प्रतिमास दो सौ पौंड मिलते रहेंगे। किन्तु मैंने उसमें न पड़नेका निश्चय किया है। इस कामका अधिकांश रिचके पास जायेगा। रिचको मैंने अपने ही दफ्तरमें बिठाया है और वह काम करने लगा है।” (पृष्ठ ६६)। इसी पत्रमें वे फीनिक्स में पाठशालाके लिए उपयुक्त इमारत बनवानेकी अपनी इच्छाका भी उल्लेख करते हैं । ए० ई० छोटाभाईके नाम अपने ४ मईके पत्रमें उन्होंने फीनिक्स संस्था ट्रस्टको सौंपनेका इरादा घोषित किया था । इस प्रकार जब वे अपनी साधना में एक नया निर्णायक कदम उठानेकी तैयारी कर रहे थे तभी उन्हें अपने पारिवारिक जीवन में एक दुःखद घटनाका मुकाबला करना पड़ा-- एक ऐसी घटनाका जो उनके लिए वर्षोंतक मर्मान्तक कष्टका कारण रही और जिसका उपशम सारी मनुष्य-सुलभ आसक्तियोंके क्रमिक त्याग द्वारा ही हो सकता था। उनके सबसे बड़े लड़के हरिलाल गांधीने, जो कुछ समय तक सत्याग्रही रह चुके थे और इस सिलसिले में जेल भी काट चुके थे, माँ-बापसे रूठ कर घर छोड़ दिया और वे भारत चले गये । हरिलाल गांधीकी शिकायत यह थी कि गांधीजीको अपने परिवारके आत्मीय जनोंके--अपने बच्चोंके सांसारिक हितकी कोई चिन्ता नहीं है । हरिलालको ऐसा ही लगता था। जाहिर है कि उनकी आध्यात्मिक प्रगतिके लिए गांधीजीके ज्वलन्त उत्साहको हरिलाल पहचान नहीं सके। इस विषयपर हरिलालके जानेसे पहले पिता-पुत्रकी काफी बातचीत हुई और उसके बाद वे "शान्त मनसे" भारत चल दिये । गांधीजी चाहते थे कि हरिलालका "विकास स्वतन्त्र रीतिसे हो" और चाहते थे कि वे उन्हें "जैसा अच्छा लगे" वैसा वे रहें। किन्तु पिता-पुत्रमें फिर पहले जैसा सहज-सम्बन्ध कभी नहीं बना ।
टॉल्स्टॉय फार्मपर रहते हुए गांधीजीका डॉ० प्राणजीवन मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, मगनलाल, छगनलाल, हरिलाल, मणिलाल और बादमें जमनादास गांधी के साथ नियमित पत्र-व्यवहार होता रहा। प्रतिदिन कुछ समय वे वहाँके स्कूलके बच्चोंको पढ़ाने में भी लगाते थे। 'महाभारत' और 'इंडियन आइडिल्स' (एडविन आर्नाल्ड द्वारा लिखित कुछ प्राचीन भारतीय आख्यान) के अंश वे बच्चोंको कुछ वैसे ही उत्साहसे सुनाते थे जिसका अनुभव किसी नई मूल्यवान वस्तुकी खोज करनेवाले व्यक्तिको होता है। समय-समयपर वे सरकार द्वारा समझौतेके पालनमें पाई जानेवाली त्रुटियों और प्रवेश तथा अधिवाससे सम्बन्धित दूसरे विषयोंपर गृह मन्त्रालयको पत्र भी लिख रहे थे । 'इंडियन ओपिनियन' में वे तीन-पौंडी कर, म्युनिसिपैल्टियों द्वारा भारतीयोंको उनकी जमी हुई
बस्तियोंसे उखाड़कर अन्यत्र ले जानेके प्रयत्न और गोरों द्वारा चलाये जा रहे एशियाई-विरोधी आन्दोलन-जैसे भारतीयोंसे सम्बन्धित महत्वपूर्ण सवालोंपर इस समय भी लिखते रहे, यद्यपि पहलेसे कुछ कम।
सन् १९११ के अन्तिम दिनोंमें अस्थायी समझौतेकी अवधि समाप्त हो गई । नया प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक तैयार हुआ और गांधीजीको दिखाया गया । किन्तु उसके 'गज़ट' में प्रकाशित होनेपर गांधीजीने उसमें कुछ फर्क देखा : वह धारा, जिसके अनुसार<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|आठ|}}</noinclude>ऑरेंज फ्री स्टेटमें प्रवेश करनेवाले शिक्षित एशियाइयोंको हलफिया यह बयान देना पड़ता था कि वे उक्त प्रदेश में खेती या व्यापार नहीं करेंगे कायम रखी गई थी। पत्रोंका आदान-प्रदान हुआ और सदाकी तरह जनरल स्मट्सने कुछ आपत्तियाँ तो हल कर दीं और कुछके बारेमें आश्वासन दे दिये । ता० २४ जूनको, जब कि विधेयकका केवल दुसरा वाचन ही समाप्त हुआ था, संसद् के सत्रका अवसान कर दिया गया और गांधीजीको
यह बताया गया कि जबतक सम्बन्धित कानून पास नहीं हो जाता, पिछली सालका अस्थायी समझौता जारी रहेगा और शिक्षित भारतीयोंको, जिनके नाम गांधीजी देंगे, सन् १९१२ में भी प्रवेश दिया जायेगा।
गांधीजी श्री गोखलेको बार-बार अत्यन्त आग्रहपूर्वक दक्षिण आफ्रिका आनेका अनुरोध करते रहे थे; २२ अक्तूबरको वे वहाँ आ पहुँचे और केप टाउनमें उतरे। दक्षिण आफ्रिकाके गोरे और रंगदार, सब लोगोंने रास्तेमें वे जहाँ-जहाँ रुके वहाँ और शहरों के नगर-भवनोंमें उनका शानदार राजकीय स्वागत किया। वे विविध वर्गोंके नेताओं और व्यक्तियोंसे मिले; जगह-जगह उनके भाषण हुए; संघके मन्त्रियों-- बोथा, स्मट्स और फिशरसे उनकी चर्चाएँ हुई और गवर्नर-जनरलके साथ उन्होंने भोजन किया।
गोखलेकी यह यात्रा भारतमें दक्षिण आफ्रिकी सवालोंके प्रति लोगोंका ध्यान केन्द्रित करने में बहुत सहायक सिद्ध हुई; इसी प्रकार दक्षिण आफ्रिकामें उसने भारतीयोंका हौसला बढ़ाया और साथ ही लॉर्ड एम्टहिलके शब्दों में उससे "सद्भावनाका वातावरण तैयार" हुआ (पृष्ठ ४९४) । गोखले से मिलने के बाद लॉर्ड ग्लैड्स्टनने शाही सरकारको अपनी इस भेंट के बारेमें जो टिप्पणी (देखिए परिशिष्ट २२) लिखी थी उसमें श्री गोखलेकी यात्राके सुपरिणामोंका सारांश आ जाता है।
प्रवेश और अधिवास-सम्बन्धी विषम प्रश्न तो इसके बाद सुलझ गये मालूम हुए किन्तु भारतीयोंका उत्पीड़न और दमन दूसरे बहानोंसे जारी ही रहा। उस समय तक यह रिवाज चला आता था कि जायदाद होती तो थी ऐसे गोरोंके नामपर जो सम्बन्धित भारतीयोंके जाने-पहचाने मित्र होते थे किन्तु उसका उपयोग वे भारतीय करते थे और उसपर न्याय-मान्य (इक्वीटेबिल) स्वामित्व भी उन्हींका होता था। अब सुवर्ण-कानून और कस्बा-कानूनके द्वारा इस रिवाजको नष्ट करनेकी कोशिश की जाने लगी। क्लार्क्सडॉर्प, क्रूगर्सडॉर्प, रुडीपूर्ट और फ्रीडीडॉर्प कस्बों में क्रमशः बाड़ोंके गोरे मालिकोंको सुवर्ण-कानूनके तहत अपने रंगदार आभोगियोंको निष्कासित करनेके नोटिस दिये गये । व्यापारियोंको अपने व्यापारिक परवाने दूसरोंके नाम बदलवानेकी इजाजत नहीं दी गई। ट्रान्सवाल म्यूनिसिपल अध्यादेश के प्रारूप में म्यूनिसिपैल्टियोंको फेरीवालोंके परवानोंके नियमनका पूरा अधिकार दे दिया गया था; उन्हें एशियाइयोंकी पृथक बस्तियों से खिलवाड़ करनेकी सत्ता भी मिल गई थी। इस प्रकार, व्यापारीके मरने या निवृत्त होनेपर उसके परवानेको रद करके अथवा जिस बस्तीमें वह व्यापार करता
था वहाँसे उसे किसी दूसरी और घटिया जगह जानेके लिए बाध्य करके भारतीयोंके कारोबारको चौपट करनेका संगठित प्रयत्न किया गया। इसके सिवा भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीयोंपर तीन-पौंडी कर भी लगता ही रहा।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|नौ|}}</noinclude>{{gap}}शीघ्र ही यह भी स्पष्ट हो गया कि जहाँतक अमलका सवाल है, अस्थायी समझौतेके मात्र शब्दोंका ही पालन हो रहा है, उसकी भावनाकी तो हत्या ही हो रही है। बन्दरगाहोंपर प्रवासी कानूनके अमलमें, खासकर नेटालमें, अधिकाधिक सख्ती बरती गई। स्त्रियों और नाबालिग बच्चोंको उतरनेकी इजाजत नहीं दी गई। हकदार
प्रवासियोंके साथ उनके रिश्तेके और उसके आधारपर प्रवेशके अधिकारके असम्भव प्रमाण माँगे गये । इस कठिनाईका एक ही उपाय था--सर्वोच्च न्यायालयसे निषेध देश प्राप्त करना। सर्वोच्च न्यायालयमें बाई रसूलके मामले में न्यायमूर्ति वेसेल्सके इस निर्णयसे कि भारतीय प्रवासी अपने साथ एक ही पत्नी ला सकता है और वह सचमुच उसकी पत्नी होनी चाहिए, सारा समाज हिल उठा। उसके कुछ ही समय बाद एक और मुसलमान अधिवासीकी पत्नी, फातिमा जसात, को प्रवेशकी इजाजत नहीं दी गई और स्मट्सने मामले में हस्तक्षेप करनेसे इनकार कर दिया।
लेकिन समझौते के भंगकी सबसे गम्भीर घटना तो यह हुई कि एशियाइयोंके पंजीयकने सन् १९१२ के लिए गांधीजी द्वारा प्रस्तुत छः शिक्षित भारतीय प्रवेशार्थियोंके नामोंमें से दो अस्वीकार कर दिये। इस घटनाकी चर्चा करते हुए गांधीजीने गोखलेको लिखा कि "मन्त्रिगण निश्चय ही अपने वादोंको पूरा नहीं कर रहे हैं।” (पृष्ठ ४५९)।उन्होंने सरकारको चेतावनी दी कि यदि सरकारका रवैया यही रहा तो सत्याग्रह पुनःशुरू किया जायेगा। और अन्तमें सन् १९१३ के शुरुआत में ही केपके सर्वोच्च न्यायालयके जस्टिस सर्लने अपना वह निर्णय दिया जिससे भारतीय समाजको सबसे ज्यादा क्षोभ और आश्चर्य हुआ। बाई मरियमके मुकदमेका फैसला देते हुए उन्होंने कहा कि मुसलमानी रिवाज के अनुसार सम्पन्न विवाह प्रवासी कानूनको मान्य नहीं है। एक दूसरे मामलेमें
नेटालके सर्वोच्च न्यायालयने भी मुसलमानी विवाहकी वैधतापर शंका प्रकट की। जाहिर है कि स्मट्सके साथ अप्रैल, १९११ में गांधीजीकी भेंटमें सौहार्द्र और सद्भावनाकी जो मिठास लक्षित हुई थी वह काफूर हो चुकी थी । सरकारके रुखमें फर्क आ गया था और गांधीजीको लाचार होकर इसकी ओर ध्यान देना पड़ा और वे समाजको पहले से भी ज्यादा बड़ी लड़ाईके लिए तैयार करनेमें लग गये ।
इस अप्रत्याशित निराशा और विफलतासे गांधीजी विचलित नहीं हुए। टॉल्स्टॉय फार्म में रहते हुए उन्होंने आन्तरिक शक्तिकी जिस विपुल निधिका संचय किया था उसने उनके राजनीतिक जीवनके उलट-फेरोंमें उन्हें सदा आश्वस्त रखा। हमें इस "आश्रम" में उनके बाहरी जीवनका विवरण, उनकी सन् १९१२ की डायरीमें मिलता है। उनका मन बिलकुल ही भिन्न कोटिके सवालोंमें व्यस्त है; इस समय उनके ध्यान और चिन्तनके विषय हैं: शरीर-श्रमका सिद्धान्त, स्वास्थ्यप्रद और साथ ही सात्त्विक आहार, स्वभाषा के माध्यम से दिया गया शिक्षण आदि । आन्तरिक ताजगीके लिए वस्तुगत सत्यका सान्निध्य एक महत्त्वपूर्ण साधन है। गांधीजीकी उक्त प्रवृत्तियाँ इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त की ओर संकेत करती मालूम होती हैं। वे इस समय एक पाठशालाके आचार्य थे--जिसमें लड़नेकी नहीं, किशोर बालक-बालिकाओंके विकास में सहायता देनेकी बात थी। आय-व्ययका अत्यन्त बारीकीसे रखा गया हिसाब आहार-व्यवहारमें उनकी मितव्ययिताका--सादगीका, और थोरोके शब्दों में कहें तो, " स्वल्पीकृत ऐन्द्रिय<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|दस|}}</noinclude>परिवेश" का सूचक है। इस हिसाबमें रोज-रोज जिन वस्तुओं का उल्लेख होता है,उन्हें देखिए: चमड़ा--यह कैलेनबैकके लिए खरीदा जाता था, कैलेनबैंक अपने वर्ग में विद्यार्थियों को चप्पलें बनाना सिखाते थे जिसे उन्होंने ट्रेपिस्ट साधुओंके मठमें सीखा था; शक्कर--यह नमककी जगह काम में आती थी; व्यक्तिगत चिट्ठियोंके लिए
स्टॅम्प--लेकिन ये चिट्ठियाँ प्राप्त नहीं हैं; लॉली स्टेशनसे प्रतिदिन आनेवाले दूधकी कीमत; उन यात्रियोंका रेलभाड़ा जो अपनी समस्याऐं सुलझानेके लिए टॉल्स्टॉय फार्म आते रहते थे।
दिसम्बरकी डायरी में एक तारीखमें यह टीप मिलती है कि अगले साल 'इंडियन ओपिनियन' में और ज्यादा घाटा होगा। पैसेकी समस्या कठिन हो गई थी--टॉल्स्टॉय फार्म, फीनिक्स, शिक्षाके प्रयोग आदिके लिए पैसेकी जरूरत थी और टाटा के दानसे अथवा डॉ० मेहताकी अक्षय उदारता से उसकी केवल आंशिक पूर्ति ही हो सकती थी। अपनी सत्योपासनाके प्रसंग में अब गांधीजीने जीविकाके लिए वकालतका त्याग कर दिया था और कठिनाईका मुख्य कारण यही था। डॉ० प्राणजीवन मेहताके नाम अपनी सन् १९११की चिट्ठियों में गांधीजी एकाधिक बार अपनी भारत लौट आनेकी इच्छाका उल्लेख करते हैं। गोखलेकी दक्षिण आफ्रिकाकी यात्राके बाद उनकी यह इच्छा और तीव्र हो गई दिखती है। २६ नवम्बर १९१८ के पत्रमें वे कहते हैं कि उन्होंने गोखलेको आश्वासन दिया है कि वे भारत तबतक नहीं लौटेंगे, जबतक उन्हें वहाँ उनकी जगह लेनवाला कोई व्यक्ति नहीं मिल जाता और यह व्यक्ति सम्भवतः पोलक होंगे। १ दिसम्बरको अपनी डायरी में वे कहते हैं कि मैंने भारतीय पोशाक पहनना शुरू कर दिया है। मातृभूमिकी पुकारको अब वे और नहीं टाल सकते; दक्षिण आफ्रिकासे विदाकी घड़ी निकट आ गई है और वे प्रस्थानकी तैयारी कर रहे हैं।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />
{{c|{{larger|'''आभार'''}}}}</noinclude>{{gap}}इस खण्डकी सामग्री के लिए हम आश्रम संरक्षक और स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिज़र्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) तथा संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी,पूना; कलोनियल ऑफिस और इंडिया ऑफिस लाइब्रेरीज़, लन्दन; श्री छगनलाल गांधी, श्रीमती राधाबेन चौधरी, श्रीमती सुशीलाबेन गांधी, श्री सी० के० भट्ट, श्री रेवाशंकर सोढा, श्री नारणदास गांधी, श्री यूजेन जोसेफ पॉल, श्री ए० एच० वेस्ट, डॉ० कूप्पन; गांधीजीनी साधना और 'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री' पुस्तकों और निम्नलिखित समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओंके प्रकाशकोंके आभारी हैं : 'केप टाइम्स', 'डायमण्ड फील्ड एडवर्टाइज़र', 'इंडियन ओपिनियन', 'द ट्रान्सवाल लीडर', 'स्टार', 'टाइम्स आफ इंडिया' और ऑनरेबिल मिस्टर गोखलेज विजिट टु साउथ आफ्रिका, १९१२ ।
अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्सके पुस्तकालय, सूचना तथा प्रसारण मन्त्रालय, नई दिल्ली, के अनुसन्धान तथा सन्दर्भ विभाग, साबरमती संग्रहालय और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद और श्री प्यारेलाल नय्यर हमारे धन्यवादके पात्र हैं। प्रलेखोंकी फोटो-नकलें तैयार कर देनेके लिए हम सूचना तथा प्रसारण मन्त्रालयके फोटो-विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं।<noinclude></noinclude>
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{{c|{{larger|'''आभार'''}}}}</noinclude>इस खण्डकी सामग्री के लिए हम आश्रम संरक्षक और स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिज़र्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) तथा संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी,पूना; कलोनियल ऑफिस और इंडिया ऑफिस लाइब्रेरीज़, लन्दन; श्री छगनलाल गांधी, श्रीमती राधाबेन चौधरी, श्रीमती सुशीलाबेन गांधी, श्री सी० के० भट्ट, श्री रेवाशंकर सोढा, श्री नारणदास गांधी, श्री यूजेन जोसेफ पॉल, श्री ए० एच० वेस्ट, डॉ० कूप्पन; गांधीजीनी साधना और 'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री' पुस्तकों और निम्नलिखित समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओंके प्रकाशकोंके आभारी हैं : 'केप टाइम्स', 'डायमण्ड फील्ड एडवर्टाइज़र', 'इंडियन ओपिनियन', 'द ट्रान्सवाल लीडर', 'स्टार', 'टाइम्स आफ इंडिया' और ऑनरेबिल मिस्टर गोखलेज विजिट टु साउथ आफ्रिका, १९१२ ।
अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्सके पुस्तकालय, सूचना तथा प्रसारण मन्त्रालय, नई दिल्ली, के अनुसन्धान तथा सन्दर्भ विभाग, साबरमती संग्रहालय और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद और श्री प्यारेलाल नय्यर हमारे धन्यवादके पात्र हैं। प्रलेखोंकी फोटो-नकलें तैयार कर देनेके लिए हम सूचना तथा प्रसारण मन्त्रालयके फोटो-विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं।<noinclude></noinclude>
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{{c|{{Larger|'''पाठकोंको सूचना'''}}}}</noinclude>विभिन्न अधिकारियोंके नाम लिखे गये पत्र तथा अभ्यावेदन, समाचारपत्रोंको लिखे गये पत्रादि और सभाओं में पास हुए प्रस्ताव जो इस खण्डमें शामिल किये गये हैं, उनको गांधीजीका लिखा माननेका आधार बहुत कुछ वही है, जिसका हवाला खण्ड १ को भूमिकामें दिया जा चुका है। यदि किन्हीं शीर्षकोंको किन्हीं विशेष कारणोंसे सम्मिलित किया गया है तो उनका खुलासा पाद-टिप्पणियोंमें कर दिया गया है। गांधीजीके जो लेख 'इंडियन ओपिनियन' में उनका नाम दिये बिना प्रकाशित हुए थे उनको गांधीजीके आत्मकथात्मक लेखों में सामान्यतः मिलनेवाले संदर्भों, उनके सहयोगियों--छगनलाल गांधी और एच० एस० एल० पोलककी सम्मति तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्य के आधारपर पहिचाना गया है।
उपलब्ध हिन्दी सामग्रीको पुनः प्रस्तुत करते समय मूल रूपको ज्योंका-त्यों बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयास किया गया है। मूलमें पाये जानेवाले एक ही नामके विभिन्न रूपोंको ज्योंका-त्यों रहने दिया गया है।
सम्पादकोंकी ओरसे जोड़े गये शब्द खड़े कोष्ठकोंमें दिये गये हैं। अंग्रेजीसे उद्धृत किये गये अंश गहरी स्याही में हाशिया छोड़कर छापे गये हैं । संवाददाताओं आदि द्वारा तैयार किये गये गांधीजीके भाषणोंके परोक्ष विवरण और ऐसे लेखांश भी, जो गांधीजीके नहीं हैं, गहरी स्याही में छापे गये हैं।
अंग्रेजी और गुजरातीसे किये गये अनुवादको मूलके अधिक-से-अधिक निकट रखने और उसे सुपाठ्य बनानेका भरसक प्रयास किया गया है। स्वयं गांधीजी द्वारा किये गये गुजराती अनुवादोंका अनुवाद करने में भी यथासम्भव उनके मूल अंग्रेजी पाठको सामने रखा गया है।
प्रत्येक शीर्षककी तिथि दाहिनी ओर सबसे ऊपर दी गई है। यदि मूलमें तिथिका उल्लेख नहीं मिला, तो खड़े कोष्ठकमें उसकी अनुमानित तिथि, जहाँ आवश्यक समझा गया है, दे दी गई है। अनुमानका कारण पाद टिप्पणियां देकर स्पष्ट किया गया है। कुछ निजी पत्रोंकी मूल प्रतियोंमें विक्रमी पंचांगके अनुसार तिथियाँ मिलती
हैं। वहाँ उनके साथ ही खड़े कोष्ठकों में ग्रिगोरियन (अंग्रेजी) पंचांगके अनुसार तिथियाँ निकाली गई है और आवश्यकता पड़नेपर आन्तरिक तथा बाह्य साक्ष्यके आधारपर वर्ष निश्चित किया गया है। साधन-सूत्र के साथ अन्तमें दी गई तिथियाँ प्रकाशनकी हैं।
पाद टिप्पणीमें जहाँ भी कहीं इस मालाके खण्ड १ का हवाला दिया गया है वह अगस्त १९५८ के संस्करणसे सम्बन्धित है। "आत्मकथा" और 'दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहका इतिहास' का हवाला देते हुए उसके विभिन्न संस्करणोंका विचार रखते हुए, केवल खण्ड और परिच्छेदका उल्लेख किया गया है।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|चौदह|}}</noinclude>{{gap}}साधन-सूत्रोंमे एस० एन० संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें उपलब्ध सामग्रीका; जी० एन० गांधी स्मारक निधि तथा संग्रहालय, नई दिल्ली में उपलब्ध कागज पत्रोंका; और सी० डब्ल्यू०, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी (सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय) द्वारा संगृहीत पत्रोंका सूचक है।
इस खण्डसे सम्बन्धित और इसे अधिक अच्छी तरह समझनेमें सहायक सामग्री परिशिष्टोंके रूपमें दी गई है। अन्तमें साधन-सूत्रोंकी सूची और इस खण्डसे सम्बन्धित कालका तारीखवार जीवन-वृतान्त तथा इस खण्डकी पारिभाषिक शब्दावली भी दी गई है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|अठारह|}}
{|width=100%
|-
|१०४. || भारतकी दुर्दशा (१५-७-१९११) || १२०
|-
|१०५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-७-१९११) || १२२
|-
|१०६. || पत्र : हरिलाल गांधीको (२५-७-१९११) || १२४
|-
|१०७. || मणिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश ( २५-७-१९११के आसपास) || १२६
|-
|१०८. || मानपत्र : एच० कैलनबैकको (३१-७-१९११) || १२६
|-
|१०९. || पत्र : छगनलाल गांधीको (१-८-१९११) || १२७
|-
|११०. || श्री कैलनबैकका स्वागत (५-८-१९११) || १२९
|-
|१११. || श्री कैलनबैक (५-८-१९११) || १३१
|-
|११२. || क्षयरोग (५-८-१९११) || १३१
|-
|११३ || पत्र : एच० एल० पॉलको (७-८-१९११) || १३३
|-
|११४. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (७-८-१९११) || १३३
|-
|११५. || तूफान उमड़ रहा है (१२-८-१९११) || १३५
|-
|११६. || पत्र : गृह मन्त्रीको (१२-८-१९११) || १३६
|-
|११७. || पत्र: छगनलाल गांधीको (१३-८-१९११) || १३६
|-
|११८. || भारतीयों द्वारा श्री रिचका समर्थन (१९-८-१९११) || १३७
|-
|११९. || एक महत्वपूर्ण निर्णय (१९-८-१९११) || १३९
|-
|१२०. || शिक्षाका कलंक (१९-८-१९११ ) || १३९
|-
|१२१. || भारतीय माता-पिताओंके लिए (१९-८-१९११) || १४०
|-
|१२२. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२०-८-१९११) || १४१
|-
|१२३. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (२१-८-१९११) || १४२
|-
|१२४. || पत्र : छगनलाल और मगनलाल गांधीको (२३-८-१९११) || १४४
|-
|१२५. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२५-८-१९११) || १४६
|-
|१२६. || पत्र : जमनादास गांधीको (२८-८-१९११) || १४८
|-
|१२७. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२९-८-१९११) || १४९
|-
|१२८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (९-९-१९११) || १५०
|-
|१२९. || जर्मिस्टनके भारतीय (२३-९-१९११) || १४२
|-
|१३०. || एक क्षोभकारी मामला (२३-९-१९११) || १५३
|-
|१३१. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२४-९-१९११) || १५४
|-
|१३२. || छगनलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (२८-९-१९११से पूर्व ) || १५६
|-
|१३३. || श्री गांधी और भारतीय कांग्रेस (३०-९-१९११) || १५७
|-
|१३४. || एक पत्रका अंश (२-१०-१९११ के लगभग) || १५७
|-
|१३५. || सूखकर कांटा हो गये (७-१०-१९११) || १५८
|-
|१३६. || मूर्खराज और उनके भाई (७-१०-१९११) || १५९
|-
|१३७. || हरिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (७-१०-१९११ के आसपास) || १६०
|-
|१३८. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (१०-१०-१९११) || १६०
|-
|१३९. || आव्रजनका मामला (१४-१०-१९११) || १६२
|-
|१४०. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२२-८-१९११) || १६३
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बीस|}}
{|width=100%
|-
|१७८. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२९-१-१९१२) || २१०
|-
|१७९. || तार : गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (३०-१-१९१२) || २१२
|-
|१८०. || तार : गृहमन्त्रीके निजी सचिवको (१-२-१९१२) || २१३
|-
|१८१. || एक टिप्पणी (२-२-१९१२ या उसके बाद ) || २१४
|-
|१८२. || नया प्रवासी विधेयक ( ३-२-१९१२) || २१४
|-
|१८३. || स्व० श्री अब्दुल्ला हाजी आदम (३-२-१९१२) || २१६
|-
|१८४. || नया प्रवासी विधेयक (३-२-१९१२) || २१७
|-
|१८५. || तार : ब्रिटिश भारतीय यूनियनको (३-२-१९१२) || २२०
|-
|१८६. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (४-२-१९१२) || २२१
|-
|१८७. || प्रस्ताव : केप ब्रिटिश भारतीय यूनियनको सभामें (४-२-१९१२) || २२२
|-
|१८८. || तारः गृह-मन्त्रीको (६-२-१९१२)|| २२३
|-
|१८९. || तारः गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (७-२-१९१२) || २२४
|-
|१९०. || तार : गृह-मन्त्रीको (८-२-१९१२) || २२४
|-
|१९१. || प्रवासी विधेयक (१०-२-१९१२)|| २२५
|-
|१९२. || अकाल निवारण कोषकी पहली किस्त (१०-२-१९१२) || २२६
|-
|१९३. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (१५-२-१९१२) || २२७
|-
|१९४. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (१५-२-१९१२) || २२८
|-
|१९५. || तीन पौंडी कर (१७-२-१९१२) || २३१
|-
|१९६. || पत्र : चंचल बहन गांधीको (१८-२-१९१२) || २३३
|-
|१९७. || हरिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (१८-२-१९१२)|| २३४
|-
|१९८. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (२०-२-१९१२) || २३५
|-
|१९९. || तार : एशियाई पंजीयकको (२१-२ - १९१२से पूर्व ) || २३६
|-
|२००. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२४-२-१९१२)|| २३७
|-
|२०१. || गलत बयानी (९-३-१९१२) || २३८
|-
|२०२. || श्रीमती जसातका मामला (९-३-१९१२) || २३९
|-
|२०३. || भाषण : विदाई सभामें (९-३-१९१२) || २४१
|-
|२०४. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (११-२-१९१२)|| २४१
|-
|२०५. || गिरमिटिया प्रथा-सम्बन्धी प्रस्ताव (१६-३-१९१२) || २४२
|-
|२०६. || श्री रत्नम् पत्तर (१६-३-१९१२) || २४३
|-
|२०७. || तार : गृह-मन्त्रीको (२०-३-१९१२) || २४४
|-
|२०८. || पत्र: छगनलाल गांधीको (२४-३-१९१२) || २४४
|-
|२०९. || सार्वजनिक पत्र : रतन जे० टाटाको (१-४-१९१२) || २४५
|-
|२१०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (४-४-१९१२) || २५०
|-
|२११. || बस्तियाँ और रोग ( ६-४-१९१२) || २५१
|-
|२१२. || पत्र: मणिलाल गांधीको ( ६-४-१९१२) || २५२
|-
|२१३. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (११-४-१९१२)|| १५३
|-
|२१४. || पत्र: मणिलाल गांधीको ( १३-४-१९१२)|| १५४
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|बाईस|}}
{|width=100%
|-
|२५१. || पत्र : गृह मन्त्रीके सचिवको (३-८-१९१२) ||२९२
|-
|२५२. || बली वोरा और चंचलबह्न गांधीको लिखे पत्रका अंश (३-८-१९१२के बाद)||२९२
|-
|२५३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (४-८-१९१२) ||२९४
|-
|२५४.|| श्री टाटाकी उदारता (१०-८-१९१२)||२९५
|-
|२५५.||शैरिफकी सभा ( १०-८-१९१२)||२९६
|-
|२५६.||अवैध विनियम ( १०-८-१९१२)||२९७
|-
|२५७.||माननीय श्री गोखले (१०-८-१९१२)||२९७
|-
|२५८.||पत्र : छगनलाल गांधीको (१६-८-१९१२)||२९८
|-
|२५९.|| जोहानिसबर्गमें चेचक (१७-८-१९१२)||३००
|-
|२६०.||जोहानिसबर्गमें चेचक (१७-८-१९१२)||३०१
|-
|२६१.|| पत्र : एशियाई-पंजीयकको (१९-८-१९१२)||३०२
|-
|२६२.||भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (२२-८-१९१२)||३०२
|-
|२६३.||एक उदात्त जीवनगाथा (२४-८-१९१२ )||३०४
|-
|२६४.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभा (२५-८-१९१२)||३०७
|-
|२६५.||भाषण : ब्रिटिश भारतीय संघकी सभामें (२५-८-१९१२)||३०९
|-
|२६६.||पत्र : हरिलाल गांधीको (२९-८-१९१२)||३०९
|-
|२६७.||श्री ह्यूमका देहान्त (३१-८-१९१२)||३१०
|-
|२६८.||ट्रान्सवालमें रेल यात्रा (३१-८-१९१२ )||३११
|-
|२६९.||स्पष्टतः कष्टदायक (३१-८-१९१२)||३१२
|-
|२७०.||पत्र : हरिलाल गांधीको (५-९-१९१२)||३१३
|-
|२७१.||श्री और श्रीमती पोलक (७-९-१९१२)||३१४
|-
|२७२.||महाविभव आगाखाँ (७-९-१९१२)||३१५
|-
|२७३.. || तुमसे ऐसी आशा नहीं थी ! (९-७-१९१२)||३१६
|-
|२७४.|| फीनिक्सका न्यासपत्र (१४-९-१९१२)||३१८
|-
|२७५.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२२
|-
|२७६.|| जोहानिसबर्गका प्रस्तावित स्कूल (१४-९-१९१२)||३२३
|-
|२७७.|| अधिकारियों द्वारा कानूनकी अवज्ञामें वृद्धि (१४-९-१९१२)||३२४
|-
|२७८.|| अपने विषयमें (१४-९-१९१२)||३२५
|-
|२७९.|| मुसलमान पत्नियाँ (२१-९-१९१२)||३२७
|-
|२८०.|| प्रवासी अधिकारियोंके कान फिर खींचे गये (२८-९-१९१२)||३२८
|-
|२८१.|| माननीय श्री गोखलेका शुभागमन (५-१०-१९१२)||३२९
|-
|२८२.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१६-१०-१९१२ )||३३०
|-
|२८३.|| श्री गोखलेका आगमन (१९-१०-१९१२ )||३३१
|-
|२८४.|| भेंट : 'केप आर्गस' को (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८५.|| भाषण : केप टाउनमें गो० कृ० गोखलेकी स्वागत-सभायें (२२-१०-१९१२)||३३२
|-
|२८६.|| भाषण : किम्बर्लेकी सभामें (२५-१०-१९१२ )||३३४
|-
|२८७.|| भाषण : किम्बर्लेमें गोखलेको दिये गये भोजके अवसरपर (२६-१०-१९१२)||३३५
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|तेईस|}}
{|width=100%
|-
|२८८.|| ब्रिटिश भारतीय संघकी ओरसे मा० श्रीगोखलेको मानपत्र (२९-१०-१९१२)||३३८
|-
|२८९.|| जोहानिसबर्गके हिन्दुओंकी ओरसे गो० कृ० गोखलेको मानपत्र(२९-१०-१९१२)||३३९
|-
|२९०.|| भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (३०-१०-१९१२)||३४०
|-
|२९१.|| भाषण : गोखलेके सम्मानार्थ जोहानिसबर्ग में आयोजित भोजके अवसरपर (३०-१०-१९१२)||३४२
|-
|२९२.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (३-११-१९१२)||३४३
|-
|२९३.|| भाषण : मैरित्सबर्ग में गोखलेके स्वागत समारोह के अवसरपर (७-११-१९१२)||३४४
|-
|२९४.||भाषण : गोखलेके सम्मानमें मैरित्सबर्गके जलपान-आयोजनमें (८-११-१९१२)||३४५
|-
|२९५.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके स्वागत समारोह में (८-११-१९१२)||३४६
|-
|२९६.|| भाषण : डर्बनमें गोखलेके सम्मान-भोजमें (११-११-१९१२)||३४७
|-
|२९७.|| भाषण : प्रिटोरियामें गोखलेके स्वागत समारोहमें (१४-१२-१९१२)||३४७
|-
|२९८.|| पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-११-१९१२ के आसपास)||३४८
|-
|२९९.|| पत्र : जमनादास गांधीको (१७-११-१९१२)||३४९
|-
|३००.|| भाषण : लोरेंको माक्विसमें गोखलेके सम्मानमें आयोजित भोजके अवसरपर (१८-१२-१९१२) ||३४९
|-
|३०१.|| एक तार (१८-११-१९१२ या उसके बाद )||३५०
|-
|३०२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (५-१२-१९१२ )||३५०
|-
|३०३.||अपनी भाषाओंके माध्यमसे शिक्षण (७-१२-१९१२)||३५१
|-
|३०४.|| पत्र : जमनादास गांधीको (२८-१२-१९१२ )||३५२
|-
|३०५.|| श्री गोखले स्वदेश पहुँचे (२१-१२-१९१२)||३५५
|-
|३०६. ||श्री गांधी " नजरकैद ” (२३-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०७.|| भयंकर अनर्थ (२८-१२-१९१२)||३५६
|-
|३०८.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२८-१२-१९१२)||३५९
|-
|३०९.|| डायरी : १९१२||३६०
|-
|३१०.|| राष्ट्रीय कांग्रेसमें श्री गोखले (४-१-१९१३)||४१८
|-
|३११. ||'इंडियन ओपिनियन' के पाठकोंके नाम (४-१-१९१३)||४१९
|-
|३१२. ||सम्राट्की भारतीय नौसेना (४-१-१९१३)||४२०
|-
|३१३.|| भारतमें श्री गोखलेका भाषण (४-१-१९१३)||४२१
|-
|३१४. ||डेकके यात्री (४-१-१९१३)||४२३
|-
|३१५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१] (४-१-१९१३)||४२५
|-
|३१६.|| पत्र: मणिलाल इच्छाराम देसाईको (९-१-१९१३ या उसके बाद)||४२७
|-
|३१७. ||" अनुग्रह" का एक कार्य (११-१-१९१३)||४२८
|-
|३१८. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-२] (११-१-१९१३)||४३०
|-
|३१९. ||पत्र: मणिलाल गांधीको (१८-१-१९१३ से पूर्व)||४३३
|-
|३२०. ||क्या फिर सत्याग्रह करना पड़ेगा ? (१८-१-१९१३)||४३३
|-
|३२१.|| गिरमिट प्रथा (१८-१-१९१३)||४३४
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|चौबीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३२२.|| भारतीय बच्चोंकी शिक्षा (१८-१-१९१३)||४३५
|-
|३२३.|| इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक (१८-१-१९१३)||४३६
|-
|३२४.|| लॉर्ड ऍम्टहिलकी समिति (१८-१-१९१३)||४३६
|-
|३२५.|| माँ-बापका फर्ज (१८-१-१९१३)||४३७
|-
|३२६.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-३] (१८-१-१९१३)||४३७
|-
|३२७.|| काफी देरसे (२५-१-१९१३)||४३९
|-
|३२८.|| परवानेसे सम्बन्धित प्रश्न (२५-१-१९१३)||४४०
|-
|३२९.|| भारतीय महिलाओं द्वारा आयोजित बाजार (२५-१-१९१३)||४४१
|-
|३३०.|| हमारी लापरवाही (२५-१-१९१३)||४४१
|-
|३३१.|| “शुं देशनो उदय एम करी शकाये ? " (२५-१-१९१३)||४४२
|-
|३३२.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-४] (२५-१-१९१३)||४४३
|-
|३३३.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (२५-१-१९१३)||४४५
|-
|३३४.|| एक संशोधन (१-२-१९१३)||४४६
|-
|३३५.|| हेट सॉंगवाद (१-२-१९१३)||४४७
|-
|३३६.|| जर्मिस्टनके भारतीय (१-२-१९१३)||४४९
|-
|३३७.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-५] (१-२-१९१३)||४४९
|-
|३३८.|| प्रवासके दो मामले (८-२-१९१३)||४५१
|-
|३३९.|| कांग्रेसमें हमारे सवालपर विचार (८-२-१९१३)||४५२
|-
|३४०.|| श्री गोखलेके प्रयत्नका फल (८-२-१९१३)||४५४
|-
|३४१.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-६] (८-२-१९१३)||४५४
|-
|३४२.|| पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१४-३-१९१३)||४५७
|-
|३४३.|| श्री गोखलेके भारतीय भाषण (१५-२-१९१३)||४५८
|-
|३४४.||बढ़िया सुझाव (१५-२-१९१३)||४६०
|-
|३४५.||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-७] (१५-२-१९१३)||४६०
|-
|३४६.||श्री गोखले देशमें (२२-२-१९१३)||४६३
|-
|३४७. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-८] (२२-२-१९१३)||४६४
|-
|३४८.|| पत्र : एच० एल० पॉलको ( २५-२-१९१३)||४६८
|-
|३४९. ||जोहानिसबर्गकी पाठशाला (१-३-१९१३)||४६८
|-
|३५०.|| आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-९] (१४-३-१९१३)||४६९
|-
|३५१.|| पत्र : गृह-सचिवको (४-३-१९१३)||४७३
|-
|३५२. ||स्वागत (८-३-१९१३)||४७४
|-
|३५३.|| गोगाका मामला (८-३-१९१३)||४७५
|-
|३५४.|| भवानीदयालका मामला (८-३-१९१३)||४७५
|-
|३५५. ||आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [१०] (८-३-१९१३)||४७६
|-
|३५६.|| पत्र : हरिलाल गांधीको (१४-३-१९१३)||४८१
|-
|३५७. ||पत्र : जमनादास गांधीको (१४-३-१९१३)||४८२
|-
|३५८.||एक सार्वजनिक उदाहरण (१५-३-१९१३)||४८५
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३२
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सीमा1
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|छब्बीस|}}
{|width=100%
|-
|१७. || संघ संसद में प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) के सम्बन्धमें स्मट्सका भाषण ||५५१
|-
|१८. || अस्थायी समझौतेके सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड ऍम्टहिलका भाषण || ५५५
|-
|१९.|| कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ || ५५९
|-
|२०. || गांधीजीके नाम गोखलेका पत्र || ५६१
|-
|२१. || स्वर्ण-कानून और कस्वा अधिनियम (१९०८ ) के बारेमें भारत सरकारको पोलकका पत्र || ५६२
|-
|२२. || गोखलेके साथ हुई भेंटपर ग्लैडस्टनकी टिप्पणी || ५६६
|-
|२३. || बम्बई में गोखलेका भाषण || ५६८
|-
|२४. || सिलबर्न और एफ० सी० हॉलेंडरको गोखलेका उत्तर || ५७७
|-
|२५. || गांधीजीके नाम गृह सचिवका पत्र || ५७९
|-
||| सामग्री के साधन-सूत्र || ५८१
|-
||| तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ५८२
|-
||| पारिभाषिक शब्दावली || ६०८
|-
||| शीर्षक सांकेतिका || ६१०
|-
||| सांकेतिका || ६१३
|-
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/१७
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|
|-
|६१.|| पत्र : प्रतापसिंहको (२५-२-१९२६)|| ५७
|-
|६२.|| पत्र : ए० अरुणाचलम् पिल्लेको (२६-२-१९२६)|| ५८
|-
|६३.|| पत्र : डॉ० नायडूको (२६-२-१९२६)|| ५८
|-
|६४.|| पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त-सम्बन्धी प्रस्तावोंका मसविदा (२७-२-१९२६)|| ५९
|-
|६५.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२७-२-१९२६)|| ५९
|-
|६६.|| सूत्रयज्ञ (२८-२-१९२६)|| ६०
|-
|६७.|| सम्राट्का गुस्सा (२८-२-१९२६)|| ६१
|-
|६८.|| सच्ची शिक्षा क्या है? (२८-२-१९२६)|| ६२
|-
|६९.|| भाषण : एक विवाह में (२८-२-१९२६)|| ६४
|-
|७०.|| पत्र : जे० बी० पेटिटको (२-३-१९२६)|| ६७
|-
|७१.|| पत्र : लाला लाजपतरायको (२-३-१९२६)|| ६८
|-
|७२.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२-३-१९२६)|| ६९
|-
|७३.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (३-३-१९२६)|| ७०
|-
|७४.|| पत्र : मौलाना मुहम्मद शफीको (३-३-१९२६)|| ७०
|-
|७५.|| पत्र : गोपालदासको (३-३-१९२६)|| ७१
|-
|७६.|| टिप्पणियाँ : किशोरोंके लिए; स्वयं कातनेवालोंके लिए; 'आत्मकथा' के सम्बन्धमें (४-३-१९२६)|| ७१
|-
|७७.|| एक प्रतिवाद (४-३-१९२६)|| ७४
|-
|७८.|| रुईकी माँग (४-३-१९२६)|| ७५
|-
|७९.|| भारतीय नारियोंकी सेवा संस्था (४-३-१९२६)|| ७६
|-
|८०.|| अपने नग्न रूपमें (४-३-१९२६)|| ७८
|-
|८१.|| पत्र : हरिभाऊको (४-३-१९२६)|| ८०
|-
|८२.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-३-१९२६)|| ८१
|-
|८३.|| पत्र : के० बी० मेननको (५-३-१९२६)|| ८२
|-
|८४.|| पत्र : एलिस मैक्के केलीको (५-३-१९२६)|| ८२
|-
|८५.|| पत्र : एडविन एम० स्टैंडिंगको (५-३-१९२६)|| ८३
|-
|८६.|| पत्र : मौलाना एम० मुजीबको (५-३-१९२६)|| ८४
|-
|८७.|| पत्र : डॉ० प्रतापचन्द्र गुहा रायको (५-३-१९२६)|| ८५
|-
|८८.|| पत्र : जे० वी० बेथमैनको (५-३-१९२६)|| ८६
|-
|८९.|| पत्र : कृष्णदासको (५-३-१९२६)|| ८६
|-
|९०.|| पत्र : एम० ए० अन्सारीको (५-३-१९२६)|| ८७
|-
|९१.|| पत्र : डाह्याभाई म० पटेलको (५-३-१९२६)|| ८८
|-
|९२.|| पत्र : एम० के० आचार्यको (६-३-१९२६)|| ८८
|-
|९३.|| पत्र : शिवाभाई जी० पटेलको (६-३-१९२६)|| ८९<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/१८
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<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|चौदह}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|९४.|| पत्र : हरसुखरायको (६-३-१९२६)|| ९०
|-
|९५.|| विशुद्ध धार्मिक विधिसे (७-३-१९२६)|| ९०
|-
|९६.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (९-३-१९२६)|| ९४
|-
|९७.|| पत्र : तुलसी मेहरको (१०-३-१९२६)|| ९५
|-
|९८.|| तार : हाजीको (१०-३-१९२६ को या उसके पश्चात्)|| ९६
|-
|९९.|| एन्ड्रयूजकी व्यथा ( ११-३-१९२६)|| ९६
|-
|१००.|| अब भी समस्यासे आँखें चुरा रहे हैं (११-३-१९२६)|| ९८
|-
|१०१.|| टिप्पणियाँ: कविवर और चरखा; अमेरिका क्यों नहीं जाते? भूल सुधार, किशोरोंके लिए (११-३-१९२६)|| १००
|-
|१०२.|| टिप्पणी : कांग्रेस के सदस्य बननेवालोंको (११-३-१९२६)|| १०४
|-
|१०३.|| पत्र : पी० एस० आर० चौधरीको (११-३-१९२६)|| १०४
|-
|१०४.|| पत्र : डी० हनुमन्तरावको (११-३-१९२६)|| १०५
|-
|१०५.|| पत्र : केलप्पनको (११-३-१९२६)|| १०७
|-
|१०६.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (११-३-१९२६)|| १०७
|-
|१०७.|| पत्र : सुन्दरस्वरूपको (११-३-१९२६)|| १०८
|-
|१०८.|| एक पत्र (११-३-१९२६)|| १०८
|-
|१०९.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (११-३-१९२६)|| १०९
|-
|११०.|| पत्र : टी० के० माधवन्को (११-३-१९२६)|| ११०
|-
|१११.|| पत्र : सुरेश बाबूको (११-३-१९२६)|| १११
|-
|११२.|| सन्देश : 'लिबरेटर' को (११-३-१९२६)|| १११
|-
|११३.|| पत्र : चुनीलालको (११-३-१९२६)|| ११२
|-
|११४.|| सन्देश : 'हिन्दुस्तानी' को (१२-३-१९२६)|| ११३
|-
|११५.|| पत्र : शार्दूलसिंह कवीसरको (१२-३-१९२६)|| ११३
|-
|११६.|| पत्र : एक ग्राहकको (१२-३-१९२६)|| ११५
|-
|११७.|| अपील : भारतीय कला और शिल्पके लिए (१२-३-१९२६)|| ११६
|-
|११८.|| पत्र : दीपक चौधरीको (१२-३-१९२६)|| ११६
|-
|११९.|| पत्र : लल्लूभाई ब० पटेलको (१२-३-१९२६)|| ११७
|-
|१२०.|| पत्र : कस्तूरचन्द सू० मरफतियाको (१२-३-१९२६)|| ११७
|-
|१२१.|| पत्र : आनन्दप्रियको (१३-३-१९२६)|| ११८
|-
|१२२.|| पत्र : शुकदेव प्रसादसिंहको (१३-३-१९२६)|| ११८
|-
|१२३.|| अविश्वास या उचित सावधानी ? (१४-३-१९२६)|| ११९
|-
|१२४.|| कुरीतियोंके साम्राज्यमें क्या करें ? (१४-३-१९२६)|| १२०
|-
|१२५.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१४-३-१९२६)|| १२१
|-
|१२६.|| पत्र : राजबहादुरको (१४-३-१९२६)|| १२२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/१९
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<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|पन्द्रह}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|१२७.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१४-३-१९२६)|| १२३
|-
|१२८.|| पत्र : मंगलभाई शा० पंचालको (१४-३-१९२६)|| १२३
|-
|१२९.|| पत्र : अयोध्याप्रसादको (१४-३-१९२६)|| १२४
|-
|१३०.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (१५-३-१९२६)|| १२५
|-
|१३१.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (१५-३-१९२६)|| १२५
|-
|१३२.|| पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चौकसीको (१५-३-१९२६)|| १२६
|-
|१३३.|| पत्र : पी० जी० मलकानीको (१६-३-१९२६)|| १२७
|-
|१३४.|| कैथरीन मेयोके साथ हुई बातचीतका विवरण (१७-३-१९२६) || १२७
|-
|१३५.|| पत्र : विधानचन्द्र रायको (१७-३-१९२६)|| १३३
|-
|१३६.|| पत्र : डॉ० सत्यपालको (१७-३-१९२६)|| १३४
|-
|१३७.|| पत्र : बर्रा सत्यनारायणको (१७-३-१९२६)|| १३५
|-
|१३८.|| पत्र : उर्मिला देवीको (१७-३-१९२६)|| १३६
|-
|१३९.|| पत्र : दीनशा म० मुन्शीको (१७-३-१९२६)|| १३७
|-
|१४०.|| पत्र : गंगाराम छत्रालाको (१७-३-१९२६)|| १३८
|-
|१४१.|| टिप्पणियाँ: राष्ट्रीय सप्ताह; म्युनिसिपल स्कूलोंमें कताई; एक विलक्षण सुझाव; निराश नहीं; खादीके सम्बन्ध में (१८-३-१९२६) || १३८
|-
|१४२.|| एक नीरस परिसंवाद (१८-३-१९२६)|| १४४
|-
|१४३.|| केवल परिमाणका भेद (१८-३-१९२६)|| १४५
|-
|१४४.|| पत्र : जोआकिम हेनरी राइनहोल्डको (१८-३-१९२६)|| १४८
|-
|१४५.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१८-३-१९२६)|| १४८
|-
|१४६.|| पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (१८-३-१९२६)|| १४९
|-
|१४७.|| पत्र : मॉड चीजमैनको (१९-३-१९२६)|| १५०
|-
|१४८.|| पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (१९-३-१९२६)|| १५१
|-
|१४९.|| पत्र : उमरावसिंहको (१९-३-१९२६)|| १५२
|-
|१५०.|| पत्र : पूँजा श्रवणको (१९-३-१९२६)|| १५२
|-
|१५१.|| पत्र : गिरधरलालको (१९-३-१९२६)|| १५३
|-
|१५२.|| पत्र : परशुराम मेहरोत्राको (२०-३-१९२६)|| १५४
|-
|१५३.|| पत्र : नलिनी रंजन सरकारको (२०-३-१९२६)|| १५५
|-
|१५४.|| पत्र : लाला लाजपतरायको (२०-३-१९२६)|| १५५
|-
|१५५.|| पत्र : सी० रामलिंग रेड्डीको (२०-३-१९२६)|| १५७
|-
|१५६.|| पत्र : एक महिलाको (२०-३-१९२६)|| १५७
|-
|१५७.|| पत्र : धनजीको (२०-३-१९२६)|| १५८
|-
|१५८.|| पत्र : काका कालेलकरको (२०-३-१९२६)|| १५९
|-
|१५९.|| पत्र : प्रभुदासको (२०-३-१९२६)|| १६०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२०
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<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|सोलह}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|१६०.|| एक चरखा-प्रेमीका दुःख (२१-३-१९२६)|| १६१
|-
|१६१.|| स्वीकृति (२१-३-१९२६)|| १६२
|-
|१६२.|| बंगालकी विशेषता (२१-३-१९२६)|| १६२
|-
|१६३.|| जाति-सुधार (२१-३-१९२६)|| १६४
|-
|१६४.|| गुजरातमें खादीकी मासिक प्रगति (२१-३-१९२६)|| १६४
|-
|१६५.|| पत्र : श्रीमती हनुमन्तरावको (२१-३-१९२६)|| १६५
|-
|१६६.|| पत्र : डी० वी० रामस्वामीको (२१-३-१९२६)|| १६६
|-
|१६७.|| पत्र : सी० वी० कृष्णको (२१-३-१९२६)|| १६६
|-
|१६८.|| पत्र : देवदास गाँधीको (२१-३-१९२६)|| १६७
|-
|१६९.|| पत्र : रामनारायणसिंहको (२१-३-१९२६)|| १६८
|-
|१७०.|| पत्र : चुन्नीलाल रंगवालाको (२१-३-१९२६)|| १६८
|-
|१७१.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (२१-३-१९२६)|| १६९
|-
|१७२.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२१-३-१९२६)|| १७०
|-
|१७३.|| भाषण : संगीतके बारेमें (२१-३-१९२६)|| १७०
|-
|१७४.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (२२-३-१९२६)|| १७२
|-
|१७५.|| पत्र : काका कालेलकरको (२३-३-१९२६)|| १७३
|-
|१७६.|| पत्र : वीरसुतको (२३-३-१९२६)|| १७५
|-
|१७७.|| पत्र : लालजीको (२३-३-१९२६)|| १७५
|-
|१७८.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (२४-३-१९२६)|| १७६
|-
|१७९.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (२४-३-१९२६)|| १७६
|-
|१८०.|| पत्र : अब्दुर्रहमानको (२४-३-१९२६)|| १७७
|-
|१८१.|| पत्र : स्वामी श्रद्धानन्दको (२४-३-१९२६)|| १७७
|-
|१८२.|| पत्र : आनन्दलालको (२४-३-१९२६)|| १७८
|-
|१८३.|| पत्र : जयसुखलालको (२४-३-१९२६)|| १७८
|-
|१८४.|| पत्र : कृष्णदासको (२४-३-१९२६)|| १८०
|-
|१८५.|| टिप्पणियाँ : चित्तरंजन सेवासदन; क्या उसपर अमल होगा ? खादीके मासिक आँकड़े (२५-३-१९२६)|| १८०
|-
|१८६.|| उनकी उलझन (२५-३-१९२६)|| १८२
|-
|१८७.|| एक भारत-सेवक (२५-३-१९२६)|| १८४
|-
|१८८.|| “स्वत्वाधिकारका आग्रह रखें" (२५-३-१९२६)|| १८५
|-
|१८९.|| तमिलनाडुका एक गाँव ( २५-३-१९२६)|| १८६
|-
|१९०.|| पत्र : प्रतापसिंहको (२५-३-१९२६)|| १८८
|-
|१९१.|| पत्र : फूलचन्दको (२५-३-१९२६)|| १८८
|-
|१९२.|| तार : जमनालाल बजाजको (२६-३-१९२६)|| १९०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२१
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शिखर तिवारी
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<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|सत्रह}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|१९३.|| पत्र : जे० ई० डेनिसनको (२६-३-१९२६)|| १९०
|-
|१९४.|| पत्र : कैथरीन मेयोको (२६-३-१९२६)|| १९१
|-
|१९५.|| पत्र : अमूल्यचन्द्र सेनको (२६-३-१९२६)|| १९२
|-
|१९६.|| पत्र : मुहम्मद शफीको (२६-३-१९२६)|| १९३
|-
|१९७.|| पत्र : हकीम अजमलखाँको (२६-३-१९२६)|| १९३
|-
|१९८.|| पत्र : मरियम आइजकको (२६-३-१९२६)|| १९५
|-
|१९९.|| पत्र : डी० वी० रामस्वामीको (२६-३-१९२६)|| १९६
|-
|२००.|| पत्र : चीनी मित्रोंको (२६-३-१९२६)|| १९६
|-
|२०१.|| पत्र : मीठाबाईको (२६-३-१९२६)|| १९७
|-
|२०२.|| पत्र : मावजीको (२६-३-१९२६)|| १९७
|-
|२०३.|| पत्र : हरबर्ट ऐंडर्सनको (२७-३-१९२६)|| १९८
|-
|२०४.|| पत्र : फेड्रिक हाइलरको (२७-३-१९२६)|| १९९
|-
|२०५.|| पत्र : जी० पी० नायरको (२७-३-१९२६)|| १९९
|-
|२०६.|| पत्र : मौलाना मुहम्मद अलीको (२७-३-१९२६)|| २००
|-
|२०७.|| पत्र : आर० डी० टाटाको (२७-३-१९२६)|| २०१
|-
|२०८.|| पत्र : सी० ए० अलेक्जेंडरको (२७-३-१९२६)|| २०२
|-
|२०९.|| पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चौकसीको (२७-३-१९२६)|| २०३
|-
|२१०.|| पत्र: प्रभुदास गांधीको (२७-३-१९२६)|| २०३
|-
|२११.|| पत्र : देवदास गांधीको (२७-३-१९२६)|| २०४
|-
|२१२.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२७-३-१९२६)|| २०४
|-
|२१३.|| कुछ धार्मिक प्रश्न (२८-३-१९२६)|| २०५
|-
|२१४.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२८-३-१९२६)|| २०८
|-
|२१५.|| पत्र : कुँवरजी वी० मेहताको (२८-३-१९२६)|| २०९
|-
|२१६.|| पत्र : मीठूबहन पेटिटको (२८-३-१९२६)|| २१०
|-
|२१७.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (२८-३-१९२६)|| २११
|-
|२१८.|| पत्र : फूकनको (२९-३-१९२६)|| २११
|-
|२१९.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-३-१९२६)|| २१२
|-
|२२०.|| पत्र : प्रभालक्ष्मीको (३०-३-१९२६)|| २१३
|-
|२२१.|| पत्र : जमनादासको (३०-३-१९२६)|| २१४
|-
|२२२.|| पत्र : कुँवरजीको (३०-३-१९२६)|| २१४
|-
|२२३.|| पत्र : प्राणजीवनदास मेहताको (३०-३-१९२६)|| २१५
|-
|२२४.|| पत्र : लक्ष्मीदासको (३०-३-१९२६)|| २१५
|-
|२२५.|| पत्र : निर्भयराम वि० कानाबारको (३०-३-१९२६)|| २१६
|-
|२२६.|| पत्र : कान्तिलाल मो० दलालको (३०-३-१९२६)|| २१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>शासन प्रणालीसे घृणा कर सकते हैं, तब मेरे कुछ भारतीय मित्र मुझपर कपटाचारका दोष मढ़ते हैं। मैं उन्हें यह बतानेकी कोशिश कर रहा हूँ कि किसी भी व्यक्तिके लिए अपने भाईकी दुष्टतासे घृणा करनेपर भी अपने भाईसे घृणा न करना सम्भव है। ईसाने स्क्राइब्स<ref>ईसाके समयके यहूदी पुरोहित।</ref> और फैरिसियोंकी<ref>एक यहूदी जाति।</ref> दुष्टतासे घृणा करनेपर भी उनसे घृणा नहीं की थी। उन्होंने व्यक्तिके प्रति प्रेम और उसकी बुराईके प्रति घृणाका कानून केवल अपने लिए नहीं बनाया, बल्कि यह सिखाया कि इसका सार्वजनिक व्यवहारमें उपयोग करें। वस्तुतः संसारके सभी धर्म-ग्रंथोंमें मैंने इसका उल्लेख पाया है।
मैं दावा करता हूँ कि मुझे मानवीय स्वभाव तथा अपनी कमजोरियोंका काफी हदतक सही ज्ञान है। अनुभवसे मैंने यह जाना है कि अपने ही द्वारा प्रस्तुत प्रणालीकी अपेक्षा आदमी स्वयं अच्छा होता है। और इसलिए मैं अनुभव करता हूँ कि वैयक्तिक रूपमें आप उस प्रणालीसे बहुत अच्छे हैं जिसे आपने संघके रूपमें विकसित किया है। १० अप्रैलके दिन अमृतसरमें मेरा प्रत्येक देशभाई जिस भीड़में शामिल था उससे अच्छा था। वह एक व्यक्तिके रूपमें उन निर्दोष अंग्रेज बैंक मैनेजरोंकी हत्या करनेसे इनकार कर देता। किन्तु उस भीड़में बहुतसे आदमी अपनेको भूल गये। इसीलिए दफ्तरमें बैठा अंग्रेज उससे बाहरके अंग्रेजसे भिन्न है। इसी प्रकार भारतमें रहनेवाला अंग्रेज, इंग्लैंडमें रहनेवाले अंग्रेजसे भिन्न है। यहाँ भारतमें आप जिस प्रणालीसे सम्बन्धित हैं वह इतनी निकृष्ट है कि उसका वर्णन ही नहीं हो सकता। अतः मेरे लिए यह सम्भव है कि मैं आपको बुरा समझे बिना तथा प्रत्येक अंग्रेजपर बुरे उद्देश्यका दोष मढ़े बिना कठोरसे-कठोर शब्दोंमें उक्त प्रणालीकी निन्दा कर सकूँ। इस प्रणालीके आप भी उतने ही गुलाम हैं जितने कि हम। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि आप भी मेरे प्रति ऐसा ही व्यवहार करें और मुझपर उन इरादोंका दोष न मढ़ें जो आपको मेरे लिखित शब्दोंमें उपलब्ध न हों। मैं जब यह कहता हूँ कि मैं उस प्रणालीको विनष्ट करने या सुधारनेके लिए अधीर हूँ जिसने भारतको आपके मुट्ठी-भर देशवासियोंका गुलाम बनाया है और जिसके कारण अंग्रेज भारतमें अपनेको किलों तथा उन तोपोंकी छायामें ही सुरक्षित अनुभव करते हैं जो यहाँ इस देशमें जहाँ-तहाँ दर्शकोंका ध्यान अपनी ओर बरबस खींचती हैं तो आप समझ लीजिए कि अपने इस कथनमें मैं पूरी तरह अपना इरादा आपके सामने रख चुका। यह आपके और हमारे लिए एक अपमानजनक दृश्य है। राजविधि द्वारा गठित हमारा जीवन पारस्परिक अविश्वास और भयपर आधारित है। आप स्वीकार करेंगे कि यह इन्सानियत नहीं है। जिसके कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। उस प्रणालीको राक्षसी ही कहना होगा। आप भारतीयोंका अखण्ड भाग बनकर भारतमें रह सकते हैं, विदेशी शोषक बनकर सदा नहीं रह सकते। एक अंग्रेजकी जानके बदले १,००० भारतीयोंकी जानें! यह एक अत्यन्त निराशाजनक सिद्धान्त है, लेकिन आप मुझपर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>पत्र : भारतके अंग्रेजोंके नाम
३८१
विश्वास कीजिए, भारतमें आपके उच्चतम अधिकारियोंने १९१९ में इस सिद्धान्त की
घोषणा की थी ।
मैं आपसे यह कहने के लिए लालायित हूँ कि आप आगे बढ़ें और इस प्रणालीको
विनष्ट करने में मेरा हाथ बँटायें, जिसने हमें और आपको नीचे गिरा दिया है। किन्तु
मैं अनुभव करता हूँ कि अभी ऐसा सम्भव नहीं है । हमने स्वयं उसे समाप्त करने के
लिए पर्याप्त तत्परता, आत्मत्याग और आत्मसंयम नहीं दिखाया है ।
किन्तु मैं आपसे इतना जरूर कहता हूँ कि आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार
तथा मद्यनिषेध आन्दोलनमें हमारी सहायता करें।
लंकाशायरका कपड़ा जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारोंने बताया है, भारतपर जबर-
दस्ती लादा गया और जान-बूझकर व्यवस्थित रूपसे उसके विश्व प्रसिद्ध उत्पादकोंको
नष्ट कर दिया गया। इसलिए भारत न केवल लंकाशायर बल्कि जापान, फ्रांस और
अमरीकाकी दयापर भी निर्भर है। हम कपड़े के लिए प्रतिवर्ष (न्यूनाधिक रूपमें) ६०
करोड़ रुपये भारतसे बाहर भेजते हैं । हम अपने कपड़ोंके लिए काफी मात्रामें रुई पैदा
करते हैं। क्या यह पागलपन नहीं है कि रुई भारतसे बाहर भेजी जाये और वहाँ
उससे कपड़ा तैयार करके फिर जहाज द्वारा हमारे पास वापस ले आया जाये ? क्या
भारतका इस निःसहाय अवस्थातक पहुँचाना सही था ?
डेढ़ सौ साल पहले हम अपना सारा कपड़ा तैयार करते थे । हमारी महिलाएँ
अपनी झोपड़ियोंमें बारीक सूत कातती थीं और अपने पतियोंकी कमाईमें वृद्धि करती
थीं। गाँवके जुलाहे उस सूतसे कपड़े बुनते थे। हमारे जैसे विशाल कृषिप्रधान देशमें
यह राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्थाका अपरिहार्य अंग था । इसके कारण हम अपने खाली
समयका स्वाभाविक ढंगसे उपयोग कर सकते थे। आज हमारी महिलाएँ अपने हाथोंकी
कुशलता खो बैठी हैं और लाखों लोगोंपर जबरदस्ती थोपी गई इस निष्क्रियताने देशको
गरीब बना दिया है । बहुतसे जुलाहोंने भंगीका काम सँभाल लिया है। कुछने किराये के
सिपाही बननेका पेशा अपना लिया है। कलाकार जुलाहोंकी आधी जाति नेस्तनाबूद
हो गई है और आधे बचे-खुचे जुलाहे हाथ-कता बारीक सूत न मिलने के कारण आयात
किये गये विदेशी सूतसे कपड़े बुन रहे हैं ।
अब शायद आप समझेंगे कि भारतके लिए विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका क्या
अर्थ है । इसकी योजना बदला लेनेकी दृष्टिसे नहीं बनाई गई है। यदि सरकार आज
खिलाफत तथा पंजाब के साथ किये गये अत्याचारोंका प्रतिकार कर दे और भारतको
तुरन्त स्वराज्य देने की अनुमति दे दे, फिर भी बहिष्कार आन्दोलन निश्चित रूपसे
चलता रहेगा । स्वराज्यका अर्थ है कमसे कम इतना अधिकार प्राप्त करना जिससे
राष्ट्रके आर्थिक अस्तित्व के लिए महत्त्वपूर्ण भारतीय उद्योगोंकी रक्षा हो सके और
आर्थिक अस्तित्वको खतरा पहुँचानेवाले आयातोंको बन्द किया जा सके । कृषि और
चरखा राष्ट्र रूपी शरीरके दो फेफड़े हैं। किसी भी कीमतपर उनके क्षयको बचाना
नितान्त आवश्यक है ।
इस मामलेपर अब लिखनेकी आवश्यकता नहीं। जब कृषिके सहायक विशाल
परिमाणमें उत्पादन करनेवाले एक ऐसे व्यवसायके अभाव में सारा राष्ट्र भूखसे मर
Gandhi Heritage Portall<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||पत्र : भारतके अंग्रेजोंके नाम|३८१}}</noinclude>विश्वास कीजिए, भारतमें आपके उच्चतम अधिकारियोंने १९१९ में इस सिद्धान्तकी घोषणा की थी।
मैं आपसे यह कहनेके लिए लालायित हूँ कि आप आगे बढ़ें और इस प्रणालीको विनष्ट करनेमें मेरा हाथ बँटायें, जिसने हमें और आपको नीचे गिरा दिया है। किन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि अभी ऐसा सम्भव नहीं है। हमने स्वयं उसे समाप्त करनेके लिए पर्याप्त तत्परता, आत्मत्याग और आत्मसंयम नहीं दिखाया है।
किन्तु मैं आपसे इतना जरूर कहता हूँ कि आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा मद्यनिषेध आन्दोलनमें हमारी सहायता करें।
लंकाशायरका कपड़ा जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारोंने बताया है, भारतपर जबरदस्ती लादा गया और जान-बूझकर व्यवस्थित रूपसे उसके विश्व प्रसिद्ध उत्पादकोंको नष्ट कर दिया गया। इसलिए भारत न केवल लंकाशायर बल्कि जापान, फ्रांस और अमरीकाकी दयापर भी निर्भर है। हम कपड़ेके लिए प्रतिवर्ष (न्यूनाधिक रूपमें) ६० करोड़ रुपये भारतसे बाहर भेजते हैं। हम अपने कपड़ोंके लिए काफी मात्रामें रुई पैदा करते हैं। क्या यह पागलपन नहीं है कि रुई भारतसे बाहर भेजी जाये और वहाँ उससे कपड़ा तैयार करके फिर जहाज द्वारा हमारे पास वापस ले आया जाये? क्या भारतका इस निःसहाय अवस्थातक पहुँचाना सही था?
डेढ़ सौ साल पहले हम अपना सारा कपड़ा तैयार करते थे। हमारी महिलाएँ अपनी झोपड़ियोंमें बारीक सूत कातती थीं और अपने पतियोंकी कमाईमें वृद्धि करती थीं। गाँवके जुलाहे उस सूतसे कपड़े बुनते थे। हमारे जैसे विशाल कृषिप्रधान देशमें यह राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्थाका अपरिहार्य अंग था। इसके कारण हम अपने खाली समयका स्वाभाविक ढंगसे उपयोग कर सकते थे। आज हमारी महिलाएँ अपने हाथोंकी कुशलता खो बैठी हैं और लाखों लोगोंपर जबरदस्ती थोपी गई इस निष्क्रियताने देशको गरीब बना दिया है। बहुतसे जुलाहोंने भंगीका काम सँभाल लिया है। कुछने किरायेके सिपाही बननेका पेशा अपना लिया है। कलाकार जुलाहोंकी आधी जाति नेस्तनाबूद हो गई है और आधे बचे-खुचे जुलाहे हाथ-कता बारीक सूत न मिलनेके कारण आयात किये गये विदेशी सूतसे कपड़े बुन रहे हैं।
अब शायद आप समझेंगे कि भारतके लिए विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका क्या अर्थ है। इसकी योजना बदला लेनेकी दृष्टिसे नहीं बनाई गई है। यदि सरकार आज खिलाफत तथा पंजाबके साथ किये गये अत्याचारोंका प्रतिकार कर दे और भारतको तुरन्त स्वराज्य देनेकी अनुमति दे दे, फिर भी बहिष्कार आन्दोलन निश्चित रूपसे चलता रहेगा। स्वराज्यका अर्थ है कमसे-कम इतना अधिकार प्राप्त करना जिससे राष्ट्रके आर्थिक अस्तित्वके लिए महत्त्वपूर्ण भारतीय उद्योगोंकी रक्षा हो सके और आर्थिक अस्तित्वको खतरा पहुँचानेवाले आयातोंको बन्द किया जा सके। कृषि और चरखा राष्ट्र रूपी शरीरके दो फेफड़े हैं। किसी भी कीमतपर उनके क्षयको बचाना नितान्त आवश्यक है।
इस मामलेपर अब लिखनेकी आवश्यकता नहीं। जब कृषिके सहायक विशाल परिमाणमें उत्पादन करनेवाले एक ऐसे व्यवसायके अभावमें सारा राष्ट्र भूखसे मर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>३८२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
रहा हो तब विदेशी निर्माताओं तथा भारतीय आयातकोंके हितोंपर विचार नहीं किया
जा सकता ।
आप इसे विदेशी मालका आम बहिष्कार करनेवाला आन्दोलन न समझें। भारत
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारसे अपनेको अलग नहीं रखना चाहता। कपड़े के अलावा जो वस्तुएँ
भारत के बाहर अधिक अच्छी बन सकती हैं उन्हें वह व्यापार-सन्धि करनेवाले दोनों
पक्षोंके लिए सुविधाजनक शर्तोंपर कृतज्ञताके साथ ग्रहण करेगा । भारतपर जबरदस्ती
कुछ भी नहीं लादा जा सकता । किन्तु मैं भविष्यकी ओर नहीं झाँकना चाहता। मैं
निश्चित रूपसे आशा करता हूँ कि जल्दी ही भारत के लिए बराबरीकी शर्तोंपर इंग्लैंड-
के साथ सहयोग करना सम्भव हो जायेगा । तब व्यापारिक सम्बन्धोंकी जाँच करनेका
अवसर मिलेगा। इस समय तो मैं आपसे कहूँगा कि आप विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारको
पूरा करनेमें हमारे सहायक बनें ।
उसी तरहका और उतना ही महत्त्वपूर्ण आन्दोलन शराबबन्दी है। शराबकी दूकानें
समाजपर लादा गया घोर अभिशाप है । इस प्रश्नके सम्बन्धमें आज जैसी चेतना
लोगोंमें पहले कभी नहीं थी । मैं स्वीकार करता हूँ कि इस सम्बन्धमें आपकी अपेक्षा
भारतीय मन्त्री ज्यादा सहायता कर सकते । लेकिन मैं चाहूँगा कि आप इस प्रश्न-
पर अपने विचार स्पष्ट रूपसे व्यक्त करें । जहाँतक मैं समझता हूँ पूर्ण मद्य निषेध
किसी प्रकार के प्रशासनके अन्तर्गत तो राष्ट्रके आग्रहपर ही किया जा सकता है। आप
राष्ट्रके पक्ष में अपना प्रभाव डालकर निरन्तर बढ़ते हुए आन्दोलनकी प्रगतिमें सहायता
पहुँचा सकते हैं ।
आपका विश्वस्त मित्र,
मो० क० गांधी
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, १३-७-१९२१
१७८. श्रद्धाका स्वरूप
मुझे एक अजीब-सा गुमनाम पत्र मिला है । जिसमें इस बात के लिए मेरी प्रशंसा
की गई है कि मैंने वह लक्ष्य हाथमें लिया है जिससे लोकमान्यको सबसे अधिक प्रेम
था और मुझसे कहा गया है कि लोकमान्यकी आत्मा मेरे अन्दर निवास कर रही है
और मुझे अपनेको उनका एक योग्य अनुगामी सिद्ध करना चाहिए। पत्रमें आगे कहा
गया है कि स्वराज्य के संघर्षमें हिम्मत न हारूँ ? और अन्तमें मुझपर आरोप लगाया
गया है कि अपनेको राजनीतिक रूपसे गोखलेका शिष्य बताकर मैं लोगोंको धोखा
देता हूँ। मैं चाहता हूँ लोग गुलामोंकी तरह नाम छिपाकर पत्र लिखनेकी प्रवृत्ति छोड़
दें। हम लोग अपने अन्दर स्वराज्यकी भावना बढ़ा रहे हैं, इसलिए हममें निर्भयतापूर्वक
अपनी बात कहने का साहस होना चाहिए। चूँकि इस पत्रका विषय सार्वजनिक महत्त्वका
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रहा हो तब विदेशी निर्माताओं तथा भारतीय आयातकोंके हितोंपर विचार नहीं किया जा सकता।
आप इसे विदेशी मालका आम बहिष्कार करनेवाला आन्दोलन न समझें। भारत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारसे अपनेको अलग नहीं रखना चाहता। कपड़ेके अलावा जो वस्तुएँ भारतके बाहर अधिक अच्छी बन सकती हैं उन्हें वह व्यापार-सन्धि करनेवाले दोनों पक्षोंके लिए सुविधाजनक शर्तोंपर कृतज्ञताके साथ ग्रहण करेगा। भारतपर जबरदस्ती कुछ भी नहीं लादा जा सकता। किन्तु मैं भविष्यकी ओर नहीं झाँकना चाहता। मैं निश्चित रूपसे आशा करता हूँ कि जल्दी ही भारतके लिए बराबरीकी शर्तोंपर इंग्लैंडके साथ सहयोग करना सम्भव हो जायेगा। तब व्यापारिक सम्बन्धोंकी जाँच करनेका अवसर मिलेगा। इस समय तो मैं आपसे कहूँगा कि आप विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारको पूरा करनेमें हमारे सहायक बनें।
उसी तरहका और उतना ही महत्त्वपूर्ण आन्दोलन शराबबन्दी है। शराबकी दूकानें समाजपर लादा गया घोर अभिशाप है। इस प्रश्नके सम्बन्धमें आज जैसी चेतना लोगोंमें पहले कभी नहीं थी। मैं स्वीकार करता हूँ कि इस सम्बन्धमें आपकी अपेक्षा भारतीय मन्त्री ज्यादा सहायता कर सकते। लेकिन मैं चाहूँगा कि आप इस प्रश्नपर अपने विचार स्पष्ट रूपसे व्यक्त करें। जहाँतक मैं समझता हूँ पूर्ण मद्य निषेध किसी प्रकारके प्रशासनके अन्तर्गत तो राष्ट्रके आग्रहपर ही किया जा सकता है। आप राष्ट्रके पक्षमें अपना प्रभाव डालकर निरन्तर बढ़ते हुए आन्दोलनकी प्रगतिमें सहायता पहुँचा सकते हैं।
{{Right|आपका विश्वस्त मित्र,<br>{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', १३-७-१९२१|1em}}
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{{C|{{larger|'''१७८. श्रद्धाका स्वरूप'''}}}}
मुझे एक अजीब-सा गुमनाम पत्र मिला है। जिसमें इस बातके लिए मेरी प्रशंसा की गई है कि मैंने वह लक्ष्य हाथमें लिया है जिससे लोकमान्यको सबसे अधिक प्रेम था और मुझसे कहा गया है कि लोकमान्यकी आत्मा मेरे अन्दर निवास कर रही है और मुझे अपनेको उनका एक योग्य अनुगामी सिद्ध करना चाहिए। पत्रमें आगे कहा गया है कि स्वराज्यके संघर्षमें हिम्मत न हारूँ? और अन्तमें मुझपर आरोप लगाया गया है कि अपनेको राजनीतिक रूपसे गोखलेका शिष्य बताकर मैं लोगोंको धोखा देता हूँ। मैं चाहता हूँ लोग गुलामोंकी तरह नाम छिपाकर पत्र लिखनेकी प्रवृत्ति छोड़ दें। हम लोग अपने अन्दर स्वराज्यकी भावना बढ़ा रहे हैं, इसलिए हममें निर्भयतापूर्वक अपनी बात कहनेका साहस होना चाहिए। चूँकि इस पत्रका विषय सार्वजनिक महत्त्वका<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>________________
पत्र: एक संवाददाताको
३८७
उनके उद्देश्यकी पवित्रता बढ़ जाती है। इस कारण सरकारी दमनसे भयभीत हुए बिना हमको अपने लक्ष्यकी ओर बढ़ते रहना चाहिए। मुझे यह भी मालूम हुआ है। कि स्थानीय दलबन्दी और झगड़ोंके कारण धारवाड़का मामला कुछ ज्यादा उलझ गया है । मेरा सभीसे यह अनुरोध है कि इस समय जो खतरा हम सबके सामने खड़ा है उसे ध्यान में रखते हुए हमें अपने आपसी मतभेदोंको भूल जाना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि यदि सब नहीं तो कमसे कम असहयोगी अवश्य ऐसा करेंगे । आपसके लोग यदि कुछ ज्यादती भी करें तो उसकी परवाह न की जाये, तो विरोधियोंका वैमनस्य स्वतः शान्त हो जायेगा । 'विरोधको दूर करनेका प्रेम और औदार्यसे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है' ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, १४-७-१९२१
१८१. पत्र : एक संवाददाताको'
लैबर्नम रोड बम्बई
१४ जुलाई, १९२१
प्रिय महोदय,
आपने जो कुछ पूछा है उसके सम्बन्धमें मेरा उत्तर यह है कि यदि कोई सनातनी हिन्दू कुछ निश्चित स्थितियोंमें स्वच्छता के साथ पकाया गया विशुद्ध निरामिष भोजन किसी मुसलमान या किसी दूसरे व्यक्ति के साथ खाता है तो उसके लिए ऐसा करना अवैध नहीं है ।
मौलाना शौकत अलीने स्वर्गीय लोकमान्य तिलककी अर्थीको कन्धा देनेपर खेद प्रकट किया है इसके सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि उन्होंने स्वतः इस कार्यपर खेद प्रकट नहीं किया है, बल्कि एक हिन्दूकी अर्थीको कन्धा देकर उन्होंने इस्लामकी परम्पराका अनजानेमें जो भंग किया है, उसके लिए उपस्थित मौलानाओं से क्षमा मांगी है।
उनकी यह क्षमा-याचना दिवंगत आत्माके प्रति उनके अक्षुण्ण आदरभाव से सर्वथा मेल खाती है ।
आपका सच्चा,
अंग्रेजी पत्र (एस० एन० ७५७१ ) की फोटो - नकलसे ।
१. पत्र पानेवाले का नाम ज्ञात नहीं है ।
मो० क० गांधी<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||पत्र : एक संवाददाताको|३८७}}</noinclude>उनके उद्देश्यकी पवित्रता बढ़ जाती है। इस कारण सरकारी दमनसे भयभीत हुए बिना हमको अपने लक्ष्यकी ओर बढ़ते रहना चाहिए। मुझे यह भी मालूम हुआ है कि स्थानीय दलबन्दी और झगड़ोंके कारण धारवाड़का-मामला कुछ ज्यादा उलझ गया है। मेरा सभीसे यह अनुरोध है कि इस समय जो खतरा हम सबके सामने खड़ा है उसे ध्यानमें रखते हुए हमें अपने आपसी मतभेदोंको भूल जाना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि यदि सब नहीं तो कमसे-कम असहयोगी अवश्य ऐसा करेंगे। आपसके लोग यदि कुछ ज्यादती भी करें तो उसकी परवाह न की जाये, तो विरोधियोंका वैमनस्य स्वतः शान्त हो जायेगा। 'विरोधको दूर करनेका प्रेम और औदार्यसे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है'।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १४-७-१९२१|1em}}
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{{Right|लैबर्नम रोड<br>बम्बई<br>१४ जुलाई, १९२१}}
{{Left|प्रिय महोदय,}}
आपने जो-कुछ पूछा है उसके सम्बन्धमें मेरा उत्तर यह है कि यदि कोई सनातनी हिन्दू कुछ निश्चित स्थितियोंमें स्वच्छताके साथ पकाया गया विशुद्ध निरामिष भोजन किसी मुसलमान या किसी दूसरे व्यक्तिके साथ खाता है तो उसके लिए ऐसा करना अवैध नहीं है।
मौलाना शौकत अलीने स्वर्गीय लोकमान्य तिलककी अर्थीको कन्धा देनेपर खेद प्रकट किया है इसके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि उन्होंने स्वतः इस कार्यपर खेद प्रकट नहीं किया है, बल्कि एक हिन्दूकी अर्थीको कन्धा देकर उन्होंने इस्लामकी परम्पराका अनजानेमें जो भंग किया है, उसके लिए उपस्थित मौलानाओं से क्षमा माँगी है।
उनकी यह क्षमा-याचना दिवंगत आत्माके प्रति उनके अक्षुण्ण आदरभावसे सर्वथा मेल खाती है।
{{Right|आपका सच्चा,<br>{{larger|'''मो॰ क॰ गांधी'''}}}}
अंग्रेजी पत्र (एस॰ एन॰ ७५७१) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२०
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2026-08-26T04:44:13Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>
१८२. पत्र : मणिबेन पटेलको
बम्बई
चि० मणि,
शुक्रवार, १५ जुलाई, १९२१
तुम्हारे पत्रका लम्बा उत्तर देनेको जी करता है । परन्तु उतना समय नहीं है । अब रातके ११ बजेंगे। परन्तु सवालका जवाब दे दूँ। जो [विदेशी] कपड़ा व्यापारके लिए रखा गया हो उसे जलाने या दे देनेका सवाल ही नहीं है।
पत्रिकाएँ तो मैं अभी पढ़ भी नहीं सका। शराब बेचनेवालों के हमले हम जितने अधिक सहन करेंगे उतना अधिक हमारा काम बढ़ेगा ।
मणिबेन
द्वारा / श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल
भद्र, अहमदाबाद
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने
भाईश्री वल्लभभाई,
१८३. पत्र : वल्लभभाई पटेलको
बापूके आशीर्वाद
शुक्रवार [१५ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात् ]
भाई गिडवानीसे खूब बातें हुईं। वे परेशान हैं। काका और आश्रमवासियों के खिलाफ कुछ शिकायत है । आप सबको जमा करके निपटारा कर दें । काकाकी तरफसे परेशानी कैसे होगी, यह समझ में नहीं आता । काकाने इस बार तो कोई बातचीत नहीं की । सारा असन्तोष मिट जाये तो अच्छा ।
अनसूयाबेनके अनुदानका निपटारा कर डालें । उनके पास जाइये और जो रकम चाहिए उसका चैक दे दीजिये ।
१. शराबबन्दी आन्दोलन सम्बन्धी पत्रिकाएँ ।
२. यह पत्र ११ जुलाई, १९२१ को मणिबेन पटेलको लिखे पत्रके बाद लिखा गया होगा जिसमें गांधीजीने विठ्ठलभाईंसे खादीके सम्बन्धमें बात करनेका उल्लेख किया है।
३. स्कूलों के लिए ।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१८२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>शुक्रवार, १५ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारे पत्रका लम्बा उत्तर देनेको जी करता है। परन्तु उतना समय नहीं है। अब रातके ११ बजेंगे। परन्तु सवालका जवाब दे दूँ। जो [विदेशी] कपड़ा व्यापारके लिए रखा गया हो उसे जलाने या दे देनेका सवाल ही नहीं है।
पत्रिकाएँ<ref>शराबबन्दी आन्दोलन-सम्बन्धी पत्रिकाएँ।</ref> तो मैं अभी पढ़ भी नहीं सका। शराब बेचनेवालों के हमले हम जितने अधिक सहन करेंगे उतना अधिक हमारा काम बढ़ेगा।
{{Right|{{larger|'''बापूके आशीर्वाद'''}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने'''}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : वल्लभभाई पटेलको'''}}
{{Right|शुक्रवार [१५ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>यह पत्र ११ जुलाई, १९२१ को मणिबेन पटेलको लिखे पत्रके बाद लिखा गया होगा जिसमें गांधीजीने विठ्ठलभाईंसे खादीके सम्बन्धमें बात करनेका उल्लेख किया है।</ref>}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
भाई गिडवानीसे खूब बातें हुईं। वे परेशान हैं। काका और आश्रमवासियोंके खिलाफ कुछ शिकायत है। आप सबको जमा करके निपटारा कर दें। काकाकी तरफसे परेशानी कैसे होगी, यह समझमें नहीं आता। काकाने इस बार तो कोई बातचीत नहीं की। सारा असन्तोष मिट जाये तो अच्छा।
अनसूयाबेनके अनुदानका<ref>स्कूलोंके लिए।</ref> निपटारा कर डालें। उनके पास जाइये और जो रकम चाहिए उसका चैक दे दीजिये।<noinclude></noinclude>
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2026-08-26T04:51:59Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१८२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>शुक्रवार, १५ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारे पत्रका लम्बा उत्तर देनेको जी करता है। परन्तु उतना समय नहीं है। अब रातके ११ बजेंगे। परन्तु सवालका जवाब दे दूँ। जो [विदेशी] कपड़ा व्यापारके लिए रखा गया हो उसे जलाने या दे देनेका सवाल ही नहीं है।
पत्रिकाएँ<ref>शराबबन्दी आन्दोलन-सम्बन्धी पत्रिकाएँ।</ref> तो मैं अभी पढ़ भी नहीं सका। शराब बेचनेवालों के हमले हम जितने अधिक सहन करेंगे उतना अधिक हमारा काम बढ़ेगा।
{{Right|{{larger|'''बापूके आशीर्वाद'''}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने'''}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : वल्लभभाई पटेलको'''}}}}
{{Right|शुक्रवार [१५ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>यह पत्र ११ जुलाई, १९२१ को मणिबेन पटेलको लिखे पत्रके बाद लिखा गया होगा जिसमें गांधीजीने विठ्ठलभाईंसे खादीके सम्बन्धमें बात करनेका उल्लेख किया है।</ref>}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
भाई गिडवानीसे खूब बातें हुईं। वे परेशान हैं। काका और आश्रमवासियोंके खिलाफ कुछ शिकायत है। आप सबको जमा करके निपटारा कर दें। काकाकी तरफसे परेशानी कैसे होगी, यह समझमें नहीं आता। काकाने इस बार तो कोई बातचीत नहीं की। सारा असन्तोष मिट जाये तो अच्छा।
अनसूयाबेनके अनुदानका<ref>स्कूलोंके लिए।</ref> निपटारा कर डालें। उनके पास जाइये और जो रकम चाहिए उसका चैक दे दीजिये।<noinclude></noinclude>
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2026-08-26T04:52:21Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१८२. पत्र : मणिबेन पटेलको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>शुक्रवार, १५ जुलाई, १९२१}}
{{Left|चि॰ मणि,}}
तुम्हारे पत्रका लम्बा उत्तर देनेको जी करता है। परन्तु उतना समय नहीं है। अब रातके ११ बजेंगे। परन्तु सवालका जवाब दे दूँ। जो [विदेशी] कपड़ा व्यापारके लिए रखा गया हो उसे जलाने या दे देनेका सवाल ही नहीं है।
पत्रिकाएँ<ref>शराबबन्दी आन्दोलन-सम्बन्धी पत्रिकाएँ।</ref> तो मैं अभी पढ़ भी नहीं सका। शराब बेचनेवालों के हमले हम जितने अधिक सहन करेंगे उतना अधिक हमारा काम बढ़ेगा।
{{Right|{{larger|'''बापूके आशीर्वाद'''}}}}
{{Left|मणिबेन<br>द्वारा/श्री वल्लभभाई झवेरभाई पटेल<br>भद्र, अहमदाबाद}}
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{{C|{{larger|'''१८३. पत्र : वल्लभभाई पटेलको'''}}}}
{{Right|शुक्रवार [१५ जुलाई, १९२१ या उसके पश्चात्]<ref>यह पत्र ११ जुलाई, १९२१ को मणिबेन पटेलको लिखे पत्रके बाद लिखा गया होगा जिसमें गांधीजीने विठ्ठलभाईंसे खादीके सम्बन्धमें बात करनेका उल्लेख किया है।</ref>}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
भाई गिडवानीसे खूब बातें हुईं। वे परेशान हैं। काका और आश्रमवासियोंके खिलाफ कुछ शिकायत है। आप सबको जमा करके निपटारा कर दें। काकाकी तरफसे परेशानी कैसे होगी, यह समझमें नहीं आता। काकाने इस बार तो कोई बातचीत नहीं की। सारा असन्तोष मिट जाये तो अच्छा।
अनसूयाबेनके अनुदानका<ref>स्कूलोंके लिए।</ref> निपटारा कर डालें। उनके पास जाइये और जो रकम चाहिए उसका चैक दे दीजिये।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
674259
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||सन्देश : जनताके नाम|३८९}}</noinclude>विट्ठलभाईके साथ फिरसे खूब बातें हुईं, यह मणिबेन या डाह्याभाईसे कहिये। मैं मानता हूँ कि विट्ठलभाई अब चरखेका महत्त्व कुछ अधिक समझते हैं। मुझे यह जरूर लगता है कि उनका सही क्षेत्र कौंसिल है। वे लोगोंमें पैठकर, उनमें घुलमिलकर सेवा नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि वे सेवा नहीं करना चाहते। परन्तु इस चीजको उन्होंने अपनेमें बढ़ाया नहीं है। कौंसिलोंमें जाकर काम करनेकी योग्यताको बढ़ाया है। मेरे खयालसे दोनोंके लिए अलग-अलग गुण चाहिए। बम्बईमें विट्ठलभाईकी कोई निन्दा करता हो, सो तो मैंने देखा ही नहीं।
{{Right|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}
{{Left|भाईश्री वल्लभभाई पटेल, बैरिस्टर<br>भद्र, अहमदाबाद}}
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो : सरदार वल्लभभाईने'''}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१८४. सन्देश : जनताके नाम<ref>भूलेश्वर जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा जारी किये गये एक पर्चेमें गांधीजीका यह सन्देश छापा गया था।</ref>}}}}
{{Right|[१६ जुलाई, १९२१ के पूर्व]<ref>इस सन्देशकी तिथि उपलब्ध नहीं है; किन्तु सम्भवतः यह और इसके बादका शीर्षक १६ जुलाई, १९२१ के "बहिष्कारके उपाय" लेखसे पहले लिखे गये होंगे।</ref>}}
आप अपने घरसे आज ही विदेशी कपड़े हटा दें; उनको पटणी भवन या किसी निकटतम स्थानवाली कांग्रेस कमेटीको दे दें और उससे रसीद ले लें।
{{Left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रॅक्ट्स''', १९२१
{{Dhr|6em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२२
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674261
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>१८५. स्वदेशी व्रत '
[१६ जुलाई, १९२१ के पूर्व ]
मैं, निम्न हस्ताक्षरकर्त्ता, अन्तःकरणपूर्वक तथा ईश्वरको साक्षी करके प्रतिज्ञा
करता हूँ कि १ अगस्त, १९२१; सम्वत् १९७७, आषाढ़ बदी १२, सोमवार के दिनसे
निम्नलिखित तीन व्रतोंमें से एकका पालन करूँगा :
१. मैं शुद्ध स्वदेशी वस्त्र पहनूंगा ।
२. मैं मिलके कते सूतसे हाथकरघेपर बुने वस्त्रका प्रयोग करूँगा ।
३. मैं भारतकी मिलोंमें कते और बुने वस्त्रोंका प्रयोग करूँगा ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स, १९२१
१८६. बहिष्कारके उपाय
बम्बई
१६ जुलाई, १९२१
बहिष्कारका काम चुपचाप हो रहा है और खद्दरकी माँग बहुत बढ़ गई है ।
यद्यपि विदेशी कपड़ा न मँगानेके प्रतिज्ञा पत्रपर ७ व्यापारियोंने ही अबतक हस्ताक्षर
किये हैं, तथापि बहुतोंने उसके लिए ऑर्डर देना बन्द कर दिया है और दिये हुए
ऑर्डर रद कर रहे हैं । दुःखकी बात है कि कलकत्ताने इस सम्बन्धमें बहुत ही कम
कर्त्तव्य पालन किया है। सभी व्यापार-केन्द्रोंमें संगठित रूपसे और जोर-शोरसे बहि-
ष्कारकी कोशिश होनी चाहिए। मारवाड़ी व्यापारियोंको उचित है कि इस समय
अपनी स्वदेश-भक्तिका प्रमाण दें। देशके सब स्त्री-पुरुषोंको चाहिए कि वे किसी भी
दलके पक्षपाती क्यों न हों, लेकिन विदेशी कपड़ेको सदाके लिए त्याग देनेमें अपनी
शक्तिभर कुछ उठा न रखें।
१ अगस्तको, जो लोकमान्य तिलकके वार्षिक श्राद्धका दिन है उस दिन भारतमें
कहीं भी हड़ताल न होनी चाहिए। जनताको यह सोचकर कि हमारा बल बढ़ रहा
१. 'बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स' के अनुसार बम्बई प्रेसीडेन्सीकी भिन्न-भिन्न स्वदेशी सभाओंको इस
प्रतिज्ञापर लोगों से हस्ताक्षर करानेके आदेश दिये गये थे ।
२. ऐसा लगता है कि इस प्रतिज्ञाका मसविदा स्वयं गांधीजीने तैयार किया था । इसकी सही
तिथि मालूम नहीं है तथापि अनुमान है कि यह विदेशी वस्त्रके बहिष्कार सम्बन्धी निर्देश-पत्रके थोड़ा
आगे-पीछे ही प्रचारित किया गया होगा । देखिए अगला शीर्षक ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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674261
2026-08-26T05:19:19Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१८५. स्वदेशी व्रत<ref>'बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स' के अनुसार '''बम्बई''' प्रेसीडेन्सीकी भिन्न-भिन्न स्वदेशी सभाओंको इस प्रतिज्ञापर लोगोंसे हस्ताक्षर करानेके आदेश दिये गये थे।</ref>'''}}}}
{{Right|[१६ जुलाई, १९२१ के पूर्व]<ref>ऐसा लगता है कि इस प्रतिज्ञाका मसविदा स्वयं गांधीजीने तैयार किया था। इसकी सही तिथि मालूम नहीं है तथापि अनुमान है कि यह विदेशी वस्त्रके-बहिष्कार सम्बन्धी निर्देश-पत्रके थोड़ा आगे-पीछे ही प्रचारित किया गया होगा। देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
मैं, निम्न हस्ताक्षरकर्त्ता, अन्तःकरणपूर्वक तथा ईश्वरको साक्षी करके प्रतिज्ञा करता हूँ कि १ अगस्त, १९२१; सम्वत् १९७७, आषाढ़ बदी १२, सोमवारके दिनसे निम्नलिखित तीन व्रतोंमें से एकका पालन करूँगा :
१. मैं शुद्ध स्वदेशी वस्त्र पहनूँगा।
२. मैं मिलके कते सूतसे हाथकरघेपर बुने वस्त्रका प्रयोग करूँगा।
३. मैं भारतकी मिलोंमें कते और बुने वस्त्रोंका प्रयोग करूँगा।
{{Left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स''', १९२१
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{{C|{{larger|'''१८६. बहिष्कारके उपाय'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>१६ जुलाई, १९२१}}
बहिष्कारका काम चुपचाप हो रहा है और खद्दरकी माँग बहुत बढ़ गई है। यद्यपि विदेशी कपड़ा न मँगानेके प्रतिज्ञा पत्रपर ७ व्यापारियोंने ही अबतक हस्ताक्षर किये हैं, तथापि बहुतोंने उसके लिए ऑर्डर देना बन्द कर दिया है और दिये हुए ऑर्डर रद कर रहे हैं। दुःखकी बात है कि कलकत्ताने इस सम्बन्धमें बहुत ही कम कर्त्तव्य-पालन किया है। सभी व्यापार-केन्द्रोंमें संगठित रूपसे और जोर-शोरसे बहिष्कारकी कोशिश होनी चाहिए। मारवाड़ी व्यापारियोंको उचित है कि इस समय अपनी स्वदेश-भक्तिका प्रमाण दें। देशके सब स्त्री-पुरुषोंको चाहिए कि वे किसी भी दलके पक्षपाती क्यों न हों, लेकिन विदेशी कपड़ेको सदाके लिए त्याग देनेमें अपनी शक्तिभर कुछ उठा न रखें।
१ अगस्तको, जो लोकमान्य तिलकके वार्षिक श्राद्धका दिन है उस दिन भारतमें कहीं भी हड़ताल न होनी चाहिए। जनताको यह सोचकर कि हमारा बल बढ़ रहा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
674264
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||सन्देश : अलीगढ़की जनताको|३९१}}</noinclude>है और लक्ष्यकी ओर हमारी गतिका वेग बढ़ रहा है, उस दिन तो खुशी मनानी चाहिए। स्वर्गवासी देशभक्त (लोकमान्य) की स्मृतिमें उस दिन शोक मनाना उचित नहीं है।...
कांग्रेस कार्यकर्त्ताओंको जनतामें स्वदेशीके प्रति अनुराग अवश्य उत्पन्न करना चाहिए। जबतक विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूर्ण रूपसे न हो जाये तबतक बहिष्कारके लिए लोगोंको उत्साहित करना और खद्दर तैयार करना उनका प्रधान कर्त्तव्य होना चाहिए। इस संक्रमणकालमें हमें आधेसे कम कपड़ेपर गुजारा करना चाहिए। नहीं तो उसकी कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जायेगी और वस्त्रके पूर्ण अकालका कष्ट सहना पड़ेगा। जबतक हर घरमें चरखा न चलने लगे और हरएक जुलाहा हाथका सूत न बुनने
लगे, हमें कपड़े को बड़ी कंजूसीसे बरतना चाहिए।<ref>मूल हिन्दीमें लिखे इस लेखका '''आज'''में उपलब्ध यह पाठ भाषाके साधारण सुधारोंके साथ यहाँ दिया गया है।</ref>
{{Left|'''आज''', १८-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१८७. सन्देश : अलीगढ़की जनताको'''}}}}
{{Right|१६ जुलाई, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने इस आशयका एक सन्देश भेजा है कि अलीगढ़-काण्डसे उनको मार्मिक व्यथा हुई है। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि मंजिलके इतने निकट पहुँचनेपर अब अलीगढ़की जनता उत्तेजना दिखाकर या हिंसाका सहारा लेकर या असहयोगियों अथवा अन्य किन्हीं लोगों द्वारा की गई हिंसाको जिम्मेदारी लेनेसे इनकार करके कोई कमजोरी नहीं दिखायेगी और इस तरह घड़ी की सुई पीछे की ओर घुमानेकी कोशिश
नहीं करेगी।<ref>यह सन्देश उर्दू और हिन्दी, दोनोंमें प्रचारित किया गया था और स्थानीय नेताओंने अलीगढ़-काण्डकी सचाईका पता लगानेकी बड़ी मुस्तैदीसे कोशिश की थी।</ref>
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''अमृतबाजार पत्रिका''', १७-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
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2026-08-26T05:31:30Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
674266
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||सन्देश : अलीगढ़की जनताको|३९१}}</noinclude>है और लक्ष्यकी ओर हमारी गतिका वेग बढ़ रहा है, उस दिन तो खुशी मनानी चाहिए। स्वर्गवासी देशभक्त (लोकमान्य) की स्मृतिमें उस दिन शोक मनाना उचित नहीं है।...
कांग्रेस कार्यकर्त्ताओंको जनतामें स्वदेशीके प्रति अनुराग अवश्य उत्पन्न करना चाहिए। जबतक विदेशी कपड़ेका बहिष्कार पूर्ण रूपसे न हो जाये तबतक बहिष्कारके लिए लोगोंको उत्साहित करना और खद्दर तैयार करना उनका प्रधान कर्त्तव्य होना चाहिए। इस संक्रमणकालमें हमें आधेसे कम कपड़ेपर गुजारा करना चाहिए। नहीं तो उसकी कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जायेगी और वस्त्रके पूर्ण अकालका कष्ट सहना पड़ेगा। जबतक हर घरमें चरखा न चलने लगे और हरएक जुलाहा हाथका सूत न बुनने
लगे, हमें कपड़े को बड़ी कंजूसीसे बरतना चाहिए।<ref>मूल हिन्दीमें लिखे इस लेखका '''आज'''में उपलब्ध यह पाठ भाषाके साधारण सुधारोंके साथ यहाँ दिया गया है।</ref>
{{Left|'''आज''', १८-७-१९२१|1em}}
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{{C|{{larger|'''१८७. सन्देश : अलीगढ़की जनताको'''}}}}
{{Right|१६ जुलाई, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने इस आशयका एक सन्देश भेजा है कि अलीगढ़-काण्डसे उनको मार्मिक व्यथा हुई है। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि मंजिलके इतने निकट पहुँचनेपर अब अलीगढ़की जनता उत्तेजना दिखाकर या हिंसाका सहारा लेकर या असहयोगियों अथवा अन्य किन्हीं लोगों द्वारा की गई हिंसाको जिम्मेदारी लेनेसे इनकार करके कोई कमजोरी नहीं दिखायेगी और इस तरह घड़ी की सुई पीछे की ओर घुमानेकी कोशिश नहीं करेगी।<ref>यह सन्देश उर्दू और हिन्दी, दोनोंमें प्रचारित किया गया था और स्थानीय नेताओंने अलीगढ़-काण्डकी सचाईका पता लगानेकी बड़ी मुस्तैदीसे कोशिश की थी।</ref>
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''अमृतबाजार पत्रिका''', १७-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२४
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2026-08-26T05:53:04Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>१८८. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर
१६ जुलाई, १९२१ श्री गांधीने कहा : हमने जिन बड़े-बड़े कामोंका बीड़ा उठाया था उनमें से एक पूरा हो गया है, लेकिन अभी एक बड़ा और कहीं मुश्किल काम, जो हमें स्वराज्य हासिल करनेसे पहले पूरा करना है, बच रहा है। जिन लोगोंने एक करोड़ रुपये इकट्ठे करनेका काम हाथमें लिया है वे लगातार मेहनत और कोशिश करके उसे पूरा कर सकते हैं, इनके बिना दुनियामें कुछ भी हासिल करना मुमकिन नहीं होता। इस काममें बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं और इसमें जो त्याग करना पड़ेगा वह पैसा कमानेके श्रमसे अधिक ही है । यदि हम स्वराज्य हासिल करना चाहते हैं, यदि हम चाहते हैं कि खिलाफत और पंजाबके उन अन्यायोंका प्रतिकार हो जिन्हें अब वाइसराय तक हमसे भूलने और माफ करनेके लिए कह रहे हैं, तो हमें अपने देशके लिए यह त्याग करना ही पड़ेगा; इसके सिवा कोई चारा नहीं है। हम कमसे कम समय में स्वराज्य चाहते हैं। बिना जी-तोड़ मेहनतके उसे हासिल नहीं किया जा सकता । और यदि मुझे सच- मुच लगता कि यह कर्त्तव्य पूरा करने लायक शक्ति हमारे अन्दर नहीं है, तो मैं आपसे कभी स्वराज्य की बात ही न करता । लेकिन आपके अन्दर शक्ति मौजूद है, आपको सिर्फ उसको पहचानना है, महसूस करना है । हृदयकी विशालतासे प्रेरित होकर एक बहनने मेरे पास इस कोषमें एक साड़ी भेजी है, जिसकी कीमत करीब ९०० रुपये बैठती है। उसका वजन करीब १२ से १५ पौंड है । मुझे अचम्भा तो इस arant है कि वे इतनी भारी साड़ी पहनती कैसे होंगी। उसमें जरीका काफी काम है। इसमें रत्ती भर भी शक नहीं कि यह साड़ी देते वक्त उनका दिल भारी हो आया होगा । वे इस साड़ीको पहनकर काफी खुशी महसूस करती होंगी। आप जितनी बहनें यहाँ मौजूद हैं, आपको अपने देशकी खातिर खद्दरकी साड़ियाँ ही पहननी चाहिए; वे इतनी भारी भी नहीं होतीं ।
बहनोंने खुशी-खुशी धन और अपने आभूषण दिये हैं। मैं जानता हूँ कि अपने बढ़िया वस्त्रोंको इस तरह दे देना कोई आसान काम नहीं है। पर मुझे उम्मीद है कि आप यदि इस राष्ट्रीय प्रयत्न में अपना पूरा-पूरा योग देना चाहती हैं तो यह त्याग अवश्य करेंगी। एक करोड़ रुपयेका योगदान काफी अच्छा योगदान है। इससे ज्ञात होता है कि लोग स्वराज्य हासिल करनेकी जरूरत कितनी गहराईसे महसूस करते हैं, लेकिन यह त्याग नहीं है। विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारमें अपने सुख और अपनी रुचिको भी छोड़ना पड़ेगा । स्त्री-पुरुष दोनोंसे यह त्याग अपेक्षित है। आज मेरे पास लन्दनसे हाल
१. यह सभा परेलके मोरारजी गोकुलदास हॉलमें हुई थी ।<noinclude></noinclude>
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674288
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2026-08-26T06:00:02Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
674288
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
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'''श्री गांधीने कहा : हमने जिन बड़े-बड़े कामोंका बीड़ा उठाया था उनमें से एक पूरा हो गया है, लेकिन अभी एक बड़ा और कहीं मुश्किल काम, जो हमें स्वराज्य हासिल करनेसे पहले पूरा करना है, बच रहा है। जिन लोगोंने एक करोड़ रुपये इकट्ठे करनेका काम हाथमें लिया है वे लगातार मेहनत और कोशिश करके उसे पूरा कर सकते हैं, इनके बिना दुनियामें कुछ भी हासिल करना मुमकिन नहीं होता। इस काममें बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं और इसमें जो त्याग करना पड़ेगा वह पैसा कमानेके श्रमसे अधिक ही है। यदि हम स्वराज्य हासिल करना चाहते हैं, यदि हम चाहते हैं कि खिलाफत और पंजाबके उन अन्यायोंका प्रतिकार हो जिन्हें अब वाइसराय तक हमसे भूलने और माफ करनेके लिए कह रहे हैं, तो हमें अपने देशके लिए यह त्याग करना ही पड़ेगा; इसके सिवा कोई चारा नहीं है। हम कमसे-कम समयमें स्वराज्य चाहते हैं। बिना जी-तोड़ मेहनतके उसे हासिल नहीं किया जा सकता। और यदि मुझे सच-मुच लगता कि यह कर्त्तव्य पूरा करने लायक शक्ति हमारे अन्दर नहीं है, तो मैं आपसे कभी स्वराज्यकी बात ही न करता। लेकिन आपके अन्दर शक्ति मौजूद है, आपको सिर्फ उसको पहचानना है, महसूस करना है। हृदयकी विशालतासे प्रेरित होकर एक बहनने मेरे पास इस कोषमें एक साड़ी भेजी है, जिसकी कीमत करीब ९०० रुपये बैठती है। उसका वजन करीब १२ से १५ पौंड है। मुझे अचम्भा तो इस बातका है कि वे इतनी भारी साड़ी पहनती कैसे होंगी। उसमें जरीका काफी काम है। इसमें रत्ती-भर भी शक नहीं कि यह साड़ी देते वक्त उनका दिल भारी हो आया होगा। वे इस साड़ीको पहनकर काफी खुशी महसूस करती होंगी। आप जितनी बहनें यहाँ मौजूद हैं, आपको अपने देशकी खातिर खद्दरकी साड़ियाँ ही पहननी चाहिए; वे इतनी भारी भी नहीं होतीं।'''
'''बहनोंने खुशी-खुशी धन और अपने आभूषण दिये हैं। मैं जानता हूँ कि अपने बढ़िया वस्त्रोंको इस तरह दे देना कोई आसान काम नहीं है। पर मुझे उम्मीद है कि आप यदि इस राष्ट्रीय प्रयत्नमें अपना पूरा-पूरा योग देना चाहती हैं तो यह त्याग अवश्य करेंगी। एक करोड़ रुपयेका योगदान काफी अच्छा योगदान है। इससे ज्ञात होता है कि लोग स्वराज्य हासिल करनेकी जरूरत कितनी गहराईसे महसूस करते हैं, लेकिन यह त्याग नहीं है। विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारमें अपने सुख और अपनी रुचिको भी छोड़ना पड़ेगा। स्त्री-पुरुष दोनोंसे यह त्याग अपेक्षित है। आज मेरे पास लन्दनसे हाल'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
674295
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर
३९३
ही में लौटे दो भारतीय नवयुवक आये थे । उनमें एक बंगाली था और दूसरा पारसी । दोनों बड़े सच्चे दिलसे बातें कर रहे थे। मैंने उनके कई सवालोंके जवाब दिये और उनसे सिर्फ एक सवाल पूछा : क्या वे अपने विदेशी वस्त्र छोड़नेके लिए तैयार हैं ? उनकी बातों में कोई भी दुराव-छिपाव नहीं था और दोनों ही अपने देशसे प्रेम करते थे। दोनोंने स्वीकार किया कि विदेशी वस्त्रोंका त्याग ही उचित है। लेकिन उनमें से एकने कहा कि वह अपने-आपमें इतनी शक्ति महसूस नहीं करता कि विदेशी वस्त्र त्याग सके । पर इस बातको भी वह पूरी तरह मानता था कि यदि लोग विदेशी वस्त्रों तकका त्याग नहीं कर सकते, तो इसका मतलब होगा कि वे स्वराज्यके लिए तैयार नहीं हैं।
मैंने स्वराज्य लेनेके लिए एक सालकी अवधि निश्चित की है। में उसका पूरा महत्त्व और उसका अर्थ समझता हूँ। मैंने उसके लिए कुछ निश्चित शर्ते रखी हैं। कांग्रेसने उनको अपने प्रस्ताव में शामिल कर लिया है। भारतकी बुराइयोंकी क्या दवा होनी चाहिए, इसे मैं उतनी ही अच्छी तरह जानता हूँ जितना कि एक डाक्टर अपने मरीजके रोगके बारेमें जानता है। लेकिन यदि मरीज डाक्टरकी बतलाई दवा न करे और इसलिए चंगा न हो पाये, तो उसमें डाक्टरका क्या दोष ? मैंने एक दवा बताई है, जिसे में समझता हूँ कि भारत बिना किसी ज्यादा कठिनाई के सेवन कर सकता है और उसे पचा सकता है। कांग्रेसने देशके सामने जो कार्यक्रम रखा है वह अपने आपमें सचमुच त्रुटि रहित है। उस कार्यक्रम में स्वदेशी भी शामिल है। स्वदेशीको आधे मनसे अपनाकर काम नहीं चलेगा, उसे पूरी तौरपर, हर क्षेत्रमें स्वीकार करना पड़ेगा ।
इस विषय में अपनी पूरी रजामंदी जाहिर करनेका शानदार मौका आपके सामने है। पहली अगस्त आ रही है। क्या हमने अपने-आपको इस योग्य बना लिया है कि हम लोकमान्यकी पुण्य तिथि मना सकें ? क्या हम इस योग्य बन पाये हैं कि लोक- मान्यके दिये हुए मन्त्रका उच्चार कर सकें? जिस तरह हर हिन्दूको गायत्री- पाठ करनेसे पहले आचमन आदि करके शुद्ध होना पड़ता है, और मुसलमानोंको नमाज पढ़ने से पहले वजू करनी पड़ती है, तभी उसमें असर पैदा होता है। इसी तरह श्री तिलक द्वारा दिये गये स्वराज्य मन्त्रका उच्चार करने योग्य बननेके लिए पहली अगस्त- को आपको खादी पहननी पड़ेगी। मेरा खयाल है कि भारतको आर्थिक रूपसे स्वाधीन बनाने और उसके जरिये स्वराज्य हासिल करनेके लिए हर भारतीय द्वारा विदेशी वस्त्रोंका त्याग करना एक सबसे जरूरी शर्त है। इसके अनुरूप अपने-आपको बनाना भारतकी सामर्थ्य से बाहर नहीं है । आशा है कि लोग इसके इच्छुक भी हैं।
मैं आप लोगोंका ध्यान मेसर्स शॉ वैलेस ऐंड कम्पनी द्वारा श्री कशालकरको कोई जवाब देनेका अवसर दिये बिना बरखास्त किये जानेकी ओर भी दिलाना चाहता हूँ। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने हाथकी कती खादीकी टोपी पहननेका<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर|३९३}}</noinclude>ही में लौटे दो भारतीय नवयुवक आये थे। उनमें एक बंगाली था और दूसरा पारसी। दोनों बड़े सच्चे दिलसे बातें कर रहे थे। मैंने उनके कई सवालोंके जवाब दिये और उनसे सिर्फ एक सवाल पूछा : क्या वे अपने विदेशी वस्त्र छोड़नेके लिए तैयार हैं? उनकी बातोंमें कोई भी दुराव-छिपाव नहीं था और दोनों ही अपने देशसे प्रेम करते थे। दोनोंने स्वीकार किया कि विदेशी वस्त्रोंका त्याग ही उचित है। लेकिन उनमेंसे एकने कहा कि वह अपने-आपमें इतनी शक्ति महसूस नहीं करता कि विदेशी वस्त्र त्याग सके। पर इस बातको भी वह पूरी तरह मानता था कि यदि लोग विदेशी वस्त्रों-तकका त्याग नहीं कर सकते, तो इसका मतलब होगा कि वे स्वराज्यके लिए तैयार नहीं हैं।
मैंने स्वराज्य लेनेके लिए एक सालकी अवधि निश्चित की है। मैं उसका पूरा महत्त्व और उसका अर्थ समझता हूँ। मैंने उसके लिए कुछ निश्चित शर्तें रखी हैं। कांग्रेसने उनको अपने प्रस्तावमें शामिल कर लिया है। भारतकी बुराइयोंकी क्या दवा होनी चाहिए, इसे मैं उतनी ही अच्छी तरह जानता हूँ जितना कि एक डाक्टर अपने मरीजके रोगके बारेमें जानता है। लेकिन यदि मरीज डाक्टरकी बतलाई दवा न करे और इसलिए चंगा न हो पाये, तो उसमें डाक्टरका क्या दोष? मैंने एक दवा बताई है, जिसे मैं समझता हूँ कि भारत बिना-किसी ज्यादा कठिनाईके सेवन कर सकता है और उसे पचा सकता है। कांग्रेसने देशके सामने जो कार्यक्रम रखा है वह अपने आपमें सचमुच त्रुटि रहित है। उस कार्यक्रममें स्वदेशी भी शामिल है। स्वदेशीको आधे मनसे अपनाकर काम नहीं चलेगा, उसे पूरी तौरपर, हर क्षेत्रमें स्वीकार करना पड़ेगा।
इस विषयमें अपनी पूरी रजामंदी जाहिर करनेका शानदार मौका आपके सामने है। पहली अगस्त आ रही है। क्या हमने अपने-आपको इस योग्य बना लिया है कि हम लोकमान्यकी पुण्य-तिथि मना सकें? क्या हम इस योग्य बन पाये हैं कि लोक-मान्यके दिये हुए मन्त्रका उच्चार कर सकें? जिस तरह हर हिन्दूको गायत्री-पाठ करनेसे पहले आचमन आदि करके शुद्ध होना पड़ता है, और मुसलमानोंको नमाज पढ़नेसे पहले वजू करनी पड़ती है, तभी उसमें असर पैदा होता है। इसी तरह श्री तिलक द्वारा दिये गये स्वराज्य-मन्त्रका उच्चार करने योग्य बननेके लिए पहली अगस्तको आपको खादी पहननी पड़ेगी। मेरा खयाल है कि भारतको आर्थिक रूपसे स्वाधीन बनाने और उसके जरिये स्वराज्य हासिल करनेके लिए हर भारतीय द्वारा विदेशी वस्त्रोंका त्याग करना एक सबसे जरूरी शर्त है। इसके अनुरूप अपने-आपको बनाना भारतकी सामर्थ्यसे बाहर नहीं है। आशा है कि लोग इसके इच्छुक भी हैं।
मैं आप लोगोंका ध्यान मेसर्स शॉ वैलेस ऐंड कम्पनी द्वारा श्री कशालकरको कोई जवाब देनेका अवसर दिये बिना बरखास्त किये जानेकी ओर भी दिलाना चाहता हूँ। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने हाथकी कती खादीकी टोपी पहननेका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>३९४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
साहस किया था। कम्पनीका मैनेजर इसको बरदाश्त नहीं कर पाया और चूँकि नवयुवक
कशालकर झुकनेके लिए तैयार नहीं हुआ, इसलिए उसे बरखास्त कर दिया गया। अपने
साहसके लिए वह हमारी बधाईका पात्र है । क्या यह घटना भारतकी गुलामी की
द्योतक नहीं है ? दूसरे किसी देशमें यदि किसी मैनेजरने इतने मनमाने ढंगले निजी
भूषाके बारेमें अपने किसी कर्मचारीकी स्वतन्त्रतामें हस्तक्षेप किया होता, तो उसे या
तो क्षमा-याचना करनी पड़ती या खुद बरखास्त होना पड़ता। अब भी समय है यदि
मेसर्स शॉ वैलेस ऐंड कम्पनीके सभी कर्मचारी पारस्परिक सहयोग और आत्म-सम्मान-
की भावना महसूस करते हों तो वे सभी, विरोधस्वरूप ही सही, खादी वस्त्र और
टोपियां पहनना शुरू कर वें और श्री कशालकरको बहाल करनेकी माँग करें।
मैं इस बरखास्तगीका बड़ा महत्त्व मानता हूँ । मैनेजरने एक असहाय भारतीय
कर्मचारीको बरखास्त करके पूरे मामलेको एक राजनीतिक पुट दे दिया है और श्री
कशालकर द्वारा किये गये एक राष्ट्रीय कार्यके प्रति रोष प्रकट करके सारे राष्ट्रका
अपमान किया है। और इस बरखास्तगीसे यहाँ मौजूद सभी श्रोताओंका सम्बन्ध है ।
यदि अन्य कोई कारण न भी माना जाये, तो श्री कशालकर जैसे एक नवयुवकको
अपमानसे बचानेके लिए ही क्यों न हो, कर्मचारियोंको खादीके वस्त्र और टोपियाँ
पहनना अवश्य शुरू कर देना चाहिए। इसी प्रकारकी घटनाओंसे आँका जायेगा
कि आपकी राष्ट्रीय भावना कितनी बलवती है। श्री कशालकर जैसे सभी अन्याय-
पीड़ित व्यक्तियोंकी रक्षा करनेकी हमारी क्षमताका अर्थ स्वराज्य हासिल करनेकी
हमारी योग्यता है ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, १७-७-१९२१
१८९. असहयोग समितिका प्रतिवेदन
केन्द्रीय खिलाफत समितिकी असहयोग समितिका प्रतिवेदन इस प्रकार है :
अंकाराकी टर्की सरकारके सम्बन्धमें उत्पन्न खतरनाक परिस्थितिको देखते हुए,
केन्द्रीय खिलाफत समितिने हमसे सामना करनेका सबसे अच्छा तरीका क्या होगा यह
पूछा है।
चूंकि हमारी समिति केवल असहयोग सम्बन्धी विषयोंपर विचार करनेके लिए
नियुक्त की गई थी, इसलिए असहयोग के अलावा दूसरे साधनोंपर विचार करनेका हमें
कोई अधिकार नहीं है । लेकिन हम समझते हैं कि अहिंसक असहयोग आन्दोलनने जो
सफलता अबतक प्राप्त कर ली है उसे देखते हुए असहयोग के अलावा दूसरे किन्हीं
साधनोंपर विचार करना अनावश्यक भी हो गया है। इस महीने के अन्तमें जब कांग्रेस-
के बेजवाड़ा कार्यक्रमके पालन किये जानेके परिणामोंका लेखा-जोखा किया जायेगा,<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''साहस किया था। कम्पनीका मैनेजर इसको बरदाश्त नहीं कर पाया और चूँकि नवयुवक कशालकर झुकनेके लिए तैयार नहीं हुआ, इसलिए उसे बरखास्त कर दिया गया। अपने साहसके लिए वह हमारी बधाईका पात्र है। क्या यह घटना भारतकी गुलामीकी द्योतक नहीं है? दूसरे किसी देशमें यदि किसी मैनेजरने इतने मनमाने ढंगसे निजी भूषाके बारेमें अपने किसी कर्मचारीकी स्वतन्त्रतामें हस्तक्षेप किया होता, तो उसे या तो क्षमा-याचना करनी पड़ती या खुद बरखास्त होना पड़ता। अब भी समय है यदि मेसर्स शॉ वैलेस ऐंड कम्पनीके सभी कर्मचारी पारस्परिक सहयोग और आत्म-सम्मानकी भावना महसूस करते हों तो वे सभी, विरोधस्वरूप ही सही, खादीके वस्त्र और टोपियाँ पहनना शुरू कर दें और श्री कशालकरको बहाल करनेकी माँग करें।'''
'''मैं इस बरखास्तगीका बड़ा महत्त्व मानता हूँ। मैनेजरने एक असहाय भारतीय कर्मचारीको बरखास्त करके पूरे मामलेको एक राजनीतिक पुट दे दिया है और श्री कशालकर द्वारा किये गये एक राष्ट्रीय कार्यके प्रति रोष प्रकट करके सारे राष्ट्रका अपमान किया है। और इस बरखास्तगीसे यहाँ मौजूद सभी श्रोताओंका सम्बन्ध है। यदि अन्य कोई कारण न भी माना जाये, तो श्री कशालकर-जैसे एक नवयुवकको अपमानसे बचानेके लिए ही क्यों न हो, कर्मचारियोंको खादीके वस्त्र और टोपियाँ पहनना अवश्य शुरू कर देना चाहिए। इसी प्रकारकी घटनाओंसे आँका जायेगा कि आपकी राष्ट्रीय भावना कितनी बलवती है। श्री कशालकर-जैसे सभी अन्याय-पीड़ित व्यक्तियोंकी रक्षा करनेकी हमारी क्षमताका अर्थ स्वराज्य हासिल करनेकी हमारी योग्यता है।'''
{{Left|'''[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १७-७-१९२१|1em}}
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{{C|{{larger|'''१८९. असहयोग समितिका प्रतिवेदन'''}}}}
'''केन्द्रीय खिलाफत समितिकी असहयोग समितिका प्रतिवेदन इस प्रकार है :'''
अंकाराकी टर्की सरकारके सम्बन्धमें उत्पन्न खतरनाक परिस्थितिको देखते हुए, केन्द्रीय खिलाफत समितिने हमसे सामना करनेका सबसे अच्छा तरीका क्या होगा यह पूछा है।
चूँकि हमारी समिति केवल असहयोग सम्बन्धी विषयोंपर विचार करनेके लिए नियुक्त की गई थी, इसलिए असहयोगके अलावा दूसरे साधनोंपर विचार करनेका हमें कोई अधिकार नहीं है। लेकिन हम समझते हैं कि अहिंसक असहयोग आन्दोलनने जो सफलता अबतक प्राप्त कर ली है उसे देखते हुए असहयोग के अलावा दूसरे किन्हीं साधनोंपर विचार करना अनावश्यक भी हो गया है। इस महीने के अन्तमें जब कांग्रेसके बेजवाड़ा कार्यक्रमके पालन किये जानेके परिणामोंका लेखा-जोखा किया जायेगा,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>खिलाफत समितिका सदस्य बनना चाहिए और स्मरनाके पीड़ित लोगोंकी सहायताके लिए खुले हाथों चन्दा देना चाहिए, अन्यथा अंकाराकी टर्की सरकारको उनपर काफी खर्च करना पड़ेगा। उसका हाथ पहले ही काफी तंग है।
इसलिए हमारा कहना है कि इन दिशाओंमें दूने उत्साहसे प्रयास किया जाना चाहिए। हमें आशा है कि जनता परिस्थितिकी गम्भीरता और अविलम्बनीयताके अनुरूप ही तत्परता दिखायेगी। सारी जनता यह समाचार पाकर बहुत क्षुब्ध हो उठी है कि ब्रिटेन टर्कीके खिलाफ और भी वैमनस्यपूर्ण कदम उठाने की बात सोच रहा है और हम इस विरोध-भावनाको ऐसा रूप देना अपना कर्त्तव्य समझते हैं कि वह अधिकसे-अधिक हितकारी हो, जिससे कि भारत खिलाफत और पंजाबके अन्यायोंका प्रतिकार करानेके अपने महान् उद्देश्य और स्वराज्य लेनेके अपने महानतम उद्देश्यको शीघ्रतासे प्राप्त कर सके। मंजिल दूर नहीं है, लेकिन टर्कीके सर्वथा अशक्त बननेसे पहले उसकी सहायतार्थ पहुँचनेके लिए अधिकसे-अधिक प्रयत्न करना जरूरी है। हर मुसलमानको इस आशंकाको देखकर असहयोग कार्यक्रमको पूरा करनेकी दिशामें जी-जानसे जुट जाना चाहिए।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १७-७-१९२१|1em}}
{{C|{{larger|'''१९०. जलायें किसलिए?'''}}}}
खम्भातसे एक बहनने लिखा है और अन्य स्थानोंसे भी पत्र आये हैं, उनमें पत्र-लेखक लिखते हैं कि विदेशी कपड़ोंको जलानेके बदले उन्हें गरीबोंको दे देना चाहिए अथवा बाहर, विदेशोंको भेज देना चाहिए। अच्छी तरह से सोच-विचार करने पर भी मुझे यही लगता है कि विदेशी वस्त्रको जला ही देना चाहिए। यदि हम मानते हों कि विदेशी कपड़ा पहनना पाप है, इसीसे देश कंगाल हुआ है, इससे अनेक बहनोंको अपना घरबार तजना पड़ा है तो हमें विदेशी कपड़ेको मैल समझना चाहिए तथा जिस तरह हम अपना मैल दूसरोंको नहीं देते उसी तरह विदेशी कपड़े रूपी इस मैलको भी हमें औरोंको देनेकी बात नहीं सोचनी चाहिए। हमने यदि विदेशी कपड़ोंको त्यागनेका निश्चय न किया होता तो हम खुद ही उन कपड़ोंको पहनकर फाड़ देते। अब अगर हमने उनका त्याग करनेका निश्चय किया है तो हमें उनका पूर्णतया त्याग करना चाहिए। उन्हें किसी को पहननेके लिए देना तो उनका उपयोग करनेके समान है, क्योंकि उन्हें किसीको देकर हम उसका पुण्य लूटना चाहते हैं। मुझे लगता है कि हमें वैसे फलका अधिकार नहीं है। हम जैसे सड़े हुए अनाजको फेंक देते हैं वैसे ही हमें विदेशी कपड़ोंको भी फेंक देना चाहिए। हिन्दू, मुसलमान, पारसी सबके लिए विदेशी कपड़ा हराम होना चाहिए। और यदि हम ऐसा मानें तो उन कपड़ोंका कतई उपयोग न करें। यह भावना उत्पन्न करनेके लिए मैं अपने पास पड़े विदेशी कपड़ोंका त्याग करना और उन्हें जला डालना आवश्यक समझता हूँ। उससे जो भावना उत्पन्न होगी उसे मैं मूल्यवान मानता हूँ। मैं लोगों में इस हदतक जोश फैलानेकी जरूरत महसूस करता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४२९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>जलायें किसलिए ?
३९७
हूँ कि विदेशी कपड़ेके सम्बन्धमें हमें धोखा देनेकी किसीकी हिम्मत न हो। इसीसे अगर हम पहली अगस्तको पहनने योग्य सभी विदेशी कपड़ोंको जला डालें तो मैं समझँगा कि हमने आत्मशुद्धि कर ली है ।
विदेशी कपड़ेके प्रति अरुचि पैदा करनेकी हमें जरूरत है । कोई-कोई मुझसे पूछते हैं कि क्या इससे विदेशियोंके विरुद्ध अरुचिका भाव उत्पन्न नहीं हो जायेगा। यह संघर्ष दुष्टताकी निन्दा करते हुए भी दुष्टके प्रति प्रेमभाव रखनेका पाठ सिखानेका संघर्ष है । मनुष्य जितनी दुष्टता करता है उतना दुष्ट होता नहीं। हम सब भूलसे भरे हुए हैं, तो फिर एक-दूसरेका तिरस्कार क्यों करें ? दुष्टकी भी सेवा करना, सब धर्मोकी शिक्षा है । धर्मीकी परीक्षा उसके राग-द्वेषादिको रोकनेमें ही है । क्रोधका कारण मिलनेपर भी जो क्रोध नहीं करता उसी व्यक्तिने प्रभुको जाना है । मनुष्य- मात्रका कार्य प्रभुको जान लेना है । क्रोधको रोकना केवल संन्यासीका ही धर्म नहीं है। संन्यासीको तो अन्य अनेक कठोर व्रतोंका पालन करना होता है । अतएव हम कपड़े तो जलायें लेकिन कपड़ा बनानेवालों पर क्रोध न करें। मैनचेस्टर और जापान कपड़ा भले बनायें किन्तु यदि हम न लें तो वे क्या कर सकते हैं? हम मद्यपान न करें तो मद्य विक्रेता क्या करेंगे ? विवेकपूर्वक विचार करें तो स्वराज्यकी चाबी हमारी अपनी ही जेब में है। हमें शराबकी लत लगी हुई है, उसे जला डालना चाहिए; रेशमी बारीक कपड़े का शौक है, उसे भस्म कर देना चाहिए; अनेक तरहके पकवान खाने का शौक है, उसे छोड़ देना चाहिए। जबतक हम सब स्त्रियोंको बहन के समान मानना नहीं सीखते तबतक हमें आँखोंपर पट्टी बाँध लेनी चाहिए। शास्त्रकारोंने जिस- जिस वस्तुके सम्बन्धमें अरुचि उत्पन्न करनी चाही है उस उस वस्तुका इतना स्पष्ट चित्रण किया है कि उसपर मनन करनेवाले व्यक्तिके मनमें उसके प्रति अरुचि उत्पन्न हुए बिना नहीं रहती । लेकिन क्या उसके कर्त्ताके सम्बन्ध में अरुचि उत्पन्न करना उचित है ? क्या हमें शराब बनानेवालों, विदेशी रेशम बनानेवालों, पकवान पकाने- वालों और सौन्दर्यमयी स्त्रीको जला डालना चाहिए अथवा हमें अपने विषयोंको और उनकी ओर प्रलोभित करनेवाली चीजोंको जलाना चाहिए। स्वराज्य कौन पायेगा ? शराब छोड़नेवाला अथवा शराब बनानेवाले को जलानेवाला व्यक्ति ?
लेकिन जो कपड़े जलाकर कपड़ा छोड़ना न सीखे बल्कि कपड़ा बनानेवाले को गाली देना सीखे तो उसे कपड़े जलाने ही नहीं चाहिए, उसे वैसा करनेका अधिकार नहीं है ।
इतना कहने के बाद भी जो लोग कपड़े जलानेकी अपेक्षा उन्हें बाहर भेजनेका विचार रखते हैं, वह भी प्रशंसनीय है । हमारे मुसलमान भाई स्मरना कपड़ा भेज रहे हैं, वहाँ भेजने के लिए अगर हम विदेशी कपड़ा दें तो भी हमारा उद्देश्य पूर्ण हो जायेगा । परदेशी कपड़ेका त्याग करते हैं अर्थात् हम अपना प्रथम कार्य पूरा करते हैं । त्याग किये गये कपड़ों के सम्बन्धमें अगर मतभेद हो तो जिसे जैसा रुचे वैसा वह कर सकता है ।
[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, १७-७-१९२१<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||जलायें किसलिए?|३९७}}</noinclude>हूँ कि विदेशी कपड़ेके सम्बन्धमें हमें धोखा देनेकी किसीकी हिम्मत न हो। इसीसे अगर हम पहली अगस्तको पहनने योग्य सभी विदेशी कपड़ोंको जला डालें तो मैं समझँगा कि हमने आत्मशुद्धि कर ली है।
विदेशी कपड़ेके प्रति अरुचि पैदा करनेकी हमें जरूरत है। कोई-कोई मुझसे पूछते हैं कि क्या इससे विदेशियोंके विरुद्ध अरुचिका भाव उत्पन्न नहीं हो जायेगा। यह संघर्ष दुष्टताकी निन्दा करते हुए भी दुष्टके प्रति प्रेमभाव रखनेका पाठ सिखानेका संघर्ष है। मनुष्य जितनी दुष्टता करता है उतना दुष्ट होता नहीं। हम सब भूलसे भरे हुए हैं, तो फिर एक-दूसरेका तिरस्कार क्यों करें? दुष्टकी भी सेवा करना, सब धर्मोकी शिक्षा है। धर्मीकी परीक्षा उसके राग-द्वेषादिको रोकनेमें ही है। क्रोधका कारण मिलनेपर भी जो क्रोध नहीं करता उसी व्यक्तिने प्रभुको जाना है। मनुष्य-मात्रका कार्य प्रभुको जान लेना है। क्रोधको रोकना केवल संन्यासीका ही धर्म नहीं है। संन्यासीको तो अन्य अनेक कठोर व्रतोंका पालन करना होता है। अतएव हम कपड़े तो जलायें लेकिन कपड़ा बनानेवालों पर क्रोध न करें। मैनचेस्टर और जापान कपड़ा भले बनायें किन्तु यदि हम न लें तो वे क्या कर सकते हैं? हम मद्यपान न करें तो मद्य-विक्रेता क्या करेंगे? विवेकपूर्वक विचार करें तो स्वराज्यकी चाबी हमारी अपनी ही जेबमें है। हमें शराबकी लत लगी हुई है, उसे जला डालना चाहिए; रेशमी बारीक कपड़े का शौक है, उसे भस्म कर देना चाहिए; अनेक तरहके पकवान खानेका शौक है, उसे छोड़ देना चाहिए। जबतक हम सब स्त्रियोंको बहनके समान मानना नहीं सीखते तबतक हमें आँखोंपर पट्टी बाँध लेनी चाहिए। शास्त्रकारोंने जिस-जिस वस्तुके सम्बन्धमें अरुचि उत्पन्न करनी चाही है उस-उस वस्तुका इतना स्पष्ट चित्रण किया है कि उसपर मनन करनेवाले व्यक्तिके मनमें उसके प्रति अरुचि उत्पन्न हुए बिना नहीं रहती। लेकिन क्या उसके कर्त्ताके सम्बन्धमें अरुचि उत्पन्न करना उचित है? क्या हमें शराब बनानेवालों, विदेशी रेशम बनानेवालों, पकवान पकाने-वालों और सौन्दर्यमयी स्त्रीको जला डालना चाहिए अथवा हमें अपने विषयोंको और उनकी ओर प्रलोभित करनेवाली चीजोंको जलाना चाहिए। स्वराज्य कौन पायेगा? शराब छोड़नेवाला अथवा शराब बनानेवाले को जलानेवाला व्यक्ति?
लेकिन जो कपड़े जलाकर कपड़ा छोड़ना न सीखे बल्कि कपड़ा बनानेवाले को गाली देना सीखे तो उसे कपड़े जलाने ही नहीं चाहिए, उसे वैसा करनेका अधिकार नहीं है।
इतना कहनेके बाद भी जो लोग कपड़े जलानेकी अपेक्षा उन्हें बाहर भेजनेका विचार रखते हैं, वह भी प्रशंसनीय है। हमारे मुसलमान भाई स्मरना कपड़ा भेज रहे हैं, वहाँ भेजनेके लिए अगर हम विदेशी कपड़ा दें तो भी हमारा उद्देश्य पूर्ण हो जायेगा। परदेशी कपड़ेका त्याग करते हैं अर्थात् हम अपना प्रथम कार्य पूरा करते हैं। त्याग किये गये कपड़ोंके सम्बन्धमें अगर मतभेद हो तो जिसे जैसा रुचे वैसा वह कर सकता है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>१९१. व्यापारी क्या करें ?
जो व्यापारी विदेशी माल बेचते हैं वे उसे कहाँ फेंक दें ? वे भिखारी बन जायें तो देशका क्या होगा ? क्या उन्हें नोटिस नहीं मिलना चाहिए ?
विदेशी मालका व्यापार करना तो सदा ही बुरा काम था । उसी व्यापारके लालचमें पड़कर तो हम फँसे, गुलाम बने, किसानोंको बिना कामके चार महीने रहना पड़ा और अकालके लिए जरा भी पूंजी न रही। विदेशी व्यापारसे हिन्दुस्तानका सत्यानाश हो गया। ऐसा व्यापार करनेवाले क्या करें, यह प्रश्न पूछा ही नहीं जाना चाहिए। उन्हें शूरवीर बनना चाहिए। सभीका देशहितको समझना और उसकी खातिर स्वार्थत्याग करनेके लिए तैयार होना, इसीका नाम स्वराज्य-शक्ति है। उन्हें इस बातपर विचार करना चाहिए कि उन्होंने इतने दिन व्यापार कैसे किया, और अब अपने सिरपर आनेवाली मुसीबतको झेल लेना चाहिए।
इसके अतिरिक्त विदेशी कपड़ेको निकालना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । उनका माल बाह्रके देशोंमें भी खप सकता है । थोड़ा-बहुत माल सामान्य रूपसे बाह्रके देशोंके कामका नहीं होता, लेकिन उसका कुछ-न-कुछ उपयोग हो सकता है, यह बात व्यापारियोंको बतानेकी जरूरत नहीं है ।
व्यापारी भिखारी हो जायेंगे ऐसी बात नहीं, पैसा तो हाथका मैल माना गया है । व्यापारी आज कमाता है और कल गँवाता है। पैसा कमानेकी शक्तिमें ही व्यापारीकी रक्षा और निर्भयता समाहित है। पैसा तो आनी-जानी वस्तु है किन्तु व्यापार करनेकी शक्ति स्थिर रहनेवाली वस्तु है। एक व्यापारमें नुकसान उठानेवाला व्यापारी दूसरेकी तलाश कर लेता है । 'व्यापारी- बच्चा कभी भीख नहीं माँगेगा ऐसे बहादुरीपूर्ण वचन मैंने अनेक व्यापारियोंके मुंहसे सुने हैं।
व्यापारी विदेशी मालके व्यापारको त्यागकर खादीका व्यापार क्यों नहीं कर सकता ? साठ करोड़ रुपयेका नया माल तैयार करना है, क्या इस उद्योगसे हजारों व्यापारी अपनी आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते ? 'क्या करेंगे' यह वाक्य तो आलस्यका परिचायक है ।
सच तो यह है कि विदेशी कपड़े के बहिष्कारमें हमें स्वराज्यकी बात सूझी ही नहीं है और जबतक जनताकी नस-नसमें स्वदेशीकी उत्कट भावना व्याप्त नहीं हो जाती तबतक बहिष्कार सफल नहीं होगा और तबतक स्वराज्य भी नहीं मिलेगा। इसलिए देशकी खातिर व्यापारी-वर्ग में कपड़े के व्यापारकी आहुति देनेका जोश आना चाहिए।
व्यापारियोंको बहिष्कारका नोटिस नहीं मिला, यह कहना अज्ञानका परिचायक है। नोटिस तो गत सितम्बरसे मिल चुका है। उसकी चर्चा भी तभी से चली है। लेकिन व्यापारी सावधान नहीं हुए। कांग्रेस प्रस्ताव पास करती रहती है और वे प्रस्ताव विस्मृतिके गर्त में विलीन हो जाते हैं, इसलिए उनकी कौन परवाह करता है ? समय बदल गया है; इसका ज्ञान व्यापारियोंको नहीं हुआ। इसमें किसका दोष है ?<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१९१. व्यापारी क्या करें?'''}}}}
जो व्यापारी विदेशी माल बेचते हैं वे उसे कहाँ फेंक दें? वे भिखारी बन जायें तो देशका क्या होगा? क्या उन्हें नोटिस नहीं मिलना चाहिए?
विदेशी मालका व्यापार करना तो सदा ही बुरा काम था। उसी व्यापारके लालचमें पड़कर तो हम फँसे, गुलाम बने, किसानोंको बिना कामके चार महीने रहना पड़ा और अकालके लिए जरा भी पूँजी न रही। विदेशी व्यापारसे हिन्दुस्तानका सत्यानाश हो गया। ऐसा व्यापार करनेवाले क्या करें, यह प्रश्न पूछा ही नहीं जाना चाहिए। उन्हें शूरवीर बनना चाहिए। सभीका देशहितको समझना और उसकी खातिर स्वार्थत्याग करनेके लिए तैयार होना, इसीका नाम स्वराज्य-शक्ति है। उन्हें इस बातपर विचार करना चाहिए कि उन्होंने इतने दिन व्यापार कैसे किया, और अब अपने सिरपर आनेवाली मुसीबतको झेल लेना चाहिए।
इसके अतिरिक्त विदेशी कपड़ेको निकालना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उनका माल बाहरके देशोंमें भी खप सकता है। थोड़ा-बहुत माल सामान्य रूपसे बाहरके देशोंके कामका नहीं होता, लेकिन उसका कुछ-न-कुछ उपयोग हो सकता है, यह बात व्यापारियोंको बतानेकी जरूरत नहीं है।
व्यापारी भिखारी हो जायेंगे ऐसी बात नहीं, पैसा तो हाथका मैल माना गया है। व्यापारी आज कमाता है और कल गँवाता है। पैसा कमानेकी शक्तिमें ही व्यापारीकी रक्षा और निर्भयता समाहित है। पैसा तो आनी-जानी वस्तु है किन्तु व्यापार करनेकी शक्ति स्थिर रहनेवाली वस्तु है। एक व्यापारमें नुकसान उठानेवाला व्यापारी दूसरेकी तलाश कर लेता है। 'व्यापारी-बच्चा कभी भीख नहीं माँगेगा' ऐसे बहादुरीपूर्ण वचन मैंने अनेक व्यापारियोंके मुँहसे सुने हैं।
व्यापारी विदेशी मालके व्यापारको त्यागकर खादीका व्यापार क्यों नहीं कर सकता? साठ करोड़ रुपयेका नया माल तैयार करना है, क्या इस उद्योगसे हजारों व्यापारी अपनी आजीविका प्राप्त नहीं कर सकते? 'क्या करेंगे' यह वाक्य तो आलस्यका परिचायक है।
सच तो यह है कि विदेशी कपड़ेके बहिष्कारमें हमें स्वराज्यकी बात सूझी ही नहीं है और जबतक जनताकी नस-नसमें स्वदेशीकी उत्कट भावना व्याप्त नहीं हो जाती तबतक बहिष्कार सफल नहीं होगा और तबतक स्वराज्य भी नहीं मिलेगा। इसलिए देशकी खातिर व्यापारी-वर्गमें कपड़ेके व्यापारकी आहुति देनेका जोश आना चाहिए।
व्यापारियोंको बहिष्कारका नोटिस नहीं मिला, यह कहना अज्ञानका परिचायक है। नोटिस तो गत सितम्बरसे मिल चुका है। उसकी चर्चा भी तभीसे चली है। लेकिन व्यापारी सावधान नहीं हुए। कांग्रेस प्रस्ताव पास करती रहती है और वे प्रस्ताव विस्मृतिके गर्तमें विलीन हो जाते हैं, इसलिए उनकी कौन परवाह करता है? समय बदल गया है; इसका ज्ञान व्यापारियोंको नहीं हुआ। इसमें किसका दोष है?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{C||टिप्पणियाँ|३९९}}</noinclude>सितम्बरसे मैंने लगभग प्रत्येक सभामें विदेशी कपड़ेके त्यागकी बात कही है। जो अनुचित धंधा करते हैं, जो व्यसनी हैं, जो व्यभिचारी हैं, जो अन्त्यजों आदिसे द्वेष करनेवाले हैं उन्हें जबसे असहयोग, आत्मशुद्धिका यज्ञ शुरू हुआ तभीसे नोटिस मिल चुका है। उनमें से जिस-जिस बातकी जरूरत जान पड़ेगी उस-उस बातपर समयानुसार अधिक जोर दिया जायेगा। लेकिन सबको यह समझ लेना चाहिए कि दुराचार, लोककल्याणके विरुद्ध अर्थसंग्रह, छोड़ दिया जाना चाहिए ऐसा नोटिस तो सबको मिल गया है।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १७-७-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१९२. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''अनुकरणीय'''}}
वराड़ गाँवमें जो घटना घटी और जिसका हाल समाचारपत्रोंमें श्री कुँवरजी विट्ठलभाईने प्रकाशित कराया है उसको पढ़कर किस असहयोगीको हर्ष नहीं होगा? अध्यापक मकनजीको उनके धैर्य और क्षमाशील स्वभावपर धन्यवाद देना उचित है। जब हम सब लोग इसी प्रकार धैर्यपूर्वक मार खाना सीख जायेंगे तब स्वराज्य मिलनेमें विलम्ब न होगा। जिस भाईने अज्ञानके कारण अध्यापक मकनजीपर अत्याचार किया उसको बराड़ गाँवके लोग सुगमतासे दण्ड दे सकते थे, किन्तु फिर भी उन्होंने अपने रोषपर अंकुश रखा इससे उनकी शुद्ध वीरता प्रकट होती है। अध्यापकके साथी पिटनेके डरसे उनको छोड़कर भाग गये; उनके सम्बन्धमें चेतावनी देनेकी जरूरत है। हमें चाहे पिटनेका डर भी हो, फिर भी हमें अपने साथीको छोड़कर नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने शरीरको जोखिममें डालकर भी उसकी रक्षा करनी चाहिए। रक्षा करनेमें मारनेकी बजाय मरनेके साहसकी जरूरत होती है। युद्धमें 'अपलायन' शूरवीरका—क्षत्रियका—गुण माना गया है। चारों वर्णोंके लोगोंमें से प्रत्येकमें कम या अधिक मात्रामें चारों वर्णोंके ही गुण होने चाहिए। ब्राह्मणों और वैश्योंके लिए वीरताकी आवश्यकता नहीं है अथवा उनमें वीरता नहीं हो सकती, ऐसा मानना केवल अज्ञान है। हममें से प्रत्येक व्यक्तिमें अपनी और अपने साथियोंकी रक्षा करनेकी शक्ति अवश्य होनी चाहिए। जो दूसरोंपर प्रहार करके अपनी रक्षा करते हैं उसके सम्मुख स्वयं मरनेका जोखिम भी होता है और वीरता इस जोखिमके अनुपातसे ही नापी जाती है। इतनी आलोचना करनेका मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि में अध्यापकके साथीके दोष बताना चाहता हूँ। हमको ये सब नये अनुभव होते रहते हैं। जबतक हमारे हृदयमें इतना साहस नहीं आता तबतक ऐसी भूलें तो होंगी ही। हम दूसरेको मारनेका दोष करके अपनी अहिंसाकी प्रतिज्ञाको भंग न करें तो हमारे ऊपर किसी प्रकारका जोखिम नहीं आयेगा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''शीर्षक सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{outdent|टिप्पणी, १०७-८, १५६-५७, २०१-२, २१६, २३७, ३००-१, ३०४-५; -[णियाँ] ५-११, १४-१९, ३६-३७, ४४-४८, ८०-८४, ११९-२७, १५२- ५४, १६१-६३, १७१-७७, १९८-९९, २२५-२७, ३३८-३९, ३५४-५७, ३९१-९३, ३९६-९९, ४०९-१४, ४६६-७०, ४९३-९७, ५६४-६५, ५८१-८३}}
{{outdent|तार, १८९; -अनन्तरामको, ४९३; -अबुल कलाम आजादको, २६३, २७९, ३२९, ३९६; -अब्दुल बारीको, १३९, १५६, २८४; –'आउट लुक' को, १९८; -एन॰ एच॰ बेलगाँववालाको, १४; -एस॰ श्रीनिवास आय्यंगारको, २१७; –कुम्भकोणम् कांग्रेस कमेटीको, २२१; -कृष्णदासको, १३९; -कोण्डा वैंकटप्पैयाको २६४; -घनश्यामदास बिड़लाको २२८, ३०१; -चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को, १८९, २७७; -चित्तरंजन दासको, २५९, ३०१; -जफर अली खाँको ३०३; -जमनादास द्वारकादास को, १६०; -जवाहरलाल नेहरूको, ३९५; - डॉ॰ बी॰ एस॰ मुंजेको, २५८, २६३; -डॉ॰ सत्यपालको, ३९५; -पण्डित मदनमोहन मालवीयको, १०२; -पीलीभीत कांग्रेस कमेटी के मन्त्रीको, २६२, २६४; -प्रभाशंकर पट्टणीको, ५७६; –बालमुकुन्द वाजपेयीको, १३९; -बी० सुब्रह्मण्यमको, ३२३; -ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको, ३७९;}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}मथुरादास त्रिकमजीको, २४१; -मु॰रा॰ जयकरको २२०; -मुहम्मद अलीको, १०२; -मोतीलाल नेहरूको, ७१, २५७, २५९, २६२, २६३; वायइसरायके निजी सचिवको, २८२, २८५ -शाहजी अहमद अलीको, २५७; -सुरेन्द्रनाथ विश्वासको, ६२१; -हिन्दी साहित्य सम्मेलनको, ३०२}}
{{outdent|पत्र : अजमेरके यातायात अधीक्षकको, १२-१३; -अब्दुल मजीदको, ४३; -अब्बास तैयबजीको, ३२; २१०, ४०८; अमीरचन्द सी॰ बम्बवालकी, ३५१- ५२; -अवन्तिकाबाई गोखलेको, ५७४; -आनन्दानन्दको, ११७, १५५; -आर॰ शर्माको, ३४४; -इन्द्र विद्यावाचस्पतिको, १३८; -एक मित्रको, ६९, १३७-३८; -एनी बेसेंटको, १५४, १८५, २५८; –ए० वरदन् को, ४६०; -कनिका के राजा साहबको, ११३, ३५३; -कपिल ठक्करको ५७५; -कर्नल मेलको, ३४०, ४२३, -काका कालेलकरको ३४५; -कान्ति गांधीको, ७०; -कुँवरजी विट्ठलभाई मेहताको, ४६२; -कुमारी मैडिलीन स्लेडको, ५५७; -कृष्टोदासको, ३१९; -गंगाबहन वैद्यको, २११, २४६, २९०; -गोपबन्धु दासको, १०३; घनश्यामदास बिड़लाको, २९, ३०, ४१, २४४; -चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको, १०५-६, १४०, १५८, ३४५-४६; -छगनलाल गांधीको, ३९४; -जमनालाल बजाजको, ३१,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६८९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh||शीर्षक सांकेतिका|६५३}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}१०६-७, ११८; -जमनादास गांधीको, २३८; -जवाहरलाल नेहरूको, १०४-५, १५७, १९३, ३२४-२५, ३४८; -जी॰ ए॰ नटेसनको, ४६५; - जीवतराम बी॰ कृपलानीको, ३४६-४७; -डाह्याभाई एम॰ पटेलको, २७५, ४६५; –तारामती मथुरादासको, ११९; -तुलसी मेहरको, २११-१२; -देवचन्द पारेखको, ६१५; -देवदास गांधीको, २१०, २८४, २९०; न॰ चि॰ केलकरको, ५६६; -नरहरि परीखको, २३२; -ना॰ मो॰ खरेको, २३९-४०, २७६; -प्रभाशंकर पट्टणीको ४०८, ४६०, ४६२-६३, ४७६, ५७५; -फॉरवर्डको, ४६६; -फूलचन्द शाहको, १४०-४१, ३२२, ५७४; -बम्बईके यातायात महाप्रबन्धकको, ६८; -बाबू भगवानदासको, ३८४-८५; -ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको, ३८०; -भगवानजी अनूपचन्द मोदीको, ४६३; -भवानी दयालको, ३२; -मगनलाल गांधीको, ३४३, ४०५, ४०६-७; -मणिबहन पटेलको, २२८, २९१; -मथुरादास त्रिकमजीको, ११८-१९, १६८, २७६, ४६१, ६१५; -मुहम्मद अलीको, ११३-१५, १६६, २४२, ३२१; -मोतीलाल नेहरूको, ५६-५८; ६८-६९, १०३-४, १६८, २३०-३१, २८८-८९; -रमा बाई पट्टणीको, ४०७; -राजगोपालाचारीको, ३७-३९; -राधा गांधीको, १, १४१, १८६; -रुक्मिणी गांधीको १६९; -रेहाना तैयबजीको, ५७३; -रोमाँ रोलाँको, ३४१; -लक्ष्मीको, १९३, ३२२-२३; -लक्ष्मीनिवास}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}बिड़लाको, ५७६; -लाला लाजपतरायको, २८३, २८६, ३२६-२८, ३५१; -वल्लभभाई पटेलको, १६१; -वसुमती पण्डितको, १, ११६, १६९, २००-१, २७४, २८६-८७, ३२८-२९; वाइसरायके निजी सचिवको, २५४-५५, २८०; वाइकोम सत्याग्रह आश्रम के मन्त्रीको, ६७ -वि॰ ल॰ फड़केको, ४७५; -वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको, २००, ३२३-२४; -शरद् कुमार घोषको, १४२; -शान्तिकुमार मोरारजी को, २४३-४४, ३२८; -शुएब कुरैशीको, ६७-६८, ३२५-२६; -श्रीमती हॉजकिन्सनको, २३३; सतीशचन्द्र मुखर्जीको, ११५-१६, २२१, ३१८, ३५०, ३८३; -सन्तोक गांधीको, ७२; -सन्मुखरायको, १४२; -सरला देवी चौधरानीको, २१७, २२४; -सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको, ३९, ४०, १६७, १७०, १८५-८६, २६१, २८०, ३८३-८४, ४२५, ४७५; -स्वामीजीको, ३४७; -स्वामी श्रद्धानन्दको, २४५; -हरनामसिंहको, २०९; -हिन्दी साहित्य सम्मेलनको, ३०२}}
{{outdent|प्रस्ताव, कलकत्ता-समझौते तथा कताई-सदस्यता के बारेमें, ५२६-२८; -बेलगाँव कांग्रेस में, ५३७-३९; -सरोजिनी नायडूकी सराहना में, ५३३-३४}}
{{outdent|प्रस्तावना, -'श्री रामकृष्ण की जीवनी' की, ४५८}}
{{outdent|भाषण, -अ॰ भा॰ कांग्रेस कमेटी, बम्बई में ३७२-७७; -अ॰ भा॰ छात्र सम्मेलन, बेलगाँवमें, ५३२; -अ॰ भा॰ देशी रियासत-परिषद् में, ५५५-५६; -अ॰ भा॰ मुस्लिम लीग अधिवेशन में, ५५७-}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६९०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}५८; -अन्त्यज आश्रम गोधरामें, ५६७-
६९; -अपरिवर्तनवादियोंके समक्ष,
४७९-८०; -अमृतसरकी सार्वजनिक
सभामें, ४२७-२८; -अमृतसर के
खिलाफत-सम्मेलनमें, ४२९-३०;
-अमृतसरके स्वर्ण मन्दिरमें, ४२६-२७;
-अस्पृश्यता सम्बन्धी प्रस्तावपर,
५३५; -अहमदाबाद नगरपालिकाके
अभिनन्दनके उत्तरमें, ४१-४३; -एक्से-
लिसयर थियेटर, बम्बईमें, ५९-६६;
-एनी बेसेंटके वक्तव्यपर, ५३६-३७;
-कताई प्रतियोगिताके सम्बन्धमें, ५४०-
४१; -कलकत्ताके कताई-प्रदर्शनमें,
३१०; -कलकत्ता नगर निगम द्वारा
दिये मानपत्रके उत्तरमें,३०८-९;
-कलकत्ता समझौतेपर,५२९-३१;
-कांग्रेस कमेटी की बैठकमें, ७१; -कांग्रेस
कार्यसमितिको बैठकमें, ३६१; -काठि-
यावाड़ राजनीतिक परिषद्, भावनगर-
में, ५९९-६०४; -कोहाट और गुल-
बर्गाके दंगोंसे सम्बन्धित प्रस्तावपर,
५३४; -खेडूत परिषद्में, ६३४-३८;
- गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी
बैठकमें, ६१६; -गुजरात राष्ट्रीय
विद्यापीठ, अहमदाबाद में, ४०४-५;
-गोधराकी सार्वजनिक सभामें, ५६९-
७०; —गोरक्षा-परिषद्में, ५४९-५५;
-तिलक महाविद्यालय पूनाके दीक्षान्त
समारोहमें, ९६-९७; - दाहोदकी
सार्वजनिक सभामें, ५६६-६७; -नेश-
नल मैडिकल कॉलेज, बम्बईमें, ७०;
-पंजाब प्रान्तीय सम्मेलनमें, ४४१-
४२; -पदाधिकारियोंसे सम्बन्धित
प्रस्तावपर, ५३९-४०; -पूनाकी}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}सार्वजनिक सभामें, ९४-९५; -बम्बई
निगमके अभिनन्दनके उत्तरमें, ५५-
५६; -बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी
बैठक में, ६६; - बेलगाँव कांग्रेसकी
विषय समितिमें, ४८४-८५;, ४८६-
९२; -बेलगाँव कांग्रेसमें, ५३६;-
बेलगाँव कांग्रेसमें शोक प्रस्तावपर,
५२५-२६; ५३२-३३; -बेलगाँवकी
अस्पृश्यता परिषद्में, ५४५-४८; -मज-
दूरोंकी सभा, अहमदाबादमें, ३३;
-मानपत्रोंके उतरमें, ४८१; -राम-
जस कालेज दिल्लीमें ३४१-४२;
-रावलपिंडीमें, ४४२-४४; -विषय
समितिकी बैठकमें, ५८४-८५; -शामल-
दास, कालेज, भावनगरमें, ६०९-१३;
-शोक सभामें, ३७८-७९; -सर्वदलीय
सम्मेलन, बम्बईमें, ३६२, ३६४, ३६५-
६६; - सूरतकी सार्वजनिक सभामें, ९९-
१०१; -सूरतके कांग्रेसी कार्यकर्ताओंके
समक्ष, ९९; -हावड़ा नगरपालिका
द्वारा दिये मानपत्रके उत्तरमें ३१४-
१५; -'हिन्दुस्तान टाइम्स', दिल्लीके
उद्घाटन समारोहके अवसरपर, १५९;
-[अध्यक्षीय] काठियावाड़ राजनीतिक
परिषद्में, ५८५-९८; -पंजाब प्रान्तीय
सम्मेलनमें, ४३८-४१; -बेलगाँव
कांग्रेस में, ५०४-२५; -[उद्घांटन]
बेलगाँव कांग्रेसमें, ४९७- ५०४;
-[दीक्षान्त] गुजरात विद्यापीठ,
अहमदाबादमें, ६१६-२१; -पंजाब
कौमी विद्यापीठमें, ४३०-४३३;
-[समापन] काठियावाड़ राजनीतिक
परिषद्में, ६०४-९; -बेलगाँवमें,
५४१-४५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}५८; -अन्त्यज आश्रम गोधरामें, ५६७-६९; -अपरिवर्तनवादियोंके समक्ष, ४७९-८०; -अमृतसरकी सार्वजनिक सभा में, ४२७-२८; -अमृतसरके ख़िलाफत-सम्मेलनमें, ४२९-३०; -अमृतसरके स्वर्ण मन्दिर में, ४२६-२७; -अस्पृश्यता सम्बन्धी प्रस्तावपर, ५३५; -अहमदाबाद नगरपालिकाके अभिनन्दनके उत्तरमें, ४१-४३; -एक्सेलिसयर थियेटर, बम्बई में, ५९-६६; -एनी बेसेंट के वक्तव्यपर, ५३६-३७; -कताई प्रतियोगिताके सम्बन्ध में, ५४०- ४१; –कलकत्ताके कताई-प्रदर्शन में, ३१०; -कलकत्ता नगर निगम द्वारा दिये मानपत्रके उत्तर में, ३०८-९; -कलकत्ता समझौतेपर, ५२९-३१; -कांग्रेस कमेटी की बैठक, ७१; -कांग्रेस कार्यसमितिको बैठकमें, ३६१; -काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्, भावनगरमें, ५९९-६०४; —कोहाट और गुलबर्गाके दंगों से सम्बन्धित प्रस्तावपर, ५३४; -खेडूत परिषद् में, ६३४-३८; -गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठकमें, ६१६; -गुजरात राष्ट्रीय विद्यापीठ, अहमदाबादमें, ४०४-५; -गोधराकी सार्वजनिक सभामें, ५६९-७०; -गोरक्षा-परिषद् में, ५४९-५५; -तिलक महाविद्यालय पूनाके दीक्षान्त-समारोहमें, ९६-९७; -दाहोदकी सार्वजनिक सभामें, ५६६-६७; -नेशनल मैडिकल कॉलेज, बम्बईमें, ७०; -पंजाब प्रान्तीय सम्मेलनमें, ४४१-४२; -पदाधिकारियोंसे सम्बन्धित प्रस्तावपर, ५३९-४०; -पूनाकी}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}सार्वजनिक सभामें, ९४-९५; -बम्बई निगमके अभिनन्दनके उत्तर में, ५५-५६; -बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक में, ६६; -बेलगाँव कांग्रेसकी विषय समितिमें, ४८४-८५; ४८६-९२; -बेलगाँव कांग्रेसमें, ५३६; -बेलगाँव कांग्रेस में शोक प्रस्तावपर, ५२५-२६; ५३२-३३; -बेलगाँवकी अस्पृश्यता परिषद् में, ५४५-४८; -मजदूरों की सभा, अहमदाबाद में, ३३; -मानपत्रोंके उत्तर में, ४८१; -रामजस कालेज दिल्ली में ३४१-४२; -रावलपिंडी में, ४४२-४४; -विषय समितिकी बैठक में, ५८४-८५; -शामलदास, कालेज, भावनगरमें, ६०९-१३; -शोक सभामें, ३७८-७९; -सर्वदलीय सम्मेलन, बम्बई में, ३६२, ३६४, ३६५- ६६, -सूरतकी सार्वजनिक सभामें, ९९-१०१; -सूरतके कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं के समक्ष, ९९; -हावड़ा नगरपालिका द्वारा दिये मानपत्रके उत्तर में ३१४-१५; -'हिन्दुस्तान टाइम्स', दिल्ली के उद्घाटन समारोह के अवसरपर १५९; -[अध्यक्षीय] काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में, ५८५-९८; -पंजाब प्रान्तीय सम्मेलनमें, ४३८-४१; -बेलगाँव कांग्रेस में, ५०४-२५; -[उद्घाटन] बेलगाँव कांग्रेस में, ४९७-५०४; -[दीक्षान्त] गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद में, ६१६-२१; -पंजाब कौमी विद्यापीठमें, ४३०-४३३; -[समापन] काठियावाड़ राजनीतिक परिषद् में, ६०४-९; -बेलगाँवमें, ५४१-४५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२४
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{{c|{{larger|'''२०१.अपील : बम्बईके मवालियोंसे'''}}}}
{{Right|[ २० नवम्बर, १९२१ ]<ref>१. यह अपील इसी तिथिको एक पर्चेके रूपमें जारी की गई थी; देखिए '''नवजीवन''', २४-११-१९२१।</ref>}}
{{C|'''बम्बईके मवालियोंसे'''}}
मैंने यह समझकर सबसे बड़ी भयंकर गलती की कि असहयोगियोंने आप लोगोंको प्रभावित कर दिया है, और आप लोगोंने नैतिक दृष्टिसे अहिंसाकी आवश्यकता भले न समझी हो, पर उसका सापेक्ष मूल्य, और राजनीतिक महत्त्व अवश्य समझ लिया है। मेरी यह धारणा हो गई थी कि आप लोगोंने अपने देशके हितोंको इतना अवश्य समझ लिया है जिससे आप कुछ ऐसा काम नहीं करेंगे कि आन्दोलनको हानि हो; और आप लोग अपने निम्नतम मनोविकारोंके वशीभूत न होंगे। पर मुझे यह देखकर मर्म-वेदना हो रही है कि आप लोगोंने जनताकी जागृतिको लूट-खसोट और अन्य अत्यन्त कुत्सित वासनाओंकी तृप्तिका साधन बना लिया है। आप लोग अपनेको हिन्दू कहते हों या मुसलमान, ईसाई कहते हों या यहूदी अथवा पारसी, आप लोगोंने अपने धार्मिक हितोंको भी नहीं समझा है और उनकी भी हानि की है। मैं जानता हूँ कि मेरे कुछ मित्र कहेंगे कि मैं मानव-स्वभावको नहीं समझता। यदि मुझे विश्वास हो जाये कि यह आरोप सही है तो मैं कहूँगा कि मैंने अपराध किया है और तब मैं सामाजिक कार्योंसे अपने आपको अलग कर लूँगा और मानव-स्वभावकी समझ अपने अन्दर पैदा करनेके बाद ही उनमें भाग लेना शुरू करूँगा। पर मैं यह जानता हूँ कि दक्षिण आफ्रिकामें मुझे हिन्दुस्तानी मवालियोंतक को नियंत्रित करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई थी। इस सफलताका कारण यह था कि जहाँ मैं स्वतः नहीं पहुँच सकता था, वहाँ सहायक कार्यकर्ताओंके जरिये अपनी बात अवश्य पहुँचा देता था। परन्तु मैं देखता हूँ कि आप लोगोंतक हम लोग नहीं पहुँच पाये हैं। मैं यह नहीं मान सकता कि धर्म और देशकी पवित्र पुकारका आप लोगोंपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता।
देखिए कि आप लोगोंने क्या कर डाला है! हिन्दू और मुसलमान मवालियोंने पारसी मन्दिरोंकी पवित्रता भंग की है और इस प्रकार पारसी मवालियोंके लिए भी रास्ता खोल दिया है कि वे आपके धार्मिक स्थानोंकी दुर्गति करें। चन्द पारसियोंने युवराजके स्वागतमें सम्मिलित होना उचित समझा, सिर्फ इसीलिए हिन्दू और मुसलमान मवालियोंने अपने सामने पड़नेवाले हरएक पारसीकी फजीहत करना अपना कर्तव्य समझा। नतीजा यह हुआ कि पारसी मवाली भी हिन्दू और मुसलमानोंके साथ इसी तरह पेश आने लगे हैं। निश्चय ही, पारसी मवालियोंको उतना दोषी नहीं माना जा सकता। सभी हिन्दुओं और सभी मुसलमानोंकी बात तो दूर रही, अधिकांश हिन्दुओं और मुसलमानोंतकने सख्तीके साथ विदेशी वस्त्रोंका परित्याग नहीं किया है। लेकिन<noinclude>{{dhr|2em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अपील : बम्बईके मवालियोंसे|४९३}}</noinclude>हिन्दू और मुसलमान मवालियोंने इस बातका कोई ख्याल न करके कुछ पारसियों और ईसाइयोंके शरीरोंपर से विलायती वस्त्र उजड्डपनसे जबर्दस्ती उतार लिये। इसी कारण पारसी और ईसाई मवाली प्रत्येक खद्दरपोश हिन्दू और मुसलमानसे उलझ रहे हैं। इस तरह एक कुटिल सिलसिला चल पड़ा है और इसमें देशका नुकसान हो रहा है।
मैं यह बात आप लोगोंको दोष देनेके लिए नहीं, आप लोगोंको सावधान करने और स्वयं यह स्वीकार करनेके लिए लिख रहा हूँ कि हमने आप लोगोंकी ओर ध्यान न देकर बड़ा अपराध किया। मैं एक ढंगसे इसका प्रायश्चित्त कर रहा हूँ। दूसरे कार्यकर्ता दूसरे ढंगसे कर रहे हैं। सर्वश्री आजाद सोबानी, जयकर<ref>१. मुकुन्दराव रामराव जयकर (१८७३-१९५९); बम्बईके वकील और नरमदलीय नेता; सरकारसे सुलह और शान्तिकी बात चलानेवाले प्रमुख व्यक्ति; १९३७ में फेडरल कोर्ट ऑफ इंडियाके न्यायाधीश नियुक्त हुए।</ref>, जमनादास मेहता, साठे, मुअज्जम अली और अन्य कार्यकर्त्ता इस दुर्भाग्यपूर्ण विस्फोटको दबाने के लिए अपनी जान जोखिममें डाल रहे हैं। श्रीमती सरोजिनी नायडू आप लोगोंको समझाने और आपसे अनुरोध करनेके लिए प्राणोंकी परवाह न कर आपके समीप पहुँचीं। आप लोगोंके बीच हमारा कार्य अभी आरम्भ ही हुआ है। क्या आप लोग हिंसा-प्रतिहिंसाका यह सिलसिला बन्द करके हमें कार्यका अवसर नहीं देंगे? पारसियों या ईसाइयोंसे बदला लेने में हिन्दुओं और मुसलमानोंको शर्म आनी चाहिए। पारसियों और ईसाइयोंको भी जानना चाहिए कि हिन्दुओं-मुसलमानोंके क्रोधका जवाब पशुबलके प्रयोगसे देना आत्मघात होगा। उनके ऐसा करनेका परिणाम यह होगा कि उन्हें विदेशी सरकारसे सहायता लेनी पड़ेगी, अर्थात् अपनी स्वाधीनता बेच देनी पड़ेगी। उनके लिए सबसे अच्छा उपाय यही है कि वे अपनी राष्ट्रीयताको समझें और भरोसा रखें कि समझदार हिन्दू और मुसलमान अपने हितोंसे पहले अल्पसंख्यक समुदायोंके हितोंकी रक्षा करेंगे और उनको करनी भी चाहिए। जो भी हो, बम्बईको दो कार्य करने हैं:— अल्पसंख्यक समुदायोंकी सुरक्षा सुनिश्चित बनाना और हुल्लड़बाजोंको नियन्त्रित करना।
बम्बईके आप सब मवालियोंका मुझे भरोसा है कि अब आप लोग अपने हाथ रोक लेंगे और उन लोगोंको काम करनेका मौका देंगे जो आपकी सेवा करनेके अभिलाषी हैं।
ईश्वर आपकी सहायता करे।
{{Right|आपका मित्र,<br>
'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया''', २४-११-१९२१}}<noinclude>{{dhr|4em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||लोहे के चने|
४९५}}</noinclude>४. तादाद चरखा
५. तादाद करघा ६. तादाद तांत
७. कपासका संग्रह
८. मदरसा और तादाद हाजिरी
९. तादाद पुलिस
१०. ब्रिटिश हुकूमतके अन्य प्रतीक
११. जेल में जाने के लिए तैयार लोगोंकी तादाद
१२. शराबकी दुकानोंकी तादाद
१३. सरकारसे सहयोग करनेवाले लोग हों तो उनकी तादाद
अगर हम एक सेनाके रूपमें संगठित हो जायें तो हरएक गाँवमें प्रजाका प्रतिनिधि और प्रजाके पंच भी होंगे। बीस-बीस आदमियोंकी एक टुकड़ी बन जाये और उनमें एक उसका मुखिया निश्चित हो। जहाँतक हो सके, इसमें हिन्दू, मुसलमान अथवा दूसरे ऐसे दल न बनें। ठीक तो यह है कि टुकड़ी एक-एक टोलेकी ही बने। जहाँ लोकमत संगठित हो चुका है वहाँ तो इसमें जरा भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। ऐसा संगठन लोकमतकी तैयारीका एक बड़ा लक्षण है।
यदि हरएक गाँव में अच्छे काम करनेवाले लोग हों तो यह काम बिना किसी मेहनत के दो दिनमें हो सकता है। हमारे यहाँके गाँवोंकी बस्ती बड़ी नहीं होती। एक दिन सवेरे उनकी सभा करके यह काम पूरा किया जा सकता है। मैं जिस तहसीलमें जाऊँगा वहाँ पूर्वोक्त तमाम बातोंकी जानकारी मिलनेकी आशा रखूँगा।
ऐसे छोटेसे कामका शीर्षक मैंने 'लोहे के चने' क्यों रखा? इसलिए कि हम सिपाहीगिरी भूल गये हैं। हम परमार्थको भूल गये हैं। हम न जातिके रहे, न देशके। किन्तु हमें तो अपने लिए नहीं मरना है। हमें जनताके लिए मरना है। और जनताके लिए मरनेके पहले जनताका तैयार हो जाना जरूरी है वरना उसको तैयार करते हुए हमें मर मिटना होगा।
यह बिलकुल ही सच है कि हमें उद्यमकी आदत नहीं रही या फिर हम निरर्थक कामोंमें अपना समय बिता रहे हैं और उन्हें करते हुए हम न लोक-सुखका खयाल करते हैं न लोक-संग्रहका। कुटुम्बसे आगे हमारी दृष्टि पहुँचती ही नहीं। हम सबका धर्म तो हमें यही शिक्षा देता है कि व्यक्ति कुटुम्बके लिए, कुटुम्ब गाँवके लिए, गाँव तहसील के लिए, तहसील जिलेके लिए, जिला प्रान्तके लिए, प्रान्त भारतवर्ष के लिए, और अन्तको भारतवर्ष सारे जगत् के लिए मरनेको तैयार हो जाये। इस स्वदेशा-भिमानके लिए मैं जी रहा हूँ और उसको प्रकट करने के लिए मर मिटना मुझे जीवित रहने के बराबर ही प्रिय है। उसके बिना जीवित रहना मृत्युके ही समान है। संसारमें अगर कोई सुख है तो वह है परदुःखके लिए दुःखी होना और दूसरेकी रक्षाके लिए स्वयं मर जाना। ऐसा करनेवाले सहज सुखका उपभोग करते हैं। इसके लिए कोई भारी काम करना पड़े, सो बात नहीं। सिर्फ हृदयको बदल देनेकी जरूरत है। जरा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||४९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विचार करते ही यह हो सकता है। इसमें देरी लगनेकी कोई बात नहीं है; क्योंकि अपने पड़ौसी के लिए मरना तो आत्माका सहज-स्वभाव ही है।
तैयार हुई तहसील अगर इस तत्त्वको समझ जाये तो जो काम लोहे के चने चबाने से भी कठिन मालूम होता है वह मुझ जैसे बूढ़े के लिए तैयार किये गये मुलायम चने चबाने से भी अधिक आसान मालूम होगा।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
''' नवजीवन,''' २०-११-१९२१}}
{{c|{{larger|'''२०३. सत्य क्या है ?'''}}}}
अंग्रेजी धर्मशास्त्रमें एक कथा है। उसमें एक न्यायाधीशने प्रश्न किया "सत्य क्या है ?" उसका उत्तर उसे नहीं मिला। हिन्दू धर्म-ग्रंथोंमें सत्यके लिए हरिश्चन्द्रने सर्वस्व अर्पण कर दिया और खुद स्त्री-पुत्र सहित चाण्डालके हाथ बिक गये। (उस जमाने में अस्पृश्यताकी न जाने क्या स्थिति रही होगी ?) इमाम, हसन और हुसैनने सत्यकी खातिर अपने प्राण दे दिये।
जो भी हो, पर उस न्यायधीशको अपने सवालका जवाब नहीं मिला। हरिश्चन्द्र जिसे सत्य समझते थे उसके लिए मिटकर वे अमर हो गये। इमाम हुसैनने जिसे सत्य जाना उसके लिए अपना प्यारी देहतक दे डाली। सम्भव है हरिश्चन्द्र और इमाम हुसैनका सत्य ही हमारा सत्य न हो; लेकिन इस परिमित सत्यके उपरान्त एक शुद्ध सत्य है। वह अखण्ड है, सर्वव्यापक है। परन्तु वह अवर्णनीय है। क्योंकि सत्य ही परमेश्वर है अथवा परमेश्वर ही सत्य है। दूसरी सब चीजें मिथ्या और असत्य हैं, अर्थात् उनमें जिस परिमाणमें जितना सत्य है वही ठीक है।
अतएव जो सत्यको जानता है, मन, वचन और कायासे सत्यका आचरण करता है, वह परमेश्वरको पहचानता है। इससे वह त्रिकालदर्शी हो जाता है। उसे इसी देहमें मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
ऐसा एक भी सत्याचारी यदि ३१ दिसम्बर के पहले तैयार हो जाये तो स्वराज्य मिला ही रखा है।
हममें से कितने ही तो केवल सत्याग्रही हैं — उन्हें सत्यके आचरणका आग्रह है। और वे भी शायद वाणीके सत्यतक ही पहुँच पाये हों। इससे स्पष्ट हो जायेगा कि सत्यका पालन कोई आसान बात नहीं है।
एक मित्रने मुझसे पूछा : "आप तो सत्य व्रतका पालन करते हैं। फिर भी आपने श्रीयुत दासके तारका अर्थ अपने पक्षमें लगा लिया<ref>१. गांधीजीने श्री चित्तरंजन दासके एक तारका अर्थ गलत लगा लिया था।</ref>और बंगालके १५ के बजाय २५ लाख प्रकट कर दिये। क्या इसमें आपने सूक्ष्म असत्यका आचरण नहीं किया ?" निश्चय ही मैंने अपने पक्षमें अर्थ लगाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था; अपने मनके अनुकूल अर्थ लगानेकी मुझे आदत नहीं है। वह तार रातको बारह बजे के बाद मिला।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||४९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विचार करते ही यह हो सकता है। इसमें देरी लगनेकी कोई बात नहीं है; क्योंकि अपने पड़ौसी के लिए मरना तो आत्माका सहज-स्वभाव ही है।
तैयार हुई तहसील अगर इस तत्त्वको समझ जाये तो जो काम लोहे के चने चबाने से भी कठिन मालूम होता है वह मुझ जैसे बूढ़े के लिए तैयार किये गये मुलायम चने चबाने से भी अधिक आसान मालूम होगा।
:Left|[ गुजरातीसे ]<br>
:''' नवजीवन,''' २०-११-१९२१
{{c|{{larger|'''२०३. सत्य क्या है ?'''}}}}
अंग्रेजी धर्मशास्त्रमें एक कथा है। उसमें एक न्यायाधीशने प्रश्न किया "सत्य क्या है ?" उसका उत्तर उसे नहीं मिला। हिन्दू धर्म-ग्रंथोंमें सत्यके लिए हरिश्चन्द्रने सर्वस्व अर्पण कर दिया और खुद स्त्री-पुत्र सहित चाण्डालके हाथ बिक गये। (उस जमाने में अस्पृश्यताकी न जाने क्या स्थिति रही होगी ?) इमाम, हसन और हुसैनने सत्यकी खातिर अपने प्राण दे दिये।
जो भी हो, पर उस न्यायधीशको अपने सवालका जवाब नहीं मिला। हरिश्चन्द्र जिसे सत्य समझते थे उसके लिए मिटकर वे अमर हो गये। इमाम हुसैनने जिसे सत्य जाना उसके लिए अपना प्यारी देहतक दे डाली। सम्भव है हरिश्चन्द्र और इमाम हुसैनका सत्य ही हमारा सत्य न हो; लेकिन इस परिमित सत्यके उपरान्त एक शुद्ध सत्य है। वह अखण्ड है, सर्वव्यापक है। परन्तु वह अवर्णनीय है। क्योंकि सत्य ही परमेश्वर है अथवा परमेश्वर ही सत्य है। दूसरी सब चीजें मिथ्या और असत्य हैं, अर्थात् उनमें जिस परिमाणमें जितना सत्य है वही ठीक है।
अतएव जो सत्यको जानता है, मन, वचन और कायासे सत्यका आचरण करता है, वह परमेश्वरको पहचानता है। इससे वह त्रिकालदर्शी हो जाता है। उसे इसी देहमें मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
ऐसा एक भी सत्याचारी यदि ३१ दिसम्बर के पहले तैयार हो जाये तो स्वराज्य मिला ही रखा है।
हममें से कितने ही तो केवल सत्याग्रही हैं — उन्हें सत्यके आचरणका आग्रह है। और वे भी शायद वाणीके सत्यतक ही पहुँच पाये हों। इससे स्पष्ट हो जायेगा कि सत्यका पालन कोई आसान बात नहीं है।
एक मित्रने मुझसे पूछा : "आप तो सत्य व्रतका पालन करते हैं। फिर भी आपने श्रीयुत दासके तारका अर्थ अपने पक्षमें लगा लिया<ref>१. गांधीजीने श्री चित्तरंजन दासके एक तारका अर्थ गलत लगा लिया था।</ref>और बंगालके १५ के बजाय २५ लाख प्रकट कर दिये। क्या इसमें आपने सूक्ष्म असत्यका आचरण नहीं किया ?" निश्चय ही मैंने अपने पक्षमें अर्थ लगाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था; अपने मनके अनुकूल अर्थ लगानेकी मुझे आदत नहीं है। वह तार रातको बारह बजे के बाद मिला।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||४९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>विचार करते ही यह हो सकता है। इसमें देरी लगनेकी कोई बात नहीं है; क्योंकि अपने पड़ौसी के लिए मरना तो आत्माका सहज-स्वभाव ही है।
तैयार हुई तहसील अगर इस तत्त्वको समझ जाये तो जो काम लोहे के चने चबाने से भी कठिन मालूम होता है वह मुझ जैसे बूढ़े के लिए तैयार किये गये मुलायम चने चबाने से भी अधिक आसान मालूम होगा।
:[ गुजरातीसे ]<br>
:''' नवजीवन,''' २०-११-१९२१
{{c|{{larger|'''२०३. सत्य क्या है ?'''}}}}
अंग्रेजी धर्मशास्त्रमें एक कथा है। उसमें एक न्यायाधीशने प्रश्न किया "सत्य क्या है ?" उसका उत्तर उसे नहीं मिला। हिन्दू धर्म-ग्रंथोंमें सत्यके लिए हरिश्चन्द्रने सर्वस्व अर्पण कर दिया और खुद स्त्री-पुत्र सहित चाण्डालके हाथ बिक गये। (उस जमाने में अस्पृश्यताकी न जाने क्या स्थिति रही होगी ?) इमाम, हसन और हुसैनने सत्यकी खातिर अपने प्राण दे दिये।
जो भी हो, पर उस न्यायधीशको अपने सवालका जवाब नहीं मिला। हरिश्चन्द्र जिसे सत्य समझते थे उसके लिए मिटकर वे अमर हो गये। इमाम हुसैनने जिसे सत्य जाना उसके लिए अपना प्यारी देहतक दे डाली। सम्भव है हरिश्चन्द्र और इमाम हुसैनका सत्य ही हमारा सत्य न हो; लेकिन इस परिमित सत्यके उपरान्त एक शुद्ध सत्य है। वह अखण्ड है, सर्वव्यापक है। परन्तु वह अवर्णनीय है। क्योंकि सत्य ही परमेश्वर है अथवा परमेश्वर ही सत्य है। दूसरी सब चीजें मिथ्या और असत्य हैं, अर्थात् उनमें जिस परिमाणमें जितना सत्य है वही ठीक है।
अतएव जो सत्यको जानता है, मन, वचन और कायासे सत्यका आचरण करता है, वह परमेश्वरको पहचानता है। इससे वह त्रिकालदर्शी हो जाता है। उसे इसी देहमें मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
ऐसा एक भी सत्याचारी यदि ३१ दिसम्बर के पहले तैयार हो जाये तो स्वराज्य मिला ही रखा है।
हममें से कितने ही तो केवल सत्याग्रही हैं — उन्हें सत्यके आचरणका आग्रह है। और वे भी शायद वाणीके सत्यतक ही पहुँच पाये हों। इससे स्पष्ट हो जायेगा कि सत्यका पालन कोई आसान बात नहीं है।
एक मित्रने मुझसे पूछा : "आप तो सत्य व्रतका पालन करते हैं। फिर भी आपने श्रीयुत दासके तारका अर्थ अपने पक्षमें लगा लिया<ref>१. गांधीजीने श्री चित्तरंजन दासके एक तारका अर्थ गलत लगा लिया था।</ref>और बंगालके १५ के बजाय २५ लाख प्रकट कर दिये। क्या इसमें आपने सूक्ष्म असत्यका आचरण नहीं किया ?" निश्चय ही मैंने अपने पक्षमें अर्थ लगाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था; अपने मनके अनुकूल अर्थ लगानेकी मुझे आदत नहीं है। वह तार रातको बारह बजे के बाद मिला।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||सत्य क्या है ?|
४९७}}</noinclude>बात मैं अपनी सफाई के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह बतानेके लिए
कह रहा हूँ कि सत्य तो सूलीपर चढ़ाये जानेपर भी ज्योंका-त्यों ही झलकना चाहिए। जो तीनों कालमें सत्यका ही आचरण करनेकी इच्छा रखता है वह उतावली नहीं कर सकता। फिर सत्यवादी तो अनजानमें भी न असत्य कहता है, न करता है। वह असत्य कहने और करने में असमर्थ हो जाता है। इस व्याख्याके अनुसार मैंने सत्यका अवश्य ही उल्लंघन किया है।
पर मुझे सिर्फ इसी बातका सन्तोष है कि मैं सत्यका आग्रह रखने के अतिरिक्त इस व्रत के विषय में अधिक कोई दावा नहीं करता। जानबूझकर मैं असत्य भाषण नहीं कर सकता। एक बार अपने पू० पिताजीको धोखा देनेके लिए मैं जानबूझकर झूठ बोला था। इसके सिवा दूसरा कोई अवसर मुझे अपनी जिन्दगीमें याद नहीं आता। सत्य कहना और करना मेरा स्वभाव ही हो गया है। अलबत्ता जिस सत्यको मैं परोक्ष रूपमें ही जानता हूँ उसके पालन करने का दावा मैं नहीं कर सकता। मुझसे अनजानमें भी अत्युक्ति हो जाती है, आत्मश्लाघा हो जाती है; मुझे अपने किये कामोंके वर्णनमें मजा आने लगता है। इस सबमें असत्यकी छाया है और ये सत्यकी कसौटीपर नहीं चढ़ सकते।
जिसका जीवन सत्यमय है वह तो स्फटिक मणिकी तरह शुद्ध हो जाता है। उसके पास असत्य जरा देरके लिए भी नहीं ठहर सकता। सत्याचारीको कोई धोखा दे ही नहीं सकता; क्योंकि उसके सामने झूठ बोलना अशक्य हो जाना चाहिए। संसारमें सर्वाधिक कठिन व्रत सत्यका है। लाखों आदमी कोशिश करें तब कहीं इसी जन्ममें उनमें से एकाध पार उतर सके तो उतर सके।
मेरे सामने जब कोई असत्य बोलता है तब मुझे उसपर क्रोध आनेके बजाय स्वयं अपने ही ऊपर अधिक क्रोध आता है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि अभी मेरे अन्तरमें कहीं असत्यका वास है।
सत्य शब्दकी उत्पत्ति 'सत्' से हुई है। सत्का अर्थ है होना। तीनों कालमें एक ही रूपमें एकमात्र अस्तित्व परमात्माका ही है। जिस सज्जनने ऐसे सत्यकी भक्ति करके उसे अपने हृदयमें सदाके लिए स्थान दे दिया है उसे मेरा कोटि-कोटि नमस्कार है। इस सत्यकी सेवा करने के लिए मैं जी-जानसे कोशिश कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि उसके लिए हिमालयकी चोटीसे कूद पड़ने की हिम्मत मुझमें है। फिर भी मैं यह जानता हूँ कि अभी मैं उससे बहुत दूर हूँ। ज्यों-ज्यों मैं उसके नजदीक पहुँचता जाता हूँ त्यों-त्यों मुझे अपनी अशक्तिका ज्ञान अधिकाधिक होता जाता है और त्यों-त्यों यह ज्ञान मुझे नम्र बनाता जाता है। हाँ, अपनी अशक्तिको न जानने के कारण अभिमान रखना सम्भव है। परन्तु जो जानता है उसका गर्व दूर हो जाता है। मेरा तो कभीका दूर हो गया है। तुलसीदासजीने अपनेको शठ कहा है। उसका मर्म मैं ठीक-ठीक समझ सकता हूँ। यह मार्ग शूरवीरोंका है, कायरोंका यहाँ काम नहीं। जो चौबीसों घण्टे प्रयत्न करता है, खाते, पीते, बैठते, सोते, सूत कातते, शौच आदि प्रत्येक काम करते हुए जो केवल सत्यका ही चिन्तन करता है, वह अवश्य सत्यमय हो जाता है। और जब किसीके अन्दर सत्यका सूर्य सम्पूर्णतः प्रकाशित होता है तब वह प्रकाश छिपा नहीं रहता। तब उसे बोलने, बतलाने या समझानेकी जरूरत नहीं रहती। या उसके बोलमें इतना बल
:२१-३२<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४९८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>होता है, इतना जीवन भरा होता है कि उसका असर लोगोंपर तुरन्त होता है।
ऐसा सत्य मुझमें नहीं है। हाँ, इस मार्ग पर मैं चल अवश्य रहा हूँ। अतएव मेरी यह दशा "रूख नहीं तेंह रेंड प्रधान" की तरह दीन है।
सत्यमें प्रेम होता है। सत्यमें अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदिका समावेश हो जाता है। पाँच यम तो केवल सुविधाके लिए बताये गये हैं। सत्यको जान लेनेके बाद जो हिंसा करता है, वह सत्यका त्याग करता है। सत्यको जाननेके बाद जो व्यभिचार करता है वह तो मानो सूर्यके रहते हुए अंधेरेके अस्तित्वको मानता है। ऐसे शुद्ध सत्यका पूरी तरह पालन करनेवाला एक मनुष्य भी इस वर्षके अन्तके पहले निकल आये तो स्वराज्य मिले बिना नहीं रह सकता; क्योंकि उसका कहना सबको मानना ही पड़ेगा। सूर्यके प्रकाशको किसीके सामने सिद्ध नहीं करना पड़ता। सत्य स्वयं प्रकाशमान् और स्वयंसिद्ध है। ऐसा सत्याचरण इस विषम कालमें कठिन तो है पर असम्भव नहीं। यदि कुछ ही लोग कुछ ही अंशमें ऐसे सत्यके आग्रही हो जायें तो हम स्वराज्य प्राप्त कर लें और अगर कुछ लोग ऐसे सत्यके सख्त आग्रही हो जायें तो फिर कहना ही क्या है। पर हम सच्चे हों। सत्यके बदले सत्यका ढोंग काम नहीं दे सकता। भले ही रुपये में एक आना हों, पर हों हम सच्चे। इस थोड़े-बहुत सत्यमें भूले भटके, जान-अनजानमें वाणी के असत्यका किंचित् भी समावेश हरगिज न करें। मेरी तो यह महत्वाकांक्षा है कि इस धर्मयज्ञमें हम सब लोग सत्यका सेवन करनेवाले बनें।
:[ गुजरातीसे ]
:''''नवजीवन''', २०-११-१९२१
{{c|{{larger|'''२०४. रेवरेंड जे० केलॉकके<ref>१. विल्सन कालेज, बम्बई के प्रोफेसर।</ref> नाम नोट'''}}}}
{{Right|मौनवार, २१ नवम्बर, १९२१}}
मैं अंग्रेज मित्रोंको वहाँ<ref>२. विभिन्न जातियोंके एक सम्मिलित दलके सदस्योंकी हैसियतसे उपद्रवग्रस्त क्षेत्रोंमें विश्वास और शान्तिकी स्थापनाके लिए जानेके लिए।</ref> जाने के लिए धन्यवाद देता हूँ। मैं उठता नहीं हूँ क्योंकि उठनेसे जोर पड़ता है। मेरी आकांक्षा है कि भले ही हमारे बीच अधिकसे-अधिक मतभेद हो किन्तु हम मित्रवत् रहें।
अंग्रेजी प्रति (सी० डब्ल्यू० ४५०२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|4em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५३१
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{{c|'''२०५. वक्तव्य : उपवास तोड़नेसे पूर्व'''<ref>१. मूल गुजराती वक्तव्य उपलब्ध नहीं है।</ref>}}
{{Right|[२१ नवम्बर, १९२१]<ref>२. देखिए परिशिष्ट २।</ref>}}
:{{gap}}'''गांधीजीने सहयोगियों, असहयोगियों, हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियोंकी एक सभामें अपना उपवास तोड़ा। हर सम्प्रदायके एक-एक प्रतिनिधिने वहाँ सद्भावनापूर्ण भाषण दिये। कार्य समितिके सदस्य भी वहाँ उपस्थित थे। उपवास तोड़नेसे पहले, गांधीजीने गुजरातीमें एक वक्तव्य दिया। उसका अनुवाद नीचे दिया जा रहा है :'''
{{Left|मित्रो,}}
इस छोटी-सी सभा में हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों और ईसाइयोंको एक साथ देखकर मेरा हृदय बहुत प्रसन्न है। मुझे आशा है कि आज सुबहका हमारा अल्पफलाहार हमारी स्थायी मैत्रीका प्रतीक बन जायेगा। यद्यपि में जन्मसे ही आशावादी हूँ, फिर भी मेरी आदत हवामें किले खड़े करनेकी नहीं है। इसलिए इस सभासे मैं धोखे में नहीं आ सकता। सभी सम्प्रदायोंके बीच स्थायी मैत्रीकी हमारी आशा तभी पूरी हो सकती है, जब यहाँ उपस्थित हम सभी लोग उसकी स्थापनाके लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहें। मैं अपना उपवास आप लोगोंके आश्वासनपर तोड़ रहा हूँ। इन चार दिनों में असंख्य मित्र जिस प्रेमके साथ मुझे घेरे रहे हैं, उसका मुझे बराबर ध्यान रहा है। मैं उनका सदा आभारी रहूँगा। उन्हींके आकर्षणसे मैं शान्तिके इस लोकसे, जिसमें कि मैं इन दिनों रह रहा था, इस तूफानी समुद्रमें फिर कूद रहा हूँ। यद्यपि मेरे कानों में दुःखद वृत्तान्त पड़ते रहे हैं, फिर भी मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि खाली पेट रहने के कारण मैंने शान्ति अनुभव की है। मैं जानता हूँ कि उपवास तोड़नेके बाद मैं उसे अनुभव नहीं कर सकूँगा। मानव होनेके कारण औरोंके दुःख मुझे प्रभावित करते हैं, और जब मुझे उन्हें दूर करनेका कोई उपाय नहीं सूझता तो मेरा मानव-स्वभाव मुझे इतना विक्षुब्ध कर देता है कि में मौतको गले लगाने के लिए उसी तरह तड़पने लगता हूँ जैसे कि कोई मुद्दतसे बिछुड़े अपने प्यारे मित्रके लिए तड़पता है। इसलिए, मैं यहाँ उपस्थित सभी मित्रोंको यह चेतावनी देता हूँ कि यदि बम्बईमें सच्चे मायनोंमें शान्ति स्थापित नहीं हुई और फिरसे दंगे शुरू हो गये और यदि उनके फलस्वरूप मुझे और भी कड़ी परीक्षामें उतरना पड़ा, तो उन्हें उसपर आश्चर्य या दुःख नहीं करना चाहिए। यदि शान्तिकी स्थापनामें उन्हें कुछ भी संशय हो, यदि हर सम्प्रदाय में अभी भी कटु भावना और सन्देह मौजूद है और यदि हम सब पिछली गलतियोंको भूलने और माफ करनेको तैयार नहीं हैं, तो फिर मैं यही चाहूँगा कि वे मुझपर<noinclude>{{dhr|1em}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||५००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>उपवास तोड़नेके लिए जोर न डालें। इस प्रकारके संयमको मैं सच्ची मित्रता की कसौटी मानूंगा।
हिन्दुओं और मुसलमानोंपर मैं खास जिम्मेदारी डालता हूँ। उनमें से अधिकांश असहयोगी हैं। उन्होंने फिलहाल अहिंसाका धर्म स्वीकार कर लिया है। उनके पास बहुसंख्याकी शक्ति है। सरकारी सहायताके बिना भी, वे छोटे सम्प्रदायोंके विरोध के सामने टिके रह सकते हैं। इसलिए यदि वे छोटे सम्प्रदायोंके प्रति मैत्री और उदारताका भाव रखें तो सब ठीक हो जायेगा। मैं पारसियों, ईसाइयों और यहूदियोंसे प्रार्थना करूँगा कि वे भारतकी नई जागृतिको ध्यानमें रखें। हिन्दू-मुस्लिम मानव-समुद्रमें उन्हें अनेक रंगोंका जल मिलेगा। किनारेपर उन्हें गदला जल दिखाई देगा। मैं उनसे आग्रह करूँगा कि उनके जो हिन्दू या मुसलमान पड़ौसी उनके प्रति दुर्व्यवहार करें उन्हें भी वे बर्दाश्त करें और उस दुर्व्यवहारकी सूचना अपने नेताओंके द्वारा तुरन्त हिन्दू और मुसलमान नेताओंको भेजें, ताकि उन्हें न्याय प्राप्त हो सके। वस्तुतः मैं यह आशा करता हूँ कि इस दुर्भाग्यपूर्ण कलहके फलस्वरूप सभी अन्तर्जातीय झगड़ोंके निपटारेके लिए एक महाजन नियुक्त कर दिया जायेगा।
इस सभाका महत्व मेरे खयालमें इस बातमें है कि उसी एक ईश्वरके उपासक हम सब अपने मतभेदोंके बावजूद, इस निर्दोष भोजमें एक साथ शामिल हो सके हैं। हम आज इन मतभेदोंको कम करनेके उद्देश्यसे इकट्ठे नहीं हुए हैं, निश्चय ही हम अपने प्रिय सिद्धान्तोंमें से किसी एकको छोड़नेके लिए भी इकट्ठे नहीं हुए हैं। हम यहाँ इकट्ठे हुए हैं यह प्रदर्शित करनेके लिए कि हम, अपने सिद्धान्तोंके प्रति सच्चे रहते हुए भी, एक-दूसरे के प्रति दुर्भावनासे मुक्त रह सकते हैं।
ईश्वर हमारे प्रयत्नको सफल बनाये।
:[ अंग्रेजीसे ]
:'''यंग इंडिया''', २४-११-१९२१
{{c|{{larger|'''२०६. साथी कार्यकर्त्ताओंसे'''}}}}
{{Right|२२ नवम्बर, १९२१}}
{{Left|साथियो,}}
ये पिछले कुछ दिन हमारी अग्नि परीक्षाके दिन थे, और हमें परमात्माको धन्यवाद देना चाहिए कि हममें से कितने ही लोग उसमें कच्चे नहीं साबित हुए। अभी बहुतसे लोग मेरे सामने हैं, जिनके सिर फोड़ दिये गये हैं। ये घायल लोग तथा जिन लोगोंकी लाशोंका हाल मैंने प्रामाणिक सूत्रसे सुना है, इस बातके यथेष्ट प्रमाण हैं। कई कार्यकर्ताओंने शान्ति स्थापित करने तथा अपने सिरफिरे देशभाइयोंके कोपको शान्त करने के कार्यमें अपनी जानें गँवाई हैं, हाथ-पैर तुड़वाये हैं, और गहरी चोटें खाई हैं। ये मौतें और ये चोटें साबित करती हैं कि यद्यपि हमारे अनेक देशभाई भूल कर बैठे हैं, तथापि हममें कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो अपने लक्ष्यकी प्राप्तिके लिए प्राणतक न्यौछावर<noinclude></noinclude>
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हिन्दुओं और मुसलमानोंपर मैं खास जिम्मेदारी डालता हूँ। उनमें से अधिकांश असहयोगी हैं। उन्होंने फिलहाल अहिंसाका धर्म स्वीकार कर लिया है। उनके पास बहुसंख्याकी शक्ति है। सरकारी सहायताके बिना भी, वे छोटे सम्प्रदायोंके विरोध के सामने टिके रह सकते हैं। इसलिए यदि वे छोटे सम्प्रदायोंके प्रति मैत्री और उदारताका भाव रखें तो सब ठीक हो जायेगा। मैं पारसियों, ईसाइयों और यहूदियोंसे प्रार्थना करूँगा कि वे भारतकी नई जागृतिको ध्यानमें रखें। हिन्दू-मुस्लिम मानव-समुद्रमें उन्हें अनेक रंगोंका जल मिलेगा। किनारेपर उन्हें गदला जल दिखाई देगा। मैं उनसे आग्रह करूँगा कि उनके जो हिन्दू या मुसलमान पड़ौसी उनके प्रति दुर्व्यवहार करें उन्हें भी वे बर्दाश्त करें और उस दुर्व्यवहारकी सूचना अपने नेताओंके द्वारा तुरन्त हिन्दू और मुसलमान नेताओंको भेजें, ताकि उन्हें न्याय प्राप्त हो सके। वस्तुतः मैं यह आशा करता हूँ कि इस दुर्भाग्यपूर्ण कलहके फलस्वरूप सभी अन्तर्जातीय झगड़ोंके निपटारेके लिए एक महाजन नियुक्त कर दिया जायेगा।
इस सभाका महत्व मेरे खयालमें इस बातमें है कि उसी एक ईश्वरके उपासक हम सब अपने मतभेदोंके बावजूद, इस निर्दोष भोजमें एक साथ शामिल हो सके हैं। हम आज इन मतभेदोंको कम करनेके उद्देश्यसे इकट्ठे नहीं हुए हैं, निश्चय ही हम अपने प्रिय सिद्धान्तोंमें से किसी एकको छोड़नेके लिए भी इकट्ठे नहीं हुए हैं। हम यहाँ इकट्ठे हुए हैं यह प्रदर्शित करनेके लिए कि हम, अपने सिद्धान्तोंके प्रति सच्चे रहते हुए भी, एक-दूसरे के प्रति दुर्भावनासे मुक्त रह सकते हैं।
ईश्वर हमारे प्रयत्नको सफल बनाये।
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'''यंग इंडिया''', २४-११-१९२१}}
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ये पिछले कुछ दिन हमारी अग्नि परीक्षाके दिन थे, और हमें परमात्माको धन्यवाद देना चाहिए कि हममें से कितने ही लोग उसमें कच्चे नहीं साबित हुए। अभी बहुतसे लोग मेरे सामने हैं, जिनके सिर फोड़ दिये गये हैं। ये घायल लोग तथा जिन लोगोंकी लाशोंका हाल मैंने प्रामाणिक सूत्रसे सुना है, इस बातके यथेष्ट प्रमाण हैं। कई कार्यकर्ताओंने शान्ति स्थापित करने तथा अपने सिरफिरे देशभाइयोंके कोपको शान्त करने के कार्यमें अपनी जानें गँवाई हैं, हाथ-पैर तुड़वाये हैं, और गहरी चोटें खाई हैं। ये मौतें और ये चोटें साबित करती हैं कि यद्यपि हमारे अनेक देशभाई भूल कर बैठे हैं, तथापि हममें कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो अपने लक्ष्यकी प्राप्तिके लिए प्राणतक न्यौछावर<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हैं। काश कि मैं हरएकको समझा सकता कि जो कुछ हुआ उससे खिलाफत, पंजाब और स्वराज्य-सम्बन्धी त्रिविध लक्ष्योंकी ओर हमारी प्रगतिको धक्का पहुँचा है ?
किन्तु यदि कार्यकर्त्ता लोग अपनी जवाबदेहीको समझकरउसके अनुसार कार्य करें तो अब भी बाजी हाथसे गई नहीं है। हमें बम्बईके उपद्रवी तत्त्वोंका पूरा सहयोग हासिल करना चाहिए। हमें मिल मजदूरोंसे परिचित होना चाहिए। वे या तो सरकार-का साथ दें या हमारा, अर्थात् या तो मार-काटमें शामिल हों या ऐसे उपद्रवोंका सामना शान्ति के साथ करें। इसमें बीचका कोई रास्ता हो ही नहीं सकता। उन्हें हमारे कार्यों में दखल हरगिज न देना चाहिए। या तो वे हमारे प्रेमके अधीन हो जायें या असहाय होकर संगीनोंके आगे सिर झुका दें। किन्तु हिंसा करनेके लिए वे अहिंसाके झंडेकी आड़ लेनेकी कोशिश न करें। और अपना सन्देश उनतक पहुँचाने के लिए हमें एक-एक मिल मजदूर के पास जाना चाहिए और उसे अपने संघर्षके हर पहलूकी जानकारी करा देनी चाहिए। इसी प्रकार हमें दूसरे उपद्रवी लोगोंसे भी मिलना चाहिए, उनसे मेल-मुहब्बत बढ़ानी चाहिए और उन्हें इस संघर्षका धार्मिक स्वरूप समझनेमें मदद देनी चाहिए। हम उन्हें भुला नहीं सकते; पर उन्हें अपने सिरपर भी नहीं चढ़ा सकते। हमें तो बस उनका सेवक बन जाना चाहिए।
हम जोर-जबर्दस्तीसे स्थापित शान्ति नहीं चाहते। हमें तो सरकारकी सहायता-के बिना, और कभी-कभी उसके प्रत्यक्ष विरोधके बावजूद स्थायी शान्तिकी गारंटीकी जरूरत है। हमें तो हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई और यहूदी — इन सबके हृदयोंकी एकताकी जरूरत है। हाँ, ये आखिरी तीन जातियाँ पहली दो जातियोंका अविश्वास कर सकती हैं और शायद करेंगी भी। हालकी घटनाओंने ऐसे अविश्वासको पक्का बनाने के कारण उपस्थित कर दिये हैं। इस अविश्वासको दूर करने के लिए हमारी तरफसे खासतौर पर प्रयत्न होने चाहिए। अगर वे पूरे असहयोगी न बनें या स्वदेशीको न अपनायें और स्वदेशीकी प्रतीक अर्थात् खादीकी सफेद टोपी न पहनें, तो भी हमें उन्हें परेशान न करना चाहिए। अगर वे हर वक्त सरकारकी ही तरफदारी करें तो भी हमें चिढ़ उठनेकी जरूरत नहीं है। हमें तो सिर्फ प्रेम-भरी सेवाके बलपर ही उन्हें अपना बनाना है। वर्तमान स्थितिमें यही हमारी आवश्यकता है। इसका विकल्प है, गृह-युद्ध। और ऐसी दशामें, जब कि एक तीसरी विदेशी सत्ता कभी एक, और कभी दूसरेका पक्ष लेकर अपनी सत्ताकी जड़ें अधिकाधिक मजबूत करने के लिए घात लगाये बैठी है, निकट भविष्य में गृह-युद्धको असम्भाव्य ही मानना चाहिए।
और जो बात छोटी जातियोंके विषयमें सच है, वह सहयोगियोंके विषयमें भी उतनी ही सच है। हमें उनके प्रति भी अधीर न होना चाहिए; उनकी हरकतें सहन करनी चाहिए। अगर हम सरकार के साथ असहयोग करनेके लिए अपनेको स्वतन्त्र मानते हैं, तो फिर सरकार के साथ सहयोग करनेकी उनकी स्वतन्त्रताको भी हमें स्वीकार करना चाहिए। अगर हमारी संख्या कम होती और सहयोगी लोग अधिक संख्या में होने के कारण हमपर हिंसा करने लगते, तो हमें कैसा लगता ? अपने विरोधियोंके हृदयको जीत लेने के जितने भी तरीके दुनियाको मालूम हैं उनमें सबसे अधिक<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|५०३}}</noinclude>
सफल और कारगर तरीका अहिंसात्मक असहयोग ही है। हमारे इस संघर्षका उद्देश्य ही यह है कि हम अंग्रेजों सहित अपने हरएक प्रतिपक्षीको इसी उपायसे अपने पक्षमें कर लें। और यह हम तब ही कर सकते हैं जब कमजोरसे-कमजोरसे लेकर बलवानसे-बलवान मनुष्य के प्रति द्वेष-भावका त्याग कर दें। और द्वेष-भावका त्याग हम उसी अवस्थामें कर सकते हैं, जब हम अपने अन्तःस्थित विश्वासकी खातिर उन लोगोंका जो उस सत्यको नहीं देख सकते, शिरोच्छेद न करें, बल्कि जिस सत्यका प्रतिपादन हम करते हैं, उसके लिए मरने को तैयार हो जायें।
{{Right|आपका विश्वस्त साथी,<br>
'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''यंग इंडिया''', २४-११-१९२१}}
{{c|{{larger|'''२०७. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''शौकत अलीका अभाव'''}}
अपनी कठिन परीक्षाके इन दिनोंमें मुझे मौलाना शौकत अलीका अपने साथ न होना बहुत खटकता रहा है। मुसलमान भाइयोंको मैं किसी मुसलमान भाईके जरिये ही प्रभावित कर सकता हूँ। वैसे कितने ही बहादुर और नेक मुसलमान भाई हैं जिनसे मेरा परिचय है; परन्तु मौलाना शौकत अली मुझे जितनी अच्छी तरह जानते हैं उतनी अच्छी तरह दूसरे कोई मुसलमान भाई मुझे नहीं जानते। अब तो मैं देखता हूँ कि उनका काम भी मुझे खुद ही करना पड़ता है। वे सब बातें मुसलमान भाइयोंसे खुद मुझे ही कहनी पड़ती हैं, जिन्हें मैं खासतौर पर उनके लिए रख छोड़ता था।
मैं देखता हूँ कि पहले ही मेरी एक अपीलका गलत अर्थ लगा लिया गया है। इस समय अगर मौलाना शौकत अली मेरे साथ होते तो अपनी अपीलमें मुझे मुसलमानोंके सम्बन्ध में खासतौर पर एक पैरा लिखना ही न पड़ता। और, अगर १७ तारीखको वे बम्बई में होते तो शायद यह दंगा हुआ ही न होता। कितनी ही बातें जो हुई हैं वे न हो पातीं। सचमुच अगर मियाँ छोटानी १७ तारीखको बम्बईमें होते, या श्री अहमद हाजी खत्री रोग-शय्यापर न पड़े होते, तो घटनाओंका रुख कुछ और ही होता। पर बीती हुई बातोंपर सिर धुननेकी मेरी इच्छा नहीं। मौलाना शौकत अलीका जिक्र मैंने यहाँ अपने मुसलमान भाइयोंको यह विश्वास दिलानेके लिए किया है कि मैं मौलाना शौकत अलीके हिस्सेके काम भी अपने ऊपर लेनेको तैयार हूँ और मैं उनसे आशा करता हूँ कि वे मुझे गलत नहीं समझेंगे। उनके कामको मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूँ और जानबूझकर तो उनके साथ मैं कभी दगा नहीं करूँगा। इसी प्रकार मित्रोंसे भी मेरा अनुरोध है कि जहाँ वे मुझे भूल करते देखें, वहाँ निःसंकोच मुझे बता दें, और मैं उन्हें यकीन दिलाता हूँ कि अगर मुझे अपनी भूलका इत्मीनान हो जायेगा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>तो मैं उसे पूरी तरह स्वीकार करनेमें कभी पीछे नहीं हटूंगा। पर मैं उन्हें पहले ही इतना जताये देता हूँ कि मैं आम तौरपर जल्दीमें अथवा बिना काफी आधारके कोई बात नहीं करता। अतएव अगर मैं अपनी भूलोंको आसानीसे स्वीकार न करूँ, तो इसपर वे चकरायें नहीं। मुझे जो इस विषयपर यहाँ इतना लिखना पड़ा हैं, इससे यही सूचित होता है कि दोनों जातियोंको एक दूसरेके विषय में या एक-दूसरेकी कोई बात बड़ी सावधानीके साथ लिखनी पड़ती है। यह है तो बर्फकी पतली परतके ऊपर चलने जैसा खतरनाक खेल ही, परन्तु हमें तो तथ्योंको उनके यथार्थ रूपमें स्वीकार करना चाहिए और उनका अच्छेसे अच्छा उपयोग करना चाहिए।
{{c|'''अच्छा और बुरा'''}}
जब मैं कहता हूँ कि इन चार दिनोंके दौरान बम्बईके दंगे के बारेमें मेरे पास अच्छी और बुरी दोनों तरहकी खबरें आती रही हैं तो आशा है पाठक इस बातको समझेंगे। असहयोगी घायल हुए हैं। हिन्दू और मुसलमान पारसियोंपर हमला कर रहे हैं। पारसी उनपर गोलियाँ चला रहे हैं। ईसाई लोग खादीकी टोपी और कपड़े पहननेवालोंपर टूट पड़े हैं। हिन्दू और मुसलमान ईसाइयोंपर हमले कर रहे हैं। इन छिट-पुट खबरोंके बीच यह खुशखबरी भी आई कि पारसी दूसरे पारसियोंके हाथोंसे हिन्दू और मुसलमानोंकी जानें बचा रहे हैं, कुछ ईसाई भी हिन्दू मुसलमानोंको बचा रहे हैं और हिन्दू-मुसलमान दोनों पारसियों तथा ईसाइयोंको आश्रय दे रहे हैं, तथा असहयोगी अपनी जानकी जोखिम उठाकर भी शान्तिकी स्थापनाके लिए प्रयत्न कर रहे हैं। मुझे अपने मनमें दो अत्यन्त शक्तिशाली और परस्पर विरोधी भावनाओंका संघर्ष झेलनेका दुर्भाग्य इससे पूर्व कभी नहीं मिला है। और फिर ऐसी नाजुक और विकट स्थितिमें मित्रोंका पथ-प्रदर्शन करना, उनको मौतके जबड़े में ढकेलना और साथ ही अपनेको मौतसे बचाये रखना! कितनी कष्टकर स्थिति थी? ऐसे कठिन अवसरपर, बस, उपवास ही मेरा बाहरी सहारा और हार्दिक प्रार्थना ही मेरा आन्तरिक बल रहा है। १७ तारीखको तो मुझे लगा, मानों मेरा सारा बल ही जाता रहा हो। मैं जन-समुदायको स्थायी तौरपर प्रभावित क्यों नहीं कर पाया ? मेरा अहिंसाका बल कहाँ चला गया ? मेरा कर्त्तव्य क्या है ? जिनके साथ ज्यादती हुई है उनसे मैं यह तो कह नहीं सकता, और कह भी कैसे सकता हूँ, कि सरकारकी मदद लो ? हमारे यहाँ पंचायतें भी नहीं, जो इन्साफ करें। ऐसा कोई नहीं दिखाई देता जिसके पास मैं जाकर कहूँ और जो बीचमें पड़कर सुलह करा दे। यह तो मैं कर नहीं सकता और न करूँगा ही कि शारीरिक बलके सहारे शान्ति स्थापित कराने के लिए लोगोंकी कुछ टुकड़ियाँ बनाऊँ। तो अब, मैं उन लोगोंको किस तरह राहत पहुँचाऊँ जो उपद्रवियोंकी हिंसा के शिकार हुए हैं। क्या मैं उन पारसियों या ईसाइयोंकी क्रोधाग्निमें, जिनका कुपित होना बेजा नहीं है, अपनी आहुति दे दूं ? पर इससे तो उलटे खूनकी नदियाँ बह जायेंगी। एक सिपाही-की हैसियतसे तो मुझे एक भी अनिवार्य संकटको पीठ दिखाना लाजिम नहीं था। परन्तु बिना सोचे-विचारे अपनी जान जोखिममें डालना भी मेरे लिए ठीक नहीं था। अब मुझे करना क्या चाहिए ? आखिर उपवासका विचार मेरे मनमें आया और इसने<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ|
५०५}}</noinclude>मेरी आत्माको राहत दी। अगर आदमीके हाथों अपनेको मरवा डालना मेरे लिए उचित नहीं, तो जबतक मेरी अर्जी प्रभुके यहाँ मंजूर न हो तबतक अनशन-व्रत लेकर मुझे ईश्वरसे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ईश्वर मुझे उठा लें। मुझ जैसा दिवालिया और कर भी क्या सकता था ? निर्दोष जनतामें अपनी साखका मैं भरोसा नहीं कर सकता। १७ तारीखको उस साखके बलपर मैंने खुद ही जनता के सामने जो हुंडी पेश की थी उसको जनताने स्वीकारनेसे इनकार कर दिया — मेरी बात माननेसे इनकार कर दिया।<ref>१. देखिए "भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभा में", १७-११-१९२१।</ref> अब तो मुझे हर हालत में खोयी हुई साख फिरसे जमानी थी या उसकी कोशिश करते हुए मर-मिटना था। अब मैं बस ईश्वरका ही एक सहारा ले सकता था, जिससे वह अपना काम मुझसे करवानेके लिए मेरी उठी हुई साखको फिर जमाने में मेरी मदद करे। और ऐसा करनेका एक ही उपाय दिखाई दिया — यह कि मैं अपनेको अधिकसे-अधिक विनम्र बनकर उसके सामने साष्टांग पड़ जाऊँ और उसका दिया अन्न खानेसे इनकार करूँ। मुझे हजारों तरहसे अपनी सच्चाई उसपर प्रकट करनी चाहिए और उससे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि अगर मैं तेरा काम करनेके लायक साबित न होऊँ तो मुझे वापस बुला ले और मेरी योग्यता और अपनी इच्छाके अनुसार नये सिरेसे मेरा निर्माणकर। और इसलिए मैंने अनाहार व्रत लिया है।
अब साथियोंको चोटें लगी हैं या उपद्रवकारियोंको चोटें लगी हैं, खबरें सुनकर कि 'मेरे मेरा चित्त अस्थिर नहीं होता। मेरा तो एकमात्र सहारा मेरी निजी अहिंसा ही है। अगर वह असर नहीं कर सकती, तो मुझे उसके लिए चिन्ता करना उचित नहीं। भारतके दूसरे भागों में हजारों लोग मरते हैं। उनकी मृत्युसे मेरे हृदयको दुःख होता है; पर उनके लिए मैं चिन्तित नहीं होता। उसी प्रकार इस मामलेमें भी, जब कि मैं जो कुछ जानता हूँ वह सब कर चुका हूँ, मेरा चिन्तित और व्याकुल होना व्यर्थ ही है। इस प्रकार यह उपवास मेरे लिए प्रायश्चित्त, आत्मशुद्धि और भूल सुधार सब-कुछ रहा है। यह कार्यकर्त्ताओंको एक चेतावनी भी है कि इस संघर्षमें वे मेरे साथ खिलवाड़ न करें। इस युद्धमें सिर्फ वही लोग शामिल रहें जो सच्चे दिलसे अहिंसाके कायल हों। ऐसे सच्चे और पक्के कार्यकर्त्ता अगर इने-गिने ही होंगे तो भी यह लड़ाई बेखटके और बिना उलझनोंके चलाई जा सकेगी। पर कार्यकर्त्ता अगर नेक और सच्चे न हों, तो उनकी संख्या बहुत होने पर भी, उनसे इस आन्दोलनको हानि ही पहुँचेगी। और अन्तिम बात यह कि उपवास शीघ्र शान्ति स्थापित करनेका एक उपाय है। लेकिन यह अन्तिम बात तो एक व्युत्पन्न वस्तु है, जो प्रायश्चित्त, आत्म-शुद्धि और भूल सुधार के फलस्वरूप प्राप्त होती है। यह एक ईश्वर-प्रदत्त साख है।
{{c|'''कार्यकर्त्ताओ, सावधान !'''}}
उपवास तोड़ देनेके सम्बन्धमें मुझसे अनेक तरहसे अनुनय-विनय किया जा रहा है। कई लोगोंने तो मेरे दुःखसे दुःखी होकर खुद भी उपवास करना आरम्भ कर दिया है। मैं ऐसे सब सज्जनोंको यह जता देना चाहता हूँ कि वे भूल कर रहे हैं। मेरे लिए तो उपवास जरूरी हो गया था। मैं तो अपराधी था, दिवालिया था। मेरे लिए<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५३८
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|५०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>प्रायश्चित्त एक आवश्यक चीज थी। दूसरे लोगोंका काम तो यह है कि वे स्थितिको समझें, अपने अन्दर अगर हिंसा-भावका लेश भी बाकी रह गया हो तो उसका त्याग करें, दूसरोंमें अहिंसाका प्रचार करें और अच्छी तरह याद रखें कि हिंसाका तनिक भी उद्रेक हमारे कामको बिगाड़नेवाला है। वे चरखेको अपनी प्रिय वस्तु बना लें और केवल हिन्दू-मुस्लिम एकताका ही नहीं, बल्कि तमाम जातियोंमें एकता स्थापित करनेके लिए प्रयत्न करें। हिन्दू-मुस्लिम एकताका अर्थ अगर यह न हो कि वे दोनों जातियाँ अपने हितोंके मुकाबले छोटी जातियोंके हितोंको तरजीह दें, तो ऐसी हिन्दू-मुस्लिम एकता किसी कामकी नहीं। भारत-भूमिमें पैदा हुए ईसाई और यहूदी विदेशी नहीं हैं और न ही पारसी लोग विदेशी हैं। उनसे आगे बढ़कर मित्रता करना, उनकी सेवा और सहायता करना, खास तौरपर हमसे उन्हें कोई हानि न पहुँचे इससे उनकी रक्षा करना आवश्यक है। इसी प्रकार असहयोगी कार्यकर्त्ताओंको सहयोगी लोगोंके साथ भी मेलजोल रखने की आवश्यकता है। वे चाहे अंग्रेज हों, चाहे हिन्दुस्तानी, हमें उनके लिए अपने मुँहसे एक भी अपशब्द न निकालना चाहिए। हमें तो अपने उद्देश्यकी सच्चाई और कष्ट सहनकी अपनी क्षमतामें ही विश्वास करना चाहिए। कमसे-कम फिलहाल तो हमने ईश्वरको साक्षी रखकर दुनियाके सामने यह घोषणा की है कि हम किसी भी अंग्रेजको किसी तरहसे नुकसान न पहुँचायेंगे, भले ही वह हमारे साथ कुछ भी क्यों न करे। इस प्रकार दुनियाके सामने ऐसी प्रतिज्ञा करके अगर उसकी ओटमें हम किसी भी अंग्रेज या हिन्दुस्तानी सहयोगीपर हाथ उठायेंगे तो हम ईश्वर और दुनिया के सामने गुनहगार ठहरेंगे।
{{c|'''शान्तिका अर्थ'''}}
अपनी दूसरी अपीलमें मैंने शान्तिकी जो बात कही है, मित्रोंने उसका अर्थ गलत समझा है। मैं जो शान्ति चाहता हूँ वह असहयोगियोंको स्थापित करनी है। इसका अर्थ यह नहीं कि कार्यका एक समान आधार ढूंढने के लिए हम सिद्धान्त या नीतिको छोड़ दें। वह, मेरे खयालमें, एक असम्भव कार्य है, क्योंकि विभिन्न दलोंकी पद्धतियाँ एक-दूसरेसे बिलकुल भिन्न हैं। जब एक दल देशकी भलाई कौंसिलोंमें जानेमें देखता हो और दूसरा उनसे बाहर रहने में, तो उनमें मेल कैसे हो सकता है ? किन्तु यदि हममें मतभेद है तो यह आवश्यक नहीं कि हम एक-दूसरेके साथ बदसलूकी करें, या एक-दूसरेका सिर फोड़ें। अहिंसाके सिद्धान्तका, जबतक हम उस सिद्धान्तपर चल रहे हैं, तकाजा है कि हम बदला लेने के लिए अपना हाथ न उठायें। मुझे विश्वास है कि यदि हम सहिष्णुताका वातावरण पैदा कर सकें, तो हम अपना क्षेत्र बेहद बढ़ा सकते हैं। आज हम अपने ही सन्देहों और संशयोंमें जकड़े हुए हैं। हम यह निश्चित रूपसे नहीं कह सकते कि ये हजारों लोग जो हमारी सभाओंमें जमा होते हैं, अहिंसाका पालन करेंगे ही। यदि हम इतने लोकप्रिय न होते तो अबतक इससे कहीं अधिक प्रगति कर लेते। और इसके लिए हममें अपने विरोधियोंके लिए सद्भाव होना परम आवश्यक है। हमें सरकार या उसके समर्थकोंकी गलतियों और कमियोंकी बातें नहीं करनी चाहिए। हमें तो शान्तचित्त होकर अपनी शक्ति, अपने भाषणों, लेखों और कार्यों, इन सभीका प्रयोग<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{larger|'''भूमिका'''}}}}
प्रस्तुत खण्डमें १५ जूनसे ५ नवम्बर, १९२६ तककी सामग्री आ जाती है। यह वही अवधि है जिसमें गांधीजीने एक वर्षके लिए ऐसे सभी सार्वजनिक कामोंसे संन्यास ले लिया था जो अनिवार्य नहीं थे। स्वेच्छासे लिया गया यह संन्यास विश्राम और मननके विचारसे लिया गया था। और इसका भंग केवल दक्षिण आफ्रिकाके प्रवासी भारतीयोंकी समस्याके सम्बन्धमें, जब वे दो बार बम्बई गये, तभी हुआ। सत्याग्रह आश्रम, साबरमतीमें रहते हुए गांधीजीने कब्जियतका उपचार ढूँढ़नेकी दृष्टिसे फलाहारका प्रयोग जारी रखा और वे इस अवधिमें 'भगवद्गीता' और 'रामायण' पर कक्षाएँ भी लेते रहे। यद्यपि उन्होंने अपने कार्यकलापको आश्रमतक ही सीमित कर रखा था, तथापि वे देश-विदेशके लोगोंसे पत्र-व्यवहार करते थे और 'नवजीवन' तथा 'यंग इंडिया' के द्वारा तत्कालीन सार्वजनिक और राजनीतिक जीवनपर अपने विचार प्रकट करते रहे। इन पत्रोंके माध्यमसे वे उन पत्रलेखकोंको भी अपने कार्यकलापोंके विषयमें सूचनाएँ देते रहे, जो उनके प्रति जिज्ञासा रखते थे।
इस अवधिमें उन्होंने विधानसभाओंमें होनेवाले काम और हिन्दू-मुस्लिम दंगोंके विषयमें मौन ही रखा। किन्तु वे अस्पृश्यता-निवारण, खादी और राष्ट्रीय-शिक्षाके विषयमें सोचते-विचारते और अपना मत व्यक्त करते रहे। उनके लेखे चरखे तो ईश्वरके ही चक्र हैं और वे "ईश्वरके चक्र धीरे-धीरे लेकिन निहायत कारगर तौरपर चलते हैं।" (पृष्ठ ३८३) सूत कातकर वे भगवानके साथ एकात्मताका अनुभव करते थे, क्योंकि भगवान उनके लिए गरीबों और दलितोंकी सेवाका ही दूसरा नाम था। वे मानते थे कि खादीके प्रसारसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार होगा और परिणामस्वरूप वह भारतीयोंमें स्वावलम्बनकी भावना और अधिक शक्ति लाएगी तथा करोड़ों रुपया प्रतिवर्ष बचेगा। गांधीजी मानते थे कि समूची भारतीय जनताका कल्याण चरखेसे सम्बद्ध है। "उद्देश्य मनुष्यसे कहीं बड़ा होता है। सचमुच चरखा मुझसे अधिक महत्त्वका है।" (पृष्ठ ५०) अपनी इस दृढ़ श्रद्धाके अनुसार गांधीजी निष्ठापूर्वक सदाकी तरह इस अवधिमें भी कातते रहे और कताईके विषयमें विचार करते रहे।
गांधीजीने अस्पृश्यताको एक अनन्त सिरवाला असुर कहा और यह चाहा कि यह असुर जब-जब सिर उठाये, उसका दमन किया जाना चाहिए। समाजमें फैले हुए ऊँच-नीचके भाव उनकी दृष्टिमें अस्पृश्यताके रोगसे ही निःसृत और अस्पृश्यताके चिह्न थे। उन्हें यह देखकर बड़ा दुःख होता था कि अस्पृश्यताके विरुद्ध लगातार पाँच<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|छ:}}
वर्षोंतक समझाते-बुझाते रहनेपर भी अभीतक ऐसे शिक्षित लोग बचे हुए हैं जो इस अनीतिपूर्ण कुप्रथाका समर्थन किये ही चले जा रहे हैं। गांधीजीने थोड़े दुःखके साथ लिखा : “यदि किसी धार्मिक ग्रन्थमें किसी प्रसिद्ध पुरुषके पाप करनेका उल्लेख हो तो क्या उससे हमें भी पाप करनेकी आज्ञा मिल जाती है ? यदि हमसे उन्होंने केवल एक बार ही यह कह दिया कि इस संसारमें केवल सत्यकी ही सत्ता है और सत्य परमेश्वरके तुल्य है तो हमारे लिए इतना ही बहुत है।” (पृष्ठ २२०-२१)
“शब्दोंका अत्याचार” नामक एक लेखमें गांधीजीने लिखा कि तर्क और तर्क-बुद्धिसे भी पहले आते हैं श्रद्धा और प्रार्थना। इनका स्थान पहला है। उनके विचारसे जब तर्क-बुद्धि अपने-आपको सर्वशक्तिमान मानने लगती है तो वह एक आसुरी वृत्ति बन जाती है, क्योंकि “श्रद्धा और विश्वासके बिना जो काम किया जाता है वह उस कागजी फूलके समान होता है, जिसमें सुवास नहीं होती।” (पृष्ठ ५१९) तर्क अथवा तर्क-बुद्धिकी परवाह न की जाये, ऐसा वे नहीं चाहते थे, किन्तु वे यह अवश्य चाहते थे कि बुद्धिको पवित्र बनानेवाले विश्वासको आवश्यक स्थान दिया ही जाना चाहिए। प्रार्थना तो उनके जीवनका एक अविच्छिन्न अंश ही था। वे भोजनके बिना रह सकते थे प्रार्थनाके बिना नहीं। “बिना खाये तो मनुष्य काफी दिनों जीवित रह जाता है परन्तु ईश्वराराधनाके बिना वह एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। इस तथ्यको चाहे वह न माने, किन्तु इसे न मानना वैसा ही होगा, जैसा किसी बेसमझ व्यक्तिका अपने शरीरमें फेफड़ोंके अस्तित्व अथवा रक्तके प्रवाहको न मानना।” (पृष्ठ १०८) एक सज्जनको पत्र लिखते हुए उन्होंने कहा, “प्रार्थना तो नित्य शुद्धिके लिए की जाती है। शरीर-शुद्धिके लिए नित्य स्नानका जो महत्त्व है, हृदय और मस्तिष्कके लिए वही महत्त्व प्रार्थनाका है।” (पृष्ठ २३५) वे प्रार्थनाको याचना नहीं, आत्माकी पुकार मानते थे। ‘यंग इंडिया’ के स्तंभोंमें किसी राष्ट्रीय संस्थाके प्रधानाचार्यको, जिनका प्रार्थनामें विश्वास नहीं था, गांधीजीने उत्तर देते हुए लिखा : “ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता और न उसे सिद्ध करनेकी जरूरत ही है। ईश्वर तो है ही।” (पृष्ठ ४५८) यही वह निष्ठा है जिसके बलपर गांधीजी कठिनसे-कठिन परिस्थितियोंमें भी आन्तरिक शान्ति बनाये रखकर सरल मार्गको अपना पाते थे।
अहिंसाके तत्त्वसे ओतप्रोत तथा सत्य और अहिंसाको अपनी एक-एक साँस खींचनेके लिए फेफड़ोंकी तरह आवश्यक माननेके कारण उन्होंने नित्य अधिकाधिक रूपमें अहिंसाकी अपारशक्ति सम्बन्धी अपने विश्वासको स्पष्ट रूपमें देखा और यह भी देखा कि आदमी स्वयं कितना नगण्य है। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा : “सबसे बड़ी ताकत जो मानवको प्रदान की गई है, अहिंसा है। सत्य उसका एकमात्र लक्ष्य है। क्योंकि ईश्वर सत्यसे इतर कुछ और नहीं है। लेकिन सत्यकी प्राप्ति अहिंसाके अतिरिक्त<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सात}}
किसी अन्य उपायसे नहीं हो सकती; कभी नहीं होगी।” (पृष्ठ १४८) वे चाहते थे कि संसारका एक-एक व्यक्ति इस बातको समझ ले।
अहिंसाके बिना, जिसे वे प्रेमका कानून कहते थे, संसारमें सच्ची शान्ति सम्भव नहीं है। शस्त्रके बलपर लोगोंको चुप तो रखा जा सकता है, किन्तु यदि करोड़ों स्त्री-पुरुषोंके मन अहिंसाके भावसे ओतप्रोत नहीं होते, तो शान्तिकी पुकार अरण्य-रोदन ही सिद्ध होगी।
वे अहिंसाको कायरता छिपानेका साधन नहीं मानते थे। वे तो यह कहते थे कि यह वीरका बड़ेसे-बड़ा गुण है। शस्त्र-कौशलकी अपेक्षा अहिंसाकी पद्धतिसे काम लेना अधिक वीरताकी अपेक्षा रखता है। अहिंसा और कायरतामें कोई सामंजस्य ही नहीं हो सकता। जिसमें हिंसा करनेकी शक्ति है, अर्थात् जो शरीरसे भी सबल है, वही आदमी जब सोच-समझकर बदला लेनेकी अपनी प्रवृत्तिका निरोध करता है और हाथ उठानेसे बाज आता है, तभी वह वास्तविक अहिंसा कहलाती है। “निष्क्रिय होकर औरतों-जैसे असहाय बनकर आत्मसमर्पण करनेसे तो बदला लेना ही कहीं अच्छा है। बदला लेनेसे क्षमा करना बड़ी चीज है। बदला लेना भी एक कमजोरी ही है।” (पृष्ठ ३०३)
“क्या यह जीवदया है ?” शीर्षकसे लिखी गई लेखमालामें गांधीजीने आवारा कुत्तोंको मारनेकी पैरवी बिना किसी लाग-लपेटके की, मित्रभावसे अथवा क्रोधसे की गई तत्सम्बन्धी अपनी आलोचनाओंको निरस्त करनेका उन्होंने पूरा प्रयत्न किया। उनके सामने अनेक ऐसे अवसर आते रहते थे जब लोग ऐसा मानते थे कि गांधीजी गलतीपर हैं। ऐसी परिस्थितियोंमें वे अपनी कथनी और करनीमें विरोध नहीं पाते थे और दृढ़ रहते थे। यदि गुस्सेमें आकर कोई असंगत ढंगसे तर्क प्रस्तुत करता था, तो वे उससे विचलित नहीं होते थे। क्योंकि उनका कहना था कि क्रोध आ जाना तो हिंसा करना है। “क्रोध तो अहिंसाका वैरी है और अभिमान है उसे खा जाने-वाला राक्षस।” (पृष्ठ ५०९) गांधीजीकी अहिंसामें पागल कुत्ते या हत्याकर्ममें आनन्द लेनेवाले व्यक्तिके नाशको स्थान है और वे मानते थे कि उनकी यह राय अहिंसा-सम्बन्धी उनके विचारसे पूर्णतया सुसंगत है। संसार हिंसासे भरा हुआ है, और इसमें अहिंसाके मार्गपर चलना तलवारकी पैनी धारपर चलने जैसा है। (पृष्ठ ५०९)
अहिंसक असहयोगमें उनकी अविचल निष्ठा इस अवधिमें लिखे गये उनके लेखों तथा उन पत्रोंमें व्यक्त होती रही जो उन्होंने मित्रों अथवा अपरिचितोंको लिखे। वे कहते रहे कि जिन्हें इस विचारमें विश्वास है, वे इसका अनुभव कर सकते हैं कि यह कोई निष्प्राण तत्त्व नहीं है, बल्कि एक अत्यन्त जीवन्त तत्त्व है और जब<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|आठ}}
क्षितिजपर घनेसे-घने काले बादल छा जायेंगे, तब यह विचार अपनी उपयोगिताको भली-भाँति सिद्ध करके दिखायेगा। लोग उस समय देखेंगे कि यह भारतकी आशाका बड़ेसे-बड़ा सहारा है। (पृष्ठ ९)
भारतका मानवताके आनन्दमें सर्वाधिक योगदान यह होगा कि वह शान्ति तथा सत्यमय साधनोंके द्वारा अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त कर ले। ऐसा कब होगा, सो कहना तो गांधीजी कठिन मानते थे और यहाँतक कि सतहपर जो-कुछ दिख रहा था, उससे इस प्रकारके विश्वासका खण्डन ही होता था, तथापि उन्होंने कहा कि भारत जब आजाद होगा, शान्ति और सत्यके मार्गपर चलकर ही होगा, अन्य किसी मार्गपर चलकर नहीं। साध्य और साधनका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अपने इस विश्वासको उन्होंने बार-बार दोहराया और उसे कार्यरूप देकर प्रमाणित किया। अर्थात् उन्होंने इस बातपर जोर दिया कि दोषपूर्ण साधनोंसे निर्दोषकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती।
गांधीजी द्वारा भारतकी जो सेवा हो रही थी, वह वास्तवमें उनके द्वारा होनेवाली समूची मानवताकी सेवाका एक अंश ही थी। “जो निःस्पृह होकर निःस्वार्थ भावसे एक ही सेवा करता है, वह सबकी सेवा करता है।” (पृष्ठ १२८) मानवताकी सेवाके बिना त्याग असम्भव है, इसलिए आत्मत्याग उनके लेखे बड़ेसे-बड़ा आचार-नियम था। उन्होंने सभी भारतीयोंको, चाहे वे देशके भीतर हों, चाहे दक्षिणी आफ्रिका आदिमें देशके बाहर, यही सलाह दी कि अन्ततोगत्वा सफलताका दारोमदार खुद उन्हींपर है। उन्होंने कहा कि स्वावलम्बनसे बढ़कर अन्य कोई अवलम्बन नहीं है। दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको उन्होंने सलाह दी कि वे अपनी माँगोंको बढ़ा-चढ़ाकर पेश न करें, एक स्वरमें बोले और सत्यके रास्तेसे तिल-भर भी न हटें। उन्होंने यह भी कहा कि वहाँके भारतीयोंको समझौतेमें स्वयंसे सम्बन्धित भागको पूरी-पूरी तरह निभाना चाहिए अर्थात् उन्हें स्वच्छता और इमारतों सम्बन्धी सारे नियमोंका पालन करना चाहिए और “उद्देश्यके हेतु सामुदायिक रूपसे एक-समाज बने रहकर, कष्ट झेलनेके लिए तैयार” रहना चाहिए। (पृष्ठ ४७१) क्योंकि बिना कष्ट सहे छुटकारा है ही नहीं।
यद्यपि गांधीजी इस अवधिमें हिन्दू-मुस्लिम प्रश्नके प्रति तटस्थ-से बने रहे, किन्तु वे इस समस्यापर विचार तो करते ही रहे। वे मानते थे कि अंशतः यह समस्या ब्रिटिश शासनकी बनाई हुई समस्या है, क्योंकि ब्रिटिश शासन अविश्वासपर आधारित है। अविश्वास पक्षपातको जन्म देता है और पक्षपात विभिन्न पक्षोंमें फूट पैदा करता है। इसे सिद्ध करनेके लिए उन्हें इस बातकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती थी कि वे सरकारी अधिकारियोंके मनमें निहित बुरे उद्देश्यको सिद्ध करें। उन्होंने साम्प्रदायिक झगड़ोंके लिए मुख्यतया लोगोंको ही दोषी ठहराया और कहा कि यदि<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|नौ}}
लोग अपने झगड़े आपसमें नहीं निपटाते, तो बाहरकी कोई भी शक्ति ऐसे झगड़ोंका अन्त नहीं कर सकती। सरकार और जनताके स्वार्थोंमें विरोध होनेके कारण सरकार तो फूट डालकर शासन करनेकी नीतिपर चले बिना रह नहीं सकती और इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम ऐक्यके बिना स्वराज्य एक असम्भव चीज है -- गांधीजी नित्य इस बातके प्रमाण देखते थे। वे यह भी मानते थे कि परिस्थिति देखनेमें ही कठिन है। भीतर उनके मनमें यह पक्का विश्वास था कि किसी न किसी दिन लोग अपनेको अधिक बलवान और निष्कलंक देख पायेंगे, क्योंकि कुछ लोग तो ऐसे हैं ही जो ऐसे पारस्परिक झगड़ोंको हृदयसे नापसन्द करते हैं और जो अहिंसाको अपना अन्तिम सहारा मानते हैं। उन्हें भरोसा था कि हम चाहें या न चाहें, एकता होकर रहेगी, क्योंकि जहाँ आदमीके प्रयत्न बेकार हो जाते हैं, वहाँ ईश्वरकी कृपा फलीभूत हो सकती है। क्योंकि भगवानका शासन भेद-नीतिपर आधारित नहीं है। (पृष्ठ ३०१)
“अनीतिकी राहपर” शीर्षक लेख-मालामें गांधीजीने वासनाओंके नंगे नाचकी निन्दा की, तथा नैतिक संयम और ब्रह्मचर्यपर जोर देते हुए सन्तति-निरोधको सफल बनानेकी सलाह दी। उन्होंने एम॰ पॉलब्यूरोकी फ्रांसीसी भाषाकी पुस्तक 'ला इनडिस्लिने डेस मोर्स' से लम्बे-लम्बे उद्धरण दिये। इस पुस्तकमें उक्त समस्याका वैज्ञानिक विवेचन किया गया था और अन्तमें उन्होंने 'टॉम मान' के इस वचनसे लेखमाला समाप्त की : “जो जातियाँ आचारवान् रहेंगी, भविष्य उनके साथ रहेगा।” (पृष्ठ ३२४)
इस अवधिमें गुजरात राष्ट्रीय विद्यापीठके विद्यार्थियोंको गांधीजी 'न्यू टेस्टामेंट' पढ़ाते थे। अनेक पत्र-लेखकोंने इसके लिए गांधीजीकी आलोचना की। “ 'बाइबिल' पढ़नेका गुनाह ' ” नामक लेखमें गांधीजीने बलपूर्वक कहा कि हर संस्कारवान् स्त्री अथवा पुरुषको चाहिए कि वह सारे संसारके धर्म-शास्त्रोंका श्रद्धा और सहानुभूतिके साथ अध्ययन करे। उन्होंने स्वयं सनातनी हिन्दू होनेका दावा किया और कहा कि अन्य धर्मोंका श्रद्धासे अध्ययन करनेके फलस्वरूप “मैं हिन्दू धर्म-ग्रन्थोंके गूढ़ अंशोंको अधिक अच्छी तरह समझ सका हूँ।” (पृष्ठ ३६४)
उन्हीं दिनों 'यंग इंडिया' में गांधीजीकी 'आत्मकथा' के अध्याय क्रमशः प्रकाशित हो रहे थे और तभी “गुरुकी तलाश” नामक जो अध्याय प्रकाशित हुआ था, उसे लेकर अनेक पत्रलेखकोंने गांधीजीको अपने-अपने सुझाव भेजे। किन्तु गांधीजीके सामने गुरुकी जो मूर्ति थी, वह साधारण नहीं थी। केवल कोई पूर्ण पुरुष ही उनकी आत्माको सन्तोष दे सकता था। उन्हें तो ऐसे गुरुकी तलाश थी, जो शरीरमें रहते हुए भी निर्विकार हो, वासनाएँ जिसे छू न पाती हों, जो द्वन्द्वोंसे परे हो, जो सत्य<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|दस}}
और अहिंसाका साकार स्वरूप हो और इसलिए न जो स्वयं किसीसे डरता हो और न जिससे कोई दूसरा डरता हो। उन्होंने नम्रतापूर्वक कहा : मुझे (ऐसे किसी) देहधारी गुरुको प्राप्त करनेके पहले खुद पूर्ण बननेका प्रयत्न करना चाहिए। (पृष्ठ ९) तथापि वे मनमें गुरुके गुणोंका चिन्तन करते रहे। मार्ग तो वे जानते ही थे। वे जानते थे कि मार्ग सरल है, किन्तु वह तलवारकी धारकी तरह संकीर्ण और पैना है और उसपर चलना आनन्दका विषय है।
१० अक्तूबर, १९२६ को गांधीजीने जो वसीयतनामा लिखा था, वह इस खण्डका विशिष्ट दस्तावेज है। उन्होंने वसीयतनामेमें लिखा : “मेरे पास मेरी अपनी कोई मिल्कीयत नहीं है, फिर भी यदि मेरी मृत्युके बाद किसी वस्तुको मेरी निजी मिल्कीयत माना जाये तो मैं सत्याग्रहाश्रमके ट्रस्टियों...को...उसका वारिस नियुक्त करता हूँ। मैंने जो-जो पुस्तकें लिखी हैं, जो भी लेख लिखे हैं और इसके बाद जो-जो पुस्तकें अथवा लेखादि लिखूँगा उनका वारिस भी मैं उक्त ट्रस्टियोंको नियुक्त करता हूँ। मैं उन्हें अपनी मृत्युके बाद उन सारी हलचलोंके संचालनका भार भी सौंपता हूँ, जिन्हें मेरे मरणके बाद मेरे नामसे चलाना आवश्यक हो जाये। साथ ही उक्त पुस्तकों और लेखों अथवा उनके स्वत्वाधिकारसे जो-कुछ आमदनी होगी तथा जो मेरी निजी मिल्कीयतकी तरह जो-कुछ माना जायेगा, उस सबका उपयोग उक्त ट्रस्टीगण सत्याग्रहाश्रमके उद्देश्योंको सफल बनानेकी दृष्टिसे इस रीतिसे करेंगे, जो उन्हें उस कार्यकी दृष्टिसे योग्य जान पड़े।” (पृष्ठ ५११-१२) इस तरह हम देखते हैं कि जो उद्देश्य उन्हें प्रिय था, वे उसके प्रति जितने समर्पित थे, उतने ही पूर्ण रूपसे अनासक्त भी थे।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{larger|'''आभार'''}}}}
इस खण्डकी सामग्रीके लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक और स्मारक न्यास (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन ऐंड मेमोरियल ट्रस्ट) तथा संग्रहालय; नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली; राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया), नई दिल्ली; श्री परशुराम मेहरोत्रा, नई दिल्ली; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्रीमती तेहमीना खम्भाता, बम्बई; श्री महेश पट्टणी, भावनगर; श्री हरिभाऊ उपाध्याय, बम्बई; श्री विष्णु दयाल, अजमेर; श्री गजानन कानिटकर, पूना; श्री मुन्नालाल जी॰ शाह, सेवाग्राम; श्री राधानाथ रथ, कटक; श्रीमती मीराबहन, गाडेन, ऑस्ट्रिया; श्री डाह्याभाई म॰ पटेल, अहमदाबाद; 'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'माई डियर चाइल्ड', 'रोमाँ रोलाँ बर्थ डे बुक', पुस्तकोंके प्रकाशकों और निम्नलिखित समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओंके आभारी हैं : 'गुजराती', 'नवजीवन', 'फॉरवर्ड', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'यंग इंडिया', 'सर्चलाइट', 'हिन्दी नवजीवन' और 'हिन्दू'
अनुसन्धान और सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पुस्तकालय, गांधी स्मारक संग्रहालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्लीके अनुसन्धान तथा सन्दर्भ विभाग, साबरमती संग्रहालय, गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद और प्यारेलाल नैयर, नई दिल्ली और कागजातोंकी फोटो-नकलें बनानेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयके फोटो-विभागके आभारी हैं।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|उन्नीस}}
{|width=100%
|-
| १८०. || पत्र : उर्मिला देवीको (२०-७-१९२६) || १७६
|-
| १८१. || पत्र : बासन्ती देवी दासको (२०-७-१९२६) || १७७
|-
| १८२. || पत्र : सुजाताको (२०-७-१९२६) || १७७
|-
| १८३. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२०-७-१९२६) || १७८
|-
| १८४. || पत्र : ए॰ एम॰ सिम्सनको (२०-७-१९२६) || १८०
|-
| १८५. || पत्र : परमानन्द कुँवरजीको (२०-७-१९२६) || १८०
|-
| १८६. || पत्र : सैयद हैदर रजाको (२१-७-१९२६) || १८२
|-
| १८७. || पत्र : आर॰ बी॰ ग्रेगको (२१-७-१९२६) || १८३
|-
| १८८. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२१-७-१९२७) || १८४
|-
| १८९. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (२१-७-१९२६) || १८५
|-
| १९०. || पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको (२१-७-१९२६) || १८५
|-
| १९१. || पत्र : रेवाशंकर ज॰ झवेरीको (२१-७-१९२६) || १८६
|-
| १९२. || पत्र : प्रभुदास भीखाभाईको (२१-७-१९२६) || १८७
|-
| १९३. || राष्ट्रीयता और ईसाई धर्म (२२-७-१९२६) || १८८
|-
| १९४. || वह गोलमेज परिषद् (२२-७-१९२६) || १८८
|-
| १९५. || अनीतिकी राहपर - ४ (२२-७-१९२६) || १९०
|-
| १९६. || कोचीनमें हाथकताई (२२-७-१९२६) || १९५
|-
| १९७. || पत्र : नॉर्मन लीजको (२३-७-१९२६) || १९६
|-
| १९८. || पत्र : ई॰ स्टेनले जोन्सको (२३-७-१९२६) || १९८
|-
| १९९. || पत्र : अ॰ वा॰ गोदरेजको (२३-७-१९२६) || १९९
|-
| २००. || पत्र : लक्ष्मीदास पु॰ आसरको (२३-७-१९२६) || २००
|-
| २०१. || पत्र : पूंजाभाई शाहको (२३-७-१९२६) || २००
|-
| २०२. || पत्र : गोपालराव कुलकर्णीको (२४-७-१९२६) || २०१
|-
| २०३. || पत्र : मगनलाल सुन्दरजीको (२४-७-१९२६) || २०२
|-
| २०४. || पत्र : विट्ठलभाई झ॰ पटेलको (२५-७-१९२६) || २०२
|-
| २०५. || पत्र : विट्ठलभाई झ॰ पटेलको (२५-७-१९२६) || २०३
|-
| २०६. || पत्र : रामदास गांधीको (२५-७-१९२६) || २०४
|-
| २०७. || पत्र : काकूको (२५-७-१९२६) || २०५
|-
| २०८. || पत्र : बलवन्तराय भ॰ मनियारको (२५-७-१९२६) || २०५
|-
| २०९. || पत्र : ए॰ आई॰ काजीको (२६-७-१९२६) || २०६
|-
| २१०. || पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (२६-७-१९२६) || २०७
|-
| २११. || सन्देश : महाराष्ट्रकी जनताके नाम (२६-७-१९२६) || २०७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|बीस}}
{|width=100%
|-
| २१२. || पत्र : गंगाधरराव देशपाण्डेको (२७-७-१९२६) || २०८
|-
| २१३. || पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको (२७-७-१९२६) || २०९
|-
| २१४. || पत्र : जनकधारी प्रसादको (२७-७-१९२६) || २१०
|-
| २१५. || पत्र : जमनालाल बजाजको (२७-७-१९२६) || २१०
|-
| २१६. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (२७-७-१९२६) || २११
|-
| २१७. || पत्र : जगजीवन तलेकचन्द दरबारीको (२७-७-१९२६) || २११
|-
| २१८. || पत्र : रमणलाल भोगीलाल चिनायको (२७-७-१९२६) || २१२
|-
| २१९. || पत्र : नानाभाई भट्टको (२७-७-१९२६) || २१२
|-
| २२०. || पत्र : आनन्दानन्दको (२७-७-१९२६) || २१३
|-
| २२१. || पत्र : वीरसुत त्रिभुवनको (२७-७-१९२६) || २१३
|-
| २२२. || पत्र : छोटालाल मो॰ कामदारको (२७-७-१९२६) || २१४
|-
| २२३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२८-७-१९२६) || २१५
|-
| २२४. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (२८-७-१९२६) || २१६
|-
| २२५. || पत्र : डा॰ मुरारीलालको (२८-७-१९२६) || २१६
|-
| २२६. || पत्र : डब्ल्यू॰ एच॰ वाइजरको (२८-७-१९२६) || २१७
|-
| २२७. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२८-७-१९२६) || २१७
|-
| २२८. || पत्र : सर हैरॉल्ड मैनको (२८-७-१९२६) || २१८
|-
| २२९. || पत्र : हेमप्रभादेवीको (२८-७-१९२६) || २१८
|-
| २३०. || पत्र : पानाचन्द शाहको (२८-७-१९२६) || २१९
|-
| २३१. || पत्र : ए॰ बी॰ गोदरेजको (२८-७-१९२६) || २१९
|-
| २३२. || अस्पृश्यता-रूपी रावण (२९-७-१९२६) || २२०
|-
| २३३. || शास्त्राज्ञा बनाम बुद्धि (२९-७-१९२६) || २२२
|-
| २३४. || अखिल भारतीय तिलक स्मारक कोष (२९-७-१९२६) || २२४
|-
| २३५. || अनीतिकी राहपर - ५ (२९-७-१९२६) || २२६
|-
| २३६. || लगनका पुरस्कार (२९-७-१९२६) || २३१
|-
| २३७. || टिप्पणियाँ : कुछ बंगाली महिलाओंसे; डटकर कताई; कातनेका कारण (२९-७-१९२६) || २३२
|-
| २३८. || पत्र : पैन एशियाटिक सोसाइटी, पीकिंगको (२९-७-१९२६) || २३३
|-
| २३९. || पत्र : एच॰ कैलेनबैकको (२९-७-१९२६) || २३४
|-
| २४०. || पत्र : धनगोपाल मुकर्जीको (२९-७-१९२६) || २३५
|-
| २४१. || पत्र : एच॰ एस॰ वॉल्डो पोलकको (२९-७-१९२६) || २३६
|-
| २४२. || पत्र : ई॰ सी॰ कार्टरको (२९-७-१९२६) || २३७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|इक्कीस}}
{|width=100%
|-
| २४३. || पत्र : माँड चीजमैनको (२९-७-१९२६) || २३७
|-
| २४४. || पत्र : एस॰ पी॰ मेननको (२९-७-१९२६) || २३८
|-
| २४५. || पत्र : प्रभाशंकर अभयचन्दको (२९-७-१९२६) || २३९
|-
| २४६. || पत्र : पूंजाभाई शाहको (२९-७-१९२६) || २३९
|-
| २४७. || पत्र : शम्भुशंकरको (२९-७-१९२६) || २४०
|-
| २४८. || पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (३०-७-१९२६) || २४०
|-
| २४९. || पत्र : मोतीलाल रायको (३०-७-१९२६) || २४१
|-
| २५०. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (३०-७-१९२६) || २४२
|-
| २५१. || पत्र : सतीशचन्द्र मुकर्जीको (३०-७-१९२६) || २४३
|-
| २५२. || पत्र : एस॰ एच॰ थत्तेको (३-७-१९२६) || २४३
|-
| २५३. || पत्र : जमनालाल बजाजको (३०-७-१९२६) || २४४
|-
| २५४. || पत्र : नानाभाई भट्टको (३०-७-१९२६) || २४५
|-
| २५५. || पत्र : देवचन्द पारेखको (३०-७-१९२६) || २४६
|-
| २५६. || पत्र : सज्जादीन मिर्जाको (३१-७-१९२६) || २४७
|-
| २५७. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (३१-७-१९२६) || २४८
|-
| २५८. || पत्र : फूलचन्द शाहको (३१-७-१९२६) || २४८
|-
| २५९. || पत्र : गोरधनभाई मो॰ पटेलको (३१-७-१९२७) || २४९
|-
| २६०. || प्रतिज्ञाका रहस्य (१-८-१९२६) || २४९
|-
| २६१. || बालिकाका वध (१-८-१९२६) || २५१
|-
| २६२. || भूल-सुधार (१-८-१९२६) || २५२
|-
| २६३. || भिखारी साधु (१-८-१९२६) || २५३
|-
| २६४. || पत्र : मु॰ रा॰ जयकरको (१-८-१९२६) || २५४
|-
| २६५. || पत्र : विट्ठलभाई झ॰ पटेलको (१-८-१९२६) || २५५
|-
| २६६. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (१-८-१९२६) || २५६
|-
| २६७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको (१-८-१९२६) || २५७
|-
| २६८. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१-८-१९२६) || २५७
|-
| २६९. || पत्र : एम॰ एल॰ गुप्ताको (१-८-१९२६) || २५८
|-
| २७०. || सन्देश : जैन स्वयंसेवक सम्मेलनको (२-८-१९२६) || २५८
|-
| २७१. || पत्र : ख्वाजाको (२-८-१९२६) || २५९
|-
| २७२. || पत्र : छगनलाल पी॰ नाणावटीको (३-८-१९२६) || २५९
|-
| २७३. || पत्र : देवदास गांधीको (३-८-१९२६) || २६०
|-
| २७४. || पत्र : मोहनलाल पण्ड्याको (३-८-१९२६) || २६१
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|बाईस}}
{|width=100%
|-
| २७५. || तार : जमनालाल बजाजको (३-८-१९२६ या उसके पश्चात्) || २६२
|-
| २७६. || पत्र : क॰ नटराजनको (४-८-१९२६) || २६२
|-
| २७७. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (४-८-१९२६) || २६४
|-
| २७८. || पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको (४-८-१९२६) || २६५
|-
| २७९. || पत्र : रमणीयराम गो॰ त्रिपाठीको (४-८-१९२६) || २६६
|-
| २८०. || पत्र : राधाकृष्ण बजाजको (४-८-१९२६) || २६७
|-
| २८१. || कर्नाटकमें खादी (५-८-१९२६) || २६८
|-
| २८२. || अनीतिकी राहपर - ६ (५-८-१९२६) || २६९
|-
| २८३. || थोपा हुआ वैधव्य (५-८-१९२६) || २७३
|-
| २८४. || विद्यालयोंमें कताई (५-८-१९२६) || २७५
|-
| २८५. || पत्र : धीरेन्द्रचन्द्र लाहिड़ीको (५-८-१९२६) || २७६
|-
| २८६. || पत्र : बच्छराज जमनालालको (५-८-१९२६) || २७७
|-
| २८७. || पत्र : प्रद्युम्नराय वी॰ शुक्लको (५-८-१९२६) || २७७
|-
| २८८. || पत्र : जी॰ सीताराम शास्त्रीको (६-८-१९२६) || २७८
|-
| २८९. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (६-८-१९२६) || २७८
|-
| २९०. || पत्र : गंगाबहनको (६-८-१९२६) || २८०
|-
| २९१. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (६-८-१९२६) || २८०
|-
| २९२. || पत्र : छोटालाल गांधीको (६-८-१९२६) || २८१
|-
| २९३. || पत्र : नानाभाई भट्टको (६-८-१९२६) || २८२
|-
| २९४. || पत्र : रामानन्दको (६-८-१९२६) || २८३
|-
| २९५. || पत्र : देवेन्द्रनाथ मैत्रको (७-८-१९२६) || २८३
|-
| २९६. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (७-८-१९२६) || २८४
|-
| २९७. || पत्र : फूलचन्द कस्तूरचन्द शाहको (७-८-१९२६) || २८५
|-
| २९८. || पत्र : मूलचन्द उ॰ पारेखको (७-८-१९२६) || २८५
|-
| २९९. || पत्र : रामेश्वरको (७-८-१९२६) || २८६
|-
| ३००. || बैल बनाम मोटर (८-८-१९२६) || २८६
|-
| ३०१. || राष्ट्रीय शालाएँ (८-८-१९२६) || २८७
|-
| ३०२. || आचार्य ध्रुव और राष्ट्रीय शिक्षा (८-८-१९२६) || २८९
|-
| ३०३. || पत्र : एस्थर मेननको (८-८-१९२६) || २९०
|-
| ३०४. || पत्र : परशुरामको (८-८-१९२६) || २९१
|-
| ३०५. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१०-८-१९२६) || २९१
|-
| ३०६. || पत्र : जमनालाल बजाजको (१०-८-१९२६) || २९२
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|तेईस}}
{|width=100%
|-
| ३०७. || पत्र : चन्दूलाल देसाईको (११-८-१९२६) || २९२
|-
| ३०८. || सात समुद्र-पारका न्याय (१२-८-१९२६) || २९३
|-
| ३०९. || भूल-सुधार (१२-८-१९२६) || २९५
|-
| ३१०. || अनीतिकी राहपर - ७ (१२-७-१९२६) || २९५
|-
| ३११. || सत्याग्रहकी विजय (१२-८-१९२६) || २९९
|-
| ३१२. || राष्ट्रीय शिक्षाके क्षेत्रमें एक अगुआ (१२-८-१९२६) || ३०१
|-
| ३१३. || क्या अहिंसाकी कोई सीमा है? (१२-८-१९२६) || ३०२
|-
| ३१४. || पत्र : आर॰ ए॰ ऐडम्सको (१२-८-१९२६) || ३०४
|-
| ३१५. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (१२-८-१९२६) || ३०५
|-
| ३१६. || पत्र : ए॰ सेन और पी॰ बोसको (१२-८-१९२६) || ३०६
|-
| ३१७. || पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको (१२-८-१९२६) || ३०७
|-
| ३१८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (१२-८-१९२६) || ३०८
|-
| ३१९. || पत्र : फूलचन्द शाहको (१२-८-१९२६) || ३०८
|-
| ३२०. || पत्र : गोकुलभाई भट्टको (१२-८-१९२६) || ३०९
|-
| ३२१. || पत्र : देवदास गांधीको (१२-८-१९२६) || ३१०
|-
| ३२२. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१२-८-१९२६) || ३११
|-
| ३२३. || पत्र : अनन्त मेहताको (१३-८-१९२६) || ३११
|-
| ३२४. || पत्र : जनकधारी प्रसादको (१३-८-१९२६) || ३१२
|-
| ३२५. || पत्र : प्रफुल्लचन्द्र सेनको (१३-८-१९२६) || ३१३
|-
| ३२६. || पत्र : भूपेन्द्रनारायण सेनको (१३-८-१९२६) || ३१४
|-
| ३२७. || पत्र : सर गंगारामको (१४-८-१९२६) || ३१४
|-
| ३२८. || पत्र : डा॰ मुरारीलालको (१७-८-१९२६) || ३१५
|-
| ३२९. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-८-१९२५) || ३१६
|-
| ३३०. || पत्र : आर॰ ए॰ ऐडम्सको (१८-८-१९२६) || ३१७
|-
| ३३१. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१८-८-१९२६) || ३१८
|-
| ३३२. || पत्र : अब्बास अब्दुल्लाभाई वानपारीको (१८-८-१९२६) || ३१८
|-
| ३३३. || पत्र : भगीरथ कानोडियाको (१८-८-१९२६) || ३१९
|-
| ३३४. || पत्र : नारायणदास बाजोरियाको (१८-८-१९२६) || ३१९
|-
| ३३५. || अनीतिकी राहपर - ८ (१९-८-१९२६) || ३२०
|-
| ३३६. || भूल-सुधार (१९-८-१९२६) || ३२४
|-
| ३३७. || दलित मानवता (१९-८-१९२६) || ३२५
|-
| ३३८. || टिप्पणियाँ : नगरपालिकाकी शालाओंमें चरखे; बिहारकी खादी प्रदर्शनियाँ (१९-८-१९२६) || ३२६
|}<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४७२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>तो यह बिलकुल निष्फल सिद्ध होगा। पूजाकी कई पद्धतियाँ हैं और यदि पुरानी पद्धतियोंसे काम चल जाये तो नई पद्धतियोंका प्रयोग आवश्यक नहीं है। हम आश्रममें जो कुछ कर सके हैं, उससे मैं स्वयं सन्तुष्ट नहीं हूँ। मैं एकदम या किसी कृत्रिम रीतिसे भक्ति-भावना जाग्रत नहीं कर सकता। यदि आश्रममें प्रार्थनाके समय हममें से कुछ एक लोगोंकी वास्तवमें वैसी भावना हो तो यथासमय उसका असर जरूर होगा। आश्रममें कुछ निष्ठावान् साधक हैं, जो प्रार्थनाके वक्त वहाँ उचित भक्ति-भावसे आते हैं––इस विश्वासके कारण ही मैं बाधाओं एवं कभी-कभी गम्भीर निराशाओंके बावजूद सामूहिक प्रार्थनाको बनाये रखनेका आग्रह करता रहा हूँ। यह अपने प्रति मेरा पक्षपात हो सकता है, परन्तु मेरा अपना अनुभव है कि हमारी प्रार्थना-सभाओंमें शक्ति बहुत धीरे-धीरे, परन्तु निश्चित रूपसे ज्यादा गहराई पाती जा रही है और उनकी प्रभाव-शक्ति बढ़ रही है। परन्तु मुझे इस तथ्यका ज्ञान है और मुझे उसका खेद है कि हम जो प्राप्त करना चाहते हैं उससे हम बहुत दूर हैं। तो भी मैं आपके सुझाव ध्यानमें रखूँगा। मैंने उनके बारेमें पहलेसे ही मित्रोंसे चर्चा कर रखी है।
ऐसा लगता है कि सफाईके मामलोंके सम्बन्धमें मेरे सुझाव माँगनेकी बातको आप ज्यादा महत्वकी नहीं मानते। मेरे विचारमें हम अकारण ही जीवनको धार्मिक और दूसरे अलग-अलग भागों में विभाजित करते हैं, जब कि यदि आदमीमें सच्ची धार्मिक भावना हो, तो यह भावना जीवनके क्षुद्रतम अंशमें भी प्रकट होनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि हमारे-जैसे समाजमें तो सफाईका सवाल सामूहिक आध्यात्मिक प्रयत्नसे जुड़ा हुआ है। सामाजिक और राजनीतिक जीवनकी तरह ही सफाईके मामलेमें थोड़ी-सी भी अनियमितता आध्यात्मिक दरिद्रताकी निशानी है। यह लापरवाही और कर्त्तव्यकी अवहेलनाकी निशानी है। कुछ भी हो, आश्रमका जीवन––जीवनकी मूलभूत एकताकी इस धारणा पर ही आधारित है।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
{{left|श्री होरेस जी॰ अलेक्जेंडर<br>
वृडब्रुक<br>
सेलीऑक<br>
बरमिंघम}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १४०५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३४
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ही करना चाहिए — वह है विदेशी सूत और कपड़ा; इसे हमारी जनता अपनी झोंपड़ियोंमें स्वयं कात और बुन सकती है।
स्वदेशी मिलोंका कपड़ा भी अगर इस जनताको दूसरा ऐसा ही काम दिये बिना उनकी रोजी छीन ले, तो हम उसे भी सहन न करें। राष्ट्रीय जीवनकी अर्थ–व्यवस्थामें मिलोंका इतना ही स्थान है कि वे करोड़ों घरोंमें चलनेवाले हाथ–कताईके हमारे राष्ट्रीय उद्योगके शेष कामकी पूर्ति करें। मिलें अगर उन्हींसे मुकाबला करने लगें और उनकी जगह लेने लगें, तो वे बाधा–स्वरूप बन जायेंगी। उनकी स्वाभाविक प्रकृति तो गाँव कतैयों और बुनकरोंकी जगह ले लेनेकी ही है। मिल–मालिक, मिल–एजेंट और उनके हिस्सेदार जिस दिन सच्चे अर्थोंमें राष्ट्रीय बन जायेंगे और जनताको लूटनेके लिए नहीं, बल्कि उनके हितको पहला और अपने लाभको दूसरा स्थान देकर अपना धन्धा चलायेंगे, उसी दिन वे बहिष्कार आन्दोलनका अर्थ समझ सकेंगे और तब उसमें वे न सिर्फ शरीक ही हो सकेंगे बल्कि उस आन्दोलनका नेतृत्व करेंगे। यह तो ऊपरके पत्रमें स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर वे दूरदर्शितासे काम लें तो उन्हें हानि तो कुछ होगी नहीं, लाभ बहुत कुछ होगा। सचमुचमें यह एक स्वयं–सिद्ध बात है। विदेशी कपड़ेके बहिष्कारसे अगर जनताको निरन्तर काम मिलते जाना
निश्चित हो जाता है तो उससे आगे चलकर मिलोंको भी लाभ होना निश्चित हो जाता है।
मगर कमसे–कम पिछले सात सालोंमें जन आन्दोलन के दौरान मिल–व्यवसायके इतिहासको देखनेसे तो यह आशा बहुत नहीं बँधती कि मिलें अवसर पड़नेपर सही काम कर दिखलायेंगी और राष्ट्रके प्रति अपना कर्तव्य समझेंगी। चाहिए तो यह था कि वे खादीपर स्नेह–दृष्टि रखतीं और उसका पोषण करतीं और हुआ यह है कि वे खादीके साथ अनुचित, देश–द्रोहपूर्ण और अवैध प्रतियोगिता करने लगी हैं। पिछले वर्षोंमें हमारी मिलोंने क्रमश: इतनी 'खादी' बनाई :
{|width=100%
|-
| || १९२५ || १९२६ || १९२७ ||
|-
|पौण्ड || २,२८,८७,९७० || २,७२,३६,३३७ || ३,३९,७७,८५१ ||
|-
|गज|| ६,५०,४८,४८७ || ७,४३,१३,२८० || ९,४३,८०,३६८ ||
|}
इतना अधिक मोटा कपड़ा उन्होंने खद्दरके नामपर बेचा है और कुछने तो कांग्रेस संस्थाओं द्वारा तैयार किये गये खादीके अनुकूल वातावरणसे जान बूझकर लाभ उठानेके लिए बेशर्मी से चरखेकी छाप आदिका भी उपयोग किया है। यह कहते हुए कष्ट होता है कि जिन मिलोंने इस तरहका मोटा कपड़ा बनाकर उसे खद्दरके नामपर बेचा, उन्होंने स्पष्ट देश–द्रोह किया है।
अगर उनकी आँखें अब भी खुल जायें और राष्ट्रका उन्होंने जो अहित किया है उसका मुआवजा देनेके लिए ही मिल–मालिक मेरी या दूसरोंकी सुझाई हुई उतनी ही प्रभावपूर्ण शर्तोंपर बहिष्कार आन्दोलनके अगुआ बनें या कमसे–कम उसमें शरीक हों तो क्या ही अच्छा हो।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३५
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|२०३}}</noinclude>
इन दुःखद आँकड़ोंका एक सुखद पहलू भी है । इन आंकड़ोंने मेरे जैसे आशावादी
और खद्दर शास्त्रके ज्ञाताकी भी आँखें खोल दी हैं कि खद्दर इतना अधिक लोकप्रिय
हो गया है। ये आँकड़े यह दिखलाते हैं कि इतने अधिक आदमियोंने, जिनका हमें
पता भी नहीं है और जो पहले महीन कपड़े पहनते थे, उसे राष्ट्रकी पुकार पर
छोड़कर मोटा कपड़ा पहनना और खरीदना पसन्द किया है। इसमें तो कोई शक ही
नहीं कि उन्होंने अकसर पहलेसे अधिक दाम दिये हैं। उन्होंने अधिकांशत: मिलकी
खादी इसी गलत विश्वाससे खरीदी है कि वही सच्ची खादी है और कांग्रेस उसीका
समर्थन करती है । जनताका हित चाहनेवाले इन आँकड़ों और उनसे निकाले गये
मेरे उचित निष्कर्षो से बहुत कुछ सोचनेका मसाला और उतना ही आशा करनेका
मी कारण मिल जाता है। मेरे यूरोप जानेकी एक सम्भावना है; लेकिन पत्र लेखक
निश्चिन्त रहें कि अगर बहिष्कारकी कोई प्रभावशाली योजना निकट भविष्यमें बन
सकी, तो मैं यूरोप नहीं जाऊँगा।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८
{{c|{{larger|'''२१९. टिप्पणियाँ'''}}}}
आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी
दीनबन्धु एन्ड्रयूज जब हालमें यहाँ थे उन्होंने समाचारपत्रोंमें प्रकाशित कवि
ठाकुरके एक लेखकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया था, जो ट्रान्सवालमें कुछ
हिन्दुस्तानियों द्वारा अपने आपको मूल आफ्रिका निवासियोंसे अलग रखनेके लिए चलाये
जा रहे आन्दोलनके सिलसिले में लिखा गया था । मुझसे उन्होंने उसपर अपनी राय
देने को भी कहा। मैं नहीं समझता कि इस आन्दोलनको कोई ऐसा महत्व देना चाहिए।
क्योंकि मुझे लगता है कि इस आन्दोलनका कोई आधार ही नहीं है । हिन्दुस्तानियों
और आफ्रिका निवासियोंमें इतनी ज्यादा बातों में समानता है कि वे आफ्रिकी लोगों से
अलग रहनेका विचार कर ही नहीं सकते । आफ्रिकी लोगोंकी सक्रिय सहानुभूति और
मित्रताके बिना दक्षिण आफ्रिकामें हिन्दुस्तानी रह ही नहीं सकते। मैं नहीं समझता
कि हिन्दुस्तानियोंने कभी अपने आफ्रिकी भाइयोंके प्रति बड़प्पनका भाव रखा हो ।
अगर दक्षिण आफ्रिकामें बसे हुए आम हिन्दुस्तानियोंमें इस तरहका कोई आन्दोलन
जोर पकड़े तो यह बहुत दुःखद बात होगी। यह कहनेकी तो जरूरत ही नहीं है
कि कवि ठाकुर ने इस आन्दोलनकी निन्दा करते हुए जो विरोधी राय व्यक्त की है
उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ। कहा जाता है कि इस तथाकथित आन्दोलनके नेताओंका
कहना है कि 'हमारे एजेंट जनरल ( शास्त्रीजी ) हमें जो इतने नीचे स्तरपर ला
रहे हैं, वह भारतीय भावना, राष्ट्रीय सम्मान और सभ्यताके लिए हीनताकी बात
है ।' अगर यह सच हो तो हमारे प्रति दक्षिण आफ्रिकाके गोरों द्वारा ऐसे ही विचार<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|२०३}}</noinclude>
इन दुःखद आँकड़ोंका एक सुखद पहलू भी है। इन आंकड़ोंने मेरे जैसे आशावादी और खद्दर शास्त्रके ज्ञाताकी भी आँखें खोल दी हैं कि खद्दर इतना अधिक लोकप्रिय हो गया है। ये आँकड़े यह दिखलाते हैं कि इतने अधिक आदमियोंने, जिनका हमें पता भी नहीं है और जो पहले महीन कपड़े पहनते थे, उसे राष्ट्रकी पुकार पर छोड़कर मोटा कपड़ा पहनना और खरीदना पसन्द किया है। इसमें तो कोई शक ही नहीं कि उन्होंने अकसर पहलेसे अधिक दाम दिये हैं। उन्होंने अधिकांशत: मिलकी खादी इसी गलत विश्वाससे खरीदी है कि वही सच्ची खादी है और कांग्रेस उसीका समर्थन करती है। जनताका हित चाहनेवाले इन आँकड़ों और उनसे निकाले गये मेरे उचित निष्कर्षोसे बहुत कुछ सोचनेका मसाला और उतना ही आशा करनेका भी कारण मिल जाता है। मेरे यूरोप जानेकी एक सम्भावना है; लेकिन पत्र–लेखक निश्चिन्त रहें कि अगर बहिष्कारकी कोई प्रभावशाली योजना निकट भविष्यमें बन सकी, तो मैं यूरोप नहीं जाऊँगा।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८
{{c|{{larger|'''२१९. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी'''}}
दीनबन्धु एन्ड्रयूज जब हालमें यहाँ थे उन्होंने समाचारपत्रोंमें प्रकाशित कवि ठाकुरके एक लेखकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया था, जो ट्रान्सवालमें कुछ हिन्दुस्तानियों द्वारा अपने आपको मूल आफ्रिका निवासियोंसे अलग रखनेके लिए चलाये जा रहे आन्दोलनके सिलसिले में लिखा गया था। मुझसे उन्होंने उसपर अपनी राय देने को भी कहा। मैं नहीं समझता कि इस आन्दोलनको कोई ऐसा महत्व देना चाहिए। क्योंकि मुझे लगता है कि इस आन्दोलनका कोई आधार ही नहीं है। हिन्दुस्तानियों और आफ्रिका निवासियोंमें इतनी ज्यादा बातोंमें समानता है कि वे आफ्रिकी लोगोंसे अलग रहनेका विचार कर ही नहीं सकते। आफ्रिकी लोगोंकी सक्रिय सहानुभूति और मित्रताके बिना दक्षिण आफ्रिकामें हिन्दुस्तानी रह ही नहीं सकते। मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तानियोंने कभी अपने आफ्रिकी भाइयोंके प्रति बड़प्पनका भाव रखा हो। अगर दक्षिण आफ्रिकामें बसे हुए आम हिन्दुस्तानियोंमें इस तरहका कोई आन्दोलन जोर पकड़े तो यह बहुत दुःखद बात होगी। यह कहनेकी तो जरूरत ही नहीं है कि कवि ठाकुर ने इस आन्दोलनकी निन्दा करते हुए जो विरोधी राय व्यक्त की है उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ। कहा जाता है कि इस तथाकथित आन्दोलनके नेताओंका कहना है कि 'हमारे एजेंट जनरल ( शास्त्रीजी ) हमें जो इतने नीचे स्तरपर ला रहे हैं, वह भारतीय भावना, राष्ट्रीय सम्मान और सभ्यताके लिए हीनताकी बात है।' अगर यह सच हो तो हमारे प्रति दक्षिण आफ्रिकाके गोरों द्वारा ऐसे ही विचार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३६
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
व्यक्त करनेपर हम उनका खण्डन कर सकने योग्य नहीं रह जायेंगे। इससे भी बड़ी
बात तो यह है कि दक्षिण आफ्रिकाके गोरे अपनी नफरत और पक्षपातको कार्य-
रूपमें परिणत कर सकते हैं, जब कि दक्षिण आफ्रिकी लोगोंके प्रति हमारे ये विचार
हमारे लिये ही प्रतिकूल पड़ेंगे।
{{c|'''स्त्रियाँ और गहने'''}}
तमिलनाडसे एक महिला डाक्टरने मुझे एक पत्र तथा साथमें उल्लेखसहित
(गह्नोंका) उपहार भेजा है। चूंकि मेरी रायमें उपहारके साथके पत्रसे भेंटका महत्व
बढ़ जाता है और वह पत्र चूँकि दूसरोंके लिए उदाहरणका काम करेगा, इसलिए
उपहार देनेवाले, सम्बन्धित राजा और स्थानका नाम दिये बिना में पत्रका सारांश
नीचे देता हूँ :
मैं ये चन्द पंक्तियाँ आपको सिर्फ यह बतानेके लिए लिख रही हूँ कि
कल मैंने आपकी सेवामें एक जोड़ी कानकी बालियाँ और हीरेकी जो एक अँगूठी
भेजी थी, सो मुझे १२ वर्ष हुए राजमहलमें महाराजासाहबके उत्तराधिकारीके
जन्मके अवसरपर की गई सेवाके स्मृति चिह्न के रूपमें मिली थीं। जब मुझे
यह मालूम हुआ कि आपके यहाँसे गुजरते समय महाराजा साहबने सरकार के
डरसे आपको अपने यहाँ निमन्त्रण तक देनेका साहस नहीं किया, तो मुझे
बहुत दु:ख हुआ । आप कल्पना कर सकते हैं कि पहले जो गहने मेरे साथ ही
रहते थे, उन्हें इस तरह आपके चले जानेके बाद पास देखकर मेरे मनमें
क्या भावनाएँ उठी होंगी। तब उन्हें देखकर मेरे दिलमें कड़वाहट भर गई,
फिर उन भूखे करोड़ों लोगोंके प्रति गहरी सहानुभूति होने लगी, जिनके बारेमें
आपने अपने भाषण में यहाँपर चर्चाकी थी। मैंने मन ही मन कहा, क्या
ये गहने लोगोंके ही धनसे नहीं बने हैं? तब उन्हें अपने मानकर रखे रहने
का मुझे क्या अधिकार है ? " और ऐसा सोचकर मैंने उन्हें आपके पास भेज
देनेका निश्चय किया है। खादी कार्यके लिए आप उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
और इस तरह करोड़ों भूखों मरनेवालोंमें से कुछकी मदद कर सकते हैं। मुझे
पूरा विश्वास है कि मेरे सन्दूकके एक कोने में पड़े रहनेकी बनिस्बत उनका
यह ज्यादा अच्छा उपयोग है। एक मित्रने उनकी कीमत ५०० रु० आँकी
है । इसलिए ५०० रु० के लिए उनका बीमा कराया गया है। मैं आशा करती
हूँ कि कोई उदार सज्जन, उस परिस्थितिको समझकर, जिसमें कि ये गहने
आपके पास भेजे जा रहे हैं, आपको उनकी असली कीमतसे अधिक देंगे। आप
इस पत्रका जो भी उपयोग करना चाहें, कर सकते हैं।
यह भी अचरजकी बात है कि भयका कोई कारण न होते हुए भी हम किस
तरह भयकी कल्पना कर लिया करते हैं। कितने राजाओं, महाराजाओंने खुल्लमखुल्ला
और खुशीसे खादीका और उसकी मार्फत जैसा कि पत्र लेखिकाने भी लिखा है और
ठीक लिखा है, उन गरीबोंके हितका समर्थन किया है, जिनसे उन्हें आखिरकार<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
व्यक्त करनेपर हम उनका खण्डन कर सकने योग्य नहीं रह जायेंगे। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि दक्षिण आफ्रिकाके गोरे अपनी नफरत और पक्षपातको कार्यरूपमें परिणत कर सकते हैं, जब कि दक्षिण आफ्रिकी लोगोंके प्रति हमारे ये विचार हमारे लिये ही प्रतिकूल पड़ेंगे।
{{c|'''स्त्रियाँ और गहने'''}}
तमिलनाडसे एक महिला डाक्टरने मुझे एक पत्र तथा साथमें उल्लेखसहित (गहनोंका) उपहार भेजा है। चूंकि मेरी रायमें उपहारके साथके पत्रसे भेंटका महत्व बढ़ जाता है और वह पत्र चूँकि दूसरोंके लिए उदाहरणका काम करेगा, इसलिए उपहार देनेवाले, सम्बन्धित राजा और स्थानका नाम दिये बिना में पत्रका सारांश नीचे देता हूँ :
{{Outdent|{{gap}}{{gap}}मैं ये चन्द पंक्तियाँ आपको सिर्फ यह बतानेके लिए लिख रही हूँ कि कल मैंने आपकी सेवामें एक जोड़ी कानकी बालियाँ और हीरेकी जो एक अँगूठी भेजी थी, सो मुझे १२ वर्ष हुए राजमहलमें महाराजासाहबके उत्तराधिकारीके
जन्मके अवसरपर की गई सेवाके स्मृति चिह्न के रूपमें मिली थीं। जब मुझे यह मालूम हुआ कि आपके यहाँसे गुजरते समय महाराजा साहबने सरकारके डरसे आपको अपने यहाँ निमन्त्रण तक देनेका साहस नहीं किया, तो मुझे बहुत दु:ख हुआ। आप कल्पना कर सकते हैं कि पहले जो गहने मेरे साथ ही रहते थे, उन्हें इस तरह आपके चले जानेके बाद पास देखकर मेरे मनमें क्या भावनाएँ उठी होंगी। तब उन्हें देखकर मेरे दिलमें कड़वाहट भर गई, फिर उन भूखे करोड़ों लोगोंके प्रति गहरी सहानुभूति होने लगी, जिनके बारेमें आपने अपने भाषणमें यहाँपर चर्चाकी थी। मैंने मन ही मन कहा, "क्या ये गहने लोगोंके ही धनसे नहीं बने हैं? तब उन्हें अपने मानकर रखे रहने का मुझे क्या अधिकार है?" और ऐसा सोचकर मैंने उन्हें आपके पास भेज देनेका निश्चय किया है। खादी कार्यके लिए आप उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। और इस तरह करोड़ों भूखों मरनेवालोंमें से कुछकी मदद कर सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे सन्दूकके एक कोने में पड़े रहनेकी बनिस्बत उनका यह ज्यादा अच्छा उपयोग है। एक मित्रने उनकी कीमत ५०० रु॰ आँकी है। इसलिए ५०० रु॰ के लिए उनका बीमा कराया गया है। मैं आशा करती हूँ कि कोई उदार सज्जन, उस परिस्थितिको समझकर, जिसमें कि ये गहने आपके पास भेजे जा रहे हैं, आपको उनकी असली कीमतसे अधिक देंगे। आप इस पत्रका जो भी उपयोग करना चाहें, कर सकते हैं।}}
यह भी अचरजकी बात है कि भयका कोई कारण न होते हुए भी हम किस तरह भयकी कल्पना कर लिया करते हैं। कितने राजाओं, महाराजाओंने खुल्लमखुल्ला और खुशीसे खादीका और उसकी मार्फत जैसा कि पत्र–लेखिकाने भी लिखा है और ठीक लिखा है, उन गरीबोंके हितका समर्थन किया है, जिनसे उन्हें आखिरकार<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
व्यक्त करनेपर हम उनका खण्डन कर सकने योग्य नहीं रह जायेंगे। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि दक्षिण आफ्रिकाके गोरे अपनी नफरत और पक्षपातको कार्यरूपमें परिणत कर सकते हैं, जब कि दक्षिण आफ्रिकी लोगोंके प्रति हमारे ये विचार हमारे लिये ही प्रतिकूल पड़ेंगे।
{{c|'''स्त्रियाँ और गहने'''}}
तमिलनाडसे एक महिला डाक्टरने मुझे एक पत्र तथा साथमें उल्लेखसहित (गहनोंका) उपहार भेजा है। चूंकि मेरी रायमें उपहारके साथके पत्रसे भेंटका महत्व बढ़ जाता है और वह पत्र चूँकि दूसरोंके लिए उदाहरणका काम करेगा, इसलिए उपहार देनेवाले, सम्बन्धित राजा और स्थानका नाम दिये बिना मैं पत्रका सारांश नीचे देता हूँ :
{{Outdent|{{gap}}{{gap}}मैं ये चन्द पंक्तियाँ आपको सिर्फ यह बतानेके लिए लिख रही हूँ कि कल मैंने आपकी सेवामें एक जोड़ी कानकी बालियाँ और हीरेकी जो एक अँगूठी भेजी थी, सो मुझे १२ वर्ष हुए राजमहलमें महाराजासाहबके उत्तराधिकारीके जन्मके अवसरपर की गई सेवाके स्मृति चिह्न के रूपमें मिली थीं। जब मुझे यह मालूम हुआ कि आपके यहाँसे गुजरते समय महाराजा साहबने सरकारके डरसे आपको अपने यहाँ निमन्त्रण तक देनेका साहस नहीं किया, तो मुझे बहुत दु:ख हुआ। आप कल्पना कर सकते हैं कि पहले जो गहने मेरे साथ ही रहते थे, उन्हें इस तरह आपके चले जानेके बाद पास देखकर मेरे मनमें क्या भावनाएँ उठी होंगी। तब उन्हें देखकर मेरे दिलमें कड़वाहट भर गई, फिर उन भूखे करोड़ों लोगोंके प्रति गहरी सहानुभूति होने लगी, जिनके बारेमें आपने अपने भाषणमें यहाँपर चर्चाकी थी। मैंने मन ही मन कहा, "क्या ये गहने लोगोंके ही धनसे नहीं बने हैं? तब उन्हें अपने मानकर रखे रहने का मुझे क्या अधिकार है?" और ऐसा सोचकर मैंने उन्हें आपके पास भेज देनेका निश्चय किया है। खादी कार्यके लिए आप उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। और इस तरह करोड़ों भूखों मरनेवालोंमें से कुछकी मदद कर सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे सन्दूकके एक कोने में पड़े रहनेकी बनिस्बत उनका यह ज्यादा अच्छा उपयोग है। एक मित्रने उनकी कीमत ५०० रु॰ आँकी है। इसलिए ५०० रु॰ के लिए उनका बीमा कराया गया है। मैं आशा करती हूँ कि कोई उदार सज्जन, उस परिस्थितिको समझकर, जिसमें कि ये गहने आपके पास भेजे जा रहे हैं, आपको उनकी असली कीमतसे अधिक देंगे। आप इस पत्रका जो भी उपयोग करना चाहें, कर सकते हैं।}}
यह भी अचरजकी बात है कि भयका कोई कारण न होते हुए भी हम किस तरह भयकी कल्पना कर लिया करते हैं। कितने राजाओं, महाराजाओंने खुल्लमखुल्ला और खुशीसे खादीका और उसकी मार्फत जैसा कि पत्र–लेखिकाने भी लिखा है और ठीक लिखा है, उन गरीबोंके हितका समर्थन किया है, जिनसे उन्हें आखिरकार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३७
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|२०५}}</noinclude>
समृद्धि प्राप्त हुई है । यह सच है कि खादीका राजनीतिक महत्व भी है; मगर बात
अभी इस हदतक नहीं आई है कि सरकार बेफिक्रीसे खादीके समर्थनको अपराध
घोषित कर सके । हरएक सेवाधर्मी आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन बनाया जा सकता
है, मगर इसीलिए उसके सेवावाले पहलूका भी बहिष्कार कर देना अनुचित होगा ।
मगर यह कहना भी ठीक ही है कि केवल इस महिला डाक्टरके बतलाये राजा ही
नहीं, बल्कि और कई लोग भी खादीका समर्थन करनेसे या मेरे जैसे सार्वजनिक
सेवकोंके प्रति सामान्य शील दिखलानेसे डरते हैं। खैर, इतनी बात तो अच्छी है कि
राजाने मेरा जो बहिष्कार किया, भेंट देनेकी यह प्रेरणा उसकी बदौलत हुई। मगर
उन सभी बहनोंसे, जिनकी नजर इस टिप्पणीपर पड़े, मैं कहूँगा कि भूखों मरनेवाले
अपने करोड़ों देश-भाइयोंके प्रति अपने कर्तव्यपर विचार करने के लिए वे किसी ऐसे
ही अवसरकी प्रतीक्षामें न बैठी रहें । निश्चय ही, वे इतना तो बड़ी आसानीसे समझ
सकती हैं कि जबतक देशमें रोजीके अभावमें करोड़ों नर-नारी भोजनके बिना भूखे
रहते हों, तबतक उन्हें अपना शरीर सजाने के लिए कीमती गहने रखनेका या प्रायः
गहनोंसे सम्पन्न होनेका सन्तोष करनेके लिए ही गहने रखनेका कोई अधिकार नहीं
है । जैसा कि मैं पहले भी इन पृष्ठोंमें कह चुका हूँ, अगर भारतकी केवल धनी बहनें
ही अपनी फिजूलखर्ची छोड़ दें और उतनी ही सज्जासे सन्तुष्ट रहें जो कि खादीसे
सम्भव है तो केवल उनके इसी सहयोगसे खादी आन्दोलनका सारा खर्च चलाया जा
सकता है । और हिन्दुस्तानकी धनी बहनोंके इस कामका जो महान नैतिक असर
राष्ट्रपर और विशेष कर भूखों मरनेवाले करोड़ों आदमियोंपर पड़ेगा, उसका तो
हिसाब ही अलग है।
{{c|'''कर्वे जयन्ती'''}}
कर्वे जयन्ती समितिके अध्यक्ष श्रीयुत वी० एम० जोशीकी इस अपील को
प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है :
प्राध्यापक कर्वे कोई ऐसे मामूली व्यक्ति नहीं हैं जो केवल उस मुग्ध जनताको
सन्तुष्ट करनेमें सन्तोष मान लेते हों जो प्रायः बहुत परेशान करती है, मुश्किलसे खुश
होती है और मन बहलावकी उसकी घड़ियोंमें अपनी थोड़ी-सी ही सेवा करनेपर
निन्यानवेफी सदी-योग्यताका प्रमाणपत्र दे देती है । प्राध्यापक कर्वे तो एक ऐसे मालिककी
आज्ञामें चलते रहे हैं जो उदार नहीं है, आसक्त नहीं है और जो हमेशा न्याय करते
हुए भी बड़ी सख्ती से काम लेते हैं। वह मालिक तो उनकी अपनी ही अन्तरात्मा
है । उनके आत्मसमर्पण, एकनिष्ठ कर्त्तव्यपालन, कभी खत्म न होनेवाली कार्य-
शक्ति, सभी स्थितियोंमें ईमानदारी, विरोधके होते हुए भी अपने काममें श्रद्धा, अदम्य
आशा आदि गुण राष्ट्रकी बहुत बड़ी सम्पत्ति हैं । जिन कामोंमें उन्होंने अपनी शक्तियाँ
लगाई हैं, उनके बारेमें दो मत हो सकते हैं किन्तु उन शक्तियोंके बारेमें कदापि दो
मत नहीं हो सकते; उनके गुण कामोंसे कहीं अधिक कीमती और स्थायी हैं । जयन्तीके
१. अपील यहाँ नहीं दी जा रही है ।<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|२०५}}</noinclude>
समृद्धि प्राप्त हुई है। यह सच है कि खादीका राजनीतिक महत्व भी है; मगर बात अभी इस हदतक नहीं आई है कि सरकार बेफिक्रीसे खादीके समर्थनको अपराध घोषित कर सके। हरएक सेवाधर्मी आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन बनाया जा सकता है, मगर इसीलिए उसके सेवावाले पहलूका भी बहिष्कार कर देना अनुचित होगा। मगर यह कहना भी ठीक ही है कि केवल इस महिला डाक्टरके बतलाये राजा ही नहीं, बल्कि और कई लोग भी खादीका समर्थन करनेसे या मेरे जैसे सार्वजनिक सेवकोंके प्रति सामान्य शील दिखलानेसे डरते हैं। खैर, इतनी बात तो अच्छी है कि राजाने मेरा जो बहिष्कार किया, भेंट देनेकी यह प्रेरणा उसकी बदौलत हुई। मगर उन सभी बहनोंसे, जिनकी नजर इस टिप्पणीपर पड़े, मैं कहूँगा कि भूखों मरनेवाले अपने करोड़ों देश–भाइयोंके प्रति अपने कर्तव्यपर विचार करने के लिए वे किसी ऐसे ही अवसरकी प्रतीक्षामें न बैठी रहें। निश्चय ही, वे इतना तो बड़ी आसानीसे समझ सकती हैं कि जबतक देशमें रोजीके अभावमें करोड़ों नर–नारी भोजनके बिना भूखे रहते हों, तबतक उन्हें अपना शरीर सजाने के लिए कीमती गहने रखनेका या प्रायः गहनोंसे सम्पन्न होनेका सन्तोष करनेके लिए ही गहने रखनेका कोई अधिकार नहीं है। जैसा कि मैं पहले भी इन पृष्ठोंमें कह चुका हूँ, अगर भारतकी केवल धनी बहनें ही अपनी फिजूलखर्ची छोड़ दें और उतनी ही सज्जासे सन्तुष्ट रहें जो कि खादीसे सम्भव है तो केवल उनके इसी सहयोगसे खादी आन्दोलनका सारा खर्च चलाया जा सकता है। और हिन्दुस्तानकी धनी बहनोंके इस कामका जो महान नैतिक असर राष्ट्रपर और विशेष कर भूखों मरनेवाले करोड़ों आदमियोंपर पड़ेगा, उसका तो
हिसाब ही अलग है।
{{c|'''कर्वे जयन्ती'''}}
कर्वे जयन्ती समितिके अध्यक्ष श्रीयुत वी॰ एम॰ जोशीकी इस अपील<ref>अपील यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref>को प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है :
प्राध्यापक कर्वे कोई ऐसे मामूली व्यक्ति नहीं हैं जो केवल उस मुग्ध जनताको सन्तुष्ट करनेमें सन्तोष मान लेते हों जो प्रायः बहुत परेशान करती है, मुश्किलसे खुश होती है और मन बहलावकी उसकी घड़ियोंमें अपनी थोड़ी–सी ही सेवा करनेपर निन्यानवेफी सदी–योग्यताका प्रमाणपत्र दे देती है। प्राध्यापक कर्वे तो एक ऐसे मालिककी आज्ञामें चलते रहे हैं जो उदार नहीं है, आसक्त नहीं है और जो हमेशा न्याय करते हुए भी बड़ी सख्तीसे काम लेते हैं। वह मालिक तो उनकी अपनी ही अन्तरात्मा है। उनके आत्मसमर्पण, एकनिष्ठ कर्त्तव्यपालन, कभी खत्म न होनेवाली कार्यशक्ति, सभी स्थितियोंमें ईमानदारी, विरोधके होते हुए भी अपने काममें श्रद्धा, अदम्य आशा आदि गुण राष्ट्रकी बहुत बड़ी सम्पत्ति हैं। जिन कामोंमें उन्होंने अपनी शक्तियाँ लगाई हैं, उनके बारेमें दो मत हो सकते हैं किन्तु उन शक्तियोंके बारेमें कदापि दो मत नहीं हो सकते; उनके गुण कामोंसे कहीं अधिक कीमती और स्थायी हैं। जयन्तीके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
9omulvds4c4a8jy0czi45tcjxw0ql0j
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३८
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
संगठनकर्त्ताओंने २५,००० रु० जमा करके प्राध्यापक कर्वेको उनके कार्यके लिए भेंटके
रूपमें देनेका नम्र भार उठाया है। यह रकम तो तुरन्त ही उन असंख्य स्त्री-पुरुषोंके
यहाँसे आ जानी चाहिए जिनपर निःस्वार्थ भावसे चुपचाप काम करनेवालोंके इस
सरदारका असर पड़ा है या जिन्होंने इनके आजीवन श्रमसे लाभ उठाया है ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८
२२०. पत्र : डा० सी० मुथुको
आश्रम
साबरमती
प्रिय डा० मुथु,
५ अप्रैल, १९२८
आपका पुर्जा मिला। मैं आपके नये उद्योगके लिए सब तरहकी सफलताकी कामना
करता हूँ । जहाँतक मैं आपके तरीकेको समझ पाया हूँ, यह तपेदिकके रोगियोंका खुली
हवा और पथ्य द्वारा इलाज करना है। जैसा कि आप जानते हैं मुझे दवाइयों और
इस तरह की चीजोंसे बड़ा भय लगता है। इसलिए मैं ईमानदारीसे किये जानेवाले
ऐसे प्रत्येक प्रयासका स्वागत करूंगा, जो इन दवाइयोंका स्थान ले सके और जिसे
हम औषध रहित एवं बीमारीका इलाज करनेवाला प्राकृतिक तरीका कह सकें ।
हमारी सूर्यके प्रकाशसे दीप्तमान भूमिपर बीमारीका कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६१) की फोटो नकलसे ।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
संगठनकर्त्ताओंने २५,००० रु॰ जमा करके प्राध्यापक कर्वेको उनके कार्यके लिए भेंटके रूपमें देनेका नम्र भार उठाया है। यह रकम तो तुरन्त ही उन असंख्य स्त्री–पुरुषोंके यहाँसे आ जानी चाहिए जिनपर निःस्वार्थ भावसे चुपचाप काम करनेवालोंके इस सरदारका असर पड़ा है या जिन्होंने इनके आजीवन श्रमसे लाभ उठाया है।
:[अंग्रेजीसे]
:'''यंग इंडिया''', ५-४-१९२८
{{c|{{larger|'''२२०. पत्र : डा॰ सी॰ मुथुको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय डा॰ मुथु,}}
आपका पुर्जा मिला। मैं आपके नये उद्योगके लिए सब तरहकी सफलताकी कामना करता हूँ। जहाँतक मैं आपके तरीकेको समझ पाया हूँ, यह तपेदिकके रोगियोंका खुली हवा और पथ्य द्वारा इलाज करना है। जैसा कि आप जानते हैं मुझे दवाइयों और इस तरहकी चीजोंसे बड़ा भय लगता है। इसलिए मैं ईमानदारीसे किये जानेवाले ऐसे प्रत्येक प्रयासका स्वागत करूंगा, जो इन दवाइयोंका स्थान ले सके और जिसे हम औषध–रहित एवं बीमारीका इलाज करनेवाला प्राकृतिक तरीका कह सकें। हमारी सूर्यके प्रकाशसे दीप्तमान भूमिपर बीमारीका कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६१) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२३९
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय जवाहर,}}
तुम मिलोंपर मेरा लेख' 'यंग इंडिया' के इसी अंकमें देखोगे | नवीनतम कदम
यह उठाया जा रहा है कि वे हमारा जिक्र किये बिना अपने बलबूते पर 'स्वदेशी
लीग' चलायेंगे । यह मत सोचना कि मेरी कोशिशसे कुछ ठोस नतीजा निकलने जा
रहा है । वे अपनी योजनाएँ अवश्य चलायें । जहाँतक मैं समझता हूँ हमें अपना ध्यान
खादीको फेरी लगाकर बेचने तक सीमित रखना चाहिए ।
यूरोपकी यात्राके बारेमें अभीतक कोई अन्तिम निर्णय नहीं हुआ है। मैं इससे
जी चुरा रहा हूँ, और निर्णयके लिए रोमां रोलांकी ओरसे आनेवाले अगले संकेत
पर, जो अगले सप्ताह मुझे मिल जाना चाहिए, निर्भर हूँ ।
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६२ ) की फोटो - नकलसे ।
२२२. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको
आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८
प्रिय शान्तिकुमार,
आपका पत्र मिला। आगे क्या होता है मैं इसके लिए रुकूंगा ।
हृदयसे तुम्हारा,
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४७८८ ) से ।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी
१. देखिए “ बहिष्कारपर एक मिल-मालिक ”, ५-४-१९२८ ।
हृदयसे आपका,
बापू<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय जवाहर,}}
तुम मिलोंपर मेरा लेख<ref>देखिए "बहिष्कारपर एक मिल–मालिक", ५-४-१९२८।</ref> 'यंग इंडिया' के इसी अंकमें देखोगे। नवीनतम कदम यह उठाया जा रहा है कि वे हमारा जिक्र किये बिना अपने बलबूते पर 'स्वदेशी लीग' चलायेंगे। यह मत सोचना कि मेरी कोशिशसे कुछ ठोस नतीजा निकलने जा रहा है। वे अपनी योजनाएँ अवश्य चलायें। जहाँतक मैं समझता हूँ हमें अपना ध्यान खादीको फेरी लगाकर बेचने तक सीमित रखना चाहिए।
यूरोपकी यात्राके बारेमें अभीतक कोई अन्तिम निर्णय नहीं हुआ है। मैं इससे जी चुरा रहा हूँ, और निर्णयके लिए रोमाॅं रोलाॅंकी ओरसे आनेवाले अगले संकेत पर, जो अगले सप्ताह मुझे मिल जाना चाहिए, निर्भर हूँ।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६२) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२२२. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आपका पत्र मिला। आगे क्या होता है मैं इसके लिए रुकूंगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८८) से।
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
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साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय जवाहर,}}
तुम मिलोंपर मेरा लेख<ref>देखिए "बहिष्कारपर एक मिल–मालिक", ५-४-१९२८।</ref> 'यंग इंडिया' के इसी अंकमें देखोगे। नवीनतम कदम यह उठाया जा रहा है कि वे हमारा जिक्र किये बिना अपने बलबूते पर 'स्वदेशी लीग' चलायेंगे। यह मत सोचना कि मेरी कोशिशसे कुछ ठोस नतीजा निकलने जा रहा है। वे अपनी योजनाएँ अवश्य चलायें। जहाँतक मैं समझता हूँ हमें अपना ध्यान खादीको फेरी लगाकर बेचने तक सीमित रखना चाहिए।
यूरोपकी यात्राके बारेमें अभीतक कोई अन्तिम निर्णय नहीं हुआ है। मैं इससे जी चुरा रहा हूँ, और निर्णयके लिए रोमाॅं रोलाॅंकी ओरसे आनेवाले अगले संकेत पर, जो अगले सप्ताह मुझे मिल जाना चाहिए, निर्भर हूँ।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६२) की फोटो–नकलसे।
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{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
५ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय शान्तिकुमार,}}
आपका पत्र मिला। आगे क्या होता है मैं इसके लिए रुकूंगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७८८) से।<br>
सौजन्य : शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४०
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२३. पत्र : बहरामजी खम्भाताको'''}}}}
आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८
{{left|प्रिय खम्भाता,}}
अदनसे आपका रेडियो-सन्देश मिला। जब मैंने उत्तर दिया, मुझे मालूम नहीं
था कि यह रेडियो-सन्देश है। इसलिए मैंने आपके बम्बईके पतेपर तार भेजा। श्री
कापड़ियाने तार प्राप्त किया और इसकी प्राप्ति स्वीकृति भेजी । आशा है कि जालने
समुद्री यात्रा आरामसे की होगी और उसे और आप सबको इससे लाभ हुआ होगा ।
मैं आपको आस्ट्रिया निवासी ऐसे मित्रोंके लिए पत्र भेज रहा हूँ जो यदि आप
वियानामें ऑपरेशन करवाना चाहेंगे तो डाक्टरके चुनाव में आपका निर्देशन करेंगे ।
ईश्वर सबको सुखी रखे। आप सबको स्नेह,
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६७) की फोटो - नकलसे ।
२२४. पत्र : डा० और श्रीमती स्टेंडेनथको
हृदयसे आपका,
आश्रम<br>
प्रिय मित्र,
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८
पत्र- वाहक श्री खम्भाता मेरे प्रिय मित्र और सहयोगी हैं। वे डाक्टरकी सलाह
पर अपने इकलौते बेटेकी रोग-परीक्षा करवाने और यदि आवश्यक हो तो ऑपरेशन
करवानेके लिए यूरोप गये हैं। मुझे विश्वास है कि आप अच्छे सर्जनके चुनाव आदि में
उनकी पूरी सहायता और पथ-प्रदर्शन करेंगे ।
डा० और श्रीमती स्टेंडेनथ<br>
ग्राज (स्टीरिया में)<br>
ट्राउट मान्स्डोर्फगास्स - १<br>
(आस्ट्रिया)
अंग्रेजी (एस० एन० १४२८१) की फोटो नकलसे ।
१. यह उपलब्ध नहीं है।
२. बहरामजी खम्बाताका पुत्र, देखिए अगला शीर्षक ।
३. देखिए अगला शीर्षक।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२३. पत्र : बहरामजी खम्भाताको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय खम्भाता,}}
अदनसे आपका रेडियो–सन्देश मिला। जब मैंने उत्तर दिया, मुझे मालूम नहीं था कि यह रेडियो–सन्देश है। इसलिए मैंने आपके बम्बईके पतेपर तार<ref>यह उपलब्ध नहीं है।</ref> भेजा। श्री कापड़ियाने तार प्राप्त किया और इसकी प्राप्ति स्वीकृति भेजी। आशा है कि जालने<ref>बहरामजी खम्बाताका पुत्र, देखिए अगला शीर्षक।</ref> समुद्री यात्रा आरामसे की होगी और उसे और आप सबको इससे लाभ हुआ होगा।
मैं आपको आस्ट्रिया निवासी ऐसे मित्रोंके लिए पत्र<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> भेज रहा हूँ जो यदि आप वियानामें ऑपरेशन करवाना चाहेंगे तो डाक्टरके चुनाव में आपका निर्देशन करेंगे।
ईश्वर सबको सुखी रखे। आप सबको स्नेह,
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६७) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२२४. पत्र : डा॰ और श्रीमती स्टेंडेनथको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
पत्र–वाहक श्री खम्भाता मेरे प्रिय मित्र और सहयोगी हैं। वे डाक्टरकी सलाह पर अपने इकलौते बेटेकी रोग–परीक्षा करवाने और यदि आवश्यक हो तो ऑपरेशन करवानेके लिए यूरोप गये हैं। मुझे विश्वास है कि आप अच्छे सर्जनके चुनाव आदि में उनकी पूरी सहायता और पथ–प्रदर्शन करेंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ और श्रीमती स्टेंडेनथ<br>
ग्राज (स्टीरियामें)<br>
ट्राउट मान्स्डोर्फगास्स — १<br>
(आस्ट्रिया)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२८१) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४१
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२२५. पत्र : सरदारनी एम० एम० सिंहको'''}}}}
{{right|आश्रम
साबरमती
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपका पत्र मिला । ऐसे लोगोंको आश्रममें लेनेका आम तौरपर प्रचलन नहीं है,
जो किसी भी सदस्यके परिचित न हों। इसलिए मैं चाहूँगा कि यदि आप सचमुच
आश्रममें रहना चाहती हैं, तो अपना सारा हवाला देते हुए प्रबन्धक - मण्डलके सचिवको
पत्र लिखें । मैं आपको यह भी सूचना दे दूँ कि फिलहाल आश्रम बहुत ज्यादा भरा
हुआ है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सरदारनी एम० एम० सिंह
अपटन हाउस
न्यू कैंट रोड
देहरादून}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६३) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{c|{{larger|'''२२६. पत्र : एम० दीवान नारायणदासको'''}}}}
आश्रम
साबरमती
६ अप्रैल, १९२८
प्रिय मित्र,
आपका पत्र मिला । यदि मानवीय सम्बन्ध गणितके नियमोंके अनुसार चलते होते
तो जो आप सुझा रहे हैं, ठीक होता । परन्तु जैसे तीस बारका खाना दस बारमें खा
लेनेका वही फल नहीं होगा जो तीस बारके खानेको नियमित रूपसे एक-एक दिन
करके खाये जानेपर होगा, इसी तरह यदि छः महीनेकी कताई पन्द्रह दिनोंमें की जाये
तो उससे काम नहीं चलेगा । भाव यह है कि व्यक्तिकी लगन और अनुशासनकी
शक्तियोंका परीक्षण किया जाये ।<noinclude>
३६-१४</noinclude>
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674029
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2026-08-25T16:26:09Z
आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२५. पत्र : सरदारनी एम॰ एम॰ सिंहको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपका पत्र मिला। ऐसे लोगोंको आश्रममें लेनेका आम तौरपर प्रचलन नहीं है, जो किसी भी सदस्यके परिचित न हों। इसलिए मैं चाहूँगा कि यदि आप सचमुच आश्रममें रहना चाहती हैं, तो अपना सारा हवाला देते हुए प्रबन्धक–मण्डलके सचिवको पत्र लिखें। मैं आपको यह भी सूचना दे दूँ कि फिलहाल आश्रम बहुत ज्यादा भरा हुआ है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सरदारनी एम॰ एम॰ सिंह<br>
अपटन हाउस<br>
न्यू कैंट रोड<br>
देहरादून}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२२६. पत्र : एम॰ दीवान नारायणदासको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। यदि मानवीय सम्बन्ध गणितके नियमोंके अनुसार चलते होते तो जो आप सुझा रहे हैं, ठीक होता। परन्तु जैसे तीस बारका खाना दस बारमें खा लेनेका वही फल नहीं होगा जो तीस बारके खानेको नियमित रूपसे एक–एक दिन करके खाये जानेपर होगा, इसी तरह यदि छः महीनेकी कताई पन्द्रह दिनोंमें की जाये तो उससे काम नहीं चलेगा। भाव यह है कि व्यक्तिकी लगन और अनुशासनकी शक्तियोंका परीक्षण किया जाये।<noinclude>{{dhr}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४२
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आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
आपके लिए यह भी उपयुक्त नहीं होगा कि आप अपने माता-पिताके विरुद्ध
सत्याग्रह करें और उनकी अनिच्छासे उनकी स्वीकृति जबर्दस्ती प्राप्त करें। आपको वह
स्वीकृति अपने परिश्रम और चरित्रबलसे प्राप्त करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत एम० दीवान नारायणदास<br>
द्वारा कृष्णा कॉटेज<br>
न्यू हाई स्कूल बिल्डिंग<br>
हसन अली एफिनिड रोड<br>
कराची}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६४) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{c|{{larger|'''२२७. पत्र : वाई० आर० गायतोंडेको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय गायतोंडे,}}
मैं तत्काल अपनी राय देनेके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ । आपने जो पुस्तकें
भेजनेका वायदा किया है, मैं उनकी प्रतीक्षा करूँगा ।
आप कहते हैं कि यदि ड्रमका प्रयोग किया जाये तो इंजन जरूरी होगा। परन्तु
मुझे उन अमेरिका निवासी मित्रसे, जिनका मैंने आपसे जिक्र किया था, पता लगा
है कि ड्रमको बिना ज्यादा कठिनाईके और बहुत कम खर्चेसे किसी आदमी या
जानवरकी भी सहायतासे प्रयोगमें लाया जा सकता है। क्या आप इस छोटेसे
चर्मालय के विकासके लिए ड्रम जरूरी समझते हैं ?
{{left|वाई० आर० गायतोंडे महोदय<br>
द्वारा बी० १२ अम्बेवाडी<br>
गिरगाँव, बम्बई}}
अंग्रेजी (एस० एन० ११३९७) की फोटो नकलसे ।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
p31547urdu68cgfd1b8ue2dte9ev1i7
674040
674034
2026-08-25T16:32:55Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
674040
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
आपके लिए यह भी उपयुक्त नहीं होगा कि आप अपने माता–पिताके विरुद्ध सत्याग्रह करें और उनकी अनिच्छासे उनकी स्वीकृति जबर्दस्ती प्राप्त करें। आपको वह स्वीकृति अपने परिश्रम और चरित्रबलसे प्राप्त करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत एम॰ दीवान नारायणदास<br>
द्वारा कृष्णा कॉटेज<br>
न्यू हाई स्कूल बिल्डिंग<br>
हसन अली एफिनिड रोड<br>
कराची}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६४) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२२७. पत्र : वाई॰ आर॰ गायतोंडेको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय गायतोंडे,}}
मैं तत्काल अपनी राय देनेके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। आपने जो पुस्तकें भेजनेका वायदा किया है, मैं उनकी प्रतीक्षा करूँगा।
आप कहते हैं कि यदि ड्रमका प्रयोग किया जाये तो इंजन जरूरी होगा। परन्तु मुझे उन अमेरिका निवासी मित्रसे, जिनका मैंने आपसे जिक्र किया था, पता लगा है कि ड्रमको बिना ज्यादा कठिनाईके और बहुत कम खर्चेसे किसी आदमी या जानवरकी भी सहायतासे प्रयोगमें लाया जा सकता है। क्या आप इस छोटेसे चर्मालय के विकासके लिए ड्रम जरूरी समझते हैं?
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|वाई॰ आर॰ गायतोंडे महोदय<br>
द्वारा बी॰ १२ अम्बेवाडी<br>
गिरगाँव, बम्बई}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११३९७) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४३
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आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>'''२२८ पत्र : गंगारामको'''
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आप देखेंगे कि मैंने फिर बाघात राज्यके कोलियोंके विषयपर लिखा है । यह
बहुत दुःखद बात है । जब मुझे आपका पहला पत्र मिला, मुझे कतई खयाल नहीं
था कि पत्र लेखक मेरे पुराने मित्र राय साहब हैं। इसलिए जब मुझे इस बातका पता
तो मुझे प्रसन्नता हुई ।
चला,
यह दीवान कौन हैं और बाघात राज्यकी स्थिति कैसी है ? इसकी आबादी
कितनी है ? क्या वहाँका जनमत जागृत है ? राज्यमें कैसे पहुँचा जा सकता है ?
क्या कोलियोंने डरके मारे जनेऊ छोड़ दिया है ?
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|लाला गंगाराम<br>
आर्य फार्म<br>
दिल्ली}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६५) की फोटो नकलसे ।
२२९. पत्र : एस० राधाकृष्णनको
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके कृपापूर्ण पत्रके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । अभीतक यूरोपकी यात्राके
सम्बन्धमें कुछ निश्चित नहीं है। मेरे लिये कोई निर्णय कर सकना कठिन है ।
आप जो लेख चाहते हैं उसके सम्बन्ध में मैं आपसे कहूँगा कि आप मुझपर दया
करें। मैं इतना अधिक व्यस्त रहता हूँ और मुझे 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन' के
१, देखिए " बाघात रियासत और जनेऊ " ५-४-१९२८ ।<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२८ पत्र : गंगारामको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आप देखेंगे कि मैंने फिर बाघात राज्यके कोलियोंके विषयपर लिखा<ref>देखिए "बाघात रियासत और जनेऊ" ५-४-१९२८।</ref> है। यह बहुत दुःखद बात है। जब मुझे आपका पहला पत्र मिला, मुझे कतई खयाल नहीं था कि पत्र–लेखक मेरे पुराने मित्र राय साहब हैं। इसलिए जब मुझे इस बातका पता चला, तो मुझे प्रसन्नता हुई।
यह दीवान कौन हैं और बाघात राज्यकी स्थिति कैसी है? इसकी आबादी कितनी है? क्या वहाँका जनमत जागृत है? राज्यमें कैसे पहुँचा जा सकता है? क्या कोलियोंने डरके मारे जनेऊ छोड़ दिया है?
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|लाला गंगाराम<br>
आर्य फार्म<br>
दिल्ली}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६५) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२२९. पत्र : एस॰ राधाकृष्णनको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके कृपापूर्ण पत्रके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। अभीतक यूरोपकी यात्राके सम्बन्धमें कुछ निश्चित नहीं है। मेरे लिये कोई निर्णय कर सकना कठिन है। आप जो लेख चाहते हैं उसके सम्बन्धमें मैं आपसे कहूँगा कि आप मुझपर दया करें। मैं इतना अधिक व्यस्त रहता हूँ और मुझे 'यंग इंडिया' तथा 'नवजीवन' के<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४४
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
लिए इतना अधिक समय देना पड़ता है कि कुछ और लिख सकनेके लिए मेरे पास
बिलकुल वक्त नहीं रहता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|प्रो० एस० राधाकृष्णन<br>
४९ - आई० सी० हरीश मुकर्जी रोड<br>
भवानीपुर<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६६) की फोटो–नकलसे।
२३०. पत्र : जे० बी० पेनिंगटनको
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके दो पत्र मिले; मैं इनके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ । मैं इतना व्यस्त
रहा हूँ कि आपकी पुस्तक समाप्त नहीं कर सका हूँ ।
यदि आप समझते हैं कि 'यंग इंडिया' में प्रकाशित मेरे लेखों और कु० मेयोकी
पुस्तकमें कोई अन्तर नहीं है, तो जहाँ तक कु० मेयोके कार्यका सम्बन्ध है, मेरे लिये
कोई और दलील पेश करना बाकी नहीं बचा है। यदि आपके भारतके अनुभव कु०
मेयोके अनुभवोंसे मिलते-जुलते हैं, तो सम्भवतः किसी भी दलीलसे आपको उसके
विपरीत विश्वास नहीं हो सकता ।
{{left|जे० बी० पेनिंगटन महोदय<br>
५, एवेल पार्क गार्डेन्स<br>
एवेल, सरे}}
अंग्रेजी (एस० एन० १४२८०) की फोटो - नकलसे ।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
bmqdnr63uk395npxkt6sfd6ucds21ct
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
लिए इतना अधिक समय देना पड़ता है कि कुछ और लिख सकनेके लिए मेरे पास बिलकुल वक्त नहीं रहता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|प्रो॰ एस॰ राधाकृष्णन<br>
४९ – आई॰ सी॰ हरीश मुकर्जी रोड<br>
भवानीपुर<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६६) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२३०. पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंगटनको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके दो पत्र मिले; मैं इनके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। मैं इतना व्यस्त रहा हूँ कि आपकी पुस्तक समाप्त नहीं कर सका हूँ।
यदि आप समझते हैं कि 'यंग इंडिया' में प्रकाशित मेरे लेखों और कु॰ मेयोकी पुस्तकमें कोई अन्तर नहीं है, तो जहाँ तक कु॰ मेयोके कार्यका सम्बन्ध है, मेरे लिये कोई और दलील पेश करना बाकी नहीं बचा है। यदि आपके भारतके अनुभव कु॰ मेयोके अनुभवोंसे मिलते–जुलते हैं, तो सम्भवतः किसी भी दलीलसे आपको उसके विपरीत विश्वास नहीं हो सकता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|जे॰ बी॰ पेनिंगटन महोदय<br>
५, एवेल पार्क गार्डेन्स<br>
एवेल, सरे}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२८०) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४५
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२३१. पत्र : जी० रामचन्द्रन्को'''}}}}
{{right|आश्रम
साबरमती
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय रामचन्द्रन्,}}
अपने पिछले पत्रके सिलसिले में मैं आपको संलग्न पत्र भेज रहा हूँ । अब मैं इस
बात के लिए उत्सुक हूँ कि आप सुझावको जितना जल्दी हो सके मान लें ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३५९१ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{c|{{larger|'''२३२. पत्र : चार्ली यू० मॉर्सेलोको'''}}}}
आश्रम
साबरमती
६ अप्रैल, १९२८
प्रिय मित्र,
आपका पत्र मिला। मैं कोई चमत्कार नहीं करता और न ही चमत्कारोंमें मेरा
विश्वास है । मैं आपको सलाह दूंगा कि ईश्वरने आपको जो कुछ दिया है उसीसे यह
ध्यान रखते हुए सन्तुष्ट रहें कि बहुतसे लोग ऐसे हैं जो आपसे भी बुरी हालत में
हैं । और आखिरकार आँखका अन्धा होना नैतिक दृष्टिसे अन्धा होने की अपेक्षा बहुत
कम बुरा है। शारीरिक दोषोंपर हमारा वश नहीं है; किन्तु नैतिक दोषोंपर हम काबू
पा सकते हैं। इसलिए यदि चमत्कार जैसी कोई चीज हो भी तो उसकी आजमाइश
हमें नैतिक कल्याणके लिए करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
चार्ली यू० मॉर्सेलो महोदय
पो० ऑ० बॉक्स १२३, वाटरलू
न्यूयार्क, सं० रा० अ०
अंग्रेजी (एस० एन० १४२८२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
dhb5u7f31e0benmojqfdhlaro23g2dq
674060
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2026-08-25T16:53:58Z
आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३१. पत्र : जी॰ रामचन्द्रन्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय रामचन्द्रन्,}}
अपने पिछले पत्रके सिलसिलेमें मैं आपको संलग्न पत्र भेज रहा हूँ। अब मैं इस बातके लिए उत्सुक हूँ कि आप सुझावको जितना जल्दी हो सके मान लें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३५९१ ) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२३२. पत्र : चार्ली यू॰ मॉर्सेलोको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
६ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैं कोई चमत्कार नहीं करता और न ही चमत्कारोंमें मेरा विश्वास है। मैं आपको सलाह दूंगा कि ईश्वरने आपको जो कुछ दिया है उसीसे यह ध्यान रखते हुए सन्तुष्ट रहें कि बहुतसे लोग ऐसे हैं जो आपसे भी बुरी हालतमें हैं। और आखिरकार आँखका अन्धा होना नैतिक दृष्टिसे अन्धा होनेकी अपेक्षा बहुत कम बुरा है। शारीरिक दोषोंपर हमारा वश नहीं है; किन्तु नैतिक दोषोंपर हम काबू पा सकते हैं। इसलिए यदि चमत्कार जैसी कोई चीज हो भी तो उसकी आजमाइश हमें नैतिक कल्याणके लिए करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|चार्ली यू॰ मॉर्सेलो महोदय<br>
पो॰ ऑ॰ बॉक्स १२३, वाटरलू<br>
न्यूयार्क, सं॰ रा॰ अ॰}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२८२) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४६
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आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२३३. पत्र : ना० र० मलकानीको'''}}}}
७ अप्रैल, १९२८
प्रिय मलकानी,
आपका पत्र मिला। मुझे आपका हिसाब-किताब नहीं चाहिए था। मैं आपको
अपना बीमा रद कर देनेके लिए बिलकुल नहीं कहता। मेरे मनपर जो बोझ था
वह मैंने आपके सामने प्रकट कर दिया है । मेरी पूछता से आपको बहुत परेशान नहीं
होना चाहिए। हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि हम जैसे हैं, वैसे ही दिखते
रहें। और यदि हम ऐसा कर सकें तो हमें किन्हीं भी प्रश्नोंकी चिन्ता नहीं होगी ।
दो सौ रुपये [ प्रति मास] तो मैं बिना आत्म सम्मान गँवाये सुलभ कर लूंगा। परन्तु
ज्यादासे ज्यादा आशा करनेका यह विशेषाधिकार आपको हमेशा मेरे पास ही रहने
देना चाहिए। आपको दहेजकी चिन्ता क्यों करनी चाहिए ? आपको एक पैसा भी
नहीं देना है। आपकी लड़कियोंका विवाह आमिल परिवारमें ही हो, ऐसा जरूरी
क्यों है? आप अभीसे लड़कियोंको ऐसा प्रशिक्षण दें कि वे इस बातको भूल जायें
कि वे किसी विशेष जातिकी हैं। वे भारतकी हैं और यदि आपको मेरे वर्णाश्रम
सम्बन्धी विचारपर विश्वास है तो मामला बहुत आसान हो जाता है ।
निस्सन्देह आपको वहाँ उसके किराये और खानेके खर्चके अलावा और कुछ
भी नहीं देना चाहिए ।
सस्नेह,
अंग्रेजी (जी० एन० ८८५) की फोटो नकलसे ।
बापू<noinclude></noinclude>
loclh29dhf3mouo2ajjjjwyji9bd8uw
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आदेश यादव
3609
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674067
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३३. पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको'''}}}}
{{right|७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
आपका पत्र मिला। मुझे आपका हिसाब–किताब नहीं चाहिए था। मैं आपको अपना बीमा रद कर देनेके लिए बिलकुल नहीं कहता। मेरे मनपर जो बोझ था वह मैंने आपके सामने प्रकट कर दिया है। मेरी पूछताछसे आपको बहुत परेशान नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि हम जैसे हैं, वैसे ही दिखते रहें। और यदि हम ऐसा कर सकें तो हमें किन्हीं भी प्रश्नोंकी चिन्ता नहीं होगी। दो सौ रुपये [प्रति मास] तो मैं बिना आत्म–सम्मान गँवाये सुलभ कर लूंगा। परन्तु
ज्यादासे–ज्यादा आशा करनेका यह विशेषाधिकार आपको हमेशा मेरे पास ही रहने देना चाहिए। आपको दहेजकी चिन्ता क्यों करनी चाहिए? आपको एक पैसा भी नहीं देना है। आपकी लड़कियोंका विवाह आमिल परिवारमें ही हो, ऐसा जरूरी क्यों है? आप अभीसे लड़कियोंको ऐसा प्रशिक्षण दें कि वे इस बातको भूल जायें कि वे किसी विशेष जातिकी हैं। वे भारतकी हैं और यदि आपको मेरे वर्णाश्रम सम्बन्धी विचारपर विश्वास है तो मामला बहुत आसान हो जाता है।
निस्सन्देह आपको वहाँ उसके किराये और खानेके खर्चके अलावा और कुछ भी नहीं देना चाहिए।
:सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८८५) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४७
250
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674071
645486
2026-08-25T17:02:39Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
674071
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२३४. पत्र : आई० पी० दुराईरत्नम्को'''}}}}
आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल १९२८
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला । मैं 'विद्यार्थी कांग्रेस' की सब तरहसे सफलताकी कामना
करता हूँ । मुझे आशा है कि विद्यार्थी अपनी मातृभूमिके लाखों भूखे रहनेवाले लोगों को
नहीं भूलेंगे। उनकी सहायता करनेका सबसे ज्यादा कारगर तरीका यह है कि वे
खादीको अपनाकर उनके साथ अपनी एकात्मता स्थापित करें।
श्रीयुत आई० पी० दुराईरत्नम्<br>
सचिव, विद्यार्थी कांग्रेस,<br>
चावकचेरी, लंका
अंग्रेजी (एस० एन० १३१७२) की माइक्रोफिल्मसे ।
२३५. पत्र : रेहाना तैयबजीको
हृदयसे आपका,
प्रिय रहाना,
आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८
कतई पत्र न लिखनेसे बोलकर पत्र लिखवा देना अच्छा है । सुहेलाको मेरी
ओरसे बधाई । बच्चेके दोनों गालोंपर, उसके होठोंपर, माथेपर और सिर में बहुत-
बहुत चुम्बन ।
काश मेरे पास तुम्हारे और गीत सुननेका समय होता ।
कुमारी रैहाना तैयबजी<br>
कैम्प, बड़ौदा
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६९) की फोटो नकलसे ।
हृदयसे तुम्हारा<noinclude></noinclude>
d3rnws6t1wo2w1e42pktxj8bunb3zzi
674076
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2026-08-25T17:07:45Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
674076
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३४. पत्र : आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैं 'विद्यार्थी कांग्रेस' की सब तरहसे सफलताकी कामना करता हूँ। मुझे आशा है कि विद्यार्थी अपनी मातृभूमिके लाखों भूखे रहनेवाले लोगों को नहीं भूलेंगे। उनकी सहायता करनेका सबसे ज्यादा कारगर तरीका यह है कि वे खादीको अपनाकर उनके साथ अपनी एकात्मता स्थापित करें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्<br>
सचिव, विद्यार्थी कांग्रेस,<br>
चावकचेरी, लंका}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७२) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२३५. पत्र : रैहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय रैहाना,}}
कतई पत्र न लिखनेसे बोलकर पत्र लिखवा देना अच्छा है। सुहेलाको मेरी ओरसे बधाई। बच्चेके दोनों गालोंपर, उसके होठोंपर, माथेपर और सिरमें बहुत–बहुत चुम्बन।
काश मेरे पास तुम्हारे और गीत सुननेका समय होता।
{{right|हृदयसे तुम्हारा}}
{{left|कुमारी रैहाना तैयबजी<br>
कैम्प, बड़ौदा}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६९) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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2026-08-25T17:08:41Z
आदेश यादव
3609
674078
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३४. पत्र : आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्को'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैं 'विद्यार्थी कांग्रेस' की सब तरहसे सफलताकी कामना करता हूँ। मुझे आशा है कि विद्यार्थी अपनी मातृभूमिके लाखों भूखे रहनेवाले लोगों को नहीं भूलेंगे। उनकी सहायता करनेका सबसे ज्यादा कारगर तरीका यह है कि वे खादीको अपनाकर उनके साथ अपनी एकात्मता स्थापित करें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्<br>
सचिव, विद्यार्थी कांग्रेस,<br>
चावकचेरी, लंका}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७२) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२३५. पत्र : रैहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय रैहाना,}}
कतई पत्र न लिखनेसे बोलकर पत्र लिखवा देना अच्छा है। सुहेलाको मेरी ओरसे बधाई। बच्चेके दोनों गालोंपर, उसके होठोंपर, माथेपर और सिर में बहुत–बहुत चुम्बन।
काश मेरे पास तुम्हारे और गीत सुननेका समय होता।
{{right|हृदयसे तुम्हारा}}
{{left|कुमारी रैहाना तैयबजी<br>
कैम्प, बड़ौदा}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१६९) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४८
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2026-08-25T17:09:47Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
674080
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२३६. पत्र : मु० अ० अन्सारीको'''}}}}
{{right|आश्रम
साबरमती
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय डा० अन्सारी,}}
आपका पत्र मिला। वाइसरायको जो पत्र आपने लिखा है, मैं उसीसे सन्तोष
कर लेता हूँ। मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि रियासतें यदि हमारी मदद करें तो हम
वह मदद खुशी से स्वीकार करेंगे। परन्तु मैं जानता हूँ कि रियासतों में ऐसी संस्थाको जो
साफ तौरपर असहयोगसे जन्मी है या असहयोगके वातावरणमें पनपी हैं, मदद देनेका
साहस नहीं होगा। परन्तु यदि वे यह जानकर भी कि यह असहयोगी संस्था है
सहायता करते हैं, तो हमें वह सहायता सहर्ष स्वीकार कर लेनी चाहिए।
फिलहाल प्रस्तावित यूरोपकी यात्रा मेरे लिये बड़ी परेशानी पैदा कर रही
है। मैं
कुछ निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि मुझे इस तरह असमंजस में
नहीं पड़े रहना चाहिए : परन्तु अपनी कमजोरी छिपानेसे क्या लाभ? मैं स्वयं इसका
कारण नहीं बता सकता। बहरहाल ज्यादासे ज्यादा अगले पखवाड़ेके दौरान मुझे कोई
निर्णय कर ही लेना चाहिए। स्वास्थ्यमें सुधारकी दृष्टिसे मुझे उसका कोई आकर्षण
नहीं है। श्री रोमाँ रोलाँसे मिलने और यूरोपके प्रमुख लोगोंसे शान्तिपूर्ण वार्तालापके
लिए ही मैं यूरोप जाऊँगा । देखें ईश्वर क्या रास्ता दिखाता है ।
बेगम अन्सारी और सोहरा यह चाहती हैं कि मैं उनके नए घरमें रहूँ; इससे
क्या लाभ है ? मैं वहाँ चाहे जितनी देर रहूँ वे तो अच्छी खासी दूरीपर पर्दे के पीछे
छिपी रहती हैं । यदि वे चाहती हैं कि मैं वहाँ आऊँ, तो उन्हें अपने फाजिल कंगन
और दूसरे गहने दिखाने होंगे, ताकि मैं उन्हें इन फालतू चीजोंसे छुटकारा दिला सकूं
और उनका अच्छा उपयोग कर सकूँ ।
जहाँतक जामियाके लिए धन संग्रहका सम्बन्ध है, मुझे आशंका है कि निजी
मित्रोंसे चन्दा पा सकनेके अलावा हम और कुछ नहीं कर पायेंगे और ऐसा किया जा
सके, इस बात के लिए संविधान और न्यास-पत्रका होना जरूरी है। इसलिए उनको
तैयार कराने में जितनी जल्दी की जा सके कीजियेगा ।
अंग्रेजी (एस० एन० १३१७०) की फोटो नकलसे ।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
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674085
674080
2026-08-25T17:16:00Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
674085
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३६. पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय डा॰ अन्सारी,}}
आपका पत्र मिला। वाइसरायको जो पत्र आपने लिखा है, मैं उसीसे सन्तोष कर लेता हूँ। मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि रियासतें यदि हमारी मदद करें तो हम वह मदद खुशीसे स्वीकार करेंगे। परन्तु मैं जानता हूँ कि रियासतोंमें ऐसी संस्थाको जो साफ तौरपर असहयोगसे जन्मी है या असहयोगके वातावरणमें पनपी हैं, मदद देनेका साहस नहीं होगा। परन्तु यदि वे यह जानकर भी कि यह असहयोगी संस्था है सहायता करते हैं, तो हमें वह सहायता सहर्ष स्वीकार कर लेनी चाहिए।
फिलहाल प्रस्तावित यूरोपकी यात्रा मेरे लिये बड़ी परेशानी पैदा कर रही है। मैं कुछ निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि मुझे इस तरह असमंजसमें नहीं पड़े रहना चाहिए : परन्तु अपनी कमजोरी छिपानेसे क्या लाभ? मैं स्वयं इसका कारण नहीं बता सकता। बहरहाल ज्यादासे–ज्यादा अगले पखवाड़ेके दौरान मुझे कोई निर्णय कर ही लेना चाहिए। स्वास्थ्यमें सुधारकी दृष्टिसे मुझे उसका कोई आकर्षण नहीं है। श्री रोमाँ रोलाँसे मिलने और यूरोपके प्रमुख लोगोंसे शान्तिपूर्ण वार्तालापके लिए ही मैं यूरोप जाऊँगा। देखें ईश्वर क्या रास्ता दिखाता है।
बेगम अन्सारी और सोहरा यह चाहती हैं कि मैं उनके नए घरमें रहूँ; इससे क्या लाभ है? मैं वहाँ चाहे जितनी देर रहूँ वे तो अच्छी खासी दूरीपर पर्देके पीछे छिपी रहती हैं। यदि वे चाहती हैं कि मैं वहाँ आऊँ, तो उन्हें अपने फाजिल कंगन और दूसरे गहने दिखाने होंगे, ताकि मैं उन्हें इन फालतू चीजोंसे छुटकारा दिला सकूं और उनका अच्छा उपयोग कर सकूँ।
जहाँतक जामियाके लिए धन संग्रहका सम्बन्ध है, मुझे आशंका है कि निजी मित्रोंसे चन्दा पा सकनेके अलावा हम और कुछ नहीं कर पायेंगे और ऐसा किया जा सके, इस बातके लिए संविधान और न्यास–पत्रका होना जरूरी है। इसलिए उनको तैयार करानेमें जितनी जल्दी की जा सके कीजियेगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७०) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
mnuns8p466frxm7pqd9wrf5i8dhtdv4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२४९
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२३७. पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबॉटमको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
यह आपका सौजन्य है कि आपने अपने पतिके' नामपर भेजी गई पूछताछका
इतनी जल्दी उत्तर दे दिया। जब आप उन्हें पत्र लिखें, कृपया उन्हें मेरा नमस्कार
लिखिएगा।
मेरी प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें अभी कुछ निश्चित नहीं है । परन्तु
यदि मैं गया भी तो समझ नहीं पाता कि उन चन्द महीनों में जो मैं इस यात्रामें
लगा सकता हूँ, यूरोप और अमेरिका दोनोंकी यात्रा कैसे कर सकूँगा ।
{{left|श्रीमती सेम हिगिनबॉटम<br>
इलाहाबाद कृषि संस्थान<br>
इलाहाबाद}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१७१) की फोटो नकलसे ।
२३८. पत्र : ए० ए० पॉलको
हृदयसे आपका,
आश्रम<br>
प्रिय राजन,
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८
'न्यूज शीट" के मई महीने के अंकके लिए मेरा सन्देश' पत्रके साथ है। यदि मैंने
प्रत्येक अंकके लिए सन्देश देना स्वीकार किया हो, तो मैं तब जरूर ही नशेकी हालत में
रहा होऊँगा, और ऐसी हालत में किये गये वायदोंकी कोई कीमत नहीं होती ।
मुझे बिलकुल पता नहीं था कि जोजेफ के बहनोईकी मृत्यु हो गई है। जो
आपने मुझे यह सूचना दी वह ठीक ही किया ।
१. देखिए “पत्र : सेम हिगिनवटमको ", २८-३-१९२८ ।
२. अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुस्व सम्बन्धी समाचार-पत्र ।
३. देखिए अगला शीर्षक<noinclude></noinclude>
k9ludyawtgohkkxkug4pvb2ygigpvwu
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३७. पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबॉटमको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
यह आपका सौजन्य है कि आपने अपने पतिके<ref>देखिए "पत्र : सेम हिगिनवटमको", २८-३-१९२८।</ref> नामपर भेजी गई पूछताछका इतनी जल्दी उत्तर दे दिया। जब आप उन्हें पत्र लिखें, कृपया उन्हें मेरा नमस्कार लिखिएगा।
मेरी प्रस्तावित यूरोप यात्राके सम्बन्धमें अभी कुछ निश्चित नहीं है। परन्तु यदि मैं गया भी तो समझ नहीं पाता कि उन चन्द महीनों में जो मैं इस यात्रामें लगा सकता हूँ, यूरोप और अमेरिका दोनोंकी यात्रा कैसे कर सकूँगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती सेम हिगिनबॉटम<br>
इलाहाबाद कृषि संस्थान<br>
इलाहाबाद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७१) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२३८. पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय राजन,}}
'न्यूज शीट'<ref>अन्तर्राष्ट्रीय बन्धुस्व सम्बन्धी समाचार–पत्र।</ref> के मई महीनेके अंकके लिए मेरा सन्देश<ref>देखिए अगला शीर्षक</ref> पत्रके साथ है। यदि मैंने प्रत्येक अंकके लिए सन्देश देना स्वीकार किया हो, तो मैं तब जरूर ही नशेकी हालतमें रहा होऊँगा, और ऐसी हालतमें किये गये वायदोंकी कोई कीमत नहीं होती।
मुझे बिलकुल पता नहीं था कि जोजेफ के बहनोईकी मृत्यु हो गई है। जो आपने मुझे यह सूचना दी वह ठीक ही किया।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५०
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
मुझे आशा है कि अपने पिछले पत्रका उत्तर' आपको समयपर मिल गया होगा ।
{{left|ए० ए० पॉल महोदय<br>
७, मिलर रोड<br>
किल्पॉक<br>
मद्रास}}
अंग्रेजी (एस० एन० १३१७३) की फोटो नकलसे।
२३९. सन्देश : 'न्यूज शीट' को
हृदयसे आपका,
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
सच्ची बन्धुत्व भावनाका विकास चुपचाप किये गये बन्धुत्वके कार्योंसे ही होता
है। इसलिए इस तरहका एक छोटा-सा कार्य भी भारी भरकम उपदेशोंसे अधिक
महत्वका है ।
अंग्रेजी (एस० एन० १३१७२ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
२४०. पत्र : जोजेफको
आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८
प्रिय जोजेफ,
राजन पॉलने बताया कि आपके बहनोईका देहान्त हो गया है। आपके और
आपकी विधवा बनके प्रति मेरी सहानुभूति स्वीकार करें। श्रीमती जोजेफसे कहियेगा
कि जब मैं आपके घरसे विदा हुआ था उस समयके अन्तिम दृश्यको, मैं कभी नहीं
भूला, हालाँकि मैंने अबतक उसके बारेमें एक शब्द भी नहीं कहा है। वह दृश्य
जिस स्नेहका साक्षी है उसे मैं सदा सँजोकर रखूंगा ।
अंग्रेजी (एस० एन० १३१६८) की फोटो- नकलसे ।
देखिए " पत्र ए० ए० पॉलको ", ४-४-१९२८ ।
हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
मुझे आशा है कि अपने पिछले पत्रका उत्तर<ref>देखिए "पत्र ए॰ ए॰ पॉलको", ४-४-१९२८।</ref> आपको समयपर मिल गया होगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|ए॰ ए॰ पॉल महोदय<br>
७, मिलर रोड<br>
किल्पॉक<br>
मद्रास}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७३) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२३९. सन्देश : 'न्यूज शीट' को'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
सच्ची बन्धुत्व भावनाका विकास चुपचाप किये गये बन्धुत्वके कार्योंसे ही होता है। इसलिए इस तरहका एक छोटा–सा कार्य भी भारी भरकम उपदेशोंसे अधिक महत्वका है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७२ ) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२४०. पत्र : जोजेफको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय जोजेफ,}}
राजन पॉलने बताया कि आपके बहनोईका देहान्त हो गया है। आपके और आपकी विधवा बनके प्रति मेरी सहानुभूति स्वीकार करें। श्रीमती जोजेफसे कहियेगा कि जब मैं आपके घरसे विदा हुआ था उस समयके अन्तिम दृश्यको, मैं कभी नहीं भूला, हालाँकि मैंने अबतक उसके बारेमें एक शब्द भी नहीं कहा है। वह दृश्य जिस स्नेहका साक्षी है उसे मैं सदा सँजोकर रखूंगा।
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
मुझे आशा है कि अपने पिछले पत्रका उत्तर<ref>देखिए "पत्र ए॰ ए॰ पॉलको", ४-४-१९२८।</ref> आपको समयपर मिल गया होगा।
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{{left|ए॰ ए॰ पॉल महोदय<br>
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अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७३) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''२३९. सन्देश : 'न्यूज शीट' को'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
सच्ची बन्धुत्व भावनाका विकास चुपचाप किये गये बन्धुत्वके कार्योंसे ही होता है। इसलिए इस तरहका एक छोटा–सा कार्य भी भारी भरकम उपदेशोंसे अधिक महत्वका है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७२) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{larger|'''२४०. पत्र : जोजेफको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ अप्रैल, १९२८}}
{{left|प्रिय जोजेफ,}}
राजन पॉलने बताया कि आपके बहनोईका देहान्त हो गया है। आपके और आपकी विधवा बनके प्रति मेरी सहानुभूति स्वीकार करें। श्रीमती जोजेफसे कहियेगा कि जब मैं आपके घरसे विदा हुआ था उस समयके अन्तिम दृश्यको, मैं कभी नहीं भूला, हालाँकि मैंने अबतक उसके बारेमें एक शब्द भी नहीं कहा है। वह दृश्य जिस स्नेहका साक्षी है उसे मैं सदा सँजोकर रखूंगा।
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||अम्बोलीमें राष्ट्रीय सप्ताहके सम्बन्धमें बातचीत|२२७}}</noinclude>'''आपके लिए तो वहाँ काफी काम है और हमेशा बना रहेगा। मैं आपका अपना रोजमर्राका काम नहीं छुड़ानेवाला हूँ। आप अपने शरीरपर जो बोझ डाल रहे थे, असाधारण था। जैसे ही आपकी तबीयत अच्छी लगने लगे, लोग आपसे मिल सकते हैं, उन्होंने जो रकमें एकत्रित की हों उनकी थैलियाँ भेंट कर सकते हैं,
कार्यकर्त्तागण अपने कामका ब्यौरा आपको दे सकते हैं और आपसे सुझाव और सलाह ले सकते हैं। मैं बस इतना ही चाहता हूँ कि काममें आप स्वयं सक्रिय भाग लिये बिना, कामका निर्देशन करते रहें। जहाँतक हो सके मनबहलाववाली या हल्की चीजें पढ़ सकते हैं। 'आत्मकथा' लिख सकते हैं लेकिन आनेवाले पत्रोंके अम्बार को न निपटायें।'''
मुझे बहुत खुशी है। लेकिन मनबहलावकी पढ़ाई है क्या? वही न कि जिसे पढ़नेमें मुझको थकान महसूस न हो? यही बात है है न?
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>यंग इंडिया, १४-४-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''२१७. अम्बोलीमें राष्ट्रीय सप्ताहके सम्बन्ध में बातचीत'''<ref>महादेव देसाईको “साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[४ अप्रैल, १९२७]}}
'''राष्ट्रीय सप्ताहके<ref>६ अप्रेलसे १३ अप्रैलतक।</ref> दो दिन पहले गांधीजीने पूछा कि अम्बोलीमें यह सप्ताह आप किस प्रकार मनाने जा रहे हैं। मैंने--कहा-बारह घंटेका अखण्ड चरखायज्ञ करके।' पर यह उनके सन्तोषके लिए बहुत ही ना-काफी था। वे बोले:--'''
बारह घंटे अखंड चरखा यज्ञ करनेका कार्यक्रम ठीक है। मैं भी अपना एक घंटा दूंगा। पर आपको सावन्तवाड़ी जरूर जाना चाहिए और वहाँ राष्ट्रीय सप्ताह भर खादीकी फेरी अवश्य लगानी चाहिए, अस्पृश्योंके घरोंमें जानेकी कोशिश जरूर करनी चाहिए, उनकी सुख-सुविधाकी उनसे पूछताछ करनी चाहिए, देखना चाहिए कि उनके यहाँ स्कूल और कुएँ आदि हैं या नहीं। अगर देवदास और आप दोनों भी चले जायेंगे तो चरखायज्ञको अखण्ड रूपसे जारी रखनेकी जिम्मेदारी में लेता हूँ।
{{Left|[अंग्रेजी से]<br>'''यंग इंडिया, '''२१-४-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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कार्यकर्त्तागण अपने कामका ब्यौरा आपको दे सकते हैं और आपसे सुझाव और सलाह ले सकते हैं। मैं बस इतना ही चाहता हूँ कि काममें आप स्वयं सक्रिय भाग लिये बिना, कामका निर्देशन करते रहें। जहाँतक हो सके मनबहलाववाली या हल्की चीजें पढ़ सकते हैं। 'आत्मकथा' लिख सकते हैं लेकिन आनेवाले पत्रोंके अम्बार को न निपटायें।'''
मुझे बहुत खुशी है। लेकिन मनबहलावकी पढ़ाई है क्या? वही न कि जिसे पढ़नेमें मुझको थकान महसूस न हो? यही बात है है न?
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'''राष्ट्रीय सप्ताहके<ref>६ अप्रेलसे १३ अप्रैलतक।</ref> दो दिन पहले गांधीजीने पूछा कि अम्बोलीमें यह सप्ताह आप किस प्रकार मनाने जा रहे हैं। मैंने--कहा-बारह घंटेका अखण्ड चरखायज्ञ करके।' पर यह उनके सन्तोषके लिए बहुत ही ना-काफी था। वे बोले:--'''
बारह घंटे अखंड चरखा यज्ञ करनेका कार्यक्रम ठीक है। मैं भी अपना एक घंटा दूंगा। पर आपको सावन्तवाड़ी जरूर जाना चाहिए और वहाँ राष्ट्रीय सप्ताह भर खादीकी फेरी अवश्य लगानी चाहिए, अस्पृश्योंके घरोंमें जानेकी कोशिश जरूर करनी चाहिए, उनकी सुख-सुविधाकी उनसे पूछताछ करनी चाहिए, देखना चाहिए कि उनके यहाँ स्कूल और कुएँ आदि हैं या नहीं। अगर देवदास और आप दोनों भी चले जायेंगे तो चरखायज्ञको अखण्ड रूपसे जारी रखनेकी जिम्मेदारी में लेता हूँ।
{{Left|[अंग्रेजी से]<br>'''यंग इंडिया, '''२१-४-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
6333
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673981
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|४ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुमने तो मुझे पत्र लिखने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, मगर में स्वयं तुम्हें हर सोमवारको पत्र लिखनेके सुखसे वंचित नहीं होना चाहता। स्नेहपत्र लिखना एक
मनोरंजन है; वह कोई ऐसा काम नहीं है, जिसे टालनेके लिए कोई बहाना ढूंढ़ना पड़े। अभी कमजोरी तो है, मगर तबीयत पहलेसे अच्छी है।
डा० मेहता बम्बईसे शरीरकी जाँच करने यहाँ आये थे। उनका तो यह दृढ़ मत है कि मुझे अगले कुछ महीनोंतक दौरा बिलकुल नहीं करना चाहिए। वे बिस्तर
पर पड़े-पड़े पढ़ने से या कभी-कभी मित्रोंको पत्र भी लिखने से मना नहीं करते। अगर मैं पूरा आराम लूँ, तो उनका खयाल है कि मेरी खोई हुई शक्ति बहुत कुछ वापस आ जायेगी। मगर इतनी ताकत मुझमें कभी नहीं आ सकेगी कि ऐसे चूरचूर कर देनेवाले दौरे कर सकूं, जैसा मैंने पिछले महीनेकी २५ तारीखतक किया और जो
उस दिन यकायक समाप्त हो गया। अब देखें आगे क्या होता है। अगर दौरा रद करनेका निर्णय अन्तिम रहा, तो में आश्रममें जाकर आराम करूँगा। मैं आज या
कल निर्णय कर लूंगा। सम्भावना यही है कि दौरा रद हो जायेगा। फिर भी मैं अगले सप्ताह मंगलके पहले यहाँसे रवाना नहीं होऊँगा।
लेकिन तुम्हें दौरे<ref>मीराबहन इस सम्बन्धमें लिखती हैं: 'तब मेरे मनमें संघर्ष चल रहा था।'</ref> क्यों पड़ रहे हैं यह केवल आध्यात्मिक पीड़ा ही है या इसका जलवायु से भी कुछ सम्बन्ध है? अगर तुम्हें स्वास्थ्यवर्धक जलवायुकी आवश्यकता हो, तो तुम अवश्य बाहर चली जाना। वहाँकी जलवायु तुम्हें कैसी लगी है?
तुम भरतपुर नहीं गई, यह बहुत ठीक किया। यदि शान्ता वहाँ हो तो उसे साथवाला पत्र दे देना।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२१४) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
{{Right|बापू}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|४ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुमने तो मुझे पत्र लिखने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, मगर में स्वयं तुम्हें हर सोमवारको पत्र लिखनेके सुखसे वंचित नहीं होना चाहता। स्नेहपत्र लिखना एक
मनोरंजन है; वह कोई ऐसा काम नहीं है, जिसे टालनेके लिए कोई बहाना ढूंढ़ना पड़े। अभी कमजोरी तो है, मगर तबीयत पहलेसे अच्छी है।
डा० मेहता बम्बईसे शरीरकी जाँच करने यहाँ आये थे। उनका तो यह दृढ़ मत है कि मुझे अगले कुछ महीनोंतक दौरा बिलकुल नहीं करना चाहिए। वे बिस्तर
पर पड़े-पड़े पढ़ने से या कभी-कभी मित्रोंको पत्र भी लिखने से मना नहीं करते। अगर मैं पूरा आराम लूँ, तो उनका खयाल है कि मेरी खोई हुई शक्ति बहुत कुछ वापस आ जायेगी। मगर इतनी ताकत मुझमें कभी नहीं आ सकेगी कि ऐसे चूरचूर कर देनेवाले दौरे कर सकूं, जैसा मैंने पिछले महीनेकी २५ तारीखतक किया और जो
उस दिन यकायक समाप्त हो गया। अब देखें आगे क्या होता है। अगर दौरा रद करनेका निर्णय अन्तिम रहा, तो में आश्रममें जाकर आराम करूँगा। मैं आज या
कल निर्णय कर लूंगा। सम्भावना यही है कि दौरा रद हो जायेगा। फिर भी मैं अगले सप्ताह मंगलके पहले यहाँसे रवाना नहीं होऊँगा।
लेकिन तुम्हें दौरे<ref>मीराबहन इस सम्बन्धमें लिखती हैं: 'तब मेरे मनमें संघर्ष चल रहा था।'</ref> क्यों पड़ रहे हैं यह केवल आध्यात्मिक पीड़ा ही है या इसका जलवायु से भी कुछ सम्बन्ध है? अगर तुम्हें स्वास्थ्यवर्धक जलवायुकी आवश्यकता हो, तो तुम अवश्य बाहर चली जाना। वहाँकी जलवायु तुम्हें कैसी लगी है?
तुम भरतपुर नहीं गई, यह बहुत ठीक किया। यदि शान्ता वहाँ हो तो उसे साथवाला पत्र दे देना।
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रितु कुमारी साव
6333
673983
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१८. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|४ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
तुमने तो मुझे पत्र लिखने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, मगर में स्वयं तुम्हें हर सोमवारको पत्र लिखनेके सुखसे वंचित नहीं होना चाहता। स्नेहपत्र लिखना एक
मनोरंजन है; वह कोई ऐसा काम नहीं है, जिसे टालनेके लिए कोई बहाना ढूंढ़ना पड़े। अभी कमजोरी तो है, मगर तबीयत पहलेसे अच्छी है।
डा० मेहता बम्बईसे शरीरकी जाँच करने यहाँ आये थे। उनका तो यह दृढ़ मत है कि मुझे अगले कुछ महीनोंतक दौरा बिलकुल नहीं करना चाहिए। वे बिस्तर
पर पड़े-पड़े पढ़ने से या कभी-कभी मित्रोंको पत्र भी लिखने से मना नहीं करते। अगर मैं पूरा आराम लूँ, तो उनका खयाल है कि मेरी खोई हुई शक्ति बहुत कुछ वापस आ जायेगी। मगर इतनी ताकत मुझमें कभी नहीं आ सकेगी कि ऐसे चूरचूर कर देनेवाले दौरे कर सकूं, जैसा मैंने पिछले महीनेकी २५ तारीखतक किया और जो
उस दिन यकायक समाप्त हो गया। अब देखें आगे क्या होता है। अगर दौरा रद करनेका निर्णय अन्तिम रहा, तो में आश्रममें जाकर आराम करूँगा। मैं आज या
कल निर्णय कर लूंगा। सम्भावना यही है कि दौरा रद हो जायेगा। फिर भी मैं अगले सप्ताह मंगलके पहले यहाँसे रवाना नहीं होऊँगा।
लेकिन तुम्हें दौरे<ref>मीराबहन इस सम्बन्धमें लिखती हैं: 'तब मेरे मनमें संघर्ष चल रहा था।'</ref> क्यों पड़ रहे हैं यह केवल आध्यात्मिक पीड़ा ही है या इसका जलवायु से भी कुछ सम्बन्ध है? अगर तुम्हें स्वास्थ्यवर्धक जलवायुकी आवश्यकता हो, तो तुम अवश्य बाहर चली जाना। वहाँकी जलवायु तुम्हें कैसी लगी है?
तुम भरतपुर नहीं गई, यह बहुत ठीक किया। यदि शान्ता वहाँ हो तो उसे साथवाला पत्र दे देना।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२१४) से।<br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२६७
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१९. पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|मौनवार, चैत्र सुदी ३ [४ अप्रैल, १९२७]<ref>महादेव देसाईको हस्तलिखित डायरीसे।</ref>}}
सर गंगारामका खेतीका अनुभव जाननेको उत्सुक हूँ।
शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
उसो तरहके मेलका भूखा हूँ। वह तो तभी सम्भव हो
स्वतः मेल रखती है, में सकता है जब हम सबको
स्वजन मानें। अनुभव बताता है कि अच्छे परिणामोंका मेल साधनेकी अपेक्षा अच्छे व्यक्तियोंका मेल साधना हमेशा अधिक श्रेयस्कर है। यह विश्वास रखना कि बादमें
परिणाम अच्छा ही आयेगा--यही निष्काम कार्य है।
गाँवोंमें प्रवेश करनेकी दिशामें कुछ किया या नहीं?
पानीकी समस्याके बारेमें तुरन्त कुछ-न-कुछ करना। दुग्धालयका काम किस तरह चलता है? रामचन्द्र कोसके विरोधमें भाई पुरुषोत्तमने जो मुद्दे उठाये हैं उनपर
धैर्यपूर्वक विचार करना और समाधान ढूंढ़ निकालना।
मैं वहाँ जल्दी ही आऊँगा।
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७७६३) से।<br सौजन्य : राधाबहन चौधरी|2em}}
{{C|{{larger|'''२२०. पत्र: जानकीदेवी बजाजको'''}}}}
{{Right|अम्बोली, सावन्तवाड़ीके समीप, कोंकण<br>सोमवार [४ अप्रैल, १९२७]<ref>महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरीसे।</ref>}}
{{Left|चि॰ जानकीबहन,}}
तुम्हारे पाससे देवदासको आना पड़ा यह मुझे अच्छा नहीं लगा। किन्तु उससे वहाँ रहा नहीं गया, यह मैं समझ सकता हूँ। अब हो सकता है थोड़े ही दिनोंमें वह वहाँ फिर पहुँच जाये।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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{{Left|चि॰ मगनलाल }}
सर गंगारामका खेतीका अनुभव जाननेको उत्सुक हूँ।
शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
उसो तरहके मेलका भूखा हूँ। वह तो तभी सम्भव हो
स्वतः मेल रखती है, में सकता है जब हम सबको
स्वजन मानें। अनुभव बताता है कि अच्छे परिणामोंका मेल साधनेकी अपेक्षा अच्छे व्यक्तियोंका मेल साधना हमेशा अधिक श्रेयस्कर है। यह विश्वास रखना कि बादमें
परिणाम अच्छा ही आयेगा--यही निष्काम कार्य है।
गाँवोंमें प्रवेश करनेकी दिशामें कुछ किया या नहीं?
पानीकी समस्याके बारेमें तुरन्त कुछ-न-कुछ करना। दुग्धालयका काम किस तरह चलता है? रामचन्द्र कोसके विरोधमें भाई पुरुषोत्तमने जो मुद्दे उठाये हैं उनपर
धैर्यपूर्वक विचार करना और समाधान ढूंढ़ निकालना।
मैं वहाँ जल्दी ही आऊँगा।
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तुम्हारे पाससे देवदासको आना पड़ा यह मुझे अच्छा नहीं लगा। किन्तु उससे वहाँ रहा नहीं गया, यह मैं समझ सकता हूँ। अब हो सकता है थोड़े ही दिनोंमें वह वहाँ फिर पहुँच जाये।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
उसो तरहके मेलका भूखा हूँ। वह तो तभी सम्भव हो
स्वतः मेल रखती है, में सकता है जब हम सबको
स्वजन मानें। अनुभव बताता है कि अच्छे परिणामोंका मेल साधनेकी अपेक्षा अच्छे व्यक्तियोंका मेल साधना हमेशा अधिक श्रेयस्कर है। यह विश्वास रखना कि बादमें
परिणाम अच्छा ही आयेगा--यही निष्काम कार्य है।
गाँवोंमें प्रवेश करनेकी दिशामें कुछ किया या नहीं?
पानीकी समस्याके बारेमें तुरन्त कुछ-न-कुछ करना। दुग्धालयका काम किस तरह चलता है? रामचन्द्र कोसके विरोधमें भाई पुरुषोत्तमने जो मुद्दे उठाये हैं उनपर
धैर्यपूर्वक विचार करना और समाधान ढूंढ़ निकालना।
मैं वहाँ जल्दी ही आऊँगा।
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तुम्हारे पाससे देवदासको आना पड़ा यह मुझे अच्छा नहीं लगा। किन्तु उससे वहाँ रहा नहीं गया, यह मैं समझ सकता हूँ। अब हो सकता है थोड़े ही दिनोंमें वह वहाँ फिर पहुँच जाये।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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सर गंगारामका खेतीका अनुभव जाननेको उत्सुक हूँ।
शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
उसो तरहके मेलका भूखा हूँ। वह तो तभी सम्भव हो
स्वतः मेल रखती है, में सकता है जब हम सबको
स्वजन मानें। अनुभव बताता है कि अच्छे परिणामोंका मेल साधनेकी अपेक्षा अच्छे व्यक्तियोंका मेल साधना हमेशा अधिक श्रेयस्कर है। यह विश्वास रखना कि बादमें
परिणाम अच्छा ही आयेगा--यही निष्काम कार्य है।
गाँवोंमें प्रवेश करनेकी दिशामें कुछ किया या नहीं?
पानीकी समस्याके बारेमें तुरन्त कुछ-न-कुछ करना। दुग्धालयका काम किस तरह चलता है? रामचन्द्र कोसके विरोधमें भाई पुरुषोत्तमने जो मुद्दे उठाये हैं उनपर
धैर्यपूर्वक विचार करना और समाधान ढूंढ़ निकालना।
मैं वहाँ जल्दी ही आऊँगा।
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रितु कुमारी साव
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शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
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रितु कुमारी साव
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शिक्षकोंके साथ तुम्हारा मेल मुझे प्रिय है। लेकिन वह हार्दिक और स्वाभाविक हो, तभी। यदि ऐसा मेरी तबीयतके कारण हुआ है तो उसमें फिर कोई विघ्न उठ
खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
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रितु कुमारी साव
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खड़ा होगा। एक आँख जिस तरह दूसरी आँखके साथ
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धैर्यपूर्वक विचार करना और समाधान ढूंढ़ निकालना।
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''३६. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
२१ अक्टूबर, १९२९}}
<br>चि॰ ब्रजकिसन,
तुमारे पत्रका उत्तर आज तक मैं नहि दे सका हुं। माता...<ref>मूलमें यहाँ अस्पष्ट है।</ref> तुमारी भक्ति में समझ सकता हुं। तुमारा अन्तरात्मा जैसा कहे ऐसा हि करो। इसी भक्तिको अंतमें तो व्यापक सेवामें परिणत होना है। परंतु ऐसा परिणाम बलात्कारसे नहिं ला सकते हैं। जब ऐसा होगा तब भी मातृभक्ति में न्यूनता नहिं होगी पर वह भक्ति विशेष शुद्ध होगी। आज उसमें सात्विक मोह है।
अब स्वास्थ्य अच्छा होगा।
मैं दिल्ही १ नवेम्बरकी रात्रीका पहोंचुंगा।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
जी॰ एन॰ २३६८की फोटो नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''३७. पत्र : गिरिराजकिशोरको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
२२ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय गिरिराज<ref>एक आश्रमवासी जो बम्बई में चर्म-शोधनका प्रशिक्षण प्राप्त करने गये थे।</ref>,
आपका पत्र मिला। मुझे प्रताप पण्डितका पत्र भी मिला है। वे लिखते हैं कि वे निजी तौर पर आपमें दिलचस्पी ले रहे है। और आप जो कुछ कर रहे हैं उसपर वे निश्चय ही ध्यान रखेंगे। फिलहाल वे यह चाहते हैं कि जो-भी कुछ लिखितमें है उसे आप जो अनुभव आपको हो रहे हैं उन्हें देखते हुए पढ़ें और समझें। मेरा खयाल है कि ऐसा करना आपके लिए सबसे अच्छी बात होगी। आप चमड़ा व्यापारके अर्थशास्त्रपर सारा साहित्य प्राप्त करनेकी कोशिश भी करें। उसमें आपको उन तरीकोंको मजबूत बनानेकी काफी-कुछ सामग्री मिलेगी, जिन्हें हम अपना रहे हैं। पण्डितके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/६९
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||पत्र आर॰ थडानीको|३१}}</noinclude>पुस्तकालय में भी इस प्रकारका साहित्य अवश्य होगा। यदि न हो तो ऐसी पुस्तकें ढूँढ़ निकालने में किशोरीलाल आपकी सहायता कर सकेगा। आपको भारतके विभिन्न चर्मालय, चमड़ा व्यापारकी स्थिति, भारतकी आवश्यकताएँ, चमड़े के सामानका बाहरसे आयात, जर्मनीसे चमड़ा व्यापार छीनने में ब्रिटिश सरकारकी असमर्थताका इतिहास—इन सब चीजोंके बारेमें सामग्री इकट्ठी करनी चाहिए। यह सब पढ़ना बड़ा रोचक है। आपको बुखारसे बचे रहना चाहिए। और जब आपको ऐसा कुछ हो जाये तो एकदम उसका उपचार कीजिएगा। वैसे आपकी तबीयत कैसी चल रही है? मुझे आशा है कि आप आश्रमको नियमित रूपसे लिखते रहते होंगे।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६१७) की माइक्रोफिल्मसे।
{{c|{{x-larger|'''३८. पत्र : आर॰ थडानीको'''}}}}
{{right|मुकाम मसूरी<br>
२२ अक्टूबर, १९२९}}
<br>प्रिय थडानी,
आपका कृपापत्र मिला। गिरधारीके बारेमें आप जो भी कुछ कहते हैं उसकी मैं कद्र करता हूँ। मेरी अपनी राय यह है कि आप किसीको भी क्यों न रख लें, वह आपकी पेढ़ीका काम और साथमें खादीका भी काम ठीक तरहसे नहीं कर सकेगा। बिक्री में थोड़ा-बहुत फर्क पड़ सकता है; परन्तु उत्पादनके कामके लिए तो [एक आदमी] पूरे वक्तके लिए चाहिए; इसलिए यदि आपका लक्ष्य उत्पादन है तो आपको पूरे समय काम करनेवाला आदमी ही रखना चाहिए। आपको उसे अपनी तनख्वाह में से या अगर पेढ़ी चाहे तो उसकी आयमें से अलगसे कोई वेतन देना चाहिए। परन्तु पेढ़ीकी आयमें से देनेकी बात तो मेरे खयालसे मुमकिन नहीं है, और यदि हो भी तो यह शायद युक्तिसंगत नहीं है। वैसे ही आप अपनी आयमें से राष्ट्रीय कार्योंके लिए काफी-कुछ दे रहे हैं। यह बिलकुल ठीक बात होगी कि आप इस भागको अपनी देखभाल में खर्च करें और यह ध्यान रखें कि आपकी उत्पादन-योजना उन लोगों और जो आपके आसपास हैं, उनके बीच सफल होती है या नहीं। यदि आपके मनमें कोई ऐसी योजना हो तो निस्सन्देह गिरधारी इसके लिए उपयुक्त आदमी नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने लिए ऐसा काम निश्चित कर लिया है, जहाँ वे ज्यादा उपयोगी ढंगसे काम कर सकते हैं। गिरधारीने राष्ट्रीय कामको छोड़कर दूसरा काम क्यों अपनाया था, इसका कारण यह था कि गिरधारी अपनी भावी योजनाओं और भावी आवश्यकताओंके बारेमें स्वयं निश्चय नहीं कर सके थे। जहाँतक मैं उन्हें जान पाया हूँ, उन्होंने बहुत सोच-विचार और सलाह-मशविरेके बाद अब अपना काम चुन लिया है और वे सोचते हैं कि अब उनकी इच्छा अपने-आपको राष्ट्रीय सेवामें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/७०
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लगा देनेकी है। अब वे किसी सीमातक अपनी उचित इच्छाओंको राष्ट्र-सेवा द्वारा ही सन्तुष्ट करना चाहते हैं। इस तरहसे आप देखेंगे कि आपने जो दृष्टान्त दिया है वह गिरधारीके मामले में लागू नहीं होता।
{{right|हृदयसे आपका,}}
<br>श्रीयुत आर॰ थडानी
<br>बुरहानपुर (सी॰ पी॰)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६९८) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''३९. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|मसूरी<br>
२२ अक्टूबर, १९२९}}
<br>चि॰ वसुमती,
आशा है अलमोड़ाके सम्बन्धमें तुम्हें मेरा पत्र मिल गया होगा।<ref>१७ अक्टूबर का पत्र।</ref> अपनी उस रायपर मैं अब भी कामय हूँ। दिल्लीमें प्रभुदाससे<ref>छगनलाल गांधीके पुत्र।</ref> बातचीत करके यदि कोई अन्य बात सूझी तो मैं उसपर विचार करूँगा। यदि मैं अलमोड़ामें आश्रम स्थापित कर सका होता तो तुम्हें वहाँ अवश्य भेज देता। किन्तु सो तो हो नहीं सका और अब मुझे ऐसा लगता है कि यह हो भी नहीं सकेगा। आखिर अलमोड़ा जानेकी तुम्हारी इच्छा क्यों है, यह भी मुझे लिखना। यदि तुम्हें वहाँ अच्छा न लगता हो तो मैं कोई दूसरी जगह खोजूँ। पहाड़ पर ही जानेकी इच्छा हो तो ऐसे और भी स्थान हैं। तुम्हें अलमोड़ा भेजनेकी बातको लेकर मैं धर्मसंकटमें पड़ गया हूँ।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२७०) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१९५
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Sanjana Chowdhury
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||ग्राम-सुधार|१५७}}</noinclude>कहना एक पुराना सरकारी चलन है। सारे हिन्दुस्तान में मुझे लाखों स्त्रियोंसे मिलनेका मौका आया है। मैंने खुद गहनोंकी निन्दा की है और कई बहनोंके गहने छुड़ा लिये है। मैं मानता हूँ कि उनमें कोई सौन्दर्य नहीं है। लेकिन अगर रीति-रिवाजों में खर्च कर सकनेवालोंकी संख्या थोड़ी है, तो गहने खरीदने और जमा करनेवालोंकी संख्या उससे भी कम है करोड़ों स्त्रियाँ पत्थर या लकड़ीके घिनौने गहने पहनती हैं। कई बहनें पीतल या ताँबेके गहने पहनती हैं और कुछ चाँदीके कड़े और छड़े या पायजेब पहनती है। हजारोंमें किसी एकके हो शरीरपर कोई सोनेका गहना दिखाई देता होगा। इसलिए गहनोंको नकद रुपयोंमें बदलकर बैंक में जमा करनेकी सलाह तो मेरी राय में बिलकुल ठीक है, लेकिन जब ग्राम-सुधारके कार्यक्रमके एक अंगके रूप में उसका विचार करते हैं तो वह असंगत लगती है। यही बात आपसी
लड़ाई-झगड़के बारेमें कही जा सकती है। इसमें शक नहीं कि मुकदमेबाजी में जो पैसा खर्च किया जाता है, उसकी मात्रा बहुत बड़ी होती है और यह शर्मनाक चीज है; लेकिन यह भी उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास पैसा है। लाखों-करोड़ोंके पास नामको भी पैसा नहीं होता, और ग्राम-मुबारके कार्यक्रम में इन्हीं करोड़ों वेबस, अज्ञानी और निराश लोगोंका खयाल करना होता है।
गृहस्थीको सुखी बनानेके लिए श्री ब्रेन स्त्रियोंके साथ मानवीयताका बर्ताव चाहते हैं और उन्हें परमें ज्यादा आदरणीय और सच्ची सहधर्मिणियाँ बनाना चाहते हैं। वे लड़कोंके साथ लड़कियोंको भी जबतक वे बहुत बड़ी नहीं हो जातीं स्कूल भेजना चाहते हैं। वे बचपन में उनकी शादी नहीं कराना चाहते। वे बड़े उत्साहसे और बड़ी प्रांजल भाषामे स्त्रियोंके अधिकारोंका समर्थन करते हैं। यहाँ दो अनुच्छेद उद्धृत
किये जाते हैं, जो विचार करने लायक हैं:
{{Outdent|{{gap}}'''जब आपकी पत्नी के प्रसवका समय आता है, तब आप उसके लिए एक अंधेरा और गन्दा कमरा चुनते है और मेहतरानीको बुलाते हैं। जब आपका हाथ टूट जाता है, तब आप मेहतरको क्यों नहीं बुलाते? आप अपनी ही स्त्रियों में से कुछको दाईको तालीम क्यों नहीं दिलाते? भंगियोंकी स्त्रियाँ जिस तरह डाक्टर नहीं बन सकतीं, उस तरह वे दाई भी नहीं बन सकतीं। क्या आपकी पत्नीके लिए ऐसे नाजुक समयमें गाँवकी एक सबसे नीची जातिवाली स्त्रीकी देखरेखमें रहनेके बजाय अपने ही लोगों में से किसी एककी देखभाल में रहना कहीं ज्यादा अच्छा नहीं होता? ऊँची जातिकी स्त्रीके लिए नर्स या दाईके काम से बढ़कर और कोई गौरवका काम नहीं हो सकता।'''}{
{{Outdent|{{gap}}'''आप अपनी पत्नी और परिवार के लिए घरका सबसे अंधेरा और सबसे कम हवावाला हिस्सा सुरक्षित न रखें। घरमें उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि आपका। और उसका बीमार रहना भी आपके लिए उतना ही
बुरा है, जितना कि आपका खुद बीमार रहना। आप खेतोंमें जाकर अपनेको स्वस्थ रख सकते हैं। लेकिन आपकी स्त्रियों और बच्चोंको तो अधिक समय'''}}<noinclude></noinclude>
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||ग्राम-सुधार|१५७}}</noinclude>कहना एक पुराना सरकारी चलन है। सारे हिन्दुस्तान में मुझे लाखों स्त्रियोंसे मिलनेका मौका आया है। मैंने खुद गहनोंकी निन्दा की है और कई बहनोंके गहने छुड़ा लिये है। मैं मानता हूँ कि उनमें कोई सौन्दर्य नहीं है। लेकिन अगर रीति-रिवाजों में खर्च कर सकनेवालोंकी संख्या थोड़ी है, तो गहने खरीदने और जमा करनेवालोंकी संख्या उससे भी कम है करोड़ों स्त्रियाँ पत्थर या लकड़ीके घिनौने गहने पहनती हैं। कई बहनें पीतल या ताँबेके गहने पहनती हैं और कुछ चाँदीके कड़े और छड़े या पायजेब पहनती है। हजारोंमें किसी एकके हो शरीरपर कोई सोनेका गहना दिखाई देता होगा। इसलिए गहनोंको नकद रुपयोंमें बदलकर बैंक में जमा करनेकी सलाह तो मेरी राय में बिलकुल ठीक है, लेकिन जब ग्राम-सुधारके कार्यक्रमके एक अंगके रूप में उसका विचार करते हैं तो वह असंगत लगती है। यही बात आपसी
लड़ाई-झगड़के बारेमें कही जा सकती है। इसमें शक नहीं कि मुकदमेबाजी में जो पैसा खर्च किया जाता है, उसकी मात्रा बहुत बड़ी होती है और यह शर्मनाक चीज है; लेकिन यह भी उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास पैसा है। लाखों-करोड़ोंके पास नामको भी पैसा नहीं होता, और ग्राम-मुबारके कार्यक्रम में इन्हीं करोड़ों वेबस, अज्ञानी और निराश लोगोंका खयाल करना होता है।
गृहस्थीको सुखी बनानेके लिए श्री ब्रेन स्त्रियोंके साथ मानवीयताका बर्ताव चाहते हैं और उन्हें परमें ज्यादा आदरणीय और सच्ची सहधर्मिणियाँ बनाना चाहते हैं। वे लड़कोंके साथ लड़कियोंको भी जबतक वे बहुत बड़ी नहीं हो जातीं स्कूल भेजना चाहते हैं। वे बचपन में उनकी शादी नहीं कराना चाहते। वे बड़े उत्साहसे और बड़ी प्रांजल भाषामे स्त्रियोंके अधिकारोंका समर्थन करते हैं। यहाँ दो अनुच्छेद उद्धृत
किये जाते हैं, जो विचार करने लायक हैं:
{{Outdent|{{gap}}'''जब आपकी पत्नी के प्रसवका समय आता है, तब आप उसके लिए एक अंधेरा और गन्दा कमरा चुनते है और मेहतरानीको बुलाते हैं। जब आपका हाथ टूट जाता है, तब आप मेहतरको क्यों नहीं बुलाते? आप अपनी ही स्त्रियों में से कुछको दाईको तालीम क्यों नहीं दिलाते? भंगियोंकी स्त्रियाँ जिस तरह डाक्टर नहीं बन सकतीं, उस तरह वे दाई भी नहीं बन सकतीं। क्या आपकी पत्नीके लिए ऐसे नाजुक समयमें गाँवकी एक सबसे नीची जातिवाली स्त्रीकी देखरेखमें रहनेके बजाय अपने ही लोगों में से किसी एककी देखभाल में रहना कहीं ज्यादा अच्छा नहीं होता? ऊँची जातिकी स्त्रीके लिए नर्स या दाईके काम से बढ़कर और कोई गौरवका काम नहीं हो सकता।'''}}
{{Outdent|{{gap}}'''आप अपनी पत्नी और परिवार के लिए घरका सबसे अंधेरा और सबसे कम हवावाला हिस्सा सुरक्षित न रखें। घरमें उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि आपका। और उसका बीमार रहना भी आपके लिए उतना ही बुरा है, जितना कि आपका खुद बीमार रहना। आप खेतोंमें जाकर अपनेको स्वस्थ रख सकते हैं। लेकिन आपकी स्त्रियों और बच्चोंको तो अधिक समय'''}}<noinclude></noinclude>
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लड़ाई-झगड़के बारेमें कही जा सकती है। इसमें शक नहीं कि मुकदमेबाजी में जो पैसा खर्च किया जाता है, उसकी मात्रा बहुत बड़ी होती है और यह शर्मनाक चीज है; लेकिन यह भी उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास पैसा है। लाखों-करोड़ोंके पास नामको भी पैसा नहीं होता, और ग्राम-मुबारके कार्यक्रम में इन्हीं करोड़ों वेबस, अज्ञानी और निराश लोगोंका खयाल करना होता है।
गृहस्थीको सुखी बनानेके लिए श्री ब्रेन स्त्रियोंके साथ मानवीयताका बर्ताव चाहते हैं और उन्हें परमें ज्यादा आदरणीय और सच्ची सहधर्मिणियाँ बनाना चाहते हैं। वे लड़कोंके साथ लड़कियोंको भी जबतक वे बहुत बड़ी नहीं हो जातीं स्कूल भेजना चाहते हैं। वे बचपन में उनकी शादी नहीं कराना चाहते। वे बड़े उत्साहसे और बड़ी प्रांजल भाषामे स्त्रियोंके अधिकारोंका समर्थन करते हैं। यहाँ दो अनुच्छेद उद्धृत
किये जाते हैं, जो विचार करने लायक हैं:
{{Outdent|{{gap}}'''जब आपकी पत्नी के प्रसवका समय आता है, तब आप उसके लिए एक अंधेरा और गन्दा कमरा चुनते है और मेहतरानीको बुलाते हैं। जब आपका हाथ टूट जाता है, तब आप मेहतरको क्यों नहीं बुलाते? आप अपनी ही स्त्रियों में से कुछको दाईको तालीम क्यों नहीं दिलाते? भंगियोंकी स्त्रियाँ जिस तरह डाक्टर नहीं बन सकतीं, उस तरह वे दाई भी नहीं बन सकतीं। क्या आपकी पत्नीके लिए ऐसे नाजुक समयमें गाँवकी एक सबसे नीची जातिवाली स्त्रीकी देखरेखमें रहनेके बजाय अपने ही लोगों में से किसी एककी देखभाल में रहना कहीं ज्यादा अच्छा नहीं होता? ऊँची जातिकी स्त्रीके लिए नर्स या दाईके काम से बढ़कर और कोई गौरवका काम नहीं हो सकता।'''}}
{{Outdent|{{gap}}'''आप अपनी पत्नी और परिवार के लिए घरका सबसे अंधेरा और सबसे कम हवावाला हिस्सा सुरक्षित न रखें। घरमें उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि आपका। और उसका बीमार रहना भी आपके लिए उतना ही बुरा है, जितना कि आपका खुद बीमार रहना। आप खेतोंमें जाकर अपनेको स्वस्थ रख सकते हैं। लेकिन आपकी स्त्रियों और बच्चोंको तो अधिक समय'''}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||ग्राम-सुधार|१५७}}</noinclude>कहना एक पुराना सरकारी चलन है। सारे हिन्दुस्तान में मुझे लाखों स्त्रियोंसे मिलनेका मौका आया है। मैंने खुद गहनोंकी निन्दा की है और कई बहनोंके गहने छुड़ा लिये है। मैं मानता हूँ कि उनमें कोई सौन्दर्य नहीं है। लेकिन अगर रीति-रिवाजों में खर्च कर सकनेवालोंकी संख्या थोड़ी है, तो गहने खरीदने और जमा करनेवालोंकी संख्या उससे भी कम है करोड़ों स्त्रियाँ पत्थर या लकड़ीके घिनौने गहने पहनती हैं। कई बहनें पीतल या ताँबेके गहने पहनती हैं और कुछ चाँदीके कड़े और छड़े या पायजेब पहनती है। हजारोंमें किसी एकके हो शरीरपर कोई सोनेका गहना दिखाई देता होगा। इसलिए गहनोंको नकद रुपयोंमें बदलकर बैंक में जमा करनेकी सलाह तो मेरी राय में बिलकुल ठीक है, लेकिन जब ग्राम-सुधारके कार्यक्रमके एक अंगके रूप में उसका विचार करते हैं तो वह असंगत लगती है। यही बात आपसी
लड़ाई-झगड़के बारेमें कही जा सकती है। इसमें शक नहीं कि मुकदमेबाजी में जो पैसा खर्च किया जाता है, उसकी मात्रा बहुत बड़ी होती है और यह शर्मनाक चीज है; लेकिन यह भी उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास पैसा है। लाखों-करोड़ोंके पास नामको भी पैसा नहीं होता, और ग्राम-मुबारके कार्यक्रम में इन्हीं करोड़ों वेबस, अज्ञानी और निराश लोगोंका खयाल करना होता है।
गृहस्थीको सुखी बनानेके लिए श्री ब्रेन स्त्रियोंके साथ मानवीयताका बर्ताव चाहते हैं और उन्हें परमें ज्यादा आदरणीय और सच्ची सहधर्मिणियाँ बनाना चाहते हैं। वे लड़कोंके साथ लड़कियोंको भी जबतक वे बहुत बड़ी नहीं हो जातीं स्कूल भेजना चाहते हैं। वे बचपन में उनकी शादी नहीं कराना चाहते। वे बड़े उत्साहसे और बड़ी प्रांजल भाषामे स्त्रियोंके अधिकारोंका समर्थन करते हैं। यहाँ दो अनुच्छेद उद्धृत
किये जाते हैं, जो विचार करने लायक हैं:
{{Outdent|{{gap}}'''जब आपकी पत्नी के प्रसवका समय आता है, तब आप उसके लिए एक अंधेरा और गन्दा कमरा चुनते है और मेहतरानीको बुलाते हैं। जब आपका हाथ टूट जाता है, तब आप मेहतरको क्यों नहीं बुलाते? आप अपनी ही स्त्रियों में से कुछको दाईको तालीम क्यों नहीं दिलाते? भंगियोंकी स्त्रियाँ जिस तरह डाक्टर नहीं बन सकतीं, उस तरह वे दाई भी नहीं बन सकतीं। क्या आपकी पत्नीके लिए ऐसे नाजुक समयमें गाँवकी एक सबसे नीची जातिवाली स्त्रीकी देखरेखमें रहनेके बजाय अपने ही लोगों में से किसी एककी देखभाल में रहना कहीं ज्यादा अच्छा नहीं होता? ऊँची जातिकी स्त्रीके लिए नर्स या दाईके काम से बढ़कर और कोई गौरवका काम नहीं हो सकता।'''}}
{{Outdent|{{gap}}'''आप अपनी पत्नी और परिवार के लिए घरका सबसे अंधेरा और सबसे कम हवावाला हिस्सा सुरक्षित न रखें। घरमें उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि आपका। और उसका बीमार रहना भी आपके लिए उतना ही बुरा है, जितना कि आपका खुद बीमार रहना। आप खेतोंमें जाकर अपनेको स्वस्थ रख सकते हैं। लेकिन आपकी स्त्रियों और बच्चोंको तो अधिक समय'''}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||ग्राम-सुधार|१५७}}</noinclude>कहना एक पुराना सरकारी चलन है। सारे हिन्दुस्तान में मुझे लाखों स्त्रियोंसे मिलनेका मौका आया है। मैंने खुद गहनोंकी निन्दा की है और कई बहनोंके गहने छुड़ा लिये है। मैं मानता हूँ कि उनमें कोई सौन्दर्य नहीं है। लेकिन अगर रीति-रिवाजों में खर्च कर सकनेवालोंकी संख्या थोड़ी है, तो गहने खरीदने और जमा करनेवालोंकी संख्या उससे भी कम है करोड़ों स्त्रियाँ पत्थर या लकड़ीके घिनौने गहने पहनती हैं। कई बहनें पीतल या ताँबेके गहने पहनती हैं और कुछ चाँदीके कड़े और छड़े या पायजेब पहनती है। हजारोंमें किसी एकके हो शरीरपर कोई सोनेका गहना दिखाई देता होगा। इसलिए गहनोंको नकद रुपयोंमें बदलकर बैंक में जमा करनेकी सलाह तो मेरी राय में बिलकुल ठीक है, लेकिन जब ग्राम-सुधारके कार्यक्रमके एक अंगके रूप में उसका विचार करते हैं तो वह असंगत लगती है। यही बात आपसी
लड़ाई-झगड़के बारेमें कही जा सकती है। इसमें शक नहीं कि मुकदमेबाजी में जो पैसा खर्च किया जाता है, उसकी मात्रा बहुत बड़ी होती है और यह शर्मनाक चीज है; लेकिन यह भी उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास पैसा है। लाखों-करोड़ोंके पास नामको भी पैसा नहीं होता, और ग्राम-मुबारके कार्यक्रम में इन्हीं करोड़ों वेबस, अज्ञानी और निराश लोगोंका खयाल करना होता है।
गृहस्थीको सुखी बनानेके लिए श्री ब्रेन स्त्रियोंके साथ मानवीयताका बर्ताव चाहते हैं और उन्हें परमें ज्यादा आदरणीय और सच्ची सहधर्मिणियाँ बनाना चाहते हैं। वे लड़कोंके साथ लड़कियोंको भी जबतक वे बहुत बड़ी नहीं हो जातीं स्कूल भेजना चाहते हैं। वे बचपन में उनकी शादी नहीं कराना चाहते। वे बड़े उत्साहसे और बड़ी प्रांजल भाषामे स्त्रियोंके अधिकारोंका समर्थन करते हैं। यहाँ दो अनुच्छेद उद्धृत
किये जाते हैं, जो विचार करने लायक हैं:
{{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''जब आपकी पत्नी के प्रसवका समय आता है, तब आप उसके लिए एक अंधेरा और गन्दा कमरा चुनते है और मेहतरानीको बुलाते हैं। जब आपका हाथ टूट जाता है, तब आप मेहतरको क्यों नहीं बुलाते? आप अपनी ही स्त्रियों में से कुछको दाईको तालीम क्यों नहीं दिलाते? भंगियोंकी स्त्रियाँ जिस तरह डाक्टर नहीं बन सकतीं, उस तरह वे दाई भी नहीं बन सकतीं। क्या आपकी पत्नीके लिए ऐसे नाजुक समयमें गाँवकी एक सबसे नीची जातिवाली स्त्रीकी देखरेखमें रहनेके बजाय अपने ही लोगों में से किसी एककी देखभाल में रहना कहीं ज्यादा अच्छा नहीं होता? ऊँची जातिकी स्त्रीके लिए नर्स या दाईके काम से बढ़कर और कोई गौरवका काम नहीं हो सकता।'''}}
{{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''आप अपनी पत्नी और परिवार के लिए घरका सबसे अंधेरा और सबसे कम हवावाला हिस्सा सुरक्षित न रखें। घरमें उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि आपका। और उसका बीमार रहना भी आपके लिए उतना ही बुरा है, जितना कि आपका खुद बीमार रहना। आप खेतोंमें जाकर अपनेको स्वस्थ रख सकते हैं। लेकिन आपकी स्त्रियों और बच्चोंको तो अधिक समय'''}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{outdent|{{gap}}'''घरमें ही बिताना पड़ता है। इसलिए उन्हें घरका सबसे अच्छा और सबसे हवादार हिस्सा दें।'''}}
काव्यात्मक सौन्दर्यसे युक्त यह दूसरा हिस्सा देखिए:
{{outdent|{{gap}}'''ईश्वरको सृष्टिमें मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो अपने लड़के और लड़कीके बीच भेद करता है और लड़की को लड़केसे घटिया मानता है। आपकी माँ एक समय लड़की थी। आपकी पत्नी भी कभी लड़की ही थी। आपकी लड़कियाँ किसी समय माताएँ बनेंगी। अगर लड़कियां ईश्वरको घटिया सृष्टि हों, तो आप खुब भी घटिया हैं।'''}}
मुझे आशा है कि पाठक भी मेरे साथ कुत्तोंके बारेमें नीचे दिये गये अनुच्छेद की कद्र करेंगे:
{{outdent|{{gap}}'''कुत्ता मनुष्यका मित्र कहा जाता है। लेकिन गुड़गाँवमें उसके साथ स्त्रीके जैसा ही व्यवहार किया जाता है और वह मनुष्यका वुश्मन माना जाता है। आप चाहें तो कुता जरूर रखें, लेकिन फिर उसे नियमसे खाना दें, उसका कोई नाम रखें और उसके गलेमें पट्टा डालें, उसे अच्छी तरह सिखायें और ठीकसे उसकी देखभाल करें। लावारिस कुत्तोंको गाँव न भटकने दें। इस बातका ध्यान रखें कि वे आपके खानेको न बिगाड़े, रातमें भौंक-भौंककर आपकी नींद खराब न करें और अन्तमें पागल होकर आपको काटें नहीं।'''}}
उनकी पुस्तकमें और भी बहुत-सा कीमती मसाला है। उनकी बारीक दृष्टिसे गाँवका एक भी दोष नहीं बच पाया है। मेरी राय में ग्राम-शिक्षाके बारेमें उनके विचार बिलकुल सही हैं और उनमें शायद ही कोई नई बात जोड़ी जा सकती है। यहाँ नोचेका हिस्सा उद्धृत करनेका लोभ मैं संवरण नहीं कर सकता:
{{outdent|{{gap}}'''गाँव स्कूलका ध्येय गाँव के लोगोंको ज्यादा भले, ज्यादा बुद्धिमान, ज्यादा स्वस्थ और ज्यादा सुखी बनाना होना चाहिए। अगर किसानका लड़का स्कूलमें आता है, तो उसे स्कूलमें ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए कि जय वह लौटकर अपने पिताका हल हाथमें ले, तब पितासे भी जल्दी अपना काम संभाल ले और सारे कामकाजमें पितासे भी अधिक बुद्धिमानीका परिचय दे। सबसे बढ़कर तो बच्चोंको स्कूलमें यह सीखना चाहिए कि स्वस्थ जीवन कैसे बिताया जाये और महामारियों से खुदको कैसे बचाया जाये। जिनके आगे चलकर अन्धे हो जाने, किसी न किसी रूपमें शरीरसे अपंग हो जाने या बालिग होनेके पहले ही मर जानेकी संभावना हो उन बच्चोंको शिक्षा देनेसे क्या लाभ? यदि उनके घर गन्दे और कष्टदायक बने रहें तो शिक्षाका क्या उपयोग होगा? महामारियाँ पूरेके पूरे परिवारोंको साफ कर देती हैं या बच्चोंको अन्धा या अपंग बना देती है?'''}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
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काव्यात्मक सौन्दर्यसे युक्त यह दूसरा हिस्सा देखिए:
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''ईश्वरको सृष्टिमें मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो अपने लड़के और लड़कीके बीच भेद करता है और लड़की को लड़केसे घटिया मानता है। आपकी माँ एक समय लड़की थी। आपकी पत्नी भी कभी लड़की ही थी। आपकी लड़कियाँ किसी समय माताएँ बनेंगी। अगर लड़कियां ईश्वरको घटिया सृष्टि हों, तो आप खुब भी घटिया हैं।'''}}
मुझे आशा है कि पाठक भी मेरे साथ कुत्तोंके बारेमें नीचे दिये गये अनुच्छेद की कद्र करेंगे:
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''कुत्ता मनुष्यका मित्र कहा जाता है। लेकिन गुड़गाँवमें उसके साथ स्त्रीके जैसा ही व्यवहार किया जाता है और वह मनुष्यका वुश्मन माना जाता है। आप चाहें तो कुता जरूर रखें, लेकिन फिर उसे नियमसे खाना दें, उसका कोई नाम रखें और उसके गलेमें पट्टा डालें, उसे अच्छी तरह सिखायें और ठीकसे उसकी देखभाल करें। लावारिस कुत्तोंको गाँव न भटकने दें। इस बातका ध्यान रखें कि वे आपके खानेको न बिगाड़े, रातमें भौंक-भौंककर आपकी नींद खराब न करें और अन्तमें पागल होकर आपको काटें नहीं।'''}}
उनकी पुस्तकमें और भी बहुत-सा कीमती मसाला है। उनकी बारीक दृष्टिसे गाँवका एक भी दोष नहीं बच पाया है। मेरी राय में ग्राम-शिक्षाके बारेमें उनके विचार बिलकुल सही हैं और उनमें शायद ही कोई नई बात जोड़ी जा सकती है। यहाँ नोचेका हिस्सा उद्धृत करनेका लोभ मैं संवरण नहीं कर सकता:
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||ग्राम-सुधार|१५९}}</noinclude>{{gap}}यह उद्देश्य सिद्ध करनेके लिए श्री ब्रेन ऐसे व्यक्तिको ग्राम-शिक्षक बनाने की सलाह नहीं देते, जो केवल लिखना पढ़ना और गणित ही लोगोंको सिखा सके।
उनकी रायमें उसे सच्चा ग्रामनेता बनना चाहिए; उसे प्रकाश और संस्कृतिका केन्द्र जैसा होना चाहिए, जिसपर लोगोंका भरोसा हो, जिसके सामने वे अपनी समस्याएँ
रखें और जिससे वे शंका या कठिनाईके समय सलाह-मशविरा करें।
{{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''शिक्षकको प्राम-जीवन में अपना उचित स्थान ग्रहण करना और उसकी रक्षा करनी चाहिए। उसे अपने उपदेशको आचरणमें उतारना चाहिये और सुधारके जिन उपायोंको वह सुझाये, उन्हें अपने हाथसे करके उदाहरण उपस्थित करे। श्रमकी प्रतिष्ठा और समाज-सेवाकी प्रतिष्ठा ही उसका जीवन-मन्त्र होना चाहिए। और जिस तरह उसे पढ़ना और लिखना सिखानके लिए तैयार रहना चाहिए, उसी तरह गांवकी सफाई करने के लिए या लोहेका हल सुधारनेके लिए भी तैयार रहना चाहिए।'''}}
अब मुझे अधिक न कहकर ग्राम-सुधार सम्बन्धी साहित्य में बहुमूल्य सामग्रीकी वृद्धि करनेवाली इस पुस्तकको पढ़नेकी सिफारिश करके ही सन्तोष करना चाहिए। यह योजना अपने-आपमें कुल मिलाकर अच्छी और व्यवहार में आने लायक है। अगर लाला देशराजकी जानकारीपर भरोसा किया जाये-और मैं मानता हूँ कि उसपर भरोसा किया जाना चाहिए-तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि उसके अमलका
ढंग बहुत ही दोषपूर्ण रहा। लेकिन इसका कारण श्री ग्रेन और उनके साथियोंमें इच्छाशक्ति और प्रयत्नकी कमी होकर सरकारी वातावरण और पुरानी लोकपर चलकर काम करनेका ढंग हो था; उसपर वे और उनके साथ काम करनेवाले लोग विजय नहीं पा सके। लेकिन यह एक ऐसा दोष है, जिसको उनकी स्थिति में काम करते हुए हममें से भी हर व्यक्तिको जूझना पड़ता। मैं जानता हूँ कि श्री ब्रेन हिन्दु-स्तानको बदनाम करते रहे हैं और अपने अंग्रेज श्रोताओंके सामने ऐसे निष्कर्ष प्रस्तुत
करते रहे हैं, जिनपर वे अपने सीमित निरीक्षणके बलपर पहुँचे थे उनके श्रोता उन निष्कर्षोको शायद चुनौती नहीं दे सकते और उतनी दूरीपर वे निष्कर्ष हिन्दुस्तान के बनिस्बत कहीं ज्यादा बढ़े-चढ़े रूप में दिखाई देते होंगे। लेकिन मैंने उनकी पुस्तकके अपने पर्यालोचनपर अंग्रेजके नाते उनकी निन्दाओं या उनके प्रयोगकी स्पष्ट असफलताका कोई प्रभाव नहीं पड़ने दिया है। मैं खुद ग्राम-सुधारमें गहरी दिलचस्पी रखनेवाला एक सुधारक हूँ और इसलिए ईमानदारीसे लिखी गई इस पुस्तकमें से मैं जो कुछ भी अच्छी बातें निकाल सका, उन्हें मैंने यहां निकालकर रखनेका प्रयत्न किया है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १४-११-१९२९|1em}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७१. मेरी स्थिति'''}}}}
इधर अंग्रेज मित्र ‘समुद्री तार’<ref>उदाहरणार्थं '''डेली एक्सप्रेस''' और ए॰ फेनर ब्राॅकवेसे मिळे तार, देखिए “तार: '''डेली एक्सप्रेसको'''”, ३-११-१९२९ और “पत्र: ए॰ फेनर ब्राॅकवेको”, १४-१२-१९२९।</ref> द्वारा बराबर मेरे नाम-शायद औरोंको भी-सन्देशे भेज रहे हैं। संक्षेप में, उनका यही कहना है कि मैं मजदूर सरकारसे सहयोग करके उसे भारत की मदद करने मेंb सहायता पहुँचाऊँ। संयुक्त वक्तव्यके<ref>देखिए “सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य”, २-११-१९२९।</ref> प्रकाशित हो जानेपर, जिसपर औरोंके साथ मैंने भी हस्ताक्षर किये हैं, मेरे लिए कुछ विशेष कहने या करने को नहीं रह जाता है। तथापि शायद मैं अपने व्यक्तिगत मित्रोंके प्रति, जो मेरे विचारों और कार्योंमें दिलचस्पी रखते हैं, और प्रेमपूर्वक मुझसे हमेशा सही बात सोचने या करनेकी आशा रखते हैं अपनी स्थितिको निश्चित रूपसे अधिक स्पष्ट कर देनेपर बाध्य हूँ; क्योंकि शायद एक संयुक्त वक्तव्य में ऐसा स्पष्टीकरण कभी संभव नहीं होता।
जिस बातको मैं इन स्तम्भों में बार-बार कह चुका हूँ उसीको फिर दोहराकर कहता हूँ कि में सहयोग के लिए मर रहा हूँ। मिथ्या सहयोगके बदले में सच्चे और हार्दिक सहयोगके लिए हृदयसे उत्सुक हूँ और मेरा असहयोग इसी उत्सुकताका चिह्न है। इसी कारण अवसर मिलते ही मैंने उसका तत्काल उत्तर दिया है। लेकिन कलकत्ता कांग्रेसके प्रसिद्ध प्रस्तावकी<ref>देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ ३२७-३१।</ref> भाँति ही मेरे लेखे संयुक्त वक्तव्यका मी प्रत्येक शब्द सोद्देश्य है। दोनों किसी भी तरह एक दूसरेके विरोधी नहीं है। अगर किसी दस्तावेज के भाव सुरक्षित रखे जायें तो उसके शब्दोंको ही पकड़े रहना कोई मूल्य नहीं रखता। मैं औपनिवेशिक स्वराज्यके विधानकी प्रतीक्षा कर सकता हूँ, बशर्ते कि मैं सच्चा और अमली औपनिवेशिक स्वराज्य पा सकूं, अर्थात् ब्रिटिश जनताका सच्चा हृदय परिवर्तन हो जाये और वह सच्चे दिलसे भारतको एक स्वतन्त्र और स्वाभिमानी राष्ट्र देखना चाहे तथा भारतके सरकारी अफसर भी सच्चे भावसे भारतकी सेवा करने लगे। लेकिन यह तो तभी हो सकता है जब फौलादी संगीनोंके बदले लोगोंकी सद्भावनाएँ सर्वोपरि मानी जायें। क्या अंग्रेज स्त्री-पुरुष तोपों और मशीनगनोंसे लैस अपने किलों की अपेक्षा अपने जानोमालकी रक्षा के लिए भारतवासियोंकी सद्भावनाओंवर विश्वास करने को तैयार है? अगर वे अभी तक इसके लिए तैयार नहीं हैं, तो कोई औपनिवेशिक स्वराज्य मुझे सन्तुष्ट नहीं कर सकता। मेरे मनके औपनिवेशक स्वराज्यका अर्थ यह है कि अगर मैं चाहूँ तो आज ही ब्रिटिश सल्तनत से अपना नाता तोड़ सकूँ। अतएव भारत और ब्रिटेनके बीच सम्बन्धका विनियमन करने में जोर या जबर्दस्तीकी कहीं गुंजाइश नहीं है। अगर मैं साम्राज्य में रहना पसन्द<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१९९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||राजाओंकी आय|१६१}}</noinclude>करूँ तो वह उसे अपना भागीदार बनाकर मैं संसारमें शान्ति और सद्भावकी वृद्धि करनेकी दृष्टिसे, न कि इसलिए कि उससे ब्रिटेनकी साम्राज्य-लिप्साको या उसकी शोषण नीतिको बढ़ावा मिले। यह बहुत सम्भव है कि जिन बातोंका मैंने ऊपर जिक्र किया है, मजदूर सरकारने उनकी कल्पना भी न की हो। मेरे विचारमें, इस गर्भित अर्थका जिक्र करके मैंने वक्तव्यके अर्थका विस्तार नहीं किया है। वक्तव्यमें इन सब गमित बातोंका समावेश होता हो या न होता हो, विलायत और भारत में बसनेवाले
मित्रोंका यह कर्त्तव्य है कि वे मेरी मूल परिस्थितिको अच्छी तरह समझ लें। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जिन बातोंका जिक्र किया है, उन सबके लिए भारत अभी पूरी तरह समर्थ नहीं हो पाया है। अतएव अगर औपनिवेशिक स्वराज्य आज ही मिलता है तो अधिकांश रूपमें उसका मिलना अंग्रेज जनताके सद्भावोंपर निर्भर रहेगा। इस मौकेपर उनके द्वारा सद्भाव प्रकट करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं होगी।
हाँ, अवतक अंग्रेजोंने भारतको जो हानि पहुँचाई है, इससे उसका थोड़ा प्रायश्चित्त
जरूर हो जायेगा।
लेकिन अगर भारतकी स्वराज्य-प्राप्तिका समय अभी परिपक्व नहीं हुआ है, तो मैं धैर्यपूर्वक उसकी प्रतीक्षा करूँगा। मैं इसी ध्येयके लिए जिन्दा रह सकता और काम कर सकता हूँ। मैं मानता हूँ कि मेरी ये बातें अपनी व्यक्तिगत बातें हैं। इनसे भारतके करोड़ों लोगोंका मत कहाँतक प्रकट होता है, यह तो कोई भी नहीं कह सकता, मैं तो कदापि नहीं कह सकता।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १४-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१७२. राजाओंकी आय'''}}}}
एक सज्जनने कठोर भाषामें एक पत्र भेजा है। पत्रमें उन आँकड़ोंका सार दिया गया है जो यूरोपके विभिन्न राजा अपनी रियासतोंकी आमदनीके प्रति १३५० में रु॰ से लेते हैं और फिर पत्रमें इसकी तुलना केवल एक महाराजा अर्थात् मैसूरके महाराजाको जो आमदनी होती है उससे की गई है। इस पत्र में से मैं निम्नलिखित
उद्धरण दे रहा हूँ।<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने १९२६ की '''स्टेट्समैन इयर बुकने''' से लिये गये प्रस्तुत किये थे।</ref>
मुझे नहीं मालूम कि पत्र लेखक द्वारा दिये गये आँकड़े लगभग भी सही है या नहीं<ref>पत्र-लेखक अपने आँकड़ोंको ‘लगभग सही’ कहा था।</ref>। यदि कोई व्यक्ति पूरक आंकड़े देकर पत्र लेखकके आँकड़ोंको परिपूर्ण कर सके तो वे आँकड़े राजाओं और जनता दोनोंके लिए अत्यन्त उपयोगी अध्ययनका<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}
{{left|४२-११}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२००
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>विषय होंगे। यदि यह कल्पना कर ली जाये कि आँकड़े सही हैं तो वे भारतीय राजाओंके लिए गहन सोच-विचारकी सामग्री प्रस्तुत करते हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १४-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१७३. संयुक्त प्रान्तका दौरा<ref>देखिए “संयुक्त प्रान्तका दौरा”, २४-१०-१९२९ की पाद-टिप्पणी।</ref>-९'''}}}}
{{c|'''दिल्लीमें'''}}
दिल्ली में गांधीजीके सामने बहुत ही व्यस्त कार्यक्रम था वे उसे जैसे-तैसे बड़ी ही मुश्किलसे पूरा कर पाये क्योंकि उन्हें न केवल अपने दौरेके कार्यक्रम ही पूरे करने थे बल्कि कार्यसमितिके सदस्योंकी अप्रत्याशित बैठक तथा इन सदस्यों और पण्डित मोतीलाल नेहरू तत्काल आमन्त्रणपर दिल्ली आये नेताओंकी संयुक्त बैठक में भी भाग लेना था। खैर, मुझे राजनैतिक सभाकी बात छोड़ ही देनी चाहिए; क्योंकि वह दौरेका अंग नहीं थी और उसका परिणाम जनताके सामने आ ही चुका है। दौरेका कार्यक्रम जामिया जानेसे शुरू हुआ। जामियाकी ओरसे खादीके लिए ५०० रु० की थैली स्वीकार करते हुए गांधीजीने जो छोटा किन्तु उदात्त भाषण दिया उससे वह मौका एक पवित्र उत्सव बन गया। साफ दिख रहा था कि वे भाव-विभोर होकर बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं जितनी भी वार दिल्ली आता हूँ, मुझे दुःख होता है क्योंकि यहाँ श्रद्धानन्दजीकी हत्या हुई और हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए हैं। मैं इसे हकीम साहब अजमलखाँ और श्रद्धानन्दजीकी दिल्ली कहना पसन्द करता था। खेद है कि अब यह उनकी दिल्ली नहीं है। लेकिन मुझे इस बातसे आश्वासन मिला कि दिल्लीमें पहला जलसा जामियासे शुरू हुआ; दिल्ली में इसकी स्थापनाके लिए मुख्य रूपसे हकीम साहब ही जिम्मेदार थे। मैं जामियाके बच्चोंसे हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करनेकी बहुत ही अधिक आशा करता हूँ और मैं उनसे यह भी आशा रखता हूँ कि ये साम्प्रदायिक भावनाओं और पूर्वग्रहोंसे अछूते रहेंगे। यहाँके विद्यार्थियोंको कमसे कम इतना तो हकीम साहबकी स्मृति में और इन शिक्षकोंके आत्मत्यागकी खातिर जो जामिया को तैयार करनेमें अपना जीवन लगा रहे हैं, करना ही चाहिए। जामियासे हमारा दल मोटरसे इन्द्रप्रस्थके गुरुकुल गया जो दिल्लीसे लगभग १४ मील पर एक अच्छे ऊँचे लम्बे-चौड़े क्षेत्रमें स्थित है। शिक्षकों, छात्रों और नौकरों सबने मिलाकर कुछ ८५५ रु० थैलीके लिए दिये जो शायद अबतक किसी भी शैक्षणिक संस्थासे मिली रकमकी अपेक्षा, देनेवालोंके अनुपातको देखते हुए सबसे अधिक थी। इस गुरुकुलमे १४१ विद्यार्थी हैं। उनके चन्देकी तफसील भी दिलचस्प है। नौकरोंने ३६-४-० रु॰ दिये; खास तौरपर इसके लिए श्रम करके उससे प्राप्त ८०-८-६ रु॰<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||संयुक्त प्रान्तका दौरा-९|१६३}}</noinclude>विद्यार्थियोंने दिये, विद्यार्थियोंने अपने कपड़ोंमें कुछ कमी करके ५७०-८-० रु॰ बचाये और शिक्षकोंने १८६-४-० रु॰ दिये; इस तरह कुल रकम ८५५-८-६ रु॰ हुई। इसके अलावा विद्यार्थियोंने बहुत बड़े परिमाणमें सूत भी दिया। गुरुकुलोंकी यह विशेष बात रही है कि वे अपना चन्दा शारीरिक श्रम द्वारा और अपनी जरूरतकी चीजोंका
त्याग करके जुटाते हैं। यहां भी गांधीजीने फिर वही सन्देश दुहराया जो उन्होंने जामियाके छात्रोंको दिया था। उन्होंने उन्हें बताया कि श्रद्धानन्दजीकी हत्याका प्रायश्चित्त करनेका एकमात्र तरीका यह है कि वे अपने आपको वहाँ हिन्दूधर्मका ज्ञान संपादन करके निर्मल बनायें। दोपहर बाद नगरपालिकाका अभिनन्दनपत्र लेनेके लिए सभा थी। उसके बाद क्रमशः महिलाओंकी, विद्यार्थियोंकी और फिर आम सभा हुई। महिलाओंने जो दिया वह उल्लेखनीय है। उसमें काफी बड़ी मात्रामें आभूषणोंके अलावा एक हजार रुपयोंसे ऊपरकी रकम भी थी। जिस राजनीतिक सभाका मैं उल्लेख कर चुका हूँ, उसके कारण शामका सारा कार्यक्रम अस्त-व्यस्त हो गया था।स्त्रियाँ जो २ बजे इकट्ठा हुई थी साढ़े छः तक धैर्यपूर्वक इन्तजार करती रहीं और फिर भी उनमें कोई क्रोध, उदासी या अधैर्य दिखलाई नहीं दिया। भारतको अपनी ऐसी नारियों पर, जो इतनी सहिष्णु हो सकती हैं, गर्व होना ठीक ही है। पाठकोंका यह सोचना कि इस सभा में जो स्त्रियां बहुत बड़ी संख्या में इकट्ठा हुई थीं अशिक्षित रही होंगी, सही नहीं होगा। इसके विपरीत उनमें बहुत-सी तो उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं थीं; लेकिन उन्हें मालूम था कि गांधीजी विवश है और इसलिए अपनी स्वाभाविक उदारता से उन्होंने गांधीजोको उस असुविधाके लिए क्षमा कर दिया, जो निस्सन्देह उन्हें हुई थी। उनमें से अनेक बहनें तो सभामें शामिल होनेके लिए अपने छोटे-छोटे बच्चे घर छोड़कर आई थीं। दिल्लीमें हुई अन्य सभाओंकी बात छोड़कर अब में पाठकोंको अलीगढ़का हाल बताऊँगा। अलीगढ़ जाते हुए रास्ते में कई स्थानोंका दौरा किया; उनकी भी बात छोड़े दे रहा हूँ।
{{c|'''अलीगढ़ में'''<ref>३ नवम्बरको।</ref>}}
मुस्लिम-विश्वविद्यालयके उपकुलपतिने गांधीजीको विद्यार्थियोंके समक्ष भाषण देनेके
लिए निमंत्रित किया था। जिस हाल में उन्होंने भाषण<ref>देखिए “भाषण: मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़में”, ४-१२-१९२९।</ref> दिया यह इतना ठसाठस भरा था कि दम घुटनेवाला हो रहा था । उपकुलपति श्री हॉर्नने अध्यक्षता की। इस सभामें। गांधी जी का विश्वविद्यालय संघका सम्मानार्थं आजीवन सदस्य बनाया गया।उनका भाषण विश्वविद्यालयके विद्यार्थियोंसे एक भावपूर्ण अपील थी। उन्होंने कहा कि वे देशके और इस्लामके गोखले सरीखे सेवक तैयार करें। गांधीजीने विद्यार्थियोंको द्वितीय खलीफा उमरकी सादगीकी याद दिलाई और उन्हें बताया कि यद्यपि संसारकी दौलत उनके चरणोंमें थी फिर भी उन्होंने अपने आपको हर तरह की सुख-सुविधा और ऐशो-आरामकी चीजोंसे वंचित रखा और जब उनके साथियोंने खुरदरी खादीके बजाय मुलायम रेशमी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||संयुक्त प्रान्तका दौरा-९|१६३}}</noinclude>विद्यार्थियोंने दिये, विद्यार्थियोंने अपने कपड़ोंमें कुछ कमी करके ५७०-८-० रु॰ बचाये और शिक्षकोंने १८६-४-० रु॰ दिये; इस तरह कुल रकम ८५५-८-६ रु॰ हुई। इसके अलावा विद्यार्थियोंने बहुत बड़े परिमाणमें सूत भी दिया। गुरुकुलोंकी यह विशेष बात रही है कि वे अपना चन्दा शारीरिक श्रम द्वारा और अपनी जरूरतकी चीजोंका
त्याग करके जुटाते हैं। यहां भी गांधीजीने फिर वही सन्देश दुहराया जो उन्होंने जामियाके छात्रोंको दिया था। उन्होंने उन्हें बताया कि श्रद्धानन्दजीकी हत्याका प्रायश्चित्त करनेका एकमात्र तरीका यह है कि वे अपने आपको वहाँ हिन्दूधर्मका ज्ञान संपादन करके निर्मल बनायें। दोपहर बाद नगरपालिकाका अभिनन्दनपत्र लेनेके लिए सभा थी। उसके बाद क्रमशः महिलाओंकी, विद्यार्थियोंकी और फिर आम सभा हुई। महिलाओंने जो दिया वह उल्लेखनीय है। उसमें काफी बड़ी मात्रामें आभूषणोंके अलावा एक हजार रुपयोंसे ऊपरकी रकम भी थी। जिस राजनीतिक सभाका मैं उल्लेख कर चुका हूँ, उसके कारण शामका सारा कार्यक्रम अस्त-व्यस्त हो गया था।स्त्रियाँ जो २ बजे इकट्ठा हुई थी साढ़े छः तक धैर्यपूर्वक इन्तजार करती रहीं और फिर भी उनमें कोई क्रोध, उदासी या अधैर्य दिखलाई नहीं दिया। भारतको अपनी ऐसी नारियों पर, जो इतनी सहिष्णु हो सकती हैं, गर्व होना ठीक ही है। पाठकोंका यह सोचना कि इस सभा में जो स्त्रियां बहुत बड़ी संख्या में इकट्ठा हुई थीं अशिक्षित रही होंगी, सही नहीं होगा। इसके विपरीत उनमें बहुत-सी तो उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं थीं; लेकिन उन्हें मालूम था कि गांधीजी विवश है और इसलिए अपनी स्वाभाविक उदारता से उन्होंने गांधीजोको उस असुविधाके लिए क्षमा कर दिया, जो निस्सन्देह उन्हें हुई थी। उनमें से अनेक बहनें तो सभामें शामिल होनेके लिए अपने छोटे-छोटे बच्चे घर छोड़कर आई थीं। दिल्लीमें हुई अन्य सभाओंकी बात छोड़कर अब में पाठकोंको अलीगढ़का हाल बताऊँगा। अलीगढ़ जाते हुए रास्ते में कई स्थानोंका दौरा किया; उनकी भी बात छोड़े दे रहा हूँ।
{{c|'''अलीगढ़ में'''<ref>३ नवम्बरको।</ref>}}
मुस्लिम-विश्वविद्यालयके उपकुलपतिने गांधीजीको विद्यार्थियोंके समक्ष भाषण देनेके लिए निमंत्रित किया था। जिस हाल में उन्होंने भाषण<ref>देखिए “भाषण: मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़में”, ४-१२-१९२९।</ref> दिया यह इतना ठसाठस भरा था कि दम घुटनेवाला हो रहा था । उपकुलपति श्री हॉर्नने अध्यक्षता की। इस सभामें।गांधी जी का विश्वविद्यालय संघका सम्मानार्थं आजीवन सदस्य बनाया गया।उनका भाषण विश्वविद्यालयके विद्यार्थियोंसे एक भावपूर्ण अपील थी। उन्होंने कहा कि वे देशके और इस्लामके गोखले सरीखे सेवक तैयार करें। गांधीजीने विद्यार्थियोंको द्वितीय खलीफा उमरकी सादगीकी याद दिलाई और उन्हें बताया कि यद्यपि संसारकी दौलत उनके चरणोंमें थी फिर भी उन्होंने अपने आपको हर तरह की सुख-सुविधा और ऐशो-आरामकी चीजोंसे वंचित रखा और जब उनके साथियोंने खुरदरी खादीके बजाय मुलायम रेशमी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३२८
भाषण : अखिल भारतीय दतिलवर्ग सम्मेलनमें'''}}
{{Rh|||२४ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}महात्मा गांधीने दलितवर्ग सम्मेलनमें अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा :
किसी अनजान आदमीपर बम फेंककर कभी स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त की जा
सकती । में इसे अत्यन्त निन्दनीय अपराध मानता हूँ।
{{Gap}}उन्होंने कहा कि संसारकी कोई भी दूसरी शक्ति स्वतन्त्रता प्राप्ति में बाधा नहीं
बन सकती; हमारी अपनी कमजोरियां ही हमारी सबसे बड़ी शत्रु हैं। आगे बोलते
हुए महात्माजीने अछूतोंसे अनुरोध किया कि वे अपनी सारी सामाजिक बुराइयाँ
दूर कर दें, शराब पीना और मरे हुए जानवरोंका मांस खाना बन्द कर दें। उन्होंने
सफाई और शिक्षा आदिपर जोर दिया। उन्होंने उनके पूर्व पुरुष और रामायण 'के
रचयिता ऋषि वाल्मीकिको श्रद्धांजलि अर्पित की और अछूतोंसे उनका अनुकरण
करनेका आग्रह किया।
{{Gap}}मदिरों में प्रवेश के प्रश्नका जिक्र करते हुए महात्मा गांधीने कहा कि बल प्रयोग
करके मन्दिरों में दाखिल होना सत्याग्रह नहीं है। आपको सत्याग्रह मुझसे सीखना
चाहिए। उन्होंने पाँच साल पहले दक्षिण भारत में वाइकोम सत्याग्रहका दृष्टान्त
दिया। उन्होंने कहा कि बल प्रयोग चाहे वह अंग्रेजों द्वारा किया जाये या भारतीयों
द्वारा अपराध है। आपको मन्दिर प्रवेशके लिए उच्च जातिके लोगोंको वाध्य नहीं
करना चाहिए। आप बल प्रयोग द्वारा ईश्वरके दर्शन नहीं कर सकते। ईश्वर आपके
हृदयमें विद्यमान है, मन्दिरों और मस्जिदोंमें नहीं। उन्होंने अछूतोंको सलाह दी कि
वे से कष्टों को सहन करें और प्रार्थना करें कि उच्च जातिके लोगोंको क्रूरता
समाप्त हो जाये ।
{{Gap}}भाषण जारी रखते हुए महात्मा गांधीने कहा कि भारतीयोंके एक बड़े वर्गने
पण्डित मालवीय और सेठ जमनालाल बजाजके पथ-प्रदर्शनमें कांग्रेसकी अछूत विरोधी
समितिके नेतृत्व में छुआछूतको समाप्त करनेका प्रण किया है। यदि वे छुआछूत दूर
नहीं कर सकते और हिन्दू-मुसलमानोंमें सच्ची एकता नहीं ला सकते तो जन-साधारणके
लिए स्वराज्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने
घोषणा की
स्वराजकी कुंजी लन्दन में या बाइसरायके पास नहीं है परन्तु वह भारतीयोंके
अपने हाथमें है।
{{Gap}}इसके बाद उन्होंने लालाजी स्मारक कोषके लिए अपील की।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<br>हिन्दुस्तान टाइम्स, २७-१२-१९२९
{{Gap}}२. देखिए खण्ड २६<noinclude></noinclude>
bggvkjpu03wgxrrbgcev847yc35khg7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६१
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Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३२९. टिप्पणिया'''}}
{{C|'''दोषपूर्ण निर्णय'''}}
{{Gap}}श्रीयुत च० राजगोपालाचारी द्वारा इकट्ठे किये हुए आंकड़ोंके अनुसार मद्रासने
मद्य और मादक द्रव्योंपर जो खर्च किया वह १६,८३,००,००० ३० अर्थात् करीब
सत्तरह करोड़ रुपयेका बैठता है। इससे जो राजस्व प्राप्त हुआ वह ५,१०,००,००० रु०
अर्थात् पाँच करोड़से कुछ ऊपर था। इसलिए कुल अपव्यय, हम कह सकते हैं,
११ करोड़ था। यह भू-राजस्वकी अपेक्षा चार करोड़से भी कुछ ज्यादा है ।
ये आंकड़े चौका देनेवाले हैं और सुधारकको सोचनेके लिए बाध्य कर देते हैं। परन्तु
इससे भी बुरा लक्षण तो अभी सामने आना है। श्री राजगोपालाचारीकी बारीक
दृष्टिने यह भी लक्षित किया है कि शराबपर किया जानेवाला खर्च और आबकारी
कानूनोंके प्रति किये जानेवाले अपराध भी हर साल बढ़ते रहते हैं। सूचना दी गई
हैं कि मद्रास सरकार इन आंकड़ोंसे इस दोषपूर्ण निष्कर्षपर पहुंची है :
{{Gap}}प्रेसीडेंसी के सब भागों में आबकारी कानूनोंके खिलाफ अपराधोंकी
लगातार वृद्धि होती दिखाई दे रही है; उसकी वजहसे वैध शराबके वितरणकी
कटौतीकी जो कार्रवाई की जा रही है, उसका तत्काल ही रोक देना आवश्यक
है, ताकि इसका परिणाम सर्वसाधारणको नैतिकताके लिए वर्तमान स्थितिसे
भी ज्यादा गम्भीर साबित न हो।
{{Gap}}यह वैसे ही है जैसी यह कहना कि चूंकि चोरीके अपराधमें वृद्धि हो रही
है इसलिए चोरीके विरुद्ध कानूनोंको उत्तरोत्तर ढीला करते चले जाना चाहिए। यह
निर्णय इस कल्पनापर आधारित है कि मादक पेयोंका पिया जाना चोरीकी तरह
कोई बीमारी या बुराई नहीं है। तथ्य जबकि यह है कि शराब पीनेकी आदत चोरी
तथा दूसरे बहुतसे अपराधोंकी जननी प्रमाणित हुई है। बढ़ते हुए अपराधसे उपयुक्त
निर्णय तो यह निकाला जाना चाहिए कि शराबकी दुकानोंका होना गरीब लोगोंके
लिए एक नाग फाँस ही है और इसलिए सही तरीका यह है कि नुकसानकी परवाह
किये बिना पूर्ण मय-निषेधकी तत्काल घोषणा कर दी जाये। मद्य निषेधके कानूनोंके
खिलाफ अपराध तो तब भी होंगे; जैसे कि चोरी आदि रोकने के लिए बनाये गये
कानूनोंके खिलाफ अपराध होते रहते हैं और हमेशा होते रहे हैं। जैसे कि किसीको
चोरीका अनुमतिपत्र नहीं दिया जाता वैसे ही शराब पीनेका अनुमतिपत्र भी नहीं
मिलना चाहिए। सीधा-सादा आदमी तो केवल इसी निष्कर्षपर पहुँच सकता है
और यही सीधा-सादा तर्क भी है। जो सरकार खर्चीला विदेशी प्रशासन चलानेके
लिए किसी न किसी तरह राजस्व चाहती है, अपने दूषित उद्देश्यके अनुकूल तर्क गढ़
लेती है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|२४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{C|''''गांधीजी के साथ सात माह '''}}
{{Gap}}यह श्री कृष्णदास द्वारा निकाले गये दो खण्डों में प्रकाशित ग्रन्थका शीर्षक है।
असहयोग आन्दोलन के दौरान जब मैं असम और दूसरे इलाकों का दौरा कर रहा
था, उन हलचलके दिनों में ये योग्य सहायकके रूपमें मेरे साथ थे। उन्होंने उन
दिनोंकी घटनाओंका विवरण अपनी डायरी में मुख्य रूपसे अपने गुरु श्रीयुत सतीशचन्द्र
मुकर्जीके लिए लिखा था। महादेवकी पण्डित मोतीलालजीको जरूरत पड़ जाने
पर उन्होंने कुछ दिनोंके लिए कृष्णदासको मेरे पास भेज दिया था। इन खण्डों में
मुख्य रूपसे उस डायरीके उद्धरण है और कुछ समय पूर्व प्रकाशित होकर ने जनता के
सामने हैं। सतीश बाबूसे कुछ विदेशी मित्रोंने खण्डों में वर्णित तथ्योंकी प्रामाणिकताके
बारेमें कुछ पूछताछ की है और सतीश बाबूने मुझसे पूछा है कि क्या मैं उन ग्रन्थोंको
पढ़कर उन्हें प्रामाणिक कह सकता हूँ? कृष्णदास स्वयं अपने ग्रन्थोंके बारेमें मेरी
राय जाननेके लिए उत्सुक थे। मैंने ये ग्रन्थ पढ़े हैं। मुझे लगता है कि तथ्य सही
रूप में सामने रखे गये हैं और उनका सांगोपांग विवरण दिया गया है। तथ्योंसे निकाले
गये या तथ्योंपर आधारित निर्णयों और मतोंके बारेमें मैं कुछ नहीं कह सकता ।
हम जानते हैं कि विभिन्न व्यक्ति एक ही प्रकारके तथ्योंके अध्ययनसे विभिन्न निष्कर्षो
पर पहुँचते हैं। हमें यह भी मालूम है कि एक ही व्यक्ति कालान्तरमें और अनुभवों के
अधिक परिपक्व हो जानेपर उन्हीं तथ्योंके आधारपर विपरीत निर्णय निकालता है ।
जहाँतक इन ग्रन्थोंका सम्बन्ध है कलम कृष्णदासकी है और उसकी दिशा-निर्देश
करनेवाली प्रतिभा उनके गुरु और पथ-प्रदर्शक सतीशचन्द्र मुकर्जीकी है। कृष्णदास
द्वारा दिया गया सात माहका यह विवरण हमें केवल इन ग्रन्थोंमें ही प्राप्त है। प्रथम
ग्रन्थ एस० गणेशन, ट्रिप्लिकेन, मद्रास और दूसरा बाबूराम विनोद सिन्हा, गांधी
कुटीर, डिगवाड़ा (बिहार) द्वारा प्रकाशित किया गया है।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, २६-१२-१९२९
{{C|'''३३०. निश्चित परामर्श'''}}
{{Gap}}संयुक्त प्रान्तके दौरे में प्रयागके विद्यार्थियोंकी ओरसे मुझे नीचे लिखा पत्र मिला था :
यद्यपि विद्यार्थियों की एक सभामें में इस विषयको चर्चा कर
स्तम्भों द्वारा विद्यार्थियोंके लिए एक निश्चित कार्यक्रम प्रस्तुत कर
पहले बताई हुई योजनाको यहाँ फिरसे अधिक दृढ़तापूर्वक पेश कर देना अनुचित
न होगा।
{{Gap}}२. १९२१ में, देखिए खण्ड २१ ।
{{Gap}}२. पत्र पह नहीं दिया जा रहा है। इसमें शिकायत की गई थी कि गांधीजीका ७-११-१९२९ का
लेख 'नवयुवक मया करें ?', अस्पष्ट था विद्यार्थी पद चाहते थे कि उनके लिए स्पष्ट रूपसे कोई निश्चित
परामर्श दिया जाना चाहिए।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||निश्चित परामर्श|
३२५}}
{{Gap}}पत्र-लेखक जानना चाहते हैं कि पढ़ाई पूरी करनेके बाद ये क्या कर सकते
हैं। मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बड़ी उम्र के विद्यार्थी, यानी कालेजोंके तमाम
विद्यार्थियोंको पढ़ाई करते हुए भी ग्राम सेवाका काम शुरू कर देना चाहिए। कुछ
समय ऐसा काम करनेवालोंके लिए मैं नीचे एक योजना देता हूँ ।
{{Gap}}विद्यार्थियों को अपनी सारी छुट्टियाँ ग्राम सेवामें लगानी चाहिए। इस बातको
ध्यान में रखकर लकीरके-फकीर बननेके बदले वे अपने मदरसों या कालेजोंके पासके
गाँवोंमें चले जायें और गांववालोंकी हालतका अध्ययन करके उनके साथ मेलजोल
करें। इस तरह वे गांववालोंके निकट सम्पर्क में आते चले जायेंगे और बादमें जब
कभी वे वहाँ जाकर रहने लगेंगे तो लोग किसी अजनवीकी तरह उनपर सन्देह करनेके
बजाय एक मित्रको हैसियतसे उनका स्वागत करेंगे। लम्बी छुट्टियोंके दिनोंमें विद्यार्थीगण
गाँवों में जाकर रहें, प्रौढ़ोंके लिए मदरसे या कक्षाएँ खोलें, गाँववालोंको सफाईके
नियम सिखायें और उनकी छोटी-मोटी बीमारियोंका इलाज करें। वे उनमें चरखेको
दाखिल करें और उन्हें अपने अवकाश समयके एक-एक मिनटका अच्छी तरह उपयोग
करना सिखायें। इस काम के लिए विद्यार्थियों और शिक्षकोंको अपने छुट्टियोंके समय के
agraat fवचारोंको बदलना पड़ेगा। छुट्टीके दिनों में विचारहीन शिक्षक
अकसर विद्यार्थियोंसे पाठ याद कर लाने को कहते हैं। मेरी राय में यह एक बहुत ही
बुरा चलन है। छुट्टी के दिनोंमें तो विद्यार्थियोंके दिमाग पढ़ाईकी आम दिनचर्यासि
मुक्त रहने चाहिए, और स्वावलम्बन तथा मौलिक विकासके लिए स्वतन्त्र रहने
चाहिए। जिस ग्राम सेवाका मैंने जिक्र किया है, वह मनोविनोद और नये-नये अनुभव
प्राप्त करनेका एक अच्छा साधन है। जाहिर है कि इस तरहकी तैयारी पढ़ाई खत्म
करते ही जो जानते ग्राम सेवामें लग जानेके लिए बहुत ही अच्छी सिद्ध होगी ।
{{Gap}}इसके बाद ग्राम सेवाकी पूरी-पूरी योजनाका विस्तारसे वर्णन करने की कोई जरूरत
नहीं बचती । छुट्टियोंमें जो कुछ किया था, उसको अब स्थायी रूप भर देना
रह जाता है। गांववाले भी हर तरह इस कामकी सहायता के लिए तैयार मिलेंगे ।
गाँवोंमें रहकर हमें ग्राम्य जीवनके हर पहलूपर विचार और अमल करना है.
क्या आर्थिक, क्या आरोग्य सम्बन्धी, क्या सामाजिक और क्या राजनैतिक । इसमें
शक नहीं कि कांश लोगों के लिए चरखा ही आर्थिक संकट निवारणका तात्कालिक
साधन है। चरखेके कारण गाँववालोंकी आमदनी तत्काल तो बढ़ती ही है, वे अन्य
बुराइयोंमें पड़नेसे भी बच जाते हैं। आरोग्य सम्बन्धी बातोंमें गन्दगी और रोग
भी शामिल हैं। इस बारे में विद्यार्थियोंसे आशा की जाती है कि वे अपने हाथोंसे
काम करेंगे और मैने तथा कूड़े-करकटकी खाद बनानेके लिए उसे गड्ढों में भरेंगे,
कुओं और तालाबों को साफ रखनेकी कोशिश करेंगे नये-नये बाँध बनायेंगे, गन्दगी
दूर करेंगे और इस तरह गाँवोंको साफ रखकर उन्हें अधिक रहने योग्य बनायेंगे ।
ग्राम सेवकको सामाजिक समस्याएँ भी हल करनी होंगी और बड़ी नम्रताके साथ
लोगोंको इस बात के लिए राजी करना होगा कि वे बुरे रीति-रिवाजों और बुरी
आदतों को छोड़ दें जैसे अस्पृश्यता, बाल-विवाह, बेजोड़ विवाह, शराबखोरी, नशाबाजी<noinclude></noinclude>
onx9wyotgojcv1pox0j7pds5ggrrghe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|३२६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
और जगह-जगह फैले हुए हर तरहके वहम, भ्रम या अन्ध-विश्वास । आखिरी बात
राजनैतिक पहलू है। इस सम्बन्ध में ग्राम सेवक गाँववालोंकी राजनैतिक शिकायतोंका
अध्ययन करेगा और उन्हें इस बात में स्वतन्त्रता, स्वावलम्बन और आत्मोद्धारका महत्व
सिखायेगा । मेरी रायमें इतना करनेसे प्रौढ़ शिक्षाका काम पूरा हो जाता है। लेकिन
ग्राम सेवकका काम यहाँ समाप्त नहीं होता। उसे छोटे बच्चोंकी शिक्षा-दीक्षा और
उनकी सुरक्षाका भार अपने ऊपर लेना होगा और बड़ोंके लिए रात्रिशालाएँ चलानी
होंगी। साक्षरताकी यह शिक्षा पूरे पाठ्यक्रमका एक अंग मात्र होगी और ऊपर जिस
बड़े ध्येयका उल्लेख किया गया है, उसकी पूर्तिका एक साधन भर होगी।
{{Gap}}मेरा दावा है कि इस सेवाके लिए हृदयकी उदारता और असंदिग्ध चारित्र्य, ये दो
जरूरी चीजें हैं। अगर ये दो गुण हों तो और सब गुण अपने-आप मनुष्यमें आ जाते हैं।
{{Gap}}आखिरी सवाल दाल-रोटीका है। मजदूरी करनेवालेको उसकी मेहनतकेमुताबिक
मजदूरी मिलनी चाहिए। कांग्रेसके भावी अध्यक्ष राष्ट्रीय सेवा संघका संघटन कर रहे
हैं। अखिल भारतीय चरखा संघ एक उन्नतिशील और स्थायी संस्था है। उसके पास
सच्चरित्र नवयुवकोंके लिए सेवाका अनन्त क्षेत्र मौजूद है। वहाँ जीवन निर्वाह लायक
वेतन अवश्य मिलता है। इससे ज्यादा रकम वह दे नहीं सकता। स्वार्थ साधन और
देशकी सेवा दोनों एक साथ नहीं हो सकते। देशकी सेवाके आगे अपना स्वार्थ बहुत
ही सीमित हो सकता है; और इसलिए हमारे गरीब देशके पास जो साधन हैं, उनसे
अधिक किसी जीविकाकी गुंजाइश नहीं है। गाँवोंकी सेवा करना स्वराज्य कायम
करना है और तो सब सपने की बातें हैं।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, २६-१२-१९२९
{{C|'''३३१. यह क्रूर प्रथा'''}}
{{Gap}}श्री गंगाधरराव देशपाण्डेने कर्नाटक में प्रचलित पशु बलिकी प्रथा पर, जिसका
विवरण इन स्तम्भों में दिया जा चुका है, निम्नलिखित बातें लिखी है:
'
{{Gap}}मेरी तीव्र कामना है कि जनमत इतनी जल्दी जाग्रत हो जाये कि यह अमानवीय
कृत्य पूरी तरह और अभी समाप्त हो जाये। हम लोग जो स्वतन्त्रताका महत्व मानते
हैं, अपने साथी प्राणियोंको इससे किस प्रकार वंचित रख सकते हैं और उन पर
ऐसा अत्याचार, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, किस तरह कर सकते हैं
और वह भी धर्मके नामपर !
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, २६-१२-१९२९
{{Gap}}१. देखिए
संयुक्त प्रान्त राष्ट्र सेवा संघ, १२-१२-१९२९ ।
{{Gap}}२. देखिए "धर्मके नामपर , २१-११.१९२९ ।
{{Gap}}३. पत्र नहीं दिया जा रहा है।<noinclude></noinclude>
pp1ln7nyo370d01rzo245t4qrrlo46w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३३२. गोआ निवासी'''}}
{{Gap}}गोआके मुखपत्र 'वॉयस के सम्पादक लिखते हैं:
{{Gap}}यदि हममें कुछ भी योग्यता है तो भावी भारत ब्रिटिश नहीं भारतीय ही होगा।
मैं चाहता हूँ कि 'वॉयस ' के सम्पादक महोदय इतना समझ सकने योग्य कल्पनाशील
होते । 'ब्रिटिश भारत' तो परस्पर विरोधी शब्दोंको साथ रखना है। भारत उस
देशका नाम है जहाँ भारतीय रहते हैं। यदि हममें केवल यह गुलामीकी आदत,
जिसपर हमने कभी आपत्ति नहीं की, न हो तो हम ब्रिटिश या भारतके साथ ऐसे
कोई दूसरे विशेषणका प्रयोग अस्वीकार कर दें। भावी भारत स्वराज्यके अधीन
होगा, ब्रिटेनके अधीन नहीं । स्वराज्यके अधीन भारतमें गोआ - निवासियोंको भारतीय
कहलाने में गर्वका अनुभव होगा। जब वे भारत में पैदा हुए हैं तो उन्हें अपने आपको
अब भी गोआ निवासी क्यों कहना चाहिए? भारत सदा ही ब्रिटिश, पुर्तगाली और
फ्रांसीसी आदिमें बँटा हुआ नहीं रहेगा; इसके भाग अलग-अलग सरकारी पद्धतियोंके
अमीन भले रहें, देश एक ही होगा। स्वतन्त्र भारत किसी भी दशामें भूमिके किसी
पुत्रको स्वतन्त्रतासे वंचित नहीं रखेगा। जब मैं देखता हूँ कि लोग इस बातकी चिन्ता
करते हैं कि स्वतन्त्र भारतमें उनका भविष्य कैसा होगा तो दुःख भी होता है और
आश्चर्य भी मेरे लिए तो वह भारत स्वतन्त्र भारत ही नहीं है, जो केवल अपनी
कृत्रिम सीमामें ही नहीं, बल्कि अपनी स्वाभाविक सीमामें भी पैदा हुए छोटेसे-छोटे
व्यक्तिको स्वतन्त्रताकी गारंटी नहीं देता। हमारा भय हमारी चिन्तन-शक्तिको समाप्त
कर देता है, अन्यथा हमें एकदम समझ जाना चाहिए कि स्वतन्त्रताका अर्थ एक
ऐसी स्थिति है जो हरएक ईमानदार पुरुष और स्त्रीके लिए वर्तमान दशासे किसी न
किसी तरह कुछ बेहतर ही होगी। स्वतन्त्रताके आगमन से भय होना चाहिए शोषक,
पैसा लूटनेवाले, समुद्री डाकू और इसी तरहके दूसरे लोगोंको ।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>यंग इंडिया, २६-१२-१९२९
{{Gap}}१. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने भावी ब्रिटिश भारतमें गोमा-निवासियोंके दर्जे के
मारेमें पूछताछ की दी।<noinclude></noinclude>
mavtr65ytux6d2x2kyh1i6tt9k1bfg5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३३३
राष्ट्रभाषा'''}}
{{Gap}}हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है, ऐसा यद्यपि सब लोग बुद्धिसे कबूल करते
हैं, तो भी जिन सूत्रों में हिन्दी मातृभाषा है वहाँ हिन्दी भाषाके प्रति जैसा प्रेम
नवयुवकोंका होना चाहिए वैसा देखनेमें नहीं आता है। हिन्दीमें जो कुछ साहित्य
निकलता है वह प्रायः अनुवाद है। यदि कुछ मौलिक वस्तु निकलती है तो वह
प्रभावरहित देखी जाती है। यह कह सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ हर जगह पैदा नहीं होते हैं,
तुलसीदास करोड़ों में से एक ही होते हैं, परन्तु तुलसीदास, रवीन्द्रनाथ इत्यादिके पैदा
होनेके लिए क्षेत्र हम सब तैयार कर सकते हैं। नवयुवकोंका सच्चा उत्साह ही वह
क्षेत्र है। उनका प्रेम जब हिन्दी भाषाके प्रति बढ़ेगा तब हिन्दीमय वायुमण्डल पैदा
हो जायेगा और उसमें से कुछ कवि भी निकल सकते हैं।
{{Gap}}आज तो हिन्दी जिनकी मातृभाषा है उन नवयुवकोंकी बोली में न प्रेम देखने में
आता है, न प्रयत्न । व्याकरणादिके जो दोष संयुक्त प्रान्त, बिहारके नवयुवकोंकी हिन्दी में
आते हैं, कभी बंगला और मराठी में देखने में नहीं आते। राष्ट्रभाषाका प्रचार मद्रास
आदि प्रान्तों में होता है, परन्तु मेरा अनुभव है कि हिन्दी शिक्षक कष्टसे ही मिलते
हैं। उनमें भी तेजस्विता नहीं होती, त्यागशक्ति बहुत कम होती है। हिन्दी प्रचारके
ही लिए सर्वार्पिण करनेवाले अनेक नवयुवक होने चाहिए; परन्तु ऐसे यदि कोई हैं
तो मैं उनको नहीं जानता हूँ। ऐसे अवश्य मिल सकेंगे जो आजीविका मात्र लेकर
सेवा करनेके लिए तत्पर होंगे, लेकिन उनके पास हिन्दी भाषाकी शिक्षा देनेकी सामग्री
नहीं होती ।
{{Gap}}नवयुवक चाहें तो इस त्रुटिको मिटा सकते हैं। एक नवयुवक भी इस कार्यको
आरम्भ करेगा तो काम आगे बढ़ सकता है। जब किसी क्षेत्रमें दुर्दशा प्रतीत होती
है तब निराश होकर बैठ रहनेसे दुर्दशा बढ़ती है। कर्त्तव्यपरायण मनुष्यका धर्म है
कि दुर्दशाको देखकर उसके निवारणकी चेष्टा शीघ्र करे, रास्ते में रुकावटोंका खयाल
करके बिना कुछ किए न रहे।
{{Gap}}प्रत्येक पाठशाला में हिन्दी भाषोत्तेजक संघ बनना चाहिए। ऐसे संघका कर्त्तव्य
प्रत्येक क्षेत्रमें हिन्दीका उपयोग बढ़ाना, पारिभाषिक शब्दोंका शोध करना, विदेशी
भाषाका उपयोग राजनीति इत्यादिमें कभी न करना, गूढ़ ग्रन्थोंका गहरा अध्ययन
करना, जहाँ हिन्दी शिक्षककी आवश्यकता देखी जाये वहाँ सहायता देना, बिना शुल्क
हिन्दी-शिक्षक स्वयंसेवक तैयार करना, इत्यादि हो सकता है। प्रत्येक बड़ी पाठशाला में
एक-एक नवयुवकके चित्तमें ऐसी लगन पैदा हो जाये तो वह बैठा नहीं रहेगा, अपने
आप संघ बन जायेगा और अपने सहपाठीको उसमें प्रवेश करनेका निमन्त्रण देगा।
नवयुवकोंमें आज जो जागृति आई है उसको स्थायी बनानेका तरीका यही है कि
उनका प्रत्येक क्षण किसी न किसी सेवाकार्यमें ही व्यतीत हो ।<noinclude></noinclude>
pdapbvmlnracr5idyu6pptqkrhgrp1f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा २|३२९}}
{{Gap}}खयाल रखना चाहिए कि इस लेखमें हिन्दीका अर्थ हिन्दुस्तानी भी है। मेरी
दृष्टिके सामने वह हिन्दी नहीं है जिसमेंसे इरादतन फारसी या अरबी शब्दोंका त्याग
किया गया हो ।
<Br>हिन्दी नवजीवन, २६-१२-१९२९
{{C|'''३३४. लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा - २'''}}
{{Rh|||लाहौर}}
{{Rh|||२६ दिसम्बर १९२९}}
{{Gap}}'फ्री प्रेस ऑफ इंडिया' के विशेष संवाददाताके अनुसार विश्वस्त सूत्रसे पता चला
है कि निम्नलिखित प्रस्ताव विचारके लिए कांग्रेस कार्यकारिणी समितिके सदस्योंके
बीच घुमाये गये हैं। कहा जाता है कि पण्डित मोतीलाल और अन्य नेताओंसे सलाह
करके महात्माजीने इन प्रस्तावोंका मसविदा तैयार किया है।
{{Gap}}१. यह कांग्रेस बाइसरायकी गाड़ीपर बम फेंके जानेके हिंसात्मक आचरण
पर दुःख प्रकट करती है और हिंसात्मक कार्य करनेमें विश्वास रखनेवालोंको चेतावनी
देती है कि इस तरहका कार्य न केवल कांग्रेसके सिद्धान्तोंके खिलाफ ही है बल्कि
इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय हितको हानि भी पहुँचती है। यह कांग्रेस राष्ट्रको और
परमश्रेष्ठ वाइसराय, लेडी इविन और उनके दलको उस अवसरपर सौभाग्यसे और
बाल-बाल बच जानेपर बधाई देती है ।
{{Gap}}२. यह कांग्रेस औपनिवेशिक स्वराज्यसे सम्बन्धित ३१ अक्तूबरकी वाइसराय की
घोषणा वारेमें कांग्रेसियों सहित, [ विभिन्न ] दलोंके नेताओं द्वारा हस्ताक्षर किये हुए
घोषणापत्र बारेमें कार्य समितिकी कार्यवाहीका समर्थन करती हुई और स्वराज्य
प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय आन्दोलनके शान्तिपूर्ण समझौते के प्रति किये गये परमश्रेष्ठ
वाइसराय के प्रयत्नों की सराहना करती हुई और वाइसराय तथा पण्डित मोतीलाल नेहरू
और अन्य नेताओंके बीच हुई मुलाकात के परिणामपर विचार करके, यह राय जाहिर
करती है कि वर्तमान दशा में प्रस्तावित गोलमेज परिषद् में प्रतिनिधित्व करके कांग्रेसको
कुछ लाभ नहीं होगा और वह पिछले साल कलकत्ता कांग्रेस में पारित प्रस्तावके
अनुसार घोषणा करती है कि कांग्रेसके सिद्धान्त में स्वराज्यका अर्थ पूर्ण स्वतन्त्रता होगा;
और इसलिए आगे यह घोषणा भी करती है कि औपनिवेशिक स्वराज्य की नेहरू योजना
निरर्थक हो चुकी है और अब जबकि साम्प्रदायिक प्रश्न कांग्रेसके सीमा क्षेत्र से बाहर हो
गया है, वह आशा करती है कि कांग्रेसके सारे दल अपना पूरा ध्यान पूर्ण स्वतन्त्रताकी
प्राप्तिपर लगायेंगे। वह यह आशा भी करती है कि वे लोग, जो नेहरू रिपोर्टमें
सुझाये गये साम्प्रदायिक समस्याके अस्थायी समाधानके कारण कांग्रेस में शामिल नहीं
हो रहे थे या जिन्हें उस कारण इससे दूर रहने की प्रेरणा मिली थी, वे अब कांग्रेसमें
दाखिल या फिरसे दाखिल हो जायेंगे और सामान्य उद्देश्यको पूरा करनेमें उत्साहसे
{{Gap}}१. रिपोर्ट की तिथि पंक्ति "लाहौर दिसम्बर २६, १९२९, था ।<noinclude></noinclude>
3x0sv8c9g1jy1v7w99oca2zfno6pit7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|३३०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
जुट जायेंगे। यह कांग्रेस स्वतन्त्रताके आन्दोलनके संगठनके प्रति प्रारम्भिक कदमके रूपमें
और कांग्रेस नीतिको परिवर्तित सिद्धान्तके अनुकूल बनानेके लिए केन्द्रीय और प्रान्तीय
fear सभाओंके पूर्ण वहिष्कार की घोषणा करती है और कांग्रेसियोंसे भावी चुनावों में
प्रत्यक्ष या परोक्ष रूपमें भाग न लेने और विधान सभाओंके वर्तमान सदस्योंसे
त्यागपत्र देनेका अनुरोध करती है और राष्ट्रसे कांग्रेसके रचनात्मक कार्यक्रमोंपर ध्यान
केन्द्रित करनेका अनुरोध करती है और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको अधिकार
देती है कि वह जब भी ठीक समझे, सविनय अवज्ञाका कार्यक्रम चालू कर दे, जिसमें
आवश्यक सावधानी के साथ कुछ चुने हुए या सभी क्षेत्रोंमें करोंकी अदायगी न
करनेका कार्यक्रम भी शामिल हो सकता है।
{{Gap}}३. यह कांग्रेस विदेशी वस्त्र बहिष्कार समिति, छुआछूत विरोधी समिति और
मद्य निषेध समितिको उन्हें सौंपे गये कार्यक्रमको पूरे जोरसे चलानेके लिए बधाई
देती है, परन्तु इस बातपर खेद प्रकट करती है कि इस सम्बन्धमें राष्ट्रकी प्रतिक्रिया
उतनी पर्याप्त नहीं रही जितनेकी आशा करनेका कांग्रेसको अधिकार था। इन समितियों
और अखिल भारतीय चरखा संघको जो अनुभव हुआ है उससे पता चलता है कि
विशेष कार्यके लिए बनाये गये स्वायत्त संगठनों द्वारा बहुत ज्यादा कारगर ढंगसे
काम हो सकता है और इसलिए यह कांग्रेस पूर्वोक्त समितियोंको स्थायी घोषित करती
है। ये समितियाँ पूर्ण स्वायत्त होंगी; इनमें कांग्रेसका प्रभुत्व या हस्तक्षेप नहीं होगा;
इन्हें अपनी संख्या में वृद्धि करने, तत्सम्बन्धी संविधान बनाने और चन्दा उगाहनेका
पूरा अधिकार होगा। इसमें शर्त यह होगी कि कांग्रेसके पास इनमें से किसी भी
संस्थाको, जबकि कांग्रेसको ऐसा लगे कि वह राष्ट्रीय हितके खिलाफ काम कर रही
है, त्याग देनेका या अपनेसे असम्बद्ध कर देनेका पूरा अधिकार रहेगा ।
{{Gap}}४. इसलिए कि कांग्रेस तेजीसे गतिशील और ज्यादा कुशल संगठन बन जाये
यह आवश्यक हो गया है कि इसके प्रदर्शनकारी कार्योंको और इसके अमली तथा
कामकाजी कार्यकलापोंको अलग-अलग कर दिया जाये और इसे अधिक सुसम्बद्ध संस्था
बनाया जाये, कांग्रेस यह निश्चय प्रकट करती है कि प्रतिनिधियोंकी संख्या १००० से
कम और अ० भा० कां० कमेटीकी १०० से कम कर दी जाये और अ० मा० कां०
कमेटीको अधिकार देती है कि वह संविधान में आवश्यक परिवर्तन समाविष्ट कर ले
और आवश्यक पुनर्विभाजन कर ले।
{{Gap}}५. चूंकि कांग्रेससे सम्बन्धित वार्षिक प्रदर्शनी मुख्य रूपसे और उत्तरोत्तर
शैक्षणिक ढंगकी और खद्दर द्वारा विदेशी वस्त्रका बहिष्कार करनेके कार्यक्रमको बढ़ावा
देनेवाली होनी चाहिए, यह कांग्रेस की बनी हुई एक स्थायी समिति नियुक्त
करती है और उसे या दूसरी सूरत में अ० भा० च० संघको अधिकार देती है कि
वह सारी प्रदर्शनीकी व्यवस्था करने और इसे चलानेके लिए स्थानीय लोगोंको नियुक्त
कर ले तथा इस कार्यके लिए चन्दा उगाह ले ।
{{Gap}}६. चूंकि धारणा यह है कि कांग्रेस गरीब लोगोंकी प्रतिनिधि संस्था है और
चूंकि दिसम्बरके अन्त में कांग्रेसका आयोजन करनेसे गरीब लोगोंपर उन्हें अपने लिये<noinclude></noinclude>
i3hfsr74sgyeos0tea7x0f8m0v1fk0z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||पत्र: रमणीकलाल मोदीको|
३३१}}
अतिरिक्त वस्त्र जुटाने में बड़ा भारी खर्च आ पड़ेगा, और वैसे भी वह समय उनके
लिए असुविधाजनक रहेगा, कांग्रेस सम्मेलनका समय सम्बन्धित प्रान्तके लिए जो
सुविधाजनक हो फरवरी या उसके बादकी किसी तारीसके लिये बदला जा रहा है ।
{{Gap}}७. यह कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा प्रचारित प्रान्तीय राष्ट्रसेवाओंके संगठनके विचारका
तहेदिलसे समर्थन करती है और सब प्रान्तोंको सलाह देती है कि ऐसी सेवाओंका
समारम्भ किया जाये और उस उद्देश्यके लिए स्थायी समितियाँ नियुक्त करती है,
जिन्हें विदेशी वस्त्र बहिष्कार समिति और दूसरी समितियोंसे सम्बन्धित प्रस्ताव ३ में
बताये गये तरीके से स्वायत्त अधिकार प्राप्त होंगे।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>हिन्दुस्तान टाइम्स, २८-१२-१९२९
{{C|'''३३५. पत्र : रमणीकलाल मोदीको'''}}
{{Rh|||लाहौर}}
{{Rh|||२६ दिसम्बर, १९२९}}
<Br>चि० रमणीकलाल,
{{Gap}}तुम्हारे पत्रोंका उत्तर देनेके लिए मैंने उन्हें सँभालकर रख छोड़ा था।
कुछ फुरसत मिली है इसलिए यह पत्र लिखवा रहा हूँ। बुधाभाईके मकानके उपयोगके
बारेमें मैंने जो सुझाव दिया था, उसके विरोध में तुम्हारी दलील मुझे पसन्द आई और
वह ठीक भी है। चन्द्रकान्ताके माता-पिताको वालजीभाईके निकट पड़ोसमें रखकर तुमने
ठीक ही किया है ।
{{Gap}}हमारा आदर्श तो यही है कि सेवा कार्यके लिए दम्पती निर्विकार भावसे, कामके
सुभीते खयालसे साथ-साथ या अलग-अलग रहकर उसी प्रकार अपना जीवन बितायें
जिस प्रकार कि दो मित्र बिताते हैं । किन्तु जबतक इस रूपमें सम्बन्ध निभानेका
अभ्यास न हो जाये और वे एक-दूसरेके प्रति बहुत ही मुश्किलसे विकारहीन रह
पाते हों तो वैसी स्थिति में उनका अलग-अलग रहना ही उचित होगा और यही
उनका कर्त्तव्य है । मुझे लगता है कि इतनेमें तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर आ गया
है। किन्तु यदि तुम्हें लगे कि कोई बात छूट गई है तो मुझे लिखना ।
{{Gap}}भणालीका विचार दोषपूर्ण तो लगता ही है;
{{Gap}}हैं क्योंकि वे भले आदमी हैं, निश्छल हैं और जिस
कहते हैं। वे हमारे सहयोगी रहे हैं और आजकल
जहाँतक उन्हें निभा सकें, निभायें। बुधाभाईको मैने कोई वचन नहीं दिया है किन्तु
बुधामाईको आश्रमके भोजनालय में खींच लानेवाला मैं भी हूँ। उन्होंने जब यह कहा
कि मैंने तो एक वर्षतक ही आश्रमके भोजनालय में खानेकी प्रतिज्ञा की थी तो उनकी
यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी और मैंने उनसे कहा कि यह बहुत उत्तम विचार
किन्तु हम उसे सहन करते रहते
बात में विश्वास करते हैं वही
व्याधिग्रस्त भी हैं। इसलिए हम<noinclude></noinclude>
ierczudicqn54l2658ywioq6r5gzt86
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|३३२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
है। मैं इसी हदतक उनसे वचनबद्ध हूँ, किन्तु मैं इसे कोई बन्धन नहीं मानता। मेरी
सलाह मानते हुए इसी दिशामें यदि वे कुछ अधिक करें तो मैं उसे अच्छा मानूंगा ।
किन्तु इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि मैं किसी प्रकारके वचनसे
बँध गया हूँ । अतः तुम और प्रबन्ध समिति जो निश्चय करोगे उस पर मैं अमल
करवाऊँगा। मेरे दृष्टिकोणके पक्षमें कारण यह है कि मैंने भाई और...
{{Gap}}बेन को निर्दोष माना है तथा अब भी यही मानता हूँ। यदि मेरा विचार गलत
हो तो भी उन्हें निर्दोष मानकर ही मुझे अपनी गलतीका पता चल सकता है। किन्तु
यदि मेरे इस विचारका अन्य लोगोंपर अच्छा असर न पड़ा हो तो उन्हें जो उचित
जान पड़े वही होना चाहिए; क्योंकि शक्की लोग किसीकी वातको स्वीकार नहीं
कर सकते, यही नहीं, बल्कि वे उसके साथ उदारतापूर्ण व्यवहार भी नहीं कर सकते ।
किन्तु इससे एक अन्य प्रश्न उठता है कि यदि किसी व्यक्तिको मैंने निर्दोष माना
हो और तुम या अन्य जो लोग मेरे विचारसे सहमत नहीं हो तो उन्हें मेरी बातका
समर्थन नहीं करना चाहिए। उसका समर्थन करना गलत है, असत्यपूर्ण है। इस सम्बन्ध में
अपने सर्वथा भिन्न विचारोंको छोड़कर में बहुमतके विचारके अनुसार कामकर सकता
हूँ। मैंने पहले भी ऐसा ही किया है और यही हमारा कर्तव्य है। इसमें सिद्धान्तकी
तो कोई बात ही नहीं है। यह तो अनुभव, पसन्द-नापसन्द या फिर विचारदोषकी
बात है। और यदि अन्य सभी लोग उन्हें निर्दोष मानते हों तो पड़ोसीके नाते
दोनोंको अपना लेना हमारा कर्तव्य हो जाता है। यदि तुम इस पूरी दलीलको न
समझे होओ तो मुझसे पूछनेके लिए इसे नोट कर रखना ।
{{Gap}}यहाँ बहुत कड़ी सर्दी पड़ रही है। मैं तो मानता हूँ कि जो कुछ लोग यहाँ
आये हैं यदि वे न आये होते तो अच्छा होता। जिन लोगोंका आना आवश्यक था
उनके अतिरिक्त और किसीको नहीं आना चाहिए था ।
आशा है कि मैं जैसा सोचता था उससे बहुत पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा । कांग्रेसके
बाद यहाँ रहने की बात आसानीसे टल गई है। अतः यदि मैं यहांसे ३० तारीखको
रवाना हो जाऊँ तो इसे कोई आश्चर्यकी बात मत मानना ।
मेरे विचारसे महादेवके बारेमें कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं। यह जिस तरह
आजकल हमारे साथ रहता है उसी तरह रहेगा। मैं अब ऐसी व्यवस्था कर रहा
हूँ ताकि वह आश्रम में ही रहे। यदि समय मिलेगा तो शेष फिर लिखूंगा।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
<Br>[ पुनश्च : ]
{{Gap}}पत्र लिखनेके बाद दुबारा नहीं पढ़ा।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४१६९ ) की फोटो नकलसे।
{{Gap}}१ और २ नामोंको छोड़ दिया गया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३७१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३३६. भाषण: अ० भा० कां० कमेटीकी विषय समितिमें''''}}
{{Rh|||लाहौर}}
{{Rh|||२७ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}प्रस्तावका पहला हिस्सा दिल्ली घोषणापत्र से सम्बन्धित है और यह राजनीतिक
आवश्यकता या समझदारी पर, आप इसे जो कुछ भी कहना चाहें, आधारित है ।
मैंने और पण्डित नेहरूने देशके लिए औपनिवेशिक स्वराज्य प्राप्त करनेकी कोशिश की
और मैं यह जरूर स्वीकार करता हूँ कि यथा सम्भव पूरी कोशिशोंके बावजूद हमें
सफलता नहीं मिली। इस सम्बन्धमें मैं एक बात यह कहना चाहूँगा कि मेरी समझ में
इस असफलता के लिए किसी तरह वाइसरायपर इल्जाम नहीं लगाया जा सकता ।
हमें किसी-न-किसी तरह का समझौता करनेकी उनकी कोशिशोंकी तारीफ जरूर करनी
चाहिए । उनका जो दृष्टिकोण था, उसे ध्यान में रखते हुए मैं उनपर कोई इल्जाम
नहीं लगा सकता। हमारी जो उनसे भेंट हुई उसके दौरान वे बड़े विनम्र रहे और
उनका व्यवहार बड़ा मधुर था। किन्तु जो भी कुछ हुआ है उसके बाद मैं कह सकता
हूँ कि गोलमेज परिषद में कांग्रेसका प्रतिनिधित्व होनेसे किसी तरह की भलाईकी आशा
नहीं है। इसलिए सवालपर सभी पहलुओंसे विचार करके हम महसूस करते हैं कि
कांग्रेस गोलमेज परिषद में प्रतिनिधि भेजकर देशका कुछ हित नहीं कर सकती। मुझे
आशा है कि प्रस्तावके इस हिस्से में कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा ।
{{Gap}}प्रस्तावका दूसरा भाग कांग्रेसके सिद्धान्तोंके परिवर्तनसे सम्बन्धित है। यह भी
पिछले साल कलकत्ता कांग्रेस में पारित किये गये प्रस्तावके तर्क सम्मत निर्णयके अलावा
और कुछ नहीं है। मद्रास कांग्रेसने 'यदि सम्भव हो तो साम्राज्यके अन्तर्गत और
यदि आवश्यक हो तो उसके बाहर स्वराज्यका आदर्श माना था । हमें परिस्थितियोंसे
विवश होकर यह घोषणा करनी पड़ रही है कि कांग्रेस पूर्ण स्वतन्त्रता चाहती है
और वह इसे ही अपना 'स्वराज' निश्चित करती है। मद्रास कांग्रेसने वास्तवमें
कांग्रेसका उद्देश्य नहीं बदला था। कलकत्ता कांग्रेसने भी इस मामले में कोई निश्चित
रुख नहीं अपनाया था। परन्तु अब हम अपना उद्देश्य बदलने जा रहे हैं और वह
पूर्ण स्वतन्त्रताका निश्चित रूप होगा।
{{Gap}}आज मैं यह कहना नहीं चाहता कि साम्राज्यके अन्दर भी किसी तरह स्वराज
सम्भव है या नहीं किंतु हम यह तो साफ तौरपर कहते हैं कि स्वराजका अर्थ है
पूर्ण स्वतन्त्रता ।
{{Gap}}१. पूर्ण स्वतन्त्रता प्रस्तावपर गांधीजीने हिन्दीमें भाषण किया देखिए प्रस्ताव २ ५४ ३२९-३१।
{{Gap}}२. देखिए सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य
{{Gap}}३. देखिए खण्ड ३८, ५४ ३२९-३१ ।
{{Gap}}४. १९२७ में।
{{Gap}}२-१२-१९९९ ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|३३४|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
{{Gap}}प्रस्तावके तीसरे हिस्सेका सम्बन्ध इस बातसे है कि पूर्ण स्वतन्त्रताके इस नये
सिद्धान्तको कार्यान्वित कैसे किया जाये। जैसे कि प्रस्ताव द्वारा सुझाया गया है, पहला
कदम, विधान सभाओं और स्थानीय संस्थाओंका बहिष्कार है या दूसरे शब्दों में हम
यह चाहते हैं कि प्रान्तीय और केन्द्रीय दोनों विधान सभाओंका कांग्रेसियों द्वारा
बहिष्कार कर दिया जाये। इतना ही नहीं कांग्रेस इसके आगे यह भी चाहती है कि
स्थानीय संस्थाओं जैसे नगरपालिकाओं, स्थानीय बोर्डो आदिका बहिष्कार किया जाये ।
निस्सन्देह यह बड़ा कदम है। परन्तु पूर्ण स्वतन्त्रताके उस महान् आदर्शकी प्राप्तिके
लिए कुछ इस तरहके कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब हमें आगे आनेवाले महान्
संघर्षोंके लिए अवश्य ही तैयार रहना है। अब हम लोगोंको अपने अंदरूनी मतभेद
और विरोध खत्म कर देने चाहिए। मैं एक और चीज आपके सामने स्पष्टकर देना
चाहता हूँ। अब चूंकि यह घोषित कर दिया जायेगा कि औपनिवेशिक स्वराजकी
पद्धतिपर आधारित नेहरू रिपोर्टकी कोई उपयोगिता नहीं रही है, इसे लेकर आगे कोई
मतभेद नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। मुझे आशा है कि सिख, मुसलमान
और दूसरे सभी वर्गोंको, जिन्हें नेहरू रिपोर्टके किसी-न-किसी पहलूसे शिकायत
थी, कांग्रेस में दाखिल होनेमें कोई आपत्ति नहीं होगी और वे स्वातन्त्र्य संग्राम के लिए
इसके दायरे में संगठित हो जायेंगे। अगर आपके बीच अनिवार्य मतभेद हों तो भी हमें
कांग्रेसके बीच संगठित होकर काम करना चाहिए। यदि मुसलमान हिन्दुओंके गले
काटते हैं तो काटे। परन्तु उस समय हमारे मन में यह सान्तवना तो अवश्य होनी
चाहिए कि हमें स्वतन्त्रता मिल गई है या यदि सिखोंका हिन्दुओं या मुसलमानोंसे
कोई झगड़ा हों तो वे अपने ऐसे सारे मतभेद भुला दें और कांग्रेस के बीच संगठित
हो जायें।
{{Gap}}मैंने विधान सभाओं में जानेकी बात कभी नहीं सोची और मुझे प्रसन्नता है कि
इन वैधानिक संस्थाओंके बारेमें दूसरे नेताओंके मनमें भी ऐसी ही भावनाएँ हैं। अब
यह बात भली-भांति महसूस की जा रही है कि इनमें भाग लेकर देशका कोई हित
नहीं किया जा सकता; इसलिए हम इन्हें छोड़ देनेका निश्चय करना चाहते हैं। जहाँतक
नगरपालिकाओं और स्थानीय संस्थाओंका सम्बन्ध है मैं यह कहना चाहूँगा कि चाहे
इन संस्थाओंको कितना भी स्वायत्त क्यों न बना दिया जाये इनसे भी अपेक्षित
परिमाण में हित-सम्पादन नहीं हो सकता। उदाहरणके तौरपर हमारे अध्यक्षने इलाहाबाद
नगरपालिकामें बड़ी सेवा की। परन्तु अन्तमें वे इससे तंग आ गये और उन्होंने
उसे छोड़ दिया। इसी तरह बाबू राजेन्द्रप्रसादने पटना नगरपालिकामें बहुत कुछ काम
किया और अन्तमें वे भी उससे तंग आ गये और उसे छोड़ दिया। यदि हम देशके
लिए स्वतन्त्रता चाहते हैं, यदि हम हृदयसे स्वतन्त्रता पाना चाहते हैं, तो हम उन
संस्थाओंके बीच नहीं जा सकते, जिनसे हमारी शक्ति इस तरह घट जाती है।
{{Gap}}इसलिए हमें यह निश्चय करनेमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हम अब
आगे विधान सभाओं और स्थानीय संस्थाओंमें नहीं जाना चाहते।
{{Gap}}यह साफ है कि करोंकी अदायगी न करना राष्ट्रीय संघर्षकी अन्तिम दशा है
और मैं मानता हूँ कि हम अभी वहाँतक नहीं पहुँचे हैं। यह भी साफ है कि हमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||भाषण अ० भा० का० कमेटीकी विषय समिति में|
३३५}}
दो बातों में से एक चुननी है। अर्थात् या तो आप परिषदों और स्थानीय संस्थाओं में
जाना पसन्द करें और सविनय अवज्ञाकी बात करना बन्द कर दें या इन स्थानोंका
बहिष्कार करना पसन्द करें और अपनी सारी शक्ति सविनय अवज्ञापर केन्द्रित करें।
ऐसा कहना ठीक नहीं कि ये दोनों चीजें साथ-साथ की जा सकती हैं। यदि आप
विधान सभाओं और स्थानीय संस्थाओंमें भाग लेना चाहें तो मैं आपसे स्पष्ट कह
देना चाहता हूँ कि सविनय अवज्ञा असम्भव है। सविनय अवज्ञाके लिए निस्सन्देह बहुत
अनुशासन, बहुत बल, और सबसे अधिक आवश्यकता तन्मयतायुक्त एकाग्रताकी है।
यदि आप परिषदों में जायेंगे तो आप सविनय अवज्ञाके लिए पूर्णतः आवश्यक ये सारी
शर्तें नहीं जुटा सकते हैं। यदि आप, जो बारडोलीमें किया गया है वही कुछ करना
चाहते हैं तो आप विधान परिषदों सभाओं जैसी अन्य चीजोंके बारेमें सोचना बन्द
कर दें। यह अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि फिलहाल देश सविनय अवज्ञाके
लिए तैयार नहीं है और देशको इसके लिए जरूर तैयार किया जाना चाहिए। यदि
आप चाहते हों कि मैं सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाऊँ तो मैं इसे चलाऊँगा । परन्तु
आप युद्धके सिपाही अवश्य बनें और सविनय अवज्ञाके लिए जो कुछ भी अपेक्षित
है वह सब कुछ हासिल किये बिना न रहें।
{{Gap}}अन्तमें महात्माजीने सब लोगों से कहा कि वे प्रस्तावके पक्षमें इसलिए मत न दें
कि मैंने इसे पेश किया है और उन्होंने कहा:
{{Gap}}मैं चाहता हूँ कि आप सारे प्रस्तावके बारेमें, इसके सभी पहलुओं और
दाँव-पेचोंपर ठीकसे विचार करें और तब आपको जो सर्वाधिक उचित लगे उस पक्ष में
अपना मत दें।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>हिन्दुस्तान टाइम्स, ३०-१२-१९२९
{{Gap}}१. बारडोली सत्याग्रह, देखिए खण्ड ३७ ॥<noinclude></noinclude>
aeus768iov8sy56huijs8otnj4safnx
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{c|'''३३७. सिख नेताओंसे बातचीत''''}}
{{Rh|||२७ दिसम्बर, १९२९}}
{{Gap}}यह पता चला है कि सिख नेताओंके साथ, जिनमें एक तरफ सरदार खड्गसिंह,
सरदार बहादुर मेहताबसिंह, सरदार तारासिंह और सरदार अमरसिंह शामिल थे
[ कांग्रेस के नेताओंकी ] जिनमें दूसरी ओर महात्मा गांधी, पण्डित मोतीलाल नेहरू,
डा० अन्सारी, डा० सत्यपाल और सरदार शार्दूलसिंह कवीश्वर थे, लम्बी और
अनौपचारिक बातचीत हुई। बातचीत सिखोंके अधिकारके सवालपर केन्द्रित थी।
{{Gap}}यह पता चला है कि महात्माजीने कार्य समितिके प्रस्तावका मूल पाठ, जिसमें
औपनिवेशिक स्वराज्यका प्रस्ताव वापस ले लिया गया है, सिख नेताओंके सामने
रखा । यह कहा जाता है कि महात्माजीने उन्हें बताया कि वह नेहरू रिपोर्टमें
सिखोंकी विशेष सुरक्षाकी मांगको सही नहीं मानते ।
{{Gap}}चूंकि सिख सन्तुष्ट नहीं हैं, इसलिए कांग्रेस प्रश्नपर फिरसे विचार करनेको
तैयार है। और अब तो स्थिति बदल गई है और कार्य समिति द्वारा औपनिवेशिक
स्वराज्यका प्रस्ताद वापस ले लिये जानेसे नेहरू रिपोर्ट अपने आप ही महत्त्वहीन
हो गई है तथा प्रश्न पर फिरसे विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
{{Gap}}महात्माजीने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्वतन्त्र भारतमें अधिकारका विभाजन
जातीय आधारपर नहीं होगा। परन्तु यदि जातीयताको राजनीतिक अधिकारोंका
आधार बनाया ही गया तो वह इस बातका पक्का ध्यान रखेंगे कि सिखोंको सन्तोष
दिया जाये।
<Br>[ अंग्रेजीसे ]
<Br>बॉम्बे क्रॉनिकल, २८-१२-१९२९
{{Gap}}२. अनौपचारिक बातचीत जिसमें एक तरफ सिखनेता सरदार खद्गसिंह, सरदार बहादुर मेहताब
सिंह, सरदार तारासिंह और सरदार अमरसिंह और दूसरी तरफ गांधीजी, मोतीलाल नेहरू, डा० अंसारी
डा० सत्यपाल और सरदार शार्दूलसिंह थे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''३८०. भाषण: अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, अहमदाबाद में'''<ref>'''यंग इंडिया,''' २३-१-१९३० में “नोट ए पालिसी बट क्रीड” शीर्षक प्रकाशित।</ref>}}}}
{{right|[१३ जनवरी, १९३०]<ref>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १४-१-१९३० से।</ref>}}
इस विद्यापीठका जन्म असहयोग आन्दोलनके सिलसिले में हुआ। और जैसा कि मैंने कुछ साल पहले कहा था, विद्यापीठका ध्येय स्वराज्य प्राप्त करना है। राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं में पढ़नेवाले और इनसे सम्बन्धित उन सब लोगोंको वे सब काम अवश्य करने चाहिए जो देशको करने पड़ रहे हैं और उसी अनुशासनमें अवश्य बँधे रहना चाहिए जिस अनुशासनमें देशको स्वराज्य प्राप्तिके लिए बंधे रहना पड़ रहा है, ताकि वे जब वक्त आये तो स्वेच्छासे त्याग करनेके लिए अपने आपको समर्पित कर दें।
हमारा आन्दोलन आत्मशुद्धिका आन्दोलन है। कुछ लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं कि नैतिकताका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, हमें अपने नेताओंके चरित्रसे कोई मतलब नहीं है। जब नैतिकताका राजनीति से कोई वास्ता पड़ता है तो यूरोप और अमेरिकाके प्रजातन्त्र नैतिकताको एक तरफ कर देते हैं। दुश्चरित्र लोग अक्सर बड़े कुशाग्रबुद्धि होते हैं और वे कुछ खास मामले अपनी तीव्र बुद्धिके बलपर काफी अच्छी तरह चला लेते हैं। ब्रिटिश लोकसभाके कुछ मूर्धन्य लोगोंका निजी चरित्र कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। [प्रारम्भमें] हमने भी अपना राजनीतिक आन्दोलन उसी तरह चलाया। हमने कांग्रेसके सदस्यों अथवा नेताओंके चरित्रसे कोई मतलब नहीं रखा। परन्तु १९२० में हमने बिलकुल नया रास्ता तय किया और हमने घोषणा की कि चूँकि अपने ध्येयको पानेके लिए कांग्रेसको केवल सत्य और अहिंसाके साधन अपनाने हैं, इसलिए राजनीतिक जीवनमें भी आत्मशुद्धि आवश्यक है।
आज इस विचारका खास खुला विरोध कोई नहीं करता; हालाँकि बहुत लोग ऐसे हैं जो मन ही मन ऐसा मानते हैं कि राजनीतिका नैतिकतासे कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि हमारी प्रगति इतनी धीमी है और किसी-किसी मामले में तो बिलकुल ही नहीं हो पाई है। यदि हम अपने १९२० के सिद्धान्तपर चले होते तो हमें वर्तमान दशापर पहुँचनेतक भी नौ साल नहीं लगते। यदि स्वराज्यका अभिप्राय हमें सभ्य बनाना और हमारी सभ्यताको शुद्ध और स्थायी बनाना नहीं है, तो इसकी कोई कीमत नहीं है। हमारी सभ्यताका सार यह है कि अपने सभी मामलों में, चाहे वे राजनीतिक हों या निजी, नैतिकताको सर्वोत्तम स्थान दिया जाये। और चूँकि विद्यापीठका एक काम हमें सभ्य बनाना है, इसलिए स्वराज्यकी लड़ाई राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओंसे सबसे ज्यादा बलिदानकी अपेक्षा रखती है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}मैं चाहता हूँ कि आप सब लोग हमारे सिद्धान्तका आशय समझ लें। यदि आप यह समझते हैं कि सत्य और अहिंसा मिलकर कोई सिद्धान्त नहीं परन्तु कांग्रेसकी नीति ही बनाते हैं तो मुझे नहीं मालूम कि मेरा यहाँ क्या स्थान हो सकता है। परन्तु यदि आपको पूरा विश्वास है कि वे आपके निजी सिद्धान्त हैं तो मुझे उनपर विस्तारसे बोलने की आवश्यकता नहीं है। यही तथ्य कि कोई व्यक्ति विद्यापीठसे सम्बन्धित है, उसकी सच्चाई और अहिंसाकी प्रतीतिके लिए काफी होना चाहिए। इसलिए इस राष्ट्रीय शिक्षा परिषदका और इसमें सम्मिलित होनेवाले सब लोगोंका पहला काम यह होना चाहिए कि वे अपने आपसे यह पूछें कि क्या उनके सारे काम उस सिद्धान्तके अनुरूप रहे हैं या नहीं। यदि आपने सत्य और अहिंसाका नीति रूप में अनुसरण करते हुए अपना कामकाज किया है तो शायद एक दिन ऐसा आयेगा जब आपको इस नीतिमें परिवर्तन करनेकी इच्छा हो। उदाहरण के तौरपर मेरे मित्र अलीभाइयोंने सत्य और अहिंसाको नीतिके रूपमें अपनाया और उन्होंने इस बातको कभी छिपाया नहीं। उन्होंने हमेशा कहा कि वे इन्हें सिद्धान्तके रूपमें स्वीकार नहीं कर सकते। उनकी जैसी विचारधाराके बहुत-से और लोग भी हैं और उनका निस्सन्देह देशकी सेवामें अपना स्थान है। परन्तु आप लोगोंके लिए, जो राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओंके विद्यार्थी और अध्यापक है, ऐसा रुख काफी नहीं होगा। आपको दोनों नियम अपने सिद्धान्तके रूपमें अवश्य स्वीकार करने चाहिए और वे नियम आपके अस्तित्वका अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग होने चाहिए। यदि सब अहिंसाको नीति बनायें और सिद्धान्त रूपमें इसका समर्थन करनेवाला केवल मैं ही रहूँ तो हम कोई प्रगति नहीं कर सकते। इसलिए हम अपने मनमें एक बार फिर सवाल करें और निश्चय करें कि हम किन्हीं भी परिस्थितियोंमें स्वराज्यकी प्राप्तिके लिए असत्य और हिंसाको स्थान नहीं देंगे। तब सब-कुछ ठीक हो जायेगा।
सत्य और अहिंसाके सिद्धान्तसे रचनात्मक कार्यक्रमका विकास हुआ है। हम
इसके प्रत्येक अंगपर विचार करें। जबतक हिन्दू मुसलमानोंके प्रति और मुसलमान हिन्दुओंके प्रति हिंसाका भाव रखेंगे, हिन्दू-मुसलमानोंमें एकता असम्भव है। लाहौर में कौमी सवाल पर कांग्रेसका प्रस्ताव इस सिद्धान्तका ही परिणाम था। सिख चाहते थे कि केवल उनके साथ न्याय किया जाये। परन्तु जैसा कि शायद आपने ध्यान दिया होगा प्रस्ताव इससे भी आगे गया है और यह केवल सिखोंके लिए ही नहीं परन्तु भारतकी सारी जातियोंके लिए है।
अस्पृश्यता-निवारणकी ही बात लीजिए। इस प्रश्नपर बात करते हुए कुछ लोग शारीरिक हुआछूतकी बात करते हैं, कुछ तथाकथित अछूतोंकी आम कुओंसे पानी लेने तथा स्कूलों और मन्दिरोंमें प्रवेश करनेकी निर्योग्यताओंको दूर करनेकी बात करते हैं। परन्तु आपको इससे बहुत आगे जाना चाहिए।आपको चाहिए कि आप उनसे उसी तरह प्रेम करें जैसे कि आप अपने-आपसे करते हैं, ताकि वे आपको देखते ही यह समझ लें कि आप उनमें से ही एक है। केवल तभी आपको रचनात्मक कार्यक्रममें उनका सहयोग मिल सकता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा-परिषद, अहमदाबादमें|४०९}}</noinclude>{{gap}}शराबबन्दी के मामले में भी यही बात लागू होती है। खादी कार्यक्रमके बारे में भी यही बात है। परन्तु उसकी यहाँ चर्चा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह काम इतना ठोस और व्यवहार्य है कि एक आदमी, जो नियमित रूपसे अपने दिन-भरके कामका रोजनामचा रखता है, स्पष्ट रूपसे यह बता सकता है कि उसने राष्ट्रीय धनमें कितनी वृद्धि की है। यदि हमने उस भावनासे काम किया होता तो हमने अबतक बड़ी प्रगति कर ली होती। विदेशी-वस्त्र बहिष्कार समितिने हमें बताया है कि हमने पिछले साल थोड़ा-सा करके ही कितना कार्य सम्पन्न कर लिया है। मेरे विचारमें तो जो हुआ है यह बहुत थोड़ा है। परन्तु यदि हम सबने यह काम दृढ़ इच्छाशक्ति और अटूट विश्वासके साथ किया होता तो इसका क्या परिणाम होता? हमें सच्चे और कुशल कार्यकर्त्ताओंकी बेहद जरूरत है।परन्तु मुझे मालूम है कि आप लोगों में से भी बहुत-से लोग ऐसे हैं जिनमें दृढ़ इच्छाशक्तिकी कमी है और इसलिए क्षमताकी भी कमी है। हमें अपनी निष्क्रियता समाप्त करनी है और विश्वासकी कमीको दूर भगाना है; क्षमता तब अपने आप ही आ जायेगी।
मैंने आपको अभीतक यह बताया कि हमें क्या करना चाहिए। अब मैं आपको वे कुछ बातें बताऊँगा जो हमें नहीं करनी चाहिए। साहित्यिक प्रशिक्षण, विद्वत्तापूर्ण अनुसन्धान, और भाषा सम्बन्धी अध्ययन, अंग्रेजी, संस्कृत और ललित कलाओंका अध्ययन इन सबको गौण स्थान दिया जाना चाहिए। हमारे सब राष्ट्रीय स्कूल हमारी राष्ट्रीय युद्धकी सामग्री अर्थात् रचनात्मक कार्यके कारखानोंमें बदल दिये जाने चाहिए। आज भारतमें लाखों बच्चे ऐसे हैं जो बिना किसी शिक्षाके और उससे भी ज्यादा बिना राष्ट्रीय शिक्षाके और जो दूसरी बड़ी-बड़ी चीजें मैने बताई है, उनके बिना रहते हैं। तो फिर हम कमसे कम स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेनेतक, उनके बिना क्यों नहीं रह सकते हैं?
कार्यसमितिने देशसे सदस्य और स्वयंसेवक भरती करनेकी अपील की है। इस कामके लिए किसी दूसरी संस्थाकी आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए? आप सभी लोग सदस्य और स्वयंसेवक बन सकते हैं और कामको सँभाल सकते हैं। सोचिए, पिछले महायुद्धमें यूरोप में विद्यार्थियोंने क्या किया। उन्होंने जो त्याग किया, क्या हम वैसा त्याग करनेके लिए तैयार हैं? यदि हमारा अपने अन्तरतममें यह विश्वास हो कि जबतक हम स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त कर लेंगे तबतक हम शान्तिसे साँस नहीं लेंगे, तब हम रचनात्मक कार्यक्रमको अमल में लानेके लिए जियेंगे और काम करेंगे।
अन्तमें आपसे जो अपेक्षा की जाती है उसे मैं एक शब्दमें आपके सामने रख दूँ। हमें चूँकि शुद्ध-पवित्र होना है, हम मृत्युका भय त्याग दें। एक अंग्रेजने अभी हाल में कहा कि गांधी भले ही यह सोचें कि अंग्रेजोंके भारतसे चले जानेपर भारतको कोई नुकसान नहीं होगा, परन्तु मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जिस क्षण मेरे देशवासी [अंग्रेज] भारतसे चले जायेंगे, अमीर लोगोंकी सम्पत्ति सुरक्षित नहीं रहेगी और एक भी कुँवारी लड़की पवित्र नहीं बचेगी। इससे पता चलता है कि हम भारतीयों के प्रति वे कितनी हीन भावना रखते हैं। परन्तु ऐसा क्यों न हो? आज<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हम इतने भयभीत हैं कि हमें अपनी सम्पत्ति और अपना मान बचानेके लिए किरायेके लोगोंसे काम लेना पड़ता है। जिस क्षण हम मौतका भय त्याग देंगे, हमारी यह दुर्दशा नहीं रहेगी। मैं विद्यापीठमें पढ़नेवाली हर लड़कीसे यह आशा रखता हूँ कि वह इतनी जाग्रत हो जाये और उसमें इतना नैतिक बल हो कि कोई दुष्ट व्यक्ति उसे छू तक न सके। मैं चाहता हूँ कि आप सब मृत्युका भय त्याग दें, ताकि जब स्वतन्त्रताका इतिहास लिखा जाये, राष्ट्रीय स्कूल और कालेजोंके लड़के-लड़कियोंके नाम हिंसा करके मरनेवालोंमें नहीं अपितु हिंसाका प्रतिरोध करते हुए मरनेवालोंमें लिखा जाये, चाहे वह हिंसा किसीके भी द्वारा की गई हो। आत्म-रक्षाके लिए हत्या करनेकी सामर्थ्य होना जरूरी नहीं है; आदमीमें मरनेकी शक्ति होनी चाहिए। जब आदमी मरनेके लिए पूरी तरह तैयार होगा तो वह हिंसा नहीं करना चाहेगा। निस्सन्देह मैं इसे स्वतः सिद्ध कथनके रूपमें सामने रखूँ कि प्राण-त्यागकी इच्छा जितनी तीव्र हो, हत्या करनेकी इच्छा उतनी ही कम होती है। इतिहास ऐसे लोगोंके उदाहरणोंसे भरा पड़ा है जो साहसके साथ अपने होठोंपर करुणाका भाव लेकर मरे और उन्होंने हिंसापर उतारू अपने शत्रुओंका हृदय-परिवर्तन कर दिया।
'''भावणके अन्त में एक प्रश्नके उत्तरमे गांधीजीने कहा:'''
आप पूछते हैं कि यदि मैं संघर्षमें विद्यार्थियोंके भाग लेनेके बारेमें इतना उत्सुक था तो मैंने स्कूलों और कालेजोंके बहिष्कारके बारेमें क्यों जोर नहीं डाला। मैं कहता हूँ [उपयुक्त] वातावरण नहीं था। परन्तु मुझे आशा है कि आप इसका ऐसा जवाब नहीं देंगे कि यदि [उपयुक्त] वातावरण नहीं था तो फिर ये विद्यार्थी भी क्या कर सकते हैं? ये बहुत कुछ कर सकते हैं। यदि इनकी लगन अपने लक्ष्यके प्रति अधिक तीव्र होती तो उससे सरकारी स्कूलों और कालेजोंके विद्यार्थी स्कूल-कालेज छोड़नेके लिए बाध्य हो जाते। जो ये अबतक नहीं कर सके हैं, सो अब भी कर सकते हैं।<ref>अगला अनुच्छेद '''नवजीवन,''' १९-१-१९३० से लिया गया है।</ref>
चूँकि मैंने यह कहा है इसलिए आप उत्तेजित न हों। एक ओर तो आप मरनेके लिए अवश्य तैयार रहें और दूसरी ओर अपने वर्तमान कर्त्तव्यको निभाने में इस तरह संलग्न रहें मानो कि आप अमर है; आपको कभी मरना नहीं है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हम इतने भयभीत हैं कि हमें अपनी सम्पत्ति और अपना मान बचानेके लिए किरायेके लोगोंसे काम लेना पड़ता है। जिस क्षण हम मौतका भय त्याग देंगे, हमारी यह दुर्दशा नहीं रहेगी। मैं विद्यापीठमें पढ़नेवाली हर लड़कीसे यह आशा रखता हूँ कि वह इतनी जाग्रत हो जाये और उसमें इतना नैतिक बल हो कि कोई दुष्ट व्यक्ति उसे छू तक न सके। मैं चाहता हूँ कि आप सब मृत्युका भय त्याग दें, ताकि जब स्वतन्त्रताका इतिहास लिखा जाये, राष्ट्रीय स्कूल और कालेजोंके लड़के-लड़कियोंके नाम हिंसा करके मरनेवालोंमें नहीं अपितु हिंसाका प्रतिरोध करते हुए मरनेवालोंमें लिखा जाये, चाहे वह हिंसा किसीके भी द्वारा की गई हो। आत्म-रक्षाके लिए हत्या करनेकी सामर्थ्य होना जरूरी नहीं है; आदमीमें मरनेकी शक्ति होनी चाहिए। जब आदमी मरनेके लिए पूरी तरह तैयार होगा तो वह हिंसा नहीं करना चाहेगा। निस्सन्देह मैं इसे स्वतः सिद्ध कथनके रूपमें सामने रखूँ कि प्राण-त्यागकी इच्छा जितनी तीव्र हो, हत्या करनेकी इच्छा उतनी ही कम होती है। इतिहास ऐसे लोगोंके उदाहरणोंसे भरा पड़ा है जो साहसके साथ अपने होठोंपर करुणाका भाव लेकर मरे और उन्होंने हिंसापर उतारू अपने शत्रुओंका हृदय-परिवर्तन कर दिया।
'''भावणके अन्त में एक प्रश्नके उत्तरमे गांधीजीने कहा:'''
आप पूछते हैं कि यदि मैं संघर्षमें विद्यार्थियोंके भाग लेनेके बारेमें इतना उत्सुक था तो मैंने स्कूलों और कालेजोंके बहिष्कारके बारेमें क्यों जोर नहीं डाला। मैं कहता हूँ [उपयुक्त] वातावरण नहीं था। परन्तु मुझे आशा है कि आप इसका ऐसा जवाब नहीं देंगे कि यदि [उपयुक्त] वातावरण नहीं था तो फिर ये विद्यार्थी भी क्या कर सकते हैं? ये बहुत कुछ कर सकते हैं। यदि इनकी लगन अपने लक्ष्यके प्रति अधिक तीव्र होती तो उससे सरकारी स्कूलों और कालेजोंके विद्यार्थी स्कूल-कालेज छोड़नेके लिए बाध्य हो जाते। जो ये अबतक नहीं कर सके हैं, सो अब भी कर सकते हैं।<ref>अगला अनुच्छेद '''नवजीवन,''' १९-१-१९३० से लिया गया है।</ref>
चूँकि मैंने यह कहा है इसलिए आप उत्तेजित न हों। एक ओर तो आप मरनेके लिए अवश्य तैयार रहें और दूसरी ओर अपने वर्तमान कर्त्तव्यको निभाने में इस तरह संलग्न रहें मानो कि आप अमर है; आपको कभी मरना नहीं है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४९
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{{c|{{larger|'''३८१. स्वतन्त्रता दिवस'''}}}}
लाहौर में स्वतन्त्रताका प्रस्ताव पास कर लेना तो आसान था। लेकिन ‘शान्तिमय और वैध’ उपायोंसे ही क्यों न हो, स्वराज्यको पाना बड़ी टेढ़ी खीर है। सबसे पहले तो जरूरी है कि सर्वसाधारण कांग्रेसके सन्देशको जानें, समझें और सराहें। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि स्वतन्त्रताका मतलब क्या है और उसके लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसीलिए कांग्रेसकी कार्यसमितिने, जिसका कर्तव्य है कि वह कांग्रेसको लोगोंकी प्रतिदिनकी चर्चाका विषय बना दे, रविवार ता॰ २६ को पूर्ण स्वराज्यका दिन ठहराया है। उस दिन जो लोग इकट्ठा होंगे वे कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत घोषणाका<ref>देखिए “२६ को यह याद रखिए”, २३-१-१९३०।</ref> उच्चार करेंगे। यह घोषणा अपने-आपमें पूर्ण होगी। अतएव उस दिन अलग भाषणोंकी जरूरत नहीं होगी। भाषण देना उचित भी नहीं होगा, क्योंकि यह बात फैल चुकी है कि स्वतन्त्रताकी बात फैलते ही लोग शायद गप्प उड़ाने लगेंगे। ऐसे लोगोंको समझ लेना चाहिए कि गैर-जिम्मेदार और छूछी बातें स्वतन्त्रता नहीं हैं, वह तो एक तरहका परवाना ‘लाइसेंस’ हुआ; वह स्वतन्त्रताके प्रेमके कारण उत्पन्न उत्साह भी नहीं है, बल्कि एक ऐसा फेन है, जो निकम्मा और हानिकर समझकर ठुकरा दिया जाना चाहिए। लेकिन यह २६ जनवरीका दिन तो हमारे लिए पूर्ण अनुशासन, संयम, संग्रह, प्रतिष्ठा और सच्ची शक्तिका दिन होगा। अच्छा तो यह हो कि यह घोषणा प्रत्येक शहर और प्रत्येक गाँवमें उद्घोषित हो, जैसा कि १९१९ की स्मरणीय ६ अप्रैल के दिन हुआ था।<ref>देखिए खण्ड १५।</ref> यह और भी अच्छा हो कि सब जगह एक ही निश्चित समयपर सभाएँ हों। इन सभाओंकी उपस्थिति बहुसंख्यक बनानेके लिए घर-घर जाना चाहिए और लोगों में पर्चे भी बाँटने चाहिए। गाँवोंमें पुराने रिवाजके अनुसार डुग्गी द्वारा ही सभाके वक्तका ऐलान किया जा सकता है। जो लोग धार्मिक वृत्तिके हैं, ये पूर्ववत् उस दिनका कार्यक्रम भी शौच-स्नान आदिसे शुरू करें और अपनी सारी शक्ति देशकी समस्या पर विचार करने और उसे हल करनेके उपायों में खर्च करें। इसलिए उस दिन वे अपना सारा समय किसी रचनात्मक कार्यक्रम में लगायेंगे, चाहे वह कताईका हो, ‘अछूतों’ की सेवाका हो, हिन्दू-मुसलमानोंके पुनः मेल-मिलापका हो, शराबबन्दीका हो या फिर ये सभी काम हों; ये नामुमकिन तो नहीं हैं। जैसे कि एक हिन्दू किसी अछूतको अपने साथ ले ले, और मुसलमान, पारसी, ईसाई, सिख वगैराको बुलाकर उनके साथ कुछ निश्चित समयके लिए चरखा-दंगलमें शामिल हो, और फिर यो कहिए कि वे सब मिलकर एक घंटेतक खादीकी फेरी लगायें―यह खादी वे सब मिलकर खरीदें और फिर बेचें, और बादमें एक घंटे के लिए पासमें किसी शराबकी दूकानपर चले<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जायें, और शराब विक्रेताको समझायें कि इन गन्दे उपायोंसे धन कमाना या जीविका उपार्जन करना कितना बुरा है। ये ऐसी दूकानोंपर आनेवाले शरावसोरोंसे भी दो बातें कर सकते हैं और फिर शामकी सभामें हाजिर होकर उस दिनका कार्यक्रम समाप्त कर सकते हैं। यह भी याद रहे कि यह रविवार झण्डा फहरानेका दिन है। और इसलिए ध्वजारोहण समारोहसे उस दिनका कार्यक्रम प्रारम्भ किया जा सकता है।
अगर कांग्रेस समितियाँ और कांग्रेसके कार्यकर्त्ता लाहौरके प्रस्तावकी गम्भीरताको समझते हैं और खुद-गम्भीर हैं, तो मुझे आशा है कि उन्होंने नये सदस्य बनाने शुरू कर दिये होंगे और पुराने सदस्योंको नये सालका चन्दा देनेके लिए कहने लगे होंगे। इसके साथ ही, उन्हें, याने पुराने और नये सदस्योंको, कांग्रेसके ध्येयके परिवर्तन की बात भी समझा दी जानी चाहिए। अगर कांग्रेस समितियाँ सही ढंगसे काम शुरू कर दें तो उनसे कांग्रेसको पक्की नीवपर पुनः संगठित करनेमें बड़ी मदद मिलेगी। और इस तरह जो लोग केवल २६ जनवरीके महोत्सव में शामिल होंगे वे निरे तमाशाई या निठल्ले लोग नहीं होंगे, बल्कि ऐसे स्त्री-पुरुष होंगे, जिन्हें इस बातकी काफी अच्छी जानकारी होगी कि वे किसलिए इकट्ठे हुए हैं और अपने उस समान उद्देश्यको पूरा करनेका पक्का इरादा रखते होंगे। आगामी महोत्सवको व्यापक बनाना और देश-भर में, उत्तरसे दक्षिण, पूरबसे पश्चिमतक और फिर भी पूर्ण सुव्यवस्थाके साथ उसे मनाना सम्भव होना चाहिए। इस स्वतन्त्रता दिवसपर कोई अशुभ या अवांछनीय घटना नहीं होनी चाहिए। केन्द्रीय कार्यालयमें प्रत्येक गाँव और प्रत्येक स्थानसे उस
दिनकी सारी कार्रवाईका पूरा-पूरा विवरण भेजा जाना उतना ही जरूरी है, जितना कि इस महोत्सवका मनाया जाना, ताकि कार्यालय आन्दोलन और कांग्रेसके संगठनकी ताकतका अन्दाज लगा सके। उस दिनके पूरे और सच्चे विवरणपर ही कार्यसमिति, जिसकी बैठक १४ फरवरीको होनेवाली है, अपना आगेका कार्यक्रम निश्चित कर सकेगी।
इस तमाम कामके लिए पूरे समयके कार्यकर्ताओंकी जरूरत है। दूसरे शब्दोंमें, इसके लिए स्थायी वैतनिक स्वयंसेवकोंकी आवश्यकता है। जो लोग अपना कुछ समय ही इन कामोंमें देते हैं, उनकी सेवा तभी उपयोगी और बहुमूल्य होती है, जब उनके साथ उस जगह कमसे कम एक वैतनिक कार्यकर्ता भी हो। मैं पहले ही कह चुका हूँ<ref>देखिए “संयुक्त प्रान्त राष्ट्रीय सेवा”, १२-१२-१९२९।</ref> कि संयुक्त प्रान्तके लिए एक ऐसा प्रान्तीय सेवा संघ होना चाहिए, जो अपने लिये एक कारगर संविधान बनाकर फौरन ही रंगरूट भरती करना शुरू कर दे। हमें आशा करनी चाहिए कि इस अत्यन्त वांछनीय संस्थाकी स्थापना करनेमें थोड़ा भी विलम्ब नहीं किया जायेगा। अगर इस संघने योग्यतासे और सच्चाईसे काम किया तो दूसरे प्रान्तोंके लिए भी यह एक दृष्टान्तका काम देगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १६-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|2em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३८२. आगामी कांग्रेस'''}}}}
मेरी राय में लाहौर कांग्रेसने यह निश्चय करके कि भविष्य में कांग्रेस के अधिवेशन दिसम्बर में न होकर फरवरी या मार्चमें किसी समय हुआ करेंगे, बड़ी ही बुद्धिमानीका काम किया है।<ref>देखिए “भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें-१”, १-१-१९३०।</ref> बेकार और खुशहाल लोगों के लिए तो दिसम्बरका महीना बेशक बहुत अनुकूल है। किन्तु कांग्रेस में हाजिर होनेवाले गरीबों की तादाद हर साल बढ़ती जाती है। इन गरीबोंके लिए भारतके कई प्रान्तों में दिसम्बरका महीना बहुत कष्टदायक होता है। ये लोग बेचारे जहाँ-तहाँ खुली जगहों में बिना कुछ ओढ़े-बिछाये पड़ रहते हैं और इन्फ्लुएऐंजा तथा दूसरे रोगोंके शिकार बन जाते हैं। बड़े दिनोंकी छुट्टियोंके कारण मिलनेवाले सस्ती दरके टिकटोंसे गरीबोंको नाममात्रका ही लाभ होता है। स्वागत समितिको प्रतिनिधियों और प्रेक्षकोंकी सुख-सुविधाका प्रबन्ध करनेमें बड़ी कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है। इस हेरफेरके पक्ष में ये सारी दलीलें तो स्पष्ट हैं ही। फिर कांग्रेसी लोगोंपर इतने वर्षोंसे दिसम्बर महीनेकी जो मोहिनी छाई हुई थी, उसे तोड़ना भी जरूरी था। शुरुआत में दिसम्बर महीना वकीलों और उन लोगोंकी सुविधा के खयालसे पसन्द किया गया था, जो देशके प्रशासन से और इसलिए उसके शोषणसे सम्बन्धित थे। इसलिए पूर्ण-स्वराज्य के प्रस्तावकी मंजूरी के साथ ही साथ इस अनुचित नष्ट होना उचित ही हुआ है। आमतौरपर कांग्रेस एक कठपुतलीका खेल या छुट्टी करने-देखनेका तमाशा समझी जाती है। अगर पूर्ण-स्वराज्य हासिल करना है, तो उसे तमाशा नहीं समझा जाना चाहिए, वरन् उसे काम करने तथा करानेवाले कर्मठ मनुष्योंका मण्डल बन जाना चाहिए।
यह सब देखते हुए विषय समितिका अपनी या प्रतिनिधियोंकी संख्याको घटानेवाला प्रस्ताव नामंजूर कर देना एक दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।<ref>देखिए “लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा”, २६-१२-१९२९।</ref> लेकिन मुझे इससे आश्चर्य नहीं होता। क्योंकि कांग्रेस भी अधिकार और उससे भी बुरी चीजोंके लोभका स्थान बन गई है। आये दिन अनेक समितियोंमें पद पानेके लिए इतनी छीना-झपटी होती है कि चुनावके झगड़े हमारी राष्ट्रीय संस्थाके लिए एक दुःखद किन्तु रात-दिनकी बात बन गये हैं। सत्ताके लोभमें कांग्रेसके संविधानकी एक-एक धाराका निर्दयतापूर्वक दुरुपयोग किया जाता है। अतः जो यह कहा गया है सो ठीक ही है कि अगर संख्या इतनी अधिक घटा दी जायेगी तो शायद नतीजा और उलटा होगा। भ्रष्टाचार खत्म होने या कम होनेके बदले शायद बढ़ेगा। मुझे इस खतरेका पूरा-पूरा खयाल है, और मैं यह भी जानता हूँ कि बाहरी उपायोंकी अपेक्षा आन्तरिक शुद्धिकी ज्यादा जरूरत है। किन्तु कांग्रेसको शुद्ध करनेके लिए हरएक उचित बाह्य साधनका इस्तेमाल करना, उसे अपने ध्येयको सवाईके साथ कार्यमें परिणत करनेवाली संस्था बनाना और फलस्वरूप एक जबर्दस्त तथा भलीभाँति काम करनेवाली संस्थामें बदल देना हमारा कर्तव्य है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}कराची कांग्रेससे<ref>आगामी कांग्रेस अधिवेशन कराचीमें होना था।</ref> मुझे बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं। सम्भव है कि उस समयके आने से पहले ही कदाचित मैं किसी अधिक अच्छे स्थान [जेल] में जा बैठूँ और यह भी सम्भव है कि अगले कांग्रेस अधिवेशनसे पहले ही सारे देशकी शक्ल बदल जाये। लेकिन वैसे, हमारा कर्तव्य तो यह है कि हम, जो हो चुका है, उसका सिंहावलोकन सामान्यतया प्रत्याशित भविष्यको ध्यान में रखकर करलें।
प्रतिनिधियोंकी संख्या घटाना सिंथके कार्यकर्त्ताओंके वशकी बात नहीं है। फिर भी ऐसी कई दूसरी बातें हैं, जिनसे आगामी अधिवेशन अपेक्षाकृत कम अव्यवस्थित और बहुत-कुछ कम व्ययसाध्य बनाया जा सकता है। खेमोंका नगर इस देशके लिए बहुत खर्चीली चीज है। घासफूसके खुले मण्डप बाँध लेने और भीतरकी ओर दस-दस फुटकी दूरी पर आधी-आधी दीवारें खड़ी करनेसे थोड़ा एकान्त भी मिल जायेगा और ऐसे मण्डप सबसे ज्यादा सस्ते भी पड़ेंगे। इन्हें बनानेके लिए जिन चीजोंसे काम लिया जायेगा, वे एक ही बारके उपयोगके बाद निकम्मी नहीं हो जायेंगी। जो जमीन पसन्द की जाये यह समतल और सुव्यवस्थित होनी चाहिए। उस जमीनमें से प्रतिनिधियों और प्रेक्षकोंको खुले चौरस ‘ब्लाक’ किरायेपर दिये जा सकते हैं, जिनमें वे अपनी इच्छानुसार रहने-बैठनेका इन्तजाम कर सकें। अभीसे इस बातके जानकार लोगोंकी एक छोटी-सी समिति बनाकर उसे एक अस्थायी नगर बनानेकी अच्छीसे-अच्छी और सस्ती से-सस्ती योजना तैयार कर लेनेका काम सौंप दिया जाना चाहिए। स्वागत समितिको
खाने-पीनेका प्रबन्ध नहीं करना चाहिए। कुछ चुनिन्दा देशभक्त होटलवालों को होटल या भोजनालय चलानेके ठेके दे दिये जायें और वे हरएक प्रान्तके लोगोंको अपने-अपने प्रान्तके रीति-रिवाजके अनुसार मनपसन्द भोजन दिया करें। प्रति वस्तु और प्रति समयके भोजनकी दर पहलेसे ही ठहरा ली जाये। इन बातोंका प्रबन्ध शौकिया तरीकेसे करनेके कारण हम अपना बहुतेरा समय और धन तो बरबाद कर ही बैठते हैं, इसके सिवा प्रतिवर्ष नया नया प्रबन्ध करनेसे हर साल मिलनेवाला अनुभव भी व्यर्थ चला जाता है, अगर यह सच न होता तो ४५ सालके अनुभवके बाद आज कांग्रेसका वार्षिक अधिवेशन करना बच्चों का खेल हो जाना चाहिए था, और व्यवस्था तो पूर्णतया निर्दोष ढंगका नमूना होनी थी; लेकिन हकीकत इससे उलटी है। आज उन शहरोंकी स्वागत समितियोंको जहाँ कांग्रेस अधिवेशन होता है, कांग्रेसका प्रबन्ध करनेमें अत्यन्त कठिन समयसे गुजरना होता है और सब कुछ शान्तिपूर्वक समाप्त हो जानेपर वे ईश्वरका आभार मानती हैं। आरोग्य-रक्षा, पानीकी व्यवस्था, अस्पताल, आकस्मिक घटना हो जानेपर सेवा-शुश्रूषाका प्रबन्ध, होटल या भोजनालय इमारत बनाना वगैरा कामोंके अलग-अलग विभाग होने चाहिए और ईमानदार राष्ट्रभक्त ठेकेदारोंको ठेके देकर उनके द्वारा इन सब विभागोंका इन्तजाम होना चाहिए। राष्ट्रीय जीवनका सुव्यवस्थित निर्माण इसी तरह हो सकता है। अब ऐसी स्थिति तो पैदा हो ही जानी चाहिए कि जिससे राष्ट्रके प्रतिनिधि पूर्ण शान्ति और निश्चितताके साथ राष्ट्रकी समस्याओंपर विचार करके उन्हें हल कर सकें।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||आगामी कांग्रेस|४१५}}</noinclude>{{gap}}प्रदर्शनीको भी स्वागत समितिके व्ययकी पूर्तिका साधन नहीं बनाना चाहिए। स्वागत-समितिके खर्चका प्रबन्ध तो बड़ी आसानीसे हो सकता है, बशर्ते कि वह व्यवहार-कुशल हो और होशियारीके साथ काम करना जानती हो। ऊपर जिस तरहके ठेकेदारोंका जिक्र किया है, उनसे ठेकेके बदले में मिलनेवाली रकमसे ही प्रधान कार्यालयका सारा खर्च चलाना चाहिए और मैंने जिस योजनाका सुझाव दिया है, उसमें प्रधान कार्यालयका काम इतना ही होना चाहिए कि वह विभिन्न विभागोंकी देखभाल करे और सामान्य व्यवस्थाकी निगरानी रखे। प्रदर्शनीका काम उस विषयके किसी विशेष जानकार मण्डलको सौंपा जाना चाहिए। मैंने इस कामके लिए अखिल भारतीय चरखा संघका सुझाव दिया है, लेकिन अगर किसीको उसके खिलाफ कोई शिकायत हो तो दूसरा कोई मण्डल पसन्द किया जा सकता है। शिक्षाकी दृष्टिसे इस प्रदर्शनीको महत्त्वपूर्ण बनानेके लिए नीचे लिखी शर्तोंका पालन जरूरी है।
१. प्रदर्शनी में खेलकूद और खिलौनों या पुतलोंके तमाशोंको स्थान नहीं होना चाहिए। मेलों-ठेलों और त्यौहारोंके मौकोंपर अन्य एजेन्सियाँ-इन्हें जनताके लिए प्रस्तुत करती ही हैं।
२. प्रदर्शनी में स्वदेशी वस्तुओंके सिवा और कोई भी चीज नहीं रखी जानी चाहिए। वही वस्तु स्वदेशी है, जो हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानी कारीगर द्वारा बनाई गई हो और अगर वह किसी कम्पनीकी बनी हुई है, तो वह कम्पनी मुख्यतः भारतीय साझेदारोंकी होनी चाहिए, जो साझेदारोंके लाभके लिए ही चलती हो। मसलन, हारमोनियमके जुदा हिस्सोको विदेशसे मँगाकर हिन्दुस्तानमें जोड़ लेनेसे यह स्वदेशी नहीं कहा जा सकता। इसी तरह विलायती सूतका देशमें बना हुआ कपड़ा भी स्वदेशी नहीं हो सकता और न अधिकांश विदेशी साझेदारोंके बलपर बनी हुई किसी कम्पनी द्वारा बनाया गया कपड़ा ही स्वदेशी कहा जा सकता है।
३. प्रदर्शनी में सब तरहकी स्वदेशी चीजें न रखी जायें। जिन चीजोंसे देशको सच्चा लाभ होता हो और जिन्हें मददकी जरूरत हो वे ही चीजें प्रदर्शनीमें रखी जानी चाहिए। अतएव प्रदर्शनी में देशी सिगार, देशी शराब, देशी दवायें, देशी श्रृंगारकी चीजें, पेटैंट दवा, अश्लील साहित्य, मिलके कपड़े वगैरा कदापि नहीं रखे जा सकते।
४. चरखे और खादीको केन्द्र मानकर उसके चारों ओर प्रदर्शनीकी अन्य सब चीजों को सजाया जाये।
इस तरहकी प्रदर्शनी राष्ट्रके लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी, और अगर इसके पीछे एक स्थायी व्यवस्थाका वल होगा तो इससे जनसाधारणको उत्तम आर्थिक महत्त्वकी शिक्षा मिलेगी। सिंधके कार्यकर्त्ता पिछली भूलोंसे सबक लें। उनके पास १२ महीनोंसे भी अधिक का समय है। उन्हें विचार करने या काम करनेसे इसलिए हाथ नहीं समेट लेना चाहिए कि कोई असंगत या गम्भीर या भारी घटना घटने वाली है। किसी असाधारण घटनाकी आशा या आशंकासे रोजमर्राके और आवश्यक काम-काजको बन्द कर देना घबराहटकी निशानी है। जिस तरह हम अपना रोजका काम बिना रुकावटके, जीवनकी सबसे बड़ी घटना―मौत―होनेतक करते ही रहते हैं, इस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>असाधारण घटनाके लिए भी हमें उसी तरह तैयार रहना चाहिए। अगर कांग्रेसके द्वारा ही पूर्ण स्वराज्य लेना हो तो कांग्रेसको अनुशासित, संगठित, ऐक्यबद्ध और गरीबों तथा करोड़ों मूक देशवासियोंकी जरूरतोंका विचार करके तदनुसार काम करनेवाली संस्था बनना चाहिए।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १६-१-१९३०|1em}}
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{{c|{{larger|'''३८३. प्रस्तुत प्रश्न'''}}}}
काशी विद्यालयके एक राजनीतिके विद्यार्थीने निम्नलिखित प्रश्न पूछे हैं:<ref>यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। अपने पत्र में पत्र-लेखकने लिखा था कि विविध बहिष्कारमें जितने त्यागकी अपेक्षा है लोग उतना करने को तैयार नहीं; यदि बहिष्कार सफल भी हो जाये तो भी उससे सरकार नहीं पल्टी जा सकती, पर पूर्वमें किये गये सत्याग्रह आन्दोलन सफल रहे हैं, क्योंकि उनमें सरकारके अस्तिस्तकको चुनौती नहीं दी गई थी।</ref>
सन् १९२२ में जो प्रश्न पूछे जाते थे, ठीक वैसे ही प्रश्न इस विद्यार्थीके हैं। परन्तु मुझे इनसे कोई आश्चर्य नहीं होता। प्रश्नोंके उत्तर प्रश्नकर्त्ता अतिरिक्त थोड़े ही लोग पढ़ते हैं। उनमें से समाधान तो बहुत कमका होता है। कइयोंको ऐसे प्रश्नोंत्तरोंका खयाल भी नहीं रहता। इसलिए जब-जब ऐसे प्रश्न पूछे जायें, तब-तब सम्पादकका कर्त्तव्य है कि वह उनका उत्तर देता रहे।
पहली बात त्याग-भावनाके अभावकी है। यह ठीक है और ठीक नहीं भी है। ठीक इसलिए है कि प्रश्नकर्ताके नजदीकी वायुमण्डलमें त्याग भावना प्रतीत नहीं होती है, और इस कारण वह यही समझता है कि देशभरमें त्याग-वृत्ति कम है; ठीक इसलिए नहीं है कि यदि त्याग-भावनाकी सर्वथा कमी होती तो देशका कुछ भी कार्य होना सम्भव न था। यह स्वीकार करते हुए भी कि त्यागकी मात्राके बढ़ने की काफी गुंजाइश है, मेरा अनुभव मुझे बताता है कि देशमें त्याग-भावना है। और वह बढ़ती जाती है। इसमें जरा भी शक नहीं कि पूर्ण स्वराज्य पानेके लिए त्यागकी मात्रा बहुत अधिक होनी चाहिए। खद्दर पहननेके सम्बन्धमें विद्यार्थीने जिस वैश्य वृत्तिका उल्लेख किया है, उसे आगे चलकर उदार और पारमार्थिक वृत्तिमें
परिवर्तित होना पड़ेगा।
त्रिविध बहिष्कारके विषयमें विद्यार्थीने जो-कुछ लिखा है, उसमें मुझे अज्ञान ही अधिक प्रतीत होता है, कारण कि कांग्रेसने पाठशालाओं और अदालतोंके बहिष्कारका पुनरुद्धार नहीं किया है। परन्तु मेरा यह विश्वास अवश्य है कि तीनों बहिष्कार आवश्यक हैं। यह कहना कि कौंसिलोंमें कोई-न-कोई तो जायेगा ही, फिर कांग्रेसवाले क्यों न जायें, उचित नहीं। शराबकी दुकान खाली न रहेगी, तो क्या उसमें भी हमें जाना ही चाहिए? यदि हम कौंसिलोंको निरर्थक अथवा हानिकर मानते हों तो<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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|-
| २६. || 'द्रौपदीना चीर' की प्रस्तावना (८-३-१९३०) || २७
|-
| २७. || 'राजकथा' की प्रस्तावना (८-३-१९३०) || २८
|-
| २८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (८-३-१९३०) || २८
|-
| २९. || भाषण : अहमदाबादमें (८-३-१९३०) || २९
|-
| ३०. || मिल-मालिक संघके सदस्योंसे बातचीत (८-३-१९३०) || ३१
|-
| ३१. || भाषण : प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रम में (९-३-१९३०) || ३२
|-
| ३२. || अन्तिम परीक्षा (९-३-१९३०) || ३३
|-
| ३३. || सत्याग्रही-दलका कूच (९-३-१९३०) || ३५
|-
| ३४. || पत्र : मणिबहन पटेलको (९-३-१९३०) || ३७
|-
| ३५. || पत्र : सतीन डी॰ गुप्तको (१०-३-१९३० के पूर्व) || ३८
|-
| ३६. || भाषण : प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रम में (१०-३-१९३०) || ३८
|-
| ३७. || सन्देश : आन्ध्र देशके लिए (११-३-१९३० के पूर्व) || ४०
|-
| ३८. || भेंट : एच॰ डी॰ राजाके साथ (११-३-१९३० या उसके पूर्व) || ४१
|-
| ३९. || भेंट : 'मैंचेस्टर गार्जियन के प्रतिनिधिको (११-३-१९३० या उसके पूर्व) || ४२
|-
| ४०. || सन्देश रिकार्ड किये जानेके सम्बन्धमें (११-३-१९३० या उसके पूर्व) || ४२
|-
| ४१. || प्रश्नोत्तर (११-३-१९३० या उसके पूर्व) || ४३
|-
| ४२. || भाषण: प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रममें (११-३-१९३० या उसके पूर्व) || ४८
|-
| ४३. || भाषण: प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रम में (११-३-१९३०) || ४९
|-
| ४४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (११-३-१९३०) || ५१
|-
| ४५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (११-३-१९३०) || ५२
|-
| ४६. || तार : भवानीदयाल संन्यासीको (११-३-१९३० या उसके पश्चात्) || ५२
|-
| ४७. || सन्देश : बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के लिए (१२-३-१९३० के पूर्व) || ५३
|-
| ४८. || सरदार वल्लभभाई पटेल (१२-३-१९३०) || ५३
|-
| ४९. || परिचित उत्तर (१२-३-१९३०) || ५५
|-
| ५०. || चहुँमुखी अभिशाप (१२-३-१९३०) || ५६
|-
| ५१. || मेरे बारेमें भ्रामक प्रचार (१२-३-१९३०) || ५९
|-
| ५२. || जैसा वह नहीं है (१२-३-१९३०) || ५१
|-
| ५३. || नई दिशा (१२-३-१९३०) || ६२
|-
| ५४. || भाषण: प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रम में (१२-३-१९३०) || ६४
|-
| ५५. || चन्दोलासे चलते समय दिया गया विदाई सन्देश (१२-३-१९३०) || ६६
|-
| ५६. || भेंट : हरिदास टी॰ मजुमदारसे (१२-३-१९३०) || ६६
|-
| ५७. || भाषण : असलालीमें (१२-३-१९३०) || ६७
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|+{{c|{{larger|'''उन्नीस'''}}}}
|-
|५८. || पत्र नारणदास गांधीको (१२-३-१९३० के पश्चात्) || ६९
|-
|५९. || बंगाल- आसाममें हिन्दी (१३-३-१९३०) || ६९
|-
|६०. || पत्र मीराबहनको (१३-३-१९३०) || ७०
|-
|६१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१३-३-१९३०) || ७१
|-
|६२. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (१३-३-१९३०) || ७१
|-
|६३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (१३-३-१९३०) || ७२
|-
|६४. || पत्र प्रेमावहन कंटकको (१३-३-१९३०) || ७२
|-
|६५. || पत्र कुसुम देसाईको (१३-३-१९३०) || ७३
|-
|६६. || पत्र: महादेव देसाईको (१३-३-१९३०) || ७३
|-
|६७. || भाषण बारेजामें (१३-३-१९३०) || ७४
|-
|६८. || भाषण नवागांवमें (१३-३-१९३०) || ७५
|-
|६९. || बातचीत : समाचारपत्रोंके प्रतिनिधियोंते (१४-३-१९३०) || ७७
|-
|७०. || पत्र वसुमती पण्डितको (१४-३-१९३०) || ७८
|-
|७१. || पत्र : सुशीला गांधीको (१४-३-१९३०) || ७९
|-
|७२. || पत्र कुसुम देसाईको (१४-३-१९३०) || ७९
|-
|७३. || भाषण: वासणा (१४-३-१९३०) || ८०
|-
|७४. || पत्र नारणदास गांधीको (१५-३-१९३०) || ८२
|-
|७५. || पत्र व्रजकृष्ण चांदीवालाको (१५-३-१९३०) || ८२
|-
|७६. || भाषण : डभाणमें (१५-३-१९३०) || ८३
|-
|७७. || भाषण : नडियादमें (१५-३-१९३०) || ८४
|-
|७८. || पत्र : दुर्गा गिरिको (१५-३-१९३० को या उसके पश्चात्) || ८५
|-
|७९. || हम सब एक हैं (१६-३-१९३०) || ८६
|-
|८०. || प्रयाण (१६-३-१९३०) || ८७
|-
|८१. || 'भगवद्गीता' अथवा 'अनासक्तियोग' (१६-३-१९३०) || ८९
|-
|८२. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१६-३-१९३०) || ९०
|-
|८३. || पत्र वसुमती पण्डितको (१६-३-१९३०) || ९०
|-
|८४. || पत्र नारणदास गांधीको (१६-३-१९३०) || ९१
|-
|८५. || भाषण: बोरीयावीमें (१६-३-१९३०) || ९१
|-
|८६. || पत्र मीराबहनको (१७-३-१९३०) || ९२
|-
|८७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-३-१९३०) || ९३
|-
|८८. || पत्र : सुशीला गांधीको (१७-३-१९३०) || ९३
|-
|८९. || पत्र : कुसुम देसाईको (१७-३-१९३०) || ९४
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
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|+{{c|{{larger|'''बीस'''}}}}
|-
|९०. || पत्र : प्रभावतीको (१७-३-१९३०) || ९४
|-
|९१. || पत्र : नारणदास गांधीको (१७-३-१९३०) || ९५
|-
|९२. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१७-३-१९३०) || ९६
|-
|९३. || पत्र : जयप्रकाश नारायणको (१७-३-१९३०) || ९६
|-
|९४. || भाषण : आनन्दमें (१७-३-१९३०) || ९७
|-
|९५. || स्वयंसेवकोंसे बातचीत (१७-३-१९३०) || १००
|-
|९६. || भाषण: सत्याग्रहियोंके समक्ष (१७-३-१९३० के पश्चात्) || १०१
|-
|९७. || महान् तत्त्वदर्शी (१८-३-१९३०) || १०२
|-
|९८. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१८-३-१९३०) || १०३
|-
|९९. || भाषण : बोरसदमें (१८-३-१९३०) || १०३
|-
|१००. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१९-३-१९३०) || १०७
|-
|१०१. || भाषण : रासमें (१९-३-१९३०) || १०७
|-
|१०२. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-३-१९३०) || ११०
|-
|१०३. || टिप्पणियाँ: नमक-कर; इसे कैसे तोड़ें; घटाया नहीं बढ़ाया है;<br>दीनबन्धु एन्ड्रयूज (२०-३-१९३०) || ११०
|-
|१०४. || विद्यार्थी क्या पसन्द करेंगे? (२०-३-१९३०) || ११३
|-
|१०५. || सरकारकी क्षुद्रता (२०-३-१९३०) || ११५
|-
|१०६. || यदि सच है तो अच्छा (२०-३-१९३०) || ११६
|-
|१०७. || स्वराज्य और रामराज्य (२०-३-१९३०) || ११७
|-
|१०८. || भाषण : कारेलीमें (२०-३-१९३०) || ११८
|-
|१०९. || पत्र : गंगादेवी सनाढ्यको (२०-३-१९३०) || ११८
|-
|११०. || पत्र : अब्दुलकादिर बावजीरको (२१-३-१९३०) || ११९
|-
|१११. || पत्र : कुसुम देसाईको (२१-३-१९३०) || ११९
|-
|११२. || भाषण : गजेरामें (२१-३-१९३०) || १२०
|-
|११३. || भाषण : अंखीमें (२१-३-१९३०) || १२१
|-
|११४. || सन्देश : महाराष्ट्रको (२२-३-१९३०) || १२२
|-
|११५. || भेंट : यूसुफ मेहरअलीको (२२-३-१९३०) || १२२
|-
|११६. || पत्र : मीराबहनको (२३-३-१९३० के पूर्व ) || १२४
|-
|११७. || पत्र : कुसुम देसाईको (२३-३-१९३०) || १२४
|-
|११८. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२३-३-१९३०) || १२५
|-
|११९. || भाषण : बुवामें (२३-३-१९३०) || १२५
|-
|१२०. || भाषण : समनीमें (२३-३-१९३०) || १२६
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
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|+{{c|{{larger|'''इक्कीस'''}}}}
|-
|१२१. || पत्र : महादेव देसाईको (२४-३-१९३०) || १२६
|-
|१२२. || पत्र : मीराबहनको (२५-३-१९३०) || १२७
|-
|१२३. || पत्र व्रजकृष्ण चांदीवालाको (२५-३-१९३०) || १२८
|-
|१२४. || भाषण: त्रालसाकी सार्वजनिक सभामें (२५-३-१९३०) || १२८
|-
|१२५. || पत्र : सुशीला गांधीको (२६-३-१९३०) || १२९
|-
|१२६. || भाषण : भड़ों में (२६-३-१९३०) || १३०
|-
|१२७. || भाषण अंकलेश्वरमें (२६-३-१९३०) || १३३
|-
|१२८. || पत्र : मीराबहनको (२६-३-१९३० के पश्चात्) || १३४
|-
|१२९. || खोदा पहाड़ निकली चुहिया (२७-३-१९३०) || १३५
|-
|१३०. || 'राजाका प्राप्य राजाको दो' (२७-३-१९३०) || १३६
|-
|१३१. || राजद्रोह धर्म है (२७-३-१९३०) || १३७
|-
|१३२. || स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र (२७-३-१९३०) || १३९
|-
|१३३. || कुछ सुझाव (२७-३-१९३०) || १४०
|-
|१३४. || टिप्पणियाँ: खद्दरकी कमी मीराबाई प्रबन्धक नहीं ( २७-३-१९३०) || १४३
|-
|१३५. || तलवारका न्याय ( २७-३-१९३०) || १४४
|-
|१३६. || सन्देश: हिन्दुस्तानी सेवा दलको (२७-३-१९३०) || १४५
|-
|१३७. || भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें (२७-३-१९३०) || १४५
|-
|१३८. || भाषण: सजोदमें ( २७-३-१९३०) || १४६
|-
|१३९. || भाषण : मांगरोलमें (२७-३-१९३०) || १४७
|-
|१४०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२८-३-१९३०) || १४८
|-
|१४१. || भाषण : रायमामें (२८-३-१९३०) || १४९
|-
|१४२. || भाषण: स्वयंसेवकोंके समक्ष (२८-३-१९३०) || १५०
|-
|१४३. || भाषण उमराठी में (२८-३-१९३०) || १५०
|-
|१४४. || भाषण: भटगाममे (२९-३-१९३०) || १५१
|-
|१४५. || बहिष्कारकी मर्यादा (३०-३-१९३०) || १५५
|-
|१४६. || मुखियों और मतादारोंके बारेमें (३०-३-१९३०) || १५८
|-
|१४७. || भाषण : ओलपाड ताल्लुके (३०-३-१९३० को या उसके पूर्व ) || १५९
|-
|१४८. || भाषण सांधियेरमें (३०-३-१९३०) ||१६०
|-
|१४९. || भाषण : देला में (३०-३-१९३०) || १६२
|-
|१५०. || पत्र: रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (३१-३-१९३०) || १६४
|-
|१५१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (३१-३-१९३०) || १६५
|-
|१५२. || भाषण छापरभाठा में (१-४-१९३०) || १६६
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
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|+{{c|{{larger|'''बाईस'''}}}}
|-
|१५३. || भाषण : सूरतमें (१-४-१९३०) || १६७
|-
|१५४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२-४-१९३०) || १७१
|-
|१५५. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२-४-१९३०) || १७१
|-
|१५६. ||भाषण : डिंडोलीमें (२-४-१९३०) || १७२
|-
|१५७. || टिप्पणियाँ: 'मुझे नहीं मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा';<br>अतिरंजित कथन; सच्ची लगन; मोतीलालजी की दानशीलता<br>(३-४-१९३०) || १७३
|-
|१५८. || ६ अप्रैलको याद रखें (३-४-१९३०) || १७६
|-
|१५९. || मद्यपान निषेध (३-४-१९३०) || १७७
|-
|१६०. || पत्र : कपिलराय मेहताको (३-४-१९३०) || १७८
|-
|१६१. || भाषण : वाँझकी प्रार्थना सभा में (३-४-१९३०) || १७८
|-
|१६२. || भाषण : नवसारीमें (३-४-१९३०) || १७९
|-
|१६३. || भाषण : धामण (३-४-१९३०) || १८२
|-
|१६४. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (४-४-१९३०) || १८३
|-
|१६५. || भाषण : वेजलपुरमें (४-४-१९३०) || १८३
|-
|१६६. || वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (५-४-१९३०) || १८५
|-
|१६७. || एक सन्देश (५-४-१९३०) || १८६
|-
|१६८. || सन्देश : अमेरिकाको (५-४-१९३०) || १८६
|-
|१६९. || भाषण : दांडीमें (५-४-१९३०) || १८९
|-
|१७०. || पत्र : नारणदास गांधीको (६-४-१९३० के पूर्व) || १९१
|-
|१७१. || सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश (६-४-१९३० के पूर्व) || १९३
|-
|१७२. || बहनोंके प्रति (६-४-१९३०) || १९५
|-
|१७३. || अन्त्यजोंके लिए कुएँ (६-४-१९३०) || १९७
|-
|१७४. || टिप्पणियाँ: कुछ प्रश्न; निर्दयी पुरुषोंके प्रति (६-४-१९३०) || १९८
|-
|१७५. || स्वदेशी (६-४-१९३०) || १९९
|-
|१७६. || अहमदाबादके मिल-मालिकोंसे (६-४-१९३०) || २०२
|-
|१७७. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (६-४-१९३०) || २०४
|-
|१७८. || पत्र : लाला दुनीचन्दको (६-४-१९३०) || २०४
|-
|१७९. || भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (६-४-१९३०) || २०५
|-
|१८०. || भाषण : दांडीमें (६-४-१९३०) || २०६
|-
|१८१. || पत्र : महादेव देसाईको (६-४-१९३०) || २०७
|-
|१८२. || पत्र : नारणदास गांधीको (६-४-१९३०) || २०८
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''तेईस'''}}}}
|-
|१८३. || पत्र : मीराबहनको (६-४-१९३०) || २०९
|-
|१८४. || पत्र : मीराबहनको (७-४-१९३० या उसके पूर्व) || २०९
|-
|१८५. || बर्बरतापूर्ण (७-४-१९३०) || २१०
|-
|१८६. || वक्तव्य : समाचार-पत्रोंको (७-४-१९३०) || २१२
|-
|१८७. || पत्र : महादेव देसाईको (७-४-१९३०) || २१३
|-
|१८८. || पत्र : प्रभावतीको (७-४-१९३०) || २१४
|-
|१८९. ||पत्र : नारणदास गांधीको (७-४-१९३०) || २१४
|-
|१९०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (७-४-१९३०) || २१५
|-
|१९१. || सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें (७-४-१९३०) || २१५
|-
|१९२. || सन्देश : काठियावाड़के लोगोंके लिए (७-४-१९३०) || २१६
|-
|१९३. || सन्देश : गुजरातके नाम (७-४-१९३०) || २१६
|-
|१९४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (७-४-१९३० या उसके पश्चात्) || २१७
|-
|१९५. || पत्र : मीराबहनको (८-४-१९३०) || २१७
|-
|१९६. || पत्र : अमीना तैयबजीको (८-४-१९३०) || २१८
|-
|१९७. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-४-१९३०) || २१८
|-
|१९८. || पत्र : महादेव देसाईको (८-४-१९३०) || २१९
|-
|१९९. || भाषण : आटमें (८-४-१९३०) || २१९
|-
|२००. || सन्देश : राष्ट्रके नाम (९-४-१९३०) || २२०
|-
|२०१. || पत्र : महादेव देसाईको (९-४-१९३०) || २२२
|-
|२०२. || भाषण : भीमराडमें (९-४-१९३०) || २२४
|-
|२०३. || भारतकी महिलाओंसे (१०-४-१९३०) || २२६
|-
|२०४. || टिप्पणियाँ : बधाई; एक दुष्टतापूर्ण आक्षेप (१०-४-१९३०) || २२८
|-
|२०५. || अनैतिक आधार (१०-४-१९३०) || २३०
|-
|२०६. || एक अंग्रेज भाईकी समस्या (१०-४-१९३०) || २३२
|-
|२०७. || कुछ शर्ते (१०-४-१९३०) || २३५
|-
|२०८. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१०-४-१९३०) || २३६
|-
|२०९. || सन्देश : बम्बईके नागरिकोंको (१०-४-१९३०) || २३६
|-
|२१०. || सन्देश : ब° प्र° कां° कमेटीको (१०-४-१९३०) || २३७
|-
|२११. || पत्र : मीराबहनको (१०-४-१९३०) || २३७
|-
|२१२. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१०-४-१९३०) || २३८
|-
|२१३. || पत्र : नारणदास गांधीको (१०-४-१९३०) || २३८
|-
|२१४. ||पत्र : महादेव देसाईको (१०-४-१९३०) || २३९
|}<noinclude></noinclude>
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{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''चौबीस'''}}}}
|-
|२१५. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१०-४-१९३०) || २४०
|-
|२१६. || पत्र : लीलावतीको (१०-४-१९३०) || २४०
|-
|२१७. || पत्र : प्रभावतीको (१०-४-१९३०) || २४१
|-
|२१८. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (१०-४-१९३०) || २४१
|-
|२१९. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (१०-४-१९३०) || २४२
|-
|२२०. || पत्र : बनारसीलाल बजाजको (१०-४-१९३०) || २४२
|-
|२२१. || भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष (१०-४-१९३०) || २४३
|-
|२२२. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको<br>(१०-४-१९३०) || २४३
|-
|२२३. || भेंट : ' हिन्दू 'के प्रतिनिधिको (१०-४-१९३०) || २४४
|-
|२२४. || भाषण : अबरामाकी सार्वजनिक सभामें (१०-४-१९३०) || २४५
|-
|२२५. || तार : एन० सी० केलकरको (११-४-१९३०) || २४७
|-
|२२६. ||पत्र : रेहाना तैयबजीको (११-४-१९३०) || २४७
|-
|२२७. || पत्र : महादेव देसाईको (११-४-१९३०) || २४८
|-
|२२८. || पत्र : नारणदास गांधीको (११-४-१९३०) || २४८
|-
|२२९. || पत्रः नारणदास गांधीको (११-४-१९३०) || २४९
|-
|२३०. || पत्र : महादेव देसाईको (११-४-१९३०) || २४९
|-
|२३१. || पत्र : शिवानन्दको (११-४-१९३०) || २५०
|-
|२३२. || पत्र : चिमनलालको (११-४-१९३०) || २५१
|-
|२३३. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (११-४-१९३०) || २५१
|-
|२३४. || पत्र : सीतलासहायको (११-४-१९३०) || २५२
|-
|२३५. || वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके लिए<br>(११-४-१९३०) || २५२
|-
|२३६. || सन्देश : हंसा मेहताके लिए (१२-४-१९३० के पूर्व) || २५३
|-
|२३७. || बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको लिखे पत्रका अंश<br>(१२-४-१९३० के पूर्व) || २५३
|-
|२३८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१२-४-१९३०) || २५४
|-
|२३९. || पत्र : नानुभाई दवेको (१२-४-१९३०) || २५४
|-
|२४०. || गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय (१३-४-१९३०) || २५५
|-
|२४१. || मिल-मालिक और खादी (१३-४-१९३०) || २५६
|-
|२४२. || बहनोंसे (१३-४-१९३०) || २५७
|-
|२४३. || सन्देश : 'हिन्दू' के लिए (१३-४-१९३०) || २५९
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''पच्चीस'''}}}}
|-
|२४४. || पत्र : महादेव देसाईको (१३-४-१९३०) || २५९
|-
|२४५. || भाषण : गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें (१३-४-१९३०) || २६०
|-
|२४६. || भाषण : दांडीमें (१३-४-१९३०) || २६१
|-
|२४७. || पत्र : गुलाम रसूल कुरैशीको (१३-४-१९३०) || २६५
|-
|२४८. || पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको (१३-४-१९३०) || २६५
|-
|२४९. || पत्र : मीराबहनको (१४-४-१९३० या उसके पूर्व) || २६६
|-
|२५०. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-४-१९३०) || २६६
|-
|२५१. || अपील : भारतके नौजवानोंसे (१४-४-१९३०) || २६७
|-
|२५२. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१४-४-१९३०) || २६७
|-
|२५३. || पत्र : महादेव देसाईको (१४-४-१९३०) || २६८
|-
|२५४. || पत्र : कुसुम देसाईको (१४-४-१९३०) || २६८
|-
|२५५. || पत्र : मणिलाल वी° देसाईको (१४-४-१९३०) || २६९
|-
|२५६. || पत्र : महादेव देसाईको (१४-४-१९३०) || २६९
|-
|२५७. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१५-४-१९३०) || २७०
|-
|२५८. || पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको (१५-४-१९३०) || २७०
|-
|२५९. || पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको (१५-४-१९३०) || २७१
|-
|२६०. || पत्र : महादेव देसाईको (१५-४-१९३०) || २७१
|-
|२६१. || भाषण : उंबेरमें (१५-४-१९३०) || २७२
|-
|२६२. || पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१६-४-१९३०) || २७४
|-
|२६३. || अस्पृश्यता (१७-४-१९३०) || २७४
|-
|२६४. || राक्षसी कर (१७-४-१९३०) || २७६
|-
|२६५. || सिंहावलोकन (१७-४-१९३०) || २७८
|-
|२६६. || अध्यक्षका सम्मान (१७-४-१९३०) || २८१
|-
|२६७. || स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र (१७-४-१९३०) || २८१
|-
|२६८. || 'सत्याग्रह-युद्ध' (१७-४-१९३०) || २८५
|-
|२६९. || कांग्रेस अध्यक्ष जेलमें (१७-४-१९३०) || २८६
|-
|२७०. || पत्र : नारणदास गांधीको (१७-४-१९३०) || २८६
|-
|२७१. || भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (१७-४-१९३०) || २८७
|-
|२७२. || भाषण : वेजलपुर में स्वयंसेवकोंके समक्ष (१७-४-१९३०) || २८९
|-
|२७३. || पत्र : मीराबह्नको (१७-४-१९३०) || २९१
|-
|२७४. || पत्र : शौकत अलीको (१७-४-१९३०) || २९१
|-
|२७५. || स्वयंसेवकोंको सलाह (१७-४-१९३०) || २९३
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''छब्बीस'''}}}}
|-
|२७६. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१८-४-१९३०) || २९३
|-
|२७७. || तार : एन॰ आर॰ मलकानीको (१८-४-१९३०) || २९४
|-
|२७८. || पत्र : रावजीभाई एन॰ पटेलको (१८-४-१९३०) || २९४
|-
|२७९. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-४-१९३०) || २९५
|-
|२८०. || पत्र : क॰ मा॰ मुन्शीको (१९-४-१९३०) || २९५
|-
|२८१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-४-१९३०) || २९६
|-
|२८२. || भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुरमें (१९-४-१९३०) || २९६
|-
|२८३. || बारडोलीमें दिये गये भाषणके अंश (१९-४-१९३०) || २९८
|-
|२८४. || 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी' की प्रस्तावना (२०-४-१९३०) || २९९
|-
|२८५. || टिप्पणियाँ : सावधान; अहमदाबादके मिल मजदूर (२०-४-१९३०) || ३००
|-
|२८६. || सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँव के लोगोंको (२०-४-१९३०) || ३०१
|-
|२८७. || कलकत्ता और कराची (२०-४-१९३०) || ३०१
|-
|२८८. || विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी (२०-४-१९३०) || ३०२
|-
|२८९. || पत्र : नारणदास गांधीको (२०-४-१९३०) || ३०४
|-
|२९०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२०-४-१९३०) || ३०५
|-
|२९१. || पत्र : क॰ मा॰ मुन्शीको (२०-४-१९३०) || ३०५
|-
|२९२. || पत्र : महादेव देसाईको (२०-४-१९३०) || ३०६
|-
|२९३. || भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल के प्रतिनिधिको (२०-४-१९३०) || ३०७
|-
|२९४. || विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह (२०-४-१९३०) || ३०८
|-
|२९५. || काला शासन (२१-४-१९३०) || ३०९
|-
|२९६. || पत्र : मीराबहनको (२१-४-१९३०) || ३१२
|-
|२९७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२१-४-१९३०) || ३१३
|-
|२९८. || पत्र : महादेव देसाईको (२१-४-१९३०) || ३१४
|-
|२९९. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको (२१-४-१९३०) || ३१५
|-
|३००. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२२-४-१९३०) || ३१६
|-
|३०१. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२२-४-१९३०) || ३१६
|-
|३०२. || भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें (२२-४-१९३०) || ३१७
|-
|३०३. || पत्र : नारणदास गांधीको (२२-४-१९३०) || ३१७
|-
|३०४. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (२३-४-१९३०) || ३१९
|-
|३०५. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२३-४-१९३०) || ३१९
|-
|३०६. || पत्र : नारणदास गांधीको (२३-४-१९३०) || ३१८
|-
|३०७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको (२३-४-१९३०) || ३१८
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''सत्ताईस'''}}}}
|-
|-|३०८. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (२४-४-१९३०) || ३२१
|-
|३०९. || जन-आन्दोलन (२४-४-१९३०) || ३२३
|-
|३१०. || खरा हिसाब रखनेकी जरूरत (२४-४-१९३०) || ३२५
|-
|३११. || शराबकी दुकानोंपर धरना (२४-४-१९३०) || ३२५
|-
|३१२. || धरना कैसे दें (२४-४-१९३०) || ३२७
|-
|३१३. || हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार (२४-४-१९३०) || ३२८
|-
|३१४. || तकलीके द्वारा बहिष्कार (२४-४-१९३०) || ३३०
|-
|३१५. || विदेशी कपड़ोंके व्यापारी (२४-४-१९३०) || ३३२
|-
|३१६. || सलाम अथवा बेंत? (२४-४-१९३०) || ३३३
|-
|३१७. || भेंट : 'हिन्दू' के प्रतिनिधिको (२४-४-१९३०) || ३३४
|-
|३१८. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (२४-४-१९३०) || ३३५
|-
|३१९. || पत्र : मीराबहनको (२४-४-१९३० के बाद) || ३३५
|-
|३२०. || पत्र : डोरोथी डि' सूवाको (२५-४-१९३०) || ३३६
|-
|३२१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको ( २५-४-१९३०) || ३३६
|-
|३२२. || पत्र : महादेव देसाईको (२५-४-१९३०) || ३३७
|-
|३२३. || पत्र : नारणदास गांधीको (२५-४-१९३०) || ३३८
|-
|३२४. || पत्र : जमनादास गांधीको (२५-४-१९३०) || ३३९
|-
|३२५. || भाषण : पन्नार में ( २५-४-१९३०) || ३४०
|-
|३२६. || पत्र : ए॰ सुब्बारावको (२६-४-१९३०) || ३४१
|-
|३२७. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-४-१९३०) || ३४१
|-
|३२८. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-४-१९३०) || ३४२
|-
|३२९. || पत्र : महालक्ष्मी एम° ठक्करको (२६-४-१९३०) || ३४२
|-
|३३०. || भाषण: अंभेटी में (२६-४-१९३०) || ३४३
|-
|३३१. || भाषण : बलसाड़में (२६-४-१९३०) || ३४३
|-
|३३२. || भाषण: छरवाड़ामें (२६-४-१९३०) || ३४६
|-
|३३३. || सन्देश : अमेरिकाको (२७-४-१९३० के पूर्व) || ३५०
|-
|३३४. || वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा (२७-४-१९३० अथवा<br>उसके पूर्व) || ३५३
|-
|३३५. || गुजरातकी महिलाओंसे अपीलका मसविदा (२७-४-१९३० के<br>आसपास) || ३५५
|-
|३३६. || विट्ठलभाई लल्लूभाईका श्राद्ध (२७-४-१९३०) || ३५६
|-
|३३७. || रासका उत्साह (२७-४-१९३०) || ३५७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''अट्ठाईस'''}}}}
|-
|३३८. || टिप्पणियाँ: हड़तालें; धरनेमें जोखिमें (२७-४-१९३०) || ३५८
|-
|३३९. || इमाम साहब (२७-४-१९३०) || ३५९
|-
|३४०. || बहिष्कार और खादी (२७-४-१९३०) || ३६०
|-
|३४१. || मेरी कसौटी (२७-४-१९३०) || ३६३
|-
|३४२. || पत्र : अमीना तैयबजीको (२७-४-१९३०) || ३६४
|-
|३४३. || आसफअलीको लिखे पत्रका अंश (२७-४-१९३०) || ३६४
|-
|३४४. || पत्र : लीलावती आसरको (२७-४-१९३०) || ३६५
|-
|३४५. || पत्र : रामेश्वरदास बिड़लाको (२८-४-१९३०) || ३६५
|-
|३४६. || पत्र : नरहरि परीखको (२८-४-१९३०) || ३६६
|-
|३४७. || भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको (२८-४-१९३०) || ३६७
|-
|३४८. || पत्र : नरहरि परीखको (२९-४-१९३०) || ३६७
|-
|३४९. || भाषण : बिलीमोरामें (२९-४-१९३०) || ३६८
|-
|३५०. || छद्म सैनिक कानून (२९-४-१९३०) || ३६९
|-
|३५१. || पत्र : मीराबहनको (२९-४-१९३०) || ३७०
|-
|३५२. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९३०) || ३७०
|-
|३५३. || भेंट : 'लीडर' के प्रतिनिधिको (२९-४-१९३०) || ३७१
|-
|३५४. || वक्तव्य : नमककी क्यारी में विष मिलाये जानेके सम्बन्धमें<br>(३०-४-१९३०) || ३७१
|-
|३५५. || दिल्लीके पत्रकारोंको बधाइयाँ (३०-४-१९३०) || ३७२
|-
|३५६. || पत्र : नरहरि परीखको (३०-४-१९३०) || ३७२
|-
|३५७. || पत्र : नरहरि परीखको (३०-४-१९३०) || ३७३
|-
|३५८. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-४-१९३०) || ३७३
|-
|३५९. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-४-१९३०) || ३७४
|-
|३६०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-४-१९३०) || ३७४
|-
|३६१. || पत्र: मणिवहन पटेलको (अप्रैल १९३०) || ३७५
|-
|३६२. || स्वराज्यके कार्यकर्त्ताओंके लिए प्रतिज्ञा (अप्रैल १९३०) || ३७५
|-
|३६३. || पत्र : अमीना कुरैशीको (१-५-१९३० अथवा उसके पश्चात्) || ३७६
|-
|३६४. || महादेव देसाई और उनके उत्तराधिकारी (१-५-१९३०) || ३७६
|-
|३६५. || पत्र-लेखकोंसे (१-५-१९३०) || ३७८
|-
|३६६. || गुण्डा-राज (१-५-१९३०) || ३७९
|-
|३६७. || टिप्पणियाँ : अध्यक्षका इस्तीफा; सीमा-प्रान्त; वादा पूरा करनेकी<br>जरूरत; राष्ट्रीय स्त्री-सभा; समुद्र-पारसे (१-५-१९३०) || ३८२
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''उनतीस'''}}}}
|-
|३६८. || प्रश्नोत्तर (१-५-१९३०) || ३८५
|-
|३६९. || शराब और पारसी (१-५-१९३०) || ३८७
|-
|३७०. || 'अहिंसाकी विजय' (१-५-१९३० ) || ३८८
|-
|३७१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१-५-१९३०) || ३८९
|-
|३७२. || पत्र : नरहरि परीखको (१-५-१९३०) || ३८९
|-
|३७३. || ओलपाडमें दिये गये भाषणके अंश (१-५-१९३०) ||३९०
|-
|३७४. || भाषण : रांदेरमें (१-५-१९३०) || ३९२
|-
|३७५. || पत्र : सुशीला गांधीको (१-५-१९३० के पश्चात्) || ३९३
|-
|३७६. || पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको (२-५-१९३०) || ३९३
|-
|३७७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३७८. || पत्र : राधा गांधीको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३७९. || पत्र : कुसुम देसाईको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३८०. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२-५-१९३०) || ३९५
|-
|३८१. || पत्र : नरहरि परीखको (२-५-१९३०) || ३९५
|-
|३८२. || सन्देश : बम्बईकी साहू सभाके लिए (२-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८३. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (३-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८४. || पत्र : नारणदास गांधीको (३-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८५. || वी॰ ए॰ सुन्दरम्को प्रमाणपत्र (३-५-१९३० के आसपास) || ३९७
|-
|३८६. || खेड़ावासियोंके प्रति (४-५-१९३०) || ३९८
|-
|३८७. || वकीलोंका धर्म (४-५-१९३०) || ४०१
|-
|३८८. || टिप्पणियाँ: शराबकी दुकानोंपर धरना; एक पारसी बालिकाकी भेंट<br>(४-५-१९३०) || ४०३
|-
|३८९. || मुद्रणालयोंपर छापा (४-५-१९३०) || ४०४
|-
|३९०. || खादीके विषयमें चेतावनी (४-५-१९३०) || ४०५
|-
|३९१. || काकासाहब (४-५-१९३०) || ४०६
|-
|३९२. || तार : मोतीलाल नेहरूको (४-५-१९३०) || ४०७
|-
|३९३. || पत्र : वाइसरायको (४-५-१९३०) || ४०८
|-
|३९४. || पत्र : डा॰ सैयद महमूदको (४-५-१९३०) || ४१२
|-
|३९५. || पत्र : पद्मावतीको (४-५-१९३०) || ४१३
|-
|३९६. || भेंट : जे॰ बी॰ कृपलानीको (४-५-१९३०) || ४१४
|-
|३९७. || भाषण : सूरतमें (४-५-१९३०) || ४१६
|-
|३९८. || अल्पसंख्यकोंकी समस्या (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१७
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''तीस'''}}}}
|-
|३९९. || टिप्पणी : जे॰ बी॰ पेनिंगटन के पत्रपर (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१८
|-
|४००. || पत्र : बम्बईकी सत्याग्रह- समितिको (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१८
|-
|४०१. || मध्यरात्रिमें गिरफ्तारी (५-५-१९३०) || ४२०
|-
|४०२. || भेंट : 'डेली टेलीग्राफ 'के प्रतिनिधिको (५-५-१९३०) || ४२१
|-
|४०३. || पत्र : ई॰ ई॰ डॉयलको (१०-५-१९३०) || ४२२
|-
|४०४. || पत्र : मीराबहनको (१२-५-१९३०) || ४२३
|-
|४०५. || पत्र : नारणदास गांधीको (१२-५-१९३०) || ४२४
|-
|४०६. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१२-५-१९३०) || ४२६
|-
|४०७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१२-५-१९३०) || ४२६
|-
|४०८. || पत्र : आश्रम के बालकोंको (१२-५-१९३०) || ४२७
|-
|४०९. || पत्र : बलभद्रको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४२८
|-
|४१०. || पत्र : कस्तूरबा गांधीको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४२८
|-
|४११. || आश्रमवासियोंको लिखे गये पत्रोंके अंश (१२-५-१९३० या<br>उसके पश्चात्) || ४२९
|-
|४१२. || पत्र : कुसुम देसाईको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४३०
|-
|४१३. || पत्र : रमाबहन जोशीको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४३०
|-
|४१४. || देवदास गांधीको लिखे पत्रका अंश (१३-५-१९३०) || ४३१
|-
|४१५. || पत्र : वाइसरायको (१८-५-१९३०) || ४३१
|-
|४१६. || पत्र : मीराबहनको (१८-५-१९३०) || ४३३
|-
|४१७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-५-१९३०) || ४३४
|-
|४१८. || पत्र : मणिबहन पटेलको (१९-५-१९३०) || ४३५
|-
|४१९. || पत्र : नरहरि परीखको (२०-५-१९३०) || ४३५
|-
|४२०. || पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (२०-५-१९३०) || ४३५
|-
|४२१. || पत्र : प्रभावतीको (२०-५-१९३०) || ४३६
|-
|४२२. || भेंट : 'डेली हैरॉल्ड' के प्रतिनिधिको (२०-५-१९३०) || ४३७
|-
|४२३. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८-२१-५-१९३०) || ४३९
|-
|४२४. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (२२-५-१९३०) || ४४१
|-
|४२५. || पत्र : मीराबहनको (२५-५-१९३०) || ४४१
|-
|४२६. || पत्र : सरलादेवीको (२५-५-१९३०) || ४४३
|-
|४२७. || पत्र : चन्द्रशंकर शुक्लको (२५-५-१९३०) || ४४३
|-
|४२८. || पत्र : सुशीला गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४४
|-
|४२९. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४४
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''इकतीस'''}}}}
|-
|४३०. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२६-५-१९३०) || ४४५
|-
|४३१. || पत्र : जमनाबहन गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४६
|-
|४३२. || पत्र : निर्मला गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४६
|-
|४३३. || पत्र : राधा गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४७
|-
|४३४. || पत्र : मंत्री गिरिको (२६-५-१९३०) || ४४७
|-
|४३५. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (२६-५-१९३०) || ४४८
|-
|४३६. || पत्र : गोमती मशरूवालाको (२६-५-१९३०) || ४४८
|-
|४३७. || पत्र : मोतीबह्नको (२६-५-१९३०) || ४४९
|-
|४३८. || पत्र : डा॰ प्राणजीवनदास मेहताको (२६-५-१९३०) || ४४९
|-
|४३९. || पत्र : रतिलाल मेहताको (२६-५-१९३०) || ४५०
|-
|४४०. || पत्र : मणिबहन परीखको (२६-५-१९३०) || ४५०
|-
|४४१. || पत्र : मीठूबन पेटिटको (२६-५-१९३०) || ४५१
|-
|४४२. || पत्र : अमीना कुरैशीको (२६-५-१९३०) || ४५१
|-
|४४३. || पत्र : शान्ताको (२६-५-१९३०) || ४५२
|-
|४४४. || पत्र : सोनामणिको (२६-५-१९३०) || ४५२
|-
|४४५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२६-५-१९३०) || ४५३
|-
|४४६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-५-१९३०) || ४५३
|-
|४४७. || पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (२६-५-१९३०) || ४५४
|-
|४४८. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२७-५-१९३०) || ४५४
|-
|४४९. || पत्र : मोहनलाल भट्टको (२७-५-१९३०) || ४५५
|-
|४५०. || पत्र : ई॰ ई॰ डायलको (३०-५-१९३०) || ४५५
|-
|४५१. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (४-६-१९३०) || ४५६
|-
|४५२. || पत्र : आर॰ वी॰ मार्टिनको (११-६-१९३०) || ४५७
|-
|४५३. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१६-६-१९३० या उसके पूर्व) || ४५८
|-
|४५४. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१८-६-१९३०) || ४५९
|-
|४५५. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (१८-६-१९३०) || ४६०
|-
|४५६. || पत्र : मीराबहनको (२२-६-१९३०) || ४६०
|-
|४५७. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२२-६-१९३०) || ४६१
|-
|४५८. || पत्र : नारणदास गांधीको (२२/२३-६-१९३०) || ४६२
|-
|४५९. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२३-६-१९३०) || ४६४
|-
|४६०. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२४-६-१९३०) || ४६५
|-
|४६१. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२६-६-१९३०) || ४६५
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''बत्तीस'''}}}}
|-
|४६२. || पत्र : प्रभावतीको (२७-६-१९३०) || ४६६
|-
|४६३. || पत्रः प्रभावतीको (२९-६-१९३०) || ४६६
|-
|४६४. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६६. || पत्र : बनारसीलाल बजाजको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (३०-६-१९३०) || ४६८
|-
|४६८. || पत्र : मीराबहनको (३०-६-१९३०) || ४६८
|-
|४६९. || पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको (३०-६-१९३०) || ४६९
|-
|४७०. || पत्र : लीलावती आसरको (३०-६-१९३०) || ४६९
|-
|४७१. || पत्र : मुन्नालालको (३०-६-१९३०) || ४७०
|-
|४७२. ||पत्र : सुशीला गांधीको (३०-६-१९३०) || ४७१
|-
|४७३. || पत्र : नारणदास गांधीको (३०-६-१९३०) || ४७१
|-
|४७४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-६-१९३०) || ४७४
|-
|४७५. || पत्र : कमला नेहरूको (३०-६-१९३०) || ४७४
|-
| || परिशिष्ट ||
|-
| || {{Gap}}१. नमक-अधिनियम के दाण्डिक खण्ड || ४७५
|-
| || {{Gap}}२. गांधीजी के साथ दाँडी-कूच करनेवाले लोगोंकी सूची || ४७७
|-
| || {{Gap}}३. अल्पसंख्यकोंके विषयमें जवाहरलाल नेहरूकी टिप्पणी || ४७८
|-
| || {{Gap}}४. 'डेली टेलीग्राफ' के विवरणसे उद्धरण || ४८१
|-
| || सामग्री के साधन-सूत्र || ४८३
|-
| || तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ४८५
|-
| || शीर्षक सांकेतिका || ४८९
|-
| || सांकेतिका || ४९३
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : अवरामाकी सार्वजनिक सभामें|२४५}}</noinclude>'''फिर मैंने पूछा कि तब फिर पुलिस अधिकारियोंको जो नमक छीननेका कर्तव्य सौंपा गया है, उसे वे कैसे पूरा करेंगे? इसपर गांधीजी ने कहा कि इसी तरहके कानूनके खिलाफ तो मेरी लड़ाई है।'''
'''इसके बाद महात्माजी के इस कथनका प्रसंग छिड़ गया कि यदि पुलिस स्त्रियोंको हाथ लगायेगी तो सारे देशकी भावना भड़क उठेगी, बशर्ते कि जनता बिलकुल नपुंसक ही न हो। मैंने बताया कि इस कथनको स्त्रियोंके वैधानिक रीतिसे गिरफ्तार किये जाने के खिलाफ एक धमकी मानकर इसकी आलोचना की गई है। इसपर महात्माजी ने हँसते हुए कहा कि मैंने जान-बूझकर यह कहा था कि यदि वैसी कठिन परिस्थिति आ गई तो देशकी भावना भड़क उठेगी, लेकिन उसका परिणाम अनिवार्यतः हिंसात्मक कार्रवाई करना ही तो नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा :'''
जब डॉ० एनी बेसेंट गिरफ्तार किये जानेपर श्री एस० सुब्रह्मण्य अय्यरने अपनी उपाधियोंका त्याग कर दिया था तब उनकी भावना ही तो भड़क उठी थी, लेकिन इसके कारण उन्होंने कोई हिंसा तो नहीं की। मेरा मतलब इसी अर्थ में भावनाके भड़कने से था।
'''फिर एक समाचार एजेंसी द्वारा प्रचारित इस खबरका प्रसंग आ गया कि महात्माजी ने स्वयंसेवकोंके लिए जो आहार निर्धारित किया है, उसको लेकर वे उनके खिलाफ विद्रोह कर उठे हैं। उन्होंने इस बातपर हँसते हुए कहा :'''
आहारमें क्या-क्या रखा जाये, यह तय करनेमें कुछ कठिनाई जरूर सामने आई थी, लेकिन जब एक बार मैने आहार तय कर दिया तो उसे सभीने चुपचाप स्वीकार
कर लिया।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू,''' ११-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२२४. भाषण : अबरामाकी सार्वजनिक सभामें १'''}}}}
{{Right|१० अप्रैल, १९३०}}
मुझे सूचना मिली थी कि कल रात मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा और इसीलिए मैंने रातको ११ बजेतक बैठकर कुछ चिट्टियाँ लिख डाली और लिखनेका कुछ और भी जरूरी काम पूरा कर लिया। रात बीत गई और वह सब नहीं हुआ जिसकी आशा की जा रही थी। मैंने समाचार-पत्रोंमें आज पढ़ा है कि नमककी कीमत लगभग आधी हो गई है। लेकिन मेरा कहना तो यह है कि नमक की कोई कीमत ही क्यों हो?
<small>१. आभग ५,००० ग्रामीण लोगोंने इस सभा में भाग लिया था।</ small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९०
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२४६|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}`</noinclude>'''इसके बाद गांधीजी ने पूर्ण नशाबन्दी और खद्दरके प्रचारकी आवश्यकतापर जोर दिया।'''
'''अपना भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि कई पत्रों--विशेषकर 'टाइम्स' में मेरे भाषणोंके विवरण तोड़-मरोड़कर दिये जा रहे हैं। ये पत्र प्रतिनिधि देशका बहुत बड़ा अहित कर रहे हैं। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में प्रकाशित एक विवरणका मुझे खण्डन करना पड़ा। उसमें विचारोंको बिलकुल तोड़-मरोड़कर पेश किया गया था। यह कहना गलत होगा कि सभी पत्र-प्रतिनिधि ऐसा ही करते हैं। लेकिन अधिकांश ऐसे हैं, अथवा मैं यह कहूंगा कि वे मेरी ग्रामीण भाषा नहीं समझ पाते। मैं रिपोर्टरोंको कभी बुलाता नहीं, परन्तु यदि समाचार-पत्र उन्हें भेजना ही चाहते हैं तो उन्हें ऐसे प्रतिनिधि भेजने चाहिए जो मेरी भाषा जानते हों। अज्ञानी रिपोर्टर मेरा तथा मेरे उद्देश्यका भी अहित करते हैं। अहिंसाका सिद्धान्त मेरे लिए नया नहीं है, कमसे कम पिछले पन्द्रह वर्षोंसे में इसपर जोर देता आ रहा हूँ। कोई यह न सोचे कि उम्र अधिक होनेके कारण मेरी मति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि मैं हिंसाको भड़काकर जेल जाना चाहता हूँ। जेल जानेके लिए भी मैं किसीके अहितकी कामना नहीं कर सकता। जो कुछ मैंने कहा था वह केवल यह कि लोगोंको अपनी मुट्ठीका नमक नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे इसके कारण उन्हें गम्भीर चोटें ही क्यों न सहनी पड़े। यह बात अहिंसाके विपरीत नहीं है। दिल्लीसे प्राप्त एक तार मुझे सूचना दी गई है कि चार स्वयंसेवकोंको इतना पीटा गया कि वे बेहोश हो गये। सरकारने अपना खेल दिखाना आरम्भ कर दिया है। यह तो अभी उसकी शुरुआत ही है। मगर इसके कारण हमें अपने कर्तव्यसे विमुख नहीं होना चाहिए। यह बहुत शर्मकी बात है कि सरकार महिलाओंको भी गिरफ्तार कर रही है। मैं संसारको दिखा देना चाहता हूँ कि हमारी लड़ाई ऐसी है, जिसमें सभी लोग भाग ले सकते हैं।'''
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ११-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९१
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२२५. तार : एन० सी० केलकरको१'''}}}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार मिला। आपके त्यागपत्र देकर सत्याग्रहका संगठन करनेके निश्चय के बारेमें जानकर अतीव प्रसन्नता हुई । मेरे स्वास्थ्यके बारेमें छपी खबरें बिलकुल अतिरंजित हैं । आज प्रातःकालीन सार्वजनिक सभामें भाग लेने सात मील दूर गया।
{{Right|गांधी}}
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १६-४-१९३०
{{C|{{larger|२२६. पत्र : रेहाना तैयबजीको}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेहाना,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैं चाहूँगा कि रविवारको तुम, माताजी तथा अन्य लोग यहां आयें। मैं महिलाओं द्वारा शराब और विदेशी वस्त्रोंकी समस्याओंके समाधानमें हाथ बँटानेके औचित्य और सम्भावनापर विचार करनेके लिए गुजरातकी महिलाओंका एक सम्मेलन कर रहा हूँ।
तुम जो सन्देश चाहती हो, दे रहा हूँ।
कमलादेवीने मेरे पत्रके' उत्तरमें एक बहुत सुन्दर पत्र लिखा है। वह यह
रहा। तुम चाहो तो इसे पढ़कर फाड़ देना।
माताजी के मान जानेकी पूरी आशा है, क्योंकि वे झेंप भी सकती हैं। यह
अच्छा लक्षण है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६१६) की फोटो नकलसे ।
<small>१. यह एन० सी० केलकरके निम्नलिखित तारके उत्तर में भेजा गया था: “दिल्लीसे विधान सभाका काम करके लौटने के तुरन्त बाद मैंने महाराष्ट्र नेशनल पार्टीकी एक सभा की और अब मैंने महाराष्ट्र में नमक कानूनी सविनय अवाका संघर्ष प्रारम्भ करने और उसका संगठन करनेका निश्चय किया है। अखबार में खबर छपी है कि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कृपया तार द्वारा उत्तर देकर चिन्ता मुक्त करें।"</small>
<small>२. यह पत्र उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२२५. तार : एन० सी० केलकरको१'''}}}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार मिला। आपके त्यागपत्र देकर सत्याग्रहका संगठन करनेके निश्चय के बारेमें जानकर अतीव प्रसन्नता हुई । मेरे स्वास्थ्यके बारेमें छपी खबरें बिलकुल अतिरंजित हैं । आज प्रातःकालीन सार्वजनिक सभामें भाग लेने सात मील दूर गया।
{{Right|गांधी}}
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १६-४-१९३०
{{C|{{larger|२२६. पत्र : रेहाना तैयबजीको}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेहाना,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैं चाहूँगा कि रविवारको तुम, माताजी तथा अन्य लोग यहां आयें। मैं महिलाओं द्वारा शराब और विदेशी वस्त्रोंकी समस्याओंके समाधानमें हाथ बँटानेके औचित्य और सम्भावनापर विचार करनेके लिए गुजरातकी महिलाओंका एक सम्मेलन कर रहा हूँ।
तुम जो सन्देश चाहती हो, दे रहा हूँ।
कमलादेवीने मेरे पत्रके' उत्तरमें एक बहुत सुन्दर पत्र लिखा है। वह यह
रहा। तुम चाहो तो इसे पढ़कर फाड़ देना।
माताजी के मान जानेकी पूरी आशा है, क्योंकि वे झेंप भी सकती हैं। यह
अच्छा लक्षण है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६१६) की फोटो नकलसे ।
<small>१. यह एन० सी० केलकरके निम्नलिखित तारके उत्तर में भेजा गया था: “दिल्लीसे विधान सभाका काम करके लौटने के तुरन्त बाद मैंने महाराष्ट्र नेशनल पार्टीकी एक सभा की और अब मैंने महाराष्ट्र में नमक कानूनी सविनय अवाका संघर्ष प्रारम्भ करने और उसका संगठन करनेका निश्चय किया है। अखबार में खबर छपी है कि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कृपया तार द्वारा उत्तर देकर चिन्ता मुक्त करें।"</small>
<small>२. यह पत्र उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२२५. तार : एन० सी० केलकरको१'''}}}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार मिला। आपके त्यागपत्र देकर सत्याग्रहका संगठन करनेके निश्चय के बारेमें जानकर अतीव प्रसन्नता हुई। मेरे स्वास्थ्यके बारेमें छपी खबरें बिलकुल अतिरंजित हैं। आज प्रातःकालीन सार्वजनिक सभामें भाग लेने सात मील दूर गया।
{{Right|गांधी}}
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२२६. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेहाना,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैं चाहूँगा कि रविवारको तुम, माताजी तथा अन्य लोग यहां आयें। मैं महिलाओं द्वारा शराब और विदेशी वस्त्रोंकी समस्याओंके समाधानमें हाथ बँटानेके औचित्य और सम्भावनापर विचार करनेके लिए गुजरातकी महिलाओंका एक सम्मेलन कर रहा हूँ।
तुम जो सन्देश चाहती हो, दे रहा हूँ।
कमलादेवीने मेरे पत्रके२ उत्तरमें एक बहुत सुन्दर पत्र लिखा है। वह यह रहा। तुम चाहो तो इसे पढ़कर फाड़ देना।
माताजी के मान जानेकी पूरी आशा है, क्योंकि वे झेंप भी सकती हैं। यह
अच्छा लक्षण है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६१६) की फोटो नकलसे ।
<small>१. यह एन० सी० केलकरके निम्नलिखित तारके उत्तर में भेजा गया था: “दिल्लीसे विधान सभाका काम करके लौटने के तुरन्त बाद मैंने महाराष्ट्र नेशनल पार्टीकी एक सभा की और अब मैंने महाराष्ट्र में नमक कानूनी सविनय अवाका संघर्ष प्रारम्भ करने और उसका संगठन करनेका निश्चय किया है। अखबार में खबर छपी है कि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कृपया तार द्वारा उत्तर देकर चिन्ता मुक्त करें।"</small>
<small>२. यह पत्र उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२२५. तार : एन० सी० केलकरको१'''}}}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार मिला। आपके त्यागपत्र देकर सत्याग्रहका संगठन करनेके निश्चय के बारेमें जानकर अतीव प्रसन्नता हुई। मेरे स्वास्थ्यके बारेमें छपी खबरें बिलकुल अतिरंजित हैं। आज प्रातःकालीन सार्वजनिक सभामें भाग लेने सात मील दूर गया।
{{Right|गांधी}}
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२२६. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय रेहाना,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैं चाहूँगा कि रविवारको तुम, माताजी तथा अन्य लोग यहां आयें। मैं महिलाओं द्वारा शराब और विदेशी वस्त्रोंकी समस्याओंके समाधानमें हाथ बँटानेके औचित्य और सम्भावनापर विचार करनेके लिए गुजरातकी महिलाओंका एक सम्मेलन कर रहा हूँ।
तुम जो सन्देश चाहती हो, दे रहा हूँ।
कमलादेवीने मेरे पत्रके२ उत्तरमें एक बहुत सुन्दर पत्र लिखा है। वह यह रहा। तुम चाहो तो इसे पढ़कर फाड़ देना।
माताजी के मान जानेकी पूरी आशा है, क्योंकि वे झेंप भी सकती हैं। यह
अच्छा लक्षण है।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (एस० एन० ९६१६) की फोटो नकलसे ।
<small>१. यह एन० सी० केलकरके निम्नलिखित तारके उत्तर में भेजा गया था: “दिल्लीसे विधान सभाका काम करके लौटने के तुरन्त बाद मैंने महाराष्ट्र नेशनल पार्टीकी एक सभा की और अब मैंने महाराष्ट्र में नमक कानून की सविनय अवज्ञाका संघर्ष प्रारम्भ करने और उसका संगठन करनेका निश्चय किया है। अखबार में खबर छपी है कि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कृपया तार द्वारा उत्तर देकर चिन्ता मुक्त करें।"</small>
<small>२. यह पत्र उपलब्ध नहीं है।</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९२
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२२७. पत्र : महादेव देसाईको'''}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुमने ढाई सौ रुपये के पुरस्कारके बारेमें पूछे गये प्रश्नका जो उत्तर दिया, सो ठीक ही किया। लेकिन यदि हमने ढाई सौ रुपया पाया है तो भी हम इसका जवाब किसलिए दें? यदि जवाब न देने पर हम पर मुकदमा चलाया जाता है तो इससे
हमारा रास्ता और भी साफ होता है?
यदि परिषद् नन्दूबहन, सरलावहन आदि आयें तो अच्छा होगा। रणछोड़-
भाईसे तो तुम कहना कि वे मोतीबहनको भेजें और साथमें खुद भी आना चाहें
तो आयें।
नवसारीसे आनेवाली मोटरोंको वे आज रोक रहे हैं। गायकवाड़ [राज्य] की सीमासे आनेवाली सभी मोटरोंको रोक रहे हैं।
गुजराती (एस० एन० ११४७७ ) की फोटो नकलसे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
२२८. पत्र : नारणदास गांधीको
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
मैं १३ तारीखको दांडीमें बह्नोंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलानेका इरादा रखता हूँ। इसमें वहाँसे जो बहनें आना चाहें और जिन्हें कामसे छुट्टी दी जा सकती हो उन बह्नोंको भेजना। खर्च सत्याग्रह-कोषसे निकालना। जिनके पास अपने पैसे हैं वे अपने खर्चपर आयें। यदि खुर्शीदबहन आना चाहे तो उसे किरायेके पैसे देनेकी बात कहना। वह तो कदाचित् इनकार कर देगी। अगर शालीनता के साथ कह सको तो कहना। सम्मेलनमें केवल मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें ही विचार करना है। लगता है यह काम खुर्शीदबहनको पसन्द नहीं है। मतलब यह कि वह इन कार्यों को स्त्रियोंके लिए निर्धारित विशेष कामके रूपमें नहीं अपनाना चाहती। इसलिए हो सकता है वह न आये।<noinclude></noinclude>
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{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुमने ढाई सौ रुपये के पुरस्कारके बारेमें पूछे गये प्रश्नका जो उत्तर दिया, सो ठीक ही किया। लेकिन यदि हमने ढाई सौ रुपया पाया है तो भी हम इसका जवाब किसलिए दें? यदि जवाब न देने पर हम पर मुकदमा चलाया जाता है तो इससे
हमारा रास्ता और भी साफ होता है?
यदि परिषद् नन्दूबहन, सरलावहन आदि आयें तो अच्छा होगा। रणछोड़-
भाईसे तो तुम कहना कि वे मोतीबहनको भेजें और साथमें खुद भी आना चाहें
तो आयें।
नवसारीसे आनेवाली मोटरोंको वे आज रोक रहे हैं। गायकवाड़ [राज्य] की सीमासे आनेवाली सभी मोटरोंको रोक रहे हैं।
गुजराती (एस० एन० ११४७७ ) की फोटो नकलसे।
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२२८. पत्र : नारणदास गांधीको
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चि० नारणदास,
मैं १३ तारीखको दांडीमें बह्नोंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलानेका इरादा रखता हूँ। इसमें वहाँसे जो बहनें आना चाहें और जिन्हें कामसे छुट्टी दी जा सकती हो उन बह्नोंको भेजना। खर्च सत्याग्रह-कोषसे निकालना। जिनके पास अपने पैसे हैं वे अपने खर्चपर आयें। यदि खुर्शीदबहन आना चाहे तो उसे किरायेके पैसे देनेकी बात कहना। वह तो कदाचित् इनकार कर देगी। अगर शालीनता के साथ कह सको तो कहना। सम्मेलनमें केवल मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें ही विचार करना है। लगता है यह काम खुर्शीदबहनको पसन्द नहीं है। मतलब यह कि वह इन कार्यों को स्त्रियोंके लिए निर्धारित विशेष कामके रूपमें नहीं अपनाना चाहती। इसलिए हो सकता है वह न आये।<noinclude></noinclude>
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चि० महादेव,
तुमने ढाई सौ रुपये के पुरस्कारके बारेमें पूछे गये प्रश्नका जो उत्तर दिया, सो ठीक ही किया। लेकिन यदि हमने ढाई सौ रुपया पाया है तो भी हम इसका जवाब किसलिए दें? यदि जवाब न देने पर हम पर मुकदमा चलाया जाता है तो इससे
हमारा रास्ता और भी साफ होता है?
यदि परिषद् नन्दूबहन, सरलावहन आदि आयें तो अच्छा होगा। रणछोड़-
भाईसे तो तुम कहना कि वे मोतीबहनको भेजें और साथमें खुद भी आना चाहें
तो आयें।
नवसारीसे आनेवाली मोटरोंको वे आज रोक रहे हैं। गायकवाड़ [राज्य] की सीमासे आनेवाली सभी मोटरोंको रोक रहे हैं।
गुजराती (एस० एन० ११४७७ ) की फोटो नकलसे।
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चि० नारणदास,
मैं १३ तारीखको दांडीमें बह्नोंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलानेका इरादा रखता हूँ। इसमें वहाँसे जो बहनें आना चाहें और जिन्हें कामसे छुट्टी दी जा सकती हो उन बह्नोंको भेजना। खर्च सत्याग्रह-कोषसे निकालना। जिनके पास अपने पैसे हैं वे अपने खर्चपर आयें। यदि खुर्शीदबहन आना चाहे तो उसे किरायेके पैसे देनेकी बात कहना। वह तो कदाचित् इनकार कर देगी। अगर शालीनता के साथ कह सको तो कहना। सम्मेलनमें केवल मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें ही विचार करना है। लगता है यह काम खुर्शीदबहनको पसन्द नहीं है। मतलब यह कि वह इन कार्यों को स्त्रियोंके लिए निर्धारित विशेष कामके रूपमें नहीं अपनाना चाहती। इसलिए हो सकता है वह न आये।<noinclude></noinclude>
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चि० महादेव,
तुमने ढाई सौ रुपये के पुरस्कारके बारेमें पूछे गये प्रश्नका जो उत्तर दिया, सो ठीक ही किया। लेकिन यदि हमने ढाई सौ रुपया पाया है तो भी हम इसका जवाब किसलिए दें? यदि जवाब न देने पर हम पर मुकदमा चलाया जाता है तो इससे
हमारा रास्ता और भी साफ होता है?
यदि परिषद् नन्दूबहन, सरलावहन आदि आयें तो अच्छा होगा। रणछोड़-
भाईसे तो तुम कहना कि वे मोतीबहनको भेजें और साथमें खुद भी आना चाहें
तो आयें।
नवसारीसे आनेवाली मोटरोंको वे आज रोक रहे हैं। गायकवाड़ [राज्य] की सीमासे आनेवाली सभी मोटरोंको रोक रहे हैं।
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गुजराती (एस० एन० ११४७७ ) की फोटो नकलसे।
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{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
मैं १३ तारीखको दांडीमें बह्नोंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलानेका इरादा रखता हूँ। इसमें वहाँसे जो बहनें आना चाहें और जिन्हें कामसे छुट्टी दी जा सकती हो उन बह्नोंको भेजना। खर्च सत्याग्रह-कोषसे निकालना। जिनके पास अपने पैसे हैं वे अपने खर्चपर आयें। यदि खुर्शीदबहन आना चाहे तो उसे किरायेके पैसे देनेकी बात कहना। वह तो कदाचित् इनकार कर देगी। अगर शालीनता के साथ कह सको तो कहना। सम्मेलनमें केवल मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें ही विचार करना है। लगता है यह काम खुर्शीदबहनको पसन्द नहीं है। मतलब यह कि वह इन कार्यों को स्त्रियोंके लिए निर्धारित विशेष कामके रूपमें नहीं अपनाना चाहती। इसलिए हो सकता है वह न आये।<noinclude></noinclude>
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चि० महादेव,
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हमारा रास्ता और भी साफ होता है?
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भाईसे तो तुम कहना कि वे मोतीबहनको भेजें और साथमें खुद भी आना चाहें
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नवसारीसे आनेवाली मोटरोंको वे आज रोक रहे हैं। गायकवाड़ [राज्य] की सीमासे आनेवाली सभी मोटरोंको रोक रहे हैं।
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चि० नारणदास,
मैं १३ तारीखको दांडीमें बहनोंका ग<code></code>एक छोटा-सा सम्मेलन बुलानेका इरादा रखता हूँ। इसमें वहाँसे जो बहनें आना चाहें और जिन्हें कामसे छुट्टी दी जा सकती हो उन बह्नोंको भेजना। खर्च सत्याग्रह-कोषसे निकालना। जिनके पास अपने पैसे हैं वे अपने खर्चपर आयें। यदि खुर्शीदबहन आना चाहे तो उसे किरायेके पैसे देनेकी बात कहना। वह तो कदाचित् इनकार कर देगी। अगर शालीनता के साथ कह सको तो कहना। सम्मेलनमें केवल मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें ही विचार करना है। लगता है यह काम खुर्शीदबहनको पसन्द नहीं है। मतलब यह कि वह इन कार्यों को स्त्रियोंके लिए निर्धारित विशेष कामके रूपमें नहीं अपनाना चाहती। इसलिए हो सकता है वह न आये।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९३
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />पत्र महादेव देसाईको
२४९</noinclude>पुरुषोत्तम कैसा रहता है ? कनु क्या करता है? किस तरहसे अपना समय व्यतीत करता है?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९८ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|२२९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}
दांडी कूचके दौरान
[११ अप्रैल, १९३०
चि० नारणदास,
मैं नाम नहीं चुन सकता। जो बहनें विशेष रूपसे ये दोनों काम करना
चाहती हों और उनमें से जिन्हें तुम कामसे मुक्त कर सकते हो, केवल वही आयें। इस
बातपर तुम्हीं विचार कर सकते हो। उत्साहके कारण यदि सब बहनें आना चाहें
तो यह एक अलग बात है। इस मामलेमें हमें तो संयमसे ही काम लेना होगा ।
व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८०९९ ) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''२३०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
शुक्रवार, ११ अप्रैल, १९३०
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला । तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक
किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो
उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती ।
" स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो
आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर
देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक
मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता ?
१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके
बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर
लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी
लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।
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सौजन्य : नारणदास गांधी
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चि० नारणदास,
मैं नाम नहीं चुन सकता। जो बहनें विशेष रूपसे ये दोनों काम करना चाहती हों और उनमें से जिन्हें तुम कामसे मुक्त कर सकते हो, केवल वही आयें। इस बातपर तुम्हीं विचार कर सकते हो। उत्साहके कारण यदि सब बहनें आना चाहें तो यह एक अलग बात है। इस मामलेमें हमें तो संयमसे ही काम लेना होगा।
व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८०९९ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
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{{Right|शुक्रवार, ११ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती। 'स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता?
<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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सौजन्य : नारणदास गांधी
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चि० नारणदास,
मैं नाम नहीं चुन सकता। जो बहनें विशेष रूपसे ये दोनों काम करना चाहती हों और उनमें से जिन्हें तुम कामसे मुक्त कर सकते हो, केवल वही आयें। इस बातपर तुम्हीं विचार कर सकते हो। उत्साहके कारण यदि सब बहनें आना चाहें तो यह एक अलग बात है। इस मामलेमें हमें तो संयमसे ही काम लेना होगा।
व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८०९९ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
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चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती। 'स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता?
<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
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चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती। 'स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता?
<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९८ ) से।
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चि० नारणदास,
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व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
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चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती। 'स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता?
<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२४९}}</noinclude>पुरुषोत्तम कैसा रहता है ? कनु क्या करता है? किस तरहसे अपना समय व्यतीत करता है?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०९८ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''२२९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|दांडी कूचके दौरान}}
{{Right|[११ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० नारणदास,
मैं नाम नहीं चुन सकता। जो बहनें विशेष रूपसे ये दोनों काम करना चाहती हों और उनमें से जिन्हें तुम कामसे मुक्त कर सकते हो, केवल वही आयें। इस बातपर तुम्हीं विचार कर सकते हो। उत्साहके कारण यदि सब बहनें आना चाहें तो यह एक अलग बात है। इस मामलेमें हमें तो संयमसे ही काम लेना होगा।
व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८०९९ ) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''२३०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|शुक्रवार, ११ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने मेरा पत्र नारणदासको नहीं दिया, सो ठीक किया। लेकिन यदि अब दोगे तो भी कोई हर्ज नहीं होगा; क्योंकि मेरा उत्तर तो उचित ही है। जब हम छिपाते नहीं हैं तब 'स्मगलिंग' (तस्करी) नहीं होती। 'स्मगलिंग' तो तभी होती है जब लोगोंका छिपाने का इरादा हो। इसलिए तुम जो आन्दोलन चला रहे हो, वह ठीक है। नमक लानेवालेको भी अन्ततः यह प्रकट कर देना चाहिए कि वह नमक कहाँसे लाया है? यदि कोई व्यक्ति डाकसे नमक मँगवाना चाहे तो क्यों नहीं मँगवा सकता?
<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्के बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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सौजन्य : नारणदास गांधी
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व्रजकृष्ण और कृष्णदास यहाँ पहुँच गये हैं।
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सौजन्य : नारणदास गांधी
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चि० महादेव,
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<small>१. पत्र का आरम्भ एकाएक किया गया है जिससे लगता है कि यह पत्र पिछला पत्र लिखनेके बाद उसी सन्दर्भमें, उसके पूरकके रूपमें लिखा गया था। इसके सिवा यह उन बहनों को ध्यान में रखकर लिखा गया था जो १३ को होनेवाले महिला सम्मेलन में उपस्थित होना चाहती थीं। अतः इसकी लेखन तिथि ११ अप्रैल्केत बादकी नहीं हो सकती।</small><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वकीलोंकी बात समझमें आई। सिर्फ एक ब्रोकरके अपना धन्धा छोड़ देनेसे बात नहीं बननेवाली है। मुझे भय है, वकील लोग अभी एकदम तो अपना धन्धा नहीं छोड़ेंगे। लेकिन यदि विद्यार्थी शालाएं छोड़ दें तो वह काफी होगा। मृदुको बधाई।
दादूभाई प्रति मेरा मोह छूट गया है। अब्बास साहब लिखते हैं कि उनसे बड़ौदा जानेके लिए दादूभाईने ही कहा था किन्तु उसने लौटनेसे इनकार कर दिया। दादूभाईने उनके साथ जानेसे भी इनकार कर दिया। लेकिन मनुष्य क्या करे? अपने स्वभावको कौन जीत सकता है? इसलिए जो हाथ लग जाये उसीसे हमें सन्तोष मानना चाहिए।
दिल्ली में तो खूब हुआ हर जगह नया रंग है। बंगालमें अतुल सेनकी हड्डी टूट गई जान पड़ती है।
लगता है, दिल्ली में महिलाओंने विदेशी वस्त्रकी दुकानोंपर धरना दिया है।
अब रविवारके दिन महिलाओंका सम्मेलन दांडीमें करनेका निश्चय किया गया है। उस सम्बन्धमें मैंने नारणदासको जो पत्र लिखा है उसे पढ़ लेना।
इसके साथके पत्रोंको पहुँचाने में भूल नहीं होनी चाहिए।
तुम आराम करते हुए काम करना। जो काम दूसरोंसे हो सके उसे उन्हें सौंपते जाना।
मैं अभी-अभी मटवाडसे लौटा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७८) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२३१. पत्र : शिवानन्दको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
भाईश्री शिवानन्द,
तुम्हारा पत्र मिलनेसे पूर्व ही फूलचन्द आदिके बारेमें समाचार मुझे मिल चुका था। शारदाबहन आनन्दसे होंगी। जो हमने चाहा हो यदि वह मिले तो उसका दुःख नहीं होता। उस तरफ यदि किसी स्वयंसेवककी जरूरत पड़े तो तुम महादेवसे कहना, वे मुझे लिखेंगे। महादेव जेलमें हों तो सीधे मुझे पत्र लिखना।
क्या शारदाबन नये आन्दोलनमें शामिल होंगी ?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गजराती (सी० डब्ल्यू० २८४१ ) की फोटो नकलसे; सौजन्य फूलचन्द शाह
जी० एन० ९२०३ से भी।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वकीलोंकी बात समझमें आई। सिर्फ एक ब्रोकरके अपना धन्धा छोड़ देनेसे बात नहीं बननेवाली है। मुझे भय है, वकील लोग अभी एकदम तो अपना धन्धा नहीं छोड़ेंगे। लेकिन यदि विद्यार्थी शालाएं छोड़ दें तो वह काफी होगा। मृदुको बधाई।
दादूभाई प्रति मेरा मोह छूट गया है। अब्बास साहब लिखते हैं कि उनसे बड़ौदा जानेके लिए दादूभाईने ही कहा था किन्तु उसने लौटनेसे इनकार कर दिया। दादूभाईने उनके साथ जानेसे भी इनकार कर दिया। लेकिन मनुष्य क्या करे? अपने स्वभावको कौन जीत सकता है? इसलिए जो हाथ लग जाये उसीसे हमें सन्तोष मानना चाहिए।
दिल्ली में तो खूब हुआ हर जगह नया रंग है। बंगालमें अतुल सेनकी हड्डी टूट गई जान पड़ती है।
लगता है, दिल्ली में महिलाओंने विदेशी वस्त्रकी दुकानोंपर धरना दिया है।
अब रविवारके दिन महिलाओंका सम्मेलन दांडीमें करनेका निश्चय किया गया है। उस सम्बन्धमें मैंने नारणदासको जो पत्र लिखा है उसे पढ़ लेना।
इसके साथके पत्रोंको पहुँचाने में भूल नहीं होनी चाहिए।
तुम आराम करते हुए काम करना। जो काम दूसरोंसे हो सके उसे उन्हें सौंपते जाना।
मैं अभी-अभी मटवाडसे लौटा हूँ।
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गुजराती (एस० एन० ११४७८) की फोटो नकलसे।
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भाईश्री शिवानन्द,
तुम्हारा पत्र मिलनेसे पूर्व ही फूलचन्द आदिके बारेमें समाचार मुझे मिल चुका था। शारदाबहन आनन्दसे होंगी। जो हमने चाहा हो यदि वह मिले तो उसका दुःख नहीं होता। उस तरफ यदि किसी स्वयंसेवककी जरूरत पड़े तो तुम महादेवसे कहना, वे मुझे लिखेंगे। महादेव जेलमें हों तो सीधे मुझे पत्र लिखना।
क्या शारदाबन नये आन्दोलनमें शामिल होंगी ?
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गजराती (सी० डब्ल्यू० २८४१ ) की फोटो नकलसे; सौजन्य फूलचन्द शाह
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वकीलोंकी बात समझमें आई। सिर्फ एक ब्रोकरके अपना धन्धा छोड़ देनेसे बात नहीं बननेवाली है। मुझे भय है, वकील लोग अभी एकदम तो अपना धन्धा नहीं छोड़ेंगे। लेकिन यदि विद्यार्थी शालाएं छोड़ दें तो वह काफी होगा। मृदुको बधाई।
दादूभाई प्रति मेरा मोह छूट गया है। अब्बास साहब लिखते हैं कि उनसे बड़ौदा जानेके लिए दादूभाईने ही कहा था किन्तु उसने लौटनेसे इनकार कर दिया। दादूभाईने उनके साथ जानेसे भी इनकार कर दिया। लेकिन मनुष्य क्या करे? अपने स्वभावको कौन जीत सकता है? इसलिए जो हाथ लग जाये उसीसे हमें सन्तोष मानना चाहिए।
दिल्ली में तो खूब हुआ हर जगह नया रंग है। बंगालमें अतुल सेनकी हड्डी टूट गई जान पड़ती है।
लगता है, दिल्ली में महिलाओंने विदेशी वस्त्रकी दुकानोंपर धरना दिया है।
अब रविवारके दिन महिलाओंका सम्मेलन दांडीमें करनेका निश्चय किया गया है। उस सम्बन्धमें मैंने नारणदासको जो पत्र लिखा है उसे पढ़ लेना।
इसके साथके पत्रोंको पहुँचाने में भूल नहीं होनी चाहिए।
तुम आराम करते हुए काम करना। जो काम दूसरोंसे हो सके उसे उन्हें सौंपते जाना।
मैं अभी-अभी मटवाडसे लौटा हूँ।
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गुजराती (एस० एन० ११४७८) की फोटो नकलसे।
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भाईश्री शिवानन्द,
तुम्हारा पत्र मिलनेसे पूर्व ही फूलचन्द आदिके बारेमें समाचार मुझे मिल चुका था। शारदाबहन आनन्दसे होंगी। जो हमने चाहा हो यदि वह मिले तो उसका दुःख नहीं होता। उस तरफ यदि किसी स्वयंसेवककी जरूरत पड़े तो तुम महादेवसे कहना, वे मुझे लिखेंगे। महादेव जेलमें हों तो सीधे मुझे पत्र लिखना।
क्या शारदाबन नये आन्दोलनमें शामिल होंगी ?
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गजराती (सी० डब्ल्यू० २८४१ ) की फोटो नकलसे; सौजन्य फूलचन्द शाह
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९५
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२३२. पत्र : चिमनलालको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० चिमनलाल,
तुम्हारा पत्र मिला था। तुम्हारी तबीयत ठीक हो गई, यह जानकर मुझे खुशी हुई। तबीयत ठीक होनेका कारण बीजापुरकी आबोहवा थी या चिन्ताके बोझका कम होना अथवा दोनों ही? यदि आबोहवा के कारण ही यह सम्भव हुआ हो तो तुम्हें समय- समयपर बीजापुर जाना चाहिए और इस तरह अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहिए। ऐसा करनेसे तुम्हारा शरीर ठीक हो जायेगा। तुम मेरे साथ नहीं हो, इस बातका तो तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। सहज ही जो कार्य हमारे जिम्मे आजाये, यदि हम उसे पूरी तन्मयता के साथ कर लें, तो इतने भरसे ही हम अपने कर्त्तव्यका पालन कर लेते हैं।
आधे सिरके दर्द के लिए तुम्हें हलकी खुराक खानी चाहिए और जब दर्द शुरू हो जाये तब रातको सिरपर मिट्टीकी पट्टी रखनी चाहिए, इससे लाभ होगा। ऐसे मामलोंमें मेरा यह पूर्णतया सफल प्रयोग है। आशा है, बबूको श्वासका कष्ट नहीं हो रहा होगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० जी० ६) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|२३३. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० बृजकृष्ण,
तुम्हारा खत आया है। घरवालोंके साथ इस तरहसे संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। आज तो सिर्फ विनय करो। इस वक्त तो कुछ वहाँ जानेका भी नहीं है। विदेशी वस्त्रके संपूर्ण वहिष्कारका समय अपने आप आ रहा है उस समय लोग स्वयं विलायती कपड़ा छोड़ देंगे। तुमने शरीर प्रकृति के हाल इस बार नहीं बताये हैं। बीजापुरमें अगर कुछ काम नहीं है तो यहां आ जाओ यहांकी आबोहवा बहुत ही अच्छी है। मकान समुद्रके सामने ही है इसलिये दिन-रात ठंडी हवा रहती है। नवसारी
<small>१. दिल्ली।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० चिमनलाल,
तुम्हारा पत्र मिला था। तुम्हारी तबीयत ठीक हो गई, यह जानकर मुझे खुशी हुई। तबीयत ठीक होनेका कारण बीजापुरकी आबोहवा थी या चिन्ताके बोझका कम होना अथवा दोनों ही? यदि आबोहवा के कारण ही यह सम्भव हुआ हो तो तुम्हें समय- समयपर बीजापुर जाना चाहिए और इस तरह अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहिए। ऐसा करनेसे तुम्हारा शरीर ठीक हो जायेगा। तुम मेरे साथ नहीं हो, इस बातका तो तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। सहज ही जो कार्य हमारे जिम्मे आजाये, यदि हम उसे पूरी तन्मयता के साथ कर लें, तो इतने भरसे ही हम अपने कर्त्तव्यका पालन कर लेते हैं।
आधे सिरके दर्द के लिए तुम्हें हलकी खुराक खानी चाहिए और जब दर्द शुरू हो जाये तब रातको सिरपर मिट्टीकी पट्टी रखनी चाहिए, इससे लाभ होगा। ऐसे मामलोंमें मेरा यह पूर्णतया सफल प्रयोग है। आशा है, बबूको श्वासका कष्ट नहीं हो रहा होगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० जी० ६) की फोटो नकलसे।
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{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० बृजकृष्ण,
तुम्हारा खत आया है। घरवालोंके साथ इस तरहसे संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। आज तो सिर्फ विनय करो। इस वक्त तो कुछ वहाँ जानेका भी नहीं है। विदेशी वस्त्रके संपूर्ण वहिष्कारका समय अपने आप आ रहा है उस समय लोग स्वयं विलायती कपड़ा छोड़ देंगे। तुमने शरीर प्रकृति के हाल इस बार नहीं बताये हैं। बीजापुरमें अगर कुछ काम नहीं है तो यहां आ जाओ यहांकी आबोहवा बहुत ही अच्छी है। मकान समुद्रके सामने ही है इसलिये दिन-रात ठंडी हवा रहती है। नवसारी
<small>१. दिल्ली।<small><noinclude></noinclude>
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चि० चिमनलाल,
तुम्हारा पत्र मिला था। तुम्हारी तबीयत ठीक हो गई, यह जानकर मुझे खुशी हुई। तबीयत ठीक होनेका कारण बीजापुरकी आबोहवा थी या चिन्ताके बोझका कम होना अथवा दोनों ही? यदि आबोहवा के कारण ही यह सम्भव हुआ हो तो तुम्हें समय- समयपर बीजापुर जाना चाहिए और इस तरह अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहिए। ऐसा करनेसे तुम्हारा शरीर ठीक हो जायेगा। तुम मेरे साथ नहीं हो, इस बातका तो तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। सहज ही जो कार्य हमारे जिम्मे आजाये, यदि हम उसे पूरी तन्मयता के साथ कर लें, तो इतने भरसे ही हम अपने कर्त्तव्यका पालन कर लेते हैं।
आधे सिरके दर्द के लिए तुम्हें हलकी खुराक खानी चाहिए और जब दर्द शुरू हो जाये तब रातको सिरपर मिट्टीकी पट्टी रखनी चाहिए, इससे लाभ होगा। ऐसे मामलोंमें मेरा यह पूर्णतया सफल प्रयोग है। आशा है, बबूको श्वासका कष्ट नहीं हो रहा होगा।
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चि० बृजकृष्ण,
तुम्हारा खत आया है। घरवालोंके साथ इस तरहसे संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। आज तो सिर्फ विनय करो। इस वक्त तो कुछ वहाँ जानेका भी नहीं है। विदेशी वस्त्रके संपूर्ण वहिष्कारका समय अपने आप आ रहा है उस समय लोग स्वयं विलायती कपड़ा छोड़ देंगे। तुमने शरीर प्रकृति के हाल इस बार नहीं बताये हैं। बीजापुरमें अगर कुछ काम नहीं है तो यहां आ जाओ यहांकी आबोहवा बहुत ही अच्छी है। मकान समुद्रके सामने ही है इसलिये दिन-रात ठंडी हवा रहती है। नवसारी
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२३२. पत्र : चिमनलालको'''}}}}
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चि० चिमनलाल,
तुम्हारा पत्र मिला था। तुम्हारी तबीयत ठीक हो गई, यह जानकर मुझे खुशी हुई। तबीयत ठीक होनेका कारण बीजापुरकी आबोहवा थी या चिन्ताके बोझका कम होना अथवा दोनों ही? यदि आबोहवा के कारण ही यह सम्भव हुआ हो तो तुम्हें समय- समयपर बीजापुर जाना चाहिए और इस तरह अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहिए। ऐसा करनेसे तुम्हारा शरीर ठीक हो जायेगा। तुम मेरे साथ नहीं हो, इस बातका तो तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। सहज ही जो कार्य हमारे जिम्मे आजाये, यदि हम उसे पूरी तन्मयता के साथ कर लें, तो इतने भरसे ही हम अपने कर्त्तव्यका पालन कर लेते हैं।
आधे सिरके दर्द के लिए तुम्हें हलकी खुराक खानी चाहिए और जब दर्द शुरू हो जाये तब रातको सिरपर मिट्टीकी पट्टी रखनी चाहिए, इससे लाभ होगा। ऐसे मामलोंमें मेरा यह पूर्णतया सफल प्रयोग है। आशा है, बबूको श्वासका कष्ट नहीं हो रहा होगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० जी० ६) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२३३. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको'''}}}}
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{{Right|११ अप्रैल, १९३०}}
चि० बृजकृष्ण,
तुम्हारा खत आया है। घरवालोंके साथ इस तरहसे संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। आज तो सिर्फ विनय करो। इस वक्त तो कुछ वहाँ जानेका भी नहीं है। विदेशी वस्त्रके संपूर्ण वहिष्कारका समय अपने आप आ रहा है उस समय लोग स्वयं विलायती कपड़ा छोड़ देंगे। तुमने शरीर प्रकृति के हाल इस बार नहीं बताये हैं। बीजापुरमें अगर कुछ काम नहीं है तो यहां आ जाओ यहांकी आबोहवा बहुत ही अच्छी है। मकान समुद्रके सामने ही है इसलिये दिन-रात ठंडी हवा रहती है। नवसारी
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तुम्हारा पत्र मिला था। तुम्हारी तबीयत ठीक हो गई, यह जानकर मुझे खुशी हुई। तबीयत ठीक होनेका कारण बीजापुरकी आबोहवा थी या चिन्ताके बोझका कम होना अथवा दोनों ही? यदि आबोहवा के कारण ही यह सम्भव हुआ हो तो तुम्हें समय- समयपर बीजापुर जाना चाहिए और इस तरह अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहिए। ऐसा करनेसे तुम्हारा शरीर ठीक हो जायेगा। तुम मेरे साथ नहीं हो, इस बातका तो तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। सहज ही जो कार्य हमारे जिम्मे आजाये, यदि हम उसे पूरी तन्मयता के साथ कर लें, तो इतने भरसे ही हम अपने कर्त्तव्यका पालन कर लेते हैं।
आधे सिरके दर्द के लिए तुम्हें हलकी खुराक खानी चाहिए और जब दर्द शुरू हो जाये तब रातको सिरपर मिट्टीकी पट्टी रखनी चाहिए, इससे लाभ होगा। ऐसे मामलोंमें मेरा यह पूर्णतया सफल प्रयोग है। आशा है, बबूको श्वासका कष्ट नहीं हो रहा होगा।
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गुजराती (एस० जी० ६) की फोटो नकलसे।
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तुम्हारा खत आया है। घरवालोंके साथ इस तरहसे संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। आज तो सिर्फ विनय करो। इस वक्त तो कुछ वहाँ जानेका भी नहीं है। विदेशी वस्त्रके संपूर्ण वहिष्कारका समय अपने आप आ रहा है उस समय लोग स्वयं विलायती कपड़ा छोड़ देंगे। तुमने शरीर प्रकृति के हाल इस बार नहीं बताये हैं। बीजापुरमें अगर कुछ काम नहीं है तो यहां आ जाओ यहांकी आबोहवा बहुत ही अच्छी है। मकान समुद्रके सामने ही है इसलिये दिन-रात ठंडी हवा रहती है। नवसारी
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>स्टेशनसे १० मील दूर डांडी मुकाम है। मुझको पकड़ लें, और मैं यहांसे छावनी उठा लूं तो भी तुमको रहने में कोई मुसीबत नहीं होगी।
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भाई सीतलासहाय,
तुम्हारे पत्रका उत्तर देरसे जा रहा है। कालाकांकरके भाईको नमक बनानेके लिए भेजे जायं भले वे जेल चले जायें। काम तो सब जगह बहुत अच्छा चल रहा है। अधिक लिखानेका समय नहीं है।
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श्रीयुत सीतलासहाय
द्वारा सत्याग्रह कमेटी
रायबरेली (सं० प्रा०)
जी० एन० ८६८४ की फोटो नकलसे।
{{larger|{{c|२३५. वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके लिए}}}}
{{right|जलालपुर}}
{{right|११ अप्रैल, १९३०}}
अखवारोंमें इस आशयका अनधिकृत समाचार छपा है कि मैं जहाँ चाहूँ, वहाँ जा सकूंगा। इस समाचारके आधारपर मुझे भारतके अनेक हिस्सोंसे कई निमन्त्रण मिले हैं, जिनसे मैं अटपटी स्थितिमें पड़ गया हूँ। मेरा कहीं भी जानेका इरादा नहीं है जहाँतक सम्भव है, मैं अपना पूरा ध्यान गुजरातपर ही केन्द्रित करना चाहता हूँ, और यदि मेरा स्वास्थ्य वैसा ठीक रहा तो अगले सप्ताह मैं गुजरातके उन हिस्सों में। जानेकी फुरसत निकाल लूंगा जहाँ जाना आवश्यक है। हो सकता है, मैं बम्बईतक जाऊँ, लेकिन उससे आगे नहीं जाऊँगा।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १२-४-१९१०
<small>१. कालाकांकरके राजा साहबके भाई कुँवर सुरेशसिंहको जून १९३० में गिरफ्तार कर लिया गया था।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९७
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{larger|{{c|२३६. सन्देश : हंसा मेहता के लिए}}}}
| १२ अप्रैल, १९३० के पूर्व ]
श्रीमती हंसा मेहतासे' कह दीजिए कि बम्बईकी महिलाओंको बम्बई नगर में
शराबबन्दी के लिए तत्परतासे जुट जाना चाहिए। यह पूर्ण स्वराज्यकी प्राप्ति में उनका
योगदान होगा। इससे न केवल दुनियाकी सबसे गरीब औरतोंके करोड़ों रुपयोंकी बचत
होगी, बल्कि यह भारत द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रताकी प्राप्तिकी दिशामें एक रचनात्मक
कदम होगा। इस संघर्ष में भारत अपने यहाँकी प्रत्येक स्त्रीसे अपने कर्त्तव्यके पालनकी
अपेक्षा रखता है ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे फॉनिकल, १२-४-१९३०
२३७. बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षको लिखे पत्रका अंश
[ १२ अप्रैल, १९३० के पूर्व ]
मुझे मालूम है बम्बईका काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। सच तो यह
है कि सम्पूर्ण देश आशासे कहीं अधिक कष्ट सहन कर रहा है। पर अभी असली
परीक्षा बाकी है। यदि देश उस अचको बिना बदलेका भाव और दुर्बलता दिखाये
सह लेगा तो फिर स्वराज्यका रास्ता साफ है। हमें आशा करनी चाहिए कि हमारा
आरम्भ जैसा श्रेष्ठ रहा है अन्त भी वैसा ही श्रेष्ठ रहेगा।
[ अंग्रेजीसे |
बॉम्बे क्रॉनिकल, १२-४-१९३०
१. बम्बई कांग्रेसी नेता डा० जीवराज मेहताकी पत्नी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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{{right|[१२ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
श्रीमती हंसा मेहतासे' कह दीजिए कि बम्बईकी महिलाओंको बम्बई नगर में शराबबन्दी के लिए तत्परतासे जुट जाना चाहिए। यह पूर्ण स्वराज्यकी प्राप्ति में उनका योगदान होगा। इससे न केवल दुनियाकी सबसे गरीब औरतोंके करोड़ों रुपयोंकी बचत होगी, बल्कि यह भारत द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रताकी प्राप्तिकी दिशामें एक रचनात्मक कदम होगा। इस संघर्ष में भारत अपने यहाँकी प्रत्येक स्त्रीसे अपने कर्त्तव्यके पालनकी अपेक्षा रखता है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे फॉनिकल''', १२-४-१९३०
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{{right|[१२ अप्रैल, १९३० के पूर्व]}}
मुझे मालूम है बम्बईका काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। सच तो यह
है कि सम्पूर्ण देश आशासे कहीं अधिक कष्ट सहन कर रहा है। पर अभी असली
परीक्षा बाकी है। यदि देश उस अचको बिना बदलेका भाव और दुर्बलता दिखाये
सह लेगा तो फिर स्वराज्यका रास्ता साफ है। हमें आशा करनी चाहिए कि हमारा
आरम्भ जैसा श्रेष्ठ रहा है अन्त भी वैसा ही श्रेष्ठ रहेगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १२-४-१९३०
<small>१. बम्बई कांग्रेसी नेता डा० जीवराज मेहताकी पत्नी।<small><noinclude></noinclude>
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श्रीमती हंसा मेहतासे' कह दीजिए कि बम्बईकी महिलाओंको बम्बई नगर में शराबबन्दी के लिए तत्परतासे जुट जाना चाहिए। यह पूर्ण स्वराज्यकी प्राप्ति में उनका योगदान होगा। इससे न केवल दुनियाकी सबसे गरीब औरतोंके करोड़ों रुपयोंकी बचत होगी, बल्कि यह भारत द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रताकी प्राप्तिकी दिशामें एक रचनात्मक कदम होगा। इस संघर्ष में भारत अपने यहाँकी प्रत्येक स्त्रीसे अपने कर्त्तव्यके पालनकी अपेक्षा रखता है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे फॉनिकल''', १२-४-१९३०
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मुझे मालूम है बम्बईका काम बहुत ही अच्छा चल रहा है। सच तो यह
है कि सम्पूर्ण देश आशासे कहीं अधिक कष्ट सहन कर रहा है। पर अभी असली
परीक्षा बाकी है। यदि देश उस अचको बिना बदलेका भाव और दुर्बलता दिखाये
सह लेगा तो फिर स्वराज्यका रास्ता साफ है। हमें आशा करनी चाहिए कि हमारा
आरम्भ जैसा श्रेष्ठ रहा है अन्त भी वैसा ही श्रेष्ठ रहेगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १२-४-१९३०
<small>१. बम्बई कांग्रेसी नेता डा० जीवराज मेहताकी पत्नी।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२९८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२३८. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१२ अप्रैल, १९३०}}
चि० ब्रजकृष्ण,
तुमारा तार मीला है। मैं तो प्रातःकालमें देहातों में गया था। तार भेजनेका कह दीया था परंतु प्यारेलाल भूल गया इससे तार नहि गया। अब दोगुना खर्च करके तार नहि भेजुंगा। मेरा कलका पत्र पढ़कर देखो क्या उचित होगा। यहां आना है तो आ जाओ और दिल्ही जाना उचित लगे तो दिल्ही जाओ।
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
जी० एन० २३८० की फोटो नकलसे।
२३९. पत्र : नानुभाई दवेको
{{Right|दांडी}}
{{Right|१२ अप्रैल, १९३०}}
भाईश्री नानुभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो विवरण दिया है वह हृदयद्रावक है। लेकिन उसे सहन करनेमें ही हमारी विजय निहित है, ऐसा जानकर में शान्तिका अनुभव करता हूँ। तथापि यदि दमनका यह चक्र इसी तरह चलता रहा तो हमें वर्तमान आन्दोलनसे भी अधिक तीव्र किसी आन्दोलनको खोज निकालना होगा और इस तरह अपने आपको और भी दुःखमें डालना होगा। मुझे समय-समय पर ब्योरेवार समाचार लिखते रहना। तुम जो लिखो वह ऐसा होना चाहिए जिसे सिद्ध किया जा सके। इन तथ्योंसे ही मैं समाधानका कोई रास्ता निकाल सकूंगा। ऐसे अत्याचार करनेवाले अधिकारियोंके नाम भी यदि तुम्हें मालूम हो सकें तो लिख भेजना। जिन व्यक्तियों पर मार पड़ी हो, उनके नाम तथा डाक्टरी जाँचका परिणाम भी लिख भेजना।
{{Right|मोहनदासके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० १६७९५ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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{{Right|१२ अप्रैल, १९३०}}
चि० ब्रजकृष्ण,
तुमारा तार मीला है। मैं तो प्रातःकालमें देहातों में गया था। तार भेजनेका कह दीया था परंतु प्यारेलाल भूल गया इससे तार नहि गया। अब दोगुना खर्च करके तार नहि भेजुंगा। मेरा कलका पत्र पढ़कर देखो क्या उचित होगा। यहां आना है तो आ जाओ और दिल्ही जाना उचित लगे तो दिल्ही जाओ।
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जी० एन० २३८० की फोटो नकलसे।
२३९. पत्र : नानुभाई दवेको
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{{Right|१२ अप्रैल, १९३०}}
भाईश्री नानुभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो विवरण दिया है वह हृदयद्रावक है। लेकिन उसे सहन करनेमें ही हमारी विजय निहित है, ऐसा जानकर में शान्तिका अनुभव करता हूँ। तथापि यदि दमनका यह चक्र इसी तरह चलता रहा तो हमें वर्तमान आन्दोलनसे भी अधिक तीव्र किसी आन्दोलनको खोज निकालना होगा और इस तरह अपने आपको और भी दुःखमें डालना होगा। मुझे समय-समय पर ब्योरेवार समाचार लिखते रहना। तुम जो लिखो वह ऐसा होना चाहिए जिसे सिद्ध किया जा सके। इन तथ्योंसे ही मैं समाधानका कोई रास्ता निकाल सकूंगा। ऐसे अत्याचार करनेवाले अधिकारियोंके नाम भी यदि तुम्हें मालूम हो सकें तो लिख भेजना। जिन व्यक्तियों पर मार पड़ी हो, उनके नाम तथा डाक्टरी जाँचका परिणाम भी लिख भेजना।
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गुजराती (एस० एन० १६७९५ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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चि० ब्रजकृष्ण,
तुमारा तार मीला है। मैं तो प्रातःकालमें देहातों में गया था। तार भेजनेका कह दीया था परंतु प्यारेलाल भूल गया इससे तार नहि गया। अब दोगुना खर्च करके तार नहि भेजुंगा। मेरा कलका पत्र पढ़कर देखो क्या उचित होगा। यहां आना है तो आ जाओ और दिल्ही जाना उचित लगे तो दिल्ही जाओ।
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जी० एन० २३८० की फोटो नकलसे।
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भाईश्री नानुभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो विवरण दिया है वह हृदयद्रावक है। लेकिन उसे सहन करनेमें ही हमारी विजय निहित है, ऐसा जानकर में शान्तिका अनुभव करता हूँ। तथापि यदि दमनका यह चक्र इसी तरह चलता रहा तो हमें वर्तमान आन्दोलनसे भी अधिक तीव्र किसी आन्दोलनको खोज निकालना होगा और इस तरह अपने आपको और भी दुःखमें डालना होगा। मुझे समय-समय पर ब्योरेवार समाचार लिखते रहना। तुम जो लिखो वह ऐसा होना चाहिए जिसे सिद्ध किया जा सके। इन तथ्योंसे ही मैं समाधानका कोई रास्ता निकाल सकूंगा। ऐसे अत्याचार करनेवाले अधिकारियोंके नाम भी यदि तुम्हें मालूम हो सकें तो लिख भेजना। जिन व्यक्तियों पर मार पड़ी हो, उनके नाम तथा डाक्टरी जाँचका परिणाम भी लिख भेजना।
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तुमारा तार मीला है। मैं तो प्रातःकालमें देहातों में गया था। तार भेजनेका कह दीया था परंतु प्यारेलाल भूल गया इससे तार नहि गया। अब दोगुना खर्च करके तार नहि भेजुंगा। मेरा कलका पत्र पढ़कर देखो क्या उचित होगा। यहां आना है तो आ जाओ और दिल्ही जाना उचित लगे तो दिल्ही जाओ।
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जी० एन० २३८० की फोटो नकलसे।
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भाईश्री नानुभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो विवरण दिया है वह हृदयद्रावक है। लेकिन उसे सहन करनेमें ही हमारी विजय निहित है, ऐसा जानकर में शान्तिका अनुभव करता हूँ। तथापि यदि दमनका यह चक्र इसी तरह चलता रहा तो हमें वर्तमान आन्दोलनसे भी अधिक तीव्र किसी आन्दोलनको खोज निकालना होगा और इस तरह अपने आपको और भी दुःखमें डालना होगा। मुझे समय-समय पर ब्योरेवार समाचार लिखते रहना। तुम जो लिखो वह ऐसा होना चाहिए जिसे सिद्ध किया जा सके। इन तथ्योंसे ही मैं समाधानका कोई रास्ता निकाल सकूंगा। ऐसे अत्याचार करनेवाले अधिकारियोंके नाम भी यदि तुम्हें मालूम हो सकें तो लिख भेजना। जिन व्यक्तियों पर मार पड़ी हो, उनके नाम तथा डाक्टरी जाँचका परिणाम भी लिख भेजना।
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Kumari Arpana Sinha
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तुमारा तार मीला है। मैं तो प्रातःकालमें देहातों में गया था। तार भेजनेका कह दीया था परंतु प्यारेलाल भूल गया इससे तार नहि गया। अब दोगुना खर्च करके तार नहि भेजुंगा। मेरा कलका पत्र पढ़कर देखो क्या उचित होगा। यहां आना है तो आ जाओ और दिल्ही जाना उचित लगे तो दिल्ही जाओ।
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जी० एन० २३८० की फोटो नकलसे।
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भाईश्री नानुभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने जो विवरण दिया है वह हृदयद्रावक है। लेकिन उसे सहन करनेमें ही हमारी विजय निहित है, ऐसा जानकर मैं शान्तिका अनुभव करता हूँ। तथापि यदि दमनका यह चक्र इसी तरह चलता रहा तो हमें वर्तमान आन्दोलनसे भी अधिक तीव्र किसी आन्दोलनको खोज निकालना होगा और इस तरह अपने आपको और भी दुःखमें डालना होगा। मुझे समय-समय पर ब्योरेवार समाचार लिखते रहना। तुम जो लिखो वह ऐसा होना चाहिए जिसे सिद्ध किया जा सके। इन तथ्योंसे ही मैं समाधानका कोई रास्ता निकाल सकूंगा। ऐसे अत्याचार करनेवाले अधिकारियोंके नाम भी यदि तुम्हें मालूम हो सकें तो लिख भेजना। जिन व्यक्तियों पर मार पड़ी हो, उनके नाम तथा डाक्टरी जाँचका परिणाम भी लिख भेजना।
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Kumari Arpana Sinha
2191
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२४०. गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय}}}}
कहा जा सकता है कि गुजरातने हमारी लाज रख ली है। गुजरातके गाँव सविनय अवज्ञाके लिए मैदानमें आ गये हैं। स्त्री, पुरुष और बालक इसमें हाथ बँटा रहे हैं। नमकके क्षेत्र बहुत-सी जगहों में है। लोगोंके घरोंमें गैरकानूनी नमक पहुँच चुका है। गुजरातको अब सरकारी नमक व्यवहार करनेकी जरूरत नहीं रही। जो चाहे थोड़ी-सी मेहनत से जितना चाहिए उतना तैयार नमक अपने लिए ले जा सकता है।
लेकिन क्या सरकार इस बातको बरदाश्त करेगी? इसलिए उसने पकड़-पकड़ शुरू कर दी। धोलेरासे लेकर जलालपुर ताल्लुके तक जागृतिकी लहर फैल चुकी है। और नेतागण गिरफतार हो चुके हैं। अमृतलाल सेठ, मणिलाल कोठारी, फूलचन्द कस्तूरचन्द शाह, डाक्टर हरिप्रसादजी, रोहित मेहता, दरबार गोपालदास, गोकुलदास तलाटी, रविशंकर व्यास, रावजीभाई मणिभाई पटेल, आशाभाई, डाक्टर चन्दूलाल, केशुभाई गणेशजी, रामदास गांधी, चिमनलाल प्राणशंकर, भिक्षुक उर्फ दरबारी साधु, कोकूभाई, मनुभाई आदि जेलमें विराजमान हैं। अनेक नाम मुझसे छूट गये हैं औरफिर सबके नाम देने न देनेसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरवार और उनके साथियोंके बेड़ियां डाल दी गई और जेलमें उनका मुण्डन कर दिया गया। यह सब अच्छा है, बशर्ते कि गुजरात इसका मूल्य समझे। आट, अहमदाबाद और घोलकामें नमक रूपी सम्मानकी रक्षा करनेवालों को पीटा गया। यह विशेष बात है, इसकी कल्पना नहीं थी। मैने सोचा था कि शायद सरकार जोर-जुल्मसे काम नहीं लेगी और कानूनन् मुकदमे चलाकर लोगोंको जेल भेज देगी। मेरा विचार गलत निकला। कोई अपना स्वभाव क्षण-भर में कैसे बदल सकता है? सरकारने अपने खूनी पंजेका कुछ स्वाद चलाया है, अतः अब हम अधिककी आशा रखें।
गुजरातसे आगे बढ़ें तो बम्बई में जमनालालजी नरीमान वगैरा पकड़ लिये गये हैं। तेजीसे मामले चलाये जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि सजाकी बात मजिस्ट्रेटकी
प्रकृतिपर निर्भर है।
दिल्ली में देवदास गांधीके साथियोंको पीटा गया है। देवदास और उसके साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
जनता इस सबका क्या जवाब देगी? इस लेखके प्रकाशित होनेतक तो ये नई बातें भी पुरानी हो चुकी होंगी।
मैं तो अब भी जनतासे और अधिककी आशा रखता हूँ। विदेशी वस्त्रोंकी होली होनी चाहिए; प्रत्येकके हाथमें तकली रहनी चाहिए। कालेज और पाठशालाएँ खाली हो जानी चाहिए। वकील और डाक्टर अनेक प्रकारसे मदद कर सकते हैं। स्त्रियोंके बारेमें तो में अलगसे लिख ही चुका हूँ। स्वतन्त्रताकी इच्छुक जनताके सभी अंगोंका विकास होना चाहिए। सरकारी नौकरीका मोह अभीतक कम नहीं हुआ है और यह कमजोरीकी निशानी है।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२४०. गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय'''}}}}
कहा जा सकता है कि गुजरातने हमारी लाज रख ली है। गुजरातके गाँव सविनय अवज्ञाके लिए मैदानमें आ गये हैं। स्त्री, पुरुष और बालक इसमें हाथ बँटा रहे हैं। नमकके क्षेत्र बहुत-सी जगहों में है। लोगोंके घरोंमें गैरकानूनी नमक पहुँच चुका है। गुजरातको अब सरकारी नमक व्यवहार करनेकी जरूरत नहीं रही। जो चाहे थोड़ी-सी मेहनत से जितना चाहिए उतना तैयार नमक अपने लिए ले जा सकता है।
लेकिन क्या सरकार इस बातको बरदाश्त करेगी? इसलिए उसने पकड़-पकड़ शुरू कर दी। धोलेरासे लेकर जलालपुर ताल्लुके तक जागृतिकी लहर फैल चुकी है। और नेतागण गिरफतार हो चुके हैं। अमृतलाल सेठ, मणिलाल कोठारी, फूलचन्द कस्तूरचन्द शाह, डाक्टर हरिप्रसादजी, रोहित मेहता, दरबार गोपालदास, गोकुलदास तलाटी, रविशंकर व्यास, रावजीभाई मणिभाई पटेल, आशाभाई, डाक्टर चन्दूलाल, केशुभाई गणेशजी, रामदास गांधी, चिमनलाल प्राणशंकर, भिक्षुक उर्फ दरबारी साधु, कोकूभाई, मनुभाई आदि जेलमें विराजमान हैं। अनेक नाम मुझसे छूट गये हैं औरफिर सबके नाम देने न देनेसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरवार और उनके साथियोंके बेड़ियां डाल दी गई और जेलमें उनका मुण्डन कर दिया गया। यह सब अच्छा है, बशर्ते कि गुजरात इसका मूल्य समझे। आट, अहमदाबाद और घोलकामें नमक रूपी सम्मानकी रक्षा करनेवालों को पीटा गया। यह विशेष बात है, इसकी कल्पना नहीं थी। मैने सोचा था कि शायद सरकार जोर-जुल्मसे काम नहीं लेगी और कानूनन् मुकदमे चलाकर लोगोंको जेल भेज देगी। मेरा विचार गलत निकला। कोई अपना स्वभाव क्षण-भर में कैसे बदल सकता है? सरकारने अपने खूनी पंजेका कुछ स्वाद चलाया है, अतः अब हम अधिककी आशा रखें।
गुजरातसे आगे बढ़ें तो बम्बई में जमनालालजी नरीमान वगैरा पकड़ लिये गये हैं। तेजीसे मामले चलाये जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि सजाकी बात मजिस्ट्रेटकी
प्रकृतिपर निर्भर है।
दिल्ली में देवदास गांधीके साथियोंको पीटा गया है। देवदास और उसके साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
जनता इस सबका क्या जवाब देगी? इस लेखके प्रकाशित होनेतक तो ये नई बातें भी पुरानी हो चुकी होंगी।
मैं तो अब भी जनतासे और अधिककी आशा रखता हूँ। विदेशी वस्त्रोंकी होली होनी चाहिए; प्रत्येकके हाथमें तकली रहनी चाहिए। कालेज और पाठशालाएँ खाली हो जानी चाहिए। वकील और डाक्टर अनेक प्रकारसे मदद कर सकते हैं। स्त्रियोंके बारेमें तो में अलगसे लिख ही चुका हूँ। स्वतन्त्रताकी इच्छुक जनताके सभी अंगोंका विकास होना चाहिए। सरकारी नौकरीका मोह अभीतक कम नहीं हुआ है और यह कमजोरीकी निशानी है।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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कहा जा सकता है कि गुजरातने हमारी लाज रख ली है। गुजरातके गाँव सविनय अवज्ञाके लिए मैदानमें आ गये हैं। स्त्री, पुरुष और बालक इसमें हाथ बँटा रहे हैं। नमकके क्षेत्र बहुत-सी जगहों में है। लोगोंके घरोंमें गैरकानूनी नमक पहुँच चुका है। गुजरातको अब सरकारी नमक व्यवहार करनेकी जरूरत नहीं रही। जो चाहे थोड़ी-सी मेहनत से जितना चाहिए उतना तैयार नमक अपने लिए ले जा सकता है।
लेकिन क्या सरकार इस बातको बरदाश्त करेगी? इसलिए उसने पकड़-पकड़ शुरू कर दी। धोलेरासे लेकर जलालपुर ताल्लुके तक जागृतिकी लहर फैल चुकी है। और नेतागण गिरफतार हो चुके हैं। अमृतलाल सेठ, मणिलाल कोठारी, फूलचन्द कस्तूरचन्द शाह, डाक्टर हरिप्रसादजी, रोहित मेहता, दरबार गोपालदास, गोकुलदास तलाटी, रविशंकर व्यास, रावजीभाई मणिभाई पटेल, आशाभाई, डाक्टर चन्दूलाल, केशुभाई गणेशजी, रामदास गांधी, चिमनलाल प्राणशंकर, भिक्षुक उर्फ दरबारी साधु, कोकूभाई, मनुभाई आदि जेलमें विराजमान हैं। अनेक नाम मुझसे छूट गये हैं औरफिर सबके नाम देने न देनेसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरवार और उनके साथियोंके बेड़ियां डाल दी गई और जेलमें उनका मुण्डन कर दिया गया। यह सब अच्छा है, बशर्ते कि गुजरात इसका मूल्य समझे।
आट, अहमदाबाद और घोलकामें नमक रूपी सम्मानकी रक्षा करनेवालों को पीटा गया। यह विशेष बात है, इसकी कल्पना नहीं थी। मैने सोचा था कि शायद सरकार जोर-जुल्मसे काम नहीं लेगी और कानूनन् मुकदमे चलाकर लोगोंको जेल भेज देगी। मेरा विचार गलत निकला। कोई अपना स्वभाव क्षण-भर में कैसे बदल सकता है? सरकारने अपने खूनी पंजेका कुछ स्वाद चलाया है, अतः अब हम अधिककी आशा रखें।
गुजरातसे आगे बढ़ें तो बम्बई में जमनालालजी नरीमान वगैरा पकड़ लिये गये हैं। तेजीसे मामले चलाये जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि सजाकी बात मजिस्ट्रेटकी
प्रकृतिपर निर्भर है।
दिल्ली में देवदास गांधीके साथियोंको पीटा गया है। देवदास और उसके साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
जनता इस सबका क्या जवाब देगी? इस लेखके प्रकाशित होनेतक तो ये नई बातें भी पुरानी हो चुकी होंगी।
मैं तो अब भी जनतासे और अधिककी आशा रखता हूँ। विदेशी वस्त्रोंकी होली होनी चाहिए; प्रत्येकके हाथमें तकली रहनी चाहिए। कालेज और पाठशालाएँ खाली हो जानी चाहिए। वकील और डाक्टर अनेक प्रकारसे मदद कर सकते हैं। स्त्रियोंके बारेमें तो में अलगसे लिख ही चुका हूँ। स्वतन्त्रताकी इच्छुक जनताके सभी अंगोंका विकास होना चाहिए। सरकारी नौकरीका मोह अभीतक कम नहीं हुआ है और यह कमजोरीकी निशानी है।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२४०. गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय'''}}}}
कहा जा सकता है कि गुजरातने हमारी लाज रख ली है। गुजरातके गाँव सविनय अवज्ञाके लिए मैदानमें आ गये हैं। स्त्री, पुरुष और बालक इसमें हाथ बँटा रहे हैं। नमकके क्षेत्र बहुत-सी जगहों में है। लोगोंके घरोंमें गैरकानूनी नमक पहुँच चुका है। गुजरातको अब सरकारी नमक व्यवहार करनेकी जरूरत नहीं रही। जो चाहे थोड़ी-सी मेहनत से जितना चाहिए उतना तैयार नमक अपने लिए ले जा सकता है।
लेकिन क्या सरकार इस बातको बरदाश्त करेगी? इसलिए उसने पकड़-पकड़ शुरू कर दी। धोलेरासे लेकर जलालपुर ताल्लुके तक जागृतिकी लहर फैल चुकी है। और नेतागण गिरफतार हो चुके हैं। अमृतलाल सेठ, मणिलाल कोठारी, फूलचन्द कस्तूरचन्द शाह, डाक्टर हरिप्रसादजी, रोहित मेहता, दरबार गोपालदास, गोकुलदास तलाटी, रविशंकर व्यास, रावजीभाई मणिभाई पटेल, आशाभाई, डाक्टर चन्दूलाल, केशुभाई गणेशजी, रामदास गांधी, चिमनलाल प्राणशंकर, भिक्षुक उर्फ दरबारी साधु, कोकूभाई, मनुभाई आदि जेलमें विराजमान हैं। अनेक नाम मुझसे छूट गये हैं औरफिर सबके नाम देने न देनेसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरवार और उनके साथियोंके बेड़ियां डाल दी गई और जेलमें उनका मुण्डन कर दिया गया। यह सब अच्छा है, बशर्ते कि गुजरात इसका मूल्य समझे।
आट, अहमदाबाद और घोलकामें नमक रूपी सम्मानकी रक्षा करनेवालों को पीटा गया। यह विशेष बात है, इसकी कल्पना नहीं थी। मैने सोचा था कि शायद सरकार जोर-जुल्मसे काम नहीं लेगी और कानूनन् मुकदमे चलाकर लोगोंको जेल भेज देगी। मेरा विचार गलत निकला। कोई अपना स्वभाव क्षण-भर में कैसे बदल सकता है? सरकारने अपने खूनी पंजेका कुछ स्वाद चलाया है, अतः अब हम अधिककी आशा रखें।
गुजरातसे आगे बढ़ें तो बम्बई में जमनालालजी नरीमान वगैरा पकड़ लिये गये हैं। तेजीसे मामले चलाये जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि सजाकी बात मजिस्ट्रेटकी
प्रकृतिपर निर्भर है।
दिल्ली में देवदास गांधीके साथियोंको पीटा गया है। देवदास और उसके साथी गिरफ्तार कर लिये गये हैं।
जनता इस सबका क्या जवाब देगी? इस लेखके प्रकाशित होनेतक तो ये नई बातें भी पुरानी हो चुकी होंगी।
मैं तो अब भी जनतासे और अधिककी आशा रखता हूँ। विदेशी वस्त्रोंकी होली होनी चाहिए; प्रत्येकके हाथमें तकली रहनी चाहिए। कालेज और पाठशालाएँ खाली हो जानी चाहिए। वकील और डाक्टर अनेक प्रकारसे मदद कर सकते हैं। स्त्रियोंके बारेमें तो मैं अलगसे लिख ही चुका हूँ। स्वतन्त्रताकी इच्छुक जनताके सभी अंगोंका विकास होना चाहिए। सरकारी नौकरीका मोह अभीतक कम नहीं हुआ है और यह कमजोरीकी निशानी है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३००
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन कमजोरी और स्वतन्त्रताकी आपसमें कभी बनी नहीं है। जहाँ-जहाँ कमजोरी है, जहाँ जहाँ स्वार्थ है, वहां-वहां उनकी जड़ें खोखली हो जायें तो आज ही स्वराज्य है और हम जेलके दरवाजे खोलकर सत्याग्रहियोंको बाहर निकालकर ला सकेंगे।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|२४१. मिल-मालिक और खादी}}}}
अहमदाबादके एक मिल मालिक श्री रणछोड़लाल अमृतलाल अपने ५ अप्रैल पत्र में लिखते हैं:
यह दुःखकी बात है। परन्तु मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे लोगोंका त्याग बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे मिल मालिकोंके हृदय पिघलेंगे। मैं तो खूब जानता हूँ कि खादीआन्दोलनसे देशी मिलोंको लाभ ही पहुँचा है। लेकिन यदि वे पेड़के मीठे फल खानेके बजाय उसकी जड़ खाने दौड़ेंगे तो मूल तो खा ही नहीं सकेंगे, फल भी हाथ नहीं लगेंगे। एक छोटा-सा उदाहरण लेता हूँ। मान लीजिए कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार सफल हो गया, और मान लीजिए कि खादीके नामपर नकली खादीका चलन हो गया और मान लीजिए कि उससे असली खादी अपना सिर ऊपर ही न उठा सकी। तो इसका उक्त दो बातोंमें से एक ही परिणाम यह होगा कि नकली खादी और देशी मिलोंमें बना दूसरा कपड़ा तो पूरा पड़ नहीं सकेगा और यदि इस बीच लोगों में खादीके प्रति रुचि पैदा न हुई तो वे विदेशी कपड़े के लिए चिल्लपों मचायेंगे; फलस्वरूप हमारी हालत पहलेसे भी ज्यादा खराब हो जायेगी और इस तूफानमें देशी मिलें भी संकटमे पड़ जायेंगी। अहिंसाकी जंजीर टूट जायेगी और गुस्सेमें भरी हुई जनता देशी मिलोंका ही बहिष्कार करने को तैयार हो जायेगी। अथवा यो समझिये कि आपने लंकाशायरका माल नहीं मँगाया और खादी-रूपी ढाल भी नहीं रही तो लंकाशायरके पूँजीपति अपनी
मिलें इस देश में कायम करेंगे और विदेशी पूँजी तथा विदेशी बुद्धि हमारे यहाँ पैर
जमा लेगी। इससे देशी मिलोंपर दबाव पड़ेगा और फलतः वे भी देशमें स्थापित विदेशी मिलोंके साथ मिलकर लोगोंको चूसना अपना कर्त्तव्य समझने लगेंगी। यद्यपि आज इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि खादीकी भावनाने गांवोंमें जड़ जमा ली है, तथापि खादीने अपना इतना प्रभाव तो जमा ही लिया है कि आज उसके लिए बहुतेरे सुशिक्षित मनुष्य प्राणतक देने को तैयार हैं। वे अपने जीते जी तो सादीको नहीं मरने देंगे। अतः यदि मिल मालिकोंने खादीके नामसे मिलका कपड़ा बनाना
<smaller>१. पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। पत्र लेखकने। शिकायत की थी कि मिलने बड़े पैमाने पर नकली खादी बनाना शुरू कर दिया है। उन्होंने नकली खाइके नमूने भी भेजे थे जिसपर एक मिलने 'स्वदेशी खादी' और दूसरीने 'शुद्ध स्वदेशी खादी' की मुहर लगाई थी।<smaller><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन कमजोरी और स्वतन्त्रताकी आपसमें कभी बनी नहीं है। जहाँ-जहाँ कमजोरी है, जहाँ जहाँ स्वार्थ है, वहां-वहां उनकी जड़ें खोखली हो जायें तो आज ही स्वराज्य है और हम जेलके दरवाजे खोलकर सत्याग्रहियोंको बाहर निकालकर ला सकेंगे।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४१. मिल-मालिक और खादी'''}}}}
अहमदाबादके एक मिल मालिक श्री रणछोड़लाल अमृतलाल अपने ५ अप्रैल पत्र में लिखते हैं:
यह दुःखकी बात है। परन्तु मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे लोगोंका त्याग बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे मिल मालिकोंके हृदय पिघलेंगे। मैं तो खूब जानता हूँ कि खादीआन्दोलनसे देशी मिलोंको लाभ ही पहुँचा है। लेकिन यदि वे पेड़के मीठे फल खानेके बजाय उसकी जड़ खाने दौड़ेंगे तो मूल तो खा ही नहीं सकेंगे, फल भी हाथ नहीं लगेंगे। एक छोटा-सा उदाहरण लेता हूँ। मान लीजिए कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार सफल हो गया, और मान लीजिए कि खादीके नामपर नकली खादीका चलन हो गया और मान लीजिए कि उससे असली खादी अपना सिर ऊपर ही न उठा सकी। तो इसका उक्त दो बातोंमें से एक ही परिणाम यह होगा कि नकली खादी और देशी मिलोंमें बना दूसरा कपड़ा तो पूरा पड़ नहीं सकेगा और यदि इस बीच लोगों में खादीके प्रति रुचि पैदा न हुई तो वे विदेशी कपड़े के लिए चिल्लपों मचायेंगे; फलस्वरूप हमारी हालत पहलेसे भी ज्यादा खराब हो जायेगी और इस तूफानमें देशी मिलें भी संकटमे पड़ जायेंगी। अहिंसाकी जंजीर टूट जायेगी और गुस्सेमें भरी हुई जनता देशी मिलोंका ही बहिष्कार करने को तैयार हो जायेगी। अथवा यो समझिये कि आपने लंकाशायरका माल नहीं मँगाया और खादी-रूपी ढाल भी नहीं रही तो लंकाशायरके पूँजीपति अपनी
मिलें इस देश में कायम करेंगे और विदेशी पूँजी तथा विदेशी बुद्धि हमारे यहाँ पैर
जमा लेगी। इससे देशी मिलोंपर दबाव पड़ेगा और फलतः वे भी देशमें स्थापित विदेशी मिलोंके साथ मिलकर लोगोंको चूसना अपना कर्त्तव्य समझने लगेंगी। यद्यपि आज इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि खादीकी भावनाने गांवोंमें जड़ जमा ली है, तथापि खादीने अपना इतना प्रभाव तो जमा ही लिया है कि आज उसके लिए बहुतेरे सुशिक्षित मनुष्य प्राणतक देने को तैयार हैं। वे अपने जीते जी तो सादीको नहीं मरने देंगे। अतः यदि मिल मालिकोंने खादीके नामसे मिलका कपड़ा बनाना
<small>१. पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। पत्र लेखकने। शिकायत की थी कि मिलने बड़े पैमाने पर नकली खादी बनाना शुरू कर दिया है। उन्होंने नकली खाइके नमूने भी भेजे थे जिसपर एक मिलने 'स्वदेशी खादी' और दूसरीने 'शुद्ध स्वदेशी खादी' की मुहर लगाई थी।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन कमजोरी और स्वतन्त्रताकी आपसमें कभी बनी नहीं है। जहाँ-जहाँ कमजोरी है, जहाँ जहाँ स्वार्थ है, वहां-वहां उनकी जड़ें खोखली हो जायें तो आज ही स्वराज्य है और हम जेलके दरवाजे खोलकर सत्याग्रहियोंको बाहर निकालकर ला सकेंगे।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४१. मिल-मालिक और खादी'''}}}}
अहमदाबादके एक मिल मालिक श्री रणछोड़लाल अमृतलाल अपने ५ अप्रैल पत्र में लिखते हैं:
यह दुःखकी बात है। परन्तु मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे लोगोंका त्याग बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे मिल मालिकोंके हृदय पिघलेंगे। मैं तो खूब जानता हूँ कि खादीआन्दोलनसे देशी मिलोंको लाभ ही पहुँचा है। लेकिन यदि वे पेड़के मीठे फल खानेके बजाय उसकी जड़ खाने दौड़ेंगे तो मूल तो खा ही नहीं सकेंगे, फल भी हाथ नहीं लगेंगे। एक छोटा-सा उदाहरण लेता हूँ। मान लीजिए कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार सफल हो गया, और मान लीजिए कि खादीके नामपर नकली खादीका चलन हो गया और मान लीजिए कि उससे असली खादी अपना सिर ऊपर ही न उठा सकी। तो इसका उक्त दो बातोंमें से एक ही परिणाम यह होगा कि नकली खादी और देशी मिलोंमें बना दूसरा कपड़ा तो पूरा पड़ नहीं सकेगा और यदि इस बीच लोगों में खादीके प्रति रुचि पैदा न हुई तो वे विदेशी कपड़े के लिए चिल्लपों मचायेंगे; फलस्वरूप हमारी हालत पहलेसे भी ज्यादा खराब हो जायेगी और इस तूफानमें देशी मिलें भी संकटमे पड़ जायेंगी। अहिंसाकी जंजीर टूट जायेगी और गुस्सेमें भरी हुई जनता देशी मिलोंका ही बहिष्कार करने को तैयार हो जायेगी। अथवा यो समझिये कि आपने लंकाशायरका माल नहीं मँगाया और खादी-रूपी ढाल भी नहीं रही तो लंकाशायरके पूँजीपति अपनी
मिलें इस देश में कायम करेंगे और विदेशी पूँजी तथा विदेशी बुद्धि हमारे यहाँ पैर
जमा लेगी। इससे देशी मिलोंपर दबाव पड़ेगा और फलतः वे भी देशमें स्थापित विदेशी मिलोंके साथ मिलकर लोगोंको चूसना अपना कर्त्तव्य समझने लगेंगी। यद्यपि आज इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि खादीकी भावनाने गांवोंमें जड़ जमा ली है, तथापि खादीने अपना इतना प्रभाव तो जमा ही लिया है कि आज उसके लिए बहुतेरे सुशिक्षित मनुष्य प्राणतक देने को तैयार हैं। वे अपने जीते जी तो सादीको नहीं मरने देंगे। अतः यदि मिल मालिकोंने खादीके नामसे मिलका कपड़ा बनाना
<small>१. पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। पत्र लेखकने। शिकायत की थी कि मिलने बड़े पैमाने पर नकली खादी बनाना शुरू कर दिया है। उन्होंने नकली खाइके नमूने भी भेजे थे जिसपर एक मिलने 'स्वदेशी खादी' और दूसरीने 'शुद्ध स्वदेशी खादी' की मुहर लगाई थी।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>लेकिन कमजोरी और स्वतन्त्रताकी आपसमें कभी बनी नहीं है। जहाँ-जहाँ कमजोरी है, जहाँ जहाँ स्वार्थ है, वहां-वहां उनकी जड़ें खोखली हो जायें तो आज ही स्वराज्य है और हम जेलके दरवाजे खोलकर सत्याग्रहियोंको बाहर निकालकर ला सकेंगे।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४१. मिल-मालिक और खादी'''}}}}
अहमदाबादके एक मिल मालिक श्री रणछोड़लाल अमृतलाल अपने ५ अप्रैल पत्र में लिखते हैं:
यह दुःखकी बात है। परन्तु मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे लोगोंका त्याग बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे मिल मालिकोंके हृदय पिघलेंगे। मैं तो खूब जानता हूँ कि खादीआन्दोलनसे देशी मिलोंको लाभ ही पहुँचा है। लेकिन यदि वे पेड़के मीठे फल खानेके बजाय उसकी जड़ खाने दौड़ेंगे तो मूल तो खा ही नहीं सकेंगे, फल भी हाथ नहीं लगेंगे। एक छोटा-सा उदाहरण लेता हूँ। मान लीजिए कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार सफल हो गया, और मान लीजिए कि खादीके नामपर नकली खादीका चलन हो गया और मान लीजिए कि उससे असली खादी अपना सिर ऊपर ही न उठा सकी। तो इसका उक्त दो बातोंमें से एक ही परिणाम यह होगा कि नकली खादी और देशी मिलोंमें बना दूसरा कपड़ा तो पूरा पड़ नहीं सकेगा और यदि इस बीच लोगों में खादीके प्रति रुचि पैदा न हुई तो वे विदेशी कपड़े के लिए चिल्लपों मचायेंगे; फलस्वरूप हमारी हालत पहलेसे भी ज्यादा खराब हो जायेगी और इस तूफानमें देशी मिलें भी संकटमे पड़ जायेंगी। अहिंसाकी जंजीर टूट जायेगी और गुस्सेमें भरी हुई जनता देशी मिलोंका ही बहिष्कार करने को तैयार हो जायेगी। अथवा यो समझिये कि आपने लंकाशायरका माल नहीं मँगाया और खादी-रूपी ढाल भी नहीं रही तो लंकाशायरके पूँजीपति अपनी
मिलें इस देश में कायम करेंगे और विदेशी पूँजी तथा विदेशी बुद्धि हमारे यहाँ पैर
जमा लेगी। इससे देशी मिलोंपर दबाव पड़ेगा और फलतः वे भी देशमें स्थापित विदेशी मिलोंके साथ मिलकर लोगोंको चूसना अपना कर्त्तव्य समझने लगेंगी। यद्यपि आज इस बात का दावा नहीं किया जा सकता कि खादीकी भावनाने गांवोंमें जड़ जमा ली है, तथापि खादीने अपना इतना प्रभाव तो जमा ही लिया है कि आज उसके लिए बहुतेरे सुशिक्षित मनुष्य प्राणतक देने को तैयार हैं। वे अपने जीते जी तो खादीको नहीं मरने देंगे। अतः यदि मिल मालिकोंने खादीके नामसे मिलका कपड़ा बनाना
<small>१. पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। पत्र लेखकने शिकायत की थी कि मिलोने बड़े पैमाने पर नकली खादी बनाना शुरू कर दिया है। उन्होंने नकली खादीके नमूने भी भेजे थे जिसपर एक मिलने 'स्वदेशी खादी' और दूसरीने 'शुद्ध स्वदेशी खादी' की मुहर लगाई थी।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंसे|२५७}}</noinclude>और बेचना बन्द नहीं किया तो उनके विरोध में भी प्रचण्ड आन्दोलन उठ खड़ा होनेकी
पूरी सम्भावना है, और इस तरहका आन्दोलन करना धर्म ही हो जायेगा।
ऐसे आन्दोलनसे उन्हें बचना चाहिए और बचना उनके ही हाथमें है। शर्तें ये हैं
१. देशी मिलें खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा न बनायें।
२. जितना बना लिया हो उसे बाहर भेज दें।
३. उसे खादी बतानेवाली छाप तो निकाल ही डालें।
४. खादीसे स्पर्धा करनेवाला अन्य कपड़ा बनाना भी छोड़ दें।
५. चला साथ मिलकर यही कपड़ा बनाना तय करें जो खादीमें नहीं
बन सकता।
६. खादी समिति के साथ विचार करके मिलके कपड़ोंका उचित दाम ही रखें।
७. मिलोंमें किनारके लिए भी विदेशी सूतका उपयोग न किया जाये।
८. मिल मालिक वगैरा विदेशी कपड़ोंका सर्वथा त्याग कर दें और यथासम्भव खादी ही पहने
मिलोंसे सम्बन्ध रखनेवाली दुकानोंमें खादीका संग्रह करें। इस शुद्धि के समय इस बातकी बड़ी आवश्यकता है कि मिलें उक्त नियमोंका पालन करें। यदि वे ऐसा करेंगी तो उससे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार थोड़े ही समयमें सफल हो सकेगा।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४२. बहनोंसे'''}}}}
पिछले सप्ताह मद्यपान निषेधके बारेमें लिखते हुए मैंने कहा था कि एक दूसरा काम भी है, जिसे बहनें अपना सकती हैं और जिसे अपनाना बहनोंका कर्तव्य है;और यह काम है खादीकी सहायतासे विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार। यह बहनोंका खास अपना क्षेत्र है अथवा होना चाहिए। क्योंकि विलायती कपड़ोंने करोड़ों घरोंको बरबाद किया है और करोड़ों बहनोंका सहायक धन्धा छीन लिया है, उन्हें बेकार बना दिया है। विदेशी कपड़ोंने हिन्दुस्तान के सात लाख गांवोंको बरबाद कर दिया है। एक ओर तो बोका धा छिन गया और दूसरी ओर जो वस्त्र वे अपने गांवों में बनवा लिया करती थीं, उनके अब पैसे देने पड़ते हैं। लोग विदेशी वस्त्रोंके बहुत शौकीन हो गये हैं। अतएव अब बड़े प्रयत्न या भारी तपश्चर्या के बिना वे उन्हें नहीं छोड़ सकते। बहनें तपश्चर्याकी मूर्ति हैं वे लोगोंपर जैसा असर डाल सकती हैं, वैसा पुरुष कभी नहीं डाल सकते।
इसके सिवा विदेशी वस्त्र पहननेवालोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या ज्यादा
है और आखिरकार बहनोंपर तो बहनोंका ही प्रभाव पड़ेगा।
इसलिए उन्हें ही विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना देना है। पुरुष तो इस
ere are fसद्ध हो चुके हैं। कोई कारण नहीं कि बहनें इस कार्य में असफल
४३-१७<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंसे|२५७}}</noinclude>और बेचना बन्द नहीं किया तो उनके विरोध में भी प्रचण्ड आन्दोलन उठ खड़ा होनेकी
पूरी सम्भावना है, और इस तरहका आन्दोलन करना धर्म ही हो जायेगा।
ऐसे आन्दोलनसे उन्हें बचना चाहिए और बचना उनके ही हाथमें है। शर्तें ये हैं
१. देशी मिलें खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा न बनायें।
२. जितना बना लिया हो उसे बाहर भेज दें।
३. उसे खादी बतानेवाली छाप तो निकाल ही डालें।
४. खादीसे स्पर्धा करनेवाला अन्य कपड़ा बनाना भी छोड़ दें।
५. चला साथ मिलकर यही कपड़ा बनाना तय करें जो खादीमें नहीं
बन सकता।
६. खादी समिति के साथ विचार करके मिलके कपड़ोंका उचित दाम ही रखें।
७. मिलोंमें किनारके लिए भी विदेशी सूतका उपयोग न किया जाये।
८. मिल मालिक वगैरा विदेशी कपड़ोंका सर्वथा त्याग कर दें और यथासम्भव खादी ही पहने
मिलोंसे सम्बन्ध रखनेवाली दुकानोंमें खादीका संग्रह करें। इस शुद्धि के समय इस बातकी बड़ी आवश्यकता है कि मिलें उक्त नियमोंका पालन करें। यदि वे ऐसा करेंगी तो उससे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार थोड़े ही समयमें सफल हो सकेगा।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४२. बहनोंसे'''}}}}
पिछले सप्ताह मद्यपान निषेधके बारेमें लिखते हुए मैंने कहा था कि एक दूसरा काम भी है, जिसे बहनें अपना सकती हैं और जिसे अपनाना बहनोंका कर्तव्य है;और यह काम है खादीकी सहायतासे विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार। यह बहनोंका खास अपना क्षेत्र है अथवा होना चाहिए। क्योंकि विलायती कपड़ोंने करोड़ों घरोंको बरबाद किया है और करोड़ों बहनोंका सहायक धन्धा छीन लिया है, उन्हें बेकार बना दिया है। विदेशी कपड़ोंने हिन्दुस्तान के सात लाख गांवोंको बरबाद कर दिया है। एक ओर तो बोका धा छिन गया और दूसरी ओर जो वस्त्र वे अपने गांवों में बनवा लिया करती थीं, उनके अब पैसे देने पड़ते हैं। लोग विदेशी वस्त्रोंके बहुत शौकीन हो गये हैं। अतएव अब बड़े प्रयत्न या भारी तपश्चर्या के बिना वे उन्हें नहीं छोड़ सकते। बहनें तपश्चर्याकी मूर्ति हैं वे लोगोंपर जैसा असर डाल सकती हैं, वैसा पुरुष कभी नहीं डाल सकते।
इसके सिवा विदेशी वस्त्र पहननेवालोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या ज्यादा
है और आखिरकार बहनोंपर तो बहनोंका ही प्रभाव पड़ेगा।
इसलिए उन्हें ही विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना देना है। पुरुष तो इस
ere are fसद्ध हो चुके हैं। कोई कारण नहीं कि बहनें इस कार्य में असफल
४३-१७<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||बहनोंसे|२५७}}</noinclude>और बेचना बन्द नहीं किया तो उनके विरोध में भी प्रचण्ड आन्दोलन उठ खड़ा होनेकी
पूरी सम्भावना है, और इस तरहका आन्दोलन करना धर्म ही हो जायेगा।
ऐसे आन्दोलनसे उन्हें बचना चाहिए और बचना उनके ही हाथमें है। शर्तें ये हैं
१. देशी मिलें खादीसे मिलता-जुलता कपड़ा न बनायें।
२. जितना बना लिया हो उसे बाहर भेज दें।
३. उसे खादी बतानेवाली छाप तो निकाल ही डालें।
४. खादीसे स्पर्धा करनेवाला अन्य कपड़ा बनाना भी छोड़ दें।
५. चरखासंघ के साथ मिलकर वही कपड़ा बनाना तय करें जो खादीमें नहीं
बन सकता।
६. खादी समिति के साथ विचार करके मिलके कपड़ोंका उचित दाम ही रखें।
७. मिलोंमें किनारके लिए भी विदेशी सूतका उपयोग न किया जाये।
८. मिल मालिक वगैरा विदेशी कपड़ोंका सर्वथा त्याग कर दें और यथासम्भव खादी ही पहने
मिलोंसे सम्बन्ध रखनेवाली दुकानोंमें खादीका संग्रह करें। इस शुद्धि के समय इस बातकी बड़ी आवश्यकता है कि मिलें उक्त नियमोंका पालन करें। यदि वे ऐसा करेंगी तो उससे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार थोड़े ही समयमें सफल हो सकेगा।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन''', १३-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४२. बहनोंसे'''}}}}
पिछले सप्ताह मद्यपान निषेधके बारेमें लिखते हुए मैंने कहा था कि एक दूसरा काम भी है, जिसे बहनें अपना सकती हैं और जिसे अपनाना बहनोंका कर्तव्य है;और यह काम है खादीकी सहायतासे विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार। यह बहनोंका खास अपना क्षेत्र है अथवा होना चाहिए। क्योंकि विलायती कपड़ोंने करोड़ों घरोंको बरबाद किया है और करोड़ों बहनोंका सहायक धन्धा छीन लिया है, उन्हें बेकार बना दिया है। विदेशी कपड़ोंने हिन्दुस्तान के सात लाख गांवोंको बरबाद कर दिया है। एक ओर तो बहनों का धंधा छिन गया और दूसरी ओर जो वस्त्र वे अपने गांवों में बनवा लिया करती थीं, उनके अब पैसे देने पड़ते हैं। लोग विदेशी वस्त्रोंके बहुत शौकीन हो गये हैं। अतएव अब बड़े प्रयत्न या भारी तपश्चर्या के बिना वे उन्हें नहीं छोड़ सकते। बहनें तपश्चर्याकी मूर्ति हैं वे लोगोंपर जैसा असर डाल सकती हैं, वैसा पुरुष कभी नहीं डाल सकते।
इसके सिवा विदेशी वस्त्र पहननेवालोंमें पुरुषोंकी अपेक्षा बहनोंकी संख्या ज्यादा है और आखिरकार बहनोंपर तो बहनोंका ही प्रभाव पड़ेगा।
इसलिए उन्हें ही विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंपर धरना देना है। पुरुष तो इस काम में असफल सिद्ध हो चुके हैं। कोई कारण नहीं कि बहनें इस कार्य में असफल
४३-१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०२
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हों। इसके अलावा आज जो वातावरण है, वह १९२०-२१में नहीं था। इस वातावरणसे बहनें ही लाभ उठा सकती हैं।
लेकिन इस कामका एक दूसरा पहलू भी है। मान लें कि आज सब लोग अपन विदेशी वस्त्रोंको जला डालते हैं, तो वे फिर पहनेंगे क्या? देशी मिलें सारे आवश्यक कपड़ेका उत्पादन नहीं कर सकतीं। और कदाचित् कर भी लें तो हम जिस उद्देश्यसे काम करना चाहते हैं, वह तो कभी सफल नहीं होगा।
इस उद्देश्यकी पूर्ति तो खादीसे ही हो सकती है। खादीका अर्थ तकली अथवा चरखा है। चरखेसे ही गांवोंकी बरकत है, वही अन्नपूर्णा है। यदि घर-घर चरख चले तो हम आज ही जितनी चाहिए उतनी खादी तैयार कर सकते हैं। खादी तैयार करने का मतलब है सूत कातना । आज भले ही पुरुष सूत कातते हों, तथापि सूत कातनेका धन्धा तो परम्परासे स्त्रियोंने ही किया है और इस सम्बन्धमें उनके हाथमें जो कौशल है, वह पुरुषके हाथमें नहीं है। स्त्रियोंमें इसका संगठन स्त्रियाँ ही भली-भाँति कर सकती हैं। अतएव बहनोंको में यह सलाह देता हूँ कि इसे वे अपना विशेष क्षेत्र बना लें।
पच्चीस दिनकी इस यात्रामें मैंने तकलीकी महान् शक्तिके दर्शन किये हैं। मैं देखता हूँ कि कुल मिलाकर तकली चरखेसे भी ज्यादा काम दे सकती है। क्योंक उसका उपयोग जहाँ चाहें, किया जा सकता है।
इस अहिंसात्मक युद्धमें हमारे हथियार बहुत छोटे होते हैं, परन्तु उनकी शक्ति बहुत अधिक होती है। क्योंकि उनमें ईश्वरीय बल है।
अतएव जिन बहनोंको तकली तथा चरखेमें विश्वास हो और जो बहनें हर साल ६० करोड़ रुपये बचाने के प्रयत्नमें आत्मत्याग करना चाहती हों, वे इस बहिष्कार कामको अपना लें तथा कताईका प्रचार करें।
यह याद रहे कि इस काम में हाथ बँटानेवाली बहनोंको गांवोंमें जानेके लिए
तैयार रहना होगा।
जिन बहनोंको इन दोनों कामोंमें विश्वास न हो, पर किसी एकमें हो, वे एक ही काम करें। मैंने उपर्युक्त दो प्रवृत्तियाँ सुझाई हैं, जिनके द्वारा लाखों बहनें अपना विकास कर सकती हैं, और स्वराज्य-यज्ञमें पूरी तरह हाथ बँटा सकती हैं।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' १२-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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लेकिन इस कामका एक दूसरा पहलू भी है। मान लें कि आज सब लोग अपने विदेशी वस्त्रोंको जला डालते हैं, तो वे फिर पहनेंगे क्या? देशी मिलें सारे आवश्यक कपड़ेका उत्पादन नहीं कर सकतीं। और कदाचित् कर भी लें तो हम जिस उद्देश्यसे काम करना चाहते हैं, वह तो कभी सफल नहीं होगा।
इस उद्देश्यकी पूर्ति तो खादीसे ही हो सकती है। खादीका अर्थ तकली अथवा चरखा है। चरखेसे ही गांवोंकी बरकत है, वही अन्नपूर्णा है। यदि घर-घर चरख चले तो हम आज ही जितनी चाहिए उतनी खादी तैयार कर सकते हैं। खादी तैयार करने का मतलब है सूत कातना । आज भले ही पुरुष सूत कातते हों, तथापि सूत कातनेका धन्धा तो परम्परासे स्त्रियोंने ही किया है और इस सम्बन्धमें उनके हाथमें जो कौशल है, वह पुरुषके हाथमें नहीं है। स्त्रियोंमें इसका संगठन स्त्रियाँ ही भली-भाँति कर सकती हैं। अतएव बहनोंको मैं यह सलाह देता हूँ कि इसे वे अपना विशेष क्षेत्र बना लें।
पच्चीस दिनकी इस यात्रामें मैंने तकलीकी महान् शक्तिके दर्शन किये हैं। मैं देखता हूँ कि कुल मिलाकर तकली चरखेसे भी ज्यादा काम दे सकती है। क्योंकि उसका उपयोग जहाँ चाहें, किया जा सकता है।
इस अहिंसात्मक युद्धमें हमारे हथियार बहुत छोटे होते हैं, परन्तु उनकी शक्ति बहुत अधिक होती है। क्योंकि उनमें ईश्वरीय बल है।
अतएव जिन बहनोंको तकली तथा चरखेमें विश्वास हो और जो बहनें हर साल ६० करोड़ रुपये बचाने के प्रयत्नमें आत्मत्याग करना चाहती हों, वे इस बहिष्कार कामको अपना लें तथा कताईका प्रचार करें।
यह याद रहे कि इस काम में हाथ बँटानेवाली बहनोंको गांवोंमें जानेके लिए तैयार रहना होगा।
जिन बहनोंको इन दोनों कामोंमें विश्वास न हो, पर किसी एकमें हो, वे एक ही काम करें। मैंने उपर्युक्त दो प्रवृत्तियाँ सुझाई हैं, जिनके द्वारा लाखों बहनें अपना विकास कर सकती हैं, और स्वराज्य-यज्ञमें पूरी तरह हाथ बँटा सकती हैं।
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' १२-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२४३. सन्देश : 'हिन्दू' के लिए'''}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज देशने अधिकतम बलिदानके लिए सभीका आह्वान किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि दक्षिण भारतके लोग उसके प्रति पर्याप्त उत्साह दिखायेंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि वहाँके लोग केवल नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञामें ही शरीक नहीं होंगे, बल्कि वे मद्य-निषेध तथा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके कार्योंमें भी यथेष्ट उत्साह दिखायेंगे।
विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा खादी कार्यको प्रोत्साहन देनेके लिए जितनी तैयारी दक्षिण भारत में है, उससे अधिक तैयारी शायद भारतके अन्य किसी हिस्से में नहीं है। दक्षिण भारतमें समुद्र तट सभी स्थानोंसे निकट पड़ता है। इसलिए नमकके सम्बन्धमें सविनय अवज्ञा करना तो बाँके लोगोंके लिए बहुत आसान होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १५-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४४. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। इस समय जो कुछ एक बहुने यहाँ आई है मैं उनसे बातचीत कर रहा हूँ। परिषद् तो साढ़े तीन बजे ही होगी। परिषद्को बैठक यहीं बुलाई गई है, कारण यह है कि विलेपार्लेसे जानकीवहन और अन्य अनेक बहनें आई हैं।
बड़ौदासे श्रीमती तैयबजी भी आई हैं।
१६ तारीखको सुविधासे आना। १५ तारीखको आनेकी कोई जरूरत नहीं। तुमने जो सूची मुझे दी है उसमें इस समय कोई वृद्धि करनेकी बात तो मुझे नहीं सूझ रही है। वृद्धि करने लायक कोई बात हुई तो मैं तुम्हें लिखूंगा। बा से कह देना कि उसे जलालपुर में शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम करना होगा। इसलिए बा तो तैयार होकर ही आयेगी, और चूंकि बिना कोई शोरगुल किये मीठूबहन धरना देनेका काम कलसे शुरू कर देगी इसलिए वह वापस तो नहीं ही जा पायेगी। आरम्भमें शराबकी तीन दुकानोंपर धरना देनेका विचार है, उनमें से एक पर तो कल ही धरना दिया जायेगा। दूसरे ओलपाडमें और तीसरे जलालपुर में धरना दिया जायेगा। मीठूबहनकी मदद और उसे सलाह-मशविरा देने के लिए कानजीभाई<noinclude></noinclude>
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{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज देशने अधिकतम बलिदानके लिए सभीका आह्वान किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि दक्षिण भारतके लोग उसके प्रति पर्याप्त उत्साह दिखायेंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि वहाँके लोग केवल नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञामें ही शरीक नहीं होंगे, बल्कि वे मद्य-निषेध तथा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके कार्योंमें भी यथेष्ट उत्साह दिखायेंगे।
विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा खादी कार्यको प्रोत्साहन देनेके लिए जितनी तैयारी दक्षिण भारत में है, उससे अधिक तैयारी शायद भारतके अन्य किसी हिस्से में नहीं है। दक्षिण भारतमें समुद्र तट सभी स्थानोंसे निकट पड़ता है। इसलिए नमकके सम्बन्धमें सविनय अवज्ञा करना तो बाँके लोगोंके लिए बहुत आसान होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १५-४-१९३०
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चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। इस समय जो कुछ एक बहुने यहाँ आई है मैं उनसे बातचीत कर रहा हूँ। परिषद् तो साढ़े तीन बजे ही होगी। परिषद्को बैठक यहीं बुलाई गई है, कारण यह है कि विलेपार्लेसे जानकीवहन और अन्य अनेक बहनें आई हैं।
बड़ौदासे श्रीमती तैयबजी भी आई हैं।
१६ तारीखको सुविधासे आना। १५ तारीखको आनेकी कोई जरूरत नहीं। तुमने जो सूची मुझे दी है उसमें इस समय कोई वृद्धि करनेकी बात तो मुझे नहीं सूझ रही है। वृद्धि करने लायक कोई बात हुई तो मैं तुम्हें लिखूंगा। बा से कह देना कि उसे जलालपुर में शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम करना होगा। इसलिए बा तो तैयार होकर ही आयेगी, और चूंकि बिना कोई शोरगुल किये मीठूबहन धरना देनेका काम कलसे शुरू कर देगी इसलिए वह वापस तो नहीं ही जा पायेगी। आरम्भमें शराबकी तीन दुकानोंपर धरना देनेका विचार है, उनमें से एक पर तो कल ही धरना दिया जायेगा। दूसरे ओलपाडमें और तीसरे जलालपुर में धरना दिया जायेगा। मीठूबहनकी मदद और उसे सलाह-मशविरा देने के लिए कानजीभाई<noinclude></noinclude>
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आज देशने अधिकतम बलिदानके लिए सभीका आह्वान किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि दक्षिण भारतके लोग उसके प्रति पर्याप्त उत्साह दिखायेंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि वहाँके लोग केवल नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञामें ही शरीक नहीं होंगे, बल्कि वे मद्य-निषेध तथा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके कार्योंमें भी यथेष्ट उत्साह दिखायेंगे।
विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा खादी कार्यको प्रोत्साहन देनेके लिए जितनी तैयारी दक्षिण भारत में है, उससे अधिक तैयारी शायद भारतके अन्य किसी हिस्से में नहीं है। दक्षिण भारतमें समुद्र तट सभी स्थानोंसे निकट पड़ता है। इसलिए नमकके सम्बन्धमें सविनय अवज्ञा करना तो बाँके लोगोंके लिए बहुत आसान होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १५-४-१९३०
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चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। इस समय जो कुछ एक बहुने यहाँ आई है मैं उनसे बातचीत कर रहा हूँ। परिषद् तो साढ़े तीन बजे ही होगी। परिषद्को बैठक यहीं बुलाई गई है, कारण यह है कि विलेपार्लेसे जानकीवहन और अन्य अनेक बहनें आई हैं।
बड़ौदासे श्रीमती तैयबजी भी आई हैं।
१६ तारीखको सुविधासे आना। १५ तारीखको आनेकी कोई जरूरत नहीं। तुमने जो सूची मुझे दी है उसमें इस समय कोई वृद्धि करनेकी बात तो मुझे नहीं सूझ रही है। वृद्धि करने लायक कोई बात हुई तो मैं तुम्हें लिखूंगा। बा से कह देना कि उसे जलालपुर में शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम करना होगा। इसलिए बा तो तैयार होकर ही आयेगी, और चूंकि बिना कोई शोरगुल किये मीठूबहन धरना देनेका काम कलसे शुरू कर देगी इसलिए वह वापस तो नहीं ही जा पायेगी। आरम्भमें शराबकी तीन दुकानोंपर धरना देनेका विचार है, उनमें से एक पर तो कल ही धरना दिया जायेगा। दूसरे ओलपाडमें और तीसरे जलालपुर में धरना दिया जायेगा। मीठूबहनकी मदद और उसे सलाह-मशविरा देने के लिए कानजीभाई<noinclude></noinclude>
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आज देशने अधिकतम बलिदानके लिए सभीका आह्वान किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि दक्षिण भारतके लोग उसके प्रति पर्याप्त उत्साह दिखायेंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि वहाँके लोग केवल नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञामें ही शरीक नहीं होंगे, बल्कि वे मद्य-निषेध तथा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके कार्योंमें भी यथेष्ट उत्साह दिखायेंगे।
विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा खादी कार्यको प्रोत्साहन देनेके लिए जितनी तैयारी दक्षिण भारत में है, उससे अधिक तैयारी शायद भारतके अन्य किसी हिस्से में नहीं है। दक्षिण भारतमें समुद्र तट सभी स्थानोंसे निकट पड़ता है। इसलिए नमकके सम्बन्धमें सविनय अवज्ञा करना तो बाँके लोगोंके लिए बहुत आसान होना चाहिए।
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू''', १५-४-१९३०
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{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला। इस समय जो कुछ एक बहनें यहाँ आई है मैं उनसे बातचीत कर रहा हूँ। परिषद् तो साढ़े तीन बजे ही होगी। परिषद्की बैठक यहीं बुलाई गई है, कारण यह है कि विलेपार्लेसे जानकीबहन और अन्य अनेक बहनें आई हैं।
बड़ौदासे श्रीमती तैयबजी भी आई हैं।
१६ तारीखको सुविधासे आना। १५ तारीखको आनेकी कोई जरूरत नहीं। तुमने जो सूची मुझे दी है उसमें इस समय कोई वृद्धि करनेकी बात तो मुझे नहीं सूझ रही है। वृद्धि करने लायक कोई बात हुई तो मैं तुम्हें लिखूंगा। बा से कह देना कि उसे जलालपुर में शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम करना होगा। इसलिए बा तो तैयार होकर ही आयेगी, और चूंकि बिना कोई शोरगुल किये मीठूबहन धरना देनेका काम कलसे शुरू कर देगी इसलिए वह वापस तो नहीं ही जा पायेगी। आरम्भमें शराबकी तीन दुकानोंपर धरना देनेका विचार है, उनमें से एक पर तो कल ही धरना दिया जायेगा। दूसरे ओलपाडमें और तीसरे जलालपुर में धरना दिया जायेगा। मीठूबहनकी मदद और उसे सलाह-मशविरा देने के लिए कानजीभाई<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>२६०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
और डॉ० सुमन्त रहेंगे। ओलपाडमें मुसलमानोंकी आबादी है इसलिए वहाँपर हमीदा
काम करेगी। और फिर कानजीभाईकी लड़की भी तो है। मोतीबहनको वहाँ भेजना
होगा। कदाचित् सूरजवहन वहाँ रहेगी। करसनदास तो आज दोहपरको आयेगा,
इसलिए वह कुछ अधिक समाचार दे सकेगा ।
हर तरहसे विचार करनेपर और शान्तिका ध्यान रखते हुए मुझे तो यही
उचित जान पड़ता है कि १६ तारीखकी बैठक दांडीमें ही की जाये। बहनें [ पहले
मेलसे ]' नास्ता आदि करके आयेंगी, सारा दिन रहेंगी और साँझको वापस अपने-
अपने स्थानोंपर जाकर ही खा-पी सकेंगी। यदि वे यहीं खाना चाहें तो उसका भी
बन्दोवस्त किया जा सकता है। लेकिन यहाँका इन्तजाम तो जैसे-तैसे ही हो सकता
है। इसमें कोई फेरफार करना चाहो तो मुझे बताना। आश्रमसे कौन-कौन आयेंगी,
इस बातका विचार तुम और नारणदास ही कर लेना अथवा बहनें स्वयं ही इसपर
विचार कर लेंगी। खुर्शीद बहन तो नहीं आयेगी, उससे आग्रह भी न करना। जिसे
इस काममें श्रद्धा हो, यहीं इसे कर सकती है।
ऊँटडीसे मोहनलाल पण्डया, नानुभाई तथा ईश्वरलाल ये तीनों पकड़े गये हैं।
अब कल्याणजी आदिकी बारी है और अन्तमें लगता है कि मैं तो दांडीकी सुखद
वायुका आनन्द उठाता रहूँगा और तुम वहां बैठे रहोगे। यह ठीक ही रहेगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (एस० एन० ११४७९ ) की फोटो नकलसे ।
२४५. भाषण: गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें
१३ अप्रैल, १९३०
कुछ काम बहनोंके ही करनेके होते हैं। मद्य निषेध और विदेशी वस्त्रोंका
बहिष्कार ऐसे ही काम हैं जिन्हें आप नहीं करेंगी तो ये होंगे ही नहीं । १९२१ में
ये काम मैंने उनके कारण पुरुषोंसे जबरदस्ती कराये थे किन्तु ऐसा कबतक चल
सकता था? आखिर हारकर मुझे ये काम छोड़ देने पड़े। यदि मैंने ये काम बहनोंको
सौंपे होते तो वे मुझे छोड़ने न पड़ते। किन्तु जब मैं बहुत परेशानी में पड़ गया और
सब तरफसे निराश हो गया तो जैसा उस कच्छप- कच्छपीवाले भजनमें है, प्रभुने
मुझे यह काम वहनोंको सौंपने की बात सुझाई। दुकानोंपर धरना देनेका काम स्त्रियों-
के लिए जोखिमसे भरा हुआ तो है किन्तु स्त्रियाँ तो हमेशासे बहुत ज्यादा जोखिम
उठाती आई हैं। इसीसे यह संसार चलता आ रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों
कामों में अनुनय-विनय और हृदय परिवर्तनकी आवश्यकता है और स्त्रियां ही पुरुषोंकें
हृदयमें प्रवेश करके उक्त परिवर्तन करा सकती हैं। इसके सिवा जो बहनें यहाँ आई
<small>१. साधन में पदस्थ अस्पष्ट है।<small>>><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>और डॉ० सुमन्त रहेंगे। ओलपाडमें मुसलमानोंकी आबादी है इसलिए वहाँपर हमीदा काम करेगी। और फिर कानजीभाईकी लड़की भी तो है। मोतीबहनको वहाँ भेजना
होगा। कदाचित् सूरजवहन वहाँ रहेगी। करसनदास तो आज दोहपरको आयेगा, इसलिए वह कुछ अधिक समाचार दे सकेगा।
हर तरहसे विचार करनेपर और शान्तिका ध्यान रखते हुए मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि १६ तारीखकी बैठक दांडीमें ही की जाये। बहनें [पहले मेलसे]१ नास्ता आदि करके आयेंगी, सारा दिन रहेंगी और साँझको वापस अपने-अपने स्थानोंपर जाकर ही खा-पी सकेंगी। यदि वे यहीं खाना चाहें तो उसका भी बन्दोवस्त किया जा सकता है। लेकिन यहाँका इन्तजाम तो जैसे-तैसे ही हो सकता है। इसमें कोई फेरफार करना चाहो तो मुझे बताना। आश्रमसे कौन-कौन आयेंगी,इस बातका विचार तुम और नारणदास ही कर लेना अथवा बहनें स्वयं ही इसपर विचार कर लेंगी। खुर्शीद बहन तो नहीं आयेगी, उससे आग्रह भी न करना। जिसे इस काममें श्रद्धा हो, यहीं इसे कर सकती है।
ऊँटडीसे मोहनलाल पण्डया, नानुभाई तथा ईश्वरलाल ये तीनों पकड़े गये हैं। अब कल्याणजी आदिकी बारी है और अन्तमें लगता है कि मैं तो दांडीकी सुखद वायुका आनन्द उठाता रहूँगा और तुम वहां बैठे रहोगे। यह ठीक ही रहेगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७९ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|२४५. भाषण: गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
कुछ काम बहनोंके ही करनेके होते हैं। मद्य निषेध और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार ऐसे ही काम हैं जिन्हें आप नहीं करेंगी तो ये होंगे ही नहीं। १९२१ में ये काम मैंने उनके कारण पुरुषोंसे जबरदस्ती कराये थे किन्तु ऐसा कबतक चल सकता था? आखिर हारकर मुझे ये काम छोड़ देने पड़े। यदि मैंने ये काम बहनोंको सौंपे होते तो वे मुझे छोड़ने न पड़ते। किन्तु जब मैं बहुत परेशानी में पड़ गया और सब तरफसे निराश हो गया तो जैसा उस कच्छप- कच्छपीवाले भजनमें है, प्रभुने मुझे यह काम वहनोंको सौंपने की बात सुझाई। दुकानोंपर धरना देनेका काम स्त्रियोंके लिए जोखिमसे भरा हुआ तो है किन्तु स्त्रियाँ तो हमेशासे बहुत ज्यादा जोखिम उठाती आई हैं। इसीसे यह संसार चलता आ रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों कामों में अनुनय-विनय और हृदय परिवर्तनकी आवश्यकता है और स्त्रियां ही पुरुषोंकें हृदयमें प्रवेश करके उक्त परिवर्तन करा सकती हैं। इसके सिवा जो बहनें यहाँ आई
<small>१. साधन में पदस्थ अस्पष्ट है।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>और डॉ० सुमन्त रहेंगे। ओलपाडमें मुसलमानोंकी आबादी है इसलिए वहाँपर हमीदा काम करेगी। और फिर कानजीभाईकी लड़की भी तो है। मोतीबहनको वहाँ भेजना
होगा। कदाचित् सूरजवहन वहाँ रहेगी। करसनदास तो आज दोहपरको आयेगा, इसलिए वह कुछ अधिक समाचार दे सकेगा।
हर तरहसे विचार करनेपर और शान्तिका ध्यान रखते हुए मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि १६ तारीखकी बैठक दांडीमें ही की जाये। बहनें [पहले मेलसे]१ नास्ता आदि करके आयेंगी, सारा दिन रहेंगी और साँझको वापस अपने-अपने स्थानोंपर जाकर ही खा-पी सकेंगी। यदि वे यहीं खाना चाहें तो उसका भी बन्दोवस्त किया जा सकता है। लेकिन यहाँका इन्तजाम तो जैसे-तैसे ही हो सकता है। इसमें कोई फेरफार करना चाहो तो मुझे बताना। आश्रमसे कौन-कौन आयेंगी,इस बातका विचार तुम और नारणदास ही कर लेना अथवा बहनें स्वयं ही इसपर विचार कर लेंगी। खुर्शीद बहन तो नहीं आयेगी, उससे आग्रह भी न करना। जिसे इस काममें श्रद्धा हो, यहीं इसे कर सकती है।
ऊँटडीसे मोहनलाल पण्डया, नानुभाई तथा ईश्वरलाल ये तीनों पकड़े गये हैं। अब कल्याणजी आदिकी बारी है और अन्तमें लगता है कि मैं तो दांडीकी सुखद वायुका आनन्द उठाता रहूँगा और तुम वहां बैठे रहोगे। यह ठीक ही रहेगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७९ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२४५. भाषण: गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
कुछ काम बहनोंके ही करनेके होते हैं। मद्य निषेध और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार ऐसे ही काम हैं जिन्हें आप नहीं करेंगी तो ये होंगे ही नहीं। १९२१ में ये काम मैंने उनके कारण पुरुषोंसे जबरदस्ती कराये थे किन्तु ऐसा कबतक चल सकता था? आखिर हारकर मुझे ये काम छोड़ देने पड़े। यदि मैंने ये काम बहनोंको सौंपे होते तो वे मुझे छोड़ने न पड़ते। किन्तु जब मैं बहुत परेशानी में पड़ गया और सब तरफसे निराश हो गया तो जैसा उस कच्छप- कच्छपीवाले भजनमें है, प्रभुने मुझे यह काम वहनोंको सौंपने की बात सुझाई। दुकानोंपर धरना देनेका काम स्त्रियोंके लिए जोखिमसे भरा हुआ तो है किन्तु स्त्रियाँ तो हमेशासे बहुत ज्यादा जोखिम उठाती आई हैं। इसीसे यह संसार चलता आ रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों कामों में अनुनय-विनय और हृदय परिवर्तनकी आवश्यकता है और स्त्रियां ही पुरुषोंकें हृदयमें प्रवेश करके उक्त परिवर्तन करा सकती हैं। इसके सिवा जो बहनें यहाँ आई
<small>१. साधन में पदस्थ अस्पष्ट है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>और डॉ० सुमन्त रहेंगे। ओलपाडमें मुसलमानोंकी आबादी है इसलिए वहाँपर हमीदा काम करेगी। और फिर कानजीभाईकी लड़की भी तो है। मोतीबहनको वहाँ भेजना
होगा। कदाचित् सूरजवहन वहाँ रहेगी। करसनदास तो आज दोहपरको आयेगा, इसलिए वह कुछ अधिक समाचार दे सकेगा।
हर तरहसे विचार करनेपर और शान्तिका ध्यान रखते हुए मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि १६ तारीखकी बैठक दांडीमें ही की जाये। बहनें [पहले मेलसे]१ नास्ता आदि करके आयेंगी, सारा दिन रहेंगी और साँझको वापस अपने-अपने स्थानोंपर जाकर ही खा-पी सकेंगी। यदि वे यहीं खाना चाहें तो उसका भी बन्दोवस्त किया जा सकता है। लेकिन यहाँका इन्तजाम तो जैसे-तैसे ही हो सकता है। इसमें कोई फेरफार करना चाहो तो मुझे बताना। आश्रमसे कौन-कौन आयेंगी,इस बातका विचार तुम और नारणदास ही कर लेना अथवा बहनें स्वयं ही इसपर विचार कर लेंगी। खुर्शीद बहन तो नहीं आयेगी, उससे आग्रह भी न करना। जिसे इस काममें श्रद्धा हो, यहीं इसे कर सकती है।
ऊँटडीसे मोहनलाल पण्डया, नानुभाई तथा ईश्वरलाल ये तीनों पकड़े गये हैं। अब कल्याणजी आदिकी बारी है और अन्तमें लगता है कि मैं तो दांडीकी सुखद वायुका आनन्द उठाता रहूँगा और तुम वहां बैठे रहोगे। यह ठीक ही रहेगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४७९ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२४५. भाषण: गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
कुछ काम बहनोंके ही करनेके होते हैं। मद्य निषेध और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार ऐसे ही काम हैं जिन्हें आप नहीं करेंगी तो ये होंगे ही नहीं। १९२१ में ये काम मैंने उनके कारण पुरुषोंसे जबरदस्ती कराये थे किन्तु ऐसा कबतक चल सकता था? आखिर हारकर मुझे ये काम छोड़ देने पड़े। यदि मैंने ये काम बहनोंको सौंपे होते तो वे मुझे छोड़ने न पड़ते। किन्तु जब मैं बहुत परेशानी में पड़ गया और सब तरफसे निराश हो गया तो जैसा उस कच्छप- कच्छपीवाले भजनमें है, प्रभुने मुझे यह काम वहनोंको सौंपने की बात सुझाई। दुकानोंपर धरना देनेका काम स्त्रियोंके लिए जोखिमसे भरा हुआ तो है किन्तु स्त्रियाँ तो हमेशासे बहुत ज्यादा जोखिम उठाती आई हैं। इसीसे यह संसार चलता आ रहा है। इसके अतिरिक्त इन दोनों कामों में अनुनय-विनय और हृदय परिवर्तनकी आवश्यकता है और स्त्रियां ही पुरुषोंकें हृदयमें प्रवेश करके उक्त परिवर्तन करा सकती हैं। इसके सिवा जो बहनें यहाँ आई
<small>१. साधन में पदस्थ अस्पष्ट है।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण दांडीमें|२६१}}</noinclude>हैं वे जानती होंगी कि जिनके पति शराब पीते हैं उनके घरकी क्या अवस्था होती है। अपनी बहनोंके घरोंको टूटने से बचाना आपका कर्तव्य है। विदेशी कपड़ेने आपकी पन्द्रह करोड़ बहनोंसे चरखा कातनेका प्रभावशाली धन्धा छीन लिया है और करोड़ों
ग्रामीणोंको बेकार बना दिया है। दस वर्षकी स्वल्प अवधि में खादीकी प्रवृत्तिके कारण
१० लाख रुपये बहनोंके घरोंमें पहुँच चुके हैं किन्तु मुझे तो आपसे करोड़ों रुपयोंका
काम करवाना है। आप यह काम हाथमें लें तो आपको विदेशी वस्त्र फेंक देने चाहिए
• उन्हें जला ही देना चाहिए। आप कहेंगी कि हमारे पास जो विदेशी वस्त्र है
उन्हें हम पहनकर फाड़ डालेंगी या सहेजकर रख लेंगी। शराबी भी यह कहेगा कि
मेरे पास जितनी शराब है उतनी पी लेने दो या यह कि मैं इसे संभालकर रख
लूंगा। जिस वस्तुको हम जहर मानते हैं उसे एक दिनके लिए भी अपने पास कैसे
रख सकते हैं? हमारे बच्चे भूलकर भी यह जहर न खायें इसलिए उसे फेंक ही देना
चाहिए। आप यह मानें कि उतने पैसे आपने पानीमें फेंक दिये थे।
'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४६. भाषण : दांडीमें१'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
<small>१. भाषण में यंग इंडिया १७-४-१९३० के अंक में "पुरुषोंकी भूमिका" शीर्ष करते भी प्रकाशित हुआ था।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण दांडीमें|२६१}}</noinclude>हैं वे जानती होंगी कि जिनके पति शराब पीते हैं उनके घरकी क्या अवस्था होती है। अपनी बहनोंके घरोंको टूटने से बचाना आपका कर्तव्य है। विदेशी कपड़ेने आपकी पन्द्रह करोड़ बहनोंसे चरखा कातनेका प्रभावशाली धन्धा छीन लिया है और करोड़ों ग्रामीणोंको बेकार बना दिया है। दस वर्षकी स्वल्प अवधि में खादीकी प्रवृत्तिके कारण
१० लाख रुपये बहनोंके घरोंमें पहुँच चुके हैं किन्तु मुझे तो आपसे करोड़ों रुपयोंका
काम करवाना है। आप यह काम हाथमें लें तो आपको विदेशी वस्त्र फेंक देने चाहिए. उन्हें जला ही देना चाहिए। आप कहेंगी कि हमारे पास जो विदेशी वस्त्र है उन्हें हम पहनकर फाड़ डालेंगी या सहेजकर रख लेंगी। शराबी भी यह कहेगा कि मेरे पास जितनी शराब है उतनी पी लेने दो या यह कि मैं इसे संभालकर रख लूंगा। जिस वस्तुको हम जहर मानते हैं उसे एक दिनके लिए भी अपने पास कैसे रख सकते हैं? हमारे बच्चे भूलकर भी यह जहर न खायें इसलिए उसे फेंक ही देना चाहिए। आप यह मानें कि उतने पैसे आपने पानीमें फेंक दिये थे।
'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४६. भाषण : दांडीमें१'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
<small>१. भाषण में यंग इंडिया १७-४-१९३० के अंक में "पुरुषोंकी भूमिका" शीर्ष करते भी प्रकाशित हुआ था।<small><noinclude></noinclude>
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'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४६. भाषण : दांडीमें१'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
<small>१. भाषण में यंग इंडिया १७-४-१९३० के अंक में "पुरुषोंकी भूमिका" शीर्ष करते भी प्रकाशित हुआ था।<small><noinclude></noinclude>
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१० लाख रुपये बहनोंके घरोंमें पहुँच चुके हैं किन्तु मुझे तो आपसे करोड़ों रुपयोंका
काम करवाना है। आप यह काम हाथमें लें तो आपको विदेशी वस्त्र फेंक देने चाहिए. उन्हें जला ही देना चाहिए। आप कहेंगी कि हमारे पास जो विदेशी वस्त्र है उन्हें हम पहनकर फाड़ डालेंगी या सहेजकर रख लेंगी। शराबी भी यह कहेगा कि मेरे पास जितनी शराब है उतनी पी लेने दो या यह कि मैं इसे संभालकर रख लूंगा। जिस वस्तुको हम जहर मानते हैं उसे एक दिनके लिए भी अपने पास कैसे रख सकते हैं? हमारे बच्चे भूलकर भी यह जहर न खायें इसलिए उसे फेंक ही देना चाहिए। आप यह मानें कि उतने पैसे आपने पानीमें फेंक दिये थे।
'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४६. भाषण : दांडीमें१'''}}}}
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आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
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'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
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{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
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'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
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आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
<small>१. भाषण में यंग इंडिया १७-४-१९३० के अंक में "पुरुषोंकी भूमिका" शीर्ष करते भी प्रकाशित हुआ था।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण दांडीमें|२६१}}</noinclude>हैं वे जानती होंगी कि जिनके पति शराब पीते हैं उनके घरकी क्या अवस्था होती है। अपनी बहनोंके घरोंको टूटने से बचाना आपका कर्तव्य है। विदेशी कपड़ेने आपकी पन्द्रह करोड़ बहनोंसे चरखा कातनेका प्रभावशाली धन्धा छीन लिया है और करोड़ों ग्रामीणोंको बेकार बना दिया है। दस वर्षकी स्वल्प अवधि में खादीकी प्रवृत्तिके कारण १० लाख रुपये बहनोंके घरोंमें पहुँच चुके हैं किन्तु मुझे तो आपसे करोड़ों रुपयोंका काम करवाना है। आप यह काम हाथमें लें तो आपको विदेशी वस्त्र फेंक देने चाहिए उन्हें जला ही देना चाहिए। आप कहेंगी कि हमारे पास जो विदेशी वस्त्र है उन्हें हम पहनकर फाड़ डालेंगी या सहेजकर रख लेंगी। शराबी भी यह कहेगा कि मेरे पास जितनी शराब है उतनी पी लेने दो या यह कि मैं इसे संभालकर रख लूंगा। जिस वस्तुको हम जहर मानते हैं उसे एक दिनके लिए भी अपने पास कैसे रख सकते हैं? हमारे बच्चे भूलकर भी यह जहर न खायें इसलिए उसे फेंक ही देना चाहिए। आप यह मानें कि उतने पैसे आपने पानीमें फेंक दिये थे।
'''वेजलपरकी एक स्वयंसेविकाके यह पूछनेपर कि यदि धरना देते हुए हमपर हमला हो तो हमें क्या करना चाहिए, गांधीजीने कहा :'''
ऐसा हमला होने की सम्भावना नहीं है। किन्तु यदि हमला हो अथवा सरकारकी पुलिस घोड़े दौड़ाकर आपको तितर-बितर कर दे तो आप उसे शान्तिपूर्वक सहन करें। स्त्रीमें तो अपार सहन-शक्ति होती है। स्त्रियोंपर जिस दिन इस तरहका हमला होगा उस दिनसे आप शराब के ठेके बन्द हुए मानें। आप यह निश्चित मानें कि जिस दिन कोई शराब पीनेवाला आपको मारेगा उसी दिनसे वह सदाके लिए शराब पीना छोड़ देगा।
[गुजरातीसे]
'''प्रजाबन्धु''', २०-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२४६. भाषण : दांडीमें१'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
आज आत्मशुद्धिके सप्ताहका अन्तिम दिन है और आप लोग इतनी बड़ी संख्या में स्वेच्छापूर्वक यहाँ आये हैं, यह बात मुझे अच्छी लगी है और इस समय मेरा आप लोगोंसे दो शब्द न कहना आपको ठीक नहीं लगेगा।
बहनोंकी परिषद् अभी-अभी पूरी हुई है। इस परिषद् में बहनोंसे जो कुछ कहकर आया हूँ उसमें आपका स्थान कहाँ है, यह बता देना आवश्यक है। बहनोंने विदेशी वस्त्रकी दुकानों और विदेशी वस्त्रका उपयोग करनेवालों तथा शराब बेचने और पीनेवालों के खिलाफ धरना देनेका प्रस्ताव पास किया है। इस काम में आप पुरुषोंको बीचमें नहीं पड़ना है। ऐसा मानना है कि यह बहनोंका स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र है।
<small>१. भाषण में यंग इंडिया १७-४-१९३० के अंक में "पुरुषोंकी भूमिका" शीर्ष करते भी प्रकाशित हुआ था।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>इस कार्यकी सफलता पुरुषोंके संयमपर आधारित है। इसके मूलमें यह विचार रहा है कि पुरुष अपना क्रोध शीघ्र ही नहीं रोक पाते, ये अहिंसाका पालन आसानीसे नहीं कर पाते, जबकि स्त्री अहिंसाका पालन आसानीसे कर सकती है। स्त्रीके लिए त्याग और अहिंसा ज्यादा स्वाभाविक है। इस विचारसे प्रेरित होकर मैंने बहनोंके समक्ष यह चीज पेश की है।
यदि मेरा यह विचार गलत निकले तो उस सीमातक मेरी यह योजना भी गलत सिद्ध होगी।
पुरुषोंको तो इसमें इतना ही करना है कि वे बहनोंके प्रयत्नकी सफलताके लिए अनुकूल वातावरण पैदा कर दें। हम पुरुषोंको शराब और विदेशी वस्त्रोंका व्यापार करनेवालों के घर व्यक्तिगत तौर पर जाकर उन्हें यह समझाना चाहिए कि अब तो इस काम के लिए भारतकी स्त्रियाँ निकल पड़ी हैं, अतः उन्हें शराब और विदेशी वस्त्रका व्यापार छोड़ ही देना चाहिए।
इन बहनोंके जत्थोंको देखकर शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंके मालिक चकित हो जायेंगे और अपना व्यापार छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे। मैं जानता हूँ कि व्यापार छोड़ना आसान काम नहीं है। किन्तु जिस समय चारों ओर देशाभिमान और देशभक्तिका वातावरण फैला हुआ हो, उस समय अनायास ही जनताकी त्यागकी शक्ति बढ़ जाती है। मैं देखता हूँ कि इसी सप्ताह में यह शक्ति सौ गुनी अधिक हो गई है किन्तु वह हजार गुनी बढ़नी चाहिए। विदेशी वस्त्रके व्यापारी फिलहाल व्यापार छोड़ना चाहते हुए भी कुछ सोच-विचार में पड़े हुए हैं। वे अभी ऐसी प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि तीन माह या बहुत हुआ तो एक वर्षतक ये अपना यह व्यापार नहीं करेंगे। वे ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि एक वर्षके बाद तो वे फिर विदेशी वस्त्र खरीदना व बेचना शुरू कर सकेंगे। स्वराज्यकी प्राप्तिके लिए जितना प्रयत्न किया जाना चाहिए उतना वे नहीं कर रहे हैं। कारण, उनमें इतनी श्रद्धा नहीं है। किन्तु यह काम ज्यों-ज्यों प्रगति करेगा त्यों-त्यों हम देखेंगे कि शराब और विदेशी कपड़े का यह व्यापार बन्द हुए बिना नहीं रह सकता। जिस समय देशमें लाखों व्यक्तियोंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया हो, उस समय इन अश्रद्धालु व्यापारियों में भी त्याग करनेकी शक्ति आये बिना नहीं रह सकती।
स्त्रियाँ इस कामको हाथमें लें, उसके बाद यदि उसे जारी रखनेके लिए
पैसेकी कमी महसूस हुई तो मैं आपके सामने अपना हाथ फैलाऊँगा, यद्यपि अभी तो
भगवान्की कृपासे जितना चाहिए उससे कहीं ज्यादा पैसा मिल रहा है। आज ही स्त्रियोंकी सभा में लगभग एक हजार रुपया इकट्ठा हो गया और कठोरके गलियारा
परिवारकी एक बहनने बिना मांगे सोनेकी चार चूड़ियाँ दे दीं।
यदि पुरुषवर्ग उदासीन न रहे और स्वेच्छापूर्वक अपने कर्त्तव्यका पालन करने लगे, उदाहरण के लिए, पर्याप्त खादीके अभाव में लंगोटी पहनने की जरूरत होनेपर
लंगोटी पहनने लगे तो बहनोंका काम उस हदतक कुछ हलका हो जायेगा।
कुमारी मेयोने भारतके पुरुषोंपर यह आरोप लगाया है कि अधिकांश लोगों में
स्त्रियोंके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वह कहती है कि हम उनसे मजदूरिनोंकी<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>इस कार्यकी सफलता पुरुषोंके संयमपर आधारित है। इसके मूलमें यह विचार रहा है कि पुरुष अपना क्रोध शीघ्र ही नहीं रोक पाते, ये अहिंसाका पालन आसानीसे नहीं कर पाते, जबकि स्त्री अहिंसाका पालन आसानीसे कर सकती है। स्त्रीके लिए त्याग और अहिंसा ज्यादा स्वाभाविक है। इस विचारसे प्रेरित होकर मैंने बहनोंके समक्ष यह चीज पेश की है।
यदि मेरा यह विचार गलत निकले तो उस सीमातक मेरी यह योजना भी गलत सिद्ध होगी।
पुरुषोंको तो इसमें इतना ही करना है कि वे बहनोंके प्रयत्नकी सफलताके लिए अनुकूल वातावरण पैदा कर दें। हम पुरुषोंको शराब और विदेशी वस्त्रोंका व्यापार करनेवालों के घर व्यक्तिगत तौर पर जाकर उन्हें यह समझाना चाहिए कि अब तो इस काम के लिए भारतकी स्त्रियाँ निकल पड़ी हैं, अतः उन्हें शराब और विदेशी वस्त्रका व्यापार छोड़ ही देना चाहिए।
इन बहनोंके जत्थोंको देखकर शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंके मालिक चकित हो जायेंगे और अपना व्यापार छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे। मैं जानता हूँ कि व्यापार छोड़ना आसान काम नहीं है। किन्तु जिस समय चारों ओर देशाभिमान और देशभक्तिका वातावरण फैला हुआ हो, उस समय अनायास ही जनताकी त्यागकी शक्ति बढ़ जाती है। मैं देखता हूँ कि इसी सप्ताह में यह शक्ति सौ गुनी अधिक हो गई है किन्तु वह हजार गुनी बढ़नी चाहिए। विदेशी वस्त्रके व्यापारी फिलहाल व्यापार छोड़ना चाहते हुए भी कुछ सोच-विचार में पड़े हुए हैं। वे अभी ऐसी प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि तीन माह या बहुत हुआ तो एक वर्षतक ये अपना यह व्यापार नहीं करेंगे। वे ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि एक वर्षके बाद तो वे फिर विदेशी वस्त्र खरीदना व बेचना शुरू कर सकेंगे। स्वराज्यकी प्राप्तिके लिए जितना प्रयत्न किया जाना चाहिए उतना वे नहीं कर रहे हैं। कारण, उनमें इतनी श्रद्धा नहीं है। किन्तु यह काम ज्यों-ज्यों प्रगति करेगा त्यों-त्यों हम देखेंगे कि शराब और विदेशी कपड़े का यह व्यापार बन्द हुए बिना नहीं रह सकता। जिस समय देशमें लाखों व्यक्तियोंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया हो, उस समय इन अश्रद्धालु व्यापारियों में भी त्याग करनेकी शक्ति आये बिना नहीं रह सकती।
स्त्रियाँ इस कामको हाथमें लें, उसके बाद यदि उसे जारी रखनेके लिए पैसेकी कमी महसूस हुई तो मैं आपके सामने अपना हाथ फैलाऊँगा, यद्यपि अभी तो भगवान्की कृपासे जितना चाहिए उससे कहीं ज्यादा पैसा मिल रहा है। आज ही स्त्रियोंकी सभा में लगभग एक हजार रुपया इकट्ठा हो गया और कठोरके गलियारा परिवारकी एक बहनने बिना मांगे सोनेकी चार चूड़ियाँ दे दीं।
यदि पुरुषवर्ग उदासीन न रहे और स्वेच्छापूर्वक अपने कर्त्तव्यका पालन करने लगे, उदाहरण के लिए, पर्याप्त खादीके अभाव में लंगोटी पहनने की जरूरत होनेपर
लंगोटी पहनने लगे तो बहनोंका काम उस हदतक कुछ हलका हो जायेगा।
कुमारी मेयोने भारतके पुरुषोंपर यह आरोप लगाया है कि अधिकांश लोगों में
स्त्रियोंके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वह कहती है कि हम उनसे मजदूरिनोंकी<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>इस कार्यकी सफलता पुरुषोंके संयमपर आधारित है। इसके मूलमें यह विचार रहा है कि पुरुष अपना क्रोध शीघ्र ही नहीं रोक पाते, ये अहिंसाका पालन आसानीसे नहीं कर पाते, जबकि स्त्री अहिंसाका पालन आसानीसे कर सकती है। स्त्रीके लिए त्याग और अहिंसा ज्यादा स्वाभाविक है। इस विचारसे प्रेरित होकर मैंने बहनोंके समक्ष यह चीज पेश की है।
यदि मेरा यह विचार गलत निकले तो उस सीमातक मेरी यह योजना भी गलत सिद्ध होगी।
पुरुषोंको तो इसमें इतना ही करना है कि वे बहनोंके प्रयत्नकी सफलताके लिए अनुकूल वातावरण पैदा कर दें। हम पुरुषोंको शराब और विदेशी वस्त्रोंका व्यापार करनेवालों के घर व्यक्तिगत तौर पर जाकर उन्हें यह समझाना चाहिए कि अब तो इस काम के लिए भारतकी स्त्रियाँ निकल पड़ी हैं, अतः उन्हें शराब और विदेशी वस्त्रका व्यापार छोड़ ही देना चाहिए।
इन बहनोंके जत्थोंको देखकर शराब और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानोंके मालिक चकित हो जायेंगे और अपना व्यापार छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे। मैं जानता हूँ कि व्यापार छोड़ना आसान काम नहीं है। किन्तु जिस समय चारों ओर देशाभिमान और देशभक्तिका वातावरण फैला हुआ हो, उस समय अनायास ही जनताकी त्यागकी शक्ति बढ़ जाती है। मैं देखता हूँ कि इसी सप्ताह में यह शक्ति सौ गुनी अधिक हो गई है किन्तु वह हजार गुनी बढ़नी चाहिए। विदेशी वस्त्रके व्यापारी फिलहाल व्यापार छोड़ना चाहते हुए भी कुछ सोच-विचार में पड़े हुए हैं। वे अभी ऐसी प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि तीन माह या बहुत हुआ तो एक वर्षतक ये अपना यह व्यापार नहीं करेंगे। वे ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि एक वर्षके बाद तो वे फिर विदेशी वस्त्र खरीदना व बेचना शुरू कर सकेंगे। स्वराज्यकी प्राप्तिके लिए जितना प्रयत्न किया जाना चाहिए उतना वे नहीं कर रहे हैं। कारण, उनमें इतनी श्रद्धा नहीं है। किन्तु यह काम ज्यों-ज्यों प्रगति करेगा त्यों-त्यों हम देखेंगे कि शराब और विदेशी कपड़े का यह व्यापार बन्द हुए बिना नहीं रह सकता। जिस समय देशमें लाखों व्यक्तियोंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया हो, उस समय इन अश्रद्धालु व्यापारियों में भी त्याग करनेकी शक्ति आये बिना नहीं रह सकती।
स्त्रियाँ इस कामको हाथमें लें, उसके बाद यदि उसे जारी रखनेके लिए पैसेकी कमी महसूस हुई तो मैं आपके सामने अपना हाथ फैलाऊँगा, यद्यपि अभी तो भगवान्की कृपासे जितना चाहिए उससे कहीं ज्यादा पैसा मिल रहा है। आज ही स्त्रियोंकी सभा में लगभग एक हजार रुपया इकट्ठा हो गया और कठोरके गलियारा परिवारकी एक बहनने बिना मांगे सोनेकी चार चूड़ियाँ दे दीं।
यदि पुरुषवर्ग उदासीन न रहे और स्वेच्छापूर्वक अपने कर्त्तव्यका पालन करने लगे, उदाहरण के लिए, पर्याप्त खादीके अभाव में लंगोटी पहनने की जरूरत होनेपर
लंगोटी पहनने लगे तो बहनोंका काम उस हदतक कुछ हलका हो जायेगा।
कुमारी मेयोने भारतके पुरुषोंपर यह आरोप लगाया है कि अधिकांश लोगों में
स्त्रियोंके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वह कहती है कि हम उनसे मजदूरिनोंकी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस
समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम
सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था।
आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह
कह रहा है कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर में तुम्हारे
सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें
अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी
कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बना-
कर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय
यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा ।
हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके
सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही
हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम
उपयोग में ला सकते हैं।
इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी।
अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें।
अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे
पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है।
अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है। ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस
समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम
सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था।
आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह
कह रहा है कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर में तुम्हारे
सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें
अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी
कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बना-
कर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय
यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा ।
हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके
सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही
हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम
उपयोग में ला सकते हैं।
इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी।
अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें।
अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे
पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है।
अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है।
ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस
समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम
सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था।
आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह
कह रहा है कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर में तुम्हारे
सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें
अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी
कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बना-
कर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय
यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा ।
हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके
सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही
हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम
उपयोग में ला सकते हैं।
इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी।
अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें।
अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे
पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है।
अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है।
ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
2191
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस
समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम
सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था।
आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह कह रहा है कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर में तुम्हारे सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बनाकर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा। हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम उपयोग में ला सकते हैं।
इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी।
अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें।
अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे
पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है।
अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है।
ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण दांडीमें|२६३}}</noinclude>तरह काम लेते हैं, मानों उनका जन्म पुरुषोंकी सेवा करनेके लिए ही हुआ हो। जिस
समय इस देशकी स्त्रियाँ समझ-बूझकर मद्यनिषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारका काम
सफल कर दिखायेंगी उस समय दुनियाको अपने-आप यह बात साफ हो जायेगी कि कुमारी मेयोका उक्त कथन झूठ था।
आजकल खादीकी कुछ कमी महसूस हो रही है। इसीलिए मैं लोगोसे यह कह रहा हूँ कि स्वयं कातो और खादी पहनो तकली पर सूत कातकर मैं तुम्हारे सामने रोज इस बातका उदाहरण भी पेश कर रहा हूँ। जिस तरह हम हरएक घरमें अपना अनाज स्वयं दलते हैं, पीसते हैं और गूंधते हैं उसी प्रकार हमें घर-घरमें अपनी कपासका जैसा बने वैसा कच्चा पक्का सूत कातना चाहिए और उसका कपड़ा बनाकर खादी पहननी चाहिए। जिस समय देशमें कताई सार्वत्रिक हो जायेगी उस समय यह निश्चित समझना कि विदेशी कपड़ोंका यह व्यापार बिलकुल बन्द हो जायेगा। हमारे देशको जितना कपड़ा चाहिए उतना कपड़ा मिलें कभी नहीं दे सकतीं। इसके सिवा भारतकी अधिकांश मिलें पूंजीकी दृष्टिसे पूरे या अधूरे तौर पर विदेशी ही हैं। इसलिए ऐसी बहुत ही थोड़ी मिलें हैं जिनका कपड़ा जरूरत पड़नेपर हम उपयोग में ला सकते हैं।
इन रचनात्मक कार्योंको करनेके लिए अनेक प्रतिष्ठित परिवारोंकी स्त्रियाँ बाहर निकल पड़ी हैं। दीवान श्री मनुभाईकी पुत्री श्रीमती हंसा मेहता और अन्य बहनोंने मिलकर अभी कुछ दिन हुए बम्बई में मद्यनिषेधका काम चलाने के लिए एक परिपत्र जारी किया है। यदि गुजरातकी स्त्रियाँ लगातार इस प्रकार काम करती रहीं और पुरुष इस कार्य में उनकी सहायता करते रहे तो यह कार्य सारे देशमें फैल जायेगा। ये तीनों चीजें बहुत आसान है। यदि हम इन्हें सफलतापूर्वक कर डालें तो हम देखेंगे कि हमने कुल मिलाकर ९१ करोड़ रुपये बचा लिये हैं-- ६ करोड़ नमक-करसे, २५ करोड़ शराबसे और ६० करोड़ विदेशी कपड़ेके व्यापारसे ऐसा करके हम ज्यादा शुद्ध बनेंगे, हमारी शक्ति बढ़ेगी और तब स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमें तनिक भी देर नहीं लगेगी।
अन्तमें यह याद रखना है कि इन सात दिनोंमें हमने जो कुछ कमाया है, उसे हम खो न दें।
अभी-अभी खबर मिली है कि कलकत्ते में कुछ नवयुवक सभाओं में जब्त की गयी पुस्तकोंके अंश पढ़कर सुनाते थे पुलिसने उनकी सभाओंको भंग करके उन्हें बहाँसे
पुलिसके इन अत्याचारोंको देखकर कलकत्तेके मेयर श्री सेनगुप्तने भी उन जब्त की हुई पुस्तकोंके अंश पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें तुरन्त ही गिरफ्तार कर लिया गया। बिखर जानेको मजबूर किया है।
अभयाश्रमकें अत्यन्त योग्य खादी कार्यकर्त्ता डा० सुरेशचन्द्र बनर्जीको, जो किसी समय सरकारसे छह सौ रुपया मासिक वेतन पाते थे, नमक-कानून तोड़नेके अपराध में ढाई वर्षके सपरिश्रम कारावासकी सजा दी गयी है।
ऐसे अत्याचारोंके बावजूद जिस प्रकार हम गुजरातमें न तो डरे हैं और न झुके हैं उसी प्रकार वहाँ भी कोई नहीं डरा है। इतना ही नहीं, उलटे उनकी शक्ति<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०८
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६४|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>बड़ी है। हमारे ऊपर चाहे जितना अत्याचार हो, हमें किसी पर बल-प्रयोग नहीं करना
है और न किसीका अपमान करना है। एक भाईने मुझे सवर दी है कि बम्बई में विदेशी कपड़ोंकी होली जलाते समय दूसरोंके सिरोंसे टोपियाँ उछाली गयीं और उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ आगमें डाल दिया गया। मैं नहीं जानता कि इस खबर में कितनी सचाई है। किन्तु यदि बात सच हो तो आप निश्चित मानें कि हमारी यह लड़ाई इस तरह नहीं चल सकती। यदि जोर-जबरदस्ती हुई तो लोग इसे सहन नहीं करेंगे, तब वे आपसमें ही लड़ने लगेंगे और सरकार उसका लाभ उठायेगी।
यदि लोग विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके द्वारा स्वराज्य नहीं पाना चाहते तो हम बलपूर्वक उनसे पुण्य नहीं करा सकते। उनका हृदय पिघलाने के लिए हमें और ज्यादा त्याग करना होगा और यदि आवश्यक हुआ तो उनके खिलाफ सत्याग्रह भी करना होगा।
यदि मुझे ऐसी प्रतीति हो कि लोग मुझे धोखा दे रहे हैं; उन्होंने खादीके द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संकल्प किया, उसकी प्रतिज्ञा भी ली किन्तु वे उसे पाल नहीं रहे हैं तो फिर मुझे क्या करना चाहिए? यदि मुझे विश्वास हो कि मैं शुद्ध हैं, दयाके गुणका पूरा विकास कर चुका हूँ तो प्रसंग उपस्थित होनेपर में सत्याग्रह करूँगा, अनशन लेकर बैठ जाऊँगा। आप लोग रोज हाथ ऊँचा करके यह कहें कि खादी पूरी मात्रामें न मिले तो हम खादीको लँगोटी पहनकर ही अपना काम चलायेंगे और फिर ऐसा हो कि कोई एक बहन भी न काते तो ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या करूँगा? तब तो ऐसी परिस्थितिमें अपनी इस उत्तरावस्था में भी यही करना होगा जो मुझे अहमदाबाद के मिल मजदूरोंको
प्रतिज्ञा भंग करते देखकर करना पड़ा था, या यम्बई में हुए उपद्रवोंके अवसर पर
करना पड़ा था। यदि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हम रोज ईश्वरको धोखा दे रहे
हैं तो मुझे अनिच्छाके वावजूद बरबस ऐसा करना पड़ेगा। लेकिन मेरा विश्वास है
कि गुजरातके लोग मेरे साथ ऐसा विश्वासघात नहीं करेंगे।
हमें अपना काम शान्तिपूर्वक करना है और शान्तिपूर्वक स्वराज्य लेना है। मैं
देशमें अशान्ति नहीं देखना चाहता; अशान्ति हुई तो फिर में जीना नहीं चाहूँगा।
इस उपवासके दिन आप लोग सहज ही चले आये तो मैंने सहज ही यह इतनी बात आपसे कह दी। आप यहाँ या बम्बई में, कहीं भी, लोगोंको बलका, जोरजबरदस्तीका प्रयोग करते देखें तो उन्हें रोकें। जब-जब मैं ऐसा सुनता हूँ कि हमारे आदमियोंमें से किसीने किसीको गाली दी है, कोई अशिष्टता की है या बलका प्रयोग किया है तो मुझे चोट लगती है और सचमुच मेरी छाती भयसे धड़कने लगती है। उस समय यदि कोई डाक्टर मेरी जांच करे तो वह इस धड़कनकी आवाज सुन सकेगा। फिर भी मैं निभा रहा हूँ; क्योंकि ऐसे समय में दो क्षणके लिए आँखें मींचकर रामनाम ले लेता है। ऐसा न करूँ तो हो सकता है कि मेरे हृदयकी धड़कन एकाएक रुक जाये। आप लोग भले मुझे महात्मा कहें किन्तु मेरा काम तो दुर्बल मनुष्यका है। इसलिए इस लड़ाईमें आप मुझे कभी धोखा मत देना। आप अपने<noinclude></noinclude>
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है और न किसीका अपमान करना है। एक भाईने मुझे खबर दी है कि बम्बई में विदेशी कपड़ोंकी होली जलाते समय दूसरोंके सिरोंसे टोपियाँ उछाली गयीं और उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ आगमें डाल दिया गया। मैं नहीं जानता कि इस खबर में कितनी सचाई है। किन्तु यदि बात सच हो तो आप निश्चित मानें कि हमारी यह लड़ाई इस तरह नहीं चल सकती। यदि जोर-जबरदस्ती हुई तो लोग इसे सहन नहीं करेंगे, तब वे आपसमें ही लड़ने लगेंगे और सरकार उसका लाभ उठायेगी।
यदि लोग विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके द्वारा स्वराज्य नहीं पाना चाहते तो हम बलपूर्वक उनसे पुण्य नहीं करा सकते। उनका हृदय पिघलाने के लिए हमें और ज्यादा त्याग करना होगा और यदि आवश्यक हुआ तो उनके खिलाफ सत्याग्रह भी करना होगा।
यदि मुझे ऐसी प्रतीति हो कि लोग मुझे धोखा दे रहे हैं; उन्होंने खादीके द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका संकल्प किया, उसकी प्रतिज्ञा भी ली किन्तु वे उसे पाल नहीं रहे हैं तो फिर मुझे क्या करना चाहिए?
यदि मुझे विश्वास हो कि मैं शुद्ध हूँ दयाके गुणका पूरा विकास कर चुका हूँ तो प्रसंग उपस्थित होनेपर मैं सत्याग्रह करूँगा, अनशन लेकर बैठ जाऊँगा। आप लोग रोज हाथ ऊँचा करके यह कहें कि खादी पूरी मात्रामें न मिले तो हम खादीको लँगोटी पहनकर ही अपना काम चलायेंगे और फिर ऐसा हो कि कोई एक बहन भी न काते तो ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या करूँगा? तब तो ऐसी परिस्थितिमें अपनी इस उत्तरावस्था में भी यही करना होगा जो मुझे अहमदाबाद के मिल मजदूरोंको प्रतिज्ञा भंग करते देखकर करना पड़ा था, या यम्बई में हुए उपद्रवोंके अवसर पर करना पड़ा था। यदि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हम रोज ईश्वरको धोखा दे रहे हैं तो मुझे अनिच्छाके वावजूद बरबस ऐसा करना पड़ेगा। लेकिन मेरा विश्वास है कि गुजरातके लोग मेरे साथ ऐसा विश्वासघात नहीं करेंगे।
हमें अपना काम शान्तिपूर्वक करना है और शान्तिपूर्वक स्वराज्य लेना है। मैं
देशमें अशान्ति नहीं देखना चाहता; अशान्ति हुई तो फिर मैं जीना नहीं चाहूँगा।
इस उपवासके दिन आप लोग सहज ही चले आये तो मैंने सहज ही यह इतनी बात आपसे कह दी। आप यहाँ या बम्बई में, कहीं भी, लोगोंको बलका, जोरजबरदस्तीका प्रयोग करते देखें तो उन्हें रोकें। जब-जब मैं ऐसा सुनता हूँ कि हमारे आदमियोंमें से किसीने किसीको गाली दी है, कोई अशिष्टता की है या बलका प्रयोग किया है तो मुझे चोट लगती है और सचमुच मेरी छाती भयसे धड़कने लगती है। उस समय यदि कोई डाक्टर मेरी जांच करे तो वह इस धड़कनकी आवाज सुन सकेगा। फिर भी मैं निभा रहा हूँ; क्योंकि ऐसे समय में दो क्षणके लिए आँखें मींचकर रामनाम ले लेता है। ऐसा न करूँ तो हो सकता है कि मेरे हृदयकी धड़कन एकाएक रुक जाये। आप लोग भले मुझे महात्मा कहें किन्तु मेरा काम तो दुर्बल मनुष्यका है। इसलिए इस लड़ाईमें आप मुझे कभी धोखा मत देना। आप अपने<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र लक्ष्मीदास श्रीकान्तको|२६५}}</noinclude>घरमें बैठे रहेंगे तो काम चलेगा किन्तु यदि मैदान में उतर पड़े तो फिर आप सचाई-
का ही व्यवहार करें।
[गुजरातीसे]
{{Right|'''नवजीवन''', २० ४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''२४७. पत्र : गुलाम रसूल कुरैशीको'''}}}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
चि० कुरैशी,
तुम्हारा पत्र मिला। जितनी हमसे बन सके उतनी मेहनत करना हमारा काम है। फल देना ईश्वर के हाथमें है। सारे नियमोंका पालन करना चाहिए। मुसलमान भाइयोंसे मिलना चाहिए। तकली रोज चलानी चाहिए और दूसरोंको तकली चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
[पुनश्च :]
आज स्त्रियोंकी जो सभा हुई वह अच्छी थी।
{{Right|बापूकी दुआ}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : हमीद कुरैशी;
जी० एन० ६६५० से भी।
२४८. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको
{{Right|दांडी}}
{{Right|१३ अप्रैल, १९३०}}
भाईश्री लक्ष्मीदास,
तुम्हारा पत्र आज ही मिला। मैं इसे अभी-अभी अर्थात् रविवारको रातके साढ़े नौ बजे ही पढ़ सका इसलिए सन्देश भेजनेका समय भी नहीं रहा। तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सफलताको कामना तो मैं सदैव ही करता हूँ। मुझे समाचार देते रहना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ४२०४ ) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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का ही व्यवहार करें।
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चि० कुरैशी,
तुम्हारा पत्र मिला। जितनी हमसे बन सके उतनी मेहनत करना हमारा काम है। फल देना ईश्वर के हाथमें है। सारे नियमोंका पालन करना चाहिए। मुसलमान भाइयोंसे मिलना चाहिए। तकली रोज चलानी चाहिए और दूसरोंको तकली चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
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आज स्त्रियोंकी जो सभा हुई वह अच्छी थी।
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२४८. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको
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भाईश्री लक्ष्मीदास,
तुम्हारा पत्र आज ही मिला। मैं इसे अभी-अभी अर्थात् रविवारको रातके साढ़े नौ बजे ही पढ़ सका इसलिए सन्देश भेजनेका समय भी नहीं रहा। तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सफलताको कामना तो मैं सदैव ही करता हूँ। मुझे समाचार देते रहना।
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[गुजरातीसे]
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तुम्हारा पत्र मिला। जितनी हमसे बन सके उतनी मेहनत करना हमारा काम है। फल देना ईश्वर के हाथमें है। सारे नियमोंका पालन करना चाहिए। मुसलमान भाइयोंसे मिलना चाहिए। तकली रोज चलानी चाहिए और दूसरोंको तकली चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
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आज स्त्रियोंकी जो सभा हुई वह अच्छी थी।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : हमीद कुरैशी;
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तुम्हारा पत्र आज ही मिला। मैं इसे अभी-अभी अर्थात् रविवारको रातके साढ़े नौ बजे ही पढ़ सका इसलिए सन्देश भेजनेका समय भी नहीं रहा। तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सफलताको कामना तो मैं सदैव ही करता हूँ। मुझे समाचार देते रहना।
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'''नवजीवन''', २० ४-१९३०
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तुम्हारा पत्र मिला। जितनी हमसे बन सके उतनी मेहनत करना हमारा काम है। फल देना ईश्वर के हाथमें है। सारे नियमोंका पालन करना चाहिए। मुसलमान भाइयोंसे मिलना चाहिए। तकली रोज चलानी चाहिए और दूसरोंको तकली चलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
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आज स्त्रियोंकी जो सभा हुई वह अच्छी थी।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : हमीद कुरैशी;
जी० एन० ६६५० से भी।
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भाईश्री लक्ष्मीदास,
तुम्हारा पत्र आज ही मिला। मैं इसे अभी-अभी अर्थात् रविवारको रातके साढ़े नौ बजे ही पढ़ सका इसलिए सन्देश भेजनेका समय भी नहीं रहा। तुम्हारे कार्य में तुम्हारी सफलताकी कामना तो मैं सदैव ही करता हूँ। मुझे समाचार देते रहना।
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>प्रिय मीरा,
{{C|{{larger|'''२४९. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
तुम्हारा लम्बा स्नेह-पत्र मिला। यह तुम्हें सिर्फ इसी बात की सूचना देनेके लिए लिख रहा हूँ। अब रातके १० बजनेवाले हैं। इसलिए फिलहाल तो शुभरात्रि।
सस्नेह,
{{Right|बापू|}}
मीन- दिवस या मीन रात्रि ? मौन रातके बारह बजे समाप्त होगा।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू०५३८६ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|{{larger|'''२५०. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
नवसारी
१४ अप्रैल, १९३०
अभी-अभी ही सुना कि जवाहरलाल गिरफ्तार हो गया है। मैं श्रीमती स्वरूपरानी और आपको सौभाग्यशाली माता-पिताके रूपमें बधाई देता जवाहरलालने अपनेको काँटोंके ताजका योग्य पात्र सिद्ध किया है।
अब उसकी जगह कौन लेगा?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १५-४-१९३०
<small>१. पद पत्र बापूज़ लेटर्स टु मीरामें जिस क्रममें रखा गया है, उससे प्रतीत होता है कि पह अप्रैल १९३० में लिखा गया था। २८ अप्रैलको कोई पत्र नहीं लिखा गया (देखिए "पत्र मीराबद्दनको", २९-४-१९३०) और २१ अप्रैला पत्र उपलब्ध है। इसलिए यह पत्र या तो १४ या उससे पहले किसी और सोमवारका हो सकता है<small><noinclude></noinclude>
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{{Right|[१४ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
तुम्हारा लम्बा स्नेह-पत्र मिला। यह तुम्हें सिर्फ इसी बात की सूचना देनेके लिए लिख रहा हूँ। अब रातके १० बजनेवाले हैं। इसलिए फिलहाल तो शुभरात्रि।
सस्नेह,
{{Right|बापू|}}
मीन- दिवस या मीन रात्रि ? मौन रातके बारह बजे समाप्त होगा।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू०५३८६ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|{{larger|'''२५०. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
नवसारी
१४ अप्रैल, १९३०
अभी-अभी ही सुना कि जवाहरलाल गिरफ्तार हो गया है। मैं श्रीमती स्वरूपरानी और आपको सौभाग्यशाली माता-पिताके रूपमें बधाई देता जवाहरलालने अपनेको काँटोंके ताजका योग्य पात्र सिद्ध किया है।
अब उसकी जगह कौन लेगा?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १५-४-१९३०
<small>१. पद पत्र बापूज़ लेटर्स टु मीरामें जिस क्रममें रखा गया है, उससे प्रतीत होता है कि पह अप्रैल १९३० में लिखा गया था। २८ अप्रैलको कोई पत्र नहीं लिखा गया (देखिए "पत्र मीराबद्दनको", २९-४-१९३०) और २१ अप्रैला पत्र उपलब्ध है। इसलिए यह पत्र या तो १४ या उससे पहले किसी और सोमवारका हो सकता है<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>प्रिय मीरा,
{{C|{{larger|'''२४९. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
तुम्हारा लम्बा स्नेह-पत्र मिला। यह तुम्हें सिर्फ इसी बात की सूचना देनेके लिए लिख रहा हूँ। अब रातके १० बजनेवाले हैं। इसलिए फिलहाल तो शुभरात्रि।
सस्नेह,
{{Right|बापू|}}
मीन- दिवस या मीन रात्रि ? मौन रातके बारह बजे समाप्त होगा।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू०५३८६ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|{{larger|'''२५०. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|नवसारी}}
१४ अप्रैल, १९३०
अभी-अभी ही सुना कि जवाहरलाल गिरफ्तार हो गया है। मैं श्रीमती स्वरूपरानी और आपको सौभाग्यशाली माता-पिताके रूपमें बधाई देता जवाहरलालने अपनेको काँटोंके ताजका योग्य पात्र सिद्ध किया है।
अब उसकी जगह कौन लेगा?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १५-४-१९३०
<small>१. पद पत्र बापूज़ लेटर्स टु मीरामें जिस क्रममें रखा गया है, उससे प्रतीत होता है कि पह अप्रैल १९३० में लिखा गया था। २८ अप्रैलको कोई पत्र नहीं लिखा गया (देखिए "पत्र मीराबद्दनको", २९-४-१९३०) और २१ अप्रैला पत्र उपलब्ध है। इसलिए यह पत्र या तो १४ या उससे पहले किसी और सोमवारका हो सकता है<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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{{Right|[१४ अप्रैल, १९३० या उसके पूर्व]१}}
प्रिय मीरा,
तुम्हारा लम्बा स्नेह-पत्र मिला। यह तुम्हें सिर्फ इसी बात की सूचना देनेके लिए लिख रहा हूँ। अब रातके १० बजनेवाले हैं। इसलिए फिलहाल तो शुभरात्रि।
सस्नेह,
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मीन- दिवस या मीन रात्रि ? मौन रातके बारह बजे समाप्त होगा।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू०५३८६ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
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१४ अप्रैल, १९३०
अभी-अभी ही सुना कि जवाहरलाल गिरफ्तार हो गया है। मैं श्रीमती स्वरूपरानी और आपको सौभाग्यशाली माता-पिताके रूपमें बधाई देता जवाहरलालने अपनेको काँटोंके ताजका योग्य पात्र सिद्ध किया है।
अब उसकी जगह कौन लेगा?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १५-४-१९३०
<small>१. पद पत्र बापूज़ लेटर्स टु मीरामें जिस क्रममें रखा गया है, उससे प्रतीत होता है कि पह अप्रैल १९३० में लिखा गया था। २८ अप्रैलको कोई पत्र नहीं लिखा गया (देखिए "पत्र मीराबद्दनको", २९-४-१९३०) और २१ अप्रैला पत्र उपलब्ध है। इसलिए यह पत्र या तो १४ या उससे पहले किसी और सोमवारका हो सकता है<small><noinclude></noinclude>
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प्रिय मीरा,
तुम्हारा लम्बा स्नेह-पत्र मिला। यह तुम्हें सिर्फ इसी बात की सूचना देनेके लिए लिख रहा हूँ। अब रातके १० बजनेवाले हैं। इसलिए फिलहाल तो शुभरात्रि।
सस्नेह,
{{Right|बापू|}}
मीन- दिवस या मीन रात्रि ? मौन रातके बारह बजे समाप्त होगा।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू०५३८६ ) से।
सौजन्य : मीराबहन
{{C|{{larger|'''२५०. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
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१४ अप्रैल, १९३०
अभी-अभी ही सुना कि जवाहरलाल गिरफ्तार हो गया है। मैं श्रीमती स्वरूपरानी और आपको सौभाग्यशाली माता-पिताके रूपमें बधाई देता हूँ। जवाहरलालने अपनेको काँटोंके ताजका योग्य पात्र सिद्ध किया है।
अब उसकी जगह कौन लेगा?
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', १५-४-१९३०
<small>१. यह पत्र बापूज़ लैटर्स टु मीरामें जिस क्रममें रखा गया है, उससे प्रतीत होता है कि यह अप्रैल १९३० में लिखा गया था। २८ अप्रैलको कोई पत्र नहीं लिखा गया (देखिए "पत्र मीराबद्दनको", २९-४-१९३०) और २१ अप्रैलका पत्र उपलब्ध है। इसलिए यह पत्र या तो १४ अप्रैलका या तो उससे पहले किसी और सोमवारका हो सकता है<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२५१. अपील : भारतके नौजवानोंसे}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}}
पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े।
क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे? इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
{{C|{{larger|२५२. पत्र : मोतीलाल नेहरूको}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय मोतीलालजी,
तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे
<small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude>
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{{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}}
पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े।
क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे? इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
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प्रिय मोतीलालजी,
तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे
<small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude>
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पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े।
क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे? इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२५२. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
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प्रिय मोतीलालजी,
तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे
<small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude>
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पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े।
क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे?
इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है।
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प्रिय मोतीलालजी,
तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे
<small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५१. अपील : भारतके नौजवानोंसे'''}}}}
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पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े।
क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे?
इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२५२. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
प्रिय मोतीलालजी,
तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे
<small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१२
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मिलनेवाले समाचार भी अत्यन्त उत्साहवर्द्धक है। 'यंग इंडिया' तो आप पढ़ते ही होंगे।
आपका स्वास्थ्य कैसा है?
{{Right|आपका,}}
{{|Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८५) से।
सौजन्य : इलाहाबाद नगरपालिका संग्रहालय
{{C|{{larger|'''२५३. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैंने बुधवारको वेजलपुरमें तुम सबसे मिलनेकी व्यवस्था की है। मैं जहाँ भी होऊँगा वहाँस वेजलपुर आऊँगा। मैं वहां सवेरे ही पहुँचनेकी तजवीज करूँगा। हमारा सदर मुकाम अब बहुत करके कराडी रहेगा।
यदि स्वामीका आग्रह बना रहा तो गुरुवारकी साँझको बम्बईके लिए रवाना
हो जाऊँगा और रविवारको सवेरे वापस लौट आऊँगा । फिलहाल तो बम्बई जानेकी
इच्छा नहीं होती।
तुम्हारा अहमदाबादका वर्णन
गुजराती (एस० एन० ११४८१ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|{{larger|२५४. पत्र : कुसुम देसाईको}}}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
चि० कुसुम
मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मैंने जो लिखा है उसमें क्या तुझे कोई विचार सूझ पड़ता है ? तू उसमें प्रमुख भाग लेनेकी हिम्मत रखती है क्या?
तेरे पत्र मिले हैं।
<small> १. गांधीजी २६ अप्रैल, १९३० को वेजलपुर पहुंचे थे। इसके अलावा गांधीजीने पत्र मदादेव देसाईको १४-४-१९३० में उन्हें सवेरे एक पत्र लिखनेका उल्लेख किया है। सम्भवतः उनका इशारा इसी की ओर है।<small>
<small>२. पत्रका शेष भाग उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
2191
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मिलनेवाले समाचार भी अत्यन्त उत्साहवर्द्धक है। 'यंग इंडिया' तो आप पढ़ते ही होंगे।
आपका स्वास्थ्य कैसा है?
{{Right|आपका,}}
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८५) से।
सौजन्य : इलाहाबाद नगरपालिका संग्रहालय
{{C|{{larger|'''२५३. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैंने बुधवारको वेजलपुरमें तुम सबसे मिलनेकी व्यवस्था की है। मैं जहाँ भी होऊँगा वहाँस वेजलपुर आऊँगा। मैं वहां सवेरे ही पहुँचनेकी तजवीज करूँगा। हमारा सदर मुकाम अब बहुत करके कराडी रहेगा।
यदि स्वामीका आग्रह बना रहा तो गुरुवारकी साँझको बम्बईके लिए रवाना
हो जाऊँगा और रविवारको सवेरे वापस लौट आऊँगा । फिलहाल तो बम्बई जानेकी
इच्छा नहीं होती।
तुम्हारा अहमदाबादका वर्णन
गुजराती (एस० एन० ११४८१ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|{{larger|२५४. पत्र : कुसुम देसाईको}}}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
चि० कुसुम
मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मैंने जो लिखा है उसमें क्या तुझे कोई विचार सूझ पड़ता है ? तू उसमें प्रमुख भाग लेनेकी हिम्मत रखती है क्या?
तेरे पत्र मिले हैं।
<small> १. गांधीजी २६ अप्रैल, १९३० को वेजलपुर पहुंचे थे। इसके अलावा गांधीजीने पत्र मदादेव देसाईको १४-४-१९३० में उन्हें सवेरे एक पत्र लिखनेका उल्लेख किया है। सम्भवतः उनका इशारा इसी की ओर है।<small>
<small>२. पत्रका शेष भाग उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude>
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2026-08-25T20:02:45Z
Kumari Arpana Sinha
2191
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मिलनेवाले समाचार भी अत्यन्त उत्साहवर्द्धक है। 'यंग इंडिया' तो आप पढ़ते ही होंगे।
आपका स्वास्थ्य कैसा है?
{{Right|आपका,}}
{{Right|मो० क० गांधी}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८५) से।
सौजन्य : इलाहाबाद नगरपालिका संग्रहालय
{{C|{{larger|'''२५३. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}}
चि० महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला।
मैंने बुधवारको वेजलपुरमें तुम सबसे मिलनेकी व्यवस्था की है। मैं जहाँ भी होऊँगा वहाँस वेजलपुर आऊँगा। मैं वहां सवेरे ही पहुँचनेकी तजवीज करूँगा। हमारा सदर मुकाम अब बहुत करके कराडी रहेगा।
यदि स्वामीका आग्रह बना रहा तो गुरुवारकी साँझको बम्बईके लिए रवाना
हो जाऊँगा और रविवारको सवेरे वापस लौट आऊँगा । फिलहाल तो बम्बई जानेकी
इच्छा नहीं होती।
तुम्हारा अहमदाबादका वर्णन
गुजराती (एस० एन० ११४८१ ) की फोटो नकलसे।
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चि० कुसुम
मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मैंने जो लिखा है उसमें क्या तुझे कोई विचार सूझ पड़ता है ? तू उसमें प्रमुख भाग लेनेकी हिम्मत रखती है क्या?
तेरे पत्र मिले हैं।
<small> १. गांधीजी २६ अप्रैल, १९३० को वेजलपुर पहुंचे थे। इसके अलावा गांधीजीने पत्र मदादेव देसाईको १४-४-१९३० में उन्हें सवेरे एक पत्र लिखनेका उल्लेख किया है। सम्भवतः उनका इशारा इसी की ओर है।<small>
<small>२. पत्रका शेष भाग उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१३
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|पत्र महादेव देसाईको|२६९}}</noinclude>वहाँ किस काममें व्यस्त है?
मेरे पकड़े जानेकी पक्की खबर है, ऐसा कहकर कल मुझे सारी रात जगाया। और मैं तो अभीतक मौज कर रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० १७९७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२५५. पत्र : मणिलाल वी० देसाईको'''}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
भाई मणिलाल देसाई,
आपने नमक के सम्बन्धमें मुझे जो पुस्तक भेजी थी वह भाई केशवरामकी मारफत मुझे मिल गई है। इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
{{Right|मोहनदास गांधी वन्देमातरम्}}
गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से।
{{C{{larger|'''२५६. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|सोमवार [१४ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र में रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं।
मेरा इस सप्ताह बम्बई जाना नहीं होगा। स्वामी लिखता है कि वह ज्यादा तैयारी करके आगामी सप्ताह में बुलायेगा।
बा को तो पूरी तैयारीके साथ ही लाना। यदि वह सामान लाना चाहे तो ले आये। उसके लिए तो मैंने काम तैयार कर ही रखा है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४८०) तथा ११४८१की फोटो नकलसे।
<small>१. जवाहरलाल नेहरू १३ अप्रैल १९३० को गिरफ्तार किये गये थे<small><noinclude></noinclude>
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मेरे पकड़े जानेकी पक्की खबर है, ऐसा कहकर कल मुझे सारी रात जगाया। और मैं तो अभीतक मौज कर रहा हूँ।
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भाई मणिलाल देसाई,
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गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से।
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चि० महादेव,
तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र में रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं।
मेरा इस सप्ताह बम्बई जाना नहीं होगा। स्वामी लिखता है कि वह ज्यादा तैयारी करके आगामी सप्ताह में बुलायेगा।
बा को तो पूरी तैयारीके साथ ही लाना। यदि वह सामान लाना चाहे तो ले आये। उसके लिए तो मैंने काम तैयार कर ही रखा है।
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गुजराती (जी० एन० १७९७ ) की फोटो नकलसे।
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भाई मणिलाल देसाई,
आपने नमक के सम्बन्धमें मुझे जो पुस्तक भेजी थी वह भाई केशवरामकी मारफत मुझे मिल गई है। इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
{{Right|मोहनदास गांधी वन्देमातरम्}}
गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से।
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{{Right|सोमवार [१४ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र में रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं।
मेरा इस सप्ताह बम्बई जाना नहीं होगा। स्वामी लिखता है कि वह ज्यादा तैयारी करके आगामी सप्ताह में बुलायेगा।
बा को तो पूरी तैयारीके साथ ही लाना। यदि वह सामान लाना चाहे तो ले आये। उसके लिए तो मैंने काम तैयार कर ही रखा है।
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गुजराती (एस० एन० ११४८०) तथा ११४८१की फोटो नकलसे।
<small>१. जवाहरलाल नेहरू १३ अप्रैल १९३० को गिरफ्तार किये गये थे<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२६९}}</noinclude>वहाँ किस काममें व्यस्त है?
मेरे पकड़े जानेकी पक्की खबर है, ऐसा कहकर कल मुझे सारी रात जगाया। और मैं तो अभीतक मौज कर रहा हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० १७९७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२५५. पत्र : मणिलाल वी० देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
भाई मणिलाल देसाई,
आपने नमक के सम्बन्धमें मुझे जो पुस्तक भेजी थी वह भाई केशवरामकी मारफत मुझे मिल गई है। इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
{{Right|मोहनदास गांधी वन्देमातरम्}}
गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से।
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{{Right|सोमवार [१४ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र में रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं।
मेरा इस सप्ताह बम्बई जाना नहीं होगा। स्वामी लिखता है कि वह ज्यादा तैयारी करके आगामी सप्ताह में बुलायेगा।
बा को तो पूरी तैयारीके साथ ही लाना। यदि वह सामान लाना चाहे तो ले आये। उसके लिए तो मैंने काम तैयार कर ही रखा है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४८०) तथा ११४८१की फोटो नकलसे।
<small>१. जवाहरलाल नेहरू १३ अप्रैल १९३० को गिरफ्तार किये गये थे<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२६९}}</noinclude>वहाँ किस काममें व्यस्त है?
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{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० १७९७ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२५५. पत्र : मणिलाल वी० देसाईको'''}}}}
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{{Right|१४ अप्रैल, १९३०}}
भाई मणिलाल देसाई,
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{{Right|मोहनदास गांधी वन्देमातरम्}}
गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से।
{{C|{{larger|'''२५६. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|सोमवार [१४ अप्रैल, १९३०]१}}
चि० महादेव,
तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र में रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१४
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५७. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|नवसारी}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
नेहरू<br>इलाहाबाद<br>निश्चित लगता है मेरा ताज पहनना अनावश्यक है, हानिकारक भी हो सकता है। यदि आप दायित्व ओढ़ सकें तो ओढ़ना चाहिए।
{{Right|गांधी}<br>[अंग्रेजीसे]
मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल संख्या जी- १।
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
२५८. पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको
१५ अप्रैल, १९३०
आपका तार पाकर मन प्रसन्नतासे भर गया। अब इस बातकी प्रतीक्षा कर
रहा हूँ कि यम्बईके नौजवान कांग्रेस अध्यक्षकी गिरफ्तारीकी खबर सुनकर कैसा
उत्साह दिखाते हैं। गुजरातमें जो काम हुआ है, उसे सुव्यवस्थित और स्थायी
बनानेके लिए यहाँ हर घड़ी मेरी जरूरत है, लेकिन जब वहाँ आना नितान्त
आवश्यक हो जायेगा, तो आऊँगा ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, १६-४-१९३०
२. मोतीलाल नेहरूने १७ तारीखको इसका यह उत्तर दिया था " आपका तार मिला। आपकी
बात बिलकुल ठीक लगती है चाहता तो था कि आपसे निजी तौर पर बात कर हूँ, लेकिन सोचता
हूँ कि इसमें और लम्बा अन्तराल हानिकारक होगा और इसलिए अपना पूरा समय अपनी सामर्थ्य भर
आपके मार्ग-दर्शनमें देशकी सेवा के लिए समर्पित करता हूँ आज दायित्व संभाल रहा हूँ बयान जारी
कर रहा हूँ।"<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५७. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|नवसारी}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
नेहरू<br>इलाहाबाद<br>निश्चित लगता है मेरा ताज पहनना अनावश्यक है, हानिकारक भी हो सकता है। यदि आप दायित्व ओढ़ सकें तो ओढ़ना चाहिए।
{{Right|गांधी}}
[अंग्रेजीसे]
मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल संख्या जी- १।<br>सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
{{C|{{larger|'''२५८. पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार पाकर मन प्रसन्नतासे भर गया। अब इस बातकी प्रतीक्षा कर
रहा हूँ कि यम्बईके नौजवान कांग्रेस अध्यक्षकी गिरफ्तारीकी खबर सुनकर कैसा
उत्साह दिखाते हैं। गुजरातमें जो काम हुआ है, उसे सुव्यवस्थित और स्थायी
बनानेके लिए यहाँ हर घड़ी मेरी जरूरत है, लेकिन जब वहाँ आना नितान्त
आवश्यक हो जायेगा, तो आऊँगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
<small>१. मोतीलाल नेहरूने १७ तारीखको इसका यह उत्तर दिया था "आपका तार मिला। आपकी। बात बिलकुल ठीक लगती है चाहता तो था कि आपसे निजी तौर पर बात कर हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि इसमें और लम्बा अन्तराल हानिकारक होगा और इसलिए अपना पूरा समय अपनी सामर्थ्य भर आपके मार्ग-दर्शनमें देशकी सेवा के लिए समर्पित करता हूँ आज दायित्व संभाल रहा हूँ बयान जारी। कर रहा हूँ।"<small><noinclude></noinclude>
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नेहरू<br>इलाहाबाद<br>निश्चित लगता है मेरा ताज पहनना अनावश्यक है, हानिकारक भी हो सकता है। यदि आप दायित्व ओढ़ सकें तो ओढ़ना चाहिए।
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[अंग्रेजीसे]
मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल संख्या जी- १।<br>सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
{{C|{{larger|'''२५८. पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार पाकर मन प्रसन्नतासे भर गया। अब इस बातकी प्रतीक्षा कर
रहा हूँ कि यम्बईके नौजवान कांग्रेस अध्यक्षकी गिरफ्तारीकी खबर सुनकर कैसा
उत्साह दिखाते हैं। गुजरातमें जो काम हुआ है, उसे सुव्यवस्थित और स्थायी
बनानेके लिए यहाँ हर घड़ी मेरी जरूरत है, लेकिन जब वहाँ आना नितान्त
आवश्यक हो जायेगा, तो आऊँगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
<small>१. मोतीलाल नेहरूने १७ तारीखको इसका यह उत्तर दिया था "आपका तार मिला। आपकी। बात बिलकुल ठीक लगती है चाहता तो था कि आपसे निजी तौर पर बात कर हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि इसमें और लम्बा अन्तराल हानिकारक होगा और इसलिए अपना पूरा समय अपनी सामर्थ्य भर आपके मार्ग-दर्शनमें देशकी सेवा के लिए समर्पित करता हूँ आज दायित्व संभाल रहा हूँ बयान जारी। कर रहा हूँ।"<small><noinclude></noinclude>
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नेहरू<br>इलाहाबाद<br>निश्चित लगता है मेरा ताज पहनना अनावश्यक है, हानिकारक भी हो सकता है। यदि आप दायित्व ओढ़ सकें तो ओढ़ना चाहिए।
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[अंग्रेजीसे]
मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल संख्या जी- १।
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
{{C|{{larger|'''२५८. पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
आपका तार पाकर मन प्रसन्नतासे भर गया। अब इस बातकी प्रतीक्षा कर
रहा हूँ कि यम्बईके नौजवान कांग्रेस अध्यक्षकी गिरफ्तारीकी खबर सुनकर कैसा
उत्साह दिखाते हैं। गुजरातमें जो काम हुआ है, उसे सुव्यवस्थित और स्थायी
बनानेके लिए यहाँ हर घड़ी मेरी जरूरत है, लेकिन जब वहाँ आना नितान्त
आवश्यक हो जायेगा, तो आऊँगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३०
<small>१. मोतीलाल नेहरूने १७ तारीखको इसका यह उत्तर दिया था "आपका तार मिला। आपकी। बात बिलकुल ठीक लगती है चाहता तो था कि आपसे निजी तौर पर बात कर हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि इसमें और लम्बा अन्तराल हानिकारक होगा और इसलिए अपना पूरा समय अपनी सामर्थ्य भर आपके मार्ग-दर्शनमें देशकी सेवा के लिए समर्पित करता हूँ आज दायित्व संभाल रहा हूँ बयान जारी। कर रहा हूँ।"<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२५९. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको१'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
...पंचमहाल देरसे जाग रहा है, इसमें भी कोई ईश्वरीय संकेत होगा। इस धर्म-युद्ध में यदि पहले भाग लेनेवाले पीछे रह जायें और अन्तमें शामिल होनेवाले प्रथम आ जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं होगी। पंचमहालके लोगोंकी शक्तिकी तो कोई सीमा नहीं। लेकिन दुःख तो इस बातका है कि हम अनेक बार अपनी इस शक्तिको पहचान नहीं पाते। यह समय उसे पहचाननेका है और मुझे उम्मीद है कि पंचमहाल अपनी शक्तिको पहचानेगा।
{{Right|मोहनदास गांधी}}
गुजराती (जी० एन० ४२०६ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२६०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
मैंने अभी-अभी सुना कि तुम गिरफ्तार हो गये हो ! ! ! अच्छा हुआ। आराम मिलेगा। इतने दिनों तक तुम्हें बाहर रखा, यह भी आश्चर्यकी बात थी। लोग जितने
कसौटीपर कसे जाते हैं, उतना ही अच्छा है।
'अब की टेक हमारी लाज राखो गिरिधारी।'
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४८२ ) की फोटो नकलसे।
<small>१. साधन-सूत्रसे यह पता नहीं चलता कि पत्र किसको लिखा गया था किन्तु जी० एन० संग्रह में यह लक्ष्मीदास श्रीकान्तको लिखे पत्रके रूपमें दर्ज है।<small><noinclude></noinclude>
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2026-08-26T01:53:08Z
Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५९. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको१'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
...पंचमहाल देरसे जाग रहा है, इसमें भी कोई ईश्वरीय संकेत होगा। इस धर्म-युद्ध में यदि पहले भाग लेनेवाले पीछे रह जायें और अन्तमें शामिल होनेवाले प्रथम आ जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं होगी। पंचमहालके लोगोंकी शक्तिकी तो कोई सीमा नहीं। लेकिन दुःख तो इस बातका है कि हम अनेक बार अपनी इस शक्तिको पहचान नहीं पाते। यह समय उसे पहचाननेका है और मुझे उम्मीद है कि पंचमहाल अपनी शक्तिको पहचानेगा।
{{Right|मोहनदास गांधी}}
गुजराती (जी० एन० ४२०६ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२६०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|दांडी}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
चि० महादेव,
मैंने अभी-अभी सुना कि तुम गिरफ्तार हो गये हो ! ! ! अच्छा हुआ। आराम मिलेगा। इतने दिनों तक तुम्हें बाहर रखा, यह भी आश्चर्यकी बात थी। लोग जितने
कसौटीपर कसे जाते हैं, उतना ही अच्छा है।
'अब की टेक हमारी लाज राखो गिरिधारी।'
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४८२ ) की फोटो नकलसे।
<small>१. साधन-सूत्रसे यह पता नहीं चलता कि पत्र किसको लिखा गया था किन्तु जी० एन० संग्रह में यह लक्ष्मीदास श्रीकान्तको लिखे पत्रके रूपमें दर्ज है।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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/* अशोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६१. भाषण : उंबेरमें'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
'''सभामें उपस्थित ग्रामीण महिलाओंसे श्री गांधीने पूछा कि क्या वे पण्डित जवाहरलाल नेहरूको जानती हैं।'''
'''उन्होंने उत्तर दिया, "हम कैसे जान सकती हैं?" इसपर गांधीजी ने कहा :'''
यह आपकी नहीं, हमारी गलती है--हम मर्दोंकी गलती है, जिन्होंने अबतक इतनेसे ही सन्तोष माना है कि आप घर-गृहस्थी सँभालें, चूल्हा-चौका देखें, पानी भरें और घर बारकी सफाई करें। लेकिन अब आप लोग ऐसी स्थितिमें नहीं रहेंगी। अगर इस आन्दोलनको सफल होना है तो आप लोगोंको अधिक नहीं तो पुरुषोंके समान ही योगदान देना होगा।
'''जवाहरलाल नेहरूका उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा :'''
उनका समस्त भारतके लिए वही महत्त्व है जो हमारे लिए गुजरातमें सरदार वल्लभभाईका है। वे राष्ट्रको सेवामें अपने-आपको खपा रहे हैं और हम सबमें बड़े होनेके कारण ही उन्हें सजा दी गई है।
अभीतक तो मैंने आपसे यही कहा है कि अगर पुलिस आपकी बन्द मुट्ठियोंसे नमक छीननेकी कोशिश करती है तो आपको इसका विरोध करना चाहिए तथा पुलिसवाले आपको जैसे भी चोट पहुँचायें, उसे आप चुपचाप और विनम्रताके साथ सहन कर लें। अगर आपमें कष्ट सहनका वल और अपने उद्देश्यके प्रति आस्था है तो मैं अब इससे भी बहुत आगेतक जाने का इरादा रखता हूँ।
मैं चाहूँगा कि आगेसे आप सब अपने-आपको अपनी मुट्ठियोंमें वन्द बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदाका ही नहीं, बल्कि आजकल नमक तैयार करनेके कड़ाहोंमें जो राष्ट्रीय सम्पदा पड़ी हुई है, उस सबका न्यासी या संरक्षक मानें। जरूरत पड़नेपर अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी इस सम्पदाकी रक्षा कीजिए। जब पुलिसवाले इन कड़ाहों पर छापा मारने आयें तो आप इन्हें घेरकर खड़े हो जायें और जबतक पुलिसवाले अपनी पाशविक शक्ति द्वारा आप लोगोंको विवश न कर दें तबतक आप उन्हें कड़ाहोंको हाथ न लगाने दें।
अगर आपको वे मारें तो भी आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। मैं आशा करता
हूँ कि अब गुजरातमें इतना साहस तो आ ही गया है। गुजरातकी शक्तिसे ही मुझे
शक्ति मिलती है। आपको कष्ट सहनेके लिए तैयार रहना चाहिए और हर कीमत
पर शान्ति बनाये रखनी चाहिए। ये कड़ाहोंको नष्ट करना चाहें तो करने दीजिए,
लेकिन तभी जब वे आपको गिरफ्तार कर लें अथवा मार-पीटकर विवश कर दें।
यह एक बिलकुल नया प्रयोग है। यह बात मैं आप लोगोंपर छोड़ता हूँ कि आप
जहाँ सम्भव हो, वहाँ ज्यादासे ज्यादा संख्या में नमक बनानेके कड़ाह तैयार करें।"
<small>१. यह अनुच्छेद १६-४-१९३० के '''बॉम्बे क्रॉनिकल''' में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६१. भाषण : उंबेरमें'''}}}}
{{Right|१५ अप्रैल, १९३०}}
'''सभामें उपस्थित ग्रामीण महिलाओंसे श्री गांधीने पूछा कि क्या वे पण्डित जवाहरलाल नेहरूको जानती हैं।'''
'''उन्होंने उत्तर दिया, "हम कैसे जान सकती हैं?" इसपर गांधीजी ने कहा :'''
यह आपकी नहीं, हमारी गलती है--हम मर्दोंकी गलती है, जिन्होंने अबतक इतनेसे ही सन्तोष माना है कि आप घर-गृहस्थी सँभालें, चूल्हा-चौका देखें, पानी भरें और घर बारकी सफाई करें। लेकिन अब आप लोग ऐसी स्थितिमें नहीं रहेंगी। अगर इस आन्दोलनको सफल होना है तो आप लोगोंको अधिक नहीं तो पुरुषोंके समान ही योगदान देना होगा।
'''जवाहरलाल नेहरूका उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा :'''
उनका समस्त भारतके लिए वही महत्त्व है जो हमारे लिए गुजरातमें सरदार वल्लभभाईका है। वे राष्ट्रको सेवामें अपने-आपको खपा रहे हैं और हम सबमें बड़े होनेके कारण ही उन्हें सजा दी गई है।
अभीतक तो मैंने आपसे यही कहा है कि अगर पुलिस आपकी बन्द मुट्ठियोंसे नमक छीननेकी कोशिश करती है तो आपको इसका विरोध करना चाहिए तथा पुलिसवाले आपको जैसे भी चोट पहुँचायें, उसे आप चुपचाप और विनम्रताके साथ सहन कर लें। अगर आपमें कष्ट सहनका वल और अपने उद्देश्यके प्रति आस्था है तो मैं अब इससे भी बहुत आगेतक जाने का इरादा रखता हूँ।
मैं चाहूँगा कि आगेसे आप सब अपने-आपको अपनी मुट्ठियोंमें वन्द बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदाका ही नहीं, बल्कि आजकल नमक तैयार करनेके कड़ाहोंमें जो राष्ट्रीय सम्पदा पड़ी हुई है, उस सबका न्यासी या संरक्षक मानें। जरूरत पड़नेपर अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी इस सम्पदाकी रक्षा कीजिए। जब पुलिसवाले इन कड़ाहों पर छापा मारने आयें तो आप इन्हें घेरकर खड़े हो जायें और जबतक पुलिसवाले अपनी पाशविक शक्ति द्वारा आप लोगोंको विवश न कर दें तबतक आप उन्हें कड़ाहोंको हाथ न लगाने दें।
अगर आपको वे मारें तो भी आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। मैं आशा करता
हूँ कि अब गुजरातमें इतना साहस तो आ ही गया है। गुजरातकी शक्तिसे ही मुझे
शक्ति मिलती है। आपको कष्ट सहनेके लिए तैयार रहना चाहिए और हर कीमत
पर शान्ति बनाये रखनी चाहिए। ये कड़ाहोंको नष्ट करना चाहें तो करने दीजिए,
लेकिन तभी जब वे आपको गिरफ्तार कर लें अथवा मार-पीटकर विवश कर दें।
यह एक बिलकुल नया प्रयोग है। यह बात मैं आप लोगोंपर छोड़ता हूँ कि आप
जहाँ सम्भव हो, वहाँ ज्यादासे ज्यादा संख्या में नमक बनानेके कड़ाह तैयार करें।"१
<small>१. यह अनुच्छेद १६-४-१९३० के '''बॉम्बे क्रॉनिकल''' में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : उंबेरमें|२७३}}</noinclude>आपके कष्ट सहन करने से न केवल पूर्ण स्वराज्यकी कल्पना साकार होगी, बल्कि उसकी रक्षा के लिए एक अहिंसक सेना तैयार होगी। नमकके कड़ाहोंकी रक्षा करने के लिए महिलाओंको पुरुषोंके साथ शामिल नहीं होना चाहिए। मैं सरकारको इतना भला तो अब भी मानता हूँ कि वह महिलाओंके साथ नहीं लड़ेगी। उसे महिलाओंसे लड़ने के लिए उकसाना हमारी गलती होगी। जबतक सरकार अपना ध्यान पुरुषों तक ही सीमित रखती है, यह लड़ाई पुरुषोंकी ही रहेगी। जब सरकार सीमाका उल्लंघन कर जायेगी तब महिलाओंके मार-पीट और जोर-जुल्म सहनेका अवसर आयेगा और फिर तो उन्हें अपनी इस क्षमताका परिचय देनेका पूरा मौका मिलेगा। ऐसा कहनेका मौका न दिया जाये कि पुरुषोंने यह बात अच्छी तरह समझते हुए कि अगर महिलाएँ उनके साथ होंगी तो ये सुरक्षित रहेंगे, अपने बचाव के लिए उस संघर्ष में महिलाओंकी आड़ ली है, जिसे किसी अच्छी संज्ञाके अभाव में, आक्रामक अहिंसा कहा जा सकता है। महिलाओंके लिए उनके सामने मैंने विनम्रतापूर्वक जो कार्यक्रम रखा है, उसमें पर्याप्तसे अधिक काम है और ये जिसनी साहसिकताका परिचय दे सकती हैं और जितना खतरा उठा सकती हैं, सबकी गुंजाइश है। अहमदाबादके श्रमिक संघने शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम अपने हाथों में लिया है। अहमदाबादमें गैरकानूनी ढंगसे बनाया नमक बेचनेका काम अब बन्द हो गया है। इस कामको स्वयंसेवकोंके दल भेजकर गांवोंमें चलाया जायेगा।
'''उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक या तो भोजनकी व्यवस्था स्वयं करें अथवा उनके लिए जो कुछ भी बनाया जाता है, उसे खायें। अलग-अलग रुचिके लोगोंके लिए अलग-अलग रसोईघरोंका प्रबन्ध करना सम्भव नहीं है। यह तो आत्मशुद्धिकी लड़ाई है,इसलिए आपको अपनी सभी अवांछनीय आदतोंको छोड़ देना होगा। आपमें पूरा अनुशासन और कठिनाइयाँ सहनेकी शक्ति होनी चाहिए। जो लोग अनुशासनका पालन नहीं कर सकते, वे शुरूमें ही अलग हो जायें। किन्तु वे समाज या राष्ट्रको धोखा नवें। यदि थोड़े-बहुत सच्चे स्वयंसेवक भी साथ रहे, तो संघर्ष जारी रहेगा। इस संघर्षका आरम्भ बहुत अच्छा रहा है और इसके लिए गुजरातको काफी श्रेय मिला है। आप लोग ऐसा काम करें जिससे किसीको यह कहनेका मौका न मिले कि हम गुजरातकी गलतियों और चूकोंके कारण यह लड़ाई हार गये।१'''
[ अंग्रेजीसे ]
'''हिन्दू,''' १६-४-१९३०
<small>१. यह अनुच्छेद बॉम्बे क्रॉनिकल में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small>
४३-१८<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : उंबेरमें|२७३}}</noinclude>आपके कष्ट सहन करने से न केवल पूर्ण स्वराज्यकी कल्पना साकार होगी, बल्कि उसकी रक्षा के लिए एक अहिंसक सेना तैयार होगी। नमकके कड़ाहोंकी रक्षा करने के लिए महिलाओंको पुरुषोंके साथ शामिल नहीं होना चाहिए। मैं सरकारको इतना भला तो अब भी मानता हूँ कि वह महिलाओंके साथ नहीं लड़ेगी। उसे महिलाओंसे लड़ने के लिए उकसाना हमारी गलती होगी। जबतक सरकार अपना ध्यान पुरुषों तक ही सीमित रखती है, यह लड़ाई पुरुषोंकी ही रहेगी। जब सरकार सीमाका उल्लंघन कर जायेगी तब महिलाओंके मार-पीट और जोर-जुल्म सहनेका अवसर आयेगा और फिर तो उन्हें अपनी इस क्षमताका परिचय देनेका पूरा मौका मिलेगा। ऐसा कहनेका मौका न दिया जाये कि पुरुषोंने यह बात अच्छी तरह समझते हुए कि अगर महिलाएँ उनके साथ होंगी तो ये सुरक्षित रहेंगे, अपने बचाव के लिए उस संघर्ष में महिलाओंकी आड़ ली है, जिसे किसी अच्छी संज्ञाके अभाव में, आक्रामक अहिंसा कहा जा सकता है। महिलाओंके लिए उनके सामने मैंने विनम्रतापूर्वक जो कार्यक्रम रखा है, उसमें पर्याप्तसे अधिक काम है और ये जिसनी साहसिकताका परिचय दे सकती हैं और जितना खतरा उठा सकती हैं, सबकी गुंजाइश है। अहमदाबादके श्रमिक संघने शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम अपने हाथों में लिया है। अहमदाबादमें गैरकानूनी ढंगसे बनाया नमक बेचनेका काम अब बन्द हो गया है। इस कामको स्वयंसेवकोंके दल भेजकर गांवोंमें चलाया जायेगा।
'''उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक या तो भोजनकी व्यवस्था स्वयं करें अथवा उनके लिए जो कुछ भी बनाया जाता है, उसे खायें। अलग-अलग रुचिके लोगोंके लिए अलग-अलग रसोईघरोंका प्रबन्ध करना सम्भव नहीं है। यह तो आत्मशुद्धिकी लड़ाई है,इसलिए आपको अपनी सभी अवांछनीय आदतोंको छोड़ देना होगा। आपमें पूरा अनुशासन और कठिनाइयाँ सहनेकी शक्ति होनी चाहिए। जो लोग अनुशासनका पालन नहीं कर सकते, वे शुरूमें ही अलग हो जायें। किन्तु वे समाज या राष्ट्रको धोखा नवें। यदि थोड़े-बहुत सच्चे स्वयंसेवक भी साथ रहे, तो संघर्ष जारी रहेगा। इस संघर्षका आरम्भ बहुत अच्छा रहा है और इसके लिए गुजरातको काफी श्रेय मिला है। आप लोग ऐसा काम करें जिससे किसीको यह कहनेका मौका न मिले कि हम गुजरातकी गलतियों और चूकोंके कारण यह लड़ाई हार गये।१'''
[अंग्रेजीसे]
'''हिन्दू,''' १६-४-१९३०
<small>१. यह अनुच्छेद बॉम्बे क्रॉनिकल में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small>
४३-१८<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}}
{{Right|१६ अप्रैल, १९३०}}
चि० महालक्ष्मी,
तुम्हारा प्यारा-सा पत्र मुझे मिला था। जवाब देने में देर हुई समय नहीं मिलता। मैं आज सवेरे दो बजे उठा हूँ।
तुमसे मैं पूरा-पूरा काम लूंगा। तुम दोनोंको मैं समझ गया हूँ। तुम्हारे निश्चय उत्तम है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ६७९५ ) की फोटो नकलसे।
{{Right|'''२६३. अस्पृश्यता'''}}
हिन्दू-मुस्लिम एकताकी भाँति अस्पृश्यता निवारणके बारेमें भी गलतफहमी फैली दिखाई देती है। कहा जाता है कि मैं स्वराज्यकी खातिर अस्पृश्योंके हितोंका बलिदान कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि लाखों अछूत भाई मेरे बारेमें ऐसी किसी बातपर विश्वास नहीं करेंगे। मेरे लिए तो जैसे कौमी एकताके बिना, वैसे ही अस्पृश्यता-निवारणके बिना भी स्वराज्य नहीं हो सकता। लेकिन मेरा यह निश्चित विश्वास है कि बगैर स्वराज्यके न कौमी एकता सम्पन्न हो सकती है और न अस्पृश्यता-निवारण ही। इस बातको देखनेके लिए बहुत कोशिश करनेकी जरूरत नहीं है कि शासकोंका स्वार्थ हममें फूट कायम रखनेमें ही है जैसे हिन्दू-मुस्लिम एकताकी उनके मनमें कोई चाह नहीं है वैसे ही अस्पृश्यता निवारणकी उनमें कोई इच्छा नहीं है।
राजस्वके साधनोंपर विचार करते हुए पिछले दिनों मैंने यह बताने की कोशिश की थी कि इस सरकारकी नींव अनीतिपर कायम है। उसी प्रकार यह सरकार हमारी कमजोरियों और हमारी बुराइयोंपर फूली फली है।
नासिककी शर्मनाक घटनाको ही लीजिए। सरकार जानती है कि सनातनियोंका पक्ष गलत है। फिर भी उसने क्या किया ? चूँकि सनातनियोंके शिविरमें बहुत शक्तिशाली लोग हैं, इसलिए सरकारने अछूतोंकी माँगोंको ठुकरा दिया। अधिकारी यदि चाहते तो सनातनियोंको बुलाकर उनके साथ बातचीत कर सकते थे। अछूतोंको भी वे समझा सकते थे और झगड़ा शुरू न करनेको कह सकते थे। लेकिन इसके लिए निष्पक्ष मन और निःस्वार्थताकी जरूरत होती पर सरकार निःस्वार्थ नहीं है। वह तो विभिन्न पक्षोंके झगड़ोंपर खुशी मनाती है और आखिरमें जो मजबूत होता है, उसका साथ देती है। मैं जानता हूँ कि बहुतेरे भले परन्तु अनजान अंग्रेज मेरे इस<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}}
{{Right|१६ अप्रैल, १९३०}}
चि० महालक्ष्मी,
तुम्हारा प्यारा-सा पत्र मुझे मिला था। जवाब देने में देर हुई समय नहीं मिलता। मैं आज सवेरे दो बजे उठा हूँ।
तुमसे मैं पूरा-पूरा काम लूंगा। तुम दोनोंको मैं समझ गया हूँ। तुम्हारे निश्चय उत्तम है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ६७९५ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२६३. अस्पृश्यता'''}}
हिन्दू-मुस्लिम एकताकी भाँति अस्पृश्यता निवारणके बारेमें भी गलतफहमी फैली दिखाई देती है। कहा जाता है कि मैं स्वराज्यकी खातिर अस्पृश्योंके हितोंका बलिदान कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि लाखों अछूत भाई मेरे बारेमें ऐसी किसी बातपर विश्वास नहीं करेंगे। मेरे लिए तो जैसे कौमी एकताके बिना, वैसे ही अस्पृश्यता-निवारणके बिना भी स्वराज्य नहीं हो सकता। लेकिन मेरा यह निश्चित विश्वास है कि बगैर स्वराज्यके न कौमी एकता सम्पन्न हो सकती है और न अस्पृश्यता-निवारण ही। इस बातको देखनेके लिए बहुत कोशिश करनेकी जरूरत नहीं है कि शासकोंका स्वार्थ हममें फूट कायम रखनेमें ही है जैसे हिन्दू-मुस्लिम एकताकी उनके मनमें कोई चाह नहीं है वैसे ही अस्पृश्यता निवारणकी उनमें कोई इच्छा नहीं है।
राजस्वके साधनोंपर विचार करते हुए पिछले दिनों मैंने यह बताने की कोशिश की थी कि इस सरकारकी नींव अनीतिपर कायम है। उसी प्रकार यह सरकार हमारी कमजोरियों और हमारी बुराइयोंपर फूली फली है।
नासिककी शर्मनाक घटनाको ही लीजिए। सरकार जानती है कि सनातनियोंका पक्ष गलत है। फिर भी उसने क्या किया ? चूँकि सनातनियोंके शिविरमें बहुत शक्तिशाली लोग हैं, इसलिए सरकारने अछूतोंकी माँगोंको ठुकरा दिया। अधिकारी यदि चाहते तो सनातनियोंको बुलाकर उनके साथ बातचीत कर सकते थे। अछूतोंको भी वे समझा सकते थे और झगड़ा शुरू न करनेको कह सकते थे। लेकिन इसके लिए निष्पक्ष मन और निःस्वार्थताकी जरूरत होती पर सरकार निःस्वार्थ नहीं है। वह तो विभिन्न पक्षोंके झगड़ोंपर खुशी मनाती है और आखिरमें जो मजबूत होता है, उसका साथ देती है। मैं जानता हूँ कि बहुतेरे भले परन्तु अनजान अंग्रेज मेरे इस<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}}
{{Right|१६ अप्रैल, १९३०}}
चि० महालक्ष्मी,
तुम्हारा प्यारा-सा पत्र मुझे मिला था। जवाब देने में देर हुई समय नहीं मिलता। मैं आज सवेरे दो बजे उठा हूँ।
तुमसे मैं पूरा-पूरा काम लूंगा। तुम दोनोंको मैं समझ गया हूँ। तुम्हारे निश्चय उत्तम है।
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गुजराती (जी० एन० ६७९५ ) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''२६३. अस्पृश्यता'''}}}}
हिन्दू-मुस्लिम एकताकी भाँति अस्पृश्यता निवारणके बारेमें भी गलतफहमी फैली दिखाई देती है। कहा जाता है कि मैं स्वराज्यकी खातिर अस्पृश्योंके हितोंका बलिदान कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि लाखों अछूत भाई मेरे बारेमें ऐसी किसी बातपर विश्वास नहीं करेंगे। मेरे लिए तो जैसे कौमी एकताके बिना, वैसे ही अस्पृश्यता-निवारणके बिना भी स्वराज्य नहीं हो सकता। लेकिन मेरा यह निश्चित विश्वास है कि बगैर स्वराज्यके न कौमी एकता सम्पन्न हो सकती है और न अस्पृश्यता-निवारण ही। इस बातको देखनेके लिए बहुत कोशिश करनेकी जरूरत नहीं है कि शासकोंका स्वार्थ हममें फूट कायम रखनेमें ही है जैसे हिन्दू-मुस्लिम एकताकी उनके मनमें कोई चाह नहीं है वैसे ही अस्पृश्यता निवारणकी उनमें कोई इच्छा नहीं है।
राजस्वके साधनोंपर विचार करते हुए पिछले दिनों मैंने यह बताने की कोशिश की थी कि इस सरकारकी नींव अनीतिपर कायम है। उसी प्रकार यह सरकार हमारी कमजोरियों और हमारी बुराइयोंपर फूली फली है।
नासिककी शर्मनाक घटनाको ही लीजिए। सरकार जानती है कि सनातनियोंका पक्ष गलत है। फिर भी उसने क्या किया ? चूँकि सनातनियोंके शिविरमें बहुत शक्तिशाली लोग हैं, इसलिए सरकारने अछूतोंकी माँगोंको ठुकरा दिया। अधिकारी यदि चाहते तो सनातनियोंको बुलाकर उनके साथ बातचीत कर सकते थे। अछूतोंको भी वे समझा सकते थे और झगड़ा शुरू न करनेको कह सकते थे। लेकिन इसके लिए निष्पक्ष मन और निःस्वार्थताकी जरूरत होती पर सरकार निःस्वार्थ नहीं है। वह तो विभिन्न पक्षोंके झगड़ोंपर खुशी मनाती है और आखिरमें जो मजबूत होता है, उसका साथ देती है। मैं जानता हूँ कि बहुतेरे भले परन्तु अनजान अंग्रेज मेरे इस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{Right||अस्पृश्यता|२७५}}</noinclude>कथनपर निरर्थक ही आपत्ति करेंगे, लेकिन मैं उनसे यही कहूँगा कि मेरा यह कथन
रात-दिनके अनुभवपर आधारित है। मैं यह नहीं कहता कि हर बार सरकार इरादतन् ऐसा पक्षपात किया करती है। परन्तु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' और 'फूट डालो और राज्य करो', ये तो सरकारी हलकोंके लिए सामान्य बातें हो गई हैं।
अपने इस निश्चित विश्वासके बावजूद यदि मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूँ
और स्वराज्य-साधनाकी गतिको अटकाऊँ तो मैं अल्पसंख्यकों और अछूतोंके साथ
अन्याय करूँगा। मैं मानता हूँ कि जिस क्षण हमें, हममें से हरएकके अन्दर जो शक्ति
छिपी हुई है, उसका ज्ञान हो जायेगा उसी क्षण हम स्वतन्त्र हो जायेंगे और हम
सच्ची एकताकी ज्योतिका अनुभव करेंगे और 'अछूत' भी अनुभव करेंगे कि उनमें
एक नई शक्ति आ गई है।
हम याद रखें कि सत्याग्रहियोंके जत्थोंमें मुसलमान भी हैं, दूसरे धर्मवाले भी हैं और अछूत भी हैं- - चाहे बहुत थोड़ी तादादमें ही क्यों न हों। हकीकत तो यह है कि आज उन्हीं लोगोंके हाथों स्वराज्य-मन्दिरकी नींव डाली जा रही है, जो कौमी एकता, अधिकार और अवसरकी समानता तथा अस्पृश्यता निवारणको अपने धर्मका अंग मानते हैं।
अंग्रेजोंके आनेसे हिन्दुओंमें विचार जागृति हुई और अस्पृश्योंको अपने अधिकारोंका भान हुआ, इस मोहक विचारमें पढ़कर अछूत भाई राष्ट्रीय लक्ष्यकी प्राप्तिकी ओरसे विमुख न हो जायें। इस बातमें जो तथ्य है वह है, लेकिन अंग्रेज लोग ऐसा परोपकारी वृत्तिसे प्रेरित होकर हिन्दुस्तानमें नहीं आये थे। उनकी सभ्यता, बल्कि कहिए तमाम पश्चिमी देशोंकी सभ्यता, उस प्रकारके किसी भेद-भावको मान्यता नहीं देती जिस प्रकारका भेद-भाव अवदशाको प्राप्त हिन्दू धर्ममें चल रहा है। यदि अंग्रेज हमें गुलाम न बनाते, तब भी हम इस अच्छाईसे लाभ उठा सकते थे। अंग्रेजोंकी यह आलोचना मैं उनके मनुष्य रूपकी नहीं बल्कि शासक जातिके रूपकी कर रहा हूँ। मनुष्यके नाते तो वे उतने ही अच्छे हैं जितने अच्छे हम हैं। कुछ बातोंमें वे हमसे अच्छे हैं, तो कुछमें बुरे भी हो सकते हैं। लेकिन शासकोंके नाते वे सर्वथा अवांछनीय हैं। शासकोंके रूपमें वे न हमारी कोई भलाई कर सकते हैं और न उन्होंने की ही है। उन्होंने हमारी बुराइयोंको उकसाया है, उन्हें और भी गम्भीर बनाया है और चूंकि हममें हीन भावना आ गई है, इसलिए उनके सम्पर्कसे हमारा नैतिक ह्रास होता है। मैंने देखा है कि हम उनके सामने कुछ और व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे कुछ और। यह पुंसत्वहीनता है और मनुष्यको पुंसत्वहीन बनानेकी प्रक्रिया है। यह चीज सर्वथा अस्वाभाविक है। गोखलेने कहा था कि " हममें से बड़ेसे-बड़े को भी उनके सामने झुकना पड़ता है।" पर जब सचमुच अंग्रेजोंकी आंखें खुलेंगी तब उन्हें पता चलेगा कि उनका शासन जितना पतनकारी हमारे लिए साबित हुआ है, उससे कुछ कम पतनकारी उनके लिए भी सिद्ध नहीं हुआ है।
अब दो शब्द 'अस्पृश्यों से कहूंगा। मैंने उन्हें सलाह दी है और वही सलाह
फिर दोहराता हूँ कि सत्याग्रही तरीकेसे भी सनातनी मन्दिरोंमें प्रवेश करनेका उनका
प्रयत्न सर्वथा अनावश्यक है। 'अस्पृश्यों' के लिए मन्दिरोंके द्वार खुलवाना 'सवर्ण'<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२०
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हिन्दुओंका कर्तव्य है। उपयुक्त समय आनेपर सत्याग्रह करना 'सवर्णों' का काम है। अस्पृश्योंको यह मालूम है कि कांग्रेसने इसी उद्देश्यसे जमनालालजी की अध्यक्षतामें एक समिति बनाई है। वे जानते हैं कि अस्पृश्यता निवारणके क्षेत्रमें बहुत प्रगति हुई है। उन्हें यह भी मालूम है कि सारे देशमें ऐसे सैकड़ों सच्चे और जाने-माने हिन्दू मिलेंगे जो अस्पृश्यता निवारण के लिए अपने प्राणोंकी बाजी लगा देने को तैयार हैं। सुधारक लोग हिन्दू-समाजसे इस बुराई को दूर कर देना अपना कर्तव्य और योग्य प्रायश्चित मानते हैं। अस्पृश्योंको यह याद रखना चाहिए कि उनमें से अधिकांश लोग आज जीवन-मरणके संघर्ष में सन्नद्ध है। मैंने जो कुछ कहा है, उसमें निहित सचाईको यदि वे महसूस करते हों तो वे कमसे कम इस संघर्षके दौरान सत्याग्रह स्थगित कर देंगे, भले ही उनमें से सभी लोग उसमें शामिल होनेवाले न हों। वैसे कुछ लोग तो उसमें शामिल हो चुके हैं। हिन्दू सुधारकोंने यह काम करनेका वीड़ा कोई परमार्थकी भावनासे नहीं उठाया है, अस्पृश्योंपर कृपा करनेके लिए भी नहीं उठाया है और राजनीति में उनसे लाभ उठानेके लिए तो कदापि नहीं उठाया है। उन्होंने यह काम करनेका जिम्मा इसलिए लिया है कि हिन्दू धर्मको उनकी जो कल्पना है, उसका। यह तकाजा है कि ये इसे करें। या तो उन्हें हिन्दू धर्मको छोड़ देना है या फिर। इस दावे को सत्य सिद्ध करना है कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्मका अंग नहीं बल्कि उसके सिरपर लगा कलंकका ऐस टीका है जिसे मिटा देना है।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२६४. राक्षसी कर'''}}}}
नमक-कर के परिणामोंके बारेमें प्राप्त हर नये अनुभव के साथ यह कर अधिकाधिक राक्षसी दीखने लगता है। इन दिनों में गुजरातके नमक-क्षेत्र में रह रहा हूँ और मेरा सारा घूमना-फिरना इसी क्षेत्रमें होता है। फलतः मुझे इस बातके प्रमाण मिलते ही रहते हैं कि ग्रामवासियों द्वारा नमक तैयार करनेपर लगाई गई पाबन्दीके कारण इस क्षेत्रके गाँव बरबाद हो गये हैं। इस जमीनका लोग एक यही उपयोग तो कर सकते हैं कि प्रकृति हर महीने इसमें काफी मात्रामें जो नमक छोड़ जाती है उसे वे निकालें। इन क्षेत्रोंमें गरीबोंका यही मुख्य धन्धा था। आज यह सारी जमीन परती पड़ी हुई है। खुद दांडीका इतिहास बड़ा दर्दनाक है। यह एक सुरम्य समुद्र तटीय स्थान है। पहले यहाँ एक 'दीवादांडी' दीपस्तम्भ-- हुआ करता था और उसी परसे इसका नाम दांडी पड़ा। आज यह एक वीरान गाँव है। एक यूरोपीयने और बादमें कुछ भारतीयोंने प्राकृतिक परिस्थितियोंके खिलाफ यहाँकी जमीनको खेती करने योग्य बनानेकी कोशिश की थी। समुद्र-तटका यह क्षेत्र वैसे बड़ा सुन्दर और शान्तिदायी है, किन्तु जब मैं यहाँ लहरोंका मधुर और दिव्य संगीत सुनते हुए घूमता हूँ तो मुझे चारों ओर टूटे-फूटे मेड़ोंसे घिरे ऐसे खेत देखनेको मिलते<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२१
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राक्षसी कर|२७७}}</noinclude>हैं जिनमें हरियालीका नामोनिशान तक नहीं होता। ये खेत मानवके निष्फल धमकी
कहानी कहते हैं। लेकिन घृणित नमक एकाधिकारके समाप्त होते ही यही खेत नमक के मूल्यवान भण्डार बन जायेंगे, जिनमें से ग्रामीण लोग ताजा, सफेद और चमकता हुआ नमक निकालेंगे और सो भी बिना ज्यादा मेहनतके । यह उन्हें उसी प्रकार रोजी
देगा जिस प्रकार कभी उनके पूर्वजोंको दिया करता था।
महादेव देसाई यह दिखा ही चुके हैं कि सरकार द्वारा जारी की गई यह सूचना कि यहाँका नमक स्वास्थ्यके लिए हानिकर है, एक दुष्टतापूर्ण झूठ है।'सरकार द्वारा बनाये अमानवीय विनियमों के बावजूद आसपास के लोग प्रकृति द्वारा बहुलतासे दिये गये यहीके नमकका उपयोग करते आये। ऐसा नहीं लगता कि उसका उपयोग करनेसे उनका कोई नुकसान हुआ हो। इस क्षेत्रके हजारों लोग पिछले हफ्ते से यही नमक खा रहे हैं और इससे उन्हें कोई हानि नहीं हुई है। सुना है, कोंकणमें लोग इधर कई वर्षोंसे स्वदेशी नमकका ही उपयोग करते रहे हैं। वे कराधीन नमक के मुकाबले इसे स्वदेशी कहते हैं और जिस नमकपर कर लगता है उसे सरकारी या विदेशी नमक कहते हैं, हालांकि यह नमक भी प्राप्त हुआ है भारतीय भूमि और भारतीय समुद्र से ही इस अंक में मैं जो नुस्खा छाप रहा हूँ उसे दो सावधा व्यक्तियोंने तैयार किया है। ये दोनों विज्ञानके स्नातक हैं। इस नुस्खके मुताबिक हर परिवार बिना किसी खर्चके अपनी जरूरतका नमक स्वयं तैयार कर सकता है। इसके लिए जो कुछ करना है वह इतना ही कि परिवारका कोई लड़का लोटा-भर नमकीन पानी ले आये। उस पानीको छानकर किसी छिछले बर्तन में आगके पास रख देना है और फिर नुस्खे में बताये तरीकेसे जो कुछ करना है, कर देना है। इतने से ही हर परिवारको अपनी हर रोजकी जरूरतके लायक पूरा नमक मिल जाता है जो बाजारमें मिलनेवाले गन्दे 'सरकारी' या 'विदेशी' नमकसे कहीं अधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यप्रद होता है। नमक सत्याग्रही (जिनकी तादाद अब हजारों तक पहुँच गई है) चुटकी भर नमक भी बरबाद न करें। चाहे कोई कानून हो या नहीं, अब किसीके पास बाजारका नमक खानेका कोई कारण नहीं रह गया है। जहाँ नमक क्षेत्र न ह वहाँ भी स्वदेशी नमक दाखिल करना चाहिए। इसे थोड़ी-थोड़ी मात्रामें बड़ी आसानीसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। सरकारकी हिम्मत हो तो वह भले ही हजारों नर-नारियोंपर मुकदमे चलाये और अपने अधिकारियोंको उनकी तलाशी लेते फिरने और जबरदस्ती नमक छीननेके लिए भेजे। वे ऐसा कहते हैं तो कहें कि 'नमक- कानून उन्हें इसकी सत्ता देता है।' मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि नमक कर से सम्बन्धित विनियम इस करके ही समान अमानवीय हैं। यदि इन विनियमोंकी प्रारम्भिक अवस्थामें इनपर अमल किये जानेका इतिहास मालूम होता तो यही पता लगता कि लोगोंको अपने स्वाभाविक धन्धेसे वंचित करने और लोहूसना सरकारी नमक खरीदने को मजबूर करनेके लिए इन राक्षसी विनियमोंपर उतने
ही राक्षसी ढंगसे अमल किया गया। पाठकोंको मालूम होना चाहिए कि अवैध नमकको
<small>१.महादेव देसाई का लेख "सफेद झूठ", १०-४-१९३० के यंग इंडिया में छपा था।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२२
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यहाँ-वहाँ ले जानेपर रोक लगानेके लिए, उन पालकियोंकी भी तलाशी ली जाती थी जिनमें पर्दानशीन औरतें बैठी होती थीं। यदि आज हमें इस अन्यायपूर्ण करको समाप्त करवानेके लिए कष्ट झेलने पड़ रहे हैं तो इसका मतलब इतना ही कि हमने अतीतमें जो उदासीनता दिखाई और जिस लज्जास्पद ढंगसे इस करको सिर-माथे लिया, अब हम उसीके लिए कुछ थोड़ा-सा प्रायश्चित्त कर रहे हैं। इस प्रकार पाठक देखेंगे कि यद्यपि यह कर अपने-आपमें काफी भारी है, लेकिन खटकनेवाली चीज केवल यह कर ही नहीं है। इसमें ऐसी कोई चीज ही नहीं है जो इसके देशको तनिक भी कम करें। इस करसे जो आय होती है, राष्ट्रको केवल उतना ही नहीं गँवाना पड़ता है। इस करके रूपमें राष्ट्रको शायद प्रतिवर्ष २० करोड़ रुपये देने पड़ते हैं; किन्तु इसके अतिरिक्त नमकके मनमाने तौर पर नष्ट कर दिये जाने अथवा लोगोंको नमक न निकालने देनेके कारण उसे उतनी ही और राशिका घाटा होता है।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया''', १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२६५. सिंहावलोकन'''}}}}
गुजरातकी जनताने सामूहिक रूपसे जैसा उत्साह दिखाया है, यह आशातीत है। बम्बई और उसके उपनगरोंने भी कुछ कम नहीं किया है। और इस एकान्त जगहमें मुझे सारे देशसे धीरे-धीरे जो समाचार मिल रहे हैं वे भी कम उत्साहप्रद नहीं है। मेरे लिए यह अत्यन्त हर्षकी बात है कि महाराष्ट्र एक बार फिर एक हो गया है और श्री न० चि० केलकर तथा उनके मित्र इस संग्राममें शामिल हो चुके हैं। श्रीयुत केलकर और श्रीयुत अणेका विधान सभासे इस्तीफा दे देना इस संघर्षकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं। बंगाल भारतका सबसे तूफानी प्रदेश है। वह जीवनसे तरंगित हो रहा है। उसकी दलबन्दी ही उसकी महान् जागृतिकी सूचक है। अगर बंगालने ठीक ढंगसे उत्साह दिखाया तो सम्भवतः वह सब प्रान्तोंसे आगे बढ़ जायेगा। मैं नहीं जानता कि कोई भी प्रान्त, यहाँतक कि महाराष्ट्र भी बंगालके जितना स्वेच्छया बलिदानके श्रेयका दावा कर सकता है। बंगालकी भावप्रवणता यदि उसकी एक कमजोरी है, तो वही उसकी एक महानतम शक्ति भी है। इसमें अहिंसाके लिए उत्सर्गकी ऐसी क्षमता है जिसे यदि ऐसी भाषाके प्रयोगको क्षम्य माना जाये तो, मैं उद्दाम उत्सर्ग-भाव कहूंगा। विद्यार्थियोंकी सभापर किये गये अकारण आकमणका श्री सेनगुप्तने जो जवाब दिया है, उसीने मुझे उक्त शब्दका प्रयोग करनेकी प्रेरणा दी है। बंगालके विद्यार्थियोंने जो कदम उठाया है और उसके जवाब में पुलिसने जो जंगली रुख अख्तियार किया है, उसकी सम्भावनाओंके आगे डा० सुरेश बनर्जी और दूसरोंका कारावास फीका पड़ जाता है। मैं जानता हूँ कि अगर कलकत्ताके पुलिस कमिश्नरने इन पंक्तियोंको पढ़ा तो वे क्या कहेंगे। मैं उन्हें यह कहते हुए सुनता हूँ कि 'तुम मेरे बंगालको नहीं पहचानते।' लेकिन मैं कहता हूँ कि जितनी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२३
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|सिंहावलोकन|२७९}}</noinclude>अच्छी तरह मैं उनके बंगाल को जानता हूँ उतना तो वह कभी जान ही नहीं सकेंगे उनका बंगाल तो सरकारका बनाया हुआ है। अगर सरकार बंगालको सताना छोड़ दे और भारतको अपने इच्छित व्येय तक पहुँचनेसे रोके नहीं तो बंगाल भी भारत के बड़े से बड़े प्रान्त के जितना ही शान्त और सौम्य बन जाये। आज बंगालमें हिंसाकी जो भावना लहरें मार रही है, उसका कारण उसके अनेक कष्ट हैं। लेकिन मुझे आशा है बंगाल समझदारीसे काम लेगा और वह यह देख सकेगा कि अहिंसा हमारा रामबाण है। सब तरहके कष्ट अहिंसादेवीकी बेदीपर अर्पण
कर दिये जाने चाहिए।
जलियांवाला हत्याकाण्डके तुरन्त बादसे ही मैं बराबर यह आशा व्यक्त करता आया हूँ कि अगली बार जब कभी हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्सेमें इस तरह गोलियोंकी बौछार की जायेगी तो कोई भी पीठ दिखाकर न भागेगा, बल्कि छातीपर हाथ बाँधकर पूरी हिम्मत और 'जो होना हो सो हो जाये'-- के भावसे सीनेपर गोलियोंको झेलेगा। परीक्षाका यह समय मेरी आशासे भी पहले निकट आ रहा जान पड़ता है। और अगर हमें इस तरह सीना खोलकर गोलियों तथा संगीनकी मार सहने की तालीम लेनी है तो हमें जरा भी हिले-डुले बिना घुड़सवारों और डण्डेवालोंकी मार सहने की आदत डालनी चाहिए। मैं जानता हूँ कि इस तरहकी बातें कहना आसान है, लेकिन करना बहुत कठिन है। तथापि मैं देख रहा हूँ कि यदि हम अपने आपको सामूहिक अहिंसाके लिए भली-भाँति तैयार करना चाहते हों तो इसपर जोर दिये बिना छुटकारा नहीं। पिछले आठ दिनोंमें यह बात ठीक-ठीक साबित हो चुकी है कि देशमें सामूहिक अहिंसा पूरी तरह सम्भव है। धोलेराके नमक-क्षेत्रमें पुलिसने स्वयंसेवकोंके साथ जैसा जंगली और क्रूर बरताव किया और स्वयंसेवकोंने जिस धीरता और बहादुरीके साथ इस बर्बरताको सहा, उसका एक यथातथ्य चित्र महादेव देसाईने खींचा है। जब पुलिसने बम्बई में उद्दण्डता और कठोरतासे यद्यपि उसमें अपेक्षाकृत कुछ थोड़ा-सा विवेक भी जरूर शामिल था-- काम लिया तब वहां हजारों लोगोंने क्या किया, यह पण्डित मुकुन्द मालवीय द्वारा दिये सजीव वर्णनसे जाना जा सकता है। उनके विवरणका संक्षिप्त अनुवाद इस अंकमें अन्यत्र छापा जा रहा है। सरदार वल्लभभाईके पुत्र डाह्याभाई उस समय मौकेपर मौजूद थे। उनके विवरणसे भी पण्डित मुकुन्द मालवीयके विवरणकी मुख्य बातोंकी ताईद होती है।
पेरीनबाई और उनकी साथिनों तथा श्रीमती कमलादेवीने भी उस दिन अपूर्व साहस और शान्तिका परिचय दिया। लेकिन यहाँ मैं उनसे यह निवेदन किया चाहता हूँ कि यदि वे पुरुषोंकी लड़ाईके क्षेत्रसे बाहर रही होतीं तो अच्छा होता। बहनोंका इस तरह अपने-आपको खतरे में डालना, पुरुषोंसे स्त्रियोंके प्रति जिस वीरोचित व्यवहारकी अपेक्षा की जाती है उस वीरताके नियमके विरुद्ध है। कमसे कम इतना तो है ही कि अभी वह समय नहीं आया है। बहनें हजारोंकी संख्या में नमक बनायें, इस पर मुझे जरा भी ऐतराज न होगा। लेकिन वे ऐसी भीड़में जान-बूझकर कभी न पड़ें, जिसपर आक्रमण होनेकी सम्भावना हो। मैं अत्यन्त नम्रतापूर्वक उनके लिए एक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सिंहावलोकन|२७९}}</noinclude>अच्छी तरह मैं उनके बंगाल को जानता हूँ उतना तो वह कभी जान ही नहीं सकेंगे उनका बंगाल तो सरकारका बनाया हुआ है। अगर सरकार बंगालको सताना छोड़ दे और भारतको अपने इच्छित व्येय तक पहुँचनेसे रोके नहीं तो बंगाल भी भारत के बड़े से बड़े प्रान्त के जितना ही शान्त और सौम्य बन जाये। आज बंगालमें हिंसाकी जो भावना लहरें मार रही है, उसका कारण उसके अनेक कष्ट हैं। लेकिन मुझे आशा है बंगाल समझदारीसे काम लेगा और वह यह देख सकेगा कि अहिंसा हमारा रामबाण है। सब तरहके कष्ट अहिंसादेवीकी बेदीपर अर्पण
कर दिये जाने चाहिए।
जलियांवाला हत्याकाण्डके तुरन्त बादसे ही मैं बराबर यह आशा व्यक्त करता आया हूँ कि अगली बार जब कभी हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्सेमें इस तरह गोलियोंकी बौछार की जायेगी तो कोई भी पीठ दिखाकर न भागेगा, बल्कि छातीपर हाथ बाँधकर पूरी हिम्मत और 'जो होना हो सो हो जाये'-- के भावसे सीनेपर गोलियोंको झेलेगा। परीक्षाका यह समय मेरी आशासे भी पहले निकट आ रहा जान पड़ता है। और अगर हमें इस तरह सीना खोलकर गोलियों तथा संगीनकी मार सहने की तालीम लेनी है तो हमें जरा भी हिले-डुले बिना घुड़सवारों और डण्डेवालोंकी मार सहने की आदत डालनी चाहिए। मैं जानता हूँ कि इस तरहकी बातें कहना आसान है, लेकिन करना बहुत कठिन है। तथापि मैं देख रहा हूँ कि यदि हम अपने आपको सामूहिक अहिंसाके लिए भली-भाँति तैयार करना चाहते हों तो इसपर जोर दिये बिना छुटकारा नहीं। पिछले आठ दिनोंमें यह बात ठीक-ठीक साबित हो चुकी है कि देशमें सामूहिक अहिंसा पूरी तरह सम्भव है। धोलेराके नमक-क्षेत्रमें पुलिसने स्वयंसेवकोंके साथ जैसा जंगली और क्रूर बरताव किया और स्वयंसेवकोंने जिस धीरता और बहादुरीके साथ इस बर्बरताको सहा, उसका एक यथातथ्य चित्र महादेव देसाईने खींचा है। जब पुलिसने बम्बई में उद्दण्डता और कठोरतासे यद्यपि उसमें अपेक्षाकृत कुछ थोड़ा-सा विवेक भी जरूर शामिल था-- काम लिया तब वहां हजारों लोगोंने क्या किया, यह पण्डित मुकुन्द मालवीय द्वारा दिये सजीव वर्णनसे जाना जा सकता है। उनके विवरणका संक्षिप्त अनुवाद इस अंकमें अन्यत्र छापा जा रहा है। सरदार वल्लभभाईके पुत्र डाह्याभाई उस समय मौकेपर मौजूद थे। उनके विवरणसे भी पण्डित मुकुन्द मालवीयके विवरणकी मुख्य बातोंकी ताईद होती है।
पेरीनबाई और उनकी साथिनों तथा श्रीमती कमलादेवीने भी उस दिन अपूर्व साहस और शान्तिका परिचय दिया। लेकिन यहाँ मैं उनसे यह निवेदन किया चाहता हूँ कि यदि वे पुरुषोंकी लड़ाईके क्षेत्रसे बाहर रही होतीं तो अच्छा होता। बहनोंका इस तरह अपने-आपको खतरे में डालना, पुरुषोंसे स्त्रियोंके प्रति जिस वीरोचित व्यवहारकी अपेक्षा की जाती है उस वीरताके नियमके विरुद्ध है। कमसे कम इतना तो है ही कि अभी वह समय नहीं आया है। बहनें हजारोंकी संख्या में नमक बनायें, इस पर मुझे जरा भी ऐतराज न होगा। लेकिन वे ऐसी भीड़में जान-बूझकर कभी न पड़ें, जिसपर आक्रमण होनेकी सम्भावना हो। मैं अत्यन्त नम्रतापूर्वक उनके लिए एक<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सर्वथा अलग कार्यक्षेत्र सुझा चुका हूँ उस क्षेत्रमें काम करनेको वे पूरी तरह स्वतन्त्र हैं, और यहाँ उनसे अपना जौहर प्रकट करनेकी आशा रखी जाती है। उस क्षेत्रमें साहस और शूरताका परिचय देनेकी काफी गुंजाइश है।
हाँ, तो यदि हमें इस युद्धके अन्तिम प्रखर तापको सहना हो तो हमें घुड़सवारों और लाठीवालोंके हमलोंका अविचल रहकर सामना करना सीखना चाहिए और इस प्रयत्न में यदि हम घोड़ोंकी टापोंसे कुचले जायें, लाठियोंके प्रहारोंसे घायल हो जायें तो हमें इस सबको भी सहना चाहिए। ऐसे हमलोंके मौकोंपर सशस्त्र भीड़ पैर जमाकर डट जाती है और जवाबी कार्रवाई करती है। पर यदि हम अहिंसाका पाठ सीखना चाहते हैं तो हमें क्रुद्ध हुए बिना, कोई भी जवाबी हमला किये बिना अपनी जगहपर अटल खड़े रहकर उस सशस्त्र भीड़से अधिक साहसका परिचय देना चाहिए। तब डायरका नया अवतार अपनी आँखों देखेगा कि हम सीनोंपर गोलियाँ झेलने को तैयार खड़े हैं।
लोगोंने अपनी नमककी कड़ाहियों आदिकी रक्षा करना तो शुरू कर ही दिया है। लेकिन अगर हममें इस तरहकी पूरी-पूरी ताकत पैदा हो चुकी है तो हमारा काम नियमित और व्यवस्थित होना चाहिए। जैसे ही पुलिस हमला करने आये और हमारे सैनिकोंकी सजीव दीवारको तोड़कर भीतर घुसे, वैसे ही बहनें, अगर पुलिसवाले उन्हें मौका दें तो वहांसे हट जायें और पुरुषोंको घायल होने दें। दुनिया-भरके सशस्त्र युद्धोंमें यहीं किया जाता है; इस युद्ध में भी, जिसमें एक पक्षके लोग जान बूझकर निहत्थे रहना पसन्द करते हैं, बहनें इसी नीतिका पालन करें।
जब नमक के युद्ध में जूझनेवाले पुरुष न रह जायें तब बहनें, अगर उनमें हिम्मत हो तो, पुरुषोंके छोड़े हुए कामको हाथमें ले लें। लेकिन मुझे भरोसा है कि इस युद्ध में पुरुष अपने पौरुषका ठीक-ठीक परिचय देंगे।
कुछ लोगोंकी यह दलील है कि अगर लोग अपने पासका गैरकानूनी नमक न दें तो पुलिसको अधिकार है कि वह जबरदस्ती उनका नमक छीन लें। इस दलीलका जवाब मैं पहले ही दे चुका हूँ। यहाँ मैं ऐसी आलोचना करनेवालों को सिर्फ यह याद दिला देना चाहूँगा कि पक्के चोरोंको भी जबतक गिरफ्तार नहीं कर लिया जाता तबतक उनसे भी पुलिस चोरीका धन जबरदस्ती नहीं छीनती और गिरफ्तार करके लानेके बाद भी उनसे वह धन तभी लिया जाता है जब उनपर मुकदमा चलाना होता है और इसके बाद भी वह सम्पत्ति तबतक उस चोरकी ही मानी जाती हैं जबतक कि उसका जुर्म साबित न हो जाये और अदालत यह फैसला न दे दे कि वह सम्पत्ति उसकी नहीं थी और नमक सम्बन्धी विनियम पुलिसवालों को गिरफ्तार करनेवाले अधिकारी, अभियोगी और न्यायाधीश सब एक ही साथ बना देते हैं, यह तो मेरे इस आरोपका कोई उत्तर नहीं हुआ कि अधिकारियों द्वारा अपनाये तरीके बर्बरतापूर्ण है।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२५
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६६. अध्यक्षका सम्मान'''}}}}
कांग्रेस अध्यक्षको बड़े सस्ते में जयमाला मिल गई। मुझे अभी-अभी पण्डित मोतीलालजी का तार मिला है कि पण्डित जवाहरलालको छः महीने की सादी कंद हुई है। लेकिन राष्ट्रके प्रथम सेवकको एक दिनके लिए भी कैद करना सारे राष्ट्रका अपमान करना है । अध्यक्षको कैद करके सरकारने हमें चुनौती दी है कि जो करना हो करो हम जो कर सकते हैं वह यही कि आगे बढ़कर अपने सिर और अधिक कष्ट लें।इसका एकमात्र उपाय वर्तमान आन्दोलनको तीव्र और संगठित बनाना है। मैं जानता हूँ कि देशके नौजवान बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; तो भी मुझे कबूल करना चाहिए कि इस युद्धके प्रति देशके विद्यार्थियोंने जितना उत्साह दिखाया है, उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ है। उनमें अभी आत्म-विश्वास पैदा नहीं हुआ है। वे यह नहीं मानते कि स्वराज्य जल्दी ही आ रहा है। वे यह भी महसूस नहीं करते कि सरल श्रद्धा और तदनुसार आचरण द्वारा स्वराज्यके आगमन की घड़ीको जल्दी निकट खींच लाना उन्हींका काम है। लेकिन श्रद्धा देनेकी चीज उसका उद्गम स्थान भी हृदय ही है। देश बड़ी उत्सुकता के साथ देखेगा कि जो हजारों विद्यार्थी आज उपाधियों और प्रमाण-पत्रोंके पीछे पड़े हुए हैं, उनपर पण्डित जवाहरलालके इस कारावासका क्या प्रभाव पड़ता है?
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १७-४-१९१०
नहीं। वह हृदयकी वस्तु है, और
{{C|{{larger|'''२६७. स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र'''}}}}
रविवार तारीख १३ अप्रैल के दिन दांडीमें स्त्रियोंकी एक परिषद् हुई थी और उसके बाद दूसरी परिषद् १६ अप्रैलको वेजलपुरमें हुई। पहली परिषद् में मैंने लगभग सौ बहनोंके आनेकी आशा की थी; लेकिन हजार आई; दूसरीमें सिर्फ अहमदाबाद और बम्बईसे आनेवाली कुछ बहनों ही से मिलना था लेकिन सूरत जिलेकी बहनोंको इस बात का पता था, इसलिए वेजलपुरमें बहनोंकी संख्या दांडीकी अपेक्षा भी अधिक रही। यों यह दूसरी परिषद् हुई।
दांडीमें नीचे लिखे प्रस्ताव पास हुए:
<small>१. १३ अप्रैल के दिन दांडीमें गांधीजी का भाषण सुननेके बाद गुजरातकी स्त्री-परिषद् यह प्रस्ताव पास करती है कि वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ शराब और ताड़ीकी दुकानोंपर धरना देंगी, अर्थात् दुकानदारोंसे अपने इस धन्धेको छोड़ देनेकी प्रार्थना करेंगी तथा शराब और ताड़ी पीनेवालों से भी इस राक्षसी व्यसनको छोड़नेकी प्रार्थना करेंगी तथा इसी तरह विदेशी कपड़ोंके दुकानदारोंसे विदेशी<small><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
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कांग्रेस अध्यक्षको बड़े सस्ते में जयमाला मिल गई। मुझे अभी-अभी पण्डित मोतीलालजी का तार मिला है कि पण्डित जवाहरलालको छः महीने की सादी कंद हुई है। लेकिन राष्ट्रके प्रथम सेवकको एक दिनके लिए भी कैद करना सारे राष्ट्रका अपमान करना है । अध्यक्षको कैद करके सरकारने हमें चुनौती दी है कि जो करना हो करो हम जो कर सकते हैं वह यही कि आगे बढ़कर अपने सिर और अधिक कष्ट लें।इसका एकमात्र उपाय वर्तमान आन्दोलनको तीव्र और संगठित बनाना है। मैं जानता हूँ कि देशके नौजवान बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; तो भी मुझे कबूल करना चाहिए कि इस युद्धके प्रति देशके विद्यार्थियोंने जितना उत्साह दिखाया है, उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ है। उनमें अभी आत्म-विश्वास पैदा नहीं हुआ है। वे यह नहीं मानते कि स्वराज्य जल्दी ही आ रहा है। वे यह भी महसूस नहीं करते कि सरल श्रद्धा और तदनुसार आचरण द्वारा स्वराज्यके आगमन की घड़ीको जल्दी निकट खींच लाना उन्हींका काम है। लेकिन श्रद्धा देनेकी चीज उसका उद्गम स्थान भी हृदय ही है। देश बड़ी उत्सुकता के साथ देखेगा कि जो हजारों विद्यार्थी आज उपाधियों और प्रमाण-पत्रोंके पीछे पड़े हुए हैं, उनपर पण्डित जवाहरलालके इस कारावासका क्या प्रभाव पड़ता है?
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १७-४-१९१०
नहीं। वह हृदयकी वस्तु है, और
{{C|{{larger|'''२६७. स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र'''}}}}
रविवार तारीख १३ अप्रैल के दिन दांडीमें स्त्रियोंकी एक परिषद् हुई थी और उसके बाद दूसरी परिषद् १६ अप्रैलको वेजलपुरमें हुई। पहली परिषद् में मैंने लगभग सौ बहनोंके आनेकी आशा की थी; लेकिन हजार आई; दूसरीमें सिर्फ अहमदाबाद और बम्बईसे आनेवाली कुछ बहनों ही से मिलना था लेकिन सूरत जिलेकी बहनोंको इस बात का पता था, इसलिए वेजलपुरमें बहनोंकी संख्या दांडीकी अपेक्षा भी अधिक रही। यों यह दूसरी परिषद् हुई।
दांडीमें नीचे लिखे प्रस्ताव पास हुए:
<small>१. १३ अप्रैल के दिन दांडीमें गांधीजी का भाषण सुननेके बाद गुजरातकी स्त्री-परिषद् यह प्रस्ताव पास करती है कि वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ शराब और ताड़ीकी दुकानोंपर धरना देंगी, अर्थात् दुकानदारोंसे अपने इस धन्धेको छोड़ देनेकी प्रार्थना करेंगी तथा शराब और ताड़ी पीनेवालों से भी इस राक्षसी व्यसनको छोड़नेकी प्रार्थना करेंगी तथा इसी तरह विदेशी कपड़ोंके दुकानदारोंसे विदेशी<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वस्त्रका व्यापार बन्द करने और विदेशी कपड़ोंके खरीदारोंसे विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रार्थना करेंगी और इन कामोंके लिए दुकानोंपर धरना देंगी।
२. इस परिषद्का विश्वास है कि विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार खादीके द्वारा ही किया जा सकता है; अतएव यहाँ उपस्थित स्त्रियां भविष्य में खादीका ही उपयोग करेंगी और यथासम्भव स्वयं प्रतिदिन सूत कातेंगी, रुई पीजेंगी और कताईकी सभी क्रियाएँ सीख लेंगी। और ये सब काम अपने हाथों ही करेंगी। साथ ही अपने पड़ोसी भाई-बहनोंमें सूत कताईकी तमाम क्रियाओंको सीख लेने तथा तदनुसार काम करनेका प्रचार भी करेंगी।
३. इस आन्दोलनके लिए यह परिषद् नीचे लिखी बहनोंकी एक कार्य-कारिणी समिति नियुक्त करती है; और उसे इस आन्दोलनसे सम्बन्धित नियम-उपनियम आदि बनाने तथा उनमें संशोधन परिवर्द्धन करनेका अधिकार प्रदान करती है। समितिको अपनी संख्या बढ़ानेका भी अधिकार होगा :
१. श्रीमती तैयबजी (सभापति)
२. श्रीमती मीठूबहन पेटिट (मन्त्री)
सदस्याएँ
३. श्रीमती मणिवहन पटेल
४. " रोहिणी देसाई
५. " चन्द्रबहन
परिषद् आशा करती है कि गुजरातकी बहनें इस आन्दोलनका स्वागत करेंगी और इसमें हाथ बँटायेंगी।
परिषद् आशा करती है कि इस परिषद्के द्वारा जो आन्दोलन आरम्भ किया जा रहा है उसे सारे गुजरात और अन्य प्रान्तों की महिलायें आगे बढ़ायेंगी१।
वेजलपुर में भी यही प्रस्ताव पास हुए; किन्तु वहाँ पहले प्रस्तावको दो भागों में बाँट दिया गया था। मद्यपान निषेध और खादी द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको दो जुदा काम माना गया जिससे यदि कोई बहन उनमें से एकको ही स्वीकार करती हो तो वह उसीके लिए अपना मत दे सके। समितिने दूसरी परिषद्को सदस्य संख्या-
में तीन बहनोंके नाम और जोड़े :
श्रीमती शारदावहन सुमन्त मेहता
" सविताबहन त्रिवेदी
" सूरजबहन मणिलाल
यों मतदानको बहुत महत्त्व देना जरूरी नहीं है। उसका महत्त्व इतना ही है कि सभामें किसी भी प्रस्तावका विरोध नहीं हुआ। इससे सूचित होता है कि उपस्थित स्त्रियाँ इस प्रस्तावके अनुसार काम करने को तैयार भले न हों, तथापि उन्हें प्रस्तावकी
<small>१. पद अनुच्छेद '''यंग इंडिया''' से लिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वस्त्रका व्यापार बन्द करने और विदेशी कपड़ोंके खरीदारोंसे विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रार्थना करेंगी और इन कामोंके लिए दुकानोंपर धरना देंगी।
२. इस परिषद्का विश्वास है कि विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार खादीके द्वारा ही किया जा सकता है; अतएव यहाँ उपस्थित स्त्रियां भविष्य में खादीका ही उपयोग करेंगी और यथासम्भव स्वयं प्रतिदिन सूत कातेंगी, रुई पीजेंगी और कताईकी सभी क्रियाएँ सीख लेंगी। और ये सब काम अपने हाथों ही करेंगी। साथ ही अपने पड़ोसी भाई-बहनोंमें सूत कताईकी तमाम क्रियाओंको सीख लेने तथा तदनुसार काम करनेका प्रचार भी करेंगी।
३. इस आन्दोलनके लिए यह परिषद् नीचे लिखी बहनोंकी एक कार्य-कारिणी समिति नियुक्त करती है; और उसे इस आन्दोलनसे सम्बन्धित नियम-उपनियम आदि बनाने तथा उनमें संशोधन परिवर्द्धन करनेका अधिकार प्रदान करती है। समितिको अपनी संख्या बढ़ानेका भी अधिकार होगा :
१. श्रीमती तैयबजी (सभापति)
२. श्रीमती मीठूबहन पेटिट (मन्त्री)
सदस्याएँ
३. श्रीमती मणिवहन पटेल
४. " रोहिणी देसाई
५. " चन्द्रबहन
परिषद् आशा करती है कि गुजरातकी बहनें इस आन्दोलनका स्वागत करेंगी और इसमें हाथ बँटायेंगी।
परिषद् आशा करती है कि इस परिषद्के द्वारा जो आन्दोलन आरम्भ किया जा रहा है उसे सारे गुजरात और अन्य प्रान्तों की महिलायें आगे बढ़ायेंगी१।
वेजलपुर में भी यही प्रस्ताव पास हुए; किन्तु वहाँ पहले प्रस्तावको दो भागों में बाँट दिया गया था। मद्यपान निषेध और खादी द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको दो जुदा काम माना गया जिससे यदि कोई बहन उनमें से एकको ही स्वीकार करती हो तो वह उसीके लिए अपना मत दे सके। समितिने दूसरी परिषद्को सदस्य संख्या-
में तीन बहनोंके नाम और जोड़े :
श्रीमती शारदावहन सुमन्त मेहता
" सविताबहन त्रिवेदी
" सूरजबहन मणिलाल
यों मतदानको बहुत महत्त्व देना जरूरी नहीं है। उसका महत्त्व इतना ही है कि सभामें किसी भी प्रस्तावका विरोध नहीं हुआ। इससे सूचित होता है कि उपस्थित स्त्रियाँ इस प्रस्तावके अनुसार काम करने को तैयार भले न हों, तथापि उन्हें प्रस्तावकी
<small>१. पद अनुच्छेद '''यंग इंडिया''' से लिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वस्त्रका व्यापार बन्द करने और विदेशी कपड़ोंके खरीदारोंसे विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रार्थना करेंगी और इन कामोंके लिए दुकानोंपर धरना देंगी।
२. इस परिषद्का विश्वास है कि विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार खादीके द्वारा ही किया जा सकता है; अतएव यहाँ उपस्थित स्त्रियां भविष्य में खादीका ही उपयोग करेंगी और यथासम्भव स्वयं प्रतिदिन सूत कातेंगी, रुई पीजेंगी और कताईकी सभी क्रियाएँ सीख लेंगी। और ये सब काम अपने हाथों ही करेंगी। साथ ही अपने पड़ोसी भाई-बहनोंमें सूत कताईकी तमाम क्रियाओंको सीख लेने तथा तदनुसार काम करनेका प्रचार भी करेंगी।
३. इस आन्दोलनके लिए यह परिषद् नीचे लिखी बहनोंकी एक कार्य-कारिणी समिति नियुक्त करती है; और उसे इस आन्दोलनसे सम्बन्धित नियम-उपनियम आदि बनाने तथा उनमें संशोधन परिवर्द्धन करनेका अधिकार प्रदान करती है। समितिको अपनी संख्या बढ़ानेका भी अधिकार होगा :
१. श्रीमती तैयबजी (सभापति)
२. श्रीमती मीठूबहन पेटिट (मन्त्री)
सदस्याएँ
३. श्रीमती मणिवहन पटेल
४. श्रीमती रोहिणी देसाई
५. श्रीमती चन्द्रबहन
परिषद् आशा करती है कि गुजरातकी बहनें इस आन्दोलनका स्वागत करेंगी और इसमें हाथ बँटायेंगी।
परिषद् आशा करती है कि इस परिषद्के द्वारा जो आन्दोलन आरम्भ किया जा रहा है उसे सारे गुजरात और अन्य प्रान्तों की महिलायें आगे बढ़ायेंगी१।
वेजलपुर में भी यही प्रस्ताव पास हुए; किन्तु वहाँ पहले प्रस्तावको दो भागों में बाँट दिया गया था। मद्यपान निषेध और खादी द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको दो जुदा काम माना गया जिससे यदि कोई बहन उनमें से एकको ही स्वीकार करती हो तो वह उसीके लिए अपना मत दे सके। समितिने दूसरी परिषद्को सदस्य संख्या-
में तीन बहनोंके नाम और जोड़े :
श्रीमती शारदावहन सुमन्त मेहता
श्रीमती सविताबहन त्रिवेदी
श्रीमती सूरजबहन मणिलाल
यों मतदानको बहुत महत्त्व देना जरूरी नहीं है। उसका महत्त्व इतना ही है कि सभामें किसी भी प्रस्तावका विरोध नहीं हुआ। इससे सूचित होता है कि उपस्थित स्त्रियाँ इस प्रस्तावके अनुसार काम करने को तैयार भले न हों, तथापि उन्हें प्रस्तावकी
<small>१. पद अनुच्छेद '''यंग इंडिया''' से लिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र||२८३}}</noinclude>मूल बात पसन्द थी। इन दोनों परिषदों में देहाती बह्नोंकी संख्या ज्यादा थी। इस बारकी लड़ाई खासकर गांवोंकी ही है। गांवोंकी जागृति आश्चर्यजनक है और यह शुभ चिह्न है। नमक, विदेशी वस्त्र बहिष्कार और मद्यपान निषेध, ये तीनों चीजें गाँववालों के लिए विशेष रूपसे हितकर है, तिस पर स्त्रियोंका तो इनमें विशेष लाभ निहित है।
इन प्रस्तावोंपर यदि थोड़ी-सी बहनें भी प्राण निछावर करनेको तैयार होंगी तो वे सामने आयेंगी। यदि ऐसा न हुआ तो परिषद्का काम अधूरा माना जायेगा। परिषद् में आई हुई बहनोंकी संख्या इस बातकी सूचक है कि कोई काम लेनेवाला हो तो वे काम करनेको तैयार हैं।
प्रत्येक संस्थाका प्राण उसकी कार्यकारिणी समिति होती है। अतएव जिन बहनोंने समितिको अपने नाम दिये हैं, उनकी लगन, तपश्चर्या और कार्यकुशलतापर ही कार्यकी सफलता निर्भर है।
मीठूबहन पेटिटने तो बड़ी तेजीसे अपना कार्य आरम्भ कर दिया है। उनके कथनानुसार शराब पीनेवाले उत्साहपूर्वक ताड़ीके मटके फोड़ डालते हैं। सूरतके हजारों शराबी अपनी-अपनी जाति में शराब न पीनेका प्रस्ताव पास करने लगे हैं।
यदि स्त्रियोंमें आत्मविश्वास आ जाये, उनकी श्रद्धा दृढ़ हो जाये तो स्त्रियाँ खुद ही जान जायेंगी कि उनके मनमें जो भय था वैसा भय रखनेका कोई कारण ही नहीं है। मनुष्य मात्रमें राम और रावण रहते हैं। यदि स्त्रियां अपने हृदयमें निवास करनेवाले रामकी सहायतासे काम करें तो मनुष्यों में रहनेवाला रावण सिर नहीं उठा सकता। स्त्रियोंकी अपेक्षा पुरुषोंमें राम देरसे जागता है। जिसे राम राखे उसे कौन चाखे? और जिससे राम रूठे उसे कौन राखे?
शराबखोरीको बन्द करने के काममें शुरुआत में जो डर लगता है, उसके मिट जानेपर वह आसान हो जाता है। क्योंकि इस काम में केवल धरना देना पड़ता है। पीनेवाले दुष्ट नहीं, भोले होते हैं। पीनेवाले इस बात को समझते ही कि मद्यपान उनके हितमें नहीं है, शराब छोड़ देंगे। इसमें शराबके ठेकेदारोंका स्वार्थ तो है, पर ये जानते हैं कि उनका व्यापार कोई अच्छा व्यापार नहीं है।
स्वराज्य आन्दोलन में इस प्रवृत्तिके शामिल होनेको मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। इन पृष्ठोंमें इसके पक्ष में जो दलीलें दी गई हैं, मुझे उनको दोहराने की कोई जरूरत नहीं है। मीठूबहनने पहले ही काम शुरू कर दिया है। वे किसी कार्यको करने में तनिक-सा भी समय नष्ट करनेवाली महिला नहीं हैं। सवाल यह है कि बीस अथवा पच्चीस महिलाओंका एक जत्था शराबकी हर दुकानपर जाये और शराब तथा ताड़ी पीने के लिए आनेवाले हर व्यक्तिसे निजी सम्पर्क स्थापित करके उसकी आदत छुड़ानेका प्रयत्न करे। ये महिलाएँ दुकानदारोंसे भी इस अनैतिक व्यापारको छोड़ देने और बेहतर साधनों द्वारा आजीविका अर्जित करनेकी अपील करेंगी।१
प्रशिक्षित महिला स्वयंसेविकाओंकी पर्याप्त संख्या हो जानेपर विदेशी वस्त्रकी
दुकानोंपर भी वैसा ही किया जायेगा जैसा शराबकी दुकानोंके साथ किया जानेवाला
<small>१. पद और अगले दो अनुच्छेद १७-४-१९३० के यंग इंडियासे लिये गये है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र||२८३}}</noinclude>मूल बात पसन्द थी। इन दोनों परिषदों में देहाती बह्नोंकी संख्या ज्यादा थी। इस बारकी लड़ाई खासकर गांवोंकी ही है। गांवोंकी जागृति आश्चर्यजनक है और यह शुभ चिह्न है। नमक, विदेशी वस्त्र बहिष्कार और मद्यपान निषेध, ये तीनों चीजें गाँववालों के लिए विशेष रूपसे हितकर है, तिस पर स्त्रियोंका तो इनमें विशेष लाभ निहित है।
इन प्रस्तावोंपर यदि थोड़ी-सी बहनें भी प्राण निछावर करनेको तैयार होंगी तो वे सामने आयेंगी। यदि ऐसा न हुआ तो परिषद्का काम अधूरा माना जायेगा। परिषद् में आई हुई बहनोंकी संख्या इस बातकी सूचक है कि कोई काम लेनेवाला हो तो वे काम करनेको तैयार हैं।
प्रत्येक संस्थाका प्राण उसकी कार्यकारिणी समिति होती है। अतएव जिन बहनोंने समितिको अपने नाम दिये हैं, उनकी लगन, तपश्चर्या और कार्यकुशलतापर ही कार्यकी सफलता निर्भर है।
मीठूबहन पेटिटने तो बड़ी तेजीसे अपना कार्य आरम्भ कर दिया है। उनके कथनानुसार शराब पीनेवाले उत्साहपूर्वक ताड़ीके मटके फोड़ डालते हैं। सूरतके हजारों शराबी अपनी-अपनी जाति में शराब न पीनेका प्रस्ताव पास करने लगे हैं।
यदि स्त्रियोंमें आत्मविश्वास आ जाये, उनकी श्रद्धा दृढ़ हो जाये तो स्त्रियाँ खुद ही जान जायेंगी कि उनके मनमें जो भय था वैसा भय रखनेका कोई कारण ही नहीं है। मनुष्य मात्रमें राम और रावण रहते हैं। यदि स्त्रियां अपने हृदयमें निवास करनेवाले रामकी सहायतासे काम करें तो मनुष्यों में रहनेवाला रावण सिर नहीं उठा सकता। स्त्रियोंकी अपेक्षा पुरुषोंमें राम देरसे जागता है। जिसे राम राखे उसे कौन चाखे? और जिससे राम रूठे उसे कौन राखे?
शराबखोरीको बन्द करने के काममें शुरुआत में जो डर लगता है, उसके मिट जानेपर वह आसान हो जाता है। क्योंकि इस काम में केवल धरना देना पड़ता है। पीनेवाले दुष्ट नहीं, भोले होते हैं। पीनेवाले इस बात को समझते ही कि मद्यपान उनके हितमें नहीं है, शराब छोड़ देंगे। इसमें शराबके ठेकेदारोंका स्वार्थ तो है, पर ये जानते हैं कि उनका व्यापार कोई अच्छा व्यापार नहीं है।
स्वराज्य आन्दोलन में इस प्रवृत्तिके शामिल होनेको मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। इन पृष्ठोंमें इसके पक्ष में जो दलीलें दी गई हैं, मुझे उनको दोहराने की कोई जरूरत नहीं है। मीठूबहनने पहले ही काम शुरू कर दिया है। वे किसी कार्यको करने में तनिक-सा भी समय नष्ट करनेवाली महिला नहीं हैं। सवाल यह है कि बीस अथवा पच्चीस महिलाओंका एक जत्था शराबकी हर दुकानपर जाये और शराब तथा ताड़ी पीने के लिए आनेवाले हर व्यक्तिसे निजी सम्पर्क स्थापित करके उसकी आदत छुड़ानेका प्रयत्न करे। ये महिलाएँ दुकानदारोंसे भी इस अनैतिक व्यापारको छोड़ देने और बेहतर साधनों द्वारा आजीविका अर्जित करनेकी अपील करेंगी।१
प्रशिक्षित महिला स्वयंसेविकाओंकी पर्याप्त संख्या हो जानेपर विदेशी वस्त्रकी
दुकानोंपर भी वैसा ही किया जायेगा जैसा शराबकी दुकानोंके साथ किया जानेवाला
<small>१. पद और अगले दो अनुच्छेद १७-४-१९३० के यंग इंडियासे लिये गये है।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>है। हालांकि एक ही समिति दोनों तरहके बहिष्कारोंका संचालन करेगी लेकिन इसके लिए दो शाखाओंका होना जरूरी है। कोई भी महिला इन दोनों कार्यों में से एक कार्यमें शामिल होनेके लिए स्वतन्त्र है, और प्रत्येक कार्यकर्त्रीका कांग्रेसकी सदस्या
होना भी जरूरी नहीं होगा। सिर्फ एक बात अच्छी तरहसे समझ ली जानी चाहिए
कि यह कार्य कांग्रेस कार्यक्रमका एक हिस्सा है और बड़े-बड़े नैतिक और आर्थिक
परिणामोंके साथ इसके भारी राजनीतिक परिणाम भी सामने आयेंगे।
जो महिलाएँ विदेशी वस्त्र- बहिष्कार-सम्बन्धी शाखामें काम करेंगी, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि खादी कार्यक्रमके रचनात्मक कार्यक्रमके बिना केवल बहिष्कार तो शरारत भरा एक काम होकर रह जायेगा । खादीके उत्पादनके बिना बहिष्कार की
सफलता स्वाधीनताके राष्ट्रीय आन्दोलनका नाश ही कर डालेगी। क्योंकि लाखों लोग
सहज विश्वाससे प्रेरित होकर इसे अंगीकार करेंगे; लेकिन जब वे देखेंगे कि पहनने के लिए खादी नहीं मिलती अथवा जो खादी मिलती है वह बहुत महँगी है, तो वे खीझ
उठेंगे। इसलिए व्यवस्था यह होनी चाहिए कि आप विदेशी कपड़ेका त्याग करके अपने हायसे खादी बनायें और उसे पहनें। पहले ही खादीकी बहुत कमी है।
विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार एक मुश्किल काम है। उसके दो पहलू हैं: एक बहिष्कार और दूसरा खादीका उत्पादन । बहिष्कारके काम में बहुत उद्यमकी आवश्यकता नहीं है। इसके लिए थोड़ी-सी सेविकाएँ काफी हो सकती हैं। किन्तु खादीके उत्पादनके लिए तो हजारों ही नहीं, लाखों लोगोंको नियमित रूपसे उद्यम करना होगा। इस तरह इस काम से संगठन, योजना आदिकी शक्ति पैदा हो सकती है। लेकिन यह काम धैर्यपूर्वक करनेका है। इसके लिए बुद्धि और श्रद्धा अर्थात् हृदयकी जरूरत है। इसके कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे हमें करोड़ों बहनोंके सम्पर्क में आना होगा। इस कार्यके लिए गाँवों और शहरोंके बीच शुद्ध समन्वय स्थापित करनेकी आवश्यकता है और इस साधनके द्वारा हिन्दुस्तान के लिए आवश्यक खादीका थोड़े ही समयमें उत्पादन हो सकता है। खादी उत्पादन के सब साधन हमारे पास मौजूद हैं। और इसके उत्पादनके लिए आवश्यक कला-कुशलता भी हममें है। सिर्फ कार्यकर्त्ता नहीं हैं। कार्यकर्ता तैयार करनेका काम बहनोंका है। यह तभी हो सकता है जब बहनें स्वयं ओटने, घुनने, कातने आदिको क्रियाओंको सीखकर स्त्री-पुरुषोंमें इन कलाओंका प्रचार करें। खादीका काम करनेवाले बहुतसे कार्यकर्त्ता नमक कानून आन्दोलन उनमें लगे हुए हैं। अतः अस्थायी रूपसे खादीका उत्पादन रुक गया है।
हमारे देशके लोगों में यह गलत धारणा घर कर गई है कि तन बँकनेके लिए हमें बाहरसे कपड़ा मंगवाना ही पड़ेगा। जिस क्षण हम अपनी इस मिथ्या धारणासे छुटकारा पा लेंगे उसी क्षण हमारे यहाँ कपड़ेकी कोई कमी नहीं रह जायेगी। यह ठीक वैसी ही बात होगी जैसे किसी व्यक्तिका यह कहना कि मँचेस्टर अथवा दिल्लीके बने बिस्कुटोंके बिना हम भूखों मर जायेंगे। जैसे हम अपना भोजन खुद बनाते और खाते हैं वैसे ही यदि हम चाहें तो अपना कपड़ा खुद तैयार करके पहन सकते हैं।
<small>१. अन्तिम दो वाक्या अगले दो अनुच्छेद १७-४-१९३० के '''यंग इंडिया'''से लिये गये हैं।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२९
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'सत्याग्रह-युद्ध'|२८५}}</noinclude>हम सौ वर्ष पहले ऐसा ही किया करते थे और हम चाहें तो उस कलाको फिरसे
सीख सकते हैं। कपड़ा बनानेकी मुख्य-मुख्य क्रियाओंको बहुत आसानीसे सीखा जा
सकता है। ऐसे नाजुक समयमें, राष्ट्रके इतिहासके ऐसे दौर में हमें संकोच और आलस्य
नहीं करना चाहिए। हमारी मिलोंके बारेमें जो कुछ कहा गया है उसे दोहरानेकी
मुझे कोई जरूरत नहीं है। यदि प्रत्येक मिल विशुद्ध रूपसे स्वदेशी बन जाये और
यदि सब मिलें देशभक्त हो जायें तो भी वे हमारी जरूरत भरका सारा कपड़ा हमें
प्रदान नहीं कर सकती। हम चाहे जिस तरहसे भी देखें, हम इस बातको पसन्द
करें अथवा न करें लेकिन यदि हम अहिंसात्मक साधनों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करना
चाहते हैं तथा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारको -जिसपर हमने १९२० में ही अपनी
पूरी शक्ति लगानी शुरू कर दी थी सफल बनाना चाहते हैं तो हमें खादीको
अपनाना ही होगा ।
बहिष्कारमें पुरुषोंके योगदान के बारेमें मैंने उस भाषण में काफी कुछ कह दिया
है जो मैंने दांडीमें मुझसे मिलने आये पुरुषोंके समक्ष अचानक ही दिया था। उस
भाषणके सम्बद्ध अंश अन्यत्र दिये जा रहे हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि यदि पुरुष महिलाओंके धरना देनेके काम में हस्तक्षेप करेंगे तो वे आन्दोलनको
नुकसान पहुँचायेंगे ।
उक्त दो परिषदोंमें प्रस्ताव पारित करके गुजरातकी बहनोंने जिम्मेदारी अपने
ऊपर ले ली है, और उनकी ओरसे बेगम अमीना तैयबजी और उनकी समितिने यह
भार अपने सिरपर उठा लिया है।
ईश्वर उन्हें शक्ति दे!
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' २०-४-१९३० तथा '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|२६८. 'सत्याग्रह-युद्ध'}}}}
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे इस नामकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। इस पुस्तिकाको सब कोई पढ़ें। विशेषकर वे लोग जो 'हिन्दी नवजीवन' के नियमित पाठक नहीं हैं, या जिन्हें इस युद्धकी बातोंका अभ्यास करना है, उनके लिए तो यह पुस्तिका विशेषतया उपयोगी है।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
<small>१. देखिए " भाषण दांडी, १३-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'सत्याग्रह-युद्ध'|२८५}}</noinclude>हम सौ वर्ष पहले ऐसा ही किया करते थे और हम चाहें तो उस कलाको फिरसे
सीख सकते हैं। कपड़ा बनानेकी मुख्य-मुख्य क्रियाओंको बहुत आसानीसे सीखा जा
सकता है। ऐसे नाजुक समयमें, राष्ट्रके इतिहासके ऐसे दौर में हमें संकोच और आलस्य
नहीं करना चाहिए। हमारी मिलोंके बारेमें जो कुछ कहा गया है उसे दोहरानेकी
मुझे कोई जरूरत नहीं है। यदि प्रत्येक मिल विशुद्ध रूपसे स्वदेशी बन जाये और
यदि सब मिलें देशभक्त हो जायें तो भी वे हमारी जरूरत भरका सारा कपड़ा हमें
प्रदान नहीं कर सकती। हम चाहे जिस तरहसे भी देखें, हम इस बातको पसन्द
करें अथवा न करें लेकिन यदि हम अहिंसात्मक साधनों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करना
चाहते हैं तथा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारको -जिसपर हमने १९२० में ही अपनी
पूरी शक्ति लगानी शुरू कर दी थी सफल बनाना चाहते हैं तो हमें खादीको
अपनाना ही होगा ।
बहिष्कारमें पुरुषोंके योगदान के बारेमें मैंने उस भाषण में काफी कुछ कह दिया
है जो मैंने दांडीमें मुझसे मिलने आये पुरुषोंके समक्ष अचानक ही दिया था। उस
भाषणके सम्बद्ध अंश अन्यत्र दिये जा रहे हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि यदि पुरुष महिलाओंके धरना देनेके काम में हस्तक्षेप करेंगे तो वे आन्दोलनको
नुकसान पहुँचायेंगे ।
उक्त दो परिषदोंमें प्रस्ताव पारित करके गुजरातकी बहनोंने जिम्मेदारी अपने
ऊपर ले ली है, और उनकी ओरसे बेगम अमीना तैयबजी और उनकी समितिने यह
भार अपने सिरपर उठा लिया है।
ईश्वर उन्हें शक्ति दे!
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' २०-४-१९३० तथा '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|२६८. 'सत्याग्रह-युद्ध'}}}}
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे इस नामकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। इस पुस्तिकाको सब कोई पढ़ें। विशेषकर वे लोग जो 'हिन्दी नवजीवन' के नियमित पाठक नहीं हैं, या जिन्हें इस युद्धकी बातोंका अभ्यास करना है, उनके लिए तो यह पुस्तिका विशेषतया उपयोगी है।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
<small>१. देखिए " भाषण दांडी, १३-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'सत्याग्रह-युद्ध'|२८५}}</noinclude>हम सौ वर्ष पहले ऐसा ही किया करते थे और हम चाहें तो उस कलाको फिरसे
सीख सकते हैं। कपड़ा बनानेकी मुख्य-मुख्य क्रियाओंको बहुत आसानीसे सीखा जा
सकता है। ऐसे नाजुक समयमें, राष्ट्रके इतिहासके ऐसे दौर में हमें संकोच और आलस्य
नहीं करना चाहिए। हमारी मिलोंके बारेमें जो कुछ कहा गया है उसे दोहरानेकी
मुझे कोई जरूरत नहीं है। यदि प्रत्येक मिल विशुद्ध रूपसे स्वदेशी बन जाये और
यदि सब मिलें देशभक्त हो जायें तो भी वे हमारी जरूरत भरका सारा कपड़ा हमें
प्रदान नहीं कर सकती। हम चाहे जिस तरहसे भी देखें, हम इस बातको पसन्द
करें अथवा न करें लेकिन यदि हम अहिंसात्मक साधनों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करना
चाहते हैं तथा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारको -जिसपर हमने १९२० में ही अपनी
पूरी शक्ति लगानी शुरू कर दी थी सफल बनाना चाहते हैं तो हमें खादीको
अपनाना ही होगा ।
बहिष्कारमें पुरुषोंके योगदान के बारेमें मैंने उस भाषण में काफी कुछ कह दिया
है जो मैंने दांडीमें मुझसे मिलने आये पुरुषोंके समक्ष अचानक ही दिया था। उस
भाषणके सम्बद्ध अंश अन्यत्र दिये जा रहे हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि यदि पुरुष महिलाओंके धरना देनेके काम में हस्तक्षेप करेंगे तो वे आन्दोलनको
नुकसान पहुँचायेंगे ।
उक्त दो परिषदोंमें प्रस्ताव पारित करके गुजरातकी बहनोंने जिम्मेदारी अपने
ऊपर ले ली है, और उनकी ओरसे बेगम अमीना तैयबजी और उनकी समितिने यह
भार अपने सिरपर उठा लिया है।
ईश्वर उन्हें शक्ति दे!
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' २०-४-१९३० तथा '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|२६८. 'सत्याग्रह-युद्ध'}}}}
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे इस नामकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। इस पुस्तिकाको सब कोई पढ़ें। विशेषकर वे लोग जो 'हिन्दी नवजीवन' के नियमित पाठक नहीं हैं, या जिन्हें इस युद्धकी बातोंका अभ्यास करना है, उनके लिए तो यह पुस्तिका विशेषतया उपयोगी है।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
<small>१. देखिए "भाषण दांडी," १३-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'सत्याग्रह-युद्ध'|२८५}}</noinclude>हम सौ वर्ष पहले ऐसा ही किया करते थे और हम चाहें तो उस कलाको फिरसे
सीख सकते हैं। कपड़ा बनानेकी मुख्य-मुख्य क्रियाओंको बहुत आसानीसे सीखा जा
सकता है। ऐसे नाजुक समयमें, राष्ट्रके इतिहासके ऐसे दौर में हमें संकोच और आलस्य
नहीं करना चाहिए। हमारी मिलोंके बारेमें जो कुछ कहा गया है उसे दोहरानेकी
मुझे कोई जरूरत नहीं है। यदि प्रत्येक मिल विशुद्ध रूपसे स्वदेशी बन जाये और
यदि सब मिलें देशभक्त हो जायें तो भी वे हमारी जरूरत भरका सारा कपड़ा हमें
प्रदान नहीं कर सकती। हम चाहे जिस तरहसे भी देखें, हम इस बातको पसन्द
करें अथवा न करें लेकिन यदि हम अहिंसात्मक साधनों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करना
चाहते हैं तथा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारको -जिसपर हमने १९२० में ही अपनी
पूरी शक्ति लगानी शुरू कर दी थी सफल बनाना चाहते हैं तो हमें खादीको
अपनाना ही होगा ।
बहिष्कारमें पुरुषोंके योगदान के बारेमें मैंने उस भाषण में काफी कुछ कह दिया
है जो मैंने दांडीमें मुझसे मिलने आये पुरुषोंके समक्ष अचानक ही दिया था। उस
भाषणके सम्बद्ध अंश अन्यत्र दिये जा रहे हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि यदि पुरुष महिलाओंके धरना देनेके काम में हस्तक्षेप करेंगे तो वे आन्दोलनको
नुकसान पहुँचायेंगे ।
उक्त दो परिषदोंमें प्रस्ताव पारित करके गुजरातकी बहनोंने जिम्मेदारी अपने
ऊपर ले ली है, और उनकी ओरसे बेगम अमीना तैयबजी और उनकी समितिने यह
भार अपने सिरपर उठा लिया है।
ईश्वर उन्हें शक्ति दे!
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' २०-४-१९३० तथा '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२६८. 'सत्याग्रह-युद्ध''''z}}}}
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे इस नामकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। इस पुस्तिकाको सब कोई पढ़ें। विशेषकर वे लोग जो 'हिन्दी नवजीवन' के नियमित पाठक नहीं हैं, या जिन्हें इस युद्धकी बातोंका अभ्यास करना है, उनके लिए तो यह पुस्तिका विशेषतया उपयोगी है।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
<small>१. देखिए "भाषण दांडी," १३-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude>
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सीख सकते हैं। कपड़ा बनानेकी मुख्य-मुख्य क्रियाओंको बहुत आसानीसे सीखा जा
सकता है। ऐसे नाजुक समयमें, राष्ट्रके इतिहासके ऐसे दौर में हमें संकोच और आलस्य
नहीं करना चाहिए। हमारी मिलोंके बारेमें जो कुछ कहा गया है उसे दोहरानेकी
मुझे कोई जरूरत नहीं है। यदि प्रत्येक मिल विशुद्ध रूपसे स्वदेशी बन जाये और
यदि सब मिलें देशभक्त हो जायें तो भी वे हमारी जरूरत भरका सारा कपड़ा हमें
प्रदान नहीं कर सकती। हम चाहे जिस तरहसे भी देखें, हम इस बातको पसन्द
करें अथवा न करें लेकिन यदि हम अहिंसात्मक साधनों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करना
चाहते हैं तथा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारको -जिसपर हमने १९२० में ही अपनी
पूरी शक्ति लगानी शुरू कर दी थी सफल बनाना चाहते हैं तो हमें खादीको
अपनाना ही होगा ।
बहिष्कारमें पुरुषोंके योगदान के बारेमें मैंने उस भाषण में काफी कुछ कह दिया
है जो मैंने दांडीमें मुझसे मिलने आये पुरुषोंके समक्ष अचानक ही दिया था। उस
भाषणके सम्बद्ध अंश अन्यत्र दिये जा रहे हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि यदि पुरुष महिलाओंके धरना देनेके काम में हस्तक्षेप करेंगे तो वे आन्दोलनको
नुकसान पहुँचायेंगे ।
उक्त दो परिषदोंमें प्रस्ताव पारित करके गुजरातकी बहनोंने जिम्मेदारी अपने
ऊपर ले ली है, और उनकी ओरसे बेगम अमीना तैयबजी और उनकी समितिने यह
भार अपने सिरपर उठा लिया है।
ईश्वर उन्हें शक्ति दे!
[गुजरातीसे]
'''नवजीवन,''' २०-४-१९३० तथा '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२६८. 'सत्याग्रह-युद्ध''''}}}}
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे इस नामकी एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। इस पुस्तिकाको सब कोई पढ़ें। विशेषकर वे लोग जो 'हिन्दी नवजीवन' के नियमित पाठक नहीं हैं, या जिन्हें इस युद्धकी बातोंका अभ्यास करना है, उनके लिए तो यह पुस्तिका विशेषतया उपयोगी है।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
<small>१. देखिए "भाषण दांडी," १३-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२६९. कांग्रेस अध्यक्ष जेलमें'''}}
पंडित जवाहरलाल अब जेलमें हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकारने सारे हिन्दुस्तानको जेल में ठूंस दिया है। यदि हम इतनी बात समझ जायें तो हमें सहज ही अपने धर्मका पता चल सकता है। यदि हम अपनी शक्तिसे जेलके दरवाजे खोलना चाहते हैं, तो हमें नीचे लिखे कामोंमें जुट जाना चाहिए:
१. हम सब जगह नमक बनायें और बाँटें।
२. स्त्रियां शराबकी दुकानोंपर धरना दें, अर्थात् विनयपूर्वक कलवारों और
शराब पीनेवालों को शराब बेचने तथा पीनेसे रोकें।
३. इसी तरह स्त्रियाँ विदेशी वस्त्र बेचनेवालों तथा पहननेवालों को भी विनयपूर्वक रोकें।
४. घर-घरमें कताईका काम शुरू कर दें।
५. विद्यार्थी विद्यालयोंको छोड़कर राष्ट्रके कार्यमें जुट पड़ें।
६. वकील लोग वकालत छोड़ें और इस राष्ट्र-यज्ञमें अपना सारा समय लगा दे
७. दूसरे धन्धेवाले भी जितना समय इन कामोंके लिए दे सकें, दें।
८. सरकारी नौकर नौकरी छोड़ें।
९. किसी भी अवस्थामें अशांत न बनें, हिंसा न करें।
१०. किसीको अपनेसे नीच न समझें। सब हिल-मिलकर रहें।
यदि हम इतना कर सकें, तो अवश्य ही हमारी शक्ति बढ़ जाये और कोई हमें अपने मार्गसे रोकनेकी हिम्मत न कर सके।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
तुम्हारे प्रश्नोंके उत्तर मैंने कल मुंहजबानी गंगाबहनको दे दिये थे। उम्मीद है, वे तुम्हें मिल गये होंगे।
हिसाब के बारेमें तुम जो लिखते हो वह सही है। में 'नवजीवन' में लिखनेकी
उम्मीद तो रखता हूँ।
...१के बारेमें मैने लौटती डाकसे उत्तर भेजा था। वह तुम्हें क्यों नहीं
मिला, इस बारे में महादेवने तुम्हें बताया होगा। रामजी सहाय यदि अपने प्रान्तमें
<small>१. नाम छोड़ दिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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पंडित जवाहरलाल अब जेलमें हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकारने सारे हिन्दुस्तानको जेल में ठूंस दिया है। यदि हम इतनी बात समझ जायें तो हमें सहज ही अपने धर्मका पता चल सकता है। यदि हम अपनी शक्तिसे जेलके दरवाजे खोलना चाहते हैं, तो हमें नीचे लिखे कामोंमें जुट जाना चाहिए:
१. हम सब जगह नमक बनायें और बाँटें।
२. स्त्रियां शराबकी दुकानोंपर धरना दें, अर्थात् विनयपूर्वक कलवारों और
शराब पीनेवालों को शराब बेचने तथा पीनेसे रोकें।
३. इसी तरह स्त्रियाँ विदेशी वस्त्र बेचनेवालों तथा पहननेवालों को भी विनयपूर्वक रोकें।
४. घर-घरमें कताईका काम शुरू कर दें।
५. विद्यार्थी विद्यालयोंको छोड़कर राष्ट्रके कार्यमें जुट पड़ें।
६. वकील लोग वकालत छोड़ें और इस राष्ट्र-यज्ञमें अपना सारा समय लगा दे
७. दूसरे धन्धेवाले भी जितना समय इन कामोंके लिए दे सकें, दें।
८. सरकारी नौकर नौकरी छोड़ें।
९. किसी भी अवस्थामें अशांत न बनें, हिंसा न करें।
१०. किसीको अपनेसे नीच न समझें। सब हिल-मिलकर रहें।
यदि हम इतना कर सकें, तो अवश्य ही हमारी शक्ति बढ़ जाये और कोई हमें अपने मार्गसे रोकनेकी हिम्मत न कर सके।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
तुम्हारे प्रश्नोंके उत्तर मैंने कल मुंहजबानी गंगाबहनको दे दिये थे। उम्मीद है, वे तुम्हें मिल गये होंगे।
हिसाब के बारेमें तुम जो लिखते हो वह सही है। में 'नवजीवन' में लिखनेकी
उम्मीद तो रखता हूँ।
...१के बारेमें मैने लौटती डाकसे उत्तर भेजा था। वह तुम्हें क्यों नहीं
मिला, इस बारे में महादेवने तुम्हें बताया होगा। रामजी सहाय यदि अपने प्रान्तमें
<small>१. नाम छोड़ दिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६९. कांग्रेस अध्यक्ष जेलमें'''}}}}
पंडित जवाहरलाल अब जेलमें हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकारने सारे हिन्दुस्तानको जेल में ठूंस दिया है। यदि हम इतनी बात समझ जायें तो हमें सहज ही अपने धर्मका पता चल सकता है। यदि हम अपनी शक्तिसे जेलके दरवाजे खोलना चाहते हैं, तो हमें नीचे लिखे कामोंमें जुट जाना चाहिए:
१. हम सब जगह नमक बनायें और बाँटें।
२. स्त्रियां शराबकी दुकानोंपर धरना दें, अर्थात् विनयपूर्वक कलवारों और
शराब पीनेवालों को शराब बेचने तथा पीनेसे रोकें।
३. इसी तरह स्त्रियाँ विदेशी वस्त्र बेचनेवालों तथा पहननेवालों को भी विनयपूर्वक रोकें।
४. घर-घरमें कताईका काम शुरू कर दें।
५. विद्यार्थी विद्यालयोंको छोड़कर राष्ट्रके कार्यमें जुट पड़ें।
६. वकील लोग वकालत छोड़ें और इस राष्ट्र-यज्ञमें अपना सारा समय लगा दे
७. दूसरे धन्धेवाले भी जितना समय इन कामोंके लिए दे सकें, दें।
८. सरकारी नौकर नौकरी छोड़ें।
९. किसी भी अवस्थामें अशांत न बनें, हिंसा न करें।
१०. किसीको अपनेसे नीच न समझें। सब हिल-मिलकर रहें।
यदि हम इतना कर सकें, तो अवश्य ही हमारी शक्ति बढ़ जाये और कोई हमें अपने मार्गसे रोकनेकी हिम्मत न कर सके।
'''हिन्दी नवजीवन,''' १७-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
चि० नारणदास,
तुम्हारे प्रश्नोंके उत्तर मैंने कल मुंहजबानी गंगाबहनको दे दिये थे। उम्मीद है, वे तुम्हें मिल गये होंगे।
हिसाब के बारेमें तुम जो लिखते हो वह सही है। में 'नवजीवन' में लिखनेकी
उम्मीद तो रखता हूँ।
...१के बारेमें मैने लौटती डाकसे उत्तर भेजा था। वह तुम्हें क्यों नहीं
मिला, इस बारे में महादेवने तुम्हें बताया होगा। रामजी सहाय यदि अपने प्रान्तमें
<small>१. नाम छोड़ दिया गया है।<small><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भेंट: फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको|२८७}}</noinclude>काम करनेके लिए जाना चाहें तो जायें। वे यदि परसे सम्पन्न हों तो अपने किराये
पर जायें।
बहनोंको भेजने के बारेमें तो मैं पहले ही लिख चुका हूँ। केशूके लिए कोई
काम ढूंढा या नहीं?
और खादी तैयार करनेके बारेमें जितना विचार किया जा सके, करना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
मलकानीको भेजना पड़ेगा; क्योंकि मैंने उसे इनकार नहीं लिखा था। अब [इनकार] लिखनेकी इच्छा नहीं होती।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१००) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|२७१. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको}}}}
{{Right|जलालपुर}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
कलकत्ता और कराचीमें हुए तथाकथित दंगों के विषयमें अभी तो मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकता। मुझे तो अक्सर अपनी आंखों-देखी घटनाओंके इतने अधिक अतिरंजित और तोड़-मरोड़कर छापे गये विवरण देखनेको मिले हैं कि मेरा मन कहता है, जनता द्वारा हिंसात्मक कार्रवाइयाँ करनेके जो किस्से छपे हैं, उनमें से अधिकांश गलत होंगे। लेकिन उन्होंने कितनी भी कम हिंसा की हो, मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उससे हमारे संघर्षको नुकसान हुआ है, लेकिन साथ ही संघर्षको बिना रुके चलना है। यदि अहिंसाको सरकारको हिसाके साथ-साथ जनताकी हिंसाके खिलाफ भी जूझना है तो इसे अब भी, जैसे हो, अपना कठिन कर्त्तव्य पूरा करना ही है। मुझे तो इससे छुटकारा मिलता दिखाई नहीं देता।
संघर्ष प्रारम्भमें ही मैंने कह दिया था कि इस बात की पूरी सम्भावना है कि जनता थोड़ी-बहुत हिंसा कर सकती हैं। लगता है अब वह हिंसा भड़क उठी है। इससे मुझे दुःख हुआ है। सिर्फ इसलिए कि इससे उस उद्देश्यको नुकसान पहुँचा है जो मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। लेकिन में यह जरूर कहूँगा कि ऐसी सभाओंको भंग करके, जिनमें कोई हिंसात्मक कार्रवाई नहीं की गई, सरकारने लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित किया है। सार्वजनिक सभाओंके आयोजनों और उनकी कार्यवाहियों पर पूरी पावन्दी लगा देनेका उद्देश्य लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित करना ही है। सरकारने खूब सोच-समझकर जनताके ऐसे नेताओंको गिरफ्तार किया है जिनकी ऐसी शोहरत थी कि ये अहिंसक हैं और लोगोंपर उनका ऐसा प्रभाव है कि वे<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भेंट: फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको|२८७}}</noinclude>काम करनेके लिए जाना चाहें तो जायें। वे यदि परसे सम्पन्न हों तो अपने किराये
पर जायें।
बहनोंको भेजने के बारेमें तो मैं पहले ही लिख चुका हूँ। केशूके लिए कोई
काम ढूंढा या नहीं?
और खादी तैयार करनेके बारेमें जितना विचार किया जा सके, करना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
मलकानीको भेजना पड़ेगा; क्योंकि मैंने उसे इनकार नहीं लिखा था। अब [इनकार] लिखनेकी इच्छा नहीं होती।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१००) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|२७१. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको}}}}
{{Right|जलालपुर}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
कलकत्ता और कराचीमें हुए तथाकथित दंगों के विषयमें अभी तो मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकता। मुझे तो अक्सर अपनी आंखों-देखी घटनाओंके इतने अधिक अतिरंजित और तोड़-मरोड़कर छापे गये विवरण देखनेको मिले हैं कि मेरा मन कहता है, जनता द्वारा हिंसात्मक कार्रवाइयाँ करनेके जो किस्से छपे हैं, उनमें से अधिकांश गलत होंगे। लेकिन उन्होंने कितनी भी कम हिंसा की हो, मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उससे हमारे संघर्षको नुकसान हुआ है, लेकिन साथ ही संघर्षको बिना रुके चलना है। यदि अहिंसाको सरकारको हिसाके साथ-साथ जनताकी हिंसाके खिलाफ भी जूझना है तो इसे अब भी, जैसे हो, अपना कठिन कर्त्तव्य पूरा करना ही है। मुझे तो इससे छुटकारा मिलता दिखाई नहीं देता।
संघर्ष प्रारम्भमें ही मैंने कह दिया था कि इस बात की पूरी सम्भावना है कि जनता थोड़ी-बहुत हिंसा कर सकती हैं। लगता है अब वह हिंसा भड़क उठी है। इससे मुझे दुःख हुआ है। सिर्फ इसलिए कि इससे उस उद्देश्यको नुकसान पहुँचा है जो मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। लेकिन में यह जरूर कहूँगा कि ऐसी सभाओंको भंग करके, जिनमें कोई हिंसात्मक कार्रवाई नहीं की गई, सरकारने लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित किया है। सार्वजनिक सभाओंके आयोजनों और उनकी कार्यवाहियों पर पूरी पावन्दी लगा देनेका उद्देश्य लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित करना ही है। सरकारने खूब सोच-समझकर जनताके ऐसे नेताओंको गिरफ्तार किया है जिनकी ऐसी शोहरत थी कि ये अहिंसक हैं और लोगोंपर उनका ऐसा प्रभाव है कि वे<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भेंट: फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको|२८७}}</noinclude>काम करनेके लिए जाना चाहें तो जायें। वे यदि परसे सम्पन्न हों तो अपने किराये
पर जायें।
बहनोंको भेजने के बारेमें तो मैं पहले ही लिख चुका हूँ। केशूके लिए कोई
काम ढूंढा या नहीं?
और खादी तैयार करनेके बारेमें जितना विचार किया जा सके, करना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
मलकानीको भेजना पड़ेगा; क्योंकि मैंने उसे इनकार नहीं लिखा था। अब [इनकार] लिखनेकी इच्छा नहीं होती।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१००) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''२७१. भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको'''}}}}
{{Right|जलालपुर}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
कलकत्ता और कराचीमें हुए तथाकथित दंगों के विषयमें अभी तो मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकता। मुझे तो अक्सर अपनी आंखों-देखी घटनाओंके इतने अधिक अतिरंजित और तोड़-मरोड़कर छापे गये विवरण देखनेको मिले हैं कि मेरा मन कहता है, जनता द्वारा हिंसात्मक कार्रवाइयाँ करनेके जो किस्से छपे हैं, उनमें से अधिकांश गलत होंगे। लेकिन उन्होंने कितनी भी कम हिंसा की हो, मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उससे हमारे संघर्षको नुकसान हुआ है, लेकिन साथ ही संघर्षको बिना रुके चलना है। यदि अहिंसाको सरकारको हिसाके साथ-साथ जनताकी हिंसाके खिलाफ भी जूझना है तो इसे अब भी, जैसे हो, अपना कठिन कर्त्तव्य पूरा करना ही है। मुझे तो इससे छुटकारा मिलता दिखाई नहीं देता।
संघर्ष प्रारम्भमें ही मैंने कह दिया था कि इस बात की पूरी सम्भावना है कि जनता थोड़ी-बहुत हिंसा कर सकती हैं। लगता है अब वह हिंसा भड़क उठी है। इससे मुझे दुःख हुआ है। सिर्फ इसलिए कि इससे उस उद्देश्यको नुकसान पहुँचा है जो मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। लेकिन में यह जरूर कहूँगा कि ऐसी सभाओंको भंग करके, जिनमें कोई हिंसात्मक कार्रवाई नहीं की गई, सरकारने लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित किया है। सार्वजनिक सभाओंके आयोजनों और उनकी कार्यवाहियों पर पूरी पावन्दी लगा देनेका उद्देश्य लोगोंको हिंसाके लिए उत्तेजित करना ही है। सरकारने खूब सोच-समझकर जनताके ऐसे नेताओंको गिरफ्तार किया है जिनकी ऐसी शोहरत थी कि ये अहिंसक हैं और लोगोंपर उनका ऐसा प्रभाव है कि वे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३२
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Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
674338
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>उन्हें नियन्त्रण में रख सकते हैं। यह तो एक चमत्कार ही होता यदि जनताकी स्वतन्त्र-
तामें ऐसी जबरदस्त दस्तन्दाजीके बावजूद आसानीसे भड़क उठनेवाले लोग प्रतिशोधके
लिए उत्तेजित न हो उठते और यह तो एक मानी हुई बात है कि ऐसे कुछ-न-कुछ
लोग हर समुदाय और दुनियाके हर हिस्सेमें पाये जाते हैं। खुद गुजरातको ही लीजिए। धोलेरामें, जो मुख्य रास्तेसे हटकर पड़ता है, और पास ही वीरमगांवमें सर्वथा निहत्थे और अशिक्षित राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओं के प्रति ऐसी घोर बर्बरता बरती गई जिसका साफ शब्दोंमें वर्णन नहीं किया जा सकता। उनका एक मात्र अपराध यही था कि उनके पास जो नमक था उसे वे अपने हाथसे जाने देने को तैयार नहीं थे।
पहली बात तो यह है कि मेरी जानकारीमें भारतके बाहर किसी भी सभ्य सरकारने पुलिसको यह अधिकार नहीं दिया है कि वह लोगोंसे, सिवाय ऐसी चीजोंके जो खतरनाक किस्मकी हों, कुछ भी जबरदस्ती छीने में जानता हूँ कि नमक-कानूनकी रूसे उन्हें यह सत्ता दी गई है। मगर इससे तो मेरा ही मत सिद्ध होता है। कोई भी बर्बरतापूर्ण काम सिर्फ इसीलिए कम बर्बरतापूर्ण नहीं हो जाता कि उसके पीछे कानूनकी सम्मति है। जो अशोभन अत्याचार किये जा रहे हैं, वे सर्वथा असह्य हैं और उनका उद्देश्य जनताके धैर्यको समाप्त कर देना है। स्पष्ट तथ्य यह है किसरकार शान्ति [नहीं] चाहती। देखता हूँ, श्रीयुत जयरामदास दौलतरामकी जाँघमें गोली लगी है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि किसी साधारण आदमीके बजाय श्रीयुत जयरामदास दौलतराम जख्मी हुए हैं। वे भारतके महानतम व्यक्तियोंमें से एक हैं। अगर भीड़में वे भी शामिल थे तो वह लोगोंको भड़कानेके लिए नहीं बल्कि उन्हें हिंसासे रोकनेके लिए ही थे।
ऐसे निर्दोष लोगोंका रक्त बहेगा तो इस अन्यायका अन्त और भी जल्दी होगा। लेकिन इस तरहके लोगोंके जख्मी किये जानेका परिणाम तो यही होगा कि जनता और भी उग्र प्रतिक्रिया दिखायेगी। लेकिन जिन लोगोंतक मेरा सन्देश पहुँच सके, उन्हें मैं आगाह कर देता हूँ कि यदि वे अपने-आपको नियन्त्रणमें नहीं रख सकते तो उन्हें संघर्ष में दखल नहीं देना चाहिए। अगर वे ऐसा करेंगे, तो हमारा देश आज जिस गति से अपने लक्ष्यकी ओर बढ़ रहा है, उसमें बाधा पड़ेगी।
लेकिन, मैं जानता हूँ कि वह समय बहुत दूर नहीं है जब मेरी आवाज जनता तक नहीं पहुँच पायेगी। मेरे हाथमें जो भी हथियार हैं, वे मुझसे छिन जायेंगे, लेकिन वे एक चीज तो मुझसे कदापि नहीं छीन सकते। वह है, अपने उद्देश्यमें मेरा अडिग विश्वास हम अपने सामने जिस प्रकारका सार्वजनिक आन्दोलन देख रहे हैं, उस तरहके आन्दोलनका नियमन मनुष्य नहीं, बल्कि ईश्वर करता है । जनताका उत्साह स्वतःस्फूर्त है। उसके लिए बहुत कम मार्ग-दर्शनकी जरूरत पड़ी है।
मैंने गुजरात में जो कुछ होते देखा है, वह यदि भारतके अन्य प्रान्तोंमें चल रहे घटना चक्रका नमूना है तो मानना पड़ेगा कि इस आन्दोलनको अधिकांशमें किसीके सूत्र संचालनकी जरूरत नहीं पड़ी है। इसलिए मुझे अब भी आशा है कि संघर्षके अन्तमें इसके लिए यह कहना सम्भव होगा कि यद्यपि यदा-कदा अहिंसाका खेदजनक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|{{larger|भाषण: वेजलपुरमें स्वयंसेवकोंके समक्ष|२८९}}</noinclude>विस्फोट हुआ, फिर भी आन्दोलनका अहिसात्मक रूप मुख्यतः कायम रहा। भारतके
भाग्यका निर्णय नगरोंमें क्या होता है, उससे नहीं, बल्कि गाँवोंमें क्या होता है, उससे
होगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७२. भाषण : वेजलपुरमें स्वयंसेवकोंके समक्ष'''}}}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजी ने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा कि आज हम यहाँ अपना आगामी कार्यक्रम तय करनेके लिए इकट्ठे हुए हैं। में जो कुछ सोचता था सरकार तो उससे बिलकुल उल्टा कर रही है। उसने सत्याग्रहियोंकी आशाओंपर पानी फेर दिया है। मैं सोचता था कि मुझे गिरफ्तार किया जायेगा, लेकिन में अब भी आजाद। हूँ। मगर सरकारने स्थितिका अन्दाजा लगाने में भूल की है। सत्याग्रहीके शब्द-कोशम 'पराजय' शब्द कहीं है ही नहीं। जो मर-मिटने और जो कुछ आ पड़े उसे सहनेके लिए तैयार हैं, उनके लिए पराजय कहीं है ही नहीं। इस कष्ट-सहन से हममें एक प्रयल शक्ति उत्पन्न होगो और उसके बलपर हम सरकारके सारे कानून तोड़ सकेंगे।'''
'''हमने नमक कानून तो सफलतापूर्वक भंग किया है। अब आगे हम क्या करें? फलकता और कराचीमें दंगे होने की खबर मिली है। मैंने अखबारोंमें जो कुछ देखा है, उससे लगता है कि जनता से कहीं कोई गलती हो रही है और यह बहुत दुःखको बात है। यद्यपि में यह आशा करता हूँ कि लोग अहिंसापर आरुढ़ रहेंगे, लेकिन में यह मानकर नहीं चल रहा हूँ कि ऐसी घटनाएँ कभी घटेंगी ही नहीं।'''
मैं इस लड़ाईको बन्द करके लोगोंको शान्ति और अहिंसाकी शिक्षा नहीं दे सकता। कोई एक आदमी करोड़ों लोगोंपर नियन्त्रण कैसे रख सकता है? हमें अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। फिर लोग अपने-आप समझ जायेंगे। मुझे उम्मीद है कि गुजरातने अहिंसाका पाठ अच्छी तरह समझ लिया है। आज अहिंसा ही हमारा धर्म है। हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक कष्ट सहन करते रहना है।
'''गांधीजी ने आगे कहा कि मैं चाहता हूँ, जबतक स्वराज्य प्राप्त न हो जाये तबतक सभीको राष्ट्रीय स्वयंसेवकोंके रूपमें काम करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। फिर उन्होंने सभीसे कहा कि जो लोग अपनी सेवाएँ देते रहना चाहते हैं, ये निर्भीक
होकर हाथ उठायें। इसपर ४८ के अतिरिक्त सभी स्वयंसेवकोंने हाथ उठा दिये।'''
'''गांधीजी ने हाथ न उठानेवाले ४८ स्वयंसेवकोंको उनके साहसके लिए बधाई देते
हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि उन सबको उनके गाँवोंमें ही योग्य कार्य दिये जायेंगे।'''
४३-१९<noinclude></noinclude>
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भाग्यका निर्णय नगरोंमें क्या होता है, उससे नहीं, बल्कि गाँवोंमें क्या होता है, उससे
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[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३०
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'''गांधीजी ने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा कि आज हम यहाँ अपना आगामी कार्यक्रम तय करनेके लिए इकट्ठे हुए हैं। में जो कुछ सोचता था सरकार तो उससे बिलकुल उल्टा कर रही है। उसने सत्याग्रहियोंकी आशाओंपर पानी फेर दिया है। मैं सोचता था कि मुझे गिरफ्तार किया जायेगा, लेकिन में अब भी आजाद। हूँ। मगर सरकारने स्थितिका अन्दाजा लगाने में भूल की है। सत्याग्रहीके शब्द-कोशम 'पराजय' शब्द कहीं है ही नहीं। जो मर-मिटने और जो कुछ आ पड़े उसे सहनेके लिए तैयार हैं, उनके लिए पराजय कहीं है ही नहीं। इस कष्ट-सहन से हममें एक प्रयल शक्ति उत्पन्न होगो और उसके बलपर हम सरकारके सारे कानून तोड़ सकेंगे।'''
'''हमने नमक कानून तो सफलतापूर्वक भंग किया है। अब आगे हम क्या करें? फलकता और कराचीमें दंगे होने की खबर मिली है। मैंने अखबारोंमें जो कुछ देखा है, उससे लगता है कि जनता से कहीं कोई गलती हो रही है और यह बहुत दुःखको बात है। यद्यपि में यह आशा करता हूँ कि लोग अहिंसापर आरुढ़ रहेंगे, लेकिन में यह मानकर नहीं चल रहा हूँ कि ऐसी घटनाएँ कभी घटेंगी ही नहीं।'''
मैं इस लड़ाईको बन्द करके लोगोंको शान्ति और अहिंसाकी शिक्षा नहीं दे सकता। कोई एक आदमी करोड़ों लोगोंपर नियन्त्रण कैसे रख सकता है? हमें अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। फिर लोग अपने-आप समझ जायेंगे। मुझे उम्मीद है कि गुजरातने अहिंसाका पाठ अच्छी तरह समझ लिया है। आज अहिंसा ही हमारा धर्म है। हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक कष्ट सहन करते रहना है।
'''गांधीजी ने आगे कहा कि मैं चाहता हूँ, जबतक स्वराज्य प्राप्त न हो जाये तबतक सभीको राष्ट्रीय स्वयंसेवकोंके रूपमें काम करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। फिर उन्होंने सभीसे कहा कि जो लोग अपनी सेवाएँ देते रहना चाहते हैं, ये निर्भीक
होकर हाथ उठायें। इसपर ४८ के अतिरिक्त सभी स्वयंसेवकोंने हाथ उठा दिये।'''
'''गांधीजी ने हाथ न उठानेवाले ४८ स्वयंसेवकोंको उनके साहसके लिए बधाई देते
हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि उन सबको उनके गाँवोंमें ही योग्य कार्य दिये जायेंगे।'''
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भाग्यका निर्णय नगरोंमें क्या होता है, उससे नहीं, बल्कि गाँवोंमें क्या होता है, उससे
होगा।
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७२. भाषण : वेजलपुरमें स्वयंसेवकोंके समक्ष'''}}}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
'''गांधीजी ने अपना भाषण प्रारम्भ करते हुए कहा कि आज हम यहाँ अपना आगामी कार्यक्रम तय करनेके लिए इकट्ठे हुए हैं। में जो कुछ सोचता था सरकार तो उससे बिलकुल उल्टा कर रही है। उसने सत्याग्रहियोंकी आशाओंपर पानी फेर दिया है। मैं सोचता था कि मुझे गिरफ्तार किया जायेगा, लेकिन में अब भी आजाद। हूँ। मगर सरकारने स्थितिका अन्दाजा लगाने में भूल की है। सत्याग्रहीके शब्द-कोशम 'पराजय' शब्द कहीं है ही नहीं। जो मर-मिटने और जो कुछ आ पड़े उसे सहनेके लिए तैयार हैं, उनके लिए पराजय कहीं है ही नहीं। इस कष्ट-सहन से हममें एक प्रयल शक्ति उत्पन्न होगो और उसके बलपर हम सरकारके सारे कानून तोड़ सकेंगे।'''
'''हमने नमक कानून तो सफलतापूर्वक भंग किया है। अब आगे हम क्या करें? फलकता और कराचीमें दंगे होने की खबर मिली है। मैंने अखबारोंमें जो कुछ देखा है, उससे लगता है कि जनता से कहीं कोई गलती हो रही है और यह बहुत दुःखको बात है। यद्यपि में यह आशा करता हूँ कि लोग अहिंसापर आरुढ़ रहेंगे, लेकिन में यह मानकर नहीं चल रहा हूँ कि ऐसी घटनाएँ कभी घटेंगी ही नहीं।'''
मैं इस लड़ाईको बन्द करके लोगोंको शान्ति और अहिंसाकी शिक्षा नहीं दे सकता। कोई एक आदमी करोड़ों लोगोंपर नियन्त्रण कैसे रख सकता है? हमें अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। फिर लोग अपने-आप समझ जायेंगे। मुझे उम्मीद है कि गुजरातने अहिंसाका पाठ अच्छी तरह समझ लिया है। आज अहिंसा ही हमारा धर्म है। हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक कष्ट सहन करते रहना है।
'''गांधीजी ने आगे कहा कि मैं चाहता हूँ, जबतक स्वराज्य प्राप्त न हो जाये तबतक सभीको राष्ट्रीय स्वयंसेवकोंके रूपमें काम करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। फिर उन्होंने सभीसे कहा कि जो लोग अपनी सेवाएँ देते रहना चाहते हैं, ये निर्भीक
होकर हाथ उठायें। इसपर ४८ के अतिरिक्त सभी स्वयंसेवकोंने हाथ उठा दिये।'''
'''गांधीजी ने हाथ न उठानेवाले ४८ स्वयंसेवकोंको उनके साहसके लिए बधाई देते
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''इसके बाद राष्ट्रीय सैनिकोंके लिए खाद्य सामग्रीके सवालपर विचार किया गया। महात्माजी की सलाहपर सभी स्वयंसेवकोंने एकमत होकर तय किया कि उनका भोजन सादा होना चाहिए और उसपर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ५ आनेसे अधिक खर्च नहीं आना चाहिए। लेकिन यह छूट दी गई कि यदि कोई स्वयंसेवक चाहे तो वह नायककी अनुमति लेकर अपने खर्चसे अपने लिए भोजनको अलग व्यवस्था कर सकता है। लेकिन, गांधीजी का कहना था कि उन्हें इस छूटका यथासम्भव कमसे-कम लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय सैनिकोंके रूपमें उनसे आत्मसंयमकी अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि इंग्लैंडमें तो राजाओं को भी नाविकोंके रूपमें काम करना पड़ा है और वहाँ वे वही खाना खाते थे जो एक आम नाविक खाता था।'''
'''राष्ट्रीय सेनाके सिपाहियों द्वारा धूमपान से सम्बन्धित प्रस्तावपर बड़ी बहस
हुई। गांधीजी ने कहा, मैं यह नहीं चाहता कि जो लोग धूमपानके आदी हैं, उन
सबको इस सेनासे बरखास्त कर दिया जाये, लेकिन उन्हें घूमपानके बिना काम चलानेकी कोशिश अवश्य करनी चाहिए।'''
'''सम्मेलनका समापन करते हुए महात्माजी ने इस बातपर बहुत जोर दिया कि आप सबको हमेशा अपने-अपने कर्तव्य स्थलपर रहना चाहिए और आपने पूरी तरह विचार-विमर्श करके स्वेच्छा से जो नियम बनाये हैं, उनका आप सबको पालन करना चाहिए। आपका चरित्र ऊँचा होना चाहिए। यदि आपकी अन्तरात्मा स्वच्छ नहीं है तो आपके किये राष्ट्रीय कार्यसे तो स्वराज्य हम सबसे और भी दूर चला जायेगा। मेरे लिए वह बहुत अधिक खुशीका दिन होगा जब में अपने राष्ट्रीय सैनिकोंको कष्ट सहन करते और गोलियोंको अपने सीनेपर झेलते हुए देखूंगा। इन अहिंसक सिपाहियोंके भस्मावशेषसे स्वराज्यका जन्म होगा।'''
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'''इसके बाद राष्ट्रीय सैनिकोंके लिए खाद्य सामग्रीके सवालपर विचार किया गया। महात्माजी की सलाहपर सभी स्वयंसेवकोंने एकमत होकर तय किया कि उनका भोजन सादा होना चाहिए और उसपर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ५ आनेसे अधिक खर्च नहीं आना चाहिए। लेकिन यह छूट दी गई कि यदि कोई स्वयंसेवक चाहे तो वह नायककी अनुमति लेकर अपने खर्चसे अपने लिए भोजनको अलग व्यवस्था कर सकता है। लेकिन, गांधीजी का कहना था कि उन्हें इस छूटका यथासम्भव कमसे-कम लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय सैनिकोंके रूपमें उनसे आत्मसंयमकी अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि इंग्लैंडमें तो राजाओं को भी नाविकोंके रूपमें काम करना पड़ा है और वहाँ वे वही खाना खाते थे जो एक आम नाविक खाता था।'''
'''राष्ट्रीय सेनाके सिपाहियों द्वारा धूमपान से सम्बन्धित प्रस्तावपर बड़ी बहस हुई। गांधीजी ने कहा, मैं यह नहीं चाहता कि जो लोग धूमपानके आदी हैं, उन सबको इस सेनासे बरखास्त कर दिया जाये, लेकिन उन्हें घूमपानके बिना काम चलानेकी कोशिश अवश्य करनी चाहिए।'''
'''सम्मेलनका समापन करते हुए महात्माजी ने इस बातपर बहुत जोर दिया कि आप सबको हमेशा अपने-अपने कर्तव्य स्थलपर रहना चाहिए और आपने पूरी तरह विचार-विमर्श करके स्वेच्छा से जो नियम बनाये हैं, उनका आप सबको पालन करना चाहिए। आपका चरित्र ऊँचा होना चाहिए। यदि आपकी अन्तरात्मा स्वच्छ नहीं है तो आपके किये राष्ट्रीय कार्यसे तो स्वराज्य हम सबसे और भी दूर चला जायेगा। मेरे लिए वह बहुत अधिक खुशीका दिन होगा जब में अपने राष्ट्रीय सैनिकोंको कष्ट सहन करते और गोलियोंको अपने सीनेपर झेलते हुए देखूंगा। इन अहिंसक सिपाहियोंके भस्मावशेषसे स्वराज्यका जन्म होगा।'''
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'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-४-१९३०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}</noinclude>की निर्णय बुद्धिमें मेरा विश्वास नहीं रह गया है। नेहरू रिपोर्टका बचाव तो मैं अब भी करूँगा। मगर यह स्वीकार करता हूँ कि अगर उससे मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकोंको सन्तोष नहीं मिलता तो वह बेकार ही है। यही कारण है कि मैंने कलकत्ता मोतीलालजीकी अनुपस्थितिमें, किन्तु उनकी सहमति और स्वीकृतिसे, रिपोर्टको बचानेवाला वह प्रस्ताव पेश किया था। आपके लिए इतना काफी होना चाहिए कि नेहरू रिपोर्ट और उसके साथ ही उसकी साम्प्रदायिक योजना खत्म हो गयी है। स्वतन्त्र भारतमें उस योजनाका रूप क्या होगा, इसका निर्णय तो अवसर आनेपर मुसलमान, सिख, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय और हिन्दू लोग ही करेंगे। अगर नेहरू रिपोर्टको स्वीकार करके मैंने गलती की तो उस गलतीमें डॉ० अन्सारी भी शरीक थे। मेरे लिए इतना काफी था।
आपका यह आरोप सही है कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेके लिए मैंने आपसे परामर्श नहीं किया। लेकिन यह जानते हुए कि हममें कोई विचार-साम्य नहीं है, मैं वैसा विचार कर भी कैसे सकता था?
क्या आप यह नहीं देख सकते कि आपसे सलाह लिये बिना काम करते हुए भी मेरे लिए यह सम्भव है कि आपका साथ न छोड़ें? मेरा मन साफ है। मैंने
न आपका साथ छोड़ा है, न मुसलमानोंका। नमक- अधिनियम तथा अन्य अन्यायोंके
खिलाफ लड़ने और स्वतन्त्रताके लिए संघर्ष करने में साथ छोड़नेका सवाल कहाँ उठता
है ? और अन्तमें कहूँगा कि मेरा कोई आश्वासन जिसे सिद्ध नहीं कर सकता उसे
समय सिद्ध कर दिखायेगा।
आप चाहें तो हमारे बीच हुआ पूरा पत्र-व्यवहार खुशी-खुशी छाप सकते हैं।
आशा करता हूँ, मुहम्मद अलीकी आँखोंके बारेमें आपकी आशंकाएँ निर्मूल साबित होंगी। उनकी आंखोंकी आवश्यकता है चाहे वह मुझसे लड़नेके लिए ही क्यों न हो। ईश्वर उनका और आपका कल्याण करे।
{{Right|सदा आपका ही,}}
अंग्रेजी (एस० एन० १६८१०) की फोटो नकलसे।
<small>१. मोतीलाल नेहरूकी अध्यक्षता में एक समिति द्वारा तैयार किये गये भारतके संविधानका मसविदा देखिए खण्ड ३८।<small<poem></poem>><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२७५. स्वयंसेवकोंको सलाह'''}}}}
{{Right|नवसारी}}
{{Right|१७ अप्रैल, १९३०}}
'''स्वयंसेवकों जो कपड़े फट गये हैं, उनके बदले नये कपड़े बनवानेके लिए उनकी खादीकी जरूरतको लेकर कल गांधीजी के शिविरमें एक सवाल खड़ा हो गया। महात्मा गांधीने कहा कि स्वयंसेवकोंको फटे या खोये हुए कपड़ोंके बिना ही काम चलाना चाहिए और भारतके करोड़ों लोगोंकी तरह केवल लँगोटियोंसे ही संतुष्ट रहना चाहिए।'''
[अंग्रेजीसे]
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १९-४-१९३०
{{C|{{larger|'''२७६. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|१८ अप्रैल, १९३०}}
धन्यवाद। आपने मेरे मनका भार काफी हलका कर दिया है। ईश्वर आपको शक्ति दे।
[अंग्रेजीसे]
गांधी-नेहरू कागजात, १९३०
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
<small>१. यह मोतीलालजी के एक तारके उत्तरमें भेजा गया था। अपने तारमें मोतीलालजी ने गांधीजी को सूचित किया था कि उन्होंने कांग्रेसकी अध्यक्षताका भार सँभाल लिया है; देखिए "तार मोतीलाल नेहरूको ", १५-४-१९३० भी।<small><noinclude></noinclude>
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'''स्वयंसेवकों जो कपड़े फट गये हैं, उनके बदले नये कपड़े बनवानेके लिए उनकी खादीकी जरूरतको लेकर कल गांधीजी के शिविरमें एक सवाल खड़ा हो गया। महात्मा गांधीने कहा कि स्वयंसेवकोंको फटे या खोये हुए कपड़ोंके बिना ही काम चलाना चाहिए और भारतके करोड़ों लोगोंकी तरह केवल लँगोटियोंसे ही संतुष्ट रहना चाहिए।'''
[अंग्रेजीसे]
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धन्यवाद। आपने मेरे मनका भार काफी हलका कर दिया है। ईश्वर आपको शक्ति दे।
[अंग्रेजीसे]
गांधी-नेहरू कागजात, १९३०
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय
<small>१. यह मोतीलालजी के एक तारके उत्तरमें भेजा गया था। अपने तारमें मोतीलालजी ने गांधीजी को सूचित किया था कि उन्होंने कांग्रेसकी अध्यक्षताका भार सँभाल लिया है; देखिए "तार मोतीलाल नेहरूको ", १५-४-१९३० भी।<small><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||शीर्षक सांकेतिका|४९१}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}६७; -डभाण में; ८३-८४; - डिंडोली-में, १७२-७३; -त्रासाकी सार्वजनिक सभामें, १२८-२९; -दांडी में, १८७-९१, २०६-७, २६१-६५; -देलाडमें, १६२-६३; -धामण, १८२: -नडियादमें ८४-८५; -नवसारी में, १७९-८१; -नवा-गाँवमें, ७५-७७; -पटेलोंकी सभा वेजलपुरमें, २९६-९७; -पटेलोंके समक्ष, सूरतमें, ३१७; -पन्नारमें, ३४०; -प्रार्थना-सभा, सजोदमें १४५-४६: -प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रम, ३२, ३८-४०, ४८, ४९-५१, ६४-६५; -बलसाड़में, ३४३-४६; -बारेजामें, ७४-७५; -बिलीमोरामें, ३६८; -बुवामें, १२५;
-बोरसदमें, १०३-६; -बोरीयावीमें, ९१-९२; -भटगाम में, १५१-५४; -भड़ौंचमें, १३०-३३; -भीमराडमें, २२४-२५; -माँगरोलमें, १४७-४८; -रांदेरमे ३९२; -रायमामें, १४९; -रासमें १०७-१०; -वाँझकी प्रार्थना-सभामें, १७८-७९; -वासणामें, ८०-८१; -वेजलपुरमें, १८३-८४; -वेजलपुरमें स्वयंसेवकों के समक्ष, २८९-९०; -सजोदमें, १४६-४७; -सत्याग्रहियोंके समक्ष, १०१; -समनीमे, १२६; - साँधियेरमे, १६०-६२; -साबरमती आश्रम में, ९-१०; - सूरतमें, १६७-७०, ४१६-१७; -स्वयंसेवकों के समक्ष, १५०, २४४}}
{{Outdent|भाषणके अंश: ओलपाडमें दिये गये भाषणके अंश, ३९०-९१; -बारडोलीमें दिये गये भाषणके अंश, २८९-९०; -सूरत जिलेमें दिये गये भाषणोंके अंश, १९३-९५}}
{{Outdent|भेंट: एच॰ डी॰ राजाके साथ, ४१; - एसोसि-एटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको २४३-४४, ३१५; -जे॰ बी॰ कृप-लानीको ४१४-१६; -‘डेली टेली-ग्राफ’ के प्रतिनिधिको, ४२१-२२; - ‘डेली हैरॉल्ड’ के प्रतिनिधिको ४३७-}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}३८; -फी प्रेस ऑफ इंडियाके प्रति-निधिको २०५-६, २८७-८९; -‘बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको, ३०७, ३६७; -‘मैचेस्टर गार्जियन’ के प्रतिनिधिको, ४२; -युसूफ मेहरअलीको, १२२-२४; - ‘लीडर’ के प्रतिनिधिको ३७१; -हरिदास टी॰ मजुमदारसे, ६६-६७; -‘हिन्दू’ के प्रतिनिधिको २४४-४५, ३३४}}
{{Outdent|मसविदा: वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा, ३५३-५४; -गुजरातकी महिलाओंसें का मसविदा, ३५५}}
{{Outdent|वक्तव्य: एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको १८५-८६, २५२; -नमककी क्यारीमें विष मिलाये जानेके सम्बन्ध में, ३७१-७२; -वल्लभभाई पटेलकी गिरफ्तारीपर, २६; -समाचार-पत्रोंको २१२-१३}}
{{Outdent|(एक) सन्देश, १८६}}
{{Outdent|सन्देश: अमेरिकाको, १८६, ३५०-५२; - आंध्रदेशके लिए, ४०; -काठिया-वाड़के लोगोंके लिए, २१६; -गुजरातके नाम, २१६-१७; -धोलेरा और वीरमगाँवके लोगोंको, ३०१; -ब॰ प्र॰ कां॰ कमेटीको, २३७; -बम्बईकी साह सभाके लिए, ३९६; -बम्बईके नाग-
रिकोंको, २३६; -बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके लिए, ५३; महाराष्ट्रको, १२२; -राष्ट्रके नाम, २२०-२२; -स्वयंसेवकोंको, आटमें २१५; -हंसा मेहताके लिए, २५३; -हिन्दुस्तानी सेवा दलको १४५; -‘हिन्दू’ के लिए, २५९; देखिए उपशीर्षक “विविध” के अन्तर्गत “चन्दोलासे चलते समय दिया गया विदाई सन्देश” भी}}
{{c|'''विविध'''}}
{{gap}}अध्यक्षका सम्मान, २८१; अनैतिक आधार, २३०-३१; अन्तिम परीक्षा,३३-१४;
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५३६
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४९२|'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}अन्त्यजोंके लिए कुएँ, '''१९७;''' अल्पसंख्यकोंकी समस्या, '''४१७;''' अशासन बनाम कुशासन, '''२१-२२;''' अश्लील साहित्य, '''२२-२३;''' अस्पृश्यता, '''२७४-७६;''' अहमदाबाद के मिल-मालिकोंसे, '''२०२-४;''' अहिंसाकी विजय, ३८८; इमाम साहब, '''३५९-६०;''' उस पत्रके बारेमें '''१५-१७;''' एक अंग्रेज भाईकी समस्या, '''२३२-३४;''' एक पुस्तककी प्रस्तावना, '''२७;''' कलकत्ता और कराची, '''३०१-२;''' कांग्रेस-अध्यक्ष जेलमें, '''२८६;''' काकासाहब, '''४०६-७;''' काला
शासन, '''३०९-१२;''' कुछ शर्तों, '''२३५;''' कुछ सुझाव, १४०-४३; खरा हिसाब रखनेकी जरूरत, '''३२५;''' खादीके विषयमें चेतावनी, '''४०५-६;''' खेड़ावासियोंके प्रति, ३९८-४०१; खोदा पहाड़ निकली चुहिया, '''१३५-३६;''' गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय, २५५-५६; गुण्डा-राज, '''३७९-८१;''' चन्दोलासे चलते समय दिया गया विदाईhसन्देश, '''६६;''' -चहूँमुखी अभिशाप, '''५६-५८;''' छद्म सैनिक कानून, '''३६९-७०;''' ६ अप्रैलको याद रखें, '''१७६;''' जन-आन्दोलन, '''३२३-२४;''' जैसा वह नहीं है, '''५९-६२;''' टक्कर बापाकी झोली, '''१;''' तकली-के द्वारा बहिष्कार, '''३३०-३२;''' तलवारका न्याय, '''१४४-४५;''' दिल्लीके पत्रकारोंको बधाइयाँ, '''३७२;''' ‘द्रौपदीना चीर' की प्रस्तावना, २७; धरना कैसे दें, '''३२७-२८;''' नई दिशा, '''६२-६४;''' नमक-कानूनके दण्ड-विषयक खण्ड, '''१४-१५;''' पत्र-लेखकों, '''३७८;''' ‘पब्लिक फिनांस एंड आयर पावर्टी’ की प्रस्तावना, '''२९९;''' परिचित उत्तर '''५५-५६;''' प्रयाण, '''८७-८९;''' प्रश्नोत्तर '''४३-४८,''' '''३८५-८६;''' बंगाल आसाममें हिन्दी, '''६९-७०;''' बर्बरतापूर्ण, '''२१०-१२;''' बहनोंके प्रति, '''१९५-९७;''' बहनोंसे '''२५७-५८;''' बहिष्कार और खादी, '''३६०-६२;''' बहिष्कार की मर्यादा, '''१५५-५७;''' ‘भगवद्गीता’ अथवा ‘अनासक्ति-योग’, '''८९-९०;''' भारतकी महिलाओंसे '''२२६-'''}}
{{Multicol-break}}
{{Outdent|{{gap}}'''२८;'''मद्यपान निषेध '''१७७;''' मध्यरात्रि में गिरफ्तारी, '''४२०;''' महादेव देसाई और उनके उत्तराधिकारी, '''३७६-७८;''' महान् तत्त्व-दर्शी, '''१०२-३;''' मिल-मालिक और खादी, '''२५६-५७;''' मिल-मालिक संघके सदस्योंसे बातचीत, '''३१;''' मुखियों और मतादारोंके बारेमें, '''१५८-५९;''' मुद्रणालयोंपर छापा, '''४०४;''' मेरी कसौटी, '''३६३;''' मेरे बारेमें भ्रामक प्रचार, '''५९;''' यदि सच है तो अच्छा, '''११६;''' राक्षसी कर, '''२७६-७८;''' राजद्रोह धर्म है, '''१३७-३९;''' ‘राजाका प्राप्य राजाको दो’, '''१३६-३७;''' ‘राजकथा’ की प्रस्तावना, '''२८;''' रासका उत्साह, '''३५७-५८;''' वकीलोंका धर्म, '''४०१-३;''' विट्ठलभाई लल्लूभाईका
श्राद्ध, '''३५६-५७;''' विदेशी कपड़ोंके व्यापारी, '''३३२-३३;''' विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह '''३०८;''' विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी, '''३०२-४;''' विद्यार्थी और चारित्र्य, '''१७-१८;''' विद्यार्थी क्या पसन्द करेंगे?, '''११३-१४;''' वी॰ ए॰ सुन्दरम्को प्रमाणपत्र, '''३९७;''' शराब और पारसी, '''३८७-८८;''' शराबकी दुकानों पर धरना, '''३२५-२७;''' सत्याग्रह-युद्ध, २८५; सत्याग्रही-दलका कूच, ३५-३७; सन्देश रिकार्ड किये जानेके सम्बन्धमें, ४२-४३, सरकारकी क्षुद्रता, ११५-१६, सरकारी कर्ज, १९-२०; सरकारी कर्जका विश्लेषण, १५; सरदार वल्लभभाई पटेल, '''५३-५४;''' सलाम अथवा बेंत?, '''३३३-३४;''' सिंहावलोकन, '''२७८-८०;''' स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र, '''२८१-८५;''' स्वदेशी, '''१९९-२०२;''' स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञापत्र, '''१३९-४०;''' स्वयंसेवकोंको सलाह, '''२९३;''' स्वयंसेवकोंसे बातचीत, '''१००;''' स्व-राज्य और रामराज्य, '''११७;''' स्वराज्यके कार्यकर्ताओंके लिए प्रतिज्ञा, '''३७५;''' हम सब एक हैं, '''८६-८७;''' हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार '''३२८-३०;'''हिन्दू-मुस्लिम एकता, '''३२१-२२'''}}
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४९२|'''सम्पूर्ण गांधी वाड्मय'''|}}</noinclude>{{Multicol}}
{{Outdent|{{gap}}अन्त्यजोंके लिए कुएँ, '''१९७;''' अल्पसंख्यकोंकी समस्या, '''४१७;''' अशासन बनाम कुशासन, '''२१-२२;''' अश्लील साहित्य, '''२२-२३;''' अस्पृश्यता, '''२७४-७६;''' अहमदाबाद के मिल-मालिकोंसे, '''२०२-४;''' अहिंसाकी विजय, ३८८; इमाम साहब, '''३५९-६०;''' उस पत्रके बारेमें '''१५-१७;''' एक अंग्रेज भाईकी समस्या, '''२३२-३४;''' एक पुस्तककी प्रस्तावना, '''२७;''' कलकत्ता और कराची, '''३०१-२;''' कांग्रेस-अध्यक्ष जेलमें, '''२८६;''' काकासाहब, '''४०६-७;''' काला
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श्राद्ध, '''३५६-५७;''' विदेशी कपड़ोंके व्यापारी, '''३३२-३३;''' विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह '''३०८;''' विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी, '''३०२-४;''' विद्यार्थी और चारित्र्य, '''१७-१८;''' विद्यार्थी क्या पसन्द करेंगे?, '''११३-१४;''' वी॰ ए॰ सुन्दरम्को प्रमाणपत्र, '''३९७;''' शराब और पारसी, '''३८७-८८;''' शराबकी दुकानों पर धरना, '''३२५-२७;''' सत्याग्रह-युद्ध, २८५; सत्याग्रही-दलका कूच, ३५-३७; सन्देश रिकार्ड किये जानेके सम्बन्धमें, ४२-४३, सरकारकी क्षुद्रता, ११५-१६, सरकारी कर्ज, १९-२०; सरकारी कर्जका विश्लेषण, १५; सरदार वल्लभभाई पटेल, '''५३-५४;''' सलाम अथवा बेंत?, '''३३३-३४;''' सिंहावलोकन, '''२७८-८०;''' स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र, '''२८१-८५;''' स्वदेशी, '''१९९-२०२;''' स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञापत्र, '''१३९-४०;''' स्वयंसेवकोंको सलाह, '''२९३;''' स्वयंसेवकोंसे बातचीत, '''१००;''' स्व-राज्य और रामराज्य, '''११७;''' स्वराज्यके कार्यकर्ताओंके लिए प्रतिज्ञा, '''३७५;''' हम सब एक हैं, '''८६-८७;''' हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार '''३२८-३०;'''हिन्दू-मुस्लिम एकता, '''३२१-२२'''}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११३
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Koyal Singh
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{{c|'''१०९. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
९ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० प्रभावती,}}
तेरा पत्र मिला। मेरे पत्र तुझे क्यों नहीं मिलते, यह बात मेरी समझमें नहीं आती। किसी भी डाकमें मैं तुझे पत्र लिखना भूल गया होऊँ, ऐसा मुझे याद नहीं आता। लेकिन किसी समय तुझे पत्र न मिले, तो समझ लेना कि मैं पराधीन हूँ। बहुत करके अब तो यहाँसे भी सब पत्र भेजे जाते हैं। मेरी चिन्ता न करना। तेरा शरीर क्षीण नहीं होना चाहिए। शेष उत्तर मैंने पिछले पत्रोंमें दे दिये हैं। पिताजीकी क्या बात करें? बिस्तरमें पड़े गये हैं फिर भी उनमें सिंहका-सा उत्साह और साहस है। तूने उनके घर जन्म लिया है; तू भी उनके इन गुणोंको अवश्य ग्रहण करेगी। भगवान तुझे सिंहनी बनायेगा!
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|[ पुनश्च : ]<br>
काकासाहब आनन्दसे हैं। तुझे आशीर्वाद भेजते हैं।}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३३६६) की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''११०. पत्र : सत्यादेवी गिरिको'''<ref>१. दलबहादुर गिरिकी दूसरी कन्या।</ref>}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
९ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० सत्य देवी,}}
तेरा पत्र मिला। तूने पेड़ अच्छे निकाले हैं। अब तुझे चाहिए कि तू जिन्दा पेड़ोंको देखकर अपने चित्रोंसे उनकी तुलना करे, जिससे तेरा चित्र देखनेवालेको ऐसा लगे, मानो वह असल पेड़ देख रहा हो। अक्षरोंको ठीक-सा मोड़ देनेसे पहले सही अक्षर निकालनेका पक्का अभ्यास कर लेना चाहिए। तुझे अच्छी बातें सीखनेका शौक है। इसलिए कहता हूँ कि तू अपने हिज्जे अभीसे सही लिखना सीख ले। कातनेमें आलस मत करना।<ref>२. मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref>
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११४
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१११. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
९ अगस्त, १९३०}}
{{Left|प्रिय भगिनि,}}
सतीशबाबूकी दिनचर्या पढ़कर बड़ा आनंद होता है। तकली पर एक दिनमें एक आदमी १००० गज निकालता है तो एक घंटेका कितना कातता है? इतनी गति मैं तो नहीं ला सकता हूँ। जो बहिन गिरफ्तार हुईं उनके लड़कोंकी देखभाल कौन करता है?
कृष्णदासका कुछ पता है? उसके तरफसे कुछ खत आते हैं।
तारीणीको मेरे आशीर्वाद दो। अरुण कहाँ है? चारु साथमें है क्या? दोनोंको आशीर्वाद।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|जी० एन० १६७० की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''११२. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१० अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे पटनासे भेजा तुम्हारा प्रेम-पत्र मिला। तुम्हारे अनुभव मूल्यवान हैं। मैं आशा करता हूँ कि पेचिशके लक्षण अब बिलकुल दूर हो गये हैं।
मैं नये चरखेको ही चला रहा हूँ। गति अभी भी वही है। लेकिन मैं इसे छोड़नेवाला नहीं हूँ। यह एक अमूल्य निधि
भजनोंका अनुवाद-कार्य घड़ीकी गतिके समान नियमित रूपसे चल रहा है, लेकिन मैं उसे और अधिक समय नहीं दे पाया हूँ। इसलिए जैसाकि मैंने अपने एक पत्रमें लिखा है, समय-सीमा वही है।
श्री हसन इमामको पत्र लिखना तो मेरी याद दिला देना और उन्हें बता देना कि दस वर्ष पहलेकी बातचीत उनको स्मरण है, यह जानकर मुझे बहुत आनन्द हुआ।
मेरा वजन दो पौंड कम हुआ है, लेकिन चिन्ताकी कोई बात नहीं है। कब्ज दूर ही नहीं होता, इस कारण दूधकी मात्रामें कमी करनी पड़ी। जितनी मात्रा लेता था उतनी ही फिर लेने लगा तो वजन फिर बढ़ जायेगा। स्वास्थ्य खोनेकी अपेक्षा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११५
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : शिवाभाई पटेलको|७४}}
वजन खोना ज्यादा अच्छा है। शक्ति वैसी ही बनी हुई है। यह समाचार प्रकाशनके लिए नहीं है। मैंने सत्यकी खातिर यह सूचना तुम्हें दी है। मैं तुम्हें अपने स्वास्थ्यके बारेमें बतानेको वचनबद्ध हूँ, और इसीलिए वजन कम होनेकी बात छिपा नहीं सकता।
<br>सप्रेम,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०६) से। सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६४० से भी।
{{c|'''११३. पत्र : शिवाभाई पटेलको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१० अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० शिवाभाई,}}
मुझे यह याद नहीं पड़ता कि तुम्हारा अलगसे लिखा हुआ पत्र मुझे मिला था या नहीं। क्या लिखा था उसमें?
अपनी कमजोरीको दूर करनेका एक रास्ता तो यह है कि जिस दिन 'गीता' के जिस अध्यायका पाठ हो, उस दिन उस अध्यायमें से जो भी श्लोक रुचे, कोई भी काम करते हुए पूरे दिन उस श्लोकका निरन्तर पाठ करें। ऐसा करनेसे अन्य हानिकारक विचार दूर हो जाते हैं। यह उपाय मेरा आजमाया हुआ है। मैं जानता हूँ कि रायचन्दभाई ऐसा ही किया करते थे। अन्य बहुतसे लोगोंका भी यही अनुभव है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० १५००) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११६
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''११४. पत्र : हरिइच्छा देसाईको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१० अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० हरिइच्छा,}}
तेरा पत्र पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। तूने इतने खराब अक्षर क्यों लिखे हैं? अक्षर बनानेके बारेमें रामदास स्वामीकी<ref>१. महाराष्ट्रके १७वीं सदीके सन्त कवि।</ref> छन्दोबद्ध कड़ियाँ हैं जिनका अनुवाद मैंने आश्रमको भेजा है। हरिभाई उसकी नकल तुझे भेज देंगे।
कताई प्रतियोगितामें किसी बहनको जीतना चाहिए। तेरी तबीयत कैसे बिगड़ गई? मैं तो तुझे खासी स्वस्थ मानता था। बुखारको भगाना। तेरी आँख कैसी है? यदि तुम सब तुरन्त आश्रम चली जाओ तो मुझे प्रसन्नता होगी। चन्दन, तारा और वसन्त भी मुझे पत्र लिखें।
काकासाहब का आशीर्वाद।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ७४६५) की फोटो-नकलसे।
{{c|'''११५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१० अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० काशिनाथ,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैं समझता हूँ कि तुम्हें आश्रम नहीं छोड़ना पड़ेगा। किन्तु तुम यज्ञका महत्त्व और दैनन्दिनी रखनेकी आवश्यकता समझ नहीं सके। ऐसे ही समयमें नियमन — अनुशासन — हमारे लिए कल्पद्रुम सिद्ध होता है। सभी लोग सदा सब चीजोंकी एक-सी कीमत नहीं आँक सकते। इसलिए सहज रास्ता यह हुआ कि जिस संस्थामें रहा जाये उसके नियमोंका आँख मूँदकर पालन किया जाये। भले ही दैनन्दिनीमें एक ही बात प्रतिदिन क्यों न लिखनी पड़े। दैनन्दिनीकी यही महत्ता है, बशर्ते कि उसमें लिखी गई बातें सत्य हों। जिसका जीवन सौर-मण्डलकी भाँति घूमता है यदि वह पुरुष सच्चाईसे अपनी दैनन्दिनी लिख सके तो वह धन्य है। इसलिए तुम्हें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११७
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : वा० गो० देसाईको|७९}}
मेरी यह सलाह है कि जो-कुछ नारणदास कहे उसे श्रद्धापूर्वक करो। मुझे उसके निर्णय पर पूरा विश्वास है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ५२४८) की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''११६. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
११ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० लक्ष्मीबहन (खरे),}}
तुम्हारे पराक्रमकी बात छगनलालने मुझे लिखी है। ईश्वर तुम्हें अटूट बल दे और तुम दीर्घायु हो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० २७५) से। सौजन्य : लक्ष्मीबहन खरे}}
{{c|'''११७. पत्र : वा० गो० देसाईको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
११ अगस्त, १९३०}}
{{Left|भाईश्री ५ वालजी,}}
आपको लिखा हुआ यह पत्र पूरी टुकड़ीके लिए है। आप लोगोंमें से कौन-कौन छूटे और सब लोग कैसे हैं, लिखें। सबने [जेलमें] क्या किया? आपका स्वास्थ्य कैसा रहता है? क्या शरीर कुछ और बना?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनश्च : ]<br>
जो मुझे पत्र लिखना चाहें वे लिखें।}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०५) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : वा० गो० देसाई}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११९
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|८१}}
है और वे शरीर तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेके बदले उनके गुलाम बनकर अपंग-जैसे हो जाते हैं। एक अनुभवी वैद्यका कहना है कि जगत्में उसने एक भी नीरोग व्यक्ति नहीं देखा। जरा भी स्वाद लेनेकी आदत पड़ी, तो शरीर भ्रष्ट हुआ; और तभी शरीरके लिए उपवासकी आवश्यकता पैदा हुई।
किन्तु इन विचारोंसे घबरानेकी जरूरत नहीं है। आस्वाद-व्रतकी कठिनाईको देखकर उसे छोड़ देना भी जरूरी नहीं है। व्रत लेनेका अर्थ व्रत लेते ही उसका सम्पूर्ण रूपसे पालन करने लगना नहीं है। व्रत लें और ईमानदारीसे उसका सम्पूर्ण पालन करनेका दृढ़ प्रयत्न मन, वचन और कर्मसे मृत्युपर्यन्त करें। अमुक व्रत कठिन है, इसलिए उसकी जरा ढीली व्याख्या करके मनको धोखा न दें। आदर्शको अपनी सुविधाके अनुसार ढालनेमें असत्य है; हमारा पतन है। आदर्शको स्वतन्त्र रूपसे जानें; वह चाहे जितना कठिन क्यों न हो, तो भी उसमें सफल होनेका जी-जानसे प्रयत्न करना ही परम अर्थ है — पुरुषार्थ है; 'पुरुष' शब्दका अर्थ केवल नर न करके उसका मूल अर्थ लें। पुरमें अर्थात् जो शरीरमें है वह पुरुष। ऐसा अर्थ करने पर पुरुषार्थ शब्दका उपयोग नर-नारी दोनोंके लिए हो सकता है। महाव्रतोंका तीनों काल सम्पूर्ण रूपसे पालन करनेमें जो समर्थ है उसे इस जगत्में कुछ भी करनेकी जरूरत नहीं। वह भगवान है, मुक्त है। हम तो क्षुद्र, मुमुक्षु, जिज्ञासु, सत्यके आग्रही, उसकी खोज करनेवाले प्राणी हैं। इसलिए 'गीता'की भाषामें धीरे-धीरे किन्तु अतन्द्रित रहकर प्रयत्न करते रहें। ऐसा करेंगे तो किसी दिन प्रभु-प्रसादीके लायक बनेंगे और तब हमारे रसमात्र यानी लालसाएँ जल जायेंगी।
यदि हम आस्वाद-व्रतके महत्त्वको समझ गये हों तो हम उसके पालनके लिए नया प्रयत्न करें। उसके लिए चौबीस घंटे खानेका ही विचार करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। सावधान और जागृत रहनेकी अवश्य ही बहुत आवश्यकता रहती है। ऐसा करनेसे थोड़े समयमें हमें अंदाज लग जायेगा कि हम क्या चीज स्वादके वश होकर और क्या शरीरका पोषण करनेके लिए खाते हैं। यह मालूम हो जाने पर हम दृढ़तापूर्वक स्वाद कम ही करते जायें। इस दृष्टिसे विचार करते हुए आस्वाद-वृत्तिसे की गई संयुक्त रसोई बहुत सहायक होती है। यहाँ हमें रोज यह विचार नहीं करना पड़ता कि क्या बनायेंगे या क्या खायेंगे। किन्तु जो तैयार किया गया हो और जो हमारे लिए त्याज्य न हो, उसे ईश्वरका अनुग्रह मानकर मनमें उसकी आलोचना किये बिना, जितना शरीरके लिए आवश्यक हो उतना लाकर सन्तोषपूर्वक उठ जायें। ऐसा करनेवाला सहज ही आस्वाद-व्रतका पालन करता है। संयुक्त रसोई करनेवाले हमारा बोझ हलका करते हैं। वे हमारे व्रतके रक्षक बन जाते हैं। वे स्वादके लिए कोई चीज न बनायें। केवल समाजके शरीरके पोषणके लिए ही खाना तैयार करें। अच्छी तरह देखें तो आदर्श स्थितिमें अग्निका उपयोग कमसे-कम या बिल्कुल न किया जाये। सूर्य-रूपी महाअग्निसे जो वस्तुएँ पकती हैं उन्हींमें से हमें खानेके लिए चीजें प्राप्त करनी चाहिए। इस तरह विचार करें तो यह सिद्ध होता है कि मनुष्य केवल फलाहारी प्राणी है, किन्तु यहाँ इतनी गहराईमें जानेकी जरूरत नहीं। यहाँ तो आस्वाद-व्रत क्या है, उसमें क्या कठिनाइयाँ हैं और क्या नहीं हैं तथा उसका
<small>४४-६</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२०
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
ब्रह्मचर्य-पालनके साथ कितना निकटका सम्बन्ध है, यही विचार करना था। इतना मनमें उतारनेके बाद सभी यथाशक्ति इस व्रतमें सफल होनेका शुभ प्रयत्न करें।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ गुजरातीसे ]
''बापुना पत्रो — १: श्री नारणदास गांधीने''; सी० डब्ल्यू० ८१२१ से भी। <br>सौजन्य : नारणदास गांधी
{{c|'''११९. पत्र : सप्रू और जयकरको'''<ref>१. १४ और १५ अगस्त, १९३० को यरवडा जेलमें एक ओर सर तेज बहादुर सप्रू और मु० रा० जयकर तथा दूसरी ओर गांधीजी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डा० सैयद महमूद आदिके बीच बातचीत हुई थी। बातचीतके बाद सप्रू और जयकरको यह पत्र दिया गया था और उन्हें अनुमति दी गई थी कि वे यह पत्र वायसरायको भी दिखा सकते हैं। देखिए परिशिष्ट ३।</ref>}}
{{Right|यरवडा सेंट्रल जेल<br>
१५ अगस्त, १९३०}}
{{Left|प्रिय मित्रो,}}
ब्रिटिश सरकार और कांग्रेसके बीच शान्तिपूर्ण समझौता करानेकी कोशिश करनेका जो भार आपने उठाया है उसके लिए हम आपके हृदयसे कृतज्ञ हैं। आप दोनों तथा वाइसरॉय महोदयके बीच हुए पत्र-व्यवहारको पढ़ने तथा आपके साथ लम्बी बातचीत करने और आपसमें विचार करनेके बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अभी ऐसा कोई समझौता करनेका समय नहीं आया है जो हमारे देशके लिए सम्मानजनक हो। हालाँकि पिछले पाँच महीनोंमें शानदार जन-जाग्रति हुई है और विभिन्न धर्मोंके सभी श्रेणी और वर्णोंके लोगोंने जबरदस्त कष्टसहन किया है, तथापि हमें लगता है कि उद्देश्यकी तात्कालिक प्राप्तिके लिए जितने व्यापक पैमाने पर और जैसा अखण्डित कष्टसहन आवश्यक है उतना व्यापक या अखण्ड वह नहीं रहा है। यह कहनेकी जरूरत नहीं है कि हम आपके या वाइसरॉयके इस विचारसे तनिक भी सहमत नहीं हैं कि सविनय अवज्ञासे देशको हानि पहुँची है अथवा वह गलत वक्त पर शुरू किया गया है या असंवैधानिक है। इंग्लैंडका इतिहास ऐसे रन्तरंजित विद्रोहों के उदाहरणोंसे भरा पड़ा है जिनकी प्रशंसा अंग्रेजोंने मुक्त कंठसे की है और हमें भी वैसा ही करना सिखाया गया है। इसलिए वाइसरॉय महोदय अथवा किसी भी प्रबुद्ध अंग्रेजके लिए एक ऐसे विद्रोहकी भर्त्सना करना शोभाजनक नहीं है जिसका इरादा तो शान्तिपूर्ण है ही, क्रियात्मक रूपमें भी जो बहुत बड़ी हदतक शान्तिपूर्ण रहा है। लेकिन वर्तमान सविनय अवज्ञा अभियानकी सरकारी या गैर-सरकारी भर्त्सनाके विरुद्ध हम कुछ नहीं कहना चाहते। हम ऐसा मानते हैं कि इस आन्दोलनको जो अद्भुत जन-समर्थन प्राप्त हुआ है उससे इस आन्दोलनका औचित्य स्वयंसिद्ध है। यहाँ तो जो<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२१
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : सप्रू और जयकरको|८३}}
मुद्दा है वह यह तथ्य है कि हमें आपके साथ कामना करते खुशी होती है कि यदि किसी भी प्रकार सम्भव हो तो सविनय अवज्ञा आन्दोलनको समाप्त अथवा स्थगित कर दिया जाये। हमारे लिए यह खुशीकी बात नहीं हो सकती कि हम देशके पुरुषों, स्त्रियों और यहाँ तक कि बच्चोंको भी नाहक ही ऐसी स्थितिमें डालें जिसमें उन्हें जेल जाना पड़े, तथा पुलिसकी लाठियाँ और इनसे भी खराब चीजें सहनी पड़ें। आप विश्वास करें, और आपके जरिये हम वाइसराय महोदयसे भी विश्वास करनेकी आशा रखते हैं, कि हम सम्मानपूर्ण शान्ति स्थापित करनेके लिए हर सम्भव उपाय पर विचार करनेमें कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन हम यह स्वीकार करते हैं कि अभी तक हमें क्षितिज पर इसके कोई चिह्न नहीं दिखाई पड़ते। इस बातके कोई लक्षण हमें नहीं दिखाई पड़ते कि अंग्रेज अधिकारी-जगत यह मानने लगा हो कि भारतके लिए क्या सर्वोत्तम है इसके निर्णयका अधिकार भारतके स्त्रियों और पुरुषोंको है। अधिकारियों द्वारा नेकनीयतीके दावोंको, जो अवसर सद्भावपूर्वक किये जाते हैं, हम अविश्वासकी दृष्टिसे देखते हैं। अंग्रेज लोग एक लम्बे समयसे इस प्राचीन देशका जो शोषण करते रहे हैं, उसके कारण अब उनकी आँखें यह देखनेमें असमर्थ हो गई हैं कि इस शोषणके कारण इस देशकी कितनी नैतिक, आर्थिक और राजनीतिक पामाली हो चुकी है। वे यह नहीं देखना चाहते कि उनके लिए जो चीज करनी सबसे अधिक जरूरी है वह यह कि वे हमारी पीठपर से उतर जायें और सौ सालके ब्रिटिश आधिपत्यके दौरान हमारे देशको हर दृष्टिसे हीन बनानेकी जो प्रक्रिया चलती रही है उससे उबरनेमें हमारी मदद करके अपनी पिछली गलतियोंकी कुछ क्षतिपूर्ति करें। लेकिन हम जानते हैं कि आप तथा हमारे कुछ विद्वान देशवासी ऐसा नहीं मानते। आप मानते हैं कि हृदय-परिवर्तन हो चुका है, या कमसे-कम इतना तो हो ही गया है जिससे प्रस्तावित सम्मेलनमें भाग लेना उचित ठहरता है। अतः जिन सीमाओंके भीतर हमें काम करना पड़ रहा है उनके बावजूद हम अपनी क्षमता-भर आपके साथ खुशी-खुशी सहयोग करेंगे।
हमारी जो परिस्थितियाँ हैं उनको देखते हुए हम आपके मैत्रीपूर्ण प्रयत्नोंका जो अधिकसे-अधिक प्रत्युत्तर दे सकते हैं, वह निम्नलिखित है।
हमें लगता है कि प्रस्तावित सम्मेलनके सम्बन्धमें आपके पत्रका जो उत्तर वाइसरायने दिया है उसकी भाषा इतनी अस्पष्ट है कि पिछले साल लाहौरमें निर्धारित राष्ट्रीय माँगकी दृष्टिसे हम उसका मूल्य निश्चित नहीं कर सकते और न ही हम आधिकारिक रूपसे तबतक कुछ कहनेकी स्थितिमें हैं जबतक कि इस प्रश्नको समुचित रूपसे गठित कार्य-समितिकी बैठकमें और यदि आवश्यक हो तो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके सामने पेश नहीं किया जाता। लेकिन हम यह कह सकते हैं कि हमारे लिए व्यक्तिगत रूपसे कोई हल तबतक सन्तोषजनक नहीं होगा जबतक कि (क) उसमें स्पष्ट रूपसे भारतका यह अधिकार नहीं स्वीकार किया जाता कि वह इच्छा होनेपर ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग हो सकता है, (ख) वह भारतको ऐसी एक पूर्णतः राष्ट्रीय सरकार नहीं प्रदान करता जो भारतकी जनताके प्रति उत्तरदायी हो और जिसमें आर्थिक नियंत्रण और प्रतिरक्षा सेनाओंका नियंत्रण भी शामिल हो और जिसमें वे ग्यारह मुद्दे भी शामिल हों जिन्हें गांधीजीने वाइसरायको लिखे अपने पत्रमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२२
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
उठाया है, और (ग) वह भारतको यह अधिकार नहीं देता कि वह ऐसे सभी ब्रिटिश दावों, रियायतों तथा ऐसी ही अन्य चीजोंको — जिनमें भारतका सार्वजनिक ऋण भी शामिल है — जिन्हें राष्ट्रीय सरकार अनुचित समझे या भारतकी जनताके हितोंके विपरीत समझे, आवश्यक होनेपर एक स्वतन्त्र न्यायाधिकरणके सामने रख सके।
टिप्पणी : सत्ता-हस्तान्तरणके दौरान भारतके हितमें जो भी समंजन करना आवश्यक हो जाये उसका निर्धारण भारतके निर्वाचित प्रतिनिधिगण करेंगे।
(२) यदि पूर्वोक्त बातें ब्रिटिश सरकारको व्यवहार्य लगें और इस आशयकी एक सन्तोषजनक घोषणा कर दी जाती है तो हम कार्य-समितिको सविनय अवज्ञा, अर्थात कतिपय कानूनोंकी अवज्ञाकी खातिर अवज्ञा आन्दोलन समाप्त करनेकी सलाह देंगे, लेकिन विदेशी वस्त्रों और शराबकी दुकानों पर शान्तिपूर्ण धरना तबतक जारी रखा जायेगा जबतक सरकार स्वयं शराब और विदेशी वस्त्रों पर निषेध लागू नहीं करती। जनता द्वारा नमकका निर्माण जारी रखा जायेगा और नमक अधिनियमकी दण्डात्मक धाराओंको लागू नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी या निजी नमक-भण्डारों पर धावा नहीं किया जायेगा।
(३) सविनय अवज्ञा समाप्त करनेके साथ ही (क) ऐसे सभी सत्याग्रही कैदी और अन्य राजनीतिक कैदी जिन्हें सजा दी जा चुकी है या जिन पर मुकदमा चल रहा है लेकिन जो हिंसा करने या हिंसा भड़कानेके अपराधी नहीं हैं, छोड़ दिये जायें, (ख) नमक अधिनियम, प्रेस अधिनियम, राजस्व अधिनियम आदिके अधीन जब्त की गई सम्पत्ति लौटा दी जानी चाहिए, (ग) सजा-प्राप्त सत्याग्रहियोंसे, या प्रेस अधिनियमके अधीन किये गये जुर्माने और जमानतोंकी रकम वापस कर दी जानी चाहिए, (घ) सविनय अवज्ञा आन्दोलनके दौरान जिन अधिकारियोंने, जिनमें ग्राम-अधिकारी भी शामिल हैं, इस्तीफा दे दिया हो अथवा जिन्हें बर्खास्त कर दिया गया हो, उनमें से जो लोग फिरसे सरकारी नौकरीमें आना चाहें उन्हें बहाल कर दिया जाना चाहिए।
टिप्पणी : पूर्वोक्त उपधाराएँ असहयोग आन्दोलनकी अवधि पर भी लागू होती हैं।
(ङ) वाइसराय द्वारा जारी किये गये सभी अध्यादेश रद्द कर दिये जायें।
(४) प्रस्तावित सम्मेलनमें किन्हें शामिल किया जायेगा, यह प्रश्न और उसमें कांग्रेसके शामिल होनेका सवाल तभी तय किया जा सकता है जब पहले पूर्वोक्त प्रारम्भिक बातें सन्तोषजनक रूपसे तय हो जायें।<ref>१. इस पत्रको लेकर सप्रू और जयकर २१ और २८ अगस्तके बीच शिमलामें वाइसरायसे मिले थे।</ref>
{{Right|हृदयसे आपके,
'''मो० क० गांधी'''
मोतीलाल नेहरू जयरामदास दौलतराम
सरोजिनी नायडू सैयद महमूद
वल्लभभाई पटेल जवाहरलाल नेहरू}}[ अंग्रेजीसे ]<br>
''हिंदू'', ५-९-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२३
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१२०. पत्र : राधाबहन गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० राधिका,}}
तेरा पत्र मिला। तू कितना दूध पीती है और कौन-कौनसे फल लेती है? क्या तुझे कब्ज रहता है? यदि तू पर्याप्त दूध पिये तो तुझे थकावट होगी ही नहीं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८४) से। सौजन्य : राधाबहन चौधरी}}
{{c|'''१२१. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० प्रेमा,}}
तू अधीर मत होना। मनको जीतना सहज नहीं है। लेकिन प्रयत्नसे वह जीता जा सकता है, ऐसी अटल श्रद्धा रखनी चाहिए।
करेलोंका शरीर पर कैसा असर हुआ? उनका रस निकाल देनेकी कोई जरूरत नहीं होती। उन्हें पीस कर अथवा कस करके ज्यों-का-त्यों नींबू और नमकके साथ लिया जा सकता है।
प्रार्थनाकी आवश्यकताके बारेमें सारे जगत्का अनुभव है। उसपर विश्वास रखें तो मन लगता है।
बहुत जल्दी है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७८) से। सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन० <br>१०२३० की फोटो-नकलसे भी।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२४
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१२२. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० वसुमती,}}
तेरा पत्र मिला। हमें तो हर स्थितिमें शान्त रहना सीखना चाहिए। आज तो मुझे पत्र लिखनेका बहुत कम समय मिला और आखिरी मिनटमें यह पत्र लिख पाया हूँ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (एस० एन० ९२८५) की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''१२३. पत्र : रुक्मिणी बजाजको'''}}
{{Right|१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० रुक्मिणी,}}
तेरा पत्र मिला। सबके पत्र कौन पढ़ता है? जिन पत्रों पर यह लिखा हो "इस पत्रको अन्य कोई न पढ़े", उन पत्रोंको कदापि नहीं पढ़ना चाहिए। अपना स्वास्थ्य बहुत अच्छा कर लेना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ९०५१)की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''१२४. पत्र : कुँवरजी पारेखको'''}}
{{Right|१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० कुँवरजी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। आखिर टोपीके बारेमें क्या हुआ, लिखना। मुझे पत्र लिखते रहना।
मेरी ओरसे भाई हीरजीको धन्यवाद पहुँचा देना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (एस० एन० ९७१६)की फोटो-नकलसे।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२५
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१२५. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० रेहाना,}}
खुदा हाफिज<sup>१</sup>,
तू अपने गुजराती पत्रोंमें तो कमाल कर रही है। मुझे पत्र लिखती रहना। श्रीमती लुकमानीकी वानर-सेनाको तू भजन सिखाती है, यह तो बहुत ही अच्छा है। तू जो-कुछ भी करे, अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखते हुए करना। तेरा पत्र और खुली चिट्ठी मेरे देखनेमें नहीं आये।
बाबाजान किसकी लिखी शरीअतका तर्जुमा कर रहे हैं? अम्माजान और जो अन्य कुटुम्बी वहाँ हों उन सबको मेरा वन्देमातरम्।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (एस० एन० ९६१९)की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''१२६. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको'''}}
{{Right|१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० रोहिणी,}}
तेरा पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। मौका निकालकर हमीदाबहनको गुजराती सिखा देना। ईश्वर तुम सबको लम्बी उम्र दे और सच्ची सेविका बनाये।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० २६५१)की फोटो-नकलसे।}}
<small>१. ये शब्द उर्दूमें हैं।</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२६
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१२७. पत्र : मणिबहन पटेलको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० मणि (पटेल),}}
तेरा पत्र मिला। बापू मेरे साथ चार-पाँच दिन रहकर गये। तेरे समाचार मिले। ईश्वर तेरा भला ही करेगा। मुझे लिखती रहना। डाह्याभाईसे लिखनेको कहना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[ गुजरातीसे ]<br>
''बापुना पत्रो — ४ : मणिबहन पटेलने''
{{c|'''१२८. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
{{Left|चि० प्रभावती,}}
तेरा पत्र मिला। इस समय देशमें जो परिस्थितियाँ हैं उनको देखते हुए सूखे मेवे अनावश्यक ही लेता रहूँ, ऐसी इच्छा नहीं होती। आज अधिक लिखनेका समय नहीं है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३४२७) की फोटो-नकलसे।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>
{{c|'''१२९. पत्र : जयप्रकाश नारायणको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
चि० जयप्रकाश,<br>
तुम्हारा खत मिला। तुम्हारे शांति के खबर सुनकर मुझको आनंद होता है। आजकल तो जवाहरलाल मेरे साथ हि हैं। तुम दोनोंका शरीर अच्छा रहता होगा।
मुझे लिखते रहो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|जी० एन० ३४२८ की फोटो-नकलसे।}}
{{c|'''१३०. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
१८ अगस्त, १९३०}}
चि० मीरा,
इस बार मुझे पिछले सप्ताहसे भी ज्यादा संक्षेपमें लिखना होगा। इस समय रातके दस बज रहे हैं — जो मेरे लिए अत्यन्त असामान्य है। और यदि मुझे समयकी पाबन्दी रखनी है, जैसीकि मुझे रखनी चाहिए, तो यह अन्तिम रात है। लेकिन ज्यादा कहनेको कुछ है भी नहीं।
कल मैंने फिर सफरी चरखेका इस्तेमाल किया। मेहनतमें फौरन कमी पड़ी और उतने ही समयमें ज्यादा उत्पादन हुआ — हालांकि बहुत नहीं। लेकिन मैं मानता हूँ कि मैं उसपर ज्यादा सूत निकाल सकूँगा। मैंने देखा कि जिस उद्देश्यसे तुमने नरला भेजा है यदि वह उससे पूरा नहीं होता तो उस चरखेका आग्रहपूर्वक इस्तेमाल करते जाना प्रेमकी अनुचित अभिव्यक्ति होगी। इतना ही है कि मैं उसे पूरी तरह परखे बगैर छोड़ना नहीं चाहता था। मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है, लेकिन वजन अभी भी कम है। लेकिन यह कुछ भी नहीं है। कब्ज काबूमें आते ही वजन बढ़ जायेगा। मैं इस सप्ताह उसके बढ़नेकी आशा करता हूँ।
सप्रेम,
{{Right|बापू}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०८) से। सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६४२ से भी।}}<noinclude></noinclude>
ckb2pgztg6wml5wnavs3xlnyshbephn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२९
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|९१}}
राजा या तन्त्र उसका मालिक है। आश्रमके नजदीक मिली हुई कोई भी चीज आश्रमके मन्त्रीके सुपुर्द करनी चाहिए। अगर वह चीज आश्रमकी न हो तो मन्त्री उसे पुलिसके हवाले कर दे। यहाँतक समझना तो प्रसंगमें सहज ही है। लेकिन अस्तेय इससे बहुत आगे जाता है। किसी चीजकी हमें जरूरत नहीं है; फिर भी हम अगर, जिसके कब्जेमें वह है, उससे उसकी इजाजत लेकर ही क्यों न हो, उसे लें, तो यह चोरी है। जिसकी जरूरत न हो ऐसी कोई भी चीज हमें नहीं लेनी चाहिए। ऐसी चोरी जगत्में ज्यादातर तो खानेकी चीजोंके बारेमें होती है। मुझे अमुक फलकी आवश्यकता नहीं है, फिर भी मैं उसे खाता हूँ, या जितना खाना चाहिए उससे ज्यादा खाता हूँ, तो वह चोरी है। अपनी आवश्यकता वास्तवमें कितनी है, यह इंसान सदा ही नहीं जान पाता है, और लगभग हम सभी जितनी चाहिए उतनी अपनी जरूरतें उससे ज्यादा बना डालते हैं। इससे हम अनजानेमें ही चोर बन बैठते हैं। विचार करनेसे स्पष्ट हो जायेगा कि हम अपनी बहुतसी जरूरतें कम कर सकते हैं। अस्तेयका व्रत पालनेवाला एक-एक करके अपनी जरूरतें कम करता जायेगा। इस जगत्में बहुत लोगोंके अभावग्रस्त होनेका कारण अस्तेयका पालन न होना ही है।
. . . ऊपर बताई गई सारी चोरियाँ बाहरी या शरीरकी चोरियाँ हुईं। इससे भी बारीक — सूक्ष्म और आत्माको नीचे गिराने या रखनेवाली चोरी मानसिक, मनसे की जानेवाली चोरी है। मनसे हम किसीकी चीज पानेकी इच्छा करें या उसपर बुरी नजर डालें, वह चोरी है। बड़े हों या बच्चे हों, अच्छी चीज देखकर ललचायें तो वह मनकी चोरी है। उपवास करनेवाला शरीरसे तो नहीं खाये, लेकिन दूसरेको खाते देखकर मनसे स्वादका मजा ले, तो वह चोरी करता है और अपने उपवासका भंग करता है। उपवास रखनेवाला जो आदमी उपवास छोड़ने पर क्या खायेगा इसका विचार किया करता है, कहा जा सकता है कि वह अस्तेय और उपवासका भंग करता है। अस्तेय-व्रत पालनेवालेको भविष्यमें पानेकी चीजके विचारोंके भंवरमें नहीं पड़ना चाहिए। बहुत-सी चोरियोंके मूलमें ऐसी बद-दियानत पाई जायेगी। आज जो चीज सिर्फ खयालमें ही है, उसे पानेके लिए कल हम भले-बुरे उपाय काममें लाना शुरू कर देंगे। और जैसे वस्तुकी चोरी होती है, वैसे विचारकी चोरी भी होती है। अमुक अच्छा विचार अपने मनमें न उठा हो, फिर भी खुद हमने ही सबसे पहले यह सोचा, जो ऐसा अहंकारसे कहता है, वह विचारकी चोरी करता है। ऐसी चोरी बहुतसे विद्वानोंने भी दुनियाकी तवारीखमें की है और आज भी चल रही है। खयाल कीजिए कि मैंने आश्रममें एक नई किस्मका चरखा देखा। वैसा चरखा मैं आश्रममें बनाऊँ और फिर कहूँ कि यह मेरी खोज है, तो इसमें मैं साफ तौर पर दूसरेकी खोजकी चोरी करता हूँ, झूठ तो बरतता ही हूँ।
इसलिए अस्तेय-व्रतका पालन करनेवालेको बहुत नम्र, बहुत विचारशील, बहुत सावधान और बहुत सादा रहना पड़ता है।
आज तो मैंने आश्रमकी डाक बहुत कामके बीचमें लिखी है। मोतीलालजी आदि साथमें हैं। पिछला सप्ताह तो पूरा ही उनके साथ बातचीतमें बीता समझो।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
सामान्य तौर पर तब भी उन्हें समय देना जरूरी है। इसलिए कल रातकी प्रार्थनाके ठीक बाद ही पत्र लिखना शुरू कर सका और यह पत्र सुबहकी प्रार्थनाके बाद लिखना शुरू किया। इसलिए आज कमसे-कम पत्र लिख रहा हूँ और उनमें कमसे-कम बातें लिख कर डाक निपटा रहा हूँ। . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनके बारेमें गंगाबहन और भगसालीको लिखे पत्र देख लेना। जो ठीक लगे, सो दृढ़तापूर्वक कर डालना। . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनका मन स्थिर और विकाररहित हो गया हो तो बाहर रहनेकी प्रतिज्ञा भंग करनेकी बातको क्षमा किया जा सकता है। फिलहाल विचार करने पर तो मुझे ऐसा ही लगता है। इस समय देखनेकी सबसे बड़ी चीज तो यह है कि विकारोंको जीतनेमें उसकी मदद करें और दूसरी ओर उसकी स्वतन्त्रताकी रक्षा करें। स्त्री-जाति इतनी दबाई गई है कि वे बेचारी स्वतन्त्र रूपसे विचार तक नहीं कर सकतीं। इसलिए उनके प्रति आदमियों को बहुत उदारतासे काम लेना है। उसमें अत्यधिक जोखिम है। वे सब [जोखिम] उनकी सेवाके लिए हम उठायें। तुम यथाशक्ति इस विचार पर अमल करना। . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनका चेहरा मेरी आँखोंके सामने आता है तो उसमें मुझे निर्दोषता और भय ही दिखाई देता है। अपने पतनका कारण वह खुद ही नहीं है। यह दोष सुननेके बाद . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> के चेहरे पर विकार मैं देख सकता हूँ। . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनके मुखपर मुझे वैसे चिह्न नहीं दिखते। उसके मुखपर तो भोलापन नजर आता है। अज्ञान तो है ही। . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनकी तुलना कुछ-कुछ ऋष्यशृंगके साथ की जा सकती है। सिर्फ यही बड़ा भेद है कि . . .<ref>१ से ७. साधन-सामग्रीमें नाम नहीं दिये गये हैं।</ref> बहनने विकारका अनुभव किया था। उसे (ऋष्यशृंगको) तो उसका बिल्कुल अनुभव नहीं हुआ था। किन्तु कविने उसका चित्रण इस प्रकार किया है मानों वह स्पर्श-सुखकी बाट जोहते हुए ही बैठा हो। ऐसी स्थिति असंख्य निर्दोष स्त्री-पुरुषोंकी आज भी है। "संगका अवसर आने पर इच्छा पनपती है", इसलिए हमें किसीकी निन्दा करनेका अधिकार नहीं है। केवल प्रेम करना, स्वयं सावधान रहना ही हमारा स्पष्ट धर्म है। आज इतना ही काफी है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]<br>
सब मिलाकर ३० पत्र हैं।
{{Left|<small>गुजराती (एम० एम० यू०/१) की माइक्रोफिल्मसे।</small>}}
[[:श्रेणी:{{rule}}]]<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''१३२. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ अगस्त, १९३०}}
चि० रमाबहन,<br>
बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र मिला। मैं बाट तो जोह ही रहा था। धीरू और विभुके बारेमें मैंने कभी कोई चिन्ता नहीं की। मैंने देखा है कि ऐसे शैतान बच्चे अन्तमें जाकर बहुत शान्त हो जाते हैं। बच्चोंसे मिलने जानेके लोभका तुमने संवरण किया, सो ठीक किया। तुम्हें जो बच्चे दिखाई दें उन्हें धीरू और विभुका ही प्रतिरूप समझकर उन्हें स्नेह दो। इस तरह धीरू और विभुके प्रति तुम्हारा प्रेम निर्मल हो जायेगा तथा वे अच्छे बनेंगे।
सब बहनोंको मेरा आशीर्वाद।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ५३२१) की फोटो-नकलसे।</small>}}
{{c|'''१३३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ अगस्त, १९३०}}
चि० मनु,<br>
तूने अच्छा 'लम्बा' पत्र लिखा; किन्तु मैं उसे लम्बा नहीं मानता। मेरी सलाह तो यह है कि जबतक काकासाहब वहाँ न पहुँचें तबतक तू वहाँ बैठकर तुझसे जो सेवा बन पड़े सो करता रह। इसीमें तेरी साधना और परीक्षा है। जन-सेवकको धैर्य रखनेका पाठ भी सीख लेना चाहिए। यह सोचनेका काम नायकका है कि कार्यकर्ता अच्छी सेवा किस रूपमें कर सकता है। जो काम हमें सौंपा जाये यदि हम उसे निष्ठापूर्वक करते हैं तो इसका यह मतलब है कि हमने अपने कर्तव्यका पालन किया। यह तो सभी अपने अनुभवसे समझ सकते हैं कि कौन-सा कार्य हमारी सामर्थ्यके बाहर है। जहाँ मोह नहीं है वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्यकी सीमा खोज सकता है। काकासाहब के साथ विचार-विमर्श करनेके बाद मैंने उपर्युक्त सुझाव दिया है। यदि इससे भी मानसिक शान्ति न मिले तो मुझे फिर लिखना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ७७६०) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''१३४. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ अगस्त, १९३०}}
भाई पण्डितजी,<br>
आपका पत्र पढ़कर हम दोनोंको प्रसन्नता हुई। ऐसा सुननेमें आया था कि आप कुछ कमजोर हो गये हैं। आप कोई बीमारी नहीं लाये हैं, इसलिए धीरे-धीरे आपका शरीर स्वस्थ हो जायेगा। आप अपने स्वास्थ्यकी ओर ध्यान दें। रामभाऊ<ref>१ और २. ना० मो० खरेके पुत्र (रामचन्द्र) और पुत्री (माधुरी)।</ref> और मधुरी<ref>१ और २. ना० मो० खरेके पुत्र (रामचन्द्र) और पुत्री (माधुरी)।</ref> मुझे जब-तब लिखते तो रहते हैं। एक-दो पत्रोंमें इस बातका उल्लेख था कि लक्ष्मीबहनने बहुत बहादुरी और धीरज दिखाया है। बहादुरी तो उसके चेहरेसे ही झलकती है। प्रार्थनाके समय आपके कण्ठसे निकला हुआ स्वर तो मेरे कानोंमें रोज ही गूँजता रहता है। हम भजन तो गा नहीं पाते इसलिए रामभाऊसे ही सन्तोष कर लेते हैं।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० २११) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : लक्ष्मीबाई खरे</small>}}
{{c|'''१३५. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ अगस्त, १९३०}}
चि० वसुमती,<br>
तेरा पत्र मिला। धीरे-धीरे अभ्यास कर लेने पर किसी भी व्यक्तिके हाथके नीचे जन-सेवा करनेसे हमें क्षोभ नहीं होता। हम ऐसा करना सीख जायें तभी यह कहा जा सकता है कि हमें सच्ची सेवा करना आ गया। अहंभाव मिट जाने पर हमें पराधीनताका अनुभव ही नहीं होगा। शून्यवत् होकर रहनेवाला किसी भी स्थितिमें शान्ति अनुभव करता है। ऐसी स्थिति एकदम नहीं आ जाती; किन्तु इसमें कोई शंका नहीं कि प्रयत्न करने पर उक्त स्थितिको प्राप्त कर लेना सभीके लिए साध्य है। तू किसी-न-किसी दिन इस स्थितिमें पहुँच जावेगी; इस सम्बन्धमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (एस० एन० ९२८४) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''१३६. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२१ अगस्त, १९३०}}
चि० मथुरादास,<br>
तुम्हारा पत्र और पिंजाई-सम्बन्धी प्रकरण मिला। तेल अभी तक नहीं मिला। क्या तुमने मिट्टीके तेलका प्रयोग करके देखा है ? उससे भी मच्छर भाग जाते हैं। जहाँ मच्छर बैठते हों वहाँ मिट्टीका तेल चुपड़ देनेसे मच्छर नहीं आते। बिनौलेके तेलके बारेमें मुझे पता नहीं था। यहाँ तो हमें खुलेमें सोनेको मिलता है, अतः मच्छरों का उपद्रव नहीं है।
पिंजाई-सम्बन्धी तुम्हारे सभी लेख मुझे पसन्द आये हैं। कुछ स्थानों पर भाषामें अनावश्यक रूपसे दावेकी झलक आ गई है। मेरा अपना अनुभव है कि अच्छी तरह पिंजी हुई रुई होने पर भी इस बातका भरोसा नहीं दिलाया जा सकता कि सूत समान ही निकलेगा। मैं बहुत ही सावधानीसे कातनेवाला हूँ किन्तु पिंजाईके भली-भाँति किये जाने पर भी हमेशा सूत समान नहीं निकलता। एक-समान सूत निकालना भी एक कला है और वह अँगुलियोंके कौशल पर निर्भर है। जिनकी अँगुलियाँ जड़-सी हो गई हैं, उन्हें एक-समान सूत निकालनेमें अवश्य कठिनाई होगी। खराब पिंजी हुई रुईसे मैंने कुशल कातनेवालोंको एक-समान सूत निकालते हुए देखा है। किन्तु यह कहकर मैं पिंजाईको कम महत्त्व नहीं देना चाहता। मेरा उद्देश्य इस बातको स्पष्ट करना है कि अच्छी पिंजाईके कारण कातनेवालेकी सभी मुश्किलें हल नहीं हो जातीं। जैसाकि मैंने कहा, कताईकी कलामें कपास चुननेसे लेकर पूनियाँ बनाने तककी सभी क्रियाएँ आ जाती हैं और सभी पर कातनेवालेका अधिकार होना चाहिए। इनमें से यदि एक भी क्रिया कच्ची होगी तो उस कमीको सावधानीसे कातकर कदापि पूरा नहीं किया जा सकता। जिस बातके बारेमें हमें सोलह आने भरोसा न हो उसे हमें विश्वासपूर्वक नहीं कहना चाहिए। तुम अपने लेखोंको छपवानेसे पहले लक्ष्मीदासको दिखा लेना। इस कलाको जाननेवाला यदि कोई अन्य व्यक्ति हो तो उसे पढ़वा देना अच्छा होगा। सम्भवतः शंकरलाल तुम्हारी मदद कर सकेगा। पुस्तक यथासम्भव परिपूर्ण होनी चाहिए। मोतीबहनके पत्र फिर नहीं मिल रहे हैं। अब वह कैसी है ?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० २७४२) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''१३७. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}
{{Right|[२१ अगस्त, १९३० के पश्चात्]<ref>१. बिनौलेके तेलका उल्लेख होनेसे ऐसा जान पड़ता है कि यह पत्र पिछले शीर्षकके बाद लिखा गया होगा।</ref>}}
चि० मथुरादास,<br>
तुम्हारा पत्र मिला। पुस्तकके बारेमें तुमने काफी सतर्कता बरती है। मैं अब तक अन्तिम अंश पढ़ नहीं पाया हूँ। चरखेके कारण मेरे पास अतिरिक्त समय बहुत ही कम बचता है। और जो-कुछ बचता भी है उसमें से अधिकांश समय पत्र लिखनेमें चला जाता है। अपनी आँख खराब मत कर लेना। यदि आवश्यक हो तो डा० हरिभाईको दिखाना। उन्हें इस विषयका अच्छा ज्ञान है। बिनौलेका तेल कार्यालयमें आ गया है। मोतीबहनने मेरे पिछले पत्रका उत्तर अबतक नहीं दिया है।
सप्तपदीके बारेमें अगले पत्रमें।<ref>२. शेष अंश उपलब्ध नहीं है।</ref> . . .
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३७४३) की फोटो-नकलसे।</small>}}
{{c|'''१३८. पत्र : राधाबहन गांधीको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० राधिका,<br>
मैं तेरे पत्रकी प्रतीक्षा करूँगा। केशू बीमार रहता है, यह बात मुझसे सहन नहीं होती। तू ध्यानसे उसकी देख-भाल करना। फिरसे बुखार क्यों आया ? वह क्या खाता है ? मुझे पूरे समाचार देना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]<br>
तेरा पत्र अभी-अभी मिला। मैं सब समझता हूँ।
{{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८५)से। सौजन्य : राधाबहन चौधरी</small>}}
<HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%">
<small><ref>१. बिनौलेके तेलका उल्लेख होनेसे ऐसा जान पड़ता है कि यह पत्र पिछले शीर्षकके बाद लिखा गया होगा।</ref>
<ref>२. शेष अंश उपलब्ध नहीं है।</ref></small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३५
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}}
{{c|'''१३९. पत्र : मणिवहन पटेलको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० मणि (पटेल),<br>
अपना अनुभव तूने ठीक-ठीक बताया है। तू बापूसे मिल गई, यह भी मालूम हुआ। बापू मुझसे तो [तबसे] नहीं मिले। मुझे बराबर लिखती रहना। जब तू बम्बईमें पहुँचे तब पेरीनबहन और लीलावतीसे मिलना।
मुझे पत्र लिखती रहना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो — ४ : मणिबहन पटेलने'''
{{c|'''१४०. पत्र : महाबीर गिरिको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० महाबीर,<br>
तेरा पत्र मिला। धनुर्धारीकी टुकड़ी तो देखने लायक होगी। जो काम हमारे हिस्सेमें आये उसमें दक्षता प्राप्त करके हमें सन्तोष अनुभव करना चाहिए। यदि तू अभ्यास करे तो तेरे अक्षर सुधर जायेंगे। जन्माष्टमीको तूने कौन-सी प्रतिज्ञा ली ? दैनन्दिनी लिखनेमें आलस्य मत करना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६२१७) की फोटो-नकलसे।</small>}}
<small>४४-७</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}}
{{c|'''१४१. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० कुसुम (देसाई),<br>
तेरा पत्र मिला। तेरे पत्रका उत्तर देनेमें मैं तनिक भी देर नहीं करता। सुशीलासे जो सीखा जा सके, सीख लेना। परन्तु पढ़ने-लिखनेका समय मिलता है? डायरी लिखती है ? प्रार्थना जारी है ? मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
वहाँ कितनी बहनें काम करती हैं ? कपड़वंजकी क्या खबर है ?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० १८०२)की फोटो-नकलसे।</small>}}
{{c|'''१४२. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० प्रेमा,<br>
तेरा पत्र मिला। श्रावणी पूर्णिमाके दिन तेरी राखी काकाने बाँधी थी और तेरी ओरसे प्रणाम भी किया था।
पण्डितजीका धैर्य और उनका त्याग तूने जैसा लिखा, वैसा ही है। उनकी सहनशक्ति भी बहुत ऊँचे दरजेकी दिखाई है।
अबसे आगे न तो तू दस बजे तक जागना, न दूसरेको जगाना। नौ बजे तो बिस्तर पर लेट ही जाना चाहिए।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७९) से। सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन० १०२३१ की फोटो-नकलसे भी।</small>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३७
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Koyal Singh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}}
{{c|'''१४३. पत्र : कपिलराय मेहताको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० कपिल,<br>
तू चाहे तो विले पार्लेमें रह सकता है। वहाँ और कौन-कौन हैं ? अब्दुल्ला सेठ क्या करते हैं ? तू अपना स्वास्थ्य सुधारना। काकासाहब का स्वास्थ्य अच्छा है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]<br>
काकासाहब के आशीर्वाद।
{{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३९७४)की फोटो-नकलसे।</small>}}
{{c|'''१४४. पत्र : सत्यादेवी गिरिको'''}}
{{Right|यरवडा मन्दिर<br>
२२ अगस्त, १९३०}}
चि० सत्यादेवी,<br>
मैं तेरे पत्र भूलचूक सुधारकर पढूँ, इससे अच्छा तो यह है कि तू ही वहाँ से अपनी भूलें सुधारकर पत्र लिखे। इससे दोहरा लाभ है। तुझे तेरी भूलें मालूम हो जायेंगी और मुझे कुछ सुधारना न पड़ेगा। है न अच्छी बात ?
माताजीसे<ref>१. कृष्णमैया देवी।</ref> कहना, मुझे लिखें और बतायें कि आजकल क्या-क्या कर रही हैं।<ref>२. मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref>
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
बापूकी विराट् वत्सलता
<HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%">
<small><ref>१. कृष्णमैया देवी।</ref>
<ref>२. मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref></small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१६
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५९. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{right|२८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मीरा,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
तुम्हें मुजफ्फरपुरमें पूरे चार दिनका भी आराम मिला नहीं या तुमने किया नहीं। मैं तुम्हारी जगह होऊँ तो अगली बार इस प्रकारके वचनोंका पालन अवश्य करूँ। विश्राम सेवाकी भावनासे क्यों नहीं किया जा सकता? अवश्य ही इसका सरलतासे दुरुपयोग किया जा सकता है और अक्सर किया जाता है। लेकिन यह तो कोई वजह नहीं है कि ईमानदार लोग ईमानदारीसे अपनेको विश्राम क्यों न दें ताकि वे और अधिक सेवा करनेके लिए अपनेको ठीक हालतमें रख सकें। कोई व्यक्ति जब यह कहता है कि वह सेवा करनेमें अपने-आपको मिटाये दे रहा है, तो मैं इसे और कुछ नहीं तो कमसे कम आत्म-प्रवंचना अवश्य समझता हूँ क्या ईश्वर अनवरत और निष्काम भावसे की जानेवाली सेवाकी अपेक्षा ऐसी सेवाको ज्यादा पसन्द करता है? शरीर तो मशीनकी भाँति है जिसे पूरी सेवा लेनेके खयालसे अच्छी हालत में रखनेकी जरूरत है। लेकिन सुरक्षित विश्राम स्थलसे बैठकर मुझे ज्यादा उपदेश नहीं देना चाहिए। इतना ही है कि मुझे लगता है कि आवश्यक आराम लेने में मुझे लज्जाका अनुभव नहीं हुआ है। मेरे निकटवर्ती लोगोंकी राय इससे भिन्न है, इसका कारण यही है कि वे विश्रामके नियमोंसे अनभिज्ञ हैं। ठीक समय पर उचित विश्राम लेना वैसा ही है जैसे कपड़े में पड़ी खोंचको समय रहते सिल देना।
काका को तुम्हारा चरखा छोड़ना पड़ा। उसपर यह प्रति घंटे ७० तारसे अधिक सूत नहीं निकाल पाते थे। अब वह पेटी- चरखा इस्तेमाल करते हैं। कल तीसरा दिन था और उन्होंने एक घंटे में ११९ तार सूत निकाला। वह और भी ज्यादा
अच्छे नतीजेकी उम्मीद करते हैं। मैं दिन-प्रतिदिन प्रगति कर रहा हूँ और उस चरखे पर थकान क्या चीज है, मुझे पता ही नहीं चलता। वह बिल्कुल आसानी के साथ चलता है। जब में आवश्यक मोटाईकी माल स्वयं बना लूँगा तब वह और भी अच्छा चलेगा। धुनाई तो वास्तविक संगीतका आनन्द देती है। विट्ठलने लिखा था कि हमें ताँतमें पत्तियाँ रगड़नेके बजाय मोमबत्ती रगड़नी चाहिए। इस परिवर्तनसे ताँत ज्यादा अच्छे परिणाम दे रहा है। मैं चाहूँगा कि जिन लोगोंको नये अनुभव प्राप्त हों वे उनकी सूचना मुझे भी देते रहें। यहां जिन्हें आजमाना सम्भव होगा उन्हें मैं निश्चय ही आजमाऊँगा। मैं कताई और धुनाई, दोनोंमें एक ऊँचा स्तर प्राप्त करना चाहता हूँ कोई वजह नहीं है कि मैं १६० तार प्रति घंटे पर ही क्यों ठहर जाऊँ। मुझे अब विश्वास है कि मैं और बेहतर कर सकता हूँ। मेरे लिए तो यह ईश्वरका कार्य है। यदि वह चाहता है तो मुझे शक्ति और क्षमता देगा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१७
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: जयसुखलाल गांधीको|१७९}}</noinclude>नारणदास मुझे बताता है कि तुम्हारी कुमारप्पासे पटरी नहीं बैठ रही है। हमारा जन्तर तो उदारता ही है। वह जैसा चाहता है मैं उसे वैसा ही करने दूँगा। लेकिन मतभेदोंके बारेमें मुझे अवश्य ही कुछ पता नहीं है। ना॰ ने अपने पत्र में इस विषय में एक या दो पंक्तियाँ ही लिखी हैं। मेरा वजन १०३ और १०४ पौंडके बीच है और आहार लगभग वही है।
सप्रेम,
{{right|{{larger|बापू}}}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४१३) से। सौजन्य: मीराबहन; जी॰ एन॰ ९६४७ से भी।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६०. पत्र: कसुम्बा गांधीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कसुम्बा,}}
तुम चलाला पहुँच गई, यह बहुत ठीक किया। हमारी आपसमें जो बातचीत हुई थी उसीके अनुसार चलना। छूतछातकी भावना अपने मनसे निकाल देना। उमिया तो प्रसन्न है न? जयसुखलालके सभी कामोंमें रुचि लेना। तुममें मुझे दृढ़ताका गुण
नजर आया, जिससे मुझे प्रसन्नता हुई थी। मैं चाहता हूँ कि तुम अपने इस गुणका उपयोग सेवा कार्यमें करो।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६१. पत्र: जयसुखलाल गांधीको'''}}}}
{{right|२८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ जयसुखलाल,}}
तुम्हारा विस्तृत पत्र मिला। तुमने पत्र लिखकर अच्छा किया। उमियाका पाँव भारी है, इस बातकी जानकारी मुझे तुम्हारे पत्रसे ही मिली। उसके दर्दका कारण मैं अब समझा। शुरूमें वह जितनी खुश थी, अब भी वह उतनी ही खुश है न? अपने नियमोंका तत्परतापूर्वक पालन करते हुए भी तुम कसुम्बाका दिल मत दुखाना। हम स्वयं जिस स्वतन्त्रताका उपभोग करना चाहते हैं वही स्वतन्त्रता उसे भी है। उसपर क्रोध करनेसे उसकी सच्ची भावनाएँ दब जायेंगी। मैंने भी तो ऐसा किया है, अत: यह मैं अपने अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ। कसुम्बामें मुझे उच्च<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१८
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>कोटिके कुछ गुण दिखाई पड़े हैं। किन्तु यदि ये गुण न हों तो भी क्या है? तुम्हारे जीवनमें वह बाधक नहीं बनेगी और तुम उसके जीवनमें बाधक मत बनना। समय-समय पर मुझे लिखते रहना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
तुमने पूँजीपतियोंके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सच है। किन्तु हम उन्हें भी प्रेमसे ही जीतेंगे।
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६२. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
तेरा पत्र मिला। चादर ओढ़ानेमें तू क्रम भूल जाती थी, यह कैसे याद न रहे? रोज एक ही भूल सहन करनेवाला पिता कितना अच्छा होगा?
'आश्रम-भजनावलि'<ref>देखिए परिशिष्ट ६।</ref> में ८४वें भजनकी तीसरी पंक्ति यों है: "कमल म्याने मोट बांधी।" इसका अर्थ तू समझती हो तो तू अथवा वालजीभाई अथवा तोतारामजी अथवा जो भी कोई जानता हो उससे समझकर भेज देना अथवा जो जानता हो वही भेज दे।
कमलाके साथ तूने मित्रता कर ली है, यह अच्छा किया। इस बातका ध्यान रखना कि वह उदास न हो। उस जोलिंगर नामकी बहनके साथ भी क्या तूने मित्रता कर ली है? न की हो तो कर लेना। आश्रमके नियमोंके बारेमें उसके मनमें कुछ प्रश्न हैं। यदि वह उनको लेकर तुझसे बातचीत करे तो तू उससे बातचीत करना और उसकी शंकाओंका समाधान करना।
अब तबीयत कैसी है?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६६८४) से। सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी॰ एन॰ १०२३६ की फोटो-नकलसे भी।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२६३. पत्र: राधाबहन गांधीको'''}}}}
{{right|२८ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ राधिका,}}
तुम सबके अलग-अलग लिखे पत्र मुझे मिल गये थे। फिलहाल तो ये लोग तुम्हारे अलग-अलग लिखे गये पत्र भी मुझे दे देते हैं; किन्तु शर्त तो यह है कि सभी पत्र एक ही लिफाफेमें भेजे जाने चाहिए।
तेरे पैरका मामला लम्बा चला। ऐसा लगता है कि तेरी शारीरिक निर्बलताका भी इसमें कुछ हिस्सा है। नारणदासकी शिकायत है कि तुममें से कोई प्रार्थना आदि में भाग नहीं लेता। क्या यह सच है? मुझे साफ-साफ लिखना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८६८६) से सौजन्य: राधाबहन चौधरी
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६४. पत्र: वेणीलाल गांधीको'''}}}}
{{right|२८ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ वेणीलाल गांधी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी तबीयत जो दो सालसे खराब चली आ रही है उसका इलाज वैद्यकी दवा नहीं बल्कि आबोहवा और खुराकमें रद्दो-बदल और अगर जरूरी हो तो उपवास है। इस तरहसे सैकड़ों लोगोंको आराम हुआ है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९१६) से सौजन्य: वेणीलाल गांधी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२६५. पत्र: बलभद्रको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२९ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ बलभद्र,}}
तेरा पत्र मिला। तूने अच्छा लिखा है। किन्तु तू इससे भी अच्छा पत्र लिख सकता है। तेरा वजन क्यों घटता जाता है? तू चबा-चबाकर खाता है न? तुझे किसी तरह की पीड़ा तो नहीं रहती? तू कितना दूध पीता है? तेरा वजन बढ़ना ही चाहिए। यह पत्र नारणदासभाई को पढ़वा देना और वे जैसा कहें वैसा करना। तू जो-कुछ करे सो मुझे लिखना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ९२११) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६६. पत्र: महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२९ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ महालक्ष्मी,}}
क्या एक ही पत्रका उत्तर देना बाकी था? रोज तुम सब बहनोंको याद तो करता ही हूँ। मेरे साथ भी यदि तुमने थोड़े महीने बिताये होते तो मुझे भी अच्छा लगता। तथापि तुम दोनोंने दूर बैठे हुए भी इस तरहसे तरक्की की है कि यदि मेरे पास ही होते तो भी मुझसे क्या [विशेष] ग्रहण करते सो मैं समझ नहीं पाता। बच्चे आज भी फलों आदि पर रहते हैं और तुम भी फिरसे फलों पर आ गई हो, यह ठीक किया। डाहीबहनने मुझे पत्र क्यों नहीं लिखा? सब बहनोंको आशीर्वाद।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६७९७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२१
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२६७. पत्र: पूँजाभाईको'''}}}}
{{left|चि॰ पूँजाभाई (छोटे, बड़ौदा),}}
{{right|२९ सितम्बर १९३०}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी बीमारी बहुत लम्बी चली। शरीरका तो ऐसा ही है। यह चूड़ीसे भी ज्यादा नाजुक है। अतः हमें उसकी देखभाल सेवा-कार्यके लिए ही करनी चाहिए तुरन्त चंगे हो जाओ। समय-समय पर मुझे लिखते रहना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४०१६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२६८. पत्र: हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}}}
{{right|२९ सितम्बर १९३०}}
{{left|प्रिय भगिनी,}}
तुमारे दो खतका उत्तर बाकी है। पहले तो सतीबाबुका प्रश्न। द्वितीय अध्यायमें जो युद्धकी बात है उसका शब्दार्थ करे तो अवश्य भौतिक युद्ध है। परंतु 'गीता' का भाव हमको अंतरयुद्धकी ओर ले जाता है उसमें मेरे दिल में थोड़ा भी संदेह नहिं है। जब संदेह पैदा हो जायगा 'गीता' मेरे लिये धर्म ग्रंथ मिट जायगा।
तुमारा शरीर अब अच्छा होगा। विनोबाको पूछकर संस्कृत सीखनेवाले लड़कों को अवश्य वर्षा भेजो छोटेलाल अब तो जेल में गया। तारीणी कुछ भी अच्छा है जानकर बहोत आनंद हुआ। तारीणी चारू अरूण–इ॰ सबको मेरे आशीर्वाद भारतवर्षमें जैसे प्राचीन तपोवन थे ऐसे अब भी हो सकते हैं हमारी तपश्चर्या पर निर्भर है। हां उसके रूपमें परिवर्तन हो सकता है। पूर्वजोंने जो किया उससे आगे बढ़नेका हमारा धर्म है।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ १६७१ की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२६७. पत्र: पूँजाभाईको'''}}}}
{{right|२९ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ पूँजाभाई (छोटे, बड़ौदा),}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी बीमारी बहुत लम्बी चली। शरीरका तो ऐसा ही है। यह चूड़ीसे भी ज्यादा नाजुक है। अतः हमें उसकी देखभाल सेवा-कार्यके लिए ही करनी चाहिए तुरन्त चंगे हो जाओ। समय-समय पर मुझे लिखते रहना।
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गुजराती (जी॰ एन॰ ४०१६) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|'''२६८. पत्र: हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}}}
{{right|२९ सितम्बर १९३०}}
{{left|प्रिय भगिनी,}}
तुमारे दो खतका उत्तर बाकी है। पहले तो सतीबाबुका प्रश्न। द्वितीय अध्यायमें जो युद्धकी बात है उसका शब्दार्थ करे तो अवश्य भौतिक युद्ध है। परंतु 'गीता' का भाव हमको अंतरयुद्धकी ओर ले जाता है उसमें मेरे दिल में थोड़ा भी संदेह नहिं है। जब संदेह पैदा हो जायगा 'गीता' मेरे लिये धर्म ग्रंथ मिट जायगा।
तुमारा शरीर अब अच्छा होगा। विनोबाको पूछकर संस्कृत सीखनेवाले लड़कों को अवश्य वर्षा भेजो छोटेलाल अब तो जेल में गया। तारीणी कुछ भी अच्छा है जानकर बहोत आनंद हुआ। तारीणी चारू अरूण–इ॰ सबको मेरे आशीर्वाद भारतवर्षमें जैसे प्राचीन तपोवन थे ऐसे अब भी हो सकते हैं हमारी तपश्चर्या पर निर्भर है। हां उसके रूपमें परिवर्तन हो सकता है। पूर्वजोंने जो किया उससे आगे बढ़नेका हमारा धर्म है।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ १६७१ की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२२
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२६९. पत्र: आर॰ वी॰ मार्टिनको'''}}}}
{{right|यरवडा सेंट्रल जेल<br>
३० सितम्बर १९३०}}
{{left|प्रिय मेजर मार्टिन,}}
मैंने इसी २१ तारीखको आपको पत्र भेजकर अनुरोध किया था कि मुझे इस जेल में बन्द सविनय अवज्ञावाले कैदियोंसे सम्पर्क स्थापित करने दिया जाये। मैंने अपने सचिव और सह-कार्यकर्त्ता प्यारेलालसे मुलाकात करनेका अनुरोध इससे भी पहले किया था। अब मैं यह आग्रह करना चाहता हूँ कि मुझे मेरी बातका जवाब जल्दी दिया जाये। मैं जानता हूँ कि सरकार अत्यन्त व्यस्त है और एक बन्दीके नाते मैं चाहता हूँ कि अपनी वजहसे उसे कोई तकलीफ न दूँ। लेकिन मैंने जो
अनुरोध किया है वह मेरे आत्माकी एक अनिवार्य माँग है। मैं अब अपनेको और अधिक नहीं रोक सकता। अपने इन सह-बन्दियोंसे मिलने न दिया जाना मेरे लिए असह्य है। अतः अगर आगामी शनिवार की दोपहर तक मेरी इच्छा पूरी न की गई तो मैं अपने शरीरके परिरक्षण में सहयोग देना बन्द करना आरम्भ कर दूँगा। मेरे लिए इस समय यह बताना सम्भव नहीं है कि यह असहयोग में किस हद तक
करूँगा। उसका निश्चय दिन बीतने के साथ-साथ मेरी आन्तरिक प्रेरणा और साहस तथा शक्ति द्वारा होगा। असहयोगका आरम्भ साधारण कैदियोंको दिये जानेवाले भोजन, अर्थात् उसमें भी जो-कुछ में धर्मपूर्वक ले सकता हूँ, उसके सिवा अन्य कोई भोजन लेनेसे इनकार करनेके साथ होगा। मैं नमकके अलावा केवल पाँच प्राकृतिक
खाद्य वस्तुएँ और ले सकता हूँ। इसलिए जहाँतक में देख सकता हूँ, मैं केवल काँजी और बाजरी और जुवारी की चपाती ही ले सकता हूँ। मैं दाल या सब्जियाँ नहीं ले सकता क्योंकि उनमें पाँचसे अधिक वस्तुएँ होती है। काँजी और चपाती में अधिकारियोंकी जिम्मेदारी और उनकी इच्छा पर लूँगा। मुझे भरोसा नहीं है कि इतने वर्षो तक इनका उपयोग न करनेके बाद मेरा पेट इन दो में से कोई भी चीज हजम कर सकेगा। मैने आरम्भमें यह समझौता इसलिए किया है क्योंकि मैं अपने वश-भर, अभी आरम्भमें, कमसे-कम अटपटी स्थिति उत्पन्न करना चाहता हूँ। मैं चाहूँगा कि सरकार इस पत्रको धमकी न माने बल्कि सौजन्य और लिहाजका द्योतक माने। मेरी इच्छा यह नहीं है कि जिसे में मानव-अधिकार मानता हूँ उस अधिकारको प्राप्त
करनेके लिए मुझे जो भी कदम उठाने पड़ें, उनकी सूचना सरकारको पहलेसे न हो।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ३८५३) की फोटो-नकलसे; बॉम्बे सीक्रेट ऐन्सट्रैक्ट्स, ७५० (५)/ ए॰ पुष्ठ २०७ से भी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२३
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2026-08-25T15:47:40Z
रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२७०. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|२५/३० सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ नारणदास,}}
आज तुम्हें ही पहले पत्र लिख रहा हूँ। पिछले सप्ताह समय कुछ कम था इसलिए कुछ एक बातें संक्षेपमें लिख कर काम चलाना पड़ा था। राजगोपालाचारीके आश्रममें कौन-कौन हैं, सुब्बैया कहाँ है, उसकी पत्नी कहाँ है, आदिके बारेमें मालूम हो तो लिखना।
पूँजाभाईको तो अब कष्ट सहन करते हुए शान्तिसे ही दिन बिताने हैं। जोलिंगर बहन के साथ ज्यादा बातचीत कर सको तो करना। यह बहन अच्छी और समझदार दिखाई देती है। किन्तु उसे हमारी सारी बातें समझने में समय लगता है। वह
चौकीदारी करना चाहे, तो वैसा करने देनेमें कोई दोष नहीं दिखाई देता। उसकी दलील ठीक है। जितनी स्वतन्त्रतासे घूमने-फिरनेके लिए वह तत्पर है, हिन्दकी बहनें शायद इतनी स्वतन्त्रता लेनेको तैयार न हों। फिर भी कोई उसके साथ रहना चाहे तो बेशक रह सकता है। यह तो मैंने यहाँ बैठे-बैठे अपना विचार व्यक्त भर कर दिया है। तुम जैसा उचित समझो वैसा कर लेना।
केशु आदिको क्या लिखूँ? इस समय जो पत्र लिख रहा हूँ, सो पढ़कर उन्हें दे देना। केशु ईमानदार नवयुवक है। समय आने पर अपना धर्म समझ जायेगा, इसलिए उसे कुछ लिखनेका मन नहीं होता। तुम तो हिम्मतसे काम लेकर जो कहना हो, कह देना। इस समय तो मैं लिख ही रहा हूँ।
मेरी खुराक है तीन सेर दूध––दो बार दहीके रूपमें, एक बार दूधके रूपमें। नौ टमाटर, छोटे-बड़े जैसे आये हों और परिमाणमें कुम्हड़ा या गोभी आदि सब्जी उबाल कर। नमक डालनेकी जरूरत लगे ही तो ऊपरसे ले लेता हूँ। चार दिनसे
रतालू छोड़ दिये हैं, क्योंकि डा॰ जीवराज काकासाहबसे मिलने आये थे और उन्होंने उन्हें बताया कि रतालू कब्ज करता है। मुझे बादमें एनीमा लेनेकी जरूरत तो पड़ी ही थी। इसलिए रतालू छोड़कर देख रहा हूँ। [शक्तिमें] कुछ फर्क नहीं पड़ा है। शक्ति बनी रही तो फिर रतालू न लेनेका प्रयत्न जारी रखूँगा। यों मुझे उसका खास नुकसान तो नहीं मालूम पड़ा। यहाँका पानी ही मेरे जैसे लोगोंके लिए कब्ज करनेवाला जान पड़ता है, किन्तु चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं है। आज शामको वजन लिया जायेगा; वह भी लिख भेजूँगा। एनीमा मेरे लिए नई चीज नहीं है। किन्तु यदि उसके बिना चल सकूँ तो उसे छोड़ना जरूर चाहता हूँ। ताजे फल भी जबतक छोड़े रह सकूँ, छोड़ना चाहता हूँ। यदि सब्जीसे एनीमा न छूटा या किसी तरह की कमजोरी लगी तो खजूर और मुनक्का लेना शुरू करूँगा। कोई चिन्ता
न करे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२४
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>चरखेका काम सुधरता जा रहा है। लगता है, गति बढ़ रही है। थकावट तो मालूम नहीं होती। ज्यादा कात पानेका लोभ बेशक नहीं करूँगा। 'गीता' के श्लोक कण्ठस्थ करनेका काम फिलहाल बन्द है। इससे मनको दुःख होता है। किन्तु अवसर देख रहा हूँ। पहले कताई करते समय याद करता था। देखता हूँ कि उससे कातनेमें विघ्न पड़ता है। अच्छी तरह कताई करनेके लिए एकाग्रताकी आवश्यकता दिन प्रति-
दिन बढ़ती दिखाई दे रही है। कातने और कातनेकी कलामें बड़ा अन्तर है, यह भी देखता हूँ। मुझे तो कलामें सिद्धहस्त होना है। यदि ऐसा इस जन्ममें न हो सके तो न हो। मैं अपने प्रयत्नमें ढिलाई न करूँ तो मुझे उतनेसे भी सन्तोष रहेगा। चरखा चलाते समय 'गीता' कण्ठस्थ करनेके लोभमें मैंने अपनी ढिलाई देखी। 'गीता' की शिक्षा इसके विरुद्ध है। चरखेकी साधनाके साथ-साथ 'गीता' कण्ठस्थ हो तो ठीक है; किन्तु चरखेकी कीमत पर 'गीता' कण्ठस्थ करूँ तो यह 'गीता' का––जिस तरह मैंने उसे समझा है––अनादर करनेके बराबर होगा। अमीदासको मना लेना। मैं उसे लिख रहा हूँ। ऐसे व्यक्तिको हम आश्रम छोड़ देनेके लिए कहें भी कैसे?
दो प्रवचन तो नहीं भेज सकूँगा। शायद इस बार सर्व-धर्म समभाव ही चलेगा। स्वदेशीको छोड़ देनेकी इच्छा होती है। राजनीतिसे सम्बन्धित विषयोंको न छेड़नेका संकल्प है। ऐसा करनेसे उसके कुछ टूटनेका भय है। स्वदेशी पर केवल धार्मिक दृष्टि रखकर लिखा जा सकता है। लिखें, तो भी कोई ऐसी बात उसमें आ सकती है जिसका राजनीतिके साथ कुछ-न-कुछ सम्बन्ध जुड़ जाये। यदि लगा कि राजनीतिको एक ओर रखकर लिख सकता हूँ तो लिखूँगा; देखता हूँ।
गिरिराजको वहाँ जबरदस्ती रखनेका कोई फायदा नहीं है। बालकृष्ण उसे वर्धा बुला रहे हैं तो यहाँ जाने देनेमें तुम्हें क्या हानि दिखाई देती है? यह आदमी तो भला है किन्तु उसका दिमाग काम नहीं करता। सम्भव है कि बालकृष्णकी
संगतसे लाभ हो। विनोबाके पास दूसरा व्यक्ति भेजने के लिए तो तुमने लिखा ही है; तो फिर गिरिराजको ही क्यों न भेज दो। यदि वह इससे खुश हुआ तो काम करेगा ही। उसका त्याग करना मुझे ठीक नहीं लगता। किन्तु फिर मैं उसे लेकर सिर खपा रहा हूँ, जिसे लेकर खपाना आवश्यक नहीं है; इसलिए इसपर बहुत ध्यान न देना। तुम्हें निर्णय करनेमें मदद हो, इसी विचारसे इतना लिखा है, ऐसा मानना। हो सकता है, मैं कोई बात समझ नहीं पाया होऊँ और मैंने ऐसी राय बना डाली हो। मुझे तुम्हारे निर्णय पर इतना ज्यादा विश्वास है कि जब मेरी बुद्धि किसी निर्णयका विरोध करती है तो मन यही कहता है कि यहाँ पर कुछ बातोंकी मुझे जानकारी नहीं है। अब तुम्हारे प्रश्नोंका जवाब:
१. आश्रम छोड़नेकी आज्ञा देनेकी जरूरत नहीं; किन्तु न रहे तो उसे आज्ञा देकर रोकना नहीं चाहता।
२. आश्रमकी सम्मतिके बिना वर्धा जाना ठीक नहीं होगा।
३. आश्रमकी आज्ञा उल्लंघन करके कुछ करे और वह आश्रमका विश्वास खो बैठे तो आश्रम उसके बच्चोंका बोझ नहीं उठा सकता।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१८७}}</noinclude>४. कटु, विमुको आश्रममें न रख सकें तो उन्हें कहाँ भेजें, यह समझ में नहीं आता। अभी गिरिराज उनकी देखरेखमें भाग न लेता हो और वह आश्रमकी सम्मतिसे बाहर तब और यदि आश्रम बच्चोंकी देखभाल कर सकता हो, तो करे। किन्तु यदि वे देखभाल करनेके लायक न रहे हों, तो गिरिराजसे यह बात कह देनी चाहिए।
५. नई व्यवस्था करनेमें गिरिराजको पैसेकी मदद तो देनी चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। कितनी रकम हो यह आश्रम ही तय करे। मुझे लगता है कि अब मैंने तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है। गिरिराजको लिखा पत्र पढ़ लेना।
मेरे पास मणिबनके बारेमें निर्णय करने लायक तथ्य नहीं हैं। किन्तु जो समझा हूँ उससे ऐसा लगता है कि वह अपने गाँव जाना चाहे तो जाने दें। भगवानजीकी इच्छाका सवाल नहीं। मणिबहनकी इच्छाका सवाल है। रहे तो खुशी से रहे। इतनी शर्त जरूर है कि भगवानजीको भूल जाये। उससे मिलनेकी इच्छा या आशा न करे। जैसे दूसरी बहनें रहती हैं वैसे नियमोंका पालन करते हुए आश्रममें रहे। वह खुशीसे ऐसा न करना चाहे तो उसे जाने देना चाहिए।
मीराबहन और कुमारप्पाके बारेमें समझ गया हूँ। तुम्हारा निर्णय ठीक लगता है। मैं मीराबहनको लिख रहा हूँ।
आजकल भाई जेठालाल कहाँ हैं? अपनी प्रदर्शनी में जो फल रखे गये उनके बारेमें पढ़कर मुझे आश्चर्य और आनन्द हुआ है। मुझे तो अंगूर बोये जानेकी खबर भी नहीं थी।
मेरी टूटी हुई चप्पलें भेजने की जरूरत नहीं। एक नई जोड़ी थी। कान्तिको नहीं मालूम, तो ठीक है। मैंने जैसा लिखा है उस तरह अभी काम चल रहा है। नई जोड़ी न मिले तो बादमें देखेंगे। वहाँ जो चप्पलें तैयार पड़ी हैं, उनमें से एक जोड़ी क्यों नहीं चलेगी? जैसी काकासाहब के लिए भेजी है, वैसी मेरे लिए भी ठीक है। उस जैसी सजावट न हो तो ज्यादा अच्छा। प्यारेलालको घरके खर्चके लिए पैसे जरूर
भेज देना। इसके बारेमें और कुछ किया ही नहीं जा सकता। उसे तो पहले ही पैसा मँगा लेना चाहिए था। वह उसने नहीं मँगाया। उसका मित्र या जो कुछ भी कहो तो आश्रम ही है। गोकीवहनके बारेमें तुमने जो किया वह शोभा देता है।
आश्रमसे तो नहीं भेज सकते थे। डा॰ मेहतासे माँग सकते थे। किन्तु तुमने ही दिया, यह मुझे बहुत अच्छा लगा है। और उसे उसकी जरूरत तो होगी ही। रेंटिया-बारस<ref>भाद्रके कृष्ण पक्षको द्वादशी; विक्रम सम्बत्के अनुसार इस दिन गांधीजीका जन्म-दिन था।</ref> की कताईका हिसाब देख लिया है। अच्छा है। लगता है, खुर्शेदबहन और बहनोंको बुलाना चाहती है। उसकी माँग समझ लो और यदि किसी बहनको भेजा जा सकता हो तो भेज देना। वहाँसे जा सकने योग्य कोई सयानी बहन बाकी ही नहीं है, मुझे ऐसा लगता है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२६
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{right|२६ सितम्बर, १९३०}}
आज वजन लिया है। १०३ से थोड़ा ऊपर है। इसलिए सुधार माना जायेगा। काकासाहब का ११५ से थोड़ा कम है। इसलिए इस सप्ताह सुधार नहीं माना जायेगा। इस तरह सेर-आधा सेर कई बार कम हो भी जाता है।
बे॰ जी॰ की पत्रिका न भेजकर तुमने ठीक किया है। वह मुझे नहीं भेजी जा सकती।
{{right|२७ सितम्बर, १९३०}}
लीलावती फिर खुर्शेदबहनके पास जानेके लिए अधीर हो रही है। यदि खुर्शेद बहन उसकी स्थिति जानते हुए भी बुलाये तो जाने देनेमें ही भलाई होगी। आश्रम में रहकर व्याकुल रहे, उससे ज्यादा अच्छा है कि वहाँका अनुभव प्राप्त करके लौट
आये। जैसा ठीक हो वैसा करना। पूनियाँ आदि तोलने लायक काँटा सतीशबाबूने तीन आने में बनाया था। वह या उसके जैसा दूसरा काँटा हो तो साथ भेज देना। मद्रासमें हिन्दी प्रचार करनेवाले अन्नाकी कोई खबर है क्या?
{{right|२८ सितम्बर, १९३०}}
काकासाहब ने बाल को गोसेवा-संघके लिए सूत दिया था। क्या वह मिला है? शंकरकी मारफत जो ८,५०० गज सूत भेजा था यह तुम्हें वहाँ मिलेगा या अहमदाबादमें? कुमारी अ॰ के बारेमें मीराबहनको मैंने लिखा है वह पढ़ लेना।
{{right|मंगल प्रभात ३० सितम्बर, १९३०}}
जैसा मैंने पिछले सप्ताह लिखा था वैसे सर्वधर्म-समभाव सम्बन्धी लेखका अंग्रेजी अनुवाद कर डाला है। वह इसके साथ भेज रहा हूँ। यदि उसका अनुवाद वालजी भाईने किया हो और वह छप चुका हो तो साथका अनुवाद वे देख लें। जिसे पढ़ना हो वह पढ़कर अन्तमें मीराबहनको सौंप दे। यदि वालजीभाई का अनुवाद प्रकाशित न हुआ हो तो मेरे अनुवादको देख लें और बादमें जो पसन्द आये उसे प्रकाशित कर दें। तुम्हें सिर्फ गुजराती ही छापना है या अंग्रेजी अनुवाद भी?
यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ इसपर थोड़ा और लिख रहा हूँ।
{{right|मंगल प्रभात ३० सितम्बर, १९३०}}
यह विषय इतने महत्वका है कि इसे यहाँ और विस्तारसे लिखना चाहता हूँ अपना कुछ अनुभव लिख दूँ तो शायद समभावका अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाये। यहाँकी तरह फीनिक्समें भी नित्य प्रार्थना होती थी। वहाँ हिन्दू, मुसलमान और ईसाई थे। स्व॰ सेठ रुस्तमजी या उनके लड़के प्रायः उपस्थित रहते ही थे। सेठ रुस्तमजीको 'मने वहालुं वहालुं दादा रामजीनुं नाम' (मुझे रामनाम प्रिय है) बहुत अच्छा लगता था। मुझे याद आ रहा है कि एक बार मगनलाल या काशी हम<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{right|२६ सितम्बर, १९३०}}
आज वजन लिया है। १०३ से थोड़ा ऊपर है। इसलिए सुधार माना जायेगा। काकासाहब का ११५ से थोड़ा कम है। इसलिए इस सप्ताह सुधार नहीं माना जायेगा। इस तरह सेर-आधा सेर कई बार कम हो भी जाता है।
बे॰ जी॰ की पत्रिका न भेजकर तुमने ठीक किया है। वह मुझे नहीं भेजी जा सकती।
{{right|२७ सितम्बर, १९३०}}
लीलावती फिर खुर्शेदबहनके पास जानेके लिए अधीर हो रही है। यदि खुर्शेद बहन उसकी स्थिति जानते हुए भी बुलाये तो जाने देनेमें ही भलाई होगी। आश्रम में रहकर व्याकुल रहे, उससे ज्यादा अच्छा है कि वहाँका अनुभव प्राप्त करके लौट
आये। जैसा ठीक हो वैसा करना। पूनियाँ आदि तोलने लायक काँटा सतीशबाबूने तीन आने में बनाया था। वह या उसके जैसा दूसरा काँटा हो तो साथ भेज देना। मद्रासमें हिन्दी प्रचार करनेवाले अन्नाकी कोई खबर है क्या?
{{right|२८ सितम्बर, १९३०}}
काकासाहब ने बाल को गोसेवा-संघके लिए सूत दिया था। क्या वह मिला है? शंकरकी मारफत जो ८,५०० गज सूत भेजा था यह तुम्हें वहाँ मिलेगा या अहमदाबादमें? कुमारी अ॰ के बारेमें मीराबहनको मैंने लिखा है वह पढ़ लेना।
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जैसा मैंने पिछले सप्ताह लिखा था वैसे सर्वधर्म-समभाव सम्बन्धी लेखका अंग्रेजी अनुवाद कर डाला है। वह इसके साथ भेज रहा हूँ। यदि उसका अनुवाद वालजी भाईने किया हो और वह छप चुका हो तो साथका अनुवाद वे देख लें। जिसे पढ़ना हो वह पढ़कर अन्तमें मीराबहनको सौंप दे। यदि वालजीभाई का अनुवाद प्रकाशित न हुआ हो तो मेरे अनुवादको देख लें और बादमें जो पसन्द आये उसे प्रकाशित कर दें। तुम्हें सिर्फ गुजराती ही छापना है या अंग्रेजी अनुवाद भी?
यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ इसपर थोड़ा और लिख रहा हूँ।
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यह विषय इतने महत्वका है कि इसे यहाँ और विस्तारसे लिखना चाहता हूँ अपना कुछ अनुभव लिख दूँ तो शायद समभावका अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाये। यहाँकी तरह फीनिक्समें भी नित्य प्रार्थना होती थी। वहाँ हिन्दू, मुसलमान और ईसाई थे। स्व॰ सेठ रुस्तमजी या उनके लड़के प्रायः उपस्थित रहते ही थे। सेठ रुस्तमजीको 'मने वहालुं वहालुं दादा रामजीनुं नाम' (मुझे रामनाम प्रिय है) बहुत अच्छा लगता था। मुझे याद आ रहा है कि एक बार मगनलाल या काशी हम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२७
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१८९}}</noinclude>सबको गवा रहे थे। रुस्तमजी सेठ उल्लासमें बोल उठे, "दादा रामजी" के बदले 'दादा होरमज्द' गाओ न।" गवाने और गानेवालोंने इस सूचना पर तुरन्त इस तरह अमल किया मानो वह बिलकुल स्वाभाविक हो। और इसके बादसे रुस्तमजी जब उपस्थित होते तब तो अवश्य ही, और वे न होते तब भी, कभी-कभी हम लोग वह भजन 'दादा होरमज्द' कहकर गाते। स्वर्गीय दाऊद सेठका पुत्र हुसैन तो
आश्रममें कई बार रह जाता था। वह प्रार्थनामें उत्साहपूर्वक शामिल होता था। वह खुद बहुत मधुर सुरमें 'आर्गन' के साथ 'है बहारे बाग दुनिया चन्द रोज' गाया करता। उसने वह भजन हम सबको सिखा दिया था। वह कई बार प्रार्थनामें गाया जाता था। हमारे यहाँकी 'आश्रम भजनावलि' में उसे स्थान मिला है; वह सत्य-प्रिय हुसैनकी स्मृति है। उसकी अपेक्षा अधिक तत्परतासे सत्यका आचार करनेवाला नवयुवक मैंने नहीं देखा। जोसेफ रायप्पन आश्रममें अक्सर आते-जाते थे। वे ईसाई थे। उन्हें 'वैष्णव जन' वाला भजन बहुत अच्छा लगता था। संगीतका उन्हें अच्छा ज्ञान था।
उन्होंने 'वैष्णव-जन' के स्थान पर 'क्रिश्चियन जन तो तेने कहिए' अलाप दिया। सबने तुरन्त उनका साथ दिया। मैंने देखा कि जोसेफके आनन्दका पारावार न रहा।
आत्म-सन्तोषके लिए जब मैं भिन्न-भिन्न धर्मपुस्तकें उलटता रहता था तब मैंने ईसाई, इस्लाम, जरतुश्त, यहूदी और हिन्दू, इतने धर्मोकी पुस्तकोंका अपने सन्तोषभरके लिए परिचय कर लिया था। मैं कह सकता हूँ कि इस अध्ययनके समय सभी धर्मोके प्रति मेरे मनमें समभाव था। मैं यह नहीं कहता कि उस समय मुझे इसकी प्रतीति थी। उस समय समभाव शब्दका भी पूरा परिचय न रहा होगा; परन्तु उस समय की अपनी स्मृतियाँ ताजी करता हूँ तो मुझे याद नहीं नहीं आता कि उन धर्मोके सम्बन्धमें टीका-टिप्पणी करनेकी इच्छा तक हुई हो। वरन् उनके ग्रन्थोंको धर्मग्रन्थ मानकर आदरपूर्वक पढ़ता और सबमें मूल नैतिक सिद्धान्त एक जैसे ही पाता था। कितनी ही बातें मैं नहीं समझ पाता था। यही बात हिन्दू-धर्मग्रन्थोंके सम्बन्धमें भी थी। आज भी कितनी ही बातें नहीं समझ पाता; पर अनुभवसे देखता हूँ कि जो बातें हमारी समझ में नहीं आतीं, वे गलत ही हैं, यह माननेकी जल्दबाजी करना भूल है। कितनी ही बातें पहले समझ में नहीं आती थीं, वे आज दीपककी तरह दिखाई देती हैं। समभावका अभ्यास करनेसे अनेक गुत्थियाँ अपने-आप सुलझ जाती हैं और जहाँ दोष दिखाई ही दें, वहाँ उन्हें दरसाने में भी नम्रता और विवेक होनेके कारण किसीको दुःख नहीं होता।
एक कठिनाई शायद रह जाती है। पिछले लेखमें मैंने कहा है कि धर्म-धर्मका भेद रहता है और धर्मके प्रति समभाव रखनेका अभ्यास करना यहाँ उद्देश्य नहीं है। यदि ऐसा हो तो धर्माधर्मका निर्णय करनेमें ही क्या समभावकी श्रृंखला नहीं टूट जाती? यह प्रश्न उठ सकता है और यह भी सम्भव है कि ऐसा निर्णय करनेवाला भूल कर बैठे। परन्तु हममें यदि वास्तविक अहिंसा मौजूद रहे तो हम वैरभावसे
बच जाते हैं; क्योंकि अधर्म देखते हुए भी उस अधर्मका आचरण करनेवालेके प्रति तो प्रेमभाव ही होगा। इससे या तो वह हमारी दृष्टि स्वीकार कर लेगा अथवा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हमारी भूल हमें दिखायेगा या दोनों एक-दूसरेके मतभेदको सहन करेंगे। अन्तमें विपक्षी अहिंसक न हुआ तो वह कठोरतासे काम लेगा। और फिर भी हम अहिसाके सच्चे
पुजारी होंगे तो इसमें सन्देह नहीं कि हमारी मृदुता उसकी कठोरताको अवश्य दूर कर देगी। दूसरेको, उसकी भूलके लिए भी, हमें पीड़ा नहीं पहुँचानी है। हमें खुद ही कष्ट सहना है। इस स्वर्ण नियमका पालन करनेवाला सभी संकटोंसे बच जाता है।
जैसा मैंने इस पत्रके आरम्भ में लिखा है, स्वदेशी पर लिखनेका विचार तो छोड़ दिया है। अब फिर किस विषय पर लिखूँ इसका विचार करना है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
आज ७० पत्र हैं।
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰ / १) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७१. पत्र: आर॰ वी॰ मार्टिनको'''}}}}
{{right|२ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|प्रिय मेजर मार्टिन,}}
श्री क्विन मेरे पिछले ३० तारीखके पत्रके बारेमें मुझसे बात करते रहे हैं। अगर आपको यह अधिकार दे दिया जाये कि मैं अपने जिन मित्रोंसे सेवाके उद्देश्यसे मिलना जरूरी समझूँ उनसे समय-समय पर उस अहाते में, जहाँ मुझे रखा गया है, मिलनेकी आप मुझे अनुमति दे सकें, तो मैं बिल्कुल सन्तुष्ट हो जाऊँगा। अवश्य ही मैं उनके साथ राजनीतिक चर्चा नहीं करूँगा, न कोई राजनीतिक सन्देश भेजूँगा, न ऐसी कोई बात कहूँगा जिसका उद्देश्य जेलके अनुशासनका भंग करना हो। जैसा कि मैंने आपको आज सुबह बताया, इन मित्रोंसे मिलनेकी इच्छाके पीछे मेरा उद्देश्य उनकी सेवा करना है और अगर आप विश्वास कर सकें, तो जैसाकि मैने १९२३ में किया था, जहाँ भी सम्भव हो, जेल अधिकारियोंकी सहायता करना है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १९९८२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२७२. पत्र: शारदा सी॰ शाहको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|चि॰ शारदा (बबु),}}
तेरा पत्र मिला। जैसे मिट्टीके टमाटरसे वास्तविक टमाटर अधिक सुन्दर होते हैं, उसी तरह बिजलीके सम्भोंसे पेड़-पौधोंकी सुन्दरता अधिक होती है। कभी मिट्टीके टमाटरोंसे किसीकी भूख मिटती सुनी है?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९८९१) से। सौजन्य: शारदा जी॰ चोखावाला
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७३. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२ अक्टूबर १९३०}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
तू खड़ाऊँ रखना चाहे तो जरूर रख ले। लेकिन इन लकड़ीके टुकड़ोंका तू क्या करेगी? उनसे तेरा कद दो इंच बढ़े तो भले ही उनका संग्रह कर मैं तो इसे मूर्तिपूजा कहकर इसकी भर्त्सना करता हूँ। अपने पिताजीका चित्र में रखता था। दक्षिण आफ्रिकामें अपने दफ्तर में, बैठकमें और सोनेके कमरे में मैंने उनके चित्र टाँग रखे थे। मैं सोनेकी जंजीर पहना करता था और उसमें लॉकेट भी हुआ करता
था। उसमें पिताजी और बड़े भाईका चित्र रहता था। आज मैंने इस सबको छोड़ दिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि अब मैं उनकी कम पूजा करता हूँ। आज वे मेरे हृदयमें पहलेसे भी ज्यादा अच्छी तरह प्रतिष्ठित हैं। उनके गुणोंका स्मरण करके मैं निरन्तर उनका अनुकरण करनेका प्रयत्न करता हूँ और ऐसी भक्ति में असंख्य देवताओंकी कर सकता हूँ। लेकिन यदि मैं उनके चित्रोंका संग्रह करने लगूँ तो मेरे
पास जगह भी न रहे। और लोगोंकी खड़ाऊँ आदि रखने लगूँ तो मुझे उसके लिए जमीन लेनी पड़े। इसलिए एक अनुभवी व्यक्तिके रूपमें मैं तुझसे कहता हूँ कि यदि मैं सच्चे मार्ग पर चलूँ तो तू मेरा अनुकरण कर ऐसा करना खड़ाऊँ रखनेकी अपेक्षा हजार गुना अधिक श्रेष्ठ है, और यदि कोई उसे देखकर तेरा अनुसरण करे तो वह और भी अच्छी बात है। लेकिन तेरे पास खड़ाऊँ देखकर उसका कोई<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३०
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>अन्धानुकरण करने लगे, तो वह खड्डेमें ही गिरेगा न? इतना समझ ले और फिर 'यथेच्छसि तथा कुरु'।
जो व्यक्ति कर्त्तव्य-कर्मको समझता है और उसपर आचरण करता है, उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है। जिसकी तृष्णा नहीं मिटी, उसे कर्त्तव्य-कर्मका भान ही नहीं हुआ है। तृष्णाका पर्वत तो इतना ऊँचा है कि उसे कोई लाँघ ही नहीं सकता। उसे धराशायी करनेके सिवा अन्य कोई चारा नहीं है। तृष्णाका त्याग करना अर्थात् कर्त्तव्यका भान होना। मुझे मालूम हो कि मुझे काशी जाना है, वहाँ जानेके मार्गकी भी मुझे जानकारी हो, तो फिर मुझे कौन-सी तृष्णा उस मार्गसे––कर्त्तव्यसे हटा––सकती है? मेरी तृष्णा ही काशीके मार्ग पर जानेकी हो और वह पूरी हो जाये, तो फिर बाकी क्या रह जाता है? सहजप्राप्त सेवा तेरे पास है। उसे एकनिष्ठासे तू करती रहे, तो उसमें तुझे पूर्ण सन्तोषकी अनुभूति होगी। सेवा करते हुए तुझे जो संग मिले, जो पढ़नेको मिले, वह ग्राह्य है; उसके अलावा किसी अन्य वस्तुका विचार तक भी नहीं करना चाहिए। मेरे विचारसे यह 'योगः कर्मसु कौशलम्' है। यही समत्व और समाधि है।
लेकिन यह सब तुझे व्यर्थ लगे और तेरी इच्छा पठन-पाठनकी हो तो उसे खुशीसे तृप्त करना। कामका बोझ हलका करना और आराम करना। यह कैसे हो, तो नारणदाससे मिलकर ही तू इसपर विचार कर सकती है। नारणदास दूरदर्शी है, धैर्यवान है और साधु-चरित है। वह तेरी जरूर मदद करेगा। तुझे और क्या सान्त्वना दूँ? मेरे जैसे लोग तो केवल दिशा-निर्देश ही कर सकते हैं। वैसे तेरी
और हम सबकी शान्तिका सच्चा आधार तो अपने ऊपर ही निर्भर करता है।
सुशीलाके बारेमें तूने जो कहा है वह मैं समझ गया हूँ। अब तो वह मराठीमें सन्देश भेजे। उसे मेरा आशीर्वाद।
पण्डितजीका संगीत सुननेके बाद तेरे-जैसी लड़कीको किसी अन्य व्यक्तिका संगीत अच्छा नहीं लगता, यह मैं समझ सकता हूँ। लेकिन तू स्वयं ही भजन-गायन में सबसे आगे क्यों नहीं रहती? यदि ऐसा करनेकी हिम्मत तुझमें हो तो उसके लिए कहना। तू कहे तो मैं लिखूँ। तुझे गाना आता तो है। लगभग रोज रातको तू गाया करती थी, यह मैं भूला नहीं हूँ। तेरे गलेकी गिल्टियाँ कैसी हैं? डा॰ हरिभाईको दिखाई थीं न?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६६८५) से। सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी॰ एन॰ १०२३७ की फोटो-नकलसे भी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३१
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२७४. पत्र: रावजीभाई ना॰ पटेलको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२ अक्टूबर १९३०}}
{{left|चि॰ रावजीभाई,}}
जैसा कि डाक्टरने कहा है, तुम्हें पूरे एक महीने आराम कर ही लेना चाहिए। सेवा-कार्य तो हमारे सामने पड़ा ही हुआ है। तुम जितने मजबूत रहोगे उतनी अधिक सेवा कर पाओगे। और फिर हमारे कार्यक्रमके अनुसार हम जहाँ भी होंगे वहाँ कुछ-न-कुछ सेवा तो कर ही सकेंगे। मुझे लिखते रहना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ८९८९) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७५. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
२ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र मिला।
तुम्हें बेटी बननेकी योग्यता प्राप्त करनी है तो मुझे माँ और बाप बननेके लिए कितनी योग्यता प्राप्त करनी चाहिए? माँ और बाप होनेका दावा करनेवाला मैं यदि अपने प्रयत्नमें असावधान रहूँ तो तीनों लोकोंमें मेरे लिए तो कोई जगह भी
न रहे। इसलिए योग्य-अयोग्यके विवादमें क्यों पड़ें? बेटे-बेटी अयोग्य हों तो उसकी जिम्मेदारी माँ-बाप पर कम नहीं होती।
तुम्हारी उदासीका कारण तो समझमें आता है। एक, दो, तीन–ये सब काम मुझे करने हैं ऐसा कहने और सोचनेके बदले यह सोचो और कहो कि एक, दो, तीन––ये सब काम भगवान करता है और मैं उसका साधन हूँ। ऐसा समझने पर बोझ तो लगेगा ही नहीं बोझ तो भगवान उठाता है और उसके कन्धे इतने विशाल है कि चाहे जितना बोझ लादें भगवानको उसका भार उतना भी नहीं लगता जितना हमें रजकणका लगता है। इसलिए हम 'मैं' और 'मेरा' भूल जायें। "मैं करता हूँ, मैं करता हूँ, यह हमारी अज्ञानता होगी। गाड़ीका भार जैसे कुत्ता ढोता है।"<ref>हुँ करूं, हुँ करूं ए ज अज्ञानता, शकटनो भार ज्यम श्वान ताणे।</ref> नरसिंह मेहताने इस पदमें अपना अनुभव बताया है। शकट अर्थात्
{{smallrefs}}
{{left|४४–१३}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३२
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रेखा साव
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>गाड़ी। गाड़ीके नीचे चलनेवाले कुत्तेके ऊपर यदि गाड़ीका भार होता है तो हम भी अपने ऊपर रहनेवाले कामका भार मानें। किन्तु जो ईश्वरके निमित्त ही सेवा करता है, वह ज्यादा बोझ तो कदापि नहीं उठाता। उसे उठानेकी जरूरत ही नहीं। उसपर भार आ पड़ता है और वह भगवानका स्मरण करता हुआ आनन्दपूर्वक चलता जाता है। 'मने चाकर राखोजी' तुम बहुत भावनासे गाती हो। इस भजनके अर्थका विचार करना और हमने स्त्रियोंकी प्रार्थनामें जो दो श्लोक लिये हैं उनका विचार करना। जो भगवानके हो गये हैं उनके योगक्षेमका बोझ भगवान पर है। ऐसी भगवानकी
प्रतिज्ञा है। फिर हमें क्या परेशानी है। यह तो हुई ज्ञान-वार्त्ता।
दुःखी होकर भी तुम्हें और हमें कहाँ जाना है? आश्रम-सम्बन्ध हिन्दू-विवाह जैसा है; पल्ला बाँधा है तो छोड़े नहीं छूटेगा? दूसरे ढीले हैं या दृढ़, उसका खयाल हम न करके यही विचार करें कि "मैं ढीला हूँ या दृढ़" तो भी काफी है। नाथसे जितना सहारा मिल सके, उतना तो लेना ही नारणदासके साथ बात करना और हर सप्ताह मुझे तो मनकी बात लिखती ही रहना। थोड़े दिनकी छुट्टी लेकर
काकासाहब से मिलने आ जाओ, तो भी थोड़ा आश्वासन मिलेगा।
इतना परिश्रम न करना कि थकान हो। सेवाभावसे किये जानेवाले काममें प्रमाणका ध्यान रखना चाहिए। ध्यान तभी रख सकते हैं, जब हममें अनासक्तिकी
भावना आ गई हो। अनासक्तिका पर्याय ममत्वहीनता कहा जा सकता है। 'चादरके अनुसार पैर फैलायें' वाली कहावतमें बहुत ज्ञान निहित है।
समय-समय पर इस पत्रको पढ़ती रहना, इसपर विचार करना और उदासी छोड़ देना और हृदयमें 'चाकर राखो' की धुन दोहराती रहना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
[गुजरातीसे]
'''बापुना पत्रो-६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७६० से भी। सौजन्य: गंगाबहन वैद्य<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३३
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674108
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२७६. पत्र: बलवीर सिंहको'''}}}}
{{left|यरवडा मन्दिर<br>
२/३<ref>लिखावट अस्पष्ट है ।</ref> अक्टूबर १९३०}}
{{left|भाई बलवीर सिंह,}}
तुमारा खत मिला। खादी भंडार काम काम हि है बहोत अच्छा है। कमसे कम आध घंटा कातना यज्ञ है। दोनोंके बीच मुकाबला नहिं हो सकता दोनों कर्त्तव्य है। इसलिये जिस तरह खानेका समय निकालना हि पढता है ठीक उसी तरह यज्ञका समय नीकालना। पुणीयां तो एक मासके लिये एक दिनमें बन सकती है। १० के बदले २० या ३० का कातनेसे कम पुणीयां चाहीयेगी। इस बारेमें महावीर प्रसादजीसे चर्चा करना। का॰ सा॰ आशीर्वाद भेजते हैं।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ १०५३८ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७७. पत्र: आर॰ वी॰ मार्टिनको'''}}}}
{{right|यरवडा सेंट्रल जेल<br>
३ अक्टूबर १९३०}}
{{left|प्रिय मेजर मार्टिन,}}
हमारी बातचीतके सन्दर्भ में मुझे आपको यह बताना है कि 'मित्रों' से मेरा अभिप्राय उन सविनय अवज्ञावाले कैदियोंसे है जिन्हें मैं जानता हूँ। मैं केवल उन्हींसे मिलना चाहूँगा जिनके बीमार होनेकी सूचना हो या जिनके साथ दुर्व्यवहार किये जानेकी शिकायत हो अथवा जिनके बारेमें दुर्व्यवहार किये जानेकी खबर हो। इस अधिकारका भी मैं यथासम्भव अधिकसे-अधिक संयमके साथ प्रयोग करूँगा। यदि मेरा
अभिप्राय और अधिक स्पष्ट करनेकी आवश्यकता हो तो कृपया मुझे सूचित करें। मैं कोई बात मनमें छिपा कर रखना नहीं चाहता।
जहाँतक अपने निश्चयके कार्यान्वयनको स्थगित रखनेका प्रश्न है, यदि मेरी माँग समय रहते स्वीकार नहीं की जा सकती तो मुझे दुःख है कि मैं उसे मुल्तवी नहीं कर सकता। लेकिन इसमें कोई तात्कालिक चिन्ता करनेकी जरूरत नहीं है<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३४
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>क्योंकि आरम्भिक चरणोंमें में साधारण कैदियोंवाला वह भोजन तो खाता ही रहूँगा जिसे मैं धर्मतः ले सकता हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
{{larger|मो॰ क॰ गांधी}}}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ३८५४) की फोटो-नकलसे तथा एस॰ एन॰ १९९८३ से भी।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७८. पत्र: परशुराम मेहरोत्राको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
३ अक्टूबर १९३०}}
{{left|चि॰ परसराम,}}
तुमारा खत मिला। जैसे शंकरलालजी कहें ऐसा करो। लोक भले उपहास करे, तुमारे तो वही काम करते रहना। मील पुनी बेचनेवालोंको प्रेमसे मनाओ धरणा मत दो। सत्य और अहिंसा हरगीज मत छोड़ो। ऐसा करने से बुद्धिबल अपने-आप आयेगा। मुझे लिखते रहो।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ४९६५ से। सौजन्य: परशुराम मेहरोत्रा
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२७९. पत्र: मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}}}
{{right|४ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|चि॰ मथुरादास,}}
तुम्हारा पत्र मिला। बुनकरोंके बारेमें तुमने जो लिखा है वह सही है। सूतमें माँड़ लगानेवाले अहमदाबादमें विशेष कारीगर होते हैं। अन्य स्थानोंमें भी ऐसे कारीगर देखनेमें आते हैं। क्या हम बुनकरोंकी माँड़वाले तानेके सूतकी माँगको पूरा नहीं
कर सकेंगे? रामजीभाई आदिसे यदि तुम आनेको कहोगे तो वे तुम्हारी सहायताके लिए आ जायेंगे। छगनभाई या सुरेन्द्र द्वारा सौंपा हुआ काम उन्हें करना है। फिर भी यदि तुम्हें ऐसा लगता हो कि में उन्हें लिखूँ तो मुझे पुनः सूचित करना। आखिर मुझे मोतीबहनका पत्र नहीं ही मिला।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७४५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३५
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२८०. पत्र: रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}}}
{{right|४ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|भाई रामेश्वरदास (धुलीया),}}
पत्र मिला। इतना शोक मत करो। राम नाम लेकर प्रसन्न चित्त रहना। दर्दका आवश्यक इलाज करनेके बाद सहना और जो कुछ सेवा कार्य हो सके करना। प्रातःकालमें न उठा जाय तो कोई चिंताका कारण नहिं है।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ १७७ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२८१. पत्र: मीराबहनको'''}}}}{{right|यरवडा मन्दिर<br>
५ अक्टूबर, १९३०}}
{{left|चि॰ मीरा,}}
मैं मौन ग्रहण करनेके बाद यह पत्र लिख रहा हूँ। मैंने 'टाइम्स इलस्ट्रेटेड बीकली' में प्रकाशित एक ग्रुप-फोटोमें तुम्हारा चित्र देखा है। तुम चरखा चला रही हो और स्वस्थ दिखाई पड़ रही हो। मैंने 'बॉम्बे क्रॉनिकल' में पढ़ा था कि तुम महिलाओंके जुलूसमें थीं और उनकी सभा में बोली थीं। तो अब तुम फिर मेरे आवासके निकट हो और शायद यह पत्र तुम्हें आश्रम में मिलेगा।
हाँ, एस॰ अय्यंगारकी बेटी बड़ी भली है लेकिन जब हम मैसूरसे चले थे तब भी उसका व्यवहार कुछ वैसा ही था जैसा भावावेगोंमें बहनेवाले असंयत-चित्त व्यक्तियोंका होता है। जब उसे चिट्ठी लिखना तो कृपया उसे मेरा प्यार कहना और कहना कि मैं अक्सर उसकी याद करता हूँ। उसके पिताका मामला बहुत ही दुखद है। उनके साथ भी वही बात है जो उनकी बेटीके साथ है। अपनी बहुतसी अजीब हरकतोंके
लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उनसे तुम मिली थीं? मद्रासमें तुम कहाँ ठहरी थीं?
काकाको मेरा चरखा दे दिया गया है इसलिए पिछले हफ्ते मैंने सोचा था कि मैं तुम्हारे वाले पर अपना कोटा पूरा कर लूँगा। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन उसे चला नहीं पाया। तकुआ घूमता ही नहीं था। राल बेकार थी या क्या बात थी, मैं कुछ समझ नहीं पाया। जो हो, वह चल नहीं रहा था। तब मुझे सूरतवाले गाण्डीवका खयाल आया। मैंने उसे असाधारण रूपसे बढ़िया चीज पाया। पिछले दो दिनोंसे में
अपना सारा कोटा उसी पर पूरा करता रहा हूँ और सो भी काफी कम समयमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८२
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४४४|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
( राग भैरवी-
तीन ताल)
१६५
हो रसिया, मैं तो शरण तिहारी,
नहिं साधन बल वचन चातुरी,
एक भरोसो चरणे गिरिधारी ॥ ध्रु० ॥
कदुइ तुंबरिया मैं तो नीच भूमिकी,
गुण-सागर पिया तुम हि संवारी ॥ १ ॥
मैं अति दीन बालक तुम सरन,
नाथ न दीजे अनाथ बिसारी ! ॥ २ ॥
निज जन जानि सँभालोगे प्रीतम,
दरसन
प्रेम सखी नित जाऊँ बलिहारी ।। ३ ।।
१६६
( राग सारंग तीन ताल)
देना प्रान पियारे !
नन्दलाला मेरे नैनोंके तारे ॥ ध्रु० ॥
दीनानाथ दयाल सकल गुण,
नवकिशोर सुन्दर मुखवारे ।। १ ।।
मनमोहन मन रुकत न रोक्यो,
दरशनकी चित चाह हमारे ।। २ ।।
रसिक खुशाल मिलनकी आशा,
निशिदिन सुमरन ध्यान लगारे ।। ३ ।।
१६७
( राग बिहाग तीन ताल)
चेतन ! अब मोहिं दर्शन दीजे ।
तुम दर्शन शिव सुख पामीजे,
३-१०-१९३०
४-१०-१९३०
तुम दर्शन भव छीजे ॥ ध्रु० ॥
तुम कारन तप संयम किरिया, कहो कहाँ लौं कीजे ?
तुम दर्शन बिनु सब या झूठी, अंतर चित न भीजे ॥ १ ॥
क्रिया मूढमति कहे जन कोई, ज्ञान औरको प्यारो,
मिलत भाव रस दोउ न भाखे तू दोनोंते न्यारो ॥ २ ॥
सबमें है और सबमें नाहीं, पूरन रूप अकेलो,
आप स्वभावे वे किम रमतो ? तू गुरु अरु तु चेलो ।। ३ ।।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८५
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|
१७३}}
( राग ग़जल )
दुनिया चंद रोज ।
देख लो इसका तमाशा चंद रोज |
ऐ मुसाफ़िर! कूचका सामान कर ।
इस जहाँ में है बसेरा बंद रोज ।
पूछा लुकमाँसे, जिया तू कितने रोज ?
बाद
दस्ते हसरत मलके बोला 'चंद रोज ' ।।
कुत्रमें बोली कज़ा ।
मदफ़न
अब यहाँपे सोते रहना चंद रोज़ ॥
'फिर तुम कहाँ औ' में कहा, ऐ दोस्तो !
क्यों
साथ है मेरा तुम्हारा चंद रोज |
हो दिले बेजुर्मको ।
सताते
जालिमो, है ये जमाना चंद रोज ।
याद कर तू ऐ नजीर क़बरोंके रोज़ ।
जिन्दगीका है भरोसा चंद रोज़ ॥
११-१०-१९३०
१७४
( राग ग़ज़ल, सिंध काफी )
बस, अब मेरे दिलमें बसा एक तु है।
मेरे दिलका अब दिलरुबा एक तू है ॥
फक्त तेरे कदमोंसे अय मेरे खालिक ।
लगा अब मेरा ध्यान शामो सुबू है ।।
मेरा दिल तो तुझसे हि पाता है तसकी ।
बसी मरजमें प्रेमके तेरी बू है ॥
समझते हैं यूँ मुझको अकसर दिवाना ।
तेरा जिक्र विरदे ज़बाँ कूबकू है ॥
नहीं मुझको दुनयवी खुशबूसे उलफत ।
तेरा प्रेम ही अब मेरा मुझको
रँगूँ प्रेमसे तेरे दिलका ये
जिसे ज्ञानसे अब किया कुछ
न पाला पड़े नपसे शैसे
तेरे दासकी अब यही आरजू
बू है ।
घोला ।
रफू है ॥
मुझको ।
है ॥
१२-१०-१९३०
४४७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८६
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४४८|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
१७५
(राग ग़ज़ल, भैरवी)
अजब तेरा क़ानून देखा,
जहाँ दिल दिया फिर वहीं तुझको
खुदाया !
पाया ॥
न यां देखा जाता है मंदिर ओ मसजिद ।
फ़क़्त यह कि तालिब सिदक दिलसे आया ।।
जो तुझपे फ़िदा हुआ एक बारी ।
उसे प्रेमका तूने जलवा दिखाया ||
तेरी पाक सीरतका आशिक हुआ जो ।
वहीं रेंग रंगा फिर जो तूने
है गुमराह, जिस दिलमें बाक़ी
मिला तुझसे जिसने खुदीको
हुआ तेरे विश्वासीको तेरा
गदाको दुरे बेवहा
रंगाया ॥
खुदी है।
गंवाया ।।
दरसन ।
हाथ
आया ।
१३-१०-१९१०
१७६
( राग अड़ाणा ताल झुमरा )
नैया मेरी तनकसी, दोझी पाथर भार
चहुँ दिसि अति भरे उठत, केवट है मतवार ॥ ध्रु० ॥
केवट है मतवार, नाव मँझधारहि आनी ।
आंधी उठी प्रचंड तेहूँ पर बरसत पानी ! ॥ १ ॥
कह गिरधर कविराय, नाथ हो तुमहि सेवैया ।
उठे दयाको डाँड घाट पर आवे नैया ॥ २ ॥
१४-१०-१९३०
१७७
( राग आसावरी
-तीन ताल)
कर ले सिंगार, चतुर अलबेली
साजनके घर जाना होगा ॥ ध्रु० ॥
मिट्टी ओढवन, मिट्टी बिछावन,
मिट्टी से मिल जाना होगा ॥ १ ॥
नहा ले, धो ले, सीस गुंधा ले,
फिर वहांसे नहि आना होगा । कर ॥ २ ॥
१४-१०-१९३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८७
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट}}
{{C|१७८}}
{{C|[ गुजराती ]}}
{{C|( राग खमाज ताल घुमाली)}}
{{Gap}}वैष्णव जन तो तेने कहीए, जे पीड पराई जाणे रे;
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आगे रे. ध्रु०
सकळ लोकमा सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे;
वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे.
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे;
जिल्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे.
मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ वैराग्य जेना मनमां रे;
रामनामनुं ताळी लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे.
लोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे;
भणे नरसंयो तेनुं दरसन करतां, कुछ एकोतेर ताय रे.
१२३
१५-१०-१९३०
४४-२९
१७९
मराठी भजन
(राग जोगीमांड- ताल कव्वाली)
जे का रंजले गांजले, त्यांसि म्हणे जो आपुले ।
तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा ।।
मृदु सबाह्य नवनीत, तैसें सज्जनायें चित्त ।
ज्यासि आपंगिता नाहीं, त्यासि घरी जो हृदयीं ॥
दिया करणें जे पुत्रासी, तेचि दासा आणि दासी ।
तुका म्हणे सांगों किलो, तोचि भगवंताची मूर्ति ।
१८०
(राग पूर्वी अगर विभास - ताल कवाली)
देव जवळी अंतरी भेटी नाहीं जन्म बेरी ।
मूर्ति त्रैलोक्य संचली, दृष्टि विश्वाची चुकली ।
भाग्यें आले संतजन झालें देवाचें दर्शन ।
रामदासी योग झाला, देहीं देव प्रगटला ॥
४४९<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८८
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|४५०|
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
{{C|१८१}}
{{C|(राग पूर्वी तीन ताल )}}
{{Gap}}तें मन निष्ठुर कां केलें, जें पूर्ण दयेनें
गजेन्द्राचे हाकेसरिसें घाउनियां
प्रह्लादाच्या भावार्थासी, स्तंभी गुरगुरलें ॥
पांचाळीच्या करुणा-वचनें कळवळुनी आलें ।
एका जनार्दनीं पूर्ण कृपेनें निशिदिनि पदीं रमलें ।
{{Rh|||१५-१०-१९३०}}
{{C|१८२}}
{{C|(राग केदार ताल केरवा अगर धुमाळी)}}
पापाची वासना नको दाबू डोळा,
त्याहुनी अंधळा बराच
निदेचें श्रवण नको माझे कानी,
मी ।
बधिर करोनि ठेवीं देवा ।
अपवित्र वाणी नको माझ्या मुखा,
त्याजहूनि मुका बराच मी ।
नको मज कधीं परस्त्रीसंगति,
जनांतूनि माती उठतां भली ।
तुका म्हणे मज अवध्याचा कंटाला,
तूं एक गोपाळा आवडसी ।।
{{Rh|||१६-१०-१९३०}}
{{C|१८३}}
{{C|( राग खमाज तीन ताल )}}
स्मरतां नित्य हरि, मग ती माया काय करी ?
श्रवणें मननें अद्वय वचनें, पळतो काळ दूरी।
करुणाकर वर-दायक हरि जो, ठेवित हात शिरीं ।
तोचि निरंतर उद्धव चरणी, अमृत पान करी ॥
{{Rh|||१७-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८९
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४५१}}
{{C|१८४}}
{{C|( राग धनाश्री- तीन ताल )}}
संतपदाची ०
संत-पदाची जोड, दे रे हरि !
संत समागमें आत्म-सुखाचा सुन्दर उगवे मोड |
सुफलित करुनी पूर्ण मनोरथ पुरविसि जीविचे फोड ।
अमृत म्हणे रे हरि-भक्तांचा शेवट करिसी गोड ।।
{Rh||१७-१०-१९३०}}
भाव
{{C|१८५}}
{{C|(राग झिझोटी ताल घुमाळी)}}
धरा रे, अपुलासा देव करा रे ।।
कोणी काय म्हणों या साठी, बळकट प्रेम असावें गांठी ।
निंदा-स्तुति वर लावुनि काठी, मी तूं हरा रे अपुलासा ०
सकाम साधन सर्वहि सांडा, निष्कामे मुळ भजनी भांडा ।
नाना कुतर्क वृत्तिसि दवडा, आलि जरा रे--
• अपुलासा०
दुर्लभ नरदेहाची प्राप्ति, पुन्हां न मिळे हा कल्पांतीं ।
ऐसा विवेक आणुनि चित्तीं, गुरुसि वरा रे अपुलासा ०
केसरिनाथ गुरुचे पायीं, सृष्टी आजि बुडाली पाही ।
शिवदिन निश्चय दुसरा नाही, भक्त सखा रे अपुलासा ०
{{Rh|||१८-१०-१९३०}}
{{C|१८६}}
{{C|(राग समाज
•तीन ताळ)}}
अशाश्वत संग्रह कोण करी ?
कोण करी घर सोपे माडया,
झोंपडि हेचि बरी ।
चिरगुट चिंध्या जोडुनि
गोधडी हेचि
नित्य नवें जें देइल
भक्षू तेचि
अमृत म्हणे मज भिक्षा
कंथा
बरी ।
माधव
परी ।
डोहळे
येति अशा लहरी ॥
१९-१०-१९३०
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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2026-08-25T13:23:33Z
Sonu kumar 07
6479
673938
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|४५१}}
{{C|१८४}}
{{C|( राग धनाश्री- तीन ताल )}}
संतपदाची ०
संत-पदाची जोड, दे रे हरि !
संत समागमें आत्म-सुखाचा सुन्दर उगवे मोड |
सुफलित करुनी पूर्ण मनोरथ पुरविसि जीविचे फोड ।
अमृत म्हणे रे हरि-भक्तांचा शेवट करिसी गोड ।।
{Rh||१७-१०-१९३०}}
भाव
{{C|१८५}}
{{C|(राग झिझोटी ताल घुमाळी)}}
धरा रे, अपुलासा देव करा रे ।।
कोणी काय म्हणों या साठी, बळकट प्रेम असावें गांठी ।
निंदा-स्तुति वर लावुनि काठी, मी तूं हरा रे अपुलासा ०
सकाम साधन सर्वहि सांडा, निष्कामे मुळ भजनी भांडा ।
नाना कुतर्क वृत्तिसि दवडा, आलि जरा रे--
• अपुलासा०
दुर्लभ नरदेहाची प्राप्ति, पुन्हां न मिळे हा कल्पांतीं ।
ऐसा विवेक आणुनि चित्तीं, गुरुसि वरा रे अपुलासा ०
केसरिनाथ गुरुचे पायीं, सृष्टी आजि बुडाली पाही ।
शिवदिन निश्चय दुसरा नाही, भक्त सखा रे अपुलासा ०
{{Rh|||१८-१०-१९३०}}
{{C|१८६}}
{{C|(राग समाज
•तीन ताळ)}}
अशाश्वत संग्रह कोण करी ?
कोण करी घर सोपे माडया,
झोंपडि हेचि बरी ।
चिरगुट चिंध्या जोडुनि
गोधडी हेचि
नित्य नवें जें देइल
भक्षू तेचि
अमृत म्हणे मज भिक्षा
कंथा
बरी ।
माधव
परी ।
डोहळे
येति अशा लहरी ॥
{{Rh|||१९-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९०
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४५२
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
{{C|१८७}}
{{C|(राग झिझोटी - ताल दादरा )}}
हरि भजनावीण काळ घालवू नको रे ।।
दोरिच्या सापा भिउनी भवा, भेटि नाहि जिवा शिवा ।
अंतरीचा ज्ञान-दिवा, मालवू नको रे ॥
विवेकाची ठरेल ओल, ऐसे बोलावे की बोल ।
आपुलें मतें उगिच चिखल, कालवू नको रे ।
संत संगतीनें उमज, आणुनि मनीं पुरतें समज ।
अनुभवावीण मान हालवू नको रे ॥
सोहिरा म्हणे ज्ञान ज्योति, तेथें कैचि दिवस राती ।
तयाविणें नेत्रपाती, हालवू नको रे ॥
{{C|१८८}}
{{Rh|||२०-१०-१९३०}}
पवित्र तें कुळ पावन तो देश जेथें हरिचे दास जन्म घेती ।
कर्मधर्म त्यांचे जाला नारायण त्याचेनि पावन तिन्ही लोक ।
वर्ण अभिमानें कोण जाले पावन ?
ऐसें या सांगून मजपाशीं
अंत्यजादि योनि तरल्या हरिभजनें तयांची पुराणें भाट झाली ।
वैश्य तुळावार गोरा तो कुंभार धागा हा चांभार रोहिदास
कबीर मोमीन लतिफ मुसलमान सेना न्हावी आणि विष्णुदास ।
कान्होपात्र खोदु पिंजारी तो दादू भजनी अभेदु हरिचे पायी ।
चोखा मेळा का जातीचा महार त्यासी सर्वेश्वर ऐक्य करी
नामयाची जनी कोण तिचा भाव ?
जेवी पंढरीराव तियेसवें
मैराळ जनक कोण कुळ त्याचें ?
महिमान तयाचे काय सांगो ?
यातायातिधर्म नाहीं विष्णुदासा निर्णय हा ऐसा वेदशास्त्री ।
तुका म्हणे तुम्हीं विचारावे ग्रंथ
तारिले पतित नेणों किती ।
{{C|१८९}}
{{C|( राग छाया समाज - ताल घुमाली)}}
{{Rh|||२१-१०-१९३०}}
नियम पाळावे, जरि म्हणशिल योगी व्हावें ॥ ध्रु० ॥
रसनेचा जो अंकित झाला, समूळ निद्रेला जो विकला,
तो नर योगाभ्यासा मुकला, असें समजावें जरि०
रात्री निद्रा परिमित ध्यावी भोजनांत ही मिति असावी,
शब्द-वल्गना बहु न करावी, साधक जीवेंजरि०<noinclude></noinclude>
d1xmay8a2alkiqlg9cnihxi5haknliv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९१
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Sonu kumar 07
6479
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|||४५३}}
{{c|परिशिष्ट}}
यापरि सकलाहार-विहारी, नियमित व्हायें मनि अवधारी,
निज-रूपोन्मुख होउनी अंतरी, चित्त मग धावें जरि०
विषयापासुनि वळतां वृत्ति, येइल सहजचि आत्म्यावरती,
जैसा निश्चळ दीप निवाती, समाधि पावे जरि०
बुद्धि-ग्राह्य अतीन्द्रिय सुख तें वर्णाया श्रुति अक्षम त्यातें,
मग तें कैसें कृष्णसुतातें बोलतां यायें जरि०
जेथें
{{C|१९०}}
जातों तेथें तूं माझा सांगाती
चालविसी हाती धरूनियां ।
बालों वाटे आम्हीं तुझाचि आधार
चालविसी भार सर्वे माझा ।
बोलों जातां वरळ करिसी तें नीट
नेली लाज घीट केलों देवा ।
जन मज झाले लोकपाळ
सोईरे सकळ प्राणसखे ।
अवधे
तुका
म्हणे आतां खेळतों कौतुकें
झाले तुझें सुख अंतहां ॥
{{C|१९१}}
{{C|(राग भैरवी
-ताल कवाली)}}
न
कळतां काय करावा उपाय
जेणें राहे भाव तुझ्या पायी ?
येउनियां बास करिसी हृदयीं
ऐसें
घडे
कई कासयानें ?
साच भावें तुझें चितन मानसी
राहे हैं करिसी गा देवा ?
लटिकें हैं माझें करूनियां दूरी
साच तूं अंतरी येउनी राहें।
तुका म्हणे मज राखावें पतिता
आपुलिया सत्ता
पांडुरंगा ||
{{Rh|||२२-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९२
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Sonu kumar 07
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४५४
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
{{C|१९२}}
मुक्ति पांग नाही विष्णूचिया दासां
संसार ते कैसा न देखती ।
वैसला गोविंद जडोनियां चित्ती
आदि तेचि अंती अवसानी ।
भोग नारायणा देऊनी निराळी
ओवियां मंगळी तोचि गाती ।
बळ बुद्धि त्यांची उपकारासाठी
अमृत तें पोटीं सांठविलें ।
दयावंत तरी देवाच सारिखीं
आपुली पारकी नोळखती ।
तुका म्हणे त्यांचा जीव तोचि देव
वैकुंठ तो ठाव वसती ते ।।
{{C|१९३}}
काय वाणूं आतां न पुरे हे वाणी
थोरीय
मस्तक चरणी ठेवीतसें ।
सांडिली आपुली परिसें
नेणें शिवों कैसें लोखंडासी ।
जगाच्या कल्याणा संतांच्या विभूति
देह
कष्टविती उपकारें ।
भूतांची दया हैं
भांडवल संतां
आपुली
ममता
नाहीं देहीं ।
तुका म्हणे सुख
पराचिया
सुखें
{{Rh|||२३-१०-१९३०}}
अमृत हें मुखें स्रवतसे ॥
{{C|१९४}}
नाहीं संतपण मिळत ते हाटी
हिंडतां कपाटी रानी
नये मोल देतां धनाचिया राशी
वनीं ।
नाहीं तें आकाशी पाताळी तें ।
तुका म्हणे मिळे जीवाचीये साटों
नाही तरी गोष्टी बोलों नये ।
{{Rh|||२४-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९३
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|परिशिष्ट}}
{{C|१९५}}
भक्त ऐसे जागा जे देहीं उदास
गेले आशापाश निवास्नी ।
विषय तो त्यांचा झाला नारायण
नावडे धन जन मातापिता ।
निर्वाणी गोविंद असे मागेंपुढे
कांहींच सांकडे पडों नेदी ।
तुका म्हणे सत्य कर्मा व्हावें साह्य
घातलिया भय नर्का जाणें ।
{{C|१९६}}
वेद अनंत बोलिला, अर्थ इतुकाचि साधिला ।
विठोबासी शरण जावें, निजनिष्ठे नाम गायें।
सकळ शास्त्रांचा विचार, अंती इतुकाचि निर्धार ।
अठरा पुराणी सिद्धांत, तुका म्हणे हाचि हेत ।।
{{C|१९७}}
आणीक दुसरें मज नाहीं आतां
नेमिलें या
चित्तापासुनियां ।
पांडुरंग ध्यानी,
पांडुरंग
मनी,
जागृती
स्वपनी
पांडुरंग ।
पडिलें वळण इंद्रियां सकळां
भाव तो निराळा नाहीं दुजा ।
तुका म्हणे नेत्रीं केली ओळखण
तटस्थ तें ध्यान विटेवरी ॥
{{C|१९८}}
न
मिळो खावया न वाढो संतान,
ऐसी
माझी
परि हा नारायण कृपा करो ।
वाचा मज उपदेशी
आणीक लोकांसी
हेंचि सांगे ।
{{Rh|||२५-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९४
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Sonu kumar 07
6479
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४५६
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
विटंयो शरीर होत कां विपत्ती
राहो चित्तीं नारायण ।
नाशिवंत हे सकळ
आठवे
गोपाळ तेंचि हित ॥
{{Rh|||२६-१०-१९३०}}
{{C|१९९}}
महारासी शिवे,
कोपे ब्राह्मण तो नव्हे ।
नावळे चांडाळ,
तया प्रायश्चित्त काही, देहत्याग करितां नाहीं ।
ज्याचा संग चित्ती तुका म्हणे तो त्या याती ॥
त्याचा अंतरी विटाळ |
{{C|२००}}
{{C|(राग बडहंस ताल घुमाली)}}
जावो अथवा राहो
पांडुरंगी दृढ़ भावो ।
न सोडीं सर्वथा
आण
तुझी पंढरिनाथा ।
मंगल नाम
हृदय
अखंडित
प्रेम ।
नामा
म्हणे केशवराजा
केला पण चालवि माझा ॥
{{C|२०१}}
पुण्य पर उपकार, पाप ते पर पीडा,
आणिक नाहीं जोडा दुजा यासी ।
सत्य तोचि धर्म, असत्य तें कर्म,
आणिक हें धर्म नाहीं दुजें ।
गति तेचि मुखी नामाचें स्मरण,
अधोगति जाण विन्मुखता ।
संतांचा संग तोचि
नर्क तो उदास
स्वर्गवास,
अनर्गळ |
तुका म्हणे उघडें आहे हित घात,
जया जें उचित करा तैसें ॥
{{Rh|||२७-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९५
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|परिशिष्ट}}
{{C|२०२}}
{{C|(राग भैरवी
शेवटची विनवणी
-
ताल कवाली)}}
संतजनीं
परिसावी ।
तुम्हांसी ।
विसर तो न पडावा माझा देवा
आतां फार बोलों काई अव पायां विदीत ।
तुका म्हणे पडिलों पायी करा छाया कृपेची ॥
{{C|२०३}}
हेची दान देगा देवा, तुझा विसर न व्हावा ।
गुण गाईन आवडी, हेचि माझी सर्व जोडी ।
नलगे मुक्ति धन संपदा, संत-संग देई सदा ।
तुका म्हणे गर्भवासीं सुखें घालावें आम्हांसी ॥
{{C|२०४}}
{{C|बंगाली भजन}}
{{Rh|||२८-१०-१९३०}}
( राग भैरवी - ताल दादरा या राग आसावरी द्रुत एक ताल )
अन्तर मम विकसित करो अन्तरतर हे !
-
निर्मल करो, उज्ज्वल करो, सुन्दर करो हे अन्तर०
जाग्रत करो, उद्यत करो, निर्भय करो है,
मंगल करो, निरलस निःसंशय करो हे - अन्तर०
युक्त करो हे सबार संगे, मुक्त करो हे बंध,
संचार करो सकल कर्मे शान्त तोमार छंद - अन्तर०
चरण-पये मम चित्त निष्पंदित करो है.
नंदित करो, नंदित करो, नंदित करो है - अन्तर०
{{C|२०५}}
वहे
निरन्तर अनंत
आनन्दधारा
बाजे असीम नभ माझे अनादि रव
जागे अगण्य
एकक अखण्ड
रवि चन्द्र तारा बहे ०
ब्रह्माण्ड
राज्ये
परम एक सेइ राज-राजेन्द्र राजे
विस्मित निमेष हृत विश्व चरणे विनत
लक्ष शत भक्त-चित वाक्यहारा - - वहे०
{{Rh|||२९-१०-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९६
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४५८
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय}}
{{C|२०६}}
{{C|( राग अडाणा -- ताल झपताल)}}
तुमि बंधु, तुमि नाथ,
तुमि आमार;
तुमि सुख, तुमि शान्ति,
तुमि हे अमृत पाथार. ध्रु०
तुम तो आनन्दलोक,
जुडाओ प्राण नाशो शोक;
तापहरण तोमार चरण,
असीम शरण दीनजनार. तुमि ०
{{Rh|||[ ३०-१०-१९३० ]}}
{{C|२०७}}
एकटि नमस्कारे प्रभु! एकटि नमस्कारे
संसारे ।
तोमार ए
रसेर भारे
सकल देह लुटिये प
घन श्रावण मेघेर मत
एकटि नमस्कारे प्रभु!
समस्त मन पडिया था
नाना सुरेर आकुल धारा
एकटि नमस्कारे प्रभु!
समस्त गान समाप्त हो
नम्र नत
एकटि नमस्कारे
तब भवनद्वारे ।
मिलिये दिये आत्म-हारा
एकटि नमस्कारे
नीरव पारावारे ।
हंस जेसन मानस यात्री, तेमनि सारा दिवस-रात्री
एकटि नमस्कारे प्रभु! एकटि नमस्कारे
समस्त प्राण उडे चलुक् महा-मरण पारे ।
{{C|२०८}}
गुजराती भजन
{{C|( राग खमाज -- ताल घुमाली)}}
{{Rh|||[ ३०-१०-१९३० ]}}
भूतळ भक्ति पदारथ मोटु, ब्रह्म लोकमां नाहि रे;
पुण्य करी अमरापुरी पाम्या, अन्ते चोराशी मांही रे.
ध्रु०
हरिना जन तो मुक्ति न मागे, मागे जन्मो जनम अवतार रे
नित सेवा, नित कीर्तन ओच्छव, नीरखवा नन्दकुमार रे १
१. साधन-सूत्र में कोई तिथि नहीं दी गई है। लेकिन इसका और इसके वाइवाले भनका अनुवाद
सम्भवत: इसी तारीखको हुआ था।<noinclude></noinclude>
osq74d837nm26bmv8kryw0bnmbzgj0w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९७
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Sonu kumar 07
6479
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|||४५९}}
{{c|परिशिष्ट}}
भरतखंड भूतळमां जनमी, जेणे गोविन्दना गुण गाया रे,
धन धन रे एनां मातपिताने, सफळ करी एणे काया रे.
धन वृन्दावन, धन ए लीला, धन ए व्रजनां वासी रे;
अष्ट महासिद्धि आगणिये रे कभी मुक्ति के एमनी दासी रे.
ए रसनो स्वाद शंकर जाणे के जाणे शुकजोगी रे;
कईएक जाणे व्रजनी रे गोपी, भणे नरसैयो भोगी रे.
२
३
४
{{Rh|||३१-१०-१९३०}}
{{C|२०९}}
{{C|( राग खमाज - ताल घुमाली)}}
१
नारायणनुं नाम ज लेतां वारे तेने तजीए रे;
मनसा वाचा कर्मणा करीने लक्ष्मीवरने भजीए रे. ध्रु०
कुळने तजीए, कुटुम्बने तजीए, तजीए मा ने बाप रे;
भगिनी सुत दाराने तजीए, जेम तज कंचुकी साप रे.
प्रथम पिता प्रह्लाद तजियो, नव तजियुं हरिनुं नाम रे ;
भरत शत्रुध्ने ती जनेता, नव तजिया श्रीराम रे.
ऋषि पत्नीए श्रीहरि काजे, तजिया निज भरणार रे ;
तेमा तेनुं कईये न गयुं, पामी पदारथ चार
व्रज वनिता विठ्ठलने काजे, सर्व तजीने
भणे नरसंयो वृन्दावनमां, मोहन साथै
रे.
२
३
चाली रे;
महाली रे.
ढें
{{Rh|||१-११-१९३०}}
{{C|२१०}}
{{C|(राग आसा-मांड-ताल झपताल)}}
समरने
श्रीहरि मेल ममता परी,
जोने विचारीने मूळ तारु;
तुं अल्या कोण ने कोने वलगी रह्यो ?
वगर समज्ये कहे मारु मारु.
देहतारी नथी, जो तुं जुगते करी,
राखतां नव रहे निश्चे जाये;
देहसंबंध तज्ये अवनवा बहु थशे
पुत्र कलन परिवार बहाये.
घन तणुं ध्यान तुं अहोनिश आदरे,
तारे अंतराय मोटी;
पासे छे पियु अल्या, तेने नव परखियो,
ए
ज
१
२
हाथथी बाजी गई, थयो रे खोटी. ३<noinclude></noinclude>
sl7nkevkd2p7ywkk16yttgxvferw2cn
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९८
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४६०
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
भरनिद्रा भय संधी घेर्यो घणो,
संतना शब्द सुणी कोन जागे ?
न जागतां नरसैंयो लाज छे अति घणी,
जनमो-जनम तारी खांत भागे,४
{{Rh|||२-११-१९३०}}
{{C|२११}}
{{C|(राग आसा-मांड - ताल झपताल )}}
अखिल ब्रह्मांडमा एक तु श्रीहरि
जूजवे रूपे अनंत भासे;
तेजमा तत्व तुं,
शून्यमा शब्द थई वेद वासे.
देहमां देव सुं
पवन तुं, पाणी तुं,
भूमि तुं, भूधरा,
वृक्ष थई फूली रह्यो आकाशे;
विविध रचना करी अनेक रस लेवाने,
१
शिव थकी जीव थयो ए ज आशे. २
वेद तो एम वदे, श्रुति स्मृति साख दे -
कनक कुण्डल विषे भेद न्होये;
घट घडिया पछी नामरूप जूजवां
अंते
तो हेमनुं हेम
वृक्षमां बीज तुं बीजमां वृक्ष तुं,
होये. ३
जोउं पटंतरी ए ज पासे;
भणे नरसंयो ए मन तणी शोधना
प्रीत करें प्रेमची प्रगट बाशे ४
{{Rh|||३-११-१९३०}}
{{C|२१२}}
{{C|( राग आसा-मांड - ताल झपताल )}}
ज्यां लगी आतमा-तत्त्व चीन्यो नहि
त्यां लगी साधना सर्व जूठी,
मानुषा-देह तारो एम एळे गयो
मावठानी जेम वृष्टि वूठी. १
शुं थयुं स्नान पूजा ने सेवा थकी,
शुं पयुं घेर रही दान दीधे ?
शुं थयुं धरी जटा भस्म लेपन कर्ये,
शुं धर्यु बाळ लोचन कीधे ?<noinclude></noinclude>
eqrbjihsrb8020ibm8dqt1qm0usb6ix
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९९
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2026-08-26T03:26:41Z
Sonu kumar 07
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|||४६१}}
{{C|परिशिष्ट}}
शुं पयुं तप ने तीरथ कीधा थकी,
शुं पयुं माळ ग्रही नाम लीधे ?
शुं थयुं तिलक ने तुळसी धार्या थकी,
शुं थयुं गंगजल पान कीधे ? ३
शुं थयुं वेद
व्याकरण वाणी वये,
शुं थयुं राग ने रंग जाण्ये ?
शुं थयुं खट दरशन सेव्या थकी
शुं थयुं वरणना भेद आण्ये ? ४
ए छे परपंच सह पेट भरवा तणा,
आतमाराम परिब्रह्म न जोयो;
भणे नरसंयो
के
रत्न-चितामणि जन्म खोयो. ५
{{Rh|||४-११-१९३०}}
{{C|२१३}}
{{C|( राग आसा मांड - ताल झपताल)}}
जे गमे जगतगुरु देव जगदीशने
ते तणो खरखरो फोक करवो;
आपणो चितव्यो अर्थ काई नव सरे,
कगरे एक उद्वेग धरवो. १
हुँ करूँ, हुं करूं, ए ज अज्ञानता
शकटनो भार जेम श्वान ताणे;
सृष्टि मंडाण छे सर्व एणी पेरे
जोगी जोगेश्वरा कोईक जाणे. २
नीपजे नरथी तो कोई ना रहे दुखी
शत्रु मारीने सौ मित्र राखे;
राय ने रंक कोई दृष्टे आवे नहि,
भवन पर भवन पर छत्र दाखे. ३
ऋतु लता पत्र फळ फूल आपे यथा,
मानवी मूर्ख मन व्यर्थ शोने;
जेहना भाग्यमा जे समे जे लख्युं
तेहने ते समे तेज पहोंचे. ४
ग्रन्थ गरबड करी बात न करी खरी
जेहने जे गमे तेने पूजे,
मन कर्म वचनथी आप मानी लहे
सत्य छे ए ज मन एम सूझे. ५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५००
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४६२
{{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
सुख संसारी मिथ्या करी मानजो
कृष्ण विना बीजुं सर्व काचुं
जुगल कर जोडी करी नरसंयो एम कहे,
जन्म प्रतिजन्म हरिने ज जाचुं.
{{C|२१४}}
{{C|( राग आसा मांड ताल झपताल )}}
{{Rh|||५-११-१९३०}}
जागीने जोउं तो जगत दीसे नहि,
भासे;
चैतन्य विलास तद्रूप छे,
ब्रह्म लटकां करे ब्रह्म पासे. १
पंच महाभूत परिब्रह्म विषे ऊपज्यां
अणु अणु मांही रह्यो रे वळगी;
फूल ने फळ ते तो वृक्षनां जाणवां,
थड थकी डाळ ते नहि रे अळगी. २
वेद तो एम वदे, श्रुति स्मृति साख दे -
घाट घडिया
कनक कुण्डल विषे भेद न्होंये;
पछी नामरूप जूजवा
अंते तो हेमनुं हेम होये. ३
जीव ने शिव तो आप इच्छाए थया
रची परपंच चौद लोक कीधा;
भणे नरसंयो ए, 'तेज तुं, ' 'ते जतुं
एने समर्याथी कई संत सीध्या. ४
{{C|२१५}}
{{C|( राग आसा मांड - ताल झपताल)}}
ध्यान धर हरि तणुं अल्पमति आळसु
जे थकी जन्मनां दुःख जाये,
अवर धंधो कर्मे अरथ कांई नवसरे
?
{{Rh|||६-११-१९३०}}
माया देखाड़ीने मृत्यु बहाये ।। १ ।।
सकल कल्याण श्रीकृष्णना चरणमां
शरण आवे सुख पार व्हाये,
अवर वेपार तुं मेल मिध्या करी
कृष्णानुं नाम तुं राख मोंये
॥ २ ॥<noinclude></noinclude>
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