विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.17 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विकिस्रोत:चौपाल 4 15 674535 673199 2026-08-27T04:11:16Z AMAN KUMAR 6475 /* विकिमीडिया हार्डवेयर डोनेशन प्रोग्राम में समर्थन हेतु निवेदन */ नया अनुभाग 674535 wikitext text/x-wiki {{विकिस्रोत:चौपाल/शीर्ष}} <!-- कृपया यह पंक्ति और इसके ऊपर की सामग्री न हटायें --> ---- == सामुदायिक बैठक २१ जनवरी २०२६ == : दिल्ली तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकिस्रोत संपादक एवं प्रबंधकों के लिए २१ जनवरी २०२६ को [[विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जनवरी २०२६]] का आयोजन किया जा रहा है। प्रबंधकों एवं दिल्ली के नए प्रतिभागियों को इसकी सूचना दी जा चुकी है। दिल्ली के कोई पुराने विकिस्रोत संपादक इसमें शामिल होना चाहते हैं तो प्रबंधकों से संपर्क कर सकते हैं। यह नए सदस्यों की प्रशिक्षण तथा प्रबंधक स्तर पर रणनीति विमर्श के लिए आयोजित बैठक है। इसमें आवास एवं यात्रा व्यय की व्यवस्था नहीं है। केवल प्रतिभागियों के भोजन एवं नाश्ते का प्रबंध होगा। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:११, २१ जनवरी २०२६ (UTC) == मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[w:hi:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस|अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। # [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव। # [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव 2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव। :इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:०६, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC) == मार्च गतिविधि अपडेट == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा मार्च 2026 में हुई गतिविधियाँ: * 'हिंदी विकि सम्मेलन 2026' पर फाउंडेशन के साथ प्राथमिक स्तर की चर्चा पूरी हुई। अप्रैल तक इसपर निर्णय आने की संभावना है। * गूगल के साथ साझेदारी संबंधी अपडेट फाउंडेशन तथा गूगल टीम के साथ पीपीटी बनाकर साझा किए गए। पिछले एक वर्ष के सभी कार्यक्रमों के (नए लेख, नए सदस्य, सांस्थानिक भागिदारी) आंकड़ों को संश्लिष्ट रूप में साझा किया गया। * फरवरी में विकिपीडिया पर आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/2026]] के सभी लेखों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित [[s:hi:विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६|विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] के सभी शोधित पृष्ठों की जाँच पूरी हुई तथा पुरस्कार विजेता घोषित किए गए। * राजस्थान विश्वविद्यालय के भौतिकि विभाग के साथ सांस्थानिक भागीदारी के प्रयास स्वरूप पहली प्रशिक्षण कार्यशाला- [[w:hi:विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026|विकिपीडिया:मुक्त स्रोत हिंदी ई-सामग्री निर्माण एवं कौशल विकास कार्यशाला/मार्च 2026]] 24 मार्च को आयोजित करना निश्चित हुआ। * आइआइटी, जोधपुर के साथ सांस्थानिक भागीदारी की संभावना परखने के लिए 21 मार्च को जोधपुर में [[b:hi:विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक/मार्च 2026|विकिपुस्तक:सामुदायिक बैठक मार्च 2026]] निश्चित की गई। जोधपुर के कोई भी हिंदी विकिपीडियन इस अनौपचारिक संवाद बैठक में शामिल हो सकते हैं। : हिंदी विकिपीडिया के अनुभवी सदस्यों द्वारा किसी भी स्थानीय या रास्ट्रीय स्तर के आयोजन प्रस्तावों का हम स्वागत करते हैं तथा सहयोग का भरोसा दिलाते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 23:49, 20 मार्च 2026 (UTC) == Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications == The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]]. Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects. '''The hackathon is intended for:''' * Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc. * Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc. * Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces. Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach. To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses. '''Apply here:''' * Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form] '''More information:''' We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page. * Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]] If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}. Best Regards, On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group == आगामी कार्यक्रम == :हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची: # जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून) # जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई) # अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त) -संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC) == हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 == :मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२५, २४ अप्रैल २०२६ (UTC) == Request for comment (global AI policy) == <bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> Apologies for writing in English. {{int:Please-translate}} A [[:m:Requests for comment/Artificial intelligence policy|request for comment]] is currently being held to decide on a global AI policy. {{int:Feedback-thanks-title}} [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ००:५८, २६ अप्रैल २०२६ (UTC) </bdi> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30424282 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १ मई २०२६ (UTC) == अब 2026 U4C चुनाव में वोट करें == <section begin="announcement-content" /> योग्य मतदाताओं से अनुरोध है कि वे २०२६ की सार्वभौमिक आचार संहिता समन्वयन समिति के चुनाव में भाग लें। अधिक जानकारी-जिसमें पात्रता जाँच, मतदान प्रक्रिया की जानकारी, उम्मीदवारों की जानकारी, तथा मतदान के लिए लिंक शामिल हैं| मेटा पर २०२६ चुनाव जानकारी पृष्ठ पर उपलब्ध है। मतदान [https://zonestamp.toolforge.org/1780358400 00:00 UTC] पर २ जून २०२६ को समाप्त होगा। यदि आपका खाता पात्र है तो कृपया वोट करें। परिणाम 14 जून 2026 तक उपलब्ध होंगे। --U4C के सहयोग से,<section end="announcement-content" /> [[m:User:Keegan (WMF)|Keegan (WMF)]] ([[m:User talk:Keegan (WMF)|talk]]) १७:१५, २७ मई २०२६ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Keegan (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश --> ==जून के हिंदी विकिपीडिया संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें == '''[[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जून 2026]]''' 1 जून से शुरु होकर 30 जून तक चलने वाला लेख निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें इस बार आप सुझाए लेखों के अलावा अपनी पसंद के लेखों का निर्माण भी कर सकते हैं। इसमें शामिल होकर एआई के दौर में मानव निर्मित ज्ञान को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:५३, ३१ मई २०२६ (UTC) लेख निर्माण प्रतियोगिता है। इसका लक्ष्य 1 जून 2026 से 30 जून 2026 तक नए लेखों का निर्माण करना है। == [[Special:Import]] == *[[:en:Index:आमचा जगाचा प्रवास.pdf]] *[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/1]] *[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/2]] *[[:en:Page:आमचा जगाचा प्रवास.pdf/3]] :[[सदस्य:Koavf|Koavf]] ([[सदस्य वार्ता:Koavf|वार्ता]]) १८:५५, ११ जून २०२६ (UTC) == RFC about AI-generated content in Wikimedia Commons == <bdi lang="en" dir="ltr">Apologies for writing in English, please help translate this message to your language. You are invited to participate in a [[c:Commons:Requests for comment/Policy update for AI content|request for comment on Wikimedia Commons about a policy update for AI content]]. This may affect files that are uploaded to Wikimedia Commons for use on this project. Thank you. [[m:User:Codename Noreste|Codename Noreste]] ([[m:User talk:Codename Noreste|वार्ता]])</bdi> १७:१२, २३ जून २०२६ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Codename Noreste@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश --> == <span lang="en" dir="ltr">Deployment of Legal and Safety Contacts Link in the Footer of Your Wiki</span> == <div lang="en" dir="ltr"> <section begin="Message"/> '''Legal & Safety Contacts''' Hello community, the Wikimedia Foundation has provided a [[wmf:Special:MyLanguage/Legal:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contact Information|single legal and safety contact page]], to be linked in the footer of your wiki, to ensure access to accurate legal information. This is a regulatory requirement. We have already rolled out links to English, German, Italian, Spanish and other wikis and we will deploy to your wiki soon. [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_and_Safety_Contacts_FAQ|Please read more on the project page]] and leave any comments in this thread or on the [[m:Special:MyLanguage/Talk:Wikimedia Foundation Legal and Safety Contacts FAQ|talk page]]. <section end="Message"/> </div> -- [[User:Sannita (WMF)|User:Sannita (WMF)]] ([[User talk:Sannita (WMF)|talk]]) १३:३१, २५ जून २०२६ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Sannita_(WMF)/Mass_sending_test&oldid=30731267 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:Sannita (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश --> == विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf में त्रुटि == प्रबंधक महोदय, मैं [[विषयसूची:Darshan-Digdarshan.pdf]] पेज पर काम कर रही हूँ। इस पर `pagelist` टैग का उपयोग करने पर बार-बार "त्रुटि: अमान्य अंतराल (Invalid Interval)" का एरर आ रहा है। मैंने सभी बुनियादी कोड जैसे `<pagelist 36="1" /><nowiki>` भी आज़मा लिए हैं, और बॉक्स को खाली छोड़ कर भी देख लिया है, पर एरर नहीं हट रहा है। ऐसा लगता है कि फाइल का बैकएंड सिंक्रोनाइजेशन या कैशे अटक गया है। कृपया इसे चेक करने या ठीक करने में मदद करें। धन्यवाद! --~~~~</nowiki> [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) ०६:४१, २६ जून २०२६ (UTC) :आपने ठीक कहा है। पेजलिस्ट नहीं बन पा रहा है। कॉमन्स की कुछ फाइलों में ऐसी समस्या आ रही है। वे हिंदी विकिस्रोत पर ठीक से रेंडर नहीं हो रही हैं। पिलहाल हमने इस फाइल को समस्याकारक श्रेणी में डाल दिया है। देखते हैं कि ऐसी फाइलों का क्या कर सकते हैं। फिलाहाल आप दूसरी फाइलों पर काम करें। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:५६, २ जुलाई २०२६ (UTC) ==जुलाई के हिंदी विकिस्रोत संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतें == '''[[:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]]''' ३ जुलाई से शुरु होकर २२ जुलाई तक चलने वाला पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसमें आप सुझाए पुस्तकों के पृष्ठों को सुधार सकते हैं और पुरस्कार जीत सकते हैं। इसमें शामिल होकर मुद्राधिकार मुक्त हिंदी पुस्तकों को संरक्षित रखने के अभियान में सहायक होने के लिए आप सबका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:१९, २ जुलाई २०२६ (UTC) == हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना == * [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] 7-9 अगस्त को नई दिल्ली के पास गुरुग्राम में संपन्न हुआ। * [[w:hi:विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026|विकिपीडिया:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव 2026]] का 15 अगस्त-14 सितंबर 2026 का आयोजन कल से शुरु हो रहा है जिसमें 80 लेख स्वीकृत होने पर 8000 के निश्चित पुरस्कार जीते जा सकते हैं। * [[s:hi:विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६|विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६]] 15-30 अगस्त 2026 को विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव में 40 पृष्ठ शोधित कर निश्चित पुरस्कार प्राप्त करें। * [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026|विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2026]] के परिणाम घोषित हो गए हैं। * [[s:hi:विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६|विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]] :सदस्यों से अनुरोध है कि 15 अगस्त से शुरु होने वाले संपादनोत्सवों में शामिल होकर हिंदी ई-सामग्री के निर्माण में सहयोग करें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, १४ अगस्त २०२६ (UTC) == Request for comment (the future of Abstract Wikipedia) == <bdi lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr"> Apologies if this has not yet been translated into your wiki's language. {{int:Please-translate}} You are invited to voice your opinions in a [[:m:Requests for comment/The future of Abstract Wikipedia|request for comment about the future of Abstract Wikipedia]]. {{Int:Feedback-thanks-title}} [[:m:User:Kowal2701|Kowal2701]] ([[:m:User talk:Kowal2701|talk]]) १२:२५, २४ जुलाई २०२६ (UTC) </bdi> <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery&oldid=30513860 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:DreamRimmer@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश --> == <span lang="en" dir="ltr">Migration to Parsoid</span> == <div lang="en" dir="ltr"> <section begin="announcement-content" /> <em>[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation/Product and Technology/Parsoid Read Views/Read View Announcement|Read this in another language]]</em> Hello everyone! I am glad to inform you that as the next step in the [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification|Parser Unification]] project, Parsoid will soon be turned on as the default article renderer on your wiki. We are gradually increasing the number of wikis using Parsoid, with the intention of making it the default wikitext parser for MediaWiki's next long-term support release. This will make our wikis more reliable and consistent for editors, readers, and tools to use, as well as making the development of future wikitext features easier. If this disrupts your workflow, don’t worry! You can still opt out through a user preference or turn Parsoid off on the current page using the Tools submenu, as described in the [[mw:Special:MyLanguage/Help:Extension:ParserMigration|Extension:ParserMigration]] documentation. There is [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Confidence Framework|more information about our roll-out strategy]] available, including the testing done before we turn on Parsoid for a new wiki. To report bugs and issues, please look at our [[mw:Special:MyLanguage/Parsoid/Parser Unification/Known Issues|known issues]] documentation and if you found a new bug please create a phab ticket and tag the [[phab:project/view/5846|Content Transform Team in Phabricator]]. <section end="announcement-content" /> </div> [[mw:User:MSantos (WMF)|Content Transform Team]] १६:३१, ३ अगस्त २०२६ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Distribution_list/Global_message_delivery/Wikisource&oldid=28221043 पर मौजूद सूची का प्रयोग करके User:MSantos (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया संदेश --> == प्रस्ताव:हिंदी विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सुविधा सक्षम करें == :हिंदी विकिस्रोत पर पुस्तक अपलोड करने की सुविधा वर्तमान स्वरूप में काम नहीं कर रही है। अभी हम सौ एमबी (100 mb) तक की फाइल को अपलोड कर सकते हैं लेकिन कोई भी फाइल विषयसूची पृष्ठ बनाने पर उसके पृष्ठ नहीं दिखते हैं या उनका ओसीआर नहीं हो पाता है। :मेरा प्रस्ताव है कि हिंदी विकिपीडिया पर स्थानीय पुस्तक अपलोड करने की सुविधा काम करनी चाहिए। जिससे कि भारतीय कानून के अनुसार मुद्राधिकार मुक्त पुस्तकों को स्थानीय रूप से अपलोड किया जा सके। :इस प्रस्ताव को फैबरिकेटर पर ले जाने के लिए सदस्यों से सहमति की आवश्यकता है। सदस्यों से इस प्रस्ताव के संबंध में राय देने का अनुरोध है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) * मैं विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड सक्षम किए जाने के प्रस्ताव का '''समर्थन''' करता हूँ, क्योंकि <nowiki>{{PD-India}}</nowiki> सामग्री कॉमन्स के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसी फ़ाइलों को स्थानीय रूप से अपलोड करने से OCR कार्य में सुविधा होगी। इसके साथ ही आवश्यक है कि अपलोड कार्य [[s:en:Wikisource:Copyright policy | Wikisource:Copyright policy]] जैसी अपलोड नीतियों के अनुरूप किया जाए, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों का भी स्थानीय अपलोड संभव हो सके। इसके लिए, मैं उचित उपयोग नीति भी समुदाय के समक्ष प्रस्तावित कर रहा हूँ। समुदाय चाहे तो [[s:en:Wikisource:Copyright policy#Fair_use|अंग्रेजी वाली नीति]] को ही अपनाया जा सकता है, जिससे फ़ेयर यूज़ फ़ाइलों के संबंध में सार्वभौमिकता को सुनिश्चित किया जा सके। आपकी टिप्पणियों का स्वागत है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:३९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) ;समर्थन: # {{समर्थन}} इस सुविधा की हिंदी विकिस्रोत को आवश्यकता है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:२९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # {{समर्थन}} विकिस्रोत पर स्थानीय अपलोड की सुविधा होनी चाहिए। कई ऐसी पुस्तकें हैं जिनके djvu फ़ाइल का आकार ज्यादा होने के कारण कॉमन्स पर अपलोड करने में असुविधा होती है। इसके साथ ही कई ऐसी फ़ाइलें हैं जो कॉमन्स पर गलत नाम से मौजूद हैं। ऐसी फ़ाइलों का नाम बदलवाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कई बार नाम बदल भी नहीं पाता है। स्थानीय अपलोड की सुविधा होने से चित्र वाले पृष्ठों का शोधन कार्य भी आसान होगा। —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०३:५८, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # {{समर्थन}} इस सुविधा से संपादन करना सुविधाजनक होगा।[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ;विरोध: ;तटस्थ: ;परिणाम: == संपर्क सूत्र निर्वाचन 2026 अक्तूबर के प्रस्तावित नियम पर मत दें == [[w:hi: विकिपीडिया:संपर्क सूत्र|विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर आगामी अक्तूबर में होने वाले संपर्क सूत्र के निर्वाचन के नियम प्रस्तावित किए गए हैं। पिछले वर्ष के निर्वाचन के दौरान हुई चर्चाओं के आधार पर प्रबंधक बैठक में चर्चा के उपरांत संशोधित नियम प्रस्तावित किए गए हैं। इनपर सदस्यों के मत का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ००:१२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) == विकिमीडिया हार्डवेयर डोनेशन प्रोग्राम में समर्थन हेतु निवेदन == नमस्ते विकिपीडियन साथियों, मैंने विकिमीडिया के हार्डवेयर डोनेशन प्रोग्राम में आवेदन किया है, यदि आपको मेरे द्वारा किए गए योगदान योग्य लगें, तो कृपया मेरे आवेदन का समर्थन (Endorse) करें। इस प्रक्रिया में समुदाय के सभी वरिष्ठ और साथी सदस्यों का समर्थन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। आवेदन का लिंक यहाँ है: [[meta:Hardware donation program/AMAN KUMAR|Hardware donation program/AMAN KUMAR]] आप सभी के समय और सहयोग के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:११, २७ अगस्त २०२६ (UTC) 0tnvi9fzlwr0awlxw633jhlpzr8fmpz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३८ 250 159711 674608 508937 2026-08-27T08:26:08Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674608 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" /></noinclude>४०६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय एक दूसरी शंका बम्बईके एक भाई पूछते हैं : यदि ढेढ़ और भंगी पढ़-लिख जायेंगे तो वे नौकरी करना अथवा व्यापारमें भाग लेना चाहेंगे। तब उनका काम कौन करेगा? इस पत्रमें दूसरे प्रश्न भी हैं किन्तु उनका उत्तर इस प्रश्नके उत्तरमें आ जाता है; इसलिए मैं उन्हें अलग नहीं देता। उक्त प्रश्न हम अस्पृश्यताको जिस रूपमें जानते हैं उसकी भयंकरता बताता है। अन्त्यजोंके साथ हम सामान्यतः जो बरताव करते हैं उनमें केवल द्वेष ही होता है। वे पढ़ें इसका अर्थ है वे भंगीका काम न करें, मुझे तो यह खयाल ही अनुचित लगता है, किन्तु इस खयाल के पीछे भी कारण हम ही हैं। हम भंगीके कामको नीचा मानते हैं; किन्तु ठीक सोचें तो यह तो सफाईका काम है और इसलिए पवित्र है। माँ अपने बच्चेका मैला उठाती है, इससे वह और भी अधिक पवित्र मानी जाती है। रोगीकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाली नर्स बदबूदार चीजोंको उठाती है किन्तु हम उसका सम्मान करते है। जो मनुष्य हमारे पाखानोंको साफ रखकर हमें तन्दुरुस्त रखने में मदद देता है हम उसका आदर क्यों न करें ? उसको नीचे गिराकर हम खुद नीचे गिरते हैं। जो दूसरोंको कुएँमें गिराता है वह स्वयं भी कुएँ में गिरता है। इसलिए हमें भंगी और उनकी जैसी अन्य जातियोंको नीचा समझनेका कोई अधिकार नहीं है। भोजा भगत मोची थे, फिर भी हम उनके भजनोंको बड़े आदरसे गाते हैं और उनको पूज्य भावसे देखते हैं। जो 'रामायण' पढ़ते हैं उनमें से ऐसा कौन होगा जिसके मनमें निषाद्की राम-भक्ति देखकर उसके प्रति आदरका भाव पैदा न हुआ हो ? फिर भंगी और उनकी जैसी अन्य जातियाँ अपने धन्धे छोड़ें तो हमारे लिए उनका विरोध करने या घबरानेका कोई कारण नहीं है। हम जबतक किसीसे भी जबरदस्ती कोई काम कराना चाहेंगे तबतक हम स्वराज्यके योग्य नहीं होंगे। हमें अपने-अपने पाखानोंको खूब साफ रखना सीख लेना चाहिए। हमें जब अपने पाखानोंको गन्दा रखने में शर्म मालूम होने लगेगी तब हम उन्हें वाचनालयकी तरह साफ रखेंगे। हमारे पाखा- नोंमें जो दुर्गन्ध या उससे उत्पन्न दूषित वायु रहती है वह हमारी सभ्यताको कलंकित करती है और यह बताती है कि हममें स्वास्थ्यके नियमोंका अज्ञान कितना गहरा है। हमारे पाखानोंकी खराब हालत अन्त्यजोंके प्रति हमारे दूषित दृष्टिकोणका प्रमाण है और हम जिन अनेक रोगों के शिकार होते हैं उनका कारण है। दूसरी जातियोंके संसर्गसे हम जाति-च्युत हो जायेंगे या भ्रष्ट हो जायेंगे, यह सोचना हमारी दुर्बलता- का सूचक है। हम जबतक संसारमें हैं तबतक दूसरोंका संसर्ग तो रहेगा ही। हमारे धर्मकी कसौटी यही है कि हम इस संसर्गके होनेपर भी निर्दोष रह सकें। भंगी और ऐसी अन्य जातियोंको स्वच्छता सिखाना, आगे बढ़ाना और उनका सम्मान करना दयाधर्म है । ऐसा करनेका अर्थ यह नहीं है कि हम उनके साथ खानपानका सम्बन्ध भी रखें; किन्तु यह तो आवश्यक है कि हम अपने हृदयके भावोंको शुद्ध करें।<noinclude></noinclude> px59xnmfufob6q7ftwfdclvuj9t1iuw 674610 674608 2026-08-27T08:32:41Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674610 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{C|'''एक दूसरी शंका'''}} बम्बईके एक भाई पूछते हैं : :'''यदि ढेढ़ और भंगी पढ़-लिख जायेंगे तो वे नौकरी करना अथवा व्यापारमें भाग लेना चाहेंगे। तब उनका काम कौन करेगा?''' इस पत्रमें दूसरे प्रश्न भी हैं किन्तु उनका उत्तर इस प्रश्नके उत्तरमें आ जाता है; इसलिए मैं उन्हें अलग नहीं देता। उक्त प्रश्न हम अस्पृश्यताको जिस रूपमें जानते हैं उसकी भयंकरता बताता है। अन्त्यजोंके साथ हम सामान्यतः जो बरताव करते हैं उनमें केवल द्वेष ही होता है। वे पढ़ें इसका अर्थ है वे भंगीका काम न करें, मुझे तो यह खयाल ही अनुचित लगता है, किन्तु इस खयालके पीछे भी कारण हम ही हैं। हम भंगीके कामको नीचा मानते हैं; किन्तु ठीक सोचें तो यह तो सफाईका काम है और इसलिए पवित्र है। माँ अपने बच्चेका मैला उठाती है, इससे वह और भी अधिक पवित्र मानी जाती है। रोगीकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाली नर्स बदबूदार चीजोंको उठाती है किन्तु हम उसका सम्मान करते है। जो मनुष्य हमारे पाखानोंको साफ रखकर हमें तन्दुरुस्त रखनेमें मदद देता है हम उसका आदर क्यों न करें? उसको नीचे गिराकर हम खुद नीचे गिरते हैं। जो दूसरोंको कुएँमें गिराता है वह स्वयं भी कुएँमें गिरता है। इसलिए हमें भंगी और उनकी जैसी अन्य जातियोंको नीचा समझनेका कोई अधिकार नहीं है। भोजा भगत मोची थे, फिर भी हम उनके भजनोंको बड़े आदरसे गाते हैं और उनको पूज्य भावसे देखते हैं। जो 'रामायण' पढ़ते हैं उनमें से ऐसा कौन होगा जिसके मनमें निषाद्की राम-भक्ति देखकर उसके प्रति आदरका भाव पैदा न हुआ हो? फिर भंगी और उनकी जैसी अन्य जातियाँ अपने धन्धे छोड़ें तो हमारे लिए उनका विरोध करने या घबरानेका कोई कारण नहीं है। हम जबतक किसीसे भी जबरदस्ती कोई काम कराना चाहेंगे तबतक हम स्वराज्यके योग्य नहीं होंगे। हमें अपने-अपने पाखानोंको खूब साफ रखना सीख लेना चाहिए। हमें जब अपने पाखानोंको गन्दा रखनेमें शर्म मालूम होने लगेगी तब हम उन्हें वाचनालयकी तरह साफ रखेंगे। हमारे पाखानोंमें जो दुर्गन्ध या उससे उत्पन्न दूषित वायु रहती है वह हमारी सभ्यताको कलंकित करती है और यह बताती है कि हममें स्वास्थ्यके नियमोंका अज्ञान कितना गहरा है। हमारे पाखानोंकी खराब हालत अन्त्यजोंके प्रति हमारे दूषित दृष्टिकोणका प्रमाण है और हम जिन अनेक रोगोंके शिकार होते हैं उनका कारण है। दूसरी जातियोंके संसर्गसे हम जाति-च्युत हो जायेंगे या भ्रष्ट हो जायेंगे, यह सोचना हमारी दुर्बलताका सूचक है। हम जबतक संसारमें हैं तबतक दूसरोंका संसर्ग तो रहेगा ही। हमारे धर्मकी कसौटी यही है कि हम इस संसर्गके होनेपर भी निर्दोष रह सकें। भंगी और ऐसी अन्य जातियोंको स्वच्छता सिखाना, आगे बढ़ाना और उनका सम्मान करना दयाधर्म है। ऐसा करनेका अर्थ यह नहीं है कि हम उनके साथ खानपानका सम्बन्ध भी रखें; 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किन्तु हमें अन्य लोगोंको भी विचार और कार्य, दोनोंकी उतनी ही स्वतन्त्रता देनी चाहिए जितनी हम अपने लिए चाहते हैं; और वयोवृद्धोंको तो विशेष रूपसे देनी चाहिए। {{C|'''मित्र रूपमें शत्रु'''}} 'प्रजामित्र' के सम्पादकको एक कार्ड मिला है, उसे मैंने पढ़ा है। पत्र अहमदाबादसे भेजा गया है। उसमें भेजनेवाले के दस्तखत तो हैं, किन्तु जगहका नाम नहीं है। दस्तखत एक मुसलमान भाईके हैं। उसकी भाषा यहाँ दी जाने योग्य, शिष्ट नहीं है। उसमें सम्पादकको मेरे विचारोंकी आलोचना करनेपर गालियाँ दी गई है। मुझे<noinclude></noinclude> b18wr5uwy4654v1nh8redv2t2jxxpwq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४० 250 159723 674612 508949 2026-08-27T08:47:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674612 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आशा है कि इस पत्रका लेखक, चाहे वह कोई भी हो और कहींका भी हो, मेरी इस टिप्पणीको देख लेगा। लेखकने दिखाई तो मित्रता है; किन्तु काम शत्रुताका किया है। इस तरह गालियाँ देकर या धमकियाँ देकर हम खिलाफत या स्वराज्यके आन्दोलनको गति नहीं दे सकते। यदि हम खिलाफत या स्वराज्यके आन्दोलनको गति देना चाहते हैं तो हमें सभ्यता और नम्रता सीखनी चाहिए। 'प्रजामित्र' के सम्पादक हमारे मतका चाहे जितना विरोध करें, इसमें उनको कुछ भी दोष कैसे दिया जा सकता है? यदि अखबारोंको आलोचनाका अधिकार न हो तो उनकी कोई कीमत नहीं रहती। सरकारने अखबारोंपर जो प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, जब हम उनको भी हटानेकी माँग करते है तब यदि लोग धमकाकर जो दबाव डालना चाहते हैं, उसे हम बरदाश्त कर सकेंगे? हम किसी भी मनुष्यके मतको या मनको प्रेमसे, तर्कसे और अपने उदाहरणसे बदलनेका प्रयत्न कर सकते हैं। हम किसीके भी मनको धमकियाँ देकर कभी नहीं बदल सकते। इसलिए प्रत्येक मनुष्यको और विशेष रूपसे असहयोगियोंको अपनी जीभको और अपने विचारोंको सुधारना चाहिए और उन्हें नरम बनाना चाहिए। जिसकी जीभपर खुदा या ईश्वरका नाम शोभित हुआ है, जिसके हृदयमें ईश्वरका वास रहा है, उसकी जीभपर या उसके हृदयमें मलिन भाव एक घड़ी या पल-भर भी कैसे टिक सकता है? जो व्यक्ति असहयोगियोंके दलमें मैली जीभ या मलिन हृदय लेकर प्रविष्ट होता है, वह मित्र होनेका दावा करनेपर भी राष्ट्रके और मेरे प्रति शत्रुका काम करता है। {{C|'''अस्पृश्यताकी मर्यादा'''<ref>यह टिप्पणी वसन्तराम शास्त्रीके इस सम्बन्धमें लिखे गये लेखके साथ दी गई थी।</ref>}} इस लेखके सम्बन्धमें मेरा एक शब्द भी लिखना आवश्यक नहीं है। शास्त्रीजीने अस्पृश्यताकी जो व्याख्या की है उस व्याख्याके विरुद्ध मैंने कुछ नहीं कहा। गन्दे लोगोंका स्पर्श करके हम सदा स्नान करते हैं। मैंने कठोर भाषाका जो प्रयोग किया है वह केवल इस प्रचलित अस्पृश्यताके विरुद्ध किया है जिसके मूलमें द्वेषके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। यदि शास्त्रीजीके जैसे विचार सभी वैष्णवोंके हों तो ऐसे वैष्णवोंसे तो मुझे कुछ भी कहनेकी जरूरत न होगी। {{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १७-७-१९२१|1em}} {{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude> klkezslt81uccwkrwqxrnrzderuisw2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४४१ 250 159732 674613 508958 2026-08-27T08:49:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674613 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" /></noinclude>&nbsp; {{C|{{larger|'''१९३. भाषण: बम्बईमें स्वदेशीपर'''<ref></ref>}}}} १७ जुलाई, १९२१ महात्मा गांधीने कहा : मैं इसके पहले भी मदनपुरा आ चुका हूँ। दो साल पहले मैं यहाँ आपका काम देखने आया था। लेकिन यह सभा एक बिलकुल दूसरे ही उद्देश्यसे बुलाई गई है। पिछली बार जब मैं यहाँ आया था, तब खिलाफतके सवाल- को लेकर कोई आशंका नहीं थी और हमें अपने शासकोंसे न्याय पानेका पक्का भरोसा था; क्योंकि ग्रेट ब्रिटनके प्रधान मन्त्रीने न्याय करने का वायदा किया था। लेकिन बाव- जूद उसके ब्रिटिश सरकारने मुसलमानोंको काफी नुकसान पहुँचाया। और अब जबतक मुसलमानोंकी शिकायतें दूर नहीं हो जाती तबतक हमारे दिमागको चैन नहीं मिल सकता। सरकारने पंजाबके साथ जो-कुछ किया है, उसको लेकर भी जनता बहुत चिन्तित है। भारतीय जनता जबतक अपने सैनिकोंको ब्रिटेन की ओरसे लड़नेके लिए विदेश जाने से नहीं रोक सकती तबतक यह नहीं कहा जा सकेगा कि असली ताकत जनताके हाथोंमें आ गई है। अब हमें एक शक्तिशाली अस्त्र मिल गया है, असहयोगका अस्त्र; और कांग्रेसने बड़े निश्चित शब्दोंमें बता दिया है कि इस दिशामें जनताको क्या करना चाहिए। लेकिन अभी जनताने इस दिशामें बहुत बड़े पैमानेपर पहल नहीं की है। लोगोंने अपने खिताब वापस नहीं किये हैं और उन्होंने स्कूलों या न्यायालयों- का त्याग नहीं किया है। इस तरह लोगोंने अपना फर्ज पूरा नहीं किया है। किन्तु फिर भी सरकारको प्रतिष्ठा गिरी है। लोग अब सरकारी खिताबोंको उतनी इज्जत- की नजरसे नहीं देखते; लोग कचहरियों में तो जाते हैं पर यह समझकर नहीं कि वे अच्छी हैं या वहाँ उनको न्याय मिल जायगा, बल्कि इसलिए कि वे उनके पतनकी निशानी हैं। बुनकरोंके सामने उनका फर्ज साफ है-- उनको स्वदेशी आन्दोलनकी भरसक सहायता करनी चाहिए। अगर बुनकर इस आन्दोलनमें हाथ बंटायें तो वे देशको फिरसे खुशहाल बना सकते हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि बुनकर लोग विदेशी सूत इस्तेमाल करते हैं। श्री गांधीने बुनकरोंसे कहा कि आपको विदेशी सूतका इस्तेमाल छोड़ देना चाहिए, सिर्फ स्वदेशी और हाथका कता सूत ही इस्तेमाल करना चाहिए। आपको महीन सूत ही नहीं हाथका कता मोटा सूत भी इस्तेमाल करना चाहिए। और किसी भी देशके बुनकर मिलका तैयार किया हुआ सूत इस्तेमाल नहीं करते। वे हाथका कता महीन सूत इस्तेमाल करते हैं, लेकिन साथ ही मोटा सूत भी इस्ते- । १. गांधीजीने वम्बईमें भायखला कांग्रेस कमेटीके तत्वावधानमें इतवारकी रातको मदनपुरामें बुनकरोंको एक सभा में भाषण किया था । Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> j09dz8ok2jz7npm2bemxci99r8nh1n4 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२५ 250 166701 674537 523328 2026-08-27T04:33:38Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674537 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''उन्नीस'''}}}} |- |१२४. || पत्र : एनी बेसेंटको (१८-९-१९२४) || १८५ |- |१२५. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्रयूजको (१८-९-१९२४) || १८५ |- |१२६. || पत्र : राधा गांधीको (१८-९-१९२४) || १८६ |- |१२७. || महादेव देसाईके साथ बातचीत (१८-९-१९२४) || १८७ |- |१२८. || तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (१८-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || १८९ |- |१२९. || तार (१८-९-१९२४ के पश्चात्) || १८९ |- |१३०. || ईश्वर एक है (१९-९-१९२४) || १९० |- |१३१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१९-९-१९२४) || १९३ |- |१३२. || पत्र : लक्ष्मीको (१९-९-१९२४) || १९३ |- |१३३. || शौकत अली से बातचीत (१९-९-१९२४) || १९४ |- |१३४. || तार : 'आउट लुक' को (१९-९-१९२४ या उसके पश्चात्) || १९८ |- |१३५. || टिप्पणियाँ: कताई में मासिक बढ़ती सभापतिकी तरफसे इनाम<br>(२०-९-१९२४) || १९८ |- |१३६. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (२०-९-१९२४) || २०० |- |१३७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२०-९-१९२४) || २०० |- |१३८. || टिप्पणी : निराश नहीं, असहाय (२१-९-१९२४) || २०१ |- |१३९. || आधे घंटेका अभ्यास (२१-९-१९२४) || २०२ |- |१४०. || उनके प्रति हमारा कर्त्तव्य (२१-९-१९२४) || २०४ |- |१४१. || धर्मके लिए "अधर्म" (२१-९-१९२४) || २०६ |- |१४२. || 'नवजीवन' के पाठकोंसे (२१-९-१९२४) || २०७ |- |१४३. || श्रद्धाकी परीक्षा (२१-९-१९२४) || २०७ |- |१४४. || पत्र : हरनाम सिंहको (२१-९-१९२४) || २०९ |- |१४५. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२१-९-१९२४) || २१० |- |१४६. || पत्र : देवदास गांधीको (२१-९-१९२४) || २१० |- |१४७. || पत्र : गंगाबह्न वैद्यको (२१-९-१९२४) || २११ |- |१४८. || पत्र : तुलसी मेहरको (२१-९-१९२४) || २११ |- |१४९. || उपवासकी कहानी (२२-९-१९२४) || २१२ |- |१५०. || टिप्पणी : पाठकोंको सूचना ( २२-९-१९२४) || २१६ |- |१५१. || तार : एस° श्रीनिवास आय्यंगारको (२२-९-१९२५) || २१७ |- |१५२. || पत्र : सरलादेवी चौधरानीको (२२-९-१९२४) || २१७ |- |१५३. || काम नहीं तो राय नहीं ( २३-९-१९२४) || २१७ |- |१५४. || तार : मु° रा° जयकरको (२३-९-१९२४) || २२० |- |१५५. || तार : कुम्भकोणम् कांग्रेस कमेटीको (२३-९-१९२४) || २२१ |- |१५६. || पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको (२३-९-१९२४) || २२१ |- |१५७. || पाठकोंसे (२४-९-१९२४) || २२२ |- |१५८. || पत्र : सरलादेवी चौधरानीको (२४-९-१९२४) || २२४ |<noinclude></noinclude> evvd35kzaa0ql9o0iuzckieic36llb7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२६ 250 166702 674538 523329 2026-08-27T04:34:24Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674538 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''बीस'''}}}} |- |१५९. || वक्तव्य : समाचारपत्रोंको (२४-९-१९२४) || २२४ |- |१६०. || टिप्पणियाँ: एक मित्रका निधन; अमानुषिक व्यवहार (२५-९-१९२४) || २२५ |- |१६१. || तार : घनश्यामदास बिड़लाको (२५-९-१९२४) || २२८ |- |१६२. || पत्र : मणिबन पटेलको (२६-९-१९२४) || २२८ |- |१६३. || हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी प्रस्तावका मसविदा (२७-९-१९२४) || २२९ |- |१६४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२७-९-१९२४) || २३० |- |१६५. || पत्र : नरहरि परीखको (२८-९-१९२४) || २३२ |- |१६६. || हृदय परिवर्तन (२९-९-१९२४) || २३२ |- |१६७. || पत्र : श्रीमती हॉजकिन्सनको (३०-९-१९२४) || २३३ |- |१६८. || सन्देश : 'गुणसुन्दरी' को (अक्तूबर १९२४) || २३३ |- |१६९. || सन्देश : एनी बेसेंट के जन्म-दिवसपर (१-१०-१९२४) || २३४ |- |१७०. || बम्बई के महिला शिष्टमण्डलको उत्तर (१-१०-१९२४) || २३५ |- |१७१. || क्या गुजरात हार जायेगा? (१-१०-१९२४) || २३५ |- |१७२. || सन्देश : अन्तर्राष्ट्रीय अफीम सम्मेलनको (२-१०-१९२४ से पूर्व) || २३६ |- |१७३. || भाई परमानन्द के सन्देशका उत्तर (२-१०-१९२४) || २३६ |- |१७४. || टिप्पणी : मैं मुसलमान क्यों नहीं होता (५-१०-१९२४) || २३७ |- |१७५. || पत्र : जमनादास गांधीको (५-१०-१९२४) || २३८ |- |१७६. || मेरा अवलम्ब (६-१०-१९२४) || २३८ |- |१७७. || पत्र : ना° मो° खरेको (७-१०-१९२४) || २३९ |- |१७८. || वक्तव्य : उपवास तोड़नेके पूर्व (८-१०-१९२४) || २४० |- |१७९. || तपकी महिमा (८-१०-१९२४) || २४१ |- |१८०. || तार : मथुरादास त्रिकमजीको (८-१०-१९२४) || २४१ |- |१८१. || पत्र : मुहम्मद अलीको (८-१०-१९२४) || २४२ |- |१८२. || सन्देश : 'स्टेट्समैन' को (९-१०-१९२४ से पूर्व) || २४२ |- |१८३. || सन्देश : अखबारोंको (९-१०-१९२४) || २४३ |- |१८४. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (११-१०-१९२४) || २४३ |- |१८५. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१४-१०-१९२४) || २४४ |- |१८६. || पत्र : स्वामी श्रद्धानन्दको (१४-१०-१९२४) || २४५ |- |१८७. || असहयोगीका कर्त्तव्य (१५-१०-१९२४) || २४५ |- |१८८. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१५-१०-१९२४) || २४६ |- |१८९. || एन्ड्र्यूजके साथ बातचीत (१५-१०-१९२४) || २४७ |- |१९०. || गंगाबहन वैद्यके लिए पुस्तकों के सम्बन्ध में टिप्पणी (१५-१०-१९२४ के<br>पश्चात्) || २५२ |- |१९१. || कताई सदस्यता (१६-१०-१९२४) || २५३ |- |१९२. || इलाहाबाद और जबलपुर (१६-१०-१९२४) || २५४ |- |१९३. || गुरुकुल कांगड़ी (१६-१०-१९२४) || २५४ |}<noinclude></noinclude> 54o5rere2b8k2l6lmopi5s75jo3j8d0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२८ 250 166703 674540 523330 2026-08-27T04:36:45Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674540 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''बाईस'''}}}} |- |२२९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२९-१०-१९२४) || २८६ |- |२३०. || सन्देश : संयुक्त प्रान्त राजनीतिक परिषद्, गोरखपुरको (३०-१०-१९२४) || २८७ |- |२३१. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३०-१०-१९२४) || २८८ |- |२३२. || पत्र : गंगावन वैद्यको (३०-१०-१९२४) || २९० |- |२३३. || पत्र : देवदास गांधीको (३०-१०-१९२४) || २९० |- |२३४. || पत्र: मणिबन पटेलको (३०-१०-१९२४) || २९१ |- |२३५. || दो दृश्य (३१-१०-१९२४) || २९१ |- |२३६. || हितोंका संघर्ष (३१-१०-१९२४) || २९३ |- |२३७. || सफलताकी कुंजी (३१-१०-१९२४) || २९६ |- |२३८. || सन्देश : गुजराती पत्रकारोंको (२-११-१९२४) || २९८ |- |२३९. || मेरा असन्तोष (२-११-१९२४) || २९९ |- |२४०. || टिप्पणी : गुजरात नहीं हारा (२-११-१९२४) || ३०० |- |२४१. || तार : चित्तरंजन दासको (२-११-१९२४) || ३०१ |- |२४२. || तार : घनश्यामदास बिड़लाको (२-११-१९२४) || ३०१ |- |२४३. || सन्देश : 'बंगाली' को || ३०२ |- |२४४. || पत्रः हिन्दी साहित्य सम्मेलनको (३-११-१९२४) || ३०२ |- |२४५. || तार : हिन्दी साहित्य सम्मेलनको (३-११-१९२४के पश्चात्) || ३०२ |- |२४६. || तार : जफर अली खाँको (५-११-१९२४ या उसके पश्चात्) || ३०३ |- |२४७. || समयकी पावन्दी (६-११-१९२४) || ३०३ |- |२४८. || टिप्पणी : अध्यक्षीय पुरस्कार (६-११-१९२४) || ३०४ |- |२४९. || केनियाकी शिकायत (६-११-१९२४) || ३०५ |- |२५०. || गांधीजी और स्वराज्यवादियोंका संयुक्त वक्तव्य (६-११-१९२४) || ३०७ |- |२५१. || भाषण : कलकत्ता नगर-निगम द्वारा दिये मानपत्रके उत्तरमें<br>(६-११-१९२४) || ३०८ |- |२५२. || भाषण : कलकत्ता के कताई-प्रदर्शनमें (६-११-१९२४) || ३१० |- |२५३. || अपरिवर्तनवादियोंके साथ बातचीत (७-११-१९२४) || ३१० |- |२५४. || भाषण : हावड़ा नगरपालिका द्वारा दिये मानपत्रके उत्तरमें<br>(७-११-१९२४) || ३१४ |- |२५५. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे (७-११-१९२४) || ३१५ |- |२५६. || समयका मूल्य (९-११-१९२४) || ३१६ |- |२५७. || पत्र : सतीश चन्द्र मुखर्जीको (९-११-१९२४) || ३१८ |- |२५८. || पत्र : कृष्टोदासको (९-११-१९२४) || ३१९ |- |२५९. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे (१०-११-१९२४) || ३१९ |- |२६०. || पत्र : मुहम्मद अलीको (११-११-१९२४) || ३२१ |- |२६१. || पत्र : फूलचन्द शाहको (११-११-१९२४) || ३२२ |- |२६२. || पत्र : लक्ष्मीको (११-११-१९२४) || ३२२ |- |२६३. || तार : बी° सुब्रह्मण्यमको (११-११-१९२४ के पश्चात्) || ३२३ |}<noinclude></noinclude> sv57t6n6uhmjyq1zu7xmhuuj174sden पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२७ 250 166704 674539 523331 2026-08-27T04:35:15Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674539 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''इक्कीस'''}}}} |- |१९४. || पत्र : वाइसरायके निजी सचिवको (१६-१०-१९२४) || २५४ |- |१९५. || ख्वाजा हसन निजामीके साथ बातचीत (१६-१०-१९२४ के आसपास) || २५५ |- |१९६. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१७-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २५७ |- |१९७. || तार : शाहजी अहमद अलीको (१७-१०-१९२५ या उसके पश्चात्) || २५७ |- |१९८. || तार : डा° बी° एस° मुंजेको (१७-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २५८ |- |१९९. || पत्र : एनी बेसेंटको (१८-१०-१९२४) || २५८ |- |२००. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१९-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २५९ |- |२०१. || तार : चित्तरंजन दासको (१९-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २५९ |- |२०२. || एक रास्ता (२०-१०-१९२४) || २५९ |- |२०३. || सन्देश : ट्रान्सवालके भारतीयोंको (२०-१०-१९२४) || २६१ |- |२०४. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्रयूजको (२०-१०-१९२४) || २६१ |- |२०५. || तार : पीलीभीत कांग्रेस कमेटी के मन्त्रीको (२०-१०-१९२४ या<br>उसके पश्चात्) || २६२ |- |२०६. || तार : मोतीलाल नेहरूको (२०-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २६२ |- |२०७. || तार : डा° बी° एस° मुंजेको (२१-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २६३ |- |२०८. || तार : अबुल कलाम आजादको (२१-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २६३ |- |२०९. || तार : मोतीलाल नेहरूको (२१-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २६३ |- |२१०. || तार : पीलीभीत कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीको (२१-१०-१९२४ या<br>उसके पश्चात्) || २६४ |- |२११. || तार : कोण्डा वेंकटप्पैयाको (२१-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २६४ |- |२१२. || जी० रामचन्द्रन् के साथ बातचीत (२१ व २२-१०-१९२४) || २६४ |- |२१३. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२२-१०-१९२४) || २७४ |- |२१४. || पत्र : डाह्याभाई एम° पटेलको (२२-१०-१९२४) || २७५ |- |२१५. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२२-१०-१९२४) || २७६ |- |२१६. || पत्र : ना° मो° खरेको (२२-१०-१९२४) || २७६ |- |२१७. || तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (२२-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २७७ |- |२१८. || प्रेमका नियम (२३-१०-१९२४) || २७७ |- |२१९. || तार : अबुल कलाम आजादको (२३-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २७९ |- |२२०. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२४-१०-१९२४) || २८० |- |२२१. || पत्र : सी° एफ° एन्ड्रयूजको (२५-१०-१९२४) || २८० |- |२२२. || हिन्दू और मुसलमान (२५-१०-१९२४) || २८१ |- |२२३. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२७-१०-१९२४) || २८२ |- |२२४. || पत्र : लाला लाजपतरायको (२७०,२८-१०-१९२४) || २८३ |- |२२५. || पत्र : देवदास गांधीको (२७-१०-१९२४) || २८४ |- |२२६. || तार : अब्दुल बारीको (२७-१०-१९२४ या उसके पश्चात्) || २८४ |- |२२७. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२८-१०-१९२४) || २८५ |- |२२८. || पत्र : लाला लाजपतरायको (२८-१०-१९२४) || २८६ |}<noinclude></noinclude> ffftitvrn88hxvtapwe4mgrnws5u73r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/२९ 250 166705 674541 523332 2026-08-27T04:38:03Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* शोधित */ 674541 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''तेईस'''}}}} |- |२६४. || पत्र : वी° एस° श्रीनिवास शास्त्रीको (१२-११-१९२४) || ३२३ |- |२६५. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१२-११-१९२४) || ३२४ |- |२६६. || पत्र : शुएब कुरैशीको (१२-११-१९२४) || ३२५ |- |२६७. || पत्र : लाला लाजपतरायको (१२-११-१९२४) || ३२६ |- |२६८. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१२-११-१९२४) || ३२८ |- |२६९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-११-१९२४) || ३२८ |- |२७०. || तार : अबुल कलाम आजादको (१२-११-१९२४ या उसके ) || ३२९ |- |२७१. || समझौता (१३-११-१९२४) || ३२९ |- |२७२. || समझौतेपर टिप्पणियाँ (१३-११-१९२४) || ३३४ |- |२७३. || टिप्पणियाँ : राष्ट्र ऋण; राष्ट्रीय क्षति (१३-१९२४) || ३३८ |- |२७४. || सम्मति : मॉडर्न स्कूलकी दर्शक-पुस्तिका में (१३-११-१९२४) || ३३९ |- |२७५. || पत्र : कर्नल मेलको (१३-११-१९२४) || ३४० |- |२७६. || पत्र : रोमाँ रोलाँको (१३-११-१९२४) || ३४१ |- |२७७. || भाषण : रामजस कालेज, दिल्लीमें (१३-११-१९२४) || ३४१ |- |२७८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-११-१९२४ के पश्चात्) || ३४३ |- |२७९. || सन्देश : 'वर्ल्ड टुमारो' को (१४-११-१९२४) || ३४३ |- |२८०. || पत्र : आर° शर्माको (१४-११-१९२४) || ३४४ |- |२८१. || पत्र : काका कालेलकरको (१४-११-१९२४) || ३४५ |- |२८२. || पत्र : चक्रवर्ती राजगोपालाचारीको (१५-११-१९२४) || ३४५ |- |२८३. || पत्र : जीवतराम बी° कृपलानीको (१५-११-१९२४) || ३४६ |- |२८४. || पत्र : स्वामीजीको (१५-११-१९२४) || ३४७ |- |२८५. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१६-११-१९२४) || ३४८ |- |२८६. || वक्तव्य : कोहाटके प्रश्नपर (१६-११-१९२४) || ३४८ |- |२८७. || सन्देश : तमिलनाड परिषद्, तिरुवन्नामलईको (१७-११-१९२४ से पूर्व) || ३४९ |- |२८८. || पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको (१७-११-१९२४) || ३५० |- |२८९. || पत्र : लाजपतरायको (१७-११-१९२४) || '३५१ |- |२९०. || पत्र : अमीरचन्द सी° बम्बवालको (१८-११-१९२४ से पूर्व) || ३५१ |- |२९१. || पत्र : कनिकाके राजाको (१८-११-१९२४) || ३५३ |- |२९२. || टिप्पणियाँ: बी-अम्माँ; स्वर्गीय पारसी रुस्तमजी; अन्धविश्वासपूर्ण<br>रिवाज; आगामी पंजाब सम्मेलन (२०-११-१९२४) || ३५४ |- |२९३. || कसौटीपर (२०-११-१९२४) || ३५७ |- |२९४. || सन्देश : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' को (२१-११-१९२४से पूर्व) || ३६० |- |२९५. || भाषण : कांग्रेस कार्य समितिको बैठकमें (२१-११-१९२४) || ३६१ |- |२९६. || भाषण : सर्वदलीय सम्मेलन, बम्बईमें (२१-११-१९२४) || ३६२ |- |२९७. || भाषण: सर्वदलीय सम्मेलन, बम्बईमें (२१-११-१९२४) || ३६४ |- |२९८. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे, (२१-११-१९२४) || ३६४ |}<noinclude></noinclude> e8s5gnjil6warrrbnymtvzyvcxz4qlm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५३९ 250 176051 674414 644658 2026-08-26T14:26:13Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674414 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||टिप्पणियाँ| ५०७}}</noinclude>{{rh|||}} कार्यक्रमको पूरा करनेमें ही लगा देना चाहिए। हमें प्रबलसे प्रबल उपद्रवकारी तत्त्वोंको भी काबू में करना चाहिए; तब हम शीघ्र ही स्वराज्य स्थापित कर सकते हैं। {{c|'''चिकित्सा शास्त्रके छात्रोंके बारेमें कुछ और'''}} मैं इस सप्ताह विशाखापट्टमके चिकित्सा शास्त्र के छात्रोंसे सम्बन्धित पत्र-व्यवहार प्रकाशित कर रहा हूँ। पत्र-व्यवहार लम्बा, पर साथ ही रोचक और शिक्षाप्रद भी है। इससे चिकित्सा अधिकारियोंकी और सरकारकी भी मनोवृत्तिका पता चल जाता है। छात्रोंको कालेजसे निकलनेके अन्तिम आदेश मद्रास सरकारकी सलाहपर या उसकी जानकारीमें दिये गये थे। पाठक इसमें देखेंगे कि पोशाक-सम्बन्धी नियमोंका कड़ाईसे पालन नहीं होता था और टोपियोंको काले रंगमें रँग देनेके बाद तो उनपर पाबन्दी लगाने का कोई कारण ही नहीं रह जाता था। किन्तु छात्रोंने खादी पहननेका जो साहस दिखाया, कालेज अधिकारियोंके क्रोधको भड़कानेके लिए वही काफी था।<ref>१. देखिए "टिप्पणियाँ", १७-११-१९२१ का उप-शीर्षक "बहादुर छात्र"।</ref>}} पाठक यह भी देखेंगे कि पोशाक-सम्बन्धी विनियम कितने अपमानजनक हैं। चोटी या गंजे सिरको, जो धर्म और सम्मानका सूचक है, ढकना जरूरी है क्योंकि इससे पाश्चात्य प्रोफेसरोंकी पाश्चात्य रुचिको ठेस पहुँचती है। छात्र हिन्दुस्तानी जूते पहनकर कालेजके अन्दर दाखिल नहीं हो सकते। उन्हें अंग्रेजी जूते पहनने होंगे या फिर नंगे पाँव रहना होगा। इस तरह छात्रोंको कच्ची उम्र में ही, जब उनके मस्तिष्क ग्रहणशील होते हैं, राष्ट्रीय वेशभूषाको त्यागनेकी शिक्षा दी जाती है। वस्तुतः देशी जूते हिन्दुस्तानकी जलवायु में अंग्रेजी जूतोंसे कहीं अच्छे होते हैं। उनके खुले होनेसे पैरोंको हवा लगती रहती है, और इसलिए वे सफाई और स्वास्थ्य की दृष्टिसे बेहतर होते हैं। मोजोंका उपयोग भारतकी गर्म जलवायुमें गँवारू और बिलकुल बेकार है। मोजे पहननेवालोंको मालूम है कि यहाँको आवहवामें उनके मोजोंसे कितनी बू आने लगती है। यदि हम गुलाम न होते तो इन सब हानिकारक और अनुचित नये तौर-तरीकोंको बिना किसी हिचकके तुरन्त दूर कर सकते थे। {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया''', २४-११-१९२१}}<noinclude>{{dhr|5em}} {{Smallrefs}}</noinclude> n8fssp0rpc4wx2ykw4o3pg982ggxzki पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३१ 250 182153 674621 628697 2026-08-27T11:03:18Z सीमा1 430 /* शोधित */ 674621 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{c|पच्चीस|}}</noinclude>{|width=100% |- |३६२. ||भाषण : वेरुलममें (१२-७-१९१४)||४५८ |- |३६३. ||भाषण : डर्बनकी सभायें (१२-७-१९१४)||४६१ |- |३६४. ||विदाई सन्देश (१२-७-१९१४)||४६३ |- |३६५. ||भाषण : जोहानिसबर्ग में (१३-७-१९१४)||४६३ |- |३६६. ||भाषण : विदाई भोजमें (१४-७-१९१४)||४६६ |- |३६७. || भेंट : 'ट्रान्सवाल लीडर' के प्रतिनिधिको (१४-७-१९१४)||४७० |- |३६८. ||पत्र : दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको (१५-७-१९१४ के पूर्व ) ||४७३ |- |३६९. ||श्रद्धांजलि : सत्याग्रही शहीदोंको (१५-७-१९१४)||४७७ |- |३७०. ||भाषण : ट्रान्सवाल भारतीय महिला संघ में (१५-७-१९१४)||४७९ |- |३७१. ||भाषण: मुसलमानोंकी सभायें (१५-७-१९१४)||४८० |- |३७२. ||भाषण : तमिल समाजकी सभा में (१५-७-१९१४)||४८५ |- |३७३. ||भाषण : प्रिटोरियामें (१६-७-१९१४)||४८८ |- |३७४. ||भाषण : गुजरातियों की सभा में (१६-७-१९१४)||४९० |- |३७५. ||कानूनी स्थिति (१८-७-१९१४ के पूर्व)||४९० |- |३७६. ||विदाईका पत्र (१८-७-१९१४)||४९३ |- |३७७. ||भाषण : केप टाउनके विदाई समारोहमें (१८-७-१९१४)||४९६ |- |३७८. || भेंट : ' केप आर्गस' के प्रतिनिधिको (१८-७-१९१४) || ४९८ |- |३७९. || धन्यवादका सन्देश (१८-७-१९१४) || ४९९ |- |३८०. || अन्तिम सत्याग्रह संघर्ष : भूमिका (२३-७-१९१४) || ४९९ |- |३८१. || अन्तिम सत्याग्रह संघर्ष : मेरे अनुभव (२३-७-१९१४ के बाद) || ५०१ |- |३८२. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२८-७-१९१४) || ५११ |- |३८३. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (२९-७-१९१४)|| ५१२ |- |३८४. ||पत्र : छगनलाल गांधीको (७-८-१९१४) || ५१३ |- |३८५. || भाषण : लन्दनके स्वागत समारोहमें (८-८-१९१४) || ५१४ |- |३८६. || पत्र: उपनिवेश-उपमन्त्रीको (१०-८-१९१४) || ५१७ |- |३८७. || एक गोपनीय गश्ती पत्र ( १३-८-१९१४) || ५१८ |- |३८८. ||पत्र : भारत-उपमन्त्रीको (१४-८-१९१४) || ५१९ |- |३८९. || पत्र : सी० राबर्ट्सको (२४-८-१९१४) || ५२० |- |३९०. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२६-८-१९१४) || ५२१ |- |३९१. || पत्र : मगनलाल गांधीको (३-९-१९१४) || ५२२ |- |३९२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-९-१९१४) || ५२३ |- |३९३. || पत्र : छगनलाल गांधीको (१९-९-१९१४) || ५२४ |- |३९४. || परिपत्र : प्रशिक्षण दलके सम्बन्धमें (२२-९-१९१४) || ५२५ |- |३९५. ||पत्र : डॉ० अब्दुर्रहमानको (१-१०-१९१४) || ५२६ |- |३९६. || भाषण : इंडियन फील्ड एम्बुलेन्स कोरके सामने (१-१०-१९१४) || ५२७ |- |३९७. || पत्र : कर्नल आर० जे० बेकरको (१३-१०-१९१४) || ५२८ |- |३९८. || प्रस्ताव (१३-१०-१९१४) || ५३० |- |}<noinclude></noinclude> eykrmilp0iyh20ibp9nfu0lz0zell95 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/३२ 250 182154 674622 628698 2026-08-27T11:28:13Z सीमा1 430 674622 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="प्रथम 07" />{{c|छब्बीस|}}</noinclude>{|width=100% |- |३९९. || पत्र : कर्नल आर० जे० बेकरको (१४-१०-१९१४) || ५३० |- |४००. || पत्र : सी० राबर्ट्सको (१६-१०-१९१४)|| ५३२ |- |४०१. || जे० ई० ऐंड्रयूजको लिखे पत्रका अंश (२०-१०-१९१४) || ५३४ |- |४०२. ||पत्र : सी० राबर्ट्सको (२२-१०-१९१४) || ५३४ |- |४०३. || पत्र : सी० राबर्ट्सको (२५-१०-१९१४) || ५३५ |- |४०४. ||पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-१०-१९१४) || ५३७ |- |४०५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२५-१०-१९१४) || ५३८ |- |४०६. ||पत्र : छगनलाल गांधीको (३१-१०-१९१४) || ५३९ |- |४०७. ||पत्र : 'इंडिया' को (४-११-१९१४) || ५३९ |- |४०८. || एक परिपत्र (४-११-१९१४) || ५४० |- |४०९. || पत्र: छगनलाल गांधीको (५-११-१९१४) || ५४१ |- |४१०. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (६-११-१९१४) || ५४२ |- |४११. || पत्र : मगनलाल गांधीको ( ६-११-१९१४) || ५४२ |- |४१२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४३ |- |४१३. || पत्र : जमनादास गांधीको (१३-११-१९१४) || ५४४ |- |४१४. || पत्र : प्रागजी देसाईको (१५-११-१९१४) || ५४५ |- |४१५. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२०-११-१९१४) || ५४७ |- |४१६. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (२६-११-१९१४) || ५४९ |- |४१७. || पत्र : मगनलाल गांधीको (४-१२-१९१४) || ५५० |- |४१८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१०-१२-१९१४) || ५५१ |- |४१९. || पत्र : छगनलाल गांधीको (१०-१२-१९१४ के आसपास) || ५५३ |- |४२०. || हिसाब : भारतीय आहत सहायक दलका (१८-१२-१९१४) || ५५४ |- |४२१. || भेंट : रायटरके प्रतिनिधिको (१८-१२-१९१४) || ५५५ |- |४२२. || भाषण : लन्दनके विदाई समारोहमें (१८-१२-१९१४) || ५५५ |- |४२३. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२३-१२-१९१४) || ५५७ |- |४२४. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२३-१२-१९१४) || ५५८ | || परिशिष्ट || |- | || {{Gap}}१. सलै निर्णयका पूरा पाठ (२१-६-१९१३) || ५५५ |- | || {{Gap}}२. प्रस्ताव : फ्रीडडॉपैकी सार्वजनिक सभामें (३०-३-१९१३)|| ५७९ |- | || {{Gap}}३. गृह मंत्रीका तार (१५-४-१९१३) || ५७९ |- | || {{Gap}}४. अ० मु० काछलियाका भाषण (२७-४-१९१३)|| ५७९ |- | || {{Gap}}५. अहिंसा परमोद्धर्मः—एक सत्य था सनक || ५७९ |- | || {{Gap}}२. अहिंसा परमोद्धर्मः—एक सत्य था सनक || ५७९ |- | || {{Gap}}२. अहिंसा परमोद्धर्मः—एक सत्य था सनक || ५७९ |- | || {{Gap}}२. अहिंसा परमोद्धर्मः—एक सत्य था सनक || ५७९ |} . (१) गृह-मंत्रीका तार (२९-५-१९१३ ) (२) उपनिवेश कार्यालयको गवर्नर-जनरलका तार (२९-५-१९१३ ) ६. प्रवास-नियमन विधेयक और अधिनियमका मसंविदा (२८-६-१९१३) ७. प्रवासी अधिनियमके विनियम (२६-७-१९१३) ८. ६० एम० जॉर्जेसका पत्र ( १९-८-१९१३ ) ५५९ ५६१ ५६२ ५६३ ५६४ ५६५ ५६६ ५७३ ५७७ ९. उपनिवेश कार्यालयको भेजे गये गवर्नर-जनरलके खरीतेका अंश (२३-१०-१९१३) ५७९<noinclude></noinclude> ct6clfl3x10sschdunm34x42gprjjxs पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/६९६ 250 182161 674529 628705 2026-08-27T01:56:46Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 674529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>________________ {{C|'''शीर्षक सांकेतिका'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} अन्त, ४३८-३९ अन्तिम सत्याग्रह संघर्ष : भूमिका, ४९९-५००; -मेरे अनुभव, ५०१-१० अपील- निकाय किसलिये ? २०० अमर-पुरुष हरवतसिंह, ३१६ आँगलियाकी गवाही, ३४७-४८ आयोगकी रिपोर्ट और सिफारिश, ३८८-९१ आयोगकी रिपोर्ट के बारेमें विचार, ३८१-८२ आरोग्यके सम्बन्ध में सामान्य ज्ञान [१४], ४०६६ [१५], २१-२४; [-१६], ३७०३९; [-१७], ४४-५०१ [१८], ६०-६२; [१९], ६५-६७९ [२०], ७१-७३ [२१], ७८-७९ [२२], ९३-९५ [२३], ९८-१००; [२४], १०६-८; [२५], १११-१३; [-२६], ११४-१५; [२७], १२४-२६; [-२८], १३०-३२ [२९], १३६- ३८ [-३०], १४३-४४ [३१], १४६-४७; [-३२], १४९-५३३ [ ३३], १५६; [-३४], १५७०५९ इसे कैसे किया जाये ? १८९ एक अधिकृत वक्तव्य, २३२-३४ एक ऐतिहासिक वहस, ४२१-२२ एक गोपनीय गश्ती पत्र, ५१८ एक तरुण महिला सत्याग्रहीकी असामयिक मृत्यु, ३५२ एक परिपत्र, ५४० ४१ एक महत्वपूर्ण सलाह, ३१८ और भी मित्र चल बसे, १७१ कस्तूरबा गांधी से बातचीत, ३० [ श्री ] काछलियाका पत्र, १८६०८८ कानूनी स्थिति, ४९०-९२ कुलसम बीबीका मुकदमा, २३५०३६ [ श्री ] गांधी लगभग गिरफ्तार ! २०६०७ गृह मन्त्री के साथ बातचीत के लिए मुद्दे, ४२५ जनरल स्मटससे भेंट, ३१८-२१ जनूबीका मामला, १८-१९ जमानतको दर्खास्त, २५३ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जोहानिसबर्ग में उपद्रव, १२७.२९ डंडीमें मुकदमा, २५५०५७ तार : अखबारोंको, २४०, कैलरेको, ४१; - गवर्नर- जनरलको, १०८; -गुल और गुलमुहम्मदको, '५०१ -गृह-मन्त्रीको, ७, ८, २६-२७, ८२, ८४-८५, ८७-८८, ९७, २४७, २४८, २५२-५३, २८८-८९, २९७-९८, ४००, ४०९, ४०३, ४०५, ४०६; -गृह-सचिवको १५४, १७६३ -गो० कृ० गोखलेको, ११३-१४, १४५, २३६, २३७, २५०, २५१, २७७-७८, २८१-८२, २८२-८३, २८६-८७, २८७, २८९, २९०-९१, २९१, २९१-९२, २९५, २९५०९६, २९८, २९९-३०२, ३०४, ३०७, ३०९, ३१०, ३१०० ११, ३११, ३२४, ३२६, ३३१, ३३३, ३४८, ३४९, ३५०, ३५६, ४३३; -जनरल बोयाको, ३४०६ - जी० ए० नटेसनको, २४४; -ड्रमंड चैपलिन और दूसरोंको, ५२,८०९ पैट्रिक डंकनको, ८१-८२१ - ब्रिटिश भारतीय संघको १०३ - मॉरिस अलेक्जेंडर को, ८५-८६; -मार्शल कैम्बेलको, ८१३ -लॉर्ड ऍम्टहिलको, ५३-५४, २८३-८४, ८५, ८७-८८; श्राइनर और कैम्बेलको, ८३-८४, -सर Nifty इंटरको, ८३३ -सिनेटर श्राइनरको, ८६, ८६-८७६ –'हिन्दू' को, ४३२-३३ तीन पौंडी कर, १९८-९९, २००-२ -सम्बन्धी निराशा, ४१-४२ तूफानका संकेत, २-३ देश निकाला किन्हें होगा ? ३३६ द्वितीय वाचन, ७०-७१ धन्यवादका सन्देश, ४९९ नया और पुराना विधेयक, १६-१८ नया प्रवासी विधेयक, १३५ नया विधेयक, १३, ३५ नये. कानूनका एक असर, १५५ नये विधेयक, ४३.४४ नाबालिगों के अधिकार, ३४३-४४<noinclude></noinclude> syiiest0n5hz408d931vdt82zrxu2vt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf/६९७ 250 182162 674530 628706 2026-08-27T02:01:57Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 674530 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||शीर्षक सांकेतिका| ६५७}} {{Multicol|line=1px solid black}} नेटाली भारतीयो, सावधान ! ३३ नेताओंसे अपील, ३३९-४० न्याय-सचिवको लिखे पत्रका सारांश, २४९ पत्र : ऑलिव ढोकको, २२९, 'इंडिया' को ५३९- ४०१ - इंडियन ओपिनियन' को, ३१४-३१५, ३८२-८३३ -३० एफ० सी० लेनको, ८-९, ३९५० ९६६ - ६० एम० जार्जेसको, ३९४-९५, ४१७, ४२५-२६, ४२९-३०, ४३३-३४; -उपनिवेश- उपमन्त्रीको, ५१७-१८१-ए० एच० वेस्टको ५४७- ४८, ५५७०५८, -एच० एस० एल० पोलकको, १४५-४६; - एशियाई पंजीयकको, १२, १४२-४३, १७३३ -कर्नल भार० जे० बेकरको, ५२८-२९, ५३०-३१; -कुँवरजी मेहताको, ४२११ -कुमारी देवी वेस्टको, २६२-६४, क्लीमेंट डोकको, २०२; - खुशालचन्द गांधीको, ३५८-५९६ गवर्नर- जनरलके निजी सचिवको, १०, ५५-५६३ - गिर- मिटिया भारतीयोंको, ४२३; -गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको, ११५-१८१ -गृह- मन्त्रीको, १-२, २४१-४२, २७१.७४; -गृह-सचिवको, ११-१२, २५-२६, २८-२९, ६२-६३, ७४-७५, ७५० ७६, ११८-२१, १२३, १६६०६८, १७६-७७, १७७-८०, १९४-९५, २०७०८, ३२१-२३; -गो० कृ० गोखलेको, ३९-४०, १००-२, १०९- ११, १३२-३३, २४८, ३५४-५५, ३९२-९३, ४०४, ४१३, ४३०, ५४२, ५४९; -छगन- लाल गांधीको, ३७३-७६, ५११-१२, ५१३, ५२४, ५३९, ५४१-४२, ५५३, -जमनादास गांधीको, ८८.९०, १२१-२३, १३९-४१, १४७.४९, ३५२-५३, ३५६, ३७९- ८१, ३८५.८६, ५४४-४५ - जेल निदेशकको, २३१; - 'ट्रान्सवाल लीडर' को, २१२-१४, ४०७; -डा० अब्दुर्रहमानको, ५२६, डमंड चैपलिनको, २९-३०, ६९; -दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको, ४७३-७७६ - दक्षिण आफ्रिकी रेलवेको, २०४-५ देवदास गांधीको, ३६६-६७९ - नेटाल ऐडवर्टाइ- जर' को, २७९-८०३ नेटाल मर्क्युरी' को, १९१-९४, २८५-८६, ३०५-०६३ - प्रवासी अधिकारीको, १५४; -प्रागजी देसाईको ५४५- ४७८ - सर बेंजामिन राबर्टसनको, ३६४-६५, १२-४२ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ३६७-६८६ - भवानीदयालको, ६८, १४१-४२, ३२६; -भारत उपमन्त्रीको, ५१९; -भारतीय परिवेदना आयोगको, ३३१३ -भारतीयोंको, २५४- ५५१ - मगनलाल गांधीको, २०३-०४, २१०, २१४-१५, २२८, २३०, २४३, २५८-५९, ३७१-७२, ५२१, ५२२, ५२२-२४, ५३७-३८, ५३८-३९, ५४२-४३, ५४३-४४, ५५०-५२, -मणिलाल गांधीको, १५९-६०, १८५-८६, ३१२-१३, ३३५, ३५२-५४, ३५७-५८, ३६६, ३७८-७९, ३८३, ३८६-८७, ३९३, ३९६- ९८, ३९८-९९, ४११६ -महात्मा मुन्शीरामको, ३९१-९२१ - मार्शल कैम्बेलको, २९२-९३, ३०८- ९, ४२२१ - रावजीभाई पटेलको, ३२३-२४, ३४६-४७, ३४९-५०, ३५०-५१, ३५९-६०, ३६८-७१, ३८४-८५, ४१५-१६ ४१८-१९, ५१२-१३; - सहायक गृह-सचिवको, १७३-७४; -सी० एफ० ऐन्ड्रयूजको, ३७६-७८६ -सी० राबट्र्सको, ५२०, ५३२-३३, ५३४-३५, ५३५० ३७९ - हरिलाल गांधीको, १८३-८५, २३४, ३६१-६३ पत्रका अंश, ३६१, ३८७, ४००-०१, ४१३-१४; - प्रवासी अधिकारीको, २४९; -मणिलाल गांधोको, १८२६ - मणिलाल और जमनादास गांधीको, ४१९-२० जे० ई० ऐन्ड्यूजको, ५३४ परिपत्र : प्रशिक्षण दलके सम्बन्धमें, ५२५-२६ [ श्रीमती ] पैंकहर्स्टका त्याग, ३६ पोलकके मुकदमे में गवाही, २६१ प्रवासके महत्वपूर्ण मामले, ३४१-४२ प्रवासी अधिनियम, ३३७-३८ प्रवासी कानून सम्बन्धी विनियम, १३३-३५ प्रवासी विधेयक, ३१-३२ प्रस्ताव, ५३० प्रस्ताव: पाटीदार संघकी सभा, २२९ फोक्सर स्टके सत्याग्रही, १९६-९७ फोक्सर स्टमें मुकदमा, २५९-६० भाषण : इंडियन फील्ड एम्बूलेन्स कोरके सामने, ५२७- २८९ - किम्बर्लेके स्वागत समारोह में, ४३१; - केपटाउनके विदाई समारोहमें, ४९६-९८; केप टाउनके स्वागत समारोह में, ३९१; -खेलकूद समारोह में, ४४६ ४९१ - गुजराती सभाके उत्सवमें,<noinclude></noinclude> 68b2hr98fwpx9cdtxuc8hyk8bw6fik6 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६३ 250 183112 674373 673053 2026-08-26T12:18:35Z सीमा1 430 674373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh||परिशिष्ट|५२५}}</noinclude>और इसमें कोई सन्देह नहीं कि केप और नेटाल दोनों ही प्रान्तों के प्रवासी अधिकारियों ने अपनी मनमानी से कई निर्दोष व्यक्तियों को बड़ा कष्ट पहुँचाया है। केप के भारतीयों का सुझाव है कि प्रान्त के प्रवासी कानूनों में रद्दोबदल करते समय प्रवासी अधिकारी के ऊपर एक प्रवासी बोर्ड बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए और उसमें भारतीयों को प्रभावपूर्ण प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। ५. परवाना कानूनों से भारतीय व्यापारी और फेरीवाले बड़ी मुसीबत में पड़ गये है। तटवर्ती प्रान्तों के परवाना-अधिकारियों ने कई विचित्र-से कारणों का बहाना लेकर, और कभी-कभी तो बिना किसी कारण के ही, भारतीय व्यापारियों को “उखाड़ने" की नीति अपना ली है। केपमें सैकड़ों भारतीय फेरीवाले बरबाद हो चुके हैं, और जिनमें वे काम करते थे, ऐसी सैकड़ों फर्मों बन्द हो चुकी हैं। नेटाल में १९०९ के संशोधन कानून से भारतीय समाज पर होनेवाले पहले के घोर अन्याय को रोकने में निःसन्देह ही काफी सहायता मिली, लेकिन अब परवाना अधिकारी परवानादारों को उनकी जीविका से वंचित करने के अन्य तरीके निकाल रहे हैं । जिन भारतीय व्यापारियों ने ऋणदाताओं से कोई करार कर रखा है, वे तो व्यापार चालू रहने पर ही उन करारों की पूर्ति कर सकते थे, लेकिन उन्हें परवाना देने से इनकार कर दिया गया है । यदि भारतीय व्यापारी अपना कारोबार किसी दूसरी दूकान में ले जाना चाहता है, तो उसके परवाने पर स्थानान्तरण के लिए आवश्यक पृष्ठांकन करने से इनकार कर दिया जाता है और यदि वह अपने कारोबार में किसी को साझेदार बनाना चाहता है तो परवाना अधिकारी उसे, इसकी भी इजाजत नहीं देते । यदि वह अपना कारोबार अपने पुत्र को सौंपना चाहता है तो उसकी इजाजत नहीं दी जाती और कोशिश यह होती है कि परवाना जिसके नामपर है, उसके जीवन काल तक ही परवाने की अवधि सीमित कर दी जाये, जिससे कि पुत्र अपने पिता के कारोबार का उत्तराधिकारी न हो सके । परवाना दूसरों के नाम पर भी करवाना, यहाँतक कि उपनिवेश में जन्मे किसी भारतीय के नाम पर करवाना भी लगभग असम्भव है । यदि इसी प्रकार उनकी उन्नति के रास्ते एकके बाद एक बन्द होते रहे, जैसा कि दिख रहा है, तो वास्तव में यह कहना कठिन है कि उपनिवेशमें जन्मे भारतीयों का भविष्य क्या होगा । केप और नेटाल के भारतीयों का मत है कि अब निवासी भारतीय समाज की संख्या में आगे कोई वृद्धि होनेकी सम्भावना नहीं है; इसे देखते हुए भारतीय व्यापारपर लगे ये प्रतिबन्ध शीघ्र ही हटाये जाने चाहिए । परन्तु इसके विपरीत श्री जी० एच० ह्यूलेट ने, जैसा कि उन्होंने खुद ही स्वीकार किया है, भारतीय व्यापारी समाज को इस मान्यताके कारण कि भारत-सरकार द्वारा गिरमिटिया मजदूरों का भेजाजाना बन्द किये जानेमें उनका हाथ रहा है, दण्डित करनेके उद्देश्यसे हाल ही में नेटाल प्रान्तीय परिषद्में एक प्रस्ताव पास कराया है, जिसमें यह माँग की गई है कि सम्बन्धित कामकाज, जिसके बारेमें अभी केवल संघ-संसद ही कानून बनाती है, उसके बजाय परिषद्को सौंप दिया जाये । नेटालके भारतीयोंने ऐसी हर कार्रवाईका जोरदार विरोध किया है । उनका यह विरोध दक्षिण आफ्रिका अधिनियमके खण्ड १४७ की लागू व्यवस्थाओंपर आधारित है । मैं मन्त्री श्री हरकोर्टकी और अधिक जानकारीके लिए इस सम्बन्धमें नेटाल भारतीय कांग्रेसमें हुई बहस और प्रस्तावकी एक प्रति इसके साथ नत्थी कर रहा हूँ । ६. भूतपूर्व गिरमिटिया भारतीय पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों पर तीन पौंडी वार्षिक कर लगने के कारण दक्षिण आफ्रिकाके समूचे भारतीय समाजमें बड़ी कटुता फैल गई है, विशेषकर स्त्रियों और बच्चों पर कर लगनेसे उनमें क्षोभ है। इससे भारतीय समाजकी भावनाओं को बड़ी ठेस लगी है। उनका कहना है कि कमसे-कम स्त्रियों और बच्चोंको तो इस करसे विमुक्त रखकर उन्हें ऐसे करों से उत्पन्न होनेवाली बुराइयों से बचाना चाहिए । १९१० के संशोधन अधिनियम से परिस्थितिमें बहुत ही थोड़ा सुधार हुआ है । कुछ मजिस्ट्रेट तो कभी-कभी कुछ व्यक्तियों को पूरी छूट दे देते हैं, कुछ मजिस्ट्रेट एक निश्चित अवधि के लिए कुछ व्यक्तियोंको अस्थायी तौरपर विमुक्त कर देते हैं, परन्तु कुछ मजिस्ट्रेट ऐसे भी हैं जो बिलकुल छूट नहीं देते; किन्तु मेहरबानीके तौरपर करकी अदायगीके लिए बहुत थोड़ा-सा समय दे देते हैं<noinclude></noinclude> o6tjqzbqb2ot11jm8ok2hzk3omj3zat पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६४ 250 183113 674374 673054 2026-08-26T12:19:16Z सीमा1 430 674374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और फिर अदायगी नहीं पानेपर दुर्भाग्यकी मारी स्त्रियोंको सपरिश्रम कारावासकी सजा दे देते हैं। इस प्रकारकी जबरन वसूलीसे अनिवार्यत: पैदा होनेवाली आर्थिक और सामाजिक बुराइयोंको अधिक विस्तारसे पेश करना मैं अनावश्यक समझता हूँ। ७. मन्त्री श्री हरकोर्टने दक्षिण आफ्रिका संघके गवर्नर-जनरलको जो खरीते भेजे थे, उनको पढ़कर केप और नेटालके भारतीयोंको बड़ा सन्तोष हुआ था । उपनिवेश मन्त्रीने उनमें कहा था कि ट्रान्सवालके विवादके सम्बन्धमें जो भी समझौता किया जाये, उसमें केप और नेटालके भारतीयोंके अधिकारों और सुविधाओंको कम नहीं होने देना चाहिए । पर दुर्भाग्य की बात है कि पिछले सत्रके दौरान संसद में जो विधेयक पेश किया गया, उसका भारतीय हितोंपर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था; और अगले वर्ष पेश होनेवाले विधेयकके बारेमें भी बड़ी आशंका यह है कि उसमें सभी आवश्यक रक्षोपाय सम्मिलित नहीं किये जायेंगे। निवेदन है कि वर्तमान नेटाल कानूनमें जैसा किया ही गया है, संविहित अधिवासकी स्पष्ट परिभाषा की जानी चाहिए, मौजूदा परीक्षाओंको अधिक सख्त नहीं बनाना चाहिए और भारतसे मुनीम तथा अन्य विश्वस्त सहायक लानेका भारतीय व्यापारियोंका मौजूदा अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए । मुझे अधिकार देकर यह अनुरोध करनेकेलिए विशेष रूपसे हिदायत दी गई है कि उपनिवेश-मन्त्री इन प्रान्तोंके भारतीय निवासियोंको गम्भीर हानि और अन्यायसे बचानेके लिए प्रत्येक प्रस्तावित प्रवासी विधानकी बड़ी सावधानीसे छानबीन करें। ८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीयोंकी शिकायतोंके दो बड़े कारण है । पहला तो यह कि दक्षिण आफ्रिका अधिनियमके खण्ड १४७ में सम्मिलित संरक्षणके उपायोंके प्रयोजनको निष्फल बनानेके लिए ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं, जो हैं तो एशियाई-विरोधी, पर जिनकी भाषा ऐसी रखी जाती है जिससे ऐसा लगे कि वे सर्वसामान्य रूपसे सभी लोगोंपर लागू होते हैं। दूसरा यह कि विधान विशेष तो चाहे स्वीकार्य हो लेकिन उसके अन्तर्गत बनाये गये विनियम ऐसे होते हैं जिनमें बहुधा जातीय भेदभावको अत्यन्त आपत्ति-जनक व्यवस्थाओं का समावेश रहता है और ये विनियम बहुधा मंजूरीके लिए संसदमें पेश नहीं किये जाते । ९. लगता है कि मैंने दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके कष्टोंके बारेमें पहले कही बातोंको ही काफी हद तक दोहराया है। लेकिन साम्राज्य-सम्मेलनमें स्वशासित उपनिवेशोंके (डोमीनियन्सके) भारतीय निवासियोंके साथ होनेवाले बरतावसे सम्बन्धित चर्चाका दिन निकट आ रहा है और चूँकि उपनिवेश-मन्त्रीके साथ मैं परिस्थितिके बारेमें व्यक्तिगत रूपसे बातचीत नहीं कर सकूँगा इसलिए मैंने सोचा कि यह ज्यादा अच्छा रहेगा कि कोई भी तत्सम्बन्धी मामला ऐसा न रह पाये जिसका पर्याप्त निरूपण न हुआ हो, फिर चाहे कुछ बातोंको दोहराना ही पड़ जाये । मन्त्री श्री हरकोर्ट, प्राप्त जानकारीके अतिरिक्त यदि कोई और ऐसी जानकारी चाहें, जो में उन्हें दे सकता हूँ, तो मैं बड़ी खुशीसे उनकी सेवांके लिए तैयार रहूँगा । {{right|आपका}} {{right|एच० एस० एल० पोलक}} :[ अंग्रेजीसे ] :कलोनियल ऑफिस रेकर्डस; सी० ओ० ५५१/२२ ।<noinclude></noinclude> 897cw0ioksdcbopfja17dx5tpo6lho5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६६ 250 184109 674520 673058 2026-08-26T20:17:30Z सीमा1 430 674520 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{gap}}इस वर्ष में कुल मिलाकर १९५५ मौतें हुईं। गत वर्षकी संख्यासे यह संख्या २६८ अधिक है ।इन मौतोंके मुख्य कारण थे : २४९ को पेचिश हुई थी, १८९ को फेफड़ोंका क्षय-रोग, १३३ को खाँसी इत्यादि और २८३ को निमोनिया। इस वर्ष २४ आत्महत्याएँ हुई; यह गत वर्षकी संख्यासे १० कम है। २४ आत्महत्याएँ बहुत बड़ी संख्या है---इनका कारण क्या था सो एक रहस्य है; संरक्षक इसके बारेमें बिलकुल चुप हैं। पेचिश, क्षयरोग और निमोनियाके कारण इतनी बड़ी संख्यामें मौतें हो जानेपर अधिकारियोंका ध्यान जाना चाहिए। 'फ्री इंडियन्स' में २२.१५ प्रतिशत के हिसाबसे होनेवाली मौतोंका कारण वह बतलाया जाता है कि गिरमिटिया माता-पिताओंके सभी बच्चोंको 'फ्री' श्रेणीमें रख दिया गया था। इस वर्ष भारतीय बच्चों की मौतोंका अनुपात २२.३३ प्रतिशत पहुँच गया है, जब कि गत वर्षकी रिपोर्ट में यह अनुपात बहुत ही कम अर्थात् ६.५६ प्रतिशत ही बताया गया था। संरक्षकके विचारसे बच्चोंकी मृत्यु-संख्यामें इस वृद्धिका कारण, सम्भवतः, कुछ हद तक यह है कि सालके पिछले छः महीने मौसम खराब रहा था । हम नहीं समझते कि मौसम इतना ज्यादा खराब था कि मृत्यु-संख्याका औसत इतना बढ़ जाये । सुना था कि बच्चोंकी बढ़ी हुई मृत्यु-संख्यापर “विचार किया जा रहा है", और हम यह समझ रहे थे कि संरक्षक महोदय इसकी कोई माकूल वजह बतलायेंगे । संरक्षकका कथन है कि स्पष्ट ही मजदूरीकी दरें बढ़ रही हैं । निःसन्देह यह बात केवल उन भारतीयोंकी मजदूरीके बारेमें कही गई है, जिन्होंने फिरसे गिरमिटिया बनना स्वीकार किया है। इस बात का कोई आभास नहीं दिया गया था कि पहले-पहले गिरमिट स्वीकार करनेवालोंकी मजदूरी बढ़ाई जानेवाली है या नहीं । अतएव, १५,११४ और आदमियोंके लिए प्रार्थनापत्र आये थे । संरक्षकको आशा है कि दुबारा गिरमिट लेनेवालोंकी औसत-संख्यामें वृद्धि होनेके फलस्वरूप १९११ के अन्तमें सम्भवतः गिरमिटियोंकी संख्या उतनी ही हो जायेगी जितनी गत दो वर्षोंमें रही है। ऐसा हो जाना सम्भव है । क्योंकि वेतन-वृद्धिकी बात छोड़ दें तो भी तीन-पौंडी करके भयसे वे अपनी स्वतंत्रता छोड़नेको तैयार हो जायेंगे । हमें यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि संरक्षककी धारणा है कि अब मालिक लोग सामान्यतया अपने भारतीय नौकरोंके साथ व्यवहार करनेमें गत वर्षोंकी अपेक्षा अधिक सावधान रहने लगे हैं और जब वे यह पाते हैं कि भारतीयोंके साथ ओवरसियरों या सरदारोंने अनुचित व्यवहार किया हैं, तो अब वे उनके अपराध ढँकनेको कम, उन्हें नौकरीसे निकाल बाहर करनेको ज्यादा तैयार रहा करते हैं । यह बात कुछ हद तक सन्तोषजनक है, और निःसन्देह हमारा यह कर्त्तव्य है कि इसके लिए उन लोगोंको धन्यवाद दें जिनका गिरमिटिया-प्रथाके दोषोंको जनताके सामने लाने में बहुत बड़ा हाथ रहा है । नियत समयसे अधिक काम करनेके प्रश्नपर अभी तक संरक्षकके सन्तोषके योग्य कोई फैसला नहीं हुआ है । संरक्षक महोदयके खयालसे एक हद तक इसका कारण दिन-भरका काम तय करनेकी कठिनाई है । उन्हें इतना और कहना था कि कामका ऐसा नाप तय करके काम लेनेकी प्रथा बिलकुल अनीतिपूर्ण है । हमने तो यही देखा है कि गन्नेकी जितनी फसल कटकर एक मजबूत मर्द या स्त्री मजदूर तीसरे पहरसे पहले ही निर्धारित काम समाप्त कर देता है इतनी कटाई समाप्त करनेके लिए अपेक्षाकृत कम मजबूत व्यक्तियोंको सूरज डूबनेके बाद तक काम करते रहना पड़ता है । और गाड़ियोंमें माल भरनेके कामके सम्बन्धमें यह कहा जा सकता है कि काम खत्म करनेका प्रश्न मुख्यतः गाड़ियाँ कितनी हैं और उन्हें कितनी दूर ले जाना है, इन दो बातोंपर निर्भर करता है । यदि अन्य शर्तें संतोषजनक हों तो भी निश्चित परिमाण में काम करनेकी प्रणाली बहुतेरे गिरमिटिया भारतीयोंका जीवन भाररूप बना देगी । यह बात आसानीसे समझी जा सकती है कि जो मजदूर अपने निर्धारित किये गये कामको अमुक अवधि में पूरा करनेमें असमर्थ ____________________________ समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरकी " प्रति काममें न लायें । " देखिए खण्ड १०, १४ ३५१ और '''इंडियन ओपिनियन''', १-१०-१९१०, १५-१०-१९१० और १९-११-१९१० ।<noinclude></noinclude> 1o6gqejmpdndu12r4yprd2pct3gtu1f पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५६९ 250 184112 674521 673061 2026-08-26T20:21:31Z सीमा1 430 674521 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /><center>{{x-larger|'''परिशिष्ट ११'''}}</center> <center>{{larger|'''साम्राज्य-सम्मेलनमें उपनिवेशीय भारतीयोंके सम्बन्धमें लॉर्ड क्रू का भाषण'''}}</center></noinclude>{{right|लन्दन <br>जून १९, १९११}} {{c|'''क'''}} '''१९ जून, १९११ को लन्दन में उपनिवेश-मन्त्री माननीय एल० हरकोर्टकी अध्यक्षता में साम्राज्य सम्मेलन हुआ था । दक्षिण आफ्रिका संघकी ओरसे उसमें जनरल एल० बोथा (संघके प्रधानमन्त्री), एफ० एस० मलान (शिक्षा मन्त्री) और सर डेविड डी विलियर ग्राफ (सार्वजनिक निर्माण, डाक और तार मन्त्री) सम्मिलित हुए थे । उपनिवेशों में रहने-वाले भारतीय प्रजाजनोंकी समस्याओंके सम्बन्धमें एक ज्ञापन भी प्रचारित किया गया था ।''' '''जिन विषयोंपर विचार हुआ उनमें न्यूजीलैंड के प्रधान मन्त्रीका एक प्रस्ताव भी था ।[इस प्रस्तावके द्वारा] पहले तो वे यह कोशिश कर रहे थे कि रंगदार प्रजातियोंको उनके ही क्षेत्रों तक सीमित रखा जाये किन्तु बादमें उन्होंने अपने प्रस्तावका विषय बदल कर उसे 'ब्रिटिश और विदेशी जहाजरानीके सम्बन्ध में स्वशासन-प्राप्त उपनिवेशोंके लिए ज्यादा व्यापक कानूनी सत्ता रखनेवाले अधिकार' कर दिया।''' '''सम्मेलनकी कार्यवाही भारत-मन्त्री लॉर्ड क्रू के भाषणसे आरम्भ हुई जिसमें उन्होंने उपनिवेशों में रहनेवाले भारतीयों के सम्बन्धमें कुछ सामान्य बातें कहीं। उनके भाषणके कुछ अंश नीचे दिये जाते हैं :''' . . .यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके केवल साम्राज्यकी सुख-समृद्धिको ही नहीं, बल्कि उसके साम्राज्यत्वको ही खतरा है, तो वह है गोरी प्रजातियों और वतनी प्रजातियोंके बीचकी यह गाँठ; कारण, मैं कह चुका हूँ कि उपनिवेशों और मातृ-देश [इंग्लैंड] के बीच ऐसा कोई प्रश्न है ही नहीं जो दोनों ओरकी सद्भावना और सुमतिसे तय न किया जा सके, फिर चाहे वह वाणिज्यका प्रश्न हो, चाहे प्रतिरक्षाका और चाहे वह उन प्रश्नों में से कोई प्रश्न हो जिनपर हम यहाँ विचार करेंगे. . . मुझे मालूम हुआ है कि यह ज्ञापन जो मेरे सामने है, सम्मेलनके सब सदस्योंको दिया गया है, और जिन्होंने इसे पढ़ा है वे स्वीकार करेंगे कि इसमें उस प्रश्नके सामान्य सिद्धान्तों और इस उल्झनके उन विशिष्ट उदाहरणोंपर विचार किया गया है जो विभिन्न उपनिवेशों में भारतीयों के प्रवेशाधिकारके सम्बन्धमें या वहाँ आ जानेपर उनके साथ किये जानेवाले व्यवहारके सम्बन्धमें उत्पन्न हुए हैं । अब मैं पहले यह कहना चाहता हूँ कि मैं दो तथ्योंको पूरी तरह मानता हूँ; सम्राट की सरकार भी इन्हें मानती है । पहला तथ्य यह है कि साम्राज्यकी रचनाको देखते हुए इस विचारका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता कि सम्राट के समस्त प्रजाजनोंके बीच बिल्कुल अबाध रूपसे अदला-बदली हो सकती है; अर्थात् सम्राट के प्रत्येक प्रजाजनको, चाहे वह कोई भी क्यों न हो,वह कहीं भी क्यों न रहता हो, साम्राज्यके किसी भी भागमें जाने या उससे भी अधिक वहाँ बसनेका, स्वाभाविक अधिकार है । हम इस बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और भारत-कार्यालयके प्रतिनिधिके रूपमें मैं भी पूरी तरह स्वीकार<noinclude></noinclude> rkhnx0hegh10gul5ns21ej99kxm2srt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७० 250 184113 674522 673063 2026-08-26T20:29:30Z सीमा1 430 674522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है । या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने-अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है। यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राट्की सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं। यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...। . . . उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है। आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं,वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थव्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही। . . . यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है। और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है...। १८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में..... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा । किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है । फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, सैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है। अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।..... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि " इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे<noinclude></noinclude> fvqm3wo19irw9foeftg1h4mfrlb0zuu 674597 674522 2026-08-27T07:35:56Z सीमा1 430 674597 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" />{{rh|५३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ कि साम्राज्यकी रचना जैसी है, उसमें सम्राट्के समस्त प्रजाजनोंका साम्राज्यके सब भागों में अबाध रूपसे आना-जाना असम्भव है। या इसी बातको दूसरी तरहसे कहें तो स्वशासित उपनिवेशोंको अपने-अपने बारेमें यह तय करनेका अधिकार है कि वे किसे अपने यहाँ नागरिकके रूपमें आने दें और किसे नहीं; उनके इस अधिकारपर आपत्ति करनेका अधिकार किसीको नहीं है। यह एक तथ्य है; और इसे मैं सम्राट्की सरकारकी ओरसे पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि इस मामलेमें उपनिवेशोंके सम्मुख जो कठिनाइयाँ हैं उनकी गम्भीरता इस देश के हम लोग प्रायः कम आँकते हैं; क्योंकि हम ऐसी किसी समस्यासे परेशान नहीं हैं। यह संयोग की बात है कि इस देशमें रंगदार प्रजातियाँ कभी इतने बड़े पैमानेपर नहीं आईं जिससे वैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हों जैसी मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि स्वशासित उपनिवेशोंमें आप सज्जनोंके सम्मुख हैं...। . . . उदाहरणार्थं, कितने ही लोग जब इस मतका त्याग कर चुके हैं कि मजदूर केवल पूर्ति और माँगकी परिस्थितियोंसे नियन्त्रित किये जा सकते है। आजकल बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह मत त्याग दिया हैं कि मजदूरोंकी मजदूरी और उनके द्वारा किये गये काममें कोई बड़ा सम्बन्ध होना आवश्यक है; और चूंकि ऐसा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतसे जैसे सस्ते मजदूर लाये जा सकते हैं,वैसे सस्ते मजदूरों की प्रतिस्पर्धा उन्नीसवीं शताब्दी के अधिकांश भागमें ब्रिटेनमें और न्यूनाधिक संसार-भर में सामान्यतः अपनाई गई कठोरतर राजनीतिक अर्थव्यवस्थाके दिनोंमें जितनी कष्टप्रद जान पड़ती थी अब उससे अधिक कष्टप्रद जान पड़ती है . . . । यदि वह समय अभी आया नहीं है, तो निश्चय ही वह बहुत दूर भी नहीं है जब संगठित मजदूर किसी भी प्रकारके कम मजदूरी पानेवाले मजदूरोंके लाये जानेपर, यदि उनका स्वरूप स्पर्धात्मक होगा तो, गम्भीर आपत्ति करेंगे; फिर चाहे वे किसी भी रंग या जातिके क्यों न हों। दरअसल भारतीयों के प्रवासके प्रश्नले सम्बन्धित यह एक मुख्य कठिनाई है, बेशक इसके सिवा अत्यन्त भद्दे तरीकेके रंगभेदकी समस्या तो है ही। . . . यह ऐसा पूर्वग्रह या विश्वास है जो लोगोंके अधिक सुरक्षित और सामान्यतः अधिक सभ्य होनेके साथ-साथ प्रबलतर होता जाता है। और इसलिए यह उन सहज और मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहोंसे भिन्न है जो वतनी प्रजातियोंके विरुद्ध होते हैं। मैं तो यहाँ तक कहनेके लिए तैयार हूँ कि अधिकांश मामलों में किसी गोरेमें गर्व करनेके योग्य जितनी कम व्यक्तिगत विशेषता होती है, उसमें अपने गोरेपनका गर्व करनेकी प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है और वह अपनेको उतना ही अधिक महत्वपूर्ण समझता है...। १८९७ के सम्मेलनमें श्री चेम्बरलेनने अपने भाषण में..... अदि आप अनुमति दें तो मैं कहना चाहता हूँ कि वे शब्द विचारणीय हैं। श्री चेम्बरलेनने वहाँ जो बात बहुत सुन्दर ढंगसे कही थी मैं उसे बढ़ाकर कहनेका प्रयत्न नहीं करूँगा। किन्तु मैं आपको शायद यह याद दिला सकता हूँ कि भारतीय अपने प्राचीन इतिहासके, अपनी वंश-परम्पराको प्राचीनता के आधार पर जो जातीय दावे करते हैं उनकी और भारतीयोंके दावोंके पोषक ऐसे ही अन्य तथ्योंकी, कमसे-कम इस समय तो, हम उपेक्षा नहीं करना चाहेंगे। अगले गुरुवारके जिस समारोहकी प्रतीक्षा हम सभी कर रहे हैं, उसकी सार्थकता बहुत बड़ी हद तक ब्रिटिश सम्राटोंकी उस दीर्घ वंश-परम्परा पर निर्भर है, जो स्टुअर्ट, ट्यूडर और प्लांटजनेट वंश और उनसे भी आगे नार्मन लोगोंकी विजय और सेक्सन राजाओंक धुंधले युगों तक जाती है। लेकिन भारत में ऐसे लोग हैं जिनका वंशाभिमान स्वयं इंग्लंडके सम्राटके वंशाभिमान की भाँति ही दृढ़ आधार पर स्थित और वास्तविक है। फिर, इतिहासके सम्बन्धमें हमें कभी यह न भूलना चाहिए कि भारत में केवल लोक-सेवा और प्राचीन साहित्यके क्षेत्रमें ही बड़ी संख्या में विशिष्ट लोग उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि बहुत कुछ हमारी जातिको भांति ही भारतीयों में भी राजनीतिज्ञ, सैनिक और अन्य अत्यन्त प्रसिद्ध लोग बड़ी संख्या में हुए है। अब निस्संदेह ऐसे लोग भी है जिन्हें ये बात नहीं जँचती ।..... यदि हमारा आदर्श वाक्य यह हो कि "इस सबके बावजूद मनुष्य मनुष्य हैं" तो सचमुच भारतके बहुतसे<noinclude></noinclude> korachmamdcg87luonqpg0cvom5awr1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२२ 250 184405 674488 640337 2026-08-26T17:40:50Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674488 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{C|अठारह}}</noinclude>{|width=100% | |- |२२७.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (३१-३-१९२६)|| २१७ |- |२२८.|| पत्र : अब्दुल हुसैनको (३१-३-१९२६)|| २१८ |- |२२९.|| पत्र : वसनजीको (३१-३-१९२६)|| २१८ |- |२३०.|| मेरा राजनीतिक कार्यक्रम (१-४-१९२६)|| २१९ |- |२३१.|| जड़ाऊ जूतियाँ बनाम चिथड़े (१-४-१९२६)|| २२१ |- |२३२.|| बिहार विद्यापीठ (१-४-१९२६)|| २२३ |- |२३३.|| टिप्पणियाँ : बंगालका अनुकरणीय उदाहरण; बेजवाड़ा नगरपालिका और खादी; खादी अप्राप्य है; प्रदर्शनियाँ (१-४-१९२६)|| २२३ |- |२३४.|| सन्देश : त्रिवेन्द्रमकी एक सभाके लिए (१-४-१९२६)|| २२५ |- |२३५.|| पत्र : बुद्धको (१-४-१९२६)|| २२५ |- |२३६:|| पत्र : एफ० ए० बुशको (१-४-१९२६)|| २२६ |- |२३७.|| पत्र : डॉ० पॉल लिंडको (१-४-१९२६)|| २२७ |- |२३८.|| पत्र : दुनीचन्दको (१-४-१९२६)|| २२८ |- |२३९.|| पत्र : एस० पी० एन्ड्रयूज डयूबको (१-४-१९२६)|| २२८ |- |२४०.|| पत्र : विनोदबिहारी दत्तको (१-४-१९२६)|| २२९ |- |२४१.|| पत्र : जंगबहादुर सिंहको (१-४-१९२६)|| २२९ |- |२४२.|| पत्र : रेवरेंड जॉन० एम० डारलिंगटनको (१-४-१९२६)|| २३० |- |२४३.|| पत्र : एस० वी० वेंकटनरसय्यनको (१-४-१९२६)|| २३० |- |२४४.|| पत्र : कालीशंकर चक्रवर्तीको (१-४-१९२६)|| २३१ |- |२४५.|| पत्र : सुधांशु कुमारी घोषको (१-४-१९२६)|| २३२ |- |२४६.|| पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (१-४-१९२६)|| २३२ |- |२४७.|| पत्र: पी० एस० वारियरको (१-४-१९२६ या उसके पश्चात्) ||२३३ |- |२४८.|| पत्र: मिर्जा कासिम अलीको (१-४-१९२६ या उसके पश्चात्)|| २३४ |- |२४९.|| पत्र : शाह जमील आलमको (२-४-१९२६)|| २३४ |- |२५०.|| पत्र : ए० जोजेफको (२-४-१९२६)|| २३४ |- |२५१.|| पत्र : धीरेन्द्रनाथ दासगुप्तको (२-४-१९२६)|| २३५ |- |२५२.|| पत्र : सी० वी० कृष्णको (२-४-१९२६)|| २३५ |- |२५३.|| पत्र: एन० एस० वरदाचारी और एस० वी० पुणताम्बेकरको (२-४-१९२६)|| २३६ |- |२५४.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (२-४-१९२६)|| २३७ |- |२५५.|| पत्र : हरबर्ट ऐंडर्सनको ( ३-४-१९२६)|| २३७ |- |२५६.|| पत्र : एल० गिबार्टीको ( ३-४-१९२६)|| २३८ |- |२५७.|| पत्र : हेलेन हाउसडिंगको ( ३-४-१९२६)|| २३९ |- |२५८.|| पत्र : डी० वी० रामस्वामीको ( ३-४-१९२६)|| २३९<noinclude></noinclude> drui5qq14bxugmsdnplouh2s6pmq0p0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२३ 250 184406 674500 640338 2026-08-26T17:57:42Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674500 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|उन्नीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |२५९.|| पत्र : आर० डी० सुब्रह्मण्यम्को (३-४-१९२६)|| २४० |- |२६०.|| पत्र : जी० पी० नायरको (३-४-१९२६)|| २४१ |- |२६१.|| पत्र : पी० गोविन्दन कुट्टी मेननको (३-४-१९२६)|| २४१ |- |२६२.|| पत्र : धर्मवीरको (३-४-१९२६)|| २४३ |- |२६३.|| पत्र : रामरीष ठाकुरको (३-४-१९२६)|| २४३ |- |२६४.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (३-४-१९२६)|| २४४ |- |२६५.|| पत्र : मानसिंह जसराजको (३-४-१९२६)|| २४५ |- |२६६.|| पत्र : नरभेराम पो० मेहताको (३-४-१९२६)|| २४५ |- |२६७.|| पत्र : चिमनलाल भो० पटेलको (३-४-१९२६)|| २४६ |- |२६८.|| डाह्याभाई म० पटेलको (३-४-१९२६)|| २४७ |- |२६९.|| पत्र : एक बनको (३-४-१९२६)|| २४७ |- |२७०.|| पत्र : देवदास गांधीको (३-४-१९२६)|| २४८ |- |२७१.|| पत्र : ठाकोरलालको (३-४-१९२६)|| २४८ |- |२७२.|| राष्ट्रीय सप्ताह (४-४-१९२६)|| २४९ |- |२७३.|| ब्रह्मचर्यके विषय में (४-४-१९२६)|| २५० |- |२७४.|| सत्याग्रह-सप्ताह (४-४-१९२६)|| २५२ |- |२७५.|| सत्याग्रह-सप्ताहमें आंशिक उपवास (४-४-१९२६)|| २५३ |- |२७६.|| पहाड़ी जातियाँ (४-४-१९२६)|| २५४ |- |२७७.|| अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक (४-४-१९२६)|| २५४ |- |२७८.|| सन्तोंका स्मरण (४-४-१९२६)|| २५५ |- |२७९.|| पत्र : लाला लाजपतरायको (४-४-१९२६)|| २५५ |- |२८०.|| पत्र : जमनालाल बजाजको (४-४-१९२६)|| २५६ |- |२८१.|| पत्र: मिल्टन न्यूबेरी फैंजको (६-४-१९२६)|| २५७ |- |२८२.|| पत्र : गो० कृ० देवधरको (६-४-१९२६)|| २५८ |- |२८३.|| पत्र : ग्रीव्ज कॉटन व कम्पनीको (६-४-१९२६)|| २५८ |- |२८४.|| पत्र : पुरी जिला बोर्ड के उपाध्यक्षको (६-४-१९२६)|| २५९ |- |२८५.|| पत्र: पी० एस० एस० राम अय्यरको (६-४-१९२६)|| २६० |- |२८६.|| पत्र : राजेन्द्रप्रसादको (६-४-१९२६)|| २६१ |- |२८७.|| पत्र : राखालचन्द्र मैतीको (६-४-१९२६)|| २६१ |- |२८८.|| पत्र : वामन लक्ष्मण फड़केको (६-४-१९२६)|| २६२ |- |२८९.|| पत्र : लल्लू मोरारको (६-४-१९२६)|| २६२ |- |२९०.|| पत्र : खंडेरियाको (६-४-१९२६)|| २६३ |- |२९१.|| पत्र : जी० जी० जोगको (७-४-१९२६)|| २६३ |- |२९२.|| पत्र : एक मित्रको (७-४-१९२६)|| २६४<noinclude></noinclude> orux5zq5unc593xvpmm5yidv651il98 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२४ 250 184407 674503 640339 2026-08-26T18:06:36Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674503 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|बीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |२९३.|| पत्र : अमृतलाल नानावटी और अन्य लोगोंको (७-४-१९२६)|| २६४ |- |२९४.|| पत्र : सोमनाथ पंचालको (७-४-१९२६)|| २६५ |- |२९५.|| पत्र : प्राणजीवन के० देसाईको (७–४–१९२६)|| २६५ |- |२९६.|| पत्र : मणिलाल गांधीको (७-४-१९२६)|| २६६ |- |२९७.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (७-४-१९२६)|| २६६ |- |२९८.|| पत्र : माणेकलालको (७-४-१९२६)|| २६७ |- |२९९.|| पत्र : देवदास गांधीको (७-४-१९२६)|| २६७ |- |३००.|| पत्र : रुस्तमजी डी० बाटलीवालाको (७-४-१९२६)|| २६८ |- |३०१.|| पत्र : बेचर भाणजीको (७-४-१९२६)|| २६८ |- |३०२.|| पत्र : एक विद्यार्थीको (७-४-१९२६)|| २६९ |- |३०३.|| शंका-समाधान (८-४-१९२६)|| २६९ |- |३०४.|| लेखाचित्रकी आवश्यकता (८-४-१९२६)|| २७३ |- |३०५.|| क्या भारत मद्यनिषेध चाहता है? (८-४-१९२६)|| २७३ |- |३०६.|| सन्देश : वकीलोंके सम्मेलनको (८-४-१९२६)|| २७५ |- |३०७.|| पत्र : गोपाल कृष्ण देवधरको (८-४-१९२६)|| २७५ |- |३०८.|| आमुख (८-४-१९२६)|| १७६ |- |३०९.|| पत्र : नागजीभाईको (८-४-१९२६)|| २७७ |- |३१०.|| पत्र : हरनारायणको ८-४-१९२६ या उसके पश्चात्)|| २७७ |- |३११.|| पत्र : कैथरीन मेयोको (९-४-१९२६)|| २७८ |- |३१२.|| पत्र : शरत्चन्द्र बोसको (९-४-१९२६)|| २७८ |- |३१३.|| पत्र : वी० एन० एस० चारीको (९-४-१९२६)|| २७९ |- |३१४.|| पत्र : एस० गोविन्दस्वामी अय्यरको (१०-४-१९२६)|| २८० |- |३१५.|| पत्र : हकीम अजमलखाँको (१०-४-१९२६)|| २८१ |- |३१६.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-४-१९२६)|| २८१ |- |३१७.|| पत्र : जे० चटर्जीको (१०-४-१९२६)|| २८२ |- |३१८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-४-१९२६)|| २८२ |- |३१९.|| पत्र : जगजीवनदासको (१०-४-१९२६)|| २८३ |- |३२०.|| पत्र : गुलाबदासको (१०-४-१९२६)|| २८४ |- |३२१.|| आशाकी किरण (११-४-१९२६)|| २८४ |- |३२२.|| गुरुकुल और खादी (११-४-१९२६)|| २८५ |- |३२३.|| निरामिषाहार अर्थात् अन्नाहार (११-४-१९२६)|| २८५ |- |३२४.|| गलतफहमी (११-४-१९२६)|| २८६ |- |३२५.|| पत्र : एस० नागसुन्दरम्को (११-४-१९२६)|| २८८ |- |३२६.|| पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (११-४-१९२६)|| २८९<noinclude></noinclude> 5l7rh0j8glj83rpw5skg6wadfxg4ukw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२५ 250 184408 674505 640340 2026-08-26T18:17:09Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674505 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|इक्कीस}}</noinclude>{|width=100% | |- |३२७.|| पत्र : शौकत अलीको (११-४-१९२६)|| २९० |- |३२८.|| पत्र : प्यारेलाल नैयरको (११-४-१९२६)|| २९१ |- |३२९.|| पत्र : ए० इर्बीको (११-४-१९२६)|| २९२ |- |३३०.|| पत्र : बगलाप्रसन्न गुहारायको (११-४-१९२६)|| २९२ |- |३३१.|| सन्देश : जलियाँवाला बागके सम्बन्ध में ( ११-४-१९२६)|| २९३ |- |३३२.|| पत्र : गोपालकृष्ण देवधरको (११-४-१९२६)|| २९४ |- |३३३.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (११-४-१९२६)|| २९५ |- |३३४.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (११-४-१९२६)|| २९६ |- |३३५.|| पत्र : मोतीबहन चौकसीको (११-४-१९२६)|| २९६ |- |३३६.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१२-४-१९२६)|| २९७ |- |३३७.|| पत्र : के० टी० पॉलको (१३-४-१९२६)|| २९८ |- |३३८.|| पत्र : महासुखको (१३-४-१९२६)|| २९९ |- |३३९.|| पत्र : भगवानदास ब्रह्मचारीको (१३-४-१९२६)|| ३०० |- |३४०.|| पत्र : छगनलाल जोशीको (१३-४-१९२६)|| ३०० |- |३४१.|| पत्रः नरगिस कैप्टेनको (१४-४-१९२६)|| ३०१ |- |३४२.|| पत्र : मोतीलालको (१४-४-१९२६)|| ३०१ |- |३४३.|| पत्र : लाभशंकर मेहताको (१४-४-१९२६)|| ३०२ |- |३४४.|| पत्र : रामदास गांधीको (१४-४-१९२६)|| ३०३ |- |३४५.|| पत्र : प्रतापसिंहको (१४-४-१९२६)|| ३०४ |- |३४६.|| पत्र : जयसुखलालको (१४-४-१९२६)|| ३०४ |- |३४७.|| पत्र : आदमसालेह अली पटेलको (१४-४-१९२६)|| ३०५ |- |३४८.|| पत्र : कायम अली मु० सलेमवालाको (१४-४-१९२६)|| ३०५ |- |३४९.|| तकली शिक्षक (१५-४-१९२६)|| ३०६ |- |३५०.|| पण्डित नेहरू और खादी (१५-४-१९२६)|| ३०७ |- |३५१.|| कैसा लगता है? (१५-४-१९२६)|| ३१० |- |३५२.|| टिप्पणियाँ: मशीनोंसे मिलनेवाले सबक; कैसे सहायता करें? खादीके उत्पादन और बिक्रीके मासिक आँकड़े (१५-४-१९२६)|| ३११ |- |३५३.|| पत्र : के० वेंकटेशनको (१५-४-१९२६)|| ३१५ |- |३५४.|| पत्र : धनगोपाल मुखर्जीको (१६-४-१९२६)|| ३१६ |- |३५५.|| पत्र : गिरिराज किशोरको (१६-४-१९२६)|| ३१७ |- |३५६.|| पत्र : गोपालकृष्ण देवधरको (१६-४-१९२६)|| ३१७ |- |३५७.|| पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको (१६-४-१९२६)|| ३१८ |- |३५८.|| पत्र : प्यारेलाल नैयरको (१६-४-१९२६)|| ३१८ |- |३५९.|| पत्र : मु० रा० जयकरको (१६-४-१९२६)|| ३१९<noinclude></noinclude> ck5n66vbobas54ulatpryi03h2rvpgd पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf/२६ 250 184409 674507 640341 2026-08-26T18:27:08Z शिखर तिवारी 633 /* शोधित */ 674507 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|बाईस}}</noinclude>{|width=100% | |- |३६०.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१६-४-१९२६)|| ३२० |- |३६१.|| पत्र : मणिलाल डाक्टरको (१६-४-१९२६)|| ३२१ |- |३६२.|| पत्र : जयकुँवरको (१६-४-१९२६)|| ३२२ |- |३६३.|| पत्र : प्राणजीवन मेहताको (१६-४-१९२६)|| ३२२ |- |३६४.|| पत्र : दयालजीको (१६-४-१९२६)|| ३२३ |- |३६५.|| पत्र : आर० एस० अय्यरको (१७-४-१९२६)|| ३२४ |- |३६६.|| पत्र : कृष्णदासको (१७-४-१९२६)|| ३२४ |- |३६७.|| पत्र : न० चि० केलकरको (१७-४-१९२६)|| ३२५ |- |३६८.|| पत्र : सतीशचन्द्र मुखर्जीको (१७-४-१९२६)|| ३२६ |- |३६९.|| पत्र : गोविन्दजी पीताम्बरको (१७-४-१९२६)|| ३२६ |- |३७०.|| पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चौकसीको (१७-४-१९२६)|| ३२७ |- |३७१.|| पत्र : जयसुखलालको (१७-४-१९२६)|| ३२८ |- |३७२.|| पत्र : मनुको (१७-४-१९२६)|| ३२८ |- |३७३.|| पत्र : चन्द्रकान्तको (१७-४-१९२६)|| ३२९ |- |३७४.|| पत्र : प्रभालक्ष्मीको (१७-४-१९२६)|| ३२९ |- |३७५.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-४-१९२६)|| ३३० |- |३७६.|| मेरी कामधेनु (१८-४-१९२६)|| ३३० |- |३७७.|| टिप्पणियाँ : भीलोंमें प्राणप्रतिष्ठा; अन्त्यज सेवककी कठिनाई (१८-४-१९२६)|| ३३३ |- |३७८.|| विविध प्रश्न [-१] (१८-४-१९२६)|| ३३५ |- |३७९.|| विविध प्रश्न [-२] (१८-४-१९२६)|| ३३७ |- |३८०.|| विविध प्रश्न [-३] ( १८-४-१९२६)|| ३४० |- |३८१.|| विविध प्रश्न [-४] ( १८-४-१९२६)|| ३४२ |- |३८२.|| विविध प्रश्न [-५] (१८-४-१९२६)|| ३४४ |- |३८३.|| वक्तव्य : मसूरी यात्रा स्थगित करनेके सम्बन्ध में (१८-४-१९२६)|| ३४७ |- |३८४.|| पत्र : गांधी-आश्रम, बनारसको (१९-४-१९२६)|| ३४७ |- |३८५.|| पत्र : विलियम डॉलको (१९-४-१९२६)|| ३४८ |- |३८६.|| पत्र: पारसी रुस्तमजीके न्यासीको (१९-४-१९२६)|| ३४९ |- |३८७.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (१९-४-१९२६)|| ३४९ |- |३८८.|| पत्र : हेनरी लॉरेंसको (२०-४-१९२६)|| ३५० |- |३८९.|| पत्र : डी० वी० रामस्वामीको (२०-४-१९२६)|| ३५० |- |३९०.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-४-१९२६)|| ३५१ |- |३९१.|| पत्र : एस० वी० फडनीसको (२०-४-१९२६)|| ३५२ |- |३९२.|| पत्र : मीठूबहन पेटिटको (२०-४-१९२६)|| ३५३<noinclude></noinclude> l8bpyuql4lrl0s86qe35vej768e06ld पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३२ 250 184940 674544 641222 2026-08-27T05:05:50Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674544 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{C|'''अली भाइयोंपर आरोप'''}} एक भाई लिखते हैं कि वे जब जूनके महीनेमें [तिलक स्वराज्य-कोषके लिए] रुपया इकट्ठा कर रहे थे तब उन्होंने अली भाइयोंके सम्बन्धमें यह आरोप सुना था कि वे लोग खिलाफत समितिके रुपयोंमें से अपने खर्चके लिए हर महीने छः-सात हजार रुपये लेते हैं। एक अन्य सज्जन लिखते हैं कि उनका प्रतिदिनका खर्च नब्बे रुपये आता है और यह खर्च खिलाफत समिति उठाती है। इस तरहकी आलोचना मैंने बहुतसे लोगोंके मुँहसे सुनी है, इसलिए मैं इन दो पत्रोंका उल्लेख कर रहा हूँ। मुझे मालूम है कि यह बात बिलकुल झूठ है। अली भाई अपना खर्च खिलाफत समितिसे लेते ही नहीं। उन दोनोंका खर्च उनके निजी मित्र चलाते हैं और वह खर्च होता भी कम है। इसकी अपेक्षा यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि इन दोनों भाइयोंने देशके लिए और इस्लामके लिए फकीरी ले ली है। चार वर्ष पहले उनका जितना खर्च था और वे जिस तरह रहते थे उससे उनकी आजकी खादीकी पोशाक और आजके सादा खानपानकी क्या तुलना! {{C|''''स्वदेशी' टोपी'''}} देशद्रोही अथवा निरे स्वार्थी लोगोंके कारण हम लोग गुलाम हुए और स्वार्थका त्याग न कर सकनेके कारण इस समय भी गुलाम बने हुए हैं। जिस समय स्वदेशीके प्रचारका काम जोरसे चल रहा है उस समय धोखेबाज लोगोंने अपनी सरगर्मी बढ़ा दी है। मेरे पास तीन शिकायतें आई हैं। बम्बईमें कुछ लोग गली हुई विदेशी बनात, विदेशी साटन और विदेशी धागेका प्रयोग करके टोपियाँ बना रहे हैं और स्वदेशी बताकर मेरे नामका उपयोग करके बेच रहे हैं। ये टोपियाँ काली हैं। जो लोग स्वदेशी टोपियाँ पहनते हैं उनको मेरी सलाह है कि वे सफेद और खादीकी बनी हुई टोपियाँ ही पहनें। सफेद टोपी जितनी सुन्दर, साफ-सुथरी और सुविधाजनक होती है उतनी रंगीन टोपी नहीं होती। यह टोपी रोज धोई जा सकती है। काली टोपीमें मैल खपता है और बदबू आने लगती है। जिन टोपियोंमें सदा पसीना बसा रहता है उन टोपियोंको सफाई-पसन्द लोग कभी नहीं पहनेंगे। जिस टोपीमें चमड़ा लगा होता है वह दिमागके लिए भी ठीक नहीं होती। हिन्दुओंको तो चमड़ा लगी हुई टोपी सुहा ही कैसे सकती है? अंग्रेज चमड़ा लगी टोपी पहनते हैं; किन्तु वे तो जब बाहर जाते हैं तभी उसको लगाते हैं और थोड़े-थोड़े दिन बाद उसे बदलते भी हैं। हम लोग तो एक ही पगड़ी या टोपी वर्षों पहनते हैं और उसे हर समय सिरपर लगाये रहते हैं, इस कारण हमारे लिए चमड़ा लगी पगड़ी या टोपी अवश्य ही असह्य होगी। खादीकी टोपी साफ-सुथरी और हलकी होनेसे बिलकुल हानिरहित होती है। फिर यदि खादी बहुत मोटी हो तो उसका अच्छेसे-अच्छा उपयोग टोपियाँ बनानेमें ही होता है; उसका इससे अच्छा उपयोग और क्या किया जा सकता है? जिन लोगोंको सिरसे लेकर पैरतक खादी पहननेका शौक हो गया है वे खादीका व्यवहार सिरसे ही आरम्भ करें। इस खादीकी टोपीको अमीर और गरीब सभी पहन सकते हैं। अमीर अपनी खादीकी टोपीको रोज धोयेगा, उसमें दर्जी बेलबूटे बना देगा और उसमें कई तहें बना देगा। टोपीमें इस तरहका<noinclude></noinclude> ry204n6e4a94m363xo64s3fl41wbam8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३३ 250 184941 674545 641223 2026-08-27T05:06:26Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674545 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>टिप्पणियाँ ४०१ फेरफार भले ही हो, किन्तु सभीके सिरोंपर टोपी एक ही तरहकी हो इस बातका ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए । अन्तमें निर्णय एक ही होना चाहिए कि केवल खादीकी ही टोपी स्वदेशी मानी जाये। जिस टोपीपर कोई छाप लगानेकी जरूरत न हो, जिसे बालक भी पहचान सकें, स्वदेशी टोपी ऐसी ही होनी चाहिए। जिस तरह हम लोग अपने मस्तिष्कमें से छल-कपट और आडम्बर निकालकर स्वराज्यवादी बन सकते हैं उसी तरह हमें टोपीमें से भी छल-कपट और आडम्बरको निकाल देना चाहिए। जो लोग स्वदेशीके नामपर विदेशी टोपियाँ बेचते हैं उनसे मेरा निवेदन है कि यदि वे अपना धन्धा ईमानदारीसे कर ही न सकते हों तो अपनी बेईमानीका प्रयोग इस देशके अहितके काममें तो न करें । चोरोंकी भी कोई निश्चित नीति होती है। चोर चोरका माल नहीं चुराता । गरीबोंके घर भी चोरी न करनेवाले चोर होते हैं । समस्त देशमें यह जो महायज्ञ चल रहा है ऐसेमें क्या हम स्वार्थ सिद्धि के नीचतापूर्ण विचारको छोड़कर ऊँचे नहीं उठ सकते ? मैं जनतासे साफ-साफ कहना चाहता हूँ जो लोग इस तरह जनसाधारणको ठगते हैं उनकी दुकानोंका सर्वथा बहिष्कार करना ही उचित है । 4 'स्वदेशी लट्ठा' जो बात टोपीके सम्बन्धमें कही जा सकती है वही लट्ठेके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । शिमलासे पत्र मिला है कि वहाँ लोग जापानी लट्ठेपर से जापानकी छाप मिटाकर, उसे फिरसे धोकर, उसपर बम्बईकी छाप लगाकर विदेशी मालको स्वदेशी-के नामसे बेच रहे हैं और इसमें कुछ मिल भी हिस्सा ले रहे हैं। मुझ आशा है कि इस मौकेपर कमसे कम मिल-मालिक तो देशको धोखा देनेमें भाग नहीं लेंगे। इस शुद्ध प्रवृत्तिके समय देश उनसे सहायताकी ही आशा करता है । खरीददारोंको भी सावधान रहनेकी जरूरत है। यदि लोग बारीक कपड़ेका मोह छोड़ दें तो उनके ठगे जानेकी सम्भावना कम हो जायेगी। लोग तरह-तरहकी माँड़ी लगे हुए मालका त्याग करके स्वदेशी कपड़ेको परख सकेंगे। इन सब परेशानियोंसे बचनेका उपाय बिना धुली खादी खरीदना है । परन्तु हर गाँवके लोग यदि अपनी आवश्यकताकी खादी स्वयं बना लें तो कोई किसीको ठग ही नहीं सकेगा । मिल-मालिक स्वदेशी आन्दोलनमें जितनी सहायता कर सकते हैं उतनी सहायता करना किसी दूसरेके लिए सम्भव नहीं । अहमदाबादके मिल मालिकोंने तिलक स्वराज्य-कोष में रुपया देकर अपना नाम उज्ज्वल किया है । श्री अम्बालाल सारा- भाईने निश्चय किया है कि वे कपड़ेके दाम नहीं बढ़ायेंगे और दुकान खोलकर फुटकर ग्राहकोंको थोकके भावमें कपड़ा देंगे। उन्होंने इस प्रकार स्वदेशीके आन्दोलनमें भाग लेनेका विचार प्रकट करके कारखानोंके मालिकोंका यश बढ़ाया है। चूँकि उन्हें असहयोगसे भय लगता है इसलिए वे हमें अपनी पूरी सहायता नहीं दे सके हैं। मैं आशा करता हूँ कि जब असहयोगी अपने संयमसे सबको निर्भय बना देंगे तब वे असहयोग में भी पूरी तरह भाग लेंगे। इस बीच उनका वह पत्र, जिसमें उन्होंने भाव न बढ़ानेका निश्चय किया है, हमारे लिए निःसन्देह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। २०-२६<noinclude></noinclude> ccb5nkkk2gb1q90pbicpl3r1k6bxz50 674546 674545 2026-08-27T05:13:32Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674546 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४०१}}</noinclude>फेरफार भले ही हो, किन्तु सभीके सिरोंपर टोपी एक ही तरहकी हो इस बातका ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। अन्तमें निर्णय एक ही होना चाहिए कि केवल खादीकी ही टोपी स्वदेशी मानी जाये। जिस टोपीपर कोई छाप लगानेकी जरूरत न हो, जिसे बालक भी पहचान सकें, स्वदेशी टोपी ऐसी ही होनी चाहिए। जिस तरह हम लोग अपने मस्तिष्कमें से छल-कपट और आडम्बर निकालकर स्वराज्यवादी बन सकते हैं उसी तरह हमें टोपीमें से भी छल-कपट और आडम्बरको निकाल देना चाहिए। जो लोग स्वदेशीके नामपर विदेशी टोपियाँ बेचते हैं उनसे मेरा निवेदन है कि यदि वे अपना धन्धा ईमानदारीसे कर ही न सकते हों तो अपनी बेईमानीका प्रयोग इस देशके अहितके काममें तो न करें। चोरोंकी भी कोई निश्चित नीति होती है। चोर चोरका माल नहीं चुराता। गरीबोंके घर भी चोरी न करनेवाले चोर होते हैं। समस्त देशमें यह जो महायज्ञ चल रहा है ऐसेमें क्या हम स्वार्थ-सिद्धिके नीचतापूर्ण विचारको छोड़कर ऊँचे नहीं उठ सकते? मैं जनतासे साफ-साफ कहना चाहता हूँ जो लोग इस तरह जनसाधारणको ठगते हैं उनकी दुकानोंका सर्वथा बहिष्कार करना ही उचित है। {{C|''''स्वदेशी लट्ठा''''}} जो बात टोपीके सम्बन्धमें कही जा सकती है वही लट्ठेके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है। शिमलासे पत्र मिला है कि वहाँ लोग जापानी लट्ठेपर से जापानकी छाप मिटाकर, उसे फिरसे धोकर, उसपर बम्बईकी छाप लगाकर विदेशी मालको स्वदेशी-के नामसे बेच रहे हैं और इसमें कुछ मिल भी हिस्सा ले रहे हैं। मुझ आशा है कि इस मौकेपर कमसे-कम मिल-मालिक तो देशको धोखा देनेमें भाग नहीं लेंगे। इस शुद्ध प्रवृत्तिके समय देश उनसे सहायताकी ही आशा करता है। खरीददारोंको भी सावधान रहनेकी जरूरत है। यदि लोग बारीक कपड़ेका मोह छोड़ दें तो उनके ठगे जानेकी सम्भावना कम हो जायेगी। लोग तरह-तरहकी माँड़ी लगे हुए मालका त्याग करके स्वदेशी कपड़ेको परख सकेंगे। इन सब परेशानियोंसे बचनेका उपाय बिना धुली खादी खरीदना है। परन्तु हर गाँवके लोग यदि अपनी आवश्यकताकी खादी स्वयं बना लें तो कोई किसीको ठग ही नहीं सकेगा। मिल-मालिक स्वदेशी आन्दोलनमें जितनी सहायता कर सकते हैं उतनी सहायता करना किसी दूसरेके लिए सम्भव नहीं। अहमदाबादके मिल-मालिकोंने तिलक स्वराज्य-कोषमें रुपया देकर अपना नाम उज्ज्वल किया है। श्री अम्बालाल सारा-भाईने निश्चय किया है कि वे कपड़ेके दाम नहीं बढ़ायेंगे और दुकान खोलकर फुटकर ग्राहकोंको थोकके भावमें कपड़ा देंगे। उन्होंने इस प्रकार स्वदेशीके आन्दोलनमें भाग लेनेका विचार प्रकट करके कारखानोंके मालिकोंका यश बढ़ाया है। चूँकि उन्हें असहयोगसे भय लगता है इसलिए वे हमें अपनी पूरी सहायता नहीं दे सके हैं। मैं आशा करता हूँ कि जब असहयोगी अपने संयमसे सबको निर्भय बना देंगे तब वे असहयोगमें भी पूरी तरह भाग लेंगे। इस बीच उनका वह पत्र, जिसमें उन्होंने भाव न बढ़ानेका निश्चय किया है, हमारे लिए निःसन्देह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।<noinclude>{{Left|२०–२६}}</noinclude> 4saiczm27iulftv4mvpsl90g0pdfcjh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३४ 250 184942 674547 641224 2026-08-27T05:14:08Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674547 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>४०२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मुझे आशा है कि अन्य मिल-मालिक भी श्री अम्बालालका अनुकरण कर स्वदेशी आन्दोलनमें सहायक होंगे । कपड़े के व्यापारियोंने तो मुझे यहाँतक बताया है कि कपड़े के वर्तमान भाव न बढ़ाये जायें [ वे घटाये जाने चाहिए]। वे आज तो जापानी मिलोंके मालके भावोंकी अपेक्षा भी ऊँचे हैं। मिल मालिकोंको इस सम्बन्धमें सलाह करके कोई निर्णय अवश्य करना चाहिए । उनको यह जाँच करनी चाहिए कि देशमें कितने कपड़े की जरूरत है । उसको देखकर ही उन्हें दूसरे देशोंसे कपड़े के आर्डर लेने चाहिए । यहाँसे दूसरे देशोंको सूत भी बहुत जाता है । उसके निर्यातमें भी आवश्यक फेरफारकी जरूरत होगी । सम्भव है कि इस मामलेमें और भी अधिक विचार करने की जरूरत हो। कुछ लोगोंको ऐसा लगेगा कि दूसरे देशोंके लोगों को हमारे कपड़ेकी जबतक मांग है तबतक जितना कपड़ा हम आजतक उनको देते आये हैं उतना तो हमें उनको देना ही पड़ेगा। हमारी स्थिति इंग्लैंड की स्थितिसे भिन्न है । इंग्लैंड और हमारे बीच के व्यापारमें एक तरहकी जबरदस्ती है । शायद दूसरे देशों के साथ हमारे व्यापारमें यह जबरदस्ती न हो । दूसरे देशोंके साथ हमारे व्यापारिक सम्बन्धोंका मामला एक भिन्न और नाजुक मामला है। तीन बातों के बारेमें कोई सन्देह नहीं है । अफीमका व्यापार नितान्त अनीतियुक्त है । इस सम्बन्धमें भारत सरकारने जो अन्याय किया है उसमें हम पूरी तरह शामिल रहे हैं। इसमें हमने चीनको नुकसान पहुँचाकर जो पाप किया है वह तो सदा हमारे सिर रहेगा ही । जबतक हिन्दुस्तानकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तब- तक यहाँसे अन्न और कपास बाहर भेजना ही नहीं चाहिए। इसके विपरीत हमारे देशसे बहुत-सा अन्न लड़ाईके समय बाहर भेजा गया। कपासके सम्बन्धमें हमने कितना बड़ा अपराध किया है उसका ज्ञान तो हमें आगे चलकर होगा । मिल मालिकोंसे हमें जो आखिरी मदद मांगनी है वह है मालकी शुद्धताके सम्बन्ध- में। उन्हें विदेशी सूतका बना माल देशी कहकर नहीं बेचना चाहिए और कपड़े में बेहद माँड़ी नहीं लगानी चाहिए। मुझे आशा है कि मालिक आपसमें सलाह करके करेंगे जिससे देश के हितकी रक्षा हो । इन बातोंके सम्बन्ध में ऐसा निर्णय किसका फायदा ? असहयोगसे धनी लोगोंके सिवा और किसको लाभ पहुँचेगा । असह्योगमें दंगे- फसाद या लड़ाई-झगड़े हुए तो उनमें कौन-कौनसे लोग शामिल होंगे ? इस तरह के दो प्रश्न एक पत्र लेखकने पूछे हैं। यदि असह्योगसे गरीबों को फायदा न पहुँचा तो उससे किसीको भी फायदा नहीं पहुँच सकता । असहयोगसे किसी भी योग्य संस्था अथवा व्यक्तिको हानि नहीं पहुँचेगी; बल्कि उससे सभीको लाभ पहुँचेगा । यह शस्त्र ऐसा है जिससे गरीब से गरीब आदमी के अधिकारकी रक्षा होगी। असहयोग में दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े होते ही नहीं; इसलिए उनमें कौन भाग लेगा यह प्रश्न ही नहीं उठता। यदि असहयोग में दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े हों तो वह असहयोग नहीं रह जाता । वहाँ असहयोग समाप्त हो जाता है । यदि देश में दंगे-फसाद<noinclude></noinclude> 264t6tyxu6f94wnce351cgn31kj25ta 674551 674547 2026-08-27T05:30:45Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मुझे आशा है कि अन्य मिल-मालिक भी श्री अम्बालालका अनुकरण कर स्वदेशी आन्दोलनमें सहायक होंगे। कपड़ेके व्यापारियोंने तो मुझे यहाँतक बताया है कि कपड़ेके वर्तमान भाव न बढ़ाये जायें [वे घटाये जाने चाहिए]। वे आज तो जापानी मिलोंके मालके भावोंकी अपेक्षा भी ऊँचे हैं। मिल-मालिकोंको इस सम्बन्धमें सलाह करके कोई निर्णय अवश्य करना चाहिए। उनको यह जाँच करनी चाहिए कि देशमें कितने कपड़ेकी जरूरत है। उसको देखकर ही उन्हें दूसरे देशोंसे कपड़ेके आर्डर लेने चाहिए। यहाँसे दूसरे देशोंको सूत भी बहुत जाता है। उसके निर्यातमें भी आवश्यक फेरफारकी जरूरत होगी। सम्भव है कि इस मामलेमें और भी अधिक विचार करनेकी जरूरत हो। कुछ लोगोंको ऐसा लगेगा कि दूसरे देशोंके लोगोंको हमारे कपड़ेकी जबतक माँग है तबतक जितना कपड़ा हम आजतक उनको देते आये हैं उतना तो हमें उनको देना ही पड़ेगा। हमारी स्थिति इंग्लैंडकी स्थितिसे भिन्न है। इंग्लैंड और हमारे बीचके व्यापारमें एक तरहकी जबरदस्ती है। शायद दूसरे देशोंके साथ हमारे व्यापारमें यह जबरदस्ती न हो। दूसरे देशोंके साथ हमारे व्यापारिक सम्बन्धोंका मामला एक भिन्न और नाजुक मामला है। तीन बातोंके बारेमें कोई सन्देह नहीं है। अफीमका व्यापार नितान्त अनीतियुक्त है। इस सम्बन्धमें भारत सरकारने जो अन्याय किया है उसमें हम पूरी तरह शामिल रहे हैं। इसमें हमने चीनको नुकसान पहुँचाकर जो पाप किया है वह तो सदा हमारे सिर रहेगा ही। जबतक हिन्दुस्तानकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तबतक यहाँसे अन्न और कपास बाहर भेजना ही नहीं चाहिए। इसके विपरीत हमारे देशसे बहुत-सा अन्न लड़ाईके समय बाहर भेजा गया। कपासके सम्बन्धमें हमने कितना बड़ा अपराध किया है उसका ज्ञान तो हमें आगे चलकर होगा। मिल-मालिकोंसे हमें जो आखिरी मदद माँगनी है वह है मालकी शुद्धताके सम्बन्धमें। उन्हें विदेशी सूतका बना माल देशी कहकर नहीं बेचना चाहिए और कपड़ेमें बेहद माँड़ी नहीं लगानी चाहिए। मुझे आशा है कि मालिक आपसमें सलाह करके इन बातोंके सम्बन्धमें ऐसा निर्णय करेंगे जिससे देशके हितकी रक्षा हो। {{C|'''किसका फायदा?'''}} असहयोगसे धनी लोगोंके सिवा और किसको लाभ पहुँचेगा। असह्योगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े हुए तो उनमें कौन-कौनसे लोग शामिल होंगे? इस तरहके दो प्रश्न एक पत्र-लेखकने पूछे हैं। यदि असहयोगसे गरीबोंको फायदा न पहुँचा तो उससे किसीको भी फायदा नहीं पहुँच सकता। असहयोगसे किसी भी योग्य संस्था अथवा व्यक्तिको हानि नहीं पहुँचेगी; बल्कि उससे सभीको लाभ पहुँचेगा। यह शस्त्र ऐसा है जिससे गरीबसे-गरीब आदमीके अधिकारकी रक्षा होगी। असहयोगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े होते ही नहीं; इसलिए उनमें कौन भाग लेगा यह प्रश्न ही नहीं उठता। यदि असहयोगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े हों तो वह असहयोग नहीं रह जाता। वहाँ असहयोग समाप्त हो जाता है। यदि देशमें दंगे-फसाद<noinclude></noinclude> tpy74ltgictgbgicwdo5xw23byyh3ds पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३५ 250 184943 674555 641225 2026-08-27T05:46:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674555 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४०३}}</noinclude>हो जायें तो समझना चाहिए कि देशने असहयोगका त्याग कर दिया है। ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। यदि दंगे-फसाद होंगे तो बदमाश लोग एक क्षणके लिए ऐसा सोच सकते हैं कि उनसे उन्हें फायदा पहुँचेगा। संसारमें सदा ऐसा होता आया है। जिस पत्र-लेखकने उक्त दो सवाल पूछे हैं वह इस बातको भूल गया है कि यह लड़ाई धर्मकी है, आत्मशुद्धिकी है, ईश्वरसे डरनेकी है और मनुष्यसे निर्भय रहनेकी है। {{C|'''सरौतेके बीच सुपारी'''}} एक सहानुभूति रखनेवाले पारसी भाईने पारसियोंकी सभाके बाद कुछ शंकाएँ उठाई थीं। ये शंकाएँ विचारणीय हैं इसलिए मैं उनके सम्बन्धमें यहाँ संक्षेपमें विचार करता हूँ। ये भाई कहते हैं : :'''{{gap}}(१) आपके जैसे विचार सब नेताओंके नहीं हैं; क्या आप यह जानते हैं ? कदाचित् आप यह नहीं जानते कि बम्बई में पारसियोंके सम्बन्धमें जो सामान्य विचार प्रकट किये जाते हैं उनमें द्वेष-भावना होती है। इसको रोकने- के लिए आप क्या उपाय कर रहे हैं और आगे क्या उपाय करेंगे ? (२) पारसियों की स्थिति ऐसी ही है जैसे “सरौतेके बीच सुपारी" की होती है। उनमें पूरी देशभक्ति है, इसलिए वे देशका कार्य करना नहीं छोड़ सकते। उसी तरह वे अबतक जिस सुरक्षित व्यवस्थामें रहते आये हैं उसको खतरे में डालना भी उन्हें कठिन लगता है। यदि आपके हाथसे देशकी बागडोर निकल जाये अथवा आपकी मृत्युके बाद देशमें इस महान् जागृतिके परिणाम- स्वरूप लोगों में समभाव न रहे तो पारसी लोग अवश्य ही कुचले जायेंगे । ये दोनों शंकाएँ ऐसी नहीं हैं जिन्हें यों ही छोड़ दिया जाये। मैंने पारसियों के सम्बन्धमें जो विचार व्यक्त किये हैं वे विचार यदि समस्त समाजके न हों, मेरे अपने ही हों तो लेखकने ऊपर जो भय प्रकट किया है वह विचारणीय माना जाना चाहिए । यह बात तो सच है कि किसी-किसी क्षेत्रमें पारसियोंकी जो आलोचना की जाती है उसमें द्वेषभाव होता है । पारसियोंकी जाति बहुत छोटी जाति है इसलिए उनका दोष आसानीसे निगाहके सामने आ जाता है और उनके गुणोंपर परदा पड़ जाता है। इस कारण हमें सदा उनके गुणोंपर ही दृष्टि रखनी चाहिए। जब हम लोगोंके गुणोंको ही देखेंगे तभी उनपर हमारा प्रेम बढ़ेगा। पारसी लोग हमारे भाई हैं, यह समझकर हमें उनकी उदारता, धैर्यशीलता, विनय, बुद्धिमत्ता, आस्तिकता और भारी सादगीको अवश्य देखना चाहिए और उनके किसी भी ऐसे दोषको न देखना चाहिए जो हममें भी न हो । पारसी लोग भारतमें रहते हैं इससे भारतकी कोई हानि हुई है ऐसी कोई बात खयालमें आ ही नहीं सकती। उनके भारतमें आनेसे भारतको लाभ पहुँचा है, यह बात हम आसानीसे देख सकते हैं। पारसी लोगोंपर सबसे बड़ा आरोप तो यह है कि वे पाश्चात्य सभ्यताकी कोरी नकल कर रहे हैं और भारतीय सभ्यताको दिनपर-दिन छोड़ते जा रहे हैं । यदि हम गहराईसे सोचें तो हमें मालूम होगा कि यह बात भी सही नहीं है । उनपर पाश्चात्य सभ्यताका बहुत अवांछनीय असर हुआ है, Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> lohb3brjiwuvgudt6bmz0gh1euo3t9k 674599 674555 2026-08-27T07:59:26Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674599 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४०३}}</noinclude>हो जायें तो समझना चाहिए कि देशने असहयोगका त्याग कर दिया है। ये दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। यदि दंगे-फसाद होंगे तो बदमाश लोग एक क्षणके लिए ऐसा सोच सकते हैं कि उनसे उन्हें फायदा पहुँचेगा। संसारमें सदा ऐसा होता आया है। जिस पत्र-लेखकने उक्त दो सवाल पूछे हैं वह इस बातको भूल गया है कि यह लड़ाई धर्मकी है, आत्मशुद्धिकी है, ईश्वरसे डरनेकी है और मनुष्यसे निर्भय रहनेकी है। {{C|'''सरौतेके बीच सुपारी'''}} एक सहानुभूति रखनेवाले पारसी भाईने पारसियोंकी सभाके बाद कुछ शंकाएँ उठाई थीं। ये शंकाएँ विचारणीय हैं इसलिए मैं उनके सम्बन्धमें यहाँ संक्षेपमें विचार करता हूँ। ये भाई कहते हैं : :'''{{gap}}(१) आपके जैसे विचार सब नेताओंके नहीं हैं; क्या आप यह जानते हैं? कदाचित् आप यह नहीं जानते कि बम्बईमें पारसियोंके सम्बन्धमें जो सामान्य विचार प्रकट किये जाते हैं उनमें द्वेष-भावना होती है। इसको रोकनेके लिए आप क्या उपाय कर रहे हैं और आगे क्या उपाय करेंगे?''' :'''{{gap}}(२) पारसियोंकी स्थिति ऐसी ही है जैसे "सरौतेके बीच सुपारी" की होती है। उनमें पूरी देशभक्ति है, इसलिए वे देशका कार्य करना नहीं छोड़ सकते। उसी तरह वे अबतक जिस सुरक्षित व्यवस्थामें रहते आये हैं उसको खतरेमें डालना भी उन्हें कठिन लगता है। यदि आपके हाथसे देशकी बागडोर निकल जाये अथवा आपकी मृत्युके बाद देशमें इस महान् जागृतिके परिणाम-स्वरूप लोगोंमें समभाव न रहे तो पारसी लोग अवश्य ही कुचले जायेंगे।''' ये दोनों शंकाएँ ऐसी नहीं हैं जिन्हें यों ही छोड़ दिया जाये। मैंने पारसियोंके सम्बन्धमें जो विचार व्यक्त किये हैं वे विचार यदि समस्त समाजके न हों, मेरे अपने ही हों तो लेखकने ऊपर जो भय प्रकट किया है वह विचारणीय माना जाना चाहिए। यह बात तो सच है कि किसी-किसी क्षेत्रमें पारसियोंकी जो आलोचना की जाती है उसमें द्वेषभाव होता है। पारसियोंकी जाति बहुत छोटी जाति है इसलिए उनका दोष आसानीसे निगाहके सामने आ जाता है और उनके गुणोंपर परदा पड़ जाता है। इस कारण हमें सदा उनके गुणोंपर ही दृष्टि रखनी चाहिए। जब हम लोगोंके गुणोंको ही देखेंगे तभी उनपर हमारा प्रेम बढ़ेगा। पारसी लोग हमारे भाई हैं, यह समझकर हमें उनकी उदारता, धैर्यशीलता, विनय, बुद्धिमत्ता, आस्तिकता और भारी सादगीको अवश्य देखना चाहिए और उनके किसी भी ऐसे दोषको न देखना चाहिए जो हममें भी न हो। पारसी लोग भारतमें रहते हैं इससे भारतकी कोई हानि हुई है ऐसी कोई बात खयालमें आ ही नहीं सकती। उनके भारतमें आनेसे भारतको लाभ पहुँचा है, यह बात हम आसानीसे देख सकते हैं। पारसी लोगोंपर सबसे बड़ा आरोप तो यह है कि वे पाश्चात्य सभ्यताकी कोरी नकल कर रहे हैं और भारतीय सभ्यताको दिनपर-दिन छोड़ते जा रहे हैं। यदि हम गहराईसे सोचें तो हमें मालूम होगा कि यह बात भी सही नहीं है। उनपर पाश्चात्य सभ्यताका बहुत अवांछनीय असर हुआ है,<noinclude></noinclude> nglz124h0c2fuyrshf61yq4unlg4f6s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३६ 250 184944 674600 641226 2026-08-27T08:07:00Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674600 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>४०४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यह मैं स्वीकार करता हूँ । किन्तु यह असर जितना हिन्दुओं और मुसलमानोंपर हुआ है उतना ही पारसियोंपर भी हुआ है । किन्तु उन्होंने जो फेरफार किया है वह इस कारण स्पष्ट दिखाई देता है कि उनकी संख्या अधिक नहीं है और वे प्रायः बम्बई में ही रहते हैं। इसके विपरीत जो हिन्दू और मुसलमान बिलकुल अंग्रेज बन गये हैं, जहाँ-तहाँ बिखरे होनेसे निगाहमें कम आते हैं। मैं जो बात कह रहा हूँ उसको वे लोग पूरी तरह समझ जायेंगे जो इंग्लैंड हो आय हैं। वहाँ मैंने पारसियों, हिन्दुओं और मुसलमानोंमें कोई भी अन्तर नहीं देखा । वहाँ मुझे सभी पूरे अंग्रेज जान पड़े। किन्तु अब ? जैसा हिन्दुओं और मुसलमानोंमें परिवर्तन हुआ है वैसा ही परिवर्तन पारसियों में भी आरम्भ हुआ है । पारसी नवयुवक सादगीके मन्त्रको समझ गये हैं। पारसी लड़कियाँ खादी पहनने लगी हैं। खादी पहननेकी जिनकी हिम्मत नहीं होती, वे देशी मिलोंके कपड़े पहनने लगी हैं। मेरी मान्यता यह है कि जब पारसी लोगोंके मनके प्रवाहकी दशा बदलेगी तब क्षणभरमें महत्त्वपूर्ण फेरफार हो जायेगा । मेरे मनपर ऐसी छाप पड़ी है कि पारसी जाति कभी नमक हराम नहीं हो सकेगी। यह सम्भव है कि वह अल्प- संख्यक होनेसे हिन्दुओं और मुसलमानोंके समान मैदानमें आती हुई न जान पड़े; किन्तु मेरे मनसे यह बात नहीं निकलती कि उनके हाड़-माँसमें भी भारतीयता है और उन्हें भारतसे प्रेम है । पारसी लोग किसी मामलेमें पीछे रहे हों यह मैं तो जानता ही नहीं । इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानोंको यह उचित है कि वे पारसियोंसे प्रेम करें और उनके दोष न निकालें और न उनकी ओर संकेत ही करें। पारसी भाइयोंको डरनेकी कोई जरूरत नहीं है। जिन्होंने दूसरे लोगोंका कुछ नहीं बिगाड़ा है उनको किसी तरहका डर नहीं होना चाहिए। पैगम्बर जरतुश्तने यह शिक्षा दी है कि भलाईका बदला सदा भलाई होता है। एक छोटी जातिके मनमें जैसे भय होता है वैसे ही निडरता भी होती है। पारसियोंको यह जानकर कि उन्होंने भारतका कुछ बिगाड़ा नहीं है यह मान लेना चाहिए कि भारत उनका कोई अहित न करेगा। जिस जाति या मनुष्यने भारत के हितके विरुद्ध अपना स्वार्थ सिद्ध किया हो उसीको डरनेकी जरूरत है। निर्दोष मनुष्य अकेला भी हो तो भी उसे डरनेकी जरूरत नहीं। फिर यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी लड़ाई है ऐसा मानकर में पारसी भाई- बहनोंको विनयपूर्वक यह सलाह देता हूँ कि वे इस लड़ाईमें पूरे मनसे शामिल हो जायें। इस लड़ाईमें हमें एक-दूसरेपर विश्वास करना चाहिए। इस तरहका विश्वास उत्पन्न करनेका उपाय है अपने मनमें आत्मविश्वास पैदा करना और आत्मविश्वास ही स्वराज्य है । मर्यादाका उल्लंघन कोई सज्जन मेरे चित्र कृष्णके रूपमें छापकर बेच रहे हैं। एक भाईने मेरा ध्यान इस ओर खींचा है और इसमें मर्यादाका जो उल्लंघन होता है उसे रोकने के लिए मुझे लिखा है । मैंने ऐसा कोई चित्र नहीं देखा है। उसे देखनेकी मेरी इच्छा<noinclude></noinclude> l6rb9fkebgyrnusdgy90vs3ynbec1fu 674601 674600 2026-08-27T08:15:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674601 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|४०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यह मैं स्वीकार करता हूँ। किन्तु यह असर जितना हिन्दुओं और मुसलमानोंपर हुआ है उतना ही पारसियोंपर भी हुआ है। किन्तु उन्होंने जो फेरफार किया है वह इस कारण स्पष्ट दिखाई देता है कि उनकी संख्या अधिक नहीं है और वे प्रायः बम्बईमें ही रहते हैं। इसके विपरीत जो हिन्दू और मुसलमान बिलकुल अंग्रेज बन गये हैं, जहाँ-तहाँ बिखरे होनेसे निगाहमें कम आते हैं। मैं जो बात कह रहा हूँ उसको वे लोग पूरी तरह समझ जायेंगे जो इंग्लैंड हो आय हैं। वहाँ मैंने पारसियों, हिन्दुओं और मुसलमानोंमें कोई भी अन्तर नहीं देखा। वहाँ मुझे सभी पूरे अंग्रेज जान पड़े। {{C|'''किन्तु अब?'''}} जैसा हिन्दुओं और मुसलमानोंमें परिवर्तन हुआ है वैसा ही परिवर्तन पारसियोंमें भी आरम्भ हुआ है। पारसी नवयुवक सादगीके मन्त्रको समझ गये हैं। पारसी लड़कियाँ खादी पहनने लगी हैं। खादी पहननेकी जिनकी हिम्मत नहीं होती, वे देशी मिलोंके कपड़े पहनने लगी हैं। मेरी मान्यता यह है कि जब पारसी लोगोंके मनके प्रवाहकी दशा बदलेगी तब क्षणभरमें महत्त्वपूर्ण फेरफार हो जायेगा। मेरे मनपर ऐसी छाप पड़ी है कि पारसी जाति कभी नमक-हराम नहीं हो सकेगी। यह सम्भव है कि वह अल्पसंख्यक होनेसे हिन्दुओं और मुसलमानोंके समान मैदानमें आती हुई न जान पड़े; किन्तु मेरे मनसे यह बात नहीं निकलती कि उनके हाड़-माँसमें भी भारतीयता है और उन्हें भारतसे प्रेम है। पारसी लोग किसी मामलेमें पीछे रहे हों यह मैं तो जानता ही नहीं। इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानोंको यह उचित है कि वे पारसियोंसे प्रेम करें और उनके दोष न निकालें और न उनकी ओर संकेत ही करें। पारसी भाइयोंको डरनेकी कोई जरूरत नहीं है। जिन्होंने दूसरे लोगोंका कुछ नहीं बिगाड़ा है उनको किसी तरहका डर नहीं होना चाहिए। पैगम्बर जरतुश्तने यह शिक्षा दी है कि भलाईका बदला सदा भलाई होता है। एक छोटी जातिके मनमें जैसे भय होता है वैसे ही निडरता भी होती है। पारसियोंको यह जानकर कि उन्होंने भारतका कुछ बिगाड़ा नहीं है यह मान लेना चाहिए कि भारत उनका कोई अहित न करेगा। जिस जाति या मनुष्यने भारतके हितके विरुद्ध अपना स्वार्थ सिद्ध किया हो उसीको डरनेकी जरूरत है। निर्दोष मनुष्य अकेला भी हो तो भी उसे डरनेकी जरूरत नहीं। फिर यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी लड़ाई है ऐसा मानकर मैं पारसी भाई-बहनोंको विनयपूर्वक यह सलाह देता हूँ कि वे इस लड़ाईमें पूरे मनसे शामिल हो जायें। इस लड़ाईमें हमें एक-दूसरेपर विश्वास करना चाहिए। इस तरहका विश्वास उत्पन्न करनेका उपाय है अपने मनमें आत्मविश्वास पैदा करना और आत्मविश्वास ही स्वराज्य है। {{C|'''मर्यादाका उल्लंघन'''}} कोई सज्जन मेरे चित्र कृष्णके रूपमें छापकर बेच रहे हैं। एक भाईने मेरा ध्यान इस ओर खींचा है और इसमें मर्यादाका जो उल्लंघन होता है उसे रोकनेके लिए मुझे लिखा है। मैंने ऐसा कोई चित्र नहीं देखा है। उसे देखनेकी मेरी इच्छा<noinclude></noinclude> au1yx01fbpmh4eodamqopl3g3sbcth8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३७ 250 184945 674602 641227 2026-08-27T08:16:47Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 674602 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>टिप्पणियाँ ४०५ भी नहीं है। मैं मानता हूँ कि ऐसे कार्योंसे मर्यादा भंग होती है । हम भगवान् श्रीकृष्णको पूर्ण पुरुषोत्तमके रूपमें देखते हैं। हम उनको ईश्वरका अवतार मानते हैं । हम उन्हें 'श्रीमद्भगवद्गीता का पूर्ण योगी मानते हैं । हम लक्ष्मीजीको सामान्य सांसा- रिक नारी नहीं मानते। इसके विपरीत हम उन्हें भगवान्‌की सम्पूर्ण माया और संसार- की धात्री के रूपमें देखते हैं। मुझे विष्णुका और मेरी पत्नीको लक्ष्मीका रूप दिया जाये तो इससे हम दोनों ही लज्जा अनुभव करते हैं । यदि हम इस तरहका रूप दिये जानेसे भ्रममें पड़ जायें तो हम पाप के भागी होंगे। मुझमें क्या-क्या अपूर्णताएँ हैं इसका मुझे पूरी तरह भान है । मैं परिपूर्णताका अभिलाषी एक तुच्छ मुमुक्षु प्राणी हूँ। मेरी पत्नी अनेक विडम्बनाओंको सहती हुई मेरे साथ-साथ चलनेका प्रयत्न करती है और वह केवल एक साधारण स्त्री है । मैं मानता हूँ कि हमारा गार्हस्थ जीवन सुखमय है, किन्तु मैं चाहता हूँ कि मेरी आँखें सेवा धर्मका पालन करते-करते ही बन्द हों, इसके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। लोकमें यश पानेका मुझे तनिक भी मोह नहीं । मेरी प्रवृत्ति ही लोकयश कमानेकी नहीं है । मेरी समस्त प्रवृत्ति श्रेय प्राप्ति के निमित्त ही है । मैं जो कुछ भी करता हूँ, धर्म मानकर ही करता हूँ, मुझे अपनी अन्तरात्मामें इस बातका निश्चय है । और जहाँ कोई भी कार्य धर्म मानकर किया जाता है वहाँ सम्मानरूपी पुरस्कार पानेकी आशा होती ही नहीं। लोक-सम्मान प्राप्त करनेमें एक क्षण भी गँवाना मुझे अखरता है । इसलिए मुझे तो अपने चित्रका बेचा जाना भी पसन्द नहीं है; तब मुझे पूर्ण पुरुषके रूपमें चित्रित किया जाये अथवा मेरी पत्नीको लक्ष्मीका रूप दिया जाये यह बात मुझे केवल असह्य ही हो सकती है। और जो लोग मेरा सम्मान करना चाहते हैं वे मैंने जो सिद्धान्त लोगोंके सम्मुख रखे हैं उनको पूरी तरह कार्यान्वित करके ही ऐसा कर सकते हैं । जो लोग मुँह से मेरा सम्मान करते हैं अथवा मेरा चित्र अपने पास रखते हैं; किन्तु मेरे सिद्धा- न्तोंका अनादर करते हैं, वे मेरा अपमान करते हैं और धार्मिक पुरुषोंकी मूर्तियोंके रूपमें मुझे चित्रित करके मर्यादाका उल्लंघन करते हैं। पुराने जमानेके एक मनुष्यने कहा है कि हम किसी भी मनुष्यको उसकी मृत्युसे पहले भला नहीं मान सकते। जो मृत्यु सामने खड़ी होनेपर भी ईश्वरको न भूले उसीको मोक्ष मिलता है। जो जीवन- पर्यंत भलाई करना न छोड़े वही भला माना जा सकता है । एक शंका भावनगरसे दो भाइयोंने पत्र लिखकर मुझसे पूछा है कि महासभाका प्रतिनिधि कौन हो सकता है । जो असहयोगी नहीं है क्या वह प्रतिनिधि नहीं हो सकता ? महासभा तो राष्ट्रीय संस्था है । यह बात बिलकुल सच है । जहाँ मतदाता असहयोगी ही हों वहाँ सहयोगी प्रति- निधि नहीं चुना जा सकता । किन्तु यदि महासभा में सहयोगी मतदाता हों और उनके मत अधिक आयें अथवा एक सहयोगीको चुनने योग्य मत इकट्ठे किये जा सकें तो सहयोगी अवश्य चुना जा सकता है और उसका चुनाव बिलकुल नियमानुसार माना जायेगा ।<noinclude></noinclude> raeowgk5gp1mkuv42tl1bt44bfrbg7h 674607 674602 2026-08-27T08:25:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 674607 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|४०५}}</noinclude>भी नहीं है। मैं मानता हूँ कि ऐसे कार्योंसे मर्यादा भंग होती है। हम भगवान् श्रीकृष्णको पूर्ण पुरुषोत्तमके रूपमें देखते हैं। हम उनको ईश्वरका अवतार मानते हैं। हम उन्हें 'श्रीमद्भगवद्गीता'का पूर्ण योगी मानते हैं। हम लक्ष्मीजीको सामान्य सांसारिक नारी नहीं मानते। इसके विपरीत हम उन्हें भगवान्‌की सम्पूर्ण माया और संसारकी धात्रीके रूपमें देखते हैं। मुझे विष्णुका और मेरी पत्नीको लक्ष्मीका रूप दिया जाये तो इससे हम दोनों ही लज्जा अनुभव करते हैं। यदि हम इस तरहका रूप दिये जानेसे भ्रममें पड़ जायें तो हम पापके भागी होंगे। मुझमें क्या-क्या अपूर्णताएँ हैं इसका मुझे पूरी तरह भान है। मैं परिपूर्णताका अभिलाषी एक तुच्छ मुमुक्षु प्राणी हूँ। मेरी पत्नी अनेक विडम्बनाओंको सहती हुई मेरे साथ-साथ चलनेका प्रयत्न करती है और वह केवल एक साधारण स्त्री है। मैं मानता हूँ कि हमारा गार्हस्थ जीवन सुखमय है, किन्तु मैं चाहता हूँ कि मेरी आँखें सेवा धर्मका पालन करते-करते ही बन्द हों, इसके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। लोकमें यश पानेका मुझे तनिक भी मोह नहीं। मेरी प्रवृत्ति ही लोकयश कमानेकी नहीं है। मेरी समस्त प्रवृत्ति श्रेय प्राप्तिके निमित्त ही है। मैं जो-कुछ भी करता हूँ, धर्म मानकर ही करता हूँ, मुझे अपनी अन्तरात्मामें इस बातका निश्चय है। और जहाँ कोई भी कार्य धर्म मानकर किया जाता है वहाँ सम्मानरूपी पुरस्कार पानेकी आशा होती ही नहीं। लोक-सम्मान प्राप्त करनेमें एक क्षण भी गँवाना मुझे अखरता है। इसलिए मुझे तो अपने चित्रका बेचा जाना भी पसन्द नहीं है; तब मुझे पूर्ण पुरुषके रूपमें चित्रित किया जाये अथवा मेरी पत्नीको लक्ष्मीका रूप दिया जाये यह बात मुझे केवल असह्य ही हो सकती है। और जो लोग मेरा सम्मान करना चाहते हैं वे मैंने जो सिद्धान्त लोगोंके सम्मुख रखे हैं उनको पूरी तरह कार्यान्वित करके ही ऐसा कर सकते हैं। जो लोग मुँहसे मेरा सम्मान करते हैं अथवा मेरा चित्र अपने पास रखते हैं; किन्तु मेरे सिद्धान्तोंका अनादर करते हैं, वे मेरा अपमान करते हैं और धार्मिक पुरुषोंकी मूर्तियोंके रूपमें मुझे चित्रित करके मर्यादाका उल्लंघन करते हैं। पुराने जमानेके एक मनुष्यने कहा है कि हम किसी भी मनुष्यको उसकी मृत्युसे पहले भला नहीं मान सकते। जो मृत्यु सामने खड़ी होनेपर भी ईश्वरको न भूले उसीको मोक्ष मिलता है। जो जीवन-पर्यंत भलाई करना न छोड़े वही भला माना जा सकता है। {{C|'''एक शंका'''}} भावनगरसे दो भाइयोंने पत्र लिखकर मुझसे पूछा है कि महासभाका प्रतिनिधि कौन हो सकता है। :'''{{gap}}जो असहयोगी नहीं है क्या वह प्रतिनिधि नहीं हो सकता? महासभा 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-अन्तर्राष्ट्रीय अफीम-सम्मेलनको, २३६; -अखबारोंको, २४३; -एनी बेसेंटके जन्म-दिवसपर, २३४; -गुजराती पत्रकारोंको, २९८-९९; 'गुण सुन्दरीको', २३३; -ट्रान्सवालके भारतीयोंको, २६१; तमिलनाड परिषद् तिरुवन्नामलईको, ३४९; -देवचन्द पारेखको, ४६३-६४; -'बंगाली' को, ३०२; -'बॉम्बे क्रॉनिकल' को ३६०; -लाहौरके 'हिन्दू' को, १६०; -'वर्ल्ड टुमारो'को, ३४३-४४, -संयुक्त प्रान्त राजनीतिक परिषद्, गोरखपुरको, २८७-८८; -'सांझ वर्तमान'को १०१; -'स्टेट्समैन' को, २४२}} {{outdent|सम्मति, मॉडर्न स्कूलकी दर्शक-पुस्तिका में, ३३९}} {{c|'''विविध'''}} {{gap}}अन्तःकरणकी आड़ में २४-२५; अपरिवर्तनवादियोंकी दशा, ३८९-९१; अपरिवर्तनवादियों के साथ बातचीत, ३१०- १४; अब क्या करें?, ४०२-३; अब्राह्मण, ६२९; अविस्मरणीय, ७३-६; असफलताके कारण, १४७-५२; असहयोगीका कर्त्तव्य, {{Multicol-break}} २४५-४६; असहयोगी विद्यार्थी, ४७६-७९; अहुरमज्द और अहरमन, ४८२-८३; आँकड़ोंपर विचार, ५१-५२; आधे घंटेका अभ्यास, २०२-३; इलाहाबाद और जबलपुर, २५४; ईश्वर एक है, १९०-९२; ईश्वर हम सबकी सहायता करे, ३८०-८२ ; उनके प्रति हमारा कर्त्तव्य, २०४-५; उपवासकी कहानी, २१२-१६; एक रास्ता, २५९- ६१; एककी सो देशकी ३६६-६७ ; एक चेतावनी, ४५१; एन्ड्रयूजके साथ बातचीत २४७-५२; कताई-सदस्यता, २५३; कपास बचाओ, ४३७-३८; कला और राष्ट्रीय विकास, ४५४; कसौटीपर, ८५- ८८, ३५७-६०; काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्, ६२६-२७; काठियावाड़ियोंसे, ५७१-७२; काम नहीं तो राय नहीं, २१७-२०; कार्य समिति, ५७७-७८; किस आशासे, ४३५-३७; केनियाकी शिकायत, ३०५-६, केनियाके हैरी थुकू, ४२४; कैसे करना चाहिए, ५६२-६३; कोहाटका दुष्काण्ड, ४७०-७२; क्या अस्पृश्यताका बचाव हो सकता है, ४२३-२४; क्या गुजरात हार जायेगा, २३५; क्या हममें एकता होगी, ३८५-८८; क्षमा प्रार्थना, १२; ख्वाजा हसन निजामी के साथ बातचीत, २५५-५७; गंगाबहन वैद्यके लिए पुस्तकों के सम्बन्ध में टिप्पणी, २५२-५३; गांधीजी और स्वराज्यवादियोंका संयुक्त वक्तव्य, ३०७-८; गांधीजीका खुलासा, १८४; गांधीजीके लिए या देशके लिए, ११-१२; धर्म, गुजरातका ३६८-६९; गुरुकुल कांगड़ी, २५४; गुलबर्गाका पागलपन, ४८- ५१; घूमता चक्र, ६२८; जी॰ रामचन्द्रन्‌के साथ बातचीत, २६४-७४; तपकी महिमा, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5gko1pd89aofbha9hve9flkdlrzfm7a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf/६९२ 250 185175 674432 643250 2026-08-26T16:05:54Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674432 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} २४१; तेरह आदेश, ४३४; दक्षिण भारत के बाढ़-पीड़ितोंको सहायता, ५५; दादाभाई नौरोजी की जयन्ती, १०९-११; देश-भक्तिके आवेश में पागलपन, ४७३-७४; दो दृश्य, २९१-९३; दो पहलू, ५२-५४; दो प्राचीन पुस्तकें, ११२; धर्म के लिए 'अधर्म' २०६; ध्वजको झुकायातक नहीं, ४१४-१८; 'नवजीवन' के पाठकोंसे, २०७; नोटिस?, ६२२-२५, पतितोंके लिए, ७९-८०; पहली परीक्षा, ३३-३६; -प्रेमका नियम, २७७-७९; पाटीदार और अन्त्यज, ४५८-५९; पाठकोंसे, २२२-२३; पूनाके कार्यकर्त्ताओंके साथ चर्चा, ९७ ९९; फीजीकी वह रिपोर्ट ४२२; बनारसमें कताई, ७७-७८; बम्बईका खादी भण्डार, ७७; बम्बईकी उदारता, १११-१२; बम्बईके महिला शिष्टमण्डलको उत्तर २३५; बेलगाँवके संस्मरण [-१] ५५८-६१; [-२], ५७८-८१; बोल्शेविज्मका अर्थ, ५६५, बोलशेविज्म या आत्मसंयम १९-२१; भाई परमानन्दके सन्देशका उत्तर २३६; मनसे और बेमनसे, ५७२-७३; मलाबार संकट निवारण, २-४; महादेव देसाई के साथ बातचीत १८७-८८; मार्गकी काठिनाइयाँ, २६-२८; मेरा अवलम्ब, २३८-३९; मेरा असन्तोष, २९९-३००; {{Multicol-break}} मेरा पथ, ४५२-५३; मेरी आस्था, ६२२; मेरी पंजाब यात्रा, ४४४-५१; मौन-दिवसकी टीप १६६; राजद्रोहात्मक किसे कहें?, ४२०-२१; राष्ट्रवादके सम्बन्ध में सचाई, ३९३-९४; वास्तविकताएँ, १२७-३२; विद्यार्थी क्या करें?, ३७०-७२; विरोधी मित्र, ४००-१; विविध विषय, ४०३-४; शक्तिका अपव्यय, २१-२४; शाबाश!, ६२५-२६; शिक्षक और चरखेकी शिक्षा, ५; शौकत अलीसे बातचीत, १९४-९७; श्रद्धाकी परीक्षा, २०७ ९; सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि, ६३०-३४; सफलताकी कुंजी, २९६-९८; सबसे बड़ा प्रश्न, १७७-८१; समझौता, ३२९-३४; समझौतेपर टिप्पणियाँ, ३३४-३८; समयका मूल्य, ३१६-१८; समयकी पाबन्दी, ३०३-४; सूतकी जाँच, १०८-९; स्थगित करें या त्याग दें?, ४१९-२०; स्पष्टीकरण, १८२-८३; स्वराज्यके व्यापारी, ६१३-१४; हब्शियोंकी सहानुभूति, २८; हितों का संघर्ष, २९३-९६; -हिन्दू और मुसलमान २८१-८२; हिन्दू-मुस्लिम एकता, १४३-४७; हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी प्रस्तावका मसविदा, २२९-३०; हृदय परिवर्तन, २३२<noinclude></noinclude> 2ux40rtfkw66o7fqk5h8gkxy601xrbl 674434 674432 2026-08-26T16:06:58Z Richmishra14 6772 674434 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|६५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}} २४१; तेरह आदेश, ४३४; दक्षिण भारत के बाढ़-पीड़ितोंको सहायता, ५५; दादाभाई नौरोजी की जयन्ती, १०९-११; देश-भक्तिके आवेश में पागलपन, ४७३-७४; दो दृश्य, २९१-९३; दो पहलू, ५२-५४; दो प्राचीन पुस्तकें, ११२; धर्म के लिए 'अधर्म' २०६; ध्वजको झुकायातक नहीं, ४१४-१८; 'नवजीवन' के पाठकोंसे, २०७; नोटिस?, ६२२-२५, पतितोंके लिए, ७९-८०; पहली परीक्षा, ३३-३६; -प्रेमका नियम, २७७-७९; पाटीदार और अन्त्यज, ४५८-५९; पाठकोंसे, २२२-२३; पूनाके कार्यकर्त्ताओंके साथ चर्चा, ९७ ९९; फीजीकी वह रिपोर्ट ४२२; बनारसमें कताई, ७७-७८; बम्बईका खादी भण्डार, ७७; बम्बईकी उदारता, १११-१२; बम्बईके महिला शिष्टमण्डलको उत्तर २३५; बेलगाँवके संस्मरण [-१] ५५८-६१; [-२], ५७८-८१; बोल्शेविज्मका अर्थ, ५६५, बोलशेविज्म या आत्मसंयम १९-२१; भाई परमानन्दके सन्देशका उत्तर २३६; मनसे और बेमनसे, ५७२-७३; मलाबार संकट निवारण, २-४; महादेव देसाई के साथ बातचीत १८७-८८; मार्गकी काठिनाइयाँ, २६-२८; मेरा अवलम्ब, २३८-३९; मेरा असन्तोष, २९९-३००; {{Multicol-break}} मेरा पथ, ४५२-५३; मेरी आस्था, ६२२; मेरी पंजाब यात्रा, ४४४-५१; मौन-दिवसकी टीप १६६; राजद्रोहात्मक किसे कहें?, ४२०-२१; राष्ट्रवादके सम्बन्ध में सचाई, ३९३-९४; वास्तविकताएँ, १२७-३२; विद्यार्थी क्या करें?, ३७०-७२; विरोधी मित्र, ४००-१; विविध विषय, ४०३-४; शक्तिका अपव्यय, २१-२४; शाबाश!, ६२५-२६; शिक्षक और चरखेकी शिक्षा, ५; शौकत अलीसे बातचीत, १९४-९७; श्रद्धाकी परीक्षा, २०७ ९; सदस्यताकी नई शर्त कार्यान्वित करनेकी विधि, ६३०-३४; सफलताकी कुंजी, २९६-९८; सबसे बड़ा प्रश्न, १७७-८१; समझौता, ३२९-३४; समझौतेपर टिप्पणियाँ, ३३४-३८; समयका मूल्य, ३१६-१८; समयकी पाबन्दी, ३०३-४; सूतकी जाँच, १०८-९; स्थगित करें या त्याग दें?, ४१९-२०; स्पष्टीकरण, १८२-८३; स्वराज्यके व्यापारी, ६१३-१४; हब्शियोंकी सहानुभूति, २८; हितों का संघर्ष, २९३-९६; -हिन्दू और मुसलमान २८१-८२; हिन्दू-मुस्लिम एकता, १४३-४७; हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी प्रस्तावका मसविदा, २२९-३०; हृदय परिवर्तन, २३२ {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 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{{outdent|अन्तरात्मा की आवाज, २४-२५, ३६}} {{outdent|अन्ता, लक्ष्मीभाई, ५४१}} {{outdent|अन्त्यज, २, ८, ५६७-९, ६१५; -और पाटीदार, ४५८-५९; देखिए अस्पृश्य}} {{outdent|अन्सारी, डॉ॰ मु॰ अ॰, ५०, १६६, २१५, २३१, २५८, ३१८-९, ३२६, ३५४, ३६१, ३८५, ३९७, ४३९, ४४७; -द्वारा कताई, २०३}} अपरिवर्तनवादी, -[दियों] का असहयोगके स्थगनके बाद कर्त्तव्य, २७७-७९,}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}३८९-९०, ४१४-१५, ४६८-६९, ४८०, ४८२-८३, ४८८, ४९०-२}} {{outdent|अपर्णादेवी, ८६, ८८}} {{outdent|अफीम, -का व्यापार, २५०-५१, ५२०; -पर कांग्रेसका प्रस्ताव, ५३८-३९; -सम्मेलनको सन्देश, २३६}} {{outdent|अबूबकर, ५९३}} {{outdent|अब्दुल गनी, १३५}} {{outdent|अब्राह्मण सम्मेलन, ६२९}} {{outdent|अभ्यंकर, एस॰ बी॰, ५२८, ५३०}} {{outdent|अमीर अली, ९१, १९२}} {{outdent|अमीरचन्द, ३५१}} {{outdent|अय्यंगार, एस॰ श्रीनिवास, २१७, ३६५, ४८५}} {{outdent|अय्यर, डॉ॰ सुब्रह्मण्यम्, ५०४-५२५}} {{outdent|अय्यर, सर पी॰ एस॰ शिवस्वामी, ३६५}} {{outdent|अराजकतावादी, ४५३; -और स्वराज्यवादी ३३१; -[दियों]के बारेमें गांधीजीके विचार, ३०९; -से गांधीजीकी अपील, २९५, ४३२, ५२२}} {{outdent|अरुन्नसा, तारामती, ५४०}} {{outdent|अर्जुन, ९३-९४, १००}} {{outdent|अर्थशास्त्र, -और नैतिक मूल्य, ५०८-९}} {{outdent|अ'''र्ली जोरोस्ट्रियनिज्म''', ९०}} {{outdent|'''अल-कलाम''', शिबली-कृत, ९१, १३५}} {{outdent|'''अल फारूक''', ९१}} {{outdent|अलीबन्धु, २०, १००, १७४, २८३, ३७८, ४२९, ४३९, ४४७; -द्वारा कताई, १५; देखिए शौकत अली और मुहम्मद अली भी}} {{outdent|अली साबरी, ५२९}} {{outdent|अवारी, मंचरशा, १२२}} {{outdent|'''अवेस्ता''', देखिए '''जेन्द-अवेस्ता'''}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> n581x40qst8jzh2abstwl5hout86n5f 674477 674476 2026-08-26T17:16:25Z Richmishra14 6772 674477 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{c|'''अ'''}} {{outdent|अंगद, ११७}} {{outdent|अंग्रेज, -और साम्राज्यवाद, १९-२०; -[ ों] की सेवावृत्ति, ११२; -के प्रति गांधीजीके मनमें कोई दुर्भावना नहीं, ६५, ७५-७६, २३१, २७९, ४९२, ५२४}} {{outdent|अंग्रेजी, -का स्थान, ५१५}} {{outdent|अंग्रेजी शासन, २९४}} {{outdent|अकाली ३८२, ५२३, ५७८}} {{outdent|अखबारोंका महत्त्व, ६११}} {{outdent|अखा भगत, ५६९}} {{outdent|अखिल भारतीय देशी रियासत परिषद्, बेलगाँव में, ५५५-५६}} {{outdent|अजमलखाँ हकीम, ५०, १५६, १६६, १८२, १८८, १९४, १९७, २००, २१४, २४०, ३२५, ३६५, ३८४, ४२९, ४३८-९, ४४७}} {{outdent|अडाजानिया, सोराबजी, ३९९}} {{outdent|अणे, ५७७}} {{outdent|अनन्तराम, ४९३}} {{outdent|अनिरुद्ध, ६०३}} {{outdent|अन्तरात्मा की आवाज, २४-२५, ३६}} {{outdent|अन्ता, लक्ष्मीभाई, ५४१}} {{outdent|अन्त्यज, २, ८, ५६७-९, ६१५; -और पाटीदार, ४५८-५९; देखिए अस्पृश्य}} {{outdent|अन्सारी, डॉ॰ मु॰ अ॰, ५०, १६६, २१५, २३१, २५८, ३१८-९, ३२६, ३५४, ३६१, ३८५, ३९७, ४३९, ४४७; -द्वारा कताई, २०३}} अपरिवर्तनवादी, -[दियों] का असहयोगके स्थगनके बाद कर्त्तव्य, २७७-७९,}} {{Multicol-break}} {{outdent|{{gap}}३८९-९०, ४१४-१५, ४६८-६९, ४८०, ४८२-८३, ४८८, ४९०-२}} {{outdent|अपर्णादेवी, ८६, ८८}} {{outdent|अफीम, -का व्यापार, २५०-५१, ५२०; -पर कांग्रेसका प्रस्ताव, ५३८-३९; -सम्मेलनको सन्देश, २३६}} {{outdent|अबूबकर, ५९३}} {{outdent|अब्दुल गनी, १३५}} {{outdent|अब्राह्मण सम्मेलन, ६२९}} {{outdent|अभ्यंकर, एस॰ बी॰, ५२८, ५३०}} {{outdent|अमीर अली, ९१, १९२}} {{outdent|अमीरचन्द, ३५१}} {{outdent|अय्यंगार, एस॰ श्रीनिवास, २१७, ३६५, ४८५}} {{outdent|अय्यर, डॉ॰ सुब्रह्मण्यम्, ५०४-५२५}} {{outdent|अय्यर, सर पी॰ एस॰ शिवस्वामी, ३६५}} {{outdent|अराजकतावादी, ४५३; -और स्वराज्यवादी ३३१; -[दियों]के बारेमें गांधीजीके विचार, ३०९; -से गांधीजीकी अपील, २९५, ४३२, ५२२}} {{outdent|अरुन्नसा, तारामती, ५४०}} {{outdent|अर्जुन, ९३-९४, १००}} {{outdent|अर्थशास्त्र, -और नैतिक मूल्य, ५०८-९}} {{outdent|अ'''र्ली जोरोस्ट्रियनिज्म''', ९०}} {{outdent|'''अल-कलाम''', शिबली-कृत, ९१, १३५}} {{outdent|'''अल फारूक''', ९१}} {{outdent|अलीबन्धु, २०, १००, १७४, २८३, ३७८, ४२९, ४३९, ४४७; -द्वारा कताई, १५; देखिए शौकत अली और मुहम्मद अली भी}} {{outdent|अली साबरी, ५२९}} {{outdent|अवारी, मंचरशा, १२२}} {{outdent|'''अवेस्ता''', देखिए '''जेन्द-अवेस्ता'''}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> rk19igxsw2m5r0ogme477br83f5k1he पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४० 250 186308 674519 644659 2026-08-26T20:06:29Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674519 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२०८. नैतिक मसला'''}}}} {{Gap}}नैतिक आधारसे स्खलित होने का मतलब है, धर्मके धरातलसे च्युत हो जाना। धर्म नैतिकताकी अवहेलना करके चले ऐसा कुछ सम्भव ही नहीं है। उदाहरण के लिए, मनुष्य झूठा, निष्ठुर या संयमहीन होते हुए ईश्वरका कृपापात्र कभी नहीं हो सकता। बम्बई में असहयोगसे हमदर्दी रखनेवाले लोगोंने अपना नैतिक सन्तुलन खो दिया। वे उन पारसियों और ईसाइयोंपर क्रुद्ध हो उठे, जो युवराजके स्वागत समारोहमें शरीक हुए थे और उन्होंने उन्हें "एक सबक सिखाने" की कोशिश की। उन्होंने वैर और बदलेको न्योता दिया और वही उन्हें मिला। १७ तारीखके बाद तो मारकाटकी एक खासी बाजी-सी लग गई, जिसमें फायदा तो वास्तवमें किसीका भी नहीं हुआ, हाँ, हानि अलबत्ता सबकी हुई। स्वराज्यका यह रास्ता नहीं है। भारत बोल्शेविज्म, विप्लववाद नहीं चाहता। यहाँके लोग इतने शान्तिप्रिय हैं कि वे अराजकताको सहन ही नहीं कर सकते। वे तो उसीके आगे घुटने टेक देंगे जो तथाकथित शान्तिकी स्थापना कर दे। भारतीयोंकी इस मनोवृत्तिको आपको समझना चाहिए। शान्तिके पीछे इस तरह पड़ जाना अच्छा है या बुरा, इसकी छानबीनकी जरूरत यहाँ नहीं। आम तौरपर भारत के मुसलमान दुनिया के दूसरे मुल्कोंके मुसलमानोंसे बिलकुल ही भिन्न हैं। भारतके वायुमण्डलमें रहने के कारण दूसरे देशोंके अपने धर्म-भाइयोंकी बनिस्बत उनके मिजाजमें ज्यादा नरमी आ गई है। अपनी जानोमालपर किसी यथार्थ संकटको वे बहुत लम्बे अर्सेतक बर्दाश्त नहीं कर सकते। और हिन्दुओंके मिजाजकी नरमी तो मशहूर ही है। वे लगभग दयनीय स्थितितक नरम हैं। पारसी और ईसाई भी कलहकी अपेक्षा शान्तिके ही अधिक प्रेमी हैं। सच तो यह है कि धर्मको हमने प्रायः शान्तिका सेवक ही बना लिया है। यह मनोवृत्ति हमारी कमजोरी भी है, और साथ ही हमारा बल भी। हमारी इस मनोवृत्तिका जो उत्तम भाग है, धार्मिक भाग है, उसीका पोषण हमें करना चाहिए। “धर्मके मामलेमें कोई दबाव न होना चाहिए।" क्या हमारे लिए स्वदेशी-व्रतका पालन करना, अतएव खादी पहनना, धर्म नहीं है ? परन्तु अगर दूसरे लोगोंका धर्म यह न चाहता हो कि स्वदेशीको अपनायें, तो हमें उन्हें इसके लिए मजबूर न करना चाहिए। ऐसा करके हमने 'कुरान शरीफ' में दोहराये गये विश्वजनीन सिद्धान्त के प्रतिकूल आचरण किया है; और उस सिद्धान्तका यह अर्थ नहीं है कि धर्मको छोड़कर दूसरे मामलोंमें जबर्दस्ती की जाये। उस आयतका मतलब तो यह है कि जिस मजबपर हमारी पक्की श्रद्धा हो उसके लिए भी दूसरोंपर जबर्दस्ती करना अगर बुरा है तो उससे कम दर्जेके मामलोंमें ऐसा करना तो और भी बुरा है। इसलिए हम तो अपने प्रतिपक्षियोंको युक्तियाँ और दलीलें पेश करके ही समझा सकते हैं। और अधिकसे-अधिक हम उनके साथ अहिंसात्मक असहयोग कर सकते हैं, जैसा कि सरकार के साथ कर रहे हैं। लेकिन खानगी मामलोंमें हम उनके साथ<noinclude></noinclude> mdoqfhzgt221j0mcem6iejqodfzu954 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४१ 250 186309 674534 644660 2026-08-27T03:44:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 674534 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||नैतिक मसला| ५०९}}</noinclude>असहयोग नहीं कर सकते; क्योंकि हम उन लोगोंके साथ व्यक्तियोंके रूपमें तो असहयोग कर नहीं रहे हैं, जो सरकारी तन्त्र चलाते हैं; हम तो उनकी उस शासन- प्रणालीके साथ असहयोग कर रहे हैं । गवर्नरकी हैसियतसे सर जॉर्ज लॉयडको हम सरकारी काममें मदद देने से इनकार करते हैं; परन्तु एक अंग्रेज भाईके नाते हम सर जॉर्ज लॉयडको सामाजिक सेवाओंसे कभी वंचित नहीं कर सकते । मुझे यह कहते दुःख होता है कि यह शरारत हिन्दुओं और मुसलमानोंसे ही शुरू हुई। सामाजिक रूपसे लोगोंको तंग किया गया और उनके साथ जबर्दस्ती की गई। हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने हमेशा ही इन बातोंकी उतने जोरसे निन्दा नहीं की जितनी कि मैं कर सकता था । जब यह प्रवृत्ति आम बनने लगी थी तब मैं आन्दोलनसे अपनेको अलग कर सकता था । पर हमने शीघ्र ही अपने मार्गको स्थिति के अनुसार सुधार लिया। हम अधिक सहनशील हो गये । परन्तु आँखोंको स्पष्ट न दिखे, ऐसे रूपमें जबर्दस्ती चलती रही । मैंने उसे चलने दिया -- सोचा कि यह आप ही अपनी मौत मर जायेगी। परन्तु बम्बई में मैंने देखा कि वह मरी नहीं । १७ तारीखको तो उसने बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया । हमने अपने हाथों अपने पाँवपर कुल्हाड़ी मार ली। हमने खिलाफतके कामको और उसके साथ ही पंजाब और स्वराज्य के कामको भी नुकसान पहुँचाया। अब हमको अपनी भूल सुधारनी होगी और अल्पसंख्यक जातियोंको अच्छी तरह यकीन दिलाना होगा कि हम उनको जरा भी तंग न करेंगे। अगर ईसाई लोग हैट लगाना और अंग्रेज बनकर रहना पसन्द करते हैं, तो उन्हें इसकी आजादी होनी चाहिए। अगर पारसी अपने फेंटको ही पहनना चाहें, तो उन्हें हर तरहसे इसका हक है । अगर ये दोनों सरकार के साथ रहने में ही अपना हित समझते हों, तो हम सिर्फ दलीलोंसे समझाकर ही उनको गलतीसे विमुख कर सकते हैं, उनको मारपीट कर नहीं । हम जितनी ज्यादा जबर्दस्ती करेंगे उतनी ही अधिक सुरक्षा हम सरकारको प्रदान करेंगे; भले ही इसका कारण सिर्फ यही हो कि हमारी बनिस्बत सरकार के पास जबर्दस्ती करनेका ज्यादा कारगर साधन मौजूद है। अगर हम सरकार की अपेक्षा ज्यादा बलप्रयोग करते हैं, तो इसका मतलब होगा भारत-माताको और भी अधिक गुलामीमें जकड़ना । स्वराज्यका अर्थ है - हरएकको आजादी हो - छोटेसे-छोटे लोग भी अपनी मर्जी के मुताबिक चलें और रहें - उनकी स्वाधीनतामें बलपूर्वक कोई भी हस्तक्षेप न किया जाये । और यह अहिंसात्मक असहयोग स्वतन्त्र लोकमत तैयार करने और उसको प्रभावपूर्ण बनाने का ही उपाय है। यह स्पष्ट ही है कि जब देशमें पूर्ण मत-स्वातन्त्र्य होगा, तब बहुमत के अनुसार ही काम चलेगा। यदि हमारी संख्या कम हो, तो जोर- जबर्दस्ती के बावजूद हम अपने धर्मपर आरूढ़ रहकर सच्चे धर्मनिष्ठ सिद्ध हो सकते हैं। हज़रत मुहम्मद बहुमतके दबावको मानकर भी अपने धर्मपर दृढ़ बने रहे, और ज्यों ही बहुमत उनकी ओर हुआ, उन्होंने अपने अनुयायियोंसे साफ कह दिया कि "मजहब के मामले में जोर-जबर्दस्ती न होनी चाहिए।" शाब्दिक या शारीरिक रूपसे<noinclude></noinclude> r40r464mhfxwi7hv19kkt5p8dhzx39n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५४२ 250 186310 674542 644661 2026-08-27T04:50:35Z Shivaniya shaw 4129 /* अशोधित */ 674542 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|५१०| सम्पूर्ण गांधी वाङमय}}</noinclude>हिंसा करके हमें हजरत मुहम्मदके बतलाये मार्ग से भटकना नहीं चाहिए, और अपनी ही मूर्खतासे प्रगतिके चक्रको पीछे की ओर नहीं घुमाना चाहिए । {{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br> '''यंग इंडिया,''' २४-११-१९२१}} {{C|{{larger|'''२०९. बम्बईके नागरिकोंसे'''<ref>१. यह अंग्रेजीमें वे टु पीस' (शान्तिका मार्ग) शीर्षकसे छपा था और प्रारम्भिक टिप्पणी में बताया गया था कि यह गांधीजी द्वारा जारी की गई गुजराती अपीलका अनुवाद है ।</ref>}}}} {{Right|बम्बई<br> २६ नवम्बर, १९२१}} ईश्वरकी कृपासे एक बार फिर हमारे बीच शान्ति स्थापित हो गई है । अब हम एक-दूसरेका सिर फोड़ने, एक दूसरेपर पथराव करने और इमारतें जलानेमें नहीं लगे हुए हैं। फिर भी, हममें से कुछ लोग अब भी नाराज हैं, उनमें कटुता है और हमारे भीतर भय है । यह बात मिलनेवाले अनेक लोगों और पत्र लेखकोंकी भाषासे जाहिर होती है । हम तभी इस शान्तिको सच्ची शान्ति कह सकते हैं जब हमारे मन इन कलुषोंसे मुक्त हो जायें। ऐसी स्थिति उत्पन्न करनेके लिए पहला काम यह करना चाहिए कि हिन्दू और मुसलमान साफ दिलसे अपना अपराध स्वीकार करें। जिन्होंने पहले हाथ उठाया, दोषी उन्हींको माना जायेगा । यदि मैं अपनी बात किसीको अपशब्द कहकर शुरू करता हूँ तो उसके सारे नतीजे के लिए जिम्मेदार मैं ही होऊँगा । यदि हिन्दुओं और मुसलमानोंने लोगोंके सिरपरसे जबरदस्ती विदेशी टोपियाँ हटाकर या पत्थर चलाकर किसी वारदातकी शुरूआत की तो दोषी पक्ष उन्हींका है। इसके अलावा उनका बहुत भारी बहुमत है; और अधिकांशतः हिन्दुओं तथा मुसलमानोंने ही अहिंसाकी शपथ ली है। इसलिए पहले उन्हींको अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए । मैं यहाँपर कानूनकी निगाहसे जिम्मेदारीका विचार नहीं कर रहा हूँ। मैं तो केवल आदमी-आदमीके बीच पारस्परिक व्यवहारकी दृष्टिसे इस बातका विचार कर रहा हूँ । यदि पारसी और ईसाई, उनका जितना दोष है, उसे महसूस नहीं करते, तो स्थायी शान्ति प्रस्थापित करना कठिन है। जिस समय हिन्दुओं और मुसलमानोंने हिंसा शुरू की उस समय यदि पारसी और ईसाइयोंने जवाबमें हाथ न उठाया होता तो उन्हें देवदूत समझा जाता और उन्होंने संसारको अपने आत्मिक बलका अद्भुत परिचय दिया होता । वे अपने बचाव में हाथ उठाते, यह तो बिल्कुल ठीक था, किन्तु उन्होंने केवल अपना बचाव ही नहीं किया वरन वे भी क्रुद्ध हो उठे और आत्मरक्षाकी सीमाओंसे आगे बढ़ गये । उनमें से कुछने जरूरत से ज्यादा हिंसाका प्रयोग किया। और यदि वे उतना भर स्वीकार नहीं करते तो तत्काल हार्दिक शान्ति पाना कठिन होगा, क्योंकि इस तथ्य के बावजूद कि पारसियों और ईसाइयोंको उत्तेजित किया गया था, हिन्दू और मुसलमान<noinclude></noinclude> 0vnu89qjrpihsi0twykxu6xn815uypz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/५७७ 250 186490 674554 644852 2026-08-27T05:44:10Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||पत्र : चिमनलाल गुलाबचंद वोराको| ५४१}} {{gap}}वरदाचारीने मुझसे कहा तो था कि मैं आपसे कपाससे सम्बन्धित अध्याय लिखनेके लिए कहूँ; लेकिन मैंने उससे कहा कि वह आपको परेशान न करें। मैं जानता था कि आप बहुत ज्यादा व्यस्त होंगे । सभीको सप्रेम । {{rh|||आपका,}} {{rh|||बापू}} {{gap}}अंग्रेजी पत्र ( जी० एन० १५६२ ) की फोटो - नकलसे । {{c|'''५६०. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}} {{rh|||आश्विन सुदी १५, १९८२ [ २१ अक्तूबर, १९२६ ]}} भाई घनश्यामदासजी, {{gap}}आपका पत्र मीला है । आप कहते हैं ऐसे आश्रम खोलनेका यह समय नहि है । वायु बहोत गंदा है। कार्य करनेवाले न तेजस्वी हैं न चारित्रवान् । {{rh|||आपका,}} {{rh|||मोहनदास गांधी}} {{gap}}मूल पत्र (सी० डब्ल्यू ० ६१३७ ) से । {{gap}}सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला {{c|'''५६१. पत्र : चिमनलाल गुलाबचंद वोराको'''}} {{rh|||आश्विन सुदी १५, १९८२ [२१, अक्तूबर १९२६ ]}} भाई चिमनलालजी, {{gap}}आपका पत्र मीला है । षड्दर्शन समुच्चय ग्रंथ बोध, वेदांत इ० का निरीक्षण है । असल संस्कृत है । उसका अनुवाद गुजरातीमें प्रगट हुआ है। गुजराती पुस्तक बेचनेवालोंसे मीलना संभवित है । ग्रंथ कठिन है । उसमें केवल बुद्धिका प्रयोग है । {{rh|||आपका,}} {{rh|||मोहनदास गांधी}} श्रीयुत चिमनलाल गुलाबचंद वोरा श्रीमाली मोहल्ला रतलाम {{gap}}मूल पत्र ( जी० एन० ६३०१ ) की फोटो नकलसे । {{gap}}१. मूलमें पता अंग्रेजीमें दिया गया है ।<noinclude></noinclude> 7krxphgwhdczechm43ewk7zxk653pik पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६०२ 250 186517 674569 644881 2026-08-27T06:03:18Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५८६. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको '''}} {{Rh|||[ साबरमती ]}} {{Rh|||२९ अक्तूबर, १९२६}} <Br>प्रिय मित्र, {{Gap}}वजेसे आपके दक्षिण आफ्रिका जानेके निश्चयकी खबर पाकर मुझे बड़ी राहत मिली। एन्ड्रयूजने मुझे तार दिया था कि आपकी बीमारी और उसकी वजहसे शिष्ट- मण्डलमें आपके शामिल न होनेकी अफवाह फैली हुई है। उन्होंने यह भी बताया था कि इस अफवाहने हमारे देशभाइयोंको परेशानीमें डाल 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proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''५८६. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको '''}} {{Rh|||[ साबरमती ]}} {{Rh|||२९ अक्तूबर, १९२६}} <Br>प्रिय मित्र, {{Gap}}वजेसे आपके दक्षिण आफ्रिका जानेके निश्चयकी खबर पाकर मुझे बड़ी राहत मिली। एन्ड्रयूजने मुझे तार दिया था कि आपकी बीमारी और उसकी वजहसे शिष्ट- मण्डलमें आपके शामिल न होनेकी अफवाह फैली हुई है। उन्होंने यह भी बताया था कि इस अफवाहने हमारे देशभाइयोंको परेशानीमें डाल दिया है । अब आपके पत्र से रहा-सहा संशय भी दूर हो गया । वजेका तार मिलनेके तुरन्त बाद मैंने एन्ड्रयूज- को तार देकर आश्वस्त कर दिया था । {{Gap}}मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ कि सम्मेलनसे किसी बड़े परिणामकी आशा नहीं की जा सकती। लेकिन मुझे इतनी आशा तो है ही कि इससे भारतीयोंको दम लेनेका मौका मिल जायेगा । {{Gap}}आवारा कुत्तोंको मारनेके बारेमें मैंने जो विचार व्यक्त किये थे, उनसे अनेक लोग मुझसे विमुख हो गये हैं । लेकिन यह तो हमेशासे मेरी किस्मत ही रही है । {{Gap}}मैं जानता हूँ कि यह तूफान भी पिछले तूफानोंकी तरह शान्त हो जायेगा । {{Gap}}मुझे उम्मीद है कि आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा और आप दक्षिण आफ्रिकाके कठिन दौरेमें भी इसे सँभाल रख सकेंगे । आपके शिष्टमण्डलमें होनेसे मुझे और एन्ड्रयूजको बहुत आशाएँ हैं। पता नहीं क्यों शिष्टमण्डलमें आपके सम्मिलित किये जानेकी बातसे में मनमें निश्चिन्त हो गया हूँ । {{Rh|||हृदयसे आपका,}} {{Rh|||मो० क० गांधी}} {{Gap}}अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १२०२८) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> pz8t4y8b7ervi7tlzipjbkljnzbmcpw पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६११ 250 186526 674561 644890 2026-08-27T05:52:42Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674561 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||टिप्पणियाँ| ५७५}} बेहतर होगी । मेरी रायमें अगर वे चाहें तो ब्रिटिश गियाना जा सकते हैं। ऐसा करनेमें उनका बहुत हर्ज भी न होगा। उनके जानेको और लोगोंके जानेका श्रीगणेश भी न समझना चाहिए। जो उपाय मैंने बतलाया है, वह फौरी है और वह शुरूमें कुछ सैकड़ों लोगोंसे ही ताल्लुक रखता है। ध्यान रहे कि मेरा बतलाया हुआ यह उपाय (फीजीसे लौटे हुए भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना भेजना ) उसी स्थितिमें लागू है जबकि अन्य सभी उपाय निष्फल हो जायें, कोई और चारा न रहे और सो भी तब, जब भेजनेके पहले खुद उन लोगोंकी सहमति ले ली जाये। इसलिए मुझे खेद है कि मैं अपनी दी हुई रायको बदल नहीं सकता। निस्सन्देह इस झगड़ेको हमेशा के लिए मिटा देनेवाला उपाय तो यह है कि भारतवासियोंको बाहर भेजनेके मामलेकी पूरे तौरपर जाँच हो तथा उसपर विचार किया जाये । <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>यंग इंडिया, ४-११-१९२६ {{C|'''५९६. टिप्पणियाँ'''}} {{C|'''चरखा संघके सदस्य '''}} {{Gap}}चरखा संघका नये सालके लिए चन्दा आ तो रहा है, मगर जिस तेजीसे आना चाहिए था, उस तेजीसे नहीं। उम्मीद यह की जाती है कि इस सालके सदस्य अपने सूतकी मजबूती, समानता और अंकको बढ़ानेपर विशेष रूपसे ध्यान देंगे। उनकी कोशिश एक निश्चित अंकका सूत कातनेकी ही होनी चाहिए, जिसमें एक ही अंकके सूतसे पूरा थान अच्छी तरह बुना जा सके । त्याग-कर्मके रूपमें काता गया यह सूत, निश्चय ही मजदूरीपर काते गये सूतकी अपेक्षा बहुत अच्छा होना चाहिए । {{Gap}}किन्तु एक भाई लिखते हैं : {{Gap}}आप सूतमें सुधार करनेको लिखते हैं। आप सूतकी परीक्षाके यन्त्रोंकी भी बात लिखते हैं । तब क्या यह आवश्यक नहीं कि कातनेवाले सदस्योंको सूतके दोष बतलाये जायें, जिससे वे उनको दूर कर सकें । {{Gap}} जितना सूत आता है, यहाँ चरखा संघ उस सबकी जाँच करनेकी कोशिश करता है, किन्तु एक दिनमें तो कुछ ही बण्डलोंकी जाँच सम्भव है । जाँचे हुए सूतके फलकी खबर कातनेवालेको दे दी जाती है। मगर जो लोग जल्दीसे उन्नति करना चाहते हैं, उन्हें मैं जाँच करनेके यन्त्र घरपर ही बना लेनेको कहूँगा । इसमें न तो कुछ खर्च है, न कोई परेशानी । घरेलू परीक्षा यन्त्रको बनानेकी विधि इस पत्रमें समझाई जा चुकी है । अगर सदस्य यह बात याद रखें कि चरखा संघ गरीबोंका संघ है और वह केन्द्रीय कार्यालयपर कोई बड़ा खर्च नहीं कर सकता तो बड़ा अच्छा हो ।<noinclude></noinclude> ncccoi55zbjkd0w8qpr50fvloypqoaz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१२ 250 186527 674562 644891 2026-08-27T05:55:21Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674562 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५७६| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{C|''' इंग्लैंड '''}} {{Gap}}ब्रिस्टलसे एक महिला लिखती है : {gap}}इस पत्रके साथ चरखोंके लिए १ पौंडकी रकम भेज रही हूँ । चाहती हूँ कि १०० पौंडकी रकम भेज सकती। शायद आप नहीं जानते कि इंग्लैंड में आपके भारको समझनेवाले कितने लोग आपको दुआएँ देते रहते हैं। वे सदा आपको अपनी स्नेहपूर्ण सद्भावनाएँ भेजकर सहायता करनेकी कोशिश करते रहते हैं । {{Gap}}इस प्रकारके पत्रोंका माहात्म्य दानमें आये हुए सिक्कोंकी संख्यासे नहीं चरखेमें निहित सत्यकी अनुभूतिसे कूता जाता है । चरखेका महत्त्व इस मान्यता है कि यह इंसानको हैवान बनानेपर तुली हुई प्रतिस्पर्धाकी प्राणलेवा होड़के स्थानपर सुनियोजित सहयोगकी भावनाको प्रतिष्ठापित करनेका प्रयास है; और यह व्यक्तिकी आत्माको उन्नत बनानेके साथ-साथ समूची मानवताको एक ऊँचे स्तरपर उठा देता है । यह आन्दोलन उसी हालतमें सफल हो सकता है जब संसार-भरकी पवित्रसे पवित्र शक्तियाँ इस लक्ष्यकी पूर्तिके लिए एक हो जुट जायें। लेकिन इसकी पहल हिन्दुस्तानकी ओरसे ही होनी चाहिए। अगर ईश्वर, स्वदेशी और अपने लक्ष्यमें मेरा विश्वास न होता तो यह भारी बोझ मेरी आत्माको कुचल ही डालता। लेकिन मेरे मनमें विश्वास है और में अपना बोझ ईश्वरके विराट् कन्धोंपर डालकर निश्चिन्त हो जाता हूँ । <बीआर>[ अंग्रेजीसे ] <Br>यंग इंडिया, ४-११-१९२६ {{C|'''५९७. दक्षिण आफ्रिकामें अनिश्चित स्थिति '''}} {{Gap}}हालमें दक्षिण आफ्रिकासे मुझे कुछ ऐसे कागज मिले हैं जिनसे पता चलता है कि वहाँ रहनेवाले भारतीय प्रवासियोंकी स्थिति संकटापन्न है । व्यापारिक परवानोंकी समस्या तो वहाँ सदा ही बनी रहती है। शासनका शिकंजा दिन-प्रतिदिन कसता ही जा रहा है। अबतक नेटालमें काफी हदतक इस बातपर अमल होता था कि परवाना अधिकारियोंको अपनी मर्जीसे काम लेनेकी जो व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, उनके अन्तर्गत पहलेके परवानोंको हाथ न लगाया जाये। पहलेके परवानोंसे छेड़छाड़ केवल तभी की जाती थी जब बहुत ज्यादा गन्दगी हो या अफसरों द्वारा लगाई गई शर्तोंको तोड़ा गया हो । किन्तु अब इस उचित नियमकी भी जब-तब अवहेलना की जाने लगी है। और परवानोंके नवीनीकरणमें मनमाने ढंगसे इनकार कर दिया जाता है । जो मामला मेरे पास भेजा गया है, वह दर्दनाक है और उसका सम्बन्ध श्रीमती सोफिया भायला नामकी एक वृद्ध महिलासे है। दक्षिण आफ्रिकी कांग्रेसके मंत्रीने इस मामलेका विवरण देते हुए लिखा है<noinclude></noinclude> acogn2cuivpcwocwympuua0be7f7vmz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१३ 250 186528 674564 644892 2026-08-27T05:58:03Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||दक्षिण आफ्रिकामें अनिश्चित स्थिति| ५७७}} {{Gap}}इस गरीब महिलाके पांच बच्चे हैं। परवाना अधिकारीकी सनकने उसे बरबाद कर दिया है। बहुत सम्भव है कि अपने साहूकारोंके हाथों जेल जानसे बचने के लिए उसे दिवालिया कानूनकी शरण लेनी पड़े। अपील अदालतके न्यायाधीशोंने इस गरीब स्त्रीसे सहानुभति तो व्यक्त की पर कुछ करनेमें असमर्थता प्रकट की, क्योंकि कानूनके अनुसार वे परवाना अधिकारियोंको विधानमण्डलों द्वारा दिये गये स्वयं निर्णय लेनेके अधिकारके प्रयोगमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अपवाद तभी किया जा सकता है जब यह सिद्ध कर दिया जाये कि उन्होंने रिश्वत ली है अथवा वे अपनी प्रदत्त शक्तियोंका उपयोग करनेके योग्य नहीं । मुख्य निर्णयमें कहा गया है : {{Gap}}इस महिलाके पास कई सालसे परवाना था, किन्तु अब परवाना अधि- कारोने इसे परवाना देनेसे इनकार कर दिया है। ऐसा लगता है कि इस महिलाने एस्कोर्टको नगर परिषदको वाजिब करको रकम अदा नहीं की थीं, इस कारण इसको परवाना देनेसे इनकार कर दिया गया। ऊपरसे देखनेसे ऐसा लगता है कि परवाना अधिकारीने, जो संयोगसे टाउन क्लर्क और नगर कोषाध्यक्ष भी हैं एवं अन्य पद भी संभालता है, टाउन क्लर्क और नगर कोषाध्यक्षके रूपमें प्राप्त अपनी जानकारीके बलपर कुछ सख्तीसे काम लिया है। उसने परवाना अधिकारीके रूपमें कहा : अच्छा, नगर परिषदसे, जिसका मैं नौकर हूँ, तुम्हारा झगड़ा है और तुमने उसे करकी वाजिब रकमें, जो तुम्हें अदा करनी चाहिए थी, अदा नहीं की हैं, इसलिए मैं तुम्हारे परवानेका नवीनी- करण नहीं करूँगा । " कोई भी इसे अन्यायपूर्ण ही मानेगा। यदि इस महिलाने उपनियम तोड़े थे तो कानूनी उपाय यह था कि उसपर मुकदमा चला कर तत्काल कार्रवाई की जाती अथवा यदि उसने कोई शर्तनामा तोड़ा होता तो उसपर कानूनके मुताबिक मुकदमा चलाया जाता । {{Gap}}इस प्रकार न्यायाधीश इच्छा रहते हुए भी इस स्पष्ट अन्यायका निराकरण नहीं कर सके। जब कानूनमें ही कोई दोष हो तो जबतक न्यायाधीश उस आधारपर त्यागपत्र न दे तबतक वह असहाय ही रहता है। किन्तु आजके जमानेमें किसीसे ऐसे साहसपूर्ण कार्यकी अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए । {{Gap}}लेकिन सरकार तो अशक्त नहीं है। नगर परिषदोंमें भारतीयोंका विरोध करने- वाले सदस्य व्यापारी हैं, अतः उनसे न्यायकी आशा नहीं की जा सकती। उनको जो शक्तियाँ प्राप्त हैं, वे उनका उपयोग सामान्यतः अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिए करेंगे ही। किन्तु केन्द्रीय प्रशासन ऐसे स्पष्ट मामलोंमें निश्चय ही सहायता दे सकता है । यदि स्पष्ट कठोरताके ऐसे मामलोंमें भी न्याय न किया जाये तो गोलमेज परि- षद् एक उपहासकी वस्तु बन जायेगी । <Br>३१-३७<noinclude></noinclude> 7a311jshhwsqcuks8exv3xftzvl7ujg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१४ 250 186529 674567 644893 2026-08-27T06:00:10Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५७८| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}वर्गीय क्षेत्र विधेयकको प्रस्तुत करनेका विचार सदाके लिए भले ही छोड़ दिया जाये, किन्तु उसके पीछे जो भावना है यदि वह भावना कायम रहे तो प्रवासियों- की स्थिति उससे अधिक अच्छी किसी भी तरह नहीं होगी जैसा विधेयकके पास होनेपर होती । थोथी जीत सचमुचकी हारसे ज्यादा बुरी होगी । इसका कारण यह है कि थोथी जीतके शोरगुलमें पीड़ितोंकी कष्टभरी पुकारको सुनकर भी कोई उनसे सहानुभूति प्रकट नहीं करेगा और उन्हें राहत नहीं पहुँचायेगा । <Br>[ अंग्रेजीसे ] <Br>यंग इंडिया, ४-११-१९२६ {{C|''' ५९८. शुद्ध आचरणके लिए आग्रह '''}} {{Gap}}मेरे पास चुनावके सम्बन्धमें और प्रसंगवशात् कौंसिलोंकी सदस्यताके कांग्रेसी उम्मीदवार बननेके लिए ढेर-ढेर चिट्ठियाँ आ रही हैं। मैं अब उन्हें प्रकट करनेपर बाध्य हो गया हूँ । विधान सभाकी सदस्यताके एक उम्मीदवार महाशय लिखते हैं : जब मैंने इस काममें हाथ डाला तब मुझे इस बातका बिलकुल ही भान न था कि यह मेरे लिए एक नाहक काम है। मेरे कार्यकर्त्ता झूठा प्रचार करते हैं। वे लोग मेरे जिन गुणोंका बखान करते हैं, वे मुझमें नहीं हैं । मेरे प्रतिद्वन्द्वी मुझे उन अवगुणोंकी खान बताते हैं, जो मुझमें कभी नहीं रहे। मैं न्यायपूर्ण और सीधी लड़ाई चाहता हूँ ।. . क्या आप इस उलझनसे बाहर निकलनेका कोई मार्ग बता सकते हैं ? या आप महज यही कहेंगे कि कौंसिलमें जाना ही गलत है और इसलिए मुझे बैठ जाना चाहिए ? . . {{Gap}}दूसरे सज्जन लिखते हैं : {{Gap}}क्या आप सदाकी भाँति उन चालबाजियोंको जो कांग्रेसके ही नहीं आपके नामपर भी की जा रही हैं, रोक नहीं सकते ?. अब यह प्रमाणित किया जा सकता है कि ये चालबाजियाँको ही जा रही हैं; तब फिर आप मौन कैसे रह सकते हैं? आप चाहें तो मैं प्रमाण भी प्रस्तुत कर सकता हूँ । {{Gap}}मेरे प्रान्तको ही ले लीजिए -- जो दल कांग्रेसका समर्थन करनेमें लाभ देख रहे हैं ( मैं और कोई शब्द प्रयोग करनेमें असमर्थ हूँ) कांग्रेसको बदनाम करनेमें जुटे हैं। खादी भी साथ-साथ बदनाम हो रही है -- यहाँतक कि दोनों है- {{Gap}}१. १९२३ में प्रस्तुत इस विधेयक में ऐसी व्यवस्थाएँ थीं जिनसे शहरी क्षेत्रों में एशियाई लोगोंको अनिवार्य रूपसे अलग बस्तियोंमें रखा जा सकता था। लेकिन अप्रैल १९२४ में दक्षिण आफ्रिकी विधान सभाके एकाएक भंग हो जानेसे विधेयक रद्द हुआ मान लिया गया था । {{Gap}}२. कुछ ही पत्र अंशतः दिये जा रहे हैं।<noinclude></noinclude> rb3b3iohjpy58x8f50jemye7ufcv0iu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१८ 250 186533 674558 644897 2026-08-27T05:49:57Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५८२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}महात्माजी, क्या आपके निकट ये तथ्य निरर्थक हैं ? {{Gap}}बिलाशक इन तथ्योंका अर्थ मेरे निकट बहुत कुछ है। उनसे निस्सन्देह मनुष्य- की क्रूरता प्रकट होती है। लेकिन ये तथ्य मुझे संयत बनाते हैं । ये हमको चेतावनी देते हैं कि असहिष्णु मत बनो। ये मुझे असहिष्णुओंके प्रति भी सहिष्णु बनाते हैं । ये मनुष्यकी नितान्त महत्त्वहीनता जतलाते हैं और इस प्रकार उसे, अगर वह खुशीसे प्रार्थना नहीं करता -- ईश-प्रार्थनाके लिए मजबूर करते हैं। क्योंकि क्या इतिहास इस बातका साक्षी नहीं है कि ईश्वरके सामने घमण्डीका सिर बार-बार नीचा हुआ है ? ईश्वरके चरणोंमें उसने खूनके आँसू बहाये हैं और ईश्वरके चरणोंके नीचे पड़कर धूलमें मिलनेकी प्रार्थना की है ? यथार्थ में किसी लकीरका फकीर बननेसे नाश और उसका अभिप्राय समझकर तदनुसार चलने से जीवनका संचार होता है । {{Gap}}पत्र- प्रेषकको जो कि 'यंग इंडिया' के नियमित और अध्यवसायी पाठकोंमें से हैं, अबतक जान लेना चाहिए था कि मेरे लिए, आराधनाके स्थान महज ईंट- चुनेसे बनी इमारतें नहीं हैं । ये तो केवल सत्यकी परछाइयाँ हैं । प्रत्येक बरबाद किये गये मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघरके बदले सैकड़ों बन गये हैं । प्रार्थनाकी आवश्यकताके बारेमें तर्क करते समय यह सवाल उठाना बिलकुल बेमतलब है कि तथाकथित आस्तिकोंने अपने एतकाद ( विश्वास ) के खिलाफ काम किया है और अपनी पवित्रताके लिए प्रख्यात अनेक आराधना-स्थल धूलमें मिला दिये गये हैं । अगर में साबित कर सकूँ कि संसारमें ऐसे लोग हो गये हैं और आजकल भी हैं, जिनके लिए ईश-प्रार्थना जीवनके निमित्त रोटीको जितनी ही जरूरी है तो मेरी समझमें इतना ही काफी है दलीलके वास्ते तो काफी है ही। मैं अपने पत्रलेखक महोदयसे सिफारिश करता हूँ कि वे मस्जिदों, मन्दिरों, इत्यादिमें किसी दूसरेकी नजरमें पड़े बिना और पहलेसे बनी-बनाई धारणाओंको ताकमें रखकर जायें। वहाँ उनको पता चलेगा जैसा कि मुझे चला है कि उनमें कुछ-न-कुछ ऐसी बात जरूर है जो उन लोगोंके दिलपर छाप डालती है, जो उनकी कायापलट कर देती है, जो दिखावे या शर्म अथवा डरके मारे नहीं, वहाँ केवल उपासनाके लिए आते हैं। इसकी व्याख्या करना असम्भव है। खैर, कुछ भी हो, यह बात तो है ही कि शुद्ध मनवाले लोग वर्तमान तीर्थ-स्थानों में भी (जो कि गलतियों, मूढ़-ज्ञान और भ्रष्टाचार तकके केन्द्र बन गये हैं) जाकर पूजाके प्रतापसे अधिक शुद्ध होकर लौटते हैं । इसीलिए 'भगवद्गीता' में यह महत्त्वपूर्ण आश्वासन दिया हुआ है.। {{Gap}}'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तान्स्तथैव भजाम्यहम् अर्थात्, " में मनुष्योंके उपासना भावके अनुसार ही, जिससे कि वे मेरी पूजा करते हैं, उनको फल देता हूँ ।" {{Gap}}पत्र-लेखकने जो कुछ लिखा है, वह निस्सन्देह हमारी वर्तमान त्रुटियाँ अवश्य जतलाता है और हमें इन्हें जल्दीसे-जल्दी हटा देना चाहिए। उनकी बात धर्मों या मजहबोंकी शुद्धिके लिए तथा दृष्टिको व्यापक बनानेके लिए एक अपील है । और वह अत्यावश्यक सुधार निश्चय ही शुरू हो रहा है । आज विश्वचेतना अधिक ऊंचे<noinclude></noinclude> qi81vfrtm25g4si87fmpxau0zpl35am पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६१९ 250 186534 674575 644898 2026-08-27T06:12:50Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674575 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||अन्त्यजोंका पूजाधिकार| ५८३}} {{Gap}}स्तरपर है। और में कहूँगा कि उस सुधार तकके लिए, जिसे हम लोग चाहते हैं, प्रार्थना जरूरी है ताकि और अधिक आत्मशुद्धि प्राप्त की जा सके। प्रार्थनाके बिना, मनुष्य मात्रका सामान्य शुद्धीकरण, आपसकी सहिष्णुता तथा पारस्परिक सद्भाव सम्भव नहीं है । <Br>अंग्रेजीसे ] <Br>यंग इंडिया, ४-११-१९२६ {{C|'''६००. अन्त्यजोंका पूजाधिकार '''}} {{Gap}}नीमच छावनीके एक भाई पूछते हैं : {{Gap}}(१) अछूत, जिनको उच्च वर्णके हिन्दू अतिशूद्र भी कहते हैं, विष्णु भगवानका मन्दिर बनाने, विष्णुकी मूर्तिकी पूजा करने और मूर्तिको विमानमें बिठाकर सरे बाजार निकालनके अधिकारी हैं या नहीं ? {{Gap}}(२) क्या अतिशूद्र द्वारा पूजित विष्णुकी मूर्तिके दर्शन करनेसे वैष्णव नरकगामी होते हैं ? अब भी ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं, यही दुःखकी बात है । मेरा दृढ़ विश्वास है कि अन्त्यज भाइयोंको विष्णु भगवान्‌की मूर्ति बाजारमें निकालने और विमानमें बिठानेका उतना ही अधिकार है जितना अन्य जातियोंको है। इसी तरह जो वैष्णव अतिशूद्र- पूजित मूर्तिकी पूजा करता है या उसके दर्शन करता है, वह पाप नहीं, पुण्य करता है । जान बूझकर ऐसी मूर्तिकी पूजासे बचनेवाला वैष्णव धर्मकी निन्दा करता है । {{Gap}}हिन्दी नवजीवन, ४-११-१९२६<noinclude></noinclude> s3tyoqis74jcyn58gniu9tpc2mmb5ml पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२३ 250 186538 674571 644902 2026-08-27T06:05:37Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674571 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५८७}} {{Gap}}आपने अलगसे एक प्रश्न उठाया है। उसके बारेमें अगर आप थोड़ी जानकारी और दें तो विशेषरूपसे आभार मानूंगा । आपने कहा है कि साम्प्रदायिक वैमनस्यकी जिम्मेदारी कुछ हदतक ब्रिटिश अधिकारियोंपर भी है। यह तो मेरी समझ में आता है कि बंगालके विभाजन जैसी प्रशासकीय कार्रवाईसे इस आगमें घी पड़ सकता है । {{Gap}}परन्तु मेरी समझ में यह बिलकुल नहीं आ सकता कि सचमुच झगड़ेपर आमादा लोगोंको झगड़वानेके लिए सरकारका कोई अधिकारी क्या कर सकता था। ज्यादा बड़ा सवाल तो यह है कि हिन्दुओं और मुसलमानोंके बीच नफरत बढ़ानेवाले भारतके उन ब्रिटिश अधिकारियों वे जो भी हों - अपने उन प्रतिनिधियोंकी उन हरकतोंको बन्द करानेके लिए एक लेबर पंथी सरकार क्या कर सकती थी । स्पष्ट है कि वह अधिकांश में उन अधिकारियोंको हटाकर उनके स्थानपर भारतीय स्वतन्त्रतासे सहानुभूति रखनेवाले व्यक्तियोंको तो नहीं रख सकती थी । वह इससे कम कठोर कार्रवाई और क्या कर सकती थी । {{Gap}}आप यदि इस पत्रका उत्तर लिखनेमें अपना समय और शक्ति व्यय करनेकी कृपा करें तो विस्तारसे मेरी एक-एक दलील लेते हुए चलनेका कष्ट न उठायें। मैंने तो आपको यह बतलाया है कि तथ्योंको देखकर मेरी अपनी क्या राय बनी है, सो भी इसलिए कि अपने उलझावको आपपर जाहिर करनेका कोई और तरीका था ही नहीं । मेरी इतनी ही प्रार्थना है कि आप इसका उत्तर लिखते समय बस यही सोचें कि अगर आप गांधी न होकर लीज होते, और ईश्वरने आपको कुछ ऐसे निर्णय करनेका दायित्व सौंपा होता, जिनपर किसी दिन ब्रिटिश सरकार अमल कर सकती है तो आप क्या करते। आप उन लोगोंके सामने ऐसी कौन-सी दलीलें पेश करते, जिनका बस यही इलाज है कि उनसे बहस न की जाये ? और, यदि आप मेरी जगह होते तो किस नीतिकी पैरवी करते ? कृपया एकदम, स्पष्ट, नपे-तुले शब्दोंमें लिखिये । आशा है बातकी यह ध्वनि आपको अखरेगी नहीं कि यदि आप मेरी जगह होते तो शायद इसी तरह सोचते जैसे मैं सोचता हूँ । यदि समूची मानव-जाति एक विशाल परिवार है, तो इसके सभी सदस्योंको अपने बीचके किसी मतभेदके कारण परस्पर सहायता करनेसे हाथ नहीं खींचना चाहिए । {{Rh|||हृदयसे आपका,}} {{Rh|||नॉर्मन लीज}} {{Gap}}अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १२१६८) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> 74ezrn5n8fcnx4fs8hd9ffnnroaxjz1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२४ 250 186539 674573 644903 2026-08-27T06:08:51Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674573 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|'''परिशिष्ट २'''}} {{C|'''नॉर्मन लोजका पत्र’''}} {{Rh|||डरबीके पास,}} {{Rh||ब्रेल्सफोर्ड}} {{Rh|||९ अगस्त, १९२६}} <Br>प्रिय श्री गांधी {{Gap}}आपके पत्रसे सचमुच आशा बंध गई है कि इस देशके समाजवादी विचारधाराके लोग आपकी सहायतासे यह समझने में सफल हो सकते हैं कि भारतके सिलसिले में उनका अपना क्या कर्त्तव्य है । परन्तु ऐसा मत समझिये कि मुझे 'इंडिपेन्डेन्ट लेबर पार्टीके' नेतृत्वका या उसके मार्ग-दर्शनका काम सौंपा गया है। मैं तो पार्टीके उन दस-बारह सदस्योंमें से एक हूँ जिनको थोड़ा विशेष अनुभव है और इसीलिए साथी-सदस्योंने उनसे कहा है कि वे पूरी समस्याकी छानबीन करके पता लगायें कि समूची पार्टीका क्या कर्तव्य है । मेरी अहमियत बस इतनी ही है । क्या आप इस बातकी अनुमति देंगे कि समितिके अन्य सदस्य भी आपके पत्रोंको इस शर्तपर पढ़ लें कि वे उनको प्रकाशित नहीं करायेंगे ? {{Gap}}भारतके विभिन्न दलों और उनके कार्यक्रमोंके बीचके अन्तरका आपने जो स्पष्टी- करण दिया है, वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। उसने मेरे दिमागका एक उलझाव दूर कर दिया है। और लेबर सरकारको भारतमें जिस समस्याका सामना करना पड़ेगा उसे हल करनेके लिए आपने जो उपाय बतलाया है वह तो और भी महत्त्वपूर्ण है । आपका कहना है कि ऐसी सरकारको किसी एक ऐसे व्यक्तिको चुनना चाहिए जो सबसे पहले तो भारतकी विभिन्न विचारधाराओंके नेताओंसे परामर्श कर ले और उसके बाद ही यह निर्धारित करे कि उसका दल भारतमें किस प्रकारके संविधान और कार्यक्रमको लागू करनेका आग्रह करेगा । लोकमत इस बातका समर्थन नहीं करेगा कि इतना महत्त्वपूर्ण कार्य किसी एक ही व्यक्तिको सौंपा जाये । पर मैं समझता हूँ कि यदि तीन-चार व्यक्तियोंकी किसी समितिको यह काम सौंपा जाये तो किसीको भी कोई आपत्ति नहीं होगी। आपने जो हल सुझाया है (जो मेरे पिछले पत्रमें रखे गये दूसरे विकल्पसे मिलता-जुलता है) उसमें सचमुच बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं, परन्तु उसकी एक बड़ी खूबी यह है कि वह एक वास्तविक हल है। उसके मार्ग में आनेवाली कठिनाइयाँ दो प्रकारकी हैं। हमारे देशमें समितियाँ प्रातिनिधिक होती हैं । वे मतोंकी विभिन्नताकी द्योतक होती हैं। परन्तु भारतके लिए एक संविधान तैयार करनेका काम जिस समितिको सौंपा जायेगा, उसमें तो एक ही विचारके सदस्य रखने होंगे । यदि उसके सदस्योंमें बड़े-बड़े मतभेद रहे तो समितिका काम ही ठप्प हो जायेगा । यह काम सौंपनेके लिए ऐसे व्यक्तियोंको चुनना पड़ेगा जो बस भारतकी आवश्यकताओं-<noinclude></noinclude> hef33q4p6en2rhgd7bl1404e5i0h451 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२५ 250 186540 674556 644904 2026-08-27T05:47:49Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट|५८९}} को ही महत्त्व दें और अन्य किसी भी विचारको कोई अहमियत न दें। पर ऐसे व्यक्ति चुनना लेबर-सरकारके लिए और भी कठिन होगा। पिछली लेबर सरकार तो भयके कारण हाथ-पैरतक नहीं हिला पाई। वह अपने शत्रुओंसे ही नहीं अपने खुदके कार्यक्रमसे ही भयभीत थी । मैं जानता हूँ कि लॉर्ड ऑलिवर भारतके सच्चे मित्र हैं । पर मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे भी अब इस बातको निश्चय ही स्वीकार कर लेंगे कि यदि तब उन्होंने सच्चे अर्थों में एक जनतान्त्रिक संविधान तैयार करने • भले ही उसकी रूपरेखा - भर तैयार करने और उसे स्वीकार करानेके लिए अपने मन्त्रि- मण्डलसे दृढ़तापूर्वक आग्रह करनेपर ही सब कुछ दाँवपर लगा दिया होता, तो उन्होंने बिलकुल ठीक काम किया होता। परन्तु यदि अगली लेबर सरकार भारतीय समस्या- के हलकी जिम्मेदारी ऐसे लोगोंको सौंप दे जो भारतीय समस्याका कुछ ऐसा समाधान खोजने की कोशिश करें जो केवल यही दो शर्तें पूरी करता हो कि संविधान अमलमें लाया जा सके और भारतका काफी बड़ा लोकमत उससे सन्तुष्ट हो जाये तो इंग्लैंडमें एक बवण्डर खड़ा हो जायेगा, इतना बड़ा बवण्डर कि आप भी उसका ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सकते। यदि 'इं० ले० पा०' अपनी दलीलों और अपने प्रचारके बलपर बड़ी तेजीसे समूची 'लेबर पार्टी' को मानसिक रूपसे इसके लिए तैयार नहीं कर देगी, तो अगली लेबर सरकार भारतकी बागडोर किसी निरापद् " किस्मके व्यक्तिको सौंप देगी; और उस हालतमें यदि 'लेबर पार्टी ' उस व्यक्तिसे यह अपेक्षा करेगी कि वह अकेले या एक-दो अन्यके साथ मिलकर भारतके लिए एक संविधान तैयार कर दे तो वह एक ऐसा संविधान ही चाहेगी, जो थोड़ी-बहुत बातें आधी- परदी मानकर अपेक्षाकृत कम कट्टर किस्मके साम्राज्य- वादियोंको अपने पक्षमें कर ले । {{Gap}}दूसरी तरह की कठिनाई आपकी तरफसे पैदा होती है । आप इस बातको लगभग स्वीकार करते ही हैं कि यदि भारतमें लोकतान्त्रिक सरकारकी स्थापना की गई तो मुसलमान लोग उसके खिलाफ लड़ाई छेड़ देंगे । मेरा अपना विश्वास है कि इस्लाम और लोकतान्त्रिकता एक दूसरेके साथ उसी प्रकार मिलकर नहीं खप सकते जैसे कि पानी और तेल । फिर क्या आप यह आशा करते हैं कि शेष भारतीय जनता अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिए उनके विरुद्ध खड़ी होगी ? या यह कि ब्रिटिश सेनाको इसके लिए बुलाया जायेगा ? दोनोंमें से जो भी हो, इतना आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि मुसलमानोंका प्रतिरोध एक युद्धकी शक्ल अख्तियार कर लेगा, और इसका मतलब यह होगा कि अनेक निर्दोष व्यक्तियोंका खून बहेगा । {{Gap}}आपने एक सुझाव रखा है जो आपके खयालसे मुसलमानोंका विरोध कुछ कम कर सकेगा । आपका सुझाव है- " शिक्षामें अधिमान्यता" देना, कुछ अधिक सुविधाएँ देना । क्या आप इसका खुलासा करेंगे। हमारे यहाँ इस देशमें एक योजना है, जिसके अन्तर्गत सरकारी कोषसे अनुदान पानेवाले माध्यमिक (अर्थात् अधिक उन्नत ) स्कूलोंमें एक बड़ी संख्या गरीब विद्यार्थियोंकी होनी चाहिए और उनको वहाँ निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए। क्या आपका आशय ऐसी ही किसी पद्धतिसे है ? क्या आप<noinclude></noinclude> fon2c9i5sbrw09g352banjdywhgbhbx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२६ 250 186541 674574 644905 2026-08-27T06:10:36Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674574 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५९०| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} यह स्वीकार करेंगे कि संविधानमें कुछ ऐसी व्यवस्थाएँ कर दी जायें जिनके अनुसार प्रान्तीय सरकारें अपने प्रान्तमें मुसलमान जन-संख्याके अनुपातमें कुछ मुसलमान विद्यार्थियोंको इसी प्रकारकी "निःशुल्क जगहें" देनेपर बाध्य हों ? और अन्तमें आपके सामने एक यह प्रश्न रख रहा हूँ, जो मेरे मस्तिष्कको बराबर झंझोड़ता रहता है और मैं जानता हूँ कि इसका कोई उत्तर हो नहीं सकता। वह प्रश्न यह है कि क्या अनुभवहीनताके कारण भारतीय जनता कुछ गलत किस्मके ऐसे लोगोंको ही अपने प्रतिनिधियोंके रूपमें नहीं चुन लेगी, जो खुशामदके बलपर जनताको धोखा देंगे और उनमें से कुछ अपनी-अपनी जेबें गरम करनेमें लगे रहेंगे ? पहली किस्मके कई लोग हमारी 'लेबर पार्टी' तक में मौजूद हैं, हाँ, दूसरी किस्मके लोग चन्द ही हैं । बात बड़ी हास्यास्पद-सी है, पर यदि मुझे भारतको स्वशासन सौंपनेवाली समितिका सदस्य बना दिया जाये तो मुझे कुछ ऐसा लगेगा जैसे कि सारी योजना बिखर कर ढह जायेगी। लेकिन साथ ही मुझे यह भी लगेगा कि साहस रखनेसे सफलताकी भी थोड़ी सम्भावना है, इसलिए साहसपूर्वक आगे बढ़कर भारतीय जनताके कन्धोंपर कर्त्तव्यों और दायित्वोंका भार रख दो, उनको उनकी माँगसे भी अधिक कर्त्तव्य और दायित्व सौंप दो और उनसे कह दो कि वे वास्तवमें स्वतन्त्र नागरिकोंकी तरह काम करें। मेरा खयाल है कि अधिकांश आई० सी० एस० अधिकारी इस योजनापर अमल करनेसे इनकार कर देंगे। तब परीक्षाकी घड़ी सामने आ जायेगी। मुझे इस बातका पूरा भरोसा है कि विधान मण्डलों, प्रशासन और सरकारके कार्य-पालक विभागों में रिक्त होनेवाले पदोंका भार पूरी कार्य-कुशलताके साथ सँभालने लायक लोग भारतमें मौजूद हैं। पर क्या भारतीय जनता ऐसे लोगोंको ही चुनेगी, अन्य लोगोंको नहीं, या यों कहिये कि क्या भारतीय जनता ऐसे लोग इतनी पर्याप्त संख्यामें चुनेगी कि वे सरकारी मशीनको इतने सुचारु रूपसे चला सकें कि नये निरंकुश शासकोंको, किसी नये अकबर या नये कर्जनको पनपनेका मौका ही न मिल पाये ? {{Rh|||आभार सहित आपका,}} {{Rh|||नॉर्मन लीज}} <Br>[ पुनश्च : {{Gap}}मेरे लिये भारत आना सर्वथा असम्भव है। हाँ हमारे दलके अनेक कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण सदस्योंने, आपके सुझावके अनुरूप ही, यह पता लगानेका भरसक प्रयत्न किया है कि भारतीय जनता लेबर सरकारसे भारतमें क्या-क्या अपेक्षा रखेगी। अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १२१७०) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> 7wk3c63gqcudtex7eccyriw9ad4am6p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२७ 250 186542 674577 644906 2026-08-27T06:19:19Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674577 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{C|'''परिशिष्ट ३'''}} {{C|'''नॉर्मन लोजका पत्र'''}} {{Rh|||२० सितम्बर, १९२६}} <Br>प्रिय श्री गांधी, आपके पत्रमें मुझे असहमत होने लायक कोई चीज नहीं मिली, हालांकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक पर्यावरणका अन्तर सदा ही [ व्यक्तियोंके सदा ही विचारोंमें ] अपनी छाप छोड़ जाता है ; में आपका अत्यन्त आभारी हूँ कि आपने मेरे प्रश्नोंपर विचार किया और उनके उत्तर देने में अपना समय लगाया । भविष्यमें जब भी कभी मुझे भारतीय समस्याओंको समझने में कोई उलझन महसूस होगी, मैं आपसे सलाह लेने में संकोच नहीं करूँगा । {{Gap}}आपके एक शिष्य, तारिणी पी० सिन्हासे हाल ही में मेरा परिचय हुआ है । इधर कुछ दिनोंसे वे हमारे घरसे करीब ३० मीलकी दूरीपर रहनेवाले खनिकोंके बीच घूम-घूमकर भाषण दे रहे थे। अभी दस दिन पहले किसी आपत्तिजनक भाषणके सिलसिलेमें उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारीकी खबर मिलते ही मैं उनसे मिलने गया था। उनका मुकदमा एक पखवारेके लिए मुल्तवी कर दिया गया है और वे लन्दनसे न्यायालयके लिए जाते समय हमारे घर आयेंगे। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि वे बरी कर दिये जायेंगे । लगता है कि पुलिसको उनके एक ही उस वाक्यपर आपत्ति थी, जिसमें उन्होंने देशभक्तिकी आलोचना की थी और इसमें जरा भी शक नहीं कि उन्होंने उसका स्पष्टीकरण कर दिया था कि उन्होंने किसीके स्वदेश-प्रेमकी नहीं, बल्कि दूसरे देशोंके प्रति घृणा और यहाँतक कि उनका अपमान करनेकी निन्दा की थी। उनकी गिरफ्तारीका वास्तविक कारण उनके साथ चलनेवाले एक बहुत ही नई उम्र के अंग्रेज द्वारा प्रयुक्त की गई भाषा मालूम पड़ती है । वह आदतन भद्दी गालियोंका प्रयोग करता था और खनिकोंको भी उकसाता था कि वे खान- मालिकोंकी शर्तोंको मान लेनेवाले अपने खनिक-साथियोंके लिए ऐसी ही गालियों भरी भाषाका प्रयोग करें। श्री सिन्हा यदि स्वयं भी अंग्रेज होते तो वे इस अंग्रेजके साथ एक ही मंचपर खड़े होनेसे तबतकके लिए इन्कार कर देते जबतक कि वह अधिक संयत ढंगसे न बोलने लगता । लेकिन मेरा खयाल है कि वह अंग्रेज अब अपने कामपर शर्मिन्दा है । {{Gap}}आपके आन्दोलनकी एक चीज ऐसी है जो हम पाश्चात्य देशोंके लोगोंको भी भाती है । वह है आपका यह विचार कि राष्ट्रीय आयमें सभी नागरिकोंका भाग समान होना चाहिए और हमको अपना निजी खर्च अपने उक्त भागतक ही सीमित रखना चाहिए। मैं वर्षोंसे यही कोशिश कर रहा हूँ, पर अधिकतर असफल ही रहा हूँ । व्यक्तिगत कठिनाइयोंके अतिरिक्त कुछ अन्य कठिनाइयाँ भी हैं; इस कारण<noinclude></noinclude> 3itv3mqgit212dz57gw8teptv7oona1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२८ 250 186543 674576 644907 2026-08-27T06:16:51Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674576 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५९२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} कि पारिवारिक खर्च ही सबसे बड़ी कठिनाई पैदा करता है और पुरुषोंकी अपेक्षा महिलायें हमेशा पुरानी लीकपर ही अधिक चलना चाहती हैं । और फिर में समझता हूँ कि किशोर-किशोरियोंपर यह सिद्धान्त लागू करना ठीक नहीं होगा, उनको तो समानसे कुछ अधिक भाग ही मिलना चाहिए। पर मुझे आशा है कि एक दिन कभी आयेगा जब इस देश में ऐसे लोगोंका एक बड़ा समुदाय होगा जो ऊपरसे देखनेमें तो उन लोगोंकी तरह जीवन-यापन करेंगे, जिन्होंने कोई व्रत नहीं लिया है, पर अपना धन अपने ऊपर खर्च न करनेके लिए प्रतिज्ञा-बद्ध होंगे। मुझे कुछ ऐसा याद पड़ता है कि श्री एन्ड्रयूजने कहा था कि मेरी पुस्तककी एक प्रति उन्होंने आपके पास भेजी है । मैंने उनको कई प्रतियाँ वितरणके लिए दी थीं । {{Gap}}उसका नाम 'केनिया' है । परन्तु यदि आपको प्रति न मिली हो और यदि आप मुझे एक प्रति भेजनेका सौभाग्य देना चाहते हों तो कृपया मुझे बतलाइयेगा । आप मुझे उसपर अपने हस्ताक्षर करनेकी अनुमति दीजिये । हम सभी समाजवादी ऐसा ही करते हैं । {{Rh|||आपका भाई,}} {{Rh|||नॉर्मन लीज}} {{Gap}}अंग्रेजी पत्र (एस० एन० १२१७२) की फोटो नकलसे । {{C|'''परिशिष्ट ४'''}} {{C|'''एक अपील'''}} <Br>महात्माजी, {{Gap}}आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसने अपने क्षुद्रसे-क्षुद्र अनुयायीके लिए भी कभी अपने द्वार बन्द नहीं किए। इसलिए आपसे अपनी बात कहने के लिए हमने यह जो एक विचित्र- सा तरीका अपनाया है, इसपर आपको शायद आश्चर्य होगा, शायद आप कुछ रुष्ट भी हो उठें। अपनी बात सुनानेके लिए यह तरीका अपनानेके पक्षमें हमारे पास केवल एक ही दलील है - यह कि हमारी राष्ट्रीय राजनीतिकी वर्तमान दशा अत्यन्त शोचनीय बन गई है, राजनीतिक दल अनेक उपदलों और गुटोंमें बँट गये हैं, व्यक्ति और पूर्वग्रह परस्पर टकरा रहे हैं। जाहिर है कि आप इस सबसे बेखबर नहीं हैं, और देशकी वर्तमान दुखद स्थितिको देखकर आपका हृदय जितनी तीव्र पीड़ासे कराह उठता होगा उतनी पीड़ा अन्य किसी भारतीयको नहीं हो सकती। लेकिन जहाँतक हम सोच पाते हैं, हमें लगता है कि आप शायद एक बातसे अनभिज्ञ हैं और हम समा- चारपत्रोंके माध्यमसे यह अपील करके आपका ध्यान उसीकी ओर सादर आकर्षित करना चाहते हैं । आप जिस चीजसे अनभिज्ञ हैं वह है आपके उन करोड़ों देशवासियों- के हृदयोंमें पैठी एक मूक व्यथा और व्यग्रता जो एक लम्बे अर्से से आपसे नेतृत्व पानेकी बाट देख रही है । आप ही एक भारतीय हैं, जिनको समूचे राष्ट्रके नेताके पदप<noinclude></noinclude> 62uajg9jyeeqxew9orhgjdd11hwu269 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२९ 250 186544 674578 644908 2026-08-27T06:20:56Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674578 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५९३}} प्रतिष्ठित होनेका सौभाग्य प्राप्त है और जिनपर सभी परस्पर जूझते समुदायोंको पूरा भरोसा है और सरकार भी जिनका आदर करती है और जिनसे भय खाती है । आपके ये देशवासी किसी भी तरहसे अपनी भावनायें व्यक्त नहीं कर पाते। वे आपसे इसलिए अपील करते हैं कि आपने अपने आपको आत्मत्यागके जिस अनुशासनसे कस लिया है उसका वे सम्मान करते हैं । श्रीमान, आप इसे हमारी धृष्टता न मानें कि हम इस प्रकार उस मूक जनताके प्रतिनिधि बनकर आपके सामने आये हैं और आपसे उस बागडोरको फिर थामनेका अनुरोध कर रहे हैं, जिसे आपने स्वेच्छासे त्याग दिया था । हमें अनुमति दीजिए कि हम आपसे यह अपील कर सकें, भारतकी मूक जनताके नामपर उन लोगोंकी दुहाई देकर जिन्होंने आपके मार्ग-दर्शनके कालमें बिना किसी आनाकानी या शंकाके आपके आदेशोंका पालन किया था; अनुमति दीजिए कि हम स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्वके उन पवित्र सिद्धान्तोंके नामपर आपसे अपील कर सकें जिनको आज सिर्फ इसलिए पैरों तले रौंदा जा रहा है कि निराशा और विपत्तिके इन दुदिनोंमें भी अपना मस्तक ऊँचा रख सकने और प्रतिक्रियावादके थपेड़ोंका मुँह मोड़ सकनेवाला जो एकमात्र व्यक्ति है, वही आज एक ओर अलग खड़ा है । {{Gap}}श्रीमान, यह अपील करनेके हमारे पास जो कारण मौजूद हैं उनसे आप परिचित नहीं हो सकते। आपने जबसे अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलनका सूत्रपात किया है, हम तब ही से आपके अनुयायी रहे हैं; और शासनकी वर्तमान व्यवस्थाके विरुद्ध आपके संघर्ष के बुनियादी सिद्धान्तों परसे हमारा विश्वास अभी उठ नहीं गया है। आपके महान आदर्श के पालनेके लिए जिस कठोर आत्मानुशासन, अडिग आत्मत्यागकी आवश्यकता थी, उसके लिए देश शायद तैयार नहीं था । अपने देशवासियोंकी अप्रस्तुत मनःस्थिति देखकर आपको घोर निराशा हुई और इसीलिए, आपने अकथनीय मानसिक पीड़ाके बावजूद यह फैसला कर लिया था कि चौरी-चौरा काण्डकी अनगिनत बार पुनरावृत्ति कराते हुए आगे बढ़नेसे तो कहीं अच्छा है कि बारडोलीसे आरम्भ हुए आन्दोलनको ही रद कर दिया जाये । श्रीमान, आपकी जेल-यात्राके साथ ही राष्ट्रीय एकताकी उग्र भावना और राष्ट्रीय स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके दृढ़ संकल्पका ह्रास शुरू हो गया। आपकी रिहाई और उसके बादकी राजनीतिक घटनाओंकी सभीको बड़ी अच्छी जानकारी है, इसलिए उनको यहाँ दोहरानेकी जरूरत नहीं। लेकिन सकतेमें पड़ा राष्ट्र साँस रोककर प्रति- क्रियावादी शक्तियोंको एकके बाद दूसरी विजय प्राप्त करते देखता आ रहा है; उसे लग रहा है कि आप देशको असाध्य अनौचित्यके अतल कूपमें गिरनेसे बचानेके लिए एकके बाद एक आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं। ऐसे भी अनेक व्यक्ति हैं जो आपके उस उदात्त आत्माको कभी समझ ही नहीं पाये, जिसने जेलसे आपकी बिना शर्त रिहाईके दिनसे ही आपकी सभी गतिविधियोंको प्रेरित किया है। लेकिन कहते हैं कि अब वह घड़ी आ पहुँची है जब आप अपनी मातृभूमिके प्रति अपने अपार प्रेमकी खातिर एक और बड़ा त्याग करें, अबतक आपने जितने त्याग किये हैं उनसे कहीं बड़ा एक त्याग और करें, अर्थात् आप अपने लिए हुए व्रतको त्याग दें। और हमारे इस उद्गारके पीछे केवल हमारी अपनी ही भावना नहीं है बल्कि उक्त शंकालु और ढुलमुल <Br>३१-३८<noinclude></noinclude> 9y43t368irc8gjcymigfnwwh2fut7g3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३० 250 186545 674579 644909 2026-08-27T06:22:02Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674579 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|५९४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} लोगोंकी भावना भी है और उन लाखों लोगोंकी भावना भी है जो मूक तो हैं पर महत्त्वहीन नहीं हैं । {{Gap}}इस संकटकी घड़ी में भारतीय जनताके निर्विवाद नेताको अपना स्व-आरोपित एकान्त त्याग कर बाहर आ ही जाना चाहिए। इसके लिए कुछ और भी अनिवार्य कारण गिनाये जा सकते हैं । हमारी जनता जिस प्रकारके विदेशी शासनमें कसमसा रही है, उससे देशकी आत्माको जो अकूत, अपार हानि हो रही है, उसके अतिरिक्त एक अनिवार्य कारण यह भी है कि भारतीय जनताके सामने आज अनगिनत ऐसे लक्षण प्रकट हो रहे हैं जिनको देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यदि वह अपने अधिकारोंकी रक्षाका एक दृढ़ संकल्प नहीं कर लेगी तो विदेशी शोषकोंके लोभकी वेदीपर हमारे देशके हितोंकी बलि चढ़ा दी जायेगी। विधान सभामें अभी हालमें जो घटनायें घटी हैं उनसे हमें क्या सबक मिलता है ? आशा है आप हमें इसका उल्लेख करनेके लिए क्षमा करेंगे। स्वराज्यवादियोंने नौकरशाहीकी अनुदार उपेक्षाके प्रति सम्मिलित रूपसे विरोध प्रदर्शन करनेके लिए सदन त्याग दिया था। उनकी अनुपस्थितिका लाभ उठाकर सरकारने देशके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हितोंसे सम्बन्धित एक विधेयकको शीघ्रता- से स्वीकृत कराने की घृष्टता की, लेकिन स्वराज्यवादियोंने मुद्रा विधेयकके अत्यधिक महत्त्वको समझा और ऐन उसी दिन विधान सभामें लौटकर सरकारकी चाल नाकाम कर दी । यदि सरकारको रोकने या नियंत्रित करनेवाले देशकी जनताके प्रतिनिधि नहीं रहेंगे, तो ऐसी अनगिनत चीजें हैं जिनमें नौकरशाही इस देशके हितोंको काफी बड़ी हानि पहुँचा सकती है और पहुँचायेगी। और यदि जनताके प्रतिनिधियोंमें पूरी तरहसे फूट पड़ गई जैसा कि सभी अनधिकार नामधारी नेताओं और वक्ताओं द्वारा हालमें की गई दलको हथियानेकी कोशिशोंसे बिलकुल स्पष्ट दिखने लगा है - तो खतरा इस बातका भी है कि भावी विधान सभा और परिषदोंमें राष्ट्र-विरोधी लोगोंका ही भारी बहुमत हो जायेगा । परन्तु स्थितिका सबसे अधिक क्षोभकारी पहलू तो यह है कि वह भारी बहुमत वास्तवमें भारतीय जनताके एक बहुत ही छोटेसे भागका प्रतिनिधि होगा । इसलिए कि हमारा निश्चित विश्वास है कि देशकी जनता आज भी तन-प्राणसे राष्ट्रवादी ही है। उसे केवल एक ऐसे नेताकी आवश्यकता है जो अपने निजी हितोंका बिलकुल भी कोई खयाल किये बिना उसकी आकांक्षाओंके साथ एक-प्राण हो, उसपर होनेवाले अन्यायोंको महसूस करे और उनके संघर्षोंमें आगे रहे। श्रीमान, ऐसा नेता दुर्लभ हुआ करता है, लेकिन भारतका सौभाग्य है कि उसके पास एक ऐसा नागरिक मौजूद है, अर्थात् आप मौजूद हैं । श्रीमान, हम आपसे आपके ही देशके नामपर अनुरोध करते हैं, हम आजतकके भुगते हुए अन्यायोंका ही नहीं, उन अन्य अनगिनत अन्यायोंका वास्ता देकर भी आपसे अनुरोध कर रहे हैं जो हमें आगे भुगतने पड़ेंगे। हमारी विनती है कि आप अपना निवृत्तिका व्रत, आत्म-त्यागका अपना संकल्प त्याग दें और अपने देशको पुकारपर कान देकर उसकी बागडोर सम्भाल लें । दूसरा कोई भी इस बागडोरको आपकी तरह नहीं सम्भाल सकता | हमारी यह विनती इस अन्धविश्वास और विवेकशून्य भावनासे प्रेरित नहीं हुई है कि संसारको<noinclude></noinclude> gz58w0g6k2xanqg7muddonl9gz390lj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३१ 250 186546 674580 644910 2026-08-27T06:23:34Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674580 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५९५}} त्रस्त करनेवाली बुराइयोंका किसी दिन कुछ न कुछ भला परिणाम अवश्य निकलेगा । हम भलीभाँति जानते हैं कि देश कैसी घोर अव्यवस्थाके कूपमें गिर पड़ा है, परन्तु श्रीमान हमारा विश्वास है कि यदि आप इस पुकारपर कोई पहल करें तो देशके स्वातन्त्र्य संग्रामके लिए एक बार फिर धन और जनकी कोई कमी नहीं रह जायेगी । {{Gap}}हम ईर्ष्याविश या व्यक्तिगत कारणोंसे कोई बात नहीं कहना चाहते। हमारी तनिक भी इच्छा नहीं है कि हम आपकी अनुपस्थिति में या आपके निवृत्ति-कालमें किये गये किन्हीं कामोंके लिए किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियोंकी आलोचना, सराहना या निन्दा करें। हम समझते हैं कि देश अब ऐसे झंझटोंसे तंग आ चुका है और पिछली बातोंको भूल जानेके लिए तैयार है । परन्तु यह सम्पन्न करानेके लिए भी हमें एक सच्चा नेता चाहिए, ऐसा नेता जिसे स्वयं ईश्वरने नेतृत्वकी प्रतिभा दी हो। ऐसी प्रतिभा समाचारपत्रोंके विज्ञापनों या सभा-मंचों द्वारा किसी भी ऐसे व्यक्तिमें पैदा नहीं की जा सकती जिसे यह प्रकृतिसे ही वरदान में न मिली हो । और यदि हमारा यह आग्रह आपको मान्य है और यदि आप कामके तरीकेके बारेमें दिये गये मात्र सुझावसे अप्रसन्न न हों, तो हम कहेंगे कि पुनः बागडोर सँभालनेका काम आप यहाँसे शुरू करें कि स्वयं ही एक पूर्ण प्रतिनिधित्वपूर्ण सम्मेलन बुलायें ऐसा सम्मेलन जो व्यक्तियोंका नहीं बल्कि इस देशको विरोधी गुटोंमें विभाजित करनेवाले सभी सिद्धान्तों या हितोंका प्रतिनिधित्व करता हो । यह हमारा एक सुझाव भर है, अधिक कुछ नहीं । ऐसे सम्मेलन में पण्डित मदन मोहन मालवीयके लिए भी काफी गुंजाइश है, सर अब्दुर रहीमके लिए भी है, श्री जयकर' और श्री पटेलके लिए भी है । हमें मालूम है कि इधर कुछ दिनोंसे हमारी राष्ट्रीय कांग्रेसका ही एक विशेष अधिवेशन बुलवानेके लिए प्रचार किया जा रहा है । पर हम सादर निवेदन करते हैं कि ऐसा अधिवेशन जितना कि अभी असामयिक होगा उतना ही विफल भी । इसलिए कि कांग्रेस संस्था तो अपने संविधान और प्रक्रिया-नियमोंसे बँधी हुई है। और उनका पालन करते हुए भावनाओं और विचारोंका निःसंकोच आदान-प्रदान नहीं हो सकेगा, जबकि आज साम्प्रदायिक वैमनस्यकी जड़में मौजूद भ्रान्तियों और पूर्वग्रहोंको दूर करनेका एकमात्र आसान तरीका ऐसा निःसंकोच वैचारिक आदान-प्रदान ही है । हमें इस बातका भी ध्यान है कि यदि आप हमारे इस सुझावके अनुरूप एक वास्तवमें प्रतिनिधित्वपूर्ण सम्मेलन बुलायें तो आप भी भर्त्सना आलोचनासे सर्वथा अछूते नहीं रह पायेंगे। परन्तु आपकी नीयतपर कोई शंका नहीं करता, आपका कार्य समुच शुद्ध- तम अर्थ में राष्ट्रीय होगा । और यदि बुरेसे बुरा परिणाम ही निकला तो उसके कारण व्यक्तिगत गलत फहमियाँ या गलत बयानियाँ भी सामने आ सकती हैं; पर हम समझते हैं कि देश के हितोंपर आनेवाली आँचको देखते हुए आप जैसी महान आत्मा उस सबसे अविचलित रह सकती है और उसे रहना ही चाहिए। हमने समूचे देशकी जनताकी अव्यक्त आकांक्षा आपपर प्रकट कर दी है । अब आप जो सर्वोचित समझें, {{Gap}}१. मु० रा० जयकर {{Gap}}२. विठ्ठलभाई पटेल<noinclude></noinclude> 4lpuq0f62ypjatvj85mgqlkphl8rryo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३३ 250 186548 674581 644912 2026-08-27T06:30:17Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674581 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५९७}} कहीं कैदियोंके सिवाय इस प्रकार अँगुलियोंकी छाप लेनेका विधान है ? यदि किसीके बलात्' करनेपर नग्न नृत्य करना अनुचित है तो क्या 'स्वेच्छा' से वैसा करनेपर उचित हो जायेगा ? {{Gap}}६. यदि सरकार अनधिकारी भारतीयोंके प्रवेश रोकनेके अभिप्रायसे अँगुलियोंकी छाप लेना चाहती थी तो क्या 'फोटो' से यह उद्देश्य सिद्ध नहीं हो सकता जैसाकि पहचान के लिए अन्य सभी सभ्य देशोंका रिवाज है ? {Gap}}७. Vested Rights के सम्बन्धमें आपका यह वाक्य है कि " By vested rights I understand the right of an Indian and his successors to live and trade in the township in which he was living and trading. No matter how often he shifts his residence or business from place to place in the same township क्या इसमें यह अर्थ नहीं निकलता कि यदि एक an व्यापारी या उसके उत्तराधिकारीका अमुक स्थानमें रोजगार करनेका अधिकार है तो उसी नगरमें बार-बार स्थान परिवर्तन करनेपर भी उसका अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए ? इस वाक्यका क्या यह अभिप्राय नहीं होता कि जो व्यापार कर रहे हैं, उनके या उनके उत्तराधिकारियों के सिवाय “ अन्य या नवीन" भारतीयोंका व्यापारका स्वत्व नहीं रहा ? जहाँतक में समझता हूँ कि vested rights से आपका मतलब ‘तत्कालीन चालू हकोंकी रक्षा' होना चाहिए । किन्तु आपके स्पष्टीकरणसे क्या यही अर्थ निकलता है ? {{Gap}}८. आपका 'दक्षिण आफ्रिकाका सत्याग्रह' मैंने अभी पढ़ा है; उसकी प्रस्तावनामें श्री राजेन्द्रबाबूका 'चम्पारन में सत्याग्रह' नामकी पुस्तकका जिक्र तो है; किन्तु दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहका इतिहास' का कोई उल्लेख नहीं है । यदि मेरी पुस्तक अपूर्ण और अप्रामाणिक है तो केवल आपकी एक पंक्तिसे उसका प्रचार रुक सकता था और यदि उसमें लिखी हुई घटनाएँ प्रामाणिक हैं तो उसकी उपेक्षा क्यों की गई ? मैंने ऊपर जो आठ प्रश्न पूछे हैं उसकी चर्चा अभीतक होती है और मैं भी भ्रममें पड़कर कई विषयोंपर ऊटपटाँग लेखनी चला चुका हूँ । अतएव इस पुस्तकमें मैं अपनी सारी गलतियोंका संशोधन और उसके लिए पश्चात्ताप प्रकट करना चाहता हूँ । इसीलिए मैं कुछ प्रश्न पूछेने की धृष्टता कर रहा हूँ । आशा है कि आप मुझपर दया करके यथासम्भव शीघ्र ही उत्तर भिजवानेकी कृपा करेंगे। मैं उपर्युक्त प्रश्नोंका कुछ विस्तारसे उत्तर चाहता हूँ । आपको हिन्दी लिखनेमें कष्ट होगा, यह मैं जानता हूँ, किन्तु मुझे आशा है कि आश्रमके किसी हिन्दी लेखकसे यह काम लिया जा सकता है । {{Rh|||आपका सेवक,}} {{Rh|||भवानीदयाल}} {{Gap}}कृपा दृष्टि बनी रहे । {{Gap}}मूल पत्र (एस० एन० १०९९०) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> ihww3w5t05qf67nty8j5c2xsgzxa7dv 674582 674581 2026-08-27T06:30:40Z Bikki97 6801 674582 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५९७}} कहीं कैदियोंके सिवाय इस प्रकार अँगुलियोंकी छाप लेनेका विधान है ? यदि किसीके बलात्' करनेपर नग्न नृत्य करना अनुचित है तो क्या 'स्वेच्छा' से वैसा करनेपर उचित हो जायेगा ? {{Gap}}६. यदि सरकार अनधिकारी भारतीयोंके प्रवेश रोकनेके अभिप्रायसे अँगुलियोंकी छाप लेना चाहती थी तो क्या 'फोटो' से यह उद्देश्य सिद्ध नहीं हो सकता जैसाकि पहचान के लिए अन्य सभी सभ्य देशोंका रिवाज है ? {{Gap}}७. Vested Rights के सम्बन्धमें आपका यह वाक्य है कि " By vested rights I understand the right of an Indian and his successors to live and trade in the township in which he was living and trading. No matter how often he shifts his residence or business from place to place in the same township क्या इसमें यह अर्थ नहीं निकलता कि यदि एक an व्यापारी या उसके उत्तराधिकारीका अमुक स्थानमें रोजगार करनेका अधिकार है तो उसी नगरमें बार-बार स्थान परिवर्तन करनेपर भी उसका अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए ? इस वाक्यका क्या यह अभिप्राय नहीं होता कि जो व्यापार कर रहे हैं, उनके या उनके उत्तराधिकारियों के सिवाय “ अन्य या नवीन" भारतीयोंका व्यापारका स्वत्व नहीं रहा ? जहाँतक में समझता हूँ कि vested rights से आपका मतलब ‘तत्कालीन चालू हकोंकी रक्षा' होना चाहिए । किन्तु आपके स्पष्टीकरणसे क्या यही अर्थ निकलता है ? {{Gap}}८. आपका 'दक्षिण आफ्रिकाका सत्याग्रह' मैंने अभी पढ़ा है; उसकी प्रस्तावनामें श्री राजेन्द्रबाबूका 'चम्पारन में सत्याग्रह' नामकी पुस्तकका जिक्र तो है; किन्तु दक्षिण आफ्रिकाके सत्याग्रहका इतिहास' का कोई उल्लेख नहीं है । यदि मेरी पुस्तक अपूर्ण और अप्रामाणिक है तो केवल आपकी एक पंक्तिसे उसका प्रचार रुक सकता था और यदि उसमें लिखी हुई घटनाएँ प्रामाणिक हैं तो उसकी उपेक्षा क्यों की गई ? मैंने ऊपर जो आठ प्रश्न पूछे हैं उसकी चर्चा अभीतक होती है और मैं भी भ्रममें पड़कर कई विषयोंपर ऊटपटाँग लेखनी चला चुका हूँ । अतएव इस पुस्तकमें मैं अपनी सारी गलतियोंका संशोधन और उसके लिए पश्चात्ताप प्रकट करना चाहता हूँ । इसीलिए मैं कुछ प्रश्न पूछेने की धृष्टता कर रहा हूँ । आशा है कि आप मुझपर दया करके यथासम्भव शीघ्र ही उत्तर भिजवानेकी कृपा करेंगे। मैं उपर्युक्त प्रश्नोंका कुछ विस्तारसे उत्तर चाहता हूँ । आपको हिन्दी लिखनेमें कष्ट होगा, यह मैं जानता हूँ, किन्तु मुझे आशा है कि आश्रमके किसी हिन्दी लेखकसे यह काम लिया जा सकता है । {{Rh|||आपका सेवक,}} {{Rh|||भवानीदयाल}} {{Gap}}कृपा दृष्टि बनी रहे । {{Gap}}मूल पत्र (एस० एन० १०९९०) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude> qvxspu989xrmhyhhq0b34mvlxcauk6z पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३४ 250 186549 674584 644913 2026-08-27T06:33:34Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674584 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{C|'''परिशिष्ट ६'''}} {{C|'''बनारसीदास चतुर्वेदीका पत्र'''}} {{Rh|||फीरोजाबाद,}} {{Rh|||आगरा}} <Br>मान्यवर, {{Gap}}९ सितम्बरके 'यंग इंडिया' में 'आउट ऑफ द फ्राइंग पेन' शीर्षकसे प्रकाशित आपके लेखमें कुछ बातें कही गई हैं, जिनका स्पष्टीकरण आपसे अपेक्षित है । आपने आई० आई० सी० एसोसिएशनके श्री वेजके प्रतिवेदनका एक अंश उद्धृत किया है, जिसमें इस बातको जोर देकर कहा गया है कि उपनिवेशोंमें बसे भारतीयोंने दो कारणोंसे अपना जन्मप्रदेश त्याग था (१) मातृभूमि जानेकी इच्छा और (२) यह अफ- वाह कि भारतको स्वराज्य मिल गया है। वापस आये इन प्रवासियोंके सम्पर्कमें में पिछले छः वर्षोंसे हूँ । इस अरसेमें और नहीं तो बीस बार अवश्य ही उनके घरोंमें जाकर उनसे मिला हूँ । इन नाते मैं कह सकता हूँ कि यह दूसरा कारण एक कोरी कल्पना है । श्री एन्ड्रयूज और आपने जब मुझे इन प्रवासियोंकी देखभालका काम सौंपा था, उस समय भी एक-दो लोगोंने मुझे यह कारण बतलाया था और मैंने इस सम्बन्धमें पूरी तरहसे जाँच-पड़ताल की थी और इसे बिलकुल ही निराधार पाया था। जाहिर है कि मटियाबुर्जके कुछ चतुर लोगोंने श्री वेजको भटका दिया होगा । {{Gap}}6 भारत लौटे हुए इन प्रवासियोंकी कठिनाइयोंका जिक्र करते हुए आपने लिखा है : " यहाँ वे सामाजिक रूपसे बहिष्कृत जैसे हैं, क्योंकि वे जनताकी भाषातक नहीं जानते । " सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अधिकांश प्रवासी जनताकी भाषा जानते हैं । निश्चय ही, वे अपना आशय व्यक्त कर सकते हैं, यह दूसरी बात है कि उनकी हिन्दुस्तानी व्याकरणकी दृष्टिसे शुद्ध नहीं होती। मैंने खुद ही मटियाबुर्ज में सैकड़ों प्रवासियोंसे हिन्दीमें बातचीत की है। में इतनी बार मटियाबुर्ज गया हूँ, पर मुझे वहाँ एक भी भारतीय ऐसा नहीं मिला जिसके बारेमें आपका यह कथन बिलकुल सही उतरता हो कि " वे जनताकी भाषातक नहीं जानते ।" मैं निश्चित तौरपर कह सकता हूँ कि उनमें से अधिकांशको बोलचालकी हिन्दुस्तानीकी अच्छी जानकारी है । हाँ, वे साहित्यिक हिन्दी या उर्दू नहीं जानते । {{Gap}}एक चीज और है जिसे भूलनान हीं चाहिए। वह यह कि लौटे हुए भारतीयोंमें से अस्सी प्रतिशत भारतके गाँवोंमें घुलमिल जाते हैं, और केवल बीस प्रतिशतसे कुछ कमको ही मटियाबुर्जमें शरण लेनी पड़ती है । मटियाबुर्जमें टिके इन लोगोंको बसने- के अवसर कई बार दिये गये, पर वे हर बार मना करते रहे हैं। इसमें शक नहीं कि मटियाबुर्ज में इस समय टिके इन प्रवासियोंमें से अनेक अपनी जातिके लोगों, जमींदारों और पुलिस तथा पण्डितोंके अत्याचारोंसे पीड़ित रह चुके हैं, पर ये लोग लौटे हुए<noinclude></noinclude> 652moh0w9yegoh9fmje4b3ql258229q पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३५ 250 186550 674588 644914 2026-08-27T06:37:12Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674588 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ५९९}} प्रवासियोंकी कुल संख्याका एक बहुत ही छोटा भाग हैं। इसलिए आपके कथनमें कुछ तरमीम जरूरी हो जाती है । {{Gap}}लौटे हुए इन प्रवासियोंको आप किसी ऐसे सर्वाधिक उपयुक्त उपनिवेशमें भेजने की नीतिका अनुमोदन करते हैं, जो इन्हें स्वीकार करने को तैयार हो । अभी इस समय तो ब्रिटिश गियाना ही इनको स्वीकार करनेके लिए तैयार है और भारत सरकार इनमें से कुछको वहाँ भेजने के लिए तैयार भी है। और सचमुच कलकत्तामें एक स्टीमर पिछले कुछ दिनोंसे इनका इन्तजार भी कर रहा है। वह २० तारीखको चलेगा। क्या आप फिजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना भेजनेकी नीतिका अनुमोदन करते हैं? में यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूँ कि मुझे आशंका है कि कहीं भारत सरकार आपके इस बयानकी आड़ लेकर फिजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना न भेज दे। इस समय मटियाबुर्ज में ब्रिटिश गियानासे लौटे प्रवासियोंकी संख्या ३०० से अधिक नहीं है जबकि फिजीसे लौटे प्रवासी ६०० से अधिक मौजूद हैं। मैंने दस महीने पहले मटियाबुर्ज में जाँच की थी और इलाहाबादसे निकलनेवाले 'चाँद' में अपने निष्कर्ष प्रकाशित कराये थे । मेरे इस लेखके कुछ अंश फिजी विधान परिषदके एक सदस्यने परिषदकी बैठकमें पढ़कर सुनाये थे और उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया था कि फिजीके इन ५०० लोगोंको फिजी बुला लिया जाये । प्रस्ताव स्वीकृत हो गया था और उसे परिषदके सदस्योंकी सर्वसम्मत राय मान लिया गया था। अब फिजीके गवर्नरने इस विषयको लेकर उपनिवेश-सचिवको लिखा है । इसलिए सम्भव है कि फिजीसे लौटे ये प्रवासी शायद फीजी वापस भेजे जा सकें । {Gap}}मटियाबुर्ज में टिके प्रवासियोंकी इस समस्याके सम्बन्धमें आपने चार बुनियादी सवाल उठाये हैं: (१) प्रवास-नीति (२) ब्रिटिश गियाना और फिजीकी विशेष स्थिति (३) मैत्रीपूर्ण संस्थाओंके कामकी मर्यादा और (४) राष्ट्रका कर्त्तव्य । आपका कहना है कि कलकत्तामें ठहरे हुए प्रवासियोंकी अविलम्ब सहायताकी जानी चाहिए। और ब्रिटिश गियानासे लौटे प्रवासियोंको वहीं वापस भेजनेकी आपकी बातसे तो मैं बिलकुल सहमत हूँ, पर फीजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना भेजनेकी सलाह में नहीं दे सकता, क्योंकि उसका जलवायु फीजीके मुकाबले बहुत ही खराब है। फिजीका जलवायु बड़ा अच्छा है । आपने जो चार प्रश्न उठाये हैं वे वास्तवमें परस्पर गुँथे हुए हैं और उनकी ओर तुरन्त ध्यान देना आवश्यक है । भारत सरकारके पत्रसे स्पष्ट है कि वह ब्रिटिश गियाना भेजनेके लिए ५०० परिवार भर्ती करना चाहती है । {{Gap}}इसके अतिरिक्त अन्य उपनिवेशोंसे भी प्रतिवर्ष हजारों भारतीय लौटते रहते हैं और मटियाबुर्जकी समस्या निस्सन्देह अस्थायी नहीं है, अभी लम्बे अरसेतक वह बार-बार सामने आती रहेगी । हमें यह भी याद रखना चाहिए । औपनिवेशिक सरकारें एक शरारत करती रही हैं - वे उनके कागजात भारत भेजती रही हैं। ये अभागे लोग उपनिवेशोंमें अपने जीवनका सबसे अच्छा क्रियाशील समय बिताकर जब भारत लौटते हैं तो नैतिक और शारीरिक दोनों ही तरहसे बिलकुल बुझ चुके होते हैं और ऐसे लोग उपनिवेशोंके लिए किसी भी तरह लाभप्रद निवासी नहीं हो सकते। हमें मालूम<noinclude></noinclude> pxpnhiz3hkrbj244byydjn1ph8hnofj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३७ 250 186552 674590 644916 2026-08-27T06:39:12Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674590 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ६०१}} उठता, लेकिन सच्चाई इससे अधिक अप्रत्याशित, पर निर्विवाद है और वह यह है कि यूरोपकी ईसाइयतको गांधीका व्यक्तित्व, उनका कर्म, उनका जीवनका तरीका और उनकी आस्था ही सबसे अधिक प्रेरणा देती रही है। ऐसी आशा न तुमको थी और न गांधीको ही; और महात्मा ऐसा कोई लक्ष्य लेकर चले भी नहीं थे । {{Gap}}परन्तु महान कार्योंके परिणाम अप्रत्याशित निकलते हैं, और अक्सर ऐसा होता है कि उनके प्रभावका महत्त्व ईश्वरका काम करनेवाले इन महान व्यक्तियोंकी अपनी आशा और इच्छासे मेल खाता हुआ या उससे भी कहीं अधिक हो जाता है । इसलिए कि आखिर व्यक्ति ही तो कर्म नहीं करता, कर्त्ता तो ईश्वर ही है जो व्यक्तिके माध्यम से कर्म करता है । {{Gap}}सच तो यह है कि यूरोपके ईसाइयोंकी नई पीढ़ीने गांधीमें आजके विशुद्धतम ईसाईके दर्शन किये हैं (भले ही गांधीको इसकी जानकारी न हो) ऐसे इन्सानके दर्शन किये हैं जो धर्माचार्यों और पादरियोंसे कहीं ऊपर उठकर ईसाके धर्मोपदेशोंकी भावनाको लेकर चलनेवाली परम्परासे प्रत्यक्ष तादात्म्य स्थापित करता है । {{Gap}}इस प्रकार ईसाइयोंके समक्ष उनके अपने धर्म-सिद्धान्तोंकी व्याख्या करने और समझाने और पीड़ाजनक आशंकाओं तथा अनिश्चयकी घड़ीमें उनका सही मार्गदर्शन करनेके कारण इन तरुण ईसाइयोंपर गांधीका प्रभाव अत्यधिक व्यापक हो गया है । {{Gap}}बहुत मुमकिन है कि गांधीकी अपनी कोई ऐसी अभिलाषा न रही हो । लेकिन मैं फिर कहूँगा कि ऊपरवाला, जो गांधीसे कहीं बड़ा है, उसकी यही इच्छा थी । और गांधी को भविष्यमें उसकी इस इच्छासे बच निकलनेका कोई अधिकार नहीं । इसलिए कि भारतमें उसका काम कितना ही अनुल्लंघनीय या अनिवार्य क्यों न हो, पर वह काम समूची मानवताके प्रति उसके कर्त्तव्यका एक अंग ही है और वह कर्त्तव्य उससे कहीं बड़ा है । और हिन्दूधर्ममें गांधीका अपना व्यक्तिगत विश्वास कितना ही गहरा क्यों न हो, लेकिन सारे धार्मिक विश्वासों में सर्वश्रेष्ठ दिव्यतम विश्वासज्ञानका प्रचण्डतम आलोक, एक शाश्वत, चिरंतन तत्त्व वही है जो सभी धार्मिक विश्वासों में समान रूपसे व्याप्त है, वह नहीं जो ईश्वरको किसी वस्तु विशेष या स्थल विशेष में ही देखता है और उसे हर कहीं समान रूपसे व्याप्त, सर्वव्यापक नहीं मानता । {{Gap}}और जो ईश्वरकी वाणी सुनता है और ईश्वरके शब्दोंको ही दोहराता है वह संसार के समस्त प्राणियोंके उद्गारोंको वाणी देता है । {{Gap}}अन्तःकरण और आस्थाकी समस्याका कोई हल तलाश न कर पानेकी दारुण व्यथा अब वर्तमान ईसाई समाज में घुन लगाती जा रही है । ईसाइयोंका कोई भी धर्माचार्य या धर्म-प्रवक्ता इस समस्याको हल करने में समर्थ नहीं है। इसकी एक बड़ी तीव्र अभिव्यंजना मैंने रोम विश्वविद्यालयके एक प्राध्यापककी रचनाओंमें देखी है। लुइगी त्राफेलीकी 'उबी क्रिस्टियानुस' और 'डोथिरीना डि क्राइस्टो' ( 'ईसाइयत कहाँ' और 'क्राइस्टका सिद्धान्त' ) दो पुस्तकें मुझे हालमें मिली थीं । निस्सन्देह, लेखकका अन्तःकरण तीव्र व्यथासे विघा हुआ है । वे शुरू ही इस घोषणाके साथ करते हैं कि ईसाने अपने पहले उपदेशमें ही जिस ' मेटानोइया ' या ' आन्तरिक परिवर्तन '<noinclude></noinclude> j5vzwr4pwankx98b8mcz3xkdfehm00x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३८ 250 186553 674591 644917 2026-08-27T06:41:14Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674591 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|६०२| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} या 'हृदय परिवर्तन' की बात कही थी, उसका मतलब होता है कि सामान्य जीवनमें मनुष्य जिन मूल्योंकी सबसे ज्यादा कद्र करते हैं, उन मूल्योंका एकदम निराकरण-निग्रह किया जाये और उनका पूर्ण रूपान्तरण हो । आवश्यकता इस वातकी है कि आध्यात्मिक ज्ञानसे 'अप्रबुद्ध मानव' को उसके अज्ञानसे मुक्त करके सहज, प्रकृत अवस्थामें लाया जाये, इस बातकी नहीं कि आध्यात्मिक रूपसे 'प्रबुद्ध मानव' का पुनः संस्कार किया जाये, उसे नया बाना पहनाया जाये, क्योंकि वह ईश्वरके साम्राज्य में तबतक प्रवेश नहीं पा सकेगा जबतक कि वह अपने सर्वोच्च, परम पुनीत कर्त्तव्यके लिए अपने छोटे-मोटे सांसारिक कर्त्तव्योंको त्याग नहीं देता और जबतक वह पूर्ण बननेकी अपनी अभिलाषा- की वेदीपर सांसारिक सुखों या मायाके हर प्रकारके मोहको बलि नहीं चढ़ा देता । {{Gap}}इसलिए तू इतना पूर्ण बन जितना कि स्वर्ग में तेरा परम पिता है ।" सांसारिक माया- मोहके लिए कोई गुंजाइश मत रहने दे । “ सब कुछ त्याग दे और मेरे पीछे चल । {{Gap}}लुइगी त्राफेलीने आध्यात्मिकता और सांसारिक मोहके बीच चलनेवाले इस सना- तन संघर्ष, विरोधाभासका विश्लेषण करनेके पश्चात् उन सभी 'समझौतों' या मध्यम मार्गों' को कसौटीपर कसा जो ईसाई धर्माचार्य और आस्थावान कहलानेवाले धर्म- शास्त्री आध्यात्मिकता और सांसारिकताकी आपसमें पटरी बैठानेके लिए सुझाते हैं । {{Gap}}तब लुइगी त्राफेली शोकार्त हो, अपने-आपसे पूछते हैं - " क्या अब भी ईसाइयोंका अस्ति- त्व कहीं है ? " वे अन्तमें यही निष्कर्ष निकालते हैं नहीं, अब कहीं भी उनका अस्तित्व नहीं रह गया ।" वे स्वयं स्वीकार करते हैं वे स्वयं स्वीकार करते हैं -- “ में ईसाई नहीं हूँ ।' और बादमें कहते हैं -- " मेरे अन्दर कमसे कम इतना पाखण्ड तो नहीं कि मैं अपने आपको ईसाई बतलाऊँ, जैसा कि धर्माचार्य लोग ईसाके स्पष्ट आदेशके उल्लंघनके बावजूद करते हैं। " {{Gap}}यूरोप, बल्कि समूचा संसार (और विशेषकर वह देश जो सनातनी 'कैथोलिक ' धर्मका गढ़ है, अर्थात् इटली), आज जिस सामाजिक संकटके दौरसे गुजर रहा है उसे देखते हुए यह प्रश्न और भी दुःखद एवं करुणाजनक बन जाता है । {{Gap}}इस समय इटलीमें राज्यकी शक्ति इतनी अधिक प्रभुता सम्पन्न हो गई है, इतनी निरंकुश हो गई है कि वह एकदम दानवी बनती जा रही है। हर वस्तु, हर मूल्य उसपर बलि चढ़ा दिया जाता है, वार्मिक विश्वास उसके पैरों तले रौंदा जा रहा है। व्यष्टिगत आत्माको तहस नहस किया जा रहा है । " {{Gap}}सरकारी आज्ञा" का (उसे गढ़नेवाले एक या दो नेताओं द्वारा पारिभाषित रूपमें) विरोध करनेवालोंको कुचल दिया गया है, या कुचल दिया जायेगा । मुसोलिनीमें यह मानव-द्वेषी भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। वही इस मतका प्रचार कर रहा है, जिसे लाखों इटालियन लोगोंने स्वीकार कर लिया है, जो थोड़े ही दिनोंमें समूचे यूरोप और अमेरिकापर (अमेरिका पर भी ) निश्चय ही छा जायेगा । {{Gap}}और, इस घड़ी में धार्मिक विश्वासके रहनुमा क्या कर रहे हैं ? उनमें इतना साहस नहीं कि वे अपने अनुयायियोंसे कहें: “प्रतिरोध करो ! अत्याचारके शिकार बनो ! {{Gap}}और इस तरह उनको अकथनीय यातनाओंमें झोंक कर, उसकी पूरी जिम्मेदारी अपने<noinclude></noinclude> n6ahweqobs79zthfrelyh7zhdl36k68 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३९ 250 186554 674592 644918 2026-08-27T06:42:54Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674592 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||परिशिष्ट| ६०३}} सिर ले सकें। उनमें से जो सबसे घटिया, मामूली दर्जेके लोग हैं वे अपनी आत्मिक शान्ति बनाये रखनेकी सोचते रहते हैं । और जो उनमें सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम किस्मके लोग हैं वे अपने मनमें उस वृद्ध टॉल्स्टॉयकी याद कर लेते हैं जो अपने शिष्योंको अत्याचारका शिकार बनते देखकर व्यथित हो उठा था कि वह स्वयं अत्याचारका शिकार क्यों नहीं बन पाया । इसलिए कि सत्ता इतनी धूर्त होती कि वह प्रतिष्ठित एवं जाने माने व्यक्तियोंके साथ नरमीसे और साधारण अज्ञातनामा व्यक्तियोंके साथ कठोरतासे पेश आना जानती है । परिणाम यह है कि सभी लोग आध्यात्मिकता और सांसारिक मायाके बीच एक मध्यम मार्ग, दोनोंको निभाते चलनेका रास्ता खोजनेमें और इसीका उपदेश देनेमें लगे रहते हैं । यह मध्यम मार्ग वास्तवमें एक आन्तरिक असत्य है, मिथ्या कल्पना है, और इसीलिए आत्मा पतनोन्मुख हो जाती है । {{Gap}}तरुण लोग इसे समझते हैं । वे ईसाकी आवाज सुननेकी कोशिश करते हैं, जो उनसे कहे -- " यह रहा तेरा कर्त्तव्य । ” लेकिन आवाज कुछ कहती नहीं । वे यों ही बेसहारा रह जाते हैं। यही कारण है कि इतने सारे ईसाई युवक रहनुमाईके लिए गांधी की ओर देखते हैं । {{Gap}}- मेरी बहन तुम्हारा कहना है कि इन युवकोंको सही उत्तर देना मेरा काम नहीं; यह मेरे बसकी बात नहीं । जरूरी यही है कि मैं जैसा हूँ उसी रूपमें मुझे देखा समझा जाये, मुझमें किसी ऐसी आस्था, विश्वास, विचार या सद्कार्यको आरोपित न किया जाये जो मेरा अपना न हो । {{Gap}}में ईसाई नहीं हूँ, में गांधीवादी भी नहीं हूँ; किसी भी श्रुतधर्म या दिव्यसंदेशमें विश्वास नहीं करता। मेरी आत्मा पाश्चात्य रंगमें रंगी हुई है और मैं प्रेम तथा सत्यनिष्ठाकी भावनासे सत्यकी खोजमें लगा हुआ हूँ। मैं स्वयं अपनेको और दूसरोंको भी, जो एक चीज समझाने-सिखाने की कोशिश करता हूँ वह यह है : आप अपने विचारोंको आचरणके द्वारा झुठलाएँ नहीं और आप जिस चीजमें मात्र विश्वास करते हैं, या जिसकी आशा करते हैं, उसके लिए कभी मत कहिए कि आप उसे जानते- समझते हैं; आप जिस सत्यको ठीक-ठीक और जितना जानते हैं उतना ही जाननेका दावा कीजिए, इससे अधिक कुछ नहीं; और आप किसी सत्यको समझ लें या न भी समझ पायें, फिर भी उसके प्रति अपना प्रेम और उसे समझने की अपनी शक्ति, अपना प्रयत्न संरक्षित रखिए। 'माइकेल एंजुलोकी जीवनी' की अपनी प्रस्तावनामें मैंने लिखा है : " मनुष्य और जीवनको उनके यथार्थ स्वरूपमें ही देखो, ग्रहण करो, और जैसे वे हैं उसी रूपमें उनसे प्रेम करो और उनके प्रति आचरण करो... {{Gap}}मैंने अपने लिए यही काम चुना है । मेरा यह भी काम है कि मैं इस संसारमें मौजूद शक्ति और प्रेरणाके सभी स्रोतों, आलोक दे सकनेवाले सभी स्रोतोंकी खोज करूँ और दूसरे सभी लोगोंको उनकी जानकारी कराऊँ । वीरनायक सूरमा और सन्त ऐसे ही स्रोत हैं। मैं कहता हूँ: "इन स्रोतोंसे जितना ले सकते हो लो, आकंठ ग्रहण करो इनका रस ! {{Gap}}लेकिन मेरा यह काम नहीं कि मैं किसी ऐसे धर्मकी दुहाई दूँ जिसमें मैं विश्वास नहीं करता। जिनको धर्ममें विश्वास है, उनको ऐसी दुहाई देने दीजिए !<noinclude></noinclude> o9rwly8kivp5qibrf60o994h0bw2a49 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६४० 250 186555 674593 644919 2026-08-27T06:45:25Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674593 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh|६०४| सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} {{Gap}}- अभी हमारे यहाँ एक बहुत ही खुशमिजाज अमेरिकी आये थे । वे संसारके सभी ख्यातनामा व्यक्तियोंसे मिलनेके लिए एक तूफानी दौरा कर रहे हैं। हर बड़े आदमीके लिए पाँच मिनट ! उनका नाम है- बुकानन । वे सालके शुरूमें गांधीसे मिल चुके हैं, और बतलाते हैं कि गांधीके बारेमें मेरी पुस्तकके सम्बन्धमें गांधीने कहा था : साहित्यकी चीज है ।" नहीं, यह कहना सर्वथा उचित नहीं । कहना चाहिए कि " प्रेमकी चीज है ।" सभी जानते हैं कि प्रेम बिलकुल ही यथार्थ स्वरूपको नहीं देख पाता । मेरी पुस्तकका वर्णन कई जगहोंपर गलत होगा । न भी कैसे होता ? मुझे न भारतके सामाजिक पर्यावरणकी कोई जानकारी थी, न भाषाकी । मैंने तो एक महान जीवनके बारेमें चन्द पुस्तकें पढ़नेके बाद अपनी कल्पनाके बलपर ही छः से बारह महीने में असाधारण कौशलका एक काम कर डाला । पुस्तकें भी ऐसी थीं जो सुदूरके मेरे सर्वथा अपरिचित लोगोंने लिखी थीं। यह एक बहुत ही बड़ी धृष्टता थी । परन्तु प्रेमने मुझे कल्पना न करनेकी और अपने प्रेम-पात्र, अपने आनन्द और अपने उत्साहसे अपने यूरोपीय भाइयोंको वंचित रखनेकी छूट नहीं दी, मुझे विवश कर दिया। और इसमें, मैं समझता हूँ, मैं सफल रहा हूँ। हो सकता है कि कहीं- कहीं, और कई जगहोंपर, गांधीके चरित्र और विचारोंको पेश करनेमें मुझसे चूक हो गई हो। ऐसा सम्भव है और मैं क्षमा चाहता हूँ । पर मैं ऐसी स्थितिमें अकसर अपने-आपसे एक प्रश्न पूछा करता हूँ -- ईसा यदि अपने सम्बन्धमें अपने शिष्यों द्वारा दिये गये वृत्तान्तोंको देखते तो क्या सोचते । सत्य या मिथ्या, जैसा भी हो, पर इतना निश्चित है कि मैंने “साहित्यकी चीज साहित्यकी चीज" नहीं लिखी थी। (साहित्यिक बन्धु मुझे अपनी पंक्तिमें बैठानेके सर्वथा उपयुक्त नहीं मानते । ) मैंने तो जो भी लिखा, अपने हृदयका भार हलका करनेके लिए, अपने उद्गारोंको अभिव्यक्ति देनेके लिए ही लिखा है । {{Gap}}हम काफी स्वस्थ हैं, यद्यपि मैं इधर एक पखवारेतक आंत्र ज्वरसे पीड़ित रह चुका हूँ । मेडेलीन अभी कुछ समय के लिए वॉयसे आई थी। साथ-साथ टहलने में बड़ा आनन्द आया । अगस्तसे ही ग्रीष्मकी अपनी निराली एक छटा है। भारतमें तुमको अपना घर जैसा महसूस हो रहा है - इसपर मुझे कोई आश्चर्य नहीं ! क्या तुमने ही नहीं कहा था कि तुम्हारे शरीरमें खानाबदोश 'जिप्सियों' का रक्त है ? तुमने देख लिया; हालकी शोधसे पता चला है कि 'जिप्सी' लोगोंका मूल वास स्थान निश्चय ही भारत था । तुम जहाँसे चली थीं, वहीं लौट गई हो। मेडेलीन और मेरी ओरसे स्नेह । बापूको आदरपूर्ण स्नेह बावजूद इस तथ्यके कि अवस्थामें मैं उनसे बड़ा हूँ, परन्तु आत्माका शरीरसे भिन्न एक अपना काल-चक्र होता है । {{Rh|||तुम्हारा}} {{Rh|||रोमाँ रोलाँ}} {{Gap}}अंग्रेजी अनुवाद (एस० एन० १२१७४) की फोटो - नकलसे ।<noinclude></noinclude> c288lgin0043r4xzhzznq10u9xsvnlg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६४१ 250 186556 674594 644920 2026-08-27T06:48:13Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674594 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{rh||सामग्री के साधन - सूत्र}} {{Gap}}गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और सम्बन्धित कागजातका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय । देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५९ । {{Gap}}राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्ज ऑफ इंडिया), नई दिल्लीमें सुरक्षित कागजात । {{Gap}}साबरमती संग्रहालय : पुस्तकालय तथा संग्रहालय, जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफ्रिकी काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३६० । {{Gap}}गुजराती ' : बम्बईसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक । {{Gap}}'नवजीवन' (१९१९ - १९३१ ) : गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक । {{Gap}}फॉरवर्ड' : कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । {{Gap}}'बॉम्बे क्रॉनिकल' : बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक। {{Gap}}'यंग इंडिया' (१९१८ - १९३१ ) : {{Gap}}अहमदाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक । सम्पादक, मो० क० गांधी, प्रकाशक, मोहनलाल मगनलाल भट्ट । {{Gap}}' सर्चलाइट' : पटनासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । 'हिन्दी नवजीवन' (१९२१ - १९३२): गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक । {{Gap}}'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक । महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी : स्वराज्य आश्रम, बारडोली । {{Gap}}'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद' : सम्पादक -- काका कालेलकर; जमनालाल बजाज ट्रस्ट, वर्धा, १९५३ । {{Gap}}'माई डियर चाइल्ड' (अंग्रेजी) : एलिस एम० बार्ज द्वारा सम्पादित; नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५६ । {{Gap}}रोमाँ रोलाँ बर्थडे बुक' : प्रकाशक टोरोप्पल -- {Gap}}वर्लेग, ज्यूरिच, १९२६ ।<noinclude></noinclude> luyjjvaouocd9sl3gs0zvmoz4ij7gxm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६४२ 250 186557 674595 644921 2026-08-27T06:49:44Z Bikki97 6801 /* शोधित */ 674595 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Bikki97" /></noinclude>{{c|तारीखवार जीवन-वृत्तान्त}} {{C|(१५ जूनसे ४ नवम्बर, १९२६ तक)}} १५ जून : गांधीजी सत्याग्रहाश्रम साबरमतीमें । १९ जूनसे पूर्व : नेलौर आदि-आन्ध्र सम्मेलनको दिये गये सन्देशमें चरखेके प्रचार और अस्पृश्यता निवारणके लिए कहा । ११ जुलाई : सारे भारतमें सभाएँ करके और जलूस निकाल कर चित्तरंजन दासकी वर्षगाँठ मनाई गई । १५ जुलाई : कलकत्तामें हिन्दू-मुसलमानोंके दंगे फूट पड़े । २६ जुलाई : लोकमान्य तिलककी पुण्यतिथिके अवसरपर गांधीजीने महाराष्ट्रको यह सन्देश भेजा कि खादी और चरखा स्वराज्यप्राप्तिके साधन हैं । १५ अगस्त : गांधीजीने 'इंडियन डेली मेल' और 'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' के सम्पादक नटराजनसे आश्रम में भेंट की । १८ सितम्बर : दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलका स्वागत करनेके लिए अहमदाबादसे बम्बई गये । १९ सितम्बर : बम्बई में 'नेटाल एडवर्टाइजर' के प्रतिनिधिसे भेंट । दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलके मानमें आयोजित उद्यान-गोष्ठीमें शामिल हुए। रातको अहमदा- बादके लिए रवाना । २० सितम्बर : अहमदाबाद पहुँचे । २६ सितम्बर : दक्षिण आफ्रिकाके प्रतिनिधियोंसे दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके मसलेपर चर्चा की । १० अक्तूबर : वसीयतनामा लिखा । १७ अक्तूबर : गांधीजीने गोलमेज परिषदके लिए भारतीय शिष्टमण्डलके सदस्योंके चुनावके बारेमें एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे भेंट की । २४ अक्तूबर : आश्रममें आयोजित मजदूर संघ, अहमदाबादके वार्षिक उत्सवमें भाषण । १ नवम्बर : सर गंगाराम और दूसरे लोगोंसे मिलनेके लिए अहमदाबादसे बम्बईके लिए रवाना । २ नवम्बर : बम्बईसे अहमदाबाद वापस आए ।<noinclude></noinclude> g5gunagkkois1hxrcn6b9izuhxv2zw2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२८ 250 186606 674462 644970 2026-08-26T16:49:13Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674462 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|चौबीस}} {|width=100% |- | ३३९. || 'नवजीवन' प्रेमियोंको (१९-८-१९२६) || ३२७ |- | ३४०. || पत्र : पूंजाभाई शाहको (१९-८-१९२६) || ३२८ |- | ३४१. || पत्र : रुस्तमजी वाछा गांधीको (१९-८-१९२६) || ३२८ |- | ३४२. || तार : डा॰ सत्यपालको (२०-८-१९२६) || ३२९ |- | ३४३. || तार : मोतीलाल नेहरूको (२०-८-१९२६) || ३२९ |- | ३४४. || पत्र : मुत्तुस्वामी मुदलीको (२०-८-१९२६) || ३३० |- | ३४५. || पत्र : एस्थर मेननको (२०-८-१९२६) || ३३० |- | ३४६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२०-८-१९२६) || ३३१ |- | ३४७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२१-८-१९२६) || ३३२ |- | ३४८. || राष्ट्रीय शालाएँ (२२-८-१९२६) || ३३३ |- | ३४९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२२-८-१९२६) || ३३५ |- | ३५०. || पत्र : लक्ष्मीदास आसरको (२४-८-१९२६) || ३३५ |- | ३५१. || पत्र : अवन्तिकाबाई गोखलेको (२५-८-१९२६) || ३३६ |- | ३५२. || पत्र : नानाभाई भट्टको (२५-८-१९२६) || ३३७ |- | ३५३. || टिप्पणियाँ : बुद्धिमानीका कदम; गुजरातके आँकड़े (२६-८-१९२६) || ३३७ |- | ३५४. || आँखें खोलनेवाले आँकड़े (२६-८-१९२६) || ३३८ |- | ३५५. || बाल-विवाहका अभिशाप (२६-८-१९२६) || ३४१ |- | ३५६. || टिप्पणियाँ : मालवीयजी और बंगाल सरकार; हिन्दुस्तानियोंका निष्कासनरंगभेद विधेयक; इसके भयानक परिणाम (२६-८-१९२६) || ३४२ |- | ३५७. || केवल आपके लिए ही क्यों? (२६-८-१९२६) || ३४५ |- | ३५८. || पत्र : अली हसनको (२६-८-१९२६) || ३४७ |- | ३५९. || पत्र : आर॰ ए॰ ऐडम्सको (२६-८-१९२६) || ३४८ |- | ३६०. || पत्र : तुलसी मेहरको (२७-८-१९२६) || ३४९ |- | ३६१. || पत्र : मरीचिको (२७-८-१९२६) || ३४९ |- | ३६२. || पत्र : नानाभाई भट्टको (२७-८-१९२६) || ३५० |- | ३६३. || पत्र : जी॰ सीताराम शास्त्रीको (२८-८-१९२६) || ३५० |- | ३६४. || पत्र : अवधनन्दनको (२८-८-१९२६) || ३५१ |- | ३६५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-८-१९२६) || ३५२ |- | ३६६. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२९-८-१९२६) || ३५२ |- | ३६७. || पत्र : शम्भुशंकरको (३०-८-१९२६) || ३५३ |- | ३६८. || पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको (१-९-१९२६) || ३५४ |- | ३६९. || पत्र : एस॰ ई॰ स्टोक्सको (१-९-१९२६) || ३५५ |}<noinclude></noinclude> 3pvkvng5s3j0ummrd5fxmd33hjqnh2i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/२९ 250 186607 674464 644971 2026-08-26T16:53:13Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674464 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|पच्चीस}} {|width=100% |- | ३७०. || पत्र : बी॰ एस॰ टी॰ स्वामीको (१-९-१९२६) || ३५६ |- | ३७१. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१-९-१९२६) || ३५७ |- | ३७२. || तार : हरिहर शर्माको (१-९-१९२६ या उसके पश्चात्) || ३५७ |- | ३७३. || टिप्पणियाँ : एक महान् उद्योगपति; मजबूरी क्यों?; कुली-भरतीकी बुराई; हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य संघ (२-९-१९२६) || ३५७ |- | ३७४. || राष्ट्रीय शालाएँ (२-९-१९२६) || ३५९ |- | ३७५. || विधवा विवाह (२-९-१९२६) || ३६१ |- | ३७६. || 'बाइबिल' पढ़नेका गुनाह (२-९-१९२६) || ३६२ |- | ३७७. || वीरोचित त्याग (२-९-१९२६) || ३६५ |- | ३७८. || जीवनदायी शक्तिका संचय (२-९-१९२६) || ३६५ |- | ३७९. || पत्र : प्रभुदास भीखाभाईको (२-९-१९२६) || ३६८ |- | ३८०. || पत्र : स्वामी राघवानन्दको (३-९-१९२६) || ३६९ |- | ३८१. || पत्र : नॉर्मन लीजको (३-९-१९२६) || ३७० |- | ३८२. || पत्र : देवदास गांधीको (४-९-१९२६) || ३७१ |- | ३८३. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (५-९-१९२६) || ३७२ |- | ३८४. || पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको (५-९-१९२६) || ३७३ |- | ३८५. || पत्र : बलवन्तराय पारेखको (५-९-१९२६) || ३७४ |- | ३८६. || पत्र : एस॰ आर॰ देशपाण्डेको (६-९-१९२६) || ३७४ |- | ३८७. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (७-९-१९२६) || ३७५ |- | ३८८. || पत्र : जुगलकिशोर बिड़लाको (७-९-१९२६) || ३७५ |- | ३८९. || पत्र : राजेन्द्रप्रसादको (७-९-१९२६) || ३७६ |- | ३९०. || पत्र : लालजी नारणजीको (७-९-१९२६) || ३७६ |- | ३९१. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (७-९-१९२६) || ३७७ |- | ३९२. || पत्र : नौरोजी बेलगाँववालाको (७-९-१९२६) || ३७८ |- | ३९३. || पत्र : कालूराम बाजोरियाको (७-९-१९२६) || ३७९ |- | ३९४. || पत्र : नानाभाई भट्टको (७-९-१९२६) || ३८० |- | ३९५. || सन्देश : भवानीदयालको (७-९-१९२६) || ३८० |- | ३९६. || पत्र : जयसुखलाल कृष्णलाल मेहताको (७-९-१९२६ या उसके पश्चात्) || ३८१ |- | ३९७. || अकर्ममें कर्म, (८-९-१९२६) || ३८१ |- | ३९८. || पत्र : कृष्णकान्त मालवीयको (८-९-१९२६) || ३८४ |- | ३९९. || पत्र : मीठूबहन पेटिटको (८-९-१९२६) || ३८४ |- | ४००. || पत्र : ठाकोरदास सुखड़ियाको (८-९-१९२६) || ३८५ |}<noinclude></noinclude> o3rg0zxk7eveskoq9cr7yz0fededct2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/३० 250 186608 674466 644972 2026-08-26T16:55:38Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674466 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>छब्बीस ४०१. पत्र : प्यारेलाल नैयरको ( ८-९ - १९२६) ३८६ ४०२. पत्र : छोटालाल तेजपालको (८-९-१९२६) ३८७ ४०३. विद्यार्थियोंकी दुर्दशा (९-९-१९२६) ३८७ ४०४. अनीतिकी राहपर- ९ (९-९-१९२६) ३८९ ४०५. टिप्पणियाँ : आगामी कांग्रेसके सभापति; अनुकरणीय; अछूतोंमें भी अछूत; झूठका अम्बार, (९-९-१९२६) ३८९ ४०६. बालविवाहके समर्थनमें (९-९-१९२६) ३९२ ४०७. श्रमका गौरव (९-९-१९२६) ३९६ ४०८. कुएँसे निकले, खाईमें गिरे (९-९-१९२६) ३९७ ४०९. पत्र : बम्बई विश्वविद्यालयके पंजीयकको (९-९-१९२६) ४०० ४१०. पत्र : आ० टे० गिडवानीको (९-९-१९२६) ४०० ४११. पत्र : जोजेफ बैप्टिस्टाको (९-९-१९२६) ४०१ ४१२. पत्र : एस० डी० देवको (९-९-१९२६) ४०१ ४१३. पत्र : देवराजको (९-९-१९२६) ४०२ ४१४. पत्र : बेचर भाणजीको (९-९-१९२६) ४१५. पत्र : भीखाईजी पालमकोटको (९-९-१९२६) ४०३ ४०३ ४१६. पत्र : जी० एन० कानिटकरको (१०-९-१९२६) ४१७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-९-१९२६) ४१८. पत्र : महाराजा नाभाको (१०-९-१९२६) ४१९. पत्र : एस० एस० मोटगीको (१०-९-१९२६) ४०४ ४०५ ४०५ ४०७ ४२०. पत्र : आर० सूर्यनारायण रावको (१०-९-१९२६) ४०८ ४२१. पत्र : शौकत अलीको (१०-९-१९२६) ४०९ ४२२. पत्र : वी० एन० आप्टेको (१०-९-१९२६) ४०९ ४२३. पत्र : द० बा० कालेलकरको (१०-९-१९२६) ४१० ४२४. पत्र: परमानन्द सैम्युअल्स लालको (११-९-१९२६) ४२५. पत्र : लाला लाजपतरायको (११-९-१९२६) ४२६. पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (११-९-१९२६) ४११ ४१२ ४१२ ४२७. पत्र : नानाभाई भट्टको (११-९-१९२६) ४१३ ४२८. सत्याग्रह अथवा दुराग्रह (१२-९-१९२६ ) ४१३ ४२९. धर्म-संकट (१२-९-१९२६) ४३०. पत्र : विलियम डुलको (१२-९-१९२६) ४३१. पत्र : रेवरेंड डी० डब्ल्यू० ड्र्यूको (१२-९-१९२६) ४१५ ४१६ ४१७ Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 23yhqwf1tkftazuwx9oivcqg756etg5 674467 674466 2026-08-26T16:56:11Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674467 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|छब्बीस}} {|width=100% |- | ४०१. || पत्र : प्यारेलाल नैयरको (८-९-१९२६) || ३८६ |- | ४०२. || पत्र : छोटालाल तेजपालको (८-९-१९२६) || ३८७ |- | ४०३. || विद्यार्थियोंकी दुर्दशा (९-९-१९२६) || ३८७ |- | ४०४. || अनीतिकी राहपर - ९ (९-९-१९२६) || ३८९ |- | ४०५. || टिप्पणियाँ : आगामी कांग्रेसके सभापति; अनुकरणीय; अछूतोंमें भी अछूत; झूठका अम्बार, (९-९-१९२६) || ३८९ |- | ४०६. || बालविवाहके समर्थनमें (९-९-१९२६) || ३९२ |- | ४०७. || श्रमका गौरव (९-९-१९२६) || ३९६ |- | ४०८. || कुएँसे निकले, खाईमें गिरे (९-९-१९२६) || ३९७ |- | ४०९. || पत्र : बम्बई विश्वविद्यालयके पंजीयकको (९-९-१९२६) || ४०० |- | ४१०. || पत्र : आ॰ टे॰ गिडवानीको (९-९-१९२६) || ४०० |- | ४११. || पत्र : जोजेफ बैप्टिस्टाको (९-९-१९२६) || ४०१ |- | ४१२. || पत्र : एस॰ डी॰ देवको (९-९-१९२६) || ४०१ |- | ४१३. || पत्र : देवराजको (९-९-१९२६) || ४०२ |- | ४१४. || पत्र : बेचर भाणजीको (९-९-१९२६) || ४०३ |- | ४१५. || पत्र : भीखाईजी पालमकोटको (९-९-१९२६) || ४०३ |- | ४१६. || पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (१०-९-१९२६) || ४०४ |- | ४१७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-९-१९२६) || ४०५ |- | ४१८. || पत्र : महाराजा नाभाको (१०-९-१९२६) || ४०५ |- | ४१९. || पत्र : एस॰ एस॰ मोटगीको (१०-९-१९२६) || ४०७ |- | ४२०. || पत्र : आर॰ सूर्यनारायण रावको (१०-९-१९२६) || ४०८ |- | ४२१. || पत्र : शौकत अलीको (१०-९-१९२६) || ४०९ |- | ४२२. || पत्र : वी॰ एन॰ आप्टेको (१०-९-१९२६) || ४०९ |- | ४२३. || पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको (१०-९-१९२६) || ४१० |- | ४२४. || पत्र : परमानन्द सैम्युअल्स लालको (११-९-१९२६) || ४११ |- | ४२५. || पत्र : लाला लाजपतरायको (११-९-१९२६) || ४१२ |- | ४२६. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (११-९-१९२६) || ४१२ |- | ४२७. || पत्र : नानाभाई भट्टको (११-९-१९२६) || ४१३ |- | ४२८. || सत्याग्रह अथवा दुराग्रह (१२-९-१९२६) || ४१३ |- | ४२९. || धर्म-संकट (१२-९-१९२६) || ४१५ |- | ४३०. || पत्र : विलियम डुलको (१२-९-१९२६) || ४१६ |- | ४३१. || पत्र : रेवरेंड डी॰ डब्ल्यू॰ ड्रयूको (१२-९-१९२६) || ४१७ |}<noinclude></noinclude> tdnhxi7m4w1waomez00w1qgyvswqlsh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/३१ 250 186609 674470 644973 2026-08-26T16:58:06Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674470 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|सत्ताईस}} {|width=100% |- | ४३२. || पत्र : एम॰ मगरिजको (१२-९-१९२६) || ४१८ |- | ४३३. || पत्र : ऋषभदासको (१४-९-१९२६) || ४१९ |- | ४३४. || पत्र : पुरुषोत्तम पटवर्धनको (१४-९-१९२६) || ४२० |- | ४३५. || तार : ए॰ ए॰ पॉलको (१५-९-१९२६) || ४२१ |- | ४३६. || सन्देश : आफ्रिकी शिष्टमण्डलको (१५-९-१९२६) || ४२१ |- | ४३७. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम्को (१५-९-१९२६) || ४२२ |- | ४३८. || पत्र : भवानीदयालको (१५-९-१९२६) || ४२३ |- | ४३९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१५-९-१९२६) || ४२४ |- | ४४०. || टिप्पणियाँ : शाहाबादके स्कूलोंमें चरखा; हिन्दुस्तानी पाठ्यपुस्तकें (१६-९-१९२६) || ४२४ |- | ४४१. || विद्यार्थियोंका धर्म (१६-९-१९२६) || ४२६ |- | ४४२. || मनोवृत्तियोंका प्रभाव (१६-९-१९२६) || ४२७ |- | ४४३. || अनिवार्य भरतीका विरोध (१६-९-१९२६) || ४३० |- | ४४४. || खादी कर्मचारी मण्डलके सम्बन्धमें (१६-९-१९२६) || ४३२ |- | ४४५. || पत्र : शौकत अलीको (१६-९-१९२६) || ४३४ |- | ४४६. || पत्र : प्राणजीवन मेहताको (१६-९-१९२६) || ४३५ |- | ४४7. || पत्र : एस्थर मेननको (१७-९-१९२६) || ४३५ |- | ४४८. || पत्र : फेंसिसका स्टेंडेनैथको (१७-९-१९२६) || ४३६ |- | ४४९. || पत्र : कुमारी हेलन हॉसडिंगको (१७-९-१९२६) || ४३७ |- | ४५०. || पत्र : वी॰ ए॰ वाडियाको (१७-९-१९२६) || ४३८ |- | ४५१. || पत्र : सेवकराम करमचन्दको (१७-९-१९२६) || ४३८ |- | ४५२. || पत्र : वी॰ एम॰ मजूमदारको (१७-९-१९२६) || ४४० |- | ४५३. || पत्र : गोपबन्धुदासको (१८-९-१९२६) || ४४१ |- | ४५४. || पत्र : प्यारेलालको (१८-९-१९२६) || ४४२ |- | ४५५. || पत्र : आर॰ के॰ करन्थाको (१८-९-१९२६) || ४४३ |- | ४५६. || पत्र : स्वामी कुवलयानन्दको (१८-९-१९२६) || ४४३ |- | ४५७. || पत्र : एस॰ नारायण अय्यरको (१८-९-१९२६) || ४४४ |- | ४५८. || एक पत्र (१८-९-१९२६) || ४४५ |- | ४५९. || पत्र : नरहरि परीखको (१८-९-१९२६) || ४४५ |- | ४६०. || टिप्पणियाँ : सनातन प्रश्न; परमेश्वरका ध्यान धरना चाहिये या नहीं?; अगर ध्यान जरूरी हो तो उसकी प्रक्रिया क्या हो?; ईश्वका रूप कैसा है?; चरखा और आत्मशुद्धि; पुराना चरखा-गीत (१९-९-१९२६) || ४४६ |- | ४६१. || भेंट : 'नेटाल एडवर्टाइजर' के प्रतिनिधिसे (१९-९-१९२६) || ४४८ |}<noinclude></noinclude> po4jro2za7tqedl6sx2ebx12lzxjl0i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/३२ 250 186610 674471 644974 2026-08-26T17:00:15Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 674471 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|अट्ठाईस}} {|width=100% |- | ४६२. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (१९-९-१९२६) || ४४९ |- | ४६३. || तार : जमनालाल बजाजको (२०-९-१९२६) || ४४९ |- | ४६४. || पत्र : ए॰ डब्ल्यू॰ बेकरको (२१-९-१९२६) || ४५० |- | ४६५. || पत्र : हरदयाल नागको (२१-९-१९२६) || ४५१ |- | ४६६. || पत्र : डा॰ सत्यपालको (२१-९-१९२६) || ४५१ |- | ४६७. || पत्र : मुन्नालाल जी॰ शाहको (२१-९-१९२६) || ४५२ |- | ४६८. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२१-९-१९२६) || ४५३ |- | ४६९. || मैसूरमें कताई (२३-९-१९२६) || ४५३ |- | ४७०. || निष्क्रिय प्रतिरोध, सही और गलत (२३-९-१९२६) || ४५४ |- | ४७१. || 'प्रार्थनामें विश्वास नहीं' (२३-९-१९२६) || ४५७ |- | ४७२. || स्वयंसेवकोंका धर्म (२३-९-१९२६) || ४५९ |- | ४७३. || उत्तर महाराष्ट्रमें खादीकी फेरी (२३-९-१९२६) || ४६० |- | ४७४. || लौटे हुए प्रवासी (२३-९-१९२६) || ४६१ |- | ४७५. || 'मैं' और 'मेरे' का अभिशाप (२३-९-१९२६) || ४६१ |- | ४७६. || टिप्पणियाँ : आगरावासी बी॰ को उत्तर; कुछ ही वर्ष पूर्व (२३-९-१९२६) || ४६२ |- | ४७७. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२३-९-१९२६ से पूर्व) || ४६३ |- | ४७८. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२३-९-१९२६) || ४६३ |- | ४७९. || पत्र : एमिल रॉनिंगरको (२३-९-१९२६) || ४६४ |- | ४८०. || पत्र : कोण्डा वेंकटप्पैयाको (२३-९-१९२६) || ४६५ |- | ४८१. || पत्र : जेड॰ एम॰ पैरेटको (२३-९-१९२६) || ४६६ |- | ४८२. || पत्र : नानालाल कविको (२४-९-१९२६) || ४६७ |- | ४८३. || पत्र : लक्ष्मीदास तेरसीको (२४-९-१९२६) || ४६७ |- | ४८४. || पत्र : जमनादास गांधीको (२४-९-१९२६) || ४६८ |- | ४८५. || तार : राघवदासको (२४-९-१९२६ या उसके पश्चात्) || ४६९ |- | ४८६. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (२५-९-१९२६) || ४६९ |- | ४८७. || पत्र : मोहनलालको (२५-९-१९२६) || ४७० |- | ४८८. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२५-९-१९२६) || ४७० |- | ४८९. || कातनेवालोंकी कठिनाई (२६-९-१९२६) || ४७१ |- | ४९०. || अभिभावकोंकी जिम्मेदारी (२६-९-१९२६) || ४७२ |- | ४९१. || तार : नेगापट्टम श्रमिक संघको (२७-९-१९२६ से पूर्व) || ४७३ |- | ४९२. || पत्र : रोहिणी पूवैयाको (२९-९-१९२६) || ४७३ |}<noinclude></noinclude> sy08foynjqah1vovkd6kv0ks9kr2i31 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०५ 250 186931 674439 645328 2026-08-26T16:17:58Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674439 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''५१७. पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> २२ जून, १९२८}} मैंने जमानतके तौर पर उनके इन चार प्रकाशनोंको लेकर गणेशनको कर्जके रूपमें रु॰ ८,५०० तककी सहायता देनेका निश्चय किया है: १. 'सत्याग्रह इन साउथ आफ्रिका,' २. 'गांधीजी इन सीलोन,' ३. 'सेवन मंथ्स विद गांधीजी,'<ref>कृष्णदासकी लिखी इस पुस्तकका नाम '''सेवन मंथ्स विद महात्मा गांधी''' था।</ref> ४. 'इकोनोमिक्स ऑफ खद्दर।' परन्तु मैं चाहूँगा कि आप उनकी सहायता करें और उनका मार्ग-निर्देशन करें। उनकी तो यह इच्छा थी कि हार मान लें और प्रकाशन-व्यापारको छोड़कर बैठ जायें। परन्तु मैंने सोचा कि यह कायरता होगी और मैंने उन्हें सलाह दी है कि वह सारी कठिनाइयोंका बहादुरीसे सामना करें और मुसीबतोंसे बच निकलें। मैंने उन्हें आपका निर्देशन प्राप्त करनेकी सलाह दी है। मैंने उन्हें यह भी सुझाव दिया कि वह नटेसनकी मदद भी ले सकते हैं। परन्तु यह सब मैं आप पर छोड़ देता हूँ। यदि आप समझें कि उन्हें वैसा करना चाहिए तो आप उनका नटेसनसे, जिन्हें आप अच्छी तरह जानते हैं, परिचय करा दें। वे पुस्तकें हरिलाल शर्माके पास इकट्ठी करके रखनी हैं। यदि आपको इस मामले पर कोई और सलाह देनी हो, तो मुझे बता दीजिएगा। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४३३) की माइक्रोफिल्मसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५१८. पत्र: एस्थर मेननको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २२ जून, १९२८}} तुम्हारे दो पत्र मिले। मगनलालकी मृत्युसे सारी योजनाएँ ही अस्त-व्यस्त नहीं हो गई हैं, उसके कारण मैं आश्रममें क्रान्तिकारी प्रतीत होनेवाले परिवर्तन करनेके लिए भी प्रेरित हुआ हूँ। इसलिए मैं तुम्हें लम्बा स्नेह-पत्र तो नहीं लिख सकूँगा। यदि सब कुछ ठीक रहा और यूरोपके मित्रोंकी मुझे वहाँ बुलानेकी इच्छा तब भी कायम रही तो मुझे आशा है कि मैं अगले साल जानेके लिए तैयार रहूँगा । {{dhr}} {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> n9237kfz1dglm5zjyo4mhst3fnr1jau पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०६ 250 186932 674455 645329 2026-08-26T16:39:20Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674455 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मैं तुम्हारा भारतमें बीमार रहना तो समझ सकता था, परन्तु तुम वहीं क्यों बीमार हो? मैं आशा करता हूँ कि तुम अपनी पहले जैसी ताजगी और शक्ति सहित वापस आओगी। तुम दोनों कब तक बाहर रहोगे? मेनन कहाँ पढ़ रहा है? {{left|श्रीमती एस्थर मेनन<br> हेव, एसनेस<br> डेन्मार्क}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३६) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''५१९. पत्र: बेन एम॰ चेरिंग्टनको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> २२ जून, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। आप अपनी मदद करनेकी मेरी योग्यताको सीमासे ज्यादा कूत रहे हैं। बहरहाल मैं अपनी योग्यतानुसार भरसक आपके प्रश्नोंका<ref>प्रश्न उपलब्ध नहीं हैं।</ref> उत्तर<ref>संलग्न पत्र।</ref> देनेकी कोशिश करता हूँ। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री बेन एम॰ चेरिंग्टन<br> कार्यकारी सचिव<br> डेन्वर विश्वविद्यालय<br> कोलोरेडो<br> स॰ रा॰ अ॰}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३३५) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|'''[संलग्न पत्र]'''}} पश्चिमकी [दान द्वारा स्थापित विद्या-] संस्थाओंके निर्माणके इतिहासका अध्ययन करनेका मुझे कभी अवसर नहीं मिला। उनके सम्बन्धमें मेरा ज्ञान बहुत ही सरसरी किस्मका है और इसलिए उसका कोई महत्व नहीं है। {{smallrefs}}<noinclude></noinclude> 6ch9zjagez33k8bopuvpckpgk8aku4y पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५०७ 250 186933 674465 645330 2026-08-26T16:54:02Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 674465 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: बेन एम॰ चेरिंग्टनको|४७५}}</noinclude>मेरी राय में वक्तकी बढ़ती हुई माँग यह है कि हृदयसे सम्बन्धित चीजोंको अर्थात् नैतिक कल्याणको, जीवनमें उसका प्राप्य स्थान दिलाया जाये। इसलिए मेरे विचारमें सामाजिक विज्ञानको नैतिक दृष्टि से देखना चाहिए। पैबन्द लगानेसे काम नहीं चलेगा। इसलिए यदि आपके काममें ईमानदारी है, तो इसका उपयोग उस पद्धतिको समूल उखाड़ फेंकनेमें होना चाहिए, जिसके अधीन अमेरिकामें धनका अतुल संग्रह सम्भव हो सका है। इसलिए यदि आप मेरा सुझाव मान लें तो ऐसा मालूम होगा कि इसमें आर्थिक सहायताकी ज्यादा जरूरत नहीं रह जाती। पहले प्रश्नका जो उत्तर मैंने यहाँ दिया है, उसके बाद मुझे दूसरेका उत्तर देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। परन्तु उक्त उत्तरको छोड़ भी दें तब भी मैं यह कहूँगा कि परम्परागत शैक्षणिक विभागों की अपेक्षा यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि आपकी यह संस्था औद्योगिक, जातीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धोंके इर्द-गिर्द संगठित की जाये। यदि पहले प्रश्नके मेरे उत्तरमें अन्तर्निहित विचारको स्वीकार कर लिया जाये तो आपको मौलिक शोध कार्यकरना पड़ेगा। पिछलेको देखते हुए इसका उत्तर अनावश्यक है। निश्चय ही बुद्धिमत्ता इसमें होगी कि सभी राष्ट्रों, जातियों और वर्गोंका प्रतिनिधित्व इसमें हो। यदि आप युवकोंका ध्यान रखें तो नागरिक अपने आपको स्वयं सुधार लेंगे। यदि आप मुझसे इस बातमें सहमत हों कि वर्तमान स्थिति असह्य है, तो मैं जिनमें काफी जगह हो, परन्तु जो बहुत ज्यादा आरामदेह न हों, ऐसे कमरोंमें कुछ प्राध्यापकों और विद्यार्थियोंको ताला लगाकर बन्द कर दूँ और उनसे आग्रह करूँ कि वे वर्तमान असह्य स्थिति से बच निकलनेका मार्ग ढूंढ निकालें। इसका उत्तर में नहीं दे सकता। विचार अच्छा है। सम्भवत: [अध्यापकों आदिके] समुचित विनिमयका या उत्तम कोटिके अतिथि सदस्य प्राप्त करनेका सबसे अधिक प्रभावशाली उपाय यह होगा कि जिन देशोंसे आप उन्हें अपने यहाँ बुलाना चाहते हैं उन देशोंमें अपना प्रतिनिधि भेजें। इस तरह आपका प्रतिनिधि सम्बन्धित देश या देशोंकी जीवन्त संस्थाओंके सीधे सम्पर्क में आयेगा। अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> 9z7ns3rvpvqrbbot3zjv2ooe806ce5t पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५१ 250 187090 674379 645490 2026-08-26T12:41:48Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>'''२४१. पत्र : एस० गणेशनको''' {{right|आश्रम साबरमती ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय गणेशन,}} डॉo मेरी स्टोप्सकी समीक्षा सहित आपका पत्र मुझे मिला। मैं इसे 'यंग इंडिया में प्रकाशित नहीं करना चाहता; क्योंकि मुझे ऐसा लगता है मानों यह गम्भीरता से लिखे गये अध्यायोंकी गम्भीर समीक्षाके बजाय उनकी [ अपनी ] पुस्तकों और उनके अपने तरीकोंका विज्ञापन हो। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|संलग्न : १ फाइल श्रीयुत एस० गणेशन १८, पाइक्रोफ्ट रोड ट्रिप्लिकेन, मद्रास}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७४ ) की माइक्रोफिल्मसे । २४२. पत्र : एलिस शैलेकको {{right|आश्रम साबरमती ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} भेंटकी टिप्पणियों सहित मुझे आपका पत्र मिला । टिप्पणियोंमें बहुत कुछ संशोधन जरूरी था । इसलिए मैं आपको उसकी एक साफ प्रति भेज रहा हूँ । कुमारी एलिस शैलेक आस्ट्रियाकी पत्रकार नेरॉन्स होटल लाहौर अंग्रेजी (एस० एन० १४२८४ ) की फोटो - नकलसे । १. देखिए " भेंट : एलिस शैलेकसे ", २०-३-१९२८ । हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude> 7slhgptoyxrysstkj82ox3vh1hm3atj 674381 674379 2026-08-26T12:50:09Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674381 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२४१. पत्र : एस॰ गणेशनको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय गणेशन,}} डॉ॰ मेरी स्टोप्सकी समीक्षा सहित आपका पत्र मुझे मिला। मैं इसे 'यंग इंडिया' में प्रकाशित नहीं करना चाहता; क्योंकि मुझे ऐसा लगता है मानों यह गम्भीरतासे लिखे गये अध्यायोंकी गम्भीर समीक्षाके बजाय उनकी [अपनी] पुस्तकों और उनके अपने तरीकोंका विज्ञापन हो। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|संलग्न : १ फाइल<br> श्रीयुत एस॰ गणेशन<br> १८, पाइक्रोफ्ट रोड<br> ट्रिप्लिकेन, मद्रास}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७४) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''२४२. पत्र : एलिस शैलेकको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ७ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय बहन,}} भेंटकी<ref>देखिए "भेंट : एलिस शैलेकसे", २०-३-१९२८।</ref> टिप्पणियों सहित मुझे आपका पत्र मिला। टिप्पणियोंमें बहुत कुछ संशोधन जरूरी था। इसलिए मैं आपको उसकी एक साफ प्रति भेज रहा हूँ। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|कुमारी एलिस शैलेक<br> आस्ट्रियाकी पत्रकार<br> नेरॉन्स होटल<br> लाहौर}} अंग्रेजी 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आपकी बहन कितने अरसे तक यहाँ रहना चाहती हैं। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|एस० ए० वेज महोदय}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७६) की फोटो नकलसे । २४४. पत्र : नारायणको {{right|आश्रम साबरमती ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला । मुझे इस विषयपर कोई सन्देह नहीं कि जबतक आप स्वयं पूरी तरह तैयार न हों आपको विवाह की बातका विरोध करना ही चाहिए। {{left|श्रीयुत नारायण २७, थर्ड क्रोस रोड डाकखाना बासवांगुडी बंगलोर, द० भा०}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७८) की माइक्रोफिल्मसे । हृदयसे आपका,<noinclude></noinclude> mvitaqiug2mnehngf5rgm6gazb99h1h 674385 674382 2026-08-26T12:58:10Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674385 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२४३. पत्र : एस॰ ए॰ वेजको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। मैं आपकी बहनको आश्रममें लेना तो चाहूँगा, परन्तु वे आश्रमका कठोर जीवन सहनकर सकेंगी इसमें मुझे सन्देह है। फिलहाल हमारे यहाँ जगहकी बहुत तंगी है। इसलिए यदि वे आयें तो 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वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५३ 250 187092 674386 645492 2026-08-26T12:59:40Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674386 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२४५. पत्र : जे० बी० कृपलानीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय प्रोफेसर,}} शायद आपको मालूम ही होगा कि कृष्णदास फिलहाल यहाँ नहीं है । बहरहाल उन्होंने मुझे आपका २५ मार्चका पत्र भेज दिया है। आप यह क्यों कहते हैं कि कतैयोंका रजिस्टर रखने का अर्थ होगा हर झोंपड़ीमें जाकर सूत खरीदना ? मैंने ऐसी किसी बातका सुझाव दिया ही नहीं है । मैंने तो यह सुझाव दिया है कि जिनसे दलालोंका सम्बन्ध रहता है हमें उन कतैयोंका पता होना चाहिये । न तो हम दलालोंसे अपना वास्ता बिलकुल ही समाप्त कर देना चाहते हैं और न यह चाहते हैं कि हमें उनकी दयापर निर्भर रहना पड़े । कतैयोंको वास्तवमें क्या दिया जाता है, इसके बारेमें भी हमें बेखबर नहीं रहना चाहिए। इसलिए समय-समयपर रजिस्टर भरा जाना चाहिए। एक बार हमें पता चल जाये कि कतैये कौन लोग हैं, वे कहां रहते हैं, उन्हें क्या मिलता है, और वे [ कातनेके सिवा और ] क्या करते हैं, तो फिर उनके बारेमें छः महीने तक तो चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं रहती । वास्तवमें तो आपको दलालोंके सम्पर्क में आने और उनके जरिये कतैयोंसे सम्पर्क करनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मैं कह नहीं सकता, अब भी मैं अपनी बात स्पष्ट कर पाया हूँ या नहीं। इनकी कार्यपद्धति न जाननेके कारण इसमें, जिनका मुझे ज्ञान नहीं है ऐसी कुछ कठिनाइयाँ हो सकती हैं । उस हालत में आप मुझे उन कठिनाइयोंके बारेमें लिखिए ताकि मैं उन्हें दूर करनेके लिए कुछ ठोस सुझाव दे सकूँ । जहाँ तक पूँजीके अभावका सम्बन्ध है, मैं जमनालालजी और शंकरलालसे सलाह करने जा रहा हूँ । आपने निश्चित रूपसे नहीं बताया है कि आपको कितनी रकम चाहिए। यदि अदायगीका जिम्मा ले लिया जाये तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त बिना सूदके उतनी रकम देने को तैयार हैं, और यदि वह तैयार हों तो यह ऋण कितने समय के लिए होगा ? मुझे आपके पत्रका अन्तिम अनुच्छेद अच्छा नहीं लगा। किसी भी स्थिति में निराशाको तो पास नहीं फटकने देना चाहिए। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आपके सामने आयें, आपको आश्रममें जमे रहना है। आपको कोई दूसरा काम नहीं उठाना चाहिए । कृपया नियमित रूपसे लिखते रहियेगा ।<noinclude></noinclude> lapyr8zdabkjoulz8kwofhjvxawuonw 674388 674386 2026-08-26T13:04:37Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२४५. पत्र : जे॰ बी॰ कृपलानीको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय प्रोफेसर,}} शायद आपको मालूम ही होगा कि कृष्णदास फिलहाल यहाँ नहीं है। बहरहाल उन्होंने मुझे आपका २५ मार्चका पत्र भेज दिया है। आप यह क्यों कहते हैं कि कतैयोंका रजिस्टर रखने का अर्थ होगा हर झोंपड़ीमें जाकर सूत खरीदना? मैंने ऐसी किसी बातका सुझाव दिया ही नहीं है। मैंने तो यह सुझाव दिया है कि जिनसे दलालोंका सम्बन्ध रहता है हमें उन कतैयोंका पता होना चाहिये। न तो हम दलालोंसे अपना वास्ता बिलकुल ही समाप्त कर देना चाहते हैं और न यह चाहते हैं कि हमें उनकी दयापर निर्भर रहना पड़े। कतैयोंको वास्तवमें क्या दिया जाता है, इसके बारेमें भी हमें बेखबर नहीं रहना चाहिए। इसलिए समय–समयपर रजिस्टर भरा जाना चाहिए। एक बार हमें पता चल जाये कि कतैये कौन लोग हैं, वे कहां रहते हैं, उन्हें क्या मिलता है, और वे [कातनेके सिवा और] क्या करते हैं, तो फिर उनके बारेमें छः महीने तक तो चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। वास्तवमें तो आपको दलालोंके सम्पर्कमें आने और उनके जरिये कतैयोंसे सम्पर्क करनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मैं कह नहीं सकता, अब भी मैं अपनी बात स्पष्ट कर पाया हूँ या नहीं। इनकी कार्यपद्धति न जाननेके कारण इसमें, जिनका मुझे ज्ञान नहीं है ऐसी कुछ कठिनाइयाँ हो सकती हैं। उस हालतमें आप मुझे उन कठिनाइयोंके बारेमें लिखिए ताकि मैं उन्हें दूर करनेके लिए कुछ ठोस सुझाव दे सकूँ। जहाँ तक पूँजीके अभावका सम्बन्ध है, मैं जमनालालजी और शंकरलालसे सलाह करने जा रहा हूँ। आपने निश्चित रूपसे नहीं बताया है कि आपको कितनी रकम चाहिए। यदि अदायगीका जिम्मा ले लिया जाये तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त बिना सूदके उतनी रकम देने को तैयार हैं, और यदि वह तैयार हों तो यह ऋण कितने समयके लिए होगा? मुझे आपके पत्रका अन्तिम अनुच्छेद अच्छा नहीं लगा। किसी भी स्थितिमें निराशाको तो पास नहीं फटकने देना चाहिए। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आपके सामने आयें, आपको आश्रममें जमे रहना है। आपको कोई दूसरा काम नहीं उठाना चाहिए। कृपया नियमित रूपसे लिखते रहियेगा।<noinclude></noinclude> djm7zgba31l6nf4l3ul29qlzpb1zsza पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५४ 250 187093 674391 645493 2026-08-26T13:07:31Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; अब क्या आप पुनः पूर्ण रूपसे स्वस्थ हो गये हैं या अब भी कोई परेशानी है? यदि हो तो अब डा० अन्सारीको अपेक्षाकृत अधिक अवकाश है । {{left|प्रो० कृपलानी<br> हृदयसे आपका, गांधी आश्रम<br> बनारस छावनी}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७७) की फोटो - नकलसे । {{c|{{larger|'''२४६. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय जवाहर,}} तुम्हारा पत्र मिला । मुझे ऐसा याद नहीं पड़ता कि पिताजीने मुझसे इस महीने के अन्तिम सप्ताह में मिल मालिकोंसे बातचीत करने और फिर बम्बई जानेकी बात कही हो । परन्तु हम दोनोंने विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रश्नपर विस्तारसे चर्चा की थी और उन्होंने सेठ लालजी, शान्तिकुमार, सेठ अम्बालाल, सेठ कस्तूरभाई और सेठ मंगलदाससे सलाह मशविरा किया था। यह बातचीत तो अच्छी रही परन्तु ठोस काम कुछ नहीं हुआ। अब मैंने सुना है कि मिल मालिक अपनी स्वदेशी लीग चलाने जा रहे हैं, जिसका अभिप्राय निस्सन्देह यह है कि हममें परस्पर कोई समझौता नहीं हो पा रहा है । आज मेरी लालाजीसे लम्बी बातचीत हुई, क्योंकि वे दो दिनसे यहाँ हैं । वे विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रति उत्साहशील हैं। मैंने उन्हें साहित्य दे दिया है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मैं कुछ नेताओंको आमन्त्रित करूँ और बहिष्कारके सम्बन्धमें उनसे बातचीत करूँ। मैंने उनसे कह दिया कि मुझमें इतना हौसला नहीं है। उनकी राय यह है कि यदि बहिष्कारका तीव्र प्रचार करना हैं, तो मुझे देशसे बाहर हरगिज नहीं जाना चाहिए; मैं इससे निस्सन्देह सहमत हूँ । परन्तु मैं तबतक तीव्र प्रचारका काम अपने हाथमें नहीं ले सकता जबतक कि राजनीतिक दृष्टिसे जागृत भारत पूरे दिलसे इसमें मेरे साथ न हो और जबतक विदेशी कपड़े, मुख्य रूपसे अंग्रेजी कपड़े के अस्थायी वहिष्कारकी बात छोड़ न दी जाये। इसलिए हमने यह अस्थायी व्यवस्था की है कि जाने माने नेताओं द्वारा की गई सहज कार्रवाईसे यदि कुछ ठोस काम बनता है, तो मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए। दूसरी ओर वैसा कुछ न होता हो और यदि मुझे अन्यथा अपना रास्ता साफ दिखाई दे तो मैं चला जाऊँगा<noinclude></noinclude> ihc946zibifzf4fo9gd4440drjalsaz 674392 674391 2026-08-26T13:12:47Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674392 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; अब क्या आप पुनः पूर्ण रूपसे स्वस्थ हो गये हैं या अब भी कोई परेशानी है? यदि हो तो अब डा॰ अन्सारीको अपेक्षाकृत अधिक अवकाश है। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|प्रो॰ कृपलानी<br> गांधी आश्रम<br> बनारस छावनी}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७७) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२४६. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय जवाहर,}} तुम्हारा पत्र मिला। मुझे ऐसा याद नहीं पड़ता कि पिताजीने मुझसे इस महीनेके अन्तिम सप्ताहमें मिल–मालिकोंसे बातचीत करने और फिर बम्बई जानेकी बात कही हो। परन्तु हम दोनोंने विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रश्नपर विस्तारसे चर्चा की थी और उन्होंने सेठ लालजी, शान्तिकुमार, सेठ अम्बालाल, सेठ कस्तूरभाई और सेठ मंगलदाससे सलाह मशविरा किया था। यह बातचीत तो अच्छी रही परन्तु ठोस काम कुछ नहीं हुआ। अब मैंने सुना है कि मिल–मालिक अपनी स्वदेशी लीग चलाने जा रहे हैं, जिसका अभिप्राय निस्सन्देह यह है कि हममें परस्पर कोई समझौता नहीं हो पा रहा है। आज मेरी लालाजीसे लम्बी बातचीत हुई, क्योंकि वे दो दिनसे यहाँ हैं। वे विदेशी वस्त्र बहिष्कारके प्रति उत्साहशील हैं। मैंने उन्हें साहित्य दे दिया है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मैं कुछ नेताओंको आमन्त्रित करूँ और बहिष्कारके सम्बन्धमें उनसे बातचीत करूँ। मैंने उनसे कह दिया कि मुझमें इतना हौसला नहीं है। उनकी राय यह है कि यदि बहिष्कारका तीव्र प्रचार करना हैं, तो मुझे देशसे बाहर हरगिज नहीं जाना चाहिए; मैं इससे निस्सन्देह सहमत हूँ। परन्तु मैं तबतक तीव्र प्रचारका काम अपने हाथमें नहीं ले सकता जबतक कि राजनीतिक दृष्टिसे जागृत भारत पूरे दिलसे इसमें मेरे साथ न हो और जबतक विदेशी कपड़े, मुख्य रूपसे अंग्रेजी कपड़ेके अस्थायी बहिष्कारकी बात छोड़ न दी जाये। इसलिए हमने यह अस्थायी व्यवस्था की है कि जाने माने नेताओं द्वारा की गई सहज कार्रवाईसे यदि कुछ ठोस काम बनता है, तो मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए। दूसरी ओर वैसा कुछ न होता हो और यदि मुझे अन्यथा अपना रास्ता साफ दिखाई दे तो मैं चला जाऊँगा<noinclude></noinclude> 8p8k0za4yaxjgkn0z71v149gc66eyq5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५५ 250 187094 674393 645494 2026-08-26T13:14:42Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : शंकरनको|२२३}}</noinclude> और लालाजी तथा उनके समान विचारोंवाले दूसरे लोग विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मिलोंकी सहायतासे या उनकी सहायताके बिना तीव्र प्रचारके लिए वातावरण तैयार करें। इसलिए मेरा सुझाव है कि आपको डा० अन्सारी और दूसरे लोगों से सलाह मशविरा करना चाहिए। मैं समझता हूँ कि वे सब पंजाब जायेंगे, खादी द्वारा विदेशी वस्त्र बहिष्कारके सम्बन्धमें प्रस्ताव पास करेंगे। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि देशी मिलोंमें बने कपड़ेका कोई जिक्र न किया जाये। आप सीधे कह सकते हैं; राष्ट्रकी संगठित शक्तिको तत्काल प्रदर्शित करनेका एकमात्र प्रभावपूर्ण उपाय यही है कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाये और हाथसे कती और हाथसे बुनी खादी अपनाई जाये, भले ही इसमें पहनावेके बारेमें अपनी रुचि बदलनेकी आवश्यकता पड़े या कुछ आर्थिक त्याग भी क्यों न करना पड़े। आप मित्रोंके साथ जो निजी चर्चा करें वह भी मुझे बतायें और मुझे सलाह दें कि क्या मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए । यों डा० अन्सारीको निर्णय कर सकना चाहिए। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७९) की फोटो नकलसे। {{c|{{larger|'''२४७. पत्र : शंकरनको'''}}}} {{right|आश्रम साबरमती ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय शंकरन्,}} मैं आज तड़के ही प्रार्थनाके तुरन्त बाद प्यारेलालसे बात करते-करते तुम्हारे बारेमें सोच रहा था; और अभी-अभी तुम्हारा पत्र मिला। मान लो कि ऐसे अनाथोंकी, जो जहाज टूट जानेसे किसी द्वीपमें आ लगे हों, कोई बस्ती है; वे सब अविवाहित पुरुष हैं; वे यह भी नहीं जानते कि कभी उनके माता-पिता भी थे; यह भी मान लो कि उन्हें अक्षरज्ञान है और पढ़ने से उन्हें पता चल जाता है कि उन सबके माता-पिता थे; मान लो कि बादमें पढ़ाईके दौरान उन्हें कोई दार्शनिक पुस्तक मिलती है जिसका नाम है 'स्वयं भू,' तो क्या वे अनाथ बच्चे दार्शनिक दृष्टिसे यह विश्वास करने लगेंगे कि वे 'स्वयं भू' हैं ? जैसे वह काल्पनिक दर्शनकी पुस्तक अधिकांश सीधे-सादे अनाथ बच्चोंके विश्वासको नहीं डिगा पायेगी, उसी तरह तुमने ईश्वरकी अस्तित्वहीनताके सम्बन्धमें जो दार्शनिक पुस्तक पढ़ी है, उससे ईश्वर पर तुम्हारा विश्वास विचलित नहीं होना चाहिए। यदि तुम अपने माता-पिताके अस्तित्वके तथ्यको स्वीकार करते हो तो फिर मूलभूत तथ्य, प्रथम कारणको कैसे अस्वीकार कर सकते हो। इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं कि तुम उस<noinclude></noinclude> dqgnfiujqplutq2xwt4xh8oifico6cm 674395 674393 2026-08-26T13:20:01Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : शंकरनको|२२३}}</noinclude> और लालाजी तथा उनके समान विचारोंवाले दूसरे लोग विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मिलोंकी सहायतासे या उनकी सहायताके बिना तीव्र प्रचारके लिए वातावरण तैयार करें। इसलिए मेरा सुझाव है कि आपको डा॰ अन्सारी और दूसरे लोगोंसे सलाह मशविरा करना चाहिए। मैं समझता हूँ कि वे सब पंजाब जायेंगे, खादी द्वारा विदेशी वस्त्र बहिष्कारके सम्बन्धमें प्रस्ताव पास करेंगे। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि देशी मिलोंमें बने कपड़ेका कोई जिक्र न किया जाये। आप सीधे कह सकते हैं; राष्ट्रकी संगठित शक्तिको तत्काल प्रदर्शित करनेका एकमात्र प्रभावपूर्ण उपाय यही है कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाये और हाथसे कती और हाथसे बुनी खादी अपनाई जाये, भले ही इसमें पहनावेके बारेमें अपनी रुचि बदलनेकी आवश्यकता पड़े या कुछ आर्थिक त्याग भी क्यों न करना पड़े। आप मित्रोंके साथ जो निजी चर्चा करें वह भी मुझे बतायें और मुझे सलाह दें कि क्या मुझे यूरोप जानेका विचार छोड़ देना चाहिए। यों डा॰ अन्सारीको निर्णय कर सकना चाहिए। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७९) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२४७. पत्र : शंकरनको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ८ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय शंकरन्,}} मैं आज तड़के ही प्रार्थनाके तुरन्त बाद प्यारेलालसे बात करते–करते तुम्हारे बारेमें सोच रहा था; और अभी–अभी तुम्हारा पत्र मिला। मान लो कि ऐसे अनाथोंकी, जो जहाज टूट जानेसे किसी द्वीपमें आ लगे हों, कोई बस्ती है; वे सब अविवाहित पुरुष हैं; वे यह भी नहीं जानते कि कभी उनके माता–पिता भी थे; यह भी मान लो कि उन्हें अक्षरज्ञान है और पढ़नेसे उन्हें पता चल जाता है कि उन सबके माता–पिता थे; मान लो कि बादमें पढ़ाईके दौरान उन्हें कोई दार्शनिक पुस्तक मिलती है जिसका नाम है 'स्वयं भू', तो क्या वे अनाथ बच्चे दार्शनिक दृष्टिसे यह विश्वास करने लगेंगे कि वे 'स्वयं भू' हैं? जैसे वह काल्पनिक दर्शनकी पुस्तक अधिकांश सीधे–सादे अनाथ बच्चोंके विश्वासको नहीं डिगा पायेगी, उसी तरह तुमने ईश्वरकी अस्तित्वहीनताके सम्बन्धमें जो दार्शनिक पुस्तक पढ़ी है, उससे ईश्वर पर तुम्हारा विश्वास विचलित नहीं होना चाहिए। यदि तुम अपने माता–पिताके अस्तित्वके तथ्यको स्वीकार करते हो तो फिर मूलभूत तथ्य, प्रथम कारणको कैसे अस्वीकार कर सकते हो। इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं कि तुम उस<noinclude></noinclude> h0tro3bp3mlzmst1rex2amqb3s81y54 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५६ 250 187095 674397 645495 2026-08-26T13:22:16Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674397 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> प्रथम कारण स्वरूप तथ्यका निश्चय हो जानेपर उसे ईश्वर कहते हो या कुछ और। यदि उस प्रथम कारणका निश्चय हो जाये तो फिर इसके बारेमें जांच-पड़ताल करना बिलकुल व्यर्थ है कि उस प्रथम कारणसे न्याय कैसे मिलता है या अपने चारों ओर हमें जो अन्याय हो रहा प्रतीत होता है वह कैसे होता है। इसके विषयमें असंख्य सिद्धान्त हैं । मेरा कार्य-कारण सिद्धान्त अर्थात् कर्म सिद्धान्तमें विश्वास है । इससे मनुष्यकी सभी शंकाओंका समाधान हो जाता है । परन्तु यदि उससे तुम्हारी शंकाओंका समाधान नहीं होता तो तुम अवश्य ही प्रतीक्षा करो, सजग रहो और प्रार्थना करो । किसी-न-किसी दिन तुम्हें बोध होगा । परन्तु यदि तुम्हारा प्रथम कारणमें विश्वास नहीं हो तो फिर कोई आशा नहीं है। क्योंकि तब तुम प्रार्थना किससे करोगे ? इसलिए ईश्वर पर अपना विश्वास दृढ़ रखो, तर्क पर ध्यान मतदो । क्या तुम अपने माता-पिताके अस्तित्वको सिद्ध कर सकते हो ? क्या तुम यह नहीं कहोगे कि चाहे मैं तर्क दे सकूँ या नहीं, मेरे माता-पिताका अस्तित्व मेरे लिये पूर्ण तथ्य है । यदि तुम पूछताछ करनेवालोंको प्रमाणित करके सन्तुष्ट न कर सको तो तुम कहोगे “मेरे तर्क में त्रुटि है, तथ्यमें नहीं । ' ऐसे ही तुम्हें अपने आपसे कहना चाहिए कि चाहे मैं ईश्वर के अस्तित्वको तर्क द्वारा सिद्ध न कर सकूं, तो भी मैं प्रथम कारणमें मानव- जातिके विश्वास और अनुभवको अवश्य स्वीकार करता हूँ । अब भी यदि तुम्हें सन्तोष न हो तो अवश्य ही मुझसे फिर पूछना । {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१७५ और १३१८०) की फोटो नकल से । {{c|{{larger|'''२४८. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको'''}}}} {{right|[१० अप्रैल, १९२८ से पूर्व]}} {{left|चि० मणिलाल और सुशीला,}} तुम्हारा पत्र मिला। अभी हालमें तो किसी दिन डाक न आई हो, ऐसा नहीं लगता । सुशीलाका अध्ययन ठीक चल रहा है यह तो अच्छा है; किन्तु मुझे तो उसके शरीरकी चिन्ता है। मैं चाहता हूँ कि शरीरको स्वस्थ बनाने के लिए जो भी प्रयत्न कर सकते हो, करो । नीमू अभी यहीं है। रामदास खादीकी फेरीके लिए गया हुआ है। बादमें ज्यादातर तो उसका जमनादासकी पाठशाला में जानेका इरादा है। दोनों वहीं काम करेंगे। देवदास दिल्ली गया है। १. देखिए अगला शीर्षक।<noinclude></noinclude> kks0uadxcupmoyanndh7bjbtpiw59ih 674399 674397 2026-08-26T13:28:45Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> प्रथम कारण स्वरूप तथ्यका निश्चय हो जानेपर उसे ईश्वर कहते हो या कुछ और। यदि उस प्रथम कारणका निश्चय हो जाये तो फिर इसके बारेमें जांच–पड़ताल करना बिलकुल व्यर्थ है कि उस प्रथम कारणसे न्याय कैसे मिलता है या अपने चारों ओर हमें जो अन्याय हो रहा प्रतीत होता है वह कैसे होता है। इसके विषयमें असंख्य सिद्धान्त हैं। मेरा कार्य–कारण सिद्धान्त अर्थात् कर्म सिद्धान्तमें विश्वास है। इससे मनुष्यकी सभी शंकाओंका समाधान हो जाता है। परन्तु यदि उससे तुम्हारी शंकाओंका समाधान नहीं होता तो तुम अवश्य ही प्रतीक्षा करो, सजग रहो और प्रार्थना करो। किसी–न–किसी दिन तुम्हें बोध होगा। परन्तु यदि तुम्हारा प्रथम कारणमें विश्वास नहीं हो तो फिर कोई आशा नहीं है। क्योंकि तब तुम प्रार्थना किससे करोगे? इसलिए ईश्वर पर अपना विश्वास दृढ़ रखो, तर्क पर ध्यान मतदो। क्या तुम अपने माता–पिताके अस्तित्वको सिद्ध कर सकते हो? क्या तुम यह नहीं कहोगे कि चाहे मैं तर्क दे सकूँ या नहीं, मेरे माता–पिताका अस्तित्व मेरे लिये पूर्ण तथ्य है। यदि तुम पूछताछ करनेवालोंको प्रमाणित करके सन्तुष्ट न कर सको तो तुम कहोगे "मेरे तर्कमें त्रुटि है, तथ्यमें नहीं।" ऐसे ही तुम्हें अपने आपसे कहना चाहिए कि चाहे मैं ईश्वरके अस्तित्वको तर्क द्वारा सिद्ध न कर सकूं, तो भी मैं प्रथम कारणमें मानवजातिके विश्वास और अनुभवको अवश्य स्वीकार करता हूँ। अब भी यदि तुम्हें सन्तोष न हो तो अवश्य ही मुझसे फिर पूछना। {{right|हृदयसे तुम्हारा,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१७५ और १३१८०) की फोटो–नकल से। {{c|{{larger|'''२४८. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको'''}}}} {{right|[१० अप्रैल, १९२८ से पूर्व]<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref>}} {{left|चि॰ मणिलाल और सुशीला,}} तुम्हारा पत्र मिला। अभी हालमें तो किसी दिन डाक न आई हो, ऐसा नहीं लगता। सुशीलाका अध्ययन ठीक चल रहा है यह तो अच्छा है; किन्तु मुझे तो उसके शरीरकी चिन्ता है। मैं चाहता हूँ कि शरीरको स्वस्थ बनाने के लिए जो भी प्रयत्न कर सकते हो, करो। नीमू अभी यहीं है। रामदास खादीकी फेरीके लिए गया हुआ है। बादमें ज्यादातर तो उसका जमनादासकी पाठशालामें जानेका इरादा है। दोनों वहीं काम करेंगे। देवदास दिल्ली गया है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> qjtoz2u301zh4el1o8w7ai0e44wwmkr पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५७ 250 187096 674402 645496 2026-08-26T13:49:45Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674402 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र: मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको|२२५}}</noinclude>&nbsp; मेरे यूरोप जानेकी बात चल रही है पर मेरा मन कोई पक्का निश्चय नहीं कर सका है। एक सप्ताह के अन्दर फैसला हो जायेगा। {{right|बापूके आशीर्वाद}} {{left|[पुनश्चः]}} भाई प्रागजी से कहना कि उनका पत्र मिल गया है। उन्हें अलग से पत्र लिखनेका समय नहीं है। ऐसा लगता है कि दोनोंके मामलोंका फैसला हो गया है। गुजराती (जी० एन० ४७२२) की फोटो- नकलसे । {{c|{{larger|'''२४९. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० अप्रैल, १९२८}} {{left|चि० मणिलाल और सुशीला,}} आज मुझे स्वयं लिखनेका वक्त नहीं है । राष्ट्रीय सप्ताह चल रहा है, इसलिए शरीर जिस हदतक सह सके और जिस हदतक समय बच सके उस हदतक उसका उपयोग कताईमें करना चाहता हूँ । इसलिए यह पत्र बोलकर लिखवा रहा हूँ । इस समय तक तो तुम फीनिक्समें स्थिर हो चुके होगे। मुझे तो यह ठीक ही लगता है । अपनी पढ़ाई के लिए सुशीला दो-तीन बार शहर चली जाये । इतना काफी होना चाहिए । अन्ततः भाषाका ज्ञान और दूसरा ज्ञान भी अपने प्रयत्नसे ही मिल सकता है । अबतक तो सुशीलाका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक हो गया होगा। कल वेन मुझे मिल गया था । मणिलालसे हुई मुलाकातकी भी थोड़ी चर्चा हुई। मैंने उसके साथ किसी खास विषयपर तो बात नहीं की; परन्तु वह यहाँसे कुछ अच्छे विचार लेकर गया है, ऐसा मुझे लगा । रामदास काठियावाड़ में खादीकी फेरी कर रहा है। नीमू यहीं है । देवदास दिल्ली के जामिया मिलियामें कताई वगैरा सिखा रहा है । इस समय आश्रममें चरखा निरन्तर चल रहा है । किशोरलाल बहुत बीमार पड़ गया था, पर खबर है कि सामान्य उपचारसे ठीक हो गया है । तुम्हें तो वहाँसे पत्र प्राप्त होते ही होंगे, इसलिए उनके विषयमें कुछ नहीं लिख रहा हूँ । 'गीता' का कुछ अध्ययन कर पाते हो न ? गुजराती (जी० एन० ४७३५) की फोटो- नकलसे । बापूके आशीर्वाद ३६-१५<noinclude></noinclude> cmuq26lr08zkr231e89s7wikik4juf4 674404 674402 2026-08-26T13:56:00Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र: मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको|२२५}}</noinclude>&nbsp; मेरे यूरोप जानेकी बात चल रही है पर मेरा मन कोई पक्का निश्चय नहीं कर सका है। एक सप्ताहके अन्दर फैसला हो जायेगा। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} {{left|[पुनश्चः]}} भाई प्रागजीसे कहना कि उनका पत्र मिल गया है। उन्हें अलगसे पत्र लिखनेका समय नहीं है। ऐसा लगता है कि दोनोंके मामलोंका फैसला हो गया है। गुजराती (जी॰ एन॰ ४७२२) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२४९. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको'''}}}} {{right|सत्याग्रह आश्रम<br> साबरमती<br> १० अप्रैल, १९२८}} {{left|चि॰ मणिलाल और सुशीला,}} आज मुझे स्वयं लिखनेका वक्त नहीं है। राष्ट्रीय सप्ताह चल रहा है, इसलिए शरीर जिस हदतक सह सके और जिस हदतक समय बच सके उस हदतक उसका उपयोग कताईमें करना चाहता हूँ। इसलिए यह पत्र बोलकर लिखवा रहा हूँ। इस समय तक तो तुम फीनिक्समें स्थिर हो चुके होगे। मुझे तो यह ठीक ही लगता है। अपनी पढ़ाईके लिए सुशीला दो–तीन बार शहर चली जाये। इतना काफी होना चाहिए। अन्ततः भाषाका ज्ञान और दूसरा ज्ञान भी अपने प्रयत्नसे ही मिल सकता है। अबतक तो सुशीलाका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक हो गया होगा। कल वेन मुझे मिल गया था। मणिलालसे हुई मुलाकातकी भी थोड़ी चर्चा हुई। मैंने उसके साथ किसी खास विषयपर तो बात नहीं की; परन्तु वह यहाँसे कुछ अच्छे विचार लेकर गया है, ऐसा मुझे लगा। रामदास काठियावाड़में खादीकी फेरी कर रहा है। नीमू यहीं है। देवदास दिल्लीके जामिया मिलियामें कताई वगैरा सिखा रहा है। इस समय आश्रममें चरखा निरन्तर चल रहा है। किशोरलाल बहुत बीमार पड़ गया था, पर खबर है कि सामान्य उपचारसे ठीक हो गया है। तुम्हें तो वहाँसे पत्र प्राप्त होते ही होंगे, इसलिए उनके विषयमें कुछ नहीं लिख रहा हूँ। 'गीता' का कुछ अध्ययन कर पाते हो न? {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} गुजराती (जी० एन० ४७३५) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{left|३६—१५}}</noinclude> n74nd8ea8yfzei5luuuairpt3drvcho पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२५८ 250 187097 674406 645497 2026-08-26T13:58:10Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२५०. पत्र : अल्बर्ट गोडमुनेको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके भाईके बारेमें आपका पत्र मिला । मैं हर रोज उनसे मिलता हूँ, क्योंकि आजकल मैं सम्मिलित रसोई-घरमें भोजन करनेवालोंके साथ बैठता हूँ, जहाँ वे भी खाना खाते हैं। मुझे खुशी है कि आपने मुझे उनके बारेमें लिखा। मैं उनपर अपनी नजर रखूंगा । परन्तु मैं आपसे इतना जरूर कहूँगा कि आजकल मेरे पास इतने आश्रमवासियोंके निकट सम्पर्क में आनेका समय नहीं रहता । इसलिए मेरे द्वारा आपके माईकी देखरेख सीमित ही होगी । मनीआर्डर अभी तक नहीं मिला है, परन्तु यथा समय मिल जायेगा। {{right|हृदयसे आपका,}} श्री अल्बर्ट गोडमुने<br> प्रोक्टर एण्ड नोटरी<br> १०, पैविलियन स्ट्रीट, केंडी अंग्रेजी (एस० एन० १३१५७ - ए) की माइक्रोफिल्मसे । २५१. पत्र : च० राजगोपालाचारीको आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८ प्रिय च० रा०, मैं आपको संलग्न पत्र अपने उत्तरकी प्रतिके साथ भेज रहा हूँ। आशा है कि आप जो कुछ आवश्यक होगा करेंगे । सम्भवतः आप इन लोगोंको जानते हैं। {{left|श्रीयुत च० राजगोपालाचारी<br> द्वारा खादी प्रतिष्ठान<br> सोदपुर}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१८३) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> dhttofu3u80b2h82o85fmn87c12kdyx 674407 674406 2026-08-26T14:02:14Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२५०. पत्र : अल्बर्ट गोडमुनेको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके भाईके बारेमें आपका पत्र मिला। मैं हर रोज उनसे मिलता हूँ, क्योंकि आजकल मैं सम्मिलित रसोई–घरमें भोजन करनेवालोंके साथ बैठता हूँ, जहाँ वे भी खाना खाते हैं। मुझे खुशी है कि आपने मुझे उनके बारेमें लिखा। मैं उनपर अपनी नजर रखूंगा। परन्तु मैं आपसे इतना जरूर कहूँगा कि आजकल मेरे पास इतने आश्रमवासियोंके निकट सम्पर्कमें आनेका समय नहीं रहता। इसलिए मेरे द्वारा आपके भाईकी देखरेख सीमित ही होगी। मनीआर्डर अभी तक नहीं मिला है, परन्तु यथा समय मिल जायेगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री अल्बर्ट 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हूँ । परन्तु यदि आप अहमदाबाद आनेके लिए उत्सुक हैं, तो मैं अगले सप्ताह सोमवारके अलावा किसी भी दिन शामके ४ बजे आपसे मिल सकूंगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री आर० आर० एथन प्रधान सचिव इंटरनेशनल पीस कैम्पेन १५०, वाट्सन होटल बम्बई}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१८५) की फोटो नकलसे । {{c|{{larger|'''२५३. पत्र : सदाशिव रावको'''}}}} {{right|आश्रम साबरमती ११ अप्रैल, १९२८}} प्रिय सदाशिव राव, मुझे आपके तीन पत्र मिले। जिन मामलोंका आपने जिक्र किया है, उनमें जितनी मदद मैं देना चाहता हूँ, उतनी दे पानेकी क्षमता मुझमें नहीं है । यद्यपि मैं बहुत-से पैसेवाले मित्रोंको जानता हूँ, परन्तु आपने उनपर जिस तरह दबाव डालनेका सुझाव दिया है, उस तरह शायद मैं अपने असरका इस्तेमाल न करूँ । इसलिए आपको अपनी नाव स्वयं खेनी है और बहादुरीसे कठिनाइयोंका सामना करना है । यदि आप आश्रय-विहीन भी हो जायें तो इससे क्या होता है ? क्या लाखों लोग ऐसी ही दशामें नहीं रहते ? और आपकी लड़कियोंको ऐसा प्रशिक्षण मिला है कि यदि आपने उनके लिए कोई प्रबन्ध न भी किया हो, तो भी वे अपने आपको योग्य<noinclude></noinclude> 5oyl214c0h9iqs2eudt4fgmltmo8o7v 674435 674431 2026-08-26T16:09:22Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674435 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२५२. पत्र : आर॰ आर॰ एथनको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला। खेद है कि मैं आपको कोई उपयोगी निर्देश नहीं दे सकता। मैं आपके संगठनको अच्छी तरहसे समझ नहीं सका हूँ। परन्तु यदि आप अहमदाबाद आनेके लिए उत्सुक हैं, तो मैं अगले सप्ताह सोमवारके अलावा किसी भी दिन शामके ४ बजे आपसे मिल सकूंगा। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|श्री आर॰ आर॰ एथन<br> प्रधान सचिव<br> इंटरनेशनल पीस कैम्पेन<br> १५०, वाट्सन होटल<br> बम्बई}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१८५) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२५३. पत्र : सदाशिव रावको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय सदाशिव राव,}} मुझे आपके तीन पत्र मिले। जिन मामलोंका आपने जिक्र किया है, उनमें जितनी मदद मैं देना चाहता हूँ, उतनी दे पानेकी क्षमता मुझमें नहीं है। यद्यपि मैं बहुत–से पैसेवाले मित्रोंको जानता हूँ, परन्तु आपने उनपर जिस तरह दबाव डालनेका सुझाव दिया है, उस तरह शायद मैं अपने असरका इस्तेमाल न करूँ। इसलिए आपको अपनी नाव स्वयं खेनी है और बहादुरीसे कठिनाइयोंका सामना करना है। यदि आप आश्रय–विहीन भी हो जायें तो इससे क्या होता है? क्या लाखों लोग ऐसी ही दशामें नहीं रहते? और आपकी लड़कियोंको ऐसा प्रशिक्षण मिला है कि यदि आपने उनके लिए कोई प्रबन्ध न भी किया हो, तो भी वे अपने आपको योग्य<noinclude></noinclude> ee67p1asse46phub20k8s8cuo39vyvo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६० 250 187099 674441 645499 2026-08-26T16:19:26Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674441 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> ही सिद्ध करेंगी । इसलिए मैं चाहता हूँ कि आपपर जो संकट आ पड़ा है, इसमें मर्दकी तरह अपने कर्त्तव्यका पालन करें। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस० एन० १३१८४) की माइक्रोफिल्मसे । {{c|{{larger|'''२५४. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय चार्ली,}} तुम्हारा पत्र मिला। बड़े दुःखकी बात है कि गुरुदेव बहुत बीमार हो गये हैं। और उन्हें रक्तचापका रोग लग गया है । भारतमें यक्ष्माका रोग बड़ा कठिन है । यदि पारजम्बु रश्मि (अल्ट्रा वायलेट रेज़) के सिद्धान्तमें कोई सचाई है. • जैसा कि मैं समझता हूँ - तो भारतमें किसीको भी इस भयंकर रोगसे पीड़ित नहीं होना चाहिए । तुम्हें श्रद्धानन्द लेखमाला समाप्त करनेकी याद बनी होगी । -- मैं अभी अम्बालालसे नहीं मिला हूँ, परन्तु अपने बीच जो बातचीत हुई थी उसे नहीं भूला हूँ । सी० एफ० एन्ड्रयूज शान्तिनिकेतन अंग्रेजी (एस० एन० १३१५२) की फोटो नकलसे । {{c|{{larger|'''२५५. एक समयानुकूल किताब'''}}}} 'यंग इंडिया' के पाठक श्री रिचर्ड बी० ग्रेगके नामसे भली-भाँति परिचित हैं। अमेरिकाके ये वकील महोदय खादीके सन्देशसे आकृष्ट होकर कोई दो वर्ष पहले हिन्दुस्तान आये और आने के बादसे ही उन्होंने खादी आन्दोलनका बहुत बारीकीसे अध्ययन किया । कोई साल भरकी मेहनतसे उन्होंने खादी आन्दोलन पर एक किताव तैयार की है, जिसमें खादी पर प्रायः बिलकुल मौलिक ढंगसे विचार किया गया है। अपनी हरएक बातके समर्थनमें उन्होंने आँकड़े और तथ्य प्रस्तुत किये हैं और पाद-टिप्पणियों में श्री ग्रेगने उन प्रमाणोंका हवाला दिया है, जिनके आधारपर उन्होंने अपने निष्कर्ष Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> otr0mmp9599clrjn5bw1pwjbjgt0vjn 674446 674441 2026-08-26T16:26:54Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674446 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> ही सिद्ध करेंगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आपपर जो संकट आ पड़ा है, इसमें मर्दकी तरह अपने कर्त्तव्यका पालन करें। {{right|हृदयसे आपका,}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१८४) की माइक्रोफिल्मसे। {{c|{{larger|'''२५४. पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको'''}}}} {{right|आश्रम<br> साबरमती<br> ११ अप्रैल, १९२८}} {{left|प्रिय चार्ली,}} तुम्हारा पत्र मिला। बड़े दुःखकी बात है कि गुरुदेव बहुत बीमार हो गये हैं। और उन्हें रक्तचापका रोग लग गया है। भारतमें यक्ष्माका रोग बड़ा कठिन है। यदि पारजम्बु रश्मि (अल्ट्रा वायलेट रेज़) के सिद्धान्तमें कोई सचाई है — जैसा कि मैं समझता हूँ — तो भारतमें किसीको भी इस भयंकर रोगसे पीड़ित नहीं होना चाहिए। तुम्हें श्रद्धानन्द लेखमाला समाप्त करनेकी याद बनी होगी। मैं अभी अम्बालालसे नहीं मिला हूँ, परन्तु अपने बीच जो बातचीत हुई थी उसे नहीं भूला हूँ। {{left|सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूज<br> शान्तिनिकेतन}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१५२) की फोटो–नकलसे। {{c|{{larger|'''२५५. एक समयानुकूल किताब'''}}}} 'यंग इंडिया' के पाठक श्री रिचर्ड बी॰ ग्रेगके नामसे भली–भाँति परिचित हैं। अमेरिकाके ये वकील महोदय खादीके सन्देशसे आकृष्ट होकर कोई दो वर्ष पहले हिन्दुस्तान आये और आने के बादसे ही उन्होंने खादी आन्दोलनका बहुत बारीकीसे अध्ययन किया। कोई साल भरकी मेहनतसे उन्होंने खादी आन्दोलन पर एक किताब तैयार की है, जिसमें खादी पर प्रायः बिलकुल मौलिक ढंगसे विचार किया गया है। अपनी हरएक बातके समर्थनमें उन्होंने आँकड़े और तथ्य प्रस्तुत किये हैं और पाद–टिप्पणियोंमें श्री ग्रेगने उन प्रमाणोंका हवाला दिया है, जिनके आधारपर उन्होंने अपने निष्कर्ष<noinclude></noinclude> 1p6owutkru1y5quojupqqzt9qnabyrx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६१ 250 187100 674447 645500 2026-08-26T16:29:24Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674447 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||एक समयानुकूल किताब|२२९}}</noinclude> निकाले हैं। इसके प्रकाशक हैं एस० गणेशन, १८ पाइक्राफ्ट्स रोड, ट्रिप्लिकेन, मद्रास । कीमत है १ ।। ) रु० | कुल २२५ पृष्ठ हैं, जिनमें पृष्ठ १६५ से लेकर पृष्ठ २२५ तक सात परिशिष्ट हैं । किताबमें कुल १२ अध्याय हैं । पाठक यह भी समझ लें कि श्री ग्रेग भारतीय गाँवोंके बारेमें जो कुछ लिखते हैं, थोड़ा-बहुत आप देखा लिखते हैं । प्रस्तावनाके पहले तीन अनुच्छेदोंसे पाठकों को पता चल जायेगा कि श्री ग्रेगने किस तरहसे पुस्तक तैयार की है :— इसी गरीबीको दूर करने के लिए श्री ग्रेगने इस उद्देश्यसे तैयार की गई विविध योजनाओंकी परीक्षा की और अन्तमें उन्हें लाचार होकर इसी निष्कर्ष पर आना पड़ा कि चरखा ही इसका एकमात्र सच्चा उपाय है। लेखक कहते हैं : इस छोटी-सी कितावमें यही दिया गया है कि मेरे जैसे आदमीको, जिसे अमेरिकाकी औद्योगिक और मजदूरोंसे सम्बंन्धित समस्याओंका ७ वर्षका व्यवहारिक ज्ञान है (जिसमें अधिकांश कपड़ेकी मिलोंका ही है) और साथ ही जिसने हिन्दुस्तान में खद्दर आन्दोलनका ढाई वर्ष तक अध्ययन किया है, और वह भी गाँवों में तथा आन्दोलनके मुख्य केन्द्र में, यह योजना कैसी जान पड़ती है। मुख्यतः अपने ही विचारोंको ठीकसे समझ लेनेके लिए यह खोज शुरू की गई थी । श्री ग्रेग द्वारा समस्याके अध्ययनकी नवीनता यही है कि उन्होंनें यन्त्र शास्त्रके पहलूको ध्यान में रखते हुए समस्या पर विचार किया है। पुस्तकके प्रथम अध्यायका शीर्षक भी यही है। उन्हें यह साबित करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई है कि किसी भी देशकी भौतिक उन्नति केवल विद्युत या यन्त्र शक्ति अथवा मशीनें संचित कर लेनेसे ही नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमालसे होती है । वे अपनी दलील यों शुरू करते हैं: " अब दूसरे अध्यायोंसे उद्धरण देनेका लोभ तो मुझे संवरण करना ही पड़ेगा । मगर ऊपर दिये गये उद्धरण अगर पाठकको जरा भी रुचिकर लगे हों तो मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आगेके अध्याय नितान्त रोचक और बहुत ही शिक्षा-प्रद हैं। अब मैं शेष ११ अध्यायोंके शीर्षक देकर जल्दबाजी में लिखी गई यह समालोचना समाप्त करता हूँ। इतना तो सभी मानेंगे कि शीर्षक काफी व्यंजना- पूर्ण हैं । १. उपर्युक्त अनुच्छेद यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं ग्रेग्रने उनमें लिखा था कि “ पहले जमाने में हिन्दुस्तान बहुत हो धनी देश समझा जाता था। कमसे कम मुसलमानोंके आक्रमणके पहले तक तो देशका धन लोगों में सम्यक रूपसे बँटा हुआ था। लेकिन यद्यपि हिन्दुस्तान अब भी धनका निधान समझा जाता है, हिन्दुस्तान के बाशिन्दे दुनियाके दरिद्र लोगोंमें गिने जाते हैं, जैसा कि मद्रास विश्वविद्यालय के प्राध्यापक गिलबर्ड स्लेटर कहते हैं कि भारतवर्ष की कंगाली एक भयानक तथ्य है । " २. केवल कुछ अंश यहाँ दिया जा रहा है । ३. यह उद्धरण यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसके मूलके लिए देखिए हमारा अंग्रेजी खंड ३६ ।<noinclude></noinclude> p9l5bkzm2536lpmv6v4on7flne1nyvy 674456 674447 2026-08-26T16:43:27Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674456 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एक समयानुकूल किताब|२२९}}</noinclude> निकाले हैं। इसके प्रकाशक हैं एस॰ गणेशन, १८ पाइक्राफ्ट्स रोड, ट्रिप्लिकेन, मद्रास। कीमत है १।।) रु॰ । कुल २२५ पृष्ठ हैं, जिनमें पृष्ठ १६५ से लेकर पृष्ठ २२५ तक सात परिशिष्ट हैं। किताबमें कुल १२ अध्याय हैं। पाठक यह भी समझ लें कि श्री ग्रेग भारतीय गाँवोंके बारेमें जो कुछ लिखते हैं, थोड़ा–बहुत आप देखा लिखते हैं। प्रस्तावनाके पहले तीन अनुच्छेदोंसे पाठकों को पता चल जायेगा कि श्री ग्रेगने किस तरहसे पुस्तक तैयार की है<ref>उपर्युक्त अनुच्छेद यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं ग्रेग्रने उनमें लिखा था कि "पहले जमानेमें हिन्दुस्तान बहुत ही धनी देश समझा जाता था। कमसे–कम मुसलमानोंके आक्रमणके पहले तक तो देशका धन लोगोंमें सम्यक रूपसे बँटा हुआ था। लेकिन यद्यपि हिन्दुस्तान अब भी धनका निधान समझा जाता है, हिन्दुस्तानके बाशिन्दे दुनियाके दरिद्र लोगोंमें गिने जाते हैं, जैसा कि मद्रास विश्वविद्यालयके प्राध्यापक गिलबर्ड स्लेटर कहते हैं कि भारतवर्षकी कंगाली एक भयानक तथ्य है।"</ref> :— इसी गरीबीको दूर करनेके लिए श्री ग्रेगने इस उद्देश्यसे तैयार की गई विविध योजनाओंकी परीक्षा की और अन्तमें उन्हें लाचार होकर इसी निष्कर्ष पर आना पड़ा कि चरखा ही इसका एकमात्र सच्चा उपाय है। लेखक कहते हैं :<ref>केवल कुछ अंश यहाँ दिया जा रहा है।</ref> {{Outdent|{{gap}}{{gap}}'''इस छोटी–सी किताबमें यही दिया गया है कि मेरे जैसे आदमीको, जिसे अमेरिकाकी औद्योगिक और मजदूरोंसे सम्बंन्धित समस्याओंका ७ वर्षका व्यवहारिक ज्ञान है (जिसमें अधिकांश 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गई यह समालोचना समाप्त करता हूँ। इतना तो सभी मानेंगे कि शीर्षक काफी व्यंजना–पूर्ण हैं।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> ee6hwgxsmq8f3w4y9dxktobwg96kmuu पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६२ 250 187101 674486 645501 2026-08-26T17:36:50Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674486 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{|width=100% |- | अध्याय || २ रा || यान्त्रिक ब्यौरे || |- | " || ३ रा || मिलके कपड़े और खद्दरमें होड़ || |- | " || ४ था || होड़को कम करनेवाले कारण || |- | " || ५ वाँ || बढ़ी हुई क्रयशक्ति || |- | " || ६ ठा || विकेन्द्रित उत्पादन और विवरण || |- | " || ७ वाँ || बेकारी || |- | " ||८ वाँ || वस्त्र-व्यवसायकी कुछ तकनीकी बातें || |- | " || ९ वाँ || क्या यह चलता भी है? || |- | " || १० वाँ || विविध आपत्तियाँ || |- | " || ११ वाँ || खद्दर कार्यक्रमकी दूसरी योजनाओंसे तुलना || |- | " || १२ वाँ || रुपये में कीमतका महत्व || |- | || निष्कर्ष || |} :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५६. खादीका स्थान'''}}}} खादी-प्रेमी अनेक सज्जन मुझे जोरोंसे चेतावनी देते हुए यह लिखते रहते हैं कि मिलवालोंसे इस आशामें मेलजोल बढ़ानेकी कोशिश करना कि विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन चलाने के लिए राष्ट्रके लिए हितकर शर्तोंपर उन्हें पक्षमें लेकर उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त किया जा सकता है, व्यर्थकी आशा है । उनकी चेतावनीका महत्व मैं समझता हूँ । इनमें कुछ सज्जन तो खादीके मँजे हुए अनुभवी कार्यकर्त्ता हैं । फिर भी मैंने इस बातकी आशा नहीं छोड़ी है कि किसी दिन मिलवाले राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपना लेंगे। आखिरकार अहिंसाके सिद्धान्तका दृढ़ विश्वासी होने के नाते जिस तरह मैं अंग्रेजोंको भारतवर्षके हितके सम्बन्धमें भारतीय दृष्टिकोण अपनानेके लिए राजी करनेका एक भी मौका नहीं छोड़ सकता उसी तरह मैं मिल-मालिकोंको भी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनानेके लिए राजी कर सकनेका कोई अवसर हाथसे नहीं जाने दे सकता । आखिरकार अगर हमें अहिंसाके रास्ते स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है तो हमें उनके भी दरवाजे खटखटाने होंगे, जो हमारी स्वाधीनताके रास्तेमें रोड़े अटकाते हैं, और उनसे भी विनय करनी होगी कि आप रुकावटोंको दूर करें। जिस तरह खूनी क्रान्तिमें उन लोगोंको - रास्ता रोकनेवालोंको -- - चाहे वे स्वदेशवासी हों या विदेशी मरना ही पड़ता है उसी तरह अहिंसात्मक क्रान्तिमें वैसे लोगोंको जो कोई युक्ति नहीं सुनते और हठपूर्वक रास्ता रोकते हैं, सत्याग्रहका सामना करना ही पड़ेगा। इसलिए उन शर्तोंको जिनपर कि मिल-मालिक राष्ट्रका साथ दे सकते हैं, सामने रखने में मैं कोई हानि नहीं देखता । उन्हें उनके सामने न रखना ही अनुचित होता । अगर मिल मालिक ये शर्तें स्वीकार कर लें तो मेरी समझ में इससे खादीकी यानी<noinclude></noinclude> tcylhmbsb0u3w9lkzx5kp5hxmv9bvu3 674492 674486 2026-08-26T17:43:40Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674492 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>&nbsp; {|width=100% |- | अध्याय || २ रा || यान्त्रिक ब्यौरे || |- | " || ३ रा || मिलके कपड़े और खद्दरमें होड़ || |- | " || ४ था || होड़को कम करनेवाले कारण || |- | " || ५ वाँ || बढ़ी हुई क्रयशक्ति || |- | " || ६ ठा || विकेन्द्रित उत्पादन और विवरण || |- | " || ७ वाँ || बेकारी || 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मालिक ये शर्तें स्वीकार कर लें तो मेरी समझमें इससे खादीकी यानी<noinclude></noinclude> rv7g1nvytfs9447mbp7fwsa40sx34bp पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६३ 250 187102 674494 645502 2026-08-26T17:49:54Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674494 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||खादीका स्थान|२३१}}</noinclude> जनताकी कोई हानि नहीं होगी। क्योंकि अगर मिलें जनताके शोषणका काम न करें, जैसा कि वे आज कर रही हैं, बल्कि उनकी सेवा करनेकी दृष्टिसे काम करें तो वे घर-घर चलनेवाले चरखों और करघोंसे होनेवाले उत्पादनको मदद पहुँचायेंगी, उनकी जगह नहीं लेंगी, जैसा कि आज वे कर रही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर वे मेरी बतलाई शर्तें स्वीकार करने में हिचकें तो इसका कारण यह होगा कि उन शर्तोंके तर्क- सिद्ध परिणामसे मिल मालिक घबराते हैं, उसी तरह जैसे कि अंग्रेजोंको मेरी इस शर्त के तर्क सिद्ध परिणामसे घबराहट होती है कि वे सचमुच में राष्ट्रके सेवक बन कर रहें। इसलिए मैं खादी-प्रेमियोंसे कहूँगा कि आप मेरे इस मेल-जोलके प्रयत्नसे जरा भी मत डरिये । अगर हमारी श्रद्धा अचल हो, अगर खादीमें वह सहज शक्ति हो जिसका हम दावा करते हैं, अगर जनताको सचमुच इसकी जरूरत हो और अगर हम अपने प्रयत्न में लगे ही रहें तो हम अपने उद्देश्यको अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे । खादी तभी असफल होगी, जब खादी-प्रेमियोंकी श्रद्धा डगमगा जाये या हमारी श्रद्धाका आधार केवल कोई ऐसी कल्पना हो, जिसमें कोई तथ्य न हो यानी जनता गरीबी से दरअसल पिस न रही हो और उसे सालमें कभी फुरसतका समय न मिलता हो, या फुरसत मिलनेपर भी करोड़ोंके लिए चरखा ही सबसे अधिक उपयुक्त और व्यावहारिक धन्धा न हो। उपर्युक्त बातोंको दृष्टिमें रखकर खादी में मेरा जो अटल विश्वास है, उसकी वजहसे और उस विश्वाससे जन्मे बलके कारण ही मैं मिल मालिकोंसे मेल मिलापकी कोशिश कर रहा हूँ। ऐसा भी हो सकता है, और शायद अब प्रायः निश्चित ही है, कि इस सलाह मशविरेसे तत्काल कोई लाभ होनेवाला न हो। अगर इस बीच हमने विदेशी वस्त्रका बहिष्कार पूरा नहीं कर लिया है तो, आगे कुछ काम करनेमें या रास्ता दिखानेमें इससे सहायता मिलेगी। इसलिए एक ही बात दोहरानेकी जोखिम उठाकर भी इस बातपर विचार कर लेना लाभदायक होगा कि बहिष्कारकी योजनायें खादीका क्या स्थान है। मेरे खयालसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार इसीलिए आवश्यक और सम्भव भी है कि जनता पर इसका असर पड़ता है और जनताको इससे लाभ भी पहुँचता है । और यह सफल तभी हो सकता है जब इसमें जनता भी शामिल हो । अगर केवल स्वदेशी मिलोंके ही बलपर विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाना सम्भव हो तो, उसका महत्व अस्थायी होगा। मैं निकट भविष्य में केवल स्वदेशी मिलोंके ही सहारे यह बहिष्कार कर सकना असम्भव मानता हूँ। मेरी सम्मतिमें केवल खादीने ही इस बहिष्कारकी बातको व्यावहारिक बनाया है। सचमुच ही, यह इतना अधिक व्यावहारिक है कि अगर राजनीतिक वृत्तिवाले हिन्दुस्तानी खादी बेचनेका भार उठा लें तो एक सालके भीतर ही, देशी या विदेशी मिलोंका बना एक गज कपड़ा न मिले तो भी राष्ट्रकी जरूरत भरकी सारी खादी तैयार की जा सकती है। इस बातपर मैं इस मान्यताके बल पर जोर देता हूँ कि गाँवोंकी जरूरतकी खादी गाँववाले आप बना लेंगे और संगठित केन्द्रोंमें उन्हीं के उपयोगके लिए खादी बनेगी,<noinclude></noinclude> adct0n1japb6ri683fmaepukz9zsfz9 674498 674494 2026-08-26T17:57:03Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674498 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||खादीका स्थान|२३१}}</noinclude> जनताकी कोई हानि नहीं होगी। क्योंकि अगर मिलें जनताके शोषणका काम न करें, जैसा कि वे आज कर रही हैं, बल्कि उनकी सेवा करनेकी दृष्टिसे काम करें तो वे घर–घर चलनेवाले चरखों और करघोंसे होनेवाले उत्पादनको मदद पहुँचायेंगी, उनकी जगह नहीं लेंगी, जैसा कि आज वे कर रही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर वे मेरी बतलाई शर्तें स्वीकार करनेमें हिचकें तो इसका कारण यह होगा कि उन शर्तोंके तर्क–सिद्ध परिणामसे मिल मालिक घबराते हैं, उसी तरह जैसे कि अंग्रेजोंको मेरी इस शर्तके तर्क–सिद्ध परिणामसे घबराहट होती है कि वे सचमुचमें राष्ट्रके सेवक बन कर रहें। इसलिए मैं खादी–प्रेमियोंसे कहूँगा कि आप मेरे इस मेल–जोलके प्रयत्नसे जरा भी मत डरिये। अगर हमारी श्रद्धा अचल हो, अगर खादीमें वह सहज शक्ति हो जिसका हम दावा करते हैं, अगर जनताको सचमुच इसकी जरूरत हो और अगर हम अपने प्रयत्नमें लगे ही रहें तो हम अपने उद्देश्यको अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे। खादी तभी असफल होगी, जब खादी–प्रेमियोंकी श्रद्धा डगमगा जाये या हमारी श्रद्धाका आधार केवल कोई ऐसी कल्पना हो, जिसमें कोई तथ्य न हो यानी जनता गरीबीसे दरअसल पिस न रही हो और उसे सालमें कभी फुरसतका समय न मिलता हो, या फुरसत मिलनेपर भी करोड़ोंके लिए चरखा ही सबसे अधिक उपयुक्त और व्यावहारिक धन्धा न हो। उपर्युक्त बातोंको दृष्टिमें रखकर खादीमें मेरा जो अटल विश्वास है, उसकी वजहसे और उस विश्वाससे जन्मे बलके कारण ही मैं मिल–मालिकोंसे मेल मिलापकी कोशिश कर रहा हूँ। ऐसा भी हो सकता है, और शायद अब प्रायः निश्चित ही है, कि इस सलाह मशविरेसे तत्काल कोई लाभ होनेवाला न हो। अगर इस बीच हमने विदेशी वस्त्रका बहिष्कार पूरा नहीं कर लिया है तो, आगे कुछ काम करनेमें या रास्ता दिखानेमें इससे सहायता मिलेगी। इसलिए एक ही बात दोहरानेकी जोखिम उठाकर भी इस बातपर विचार कर लेना लाभदायक होगा कि बहिष्कारकी योजनायें खादीका क्या स्थान है। मेरे खयालसे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार इसीलिए आवश्यक और सम्भव भी है कि जनता पर इसका असर पड़ता है और जनताको इससे लाभ भी पहुँचता है। और यह सफल तभी हो सकता है जब इसमें जनता भी शामिल हो। अगर केवल स्वदेशी मिलोंके ही बलपर विदेशी वस्त्रका बहिष्कार किया जाना सम्भव हो तो, उसका महत्व अस्थायी होगा। मैं निकट भविष्यमें केवल स्वदेशी मिलोंके ही सहारे यह बहिष्कार कर सकना असम्भव मानता हूँ। मेरी सम्मतिमें केवल खादीने ही इस बहिष्कारकी बातको व्यावहारिक बनाया है। सचमुच ही, यह इतना अधिक व्यावहारिक है कि अगर राजनीतिक वृत्तिवाले हिन्दुस्तानी खादी बेचनेका भार उठा लें तो एक सालके भीतर ही, देशी या विदेशी मिलोंका बना एक गज कपड़ा न मिले तो भी राष्ट्रकी जरूरत भरकी सारी खादी तैयार की जा सकती है। इस बातपर मैं इस मान्यताके बल पर जोर देता हूँ कि गाँवोंकी जरूरतकी खादी गाँववाले आप बना लेंगे और संगठित केन्द्रोंमें उन्हींके उपयोगके लिए खादी बनेगी,<noinclude></noinclude> 8burbnz6hmprngjeeux1dtf827jzpop पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६४ 250 187103 674502 645503 2026-08-26T18:05:49Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674502 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|२३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> जो आप अपने कपड़ेके लिए सूत नहीं कातते । पिछले ७ वर्षोंका अनुभव हमें बतलाता है कि अगर अचानक कपड़ेका अभाव हो जाये और जनताको उत्साहित किया जाये तो उनमें इतना काफी हुनर है और उनके पास इतने स्वदेशी यन्त्र हैं कि वे अपनी खादी आप बना सकते हैं। बेशक, राजनीतिक मनोवृत्तिवाले हिन्दुस्तानियों के मानसिक दृष्टिकोण और वस्त्र विषयक रुचिमें क्रान्तिकारी परिवर्तन होना जरूरी है । मुझे इसमें कोई शंका नहीं है कि अगर आज उनमें से अधिकांश इस पुकारको नहीं सुनते तो उस दिन जब वे देखेंगे कि खादीकी गति रोकी ही नहीं जा सकती उन्हें लाचार होकर इसे सुनना होगा। इसकी गतिको अबाध बनानेके लिए खादी कार्य- कर्त्ताओंको दृढ़ता, ईमानदारी, शास्त्रीय निपुणता और बारीकीसे बराबर काम करते रहना होगा। मैंने जो मिलवालोंको अपने साथ लेना चाहा है और उनके सहयोगसे विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार तुरन्त करनेकी सम्भावनाके बारेमें चर्चा की है, वह यह दिखलाने के लिए कि अगर वे सचमुच चाहें तो अपनी सेवाके साथ-साथ राष्ट्रकी सेवाका सौभाग्य भी लूट सकते हैं। इस बीच कोई इसमें शंका न करे कि खादी शान्तिपूर्वक और अनजाने ही लोगोंकी रुचिमें आमूल परिवर्तन करती जा रही है और अगर बीचमें ही मेरे सुझाये हुए मेलजोलके जैसी कोई योजना बहिष्कारको सफल न कर पाई तो अपने ढंगपर यथासम्भव एक दिन जरूर खादी बहिष्कारको सफल करेगी। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५७. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''वचन भंग'''}} पिछले साल जब मैं गंजम जिलेमें बरहामपुर गया था, मुझे लोग एक मन्दिरमें ले गये थे। उसके बारेमें मुझे बताया गया था कि वह तथाकथित अछूतोंके लिए भी खुला हुआ है। मेरे साथ कुछ 'अछूत' मित्र भी थे। कुछ हफ्ते हुए मेरे पास एक पत्र आया कि अब मन्दिरके न्यासियोंने अछूतोंके प्रवेशका निषेध कर दिया है। इस बातपर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। इसलिए मैंने पत्र लिखकर पुछवाया उसका जवाब यह आया है : अगर ये बातें सच्ची हैं तो यह न्यासियों द्वारा सरासर अपना वचन मंग करना है • और वह वचन न सिर्फ मुझ ही को सार्वजनिक रूपमें दिया गया थ - १. गांधीजीका २२ मार्चका यह पत्र उपलब्ध नहीं है। २. पत्र लेखकने जिसका पत्र यहाँ नहीं दिया गया है, लिखा था कि मन्दिरके न्यासी अछूतोंपर पहले भी ज्यादा प्रतिबन्ध लगा रहे है और अछूत लोगोंका कांग्रेसके अछूत आन्दोलनपरसे विश्वास उठता जा रहा है।<noinclude></noinclude> okjc892wxydaebhhpeuy3yb8nys2bwu 674504 674502 2026-08-26T18:13:16Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674504 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|२३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude> जो आप अपने कपड़ेके लिए सूत नहीं कातते। पिछले ७ वर्षोंका अनुभव हमें बतलाता है कि अगर अचानक कपड़ेका अभाव हो जाये और जनताको उत्साहित किया जाये तो उनमें इतना काफी हुनर है और उनके पास इतने स्वदेशी यन्त्र हैं कि वे अपनी खादी आप बना सकते हैं। बेशक, राजनीतिक मनोवृत्तिवाले हिन्दुस्तानियोंके मानसिक दृष्टिकोण और वस्त्र विषयक रुचिमें क्रान्तिकारी परिवर्तन होना जरूरी है। मुझे इसमें कोई शंका नहीं है कि अगर आज उनमें से अधिकांश इस पुकारको नहीं सुनते तो उस दिन जब वे देखेंगे कि खादीकी गति रोकी ही नहीं जा सकती उन्हें लाचार होकर इसे सुनना होगा। इसकी गतिको अबाध बनानेके लिए खादी कार्यकर्त्ताओंको दृढ़ता, ईमानदारी, शास्त्रीय निपुणता और बारीकीसे बराबर काम करते रहना होगा। मैंने जो मिलवालोंको अपने साथ लेना चाहा है और उनके सहयोगसे विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार तुरन्त करनेकी सम्भावनाके बारेमें चर्चा की है, वह यह दिखलानेके लिए कि अगर वे सचमुच चाहें तो अपनी सेवाके साथ–साथ राष्ट्रकी सेवाका सौभाग्य भी लूट सकते हैं। इस बीच कोई इसमें शंका न करे कि खादी शान्तिपूर्वक और अनजाने ही लोगोंकी रुचिमें आमूल परिवर्तन करती जा रही है और अगर बीचमें ही मेरे सुझाये हुए मेलजोलके जैसी कोई योजना बहिष्कारको सफल न कर पाई तो अपने ढंगपर यथासम्भव एक दिन जरूर खादी बहिष्कारको सफल करेगी। :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५७. टिप्पणियाँ'''}}}} {{c|'''वचन–भंग'''}} पिछले साल जब मैं गंजम जिलेमें बरहामपुर गया था, मुझे लोग एक मन्दिरमें ले गये थे। उसके बारेमें मुझे बताया गया था कि वह तथाकथित अछूतोंके लिए भी खुला हुआ है। मेरे साथ कुछ 'अछूत' मित्र भी थे। कुछ हफ्ते हुए मेरे पास एक पत्र आया कि अब मन्दिरके न्यासियोंने अछूतोंके प्रवेशका निषेध कर दिया है। इस बातपर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था। इसलिए मैंने पत्र<ref>गांधीजीका २२ मार्चका यह पत्र उपलब्ध नहीं है।</ref> लिखकर पुछवाया उसका जवाब यह आया है :<ref>पत्र–लेखकने जिसका पत्र यहाँ नहीं दिया गया है, लिखा था कि मन्दिरके न्यासी अछूतोंपर पहलेसे भी ज्यादा प्रतिबन्ध लगा रहे है और अछूत लोगोंका कांग्रेसके अछूत आन्दोलनपरसे विश्वास उठता जा रहा है।</ref> अगर ये बातें सच्ची हैं तो यह न्यासियों द्वारा सरासर अपना वचन भंग करना है — और वह वचन न सिर्फ मुझ ही को सार्वजनिक रूपमें दिया गया था।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> clbuf8352psqpa1fb9gdlux0x6aife0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२६५ 250 187104 674506 645504 2026-08-26T18:18:43Z आदेश यादव 3609 /* अशोधित */ 674506 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh||दक्षिण–आफ्रिकी भारतीय|२३३}}</noinclude> बल्कि मेरी मार्फत बरहामपुरके लोगोंको दिया गया था। मैं समझ नहीं सकता न्यासियों के पास अपने इस कामकी क्या कैफियत या बचाव देनेको है । यह तो बेशक अछूतोंके सत्याग्रह करनेका स्पष्ट मामला है । अगर उनका मन्दिर प्रवेश सचमुच ही मना हो तो, मैं आशा करता हूँ कि बरहामपुरकी जनता इस निषेधको हटाकर अपने सम्मानकी रक्षा करेगी। {{c|'''माजोरका मानवीय कताई यन्त्र'''}} निम्न दिलचस्प अखबारी कतरन' भेजने के लिए मैं कोयम्बटूरके श्रीयुत सी ० बालाजी रावका कृतज्ञ हूँ : :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीय'''}}}} आफ्रिका गृहमन्त्रीकी ओरसे २४ फरवरी १९२८, को दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसके मन्त्रीके नाम भेजे गये निम्न पत्र में कथित जाली प्रवेशोंके सम्बन्ध में संघ- सरकारकी दी हुई रियायतें लिखी गई हैं : ' यदि पत्नियों और बच्चोंके सम्बन्धमें पत्रको धारा (ग) में दी गई शर्त अत्यन्त कठोरतापूर्वक लागू न की जायेगी तो यह रियायत ठीक काम देगी । :[अंग्रेजी से] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ १. यहां नहीं दी जा रही है। २. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। ३. रिवायतों का सार यह था कि यदि कोई भारतीय यद विश्वास दिला देगा कि वह संघ 'आरेंज फ्री स्टेट' के अतिरिक्त अन्य किसी प्रान्तमें ५ जुलाई, १९२४ के पूर्व प्रवेश कर चुका था, तो कुछ शर्ते पूरी कर देनेपर संघ सरकार १९१३ के कानून २२के खण्ड १० को, १९२७ के कानून ३७ के खण्ड ५ द्वारा संशोधित रूपमें पूरी तरह अमल में नहीं लायेगी । ४. शर्त यह थी कि जो पत्नि और बच्चे ५ जुलाई, १९२७ से पहले ही दक्षिण आफ्रिको संघमें नहीं लाये गये थे, उन्हें नहीं आने दिया जायेगा ।<noinclude></noinclude> q98e2mchl85okdwmbumu4fkt45te1jz 674508 674506 2026-08-26T18:28:34Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 674508 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||दक्षिण–आफ्रिकी भारतीय|२३३}}</noinclude> बल्कि मेरी मार्फत बरहामपुरके लोगोंको दिया गया था। मैं समझ नहीं सकता न्यासियोंके पास अपने इस कामकी क्या कैफियत या बचाव देनेको है। यह तो बेशक अछूतोंके सत्याग्रह करनेका स्पष्ट मामला है। अगर उनका मन्दिर प्रवेश सचमुच ही मना हो तो, मैं आशा करता हूँ कि बरहामपुरकी जनता इस निषेधको हटाकर अपने सम्मानकी रक्षा करेगी। {{c|'''माजोरका मानवीय कताई यन्त्र'''}} निम्न दिलचस्प अखबारी कतरन<ref>यहां नहीं दी जा रही है।</ref> भेजनेके लिए मैं कोयम्बटूरके श्रीयुत सी॰ बालाजी रावका कृतज्ञ हूँ : :[अंग्रेजीसे] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८ {{c|{{larger|'''२५८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीय'''}}}} आफ्रिकाके गृहमन्त्रीकी ओरसे २४ फरवरी १९२८, को दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसके मन्त्रीके नाम भेजे गये निम्न पत्रमें<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> कथित जाली प्रवेशोंके सम्बन्धमें संघ–सरकारकी दी हुई रियायतें लिखी गई हैं :<ref>रिवायतोंका सार यह था कि यदि कोई भारतीय यह विश्वास दिला देगा...कि वह संघ 'आरेंज फ्री स्टेट' के अतिरिक्त अन्य किसी प्रान्तमें ५ जुलाई, १९२४ के पूर्व प्रवेश कर चुका था, तो कुछ शर्ते पूरी कर देनेपर संघ सरकार १९१३ के कानून २२के खण्ड १० को, १९२७ के कानून ३७ के खण्ड ५ द्वारा संशोधित रूपमें पूरी तरह अमल में नहीं लायेगी।</ref> यदि पत्नियों और बच्चोंके सम्बन्धमें पत्रको धारा (ग) में दी गई शर्त<ref>शर्त यह थी कि जो पत्नियाँ और बच्चे ५ जुलाई, १९२७ से पहले ही दक्षिण आफ्रिकि संघमें नहीं लाये गये थे, उन्हें नहीं आने दिया जायेगा।</ref> अत्यन्त कठोरतापूर्वक लागू न की जायेगी तो यह रियायत ठीक काम देगी। :[अंग्रेजी से] :'''यंग इंडिया''', १२-४-१९२८<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 725er7683vploc8yt83q7e3nf8luvu2 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/७१ 250 196490 674450 668875 2026-08-26T16:35:20Z ऋतु मिश्रा 6631 /* शोधित */ सुधार 674450 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''४०. पत्र : मोहनलाल भट्टको'''}}}} {{right|२२ अक्टूबर, १९२९}} <br>भाईश्री मोहनलाल, तुम्हारा पत्र जब रास्तेमें रहा होगा, मैं भी तुम्हें तभी पत्र लिख चुका था। मैंने न्यासका घोषणपत्र<ref>देखिए "न्यासका घोषणापत्र", २६-११-१९२९।</ref> पढ़ लिया है। नाम ठीक ही हैं। जैसा कि मैंने लिखा था तदनुसार यदि मेरा नाम निकाला जा सके तो निकाल देना। मेरी देखरेख में आरम्भ हुआ था या ऐसा ही कुछ लिखना हो तो भले लिख दिया जाये किन्तु मेरे हस्ताक्षरकी जरूरत न पड़े तो अच्छा हो। 'गीताजी' के प्रूफ मुझे आज मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} <br>श्री मोहनलाल भट्ट <br>नवजीवन कार्यालय <br>अहमदाबाद <br>बी॰ बी॰ ऐंड सी॰ आई॰ रेलवे गुजराती (जी॰ एन॰ १२२४) की फोटो-नकलसे। {{c|{{x-larger|४१. पत्र : छगनलाल जोशीको}}}} {{right|मसूरी<br> २२ अक्टूबर, १९२९}} <br>चि॰ छगनलाल, आजकी डाक अभीतक नहीं आई है। ऐसा नहीं लगता कि कोई डाक बेठिकाने पहुँची हो। आगे-पीछे सभी पत्र मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि ईश्वरलालके<ref>देखिए "पत्र : ईश्वरलाल जोशीको", २३-१०-१९२९।</ref> बारेमें कहीं कोई गलतफहमी हो गई है। मेरा खयाल है कि ईश्वरलालने तुमसे अनुमति माँगनेके बावजूद मुझसे भो अनुमति माँगी थी। पहली बार अनुमति माँगने पर मैंने तुमसे ही पूछने को कह दिया था। किन्तु अबसे यही नियम होना चाहिए कि पहले तो मुझसे कोई अनुमति माँगे ही नहीं। तुम्हारी अनुमति मिलनेपर यदि मेरी अनुमति लेना आवश्यक हो तो भले<noinclude>{{smallrefs}} ४२-३</noinclude> i3u0tehkoqlx5wwv2pnu8d18fqxbbxh 674453 674450 2026-08-26T16:36:37Z ऋतु मिश्रा 6631 सुधार 674453 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''४०. पत्र : मोहनलाल भट्टको'''}}}} {{right|२२ अक्टूबर, १९२९}} <br>भाईश्री मोहनलाल, तुम्हारा पत्र जब रास्तेमें रहा होगा, मैं भी तुम्हें तभी पत्र लिख चुका था। मैंने न्यासका घोषणपत्र<ref>देखिए "न्यासका घोषणापत्र", २६-११-१९२९।</ref> पढ़ लिया है। नाम ठीक ही हैं। जैसा कि मैंने लिखा था तदनुसार यदि मेरा नाम निकाला जा सके तो निकाल देना। मेरी देखरेख में आरम्भ हुआ था या ऐसा ही कुछ लिखना हो तो भले लिख दिया जाये किन्तु मेरे हस्ताक्षरकी जरूरत न पड़े तो अच्छा हो। 'गीताजी' के प्रूफ मुझे आज मिले। {{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}} <br>श्री मोहनलाल भट्ट <br>नवजीवन कार्यालय <br>अहमदाबाद <br>बी॰ बी॰ ऐंड सी॰ आई॰ रेलवे गुजराती (जी॰ एन॰ १२२४) की फोटो-नकलसे। {{c|{{x-larger|'''४१. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}} {{right|मसूरी<br> २२ अक्टूबर, १९२९}} <br>चि॰ छगनलाल, आजकी डाक अभीतक नहीं आई है। ऐसा नहीं लगता कि कोई डाक बेठिकाने पहुँची हो। आगे-पीछे सभी पत्र मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि ईश्वरलालके<ref>देखिए "पत्र : ईश्वरलाल जोशीको", २३-१०-१९२९।</ref> बारेमें कहीं कोई गलतफहमी हो गई है। मेरा खयाल है कि ईश्वरलालने तुमसे अनुमति माँगनेके बावजूद मुझसे भो अनुमति माँगी थी। पहली बार अनुमति माँगने पर मैंने तुमसे ही पूछने को कह दिया था। किन्तु अबसे यही नियम होना चाहिए कि पहले तो मुझसे कोई अनुमति माँगे ही नहीं। तुम्हारी अनुमति मिलनेपर यदि मेरी अनुमति लेना आवश्यक हो तो भले<noinclude>{{smallrefs}} :४२-३</noinclude> tkr44p3btcymk6otes8z8edv9gvddsr 674454 674453 2026-08-26T16:37:58Z ऋतु मिश्रा 6631 674454 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''४०. पत्र : मोहनलाल भट्टको'''}}}} {{right|२२ अक्टूबर, १९२९}} <br>भाईश्री मोहनलाल, तुम्हारा पत्र जब रास्तेमें रहा होगा, मैं भी तुम्हें तभी पत्र लिख 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पहले तो मुझसे कोई अनुमति माँगे ही नहीं। तुम्हारी अनुमति मिलनेपर यदि मेरी अनुमति लेना आवश्यक हो तो भले<noinclude>{{smallrefs}} ४२-३</noinclude> 1uhiemyjue7vf4xawzwe19x2be2rw0f पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०२ 250 196621 674475 669006 2026-08-26T17:08:26Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674475 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वस्त्र पहनकर और चक्कीके पिसे मोटे आटेके बजाय अच्छा आटा खाकर अपनी आदतें बिगाड़ी तो उन्होंने उनकी भर्त्सना की। विद्यार्थियोंके बीच खादीका लगभग अभाव दिखलाई पड़ रहा था; और यह बात गांधीजीको अखर रही थी। इसलिए उन्होंने उनसे हृदयस्पर्शी अपील की कि यदि आप भारतके उन लाखों कंगालोंके साथ जीता-जागता सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, जिनके बच्चे कभी इस शिक्षाकी सुविधा नहीं पा सकते, जिसे स्वर्गीय सर सैयद अहमदकी दूरदर्शिता और प्रखर बुद्धिने आपके लिए मुहैया कर दिया है, तो आपको खादी अपनानी चाहिए। तीसरी बात उन्होंने यह कही कि आपको चाहिए कि आप अपने आपको भारतके सम्मानका रक्षक और हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करनेवाला समझें। मैं आपसे मुसीबत में पड़े एक हिन्दूकी मदद करनेमें उसी तरह सबसे पहले आगे बढ़ने की आशा करूँगा जैसे आप दुःसमें पड़े एक मुसलमान भाईकी मदद के लिए आगे आयेंगे। यद्यपि सभामें जोशकी कमी नहीं थी फिर भी विद्यार्थियों और प्रोफेसरोंकी ओरसे किसी थैलीका न मिलना ऐसी बात भी जिसपर ध्यान न जाना नामुमकिन था। सारे दीरेमें विद्यार्थियोंकी समामें जहाँ भी गांधीजीने भाषण दिया, यह पहला ऐसा अनुभव था जहाँ दरिद्रनारायणके लिए कोई थैली भेंट नहीं की गई थी। इस कमीपर इसलिए और भी ज्यादा ध्यान जाता था कि गांधीजीने सभामें इसका जान-बूझकर कोई उल्लेख नहीं किया। सभाके अन्तमें उन्हें आटोग्राफोंके लिए घेर लिया गया। उन्होंने तुरन्त ही उसकी कीमत बताई। यदि आपको मेरा आटोग्राफ लेना है, तो आपको खादी पहननेका वायदा जरूर करना होगा। पहले प्रार्थीकी तरफसे थोड़ी झिझकके बाद ऐसे कई लोग आगे आये जिन्होंने खादी पहननेका वायदा किया और आटोग्राफ प्राप्त किये। कुछ और लोगभी खादी पहननेका वायदा करके उसके बदले में आटोग्राफ लेने दूसरे दिन आये। निस्सन्देह अलीगढ़में भी अन्य सामान्य जलसे तो हुए ही; जिनका कोई खास ब्यौरा देनेकी जरूरत नहीं है। {{c|'''मथुरामे'''<ref>६ नवम्बर को।</ref>}} अलीगढ़ से रास्ते में कई जगह होते हुए हम आगे मथुरा पहुँच गये। हिन्दुओंका यह प्रसिद्ध तीर्थस्थान कृष्णके निवास स्थानमें से एक है, इसलिए गांधीजीको वहाँ उनका विचार आते रहना स्वाभाविक था; गांधीजीने आम सभामें संसारके गोपालोंमें कृष्णको शीर्षस्थ कहा। अभिनन्दनपत्रोंके उत्तरमें गांधीजीने गायके संबन्धमें ही अपने हृदयकी भावनाएँ व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मथुरा और उसके आसपासकी भगवान कृष्णकी लीलाभूमिमें आने वाला यहाँ बहुत ही अच्छी गायें और अच्छा शुद्ध दूध लगभग पानी-मोल, जैसा कि कहा जाता है कि कृष्णके जमाने में मिलता था, पानेकी आशा करता है। यहाँ आनेवाला मथुराके लोगोंमें बेहद दयाभाव, सादगी और कृष्णकी बहादुरीकी उम्मीद करता है। वह यह भी आशा रखेगा कि यहाँ पद-दलित अछूतों प्यारसे बरताव किया जाता होगा और उनका हर तरहसे ध्यान रखा जाता होगा।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 6ounuy6wyu5m0x85tmw5xmmrmp8e0ro पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०३ 250 196622 674478 669007 2026-08-26T17:16:35Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674478 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||संयुक्त प्रान्तका दौरा-९|१६५}}</noinclude>किंतु जब मैं मथुराकी गलियोंसे गुजरता हूँ तो मुझे ऐसी गायें दिखाई पड़ती है जिनकी हड्डियाँ निकल आई हैं; ये गायें बहुत कम दूध देती होंगी और आर्थिक दृष्टिसे बोझ होंगी। इस तीर्थ-स्थानमें बूचड़खाना भी है; और वहाँ वे गायें जिनकी कृष्ण रक्षा और सेवा करते थे, मानवके खाये जानेके लिए काटी जाती है। यह मत समझिए कि इस शर्मनाक स्थितिके लिए मुख्यरूपसे मुसलमान या अंग्रेज कौम जिम्मेदार है। हम हिन्दू ही मुख्य रूपसे इसके लिए जिम्मेदार हैं। गायें देशपर आर्थिक भार बनती जा रही हैं, इसलिए वे मारी ही जायेंगी। और यदि वे भारत में नहीं तो आस्ट्रेलियाके बूचड़खानोंमें भेज दी जायेंगी; आज वे वहाँ भेजी जा रही हैं।हिन्दू ही भारत में सबसे ज्यादा गायें पालते हैं। वे ही उन्हें कसाइयोंके हाथ बेचते हैं। यदि हम उस बाल-गोपाल भगवानके प्रति, जिसकी हम पूजा करते हैं अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहें तो हमें पशु-पालनके विज्ञानको ध्यानसे समझना चाहिए और इस बातका पूरा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा गोवंश संसारके पशुओंमें सबसे ज्यादा दूध देनेवाला और बोझ उठानेवाला बन जाये। यदि हम ऐसा करना चाहें तो हमें मूर्खतापूर्ण पूर्वग्रहों और अन्धविश्वासोंको चाहे वे कितने ही पुराने क्यों न हों, छोड़ना होगा। {{c|'''गोवर्धन'''<ref>७ नवम्बरको।</ref>}} मथुरासे हम गोवर्धन गये और रास्तेमें वृन्दावन। गांधीजीने गोवर्धनमें जो हालत देखी उसे देखकर उन्हें मथुरासे भी ज्यादा दुःख हुआ। गोवर्धन वे सुबह सात बजे पहुँचे। जब हम गोवर्धनकी खास सड़क से गुजरे हमने बैलों और भैंसोंकी एक जोड़ी देखी; दोनोंकी हड्डियाँ निकली हुई थीं। सभामें लोग ऐसे दिखाई दे रहे थे, मानों अभी अभी सोतेसे उठे हों। बच्चोंके कपड़े गन्दे थे और उनकी आँख-नाक वगैरा नहीं धुली हुई थी; न उनकी आँखोंमें कोई चमक थी और न उनके चेहरे पर बुद्धिकी तीक्ष्णता थी। इसके अलावा उन्हें इस बातसे और भी दुःख हुआ कि जिस स्त्रीने खादी के लिए थैली भेंट की उसने कहा यह जगह उन ब्राह्मणोंसे भरी है जो भिखारी हैं। इसलिए हम आपको कोई बड़ी थैली नहीं दे सकते। बातसे गांधीजीको बोलने की प्रेरणा मिली और उनके भाषणम उनका गहरा दुःख व्यक्त हुआ। उन्होंने थैलीका कोई उल्लेख नहीं किया और पैसेके लिए वैसी अपील भी नहीं की जो वे हर जगह हमेशा करते हैं। उन्होंने कहा: “आप मुझे जिस जगह ले आये हैं वहाँ आकर मुझे गहरा धक्का लगा है। मैं एक वैष्णव परिवारसे आता हूँ। अपने बचपन से ही मुझे यह सिखाया गया है कि श्रीकृष्णका जन्म स्थान और क्रीड़ाभूमि ऐसा पवित्र स्थल है जहाँ जानेसे व्यक्ति पाप धुल जाते हैं। जब मैं यहाँको गलियोंसे गुजरा तो मुझे ऐसी कोई अनुभूति नहीं हुई। कहा जाता है कि यह वही स्थान है, जहाँ कृष्णने अपनी छगुनीपर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था और अपने ग्वाले साथियों और उनके जानवरोंको मूसलाधार वर्षामें डूबने से बचा लिया था। परन्तु यहाँ मुझे मानवता और इसकी संगिनी गायके प्रति सेवा-भावनाका अभाव<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> ec18q9xeckboif51wq5xux0anf3eudc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०४ 250 196623 674481 669008 2026-08-26T17:25:35Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674481 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मिलता है। इसके बजाय मैं यहाँ जर्जर पशु और अपने सामने जीवनहीन और तेजहीन लोग तथा बच्चे देखता हूँ। मुझे अभी बताया गया कि यहाँके ब्राह्मण भिखारी हैं; मैं उन्हें वैसा ही देख भी रहा हूँ। प्राचीनकालमें ये ब्राह्मण ऐसे तो नहीं थे। उन ब्राह्मणोंने तो ईश्वरका साक्षात्कार किया था और वे सभी लोगोंको ईश्वरसे साक्षात्कार करनेका रहस्य बताते थे। वे अपने दिन किसीके दानपर नहीं काटते थे।जिन्हें वे देवी ज्ञानकी शिक्षा देते थे, वे लोग उनका भरण-पोषण करना अपना सौभाग्य समझते थे। कृष्णके जमाने में ब्राह्मण सच्चे धर्मके रक्षक थे। वे स्वयं अपने आपको ऊँचा नहीं मानते थे; बल्कि मानवताकी सेवा करनेके कारण उनका आदर सत्कार किया जाता था। मुझे गोवर्धन तीर्थमें इस तरहका कोई लक्षण नहीं दिखा।” गोवर्धन की समामें २० मिनटसे ज्यादा नहीं लगे, क्योंकि अपने गन्तव्य स्थल वृन्दावन पहुँचनेसे पहले हमें कई जगह जाना था। {{c|'''वृन्दावन'''<ref>७ नवम्बरको।</ref>}} वृन्दावन में हम लोग प्रेममहाविद्यालय में ठहरे जो वीर देशभक्त राजा महेन्द्र प्रतापकी दानशीलताका स्मारक है। फिर भी मैं इस संस्थाका या रामकृष्ण मिशन या गुरुकुलका वर्णन नहीं करूँगा; गांधीजी इन सभी जगहोंपर गये। आम सभामें राजा साहब के चित्रका गांधीजीने अनावरण किया और प्रेम महाविद्यालयके विद्यार्थियोंके सामने भाषण दिया। आचार्य जुगलकिशोरने जानबूझकर विद्यालयका वार्षिकोत्सव गांधीजीके दौरेके समयतक मुल्तवी कर दिया था। गांधीजीने अनावरणके मौकैसे लाभ उठाते हुए राजा महेन्द्र प्रतापको बड़ी प्रशंसा समर्पित की और उनके त्याग और देशभक्तिका दृष्टान्त सभी जमीदारोंके लिए अनुकरणीय बताया। विद्यार्थियोंसे उन्होंने कहा: “यदि आप लोग अपने पड़ोसियोंके लिए परिश्रम नहीं करते हैं तो आप राजा महेन्द्र प्रताप के इस अति उदार दानके योग्य नहीं है। यदि आपकी शिक्षा कुछ महत्व रखती है, तो उसकी सुगन्ध आपके चारों ओर फैलनी चाहिए। आपको रोज थोड़ा समय अपने आसपासके लोगोंकी सेवा करने में लगाना चाहिए। इसलिए आपको फावड़ा, झाड़ू और बाल्टी उठानेके लिए तैयार रहना चाहिए। आपको स्वेच्छासे इस पवित्र स्थलकी सफाई करनेवाले ही बन जाना चाहिए। आपकी शिक्षाका यही सबसे अच्छा अंग होगा; साहित्य लेख रटना नहीं। मुझे पता चला है कि वृन्दावन में ऐसी विधवाएँ बड़ी संख्या में हैं जो अधिकतर बंगालसे अपना शेष जीवन यहीं बितानेके विचारसे आई है। उनमें से जो गरीब हैं उन्हें सत्संगमें राधेश्यामके <ref>साधन-सूत्र में राधाश्याम है।</ref> पवित्र नामोच्चारके लिए थोड़ा-सा पैसा दिया जाता है। मैं यह आशा करता हूँ कि जो लोग इस दानके वितरण के लिए जिम्मेदार हैं वे इन विधवाओंको पवित्र नामोच्चार के बदले में ऐसा दान देनेके बजाय कुछ काम देंगे। व्यर्थ ही नाम दुहराने में तो कोई पुण्य नहीं है। {{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १४-११-१९२९|1em}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> brbgogomo6x2aqfk58wi3uz908bz97p पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०५ 250 196624 674487 669009 2026-08-26T17:40:09Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674487 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७४. आदर्श मानपत्र'''}}}} पिछले अंक में मैने मानपत्रोंकी भाषाके कुछ नमूने<ref>देखिए “राष्ट्रभाषा”, ७-११-१९२९।</ref> दिये थे। हरएक सभामें मुझे तीन-चार या इससे भी अधिक मानपत्र मिलते हैं। उनमें से बहुतेरोंमें मुझे कोई कला नहीं दीख पड़ती। अधिकतर मानपत्र तो केवल मेरी स्तुतिके विशेषणोंसे ही भरे रहते हैं। इसमें मेरी दृष्टिसे तो, विवेक और विचार दोनोंका अभाव है। एक मनुष्यके सामने उसके गुणोंका कथन करके हम न तो उसका सम्मान करते हैं और न उसे खुश ही रख सकते हैं। जिन विशेषणोंका प्रयोग मेरे लिए किया जाता है, उन सबको अगर मैं स्वीकार कर लूँ, तो मेरा बहुतेरा काम रुक जाये। ईश्वरने मुझे विनोद शक्ति दी है, उसके सहारे मैं ऐसे सब विशेषणोंको विनोदमें टाल देता हूँ और चूँकि मैं ‘गीताजी’ की शिक्षापर अमल करनेका प्रयत्न करता हूँ, स्तुति और निन्दाका मेरी जानमें मुझपर कोई असर नहीं पड़ सकता। परन्तु इस लेखमें में यह विचार करने नहीं बैठा हूँ कि मानपत्रका मुझपर क्या असर हो सकता है। यहाँ तो मैं पाठकोंको यही बताना चाहता हूँ कि आदर्श मानपत्र कैसा होना चाहिए, जिससे भविष्य में मानपत्र देनेवालोंको भी मानपत्र बनाने में थोड़ी सहायता मिल सके। निम्नलिखित नियमोंका पालन करनेसे आदर्श मानपत्र बन सकता है: १. मानपत्र की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि उसे हिन्दू-मुसलमान सब समझ सकें। २. मानपत्रके लिए चौखटेकी कोई आवश्यकता न समझी जाये। ३. जहाँतक हो सके मानपत्र हाथके बने कागजपर लिखा जाना चाहिए। प्रयत्न करनेसे ऐसे कागज मिल सकते हैं। भले ही हाथका बना हुआ कागज यन्त्रके बने कागजका मुकाबला न कर सके, फिर भी हमें हाथके इस हुनरको मिटाना नहीं चाहिए। ऐसे हुनर की हस्ती धनिकों और विचारशील लोगोंके देश-प्रेमपर निर्भर है। ४. मानपत्र हस्तलिखित ही होना चाहिए। अगर यह रिवाज चल जाये तो लेखन- कलाकी खूब उन्नति हो सकती है। ऐसा मानपत्र हर किसीके हाथसे न लिखा जाना चाहिए। सुन्दर अक्षर लिखनेकी कलामें निष्णात किसी कातिबके हाथों ही लिखाया जाना चाहिए। जनता में प्रचारके लिए मानपत्र छपवाने की आवश्यकता मानी जाये, यह दूसरी बात है। मेरे विचारमें तो इस तरह मानपत्र बांटने की कोई आवश्यकता नहीं है। मानपत्र अतिथिके आनेसे पहले ही सभाके समक्ष पढ़ दिया जाना चाहिए। ५. आजकल यह रिवाज-सा हो गया है कि संस्था या समाजके नामसे जो मानपत्र दिया जाता है, वह किसी एक ही आदमीका लिखा होता है; उसके बारेमें समाज या संस्था, किसीकी भी सम्मति नहीं ली जाती। हम लोग ऐसी बातोंमें उदासीन रहते हैं, इसलिए जो कुछ कहना या करना होता है, एक आदमी ही सबके लिए<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 4aez4z8tb4yuvszxqn4u8xtz0d3bcm9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०६ 250 196625 674495 669010 2026-08-26T17:51:31Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674495 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कह या कर लेता है। लेकिन सभ्य तरीका तो यह है कि जिनके नामसे मानपत्र दिया जाये, उन सब लोगोंको वह पहले बता दिया जाये। तभी उस मानपत्रका कुछ मूल्य हो सकता है। मसलन, जब विद्यार्थियोंके नामसे कोई मानपत्र दिया जाये तो विद्यार्थियोंकी एक समिति बननी चाहिए और फिर भी तैयार मानपत्र सब विद्यार्थियोंकी आम समामें पेश किया जाना चाहिए। ६. मानपत्र में स्तुत्यात्मक शब्द कमसे-कम रहें। हाँ, जिसको हम मानपत्र देना चाहते हैं, उसके विचारोंके अनुरूप क्या हुआ है और क्या करनेका निश्चय किया गया है, इसका मानपत्र में उल्लेख होना चाहिए। साथ ही मानपत्र देनेवाली संस्था और समाजका उसमें परिचय भी दिया जाना चाहिए। यदि उपरोक्त शर्तोंका पालन किया जायेगा तो मानपत्र जो आज नीरस और निरर्थक-से पाये जाते हैं, वे सब सरस और सार्थक बन जायेंगे। {{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' १४-११-१९२९|1em}} {{dhr}} {{c|{{larger|'''१७५. पत्र: जॉन एस॰ हॉलैंडको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<br>१४ नवम्बर, १९२९}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपके १८ अक्टूबरके पत्रके लिए धन्यवाद। मुझे अभी वह पुस्तक<ref>'''केस फॉर इंडिया।'''</ref> नहीं मिली हैं। जब मैं आश्रम वापस लौटूँगा तो मेरा खयाल है, वह मुझे वहाँ मिलेगी और जब कभी मुझे वक्त मिला, मैं उसे पढू़ँगा और देखूँगा कि इस विषय में क्या कर सकता हूँ। आम तौरपर ‘यंग इंडिया’ में पुस्तकोंकी समीक्षा नहीं दी जाती। मैं यह चाहता हूँ कि मैं इंग्लैंड आ सकूँ परन्तु अभी फिलहाल अन्तरात्मासे ऐसी आवाज नहीं आई है। मुझे आशा है कि आपका स्वास्थ्य आपके भारत आने में बाधक नहीं होगा।<ref>जॉन एस॰ हॉलैंड सोलह साल भारतमै रहे थे।</ref> {{right|'''हृदयसे आपका,'''}} {{left|'''जॉन एस॰ हॉलैंड महोदय'''<br>'''वरमिंघम (इंग्लैंड)'''}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५६८२) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}} {{smallrefs}}</noinclude> hgkrah32aqd93ikxgj2b77d998ltbwm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०७ 250 196626 674523 669011 2026-08-27T00:42:49Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger||'''१७६. पत्र: अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<Br>१४ नवम्बर, १९२९}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका पत्र मिला।<ref>इसमें लिखा था “...कुछ समय पहले कादियाँ, पंजाब में सिखों और हिन्दुओंने साथ मिलकर गायोंके बूचड़खानेको पूरी तरह सहस-नहस कर दिया...इस पाशविक घटनापर हिन्दू नेताओंने अपराधियोंकी भर्त्सना करनेके बजाय विरोधमें एक शब्द भी नहीं कहा। इन परिस्थितियों में मुसलमानोंको यह विश्वास कैसे दिलाया जा सकता है कि जब भारतको स्वराज्य या औपनिवेशिक स्वराज्य मिल जायेगा तो उनके अधिकार सुरक्षित रह सकेंगे (एस॰ एन॰ १५७४३)।</ref> आपने जिस घटनाका जिक्र किया है उसके बारेमें मुझे कुछ भी नहीं मालूम है। यदि यह मान लिया जाये कि कुछ सिखों और कुछ हिन्दुओंने दुर्व्यवहार किया तो भी इस कारणसे हिन्दू-मुस्लिम मित्रतामें बाधा क्यों पड़नी चाहिए; इसके आधारपर कुछ एक लोगोंके दोष सबके सिर मढ़ देना भी उचित नहीं है। {{right|हृदयसे आपका}} {{left|अली मुहम्मद ए॰ अलादीन महोदय, एम॰ ए॰<br>अलादीन बिल्डिंग्स<br>सिकन्दराबाद, दक्षिण}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७४४) की माइक्रोफिल्म से। {{dhr}} {{c|{{larger|'''१७७. पत्र: सी॰ डी॰ स्माइलीको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय बहन,}} आपका पत्र मिला। आप ८ और १५ दिसम्बर के बीच मुझे नागपुरके समीप आश्रम में मिल सकती हैं। अभी मेरे आने-जानेके [कार्यक्रम] में रद्दोबदल हो सकती है। पर पूरी सम्भावना इसी बात की है कि मैंने जो तारीखें बताई हैं उनके दौरान<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 5dxj50vq71t4o52xln7nbuc26vmqfox पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०८ 250 196627 674524 669012 2026-08-27T00:50:29Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मैं वर्धामें होऊँगा। उस वक्त साबरमती में पूछताछ करनेपर आपको पता चल जायेगा कि मैं वर्धा में हूँ या नहीं। {{right|हृदयसे आपका,}} {{left|कु॰ सी॰ डी॰ स्माइली<ref>एक अमेरिकी बहन जो मिशनके कामका अध्ययन करने के लिए भारत आई थीं।</ref><br>अमेरिकी मराठी मिशन<br>बाइकुला, बम्बई}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७४६) की माइक्रोफिल्म से। {{dhr}} {{c|{{larger|'''१७८. पत्र: अलवीको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय मित्र,}} मैंने आपकी पुस्तकके कुछ पृष्ठ पढ़े। जैसी आपने लिखी है, वैसी पुस्तकके बारेमें कुछ कह सकना मेरे क्षेत्रसे बाहरकी चीज है। मैं अंग्रेजी कविताका पारखी नहीं हूँ और मेरे पास इस तरहके आनन्द आस्वादन के लिए समय नहीं है। परन्तु मैंने आपकी पुस्तक के काफी पृष्ठ देखे जिनमें मुझे छापेकी और दूसरी बहुत-सी गलतियाँ दिखलाई दीं। जब मैं उन कुछ पृष्ठोंको पढ़ रहा था मेरे मनमें बरबस यह प्रश्न उठा कि आपने अपना कीमती वक्त ऐसी चीज लिखने में क्यों लगाया, जिसे कोई अंग्रेज अधिक आत्मविश्वास और अधिकारके साथ लिख सकता था; आपने उर्दूमें और उर्दू जाननेवाले अपने देशवासियोंके लिए कुछ लिखने में अपना समय क्यों नहीं लगाया। {{right|हृदयसे आपका}} {{left|प्रो॰ अलवी<br>मुस्लिम विश्वविद्यालय<br>अलीगढ़}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७६५) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|5em}} {{smallrefs}}</noinclude> p0va334wq812nb6sdl55lac5a43skzo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/२०९ 250 196628 674525 669013 2026-08-27T01:01:59Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 674525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७९. पत्र: अ॰ भा॰ च॰ संघ मसूलीपट्टमके सचिवको'''<ref>एस॰ एन॰ सूचीसे। पत्र रजिस्ट्रीसे भेजा गया था।</ref>}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय महोदय,}} मैं नकली आन्ध्र खादीके वितरकोंके बारेमें ‘यंग इंडिया’ में<ref>देखिए “टिप्पणियाँ”, २१-११-१९२९ का उपशीर्षक “खादीके खरीदारो होशियार”।</ref> टिप्पणी लिख रहा हूँ। आपके द्वारा भेजे हुए कागजात वापस लौटा रहा हूँ। {{right|हृदयसे आपका}} {{left|संलग्न:}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७६६) की माइक्रोफिल्म से। {{c|{{larger|'''१८०. पत्र: ए॰ फेनर ब्रॉकवेको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली*<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका समुद्री तार<ref>समुद्री तार इस प्रकार था: बेनको देखनेके बाद विश्वास हो गया है कि भारतसे बराबर के स्तरपर मिलने की हार्दिक इच्छा है। प्रार्थना है कि मित्रता आरम्भ करनेकी दिशामें आप सहयोग दें। सार्वजनिक माफीका प्रबन्ध कर रहा हूँ। “सस्नेह”।</ref> मिला। मैं जो-कुछ भी कर सकता था, सो मैंने किया है। यदि मैं बिलकुल विश्वासपर ही बातें स्वीकार न कर सकूँ तो आप से काम लें। मुझे इसका पूरा इत्मीनान दिला दिया जाना चाहिए कि सचमुच परिस्थिति जैसी प्रतीत होती है वैसी नहीं है। संसदकी दोनों बहसोंमें, बेनके<ref>बैजबुड बेन, लेबर सरकार में भारत के राज्य सचिव।</ref> भाषण में भी ऐसी कोई चीज नहीं जिससे मुझे यह आश्वासन मिले कि मैं विश्वासके साथ बेफिक्री महसूस करते हुए परिषद्से<ref>प्रस्तावित गोलमेज परिषद्।</ref> आ सकता हूँ। मैं इन्तजार करना और देखते रहना और प्रार्थना करते रहना ज्यादा पसन्द करूँगा; यह किसी ऐसे फन्देमें जा फँसनेसे जो चाहे वैसा सोचा न गया हो फिर भी शायद खतरनाक साबित हो, अच्छा रहेगा। मांटेग्यु सुधार आशानुकूल प्रमाणित नहीं हुए। उनसे गरीबोंकी मुसीबत कम नहीं हुई, उलटे उनपर बोझ स्पष्ट ही बहुत बढ़ गया है।सुधारोंके लिए जो कीमत चुकाई गई वह कुल मिलाकर बहुत ज्यादा सिद्ध हुई।औपनिवेशिक स्वराज्यके लिए, उसे चाहे कोई और नाम दे दिया जाये, मैं कोई कीमत नहीं देना चाहता। उधार देनेवालेको अपना प्राप्य<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> 0rhx5e33qvqssgk7vxjpr5mvltd68ho 674526 674525 2026-08-27T01:02:38Z Sanjana Chowdhury 5438 674526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''१७९. पत्र: अ॰ भा॰ च॰ संघ मसूलीपट्टमके सचिवको'''<ref>एस॰ एन॰ सूचीसे। पत्र रजिस्ट्रीसे भेजा गया था।</ref>}}}} {{right|मुकाम रायबरेली<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय महोदय,}} मैं नकली आन्ध्र खादीके वितरकोंके बारेमें ‘यंग इंडिया’ में<ref>देखिए “टिप्पणियाँ”, २१-११-१९२९ का उपशीर्षक “खादीके खरीदारो होशियार”।</ref> टिप्पणी लिख रहा हूँ। आपके द्वारा भेजे हुए कागजात वापस लौटा रहा हूँ। {{right|हृदयसे आपका}} {{left|संलग्न:}} अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७६६) की माइक्रोफिल्म से। {{c|{{larger|'''१८०. पत्र: ए॰ फेनर ब्रॉकवेको'''}}}} {{right|मुकाम रायबरेली*<br>१४ नवम्बर १९२९}} {{left|प्रिय मित्र,}} आपका समुद्री तार<ref>समुद्री तार इस प्रकार था: बेनको देखनेके बाद विश्वास हो गया है कि भारतसे बराबर के स्तरपर मिलने की हार्दिक इच्छा है। प्रार्थना है कि मित्रता आरम्भ करनेकी दिशामें आप सहयोग दें। सार्वजनिक माफीका प्रबन्ध कर रहा हूँ। “सस्नेह”।</ref> मिला। मैं जो-कुछ भी कर सकता था, सो मैंने किया है। यदि मैं बिलकुल विश्वासपर ही बातें स्वीकार न कर सकूँ तो आप से काम लें। मुझे इसका पूरा इत्मीनान दिला दिया जाना चाहिए कि सचमुच परिस्थिति जैसी प्रतीत होती है वैसी नहीं है। संसदकी दोनों बहसोंमें, बेनके<ref>बैजबुड बेन, लेबर सरकार में भारत के राज्य सचिव।</ref> भाषण में भी ऐसी कोई चीज नहीं जिससे मुझे यह आश्वासन मिले कि मैं विश्वासके साथ बेफिक्री महसूस करते हुए परिषद्से<ref>प्रस्तावित गोलमेज परिषद्।</ref> आ सकता हूँ। मैं इन्तजार करना और देखते रहना और प्रार्थना करते रहना ज्यादा पसन्द करूँगा; यह किसी ऐसे फन्देमें जा फँसनेसे जो चाहे वैसा सोचा न गया हो फिर भी शायद खतरनाक साबित हो, अच्छा रहेगा। मांटेग्यु सुधार आशानुकूल प्रमाणित नहीं हुए। उनसे गरीबोंकी मुसीबत कम नहीं हुई, उलटे उनपर बोझ स्पष्ट ही बहुत बढ़ गया है सुधारोंके लिए जो कीमत चुकाई गई वह कुल मिलाकर बहुत ज्यादा सिद्ध हुई।औपनिवेशिक स्वराज्यके लिए, उसे चाहे कोई और नाम दे दिया जाये, मैं कोई कीमत नहीं देना चाहता। उधार देनेवालेको अपना प्राप्य<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> kdoywx71y46pk3gfqe4nr5od82uq5ca विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६ 4 196812 674528 673880 2026-08-27T01:51:47Z Lado Shaw 6039 /* पुस्तक सूची */ 674528 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था। ##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)— # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 9t5hx7vcl15i5g16snnod2xgxb340cs 674543 674528 2026-08-27T05:05:37Z Vineet Kumar Tiwari 29 4901 /* पुस्तक सूची */ 674543 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०) # ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। * (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ग्यारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३८, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०९:५०, २० अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८९ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:४४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११५ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४९, २१ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ५७५ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६१२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या २३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३७ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ११:५२, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ४४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४४२ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१३, २२ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (पृष्ठ संख्या २३८ से २४४ तक को छोड़कर) (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १९८ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३८ से पृष्ठ संख्या २४४ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल ७ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०७:५७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##:पेज १३३-३३८ तक मैंने हस्ताक्षर किया था। अपने बीच में आ गए? [[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) ०८:४२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ##::@[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] जी, मैने संपादन इतिहास देखा तो पाया कि @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, ने पृष्ठ-परिधि में परिवर्तन किया था। ##::[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5_%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A8%E0%A5%AC&diff=next&oldid=672358 यहाँ जानकारी देखें] [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०९:४८, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १६:०४, २२ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या २७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २८ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) ०८:३४, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४६, २२ अगस्त २०२६ (UTC)॥]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 13.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेरह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५२ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०९:३५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९२ अंक)— # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 25.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड पचीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ५६ अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ११:२५, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६३० से पृष्ठ संख्या ६५१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २२ अंक)— [[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२२, २३ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २५ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक)—[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०६:२५, २५ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 12.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बारह]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १३ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६३ अंक)— [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:४२, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६५६ से पृष्ठ संख्या ६७४ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७६ अंक)—[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) ०१:५१, २७ अगस्त २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 30.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तीस]] ## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ९५ अंक)— [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १३:४७, २४ अगस्त २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६७१ से पृष्ठ संख्या ७०० (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १२० अंक)— [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०५:०५, २७ अगस्त २०२६ (UTC) == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}} == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है: :आयोजक- # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :निर्णायक- # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें। #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]]) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]]) ०७:३५, २४ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०३:१०, २२ अगस्त २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Manikantkmr|Manikantkmr]] ([[सदस्य वार्ता:Manikantkmr|वार्ता]]) १३:२७, २३ अगस्त २०२६ (UTC) == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] fknqniqx0d1xgxktcttm6u7iguky0d7 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५५ 250 196876 674421 669261 2026-08-26T15:27:27Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 674421 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||प्रस्तुत प्रश्न|४१७}}</noinclude>उनमें क्यों जायें? अब पाठशालाओंकी बात लीजिए। सरकारी पाठशालाओंको त्यागने से लड़के अशिक्षित रहेंगे, इस मान्यतामें में भयंकर आत्मवंचना पाता हूँ। अंग्रेज सरकारके आनेसे पहले लड़के अशिक्षित नहीं रहते थे। बात यह है कि अंग्रेजी सत्ताके भारतमें कायम होनेसे पूर्व प्राथमिक शिक्षा आजसे कहीं अधिक थी और उच्च प्रकारकी शिक्षा भी लोग काफी पाते थे। क्या आज हम इतने गिरे हुए हैं कि सरकारी शिक्षा बन्द कर देनेसे हमारी शिक्षा ही बन्द हो जायेगी? इस विद्यार्थीको जानना चाहिए कि आजकल भारतवर्ष में राष्ट्रीय विद्यापीठ मौजूद हैं और उनमें हजारों नवयुवक राष्ट्रीय शिक्षा पा रहे हैं। यदि लड़के तमाम सरकारी पाठशालाएँ छोड़ दें, तो भी उन्हें अशिक्षित रहनेकी आवश्यकता न पड़ेगी। हाँ, यह अवश्य है कि उन्हें गरीबोंके खून से सने हुए पैसोंसे निर्मित शानदार मकान पाठशालाके लिए नहीं मिलेंगे और न स्वतन्त्रता-नाशक शिक्षा मिलेगी। अदालतोंके बहिष्कारके सम्बन्धमें यह स्वीकार करना चाहिए कि यह कठिन काम है। आज उनके प्रति जो मोह है, वह देशहितका घातक है। जहाँतक हो सकता है, इस मोहको हटाने की कोशिश करके ही हमें सन्तुष्ट हो जाना पड़ता है। किन्तु यह भूलना नहीं चाहिए कि अदालतें प्रत्येक सल्तनतका प्रधान आश्रय स्थान होती हैं। इस कारण जितने वकील इन्हें छोड़ सकें, जितने वादी और प्रतिवादी इन्हें छोड़ें, उतना लाभ ही है। हमें तो अदालतोंकी प्रतिष्ठाको प्रतिदिन कम ही करना चाहिए। अन्तमें यह जानना चाहिए कि प्रत्येक संस्था व मनुष्य अपनी प्रतिष्ठापर ही निर्भर रहता है। विधानसभा, पाठशाला, अदालत इत्यादिसे सरकार प्रतिष्ठा पाती है। बहिष्कारसे प्रतिष्ठा टूटती है। अतः उसे प्रजाके सम्मुख रखनेसे सरकारकी प्रतिष्ठा कम होगी। यह सर्वथा स्वाभाविक है। केवल बन्दूकके बलसे कोई सरकार कायम नहीं रह सकेगी। सत्याग्रहसे बारडोलीके लोगोंने कमाया कम और गँवाया अधिक, यह कहना यथार्थ नहीं है। वे स्वयं जानते हैं कि सत्याग्रहसे उन्हें अत्यधिक लाभ पहुँचा है। यदि यह प्रत्यक्ष देखना हो तो बारडोली जाकर आज कोई भी देख सकता है। हाँ, स्वराज्य पानेके लिए अधिक कष्ट उठाना होगा, इसमें न दुःखकी बात है, न आश्चर्यकी। {{left|'''हिन्दी नवजीवन,''' १६-१-१९३०|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}} {{left|४२-२७|1em}}</noinclude> kpz4nmcic6n4b13nfayyy2fw9dokvo9 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५६ 250 196877 674424 669262 2026-08-26T15:36:54Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 674424 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३८४. तार: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|साबरमती<br>१६ जनवरी १९३०}} {{left|जवाहरलाल नेहरू<br>इलाहाबाद}} तार मिले। आँकड़ोंकी फिरसे जाँच की गई। सही पाये गये। जरूरत हो तो छोटा-सा प्रस्ताव जोड़ा जा सकता है। {{right|'''गांधी'''}} {{left|'''[अंग्रेजीसे]'''|1em}} अ॰ भा॰ कां॰ क॰ फाइल सं॰ १६-ए, १९३० सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय {{dhr}} {{c|{{larger|'''३८५. तार: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|साबरमती<br>१६ जनवरी, १९३०}} {{left|जवाहरलाल नेहरू<br>इलाहाबाद}} पत्र तार भेजे जाने के बाद मिला। जो प्रस्ताव तैयार किया है वह बिलकुल गैरजरूरी है। संशोधित घोषणा घुमा दी जानी चाहिए। तटकरकी औसत अमेरिका और जर्मनीकी ओरसे क्रमश: चौबीस और आठ गुना कम होनी चाहिए। {{right|'''गांधी'''}} {{left|'''[अंग्रेजीसे]'''}} अ॰ भा॰ कां॰ क॰ फाइल सं॰ १६-ए, १९३० सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय<noinclude></noinclude> p112x1ils9ikcvb4nppvr9tzznfnyg8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५७ 250 196878 674428 669263 2026-08-26T15:49:29Z Priyanka1114 6799 /* अशोधित */ 674428 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Priyanka1114" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८६. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}} {{right|१६ जनवरी १९३०}} {{left|भाई घनश्यामदासजी,}} आपके दोनों पत्र मीले हैं। आज कल में इतना काममें पड़ा हुं कुछ समय ही पत्रोत्तर देनेका नहीं रहता है। व्याख्यान पढ़कर अभिप्राय पीछे भेजुंगा।मालवीजी महाराजसे मेरी भी बात हो गई थी। यदि वे दूसरे दल बालोंको सहिष्णुता सीखा सकेंगे तो बहोत काम सुधर सकता है। इस बारेमें जो प्रयत्न कर सकते हैं कीजीये। आपकी प्रवृत्तिके बारेमें मीलनेसे बातें करेंगे। केशुके बारेमें मैं कुछ भी चिंता नहि करता हुं।। {{right|'''आपका,'''<Br>{{larger|'''मोहनदास'''}}}} सी॰ डब्ल्यू॰ ६१८१ से। सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला {{dhr}} {{c|{{larger|'''३८७. तार: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|अहमदाबाद<br>१७ जनवरी १९३०}} {{left|जवाहरलाल नेहरू<br>इलाहाबाद}} अभी सुबह तीन बजे आयात-कर मुद्रासे सम्बन्धित अनुच्छेद पढ़ रहा हूँ।अच्छा नहीं लग रहा है। यदि ज्ञापन अखबारोंको भेज नहीं दिया गया हैं तो सम्बन्धित अनुच्छेदको इस तरह कर दे “आयात कर और मुद्राके बारेमें बरती नई चालाकीसे किसान वर्गपर और ज्यादा बोझ पड़ गया है। हमारे आयातका अधिकांश भाग अंग्रेजों द्वारा तैयार किया हुआ माल होता है।अंग्रेजों द्वारा तैयार किये गये मालके प्रति सीमा और वहाँसे उगाहे गये कम करनेके लिए रखने के शुल्क में राजस्व नहीं परन्तु लिए होता है । मुद्रा पक्षपात साफ दिखाई देता का इस्तेमाल आम लोगोंका अत्यन्त खर्चीले प्रशासनको विनिमयकी औसतको ठीक है । बोझ कायम बैठाने में Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 8vm3kinrgu5solmos7ehi82d7wgt9ds 674430 674428 2026-08-26T16:01:01Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 674430 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''३८६. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}} {{right|१६ जनवरी १९३०}} {{left|भाई घनश्यामदासजी,}} आपके दोनों पत्र मीले हैं। आज कल में इतना काममें पड़ा हुं कुछ समय ही पत्रोत्तर देनेका नहीं रहता है। व्याख्यान पढ़कर अभिप्राय पीछे भेजुंगा।मालवीजी महाराजसे मेरी भी बात हो गई थी। यदि वे दूसरे दल बालोंको सहिष्णुता सीखा सकेंगे तो बहोत काम सुधर सकता है। इस बारेमें जो प्रयत्न कर सकते हैं कीजीये। आपकी प्रवृत्तिके बारेमें मीलनेसे बातें करेंगे। केशुके बारेमें मैं कुछ भी चिंता नहि करता हुं।। {{right|'''आपका,'''<Br>{{larger|'''मोहनदास'''}}}} सी॰ डब्ल्यू॰ ६१८१ से। सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला {{dhr}} {{c|{{larger|'''३८७. तार: जवाहरलाल नेहरूको'''}}}} {{right|अहमदाबाद<br>१७ जनवरी १९३०}} {{left|जवाहरलाल नेहरू<br>इलाहाबाद}} अभी सुबह तीन बजे आयात-कर मुद्रासे सम्बन्धित अनुच्छेद पढ़ रहा हूँ।अच्छा नहीं लग रहा है। यदि ज्ञापन अखबारोंको भेज नहीं दिया गया हैं तो सम्बन्धित अनुच्छेदको इस तरह कर दे “आयात कर और मुद्राके बारेमें बरती नई चालाकीसे किसान वर्गपर और ज्यादा बोझ पड़ गया है। हमारे आयातका अधिकांश भाग अंग्रेजों द्वारा तैयार किया हुआ माल होता है।अंग्रेजों द्वारा तैयार किये गये मालके प्रति सीमा शुल्क में पक्षपात साफ दिखाई देता हैं। और वहाँसे उगाहे गये राजस्व का इस्तेमाल आम लोगोंका कम करनेके लिए नहीं परन्तु अत्यन्त खर्चीले प्रशासनको कायम रखने के लिए होता है। मुद्रा विनिमयकी औसतको ठीक बैठाने में<noinclude></noinclude> sv6f19cfix7qwum7i45vjjzxxhrdo98 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५८ 250 196879 674437 669264 2026-08-26T16:13:38Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 674437 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और भी स्वेच्छाचारितासे काम लिया गया है―जिसका परिणाम यह हुआ है कि लाखोंकी मुद्रा देशसे बाहर चली गई है<ref>अन्तिम ज्ञापनमें इसे बदल दिया गया था। देखिए “२६ को यह याद रखिए”, २३-१-१९३०।</ref>।” {{right|'''गांधी'''}} {{left|[अंग्रेजीसे]|1em}} अ॰ भा॰ कां॰ क॰, फाइल सं॰ १६-ए, १९३० सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय {{dhr}} {{c|{{x-larger|'''३८८. भाषण: छात्रालय में रहनेवाले छात्रोंके सम्मेलन, साबरमती में'''<ref>छात्रोंके लिए आदर्श छात्रावासके बारेमें गांधीजीका क्या दृष्टिकोण है, इसकी जानकारीके लिए छात्रावासके प्रकों (सुपरिंटेंटस) के निवेदनपर यह भाषण दिया गया था।</ref>'''}}}} {{right|१७ जनवरी, १९३०}} छात्रालयकी मेरी कल्पना यह है कि छात्रालय एक कुटम्बकी तरह हो, उसमें रहनेवाले गृहपति और छात्र कुटुम्बियोंकी तरह रहते हों, गृहपति छात्रोंके माता और पिता दोनोंके स्थानकी पूर्ति करें। यदि गृहपतिके साथ उसकी पत्नी भी हो, तो पति-पत्नी दोनों मिलकर माता-पिताकी तरह बरतें। आज तो हमारे यहाँ स्थिति करुणाजनक हो रही है। गृहपति ब्रह्मचर्य का पालन न करता हो, तो उसकी पत्नी छात्रालय में माँका स्थान हरगिज नहीं ले सकती। उसे शायद पतिका छात्रालय में काम करना ही पसन्द न आये और शायद आये तो इसीलिए कि बदले में रुपये मिलते हैं। वह छात्रालय में से थोड़ा घी चुरा लाये, तो भी पत्नी खुश होगी कि चलो, मेरे बच्चोंको ज्यादा थी खानेको मिलेगा। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि गृहपति ऐसे ही होते हैं, बल्कि यह है कि आज हमारे सारे कामकाज इसी तरहकी अस्त-व्यस्त हालत में हैं। मेरी कल्पना छात्रालय आज गुजरात में या भारतमें विरल ही होंगे। काफी हों तो मुझे उनके बारेमें मालूम नहीं है। गुजरात के बाहर तो हिन्दुस्तानमें ये संस्थाएँ वैसे भी बहुत कम है। छात्रालयकी संस्था गुजरातकी खास देन है। इसके कई कारण हैं। गुजरात व्यापारियोंका देश है जो व्यापारसे धन कमाते हैं, उन्हें शौक होता है कि अपनी जातिके बच्चोंके लिए छात्रालय खोलें। ‘छात्रालय’ जैसा बड़ा नाम तो बादमें पड़ा। उन बेचारोंने तो ‘बोर्डिग’ ही कहा था और लड़कोंके खाने-पीने का प्रबन्ध कर देनेके सिवा उनका और कोई विचार नहीं था। बादमें जब इन बोर्डिगों में संस्कारवान गृहपति आये, तब उन्होंने इनमें भावनाका समावेश प्रारम्भ किया। मैं स्वयं विद्यालयसे छात्रालयको ज्यादा महत्व देता हूँ। ऐसी बहुत-सी बातें, जो स्कूलमें नहीं सीखी जा सकतीं, छात्रालय में सीखी जा सकती हैं। शालाओंमें थोड़ा-बहुत बौद्धिक शिक्षण भले ही दिया जाता हो, किन्तु वहाँ जो-कुछ पढ़ाया जाता है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> r0uj17disruuzceeopx8vlzrp6m9f0u 674438 674437 2026-08-26T16:14:05Z Priyanka1114 6799 674438 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और भी स्वेच्छाचारितासे काम लिया गया है―जिसका परिणाम यह हुआ है कि लाखोंकी मुद्रा देशसे बाहर चली गई है<ref>अन्तिम ज्ञापनमें इसे बदल दिया गया था। देखिए “२६ को यह याद रखिए”, २३-१-१९३०।</ref>।” {{right|'''गांधी'''}} {{left|[अंग्रेजीसे]|1em}} अ॰ भा॰ कां॰ क॰, फाइल सं॰ १६-ए, १९३० सौजन्य: नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय {{dhr}} {{c|{{x-larger|'''३८८. भाषण: छात्रालय में रहनेवाले छात्रोंके सम्मेलन, साबरमती में'''<ref>छात्रोंके लिए आदर्श छात्रावासके बारेमें गांधीजीका क्या दृष्टिकोण है, इसकी जानकारीके लिए छात्रावासके प्रकों (सुपरिंटेंटस) के निवेदनपर यह भाषण दिया गया था।</ref>'''}}}} {{right|१७ जनवरी, १९३०}} छात्रालयकी मेरी कल्पना यह है कि छात्रालय एक कुटम्बकी तरह हो, उसमें रहनेवाले गृहपति और छात्र कुटुम्बियोंकी तरह रहते हों, गृहपति छात्रोंके माता और पिता दोनोंके स्थानकी पूर्ति करें। यदि गृहपतिके साथ उसकी पत्नी भी हो, तो पति-पत्नी दोनों मिलकर माता-पिताकी तरह बरतें। आज तो हमारे यहाँ स्थिति करुणाजनक हो रही है। गृहपति ब्रह्मचर्य का पालन न करता हो, तो उसकी पत्नी छात्रालय में माँका स्थान हरगिज नहीं ले सकती। उसे शायद पतिका छात्रालय में काम करना ही पसन्द न आये और शायद आये तो इसीलिए कि बदले में रुपये मिलते हैं। वह छात्रालय में से थोड़ा घी चुरा लाये, तो भी पत्नी खुश होगी कि चलो, मेरे बच्चोंको ज्यादा थी खानेको मिलेगा। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि गृहपति ऐसे ही होते हैं, बल्कि यह है कि आज हमारे सारे कामकाज इसी तरहकी अस्त-व्यस्त हालत में हैं। मेरी कल्पना छात्रालय आज गुजरात में या भारतमें विरल ही होंगे। काफी हों तो मुझे उनके बारेमें मालूम नहीं है। गुजरात के बाहर तो हिन्दुस्तानमें ये संस्थाएँ वैसे भी बहुत कम है। छात्रालयकी संस्था गुजरातकी खास देन है। इसके कई कारण हैं। गुजरात व्यापारियोंका देश है जो व्यापारसे धन कमाते हैं, उन्हें शौक होता है कि अपनी जातिके बच्चोंके लिए छात्रालय खोलें। ‘छात्रालय’ जैसा बड़ा नाम तो बादमें पड़ा। उन बेचारोंने तो ‘बोर्डिग’ ही कहा था और लड़कोंके खाने-पीने का प्रबन्ध कर देनेके सिवा उनका और कोई विचार नहीं था। बादमें जब इन बोर्डिगों में संस्कारवान गृहपति आये, तब उन्होंने इनमें भावनाका समावेश प्रारम्भ किया। मैं स्वयं विद्यालयसे छात्रालयको ज्यादा महत्व देता हूँ। ऐसी बहुत-सी बातें, जो स्कूलमें नहीं सीखी जा सकतीं, छात्रालय में सीखी जा सकती हैं। शालाओंमें थोड़ा-बहुत बौद्धिक शिक्षण भले ही 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रहते। अब हमें परिस्थितिको देखकर यह सोच लेना है कि उन्हें किस तरह सुधारा जा सकता है। यदि हम इरादा कर लें तो इन संस्थाओंकी शक्ल बहुत कुछ बदल सकते हैं। जो बात स्कूलोंमें नहीं की जा सकती, वह छात्रालयों में सम्भव है। गृहपति सिर्फ हिसाब रखनेवाला ही न रहे, बल्कि इसकी भी जाँच करे कि विद्यार्थी स्कूलमें जाकर क्या सीखता है। यह विद्यार्थीको पुत्र या अपना शिष्य मानकर उसके विषयमें सचिन्त बना रहे। आज तो बहुत-सी जगहोंका ऐसा हाल है कि गृहपतिको यह भी पता नहीं रहता कि विद्यार्थी क्या खाते-पीते हैं। छात्रालयोंमें जो एक गम्भीर अराजकता फैली हुई है, उसकी तरफ मैं खास तौरपर ध्यान खींचना चाहता हूँ। इस चीजकी हमेशा उपेक्षा की जाती है। यह समझकर कि हमारे छात्रालयकी बदनामी होगी, गृहपति लोग उसे जाहिर करते शरमाते हैं और छिपाते हैं। वे सोचते हैं कि हमारे विद्यार्थी जो बुरा काम करते हैं यह खुल जायेगा, अत: वे माता-पिताको भी इसकी खबर नहीं देते। किन्तु इस तरह भी बात नहीं छिपती गृहपति अपने मनमें यह समझते होंगे कि कोई नहीं जानता, किन्तु बदबू तो देखते-देखते फैल जाती है। अनुभवी गृहपति समझ गये होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। गृहपतियोंको मैं इस बारेमें चेतावनी देता हूँ। ये सावधान रहें, अपना धर्म अच्छी तरह समझें। जो छात्रालयको शुद्ध न रख सकें, वे इस्तीफा देकर इस कामसे अलग हो जायें। यदि छात्रालय में रहकर लड़के निकम्मे बनें, उनमें दृढ़ता न रहे, उनके विचार तितर-बितर हो जायें, बुद्धिके स्रोत सूख जायें, तो इस सबसे गृहपतिकी अयोग्यता सूचित होती है। मैं जो कहता हूँ उसकी बहुत-सी मिसालें दे सकता हूँ। मेरे पास विद्यार्थियोंके ढेरों पत्र आते हैं। बहुत-से गुमनाम होते हैं और उन्हें मैं रद्दीकी टोकरीमें डाल देता हूँ, किन्तु उनका सार समझ लेता हूँ। बहुत-से भोले-भाले विद्यार्थी अपना नाम-पता देकर मुझसे उपाय पूछते हैं। जब कुटेव नई-नई पड़ती है, तब गृहपतिकी तरफसे उन्हें उसे छोड़ने में सहारा नहीं मिलता, उलटे कभी-कभी उस दिशामें उत्तेजन मिलता है। फिर जब उनकी आँखें खुलती हैं, तब उनकी दृढ़ता नष्ट हो चुकी होती है, मनपर काबू नहीं रह जाता और मुझ-जैसा कोई व्यक्ति सलाह दे तो उसपर चलनेकी शक्ति नहीं रह जाती। गृहपतिका काम करनेमें समर्थ व्यक्ति वेतन बहुत माँगते हैं, वे कहते हैं कि हमें अपनी विधवा बहनोंकी परवरिश करनी पड़ती है, लड़के-लड़कियोंके शादी-व्याहमें<noinclude></noinclude> 9r0wauqjrw6nx5r008wl5waon7ktkui पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४६० 250 196881 674527 669266 2026-08-27T01:12:57Z Priyanka1114 6799 /* शोधित */ 674527 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|४२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>खर्च करना पड़ता है। इस तरहके गृहपति योग्य हों, तो भी हमें उन्हें छोड़ना पड़ेगा। कुछ गृहपति ऐसे भी होते हैं, जो यह मानते हैं कि हमारा तो काम ही यह है। उन्हें दूसरा काम पसन्द ही नहीं आता। कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं, जो गुजारेके योग्य लेकर काम करनेको तैयार रहते हैं। मैं जो कहता हूँ उससे स्पष्ट होगा कि गृहपतिको लगभग निर्दोष पुरुष होना चाहिए। जो व्यक्ति विद्यार्थियोंपर असर डाल सके, उनके मन में जगह बना सके, वही गृहपति बन सकता है। ऐसा गृहपति न मिले तो लड़कोंको इकट्ठा करना भयंकर है। यह तो गृहपतियोंकी बात हुई। अब छात्रोंसे दो शब्द छात्र अज्ञानवश गृहपतिको नौकर मान लें और यह सोचने लगे कि उनका सब काम नौकर ही करेंगे और वे स्वयं हाथसे कुछ भी नहीं करेंगे, तो यह उनकी भूल होगी। छात्रोंको जानना चाहिए कि छात्रालय उनके ऐश-आरामके लिए नहीं है। वे यह न सोचें कि छात्रालयको वे रुपया देते हैं। वे जो-कुछ देते हैं, उससे ही खर्च पूरा नहीं हो जाता। छात्रालय खोलनेवाले सेठ गलती करके यह मान लेते हैं कि विद्यार्थी लाड़-प्यारसे रखने से अच्छे बनते हैं और उन्हें आराम देना धर्म है। इस समझके कारण वे विद्यार्थियोंको सहूलियतें देते हैं, किन्तु इससे अकसर धर्मके बजाय पाप पल्ले पड़ता है। इससे विद्यार्थी उलटे बिगड़ते हैं और परावलम्बी बनते हैं। जो विद्यार्थी बुद्धिसे काम लेता है, यह यह हिसाब लगा लेगा कि छात्रालयके जिस मकान में वह रहता है, उसका किराया कितना है, नौकर-चाकरों और गृहपतिकी तनख्वाह कितनी है? यह सब छात्रोंसे नहीं लिया जाता। ये तो सिर्फ खानेका खर्च देते हैं। बहुत-से छात्रालयों में तो खाना, कपड़ा, पुस्तकें वगैरा भी मुफ्त दी जाती है। दान देनेवाले लोग यह लिखा लेते हों कि पढ़-लिखकर ये लड़के देशसेवा करेंगे तो भी ठीक है, परन्तु वे इतने उदार होते हैं कि ऐसा भी कुछ नहीं करते। परन्तु छात्रोंको समझ लेना चाहिए कि वे जो खाते हैं उसका बदला नहीं देंगे, तो कहा जायेगा कि चोरीका धन खाते हैं। बचपन में मैंने अखा भगतकी कविता पढ़ी थी: '''‘काचोपारो खावो अन्न, तेवुं छे चोरीनुं धन।’''' चोरीका माल खानेसे छात्र वीर नहीं बनते, दीन बनते हैं। तब छात्र यह निश्चय करें कि हम भीखका अन्न नहीं खायेंगे। वे छात्रालयकी सुविधाओंका फायदा भले ही उठायें, किन्तु इस सम्मेलनसे लौटकर वे तत्काल गृहपतिसे सारे नौकरोंको विदा कर देनेकी प्रार्थना करें। या नौकरोंपर दयाका भाव हो तो उनकी नौकरी रहने दें, किन्तु अपना सारा काम तो स्वयं ही करें। पाखाना साफ करनेतक सारे काम अपने ही हाथोंसे कर लेनेका निश्चय करें। तभी आगे चलकर वे अच्छे गृहस्थ बन सकेंगे, देशकी सेवा कर सकेंगे। आज तो हमारे लोग ईमानदारीके धन्धेसे अपना स्त्रीका या माँ का गुजारा करने की भी ताकत नहीं रखते। यदि कोई कहीं नौकरी मिलनेपर यह घमण्ड करता हो कि मैं ईमानदारीका धन्धा करता हूँ, तो उसे यह विचार भी करना चाहिए कि मिलमें गुमास्तेका काम १. चोरीका धन कच्चा पारा खानेके समान है।<noinclude></noinclude> t06c7mvfrfa3itb67mk4hxt0y63nwnm पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९४ 250 197014 674485 671847 2026-08-26T17:36:20Z Richmishra14 6772 674485 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''सांकेतिका'''}}}} {{Multicol}} {{c|{{larger|'''अ'''}}}} {{outdent|अंग्रेजी, —भाषा भण्डार, १२२}} {{outdent|अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, १०८ पा॰ टि॰, १९१, ३३०, ३३३, ३३९, ३४६, ३४७, ३५१, ३५६, ३५८, ३६२, ३६८, ३८७}} {{outdent|अखिल भारतीय चरखा—संघ, ४०, ४८, ७२, १००, ११५, १७१, १८३, १८५ पा० टि०, २०२, २०७, २०९, २३१, २५१, २५६, २७०, २७७, २८९, ३१२, ३२६, ३३०, ३४७, ४१५, ४७४}} {{outdent|अखिल भारतीय दलित वर्ग—सम्मेलन, ३२२}} {{outdent|अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, ३१० पा० टि०, ४०७}} {{outdent|अग्रवाल, खेमराज, २९२}} {{outdent|अग्रवाल, मूलचन्द, २९}} {{outdent|अग्रवाल, शंकरलाल, २४७}} {{outdent|अछूत, देखिए, अस्पृश्य}} {{outdent|अजमलखाँ, हकीम, ८८}} {{outdent|अणे, माधव श्रीहरि, ८६ पा० टि०, ३५०}} {{outdent|अनसूयाबहन, १९९, २००, २४१}} {{outdent|अन्तरात्माकी आवाज, का अर्थ देवी या आसुरी सन्देश, ४९०; —को सुनना और मानना सम्भव, ४३५; या षड् रिपु, २४६}} {{outdent|अन्तर्यामी, ४९६}} {{outdent|अन्त्यज, ९२, २३६, २६७, ३०८}} {{outdent|अन्सारी, डा९ मु० अ०, ४८, ८६ पा० टि०, ११९, १२२, ३२०, ३३६ पा० टि०, ३५४ पा० टि०, ३७०, ४९५}} {{outdent|अपराध, और दण्ड, ४७३}} {{Multicol-break}} {{outdent|अप्फेल, डा० एल्फ्रेड, ४८५}} {{outdent|अब्दुस्समद, ४४}} {{outdent|अब्बासी, मुहम्मद आदिल, १६}} {{outdent|अभय आश्रम, ७८, ४२८}} {{outdent|अभय, पण्डित देवशर्मा, ४४, ९४, १९६}} {{outdent|अमरसिंह, ३३६ पा० टि०}} {{outdent|अमावाकी रानी, ४७}} {{outdent|अयोध्याप्रसाद, २९८}} {{outdent|अय्यर, पी०, ८६ पा० टि०}} {{outdent|अय्यर, पी० रंगनाथ, १४, ४०, ४१}} {{outdent|अर्जुन, १४०, २३८}} {{outdent|अर्जुन, ४२८}} {{outdent|अर्थशास्त्र, —भारतीय, पाठ्यक्रम, ८-९}} {{outdent|अलवी, १७०}} {{outdent|अलादीन, अली मुहम्मद ए०, १६९}} {{outdent|अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, १०७, १६३}} {{outdent|अलीबन्धु, ४०८}} {{outdent|असहयोग, ११४, १६०, २१३, २३१, २३४, २८१, ३४४, ३८४; -और सत्याग्रह, २५; —उचित शस्त्र, ६१, देखिए बहिष्कार भी}} {{outdent|असहयोग आन्दोलन (१९२१ का), १३७ पा० टि०, २१३; —और लाहौर कांग्रेस द्वारा उसका संकल्पित रूप, ३७१}} {{outdent|अस्पृश्य, ४२, ७५, ७७, ८१, ११४, १६४, २५३, ३२२, ४०८, ४११; —[ों] के लिए मन्दिरोंका खोला जाना, २३३-३४, ३५८-९, ४८९}} {{outdent|अस्पृश्यता, ४०, ६३, ७७, ८१ पा० टि०, ८९, १४२, २२२, २३३, २५३, २६८, २७०, ३०१, ३२२, ३२५, ३५८, ३८३; —रूपी डाकिनीकी आखिरी साँस, २३६—७}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> o19ulnwgqu09y0wvv22ln5kwtrghjyz 674536 674485 2026-08-27T04:31:18Z Richmishra14 6772 /* शोधित */ 674536 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{x-larger|'''सांकेतिका'''}}}} {{c|{{larger|'''अ'''}}}} {{Multicol}} {{outdent|अंग्रेजी, -भाषा भण्डार, १२२}} {{outdent|अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, १०८ पा० टि०, १९१, ३३०, ३३३, ३३९, ३४६, ३४७, ३५१, ३५६, ३५८, ३६२, ३६८, ३८७}} {{outdent|अखिल भारतीय चरखा-संघ, ४०, ४८, ७२, १००, ११५, १७१, १८३, १८५ पा० टि०, २०२, २०७, २०९, २३१, २५१, २५६, २७०, २७७, २८९, ३१२, ३२६, ३३०, ३४७, ४१५, ४७४}} {{outdent|अखिल भारतीय दलित वर्ग-सम्मेलन, ३२२}} {{outdent|अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, ३१० पा० टि०, ४०७}} 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/></noinclude>{{C|{{larger|'''२५१. अपील : भारतके नौजवानोंसे'''}}}} {{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}} पण्डित जवाहरलाल नेहरूकी गिरफ्तारीकी उम्मीद तो मैं हर घड़ी कर रहा था। सरकार इस नौजवान अध्यक्ष और आदर्श देशभक्तकी उपेक्षा कर दे, यह असम्भव था। यदि मैं अपने देशको पहचानता हूँ तो कहूँगा कि अगर दूसरे नेताओंकी गिरफ्तारी पर जनताने दसगुना जोश दिखाया तो सरकारने जो यह चरम कदम उठाया है, उसके बाद वह सौगुना ज्यादा जोश दिखायेगी। अपेक्षित यह है कि इस गिरफ्तारीका मूल्य सरकारको अपने अस्तित्वसे चुकाना पड़े। क्या देशके नौजवान जवाहरलाल नेहरूकी आशाओंको पूरा करेंगे, क्या वे स्कूलों और कालेजोंका त्याग करके केवल स्वराज्य प्राप्ति के लिए काम करेंगे? इसमें सन्देह नहीं कि सारे भारतमें हड़ताल होगी, यद्यपि कठोर कर्मकी इस घड़ीमें उसका कोई मतलब नहीं है। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३० {{C|{{larger|'''२५२. पत्र : मोतीलाल नेहरूको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|१४ अप्रैल, १९३०}} प्रिय मोतीलालजी, तो जवाहरको अब छः महीने तक विश्राम करना है। उसने 'ट्रोजन' सैनिकोंकी तरह [अनथक और बहुत बहादुरीसे] काम किया है। उसको इस विश्रामकी आवश्यकता भी थी। यदि घटना क्रम वर्तमान गतिसे ही चलता रहा तो उसे छः महीनेका भी विश्राम नहीं मिलेगा। आपने उस दिन जम्बुसरको जैसा देखा था, आज वह वैसा ही नहीं है। सभी गाँव उठ खड़े हुए हैं। लोग ऐसा शानदार उत्साह दिखायेंगे, इसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी। कई गाँवोंमें तो सरकारी नौकरोंको अपने कामके लिए एक भी आदमी नहीं मिल रहा है। हमारे चुने हुए कुछ आदमियोंकी गिरफ्तारी से जनताके प्रतिरोधमें तीव्रता ही आई है। लेकिन इस आशावादिताकी बात यहीं छोड़ता हूँ। कल क्या होगा, यह तो कोई पहुँचा हुआ आदमी ही कह सकता है। बम्बईसे <small>१. मोतीलालजी जवाहरलाल नेहरू के साथ मार्च १९३० के अन्तिम दिनोंमें गांधी से मिलने जम्बुसर गये थे। तब गांधीजी दांडीकी ओर कूच कर रहे थे।<small><noinclude></noinclude> qcdcks2eczrmgniy02v7j0lv6arbe7w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१२ 250 197355 674375 674160 2026-08-26T12:21:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674375 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>मिलनेवाले समाचार भी अत्यन्त उत्साहवर्द्धक है। 'यंग इंडिया' तो आप पढ़ते ही होंगे। आपका स्वास्थ्य कैसा है? {{Right|आपका,}} {{Right|मो० क० गांधी}} अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८५) से। सौजन्य : इलाहाबाद नगरपालिका संग्रहालय {{C|{{larger|'''२५३. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|[१४ अप्रैल, १९३०]}} चि० महादेव, तुम्हारा पत्र मिला। मैंने बुधवारको वेजलपुरमें तुम सबसे मिलनेकी व्यवस्था की है। मैं जहाँ भी होऊँगा वहाँसे वेजलपुर आऊँगा। मैं वहां सवेरे ही पहुँचनेकी तजवीज करूँगा। हमारा सदर मुकाम अब बहुत करके कराडी रहेगा। यदि स्वामीका आग्रह बना रहा तो गुरुवारकी साँझको बम्बईके लिए रवाना हो जाऊँगा और रविवारको सवेरे वापस लौट आऊँगा। फिलहाल तो बम्बई जानेकी इच्छा नहीं होती। तुम्हारा अहमदाबादका वर्णन गुजराती (एस० एन० ११४८१ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''२५४. पत्र : कुसुम देसाईको'''}}}} {{Right|१४ अप्रैल, १९३०}} चि० कुसुम मद्यपान निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कारके बारेमें मैंने जो लिखा है उसमें क्या तुझे कोई विचार सूझ पड़ता है? तू उसमें प्रमुख भाग लेनेकी हिम्मत रखती है क्या? तेरे पत्र मिले हैं। <small> १. गांधीजी २६ अप्रैल, १९३० को वेजलपुर पहुंचे थे। इसके अलावा गांधीजीने पत्र मदादेव देसाईको १४-४-१९३० में उन्हें सवेरे एक पत्र लिखनेका उल्लेख किया है। सम्भवतः उनका इशारा इसी की ओर है।<small> <small>२. पत्रका शेष भाग उपलब्ध नहीं है।<small><noinclude></noinclude> rbr8lffbahp2zd5q9xd0xg6o4cokrf3 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१३ 250 197356 674376 674218 2026-08-26T12:25:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पत्र महादेव देसाईको|२६९}}</noinclude>वहाँ किस काममें व्यस्त है? मेरे पकड़े जानेकी पक्की खबर है, ऐसा कहकर कल मुझे सारी रात जगाया। और मैं तो अभीतक मौज कर रहा हूँ। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० १७९७ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''२५५. पत्र : मणिलाल वी० देसाईको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|१४ अप्रैल, १९३०}} भाई मणिलाल देसाई, आपने नमक के सम्बन्धमें मुझे जो पुस्तक भेजी थी वह भाई केशवरामकी मारफत मुझे मिल गई है। इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। {{Right|मोहनदास गांधी वन्देमातरम्}} गुजराती (एम० एम० यू० / २२/८) की माइक्रोफिल्म से। {{C|{{larger|'''२५६. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|सोमवार [१४ अप्रैल, १९३०]१}} चि० महादेव, तुम्हें मैंने एक पत्र तो सवेरे ही भेजा है। यह दूसरा पत्र मैं रातके साढ़े दस बजे लिख रहा हूँ। जवाहर भी गया। यहांसे पण्डया, घीया इत्यादि भी पकड़ लिये गये। सुना है, वे लोग जुगतरामको भी ले जानेवाले हैं। इन सबको आरामकी आवश्यकता तो थी ही सब एक साथ ही काम कर रहे थे। लोग तो खुद-ब-खुद काम करने लग गये जान पड़ते हैं। मेरा इस सप्ताह बम्बई जाना नहीं होगा। स्वामी लिखता है कि वह ज्यादा तैयारी करके आगामी सप्ताह में बुलायेगा। बा को तो पूरी तैयारीके साथ ही लाना। यदि वह सामान लाना चाहे तो ले आये। उसके लिए तो मैंने काम तैयार कर ही रखा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ११४८०) तथा ११४८१की फोटो नकलसे। <small>१. जवाहरलाल नेहरू १३ अप्रैल १९३० को गिरफ्तार किये गये थे<small><noinclude></noinclude> er1tlvmu768szcr95dvhi4k49vx7lqg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१४ 250 197357 674377 674222 2026-08-26T12:28:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५७. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}} {{Right|नवसारी}} {{Right|१५ अप्रैल, १९३०}} नेहरू<br>इलाहाबाद<br>निश्चित लगता है मेरा ताज पहनना अनावश्यक है, हानिकारक भी हो सकता है। यदि आप दायित्व ओढ़ सकें तो ओढ़ना चाहिए। {{Right|गांधी}} [अंग्रेजीसे] मोतीलाल नेहरू कागजात, फाइल संख्या जी- १। सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय व पुस्तकालय {{C|{{larger|'''२५८. पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको'''}}}} {{Right|१५ अप्रैल, १९३०}} आपका तार पाकर मन प्रसन्नतासे भर गया। अब इस बातकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि बम्बईके नौजवान कांग्रेस अध्यक्षकी गिरफ्तारीकी खबर सुनकर कैसा उत्साह दिखाते हैं। गुजरातमें जो काम हुआ है, उसे सुव्यवस्थित और स्थायी बनानेके लिए यहाँ हर घड़ी मेरी जरूरत है, लेकिन जब वहाँ आना नितान्त आवश्यक हो जायेगा, तो आऊँगा। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १६-४-१९३० <small>१. मोतीलाल नेहरूने १७ तारीखको इसका यह उत्तर दिया था "आपका तार मिला। आपकी बात बिलकुल ठीक लगती है चाहता तो था कि आपसे निजी तौर पर बात करता हूँ, लेकिन सोचता हूँ कि इसमें और लम्बा अन्तराल हानिकारक होगा और इसलिए अपना पूरा समय अपनी सामर्थ्य भर आपके मार्ग-दर्शनमें देशकी सेवा के लिए समर्पित करता हूँ आज दायित्व संभाल रहा हूँ बयान जारी कर रहा हूँ।"<small><noinclude></noinclude> npouze3ajn213ky51mwahwfp9vebc50 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१५ 250 197358 674378 674224 2026-08-26T12:41:44Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२५९. पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको१'''}}}} {{Right|१५ अप्रैल, १९३०}} ...पंचमहाल देरसे जाग रहा है, इसमें भी कोई ईश्वरीय संकेत होगा। इस धर्म-युद्ध में यदि पहले भाग लेनेवाले पीछे रह जायें और अन्तमें शामिल होनेवाले प्रथम आ जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं होगी। पंचमहालके लोगोंकी शक्तिकी तो कोई सीमा नहीं। लेकिन दुःख तो इस बातका है कि हम अनेक बार अपनी इस शक्तिको पहचान नहीं पाते। यह समय उसे पहचाननेका है और मुझे उम्मीद है कि पंचमहाल अपनी शक्तिको पहचानेगा। {{Right|मोहनदास गांधी}} गुजराती (जी० एन० ४२०६ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''२६०. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|दांडी}} {{Right|१५ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, मैंने अभी-अभी सुना कि तुम गिरफ्तार हो गये हो ! ! ! अच्छा हुआ। आराम मिलेगा। इतने दिनों तक तुम्हें बाहर रखा, यह भी आश्चर्यकी बात थी। लोग जितने कसौटीपर कसे जाते हैं, उतना ही अच्छा है। 'अब की टेक हमारी लाज राखो गिरिधारी।' {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ११४८२ ) की फोटो नकलसे। <small>१. साधन-सूत्रसे यह पता नहीं चलता कि पत्र किसको लिखा गया था किन्तु जी० एन० संग्रह में यह लक्ष्मीदास श्रीकान्तको लिखे पत्रके रूपमें दर्ज है।<small><noinclude></noinclude> buj8jyc6729c8oe8tiqw8vonyn9q846 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१६ 250 197359 674380 674226 2026-08-26T12:47:54Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674380 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६१. भाषण : उंबेरमें'''}}}} {{Right|१५ अप्रैल, १९३०}} '''सभामें उपस्थित ग्रामीण महिलाओंसे श्री गांधीने पूछा कि क्या वे पण्डित जवाहरलाल नेहरूको जानती हैं।''' '''उन्होंने उत्तर दिया, "हम कैसे जान सकती हैं?" इसपर गांधीजी ने कहा :''' यह आपकी नहीं, हमारी गलती है--हम मर्दोंकी गलती है, जिन्होंने अबतक इतनेसे ही सन्तोष माना है कि आप घर-गृहस्थी सँभालें, चूल्हा-चौका देखें, पानी भरें और घर बारकी सफाई करें। लेकिन अब आप लोग ऐसी स्थितिमें नहीं रहेंगी। अगर इस आन्दोलनको सफल होना है तो आप लोगोंको अधिक नहीं तो पुरुषोंके समान ही योगदान देना होगा। '''जवाहरलाल नेहरूका उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा :''' उनका समस्त भारतके लिए वही महत्त्व है जो हमारे लिए गुजरातमें सरदार वल्लभभाईका है। वे राष्ट्रकी सेवामें अपने-आपको खपा रहे हैं और हम सबमें बड़े होनेके कारण ही उन्हें सजा दी गई है। अभीतक तो मैंने आपसे यही कहा है कि अगर पुलिस आपकी बन्द मुट्ठियोंसे नमक छीननेकी कोशिश करती है तो आपको इसका विरोध करना चाहिए तथा पुलिसवाले आपको जैसे भी चोट पहुँचायें, उसे आप चुपचाप और विनम्रताके साथ सहन कर लें। अगर आपमें कष्ट सहनका वल और अपने उद्देश्यके प्रति आस्था है तो मैं अब इससे भी बहुत आगेतक जाने का इरादा रखता हूँ। मैं चाहूँगा कि आगेसे आप सब अपने-आपको अपनी मुट्ठियोंमें वन्द बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदाका ही नहीं, बल्कि आजकल नमक तैयार करनेके कड़ाहोंमें जो राष्ट्रीय सम्पदा पड़ी हुई है, उस सबका न्यासी या संरक्षक मानें। जरूरत पड़नेपर अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी इस सम्पदाकी रक्षा कीजिए। जब पुलिसवाले इन कड़ाहों पर छापा मारने आयें तो आप इन्हें घेरकर खड़े हो जायें और जबतक पुलिसवाले अपनी पाशविक शक्ति द्वारा आप लोगोंको विवश न कर दें तबतक आप उन्हें कड़ाहोंको हाथ न लगाने दें। अगर आपको वे मारें तो भी आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि अब गुजरातमें इतना साहस तो आ ही गया है। गुजरातकी शक्तिसे ही मुझे शक्ति मिलती है। आपको कष्ट सहनेके लिए तैयार रहना चाहिए और हर कीमत पर शान्ति बनाये रखनी चाहिए। ये कड़ाहोंको नष्ट करना चाहें तो करने दीजिए, लेकिन तभी जब वे आपको गिरफ्तार कर लें अथवा मार-पीटकर विवश कर दें। यह एक बिलकुल नया प्रयोग है। यह बात मैं आप लोगोंपर छोड़ता हूँ कि आप जहाँ सम्भव हो, वहाँ ज्यादासे ज्यादा संख्या में नमक बनानेके कड़ाह तैयार करें।"१ <small>१. यह अनुच्छेद १६-४-१९३० के '''बॉम्बे क्रॉनिकल''' में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small><noinclude></noinclude> ao0m9mcjcz5tcyam8mdekb26a0x35xg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१७ 250 197360 674383 674231 2026-08-26T12:52:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674383 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण : उंबेरमें|२७३}}</noinclude>आपके कष्ट सहन करने से न केवल पूर्ण स्वराज्यकी कल्पना साकार होगी, बल्कि उसकी रक्षा के लिए एक अहिंसक सेना तैयार होगी। नमकके कड़ाहोंकी रक्षा करने के लिए महिलाओंको पुरुषोंके साथ शामिल नहीं होना चाहिए। मैं सरकारको इतना भला तो अब भी मानता हूँ कि वह महिलाओंके साथ नहीं लड़ेगी। उसे महिलाओंसे लड़ने के लिए उकसाना हमारी गलती होगी। जबतक सरकार अपना ध्यान पुरुषों तक ही सीमित रखती है, यह लड़ाई पुरुषोंकी ही रहेगी। जब सरकार सीमाका उल्लंघन कर जायेगी तब महिलाओंके मार-पीट और जोर-जुल्म सहनेका अवसर आयेगा और फिर तो उन्हें अपनी इस क्षमताका परिचय देनेका पूरा मौका मिलेगा। ऐसा कहनेका मौका न दिया जाये कि पुरुषोंने यह बात अच्छी तरह समझते हुए कि अगर महिलाएँ उनके साथ होंगी तो ये सुरक्षित रहेंगे, अपने बचाव के लिए उस संघर्ष में महिलाओंकी आड़ ली है, जिसे किसी अच्छी संज्ञाके अभाव में, आक्रामक अहिंसा कहा जा सकता है। महिलाओंके लिए उनके सामने मैंने विनम्रतापूर्वक जो कार्यक्रम रखा है, उसमें पर्याप्तसे अधिक काम है और ये जिसनी साहसिकताका परिचय दे सकती हैं और जितना खतरा उठा सकती हैं, सबकी गुंजाइश है। अहमदाबादके श्रमिक संघने शराबकी दुकानोंपर धरना देनेका काम अपने हाथों में लिया है। अहमदाबादमें गैरकानूनी ढंगसे बनाया नमक बेचनेका काम अब बन्द हो गया है। इस कामको स्वयंसेवकोंके दल भेजकर गांवोंमें चलाया जायेगा। '''उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक या तो भोजनकी व्यवस्था स्वयं करें अथवा उनके लिए जो कुछ भी बनाया जाता है, उसे खायें। अलग-अलग रुचिके लोगोंके लिए अलग-अलग रसोईघरोंका प्रबन्ध करना सम्भव नहीं है। यह तो आत्मशुद्धिकी लड़ाई है,इसलिए आपको अपनी सभी अवांछनीय आदतोंको छोड़ देना होगा। आपमें पूरा अनुशासन और कठिनाइयाँ सहनेकी शक्ति होनी चाहिए। जो लोग अनुशासनका पालन नहीं कर सकते, वे शुरूमें ही अलग हो जायें। किन्तु वे समाज या राष्ट्रको धोखा न दे। यदि थोड़े-बहुत सच्चे स्वयंसेवक भी साथ रहे, तो संघर्ष जारी रहेगा। इस संघर्षका आरम्भ बहुत अच्छा रहा है और इसके लिए गुजरातको काफी श्रेय मिला है। आप लोग ऐसा काम करें जिससे किसीको यह कहनेका मौका न मिले कि हम गुजरातकी गलतियों और चूकोंके कारण यह लड़ाई हार गये।१''' [अंग्रेजीसे] '''हिन्दू,''' १६-४-१९३० <small>१. यह अनुच्छेद बॉम्बे क्रॉनिकल में प्रकाशित विवरणसे लिया गया है।<small> ४३-१८<noinclude></noinclude> a5x73p2pmwmlwqwhyv6izijut0pzw6i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१८ 250 197361 674384 674229 2026-08-26T12:55:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}} {{Right|१६ अप्रैल, १९३०}} चि० महालक्ष्मी, तुम्हारा प्यारा-सा पत्र मुझे मिला था। जवाब देने में देर हुई समय नहीं मिलता। मैं आज सवेरे दो बजे उठा हूँ। तुमसे मैं पूरा-पूरा काम लूंगा। तुम दोनोंको मैं समझ गया हूँ। तुम्हारे निश्चय उत्तम है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी० एन० ६७९५ ) की फोटो नकलसे। {{C|{{larger|'''२६३. अस्पृश्यता'''}}}} हिन्दू-मुस्लिम एकताकी भाँति अस्पृश्यता निवारणके बारेमें भी गलतफहमी फैली दिखाई देती है। कहा जाता है कि मैं स्वराज्यकी खातिर अस्पृश्योंके हितोंका बलिदान कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि लाखों अछूत भाई मेरे बारेमें ऐसी किसी बातपर विश्वास नहीं करेंगे। मेरे लिए तो जैसे कौमी एकताके बिना, वैसे ही अस्पृश्यता-निवारणके बिना भी स्वराज्य नहीं हो सकता। लेकिन मेरा यह निश्चित विश्वास है कि बगैर स्वराज्यके न कौमी एकता सम्पन्न हो सकती है और न अस्पृश्यता-निवारण ही। इस बातको देखनेके लिए बहुत कोशिश करनेकी जरूरत नहीं है कि शासकोंका स्वार्थ हममें फूट कायम रखनेमें ही है जैसे हिन्दू-मुस्लिम एकताकी उनके मनमें कोई चाह नहीं है वैसे ही अस्पृश्यता निवारणकी उनमें कोई इच्छा नहीं है। राजस्वके साधनोंपर विचार करते हुए पिछले दिनों मैंने यह बताने की कोशिश की थी कि इस सरकारकी नींव अनीतिपर कायम है। उसी प्रकार यह सरकार हमारी कमजोरियों और हमारी बुराइयोंपर फूली फली है। नासिककी शर्मनाक घटनाको ही लीजिए। सरकार जानती है कि सनातनियोंका पक्ष गलत है। फिर भी उसने क्या किया ? चूँकि सनातनियोंके शिविरमें बहुत शक्तिशाली लोग हैं, इसलिए सरकारने अछूतोंकी माँगोंको ठुकरा दिया। अधिकारी यदि चाहते तो सनातनियोंको बुलाकर उनके साथ बातचीत कर सकते थे। अछूतोंको भी वे समझा सकते थे और झगड़ा शुरू न करनेको कह सकते थे। लेकिन इसके लिए निष्पक्ष मन और निःस्वार्थताकी जरूरत होती पर सरकार निःस्वार्थ नहीं है। वह तो विभिन्न पक्षोंके झगड़ोंपर खुशी मनाती है और आखिरमें जो मजबूत होता है, उसका साथ देती है। मैं जानता हूँ कि बहुतेरे भले परन्तु अनजान अंग्रेज मेरे इस<noinclude></noinclude> sfi94751i9e2wol5nu98v10r28042fi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१९ 250 197362 674387 674232 2026-08-26T12:59:41Z Kumari Arpana Sinha 2191 674387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{Right||अस्पृश्यता|२७५}}</noinclude>कथनपर निरर्थक ही आपत्ति करेंगे, लेकिन मैं उनसे यही कहूँगा कि मेरा यह कथन रात-दिनके अनुभवपर आधारित है। मैं यह नहीं कहता कि हर बार सरकार इरादतन् ऐसा पक्षपात किया करती है। परन्तु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' और 'फूट डालो और राज्य करो', ये तो सरकारी हलकोंके लिए सामान्य बातें हो गई हैं। अपने इस निश्चित विश्वासके बावजूद यदि मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूँ और स्वराज्य-साधनाकी गतिको अटकाऊँ तो मैं अल्पसंख्यकों और अछूतोंके साथ अन्याय करूँगा। मैं मानता हूँ कि जिस क्षण हमें, हममें से हरएकके अन्दर जो शक्ति छिपी हुई है, उसका ज्ञान हो जायेगा उसी क्षण हम स्वतन्त्र हो जायेंगे और हम सच्ची एकताकी ज्योतिका अनुभव करेंगे और 'अछूत' भी अनुभव करेंगे कि उनमें एक नई शक्ति आ गई है। हम याद रखें कि सत्याग्रहियोंके जत्थोंमें मुसलमान भी हैं, दूसरे धर्मवाले भी हैं और अछूत भी हैं- - चाहे बहुत थोड़ी तादादमें ही क्यों न हों। हकीकत तो यह है कि आज उन्हीं लोगोंके हाथों स्वराज्य-मन्दिरकी नींव डाली जा रही है, जो कौमी एकता, अधिकार और अवसरकी समानता तथा अस्पृश्यता निवारणको अपने धर्मका अंग मानते हैं। अंग्रेजोंके आनेसे हिन्दुओंमें विचार जागृति हुई और अस्पृश्योंको अपने अधिकारोंका भान हुआ, इस मोहक विचारमें पढ़कर अछूत भाई राष्ट्रीय लक्ष्यकी प्राप्तिकी ओरसे विमुख न हो जायें। इस बातमें जो तथ्य है वह है, लेकिन अंग्रेज लोग ऐसा परोपकारी वृत्तिसे प्रेरित होकर हिन्दुस्तानमें नहीं आये थे। उनकी सभ्यता, बल्कि कहिए तमाम पश्चिमी देशोंकी सभ्यता, उस प्रकारके किसी भेद-भावको मान्यता नहीं देती जिस प्रकारका भेद-भाव अवदशाको प्राप्त हिन्दू धर्ममें चल रहा है। यदि अंग्रेज हमें गुलाम न बनाते, तब भी हम इस अच्छाईसे लाभ उठा सकते थे। अंग्रेजोंकी यह आलोचना मैं उनके मनुष्य रूपकी नहीं बल्कि शासक जातिके रूपकी कर रहा हूँ। मनुष्यके नाते तो वे उतने ही अच्छे हैं जितने अच्छे हम हैं। कुछ बातोंमें वे हमसे अच्छे हैं, तो कुछमें बुरे भी हो सकते हैं। लेकिन शासकोंके नाते वे सर्वथा अवांछनीय हैं। शासकोंके रूपमें वे न हमारी कोई भलाई कर सकते हैं और न उन्होंने की ही है। उन्होंने हमारी बुराइयोंको उकसाया है, उन्हें और भी गम्भीर बनाया है और चूंकि हममें हीन भावना आ गई है, इसलिए उनके सम्पर्कसे हमारा नैतिक ह्रास होता है। मैंने देखा है कि हम उनके सामने कुछ और व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे कुछ और। यह पुंसत्वहीनता है और मनुष्यको पुंसत्वहीन बनानेकी प्रक्रिया है। यह चीज सर्वथा अस्वाभाविक है। गोखलेने कहा था कि " हममें से बड़ेसे-बड़े को भी उनके सामने झुकना पड़ता है।" पर जब सचमुच अंग्रेजोंकी आंखें खुलेंगी तब उन्हें पता चलेगा कि उनका शासन जितना पतनकारी हमारे लिए साबित हुआ है, उससे कुछ कम पतनकारी उनके लिए भी सिद्ध नहीं हुआ है। अब दो शब्द 'अस्पृश्यों से कहूंगा। मैंने उन्हें सलाह दी है और वही सलाह फिर दोहराता हूँ कि सत्याग्रही तरीकेसे भी सनातनी मन्दिरोंमें प्रवेश करनेका उनका प्रयत्न सर्वथा अनावश्यक है। 'अस्पृश्यों' के लिए मन्दिरोंके द्वार खुलवाना 'सवर्ण'<noinclude></noinclude> 91csb65hvon4ig4iuajh3ex0t2zi99t 674389 674387 2026-08-26T13:04:51Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674389 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{Right||अस्पृश्यता|२७५}}</noinclude>कथनपर निरर्थक ही आपत्ति करेंगे, लेकिन मैं उनसे यही कहूँगा कि मेरा यह कथन रात-दिनके अनुभवपर आधारित है। मैं यह नहीं कहता कि हर बार सरकार इरादतन् ऐसा पक्षपात किया करती है। परन्तु 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' और 'फूट डालो और राज्य करो', ये तो सरकारी हलकोंके लिए सामान्य बातें हो गई हैं। अपने इस निश्चित विश्वासके बावजूद यदि मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूँ और स्वराज्य-साधनाकी गतिको अटकाऊँ तो मैं अल्पसंख्यकों और अछूतोंके साथ अन्याय करूँगा। मैं मानता हूँ कि जिस क्षण हमें, हममें से हरएकके अन्दर जो शक्ति छिपी हुई है, उसका ज्ञान हो जायेगा उसी क्षण हम स्वतन्त्र हो जायेंगे और हम सच्ची एकताकी ज्योतिका अनुभव करेंगे और 'अछूत' भी अनुभव करेंगे कि उनमें एक नई शक्ति आ गई है। हम याद रखें कि सत्याग्रहियोंके जत्थोंमें मुसलमान भी हैं, दूसरे धर्मवाले भी हैं और अछूत भी हैं- - चाहे बहुत थोड़ी तादादमें ही क्यों न हों। हकीकत तो यह है कि आज उन्हीं लोगोंके हाथों स्वराज्य-मन्दिरकी नींव डाली जा रही है, जो कौमी एकता, अधिकार और अवसरकी समानता तथा अस्पृश्यता निवारणको अपने धर्मका अंग मानते हैं। अंग्रेजोंके आनेसे हिन्दुओंमें विचार जागृति हुई और अस्पृश्योंको अपने अधिकारोंका भान हुआ, इस मोहक विचारमें पड़कर अछूत भाई राष्ट्रीय लक्ष्यकी प्राप्तिकी ओरसे विमुख न हो जायें। इस बातमें जो तथ्य है वह है, लेकिन अंग्रेज लोग ऐसा परोपकारी वृत्तिसे प्रेरित होकर हिन्दुस्तानमें नहीं आये थे। उनकी सभ्यता, बल्कि कहिए तमाम पश्चिमी देशोंकी सभ्यता, उस प्रकारके किसी भेद-भावको मान्यता नहीं देती जिस प्रकारका भेद-भाव अवदशाको प्राप्त हिन्दू धर्ममें चल रहा है। यदि अंग्रेज हमें गुलाम न बनाते, तब भी हम इस अच्छाईसे लाभ उठा सकते थे। अंग्रेजोंकी यह आलोचना मैं उनके मनुष्य रूपकी नहीं बल्कि शासक जातिके रूपकी कर रहा हूँ। मनुष्यके नाते तो वे उतने ही अच्छे हैं जितने अच्छे हम हैं। कुछ बातोंमें वे हमसे अच्छे हैं, तो कुछमें बुरे भी हो सकते हैं। लेकिन शासकोंके नाते वे सर्वथा अवांछनीय हैं। शासकोंके रूपमें वे न हमारी कोई भलाई कर सकते हैं और न उन्होंने की ही है। उन्होंने हमारी बुराइयोंको उकसाया है, उन्हें और भी गम्भीर बनाया है और चूंकि हममें हीन भावना आ गई है, इसलिए उनके सम्पर्कसे हमारा नैतिक ह्रास होता है। मैंने देखा है कि हम उनके सामने कुछ और व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे कुछ और। यह पुंसत्वहीनता है और मनुष्यको पुंसत्वहीन बनानेकी प्रक्रिया है। यह चीज सर्वथा अस्वाभाविक है। गोखलेने कहा था कि " हममें से बड़ेसे-बड़े को भी उनके सामने झुकना पड़ता है।" पर जब सचमुच अंग्रेजोंकी आंखें खुलेंगी तब उन्हें पता चलेगा कि उनका शासन जितना पतनकारी हमारे लिए साबित हुआ है, उससे कुछ कम पतनकारी उनके लिए भी सिद्ध नहीं हुआ है। अब दो शब्द 'अस्पृश्यों' से कहूंगा। मैंने उन्हें सलाह दी है और वही सलाह फिर दोहराता हूँ कि सत्याग्रही तरीकेसे भी सनातनी मन्दिरोंमें प्रवेश करनेका उनका प्रयत्न सर्वथा अनावश्यक है। 'अस्पृश्यों' के लिए मन्दिरोंके द्वार खुलवाना 'सवर्ण'<noinclude></noinclude> ml4lecz6jq72fpwf6sq1oeo8eho5j5h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२० 250 197363 674390 674233 2026-08-26T13:07:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>हिन्दुओंका कर्तव्य है। उपयुक्त समय आनेपर सत्याग्रह करना 'सवर्णों' का काम है। अस्पृश्योंको यह मालूम है कि कांग्रेसने इसी उद्देश्यसे जमनालालजी की अध्यक्षतामें एक समिति बनाई है। वे जानते हैं कि अस्पृश्यता निवारणके क्षेत्रमें बहुत प्रगति हुई है। उन्हें यह भी मालूम है कि सारे देशमें ऐसे सैकड़ों सच्चे और जाने-माने हिन्दू मिलेंगे जो अस्पृश्यता निवारण के लिए अपने प्राणोंकी बाजी लगा देने को तैयार हैं। सुधारक लोग हिन्दू-समाजसे इस बुराई को दूर कर देना अपना कर्तव्य और योग्य प्रायश्चित मानते हैं। अस्पृश्योंको यह याद रखना चाहिए कि उनमें से अधिकांश लोग आज जीवन-मरणके संघर्ष में सन्नद्ध है। मैंने जो कुछ कहा है, उसमें निहित सचाईको यदि वे महसूस करते हों तो वे कमसे कम इस संघर्षके दौरान सत्याग्रह स्थगित कर देंगे, भले ही उनमें से सभी लोग उसमें शामिल होनेवाले न हों। वैसे कुछ लोग तो उसमें शामिल हो चुके हैं। हिन्दू सुधारकोंने यह काम करनेका वीड़ा कोई परमार्थकी भावनासे नहीं उठाया है, अस्पृश्योंपर कृपा करनेके लिए भी नहीं उठाया है और राजनीति में उनसे लाभ उठानेके लिए तो कदापि नहीं उठाया है। उन्होंने यह काम करनेका जिम्मा इसलिए लिया है कि हिन्दू धर्मको उनकी जो कल्पना है, उसका यह तकाजा है कि ये इसे करें। या तो उन्हें हिन्दू धर्मको छोड़ देना है या फिर इस दावे को सत्य सिद्ध करना है कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्मका अंग नहीं बल्कि उसके सिरपर लगा कलंकका ऐस टीका है जिसे मिटा देना है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३० {{C|{{larger|'''२६४. राक्षसी कर'''}}}} नमक-कर के परिणामोंके बारेमें प्राप्त हर नये अनुभव के साथ यह कर अधिकाधिक राक्षसी दीखने लगता है। इन दिनों में गुजरातके नमक-क्षेत्र में रह रहा हूँ और मेरा सारा घूमना-फिरना इसी क्षेत्रमें होता है। फलतः मुझे इस बातके प्रमाण मिलते ही रहते हैं कि ग्रामवासियों द्वारा नमक तैयार करनेपर लगाई गई पाबन्दीके कारण इस क्षेत्रके गाँव बरबाद हो गये हैं। इस जमीनका लोग एक यही उपयोग तो कर सकते हैं कि प्रकृति हर महीने इसमें काफी मात्रामें जो नमक छोड़ जाती है उसे वे निकालें। इन क्षेत्रोंमें गरीबोंका यही मुख्य धन्धा था। आज यह सारी जमीन परती पड़ी हुई है। खुद दांडीका इतिहास बड़ा दर्दनाक है। यह एक सुरम्य समुद्र तटीय स्थान है। पहले यहाँ एक 'दीवादांडी' दीपस्तम्भ-- हुआ करता था और उसी परसे इसका नाम दांडी पड़ा। आज यह एक वीरान गाँव है। एक यूरोपीयने और बादमें कुछ भारतीयोंने प्राकृतिक परिस्थितियोंके खिलाफ यहाँकी जमीनको खेती करने योग्य बनानेकी कोशिश की थी। समुद्र-तटका यह क्षेत्र वैसे बड़ा सुन्दर और शान्तिदायी है, किन्तु जब मैं यहाँ लहरोंका मधुर और दिव्य संगीत सुनते हुए घूमता हूँ तो मुझे चारों ओर टूटे-फूटे मेड़ोंसे घिरे ऐसे खेत देखनेको मिलते<noinclude></noinclude> oudkjd4jy7l7k331ok2jakyba0mn3tx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२१ 250 197364 674394 674234 2026-08-26T13:15:15Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राक्षसी कर|२७७}}</noinclude>हैं जिनमें हरियालीका नामोनिशान तक नहीं होता। ये खेत मानवके निष्फल धमकी कहानी कहते हैं। लेकिन घृणित नमक एकाधिकारके समाप्त होते ही यही खेत नमक के मूल्यवान भण्डार बन जायेंगे, जिनमें से ग्रामीण लोग ताजा, सफेद और चमकता हुआ नमक निकालेंगे और सो भी बिना ज्यादा मेहनतके। यह उन्हें उसी प्रकार रोजी देगा जिस प्रकार कभी उनके पूर्वजोंको दिया करता था। महादेव देसाई यह दिखा ही चुके हैं कि सरकार द्वारा जारी की गई यह सूचना कि यहाँका नमक स्वास्थ्यके लिए हानिकर है, एक दुष्टतापूर्ण झूठ है।'सरकार द्वारा बनाये अमानवीय विनियमों के बावजूद आसपास के लोग प्रकृति द्वारा बहुलतासे दिये गये यहीके नमकका उपयोग करते आये। ऐसा नहीं लगता कि उसका उपयोग करनेसे उनका कोई नुकसान हुआ हो। इस क्षेत्रके हजारों लोग पिछले हफ्ते से यही नमक खा रहे हैं और इससे उन्हें कोई हानि नहीं हुई है। सुना है, कोंकणमें लोग इधर कई वर्षोंसे स्वदेशी नमकका ही उपयोग करते रहे हैं। वे कराधीन नमक के मुकाबले इसे स्वदेशी कहते हैं और जिस नमकपर कर लगता है उसे सरकारी या विदेशी नमक कहते हैं, हालांकि यह नमक भी प्राप्त हुआ है भारतीय भूमि और भारतीय समुद्र से ही इस अंक में मैं जो नुस्खा छाप रहा हूँ उसे दो सावधान व्यक्तियोंने तैयार किया है। ये दोनों विज्ञानके स्नातक हैं। इस नुस्खके मुताबिक हर परिवार बिना किसी खर्चके अपनी जरूरतका नमक स्वयं तैयार कर सकता है। इसके लिए जो कुछ करना है वह इतना ही कि परिवारका कोई लड़का लोटा-भर नमकीन पानी ले आये। उस पानीको छानकर किसी छिछले बर्तन में आगके पास रख देना है और फिर नुस्खे में बताये तरीकेसे जो कुछ करना है, कर देना है। इतने से ही हर परिवारको अपनी हर रोजकी जरूरतके लायक पूरा नमक मिल जाता है जो बाजारमें मिलनेवाले गन्दे 'सरकारी' या 'विदेशी' नमकसे कहीं अधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यप्रद होता है। नमक सत्याग्रही (जिनकी तादाद अब हजारों तक पहुँच गई है) चुटकी भर नमक भी बरबाद न करें। चाहे कोई कानून हो या नहीं, अब किसीके पास बाजारका नमक खानेका कोई कारण नहीं रह गया है। जहाँ नमक क्षेत्र न हो वहाँ भी स्वदेशी नमक दाखिल करना चाहिए। इसे थोड़ी-थोड़ी मात्रामें बड़ी आसानीसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। सरकारकी हिम्मत हो तो वह भले ही हजारों नर-नारियोंपर मुकदमे चलाये और अपने अधिकारियोंको उनकी तलाशी लेते फिरने और जबरदस्ती नमक छीननेके लिए भेजे। वे ऐसा कहते हैं तो कहें कि 'नमक-कानून उन्हें इसकी सत्ता देता है।' मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि नमक कर से सम्बन्धित विनियम इस करके ही समान अमानवीय हैं। यदि इन विनियमोंकी प्रारम्भिक अवस्थामें इनपर अमल किये जानेका इतिहास मालूम होता तो यही पता लगता कि लोगोंको अपने स्वाभाविक धन्धेसे वंचित करने और लोहूसना सरकारी नमक खरीदने को मजबूर करनेके लिए इन राक्षसी विनियमोंपर उतने ही राक्षसी ढंगसे अमल किया गया। पाठकोंको मालूम होना चाहिए कि अवैध नमकको <small>१.महादेव देसाई का लेख "सफेद झूठ", १०-४-१९३० के यंग इंडिया में छपा था।<small><noinclude></noinclude> c9ugsmtajrlnxbtcc9mju362q4u5ecf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२२ 250 197365 674396 674242 2026-08-26T13:21:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674396 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यहाँ-वहाँ ले जानेपर रोक लगानेके लिए, उन पालकियोंकी भी तलाशी ली जाती थी जिनमें पर्दानशीन औरतें बैठी होती थीं। यदि आज हमें इस अन्यायपूर्ण करको समाप्त करवानेके लिए कष्ट झेलने पड़ रहे हैं तो इसका मतलब इतना ही कि हमने अतीतमें जो उदासीनता दिखाई और जिस लज्जास्पद ढंगसे इस करको सिर-माथे लिया, अब हम उसीके लिए कुछ थोड़ा-सा प्रायश्चित्त कर रहे हैं। इस प्रकार पाठक देखेंगे कि यद्यपि यह कर अपने-आपमें काफी भारी है, लेकिन खटकनेवाली चीज केवल यह कर ही नहीं है। इसमें ऐसी कोई चीज ही नहीं है जो इसके देशको तनिक भी कम करें। इस करसे जो आय होती है, राष्ट्रको केवल उतना ही नहीं गँवाना पड़ता है। इस करके रूपमें राष्ट्रको शायद प्रतिवर्ष २० करोड़ रुपये देने पड़ते हैं; किन्तु इसके अतिरिक्त नमकके मनमाने तौर पर नष्ट कर दिये जाने अथवा लोगोंको नमक न निकालने देनेके कारण उसे उतनी ही और राशिका घाटा होता है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया''', १७-४-१९३० {{C|{{larger|'''२६५. सिंहावलोकन'''}}}} गुजरातकी जनताने सामूहिक रूपसे जैसा उत्साह दिखाया है, यह आशातीत है। बम्बई और उसके उपनगरोंने भी कुछ कम नहीं किया है। और इस एकान्त जगहमें मुझे सारे देशसे धीरे-धीरे जो समाचार मिल रहे हैं वे भी कम उत्साहप्रद नहीं है। मेरे लिए यह अत्यन्त हर्षकी बात है कि महाराष्ट्र एक बार फिर एक हो गया है और श्री न० चि० केलकर तथा उनके मित्र इस संग्राममें शामिल हो चुके हैं। श्रीयुत केलकर और श्रीयुत अणेका विधान सभासे इस्तीफा दे देना इस संघर्षकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं। बंगाल भारतका सबसे तूफानी प्रदेश है। वह जीवनसे तरंगित हो रहा है। उसकी दलबन्दी ही उसकी महान् जागृतिकी सूचक है। अगर बंगालने ठीक ढंगसे उत्साह दिखाया तो सम्भवतः वह सब प्रान्तोंसे आगे बढ़ जायेगा। मैं नहीं जानता कि कोई भी प्रान्त, यहाँतक कि महाराष्ट्र भी बंगालके जितना स्वेच्छया बलिदानके श्रेयका दावा कर सकता है। बंगालकी भावप्रवणता यदि उसकी एक कमजोरी है, तो वही उसकी एक महानतम शक्ति भी है। इसमें अहिंसाके लिए उत्सर्गकी ऐसी क्षमता है जिसे यदि ऐसी भाषाके प्रयोगको क्षम्य माना जाये तो, मैं उद्दाम उत्सर्ग-भाव कहूंगा। विद्यार्थियोंकी सभापर किये गये अकारण आक्रमणका सेनगुप्तने जो जवाब दिया है, उसीने मुझे उक्त शब्दका प्रयोग करनेकी प्रेरणा दी है। बंगालके विद्यार्थियोंने जो कदम उठाया है और उसके जवाब में पुलिसने जो जंगली रुख अख्तियार किया है, उसकी सम्भावनाओंके आगे डा० सुरेश बनर्जी और दूसरोंका कारावास फीका पड़ जाता है। मैं जानता हूँ कि अगर कलकत्ताके पुलिस कमिश्नरने इन पंक्तियोंको पढ़ा तो वे क्या कहेंगे। मैं उन्हें यह कहते हुए सुनता हूँ कि 'तुम मेरे बंगालको नहीं पहचानते।' लेकिन मैं कहता हूँ कि जितनी<noinclude></noinclude> g83comijf8mbkbuxslmvqxe1z4u653i पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२३ 250 197366 674398 674245 2026-08-26T13:26:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674398 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||सिंहावलोकन|२७९}}</noinclude>अच्छी तरह मैं उनके बंगाल को जानता हूँ उतना तो वह कभी जान ही नहीं सकेंगे उनका बंगाल तो सरकारका बनाया हुआ है। अगर सरकार बंगालको सताना छोड़ दे और भारतको अपने इच्छित व्येय तक पहुँचनेसे रोके नहीं तो बंगाल भी भारत के बड़े से बड़े प्रान्त के जितना ही शान्त और सौम्य बन जाये। आज बंगालमें हिंसाकी जो भावना लहरें मार रही है, उसका कारण उसके अनेक कष्ट हैं। लेकिन मुझे आशा है बंगाल समझदारीसे काम लेगा और वह यह देख सकेगा कि अहिंसा हमारा रामबाण है। सब तरहके कष्ट अहिंसादेवीकी बेदीपर अर्पण कर दिये जाने चाहिए। जलियांवाला हत्याकाण्डके तुरन्त बादसे ही मैं बराबर यह आशा व्यक्त करता आया हूँ कि अगली बार जब कभी हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्सेमें इस तरह गोलियोंकी बौछार की जायेगी तो कोई भी पीठ दिखाकर न भागेगा, बल्कि छातीपर हाथ बाँधकर पूरी हिम्मत और 'जो होना हो सो हो जाये'-- के भावसे सीनेपर गोलियोंको झेलेगा। परीक्षाका यह समय मेरी आशासे भी पहले निकट आ रहा जान पड़ता है। और अगर हमें इस तरह सीना खोलकर गोलियों तथा संगीनकी मार सहने की तालीम लेनी है तो हमें जरा भी हिले-डुले बिना घुड़सवारों और डण्डेवालोंकी मार सहने की आदत डालनी चाहिए। मैं जानता हूँ कि इस तरहकी बातें कहना आसान है, लेकिन करना बहुत कठिन है। तथापि मैं देख रहा हूँ कि यदि हम अपने आपको सामूहिक अहिंसाके लिए भली-भाँति तैयार करना चाहते हों तो इसपर जोर दिये बिना छुटकारा नहीं। पिछले आठ दिनोंमें यह बात ठीक-ठीक साबित हो चुकी है कि देशमें सामूहिक अहिंसा पूरी तरह सम्भव है। धोलेराके नमक-क्षेत्रमें पुलिसने स्वयंसेवकोंके साथ जैसा जंगली और क्रूर बरताव किया और स्वयंसेवकोंने जिस धीरता और बहादुरीके साथ इस बर्बरताको सहा, उसका एक यथातथ्य चित्र महादेव देसाईने खींचा है। जब पुलिसने बम्बई में उद्दण्डता और कठोरतासे यद्यपि उसमें अपेक्षाकृत कुछ थोड़ा-सा विवेक भी जरूर शामिल था-- काम लिया तब वहां हजारों लोगोंने क्या किया, यह पण्डित मुकुन्द मालवीय द्वारा दिये सजीव वर्णनसे जाना जा सकता है। उनके विवरणका संक्षिप्त अनुवाद इस अंकमें अन्यत्र छापा जा रहा है। सरदार वल्लभभाईके पुत्र डाह्याभाई उस समय मौकेपर मौजूद थे। उनके विवरणसे भी पण्डित मुकुन्द मालवीयके विवरणकी मुख्य बातोंकी ताईद होती है। पेरीनबाई और उनकी साथिनों तथा श्रीमती कमलादेवीने भी उस दिन अपूर्व साहस और शान्तिका परिचय दिया। लेकिन यहाँ मैं उनसे यह निवेदन किया चाहता हूँ कि यदि वे पुरुषोंकी लड़ाईके क्षेत्रसे बाहर रही होतीं तो अच्छा होता। बहनोंका इस तरह अपने-आपको खतरे में डालना, पुरुषोंसे स्त्रियोंके प्रति जिस वीरोचित व्यवहारकी अपेक्षा की जाती है उस वीरताके नियमके विरुद्ध है। कमसे कम इतना तो है ही कि अभी वह समय नहीं आया है। बहनें हजारोंकी संख्या में नमक बनायें, इस पर मुझे जरा भी ऐतराज न होगा। लेकिन वे ऐसी भीड़में जान-बूझकर कभी न पड़ें, जिसपर आक्रमण होनेकी सम्भावना हो। मैं अत्यन्त नम्रतापूर्वक उनके लिए एक<noinclude></noinclude> on6do7wo3dpxijydr9e5dff4c0guypi पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२४ 250 197367 674400 674285 2026-08-26T13:30:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>सर्वथा अलग कार्यक्षेत्र सुझा चुका हूँ उस क्षेत्रमें काम करनेको वे पूरी तरह स्वतन्त्र हैं, और यहाँ उनसे अपना जौहर प्रकट करनेकी आशा रखी जाती है। उस क्षेत्रमें साहस और शूरताका परिचय देनेकी काफी गुंजाइश है। हाँ, तो यदि हमें इस युद्धके अन्तिम प्रखर तापको सहना हो तो हमें घुड़सवारों और लाठीवालोंके हमलोंका अविचल रहकर सामना करना सीखना चाहिए और इस प्रयत्न में यदि हम घोड़ोंकी टापोंसे कुचले जायें, लाठियोंके प्रहारोंसे घायल हो जायें तो हमें इस सबको भी सहना चाहिए। ऐसे हमलोंके मौकोंपर सशस्त्र भीड़ पैर जमाकर डट जाती है और जवाबी कार्रवाई करती है। पर यदि हम अहिंसाका पाठ सीखना चाहते हैं तो हमें क्रुद्ध हुए बिना, कोई भी जवाबी हमला किये बिना अपनी जगहपर अटल खड़े रहकर उस सशस्त्र भीड़से अधिक साहसका परिचय देना चाहिए। तब डायरका नया अवतार अपनी आँखों देखेगा कि हम सीनोंपर गोलियाँ झेलने को तैयार खड़े हैं। लोगोंने अपनी नमककी कड़ाहियों आदिकी रक्षा करना तो शुरू कर ही दिया है। लेकिन अगर हममें इस तरहकी पूरी-पूरी ताकत पैदा हो चुकी है तो हमारा काम नियमित और व्यवस्थित होना चाहिए। जैसे ही पुलिस हमला करने आये और हमारे सैनिकोंकी सजीव दीवारको तोड़कर भीतर घुसे, वैसे ही बहनें, अगर पुलिसवाले उन्हें मौका दें तो वहांसे हट जायें और पुरुषोंको घायल होने दें। दुनिया-भरके सशस्त्र युद्धोंमें यहीं किया जाता है; इस युद्ध में भी, जिसमें एक पक्षके लोग जान बूझकर निहत्थे रहना पसन्द करते हैं, बहनें इसी नीतिका पालन करें। जब नमक के युद्ध में जूझनेवाले पुरुष न रह जायें तब बहनें, अगर उनमें हिम्मत हो तो, पुरुषोंके छोड़े हुए कामको हाथमें ले लें। लेकिन मुझे भरोसा है कि इस युद्ध में पुरुष अपने पौरुषका ठीक-ठीक परिचय देंगे। कुछ लोगोंकी यह दलील है कि अगर लोग अपने पासका गैरकानूनी नमक न दें तो पुलिसको अधिकार है कि वह जबरदस्ती उनका नमक छीन लें। इस दलीलका जवाब मैं पहले ही दे चुका हूँ। यहाँ मैं ऐसी आलोचना करनेवालों को सिर्फ यह याद दिला देना चाहूँगा कि पक्के चोरोंको भी जबतक गिरफ्तार नहीं कर लिया जाता तबतक उनसे भी पुलिस चोरीका धन जबरदस्ती नहीं छीनती और गिरफ्तार करके लानेके बाद भी उनसे वह धन तभी लिया जाता है जब उनपर मुकदमा चलाना होता है और इसके बाद भी वह सम्पत्ति तबतक उस चोरकी ही मानी जाती हैं जबतक कि उसका जुर्म साबित न हो जाये और अदालत यह फैसला न दे दे कि वह सम्पत्ति उसकी नहीं थी और नमक सम्बन्धी विनियम पुलिसवालों को गिरफ्तार करनेवाले अधिकारी, अभियोगी और न्यायाधीश सब एक ही साथ बना देते हैं, यह तो मेरे इस आरोपका कोई उत्तर नहीं हुआ कि अधिकारियों द्वारा अपनाये तरीके बर्बरतापूर्ण है। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९३०<noinclude></noinclude> lz53qzbqd0jiw76bfiq462eyg5lx6tj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२५ 250 197368 674531 674300 2026-08-27T03:12:00Z Kumari Arpana Sinha 2191 674531 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६६. अध्यक्षका सम्मान'''}}}} कांग्रेस अध्यक्षको बड़े सस्ते में जयमाला मिल गई। मुझे अभी-अभी पण्डित मोतीलालजी का तार मिला है कि पण्डित जवाहरलालको छः महीने की सादी कैद हुई है। लेकिन राष्ट्रके प्रथम सेवकको एक दिनके लिए भी कैद करना सारे राष्ट्रका अपमान करना है। अध्यक्षको कैद करके सरकारने हमें चुनौती दी है कि जो करना हो करो। हम जो कर सकते हैं वह यही कि आगे बढ़कर अपने सिर और अधिक कष्ट लें। इसका एकमात्र उपाय वर्तमान आन्दोलनको तीव्र और संगठित बनाना है। मैं जानता हूँ कि देशके नौजवान बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; तो भी मुझे कबूल करना चाहिए कि इस युद्धके प्रति देशके विद्यार्थियोंने जितना उत्साह दिखाया है, उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ है। उनमें अभी आत्म-विश्वास पैदा नहीं हुआ है। वे यह नहीं मानते कि स्वराज्य जल्दी ही आ रहा है। वे यह भी महसूस नहीं करते कि सरल श्रद्धा और तदनुसार आचरण द्वारा स्वराज्यके आगमन की घड़ीको जल्दी निकट खींच लाना उन्हींका काम है। लेकिन श्रद्धा देनेकी चीज उसका उद्गम स्थान भी हृदय ही है। देश बड़ी उत्सुकता के साथ देखेगा कि जो हजारों विद्यार्थी आज उपाधियों और प्रमाण-पत्रोंके पीछे पड़े हुए हैं, उनपर पण्डित जवाहरलालके इस कारावासका क्या प्रभाव पड़ता है? [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९१० नहीं। वह हृदयकी वस्तु है, और {{C|{{larger|'''२६७. स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र'''}}}} रविवार तारीख १३ अप्रैल के दिन दांडीमें स्त्रियोंकी एक परिषद् हुई थी और उसके बाद दूसरी परिषद् १६ अप्रैलको वेजलपुरमें हुई। पहली परिषद् में मैंने लगभग सौ बहनोंके आनेकी आशा की थी; लेकिन हजार आई; दूसरीमें सिर्फ अहमदाबाद और बम्बईसे आनेवाली कुछ बहनों ही से मिलना था लेकिन सूरत जिलेकी बहनोंको इस बात का पता था, इसलिए वेजलपुरमें बहनोंकी संख्या दांडीकी अपेक्षा भी अधिक रही। यों यह दूसरी परिषद् हुई। दांडीमें नीचे लिखे प्रस्ताव पास हुए: <small>१. १३ अप्रैल के दिन दांडीमें गांधीजी का भाषण सुननेके बाद गुजरातकी स्त्री-परिषद् यह प्रस्ताव पास करती है कि वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ शराब और ताड़ीकी दुकानोंपर धरना देंगी, अर्थात् दुकानदारोंसे अपने इस धन्धेको छोड़ देनेकी प्रार्थना करेंगी तथा शराब और ताड़ी पीनेवालों से भी इस राक्षसी व्यसनको छोड़नेकी प्रार्थना करेंगी तथा इसी तरह विदेशी कपड़ोंके दुकानदारोंसे विदेशी<small><noinclude></noinclude> pbb0d9aqxgplf3kv9mw938zefl1wnwa 674532 674531 2026-08-27T03:12:19Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674532 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२६६. अध्यक्षका सम्मान'''}}}} कांग्रेस अध्यक्षको बड़े सस्ते में जयमाला मिल गई। मुझे अभी-अभी पण्डित मोतीलालजी का तार मिला है कि पण्डित जवाहरलालको छः महीने की सादी कैद हुई है। लेकिन राष्ट्रके प्रथम सेवकको एक दिनके लिए भी कैद करना सारे राष्ट्रका अपमान करना है। अध्यक्षको कैद करके सरकारने हमें चुनौती दी है कि जो करना हो करो। हम जो कर सकते हैं वह यही कि आगे बढ़कर अपने सिर और अधिक कष्ट लें। इसका एकमात्र उपाय वर्तमान आन्दोलनको तीव्र और संगठित बनाना है। मैं जानता हूँ कि देशके नौजवान बहुत बड़ा काम कर रहे हैं; तो भी मुझे कबूल करना चाहिए कि इस युद्धके प्रति देशके विद्यार्थियोंने जितना उत्साह दिखाया है, उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ है। उनमें अभी आत्म-विश्वास पैदा नहीं हुआ है। वे यह नहीं मानते कि स्वराज्य जल्दी ही आ रहा है। वे यह भी महसूस नहीं करते कि सरल श्रद्धा और तदनुसार आचरण द्वारा स्वराज्यके आगमन की घड़ीको जल्दी निकट खींच लाना उन्हींका काम है। लेकिन श्रद्धा देनेकी चीज उसका उद्गम स्थान भी हृदय ही है। देश बड़ी उत्सुकता के साथ देखेगा कि जो हजारों विद्यार्थी आज उपाधियों और प्रमाण-पत्रोंके पीछे पड़े हुए हैं, उनपर पण्डित जवाहरलालके इस कारावासका क्या प्रभाव पड़ता है? [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' १७-४-१९१० नहीं। वह हृदयकी वस्तु है, और {{C|{{larger|'''२६७. स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र'''}}}} रविवार तारीख १३ अप्रैल के दिन दांडीमें स्त्रियोंकी एक परिषद् हुई थी और उसके बाद दूसरी परिषद् १६ अप्रैलको वेजलपुरमें हुई। पहली परिषद् में मैंने लगभग सौ बहनोंके आनेकी आशा की थी; लेकिन हजार आई; दूसरीमें सिर्फ अहमदाबाद और बम्बईसे आनेवाली कुछ बहनों ही से मिलना था लेकिन सूरत जिलेकी बहनोंको इस बात का पता था, इसलिए वेजलपुरमें बहनोंकी संख्या दांडीकी अपेक्षा भी अधिक रही। यों यह दूसरी परिषद् हुई। दांडीमें नीचे लिखे प्रस्ताव पास हुए: <small>१. १३ अप्रैल के दिन दांडीमें गांधीजी का भाषण सुननेके बाद गुजरातकी स्त्री-परिषद् यह प्रस्ताव पास करती है कि वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ शराब और ताड़ीकी दुकानोंपर धरना देंगी, अर्थात् दुकानदारोंसे अपने इस धन्धेको छोड़ देनेकी प्रार्थना करेंगी तथा शराब और ताड़ी पीनेवालों से भी इस राक्षसी व्यसनको छोड़नेकी प्रार्थना करेंगी तथा इसी तरह विदेशी कपड़ोंके दुकानदारोंसे विदेशी<small><noinclude></noinclude> g6w3e9fvmt442n4xqp8lddq2ufo7ywh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२६ 250 197369 674533 674304 2026-08-27T03:17:08Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित */ 674533 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>वस्त्रका व्यापार बन्द करने और विदेशी कपड़ोंके खरीदारोंसे विदेशी कपड़ा न खरीदनेकी प्रार्थना करेंगी और इन कामोंके लिए दुकानोंपर धरना देंगी। २. इस परिषद्का विश्वास है कि विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार खादीके द्वारा ही किया जा सकता है; अतएव यहाँ उपस्थित स्त्रियां भविष्य में खादीका ही उपयोग करेंगी और यथासम्भव स्वयं प्रतिदिन सूत कातेंगी, रुई पीजेंगी और कताईकी सभी क्रियाएँ सीख लेंगी। और ये सब काम अपने हाथों ही करेंगी। साथ ही अपने पड़ोसी भाई-बहनोंमें सूत कताईकी तमाम क्रियाओंको सीख लेने तथा तदनुसार काम करनेका प्रचार भी करेंगी। ३. इस आन्दोलनके लिए यह परिषद् नीचे लिखी बहनोंकी एक कार्य-कारिणी समिति नियुक्त करती है; और उसे इस आन्दोलनसे सम्बन्धित नियम-उपनियम आदि बनाने तथा उनमें संशोधन परिवर्द्धन करनेका अधिकार प्रदान करती है। समितिको अपनी संख्या बढ़ानेका भी अधिकार होगा : १. श्रीमती तैयबजी (सभापति) २. श्रीमती मीठूबहन पेटिट (मन्त्री) सदस्याएँ ३. श्रीमती मणिवहन पटेल ४. श्रीमती रोहिणी देसाई ५. श्रीमती चन्द्रबहन परिषद् आशा करती है कि गुजरातकी बहनें इस आन्दोलनका स्वागत करेंगी और इसमें हाथ बँटायेंगी। परिषद् आशा करती है कि इस परिषद्के द्वारा जो आन्दोलन आरम्भ किया जा रहा है उसे सारे गुजरात और अन्य प्रान्तों की महिलायें आगे बढ़ायेंगी१। वेजलपुर में भी यही प्रस्ताव पास हुए; किन्तु वहाँ पहले प्रस्तावको दो भागों में बाँट दिया गया था। मद्यपान निषेध और खादी द्वारा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको दो जुदा काम माना गया जिससे यदि कोई बहन उनमें से एकको ही स्वीकार करती हो तो वह उसीके लिए अपना मत दे सके। समितिने दूसरी परिषद्को सदस्य संख्यामें तीन बहनोंके नाम और जोड़े : श्रीमती शारदावहन सुमन्त मेहता श्रीमती सविताबहन त्रिवेदी श्रीमती सूरजबहन मणिलाल यों मतदानको बहुत महत्त्व देना जरूरी नहीं है। उसका महत्त्व इतना ही है कि सभामें किसी भी प्रस्तावका विरोध नहीं हुआ। इससे सूचित होता है कि उपस्थित स्त्रियाँ इस प्रस्तावके अनुसार काम करने को तैयार भले न हों, तथापि उन्हें प्रस्तावकी <small>१. पद अनुच्छेद '''यंग इंडिया''' से लिया गया है।<small><noinclude></noinclude> mhlc139ksijwj01makga94670zdka6n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३९ 250 197382 674408 669906 2026-08-26T14:03:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित नहीं */ 674408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२७९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, पैसा अनेक व्यक्तियोंके हाथमें चला जाता है; इस बारेमें तो मैं 'नवजीवन में लिख चुका हूँ। इस सम्बन्धमें जो कुछ किया जा सकता हो सो करनेके लिए मैंने महादेवको भी लिखा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०१)से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|२८०. पत्र क० मा० मुन्शीको}}}}} {{Right|जलालपुर चौकी}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} भाईश्री मुन्शी, आपका पत्र मिला। मैं क्या सलाह दूं? वकालत छोड़नेके बाद तो केवल वही केस लिया जाना चाहिए जो अधूरा हो। मोतीलालजी, दास इत्यादिने ऐसा ही किया था। आपको क्या करना चाहिए, सो तो केवल आप ही समझ सकते हैं। आपने मुझे बम्बई बुलानेका पक्का निश्चय तो नहीं किया है न? मैंने स्वामीको लिखा था। उसने उत्तरमें मुझे तार भेजा था जिसका आशय यह है कि जबतक यह न लिखे तबतक मुझे बम्बई नहीं आना चाहिए। वह आपसे मिला होगा। बम्बई आनेके लिए फिलहाल मेरे पास तनिक भी समय नहीं है। और मैं समझता हूँ कि यदि यहाँका काम पूरा हो जाये तो वहीं पर्याप्त है। आपने भट्टच हो आनेका निश्चय किया, यह बहुत अच्छा हुआ। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७५१२) से। सौजन्य: क० मा० मुंशी<noinclude></noinclude> 5q62tyrfg35rym3ixgj3rptcbj7ra2d 674410 674408 2026-08-26T14:04:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 674410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२७९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, पैसा अनेक व्यक्तियोंके हाथमें चला जाता है; इस बारेमें तो मैं 'नवजीवन में लिख चुका हूँ। इस सम्बन्धमें जो कुछ किया जा सकता हो सो करनेके लिए मैंने महादेवको भी लिखा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०१)से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|२८०. पत्र क० मा० मुन्शीको}}}} {{Right|जलालपुर चौकी}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} भाईश्री मुन्शी, आपका पत्र मिला। मैं क्या सलाह दूं? वकालत छोड़नेके बाद तो केवल वही केस लिया जाना चाहिए जो अधूरा हो। मोतीलालजी, दास इत्यादिने ऐसा ही किया था। आपको क्या करना चाहिए, सो तो केवल आप ही समझ सकते हैं। आपने मुझे बम्बई बुलानेका पक्का निश्चय तो नहीं किया है न? मैंने स्वामीको लिखा था। उसने उत्तरमें मुझे तार भेजा था जिसका आशय यह है कि जबतक यह न लिखे तबतक मुझे बम्बई नहीं आना चाहिए। वह आपसे मिला होगा। बम्बई आनेके लिए फिलहाल मेरे पास तनिक भी समय नहीं है। और मैं समझता हूँ कि यदि यहाँका काम पूरा हो जाये तो वहीं पर्याप्त है। आपने भट्टच हो आनेका निश्चय किया, यह बहुत अच्छा हुआ। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७५१२) से। सौजन्य: क० मा० मुंशी<noinclude></noinclude> 2k76x2n8z4pepwup5783j1fqfjii3pf 674411 674410 2026-08-26T14:06:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 674411 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२७९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, पैसा अनेक व्यक्तियोंके हाथमें चला जाता है; इस बारेमें तो मैं 'नवजीवन में लिख चुका हूँ। इस सम्बन्धमें जो कुछ किया जा सकता हो सो करनेके लिए मैंने महादेवको भी लिखा है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०१)से। सौजन्य : नारणदास गांधी {{C|{{larger|'''२८०. पत्र क० मा० मुन्शीको'''}}}} {{Right|जलालपुर चौकी}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} भाईश्री मुन्शी, आपका पत्र मिला। मैं क्या सलाह दूं? वकालत छोड़नेके बाद तो केवल वही केस लिया जाना चाहिए जो अधूरा हो। मोतीलालजी, दास इत्यादिने ऐसा ही किया था। आपको क्या करना चाहिए, सो तो केवल आप ही समझ सकते हैं। आपने मुझे बम्बई बुलानेका पक्का निश्चय तो नहीं किया है न? मैंने स्वामीको लिखा था। उसने उत्तरमें मुझे तार भेजा था जिसका आशय यह है कि जबतक यह न लिखे तबतक मुझे बम्बई नहीं आना चाहिए। वह आपसे मिला होगा। बम्बई आनेके लिए फिलहाल मेरे पास तनिक भी समय नहीं है। और मैं समझता हूँ कि यदि यहाँका काम पूरा हो जाये तो वहीं 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ही समझ सकते हैं। आपने मुझे बम्बई बुलानेका पक्का निश्चय तो नहीं किया है न? मैंने स्वामीको लिखा था। उसने उत्तरमें मुझे तार भेजा था जिसका आशय यह है कि जबतक यह न लिखे तबतक मुझे बम्बई नहीं आना चाहिए। वह आपसे मिला होगा। बम्बई आनेके लिए फिलहाल मेरे पास तनिक भी समय नहीं है। और मैं समझता हूँ कि यदि यहाँका काम पूरा हो जाये तो वहीं पर्याप्त है। आपने भड़ौच हो आनेका निश्चय किया, यह बहुत अच्छा हुआ। {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७५१२) से। सौजन्य: क० मा० मुंशी<noinclude></noinclude> pb5d5uya2gngla8d4n8b6akk49lligc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४० 250 197383 674440 669907 2026-08-26T16:18:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674440 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{|C{{larger|'''२८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० गंगाबहन, सभी बहनोंसे कहना कि कोई यह न समझे कि मैं उन्हें यहां बुलानेवाला नहीं हूँ। मैं उन्हें जल्दी ही बुलाऊंगा, पर वहाँ किसे रहना चाहिए, इस बारे में मुझे तुरन्त ही लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४५ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''२८२. भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुर में'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} हमारा अहिंसा धर्म ही ऐसा है कि वह धूलसे धान पैदा कर सकता है। सरकारका धर्म हिंसा है। इसीलिए वह नमकमें धूल मिलाती है, जबकि हम मिट्टीसे नमक बनाते हैं। सरकार उसे मिट्टीमें मिलाती है और हम उत्पादन करते हैं। सरकारके पास तोपें और बन्दूकें हैं, हमारे पास कुछ नहीं है। उसके पास बड़े-बड़े कारखाने हैं और हमारे पास वैसा कुछ भी नहीं है। हमारे कारखाने हमारी झोंपड़ियों में हैं और हमारी मिलें हमारी यह तकली है। किन्तु आपको यह विश्वास होना चाहिए कि इसमें स्वराज्य दिलानेकी शक्ति है। स्वराज्य तो विश्वासकी बात है। आपने छः महीने में स्वराज्यका रचनात्मक कार्यक्रम पूरा कर दिखानेकी प्रतिज्ञा ली थी। आप उस प्रतिज्ञाको पूरा करके मेरे विश्वासको सिद्ध कर दिखायें। यदि आप ऐसा करें तो बारडोली हिन्दुस्तानको स्वराज्य दिला सकती है। अब जबकि आपने सरकारकी पटेलगिरी छोड़ दी हैं तो जनताकी पटेलगिरी कीजिए। जिस गांवमें आप [झूटी] पटेलगिरी करते थे उसी गाँव में अब सच्ची पटेलगिरी करें अर्थात् गांवके लोगोंकी सेवा करें। सेवा तो बहुत प्रकारकी है, किन्तु इतनी सेवा तो अवश्य करें। हरएक भाई नमक-कानून तोड़े, और वह अपने घरखर्च लायक नमक बनाये संग्रह कर ले कि समुद्रके इतना ही नहीं बल्कि वह इतना अधिक नमक बनाकर किनारेसे दूरके भागों में भी वह नमक पहुँचाया जा सके।<noinclude></noinclude> hfbf48m9dlv32me2fhycue9e1i287mk 674442 674440 2026-08-26T16:20:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 674442 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C{{larger|'''२८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० गंगाबहन, सभी बहनोंसे कहना कि कोई यह न समझे कि मैं उन्हें यहां बुलानेवाला नहीं हूँ। मैं उन्हें जल्दी ही बुलाऊंगा, पर वहाँ किसे रहना चाहिए, इस बारे में मुझे तुरन्त ही लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४५ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''२८२. भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुर में'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} हमारा अहिंसा धर्म ही ऐसा 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इतना ही नहीं बल्कि वह इतना अधिक नमक बनाकर किनारेसे दूरके भागों में भी वह नमक पहुँचाया जा सके।<noinclude></noinclude> lk7zemozt4m0qu96iui1objnxxm4ptb 674443 674442 2026-08-26T16:23:27Z Kumari Arpana Sinha 2191 674443 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C{|{larger|'''२८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० गंगाबहन, सभी बहनोंसे कहना कि कोई यह न समझे कि मैं उन्हें यहां बुलानेवाला नहीं हूँ। मैं उन्हें जल्दी ही बुलाऊंगा, पर वहाँ किसे रहना चाहिए, इस बारे में मुझे तुरन्त ही लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४५ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''२८२. भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुर में'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} हमारा अहिंसा धर्म ही ऐसा है कि वह धूलसे धान पैदा कर सकता है। सरकारका धर्म हिंसा है। इसीलिए वह नमकमें धूल मिलाती है, जबकि हम मिट्टीसे नमक बनाते हैं। सरकार उसे मिट्टीमें मिलाती है और हम उत्पादन करते हैं। सरकारके पास तोपें और बन्दूकें हैं, हमारे पास कुछ नहीं है। उसके पास बड़े-बड़े कारखाने हैं और हमारे पास वैसा कुछ भी नहीं है। हमारे कारखाने हमारी झोंपड़ियों में हैं और हमारी मिलें हमारी यह तकली है। किन्तु आपको यह विश्वास होना चाहिए कि इसमें स्वराज्य दिलानेकी शक्ति है। स्वराज्य तो विश्वासकी बात है। आपने छः महीने में स्वराज्यका रचनात्मक कार्यक्रम पूरा कर दिखानेकी प्रतिज्ञा ली थी। आप उस प्रतिज्ञाको पूरा करके मेरे विश्वासको सिद्ध कर दिखायें। यदि आप ऐसा करें तो बारडोली हिन्दुस्तानको स्वराज्य दिला सकती है। अब जबकि आपने सरकारकी पटेलगिरी छोड़ दी हैं तो जनताकी पटेलगिरी कीजिए। जिस गांवमें आप [झूटी] पटेलगिरी करते थे उसी गाँव में अब सच्ची पटेलगिरी करें अर्थात् गांवके लोगोंकी सेवा करें। सेवा तो बहुत प्रकारकी है, किन्तु इतनी सेवा तो अवश्य करें। हरएक भाई नमक-कानून तोड़े, और वह अपने घरखर्च लायक नमक बनाये संग्रह कर ले कि समुद्रके इतना ही नहीं बल्कि वह इतना अधिक नमक बनाकर किनारेसे दूरके भागों में भी वह नमक पहुँचाया जा सके।<noinclude></noinclude> dwbqmzyeu1mnvumvdxcvkc9ded2kix0 674445 674443 2026-08-26T16:24:10Z Kumari Arpana Sinha 2191 674445 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} चि० गंगाबहन, सभी बहनोंसे कहना कि कोई यह न समझे कि मैं उन्हें यहां बुलानेवाला नहीं हूँ। मैं उन्हें जल्दी ही बुलाऊंगा, पर वहाँ किसे रहना चाहिए, इस बारे में मुझे तुरन्त ही लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८७४५ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य {{C|{{larger|'''२८२. भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुर में'''}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} हमारा अहिंसा धर्म ही ऐसा है कि वह धूलसे धान पैदा कर सकता है। सरकारका धर्म हिंसा है। इसीलिए वह नमकमें धूल मिलाती है, जबकि हम मिट्टीसे नमक बनाते हैं। सरकार उसे मिट्टीमें मिलाती है और हम उत्पादन करते हैं। सरकारके पास तोपें और बन्दूकें हैं, हमारे पास कुछ नहीं है। उसके पास बड़े-बड़े कारखाने हैं और हमारे पास वैसा कुछ भी नहीं है। हमारे कारखाने हमारी झोंपड़ियों में हैं और हमारी मिलें हमारी यह तकली है। किन्तु आपको यह विश्वास होना चाहिए कि इसमें स्वराज्य दिलानेकी शक्ति है। स्वराज्य तो विश्वासकी बात है। आपने छः महीने में स्वराज्यका रचनात्मक कार्यक्रम पूरा कर दिखानेकी प्रतिज्ञा ली थी। आप उस प्रतिज्ञाको पूरा करके मेरे विश्वासको सिद्ध कर दिखायें। यदि आप ऐसा करें तो बारडोली हिन्दुस्तानको स्वराज्य दिला सकती है। अब जबकि आपने सरकारकी पटेलगिरी छोड़ दी हैं तो जनताकी पटेलगिरी कीजिए। जिस गांवमें आप [झूटी] पटेलगिरी करते थे उसी गाँव में अब सच्ची पटेलगिरी करें अर्थात् गांवके लोगोंकी सेवा करें। सेवा तो बहुत प्रकारकी है, किन्तु इतनी सेवा तो अवश्य करें। हरएक भाई नमक-कानून तोड़े, और वह अपने घरखर्च लायक नमक बनाये संग्रह कर ले कि समुद्रके इतना ही नहीं बल्कि वह इतना अधिक नमक बनाकर किनारेसे दूरके भागों में भी वह नमक पहुँचाया जा सके।<noinclude></noinclude> 0gzey39a67ynhok9v8h7klibg43ns6o पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४१ 250 197384 674448 669908 2026-08-26T16:31:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674448 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|भाषण पटेलोंकी सभा, वेजलपुरमें|२९७}}</noinclude>किन्तु आपका पूरा दिन तो इस काम में नहीं लगेगा। इसलिए आपका दूसरा काम है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना। यदि आप सचमुच विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हों तो आपको अपने घरमें बैठकर तकली घुमानी चाहिए, जिसके बनाने में एक पाई भी खर्च नहीं होती। यदि आप जैसे पटेल यह काम करने लगे तो गाँव के सभी लोग आपका अनुकरण करने लगेंगे। कहावत है कि संख्यामें बल है। और गांवमें सभीको खादी पहनाकर आप गाँवसे बाहर खिंचे चले जा रहे पैसे बचा सकेंगे। इसके अतिरिक्त यदि आप सब मिलकर निश्चय कर लें तो गांवकी शराबकी दुकानोंको तुरन्त बन्द कर सकते हैं क्योंकि गांवमें रहनेवाले सभी लोगोंकी रग आप पहचानते हैं। इसके अलावा पंचका महत्त्वपूर्ण कार्य भी आपको ही करना चाहिए। आप ऐसे सभी काम-काज करनेके अभ्यस्त हैं। बहुत से लोगोंको तो इसका चस्का पड़ गया होगा। पटेलगिरी छोड़ देनेके बाद यदि वे बेकार रहेंगे तो दुःखी हो जायेंगे और शायद उन्हें पटेलगिरी छोड़ देनेका पछतावा भी हो। मैं खुद वकालत करता था किन्तु उसे छोड़ देनेके बाद मुझे कभी पछतावा नहीं हुआ। क्योंकि मैंने ऐसा धन्धा खोज लिया जो मुझे वकालतकी अपेक्षा कहीं अधिक व्यस्त बनाये रखता है। पटेल पटेलगिरी छोड़ सकते हैं किन्तु उनके घर दरवार तो भरना ही चाहिए। वे पंचायतों की स्थापना करें। उनका गांवके मामलोंसे परिचय होनेके कारण वे झगड़ोंका निबटारा बहुत ही सन्तोषजनक ढंगसे कर सकते हैं। ये सब काम आप संगठित रूपसे कर सकें इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप। एक 'भूतपूर्व पटेल मण्डल' की स्थापना करें। यदि ऐसा मण्डल होगा तो उसके कामकाजको रिपोर्ट मुझे नियमित रूपसे मिलती रहेगी तथा आपकी सभी प्रवृत्तियोंकी मुझे जानकारी रहेगी। [गुजरातीसे] '''नववजीवन,'''२५-५-१९३०<noinclude></noinclude> 8me1l92lqdgz8aorbaklmveca3t8oit 674449 674448 2026-08-26T16:32:07Z Kumari Arpana Sinha 2191 674449 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||भाषण पटेलोंकी सभा, वेजलपुरमें|२९७}}</noinclude>किन्तु आपका पूरा दिन तो इस काम में नहीं लगेगा। इसलिए आपका दूसरा काम है विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना। यदि आप सचमुच विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहते हों तो आपको अपने घरमें बैठकर तकली घुमानी चाहिए, जिसके बनाने में एक पाई भी खर्च नहीं होती। यदि आप जैसे पटेल यह काम करने लगे तो गाँव के सभी लोग आपका अनुकरण 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मण्डल होगा तो उसके कामकाजको रिपोर्ट मुझे नियमित रूपसे मिलती रहेगी तथा आपकी सभी प्रवृत्तियोंकी मुझे जानकारी रहेगी। [गुजरातीसे] '''नववजीवन,'''२५-५-१९३०<noinclude></noinclude> qjtlpjwoirvbkgimghrlk0ifw2loj6g पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४२ 250 197385 674451 669909 2026-08-26T16:36:01Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674451 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२८३. बारडोलीमें दिये गये भाषणके अंश}}}} {{Right|१९ अप्रैल, १९३०}} पटेल और तलाटी अब भी भयभीत नजर आते हैं। अब भी यह बात उनके मनमें बैठी हुई है कि ये सरकारकी मारफत प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं, साहबी ठाठ-बाटसे रह सकते हैं और सरकारके नामपर जनताको लूट सकते हैं। इसीलिए आज भी आपको उन्हें इस्तीफे देनेके लिए समझाना पड़ता है और उनके विरुद्ध बहिष्कारका शस्त्र उठाना पड़ता है। सच बात तो यह है कि इस सम्बन्ध में अब किसीको समझाने या बहिष्कार द्वारा किसीपर दबाव डालने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। लोगोंको यह बात अपने-आप सूझ जानी चाहिए कि यह बुरी नौकरी और गन्दी सत्ता त्याज्य है। पटेल और तलाटियोंके बारेमें ही क्यों कुछ कहा जाये? क्योंकि मैं यह नहीं मानता कि इन लोगोंके अतिरिक्त अन्य सभी लोगोंके मनमें इस लड़ाईके प्रति पूरा विश्वास बैठ गया है। किन्तु जनतामें जितनी हिम्मत आई है उसीकी नींव पर हमें निर्माण करना होगा। मैं चाहता हूँ कि जिन पटेलों और तलाटियोंने अभीतक इस्तीफे नहीं दिये हैं वे तुरन्त इस्तीफे दे दें। किन्तु यदि इस्तीफे दें तो पूरी तरह दें । यदि इस्तीफे देनेके बाद वे अपने पास बहीखाते रखे रहें, अधिकारियोंकी बराबर सेवा करते रहें तो यह जनताको धोखा देना माना जायेगा। इसकी अपेक्षा तो उन्हें साहसपूर्वक यह कह देना चाहिए कि " आप हमारा बहिष्कार करना चाहें तो करें किन्तु हमें अभी इस्तीफे देनेकी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। नमक -कानून तोड़ना हमारे कार्यका सिर्फ एक अंग है। हमें तो स्वराज्य लेना है। इसके लिए कुछ अन्य कार्य करने भी आवश्यक हैं। जितनी भी शराबकी दुकानें हैं वे सभी बन्द होनी चाहिए। फिलहाल थोड़ी-सी बहनें हिम्मत करके निकल पड़ी हैं और उन्होंने काम शुरू कर दिया है। सभी बहनोंको घरसे बाहर निकलनेकी आवश्यकता नहीं है। ये अपने-अपने गाँवोंसे ही शराबको निकालें। हमें किसीको भला-बुरा नहीं कहना है, किसीपर हाथ नहीं उठाना है। शराबकी दुकानवालेसे जाकर कहें कि कृपा करके आप अपनी दुकान बन्द कर दें। पीनेवालों को भी विनयपूर्वक समझायें। बहनोंके लिए यह काम करना सहज है। पुरुषोंको चाहिए कि ये समझाने में बहनोंकी मदद करें और खजूरके पेड़के मालिकोंके हितके लिए वे पेड़ काट दें। बहन और भाई घर बैठे यह सब कर सकते हैं। तीसरी चीज विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार है। यह काम भी हमने बहनोंके हाथमें सौंपा है। आप लोगोंको यह काम कठिन जान पड़ता है किन्तु मेरे जैसे व्यक्तिके लिए यह सहज है। अथवा यह काम जितना कठिन है उसी अनुपात में इसके द्वारा स्वराज्य लेना सहज है। यह कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है कि यह सरकार विशेष रूपसे कपड़ेके व्यापार के लिए इस देशमें पड़ी हुई है। ६६ करोड़ रुपयेके इस सीधे व्यापारके पीछे<noinclude></noinclude> lfey7zhgroq1gxhc6zevh5oqne3g9sd 674452 674451 2026-08-26T16:36:26Z Kumari Arpana Sinha 2191 674452 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" 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हाथमें सौंपा है। आप लोगोंको यह काम कठिन जान पड़ता है किन्तु मेरे जैसे व्यक्तिके लिए यह सहज है। अथवा यह काम जितना कठिन है उसी अनुपात में इसके द्वारा स्वराज्य लेना सहज है। यह कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है कि यह सरकार विशेष रूपसे कपड़ेके व्यापार के लिए इस देशमें पड़ी हुई है। ६६ करोड़ रुपयेके इस सीधे व्यापारके पीछे<noinclude></noinclude> f2f9gwrfhnykfysv8zle89xmbsbpyrg पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४३ 250 197386 674457 669910 2026-08-26T16:45:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674457 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवों से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> 50nfp8x8u828ci394ymmwpyybalecti 674458 674457 2026-08-26T16:45:46Z Kumari Arpana Sinha 2191 674458 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवों से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> f4aw7jyf2urvg60noyo4wjkklipoxav 674459 674458 2026-08-26T16:46:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 674459 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवों से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> 87y9muj4mm2030uci3vb0256utr8c5l 674460 674459 2026-08-26T16:47:03Z Kumari Arpana Sinha 2191 674460 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवों से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> boqojwhxs39k5er2foosf9a5augh7gt 674461 674460 2026-08-26T16:47:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 674461 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावकी' प्रस्तावना|२९९}}</noinclude>अन्य इतनी तरहके धन्धे जुड़े हुए हैं कि हम उनका अनुमान भी नहीं लगा पाते। कराडीके लोगोंकी तरह विदेशी कपड़ोंको इकट्ठा करके जला तो देना ही चाहिए। बारडोली भाइयो और बहनो, आपके पास जितने भी विदेशी कपड़े हों उन्हें आप श्रद्धापूर्वक जला दें किन्तु साथ-साथ यह प्रतिज्ञा करें कि आप खादी ही पहनेंगे। यदि आप खादी पहनेंगे तो आपका कपड़ेपर होनेवाला बहुत-सा खर्च बच जायेगा । यदि आप बारीक विदेशी या मिलके बने कपड़े पहनेंगे तो आपको १०-२० कपड़ोंकी आवश्यकता होगी किन्तु खादीके एक कच्छे या एक साड़ीसे काम चल जायेगा। फिर खादीकी प्रतिज्ञा तो ऐसी प्रतिज्ञा होनी चाहिए कि मैं अपने ही कते सूतकी खादी बुनवाकर पहनूंगा। ऐसा करना कुछ कठिन नहीं है। बुनना तो आप तुरन्त नहीं सीख सकते किन्तु तकलीपर कातना तो मैं आपको तुरन्त सिखा सकता हूँ। आप सूत कातने लगें तो उसे बुन देना आश्रमोंका काम है। यहाँ जो आश्रम हैं वे सब खादीके कामके लिए ही हैं। यहाँ काम तो हुआ है; किन्तु जितना होना चाहिए, अबतक उससे बहुत कम हुआ है। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २५-५-१९३० {{C|{{larger|'''२८४. 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी'की प्रस्तावना'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} यह पुस्तिकाकी दूसरी आवृत्ति है। इसमें संकलित लेखोंके लेखक हैं प्रोफेसर कुमारप्पा | ये लेख पहले-पहल 'यंग इंडिया में छपे थे। इस आवृत्तिमें जहाँ कहीं आवश्यक हुआ है, संशोधन परिवर्धन भी किया गया है। इन लेखोंमें अंग्रेज सरकारकी आर्थिक नीति तथा भारतके सर्वसाधारणपर उसके प्रभावपर विचार किया गया हैं। इसलिए ये लेख बहुत समयानुकूल हैं। इस आवृत्तिमें खुद लेखकने ही बहुत सावधानी से तैयार की गयी और काफी विस्तृत सांकेतिका भी जोड़ दी है। इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मैं भारतीयों तथा पाश्चात्य देशोंके लोगों से भी यह पुस्तिका पढ़नेका अनुरोध करता हूँ। {{Right|मो० क० गांधी}} [अंग्रेजीसे] पब्लिक फिनांस एंड आवर पॉवों से तथा जी० एन० १००८५ से भी।<noinclude></noinclude> 13bcy71cy8lfxdssv0jmp0zicmdpw66 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४४ 250 197387 674468 669911 2026-08-26T16:56:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674468 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८५. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|'''}} महान् आन्दोलनके समय उदार लोग अपनी जेबें खाली करते हैं और उनके पास पहुँचनेवालों में से सभीको जनताका सेवक मानते हैं। दगाबाज लोग इस अवसरका लाभ उठाते हैं और जहाँ लूटा जा सके वहांसे लूटते हैं। चाहे जो व्यक्ति स्वदेशी नमक बेचता फिरता है, जिस किसीके मनमें आता है वह चन्दा इकट्ठा करने लगता है; और लोग भोलेपन में पैसा देते हैं। ऐसे समय लोगोंको सावधान रहना चाहिए। देनेवाला जिसे जानता-पहचानता हो, उसे ही पैसा दे और उससे रसीद लिये बिना तो कदापि न दे। रसीदपर कांग्रेसके अधिकारीके हस्ताक्षर और कार्यालयकी मुहर होनी चाहिए। समितियोंको चाहिए कि वे पाई-पाईका हिसाब रखें और नामके साथ उसे प्रकाशित करें। रसीद बहियोंकी गिनती होनी चाहिए और इन गिनी हुई बहियोंमें से ही रसीदें दी जानी चाहिए और बादमें उनके आधारपर ठीक तरहसे हिसाब कर लेना चाहिए। इतनी सावधानी बरतने के बावजूद चोरी तो होगी ही। चोरकी सौ और साहकी एक ही नजर होती है। परन्तु प्रत्येक सार्वजनिक संस्थाका यह धर्म है कि जितनी सावधानी बरती जा सकती है, यह उतनी सावधानी अवश्य बरते। {{C|'''अहमदाबाद के मिल मजदूर'''}} अहमदाबाद के मिल मजदूर स्वराज्य-यज्ञ में उत्तम ढंगसे अपना योगदान दे रहे हैं। उनमें से अनेकों खादी पहनते हैं। ये नहीं तो उनके बच्चे कातते हैं और शराबकी दुकानोंपर धरना देते हैं। कुछ एकने नमक कानूनकी सविनय अवज्ञा भी की हैं। मद्यपान निषेध आन्दोलनके कारण शराबकी दुकानोंकी आय बहुत कम हुई है। १८२८- २९ के दौरान अहमदाबादकी शराबकी ६ दुकानोंमें औसतन २३१३ गैलन शरावकी विक्री हुई थी। इस साल ४५३ गैलन शराबकी बिक्री हुई है। अर्थात् ८१ प्रतिशतकी कमी हुई है; अथवा कहें १९ प्रतिशत खपत ही बाकी बची है। यदि यह आन्दोलन चलता ही रहा तो इस हिसाब से हम आशा कर सकते हैं कि अहमदाबादकी शराबकी दुकानें अवश्य बन्द हो जायेंगी। ऐसे शुभ परिणामके लिए मिल मजदूर तथा कार्यकर्तागण बधाईके पात्र है। दुकानोंपर धरना भी मजदूर ही देते हैं और कह सकते हैं, उनके धरना देनेका ढंग आदर्श है। पूर्ण शान्तिका वातावरण है। यदि अन्य मजदूर भी इन मजदूरोंका अनुसरण करें तो मजदुरोंकी आय एकदम बढ़ जायेगी, क्योंकि बचे हुए पैसे तो कमाये हुए पैसोंके समान ही हैं; और इसके अतिरिक्त घरमें जो शान्ति बढ़ेगी, सो अलग। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४.१९३०<noinclude></noinclude> 96wsdv5g7sbv9o8p5tgu9hr92ga5571 674469 674468 2026-08-26T16:57:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 674469 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८५. टिप्पणियाँ'''}}}} {{C|'''सावधान'''}} महान् आन्दोलनके समय उदार लोग अपनी जेबें खाली करते हैं और उनके पास पहुँचनेवालों में से सभीको जनताका सेवक मानते हैं। दगाबाज लोग इस अवसरका लाभ उठाते हैं और जहाँ लूटा जा सके वहांसे लूटते हैं। चाहे जो व्यक्ति स्वदेशी नमक बेचता फिरता है, जिस किसीके मनमें आता है वह चन्दा इकट्ठा करने लगता है; और लोग भोलेपन में पैसा देते हैं। ऐसे समय लोगोंको सावधान रहना चाहिए। देनेवाला जिसे जानता-पहचानता हो, उसे ही पैसा दे और उससे रसीद लिये बिना तो कदापि न दे। रसीदपर कांग्रेसके अधिकारीके हस्ताक्षर और कार्यालयकी मुहर होनी चाहिए। समितियोंको चाहिए कि वे पाई-पाईका हिसाब रखें और नामके साथ उसे प्रकाशित करें। रसीद बहियोंकी गिनती होनी चाहिए और इन गिनी हुई बहियोंमें से ही रसीदें दी जानी चाहिए और बादमें उनके आधारपर ठीक तरहसे हिसाब कर लेना चाहिए। इतनी सावधानी बरतने के बावजूद चोरी तो होगी ही। चोरकी सौ और साहकी एक ही नजर होती है। परन्तु प्रत्येक सार्वजनिक संस्थाका यह धर्म है कि जितनी सावधानी बरती जा सकती है, यह उतनी सावधानी अवश्य बरते। {{C|'''अहमदाबाद के मिल मजदूर'''}} अहमदाबाद के मिल मजदूर स्वराज्य-यज्ञ में उत्तम ढंगसे अपना योगदान दे रहे हैं। उनमें से अनेकों खादी पहनते हैं। ये नहीं तो उनके बच्चे कातते हैं और शराबकी दुकानोंपर धरना देते हैं। कुछ एकने नमक कानूनकी सविनय अवज्ञा भी की हैं। मद्यपान निषेध आन्दोलनके कारण शराबकी दुकानोंकी आय बहुत कम हुई है। १८२८- २९ के दौरान अहमदाबादकी शराबकी ६ दुकानोंमें औसतन २३१३ गैलन शरावकी विक्री हुई थी। इस साल ४५३ गैलन शराबकी बिक्री हुई है। अर्थात् ८१ प्रतिशतकी कमी हुई है; अथवा कहें १९ प्रतिशत खपत ही बाकी बची है। यदि यह आन्दोलन चलता ही रहा तो इस हिसाब से हम आशा कर सकते हैं कि अहमदाबादकी शराबकी दुकानें अवश्य बन्द हो जायेंगी। ऐसे शुभ परिणामके लिए मिल मजदूर तथा कार्यकर्तागण बधाईके पात्र है। दुकानोंपर धरना भी मजदूर ही देते हैं और कह सकते हैं, उनके धरना देनेका ढंग आदर्श है। पूर्ण शान्तिका वातावरण है। यदि अन्य मजदूर भी इन मजदूरोंका अनुसरण करें तो मजदुरोंकी आय एकदम बढ़ जायेगी, क्योंकि बचे हुए पैसे तो कमाये हुए पैसोंके समान ही हैं; और इसके अतिरिक्त घरमें जो शान्ति बढ़ेगी, सो अलग। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४.१९३०<noinclude></noinclude> cw2r1gssa9ekpa1uhe5q1tuxd8wm0tk पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४५ 250 197388 674472 669912 2026-08-26T17:05:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674472 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२८६. सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँवके लोगोंको}}}} धोलेरा और वीरमगावके आसपाससे जो खबरें आ रही हैं, उन्हें सुनते रहना असह्य ही गया है। बर्बरतापूर्ण अत्याचार किये जानेकी जो बातें कही जा रही हैं उन्हें मानते हुए रोमांच हो आता है। जिन्होंने विवरण भेजा है वे सावधान रहें और उसे सिद्ध करने को तैयार रहें। अमानुषिक अत्याचारका जो विवरण दिया गया है, उसके बारेमें कहा जाता है कि वह लुके-छिपे नहीं बल्कि खुले आम हुआ है। मुझे आशा है कि उक्त विवरण गलत होगा। किन्तु यदि यह सही हो तो सत्याग्रहके जो साधन आजतक प्रयोगमें आये हैं उनकी अपेक्षा कहीं उम्र साधन भी हैं जो काममें लाये जा सकते हैं। उनके द्वारा इन अमानुषिक कृत्योंको तो रोका ही जा सकता है। जिनपर अत्याचार हुआ है वे लोग घबरायें नहीं। मैं स्वयं उस ओर जानेको बेचैन हूँ। और यदि ये अत्याचार बन्द नहीं हुए, और ईश्वरकी कृपा होगी तो मैं वहाँ पहुँचकर उनके निवारणके उपाय सुझाऊँगा । वे लोग यह मान लें कि सूरत जिलेका काम करते हुए भी मेरा मन धोलेरा और वीरमगांवमें ही अटका रहेगा। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४-१९३० {{C|{{larger|२८७. कलकत्ता और कराची}} कलकत्ता-कराचीसे मिली हुई खबरें चौंकानेवाली हैं। इनमें सचाई कितनी है, सो तो समय आनेपर पता चलेगा। अखबारोंमें इतनी झूठी बातें छपती हैं कि उनसे सत्यको जान लेना बहुत मुश्किल है। हिंसक शासनको हमेशा धूर्तताके सहारेकी आवश्यकता बनी ही रहती है। यह कौन नहीं जानता कि बारडोली सत्याग्रहके दिनों में सत्याग्रहियों के बारेमें बेसिर-पैरकी बातें फैलाई गई थी? मेरे सम्बन्धमें आये दिन जो झूठी खबरें फैलती रहती हैं, उनका क्या मुझे अनुभव नहीं है? इतना होते हुए भी हमारे विपक्षमें कुछ-न-कुछ सत्य तो है ही। यह सच है कि कुछ हिन्दुस्तानियोंने किसी-न-किसीकी जानमालको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाया है। इस तरह उन्होंने इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाया है, और मेरी स्थितिको विषम बना दिया है। लोग मुझसे जिस सेवाकी आशा रखते हैं, ऐसी घटनाओंके कारण उसमें रुकावट पड़ती है। यह दुःखकी बात है। ऐसी घटनाएँ मुझे झकझोर देती हैं। यह मेरा स्वभाव है, उससे मैं कैसे बचूं? फिर भी मेरा रास्ता तो सीधा-सादा है। कुछ भी क्यों न हो, मैं इस लड़ाईको बन्द नहीं कर सकता। मेरे पास अपनी अहिंसाको मापनेका कोई पैमाना नहीं है। मैं श्रद्धापूर्वक काम कर रहा हूँ । यदि शुद्ध अहिंसा ही काम कर रही होगी तो सब कुछ<noinclude></noinclude> 3jqafyzigdtp8fs39y44kutm1u2stmt 674473 674472 2026-08-26T17:06:08Z Kumari Arpana Sinha 2191 674473 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८६. सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँवके लोगोंको'''}}} धोलेरा और वीरमगावके आसपाससे जो खबरें आ रही हैं, उन्हें सुनते रहना असह्य ही गया है। बर्बरतापूर्ण अत्याचार किये जानेकी जो बातें कही जा रही हैं उन्हें मानते हुए रोमांच हो आता है। जिन्होंने विवरण भेजा है वे सावधान रहें और उसे सिद्ध करने को तैयार रहें। अमानुषिक अत्याचारका जो विवरण दिया गया है, उसके बारेमें कहा जाता है कि वह लुके-छिपे नहीं बल्कि खुले आम हुआ है। मुझे आशा है कि उक्त विवरण गलत होगा। किन्तु यदि यह सही हो तो सत्याग्रहके जो साधन आजतक प्रयोगमें आये हैं उनकी अपेक्षा कहीं उम्र साधन भी हैं जो काममें लाये जा सकते हैं। उनके द्वारा इन अमानुषिक कृत्योंको तो रोका ही जा सकता है। जिनपर अत्याचार हुआ है वे लोग घबरायें नहीं। मैं स्वयं उस ओर जानेको बेचैन हूँ। और यदि ये अत्याचार बन्द नहीं हुए, और ईश्वरकी कृपा होगी तो मैं वहाँ पहुँचकर उनके निवारणके उपाय सुझाऊँगा । वे लोग यह मान लें कि सूरत जिलेका काम करते हुए भी मेरा मन धोलेरा और वीरमगांवमें ही अटका रहेगा। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४-१९३० {{C|{{larger|२८७. कलकत्ता और कराची}} कलकत्ता-कराचीसे मिली हुई खबरें चौंकानेवाली हैं। इनमें सचाई कितनी है, सो तो समय आनेपर पता चलेगा। अखबारोंमें इतनी झूठी बातें छपती हैं कि उनसे सत्यको जान लेना बहुत मुश्किल है। हिंसक शासनको हमेशा धूर्तताके सहारेकी आवश्यकता बनी ही रहती है। यह कौन नहीं जानता कि बारडोली सत्याग्रहके दिनों में सत्याग्रहियों के बारेमें बेसिर-पैरकी बातें फैलाई गई थी? मेरे सम्बन्धमें आये दिन जो झूठी खबरें फैलती रहती हैं, उनका क्या मुझे अनुभव नहीं है? इतना होते हुए भी हमारे विपक्षमें कुछ-न-कुछ सत्य तो है ही। यह सच है कि कुछ हिन्दुस्तानियोंने किसी-न-किसीकी जानमालको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाया है। इस तरह उन्होंने इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाया है, और मेरी स्थितिको विषम बना दिया है। लोग मुझसे जिस सेवाकी आशा रखते हैं, ऐसी घटनाओंके कारण उसमें रुकावट पड़ती है। यह दुःखकी बात है। ऐसी घटनाएँ मुझे झकझोर देती हैं। यह मेरा स्वभाव है, उससे मैं कैसे बचूं? फिर भी मेरा रास्ता तो सीधा-सादा है। कुछ भी क्यों न हो, मैं इस लड़ाईको बन्द नहीं कर सकता। मेरे पास अपनी अहिंसाको मापनेका कोई पैमाना नहीं है। मैं श्रद्धापूर्वक काम कर रहा हूँ । यदि शुद्ध अहिंसा ही काम कर रही होगी तो सब कुछ<noinclude></noinclude> aq1rt0f2elcnpn638v67h4o5zpmlnbv 674474 674473 2026-08-26T17:06:36Z Kumari Arpana Sinha 2191 674474 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२८६. सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँवके लोगोंको'''}}}} धोलेरा और वीरमगावके आसपाससे जो खबरें आ रही हैं, उन्हें सुनते रहना असह्य ही गया है। बर्बरतापूर्ण अत्याचार किये जानेकी जो बातें कही जा रही हैं उन्हें मानते हुए रोमांच हो आता है। जिन्होंने विवरण भेजा है वे सावधान रहें और उसे सिद्ध करने को तैयार रहें। अमानुषिक अत्याचारका जो विवरण दिया गया है, उसके बारेमें कहा जाता है कि वह लुके-छिपे नहीं बल्कि खुले आम हुआ है। मुझे आशा है कि उक्त विवरण गलत होगा। किन्तु यदि यह सही हो तो सत्याग्रहके जो साधन आजतक प्रयोगमें आये हैं उनकी अपेक्षा कहीं उम्र साधन भी हैं जो काममें लाये जा सकते हैं। उनके द्वारा इन अमानुषिक कृत्योंको तो रोका ही जा सकता है। जिनपर अत्याचार हुआ है वे लोग घबरायें नहीं। मैं स्वयं उस ओर जानेको बेचैन हूँ। और यदि ये अत्याचार बन्द नहीं हुए, और ईश्वरकी कृपा होगी तो मैं वहाँ पहुँचकर उनके निवारणके उपाय सुझाऊँगा । वे लोग यह मान लें कि सूरत जिलेका काम करते हुए भी मेरा मन धोलेरा और वीरमगांवमें ही अटका रहेगा। [गुजरातीसे] '''नवजीवन,''' २० ४-१९३० {{C|{{larger|२८७. कलकत्ता और कराची}} कलकत्ता-कराचीसे मिली हुई खबरें चौंकानेवाली हैं। इनमें सचाई कितनी है, सो तो समय आनेपर पता चलेगा। अखबारोंमें इतनी झूठी बातें छपती हैं कि उनसे सत्यको जान लेना बहुत मुश्किल है। हिंसक शासनको हमेशा धूर्तताके सहारेकी आवश्यकता बनी ही रहती है। यह कौन नहीं जानता कि बारडोली सत्याग्रहके दिनों में सत्याग्रहियों के बारेमें बेसिर-पैरकी बातें फैलाई गई थी? मेरे सम्बन्धमें आये दिन जो झूठी खबरें फैलती रहती हैं, उनका क्या मुझे अनुभव नहीं है? इतना होते हुए भी हमारे विपक्षमें कुछ-न-कुछ सत्य तो है ही। यह सच है कि कुछ हिन्दुस्तानियोंने किसी-न-किसीकी जानमालको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाया है। इस तरह उन्होंने इस लड़ाईको नुकसान पहुँचाया है, और मेरी स्थितिको विषम बना दिया है। लोग मुझसे जिस सेवाकी आशा रखते हैं, ऐसी घटनाओंके कारण उसमें रुकावट पड़ती है। यह दुःखकी बात है। ऐसी घटनाएँ मुझे झकझोर देती हैं। यह मेरा स्वभाव है, उससे मैं कैसे बचूं? फिर भी मेरा रास्ता तो सीधा-सादा है। कुछ भी क्यों न हो, मैं इस लड़ाईको बन्द नहीं कर सकता। मेरे पास अपनी अहिंसाको मापनेका कोई पैमाना नहीं है। मैं श्रद्धापूर्वक काम कर रहा हूँ । यदि शुद्ध अहिंसा ही काम कर रही होगी तो सब कुछ<noinclude></noinclude> s2fq2dtzjc049mdze34xcz2efp5ub1n पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४६ 250 197389 674479 669913 2026-08-26T17:18:09Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674479 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठीक ही होगा। जो भी कदम उठाये जा रहे हैं, उनका आखिरी परिणाम अच्छा ही होगा। 'नवजीवन' के पाठकोंका एक ही मार्ग और कर्तव्य है। वे जहाँ जायें, शान्तिका ही प्रचार करें, किसीसे कोई कड़वी बात न कहें, अंग्रेजोंके प्रति तिरस्कारके भाव पैदा न करें और अपने ही देशके अफसरोंके प्रति भी किसीके दिलमें नफरत पैदा न करें। अत्याचारीसे भी प्रेम करना हमारा कर्तव्य है। हमें उसपर आंच तक नहीं आने देनी चाहिए। बढ़ते हुए अत्याचारका मुकाबला हमें अधिकाधिक दुःख सहकर करना है। कलकता-कराचीके समाचारोंमें एक सुखद समाचार भी है। जयरामदासकी जांघ में गोली लगी है। जयरामदाससे बढ़कर सहृदय और सरल व्यक्तिको मैं नहीं जानता। जैसी उनकी निर्मलता है, वैसी ही निर्मल बुद्धि है और वैसी ही उनकी प्रतिष्ठा है। जयरामदास कांग्रेसकी कार्यसमिति के सदस्य और विदेशी वस्त्र बहिष्कार समितिके मन्त्री हैं। वे पूर्णतः अहिंसावादी हैं। इस युद्धमें ऐसे ही पुरुषोंके बलिदानकी आवश्यकता है। अतएव जयरामदास को मैं सौभाग्यशाली समझता हूँ कि उनके हिस्से में यह पहली गोली आई। अगर वहाँ उपद्रव हो गया था तो जयरामदास उपद्रव कराने वहीं नहीं गये थे बल्कि लोगोंको शान्त करने गये थे। उनका घायल होना अच्छा ही है। ऐसे ही भारतीयोंके रक्त से स्वराज्य-मन्दिर चुना जायेगा। यदि हम भी इस यज्ञमें अन्तिम वलिदान देना चाहते हों तो हमें जयरामदासके समान निर्मल, सरल और दृढ़ बनना होगा। [गुजरातीसे] नवजीवन, २० ४ १९३० {{C|{{larger|२८८. विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी}}}} अभी-अभी दिल्लीसे मुझे एक तार मिला है, जिसमें लिखा है : "चौबीसों घंटे धरनेके फलस्वरूप विदेशी कपड़ेके व्यापारी कुछ विशेष शर्तोंपर समझौता करना चाहते हैं। जिस आर्डरका माल नहीं आया है उसे रद करने और जो माल पड़ा है उसे निर्धारित अवधिके भीतर बेच देनेकी अनुमति चाहते हैं।" प्रश्न यह है कि क्या ऐसी शर्तें स्वीकार की जा सकती हैं। मैंने अपनी यह राय लिख भेजी है : "अवधि कदापि नहीं दी जा सकती। यदि व्यापारियोंमें श्रद्धा हो तो वे विश्वास रखें कि स्वराज्यमें ऐसे गरीब व्यापारियोंको, जिनका नुकसान होगा, समुचित मुआवजा मिलेगा। सुखी-सम्पन्न व्यापारियोंको मुआवजा नहीं मिलेगा। यदि जमा मालके कारण उन्हें हानि उठानी पड़े तो वे इसे अपने पिछले पापोंका यत्किचित् प्रायश्चित्त समझें।<noinclude></noinclude> kyajfgf393qsf5j5iik7i1ztx1z41i8 674480 674479 2026-08-26T17:21:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 674480 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>ठीक ही होगा। जो भी कदम उठाये जा रहे हैं, उनका आखिरी परिणाम अच्छा ही होगा। 'नवजीवन' के पाठकोंका एक ही मार्ग और कर्तव्य है। वे जहाँ जायें, शान्तिका ही प्रचार करें, किसीसे कोई कड़वी बात न कहें, अंग्रेजोंके प्रति तिरस्कारके भाव पैदा न करें और अपने ही देशके अफसरोंके प्रति भी किसीके दिलमें नफरत पैदा न करें। अत्याचारीसे भी प्रेम करना हमारा कर्तव्य है। हमें उसपर आंच तक नहीं आने देनी चाहिए। बढ़ते हुए अत्याचारका मुकाबला हमें अधिकाधिक दुःख सहकर करना है। कलकता-कराचीके समाचारोंमें एक सुखद समाचार भी है। जयरामदासकी जांघ में गोली लगी है। जयरामदाससे बढ़कर सहृदय और सरल व्यक्तिको मैं नहीं जानता। जैसी उनकी निर्मलता है, वैसी ही निर्मल बुद्धि है और वैसी ही उनकी प्रतिष्ठा है। जयरामदास कांग्रेसकी कार्यसमिति के सदस्य और विदेशी वस्त्र बहिष्कार समितिके मन्त्री हैं। वे पूर्णतः अहिंसावादी हैं। इस युद्धमें ऐसे ही पुरुषोंके बलिदानकी आवश्यकता है। अतएव जयरामदास को मैं सौभाग्यशाली समझता हूँ कि उनके हिस्से में यह पहली गोली आई। अगर वहाँ उपद्रव हो गया था तो जयरामदास उपद्रव कराने वहीं नहीं गये थे बल्कि लोगोंको शान्त करने गये थे। उनका घायल होना अच्छा ही है। ऐसे ही भारतीयोंके रक्त से स्वराज्य-मन्दिर चुना जायेगा। यदि हम भी इस यज्ञमें अन्तिम वलिदान देना चाहते हों तो हमें जयरामदासके समान निर्मल, सरल और दृढ़ बनना होगा। [गुजरातीसे] नवजीवन, २० ४ १९३० {{C|{{larger|'''२८८. विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी'''}}}} अभी-अभी दिल्लीसे मुझे एक तार मिला है, जिसमें लिखा है : "चौबीसों घंटे धरनेके फलस्वरूप विदेशी कपड़ेके व्यापारी कुछ विशेष शर्तोंपर समझौता करना चाहते हैं। जिस आर्डरका माल नहीं आया है उसे रद करने और जो माल पड़ा है उसे निर्धारित अवधिके भीतर बेच देनेकी अनुमति चाहते हैं।" प्रश्न यह है कि क्या ऐसी शर्तें स्वीकार की जा सकती हैं। मैंने अपनी यह राय लिख भेजी है: "अवधि कदापि नहीं दी जा सकती। यदि व्यापारियोंमें श्रद्धा हो तो वे विश्वास रखें कि स्वराज्यमें ऐसे गरीब व्यापारियोंको, जिनका नुकसान होगा, समुचित मुआवजा मिलेगा। सुखी-सम्पन्न व्यापारियोंको मुआवजा नहीं मिलेगा। यदि जमा मालके कारण उन्हें हानि उठानी पड़े तो वे इसे अपने पिछले पापोंका यत्किचित् प्रायश्चित्त समझें।<noinclude></noinclude> tpuet15gvhpj27d56p83n0y3phduqqv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४७ 250 197390 674482 669914 2026-08-26T17:27:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674482 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी|२०३}}</noinclude>मेरे विचारसे स्वराज्यके इच्छुकोंके लिए यह आवश्यक है कि वे इसे भली-भाँति स्पष्ट कर दें। जो दुःसाहसी लोग मैदान में उतरे हैं, वे जीतें या मरें, परन्तु मरते- मरते भी स्वयं बहुत सी बातोंको साफ कर ही जायेंगे। इस संसारमें ऐसी कोई लड़ाई नहीं हुई, जिसमें हजारों आदमियोंको नुकसान न उठाना पड़ा हो। परन्तु यह संग्राम यदि अन्तत शान्तिमय बना रहा तो फल अधिकसे-अधिक मिलेगा और नुकसान कमसे कम होगा। इस तरह नुकसानको कम करनेकी दृष्टिसे भी सत्याग्रहियों को दृढ़ बनना चाहिए। जिस वहिष्कारको हमें आज ही सफल बनाना है, उसके लिए अवधि कैसी ? विदेशी कपड़ोंके सभी व्यापारी यदि अवधिको माँग करने लगें तो हम कहाँके रहेंगे ? तब तो बहिष्कार आन्दोलनकी शक्ति व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगी और दगाबाजी के आगे-पीछे और अगल-बगलके दरवाजे खुल जायेंगे। कौन किस व्यापारपर निगाह रखेगा ? हाँ, जिस व्यापारीको हमारी जीतका भरोसा नहीं है, परन्तु जो दगा भी नहीं देना चाहता, वह इतना कर सकता है कि फिलहाल अपने मालको सुरक्षित रख छोड़े। यदि जनता हार जाये और गुलामीका दूसरा पट्टा दे तो वे अपना माल सहजमें ही बेच सकेंगे। ऐसे व्यापारी जाने-पहचाने स्वयं-सेवकोंको अपने मालकी फेहरिस्त सौंप दें और उसपर कांग्रेसकी मुहर लगवा लें, जिससे उचित समयपर यदि उन्हें मुआवजा देना ठीक जान पड़े तो स्वराज्य सर कार मुआवजा दे सके। दूसरा रास्ता यह है कि ऐसे व्यापारी अपना माल वहाँ भेज दें, जहाँ विदेशी कपड़ा बिकता हो। जो कुछ करना ही चाहता है, उसे अनेक सीधे रास्ते मिल जाते हैं। अन्यथा, नाचना न जाननेवालेको आँगन टेढ़ा ही लगता है। परन्तु व्यापारीके दुःखका क्या रोना? पढ़े-लिखे वकीलोंके बारेमें क्या कहा जाये? जैसे-तैसे एक कन्हैयालाल मुंशीको अपना मार्ग स्पष्ट सूझ पड़ा और उन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालत तथा सरकारी समुदाय जिसे 'कैरियर' मानता है, उसका बलिदान कर दिया। दूसरे वकील सविनय अवज्ञा करते हुए डरते हैं। कहीं 'किताब' में से नाम कट जाये तो ? ये भले भीरु वकील सोचें तो समझ सकते हैं कि यदि सब सविनय अवज्ञा करें तो किसीका नाम 'किताब' से न निकले। लेकिन यदि सब वैसा न करें तो ? तो भी डर क्या है? त्यागी वकील यह विश्वास क्यों न रखे कि वह अपना भाग अदा करके स्वराज्यको अधिक निकट लायेगा। वह इस बातको क्यों न माने कि इस महायुद्धका अन्तिम परिणाम स्वराज्य ही होगा। उस समय 'किताब' से काटे गये नाम भी ससम्मान फिर लिखे जायेंगे। डाक्टर काउजे ट्रान्सवालके प्रसिद्ध वकील थे। वे फांसी पर लटकने से बचे थे। उनकी वकालत छीन ली गई थी। लेकिन उन्होंने पुनः प्रतिष्ठापूर्वक अपनी वकालत शुरू की और न सिर्फ खोया हुआ पाया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी। ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस लड़ाई में सबसे महंगी चीज विश्वास है। यदि हममें थोड़ा-सा भी आत्म-विश्वास आ जाये तो स्वराज्य हमारी मुट्ठी में है। अन्यथा भ्रमवश हम बगल में बैठे हुए बालकको सारे गाँवमें ढूंढते फिरेंगे।<noinclude></noinclude> n48xfmug37nins7ftr4s3qryycymo2h 674483 674482 2026-08-26T17:28:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 674483 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी|२०३}}</noinclude>मेरे विचारसे स्वराज्यके इच्छुकोंके लिए यह आवश्यक है कि वे इसे भली-भाँति स्पष्ट कर दें। जो दुःसाहसी लोग मैदान में उतरे हैं, वे जीतें या मरें, परन्तु मरते- मरते भी स्वयं बहुत सी बातोंको साफ कर ही जायेंगे। इस संसारमें ऐसी कोई लड़ाई नहीं हुई, जिसमें हजारों आदमियोंको नुकसान न उठाना पड़ा हो। परन्तु यह संग्राम यदि अन्तत शान्तिमय बना रहा तो फल अधिकसे-अधिक मिलेगा और नुकसान कमसे कम होगा। इस तरह नुकसानको कम करनेकी दृष्टिसे भी सत्याग्रहियों को दृढ़ बनना चाहिए। जिस वहिष्कारको हमें आज ही सफल बनाना है, उसके लिए अवधि कैसी ? विदेशी कपड़ोंके सभी व्यापारी यदि अवधिको माँग करने लगें तो हम कहाँके रहेंगे ? तब तो बहिष्कार आन्दोलनकी शक्ति व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगी और दगाबाजी के आगे-पीछे और अगल-बगलके दरवाजे खुल जायेंगे। कौन किस व्यापारपर निगाह रखेगा ? हाँ, जिस व्यापारीको हमारी जीतका भरोसा नहीं है, परन्तु जो दगा भी नहीं देना चाहता, वह इतना कर सकता है कि फिलहाल अपने मालको सुरक्षित रख छोड़े। यदि जनता हार जाये और गुलामीका दूसरा पट्टा दे तो वे अपना माल सहजमें ही बेच सकेंगे। ऐसे व्यापारी जाने-पहचाने स्वयं-सेवकोंको अपने मालकी फेहरिस्त सौंप दें और उसपर कांग्रेसकी मुहर लगवा लें, जिससे उचित समयपर यदि उन्हें मुआवजा देना ठीक जान पड़े तो स्वराज्य सर कार मुआवजा दे सके। दूसरा रास्ता यह है कि ऐसे व्यापारी अपना माल वहाँ भेज दें, जहाँ विदेशी कपड़ा बिकता हो। जो कुछ करना ही चाहता है, उसे अनेक सीधे रास्ते मिल जाते हैं। अन्यथा, नाचना न जाननेवालेको आँगन टेढ़ा ही लगता है। परन्तु व्यापारीके दुःखका क्या रोना? पढ़े-लिखे वकीलोंके बारेमें क्या कहा जाये? जैसे-तैसे एक कन्हैयालाल मुंशीको अपना मार्ग स्पष्ट सूझ पड़ा और उन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालत तथा सरकारी समुदाय जिसे 'कैरियर' मानता है, उसका बलिदान कर दिया। दूसरे वकील सविनय अवज्ञा करते हुए डरते हैं। कहीं 'किताब' में से नाम कट जाये तो ? ये भले भीरु वकील सोचें तो समझ सकते हैं कि यदि सब सविनय अवज्ञा करें तो किसीका नाम 'किताब' से न निकले। लेकिन यदि सब वैसा न करें तो ? तो भी डर क्या है? त्यागी वकील यह विश्वास क्यों न रखे कि वह अपना भाग अदा करके स्वराज्यको अधिक निकट लायेगा। वह इस बातको क्यों न माने कि इस महायुद्धका अन्तिम परिणाम स्वराज्य ही होगा। उस समय 'किताब' से काटे गये नाम भी ससम्मान फिर लिखे जायेंगे। डाक्टर काउजे ट्रान्सवालके प्रसिद्ध वकील थे। वे फांसी पर लटकने से बचे थे। उनकी वकालत छीन ली गई थी। लेकिन उन्होंने पुनः प्रतिष्ठापूर्वक अपनी वकालत शुरू की और न सिर्फ खोया हुआ पाया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी। ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस लड़ाई में सबसे महंगी चीज विश्वास है। यदि हममें थोड़ा-सा भी आत्म-विश्वास आ जाये तो स्वराज्य हमारी मुट्ठी में है। अन्यथा भ्रमवश हम बगल में बैठे हुए बालकको सारे गाँवमें ढूंढते फिरेंगे।<noinclude></noinclude> rnbqlmulkfwgda0laeghwtea2kd6cmh 674484 674483 2026-08-26T17:28:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 674484 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी|२०३}}</noinclude>मेरे विचारसे स्वराज्यके इच्छुकोंके लिए यह आवश्यक है कि वे इसे भली-भाँति स्पष्ट कर दें। जो दुःसाहसी लोग मैदान में उतरे हैं, वे जीतें या मरें, परन्तु मरते- मरते भी स्वयं बहुत सी बातोंको साफ कर ही जायेंगे। इस संसारमें ऐसी कोई लड़ाई नहीं हुई, जिसमें हजारों आदमियोंको नुकसान न उठाना पड़ा हो। परन्तु यह संग्राम यदि अन्तत शान्तिमय बना रहा तो फल अधिकसे-अधिक मिलेगा और नुकसान कमसे कम होगा। इस तरह नुकसानको कम करनेकी दृष्टिसे भी सत्याग्रहियों को दृढ़ बनना चाहिए। जिस वहिष्कारको हमें आज ही सफल बनाना है, उसके लिए अवधि कैसी ? विदेशी कपड़ोंके सभी व्यापारी यदि अवधिको माँग करने लगें तो हम कहाँके रहेंगे ? तब तो बहिष्कार आन्दोलनकी शक्ति व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगी और दगाबाजी के आगे-पीछे और अगल-बगलके दरवाजे खुल जायेंगे। कौन किस व्यापारपर निगाह रखेगा ? हाँ, जिस व्यापारीको हमारी जीतका भरोसा नहीं है, परन्तु जो दगा भी नहीं देना चाहता, वह इतना कर सकता है कि फिलहाल अपने मालको सुरक्षित रख छोड़े। यदि जनता हार जाये और गुलामीका दूसरा पट्टा दे तो वे अपना माल सहजमें ही बेच सकेंगे। ऐसे व्यापारी जाने-पहचाने स्वयं-सेवकोंको अपने मालकी फेहरिस्त सौंप दें और उसपर कांग्रेसकी मुहर लगवा लें, जिससे उचित समयपर यदि उन्हें मुआवजा देना ठीक जान पड़े तो स्वराज्य सर कार मुआवजा दे सके। दूसरा रास्ता यह है कि ऐसे व्यापारी अपना माल वहाँ भेज दें, जहाँ विदेशी कपड़ा बिकता हो। जो कुछ करना ही चाहता है, उसे अनेक सीधे रास्ते मिल जाते हैं। अन्यथा, नाचना न जाननेवालेको आँगन टेढ़ा ही लगता है। परन्तु व्यापारीके दुःखका क्या रोना? पढ़े-लिखे वकीलोंके बारेमें क्या कहा जाये? जैसे-तैसे एक कन्हैयालाल मुंशीको अपना मार्ग स्पष्ट सूझ पड़ा और उन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालत तथा सरकारी समुदाय जिसे 'कैरियर' मानता है, उसका बलिदान कर दिया। दूसरे वकील सविनय अवज्ञा करते हुए डरते हैं। कहीं 'किताब' में से नाम कट जाये तो ? ये भले भीरु वकील सोचें तो समझ सकते हैं कि यदि सब सविनय अवज्ञा करें तो किसीका नाम 'किताब' से न निकले। लेकिन यदि सब वैसा न करें तो ? तो भी डर क्या है? त्यागी वकील यह विश्वास क्यों न रखे कि वह अपना भाग अदा करके स्वराज्यको अधिक निकट लायेगा। वह इस बातको क्यों न माने कि इस महायुद्धका अन्तिम परिणाम स्वराज्य ही होगा। उस समय 'किताब' से काटे गये नाम भी ससम्मान फिर लिखे जायेंगे। डाक्टर काउजे ट्रान्सवालके प्रसिद्ध वकील थे। वे फांसी पर लटकने से बचे थे। उनकी वकालत छीन ली गई थी। लेकिन उन्होंने पुनः प्रतिष्ठापूर्वक अपनी वकालत शुरू की और न सिर्फ खोया हुआ पाया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी। ऐसे बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस लड़ाई में सबसे महंगी चीज विश्वास है। यदि हममें थोड़ा-सा भी आत्म-विश्वास आ जाये तो स्वराज्य हमारी मुट्ठी में है। अन्यथा भ्रमवश हम बगल में बैठे हुए बालकको सारे गाँवमें ढूंढते फिरेंगे।<noinclude></noinclude> gtobnxdjav1lyiipz5s8jx8x749z280 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४८ 250 197391 674489 669915 2026-08-26T17:41:16Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674489 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{rh|३०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जैसे व्यापारी और वकील हैं, वैसे ही विद्यार्थी हैं। हम कितने नीचे गिर गये हैं, इसका हम विचार तक नहीं कर पाते। इसी कारण हमें अपनी गिरी हुई हालतसे जितनी अरुचि होनी चाहिए उतनी अरुचि नहीं होती। अपनी स्थिति के बारेमें यह अज्ञान हमारे आड़े आता है। इसके बावजूद आज जिस तेजीके साथ हम बड़े जा रहे हैं, यदि वह तेजी बनी रहे तो व्यापारी, वकील, विद्यार्थी, वैद्य और नाई तक सबमें तेज और साहस आ जायेगा और हम अपनी इच्छित वस्तु शीघ्र ही पा लेंगे। [गुजरातीसे] '''नवजीवन, २० ४-१९३० {{C|{{larger|'''२८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, मैने छोटेलालको आज अहमदाबाद भेजा है, उसी तरह जिस तरह प्यारेलालको भेजा है। उन दोनोंको अपनी सेवामें रखनेसे उनकी और मेरी आरामतलबी बढ़ती जा रही थी और मैं उनका पूरी तरहसे उपयोग नहीं कर पाता था। इसीसे प्यारेलालको बढवान और अन्य स्थानोंपर भेजा तथा छोटेलालको विद्यापीठ तथा अन्यत्र रहने और तकली, चरखे आदिका प्रचार करनेके लिए भेजा है। किन बहनोंको हर हालत में वहां रहना चाहिए, सो लिखना। छोटेलालके हाथ जो २५० रुपये भेजे हैं वे एक मारवाड़ी सज्जनसे मिले हैं। उन्हें सत्याग्रह कोपमें डाल देना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude> azdxvxne72qbi4sghfae3r6xyppsdic 674490 674489 2026-08-26T17:41:58Z Kumari Arpana Sinha 2191 674490 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जैसे व्यापारी और वकील हैं, वैसे ही विद्यार्थी हैं। हम कितने नीचे गिर गये हैं, इसका हम विचार तक नहीं कर पाते। इसी कारण हमें अपनी गिरी हुई हालतसे जितनी अरुचि होनी चाहिए उतनी अरुचि नहीं होती। अपनी स्थिति के बारेमें यह अज्ञान हमारे आड़े आता है। इसके बावजूद आज जिस तेजीके साथ हम बड़े जा रहे हैं, यदि वह तेजी बनी रहे तो व्यापारी, वकील, विद्यार्थी, वैद्य और नाई तक सबमें तेज और साहस आ जायेगा और हम अपनी इच्छित वस्तु शीघ्र ही पा लेंगे। [गुजरातीसे] '''नवजीवन, २० ४-१९३० {{C|{{larger|'''२८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, मैने छोटेलालको आज अहमदाबाद भेजा है, उसी तरह जिस तरह प्यारेलालको भेजा है। उन दोनोंको अपनी सेवामें रखनेसे उनकी और मेरी आरामतलबी बढ़ती जा रही थी और मैं उनका पूरी तरहसे उपयोग नहीं कर पाता था। इसीसे प्यारेलालको बढवान और अन्य स्थानोंपर भेजा तथा छोटेलालको विद्यापीठ तथा अन्यत्र रहने और तकली, चरखे आदिका प्रचार करनेके लिए भेजा है। किन बहनोंको हर हालत में वहां रहना चाहिए, सो लिखना। छोटेलालके हाथ जो २५० रुपये भेजे हैं वे एक मारवाड़ी सज्जनसे मिले हैं। उन्हें सत्याग्रह कोपमें डाल देना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude> tukvlkzdtzyzvx33mfmman86wrinbzu 674491 674490 2026-08-26T17:42:52Z Kumari Arpana Sinha 2191 674491 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जैसे व्यापारी और वकील हैं, वैसे ही विद्यार्थी हैं। हम कितने नीचे गिर गये हैं, इसका हम विचार तक नहीं कर पाते। इसी कारण हमें अपनी गिरी हुई हालतसे जितनी अरुचि होनी चाहिए उतनी अरुचि नहीं होती। अपनी स्थिति के बारेमें यह अज्ञान हमारे आड़े आता है। इसके बावजूद आज जिस तेजीके साथ हम बड़े जा रहे हैं, यदि वह तेजी बनी रहे तो व्यापारी, वकील, विद्यार्थी, वैद्य और नाई तक सबमें तेज और साहस आ जायेगा और हम अपनी इच्छित वस्तु शीघ्र ही पा लेंगे। [गुजरातीसे] '''नवजीवन, २० ४-१९३० {{C|{{larger|'''२८९. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, मैने छोटेलालको आज अहमदाबाद भेजा है, उसी तरह जिस तरह प्यारेलालको भेजा है। उन दोनोंको अपनी सेवामें रखनेसे उनकी और मेरी आरामतलबी बढ़ती जा रही थी और मैं उनका पूरी तरहसे उपयोग नहीं कर पाता था। इसीसे प्यारेलालको बढवान और अन्य स्थानोंपर भेजा तथा छोटेलालको विद्यापीठ तथा अन्यत्र रहने और तकली, चरखे आदिका प्रचार करनेके लिए भेजा है। किन बहनोंको हर हालत में वहां रहना चाहिए, सो लिखना। छोटेलालके हाथ जो २५० रुपये भेजे हैं वे एक मारवाड़ी सज्जनसे मिले हैं। उन्हें सत्याग्रह कोपमें डाल देना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०२ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude> fileh8a5rw8n59888fuubu3a2mj9oaa पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४९ 250 197392 674496 669916 2026-08-26T17:56:09Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674496 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९०. पत्र : जमनादास गांधीको'''}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० जमनादास मैं तेरे पत्रकी राह देख रहा था। तू ठीक काम कर रहा जान पड़ता है। तेरा गला ठीक है या नहीं? खुशालभाई यदि आन्दोलनमें शामिल हो जायें तो बहुत अच्छा हो। मेरे विचारसे तो इसमें शामिल होना शुद्ध धर्म है। मुझे ब्योरेवार पत्र लिखते रहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} चि० जमनादास गांधी मिडिल स्कूलके सामने नवापारा, राजकोट काठियावाड़ गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३०७ ) से। सौजन्य : जमनादास गांधी {{C|{{larger|'''२९१. पत्र : क० मा० मुंशीको'''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} भाईश्री मुंशी, आज एक पत्र मिला है जिसमें लिखा है: '''श्री मुंशीने अपने साहसपूर्ण कदमसे लोगोंपर अच्छा प्रभाव डाला है। लेकिन उन्होंने अपने वकील मित्रोंको एक गश्ती चिट्ठी भेजी है जिसमें उन्होंने लिखा है कि वे दोपहरको एक बजेसे चार बजे तक अपने चेम्बर में कामकाज देख सकेंगे।''' सात व्यक्तियोंके हस्ताक्षरोंसे युक्त एक और पत्र मुझे प्राप्त हुआ है जिसमें आपको गालियां दी गई हैं। हस्ताक्षर करनेवाले व्यक्तियोंकी इच्छा है कि यह पत्र प्रकाशित किया जाये। मैंने ऐसा करनेसे साफ इनकार कर दिया है। यह तो केवल आपकी जानकारीके लिए है। श्री मुकुन्द मालवीयने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि अभी उनमें से कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं वहाँ जाऊँ। मैं कांग्रेसके नेताओंसे ४३-२०<noinclude></noinclude> 96z8c70tya62ozgoa5xvq7ho239yohx 674497 674496 2026-08-26T17:56:38Z Kumari Arpana Sinha 2191 674497 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९०. पत्र : जमनादास गांधीको''''}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० जमनादास मैं तेरे पत्रकी राह देख रहा था। तू ठीक काम कर रहा जान पड़ता है। तेरा गला ठीक है या 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वहाँ जाऊँ। मैं कांग्रेसके नेताओंसे ४३-२०<noinclude></noinclude> 0eczlza0ng7ktidep14zdctliwjhgnc 674499 674497 2026-08-26T17:57:30Z Kumari Arpana Sinha 2191 674499 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९०. पत्र : जमनादास गांधीको''''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० जमनादास मैं तेरे पत्रकी राह देख रहा था। तू ठीक काम कर रहा जान पड़ता है। तेरा गला ठीक है या नहीं? खुशालभाई यदि आन्दोलनमें शामिल हो जायें तो बहुत अच्छा हो। मेरे विचारसे तो इसमें शामिल होना शुद्ध धर्म है। मुझे ब्योरेवार पत्र लिखते रहना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} चि० जमनादास गांधी मिडिल स्कूलके सामने नवापारा, राजकोट काठियावाड़ गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३०७ ) से। सौजन्य : जमनादास गांधी {{C|{{larger|'''२९१. पत्र : क० मा० मुंशीको'''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} भाईश्री मुंशी, आज एक पत्र मिला है जिसमें लिखा है: '''श्री मुंशीने अपने साहसपूर्ण कदमसे लोगोंपर अच्छा प्रभाव डाला है। लेकिन उन्होंने अपने वकील मित्रोंको एक गश्ती चिट्ठी भेजी है जिसमें उन्होंने लिखा है कि वे दोपहरको एक बजेसे चार बजे तक अपने चेम्बर में कामकाज देख सकेंगे।''' सात व्यक्तियोंके हस्ताक्षरोंसे युक्त एक और पत्र मुझे प्राप्त हुआ है जिसमें आपको गालियां दी गई हैं। हस्ताक्षर करनेवाले व्यक्तियोंकी इच्छा है कि यह पत्र प्रकाशित किया जाये। मैंने ऐसा करनेसे साफ इनकार कर दिया है। यह तो केवल आपकी जानकारीके लिए है। श्री मुकुन्द मालवीयने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि अभी उनमें से कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं वहाँ जाऊँ। मैं कांग्रेसके नेताओंसे ४३-२०<noinclude></noinclude> 3rj6rmdlo3nvwbbs0w3gnbth6ozzdzx 674501 674499 2026-08-26T17:58:24Z Kumari Arpana Sinha 2191 674501 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९०. पत्र : जमनादास गांधीको''''}}}} {{Right|२० अप्रैल, १९३०}} चि० जमनादास मैं तेरे पत्रकी राह देख रहा था। तू ठीक काम कर रहा जान पड़ता है। तेरा गला ठीक है या नहीं? खुशालभाई यदि आन्दोलनमें शामिल हो जायें तो बहुत अच्छा हो। मेरे विचारसे तो इसमें शामिल होना शुद्ध धर्म है। मुझे ब्योरेवार 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Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५० 250 197393 674560 669917 2026-08-27T05:52:39Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674560 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भी मिला हूँ। उनका भी यही कहना है। वे कहते हैं कि जब हम आपके मनोनुकूल कोई काम कर दिखायें तभी आप आयें। अभी तो आप मुझे वहाँ आनेके लिए विवश न करेंगे। यहाँके कामसे मुझे पल-भरकी भी फुरसत नहीं है। बम्बईमें उत्साहका प्रसार करनेकी आवश्यकता अधिक नहीं है। [अपने लिए] शान्तिकी दृष्टिसे मेरा तो यही सुझाव है। कांग्रेसके चन्द नेताओंको लेकर यहाँ आ जाओ। मुझे तो अभी इससे उबार लोगे न? लीलावती से कहना कि उससे मैं अलगसे और भारी योगदानकी अपेक्षा रखता हूँ। हमारे पुराने सम्बन्धका स्मरण आपने सार्वजनिक रूपसे कराया है, इसमें यदि उसकी सम्मति रही हो तो मैं कहना चाहूँगा कि हमारा वह पुराना सम्बन्ध बाप- बेटीका था। एक बिछुड़ा हुआ बाप अपनी खोई हुई बेटीको पाकर उससे क्या-क्या आशाएँ करेगा? {{Right|मोहनदासके वन्देमातरम्}} [पुनश्:] इस पत्रको समाप्त करनेके बाद मुझे एक और पत्र मिला है जिसमें आपकी प्रशंसा की गई है। इसे तो मुझे आपको भेजना ही चाहिए। मुझे वापस मत भेजना। फाड़ देना। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७५१३) से। सौजन्य : क० मा० मुंशी {{C|{{larger|'''२९२. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|साढ़े ९ बजे रातको २० अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, दो दिनसे तुम्हारा पत्र नहीं आया। मैं वीरमगाँव और धोलेराके बारेमें जाननेको उत्सुक हूँ। लिखना अथवा किसीसे लिखवाना चटगाँवमें तो बलवा ही हो गया जान पड़ता है। राम जैसा रखे वैसा रहें। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (एस० एन० ११४८३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> 080ngbzbla7atxwowjt106f17yvqb26 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५१ 250 197394 674565 669918 2026-08-27T05:58:55Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* शोधित नहीं */ 674565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२९३. भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको}}}} {{Right|जलालपुर}} {{{Right|२० अप्रैल, १९३०}} देखता हूँ, बहुत-से मित्र अगले सप्ताह बम्बईमें मेरी उपस्थितिकी आशा लगाये हुए हैं। श्रीयुत मुंशीके आग्रहपूर्ण निमन्त्रणके उत्तरमें मैंने लिखा था कि अगर मौसम ठीक रहा तो मैं अगले सप्ताह बम्बई आ सकता हूँ। लेकिन मैं देखता हूँ कि इन इलाकों में मेरी उपस्थिति बहुत आवश्यक है और बम्बईसे कई मित्रोंने मुझे पत्र लिखे हैं कि जबतक बम्बई और अच्छी तरह तैयार न हो जाये, मुझे गुजरातसे बाहर नहीं निकलना चाहिए। जहाँतक अखबारोंसे मालूम होता है, बम्बई में उत्साहकी कमी नहीं है। अनुशासनकी बात मुझे मालूम नहीं। इस समय तो हम जो चाहते। है यह है कठोरतम अनुशासन रक्तरंजित युद्धमें भाग लेनेके लिए खड़ी की गई सेनासे भी अधिक कठोर अनुशासन; और इस अनुशासनके साथ-साथ चुने हुए कानूनोंका और केवल उन्हींका, अहिंसा और सत्यके सिद्धान्तोंके अनुरूप अधिकतम प्रतिरोध। फिर, लगातार रचनात्मक कार्यक्रमको भी चलाते रहना है--इस प्रकार कि मानों आज ही स्वराज्य स्थापित होना है। यह सब बम्बई में कहाँ तक हो रहा है, यह मैं नहीं जानता। इसलिए मैं बम्बईवासी भाइयोंसे कहता हूँ कि वे मुझे बम्बई बुलानेकी जल्दी न करें। यदि केवल गुजरातके स्त्री-पुरुष ही, उनके सामने जो काम रखा गया है, उसके प्रति यथेष्ट उत्साह दिखायें तो वह स्वराज्यप्राप्तिकी दिशामें एक बहुत बड़ी बात होगी। आखिरकार यह संघर्ष एक सार्वजनिक आन्दोलनका रूप लेता जा रहा है। इसलिए किसीकी भी उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। सबसे जरूरी बात यह है कि आज सर्वत्र जो एक विलक्षण उत्साहका ज्वार उठ रहा है उसे जहाँतक सम्भव हो, विशुद्ध अहिंसात्मक ढंगकी स्थायी और सक्रिय शक्तिका रूप दिया जाये। दुनियाको गत १२ मार्चसे हमारे उत्साहका पर्याप्त परिचय मिल चुका है। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude> 0tqf2tl6rd3qzrox10cuchlakmi5v0y 674566 674565 2026-08-27T05:59:42Z Kumari Arpana Sinha 2191 674566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९३. भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|जलालपुर}} {{{Right|२० अप्रैल, १९३०}} देखता हूँ, बहुत-से मित्र अगले सप्ताह बम्बईमें मेरी उपस्थितिकी आशा लगाये हुए हैं। श्रीयुत मुंशीके आग्रहपूर्ण निमन्त्रणके उत्तरमें मैंने लिखा था कि अगर मौसम ठीक रहा तो मैं अगले सप्ताह बम्बई आ सकता हूँ। लेकिन मैं देखता हूँ कि इन इलाकों में मेरी उपस्थिति बहुत आवश्यक है और बम्बईसे कई मित्रोंने मुझे पत्र लिखे हैं कि जबतक बम्बई और अच्छी तरह तैयार न हो जाये, मुझे गुजरातसे बाहर नहीं निकलना चाहिए। जहाँतक अखबारोंसे मालूम होता है, बम्बई में उत्साहकी कमी नहीं है। अनुशासनकी बात मुझे मालूम नहीं। इस समय तो हम जो चाहते। है यह है कठोरतम अनुशासन रक्तरंजित युद्धमें भाग लेनेके लिए खड़ी की गई सेनासे भी अधिक कठोर अनुशासन; और इस अनुशासनके साथ-साथ चुने हुए कानूनोंका और केवल उन्हींका, अहिंसा और सत्यके सिद्धान्तोंके अनुरूप अधिकतम प्रतिरोध। फिर, लगातार रचनात्मक कार्यक्रमको भी चलाते रहना है--इस प्रकार कि मानों आज ही स्वराज्य स्थापित होना है। यह सब बम्बई में कहाँ तक हो रहा है, यह मैं नहीं जानता। इसलिए मैं बम्बईवासी भाइयोंसे कहता हूँ कि वे मुझे बम्बई बुलानेकी जल्दी न करें। यदि केवल गुजरातके स्त्री-पुरुष ही, उनके सामने जो काम रखा गया है, उसके प्रति यथेष्ट उत्साह दिखायें तो वह स्वराज्यप्राप्तिकी दिशामें एक बहुत बड़ी बात होगी। आखिरकार यह संघर्ष एक सार्वजनिक आन्दोलनका रूप लेता जा रहा है। इसलिए किसीकी भी उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। सबसे जरूरी बात यह है कि आज सर्वत्र जो एक विलक्षण उत्साहका ज्वार उठ रहा है उसे जहाँतक सम्भव हो, विशुद्ध अहिंसात्मक ढंगकी स्थायी और सक्रिय शक्तिका रूप दिया जाये। दुनियाको गत १२ मार्चसे हमारे उत्साहका पर्याप्त परिचय मिल चुका है। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २१-४-१९३०<noinclude></noinclude> ta99w0gzu7fqk0i303w10iyq2uh4zcz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५६ 250 197399 674583 669924 2026-08-27T06:31:43Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674583 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय</noinclude>यह लेख लिखते समय अभी दो स्वयंसेवक मेरे पास ऐसा नमक लेकर आये हैं जिसे विषाक्त बताया जाता है। अधिकारीगण न केवल नमक और नमककी कड़ाहियोंको मनमाने ढंगसे नष्ट करते हैं, बल्कि कहते हैं, अब वे उसके उद्गम स्थलको विषाक्त भी करने लगे हैं। अगर यह खबर सही हैं तो इस शासनका कलंक और भी गहरा हो जाता है। और यह सब किया किनके खिलाफ जा रहा है? उन लोगोंके खिलाफ जो किसीको किसी प्रकारकी चोट पहुँचाये बिना कष्ट सहन करके स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|२९६. पत्र : मीराबहनको}}}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, मुझे पेंसिल से पत्र लिखनेसे चिढ़ है। लेकिन यह खत में प्रार्थना स्थलपर और लोगोंके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए लिख रहा हूँ। ४ बजकर २० मिनट हुआ ही चाहता है। तुम्हें प्रेमाबाईसे अपने हृदयका सम्पूर्ण प्रेम डालकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करोगी तो वह तुम्हारी बात अवश्य सुनेगी। वह योग्य और भली लड़की है। वह अपने तई अच्छेसे अच्छा काम करना चाहती है। उसे अपनी खामियोंका पता है। जरूरत सिर्फ इसी बात की है कि कोई स्नेहपूर्वक उसकी सहायता करे। मैं उसे भी लिख रहा हूँ। रेजिनाल्डका क्या हाल है? मैं लगातार घूम रहा हूँ और कताईपर ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। कताईके बिना विदेशी वस्त्रका बहिष्कार हमें उलझा देनेवाला एक जाल बनकर रह जायेगा। और कताईको सार्वत्रिक बनानेवाली एकमात्र वस्तु तकली है । इसलिए तुमसे वहाँ ज्यादा खादी तैयार करनेके लिए जो कुछ हो सके, करना। मैं तुम्हारे ही बारेमें एक कतरन तुम्हें भेज रहा हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च:] स्याहीवाला भाग प्रार्थनाके बाद लिखा गया था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९३) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२७ से भी। <small>१.तपत्र पेंसिल्से दिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> grv6d9neat8lc56brwml4qdu611f602 674585 674583 2026-08-27T06:34:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 674585 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यह लेख लिखते समय अभी दो स्वयंसेवक मेरे पास ऐसा नमक लेकर आये हैं जिसे विषाक्त बताया जाता है। अधिकारीगण न केवल नमक और नमककी कड़ाहियोंको मनमाने ढंगसे नष्ट करते हैं, बल्कि कहते हैं, अब वे उसके उद्गम स्थलको विषाक्त भी करने लगे हैं। अगर यह खबर सही हैं तो इस शासनका कलंक और भी गहरा हो जाता है। और यह सब किया किनके खिलाफ जा रहा है? उन लोगोंके खिलाफ जो किसीको किसी प्रकारकी चोट पहुँचाये बिना कष्ट सहन करके स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|२९६. पत्र : मीराबहनको}}}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, मुझे पेंसिल से पत्र लिखनेसे चिढ़ है। लेकिन यह खत में प्रार्थना स्थलपर और लोगोंके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए लिख रहा हूँ। ४ बजकर २० मिनट हुआ ही चाहता है। तुम्हें प्रेमाबाईसे अपने हृदयका सम्पूर्ण प्रेम डालकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करोगी तो वह तुम्हारी बात अवश्य सुनेगी। वह योग्य और भली लड़की है। वह अपने तई अच्छेसे अच्छा काम करना चाहती है। उसे अपनी खामियोंका पता है। जरूरत सिर्फ इसी बात की है कि कोई स्नेहपूर्वक उसकी सहायता करे। मैं उसे भी लिख रहा हूँ। रेजिनाल्डका क्या हाल है? मैं लगातार घूम रहा हूँ और कताईपर ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। कताईके बिना विदेशी वस्त्रका बहिष्कार हमें उलझा देनेवाला एक जाल बनकर रह जायेगा। और कताईको सार्वत्रिक बनानेवाली एकमात्र वस्तु तकली है । इसलिए तुमसे वहाँ ज्यादा खादी तैयार करनेके लिए जो कुछ हो सके, करना। मैं तुम्हारे ही बारेमें एक कतरन तुम्हें भेज रहा हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च:] स्याहीवाला भाग प्रार्थनाके बाद लिखा गया था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९३) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२७ से भी। <small>१.तपत्र पेंसिल्से दिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> exwj8gtkbuifc4z71q4ufnh69mlqu3e 674586 674585 2026-08-27T06:36:09Z Kumari Arpana Sinha 2191 674586 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यह लेख लिखते समय अभी दो स्वयंसेवक मेरे पास ऐसा नमक लेकर आये हैं जिसे विषाक्त बताया जाता है। अधिकारीगण न केवल नमक और नमककी कड़ाहियोंको मनमाने ढंगसे नष्ट करते हैं, बल्कि कहते हैं, अब वे उसके उद्गम स्थलको विषाक्त भी करने लगे हैं। अगर यह खबर सही हैं तो इस शासनका कलंक और भी गहरा हो जाता है। और यह सब किया किनके खिलाफ जा रहा है? उन लोगोंके खिलाफ जो किसीको किसी प्रकारकी चोट पहुँचाये बिना कष्ट सहन करके स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|२९६. पत्र : मीराबहनको}}}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, मुझे पेंसिल से पत्र लिखनेसे चिढ़ है। लेकिन यह खत में प्रार्थना स्थलपर और लोगोंके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए लिख रहा हूँ। ४ बजकर २० मिनट हुआ ही चाहता है। तुम्हें प्रेमाबाईसे अपने हृदयका सम्पूर्ण प्रेम डालकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करोगी तो वह तुम्हारी बात अवश्य सुनेगी। वह योग्य और भली लड़की है। वह अपने तई अच्छेसे अच्छा काम करना चाहती है। उसे अपनी खामियोंका पता है। जरूरत सिर्फ इसी बात की है कि कोई स्नेहपूर्वक उसकी सहायता करे। मैं उसे भी लिख रहा हूँ। रेजिनाल्डका क्या हाल है? मैं लगातार घूम रहा हूँ और कताईपर ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। कताईके बिना विदेशी वस्त्रका बहिष्कार हमें उलझा देनेवाला एक जाल बनकर रह जायेगा। और कताईको सार्वत्रिक बनानेवाली एकमात्र वस्तु तकली है । इसलिए तुमसे वहाँ ज्यादा खादी तैयार करनेके लिए जो कुछ हो सके, करना। मैं तुम्हारे ही बारेमें एक कतरन तुम्हें भेज रहा हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च:] स्याहीवाला भाग प्रार्थनाके बाद लिखा गया था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९३) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२७ से भी। <small>१.तपत्र पेंसिल्से दिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> ga8f3flh9wykgzekcb67q98wjzoliy1 674587 674586 2026-08-27T06:36:40Z Kumari Arpana Sinha 2191 674587 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यह लेख लिखते समय अभी दो स्वयंसेवक मेरे पास ऐसा नमक लेकर आये हैं जिसे विषाक्त बताया जाता है। अधिकारीगण न केवल नमक और नमककी कड़ाहियोंको मनमाने ढंगसे नष्ट करते हैं, बल्कि कहते हैं, अब वे उसके उद्गम स्थलको विषाक्त भी करने लगे हैं। अगर यह खबर सही हैं तो इस शासनका कलंक और भी गहरा हो जाता है। और यह सब किया किनके खिलाफ जा रहा है? उन लोगोंके खिलाफ जो किसीको किसी प्रकारकी चोट पहुँचाये बिना कष्ट सहन करके स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''२९६. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, मुझे पेंसिल से पत्र लिखनेसे चिढ़ है। लेकिन यह खत में प्रार्थना स्थलपर और लोगोंके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए लिख रहा हूँ। ४ बजकर २० मिनट हुआ ही चाहता है। तुम्हें प्रेमाबाईसे अपने हृदयका सम्पूर्ण प्रेम डालकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करोगी तो वह तुम्हारी बात अवश्य सुनेगी। वह योग्य और भली लड़की है। वह अपने तई अच्छेसे अच्छा काम करना चाहती है। उसे अपनी खामियोंका पता है। जरूरत सिर्फ इसी बात की है कि कोई स्नेहपूर्वक उसकी सहायता करे। मैं उसे भी लिख रहा हूँ। रेजिनाल्डका क्या हाल है? मैं लगातार घूम रहा हूँ और कताईपर ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। कताईके बिना विदेशी वस्त्रका बहिष्कार हमें उलझा देनेवाला एक जाल बनकर रह जायेगा। और कताईको सार्वत्रिक बनानेवाली एकमात्र वस्तु तकली है । इसलिए तुमसे वहाँ ज्यादा खादी तैयार करनेके लिए जो कुछ हो सके, करना। मैं तुम्हारे ही बारेमें एक कतरन तुम्हें भेज रहा हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च:] स्याहीवाला भाग प्रार्थनाके बाद लिखा गया था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९३) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२७ से भी। <small>१.तपत्र पेंसिल्से दिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> 6oyg847ydd7v3buq5uo3w5obondcijl 674589 674587 2026-08-27T06:37:45Z Kumari Arpana Sinha 2191 674589 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|३१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>यह लेख लिखते समय अभी दो स्वयंसेवक मेरे पास ऐसा नमक लेकर आये हैं जिसे विषाक्त बताया जाता है। अधिकारीगण न केवल नमक और नमककी कड़ाहियोंको मनमाने ढंगसे नष्ट करते हैं, बल्कि कहते हैं, अब वे उसके उद्गम स्थलको विषाक्त भी करने लगे हैं। अगर यह खबर सही हैं तो इस शासनका कलंक और भी गहरा हो जाता है। और यह सब किया किनके खिलाफ जा रहा है? उन लोगोंके खिलाफ जो किसीको किसी प्रकारकी चोट पहुँचाये बिना कष्ट सहन करके स्वतन्त्रता प्राप्त करनेकी कोशिश कर रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''यंग इंडिया,''' २४-४-१९३० {{C|{{larger|'''२९६. पत्र : मीराबहनको'''}}}} {{Right|२१ अप्रैल, १९३०}} चि० मीरा, मुझे पेंसिल से पत्र लिखनेसे चिढ़ है। लेकिन यह खत में प्रार्थना स्थलपर और लोगोंके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए लिख रहा हूँ। ४ बजकर २० मिनट हुआ ही चाहता है। तुम्हें प्रेमाबाईसे अपने हृदयका सम्पूर्ण प्रेम डालकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करोगी तो वह तुम्हारी बात अवश्य सुनेगी। वह योग्य और भली लड़की है। वह अपने तई अच्छेसे अच्छा काम करना चाहती है। उसे अपनी खामियोंका पता है। जरूरत सिर्फ इसी बात की है कि कोई स्नेहपूर्वक उसकी सहायता करे। मैं उसे भी लिख रहा हूँ। रेजिनाल्डका क्या हाल है? मैं लगातार घूम रहा हूँ और कताईपर ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। कताईके बिना विदेशी वस्त्रका बहिष्कार हमें उलझा देनेवाला एक जाल बनकर रह जायेगा। और कताईको सार्वत्रिक बनानेवाली एकमात्र वस्तु तकली है । इसलिए तुमसे वहाँ ज्यादा खादी तैयार करनेके लिए जो कुछ हो सके, करना। मैं तुम्हारे ही बारेमें एक कतरन तुम्हें भेज रहा हूँ। सस्नेह, {{Right|बापू}} [पुनश्च:] स्याहीवाला भाग प्रार्थनाके बाद लिखा गया था। अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३९३) से; सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६२७ से भी। <small>१.तपत्र पेंसिल्से दिखा गया है।<small><noinclude></noinclude> e8z1la40dwz9zudf5dd9r5zoj290xd8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५७ 250 197400 674596 669925 2026-08-27T07:09:51Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674596 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}}} {{Right|सोमवार की रात्रि [२१ अप्रैल, १९३०]१}} चि० गंगाबहन, अब रातके सवा ग्यारह बजे है, इसलिए अधिक नहीं लिखूंगा। मुझे अब भी बहुत काम है। जो बहनें वहां रहती हैं वे भी लड़ाईके काममें ही लगी है। मैंने अनेक बार समझाया है, आश्रम और हमारी यह लड़ाई दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। जिन्होंने जेलका भय त्याग दिया है उनके लिए तो जेल और घर दोनों एक समान है। जहां सहज ही सेवा करनेका अवसर मिले वहां उसका लाभ उठाना चाहिए। यदि धरना देनेके लिए बहनोंकी जरूरत पड़ी तो उसके लिए सब बहनोंका निकल पड़ना ही ठीक है। जब कोई कार्यकर्ता न बच रहे और सब ओर भयका वातावरण हो तब तुम सब लोग आश्रमको खाली करके कार्य करने के लिए निकल पड़ना और संघर्ष करते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर देना। इस समय जब कि अनेक बहनें धरना देनेके कार्य में आगे आ रही हैं उस समय आश्रमकी बहनोंको जो कार्य मिले उन्हें वही करते रहना चाहिए। कुसुमसे मैने कहा है कि आश्रमके भाई-बहनोंके दो भाग कदापि नहीं हो सकते। यदि वह आश्रमकी ओरसे शामिल होती है तो उसे प्रतिज्ञापर हस्ताक्षर करने ही चाहिए। यदि यह प्रतिज्ञापर हस्ताक्षर नहीं करती और आश्रम में रहना भर चाहती है तो वह आश्रमके अन्य नियमोंको मानते हुए भी वहाँ रह सकती है। यह सुनकर जिस दिन अन्य बहनें यहाँ आई उसी दिन वह अपनी माँ साथ सलाह-मशविरा करनेके लिए गई। बादमें क्या हुआ, सो मैं नहीं जानता। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७४६ ) से। सौजन्य : गंगाबहन वैद्य <small>१. तारीख '''बापुना पत्रो-६: गं० स्व० गंगाबहेनने''' से ली गई है।<noinclude></noinclude> ib07sfrmf06q5atc3ihs13g5c05ksp1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५८ 250 197401 674598 669926 2026-08-27T07:53:13Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674598 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{२९८. पत्र : महादेव देसाईको}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|अर्धरात्रि, सोमवार, २१ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, प्यारेलाल पहुँच गया है। तुम्हारा वक्तव्य तो काममें नहीं आया। मेरा लेख जब तुम पढ़ोगे तब तुम्हें मालूम होगा। भट्टोंचमें जो घटनाएँ हो रही हैं और बिहार में जो घटनाएँ हुई हैं उन्हें देखते हुए धोलेरा और वीरमगांवमें हुई घटनाएँ कुछ भी नहीं लगतीं। अब चूंकि वहाँका उपद्रव शान्त हो गया है इसलिए अब इसकी ज्यादा चर्चा करनेसे क्या लाभ? तुमने अपनी साप्ताहिक चिट्ठीमें जो थोड़ा-कुछ लिख दिया है उसमें कोई हर्ज नहीं तुम्हारे वक्तव्यका कुछ भाग तो निकाल देने लायक लगा। ऐसा मुझे क्यों लगा, यह समझा सकनेका फिलहाल मेरे पास समय नहीं है। मैं पूरे दिन लिखता रहा । बादमें में नवसारी अस्पतालमें भरती एक व्यक्तिको देखने गया; उसे खजूरका वृक्ष काटते समय बड़ी जबरदस्त चोट आई थी और अब वह अन्तिम सासें गिन रहा है। वहांसे वापस आनेपर में कताई-यज्ञको पूरा कर रहा हूँ और तुम्हें यह पत्र लिखवा रहा हूँ। प्यारेलालको भड़ौच भेज रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि तुम तो पहले ही किसीको भेज चुके हो और अधिक सावधानीके तौरपर मैं प्यारेलालको भेज रहा हूँ। कल छोटेलालको वहाँ [तुम्हारे पास] भेजा है। उसको भेजने का उद्देश्य तो खादी-प्रचार में उससे काम लेना है। काकाको मैंने समझा दिया है। यों छोटेलालको शतावधानी कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उससे जो काम लेना हो, लेना। अन्तिम निर्देश देनेकी दिशामें में विचार कर रहा हूँ। कह नहीं सकता, लेकिन एक-दो दिनमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँगा। कल दोपहरको सूरत पहुँचूँगा और शामतक वहीं रहूँगा। शामको वापस आऊँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनञ्च:] सारे हलफ़नामे भेज रहा हूँ। 'यंग इंडिया' का पुलिन्दा सीधे भेजा गया है। एक हलफनामेका अनुवाद मेरे लेखमें लिया गया है। प्यारेलालका अनुवाद अधूरा और दोषपूर्ण है। मैंने प्यारेलालको [भौंच] भेजनेका विचार त्याग दिया है। गुजराती (एस० एन० १६८२४) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> 2366tbhbc6162mvr0dkk9a49zjm4646 674603 674598 2026-08-27T08:16:48Z Kumari Arpana Sinha 2191 674603 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९८. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}} {{Right|कराडी}} {{Right|अर्धरात्रि, सोमवार, २१ अप्रैल, १९३०}} चि० महादेव, प्यारेलाल पहुँच गया है। तुम्हारा वक्तव्य तो काममें नहीं आया। मेरा लेख जब तुम पढ़ोगे तब तुम्हें मालूम होगा। भट्टोंचमें जो घटनाएँ हो रही हैं और बिहार में जो घटनाएँ हुई हैं उन्हें देखते हुए धोलेरा और वीरमगांवमें हुई घटनाएँ कुछ भी नहीं लगतीं। अब चूंकि वहाँका उपद्रव शान्त हो गया है इसलिए अब इसकी ज्यादा चर्चा करनेसे क्या लाभ? तुमने अपनी साप्ताहिक चिट्ठीमें जो थोड़ा-कुछ लिख दिया है उसमें कोई हर्ज नहीं तुम्हारे वक्तव्यका कुछ भाग तो निकाल देने लायक लगा। ऐसा मुझे क्यों लगा, यह समझा सकनेका फिलहाल मेरे पास समय नहीं है। मैं पूरे दिन लिखता रहा । बादमें में नवसारी अस्पतालमें भरती एक व्यक्तिको देखने गया; उसे खजूरका वृक्ष काटते समय बड़ी जबरदस्त चोट आई थी और अब वह अन्तिम सासें गिन रहा है। वहांसे वापस आनेपर में कताई-यज्ञको पूरा कर रहा हूँ और तुम्हें यह पत्र लिखवा रहा हूँ। प्यारेलालको भड़ौच भेज रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि तुम तो पहले ही किसीको भेज चुके हो और अधिक सावधानीके तौरपर मैं प्यारेलालको भेज रहा हूँ। कल छोटेलालको वहाँ [तुम्हारे पास] भेजा है। उसको भेजने का उद्देश्य तो खादी-प्रचार में उससे काम लेना है। काकाको मैंने समझा दिया है। यों छोटेलालको शतावधानी कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उससे जो काम लेना हो, लेना। अन्तिम निर्देश देनेकी दिशामें में विचार कर रहा हूँ। कह नहीं सकता, लेकिन एक-दो दिनमें किसी निश्चयपर पहुँच जाऊँगा। कल दोपहरको सूरत पहुँचूँगा और शामतक वहीं रहूँगा। शामको वापस आऊँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनञ्च:] सारे हलफ़नामे भेज रहा हूँ। 'यंग इंडिया' का पुलिन्दा सीधे भेजा गया है। एक हलफनामेका अनुवाद मेरे लेखमें लिया गया है। प्यारेलालका अनुवाद अधूरा और दोषपूर्ण है। मैंने प्यारेलालको [भौंच] भेजनेका विचार त्याग दिया है। गुजराती (एस० एन० १६८२४) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude> 67dfc0hf0s4pxc1rvyt8z6ve4g6ffye पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३५९ 250 197402 674604 669927 2026-08-27T08:18:43Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674604 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको}}}} {{Right|नवसारी}} २१ अप्रैल, १९३० चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे । [अंग्रेजीसे] यॉम्बे क्रॉनिकल, २२-४-१९३० Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 94djuq7jxe3s6tgb9p1jm3rpfq1gxwd 674605 674604 2026-08-27T08:23:42Z Kumari Arpana Sinha 2191 674605 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको''"}}}} {{Right|नवसारी}} २१ अप्रैल, १९३० चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यॉम्बे क्रॉनिकल''', २२-४-१९३० Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 66q0up13pvkkiywy66eal5c9ns92vil 674606 674605 2026-08-27T08:24:11Z Kumari Arpana Sinha 2191 674606 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''२९९. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको'''}}}} {{Right|नवसारी}} २१ अप्रैल, १९३० चटगाँवका समाचार पढ़कर मन व्यथित हो जाता है। इससे प्रकट होता है कि बंगाल में कमोवेश तादादमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो अहिंसामें विश्वास नहीं रखते न तो सिद्धान्त और न नीतिके रूपमें। मुझे यह तो मालूम ही था कि ऐसे लोग सारे देशमें हैं, लेकिन मैंने आशा यह की थी कि वे अहिंसाको एक मौका देंगे। कलकत्ता और कराचीकी घटनाओंको तो मैं किसी हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण नहीं, बल्कि आकस्मिक घटनाएँ मानता हूँ। लेकिन चटगांवकी घटनाएँ शायद हिंसात्मक वृत्तिका लक्षण हैं और यदि ऐसा है तो यह बात बहुत गम्भीर है। लेकिन परिस्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो जाये, अब संघर्षको स्थगित नहीं किया जा सकता। हम अपना कदम पीछे नहीं हटा सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। 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सकते। देखता हूँ, वाइसराय महोदयने चटगाँवके उपद्रवोंके जवाब में अपनी असाधारण सत्ताका प्रयोग किया है। मगर इसकी आशा तो की ही जाती थी। जबतक अंग्रेज लोग अनिच्छुक जनतापर अपना शासन थोपनेका निश्चय किये बैठे है तबतक तो ये वास्तवमें बिना कानूनका ही शासन करेंगे। हम भारतीय लोग सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमारे यहाँ विधिवत् गठित विधानमण्डल हैं। अब बहुत जल्द सबका भ्रम दूर हो जायेगा। इसलिए सत्याग्रहियोंको एक अद्वितीय संघर्ष करना है -- एक ओर तो सरकारको हिंसाके खिलाफ और दूसरी ओर हममें से जो लोग अहिंसा में विश्वास नहीं करते, उनकी हिंसाके खिलाफ सत्याग्रही लोग यदि अपने धर्मके प्रति ईमानदार हैं तो वे या तो इस संघर्षसे विजयी होकर निकलेंगे या फिर इन दो चक्कियोंके बीच बिलकुल पिस जायेंगे। [अंग्रेजीसे] '''यॉम्बे क्रॉनिकल''', २२-४-१९३०<noinclude></noinclude> pgra7ca4mmvuj8h24gf37xi2mzn6cah पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६१ 250 197404 674614 669929 2026-08-27T09:11:31Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674614 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|३०३. पत्र : नारणदास गांधीको}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।<small><noinclude></noinclude> ecdgffma9e9qrzp8x6dl8bk7s3n0y12 674615 674614 2026-08-27T09:12:20Z Kumari Arpana Sinha 2191 674615 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{'''larger|३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|३०३. पत्र : नारणदास गांधीको}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।<small><noinclude></noinclude> 7fjamqzvktjx2v5ih0afade5e4az6g7 674616 674615 2026-08-27T09:13:04Z Kumari Arpana Sinha 2191 674616 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|३०३. पत्र : नारणदास गांधीको}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।<small><noinclude></noinclude> 3nsqhusfebeapaf2ygkrhv32miuwh6e 674617 674616 2026-08-27T09:14:18Z Kumari Arpana Sinha 2191 674617 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०२. भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} याद रखिए कि आपने देशहित में अपनी सेवाएँ अर्पित करनेकी शपथ ली है। अब आपका यह कर्तव्य हो गया है कि आप लोग स्वराज्य सरकार के लिए पूरे मनसे कार्य करें। अगर आप लोगोंने अनिच्छासे अपने पद छोड़े हैं तो मैं मानता हूँ कि आप अपने देशकी बहुत बड़ी कुसेवा कर रहे हैं। आप लोगोंको अपने-आपमें और इसलिए स्वराज्यमें विश्वास हो तभी मैं आपको इस संघर्षमें सम्मिलित होनेका निमन्त्रण देता हूँ। '''अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने पटेलोंसे अपील की कि उन्हें राष्ट्र के लिए उपयोगी रचनात्मक कार्यों में प्रमुख हिस्सा लेना चाहिए। सरकारी नमक मत खरीदिए। विदेशी कपड़ा मत पहनिए और शराबसे दूर रहिए। आप स्वराज्यके लिए कदम बढ़ा रहे हैं। [अंग्रेजीसे] '''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २३-४-१९३० {{C|{{larger|'''३०३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}} {{Right|२२ अप्रैल, १९३०}} चि० नारणदास, सारजाके१ बारेमें तुमने ठीक ही लिखा है। साथका पत्र गंगाबहनके लिए है। पढ़कर उन्हें दे देना। अधिक लिखनेका समय नहीं है, अब कुछ ही देरमें रातके साढ़े ग्यारह होनेवाले हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८१०३ ) से। सौजन्य : नारणदास गांधी <small>१. सारजा आप्टे अपने पतिसे अलग होना और कुछ काम करना चाहती थी।<small> <small>२. गंगाबहनके नाम इस तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दवाला २१ अप्रैलके पत्रका है।<small><noinclude></noinclude> mbh5xlf4gz9oip2wn77uj6pu60sswnt पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६२ 250 197405 674618 669930 2026-08-27T10:03:54Z Kumari Arpana Sinha 2191 /* अशोधित */ 674618 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|३०४. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाई हरिभाऊ, आपका पत्र मिला । आप सबके पकड़े जानेपर यदि मैं मुक्त रहा तो 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' में लिखूंगा। 'नवजीवन' में तो आज ही लिखना है। इसलिए कुछ लिख डालूंगा। रामनारायणने वहाँ आने की मांग की है और मैंने अपनी सम्मति भी दे दी है। लड़ाई खूब रंग पकड़ रही है। यदि हमारी ताकत ऐसी ही बनी रही तो मेरा विश्वास है कि हम थोड़े ही समय में अपने उद्देश्यको प्राप्त कर लेंगे। कल इतना लिखनेके बाद मुझे बाहर जाना पड़ा। नवसारीमें आपका तार मिला। आपका पत्र भी मिला। इस पत्रका ही उपयोग करते हुए मैंने 'हिन्दी नवजीवन 'में'लिखा है। 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए यदि मैं कुछ लिख सका तो लिखूगा। अपने शरीरका ध्यान रखना। शायद अगले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया जाऊँ। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६०७२) से। सौजन्य : हरिभाऊ उपाध्याय {{C|{{larger|'''३०५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Right|कराडी}} {{Right||२३ अप्रैल, १९३०}} चि० व्रजकृष्ण, तुम्हारा खत मिला। यहां बुलाकर मैं क्या करूं। दिल्लीके हाल में अच्छी तरह जानता हूं। जितना हो सके उतना किया जाय। अगर दिल्हीमें या उसके इर्द-गिर्दमे खद्दर उत्पतिका ज्यादा काम हो सके तो करो। बांसकी तकली बनाओ दूसरोंको बनानेका सिखा दो और सूतका संगठन करो और नायरसे मिलकर जो कुछ भी हो सकता है वह किया जाय। आश्रम स्थायी रखनेमें में कोई हानि देखता नहि हुँ ।लेकिन हमारी प्रतिज्ञामें विश्वास है तो जानो कि आश्रम वैसे ही स्थायी वन जाता है क्यूंकी यह लड़ाई आखरीका फैसला है इसलिये स्वराज्यकी स्थापना होने तक तो वो रहता ही है और स्वराज्य मिल जानेके बाद तो सब आश्रम वैसे ही स्थायी <small>१. देखिए "सलाम अथवा देत १ २४-४-१९३०।<small><noinclude></noinclude> jig92v8lhss7jeu8jryd45r4cp1w3x2 674619 674618 2026-08-27T10:06:54Z Kumari Arpana Sinha 2191 674619 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३०४. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको'''}}}} {{Right|२३ अप्रैल, १९३०}} भाई हरिभाऊ, आपका पत्र मिला । आप सबके पकड़े जानेपर यदि मैं मुक्त रहा तो 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' में लिखूंगा। 'नवजीवन' में तो आज ही लिखना है। इसलिए कुछ लिख डालूंगा। रामनारायणने वहाँ आने की मांग की है और मैंने अपनी सम्मति भी दे दी है। लड़ाई खूब रंग पकड़ रही है। यदि हमारी ताकत ऐसी ही बनी रही तो मेरा विश्वास है कि हम थोड़े ही समय में अपने उद्देश्यको प्राप्त कर लेंगे। कल इतना लिखनेके बाद मुझे बाहर जाना पड़ा। नवसारीमें आपका तार मिला। आपका पत्र भी मिला। इस पत्रका ही उपयोग करते हुए मैंने 'हिन्दी नवजीवन 'में'लिखा है। 'यंग इंडिया' के आगामी अंकके लिए यदि मैं कुछ लिख सका तो लिखूगा। अपने शरीरका ध्यान रखना। शायद अगले सप्ताह में गिरफ्तार कर लिया जाऊँ। गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६०७२) से। सौजन्य : हरिभाऊ उपाध्याय {{C|{{larger|'''३०५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}} {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Right|कराडी}} {{Right||२३ अप्रैल, १९३०}} चि० व्रजकृष्ण, तुम्हारा खत मिला। यहां बुलाकर मैं क्या करूं। दिल्लीके हाल में अच्छी तरह जानता हूं। जितना हो सके उतना किया जाय। अगर दिल्हीमें या उसके इर्द-गिर्दमे खद्दर उत्पतिका ज्यादा काम हो सके तो करो। बांसकी तकली बनाओ दूसरोंको बनानेका सिखा दो और सूतका संगठन 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रसीद इलाहाबाद भेजना। अभी रातके दस बजे हैं। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०४ ) से। सौजन्य:नारणदास गांधी {{C|{{larger|३०७. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको}}}}} २३ अप्रैल, १९३० भाईश्री विट्ठलदास जेराजाणी, खादी आन्दोलन में और इसलिए तुम्हारे काममें समय-समयपर परिवर्तन होता आया है । मेरी मान्यता है कि जो परिवर्तन किये गये हैं वे सादीके लिए अर्थात् दरिद्रनारायणके लिए आवश्यक थे। हालांकि उस समय [ कुछ लोगोंकी ] बुद्धि इन परिवर्तनोंको स्वीकार नहीं करती थी। अभीतक तो अनुभव भी यही कहता है कि अन्ततः वे सारे परिवर्तन बुद्धिग्राह्य ही ठहरे और उनके उचित परिणाम निकले; तथा हमने देखा कि वे आवश्यक ही थे। मैं इस समय जिस परिवर्तनका सुझाव देने जा रहा हूँ वह मेरे विचारसे पहले परिवर्तनोंसे कहीं अधिक भय उपजानेवाला लगेगा। लेकिन मैं मानता हूँ कि खादी-प्रेमियोंको ऊपर-ऊपरसे विचार करनेपर यह परिवर्तन जितना खतरनाक जान पड़ेगा खादीके लिए यह उतना ही उपयोगी और आवश्यक है। विदेशी वस्त्रके बहिष्कार शास्त्रके समंज लोग इस परिवर्तनकी आय- श्यकताको तुरन्त समझ लेंगे। अभी खादीकी जितनी मांग है उसके अनुरूप हमारे Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> k0mfb8eivuskdhbbhk2ya6zdo2bcqxj पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३ 250 197622 674413 673291 2026-08-26T14:23:02Z Juhi1986 6803 674413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Juhi1986" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || पन्द्रह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || सोलह |- | १. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०) || १ |- | २. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०) || १ |- | ३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ४. || पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ५. || पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०) || ३ |- | ६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०) || ३ |- | ७. || पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०) || ४ |- | ८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०) || ४ |- | ९. || पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०) || ५ |- | १०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०) || ५ |- || ११. || पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०) || ६ |- | १२. || पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०) || ६ |- | १३. || पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०) || ७ |- | १४. || पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०) || ८ |- | १५. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (७-७-१९३०) || ९ |- | १६. || पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०) || १० |- | १७. || पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०) || १३ |- | १८. || पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०) || १४ |- | १९. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०) || १४ |- | २०. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०) || १४ |- | २१. || पत्र : शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०) || १४ |- | २२. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०) || १५ |- | २३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १५ |- | २४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || |- | २५. || पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०) || |- | २६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०) || |- | २७. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०) || |- | २८. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०) ||<noinclude></noinclude> ol2perknx52pc0u7r0t1yb5fbe7ob15 674415 674413 2026-08-26T14:31:20Z Juhi1986 6803 /* शोधित */ 674415 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || पन्द्रह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || सोलह |- | १. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०) || १ |- | २. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०) || १ |- | ३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ४. || पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ५. || पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०) || ३ |- | ६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०) || ३ |- | ७. || पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०) || ४ |- | ८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०) || ४ |- | ९. || पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०) || ५ |- | १०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०) || ५ |- || ११. || पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०) || ६ |- | १२. || पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०) || ६ |- | १३. || पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०) || ७ |- | १४. || पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०) || ८ |- | १५. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (७-७-१९३०) || ९ |- | १६. || पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०) || १० |- | १७. || पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०) || १३ |- | १८. || पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०) || १४ |- | १९. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०) || १४ |- | २०. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०) || १४ |- | २१. || पत्र : शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०) || १५ |- | २२. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०) || १५ |- | २३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २५. || पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०) || १७ |- | २६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०) || १७ |- | २७. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०) || १८ |- | २८. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०) || १८ |}}<noinclude></noinclude> hwd676my9app3d1p678u2rshfo3hmsc 674416 674415 2026-08-26T14:31:43Z Juhi1986 6803 674416 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ |- | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || पन्द्रह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || सोलह |- | १. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०) || १ |- | २. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०) || १ |- | ३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ४. || पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ५. || पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०) || ३ |- | ६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०) || ३ |- | ७. || पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०) || ४ |- | ८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०) || ४ |- | ९. || पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०) || ५ |- | १०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०) || ५ |- || ११. || पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०) || ६ |- | १२. || पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०) || ६ |- | १३. || पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०) || ७ |- | १४. || पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०) || ८ |- | १५. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (७-७-१९३०) || ९ |- | १६. || पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०) || १० |- | १७. || पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०) || १३ |- | १८. || पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०) || १४ |- | १९. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०) || १४ |- | २०. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०) || १४ |- | २१. || पत्र : शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०) || १५ |- | २२. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०) || १५ |- | २३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २५. || पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०) || १७ |- | २६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०) || १७ |- | २७. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०) || १८ |- | २८. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०) || १८ |}}<noinclude></noinclude> pgyiafr48to25f0z8qhsxxdkkfvkkzd 674417 674416 2026-08-26T14:34:10Z Juhi1986 6803 674417 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>&nbsp; {|width=100% |+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}} | &nbsp; || || पृष्ठ |- | &nbsp; || भूमिका || पाँच |- | &nbsp; || आभार || पन्द्रह |- | &nbsp; || पाठकोंको सूचना || सोलह |- | १. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०) || १ |- | २. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०) || १ |- | ३. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ४. || पत्र : नानीबहन झवेरीको (३-७-१९३०) || २ |- | ५. || पत्र : मनु गांधीको (३-७-१९३०) || ३ |- | ६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०) || ३ |- | ७. || पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (५-७-१९३०) || ४ |- | ८. || पत्र : मोतीबहन चोकसीको (५-७-१९३०) || ४ |- | ९. || पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०) || ५ |- | १०. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (६-७-१९३०) || ५ |- || ११. || पत्र : डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०) || ६ |- | १२. || पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०) || ६ |- | १३. || पत्र : मीराबहनको (७-७-१९३०) || ७ |- | १४. || पत्र : नारणदास गांधीको (७-७-१९३०) || ८ |- | १५. || पत्र : भगवानजी पण्ड्याको (७-७-१९३०) || ९ |- | १६. || पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०) || १० |- | १७. || पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०) || १३ |- | १८. || पत्र : प्रभावतीको (८-७-१९३०) || १४ |- | १९. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०) || १४ |- | २०. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (८-७-१९३०) || १४ |- | २१. || पत्र : शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०) || १५ |- | २२. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०) || १५ |- | २३. || पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०) || १६ |- | २५. || पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०) || १७ |- | २६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०) || १७ |- | २७. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१३-७-१९३०) || १८ |- | २८. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०) || १८ |}<noinclude></noinclude> dzjrgerg9u56178h42xafs6i4ksr07o पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४ 250 197623 674418 670333 2026-08-26T14:53:40Z Juhi1986 6803 /* शोधित */ 674418 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||अठारह|}}</noinclude>{|width=100% |- | २९. || पत्र : दुर्गा गिरिको (१३-७-१९३०) || १९ |- | ३०. || पत्र : मीराबहनको (१४-७-१९३०) || २० |- |३१. || पत्र : कुसुम देसाईको (१४-७-१९३०) || २१ |- | ३२. || पत्र : मणिबन पटेलको (१४-७-१९३०) || २२ |- | ३३. || पत्र : हरिप्रसादको (१४-७-१९३०) || २२ |- | ३४. || पत्र : नारणदास गांधीको (१३/१५-७-१९३०) || २३ |- | ३५. || पत्र प्रभावतीको (१५-७-१९३०) || २५ |- | ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१५-७-१९३०) || २५ |- | ३७. || पत्र : एस० एस० एल० पोलकको (१६-७-१९३०) || २५ |- | ३८. || पत्र गोविन्द पटेलको (१७-७-१९३०) || २६ |- | ३९. || पत्र : मीराबहनको (१८-७-१९३०) || २७ |- | ४०. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (१८-७-१९३०) || २७ |- | ४१. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८-७-१९३०) || २८ |- | ४२. || पत्र प्रभावतीको (१८-७-१९३०) || २८ |- | ४३. || पत्र : शिवाभाईको (१९-७-१९३०) || २९ |- | ४४. || पत्र : दूधीवन देसाईको (१९-७-१९३०) || २९ |- | ४५. || पत्र : अमीना कुरेशीको (१९-७-१९३०) || ३० |- | ४६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-७-१९३०) || ३० |- | ४७. || पत्र : प्रेमावहन कंटकको (१९-७-१९३०) || ३१ |- | ४८. || पत्र : लालजी परमारको (१९-७-१९३०) || ३१ |- | ४९. || पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१९-७-१९३०) || ३२ |- | ५०. || पत्र : रमाबहन जोशीको (१९-७-१९३०) || ३२ |- | ५१. || पत्र : मीराबहनको (२०-७-१९३०) || ३३ |- | ५२. || पत्र : पैट्रिक क्विनको (२०-७-१९३०) || ३४ |- | ५३. || पत्र : पैट्रिक विवनको (२०-७-१९३०) || ३५ |- | ५४. || पत्र : रतिलाल शाहको (२०-७-१९३०) || ३५ |- | ५५. || पत्र पुरुषोत्तम डी० सरैयाको (२०-७-१९३०) || ३६ |- | ५६. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२०-७-१९३०) || ३६ |- | ५७. || पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको (२१-७-१९३०) || ३७ |- | ५८. || पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-७-१९३०) || ३७ |- | ५९. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२१-७-१९३०) ||३८ |- | ६०. || तार वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२२-७-१९३०) || ३८ |- | ६१. || पत्र जी० ए० नटेसनको (२२-७-१९३०) || ३९ |- | ६२. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८/२२-७-१९३०) || ३९ |- | ६३. || ज्ञापिका : मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको (२३-७-१९३०) || ४३ |- | ६४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२३-७-१९३०) || ४५ |}<noinclude></noinclude> lm6s9chveqpm0fugpiqr8g0cqm4c0ly पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३८ 250 197737 674409 670455 2026-08-26T14:04:05Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674409 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१४५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २३ अगस्त, १९३०}} चि० काशिनाथ,<br> तुम्हारा पत्र मिला। शान्ता और कलावतीको डॉक्टरने जो दवा दी है, उसे आजमाने के बाद मुझे लिखना कि उसका क्या असर हुआ। कलावतीने यदि इस लड़ाईमें भाग लेनेकी प्रतिज्ञा की हो, तो मैं समझता हूँ कि वह अब नहीं जा सकेगी। तुम पिताजीको तो लिख ही चुके हो। अब तुम दोनोंकी अन्तरात्मा जो कहे सो करना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ५२४९) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१४६. पत्र : मीराबहनको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २४ अगस्त, १९३०}} चि० मीरा,<br> तुम्हारी मद्रास-यात्राके दौरान लिखा गया तुम्हारा प्रेम-पत्र मुझे मिला। मैं आशा करता हूँ कि वह मेहनत तुम्हारे लिए बहुत ज्यादा साबित नहीं होगी। तुम्हारे सभी विवरण मूल्यवान हैं। हाँ, नेहरूओंकि<ref>१. मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू।</ref> यहाँ आने पर बहुत व्यस्तता रही। बड़ी कठिनाईसे मैं ३७५ तार सूत कात सका, जिसे न करने पर मैं बहुत दुःखी अनुभव करूँगा। पेटी चरखा बहुत अच्छा काम दे रहा है और निस्सन्देह उसमें कम मेहनत पड़ती है। तुमने जो पतली माल भेजी थी उसे उसपर लगा देनेके बादसे अब वह और सन्तोषजनक रूपसे काम करती है। मोटी मालसे दिक्कत पैदा हो रही थी। पुनकी बिल्कुल ठीक काम कर रही है। उसमें मुझे कोई मेहनत नहीं पड़ती। काकासाहब पूनियाँ बनाते हैं। उन्हें धुनाई अभी सीखनी है और वह जल्दी ही उसे शुरू करनेवाले हैं। भजनोंका अनुवाद पहलेकी तरह ही नियमित रूपसे लेकिन धीरे-धीरे चल रहा है और मैं इससे ज्यादा तेजीसे अनुवाद कर सकनेकी सम्भावना निकट भविष्यमें नहीं देखता। मैं अच्छा हूँ। वजन घटता-बढ़ता रहता है। मेरा जो दो या तीन पौंड वजन कम हुआ लगता था उसमें से एक पौंड पिछले हफ्ते मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू।<noinclude></noinclude> mdbhil5csa1p57m6ueyqw9f4tvmfvzo पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३९ 250 197738 674419 670456 2026-08-26T15:17:31Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674419 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र :सुशीला गांधी को|१०१}} बढ़ गया। शक्तिमें कोई कमी नहीं हुई है। यहाँका पानी भारी है इसलिए कब्जके मामलेमें थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। <br>सप्रेम, {{Right|बापू}} [पुनश्च :]<br> तुम्हें जानकर खुशी होगी कि ताँत एक बार भी नहीं टूटा है। {{Left|<small>अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०९)से। सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६४३से भी।</small>}} {{c|'''१४७. पत्र : प्रभावतीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २४ अगस्त, १९३०}} चि० प्रभावती,<br> इस सप्ताह तेरा कोई पत्र नहीं आया। जयप्रकाशको और तुझे लिखे मेरे पत्र मिले होंगे। पिछले दिनों मेरा वजन कम हो रहा था लेकिन अब दो पौंड बढ़ गया है। तू आजकल क्या करती है? वल्लभभाईने बताया कि जयप्रकाशकी तबीयत कुछ ढीली है। क्या यह बात सच है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३३६७)की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१४८. पत्र : सुशीला गांधीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २४ अगस्त, १९३०}} चि० सुशीला (मणिलाल),<br> तू भूल गई है क्या? ऐसा मुझपर तरस लानेके कारण हुआ है या आलस्यवश? यदि तू मुझपर तरस खाती हो तो मुझे लिखना। सीता कैसी है? वह बीमार क्यों पड़ती रहती है? तू उसे फल खिलानेमें कंजूसी तो नहीं करती है न? तेरा कान कैसा है? तेरी तबीयत कैसी रहती है? तारा क्या करती है? ताराभाईका स्वास्थ्य कैसा रहता है? अन्य प्रश्न तू स्वयं ही सोच लेना। मणिलाल हँसी करता रहता है न? वह जेलमें क्या पढ़ता है? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ४७७०) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude> d1tyle4o45lmk2rsnp3z7rmjtzho5nz पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४० 250 197739 674420 670457 2026-08-26T15:24:54Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674420 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१४९. पत्र : रसिख देसाईको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २४ अगस्त, १९३०}} चि० रसिक (देसाई),<br> क्या तूने मेरी लाज रखी ? तूने जो व्रत लिये थे, क्या उनका पालन किया था ? मुझे पूरे समाचार देना। तूने अपना समय कैसे बिताया ? क्या तू आलस्य करता था ? क्या बहुत बक-बक करता था ? क्या तेरा शरीर स्वस्थ रहा ? ये और इन-जैसे अन्य प्रश्नोंके उत्तर देना। तूने किन-किनको अपना मित्र बनाया ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६६१७) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१५०. पत्र : नारणदास गांधीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २४/२६ अगस्त, १९३०}} चि० नारणदास,<br> इस बार डाक हमेशासे जल्दी मिली है। अर्थात् गुरुवारके बदले बुधवारको। पत्रोंमें सतीश बाबू — कृष्णदासके गुरु सतीश मुखर्जी — का पत्र है। उनका पता हाजरा रोड, कलकत्ता है। नम्बर भूल गया हूँ। शायद सुरेन्द्रको मालूम होगा या पत्रोंमें कहीं होगा। देवदासका स्वास्थ्य कैसा है ? उससे कहना कि उसका यशोगान होता ही रहता है। क्या रामदासकी तबीयत ठीक हो चुकी है ? जो छूट गये हैं उनके नाम तो मैंने माँगे हैं, साथ ही उन्होंने कितना काता-पींजा यह भी लिख भेजो तो अच्छा हो। कपड़ेका लिफाफा न मिले तो बुक-पोस्टकी तरह रस्सीसे कसकर बाँध भेजनेमें कोई हानि नहीं है। केशुका स्वास्थ्य फिर बिगड़ गया मालूम होता है। उसका जल्दी इलाज करवाना। गिरिराजकी बीमारी भी लम्बी चली है। जान पड़ता है, उसका खून खराब हो गया है। फिंगरकी गाइड नहीं मिली। मिलनेमें बहुत कठिनाई हो तो जाने देना। हसमुखरायके बारेमें समझ गया हूँ। ठीक लगे तभी उसे पत्र देना। जोलिंगरको लिखा पत्र पढ़कर उसे देना। यहाँ इस बारेमें इससे ज्यादा नहीं लिखता। धनगोपालको तो तुमने पहुँच लिखी होगी। जमनादासका स्वास्थ्य कैसा रहता है ? उसे समय-समयपर मिलने देते हैं क्या ?<noinclude></noinclude> okpf8p27hjjs4t3rphqvtrykr32e20a पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४१ 250 197740 674422 670458 2026-08-26T15:28:57Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674422 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : नारणदास गांधीको|१०३}} {{Right|मंगल प्रभात, २६ अगस्त, १९३०}} अपरिग्रहका सम्बन्ध अस्तेयसे है। जो असलमें चुराया नहीं है उसे जरूरत न होनेपर भी जमा करनेसे वह चोरीका माल-सा बन जाता है। परिग्रहके मानी हैं संचय यानी इकट्ठा करना। सत्यकी खोज करनेवाला, अहिंसा बरतनेवाला परिग्रह नहीं कर सकता। परमात्मा परिग्रह नहीं करता। अपने लिए जरूरी चीज वह रोजके-रोज पैदा करता है। इसलिए अगर हम उसपर भरोसा रखते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हमारी जरूरतकी चीजें वह रोजाना देता है, देगा। औलियाओंका, भक्तोंका यही अनुभव है। रोजकी जरूरत जितना ही रोज पैदा करनेका ईश्वरीय नियम हम नहीं जानते, या जानते हुए भी पालते नहीं। इसलिए जगतमें असमानता और उसमें से पैदा होनेवाले दुःख हम भुगतते हैं। अमीरके यहाँ जो उसको नहीं चाहिए, ऐसी चीजें भरी पड़ी होती हैं; वे लापरवाहीसे खो जाती हैं, बिगड़ जाती हैं; जब कि इन्हीं चीजोंकी कमीके कारण करोड़ों लोग भटकते हैं, भूखों मरते हैं, ठंडसे ठिठुर जाते हैं। सब अगर अपनी जरूरतकी चीजोंका ही संग्रह करें, तो किसीको तंगी महसूस न हो और सबको सन्तोष हो। आज तो दोनों (तंगी) महसूस करते हैं। करोड़पति अरबपति होना चाहता है; फिर भी उसको सन्तोष नहीं होता। गरीब धनवान होना चाहता है। कंगालको भरपेट मिल जानेसे ही सन्तोष होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता। फिर भी उसे भरपेट पानेका हक है, और वह उतना पाये, यह देखना समाजका फर्ज है। इसलिए उस (गरीब) के और अपने सन्तोषकी खातिर अमीरको पहल करनी चाहिए। अगर वह अपना ज्यादा परिग्रह छोड़े तो गरीबको अपनी जरूरत-भरके लिए आसानीसे मिल जाये और दोनों पक्ष सन्तोषका सबक सीखें। आत्यन्तिक आदर्श अपरिग्रह तो जो मन और कर्मसे दिगम्बर है उसीका हो सकता है। मतलब कि वह पंछीकी तरह बगैर घरके, बगैर कपड़ेके और बगैर अन्नके चलता-फिरता रहेगा। अन्न तो उसे रोज चाहिए, जो भगवान देता रहेगा। इस अवधूत दशाको बिरला ही आदमी पहुँच सकेगा। हम मामूली दरजेके सत्याग्रही जिज्ञासु (जाननेकी इच्छा रखनेवाले) लोग आदर्शको खयालमें रखकर जैसा बन पड़े, हमेशा अपने परिग्रहकी जाँच करते रहें और उसे कम करते जायें। सही प्रगति, सच्ची सभ्यताका लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्छासे उसे कम करना है। ज्यों-ज्यों हम परिग्रह घटाते जाते हैं, त्यों-त्यों सच्चा सुख और सच्चा सन्तोष बढ़ता जाता है, सेवाकी शक्ति बढ़ती जाती है। इस तरह सोचनेपर और बरतनेपर हम देखेंगे कि आश्रममें हम बहुत-सा संग्रह ऐसा करते हैं, जिसकी जरूरत साबित नहीं कर सकेंगे; और ऐसे बिना जरूरी परिग्रहसे पड़ोसियोंको चोरी करनेके लालचमें फँसाते हैं। अभ्याससे, आदत डालनेसे आदमी अपनी जरूरतें घटा सकता है; और ज्यों-ज्यों उन्हें घटाता जाता है त्यों-त्यों वह सुखी, शान्त और सब तरहसे तन्दुरुस्त होता जाता है। महज सत्यकी यानी आत्माकी नजरसे सोचने पर शरीर भी परिग्रह है। भोगकी इच्छासे हमने शरीरका आवरण पैदा किया है और उसे हम टिकाये रखते हैं। अगर भोगकी इच्छा बिलकुल कम हो जाये तो<noinclude></noinclude> maeywz69yleg9ejllpj4j2ajnu6a7oc पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४२ 250 197741 674423 670459 2026-08-26T15:33:22Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674423 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|१०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} शरीरकी आवश्यकता समाप्त हो जाये; यानी मनुष्यको नया शरीर लेनेकी जरूरत न रहे। आत्मा सब जगह फैलनेवाली, सर्वव्यापी होनेसे शरीर-रूपी पिंजरेमें क्योंकर कैद होगी ? उस पिंजरेको बनाये रखनेके लिए बुरा काम क्यों करें ? औरोंको क्यों मारें ? इस तरह विचार करते हुए हम आखिरी त्याग तक पहुँच जाते हैं, और जबतक शरीर है तबतक उसका उपयोग सिर्फ सेवाके लिए करना सीखते हैं; यहाँ तक कि सेवा ही उसकी असली खुराक हो जाती है। वह खाता है, पीता है, लेटता है, बैठता है, जागता है, सोता है; यह सब सेवाके लिए ही होता है। इसमें से पैदा होनेवाला सुख सच्चा सुख है, और ऐसा करते-करते मनुष्य अन्तमें सत्यकी झाँकी करता है। हम सब अपने-अपने परिग्रहके बारेमें इसी निगाहसे सोचें। इतना याद रखने लायक है कि जैसे चीजोंका, वैसे ही विचारोंका भी अपरिग्रह होना चाहिए। जो आदमी अपने दिमागमें बेकारका ज्ञान भर रखता है वह परिग्रही है। जो विचार हमें ईश्वरसे विमुख करते हैं, फेर लेते हैं या ईश्वरकी ओर नहीं ले जाते, वे सब परिग्रहमें गिने जायेंग और इसलिए छोड़ने लायक हैं। ज्ञानकी ऐसी व्याख्या भगवानने 'गीता' के तेरहवें अध्यायमें दी है। वह इस मौके पर सोचने लायक है। अमानित्व वगैरहको गिना कर भगवानने कह दिया है कि उसके अलावा जो-कुछ है वह सब अज्ञान है। अगर यह सही वचन है — और सही तो है ही — तो आज जो हम बहुत कुछ ज्ञानके नामसे जमा करते हैं वह अज्ञान ही है और उससे लाभके बजाय नुकसान होता है; उससे सिर घूमता रहता है, और आखिर वह खाली हो जाता है; उससे असन्तोष फैलता है और बुराइयाँ बढ़ती हैं। इसमें से कोई जड़ताका अर्थ कभी न निकाले। हमारा हरएक पल और क्षण प्रवृत्तिपूर्ण होना चाहिए। लेकिन वह प्रवृत्ति सात्विक हो, सत्यकी ओर ले जानेवाली हो। जिसने सेवाधर्मको अपनाया है वह एक पलके लिए भी जड़ दशामें नहीं रह सकता। यहाँ तो सार-असारका विवेक सीखनेकी बात है। सेवापरायणको यह विवेक आसानीसे हासिल होता है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :]<br> काकासाहब का वजन एक पौंड फिर बढ़ गया है और उत्साह भी बढ़ा है। मेरा जो वजन कम हुआ था उसमें एक पौंडकी वृद्धि हो गई है। तीन दिनसे दहीके साथ उबली हुई सब्जी लेने लगा हूँ। आजके पत्र तुम्हारे भेजे हुए लिफाफे पर नया कागज चिपका कर भेजे हैं, यह देखोगे ही। तुम यही वापस भेज सकते हो। {{Right|बापू}} [पुनश्च :]<br> ५३ पत्र हैं। {{Left|<small>गुजराती (एम० एम० यू०/१) की माइक्रोफिल्मसे।</small>}}<noinclude></noinclude> 7hg3ei5wkls1kpdlh7s6dldhapfkad5 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४३ 250 197742 674425 670460 2026-08-26T15:37:17Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674425 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१५१. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २९ अगस्त, १९३०}} चि० प्रेमा,<br> तेरा पत्र मिला। कागजकी कतरनों पर लिखे पत्रोंको देखकर कोई हँसे नहीं, न रोष ही करे। मुझे यही शोभा देता है। ऐसी कतरनों पर पत्र लिखते समय भी मैं उसे जितना सुन्दर और दिलचस्प बना सकता हूँ, बनाता हूँ। तेरे शरीरमें रोग है, ऐसी शंकासे तू भयभीत क्यों होती है ? रोग हो तो भी क्या ? और वह रोग गम्भीर हो तो भी क्या ? 'देह जावो अथवा राहो पांडुरंगी दृढ़ भावो'<ref>१. मराठी सन्त नामदेवकी पंक्तियाँ, जिनका अर्थ है कि शरीर रहे अथवा नष्ट हो जाये, पाण्डुरङ्ग (भगवान) के प्रति भक्ति बनी रहे।</ref> आश्रममें हमने कमसे-कम इतना तो सीखा ही है। कुछ दिन उपवास करनेसे तेरा शरीर स्वच्छ हो जायेगा। 'कूने बाथ', कटि-स्नान और विशेष रूपसे इन्द्रिय-घर्षण-स्नान (फ्रिक्शन सिट्ज़ बाथ) आवश्यक है। तुझे इनकी जानकारी न हो तो कान्ता या राधासे पूछना। सम्भवतः उन्हें इसकी जानकारी है। कूनेकी पुस्तकसे इनके विषयमें पढ़ भी लेना। स्त्रियोंको यदि कोई रोग हो तो मासिकधर्म के बारेमें जानना जरूरी हो जाता है। मासिकधर्म तुझे ठीक आता है ? नियमसे होता है ? तकलीफ होती है ? डाक्टरकी सलाह लेनेकी जरूरत हो तो लेना। अरविन्दबाबू की पुस्तक मैंने पढ़ी है। मैंने कितनी कम पुस्तकोंका अध्ययन किया है, सो तो मैं ही जानता हूँ। मेरा धन्धा तो मुख्यतः प्रकृतिकी पुस्तकको पढ़नेका ही रहा है और यह कभी खत्म हो ही नहीं सकता। नींद तुझे पूरी लेनी ही चाहिए। ९ से ४ का नियम पालना चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८०) से। सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन० १०२३२ की फोटो-नकलसे भी।</small>}} <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. मराठी सन्त नामदेवकी पंक्तियाँ, जिनका अर्थ है कि शरीर रहे अथवा नष्ट हो जाये, पाण्डुरङ्ग (भगवान) के प्रति भक्ति बनी रहे।</ref></small><noinclude></noinclude> pav3x4ul1ggg2v5f220q38isyxg0e49 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४४ 250 197743 674426 670461 2026-08-26T15:43:21Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674426 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१५२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २९ अगस्त, १९३०}} चि० महालक्ष्मी,<br> किसी पत्रका उत्तर देना रह गया था क्या ? मैं तुम सभी बहनोंको याद तो कर ही लेता हूँ। यदि तुम लोग मेरे साथ कुछ महीने रही होतीं तो मुझे भी अच्छा लगता। इसके बावजूद तुम दोनोंने इतनी दूर बैठे हुए भी स्वयंको इस तरह तैयार कर लिया है कि यदि तुम मेरे पास ही रही होतीं तो मुझसे और अधिक क्या ले पातीं, यह मुझे नहीं सूझता। बच्चे अब भी फलाहार पर रहते हैं और तुम भी फलों पर रहने लगी हो, यह ठीक किया। डाहीबहनने मुझे क्यों नहीं लिखा ? सभी बहनोंको आशीर्वाद। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६७९३) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१५३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २९ अगस्त, १९३०}} चि० मनु (त्रिवेदी),<br> गंगाबहन लिखती हैं कि तू बाहर निकलनेको अधीर है। यह तो मेरा पत्र मिलनेके पहलेकी बात है। मुझे आशा है कि मेरे पत्रसे तेरा मन शान्त हुआ होगा। सिपाहीके मुँहसे 'क्यों' निकल ही कैसे सकता है ? उसे जो काम मिलता है, वह मूक भावसे और प्रफुल्लित मनसे किये चला जाता है। काकासाहब की शर्त पूरी हो लेने दो। अब क्या काकासाहब के छूटनेमें कोई बहुत देर है ? इसके बावजूद यदि मनको शान्ति न मिले तो मुझे लिखना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ७७६१) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude> 39i3teothrwprd27hvfdv0y2etpd53s पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४५ 250 197744 674427 670462 2026-08-26T15:47:54Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674427 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१५४. पत्र : प्रभावतीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २९ अगस्त, १९३०}} चि० प्रभावती,<br> तेरा पत्र मिला। यदि कमलाबहन खुशी-खुशी तुझे अनुमति दें और बिहारमें काम करनेकी सुविधा हो तो वहाँ जाना तेरा पहला धर्म है। जयप्रकाशकी तबीयत तो अच्छी रहती है न ? अपनी सेहतका ध्यान रखना। मृत्युंजयका पत्र मिला है। मैं चंगा हूँ। खुराकमें अब खजूर और मुनक्के के स्थान पर हरी सब्जियाँ लेनी शुरू की हैं। देखता हूँ, उसका क्या असर होता है ? मेरी चिन्ता न करना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३३६८) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१५५. पत्र : मैत्री गिरिको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २९ अगस्त, १९३०}} चि० मैत्री,<br> तू मुझे पत्र लिखती रहना। गंगाबहनने तेरे बारेमें सन्तोष व्यक्त किया है, जिससे मुझे आनन्द हुआ। तेरा शरीर तो स्वस्थ है न ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६२१८) की फोटो-नकलसे।</small>}}<noinclude></noinclude> 6n7gjdrwxehukfvv31fiysxxmif1r0h पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४६ 250 197745 674429 670463 2026-08-26T15:50:14Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674429 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१५६. पत्र : गुलाम रसूल कुरेशीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br ३० अगस्त, १९३०}} चि० कुरेशी,<br> तुम्हारा पत्र पढ़कर प्रसन्नता हुई। तुमने कुरान शरीफका अध्ययन करके ठीक किया। 'मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम' नामक पुस्तक खोजकर पढ़ डालना। मुझे जो लिखना चाहो सो लिखना। दहीका सेवन करनेसे बहुत करके तुम ठीक हो जाओगे। आवश्यक व्यायाम करते रहना। तुम जब इमामसाहबसे मिलो तो कहना कि हम दोनों उन्हें खूब याद करते हैं और प्रायः आपसकी बातचीतमें उनका नाम तो आता ही रहता है। अमीनासे मुझे पत्र लिखनेको कहना। तुम दोनोंको हमारा आशीर्वाद और दुआ। {{Right|बापू}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६६५१) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१५७. पत्र : शारदा सी० शाहको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> ३१ अगस्त, १९३०}} चि० शारदा,<br> तेरे पत्र सर्वथा नियमित रूपसे मिलते रहते हैं। ऐसे समय भी यदि मन आनन्द मनाना चाहे तो शायद शारीरिक रूपसे उसका उपभोग करना उचित होगा। किन्तु यदि मन ही ऐसा न करना चाहे और उस दिन कोई विशेष कार्य मनःपूर्वक किया जाये तो निश्चय ही ज्यादा अच्छा होगा। ऐसे मामलोंमें बालकोंसे जबरदस्ती कुछ भी नहीं कराया जा सकता। उद्योगमें आलस्य अनुभव होनेपर उसे निकालनेकी सतत चेष्टा करनेसे वह चला जाता है। तुझे उद्योगकी आवश्यकता समझनी चाहिए। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८८८) से। सौजन्य : शारदाबहन जी० चोखावाला</small>}}<noinclude></noinclude> jl1x0ywerttm2xihplfs0g2d3k08pz0 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४७ 250 197746 674433 670464 2026-08-26T16:06:12Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674433 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|''१५८. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> ३१ अगस्त, १९३० चि० ब्रज कृष्ण,<br> तुमारा खत मिला। आलमोडा जानेका मौका मिल जाय तो अवश्य जाओ । अब मानसिक स्थिति कैसी रहती है ? कृष्ण नायर को मेरे आशीर्वाद भेजो। मुझे खत लीखते रहो। जी० एन० २३८४ की फोटो नकलसे । बापुके आशीर्वाद १५९. पत्र : मीराबहनको चि० मीरा,<br> [ ३१ अगस्त, १९३० के लगभग | तुम्हारा पत्र हालांकि हिलती हुई रेलगाड़ीमें लिखा गया था लेकिन खूब साफ था। अगर तुमने इस ओर मेरा ध्यान न दिलाया होता तो मुझे कोई फर्क नहीं लगा होता । मैं समझता हूँ कि सफरी चरखेके ऊपर मेरी अच्छी पकड़ हो गई है और मैं आगे और अधिक गतिसे काम कर सकनेकी आशा करता हूँ। उस पर कातनेसे में आज भी एक घंटा बचा पा रहा हूँ और थकावट कम होती है। लेकिन तुम्हारी मेहनत बेकार नहीं गई है। काकासाहब गाण्डीवका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन उससे उन्हें सन्तोष नहीं मिला है और यह एक इकाई अर्थात् १६० तार भी हमेशा कभी नहीं निकाल पाते थे। तुम्हारे चरखे पर उन्हें दो घंटे में एक इकाई सूत निकालने में कोई कठिनाई नहीं है। चरखेको कमसे कम इतना समय देनेका उन्होंने व्रत लिया है। १. सफरी चरखेके उल्लसे ऐसा लगता है कि यह पत्र १८ अगस्तके बाद किसी समय लिखा गया था देखिए पत्र मीराबहनको, १८-८-१९३० । अपने ५ अक्टूबर के पत्र में गांधीजीने मीराबहनको लिखा या कि एक भी ऐसा सप्ताह नहीं गुजरा है जब उन्होंने उनको (मीराबहनको ) पत्र न लिखा हो। चूँकि २४ अगस्त और ७ सितम्बर के बीचकी तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस बातकी सम्भावना है कि यह पत्र ३१ अगस्तको या उसके आसपास लिखा गया होगा। Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude> 7s0zsj0d7r6qv0mssbszbnocxf9159w पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४८ 250 197747 674436 670465 2026-08-26T16:13:16Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674436 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|११०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}} तुमने दूसरे दर्जेमें बदली करवा कर ठीक किया। जब तीसरे दर्जेमें चलना असम्भव या लगभग असम्भव हो उस समय दूसरे दर्जेमें सफर करनेमें कोई हर्ज नहीं है और शर्मकी तो निश्चय ही कोई बात नहीं है। मुझे खुशी है कि कुमारी पीटरसनके साथ तुमने ३६ घंटेका समय शान्तिपूर्वक बिताया। क्या तुम्हारी बहन मद्रास ही में कहीं नहीं है ? एण्ड्रयूज, रेजिनाल्ड तथा मेरी याद करनेवाले अन्य लोगोंको मेरा प्यार भेजना। सप्रेम,<br> {{Right|बापू}} {{Left|<small>अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०७) से। सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६४१से भी।</small>}} {{c|'''१६०. पत्र : अमृतलाल ठक्करको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> १ सितम्बर, १९३०}} भाई ठक्कर बापा,<br> आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि चूंकि आपने मेरा कभी कोई काम नहीं किया है, अतः आपको मुझे पत्र लिखनेका अधिकार नहीं है। सच कहा जाये तो मेरा काम नामकी कोई चीज ही कहाँ है ? हम सबको भगवानका काम यथाशक्ति यथामति करना है। और यह काम आप प्रतिक्षण कर रहे हैं। मैं और काका आपके बारेमें प्रायः बातें करते हैं। यदि आपको कुछ लिखना आवश्यक जान पड़े तो अवश्य लिखें। मैं आपसे यह नहीं कहता और न चाहता ही हूँ कि आप सिर्फ लिखनेकी खातिर मुझे लिखें। मैं जानता हूँ कि आप प्रत्येक क्षणका हिसाब रखने और देनेके लिए तैयार रहते हैं। {{Right|बापू}} [गुजरातीसे] '''कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रंथ'''<noinclude></noinclude> 7krdv8fksymbc9tyncjele2bhn8b85j पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४९ 250 197748 674444 670466 2026-08-26T16:23:29Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674444 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}}e {{c|'''१६१. पत्र : मोतीबहन चोकसीको'''}} {{Right|मौनवार [१ सितम्बर, १९३०]<ref>१. मूल पत्रपर किसी अन्य व्यक्तिने "१-९-३० के आसपास" लिखा है। १ सितम्बरको सोमवार था।</ref>}} चि० मोतीबहन,<br> बा कह रही थी कि तुम उद्विग्न रहती हो। ऐसा क्यों है ? जो 'गीता' का पाठ करता है वह कभी उद्विग्न नहीं हो सकता। जो प्रतिदिन ईश्वरका ध्यान करता है, जो ईश्वरको अपने हृदयमें स्थित मानता है उसे उद्वेग कैसा ? उद्वेगको अपने मनसे निकाल देना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३७३६) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१६२. पत्र : गंगाबहन झवेरीको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> १ सितम्बर, १९३०}} चि० गंगाबहन (झवेरी),<br> मुझे ऐसा याद पड़ता है कि तुमसे और नानीबहनसे मुझे एक पत्रका उत्तर पाना है। आज कोई विशेष बात लिखनेको नहीं है। किन्तु मैं तुम सब लोगोंको रोज याद करता हूँ, इतना ही बतानेके लिए यह पत्र लिख रहा हूँ। मैं यह जानता हूँ कि तुम सदा अपने कर्तव्यमें प्रवृत्त रहती हो। यही उचित भी है और इसीसे उचित परिणाम निकलेगा। कर्तव्यके प्रति तन्मयता कल्पद्रुम है। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ३१०१)की फोटो-नकलसे।</small>}} <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. मूल पत्रपर किसी अन्य व्यक्तिने "१-९-३० के आसपास" लिखा है। १ सितम्बरको सोमवार था।</ref></small><noinclude></noinclude> d31awe70u31cdv8rfi26kxefciniqpb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५१ 250 197750 674548 670468 2026-08-27T05:24:48Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674548 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१६४. पत्र : दुर्गा गिरिको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> १ सितम्बर, १९३०}} चि० दुर्गा,<br> क्या तू रूठ गई है ? तू पत्र भी न लिखे और रूठ भी जाये, यह कौनसा न्याय है ? आश्रमका या पहाड़का ? या रूठनेका बहाना करके लिखनेका आलस करती है ? तू रोज कितना कातती है ? दूसरा क्या काम करती है ? नियमित रूपसे सबेरे उठती है ? कितने अध्याय कण्ठ किये हैं ?<ref>१. मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref> {{Right|बापूके आशीर्वाद}} बापूकी विराट वत्सलता {{c|'''१६५. पत्र : वा० गो० देसाईको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> २ सितम्बर, १९३०}} भाईश्री ५ वालजी,<br> तुम्हारा पत्र मिला। मसूड़ोंसे खून निकलता है तो दिनमें तीन-चार बार नमकके पानीसे कुल्ले करने चाहिए। सुबहके वक्त बारीक पिसा हुआ अच्छा नमक मसूड़ों पर रगड़ना चाहिए और लारको थूकना नहीं चाहिए। नमकके बदले तुम नारियलका तेल भी इस्तेमाल कर सकते हो। लाल दवाके पानीसे कुल्ले करने चाहिए। यदि इससे भी खून निकलना बन्द न हो तो मसूड़े डाक्टरको दिखाने चाहिए। कभी-कभी बदहजमीसे भी ऐसा हो जाता है। कुछ थोड़ी-सी कच्ची हरी सब्जी भी खाना आवश्यक है। तुम्हें ज्वार-बाजरेकी रोटियां मजबूर होकर खानी पड़ी थीं या अन्य कैदियोंका साथ देनेके ख्यालसे तुमने खाई थीं ? हरे-भरे वृक्षके पास रहकर भी मैंने तुम्हें उसकी छायाका अनादर करते देखा है। यदि मिल सके तो मैं किसने कितना काता, कितना पीजा, इसका हिसाब देखना चाहूँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०६) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : वा० गो० देसाई</small>}} <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. मूल पत्र गुजरातीमें था।</ref></small><noinclude></noinclude> r0w5zixe36q5d7orxfm0zx55302dgti पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५२ 250 197751 674549 670469 2026-08-27T05:28:00Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674549 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१६६. पत्र : नारनदास गांधीको'''}} {{Right|[२ सितम्बर, १९३०]<ref>१. बापुना पत्रो–९: श्री नारनदास गांधीनेने दी हुई तारीख अनुसार।</ref>}} चि० नारनदास,<br> आश्रमका बंडल गुरुवारको मिला। प्रवचन छपवायें तो एक-दो प्रतियाँ यहाँ भी भेजना। पिछले प्रवचनकी नकल भी हो तो अच्छा है। आश्रम नियमावली भी भेजना। सुरेन्द्र, माधवजी और माधवलालने अभी पत्र न लिखा हो तो मुझे लिखें। दूसरे भी लिखें। कुसुमका हाथ ठीक हो गया होगा। श्रीमती जोगिलेकर कुछ शान्त हुई ? उनको प्रसन्न करनेका प्रयत्न करना। स्वीडिशमें 'आत्मकथा' का अनुवाद करनेके लिए किसीको लिखनेकी बात याद है। ११ पौंड ले लेना और जिन खातोंमें ठीक समझो, डाल देना। रक्षा-बन्धनका अच्छा उपयोग किया। लीलावतीका ध्यान रखना। डोरे आते रहते हों तो आश्रममें आ जायें और मनको शान्त रखें। देवदासका वजन मालूम हो तो लिखना। वहाँ तो स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए। जमनालालजीके सूतकी माला मिल सकेगी। मेरा चरखा अब तंग नहीं कर रहा है। गति बहुत नहीं बढ़ी है, किन्तु ठीक है। यह चरखा यात्राके लिए है और इसके वास्ते पतली मालकी जरूरत थी। माल बनानेकी सरल रीति किसीको मालूम हो तो लिख भेजें। अब्बासने बताई थी। किन्तु मैं वह भूल गया हूँ। रुईका एक बंडल काममें आ चुका है। दूसरेको देखते हुए पूनियाँ एक महीना तो चलेंगी। किन्तु काकासाहब से मिलने तो कोई आयेगा ही। उसीके हाथ एक बंडल भेज देना। बलवन्तभाईसे मिलनेके लिए भी हर सप्ताह या पखवाड़े कोई आता है, उसके हाथ भी भेज सकते हो। यदि ऐसा न हो सकता हो तो जिस तरह डाकसे भेजा था उसी तरह भेज देना। कुछ जल्दी नहीं है। साथ ही चप्पलकी एड़ीकी मरम्मत करने लायक चमड़ेके टुकड़े भेजना या उसका प्रबन्ध न हो सके और मेरी चप्पलकी जोड़ी मिल जाये तो वही भेज देना। यात्रामें एक जोड़ी ज्यादा थी, कान्तिका मालूम होगा; आश्रममें भी एक थी, कुसुमको मालूम होगा; या जिसको उसने सब कुछ सौंपा होगा उसे। अभय: इसकी गिनती गीताजीके सोलहवें अध्यायमें दैवी सम्पतका जिक्र करते हुए भगवानने प्रथम की है।<ref>२. "अभयंंसत्त्वसंशुद्धि. . ." इत्यादि।</ref> यह श्लोककी रचनाकी सुविधाकी खातिर है या अभयका पहला स्थान होना चाहिए इसलिए है, इस बहसमें मैं नहीं उतरूँगा; ऐसा निर्णय करनेकी मुझमें लियाकत भी नहीं है। मेरी रायमें अभयसे सहज ही पहला स्थान मिला हो तो भी वह उसके लायक ही है। बिना अभयके दूसरी कड़ियों नहीं मिलेंगी। <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. बापुना पत्रो–९: श्री नारनदास गांधीनेने दी हुई तारीख अनुसार।</ref> <ref>२. "अभयंंसत्त्वसंशुद्धि. . ." इत्यादि।</ref></small><noinclude></noinclude> 8st54ri6a5hjr9kd7j53ch7vlrlmaqq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५३ 250 197752 674552 670470 2026-08-27T05:34:22Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674552 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh| |पत्र : नारनदास गांधीको | ११५}} बिना अभयके सत्यकी खोज कैसे हो ? बिना अभयके अहिंसाका पालन कैसे हो ? 'हरिनो मारग छे शूरानो, नहीं कायरनुं काम जोने' (हरिका मार्ग शूरका है, उसमें कायरका काम नहीं)। सत्य ही हरि, वही राम, वही नारायण, वही वासुदेव है। कायर यानी डरा हुआ, बुजदिल, शूर यानी भयसे मुक्त, तलवार वगैरहसे लैस नहीं। तलवार बहादुरीकी निशानी नहीं है, डरकी निशानी है। अभयका मतलब है तमाम बाहरी भयोंसे मुक्ति। मौतका डर, धन-दौलत लुट जानेका डर, कुटुम्ब-कबीलेके बारेमें डर, रोगका डर, हथियार चलनेका डर, आबरूका डर, किसीको बुरा लगानेका, चोट पहुँचानेका डर, इस तरह डरकी फेहरिस्त जितनी बढ़ाना चाहें हम बढ़ा सकते हैं। एक सिर्फ मौतका भय जीत लिया तो सब भयोंको जीत लिया, ऐसा आम तौर पर कहा जाता है। लेकिन वह ठीक नहीं लगता। बहुत-से लोग मौतका डर छोड़ देते हैं, फिर भी वे तरह-तरहके दुःखोंसे भागते रहते हैं। कुछ लोग खुद मरनेको तैयार होते हैं, लेकिन सगे-सम्बन्धियोंका विछोह बरदाश्त नहीं कर सकते। कोई कंजूस यह सब छोड़ देगा, देह भी छोड़ देगा, लेकिन जमा किया हुआ धन छोड़ते झिझकेगा। कोई आदमी अपनी मानी हुई इज्जत-आबरू बनाये रखनेके लिए बहुत-कुछ स्याह-सफेद करनेको तैयार हो जायेगा और करेगा। कोई जगतकी निन्दाके भयसे सीधी राह जानते हुए भी उसे पकड़ते हिचकिचायेगा। सत्यकी खोज करनेवालेको इन सब भयोंको छोड़े बिना चारा नहीं। हरिश्चन्द्रकी तरह पामाल होनेकी उसकी तैयारी होनी चाहिए। हरिश्चन्द्रकी कथा भले ही मनगढ़ंत हो, लेकिन उसमें सब आत्मार्थियों (आत्माका कल्याण चाहनेवालों) का अनुभव भरा हुआ है; इसलिए उस कथाकी कीमत किसी ऐतिहासिक कथासे अनन्तगुनी है और हम सबको उसे अपने मनमें रखना चाहिए और उसपर गौर करना चाहिए। अभय-व्रतका पूरी तरह पालन करना लगभग नामुमकिन है। तमाम भयोंसे मुक्ति तो वही पा सकता है जिसे आत्माके दर्शन हुए हों। अभय अमूर्च्छ दशाकी आखिरी हद है। निश्चय करनेसे, लगातार कोशिश करनेसे और आत्मामें श्रद्धा बढ़नेसे अभयकी मिकदार बढ़ सकती है। मैंने शुरूमें ही कहा कि हमें बाहरी भयोंसे मुक्ति पानी है। अन्दर जो दुश्मन हैं उनसे तो डरकर ही चलना है। काम, क्रोध वगैरहका भय सच्चा भय है। उसे जीत लें तो बाहरी भयोंकी परेशानी अपने-आप मिट जायेगी। तमाम भय देहको लेकर हैं। अगर देहकी ममता छूटे तो आसानीसे अभय प्राप्त हो जाये। इस तरह सोचते हुए हम देखेंगे कि तमाम भय हमारी खयाली पैदावार हैं। पैसेमें से, कुटुम्बमें से, शरीरमें से 'मेरापन' निकाल दें, तो भय कहाँ रहा ? "'तेन त्यक्तेन भुंजीथा:'" (उसे तजकर भोगो) – यह रामबाण वचन है। कुटुम्ब, पैसा, देह ज्योंके त्यों रहें; उनके बारेमें हमारी कल्पना बदलनी होगी। वे 'हमारे' नहीं हैं, 'मेरे' नहीं हैं। वे ईश्वरके हैं; 'मैं' भी उसीका हूँ; इस जगत्में 'मेरा' कहनेकी चीज कुछ है ही नहीं। फिर मुझे भय काहेका ? इसीलिए उपनिषत्कारने कहा : "उसे तजकर भोगो"। इसलिए हम उसके रखवाले बनें, वह उसकी <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. ईशोपनिषद्, ५, १।</ref></small><noinclude></noinclude> 808ksael5r84thkulstlm27asnqw2db पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५४ 250 197753 674553 670471 2026-08-27T05:39:34Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674553 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|११६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} रखवालीके लिए जरूरी सामान और शक्ति हमें देगा। यों हम स्वामी मिटकर सेवक बनें, शून्य जैसे (कुछ नहीं) होकर रहें, तो आसानीसे तमाम भयोंको जीत लेंगे, आसानीसे शान्ति पायेंगे और सत्यनारायणका दर्शन करेंगे। काकासाहब ने चरखेके बारेमें स्पष्ट व्रत नहीं लिया था; अब लिया है। रोज कमसे कम दो घंटे कातेंगे और उसमें भी कमसे-कम १६० तार। पिंजाई भी शुरू की है। उनका बहुत-सा समय तो शारीरिक प्रवृत्तियोंमें जाता है। उनकी शरीरकी शक्ति बराबर बनी हुई है। मैंने चार दिनसे मुनक्का और खजूर छोड़ दिये हैं। उबली हुई सब्जी और कच्चे टमाटर आदि लेता हूँ। इससे काम नहीं चलेगा तो फल लेना शुरू करूँगा। यह परिवर्तन कब्ज कम करनेके लिए किया है। इससे सहज ही अर्थलाभ होता हो, तो और भी अच्छा है। इसमें किसी तरहका आग्रह नहीं रखूँगा। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} [पुनश्च :]<br> ५८ पत्र हैं। {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१२३) से। सौजन्य : नारनदास गांधी; बापुना पत्रो– ९ : श्री नारनदास गांधीनेसे भी।</small>}} {{c|'''१६७. पत्र : वसुमती पण्डितको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> ३ सितम्बर, १९३०}} चि० वसुमती,<br> तेरे दोनों पत्र एक-साथ मिले। सरभणमें तेरे साथ और कौन-कौन है ? सर्वथा अभिमान रहित तो केवल एक ईश्वर है। हम सब अभिमानसे मुक्त होनेका रोज प्रयत्न करते रहें। “शूर संग्रामको देख भागे नहि . . . काम और क्रोध मद लोभसे जूझना।” कल ही जब मैं इस भजनका अनुवाद कर रहा था,<ref>१. गांधीजी द्वारा किये गये कबीरके इस भजनके अंग्रेजी अनुवादके लिए देखिए अंग्रेजीका खण्ड ४४।</ref> तो इसका अर्थ और अच्छी तरह समझमें आया। हमारे लिए यही वास्तविक लड़ाई है। यदि हम जूझते रहें तो आखिरकार हमारी जीत होगी ही। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५११) की फोटो-नकलसे। सौजन्य : वसुमती पण्डित; एस० एन० ९२८६से भी।</small>}} <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१. गांधीजी द्वारा किये गये कबीरके इस भजनके अंग्रेजी अनुवादके लिए देखिए अंग्रेजीका खण्ड ४४।</ref></small><noinclude></noinclude> dg29ijonfilpxheik3ru79nziue7p0x पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५५ 250 197754 674557 670472 2026-08-27T05:48:15Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674557 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१६८. पत्रका अंश'''}} {{Right|३ सितम्बर, १९३०}} यदि आश्रमकी बहनें तूफानमें फेंक जानेपर भी पार हो जायें तभी यह कहा जा सकता है कि हमारा प्रयोग सफल हुआ। चोटें लगनी होंगी तो लगेंगी। ऊपर चढ़ते हुए गिरनेका भय तो बना ही रहता है। हमारा निस्तार वह खतरा उठानेपर ही होगा। हम जान-बूझकर ऐसी जोखिम न उठायें, किन्तु यदि जोखिम सामने आ जाये तो पीछे न हटें। पुरुषोंके बारेमें हमारे मनमें जितनी उदारता है, उतनी ही स्त्रियोंके बारेमें रखें। हमारी लाज रखनेवाला तो गिरधारी ही है न ? और जैसा हम गाते हैं उसीके अनुसार आचरण भी करें। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ६७९८) की फोटो-नकलसे।</small>}} {{c|'''१६९. पत्र : सप्रू और जयकरको'''<ref>१. सर तेज बहादुर सप्रू और श्री मु० रा० जयकरके मिलनेके बाद वायसरायने २८ अगस्तको उन्हें एक पत्र लिखा था; देखिए परिशिष्ट ३। इसके बाद सप्रू और जयकरने नैनी जेलमें २० और ३१ अगस्तको मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और सैयद महमूदसे भेंट की और उन्हें वायसरायका पत्र तथा वायसरायके साथ अपनी बातचीतका विवरण भी दिखाया; देखिए परिशिष्ट ४। इसके बाद मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूने सप्रू और जयकरको गांधीजीके नाम अपनी अन्तिम टिप्पणी दी; देखिए परिशिष्ट ५। इन कागजातोंके साथ सप्रू और जयकरने ३, ४ और ५ सितम्बरको यरवदा जेलमें गांधीजी तथा अन्य नेताओंसे बातचीत की। गांधीजीकी हस्तलिपिमें इस पत्रका जो मसविदा एस० एम० १५२७ में प्राप्त है उसमें दूसरी अन्य व्यक्तिकी हस्तलिपिमें कुछ परिवर्तन और परिवर्द्धन है।</ref>}} {{Right|५ सितम्बर, १९३०}} प्रिय मित्रो,<br> वायसराय द्वारा आपको लिखे गये २८-८-१९३० के पत्रको हमने बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा है। पत्रमें जिन मुद्दोंका जिक्र नहीं है, उन मुद्दों पर वायसरायके साथ हुई आपकी बातचीतका विवरण भी आपने कृपापूर्वक हमें इसके साथ दे दिया है। पण्डित मोतीलाल नेहरू, डा० सैयद महमूद और पण्डित जवाहरलाल नेहरू द्वारा हस्तान्तरित और आपके जरिये भेजी गई उनकी टिप्पणी भी हमने उतने ही ध्यानके साथ पढ़ी है। इस टिप्पणीमें उक्त पत्र और बातचीतके सम्बन्धमें उनकी सुविचारित राय दी हुई है। {{Left|<small><HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <ref>१. सर तेज बहादुर सप्रू और श्री मु० रा० जयकरके मिलनेके बाद वायसरायने २८ अगस्तको उन्हें एक पत्र लिखा था; देखिए परिशिष्ट ३। इसके बाद सप्रू और जयकरने नैनी जेलमें २० और ३१ अगस्तको मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और सैयद महमूदसे भेंट की और उन्हें वायसरायका पत्र तथा वायसरायके साथ अपनी बातचीतका विवरण भी दिखाया; देखिए परिशिष्ट ४। इसके बाद मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूने सप्रू और जयकरको गांधीजीके नाम अपनी अन्तिम टिप्पणी दी; देखिए परिशिष्ट ५। इन कागजातोंके साथ सप्रू और जयकरने ३, ४ और ५ सितम्बरको यरवदा जेलमें गांधीजी तथा अन्य नेताओंसे बातचीत की। गांधीजीकी हस्तलिपिमें इस पत्रका जो मसविदा एस० एम० १५२७ में प्राप्त है उसमें दूसरी अन्य व्यक्तिकी हस्तलिपिमें कुछ परिवर्तन और परिवर्द्धन है।</ref></small>}}<noinclude></noinclude> 9n94z0jtpzaqh8efyxwq8vcd0eidhcv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५७ 250 197756 674559 670474 2026-08-27T05:51:59Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674559 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|| पत्र : सप्रू और जयकरको | ११९}} वक्तव्यमें निम्नलिखित बात कही गई थी : "सरकार जानगी तौर पर यह आश्वासन देगी कि वह भारतकी विशेष आवश्यकताओं और परिस्थितियों तथा ग्रेट ब्रिटेनके साथ उसके लम्बे सम्बन्धको देखते हुए समायोजन और सत्ताके हस्तान्तरणकी जो शर्तें आवश्यक होंगी तथा गोलमेज सम्मेलन जैसा तय करेगा, वैसी पारस्परिक समायोजना तथा सत्ता-हस्तान्तरणकी शर्तोंके साथ पूर्ण उत्तरदायी सरकारकी माँगका समर्थन करेगी।"<ref>१ और २. मसविदेमें ये अनुच्छेद नहीं थे।</ref> वायसरायके पत्रका प्रासंगिक अंश निम्नलिखित है : मेरी और मेरी सरकारकी — और मुझे कोई सन्देह नहीं कि सम्राट्की सरकारकी भी — यह हार्दिक इच्छा है कि जिन मामलोंमें भारतीय लोग अभी स्वयं जिम्मेदारी उठानेकी स्थितिमें नहीं हैं, उन मामलोंके सम्बन्धमें विशेष उपाय करनेके बाद भारतकी जनताको यथासम्भव अधिक-से-अधिक मामलोंमें उस हद तक स्वराज्य दिलानेके लिए हम अपने-अपने क्षेत्रमें मदद करें जिस हद तक यह दिखाया जा सके कि वैसा करना उन विशेष उपायोंसे असंगत नहीं होगा। वे मामले क्या हैं, और उनके लिए क्या पूर्वोपाय करना सर्वोत्तम होगा, इस प्रश्नपर सम्मेलन विचार करेगा, लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं माना है कि दोनों पक्षोंके बीच परस्पर विश्वास होनेपर कोई समझौता हो सकना असम्भव है।<ref>१ और २. मसविदेमें ये अनुच्छेद नहीं थे।</ref> हमें लगता है कि दोनों पक्षोंने जो स्थिति अपनाई है उसमें जबरदस्त अन्तर है। पण्डित मोतीलालजीकी जहाँ यह कल्पना है कि प्रस्तावित गोलमेज सम्मेलनमें विचार-विमर्शके परिणाम-स्वरूप भारत स्वतन्त्र हो जायेगा और उस स्वतन्त्र भारतका दर्जा आज भारतको प्राप्त दर्जेसे भिन्न प्रकारका होगा, वहीं वायसरायका पत्र केवल उनकी, उनकी सरकारकी और ब्रिटिश मन्त्रिमण्डलकी यह हार्दिक इच्छा मात्र व्यक्त करता है कि जिन मामलोंमें भारतीय लोग अभी स्वयं जिम्मेदारी उठानेकी स्थितिमें नहीं हैं, उन मामलोंके सम्बन्धमें विशेष उपाय करनेके बाद वे भारतकी जनताको यथासम्भव अधिक-से-अधिक मामलोंमें उस हद तक स्वराज्य दिलानेमें मदद करना चाहते हैं जिस हद तक यह दिखाया जा सके कि वैसा करना उन विशेष उपायोंसे असंगत नहीं होगा। दूसरे शब्दोंमें, वायसरायके पत्रसे यही सम्भावना प्रकट होती है कि लैंसडाउन रिफॉर्म्सके नामसे विख्यात सुधारोंके साथ ही साथ कुछ और सुधार भी लागू कर दिये जायेंगे। चूँकि हमें भय था कि हमारी धारणा सही है, अतः अपने १५-८-१९३० के पत्रमें, जिसपर पण्डित मोतीलाल नेहरू, डा० सैयद महमूद और पण्डित जवाहरलाल नेहरूने भी हस्ताक्षर किये थे, हमने स्थिति निषेधात्मक रूपमें रखी थी और बताया था कि क्या-क्या बातें हैं जो हमारी रायमें कांग्रेसको सन्तुष्ट नहीं करेंगी। जो पत्र <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१ और २. मसविदेमें ये अनुच्छेद नहीं थे।</ref></small><noinclude></noinclude> 459n19s3wmp2i74ghbeg4vstqdogh5u पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५८ 250 197757 674563 670476 2026-08-27T05:56:42Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674563 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|१२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}} अब आप वाइसराय महोदयसे लाये हैं उसमें वही बात दोहराई गई है जो उन्होंने अपने पहले पत्रमें कही थी, और हमें यह कहते हुए दुख होता है कि इस पत्रमें वाइसराय महोदयने हमारे पत्रको तिरस्कारपूर्वक विचारके योग्य भी नहीं माना है और उस पत्रमें निहित सुझावोंके आधार पर समझौता-वार्ता करनेको असम्भव बताया है। आपने हमें यह बताकर इस प्रश्न पर और ज्यादा प्रकाश डाला है कि "यदि श्री गांधी सरकारके सामने निश्चित रूपसे ऐसा सवाल रखेंगे" अर्थात् भारतकी इच्छा पर साम्राज्यसे पृथक होनेके अधिकारका सवाल रखेंगे, तो वाइसराय कहेंगे कि हम इस सवालको विचारणीय प्रश्न माननेको तैयार नहीं हैं। हम लोग, दूसरी ओर, ऐसा मानते हैं कि भारतको जो भी संविधान मिलेगा उसमें यह अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण होगा और यह ऐसा प्रश्न है जिसपर किसी बहसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए। यदि भारतको अब पूर्ण उत्तरदायी सरकार या पूर्ण स्वायत्त शासन, अथवा उस सरकारका जो भी नाम रखा जाये, प्राप्त करना है तो यह बिल्कुल स्वैच्छिक आधार पर ही हो सकता है, जिसमें प्रत्येक पक्षको अपनी इच्छाके अनुसार साझेदारी या सम्बन्ध तोड़नेका अधिकार होगा। यदि भारतको आगेसे साम्राज्यका अंग नहीं रहना है बल्कि राष्ट्र-मण्डलमें एक बराबरीका दर्जा रखनेवाले स्वतन्त्र सदस्यके रूपमें रहना है, तो वैसी हालतमें उसे इस सम्बन्धकी आवश्यकता और हार्दिकताका अनुभव होना चाहिए। इस सम्बन्धमें इससे भिन्न कोई स्थिति कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकती। आप कृपा करके देखेंगे कि हमने जिस भेंटका ऊपर जिक्र किया है उसमें यह स्थिति स्पष्ट रूपसे जता दी गई है। इसलिए जबतक ब्रिटिश सरकार या ब्रिटिश जनता इस स्थितिको असम्भव या अतर्कसंगत मानती है तबतक हमारी रायमें कांग्रेसको स्वतन्त्रता की लड़ाई जारी रखनी चाहिए। नमक-करके विषयमें दिये गये हमारे अत्यन्त नरम प्रस्तावके सम्बन्धमें वाइसराय महोदयने जो रवैया अपनाया है उससे हमें सरकारकी मनोवृत्तिकी बड़ी दुखद झांकी मिलती है। हमारे लिए यह बात दिनके प्रकाशके समान स्पष्ट है कि शिमलाकी चकरानेवाली ऊँचाइयों पर बैठे हुए भारतके शासक मैदानोंमें रहनेवाले उन करोड़ों क्षुधापीड़ित लोगोंकी कठिनाइयोंको न तो समझ सकते हैं, न उन्हें उनका अहसास ही हो सकता है जिनके अनवरत श्रमके कारण ही उन चकरानेवाली ऊँचाइयों परसे शासन करना सम्भव है। गरीब लोगोंके लिए जिस प्रकृति-प्रदत्त वस्तुका महत्त्व हवा और पानीके समान ही है, उस चीजपर एकाधिकार बनाये रखनेके लिए निर्दोष लोगोंका खून बहाकर भी यदि सरकारको उसकी घोर अनैतिकताका विश्वास नहीं हुआ है, तो वाइसराय द्वारा सुझाया गया भारतीय नेताओंका कोई सम्मेलन वैसा विश्वास नहीं दिला सकता। यह सुझाव देना कि एकाधिकारको रद्द करनेकी माँग करनेवालोंको उतने ही राजस्वका कोई अन्य साधन बताना चाहिए, जलेपर नमक छिड़कनेके समान है। यह रवैया इस बातका संकेत है कि यदि सरकारका वश चले तो मौजूदा पीस डालनेवाली खर्चीली प्रणाली अनन्त काल तक जारी रहेगी। हम यह भी ध्यानमें लानेका साहस करते<noinclude></noinclude> 7k95983jahzhi1dj7vt9cwszwecgxv1 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५९ 250 197758 674568 670477 2026-08-27T06:00:57Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh||पत्र : सप्रू और जयकरको | १२१}} हैं कि यहाँकी सरकार ही नहीं बल्कि संसारभर की सरकारें ऐसे कानूनोंके उल्लंघनको खुले तौर पर माफ करती हैं जो अलोकप्रिय हो गये हैं किन्तु जिन्हें प्राविधिक अथवा अन्य किन्ही कारणोंवश एकदम रद्द नहीं किया जा सकता। अब हमें उन अन्य अनेक महत्वपूर्ण विषयोंकी चर्चा करनेकी जरूरत नहीं है जिनके बारेमें हमने जनताकी स्थिति स्पष्ट की थी किन्तु जिनके बारेमें वाइसरायने कोई अनुकूल उत्तर नहीं दिया है। हम आशा करते हैं कि हमने ऐसे पर्याप्त महत्वपूर्ण मामले यहाँ गिनाये हैं जिनके बारेमें इस समय ब्रिटिश सरकार और कांग्रेसके बीच ऐसे मतभेद हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता। तथापि शान्ति-वार्ताकी प्रकट विफलता पर निराश होनेकी जरूरत नहीं है। कांग्रेस स्वतन्त्रताकी कड़ी लड़ाई लड़ रही है। हमारे राष्ट्रने एक ऐसे अस्त्रका सहारा लिया है जिसके हमारे शासक अभ्यस्त नहीं हैं और इसलिए जिसे समझने और जिसकी कद्र करनेमें उन्हें समय लगेगा। हमारे कुछ महीनोंके कष्ट-सहनेसे उनका हृदय-परिवर्तन नहीं हुआ है, इस बात पर हमें कोई आश्चर्य नहीं है। कांग्रेसकी इच्छा किसीके भी, वह कोई भी क्यों न हो, वैध हितोंको हानि पहुँचानेकी नहीं है। कांग्रेसका अंग्रेजोंसे उनके अंग्रेज होनेके नाते कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन वह असह्य ब्रिटिश आधिपत्यका अपनी सम्पूर्ण नैतिक शक्तिसे विरोध करती है और करेगी। अन्त तक अहिंसात्मक रहनेका विश्वास होनेके कारण हमें निश्चय है कि हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाएँ शीघ्र ही पूरी होंगी। यह बात हम सविनय अवज्ञाके सम्बन्धमें शासक वर्ग द्वारा कटु और अक्सर अपमानजनक भाषा प्रयुक्त की जानेके बावजूद कह रहे हैं। अन्तमें, हम एक बार आपको फिर धन्यवाद देते हैं कि आपने शान्ति स्थापित करनेके लिए इतनी तकलीफ उठाई है, लेकिन हमारी रायमें कांग्रेस संगठनके अधिकारियोंके साथ और आगे शान्तिवार्ता चलानेका अभी समय नहीं आया है। बन्दी होनेके कारण हमारे सामने कुछ स्पष्ट कठिनाइयाँ हैं। हमारी राय, जैसाकि अनिवार्य है, दूसरोंसे सुनी बातों पर आधारित है और उसके गलत होनेका खतरा है। कांग्रेस संगठनकी बागडोर जिनके हाथमें है वे स्वभावतः चाहने पर हममें से किसीसे भी मिल सकते हैं। वैसी स्थितिमें, और जब सरकार स्वयं भी शान्तिकी उतनी ही इच्छुक हो, तब उनके लिए हमसे मिलनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। {{Right|मो० क० गांधी सरोजिनी नायडू वल्लभभाई पटेल जयरामदास दौलतराम}} [ अंग्रेजीसे ] हिंदू, ५-९-१९३०<noinclude></noinclude> nls6267pemw7o1sfx36abavh63nctav पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१६० 250 197759 674572 670479 2026-08-27T06:06:28Z Koyal Singh 6351 /* शोधित */ 674572 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{rh|||}} {{c|'''१७०. पत्र : भगवानजी पण्ड्याको'''}} {{Right|५ सितम्बर, १९३०}} चि० भगवानजी,<br> तुम्हारा दुःखपूर्ण पत्र मिला। . . .<ref>१, २ और ३. यहाँ नाम छोड़ दिये गये हैं।</ref> तो बहुत अधम महिला प्रतीत होती है। लेकिन अब उसे दयासे जीता जा सके तो हम प्रयत्न करेंगे। तुम्हारा धर्म स्पष्ट है। तुम्हें उसका संग फिलहाल तो तुरन्त छोड़ देना चाहिए। तुम्हें न उससे सेवा लेनी है न उसकी सेवा करनी है। मैंने उसे पत्र लिखा है। वह पत्र नारनदास उसे पढ़नेको देगा। तुम [भी] उसे पड़ जाना। जो पुरुष अथवा स्त्री किसी अन्य स्त्री अथवा पुरुषके प्रति मनसे विकारवश हो सकते हैं उन्हें अपने पति अथवा पत्नीसे सेवा लेने अथवा उसकी सेवा करनेका अधिकार नहीं रह जाता। तुम्हारा पति-पत्नीका सम्बन्ध तो खत्म हो गया है और यदि यह सम्बन्ध हो भी तो विकारवश पति अपनी पत्नीकी शुद्धभावसे कदापि सेवा नहीं कर सकता। इस बातको अनुभवसिद्ध समझो। इसलिए फिलहाल तो तुम इस बातको ही अपने मनसे निकाल देना कि . . .<ref>१, २ और ३. यहाँ नाम छोड़ दिये गये हैं।</ref> नामका कोई प्राणी आश्रममें रहता है। इसीमें तुम्हारा श्रेय है। . . .<ref>१, २ और ३. यहाँ नाम छोड़ दिये गये हैं।</ref>के लिए यदि यह स्थिति असह्य होगी तो वह चली जायेगी और यदि वह जाती है तो भले ही चली जाये। यह सब तुम्हें समझ न आया हो तो फिर पूछना। {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२३) से। सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या</small>}} {{c|'''१७१. पत्र : पूँजाभाईको'''}} {{Right|यरवडा मन्दिर<br> ५ सितम्बर, १९३०}} चि० पूँजाभाई,<br> तुम्हारा पत्र मिला। स्वास्थ्य बिगड़ने पर हमें शर्मिन्दा तो होना ही चाहिए। किन्तु प्रायः अनजाने ही हमें रोग आ घेरते हैं। यह मानकर हमें अपने मनको शान्त रखना चाहिए। हम नम्र रहें और ईश्वरके प्रति अपनी श्रद्धाको बढ़ायें, यही बीमारीका सदुपयोग है। तुम कौन-सी चिकित्सा करा रहे हो ? तुम्हारा चिकित्सक कौन है ? {{Right|बापूके आशीर्वाद}} {{Left|<small>गुजराती (जी० एन० ४०१५) की फोटो-नकलसे।</small>}} <HR ALIGN="left" NOSHADE SIZE="1" WIDTH="30%"> <small><ref>१, २ और ३. यहाँ नाम छोड़ दिये गये हैं।</ref></small> o<noinclude></noinclude> jr314207df9ub1ee7o1mbcsiuh0g7fb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३६ 250 197835 674509 670563 2026-08-26T19:14:25Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674509 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>और तनिक भी थकान महसूस किये बिना। इसने मुझे मोहित कर लिया है और मैं चाहता हूँ कि तुम भी इसे आजमाओ। यह बुनियादी तौर पर गरीबोंका चरखा है। इसका बनानेवाला कोई कुशल कारीगर नहीं है। लेकिन चरखेका प्रत्येक भाग मुझे लगता है कि क्षुधा-पीड़ितोंको ध्यान में रख कर बनाया गया। इसकी कीमत १ १/२ रुपये है लेकिन मुझे विश्वास है कि इसे सिर्फ ८ आने में बनाया जा सकता है। भारतमें जितने भी चरखे हैं, यह उन सबसे ज्यादा हलका है। इसकी ओर कमसे-कम ध्यान देनेकी जरूरत है। जितने भी चरखे मैं जानता हूँ उनमें यह सबसे कम स्थान घेरता है। एक छोटा बच्चा भी इसे चला सकता है। अगर चकरियाँ और तकुए भंडारमें हों तो एक दिनमें हजारों ऐसे चरखे बनाये जा सकते हैं। इसकी बनावट बहुत ही सादी है। इस पर बारीक सूत तो सहज ही निकलता है। पहली बार मैंने जो सूत काता वह ३० नम्बरका था। और मेरा खयाल है कि रफ्तारके मामलेमें यह चरखा किसी भी चरखेसे टक्कर ले सकता है। इसमें कुछ सुधारोंकी गुंजाइश है जो इसकी लागतमें एक पाईका इजाफा हुए बगैर किये जा सकते हैं। मैंने दो बनाये हैं और इससे लागत कम हुई है। मूल चरखेमें लकड़ीके चमरख हैं जिनसे बड़ी आवाज होती है। मैंने उन्हें निकाल कर नारियलकी रस्सी लगा दी है जो मैंने कूड़े में से निकाली है। मैंने तकुए पर लगे खनखनानेवाले शीशेके छड़को तोड़ कर उसकी जगह कुछ धागा लपेट दिया है ताकि तकुआ अपनी जगहसे न हिले। ऐसा करनेसे अब चरखेमें कोई आवाज नहीं होती। यह राय इस चरखेके एक नये भक्तकी है जिसने उसे पिछले चार दिन ही आजमाया है। इसलिए इस रायमें सुधारकी आवश्यकता हो सकती है। लेकिन निस्सन्देह आस्थावान लोगोंको इस चरखेकी आजमाइशका पूरा मौका देना चाहिए। मैं इस चरखेके आविष्कारकको पत्र लिख कर इसमें कुछ सुधारोंका सुझाव दे रहा हूँ और केशुको भी लिख रहा हूँ कि वह इस चरखेको जाँचे, आजमाये और यदि मेरा आरम्भिक प्रेक्षण तनिक भी ठीक हो, तो वह परमें सुधार करे। इस चरलेके कुछ और भी गुण हैं जिनका वर्णन में नहीं करूँगा क्योंकि अभी मुझे कई और पत्र लिखने है तुम्हारे चरखेका तकुआ किस कारण नहीं चल रहा है, यह अगर सोचनेसे समझ में आये तो कृपया मुझे बताना। व्रजकिशोर बाबू तुम्हें कैसे मिले? क्या अब वह बेहतर है? क्या तुम प्रभावती से मिलीं? वह काफी दुबली हो गई है और उसके अन्तिम पत्र में लिखा है कि उसे तेज बुखार था। और तुम्हारा स्वास्थ्य? तुम आश्रम में अपनेको थका कर चूर मत कर देना। तुम कमलावन लुंडीसे मिली होगी। यह कहने की जरूरत नहीं कि तुम उसे मित्र बिना लोगी। वह बहुत भली स्त्री मालूम पड़ती है। हम दोनोंका स्वास्थ्य बहुत बढ़िया है। मेरे वजनमें कुछ बढ़ोतरी ही हुई है। सब्जियोंवाला प्रयोग सफल सिद्ध हुआ दिखता है और मुझे यह जानकर बहुत ही खुशी है कि सूखे मेवे छोड़नेसे भी खर्चमें काफी कमी होती है। सब्जियोंमें मैं पिछले दो दिनोंसे पालक ले रहा हूँ जिससे पेट अपने-आप साफ हुआ है। मैं कभी-कभी<noinclude></noinclude> 87fn7ej8vlthynh5296094ko5khikg8 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३७ 250 197836 674510 670565 2026-08-26T19:15:47Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674510 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: दूधीबहन देसाईको|१९९}}</noinclude>शकरकन्द खाता हूँ। मुझे आशा है कि अब तक तुम्हें मेरे सभी पत्र मिल गये होंगे? मैंने किसी सप्ताह नागा नहीं किया है। सप्रेम, {{right|बापू}} अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ५४१४) से सौजन्य: मीराबहन जी॰ एन॰ ९६४८ से भी। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२८२. पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}}} {{right|५ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ मनु,}} तुझे बुखार कैसे आ गया? अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखनेके कारण तू तो इनाम पाने योग्य है। अपने उद्योगसे ही तू अपना शरीर बना सका है और उसे बनाये रखना भी तेरा ही काम है। जब काकासाहब छूटें तब तक तू एक प्रशिक्षित कार्य-कर्त्ताके रूपमें तैयार हो जाना। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ७७६५) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२८३. पत्र: दूधीबहन देसाईको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ५ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ दूधीबहन,}} तुम्हारा पत्र मिला। तुम कक्षाओंको पढ़ाती हो, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। अपनेको भूलकर उक्त कार्यमें खूब रस उत्पन्न करना। सभी बालकोंको मनु समझकर अपना लेना। तुम्हारे पत्र लिखनेसे मेरा कार्य तनिक भी नहीं बढ़ता। मुझे समय-समय पर लिखती रहना और यदि मुझसे कुछ पूछना चाहो, पूछना। अब तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? कुल मिलाकर तुमपर उपवासका कैसा प्रभाव पड़ा जान पड़ता है? {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ७४५४) की फोटो-नकलसे सौजन्य: वा॰ गो॰ देसाई<noinclude></noinclude> 6mdwwjksh71oimja0f7vwe3asexsa57 पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३८ 250 197837 674511 670566 2026-08-26T19:16:47Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674511 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२८४. पत्र: गोविन्द पटेलको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ६ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ गोविन्द,}} तेरा सुन्दर अक्षरोंमें लिखा हुआ पत्र मिला। समय-समय पर अपनी गतिविधिके बारेमें लिखते रहना। क्या तू कुछ पढ़ रहा है? अब तेरा वजन कितना है? {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३९४५) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२८५. पत्र: प्रभावतीको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ६ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ प्रभावती,}} तुझे मैंने सीधे ही एक पत्र भेजा है; उम्मीद है वह मिल गया होगा। तेरे तारकी बाट जोह रहा हूँ। तू बीमार क्यों पड़ जाती है? देखना, अपना स्वास्थ्य खराब न करना। यदि वहाँ स्वास्थ्य नहीं सुधरता तो आश्रम चली जाना। तबीयत की खातिर आश्रम जानेसे कोई इनकार नहीं करेगा। चूँकि तू पटनायें है, इसलिए मुझे सबके समाचार दे सकती है। मैं आनन्दसे हूँ। काकासाहब का स्वास्थ्य अच्छा होता जा रहा है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३३७५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> i7xwckxh1s7k314qi4y359xlh6y7jst पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३९ 250 197838 674512 670567 2026-08-26T19:18:11Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674512 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२८६. पत्र: शान्ता शंकरभाई पटेलको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ६ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ शान्ता (पटेल),}} तेरा पत्र मिला। तूने ठीक विवरण दिया है किन्तु अबतक अपनी लिखावट नहीं सुधारी है। यदि तू सुधारनेकी कोशिश करेगी तो लिखावट अवश्य सुधर जायेगी। यदि तू अपनी लिखावट अभी नहीं सुधारेगी तो वह मेरी जैसी खराब रह जायेगी। तू यह समझती है न कि किसीको बुरी लिखावटमें पत्र लिखने में भी हिंसा-दोष ही है। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ४०५४) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२८७. पत्र: बलभद्रको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ६ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ बलभद्र,}} तेरा पत्र मिला। यदि सचमुच ही मथुरादास भाई तुझे ले जानेको तैयार हों और नारणदास भाई तुझे जानेकी अनुमति दे दें तो इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। तू अपनी लिखावट सुधारना और अपना वजन बढ़ाना। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ९२१२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> hn1jy24qrdkj4ym554ec1pgu33eke8r पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४० 250 197839 674513 670568 2026-08-26T19:19:27Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674513 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२८८. पत्र: भगवानजी पण्डयाको'''}}}} {{right|६ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ भगवानजी,}} तुम्हारे पत्र पढ़ गया। तुम्हारे स्वभावमें वहमकी मात्रा अधिक है इसलिए तुम्हारी राय सदोष हो सकती है। फिर भी तुम्हारा धर्म अपने ऊपर पूरी चौकसी रखना है तुम्हारा धर्म यह है कि तुम्हें जो बुराई दीख पड़े उसके बारेमें नारणदास को बता दो और फिर चुप रहो। तभी तुम आगे बढ़ सकोगे। जबतक आश्रममें एक भी ऐसा व्यक्ति है जो सत्यादि व्रतोंका पुजारी है तबतक आश्रमको कदापि स्वामीहीन न समझना। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ३२५) से। सौजन्य: भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या {{dhr}} {{c|{{larger|'''२८९. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}} {{right|२/७ अक्टूबर १९३०}} {{left|चि॰ नारणदास,}} आश्रमका पुलिंदा कल मिला। अधिकतर तो जिस दिन पहुँचता है उसी दिन मुझे दे दिया जाता है। हरिलाल देसाईको पत्र लिख रहा हूँ। उसे पढ़ लेना। आज गिरिराजके बारेमें कुछ लिखनेकी जरूरत नहीं। तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा करना। जैनूके बारेमें पढ़कर खुशी हुई। भगवानजीको लिख रहा हूँ। उसके पत्रका मुझपर असर नहीं पड़ेगा। उसका स्वभाव में जानता हूँ। मधुके पत्र से मुझे वह बहुत निर्दोष बालिका लगी है, नवीन आदि धीरे-धीरे सादगी सीख लेंगे, ऐसा मानता हूँ। तुम्हारा विश्वास मुझे अच्छा लगता है। विश्वास करनेवालेने इस संसारमें कभी कुछ खोया नहीं। अविश्वासी कभी कुछ पाता नहीं और कई बार तो खो ही बैठता है, और शान्ति खोकर अशान्ति मोल लेता है। मलेरियावालों से तीन बातोंका ध्यान रखनेको कहना। टट्टी साफ हो, अपने-आप न आये, तो जुलाब लें या एनीमाका इस्तेमाल करें। बुखार उतर जाने पर भी एक सप्ताह तक पाँच ग्रेन कुनैन नींबूके रसमें घोल कर उसमें १० या १५ ग्रेन सोडा डालनेके बाद सोडावाटरकी तरह पी जायें। उसमें उफान आता है, और आना भी चाहिए। और बुखार उतरनेके बाद कमसे-कम एक सप्ताह दूध तथा मुनक्का या उबली हुई सब्जी पर रहें। जिन्हें बुखार नहीं है, पर मच्छर परे-<noinclude></noinclude> 94o1ayjr9ivbwi7bluk661bj7l5x1fh पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४१ 250 197840 674514 670569 2026-08-26T19:20:25Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674514 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|२०३}}</noinclude>शान करते हों, वे शरीरके खुले भाग पर मिट्टीका तेल मलकर सोयें। सबको अपना पेट तो साफ रखना ही चाहिए। अमीदासके बारेमें चिन्ता तो जरूर होती है। मेरे पत्रका कुछ असर हुआ हो और वह दूध लेने लगा हो तो अच्छा है। पूँजाभाईको जैसा ठीक लगे वैसा करें और रहें। चन्द्रशंकर जिस उदासी वैद्यसे उपचार करवाता है वह शायद जमनाके लिए भी ठीक रहेगा। चन्द्रशंकर उसकी बहुत तारीफ करता है। पता लगाना। गंगाबहनको लिखा पत्र पढ़ लेना। उसे समय और धीरज देना। वह काकासाहब को देखनेके बहाने भी पूना आ जाये तो तीन दिनके लिए वायु-परिवर्तन हो जायेगा। नाथजीसे आग्रह करते ही रहना। उनकी उपस्थिति भी गंगाबहनके लिए शान्तिप्रद हो सकती है। महादेवकी माताजीसे कहना कि उन्होंने आकर अच्छा किया है। अब जल्दी दिहेण वापस जानेका विचार न करें। हो सके तो आश्रम में ही रहने लगे। छगनलालको लिखा पत्र पढ़ना। मुझे पत्र लिखने में कैसी मर्यादाका पालन करना चाहिए, उससे यह मालूम होगा। जिसने उसका पालन न किया हो उसका पत्र वहीं रोक लेना। खड़ग बहादुरके पत्रमें उसका उल्लंघन हुआ मानता हूँ। प्रेमावहन भी चिन्तित हो गई है। उसको लिखा पत्र पढ़ लेना। उसे सान्त्वना देना। कमलाबहन लुंडीका पत्र पढ़ना। उसके कई सुझाव अपनाये जानेके योग्य है। {{right|४ अक्टूबर १९३०}} छगनलाल जोशीको लिखा पत्र पढ़ना। उसमें जिन मर्यादाओंको सूचित किया है सभी उनका पालन करें। उनका उल्लंघन करनेवालोंके पत्र वहीं रोक लेना। खड़ग बहादुरका पत्र ऐसा ही माना जायेगा।<ref> पिछले चार वाक्योंमें पुनरुक्ति अनजानेमें हो गई लगती है।</ref> सभी पत्र तुम पढ़ो ऐसा बोझ मैं तुमपर डालना नहीं चाहता। किन्तु नया व्यक्ति हो तो उसके पत्र एक नजर देख जाओ। बहनोंके पत्र में तो आपत्तिके योग्य कुछ नहीं होता। इसलिए थोड़े ही देखने लायक होंगे। मुझे कई बार यह विचार तो आता ही है कि यहाँ जो पत्र में भेजता हूँ उन्हें छाँटने और सब लोगों तक भेजनेका काफी बोझ पड़ जाता होगा। उसे कैसे कम किया जाये, यह समझ नहीं आता। न लिखना भी योग्य नहीं है; इसलिए अनिवार्य समझकर यह बोझ लादता जाता हूँ। हरिलाल देसाईका पत्र पढ़ना ताकि उसमें लिखे सुझावोंका तुम्हें ध्यान रहे। गाण्डीव चरखा अभी चलाना शुरू किया है। मुझे वह अच्छा लगा है। उसपर उसी गति से काल सका हूँ जितनी दूसरे पेटी चरखे पर है। गति और बढ़ानेकी आशा करता हूँ। इसमें कई और सुधार सम्भव हैं, तब शायद यह और भी सम्पूर्ण बन सके। उसके बारेमें ईश्वरलाल बीमावालाको जो लिखा है वह पढ़ना। मीराबहनके पत्र में भी लिखना है उसे भी पढ़ लेना। मैं चाहता हूँ कि आश्रम में कोई उसे चलाकर देखे। तुम खुद भी देख लेना। मैं ईश्वरलालको दो-तीन और चरखे भेजनेको लिख रहा हूँ। मैंने बहुत-से चरखे देखे है किन्तु सबमें अभी तो यही अभ्यास करने लायक लगा है। और जैसे अनुभव होता जायेगा वैसे लिखूँगा।<noinclude></noinclude> rxs1qbplkaborqwxijf6kypchwuh1gf पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४२ 250 197841 674515 670571 2026-08-26T19:21:46Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674515 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{right|मंगल प्रभात, ७ अक्टूबर, १९३०}} रुई और सूतकी माला मिल गई है। रुईका आना तो खास तरहसे अच्छा लगा है क्योंकि वल्लभभाईके लिए पूनियाँ यहींसे जाती हैं। काँटेकी राह देख रहा हूँ किन्तु उसकी जल्दी नहीं। नम्रताः इसे व्रतोंमें पृथक स्थान नहीं है और हो भी नहीं सकता। अहिंसाका यह एक अर्थ है, अथवा यों कहें कि यह उसके अन्तर्गत है; परन्तु नम्रता अभ्याससे प्राप्त नहीं होती, वह स्वभावमें ही आ जानी चाहिए। जब आश्रमकी नियमावली पहलेपहल बनी तब मित्रोंके पास उसका मसविदा भेजा गया था। सर गुरुदास बनर्जीने नम्रताको व्रतोंमें स्थान देनेका सुझाव दिया, तब भी उसे व्रतोंमें स्थान न देनेका मैंने वही कारण बतलाया था जो यहाँ लिख रहा हूँ। यद्यपि व्रतोंमें उसे स्थान नहीं है तथापि वह व्रतोंकी अपेक्षा शायद अधिक आवश्यक है; आवश्यक तो है ही। परन्तु नम्रता किसीको अभ्याससे प्राप्त होती नहीं देखी गई। सत्यका अभ्यास किया जा सकता है, दयाका अभ्यास किया जा सकता है, परन्तु नम्रताके सम्बन्धमें कहना चाहिए कि उसका अभ्यास करना दम्भका अभ्यास करना है। यहाँ नम्रतासे तात्पर्य उस वस्तुसे नहीं है जो बड़े आदमियोंमें एक दूसरेके सम्मानार्थ सिखाई-पढ़ाई जाती है। कोई बाहरसे दूसरेको साष्टांग नमस्कार करता हो, पर मनमें उसके सम्बन्धमें तिरस्कार भरा हुआ हो तो यह नम्रता नहीं है, पाखण्ड है। कोई रामनाम जपता रहे, माला फेरे, मुनि-सरीखा बनकर समाजमें बैठे, पर भीतर स्वार्थ भरा हो, तो वह नम्र नहीं है, पाखण्डी है। नम्र मनुष्य खुद नही जानता कि कब वह नम्र है। सत्यादिका माप हम रख सकते हैं, पर नम्रताका नहीं। स्वाभाविक नम्रता छिपी नहीं रहती, तथापि नम्र मनुष्य खुद उसे नहीं देख पाता। वशिष्ठ-विश्वामित्रका उदाहरण तो आश्रममें हम लोगोंने अनेक बार सुना और समझा है। हमारी नम्रता शून्यता तक पहुँच जानी चाहिए। हम कुछ हैं, यह भूत मनमें घुसा कि नम्रता हवा हो गई और हमारे सभी व्रत मिट्टीमें मिल गये। व्रत-पालन करनेवाला यदि मनमें अपने व्रत-पालनका गर्व रखे तो व्रतोंका मूल्य खो देगा और समाजमें विषरूप हो जायेगा। उसके व्रतका मूल्य न समाज ही करेगा, न वह खुद ही उसका फल भोग सकेगा। नम्रताका अर्थ है अहंभावका आत्यन्तिक क्षय। विचार करनेपर मालूम हो सकता है कि इस संसारमें जीवमात्र एक रजकणकी अपेक्षा अधिक कुछ नहीं है। शरीरके रूपमें हम लोग क्षणजीवी हैं। कालके अनन्त चक्रमें सौ वर्ष क्या हैं; परन्तु यदि हम इस चक्करसे बाहर हो जायें, अर्थात् 'कुछ नहीं हो जायें,' तो हम सबकुछ हो जायें। कुछ होनेका अर्थ है ईश्वरसे––परमात्मासे––सत्यसे पृथक हो जाना। कुछका मिट जाना परमात्मामें मिल जाना है। समुद्रमें रहनेवाला बिन्दु समुद्रकी महत्ताका उपभोग करता है, परन्तु उसका उसे ज्ञान नहीं होता। समुद्रसे अलग होकर ज्यों ही अपनेपनका दावा करने चला कि वह उसी क्षण सूखा। इस जीवनको पानीके बुलबुलेकी उपमा दी गई है, इसमें मुझे जरा भी अतिशयोक्ति नहीं दिखाई देती। ऐसी नम्रता––शून्यता––अभ्याससे कैसे आ सकती है? पर व्रतोंको सही रीतिसे<noinclude></noinclude> ndp9f1j5t6cnjkriv12edvtsy44crgx पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४३ 250 197842 674516 670572 2026-08-26T19:22:39Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674516 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|२०५}}</noinclude>समझ लेनेपर नम्रता अपने-आप आने लगती है। सत्यका पालन करनेकी इच्छा रखनेवाला अहंकारी कैसे हो सकता है? दूसरेके लिए प्राण न्यौछावर करनेवाला अपना स्थान कहाँ घेरने जायेगा? उसने तो जब प्राण न्यौछावर करनेका निश्चय किया, तभी अपनी देहको फेंक दिया। क्या ऐसी नम्रता पुरुषार्थरहितता न कहलायेगी? हिन्दू-धर्ममें ऐसा अर्थ अवश्य कर डाला गया है और इससे बहुत जगह आलस्यको, पाखण्ड को स्थान मिल गया है। वास्तवमें नम्रताका अर्थ तीव्रतम पुरुषार्थ है: परन्तु यह सब परमार्थके लिए होना चाहिए। ईश्वर स्वयं चौबीसों घंटे एकसा काम करता रहता है, अँगड़ाई लेने तकका अवकाश नहीं लेता, हम उसके हो जायें। उसमें मिल जायें तो हमारा उद्योग भी उसके समान ही अतन्द्रित हो गया––हो जाना चाहिए। समुद्रसे अलग हो जानेवाले विन्दुके लिए हम आरामकी कल्पना कर सकते हैं; परन्तु समुद्रमें रहनेवाले बिन्दुके लिए आराम कहाँ? समुद्रको एक क्षणके लिए भी आराम कहाँ मिलता है? ठीक यही बात हमारे सम्बन्धमें है। ईश्वररूपी समुद्रमें हम मिले और हमारा आराम गया, आरामकी आवश्यकता भी जाती रही। यही सच्चा आराम है। यह महा अशान्तिमें शान्ति है। इसलिए सच्ची नम्रता हमसे जीवमूर्तिकी सेवाके लिए सर्वापणकी आशा रखती है। सबसे निवृत्त हो जानेपर हमारे पास न रविवार रह जाता है, न शुक्रवार, न सोमवार इस अवस्थाका वर्णन करना कठिन है, परन्तु वह अनुभवगम्य है। जिसने सर्वार्पण किया है उसने इसका अनुभव किया है। हम सब अनुभव कर सकते हैं। यह अनुभव करनेके उद्देश्यसे ही हम लोग आश्रम में एकत्र हुए हैं। सब व्रत, सब प्रवृत्तियाँ यह अनुभव करनेके लिए ही हैं। जो सेवा प्राप्त हो जाये वही करते-करते किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायेगा। केवल उसीको खोजने जानेसे यह अनुभव प्राप्त नहीं होता। {{right|बापूके आशीर्वाद}} {{left|[पुनश्च:]}} आज ६१ पत्र हैं। खुर्शेदबहन आश्रमसे कोई लोग मिलने जायें। मणिबहनके बारेमें कुछ खबर हो तो लिखना। गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/ १) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude> 8mjset73ic62f91jzh5bo6ootub6yqq पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४४ 250 197843 674517 670573 2026-08-26T19:23:19Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674517 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२९०. पत्र: कुसुम देसाईको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> ७ अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ कुसुम (देसाई),}} पिछले सप्ताह में प्यारेलालसे मिल सका। मिलनेके लिए थोड़ा ही समय दिया गया था। वह कमजोर तो जरूर हो गया है लेकिन अब ठीक। उसे दूध आदि मिलता है। उसकी देख-भाल अच्छी होती है। अब मेरा खयाल है कि उससे फिर मिल सकूँगा। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ १८०६) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२९१. पत्र: शारदा सी॰ शाहको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १० अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ शारदा (बबु),}} तेरा पत्र मिला। कातना अच्छा नहीं लगता, इसका एक कारण तो यह है कि तुझे अभी इस बातका पूरा भान नहीं हुआ कि उसके द्वारा करोड़ों लोगोंकी सेवा होती है, अथवा यह कारण होना चाहिए कि इस सेवामें तुझे रसका ही अनुभव नहीं होता। ऐसा हो तो अपने विचारका शोधन कर लेना। दूसरा कारण यह हो सकता है कि कातनेकी कला अभी तूने हस्तगत न की हो। सूत अच्छा निकले, तार टूटे नहीं, चरखा बिना किसी तरहकी कटु आवाज करते हुए चलता रहे तो इस क्रियामें रसका अनुभव हुए बिना नहीं रहता। किसी प्रदर्शनीमें किसी दिन तूने आन्ध्रकी बहनोंको कालते हुए देखा है? वे सचमुच कातती है। कातनेकी ऐसी क्रियामें किसे रस न आयेगा? 'गीता' की भी यही बात है। उसका मूल्य तू समझे तो ही वह तुझे भायेगी। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ १००२३) से। सौजन्य: शारदाबहन जी॰ चोखावाला<noinclude></noinclude> a8mjxg283rqzeuyv431i6suv31b5tkb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४५ 250 197844 674518 670574 2026-08-26T19:25:38Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 674518 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>&nbsp; {{c|{{larger|'''२९२. पत्र: हरिइच्छा-देसाईको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १० अक्टूबर १९३०}} {{left|चि॰ हरिइच्छा,}} तेरा पत्र मिला। चन्दनको धन्यवाद। तुझे भी प्रतियोगितामें अपना नाम देना चाहिए। तुझे जो इनाम मिले, उसका उपयोग तू चाहे तो परोपकारके लिए करना। जिन लोगोंको प्रतियोगिता आदिके द्वारा प्रोत्साहनकी आवश्यकता नहीं है वे लोग दूसरोंके लिए प्रतियोगितामें भाग लें। चन्दन, तारा और वसन्तको आशीर्वाद। {{right|बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ७४६६) की फोटो-नकलसे। {{dhr}} {{c|{{larger|'''२९३. पत्र: कपिलराय मेहताको'''}}}} {{right|यरवडा मन्दिर<br> १० अक्टूबर, १९३०}} {{left|चि॰ कपिल,}} तेरा पत्र विले पार्लेमें मिल गया है। घर निकट होनेके बावजूद किसीको घरमें मिलनेवाली सुविधाओं या सगे-सम्बन्धियोंके प्रेमकी खातिर वहाँ नहीं जाना चाहिए, किन्तु संगी-साथियोंका बोझ हलका करनेके खयालसे और उनकी इच्छासे तीमारदारीके लिए पर जानेमें दोष नहीं हो सकता। यह व्यक्तिकी मानसिक स्थिति पर निर्भर है। तुझे अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना चाहिए और उसे सुधार लेना चाहिए। तेरा स्वास्थ्य इस जवानीमें नाजुक हो जाये, यह बात ठीक कैसे लग सकती है? सूर्य-स्नान, प्राणायाम, शवासन और अल्पाहार दमेमें बहुत सहायता पहुँचाते हैं। काकासाहब आनन्दसे हैं। {{right|उनके और बापूके आशीर्वाद}} गुजराती (जी॰ एन॰ ३९७५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude> q7ryyqrak3ne8of1zmnniutjxq4aibv पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०१ 250 198100 674401 670834 2026-08-26T13:48:52Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 674401 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{Rh|||४६३}} {{c|परिशिष्ट}} पटक माया परी, अटक चरणे हरि बटक मावात सुणतां ज साची, आशनुं भवन आकाश सुधि रच्धुं मूढ़ ! ए मूळची भीत काची। ।।३।। सरस गुण हरि तणा जे जनो अनुसर्या ते तथा सुजश तो जगत बोले नरसैयो रंकनी प्रीत प्रभुशुं घणी अवर वेपार नहि भजन तोले ।।४।। {{Rh|||७-११-१९३०}} {{C|२१६}} {{C|( राग आसा मांड तीन ताल)}} थयुं रे देवळ जूनुं तो थयुं, मारो हंसलो नानो ने देवळ जूनुं तो थयुं. ध्रु० आ रे काया रे हंसा, डोलवाने लागी रे, पडी गया दांत, मांयली रेखूं तो रहयुं. मारो० तारे ने मारे हंसा, प्रीत्युं बंधाणी रे, ऊडी गयो हंस, पांजर पड़ी रे रयू. मारो० बाई मीरां कहे छे प्रभु गिरिधरना गुण, प्रेमनो प्यालो समने पाउं ने पीउं. मारो० {{Rh|||८-११-१९३०}} {{C|२१७}} {{C|( राग कालिंगड़ा - ताल दीपचंदी)}} नहीं रे विसाएं हरि, अंतरमाथी नहीं रे ० जमुनाना पाणी रे जाता ध्रु० शिर पर मटकी घरी. १ आवतां ने जातां मारग बच्चे अमूलख वस्तु जडी. २ आवतां ने जातां वृन्दा रे वनमां चरण तमारे पीळां पीताम्बर जरकशी पडी. ३ जामा कैंसर आड करी मोर मुगट ने काने रे कुंडल मुख पर मोरली धरी.<noinclude></noinclude> lt6fc7ex7qo54j8flwoa1gdijucvo7d पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०२ 250 198101 674405 670835 2026-08-26T13:57:27Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 674405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>४६४ {{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय} {{C|बाई मीरां कहे प्रभु गिरिधरना गुण विठ्ठलवरने}} वरी.६ {{Rh|||९-११-१९३०}} {{C|२१८}} {{C|(राग झिंझोटी तीन ताल)}} - बोल मा, बोल मा, बोल मा, रे राधा-कृष्ण विना बीजुं बोल मा. भु० शेलडीनो स्वाद तजीने कडवो लीमडो घोळ मा रे. १ चांदा सूरजनुं तेज तजीने आगिया संगाते प्रीत जोड मा रे. २ हीरा माणेक झवेर तजीने कथीर संगाते मणि तोळ मा रे. ३ मीरां कहे प्रभु गिरिधर नागर शरीर आप्यु समतोलमां रे. ४ {{Rh|||१०-११-१९३०}} {{C|२१९}} {{C|( राग काफी - ताल द्रुत - दीपचंदी)}} माया लागी रे, मोहन प्यारा ! मुख में जोयुं तारं, सर्व जग थयुं खाएं, मन मारुं रहभुं न्याएं रे, मोहन ० संसारीनुं सुख एवं झांझवानां नीर जेवुं, तेने तुच्छ करी फरीए रे, मोहन ० मीरांबाई बलिहारी, आशा मने एक तारी, हवे हूं तो बडभागी है, {{C|२२० }} {{c|( राग आसावरी -- तीन ताल)}} {{Rh|||११-११-१९३०}} वैष्णव नथी थियो तु रे, शीद गुमानमां घूमे हरिजन नथी थयो तु रे. टेक हरिजन जोई हैहुं नव हरखे, द्रवे न हरिगुण गातां, काम धाम चटकी नथी पटकी, क्रोधे लोचन रातां. १<noinclude></noinclude> qi4rmbdz6po6grp5gt66l5hiex8h6rb पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०३ 250 198102 674550 670836 2026-08-27T05:29:28Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 674550 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|||६५}} {{C|परिशिष्ट}} तुज संगे कोई वैष्णव थाये, तो तुं वैष्णव साचो, तारा संगनो रंग न लागे, तांहां लगी तुं काचो. २ परदुःख देखी हृदे न दाझे, परनिंदा नथी डरतो, बहाल नथी विठ्ठलसुं सानुं, हठे न हूँ हूँ करतो. ३ परोपकारे प्रीत न तुजने, स्वारय छूटयो छे नहीं, कहेणी तेवी रहेणी न मळे, कांहां लख्युं एम कहेनी. ४ भजवानी रुचि नथी मन निश्चे, नथी हरिनो विश्वास, जगत तणी आशा हे जांहां लगी, जगत गुरुं, तुं दास. ५ करेश तो, साची वस्तु जडशे, मान पण, साधुं कहेवुं पडशे. मन तणो गुरु मन दया दुःख के सुख ६ {{Rh|||१२-११-१९३०}} {{C|२२१}} {{C|(राग हिंडोल---ताल तेवरा)}} हरि, जेवो तेवो हूँ दास समारो २ करुणासिंधु, ग्रहो कर मारो. टेक सांकडाना साथी शामक्रिया, छो बगडचाना बेली, शरण पडचो खल अमित कुकरमी, तदपि न मूको ठेली. १ निज जन शूठानी जाती लज्जा, राखो छो श्रीरणछोड, शून्य भाग्यने सफळ करो छो, पूरो वरद बळ कोड. २ अवळनुं सवळ करो सुन्दर-बर, ज्यारे जन जाय हारी, अयोग्य योग्य, पतित करो पावन, प्रभु दुःख दुष्कृतहारी. ३ विनति विना रक्षक निज जनना, दोष तथा गुण मानो, स्मरण करता संकट टाळो, गणो न मोटो नानो. ४ विकळ पराधीन पीडा प्रजाळो, अंतरनुं दुःख जाणो, आरत-बन्धु सहिष्णु अभयकर, अवगुण उर नव आणो.५ सर्वेश्वर सर्वात्मा स्वतंत्र, दया प्रीतम गिरिधारी, श्रीजी मारे, मोटी छे ओष तमारी. ६ {{Rh|||१३-११-१९३०}} {{C|२२२}} {{C|(राग बिलावल झपताल)}} महाकष्ट पाभ्या विना कृष्ण कोने मला ? चारे जुगना जुओ साधु शोधी बहाल वैष्णव विषे विरलाने होय बहु पीड नाराज भक्ति विरोधी ४४-३० {{Rh|||॥ ध्रु० ॥}}<noinclude></noinclude> 6dnqr2icvnevyr86jpnv2rm3rjmveu3